Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 13 शिक्षा

Bihar Board 12th Hindi Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 13 शिक्षा

Question 1.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म कब हुआ था ?
(A) 12 मई, 1895 को
(B) 18 जून, 1892 को
(C) 23 मई, 1989 को
(D) 15 अगस्त, 1902 को
Answer:
(A) 12 मई, 1895 को

Question 2.
जे. कृष्णमूर्ति का पूरा नाम था
(A) जयंत कृष्णमूर्ति
(B) जिद्दू कृष्णमूर्ति
(C) जीवंत कृष्णमूर्ति
(D) जनेश कृष्णमूर्ति
Answer:
(B) जिद्दू कृष्णमूर्ति

Question 3.
‘द फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम’ किसकी कृति है?
(A) अब्दुल कलाम आजाद
(B) पट्टाभि सीतारमैया
(C) जे. कृष्णमूर्ति
(D) जाबिर हुसैन
Answer:
(C) जे. कृष्णमूर्ति

Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 13 शिक्षा

Question 4.
लीडबेटर किनमें ‘विश्व शिक्षक’ का रूप देखते थे?
(A) राधाकृष्णन में
(B) राजेन्द्र प्रसाद में
(C) गाँधी में
(D) जे. कृष्णमूर्ति में
Answer:
(C) गाँधी में

Question 5.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म कब हुआ था?
(A) 12 मई 1895 को
(B) 12 मई 1996 को
(C) 18 मई 1902 को
(D) 18 जून 1904 को
Answer:
(A) 12 मई 1895 को

Question 6.
जे. कृष्णमूर्ति के संबंध में कौन-सा तथ्य सही है?
(A) वे प्रायः लिखते थे
(B) वे उपन्यासकार थे
(C) वे प्रसिद्ध नाटककार थे।
(D) वे प्रायः बोलते थे, संभाषण करते थे
Answer:
(D) वे प्रायः बोलते थे, संभाषण करते थे

Question 7.
‘शिक्षा’ पाठ के रचयिता कौन है ?
(A) महात्मा गाँधी
(B) विनोबा भावे
(C) जगदीशचन्द्र माथुर
(D) जे. कृष्णमूर्ति
Answer:
(D) जे. कृष्णमूर्ति

Question 8.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म किस राज्य में हुआ था?
(A) आंध्र प्रदेश में
(B) उत्तर प्रदेश में
(C) राजस्थान में
(D) उड़ीसा में
Answer:
(A) आंध्र प्रदेश में

Question 9.
“दि फास्ट एंड लास्ट फ्रीडम’ के रचनाकार कौन हैं?
(A) गाँधी
(B) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(C) अम्बेडकर
(D) जे. कृष्णमूर्ति
Answer:
(B) रवीन्द्रनाथ ठाकुर

Question 10.
जे. कृष्णमूर्ति की इनमें से कौन सी रचना है?
(A) रोज
(B) बातचीत
(C) सम्पूर्ण काति
(D) शिक्षा
Answer:
(D) शिक्षा

Question 11.
जे० कृष्णमूर्ति का जन्म कहाँ हुआ था?
(A) उत्तरप्रदेश में
(B) आन्ध्रप्रदेश में
(C) मध्यप्रदेश में
(D) कर्नाटक में
Answer:
(B) आन्ध्रप्रदेश में

Question 12.
माँ की मृत्यु के समय जे० कृष्णमूर्ति कितने वर्ष के थे?
(A) 10 वर्ष
(B) 12 वर्ष
(C) 15 वर्ष
(D) 20 वर्ष
Answer:
(A) 10 वर्ष

Question 13.
जे. कृष्णमूर्ति की ‘शिक्षा’ कृति क्या है?
(A) संभाषण
(B) निबंध
(C) संस्मरण
(D) एकांकी
Answer:
(A) संभाषण

Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 13 शिक्षा

Question 14.
मेधा कहाँ नहीं हो सकती है?
(A) जहाँ स्वतंत्रता हो
(B) जहाँ भय हो
(c) जहाँ अनुशासनहीनता हो
(D) इनमें से कोई नहीं
Answer:
(A) जहाँ स्वतंत्रता हो

Question 15.
लेखक के अनुसार कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लेने से कहीं ज्यादा कठिन क्या है?
(A) जीवन में उन्नति करना
(B) जीवन खुशी पूर्वक व्यतीत करना
(C) जीवन को समझना
(D) इनमें से कोई नहीं
Answer:
(C) जीवन को समझना

Question 16.
लेखक के अनुसार सच्ची शिक्षा हमें क्या देती है?
(A) रोजगार
(B) प्रसिद्धि
(C) व्यापकता
(D) इनमें कोई नहीं
Answer:
(C) व्यापकता

Question 16.
बचपन में किस वातावरण में रहना आवश्यक है?
(A) स्वतंत्र
(B) अनुशासित
(C) दायित्वपूर्ण
(D) इनमें से कोई नहीं
Answer:
(A) स्वतंत्र

Question 17.
जिंदगी का अर्थ क्या है?
(A) धन कमाना
(B) प्रसिद्धि प्राप्त करना
(C) सत्य की खोज करना
(D) सत्य प्राप्त करना
Answer:
(C) सत्य की खोज करना

Question 18.
जे० कृष्णमूर्ति के अनुसार मानव के विचारों को, उसके सम्बन्धों तथा उसके प्रेम को कौन नष्ट कर देता है?
(A) उत्साह
(B) नाराजगी
(C) खुशी
(D) भय
Answer:
(D) भय

Question 19.
जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार, सम्पूर्ण विश्व किस ओर अग्रसर है?
(A) विकास की ओर
(B) नाश की ओर
(c) प्रतिस्पर्धा की ओर
(D) इनमें से कोई नहीं
Answer:
(B) नाश की ओर

Question 20.
‘द फार्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम’ किसकी कति है?
(A) मलयज की
(B) मोहन राकेश की
(C) जे. कृष्णमूर्ति की
(D) अब्दुल कलाम आजाद की
Answer:
(C) जे. कृष्णमूर्ति की

Question 21.
साम्यवादी किससे लड़ रहा है?
(A) समाजवादी से
(B) पूँजीपति से
(C) सत्तावादी से
(D) इनमें से कोई नहीं
Answer:
(B) पूँजीपति से

Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 13 शिक्षा

Question 22.
जे० कृष्णमूर्ति का जन्म कब हुआ था?
(A) 12 मई 1895 को
(B) 18 जून 1892 को
(C) 23 मई 1898 को
(D) 15 अगस्त 1902 को
Answer:
(A) 12 मई 1895 को

Question 23.
जे. कृष्णमूर्ति का पूरा नाम था
(A) जयंत कृष्णमूर्ति
(B) जिहू कृष्णमूर्ति
(C) जीवंत कृष्णमूर्ति
(D) जनेश कृष्णमूर्ति
Answer:
(B) जिहू कृष्णमूर्ति

Question 24.
‘द फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम’ किसकी कृति है?
(A) अब्दुल कलाम आजाद
(B) पट्टाभि सीतारमैया
(C) जे० कृष्णमूर्ति
(D) जाबिर हुसैन
Answer:
(C) जे० कृष्णमूर्ति

Question 25.
जे० कृष्णमूर्ति के संबंध में कौन-सा तथ्य सही है?
(A) वे प्रायः लिखते थे
(B) वे उपन्यासकार थे
(C) वे प्रसिद्ध नाटककार थे
(D) वे प्रायः बोलते थे, संभाषण करते थे
Answer:
(C) जे० कृष्णमूर्ति

Question 26.
‘शिक्षा’ पाठ के रचयिता कौन है?
(A) महात्मा गाँधी
(B) विनोबा भावे
(C) जगदीशचंद्र माथुर
(D) जे. कृष्णमूर्ति
Answer:
(D) जे. कृष्णमूर्ति

Question 27.
जे० कृष्णमूर्ति का जन्म किस राज्य में हुआ था?
(A) आंध्र प्रदेश में
(B) उत्तर प्रदेश में
(C) राजस्थान में
(D) उड़ीसा में
Answer:
(A) आंध्र प्रदेश में

Bihar Board 12th Hindi 100 Marks Objective Answers गद्य Chapter 13 शिक्षा

Question 28.
लोडबेटर किनमें ‘विश्व शिक्षक’ के रूप देखते थे?
(A) राधाकृष्णन में
(B) राजेन्द्र प्रसाद में
(C) गाँधी में
(D) जे० कृष्णमूर्ति में
Answer:
(D) जे० कृष्णमूर्ति में

Question 29.
जे. कृष्णामूर्ति की इनमें से कौन-सी रचना है?
(A) रोज
(B) संपूर्ण क्रान्ति
(C) बातचीत
(D) शिक्षा
Answer:
(D) शिक्षा

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Bihar Board 12th Economics Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 1.
When the proportionate change in the supply of goods is more than the proportionate change in the price the elasticity of supply will be:
(a) Less than
(b) Equal to unit
(c) Greater than unit
(d) Infinite
Answer:
(c) Greater than unit

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 2.
The optional value of opportunity cost:
(a) Economic cost
(b) Equilibrium price
(c) Limited cost
(d) Average cost
Answer:
(a) Economic cost

Question 3.
In which stages of production a rational producer likes to operate in short run production:
(a) First stage
(b) Second stage
(c) Third stage
(d) None of these
Answer:
(b) Second stage

Question 4.
Long-run production function is related to:
(a) Law of demand
(b) Law of increasing returns
(c) Law of returns to scale
(d) Law of increasing returns
Answer:
(c) Law of returns to scale

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 5.
A market in which there is free entry and exist, the market is
(a) Monopolistic competitive market
(b) Imperfect competitive maiket
(c) Perfectly competitive market
(d) None of these
Answer:
(c) Perfectly competitive market

Question 6.
Market price is found in:
(a) Short period market
(b) Long period market
(c) very short period market
(d) None of these
Answer:
(d) None of these

Question 7.
The price elasticity of demand for GifTin goods is:
(a) Negative
(b) Positive
(c) Zero
(d) None of these
Answer:
(a) Negative

Question 8.
Price elasticity of supply detine the reasono of chayes in percentage of supply:
(a) price 10%
(b) price 100% chaye
(c) price 50% chaye
(d) price 1 % chaye
Answer:
(d) price 1 % chaye

Question 9.
In the price of goods rises by 60% but supply increases by only 5% the supply of goods will be :
(a) Highly elastic
(b) Elastic
(c) Inelastic
(d) Perfectly inelastic
Answer:
(c) Inelastic

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 10.
The market price of all final goods and services produced in the domestic territory of a country in a year is known as :
(a) GDPMP
(b) GDPFC
(C) NNPFC
(d) none of these
Answer:
(a) GDPMP

Question 11.
Keyne’s derived investment multiplier from
(a) Income multiplier
(b) Consumption multiplier
(c) Employment multiplier
(d) None of these
Answer:
(c) Employment multiplier

Question 12.
The subject of the study of Micro ecnomics is:
(a) The principle of national income
(b) The pri nciple of consumer
(c) The principle of producer
(d) None of these
Answer:
(a) The principle of national income

Question 13.
In which following is real investment ?
(a) Purchase of shares
(b)Purchasexrfoldfactory
(c) Construction of a building
(d) Open a credit a/c in bank
Answer:
(a) Purchase of shares

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 14.
The component of balance payment is :
(a) current a/c
(b) capital a/c
(c) both (a) &(b)
(d) None
Answer:
(c) both (a) &(b)

Question 15.
Direct-tax is:
(a) Income tax
(b) Gift-tax
(c) Both
(d) None of these
Answer:
(a) Income tax

Question 16.
In India one rupee note is issued by
(a) Reserve Bank of India
(b) Finance Minister of Government of India
(c) State Bank of India
(d) None of tehse
Answer:
(b) Finance Minister of Government of India

Question 17.
Capital budget consist of:
(a) Revenue receipts and revenue expenditure
(b) Capital receipts and capital expenditure
(c) Direct and indirect tax
(d) None of these
Answer:
(b) Capital receipts and capital expenditure

Question 18.
Economy problem is mainly problem of:
(a) Selection
(b) Firm’s selection
(c) Customer’s selection
(d) None
Answer:
(a) Selection

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 19.
In the price of goods rises by 40% but supply increases by only 15%, the supply of goods will be
(a) Elastic
(b) Highly elastic
(c) Perfectly elastic
(d) Inelastic
Answer:
(d) Inelastic

Question 20.
Elasticity of demand is:
(a) Qualitative statement
(b) Queslitative statement
(c) Both
(d) None of these
Answer:
(a) Qualitative statement

Question 21.
GNPMP = ?
(a) GNP + subsidy
(c) GDPMP – depreciation
(b) GDPMP + income from foreign
(d) None of these
Answer:
(c) GDPMP – depreciation

Question 22.
In which following has a characteristic of monopoly ?
(a) Prohibited in enter of new firm
(b) One seller many buyer
(c) Lack of nearer place
(d) All these
Answer:
(d) All these

Question 23.
Financial year of India is :
(a) From 1st April to 31st March
(b) From 1st Oct. to 30th Sept.
(c) From 1st January to 31st December
(d) None of these
Answer:
(a) From 1st April to 31st March

Question 24.
Central problem of economics is:
(a) Economic development
(b) Allotment of resources
(c) Maximum use of resources
(d) All these
Answer:
(d) All these

Question 25.
Demand curve always downwards :
(a) From left to right
(b) From left to right
(c) Y-axis parallel
(d) None of these
Answer:
(a) From left to right

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 26.
In balance of Arm is:
(a) MR < MC (b) MR = MC (c) MR > MC
(d) MR = MC = 0
Answer:
(b) MR = MC

Question 27.
Direct taxis:
(a) Gift-tax
(b) Income tax
(c) Both
(d) None of these
Answer:
(c) Both

Question 28.
In India one rupee note is issued by
(a) Reserve Bank of India
(b) Finance ministry of Govt, of India
(c) State Bank of India
(d) None of these
Answer:
(a) Reserve Bank of India

Question 29.
The optional name of opportunity cost is :
(a) Balance price
(b) Marginal cost
(c) Average cost
(d) Economic cost
Answer:
(d) Economic cost

Question 30.
Who said it “Money is what money does.”
(a) Thomas
(b)Kalbum
(c) Hartley withers
(d) Keynes
Answer:
(c) Hartley withers

Question 31.
According to saving-investment viewpoint, income – employment equilibrium will be determined at a point where:
(a) I > S
(b) S < I
(c) I = S
(d) None of these
Answer:
(c) I = S

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 32.
Who gave the concept of ‘Time Element’ in price • determination process ?
(a) Walras
(b) Recardo
(c) J.K. Mehta
(d) Marshal
Answer:
(d) Marshal

Question 33.
How it is calculated of marginal utility?
\((a) \frac{\Delta T U}{\Delta Q}
(b) \frac{\Delta M U}{\Delta Q}
(c) \frac{\Delta Q}{\Delta T U}
(d) \frac{\Delta Q}{\Delta M U}\)
Answer:
\((c) \frac{\Delta Q}{\Delta T U}\)

Question 34.
A curve which rises first and starts declining after that is called:
(a) APP
(b) MPP
(c) TPP
(d) All these
Answer:
(b) MPP

Question 35.
The quantity of that goods is called where any seller sales goods at fixed place, market and fixed price:
(a) Supply
(b) Demand
(c) Elasticity of supply
(d) Elasticity of demand
Answer:
(c) Elasticity of supply

Question 36.
The Central Bank of India is:
(a) Reserve Bank
(b) State Bank
(c) Public Bank
(d) Share Market
Answer:
(a) Reserve Bank

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 37.
NNPMp ?
(a) GNPMp -Depreciation
(b) GNPMP + Depreciation
(c) GNPMP + Indirect tax
(d) None of these
Answer:
(a) GNPMp -Depreciation

Question 38.
Production function is expressed by
(a) Px = Px
(b) Qx = f(A, B, C, D)
(c) Qx = Dx
(d) None of these
Answer:
(c) Qx = Dx

Question 39.
In the following which is not immovable cost ?
(a) Premium of insurance
(b) Interest
(c) Cost of raw material
(d) Rent of factory
Answer:
(d) Rent of factory

Question 40.
Which services included in secondry sector ?
(a) Insurance
(b) Banking
(c) Business
(d) Reconstruction
Answer:
(d) Reconstruction

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 41.
Which is Budget receipt in the following:
(a) Tax receipts
(b) Capital receipts
(c) a and b both
(d) None of these
Answer:
(c) a and b both

Question 42.
Two branches of economic activities-Micro and Macro are divided by economists ?
(a) Marshall ,
(b)Richardo
(c) Ragner Frish
(d) None of these
Answer:
(c) Ragner Frish

Question 43.
Cost or budget line exbressed by
\((a) \frac{P_{X}}{P_{Y}}
(b) \frac{P_{Y}}{P_{X}} \quad (c) \frac{P_{X}}{P_{Y}} \quad(d)+\frac{P_{Y}}{P_{X}}\)
Answer:
\((a) \frac{P_{X}}{P_{Y}}\)

Question 44.
Demand cycle is expressed by
(a) From above left to right
(b) From bottom right to left
(c) Y-axis
(d) None of these
Answer:
(b) From bottom right to left

Question 45.
In the following, according to kynes, employment principles
(a) Effective Demand
(b) Supply
(O Production Function
(d) None of these
Answer:
(a) Effective Demand

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 46.
Total cost of market of any country of one year is called (a) GDPm), (b) GDPFC (c) NNPFr (cl) None of these
(a) GDPMP
(b) GDPFC
(c) NNPFC
(d) None of these
Answer:
(b) GDPFC

Question 47.
Financial year of India is:
(a) From I April to 31 March
(b) From I January to 31 December
(c) From 1 October to 30 September
(d) None of these
Answer:
(a) From I April to 31 March

Question 48.
Multiplier expressed by which formula
\((a) K=\frac{\Delta S}{\Delta L}
(b) K=\frac{\Delta Y}{\Delta L}\)
(c) K = I – S
(d) None of these AL A L
Answer:
(b) K=\frac{\Delta Y}{\Delta L}[/latex]

Question 49.
Money expand when CRR .
(a) decrease
(b) Increase
(c) a and b both
(d) None of these
Answer:
(a) decrease

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 6 in English

Question 50.
Narshim committee is related to
(a) By Tax
(b) By Banking
(c) By agriculture
(d) By agriculture
Answer:
(b) By Banking

Bihar Board Class 11th Hindi प्रमुख रचनाकर एवं रचनाएँ

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi प्रमुख रचनाकर एवं रचनाएँ

 Bihar Board Class 11th Hindi प्रमुख रचनाकर एवं रचनाएँ

विद्यापति दरभंगा जिले के विसपी ग्राम में महाकवि विद्यापति का जन्म 1380 ई. के आसपास हुआ था। उनके पिता श्रीगणपति ठाकुर मिथिला के तत्कालीन राजदरबार के अत्यंत सम्मानित पंडित थे। विद्यापति का भी उक्त दरबार में ससम्मान प्रवेश हुआ। कीर्तिसिंह के दरबार में तो उन्हें प्रतिष्ठा मिली ही महाराज शिवसिंह एवं उनकी धर्मपत्नी लखिमा देवी के भी वे कृपापात्र थे, जिनकी प्रशंसा उन्होंने अपने अनेक पदों में की है।

विद्यापति की प्रमुख रचनाएँ हैं-‘कीर्तिलता’, ‘कीर्तिपताका’, ‘भू-परिक्रमा’, ‘पुरुष-परीक्षा’, ‘लिखनावली’, ‘शैवसिद्धान्तसार’, ‘गंगावाक्यावली’,’विभागसार’, ‘दानवाक्यावली’, ‘दुर्गाभक्तितरंगिणी’ इत्यादि। ‘कीर्तिलता’ में तिरहुत राजा कीर्तिसिंह की वीरता, उदारता, गुण-ग्राहकता आदि का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया गया है। डॉ. शिवप्रसाद सिंह ने ‘कीर्तिलता’ के संबंध में लिखा है, “इस रचना से कवि विद्यापति की प्रबंध-प्रतिभा का पता चलता है। यद्यपि यह काव्य मध्यकालीन ऐतिहासिक कथाकाव्यों की शैली में लिखी गई है, किन्तु कवि ने परिपाटी के प्रतिकूल इसमें अपने संरक्षक नरेश की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा प्रायः नहीं की है। मध्यकालीन कथाकाव्य प्रायः पद्य में लिखे गए हैं।

‘कीर्तिलता’ प्रचलित चरितकाव्यों किंचित् भिन्न शैली में लिखी गई है। इसमें अलंकृत पद्य भी है।” इसमें सज्जन-प्रशंसा, दुर्जन-निंदा, नगर-वर्णन, युद्ध-वर्णन जैसे मध्यकालीन कथाकाव्यों की रूढ़ियाँ भी हैं, किन्तु अत्यंत भव्य हैं। कीर्तिपताका’ भी प्रशस्तिमूलक काव्य है, किन्तु इसमें महाराज कीर्तिसिंह के वंशज शिवसिंह महाराज की प्रशंसा है। ‘भू-परिक्रमा’ राजा शिवसिंह की आज्ञा से लिखित भूगोल-संबंधी पुस्तक है।

‘पुरुष-परीक्षा’ में कवि ने दण्डनीति का निरूपण किया है। ‘लिखनवाली’ में चिट्ठी-पत्री लिखने का निदर्शन है। ‘शैवसिद्धान्तसार’ में दान-संबंधी शास्त्र, ‘विभागसार’ संपत्ति के बँटवारे की विविध समस्याओं के समाधान एवं ‘दुर्गाभक्तितरंगिणी’ में दुर्गा की भावपूर्ण भक्ति से संबंधित पद हैं। इनके अतिरिक्त, ‘मंजरी’ नामक एक नाटक की भी रचना उन्होंने की है।

 Bihar Board Class 11th Hindi प्रमुख रचनाकर एवं रचनाएँ

♣ अमीर खुसरो

कवि अमीर खुसरो इस युग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। उनके काव्योत्कर्ष का प्रमाण उनकी फारसी रचनाएँ हैं। वे संगीतज्ञ, इतिहासकार, कोशकार, बहुभाषाविद्, सूफी औलिया, कवि बहुत कुछ थे। उनकी हिन्दी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय रही हैं। उनकी पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सखुने अभी तक लोगों की जवान पर हैं। उनके नाम से निम्नलिखित दोहा बहुत प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यह दोहा अमीर खुसरो ने हजरत निजामुद्दीन औलिया के देहांत पर कहा था-

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।।
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस।

उनकी हिन्दी रचनाओं का ऐतिहासिक महत्व है। उनकी भाषा, हिन्दी की आधुनिक काव्य भाषा के रूप में पूर्णतः प्रतिष्ठित होने का संकेत देती है। उनकी व्यक्तित्व और उनकी हिन्दी इस बात को प्रमाणित करती है कि हिन्दी काव्य प्रारंभ से ही मध्य देश की मिली-जुली संस्कृति का चित्र रहा है। उन्होंने ऐसी पंक्तियाँ रची हैं जिनमें फारसी और हिन्दी को एक ही ध्वनि प्रवाह ‘ में गुंफित कर दिया गया है। यह कला संस्कृति-साधक का ही सिद्ध कर सकता है-

जे हाल मिसकी मकन तगाफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ।
कि ताबे हिजॉब दारम ऐ जाँ न लेहु काहे लगाय छतिया।
शबाने हिजा दराज चूं जुल्फ व रोजे वसलत चूं उम्र को तह।
सखी पिया को जो मैं न देखू तो कैसे का, अंधेरी रतियाँ।

♣ कबीर

सन्त कबीर के जन्म और उनके माता-पिता को लेकर बहुत विवाद है। लेकिन यह स्पष्ट है कि कबीर जुलाहा थे, क्योंकि उन्होंने अपनी कविता में खुद को अनेक बार जुलाहा कहा है।

 Bihar Board Class 11th Hindi प्रमुख रचनाकर एवं रचनाएँ

कबीर का अपना पंथ तथा संप्रदाय क्या था, इसके बारे में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है। वे रामानंद के शिष्य के रूप में विख्यात हैं, किन्तु उनके ‘राम’ रामानंद के ‘राम’ नहीं हैं। शेख तकी नाम के सूफी संत को भी कबीर का गुरु कहा जाता है, किन्तु इसकी पुष्टि नहीं होती। संभवत: कबीर ने इन सबसे सत्संग किया होगा और इन सबसे किसी-न-किसी रूप में प्रभावित भी हुए होंगे।

कबीर के काव्य पर अनेक साधनाओं का प्रभाव है। उनमें वेदांत का अद्वैत, नाथ पंथियों की अंतस्साधनात्मक रहस्य भावना, हठयोग, कुंडलिनी योग, सहज साधना, इस्लाम का एकेश्वरवाद सब कुछ मिलता है।

हठयोग की पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग उन्होंने खूब किया है, साथ ही अहिंसा की भावना पर भी बल दिया है। कबीर की वाणी का संग्रह बीजक कहलाता है।

इसके तीन भाग हैं-

  • रमैनी
  • सबद और
  • साखी।

रमैनी और सबद में गेयपद हैं, साखी दोहों में है। रमैनी और सबद ब्रजभाषा में हैं जो तत्कालीन मध्य देश की काव्य भाषा थी।

कबीर ने धार्मिक साधनाओं को आत्मसात अवश्य किया था। किन्तु वे इन साधनाओं को भक्ति की भूमिका या तैयारी मात्र मानते थे। जीवन की सार्थकता वे भक्ति या भगवद् विषयक रति में ही मानते थे। यद्यपि उनके राम निराकार हैं, किन्तु वे मानवीय भावनाओं के आलंबन हैं। इसीलिए कबीर ने निराकार, निर्गुण राम को भी अनेक प्रकार के मानवीय संबंधों में याद किया है। वे ‘भरतार’ हैं, कबीर ‘बहुरिया’ हैं। वे कबीर की माँ हैं-‘हरिजननी मैं बालक तोरा।’ वे पिता भी हैं जिनके साथ कबीर बाजार जाने की जिद करते हैं।

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कबीर भक्ति के बिना सारी साधनाओं को व्यर्थ मानते हैं। इसी प्रेम एवं भक्ति के बल पर वे अपने युग के सारे मिथ्याचार, कर्मकांड, अमानवीयता, हिंसा, परपीड़ा को चुनौती देते हैं। वे बाह्य आडंबरों और पाखंड के प्रबल विरोधी थे और इस भावना को उन्होंने बार-बार अपनी कविताओं में मुखारित किया है। वे ऊँच-नीचे, जात-पात, धर्म-संप्रदाय आदि की संकीर्णताओं का आजीवन विरोध करते रहे। उनके काव्य उनके व्यक्तित्व और उनकी साधना में जो अक्खड़पन, निर्भीकता और दो टूकपन है वह भी इसी भक्ति के कारण।

वे पूर्व साधनाओं की पारिभाषिक शब्दावली को अपनाकर भी उसमें नया अर्थ भरते हैं। . कबीर अपने अनुभव को प्रमाण मानते हैं, शास्त्र को नहीं। इस दृष्टि से वे यथार्थबोध के रचनाकार हैं। उनके यहाँ जो व्यंग्य की तीव्रता और धार है वह भी कथनी-करनी के अंतर को देख पाने की क्षमता के कारण। वे परंपरा द्वारा दिए गए समाधान को अस्वीकार करके नए प्रश्न पूछते हैं-‘चलन चलन सब लोग कहते हैं, न जानों बैकुंठ कहाँ है? या न जाने तेरा साहब कैसा है?”

परंपरा पर संदेह, यथार्थ-बोध, व्यंग्य, काला-बोध की तीव्रता और गहरी मानवीय करुणा के कारण कबीर आधुनिक भाव-बोध के बहुत निकट लगते हैं। किन्तु कबीर में रहस्य भावना भी है और राम में अनन्य भक्ति तो उनकी मूल भाव-भूमि ही है।

नाद, बिन्दु, कुंडलिनी, षड्चक्रभेदन आदि का बारंबार वर्णन कबीर के काव्य का रहस्यवादी पक्ष है। कबीर में स्वाभाविक रहस्य भावना बहुत मार्मिक रूप से व्यक्त हुई है। ऐसे अवसरों पर वे प्रायः जिज्ञासु होते हैं-

कहो भइया अंबर कासौ लागा।

कबीर तथा अन्य निर्गुण संतों की उलटबांसियाँ प्रसिद्ध हैं। उलटवासियों का पूर्व रूप हमें सिद्धों गंधा भाषा में मिलता है। उलटबाँसियाँ अनुभूतियों को असामान्य प्रतीकों में प्रकट करती है। व्यस्था को मानने वाले संस्कारों को धक्का देती हैं। इन प्रतीकों का अर्थ खुलने पर ही उलट का समझ में आती हैं।

♣ तुलसीदास

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तुलसीदास मध्यकालीन के उन श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं जिनकी लोकप्रियता आज भी बनी हुई है। तुलसी का बचपन घोर दरिद्रता एवं असहायावस्था में बीता था। उन्होंने लिखा है कि माता-पिता ने दुनिया में पैदा करके मुझे त्याग दिया। विधाता ने भी मेरे भाग्य में कोई भलाई नहीं लिखी-

मातु पिता जग जाई तथ्यो, विधि ह न लिखी कछु भाल भलाई।

जैसे कुटिल कीट को पैदा करके छोड़ देते हैं वैसे ही मेरे माँ-बाप ने मुझे त्याग दिया-

तनु जन्यों कुटिल कीट ज्यों तज्यों माता पिता हूँ।

उनके जन्म स्थान के विषय में काफी विवादे हैं। किन्तु अधिकतर विद्वान राजापुर को ही उनका जन्म स्थान मानते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं-दोहावली, कवित रामायण (कवितावली); गीतावली, रामचरितमानस, रामाज्ञाप्रश्न, विनयपत्रिका रामललानहछू, पार्वतीमंगल, जानकीमंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपिनी, श्रीकृष्णगीतावली। रामचरितमानस तुलसी की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा आधार है। इसकी रचना गोस्वामी जी ने 1754 ई. में प्रारंभ की जैसा कि उनकी इस अर्धाली से प्रकट है-

संवत सोरह सौ इकतीसा। करऊ कथा हरिपद धरि सीसा।।

गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय कवि हैं। उन्हें हिन्दी का जातीय कवि कहा जाता है। उन्होंने मध्य काल में प्रचलित दोनों काव्य. भाषाओं-ब्रजभाषा और अवधी में समान अधिकार से रचना की है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि उनहोंने मध्य काल में व्यवहत प्रायः सभी काव्यरूपों का उपयोग किया है। केवल तुलसीदास की ही रचनाओं को देखकर समझा जा सकता है कि मध्य कालीन हिन्दी साहित्य में किन काव्यरूपों में रचनाएं होती थीं।

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उन्होंने वीरगाता काव्य की छप्पय-पद्धति, विद्यापति और सूरदास की गीत-पद्धति, गंगा आदि कवियों की कवित्त-सवैया पद्धति, रहीम के समान दोहे और बरवै, जायसी की तरह चौपाई-दोहे के क्रम से प्रबंध काव्य रचे। रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में “हिन्दी काव्य की सब प्रकार की रचनाशैली के ऊपर गोस्वामी जी ने अपना ऊँचा आसन प्रतिष्ठित किया है। यह उच्चता और किसी को प्राप्त नहीं।”

तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में काव्य के लोकमंगलकारी पक्ष पर अधिक बल दिया है। इसी दृष्टि से उन्होंने तत्कालीन सामंतों की लोलुपता पर प्रहार किया है। प्रजा-द्रोही शासक तुलसी की रचनाओं में प्रायः उनके कोपभाजन बनते हैं। उन्होंने अकाल, महामारी के साथ-साथ प्रजा से अधिक कर वसूलने की भी निंदा की। अपने समय की विभिन्न धार्मिक साधनाओं के पाखंड का उद्घाटन किया।

तुलसी की दृष्टि में जो बुरा है, वह कलिकाल का प्रभाव है। यहाँ तक कि यदि लोग वर्णश्रम धर्म का पालन नहीं कर रहे हैं तो वह भी कलिकाल का प्रभाव है। वे दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से रहित सर्वसुखद रामराज्य का स्वप्न बुनता है। रामराज्य तुलसी की आदर्श व्यवस्था है। इसके नायक एवं व्यवस्था तुलसी के राम हैं।

प्रबंधकार कवि के लिए कथा के उचित अवयवों में अनुपात की जो आवश्यकता पड़ती है, वह तुलसी में प्रचुर मात्रा में थी। कथा में कौन-सा प्रसंग कितनी दूर तक चलना चाहिए, इसकी उन्हें सच्ची पहचान थी। इसके साथ उन्हें कथा के मार्मिक स्थलों की भी पहचान थी। रामचरितमानस या अन्य काव्यों में उन्होंने अधिक विस्तार उन्हीं अंशों को दिया है जो मार्मिक हैं, अर्थात् जिनमें मनुष्य का मन देर तक रम सकता है, जैसे-पुष्पवाटिका प्रसंग, राम-वन-गमन, दशरथ-मरण, भरत की ग्लानि वन-मार्ग, लक्ष्मण शक्ति।

किस स्थिति में पड़ा हुआ पात्र कैसी चेष्टा करेगा-इसे जानने और चित्रित करने में तुलसी अद्वितीय हैं। वे मानव मन के परम कुशल चितेरे हैं। चित्रकूट में राम और भरत मिलन के अपतर पर जो सभा जुड़ती है उसमें राम, भरत, जनक, विश्वामित्र आदि के वक्तव्य मध्य कालीन शालीनता एवं वाक्-विदग्धता का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

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तुलसीदास जिस प्रकार ब्रजभाषा और अवधी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते हैं उसी प्रकार प्रबंध और मुक्तक दोनों की रचना में भी कुशल हैं। वस्तुतः तुलसी ने गीतावली, कवितावली आदि में मुक्तकों में कथा कही है। यह विरोधाभाषा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि इन मुक्तकों को एक साथ पढ़िए तो प्रबंध का और अलग-अलग पढ़िए तो वे स्वतंत्र मुक्तकों का आनंद देते हैं। इनमें विनयपत्रिका की स्थिति विशिष्ट हैं।

तुलसी की रचनाओं से जहाँ एक ओर रामभक्ति शाखा की अभूतपूर्व वृद्धि, हुई, वहीं दूसरी ओर यह भी हुआ है कि रामभक्ति शाखा के साहित्य में होने वाले परवर्ती कवि उनके आगे धूमिल पड़ गए। इस प्रकार तुलसी परवर्ती सगुण रामभक्त कवियों का ऐतिहासिक महत्व अधिक, साहित्यिक महत्व अपेक्षाकृत कम।

♣ सूरदास

हिन्दी साहित्य में श्रेष्ठ कृष्णभक्त कवि सूरदास के बारे में भक्तमाल और चौरासी वैष्णवों की वार्ता से थोड़ा-बहुत जानकारी मिल जाती है। आईने अकबरी और मुंशियात अबुलफजल में भी किसी संत सूरदास का उल्लेख है, किन्तु वे बनारस के कोई और सूरदास प्रतीत होते हैं। जनश्रुति यह अवश्य है कि अकबर बादशाह सूरदास का यश सुनकर उनसे मिलने आए थे। भक्तमाल में इनकी भक्ति, कविता एवं गुणों की प्रशंसा है तथा उनकी अंधता का उल्लेख है। चौरासी वैष्णवों की वार्ता के अनुसार वे आगरा और मथुरा के बीच साधु या स्वामी के रूप में रहते थे। वे वल्लभाचार्य के दर्शन को गए और उनसे लीलागान का उपदेश पाकर कृष्ण-चरित विषयक पदों की रचना करने लगे। कालांतर में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण होने पर महाप्रभु वल्लभाचार्य ने उन्हें वहाँ भजन-कीर्तन का कार्य सौंपा।

सूरदास के विषय में कहा जाता है कि वे जन्मांध थे। उन्होंने अपने को जन्म से आँधर कहा भी है कि किन्तु इसके शब्दार्थ पर अधिक नहीं जाना चाहिए। सूर के काव्य में प्रकृति और जीवन का जो सूक्ष्म सौंदर्य चित्रित है उससे यह नहीं लगता कि वे जन्मांध थे।

सूरदास वात्सल्य और श्रृंगार के कवि हैं भारतीय साहित्य क्या संभवतः विश्व साहित्य में कोई कवि वात्सल्य के क्षेत्र में उनके समकक्ष नहीं है। यह उनकी ऐसी विशेषता है कि इसी के आधार पर वे साहित्य क्षेत्र में अत्यंत उच्च स्थान के अधिकारी माने जा सकते हैं। बाल जीवन का ऐसा अनुपम चित्रण महान सहृदय और मानव-प्रेमी व्यक्ति ही कर सकता है। सूरदास ने वात्सल्य और श्रृंगार का वर्णन लोक सामान्य की भावभूमि पर किया है। सूर ने अपनी रचना में प्रकृति और जीवन के कर्म के क्षेत्रों को अचूक कौशल से उतार लिया है। लोक साहित्य की सहज जीवंतता जितनी सूर के साहित्य में मिलती हैं, हिन्दी के किसी कवि में नहीं।

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♣ बिहारी

कवि बिहारी का जन्म 1595 ई. में (संवत् 1625 वि.) ग्वालियर में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवराय था। उनको एक भाई और एक बहन थी। उनका विवाह मथुरा के किसी माथुर ब्राह्मण की कन्या से हुआ था। बिहारी को कोई संतान न थी, इसलिए अपने भतीजे निरंजन को गोद ले लिया। वे घरबारी चौबे थे। कहा जाता है कि उनके जन्म के 7-8 वर्ष बाद उनके पिता केशवराय ग्वालियर छोड़कर ओरछा चले गए। वहीं बिहारीलाल को सुप्रसिद्ध आचार्य शवदास से कवि-शिक्षा प्राप्त हुई। ओरछा में ही उन्होंने संस्कृत-प्राकृत का अध्ययन किया।

उसके बाद वे आगरा आ गए जहाँ उन्होंने उर्दू-फारसी का ज्ञान प्राप्त किया। यहाँ उन्होंने खानखाना अब्दुर्रहीम की प्रशंसा में कुछ दोहे लिखे जिनपर वे पुरस्कृत हुए। वे शाहजहाँ के तो कृपा र थे ही, जोधपुर और राज्यों के भी आश्रय में रहे थे। जयपुर के राजा जयसिंह और उनकी पत्नी अनंतदेवी के ही प्रिय कवि थे। बिहारी रसिक जीव थे, किन्तु उनकी रसिकता गरिक, जीवन की रसिकानावे विनोदी और व्यंग्यप्रिय जीव थे। 1663 ई. (संवत् 1720 वि.) के आसपास उनका परलोक गमन हुआ।

उनकी कविताओं का एक ही कालजयी संग्रह ‘बिहारी सतसई’ है जिसमें 713 मुक्तक दोहे और सोरठ हैं। दोहों के अनुपात में सोरठे नगण्य हैं। उनके तीन कवित्त भी मिलते हैं। यद्यपि। हारी की इतनी ही रचनाएँ मिलती हैं, किन्तु उनके मार्ग पर चलनेवालों, उनका भावापहरण बालों, उनकी सतसई के एक विशाल समुदाय के लोकप्रियता का पता चलहास कराना है।

करनेवालों, उनकी सतसई के अनेक प्रकार के टीका-ग्रंथकारों, आलोचकों, तुलनात्मक आलोचकों और छिटपुट निबंध-लेखकों का एक विशाल समुदाय है जिससे बिहारी की प्रतिभा, परविर्ती हिन्दी साहित्य पर उनके अप्रतिम प्रभाव एवं उनकी अतुल लोकप्रियता का पता चलता है। ‘बिहारी सतसई’ के सम्यक् अध्ययन के बिना साहित्यकों की जमात में बैठना अपना उपहास कराना है। ‘रामचतिमानस’ के बाद हिन्दी भाषा-भाषियों पर किसी का भी कोई वैसा ही और सम्मोहक प्रभाव पड़ा तो ‘बिहारी सतसई’ का ही। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि अपनी कल्पना की समाहार-शक्ति एवं भाषा की अप्रतिम समास-शक्ति के कारण उन्होंने अपने मुक्तकों को उनके उच्चतम शिखर पर पहुंचा दिया है।

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कभी परंपरा के पार्श्व में चलकर तो कभी उसमें गोते लगाकर बिहारी ने श्रृंगारपरक रचनाएँ की हैं जिनकी लंबी परंपरा उनके काल तक संस्कृत और प्राकृत के गाथा एवं शतक-ग्रंथों के रूप में बन चुकी थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि ‘बिहारी सतसई’ किसी रीति-परंपरा की उपज नहीं है। यह एक विशाल परंपरा के लगभग अतिम छोर पर पड़ती है और अपनी परंपरा को संभवतः अंतिम बिन्दु तक ले जाती है। इतनी दीर्घ परंपरा के अनुयायी कवि में पुरानापन रह ही जाता है। फिर, बिहारी सूक्ति-संग्राहक कवि थे। उन्होंने पुरानी बातों को पॉलिश करके, खराद के, संवार के नया रूप दिया है। इसी कला का चलता नाम ‘मजमून छीन लेना’ हैं। बिहारी सजग कलाकार थे।

शृंगार-रस की अभिव्यंजना में नायक-नायिका के रूप-वर्णन के क्रम में उनकी शोभा, दीप्ति, कांति और माधुर्य का भी चित्र उन्होंने उन नायक-नायिकाओं की अंगिक एवं वाचिक चेष्टाओं के साथ खींचा है। इसी दिशा में काव्य-लक्ष्मी की जैसी भव्यता और कलापटुता बिहारी में दिखाई पड़ती है, जैसी अन्य कवियों के काव्यों में नहीं। यों तो उन्होंने नख-शिख-वर्णन किया है किन्तु नेत्रों का 41 बड़ी रुचि के साथ किया है। श्रृंगार के सीमित क्षेत्र में, वह भी विशेषतः संयोग श्रृंगार के, इतनी दूर तक धावा मारनेवाला और कोई कवि नहीं हुआ।

श्रृंगार के अतिरिक्त उन्होंने भक्ति और नीतिपरक भी कुछ दोहे लिखे हैं जो अपने क्षेत्र में प्रतिमान हैं। कुछ दोहों से उनके ज्योतिष ज्ञान का गांभाय भी प्रकट होता है। उनकी भाषा ब्राजी है जिसपर बुंदेलखंडी और पूर्वी का भी प्रभाव है। पूर्वी शब्दों का पश्चिमी अर्थों में ही प्रयोग उन्होंने किया है। उन्होंने कोई लक्षण ग्रंथ नहीं लिखा, किन्तु उनकी मानसिकता में उसके तत्त्व विद्यमान थे। अतः, वे लक्षण ग्रंथ न लिखकर भी रीतिकाल के आचार्य और सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है। उनके अलंकार प्रायः आवेग-साकर हैं, अत: वे उनके काव्य को ऊर्जास्वल तेज से भर देते हैं। ऊहात्मकाता कहीं-कहीं उनके दोहों को हस्यास्पद भी बना देती है।

♣ रैदास

रैदास रामानंद के शिष्य कहे जाते हैं। उन्होंने अपने पदों में कबीर और सेन का उल्लेख किया है। अनुमानतः 15वीं शदी उनका समय रहा होगा। धन्ना और मीराबाई ने रैदास का उल्लेख आदरपूर्वक किया है। यह भी कहा जाता है कि मीराबाई रैदास की शिष्या थीं। रैदास ने अपने को एकाधिक स्थलों पर चमार जाति का कहा है-‘कह रैदास खलास चमारा’ या ‘ऐसी मेरी जाति विख्यात चमारा’।

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रैदास कोशी के थे। रैदास के पद गुरुग्रंथ साहब में संकलित हैं। कुछ फुटकल पद सतबानी में है। रैदास की भक्ति का ढाँचा निर्गुणवादियों का ही है, किन्तु उनका स्वर कबीर जैसा आक्रामक नहीं। रैदास की कविता की विशेषता उनकी निरीहता है। वे अनन्यता पर बल देते हैं। रैदास में निरीहता के साथ-साथ कुंठाहीनता का भाव द्रष्टव्य है। भक्ति भावना ने उनमें वह बल भर दिया था जिसके आधार पर वे डंके की चोट पर घोषित कर सके-

जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत
फिरहिं अजहुँ बानारसी आस-पासा।
आचार सहित बिप्र करहिं डंड उति
तिन तनै रविदास दासानुदासा।

रैदास की भाषा सरल, प्रवाहमयी और गेय है।

♣ गुरु नानक

गुरु नानक का जन्म तलवंडी ग्राम, जिला लाहौर में हुआ था। इनके पिता का नाम कालूचंद खत्री और माँ का नाम तृप्ता था। इनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था। कहते हैं कि इनके पिता ने इन्हें व्यवसाय में लगाने का बहुत प्रयास किया, किन्तु इनका मन भक्ति की ओर अधिकाधिक झुकता गया। इन्होंने हिन्दू-मुसलमान दोनों की समान धार्मिक उपासना पर बल दिया। वर्णाश्रम व्यवस्था और कर्मकांड का विरोध करके निर्गुण ब्रह्म की भक्ति का प्रचार किया। गुरु नानक ने व्यापक देशाटन किया और मक्का-मदीना तक की यात्रा की।

कहते हैं कि मुगल-सम्राट बाबर से भी इनकी भेंट हुई थी। यात्रा के दौरान इनके साथी और शिष्य रागी नामक मुस्लिम थे जो इनके द्वारा रचित पदों को गाते थे। गुरु नानक ने पंजाबी के साथ हिन्दी में भी कविताएँ की। इनकी हिन्दी में ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों का मेल है। भक्ति और विनय के पद बहुत मार्मिक हैं। उदारता और सहनशीलता इनके व्यक्तित्व और रचना की विशेषता है। इनके दोहों में जीवन के अनुभव उसी प्रकार गुंथे हैं जैसे कबीर की रचनाओं में। आदि गुरुग्रंथ साहब के अंतर्गत ‘पहला’ नामक प्रकरण में इनकी वाणी संकलित है।

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उसमें सब्द, सलोल मिलते हैं। गुरु नानक की रचनाएँ हैं- जपुजी, आसादीवार, रहिरास और सोहिला। गुरु नानक की परंपरा में उनके उत्तराधिकारी गुरु कवि हुए। इनमें गुरु अंगद, गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुन, गुरु तेगबहादुर और दसवें गुरु गोविंद सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं।

♣ दादूदयाल

कबीर की तरह दादू के ही जन्म और उनकी जाति के विषय में विवाद और अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग उन्हें गुजराती ब्राह्मण मानते हैं, कुछ लोग मोची या धुनिया। चंद्रिका प्रसाद त्रिपाठी और क्षितिमोहन सेन के अनुसार दादू मुसलमान थे और उनका नाम दाऊद था। रामचंद्र शुक्ल का विचार है कि उनकी बानी में कबीर का नाम बहुत जगह आया है और इसमें कोई संदेह नहीं कि वे उन्हीं के मतानुयायी थे। वे आमेर, मारवाड़, बीकानेर आदि स्थानों में घूमते हुए जयपुर आए। वहीं से नराने नामक स्थान पर उन्होंने शरीर छोड़ा। वह स्थान दादू पंथियों का केन्द्र है। दादू की रचनाओं का संग्रह उनके दो शिष्यों संतदास और जगनदास ने हरडेवानी नाम से किया था। कालांतर में रज्जब ने इसका संकलन अंगवधू नाम से किया।

दादू की कविता जन सामान्य को ध्यान में रखकर लिखी गई है, अतएव सरल एवं सहजन है। दादू भी कबीर के समान अनुभव को ही प्रमाण मानते थे। दादू की रचनाओं में भगवान के प्रति प्रेम और व्याकुलता का भाव है। कबीर की भांति उन्होंने भी निर्गुण निराकार भगवान को वैयक्तिक भावनाओं का विषय बनाया है। उनकी रचनाओं में इस्लामी साधना के शब्दों का प्रयोग खुलकर हुआ। उनकी भाषा पश्चिमी राजस्थानी से प्रभावित हिन्दी है। उसमें अरबी-फारसी के काफी शब्द आए हैं, फिर भी वह सहज और सुगम है।

♣ सुंदरदास

सुंदरदास 6 वर्ष की आयु में दादू के शिष्य हो गए थे। उनका जन्म जयपुर के निकट द्यौसा नामक स्थान पर हुआ था। दादू की मृत्यु के बाद एक संत जगजीवन के साथ वे 10 वर्ष की आयु में काशी चले आए। वहाँ 30 वर्ष की आयु तक उन्होंने गहन अध्ययन किया। काशी से लौटकर वे राजस्थान में शेखावटी के निकट फतेहपुर नामक स्थान पर गए। वे फारसी भी बहुत अच्छा जानते थे। उनका देहांत सांगानेर में हुआ। – निर्गुण संत कवियों में सुंदरदास सर्वाधिक शास्त्रज्ञ एवं सुशिक्षित थे। कहते हैं कि वे अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुंदर थे।

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सुशिक्षित होने के कारण उनकी कविता में कलात्मकता है और भाषा परिमार्जित निर्गुण संतों ने प्राय: गेयपद ओर दोहे ही लिखे हैं। सुंदरदास ने कवित्त और सवैये भी रचे हैं। उनकी काव्यभाषा में अलंकारों का प्रयोग खूब है। उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ सुंदरविलास है। काव्य-कला में शिक्षित होने के कारण उनकी रचनाएँ निर्गुण साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती हैं। निर्गुण साधना और भक्ति के अतिरिक्त उन्होंने सामाजिक व्यवहार, लोकनीति और भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के आचार-व्यवहार पर भी उक्तियाँ कही हैं। लोक धर्म और लोक मर्यादा की उन्होंने अपने काव्य में उपेक्षा नहीं की है।

♣ रज्जब

रज्जब भी दादू के ही शिष्य थे। ये भी राजस्थान के थे। इनकी कविताएँ साफ और सहज हैं। भाषा पर राजस्थानी प्रभाव अधिक है और इस्लामी साधना के शब्द भी हैं।

निर्गुण संतों की ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्य प्रसिद्ध संत कवि मलूकदास, अक्षर अनन्य, जंभनाथ, सिंगा जी और हरिदास निरंजनी हैं। दयाबाई और सहजोबाई जैसे संत कवियित्रियाँ तथा कबीर के विषय धर्मदास की गणना इसी परंपरा में होती है। इनमें धर्मदास की रचनाओं का संतों में बहुत आदर है। इनकी कविताएँ सरल और प्रेम प्रधान है।

♣ कुतुबुन

कुतुबुन ने मिरगावत रचना 1503-04 ई. में की थी। सोहरावर्दी पंथ के ज्ञात होते हैं। रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार ये जौनपुर के बादशाह हुसैन शाह के आश्रित थे। इसमें नायक मृगी रूपी नायिका पर मोहित हो जाता है और उसकी खोज में निकल पड़ता है। अंत में शिकार खेलते समय सिंह द्वारा मारा जाता है। यह रचना अनेक कथानक-रुढ़ियों से युक्त है। भाषा प्रवाहमयी है।

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♣ मालिक मुहम्मद जायसी

हिन्दी में सूफी काव्य-परंपरा के श्रेष्ठ कवि मलिक मुहम्मद जायसी है। ये अमेठी के निकट जायस के रहने वाले थे, इसलिए इन्हें जायसी कहा जाता है। जायसी अपने समय के सिद्ध फकीरों में गिने जाते थे। अमेठी के राजघराने में इनका बहुत सम्मान था। इनकी तीन रचनाएँ उपलब्ध हैं-अखरावट, आखिरी कलाम और पद्मावत। कहते हैं कि एक नवोपलब्ध काव्य कन्हावत भी इनकी रचना है, किन्तु कन्हावत का पाठ प्रामाणिक नहीं लगता। अखरावट में देवनागरी वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर रचना की गई है। आखिरी कलाम में कयामत का वर्णन है। कवि के यश का आधार है पद्मावत। इसकी रचना कवि ने 1520 ई. के आस-पास की थी।

पद्मावत प्रेम की पीर की व्यंजना करने वाला विशद प्रबंध काव्य है। यह दोहा-चौपाई में। निबंध मसनवी शैली में लिखा गया है। पद्मावत की काव्य-भूमिका विशद एवं उदात्त है। कवि ने प्रारंभ में ही प्रकट कर दिया है कि जीवन और जगत को देखने वाली उसकी दृष्टि व्यापक और परस्पर विरोध को आँकने वाली है। कवि अल्लाह को इस विविधतामय सृष्टि का कर्ता कहता है-

कीन्हेसि नाग मुखहि विष बसा। कीन्हेसि मंत्र हरह जेहिं डसा।
कीन्हेसि अमिट जिअन जेहि पाएँ। कीन्हेसि विष जो मीचु तेहि खाएँ।
कीन्हेसि अखि मीठि रस भरी। कन्हिएसि करइ बेलि बहु फरी।

उपर्युक्त पंक्तियों में जायसी वस्तुओं का परस्पर-विरोध देख-दिखा रहे हैं। उनकी दी सामाजिक विषमता की ओर भी जाती है-

कीन्हेसि कोई भखारि कोई धनी। कीन्हेसि संपति बिपति पुन धनी।
काहू भोग भुगुति सुख सारा। कहा काहू भूख भवन दुख भारा॥

जायसी इन सबको अल्लाह का ही किया हुआ मानते थे।

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पद्मावत की कथा चित्तौड़ के शासक रतनसेन और सिंहल देश की राजकन्या पद्मिन’ की प्रेम कहानी पर आधारित है। इसमें कवि ने कौशलपूर्वक कल्पना एवं ऐतिहासिकता का श्रण कर दिया है। इसमें अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण और विजय ऐतिहासिक टना है। रतनसेन अपनी विवाहित पत्नी नागमती को छोड़कर पद्मिनी की खोज में योगी होकर . पड़ता है। पद्मिनी से उसका विवाह होता है। राघवचेतन नामक पंडित पद्मिनी के रूप की प्रशंसा अलाउद्दीन से करता है। अलाउद्दीन छल से रतनसेन को पकड़कर दिल्ली से जाता है। गोरा-बादल वीरतापूर्वक रतनसेन को छुड़ा लेते हैं। बाद में तरनसेन एक अन्य राजा देवपाल से लड़ाई में मारा जाता है। पद्मिनी और नागमती राजा के शव को लेकर सती हो जाती है। अलाउद्दीन जब चित्तौड़ पहुँचता है उसे उसकी राख मिलती है।

जायसी ने इस प्रेम कथा को आधिकारिक एवं आनुषंगिक कथाओं के ताने-बाने में बहुत जतन से बाँधा है। पद्मावत आद्यंत ‘मानुष-प्रेम’ अर्थात् मानवीय प्रेम की महिमा व्यजित करता है। हीरामन शुक शुरू में कहता है-

मानुस प्रेम भउँ बैकुठी। नाहिं त काह छार भरि मूठी।

रचना के अंत में छार भरि मूठि आती है। अलाउद्दीन पद्मिनी के सती होने के बाद चित्तौड़ पहुँचता है तो यहाँ राख ही मिलती है-

छार उठाइ लीन्हि एक मूठी। दीन्हि उड़ाइ पिरिथमी झूठी।

कवि ने कौशल से यह मार्मिक व्यंजना की है कि जो पद्मिनी रतनसेन के लिए ‘पारस रूप’ है वही अलाउद्दीन जैसे के लिए मुट्ठी भर धूल। मध्यकालीन रोमांचक आख्यानों का कथानक प्रायः बिखर जाता है, किन्तु पद्मावत का कथानक सुगठित है।

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पद्मावत विशुद्ध अवधी में रचित काव्य है। इनमें रामचरितमानस की भांति अनेक क्षेत्रों की भाषाओं का मेल नहीं है। इसलिए विशुद्ध अवधी का जो सहज और चलना रूप पद्मावत में मिलता है, मानस में नहीं। इसमें तत्सम शब्दों का प्रयोग भी बहुत कम या नहीं के बराबर है। जायसी का प्रिय अलंकार हेतूत्प्रेक्षा है जैसे

पिउ सो कहहु संदेसड़ा, हे भौंरा हे काग।
सो धनि बिरहे जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥

♣ मंझन

मंझन ने 1545 ई. में मधुमालती की रचना की। मधुमालती में नायक को अप्सराएँ उड़ाकर मधुमालती की चित्रसारी में भेज देती हैं और वही नायक नायिका को देखता है। इसमें मनोहर और मधुमालती की प्रेम कथा के समानांतर प्रेमा और ताराचंद की प्रेम कथा चलती है। इसमें प्रेम का बहुत ऊँचा आदर्श सामने रखा गया है। सूफी काव्यों में नायक की प्रायः दो पलियाँ होती हैं, किन्तु इसमें मनोहर प्रेमा से बहन का संबंध स्थापित करता है।

इनके अतिरिक्त सूफी काव्य परंपरा के अन्य उल्लेखनीय कवि और काव्य इस प्रकार हैं-उसमान ने 1613 ई. में चित्रावली की रचना की। शेख नबी ने 1619 ई. में ज्ञानद्वीवीय नामक काव्य लिखा। कासिम शाह ने 1731 ई. में हंस जवाहिर रचा। नूरमुहम्मद ने 1744 ई. में इंद्रावती और 1764 ई. में अनुराग बाँसुरी लिखी। अनुराग बाँसुरी में शरीर, जीवात्मा और मनोवृत्तियों को लेकर रूपक बाँधा गया है। इन्होंने चौपाइयों के बीच में दोहे न रखकर बरवै रखे हैं।

♣ नाभादास

रामानंद के शिष्यों में से एक अनंतानंद थे। उनके शिष्य कृष्णदास पयहारी थे। ये 1575 ६. के. आस-पास वर्तमान थे। उनकी चार रचनाओं का पता चलता है। उन्हें कृष्णदास पयहारी के शिष्य प्रसिद्ध भक्त नाभादास थे। नाभादास की रचना भक्तमाल का हिन्दी साहित्य में ऐतिहासिक महत्व है। इसकी रचना नाभादास ने 1585 ई. के आस-पास की। इसकी टीका प्रियादास ने 1712 ई. में लिखी। इसमें 200 भक्तों के चरित 316 छप्पयों में वर्णित हैं। इसका उद्देश्य तो जनता में भक्ति का प्रचार था, किन्तु आधुनिक इतिहासकारों के लिए यह हिन्दी साहित्य के इतिहास का महत्वपूर्ण आधार-ग्रंथ सिद्ध हुआ है।

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इस ग्रंथ से रामानंद, कबीर, तुलसी, सूर, गोरा आदि के विषय में अनेक तथ्यों का भी पता चल जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे पता तो अचूक तौर पर लग ही जाता है कि वर्णित भक्तों एवं भक्त-कवियों की कवि जन सामान्य में कैसी थी और जिस समाज में भक्तों कवियों, महापुरुषों के जीवन वृत्त के विषय में इतना कम ज्ञात हो, उसमें इतना पता लग जाना भी बहुत काम की बात है।

रामभक्ति शाखा के कुछ अन्य उल्लेखनीय कवि प्राणनंद चौहान (17वीं शती) एवं हृदय .. राम (17वीं शती) हैं। प्राणनंद चौहान ने सन् 1610 ई. में रामायण महानाटक लिखा। हृदय ने 1613 ई. में भाषा अनुगान्नाटक लिखा।

रामचंद्रिका को ध्यान में रखें तो केशवदास रामभक्ति शाखा के कवि ठहरते हैं, यद्यपि साहित्य के इतिहास की दृष्टि से केशवदास का अधिक महत्व उनके आचार्यत्व में है। रामचंद्रिका के संवाद बहुत नाटकीय हैं और उसमें विविध छंदों का प्रयोग किया गया है। केशवदास ने रामचंद्रिका की रचना 1601 ई. में की थी।

♣ नंददास

नंददास 16वीं शती के अंतिम चरण में विद्यमान थे। इनके विषय में भक्तमाल में लिखा है-‘चंद्रहास-अग्रज सुहृदय परम प्रेम-पथ में पगे।’ इनके काव्य के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है-‘और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया।’ इससे प्रकट होता है कि इनके काव्य का कला पक्ष महत्वपूर्ण है। इनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं-रामपंचाध्यायी, सिद्धांत पंचाध्यायी, भागवत दशम स्कंध, रुक्मिणीमंगल, रूपमंजरी, रसमंजरी, दानलीला, मानलीला आदि। इनके यश का आधार रासपंचाध्यायी है। रासपंचाध्यायी भागवत के रासपंचाध्यायी के अंश पर आधारित है। यह रोला छंद में रचित है। कृष्ण की रास लीला का वर्णन इस काव्य में कोमल एवं सानुप्रास पदावली में किया गया है, जो संगीतात्मकता से युक्त है, जैसे-

ताही छन उडुराज उदित रस-रास-सहायक,
कुंकुम-मंडित-बदल प्रिया जनु नागरि नायक।
कोमल किरन अरुन मानो बन व्यापि रही यों,
मनसिज खेल्यो फागु घुमड़ि घुरि रह्यो गुलाल ज्यों।

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अष्टछाप के शेष कवियों ने भी लीला गान के पद कहे हैं जो प्रधानतः शृंगारी हैं। राधा और कृष्ण के रूप में एवं शृंगार के साथ-साथ उनके चरित्र का गुणगान इन कवियों का विषय रहा है।

कृष्णदास (16वीं शती) वल्लभाचार्य के कृपा-पात्र थे और मंदिर के प्रधान हो गए थे। इनका रचना हुआ जुगमान चरित्र नामक ग्रंथ मिलता है। परमानंद दास (16वीं शती) के 835 पद परमानंद सागर में संकलित है। इनकी कविताएँ सरसता के कारण प्रसिद्ध हैं। कुंभनदास परमानंददास के समकालीन थे। ये अत्यंत स्वाभिमानी भक्त थे। इन्होंने फतेहपुर सीकरी के राजसम्मान से खिन्न होकर कहा था-

संतन को कहा सीकरी सो काम।

कुंभनदास का कोई ग्रंथ नहीं मिलता, फुटकल पद ही मिलते हैं। चतुर्भुजदास. कुंभनदास के पुत्र थे। इनकी तीन कृतियाँ मिलती हैं-द्वादश यश, भक्तिप्रताप, हितजू को मंगल। छीतस्वामी 16वीं शती के उत्तरार्द्ध में वर्तमान थे। इनका कोई ग्रंथ नहीं मिलता. फुटंकल पद ही मिलते हैं। गोविंद स्वामी के रचनाकाल 1543 ई. ओर 1568 ई. के बीच रहा होगा। कहा जाता है कि इनका गाना सुनने के लिए कभी-कभी तानसेन भी आते थे। इनका भी कोई ग्रंथ नहीं मिलता।

♣ मीराबाई

मीराबाई के बारे में अनेक किंवदंतियाँ गढ़ ली गई हैं। ये महाराणा सांगा की पुत्र-वधू और महाराणा कुमार भोजराज की पत्नी थीं। कहा जाता है कि विवाह के कुछ वर्षों के बाद जब इनके पति का देहांत हो गया तो ये साधु-संतों के बीच भजन-कीर्तन करने लगीं। इस पर इनके परिवार के लोग, विशेषकर, देवर राणा विक्रमादित्य बहुत रूष्ट हुए। उन्होंने इन्हें नाना प्रकार की यातनाएँ दीं। इन्हें विष तक दिया गया। खिन्न होकर इन्होंने राजकुल छोड़ दिया। इनकी मृत्यु द्वारिका में हुई।

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मीरा का सामान्य लोगों के बीच उठना-बैठना उस सामाजिक व्यवस्था को असाह्य था जिसमें नारी पति के मरने पर या तो सती हो सकती थी या घर की चहारदीवारी के भीतर वैधव्य झेलने के लिए अभिशप्त थी। मीरा को भक्त होने के लिए लोक-लाज छोड़नी पड़ी। लोक-लाज तजन की बात मीरा की कविताओं में बार-बार आती है। मीरा ने अपने इष्टदेव गिरधर नागर को जो रूप चित्रित किया है, वह अत्यंत मोहक हैं। मीरा के यहाँ विरह वेदना उनका यथार्थ है तो कृष्ण मिलन उनका स्वप्न। मीरा के जीवन के यथार्थ की प्रतिनिधि पंक्ति हैं-‘अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई।’ और उनके स्वप्न की प्रतिनिधि पंक्ति है-“सावन माँ उमग्यो म्हारो हियरा भणक सुण्या हरि आवण री।” मीरा के काव्य में मध्य कालीन नारी का जीवन बिंबित है।

मीरा भक्त कवयित्री है। उनकी व्याकुलता एवं वेदना उनकी कविता में निश्छल अभिव्यक्ति पाती है। मीरा की कविता के रूप, रस और ध्वनि के प्रभावशाली बिम्ब हैं। वे अपनी कविता में वेदना को श्रोताओं और पाठकों के अनुभव को माध्यम से संप्रेषित करती हैं ‘घायल की गति घायल जाणै और न जाणै कोय’ का यही अभिप्राय है।

मीरा के काव्य पर निर्गुण-सदुण दोनों साधनाओं का प्रभाव है। नाथ मत का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है। उन्होंने रामकथा से संबंधित कुछ गेयपद भी लिखें हैं।

♣ रसखान

इनका वृत्तांत दो सौ बाबन वैष्णवों की वार्ता में मिलता है और उससे प्रकट होता है कि ये लौकिक प्रेम से कृष्ण-प्रेम की ओर उन्मुख हुए। इनकी प्रसिद्ध कृति प्रेम वाटिका रचनाकाल 1641 ई. है। कहते हैं कि ये गोसाईं विट्ठलनाथ के शिष्य थे।

रसखान ने कृष्ण का लीलागान सवैयो में किया है। रसखान को सवैया छंद सिद्ध था। जितने सरस, प्रवाहमय सवैये रसखान के हैं, उतने शायद ही किसी अन्य हिन्दी कवि के हों। ब्रजभाषा का ऐसा सहज प्रवाह अन्यत्र बहुत कम मिलता है।

मोर पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पितांबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।
भावतों सोई मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।

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कृष्णभक्त कवियों की सुदीर्घ परंपरा है। स्वामी हरिदास, हरीराम व्यास, सुखदास, लालदास, नरोत्तमदास आदि अन्य कृष्णभक्त कवि हैं। इनमें नरोत्तमदास का सुदामाचरित अपनी मार्मिकता और सहज प्रवाह के कारण बहुत लोकप्रिय है।

♣ रहीम

सम्राट अकबर के प्रसिद्ध मनापति बैरम खाँ के पुत्र रहीम (अब्दुरहीम खान खाना) थे। इनकी गणना कृष्णभक्त कवियों में की जाती है। रहीम ने बरवै नायिका भेद भी लिखा है, जो निश्चित रूप से रीतिकाव्य की कोटि में रखा जाएगा, किन्तु रहीम को भक्त हृदय मिला था। उनके भक्तिपरक दोहे उनके व्यक्ति और रचनाकार का वास्तविक प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके मित्र तुलसी ने बरवै रामायण की रचना रहीम के बरवै काव्य से उत्साहित होकर की।

रहीम अरबा, फारसी, संस्कृत आदि कोई भाषाओं के जानकार थे। वे बहुत उदार, दानी और करुणावान थे। अंत में उनकी मुगल दरबार से नहीं पटी और जनश्रुति के अनुसार उनके अंतिम दिन तंगी में गुजरे। रहीम की अन्य रचनाएँ हैं-रहीम दोहावली या सतसई, श्रृंगार सोरठा, मदनाष्टकं, रासपंचाध्यायी। उन्होंने खेल कौतुकम् नामक ज्योतिष का ग्रंथ भी रचा है, जिसकी भाषा संस्कृति-फारसी मिश्रित है। रहीम ने तुलसी के समान अवधि और ब्रज दोनों में अधिकारपूर्वक काव्य-रचना की है।

रहीम के भक्ति और नीति के दोहे आज भी लोगों की जबान पर हैं।

♣ केशवदास

केशव ओरछा महाराजा रामसिंह के भाई इंद्रजीत सिंह के सभा-कवि थे। यहाँ इनका बहुत सम्मान था। केशवदास द्वारा रचित सात ग्रंथ मिलते हैं-कविप्रिया, रसिकप्रिया, वीरसिंह देवचरित, विज्ञान गीता, रतन बावनी और जहाँगीर-जस चंद्रिका। कविप्रिया और रसिकप्रिया काव्यशास्त्रीय पुस्तकें हैं।

केशवदास का उल्लेख रामभक्ति शाखा के प्रसंग में हो चुका है। उन्होंने ‘रामकथा’ का वर्णन रामचंद्रिका में किया है। केशव का महत्व इस बात में है कि उन्होंने पहली बार काव्यांगों।

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सम्म पर हिन्दी में विचार किया। इसके पूर्व कृपाराम, मोहनलाल मिश्र, करनेस आदि के रस, शृंगार और अलंकार पर अलग-अलग पुस्तकें लिखी थी, पर एक साथ सभी काव्यांगों का परिचय नहीं दिया था। केशव ने यही किया और इसीलिए वे हिन्दी के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। वे काव्य में अलंकार को अधिक महत्व देते थे।

केशव हिन्दी के प्रथम आचार्य हैं किन्तु रीतियों की परंपरा चिंतामणि (जन्म 1609 ई.) से चली। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ कविकुल कल्पतरू है। इस काल के अन्य प्रसिद्ध आचार्य कवि हैं भिखारीदास (18वीं शती, ग्रंथ काव्य निर्णय), तोष (1634 ई. ग्रंथ सुधानिधि), कुलपति (1670 ई. ग्रंथ रस रहस्य) सुखदेव मिश्र (1673 ई. ग्रंथ रसार्णव) आदि हैं। इनके उपजीव्य संस्कृति ग्रंथ काव्य प्रकाश, साहित्यदर्पण, रसमंजरी, चंद्रालोक और कुवलयानंद हैं।

♣ देव

देव अनेक आश्रयदाताओं के यहाँ रहे और उनकी रुचि के अनुकूल रचनाएँ की। इनके रचे ग्रंथों की संख्या काफी है, उनमें कुछ इस प्रकार हैं : भावविलास, भवानीविलास, रसविलास, सुखसागर तरंग, अष्टयाम, प्रेमचंद्रिका, काव्यरसायन।

देव रीति काल के श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। इनकी तुलना बिहारी से की गई है। देव ने भी लक्षण-ग्रंथ लिखे हैं। अतः इन्हें भी रीति काल के आचार्य कवियों की कोटि में रखी जा सकती है। किन्तु देव मूलत: आचार्य नहीं, कवि ही थे।

देव में मौलिक रचनाकार की प्रतिभा और सहृदयता प्रचुर मात्रा में थी। लोकप्रियता की दृष्टि से वे बिहारी से बहुत पीछे नहीं हैं। देव की काव्य-भूमि बिहारी से कहीं अधिक व्यापक है। इन्होंने प्रकृति के क्रियाकलाप को देखकर अनेक उत्तम रूप बाँधे हैं

डार दुम पालना बिछौना नव पल्लव के,
सुमन झिंगूला सोहै तन छवि भारी दे।
पवन झुलावै, केकी-कीर बहराबैं देव,
कोकिल हलावै-हुलसावै कर तारी दै।
पूरित पराग सों उतारो करे राई लोन,
कंज कली नायिका लतानि सिर सारी दै।
मदन महीप जू को बालक वसंत ताहि,
प्रातहि जगावत गुलाब चटकारी है।
देव में उत्कृष्ट बिंब विधान पाया जाता है।
जैसे बड़े-बड़े नैनन सों आँसू-भरि-भरि ढरि
गोरो गोरो मुख आज ओरो सो बिलानो जात।

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देव काव्य कला के कुशल कवि हैं, किन्तु चमत्कार या काव्य रूढ़ियों के आधार पर रचना करने की प्रवृत्ति उनमें बिहारी की अपेक्षा कम है। इसीलिए उनमें चमत्कृत करने की अपेक्षा रमाने की प्रवृत्ति अधिक है।

♣ भूषण

भूषण रीति काल के दो प्रसिद्ध कवियों-चिंतामणि और मतिराम के सगे भाई थे। चित्रगुट के सोलंकी राजा रूद्र ने इन्हें ‘कवि भूषण’ कहा। फिर ये इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। वास्तविक नाम कुछ और रहा होगा। ये वीर रस के कवि थे। इन्होंने रीति काल की परंपरा में एक अलंकार ग्रंथ शिवराज भूषण भी लिखा है। इनके जो ग्रंथ मिलते हैं, वे इस प्रकार हैं-शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दसक।

रीति कालीन कविता का प्रधान स्वर श्रृंगार का है। भूषण का स्वर वीरता का है। इसलिए ये रीति काल के विशिष्ट कवि हैं, लेकिन भूषण के महत्व पर विचार करते समय कुछ और बातों की ओर ध्यान जाता है। रीति काल में कुछ अन्य कवियों ने भी वीरता की कविताएँ लिखी हैं, किन्तु उनको भूषण जैसी प्रसिद्धि नहीं मिली। इसका प्रमुख कारण यह है कि काव्योत्कर्ष की दृष्टि से वे इस क्षेत्र में भूषण जैसे कवि नहीं हैं।

भूषण ने अपनी काव्य पंक्तियों में अनेक ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख किया है, जैसे-अफजल खाँ का शिवाजी द्वारा मारा जाना, दारा की औरंगजेब द्वारा हत्या, सूरत पर शिवाजी का अधिकार, खजुवा का युद्ध, शिवाजी का औरंगजेब के दरबार में जाना आदि। उनका एक प्रसिद्ध कवित्त इस प्रकार हैं-

इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर,
रावण सदंभ पर रघुकुलराज हैं।
पौन बारिवाह पर, संभु रतनिआह पर,
ज्यों सहस्त्रबाहु पर राम द्विजराज है।
दावा द्रुम दंड पर, चीता मृग झुंड पर,
भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज हैं।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यों म्लेच्छ वंस पर सेर सिवराज हैं।

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♣ मतिराम

मतिराम रीति काल के प्रसिद्ध आचार्य कवि हैं। उनके ग्रंथों के नाम हैं-छंदसार, रसराज, साहित्य सार, श्रृंगार और ललित ललाम। रासराज और ललित ललाम उनके यश के आधार ग्रंथ हैं।

मतिराम रीति काल में भाषा की प्रवाहमयता और भाव की सहजता के प्रतिमान हैं। उनकी शैली इतनी सहज है कि उनकी कविता अन्य रीति कालीन कवियों से अलग लगती है। वे रीति काल में व्याप्त चमत्कारिकता से लगभग अछूते रचनाकार हैं उनकी भाव योजना बिलकुल सीधी होती है। वे बात को घुमाकर कहने में विश्वास नहीं करते। वे काव्य रूढ़ियों का कम-से-कम प्रयोग करते हैं। लक्षण ग्रंथों के रचयिता होने के बावजूद उनके काव्य में अलंकृत पद्योजना बहुत कम मिलती है। उनकी काव्यगत सहजता का एक उदाहरण है

क्यों इन आँखिन सो निहसंक है मोहन को तन पानिप पीजै।
नेकु निहारे कलंक लगै, यही गाँव बसे कहु कैसे के जीजै॥
होत रहे मन यों, मतिराम कहू बन जाय बड़ो तप कीजै।
है वनमाल हिए लगिए अरू द्वै मुरली अधरा-रस पीजै।

♣ पद्माकर

पद्माकर का जन्म बाँदा में हुआ था। ये रीति काल के अत्यंत प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय कवि थे। ये अनेक गुणग्राहकों के द्वारा सम्मानित किए गए। सुगरा, सतारा, जयपुर, ग्वालियर के दरबारों में इनका आदर हुआ। बाँदा और अवध के नवाबों के सेना अधिकारी हिम्मत बहादुर के नाम पर इन्होंने हिम्मत बहादुर बिरूदावली लिखी। इनके द्वारा रचित कुछ अन्य ग्रंथ इस प्रकार हैं-जगविनोद, पद्माभरण, प्रबोध पचासा, राम रसायन, गंगा लहरी। जगविनोद लक्षण ग्रंथ है।

पद्माकर भी मतिराम के समान भाषा और भाव की प्रवाहमयी सहजता के कारण लोकप्रिय हैं, किन्तु पद्माकर की कविता शृंगार भक्ति और वीरता तीनों भूमियों पर समान अधिकार के साथ रस का संचार करती है। विभिन्न भावों के अनुरूप भाषा को सहज तौर पर ढाल लेने में ये सिद्ध थे। शुक्ल जी के शब्दों में, “इनकी भाषा में वह अनेकरूपता है जो एक बड़े कवि में होनी चाहिए।

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भाषा की ऐसी अनेकरूपता गोस्वामी तुलसीदास में दिखाई पड़ती है। पद्माकर के काव्य में कहीं-कहीं विदग्धता भी मिली है लेकिन वह कविता के केन्द्रीय भाव में ढल जाती है। पद्माकर में बिहारी की तरह समुचित बाह्य चेष्टाओं की योजना द्वारा आंतरिक भाव को व्यजित करने की प्रतिभा थी। इनमें चमत्कार प्रियता नहीं कि बराबर मिलती है।”

पद्माकर की वीर रस की कविताओं में भूषण की तरह ही वीरोचित ओज तो है, किन्तु भाषा व्यवस्थित बनी रहती है। पद्माकर की गंगा लहरी में एक शांति चाहने वाले मन की और गंगा के महात्म्य पर अटूट श्रद्धा दिखलाई पड़ती है। पद्माकर के काव्य में बुंदेलखंड की प्रकृति का सजीव चित्रण हुआ है। पद्माकर के काव्य की विशेषता भावों को व्यजित करने में समर्थ सजीव चित्र खींच देने में है। नीचे दिए हुए सवैए से इस कथन की पुष्टि हो जाएगी-

फागु की भीर अभरिन में गहि गोबिंदै लै गई भीतर गोरी,
भाई करी मन की पद्माकर ऊपर नाई अबीर की झोरी।
छीनि पितंबर कम्मर तें सु विदा दई मीडि कपोलन रोगी,
नैन नचाय कही मुसुकाय ‘लला फिरि आइयो खेलन होरी’।

♣ गुरु गोविंद सिंह

गुरु गोविंद सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे मध्यकालीन सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना के प्रतीक थे। वे योद्धा, संत, राजनीतिक, कवि, प्रशासक सब कुछ थे। गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित अनेक ग्रंथ बताए जाते हैं। इनकी रचनाओं के संग्रह का नाम दशम ग्रंथ है। इसमें 16 रचनाएँ संकलित हैं। इन्होंने पंजाबी, फारसी और हिन्दी (ब्रजभाषा) में काव्य रचना की है। इनका संप्रदाय देखते हुए इन्हें निर्गुण कवि होना चाहिए, किन्तु इन्होंने देवी-देवताओं ओर सगुण रूप से संबंधित रचनाएँ भी की हैं। चंडीचरित्र इनकी विशिष्ट साहित्यिक रचना है।

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इसकी शैली ओजस्विनी है। गुरु जी की रचनाओं में वीर रस प्रधान है, यद्यपि इनकी मुख्य भूमि भक्ति है। चौबीस अवतार नामक रचना में श्रृंगार का भी पर्याप्त रंग दिखलाई पड़ता है। गुरु जी काव्यरीति के मर्मज्ञ थे। रीति काल में इनका व्यक्तित्व और कृतित्व अनुपम है। हिन्दी में भक्तजनों का भक्ति काव्य तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, किन्तु वीरजनों द्वारा रचित वीर काव्य नहीं मिलता। इस दृष्टि से गुरु गोविंद सिंह के काव्य का विशिष्ट महत्त्व है-

बीरबली सरदार दयैत सु क्रोध के म्यान तै खड्ग निकारौ।
एक दयो तन चंडि प्रचंड कै दूसर के हरि के सिर झारौ।
चंडि सम्हारि तबै बलु धारि लयौ गहि नारि धरा पर मारी।
ज्यों धुबिया सरिता-तट जाइक लै पट को पट साथ पछारौ।

♣ मुंशी सदासुख लाल ‘नियाज’

मुंशी सदासुख लाल ‘नियाज’ दिल्ली के रहने वाले थे और उर्दू-फारसी के प्रसिद्ध लेखक थे। इन्होंने सुखसागर लिखा था और एक ज्ञानोपदेश वाली पुस्तक जिसका उल्लेख हो चुका है। इनकी भाषा सहज एवं प्रवाहमयी है। कथा वाचकों, पंडितों और साधु-संतों में प्रचलित शैली का प्रभाव इनकी खड़ी बोली के गद्य पर है, किन्तु इससे भाषा की सहजता पर आँच नहीं आयी है।

♣ इंशाअल्ला खाँ

इंशाअल्ला खाँ उर्दू के प्रसिद्ध कवि थे। इन्होंने उदयभान चरित या रानी केतकी की कहानी खड़ी बोली गद्य में लिखी। इनकी भाषा काफी अलंकृत, चुटीली और मुहावरेदार है। बात यह है कि उन दिनों कहानी कहने या किस्सागोई की कला काफी प्रचलित थी। इंशाअल्ला खाँ के गद्य पर इस किस्सागोई की शैली का प्रभाव है। गद्य के बीच-बीच में पद्य जैसी तुकबंदी उन दिनों के उर्दू गद्य लेखन में मिलती है। वह लल्लूलाल के यहाँ भी है और इंशाअल्ला खाँ के यहाँ भी। उदाहरण के लिए यह पंक्ति-यह कैसी चाहत जिसमें लहू बरसने लगा और अच्छी बातों को जी तरसने लगा।

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♣ सदलमिश्र

सदलमिश्र लल्लूलाल जी की तरह फोर्ट विलियम कॉलेज के लिए खड़ी बोली गद्य की पुस्तक तैयार की। इनकी पुस्तक का नाम है नासिकेतोपाख्यान। इनकी भाषा में पूरबीपन है। ये आरा (बिहार) के रहने वाले थे। इनकी भाषा व्यवहारोपयोगी है।

खड़ी बोली गद्य के इन चारों प्रारंभिक लेखकों में मुंशी सदासुखलाल ‘नियाज’ का गद्य अधिक व्यवस्थित और व्यवहारोपयोगी है। रामप्रसाद निरंजनी के भाषा योग वशिष्ठ की ही परंपरा में उनका गद्य है।

गद्य का विकास करने में ईसाई मिशनरियों का भी बहुत बड़ा हाथ है। गद्य के विकास में छापाखानों (प्रेस) की बहुत बड़ी भूमिका है ! छापाखानों के बिना इतनी अधिक संख्या में पुस्तकें मुद्रित नहीं हो सकती थी।

अंग्रेजी की शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ हिन्दी, उर्दू की भी पढ़ाई की व्यवस्था सरकार ने की। इसके लिए पुसतकों के प्रकाशन की भी व्यवस्था हुई। 1833 ई. के आसपास आगरा में स्कूल बुक सोसाइटी की स्थापना हुई, जिसने कथासार नामक पुस्तक प्रकाशित कराई। 1840 ई. में भूगोलसार और 1847 ई. में रसायन प्रकाश छपा। इस तरह हिन्दी गद्य में पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।

♣ भारतेन्दु हरिश्चंद्र

जीवन के अल्प काल में ही भारतेन्दु ने साहित्य की बहुत बड़ी सेवा की। उनकी रचनाओं की संख्या काफी है। उन्होंने साहित्य की विविध विधाओं को समृद्ध किया और अनेक विधाओं का प्रवर्तन किया। वे हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग के प्रवर्तक हैं। 18 वर्ष की आयु में ही उन्होंने बंगाल से विद्यासुंदर नाटक का हिन्दी में अनुवाद किया। 1868 ई. उन्होंने कविवचन सुधा नाम पत्रिका निकाली। इसमें साहित्यिक रचनाएँ तो होती थी, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विचार और टिप्पणियाँ भी होती थीं।

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इसी पत्रिका में उन्होंने विलायती कपड़ों के बहिष्कार की अपील और ग्राम-गीतों के संकलन की योजना प्रकाशित की थी। 1873 ई. में उन्होंने हरिश्चन्द्र मैगजीन नामक मासिक पत्रिका निकाली। इस पत्रिका का प्रकाशन कितना महत्वपूर्ण है– यह इसी से समझा जा सकता है कि स्वयं भारतेन्दु के अनुसार- हिन्दी नई चाल में ढली’ (1873 ई.)। बाद में इस पत्रिका का नाम उन्होंने हरिश्चन्द्र चंद्रिका कर दिया। 1874 ई. में उन्होंने स्त्री-शिक्षा के लिए बालाबोधिनी नामक पत्रिका निकाली। भारतेन्दु ने सबसे अधिक संख्या में नाटक लिखे और अनुवाद किया। उनके मौलिक नाटक इस प्रकार हैं-वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, चंद्रावली, विषस्य विषमौषधम्, भारत दुर्दशा, नील देवी, अंधेर नगरी, प्रेम जोगनी और सती प्रताप।

अनूदित नाटक-विद्यासुंदर, पाखंड-बिडंबन, धनंजय-विजय, कर्पूरमंजरी, मुद्राराक्षस, सत्य हरिश्चन्द्र और भारत-जननी।

बादशाह दर्पण, कश्मीर कुसुम उनके इतिहासिक ग्रंथ है। कुछ आप-बीती कुछ जग-बीती कहानी है। कविताएँ भारतेन्दु ने ब्रजभाषा में लिखी, जिनका उल्लेख यथास्थान किया गया है। भारतेन्दु ने यात्रा-वर्णन भी लिखा है। उन्होंने सुदूर देहाती क्षेत्रों की यात्रा बैलगाड़ी से की। कहते हैं कि 1865 ई. में उन्होंने जगन्नाथ पुरी की जो यात्रा की उसका उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उनका परिचय बंगाल के नए साहित्यिक आंदोलन से हुआ।

♣ प्रताप नारायण मिश्र

प्रताप नारायण मिश्र अत्यंत विनोदी कवि थे। वे ब्राह्मण नामक पत्रिका निकालते थे। उनका मनमौजीपन उनकी रचनाओं, विशेषतः निबंधों में दिखाई पड़ता है। उन्होंने कुछ गंभीर निबंध भी लिखे हैं। उन्होंने कलिकौतुक रूपक, संगीत शाकुंतल, भारत दुर्दशा, हठी हम्मीर, गोसंकट, कलिप्रभाव, जुआरी-खुआरी नाटक लिखें। उन्होंने दैनिक जीवन की घटनाओं पर और नए फैशन पर अनेक कविताएँ लिखीं। उनकी कविताओं का महत्वपूर्ण अंश वह है, जिसमें उन्होंने आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक समस्याओं का नए बोध के साथ चित्रण किया है। कविताओं के लिए आल्हा, लावनी जैसी लोक प्रचलित काव्य शैलियों का उपयोग भी किया है।

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♣ बालकृष्ण भट्ट

बालकृष्ण भट्ट जी हिन्दी प्रदीप नामक पत्र निकालते थे। वे निबंधकार, समीक्षक और नाटककार थे। उन्होंने कलिराज की सभा, रेल का विकेट खेल, बाल विवाह, चंद्रसेन आदि नाटकों की रचना की। भट्ट जी ने कुछ बंगला नाटकों का हिन्दी में अनुवाद भी किया।

♣ उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमधन’ काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु को अपना आदर्श मानते थे। वे कलात्मक एवं अलंकृत गद्य लिखते थे। आनंद कादंबिनी नाम की पत्रिका गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट।

निकालते थे। बाद में नागरी नीरद नामक पत्र भी निकाला। प्रेमधन जी निबंधकार, नाटककार, कवि एवं समीक्षक एक साथ थे। भारत सौभाग्य, प्रयाग रामगमन उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। प्रेमधन ने जीर्ण जनपद नामक एक काव्य लिखा है जिसमें ग्रामीण जीवन का यथार्थवादी चित्रण है।

♣ मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगाँव जिला झाँसी (उत्तर प्रदेश) में 3 अगस्त 1886 को हुआ था। उनके पिता रामचरणजी वैष्णव थे। वे कविता के बड़े प्रेमी थे। ‘कनकलता’ नाम से वह स्वयं भी कविताएँ लिखा करते थे। इस तरह कविता का संस्कार मैथिलीशरण गुप्तजी विरासत में अपने पिता से ही प्राप्त हो गया था। उस समय हिन्दी साहित्य में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का वर्चस्व बना हुआ था। गुप्तजी की प्रतिभा को देखकर द्विवेदीजी ने उन्हें प्रोत्साहित किया। गुप्तजी ने द्विवेदीयुगीन भावगत एवं शिल्पगत प्रवृत्तियों को आत्मसात् कर अपने काव्य को उन्हीं साँचों में ढाला। किन्तु, उनकी काव्ययात्रा स्थिर नहीं, बल्कि पर्याप्त गतिशील एवं वेगवती रही। उनमें अभियोजन की अद्भुत क्षमता थी।

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यही कारण है कि द्विवेदी-युग से छायावाद और छायावादोत्तर काल तक वे हिन्दी कविता के क्षेत्र में प्रभावशाली रूप में क्रियाशील रहे। उनका भावक्षेत्र अत्यंत व्यापक रहा है। उनमें संकीर्णता कभी नहीं दिखाई पड़ी। उनकी प्रमुख प्रबंध -काव्य-रचनाएँ हैं-साकेत, जय भारत, रंग में भंग, जयद्रथ-वध, शकुंतला, किसान, पंचवटी, सैरंध्री, हिडिंबा, युद्ध, यशोधरा, सिद्धराज, नहुष, अर्जुन और विर्सजन, काबा और कर्बला, गुरु तेगबहादुर, अजित और विष्णुप्रिया। विषय की दृष्टि से इनमें कुछ पौराणिक हैं तो कुछ ऐतिहासिक और सामाजिक।

‘स्वस्ति और संकेत’ उनकी फुटकर कविताओं का नवीनतम संग्रह है जो उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुआ है। गुप्तजी सच्चे अर्थ में भारतीय संस्कृति के कवि अर्थात् राष्ट्रकवि हैं। राम के अनन्य भक्त होते हुए भी मैथिलीशरण गुप्त धर्म के क्षेत्र में बड़े उदार रहे हैं। उनकी जिस लेखनी से ‘पंचवटी’ और ‘साकेत’ की रचना हुई, उसी से अनघ, यशोधरा और कुणालगीत की भी, उनकी जिस लेखनी ने सिक्खों की शक्ति का हमें परिचय देने के लिए गुरुकुल की गाथा गाई, उसी ने इस्लाम धर्म में चरित्र की महानता और सहनशीलता के महत्त्व को हमें समझाने के लिए ‘कर्बला’ की कहानी भी सुनाई।

इस तरह उनकी राष्ट्रीयता क्रमशः उदार होती हुई विश्व मानवतावादी होती गई है। राजनीति में गुप्तजी गाँधीजी से प्रभावित रहे हैं। करुणा के चित्रण में गुप्तजी अद्वितीय हैं। उनका काव्य कहीं भी अश्लील नहीं होने पाया है। खड़ी बोली हिन्दी के परिमार्जन और उसे काव्योपयुक्त बनाने में गुप्तजी की साधना अप्रतिम है। उन्होंने अनेक छंदों और अलंकारों का प्रयोग अपनी कविताओं में किया है। इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दी काव्य के निर्माता और प्रयोक्ता-दोनों ही रूपों में गुप्तजी का महत्वपूर्ण स्थान है।

♣ जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई. में वाराणसी में हुआ। उनका परिवार शैव था किन्तु उनके यहाँ सुरती बनाने का काम चलता था। इसलिए आज तक उस परिवार को ‘सुंघनी साहु का परिवार’ कहा जाता है। दुर्भाग्यवश प्रसादजी की बाल्यावस्था में ही उनके माता-पिता स्वर्गवासी हो गए। परिवार का भारत प्रसादजी पर आ जाने के कारण आठवें वर्ग तक की ही शिक्षा उन्हें मिल सकी। किन्तु उनके पुस्तकालय और उनकी रचनाओं से उनके अध्ययन की व्यापकता और गहनता का पता चलता है। उन्होंने गद्य-पद्य-दोनों में समान दक्षता के साथ रचनाएँ की हैं।

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क्या कविता और क्या नाटक, क्या कथा और क्या निबंध-सभी विधाओं में हमें उनकी अप्रतिम प्रतिभा दिखाई पड़ती है। उनकी काव्य-रचनाएँ हैं-‘चित्राधार’, ‘काननकुसुम’, ‘प्रेमपथिक’, ‘करुणालय’, ‘झरना’, ‘आँसु’, ‘लहर’ और ‘कामायनी’। कामायनी उनकी कालजयी काव्यकृति . है। वे मूलतः प्रेम और सौंदर्य के कवि थे। जीवन के प्रेमविलासमय मधुर पक्ष की ओर उनकी विशेष प्रवृत्ति है जिसका प्रसार प्रियतम के संयोग-वियोगवली रहस्यभावना तक दिखाई पड़ता है।

शारीरिक प्रेम-व्यापारों और चेष्टाओं, रंगरेलियों और अठखेलियों, उनकी वेदनाजन्य कसक और टीस आदि की ओर उनकी विशेष दृष्टि रहती थी। आचार्य शुक्ल ने इस संदर्भ में लिखा है, “इसी मधुमयी प्रवृत्ति के अनुरूप प्रकृति के अनंत क्षेत्र में भी बल्लरियों के दान, कलिकाओं की मंद मुस्कान, सुमनों के मधुपात्र, मँडराते मिलिंदों के गुंजार, सौरभहर समीर की लपक-झपक, पराग-मकरंद की लूट, उषा के कपोलों पर लज्जा और लाली, आकाश और पृथ्वी के अनुरागमय परिरंभ, रजनी के आँसू से भीगे अंबरी, चंद्रमुख पर शरद्घन के सरकते अवगुंठन, मधुमास की मधुवर्षा और झूमती मादकता पर उनकी दृष्टि विशेष रूप से जमती दिखाई पड़ती है।

“प्रसादजी की प्रारंभिक कुछ कविताओं में परम्परा की छाप है। उनकी भाषा भी ब्रजभाषा है। किन्तु, अपनी काव्ययात्रा में उन्होंने तत्सम प्रधान खड़ी बोली को ही अपनी कोमल अनुभूतियों के अनुरूप सँवार लिया। उनका देहावसान राजयक्ष्मा के कारण 1937 ई. में हो गया।

♣ सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला’

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 1896 ई. में मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) जिले के महिषादल में हुआ था। उनके बचपन का नाम सूचकुमार था। अपनी पत्नी मनोहरा देवी की प्रेरणा से वे हिन्दी की ओर प्रवृत्त हुए। उनकी स्कूली शिक्षा नौवें वर्ग तक ही हुई, किन्तु स्वाध्याय के बल पर उन्होंने हिन्दी, बँगला, संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य का गहन अनुशीलन किया था। उनमें अप्रितिम काव्य-प्रतिभा थी। इसी प्रतिभा के बल पर उनकी गणना छायावाद के चार महान उन्नायकों (प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी) में होती है।

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फिर भी, वे सदा से विद्रोही और स्वच्छंद प्रवृत्ति के कवि थे। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, रेखाचित्र और आलोचनात्मक निबंध की विधाओं में महत्त्वपूर्ण रचनाएँ की हैं। उनकी पुस्तकाकार काव्य कृतियाँ हैं-परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना और गीतगुंज। इन कविता-पुस्तकों की कई कविताएँ इनके ‘राग-विराग’ में संकलित हैं। निराला ने जहाँ एक ओर शृंगारिक और भक्तिपूर्ण रचनाएँ की हैं तो दूसरी ओर पौरुष और राष्ट्रप्रेम से परिपूर्ण कविताएँ भी।

कबीर के समान ही उनमें अखंड आत्म-विश्वास, रूढ़ियों के प्रति आक्रामक भाव, क्रांतिदर्शिता, अक्खड़पन और फक्कड़पन पाया जाता है। इसलिए, उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक विषमताओं, विसंगतियों और विद्रूपताओं पर करारा व्यंग्य किया है। वस्तुतः निराला ओज और पौरुष के कवि हैं। उन्हें हिन्दी में मुक्त छंद का प्रथम प्रयोक्ता कवि कहा जाता है। यह सच है क्योंकि हिन्दी कविता में उनका पदार्पण मुक्त कविता के साथ ही हुआ था। भारतीय वेदांतदर्शन, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर का प्रभाव उनकी कविताओं में स्पष्टतः परिलक्षित होता है। एक ओर वे “तुम्हीं गाती हो अपना गान, व्यर्थ मैं पाता हूँ सम्मान” जैसी आध्यात्मिक भावभरी पंक्तियाँ लिखते हैं तो दूसरी ओर-

“विजय-वन-वल्लरी पर
सोती थी सोहाग भरी स्नेह-स्वप्न-मग्न
अमल कोमल तनु-तरुणी-जुही की कली
दृग बंद किए शिथिल पत्रांक में वासंती निशा”

जैसी शृंगारिक पंक्तियाँ भी जिनमें यौवन का उद्दाम प्रवाह तथा ऊष्मा मुखरित है। किन्तु, वस्तुतः निराला ओज और पौरुष के कवि हैं। ‘राम की शक्ति पूजा’ की निम्नलिखित ओजगुण-संपन्न और समस्त पद-शैय्या (शब्द-विन्यास) देखिए-

वारित सौमित्र भल्लपति-अगणित-मल्ल-रोध,
गर्जित-प्रलयाब्लि-क्षुब्ध-हनुमत्-केवल-प्रबोध,
उद्गीरित-वाहि-भीम-पर्वत-कपि चतुः प्रहर,
जानकी-भीरु-उर-आशाभर-रावण-संवर।
लौटे युगदल। राक्षस-पदतल पृथ्वी टलमल,
बिध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल।

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संक्षेप में, उत्कृष्ट मानवतावादी दृष्टिकोण, उत्कट राष्ट्रीय चेतना, मनोमुग्धकारिणी भंगारप्रियता तथा उच्च कोटि का बौद्धिकतायुक्त दार्शनिक चिंतन निराला के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं। कहीं-कहीं भाषा क्लिष्ट किन्तु स्निग्ध एवं मंगलमयी है। निरालाजी का स्वर्गवास 1961 ई. में हुआ।

♣ सुमित्रानंदन पंत

छायावाद के चार स्तंभों में से एक कवि सुमित्रानंदन पंत का जन्म अल्मोड़ा जिले के कोसानी नामक ग्राम में सन् 1900 ई. में हुआ था। जन्म के तुरन्त बाद माता का स्वर्गवास हो जाने के कारण बचपन मातृस्नेह से वंचित हो गया। पिता का दिया हुआ नाम था-गोसाईदत्त पंत, परन्तु बाद में पंतजी ने स्वयं अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख दिया और इसी नाम से कवि रूप में असीम प्रसिद्धि पायी।

पंतजी का जन्म तो अल्मोड़ा और कोसानी की प्राकृतिक सुषुमा की गोद में हुआ ही था, उनमें प्रकृति और सौन्दर्य के प्रति गहरी संवेदनशीलता जन्मजात थी। सातवें वर्ग से ही उनका काव्यात्मक रुझान स्पष्ट होने लगा था। वैसे पंतजी का काव्यारंभ आमतौर पर सन् 1918 ई. के बाद से ही माना जाता है, परन्तु स्वयं पंतजी ने 1907 से 1918 ई. तक के काल को अपने कवि-जीवन का आरंभिक काल माना है।

घर के धार्मिक वातावरण, बाहरी प्राकृतिक घटनाओं, और सरस्वती, अल्मोड़ा अखबार, बैंकटेश्वर सामाचार आदि पत्र-पत्रिकाओं ने पंतजी में ऐसी काव्यात्मक रूचि पैदा कर दी कि एक दिन उन्होंने हिन्दी कविता की दिशा ही बदल दी।

सन् 1918 ई. में पंतजी अपने मंझले भाई के साथ बनारस आ गए थे। बनारस के जयनारायण हाई स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने स्वाध्याय और लेखन दोनों को ऊँचाई ओर विस्तृति दी। सन् 1919 ई. में पंतजी ने बनारस से मैट्रिक पास कर म्योर कॉलेज प्रयाग में नामांकन कराया। लेकिन सन् 1912 के सत्याग्रह आंदोलन में बड़े भाई के कहने पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया।

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पंतजी स्वभाव से ही कवि हृदय जीव थे। कॉलेज छोड़ने के बावजूद अपनी स्वाभाविक सुकुमारता के चलते वे सक्रिय राजनीति में भाग तो नहीं ले सके, किन्तु इसका लाभ स्वाध्याय और काव्य-सृजन में अवश्य उठाया। उनके हिन्दी काव्यगत में प्रवेश के साथ ही छायावाद का आरंभ होता है। उसके चार प्रमुख स्तंभों में एक प्रमुख स्तंभ उन्हें भी माना जाता है।

पंतजी के कवि-जीवन में अनेक मोड़ आते रहे हैं, पर उनके वास्तविक जीवन में विशेष जटिल तथा निर्णायक मोड़ प्रायः नहीं आए हैं। स्वभाव से सुकुमार पंतजी शारीरिक स्तर पर अत्यंत कोमल गात वाले व्यक्ति थे। वे आजन्म कुँवारे रहे। ऐसा कहा जाता है कि कवि सम्मेलनों में जब वे अपनी कविताओं का पाठ करते थे तो स्रोताओं में मुग्धता की स्थिति बन जाती थी।

पंतजी सन् 1950 ई. में ऑल इंडिया रेडियो के परामर्शदाता बने थे, जहाँ लगभग सात वर्षों तक रहे। लेकिन मूलरूप से वे एक मुक्त मन कवि थे। लगभग सन् 1920 ई. से ही काव्य रचना आरंभ कर सन् 1964 ई. (लोकायतन) तक हिन्दी कविता के भंडार को अपनी रचनाओं से भरते रहे। उनके ‘कला और बूढा चाँद’ तथा ‘चिदंबरा’ नाम कविता-संग्रहों पर क्रमशः साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिले थे।

♣ महादेवी वर्मा

छायावाद के चार महान कवि हैं-प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी जिनमें महादेवी का जन्म 1907 ई. में हुआ था। इनमें संबंध में शंभुनाथ सिंह ने लिखा है-“महादेवी छायावाद के कवियों में औरों से भिन्न अपना एक विशिष्ट और निराला स्थान रखती हैं। इस विशिष्टता के दो कारण हैं। एक तो उनका कोमल-हृदय नारी होना, दूसरा अंग्रेजी और बंगला के रोमांटिक और रहस्यवादी काव्य से प्रभावित होना।

इन दोनों कारणों से इन्हें एक ओर तो अपने आध्यात्मिक प्रियतम को पुरुष मानकर स्वाभाविक रूप में अपनी स्त्रीजनोचित प्रणयानुभूतियों को निवेदित करने की सुविधा मिली, दूसरी ओर प्राचीन भारतीय साहित्य और दर्शन तथा संत-युग के रहस्यवादी काव्य के अध्ययन और दर्शन तथा अपने पूर्ववर्ती तथा समकालीन छायावादी कवियों के काव्य से निकट परिचय होने के फलस्वरूप उनकी काव्याभिव्यंजना और बौद्धिक चेतना शत-प्रतिशत भारतीय परंपरा के अनुरूप बनी रही।

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“इसीलिए, अव्यक्त प्रियतम की उनकी रहस्यमयी अनुभूतियाँ निर्गुणियों की अनुभूति के समीप दिखाई पड़ती हैं। अलौकिक प्रियतम के प्रति गूढ और तीव्र विरहानुभूति के कारण वे ‘आधुनिक मीरा’ कही जाती हैं। उन्होंने बौद्ध दर्शन का गहन अध्ययन किया था और उसके दुःखवाद से वे बहुत प्रभावित थीं। इसीलिए, उन्होंने लिखा है-“मुझे दुःख के दोनों रूप प्रिय हैं, एक वह जो मनुष्य के संवेदनशील हृदय को सारे संसार के एक अविच्छन्न बंधनों में बाँध देता है और दूसरा वह जो काल और सीमा के बंधन में पड़े हुए असीम चेतन का क्रंदन है।

“सच्चाई यह है कि उनके काव्य में दूसरे प्रकार का दुःख ही अधिक मुखरित सुनाई पड़ता है। चाहे जो हो, वेदनामयी अनुभूतियों गीतात्मक अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिन्दी की आधुनिक कविता में महादेवी सचमुच अप्रतिम हैं। इसीलिए, इस संदर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है-“गीत लिखने में जैसी सफलता महादेवीजी को हुई वैसी और किसी को नहीं। न तो भाषा का ऐसा स्निग्ध प्रांजल प्रवाह और कहीं मिलता है, न हृदय की ऐसी भावभंगी। जगह-जगह ऐसी ढली हुई और अनूठी व्यंजना से भरी हुई पदावली मिलती है कि हृदय खिल उठता है।” महादेवी का निधन 1987 ई. में हुआ।

♣ रामधारी सिंह ‘दिनकर’

हिन्दी के स्वनामधन्य कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म मुंगेर (वर्तमान बेगूसराय) (बिहार) के सिमरिया गाँव में 1908 ई. में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव में पाने के बाद उन्होंने 1928 ई. में रेलवे उच्च विद्यालय, मोकामा से मैट्रिक की परीक्षा पास की। अपनी उच्चतर शिक्षा के लिए वे पटना आए और 1932 ई. में पटना कॉलेज से बी. ए. ऑनर्स (इतिहास) किया। उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं-

जनसंपर्क विभाग में सब-रजिस्ट्रार (1934-43 ई.), उपनिवेशक (1947-50 ई.) लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर (बिहार) में स्नातकोत्तर हिन्दी-विभागाध्यक्ष (1952-58 ई.), राष्ट्रभाषा आयोग, संगीत नाटक अकादमी और आकाशवाणी की परामर्शदात्री समिति के सदस्य, पद्मभूषण (1959 ई.) भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति (1964 ई.) इत्यादि। उनका निधन मद्रास के एक अस्पताल में 1974 ई. में हो गया।

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दिनकरजी की प्रकाशित काव्यकृतियाँ हैं-प्राणभंग, रेणुका, हुंकार, रसवंती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, नीलकुसुम, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, कोयला और कवित्व, द्वंद्व गीत, सामधेनी, बापू, इतिहास के आँसू, दिल्ली, नीम के पत्ते, सीपी. और शंख, नए सुभाषित, मृत्तितिलक और आत्मा की आँखें।

दिनकर की काव्यगत विशेषताओं को रेखांकित करते हुए डॉ. विश्वंभर मानव ने लिखा है कि दिनकर के काव्य की पहली विशेषता है-ओज। यह ओज राष्ट्रीय चेतना और मानवता के उद्धार की भावना से युक्त होकर स्पृहणीय बन गया है। इनकी प्रारंभिक कृतियाँ ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ हैं जिनमें समय की पुकार है। इन दो कृतियों ने वस्तुतः राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों मे पांचजन्य फूंकने का काम किया। वस्तुतः दिनकर जनकवि हैं। उनके ओज का स्वाभाविक पर्यवसान गाँधी-दर्शन में हुआ जिसका सुपरिणाम ‘बापू’ रचना है।

परशुराम की प्रतीक्षा’ की वीररसात्मक कविताएँ भारत पर चीनी आक्रमण के समय लिखी गई थीं। देशभक्ति से भरी इन कविताओं ने पाठकों में ओज और उत्साह भर दिया था। दिनकर के काव्य की दूसरी विशेषता कोमलता है। जिसका एक छोर ‘रसवंती’ में और दूसरा ‘उर्वशी’ में दिखाई पड़ता है। रसवंती में यौवन, सौंदर्य और विरह-व्यथापूर्ण सुंदर-सुंदर गीत हैं। वस्तुतः दिनकर की अक्षय काव्यकीर्ति का आधार उनकी दो कृतियाँ हैं-कुरुक्षेत्र और उर्वशी। ‘कुरुक्षेत्र’ में युद्ध की भयंकर समस्या का विवेचन-विश्लेषण है। दिनकर ने अपने इस चिंतन के लिए महाभारत के एक प्रसंग को चुना है।

‘कुरुक्षेत्र’ का वास्तविक महत्त्व सीमित कथानक के भीतर देशकालातीत विस्तृत समस्या पर चिंतन और उसका समाधान है। उर्वशी गाँच अंकोंवाला एक लंबा काव्य-रूपक है। इसका केन्द्रीय भाव प्रेम है। शृंगार की ऐसी पूर्ण और रसमयी अभिव्यक्ति अन्यत्र दुर्लभ है। यह समर्थ प्राणियों का प्रेम है। पुरुरवा और उर्वशी का प्रणय-व्यापार प्रकृति के रम्य वातावरण में चलता है। इस प्रेम की विशेषता यह है कि यह केवल शरीर तक सीमित न रहकर मन और आत्मा के उत्तुंग शिखरों का भी स्पर्श करता चलता है। सचमुच नर और नारी के संयोग के ये क्षण अपनी पवित्रता, चित्रमयता और रसात्मकता में अनुपम हैं।

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समग्रतः दिनकर की कविता हृदय के तारों को झंकृत करती है। उसमें भारतीय संस्कृति और ‘ सभ्यता का स्वर है। अतीत को देखकर उसे वर्तमान में उतार देना कवि-प्रतिभा का प्रमाण है। अंतर्वेदना के अंकन में दिनकर सचमुच अप्रतिम हैं। उनका देहावसान 1974 ई. में हुआ।

♣ नागार्जुन

कविवर बाबा नागार्जुन का जन्म सन् 1911 ई. में हुआ था। ये दरभंगा जिला के तरौनी ग्राम में साहित्य साधना में कार्यरत रहे हैं। छायावादी काल से साहित्यिक प्रवृत्तियों की एक विशिष्ट भंगिमा लेकर मंच पर उदित हुए जिस कवि को पाठकों ने देर से पहचाना, आज हम उसे ही ‘नागार्जुन’ नाम से पुकारते हैं। इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, पाली और मैथिली साहित्यिक मंच से साहित्य-सृजन का कार्य किया।

आधुनिक हिन्दी साहित्यों में नागार्जुन महत्तर क्रांतिदर्शी कवि के रूप में सर्वाधिक विख्यात है। उनके द्वारा अनेक भाषाओं को मौलिक साहित्य प्राप्त हो चुका है। हिन्दी काव्यधारा में मौलिक ग्रंथों की सूची युगधारा, शपथ, प्रेत का बयान, खून और शोले, चनाजोर गरम आदि हैं। मैथिली में चित्रा और विशाखा से सभी परिचित हैं। पारो, बलचनमा, नवतुरिया जहाँ इनके मैथिली उपन्यास हैं, वहाँ हिन्दी में भी रतिनाथ की चाची, नई पौधा, बाबा बटसेरनाथ, बरुण के बेटे, दुशमोचन, कुभीपाक आदि सामने आ चुके हैं।

‘धर्मालोक शतकम्’ सिंहली लिपी में संस्कृत का एक काव्य-ग्रंथ है। देश दशकम्’, ‘कृषक-दशकम्’, ‘श्रमिक दशकम्’, आदि में इनकी संस्कृत कविताएँ प्रकाशित हैं। अपने साहित्य के माध्यम से उन्होंने नारी की मार्मिक कहानी, समाज की अन्धता, स्याह सफेद चेहरों के रंग के प्रति तीखे व्यंग्य की झड़ी और ‘कुंभीपाक’ बदलते चरण के साथ इन्होंने अपना स्वर मिलाया, साथ ही सत्य के वाचन के साथ इनकलाब के नारों को संगति दी है। यही वे साधक हैं जिसके व्यक्तित्व और साहित्य में कोई भेद नहीं लक्षित होता और उनके कवि-व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है।

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बाबा नागार्जुन अत्याधुनिक युग के क्रांतिदर्शी महाकवि हैं। संस्कृत, हिन्दी, पाली और मैथिली साहित्य में गम्भीर स्वाध्याय से उन्होंने मौलिकता की मुहर लगायी है। मौलिकता की मुहर लगा देने को पाठक-संसार अमरत्व के विशेषण से विभूषित कर देता है।

नागार्जुन गद्य और पद्य दोनों में समान गति से लिखने वाले साहित्यकार हैं। वे जितने प्रसिद्ध कवि हैं उतने ही विख्यात आंचलिक उपन्यासकार भी हैं। ‘नई पौधा’, बाबा बटेसर नाथ’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘हरिक जयंती’ और ‘जमुनिया’ उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं जिनमें मिथिला का जीवन कदम-कदम पर साकार हो उठा है।

उनके कविता संग्रह में ‘युगधारा’, ‘प्यासी पथराई आँखें, ‘हजार-हजार बाँहों वाली’, ‘तालाब की मछलियाँ’, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने’, ‘रत्नगर्भ’, ‘ऐसे भी हम क्या ऐसे भी तुम क्या’, ‘सतरंगे पंखों वाली’, ‘तुमने कहा था’, ‘पुराने जूतियों का कोस’, ‘हरिजन गाथा’, और ‘भस्मांकुर’ .(खण्डकाव्य) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

नागार्जुन क्रांतिकारी विचारधारा के कवि हैं। इनकी साहित्य तथा राजनीति में समान रुचि तथा गति है। वे भारत की जनता और माटी से जुड़े कवि हैं। उनकी संवेदनशीलता में कबीर की-सी सहजता है। उनकी कविता में कबीर तथा भारतेन्दु की-सी व्यंग्य-भंगिमा है। बाबा नागार्जुन का निधन सन् 1989 में हुआ।

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Bihar Board Class 11th Hindi व्याकरण समास

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Bihar Board Class 11th Hindi व्याकरण समास

 Bihar Board Class 11th Hindi व्याकरण समास

1. समास की परिभाषा देकर उसको सोदाहरण समझाएँ।
‘समास’ का धातुगत अर्थ है – संक्षेप में होना। दो या दो से अधिक सार्थक शब्दों का परस्पर संबंध बतानेवाले शब्दांशों अथवा प्रत्ययों का लोप हो जाने पर उन दो या दो से अधिक शब्दों के मिल जाने से जो एक स्वतंत्र शब्द बनता है उस शब्द को ‘सामासिक’ शब्द कहते हैं और इस रूप में होने की क्रिया को ‘समास’ कहते हैं।

उदाहरण के लिए एक शब्द – समूह लें – ‘विद्या के लिए आलय’ इनमें दो पद आए हैं – ‘विद्या’ और ‘आलय’। इन दोनों के बीच का संबंध बतानेवाला शब्द या प्रत्यय है – के लिए। इसका लोप हो जाने पर दोनों के मेल से एक शब्द बन जाता है – विद्यालय। यह समस्त पद हुआ और ऐसा होने की क्रिया ही ‘समास’ है।

2. ‘संधि’ और ‘समास’ के बीच क्या अंतर है? सोदाहरण समझाएँ।

 Bihar Board Class 11th Hindi व्याकरण समास

संधि और समास दोनों किसी भाषा में शब्द – रचना से ही संबंध रखते हैं, पर दोनों में निम्नांकित अंतर हैं।

  1. संधि में दो वर्णों का योग होता है जबकि समास में दो शब्दों का।
  2. समास में पदों के बीच उनके परस्पर संबंध बतानेवाले प्रत्ययों का लोप हो जाता है जबकि संधि में अत्यंत समीप आ गए दो वर्गों के बीच मेल, लोप या कोई नया विकार उत्पन्न होता है।
  3. संधि में तोड़कर दिखाए जानेवाले वर्ण – विकार को ‘विच्छेद’ कहते हैं, जबकि समास में तोड़कर दिखाए जानेवाले प्रत्यय – युक्त शब्दों को ‘विग्रह’ कहते हैं। उदाहरण के लिए ‘पीताम्बर’ शब्द को लें। ‘संधि’ और ‘समास’ को इस प्रकार दिखाया जाएगा – संधि – पीताम्बर = पीत + अंबर। समास – पीताम्बर = पीत (वर्ण) है जिसका अंबर, वह (विष्णु या श्रीकृष्ण)।
  4. ‘संधि’ केवल तत्सम (संस्कृत के मूल) शब्दों में ही होती है जबकि ‘समास’ संस्कृत तत्सम, हिन्दी, उर्दू, सभी प्रकार के पदों में।

3.समास के भेदों का सोदाहरण परिचय दें।
संस्कृत भाषा में समास की बड़ी महिमा है। इसलिए इसके भेदोपभेद भी संस्कृत में ही विस्तार से मिलते हैं, जो हिन्दी भाषा की प्रकृति के न तो अनुकूल हैं और न अपेक्षित ही। व्यावहारिक दृष्टि से हिन्दी में समास के निम्नांकित भेद प्रचलित एवं मान्य हैं।

  • अव्ययीभाव समास – यथाशक्ति, प्रतिदिन
  • तत्पुरुष समास – आशातीत, आचरकुशल
  • बहुव्रीहि समास – पीताम्बर, पंकज
  • कर्मधारय समास – कमलनयन, घनश्याम
  • द्विगु समास – त्रिलोकी, नवरत्न
  • द्वन्द्व समास – माता – पिता, लोटा – डोरी
  • नञ् समास – अनपढ़, अनादि
  • मध्यमपदलोपी समास – दहीबड़ा, सिंहासन

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4. ‘समास’ में “पूर्वपद’ और ‘उत्तरपद’ से क्या तात्पर्य है?
प्रायः दो शब्दों (कभी – कभी दो से अधिक भी) के मिलकर एक शब्द होने को ‘समास’ कहते हैं और नए बने शब्द को समस्त पद। एक समस्त पद में आनेवाले पहले (पूर्व) शब्द को ‘पूर्वपद’ कहते हैं और बाद (उत्तर) आनेवाले शब्द को ‘उत्तरपद’। उदाहरण के लिए, एक शब्द लें – ‘विद्यालय’ जो विद्या + आलय से बना है; इसमें ‘विद्या’ पूर्वपद है और ‘आलय’ उत्तरपद।

5. ‘अव्ययीभाव समास से क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।
अव्ययीभाव समास – इसमें पूर्वपद की प्रधानता होती है और वह निश्चित रूप से अव्यय होता है। उदाहरण – यथाशक्ति = यथा + शक्ति। इसमें पूर्वपद ‘यथा’ प्रधान है और यह निश्चित रूप से अव्यय है। इसी तरह अन्य उदाहरण भी होंगे।

6. ‘तत्पुरुष’ समास से क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएं।
तत्पुरुष समास – इसमें उत्तरपद की प्रधानता होती है और इसमें सामान्यतया पूर्वपद विशेषण और उत्तरपद विशेष्य होता है। उदाहरण – राजकुमार = राजा का कुमार। इसमें उत्तरपद ‘कुमार” प्रधान है और ‘राजा’ इसकी विशेषता बताता है। इसी तरह अन्य उदाहरण भी होंगे।

7. ‘बहुव्रीहि समास से क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।
बहुव्रीहि समास – इसमें आनेवाला पूर्वपद एवं उत्तरपद दोनों की अप्रधान (गौण) होते हैं और इन दोनों पदों के अर्थों के मेल से सामने आनेवाला कोई तीसरा ही अर्थ प्रधान होता है।

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उदाहरण–

  • पीताम्बर = पीत + अंबर।

पूर्वपद ‘पीत’ का अर्थ है ‘पीला’ और उत्तरपद ‘अंबर’ का अर्थ है ‘कपड़ा’, पर ये दोनों अर्थ गौण हैं और इन दोनों के मिलने से सामने आनेवाला एक तीसरा ही अर्थ, ‘पीले वस्त्र धारण करनेवाले विष्णु या श्रीकृष्ण’, प्रधान हो जाता है। इसी तरह अन्य उदाहरण भी होंगे।

8. ‘कर्मधारय समास से क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।
कर्मधारय समास – इसमें पूर्वपद एवं उत्तरपद के बीच विशेष्य – विशेषण संबंध होता है। इसमें दोनों पद कर्ता कारक में होते हैं और इनके लिंग – वचन समान होते हैं। उदाहरण – कमलनयन = कमल (पूर्वपद विशेषण) के समान नयन (उत्तरपद)। इसी तरह अन्य उदाहरण भी होंगे।

9. ‘द्विगु समास से क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।।।
द्विगु समास – इसमें पूर्वपद निश्चित रूप से संख्यावाचक होता है। उदाहरण – नवरत्न = नव (नौ) रत्नों का समूह। इनमें पूर्वपद ‘नव’ (नौ) संख्यावाचक है। इसी तरह अन्य उदाहरण भी होंगे।

10. ‘द्वन्द्व’ समास से आप क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।
द्वन्द्व समास – इसमें पूर्वपद और उत्तरपद दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण होते हैं। उदाहरण – माता – पिता। इस ‘माता – पिता’ समस्पद में ‘माता’ पूर्वपद है और ‘पिता’ उत्तरपद। ये दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इसी तरह अन्य उदाहरण होंगे।

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11. ‘न’ समास से आप क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।
न समास – इसमें पूर्वपद अनिवार्य रूप से ‘न’ या ‘नहीं’ का अर्थ रखनेवाला (निषेधवाचक) होता है और उत्तरपद अर्थ की प्रधानता रखनेवाला होता है। उदाहरण – अनपढ़। इस ‘अनपढ़ शब्द में दो पद हैं – अन (निषेधवाचक पूर्वपद) + पढ़ (पढ़ा हुआ) = नहीं पढ़ा – लिखा। इसी प्रकार अन्य उदाहरण होंगे।

12. ‘मध्यमपदलोपी’ समास से आप क्या समझते हैं? सोदाहरण बताएँ।
मध्यमपदलोपी समास – यह समास स्वतंत्र भेद – जैसा होकर भी तत्पुरुष समास का एक प्रकार है। इसमें पूर्वपद और उत्तरपद के बीच आए पूरक शब्दों का लोप हो जाता है। उदाहरण – दहीबड़ा = दही (में फूला हुआ) बड़ा। यहाँ में फूला हुआ’ शब्दों का लोप हो जाना स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है।

स्मरणीय : प्रमुख समास – पदों की सविग्रह तालिका

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1. ‘संधि’ की परिभाषा देते हुए उसके भेदों का सोदाहरण परिचय दीजिए।

दो अक्षरों की अत्यंत समीपता के कारण उनके मेल से जो विकार उत्पन्न होता है उसे संधि कहते हैं। जैसे – देव+अर्चन = देवार्चन में ‘अ’ [‘व’ का अ] और ‘अ’ [अर्चन का आदि अक्षर] मिलकर ‘आ’ हो गए हैं और यह ‘संधि’ का एक रूप है।

संधि के तीन भेद माने जाते हैं – स्वर – संधि, व्यञ्जन – संधि और विसर्ग – संधि। स्वर – संधि में दो स्वर – वर्गों के बीच संधि होती है। जैसे-

  • देव + आलय = देवालय
  • मत + ऐक्य = मतैक्य
  • सत्य + आग्रह = सत्याग्रह
  • महा + औषधि = महौषधि

व्यञ्जन – संधि में एक व्यञ्जन + एक स्वर अथवा एक व्यञ्जन + एक व्यञ्जन वर्ण के बीच संधि होती है। जैसे

  • दिक् + अंबर = दिगंबर
  • सत् + जन = सज्जन
  • वाक् + ईश = वागीश
  • उत् + डयन = उड्डयन

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विसर्ग – संधि में विसर्ग तथा स्वर वर्ण अथवा व्यञ्जन वर्ण के बीच संधि होती है। जैसे

  • निः + चय = निश्चय
  • निः + फल = निष्फल
  • निः + छल = निश्छल
  • प्रातः + काल = प्रात:काल
  • दुः + कर्म = दुष्कर्म
  • अंतः + करण = अंत:करण

संधि के सामान्य नियम

2. स्वर – संधि के नियमों का सोदाहरण परिचय दीजिए।
‘स्वर – संधि’ में दो स्वर – वर्गों के बीच संधि होती है। इसके प्रमुख नियम सोदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं।

[i] दो सवर्ण स्वर मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। यदि ‘अ’, ‘आ’, ‘इ’, ‘ई’, ‘उ’, ‘ऊ’ और ‘ऋ’ के बाद क्रमशः वे ही ह्रस्व या दीर्घ स्वर आएँ तो दोनो मिलकर क्रमशः ‘आ’, ‘ई’, ‘ऊ’ और ‘ऋ’ हो जाते हैं। जैसे-

  • अ + अ = आ
  • अन्न + अभाव = अन्नाभाव
  • आ + अ = आ
  • तथा + अपि तथापि
  • गिरि + इन्द्र = गिरीन्द्र
  • गिरि + ईश = गिरीश
  • उ + उ = ऊ
  • पृथ्वी + ईश = पृथ्वीश
  • उ + उ = ऊ
  • भानु + उदय = भानूदय
  • ऋ + ऋ =ऋ
  • पितृ + ऋण = पितृण

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[ii] यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘इ’ या ‘ई’, ‘उ’ या ‘ऊ’ और ‘ऋ’ आए तो दोनों मिलकर क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’ ओर ‘अर्’ हो जाते हैं। जैसे-

  • अ + इ = ए
  • देव + इन्द्र = देवेन्द्र
  • आ + इ =ए
  • यथा + इष्ट = यथेष्ट

[ii] यदि ‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’ या ‘ऐ’ आए तो दोनों स्थान में ‘ऐ’ तथा ‘ओ’ या ‘औ’ आए तो दोनों के स्थान में ‘औ’ हो जाता है। जैसे-

  • अ + ए = ऐ
  • एक + एक = एकैक
  • सदा + एव = सदैव
  • परम + ओजस्वी = परमौजस्वी
  • अ + औ
  • परम + औषधि = परमौषधि

[iv] यदि ‘इ’, ‘ई’, ‘ऊ’ और ‘ऋ’ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो ‘इ – ई’ का ‘य’, ‘उ – ऊ’ का ‘व्’ और ‘ऋ’ का ‘र’ हो जाता है। जैसे-

  • इ + अ
  • यदि + अपि = यद्यपि
  • उ + अ
  • अनु + अय = अन्बय
  • ऋ + आ
  • पितृ + आदेश = पित्रादेश

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[v] यदि ‘ए’, ‘ऐ’, ‘ओ’, ‘औ’ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो [क] ‘ए’ का ‘अय्’ [ख] ‘ऐ’ का ‘आय’ [ग] ‘ओ’ का ‘अ’ और [घ] ‘औ’ का ‘आ’ हो जाता है। जैसे-
[क] ने + अन = नयन
[ग] पो + अन = पवन
[ख] नै + अक = नायक
[घ] पौ + अन = पावन

3. ‘व्यञ्जन – संधि’ के नियमों का सोदाहरण परिचय दीजिए।
व्यञ्जन – संधि में एक व्यञ्जन + एक स्वर अथवा एक व्यञ्जन + एक व्यञ्जन के बीच संधि होती है। इसके प्रमुख नियम सोदाहरण नीचे दिए जाते हैं।
[vi] यदि ‘क’, ‘च’, ‘त’, ‘ट्’ के बाद किसी वर्ग का तृतीय या चतुर्थ वर्ण आए या य, र, ल, व या कोई स्वर आए तो ‘क्’, ‘च’, ‘ट्’, ‘त्’, ‘प्’ के स्थान में अपने ही वर्ग का तीसरा वर्ण हो जाता है। जैसे-

  • दिक् + गज = दिग्गज
  • अच् + अंत = अजंत
  • सत् + वाणी = सवाणी
  • षट् + दर्शन = षड्दर्शन

[ii] यदि ‘क’, ‘च’, ‘ट्’, ‘त्’, ‘प’ के बाद ‘न’ या ‘म’ आए तो ‘क्’, ‘च’, ‘ट् , ‘प्’ अपने ही वर्ग का पंचम वर्ण हो जाता है। जैसे –

  • वाक् + मय = वाङ्मय
  • षट् + मास = षण्मास
  • अप् + मय = अम्मय
  • उत् + नति = उन्नति

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[iii] यदि ‘म्’ के बाद कोई स्पर्श व्यञ्जन – वर्ण आए तो ‘म्’ का अनुस्वार या बादवाले वर्ण के वर्ग का पंचम वर्ण हो जाता है। जैसे-

  • अहम् + कार = अहंकार, अहङ्कार
  • सम् + गम = संगम, सङ्गम
  • किम् + चित् = किंचित्, किञ्चित्
  • पम् + चम = पंचम, पञ्चम

[iv] यदि त – द् के बाद ‘ल’ वर्ण रहे तो त् – ‘ल’ में बदल जाते हैं और ‘न्’ के बाद ‘ल’ रहे तो ‘न’ का अनुनासिक के साथ ‘ल’ हो जाता है। जैसे-

  • त् + ल
  • उत् + लास उल्लास
  • न् + छ।
  • महान् + लाभ = महाँल्लाभ

[v] सकार और तवर्ग का श्याकार और चवर्ग तथा षकार और टवर्ग के योग में षकार और टवर्ग हो जाता है। जैसे-

  • प् + त
  • द्रष् + ता = द्रष्टा।
  • महत् + छत्र = महच्छत्र

[vi] यदि वर्गों के अंतिम वर्गों को छोड़ शेष वर्णों के बाद ‘ह’ आए तो ‘ह’ पूर्व वर्ण के वर्ग का चतुर्थ वर्ण हो जाता है ओर ‘ह’ के पूर्ववाला वर्ण अपने वर्ग का तृतीय वर्ण। जैसे-

  • उत् + हत = उद्धत
  • उत् + हार = उद्धार
  • वाक् + हरि = वाग्घरि
  • उत् + हरण = उद्धरण

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[vii] ह्रस्व स्वर के बाद ‘छ’ हो तो ‘छ’ के पहले ‘च’ वर्ण जुड़ जाता है। दीर्घ स्वर के बाद ‘छ’ होने पर ऐसा विकल्प से होता है। जैसे-

  • परि + छेद = परिच्छेद
  • शाला + छादन = शालाच्छादन

4. ‘विसर्ग – संधि’ के नियमों का सोदाहरण परिचय दीजिए।
विसर्ग – संधि में विसर्ग तथा स्वर – वर्ण अथवा विसर्ग तथा व्यञ्जन – वर्ण के बीच संधि होती है। इस विसर्ग – संधि के नियमों का सोदाहरण परिचय नीचे दिया जा रहा है
[i] यदि विसर्ग के बाद ‘च – छ’ हो तो विसर्ग का ‘श’, ‘ट – ठ’ हो तो तो ‘ए’ और ‘त – थ’ हो तो ‘स’ हो जाता है। जैसे-

  • : + च
  • निः + चय = निश्चय

[ii] यदि विसर्ग के पहले इकार या उकार आए और विसर्ग के बाद का वर्ण क, ख, प, फ हो तो विसर्ग का ‘ए’ हो जाता है। जैसे-

  • निः + कपट = निष्कपट
  • निः + फल = निष्फल
  • निः + कारण = निष्कारण
  • निः + पाप = निष्पाप

[iii] यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ हो और परे क, ख, प, फ में कोई वर्ण हो तो विसर्ग ज्यों – का – त्यों रहता है। जैसे-

  • प्रातः + काल = प्रात:काल
  • पयः + पान = पयःपान

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[iv] यदि ‘इ’ – ‘उ’ के बाद विसर्ग हो और इसके बाद ‘र’ आए तो ‘इ’ – ‘उ’ का ‘ई’ – ऊ’ हो जाता है और विसर्ग लुप्त हो जाता है। जैसे-

  • निः + रव = नीरव
  • निः + रस = नीरस
  • निः + रोग = नीरोग
  • दुः + राज = दूराज

[v] यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ और ‘आ’ को छोड़कर कोई दूसरा स्वर आए और विसर्ग के बाद कोई दूसरा स्वर हो या किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ या पंचम वर्ण हो अथवा य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान में ‘र’ हो जाता है। जैसे-

  • निः + उपाय = निरुपाय
  • निः + झर = निर्झर
  • निः + जल =निर्जल
  • निः + धन =निर्धन

[vi] यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ स्वर आए और उसके बाद वर्ग का तृतीय, चतर्थ या पंचम वर्ण आए अथवा य, र, ल, व, ह रहे तो विसर्ग का ‘उ’ हो जाता है और यह ‘उ’
अपने पूर्ववर्ती ‘अ’ से मिलकर गुणसंधि द्वारा ‘ओ’ हो जाता है। जैसे-

  • तेजः + मय = तेजोमय
  • पयः + धर = पयोधर
  • पयः + द = पयोद
  • पुरः + हित = पुरोहित
  • मनः + रथ = मनोरथ
  • मनः + भाव = मनोभाव

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[vii] यदि विसर्ग के आगे – पीछे ‘अ’ स्वर हो तो पहला. ‘अ’ और विसर्ग मिलकर छठे नियम की तरह ‘ओकार’ हो जाता है ओर बादवाले ‘अ’ का लोप होकर उसके स्थान में
लुप्ताकार [ऽ] का चिह्न लग जाता है। जैसे-
प्रथमः + अध्यायः = प्रथमोऽध्यायः

लेकिन, विसर्ग के बाद ‘अ’ के सिवा दूसरा स्वर आए तो यह नियम लागू नहीं होगा, बल्कि विसर्ग का लोप हो जाएगा। जैसे-
अत: + एव = अतएव

स्मरणीय : प्रमुख शब्दों की संधि – तालिका

अन्वय = अनु + अय
अंत:पुर = अंतः + पुर
अत्यधिक = अति + अधिक
अधीश्वर = अधि + ईश्वर
अन्योन्याश्रय = अन्यः + आश्रय
अभीष्ट = अभि + इष्ट
अत्याचार अति + आचार
अन्यान्य = अन्य + अन्य
अतएव = अतः + एव

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अधोगति अधः + गति
आशीर्वाद आशी: + वाद
आकृष्ट = आकृष् + त
आशीर्वचन = आशी: + वचन।
अभ्युदय = अभि + उदय
आविष्कार = आविः + कार
आच्छादन = आ + छादन
आद्यन्त = आदि + अंत
आद्यारम्भ = आदि + आरंभ
अरुणोदय = अरुण + उदय
इत्यादि = इति + आदि
उच्छृखल = उत् + श्रृंखल
उन्माद = उत् + माद
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Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Bihar Board 12th History Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 1.
इब्नबतूता ने अपनी यात्रा का विवरण लिखा था
(a) अरबी में
(b) अंग्रेजी में
(c) उर्दू में
(d) फारसी में
उत्तर-
(d) फारसी में

प्रश्न 2.
भारत की जिन तीन भाषाओं के ग्रंथों के अरबी भाषा में हुए अनुवादों से अलबरुनी परिचित था, वह थीं
(a) संस्कृत, पाली तथा प्राकृत
(b) हिन्दी, संस्कृत तथा तमिल
(c) हिन्दी, उर्दू तथा संस्कृत
(d) संस्कृत, तेलुगू, मलयालम
उत्तर-
(a) संस्कृत, पाली तथा प्राकृत

प्रश्न 3.
मार्को पोलो ने तेरहवीं शताब्दी से जिस स्थान से चलकर चीन और भारत की यात्रा की, उसका नाम था
(a) वेनिस
(b) पेरिस
(c) बोन
(d) बर्लिन
उत्तर-
(a) वेनिस

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प्रश्न 4.
अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत की जिन दो चीजों को असामान्य माना है, वे हैं
(a) दूध तथा अंडे
(b) नारियल तथा पान
(c) पपीता तथा टमाटर
(d) खरबूजा तथा तरबूज
उत्तर-
(b) नारियल तथा पान

प्रश्न 5.
अलबरूनी भारत में जिस शताब्दी में आया था, वह थी
(a) ग्यारहवीं
(b) दसवीं
(c) चौदहवीं
(d) सत्रहवीं
उत्तर-
(a) ग्यारहवीं

प्रश्न 6.
इब्नबतूता की भारत यात्रा को जिस शताब्दी से संबंधित माना जाता है, वह थी.
(a) ग्यारहवीं
(b) बारहवीं
(c) चौदहवीं
(d) तेरहवीं
उत्तर-
(c) चौदहवीं

प्रश्न 7.
फ्रांस्वा बर्नियर जिस देश से भारत आया था, उसका नाम था
(a) पुर्तगाल
(b) फ्रांस
(c) इंग्लैंड
(d) स्पेन
उत्तर-
(b) फ्रांस

प्रश्न 8.
इनबतूता के अनुसार उसे मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में जितने दिन लगे थे, उनकी संख्या थी- .
(a) चालीस
(b) पचास
(c) दस
(d) साठ
उत्तर-
(a) चालीस

प्रश्न 9.
रिहला के रचनाकार का नाम है
(a) इब्नबतूता
(b) अलबरुनी
(c) मार्को पोलो
(d) दूरते बार बोस्य
उत्तर-
(a) इब्नबतूता

प्रश्न 10.
मध्य एशिया के रास्ते होकर इब्नबतूता सन् 1333 में स्थल मार्ग पहुँचा था
(a) सिंध
(b) मुलतान
(c) लाहौर
(d) पानीपत
उत्तर-
(a) सिंध

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प्रश्न 11.
अलबरूनी किसके साथ भारत आया था ?
(a) मुहम्मद-बिन-कासिम
(b) महमूद गजनवी
(c) मुहम्मद गोरी
(d) बाबर
उत्तर-
(b) महमूद गजनवी

प्रश्न 12.
इब्नबतूता किस देश का निवासी था ?
(a) मिस्र
(b) पुर्तगाल
(c) मोरक्को
(d) फ्रांस
उत्तर-
(c) मोरक्को

प्रश्न 13.
इब्नबतूता किस देश का यात्री था ?
(a) मोरक्को
(b) मिस्र
(c) तुर्की
(d) ईरान
उत्तर-
(a) मोरक्को

प्रश्न 14.
इब्नबतूता ने अपनी यात्रा का विवरण किस भाषा में लिखा था?
(a) फारसी
(b) उर्दू
(c) अंग्रेजी
(d) अरबी
उत्तर-
(a) फारसी

प्रश्न 15.
गुप्त काल में कौन चीनी यात्री भारत आया था ?
(a) इत्सिंग
(b) फाह्यान
(c) ह्वेन-सांग
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) फाह्यान

प्रश्न 16.
दिल्ली से दौलताबाद किस शासक ने अपनी राजधान, परिवर्तित की?
(a) बलवन
(b) मुहम्मद तुगलक
(c) अनाउद्दीन खिलजी
(d) अकबर
उत्तर-
(b) मुहम्मद तुगलक

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 17.
वास्को-डी-गामा कब भारत पहुँचा?
(a) 17 मई, 1498 ई.
(b) 17 मार्च, 1598 ई.
(c) 17 मार्च, 1498 ई.
(d) 17 मई, 1598 ई.
उत्तर-
(a) 17 मई, 1498 ई.

प्रश्न 18.
किस शासक ने अपनी राजधानी दिल्ली में दौलताबाद परिवर्तित की?
(a) बलबन
(b) मुहम्मद तुगलक
(c) बाबर
(d) अकबर
उत्तर-
(b) मुहम्मद तुगलक

प्रश्न 19.
अलबकनी किसके साथ भारत आया था? (2009A. 2011A,2014A, 15A, 18A,19A)
(a) मुहम्मद-बिन-कासिम
(b) महमूद गजनवी
(c) मुहम्मद गोरी
(d) बाबर
उत्तर-
(b) महमूद गजनवी

प्रश्न 20.
इब्नबतूता किस देश का निवासी था? (2009A, 2013A)
(a) मिस्र
(b) पुर्तगाल
(c) मोरक्को
(d) फ्रांस
उत्तर-
(c) मोरक्को

प्रश्न 21.
इनबतूता ने अपनी यात्रा का विवरण किस भाषा में लिखा था? (14A, 15A,17A,19A)
(a) फारसी
(b) उर्दू
(c) अंग्रेजी
(d) अरबी
उत्तर-
(a) फारसी

प्रश्न 22.
गप्त काल में कौन चीनी यात्री भारत आया था? (2014A,2019A)
(a) इत्सिंग
(b) फाह्यान
(c) ह्वेनसांग
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) फाह्यान

प्रश्न 23.
दिल्ली से दौलताबाद किस शासक ने अपनी राजधानी परिवर्तित की? (2010A)
(a) बलबन
(b) मुहम्मद तुगलक
(c) अलाउद्दीन खिलजी
(d) अकबर
उत्तर-
(b) मुहम्मद तुगलक

प्रश्न 24.
वास्को-डि-गामा कब भारत पहँचा? (2012A. 2017A.2019A)
(a) 17 मई, 1498 ई.
(b) 17 मार्च, 1598 ई.
(c) 17 मार्च, 1498 ई.
(d) 17 मई, 1598 ई.
उत्तर-
(a) 17 मई, 1498 ई.

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प्रश्न 25.
भारत की जिन तीन भाषाओं के ग्रंथों के अरबी भाषा में हए अनुवादों से अलबरूनी परिचित था, वह थीं
(a) संस्कृत, पाली तथा प्राकृत
(b) हिन्दी, संस्कृत, तथा तमिल
(c) हिन्दू, उर्दू तथा संस्कृत
(d) संस्कृत, तेलुगू, मलयालम
उत्तर-
(a) संस्कृत, पाली तथा प्राकृत

प्रश्न 26.
पार्कोपोलो ने तेरहवीं शताब्दी से जिस स्थान से चलकर चीन और भारत की यात्रा की, उसका नाम था
(a) बैनिस
(b) पेरिस
(c) बोन
(d) बर्लिन
उत्तर-
(a) बैनिस

प्रश्न 27.
अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत की जिन दो चीजों को असामान्य माना है, वे हैं
(a) दूध तथा अंडे
(b) नारियल तथा पान
(c) पपीता तथा टमाटर
(d) खरबूज तथा तरबूज
उत्तर-
(b) नारियल तथा पान

प्रश्न 28.
अलबरूनी भारत में जिस शताब्दी में आया था, वह थी
(a) ग्यारहवीं
(b) दसवीं
(c) चौदहवीं
(d) सत्रहवाँ
उत्तर-
(a) ग्यारहवीं

प्रश्न 29.
इस्लनतता की भारत यात्रा को जिस शताब्दी से संतंथित माना जाता है, वह थी
(a) ग्यारहवीं
(b) बारहवीं
(c) चौदहवीं
(d) तेरहवीं
उत्तर-
(c) चौदहवीं

प्रश्न 30.
फ्रांस्वा बर्नियर जिस देश से भारत आया था, उसका नाम था
(a) पुर्तगाल
(b) फ्रांस
(c) इंग्लैंड
(d) स्पेन
उत्तर-
(b) फ्रांस

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 31.
इत्नबतूता के अनुसार उसे मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में जितने दिन लगे थे, उनको संख्या थी
(a) चालीस
(b) पचास
(c) दस
(d) साठ
उत्तर-
(a) चालीस

प्रश्न 32.
मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली के काजी नियुक्त किया शा.
(a) अलबरुनी को
(b) इन्नबतूता को
(c) बर्नियर को
(d) अब्दुर्रज्जाक को
उत्तर-
(b) इन्नबतूता को

प्रश्न 33.
पध्य एशिया के गस्ते होकर इन्नबाला पर 1333 में स्थल पार्ग से पहुँचा था
(a) सिंध
(b) मुल्तान
(c) लाहौर
(d) पानीपत
उत्तर-
(a) सिंध

प्रश्न 34.
‘तहकीक-ए हिन्दी’ में किसका यात्रा वृतान्त लिखा है? (2015A)
(a) अलबरूनी
(b) अपुरज्जाक
(c) फाह्यान
(d) मार्कोपोलो
उत्तर-
(a) अलबरूनी

प्रश्न 35.
मेगास्थनीज कौन था? (2018)
(a) यात्री
(b) व्यापारी
(c) राजदूत
(d) गुलाम
उत्तर-
(c) राजदूत

प्रश्न 36.
किताब-उर-रेहला में किसका यात्रा वृतान्त मिलता है? (2018A)
(a) अलबरूनी
(b) अब्दुर्रज्जाक
(c) इब्नबतूता
(d) बर्नियर
उत्तर-
(c) इब्नबतूता

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 37.
भारत को डाक व्यवस्था का वर्णन अपने यात्रा वृतांत में कौन किया था?
(a) अलबरूनी
(b) इब्नबतूता
(c) बर्नियर
(d) अब्दुर्रज्जाक
उत्तर-
(b) इब्नबतूता

प्रश्न 38.
मॉन्टेस्क्य नापक फ्रांसीसी दार्शनिक ने किस यात्री के विवरण के आधार पर ‘प्राच्य निरंकशवाद’ का सिद्धान्त प्रतिपादित किया?
(a) बर्नियर
(b) टैवर्नियर
(c) अलबरुनी
(d) इब्नबतूता
उत्तर-
(a) बर्नियर

प्रश्न 39.
अब्दुर्रज्जाक समरकन्दी नामक यात्रो ने किसके यात्रा वृतान्तों को पड़ा और उससे प्रेरणा ली?
(a) अलबरूनी
(b) इब्नबतूता
(c) बर्नियर
(d) इनमें सभी से
उत्तर-
(b) इब्नबतूता

प्रश्न 40.
अपनी आँखों के सामने सती प्रथा का दुख्य देखकर कौन विदेशी यात्री पूर्छित हो गया था?
(a) अलबरूनी
(b) अब्दुर्रज्जाक
(c) इब्नबतूता
(d) बर्निय
उत्तर-
(c) इब्नबतूता

प्रश्न 41.
लाहौर में एक 12 वषीय बालिका को जबरदस्ती सती बनाये जाने की मार्मिक घटना का आँखों देखा हाल किस विदेशी यात्री ने बताया
(a) अलबरूनी
(b) अब्दुर्रज्जाक
(c) इब्नबतूता
(d) बर्नियर
उत्तर-
(d) बर्नियर

प्रश्न 42.
महम्मद दुल्न जून्निये ने पोरक्को के सल्तानके कहने पर किसका यात्रा वृतान्त लिखा?
(a) अलबरूनी
(b) इनबतूता
(c) अब्दुर्रज्जाक
(d) बर्नियर
उत्तर-
(b) इनबतूता

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 43.
किस नगर का अथवा उसके किले का वर्णन प्रायः अधिकांश यात्रियों द्वारा किया गया है?
(a) ग्वालियर
(b) उज्जैन
(c) लाहौर
(d) पटना
उत्तर-
(a) ग्वालियर

प्रश्न 44.
भारतीय अध्ययन साबन्धी बाधाओं का वर्णन किस विदेशी यात्री ने किया है?
(a) अलबरूनी
(b) इब्नबतूता
(c) बर्नियर
(d) टैवर्नियर
उत्तर-
(a) अलबरूनी

प्रश्न 45.
मध्ययुगीन यात्रियों का सरताज किस यात्री को कहा जाता है?
(a) अलबरूनी
(b) मार्को पोलो
(c) बर्नियर
(d) इब्नबतूता
उत्तर-
(b) मार्को पोलो

प्रश्न 46.
जैसे घोंसले को पक्षी छोड़ता है उसी तरह किसी यात्री ने यात्रा पर जाने हेतु अपने घर को छोड़ा?
(a) अलबरूनी
(b) मार्को पोलो
(c) बर्नियर
(d) इब्नबतूता
उत्तर-
(d) इब्नबतूता

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 47.
हुमायूँ के दरबार में कौन अफ्रीकी यात्री भारत आया?
(a) अब्दुर्रज्जाक
(b) अलबरूनी
(c) बर्नियर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 48.
यात्रियों का राजकुमार किसे कहा गया है?
(a) फाह्यान
(b) ह्वेनसांग
(c) अलबरूनी
(d) इब्नबतूता
उत्तर-
(b) ह्वेनसांग

प्रश्न 49.
कैप्टन हाकिन्स किस मुगल शासक के दरबार में आया था? (2009,2013, 2016, 2017)
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) औरंगजेब
(d) शाहजहाँ
उत्तर-
(b) जहाँगीर

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Bihar Board 12th History Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 1.
स्थाई बन्दोबस्त जुड़ा था
(a) वारेन हेस्टिंग्स से
(b) वेलजली से
(c) कॉर्नवालिस से
(d) रिपन से
उत्तर-
(c) कॉर्नवालिस से

प्रश्न 2.
संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया
(a) जतरा भगत ने
(b) दुबिया गोसाई ने
(c) भगीरथ ने
(d) सिद्धू एवं कान्हू ने
उत्तर-
(d) सिद्धू एवं कान्हू ने

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 3.
सिद्धू कान्हू ने किस विद्रोह का नेतृत्व किया ?
(a) मुण्डा विद्रोह
(b) संथाल विद्रोह
(c) संन्यासी विद्रोह
(d) हो विद्रोह
उत्तर-
(b) संथाल विद्रोह

प्रश्न 4.
भारत में स्थायी बन्दोबस्त कहाँ लागू किया गया था?
(a) बंगाल
(b) पंजाब
(c) दक्षिण भारत
(d) इनमें से सभी
उत्तर-
(a) बंगाल

प्रश्न 5.
‘दामिन-इ-कोह’ क्या था ?
(a) भू-भाग
(b) उपाधि
(c) तलवार
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) उपाधि

प्रश्न 6.
संथाल विद्रोह का नेता कौन था ?
(a) बिरसा मुण्डा
(b) सिधो
(c) कालीराम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) बिरसा मुण्डा

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 7.
संथाल विद्रोह कब हुआ?
(a) 1855 ई. में
(b) 1851 ई. में
(c) 1841 ई. में
(d) 1832 ई. में
उत्तर-
(a) 1855 ई. में

प्रश्न 8.
ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई ?
(a) 1600 A.D
(b) 1605 A.D
(c) 1610 A.D
(d) 1615 A.D
उत्तर-
(a) 1600 A.D

प्रश्न 9.
स्थायी बंदोबस्त कहाँ लागू किया गया?
(a) बम्बई
(b) पंजाब
(c) बंगाल
(d) इनमें से सभी
उत्तर-
(c) बंगाल

प्रश्न 10.
संथाल विद्रोह का नेता कौन था ?
(a) बिरसा मुण्डा
(b) सिधो
(c) कालीराम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) बिरसा मुण्डा

प्रश्न 11.
कॉर्नवालिस कांड बना
(a) 1797 ई. में
(b) 1775 ई. में
(c) 1805 ई. में
(d) 1793 ई. में
उत्तर-
(d) 1793 ई. में

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 12.
राजमहल की पहाड़ियों में मुख्यतया जो लोग रहे थे। वे थे
(a) पहाड़िया और संथाल लोग
(b) पहाड़िया और भील लोग
(c) पहाड़िया तथा अंग्रेज लोग
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) पहाड़िया और संथाल लोग

प्रश्न 13.
कंपनी काल में अक्सर शक्तिशाली जमींदारों के लिए जो शब्द प्रयोग किया जाता था वह था
(a) कोतवाल
(b) राजा
(c) रैयत
(d) जोतदार
उत्तर-
(b) राजा

प्रश्न 14.
18वीं शताब्दी में बंगाल में नीलामी में कितने प्रतिशत से अधिक बिक्री फर्जी होती थी?
(a) 95 प्रतिशत
(b) 99 प्रतिशत
(c) 75 प्रतिशत
(d) 39 प्रतिशत
उत्तर-
(a) 95 प्रतिशत

प्रश्न 15.
इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने के बाद कितने प्रतिशत से अधिक जमींदारियाँ हस्तांतरित कर दी गई थीं?
(a) 75 प्रतिशत
(b) 95 प्रतिशत
(c) 15 प्रतिशत
(d) 45 प्रतिशत
उत्तर-
(a) 75 प्रतिशत

प्रश्न 16.
चार्ल्स कॉर्नवालिस का जीवन-काल था
(a) 1838-1905
(b) 1738-1805
(c) 1638-1705
(d) इनमें से कोई भी नहीं
उत्तर-
(b) 1738-1805

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 17.
शिकमी-रैयत को बंगाल में जमीन कौन पट्टे पर देता था ?
(a) रैयत
(b) कंपनी
(c) जमींदार
(d) इक्तेदार
उत्तर-
(a) रैयत

प्रश्न 18.
‘अमला’ किसके द्वारा भेजा अधिकारी होता था ?
(a) दीवान
(b) जमींदार
(c) कोतवाल
(d) मनसबदार
उत्तर-
(b) जमींदार

प्रश्न 19.
प्रायः जोतदार कहाँ रहते थे?
(a) गाँव में
(b) शहरों में
(c) महानगरों में
(d) कस्बों में
उत्तर-
(a) गाँव में

प्रश्न 20.
महाराजा मेहताब चंद्र का जीवन काल था
(a) 1820-1879
(b) 1920-1939
(c) 1729-1799
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 21.
स्थाई बन्दोबस्त जुड़ा था (2011A,2014A )
(a) वारेन हेस्टिंग्स से
(b) वेलजली से
(c) कॉर्नवालिस से
(d) रिपन से
उत्तर-
(c) कॉर्नवालिस से

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 22.
संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया (2011A)
(a) जतरा भगत ने
(b) दुबिया गोसाई ने
(c) भागीरथ ने
(d) सिद्ध एवं कान्हू ने
उत्तर-
(d) सिद्ध एवं कान्हू ने

प्रश्न 23.
सिद्धू कान्हू ने किस विद्रोह का नेतृत्व किया? (2012A)
(a) मुण्डा विद्रोह
(b) संथाल विद्रोह
(c) संन्यासी विद्रोह
(d) हो विद्रोह
उत्तर-
(b) संथाल विद्रोह

प्रश्न 24.
भारत में स्थायी बन्दोबस्त कहाँ लागू किया गया था? (2012A, 2015A)
(a) बंगाल
(b) पंजाब
(c) दक्षिण भारत
(d) इनमें से सभी
उत्तर-
(a) बंगाल

प्रश्न 25.
संथाल विद्रोह का नेता कौन था? (2015A)
(a) बिरसा मुण्डा
(b) सिधो
(c) कालीराम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) बिरसा मुण्डा

प्रश्न 26.
संथाल विद्रोह कब हुआ? (2015A, 2018A,2019A)
(a) 1855 ई. में
(b) 1851 ई. में
(c) 1841 ई. में
(d) 1832 ई. में
उत्तर-
(a) 1855 ई. में

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 27.
ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई? (2016A)
(a) 1600AD
(b) 1605AD
(c) 1610AD
(d) 1615AD
उत्तर-
(a) 1600AD

प्रश्न 28.
कॉर्नवालिस कोड बना (2015A,2017A,2019A)
(a) 1797 ई. में
(b) 1775 ई. में
(c) 1805 ई. में
(d) 1793 ई. में
उत्तर-
(d) 1793 ई. में

प्रश्न 29.
राजमहल की पहाड़ियों में मुख्यतया जो लोग रहे थे। वे थे
(a) पहाड़िया और संथाल लोग
(b) पहाड़िया और भील लोग
(c) पहाड़िया तथा अंग्रेज लोग
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) पहाड़िया और संथाल लोग

प्रश्न 30.
कम्पनी काल में अक्सर शक्तिशाली जमींदारों के लिए जो शब्द प्रयोग किया जाता था, वह था
(a) कोतवाल
(b) राजा
(c) रैयत
(d) जोतदार
उत्तर-
(b) राजा

प्रश्न 31.
18वीं शताब्दी में बंगाल में नीलामी में कितने प्रतिशत से अधिक बिक्री फर्जी होती थी?
(a) 95 प्रतिशत
(b) 99 प्रतिशत
(c) 75 प्रतिशत
(d) 39 प्रतिशत
उत्तर-
(a) 95 प्रतिशत

प्रश्न 32.
इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने के बाद कितने प्रतिशत से अधिक जमींदारियाँ हस्तांतरित कर दी गई थीं?
(a) 75 प्रतिशत
(b) 95 प्रतिशत
(c) 15 प्रतिशत
(d) 45 प्रतिशत
उत्तर-
(a) 75 प्रतिशत

प्रश्न 33.
चार्ल्स कॉर्नवालिस का जीवन-काल था
(a) 1838-1905
(b) 1738-1805
(c) 1638-1705
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) 1738-1805

प्रश्न 34.
शिकमी-रैयत को बंगाल में जमीन कौन पट्टे पर देता था?
(a) रैयत
(b) कम्पनी
(c) जमींदार
(d) इक्तेदार
उत्तर-
(a) रैयत

प्रश्न 35.
‘अमला’ किसके द्वारा भेजा अधिकारी होता था?
(a) दीवान
(b) जमींदार
(c) कोतवाल
(d) मनसबदार
उत्तर-
(b) जमींदार

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 36.
प्रायः जोतदार कहाँ रहते थे?
(a) गाँव में
(b) शहरों में
(c) महानगरों में
(d) कस्बों में
उत्तर-
(a) गाँव में

प्रश्न 37.
महाराजा मेहताब चंद का जीवनकाल था
(a) 1820-1879
(b) 1920-1939
(c) 1729-1799
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) 1820-1879

प्रश्न 38.
बंगाल और बिहार में स्थायी बन्दोबस्त शुरू करने का श्रेय किसे दिया जाता है? (2018A)
(a) लार्ड कार्नवालिस
(b) लार्ड वेलेस्ली
(c) लार्ड रिपन
(d) लार्ड कर्जन
उत्तर-
(a) लार्ड कार्नवालिस

प्रश्न 39.
भारत आने वाले प्रथम यरोपियन कौन थे?
(a) पुर्तगाली
(b) ब्रिटिश
(c) डच
(d) फ्रांसीसी
उत्तर-
(a) पुर्तगाली

प्रश्न 40.
अंग्रेजों ने सर्वप्रथम अपनी फैक्ट्री कहाँ स्थापित किया था?
(a) हल्दियाँ
(b) मछलीपट्नम
(c) कोचीन
(d) इनमें से सभी
उत्तर-
(b) मछलीपट्नम

प्रश्न 41.
पुर्तगालियों ने गोवा पर कब अधिकार किया? (2018.4,2019A)
(a) 1515
(b) 1512
(c) 1510
(d) 1509
उत्तर-
(c) 1510

प्रश्न 42.
फ्रांसिस बुकानन कौन था?
(a) सैनिक
(b) गायक
(c) अभियन्ता
(d) सर्वेक्षक
उत्तर-
(d) सर्वेक्षक

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 43.
फ्रांसिस बुकानन के विवरण की तुलना इतिहास के किस स्कूल से की गयी है?
(a) एनाल्स
(b) सवाल्टर्न
(c) मार्क्सवादी
(d) साम्राज्यवादी
उत्तर-
(a) एनाल्स

प्रश्न 44.
फ्रांसिस बुकानन के विवरणों से किस जनजाति के बारे में पता चलता है?
(a) गौड़
(b) संथाल
(c) कोल
(d) हुम्मार
उत्तर-
(b) संथाल

प्रश्न 45.
किस रिपोर्ट का सम्बन्ध भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के क्रिया-कलापों से है?
(a) 11वीं रिपोर्ट
(b) 21वीं रिपोर्ट
(c) 5वीं रिपोर्ट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(c) 5वीं रिपोर्ट

प्रश्न 46.
रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के जनक थे.
(a) मार्टिन बर्ड
(b) बुकानन
(c) मुनरो एवं रीड
(d) इनमें से सभी
उत्तर-
(c) मुनरो एवं रीड

प्रश्न 47.
महालवाडी बन्दोबस्त किसके द्वारा लाग किया गया? (2019A)
(a) मार्टिन बर्ड
(b) रीड
(c) मुनरो
(d) बुकानन
उत्तर-
(a) मार्टिन बर्ड

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 48.
किस युद्ध में विजय के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्राप्त कर लिये
(a) प्लासी
(b) बक्सर
(c) पानीपत
(d) हल्दीघाटी
उत्तर-
(b) बक्सर

प्रश्न 49.
भारत में स्थायी रूप से 10 वर्षीय जनगणना का आरम्भ 1881 में किस गर्वनर जनरल के काल में हुआ?
(a) क्लाइव
(b) वारेन हेस्टिंग्स
(c) रिपन
(d) मेयो
उत्तर-
(c) रिपन

प्रश्न 50.
दक्कन दंगा आयोग कब गठित हुआ?
(a) 1875
(b) 1880
(c) 1885
(d) 1890
उत्तर-
(a) 1875

प्रश्न 51.
किस सरकारी रिपोर्ट से भारतीय कृषक जनजातियों की स्थिति का पता चलता है?
(a) बुकानन की रिपोर्ट
(b) पाँचवीं रिपोर्ट
(c) दक्कन दंगा आयोग रिपोर्ट
(d) उक्त सभी से
उत्तर-
(d) उक्त सभी से

प्रश्न 52.
उलगुलान विद्रोह का नेता कौन था?
(a) सिद्ध
(b) गोमधर कुंवर
(c) चित्तर सिंह
(d) विरसामुण्डा
उत्तर-
(d) विरसामुण्डा

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

Bihar Board 12th History Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

प्रश्न 1.
पानीपत का प्रथम युद्ध किस वर्ष हुआ था ?
(a) 1509 ई. में
(b) 1526 ई. में
(c) 1556 ई. में
(d) 1761 ई. में
उत्तर-
(b) 1526 ई. में

प्रश्न 2.
बाबर की आत्मकथा का क्या नाम है?
(a) बाबरनामा
(b) तुजुक-ए-बाबरी
(c) किताब-उल-हिन्द
(d) रेहला
उत्तर-
(a) बाबरनामा

प्रश्न 3.
तम्बाकू पर किस शासक ने प्रतिबंध लगाया ?
(a) अकबर
(b) बाबर
(c) जहाँगीर
(d) शाहजहाँ
उत्तर-
(d) शाहजहाँ

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

प्रश्न 4.
अकबर का संरक्षक कौन था?
(a) फौजी
(b) मुनीम खाँ
(c) अब्दुल रहीम
(d) बैरम खाँ
उत्तर-
(d) बैरम खाँ

प्रश्न 5.
तम्बाकू का सेवन सर्वप्रथम किस मुगल सम्राट ने किया ?
(a) जहाँगीर
(b) शाहजहाँ
(c) बाबर
(d) अकबर
उत्तर-
(a) जहाँगीर

प्रश्न 6.
ताजमहल का निर्माण किसने किया था ?
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) औरंगजेब
(d) शाहजहाँ
उत्तर-
(d) शाहजहाँ

प्रश्न 7.
निम्नलिखित इतिहासकारों में कौन अकबर का समकालीन था ?
(a) फरिस्ता
(b) बदायूनी
(c) मतुल्ला दाउद
(d) मुहम्मद खान
उत्तर-
(d) मुहम्मद खान

प्रश्न 8.
किस प्रशासकीय सुधार के लिए शेरशाह खासतौर पर जाना जाता
(a) बाजार नियंत्रण
(b) भूमि-सुधार व्यवस्था
(c) मनसबदारी व्यवस्था
(d) विधि-नियंत्रण व्यवस्था
उत्तर-
(d) विधि-नियंत्रण व्यवस्था

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

प्रश्न 9.
भारत का अंतिम मुगल शासक कौन था ?
(a) शाहजहाँ
(b) औरंगजेब
(c) मुहम्मद शाह
(d) बहादुर शाह जफर
उत्तर-
(d) बहादुर शाह जफर

प्रश्न 10.
भारत का अंतिम मुगल शासक कौन था ?
(a) औरंगजेब
(b) शाहजहाँ
(c) बहादुरशाह जफर
(d) मुहम्मद शाह
उत्तर-
(d) मुहम्मद शाह

प्रश्न 11.
‘दामिन-इ-कोह’ क्या था ?
(a) भूभाग
(b) तलवार
(c) उपाधि
(d) घोड़ा
उत्तर-
(a) भूभाग

प्रश्न 12.
मुगल नाम व्युत्पन्न हुआ है
(a) मध्य एशिया से
(b) मंगोल से
(c) मोगली नामक पुस्तक से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) मंगोल से

प्रश्न 13.
मुगल साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक थे
(a) अकबर
(b) बाबर
(c) हुमायूँ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) बाबर

प्रश्न 14.
मुगल साम्राटों में समान्यतया महानतम सम्राट् माना जाता है
(a) जलालुद्दीन अकबर को
(b) नसीरुद्दीन हुमायूँ को
(c) जहाँगीर को
(d) औरंगजेब को
उत्तर-
(a) जलालुद्दीन अकबर को

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

प्रश्न 15.
औरंगजेब का देहांत हुआ था
(a) 1857 ई. में
(b) 1707 ई. में
(c) 1907 ई. में
(d) 1607 ई. में
उत्तर-
(b) 1707 ई. में

प्रश्न 16.
बहादुरशाह जफर को उखाड़ फेंका था
(a) मराठों ने
(b) सिक्खों ने
(c) जाटों ने
(d) अंग्रेजों ने
उत्तर-
(d) अंग्रेजों ने

प्रश्न 17.
आलमगीर जिस मुगल सम्राट् की पद्वी थी, उसका नाम था
(a) औरंगजेब
(b) शाहजहाँ
(c) जहाँगीर
(d) बहादुरशाह
उत्तर-
(a) औरंगजेब

प्रश्न 18.
अकबर ने सोच-समझकर जिसको दरबार की मुख्य भाषा बनाया, वह थी
(a) हिंदवी
(b) अरबी
(c) फारसी
(d) तुर्की
उत्तर-
(c) फारसी

प्रश्न 19.
रिपब्लिक के लेखक हैं
(a) प्लेटो
(b) अरस्तू
(c) सुकरात
(d) अबुल फजल
उत्तर-
(a) प्लेटो

Bihar Board 12th History Objective Answers Chapter 9 राजा और विभिन्न वृतांत : मुगल दरबार

प्रश्न 20.
सुलह-ए-कुल का अर्थ है
(a) अच्छा कुल
(b) पूर्ण शांति
(c) पूर्ण अशांति
(d) सुंदर कुल
उत्तर-
(b) पूर्ण शांति

प्रश्न 21.
अकबर ने जजिया को समाप्त कर दिया था
(a) 1564 ई. में
(b) 1556 ई. में
(c) 1570 ई. में
(d) 1605 ई. में
उत्तर-
(a) 1564 ई. में

प्रश्न 22.
सुईम जिस मुगल सम्राट् का नाम था, वह थे
(a) शाहजहाँ
(b) जहाँगीर
(c) अकबर
(d) कोई भी नहीं
उत्तर-
(a) शाहजहाँ

प्रश्न 23.
बुलंद दरवाजा जिस स्थान पर है, वह है
(a) आगरा
(b) फतेहपुर सीकरी
(c) फतहनगर
(d) फिरोजपुर
उत्तर-
(b) फतेहपुर सीकरी

प्रश्न 24.
औरंगजेब ने अपने जीवन का अंतिम भाग बिताया
(a) पश्चिमी भारत में
(b) उत्तरी भारत में
(c) पूर्वी भारत में
(d) दक्षिणी भारत में
उत्तर-
(d) दक्षिणी भारत में

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प्रश्न 25.
स्थापत्यकला का सबसे अधिक विकास किसके समय में हुआ ?
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) शाहजहाँ
(d) औरंगजेब
उत्तर-
(c) शाहजहाँ

प्रश्न 26.
कैप्टेन हॉकिन्स किस मुगल शासक के दरबार में आया ?
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) शाहजहाँ
(d) औरंगजेब
उत्तर-
(b) जहाँगीर

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में अकबर किस पर अधिकार नहीं कर सका ?
(a) मेवाड़
(b) मारवाड़
(c) चित्तौड़
(d) जोधपुर
उत्तर-
(a) मेवाड़

प्रश्न 28.
निम्नलिखित में कौन मुगल बादशाह ‘आलमगीर’ के नाम से जाना जाता था ?
(a) जहाँगीर
(b) शाहजहाँ
(c) औरंगजेब
(d) बहादुर शाह
उत्तर-
(c) औरंगजेब

प्रश्न 29.
औरंगजेब ने अपने जीवन का अंतिम भाग बिताया (2009A, 12A, 15A,16A,19A)
(a) पश्चिमी भारत में
(b) उत्तरी भारत में
(c) पूर्वी भारत में
(d) दक्षिणी भारत में
उत्तर-
(d) दक्षिणी भारत में

प्रश्न 30.
स्थापत्यकला का सबसे अधिक विकास किसके समय में हुआ? (2009A, 13A, 16A)
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) शाहजहाँ
(d) औरंगजेब
उत्तर-
(c) शाहजहाँ

प्रश्न 31.
भारत का प्रथम भुगल शासक कौन था? (2019A)
(a) बाबर
(b) अकबर
(c) शेरशाह सूरी
(d) बलबन
उत्तर-
(a) बाबर

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प्रश्न 32.
निम्नलिखित में अकबर किस पर अधिकार नहीं कर सका? (2009A,2012A)
(a) मेवाड़
(b) मारवाड़
(c) चित्तौड़
(d) जोधपुर
उत्तर-
(a) मेवाड़

प्रश्न 33.
निम्नलिखित में कौन मुगल बादशाह ‘आलमगीर’ के नाम से जाना जाता था? (2009A, 2012A. 2014A)
(a) जहाँगीर
(b) शाहजहाँ
(c) औरंगजेब
(d) बहादुर शाह
उत्तर-
(c) औरंगजेब

प्रश्न 34.
पानीपत का प्रथम युद्ध किस वर्ष हुआ था? (2010A,2012A,2014A.2016A)
(a) 1509 ई. में
(b) 1526 ई. में
(c) 1556 ई. में
(d) 1761 ई. में
उत्तर-
(b) 1526 ई. में

प्रश्न 35.
बाबर की आत्मकथा का क्या नाम है? (2012A)
(a) बाबरनामा
(b) तुजुक-ए-बाबरी
(c) किताब-उल-हिन्द
(d) रेहला
उत्तर-
(a) बाबरनामा

प्रश्न 36.
अकबर का संरक्षक कौन था? (2015A,2016A)
(a) फौजी
(b) मुनीम खाँ
(c) अब्दुल रहीम
(d) बैरम खाँ
उत्तर-
(d) बैरम खाँ

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प्रश्न 37.
ताजमहल का निर्माण किसने किया था? (2010A)
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) औरंगजेब
(d) शाहजहाँ
उत्तर-
(d) शाहजहाँ

प्रश्न 38.
निम्नलिखित इतिहासकारों में कौन अकबर का समकालीन था? (2011A)
(a) फरिस्ता
(b) बदायूनी
(c) मतुल्ला दाउद
(d) मुहम्मद खान
उत्तर-
(d) मुहम्मद खान

प्रश्न 39.
किस प्रशासकीय सुधार के लिए शेरशाह खासतौर पर जाना जाता (2011)
(a) बाजार नियंत्रण
(b) भूमि-सुधार व्यवस्था
(c) मनसबदारी व्यवस्था
(d) विधि-नियंत्रण व्यवस्था
उत्तर-
(b) भूमि-सुधार व्यवस्था

प्रश्न 40.
‘दामिन-इ-कोह’ क्या था? (2015A,2014A, 2018A)
(a) भूभाग
(b) तलवार
(c) उपाधि
(d) घोड़ा
उत्तर-
(a) भूभाग

प्रश्न 41.
मुगल नाम व्युत्पन्न हुआ है
(a) मध्य एशिया से
(b) मंगोल से
(c) मोगली नाम पुस्तक से
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(b) मंगोल से

प्रश्न 42.
मुगल समान्य का वास्तविक संस्थापक कौन था?
(a) अकबर
(b) बाबर
(c) हुमायूँ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) अकबर

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प्रश्न 43.
मुगल सम्राटों में समान्यतया महानतम सम्राट माना जाता है
(a) जलालुद्दीन अकबर को
(b) नसीरुद्दीन हुमायूँ को
(c) जहाँगीर को
(d) औरंगजेब को
उत्तर-
(a) जलालुद्दीन अकबर को

प्रश्न 44.
औरंगजेब का देहान्त हुआ था
(a) 1857 ई. में
(b) 1707 ई. में
(c) 1907 ई. में
(d) 1607 ई. में
उत्तर-
(b) 1707 ई. में

प्रश्न 45.
बहादुरशाह जफर को उखाड़ फेंका था
(a) मराठों ने
(b) सिक्खों ने
(c) जाटों ने
(d) अंग्रेजों ने
उत्तर-
(d) अंग्रेजों ने

प्रश्न 46.
अकबर ने सोच-समझकर जिसको दरबार की मुख्य भाषा बनाया वह थी
(a) हिंदवी
(b) अरबी
(c) फारसी
(d) तुर्की
उत्तर-
(c) फारसी

प्रश्न 47.
रिपब्लिक के लेखक हैं
(a) प्लेटो
(b) अरस्तू
(c) सुकरात
(d) अबुल फजल
उत्तर-
(a) प्लेटो

प्रश्न 48.
सुलह-ए-कुल का अर्थ है
(a) अच्छा कुल
(b) पूर्ण शांति
(c) पूर्ण अशांति
(d) सुंदर कुल
उत्तर-
(b) पूर्ण शांति

प्रश्न 49.
अकबर ने जजिया को समाप्त कर दिया था
(a) 1564 ई. में
(b) 1556 ई. में
(c) 1570 ई. में
(d) 1605 ई. में
उत्तर-
(a) 1564 ई. में

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प्रश्न 50.
खुर्रम किस मुगल सम्राट का नाम था?
(a) शाहजहाँ
(b) जहाँगीर
(c) अकबर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(a) शाहजहाँ

प्रश्न 51.
बुलंद दरवाजा जिस स्थान पर है, वह है
(a) आगरा
(b) फतेहपुर सिकरी
(c) फतहनगर
(d) फिरोजपुर
उत्तर-
(b) फतेहपुर सिकरी

प्रश्न 52.
हुमायूँ का भाई कौन था?
(a) कामरान
(b) असकरी
(c) हिन्दाल
(d) ये सभी
उत्तर-
(d) ये सभी

प्रश्न 53.
मुगलकालीन चित्रकला किसके काल में चरमोत्कर्ष पर पहंची?
(a) हुमायूँ
(b) अकबर
(c) जहाँगीर
(d) शाहजहाँ
उत्तर-
(c) जहाँगीर

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प्रश्न 54.
रज्मनामा के नाम से किस ग्रंथ का फारसी अनवाद किया गया?
(a) रामायण
(b) महाभारत
(c) गीता
(d) उपनिषद्
उत्तर-
(c) गीता

प्रश्न 55.
गलबदन बेगम ने किसके आग्रह पर हमायँनामा लिखा
(a) अकबर
(b) हुमायूँ
(c) बाबर
(d) अबुल फजल
उत्तर-
(a) अकबर

प्रश्न 56.
बादशाहनामा किसने लिखा?
(a) फौजी
(b) अबुल फजल
(c) अब्दुल हमीद लाहौरी
(d) निजामुद्दीन अहमद
उत्तर-
(c) अब्दुल हमीद लाहौरी

प्रश्न 57.
यास्सा (राजकीय नियम) किसने लागू किये थे?
(a) तैमूर
(b) चंगेज खाँ
(c) बाबर
(d) अकबर
उत्तर-
(b) चंगेज खाँ

प्रश्न 58.
‘हुमायूँनामा’ का अंग्रेजी अनवाद किसने किया?
(a) हेनरी बेवरीज
(b) जैरेट
(c) ब्लाकमैन
(d) ग्राण्ड डफ
उत्तर-
(a) हेनरी बेवरीज

प्रश्न 59.
लाड़ली बेगम किसकी पुत्री थी?
(a) नूरजहाँ
(b) मुमताज
(c) अस्मा बेगम
(d) जहाँआरा
उत्तर-
(a) नूरजहाँ

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प्रश्न 60.
फतेहपुर सिकरी को राजधानी किसने बनाया? (2019)
(a) अकबर
(b) जहाँगीर
(c) शाहजहाँ
(d) बाबर
उत्तर-
(a) अकबर

प्रश्न 61.
दरबार में अभिवादन का तरीका निम्न में से कौन सा था?
(a) कोर्निश
(b) सजदा
(c) पायवोस
(d) ये सभी
उत्तर-
(d) ये सभी

प्रश्न 62.
अकबर ने किस सन् में दीन-ए-इलाही धर्म चलाया? (2011, 13.1AN )
(a) 1562
(b) 1564
(c) 1579
(d) 1581
उत्तर-
(d) 1581

प्रश्न 63.
दारा एवं शाहजहाँ के पास आगग में रहती थी
(a) जहाँआरा
(b) रोशनआरा
(c) गौहरआरा
(d) ये सभी
उत्तर-
(a) जहाँआरा

प्रश्न 64.
दिल्ली में चाँदनी चौक का निर्माण किसने कराया?
(a) जहाँआरा
(b) रोशनआरा
(c) गौहरआरा
(d) किसी ने नहीं
उत्तर-
(a) जहाँआरा

प्रश्न 65.
बाबर चंगेज खाँ का कौन-सा वंगज था?
(a) पाँचवाँ
(b) सातवाँ
(c) बारहवाँ
(d) चौदहवाँ
उत्तर-
(d) चौदहवाँ

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प्रश्न 66.
गुलबदन बेगम कौन थी?
(a) नर्तकी
(b) गायिका
(c) लेखिका
(d) नायिका
उत्तर-
(c) लेखिका

प्रश्न 67.
अकबर के समय राजकुमारों को अधिकतम कितने का मनसबदार बनाया गया?
(a) 5,000
(b)7,000
(c) 10,000
(d) 12,000
उत्तर-
(d) 12,000

प्रश्न 68.
तुजक-ए-जहाँगीरी की रचना किसने की?
(a) अब्बास खाँ सरवानी
(b) गुलबदन बेगम
(c) जहाँगीर
(d) नूरजहाँ
उत्तर-
(c) जहाँगीर

प्रश्न 69.
तुजक-ए-बाबरी किसने लिखी? (2012)
(a) बाबर
(b) फैजी
(c) अबुल फजल
(d) हुमायूँ
उत्तर-
(a) बाबर

प्रश्न 70.
अकबर का बजीर था
(a) बैरम खाँ
(b) मुनीम खाँ
(c) टोडरमल
(d) अब्दुल रहीम
उत्तर-
(a) बैरम खाँ

प्रश्न 71.
मुगल प्रशासन में जिले को किस नाम से जाना जाता था?
(a) अहार
(b) सूबा
(c) सरकार
(d) दस्तूर
उत्तर-
(c) सरकार

प्रश्न 72.
दीवान-ए-अशरफ का अर्थ है (2017)
(a) भूमि विभाग का अध्यक्ष
(b) वन विभाग का अध्यक्ष
(c) राजस्व विभाग का अध्यक्ष
(d) सेना विभाग का अध्यक्ष
उत्तर-
(c) राजस्व विभाग का अध्यक्ष

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प्रश्न 73.
भारत में सुलह-ए-कुल की नीति का प्रतिपादन किसने किया?
(a) हुमायूँ
(b) अकबर
(c) जहाँगीर
(d) औरंगजेब
उत्तर-
(b) अकबर

प्रश्न 74.
भारत का अंतिम मुगल शासक कौन था? (2018A)
(a) शाहजहाँ
(b) मुहम्मद शाह
(c) औरंगजेब
(d) बहादुर शाह जफर
उत्तर-
(d) बहादुर शाह जफर

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शब्द-शक्ति

प्रश्न 1.
‘शब्द-शक्ति’ का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए उसके स्वरूप का विवेचना कीजिए।
उत्तर-
‘शब्द-शक्ति’ का तात्पर्य-साहित्य मूलतः शब्द के माध्यम से साकार होता है। भारतीय दर्शनशास्त्र में ‘शब्द’ को ‘ब्रह्म’ कहा गया है। जिस प्रकार ब्रह्म इस जगत का स्रष्टा है, उसी की माया का विविध रूपों में प्रसार विश्व की गतिशीलता और क्रियाशीलता का आधार है। यही ‘माया’ ब्रह्म की ‘शक्ति’ भी कहलाती है। उसी प्रकार शब्द की माया अर्थात् शक्ति समस्त भाव जगत या विचार सृष्टि की विधात्री है। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचतिमानस’ महाकाव्य के आरंभ में कहा है-‘जिस प्रकार जल और उसकी लहर कहने को भले ही अलग हैं पर वास्तव में वे दोनों हैं एक ही, उसी प्रकार ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ नाम अलग होते हुए भी, दोनों एक दूसरे से अभिन्न हैं।’

शब्द अरथ जल बीचि, सम, कहियत भिन्न-न-भिन्न
-रामचरितमानस, (बालकांड)

जैसे वस्त्र से उनका रंग, फूल से उसकी गंध और आग से उसकी तपन अलग नहीं, उसी प्रकार शब्द से उसका अर्थ अलग नहीं। शब्द और अर्थ की इसी ‘अभिन्नता’ का नाम ‘शब्दशक्ति’ है।

‘शब्द-शक्ति’ का स्वरूप-‘शब्द’ की ‘शक्ति’ क्या है-‘अर्थ’। अर्थ के माध्यम से ही किसी शब्द की क्षमता, महत्ता, सुष्टुता और प्रभविष्णुता का पता चल पाता है।

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इस आधार पर ‘शब्द-शक्ति’ की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है। ‘शब्द में अर्थ को सूचित करने की जो क्षमता होती है उस ‘शद्र किन, कहते हैं। इस परिभाषा को अन्य विद्वानों ने कुछ मग्ल-रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है ‘शब्द का वह व्यापार, जिसके द्वारा किसी अर्थ का बोध होता है, ‘शब्द-शक्ति’। कहलाता है।’ एक उदाहरण द्वारा ‘शब्द-शक्ति’ के स्वरूप को समझना होगा। गष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी का गीत है-

यह मेरी नन्ही तकली,
है नाचती जैसे मछली,
मैं सूत बनाता इसमें,
मैं गाना गाता इसमें,
मैं दिल बहलाता इसमें,
मैं खेल मचाता इसमें,
यह फिरती उछली-उछली,
यह मेरी नन्ही तकली।

इस गीत में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है वे सभी ‘वाचक’ हैं अर्थात् वे अपना अर्थ स्वयं ही बता रहे हैं। यदि किसी शब्द का अर्थ पहले से पता न भी हो तो ‘कोश’ से देखकर या किसी अन्य जानकार से पूछकर मालूम कर सकते हैं। नन्हीं, तकली, मछली, सूत, गाना, दिल, . खेल, आदि के अर्थ प्रसिद्ध और सर्वज्ञात हैं। इस प्रकार के प्रसिद्ध अर्थ अर्थात् मुख्य अर्थ या वाच्य अर्थ कहलाते हैं। अर्थात् ये अर्थ प्रसिद्ध हैं और पहले से पुस्तकों में (कोश, व्याकरण आदि में) में बताए जा चुके हैं। ऐसे वाच्य अर्थ’ या ‘मुख्य अर्थ’ का बोध जिन शब्दों से होता है।

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वे ‘वाचक’ शब्द कहलाते हैं। – अब इसी गीत में आए हुए ‘दिल बहलाता’, ‘खेल मचाता’ और ‘फिरती उछली-उछली’ पर ध्यान दें। ‘बहलाया’ बच्चों को जाता है। दिल बच्चा नहीं। उसे ‘बहलाना’ कैसे संभव है? इस प्रकार ‘बहलाना’ शब्द का मुख्य अर्थ ‘खुश करना’ बाधित (ठीक न लगने वाला) प्रतीत होता है। तब हम बहलाने के लक्षण से यह अर्थ मालूम करेंगे कि जैसे उदास बच्चे को किसी खेल-खिलौने से खुश किया जाता है, उसी प्रकार ‘मेरा उदास मन तकली चलाने से खुश रहता है’ (तकली चलाने में मस्त होकर मन ही उदासी दूर हो जाती है।)

इस तरह हमने एक अन्य अर्थ लक्षित कर लिया। इस अर्थ को ‘लक्ष्यार्थ’ (लक्ष्य अर्थ लक्षण से जाना गया अर्थ, कहते हैं और इस प्रकार का अर्थ देने वाला शब्द ‘लक्षक’ शब्द कहलाता है। इसी प्रकार, ‘खेल मचाना’ या ‘तकली का उछलमा प्रयोगों में भी लक्षक शब्द और लक्ष्यार्थ हैं। उछलते बच्चे (मनुष्य या जीवित प्राणी) है। तकली तो बेजान है, वह कैसे उछली-उछली फिर सकती है। इस तरह ‘उछली’ शब्द के प्रसिद्ध अर्थ ‘कूदना, ऊपर-नीचे होकर मटकना या मस्ती से ‘चलना’ बाधक (रोक) प्रतीक होती है।

अर्थात् यहाँ यह अर्थ (तकली मस्ती में झूमकर उछल रही संगत प्रतीत नहीं होता। तब हम ‘उछलना’ के लक्षण (मस्ती से झूमना) द्वारा यह लक्ष्यार्थ ग्रहण करते हैं कि जैसे बच्चे (या प्राणी) मस्ती में उछलते हैं उसी प्रकार सूत कातते समय तकली का ऊपर-नीचे होना, इधर-उधर हिलना ऐसा लगता है मानों वह मस्ती में उछल-नाच रही है।

अब, इस सारे गीत को एक-बार फिर पढ़ने पर जब हम यह जानते हैं कि तकली चलानेवाले का मन बड़ा खुश है। वह अपनी छोटी-सी तकली चलाते समय खेल-कूद जैसा आनंद अनुभव करता है। तब इसमें छिपा हुआ यह मूढ़ भाव स्पष्ट हो जाता है कि गाँधीजी ने देशवासियों को जो चरखा-तकली चलाकर अपने हाथ से सूत कातकर ‘स्वदेशी’ का संदेश दिया वह बड़ा सुखकर और आनंददायक है। यह ‘छिपा हुआ गूढ अर्थ “व्यंग्यार्थ,(व्यंग्य अर्थ अर्थात् शब्दों के माध्यम से व्यजित (प्रकट होने वाला. नया-सूक्ष्म अर्थ) कहलाता है और इस प्रकार के ‘व्यंग्यार्थ’ (गूढ़ अर्थ) वाले. शब्द (व्यंजक) कहलाते हैं।

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उपर्युक्त पद्यबद्ध उदाहरण के अर्थ-सौंदर्य के विवेचन के आधार पर शब्दशक्ति का स्वरूप भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है।

प्रश्न 2.
‘शब्द-शक्ति’ के प्रमुख भेद लक्षण-उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
अथवा,
‘शब्द-शक्ति’ कितने प्रकार की है? उसके विभिनन प्रकार (भेद या रूप) लक्षण-उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
जब हम साहित्य के किसी भी वंश (पद्य या गद्य) के अर्थ-सौंदर्य पर विचार करते हैं तो पहले यह तथ्य सामने आता है कि उस गद्यांश में प्रयुक्त शब्दों में प्राप्त होने वाले अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया क्या हो सकती है। उदाहरणतया फूल शब्द का अर्थ ग्रहण करने की तीन प्रक्रियाएँ संभव है। एक-उसका शब्दकोश और लोक-व्यवहार में प्रचलित मुख्य अर्थ-किसी पौधे पर उगने वाला वह आकर्षक, रंगीन, सुंदर पदार्थ जिसमें गंध भी होती है। जैसे-गुलाब, गेंदा, चमेली, आदि। दूसरी-‘मेरे जीवन में ‘फूल’ कभी खिले ही नहीं’ इस वाक्य में फूल के अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया बदल जाएगी।

जीवन कोई पेड़-पौधा नहीं जिस पर फूल खिला करते हों। इस प्रकार मुख्य, प्रचलित या वाच्य अर्थ असंगत लगता है। उसकी प्रतीत (अर्थ की प्राप्ति) में बोध (व्यवधान) है। तब नई प्रक्रिया शुरू होती है-‘फूल के गुण लक्षण के आधार पर। फूल आनंददायक होता है। इस लक्षण की सहायता से हम यह अर्थग्रहण करेंगे-मेरे जीवन में कभी सुख-आनंददायक का अवसर आया ही नहीं। तीसरी प्रक्रिया तनिक और भी भिन्न होगी। उसमें इसी ‘फूल’ शब्द का न तो वाच्यार्थ पूर्णतः संगत होगा, न ही लक्ष्यार्थ (सुख-आनंद) उचित प्रतीत होगा। ‘कली फूल बनने से पहले ही मुरझा गई।’

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हो सकता है, इस वाक्य का वाच्यार्य भी अभीष्ट हो कि (आँधी, तूफान या बाढ़ के कारण) कई कलियाँ विकसित होने से पहले ही नष्ट हो गईं। परंतु इसका व्यजित अर्थ बड़ा मार्मिक है-बच्चा यौवन आने से पहले ही काल का ग्रास बन गया अथवा बालिका (भीषण विपत्तियों के कारण) पूर्ण यौवन के सौंदर्य के आगमन से पहले ही उदास, लाचार और मरी-मरी सी हो गई है। या बालक अभी जवान ही नहीं हुआ था कि (पिता आदि के न रहने से) जिम्मेदारी के बोझ से दबकर दुबला-पतला हो गया है” आदि।

इस प्रकार हमने देखा कि किसी शब्द के अर्थ को बोध करने वाला शक्ति अर्थात् शब्द-शक्ति भिन्न-भिन्न रूपों (प्रक्रियाओं) में काम करती है। ऊपर दिए गए ‘फूल’ वाले उदाहरण से स्पष्ट है कि शब्द शक्ति से संदर्भ में शब्द मुख्यतः तीन स्तरों में विभाजित हो सकते हैं-

  • ‘वाच्यार्थ’ का बोध कराने वाले शब्द ‘वाचक’।
  • ‘लक्ष्यार्थ’ का बोध कराने वाले शब्द ‘लक्षक’।
  • ‘व्यंग्यार्थ’ का बोध कराने वाले शब्द ‘व्यंजक’।

पहले स्तर का अर्थ-व्यापार ‘अभिधा’ शब्द-शक्ति का है, दूसरे स्तर का व्यापार ‘लक्षणा’ शब्द-शक्ति का तथा तीसरे स्तर का व्यापार ‘व्यंजना’ शब्द-शक्ति का है। इसी आधार पर ‘शब्द-शक्ति के तीन भेद माने जाते हैं-

  • अभिधा,
  • लक्षणा,
  • व्यंजना।

अभिधा शब्द-शक्ति-‘शब्द के जिस व्यापार या सामर्थ्य से उसके स्वाभाविक (प्रसिद्ध, मुख्य या प्रचलित) अर्थ का बोध होता है, उसे ‘अभिधा’ शब्द-शक्ति कहते हैं।

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‘अभिधा’ शब्द-शक्ति से प्राप्त अर्थ ‘वाच्यार्थ’ या ‘मुख्यार्थ’ तथा ऐसे अर्थ का बोध कराने वाला शब्द ‘वाचक’ शब्द कहलाता है। जैसे-

पंचवटी की छाया में है सुंदर पर्ण-कुटीर बना,
उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर धीर वीर निर्भीक मना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर जबकि भुवन पर सोता है। (मैथिलीशरण गुप्त, पंचवटी)

इन पंक्तियों के सभी शब्द ‘वाचक’ हैं और उनसे मुख्यार्थ या वाच्यार्थ (स्वाभाविक, प्रसिद्ध या प्रचलित अर्थ) का बोध होता है। अतः यहाँ ‘अभिधा’ शब्द-शक्ति है।

लक्षणा शब्द-शक्ति-‘शब्द’ के जिस व्यापार (सामर्थ्य) से, ज्ञात मुख्यार्थ में बोध होने पर, लक्षण के आधार पर किसी अन्य अर्थ का बोध होता है उसे ‘लक्षणा’ शब्द-शक्ति कहते हैं।

‘लक्षणा’ शब्द-शक्ति से ज्ञात अर्थ ‘लक्ष्यार्थ’ तथा उसका बोध कराने वाला शब्द ‘लक्षक’ कहलाता है।जैसे-

सपने में तुम नित आते हो, मैं हूँ अति सुख पाती।
मिलने को उठती हूँ, सौतन आँख प्रथम उठ जाती। (रामनरेश त्रिपाठी)

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‘आँख’ जो स्त्री नहीं, सो वह सौत हो सकती है। प्राणी सोता या जागता (उठता) है, आँख नहीं। इस प्रकार, यहाँ आँख उठ जाती के वाच्यार्थ में बोध है। तब हम ‘सौत’ के लक्षण द्वारा यह लक्ष्यार्थ मालूम करते हैं कि जिस प्रकार किसी स्त्री की सौत (पति की दूसरी पत्नी) उसे पति से मिलने में बाधक बनती है, उसी प्रकार इस कविता में दुखी नायिका को स्वप्न में भी प्रिय-मिलन का सुख अनुभव करने में उसकी आँख बाधक बन जाती है, क्योंकि स्वप्न के समय आँखें बंद होती हैं। नायिका स्वपन में प्रिय को देखकर ज्यों ही उससे मिलने के लिए उठती है तभी आँखें खुल जाती हैं। नायिका का सुख दुःख में बदल जाता है। इस प्रकार, यहाँ ‘लक्षण’ शब्द ‘सौतन’ तथा ‘आँख उठ जाती’ द्वारा लक्ष्यार्थ की प्रतीति हुई है, अतः, “लक्षणा’ शब्द-शक्ति है।

इस विवेचन से स्पष्ट है कि ‘लक्षणा’ शब्द-शक्ति के व्यापार में क्रमशः दो बातें आवश्यक हैं-

  • मुख्यार्थ में बाधा होना, अर्थात् प्रसिद्ध अर्थ का असंगत प्रतीत होना।।
  • लक्षक शब्द के मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ में लक्षण (गुण-स्वभाव आदि की विशेषता) का साम्य होना।

ऊपर के उदाहरण में ‘आँख उठ जाना’ के मुख्यार्थ में बाधक स्पष्ट है-आँख उठती-बैठती जागती-सोती नहीं। यह तो प्राणी के स्वभाव या लक्षण है। फिर सौत के स्वभाव (नायिका के पति-मिलन के सुख में रुकावट डालकर उसे और सताने) तथा ‘आँख के उठ जाने’ के परिणाम में साम्य है। इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण है-

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तलवारों का प्यास बुझाता, केवल तलवारों का पानी।  – (सोहनलाल द्विवेदी, भैरवी)

तलवार कोई ऐसी प्राणी नहीं जिसे प्यास लगे। न तलवार में पानी (जल) होता है जो किसी की प्यास बुझाता है। तलवार का लक्षण (स्वभाव, पहचान) है-वैरी पर वार कर लहू बहाना। यह कार्य तलवार स्वयं नहीं करती, उसे थामने या चलाने वाला वीर योद्धा करता है। उसका जवाब भी कोई वीर-योद्धा ही देकर विरोधी की युद्ध संबंधी इच्छा (प्यास) पूरी करता है। इस तरह यहाँ ‘तलवार प्यास और पानी-लक्षण’ शब्द हैं जिनसे उपर्युक्त लक्ष्यार्थ की प्राप्ति हुई है।

व्यंजना शब्द-शक्ति-‘शब्द के जिस व्यापार का सामर्थ्य से, उसके मुख्यार्थ (वाच्य या प्रसिद्ध अर्थ) अथवा लक्ष्यार्थ से भिन्न किसी अन्य, विशेष, गूढ़ या प्रतीयमान अर्थ का बोध होता है उसे ‘व्यंजना’ शब्द-शक्ति कहते हैं।

व्यंजना शब्द-शक्ति वहाँ होती है जहाँ अभिप्रेत अर्थ स्पष्ट ज्ञात न होकर, प्रकारांतर से सांकेतिक या व्यजित होता है। अत: व्यंजना से प्रतीत होने वाला अर्थ ‘व्यंग्यार्थ’ तथा. व्यंजना-शब्द-शक्ति से युक्त शब्द ‘व्यंजक’ कहलाता है।

उदाहरण-
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।।

यहाँ मुख्य (वाक्य) अर्थ यह है कि ‘संत कबीर चलती हुई चक्की को देखकर अत्यंत दुखी हैं, क्योंकि चक्की के दोनों पाटों के बीच में आने वाला कोई भी (दाना) बिना पिसे नहीं रह सकता। यह मुख्यार्थ साधारण है। कवि का अभिप्राय चक्की में पाटों द्वारा अनाज के दानों के पीसे जाने की प्रक्रिया बताना नहीं है-इसे तो सभी जानते हैं। कवि का अभीष्ट अथवा प्रतीयमान अर्थ यह है कि ‘संसार चक्की के समान है।

दिन और रात, या जन्म और मृत्यु इसके दो पाट हैं। इनके बीच फंस जाने के बाद कोई भी जीवन सुरक्षित नहीं रह पाता। व्यंग्यार्थ यह है कि ‘संसार नश्वर है जन्म और मृत्यु के चक्र से कोई भी बच नहीं सकता। ‘चक्की’ और ‘पाट’ ‘व्यंजक’ शब्द है।

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इसी प्रकार-

अबला जीवन हाय ! तुम्हारा यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।  –(मैथिलीशरण गुप्त)

इन पंक्तियों का मुख्य या वाच्य (ज्ञात) अर्थ है-‘हे नारी ! तेरी कहानी बस इतनी-सी है कि तुम्हारे अंचल (वक्ष या स्तनों) में दूध और आँखों पानी है।’ कवि का अभिप्रेत अर्थ इतना ही नहीं। छुपा हुआ (व्यंग्य) अर्थात् प्रतीयमान अथवा अभीष्ट (व्यंजित) अर्थ यह है कि ‘समाज -: में नारी महा-महिमामयी होते हुए भी सदा असहाय, उपेक्षित और अशक्त ही रहती है।

उसके अंत:करण में परिवार-समाज के लिए ममत्व, स्नेह, समर्पण, सौहार्द का ही स्रोत बहता है। वह जीवन भर ममता का अमृत प्रदान करती है। किन्तु बदले में उसे मिलता क्या है-उपेक्षा, तिरस्कार, शोषण, अन्याय और स्वार्थ के रूप में जीवन भर तड़पते हुए रोते रहना, आहें भरकर तिल-तिल जलते रहना।’ इस मार्मिक अर्थ की व्यंजना (प्रतीति) कराने वाले ‘व्यंजक’ शब्द हैं-

  • ‘अंचल पें है दूध’
  • ‘आँखों में पानी’।

क्रमशः इनका व्यंग्यार्थ यातना, आहे और सिसकियाँ।

प्रश्न 3.
‘लक्षण’ और ‘व्यंजना’ शब्द-शक्ति में क्या अंतर है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
लक्षण और व्यंजना दोनों शब्द-शक्तियाँ साधारण रूप से जाने-पहचाने, मुख्य अथवा वाच्य अर्थ से कुछ अलग, भिन्न अर्थ का बोध कराती है, इसलिए इन दोनों की अलग-अलग पहचान में कई बार भ्रांति या कठिनाई की संभावना रहती है। दोनों के स्वरूप को पृथक रूप से स्पष्ट करने के लिए, दोनों की निम्नलिखित भिन्नताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है

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(1) लक्षण’ शब्द-शक्ति का अस्तित्व वही मानना चाहिए जहाँ मुख्य (वाक्य या प्रसिद्ध) अर्थ में बाधा (असंगति) हो। ‘व्यंजना’ शब्द-शक्ति के अंतर्गत मुख्यार्थ या वाच्यार्थ में बाधा (असंगति) नहीं होती, अर्थात् मुख्य या वाच्य अर्थ असंगत, असंभव, या असंबद्ध प्रतीत नहीं होता। जैसे-

अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी।  –(सूरदास, भ्रमरगीत)

आँखों का भूखा होना संभव नहीं है, वे आहार नहीं करतीं। इस प्रकार ‘भूखी’ शब्द लक्षक है जिसका मुख्य अर्थ ‘खाने को व्याकुल होना’ बाधित अर्थात् असंभव, ‘असंगत या असंबद्ध है। इस असंगति को देखकर ही हम ‘भूख’ के लक्षण ‘व्याकुलता’, ‘उत्सुकता’, ‘तड़प’, ‘तीव्र लालसा’ के आधार पर यह लक्ष्यार्थ प्राप्त करते हैं कि ‘आँखें कृष्ण को देखने के लिए व्याकुल हैं।’

दूसरे ओर व्यंजना के अंतर्गत मुख्य (वाच्य) अर्थ का बाधिक (असंगत) होना वांछनीय नहीं जैसे-

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंक्षी को छाया नहीं फल लागै अति दूर॥ –(कबीर)

मुख्यार्थ स्पष्ट है-‘खजूर के पेड़ की तरह लंबा होने का क्या महत्त्व है? न तो वह पथिक को छाया दे सकता है और न ही आसानी से उसके फल को प्राप्त कर स्वाद लिया जा सकता है।’ यह अर्थ के रहते हुए भी एक अन्य छिपे हुए, गूढ (व्यंग्य) या प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति संभव है-‘केवल ऊँचा खानदान होने से ही कोई महान नहीं बन सकता, जब तक कि कोई दूसरों को सुख-सहानुभूति और उपकार-सहायता न दे।’

(2) इसी उदाहरण के आधार पर ‘लक्षण’ और ‘व्यंजना’ शब्द-शक्तियों में एक अन्य अंतर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ‘लक्षण’ शब्द-शक्ति के अंतर्गत तो मुख्य (वाच्य या प्रसिद्ध, ज्ञात) अर्थ तभी लक्ष्य (लक्षित) अर्थ में गुण, स्वभाव या लक्षण संबंधी कोई-न-कोई पारस्परिक संबंध होता है जबकि ‘व्यंजना में ‘मुख्यार्थ’ और ‘व्यंग्यार्थ’ में परस्पर संबंध होना आवश्यक नहीं। जैसे

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फूल काँटों में खिला था, से पर मुरझा गया। -(रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल)

यहाँ व्यंग्यार्थ अर्थात् प्रतीयमान अर्थ यह है कि ‘जीवन संघर्षों और कष्टों से गुजर कर ही . सार्थक और सुखी होता है। ऐश-आराम में मस्त हो जाने पर जीवन की सार्थकता समाप्त हो जाती है। आलस्य, प्रमाद और निष्क्रियता से वह निरर्थक-सा हो जाता है।’ फूल, कांटा, खिलना, मुराना आदि के मुख्य अर्थ से इस प्रतीयमान अर्थ का कोई स्वभाव, लक्षण या गुण संबंधी साम्य नहीं।

(3) लक्षण’ और ‘व्यंजना’ के अंतर को स्पष्ट करने वाला एक अन्य मुख्य तथ्य यह है . कि ‘लक्षण’ द्वारा केवल किसी एक लक्ष्यार्थ का बोध होता है, जबकि व्यंजना शब्द-शक्ति द्वारा एक ही कथन या शब्द के अनेक अर्थों की प्रतीति की जा सकती है। हर सहृदय पाठक का श्रोता अपनी मन:स्थिति, रुचि या प्रवृत्ति के अनुसार प्रतीयमान (अभिप्रेत) अर्थ को प्रतीति कर सकता है।

जैसे-
खून खौलने लगा वीर का, देख-देखकर न संहार।
नाच रही सर्वत्र मौत थी, गूंज रहा था हाहकार॥

खौलनां पानी या दूध का स्वभाव है, नाचना प्राणी का लक्षण है, गूंजना संगीत का। यहाँ मुख्यार्थ में बाँधता (असंगति) स्पष्ट है। लक्ष्यार्थ है-वीर को क्रोध की अनुभूति, असंख्य लोगों की पल-पल मौत और रुदन-चीत्कार की आवाजों का शोर। लक्षण द्वारा प्राप्त यह अर्थ ही ग्राह्य है, अन्य कोई अर्थ संभव नहीं। परंतु नीचे दिए गए उदाहरण में ‘श्याम घटाएँ देखकर मन के उल्लसित होने’ के अनेक प्रतीयमान अर्थ (व्यंग्यार्थ) संभव हैं-

श्यामा घटा अवलोक नाचता।
मन-मयूर था उसका॥

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राधा का किसी गोपी अथवा अन्य किसी कृष्णभक्त के लिए श्याम घटा श्रीकृष्ण की मोहिनी साँवली सूरत की अनुभूति का आभास दे सकती है। यदि कृषक का मन उल्लास से भर रहा है तो श्याम घटाएँ उसे अपनी अब तक की सूखी धरती में धन-धान्य की हरियाली की आशा बँधा रही हैं। तपती दुपहरी में, पसीने से सरोबार थका मुसाफिर श्याम घटाओं में सुखद राहत की अनुभूति कर सकता है।

इस प्रकार, ‘लक्षण’ और ‘व्यंजना’ शब्द-शक्ति के अस्तित्व की पहचान वास्तव में कथन के संदर्भ के आधार पर की जा सकती है। किसी ‘एक शब्द’ का लक्ष्यार्थ या व्यंग्यार्थ कथन में प्रस्तुत भाषिक संरचना के स्वरूप के अनुसार ग्रहण किया जा सकता है।

रस-ध्वनि

प्रश्न 1.
रस का स्वरूप स्पष्ट करते हुए, काव्य में उसका स्थान और महत्त्व निर्धारित कीजिए।
अथवा,
रस की परिभाषा देकर स्पष्ट कीजिए कि काव्य में रस की क्या स्थिति है?
अथवा,
रस का तात्पर्य क्या है? काव्य के अंतर्गत रस-व्यंजन का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए उसके स्वरूप पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
‘रस’ शब्द का सामान्य प्रचलित अर्थ है-आनंद, स्वाद, सुख या मजा। यह अर्थ लौकिक जीवन में मानव-शरीर को अनुभव होने वाली सुविधाओं से मिलने वाली खुशी से संबंधित है। जैसे-‘कोई दृश्य देखकर हमें बड़ा ‘मजा’ आया।’ ‘अमुक गीत सुनकर कानों में मानों’ ‘रस’ घुल गया’ आदि। परंतु काव्य के अंतर्गत ‘रस’ का अभिप्राय’ एक विशेष प्रकार का अलौकिक आनंद’ है।

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काव्य का आनंद व्यक्ति, स्थान या समय की सीमा में नहीं बंधा रहता। वह शाश्वत, सार्वभौम, सार्वकालिक तथा सार्वजनीत होता है। कालिदास के नाटक, बाल्मीकि के श्लोक, कबीर के पद, तुलसी के दोहे या प्रसाद, पंत आदि के गीत किसी भी युग के, किसी भी वर्ग के पाठक या श्रोता के अंत:करण को समान तृप्ति प्रदान करते हैं। एक प्राचीन ग्रंथ में कहा गया है-“जिस प्रकार एक ब्रह्मयोगी साधक को, साधना के चरम बिन्दु पर पहुँचने के बाद मिलने वाली आत्मानंद की अनुभूति अनिर्वचनीय और अलौकिक होती है उसी प्रकार काव्य द्वारा मिलने वाला आंतरिक आनंद (काव्यास्वाद अर्थात् काव्य का आसवादन) भी अलौकिक होता है।”

संस्कृत के प्राचीन आचार्य भरत ने उचित ही कहा है कि ‘रस के बिना अर्थ-अनुभूति का प्रवर्तन संभव नहीं।’

स्वरूप-संक्षेप में कहें, तो ‘काव्य-अध्ययन’ से अनुभूति होने वाला अलौकिक आंतरिक आस्वाद ही रस है। ‘इस संबंध में ध्यान देने की बात यह है कि काव्य द्वारा उद्भूत अलौकिक आनंदानुभूति का कोई-न-कोई आधारभूत ‘कारण’ होना आवश्यक है। उस ‘कारण’ के साथ कुछ सहायक ‘परिस्थितियाँ’, मिलकर उसे विशेष प्रभावशाली बना देती है। इन दोनों के माध्यम से अंत:करण में अनेक भाव-तरंगों की ‘हलचल’ शुरू हो जाती है।

यह ‘हलचल’ काव्य के पाठक या श्रोता (दर्शक) के हृदय में एक ऐसी विशिष्ट ‘रागात्मक संवेदना’ को जागृत कर देती है जो अंतत: एक ‘अलौकिक आनंद’ का रूप ले लेती है। – इस प्रकार काव्य में निहित अलौकिक आस्वाद (रस) की अभिव्यंजना मुख्य रूप से इन चार घटकों पर आधारित है-कारण, उसमें सहायक परिस्थितियाँ, उनके प्रभाव से होने वाली हलचल सम्म तथा उसके परिणामस्वरूप किसी विशिष्ट रागात्मक संवेदना का आस्वाद।

इन्हीं को प्राचीन आचार्यों ने साहित्यशास्त्र की शब्दावली में क्रमशः विभाव, अनुभव, संचारी भाव तथा स्थायी भाव कहा है। इसी आधार पर भारत के सर्वप्रथम साहित्यशास्त्रीय आचार्य भरत ने अपने नाट्य-शास्त्र’ नामक ग्रंथ में ‘रस’ की यह परिभाषा प्रस्तुत की है

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“विभावानुभावसंचारी संयोगात् रसनिष्पत्तिः” अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी (भाव) के संयोग से रस की निष्पत्ति (अर्थात् व्यंजना) होती है।

इस परिभाषा में यद्यपि ‘स्थायी भाव’ का उल्लेख नहीं है, तथापि भरत ने बाद में, उक्त परिभाषा को स्पष्ट करते हुए, स्थायी भाव का भी अलग से विवेचन कर दिया है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर रस के स्वरूप को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है … “विभाव अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध (जागृत या अभिव्यक्त) होने वाले स्थायी भाव के आस्वाद को ‘रस’ कहते हैं।

एक उदाहरण के माध्यम से ‘रस’ के उपर्युक्त स्वरूप को सरलतापूर्वक स्पष्ट किया जा सकता है-

खेलत हरि निकसब्रज-खोरी।
कटि कछनी पीताम्बर बाँधे, हाथ लिए भौरा चक डोरी।
गए स्याम रवि-तनया के तट, अंग लसत चंदन की खोरी॥
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिए रोरी।
सूर स्याम देखत ही रीझे, नैन-नैन मिलि परी डगोरी॥  –(सूरदास, साहित्य-मंजूषा, भाग-1)

यहाँ कृष्ण और राधा “विभाव’ अर्थात् भाव के कारण है। कृष्ण का फिरकी, लटू आदि घुमाना ‘अभुभाव’ है। उनके हृदय में राधा को देखकर उठने वाले आकर्षण, औत्सुक्य, हर्ष आदि ‘संचारी भाव’ हैं। दोनों का परस्पर प्रेम (आकर्षण) अथवा ‘रति’ स्थायीभाव है जिससे ‘शृंगार’ रस की अभिव्यंजना हुई है।

रस की काव्य में स्थिति अथवा महता

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‘अग्नि पुराण’ में कहा गया है कि “काव्य में भाषा का चाहे जितना भी चमत्कार हो, परंतु उसका जीवन तो रस ही है।” आचार्य वामन कहते हैं कि ‘काव्य की वास्तविक दीप्ति, चमत्कृति या क्रांति उसके रसत्व में ही निहित हैं।” एक अन्य प्रसिद्ध साहित्याशास्त्रीय आचार्य विश्वनाथ ने ‘काव्य का स्वरूप’ ही ‘रसात्मक’ बताते हुए कहा है कि-‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ अर्थात् रसात्मक रचना ही काव्य है।

स्पष्टतया ‘रस’ काव्य की आत्मा है। काव्य को पढ़ते, सुनते अथवा दृश्य काव्य (नाटक आदि) के रूप में देखते समय हमारा हृदय जो एक विशेष का आंतरिक ‘अलौकिक संतोष, तृप्ति भाव या आस्वाद अनुभव करता है, वही एक विशिष्ट साँचे में ढलकर, साहित्य-शास्त्र की शब्दावली में ‘रस’ कहलाता है।

काव्य में चित्रित अनुभूतियों से जब हमारे अंत:करण की अनुभूतियाँ एकरूप होकर, परस्पर एकरस होकर, हमारे मन-मस्तिष्क को एक आंतरिक तृप्ति का अनुभव या अस्वाद कराती है तब हम ‘व्यक्ति’ मात्र न रहकर रचनाकार, रचना और उसमें विद्यमान पात्रों तथा उस रचना के असंख्य पाठकों, श्रोताओं या दर्शकों जैसा ही सामान्य सहृदय मानव-रूप हो जाते हैं। तब हम आयु, वर्ग, जाति, देश और काल की सीमाओं में बंधे नहीं रहते। हम मानव-मात्र के रूप में प्रेम, करुणा, उत्साह आदि भावों के आस्वाद में निमग्न, तनमय और आत्मविभोर हो जाते हैं।

यही निमग्नता, तन्मयता, आत्मविभोरता काव्य के आस्वाद अथवा ‘रस’ के रूप में अभिव्यक्त होती है। स्पष्ट है कि ‘रस”काव्य का प्राण-तत्त्व है। काव्य-सौष्ठव के अन्य विविध आयाम, उपकरण अथवा माध्यम इसी के द्वारा संचालित अथवा संचालित होते हैं। उदाहरणतया किसी प्राण-हीन शरीर का रंग-रूप, अलंकरण सौष्ठव आदि निरर्थक है। यह निर्जीव है। उसी प्रकार रंस-व्यंजना के अभाव में काव्य-शोभा के अन्य प्रतिमान निरर्थक हैं।

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प्रश्न 2.
‘रस के अंग’ से क्या अभिप्राय है? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर-
जिस प्रकार मानव-शरीर का संचालन उसके विभिन्न अंगों के माध्यम से संभव है उसी प्रकार रस की परिपूर्णता अर्थात् अभिव्यंजना उसके विभिन्न अंगों के संयोग-सामंजस्य पर आधारित है। ‘रस’ यदि काव्य की आत्मा है, तो ‘भाव’ रस का आधारभूत तत्त्व है। वहीं (भाव) अनेक रूपों, स्थितियों आदि के सोपान करता हुआ, अंततोगत्वा ‘रस-निष्पत्ति’ (रस की अभिव्यंजना) अथवा रसास्वाद की अवस्था तक पहुंचता है। आचार्य भरत ने ‘नाट्यशास्त्र’ में इस प्रक्रिया को एक दृष्टांत के माध्यप से समझाते हुए कहा है-

“जिस प्रकार बीज से वृक्ष, वृक्ष से पत्र-पुष्प, फल का उद्भव होता है उसी प्रकार भाव से रस और रस से अन्य भाव व्यवस्थित होते हैं?”

‘भाव’ से मुख्य रूप से चार स्थितियों या रूपों के माध्यम से ‘रस’ की अवस्था प्राप्त करता है। इन्हीं को साहित्य शास्त्रीय आचार्यों ने ‘रस के चार अंग’ कहा है-

  • विभाव,
  • अनुभाव,
  • संचारी भाव,
  • स्थायी भाव।

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(रस की परिभाषा भी इन्हीं चार अंगों के आधार पर की गई है-“विभाव, अनुभाव और संचारी’ भाव के संयोग से अभिव्यक्त होने वाले स्थायी भाव को ‘रस’ कहते हैं।

(1) विभाव-‘विभाव’ का अभिप्राय है-‘कारण’ अथवा ‘निमित्त’। इस आधार पर कहा जा सकता है कि “विभाव के कारण या निमित्त हैं जो काव्य, नाटक आदि में अंतःकरण की रागात्मक’ संवेदनाओं को तरंगित (उद्बुद्ध, जागृत) करते हैं।”

काव्य-रूप भाव अर्थात् ‘विभाव’ के दो पक्ष स्पष्ट हैं-एक वह जो प्रवृत्त करता है अर्थात् ‘प्रवृति का कारण’ है। दूसरा वह जो प्रवृत्ति होता है अर्थात् ‘प्रवृति से प्रेरित’ है। इन्हीं दोनों पक्षों को साहित्यशास्त्र की शब्दावली में
(1) आलंबन विभाव और
(2) आश्रय विभाव कहा जाता है।

(1) आलंबन विभाव-जो भाव की प्रवृत्ति का मूल कारण हो उसे ‘आलंबन विभाव’ कहते हैं।
(2) आश्रम विभाव-जो आलंबन की ओर प्रवृत्त होने वाला कारण है उसे ‘आश्रय विभाव’ कहते हैं।

‘विभाव’ के उपर्युक्त दोनों पक्षों के अतिरिक्त एक अन्य सहायक पक्ष भी है-‘उद्दीपन विभाव’। उद्दीपन का अभिप्राय है-उद्दीप्त अर्थात् प्रोत्साहित करने अर्थात् प्रवृत्ति को बढ़ाने में सहायक होने वाला।
इस प्रकार ‘विभाव’ के अंतर्गत क्रमशः आलंबन, आश्रय और उद्दीपन-इन तीनों की स्थिति रहती है।

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एक उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जाएगी-

खेलत हरि निकसे ब्रज-खोरी।।
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिए भौंरा, चक, डोरी॥
मोर-मुकुट, कुंडल सवननि बर, दसन-दमक दामिनी-छवि छोरी॥
गए स्याम रवि-तनया के तट, अंग लसंति चंदन की खोरी॥
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिए रोरी॥
नील बसन फरिया कट पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी॥
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरि, अति छबि तन-गोरी।
सूर स्याम देखत ही रीझै, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी॥  – (सूरदास, साहित्य-मंजूषा, भाग-1)

यह शृंगार-रस का उदाहरण है। इसमें राधा आलंबन विभाव है। वह हरि (कृष्ण या श्याम) की आकर्षण (प्रेम)-प्रवृत्ति का कारण है। हरि आश्रय विभाव है। यह राधा के आकर्षण भाव से प्रेरित या प्रभावित है। यमुना का तट, राधा की बड़ी आँखें, मस्तक की रोली, नीली लहंगा, झूलती हुई आदि उद्दीपन विभाव हैं। ये आकर्षण (प्रेम)-भाव को उद्दीप्त करने वाले तत्त्व हैं।

(2) अनुभाव-‘अनुभाव’ का अभिप्राय है-‘पीछे (अर्थात् विभाव के पश्चात्) आने वाला भाव’ (अनु + भाव)। आश्रय जब आलंबन के प्रति प्रवृत्त होता है तब उसके द्वारा अनायास या सायाम (अपने-आप ही अथवा प्रयत्न करने पर) कुछ ऐसे हाव-भाव, चेष्टाएँ आदि होती हैं जो आकर्षण (प्रेम) की सांकेतिका या परिचायक होती है। यही ‘आश्रय की चेष्टाएँ (हाव-भाव आदि) ‘अनुभाव’ कहलाती है। साहित्यशास्त्र की शब्दावली में

“भावों का प्रत्यक्ष बोध कराने वाली आश्रय की चेष्टाएँ ‘अनुभाव’ कहलाती है।” उदाहरणतया जनक-वाटिका में सीता श्रीराम की छवि देखते ही मुग्ध हो जाते हैं। राम आलंबन और सीता आश्रय है। सीता राम की छवि बार-बार निहारना चाहती है। वह उपवन में विद्यमान पशु-पक्षियों अथवा पेड़-पौधों को देखने के बहाने बार-बार अपनी दृष्टि पीछे की ओर घुमाती है-

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नख-सिख देखि राम कै सोभा
परबस सिखिन्ह लखी जब सीता
देखन मिस मृग बिहग तरु, फिरइ बहोरि बहोरि।
निरखि-निरखि रघुवीर छवि बाढ़ई प्रीति न थोरि।

यहाँ सीता (आश्रय) का पीछे मुड़ना, नजरें घुमा-घुमाकर देखना आदि चेष्टाएँ ‘अनुभाव’ कहलाएंगी।)

(3) संचारी भाव-‘संचारी’ शब्द का अर्थ है-‘संचरण करने वाले’ अर्थात् ‘चलते रहने वाले’ (बार-बार प्रकट-अप्रकट होते रहने वाले), अस्थिर या चंचल। ये भाव किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक रस में संचरण करते हैं, जैसे ‘हर्ष’ नामक भाव ‘अद्भुत’ रस (विस्मय स्थायी भाव) में भी रहता है, ‘शृंगार’ रस में भी और ‘हास्य’ रस में भी। अत: ‘हर्ष’ की गणना संचारी भाव में की जाती है।

इसी प्रकार वैराग्य, ग्लानि, आलस्य, चिंता, मोह, स्मृति, लज्जा, गर्व, उत्सुकता, उन्माद आदि संचारी भाव हैं। इनका संचरण समय और स्थिति के अनुसार किसी भी रस में हो सकता है। इसी आधार पर “अंत:करण की अस्थिर (चंचल) प्रवृत्तियों या समय और स्थिति के अनुसार सभी रसों में संचरण करते रहने वाले भावों को संचारी भाव कहते हैं।”

मानव-मन की अस्थिर प्रवृत्तियाँ असंख्य हो सकती हैं। फिर भी काव्य-मर्मज्ञ साहित्यशास्त्रीय आचार्यों ने मुख्यतः तैंतीस (33) संचारी भावों का नामोल्लेख किया है। निम्नलिखित उदाहरण से ‘संचारी भाव’ का स्वरूप स्पष्ट हो जाएगा।

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हरि अपनौ आँगन कछू गावत।
तनक-तनक चरननि सौ नाचत, मनही मनहिं रिझावत।
बाँह उठाए काजरी-धौरी, गैयनि टेरि बुलावत।
कबहुँक बाबा नंद पुकारत, कबहुँक घर में आवत।
माखन तनक आवनै कर लै, तनक बदन में नावत।
कबहुँक चितै प्रतिबिंब खंभ में लोनी लिए खवावत।
दूरि देखति जसुमति यह लीला हरष आनंद बढ़ावत।
सूर स्याम के बाल-चरित, नित नितही देखत भावत॥ – सूरदास साहित्य-मंजूषा भाग-1

यहाँ हरि (शिशु-कृष्ण) आलंबन है। यशोदा (जसुमति) आश्रय है। हर्ष, गर्व, मोह, उत्सुकता, धैर्य आदि संचारी भाव है।

(4) स्थायी भाव-‘स्थायी’ का अभिप्राय है-सदा स्थिर रहने वाले। साहित्यशास्त्र की शब्दावली में कहा जा सकता है कि “जो आंतरीय भाव रस के आस्वाद तक स्थिर रहकर, स्वयं ही रस-रूप में उबुद्ध (अभिव्यक्त) होते हैं उन्हें ‘स्थायी भाव’ कहते हैं।”

ऊपर सूरदास का जो पद दिया गया है उसमें ‘वात्सल्य’ स्थायी भाव है जो कि ‘वात्सल्य’ रस की अभिव्यंजना के रूप में साकार हुआ है।

स्थायी भावों की संख्या अथवा उनके भेदों के संबंध में सर्वप्रथम आचार्य भरत ने अपने नाट्शास्त्र में चर्चा की है। उनके अनुसार स्थायी भाव आठ हैं-रति (स्त्री-पुरुष का प्रेम), हास, शोक, क्रोध, उत्साह, विस्मय, भय, जुगप्सा।

बाद के साहित्यशास्त्रीय आचार्यों ने ‘शम’ नामक नौवें भाव को जोड़कर इस संख्या में एक ही वृद्धि कर दी है। इसके उपरांत श्रीमद्भागवत के प्रभाव से जब काव्य में श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं के हृदयस्पर्शी, सरस चित्रण की परंपरा चली तब ‘वात्सल्य’ का दसवाँ स्थायी भाव स्वीकार कर लिया गया।

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प्रश्न 3.
‘रस’ के विभिनन भेदों का परिचय देते हुए, लक्षण, उदाहरण सहित उनका विवेचना कीजिए।
अथवा,
‘रस’ कितने प्रकार के होते हैं? उनके स्वरूप का लक्षण-उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।
उत्तर-
‘रस’ मूलतः किसी ‘स्थायी भाव’ की अभिव्यंजना के माध्यम से अनुभव किया जाने वाला आस्वाद अथवा अलौकिक आनंद है। अतः ‘रस’ के उतने ही प्रकार या भेद संभव हैं जितने स्थायी भाव हैं। इस दृष्टि से मानव-मन की विविध भाव-तरंगें-जो ‘संचारी भाव’ कहलाती हैं-जब किसी एक मुख्य या ‘विशिष्ट भाव’ में ही समाहित हो जाती है तो वह ‘विशिष्ट या मुख्य भाव’ ही स्थायी भाव होकर रस-व्यंजना का आधार बनता है। . भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा में सर्वप्रथम उल्लेखनीय नाम आचार्य भरत तथा उनके ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ का है।

उन्होंने स्थायी भावों की संख्या आठ बताते हुए, आठ ही रसों का उल्लेख किया है- शृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत। भरत ने रसों के ये (आठ) भेद मूलतः दृश्यकाव्य (नाटक आदि) के संदर्भ में ही प्रस्तुत किए। बाद में श्रव्यकाव्य के अन्य रूपों (प्रबंधकाव्य, कथा काव्य आदि) के संदर्भ में ‘शांत’ रस को भी मान्यता मिली। तदुपरांत, भक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप, श्रीमद्भागवत के आधार पर श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को हृदयस्पर्शी, सरस-चित्रण काव्य का एक प्रमुख विषय बन गया। तब ‘वात्सल्य’ नामक दसवें रस की भी गणना होने लगी।

‘रस की परिभाषा’ एवं उसके ‘स्वरूप’ के अंतर्गत स्पष्ट हो चुका है-स्थायी भाव ही रस के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। तदनुसार दस स्थायी भावों तथा उनसे उबुद्ध होने वाले रसों की क्रम-तालिका इस प्रकार है-

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हम यदि ‘रस’ की मूल परिभाषा पर ध्यान दें तो उपर्युक्त सभी (दस) रसों की परिभाषा निर्धारित करना अत्यंत सरल प्रतीत होगा।

रस की परिभाषा इस प्रकार है-

“विभव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से अभिव्यक्त होने वाले स्थायी भाव को ‘रस’ कहते हैं।”

इस परिभाषा में हम जिस स्थायी भाव का उल्लेख करेंगे, उसी से अभिव्यक्त होने वाले संबंधित रस का नाम भी जोड़ देंगे।

जैसे-“विभाव, अनुभव और संचारी भाव के संयोग से अभिव्यक्त (उबुद्ध) होने वाले . ‘रति’ स्थायी भाव से ‘ श्रृंगार’ रस की व्यंजना होती है।” अथवा ………………………

“उत्साह” स्थायी भाव से ‘वीर’ रस की व्यंजना होती है।”

इसी प्रकार परस्पर संबद्ध अन्य सभी स्थायी भावों तथा ‘रसों’ का नामोल्लेख करते हुए अभीष्ट रस की परिभाषा प्रस्तुत की जा सकती है।

यहाँ उपर्युक्त दस रसों का लक्षण-उदाहरण-सहित स्वरूप-विवेचन किया जा रहा है।

श्रृंगार-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध होने वाले ‘रति’ नामक स्थायी भाव से ‘शृंगार’ रस की अभिव्यंजना होती है।”

‘रति’ अर्थात् प्रेमासक्ति की दो स्थितियाँ संभव हैं-

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  • मिलन,
  • विरह।

इसी आधार पर शृंगार रस के दो भेद माने गए हैं-

  • संयोग शृंगार,
  • वियोग शृंगार।

संयोग श्रृंगार-विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से नायक-नायिका के मिलन के रूप में उबुद्ध स्थायी भाव से ‘संयोग शृंगार’ की अभिव्यक्ति होती है। जैसे-

दुलह श्री रघुवीर बने, दुलही सिय सुंदर मंदिर माहीं।
गावत गीत सबै मिलि सुंदरि, वेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं॥
राम को रूप निहारित जानकी, कंचन के नग की परछाहीं।
या ते सबै सुधि भूलि गईं, कर देखि रही, पल टारत नाहीं। – (तुलसीदास, कवितावली)

यहाँ श्रीराम और सीमा ‘विभाव’ है। राम ‘आलंबन’ है। सजा हुआ मंडप, सुंदरियों के गीत, वेदमंत्रों का पाठ आदि ‘उद्दीपन’ विभाव है। सीता ‘आश्रय’ विभाव है। सीता का नग में राम का झलक देखना, देखते रह जाना, सुध-बुध भूल जाना, हाथ न छोड़ना आदि अनुभाव हैं। हर्ष, विस्मय, क्रीड़ा, अपस्मार, आवेग, मोह आदि संचारी भाव हैं और ‘रति’ स्थायी भाव है जो मिलन-आनंद के संयोग से ‘संयोग शृंगार’ के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है।”

वियोग श्रृंगार की स्थिति वहाँ होती है जहाँ ‘रति’ भाव नायक-नायिका के परस्पर अलग (बिछुड़े हुए) होने के रूप में विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से रंस-रूप में अभिव्यक्त होता है।” जैसे-

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रो रो चिंता सहित दिन को राधिका थीं बिताती।
आँखों को थी सजल रखतीं, उन्मना थीं दिखातीं॥
शोभा वाले जलद-वपु को हो रही चातकी थीं।
उत्कंठा थी पर न प्रबला वेदना वद्धिता थी।  – (अयोध्या प्रसाद हरिऔध, प्रियप्रवास)

यहाँ राधा आश्रय विभाव और श्रीकृष्ण आलंबन विभाव हैं (जो गोकुल-वृंदावन छोड़कर मथुरा जा बसे हैं)। राधा का रोना, आँखें सजल रखना, बादलों की ओर (उनमें कृष्ण के साँवले शरीर की झलक पाकर) टकटकी बाँधे रखना आदि अनुभाव हैं.। शंका, दैन्य, चिन्ता, स्मृति, जड़ता, विषाद, व्याधि, उन्माद आदि संचारी भाव हैं। इनके संयोग से ‘रति’ स्थायी भाव प्रिय विरह की वेदना के कारण ‘वियोग शृंगार’ के रूप में अभिव्यक्त हुआ है।

हास्य-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से संयोग से उबुद्ध होने वाले ‘हास’ स्थायी भाव से ‘हास्य’ रस की अभिव्यक्ति होती है।” जैसे-

जब सुख का नींद कढ़ा तकिया, इस सिर के नीचे आता है।
तो सच कहता हूँ-इस सिर में, इंजन जैसे लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ बुद्धि भी फक-फक करती है।।
सपनों से स्टेशन लाँघ-लाँघ, मस्ती का मंजिल दिखती है।

यहाँ कवि का कथन ही आलंबन और पाठक-श्रोता आश्रय है। कवि कविता पढ़ते समय तकिए पर सिर टिकाने, आँखें बंद करके झूमने आदि का जो अभिनय करेगा वह ‘उद्दीपन’ विभाव होगा। कविता पढ़ या सुन कर हमारा मुस्काना, ‘वाह वाह !’ करना, झूमना आदि अनुभाव हैं। चपलता, हर्ष, आवेग, औत्सुक्य आदि संचारी भाव है। इनके संयोग से ‘हास’ स्थायी भाव की ‘हास्य’ रस के रूप में निष्पत्ति हुई है।

रौद्र-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध होने वाले ‘क्रोध’ स्थायी भाव से ‘रौद्र’ रस की निष्पत्ति (अभिव्यक्ति) होती है।’

जैसे-
फिर दुष्ट दुःशासन समर में शीघ्रग सम्मुख हो गया !
अभिमन्यु उसको देखते ही क्रोध से जलने लगा!
निःश्वास बारंबार उसका उष्णत चलने लगा!
रे रे नराधम नारकी ! तू था बता अब तक कहाँ?
मैं खोजता फिरता तुझे सब ओर कब से हूँ यहाँ !
मेरे करों से अब तुझे कोई बचा सकता नहीं !
पर देखना, रण-भूमि से तू भाग जाना मत कहीं ! – (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ-वध)

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यहाँ अभिमन्यु आश्रय विभाव तथा दुःशासन आलंबन-विभाव है। युद्ध का वातावरण ‘उद्दीपन’ विभाव है। अभिमन्यु का जलना, बार-बार गरम श्वास छोड़ना और कठोर वचन कहना आदि अनुभव है। असूया, अमर्ष, श्रम, धृति, चपलता, गर्व, उग्रता आदि संचारी भाव हैं। इनके संयोग से उबुद्ध ‘क्रोध’ स्थायी भाव से ‘रौद्र’ रस की निष्पत्ति (व्यंजना) हुई है।

करुण-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘शोक’ स्थायी भाव से ‘करुण’ रस की अभिव्यक्ति होती है।” जैसे-

प्रिय मृत्यु का अप्रिय महासंवाद पाकर विष भरा।
चित्रस्थ-सी निर्जीव मानों रह गई हत उत्तरा।
संज्ञा-रहित तत्काल ही फिर वह धरा पर गिर पड़ी।
उस काल मुर्छा भी अहो! हिकतर हुई उसको बड़ी।  – (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ-वध)

यहाँ उतरा आश्रय विभाव तथा उसका मृतक प्रियतम अभिमन्यु आलंबन विभाव है। दैन्य, चिंता, स्मृति, जड़ता, विषाद, व्याधि, उन्माद, मूर्छा आदि संचारी भाव हैं। इनके संयोग से उबुद्ध ‘शोक’ स्थायी भाव से ‘करुण’ रस की अभिव्यक्ति हुई है।

बीभत्स-“विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘जुगुप्सा’ स्थायी भाव से ‘बीभत्स’ रस की निष्पत्ति (अभिव्यक्ति) होती है।” जैसे-

यज्ञ समाप्त हो चुका, तो भी धधक रही थी ज्वाला।
दारुण दृश्य ! रुधिर के छींटे, अस्थिखंड की माला।
वेदी की निर्मम प्रसन्नता, पशु की कतार वाणी।
मिलकर वातावरण बना था, कोई कुत्सित प्राणी  – (जयशंकर प्रसाद, कामायनी)

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(मनु द्वारा यज्ञ में पशु की बलि चढ़ाए जाने के इस दृश्य में) श्रद्धा आश्रय विभाव तथा यज्ञ की वेदी अलंबन विभाव है। धधकती ज्वाला, लहू के छींटे, हड्डियों की माला, बलि चढ़ाए जाते पशु की घबराई चीख आदि वातावरण ‘उद्दीपन’ विभाव हैं। आँखें मूंदना, नाक-भौंह सिकोड़ना, मुँह फेर लेना, कानों पर हाथ रखना या नासिक के छिद्र बंद कराना आदि अनुभाव होंगे। ग्लानि, चिंता, आवेग, विषाद, त्रास आदि संचारी भाव हैं। इन सब के संयोग से उबद्ध ‘जुगुप्सा’ स्थायी भाव से ‘वीभत्स’ रस की अभिव्यक्ति हुई है।

भयानक-
“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘भय’ स्थायी भाव से ‘भयानक’ रस की निष्पत्ति (अभिव्यक्ति) होती है।” जैसे-

उस सुनसान डगर पर था सन्नाटा चारों ओर,
गहन अँधेरी रात घिरी थी, अभी दूर थी भोर।
सहसा सुनी दहाड़ पथिक ने सिंह-गर्जना भारी,
होश उड़े, सिर गया घूम, हुई शिथिल इंद्रियाँ सारी।

यहाँ पथिक आश्रय विभाग तथा दहाड़ आलंबन विभाव है। सुनसान डगर, सन्नाटा, अंधेरी रात आदि ‘उद्दीपन’ विभाव हैं, होश उड़ जाना, सिर घूमना, इंद्रियाँ शिथिल होना आदि अनुभाव हैं। शंका, दैन्य, चिंता, मोह, जड़ता, विषाद, त्रास आदि संचारी भाव हैं। इन सबके संयोग से उबुद्ध ‘भय’ स्थायी भाव ‘भयानक’ रस के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है।

वीर-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘उत्साह’ स्थायी भाव से अभिव्यक्त होने वाला रस ‘वीर’ रस कहलाता है। जैसे-

जिस वीरता से शत्रुओं का सामना उसने किया।
असमर्थ हो उसके कथन में मौन वाणी ने लिया॥
सब ओर त्यों ही छोड़कर निज प्रखतर शर जाल को।
करने लगा वह वीर व्याकुल शत्रु-सैन्य विशाल हो। – (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ-वध)

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यहाँ अभिमन्यु आश्रय तथा शत्रु (कौरव-दल के सैनिक) आलंबन विभाव हैं। युद्ध का वातावरण ‘उद्दीपन’ विभाव है। अभिमन्यु का इधर-उधर घुमकर बाण छोड़ना आदि अनुभाव है, असूया, श्रम, चपलता, आवेग, अमर्ष, उग्रता आदि संचारी भाव हैं। इन सबके संयोग से उबुद्ध ‘उत्साह’ स्थायी भाव से ‘वीर’ रस की अभिव्यक्ति हुई है।

अद्भुत-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘विस्मय’ स्थायी भाव। से अभिव्यक्ति होने वाला रस ‘अद्भुत’ कहलाता है।” जैसे-

अस जिय जानि जानकी देखी।
प्रभु पलके लखि प्रीति बिसेखी।
गुरुहिं प्रनाम मनहिं मन किन्हा।
अति लाधवं उठाइ धनु लीन्हा।
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ।
पुनि नभ धुनमंडल सम भयऊ।
लेत चढ़ावत बैंचत गाढ़े।
काहू न लखा देख सबु ठाढ़े।
तेहि छन राम मध्य धन तोरा।
भेर भुवन धुनि घोरा कठोरा।  – (तुलसीदास, रामचरितमानस, बालकांड)

यहाँ श्रीराम आलंबन विभाव तथा राजसभा में विद्यमान अन्य सभी आश्रय विभाव हैं। भारी। शिव-धनुष, सीता की व्याकुलता, स्वयंवर-सभा का वातावरण ‘उद्दीपन’ विभाव है। श्रीराम का सीता की ओर निहारना, सहज भाव से धनुष उठाना, फुरती से चिल्ला चढ़ाना, धनुष तोड़ना आदि हर पालन , जोइ कबहुँ अबतावे। अनुभाव हैं। श्रम, धृति, चलता, हर्ष, आवेग, औत्सुक्य मति आदि संचारी भाव हैं। इन सबके संयोग से उबुद्ध ‘विस्मय’ स्थायी भाव की ‘अद्भुत’ रस के रूप में अभिव्यक्ति हुई है।

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शांत-“विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘शम’ (निर्वेद) स्थायी भाव से अभिव्यक्त होने वाले रस को शांत कहते हैं।” जैसे-

ओ क्षणभंगुर भव राम राम।
भाग रहा हूँ भार देख, तू मेरी ओर निहार देख !
मैं त्याग चला निस्सार देख, अटकेगा मेरा कोन काम !
ओ क्षणभंगुर भव राम राम ! – (मैथिलीशरण गुप्त, यशोधरा)

यहाँ नश्वर संसार आलंबन विभाव है और ‘राम-राम’ करने वाले सिद्धार्थ आश्रय विभाव हैं। संसार की परिवर्तनशीलता, क्षणभंगुरता, रोग-बुढ़ापा आदि ‘उद्दीपन’ विभाव हैं। सिद्धार्थ का उदासीन (विरक्त) होना अनुभाव है। निर्वेद, ग्लानि, चिंता, धृति, मति आदि संचारी भाव हैं। इन सबके संयोग से उबुद्ध ‘शम’ स्थायी भाव को ‘शांत’ रस के रूप में अभिव्यक्ति हुई है।

वत्सल-“विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से उबुद्ध ‘वात्सल्य’ स्थायी भाव से ‘वत्सल’ रस की निष्पत्ति (अभिव्यक्ति) होती है।” जैसे-

जशोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै दलाइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
कबहुँ पलक हरि-मुंद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै॥
सोवत जानि मौन है रहि करि-करि सैन बतावै।
इति अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरे गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ, सो नँद भामिनि पावै॥  – (सूरदास, सूरसागर)

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यहाँ कृष्ण आलंबन विभाव और यशोदा आश्रय विभाव है। झूला, कृष्ण का पलकें मूंदना, होंठ फड़काना, इशारे करना आदि ‘उद्दीपन’ विभाव हैं। यशोदा का झूले को झुलाना, कृष्ण को दुलारना-पुचकारना, मधुर गीत गाना आदि अनुभाव हैं। मोह, चपलता, हर्ष, औत्सुक्य आदि संचारी .. भाव हैं। इन सबके संयोग से उबुद्ध ‘वात्सल्य’ भाव से ‘वत्सल’ रस की अभिव्यक्ति हुई है।

(अनेक पुस्तकों में इसको ‘वात्सल्य’ कहा गया जो ठीक नहीं। ‘वात्सल्य’ स्थायी भाव है। रस का नाम ‘वत्सल’ है जैसा कि आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्यदर्पण’ में कहा है-‘वत्सलं च रसं विदुः।’

प्रश्न 4.
नीचे दिए गए विषयों पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीजिए
(क) विभाव और अनुभाव में अंतर,
(ख) संचारी भाव और स्थायी भाव में अंतर
(ग) वीर रस और रौद्र रस में अंतर
उत्तर-
(क) विभाव और अनुभाव में अंतर-‘विभाव’ मूलतः भाव नहीं, भाव के कारण-मात्र हैं। ‘अनुभाव’ भी वास्तव में स्वयं भाव नहीं, भावों के परिचायक विकार (परिवर्तन या चेष्टाएँ) है। ‘विभाव का संबंध तीन पक्षों से है-आलंबन, उद्दीपन और आश्रय, परंतु ‘अनुभाव’ का संबंध केवल. ‘आश्रय’ से है। ‘विभाव’ कोई व्यक्ति, प्रसंग, पदार्थ या विषय हो सकता है, जबकि अनुभाव किसी एक व्यक्ति (आश्रय) के शरीर को अनायास (अपने-आप) होने वाली या जानबूझकर की जा सकने वाली चेष्टाएँ ही होती हैं।

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(ख) संचारी भाव और स्थायी भाव में अंतर-‘संचारी भाव’ और ‘स्थायी भाव’ दोनों ही आंतरिक भाव हैं। दोनों की स्थिति ‘विभाव’ पर आधारित है। परंतु दोनों में पर्याप्त अंतर भी है-

  1. संचारी भाव अस्थिर होते हैं, जबकि स्थायी भाव स्थिर रहते हैं।
  2. संचारी भाव अनेक रसों में संचारित हो सकते हैं। एक ही रस में कई संचारी भाव तथा एक संचारी भाव अनेक रसों में संभव हैं परंतु कोई एक स्थायी भाव किसी एक ही रस से संबंधित होता है।
  3. संचारी भाव प्रकट होकर विलीन हो जाते हैं। वे आते-जाते, प्रकट-विलीन, होते रहते हैं स्थायी भाव अंत-पर्यंत स्थिर बने रहते हैं और वही रस के रूप में परिणत (उबुद्ध या अभिव्यक्त) होते हैं।
  4. संचारी भाव नदी की लहरों के समान चंचल, गतिशील या संचरणशील है जबकि स्थायी भाव नदी की मूल (अंतर्निहित) जलधारा के समान एकरूप बने रहते हैं।
  5. संचारी भाव अपने वर्ग के अन्य भावों में घुल-मिल सकते हैं या विरोधी भावों से दब सकते या क्षीण हो सकते हैं, परंतु स्थायी भाव न तो अपने वर्ग से और न ही विरोधी वर्ग के भावों से दबते. या क्षीण होते हैं।

(ग) वीर रस और रौद्र रस में अंतर-वीर और रौद्र रस में विभाव तथा संचारी भाव प्रायः एक-से होते हैं। दोनों में ‘शत्रु’ या ‘विरोधी पक्ष’ आलंबन विभाव होता है। दोनों में आश्रय को अनिष्ट की आशंका होती है। असूया, आमर्ष, आवेग, श्रम आदि संचार भाव भी प्रायः दोनों में होते हैं। फिर भी दोनों में पर्याप्त अंतर है। यह तो स्पष्ट ही है कि वीर में ‘उत्साह’ तथा रौद्र में ‘क्रोध’ स्थायी भाव होता है।

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वीर रस में शस्त्र-संचालन, आगे बढ़ना, आक्रमण करना, अपना बचाव करना आदि अनुभाव होंगे, जबकि रौद्र रस में आवेशपूर्ण शब्द, ललकार, आँखें तरेरना, मुट्ठियाँ भींचना, दाँत पीसना आदि अनुभाव होंगे। साथ ही, वीर रस में आश्रय का विवेक बना रहता है, जबकि रौद्र रस में विवेक की मर्यादा नहीं रहती। वास्तव में रौद्र रस वीर रस की पृष्ठभूमि तैयार करता है। जहाँ रौद्र रस की सीमा समाप्त होती है वहीं से वीर रस की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।

छंद

1. छंद किसे कहते हैं? निम्नलिखित छंदों के लक्षण-उदाहरण दीजिए सोरठा, दोहा, रोला, चौपाई, बरवै, गीतिका, हरिगीतिका, कवित्त, सवैया।
उत्तर-
जिस रचना में मात्राओं और वर्णों की विशेष व्यवस्था और गणना होती है, साथ ही संगीत सम्बंधी लय और गति की योजना रहती है उसे छंद कहते हैं। दूसरे शब्दों में निश्चित वर्णों या मात्राओं की गति, यति, आति से बंधी हुई शब्द योजना को छंद कहते हैं।

सोरठा :
लक्षण-यह भी अर्द्धसममात्रिक छंद है। इसके प्रथम और तीसरे चरणों में ग्यारह-ग्यारह एवं दूसरे और चौथे चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोहा की चरण-व्यवस्था को बदल देने से सोरठा हो जाता है। दोहा से अन्तर यह है कि सोरठा के विषम चरणों में अंत्यानुप्रास पाया जाता है।
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दोहा
लक्षण- यह अर्द्धसममात्रिक छंद है। इसके प्रथम और तीसरे चरणों में तेरह-तेरह तथा . द्वितीय और चतुर्थ चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। [विषम चरणों के अन्त में प्रायः (15) क्रम रहता है। चरणांत में ही यति होती है।
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रोला:
लक्षण-यह सममात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में चौबीस-चौबीस मात्राएँ होती हैं। ग्यारह और तेरह मात्राओं पर यति का विधान था जो अब उठ रहा है।
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चौपाई :
लक्षण-यह चार चरणोंवाला सममात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं। चरणांत में यति होती है। चरणांत में ये दो कम वर्जित हैं-15। और ऽ ऽ। (अर्थात् जगण और तगण)।
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बरवै :
लक्षण-यह एक अर्द्धसममात्रिक छंद है। इस छंद में कुल चार चरण होते हैं। विषम (प्रथम तथा तृतीय) चरणों में प्रत्येक में बारह और सम (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरणों में प्रत्येक में सात मात्राएँ होती हैं। बारह और सात मात्राओं पर विराम और अंत में लघु मात्र होती है।
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गीतिका:
लक्षण-यह एक सममात्रिक छंद है। इसमें कुल चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण की चौदहवीं और बारहवीं मात्रा के बाद विराम (यति) होता है। चरणांत (पादांत) में लघु-गुरु (5) क्रम से मात्राएँ रहती हैं।
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हरिगीतिका:
लक्षण-यह एक सममात्रिक छंद है। इसमें कुल चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक सोलहवीं और बारहवीं मात्राओं के बाद विराम (यति) होता है। प्रत्येक चरण के अंत में गुरु (5) मात्रा होती है।
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कवित्त :
लक्षण-यह वर्णिक छंद है। इसे ‘मनहरण’ या ‘घनाक्षरी’ भी कहते हैं। इसके प्रमुख भेद हैं-मनहरण, रूपघ्नाक्षरी, जनहरण, जलहरण और देवघनाक्षरी। मुख्यतः इस छंद के प्रत्येक चरण में 31 से 33 वर्ण तक पाए जाते हैं। (16)
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सवैया :
लक्षण-यह वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 22 से लेकर 26 तक वर्ण होते हैं, मदिरा, मत्तगयंद (मालती), चकोर, दुर्मिल, सुंदरी सुख, उपजाति और किरीट नामक इसके प्रकार हैं।

उदाहरण-
सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाति निरंतर गावै।।
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावै।
जाहि हियै लखि आनंद है जड़ मूढ़ हिये रसखानि कहावै।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाँछ पर नाच नचावै।

अलंकार

प्रश्न 1.
‘अलंकार’ का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए काव्य में उसके स्थान एवं महत्व पर प्रकाश डालिए।
अथवा,
काव्य में ‘अलंकार’ से क्या अभिप्राय है? काव्य और अलंकार का अंतः संबंध बताते हुए उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।
उत्तर-
‘अलंकार का तात्पर्य अथवा अभिप्राय-‘अलंकार’ शब्द ‘अलंकरण’ से बना है जिसका अभिप्राय है-सजावट। इस दृष्टि से ‘अलंकार’ का तात्पर्य हुआ-सजावट का माध्यम। संस्कृत का प्रसिद्ध उक्ति है-‘अलं करोति इति अलंकारः’ अर्थात् जो अलंकृत करे-सजाए, सुशोभित करे, शोभा बढ़ाए वह अलंकार है इस आधार पर, काव्य के संदर्भ में ‘अलंकार का तात्पर्य है जो भाषा का सौष्ठव बढ़ाए, उसमें चमत्कार पैदा करके उसे प्रभावशाली बना दे।’ अलंकार वाणी के भूषण हैं’-यह उक्ति बहुत प्राचीन है। हम जो भी कहते या लिखते हैं-दूसरों तक अपनी बात प्रभावशाली ढंग से पहुंचाने के लिए। कथन को प्रभावशाली बनाने के लिए जिन अनेक उपकरणों, साधनों या माध्यमों का उपयोग किया जा सकता है उनमें ‘अलंकार’ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

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विशेष प्रतिभाशाली, कल्पनाशील और कला-निपुण वक्ता का रचनाकार अपने कथन को चमत्कारपूर ढंग से प्रस्तुत कर, श्रोताओं या पाठकों के हृदय को छूकर, उन्हें प्रभावित कर सकता है। यह क्षमता प्रदान करने वाला तत्त्व ही ‘अलंकार’ कहलाता है।

काव्य में ‘अलंकार’

जिस प्रकार कोई भूषण (गहना) किसी सामान्य व्यक्ति के आकर्षण, सौंदर्य और प्रभाव को बढ़ाने में सहायक होता है वैसे ही अलंकार वाणी अर्थात् कविता या रचना को सुंदर, आकर्षक और प्रभावशाली बनाते हैं। संस्कृत के प्राचीन आचार्य दंडी ने कहा है-“काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्व को अलंकार कहते हैं।” प्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथ ‘चंद्रलोक के रचयिता जयदेव न ‘काव्य में अलंकार का महत्त्व’ स्पष्ट करने के लिए बड़ा रोचक उदाहरण दिया है।

वे कहते हैं-‘जिस प्रकार ताप से रहित अग्नि की कल्पना असंभव है, उसी प्रकार अलंकार के बिना काव्य के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।’ ताप अग्नि का गुण है, उसकी पहचान है। इसी प्रकार काव्य में साधारण कथन वाला प्रमुख तत्त्व अलंकार है। अलंकार काव्य में काव्यत्व लाने वाला उपकरण है, उसकी प्रमुख पहचान है।

रीतिकाल के प्रसिद्ध आचार्य केशवदास ने, काव्य में अलंकार का महत्त्व स्पष्ट करते हुए कहा है-

“आभूषणों के बिना नारी और अलंकारों के बिना कविता की शोभा संभव नहीं।’
भूषन बिनु न बिराजई बनिता मित्त। – (केशवदास, कविप्रिया)

(अर्थात् हे मित्र ! कविता और विनता (स्त्री) भूषण के बिना शोभा नहीं पातीं)।

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इसमें कोई संदेह नहीं कि अलंकार के प्रयाग से सामान्य-सी उक्ति भी अत्यंत प्रभावी, चमत्कारिक और मर्मस्पर्शी बन जाती है। कविवर पंत ने ‘गंगा में चल रही नाव’ के एक साधारण दृश्य को ‘अनुप्रास’ और ‘रूपक’ अलंकार के प्रयोग से कैसे संजीव बिंब-सा मनोहारी, प्रभावी और आकर्षक बना दिया है-

मृदु मंद-मंद, मंथर, मंथर
लघु तरणी हंसिनी-सी सुंदर,
तिर रही खोल पालों के पर।
(सुमित्रानंदन पंत, नौका विहार)

यहाँ पहली पंक्ति में ‘अनुप्रास अलंकार’ (म और अनुस्वार की आवृति) के कारण संगीतात्मक लय-प्रवाह का संचार हो गया है। दूसरी पंक्ति में ‘उपमा’ (हंसिनी-सी), तीसरी पंक्ति में ‘रूपक (पालों के पर) के कारण, गंगा में तैरती का बिंब सजीव चलचित्र की भाँति साकार हो गया है।

स्पष्ट है कि काव्य के वास्तविक सौंदर्य का रहस्य अलंकारों पर निर्भर है। परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं कि काव्य में अलंकार ही सब कुछ है। अलंकार काव्य की शोभा के बाहरी साधन मात्र हैं साध्य नहीं है। काव्य तो स्वयं ही रमणी, चारु तथा सुंदर है। जो स्वभाव से ही मोहक, आकर्षक या सुंदर है, उसे शोभा या चमत्कार के साधनों की क्या आवश्यकता है? किसी अत्यंत दुर्बल, अरूण और रुग्ण व्यक्ति को चाहे कितने बढ़िया आभूषणों से लाद दिया जाए-वह सुंदर या मोहक नहीं बन सकता।

इसी प्रकार, जिस काव्य में भाव और अर्थ की चारुता या मोहकता नहीं उसे केवल वर्णों या शब्दों की आवृत्ति अथवा उपमानों-रूपकों की भरमार से प्रभावशाली नहीं बनाया जा सकता। काव्य में अलंकार का महत्त्व उतना ही समझना चाहिए जितना स्वाभाविक रूप से एक स्वस्थ, सुंदर, सुरूप और सुडौल शरीर को सजाने में आकर्षक आभूषणों का। तात्पर्य यह है कि काव्य में अलंकारों का संतुलित, सुचारु तथा सुसंगत प्रयोग ही उपयुक्त है।

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तात्पर्य यह है कि ‘अलंकार’ कोरे चमत्कार के लिए नहीं। उनकी महत्ता काव्य की स्वाभाविक चारुता और सुष्टुता में वृद्धि करने में है। अलंकार ‘काव्य के लिए है काव्य ‘अलंकार’ के लिए नहीं है।

प्रश्न 2.
अलंकार का स्वरूप स्पष्ट करते हुए, उसके प्रमुख भेदों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर-
काव्य का स्वरूप-‘अलंकार’ शब्द सामान्य रूप से सजावट, शोभा और चमत्कार बढ़ाने वाले उपकरण के लिए प्रयुक्त होता है। भूषण, आभूषण, आवरण आदि इसी के अन्य पर्याय हैं। अलंकार शब्द के इसी अर्थ को ध्यान में रखकर आचार्य दंडी ने कहा है-‘काव्य के शोभा कारक तत्त्व अलंकार कहलाते हैं।” (काव्यादर्श) आचार्य वामन का मत इससे कुछ भिन्न है। उनके कथनानुसार, ‘काव्य के शोभाकारक’ तत्त्व तो गुण हैं, उन गुणों में अतिशयता (वृद्धि का उत्कर्ष) लाने वाले साधन अलंकार हैं। अपने इस मत को वामन ने केवल एक शब्द में समेटते हुए, निष्कर्ष के रूप में आगे यह भी कहा है कि काव्य के अंतर्गत ‘सौंदर्य मात्र अलंकार है-सौंदर्यमलंकारः।

प्रश्न यह है कि अलंकार स्वयं सौंदर्य है अथवा सौंदर्य का हेतु (कारण का साधन) है? अधिकतर विद्वान दूसरे पक्ष के समर्थक हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में ‘ध्वनि’ संप्रदाय के प्रवर्तक आनंदवर्धन ने स्पष्टं कहा है कि काव्य में चारुत्व (सुन्दरता, सरसता, रोचकता, चमत्कारता) लाने वाले उपकरण (कारण, साधन या माध्यम) अलंकार है। (ध्वन्यालोक) काव्य में अलंकारों को सर्वप्रथम महत्त्व प्रदान करने वाले आचार्यों में भामह का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उनका कथन है कि ‘शब्द और अर्थ को एक विशेष प्रकार (वक्र रूप) से प्रस्तुत करने की युक्ति (शैली) अलंकार है।

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(काव्यालांकार) भामह द्वारा प्रस्तुत किया गया अलंकार का यह लक्षण पर्याप्त सुसंगत है। इसो की व्याख्या करते हुए मध्ययुग के आचार्य मम्मट और विश्वनाथ ने कहा है-‘शरीर में हार, कंगन आदि के समान, काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तथा रस-भाव आदि के उपकारक (अर्थात् रस-भाव को उत्कर्ष प्रदान करने वाले) शब्दार्थ के अस्थिर धर्म (तत्त्व) अलंकार कहलाते हैं।”

उपर्युक्त लक्षण में अलंकारों को ‘शब्दार्थ के अस्थिर धर्म’ कहा गया है तो सर्वथा उचित है। अलंकार काव्य के स्थायी, अभिन्न या अनिवार्य तत्त्व नहीं है। इनका उपयोग आवश्यकता होने पर, या स्वाभाविक रूप से कहीं-कहीं यथोचित रूप से किया जाता या हो जाता है। इस दृष्टि से हिन्दी के विख्यात आलोचक और काव्य-मीमासंक आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत बहुत महत्त्वपूर्ण है _ ‘भावों के उत्कर्ष और वस्तुओं के रूप, गुण और क्रिया का अधिक तीव्र अनुभव कराने में कभी-कभी सहायक होने वाली युक्ति ही अलंकार है।’

संक्षेप में कहा जा सकता है कि साहित्य-रचना में किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार के सौंदर्य का उन्मेष होता है, तब वह अपनी समग्रता में अलंकार पर्याप्त हो जाता है।

अलंकारों के प्रमुख भेद

‘अलंकार’ वास्तव में कथन के विशेष प्रकार का नाम है। विशेष प्रकार के वाग्वैदग्ध्य को ही आचार्यों ने ‘अलंकार’ की संज्ञा दी है। यह वाग्वैदग्ध्य या कथन के प्रकार-विशेष के अनेक रूप संभव है। ‘अलंकार’ क्योंकि मुख्य रूप से काव्य में चारुत्व, चमत्कार और प्रभविष्णुता का संचार करते हैं और काव्य-संरचना ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ के सुसंगत संयोग पर निर्भर है (शब्दार्थों सहितौ काव्यम्) अतः अलंकार के दो प्रमुख भेद तो स्पष्ट ही हैं-

  • शब्दालंकार,
  • अर्थालंकार।

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काव्यगत सौंदर्य अथवा चमत्कार का आधार जहाँ केवल शब्द हो वहाँ ‘शब्दालंकार’ होगा और जहाँ काव्यगत सौन्दर्य अथवा चमत्कार अर्थकेंद्रित होगा, वहाँ ‘अर्थालंकार’ माना जाएगा। कई आचार्य एक ही कथन में ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ दोनों का संयुक्त चमत्कार होने की स्थिति में अलंकारों का एक तीसरा भेद भी स्वीकार करते हैं जिसे ‘उभयालंकार’ की संज्ञा दी है। ‘उभय’ का अर्थ है दोनों-अर्थात् शब्द भी और अर्थ भी। इस भेद को ‘शब्दार्थालंकार’ भी कहा जाता है।

अलंकार के उपर्युक्त तीनों भेदों का स्पष्टीकरण नीचे दिए गए उदाहरणों से हो सकता है

शब्दालंकार
“तरिन-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।” यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति के कारण चमत्कार उत्पन्न हुआ है। ‘तरनि’ की जगह ‘सूर्य’ ‘तनुजा’ की जगह ‘पुत्री’ अथवा ‘तरुवर’ की जगह ‘वृक्ष’ शब्द प्रयुक्त होने पर यह चमत्कार नहीं रहता। स्पष्ट है कि यह चमत्कार ‘शब्द’ पर आधारित है, अतः यहाँ शब्दालंकार’ है। इसका नाम ‘अनुप्रास’ है।’

अर्थालंकार
“महँगाई बढ़ रही निरंतर, द्रपुद-सुता के चीर सी,
बेकारी बढ़ रही चीरती, अंतर्मन को तीर-सी।”

यहाँ ‘महँगाई’ (उपमेय, प्रस्तुत) की समता ‘द्रोपदी के चीर’ (उपमान, अप्रस्तुत) से की गई है। ‘बेकारी’ की समता ‘तीर’ से की गई है। दोनों में ‘चीरना’ लक्षण एक-सा है। शब्द बदल देने पर भी चमत्कार कम नहीं होगा, क्योंकि उसका आधार ‘अर्थ’ है। अत: यह ‘अर्थालंकार’ है। इसे “उपमा’ कहते हैं।

शब्दार्थालंकार
“अंतद्वीप समुज्जवल रहता सदा स्नेह स्निग्ध होकर।”

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यहाँ ‘स’ वर्ण की आवृत्ति से ‘अनप्रास’ (शब्दालंकार) है। ‘सदा’ की जगह ‘हमेशा’ या स्नेह की जगह ‘प्रेम’ कर देने से चमत्कार नहीं रहेगा। साथ ही यहाँ ‘स्नेह’ के दो अर्थ हैं-‘प्रेम’ और ‘दीप’। ‘अंतर’ (मन) प्रेम से उज्जवल रहता है, ‘दीप’ तेल से। यह भी शब्दालंकार (श्लेष) है। इसके अतिरिक्त ‘अंत:करण’ (उपमेय) को ‘दीप’ उपमान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। शब्द बदलकर ‘हृदय’ रूपी ‘दीपक’ भी कह सकते हैं। अर्थ-चमत्कार बना रहेगा। इस प्रकार इस उदाहरण में शब्द के अर्थ-दोनों का चमत्कार होने के कारण ‘शब्दार्थालंकार’ या ‘उभयालंकार’ है।

प्रश्न 3.
प्रमुख शब्दालंकार कौन-से हैं? लक्षण उदाहरण सहित उसका विवेचन कीजिए।
उत्तर-
प्रमुख शब्दालंकार चार हैं-अनुप्रास, यमक, श्लेष, पुनरुक्ततदाभास। इन चारों का लक्षण-उदाहरण सहित विवेचन आगे किया जा रहा है :
(i) अनुप्रास- अनुप्रास’ शब्द का अर्थ है-साथ-साथ रखना (अनु+प्र+आस, क्रमबद्ध रूप से सँजाना)। जब वर्गों को एक विशेष क्रम से इस प्रकार साथ-साथ रखा जाता है (उनकी आवृत्ति की जाती है), तब संरचना में एक लयात्मक नाद के सौंदर्य का समावेश होता है। इस दृष्टि से ‘अनुप्रास’ का यह लक्षण ध्यान देने योग्य है

“जहाँ स्वरों की भिन्नता होने पर भी व्यंजनों से रस के अनुकूल समानता (व्यंजन वर्णों की आवृत्ति) हो वहाँ ‘अनुप्रास’ अलंकार माना जाता है।” जैसे-

मानते मनुष्य यदि अपने को आप हैं,
तो क्षमा कर वैरियों को वीरता दिखाइए।

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यहाँ पहले ‘म’ वर्ण की आवृत्ति एक विशेष क्रम से है। फिर ‘व’ वर्ण की समानता द्वारा भी सौंदर्य की सृष्टि हुई है। अतः ‘अनुप्रास’ अलंकार है।
(ii) यमक-‘यमक’ का अभिप्राय है-‘युग्म’ अर्थात् जोड़ा। काव्य में शब्द-युग्म (एक ही शब्द के दो या अधिक बार) के प्रयोग से तब विशेष चमत्कार आ जाता है जब उनके अर्थ अलग-अलग हों। इस आधार पर हम कह सकते हैं

“जहाँ एक शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग हो परंतु हर बार उसका अर्थ भिन्न हो वही ‘यमक’ अलंकार होता है। जैसे-

माला फेरत जुग गया, मिटा न मनका फेर।
कर का मनका डारि कै, मन का मनका फेर। (कबीर)

यहाँ ‘मनका’ शब्द का एक से अधिक बार प्रयोग हुआ है, किन्तु अर्थ अलग-अलग है। पहली पंक्ति में ‘मनका’ का अभिप्राय है-मन का, अर्थात् हृदय का। दूसरी पंक्ति में ‘मनका’ का . अभिप्राय है-माला का दाना। इसी पंक्ति के अंत में पुन:-‘मन का मनका’ फेर अर्थात् हृदय को बदलने (माया से हटकर सत्यकर्मों में लगाने) को कहा गया है। इस प्रकार यहाँ एक ही शब्द ‘मनका’ का अनेक बार प्रयोग होने पर भी, अर्थ भिन्न-भिन्न है, अत: यमक अलंकार है।।

(iii) श्लेष-‘श्लेष’ शब्द का अर्थ है-संयोग। कई शब्द में एक साथ कई अर्थों का संयोग होता है जिनके कारण कथन में विशेष चमत्कार आ जाता है। ‘श्लेष’ शब्द की रचना ‘श्लिष’ धातु से हुई है जिसका अभिप्राय है-‘चिपकना’। जैसे चपड़ा लाख की लकड़ी से ऐसी चिपकी रहती है कि अलग नहीं होती। एक ओर वह लाख प्रतीत होती है, दूसरी ओर से लकड़ी। इसी प्रकार किसी एक शब्द में एक से अधिक अर्थ चिपके होने पर भी कभी एक अर्थ प्रभावित करता है, कभी दूसरा।

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‘श्लेष’ का लक्षण इस प्रकार है-
‘जहाँ एक शब्द से अनेक अर्थों का बोध अभिधा द्वारा हो वहाँ ‘श्लेष’ अलंकार होता है। जैसे-

मेरो भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोई।
जा तन की झाई परै, स्याम हरित दुति होई॥ (बिहार)

यहाँ ‘स्याम’ और ‘हरित’ शब्द में श्लेष है। ‘स्याम’ का अर्थ ‘कृष्ण’ भी है और ‘साँवला’ अर्थात् ‘नील’ भी; हरित का अर्थ ‘मंद’ (हर ली गई) भी है तथा ‘हरि’ भी। राधा के तन की झलक पड़ते ही कृष्ण की दीप्ति भी मंद पड़ जाती है अथवा ‘कृष्ण का साँवला रंग’ (राधा के गोरे रंग की झलक से) हरा प्रतीत होने लगता है। ये दोनों अर्थ संभव हैं जो चमत्कार के आधार हैं। अतः यहाँ ‘श्लेष’ अलंकार है।

(iv) पुनरुक्ततदाभास-‘पुनरुक्ततदाभास’ में चार शब्दों का मेल है-पुनः + उक्त + वत् + आभास। इस आधार पर अर्थ हुआ-पुनः (दोबार) उक्त (कहा गया) वत् (वेसा) आभास (प्रतीत होना)।

जब ऐसा लगे कि एक ही पंक्ति में कोई बात (अनावश्यक रूप से) दोहरा दी गई है, पर वास्तव में ऐसा है कि नहीं-यही चमत्कार का आधार होता है।

“जहाँ अलग-अलग शब्द का जैसा अर्थ देते प्रतीत हो वहाँ ‘पुनरुक्तारापास’ अलंकार होता है।” जैसे-

समय जा रहा और काल है आ रहा।
सचमुच उलटा भाव भुवन में छा रहा। (मैथिलीशरण गुप्त)

यहाँ ‘समय’ और ‘काल’ दोनों का अर्थ ‘वक्त’ (टाइम) प्रतीत होता है। ‘समय’ का अर्थ ‘वक्त’ तो ठीक है परंतु ‘काल’ का अर्थ यहाँ ‘मृत्यु’ है। प्रथम बार समान अर्थ प्रतीत कराने वाले शब्दों के कारण यहाँ चमत्कार है। अतः यहाँ ‘पुनरुक्ततदाभास’ अलंकार है।

प्रश्न 4.
प्रमुख अर्थालंकार कौन-कौन हैं? उन्हें कितना वर्गों में बाँटा जा सकता है? उनका लक्षण उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।
उत्तर-
प्रमुख अर्थालंकारों के नाम इस प्रकार हैं-उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, संदेह, भ्रांतिमान, अन्योक्ति, विरोधाभास, मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय।

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अर्थालंकारों के प्रमुख वर्ग
साहित्यशास्त्रीय ग्रंथों में ‘अर्थालंकारों के वर्ग को ही अधिक महत्व दिया गया है। इनके अंतर्गत कवि-गण अनेक प्रकार से काव्य-सौंदर्य की सृष्टि करते हैं, अतः अर्थालंकारों के अपने उपवर्ग भी संभावित हैं। इनमें से प्रमुख ये हैं-

  1. सादृश्यमूलक अलंकार-जिन अलंकारों में उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) के साम्य (सादृश्य) द्वारा चमत्कार अथवा सौंदर्य की सृष्टि होती है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि सादृश्यमूलक अलंकार हैं।
  2. विरोधमूलक अलंकार-जिन अर्थालंकारों का सौंदर्य या चमत्कार विरोध की स्थिति पर निर्भर करता है वे “विरोधमूलक’ अलंकार कहलाते हैं। जैसे-विरोध (विरोधाभास), विभावना, विशेषोक्ति आदि।
  3. श्रृंखलामूलक अलंकार-यहाँ चमत्कार उत्पन्न करने वाले कथन एवं श्रृंखला (कड़ी) के रूप में (विशेष क्रम से) परस्पर गूंथे हों, वहाँ ‘शृंखलामूलक’ अलंकार की स्थिति मानी जाती है। कारणमाला, सार, एकावली आदि ऐसे ही अलंकार हैं।
  4. न्यायमूलक अलंकार-जिन अर्थालंकारों के अंतर्गत लोकन्याय अथवा तर्क के आधार पर काव्य-सौंदर्य या चमत्कार की सृष्टि की जाती है वे ‘न्यायमूलक’ अलंकार कहलाते हैं।

उपर्युक्त वर्गों में से दो वर्ग विशेष रूप से चर्चित और प्रचलित हैं-

  • सादृश्यमूलक अलंकार
  • विरोधमूलक अलंकार।।

सादृश्यमूलक अलंकारों के चार घटक या अवयव प्रमुख होते हैं

  • उपमेय-जिस व्यक्ति, वस्तु या भाव की किसी अन्य से समानता की जाती है। इसे ‘प्रस्तुत’ भी कहते हैं।
  • उपमान-जिस व्यक्ति, वस्तु या भाव के साथ ‘उपमेय’ या ‘प्रस्तुत’ की समानता बतलाई . जाती है।
  • साधारण धर्म-‘उपमेय’ और ‘उपमान’ में जिस गुण, लक्षण या विशेषता आदि के कारण समानता होती है।
  • वाचक शब्द-जिस शब्द (सा, जैसा, सम, समान, सदृश आदि) के द्वारा उपमेय और उपमान की समानता व्यक्त की जाती है। एक उदाहरण से उपर्युक्त चारों अवयव स्पष्ट हो जाएंगे।

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“लघु तरिण हंसिनी सी सुंदर” (नौका बिहार, पंत)

यहाँ ‘रिण’ (नौका) उपमेय है। ‘हसिनी’ उपमान है। ‘सौंदर्य साधारण धर्म हैं ‘सी’ दायक शब्द है। (यहाँ उपमा सादृश्यमूलक अलंकार) के चारों अंग विद्यमान हैं।)

प्रमुख अर्थालंकारों का लक्षण-उदाहरण सहित विवेचन आगे किया जा रहा है।।

उपमा-अर्थालंकारों में ‘उपमा’ सर्वप्रमुख है। आचार्य दंडी ने सभी अलंकारों को-‘उपमा’ का मुही प्रपंच (विस्तार) बताया है। आचार्य वामन उपमा को सभी अलंकारों का ‘मूल’ मानते हैं। राजशेखर ने उपमा को सर्वशिरोमणि तथा कवियों की माता कहा है, (अलंकार शेखर) तथा अप्पय दीक्षित का कथन है कि उपमा वह नटी है जो रूप बदल-बदल कर काव्य-रूपी रंगमंच पर कौतुक दिखाकर सब काव्यप्रेमियों के चित्त को मुग्ध करती रहती है।” (चित्रमीमांसा) संस्कृत के अमर कवि कालिदास के विश्व विख्यात होने का आधार यही ‘उपमा’ है-

‘उपमा कालिदासस्य’-‘उपमा’ शब्द का अभिप्राय है-निकट रखकर परखना-मापना अर्थात् दो वस्तुओं को निकट रखकर, उनकी समानता (साम्य, सादृश्य) के आधार पर उनकी विशेषता को परखना ‘उपमा’ की प्रमुख पहचान है। निकट ‘समीप’ रखी जाने वाली दोनों वस्तुओं (पदार्थों, व्यक्तियों, विषयों, भावों आदि) में एक ‘प्रस्तुत’ होती है जिसे ‘उपमेय’ कहते हैं-जिसकी (किसी अन्य वस्तु से) समता की जाती है।

(उपमा दी जाती है।) दूसरी वस्तु ‘अप्रस्तुत’ होती है जिसे ‘उपमान’ कहते हैं-जिससे किसी की समता की जाती है। इन दोनों (प्रस्तुत-अप्रस्तुत या उपमेय-उपमान) में जिस गुण, लक्षण, स्वभाव या विशेषता के आधार पर समानता बतलाई जाती है उसे समान धर्म’ कहा जाता है तथा दो भिन्न वस्तुओं (उपमेय-उपमान) में समानता का बोध कराने वाला (सूचक) शब्द (सा, सम, ‘तुल्य’ समान आदि) वाचक शब्द कहलाता है।

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इस प्रकार ‘उपमा’ अलंकार के चार ‘अंग’ हैं-

  • उपमेय,
  • उपमान,
  • समान धर्म,
  • वाचक शब्द।

‘उपमा’ के लक्षण और उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जाएगी।

लक्षण-‘जहाँ एक ही वाक्य में, दो भिनन वस्तुओं की गुण-स्वभाव, रूप-रंग या किसी अन्य विशेषता संबंधी समानता उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) के रूप में बताई गई हो वहाँ ‘उपमा’ अलंकार होता है।”

उदाहरण-
महँगाई बढ़ रही निरंतर द्रुपद-सुता के चीर-सी।
बेकारी बढ़ रही चीरती अंतर्मन को तीर-सी।  – (सोहनलाल द्विवेदी, मुक्तिगंधा)

यहाँ ‘महँगाई’ (उपमेय या प्रस्तुत) की समता द्रुपदसुता के चीर (उपमान या अप्रस्तुत) और बेकारी (उपमेय) की समानता तीर (उपमान) से की गई है, अतः ‘उपमा’ अलंकार है।

इस उदाहरण में ‘उपमा’ के चारों अंग हैं-

उपमेय-महँगाई, बेकारी
उपमान-चीर, तीर समान
धर्म-निरंतर बढ़ना,
चीरना वाचक शब्द-सी

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रूपक-‘रूपक’ शब्द का अभिप्राय है-‘रूप धारण करने वाला’। उपमेय की महिला बताने के कई ढंग हैं जिनमें से एक यह भी है कि उसे उपमान का रूप दे दिया जाए अर्थात् उपमेय और उपमान एक साथ हो जाएँ। ‘उपमेय’ में ‘उपमान’ का इस प्रकार, ‘आरोप’ के कारण ही इस अलंकार का नाम ‘रूपक’ अलंकार है।

लक्षण-“जहाँ उपमेय में उपमान का अभेद आरोप किया गया हो अर्थात् उपमेय-उपमान एक रूप बताए जाएं वहाँ ‘रूपक’ अलंकार होता है।” जैसे-

स्नेह का सागर जहाँ लहरा रहा गंभीर।।
घृणा का पर्वत वहीं पर खड़ा लिए शरीर॥  – (सोहनलाल द्विवेदी, कुणाल)

यहाँ स्नेह (उपमेय) में सागर (उपमान) और घृणा (उपमेय) में पर्वत (उपमान) का आरोप हुआ है, अत: रूपक अलंकार है।

‘रूपक’ का एक प्रसिद्ध उदाहरण है-चरण कमल बंद हरिराई।

अर्थात्-मैं हरि के चरण कमलों (चरण रूपी कमलों) की वंदना करता हूँ।

यहाँ चरण (उपमेय) और कमल (उपमान) अभिन्न (एक रूप) बताए गए हैं। चरण में कमल का आरोप है, अर्थात् चरणों में कमलों का रूप दिया गया है, अत: ‘रूपक’ अलंकार है-

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उत्प्रेक्षा-‘उत्प्रेक्षा’ शब्द का अभिप्राय है-‘संभावना’ या ‘कल्पना’। जिस वस्तु (पदार्थ, व्यक्ति, विषय, स्थिति, भाव, आदि) का वर्णन किया जाता है, वह होती तो वही (प्रस्तुत या उपमेय) है, पर उसमें किसी अन्य (श्रेष्ठ) (उपमान) की कल्पना या संभावना करके उसक विशेषता को उजागर करने की एक प्रभावशाली विधि ‘उत्प्रेक्षा’ मानी जाती है। जैसे, किसी बुद्धि वाले विद्यार्थी की स्मरण-शक्ति की गणना-कौशल देखकर हम कहते हैं-“इसका। मानों कम्प्यूटर है। ‘इस प्रकार, हम दिमाग (उपमेय) में, ‘कम्प्यूटर’ (उपमान) की संभावना का लेते हैं। ‘मानो’ शब्द के प्रयोग से स्पष्ट है कि ‘हम मानते (संभावना) करते हैं।’

लक्षण-“जहाँ प्रस्तुत (उपमेय) में अप्रस्तुत (उपमान) की संभावना ‘मानो’, ‘जानो’, ‘मनु’, “जनु’, आदि शब्दों द्वारा की गई हो वहाँ ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार होता है।” जैसे-

उस काल मारे क्रोध के तन काँपने उनका लगा।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा॥  – (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ-वध)

यहाँ कांपते तन (उपमेय) में लहराते सागर (उपमान) की संभावना ‘मानो’ शब्द के माध्यम से की गई है। अत: ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार है।

संदेह-जब कोई दूर से किसी ऐसे पदार्थ को देख ले जो कभी तो उसे डरावना जंतु-सा लगे; कभी ढूँठ पेड़ के तने-सा, तो उसके मन में दुविधा होना स्वाभाविक है। यह दुविधा दोनों . संभावित वस्तुओं (उपमेय और उपमान) के सादृश्य के कारण हो सकती हैं। ऐसी मन:स्थिति. का वर्णन काव्य में अनायास चमत्कार ले आता है।

लक्षण-“जहाँ सादृश्य के कारण उममेय और उपमान निश्चित न हो सके कि यह है या वह है-वहाँ ‘संदेह’ अलंकार होता है।”

नयन है या बिजलियाँ ये,
केश है या काले. नाग!

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यहाँ चमकते आँखों (उपमेय) और बिजलियाँ (उपमान) तथा केश (उपमेय) और काले नाम (उपमान) में अनिश्चय की स्थिति बतलाई गई है, अत: ‘संदेह’ अलंकार है।

भांतिमान-रस्सी को साँप समझकर, डर से चीखना कितना विचित्र होगा। यही स्थिति ‘प्रातिमान’ अलंकार में होती है। सादृश्य के कारण उपमेय को उपमान समझ लेना चमत्कार की सृष्टि करता है-उपमेय में उपमान का भ्रम हो जाता है, प्रांति हो जाती है इसलिए इसे भ्रम’ अलंकार या प्रतिमान अलंकार कहा गया है। जैसे-

दुग्ध समझकर रजत-पात्र को लगे चटने तभी बिडोल।

यहाँ बिडाल (विलाव) द्वारा चाँदी) (रजत) के पात्र (बरतन) को दूध समझकर चाटने का चमत्कारपूर्ण वर्णन है, अतः ‘भ्रांतिमान’ अलंकार है।।

अन्योक्ति (अप्रस्तुत प्रशंसा)-‘अन्योक्ति’ (अन्य का कथन) शब्द का अभिप्राय है किसी ‘अन्य’ के माध्यम से अभीष्ट (प्रस्तुत) बात कहना। यहाँ ‘अन्य’ का तात्पर्य ‘अप्रस्तुत’ अर्थात् ‘उपमान’ है। कई बार हमारा कोई प्रियजन जब बहुत दिनों बाद आता है तो हम कहते हैं-‘आज यह सूरज कहाँ से निकला !’ या ‘यह ईद का चाँद कहाँ से आ गया!’ हमारा अभीष्ट वस्तु ‘सूरज’ या ‘चाँद’ नहीं होता ! सूर्य या चाँद तो अप्रस्तुत (उपमान) है।

उनके माध्यम से हम ‘प्रस्तुत’ ‘उपमेय (मित्र) की बातें करते हैं। इस प्रकार के चमत्कार कर सौंदर्य को काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में अप्रस्तुत प्रशंसा’ अलंकार भी कहा गया है, क्योंकि इसमें ‘अप्रस्तुत’ के माध्यम से प्रस्तुत की प्रशंसा, अर्थात् ‘उपमान’ के कथन द्वारा वास्तव में ‘उपमेय’ का वर्णन होता है। आजकल यह अलंकार ‘अन्योक्ति’ के नाम से ही प्रचलित है। जिसका लक्षण इस प्रकार है-

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लक्षण-“जहाँ अप्रस्तुत (उपमान) के वर्णन से प्रस्तुत (उपमेय) का बोध हो वहाँ। ” “प्रस्तुत प्रशंसा’ या ‘अन्योक्ति अलंकार होता है।”

जैसे-
फूल काँटों में खिला था, सेज पर मुरझा गया।  – (रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’)

यहाँ फूल, काँटे, सेज आदि ‘अप्रस्तुत (उपमान) हैं। इनके माध्यम से कवि ने जीवन (प्रस्तुत या टपमेय) का वर्णन किया है जो संघर्ष (काँटों) में विकास पाता है पर ऐश-आराम, आलस्य-मस्ती (सेज) में क्षीण हो जाता है।

इर प्रकार बिहारी के अनेक दोहे, ‘अनयोक्ति’ के उत्तम उदाहरण हैं। जैसे-

मरत पयास पिंजरा परयो, सुवा समै के फेर।
आद दै दै बोलियत, बायस बलि का बेर॥ (बिहार)

(श्राद्ध के दिनों में, समय के फेर से, तोते जैसा सुंदर, समझदार और मधुरभाषी पक्षी तो पिंजरे में पड़ा प्यासा तड़पता रहता है और हलवा-पूरी का भोजन करने के लिए कौओं को आदर-सहित बुलाया जाता है।)

यहाँ ‘तोता’ और ‘कौआ’ अप्रस्तुत है जिनके माध्यम से इस प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति कराई गई है-‘कैसा जमाना (बुरा समय) आ गया है ! सज्जन, विद्वान और सच्चे कलाकार तो भूखे मर रहे हैं और गला फाड़-फाड़ कर खुशामद करने वाले धूर्त राजकीय पद, सम्मान और पुरस्कार प्राप्त रहे हैं।

मानवीकरण-‘मानवीकरण’ का अर्थ है-प्रकृति, जड़ या अमूर्त भाव (जो मानव नहीं है) में मानवीय भावनाओं, चेष्टाओं, गुणों आदि की स्थिति बताना। .. “जहाँ प्रकृति आदि या जड़ पदार्थों का मनुष्य के गुण, कार्य, भाव, विचार आदि से युक्त वर्णन किया जाए वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।” जैसे-

“निशा को धो देता राकेश,
चांदनी में जब अलके खोल।”

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यहाँ निशा (रात) और राकेश (चंद्रमा) का मनुष्य की भांति (बाल खोकर धोना आदि) वर्णन है। अतः ‘मानवीकरण’ अलंकार है।

विरोधाभास-‘विरोधाभास’ के शब्द का अभिप्राय है-‘विरोध का आभास अर्थात् प्रतीति (वास्तविकता नहीं)।’ कोई बात इस प्रकार कहना कि जिसमें विरोध प्रतीत हो, पर वास्तव में हो नहीं, चमत्कारपूर्ण होता ही है। यद्यपि ऐसे चमत्कारपूर्ण कथन का सूक्ष्म विवेचन करने से विरोध नहीं रहता, तथापि उससे उत्पन्न चमत्कार का प्रभाव बना ही रहता है।

लक्षण-“जहाँ दो वस्तुओं (कथनों, भावों, आदि) में वास्तविक विरोध न होने पर भी विरोध की प्रतीति कराई जाए वहाँ ‘विरोधाभास’ अलंकार होता है।” जैसे-

या अनुरागी चित्त की गति समुझे नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जल होय॥ (बिहारी सतसई)

यहाँ ‘स्याम (काले-नीले) रंग में डूबकर भी ‘उजला होना’ परस्पर विरोधी बातें प्रतीत होती हैं, किन्तु वास्तव में विरोध नहीं है क्योंकि स्याम का अर्थ ‘श्रीकृष्ण’ है-‘यह प्रेम-ठगा हृदय श्रीकृष्ण में जितना अधिक लीन रहता है उतना ही उजला (आनंदित) होता है। इस प्रकार यहाँ ‘विरोधाभास’ अलंकार है।

 Bihar Board Class 11th Hindi साहित्य शास्त्र

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Bihar Board 12th Economics Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 1.
Which Economist divided Economics in two branches of micro and macro on the basis of economics activity ?
(A) Marshall
(B) Ricardo
(C) Ragnar Frish
(D) None of these
Answer:
(C) Ragnar Frish

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

 

Question 2.
Which of the following is studied under Micro Eco¬nomics ?
(A) Individual unit
(B) Economic Aggregate
(C) National Income
(D) None of these
Answer:
(A) Individual unit

Question 3.
Which of the following economic activities are included in the subject-matter of Economics ?
(A) Economics Activities related to Unlimited Wants
(B) Economic Activities related to Limited Resources
(C) Both (A) and (B)
(D) None of these
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 4.
The central problem of an economy is :
(A) What to produce
(B) How to produce
(C) How to distribute produced goods
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 5.
Mention the name of the curve which shows economic problem:
(A) Productions Curve
(B) Demand Curve
(C) Indifference Curve
(D) production Possibility Curve
Answer:
(D) production Possibility Curve

Question 6.
Who gave the cardinal concept of utility ?
(A) Marshall
(B) Pigou
(C) Hicks
(D) Samuelson
Answer:
(A) Marshall

Question 7.
Consumer’s behaviour is studied in :
(A) Micro Economics
(B) Macro Economics
(C) Income Analysis
(D) None of these
Answer:
(A) Micro Economics

Question 8.
Which is the First Law of Gossen ?
(A) Law of Demand
(B) Law of Diminishing Marginal Utility
(C) Law of Equi-marginal Utility
(D) Consumer’s Surplus
Answer:
(B) Law of Diminishing Marginal Utility

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 9.
Which element is essential for demand ?
(A) Desire to consumer
(B) Avaiability of adequate resources
(C) Willingness to consume
(D) All to these
Answer:
(D) All to these

Question 10.
Demand Curve generally slopes :
(A) Upward from left to right
(B) Downward from left to right
(C) Parallel to X-axis
(D) Parallel to Y-axis
Answer:
(B) Downward from left to right

Question 11.
With rise in coffee price, the demand of tea :
(A) Rises
(B) Falls
(C) Remains stable
(D) None of these
Answer:
(A) Rises

Question 12.
With a rise in price the demand for ‘Giffin’ goods :
(A) increases
(B) decreases
(C) remains’constant
(D) becomes unstable
Answer:
(A) increases

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 13.
With which method, elasticity of demand is measured ?
(A) Total Expenditure Method
(B) Percentage or Proportionate Method
(C) Point Method
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 14.
How many types elasticity of demand has ?
(A) Three
(B) Five
(C) Six
(D) Seven
Answer:
(B) Five

Question 15.
For luxury goods the demand is :
(A) Inelastic
(B) Elastic
(C) Highly elastic
(D) Perfectly Inelastic
Answer:
(C) Highly elastic

Question 16.
In production fucntion, production is a function of:
(A) Price
(B) Factors of Production
(C) Total Expenditure
(D) None of these
Answer:
(B) Factors of Production

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 17.
The basic reason of operating the Law of Diminishing Returns is:
(A) Scarcity of Factors
(B) Imperfect Substitution between Factors
(C) Both (A) and (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 18.
Which statement of the following is true ?
(A) AC = TFC – TVC
(B) AC = AFC + TVC
(C) AC = TFC = AVC
(D) AC = AFC + A VC
Answer:
(D) AC = AFC + A VC

Question 19.
The quantity of a goods which the seller is ready to sell in the market at fixed price and time is called ?
(A) Supply
(B) Demand
(C) Elasticity of supply
(D) Elasticity of demand
Answer:
(A) Supply

Question 20.
The measurement of the elasticity of supply is expressed as :
\((A) \frac{\Delta Q_{s} / Q_{s}}{\Delta P / P}
(B) \frac{Q_{s}}{\Delta P} \cdot \frac{1}{P}
(C) \frac{Q_{s}}{Q_{s}} \cdot \Delta P
(D) \frac{\Delta P}{Q_{s}} \cdot \frac{P}{\Delta Q_{s}}\)
Answer:
\((A) \frac{\Delta Q_{s} / Q_{s}}{\Delta P / P}\)

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 21.
Which is a characteristic of the market ?
(A) One Area
(B) Preasence of both Buyers and Sellers
(C) Single Price of the Commodity
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 22.
Which factor determines Equilibrium Price ?
(A) Demand for Commodity
(B) Supply of Commodity
(C) Both (A) and (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 23.
“Price is determined by Demand and Supply. Whose statment is this” ?
(A)Jevons
(B) Walras
(C) Marshall
(D) None of these.
Answer:
(C) Marshall

Question 24.
Which statement is correct ?
(A) In very short period, supply is perfectly inelastic, price is affected by both demand conditions.
(B) Supply curve elasticity depends on time period
(C) Both (A) and (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 25.
Market Price is found in :
(A) Short Period Market
(B) Long Period Market
(C) Very Long Period Market
(D) None of these
Answer:
(A) Short Period Market

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 26.
Which of the following is a stock ?
(A) Wealth
(B) Saving
(C) Export
(D) Profit
Answer:
(A) Wealth

Question 27.
Which one of the following is included in ‘Stock’ ?
(A) Quantity of Money
(B) Wealth
(C) Quantity of wheat stored in warehouse
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 28.
Primary sector includes :
(A) Agriculture
(B) Retail trading
(C) Small Industries
(D) All the these
Answer:
(D) All the these

Question 29.
Which one is a component of profit ?
(A) Divident
(B) Undistributed Profit
(C) Corporate Profit Tax
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 30.
Which one is included in National Income ?
(A) Rent, Wage, Interest
(B) Rent, Wage, Salary
(C) Rent, Profit, Interest
(D) Rent, Wage, Salary, Interest, Profit
Answer:
(D) Rent, Wage, Salary, Interest, Profit

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 31.
“Money is what money does.” Who said it ?
(A) Hartley Withers
(B) Hawtrey
(C) Thomas
(D) Keynes
Answer:
(A) Hartley Withers

Question 32.
The function of money is :
(A) Medium of Exchange
(B) Measure of Value
(C) Store of Value
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 33.
The primary function of Commercial Bank is ?
(A) Accepting Deposits
(B) Advancing Loans
(C) Credit Creation
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 34.
Credit money is increased when CRR :
(A) Falls
(B) Rises
(C) Both (A) and (B)
(D) None of these
Answer:
(A) Falls

Question 35.
Central Bank of India is :
(A) Reserve Bank of India
(B) State Bank of India
(C) Central Bank of India
(D) Bank of India
Answer:
(A) Reserve Bank of India

Question 36.
Who is the author of the book ‘General Theory of Employment, Interest and Money’ ?
(A) A.C. Pigou
(B) Malthus
(C) J.M. Keyness
(D) Marshall
Answer:
(C) J.M. Keyness

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 37.
On which factor Keyesian Theory of Employment depends ?
(A) Effective Demand
(B) Supply
(C) Production Efficiency
(D) None of the above
Answer:
(A) Effective Demand

Question 38.
MPC + MPS = ?
(A) ∞
(B) 2
(C) 1
(D) 0
Answer:
(C) 1

Question 39.
Multiplier can be expressed as :
(A) K = \(\frac{\Delta \mathrm{S}}{\Delta \mathrm{I}}\)
(B) K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta l}\)
(C) K = I – S
(D) None of the these
Answer:
(B) K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta l}\)

Question 40.
Which of the following is correct ? .
(A) MPC and multiplier have direct relationship
(B) MPS and multiplier have inverse relationship
(C) Both (A) and (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 41.
Which of the following is included in fiscal policy ?
(A) Public Expenditure
(B) Tax
(C) Public Debt
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 42.
Budget may include :
(A) Revenue Deficit
(B) Finscal Deficit
(C) Primary Deficit
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 43.
Which one of the following is a pair of direct tax ?
(A) Excise duty and Wealth Tax
(B) Service Tax and Income Tax
(C) Excise Duty and Service Tax
(D) Wealth Tax and Income Tax
Answer:
(D) Wealth Tax and Income Tax

Question 44.
Which of the following is not a revenue receipt ?
(A) Recovery of Loans
(B) Foreign Grants
(C) Profits of Public Enterprise
(D) Wealth Tax
Answer:
(A) Recovery of Loans

Question 45.
Which of the following is a correct measure of primary deficit ?
(A) Fiscal deficit minus revenue deficit
(B) Revenue deficit minus interest payments
(C) Fiscal deficit minus interest payments
(D) Capital expenditure minus revenue expenditure
Answer:
(C) Fiscal deficit minus interest payments

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 46.
Which one is a kind of exchange rate ?
(A) Fixed Exchange Rate
(B) Flexible Exchange Rate
(C) Both (A) and (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 47.
Which of the following is true ?
(A) Fixed exchange rate is determined by the government
(B) Flexible exchange rate is determined by market (demand and supply of foreign exchange)
(C) Both (A) and (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) and (B)

Question 48.
Balance of Trade = ?
(A) Export of Visible Items – Imports of Visible Items
(B) Export of both Visible and Invisible Items – Import of both Visible and Invisible Items
(C) Import of Visible Items – Export of Visible Items
(D) None of the above
Answer:
(A) Export of Visible Items – Imports of Visible Items

Question 49.
Which items are included in Balance of Payments ?
(A) Visible Items
(B) Invisible Items
(C) Capital Transfers
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 2 in English

Question 50.
Which one is the item of Current Account ?
(A) Import of Visible Items
(B) Expenses of Tourists
(C) Exports of Visible Items
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Bihar Board 12th Economics Objective Questions and Answers

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 1.
Who was the father of Economics ?
(A) J.B.Say
(B) Malthus
(C) Adam Smith
(D) Joan Robinson
Answer:
(C) Adam Smith

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 2.
Production Possibility Curve is :
(A) Cancave to the axis
(B) Convex to the axis
(C) Parallel to the axis
(D) Vertical to the axis
Answer:
(A) Cancave to the axis

Question 3.
According to Marshall, utility of a commodity.
(A) can be measured by money
(B) cannot be measured by money
(C) can be measured in cardinal numbers
(D) Both (A) and (C)
Answer:
(D) Both (A) and (C)

Question 4.
An active factor of production is :
(A) Capital
(B) Labour
(C) Land
(D) None of these
Answer:
(B) Labour

Question 5.
In which market is average revenue equal to marginal revenue ?
(A) Perfect Competition
(B) Oligopoly
(C) Imperfect competition
(D) Monopoly
Answer:
(A) Perfect Competition

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 6.
Which service is included in Tertiary Sesator ?
(A) Mining
(B) Construction
(C) Communication
(D) Animal Husbandary
Answer:
(C) Communication

Question 7.
By supply of money we mean :
(A) Money deposited in bank
(B) Money available with the public
(C) Deposits with Post Office savings bank
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 8.
Supply creates its own demand ? Who gave this law ?
(A) J.B.Say
(B) J.S.Mill
(C) Keynes
(D) Ricardo
Answer:
(A)J.B.Say

Question 9.
Which is included in indirect tax ?
(A) Income Tax
(B) Wealth Tax
(C) Excise Duty
(D) Gift Tax
Answer:
(C) Excise Duty

Question 10.
Balance of Trade means:
(A) Capital transaction
(B) Import & Export of goods
(C) Total debit and credit
(D) All of above
Answer:
(B) Import & Export of goods

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 11.
Which of the following statement is true ?
(A) Human wants are infinite
(B) Resources are limited
(C) Scarcity problem gives birth to choice
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 12.
Micro economics includes :
(A) Individual unit
(B) Small units
(C) Individual Price determination
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 13.
In which economy decisions are taken on the basis of price mechanism ?
(A) Socialist
(B) Capitalist
(C) Mixed
(D) All of these
Answer:
(B) Capitalist

Question 14.
According to the law of equimarginal utility, the condition for consumer’s equilibrium is :
(A) \(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{A}}}{\mathrm{P}_{\mathrm{A}}}=\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{B}}}{\mathrm{P}_{\mathrm{B}}}\)
(B) \(\frac{\mathrm{MU}_{\mathrm{A}}}{\mathrm{MU}_{\mathrm{B}}}=\frac{\mathrm{P}_{\mathrm{A}}}{\mathrm{P}_{\mathrm{B}}}\)
(C) Both (A) & (B)
(D) undefined
Answer:
(C) Both (A) & (B)

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 15.
Which is a reason of change in demand ?
(A) Change of consumer’s income
(B) Change in price of related goods
(C) Population increases
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 16.
With an increase in income consumer decreases the consumption of which goods ?
(A) Inferior goods
(B) Normal goods
(C) Giffin goods
(D) Both (A) and (B)
Answer:
(C) Giffin goods

Question 17.
Which of the following factors affects elasticity of demand ?
(A) Nature of goods
(B) Price level
(C) Income level
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 18.
If all the factors of production are increased by some proportion and as a result output increases by a greater proportion then it is called :
(A) Constant returns to scale
(B) Decreasing returns
(C) Increasing returns to scale
(D) None of these
Answer:
(C) Increasing returns to scale

Question 19.
The shape of average cost curve is :
(A) U-Shaped
(B) Rectangular hyperbola shaped
(C) Line paralledl to v-axis
(D) None of these
Answer:
(A) U-Shaped

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 20.
The reason of decrease in supply is :
(A) Increase in production cost
(B) Increase in price of substitutes
(C) Fall in number of firms in the industry
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 21.
It which market is average revenue equal to marginal revenue ?
(A) Perfect competition
(B) Oligopoly
(C) Imperfect competition
(D) Monopoly
Answer:
(A) Perfect competition

Question 22.
Market Price is found in :
(A) Short period market
(B) Long period market
(C) Very short period market
(D) None of these
Answer:
(A) Short period market

Question 23.
Which is not a condition for equilibrium of a monopoly firm?
(A) AR = MC
(B) MR = MC
(C) Marginal cost curve should cut the marginal revenue curve from below
(D) Both (B) & (C)
Answer:
(A) AR = MC

Question 24.
Which is the component of factor price determination ?
(A) Rent
(B) Wages
(C) Interest
(D) All of the above
Answer:
(D) All of the above

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 25.
Rent is = ?
(A) Actual Income – Transfer Earnings
(B) Actual Income + Transfer earnings
(C) Transfer Earnings
(D) None of the above
Answer:
(A) Actual Income – Transfer Earnings

Question 26.
Which one of the following is included in circular flow ?
(A) Real Flow
(B) Money Flow
(C) Both (A) & (B)
(D) None of these
Answer:
(C) Both (A) & (B)

Question 27.
The market value of all final goods and services produced in an economy over a year is called :
(A) Gross National Product
(B) National Income
(C) Gross Domestic Product
(D) Net National Product
Answer:
(C) Gross Domestic Product

Question 28.
Which one is a compenent of profit ?
(A) Dividend
(B) Undistributed profit
(C) Corporate profit tax
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 29.
Which method is adopted in measuring National Income ?
(A) Production Method
(B) Income Method
(C) Expenditure method
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 30.
Money is a matter which is :
(A) A measure of value
(B) Accepted as a means of exchange
(C) used to store wealth
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 31.
Which one is the Bank of the Public ?
(A) Commercial Bank
(B) Central Bank
(C) Both (A) & (B)
(D) None of the above
Answer:
(A) Commercial Bank

Question 32.
The full form of ATM is :
(A) Any time money (B) All time money
(C) Automated Teller Money
(D) Both (A) & (B)
Answer:
(C) Automated Teller Money

Question 33.
Throught with which method can we withdraw money from bank ?
(A) Withdrawal Form
(B) Cheque
(C)ATM
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 34.
Who is the custodian of Indian Banking System ?
(A) Reserve Bank of India
(B) State Bank of India
(C) Unit Trust of India
(D) LIC of India
Answer:
(A) Reserve Bank of India

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 35.
Monetary policy is related with :
(A) Public Expenditure
(B) Taxes
(C) Public Debt
(D) Open market operations
Answer:
(D) Open market operations

Question 36.
Who is the writer of the Book, ‘Trailed Economic Politique ?
(A) Pigou
(B) J. B. Say
(C) Keynes
(D) Ricardo
Answer:
(A) Pigou

Question 37.
On which concept does classical viewpoint depend ?
(A) Say’s law of market
(B) Perfect Flexibility of Wage Rate
(C) Perfect Flexibility of Interest Rate
(D) All of these
Answer:
(D) All of these

Question 38.
Keyness theory is associated with :
(A) Effective demand
(B) Propensity to consume
(C) Propensity to save
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 39.
The theory of employment multipler was propounded by:
(A) Keynes
(B) Kahn
(C) Hamen
(D) Marshall
Answer:
(B) Kahn

Question 40.
Which of the following is a reason of appeaming surplus Demand ?
(A) Increase in Public expenditure
(B) Increase in money supply
(C) Fall in taxes
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 41.
Which monetary measure is to be adopted in correcting Inflationary gap ?
(A) Increase in Bank rate
(B) Selling of securities in open market
(C) Increase in Cash Reserve Ratio
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 42.
In an unbalanced budget:
(A) Income is greater than expenditure
(B) Expenditure is higher relative to income
(C) Deficit is covered by loans or printing of notes
(D) Only (B) and (C)
Answer:
(D) Only (B) and (C)

Question 43.
In Indian one rupee note is issued by :
(A) Reserve Bank of India
(B) Finance Ministry of Government of India
(C) State Bank of India
(D) None of these
Answer:
(B) Finance Ministry of Government of India

Question 44.
Financial Year in India is :
(A) April 1 to March 31
(B) January 1 to December 31
(C) October 1 to September 30
(D) None of these
Answer:
(A) April 1 to March 31

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 45.
Capital budget consist of:
(A) Revenue Receipts & Revenue Expenditure
(B) Capital Receipts & Capital Expenditure
(C) Direct & Indirect Tax
(D) None of these
Answer:
(B) Capital Receipts & Capital Expenditure

Question 46.
Foreign exchange rate is determined by :
(A) Government
(B) Bargeining
(C) World Bank
(D) Demand & Supply Forces
Answer:
(D) Demand & Supply Forces

Question 47.
The forms of foreign exchange market is/are :
(A) Spot Market
(B) Forward Market
(C) Both (A) & (B)
(D) None of these
Answer:
(C) Both (A) & (B)

Question 48.
Which account is included in the composition of Balance of Payments ?
(A) Current Account
(B) Capital Account
(C) Both (A) & (B)
(D) None of the above
Answer:
(C) Both (A) & (B)

Bihar Board 12th Economics VVI Objective Questions Model Set 1 in English

Question 49.
Which one is the visible item of Balance of Payments ?
(A) Machine
(B) Cloth
(C) Cement
(D) All the above
Answer:
(D) All the above

Question 50.
Balance of Trade = ?
(A) Export of Visible Items – Imports of Visible Items
(B) Export of both Visible and Invisible Item – Imports of both visible and Invisible Items
(C) Import of Visibl Items – Export of Visible Items
(D) None of these
Answer:
(A) Export of Visible Items – Imports of Visible Items