Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 12 दूरी, मापन एवं गति

Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 12 दूरी, मापन एवं गति Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 12 दूरी, मापन एवं गति

Bihar Board Class 6 Science दूरी, मापन एवं गति Text Book Questions and Answers

अभ्यास और प्रश्नोत्तर :

प्रश्न 1.
सही उत्तर चुनिए –

(क) एस. आई. मात्रक में लम्बाई का मात्रक हैं –
(i) मिलीमीटर
(ii) सेंटीमीटर
(iii) मीटर
(iv) किलोमीटर
उत्तर:
(iii) मीटर

(ख) आप अपने घर से विद्यालय जाने में एक किलोमीटर की दूरी तय करते हैं । इस एक किलोमीटर में कितने मीटर होते हैं ?
(i) 100
(ii) 1000
(iii) 10000
(iv) 100000
उत्तर:
(iii) 10000

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(ग) गतिशील वस्तु का उदाहरण नहीं है –
(i) उड़ती चिड़ियाँ
(ii) चींटी की गति
(iii) घड़ी
(iv) घड़ी की सूई
उत्तर:
(iii) घड़ी

(घ) आवर्ती गति का उदाहरण है –
(i) झूला झुलते बच्चे को गति
(ii) लालक की गति
(iii) बजते तबलों के पृष्ठ की गति
(iv) इनमें से सभी
उत्तर:
(iv) इनमें से सभी

(ङ) एक निश्चित समय में एक विस्तु जितनी दूरी तय करती है, वह उस वस्तु की कहलाती है –
(i) चाल
(ii) दुरो
(iii) गति
(iv) इनमें से काई नहीं
उत्तर:
(iii) गति

प्रश्न 2.
खाली स्थान भरें –
(क) 1 सेमी – ………… मिमी 1 मिमी …………….. समी
(ख) 1 मी = …………… सेमी 1 सेमी ……………… मी
(ग) 1 मी – ……………….. मिमी 1 मिमी – ………… मी
(घ) 1 किमी ………………. मी 1 मी = ……………. किमी
(ङ) झूले पर किसी बच्चे की गति ……………….. होती है।
(च) सिलाई मशीन की सुई की गति …………… होती है।
उत्तर:
(क) 10.1/2
(ख) 100, 1/100
(ग) 1000, 1/1000
(घ) 1000, 1/1000
(ङ) आवृति गति
(च) आवृति गति।

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प्रश्न 3.
पग अथवा कदम का उपयोग लम्बाई के मानक मात्र के रूप में क्यों नहीं किया जाता?
उत्तर:
कदम का उपयोग लम्बाई के मानक मात्र के रूप में उपयोग नहीं किया जाता है क्योंकि अलग-अलग व्यक्तियों के कदमों की लम्बाई अलग-अलग होती है। जबकि मानक मात्रक स्थिति स्थान के अनुसार नहीं बदलती है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित को लम्बाई के बढ़ते परिमाणों में व्यवस्थित कीजिए –
1 मीटर, 1 सेंटीमीटर, 1 किलोमीटर, 1 मिलीमीटर,
उत्तर:
1 मिलीमीटर – 1 सेंटीमीटर- 1 मीटर – 1 किलोमीटर

प्रश्न 5.
विभिन्न प्रकार की गतियाँ कौन-कौन-सी हैं? अपने दैनिक जीवन में से उनके दो-दो उदाहरण लिखिए –
उत्तर:
किसी वस्तु का अपने चारों तरफ स्थित वस्तुओं की तुलना में स्थान परिवर्तित होता है तो उसे उस वस्तु का गति कहते है।

गति के अनेक प्रकार होते हैं –
जैसे – सरल रेखीय गति, वर्तुल गति, आवृति गति, घूर्णन गति आदि। – सरल रेखीय गति-जब कोई वस्तु एक सरल रेखा के अनुदिश गति कर रही हो तो इस प्रकार की गति को सरल रेखीय गति कहते हैं। जैसे – सड़क पर दौडती गाड़ी, सेना के जवान की चाल आदि।

वर्तुल गति – वैसी गति जिसमें किसी वस्तु की किसी नियत विन्दु से दूरी समान रहती है।
जैसे -कोलइ का बैल का गति, बिजली पंखा की गति।

आवर्ती गति-ऐसी गति जो एक निश्चित अन्तराल के पश्चात् दोहराती है, उसे आवर्ती गति कहते हैं।
जैसे-झूला की गति, सितार की डोरियों की गति आदि।

प्रश्न 6.
सीमा के घर तथा उसके स्कूल के बीच की दूरी 1600 मीटर है। इस दूरी को किलोमीटर में व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
हम जानते हैं,
1000 मीटर = 1 किलोमीटर
∴ 1 मीटर = 1/1000 किलोमीटर
∴ 1600 मीटर = 1/1000 × 1600 किलोमीटर :
अत: 1600 मीटर = 1.6 किलोमीटर।

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प्रश्न 7.
किसी चलती हुई साइकिल के पहिये तथा चलते हुए छत के पंखे की गतियों में समानताएँ तथा असमानताएँ लिखिये।
उत्तर:
चलती हु साइकिल के पहिये में दो तरह की गतियाँ पायी जाती हैं। रेखीय गति तथा वर्तुल गति। जबकि छत के पंखे की गति में सिर्फ वर्तुल गति होती है। दोनों में समानताएँ यह हैं कि दोनों में वर्तुल गति है परन्तु साइकिल एक स्थान से दूसरे स्थान तक रेखीय गति के कारण जाती है। यही असमानताएँ हैं।

प्रश्न 8.
रोज काम में आने वाली वस्तुओं में से ऐसी दो वस्तुओं के नाम लिखिये जिनकी लम्बाई लगभग –
(क) एक मीटर हो ।
(ख) एक सेंटीमीटर हो
(ग) एक मिलीमीटर हो
उत्तर:
(क) एक मीटर – कपड़ा मापने वाला फीता तथा कपड़ा मापने वाला
(ख) एक सेंटीमीटर – पेंसिल की लिखावट को मिटाने वाला रबर, कटर (छिलनेवाला)
(ग) एक मिलीमीटर – पंसिल की नोंक, कलम की नोंक।

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Bihar Board Class 6 Science दूरी, मापन एवं गति Notes

अध्ययन सामग्री :

हमारे दैनिक जीवन में लगभग प्रत्येक काम में दूरी एवं गति संबंधी अवध रणाएँ प्रयोग में आती है। जैसे कबड्डी के मैदान के छोर से दूसरे छोर की दूरी मापना। गिल्ली-डंडे के खेल में गुच्चक से गिल्ली की दूरी नापना, बाजार में कपड़े को नापना, गाँव से शहर की दूरी मापना, स्कूल में बच्चों की लम्बाई मापना आदि। यहाँ हम पाते हैं कि अलग-अलग देशों में मापने की इकाई यानि ‘पैमाना अलग-अलग है जिसके कारण व्यापार में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। तब पूरे संसार में एक ही पैमाना को चुना गया। इसके साथ ही अलग-अलग पैमाने भी प्रचलित हैं। जैसे वजन की माप किलोग्राम या ग्राम या पौंड में भी होती है। लम्बाई की माप फुट या मीटर या सेंटीमीटर में भी होती है।

दुनिया के कोने-कोने से नाप-तौल के मुद्दे पर झगड़े होते रहते थे। कहीं – खेत की लम्बाई को लेकर, कहीं रस्सी की लम्बाई को लेकर और कहीं किसी और नाप को लेकर। अंत में लोगों ने तय किया कि एक निश्चित दूरी का पैमाना – बना लिया जाय। उसको छोटे-छोटे बराबर हिस्सों में बांट लिया गया। इस पैमाने के बराबर लम्बाई के ही लकड़ी तथा धातु के और पैमाने बना लिए गए। यानि एक निश्चित लम्बाई या दूरी को मानक इकाई या पैमाना कहते हैं।

फ्रांस नामक देश में तय किया गया कि विशेष धातु की एक छड़ की लम्बाई को “एक मीटर” माना गया। एक मीटर के सौ बराबर हिस्से किए गए। प्रत्येक भाग को सेंटीमीटर कहा गया। प्रत्येक एक सेंटीमीटर को पुनः दस भागों में बांटा गया जिसे मिलीमीटर कहा गया।

आपके ज्यामिति बॉक्स के पैमाने पर लिखे अंक सेंटीमीटर (सेमी) की नाप है। हर एक सेंटीमीटर दस बराबर भागों में बंटा है। सेंटीमीटर का दसवाँ भाग मिलीमीटर (मिमी) कहलाता है।

किसी पैमाने से कम से कम नापी जा सकने वाली दूरी को उस पैमाना की अल्पत्तम नाप कहते हैं।

“किलो” का अर्थ होता है एक हजार।

जैसे 1 किलोग्राम का मतलब होता है 1000 ग्राम । इसी तरह ।
किलोमीटर का मतलब 1000 मीटर होता है।

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1 गज = 3 फीट। 200 गज = 1 फलांग।
1 फुट = 12 इंच। 8 फलांग = 1 मील।
1 इंच = 2.54 सेमी
1 किलोमीटर = 10 हेक्टोमीटर
1 हेक्टोमीटर = 10 डेकामीटर
1 डंकामीटर – 10 मीटर
1 मीटर = 10 डेसीमीटर
1 डेसीमीटर = 10 सेंटीमीटर
1 सेंटी मीटर = 10 मिलीमीटर

अब हम अपने चारों तरफ फैली वस्तुओं की स्थिति के बारे में जानना चाहेंगे। यदि किसी वस्तु की स्थिति या स्थान उसके चारों तरफ विद्यमान वस्तु की तुलना में समय के बदलते रहता हो, तो उसे गतिशील वस्तु कहते हैं। दूसरी तरफ यदि किसी वस्तु की स्थिति चारों तरफ उपस्थित वस्तुओं की तुलना में नहीं बदलता हो तो उस स्थिति को विराम कहते हैं।

जैस –
विराम में वस्तु – गतिशील वस्तु
घर – उड़ती चिड़िया
मेज – घड़ी में सेकेंड की सुई।
कुर्सी – दौड़ता हुआ लड़का

वस्तु द्वारा किसी समय अन्तराल में तय किए गए मार्ग की सम्पूर्ण लम्बाई को दूरी कहते हैं। यह एक अदिश राशि है। यह सदैव धनात्मक होती है।

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वस्तु की अंतिम स्थिति तथा प्रारंभिक स्थिति के बीच की न्यूनतम दूरी को विस्थापन कहते हैं। यह एक सदिश राशि है। विस्थापन का मान धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य कुछ भी हो सकता है।

प्रत्येक गतिमान वस्तुओं की गति अलग-अलग होती है। कोई वस्तु सीधी रेखा के अनुकूल दौड़ती है तो कोई वृत्तीय पथ पर गतिमान है। इसके अलावे भी अनेक प्रकार की गति होती है।

सीधी सड़क पर किसी वाहन की गति, सेना के मार्च-पास्ट की गति, गिरते पत्थर की गति आदि ऐसी गति है जो सरल रेखा के अनुदिश है। अत: इस प्रकार की गति को सरल रेखीय गति कहते हैं।

धागा में बाँधा पत्थर की गति, पंखा, घड़ी सुई की गति आदि में वस्तु वृत्तीय पथ के अनुदिश गतिमान है तथा एक निश्चित विन्दु से, इस वस्तु की दूरी समान रहती है। अतः इस प्रकार की गति को वर्तुल गति कहते हैं।

लोलक की गति, झुला की गति, सितार की डोरियों की गति आदि में वस्तु एक निश्चित समयान्तराल के पश्चात् दोहराती है। अत: इस प्रकार की गति का आवर्ती गति कहते हैं जिसकी चर्चा हमलोग अगली कक्षा में करेंगे।

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इस प्रकार इस अध्याय में हमने देखा कि समय के साथ स्थिति में परिवर्तन को गति कहते हैं। स्थिति में हुए परिवर्तन को हम दूरी-मापन द्वारा ज्ञात करते हैं।

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 8 हमारा राज्य बिहार

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 1 Chapter 8 हमारा राज्य बिहार Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 8 हमारा राज्य बिहार

Bihar Board Class 6 Social Science हमारा राज्य बिहार Text Book Questions and Answers

अभ्यास

प्रश्न 1.
सही विकल्पों पर (✓) का निशान लगाएँ

प्रश्न (i)
रबी फसलों के लिए मशहूर ताल क्षेत्र अवस्थित है
(क) तराई क्षेत्र
(ख) पटना से पूरब
(ग) पटना से पश्चिम
(घ) शाहाबाद में
उत्तर-
(ख) पटना से पूरब

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 8 हमारा राज्य बिहार

प्रश्न (ii)
सोमेश्वर पहाड़ियाँ हैं
(क) तराई क्षेत्र में
(ख) राजगीर में
(ग) कैमूर में
(घ) मंदार हिल में
उत्तर-
(ख) राजगीर में

प्रश्न (iii)
सरैसा क्षेत्र में शामिल जिले हैं
(क) सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल
(ख) सुपौल, सहरसा, अररिया
(ग) वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर
(घ) जहानाबाद, गया, पटना
उत्तर-
(ग) वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर

प्रश्न (iv)
गन्ना उत्पादक जिले हैं
(क) किशनगंज, अररिया, जोगबनी
(ख) पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर
(ग) गया, नवादा, बिहार
(घ) गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी
उत्तर-
(घ) गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी

प्रश्न 2.
प्रश्नों के उत्तर लिखें-

प्रश्न (क)
बिहार की चौहद्दी लिखें।
उत्तर-
बिहार के उत्तर दिशा में नेपाल देश, पूरब में पश्चिम बंगाल. दक्षिण में झारखंड तथा पश्चिम में उत्तर प्रदेश राज्य है।

प्रश्न (ख)
ताल क्षेत्र की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर-
ताल क्षेत्र में किसी का भी घर नहीं होता है। ताल क्षेत्र में हम रबी की फसल ही कंवल बोते हैं। खरीफ की फसल तो बोते ही नहीं हैं। बरसात में नदियों का पानी का बड़ा हिस्सा पूरे इलाके में दूर-दूर तक फैल जाता है और एक बड़ा ताल-सा दृश्य दिखाई देता है। उसे ही ताल क्षेत्र कहते हैं।

अक्टूबर के महीने में जब सारा पानी धरती सोख लेती है और जमीन दलदली होती है तब हम इनमें दलहन और रबी की फसलों को बो देते हैं। इनमें चना, मसूर, सरसों, तीसी, गेहूँ होता है। मिट्टी दलदली होने के कारण

रबी की जबरदस्त फसल होती है। ताल क्षेत्र में दुधारू पशओं के लिए पर्याप्त भूसा मिलता है। यह पशुओं के लिए अत्यंत लाभदायक होता है।

रबी की फसल अच्छी होने के कारण ही यहाँ दाल छाँटने वाली कई मिलें भी हैं। ताल क्षेत्र में दलहन की फसल अत्यधिक मात्रा में होती है जिससे यहाँ खेती की पैदावार काफी अच्छी होती है।

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प्रश्न (ग)
सरैसा क्षेत्र में कौन-कौन से जिले आते हैं और उनका क्या महत्व है?
उत्तर-
उत्तर बिहार में समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिलों के कुछ-कुछ प्रखंडों में तम्बाकू उपजाया जाता है।

इस इलाके को संयुक्त रूप से सरैसा क्षेत्र कहा जाता है । यह किसी खास क्षेत्र न होकर पूरे इलाके का ही नाम है। इस इलाके का तम्बाकू देश के अन्य राज्यों में भी भेजा जाता है। वहाँ के किसानों की खेती-बाड़ी का अर्थ खेतों

को साफ करके तम्बाकू के पौधों को लगाना उसके पत्तों को सुखाना और उन्हें व्यापारियों के हाथों में बेचना है । इस इलाके के किसान बड़ी मेहनत से तम्बाकू के पौधे को उगाते हैं। यहाँ की मिट्टी भी चूनायुक्त होती है। तंबाकू के पौधे धीरे-धीरे बड़े होकर फैलते हैं। बाद में इसे सखाते हैं। धीरे-धीरे और पत्ते को लपेटकर रखते हैं। चूँकि सरैसा इलाके के तम्बाक काफी कड़कदार होते हैं। इसलिए तम्बाकू बेचने वाले सरैसा के नाम का इस्तेमाल तम्बाकू को प्रभावशाली बनाने के लिए करते हैं।

प्रश्न (घ)
बिहार की ज्यादातर चीनी मिलें उत्तर बिहार में हैं । क्यों ?
उत्तर-
बिहार की ज्यादातर चीनी मिलें उत्तर बिहार में ही हैं। क्योंकि उत्तर बिहार में नेपाल की पहाड़ियों से पानी बहकर आता है और मिट्टी में चूने का अंश चला आता है। यह मिट्टी ईख की खेती के लिए उपयुक्त है

और यहाँ भारी मात्रा में ईख की खेती की जाती है। उत्पादन होने से उसकी पैदावार भी अच्छी होती है। एक बड़े किसान अकेले सौ सवा सौ ट्रैक्टर गन्ने बेचते हैं और किसानों के गन्ने खरीदने के लिए मिलें तैयार रहती हैं और उन्हें नकद पैसा भी देती है। इसलिए यहाँ के किसान गन्ना उपजाना पसंद करते हैं। किसान भी गन्ने के फसल एक ही खेत में बार-बार लगातार उपजाते हैं जिससे यहाँ उसकी खरीद-बिक्री भी ज्यादा मात्रा में होती है। चीनी मिलें उन गन्नों से रस निकालकर चीनी बनाई जाती है। ‘पाना जाता ह

प्रश्न (च)
बाढ़ का पानी उतरते ही गाँवों एवं घरों की प्राथमिक जरूरतें क्या होती होगी?
उत्तर-
बाढ़ का पानी उतरते ही गाँवों एवं घरों की प्राथमिक जरूरत अपने मवेशियों को ऊँचे स्थानों पर रखकर सुरक्षित करते हैं। ऐसा इसलिए कि बाढ़ का पानी इनकी मवेशियों को बहा न ले जाएँ। बरसात के दिनों में वे लोग बाढ़ से बचने के लिए तटबंधों और स्परों पर रहने चले जाते हैं। उसकी प्राथमिक जरूरत अपने और अपने मवेशियों को सुरक्षित जगहों तक पहुँचाना जिससे अपने मवेशियों की जान बचा सकें इसलिए वे फुस और प्लास्टिक के कामचलाऊ छत और दीवार बनाकर रहते हैं।

घरों को छोड़कर तटबंध पर जाने से पहले खेतों में मनीजर के बीज छींट देते हैं। बाद में बाढ़ का पानी उतरने पर मनीजर के पौधे डंठल के रूप में तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार वह अपने-आपको तैयार करते हैं जिससे वह अपना बचाव कर सकें।

प्रश्न (छ)
बरसात में उत्तर बिहार के लोगों को किस प्रकार की कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं?
उत्तर-
बरसात में उत्तर बिहार के लोगों को वर्ष में लगभग 3-4 महीने दोहरी जिंदगी जीते हैं। प

  • बाढ़ का पानी बढ़ने से परेशान लोगों को अपने घरों को छोड़कर तटबंधों और स्परों पर रहने के लिए जाना पड़ता है।
  • सबसे पहले अपने मवेशियों को बचाने के लिए उसे ऊँचे स्थानों पर रखकर सुरक्षित करना पड़ता है जिससे वह बाढ़ के पानी में बहकर कहीं चले न जाएँ।
  • गाँव से पानी उतरते ही लोग वापस गाँव में आते हैं और फिर आठ महीनों के लिए फिर से गृहस्थी जमाते हैं। फिर अगले साल पुनः चार महीने बाढ़ की विभीषिका झेलने को तैयार रहना पड़ता है।
  • बरसात के मौसम में प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जनजीवन पर बहुत ही गहरा असर पड़ता है।
  • बरसात में किसानों, गरीब मजदूरों पर अन्न, जल और आवास की
    समस्या उत्पन्न हो जाती है।

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प्रश्न (ज)
बाढ़ से बचाव का क्या समाधान है?
उत्तर-
बाढ़ से बचाव का निम्न समाधानों को अपनाकर बाढ़ से बचाव किया जा सकता है

  • बाढ़ से बचने के लिए हमें अपने घरों को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर सुरक्षित पहुँचना चाहिए ।
  • अपने मवेशियों को किसी ऊँचे स्थानों पर ले जाकर रखना चाहिए।
  • अपनी जरूरतों की चीजों को पहले से ही अपने पास उपलब्ध करा लेना चाहिए। जिससे सही समय पर उसका उपयोग कर सकें।
  • बाढ़ की समस्या का सामना हमलोगों को एक साथ मिल-जुलकर करना चाहिए।
  • बाढ़ से बचने के लिए हमलोगों को भूमि अपरदन की क्रिया को रोकना चाहिए।
  • बड़े-बड़े नदियों के जल को मजबूत बाँध बनाकर उसकी दिशाओं को बदलकर उससे बचाव किया जा सकता है।
  • बरसात के पानी से बचने के लिए नावों की व्यवस्था भी रखनी चाहिए जिससे पानी बढ़ने पर हम उन.नावों के द्वारा दूसरे गाँवों की ओर पलायन कर सकें।

Bihar Board Class 6 Social Science हमारा राज्य बिहार Notes

पाठ का सारांश

बिहार पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है जो परब से पश्चिम तक 483 किलोमीटर लम्बा तथा उत्तर से दक्षिण तक 345 किलोमीटर चौड़ा है। हमारे आस-पास के घरों में खेलने या किसी काम से आते-जाते हैं। ऐसे घर हमारे पड़ोसी कहलाते हैं । ठीक उसी प्रकार राज्यों से सटे दूसरे राज्य भी होते हैं जो पड़ोसी राज्य कहलाते हैं। जैसे–हमारे पड़ोसी एक-दूसरे के काम आते या एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं ठीक वैसे ही हमारे पडोसी राज्य भी एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। बिहार के उत्तर दिशा में नेपाल देश, पूरब में पश्चिम बंगाल, दक्षिण में झारखण्ड तथा पश्चिम में उत्तर प्रदेश राज्य है। सडक और रेल लाइनें अपने राज्य को पड़ोसी राज्यों और देशों से जोड़ती हैं।

इतने बड़े राज्य को प्रशासनिक सुविधा के लिए 9 प्रमंडलों और 38 जिलों में बांटा गया है।

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एक प्रमंडल में कई जिले होते हैं और जिलों में अनमंडल होते हैं। इन अनुमंडलों में कई प्रखंड होते हैं। ऐसे प्रखंडों की संख्या 534 है। ये प्रखंड कई पंचायतों से मिलकर बने होते हैं।

बिहार के पूर्व में गर्म और आर्द्र जलवायु एवं पश्चिम में गर्म एवं शुष्क जलवायु मिलती है। यहाँ की जलवायु मानसूनी है। यहाँ मुख्यतः तीन ऋतुएँ होती हैं-ग्रीष्म, वर्ण, शीत । हमें कैसे पता चलता है कि गर्मी आ गई है?

रेशमा ने बताया कि जब हाट-बजारों, घरों यात्राओं में ककड़ी, खीरा, तरबूज, कुल्फी, लस्सी, शरबत, पंखा कलर, घडे-सुराही की मांग बढ़ जाए तब समझिये कि गरमी का मौसम आ गया। । होली के बाद से गर्मी पड़ने लगती है। जून तक पड़ती है। इस दौरान धूल भरी तेज हवाएँ एवं आँधियाँ चलतो हैं जिसे ‘ल’ कहते हैं। कभी-कभी हल्की वर्षा भी हो जाती है। औसत तापमान 30° सेन्टीग्रड रहता है। जबकि गरमी में तापमान 400 सेन्टीग्रेड से अधिक हो जाता है।

वर्षा ऋतु जून तीसरे सप्ताह से शुरू हो जाता है जिससे अक्टूबर तक बारिश होती है। बरसात का पानी खेतो, नालों, गहों में भर जाता है। नदियों में उफान आता है। किसान खरीफ फसल बोने लगते हैं। दक्षिण बिहार में किसान धान के बिचड़े तैयार करके रोपते हैं। इन दिनों कुदाल, खेती, ट्रैक्टर, बैल, भैंस, प्लास्टिक के जूते छाता आदि का उपयोग बढ़ जाता है।

इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को भी खेती के कामों में पर्याप्त रोजगार मिल जाता है। नेपाल में पहाड़ी से तेजी से गिरने के बाद नदियाँ अपने साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी एवं कंकड़-पत्थर लाती हैं जो नदियों के तल में जमा हो जाते हैं। इसके कारण नदियों का पानी आस-पास के इलाकों में बाढ़ की शक्ल में फैल जाता है।

रोहित ने बताया कि – अपने राज्य में भी तो खूब बाढ़ आती है। गुरुजी ने कहा-बाढ़ का मूल स्रोत गंडक, बागमती, कमला, करेह, महानंदा. कोसी

आदि नदियाँ हैं। जिनका उद्गम नेपाल से होता है। सुपौल से दक्षिण सहरसा जिले तक लगभग 110 किलोमीटर तक का पूर्वी बांध और मधुबनी से दक्षिण खगड़िया तक 90 किलोमीटर तक लोग वर्ष में लगभग 3-4 महीने दोहरी जिंदगी जीते हैं।

बरसात के दिनों में लोग बाढ़ की समस्याओं से बचने के लिए तटबंधों और स्परों पर रहने चले आते हैं। वे फ़स और प्लास्टिक के कामचलाऊ छत और दीवार बनाकर रहते हैं। सबसे पहले अपने मवेशियों को ऊँचे स्थानों पर

रखकर सुरक्षित करते हैं। ऐसा इसलिए कि बाढ़ का पानी इनके मवेशियों को बहाकर ले न जाएँ। इस प्रकार बाढ़ से बचने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय कर बचाव करते हैं।

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बरसात पूरे राज्य में समान रूप से होती नहीं है। कहीं बाढ़ आती है तो कहीं खेतों में पूरा पानी नहीं रुकता है। इस प्रकार बरसात के दिनों में अलग-अलग हिस्सों में जनजीवन पर भी असर पड़ता है। पटना से पूर्व का एक बड़ा हिस्सा फतुहा से बड़हिया मोकामा तक टाल

या टाल क्षेत्र कहलाता है। यह ताल क्षेत्र में ही खरीफ की फसल बोयी जाती – है। अक्टूबर में सारा पानी धरती सोख लेती है और जमीन दलदली होती है तब हम इनमें दलहन और रबी की फसलें बो देते हैं। ‘मिट्टी दलदली होने के कारण रबी की फसल जबरदस्त होती है। पटना के निकट दियारा एवं जल्ला क्षेत्र में सब्जियों का उत्पादन भी होता है।

जाड़े के मौसम “दूर्गा पूजा से सरस्वती पूजा” तक चलता है। इन दिनों तापमान कम हो जाता है। दिसम्बर-जनवरी महीने में शीतलहर चलती है। शीतलहरी में तापमान 5°-10° सेंटीग्रेड तक चल जाता है। प्रायः दोपहर तक कोहरा बना रहता है। . अपने बिहार राज्य में धान की खेती प्रमुख है। धान से ही चावल प्राप्त होता है। यही हमारा प्रमुख खाद्यान्न है । फिर गेहूँ, मक्का, दलहन और तेलहन

की भी खेती होती है। ये सभी फसल प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसान उपयोग में लाते हैं। लेकिन वैशाली, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिलों में तम्बाकू, छपरा, सिवान, गोपालगंज एवं चम्पारण क्षेत्र में गन्ना तथा पूर्णियाँ, कटिहार, अररिया और किशनगंज जिलों में जूट की खेती होती है। इन फसलों को कारखानों में ले जाया जाता है। तम्बाकू से सिगरेट और बीड़ी, गन्ना से चीनी, गुड़ एवं जूट से पाट के सामान बनाये जाते हैं। बिहार में मात्र 6.4% भूभाग पर वन है-उत्तर-पश्चिम में हिमालय की तराई में सोमेश्वर की पहाड़ियों में जंगल मिलते हैं।

बिहार में समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और वैशाली जिलों के कुछ प्रखंडों में । तम्बाकू उपजाया जाता है। इस इलाके को संयुक्त रूप से सरैसा क्षेत्र कहा जाता है। इस इलाके का तम्बाकू देश के अन्य राज्यों में भी भेजा जाता है। किसान

बड़ी मेहनत से तम्बाक को उगाते हैं। यहाँ की मिट्टी भी चूनायुक्त होती है। तम्बाकू धीरे-धीरे बड़े होकर फैलते हैं। उसे बाद में सुखाकर तैयार करते हैं।

सरसा इलाके के तम्बाकू काफी कड़कदार होते हैं। इसलिए तम्बाकू बंचने वाले सरसा के नाम का इस्तेमाल तम्बाकू को प्रभावशाली बनाने के लिए किया करते हैं। बिहार के उत्तर-पश्चिम में स्थित गोपालगंज या पश्चिमी चम्पारण में गुड़ – और चीनी का उत्पादन होता है।

नेपाल की पहाड़ियों का पानी बहकर आता है और मिटटी में चने का अंश चला आता है। यह मिट्टी ईख की खेती के लिए उपयुक्त है और यहाँ खेती की फसल भी अच्छी होती है और वे चीनी मिलों में गन्ने को बेच देते हैं और गन्नों के रस से गढ़ और चीनी बनाई जाती है और छोटे किसान गन्नों की पेराई खलिहानों में ही करके तैयार रस से गुड़ बना लेते हैं जिसकी बिक्री सहज ढंग से हो जाती है। चीनी से चॉकलेट भी बनाई जाती है। पश्चिमी चम्पारण जिला के बाल्मीकिनगर अभ्यारण्य में जंगली जानवरों की संख्या अधिक है। यहाँ जंगली सूअर, भालू और हिरण भी बहुलता से मिलते हैं।

बाल्मीकिनगर अभ्यारण्य के अतिरिक्त रोहतास जिले का कैमूर अभ्यारण्य, नालन्दा जिले का राजगीर अभ्यारण्य अवस्थित भीम बाँध अभ्यारण्य और – इसके पहाड़ियों के बीच गंगा और सोन नदी के दियारे में उगी लम्बी घासों के बीच भील गायों को भी देखा जाता है।
पटना नगर में स्थित संजय गाँधी जैविक उद्यान भी जंगली जानवरों को नजदीक से देखने का एक आकर्षक जगह है। जाड़े के दिनों में पटना क दानापुर सैनिक छावनी के निकट गंगा तट पर साईवेरियन क्रेन (प्रवासी पक्षी) भारी संख्या में प्रतिवर्ष आते हैं।

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 8 हमारा राज्य बिहार

बिहार की कुल जनसंख्या 8 करोड़ से अधिक थी। बिहार से अधिक लोग सिर्फ उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में रहते हैं। 2011 में जनगणना हुई है। यहाँ अधिकतर लोग गाँवों में रहते हैं लेकिन कई बड़े नगर भी हैं बिहार की राजधानी पटना सबसे बड़ा नगर है। इस नगर में करीब 20 लाख लोग रहते हैं। बिहार की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है।

इसका प्रभाव है कि वनों को काटकर लगातार खत बनाया जा रहा है। खेती करने से भी मिटटी की उर्वरा शक्ति कम होती जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि एक ही खेत में लगातार कई प्रकार की फसलें उपजाई जाती हैं जिससे भूमि की उर्वराशक्ति नष्ट हो जाती है।

शहरों की वृद्धि से परिवहन साधनों में भी वृद्धि होती है। इन कारणों से प्रदूषण भी फैल रहा है। बिहार की जनसंख्या वृद्धि को रोकना आवश्यक है। सभी लोग चाहते हैं कि स्वस्थ रहें। इसके लिए हमलोगों को मिलकर इस समस्या का समाधान करना होगा।

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से

Bihar Board Class 11 History समय की शुरुआत से Textbook Questions and Answers

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दिए गए सकारात्मक प्रतिपुष्टि व्यवस्था (Positive Feedback Mechanism) को दर्शाने वाले आरेख को देखिए क्या आप उन निवेशों (Inputs) की सूची दे सकते हैं जो औजारों के निर्माण में सहायक हुई? औजारों के निर्माण से किन-किन प्रक्रियाओं को बल मिला?

सकारात्मक प्रतिपुष्टि व्यवस्था –

किसी बॉक्स विशेष की ओर इंगित तीर के निशान उन प्रभावों को बताते हैं जिनकी वजह से कोई विशेषता विकसित हुई।
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उत्तर:
औजारों के निर्माण में सहायक निवेश –

  • मस्तिष्क के आकार और उसकी क्षमता में वृद्धि।
  • औजारों के इस्तेमाल के लिए और बच्चों व चीजों को ले जाने के लिए हाथों का मुक्त होना।
  • सीधे खड़े होकर चलना।
  • आँखों से निगरानी, भोजन और शिकार की तलाश में लंबी दूरी तक चलना।

प्रक्रियाएँ जिनको औजारों के निर्माण से बल मिला –

  • सीधे खड़े होकर चलना।
  • आँखों से निगरानी, भोजन और शिकार की तलाश में लंबी दूरी तक चलना।
  • मस्तिष्क के आकार और उसकी क्षमता में वृद्धि

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प्रश्न 2.
मानव और लंगूर तथा वानरों जैसे स्तनपायियों के व्यवहार तथा शरीर रचना में कुछ समानताएँ पाई जाती हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि संभवतः मानव का क्रमिक विकास वानरों से हुआ। (क) व्यवहार और (ख) शरीर रचना शीर्षकों के अंतर्गत दो अलग-अलग स्तंभ बनाइए और उन समानताओं की सूची दीजिए। दोनों के बीच पाए जाने वाले उन अंतरों का भी उल्लेख कीजिए जिन्हें आप महत्वपूर्ण समझते हैं ?
उत्तर:
समानताएँ :
(क) व्यवहार और –
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(ख) शरीर रचना –
Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से 2Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से

असमानताएँ:
(क) व्यवहार और –
Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत स
(ख) शरीर रचना –
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प्रश्न 3.
मानव उद्भव के क्षेत्रीय निरंतरता मॉडल के पक्ष में दिए गए हैं। तर्कों पर चर्चा कीजिए। क्या आपके विचार से यह मॉडल पुरातात्विक साक्ष्य का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण देता है?
उत्तर:
मानव उद्भव के क्षेत्रीय मॉडल के अनुसार आधुनिक मानव का विकास भिन्न-भिन्न ‘देशों में रहने वाले होमो सैपियंस से हुआ। उनके विकास की गति धीमी थी और अलग-अलग थी। इसलिए आधुनिक मानव संसार के भिन्न-भिन्न भागों में अलग-अलग स्वरूप में दिखाई दिया। इस तर्क का आधार आज के मनुष्यों में पाये जाने वाले विभिन्न लक्षण हैं। इस मॉडल के समर्थकों का मानना है कि ये विभिन्नताएँ एक ही क्षेत्र में पहले से रहने वाले होमो एरेक्टस तथा होमो हाइलबर्गसिस समुदायों में पाई जाने वाली असमानताओं के कारण हैं। हमारे विचारों के मॉडल पुरातात्विक साक्ष्य का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण नहीं देता। इसमें कहीं न कहीं कोई त्रुटि अवश्य है।

प्रश्न 4.
इनमें से कौन-सी क्रिया के साक्ष्य व प्रमाण पुरातात्त्विक अभिलेख में सर्वाधिक मिलते हैं-(क) संग्रहण, (ख) औजार बनाना, (ग) आग का प्रयोग।
उत्तर:
औजार बनाना।

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प्रश्न 5.
भाषा के प्रयोगों से (क) शिकार करने और (ख) आश्रय बनाने के काम में कितनी मदद मिली होगी ? इस पर चर्चा करिए । इन क्रियाकलापों के लिए विचार-संप्रेषण के अन्य किन तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता था?
उत्तर:
भाषा के प्रयोगों से शिकार करने तथा आश्रय बनाने में बहुत अधिक सुविधा मिली होगी जिसका वर्णन इस प्रकार है
(क) शिकार करने में –

  • लोग शिकार की योजना बना सकते थे।
  • वे शिकार के तरीकों एवं तकनीकों पर एक-दूसरे से चर्चा कर सकते थे।
  • वे विभिन्न क्षेत्रों में जानवरों के बहुतायत की जानकारी प्राप्त कर सकते थे।
  • वे जानवरों की प्रकृति एवं स्वभाव पर विचार-विमर्श कर सकते थे।
  • वे शिकार के लिए औजारों में सुधार ला सकते थे।
  • वे मारे गए जानवर के शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों के उपयोग पर चर्चा कर सकते थे।

(ख) आश्रय बनाने में –

  • लोग आश्रय बनाने के लिए उपलब्ध सामग्री की जानकारी प्राप्त कर सकते थे।
  • वे आश्रय बनाने के लिए सुरक्षित क्षेत्रों पर चर्चा कर सकते थे।
  • वे आश्रय स्थल के निकट उपलब्ध सुविधाओं पर विचारों का आदान-प्रदान कर सकते थे।
  • वे आश्रय बनाने के तरीकों तथा तकनीकों की जानकारी एक-दृशो को दे सकते थे। इन क्रिया-कलापों के लिए लाग भाषा के अतिरिक्त संकेतों तथा चित्रकारियों का प्रयोग कर सकते थे।

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प्रश्न 6.
अध्याय के अंत में दिए गए प्रत्येक कालानुक्रम में से किन्हीं दो घटनाओं को चुनिए और यह बताइये कि इनका क्या महत्व है?
उत्तर:
1. होमिनॉइड और होमोनिड शाखा विभाजन (64 लाख वर्ष पूर्व) – लगभग 64 लाख वर्ष पूर्व होमिनॉइड उपसमूह में ‘होमिनिइड’ वर्ग का विकास हुआ। यह प्राणियों का पहले से अधिक विकसित रूप था। इनके मस्तिष्क का आकार होमिनॉइड से बड़ा था । होमिनॉइड चार पैरों के बल चलते थे। जबकि होमिनिड सीधे खड़े होकर दो पैरों के बल चलते थे। होमिनिड के हाथ भी विशेष प्रकार के थे। इनकी सहायता से वे औजार बना सकते थे और उनका प्रयोग कर सकते थे।

2. पत्थर के सबसे पहले औजार (26-25 लाख वर्ष पूर्व) – आज से लगभग 26-25 लाख वर्ष पूर्व मानव ने पत्थर के सबसे पहले औजार बनाये और उनका प्रयोग करना सीखा। भले ही ये सादे तथा खुरदरे थे, तो भी मानव हिंसक जानवरों से अपनी रक्षा करने में सक्षम हो गया। उसके लिए जानवरों का शिकार करके भोजन प्राप्त करना भी सरल हो गया ।

कालानुक्रम – 2

1. स्वर – तंत्र का विकास-मानव में स्वर तंत्र के विकास का विशेष महत्त्व है। इससे मानव को बोलने की शक्ति मिली और वह अपने मन के विचार बोल कर प्रकट करने लगा। इससे शिकार करने, औजार बनाने तथा अन्य क्रियाकलापों के लिए नये तरीकों तथा तकनीकों का विकास. भी हुआ।

2. चूल्हों के इस्तेमाल के बारे में सबसे पहला साक्ष्य – चूल्हों के इस्तेमाल का सबसे पहला साक्ष्य दक्षिण फ्रांस में स्थित लाजारेट गुफा से मिला है। यहाँ दो चूल्हे पाये गए हैं। ये आग के नियंत्रित प्रयोग को दर्शाते हैं। इससे पता चलता है कि मानव लगभग 25000 वर्ष पूर्व आग का नियत्रित प्रयोग करना सीख गया था। वह आग से गुफाओं में प्रकाश करता था, उष्णता प्राप्त करता था और भोजन पकाता था। वह आग का इस्तेमाल भाले की नोक बनाने तथा खतरनाक जानवरों को भगाने के लिए भी करता था।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रजाति या स्पीशीज क्या होती है?
उत्तर:
प्रजाति ऐसे जीवों का एक समूह होती है जो प्रजनन द्वारा नई संतान उत्पन्न कर सकते हैं। परंतु एक प्रजाति के जीव किसी अन्य प्रजाति के जीवों से प्रजनन करके संतान पैदा नहीं कर सकते।

प्रश्न 2.
आदि मानव के इतिहास की जानकारी में किन-किन खोजों ने सहायता पहुंचाई है?
उत्तर:
मानव के जीवाश्मों, पत्थर के औजारों तथा गुफाओं की चित्रकारियों की खोजों ने।

प्रश्न 3.
विलुप्त हो चुकी मानव प्रजातियों के जीवाश्मों का तिथि-निर्धारण कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:

  • प्रत्यक्ष रासायनिक विश्लेषण द्वारा तथा
  • उन परतों की परोक्ष तिथि-निर्धारण द्वारा जिनमें वे दबे हुए पाये जाते हैं।

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प्रश्न 4.
चार्ल्स डार्विन की मनुष्य की उत्पत्ति संबंधी पुस्तक का नाम बताएँ । विकास के संबंध में डार्विन ने क्या तर्क दिया?
उत्तर:
डार्विन की मनुष्य की उत्पत्ति संबंधी पुस्तक का नाम ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज’ है। उन्होंने तर्क दिया कि मानव का विकास बहुत समय पहले जानवरों से क्रमिक विकास के रूप में हुआ।

प्रश्न 5.
एशिया और अफ्रीका में प्राइमेट्स कब अस्तित्व में आये?
उत्तर:
लगभग 36 मिलियन (360 लाख) वर्ष पहले।

प्रश्न 6.
होमिनिड्ज (homonoids) का उदय अफ्रीका में हुआ था। इस संबंध में कौन-कौन से दो प्रमाण दिए जा सकते हैं?
उत्तर:

  1. यह अफ्रीकी वानरों का समूह है जिनका अफ्रीकी होमिनिडों से बहुत ही निकट का संबंध है।
  2. पूर्वी अफ्रीका में पाये गए आस्ट्रेलोपिथिकस वर्ग से संबंधित आरंभिक होमोनिड के जीवाश्म लगभग 56 लाख वर्ष पुराने हैं। इनके विपरीत अफ्रीका से बाहर पाये गए जीवाश्म 18 लाख वर्ष से अधिक पुराने नहीं हैं।

प्रश्न 7.
होमिनिड्ज की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. मस्तिष्क का बड़ा आकार
  2. सीधे खड़ा होना
  3. दो पावों पर चलना
  4. हाथ विशेष क्षमता युक्त जिससे वह औजार बना सकता था तथा उनका प्रयोग कर सकता था।

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प्रश्न 8.
होमोनिड्ज के दो महत्त्वपूर्ण वर्ग कौन-से हैं?
उत्तर:

  1. आस्ट्रेलोपिथिकस तथा
  2. होमो।

प्रश्न 9.
आस्ट्रेलोपिथिकस तथा होमो में क्या अंतर है?
उत्तर:
होमो की तुलना में आस्ट्रेलोपिथिकस के दिमाग का आकार छोटा, बड़ा, भारी तथा दाँत भी ज्यादा बड़े होते हैं।

प्रश्न 10.
वैज्ञानिकों ने विभिन्न मानव प्रजातियों को उनका नाम देने के लिए किन दो भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया है?
उत्तर:
यूनानी तथा लैटिन (लातिनी) भाषाओं में।

प्रश्न 11.
आस्ट्रेलोपिथिकस के कौन-से शारीरिक लक्षण उसे वृक्षों पर रहने के अनुकूल बनाते थे?
उत्तर:

  1. आगे के अवयवों का लंबा होना
  2. हाथों तथा पैरों की मुड़ी हुई हड्डियों तथा
  3. टखनों के घुमावदार जोड़।

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प्रश्न 12.
औजार बनाने तथा लंबी दूरी तक चलने से आस्ट्रेलोपिथिकस में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर:
उसमें कई मानवीय लक्षणों का विकास हुआ।

प्रश्न 13.
‘होमो’ शब्द का क्या अर्थ है ? होमो के अवशेषों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है?
उत्तर:’
होमो’ लातिनी (Latin) भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘आदमी’ भले ही इसमें स्त्री और पुरुष दोनों ही शामिल हैं। होमो को उनकी विशेषताओं के अनुसार तीन वर्गों में बांटा गया है-

  1. होमो हैबिलिस (औजार बनाने वाले)
  2. होमो एरेक्टस (सीधे खड़े होकर पैरों के बल चलने वाले)
  3. होमो सेपियंस (चिंतनशील मनुष्य)।

प्रश्न 14.
कोई दो उदाहरण दीजिए जिनमें होमो के जीवाश्मों को उनकी प्राप्ति-स्थल के नाम पर नामित किया गया हो।
उत्तर:

  1. जर्मनी के शहर हाइडलबर्ग में पाए गए जीवाश्मों को होमोहाइडल बर्गेसिस (Homo heidel bergenisis) कहा गया है।
  2. निअंडर घाटी में पाए गए जीवाश्मों को होमो निअंडरथलैंसिस श्रेणी में रखा गया है।

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प्रश्न 15.
यूरोप में पाये जाने वाले सबसे पुराने ‘होमो’ जीवाश्म कौन-कौन से हैं। ये किस प्रजाति के हैं?
उत्तर:
यूरोप में मिले सबसे पुराने जीवाश्म होमो हाइडलबर्गसिस तथा होमो निअंडरथलैंसिस हैं। ये दोनों ही होमो सैपियंस प्रजाति के हैं।

प्रश्न 16.
आदिकालीन मानव किन-किन तरीकों से भोजन प्राप्त करता था?
उत्तर:
आदिकालीन मानव कई तरीकों से अपना भोजन प्राप्त करता था-जैसे संग्रहण (Gatherings), शिकार (Hunting), अपमार्जन (Scavenging) और मछली पकड़ना (Fishing)।

प्रश्न 17.
मस्तिष्क का आकार होमो के किस लक्षण को दर्शाता है?
उत्तर:
अधिक बुद्धिमत्ता तथा अधिक अच्छी स्मृति को।।

प्रश्न 18.
किस बात से संकेत मिलता है कि होमिनिड्ज पूर्वी अफ्रीका के अन्य भागों से एशिया तथा यूरोप में पहुंचे?
उत्तर:
एशिया में पाए गए होमिनिड के जीवाश्म अफ्रीका में पाए गए जीवाश्मों की तुलना में बाद के हैं। इसलिए यह संभव है कि होमीनिड पूर्वी अफ्रीका के अन्य भागों से एशिया और यूरोप में पहुंचे।

प्रश्न 19.
आदिकालीन गुफाओं में पाये गए चूल्हे किस बात के द्योतक हैं?
उत्तर:
आग के नियंत्रित उपयोग के द्योतक हैं।

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प्रश्न 20.
मनुष्य की भांति वानर औजारों का निर्माण तथा उनका उपयोग क्यों नहीं कर पाते थे?
उत्तर:
स्मरण शक्ति तथा आवश्यक कौशल के अभाव के कारण।

प्रश्न 21.
पत्थर के औजार बनाने और उनका इस्तेमाल करने का सबसे प्राचीन साक्ष्य कहाँ से मिला है? ये संभवतः किस प्रजाति ने बनाए थे?
उत्तर:
पत्थर के औजार बनाने और उनका इस्तेमाल किए जाने का सबसे प्राचीन साक्ष्य इथियोपिया और केन्या के पुरा स्थलों से मिला है। ये औजार संभवतः आस्ट्रेलोपिथिकस ने बनाए थे।

प्रश्न 22.
फ्रांस तथा स्पेन की किन गुफाओं में आदिकालीन चित्रकारियाँ पाई गई हैं? इन चित्रकारियों में किन-किन जानवरों के चित्र शामिल हैं ?
उत्तर:
फ्रांस में स्थित लैसकॉक्स (Lascaux) तथा चाउवेट (Chauvet) की गुफाओं में और स्पेन में स्थित आल्टामीरा की गुफा में जानवरों की अनेक चित्रकारियाँ पाई गई हैं। ये 30,000 से 12,000 वर्ष पहले बनाई गई थीं। इनमें जंगली भैसों, घोड़ों, हिरणों, गेण्डों, शेरों, भालुओं तेंदुओं आदि के चित्र शामिल हैं।

प्रश्न 23.
मानव विज्ञान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानव विज्ञान वह विज्ञान है जो मानव संस्कृति और मानव जीव विज्ञान के उद्विकासीय पहलुओं का अध्ययन करता है।

प्रश्न 24.
अफ्रीका के हादजा जनसमूह का मुख्य भोजन क्या है। वे किस जानवर का मांस नहीं खाते?
उत्तर:
अफ्रीका के हादजा जनसमूह का मुख्य भोजन जंगली साग-सब्जियाँ तथा पशुओं का मांस हैं। वे हाथी का मांस नहीं खाते।

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प्रश्न 25.
हादजा लोग जमीन और उसके संसाधनों पर अपना दावा क्यों नहीं करते?
उत्तर:
इसका कारण यह है कि –

  1. वे जहाँ चाहे रह सकते हैं।
  2. पशुओं का शिकार कर सकते हैं।
  3. कंदमूल और शहद इकट्ठा कर सकते है और पानी ले सकते हैं।

प्रश्न 26.
हादजा लोगों के पास सूखा पड़ने पर भी भोजन की कमी क्यों नहीं होती?
उत्तर:
हादजा लोगों के इलाके में सूखे के मौसम में भी पर्याप्त मात्रा में खाने वाले कंदमूल, बेर, बाओबाब पेड़ के फल आदि मिलते हैं। इसीलिए उनके पास भोजन की कमी नहीं होती।

प्रश्न 27.
आज के शिकारी समाजों में पाई जाने वाली तीन भिन्नताएं बताएँ।
उत्तर:

  1. आज के शिकारी समाज शिकार और संग्रहण को अलग-अलग महत्व देते हैं।
  2. उनके आकार भिन्न-भिन्न अर्थात् छोटे-छोटे हैं।
  3. उनकी गतिविधियों में भी अंतर पाया जाता है।

प्रश्न 28.
अंतिम हिमयुग का अंत होने के कोई दो परिणाम बताओ।
उत्तर:

  1. अपेक्षाकृत अधिक गर्म और नम मौसम की शुरूआत हुई।
  2. जंगली जौ और गेहूँ जैसे जंगली अनाज उगाने के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल हो गई।

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प्रश्न 29.
जीवाश्म किस प्रकार लाखों वर्षों तक सुरक्षित रहते हैं?
उत्तर:
जीवाश्म प्राय: चट्टानों में दबे रहते हैं। फलस्वरूप वे लाखो वर्षों तक सुरक्षित रहते हैं।

प्रश्न 30.
विश्व के एक क्षेत्र का नाम बताएँ जहाँ आज से लगभग दस हजार साल पहले खेती और पशुचारण प्रारंभ हुआ?
उत्तर:
मध्य सागर के तट से लेकर ईरान में जागरोस (Zagros) पर्वतमाला तक फैला हुआ क्षेत्र जिसे फर्टाइल क्रीसेंट यानी उर्वर अर्धचंद्राकार क्षेत्र कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आरंभिक मानव-प्रतिरूप के दो पैरों पर चलने से क्या लाभ हुए ? दो पैरों पर चलने वाले मानव के प्रारंभिक प्रत्यक्ष प्रमाण कहाँ से मिले हैं?
उत्तर:
दो पैरों पर चलने से मानव कं हाथ कार्यमुक्त हो गये। अब वह हाथों का प्रयोग बच्चों को उठाने अथवा आवश्यक वस्तु को उठाने के लिए कर सकता था। हाथों के लगातार प्रयोग से मानव की खड़ा होकर चलने की कुशलता धीरे-धीरे बढ़ती गई। इसके अतिरिक्त उसके चलने में चौपायों की तुलना में कहीं कम ऊर्जा खर्च लगी, भले ही दौड़ने में उसे अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती थी। दो पैरों पर चलने वाले मानव-प्रतिरूप के प्रमाण हादर (Hadar) इथोपिया से प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 2.
‘होमो’ का क्या अर्थ है ? इन्हें कौन-कौन सी प्रजातियों में बाँटा गया है?
उत्तर:
‘होमो’ लातिनी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है ‘आदमी’। वैज्ञानिकों ने होमो को कई प्रजातियों में बाँटा है और इन प्रजातियों को उनकी विशेषताओं के अनुसार अलग-अलग नाम दिए गए हैं। इस प्रकार जीवाश्मों को निम्नलिखित तीन प्रजातियों में बाँटा

  • होमो हैबिलिस औजार बनाने वाले
  • होमो एरेक्टस सीधे खड़े होकर पैरों के बल चलने वाले
  • होमो सैपियंस-चिंतनशील मनुष्य

होमो हैबिलिस के जीवाश्म इथियोपिया में ओमो (Ome) और तंजानिया में ओल्डवई गोर्ज (Olduvai Gorge) से प्राप्त हुए हैं। होमो एरेक्टस के प्राचीनतम जीवाश्म अफ्रीका और एशिया महाद्वीपों में पाए गए हैं।

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प्रश्न 3.
आदिकालीन मानव के खुले स्थलों पर आवास तथा जीवन-शैली के बारे में जानकारी कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर:
आदिकालीन मानव के खुले स्थान पर आवास तथा जीवन-शैली के बारे में जानकारी प्राप्त करने का एक तरीका है। उनके द्वारा निर्मित शिल्पकृतियों के फैलाव की जाँच करना। उदाहरण के लिए केन्या में किलोंबे (Kilomble) और ओलोर्जेसाइली (Olorgesaillie) के खनन स्थलों पर हजारों की संख्या में शल्क-उपकरण और हस्तकुठार मिले हैं। ये औजार 700,000 से 500,000 साल पुराने हैं। इतने अधिक औजार एक ही स्थान पर इकट्ठे होने का अर्थ है कि इन स्थानों पर आदि मानव लंबे समय तक रहा होगा या बार-बार आता होगा । वास्तव में जिन स्थानों पर खाद्य प्राप्ति के संसाधन प्रचुर मात्रा से उपलब्ध थे, वहाँ लोग बार-बार आते रहते होंगे।

ऐसे क्षेत्रों में लोग शिल्पकृतियाँ सहित अपने क्रियाकलापों के चिह्न छोड़ जाते होंगे। जमा शिल्पकृतियों कुछ ही क्षेत्रों में मिलती है और वे क्षेत्र कुछ अलग से दिखाई पड़ते हैं। जिन स्थानों पर लोगों का आवागमन कम होता था वहाँ ऐसी शिल्पकृतियाँ कम मात्रा में मिलती हैं।

प्रश्न 4.
फ्रांस तथा स्पेन की किन गुफाओं में जानवरों की चित्रकारियाँ पाई गई हैं? ये चित्रकारियाँ क्यों की गई थी, इसके बारे में क्या बताया जाता है?
उत्तर:
फ्रांस में स्थित लैसकाक्स (Lascaux) तथा चाउवेट (Chauvet) की गुफाओं। और स्पेन में स्थित आल्टामीरा की गुफा में जानवरों की अनेक चित्रकारियाँ पाई गई है। ये 3000 से 12,000 साल पहले बनाई गई थीं। इनमें गौरों (जंगली बैलों), घोड़ों, पहाड़ी बकरों (Abox), हिरनों, मेमनों, विशालकाय जानवरों, गैडों, शेरों, भालुओं, चीतों, लकड़बग्घों, उल्लुओं आदि के चित्र शामिल हैं।

बताया जाता है कि इन चित्रकारियाँ का संबंध धार्मिक क्रियाओं अथवा जादू-टोनों से है। संभवत: चित्रकारी के रूप में जादू-टोना करके मनुष्य अपने शिकार को सफल बनाने का प्रयास करता होगा। यह भी कहा जाता है कि शायद ये गुफाएँ संगम स्थल थीं। यहाँ लोगों के यहाँ छोटे-छोटे समूह आपस में मिलते थे और सामूहिक क्रियाकलाप संपन्न करते थे। संभव है कि वहाँ ये समूह मिलकर शिकार की योजना बनाते हों अथवा शिकार के तरीकों एवं तकनीकों पर एक-दूसरे से चर्चा करते हों। यह भी संभव है ये चित्रकारियाँ आगे आने वाली पीढ़ियों को इन तकनीकों की जानकारी देने के लिए की गई हों।

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प्रश्न 5.
यह किस आधार पर कहा जाता है कि मानव का निकास क्रमिक रूप से हुआ?
उत्तर:
वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव का विकास क्रमिक रूप से हुआ है। मानव की एक के बाद एक कई प्रजातियाँ उत्पन्न हुई और लुप्त हो गई । लाखों वर्षों की इस प्रक्रिया के बाद आधुनिक मानव का उद्भव हुआ। इसका साक्ष्य हमें मानव की उन प्रजातियों के अवशेषों से मिलता है जो अब लुप्त हो चुकी हैं। इनके शारीरिक लक्षण भिन्न-भिन्न थे। इनका काल निर्धारण प्रत्यक्ष रासायनिक विश्लेषण द्वारा अथवा उन परतों का परोक्ष रूप से काल का निर्धारण करके किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि ये प्रजातियाँ एक क्रम में अलग-अलग काल में जीवित रहीं। इनके शारीरिक लक्षण बदलते रहे और इस प्रकार आज का मानव अस्तित्व में आया ।

प्रश्न 6.
होमिनिड का विकास किससे हुआ है ? दोनों में क्या-क्या अंतर पाये जाते हैं?
उत्तर:
होमिनिड का विकास होमिनॉइड से हुआ है। इन दोनों में निम्नलिखित अंतर पाये जाते हैं –

  1. होमिनॉइड के दिमाग का आकार होमिनिइज की तुलना में छोटा होता है।
  2. वे चौपाये होते हैं और चारों पैरों के बल चलते हैं। इसके विपरीत होमिनिड् का शरीर सीधा होता है। वे दो पैरों पर चलते हैं।
  3. उनके हाथों में भी काफी अंतर पाया जाता है। होमिनिड के हाथों की रचना इस प्रकार होती है कि उन्हें औजार बनाने और उनका प्रयोग करने में सहायता करते हैं।

प्रश्न 7.
लगभग 35,000 वर्ष पहले तथा उसके बाद आदिमानव की जीवन शैली में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लगभग 35,000 वर्ष पहले तथा उसके बाद आदि मानव के जीवन शैली में निम्नलिखित परिवर्तन आए –

  1. फेंककर मारने वाले भालों तथा तीर-कमान जैसे नए औजार बनाए जाने लगे। इससे जानवरों को मारने के तरीकों में सुधार हुआ।
  2. मांस को साफ किया जाने लगा। उसमें से हड्डियाँ निकाल दी जाती थीं। फिर उसे सुखाकर, हल्का सेकते हुए सुरक्षित रख लिया जाता था। इस प्रकार सुरक्षित रखे मांस को बाद में खाया जा सकता था।
  3. समूरदार जानवरों को पकड़ा जाने लगा और उनके रोएँदार खाल का कपड़े की तरह प्रयोग किया जाने लगा।
  4. सिलने के लिए सुई का आविष्कार भी हुआ। सिले हुए कपड़ों का सबसे पहला साक्ष्य लगभग 21,000 वर्ष पुराना है।
  5. छेनी या रूखानी जैसे छोटे-छोटे औजारों के बनाने की तकनीक का आविष्कार हुआ । इन नुकीले ब्लेडों से हड्डी, सींग, हाथी दाँत या लकड़ी पर नक्काशी करना संभव हो गया।

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प्रश्न 8.
मानव उद्भव के प्रतिस्थापन मॉडल की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
प्रतिस्थापन मॉडल के अनुसार मानव चाहे कहीं भी रहा हो, उसके सभी पुराने रूप बदल गए और उसका स्थान आधुनिक मानव ने ले लिया । हम देखते हैं कि आधुनिक मानव में सभी जगह शारीरिक तथा उत्पत्तिमूलक समरूपता पाई जाती है। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि यह समानता इसलिए है, क्योंकि उनके पूर्वज एक ही क्षेत्र अर्थात् अफ्रीका में उत्पन्न हुए थे। वहीं से वे अन्य स्थानों को गए। इस बात की पुष्टि इथोपिया के ओमो नामक स्थान पर मिले प्राचीन मानव जीवाश्मों से हो जाती है।

दूसरी ओर आज के मनुष्यों में पाई जाने वाली शारीरिक विभिन्नताएँ किसी स्थान विशेष पर निरतर हजारों वर्षों तक स्थायी रूप से रहने के कारण है । भिन्न-भिन्न स्थानों की परिस्थितियों ने ही यं भिन्नताएँ उत्पन्न की क्योंकि मनुष्य स्थान विशेष की परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है।

प्रश्न 9.
आटिमानव दवारा पत्थर के औजार बनाने और उनका इस्तेमाल करने की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
आदिमानव द्वारा पत्थर के औजार बनाने और उनका इस्तेमाल करने का सबसे प्राचीन साक्ष्य इथोपिया और केन्या के पुरास्थलों से मिला है। ये औजार संभवत: आस्ट्रेलोपिथिकस ने बनाए थे। वास्तव में मनुष्य के जीवन में औजारों का विशेष महत्त्व था। उसमें वानरों से हटकर कुछ ऐसी शारीरिक विशेषताएँ थीं जिन्होंने उसे औजार बनाने और उनका प्रयोग करने में सहायता दी। उसकी सबसे पहली विशेषता थी-हाथों का कुशलतापूर्व प्रयोग । इसके अतिरिक्त उसमें वानरों से अधिक स्मरण शक्ति और जटिल संगठनात्मक कौशल भी था।

प्रश्न 10.
प्राइमेट्स से क्या अभिप्राय है? इनकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
प्राइमेट्स स्तनधारियों के बहुत बड़े वर्ग का एक उपवर्ग है। इस वर्ग में वानर, लंगूर तथा मानव आदि शामिल हैं। इस वर्ग की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. इनके शरीर पर बाल होते हैं।
  2. इनका गर्भकाल अपेक्षाकृत लंबा होता है।
  3. ये बच्चों को जन्म देते हैं।
  4. माताओं में बच्चों को दूध पिलाने के लिए ग्रंथियाँ होती हैं।
  5. इनके दाँत भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं।
  6. इनमें अपने शरीर का तापमान स्थिर रखने की क्षमता होती है।

प्रश्न 11.
होमिनॉइड तथा बंदर में क्या-क्या अंतर पाये जाते हैं?
उत्तर:
होमिनॉइड तथा बंदर में निम्नलिखित कई अंतर पाये जाते हैं –

  1. होमिनॉइड्ज का शरीर बंदर के शरीर से बड़ा होता है।
  2. उनको पूँछ नहीं होती।
  3. उनके बच्चों का विकास धीरे-धीरे होता है।
  4. होमिनॉइड के बच्चे बंदर के बच्चों की तुलना में लंबे समय तक उन पर निर्भर रहते हैं

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प्रश्न 12.
आस्ट्रेलोपिथिकस को यह नाम क्यों दिया गया?
उत्तर:
आस्ट्रेलोपिथिकस दो शब्दों के मेल से बना है-लैटिन शब्द ‘आस्ट्रल’ (austral) जिसका अर्थ होता है ‘दक्षिणी’ तथा यूनानी शब्द ‘पिथिकस’ (pithekos) जिसका अर्थ है वानर । यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि मानव के बन रहे प्रारंभिक प्रतिरूपों में वानर अवस्था के कई लक्षण पाये जाते थे। उदाहरण के लिए –

  • होमो की तुलना में उनके दिमाग का आकार छोटा था।
  • उनके पिछले दाँत बड़े थे।
  • उनके हाथों की दक्षता सीमित थी।
  • वे सीधे खड़े होकर बहुत कम चल पाते थे क्योंकि वे अभी भी अपना अधिकतर समय वृक्षों पर बिताते थे अतः उनके शारीरिक लक्षण वृक्षों पर रहने के अनुकूल थे।

प्रश्न 13.
क्या खानाबदोश पशुचारक शहरी जीवन के लिये खतरा थे?
उत्तर:
मेसोपोटामिया का मुख्य भूमि प्रदेश काफी उपजाऊ था। फलतः खानाबदोश पशुचारकों का झुंड यहाँ आता था। ये किसानों के बोये हुए खेतों में अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने ले जाते थे, जिससे फसल को नुकसान पहुँचता था। इसके अतिरिक्त ये पशुचारक किसानों के गाँवों को लूट लेते थे। इस प्रकार ये स्थानीय किसानों हेतु खतरा थे। इसके कारण शासकों को यह डर बना रहता था कि ये पशुचारक कहीं छापे अथवा हमलों की कोई योजना तो नहीं बना रहे।

प्रश्न 14.
उच्चरित अर्थात् बोली जाने वाली भाषा की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
ऐसा माना जाता है कि होमोहैबिलिस के मस्तिष्क में कुछ ऐसी विशेषताएँ थीं जिनके कारण उसके लिए बोलना संभव हुआ होगा। यह विकास संभवतः 20 लाख वर्ष पूर्व शुरू हुआ होगा। मस्तिष्क में हुए परिवर्तन के अतिरिक्त स्वर-तंत्र का विकास भी महत्त्वपूर्ण था। यह विकास लगभग 200,000 वर्ष पहले हुआ था। इसका संबंध विशेष रूप से आधुनिक मानव से रहा है। एक अन्य सुझाव यह है कि भाषा-कला के साथ-साथ लगभग 40,000-35000 वर्ष पहले विकसित हुई। बोली जाने वाली भाषा-कला के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी है, क्योंकि ये दोनों ही विचार अभिव्यक्ति के माध्यम हैं।

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प्रश्न 15.
संजाति वृत्त Ethnography) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
संजाति वृत्त में समकालीन नृजातीय समूहों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाता है। इससे उनके रहन-सहन, खान-पान, आजीविका के साधनों, तकनीकों आदि का पता लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त समूहों में स्त्री-पुरुष की भूमिका, राजनीतिक संस्थाओं तथा सामाजिक रूढ़ियों की जानकारी प्राप्त की जाती है। साथ ही उनके कर्मकांडों तथा रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 16.
हिमयुग कब आया? इससे मानव की प्रक्रिया में कैसे और क्या परिवर्तन आया?
उत्तर:
हिमयुग लगभग 25 लाख वर्ष पहले आया। पृथ्वी के बड़े-बड़े भाग बर्फ से ढंक गए । फलस्वरूप जलवायु तथा वनस्पति में बड़े-बड़े परिवर्तन देखने को मिले । तापमान और वर्षा में कमी आ गई जिसके कारण वन कम हो गए। इसके विपरीत घास के मैदानों का क्षेत्रफल बढ़ा गया। परिणामस्वरूप आस्ट्रलोपिथिकस के प्रारंभिक रूप धीरे-धीरे लुप्त हो गए, क्योंकि ये वनों में रहने के आदी थे। अब उनके स्थान पर उनकी प्रजातियाँ प्रकट हुईं जो सूखी परिस्थितियों में आराम से रह सकती थीं। प्रजातियों में जीनस होमो के सबसे पुराने प्रतिनिधि शामिल थे।

प्रश्न 17.
पूर्व (आदिकालीन) मानव कुछ स्थलों को सोच समझकर शिकार के लिए चुनता था । क्यों ? उदाहरण देकर समझाओ।
उत्तर:
पूर्व मानव कुछ स्थलों को सोच समझ कर चुनता था। ऐसा एक स्थल चेक गणराज्य में दोलनी वेस्तोनाइस (Dolni Vestonice) था जो एक नदी के पास स्थित है। मानव ऐसे स्थल इसलिए चुनता था क्योंकि वह जानवरों की आवाजाही के बारे में जानता था। वह जल्दी से बड़ी संख्या में जानवरों को मारने के तरीकों से भी परिचित था । उदाहरण के लिए मानव ने जो स्थल चेक गणराज्य के नदी के पास चुना था, वहाँ पतझड़ और बसंत के मौसम में रैडियर तथा घोड़ों जैसे स्थान बदलने वाले जानवरों के झुंड के झुंड आते थे। इनका बड़े पैमाने पर शिकार किया जाता था।

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प्रश्न 18.
आस्ट्रेलोपिथिकस तथा होमो के बीच क्या शारीरिक अंतर थे? ये अंतर क्या दर्शाते हैं?
उत्तर:
आस्ट्रेलोपिथिकस तथा होमो के बीच निम्नलिखित शारीरिक अंतर थे –

  1. आस्ट्रेलोपिथिकस की तुलना में होमो के मस्तिष्क का आकार बड़ा था।
  2. होमो के जबड़े कम बाहर निकले हुए थे।
  3. होमो के दाँत अपेक्षाकृत छोटे थे।
  4. होमो के मस्तिष्क का बड़ा आकार उसके बुद्धिमान तथा उसकी बेहतर स्मृति को दर्शाता है।
  5. जबड़ों तथा दाँतों में हुआ परिवर्तन संभवतः उनके खान-पान की भिन्नता से संबंधित है।

प्रश्न 19.
भाषा का विकास किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास भाषा है। भाषा के विकास के विषय में कई प्रकार के मत हैं –

  1. होमिनिड भाषा में अंगविक्षेप (हाव-भाव) या हाथों का संचालन (हिलाना) शामिल था।
  2. उच्चरित अथवा बोली जाने वाली भाषा से पहले गाने या गुनगुनाने जैसे मौखिक या अ-शाब्दिक संचार का प्रयोग होता था।
  3. मनुष्य की वाणी का प्रारंभ संभवतः आह्वान या बुलावों की क्रिया से हुआ था जैसे कि नर-वानर करते हैं। प्रारंभिक अवस्था में मानव बोलने में बहुत ही कम ध्वनियों का प्रयोग करता होगा। यही ध्वनियाँ आगे चलकर भाषा के रूप में विकसित हो गई होगी।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आदिकालीन मानव किन-किन तरीकों से अपना भोजन जुटाता था?
उत्तर:
आदिकालीन मानव कई तरीकों से अपना भोजन जुटाता था जैसे संग्रहण (Gathering), शिकार (Hunting), अपमार्जन (Scavenging) और मछली पकड़ना (Fishing) –
1. संग्रहण – संग्रहण की क्रिया में पेड़ों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों, जैसे बीज, गुठलियाँ, बेर फल एवं कंदमूल को इकट्ठा करना शामिल था। संग्रहण के संबंध में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है क्योंकि इस बारे में प्रत्यक्ष साक्ष्य बहुत कम मिलते हैं। हमें हड्डयों के जीवाश्म तो बहुत मिल जाते हैं परंतु पौधे के जीवाश्म दुर्लभ ही हैं। पौधों से भोजन जुटाने के बारे में सूचना प्राप्त करने का एक मात्र तरीका दुर्घटनाओं या संयोगवश जले हुए पौधों के प्राप्त अवशेष हैं।

इस प्रक्रिया से कार्बनीकरण हो जाता है और जला हुआ जैविक पदार्थ लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता है। फिर भी, अभी तक पुरातत्वविदों को अति पुराने जमाने के संबंध में कार्बनीकृत बीजों का साक्ष्य नहीं मिला है।

2. शिकार – शिकार संभवतः बाद में शुरू हुआ-लगभग 5 लाख साल पहले। स्तनपायी जानवरों के योजनाबद्ध शिकार और उनका वध करने का सबसे पुराना स्पष्ट साक्ष्य दो स्थलों से मिलता है। ये स्थल हैं दक्षिण इंग्लैण्ड में बाक्सग्रोव (Boxgrove) और जमनी में शोनिंजन (Schoningen).

3. अपमार्जन – अपमार्जन से तात्पर्य त्यागी हुई वस्तुओं की सफाई करने से है ! अब मुख्य रूप से यह माना जाने लगा है कि आदिकालीन होमिनिड अपमार्जन के द्वारा उन जानवरों की लाशों सं मांस-मजा खुरच कर निकालने लग थ जो जानवर अपने आप मर जाते थे या अन्य हिंसक जानवरों द्वारा मार दिए जाते थे। यह भी इतना ही संभव है कि पूर्व होमिनीड छोटे स्तनपायी जानवरों-चूहे, छछूदर जैसे कृतकों (Rodents), पक्षियों (और उनके अंडों), सरीसृपों और यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़े भी खा जाते थे।

4. मछली पकड़ना – मछली पकड़ना भी भोजन प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण तरीका इस बात की जानकारी अनेक खोज स्थलों से मछली की हड्डियाँ मिलने से होती है।

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प्रश्न 2.
क्या वर्तमान शिकारी-संग्राहक समाजों के बारे में प्राप्त जानकारी को सुदूर अतीत के मानव के जीवन को पुनर्निर्मित करने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है?
उत्तर:
वर्तमान शिकारी-संग्राहक समाजों की जानकारी के आधार पर आदिकालीन शिकारी-संग्राहक समाजों के अध्ययन के बारे में दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ चल रही हैं।
1. पहली विचारधारा – विद्वानों के एक वर्ग ने आज के शिकारी-संग्राहक समाजों से प्राप्त तथ्यों तथा आँकड़ों का सीधे अतीत के अवशेषों की व्याख्या करने के लिए उपयोग कर लिया है। उदाहरण के लिए कुछ पुरातत्वविदों का कहना है कि 20 लाख साल के होमिनिड स्थल जो तुर्काना झील के किनारे स्थित हैं, संभवतः आदिकालीन मानवों के शिविर या निवास स्थान थे। वे यहाँ सूखे के मौसम में आकर रहते थे। वर्तमान हादजा और फुग सैन समाज भी ऐसा ही करते हैं।

2. दूसरी विचारधारा – दूसरी ओर कुछ विद्वानों का मत है कि संजाति वृत्त संबंधी तथ्यों और आंकड़ों का उपयोग अतीत के समाजों को समझने के लिए नहीं किया जा सकता है। उनके अनुसार ये चीजों एक-दूसरे से बिल्कुल आर्थिक कियाकलापों में भी लगी हुई हैं। वे जंगलों में पाई जाने वाली छोटी-छोटी चीजों का विनिमय और व्यापार करते हैं। कुछ समाज पड़ोस के किसानों के खेतों में मजदूरी करते हैं। इसके अतिरिक्त जिन परिस्थितियों में रहते हैं। वे आरंभिक मानव की अवस्था से बहुत भिन्न हैं।

आज के शिकारी – संग्राहक समाजों की जीवन-शैली भी भिन्न-भिन्न है। कई बातों में तो परस्पर विरोधी तथ्य दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए आज के शिकारी समाज शिकार और संग्रहण को अलग-अलग महत्त्व देते हैं। उनके आकार भिन्न-भिन्न अर्थात् छोटे-बड़े होते हैं। उनकी गतिविधियों में भी अंतर पाया जाता है। भोजन प्राप्त करने में श्रम विभाजन को लेकर भी कोई आम सहमति नहीं है।

यह सच है कि आज भी अधिकतर स्त्रियाँ ही खाने पीने की सामग्री जुटाने का काम करती हैं और पुरुष शिकार करते हैं। परंतु ऐसे समाजों के भी उदाहरण मिलते हैं जहाँ स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही शिकार और संग्रहण तथा औजार बनाने के काम करते हैं। संभवत: इसी बात से यह सुनिश्चित होता है कि आज के शिकारी-संग्राहक समाजों में स्त्री-पुरुष दोनों की भूमिका लगभग एक समान है। अतः वर्तमान स्थिति में अतीत के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना कठिन है।

प्रश्न 3.
आदि मानव के गुफाओं तथा खुले स्थानों पर आवास के बारे में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
गुफाओं तथा खुले निवास क्षेत्र का प्रचलन 400,000 से 125,000 वर्ष पहले शुरू हो गया था। इसके साक्ष्य यूरोप के पुरास्थलों में मिलते हैं।
1. दक्षिण फ्रांस में स्थित लाजारेट गुफा की दीवार को 12×4 मीटर आकार के एक निवास स्थान से सटाकर बनाया गया है। इसके अंदर दो चूल्हों (Hearths) के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न प्रकार के खाद्य स्रोतों जैस फलों, वनस्पतियों, बीजों, काष्ठफला, पक्षियों के अण्डों और मीठे जल की मछलियों (ट्राउट, पर्च और कार्प) के साक्ष्य मिले हैं। दक्षिणी फ्रांस के समुद्रतट पर स्थित टेरा अमाटा (Terra Amata) एक अन्य पुरास्थल है। यहाँ घास-फूस और लकड़ी की छत वाली कच्ची झोपड़ियाँ बनाई जाती थीं। ये झोपड़ियाँ किसी विशेष मौसम में थोड़े समय के आवास के लिए बनाई जाती थी।

केन्या में चसीबांजा (Chesowanja) और दक्षिण अफ्रीका से स्वार्टक्रान्स (Swarkarns) में पत्थर के औजारों के साथ-साथ आग में पकायी गई चिकनी मिट्टी और जली हुई हड्डियों के टुकड़े मिले हैं। ये 14 लाख से 10 लाख साल पुराने हैं। यह पता नहीं चल पाया कि ये चीजें प्राकृतिक रूप से झाड़ियों में लगी आग या ज्वालामुखी से उत्पन्न अग्नि से जलने का परिणाम हैं अथवा एक सुनियोजित ढंग से लगाई गई आग में पकाकर बनाई गई थीं।

दूसरी ओर, चूल्हे आग के नियंत्रित प्रयोग के प्रतीक हैं। इसके कई लाभ थे।

  • इनका प्रयोग गफाओं के अंदर प्रकाश और उष्णता प्राप्त करने के लिए किया जाता होगा।
  • इससे भोजन भी पकाया जा सकता था।
  • इसके अतिरिक्त लकड़ी को कठोर करने में भी आग का इस्तेमाल होता था जैसे कि भाले की नोंक बनाने में।
  • शल्क निकाल कर औजार बनाने में भी आग की उष्णता की सहायता ली जाती थी।
  • साथ ही इसका उपयोग खतरनाक जानवरों को भगाने में किया जाता था।

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प्रश्न 4.
आधुनिक मानव का उद्भव कहाँ हुआ? इस संबंध में प्रचलित मतों की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
आदि मानव के उद्भव स्थल के बारे में बहुत अधिक वाद-विवाद हुआ है। आज इस संबंध में दो मत प्रचलित हैं जो एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं। ये मत आगे दिए गए हैं
1. क्षेत्रीय निरंतरता मॉडल (Continuity Model) – मानव उद्भव के क्षेत्रीय मॉडल के अनुसार आधुनिक मानव का विकास भिन्न-भिन्न प्रदेशों में रहने वाले होमो सेपियंस से हुआ। उनके विकास की गति धीमी थी और अलग-अलग थी। इसलिए आधुनिक मानव संसार के भिन्न-भिन्न भागों में अलग-अलग स्वरूप में दिखाई दिया । इस तर्क का आधार आज के मनुष्य में पाये जाने वाले विभिन्न लक्षण हैं।

इस मॉडल के समर्थकों का मानना है कि ये विभिन्नताएँ एक ही क्षेत्र में पहले से रहने वाले होमो एरेक्टस तथा होमो हाइलबर्गसिस समुदायों में पाई जाने वाली असमानताओं के कारण हैं। हमारे विचार में यह मॉडल पुरातात्त्विक साक्ष्य का युक्तियुक्त स्पष्टीकरण नहीं देता। इसमें कहीं न कहीं कोई त्रुटि अवश्य है।

2. प्रतिस्थापन मॉडल (Replacement Model) – प्रतिस्थापन मॉडल के अनुसार मानव चाहे कहीं भी रहा हो, उसके सभी पुराने रूप बदल गए और उसका स्थान आधुनिक मानव ने ले लिया । हम देखते हैं कि आधुनिक मानव में सभी जगृह शारीरिक तथा उत्पत्तिमूलक समरूपता पाई जाती है। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि यह समानता इसलिए है, क्योंकि उनके पूर्वज एक ही क्षेत्र अर्थात अफ्रीका में उत्पन्न हुए थे।

वहीं से वे अन्य स्थानों को गए। इस बात की पुष्टि इथोपिया के ओमो नामक स्थान पर मिले प्राचीन मानव जीवाश्मों से हो जाती है। दूसरी ओर आज के मनुष्यों में पाई जाने वाली शारीरिक भिन्नताएँ किसी स्थान विशेष पर निरंतर हजारों वर्षों तक स्थायी रूप से रहने के कारण है। भिन्न-भिन्न स्थानों की परिस्थितियों ने ही ये भिन्नताएँ उत्पन्न का क्योंकि मनुष्य स्थान विशेष की पथतियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक मानव के उद्भव से संबंधित प्रतिस्थापन मॉडल के अनुसार कौन-सा मत सही है।
(क) मनुष्य का उद्भव एक ही स्थान अफ्रीका में हुआ
(ख) अनेक क्षेत्रों में एक ही तरह के मनुष्यों की उत्पत्ति हुई
(ग) मनुष्य का उद्भव यूरोप में हुआ
(घ) सभी क्षेत्रों में एक ही तरह के मनुष्यों को उत्पत्ति नहीं हुई
उत्तर:
(क) मनुष्य का उद्भव एक ही स्थान अफ्रीका में हुआ

प्रश्न 2.
अपमार्जन का अर्थ है ………………………
(क) भोजन की तलाश करना
(ख) भोजन एकत्रित करना
(ग) त्यागी हुई वस्तुओं की सफाई करना
(घ) कंदमूल जमा करना
उत्तर:
(ग) त्यागी हुई वस्तुओं की सफाई करना

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प्रश्न 3.
गुफा चित्रकला का प्राचीनतम प्रमाण किस काल का मिला है?
(क) पुरापाषाण
(ख) मध्यपाषाण
(ग) नवपाषाण
(घ) हड़प्पा
उत्तर:
(ग) नवपाषाण

प्रश्न 4.
हमें प्रथम होमिनिड्स का साक्ष्य मिलता है ………………………..
(क) 50 मिलियन वर्ष पूर्व
(ख) 5.6 मिलियन वर्ष पूर्व
(ग) 10 मिलियन वर्ष पूर्व
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) 5.6 मिलियन वर्ष पूर्व

प्रश्न 5.
साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि होमिनिड्स का उद्भव ……………………..
(क) एशिया में हुआ
(ख) यूरोप में हुआ
(ग) अफ्रीका में हुआ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) अफ्रीका में हुआ

प्रश्न 6.
जीवों का ऐसा समूह, जिसके नर और मादा मिल कर बच्चे पैदा कर सकते हैं और बाद में भी ये क्रम जारी रहता है, कहलाता है।
(क) प्राइमेट्स
(ख) स्पीशीज
(ग) होमोनिड
(घ) जीवाश्म
उत्तर:
(ख) स्पीशीज

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प्रश्न 7.
होमो लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ………………………..
(क) आदमी
(ख) स्त्री
(ग) वानर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आदमी

प्रश्न 8.
होमिनिड समूह की विशेषताएँ हैं ……………………….
(क) मस्तिष्क का बड़ा आकार
(ख) दौ पैरों पर चलना
(ग) हाथ की विशेष आकृति
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 9.
आस्ट्रोलोपिथिकस की उत्पत्ति हुई है ………………………
(क) लैटिन भाषा से
(ख) ग्रीक भाषा से
(ग) लैटिन तथा ग्रीक भाषाओं से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) लैटिन तथा ग्रीक भाषाओं से

प्रश्न 10.
चार्ल्स डारविन की पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पेसिज’ कब प्रकाशित हुई?
(क) 1852
(ख) 1856
(ग) 1857
(घ) 1859
उत्तर:
(घ) 1859

प्रश्न 11.
आधुनिक मानव का उद्भव लगभग कितने वर्ष पूर्व हुआ?
(क) 45000
(ख) 200000
(ग) 300000
(घ) 400000
उत्तर:
(क) 45000

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प्रश्न 12.
केन्या के किलोबे और ऑलार्जेसाइली स्थल से किस काल के हस्त कुठार मिलते हैं?
(क) पुरापाषाण काल
(ख) मध्यपाषाण काल
(ग) नवपाषाण काल
(घ) ताम्रपाषाण काल
उत्तर:
(क) पुरापाषाण काल

प्रश्न 13.
पत्थर के औजार संभवतः सबसे पहले किसने बनाए थे?
(क) रामापिथेकस
(ख) आस्ट्रेलीपिथिकस
(ग) निअंडर थाल
(घ) हीमोसैपियंस
उत्तर:
(ख) आस्ट्रेलीपिथिकस

प्रश्न 14.
लैसकॉक्स और शोवे की गुफा की चित्रकला कहाँ पायी गयी है?
(क) फ्रांस
(ख) नार्वे
(ग) डेनमार्क
(घ) रूस
उत्तर:
(क) फ्रांस

प्रश्न 15.
शहरी जीवन की शुरूआत सर्वप्रथम कहाँ हुई?
(क) मेसोपोटामिया
(ख) चीन
(ग) यूनान
(घ) रोम
उत्तर:
(क) मेसोपोटामिया

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 1 समय की शुरुआत से

प्रश्न 16.
वार्का शीर्ष कहाँ मिला है?
(क) उरुक
(ख) यमन
(ग) जॉर्डन
(घ) तुर्की
उत्तर:
(क) उरुक

प्रश्न 17.
ओल्डुबई गोर्ज रिफ्ट घाटी, जहाँ आदिकालीन मानव के इतिहास के चिह्न पाये गये हैं कहाँ स्थित हैं?
(क) द. अमेरिका
(ख) पूर्वी अफ्रीका
(ग) इंडोनेशिया
(घ) मध्य यूरोप
उत्तर:
(ख) पूर्वी अफ्रीका

प्रश्न 18.
यूरोप में मिले सबसे पुराने होमो जीवाश्म किसके हैं?
(क) होमोहाइडेलवर्गेसीस
(ख) रामापिथेकेस
(ग) आस्ट्रेलोपिथिकस
(घ) क्रोमैतानम्
उत्तर:
(क) होमोहाइडेलवर्गेसीस

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प्रश्न 19.
योजनाबद्ध तरीके से जानवरों का शिकार का सबसे पुराना स्पष्ट साक्ष्य कहाँ से मिलता …………………………
(क) बॉक्सग्रोव (इंगलैंड)
(ख) शोमिंजन
(ग) सोजन घाटी (पाकिस्तान)
(घ) बलन घाटी
उत्तर:
(क) बॉक्सग्रोव (इंगलैंड)

प्रश्न 20.
दफनाने की परंपरा का प्राचीनत्तम साक्ष्य लगभग कितने लाख वर्ष पहले का मिला है?
(क) 5 लाख वर्ष पूर्व
(ख) 4 लाख वर्ष पूर्व
(ग) 3 लाख वर्ष पूर्व
(घ) 2 लाख वर्ष पूर्व
उत्तर:
(ग) 3 लाख वर्ष पूर्व

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4 Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4

प्रश्न 1.
5 cm तथा 3 cm त्रिज्या वाले दो वृत्त दो विन्दुओं पर प्रतिच्छेद करते हैं तथा मके केन्द्रों के बीच की दूरी 4 cm है। उभयनिष्ठ जीवा की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना 5 cm तथा 3 cm की त्रिज्याओं वाले वृत्त के केन्द्र O तथा O’ है जिनकी उभयनिष्ठ जीला PQ है।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4
∴ OP = 5cm. O’P = 3cm तथा OO’ = 4 cm.
∆OO’P एक समकोण त्रिभुव है।[∵ OP² = PO’² – OO’²]
हम जानते है कि किसी चूत के केन्द्र से डाला गया लम्ब उसकी जीवा को समद्विभाजित करता है।
नकि उभयनिष्ठ जीवा PQ छोटे वृत्त के केन्द्र O से होकर जाती है, इसलिए PQ खेटे वृत्त का व्यास है।
अत: जीवा PQ को सम्याई = खेटे वृत्त का व्यास D
⇒ PQ = 2 × O’P
∴ PQ = 2 × 3 = 6 cm.

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प्रश्न 2.
यदि एक वृत्त की दो समान जीयाएँ वृत्त के अन्दर प्रतिच्छेद करें, तो सिद्ध कीजिए कि एक जीवा के खण्ड दूसरी जीवा के संगत खण्डों के बराबर है।
उत्तर:
दिया गया है : PQ तथा RS वृत्त की दो समान जीवाएँ जो एक-दूसरे को T पर प्रतिच्छेद करती है।
सिद्ध करना है:
(i) PT = RT
(ii) TQ = TS
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रचना : OV ⊥ PT तथा OU ⊥ RT खाँची
उपपत्ति: ∆OVT तथा ∆OUT में,
OV = OU
(बराबर जीवाएँ जो केन्द्र से समान दूरी पर होंगी)
राया ∠OVT = ∠OUT
∴ OT = OT (उभयनिष्ठ)
∆OVT ≅ ∆OUT (SAS सांगसम गुणधर्म से)
∴ VT = UT …….. (1)
हम जानते हैं. PQ = RS …….. (2)
\(\frac{1}{2}\) PQ = \(\frac{1}{2}\) RS
⇒ PV = RU ……. (3)
समी- (1) व (3) को जोड़ने पर,
PV + VT = RU + UT
⇒ PT = RT
सगी. (2) में से (4) को घटाने पर,
PQ – PT = RS – RT
⇒ QT – ST …….. (5)
अत: समी. (4) तथा (5) से सिद्ध है कि संगत खण्ड बराबर होंगे।

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प्रश्न 3.
बदि एक वृत्त की दो समान जीवाएं वृत्त के अन्दर प्रतिच्छेद करें, तो सिद्ध कीजिए कि प्रतिच्छेद विन्दु को केन्द्र से मिलाने वाली रेखा जीवाओं से बराबर कोण बनाती हैं।
उत्तर:
दिया गया है : PQ तथा RS दो समान जीवाजे एक दूसरे को T पर प्रतिच्छेद करती है।
सिद्ध करना है! ∠OTV = ∠OTU
रचना : OV ⊥ PQ तथा OU ⊥ RS खाँची।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4
उपपत्ति: ∆OVT तथा ∆OUT में,
OV = OU
(समान जीवा केन्द्र से समान दूरी पर होंगी)
∠OVT = ∠OUT
OT = OT (उभयनिष्ठ)
∴ ∆OVT ≅ ∆OUT (SAS सर्वांगसमता से)
∴ ∠OTV = ∠OTU
(सवांगसम त्रिभुज के संगत भाग)

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प्रश्न 4.
यदि एक रेखा दो संकेन्द्री वृत्तों (एक ही केन्द्र वाले वृत्त) को, जिनका केन्द्र O है. A, B, C और D पर प्रतिच्छेद करे, तो सिद्ध कीजिए AB = CD(पाठ्य-पुस्तक में आकृति देखिए।)
उत्तर:
रचना : OM ⊥ AD खींची।
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हम देख सकते हैं कि BC छेटे वृत्त तथा AD बड़े वृत की जीजा है। केन्द्र से डाला गया लम्ब जीया को समद्विभाजित करती है।
∴ BM = MC …… (1)
तथा AM = MD …….. (2)
समी. (2) में से (1) को घटाने पर,
AM – BM = MD – MC
⇒ AB = CD

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प्रश्न 5.
एक पार्क में बने 5 m त्रिज्या वाले बन पर खड़ी तीन लड़कियाँ रेशमा, सलमा एवं मनदीप खेल रही है। रेशमा एक गेंद को सलमा के पास, सलमा मनदीप के पास तथा मनदीप रेशमा के पास फेंकती है। यदि रेशमा तथा सलमा के बीच और सलमा तथा मनदीप के बीच की प्रत्येक दूरी 6 m झे, तो रेशमा और मनदीप के बीच की दूरी क्या है?
उत्तर:
O तथा OB लन्ध क्रमश: RS तथा SM पर खींचे।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4
AR = AS = \(\frac{6}{2}\) = 3m
OR = OS = OM = 5 m
(वृत्त की त्रिज्याएँ)
समकोण ∆OAR में,
OA² + AR² = OR²
OA² + (3)² = (5)²
OA = 4 m
ORSM एक पतंग की तरह होगी।
(OR = OM तथा RS = MS)
हम जानते हैं कि पतंग के विकर्ण लम्ब तथा उभयनिष्ठ विकर्ण अन्य विकर्ण से दोनों समबाहु त्रिभुज का समद्विभाजित होता है।
∴ ∠RCS = 90° तपा RC = CM
∆ORS का क्षेत्रफल = \(\frac{6}{2}\) × OA × RS
\(\frac{6}{2}\) × RC × OS = \(\frac{6}{2}\) × 4 × 6
= RC × 5 = 24
RC = 4.8
RM = 2RC = 2(4.8) = 9.6
अत: रेशमा तथा मनदीप के बीच की दूरी = 9.6 m.

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4

प्रश्न 6.
20 m त्रिज्या का एक गोल पार्क (वृत्ताकार) एक कालोनी में स्थित है। तीन लड़के अंकुर, सैय्यद तथा डेविड इसकी परिसीमा पर बराबर दूरी पर बैठेहैं और प्रत्येक के हाथ में एक खिलौना टेलीफोन आपस में बात करने के लिए है। प्रत्येक फोन की डोरी की लम्बाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4
दिया है : AS = SD = DA
∴ ∆ASD एक समबाहु त्रिभुज है।
OA = 20 m
AB, ∆ASD की माध्यिका AK है तथा केन्द्र O, AB को 2 : 1 में विभाजित करता है।
उत्तर:
⇒ \(\frac{OA}{OB}\) = \(\frac{2}{1}\)
⇒ \(\frac{20}{OB}\) = \(\frac{2}{1}\)
⇒ OB = 10 m
∴ AB = OA + OB
= (20 + 10) = 30 m
समकोण ∆ABD में, AD² = AB² + BD²
⇒ AD² = (30)² + (\(\frac{AD}{2}\))²
⇒ AD² = 900 + \(\frac{1}{4}\) AD²
⇒ AD² – \(\frac{1}{4}\) AD² = 900
⇒ \(\frac{3}{4}\) AD² = 900
⇒ AD² = 1200
⇒ AD = 20√3 m
अत: प्रत्येक फोन की डोरी की लम्बाई = 20√3 m.

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.4

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 1 Chapter 7 मानचित्र अध्ययन Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 6 Social Science मानचित्र अध्ययन Text Book Questions and Answers

अभ्यास

प्रश्न 1.
सही विकल्पों पर (✓) का निशान लगाएँ –

प्रश्न 1.
जमीन पर के बड़े भाग को कागज पर दिखाने के लिए प्रयोग करते हैं
(क) छोटे मापक का
(ख) बड़े मापक का
(ग) दोनों मापक का
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर-
(क) छोटे मापक का।

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प्रश्न 2.
जिस मानचित्र में पर्वत, पठार, मैदान इत्यादि को दर्शाते हैं उसे कहते हैं
(क) थिमैटिक मानचित्र
(ख) भौतिक मानचित्र
(ग) राजनैतिक मानचित्र
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) भौतिक मानचित्र ।

प्रश्न 3.
मानचित्र में मैदान को दिखाते हैं
(क) काले रंग से
(ख) नीले रंग से
(ग) हरे रंग से
(घ) लाल रंग से
उत्तर-
(ग) हरे रंग से।

प्रश्न 4.
मानचित्र में दक्षिण दिशा होती है
(क) दायीं ओर
(ख) बायीं ओर
(ग) ऊपर की ओर
(घ) नीचे की ओर
उत्तर-
(घ) नीचे की ओर।

प्रश्न 5.
मानचित्र निर्माण में ध्यान रखना चाहिए
(क) संकेतों का
(ख) दिशाओं का
(ग) मापक का
(घ) उपर्युक्त सभी का
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी का।

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
बताइए-

प्रश्न 1.
चित्र एवं मानचित्र में क्या अंतर है?
उत्तर-
चित्रों में आमतौर पर चीजें वैसी ही बनाई जाती हैं। जैसी वह दिखती हैं परन्तु मानचित्र में चीजों को चिह्न या संकेत के रूप में दिखाई जाती चित्र आमतौर पर ऐसे बनाये जाते हैं जैसे कोई उस जगह किनारे खड़े होकर देखता हो और वह उसी प्रकार दिखाई भी देता है लेकिन मानचित्र हमेशा ऐसा बनाया जाता है जैसे उस जगह को ऊपर या आसमान से देख रहे हैं। चित्र में मापक (स्केल) का उपयोग नहीं होता परन्तु मानचित्र में मापक (स्केल) का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार चित्र और मानचित्र में यही आधारभूत अंतर पाया जाता है।

प्रश्न 2.
अगर आपको विश्व का मानचित्र बनाना हो तो किन-किन बातों का ध्यान रखना होगा?
उत्तर-
मानचित्र बनाना हो तो निम्न बातों को ध्यान में रखकर बना सकते

  • नक्शे में अगर कोई दुरी | सेमी. है तो वह वास्तविक रूप में कमरे में 1 मीटर के बराबर होगा।
  • 1 सेमी = 1 मीटर जिससे पता किया जा सकता है कि नक्शे में जो दूरी है वह वास्तव में कितनी दूरी के बराबर है। इस प्रकार हम मानचित्र को छोटा, बड़ा कर सकते हैं। जितना बड़ा मानचित्र बनाना होता है पैमाने का निर्धारण भी उसी प्रकार करते हैं।

मानचित्र में दिशा सूचक रेखा बनाई जाती है।

जैसे-
Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन 1

  • मानचित्र से हमें बहुत अधिक जानकारी प्राप्त होती है। मानचित्रों में दी गई सूचनाओं के आधार पर उनका नामकरण किया जाता है – जलवायु मानचित्र, वनस्पति मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, वर्षा मानचित्र, उद्योग मानचित्र आदि ।
  • नक्शे में रंगों एवं चिह्नों की सहायता से हमें वहाँ की जानकारी प्राप्त करने में सहायता होती है। जैसे – जलाशय-नीला रंग।
    पर्वत – भूरा रंग, पठार-पीला रंग, मैदान-हरा रंग।

इस प्रकार हम उपर्युक्त इन सभी बातों को ध्यान में रखकर विश्व का मानचित्र बना सकते हैं।

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 3.
मानचित्र में इस्तेमाल किये गये रंग किसके प्रतीक हैं?
उत्तर-
मानचित्र में जलाशय-नीले रंग का प्रतीक है।

पर्वत – भूरा रंग का प्रतीक है। पठार – पीला रंग और मैदान – हरा रंग का प्रतीक है।

प्रश्न 4.
मानचित्र के कितने प्रकार हैं ?
उत्तर-
मानचित्र के निम्न प्रकार के होते हैं

  • पर्वत, पठारों, मैदानों, नदियों, महासागरों आदि को दर्शाते हैं।
  • गाँव, शहर, राज्य, देश एवं विश्व के विभिन्न देशों तथा उनकी सीमाओं को दर्शाने वाले मानचित्र, राजनीतिक मानचित्र कहलाते हैं। ।
  • इन मानचित्रों में दी गई सूचनाओं के आधार पर उनका नामकरण किया जाता है। जैसे-जलवायु मानचित्र, वनस्पति मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, वर्षा मानचित्र, उद्योग मानचित्र आदि ।

प्रश्न 5.
मानचित्र में दिशाओं का निर्धारण कैसे करते हैं ? .
उत्तर-
मानचित्र में दिशाओं का निर्धारण दिशा सूचक रेखा के द्वारा किया जाता है। मानचित्र में उत्तर दिशा जो ऊपर की ओर है उसे उत्तर दिशा सूचक रेखा के माध्यम से दिखाई जाती है। जैसे-उत्तर की ओर चिह्न को दर्शाया जाता है।

पाठ के महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित नक्शो के लिए उपयुक्त रंगों के साथ मिलाएँ-
Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन 2
उत्तर-

  • जलाशय – नीला रंग
  • पर्वत – भूरा रंग
  • पठार – पीला रंग
  • मैदान – हरा रंग

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित नामों को चित्रों के द्वारा दर्शाएँ ।
(क) रेलवे लाइन
(ख) पक्की सड़क
(ग) कच्ची सड़क
(घ) राज्य
(ङ) अंतर्राष्ट्रीय सीमा
(च) जिला।
उत्तर-
Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन 3

Bihar Board Class 6 Social Science मानचित्र अध्ययन Notes

पाठ का सारांश

कक्षा में आते ही रमेश ने गुरुजी से पूछा-गुरुजी, कल मैंने पिताजी केऑफिस में एक कैलेण्डर देखा तो उसमें कोई चित्र नहीं था बल्कि उस पर आडी-तिरछी रेखाएँ खींची हई थीं और उसमें कई रंग भरे हुए थे। क्या ऐसा भी कैलेण्डर होता है । गुरुजी ने बताया कि जिसे आप चित्र समझ रहे हैं वास्तव में वह मानचित्र है। उन्होंने श्यामपट्ट पर चित्र बनाया और बच्चों को समझाया ।

मानचित्र में चीजों को चिह्न या संकेत के रूप में दिखाया जाता है । चित्र । अमातौर पर ऐसे बनाये जाते हैं जैसे कोई उस जगह को उसके किनारे खड़े होकर देख रहा हो लेकिन मानचित्र हमेशा ऐसा बनाया जाता है। जैसे उस जगह को ऊपर या आसमान से देख रहे हों।

चित्र में स्केल का उपयोग नहीं होता है परंतु मानचित्र में स्केल का उपयोग किया जाता है चित्र और मानचित्र में यही आधारभूत अंतर हैं।

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन

नक्शा में जिस दिशा में जो चीज थी उसे वहाँ पर दर्शाया जाता है। मानचित्र बनाने के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें हैं।।

  1. संकेतों का उपयोग।
  2. मानक उपयोग
  3. दिशाओं का निर्धारण ।

सबसे पहले उन चीजों की सूची बनाते हैं जो इस कमरे में हैं। उसे उस जगह से हम हटा नहीं सकते हैं। मानचित्र में सभी चीजों को संकेत के रूप में दिखाया जाता है। इतने बड़े कमरे का मानचित्र बनाने के लिए पहले हमें इस कमरे की माप लेनी पड़ती है तभी हम छोटा मानचित्र बना सकते हैं। इसके लिए उन्होंने बच्चों को लम्बाई, चौड़ाई मापकर बताया। कमरे की लम्बाई 6 मीटर और चौड़ाई 3 मीटर स्केल थी।

उन्होंने बच्चों से पूछा- अगर हम इतना लंबा नक्शा बनाएँ तो हमें बड़ा कागज लेना पड़ेगा। इस प्रकार राज्य, जिला एवं देश का नक्शा बनाने के लिए कितने कागजों की जरूरत पड़ेगी।

गुरुजी ने बच्चों को बताया कि जब हमें जमीन पर ही कम दूरी को मानचित्र में दिखाते हैं तो वह स्केल में दिखाते हैं परंतु जब जमीन की अधिक दूरी दिखाना होता है तो छोटे स्केल का सहारा लेते हैं। जैसे – अगर हम भारत का मानचित्र बनाएँगे तो कागज पर दर्शाने के लिए हमें छोटे स्केल का सहारा लेना पड़ता नहीं तो हमारे कागज में भारत या विश्व का मानचित्र नहीं समा सकता है।

हम जमीन पर की छोटी-छोटी विशेषताओं को भी आसानी से दिखा या समझ सकते हैं, इसलिए अगर हम स्कूल का मानचित्र बनायें तो बड़े मापक का सहारा लेना पड़ता, जैसे – 1 से.मी. = 1 मी। परंतु अगर देश का मानचित्र बनाना हो तो यह 1 से मी० = 1000 किलोमीटर रखना पड़ेगा। गुरुजी ने बच्चों को समझाया कि पहले आप लोगों ने दीवार को मीटर स्केल से मापा और नक्शा बनाने के लिए | सेमी. को एक मीटर स्केल के बराबर माना जाता है।

1 सेमी = 1 मीटर

अर्थात् नक्शे में अगर कोई दूरी 1 सेमी० है तो वास्तविक | मीटर है। इसी प्रकार हर मानचित्र में एक मापक दिया होता है जिससे पता किया जा सकता है कि नक्शे में जो दूरी है वह वास्तव में कितनी दूरी के बराबर है। इस प्रकार हम मानचित्र को छोटा-बड़ा कर सकते हैं और किसी स्कूल या घर का नक्शा तैयार कर सकते हैं।

Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन

मानचित्र में जो चीजें जहाँ-जहाँ थीं वहीं पर बनाये और दर्शायें । मानचित्र में दिशा सूचक रेखा बनाई जाती है

जैसे –
Bihar Board Class 6 Social Science Geography Solutions Chapter 7 मानचित्र अध्ययन 4
मानचित्र से हमें बहुत अधिक जानकारी प्राप्त होती है। ये कई प्रकार के होते हैं।

  • इसमें हम पर्वतों, पठारों, मैदानों, नदियों, महासागरों आदि को दर्शाते हैं।
  • गाँव, शहर, राज्य, देश एवं विश्व के विभिन्न देशों तथा उनकी सीमाओं को दर्शाने वाले मानचित्र, राजनीतिक मानचित्र कहलाते हैं।
  • इन मानचित्रों में दी गई सूचनाओं के आधार पर उनका नामकरण किया जाता है।

जैसे – जलवायु मानचित्र, वनस्पति मानचित्र, जनसंख्या मानचित्र, वषां मानचित्र उद्योग मानचित्र आदि ।

इस प्रकार नक्शे में रंगों एवं चिह्नों (प्रतीकों) की सहायता से हम वहाँ की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए इसमें एकरूपता रखी गई है

जैसे-

  • जलाशय – नीला रंग
  • पर्वत – भूरा रंग
  • पठार – पीला रंग
  • मैदान – हरा रंग

हम किसी भी देश एवं विश्व का मानचित्र भी पैमाने को घटा-बढ़ाकर बना सकते हैं। जितना बड़ा मानचित्र बनाना होता है हम पैमाने का निर्धारण उसी के अनुसार कर सकते हैं। इसी तरह हम अपने गाँव/मुहल्ले का भी मानचित्र बनाकर उसमें इन प्रतीकों के द्वारा अंकित कर सकते हैं।

Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 11 सजीवों में अनुकूलन

Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 11 सजीवों में अनुकूलन Text Book Questions and Answers, Notes.

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Bihar Board Class 6 Science सजीवों में अनुकूलन Text Book Questions and Answers

अभ्यास और प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सजीवों के वास-स्थान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सजीव-जगत में असंख्य छोटे-बड़े जीव-जन्तु एवं पौधे पाए जाते हैं, जिन्हें अपने परिवेश में रहने के लिए कुछ विशिष्ट संरचनाएँ होती हैं। ऐसी विशिष्ट संरचनाओं एवं स्वभाव की स्थिति को अनुकूलन कहते हैं। एक सजीव जिस परिवेश में रहता है। जहाँ से उसे भोजन, वायु, शरण-स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं उसे वास-स्थल कहते हैं। जमीन पर पाए जाने वाले सजीवों के वास-स्थल स्थलीय वास-स्थान तथा जल में पाए जाने वाले सजीवों के स्थान को जलीय वास-स्थान कहते

प्रश्न 2.
ऊँट रेगिस्तान में जीवन-यापन के लिए किस प्रकार अनुकूलित है?
उत्तर:
ऊँट के पैर नीचे रखते ही फैल जाते हैं इसके साथ वह गत्तेदार होता है जिसके कारण रेत में धंसने से बच जाते हैं और आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान चले जाते हैं। ऊँट के पलकों में लम्बे बाल और घनी भौहें उन्हें . रेत और मिट्टी से बचा लेती हैं। उसके छोटे-छोटे कान में भी आसानी से रेत नहीं जा पाते हैं। ऊँट अपनी नाक को मर्जी के अनुसार खोल या बन्द कर लेता है। ऊँट अपने कूबड़ में भोजन चर्बी के रूप में जमा रखता है। जो बुरे वक्त में काम आता है। पानी पिए बिना भी वह कई दिनों रह लेता है। इसके अलावा ऊँट के पैर लम्बे होते हैं जिससे उसका शरीर रेत की गरमी से दूर रहता है। साथ ही वे बहुत कम पेशाब करते हैं। उसे पसीना भी नहीं आता। इन्हीं सब बातों के कारण वे रेगिस्तान में जीवन-यापन के लिए अनुकूलित है।

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प्रश्न 3.
मछली जल में अपने को किस प्रकार अनुकूलित करती है?
उत्तर:
मछलियों का शरीर धारारेखीय होता है। इनका शरीर चिकने शल्कों से ढका रहता है। शल्क, इनके शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं तथा इनकी विशिष्ट आकृति जल में गति करने में सहायक होती है। मछली के पक्ष्म एवं पूँछ चपटे होते हैं जो उसे जल के अंदर दिशा परिवर्तन एवं संतुलित बनाए रखने में मदद करते हैं। इसके अलावे मछली गिल से पानी में घुले ऑक्सीजन को अलग कर अपने श्वसन प्रक्रिया को पूरी करती है। इस प्रकार मछली अपने को जल में रहने के लिए अनुकूलित करती है।

प्रश्न 4.
पर्वतीय पौधे किस प्रकार अनुकूलित हैं?
उत्तर:
पर्वतीय क्षेत्र में सामान्यत: बहुत ठंड होती है तथा सर्दियों में तो हिमपात भी होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वृक्ष शंक्वाकार (कीप जैसा) होता है तथा इसकी शाखाएँ तिरछी होती हैं। इससे वर्षा का जल एवं हिम आसानी से नीचे की ओर खिसक जाता है। इस प्रकार पर्वतीय पौधे अनुकूलित रहते हैं।

प्रश्न 5.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –
(क) स्थल पर पाए जाने वाले पौधों एवं जंतुओं के वास-स्थान को. …………… आवास कहते हैं।
(ख) वे वास स्थान जिनमें जल में रहने वाले पौधे एवं जंतु रहते हैं …………… आवास कहलाते हैं।
(ग) याक का शरीर लंबे ………….. से ढका होता है।
(घ) मछली का शरीर ………….. होता है जिससे वह जल में आसानी से तैर सकती है।
(ङ) जलीय पौधों का तना …………….. खोखला एवं ………….. होता है।
उत्तर:
(क) स्थलीय वास
(ख) जलीय
(ग) बालों
(घ) नौकाकार
(ङ) लम्बा, हल्का

प्रश्न 6.
मिलान कीजिए –
Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 11 सजीवों में अनुकूलन 1
Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 11 सजीवों में अनुकूलन 2
उत्तर:
(क) – ख
(ख) – क
(ग) – ङ
(घ) – घ
(ङ) – ग

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प्रश्न 7.
सही विकल्प चुनें –

(क) ऊँट निम्न परिवेश में पाया जाने वाला जन्तु है –
(1) जलीय
(2) पर्वतीय
(3) मरुस्थलीय
(4) कोई नहीं
उत्तर:
(3) मरुस्थलीय

(ख) धारारेखीय शरीर होता है –
(1) घोड़े का ।
(2) भालू का
(3) मछली का
(4) मेंढक का
उत्तर:
(3) मछली का

(ग) हमें श्वास लेने में कठिनाई होती है –
(1) मैदानी क्षेत्र में
(2) जलीय क्षेत्र में
(3) पर्वतीय क्षेत्र में
(4) रेगिस्तानी क्षेत्र में।
उत्तर:
(3) पर्वतीय क्षेत्र में

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(घ) घास स्थल अथवा वनों का शक्तिशली जन्तु है –
(1) हिरण
(2) शेर
(3) घोड़ा
(4) ऊँट
उत्तर:
(2) शेर

(ङ) जलकुंभी पाया जाता है –
(1) जंगल में
(2) पर्वतों पर
(3) जल में
(4) बर्फ में।
उत्तर:
(3) जल में

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Bihar Board Class 6 Science सजीवों में अनुकूलन Notes

अध्ययन सामग्री :

जैसा कि हम पहले अध्याय में पढ़ चुके हैं कि पर्यावरण में उपस्थित सभी पदार्थों को दो भागों में बाँटा गया है। सजीव और निर्जीव के इस अध्याय में हमें जानना है। “सजीवों में अनुकूलन”। सजीव-जगत में अनेक छोटे-बड़े – जीव-जन्तु एवं पौधे रहते हैं। सभी जीव के अलग-अलग वास-स्थल होते हैं। शारीरिक संरचना खान-पान भी प्रत्येक जीव-जन्तुओं एवं पौधों का अलग होता है। कोई जीव-जन्तु एवं पौधे स्थलीय होते हैं तो कोई जलीय। स्थलीय जीव एवं पौधों में भी कुछ मरुस्थलीय तो कुछ पर्वत्तीय होते हैं। अलग-अलग क्षेत्र में रहने के कारण ही प्रत्येक जीव को पर्यावरण से लड़ने की क्षमता अलग-अलग होती है। जैसे मछली पानी में जिन्दा रहती है। परन्तु पानी के बाहर मर जाती है। यानि कहने का तात्पर्य यह है कि अलग-अलग क्षेत्र में जीव वहाँ रहने के लिए अपने को अनुकूलित कर लेते हैं।

पृथ्वी पर असंख्य जीव- जन्तु एवं पौधं पाए जाते हैं, जिन्हे अपने परिवेश में रहने के लिए कुछ विशिष्ट संरचनाएँ होती हैं। ऐसी विशिष्ट संरचनाओं एवं स्वभाव की स्थिति को अनुकूलन कहते हैं। एक सजीव जिस परिवेश (या जगह) में रहता है। जहाँ से उसे भोजन, वायु, शरण-स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। वह उसका वास-स्थल कहलाता है।

जमीन पर पाए जाने वाले सजीवों के वास-स्थल स्थलीय वास-स्थान तथा जल में पाए जाने वाले सजीवों के स्थान को जलीय वास स्थान कहते हैं। सजीव जगत के जीव अपने पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करके ही जीवित रहता है। यह सामंजस्य दो प्रकार का होता है।- (क) अल्पावधि में विकसित होने वाला सामंजस्य। (ख) लंबी अवधि में विकसित होने वाला अनुकूलन।

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अपने परिवेश में होने वाले परिवत्तनों के साथ सामंजस्य स्थापित करने . के लिए कुछ जीवों में अल्प अवधि परिवर्तन हो सकते हैं। जब हम अचानक. पर्वतीय क्षेत्र में चले जाते हैं तो श्वास लेने में तथा शारीरिक श्रम करने में कठिनाई होती है। फिर धीरे-धीरे हम वहाँ के परिवेश में अनुकूलित हो जाते हैं। इस प्रकार के अस्थायी अनुकूलन को पर्यानुकुलन कहते हैं। दूसरी तरफ पर्वतीय क्षेत्र में जन्म लोगों के फेफड़ों की क्षमता अधिक होती है। यह आनुवांशिक अनुकूलन कहलाता है। जो जीव परिवेश के अनुसार अपने को ढाल नहीं पाते हैं। वे जीव मर जाते हैं। यही कारण है कि सभी जीव या पौधे सभी क्षेत्रों में नहीं पाए जाते हैं।

मरुस्थल में दिन में तेज गर्मी पड़ती है तथा रातें अधिक ठंडी होती हैं। पानी की कमी होती है। अतः यहाँ वैसे पौधे ही उगते जिसे कम पानी का जरूरत होती है। जैसे-गागफनी बबूल, ग्वारपाठा, केकट्स आदि। रेगिस्तान में पाए जाने वाले छोटे जीव अधिक ताप से बचने के लिए गहरे बिलों में चले जाते हैं तथा रात को भोजन के लिए बाहर आते हैं। ऊँट रेत में आसानी चल लेते हैं। क्योंकि इसके पैर गत्तेदार होते हैं। पैर लम्बे-लम्बे होते जिससे गर्मी कम लगती है उसे चलने में। ऊँट की पलकों में लम्बे बाल और घनी भौहें उन्हें रेत और मिट्टी से बचा होती है। उसके छोटे-छोटे कान में भी आसानी से रेत नहीं जा पाते हैं। नाक को अपनी मर्जी से वह खोल और बन्द कर लेते हैं। ऊँट अपने कूबड़ में भोजन चर्बी के रूप में जमा रखता है। ऊँट को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है। उसे पसीना भी नहीं आता है। अतः वह कई दिनों तक बिना पानी के रह जाता है।

पर्वतीय क्षेत्रों में सामान्यतः बहुत ठंड होती है और सर्दियों में हिमपात भी होता है। यहाँ के वृक्ष शंक्वाकार होते हैं तथा इसकी शाखाएँ तिरछी होती हैं। कुछ वृक्षों की पत्तियाँ-सूई के समान होती हैं। इससे वर्षा का जल एवं हिम आसानी से नीचे की ओर खिसक जाता है। यहाँ पाए जाने वाले जीव-जन्तुओं की त्वचा मोटी या फर से ठकी रहती है जिसे वह ठंड से बच पाते हैं। पहाड़ी बकरी के मजबूत खुर होते हैं जिससे ढालदार चट्टानों पर दौड़ने के लिए अनुकूलित होते हैं। वहाँ पाए जाने वाले जन्तुओं में याक, पहाड़ी बकरी, पहाड़ी तेंदुए, भालू आदि हैं।

शेर, हिरण आदि जन्तुओं के रंग, नाखुन, बाल, दाँत, आँख, आदि. की संरचना इस प्रकार होती है जिसके कारण उस परिवेश में वह अनुकूलित होते

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जलीय वास-स्थल में भी विभिन्न प्रकार के पौधे तथा जीव-जन्तु निवास करते हैं। जल की सतह पर रहने वाले जीव तथा पौधे की संरचना अलग होती है। जल के मध्य तथा तलछट्टी में रहने वाले पौधे तथा जीवों की संरचना ‘अलग होती है। मछली का शरीर धारारेखीय होता है। इनका शरीर चिकने शल्कों से ढका रहता है। शल्क इनके शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है तथा इसकी विशिष्ट आकृति जल में गति करने में सहायक होते हैं। मछली गिल से पानी में घुले ऑक्सीजन को अलग कर श्वास लेती है। इस प्रकार मछली, अपने को जल में रहने के लिए अनुकूलित करती है।

अन्ततः कहा जा सकता है कि अलग-अलग क्षेत्र में रहने वाले जीवों और पौधों की संरचना अलग-अलग होती है जिसके कारण वह उस क्षेत्र सं सामंजस्य स्थापित कर अपना जीवन-निर्वाह करते हैं।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 12 कुछ सवाल

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 पद्य खण्ड Chapter 12 कुछ सवाल Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 12 कुछ सवाल

Bihar Board Class 9 Hindi कुछ सवाल Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
समुद्र के खारेपन तथा नदियों के मीठेपन की इंगित कर कवि ने प्रकृति के किस सत्य से परिचित कराना चाहता है?
उत्तर-
उपरोक्त पंक्तियों में समुद्र के खारेपन और नदियों के मीठेपन की ओर इशारा करते हुए कवि ने प्रकृति की विशेषताओं एवं उसके विविध रूप-गुणों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। नदियों का उद्गम स्थल भी प्रकृति ही है और समुद्र का भी रूप प्रकृति द्वारा ही प्रदत्त है। मीठापन और खारापन के माध्यम से प्रकृति के दोनों रूपों का दर्शन हमें कवि की कविता में होता है। सृजन और संहार के बीच ही प्रकृति का संतुलन कायम है। यही प्रकृति का सत्य है। एक तरफ सृजन रूप दृष्टिगत होता है तो दूसरी तरफ विनाश रूप भी। प्रकृति का यह निजी गुण है। उसकी अपनी खास विशेषता है। यह प्रकृति का सत्य स्वरूप है।

प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के जीवन के यथार्थ सत्य को भी उद्घाटित किया गया है। मानव जीवन भी सुख-दुख के बीच पलता-बढ़ता और शून्य में विलीन हो जाता है। मानव जीवन प्रकृति की तरह ही है। दोनों में साम्यता है। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 12 कुछ सवाल

प्रश्न 2.
कवि अपने सवालों के माध्यम से प्रकृति में होने वाली दो असमान घटनाओं-विध्वंस और निर्माण को साथ दिखलाता है। पठित-कविता से कुछ उदाहरण देकर इसे अपने शब्दों में समझाइए।
उत्तर-
1. ऋतुओं को कैसे मालूम पड़ता है कि अब पोल के बदलने का वक्त आ गया इन पंक्तियों में कवि ने प्रकृति के परिवर्तल के रूपों को दर्शाया है। ही अपने आवरण में परिवर्तन लाकर स्वरूप बदल लेती है। इन पंक्तियों में प्रकृति के परिवर्तन और गतिमय जीवन पर प्रकाश डाला गया है। जड़ और चेतन के स्वरूप में जो बदलाव आता है उसके पीछे प्रकृति का हाथ है।

2. जाड़े इतने सुस्त-रफ्तार क्यों होते हैं
और दूसर कटाई की घास इतमी चंचल उड्डीयमान?

इन पंक्तियों में भी प्रकृति के परिवर्तित रूप का दर्शन होता है। एक तरफ जाड़े की ऋतु में जीव-जंतुओं की गति में शिथिलता आ जाती है जबकि दूसरी ओर घास जो निर्जीव पदार्थ है उसके स्वरूप में जल्दी-जल्दी बदलाव दिखता है। यह भी तो प्रकृति के सृजन रूप ही है। एक तरफ घास कटाई होती है और वह पुनः जल्दी-जल्दी बढ़कर अपनी वृद्धि का दर्शन कराता है। उसमें चंचलता का दिग्दर्शन होता है यह प्रकृति की ही विशेषता तो है।

3. कैसे जानती हैं जड़ें
कि उन्हें उजाले की ओर चढ़नी ही है?
और फिर बयार का स्वागत
‘ऐसे रंगों और फूलों से करना?

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 12 कुछ सवाल

इन पंक्तियों में भी सृजन-संहार प्रकृति के दोनों रूपों का दर्शन होता है। जो जड़ पदार्थ है उनमें भी गतिमयता आ जाती है और लगता है कि उन्हें भी उजाले की ओर चढ़ना है यानि विकसित होना है। बयार भी तो नए रूप रंग में दस्तक दे रही है क्योंकि रंगों और फूलों से सजी-धजी धरती बयारों के स्वागत में प्रतीक्षारत है। यहाँ प्रकृति के आंतरिक सौंदर्य की व्याख्या की गयी है।

4. क्या हमेशा वही वसंत होता है,
वही किरदार फिर दुहराता हुआ?

इन पंक्तियों में भी वसंत के भिन्न-भिन्न रूपों की चर्चा है। भूतकालीन वसंत अब लौट नहीं सकता। वर्तमान का वसंत न भूत वाला बन सकता है न भविष्य के समान हो सकता है। ठीक भविष्य का भी वसंत अपने रूप-रंग में दृष्टिगत होगा? यही प्रकृति की विभिन्नता और विशेषता है।

इस प्रकार सृजन और संहार के बीच प्रकृति संतुलन रखते हुए अपनी निजी विशेषताओं को आंतरिक और वाह्य रूपों में सौंदर्य और परिवर्तन के द्वारा नित नयापन का दर्शन करती है।

प्रश्न 3.
इस कविता को पढ़कर आपको क्या संदेश मिला?
उत्तर-
‘कुछ सवाल’ पाब्लो नेरुदा की चर्चित कविता है। इस कविता में कवि ने कुछ प्रकृति संबंधी सवाल उठाए हैं जिनका जबाब भी उसी सवाल में निहित है। इस प्रकार यह कविता प्रकृति के विविध रूपों, गुणों एवं विशेषताओं से युक्त कविता है। इस कविता में प्रकृति के साथ-साथ मानवीय संबंधों पर भी सम्यक प्रकाश डाला गया है। प्रकृति और मनुष्य के बीच रूपों, गुणों एवं कर्म के आधार पर जो संबंध स्थापित हुए है उसकी भी चर्चा कवि ने की है।

इस कविता के द्वारा प्रकृति में होनेवाली दो असमान घटनाओं-विध्वंस और निर्माण को साथ-साथ दिखाते हुए मनुष्य की अदम्य जिजीविषा में विश्वास की झलक भी कवि कराता है। कवि को पक्का विश्वास है कि अंततः जड़ों को उजाले की ओर ही चढ़ना है। बयार का स्वागत अनेक रंगों और फूलों से करना है। यहाँ प्रकृति की बाह्य और आंतरिक सौंदर्य का दर्शन होता है। इस कविता द्वारा प्रकृति की विविधता का दर्शन होता है। इस कविता द्वारा प्रकृति के परिवत्तनशील रूपों की झलक देखने को मिली है। ‘कुछ सवाल’ नामक कविता अपने आप में पूर्ण कविता है जो सवाल तो उठाती ही है जवाब के रूप में स्वयं में छिपे समाधान का भी बिंब उभारती है।

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कवि ने ‘कुछ सवाल’ शीर्षक कविता के द्वारा प्रकृति और मनुष्य के बीच के संबंधों को भी दर्शाता है। वह जड़-चेतन के स्वरूपों गुणों की चर्चा करते हुए किसी परम सत्ता की ओर भी ध्यान आकृष्ट करता है। जिस प्रकार प्रकृति किसी न किसी परम सत्ता का प्रत्यक्ष चाहे परोक्ष हाथ है।

दूसरी ओर मनुष्य भी तो प्रकृति का ही एक अंग है। यह चेतनस्वरूप है। इसके बीच भी कई प्रकार के परिवर्तन विद्यमान हैं। मनुष्य चेतना संपन्न प्राणी है अतः इसके भीतर अदम्य जिजीविषा पलती रहती है। वह इसी जिजीविषा के बल पर विकास के पथ पर कदम बढ़ाता है। प्रकृति में विविधता, विशेषताएँ हैं तो मनुष्य में भी अदम्य उत्साह, उमंग विद्यमान है।

सजन और संहार के दोनों रूपों का सम्यक् चित्रण करते हुए कवि ने प्रकृति की इन असमान घटनाओं से हमें परिचित कराया है।
दूसरी ओर मनुष्य के भीतर पल रही अदम्य जिजीविषा के प्रबल विश्वास को भी रेखांकित किया है।

जड़ों को उजाले की ओर चढ़ना है यानि स्वयं को विकसित रूप में लाना है। बयार और रंग-फूल भी तो प्रकृति वाह्य और आंतरिक सौंदर्य हैं। इनका भी ज्ञान इस कविता द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
कवि ने प्रकृति को शक्ति कहा है-“ऋतुओं को कैसे मालूम पड़ता है कि अब पोल के बदलने का वक्त आ गया है।” इस पंक्ति में प्रकृति के किस प्रकार के बदलाव को कवि ने प्रकट करना चाहा है?
उत्तर-
‘कुछ सवाल’ नामक कविता में कवि ने प्रकृति में जो बदलाव या परिवर्तन होता है, उसका सबसे पहले ज्ञान ऋतुओं को हो जाता है। इन पंक्तियों में प्रकृति के वाह्य रूप में जो परिवर्तन दिखाई पड़ता है उसकी गंध सबसे पहले ऋतुओं को होती है क्योंकि वसंत ऋतु में पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के जीवन में एक नया उमंग, आनंद दृष्टिगत होता है। सारे पेड़ों के पुरातन पत्ते झड़ जाते हैं और नयी-नयी कोंपलें निकलने लगती हैं। इस प्रकार मौसम के बदलते ही प्रकृति का निजी रूप भी बदल जाता है।

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ठीक दूसरी ओर जब ग्रीष्म का महीना आता है तब पेड-पौधे शष्कता का रूप-दर्शन कराते हैं। पशु-पक्षी भी तीखी धूप में बेचैनी का अनुभव करते हैं। मौसम के अनुसार बदलते आवरण या बाह्य रूप-सज्जन के रंग में परिवर्तन होने से भी हमें प्रकृति के बदलाव का ज्ञान हो जाता है।

उपरोक्त वर्णन तो प्रकृति के सामान्य बदलाव का हुआ लेकिन कवि प्रकृति के विशिष्ट बदलाव की यहाँ चर्चा करता है। मौसम के अनुसार प्रकृति के बाह्य और आंतरिक रूपों में मौसम के अनुसार रूप परिवर्तन तो दिखाई पड़ता ही है लेकिन प्रकृति अपने रूप में जो विशिष्ट परिवर्तन करती है वह है सृजन और संहार का रूप। प्रकृति का अकाट्य नियम है कि वह पुरातन को नवीन साँचे में ढालकर नूतन-आवरण में प्रस्तुत करती है। कहने का मूल आशय है कि जब प्रकृति का रूप पुरातन को प्राप्त कर लेता है, निष्क्रियता को प्राप्त कर लेता है तब प्रकृति नए सृजन द्वारा नया स्वरूप गढ़ती है। यही पुरातन सत्य है।

प्रकृति के इस मूल रूप में बदलाव की ओर कवि ने ध्यान आकृष्ट किया है। प्रकृति का यह कर्म निरंतर अबाध गति से चलता रहता है। सृजन और संहार के बीच संतुलन ही प्रकृति का न्यायसंगत न्याय कहा जा सकता है।

एक तरफ विध्वंस के द्वारा जीर्ण-शीर्ण रूप का विनाश हो जाता है और नए निर्माण में प्रकृति संलग्न हो जाती है।
ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी अदम्य जिजीविषा में विश्वास रखते हुए विकास पथ पर अग्रसर होता है। मनुष्य की यही जिजीविषा जीने और कुछ करने के लिए विवश करती है और प्रकृति के साथ मनुष्य का जीवन-मरण सनातन रूप से जड़ा रहता है।

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प्रश्न 5.
‘कुछ सवाल’ शीर्षक कहाँ तक सार्थक है? तर्कपूर्ण उत्तर दें:
उत्तर-
‘कुछ सवाल’ नामक कविता के रचयिता महाकवि पाब्लो नेरुदा हैं। नेरुदा ने अपनी उपरोक्त कविता में अपने मौलिक विचारों को मूर्त रूप देते हुए प्रकृति विषयक गंभीर बातों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

‘कुछ सवाल’ शीर्षक एक ऐसा कौतुहलबर्द्धक शीर्षक है जिसके पढ़ने से मनुष्य के मस्तिष्क में हलचल पैदा हो जाती है। कवि की यह बौद्धिकता से पूर्ण एवं रहस्यात्मकता से युक्त कविता भी है। कवि ने सूक्ष्म भाव से प्रकृति के रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है। बौद्धिकता से युक्त कविता की इतनी सघन बनावट है कि इसके परत-दर-परत को उघाड़ने एवं उसमें निहित सूक्ष्म भावों के अर्थ समझने में दिमागी कसरत करनी पड़ती है।

नेरुदा विश्वविख्यात कवि हैं। वे एक प्रख्यात चिंतक भी थे। अतः उक्त कविता में कवि के वैचारिक धरातल की व्यापकता का भी दर्शन होता है।

भावों की अभिव्यक्ति में भी कवि को सफलता मिलती है। सरल और सहज शब्दों द्वारा कविता का सृजन करते हुए कवि ने प्रकृति के गूढ़ भाव को चित्रित करने में सफलता पाई है। कवि ने प्रकृति के रहस्यों की परत-दर-परत को खोलते हुए कहा है कि एक तरफ नदियों में मीठा पानी और दूसरी ओर समुद्र का पानी खारा क्यों? इसी प्रश्न में उत्तर भी छिपा हुआ है। कवि के कहने का आशय है कि प्रकृति के दो रूप हैं, सृजन और संहार। इन्हीं के बीच प्रकृति संतुलन रखने का काम करती है।

ऋतुओं को भी प्रकृति के बदलते मौसम की जानकारी सबसे पहले होती है। प्रकृति मौसम के अनुकूल आवरण परिवर्तन कर स्थूल रूप में दृष्टिगत होती है।

जाड़े के मौसम में भी चेतन रूप में शिथिलता को दर्शन होता है जबकि जड़ता में गतिमयता दिखाई पड़ती है।
कवि जड़ों की बात करता है कि उन्हें पता है कि उजाले की ओर चढ़ना ही उनकी नियति है। यानि जड़ में गति का जब संचार होगा तो उसकी वृद्धि होगी ही।
और फिर बयार का स्वागत भी रंगों एवं फूलों द्वारा होता है जो प्रकृति का शाश्वत निर्भय है।

वसंत भी सर्वदा एक समान नहीं होता? उसका भी रूप परिवर्तन समयानुकूल होता रहा है और उनमें समानता नहीं मिलती। भूत, वर्तमान और भविष्य के वसंत में शुरू से भिन्नता रही है और आगे भी रहेगा। उपरोक्त बिन्दुओं पर चिंतन करने पर यह बात साफ दृष्टिगत होती है कि “कुछ सवाल” शीर्षक नाम से जो कविता रची गयी है वह सार्थक है। विवेचना और विश्लेषण के आधार पर यह सिद्ध हो जाता है कि कुछ सवाल शीर्षक सार्थक शीर्षक है।

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प्रश्न 6.
क्या वसंत हर व्यक्ति या परिवेश या परिस्थिति के लिए एक जैसा होता है? तर्क सहित उत्तर दें:
उत्तर-
कवि ने अपनी कविता में वसंत के स्वरूप की चर्चा सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत किया है।
कवि ने अपनी कविता में-“क्या हमेशा वही वसंत होता है” द्वारा प्रश्न उठाता है कि क्या हमेशा वसंत एक रूप में हर मनुष्य के जीवन में होता है?

क्या सबके जीवन में वसंत की भूमिका समान होती है। कवि के विचार भिन्न हैं। कवि कहता है कि हर मनुष्य के जीवन में अलग-अलग वसंत अलग-अलग रूपों में आता है। कहने का भाव यह है कि वसंत की भूमिका विभिन्नता लिए रहती है। भूत में जो वसंत था, जिस रूप में था वह वर्तमान के वसंत से मेल नहीं खाएगा। ठीक उसी प्रकार वर्तमान का वसंत भी भविष्य के वसंत से भिन्न होगा। कभी भी कहीं भी किसी भी परिस्थिति या परिवेश में वसंत का रूप विभिन्नता लिए आता है। यही उसकी विशेषता है अतः वसंत के रूप, रंग गुण में परिवेश एवं परिस्थिति के अनुकूल भिन्नता दिखाई पड़ती है। कवि के कथनानुसार वसंत मानव जीवन में अलग अलग रूपों में दिखाई पड़ता है।

भाव स्पष्ट करें:

प्रश्न 7.
(क) कैसे जानती हैं जड़ें कि उन्हें उजाले की ओर चढ़ना ही
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘कुछ सवाल’ काव्य पाठ से ली गई हैं। इस कविता के रचयिता महाकवि पाब्लो नेरुदा जी हैं। नेरुदा जी विश्वविख्यात कवि और विचारक के रूप में जाने जाते हैं।
इसी कारण नेरुदा की कविताएँ बौद्धिकता से पूर्ण हैं साथ ही रहस्यमयी भी। नेरुदा ने अपनी कविताओं में प्रकृति के गूढ़ रूपों के रहस्य का उद्घाटन किया है।

कवि कहता है कि जो जड चीजें हैं वे कैसे जानती हैं कि उन्हें उजाले की र चढना ही है। इन पंक्तियों में कवि ने प्रकृति के गूढ़ कर्म की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। कवि कहता है कि सृष्टि का सृजन करना ही प्रकृति का सनातन नियम है। साथ ही सृजन में ही संहार की क्रिया में छिपी रहती है।

प्रकृति हमें दो रूपों में दिखाई पड़ती है-एक रूप जड़ है और दूसरा रूप चेतनमय। इन्हीं दोनों के बीच सष्टि और संस्कति का क्रम चलता रहता है और प्रकति अपने रूप परिवर्तन द्वारा हमारे समक्ष प्रकट होती है।

प्रकृति का शाश्वत नियम है कि यह गतिमय रूप में है। प्रकृति का रूप वह जड़ हो चाहे चेतन अपने गतिमय होती रहती है क्रिया के बीच संचालित प्रकृति का यही गतिमय होना ही जड़ को उजाले की ओर चढना ही है कि ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। कहने का भाव यह है कि जड़ें भी गतिमय रूप में वृद्धि की ओर बढ़ती हैं। उनके रूप में भी परिवर्तन दृष्टिगत होता है। जड़ गति के कारण अपने वृद्धि को पूर्णता का रूप देने में सक्षम होती है।

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जड़ पदार्थों में गतिमयता के कारण जीवन संचार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं, उसे कवि ने अपनी कविताओं के द्वारा व्यक्त किया है। जड़ भी चेतन की तरह स्वरूप धारण कर लेते हैं। उनमें भी ऊर्जा और गति आ जाती है।

जड़ों को उजाले की ओर चढ़ाना है कि जानकारी प्रकृति की आंतरिक क्रियाओं के द्वारा हो जाती है। ये ही आंतरिक क्रियाएँ ऊर्जा और गति से संचालित होती है। ऊर्जा और गति प्रकृति के मौलिक रूप हैं जिसकी ओर कवि ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।
भाव स्पष्ट करें:

प्रश्न 7.
(ख) क्या हमेशा वही वसंत होता है, वही किरदार फिर दुहराता हुआ?
उत्तर-
‘कुछ सवाल’ नामक कविता महाकवि पाब्लो नेरुदा द्वारा रचित है जिसमें प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित में किया गया है।

कवि कहता है कि हर मनुष्य के जीवन में वसंत का आगमन समान रूप नहीं होता। हर मनुष्य के जीवन में वसंत का रूप अलग-अलग होता है। वसंत अपनी भूमिका परिवेश और परिस्थिति के अनुकूल हर मनुष्य के जीवन में अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत करता है। वसंत के आगमन में भी भिन्नता है। भूतकाल में जो वसंत था वह वर्तमान काल के वसंत से भिन्न था। ठीक उसी प्रकार वर्तमान काल के वसंत का रूप भी भविष्य काल के वसंत से भिन्न रहेगा। भविष्य में भी वसंत का रूप अलग ढंग से होगा। अतः हर मनुष्य के जीवन में वसंत अपनी भूमिका भिन्न-भिन्न रूपों में निभाता है।

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कवि ने अत्यंत ही साफ और सटीक शब्दों में वसंत के किरदार रूप की व्याख्या की है।
अतः वसंत का रूप मानव जीवन में हर मनुष्य के लिए अलग-अलग रूप । में उपस्थित होता है।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 11 समुद्र

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 पद्य खण्ड Chapter 11 समुद्र Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 11 समुद्र

Bihar Board Class 9 Hindi समुद्र Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
समुद्र ‘अबूझ भाषा’ में क्या कहता रहता है?,
उत्तर-
समुद्र ‘अबूझ भाषा’ में मनुष्य से कहता है कि मेरा यानि समुद्र का कुछ नहीं होता यही अबूझ भाषा में वह अपने मनोभाव को प्रकट करता है। समुद्र . के अबूझ भाषा में कहने का मूलभाव यह है कि समुद्र अक्षय का भण्डार है। मनुष्य को अपनी इच्छानुसार समुद्र के अक्षय भण्डार से जितना कुछ लेने की इच्छा हो उतना वह ले ले। यहाँ समुद्र की उदारता और विराटता का चित्रण हुआ है। मनुष्य अपनी इच्छानुसार जितना भी समुद्र का अपने हित के लिए उपयोग करेगा उससे समुद्र का कुछ नहीं बिगड़ेगा, कुछ नहीं घटेगा। समुद्र की अभिलाषा भी कम नहीं होगी।

“यहाँ मूक और अबूझ भाषा में समुद्र के माध्यम से प्रकृति और पुरुष के बीच के संबंधों को उजागर किया गया है। प्रकृति के विभिन्न रूप मनुष्य के विकास में कितना सहायक है, इसकी चर्चा उपरोक्त कविता में हुई है। इस प्रकार सागर प्रकृति का विराट अवयव है जो मानव हित में सदैव उपयोगी रहा है। उसके द्वारा मानव अपनी सभ्यता और संस्कृति शकर को खींचकर यहाँ तक लाया है। प्रकृति की भाषा तो रहस्यमयी है ही। इस प्रकार समुद्र भी अपने मौन रूप में ही अबूझ भाषा का उपयोग करते हुए मानव हित में अपनी तत्परता को व्यक्त करता है। इस प्रकार यहाँ प्रकृति पुरुष, सृष्टि के सृजन की ओर ध्यान खींचा गया है।

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प्रश्न 2.
समुद्र में देने का भाव प्रबल है। कवि समुद्र के माध्यम से क्या कहना चाहता है?
उत्तर-
‘समुद्र’ नामक कविता में कवि ने प्रतीक प्रयोगों द्वारा मानव जीवन के लिए समुद्र की उपयोगिता पर ध्यान आकृष्ट किया है।
समुद्र अक्षय भंडार है। वह सदैव से सृष्टि के सृजन में सहयोगी रहा है। समुद्र । अपनी अबूझ भाषा में मौन रूप में रहकर मानव हित के लिए तत्पर है। वह कहता है कि मेरे गर्भ में पल रहे घोंघे, केंकड़े या अन्य जीव-जन्तुओं से मनुष्य ने अपने उपयोग के लिए अनेक वस्तुओं का निर्माण किया है। वह मेरे सौंदर्य का दुख भी लूटा है। वह मेरे अक्षय निधि से अपना हित भी साधा है। जीवनोपयोगी अनेक चीजों जैसे-बटन, औजार, टेबुल पर सजाने की चीजों का निर्माण किया है।

वह सागर के चित्रों को फोटो फ्रेम में सजाकर टी० बी० के बगल में रखा भी है। सागर मनुष्य से कहता है कि सूरज तो अनवरत आदि काल से अपनी प्यास मेरी छाती से बुझा रहा है लेकिन आजीवन वह प्यासा का प्यासा ही है और मैं भी तो सूखा नहीं यानि मेरा भी तो कुछ घटा नहीं।

सागर पुनः कहता है कि ऐ मानव! मुझे तुम कुछ देना चाहते हो तो दे जाओ किन्तु तुम्हारी देने की विसात ही क्या है? सिवा मुझसे लेने के तुम क्या दे सकते हो? तुम्हारा तो जीवन सदैव से यायावरी रूप लिए रहा है। तुम्हारे पद-चिन्ह भी तो सदैव बनते-मिटते रहे हैं। तुम स्थिर जीवन जी ही कब पाये? तुम्हारी चंचलता और तुम्हारी आतुरता ने तुम्हें स्थायित्व प्रदान ही कहाँ किया?

इस प्रकार तुम्हारे पद-चिन्हों को बनाने-बिगाड़ने में मेरा भी सहयोग रहा है। मैंने सदैव तुम्हारे पद-चिन्हों को लीप-पोतकर मिटाया है। तुम्हारी आतुरताभरी वापसी को अपने सुलभ स्वभाव के अस्थिर हलचलों में मैंने मिला लिया है। इन पंक्तियों में सृष्टि-सुजन एवं संहार के रूपों का बड़ी बारीकी से कवि ने चित्रित किया है। सागर हमारी सभ्यता और संस्कृति के निर्माण एवं विध्वंस में सदैव संलग्न रहा है। इस धरती पर अनेक सभ्यताएँ बनी-बिगड़ी। कई संस्कृतियाँ विकसित हुईं और मिटी भी।

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इस प्रकार पुरातन एवं नूतन के सृजन एवं संहार के बीच सदैव खेल होता रहा है। यही प्रकृति का नियम है। प्रकृति और मानव का संबंध आदिकाल से रहा । _है दोनों एक-दूसरे के पूरक रूप में सहयोगी रहे हैं। अपनी स्वार्थपरता, इच्छा की पूर्ति के लिए मानव ने प्रकृति के सारे रूपों का इस्तेमाल किया है। उपभोग किया है। इस प्रकार ‘समुद्र’ के प्रतीक प्रयोग द्वारा कवि ने मानव और ‘समुद्र’ के बीच के संबंधों में उसकी उपयोगिता एवं साथ ही उपभोक्तावादी संस्कृति के कई रूपों का सफल चित्र प्रस्तुत किया है।

प्रश्न 3.
निम्नांकित पंक्तियों का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
“सोता रहँगा छोटे से फ्रेम में बँधा
गर्जन-तर्जन, मेरा नाच गीत उद्वेलन
कुछ भी नहीं होगा।”
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘समुद्र’ काव्य पाठ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में महाकवि सीताराम महापात्र ने ‘समुद्र’ के जीवंत रूप का चित्रण करते हुए उसकी
महत्ता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। कवि कहता है कि सागर प्रतीक रूप में मनुष्य से अपनी पीड़ा या भावना को व्यक्त करते हुए कहता है कि-मेरे चित्र यानि ‘समुद्र’ के चित्र को छोटे से फ्रेम में गढ़कर तुम टी. वी. के बगल में टाँग दोगे।
उस चित्र में मेरा जीवंत स्वरूप दृष्टिगत नहीं होगा। मैं तो उस फोटो में सुषुप्तावस्था में दिखाई पगा। मेरी जीवंतता, मेरी यथार्थता वहाँ से ओझल हो जाएगी। समुद्र में जो गर्जन-तर्जन, गीत-नृत्य आलोड़न होता है उसे आँखों के समक्ष देखकर तुम जितना प्रसन्नचित्त अपने को पाओगे उतना उस चित्र युक्त फोटो से नहीं। तुम्हें मेरे सही रूप का दर्शन वहाँ नहीं होगा। – यहाँ कवि सूक्ष्म रूप से फोटो की अनुपयोगिता की ओर ध्यान आकृष्ट करता है।

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चित्र युक्त समुद्र की तुलना में यथार्थ समुद्र का दर्शन, उसने गर्जन-तर्जन को सुनना उसके गीत-नृत्य को सुनना-देखना और उसमें जो हलचलें होती हैं-उसका प्रत्यक्ष, दर्शन करना ही यथार्थ है। यानि समुद्र का जो प्राकृतिक स्वरूप है। जो प्राकृतिक सुषमा है उसके आगे ये कृत्रिम रूप टिक पाएँगे क्या? सागर के गर्जन में जो यथार्थ सौंदर्य का दर्शन होता है, उसके तर्जन में जो रूप-सौंदर्य दीखता है। उसके गीत में जो आनंद मिलता है, उसके नृत्य में जो प्रसन्नता होती है।

सागर की हलचलों में उठते-गिरते जल-तरंगों को देखकर किसका मन प्रसन्न नहीं होता होगा? यानि सागर के इन यथार्थ रूपों का दर्शन का मानव भाव-विह्वल हो उठता है। इस प्रकार कवि ने सागर के सौंदर्य-बोध को अपने शब्दों के द्वारा सफल चित्रण करने में सफलता पायी है। सागर के मूलरूपों का सम्यक् और सटीक चित्रण किया है। उसके गुणों का अंकन किया है। . इस प्रकार चित्रात्मकता एवं गीतात्मकता से युक्त दृश्यों का प्रतिबिंब उपस्थित करते हुए कवि ने सागर के सौंदर्य बोध को काव्य पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत, किया है।

प्रश्न 4.
‘नन्हें-नन्हें सहस्र गड्ढों के लिए/भला इतनी पृथ्वी पाओगे कहाँ’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
‘समुद्र’ काव्य पाठ में सीताराम महापात्र ने उपरोक्त काव्य पंक्तियों के द्वारा समुद्र और पृथ्वी की विराटता, महत्ता, उपयोगिता पर यथेष्ट प्रकाश डाला है। सागर जब मनुष्य से पूछता है यह कहता है कि मेरे गर्भ में पल रहे सैकड़ों जीव-जंतु जो विद्यमान है उनमें से केंकड़ा भी एक उपयोगी जीव है। अगर तुम उसे ‘पकड़कर अपनी आवश्यकतानुसार रखना चाहते हो तो यह पृथ्वी सागर की तुलना में छोटी पड़ जाएगी। मेरे गर्भ की गहराई अथाह है जबकि धरती की सीमाएँ सीमित हैं। अगर उन केंकड़ों को रखने के लिए इस धरती पर तुम हजारों गड्ढों का निर्माण करोगे तो भी यह धरती छोटी पड़ जाएगी।

यहाँ कवि के कहने का भाव यह है कि सागर की विराटता और उपयोगिता अपने महत्व के आधार पर अलग है जबकि धरती की उपयोगिता अलग है। दोनों का महत्व मनुष्य के लिए समान है लेकिन कार्य और प्रकृति के अनुसार दोनों के, उपयोग में भिन्नता है। यहाँ कवि सागर की विराटता और उसकी महत्ता को चित्रित किया है।

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केंकडे रूपी जीव के माध्यम से जीवंतता का सटीक चित्रण मिलता है। अपनी स्वार्थ- परता और अंधे रूप में उपयोग के लिए इन जीवों या वस्तुओं के साथ मनुष्य, जिस क्रूर रूप में बर्ताव उपस्थित करता है, वह चिंतनीय एवं आलोचना का विषय है। यहाँ उपभोक्तावादी संस्कृति की ओर अपने व्यंग्यात्मक पंक्तियों द्वारा कवि जीवन के यथार्थ का चित्रण करने में सफल रहा है। यहाँ सागर और उसके. जीवों की उपयोगिता और महत्ता मानव जीवन के लिए अत्यधिक है किन्तु मानव स्वार्थ में अंधा हो गया है। वह उसकी जीवंतता के साथ खिलवाड़ करता है। उसके मूल-सौंदर्य को मिटाने में लगा रहता है वह घोर रूप में उपयोगी जीवन जी रहा है। इस प्रकार प्रकृति के विराट रूपों-सागर एवं धरती के साथ मनुष्य की स्थिति एवं संबंधों को कवि ने स्पष्ट चित्र उकेरा है।

प्रश्न 5.
कविता में “चिर-तृषित’ कौन है?
उत्तर-
‘समुद्र’ काव्य पाठ में, सीताराम महापात्र ने चिरतृषित’ रूप में सूर्य को प्रतीक मानकर किया है। इस कविता में ‘चिर-तृषित’ के रूप में सूर्य को दर्शाया गया है। सूर्य सदैव सागर के जल को सोखता रहा है यानि पीता रहा है। यहाँ सूर्य का प्रतीक रूप इस धरती का मानव है। वह सदियों से भूखा-प्यासा है। आज भी उसकी भूख-प्यास मिटी नहीं है। वह युगों-युगों से प्रकृति के रूपों, साधनों वस्तुओं का अपनी सुख-सुविधा के लिए उपयोग करता रहा है। उसकी चिर-पिपासा अभी तक बुझी नहीं है। वह सदैव उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच जी रहा है। उसकी स्वार्थपरता अंधविश्वास एवं अविश्वासनीयता द्रष्टव्य है चिंतनीय है।

सृष्टि के सृजन काल से लेकर आज तक मानव ने क्या-क्या खोजें नहीं की। अपनी सुख-सुविधा और उपभोग के लिए नित नयी-नयी चीजों का अनुसंधान किया और उसका उपयोग भी जमकर किया। लेकिन उसे आज भी शांति और चैन नहीं है। वह बेचैन और भूखा-प्यासा है। ‘चिर-तृषित’ के रूप में सूर्य रूपी मानव आज भी अपनी अतृप्त भूख-न्यास के बीच तड़प रहा है, आतुरमय जीवन जी रहा है।

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सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
(क) उन पद-चिन्हों को,
लीप-पोतकर मिटाना ही तो है काम मेरा
तुम्हारी आतुर वापसी को
अपने स्वभाव सुलभ
अस्थिर आलोड़न में
मिला लेना ही तो है काम मेरा।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘समुद्र’ काव्य पाठ शीर्षक से ली गई हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग समुद्र एवं मानव के बीच के अटूट संबंधों से जुड़ा हुआ है।

महाकवि सीताराम महापात्र के अपनी ‘समुद्र’ कविता में उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से मानव सभ्यता के अमिट चिन्हों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। कवि कहता है कि सागर ने मानव द्वारा निर्मित पद-चिन्हों को लीप-पोतकर अनेक बार मिटाने का काम किया है। मनुष्य की आतुरतामय वापसी को वह अपने स्वभाव के अनुसार अस्थिर हलचलों के द्वारा सुलभता के साथ स्वयं में मिला लिया है। यानि अपने में समाहित कर लिया है। इन पंक्तियों के प्रयोग द्वारा कवि ने गूढ़ भाव की व्याख्या की है। मानव स्वयं द्वारा निर्मित सभ्यता और संस्कृति के शकट को अनवरत काल से खींचता ला रहा है। लेकिन इस धरती पर विलुप्त हो गयी और पुनः नए रूप में अवतरित हुई। इस प्रकार इस विकास पथ का निर्माण सदैव होते रहा है। मानव सदैव प्रगति पथ का अनुगामी रहा है।

वह प्रकृति के साथ चलकर अपने सृजन कर्म में सदैव लीन रहा है। लेकिन सागर का भी काम तो यही रहा है कि उसने अनेक सभ्यताओं को विकसित और पल्लवित-पुष्पित होते देखा। उन्हें स्वयं में विलीन होते भी देखा। इस प्रकार सागर भी साक्षी है इस उत्थान-पतन की कहानी का। सागर के प्रतीक प्रयोग द्वारा मानव सदैव से सृजन और संहार के बीच जीता रहा है और नित नए-नए अन्वेषण के द्वारा उसमें नवीनता का दर्शन कराता है।

सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न
(ख)क्या चाहते हो ले जाना घोंघे?
क्या बनाओगे ले जाकर? ।
कमीज के बटन
नाड़ा काटने के औजार।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘समुद्र’ काव्य पाठ से उद्धृत की गयी हैं। इस कविता के कवि सीताराम महापात्र जी हैं। इन्होंने अपनी इन काव्य पंक्तियों में समुद्र के अंतर्गत पल रहे जीव-जंतुओं के माध्यम से मानवीय जीवन के संबंधों को उजागर किया है। इसका प्रसंग उन्हीं जीव-जंतुओं के जीवन से जुड़ा हुआ है।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 11 समुद्र

उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने ‘समुद्र’ के माध्यम से यह कहना चाहा कि ऐ मानव! तुम मुझसे क्या चाहते हो घोंघा? घोंघे को ले जाकर तुम उसका क्या उपयोग करोगे? क्या उसका कमीज के बटन बनाने में उपयोग करोगे या कि नाड़ा काटने के लिए औजार का रूप गढ़ोगे।

इन पंक्तियों में कमीज, बटन, औजार मानव जीवन के लिए उपयोगी चीजें हैं। घोंघा एक उपयोगी जीव ही नहीं है बल्कि प्रतीक रूप में प्रयुक्त भी है। मानव कितना स्वार्थ में अंधा हो गया है कि घोंघे की जीवंतता से मजाक करता है। उसको मारकर अपने जीवनोपयोगी वस्तुओं का निर्माण करता है तथा उसे उपयोग में लाता है। इन पंक्तियों में मनुष्य की उपभोक्तावादी संस्कृति पर कवि ने तीखा प्रहार किया है। कवि ने घोंघे की जीवंतता में जिस सौंदर्य का दर्शन करता है वह उसे मारकर अपने उपयोग में लाए गए वस्तुओं में नहीं प्राप्त करता है। कवि ने इस पंक्तियों में घोंघे की जीवन एवं उससे जडे हए सौंदर्य की ओर हमारा ध्यान खींचा है। घोंघा के जीवन में जो स्वच्छंदता है रेंगने में जो आत्मीय सुख है। जल के बीच और रेत में रहकर जीते हुए जो आनंद है, उसे मारकर वह आनंद नहीं सुलभ हो सकता। इस प्रकार कवि ने प्रकृति के साथ किए गए दुर्व्यवहार और मानव की क्रूरता का वर्णन करते हुए उसे सचेत किया है।

समुद्र सदैव मानव के लिए उपयोगी रहा है। वह मानव के विकास एवं उसके सुख-दुख में सदैव सहयोग किया है। इस प्रकार उपरोक्त पंक्तियों में एक छोटे से घोंघे के प्रतीक रूप से जीवों की मानव जीवन में क्या उपयोगिता है। इसकी ओर कवि ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

इस प्रकार सीताराम महापात्र ने घोंघे, समुद्र, प्रकृति और मनुष्य के बीच के अटूट और आत्मीय संबंधों की सटीक व्योरे या प्रस्तुत करते हुए अपनी इन काव्य पंक्तियों में यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। ये जीव-जंतु हमारे जीवन में सदैव ‘उपयोगी रहे हैं और आगे भी रहेंगे।

प्रश्न 7.
समुद्र मनुष्य से प्रश्न करता है। इस तरह के प्रश्न के पीछे मनुष्य की उपभोक्तावादी प्रवृत्ति का पता चलता है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं। इस पर अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर-
‘समुद्र’ शीर्षक कविता के माध्यम से महाकवि सीताराम महापात्र ने कई प्रकार के प्रश्नों को उठाया है। इन प्रश्नों के भीतर मनुष्य की उपभोक्तावादी संस्कृति का दिग्दर्शन होता है।

‘ कवि ने ‘समुद्र’ के विराट एवं उदार पक्ष को उदघाटित किया है। समुद्र मनुष्य के लिए अपना अक्षय भंडार सुपुर्द कर देता है। वह मनुष्य को यह भी छूट दे देता है कि जो चाहो, जितना चाहो अपने उपयोग के लिए मेरे इस अक्षय भांडर का सदुपयोग करो। इससे मेरा कुछ स्वरूप नहीं बदलेगा। मेरा कुछ नहीं घटेगा। इन भावों में ‘समुद्र’ का प्रयोग प्रकृति के अवयव एवं प्रीतक रूप में प्रयोग हुआ है। समुद्र मानव के विकास में सदैव सहयोगी रहा है। ___’समुद्र’ अपने भीतर पल रहे जीव-जंतुओं की महत्ता एवं उपयोगिता पर भी प्रकाश डालते हुए उसकी बड़ाई की है। समुद्र के भीतर जितने भी जीव-जंतु पलते हैं वे किसी न किसी रूप में मानव के लिए हितकारी हैं।

कवि केंकड़े और घोंघे के द्वारा समुद्री जीव जंतुओं की महत्ता का प्रतीकात्मक रूप में प्रयोग करते हए वर्णन किया है। ये जीव मानव जीवन के लिए जितना जीवं रूप में उपयोगी हो सकते हैं। उतना मृत रूप में नहीं। अतः उनके जीवन में उसे सौंदर्य और विशेषताएँ छिपी हैं वे उनके मृत रूप से प्राप्त वस्तुओं में नहीं।

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कवि-समुद्र के सचित्र को फ्रेम में मढ़ाकर अपने टी. वी. के समक्ष रखकर जो आनंद उठाना चाहता है, वह उचित नहीं जान पड़ता।
समुद्र के ‘गजन-तर्जन, नृत्य-गीत एवं हलचल, में जो जीवंतता है, जो सौंदर्य-बोध है वह उसके चित्र युक्त फोटो फ्रेम में नहीं। यहाँ समुद्र का प्रतीकात्मक प्रयोग है। समुद्र का मानव हित के लिए कितनी उपयोगिता है उसके यथार्थ रूप में कितना सौंदर्य है आनंद है, प्रसन्नता मिल सकती है वह उसके चित्र में संभव नहीं।

कवि अपनी कविता में समुद्र की विराटता एवं उदारता को प्रकट करते हुए उसकी विशेषताओं की ओर ध्यान खींचा है। जिस प्रकार, सूर्य सदैव प्यासे रूप में सागर के जल को पीकर तृप्त नहीं होता है, उसकी प्यास यथावत बनी रहती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य की भी स्थिति है। मनुष्य भी बड़ा स्वार्थी है, वह सदियों से भूखा-प्यासा रहा है। वह प्रकृति के विभिन्न स्रोतों एवं रूपों का शोषण-दोहन किया है लेकिन उसकी भूख और प्यास अतृप्त अवस्था में ही है।

कवि मनुष्य से कुछ कामना करता है यानि समुद्र कहता है कि मनुष्य को जो देना है। वह दे दे किन्त वह देगा क्या? उसके पास लेने के सिवा देने के लिए है ही क्या? उसका चंचल और आतुर जीवन कभी भी स्थिर नहीं रहा है। उसमें ठहराव भी नहीं।
समुद्र कहता है कि मानव निर्मित पद-चिन्हों को तो वह सदैव लीप-पोतकर मिटाता रहा है। उसकी आतुरता, चंचलता को अपने आलोड़न यानि हलचल में समाहित कर लेता है। यही तो सागर का काम है। मानव के अस्तित्व को अपने अस्तित्व में समाहित कर लेना।

यहाँ सृजन एवं संहार के गूढ भावों की ओर कवि ने ध्यान आकृष्ट किया है। कवि ने सागर द्वारा प्रकृति के रहस्यमयी रूपों को उद्घाटित किया है। मानव की सभ्यता और संस्कृति सदैव पुरातन से नूतन की ओर अग्रसर होती रही है। वह जड़-चेतन के अटूट संबंधों को भी अपनी काव्य-पक्तियों के द्वारा उद्घाटित करता है। . इस प्रकार सीताराम महापात्र ने अपनी काल्य प्रतीभा द्वारा प्रकृति और मानव के बीच के संबंधों को उद्घाटित करते हुए उसके उपभोक्तावादी संस्कृति पर भी तीखा व्यंग्य किया है। मानव सदैव से ही प्रकृति के साथ अपना संबंध स्थापित कर उसके विभिन्न स्रोतों से अपने स्वार्थ की पूर्ति में सदैव संलग्न रहा है। इस प्रकार यह कविता ‘समुद्र’ के माध्यम से मानव जीवन की उपभोक्तावादी संस्कृति को उद्घाटित करने में सक्षम है।

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प्रश्न 8.
कविता के अनुसार मनुष्य और समुद्र की प्रकृति में क्या अंतर है?
उत्तर-
‘समुद्र’ कविता सीताराम महापात्र की एक उत्कृष्ट कविता है। इसमें मनुष्य और समुद्र के बीच के अटूट संबंध पर कवि ने प्रकाश डाला है।

कवि सागर की उदारता, विराटता और उसकी महत्ता का अनूठा चित्रण प्रस्तुत किया है। सांगर का स्वरूप सदैव से मनुष्य के लिए हितकारी रहा है। सागर के पास अक्षय भंडार है। उसके गर्भ में रत्नों की खान है। जीव-जंतुओं की अधिक भरमार है। वे किसी न किसी रूप में मानव जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं।

अपनी ‘समुद्र’ कविता में कवि ने उसके विविध रूपों का वर्णन किया है। समुद्र का प्रयोग प्रतीक प्रयोग है। समुद्र खुले हाथ से अपनी अक्षय निधि को मानव के लिए दान करना चाहता है। वह दानवीर एवं त्यागी रूप में चित्रित हुआ है। मनुष्य को जितना जिस चीज की जरूरत हो, खुले हृदय से वह सागर के गर्भ से ले सकता है। इसके लिए सागर को कोई पीड़ा होने का उलाहना देने की स्थिति नहीं आएगी।

सागर में पल रहे जीव-जंतुओं का उपयोग भी मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए करता है किंतु इस पक्ष का कवि समर्थन नहीं करता। कवि की दृष्टि में यह मानव का कमजोर पक्ष साबित हुआ है। वह घोंघों, केंकड़े की जीवंतता में विश्वास करता है, उसके मेरे हुए जीवन के उपयोग में नहीं।

समुद्र अपनी प्राकृतिक सुषमा के यथार्थ चित्र को मनुष्य के लिए हितकारी मानता है। समुद्र का असली रूप ही जिसमें गर्जन-तर्जन निहित है, गीत-नृत्य जुड़ा हुआ है और उसके बीच हलचल यानि जल-तरंगें उठती रहती हैं, उसी यथार्थ रूप का कवि पक्षधर है। समुद्र के इसी रूप में जो आनंद, उत्साह या प्रसन्नता मनुष्य को मिलती है वह उसके मृत चित्र में नहीं। यह प्रकृति के असली रूप के दिग्दर्शन, उसके सौंदर्य को देखने-परखने का हिमायती कवि रहा है।

कवि समुद्र की अभिलाषा को भी प्रकट करता है। वह हमेशा से चिर-तृषित सूर्य की प्यास को बुझाते आया है। लेकिन सूर्य की प्यास आज भी अतृप्त है। यहाँ सूर्य का प्रयोग मनुष्य के लिए हुआ है। मनुष्य की लालसा, आकांक्षा या भूख-प्यास सदियों से अमिट रूप लिए रही है। वह आज भी, उतना ही भूखा-प्यासा है जितना सृष्टि के आरंभ में था। उसकी आकांक्षा आज और विकराल रूप धारण कर चुकी है। वह अपनी स्वार्थपरता में अंधा हो चुका है वह अपने हित में प्रकृति के संसाधनों एवं रूपों का शोषण-दोहन करता आ रहा है। कवि अपनी कविताओं समुद्र की उदारता को चित्रित किया है। वह मानव द्वारा निर्मित पद-चिन्हों को लीप-पोतकर मिटाने का काम करता रहा है। कहने का भाव यह है कि प्रकृति द्वारा मानव की सत्यता और संस्कृति के विकास में मदद तो मिला है किन्तु उसके संहार में भी समुद्र का कहीं न कहीं हाथ रहा है।

मनुष्य तो चंचल, आतुर चित्त वाला रहा है। वह अपने द्वारा सृजन कर्म करते चला आ रहा है। प्रकृति के भीतर सृजन के साथ संहार तत्व भी छिपा रहता है। इसमें जब प्रकृति के नियमों का व्यतिक्रमण होता है तब वह अनुशासन कायम करना भी जानती है। इस प्रकार सृजन-संहार के बीच मानव और प्रकृति का निरंतर खेल चलता रहता है। प्रकृति के कई रूप मानव के विकास में सहायक होते हैं तो कई रूप उनके अस्तित्व को नवीन रूप देने में भी संलग्न रहते हैं। इस प्रकार पुरातन और नूतन के बीच एक रहस्यमयी खेल चलता रहता है। मनुष्य का स्वभाव और प्रवृत्ति अपने हित और स्वार्थ में उपभोक्तावादी है जबकि प्रकृति या समुद्र का रूप सृजन को ऊंचाई देने के साथ उसका सुव्यवस्थित करने में भी सक्रिय है। मनुष्य उपभोक्ता है और प्रकृति संसाधनों से युक्त है। इस प्रकार समुद्र भी प्राकृतिक संसाधन है और मनुष्य का उसके साथ अटूट संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों सृजन और संहार के बीच जीते हुए युगों-युगों से परस्पर संबंधों का निर्वाह करते आ रहे हैं।

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प्रश्न 9.
कविता के माध्यम से आपको क्या संदेश मिला है?
उत्तर-
‘समुद्र’ कविता के माध्यम से सीताराम महापात्र ने मानव के लिए एक नूतन संदेश देने का काम किया है। अपनी इस उत्कृष्ट कविता के द्वारा कवि ने समुद्र . की उपयोगिता, महत्ता, विराटता और उसकी मानव के लिए जरूरत की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए प्रकृति के यथार्थ रूप का सुंदर और सटीक चित्रण किया है।

कवि ने समुद्र की उदारता के प्रबल पक्ष को उदघाटित किया है। समुद्र सदैव अपने अक्षय भंडार को मानव हित के लिए बिना मीन-मेष के प्रस्तुत किया है। वह मनुष्य को संदेश देता है कि मेरे गर्भ में अक्षय भंडार से जितना लाभ लेना हो दिल खोलकर ले लो। संकोच मत करो। मेरा उससे कुछ घटने वाला नहीं है। प्रस्तुत कविता के द्वारा कवि ने लोकहितकारी पक्ष को उद्घाटित करते हुए प्रकृति को मनुष्य के विकास में सहायक के रूप में चित्रित किया है। प्रकृति सदैव से मनुष्य के विकास में तत्पर रही है। जन्म से मरण तक समुद्र ने मानव के विकास में योगदान किया है।

समुद्र भी प्रकृति का ही एक हिस्सा है, अंग है, संसाधन है। इस प्रकार समुद्र की मानव के जीवन के लिए क्या उपयोगिता है, इस सम्यक् प्रकाश डाला है। . इस कविता में समुद्र समाज का प्रतीक है। समुद्र जो प्रकृति का एक हिस्सा है वह मनुष्य को सब कुछ देना चाहता है क्योंकि वह अक्षय है। उसके पास अपार संपदा है जो मानव के लिए उपयोगी है।

. समुद्र का असली स्वरूप जितना मानव के लिए लाभप्रद है उतना चित्रयुक्त फ्रेम में भरा हुआ फोटो नहीं। सागर के गर्जन-तर्जन, गीत-नृत्य एवं आलोड़न में उसकी प्राकृतिक सुषमा छिपी हुई है। वह मानव के लिए उपयोगी और उत्साहवर्द्धक है। प्यासे सूरज यानि प्रतीक रूप में भूखे-प्यासे मनुष्य को चित्रित किया गया है। मनुष्य तो सदियों से भूखा-प्यासा है। उसकी आकांक्षाएँ, इच्छाएँ, असीमित हैं। वह स्वार्थ में अंधा होकर अपने हित की ही सोचता रहा है।

समुद्र मानव से लेने की अभिलाषा नहीं रखता है। वह उसे देने की कामना रखता है। मनुष्य तो सदैव से चंचल और आतुर प्रकृति का रहा है। इसीलिए उसकी समस्याएँ एवं इच्छाएँ भी अनंत हैं।

समुद्र ने सृजन-संहार के बीच यह मध्यस्थता का रूप रखा है। वह प्रकृति के नियमों को संतुलन रखने में सदैव तत्पर रहा है। मनुष्य और प्रकृति के बीच अटूट संबंध तो है ही किन्तु उसने नियमों के बीच अनुशासन को प्राथमिकता दिया है। कहने का भाव यह है कि प्रकृति अपने नियमों के व्यतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं करती।

अतः समुद्र कविता मानव के उपभोक्तावादी स्वरूप का सूक्ष्म चित्रण करते हुए समुद्र रूपी समाज के विविध पक्षों का संतुलित एवं उदार पक्षों का उद्घाटन किया है। यह कविता उत्कृष्ट कविता के रूप में प्रस्तुत है।

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प्रश्न 10.
‘किन्तु मेरी रेत पर जिस तरह दिखते हैं। उस तरह कभी नहीं दिखेंगे।’ पंक्तियों के माध्यम से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-
‘समुद्र’ शीर्षक काव्य पाठ से उपरोक्त पंक्तियाँ ली गई हैं। इस कविता के कवि श्री सीताराम महापात्र जी हैं। उन्होंने अपनी कविता में छोटे-छोटे जीव-जंतुओं के प्रतीक प्रयोगों द्वारा मानव जीवन के विकास में उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला है।

कवि घोंघे को प्रस्तुत करते हुए सागर की पीड़ा को व्यक्त करता है। सागर मानव से प्रश्न करता है कि तुम किसलिए घोंघे को ले जाना चाहते हो? उनको ले जाकर कमीज का बटन बनाओगे या नाड़ा काटने का औजार या टेबुल पर उन्हें रखकर ड्राइंग रूप को सजाओगे? इन पंक्तियों में घोंघे के माध्यम से समुद्र की भीतर पल रहे जीव-जंतुओं की सार्थकता उसकी उपयोगिता पर कवि ने सत्य रूप से चिंतन किया है। जिस प्रकार इन जीवों के मृत स्वरूप से अपने स्वार्थ की पूर्ति में मानव लगा हुआ है यह यथोचित नहीं प्रतीत होता है। यह मानव का क्रूर पक्ष है जो कवि को अच्छा नहीं लगता। कवि घोंघे जैसे सागर में पल रहे अनेक जीव-जंतुओं की जीवंतता को तरजीह देते हुए उनके सजीव जीवन के लिए पक्ष लेते हुए अपना तर्क प्रस्तुत करता है।

समुद्र कहता है कि ये घोंघे जिस तरह मेरी रेत यानि मेरी छाती पर रेंगते हुए विचरण करते हैं उसमें जो सौंदर्य और आनंद मिलता है वह उनके मृत रूप से बने हुए वस्तुओं से नहीं। वे मृत रूप में अपने जीवंत स्वरूप का दर्शन नहीं दे सकते। यह उनके लिए कष्टकर नहीं बल्कि समद्र के लिए भी कष्टकर है यहाँ समद्र समाज के रूप में चित्रित हुआ है और समाज में पल रहे छोटे-छोटे जीव यानि दीनहीन बेबस, बेकस, लाचार लोगों के भी अस्तित्व का ख्याल रखना होगा।

कवि यहाँ अपनी काव्य प्रतिभा कर परिचय देते हुए समुद्र रूपी समाज और घोंघे सदृश समाज में पल रहे छोटे-छोटे असहाय और निर्बल लोगों के प्रति भी सहानुभूति और दर्द रखने की आवश्यकता है।

कवि अपने प्रतीक प्रयोगों द्वारा समाज के यथार्थ रूप का बड़ा ही स्पष्ट और स्वस्थ चित्र प्रस्तुत किया है।
इस प्रकार ‘समुद्र’ कविता प्रतीकात्मक कविता है जो प्रकृति और मनुष्य के अटूट संबंधों को उद्घाटित तो करती ही है वह समाज में व्याप्त कुरीतियों, अव्यवस्थाओं के साथ मानव के अस्तित्व और उसकी स्वार्थपरक नीतियों का भी सम्यक् उद्घाटन किया है।

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प्रश्न 11.
“जितना चाहो ले जाओ/फिर भी रहेगी बची देने की अभिलाषा’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
‘समुद्र’ शीर्षक से प्रस्तुत कविता हमारी पाठ्य पुस्तक से ली गई है। इस कविता के कवि सीताराम महापात्र जी हैं। उन्होंने अपनी इस कविता में समुद्र के प्रतीक प्रयोगों द्वारा समाज में परिव्याप्त अनेक विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।

यहाँ समुद्र मानव से कहता है कि जितना चाहो तुम ले जाओ। कहने का मूल भाव यह है कि समुद्र अक्षय भंडार है। उसके गर्भ में अनेक रत्नों का भंडार है। उसके गर्भ में अनेक जीव-जंत पल रहे हैं। वह कहता है कि अपनी तषित प्यास बुझाने के लिए भूख मिटाने के लिए अपनी क्षमता से भी अधिक जो चाहो, जितना चाहो मेरे अक्षय शेष से ले सकते हो।

यहाँ ‘समुद्र’ के उदार और विराट पक्ष को उद्घाटित किया गया है। समुद्र कहता है कि सब कुछ दे देने के बाद भी मेरी अभिलाषा अशेष रहेगी। मुझे किसी भी प्रकार की पीड़ा, वेदना या खेद नहीं होगा।
उपरोक्त काव्य पंक्तियों में कवि ने ‘समुद्र’ के रूप में इस विशाल मानव समाज की विराटता, उदारता और सहिष्णुता का समुचित उद्घाटन किया है।
समाज तो सदैव ही मानव के विकास में तत्पर रहा है। समाज ने मानव को जन्म से लेकर मरण तक सभी क्षेत्रों में विकास करने के लिए अपना सहयोग दिया।

समाज समुद्र रूपी अथाह अक्षय भंडार है। उसके पास अपरिमित बल है। उसके भीतर छोटे जीव से लेकर बड़े जीव सबका पालन-पोषण होता है। सबको संरक्षण मिलता है। इस प्रकार प्रकृति के एक रूप में मनुष्य का इस धरती पर अवतरित होना अपने में एक महत्वपूर्ण घटना है। समुद्र की अभिलाषा या आकांक्षा अनंत है। उसका व्यक्तित्व विराट है। उसके पास धन-संपदा का अकूत भंडार है। वह मानव के हित के लिए सदैव तत्पर और जागरूक रहा है।

प्रस्तुत कविता में समाज को समुद्र के रूप में चित्रित करते हुए उसकी उपयोगिता के बारे में प्रकाश डाला गया है। व्यक्ति के विकास में समाज का अत्यंत ही उदार पक्ष सदैव से चिंतित रहा है। मानव और समाज के बीच अटूट रिश्ता है। समाज व्यक्ति या मानव को उसके व्यक्तित्व के विकास में अपना अमूल्य योगदान देते हुए उससे कुछ भी अपेक्षा नहीं रखता। ठीक उसी प्रकार समुद्र की भी स्थिति है। दोनों की साम्यता के आधार पर कवि ने प्रकृति और पुरुष के बीच के अमिट संबंधों को चित्रित करते हुए समाज की महत्ता पर प्रकाश डाला है।

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प्रश्न 12.
इस कविता के माध्यम से समुद्र के बारे में क्या जानकारी मिलती है? .
उत्तर-
‘समुद्र कविता’ महाकवि सीताराम महापात्र द्वारा लिखित एक उत्कृष्ट कविता है। इस कविता में ‘समुद्र’ समाज के लिए प्रतीक प्रयोग के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

‘समुद्र’ कविता के द्वारा समुद्र की विराटता, उदारता और उसकी महत्ता पर कवि ने समुद्र को एक दानवीर उदार और लोकहितकारी रूप में चित्रित करते हुए कहा है कि ‘समुद्र’ अपनी मौन और अबूझ भाषा में बहुत कुछ कह देता है। वह ” अपनी चिंता नहीं करता। वह अपने बारे में कहता है कि मेरा कुछ भी नहीं घटता . या बिगड़ता है। हे मानव! तुम जितना चाहो मेरे उदर से या अक्षय भंडार से जितना रत्न या वस्तुएँ चाहो, नि:संकोच रूप में ले जा सकते हो, तुम कितना भी ले जाओगे फिर भी मेरी अभिलाषा तुम्हें देने से भरेगी नहीं बल्कि और उदार रूप में देने के लिए तत्पर रहेगी।

‘समुद्र मानव से कहता है कि तुम क्या चाहते हो ले जाना। क्या मेरे भीतर घोंघे सदृश जो छोटे-छोटे जीव जंतु, पल रहे हैं उन्हें पकड़कर ले जाना चाहते हो क्या? उन्हें ले जाकर तुम क्या बनाओगे? कमीज के बटन बनाओगे क्या? या नाड़ा काटने का औजार बनाओगे क्या? टेबुल पर सजाने के लिए इन घोंघों का उपयोग करना चाहते हो क्या? लेकिन एक बात याद रखो तुम? ये मेरी रेत पर जिस स्वच्छंदता और उन्मुक्तता के साथ विचरण करते हैं उस स्वरूप का तुम्हें दर्शन नहीं होगा। इन्हें जीवंत रूप में तुम देख नहीं पाओगे?

नीचे लिखे पद्यांशों को सावधानीपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें।

1. समुद्र का कुछ भी नहीं होता।
मानो अपनी अबूझ भाषा में
कहता रहता है
जो भी ले जाना हो ले जाओ
जितना चाहो ले जाओ
फिर भी बची रहेगी देने की अभिलाषा
(क) कवि और कविता के नाम लिखें।
(ख) “समुद्र का कुछ भी नही होता’-इस कथन को स्पष्ट करें।
(ग) समुद्र अपनी अबूझ भाषा में क्या कहता रहता है?
(घ) “फिर भी रहेगी बची देने की अभिलाषा’-समुद्र के इस कथन का अभिप्राय लिखें।
उत्तर-
(क) कवि-सीताकांत महापात्र, कविता-समुद्र

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(ख) प्रस्तुत पंक्ति में कवि यह कहता है कि समुद्र कीमती रत्नों, पत्थरों, अन्य वस्तुओं तथा जीव-जंतुओं से भरा होता है। लेकिन यह समुद्र की उदारता का परिणाम है कि समुद्र अपनी उन तमाम वस्तुओं को मुक्त हस्त से दान देकर लेनेवाले को कृतार्थ कर देता है। ऐसी स्थिति में वह सबकुछ का स्वामी होकर भी कुछ का भी स्वामी नहीं बन पाता है। समुद्र के गर्भ में रहनेवाले सारे-के-सारे पदार्थ समुद्र के होकर भी उसके पास नहीं रहते। उन सारी वस्तुओं को लोग इच्छा के अनसार प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए तो इस पंक्ति में कवि के कहा है कि समुद्र का कुछ भी नहीं होता।

(ग) समुद्र अपनी अबूझ भाषा में लोगों से कहता रहता है-आ जाओ मेरे पास जो भी ले जाना चाहते हो हमारे पास से ले जाओ। जितना चाहो उतना ले जाओ, लेकिन मैं जानता हूँ कि सबकुछ लेने के बाद भी तुम्हारी लालसा पूरी नहीं होगी।

(घ) प्रस्तुत पंक्ति में कवि ने समुद्र की विशालता और उदारता का परिचय दिया है। समुद्र लोगों को बुला-बुलाकर उनकी इच्छा के अनुकूल उन्हें अपने पास की सारी वस्तुओं को दे देकर कृतार्थ करता रहता है। वह अपने पास कुछ भी नहीं रखना चाहता। इन सारी चीजों को देने के बाद भी समुद्र को संतोष नहीं होता। वह सबकुछ लुटाकर भी कुछ और देने की अभिलाषा से विरत नहीं हो पाता है। उसकी देते रहने की यह अभिलाषा शाश्वत रहती है।

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2. जो ले जाना चाहते हो, ले जाओ, जी भर
कुछ भी खत्म नहीं होगा मेरा
चिर-तृषित सूर्य लगातार
पीते जा रहे हैं मेरी ही छाती से
फिर भी तो मैं नहीं सूखा!
और जो दे जाओगे, दे जाओ खुशी-खुशी
पर दोगेभी क्या
(क) कवि और कविता का नाम लिखें।
(ख) समुद्र क्या कहकर लोगों को कुछ ले जाने के लिए आमंत्रित करता है?
(ग) सूर्य का समुद्र के साथ कैसा संबंध है? उससे समुद्र का क्या बनता बिगड़ता है?
(घ) समुद्र का कुछ भी खत्म नहीं होता, आखिर क्यों?
(ङ) “पर दोगे भी क्या’ इस व्यंग्यार्थ को स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कवि-सीताकांत महापात्र, कविता-समुद्र

(ख) समुद्र यह कहकर लोगों को बार-बार आने का आमंत्रण देता है कि जो कुछ ले जाना हों, उसे इच्छा भर मुझसे ले जाओ। उसे देने में कोई भी कंजूसी नहीं है। मेरा कुछ भी और कभी भी खत्म नहीं होगा। यहाँ समुद्र की यह उदारता और परकल्याण की भावना कवि की दृष्टि में स्तुत्य और वरेण्य है, साथ-ही-साथ प्रेरणादयक भी।

(ग) सूर्य की तप्त और प्यासी किरणें दिन भर समुद्र की विशाल जलराशि के तल पर लोटती और पसरी रहती है। ऐसा लगता है कि सूर्य बहुत प्यासा है तथा अपनी गर्मी से व्याकुल है। अपनी उसी प्यास की आकुलता को मिटाने के लिए वह अपनी किरणों को समुद्र के पास भेजकर जल प्राप्त करता है और इस रूप में अपनी प्यास बुझाता रहता है। लेकिन, यह उस समुद्र के जलकोष की विलक्षणता है कि समुद्र कभी सूखता नहीं।

(घ) समुद्र दान देना जानता है और वह दान देता रहता है। वह लेना नहीं जानता, इसलिए वह किसी से कुछ लेता ही नहीं है। लेकिन, यह अद्भुत बात है कि समुद्र अपने कोष से लुटाकर भी कभी रिक्तहस्त नहीं होता, अर्थात खाली नहीं होता। आखिर क्यों? इसका कारण है कि जो देने में सुख पाता है उसके पास देय वस्तु की कमी नहीं रहती। यह प्रकृति का नियम है। क्या सूर्य की रोशनी कभी कम हुई है? क्या चंद्रमा कभी अपनी निर्मलता और शीतलता से विरत हुआ है? उत्तर · है नहीं, नहीं, नहीं। तो समुद्र कैसे खाली होगा?

(ङ) समुद्र के इस व्यंग्य कथन का अर्थ यह है कि जो मनुष्य किसी से केवल पाने की इच्छा रखता है वह उसको भला प्रतिदान में क्या दे पाएगा? मनुष्य तो तमाम प्राकृतिक उपादानों से कुछ-न-कुछ पाता ही रहा है-सूर्य से प्रकाश, चंद्रमा से शीतलता, हवा से गतिशीलता, पेड़-पौधों से फूल और फल। उसके भाग्य में तो केवल लेना ही लेना लिखा है। उसने प्रकृति को आजतक कुछ दिया भी है क्या? लेनेवाला सचमुच दिल से बड़ा गरीब होता है और देनेवाला दिल का राजा। समुद्र ऐसा ही राजा है।

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3. उन पद चिन्हों को
लीप-पोंछकर मिटाना ही तो है मेरा काम
तुम्हारी आतुर वापसी को
अपने स्वभाव सुलभ
अस्थिर आलोड़न में
मिला लेना ही तो है काम मेरा।
(क) कवि एवं कविता के नाम लिखें।
(ख) कवि ने यहाँ किन पद-चिन्हों की चर्चा की है?
(ग) समुद्र उन पद-चिन्हों के साथ कैसा व्यवहार करता है, और क्यों?
(घ) समुद्र का प्राकृतिक स्वभाव क्या है?
(ङ) इस पद्यांश में चित्रित समुद्र के हृदय की विशालता का परिचय दीजिए।
उत्तर-
(क) कवि-सीताकांत महापात्र, कविता-समुद्र ।

(ख) लोग समुद्र से कुछ पाने के लिए उसके पास जाते हैं और उससे इच्छानुकूल वस्तुओं को पाकर अपने घर लौट जाते हैं। लोगों के समुद्र के पास इस . रूप में आने-जाने से लोगों के पदचिन्ह रेत रूपी समुद्र की छाती पर अंकित हो जाते हैं। कवि ने यहाँ इन्हीं पदचिन्हों की चर्चा की है। ये पदचिन्ह इस बात के साक्षी हैं कि लोगों ने समुद्र से दान और कल्याण के रूप में कुछ पाया है।

(ग) समुद्र सचमुच विशाल. हृदयवाला है। वह इस रूप में कि वह उन पदचिन्हों को अपनी बड़ी-बड़ी लहरों को फैलाकर लीप-पोंछकर मिटा देता है। वह यह संसार को दिखाना नहीं चाहता है। कि लोग बचे हुए उन पदचिन्हों को देखकर यह न समझें कि ये पदचिन्ह समुद्र से उपकृत होनवाले लोगों के हैं। समुद्र अपने द्वारा किए गए उपकारों का प्रचार और प्रसार नहीं चाहता है और विज्ञापन के उन चिन्हों को अपनी लहरों से मिटाकर ही दम लेता है।

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(घ) कवि के अनुसार समुद्र का प्रकृतिक स्वभाव है-अपनी वस्तुओं को दानस्वरूप देकर संसार पर उपकार करना, लेकिन लोगों से कुछ पाने की कामना नहीं पालना। उसे लोगों को कुछ देने में बड़ा सुख मिलता है। लेना तो वह कुछ जानता ही नहीं है। उसका सबसे बड़ा गुण इस संदर्भ में यही परिलक्षित होता है कि वह नहीं चाहता है कि उसके द्वारा किए गए परोपकार का कोई चिन्ह कहीं बचे और उसे विज्ञापन का लाभ मिले। समुद्र के हृदय की यह विशालता सचमुच अनुकरणीय और प्रेरणादायक है।

(ङ) इस प्रश्न के उत्तर के लिए ऊपर के प्रश्न (घ) का उत्तर देखें।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

BSEB Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 10 Science कार्बन एवं इसके यौगिक InText Questions and Answers

अनुच्छेद 4.1 पर आधारित

प्रश्न 1.
CO2 सूत्र वाले कार्बन डाइऑक्साइड की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना क्या होगी?
उत्तर:
CO2 सूत्र वाले कार्बन डाइ-ऑक्साइड की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना निम्न प्रकार है –
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प्रश्न 2.
सल्फर के आठ परमाणुओं से बने सल्फर के अणु की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना क्या होगी?
(संकेतः सल्फर के आठ परमाणु एक अंगूठी के रूप में आपस में जुड़े होते हैं।)
उत्तर:
सल्फर के अणु की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना निम्न प्रकार है –
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अनुच्छेद 4.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
पेन्टेन के लिए आप कितने संरचनात्मक समावयवों का चित्रण कर सकते हैं?
उत्तर:
पेन्टेन के लिए तीन संरचनात्मक समावयवों का चित्रण निम्नवत् किया जा सकता है –
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प्रश्न 2.
कार्बन के दो गुणधर्म कौन-से हैं जिनके कारण हमारे चारों ओर कार्बन यौगिकों की विशाल संख्या दिखाई देती है?
उत्तर:
कार्बन यौगिकों की बहुतायत के निम्नलिखित दो कारण हैं –
1. कार्बन परमाणु श्रृंखलन (catenation)।
2. कार्बन परमाणु की चतुः संयोजकता।
शृंखलन कार्बन परमाणुओं का विशेष गुण होता है जिसके कारण कार्बन परमाणु सीधी, शाखित या चक्रीय श्रृंखलाएँ बना लेते हैं।
चतुःसंयोजकता के कारण कार्बन अपने ही परमाणुओं के साथ एकल, द्वि या त्रिक सहसंयोजक आबंध बनाते हैं।
उपर्युक्त कारणों से कार्बन बहुत अधिक संख्या में यौगिक बनाता है। अतः हमारे चारों ओर कार्बनिक यौगिकों की विशाल संख्या दिखाई देती है।

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प्रश्न 3.
साइक्लोपेन्टेन का सूत्र तथा इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना क्या होंगे?
उत्तर:
साइक्लोपेन्टेन का सूत्र CH5H10 होता है। C5H10 की इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना निम्न प्रकार से है
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प्रश्न 4.
निम्न यौगिकों की संरचनाएँ चित्रित कीजिए –

  1. एथेनॉइक अम्ल
  2. ब्रोमोपेन्टेन’
  3. ब्यूटेनोन
  4. हेक्सेनैल

क्या ब्रोमोपेन्टेन के संरचनात्मक समावयव संभव हैं?
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हेक्सेनैल हाँ, ब्रोमोपेन्टेन के संरचनात्मक समावयव सम्भव हैं।

प्रश्न 5.
निम्न यौगिकों का नामकरण कैसे करेंगे?
उत्तर:
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  1. ब्रोमोएथेन
  2. मेथेनॉल
  3. हेक्सा 1-आइन

अनुच्छेद 4.3 पर आधारित

प्रश्न 1.
एथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल में परिवर्तन को ऑक्सीकरण अभिक्रिया क्यों कहते हैं?
उत्तर:
एथेनॉइक अम्ल में एथेनॉल की अपेक्षा एक ऑक्सीजन परमाणु अधिक और दो हाइड्रोजन परमाणु कम होते हैं। ऑक्सीजन की वृद्धि और हाइड्रोजन की कमी वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ ऑक्सीकरण अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।

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प्रश्न 2.
ऑक्सीजन तथा एथाइन के मिश्रण का दहन वेल्डिंग के लिए किया जाता है। क्या आप बता सकते हैं कि एथाइन तथा वायु के मिश्रण का उपयोग क्यों नहीं किया
जाता?
उत्तर:
वायु में नाइट्रोजन और अन्य निष्क्रिय गैसें होती हैं जो एथाइन के दहन हेतु ऑक्सीजन की प्रचुर आपूर्ति को बाधित करती हैं, इसलिए एथाइन के दहन के लिए वायु का उपयोग नहीं कर सकते हैं।

अनुच्छेद 4.4 पर आधारित

प्रश्न 1.
प्रयोग द्वारा आप ऐल्कोहॉल एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल में कैसे अंतर कर सकते हैं?
उत्तर:
ऐल्कोहॉल और कार्बोक्सिलिक अम्ल में निम्न प्रकार से अंतर किया जा सकता है –
1. ऐल्कोहॉल और सोडियम कार्बोनेट की अभिक्रिया कराने पर कोई गैस नहीं निकलती है।
2. कार्बोक्सिलिक अम्ल की सोडियम कार्बोनेट से अभिक्रिया कराने पर सनसनाहट के साथ CO2गैस उत्पन्न होती है जो चूने के पानी को दूधिया कर देती है।

प्रश्न 2.
ऑक्सीकारक क्या हैं?
उत्तर:
वे रासायनिक पदार्थ जो स्वयं अपचयित होकर दूसरे को ऑक्सीकृत करते हैं उन्हें ऑक्सीकारक कहते हैं। जैसे – KMnO4 K2Cr2O7 ऑक्सीकारक हैं।

अनुच्छेद 4.5 पर आधारित

प्रश्न 1.
क्या आप डिटरजेंट का उपयोग कर बता सकते हैं कि कोई जल कठोर है अथवा नहीं?
उत्तर:
नहीं, क्योंकि अपमार्जक (डिटरजेंट) कठोर और मृदु दोनों प्रकार के जल के साथ अधिक मात्रा में झाग उत्पन्न करते हैं।

प्रश्न 2.
लोग विभिन्न प्रकार से कपडे धोते हैं। सामान्यतः साबन लगाने के बाद लोग कपडे को पत्थर पर पटकते हैं, डंडे से पीटते हैं, ब्रश से रगड़ते हैं या वाशिंग मशीन में कपड़े रगड़े जाते हैं। कपड़ा साफ करने के लिए उसे रगड़ने की क्यों आवश्यकता होती है?
उत्तर:
साबुन से कपड़े धोकर साफ करने के लिए रगड़ना या पीटना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि जल में उपस्थित मैग्नीशियम और कैल्सियम के लवणों के साथ साबुन क्रिया करके अघुलनशील, श्वेत दही जैसा पदार्थ बनाता है। यह पदार्थ कपड़ों पर चिपक जाता है। उसे हटाने के लिए ब्रश या हाथ से रगड़कर कपड़ों को धोना आवश्यक है।

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प्रश्न 1.
एथेन का आणविक सूत्र – C2H6 है। इसमें
(a) 6 सहसंयोजक आबंध हैं
(b) 7 सहसंयोजक आबंध हैं
(c) 8 सहसंयोजक आबंध हैं
(d) 9 सहसंयोजक आबंध हैं
उत्तर:
(b) 7 सहसंयोजक आबंध हैं।

प्रश्न 2.
ब्यूटेनॉन चर्तु-कार्बन यौगिक है जिसका प्रकार्यात्मक समूह है
(a) कार्बोक्सिलिक अम्ल
(b) ऐल्डिहाइड
(c) कीटोन
(d) ऐल्कोहॉल
उत्तर:
(c) कीटोन

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प्रश्न 3.
खाना बनाते समय यदि बर्तन की तली बाहर से काली हो रही है तो इसका मतलब है कि –
(a) भोजन पूरी तरह नहीं पका है
(b) ईंधन पूरी तरह से नहीं जल रहा है
(c) ईंधन आर्द्र है
(d) ईंधन पूरी तरह से जल रहा है
उत्तर:
(b) ईंधन पूरी तरह से नहीं जल रहा है।

प्रश्न 4.
CH3Cl में आबंध निर्माण का उपयोग कर सहसंयोजक आबंध की प्रकृति समझाइए।
उत्तर:
CH3Cl की आबंध संरचना निम्न प्रकार है –
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उपर्युक्त संरचना में तीन हाइड्रोजन परमाणु कार्बन से सहसंयोजक आबंध द्वारा जुड़े हैं। कार्बन और क्लोरीन के बीच भी सहसंयोजक आबंध है परन्तु क्लोरीन कार्बन की अपेक्षा अधिक ऋणात्मक है इसलिए यह एक ध्रुवीय सहसंयोजक आबंध बनाती है।
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प्रश्न 5.
इलेक्ट्रॉन बिंदु संरचना बनाइए
(a) एथेनॉइक अम्ल
(b) H2S
(c) प्रोपेनोन
(d) F2
उत्तर:
(a) एथेनॉइक अम्ल
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(b) हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S)
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(c) प्रोपेनोन (CH3COCH3)
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(d) फ्लु ओरीन अणु (F2)
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प्रश्न 6.
समजातीय श्रेणी क्या है? उदाहरण के साथ समझाइए। (2009, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 18)
उत्तर:
कार्बनिक यौगिकों का वह समूह जिनका सामान्य सूत्र एवं क्रियात्मक समूह एक जैसा होता है उसे समजातीय श्रेणी कहते हैं तथा उसके सदस्यों को समजात गण कहते हैं। जैसे- मेथेनॉल CH3OH ; एथेनॉल CH3CH2OH ; प्रोपेनॉल CH3CH2CH2OH
समजातीय श्रेणी के सदस्यों के निम्नलिखित लक्षण हैं –
(a) सभी सदस्यों को एक सामान्य सूत्र द्वारा प्रदर्शित कर सकते हैं।
(b) सभी सदस्यों का एक ही क्रियात्मक समूह होता है।
(c) प्रत्येक क्रमागत सदस्य के अणुसूत्र में – CH2 का अंतर होता है।
(d) प्रत्येक क्रमागत सदस्य के अणुभार में 14 u का अंतर होता है।
(e) किसी एक सदस्य के गुणधर्म के आधार पर सभी सदस्यों के सामान्य गुणधर्म ज्ञात कर सकते हैं।

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प्रश्न 7.
भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्मों के आधार पर एथेनॉल एवं एथेनॉइक अम्ल में आप कैसे अंतर करेंगे?
उत्तर:
1. भौतिक गुण –
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2. रासायनिक गुण –
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प्रश्न 8.
जब साबुन को जल में डाला जाता है तो मिसेल का निर्माण क्यों होता है? क्या एथेनॉल जैसे दूसरे विलायकों में भी मिसेल का निर्माण होगा?
उत्तर:
साबुन के अणु के दो मुख्य भाग होते है – एक जलरागी और दूसरा जलविरागी। कार्बन शृंखला वाला भाग जलविरागी होता है और आयनिक भाग जिसमें सोडियम या पोटैशियम परमाणु होता है वह जलरागी होता है। यह जब पानी जैसे ध्रुवीय विलायक में डाले जाते हैं तब आवेशित भाग के कारण इनका जलरागी भाग बाहर (जल की ओर) होता है। इस प्रकार मिसेल बनते हैं। एथेनॉल एक अध्रुवीय विलायक है अतः इसमें जलरागी भाग के लिए आकर्षण भी नहीं होता है। अतः एथेनॉल में साबुन घोलने पर मिसेल नहीं बनेंगे।

प्रश्न 9.
कार्बन एवं उसके यौगिकों का उपयोग अधिकतर अनुप्रयोगों में ईंधन के रूप में क्यों किया जाता है?
उत्तर:
कार्बन और इसके यौगिक दहन के परिणामस्वरूप अधिक मात्रा में ऊष्मा देते हैं। कार्बन और हाइड्रोजन की प्रतिशत मात्रा अधिक होने के कारण इनका ज्वलन ताप सामान्य होता है। इनका रखरखाव आसान होता है तथा दहन नियन्त्रित किया जा सकता है। इसलिए कार्बन और उसके यौगिकों का उपयोग ईंधन के रूप में होता है।

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प्रश्न 10.
कठोर जल को साबुन से उपचारित करने पर झाग के निर्माण को समझाइए।
उत्तर:
कठोर जल में कैल्सियम और मैग्नीशियम के घुलनशील लवण होते हैं। जब साबुन से ये लवण क्रिया करते हैं तब अघुलनशील लवण बनाते हैं जिसे स्कम या झाग कहते हैं।
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प्रश्न 11.
यदि आप लिटमस पत्र (लाल एवं नीला) से साबुन की जाँच करें तो आपका प्रेक्षण क्या होगा?
उत्तर:
यदि हम लिटमस पत्र से साबुन की जाँच करें तो पता चलता है कि यह लाल लिटमस पत्र को नीला कर देता है। क्योंकि इसकी प्रकृति क्षारीय होती है।

प्रश्न 12.
हाइड्रोजनीकरण क्या है? इसका औद्योगिक अनुप्रयोग क्या है?
उत्तर:
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन श्रृंखला में हाइड्रोजन के योग को हाइड्रोजनीकरण कहते हैं। यह क्रिया उत्प्रेरक की उपस्थिति में कराई जाती है।
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हाइड्रोजनीकरण का उपयोग असंतृप्त वसा (तेल) को संतृप्त वसा (वनस्पति घी) बनाने वाले उद्योगों में होता है।
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प्रश्न 13.
दिए गए हाइड्रोकार्बन: C2H6, C3H8,C3H6, C2H2 एवं CH4 में किसमें संकलन अभिक्रिया होती है?
उत्तर:
C2H2 एवं C3H6 में संकलन अभिक्रिया होगी; क्योंकि ये दोनों यौगिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन हैं तथा इनमें द्वि व त्रि-आबंध उपस्थित हैं।
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प्रश्न 14.
मक्खन एवं खाना बनाने वाले तेल के बीच रासायनिक अंतर समझने के लिए एक परीक्षण बताइए।
उत्तर:
मक्खन संतृप्त हाइड्रोकार्बन है जबकि खाद्य तेल असंतृप्त हाइड्रोकार्बन है। इस अंतर को निम्न प्रकार से प्रदर्शित किया जा सकता है
1. थोड़े-से मक्खन को गर्म करके उसमें कुछ बूंदें ब्रोमीन जल डालते हैं। ब्रोमीन जल का रंग नहीं उड़ता। इससे यह पता चलता है कि मक्खन संतृप्त कार्बनिक यौगिक है।
2. खाद्य तेल में कुछ बूंदें ब्रोमीन जल की डालकर हिलाते हैं। कुछ समय बाद ब्रोमीन जल का रंग उड़ जाता है। इससे यह पता चलता है कि खाद्य तेल असंतृप्त कार्बनिक यौगिक है।

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प्रश्न 15.
साबुन की सफाई प्रक्रिया की क्रियाविधि समझाइए। (2013, 15, 17)
उत्तर:
साबुन के अणु ऐसे होते हैं जिनके दोनों सिरों के विभिन्न गुणधर्म होते हैं। जल में विलेय एक सिरे को जलरागी कहते हैं तथा हाइड्रोकार्बन में विलेय दूसरे सिरे को । जलविरागी कहते हैं। जब साबुन जल की सतह पर होता है तब इसके अणु अपने को इस प्रकार व्यवस्थित कर लेते हैं कि इसका आयनिक सिरा जल के अंदर होता है जबकि हाइड्रोकार्बन पूँछ (दूसरा छोर) जल के तैलीय गंदगी बाहर होती है। जल के अंदर इन अणुओं की एक विशेष व्यवस्था होती है ? जिससे इसका हाइड्रोकार्बन सिरा जल के बाहर बना होता है।
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ऐसा अणुओं का बड़ा गुच्छा बनने के कारण होता है जिससे जलविरागी पूँछ गुच्छे के आन्तरिक हिस्से में होती है जबकि उसका आयनिक सिरा गुच्छे की सतह चित्र मोदी के नाराज मिया पर होता है। इस संरचना को मिसेल कहते हैं। मिसेल के रूप में साबुन स्वच्छ करने में सक्षम होता है; क्योंकि तैलीय मैल मिसेल के केन्द्र में एकत्र हो जाते हैं। मिसेल विलयन में कोलॉइड के रूप में बने रहते हैं तथा आयन-आयन विकर्षण के कारण वे अवक्षेपित नहीं होते। इस प्रकार साबुन का मिसेल मैल को पानी में घुलाने में मदद करता है और हमारे कपड़े साफ़ हो जाते हैं (चित्र देखिए)।

Bihar Board Class 10 Science कार्बन एवं इसके यौगिक Additional Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्बनिक यौगिकों का मुख्य स्रोत है – (2009)
(a) कोलतार
(b) पेट्रोलियम
(c) कोलतार तथा पेट्रोलियम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) कोलतार तथा पेट्रोलियम

प्रश्न 2.
कार्बनिक यौगिक अकार्बनिक यौगिकों की तुलना में (2012)
(a) जल में अधिक घुलनशील होते हैं।
(b) सामान्यत: यह जटिल नहीं होते हैं व इनका अणुभार कम होता है
(c) जल में ये शीघ्र आयनित होते हैं
(d) इनका क्वथनांक व गलनांक अपेक्षाकृत कम होता है।
उत्तर:
(d) इनका क्वथनांक व गलनांक अपेक्षाकृत कम होता है

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प्रश्न 3.
मिट्टी के तेल में कार्बन परमाणुओं की संख्या है – (2015, 16)
(a) C5 – C6
(b) C8 – C9
(c) C18 – C32
(d) C11 – C16
उत्तर:
(d) C11 – C16

प्रश्न 4.
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन – (2013)
(a) में द्विबन्ध होते हैं।
(b) में सिर्फ एकलबन्ध होते हैं
(c) चतुष्फलक होते हैं
(d) में C-C के मध्य बंध कोण 109°28′ होता है
उत्तर:
(a) में द्विबन्ध होते हैं

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में असंतृप्त यौगिक है (2014)
(b) CH4
(a) C2H6
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(d) C2H4
उत्तर:
(d) C2H4

प्रश्न 6.
ऐरोमैटिक यौगिक है –
(a) C2H6
(b) CH3OH
(c) C6H6
(d) C2H6
उत्तर:
(c) C6H6

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प्रश्न 7.
विवृत श्रृंखला यौगिक है –
(a) चक्रीय हेक्सेन
(b) चक्रीय ब्यूटेन
(c) बेंजीन
(d) ब्यूटीन-2
उत्तर:
(d) ब्यूटीन-2

प्रश्न 8.
ऐल्केनों का सामान्य सूत्र है –
(a) CnH2n+2
(b) CnH2n
(c) CnH2n-2
(d) C2H4
उत्तर:
(a) CnH2n+2

प्रश्न 9.
ऐल्कीन श्रेणी का प्रथम सदस्य है –
(a) मेथेन
(b) एथेन
(c) एथिलीन
(d) ऐसीटिलीन
उत्तर:
(c) एथिलीन

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में एल्काइन है –
(a) C3H8
(b) C4H10
(c) C3H6
(d) C3H4
उत्तर:
(d) C3H4

प्रश्न 11.
ऐसीटिक अम्ल में क्रियात्मक समूह है –
(a) > C = O
(b) -OH
(c) -COOH
(d) -O-
उत्तर:
(c) -COOH

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प्रश्न 12.
ब्यूटेनोन में क्रियात्मक समूह है – (2011, 12, 13, 14)
(a) -CHO
(b) >C =O
(c) -OH
(d) -COOH
उत्तर:
(b) >C =O

प्रश्न 13.
प्रोपेनल में क्रियात्मक समूह है – (2017)
(a) -CHO
(b) >C =O
(c) -OH
(d) -OCH3
उत्तर:
(a) -CHO

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से किस यौगिक में ऐल्कोहॉलीय समूह उपस्थित है ? (2011, 14, 17)
(a) CH3-CO-OH
(b) CH3-CH2-OH
(c) C6H5OH
(d) H-OH
उत्तर:
(b) CH3-CH2-OH

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में किस यौगिक में कीटोनी समूह उपस्थित है? (2017)
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उत्तर:
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प्रश्न 16.
निम्नलिखित में सजातीय युग्म है – (2010, 11)
(a) CH4तथा C2H4
(b) CH3Cl तथा CH3OH
(c) CH3OH तथा C3H7OH
(d) HCHO तथा CH3NH2
उत्तर:
(c) CH3OH तथा C3H7OH

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प्रश्न 17.
ऐसीटिक अम्ल का आई०यू०पी०ए०सी० नाम है – (2014, 16, 17)
(a) ऐसीटिक अम्ल
(b) एथेनोइक अम्ल
(c) मेथेनोइक अम्ल
(d) प्रोपेनोइक अम्ल
उत्तर:
(b) एथेनोइक अम्ल

प्रश्न 18.
फॉर्मेल्डिहाइड का आई०यू०पी०ए०सी० नाम है – (2015)
(a) फॉर्मेल्डिहाइड
(b) मेथेनल
(c) एथेनल
(d) ऐसेटेल्डिहाइड
उत्तर:
(b) मेथेनल

प्रश्न 19.
ऐसेटेल्डिहाइड का आई०यू०पी०ए०सी० नाम है – (2016)
(a) एथेनॉल
(b) एथेनल
(c) एथीन
(d) एथाइन
उत्तर;
(b) एथेनल

प्रश्न 20.
ऐसीटोन का आई० यू० पी० ए० सी० नाम है – (2015, 16)
(a) ब्यूटेनोन
(b) प्रोपेनोन
(c) ब्यूटेनॉल
(d) प्रोपेनॉल
उत्तर:
(b) प्रोपेनोन

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प्रश्न 21.
C2H6 का IUPAC नाम है – (2018)
(a) मेथेन
(b) एथेन
(c) एथाइन
(d) एथिलीन
उत्तर:
(b) एथेन

प्रश्न 22.
ऐलुमिनियम कार्बाइड पर जल की क्रिया द्वारा इनमें से कौन-सा हाइड्रोकार्बन उत्पन्न होता है? (2018)
(a) एथेन
(b) मेथेन
(c) एसीटिलीन
(d) एथिलीन
उत्तर:
(b) मेथेन

प्रश्न 23.
प्राकृतिक गैस का मुख्य अवयव है – (2013, 14, 16, 17)
(a) मेथेन
(b) एथेन
(c) प्रोपेन
उत्तर:
(a) मेथेन

प्रश्न 24.
पेट्रोलियम में होते हैं, मुख्यतः
(a) ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन
(b) ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन
(c) ऐलिफैटिक ऐल्कोहॉल
(d) एरोमैटिक ऐल्कोहॉल
उत्तर:
(a) ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन

प्रश्न 25.
ऐल्कोहॉलों के विहाइड्रोजनीकरण से यौगिक प्राप्त होता है – (2013)
(a) अम्ल
(b) एस्टर
(c) ऐल्डिहाइड
(d) ऐमीन
उत्तर:
(c) ऐल्डिहाइड

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प्रश्न 26.
जब एथेनॉल को सान्द्र H2SO4 के साथ 160°- 170°C पर गर्म करते हैं तो उत्पादित यौगिक का नाम है –
(a) एथिल हाइड्रोजन सल्फेट
(b) डाइ-एथिल ईथर
(c) एथिलीन
(d) ऐसीटेल्डिहाइड
उत्तर:
(c) एथिलीन

प्रश्न 27.
ऐसीटिक अम्ल में कितने अम्लीय (विस्थापनीय) H परमाणु हैं ? (2013, 14, 15)
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 4
उत्तर:
(a) 1

प्रश्न 28.
साबुन बनाने में तेल के साथ प्रयोग में लाया जाता है – (2009)
या साबुन बनाने में प्रयोग किया जाने वाला पदार्थ है
(a) सोडियम नाइट्रेट
(b) कॉस्टिक सोडा (सोडियम हाइड्रॉक्साइड)
(c) सोडियम ऐसीटेट
(d) सोडियम क्लोराइड
उत्तर:
(b) कॉस्टिक सोडा (सोडियम हाइड्रॉक्साइड)

प्रश्न 29.
मृदु साबुन बनाने के लिए आवश्यक पदार्थ है –
(a) कॉस्टिक सोडा
(b) धावन सोडा
(c) खाने वाला सोडा
(d) कॉस्टिक पोटाश
उत्तर:
(d) कॉस्टिक पोटाश

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प्रश्न 30.
एस्टरों के क्षारीय जल-अपघटन की क्रिया कहलाती है –
(a) एस्टरीकरण
(b) साबुनीकरण
(c) बहुलकीकरण
(d) उदासीनीकरण
उत्तर:
(b) साबुनीकरण

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि कार्बन चार एकल बन्ध बनाता है तो किन्हीं दो बन्धों के बीच का कोण कितना होता है ?
उत्तर:
109°28′

प्रश्न 2.
कार्बनिक यौगिकों में किस प्रकार की संयोजकता होती है ?
उत्तर:
सहसंयोजकता।

प्रश्न 3.
कार्बनिक यौगिकों की विलेयता जल अथवा कार्बनिक विलायकों में से किसमें अधिक होती है ?
उत्तर:
कार्बनिक विलायकों में।

प्रश्न 4.
प्रयोगशाला में सर्वप्रथम किस कार्बनिक यौगिक का निर्माण हुआ था? इसका नाम व सूत्र दीजिए। (2012, 16)
उत्तर:
यूरिया (NH2 .CO .NH2 )

प्रश्न 5.
दो ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों के नाम व अणु सूत्र लिखिए। (2017)
उत्तर:
एथिलीन (C2H4) व ऐसीटिलीन (C2H2)।

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प्रश्न 6.
ऐल्कीन श्रेणी का सामान्य सूत्र लिखिए। (2012, 13, 14)
उत्तर:
CnH2n

प्रश्न 7.
सजातीय श्रेणी में यौगिकों के किस गुण में समानता होती है –
1. भौतिक गुणों में
2. रासायनिक गुणधर्मों में।
उत्तर:
रासायनिक गुणधर्मों में।

प्रश्न 8.
CH-O-CH2-CH3 तथा
CH3-CH2-CH=CH2CH3
यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० पद्धति में नाम लिखिए। (2011)
उत्तर:
CH3-O-CH2CH3 मेथॉक्सी एथेन
CH3-CH2-CH=CH-CH3 पेन्टीन-2

प्रश्न 9.
यौगिक CH3CH2OH का IUPAC नाम क्या है? (2017, 18)
उत्तर:
एथेनॉल।

प्रश्न 10.
पेट्रोलियम के शोधन के लिए प्रयुक्त विधि का नाम बताइए।
उत्तर:
प्रभाजी आसवन।

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प्रश्न 11.
किसी एक योगात्मक अभिक्रिया की समीकरण लिखिए। (2011, 17, 18)
या योगात्मक अभिक्रिया को उदाहरण देकर समझाइए। (2012, 13, 16, 17, 18)
या योगात्मक अभिक्रिया पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013, 15, 18)
या एथिलीन गैस की एक योगात्मक अभिक्रिया का समीकरण लिखिए।
उत्तर:
योगात्मक अभिक्रिया में पदार्थ आपस में संयोग करके केवल एक पदार्थ बनाते हैं तथा कोई भी अन्य पदार्थ नहीं बनता है।
उदाहरणार्थ:
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प्रश्न 12.
एथिलीन की प्रतिस्थापन अभिक्रिया का समीकरण लिखिए। (2013, 15, 18)
या एथिलीन की क्लोरीन के साथ रासायनिक अभिक्रिया लिखिए। (2018)
उत्तर:
400°C पर एथिलीन अणु के एक हाइड्रोजन परमाणु का विस्थापन, क्लोरीन परमाणु द्वारा हो जाता है और वाइनिल क्लोराइड बनता है। जिसके बहुलकीकरण से पॉली वाइनिल क्लोराइड (P.V.C.) बनाया जाता है।
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प्रश्न 13.
मेथेन की सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरीन के साथ क्या अभिक्रिया होती है? (2011, 15, 17)
या मेथेन की क्लोरीन के साथ क्रिया लिखिए। (2017)
उत्तर:
सूर्य के मद्धिम प्रकाश की उपस्थिति में मेथेन हैलोजनों के साथ विस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करती है। इस अभिक्रिया में इसके चारों हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके चार हैलोजन परमाणुओं द्वारा विस्थापित हो जाते हैं।
उदाहरणार्थ:
CH4 + Cl2 → HCl + CH3 Cl (मेथिल क्लोराइड)
CH3Cl + Cl2 → HCl + CH2Cl2(डाइ-क्लोरो मेथेन)
CH2Cl2 + Cl2 → HCl + CHCl3 (क्लोरोफॉर्म)
CHCl3 + Cl2 → HCl + CCl4 (कार्बन टेट्रा-क्लोराइड)

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प्रश्न 14.
एथिल ऐल्कोहॉल से आयोडोफार्म तथा डाइएथिल ईथर कैसे प्राप्त करेंगे? केवल समीकरण दीजिए। (2013, 14)
या एथिल ऐल्कोहॉल की हैलोफार्म अभिक्रिया का समीकरण लिखिए। (2013)
उत्तर:
1. एथिल ऐल्कोहॉल को आयोडीन व सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गर्म करने पर आयोडोफार्म बनता है।
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इस क्रिया को हैलोफार्म अभिक्रिया कहते हैं।
2. एथिल ऐल्कोहॉल तथा सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल को 140°C पर गर्म करने पर डाइएथिल ईथर बनता है।
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प्रश्न 15.
एथिल ऐल्कोहॉल के ऑक्सीकरण से प्राप्त यौगिकों के नाम व सूत्र लिखिए। (2011)
उत्तर:
एथिल ऐल्कोहॉल के ऑक्सीकरण से प्रथम पद में ऐसेटेल्डिहाइड (CH3CHO) व द्वितीय पद में ऐसीटिक अम्ल (CH3COOH) प्राप्त होता है।

प्रश्न 16.
क्या होता है जब (केवल समीकरण दीजिए) (2011)

  1. एथिल ऐल्कोहॉल को क्लोरीन व NaOH के साथ गर्म करते हैं?
  2. ऐसीटिक अम्ल क्लोरीन से क्रिया करता है? (2014, 17)
  3. एथिल ऐल्कोहॉल को सोडियम धातु के साथ क्रिया कराते हैं? (2016, 18)

उत्तर:
1. क्लोरोफार्म बनता है।
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2. लाल फॉस्फोरस की उपस्थिति में ऐसीटिक अम्ल में क्लोरीन प्रवाहित करने पर मेथिल मूलक के हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन परमाणुओं से विस्थापित हो जाते हैं।
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3. सोडियम एथॉक्साइड बनता है।
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प्रश्न 17.
एथिल ऐल्कोहॉल के दो प्रमुख उपयोग दीजिए। (2011, 15)
उत्तर:
1. शराब तथा अन्य एल्कोहॉलीय पेय पदार्थ बनाने में
2. यह एक अच्छा विलायक है।

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प्रश्न 18.
ऐसीटिक अम्ल का संरचना सूत्र लिखिए। इसकी अपचयन की अभिक्रिया का समीकरण लिखिए।
या ऐसीटिक अम्ल से एथिल ऐल्कोहॉल कैसे प्राप्त करेंगे? ( केवल समीकरण दीजिए)
उत्तर:
संरचना सूत्र
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अपचयन अभिक्रिया यह लीथियम ऐलुमिनियम हाइड्राइड द्वारा अपचयित होकर एथिल ऐल्कोहॉल बनाता है।
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प्रश्न 19.
ऐसीटिक अम्ल के निर्जलीकरण की अभिक्रिया का समीकरण लिखिए। (2011, 16)
या ऐसीटिक अम्ल से ऐसीटिक एन्हाइड्राइड कैसे प्राप्त करेंगे? (2013)
उत्तर:
P2O5 (निर्जलीकारक) की उपस्थिति में गर्म करने पर ऐसीटिक अम्ल के दो अणुओं में से जल का एक अणु पृथक हो जाता है तथा ऐसीटिक एन्हाइड्राइड प्राप्त होता है –
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प्रश्न 20.
क्या होता है जब ऐसीटिक अम्ल फॉस्फोरस पेन्टाक्लोराइड से क्रिया करता है? (2014)
उत्तर:
ऐसीटिल क्लोराइड बनता है –
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प्रश्न 21.
आप निम्नलिखित परिवर्तन किस प्रकार करेंगे (केवल रासायनिक समीकरण दीजिए) ऐसीटिक अम्ल से मेथेन।। (2012, 13, 14, 16)
उत्तर:
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प्रश्न 22.
क्या होता है जबकि ऐसीटिक अम्ल को P2O5 के साथ गर्म किया जाता है? (2017)
उत्तर:
ऐसीटिक अम्ल को P2O5 के साथ गर्म करने पर, इसके दो अणुओं में से जल का एक अणु पृथक हो जाता है तथा ऐसीटिक एन्हाइड्राइड प्राप्त होता है।

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प्रश्न 23.
ऐसीटिक अम्ल के दो उपयोग लिखिए। (2011)
उत्तर:
1. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।
2. कृत्रिम सिरका बनाने में।

प्रश्न 24.
साबुन क्या है ? किसी एक साबुन का रासायनिक सूत्र व नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
साबुन उच्च वसीय अम्लों के क्षारीय (सोडियम या पोटेशियम) लवण होते हैं। एक प्रमुख साबुन सोडियम स्टिएरेट (CH17H35COONa) है।

प्रश्न 25.
साबुन के निर्माण में प्रयुक्त प्रमुख दो पदार्थों के नाम लिखिए। (2017)
उत्तर:
साबुन के निर्माण में प्रयुक्त दो प्रमुख पदार्थ तेल या वसा व कास्टिक सोडा हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कार्बनिक परमाणु की चारों संयोजकताओं के बारे में ली बेल तथा वान्टहॉफ की धारणा का सचित्र वर्णन कीजिए। या चित्रों की सहायता से कार्बनिक परमाणु की संयोजकता की चतुष्फलकीय आकृति समझाइए।
या कार्बन की चतुष्फलकीय प्रकृति पर टिप्पणी लिखिए। (2013, 15)
उत्तर:
कार्बन परमाणु की चारों संयोजकताएँ एक ही समतल में समान रूप से 90° के कोण पर वितरित नहीं होती हैं। ली बेल तथा वान्ट हॉफ (Le Bel and Vant Hoff) 1874 ई० के अनुसार, यदि कार्बन परमाणु को किसी समचतुष्फलक (regular tetrahedron) के केन्द्र पर स्थित माना जाये तो इसकी चारों संयोजकताएँ समचतुष्फलक के चारों शीर्षों को केन्द्र से मिलाने वाली चार सरल रेखाओं को प्रदर्शित करती हुई होती हैं। इस प्रकार किन्हीं भी दो संयोजकताओं के बीच 109° 28′ का कोण होता है। कार्बन की चारों संयोजकताएँ चित्रानुसार आकाश (space) में वितरित रहती हैं।
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सुविधा के लिए कार्बन की चारों संयोजकताएँ समतल में Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 4 कार्बन एवं इसके यौगिक द्वारा प्रदर्शित की जाती हैं।

प्रश्न 2.
कार्बनिक यौगिकों की निम्न विशेषताओं को संक्षेप में समझाइए (2012)
1. समावयवता
2. बन्धनों की प्रकृति
उत्तर:
1. कार्बनिक यौगिकों में समावयवता पायी जाती है। एक ही अणुसूत्र द्वारा दो अथवा दो से अधिक भिन्न-भिन्न यौगिकों को दर्शाये जाने की घटना को समावयवता कहते हैं और इन भिन्न-भिन्न यौगिकों को आपस में समावयवी कहते हैं।

उदाहरणार्थ: C2H6O अणुसूत्र एथिल ऐल्कोहॉल (C2H5OH) तथा डाइमेथिल ईथर (CH3OCH3) दो भिन्न-भिन्न यौगिकों को दर्शाता है। अत: एथिल ऐल्कोहॉल तथा डाइमेथिल ईथर आपस में समावयवी हैं।

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2. कार्बनिक यौगिकों में सहसंयोजक बन्ध पाये जाते हैं। कार्बन के दो परमाणु आपस में संयोग करके एकलबन्ध, द्विबन्ध और त्रिबन्ध बनाते हैं। कार्बन परमाणुओं में आपस में जुड़कर श्रृंखलाएँ बनाने की अद्वितीय क्षमता होती है।

प्रश्न 3.
ऐल्केन, ऐल्कीन तथा एल्काइन से आप क्या समझते हैं? उदाहरण देकर समझाइए। (2012, 18)
या संतृप्त तथा असंतृप्त हाइड्रोकार्बन में क्या अन्तर है? उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। (2013, 15)
या असंतृप्त हाइड्रोकार्बन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013)
या संतृप्त तथा असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों से आप क्या समझते हैं? उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें। (2018)
उत्तर:
1.संतृप्त हाइड्रोकार्बन (Saturated hydrocarbons) वे हाइड्रोकार्बन जिनके अणुओं में उपस्थित कार्बन परमाणुओं में से प्रत्येक की चारों संयोजकताएँ, एकल बन्धों (single bonds) द्वारा सन्तुष्ट होती हैं, संतृप्त हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। उदाहरणार्थ :
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इनका सामान्य अणुसूत्र CnH2n+2 होता है। इस श्रेणी के यौगिकों को ऐल्केन अथवा पैराफिन भी कहते हैं। ये कम क्रियाशील होते हैं, परन्तु प्रतिस्थापित यौगिक बनाते हैं।

2. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (Unsaturated hydrocarbons) ऐसे हाइड्रोकार्बन जिनके अणुओं में उपस्थित कार्बन परमाणुओं के आपस में एक-एक संयोजकता बन्ध (bond) बनाने के बाद कार्बन परमाणुओं की शेष संयोजकताओं को पूर्णतया सन्तुष्ट करने हेतु हाइड्रोजन परमाणु उपलब्ध नहीं होते हैं और अणु में उपस्थित दो कार्बन परमाणुओं को आपस में द्विबन्ध (double bond) या त्रिबन्ध (triple bond) बनाना पड़ता है, असंतृप्त हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं।
उदाहरणार्थ :
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असंतृप्त हाइड्रोकार्बन को पुन: दो भागों में विभाजित किया गया है –
1. ओलीफिन या ऐल्कीन (Olefin or Alkene) इनमें दो कार्बन परमाणुओं के बीच एक द्विबन्ध होता है, ये एथिलीन श्रेणी के हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2nहोता है।
2. ऐसीटिलीन या ऐल्काइन (Acetylene or Alkyne) इनमें दो कार्बन परमाणुओं के बीच एक त्रिबन्ध होता है। ये ऐसीटिलीन श्रेणी के हाइड्रोकार्बन हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n-2 होता
असंतृप्त यौगिक संतृप्त यौगिकों की अपेक्षा अधिक क्रियाशील होते हैं तथा योगशील यौगिक बनाते हैं।

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प्रश्न 4.
विषम चक्रीय यौगिक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013)
उत्तर:
वे चक्रीय यौगिक जिनके संवृत श्रृंखला के बनाने में कार्बन के अतिरिक्त अन्य तत्त्वों के परमाणु भी भाग लेते हैं, विषम चक्रीय यौगिक कहलाते हैं। उदाहरणार्थ-पिरिडीन, थायोफीन, फ्यूरॉन।
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प्रश्न 5.
समूह या मूलक से आप क्या समझते हैं ? अभिक्रियात्मक समूह का क्या तात्पर्य है ? (2015, 16, 18)
या ऐल्किल मूलक पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए। (2012, 13)
या क्रियात्मक समूह पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2017)
या क्रियात्मक समूह को उदाहरण सहित समझाइए। (2015)
उत्तर:
कार्बनिक यौगिक प्राय: दो भागों से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक भाग को समूह या मूलक कहते हैं। माना कि यौगिक R – X है, इसके दो भाग निम्नवत् होंगे
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प्रथम भाग -R, ऐल्किल (समूह) मूलक तथा द्वितीय भाग अभिक्रियात्मक समूह कहलाता है। ऐल्किल मूलक किसी संतृप्त हाइड्रोकार्बन से एक हाइड्रोजन परमाणु कम करने से प्राप्त होता है तथा यौगिक के भौतिक गुणों को प्रदर्शित करता है। अभिक्रियात्मक समूह Functional group or Radical यह समूह यौगिक का वह भाग है जिस पर यौगिकों के रासायनिक गुण निर्भर करते हैं; अत: वे कार्बनिक यौगिक जिनका अभिक्रियात्मक समूह एक ही होता है, रासायनिक गुणों में समान होंगे।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित यौगिकों में उनके मूलकों तथा अभिक्रियात्मक समूहों के नाम लिखिए
(i) CH3COOH या
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(ii) CH3COOCH3
(iii) C2H5CHO
(iv) C3H7OH (2009, 10, 11, 12)
उत्तर:
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प्रश्न 7.
ऐल्कोहॉल, ऐल्डिहाइड, कीटोन तथा कार्बोक्सिलिक समूह के सूत्र लिखिए। (2011)
उत्तर:
ऐल्कोहॉल – -OH
ऐल्डिहाइड – -CHO
कीटोन – >C= O
कार्बोक्सिलिक – -COOH

प्रश्न 8.
निम्नलिखित यौगिकों के I.U.P.A.C. नाम लिखिए

  1. CH3COOH (ऐसीटिक अम्ल) (2009, 13, 16)
  2. HCHO (2009, 10, 11, 13)
  3.  HCOOH (2010, 13)
  4. CH3OH (2009, 10)
  5. CH3-CH = CH2 (2013)
  6. CH3-C = CH (2011, 12, 14)
  7. CH2=CH-CH=CH2 (2009, 12, 15, 17)
  8. CH3CHC = CH – CH3 (2011)

उत्तर:

  1. CH3COOH – एथेनोइक अम्ल
  2. HCHO – मेथेनल
  3. HCOOH – मेथेनोइक अम्ल
  4. CH3OH – मेथेनॉल
  5. CH3 -CH = CH2 – प्रोपीन
  6. CH3-C=CH – प्रोपाइन
  7. CH2 =CH – CH = CH2 – 1, 3 ब्यूटाडाइईन
  8. CH3 – HC = CH – CH3 – ब्यूटीन-2

प्रश्न 9.
निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० प्रणाली में नाम लिखिए – (2013)
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उत्तर:
1. 2, 2 डाइमेथिल पेन्टेन
2. मेथॉक्सी एथेन

प्रश्न 10.
निम्नलिखित यौगिकों के I.U.P.A.C. में नाम लिखिए
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उत्तर:
1. पेन्टेनोन-2
2. 2-मेथिल प्रोपेनल

प्रश्न 11.
निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए०सी० नाम लिखिए –
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उत्तर:
1. एथिल एथेनोएट
2.  प्रोपेनॉल

प्रश्न 12
निम्नलिखित यौगिकों के I.U.P.A.C. में नाम लिखिए।
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उत्तर:
1. 2 मेथिल ब्यूटीन-2,
2. एथेन-1, 2 डाइऑल

प्रश्न 13.
निम्नलिखित यौगिकों के संरचनात्मक सूत्र लिखिए -(2011, 12, 14)

  1. एथेनोइक अम्ल
  2. मेथिल ऐसीटिलीन
  3. मेथेनल (2018)
  4. 1 प्रोपाइन
  5. 1, 3 ब्यूटाडाइईन

उत्तर:
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(v) CH2=CH-CH=CH2

प्रश्न 14.
निम्नलिखित यौगिकों के संरचनात्मक सूत्र लिखिए
1. प्रोपेन-2-ऑल (2017)
2. 2-हाइड्रॉक्सी प्रोपेनोइक अम्ल (2015)
उत्तर:
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प्रश्न 15
निम्नलिखित यौगिकों के संरचनात्मक सूत्र लिखिए –
1. पेन्टेनोन-3 (2018)
2. ब्यूटेनोन-2 (2015, 17)
उत्तर:
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प्रश्न 16.
मेथेन की ओजोन, नाइट्रिक अम्ल व वायु (ऑक्सीजन के साथ दहन) से अभिक्रिया का समीकरण दीजिए। क्या होता है जब मेथेन की नाइट्रिक अम्ल के साथ 400°C पर क्रिया होती है? (2017)
या  क्या होता है जबकि मेथेन का ओजोन से ऑक्सीकरण किया जाता है? (2016)
या  मेथेन के तीन रासायनिक गुण लिखिए। (2011, 13)
या  मेथेन से मेथेनल कैसे प्राप्त करेंगे? समीकरण दीजिए। (2012)
या कैसे प्राप्त करेंगे? मेथेन से नाइट्रो मेथेन (2015)
उत्तर:
मेथेन की ओजोन से क्रिया मेथेन का ओजोन द्वारा उपचयन (oxidation) होने पर फॉर्मेल्डिहाइड बनती है।
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मेथेन की नाइट्रिक अम्ल से क्रिया यदि मेथेन को नाइट्रिक अम्ल के साथ 400°C पर तप्त किया जाये तो मेथेन अणु के एक हाइड्रोजन परमाणु का -NO2वर्ग द्वारा प्रतिस्थापन हो जाता है और नाइट्रो मेथेन की प्राप्ति होती है।
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मेथेन की वायु के साथ क्रिया यह वायु अथवा ऑक्सीजन के साथ गर्म करने पर CO2 और H2O बनाती है।
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प्रश्न 17.
पेट्रोलियम क्या है ? भारत में यह कहाँ पाया जाता है ? इससे प्राप्त होने वाले मुख्य ईंधनों के नाम व उपयोग लिखिए। या पेटोलियम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2014, 16)
उत्तर:
पेट्रोलियम प्रकृति में कुछ स्थानों पर चट्टानों के नीचे एक गाढ़ा, चिपचिपा तथा गहरे रंग का द्रव पाया जाता है। इस द्रव में मुख्यत: C1 से C40 तक के ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन उपस्थित होते हैं। इस द्रव को पेट्रोलियम या अपरिष्कृत (कच्चा) तेल कहते हैं। यह विभिन्न पदार्थों का मिश्रण है।

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भारत में पेट्रोलियम प्राप्ति के स्थान असम, गुजरात तथा राजस्थान के कुछ भाग।
पेट्रोलियम का संघटन पेट्रोलियम में मुख्यत: C1 से C40 तक के ऐलिफैटिक कार्बनिक यौगिक, कुछ ऐलिसाइक्लिक हाइड्रोकार्बन, कुछ ऐरोमैटिक यौगिक तथा क्लोरोफिल, हीमिन उपस्थित होते हैं।

मुख्य ईंधन के नाम व उपयोग –
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प्रश्न 18.
प्रतिस्थापन अभिक्रिया पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012, 13, 18)
या प्रतिस्थापन अभिक्रिया को एक उदाहरण देकर समझाइए। (2011, 17, 18)
उत्तर:
जब किसी यौगिक के अणु में से एक या एक से अधिक परमाणु या समूह क्रमशः किसी अन्य परमाणुओं अथवा समूह से विस्थापित हो जाते हैं, तो वे क्रियाएँ विस्थापन प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (substitution reactions) कहलाती हैं। इस प्रकार प्राप्त नये यौगिक को विस्थापित यौगिक कहते हैं। विस्थापन क्रिया का उदाहरण मेथेन को सान्द्र HNO3 (नाइट्रिक अम्ल) के साथ 400°C पर गर्म करने पर मेथेन अणु का एक हाइड्रोजन परमाणु -NO2 समूह द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है और नाइट्रो मेथेन बनता है।
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प्रश्न 19.
निम्नलिखित परिवर्तन किस प्रकार करेंगे? (केवल रासायनिक समीकरण दीजिए) मेथेन से एथेन (2013, 16, 17)
उत्तर:
मेथेन की सूर्य के मन्द प्रकाश में क्लोरीन से क्रिया करने पर मेथिल क्लोराइड प्राप्त होता है।
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अब CH3Cl व Na की वु अभिक्रिया द्वारा एथेन प्राप्त होती है।
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प्रश्न 20.
एथिल ऐल्कोहॉल के निर्माण की दो विधियों के समीकरण लिखिए। या क्या होता है जब एथिल ऐसीटेट को क्षारक की उपस्थिति में जल अपघटित कराते (2016)
उत्तर:
1. एथिल ऐसीटेट से
एथिल ऐसीटेट को क्षारक की उपस्थिति में जल अपघटित कराने पर एथिल ऐल्कोहॉल बनता है।
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2. एथिलीन से –
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प्रश्न 21.
एथिल ऐल्कोहॉल से एथिलीन कैसे प्राप्त करोगे? या क्या होता है जब एथिल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 160°C-170°C पर गर्म करते हैं? (2015, 16, 17, 18)
उत्तर:
एथिल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म (160°-170°C) करने पर एथिलीन प्राप्त होती है।
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प्रश्न 22.
एथिल ऐल्कोहॉल की निम्न के साथ क्रिया लिखिए (2016, 18)
1. NH3
2. Cl2
3. PCl5
उत्तर:
1. एथिल ऐमीन बनता है।
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2. एथिल ऐल्कोहॉल की क्लोरीन से निम्न प्रकार अभिक्रिया होती है –
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3. एथिल क्लोराइड बनता है –
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प्रश्न 23.
‘स्प्रिट तथा शराब में क्या अन्तर है ? परिशोधित स्प्रिट क्या होती है? (2011, 12)
उत्तर:
यदि ऐल्कोहॉलीय पेय पदार्थ आसुत है तो उसे स्प्रिट कहते हैं तथा यदि ऐल्कोहॉलीय पेय पदार्थ आसुत नहीं है तो इसे शराब कहते हैं। 95% ऐल्कोहॉल तथा 5% जल के मिश्रण को परिशोधित स्प्रिट कहते हैं।

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प्रश्न 24.
साबुन क्या है ? इसके बनाने की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए। (2013, 14)
या साबुन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2015, 16)
या साबुन के निर्माण में प्रयुक्त प्रमुख दो पदार्थों के नाम लिखिए तथा साबुन बनाने की विधि का समीकरण भी लिखिए। (2011, 12, 13)
या साबुन के निर्माण से प्राप्त सहउत्पाद का नाम व सूत्र लिखिए। साबुनीकरण अभिक्रिया का समीकरण दीजिए (2012)
या साबुनीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013, 14, 15, 16, 17, 18)
या क्या होता है जब ट्राइस्टिएरिन को कॉस्टिक सोडा के साथ गर्म किया जाता है? (2016)
उत्तर:
उच्च अणुभार वाले मोनो-कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम तथा पोटेशियम लवण साबुन कहलाते हैं। ये तेलों और वसाओं के तनु NaOH या KOH द्वारा जल अपघटन से प्राप्त किये जाते हैं। इस क्रिया को साबुनीकरण कहते हैं।

साबुन बनाने की रासायनिक अभिक्रिया (साबुनीकरण)
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प्रश्न 25.
अच्छे साबुन की विशेषताएँ लिखिए ? (2009, 13, 18)
या श्रेष्ठ साबुन के गुण बताइए।
उत्तर:
अच्छे साबुन में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

  1. साबुन क्षार रहित होना चाहिए, क्योंकि क्षार वस्त्रों तथा त्वचा को हानि पहुंचाता है।
  2. प्रयोग में लाने पर साबुन चटकना नहीं चाहिए।
  3. साबुन चिकना एवं मुलायम होना चाहिए, खुरदरा साबुन अच्छा नहीं होता है।
  4. साबुन ऐल्कोहॉल में विलेय होना चाहिए।
  5. साबुन में जल की मात्रा 10% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  6. इसमें कीटाणुनाशक पदार्थ मिले होने चाहिए।

प्रश्न 26.
मिसेल पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2016, 18)
उत्तर:
साबुन के अणु ऐसे होते हैं जिनके दोनों सिरों के विभिन्न गुणधर्म होते हैं। जल में विलेय एक सिरे को जलरागी कहते हैं तथा हाइड्रोकार्बन में विलेय दूसरे सिरे को जलविरागी कहते हैं। जब साबुन जल की सतह पर होता है तब इसके अणु अपने को इस प्रकार व्यवस्थित कर लेते हैं कि इसका आयनिक सिरा जल के अन्दर होता है जबकि हाइड्रोकार्बन पूँछ (दूसरा छोर) जल के बाहर होती है। जल के अन्दर इन अणुओं की एक विशेष व्यवस्था होती है।

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ऐसा अणुओं का बड़ा गुच्छा बनने के कारण होता है जिसमें जलविरागी पूँछ गुच्छे के आन्तरिक हिस्से में होती है जबकि उसका आयनिक सिरा गुच्छे की सतह पर होता है। इस संरचना को मिसेल कहते हैं। मिसेल के रूप में साबुन स्वच्छ करने में सक्षम होता है क्योंकि तैलीय मैल मिसेल के केन्द्र में एकत्र हो जाते हैं। मिसेल विलयन में कोलॉइड के रूप में बने रहते हैं तथा आयन-आयन विकर्षण के कारण वे अवक्षेपित नहीं होते। इस प्रकार मिसेल में तैरते मैल आसानी से हटाए जा सकते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐलिफैटिक तथा ऐरोमैटिक यौगिक क्या हैं? स्पष्ट करें। ऐलिफैटिक तथा ऐरोमैटिक यौगिकों में महत्त्वपूर्ण तीन अन्तर लिखें। (2014)
या ऐलिफैटिक यौगिक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013)
या ऐरोमैटिक यौगिक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2015)
उत्तर:
ऐलिफैटिक यौगिक “वे सभी यौगिक जिनके अणुओं में कार्बन के सभी परमाणु खुली श्रृंखला में सीधी अथवा शाखायुक्त रूप में व्यवस्थित होते हैं, विवृत श्रृंखला यौगिक या ऐलिफैटिक यौगिक कहलाते हैं।” उदाहरणार्थ- मेथेन, एथेन, एथिल ब्रोमाइड, आइसोब्यूटेन
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उपर्युक्त सभी यौगिकों में कार्बन परमाणुओं की चारों संयोजकताएँ सन्तुष्ट हैं, परन्तु ऐसे भी विवृत श्रृंखला युक्त यौगिक होते हैं, जिनमें कार्बन परमाणुओं के मध्य एक या एक से अधिक द्विबन्ध या त्रिबन्ध (double or triple bond) हो सकते हैं; जैसे-एथिलीन, ऐसीटिलीन, ब्यूटाडाइईन 1-31
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ऐरोमैटिक यौगिक संवृत श्रृंखला वाले वे समचक्रीय कार्बनिक यौगिक जिनकी संवृत श्रृंखला में 6 कार्बन परमाणु होते हैं तथा कार्बन परमाणुओं में एकान्तर क्रम में द्वि-बन्ध होता है, ऐरोमैटिक यौगिक कहलाते हैं। इन यौगिकों में एक विशेष प्रकार की गन्ध होती है, अर्थात् सौरभीय प्रकृति के होते हैं। इस श्रेणी का प्रथम मूल्यवान यौगिक बेंजीन है, जिसका अणुसूत्र C6H6है। बेंजीन के संरचना सूत्र को निम्नलिखित प्रकार से प्रदर्शित किया जा सकता है
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ऐरोमैटिक तथा ऐलिफैटिक यौगिकों में अन्तर –
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प्रश्न 2.
निम्नलिखित यौगिकों का आई०यू०पी०ए०सी० पद्धति में नाम बताइए

  1. C2H5CHO (2009, 14, 17)
  2. CH3OCH3 (2017)
  3. CH3OC2H5 (2011)
  4. CH3CH2COOH (2013, 14, 16)
  5. C2H4 या CH2 = CH2 (2011)
  6. CH3CH2Cl (2009)
  7. CH3-CO-CH3 (2016, 17, 18)

उत्तर:

  1. C2H5CHO …..प्रोपेनल
  2. CH3OCH3 …… मेथॉक्सी मेथेन
  3. CH3OC2H5 …… मेथॉक्सी एथेन
  4. CH3CH2COOH …… प्रोपेनोइक अम्ल
  5. C2H4 या CH2 = CH2 …… एथीन
  6. CH3CH2Cl …… क्लोरो एथेन
  7. CH3-CO-CH3 …….. प्रोपेनोन

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित यौगिकों के आई०यू०पी०ए० सी० पद्धति में नाम बताइए –

  1. CH3 – CH2 – CH2-CH2-CH3 (2014)
  2. CH3CHO (ऐसेटेल्डिहाइड) (2009, 16)
  3. CH3CH2COCH2CH3(2011)
  4. HC = CH
  5. C2H5OH (एथिल ऐल्कोहॉल) (2015, 16, 18)
  6. CH3=C = C–CH3 (2011, 16)
  7. CH3-CHOH-CH3 (2013)
  8. (CH3)2CH-CH2OH (2012)

उत्तर:

  1. पेन्टेन
  2. एथेनल
  3. पेन्टेनोन-3
  4. एथाइन
  5. एथेनॉल
  6. ब्यूटाइन-2
  7. प्रोपेनॉल-2
  8. 2-मेथिल प्रोपेनॉल-1

प्रश्न 4.
एथिल ऐल्कोहॉल के निर्माण की प्रमुख विधियों का रासायनिक समीकरण देते हुए संक्षिप्त विवरण दीजिए। इसकी
(i) हैलोजन अम्ल
(ii) सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 170°C ताप पर क्या अभिक्रिया होती है? (2012, 14,15, 16, 18)
या एथिलीन से एथिल ऐल्कोहॉल बनाने की विधि का रासायनिक समीकरण दीजिए। (2013, 18)
या एथिल ऐल्कोहॉल के दो रासायनिक गुणों को लिखिए। (2015)
या स्टार्च से एथिल ऐल्कोहॉल के औद्योगिक निर्माण विधि का वर्णन कीजिए। रासायनिक अभिक्रिया के समीकरण भी लिखिए। (2017, 18)
या किण्वन द्वारा एथेनॉल के निर्माण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18)
उत्तर:
एथिल ऐल्कोहॉल बनाने की विधियाँ –
1. एथिलीन को सान्द्र H2SO4 में अवशोषित करके भाप द्वारा जल अपघटित करने पर एथिल ऐल्कोहॉल (एथेनॉल) बनता है।
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2. एथिल ऐल्कोहॉल का व्यापारिक मात्रा में निर्माण शर्करा एवं स्टार्च के किण्वन के द्वारा किया जाता है। किण्वन एक धीमी जैविक प्रक्रिया है जोकि विषाणुओं या खमीर के द्वारा सम्पन्न होती है। स्टार्च युक्त पदार्थों के किण्वन में निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं –
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अभिक्रियाएँ –
1. हैलोजन अम्ल से हैलोजन अम्लों से अभिक्रिया करने पर एथिल हैलाइड बनता है।
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2. सान्द्र सल्फ्यू रिक अम्ल के साथ सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ 170°C पर गर्म करने पर यह एथिलीन बनाता है।
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प्रश्न 5.
एथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल बनाने की विधि बताइए। एथेनॉइक अम्ल की निम्न के साथ अभिक्रिया लिखिए (2015)
1. सोडियम
2. NaHCO3
3. सान्द्र H2 SO4 की उपस्थिति में एथिल ऐल्कोहॉल के साथ (2018)
ऐसीटिक अम्ल बनाने की किसी एक विधि का रासायनिक समीकरण लिखिए। इसके तीन प्रमुख रासायनिक गुण भी लिखिए। (2011, 13, 14, 16, 18)
एथिल ऐल्कोहॉल से ऐसीटिक अम्ल बनाने की विधि का रासायनिक समीकरण लिखिए। (2011, 12)
या एथेनॉल की ऑक्सीकरण अभिक्रिया का समीकरण लिखिए। (2013)
उत्तर:
एथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल (ऐसीटिक अम्ल ) बनाने की प्रयोगशाला विधि एथेनॉल का क्षारीय KMnO. द्वारा ऑक्सीकरण होने पर प्राप्त विलयन का तनु HCl द्वारा उदासीनीकरण कराने पर एथेनॉइक अम्ल प्राप्त होता है।
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प्रमख अभिक्रियाएँ या रासायनिक गण –
1. सोडियम के साथ सोडियम के साथ क्रिया होने पर सोडियम ऐसीटेट बनता है तथा हाइड्रोजन गैस मुक्त होती है।
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2. NaHCO3 के साथ सोडियम ऐसीटेट बनता है तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस निकलती है।
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3. सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में एथिल ऐल्कोहॉल के साथ क्रिया एथिल ऐसीटेट बनता है।
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प्रश्न 6.
ऐसीटिक अम्ल बनाने की निम्न विधियों का संक्षिप्त विवरण रासायनिक समीकरण देते हुए दीजिए
1. मेथिल सायनाइड से
2. ऐसीटेमाइड से
3. मुख्य औद्योगिक विधि द्वारा (2014, 16, 17)
इसकी निम्न अभिक्रियाओं के समीकरण भी दीजिए (2012)
(i) निर्जलीकरण
(i) श्मिट अभिक्रिया (2014, 15, 16, 17)
ऐसीटिक अम्ल निर्माण की दो विधियों का वर्णन समीकरण द्वारा कीजिए। (2013, 16, 17)
या किण्वन विधि द्वारा एथिल ऐल्कोहॉल से ऐसीटिक अम्ल बनाने की विधि का रासायनिक समीकरण सहित वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
1. मेथिल सायनाइड से मेथिल सायनाइड के तनु अम्ल अथवा तनु क्षार द्वारा जल अपघटन से ऐसीटिक अम्ल प्राप्त होता है।
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2. ऐसीटेमाइड से ऐसीटेमाइड पर नाइट्रस अम्ल की क्रिया से ऐसीटिक अम्ल प्राप्त होता है।
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3. मुख्य औद्योगिक विधि औद्योगिक विधि में ऐसीटिक अम्ल का निर्माण, वायु में उपस्थित माइकोडर्मा ऐसीटि नामक जीवाणु द्वारा एथिल ऐल्कोहॉल के किण्वन से होता है।
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निर्जलीकरण तथा श्मिट अभिक्रियाओं का वर्णन निम्नवत् है –
(1) निर्जलीकरण क्रिया ऐसीटिक अम्ल को निर्जलीकारकों; (जैसे-फॉस्फोरस पेन्टाऑक्साइड) की उपस्थिति में गर्म करने पर इसके दो अणुओं में से जल का एक अणु पृथक् हो जाता है तथा ऐसीटिक एन्हाइड्राइड प्राप्त होता है।
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(2) श्मिट अभिक्रिया सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में हाइड़ेजोइक अम्ल (N3H) से अभिक्रिया करने पर ऐसीटिक अम्ल, मेथिल ऐमीन देता है। इस क्रिया को श्मिट अभिक्रिया कहते हैं।
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प्रश्न 7.
एस्टरीकरण से आप क्या समझते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। एथिल ऐसीटेट के जल-अपघटन की समीकरण दीजिए। ऐसीटिक अम्ल के प्रमुख उपयोगों का उल्लेख कीजिए। (2013, 14, 16)
ऐसीटिक अम्ल के एस्टरीकरण की अभिक्रिया का समीकरण लिखिए। (2011, 12)
ऐसीटिक अम्ल से एथिल ऐसीटेट कैसे प्राप्त करेंगे? (2013)
एस्टरीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2014, 15, 16, 17, 18)
क्या होता है जब ऐसीटिक अम्ल की सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में एथिल ऐल्कोहॉल से क्रिया कराते हैं?
उत्तर:
जिस प्रकार अम्ल और क्षार की पारस्परिक अभिक्रिया से लवण तथा जल बनते हैं ठीक उसी प्रकार अम्ल तथा ऐल्कोहॉल की अभिक्रिया से एस्टर तथा जल बनते हैं। इस अभिक्रिया को एस्टरीकरण कहते हैं। कार्बोक्सिलिक अम्लों की एस्टरीकरण क्रिया प्रायः सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में करायी जाती है। यह निर्जलीकरण तथा उत्प्रेरक दोनों का कार्य करता है। उदाहरण के लिए,
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एथिल ऐसीटेट के जल अपघटन का समीकरण –
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उपयोग –
1. प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में
2. कृत्रिम सिरका बनाने में।

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प्रश्न 8.
ऐसीटिक अम्ल की निम्न के साथ रासायनिक अभिक्रिया लिखिए (2017)

  1. PCl5
  2. NaOH
  3. N3H
  4. Cl2

उत्तर:
1. ऐसीटिल क्लोराइड बनाता है –
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2. सोडियम ऐसीटेट बनता है –
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3. उपरोक्त प्रश्न के अन्तर्गत श्मिट अभिक्रिया देखें।
4. लाल फॉस्फोरस की उपस्थिति में ऐसीटिक अम्ल में क्लोरीन या ब्रोमीन प्रवाहित करने पर मेथिल मूलक के हाइड्रोजन परमाणु एक-एक करके क्लोरीन अथवा ब्रोमीन परमाणुओं से विस्थापित हो जाते हैं।
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Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 10 सजीव और निर्जीव

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Bihar Board Class 6 Science सजीव और निर्जीव Text Book Questions and Answers

अभ्यास और प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सही उत्तर चुनिए –

(क) निम्न में निर्जीव हैं –
(i) गाय
(ii) घोड़ा
(iii) पेड़-पौधे
(iv) रेलगाड़ी :
उत्तर:
(iv) रेलगाड़ी :

(ख) निम्न में सजीव हैं –
(i) कुसी
(ii) मेज
(iii) पत्थर
(iv) बीज
उत्तर:
(iv) बीज

(ग) सजीवों के मुख्य लक्षण नहीं हैं –
(i) श्वसन
(ii) वृद्धि
(iii) प्रजनन
(iv) स्थिरता
उत्तर:
(iv) स्थिरता

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(घ) पौधे अपना भोजन निम्न क्रिया द्वारा स्वयं बनाते हैं –
(i) श्वसन
(ii) उद्दीपन
(iii) प्रकाश-संश्लेषण
(iv) उत्सर्जन
उत्तर:
(ii) उद्दीपन

(ङ) निम्न में से किस पौधे की पत्तियाँ छूने पर अचानक सिकुड़ जाती हैं –
(i) गुलाब
(ii) गुड़हुल
(iii) छुई-मुई
(iv) मेंहदी
उत्तर:
(iii) छुई-मुई

प्रश्न 2.
खाली जगहों को दिये गए शब्दों की सहायता से भरें
(उत्सर्जन, श्वसन, प्रजनन, ऊर्जा)
(क) सजीव ……….. द्वारा अपने समान जीवों की उत्पत्ति करता है।
(ख) सजीवों को कार्य करने के लिए …….. की आवश्यकता होती है।
(ग) सजीवों में ऊर्जा उत्पन्न होने के लिए भोजन तथा ……………. आवश्यक है।
(घ) विपैले एवं दूपित पदार्थ ……………. क्रिया द्वारा शरीर से बाहर निकलते हैं।
उत्तर:
(क) प्रजनन
(ख) श्वसन
(ग) ऊर्जा
(घ) उत्सर्जन

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प्रश्न 3.
सजीवों तथा निर्जीवों में किन्ही पाँच अंतर को स्पष्ट करें।
उत्तर:
सजीव:

  1. सजीव भाजन करते हैं
  2. सजीव बोलते हैं।
  3. सजीव में वृद्धि होती है।
  4. सजीव श्वसन क्रिया करते हैं।
  5. सजीव वंश-वृद्धि करत हैं।

निर्जीव:

  1. निर्जीव भोजन नहीं करते हैं।
  2. निर्जीव बोलते नहीं हैं।
  3. निर्जीव में वृद्धि नहीं होती है।
  4. निर्जीव में श्वसन क्रिया नहीं होती है।
  5. निर्जीव में वंश-वृद्धि की क्षमता नहीं होती है।

प्रश्न 4.
गाड़ी गतिमान है लेकिन यह सजीब नहीं है, कैसे?
उत्तर:
किसी वस्तु को सजीव हम तब कहते हैं जब उसमें एक साथ ये सभी लक्षण जैस- श्वसन, उत्सर्जन, उद्योपन के प्रति अनुक्रिया, प्रजनन, गति एवं वृद्धि पाए जाते हैं। यही कारण है कि गाड़ी सजीव नहीं है। क्योंकि इसमें गति है परन्तु सजीव के सभी लक्षण मौजूद नहीं हैं।

प्रश्न 5.
मछली सजीव है। इसके पक्ष में तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर:
मछली सजीव है क्योंकि इसमें सजीव के सभी लक्षण मौजूद हैं जैसे मछली भोजन करती है, श्वसन एवं उत्सर्जन करती है उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया करती है। इसके साथ-साथ उसमें वंश-वृद्धि की भी क्षमता होती है।

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प्रश्न 6.
आपकी कक्षा में रखे मेज, कुर्सी निर्जीव हैं? तर्क दें।
उत्तर:
कक्षा में रखे मेज, कुर्सी निर्जीव हैं। क्योंकि इसे न तो भोजन की आवश्यकता होती है। न ही इसमें वृद्धि होती है न ही श्वसन एवं उत्सर्जन की क्रिया होती है और न ही वंश वृद्धि की क्षमता होती है। यानि इसमें सजीव के सभी लक्षणों का समावेश नहीं है।

प्रश्न 7.
किसी ऐसी निर्जीव वस्तु का उदाहरण दीजिए जिसमें सजीवों के दो लक्षण परिलक्षित होते हैं।
उत्तर:
गाड़ी एक निर्जीव वस्तु है परन्तु इसमें गति होती है। उसके साथ भोजन के रूप में ईंधन का प्रयोग होता है। ये दोनों लक्षण सजीव की तरह इसमें परिलक्षित होते हैं।

प्रश्न 8.
निम्न में से कौन-सी निर्जीव वस्तुएँ किसी समय सजीव का अंश थी?
मक्खन चमड़ा, मृदा, ऊन, बिजली का बल्ब, खाद्य तेल, नमक, सेब, रबड़।
उत्तर:
चमड़ा, मक्खन, ऊन, खाद्यतेल, सेब, रबड़।

प्रश्न 9.
सजीवों के विशिष्ट लक्षण सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
सजीवों के विशिष्ट लक्षण निम्न होते हैं –

  1. सजीव गतिमान होते हैं।
  2. सजीव को भोजन की आवश्यकता होती है।
  3. सजीव बोलते हैं।
  4. सजीव श्वसन क्रिया करते हैं।
  5. सजीव उत्सर्जन क्रिया करते हैं।
  6. सजीव उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया करते हैं।
  7. सजीव वंश-वृद्धि करते हैं आदि।

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Bihar Board Class 6 Science सजीव और निर्जीव Notes

अध्ययन सामग्री :

भूमिका एवं विषय प्रवेश –

हमारे चारो तरफ अनेक पेड़-पौधे, छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े, बड़े-बड़े – जीव-जन्तु तथा मिट्टी, वायु, जल, पत्थर आदि फैले हुए हैं। इसके अलावे हम अपने घर में मेज, कुर्सी, किताब, बिल्ली, चूहा, फोन, गाड़ी आदि को प्रत्येक दिन देखते हैं। इनमें से कुछ बोलते हैं। चलते हैं श्वास लेते हैं, उत्सर्जन क्रिया करते हैं। वंश-वृद्धि करते हैं तथा उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया करते हैं। परन्तु कुछ ऐसी वस्तु में से एक-दो लक्षण ही पाए जाते हैं।

अब इन सभी वस्तुओं का दो वर्गों में बाँटा गया है. सजीव एवं निर्जीव। सजीव और निर्जीव में अंतर स्पष्ट करना कठिन-सा प्रतीत होता है क्योंकि एक ओर सजीव चलते हैं तो कार, बस भी चलते हैं। यह भोजन के रूप में ईंध न लेते हैं तथा उत्सर्जन के रूप में धुंआ फेकते हैं। आकाश में बादल चलते भी हैं और अपने में वृद्धि भी करते हैं तो क्या उसका अर्थ है कि बादल, कार आदि सजीव हैं? नहीं । तो आखिरकार हम निर्जीव एवं सजीवों में विभेद किस प्रकार करेंगे। क्या सजीवों में कुछ विशेष लक्षण होते हैं। जो उन्हें निर्जीव पदार्थों से अलग करते हैं।

सजीवों में पाए जाने वाले लक्षणों पर हम प्रकाश डाल सकते हैं –

  1. सभी सजीवों को भोजन की आवश्यकता होती है।
  2. सभी सजीवों में वृद्धि परिलक्षित होती है।
  3. सभी सजीवों में श्वसन क्रिया होती है।
  4. सभी सजीव उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया करते हैं।
  5. सभी सजीवां में जान होती है।
  6. सभी सजीवों में उत्सर्जन क्रिया सम्पन्न होती है।
  7. सभी सजीव वंश-वृद्धि करते हैं।
  8. सभी सजीव गतिमान होते हैं।
  9. सभी सजीव की मृत्यु होती है।

ये सभी लक्षणों का सामान्य तौर पर पदार्थों में समावेश होता है उन्हें सजीव कहते हैं। इन सभी लक्षणों में से एक-दो किसी पदार्थ में मौजूद होते हैं परन्तु सभी लक्षण नहीं होते हों तो उसे निर्जीव कहते हैं।

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सजीव जगत में भोजन की आवश्यकता उसे कार्य करने के लिए क्षमता प्रदान करती है। यही भोजन सजीव में वृद्धि करते हैं। ग्रहण किए गए भोजन से हमारे शरीर को ऊर्जा श्वसन के बाद ही मिल पाती है। हमारे शरीर के लिए भोजन एक ईंधन है। शरीर के अन्दर किये गए भोजन को ऑक्सीजन जलाती है जिससे हमारे शरीर को जीवित रखने एवं कार्य करने के लिए ऊर्जा मिलती

सजीव जगत के जीव-जन्तु में भोजन का तरीका अलग-अलग होता है। ठीक उसी प्रकार श्वसन का तरीका भी भिन्न-भिन्न होता है। उदाहरण के लिए केंचुआ त्वचा द्वारा सांस लेता है। मछली के गिल होते हैं जिनकी सहायता से वह जल में घुले वायु से ऑक्सीजन अवशोपित कर लेती है। पौधों की श्वसन क्रिया में गैसों का विनिमय मुख्यत: उनकी पत्तियों द्वारा होता है। पत्तियाँ सूक्ष्म रंध्रों द्वारा वायु को अंदर लेती हैं तथा ऑक्सीजन का उपयोग करती हैं और – कार्बन डाईआक्साइड वायु में निष्काषित कर देती हैं। प्रकाश की उपस्थिति में पौधे वायु की कार्बनडाई ऑक्साइड का उपयोग भोजन बनाने के लिए करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

सजीव के सभी लक्षणों में से उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया प्रमुख माना जाता है। प्रिय व्यंजन, तेज, प्रकाश, गर्म वस्तु, कांटा आदि उपरोक्त स्थितियों में आपके बाह्य वातावरण में होने वाले परिवर्तन हैं जिसके प्रति ज्ञानेन्द्रियाँ अनुक्रिया करती हैं। इन्हें ही उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया कहते हैं। जैसे जंगली जानवरों पर तेज प्रकाश पड़ते ही भाग जाते हैं। रसोई घर में बल्ब प्रदीप्त करते ही कॉकरोच अचानक अपने छिपने के स्थान में भाग जाते हैं। छुई-मुई के पौधे की पत्तियाँ छूने पर अचानक सिकुड़ जाती हैं। जिन जन्तुओं के सिर पर स्पर्शक होते हैं वे स्पर्श दबाव, ध्वनि, गंध, प्रकाश, तापमान, नमी आदि के प्रति संवेदनशील होते हैं।

सजीवों में उत्सर्जन भी एक महत्वपूर्ण लक्षण होते हैं। हमारे शरीर में विभिन्न प्रक्रियाओं के फलस्वरूप विषैले एवं दूषित पदार्थ बनते रहते हैं। ऐसे दूषित पदार्थ मूत्र या पसीना या मल आदि के द्वारा हमारे शरीर से निकल जाते हैं जिसे उत्सर्जन कहते हैं।

व अपशिष्ट पदार्थ पेड़ की छाल के नीचे जमा होता है, जो छाल के गिरने के साथ अपशिष्ट पदार्थ भी बाहर निकल जाता है। पेड़ से सूखी पत्तियों के गिरने के साथ अपशिष्ट पदार्थ का निष्कासन होता है।

सजीव जगत के जीव-जन्तु के सबसे महत्वपूर्ण लक्षण अपने समान दूसरी पीढ़ी का निर्माण करना है। यानि सजीव में वंश-वृद्धि (प्रजनन) की क्षमता होती है जो निर्जीव पदार्थ में नहीं पाए जाते हैं।

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इस प्रकार सजीव में ऊपर वर्णित लक्षणों के अलावे भी अनेक लक्षणों की उपस्थिति ही उन्हें निर्जीव पदार्थों से अलग करता है।

सजीव – वे सभी पदार्थ जिसमें गति, वृद्धि, बोलने की क्षमता, श्वसन, उत्सर्जन, उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया तथा वंश-वृद्धि करने की क्षमता हो, उन्हें सजीव कहते हैं। जैसे- पेड़- पौधे, मानव, जीव-जन्तु (कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, केंचुला, मछली) आदि।

निर्जीव – के सभी पदार्थ जिसमें सजीव में पाए जाने वाले एक-या दो लक्षण ही पाए जाते हों उसे निर्जीव कहते हैं। यानि जो न बोलता हो, न श्वास लेता हो, न हँसता हो, न ही उसर्जन करता हो, न उद्यीपन के प्रति अनुक्रिया करता हो और न वंश-वृद्धि करने (प्रजनन) की क्षमता हो। उसे निर्जीव कहते हैं। जैसे – कुर्सी, मंज, पुस्तक, दीवार, गाड़ी आदि।

Bihar Board Class 9 Hindi रचना निबंध लेखन

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Bihar Board Class 9 Hindi रचना निबंध लेखन Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi रचना निबंध लेखन

Bihar Board Class 9 Hindi रचना निबंध लेखन Questions and Answers

1. होली

भूमिका-भारत उत्सवों का देश है। होली सबसे अधिक रंगीन और मस्त उत्सव है। इस दिन भारत का प्रत्येक हिन्दू भस्मीभूत शंकर भोले भण्डारी का अवतार होता है। भारतवर्ष में उस दिन सभी फक्कड़ता और मस्ती की भाँग में मस्त रहते हैं। होली वाले दिन लोग छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर, ग्रामीण-शहरी का भेद भुलाकर एक दूसरे से गले मिलते हैं तथा परस्पर गुलाल मलते हैं। इस दिन प्रत्येक हिन्दू गुलाल से पता हआ नज़र आता है। – होली का महत्त्व-होली के मूल में हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद और होलिका का प्रसंग आता है।

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मार डालने के लिए होलिका को नियुक्त किया था। होलिका के पास एक ऐसी चादर थी, जिसे ओढ़ने पर व्यक्ति आग के प्रभाव से बच सकता था। होलिका ने उस चादर को ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में ले लिया और अग्नि में कूद पड़ी। वहाँ दैवीय चमत्कार हुआ। होलिका आग में जलकर भस्म हो गई, परन्तु रामभक्त प्रहलाद का बाल भी बाँका न हआ। भक्त की विजय हुई, राक्षस की पराजय। उस दिन सत्य ने असत्य पर विजय घोषित कर दी। तब से लेकर आज तक होलिका दहन की स्मृति में होली का मस्त पर्व मनाया जाता है।

मनाने की विधि-होलो का उत्सव दो प्रकार से मनाया जाता है। कुछ लोग रात्रि में लकड़ियाँ, झाड़-झंखाड़ एकत्र कर उसमें आग लगा देते हैं और समूह में इकट्ठे होकर गीत गाते हैं। आग जलाने की यह प्रथा होलिका-दहन की याद दिलाती है। ये लोग रात को आतिशबाजी आदि छोड़कर भी अपनी खुशी प्रकट करते हैं।

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होली मनाने की दूसरी प्रथा आज सारे समाज में प्रचलित है। होली वाले दिन लोग प्रात:काल से दोपहर 12 बजे तक अपने हाथों में लाल, हरे, पीले रंगों का गुलाल लिए हुए परस्पर प्रेमभाव से गले मिलते हैं। इस दिन किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखा जाता। किसी अपरिचित को भी गुलाल मलकर अपने हृदय के नजदीक लाया जा सकता है।

नृत्यभाव का वातावरण-होली वाले दिन गली-मुहल्लों में ढोल-मजीरे बजते सुनाई देते हैं। इस दिन लोग समूह-मण्डलियों में मस्त होकर नाचते-गाते हैं। दोपहर तक सर्वत्र मस्ती छाई रहती है। कोई नील-पीले वस्त्र लिए घूमता है, तो काई जोकर की मुद्रा में मस्त है। बच्चे पानी के रंगों में एक-दूसरे को नालाने का आनन्द लेते हैं। गुब्बारों में रंगीन पानी भरकर लोगों पर गुब्बारे फेकना भी बच्चों का प्रिय खेल होता जा रहा है। बच्चे पिचकारियों से भी रंग की वर्षा करते दिखाई देते हैं। परिवारों में इस दिन लड़के-लड़कियाँ, बच्चे-बूढ़े, तरुण-तरुणियाँ सभी मस्त होते हैं। प्रौढ़ महिलाओं की रंगबाजी बड़ी रोचक बन पड़ती है। यह सब वातावरण शहरी होली का है। गाँव में होली का रूप मर्दाना हो जाता है। होली आने से कई दिन पूर्व ही गाँव की महिलाएँ ऐंठनदार रस्सी से घर के पुरुषों को मरम्मत करती हैं। प्राय: भाभियाँ अपने देवरों को रस्से पर मचाती हैं।

दोष-होली के दिन कई बार अनुचित छेड़छाड़, मदिरापान, लड़कियों के साथ छेड़खानी करने के कारण झगड़े पैदा हो जाते हैं। इनके कारण रग में भंग पड़ जाता है। यदि इन दोषों को रोक लिया जाए तो इससे मस्त उत्सव ढूँढ़ना कठिन है।

2. दीपावली
अथवा, किसी त्योहार का वर्णन

भूमिका-दीपावली हिन्दुओं का महत्वपूर्ण उत्सव है। यह कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि में मनाया जाता है। इस रात को घर-घर में दीपक जलाए जाते हैं। इसलिए इसे ‘दीपावली’ कहा गया। रात्रि के घनघोर अन्धेरे में दीवाली का जगमगाता हुआ प्रकाश अति सुन्दर दृश्य की रचना करता है।

मनाने का कारण-दीवाली वर्षा-ऋतु की समाप्ति पर मनाई जाती है। धरतो की कीचड़ और गन्दगी समाप्त हो जाती है। अत: लोग अपने घरों-दुकानों की पूरी सफाई करवाते हैं ताकि सोलन, कीड़े-मकोड़े और अन्य रोगाणु नष्ट हो जाएँ। दीवाली से पहले लोग रंग-रोगन करवाकर अपने भवनों को नया कर लेते हैं। दीप जलाने का भी शायद यही लक्ष्य रहा होगा कि वातावरण के सब रोगाण नष्ट हो जाएँ।

दीवाली के साथ निम्नलिखित प्रसंग भी जडे हए हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्री रामचन्द्र जी रावण का संहार करने के पश्चात् वापस अयोध्या लौटे थे। उनकी खुशी में लोगों ने घी के दीपक जलाए थे। भगवान् महावीर ने तथा स्वामी दयानन्द ने इसी तिथि को निर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए जैन सम्प्रदाय तथा आर्य समाज में भी इस दिन का विशेष महत्व है। सिक्खों के छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी भी इसी दिन कारावास से मुक्त हए थे। इसलिए गुरुद्वारों की शोभा इस दिन दर्शनीय होती है। इसी दिन भगवान् कृष्ण ने इन्द्र के क्रोध से ब्रज की जनता को बचाया था।

व्यापारियों का प्रिय उत्सव-व्यापारियों के लिए दीपावली उत्सव-शिरोमणि है। व्यापारी-वर्ग विशेष उत्साह से इस उत्सव को मनाता है। इस दिन व्यापारी लोग अपनीअपनी दुकानों का काया-कल्प तो करते ही हैं, साथ ही ‘शुभ-लाभ’ की आकांक्षा ” भी करते हैं। बड़े-बड़े व्यापारी प्रसन्नता में अपने ग्राहक-वृन्द में मिठाई आदि का वितरण करते हैं। घर-घर में लक्ष्मी का पूजन होता है। ऐसी मान्यता है कि उस रात लक्ष्मी घर में प्रवेश करती हैं। इस कारण लोग रात को अपने घर के दरवाजे खुले रखते हैं। हलवाई और आतिशबाजी की दुकानों पर इस दिन विशेष उत्साह होता है। बाजार मिठाई से लद जाते हैं। यह एक दिन ऐसा होता है, जब गरीब से अमीर तक, कंगाल से राजा तक सभी मिठाई का स्वाद प्राप्त करते हैं। लोग आतिशबाजी छोडकर भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। गृहिणियाँ इस दिन कोई-न-कोई बर्तन खरीदना शकुन समझती हैं।

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निष्कर्ष-दीवाली की रात को कई लोग खुलकर जुआ खेलते हैं। इस कुप्रथा को बन्द किया जाना चाहिए। कई बार जुएबाजी के कारण प्राणघातक झगड़े हो जाते _ हैं। आतिशबाजी पर भी व्यर्थ में करोड़ों-अरबों रुपया खर्च हो जाता है। कई बार आतिशबाजी के कारण आगजनी की दुर्घटनाएं हो जाती हैं। इन विषयों पर पर्याप्त विचार होना चाहिए।

3. मेरे जीवन का लक्ष्य
अथवा, मेरी सबसे बड़ी आकांक्षा

लक्ष्य की आवश्यकता-प्रत्येक मानव का कोई-न-कोई लक्ष्य होना चाहिए। बिना लक्ष्य के मानव उस नौका के समान है जिसका कोई खेवनहार नहीं है। ऐसी नौका कभी भी भँवर में डूब सकती है और कहीं भी चट्टान से टकराकर चकनाचूर हो सकती है। लक्ष्य बनाने से जीवन में रस आ जाता है।

मेरे जीवन का लक्ष्य-मैंने यह तय किया है कि मैं पत्रकार बनूँगा। आजकल सबसे प्रभावशाली स्थान है-प्रचार-माध्यमों का। समाचार-पत्र, रेडियो, दूरदर्शन आदि चाहें तो देश में आमूल-चूल बदलाव ला सकते हैं। मैं भी ऐसे महत्वपूर्ण स्थान पर पहुँचना चाहता हूँ जहाँ से मैं देशहित के लिए बहुत कुछ कर सकूँ। पत्रकार बनकर मैं देश को तोड़ने वाली ताकतों के विरुद्ध संघर्ष करूँगा, समाज को खोखला बनाने वाली कुरीतियों के खिलाफ जंग छेडूंगा और भ्रष्टाचार का भण्डाफोड़ करूँगा।

यह प्रेरणा कैसे मिली-मेरे पड़ोस में एक पत्रकार रहते हैं-मि० नटराजन। वे इण्डियन एक्सप्रेस के संवाददाता तथा भ्रष्टाचार-विरोधी विभाग के प्रमुख पत्रकार हैं। उन्होंने पिछले वर्ष गैस एजेन्सी की धाँधली को अपने लेखों द्वारा बन्द कराया था। उन्हीं के लेखों के कारण हमारे शहर में कई दीन-दुखो लोगों को न्याय मिला है। उन्होंने बहू को जिन्दा जलाने वाले दोषियों को जेल में भिजवाया, नकली दवाई बेचने वाले का लाइसेंस रद्द करवाया, प्राइवेट बस वालों की मनमानी को रोका तथा बस-सुविधा को सुचारू बनाने में योगदान दिया। इन कारणों से मैं उनका बहुत आदर करता हूँ। मेरा भी दिल करता है कि मैं उनकी तरह श्रेष्ठ पत्रकार बनूँ और नित्य बढ़ती समस्याओं का मुकाबला करूं।

मुझे पता है कि पत्रकार बनने में खतरे हैं तथा पैसा भी बहुत नहीं है। परन्तु मैं पैसा के लिए या धन्धे के लिए पत्रकार नहीं बनूंगा। मेरे जीवन का लक्ष्य होगा-समाज की कुरीतियों और भ्रष्टाचार को समाप्त करना। यदि मैं थोड़ी-सी बुराइयों को भी हटा सका तो मुझे बहुत सन्तोष मिलेगा। मैं हर दुखी को देखकर दुखी होता हूँ, हर बुराई को देखकर उसे मिटा देना चाहता हूँ। मैं स्वस्थ समाज को देखना चाहता हूँ। इसके लिए पत्रकार बनकर हर दुख-दर्द को मिटा देना मैं अपना धर्म समझता हैं।

लक्ष्य प्राप्ति की तैयारियाँ-केवल सोचने भर से लक्ष्य नहीं मिलता। मैंने इस लक्ष्य को पाने के लिए कुछ तैयारियाँ भी शुरू कर दी हैं। मैं दैनिक समाचार-पत्र पढ़ता हूँ, रेडियो-दूरदर्शन के समाचार तथा अन्य सामयिक विषयों को ध्यान से सुनता ।  हूँ। मैंने हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा का गहरा अध्ययन करने की कोशिशें भी शुरू कर – दी हैं ताकि लेख लिख सकूँ। वह दिन दूर नहीं, जब मैं पत्रकार बनकर समाज को
सेवा करने का सौभाग्य पा सकूँगा।

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4. भारत प्यारा देश हमारा
अथवा, भारत प्यारा सबसे न्यारा
अथवा, प्यारा भारत देश हमारा
अथवा, कितना निराला देश हमारा
अथवा, मेरा भारत महान

भूमिका-मेरा प्यारा देश भारत अपने अतीत में महान-गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। इसके गर्भ में अनेक प्राचीन-संस्कृतियाँ एवं मानव-सभ्यता के क्रमिक-विकास की गौरवपूर्ण-गाथा है, जिससे हम भारतवासी अंपनी अद्वितीय आन-बान-शान से विश्व में अग्रणी रहे हैं।

भारतीय संस्कृति-भारत की संस्कृति की गणना विश्व की प्राचीनतम् सभ्यताओं में होती है। संसार की प्रायः सभी संस्कृतियों के नष्ट होने पर भी भारतीय-संस्कृति समय के अनेक झंझावातों और तूफानों के सामने अपनी उच्चता और महानता को अक्षुण रखे हुए है। मानव-संस्कृति के आदिम-ग्रंथ ऋग्वेद की रचना का श्रेय इसी देश को प्राप्त है। इस देश के मनीषी आत्मा और परमात्मा की गुत्थियाँ सुलझानेवाले कोरे दार्शनिक ही नहीं थे, वरन् ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की गहराई से खोज की। संगीतकला, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्यकला में भी हमने बेजोड़ (आश्चर्यजनक) उन्नति की। हमारे देश में उस-समय ही उच्चकोटि की नागरिक सभ्यता विकसित हो चुकी थी जिस-समय संसार का अधिकांश भाग घुमंतू जीवन अपनाए हुए था। सिंधु-घाटी की सभ्यता इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

प्राकृतिक शोभा-मेरा देश भारत प्रकृति की पुण्य-लीलास्थली तथा विश्व का सिरमौर है। माँ भारती के मस्तक पर हिमालय मकट के समान, गले में गंगा तथा यमुना हार के समान और दक्षिण में भारत-माता के चरणों को हिन्द-महासागर निरंतर धोता रहता है। गंगा, यमुना, सतलुज, व्यास, गोमती, कावेरी जैसी अनेक नदियों का यह देश अन्न के रूप में सोना उगलता है तथा केवल यहीं पर छः ऋतुएँ आती हैं।

अनेकता में एकता-अपने अंतर में संजोए अनेक प्राचीन-संस्कृतियों का साक्षी हमारा देश समय-समय पर आने वाली विभिन्न संस्कृतियों, धर्म और सम्प्रदायों को अपने यहाँ आश्रय देता रहा है। यही कारण है कि यहाँ अनेकता में एकता का अद्वितीय उदाहरण मिलता है। विविध आस्थाओं, धार्मिक-विश्वासों और सामाजिक जीवन-शैली की अनूठी मिसाल है, यह “अनेकता में एकता”। मेरा देश भारत सामाजिक-धार्मिक अनंकता (विविधता) को एक सूत्र में पिरोये है।

उपसंहार-उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में हमारे देश के विषय में निम्नांकित निष्कर्ष उभर कर सामने आते हैं,-() अनेक प्राचीन-संस्कृतियों एवं मानव-सभ्यता का केन्द्र (ii) महान गौरवशाली इतिहास का भंडार (iii) आध्यात्मिक दार्शनिक तथा ज्ञानी-विज्ञानी विभूतियों एवं मनीषियों की कर्मभूमि (iv) अपूर्व प्राकृतिक-शोभा, छः ऋतुओं एवं प्रचुर-मात्रा में उत्पन्न करनेवाली उर्वरा धरती (v) अनेकता में एकता के अनुपम उदाहरण का पावन एवं महापरम्पराओं वाला-हमारा भारत देश संसार में एकमात्र मिसाल है। अपने देश की गौरवमयी-परम्पराओं तथा वैभवशाली इतिहास को अक्षुण बनाने हेतु यही निश्चय करें-

जिएँ तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे, यह हर्ष।
निछावर कर दं हम सर्वेस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष।।

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तो निश्चित रूप से भारत, उन्नति के शिखर पर अग्रसर होता चला जाएगा।

5. विज्ञान : वरदान या अभिशाप

विज्ञान के दो रूप-विज्ञान एक शक्ति है, जो नित नए आविष्कार करती है। यह
शक्ति न तो अच्छी है, न बुरी। वह तो केवल शक्ति है। अगर हम उस शक्ति से मानव-कल्याण के कार्य करें तो वह ‘वरदान’ प्रतीत होती है। अगर उसी से विनाश करना शुरू कर दें तो वह ‘अभिशाप’ बन जाती है।

विज्ञान वरदान के रूप में-विज्ञान ने अन्धों को आँखें दी है, बहरों को सुनने की ताकत। लाइलाज रोगों की रोकथाम की है तथा अकाल मृत्यु पर विजय पाई है। विज्ञान की सहायता से यह युग बटन-युग बन गया है। बटन दबाते ही वायु-देवता हमारी सेवा करने लगते हैं, इन्द्र-देवता वर्षा करने लगते हैं, कहीं प्रकाश जगमगाने लगता है तो कहीं शीत-ऊष्ण वायु के झोंके सुख पहुँचाने लगते हैं। बस, गाड़ी, वायुयान आदि ने स्थान की दूरी को बाँध दिया है। टेलीफोन द्वारा तो हम सारी वसुधा से बातचीत करके उसे वास्तव में कुटुम्ब बना लेते हैं। हमने समुद्र की गहराइयाँ भी नाप डाली हैं और आकाश की ऊँचाइयाँ भी। हमारे टी० वी०, रेडियो, वीडियो में मनोरंजन के सभी साधन कैद हैं। सचमुच विज्ञान ‘वरदान’ ही तो है।

विज्ञान अभिषाप के रूप में मनुष्य ने जहाँ विज्ञान से सुख के साधन जुटाए हैं, वहाँ दुख के अम्बार भी खड़े कर लिए हैं। विज्ञान के द्वारा हमने अणु बम, परमाणु बम तथा अन्य ध्वंसकारी शस्त्र-अस्त्रों का निर्माण कर लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब दुनिया में इतनी विनाशकारी सामग्री इकट्ठी हो चुकी है कि उससे सारी पृथ्वी को अनेक बार नष्ट किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रदूषण को समस्या बहुत बुरी तरह फैल गई है। नित्य नए असाध्य रोग पैदा होते जा रहे हैं, जो वैज्ञानिक साधनों के अन्धाधुन्ध प्रयोग करने के दुष्परिणाम हैं।

वैज्ञानिक प्रगति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम मानव-मन पर हुआ है। पहले जो मानव निष्कपट था, निस्वार्थ था, भोला था, मस्त और बेपरवाह था, वह अब छली, स्वार्थी, चालाक, भौतिकवादी तथा तनावग्रस्त हो गया है। उसके जीवन में से संगीत गायब हो गया है, धन की प्यास जाग गई है। नैतिक मूल्य नष्ट हो गए हैं।

निष्कर्ष-वास्तव में विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाने वाला मनष्य है। जैसे अग्नि से हम रसोई भी बना सकते हैं और किसी का घर भी जला सकते हैं, जैसे चाकू से हम फलों का स्वाद भी ले सकते हैं और किसी की हत्या भी कर सकते हैं, उसी प्रकार विज्ञान से हम सुख के साधन भी जुटा सकते हैं और मानव का विनाश भी कर सकते हैं। अत: विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाना मानव के हाथ में है। इस सन्दर्भ में एक उक्ति याद रखनी चाहिए-‘विज्ञान अच्छा सेवक है लेकिन बुरा हथियार।

6. प्रदूषण की समस्या
अथवा, पर्यावरण प्रदूषण : एक गम्भीर समस्या
अथवा, पर्यावरण-प्रदूषण
अथवा, प्रदूषण-समस्या और समाधान
अथवा, महानगरों में बढ़ता प्रदूषण

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प्रदूषण का अभिप्राय-विज्ञान के इस युग में मानव को जहाँ कुछ वरदान मिले हैं, वहाँ कुछ अभिशाप भी मिले हैं। प्रदूषण भी एक ऐसा अभिशाप है जो विज्ञान की कोख में से जन्मा है और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबर है।

प्रदूषण के प्रकार-प्राकृतिक सन्तुलन में दोष पैदा होना। न शुद्ध वायु मिलना, न शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना, न शान्त वातावरण मिलनाः प्रदूषण कई प्रकार का होता है। प्रमुख प्रदूषण हैं-वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण।

महानगरों में यह प्रदूषण अधिक फैला हुआ है। वहाँ चौबीसा घण्टे कलकारखानों का धुआँ, मोटर-वाहनों का काला धुआँ इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में साँस लेना दूभर हो गया है। मुम्बई की महिलाएँ धोए हुए वस्त्र छत से उतारने जाती हैं तो उन पर काले-काले कण जमे हुए पाती हैं। ये कण सॉस के साथ मनुष्य के फेफड़ों में चले जाते हैं और असाध्य रोगों को जन्म देते हैं। यह समस्या वहाँ अधिक होती है जहाँ सघन आबादी होती है, वृक्षो का अभाव होता है और वातावरण तंग होता है।

कल-कारखानों का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है। बाढ़ के समय तो कारखानों का दुर्गन्धित जल सब नदी-नालों में घुलमिल जाता है। इससे अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं।

मनुष्य को रहने के लिए शान्त वातावरण चाहिए। परन्तु आजकल कलकारखानों का शोर, यातायात का शोर, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों, लाउडस्पीकरों की कर्ण भेदक ध्वनि ने बहरेपन और तनाव को जन्म दिया है:

उपर्युक्त प्रदूषणों के कारण मानव के स्वस्थ जीवन को खतरा पैदा हो गया है। खुली हवा में लम्बी साँस लेने तक को तरस गया है आदमीः गन्द जल के कारण कई बीमारियाँ फसलों में चली जाती हैं जो मनुष्य के शरीर में पहुंचकर घातक बीमारियाँ पैदा करती हैं। भोपाल गैस कारखाने से रिसी गैस के कारण हजारों लोग मर गए, कितने ही अपंग हो गए। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण न समय पर वर्षा आती है, न सदी-गर्मी का चक्र ठीक चलता है। सखा, बाढ, ओला आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है।

प्रदूषण को बढ़ाने में कल-कारखाने, वैज्ञानिक साधनो का अधिकाधिक उपयोग, फ्रिज, कूलर, वातानुकूलन, ऊर्जा संयंत्र आदि दोषी है। प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना भी मुख्य कारण है। वृक्षों को अन्धाधुन्ध काटने से मौसम का चक्र बिगड़ा है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली न होने से भी प्रदूषण बढ़ा है।

समाधान-विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों से बचने के लिए हमें चाहिए कि अधिकाधिक वृक्ष लगाए जाएँ, हरियाली की मात्रा अधिक हो। सड़कों के किनारे घने तृक्ष हो। आबादी वाले क्षेत्र खुले हों, हवादार हों, हरियाली से आतप्रोत हो कल-कारखानों को आबादी से दूर रखना चाहिए और उनसे निकले प्रदूषित मल को नष्ट करने के उपाय सोचने चाहिए।

उपसंहारः-इन तमाम विचारणीय और महत्वपूर्ण तथ्यों से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रदूषण की समस्या मानव निर्मित है। जहां एक ओर मनुष्य की लापरवाही एवं जानबूझकर प्रदूषित करने की गलत आदतें हैं, वहीं विज्ञान का दुरुपयोग भी एक अन्य कारण है। कारखानों तथा नालों का मल और कचरा, चिमनी से निकलने वाला धुंआ, मोटर गाड़ियों का कार्बन पर्यावरण को प्रदूषित करता है। साथ ही, वृक्षों की कटाई वायु को दूषित करती हैं अतः हमें इनसे बचना होगा। कचरों, गन्दे-जल का समुचित रख-रखाव होना चाहिए।

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7. दहेज-प्रथा
अथवा, दहेज प्रथा : एक गम्भीर समस्या
अथवा, दहेज : एक कुप्रथा

दहेज समस्या-दहेज भारतीय समाज के लिए अभिशाप है। यह कुप्रथा घुन की तरह समाज को खोखला करती चली जा रही है। इसने नारी-जीवन और सामाजिक व्यवस्था को तहस-नहस करके रख दिया है।

दहेज क्या है? -विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को उपहार के रूप में जो भेंट दी जाती है, उसे ‘दहेज’ कहते हैं। यह प्रथा अत्यन्त प्राचीनकाल से चली आ रही है। आज यह प्रथा बुराई का रूप धारण कर चुकी है, परन्तु मूल रूप में – यह बुराई नहीं है।

प्रश्न उठता है कि दहेज को बुराई क्यों कहा जाता है? विवाह के समय प्रेम का उपहार देना बुरा कैसे है? क्या एक पिता अपनी कन्या को खाली हाथ विदा कर दे? नहीं। अपनी प्यारी बिटिया के लिए धन, सामान, वस्त्र आदि देना प्रेम का प्रतीक है। परन्तु यह भेंट प्रेमवश दी जानी चाहिए, मजबूरी में नहीं। दूसरे, दहेज़ अपनी शक्ति के अनुसार दिया जाना चाहिए, धाक जमाने के लिए नहीं। तीसरे, दहेज दिया जाना ठीक है, माँगा जाना ठीक नहीं। दहेज को बुराई वहाँ कहा जाता है, जहाँ माँग होती है। दहेज प्रेम का उपहार है, जबरदस्ती खींच ली जाने वाली सम्पत्ति नहीं।

दुर्भाग्य से आजकल दहेज की जबरदस्ती मांग की जाती है। दूल्हों के भाव लगते हैं। बुराई को हद यहाँ तक बढ़ गई है कि जो जितना शिक्षित है, समझदार है, उसका भाव उतना ही तेज है। आज डॉक्टर, इन्जीनियर का भाव दस-पन्द्रह लाख, आई०ए०एस० का चालीस-पचास लाख, प्रोफेसर का आठ-दस लाख, ऐसे अनपढ़ व्यापारी जो खद कोडी के तीन बिकते हैं, उनका भी भाव कई बार लाखों तक जा पहुँचता है। ऐसे में कन्या का पिता कहाँ मरे? वह दहेज की मण्डी में से योग्यतम वर खरीदने के लिए धन कहाँ से लाए? बस यहीं से बुराई शुरू हो जाती है।

दुष्परिणाम-दहेज-प्रथा के दुष्परिणाम विभिन्न हैं। या तो कन्या के पिता को लाखों का दहेज देने के लिए घस रिश्वतखोरी भ्रष्टाचार, काला-बाजार आदि का सहारा लेना पड़ता है, या उसकी कन्याएँ अयोग्य वरों के मत्थे मढ़ दी जाती हैं। मुंशी प्रेमचन्द की ‘निर्मला’ दहेज के अभाव में बूढ़े तोताराम के साथ ब्याह दी गई। परिणाम क्या हुआ? तोताराम की हरी-भरी ज़िन्दगी श्मशान में बदल गई। स्वयं निर्मला भी तनावग्रस्त होकर चल बसी। हम रोज समाचार-पत्रों में पढ़ते हैं कि अमुक शहर में कोई युवती रेल के नीचे कट मरी, किसी बहू को ससुराल वालों ने जलाकर मार डाला, किसी ने छत से कूदकर आत्महत्या कर ली। ये सब घिनौने परिणाम दहेज रूपी दैत्य के ही हैं।

रोकने के उपाय-हालांकि दहेज को रोकने के लिए समाज में संस्थाएँ बनी हैं, युवकों से प्रतिज्ञा-पत्रों पर हस्ताक्षर भी लिए गए हैं, कानून भी बने हैं, परन्तु समस्या ज्यों की त्यों है। सरकार ने ‘दहेज निषेध’ अधिनियम के अन्तर्गत दहेज के दोषी को कड़ा दण्ड देने का विधान रखा है। परन्तु वास्तव में आवश्यकता है-जन-जागृति की। जब तक यवक दहेज का बहिष्कार नहीं करेंगे और यवतियाँ दहेज-लोभी युवकों का तिरस्कार नहीं करेंगी, तब तक यह कोढ़ चलता रहेगा। हमारे साहित्यकारों और कलाकारों को चाहिए कि वे युवकों के हृदयों में दहेज के प्रति तिरस्कार जगाएँ। प्रेम-विवाह को प्रात्साहन देने से भी यह समस्या दूर हो सकती है।

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8. बेकारी की समस्या
अथवा, युवा वर्ग और बेकारी की समस्या
अथवा, बेरोजगारी की समस्या
वेरोजगारी-समस्या और समाधान

भूमिका-आज भारत के सामने अनेक समस्याएँ चट्टान बनकर प्रगति का रास्ता रोके खड़ी है: उनमें से एक प्रमुख समस्या है-बेरोजगारी। महात्मा गाँधी ने इसे समस्याओं को समस्या कहा था।

अर्थ-वेरोज़गारी का अर्थ है-योग्यता के अनुसार काम का न होना। भारत में मुख्यतया तीन प्रकार के बेरोज़गार हैं। एक वे, जिनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं है। वे पूरी तरह खाली हैं। दूसरे, जिनके पास कुछ समय काम होता है, परन्तु मौसम या काम का समय समाप्त होते ही वे बेकार हो जाते हैं। ये आंशिक बेरोजगार लाते हैं। तीसरे वे, जिन्हें योग्यता के अनुसार काम नहीं मिला। जैसे कोई एम०ए० करके रिक्शा चला रहा है या बी०ए० करके पकौड़े बेच रहा है।

कारण-बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण है-जनसंख्या-विस्फोट। इस देश में रोजगार देने की जितनी योजनाएँ बनती हैं, वे सब अत्यधिक जनसंख्या बढ़ने के कारण बेकार हो जाती हैं। एक अनार सौ बीमार वाली कहावत यहाँ पूरी तरह चरितार्थ होती है। बेरोजगारी का दूसरा कारण है-युवकों में बाबूगिरी की होड़ नवयुवक हाथ का काम करने में अपना अपमान समझते हैं। विशेषकर पढ़े-लिखे युवक दफ्तरी ज़िन्दगी पसन्द करते हैं। इस कारण वे रोजगार कार्यालय की धूल फाँकते रहते हैं।

बेकारी का तीसरा बड़ा कारण है-दूषित शिक्षा-प्रणाली। हमारी शिक्षा प्रणाली नित नए बेरोजगार पैदा करती जा रही है। व्यावसायिक प्रशिक्षण का हमारी शिक्षा में अभाव है। चौथा कारण है-गलत योजनाएँ। सरकार को चाहिए कि वह लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दे। मशीनीकरण को उस सीमा तक बढ़ाया जाना चाहिए जिससे कि रोज़गार के अवसर कम न हों। इसीलिए गाँधीजी ने मशीनों का विरोध किया था, क्योंकि एक मशीन कई कारीगरों के हाथों को बेकार बना डालती है। सोचिए, अगर सादुन बनाने का लाइसेंस बड़े उद्योगों को न दिया जाए तो उससे हजारों-लाखों युवक यह धन्धा अपनाकर अपनी आजीविका कमा सकते हैं।

दुष्परिणाम-बेरोजगारी के दुष्परिणाम अतीव भयंकर हैं। खाली दिमाग शैतान का घर। बेरोजगार युवक कुछ भी गलत-सलत करने पर उतारू हो जाता है। वही शान्ति को भंग करने में सबसे आगे होता है। शिक्षा का माहौल भी वही बिगाड़ते हैं जिन्हें अपना भविष्य अन्धकारमय लगता है।

समाधान-बेकारी का समाधान तभी हो सकता है, जब जनसंख्या पर रोक लगाई जाए। युवक हाथ का काम करें। सरकार लघु उद्योगों को प्रोत्साहन दे। शिक्षा व्यवसाय से जुड़े तथा रोजगार के अधिकाधिक अवसर जुटाए जाएँ।

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9. सर्व शिक्षा अभियान

भूमिका-भारत में आजादी के बाद से देशवासियों में शिक्षा का प्रचार होना शुरू हुआ, लेकिन इसमें आशातीत सफलता नहीं मिली। आजादी के साठ साल बीतने के बाद भी देश में लगभग चालीस प्रतिशत लोग अशिक्षित हैं। अशिक्षा देश के लिए अभिशाप है। अशिक्षित व्यक्ति राष्ट्र की मुख्य धारा में नहीं आ सकता।

भारत की बौद्धिक पृष्ठ भूमि :-भारत की बौद्धिक पृष्ठभूमि बहुत ही गौरवशाली रही है। प्राचीन भारत की वौद्धिक परम्परा विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। भारत के ऋषि-मुनि गुरुकुल परम्परा के अन्तर्गत सबको शिक्षा प्रदान करते थे। साथ ही, गुरु अपने शिष्यों को अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, धर्मशास्त्र आदि सभी विषयों की शिक्षा देते थे। लेकिन, हजार वर्ष की गुलामी में गुरु परम्परा का अंत हो गया।

जीवन में शिक्षा का महत्व :-आज मानव जीवन में शिक्षा का बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान है। निरक्षरता अभिशाप है और साक्षरता वरदान है। शिक्षा से अपार ज्ञान राशि का भंडार खल जाता है। अधिकार और कर्तव्य की समझ बढ़ जाती है तथा शोषण के विरुद्ध लड़ने की क्षमता में वृद्धि होती है। साक्षरता मानव जीवन को सार्थक बनाती है। शिक्षा के अभाव में कोई व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकता।

सरकारी प्रयत्न :-अशिक्षा की समस्या के समाधान हेतु संविधान का 86 वाँ संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत 6 से 14 साल तक के सभी बालक-बालिकाओं को शिक्षा उपलब्ध करना अनिवार्य कर दिया गया था। इसी संशोधन के तहत केन्द्र सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान का शुभारंभ किया।

सर्वशिक्षा अभियान देश के 25 राज्यों एवं संघीय क्षेत्रों के छह सौ जिलों में स्थित छः लाख चालीस हजार गाँवों में चालू किया गया। इस अभियान में करोड़ों बच्चों को सम्मिलित किया गया। इस अभियान के उद्देश्यों में कहा गया कि सभी पढ़ें, सभी बढ़ें, क्योंकि साक्षर भारत ही समर्थ भारत की नींव है।

उपसंहार : – अतः सर्वशिक्षा अभियान एक सर्वोच्च कार्यक्रम है। इस अभियान को सफल बनाने में सरकार, सरकारी कर्मचारी एवं सामान्य जनता सबकी भागीदारी अनिवार्य है। यदि देश में सर्व शिक्षा अभियान सफल होता है तो भारत में एक नये : युग का प्रारम्भ होगा। घर-घर में खुशहाली आयगी। देश विकसित होगा। देश में समृद्धि आयगी।

10. समाचार-पत्र का महत्त्व
अथवा, समाचार-पत्र : ज्ञान का सशक्त माध्यम
अथवा, समाचार-पत्र

भूमिका-समाचार-पत्र वह कड़ी है जो हमें शेष दुनिया से जोड़ती है। जब हम समाचार-पत्र में देश-विदेश की खबरें पढ़ते हैं तो हम पूरे विश्व के अंग बन जाते हैं। उससे हमारे हृदय का विस्तार होता है।

लोकतंत्र का प्रहरी-समाचार-पत्र लोकतन्त्र का सच्चा पहरेदार है। उसी के माध्यम से लोग अपनी इच्छा, विरोध और आलोचना प्रकट करते हैं। यही कारण है कि राजनीतिज्ञ समाचार-पत्रों से बहुत डरते हैं। नेपोलियन ने कहा था- ”मैं लाखों विरोधियों की अपेक्षा इन समाचार-पत्रों से अधिक भयभीत रहता हूँ।” समाचार-पत्र जनमत तैयार करते हैं। उनमें युग का बहाव बदलने की ताकत होती है। राजनेताओं को अपने अच्छे-बुरे कार्यों का पता इन्हीं से चलता है।

प्रचार का उत्तम माध्यम-आज प्रचार का युग है। यदि आप अपने माल को, अपने विचार को, अपने कार्यक्रम को या अपनी रचना को देशव्यापी बनाना चाहते हैं तो समाचार-पत्र का सहारा लें। उससे आपकी बात शीघ्र सारे देश में फैल जाएगी। समाचार-पत्र के माध्यम से रातों-रात लोग नेता बन जाते हैं या चर्चित व्यक्ति बन जाते हैं। यदि किसी घटना को अखबार की मोटी सुर्खियों में स्थान मिल जाए तो वह घटना सारे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। देश के लिए न जाने कितने नवयुवकों ने बलिदान दिया, परन्तु जिस घटना को पत्रों में स्थान मिला, वे घटनाएँ अमर हो गई।

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व्यापार में लाभ-समाचार-पत्र व्यापार को बढ़ाने में परम सहायक सिद्ध हुए हैं। विज्ञापन की सहायता से व्यापारियों का माल देश में ही नहीं विदेशों में भी बिकने लगता है। रोज़गार पाने के लिए भी अखबार उत्तम साधन है। हर बेरोज़गार का सहारा अखबार में निकले नौकरी के विज्ञापन होते हैं। इसके अतिरिक्त सरकारी या गैरसरकारी फर्मे अपने लिए कर्मचारी ढूँढ़ने के लिए अखबारों का सहारा लेती है। व्यापारी नित्य के भाव देखने के लिए तथा शेयरों का मूल्य जानने के लिए अखबार का मुँह जोहते हैं।

जे० पार्टन का कहना है- ‘समाचार-पत्र जनता के लिए विश्वविद्यालय है।’ उनसे हमें केवल देश-विदेश की गतिविधियों को जानकारी ही नहीं मिलती, अपितु महान विचारकों के विचार पढ़ने को मिलते हैं। उनसे विभिन्न त्योहारों और महापुरुषों का महत्त्व पता चलता है। महिलाओं को घर-गृहस्थी सम्हालने के नए-नए नुस्खे पता चलते हैं। प्रायः अखबार में ऐसे कई स्थाई स्तम्भ होते हैं जो हमें विभिन्न जानकारियाँ देते हैं।

आजकल अखबार मनोरंजन के क्षेत्र में भी आगे बढ़ चले हैं। उनमें नई-नई कहानियाँ, किस्से, कविताएँ तथा अन्य बालोपयोगी साहित्य छपता हैं। दरअसल, आजकल समाचार-पत्र बहुमुखी हो गया है। उसके द्वारा चलचित्र, खेलकूद, दूरदर्शन, भविष्य-कथन, मौसम आदि की अनेक जानकारियाँ मिलती है।

समाचार-पत्र के माध्यम से आप मनचाहे वर-वधू ढूँढ़ सकते हैं। अपना मकान, गाडी, वाहन खरीद-बेच सकते हैं। खोए गए बन्धु को बुला सकते हैं। अपना परीक्षापरिणाम जान सकते हैं। इस प्रकार समाचार-पत्रों का महत्त्व बहुत अधिक हो गया है।

11. महात्मा गाँधी
अथवा, हमारा प्रिय नेता
अथवा, मेरा प्रिय महापुरुष

जन्म-2 अक्तूबर, सन् 1869 को भारत की धरती ने एक ऐसा महामानव पैदा किया जिसने न केवल भारतीय राजनीति का नक्शा बदला बल्कि सम्पर्ण विश्व सत्य, अहिंसा, शान्ति और प्रेम की अजेय शक्ति के दर्शन कराए। उनका जन्म पोरबन्दर काठियावाड़ में हुआ! माता-पिता ने उनका नाम मोहनदास रखा।

शिक्षा-मोहनदास स्कूल-जीवन में साधारण कोटि के छात्र थे। परन्तु व्यावहारिक जीवन में उनकी विशेषता प्रकट होने लगी थी। उन्होंने अध्यापक द्वारा नकल कराए जाने पर नकल करने से इन्कार कर दियाः वे 1887 में कानून पढ़ने के लिए विलायत चले गए। वहां उन्होंने शराब न पीने, माँस न खाने और व्यभिचार न करने के वचनों का दृढ़ता से पालन किया। वापसी पर उन्होंने वकालत शुरू कर दी।

दक्षिणी अफ्रिका में वकालत के सिलसिले में उन्हें एक बार दक्षिणी अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। स्वयं मोहनदास के साथ भी ऐसा दुर्व्यवहार घटित हुआ। उसे देखकर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। उन्होंने 1894 में ‘नटाल इंडियन कांग्रेस’ की स्थापना करके गोरी सरकार के विरुद्ध प्रतिरोध का बिगल बजा दिया। सत्याग्रह का पहला प्रयोग उन्होंने यहीं किया था। उनके प्रयत्नों से गोरों के कुछ अत्याचार कम हो गए।

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भारतीय राजनीति में-भारत आकर गाँधी जो स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। उन्होंने सत्य और अहिया को आधार बनाकर राजनीतिक स्वतन्त्रता का आन्दोलन कड़ा। 1920-22 में उन्होंने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन छेड़ दिया। ‘वदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। हिंसा होने के कारण गाँधी जी ने आन्दोलन वापस ले लिया। सन् 1929 में गाँधी जी ने पुनः आन्दोलन प्रारम्भ किया। यह आन्दोलन ‘नमक सत्याग्रह’ के नाम से प्रसिद्ध है। गाँधी जी ने स्वयं साबरमती आश्रम से डाण्डी नक पदयात्रा की तथा वहाँ नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया। सन् 1931 में आप ‘राउण्ड टेबल कांफ्रेस’ में सम्मिलित होने के लिए लन्दन गए। सन् 1942 में आपने ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन छेड़ दिया। देश भर में क्रान्ति की ज्वाला सुलगने लगी। देश का बच्चा-बच्चा अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने पर उतारू हा गया। गाँधी जी को देश के अन्य नेताओं के साथ बन्दी बना लिया गया: 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतन्त्र हो गया।

बलिदान-भारत पाक विभाजन हुआ। देश के विभिन्न स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे होने लगे। उन्हें रोकने के लिए गाँधी जी ने आमरण अनशन रखा, जिससे साम्प्रदायिकता की आग तो बुझ गई परन्तु वे स्वयं उसके शिकार हो गए। 30 जनवरी, 1948 को संसार का यह एक महान मानव एक हत्यारे को गोली का शिकार बन परलोक सिधार गया।

देन-गाँधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे। वे सभी धर्मों का समान आदर करते थे। उनकी प्रसिद्ध उक्ति है- ‘ईश्वर अल्ला तेरे नाम। सबको सन्मति दे भगवान।’ गाँधी जी ने छुआछूत, जाति-पाति, मदिरापान आदि का घोर विरोध किया। उन्होंने स्वदेशी पर बल दिया। राजनीति में नैतिकता को स्थान दिया। उन्होंने ग्रामीण विकास को ध्यान में रखते हुए लघु उद्योगों को लगाने की दिशा प्रदान की। वे कुशल राजनीतिज्ञ और महान संत थे।

12. गणतन्त्र-दिवस (26 जनवरी)
अथवा, गणतन्त्र दिवस की परेड का आँखों देखा हाल
अथवा, गणतंत्र समारोह का आँखों देखा हाल

महत्त्व-गणतन्त्र-दिवस भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व है। इस दिन हमारा आजाद भारत सही अर्थों में ‘स्वतन्त्र’ हुआ था। 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। इस दिन का एक और ऐतिहासिक महत्व भी है! 26 जनवरी 1929 को अखिल भारतीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में यह प्रतिज्ञा को गई थी कि जब तक स्वराज्य नहीं मिलता, विदेशी सत्ता से संघर्ष जारी रहेगा। यह प्रतिज्ञा आज भी हमें आजादी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती है।

मनाने का ढंग-26 जनवरी का दिन समूचे भारतवर्ष में बड़े उत्साह तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। समूचे देश में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। प्रदेशों की सरकारें सरकारी स्तर पर अपनी-अपनी राजधानियों में तथा जिला स्तर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का तथा अन्य अनेक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं।

देश की राजधानी में इस राष्ट्रीय पर्व के लिए विशेष समारोह का आयोजन किया जाता है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है। समूचे देश के विभिन्न भागों से असंख्य व्यक्ति इस समारोह में सम्मिलित होने तथा इसकी शोभा देखने के लिए आते हैं।

विविध झाकियाँ-नई दिल्ली के विजय चौक से प्रात: परेड प्रारम्भ होती है। इण्डिया गेट के निकट राष्ट्रपति राष्ट्रीय धुन के साथ ध्वजारोहण करते हैं। उन्हें 31 तोपों की सलामी दी जाती है। हवाई जहाजों द्वारा पुष्प-वर्षा की जाती है। राष्ट्रपति जल, नभ तथा थल-तीनों सेनाओं की टुकड़ियों का अभिवादन स्वीकार करते हैं। सैनिकों का सीना तानकर अपनी साफ-सुथरी केशभूषा में कदम-से-कदम मिलाकर चलने का दृश्य बड़ा मनोहारी होता है। इस 23, दृश्य को देखकर मन में राष्ट्र के प्रति असीम भक्ति तथा हृदय में असीम उत्साह का संचार होने लगता है। इन सैनिक टुकड़ियों के पीछे आधुनिक शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित वाहन निकलते हैं। इनके पीछे स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राएँ एम०सी०सी० की वेशभूषा में सज्जित कदम-से-कदम मिलाकर चलते हुए यह विश्वास उत्पन्न करते हैं कि हमारी दूसरी सुरक्षा-पंक्ति अपने कर्तव्य से भली-भाँति परिचित है।

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उत्सव का माहौल-मिलिट्री तथा स्कूलों के अनेक बैंड सारे वातावरण को देश-भक्ति तथा राष्ट्र-प्रेम की भावना से गुंजायमान कर देते हैं। विभिन्न प्रदेशों की झाँकियाँ वहाँ के सांस्कृतिक जीवन, वेश-भषा रीति-रिवाजों औद्योगिक तथा सामाजिक क्षेत्र में आए परिवर्तनों का चित्र प्रस्तत करने में परी तरह समर्थ होती हैं। झाँकियों की कला तथा शोभा को देखकर दर्शक मन्त्र-मुग्ध हो जाते हैं। झाँकियों से पहले विभिन्न प्रान्तों से आई नृत्य-मंडलियाँ समस्त वातावरण को उल्लास से भर देती हैं। उन्हें देखकर भारत का बहुरंगी रूप सामने आ जाता है। यह पर्व अतीव प्रेरणादायी होता है।

13. विद्यार्थी और अनुशासन

भूमिका-जीवन को आनन्दपूर्वक जीने के लिए विद्या और अनुशासन दोनों आवश्यक हैं। विद्या का अन्तिम लक्ष्य है-इस जीवन को मधुर तथा सुविधापूर्ण बनाना। अनुशासन का भी यही लक्ष्य है।

अनुशासन भी एक प्रकार की विद्या है। अपनी दिनचर्या को, अपने बोल-चाल को, अपने रहन-सहन को, अपने सोच-विचार को, अपने समस्त व्यवहार को व्यवस्थित करना ही अनुशासन है। एक अनपढ़ गँवार व्यक्ति के जीवन में क्रम और व्यवस्था नहीं होती, इसीलिए उसे असभ्य, अशिक्षित कहा जाता है। पढ़े-लिखे व्यक्ति से यही अपेक्षा की जाती है कि उसका सब कुछ व्यवस्थित हो। अत: अनुशासन विद्या का एक अनिवार्य अंग है।

छात्र के लिए लाभकारी-विद्यार्थी के लिए अनुशासित होना परम आवश्यक है। अनुशासन से विद्यार्थी को सब प्रकार का लाभ ही होता है। अनुशासन अर्थात् निश्चित व्यवस्था से समय और धन की बचत होती है। जिस छात्र ने अपनी दिनचर्या निश्चित कर लो है, उसका समय व्यर्थ नहीं जाता। वह अपने एक-एक क्षण का समुचित उपयोग करता है। वह समय पर मनोरंजन भी कर लेता है तथा अध्ययन भी पूरा कर पाता है। इसके विपरीत अनुशासनहीन छात्र आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर टालकर अपने लिए मुसोबत इकट्ठी कर लेता है।

सफलता का मंत्र-अनुशासन का गुण बचपन में ही ग्रहण किया जाना चाहिए। इसलिए इसका सम्बन्ध छात्रों से है। विद्यालय की सारी व्यवस्था में अनुशासन और नियमों को लागू करने के पीछे यही बात है। यही कारण है कि अच्छे अनुशासित विद्यालयों के छात्र जीवन में अच्छी सफलता प्राप्त करते हैं। अनुशासन हमारी हौचपौच जिन्दगो को साफ़-सुथरी तथा सुलझी हुई व्यवस्था देता है। इसके कारण हमारी । शक्तियाँ केन्द्रित होती हैं। हमारा जीवन उद्देश्यपूर्ण बनता है तथा हम थोड़े समय में हो । बहुत काम कर पाते हैं।

निष्कर्ष-अनुशासन का अर्थ बन्धन नहीं है। उसका अर्थ है-व्यवस्था! हाँ, उस व्यवस्था के लिए कछ अनुचित इच्छाओं से छटकारा पाना पडता है। उनसे छुटकारा पाने में ही लाभ है। छात्र यदि सभ्य बनने के लिए अपनी गलत आदतों पर रोक लगाते हैं तो वह लाभप्रद ही है। अत: अनुशासन जीवन के लिए परमावश्यक है तथा उसको प्रथम पाठशाला है–विद्यार्थी जीवन।।

14. जीवन में खेलों का महत्व

स्वामी विवेकानन्द का मत-स्वामी विवेकानन्द ने अपने देश के नवयुवकों को सम्बोधित करते हुए कहा था-‘सर्वप्रथम हमारे नवयुवकों को वलवान वनना चाहिए। धर्म पीछे आ जाएगा। मेरे नवयुवक मित्रो! वलवान वनो। तुमको मेरी यह सलाह है। गीता के अभ्यास की अपेक्षा फुटवाल खेलने के द्वारा तुम स्वर्ग के अधिक निकट पहुँच जाओगे। तुम्हारी कलाई और भुजाएँ अधिक मजबूत होने पर तुम गीता को अधिक अच्छी तरह समझ सकोगे।’ स्वामी विवेकानन्द के इस कथन से स्पष्ट है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास संभव है और शरीर को . स्वस्थ तथा हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए खेल अनिवार्य हैं।

खेल से लाभ-पाश्चात्य विद्वान पी० साइरन ने कहा है-‘अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।’ इन दोनों की प्राप्ति के लिए जीवन में : खिलाड़ी की भावना से खेल खेलना आवश्यक है। खेलने से शरीर पुष्ट होता है, माँसपेशियाँ उभरती हैं, भूख बढ़ती है, शरीर शुद्ध होता है तथा आलस्य दूर होता है। न । खलने की स्थिति में शरीर दुर्बल, रोगी तथा आलसी हो जाता है। इन सबका कुप्रभाव मन पर पड़ता है जिससे मनुष्य की सूझ-बूझ समाप्त हो जाती है। मनुष्य निस्तेज, उत्साहहीन एवं लक्ष्यहीन हो जाता है। शरीर तथा मन से दुर्बल एवं रोगी व्यक्ति जीवन के सच्चे सुख और आनन्द को प्राप्त नहीं कर सकता। धन-सम्पदा, मान-सम्मान तथा ऊँची कुर्सी प्राप्त होने पर भी बिना अच्छे स्वास्थ्य के मनुष्य दुखी रहता है। बीमार होने की स्थिति में मनुष्य अपना तो अहित करता ही है, समाज का भी अहित करता है। रोगी व्यक्ति समाज पर बोझ बनकर जीता है। गाँधी जी तो बीमार होना पाप का चिह्न मानते थे।

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खेल विजयी वनाते हैं-खेल खेलने से मनुष्य को संघर्ष करने की आदत लगती है। उसकी जुझारू शक्ति उसे नव-जीवन प्रदान करती है। उसे हार-जीत को सहर्ष झेलने की आदत लगती है। खेलों से मनुष्य का मन एकाग्रचित होता है। खेलते समय खिलाड़ी स्वयं को भूल जाता है। खेल हमें अनुशासन, संगठन, पारस्परिक सहयोग, आज्ञाकारिता साहस विश्वास और औचित्य को शिक्षा प्रदान करते हैं। इंग्लैंड वालों का कथन है-“विद्यार्थी जीवन में खेल की भावना में प्रशिक्षित होकर ही ‘एटन’ के मैदान में अंग्रेजों ने नेपोलियन को ‘वाटरलू’ के युद्ध में पराजित किया था।” इससे जीवन में खेलों की महत्ता स्पष्ट हो जाती है।

मनोरंजन-खेल हमारा भरपूर मनोरंजन करते हैं। खिलाड़ी हो अथवा खेलप्रेमी, दोनों को खेल के मैदान में एक अपूर्व आनन्द मिलता है। मनोरजन जीवन को सुमधुर बनाने के लिए आवश्यक है। इस दृष्टि से भी, जीवन में खेलों का अपना महत्व

15. परोपकार

भूमिका-परोपकार दो शब्दों के मेल से बना है- पर + उपकार। इसका अर्थ है-दूसरों की भलाई करना।
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है- ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई।’ अर्थात् परोपकार सबसे बड़ा धर्म है। मैथिलीशरण गुप्त जो भी यही कहते हैं–

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे,
यह पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।

महत्व-प्रकृति हमें परोपकार की शिक्षा देती है। सूर्य हमें प्रकाश देता है, चंद्रमा अपनी चाँदनी छिटकाकर शीतलता प्रदान करता है, वायु निरन्तर गति से बहती हुई हमें जीवन देती है तथा वर्षा का जल धरती को हरा-भरा बनाकर हमारी खेती को लहलहा देता है। प्रकृति से परोपकार को शिक्षा ग्रहण कर हमें भी परोपकार की भावना को अपनाना चाहिए! पन्त जी ने कहा है-

हँसमुख प्रसून सिखलाते
पल भर है जो हँस पाओ।
अपने उर को सौरभ से
जग का आँगन भर जाओ!

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भारत अपनी परोपकारी परम्परा के लिए जगत-प्रसिद्ध रहा है। भगवान शंकर ने समद्र-मंथन में मिले विष का पान करके धरती के कष्ट को स्वय उठा लिया महर्षि दधीचि ने राक्षसो के नाश के लिए अपने शरीर की हड्डियाँ तक दान कर दी थीं। आधुनिक काल में दयानन्द, तिलक, गाँधी, सुभाष आदि के उदाहरण हमें लोकहित की प्रेरणा देते हैं।

परोपकार करने से पहले आवश्यक है कि परोपकारी का जोवन प्रेम से, भरा हुआ हो। जो स्वयं समृद्ध होगा, वही कुछ दे सकेगा। दूसरे, जिसका हमें उपकार करना है, उसके प्रति आत्मीयता होनी चाहिए। पराया मानकर किया गया उपकार दम्भ को जन्म देता है।

निष्कर्ष-परोपकार करने से आत्मा को सच्चे आनन्द को प्राप्ति होती है। दूसरे का कल्याण करने से परोपकारी को आत्मा विस्तृत हो जाती है। उसे अलौकिक आनन्द मिलता है! उसक आनन्द को तुलना भौतिक सखा स नहीं की जा सकती। ईसा मसीह ने एक बार अपने शिष्यों को कहा था–‘स्वार्थी बाहरी रूप से भले ही सुखी दिखाई पड़ता है, परन्तु उसका मन दुःखी और चिन्तित रहता है। सच्चा आनन्द दो परोपकारियों को प्राप्त होता है।

16. मेरा प्रिय कवि

हिन्दी साहित्य अनेक श्रेष्ठ कवियों का भाण्डार है। मुझे गोस्वामी तुलसीदास का जीवन और काव्य विशेष रूप से पसन्द है। उनकी कविता का पढ़कर मुझे भरपूर रस और प्रेरणा मिलती है।

तुलसीदास का जन्म सम्वत् 1554 को बाँदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम हलसी तथा पिता आत्माराम दुबे थे। इनका बचपन बहुत कष्टों में बीता। उन्हें अनाथों की भाँति दर-दर भटकना पडा। गरु नरहरि ने इन्हें राममन्त्र की दीक्षा दीसंवत् 1583 में रत्नावली नामक सुन्दरी से इनका विवाह हुआ! वं पत्नी पर बहुत आसक्त थे। एक दिन पत्नी की कटोक्ति सुनकर वे रामभक्ति की आर मुड़ गए। संवत् 1680 में उनका देहान्त हो गया।

तुलसीदास का जीवन राममय था। वे भगवान राम के परम भक्त थे। भक्तिभावना का जैसा सुन्दर रूप उनके काव्य में प्रकट हुआ है, वैसा अन्य किसो कवि की कविता में नहीं। वे प्रभु राम के सामने स्वयं को लघु मानते हुए कहते हैं-

राम सो बडो है कौन. मांसा कौन छोरा
राम सों खरो है कौन, मांसों कोन खोला?

तुलसीदास ने राम के चरित्र का उज्ज्वल बनाकर प्रस्तुत किया। उनके राम श्रेष्ठ पुत्र, योग्य पति, अच्छे भाई और कुशल राजा हैं। वे शोल, शक्ति और सौन्दर्य के अवतार हैं। तुलसीदास उन्हें जगत के कण-कण में व्याप्त देखते हैं

सियाराम मय सब जग जानी।
करहें प्रणाम जारि जुग पानी।।

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तुलसीदास ने शिव-भक्तों और विष्णु-भक्तों के वैर-भाव को दूर करने का प्रयत्न किया। उन्होंने भक्ति, ज्ञान और कर्म के तालमेल पर बल दिया। वे लोकमंगल को महत्व देते थे। वे उसी कविता को श्रेष्ठ मानते थे जो जन-कल्याण करे-

कीरति भनति भूति भल सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हितु होई।।

तुलसीदास की कविता रस का भाण्डार है। उनकी चौपाइयाँ और दोहे तो जन-जन के गले का हार बने हए हैं। उन्हें गाकर आज भी गायक धन्य होते हैं। उनकी भाषा इतनी सरल, सरस और मधुर है कि प्रत्येक श्रोता उसके आनन्द में गोते लगाने लगता है।

17. श्रम का महत्व
अथवा, परिश्रम का महत्व
अथवा, अपना हाथ जगन्नाथ
अथवा, भाग्य और पुरुषार्थ
अथवा, परिश्रम सफलता का मूल है

भूमिका-संस्कृत का एक सुप्रसिद्ध श्लोक है-

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

अर्थात् परिश्रम से ही कार्य होते हैं, इच्छा से नहीं। सोते हुए सिंह के मुँह में पशु स्वयं नहीं आ गिरते। कार्य-सिद्धि के लिए परिश्रम बहुत आवश्यक है।

प्रकृति परिश्रम का पाठ पढ़ाती है-सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक मनुष्य ने जो भी विकास किया है, वह सब परिश्रम की ही देन है। जब मानव जंगलो अवस्था में था तग वह घोर परिश्रमी था। उसे खाने-पीने, सोने, पहनने आदि के लिए जी-तोड मेहनत करनी पड़ती थी। आज, जबकि युग बहुत विकसित हो चुका है, परिश्रम की महिमा कम नहीं हुई है। बड़ी-बड़ी बाँधों का निर्माण देखिए, अनेक मंजिले भवन देखिए, खदानों की खुदाई, पहाड़ों की कटाई, समुद्र की गोताखोरी या आकाशमण्डल की यात्रा का अध्ययन कोजिए। सब जगह मानव के परिश्रम की गाथा सुनाई पड़ेगीः एक कहावत है—-‘स्वर्ग क्या है, अपनी मेहनत से रची गई सृष्टि। नरक क्या है? अपने आप बन गई दुरवस्था।’ आशय यह है कि स्वर्गीय सुखो को पाने के लिए तथा विकास करने के लिए मेहनत अनिवार्य है। इसीलिए मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है-

पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो,
सफलता वर-तुल्य वरो, उठो।
अपुरुषार्थ भयकर पाप है,
न उसमें यश है, न प्रताप है।

‘केवल शारीरिक परिश्रम ही परिश्रम नहीं है। कार्यालय में बैठे हुए प्राचार्य, लिपिक या मैनेजर केवल लखनी चलाकर या परामर्श देकर भी जी-तोड़ मेहनत करते है। जिस क्रिया में कुछ काम करना पड़े, जोर लगाना पड़े, तनाव मोल लेना पड़े, वह मेहनत कहलाती है। महात्मा गाँधी दिन-भर सलाह-मशविर में लगे रहते थे, परन्तु वे घोर परिश्रमी थे।

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भाग्य और पुरुषार्थ-पुरुषार्थ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे सफलता मिलती है। परिश्रम ही सफलता की ओर जाने वाली सड़क है। परिश्रम से आत्मविश्वास पैदा होता है। मेहनती आदमी को व्यर्थ में किसी को जी-हजूरी नहीं करनी पड़ती, बल्कि लोग उसकी जी-हजूरी करते हैं। तीसरे, मेहनती व्यक्ति का स्वास्थ्य सदा ठीक रहता है। चौथे मेहनत करने से गहरा आनन्द मिलता है। उससे मन में यह शान्ति होती है कि मै निठल्ला नहीं बैठा। किसी विद्वान का कथन है-जब तुम्हारे जीवन में घोर आपत्ति और दुःख आ जाएं तो व्याकुल और निराश मत बनो; अपितु तुरन्त काम में जुट जाओ। स्वयं को कार्य में तल्लीन कर दो तो तुम्हें वास्तविक शान्ति और नवीन प्रकाश की प्राप्ति होगी।

उपसंहार-राबर्ट कोलियार कहते हैं-‘मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र उसकी दस अगुलियाँ हैं।’ ‘अतः हमें जीवन का एक-एक क्षण परिश्रम करने में बिताना चाहिए। श्रम मानव-जीवन का सच्चा सौन्दर्य है। हरिवंशराय बच्चन भी इसी भाव को इन शब्दों में कहते है-

यह महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वंद रक्त से
लथपथ-लथपध-लथपथ।

18. भारत का किसान
अथवा, भारतीय कृषक

भूमिका-भारत की आत्मा गाँवों के खेत-खलिहानों, पोखर तथा वृक्षाच्छादित रम्य बाग-बगीचों में बसती है। हमारे किसान ही वस्तुतः हमारे अन्नदाता और राष्ट्र-निर्माता हैं। गाँवों में ही त्याग, परिश्रम और राष्ट्रसेवा की मूर्ति किसान निवास करते हैं।

सरलता की मूर्ति-भारतीय किसान बहुत सहज तथा सरल जीवन जीते हैं। कृत्रिमता से वे दूर रहते हैं। उनके जीवन की आवश्यकताएँ अत्यन्त सीमित होती हैं। उनका संबंध प्रकृति से निकट का होने के कारण वे हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ रहते हैं। सात्विक जीवन व्यतीत करते हुए वे संवेदनशील, दयालु और सुख-दुख के सच्चे-साथी हैं।

परिश्रमी-स्वभाव सं भारतीय किसान अत्यन्त परिश्रमी होता है। जाड़ों की बर्फीली ठंड, ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड गर्मी तथा वर्षा ऋतु की मूसलाधार वृष्टि को सहन करते हुए निरंतर अपने कर्तव्य-पालन में व्यस्त रहता है और कप्टपूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

अभावपूर्ण जीवन-भारतीय-कृषक अन्नदाता होकर भी स्वयं पेटभर भोजन तथा पर्याप्त वस्त्र नहीं जुटा पाता है, और इस वेदनापूर्ण स्थिति में ही वह जीवन की अंतिम साँस लेता है, यद्यपि वह दिन-रात अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कठोर श्रम करता है।

वर्तमान स्थिति-भारतीय-कृषक शोषण का शिकार है। वह अभाव और कप्ट की स्थिति में जीवन गुजार देता है, अपर्याप्त भोजन तथा वस्त्र उसकी नियति बन गई है। कर्ज के भार से पीड़ित रहता है। शिक्षा का अभाव, रूढ़ियाँ और अंधविश्वास उसके जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं।

विकास योजनाएँ- भारतीय कृषकों की समस्याओं के निराकरण और जीवन-स्तर को उन्नत बनाने के लिए यद्यपि सरकार द्वारा अनेक योजनाएँ बनी हैं, किन्तु उनका समुचित कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। किसान आज भी उपेक्षित और शोषण का शिकार हैं।

उपसंहार-उपरोक्त वर्णित तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि देश तभी उन्नति के शिखर पर पहुँच सकता है जब किसानों की दशा में सधार हो और उनकी समस्याओं का समाधान हो। भारतीय-किसान अभाव और कप्ट की स्थिति झेलने को अभिशप्त हैं। श्री लालबहादुर शास्त्री का नारा-“जय जवान जय-किसान” में यह वास्तविकता प्रतिबिम्बित होती है।

अतः उनके उत्थान के लिए हमें हर संभव प्रयास करना चाहिए।

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19. मित्रता
अथवा, मित्रता वड़ा अनमोल रत्न
अथवा, विपत्ति कसौटी जे कसे सोई साँचे मीत

भूमिका-मनुष्य स्वयं में अधूरा है। उस अपने सुख-दुःख बॉटने के लिए तथा अपने मन की बात कहने के लिए भागीदार की आवश्यकता पड़ती है। सच्चा मित्र ही इस कार्य को कर सकता है। सच्चा मित्र एक प्रकार से हमारा ही विस्तार होता है। जीवन को सरसता और आसानी से जीने के लिए मित्रता आवश्यक है।

पंचतंत्र में कहा गया है-“जो व्यक्ति न्यायालय, श्मशान और विपत्ति के समय साथ देता है उसको सच्चा मित्र समझना चाहिए।” गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं –

जे न मित्र दुख होहि दुखारी।
तिन्हहिं विलोकत पातक भारी।।

एक सच्चा मित्र दो शरीर में एक आत्मा के समान है।’

सच्चा मित्र कौन-मित्र का चुनाव बाहरी चमक-दमक, चटक-मटक या वाकपटुता देखकर नहीं कर लेना चाहिए। उसके लिए कुछ बातें देखनी चाहिए। मित्रता समानता के आधार पर होनी चाहिए। दानों क आर्थिक स्तर में अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। मित्र अपने से बहुत अधिक शक्तिशाली भी नहीं होना चाहिए। वह केवल अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाला न होकर हमारी भावनाओं को समझने वाला होना चाहिए। वह सच्चरित्र, परदुःखकातर तथा विनम्र होना चाहिए। विश्वासपात्र मित्र को पा लेना बहुत बड़ी सफलता है।

लाभ-सच्चा मित्र जीवन को अनुपम निधि है। वह हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, दोषों से हमारी रक्षा करता है, निराश होने पर उत्साह देता है, महान कार्यों में सहायता देता है। मित्रता कवच के समान हमारी रक्षा करती है। श्रीकृष्ण की मित्रता पाकर पाण्डवों ने कौरवों को मार डाला। राम का सहयोग पाकर सग्रीव ने अत्याचारी बाली को मार डाला। मित्रता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि हम उस अपना भरोसे का साथी मानकर अपने सुख-दुख उसके सामने निर्भीक होकर कह सकते हैं।

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समानता-मित्रता के लिए समान स्वभाव अच्छा रहता है। परन्तु यह नितान्त आवश्यक नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में भी मैत्री सभव है। नीति-निपुण अकबर तथा हास्य-व्यंग्य की साकार प्रतिमा बीरबल मे घनिष्ठ मित्रता थी। दानवीर कर्ण और लोभी दुर्योधन की खूब पटतो थो।।

निष्कर्ष-सच्चा मित्र जीवन में सफलता की कुंजी है। मित्रता वास्तव में एक नई शक्ति को योजना है। मित्र के सुख और सौभाग्य को चिन्ता करने वाला सच्चा मित्र बड़े भाग्य से मिलता है। किसी ने ठीक ही कहा है- ‘सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्चो मित्रता उससे भो दुर्लभा’

20. दूरदर्शन
अथवा, टेलीविजन : विज्ञान का वरदान
अथवा, युवा पीढ़ी पर दूरदर्शन का प्रभाव
अथवा, दूरदर्शन : विकास या विनाश

भूमिका-आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों में सबसे अधिक आकर्षक यन्त्र है– दूरदर्शन। इसके माध्यम से दूर के स्थान से प्रसारित ध्वनि चित्र सहित दर्शकों के पास पहुंच जाती है। दूरदर्शन का प्रभाव रेडियो से अधिक स्थायो है। पिछले दो दशकों में दूरदर्शन ने भारत में बहुत लोकप्रियता प्राप्त की है।

लाभ-भारत जैसे विशाल देश में दूरदर्शन की महत्ता असंदिग्ध है। आज हमारे देश के सामने अनेक समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं। दूरदर्शन के माध्यम से उन समस्याओं की और लोगों का ध्यान आकृष्ट कर उनके समाधान की दिशा में प्रयत्न किया जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान समाज-शिक्षा तथा खेती-बाडी सम्बन्धी विषयों के सम्बन्ध में जानकारी द्वारा लोगों का ज्ञानवर्द्धन किया जा सकता है। देश में मद्यपान के कप्रभावों परिवार नियोजन की आवश्यकता, भारतीय जीवन में विविधता होते हुए भी एकता इत्यादि विषयों पर विभिन्न कार्यक्रम दिखाकर लोगों को अधिक जागरूक बनाया जा सकता है। इस दिशा में हमारा दरदर्शन अब रुचि लेने लगा है प्रसन्नता का विषय है।

दरदर्शन के द्वारा जनसामान्य को शिक्षित बनाया जा सकता है तथा अपेक्षित कार्यक्रमों के द्वारा जहाँ लोगों का मनोरंजन किया जा सकता है, वहीं उनके दृष्टिकोण को वैज्ञानिक तथा स्वस्थ बनाया जा सकता है।

हानियाँ-दूरदर्शन की हानियाँ जितनी पाश्चात्य देशों में प्रकट होकर सामने आई हैं, उतनी अभी भारत में नहीं आई हैं। वहाँ दूरदर्शन के कारण सामाजिक जीवन जड़ हो गया है। लोग दूरदर्शन के कार्यक्रमों के बारे में तो जानते हैं, परन्तु अपने पड़ोसी के बारे में नहीं जानते। वहाँ आत्म-सीमितता और अकेलेपन का दोष बढ़ता जा रहा है।

दूरदर्शन से एक हानि यह भी है कि यह देखने वाले व्यक्ति को पंगु-सा बना देता है। सब कुछ चलचित्रों के माध्यम से उसके पास घर में ही पहुँच जाता है और वह चुपचाप कुर्सी पर बैठा अथवा बिस्तर पर लेटा उसका दर्शक मात्र रह जाता है। घटनाएँ उस तक पहुँच जाती हैं परन्तु स्वयं वह उन्हें देखने का वास्तविक अनुभव प्राप्त नहीं कर सकता। वह देखता है कि किन्हीं दूर देशों में युद्ध में बम-बर्षा हो रही है अथवा गोलियाँ चल रही हैं। या दो देशों के खिलाड़ी खेल रहे हैं, रन या गोल बन रहे हैं, मैदान में उपस्थित दर्शक तालियाँ बजा रहे हैं, परन्तु इस प्रक्रिया को वह मात्र देख सकता है, स्वयं उसमें भागीदार नहीं बन सकता! ।

निष्कर्ष-दूरदर्शन से आत्मसीमितता, जड़ता, पंगुता, अकेलापन आदि दोष बढ़े हैं। कई देशों में दूरदर्शन के कारण अपराध भी बढ़े हैं। परन्तु इसमें दोष दूरदर्शन का नहीं, कार्यक्रम प्रसारण-समिति का है। दूरदर्शन तो हमारे हाथ में एक सशक्त साधन है जिसके समुचित उपयोग से हम जीवन को और अधिक सुखद, स्वस्थ और सुन्दर बना सकते हैं।

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21. मेरी प्रिय पुस्तक

भूमिका-मुझे श्रेष्ठ पुस्तकों से अत्यधिक प्रेम है। पुस्तके मेरे जीवन की सच्ची संगनी है। यों मुझे अनेक पुस्तकें पसन्द है, लेकिन जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह है तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’! यह वह पुस्तक है, जिसको छाप मेरे जीवन के प्रत्येक व्यवहार पर अकित है।

विषय-वस्तु-‘रामचरितमानस’ में दशरथ-पुत्र राम की जीवन-कथा का वर्णन है। इसमें राम के जन्म, शिक्षण, विवाह, वनवास, सीता-हरण, रावण-संहार और राजतिलक का अत्यन्त सजीव, स्वाभाविक और सुन्दर वर्णन हुआ है। श्रीराम के जीवन कि प्रत्येक लीला मन को भाने वाली है। उन्होंने किशोर अवस्था में ही राक्षसों का वध और यज्ञ-रक्षा का कार्य जिस कुशलता से किया है, वह मेरे लिए अत्यन्त प्रेरणादायक है। उनकी वीरता और कोमलता के सामने मरा हृदय श्रद्धा से झुक जाता है। सीता-स्वयंवर के दृश्य में रावण, अन्य राजा गण तथा परशुराम का व्यवहार अत्यन्त रोचक है।

उपयोगिता-रामचरितमान में मार्मिक स्थलों का वर्णन तल्लीनता से हुआ है। राम-वनवास, दशरथ-मरण, सीता-हरण, लक्ष्मण- मूर्छा, भरत-मिलन आदि के प्रसंग दिल को छूने वाले हैं। इन अवसरों पर मेरे नयनों में आँसुओं की धार उमड़ आती है। विशेष रूप से राम और भरत का मिलन दृश्य हृदय का छूने वाला है।

इस पुस्तक में तुलसीदास ने मानव के आदर्श व्यवहार को अपने पात्रों के जीवन में साकार होते दिखाया है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे आदर्श राजा, आदर्श पुत्र, आदर्श पति और आदर्श भाई हैं। भरत और लक्ष्मण आदर्श भाई हैं। उनमें एकदूसरे के लिए सर्वस्व त्याग की भावना प्रबल है। सीता आदर्श पत्नी है। हनुमान आदर्श सेवक हैं। पारिवारिक जीवन की मधुरता का जैसा सरस वर्णन इस पुस्तक में है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं मिलता।

उपसंहार-यह पुस्तक केवल धार्मिक महत्व को नहीं है। इसमें मानव को प्रेरणा देने की असीम शक्ति है। इसमें राजा, प्रजा, स्वामी, दास, मित्र, पति, नारी; स्त्री, पुरुष सभी को अपना जीवन उज्ज्वल बनाने की शिक्षा दी गई है। राजा के बारे में उनका वचन हैं

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवस नरक अधिकारी।
इसी भाँति श्रेष्ठ मित्र के गणों का वर्णन करते हए वे कहते हैं
म रज करि जाना। मित्रक दुख-रज मेरु समाना।
जें न मित्र दुख होहि दुखारी। तिहि विलोकित पातक भारी।।

तुलसीदास ने प्रायः जीवन के सभी पक्षों पर सूक्तियाँ लिखी हैं। उनके इन अनमोल वचनों के कारण यह पुस्तक अमरता को प्राप्त हो गई है।

रामचरितमानस की भाषा अवधी है। इसे दोहा-चौपाई शैली में लिखा गया है। इसका एक-एक छन्द रस और संगीत से परिपूर्ण है। इसकी रचना को लगभग 500 वर्ष हो चुके हैं। फिर भी आज इसके अंश मधुर कंठ में गाए जाते हैं। यही इसकी महिमा और मधुरिमा का प्रमाण है।

22. महँगाई की समस्या
अथवा, महँगाई एक समस्या

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भूमिका-आज विश्व के विकासशील देशों के सामने दो समस्याएँ प्रमुख हैं-मुद्रा-स्फीति तथा महँगाई। जनता अपनी सरकार से माँग करती है कि उसे कम दामों पर दैनिक उपभोग की वस्तएँ उपलब्ध करवाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाता तब लोग _आय में वृद्धि की भी माँग करते हैं। देश के पास उतना धन है नहीं। फलस्वरूप मुद्रा का फैलाव बढ़ता है, सिक्के की कीमत घटती है और महँगाई बढ़ती जाती है।

महँगाई के कारण-सरकार ने आवश्यक वस्तुओं की कीमतें कम करने के आश्वासन दिये, किन्तु कीमतें बढ़ती ही चली गईं। इस कमरतोड़ महँगाई के अनेक कारण हैं। महँगाई का सबसे बड़ा कारण होता है-उपज में कमी, सूखा, बाढ, सुरसा के मँह की भाँति बढ़ती आबादी और टिपर्ण वितरण-व्यवस्था। हरित-क्रान्ति के अन्तर्गत बहुत-से कार्यक्रम चलाए गए, अधिक उपज वाले बीजों का आविष्कार तथा प्रयोग बढ़ा, रासायनिक खाद के प्रयोग से उपज भी बढ़ी, किन्तु हमारी आबादी भी बढ़ती चली गई और हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सकी।

जमाखोरी भी इसका एक प्रमुख कारण है। उपज जब मण्डियों में आती है, अमीर व्यापारी भारी मात्रा में अनाज एवं अन्य वस्तुएँ खरीद कर अपना गोदाम भर लेता है और इस प्रकार बाजार में वस्तओं की कमी आ जाती है। व्यापारी 3 गोदामों की वस्तएँ तभी निकालता है जब कई गना अधिक उसे कीमत प्राप्त होती है। केन्द्रीय सरकार में होने वाले निरन्तर परिवर्तन तथा मध्यावधि चुनावों और युद्धों ने भी महँगाई में वृद्धि की है। स्थायी सरकार हो महँगाई पर अंकुश लगाने में समर्थ हो सकती है।

दोष-हमारी वितरण–प्रणाली में भी ऐसा दोष है जो उपभोक्ताओं की कठिनाइयाँ बढ़ा देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार का सर्वग्रासी अजगर यहाँ भी अपना काम करता हैं वस्तुओं की खरीद और वितरण की निगरानी करने वाले विभागों के कर्मचारी ईमानदारी से कार्य करें तो क़ीमतों की बढ़ोत्तरी को रोका जा सकता है।

उपसंहार-बढ़ती महँगाई पर अंकुश रखने के लिए एक सक्रिय राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है। यदि निम्न तथा मध्य वर्ग के लोगों को उचित दाम पर आवश्यक वस्तुएँ नहीं मिलेंगी तो असन्तोष बढ़ेगा और अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। अतः महँगाई पर लगाम जरूरी है।

23. रेल की एक यात्रा
अथवा, एक अविस्मरणीय रेल-यात्रा

भूमिका-यह बात सन् 2006 की है। मुझे दिल्ली से चण्डीगढ़ जाना था। मैं पिनाजी के साथ था। मै पाँचवी कक्षा में पढ़ता था। पिताजी ने बतलाया था कि दोपहर 12.30 पर नई दिल्ली से चलने वाली फ्लाईंग मेल से हमें चण्डीगढ़ के लिए चलना है। यह मेरी प्रथम रेल-यात्रा थी। अत: मैं प्रात: से बहुत उत्साहित था। इससे पूर्व मैंने गाड़ी देखी अवश्य थो, लेकिन उस पर यात्रा नहीं की थी।

स्टेशन का दृश्य-हमारे टिकट पहले ही खरीदे जा चुके थे। उस दिन मेरे जल्दी हम कारण 12.00 बजे ही नई दिल्ली स्टेशन पर पहुँच गए। साफ-सुथरा चहलपहल से भरा रेलवे स्टेशन था। कोई कुली के साथ अटैौचयाँ लिए आ रहा था, कोई अपना बैग सम्हाले गाड़ियों की ओर लपका जा रहा था। 12.05 पर हमने अपनी जगह ढूँढ़ निकाली। मुझे खिड़की के पास बैठने का मौका मिला, इसलिए मै खुश था। गाड़ी पर बैठकर मुझे बहुत अच्छा लगा।

गाड़ी का दृश्य-ठीक 12.30 पर गाड़ी चली। लगभग सभी सोटे यात्रियों से भर गई थीं। लोग अपने-अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ किसी-न-किसी क्रिया में व्यस्त थे। अधिकांश लोग पत्र-पत्रिका, समाचार-पत्र या पुस्तक आदि पढ़ रहे थे। एकाध जगह ताश का खेल चल रहा था। बुजुर्ग लगने वाले यात्री देश-विदेश की चर्चा में व्यस्त थे। कहीं से हँसी के फव्वारे और मजाक के स्वर आ रहे थे। शायद यह किसी कॉलेज के छात्र छात्राओं का समूह था जो मीठी-मीठी बातों में आनन्द ले रहा था।

वाहर का दृश्य-गाड़ी के चलते ही मेरा ध्यान बाहर के दृश्यों की तरफ खिंच गया। मेरे लिए तो यह सजीव चलचित्र था। मैं दिल्ली से चण्डीगढ़ के सारे दृश्यों को पी लेना चाहता था। मेरा ध्यान पटरी के काँटे बदलती गाड़ी की ओर गया। मैं समझ नहीं पाया कि गाड़ी कैसे उन आड़ी-तिरछी पटरियों में से अपना रास्ता ढूँढ़ पा रही है। यह मैं समझ पाऊ कि गाड़ी रुक गई। यह सब्जी मण्डी स्टेशन था। यात्रियों का हुजूम स्टेशन पर खड़ा था। मैंने अपनी सीट सम्हाल ली। सब्जी मण्डी स्टेशन पर इतने अधिक यात्री चढ़े कि बोसियों यात्रियों को खड़ा रहना पड़ा। कई यात्री दो की सीट पर तीनतीन करके बैठे जा रहे थे

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चहल-पहल-गाड़ी में खाने-पीने का सामान बेचने वाले, जूते-पालिश करने वाले, भीख माँगने वाले, खिलौने बेचने वाले आ-जा रहे थे! जहाँ जिस स्टेशन पर गाड़ी रुकती थी, वहीं चहल-पहल शुरू हो जाती थी। चाय, बोतल, पुस्तकें, पकौड़े आदि बेचने वाले अधीर हो उठते थे। इस सारी चहल-पहल में कब पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, अम्बाला आकर चला गया, मुझे पता ही न चला। मेरा ध्यान तो तब टूटा, जब पिताजी ने कहा-बेटा पुरु। चलो जूते पहनो, स्टेशन आ गया है। मेरी वह प्रथम रेल-यात्रा आज भी मुझे स्मरण है। वह यात्रा अत्यन्त सुखद थी।

24. साम्प्रदायिकता : एक अभिशाप

अर्थ-किसी एक मत या पूजा-पद्धति को मानने वाले मानव-समुदाय को ‘सम्प्रदाय’ कहते हैं। जब कोई सम्प्रदाय और उसके अनुयायी स्वयं का बहुत श्रेष्ठ और अन्य सम्प्रदायों को घृणित मान लेते हैं तो साम्प्रदायिकता का जन्म होता है। दूसरे शब्दों में, सम्प्रदाय का असहनशील हो उठना ही साम्प्रदायिकता है।

साम्प्रदायिकता की समस्या पूरे विश्व में व्याप्त है। इंग्लैंड में रोमन कैथोलिकों और प्रोटेस्टेन्टों के मध्य संघर्ष छिड़ा रहता है। इस्लामी देशों में शिया-सुन्नी के झगड़े हैं। भारत की स्थिति और अधिक विचित्र है।

भारत में साम्प्रदायिक तनाव-भारत में अनेक सम्प्रदाय हैं। इस कारण यहाँ साम्प्रदायिकता की समस्या अधिक जटिल है। भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है–हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य। इन दोनों का इतिहास ही आक्रान्त और आक्रान्ता का इतिहास है। मुसलमान आक्रमणकारी के रूप में हिन्दुस्तान आए। उन्होने यहाँ के मन्दिरों को तोड़ा धन-सम्पत्ति को लूटा, बहू-बेटियों को अपमानित किया। दुर्भाग्य से आज भी उनके आक्रमणों के चिह्न भारतभर में विद्यमान हैं। परिणामस्वरूप ये दोनों जातियाँ कभी सहज नहीं हो पाती। जब भी कोई बहाना पाकर आग भड़कती है तो देशभर में खून की नदियाँ बह जाती है।

धार्मिक उन्माद संघर्ष के कारण-वर्तमान काल में भी इन दोनों सम्प्रदायों को आपस में लड़ाने के कारण’ बने हुए हैं। मुख्य कारण है-कुटिल राजनीति। राजनीति इन दोनों सम्प्रदायों को अपना हथियार बनाकर खेलती है। जब से भारत आजाद हुआ है, यहाँ सबको समान अधिकार नहीं दिए गए हैं। मुसलमानों और हिन्दुओं पर अलगअलग कानून लागू होते हैं। संविधान की धारा 370 के कारण काश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। ये विशेष अधिकार शेष समाज की आँखों में चुभने हैं। इसलिए कुछ लोग सविधाप्राप्त सम्प्रदाया के विरद्ध उग्र रूप धारण कर लेते हैं। दर्भाग्य से भारत में सत्ताधारियों ने अल्पसंख्याको को सामान्य नागरिक न मानकर अपना वोट बैंक’ ही माना है।

साम्प्रदायिकता की समस्या उत्पन्न होने का दूसरा कारण है–विदेशी षड्यंत्र। पाकिस्तान निरन्तर भारत में अलगाववाद को भावना को पोत्साहन दे रहा है। तीसरे, धर्मों का उन्माद भी दोषों है।

भारत में हिन्दू-ईसाई संधर्ष भी जटिल रूप धारण करता रहा है। जहाँ-जहाँ ईसाई संख्या में अधिक है, वहाँ-वहाँ अलगाववाद और भारत विरोध के स्वर उठते रहे हैं। इसलिए आज ईसाइयों पर भी प्रतिक्रियावादी हमले होने लगे हैं।

हानियाँ-साम्प्रदायिकता के कारण देश को भीषण अशान्ति, लूट पाट और जन-हानि का सामना करना पड़ता है। कुछ वर्ष पहले पंजाब का हरा-भरा प्रदेश हिंसा, बमकाड और गोलियों की आवाज से आतंकित रहा है। वहाँ का जन-जन भयकंपित रहा है। जम्मू-कश्मीर तो मानो भारत के मस्तक का फोड़ा साबित हुआ है। साम्प्रदायिक आतंक के कारण वहाँ से तीन लाख हिन्दू घर-बार छोड़कर शेष भारत में शरणार्थी बने हुए हैं। अभी-अभी रामजन्म भूमि तथा बाबरी मस्जिद को लेकर भारत में जो नर-संहार हुआ, उससे हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के घाव फिर से हरे हो गए हैं। सारा देश मानो जल रहा है।

समाधान-साम्प्रदायिकता का समाधान बहुत जटिल काम है। कारण यह है कि इस समस्या को हवा देने वाले स्वयं देश के राजनीतिक नेता हैं। वे जानबूझकर लड़ाई भड़काकर सत्ता में जमा रहना चाहते हैं। उन्हें बोट बैंक चाहिए। उनके लिए साम्प्रदायिक विभाजन बहुत आसान रास्ता है। अतः जब देश के आम नागरिक उनकी इस चाल को समझ जाएंगे और उनके विरुद्ध खड़े हो जाएग, तभी यह आग बुझगी। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता है कि यह समस्या अभी और जटिल रूप धारण करेगी। लकड़ियाँ जलने को तैयार हैं, सत्ताधारी घी बने हुए हैं, विरोधी दल हवा दे रहे । हैं। अत: देश का जलना निश्चित है। बस समाधान के नाम पर हम ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि वह इस अग्नि को शान्त करे।

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25. राष्ट्रीय एकता
अथवा, हम भारतवासी एक हैं।

अर्थ-राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य है— राष्ट्र के सब घटकों में भिन्न विचारो और भिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम, एकता और भाईचारे का बना रहना। ‘एकता’ शब्द ‘अविरोध’ को प्रकट करता है। अर्थात् देश में भिन्नताएँ हो, फिर भी सभी नागरिक राष्ट्र-प्रेम से ओतप्रोत हो। देश के नागरिक पहले ‘भारतीय’ हो, फिर हिन्दू या मुसलमान। राष्ट्रीय एकता का भाव दंश रूपी भवन में सीमेंट का काम करता है। जैसे भवन में ईंट, लोहा, बजरी आदि भिन्न-भिन्न पदार्थ होते हैं, और सीमेंट उन्हें जोड़े रहता है! उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता का भाव समूचे राष्ट्र को शक्तिशाली, शान्त और समृद्ध बनाता है!

अनेकता में एकता-भारत में विभिन्नता होते हए भी एकता या अविराध विद्यमान है। यहाँ सभी जातियाँ घुल-मिलकर रहती रही हैं। यहाँ प्रायः लोग एक-दूसरे के धर्म का आदर करते हैं। आदर न भी करें तो दूसरे के प्रति सहनशील हैं। भारत की यह दृढ़ मान्यता है कि ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।’ अर्थात सत्य एक है। उस तक पहुँचने के मार्ग भिन्न-भिन्न है। गीता में उसी दृष्टि को श्रेष्ठ कहा गया है जो अनेकता में एकता को पहचानती है।

राष्ट्रीय एकता के वाधक तत्व-भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए अनेक खतरे हैं। सबसे बड़ा खतरा है—कुटिल राजनीति। यहाँ के राजनेता ‘वोट-बैक’ बनाने के लिए कभी अल्पसंख्यकों में अलगाव के बीज बोते हैं, कभी आरक्षण के नाम पर पिछड़े वर्गों को देश की मुख्य धारा से अलग करते हैं। कभी किसी विशेष जाति, प्रान्त या भाषा के हिमायती बनकर देश को तोड़ते हैं। जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हो, खालिस्तान की माँग हो, असम या गोरखालैंड की पृथकता का आन्दोलन हो, सबके ऊपर वोट के प्रेत मँडराते नजर आते है। इस देश के हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी परस्पर प्रेम में रहना चाहते हैं, लेकिन भ्रष्ट राजनता उन्हें बाँटकर रखना चाहते हैं। राष्ट्रीय एकता में अन्य बाधक तत्व है–विभिन्न धार्मिक नेता, जातिगत असमानता, आर्थिक असमानता आदि।

परस्पर संघर्ष के दुष्परिणाम-जब देश में कोई भी दो राष्ट्रीय घटक संघर्ष करते हैं तो उसका दुष्परिणाम पूरे देश का भुगतान पड़ता है। मामला आरक्षण का हो या अयोध्या के राम-मन्दिर का, उसकी गूंज पूरे देश के जनजीवन को कुप्रभावित करती है। इतिहास प्रमाण है। आरक्षण के नाम पर देशभर में युवक जले सड़के रुको, सम्पत्तियाँ नष्ट हुई। अयोध्या का प्रकरण देश की सीमाओं को पार करके विदेशों में रह-रहे लोगो को भी कँपा गया।

समाधान-प्रश्न यह है कि राष्ट्रीय एकता को बल कैसे मिल? राघर्ष का शमन कैसे हो? इसका एकमात्र उत्तर यही है कि –

शान्ति नही तब तक जब तक
सुख- भाग न सबका राम हा
नही विसी को बहुत अधिक हो
नही किसी को कम हो।। ( क्षेत्र से)

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अर्थात् देश में सभी असमानता लाने वाले कानूनों को समाप्त किया जाए। मुस्लिम पर्सनल लॉ, हिन्दू कानून आदि अलगाववादी कानूनों को लिलाजलि दी जाए। उसकी जगह एक राष्ट्रीय कानून लागू किया जाए। मर नागरकों को एक-समान अधिकार प्राप्त हों। किसो को किसी नाम पर भी विशेष गविधा या विशेष दर्जा न दिया जाए। भारत में तुष्टिकरण की नीति बन्द हो!

राष्ट्रीय एकता को बनाने का दूसरा उपाय यह है कि लागों के हृदयों में परस्पर आदर का भाव जगाया जाए। यह काम साहित्यकार, कलाकार, विचारक और पत्रकार कर सकते हैं। वे अपनी लेखनी और कला से देशवासियों को एकता का मन्त्र पढ़ा सकते हैं।

26. कम्प्यूटर : आज की जरूरत
अथवा, कम्प्यूटर-विज्ञान का अद्भुत वरदान
अथवा, जीवन में कम्प्यूटर का महत्व

भूमिका-वर्तमान युग कम्प्यूटर-युग है। यदि भारतवर्ष पर नजर दौडाकर देखें तो हम पाएँगे कि आज जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में कम्प्यूटर का प्रवेश हो गया है। बैंक, रेलवे-स्टेशन, हवाई अड्डे, डाकखाने, बड़े-बड़े उद्योग, कारखाने, व्यवसाय, हिसाब-किताब, रुपये गिनने की मशीने तक कम्प्यूटरीकृत हो गई हैं। अब भी यह कम्प्यूटर का प्रारंभिक प्रयोग है। आने वाला समय इसके विस्तृत फैलाव का संकेत दे रहा है।

आधुनिक उपकरण कम्प्यूटर-इस ‘पागल गति’ को सुव्यवस्था देने की समस्या आज को प्रमुख समस्या है। कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। इस आवश्यकता ने अपने अनुसार निदान ढूँढ़ लिया है। कम्प्यूटर एक ऐसी स्वचालित प्रणाली है, जो कैसी भी अव्यवस्था को व्यवस्था में बदल सकता है। हड़बड़ी में होने वाली मानवीय भूलों के लिए कम्प्यूटर रामबाण-औषधि है। क्रिकेट के मैदान में अम्पायर को निर्णायक- भूमिका हो, या लाखों-करोड़ों-अरबों की लम्बी-लम्बी गणनाएँ, कम्प्यूटर पलक झपकते ही आपकी समस्या हल कर सकता है। पहले इन कामों के करने वाले कर्मचारी हड़बड़ाकर काम करते थे; एक भूल से घबड़ाकर और अधिक गड़बड़ी करते थे। परिणामस्वरूप काम कम, तनाव अधिक होता था। अब कम्प्यूटर की सहायता से काफी सुविधा हो गई है।

निर्दोष गणक-कम्यूटर ने फाइलों की आवश्यकता कम कर दी है। कार्यालय की सारी गतिविधियाँ फ्लॉपी में बन्द हो जाती है। इसलिए फाइलों के स्टोरों की जरूरत अब नहीं रही। अब समाचार-पत्र भी इन्टरनेट के माध्यम से पढ़ने की व्यवस्था हो गई है। विश्व के किसी कोने में छपी पुस्तक, फिल्म, घटना की जानकारी इंटरनेट । पर ही उपलब्ध है। एक समय था, जब कहते थे कि विज्ञान ने संसार को कुटुम्ब बना दिया है। कम्प्यूटर ने तो मानो उस कुटुम्ब को आपके कमरे में उपलब्ध करा दिया है। संभव है कम्प्यूटर की सहायता से आप मनचाहं सवाल का जवाब दूरदर्शन या इंटरनेट से ले पाएँ। शारीरिक रूप से न सही, काल्पनिक रूप से जिस मौसम का, जिस प्रदेश का आनन्द उठाना चाहें, उठा सके।

संचार-व्यवस्था-आज टेलीफोन, रेल, फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि उपकरणों के बिना नागरिक जीवन जीना कठिन हो गया है। इन सबके निर्माण या क्रियान्वयन में कम्प्यूटर का योगदान महत्वपूर्ण है। रक्षा-उपकरणों, हजारों मील की दूरी पर सटीक निशाना बाँधने, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तुओं को खोजने में कम्प्यूटर का अपना महत्व है।

आज कम्प्यूटर ने मानव-जीवन को सुविधा, सरलता, सुव्यवस्था और सटीकता प्रदान की है। अत: इसका महत्व बहुत अधिक है।

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27. कैसा शासन विन अनुशासन
अनुशासन

भूमिका-शासन और अनुशासन दोनों में घनिष्ठ संबंध है। शासन के बिना अनुशासन की कल्पना नहीं की जा सकती और अनुशासन के बिना शासन नहीं हो सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में शासन ही देश में नियम-कानून बनाता है, ताकि अनुशासन फल-फूल सके। इस प्रकार शासन अनुशासन का निर्माता है, उसका मूल स्रोत है।

समस्या-दुर्भाग्य से आज भारतवर्ष में एक विचित्र स्थिति उपस्थित हो गई है। यहाँ के शासक ही अनुशासनहीन हो गए हैं। संसद का दृश्य देखे। सांसदों का व्यवहार देखकर ऐसा लगता है मानों उन पर किसी प्रकार का कोई अंकुश नहीं रहा। वे भरी संसद में कुछ भी बोलते हैं, कुछ भी करते हैं। उन्हें किसी नियम की परवाह नहीं है। अनेक विधानसभाएं ऐसी हैं जिनमें सत्ताधारी दल और विरोधी दल के सदस्य आपस में गुत्थमगुत्थ हो जाते हैं। कई बार कुर्सियाँ और माइक एक-दूसरे पर फेंके जाते हैं। ऐसा दंगल देखकर देशवासियों का माथा शर्म से झुक जाता है।

संसद से बाहर भी शासकों का व्यवहार अनुशासित नहीं दिखाई देता। शायद ही कोई नेता, मंत्री या पदाधिकारी ठीक समय पर कार्यक्रम पर पहुँचता हो। जहाँ तक वित्तीय अनुशासन की बात है, कितने हो शासकों पर आयकर, दूरभाष-बिल या अन्य व्ययों क भुगतान बकाया है। कोई मंत्री आसानी से सरकारी आवास को खाली नहीं करता, चाहे मंत्री पद छिने कितने समय बीत गया हो। ऐसा मंत्री भला क्या किसी से झुग्गी-झोंपड़ी या अवैध कब्जा खाली कराएगा? जिसे खुद किसी सरकारी कार्यालय का बकाया पैसा देना हो वह कैसे जनता से उगाही करेगा? जो मख्यमंत्री स्वयं अनेक घोटालों में लिप्त हो, आय से अधिक धन-सम्पत्ति रखता हो, वह कैसे जनता में अनुशासन ला सकता है। अनेक प्रान्तों के मुख्यमंत्री स्वयं अनेक भ्रष्टाचारों के सूत्रधार है।

उपसंहार-अनुशासन का अर्थ ही शासन-व्यवस्था के अनुसार चलना है। अत: देशभर को अनुशासन में रखने के लिए शासन का अनुशासित होना अनिवार्य है। जनता सरकार को देखकर आचरण करती है। यदि सरकारी पदाधिकारी ईमानदार सम्मान करते हो तो प्रजा उनका उल्लंघन नहीं कर सकती। अतः अनुशासन लाने का अधिक दायित्व स्वय शासन पर है।

28. वन-संरक्षण

भूमिका-हमारे जीवन में वन एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। प्रकृति जीवनदायिनी है। उसी के द्वारा बनाए गए स्वस्थ-वातावरण में साँस लेकर हम. जीवित हैं। वृक्षों और वनों का प्रकृति की जीवन्तता में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। वन मानव-जीवन को अनेक रूपों में उसके अस्तित्व की रक्षा में अद्वितीय योगदान करते हैं।

वृक्ष प्रकृति का सुन्दर उपहार-वृक्ष वस्तुतः हमारे लिए प्रकृति का सुन्दर उपहार है। वृक्षों से हमें लकड़ी प्राप्त होती है जिसपर हमारे अनेकों कारोबार आश्रित हैं। वनों में वृक्षों की सघनता से पर्याप्त वर्षा होती है। बाढ़ नियंत्रण और वातावरण को शुद्ध करना भी इसी पर निर्भर है। वैज्ञानिक-परीक्षणों का निष्कर्ष है कि विगत कुछ वर्षों से मौसम में आई अनियमितता का कारण वनों की निरंतर कटाई है। देश में आवश्यक 33 प्रतिशत भू-भाग के स्थान पर मात्र 23 प्रतिशत क्षेत्र में ही वन हैं। परिणाम अनावृष्टि और अकाल के रूप में हमारे सामने है।।

वृक्षारोपण का महत्व-वृक्षारोपण का महत्व-वृक्षारोपण का महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि वह हमें अनेक प्रकार, से हमारे अस्तित्व की रक्षा में, सहायक होते हैं, जिसे निम्नांकित यथार्थपूर्ण कथन द्वारा समझा जा सकता है।

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(i) वृक्षों से आच्छादित वन हमें वर्षा देते हैं।
(ii) लकड़ी, कोयला, कागज, गोंद आदि हमें वृक्षों से प्राप्त होते हैं।
(iii) वृक्षों द्वारा धरती का कटाव रूकता है। ये बाढ़ नियन्त्रण में भी सहायक होते हैं।
(iv) वर्षा तथा अन्य स्रोतों से प्राप्त जल को सोखकर धरती की निचली परत तक नमी पहुँचाकर भूमि की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखते हैं तथा मरूस्थल बनने से रोकते हैं।
(v) हमें जीवनदायिनी ऊर्जा और प्राणवायु अत्यधिक मात्रा में ऑक्सीजन छोडकर प्रदान करते हैं। जीवन रक्षा तथा रोगों से मक्ति हेत बहमल्य जडी बटियाँ वनों में वक्ष द्वारा हमें उपलब्ध होती हैं। शक्तिदायक फल भी प्राप्त होते हैं।
(vi) घनी आबादी वाले क्षेत्रों विशेषकर नगरों को प्रदूषण मुक्त करने में सहायक होते हैं।

वृक्ष पूजा-वृक्षों के महत्व को समझते हुए उनकी आराधना वन महोत्सव एवं अन्य आयोजनों द्वारा उन्हें समुचित श्रेष्ठता प्रदान करनी चाहिए। ये देते बहुत कुछ हैं, लेते कुछ नहीं।

मानव मूल्यों के प्रतीक-वन मानव मूल्यों के प्रतीक हैं। ये मानव एवं अन्य प्राणियों का संरक्षण करते हैं। विभिन्न जीवों के जीने से यह संसार अधिक सुन्दर तथा समृद्ध बनता है। अनेक जीवों की जातियाँ समाप्त हो जाती यदि ये वन नहीं होते।

अमूल्य औषधियों के भाडार-ये वन अनेक औषधीय जड़ी-बूटियों के भाडार को अपने अन्तर में समेटे हुए हैं। इन बहूमूल्य जड़ी-बूटियों द्वारा अनेक असाध्य और संक्रामक बीमारियों के लिए औषधियाँ प्रचुर मात्रा में बनाई जाती हैं, जिससे इन रोगों से मुक्ति संभव है।

उपसंहार-वन हमारी अमूल्य निधि हैं। वस्तुतः निष्काम देवता के रूप में प्राणियों की अस्तित्व रक्षा कर रहे हैं। अत: पूजनीय हैं। ये हमारी प्राण-वायु तथा उद्धारक हैं। हमें वृक्षों की कटाई रोककर और अधिकाधिक वृक्ष रोपण द्वारा इनका संरक्षण करना चाहिए।

29. आतंकवाद

संसार भर की समस्या-आतंकवाद अपराध का आधुनिकतम रूप है जिससे विश्व के अनेक देश भयाक्रांत हैं। अब किसी क्षेत्र-विशेप की समस्या न रहकर, सम्पूर्ण-विश्व आतंकवाद की चपेट में आ गया है तथा अन्तर्राष्ट्रीय-स्तर पर निरीह-जनमानस भयातुर है। अमेरिका की गगनचुम्बी वर्ल्ड-ट्रेड-सेन्टर-टावर, भारतीय संसद तथा अयोध्या की राम-जन्मभूमि पर हमला, इन्दिरा गाँधी एवं अनेकों-राष्ट्राध्यक्षों सहित विश्व की महान-हस्तियों की हत्या इस आसुरी-संस्कृति के घिनौने तथा नृशंस उदाहरण हैं। कश्मीर में अबतक असंख्य-व्यक्ति आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं।

आतंकवाद के फैलने के कारण- संसार के समस्त-राष्ट्रों का शासन-संचालन या तो लोकतान्त्रिक ढाँचे के अन्तर्गत अथवा राजतंत्रीय-व्यवस्था द्वारा होता है। लोगों की रक्षा, खुशहाली तथा आवश्यकताओं की पूर्ति संवैधानिक-नियमों तथा विधि-व्यवस्था द्वारा की जाती है किन्तु व्यवस्था से असहमत कुछ सिरफिरे-लोग स्वीकृत संवैधानिक-व्यवस्था से इतर अनुचित-हिंसात्मक-गतिविधियों द्वारा अपनी बातें मनवाना चाहते हैं। विश्व के विभिन्न देशों के ऐसे आतंकवादी-समूह आपस में संगठित होते हैं तथा बंकार-युवकों को अनेक प्रलोभन, धन तथा सब्जबाग दिखा एवं दिक्भ्रमित कर अपने आतंकवादी-संगठन में सम्मिलित कर लेते हैं। संवैधानिक जनतांत्रिक-व्यवस्था का पंगु बनाकर संविधानंतर-निरंकुश-तत्र स्थापित करना ही उनका मूल उद्देश्य होता है।

हानियाँ-आतंकवाद की पृष्ठभूमि में विश्व के अधिसंख्य-राष्ट्रों के आतंकवादियों का संगठित योगदान है। अत: अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इससे व्यापक-क्षति हो रही है। भारत, अमेरिका, श्रीलंका, अफगानिस्तान, इराक इत्यादि अनेक-देशों में आतंकवाद की जड़ें गहराई तक जा पहुँची हैं। अतः धन-जन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की अभूतपूर्व-क्षति हो रही है।

समाधान-आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय-स्तर पर संगठित-प्रयास आवश्यक है। विश्व-संस्था “सयुंक्त-राष्ट्रसंघ” द्वारा आतंकवाद के खिलाफ चरणबद्ध-अभियान द्वारा उसकी जड को कमजोर करने की दिशा में सार्थक-पहल युद्ध-स्तर पर अपेक्षित है। विश्व-जनमत को आतंकवाद की बुराइयों, खतरों तथा संभावित-क्षति के प्रति जागरूक करना न केवल आवश्यक वरन् महत्वपूर्ण विकल्प है।

30. भारतीय नारी, अथवा, नारी शिक्षा अथवा स्त्री-शिक्षा

‘विद्या हमारी भी ना तब तक काम में कुछ आएगी-
अगिनियों को भी सुरक्षित दो ना जब तक जाएगी;
सर्वाग के बदले हुई यदि व्याधि पक्षाघात की-
तो भी ना क्या दुर्बल तथा व्याकुल रहेगा वाम भी?”
“मुक्त करो नारी को मानव, चिर वंदिनी नारी को
युग-युग की परतंत्रता से, जननी, सखी, प्यारी को !”

स्त्री एवं पुरुष समाजरूपी रथ के दो पहिए हैं। जिस तरह रथ के चलने में दोनों पहियों का समान हाथ होता है, उसी प्रकार समाज को ससंचरणशीलता में स्त्री और पुरुष का समान हाथ होता है। इन दोनों में एक की भी निर्बलता समाजरूपी रथ की गति को बाधित कर देती है। अत:, समाज की सुव्यवस्थित प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि इसके सभी स्त्री-पुरुष साक्षर और शिक्षित हों। केवल पुरुषवर्ग के शिक्षित होने से समाज और देश का कल्याण नहीं हो सकता। जिस देश की स्त्रियाँ अशिक्षित होती हैं, उस देश की प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती।

प्राचीन भारत में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। परुषों की तरह स्त्रियाँ भी सुशिक्षित होती थी। पर, मध्यकाल में (मुगलों के शासनकाल में) स्त्रियों को शिक्षा से अलग रखा गया। स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष में स्त्रियों की शिक्षा को अनिवार्यता महसूस की गई। राजा राममोहन राय तथा ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने आधुनिक भारत के निर्माण में स्त्रियों का सहयोग अनिवार्य माना। इसलिए इन्होंने स्त्रियों की शिक्षा पर जोर दिया। महात्मा गाँधी ने भी स्त्री-शिक्षा को समाज और देश के उत्थान के लिए आवश्यक माना।

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आज भारत ने स्त्री-शिक्षा के महत्त्व को पहचान लिया है। इसीलिए तो अब यह प्रश्न नहीं उठाया जाता कि स्त्री-शिक्षा आवश्यक है या नहीं। हाँ, इस संदर्भ में यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या स्त्रियों और पुरुषों की शिक्षा प्रणाली एक होनी चाहिए या उनकी प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न? मेरी दृष्टि में शिक्षा की विधि दोनों के लिए एक ही होनी चाहिए।

आधुनिक भारत में नारियाँ शिक्षित होकर जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं। पर, आज भी पुरुष-मनोविज्ञान स्त्री-मनोविज्ञान पर हावी है, जिसके चलते स्त्रियों के अपेक्षित विकास में अनेक कठिनाइयाँ आ रही हैं। भारतीय समाज में आज भी अंधविश्वास जड़ से दूर नहीं हुए हैं, अत: स्त्री-शिक्षा पर हमारा जितना ध्यान केंद्रित होना चाहिए था, उतना नहीं हो पा रहा है। आर्थिक विपन्नता (गरीबी) भी स्त्रिी-शिक्षा में बाधक बन रही है। यह प्रसन्नता की बात है कि भारत सरकार ने स्नातक स्तर पर लड़कियों को नि:शुल्क शिक्षा देने की योजना बनाई है। इस योजना के कार्यान्वयन से भारत में स्त्री-शिक्षा का अपेक्षित विस्तार होगा।

31. दैव-दैव आलसी पकारा

भूमिका-केवल आलसी लोग ही हमेशा दैव-दैव पुकारा करते है। आलसी व्यक्तियों का गुरूमन्त्र है-“अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता रामा” अकर्मण्य व्यक्ति ही भाग्य के भरोसे बैठता है। कर्मवीर व्यक्ति तो ब्राधाओं को परास्त करते हुए अपने बाहुबल पर विश्वास रखते हैं।

आलस्य मनुष्य का महान शत्रु :-आलसी व्यक्ति परिवार, समाज और देश के लिए कलंक होता है। संस्कृत में कहा गया है-आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।” आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। इससे जीवन का पतन हो जाता है। अकर्मण्य व्यक्ति सदा दूसरों का मुंह ताका करता है। वह पराधीन हो जाता है। आलसी मनुष्य ही देव या प्रारब्ध का सहारा लेते हैं।

आलस्य से हानि :-जो व्यक्ति हर बात के लिए दूसरों का मुँह जोहता है, उसे अनेक बार निराशा का सामना करना पड़ता है। आलसी व्यक्ति न व्यापार कर सकता है, न शिक्षा ग्रहण कर सकता है। वह तो कायर बन जाता है। संसार की समस्त बुराइयाँ उसे बुरी तरह घेर लेती हैं। उसका जीवन निरर्थक हो जाता है।

मेहनत से जी चुराने वाले दास मलूका के स्वर में स्वर-मिलाकर भाग्य की दुहाई के गीत गा सकते हैं, लेकिन वे नहीं सोचते कि जो चाहता है, वही आगे बढ़ता है और मंजिल को प्राप्त करता है। परिश्रम से जी चुराना, आलस्य और प्रमोद में जीवन बिताना इसके समान कोई बड़ा पाप नहीं है।

आलस्य त्यागने से लाभ :-हमें अपने हाथों की शक्ति पर भरोसा करना चाहिए। जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास है, वह व्यक्ति जीवन में कभी असफल नहीं हो सकता। जीवन में सफलता केवल पुरुषार्थ से ही पाई जा सकती है। स्वावलम्बी व्यक्ति अपने भरोसे रहता है। विश्व का इतिहास ऐसे महापुरुषों से भरा पड़ा है जिन्होंने कर्म में रत रहकर सफलता की उच्चतम् सीमा छू लिया। जो पुरुप उद्यमी एवं स्वावलम्बी होते हैं, वे निश्चय ही सफल हात हैं।

उपसंहार :-पुरुषों में सिंह के समान उद्योगी पुरुष को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है। ‘दैव देगा’ ऐसा कायर पुरुष कहा करते हैं। हमें भगवान भरोसे न रह कर अपनी भरपूर शक्ति से पुरुषार्थ करना चाहिये और यदि फिर भी कार्य सिद्ध न हो तो सोचना चाहिये कि कहाँ और क्या कमी रह गई है। सबसे बड़ा देवत्व है- मनुष्य का पुरुषार्थ। अतः परिश्रमी व्यक्ति राष्ट्र की बहुमूल्य पूँजी है। हमें परिश्रमी होना चाहिए।

32. पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं
अथवा, पराधीन को सुख नहीं

भूमिका-तुलसीदास की यह काव्य-पक्ति बहुत गहरा अर्थ रखती है। इसका , अर्थ है कि पराधीन व्यक्ति स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता। मानव जन्म से लेकर मृत्यु तक स्वतन्त्र रहना चाहता है। वह स्वयं को सभी प्रकार की दासताओं से मुक्त करने के लिए बड़े-से-बड़े बलिदान करने को तैयार रहता है। वह किसी भी मूल्य पर अपनी स्वाधीनता बेचना नहीं चाहता। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसीलिए कहा था कि ‘स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’

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एक अभिशाप-हितोपदेश में लिखा है-‘पराधीन को यदि जीवित कह तो मृत कौन है।’ पराधीनता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। क्या सोने के पिंजरे में पड़ा पक्षी सच्चे सुख और आनन्द की अनुभूति कर सकता है? नहीं। अग्रेजो में एक सूक्ति है-‘स्वर्ग में दास बनकर रहने की अपेक्षा नरक में स्वाधीन शासन करना अधिक अच्छा है।’

द्वानियाँ-पराधीन व्यक्ति कभी चैन की साँस नहीं ले सकता। उसके माथे पर सदा अपने मालिक की तलवार लटकी रहती है। उसे मालिक की इच्छा का दास बने रहना पड़ता है। स्वामी के अत्याचारों को गूंगे बनकर सहना पड़ता है। अधीन रहतेरहते उसकी आत्मा तक गुलाम हो जाती है। उसे तलवे चाटने की आदत पड़ जाती है जो मानवीय गरिमा के विपरीत है। ऐसा व्यक्ति स्वयं को तच्छ, हीन और कलंकित मानने लगता है। उसके व्यक्तित्व का विकास रुक जाता है। उसके जीवन का आनन्द मारा जाता है। उसकी हँसी और मुस्कान गायब हो जाती है। उसमे और पूँछ हिलाने वाले पशु में कोई अन्तर नहीं रहता।

प्रकार-पराधीनता केवल राजनीतिक ही नहीं होती, वह मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक या अन्य प्रकार की भी हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति दूसरे के विचारो से इतना अधिक प्रभावित है कि अपना मौलिक विचार ही नहीं कर सकता तो उसे हम बौद्धिक रूप से गुलाम कहेंगे। यदि कोई जाति दूसरी जाति को श्रेष्ठ मानकर उसका अन्धानुकरण करती है तो हम उसे मानसिक गुलाम कहंगे। जैसे भारतीय मानसिकता अभी भी अंग्रेजो की गुलाम है। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से दूसरे पर निर्भर है और इस कारण आज़ाद होकर नहीं जी जा सकता तो वह भी एक प्रकार का पराधीन है।

निष्कर्ष-पराधीनता चाहे किसी प्रकार की हो, वह मानव को सच्चे आनन्द से वंचित कर देती है। पराधीन व्यक्ति अथवा देश सम्मानपूर्वक नहीं जी सकता। पराधीनता से बचने का एक ही उपाय है-संघर्ष और बलिदान। आजादी मिलती नहीं, छीनी जाती है। उसके लिए सिर हथेली में लिए हुए युवक चाहिए। अत: जिसे स्वतन्त्रता से जीना हो, उसे बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए।

33. जो तोको काँटा वुवै ताहि बोई तू फूल

हिन्दी का एक प्रसिद्ध दोहा है-

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोई तू फूल।
तोहे फूल को फूल है ताको है तिरसूल।

यह दोहा मनुष्य के मनोविज्ञान की गहरी व्याख्या करता है। इसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि बुरे कर्म का विरोध बुरे कर्म से किया जाए या अच्छे कर्म से। कीचड़ को कीचड़ से धोया जाए या निर्मल जल से। घृणा को प्रेम से जीता जाए या महाघृणा से? जो हमारे लिए संकट पैदा कर रहा हो, उसके साथ मित्र जैसा आचरण करें या शत्रु जैसा? प्रश्न वास्तव में जटिल है।

साधारणतया देखने में आता है कि लोग ईंट का जवाब पत्थर से देने की वकालत करते हैं। ‘जैसे को तैसा’, ‘सेर के साथ सवा सेर’, ‘तुम बाँके तो हम महाबाँके’ जैसे वाक्य बड़े लोकप्रिय बनते जा रहे हैं। एक दोहा भी प्रचलित हो चला है-

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोई तू भाला।
वो पट्ठा क्या याद करे, था पड़ा किसी से पाला।।

यह दोहा क्रोध के विरुद्ध प्रतिक्रोध और प्रतिशोध की वकालत करता है। शायद सरल और स्वाभाविक भी यही है कि आँख उठाकर देखने वालों की दोनों आँखें फोड़ दी जाएँ। जब कोई हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र करता है तो हम स्वाभाविक रूप से क्रोध में लाल-पीले हो जाते है। कई बार हमारा क्रोध देखकर षड्यन्त्रकारी डर भी जाता है। तब हमारे मन में यह धारणा पक्की हो जाती है कि ‘डंडे के बल बन्दर नाचे’। परन्तु यह धारणा पूरी तरह सत्य नहीं है।

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मनोविज्ञान यह कहता है कि क्रोध चाण्डाल है तो प्रतिक्रोध महाचाण्डाल। क्रोध को शान्ति से जीता जा सकता है, घृणा को प्रेम से जीता जा सकता है, कीचड़ को निर्मल जल से धोया जा सकता है। यहाँ प्रश्न है कि ‘प्रतिक्रोध’ बड़ा हथियार है या ‘क्षमा’। हमारा विश्वास है कि ‘क्षमा’ बड़ा हथियार है। क्षमा करने से शत्रु मन से लज्जित होता है। प्रतिक्रोध से उसके हृदय में संघर्ष की अग्नि उठती है या भय की भावना जन्म लेती है। दोनों ही भावनाएँ अहितकर हैं। यदि शत्रु ने संघर्ष किया तो परिणाम होता है–अशान्तिा यदि वह भयभीत हो गया, तो फिर अवसर की तलाश में रहेगा और मौका पाते ही आक्रमण करेगा। अत: यह तो काँटे से मुक्ति का अस्थायी प्रबन्ध हुआ। स्थायी प्रबन्ध के लिए शत्रु का हृदय-परिवर्तन होना चाहिए।

मानव का स्वभाव है कि वह अच्छाई के सामने झुकता है। वह मन-ही-मन अच्छाई की इज्जत करता है। यदि शत्रु हमारी भलाई कर दे तो हम डूब मरने को हो जाते हैं। फिर हमारी आँखों में उससे लड़ने की शक्ति नहीं रहती। हम किसी के शत्रु तभी तक रहते हैं, जब तक कि हम उसका बुरा करते है। एक बार भी हमने उसका भला कर दिया या पीठ पीछे उसकी प्रशंसा कर दी तो वह शत्रुता भूलकर हमारे प्रति विनम्र होना शुरू कर देता है। यदि हम शत्रु के दुख में उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाएँ तो वह सारी शत्रुता भूल जाता है। अत: भलाई में न केवल शक्ति है, अपित हृदय को बदल डालने की अद्भुत क्षमता है।

इस दोहे में एक मनोवैज्ञानिक सत्य यह भी बताया गया है कि फूल तो हमेशा ‘फूल’ कहलाएगा किन्तु काँटा ‘त्रिशूल’ बनके चुभेगा। शत्रुता का समय बीत जाने पर अच्छे कर्म करने वाले का सर सदा गौरव से ऊँचा रहेगा। वह सबको बड़े गर्व से अपनी गाथा सुनाएगा, जबकि काँटे बोने वाले का माथा झुका रहेगा। उसे उसके बुरे कर्म सताएँगे। उसके बुरे कर्म ही उसके लिए त्रिशूल जैसी चुभन पैदा करके हृदय छलनी कर देंगे। अतः बुरा करने वाले का भी भला करो। भला आदमी कभी-कभी हार जरूर जाता है किन्तु अन्तिम और स्थायी जीत उसकी ही होती है, आत्मा उसी की प्रसन्न होती है। गहरी नींद उसी को आती है।

34. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

मन की शक्ति-मन बहुत बलवान है। शरीर की सब क्रियाएँ मन पर भी निर्भर करती हैं। यदि मन में शक्ति, उत्साह और उमंग हो तो शरीर भी तेजी से कार्य करता है। अत: व्यक्ति की हार-जीत उसके मन की दुर्बलता-सबलता पर निर्भर है।

दृढ़ संकल्प-यदि मन में दृढ़ संकल्प हो तो दुनिया का कोई संकट व्यक्ति को रोक नहीं सकता। एक कहावत है-‘जाने वाले को किसने रोका है?’ अर्थात् जिसके मन में जाने का संकल्प हो तो कोई भी परिस्थिति उसे जाने से रोक नहीं सकती। विषम परिस्थितियों में से भी संकल्पवान व्यक्ति रास्ता निकाल लेता है।

संघर्ष की क्षमता-किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का दृढ़-संकल्प होना जरूरी है। गुलामी और आतंक के वातावरण में क्रान्तिकारी किस प्रकार विद्रोह का बिगुल बजा लेते हैं? सूखी रोटियाँ खाकर और कठोर धरती को शय्या बनाकर भी देश को आजाद कराने का कार्य कैसे कर पाए महाराणा प्रताप? वह कौन-सा बल था, जिसके आधार पर मुट्ठीभर हड्डियों वालं महात्मा गाँधी विश्वविजयी अंग्रेजों को देश से बाहर कर सके। निश्चय ही यह थी-मन की सबलता।

विजय के लिए धैर्य आवश्यक-मन की सबलता के लिए सत्य, न्याय और कल्याण के भाव का होना जरूरी है। जिसके मन में सत्य की शक्ति नहीं है, जो न्याय के पक्ष में नहीं है, उसके मन में तेज नहीं आ पाता। अनुचित कार्य करने वाला व्यक्ति आधा मन यूँ ही हार बैठता है। उसके मन में एक छिपा हुआ चोर होता है, जो उसे कभी सफल नहीं होने देता।

मन की स्थिरता, दृढ़ता और धीरता ऐसे गुण हैं जो व्यक्ति को विजय की ओर अग्रसर करते हैं। संकटों की बाढ़ में जो बह जाते हैं, रोने-चिल्लाने लगते हैं, वे कायरों-सा जीवन जीते हुए नष्ट हो जाते हैं। संकटों की उत्ताल तरंगों को सहर्ष झेलकर जो युवक कर्तव्य-मार्ग पर चलते रहते हैं वे ही विजयी होते हैं। कर्मवान युवक का धर्म तो कवि के शब्दों में ऐसा होना चाहिए-

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जब नाव जल में छोड़ दी
तूफान ही में मोड़ दी
दे दी चुनौती सिन्धु को
फिर धार क्या मंझधार क्या?

कार्य करने से पूर्व ही यदि व्यक्ति का मन शिथिल हो तो फिर विजय प्राप्त हो ही नहीं सकती। बीमार और पराजित मन को हर बाधा अपना शिकार बनाती है। अत: यह बात पूरी तरह सच है कि जीत या हार मन की स्थिति पर निर्भर है।

35. समय अमूल्य धन है
अथवा, समय का सदुपयोग

भूमिका-फ्रैंकलिन का कथन है-‘तुम्हें अपने जीवन से प्रेम है, तो समय को व्यर्थ मत गँवाओ क्योंकि जीक्म इसी से बना है।’ समय को नष्ट करना जीवन को नष्ट करना है। समय ही तो जीवन है। ईश्वर एक बार एक ही क्षण देता है और दूसरा क्षण देने से पहले उसको छीन लेता है। समय ही एक ऐसी वस्तु है जिसे खोकर पुन: प्राप्त नहीं किया जा सकता। समय का कोई मोल नहीं हो सकता। श्रीमन्नारायण ने लिखा
‘समय धन से कहीं अधिक महत्त्वपर्ण है। हम रुपया-पैसा तो कमाते ही हैं और जितना अधिक परिश्रम करे उतना ही अधिक धन कमा सकते हैं। परन्त क्या हजार परिश्रम करने पर भी चौबीस घण्टों में एक भी मिनट बढ़ा सकते हैं? इतनी मल्यवान वस्तु का धन से फिर क्या मुकाबला!’ इससे समय की महत्ता पर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है।

समय के सदुपयोग का अर्थ है-उचित अवसर पर उचित कार्य पूरा कर लेना। जो लोग आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर टालते रहते हैं, वे एक प्रकार से अपने लिए जंजाल खड़ा करते चले जाते हैं। मरण को टालते-टालते एक दिन सचमुच मरण आ हो जाता है। जो व्यक्ति उपयुक्त समय पर कार्य नही करता, वह समय को नष्ट करता है। एक दिन ऐसा आता है, जबकि समय उसको नष्ट __ कर देता है। जो छात्र पढ़ने के समय नहीं पढ़ते, वे परिणाम आने पर रोते हैं।

समय रुकता नहीं। जिसे उसका उपयोग करना है, उसे तैयार होकर उसके आने का अग्रिम इन्तजार करना चाहिए। जो समय के निकल जाने पर उसके पीछे दौड़ते हैं, वे ज़िन्दगी मे सदा घिसटते-पिटते रहते हैं। समय सम्मान माँगता है। इसलिए कबीर ने कहा है-

काल करे सो आज कर आज करे सो अब।
पल में परलय होगा, बहुरि करेगा कब।।

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जो जाति समय का सम्मान करना जानती है, वह अपनी शक्ति को कई गुना । बढ़ा लेती है। यदि सभी गाड़ियाँ अपने निश्चित समय से चलने लगें तो देश में कितनी कार्यकुशलता बढ़ जाएगी। यदि कार्यालय के कार्य ठीक समय पर सम्पन्न हो जाएँ, कर्मचारी समय के पाबन्द हों तो सब कार्य सुविधा से हो सकेंगे। यदि रोगी को ठीक समय पर दवाई न मिले तो उसकी मौत भी हो सकती है। अत: हमें समय की गम्भीरता को समझना चाहिए। गाँधी जी एक मिनट देरी से आने वाले व्यक्ति को क्षमा नहीं करते थे। आप ही सोचिए, सष्टि का यह चक्र कितना नियमित है, कितना समय का पाबन्द है? यदि एक भी दिन धरती अपनी धुरी पर घूमने में देरी कर जाए तो परिणाम क्या होगा? _ विनाश और महाविनाश। अत: हमें समय की महत्ता को समझना चाहिए।