Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व

Bihar Board Class 11 Chemistry p-ब्लॉक तत्त्व Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 11.1
(क) B से Tl तक तथा
(ख) C से Pb तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता के क्रम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(क) B से Tl तक (बोरॉन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from B to Tl (Boron family)]
बोरॉन परिवार (वर्ग 13) के तत्वों का विन्यास ns2p1 होता है। इसका तात्पर्य यह है कि बन्ध निर्माण के लिए तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन उपलब्ध हैं। इन इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके ये परमाणु अपने यौगिकों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि इन तत्वों की ऑक्सीकरण-अवस्था में निम्नलिखित प्रवृत्ति प्रेक्षित होती है –

1. प्रथम दो तत्व बोरॉन तथा ऐलुमिनियम यौगिकों में केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, परन्तु शेष तत्वगैलियम, इण्डियम तथा थैलियम +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ-साथ +1 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करते हैं अर्थात् से परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।

2. +3 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व ऐलुमिनियम से आगे जाने पर घटता है तथा अन्तिम तत्व थैलियम की स्थिति में, +1 ऑक्सीकरण अवस्था, +3 ऑक्सीकरण अवस्था से अधिक स्थायी होती है। इसका अर्थ यह है कि TICI, TIC15 से अधिक स्थायी होता है।

(ख) से Pb तक (कार्बन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from C to Pb (Carbon family)]
कार्बन परिवार (समूह-14) के तत्वों का विन्यास ns2p2 होता है। स्पष्ट है कि इन तत्वों के परमाणुओं के बाह्यतम कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन तत्वों द्वारा सामान्यतः +4 तथा +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाई जाती है। कार्बन ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करता है।

चूंकि प्रथम चार आयनन एन्थैल्पी का योग अति उच्च होता है; अतः +4 ऑक्सीकरण अवस्था में अधिकतर यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते हैं। इस समूह के गुरुतर तत्वों में Ge < Sn < Pb क्रम में +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

सहसंयोजक कोश में ns2 इलेक्ट्रॉन के बन्धन में भाग नहीं लेने के कारण यह होता है। इन दो ऑक्सीकरण अवस्थाओं का सापेक्षिक स्थायित्व वर्ग में परिवर्तित होता है। कार्बन तथा सिलिकन मुख्यत: +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। जर्मेनियम की +4 ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होती है, जबकि कुछ यौगिकों में +2 ऑक्सीकरण अवस्था भी मिलती है।

टिन ऐसी दोनों अवस्थाओं में यौगिकों बनाता है (+2 ऑक्सीकरण अवस्था में टिन अपचायक के रूप में कार्य करता है)। +2 ऑक्सीकरण अवस्था में लेड के यौगिक स्थायी होते हैं, जबकि इसकी +4 अवस्था प्रबल ऑक्सीकरण है। इस आधार पर स्पष्ट है कि –

  1. SnCl4 तथा PbCl4 की तुलना में SnCl2 तथा PbCl2 अधिक सरलता से बनते हैं।
  2. PbCl2, SnCl2, से अधिक स्थायी होता है चूँकि इसमें अक्रिय युग्म प्रभाव का परिमाण अधिक होता है।

चतुः संयोजी अवस्था में अणु के केन्द्रीय परमाणु पर आठ इलेक्ट्रॉन होते हैं। इलेक्ट्रॉन परिपूर्ण अणु होने के कारण सामान्यतया इलेक्ट्रॉनग्राही या इलेक्ट्रॉनदाता स्पीशीज की अपेक्षा इनसे नहीं की जाती है। यद्यपि कार्बन अपनी सहसंयोजकता +4 का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, परन्तु समूह के अन्य तत्व ऐसा करते हैं।

यह उन तत्वों में d – कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है। यही कारण है कि ऐसे तत्वों के हैलाइड जल-अपघटन के उपरान्त दाता स्पीशीज (donor species) से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके संकुल बनाते हैं। उदाहरणार्थ-कुछ स्पीशीज; जैसे –
(SiF6)2-, (GeCl6)2- तथा Sn(OH)62- ऐती होती हैं, जिनके केन्द्रीय परमाणु sp3d2 संकरित होते हैं।

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प्रश्न 11.2
TlCl3 की तुलना में BCl3 के उच्च स्थायित्व को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
बोरॉन (B) परमाणु की स्थिति में, अक्रिय युग्म प्रभाव नगण्य होता है। इसका अर्थ है कि इसके तीनों संयोजी इलेक्ट्रॉन (2s2px1) क्लोरीन परमाणुओं के साथ बन्ध बनाने के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए BCl3 स्थायी होती है। यद्यपि थैलियम (Tl) की स्थिति में, संयोजी s-इलेक्ट्रॉन (6s2) अधिकतम अक्रिय युग्म प्रभाव अनुभव करते हैं। अतः केवल संयोजी p – इलेक्ट्रॉन (6p1) बन्ध के लिए उपलब्ध होते हैं। इन परिस्थितियो में TlCl अत्यधिक स्थायी होता है, जबकि TlCl3 अपेक्षाकृत बहुत कम स्थायी होता है। निष्कर्ष रूप में स्पष्ट है कि TlCl3 की तुलना में BCl, उच्च स्थायी होता है।

प्रश्न 11.3
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड लूईस अम्ल के समान व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड BF3 अणु में F परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों से साझा करके केन्द्रीय बोरॉन परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की संख्या 6 (तीन युग्म) होती है। अतः यह एक इलेक्ट्रॉन-न्यून अणु है तथा यह स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके लूईस अम्ल के समान व्यवहार प्रदर्शित करता है।

उदाहरणार्थ –
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड सरलतापूर्वक अमोनियाम से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके BE3.NH3 उपसहसंयोजक यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 11.4
BCl3 तथा CCl4 यौगिकों का उदहारण देते हए जल के प्रति इनके व्यवहार के औचित्य को समझाइए।
उत्तर:
BCl3 में (B परमाणु ap2 – संकरित हैं), B परमाणु का अष्टक अपूर्ण है तथा इसका असंकरित 2p – कक्षक जल अणु से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करके योगात्मक उत्पाद बना सकता है।
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इस प्रकार जल से अभिक्रिया करने पर एक Cl परमाणु -OH समूह से प्रतिस्थापित हो जाता है। इसी प्रकार अन्य दो Cl परमाणु भी -OH समूहों से प्रतिस्थापित हो जाते हैं।
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इससे प्रदर्शित होता है कि बोरॉन ट्राइक्लोराइड का जल-अपघटन हो जाता है, परन्तु यह CCl4 के साथ सम्भव नहीं है। कार्बन परमाणु का अष्टक पूर्ण होता है तथा H2O अणुओं के साथ योगात्मक उत्पाद बनने की कोई सम्भावना नहीं है। परिणामस्वरूप कार्बन टेट्राक्लोराइड जल-अपघटित नहीं होता। जल में मिलाने पर यह उसमें मिश्रित भी नहीं होता, अपितु एक पृथक तैलीय पर्त बनाता है।

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प्रश्न 11.5
क्या बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल है? समझाइए।
उत्तर:
बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल नहीं है। यह एक लूईस अम्ल है तथा H2O अणु के हाइड्रॉक्सिल आयन से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करता है।
B(OH)3 + 2HOH → B(OH4)] + H3O+

प्रश्न 11.6
क्या होता है, जब बोरिक अम्ल को गर्म किया जाता है?
उत्तर:
370K से अधिक ताप गर्म किए जाने पर बोरिक अम्ल (ऑर्थोबोरिक अम्ल) मेटाबोरिक अम्ल (HBO2) बनाता है, जो और अधिक गर्म करने पर बोरिक ऑक्साइड (B2O3) में परिवर्तित हो जाता है।
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प्रश्न 11.7
BF3 तथा BH4 की आकृति की व्याख्या कीजिए। इन स्पीशीज में बोरॉन के संकरण को निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोरॉन ट्राइफ्लु ओराइड (Boron trifluoridie, BF3):
इसमें केन्द्रीय परमाणु बोरॉन है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2, 2s2 2p1 है। तलस्थ अवस्था में इसमें केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है जिसके आधार पर केवल एक सहसंयोजक बन्ध ही बन सकता है। अतः BF3 अणु बनने में यह अवश्य ही उत्तेजित अवस्था में होगा जिस स्थिति में एक s – इलेक्ट्रॉन p – कक्षक में उन्नत हो जाएगा –
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उत्तेजित बोरॉन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं जिससे यह तीन. सहसंयोजक बन्ध बना सकता है। तीन फ्लुओरीन BF3 में युग्मन के लिए तीन इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं।
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इसमें एक बन्ध s – इलेक्ट्रॉन के माध्यम से है तथा अन्य दो बन्ध दो p – इलेक्ट्रॉनों के माध्यम से है। अतः तीनों बन्ध समान नहीं होने चाहिए। ऽ तथा px व py कक्षकों की ऊर्जा का संचय होकर तीनों कक्षकों में बराबर राशि में वितरित हो जाता है। इस प्रकार तीन sp2 संकर कक्षकों का उद्भव होता है। इन कक्षकों के बीच 120° का कोण होता है जिससे इलेक्ट्रॉन युग्मों में पारस्परिक प्रतिकर्षण न्यूनतम रहता है।
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चित्र – sp2 – संकरण।

ये sp2 संकर कक्षक F परमाणुओं के कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके बन्ध बनाते हैं। इस प्रकार BF3 में बन्ध कोण 120° होता है तथा अणु त्रिकोणीय व समतल होता है।
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चित्र-बोरॉन ट्राइफ्जुओराइड की आकृति।

बोरॉन टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन (BH4):
वर्ग -13 के तत्व MH3 प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। ये हाइड्राइड दुर्बल लूईस अम्ल होते हैं तथा प्रबल लूईस क्षारकों (:B) के साथ MH3 : B प्रकार के योग-उत्पाद बनाते हैं (M = B, Al, Ga)। इन हाइड्राइडों का निर्माण इनके बाह्यतम कोश में उपस्थित रिक्त p – कक्षकों के कारण होता है। जो हाइड्राइड आयन (H) से तुरन्त इलेक्ट्रॉन युग्म लेकर टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन बनाते हैं। BH4 की संरचना संकरण के प्रकार के आधार पर निर्धारित की जा सकती है। संकरण का प्रकार निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है –
H = \(\frac{1}{2}\) [V + M – C + A]

जहाँ H = संकरण में सम्मिलित कक्षकों की संख्या
V = केन्द्रीय परमाणु के संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
M = एकल संयोजी परमाणुओं की संख्या
C = धनायन पर आवेश
A = ऋणायन पर आवेश
इस प्रकार
H = \(\frac{1}{2}\) [3 + 4 – 0 + 1] = 4

चूँकि संकरण में भाग लेने वाले कक्षकों की संख्या 4 है; अत: यह sp3 संकरण है। sp3 संकरण में एक s – कक्षक तथा तीन p – कक्षकों के सम्मिश्रण से चार समतुल्य संकर कक्षक बनते हैं। इन चारों कक्षकों में अल्पतम प्रतिकर्षण होने के लिए वे एक। समचतुष्फलक के चारों कोनों की ओर दिष्ट होते हैं तथा परस्पर 109°28′ का कोण बनाते हैं। अतः BH4 की आकृति निम्नवत्
होगी –
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चित्र – [BH4] की आकृति।

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प्रश्न 11.8
एल्यूमीनियम के उभयधर्मी व्यवहार दर्शाने वाली अभिक्रियाएँ दीजिए।
उत्तर:
चूँकि एल्यूमीनियम अम्लों तथा ‘क्षारों दोनों से अभिक्रिया कर सकता है, अतः यह उभयधर्मी प्रवृत्ति का होता है; जैसे –
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प्रश्न 11.9
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्या होते हैं? क्या BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक हैं? समझाइये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक-ऐसे यौगिक जिनके अणुओं में केन्द्रीय परमाणु या अधिक इलेक्ट्रॉन-युग्मों को ग्रहण, करने की प्रवृत्ति हो, इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक कहलाते हैं। इन्हें लूईस अम्ल भी कहते हैं।

BCl3 तथा SiCl4 दोनों इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक हैं। B और Si परमाणुओं में क्रमशः रिक्त 2p – कक्षक तथा रिक्त 3d – कक्षक होते हैं। ये दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉन-दाता स्पीशीज से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं। अत: BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है।

प्रश्न 11.10
CO32- तथा HCO3, की अनुनादी संरचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
CO32- की अनुनादी संरचना
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HCO2-3 की अनुनादी संरचना
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प्रश्न 11.11
(क) CO32-, (ख) हीरा तथा (ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था क्या होती है?
उत्तर:
(क) CO32- में कार्बन की संकरण-अवस्था sp2 है।
(ख) हीरे में कार्बन की संकरण-अवस्था sp3 है।
(ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था sp2 है।

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प्रश्न 11.12
संरचना के आधार पर हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में निहित भिन्नता को समझाइए।
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट में अन्तर:
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प्रश्न 11.13
निम्नलिखित कथनों को युक्तिसंगत कीजिए तथा रासायनिक समीकरण दीजिए –
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके PbCl4 देता है।
(ख) लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी है।
(ग) लेड एक आयोडाइड Pbl4 नहीं बनाता है।
उत्तर:
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके लेड (IV) क्लोराइड, PbCl4 देता है क्योंकि क्लोरीन एक प्रबलतम ऑक्सीकारक हैं।
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(ख) चूँकि लेड IV ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में II ऑक्सीकरण अवस्था में अधिक स्थायी होता है; अत: लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी होता है। Pb (IV) क्लोराइड अपघटित होकर Pb (II) क्लोराइड बनाता है और Cl2 गैस मुक्त होती है।
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(ग) चूँकि I आयन के प्रबल अपचायक हैं और यह विलयन में Pb4+ आयन Pb2+ आयन में अपचयित कर देता हैं, अतः लेड एक आयोडाइड PbI4 नहीं बनाता है।
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प्रश्न 11.14
BF3 में BF4 में बन्ध लम्बाई क्रमशः 130 pm तथा 143 pm होने के कारण बताइए।
उत्तर:
BF3 में तथा BF4 में बोरॉन की संकरण – अवस्था निम्नवत् है –
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अतः दिए गए दो फ्लुओराइडों के बन्ध लम्बाइयों में अन्तर बोरॉन की संक्रमण अवस्था में अन्तर के कारण होता है।

प्रश्न 11.15
B – Cl आबन्ध द्विध्रुव आघूर्ण रखता है, किन्तु BCl3 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है, क्यों?
उत्तर:
B – Cl बन्ध में एक निश्चित द्विध्रुव आघूर्ण होता है। दूसरी ओर BCl3 का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है क्योंकि इसका अणु समतलीय होता है जिसमें आबन्ध ध्रुवताएँ परस्पर निरस्त हो जाती हैं।

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प्रश्न 11.16
निर्जलीय (HF) में एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड अविलेय हैं, परन्तु NaF मिलाने पर घुल जाता है। गैसीय BF3 को प्रवाहित करने पर परिणामी विलयन में से एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड अवक्षेपित हो जाता है। इसका कारण बताइए।
उत्तर:
चूँकि एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड (AIF3) की प्रकृति सहसंयोजी होती है, अत: यह निर्जलीय (HF) अधुलनशील है। यह NaF से अभिक्रिया के पश्चात् एक संकुल यौगिक बनाता है जो जल में विलेय है।
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यह संकुल यौगिक को जलीय विलयन BF3 की वाष्प प्रवाहित करने पर तोड़ा जा सकता है। फलत: AIF3 पुन: अवक्षेपित हो जाता है।
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प्रश्न 11.17
CO के विषैली होने का एक कारण बताइए।
उत्तर:
CO की अत्यंत विषैली प्रकृति हीमोग्लोबिन के साथ एक संकुल बनाने के कारण होती है जो ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन संकुल से 300 गुना अधिक स्थाई होता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन को शरीर में ऑक्सीजन प्रवाह को रोकती है। इससे दम घुटने लगता है और अंततः मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 11.18
CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी कैसे है?
उत्तर:
CO2 में CH4 की तरह ऊष्मा अवशोषित करने की प्रवृत्ति होती है, जिसे हरित-ग्रह गैस करते हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 11.19
डाइबोरेन तथा बोरिक अम्ल की संरचना समझाइए।
उत्तर:
(क) डाइबोरेन की संरचना:
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चित्र – (क) डाइबोरेन (B2H6 ) की संरचना।
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चित्र – (क) डाइबोरेन में बन्धन। डाइबोरेन में प्रत्येक बोरॉन परमाणु sp3 – संकरित होता है। इन चार sp3 – संकरित कक्षकों में से एक इलेक्ट्रॉन रहित होता है, जिसे बिन्दुकृत रेखाओं (Dotted Lines) द्वारा दर्शाया गया है। सिर वाले B – H समान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (2e – 2e) बन्ध हैं, जबकि दो सेतुबन्ध B – H – B त्रिकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (3e – 3e) है। इसे ‘केलाबन्ध’ (Banana Bond) भी कहते हैं।

डाइबोरेन की संरचना को चित्र (क) द्वारा दर्शाया गया है। इससे सिरे वाले चार हाइड्रोजन परमाणु तथा दो बोरॉन परमाणु एक ही तल में होते हैं। इस तल के ऊपर तथा नीचे दो सेतुबन्ध (bridging) हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। सिरे वाले चार B-H बन्ध सामान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (two centre-two electron) बन्ध भिन्न प्रकार के होते हैं, जिन्हें ‘त्रिकेन्द्रीयद्विइलेक्ट्रॉन बन्ध’ कहते हैं चित्र (ख)।

(ख) बोरिक अम्ल की संरचना:
ठोस अवस्था में बोरिक अम्ल की पीय संरचना होती है, जहाँ समतलीय BO3 की इकाइयाँ हाइड्रोजन बन्ध द्वारा एक-दूसरे से 3.18pm की दूरी पर जुड़ी रहती हैं।
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चित्र – (ख) बोरिक अम्ल की संरचना में बिन्दुकृत रेखाएँ हाइड्रोजन आबन्ध को प्रदर्शित करती हैं।

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प्रश्न 11.20
क्या होता है, जब –
(क) बोरेक्स को अधिक गर्म किया जाता है।
(ख) बोरिक अम्ल को जल में मिलाया जाता है।
(ग) एल्यूमीनियम की तनु NaOH से अभिक्रिया कराई जाती है।
(घ) BF3 की क्रिया अमोनिया से की जाती है।
उत्तर:
(क) पहले यह जल के अणु का निष्कासन करके फूल जाता है। पुनः गर्म करने पर यह एक पारदर्शी द्रव में परिवर्तित हो जाता है, जो काँच के समान एक ठोस में परिवर्तित हो जाता है। इसे बोरेक्स मनका कहते हैं।
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(ख) यह जल में घुल जाता है। क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन-न्यून प्रकृति का होता है।
B(OH)3 + H – OH → [B(OH)4] + H+

(ग) एल्यूमीनियम NaOH विलयन में घुलकर एक विलेय संकुल बनाता है तथा हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।
2Al (s) + 2NaOH (aq) + 6H2O (l) → 2Na+[Al(OH)4] (aq) + 3H2 (g)

(घ) BF3 (लूईस अम्ल) NH3 (लूईस-क्षार) के साथ योगत्मक यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 11.21
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को समझाइए –
(क) कॉपर की उपस्थिति में उच्च ताप पर सिलिकन को मेथिल क्लोराइड के साथ गर्म किया जाता है।
(ख) सिलिकॉन डाऑक्साइड की क्रिया हाइड्रोजन फ्लु ओराइड के साथ की जाती है।
(ग) CO को ZnO के साथ गर्म किया जाता है।
(घ) जलीय ऐलुमिना की क्रिया जलीय NaOH के साथ की जाती है।
उत्तर:
(क) सिलिकन कॉपर (उत्प्रेरक) की उपस्थिति में मेथिल क्लोराइड के साथ 570K पर गर्म करने पर डाइमेथिल डाइक्लोरोसिन बनाता है। इसके जल अपघटन पर संघनन बहुलीकरण द्वारा श्रृंखला बहुलक प्राप्त होते हैं।
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(ख) सिलिकन टेट्राफ्लुओराइड (SiF4) बनाता है।
SiO2 + 4HF → SiF4 + 2H2O

(ग) CO (प्रबल अपचायन) द्वारा ZnO का अपचयन Zn में हो जाता है।
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(घ) क्रिया करके एक घुलनशील संकुल बनाते हैं।
Al2O3 (s) + 2NaOH(aq) + 3H22 (l) → 2Na [AI(OH)4] (aq)

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प्रश्न 11.22
कारण बताइए –
(क) सान्द्र HNO3 का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है।
(ख) तनु NaOH तथा ऐलुमिनियम के टुकड़ों के मिश्रण का प्रयोग अपवाहिका खोलने के लिए किया जाता है।
(ग) ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
(घ) हीरा का प्रयोग अपघर्षक के रूप में होता है।
(ङ) वायुयान बनाने में ऐलुमिनियम मिश्रधातु का उपयोग होता है।
(घ) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए।
(छ) संचरण केवल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।
उत्तर:
(क) सान्द्र HNO3 प्रारम्भ में ही ऐलुमिनियम से क्रिया करके ऐलुमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) बना लेता है। जो पात्र के भीतर एक रक्षी-लेपन कर देता है। इस प्रकार धात्विक पात्र निष्क्रिय (passive) हो जाता है तथा फिर अम्ल से क्रिया नहीं करता। इसलिए अम्ल का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा सुरक्षापूर्वक किया जा सकता है।

(ख) ऐलुमिनियम तनु NaOH में घुलकर H2 मुक्त करता है। यह हाइड्रोजन गैस अपवाहिका खोलने में सहायता करती
2Al + 2NaOH + 2H2O → 2NaAlO2 + 3H2

(ग) प्रेफाइट में sp2 – संकरित कार्बन होता है तथा इसकी पीय संरचना होती है। व्यापक पृथक्करण तथा दुर्बल अन्तरपीय बन्धों के कारण इसकी दो समीपवर्ती पर्ते एक-दूसरे पर सरलतापूर्वक फिसल जाती हैं। इस कारण इसे शुष्क स्नेहक की भाँति उन मशीनों में प्रयुक्त किया जा सकता है जिनमें किसी कारणवश तैलीय स्नेहक प्रयुक्त न किए जा सकते हों।

(घ) हीरा समस्त ज्ञात पदार्थों में कठोरतम पदार्थ होता है। अतः इसका प्रयोग अपघर्षक (abrasive) तथा काँच काटने में किया जाता है।

(ङ) ऐलुमिनियम मिश्रधातु – मैग्नोलियम तथा ड्यूरैलियम जिनमें लगभग 95% धातु होती है, को वायुयान बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि ये हल्के, परन्तु मजबूत होते हैं। इसके अतिरिक्त इन पर जंग भी नहीं लगता है।

(च) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए, क्योंकि लम्बे समय तक नमी तथा ऑक्सीजन से धातु संक्षारित हो सकती है।

(छ) ऐलुमिनियम सामान्यतया वायु तथा नमी से प्रभावित नहीं होती तथा इसकी विद्युत-चालकता कॉपर से दोगुनी होती है। इसलिए संचरण केबल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।

प्रश्न 11.23
कार्बन से सिलिकॉन तक आयनीकरण एन्थैल्पी में प्रघटनीय कमी होती है। क्यों?
उत्तर:
कार्बन से सिलिकन तक आयनीकरण में प्रघटनीय कमी होती है; क्योंकि कार्बन की परमाणु त्रिज्या (77pm) की तुलना में सिलिकन की परमाणु त्रिज्या अधिक (118 pm) होती है। इसलिए इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन सरलतापूर्वक हो जाता है। सिलिकन से जर्मेनियम तक आयनन एन्थैल्पी में कमी प्रघटनीय नहीं होती; क्योंकि तत्वों के परमाणु आकार एकसमान रूप से बढ़ते हैं।

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प्रश्न 11.24
Al की तुलना में Ga की कम परमाणवीय त्रिज्या को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
समूह में नीचे जाने पर प्रत्येक क्रमागत सदस्य में इलेक्ट्रॉनों का एक कोश जुड़ता है। आंतरिक कोड के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास यह देखा जा सकता है कि Ga में उपस्थित 10d इलेक्ट्रॉन बढ़े हुए नाभिकीय आवेश की तुलना में बाह्य इलेक्ट्रॉनों पर दुर्बल परीक्षण प्रभाव डाले हैं। फलत: Ga की परमाणवीय त्रिज्या AI की तुलना में कम होती है।

प्रश्न 11.25
अपररूप क्या होता है? कार्बन के दो महत्त्वपूर्ण अपररूप हीरा तथा ग्रेफाइट की संरचना का चित्र बनाइए। इन दोनों अपररूपों के भौतिक गुणों पर संरचना का क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
अपररूप:
प्रकृति में शुद्ध कार्बन दो रूपों में पाया जाता है:
हीरा तथा ग्रेफाइट। यदि हीरे अथवा ग्रेफाइट को वायु में अत्यधिक गर्म किया जाए तो यह पूर्ण ग्रेफाइट की समान मात्रा दहन की जाती है, तब कार्बन डाइ-ऑक्साइड की बराबर मात्रा उत्पन्न होती है तथा कोई अवशेष नहीं बचता। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि हीरा तथा ग्रेफाइट रासायनिक रूप से एकसमान है तथा केवल परमाणु से बने हैं। इनके भौतिक गुण अत्यधिक भिन्न होते हैं। अतः प्रकार के गुणों को प्रदर्शित करने वाले तत्त्वों को अपररूप कहते हैं।

हीरा:
हीरा में क्रिस्टलीय जालक होता है। इसमें प्रत्येक परमाणु sp3 – संकरित होता है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति से अन्य चार कार्बन परमाणु से जुड़ा रहता है। इसमें कार्बन-कार्बन बन्ध लम्बाई 154 pm होती है। कार्बन परमाणु द्विक (space) में दृढ़ त्रिविमीय जालक (rigid three dimensional network) का निर्माण करते हैं।

इस संरचना में सम्पूर्ण जालक में दिशात्मक सहसंयोजक बन्ध उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार विस्तृत सहसंयोजक बन्ध को तोड़ना कठिन कार्य होता है। अतः हीरा पृथ्वी पर पाया जाने वाला सर्वाधिक कठोर पदार्थ है। इसका उपयोग धार तेज करने के लिए अपघर्षक (abrasive) के रूप में, रूपदा (dies) बनाने में तथा विद्युत-प्रकाश लैम्प में टंगस्टन तन्तु (filament) बनाने में होता है।
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चित्र-हीरे की संरचना।

ग्रेफाइट ग्रेफाइट की परतीय संरचना (layered structure) होती है। ये पर्ते वान्डरवाल बल द्वारा जुड़ी रहती हैं। इस कारण ग्रेफाइट चिकना (slippery) तथा मुलायम (soft) होता है। दो पर्तों के मध्य की दूरी 340pm होती है। प्रत्येक पर्त में कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय (hexagonal rings) के रूप में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें C – C बन्ध लम्बाई 141.5pm होती है। षट्कोणीय वलय में प्रत्येक परमाणु (sp2) संकरित होता है।

प्रत्येक कार्बन परमाणुओं से तीन सिग्मा बन्ध बनाता है। इसका चौथा इलेक्ट्रॉन π – बन्ध बनता है। सम्पूर्ण परत में इलेक्ट्रॉन विस्थानीकृत होते हैं। इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं; अत: ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है। उच्च ताप पर जिन मशीनों में तेल का प्रयोग स्नेहक (lubricant) के रूप में नहीं हो सकता है, उनमें ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक का कार्य करता है।
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प्रश्न 11.26
(क) निम्नलिखित ऑक्साइड को उदासीन, अम्लीय, क्षारीय तथा उभयधर्मी ऑक्साइड के रूप में वर्गीकृत कीजिए –
CO, B2O3, SiO2, CO2, Al2O3, PbO2, Tl2O3
(ख) इनकी प्रकृति को दर्शाने वाली रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
(क) उदासीन ऑक्साइड : Co
अम्लीय ऑक्साइड : SiO2, CO2, B2O3
क्षारीय ऑक्साइड : Tl2O3 + PbO2
उभयधर्मी ऑक्साइड : Al2O3

(ख) CO – उदासीन
B2O3 – अम्लीय
B2O3 + Cu0 → Cu(BO2)2

SiO2 – अम्लीय
SiO2 + CaO → CaSiO3

CO2 – अम्लीय
NaOH + CO2 → NaHCO3
2NaOH + CO2 → Na2CO3 + H2O

Al2O3 – उभयधर्मी
Al2O3 + 6HCl → 2AlCl3 + 3H2O
Al2O3 + 2NaOH → 2NaAlO2 + H2O

PbO2 – क्षारीय
PbO2 + HCl → PbCl4 + 2H20

Tl2O3 – क्षारीय
Tl2O3 + 8H2SO4 → Tl2(SO4)3 + 3H2O

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प्रश्न 11.27
कुछ अभिक्रियाओं में थैलियम, ऐलुमिनियम से समानता दर्शाता है, जबकि अन्य में यह समूह I के धातुओं से समानता दर्शाता है। इस तथ्य को कुछ प्रमाणों के द्वारा सिद्ध करें।
उत्तर:
थैलियम की ऐलुमिनियम से समानता (Similarities of Thallium with Aluminium):
ऐलुमिनियम अपने यौगिकों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। थैलियम, वर्ग-13 का अन्तिम तत्व, अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण + 3 तथा +1 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है। अतः ये धातुएँ +3 ऑक्सीकरण अवस्था में समानता रखती हैं। यद्यपि ये +1 ऑक्सीकरण अवस्था में भिन्नता दर्शाती हैं। इनमें समानता के कुछ बिन्दु निम्नलिखित हैं –

  1. दोनों का बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1 होता है।
  2. दोनों वायु में ऑक्साइड बनने के कारण धूमिल पड़ जाती है।
  3. Al तथा Tl दोनों के फ्लुओराइड आयनिक होते हैं तथा इनका गलनांक उच्च होता है।

थैलियम की समूह – I के धातुओं से समानता (Similarities of Thallium with group – I metals):
थैलियम + 1 ऑक्सीकरण अवस्था में समूह – I की धातुओं से समानता दर्शाता है। इनमें समानता के कुछ बिन्दु निम्नलिखित –

  1. NaOH के समान, Tl(OH) जल में विलेय होकर प्रबल क्षारीय विलयन देता है।
  2. क्षार धातुओं के समान, थैलियम (TI) ऐलुमिनियम लवणों के साथ द्विक-लवण बनाता है।
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प्रश्न 11.28
जब धातु x की क्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ की जाती है तो श्वेत अवक्षेप (A) प्राप्त होता है, जो NaOH के आधिक्य में विलेय होकर विलेय संकुल (B) बनाता है। यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर यौगिक (C) बनाता है। यौगिक (A) को अधिक गर्म किए जाने पर यौगिक (D) बनता है, जो एक निष्कर्षित धातु के रूप में प्रयुक्त होता है। X, A, B, C तथा D को पहचानिए तथा इनकी पहचान के समर्थन में उपयुक्त समीकरण दीजिए।
उत्तर:
1. एल्यूमीनियम (X) को NaOH के साथ गर्म करने पर यह Al(OH)3 का सफेद अवक्षेप बनाता है अर्थात् यौगिक (A) बनाता है, जो NaOH के आधिक्य में घुलकर विलेय संकर (B) बनाता है।
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2. यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर एल्यूमीनियम क्लोराइड (C) बनाता है।
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3. यौगिक (A) अर्थात् Al(OH), को गर्म करने पर ऐलुमिना (D) में बदल जाता है।
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प्रश्न 11.29
निम्नलिखित से आप क्या समझते हैं?
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव
(ख) अपररूप
(ग) श्रृंखलन।
उत्तर:
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव (Inert pair effect):
कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (n-1)d10 ns2 np1 वाले तत्व में, d – कक्षक के इलेक्ट्रॉन दुर्बल परिरक्षण प्रभाव प्रस्तावित करते हैं। इसलिए ns2 इलेक्ट्रॉन नाभिक के धनावेश द्वारा अधिक दृढता से बँधे रहते हैं। इस प्रबल आकर्षण के परिणामस्वरूप, ns2 इलेक्ट्रॉन युग्मित रहते हैं तथा बन्ध में भाग नहीं लेते हैं अर्थात् अक्रिय रहते हैं। यह प्रभाव अक्रिय युग्म प्रभाव कहलाता है। इस स्थिति में, ns2np1 विन्यास में, तीन इलेक्ट्रॉनों में से केवल एक इलेक्ट्रॉन बन्ध-निर्माण में भाग लेता है।

(ख) अपररूप (Allotropes):
किसी तत्व का समान रासायनिक अवस्था में दो या अधिक भिन्न-रूपों में पाया जाना अपररूपता कहलता है। तत्व के ये विभिन्न रूप अपररूप कहलाते हैं। किसी तत्व के सभी अपररूपों के समान रासायनिक गुण होते हैं, परन्तु इनके भौतिक गुणों में अन्तर होता है।

(ग) श्रृंखलन (Catenation):
कार्बन में अन्य परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बन्ध द्वारा जुड़कर लम्बी श्रृंखला या वलय बनाने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को श्रृंखलन कहते हैं। C – C बन्ध अधिक प्रबल होने के कारण ऐसा होता है।

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प्रश्न 11.30
एक लवण x निम्नलिखित परिणाम देता है –
(क) इसका जलीय विलयन लिटमस के प्रति क्षारीय होता है।
(ख) तीव्र गर्म किए जाने पर यह काँच के समान ठोस में स्वेदित हो जाता है।
(ग) जब x के गर्म विलयन में सान्द्र H2SO4 मिलाया जाता है तो एक अम्ल Z का श्वेत क्रिस्टल बनता है।
उपरोक्त अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए और X, Y तथा Z को पहचानिए।
उत्तर:
उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है कि लवण X बोरेक्स (Na2B4O7) है।
(क) बोरेक्स का जलीय विलयन क्षारीय प्रकृति का होता है, जो लाल लिटमस को नीला कर देता है।
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(ख) बोरेक्त तीव्र गर्म किए जाने पर यह स्वेदित हो जाता है, जो क्रिस्टलन जल के अणु खोकर ठोस (Y) बनाता है।
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(ग) बोरेक्स सान्द्र H2SO4 के साथ अभिक्रिया करने पर बोरिक अम्ल (H3BO3) बना है। जब इसे क्रिस्टलीकृत किया जाता है तो यह श्वेत क्रिस्टलों (Z) के रूप में प्राप्त है।
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प्रश्न 11.31
सन्तुलित समीकरण दीजिए –
(क) BF3 + LIH →
(ख) B2H6 + H2O →
(ग) NaH + B2H6
(घ)
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(ङ) Al + NaOH →
(च) B2H6 + NH3
उत्तर:
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प्रश्न 11.32
CO तथा CO2 प्रत्येक के संश्लेषण के लिए एक प्रयोगशाला तथा एक औद्योगिक विधि दीजिए।
उत्तर:
1. कार्बन मोनो-ऑक्साइड (CO)
प्रयोगशाला विधि:
सान्द्र H2SO4 का 273K पर फार्मिक अम्ल के द्वारा निर्जलीकरण कराने पर अल्प मात्रा में शुद्ध CO प्राप्त होती हैं।
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औद्योगिक विधि:
औद्योगिक रूप से कोक पर भाप प्रवाहित करके बनाया जाता है। इस प्रकार CO तथा N2 का मिश्रण प्राप्त होता है। इसे प्रोड्यूसर गैस कहते हैं।
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2. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
प्रयोगशाला विधि:
प्रयोगशाला में इसे कैल्शियम कार्बोनेट पर तनु HCl की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है।
CaCO3 (g) + 2HCl (aq) → CaCl2 (aq) + CO2 (g) + H2O (l)

औद्योगिक विधि:
इसे चूना पत्थर को गर्म करके बनाया जाता है।
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प्रश्न 11.33
बोरेक्स के जलीय विलयन की प्रकृति कौन-सी होती है –
(क) उदासीन
(ख) उभयधर्मी
(ग) क्षारीय
(घ) अम्लीय
उत्तर:
(ग) क्षारीय।

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प्रश्न 11.34
बोरिक अम्ल के बहुलकीय होने का कारण –
(क) इसकी अम्लीय प्रकृति है।
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।
(ग) इसकी एकक्षारीय प्रकृति है।
(घ) इसकी ज्यामिति है।
उत्तर:
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।

प्रश्न 11.35
डाइबोरेन में बोरॉन का संक्रमण कौन-सा होता है –
(क) sp
(ख) sp2
(ग) sp3
(घ) dsp2
उत्तर:
(ग) sp3

प्रश्न 11.36
ऊष्मागतिकीय रूप से कार्बन का सर्वाधिक स्थायी रूप कौन-सा है –
(क) हीरा
(ख) ग्रेफाइट
(ग) फुलरीन्स
(घ) कोयला
उत्तर:
(ख) ग्रेफाइट।

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प्रश्न 11.37
निम्नलिखित में से समूह – 14 के तत्वों के लिए कौन-सा कथन सत्य है –
(क) +4 ऑक्सीकरण प्रदर्शित करते हैं।
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं
(ग) M2- तथा M4- आयन बनाते हैं
(घ) M2+ तथा M4+ आयन बनाते हैं
उत्तर:
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 11.38
यदि सलिकॉन निर्माण में प्रारम्भिक पदार्थ RSiCl3 है तो बनने वाले उत्पाद की संरचना बताइए।
उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 10 s-ब्लॉक तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 10.1
क्षार धातुओं के सामान्य भौतिक तथा रासायनिक गुण क्या हैं?
उत्तर:
वर्ग 1 के तत्व : क्षार धातुएँ (Elements of Group 1 : Alkali Metals):
क्षार धातुओं के भौतिक तथा रासायनिक गुणों में परमाणु-क्रमांक के साथ एक नियमित प्रवृति पाई जाती है। इन तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणों की व्याख्या निम्नलिखित हैं –

भौतिक गुण (Physical Properties):
क्षार धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण सारणी-1 में सूचीबद्ध है।

सारणी-1 : क्षार धातुओं के भौतिक गुण (Physical Properties of the Alkali Metals):
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1. परमाणु त्रिज्या (Atomic radii):
क्षार धातुओं की परमाणु त्रिज्या (धात्विक त्रिज्या का मान अपने आवर्तों में सबसे अधिक होता है तथा ये मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते जाते हैं। किसी परमाणु के नाभिक के केन्द्र से संयोजकता कोश में उपस्थित बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी परमाणु त्रिज्या कहलाती है। क्षार धातुएँ, आवर्त का प्रथम तत्व होते हुए, सर्वाधिक परमाणु त्रिज्या रखती है, चूँकि इनके संयोजकता कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है। परिणामस्वरूप नाभिक के साथ आकर्षण बल का परिमाण न्यूनतम होता है।

वर्ग में नीचे जाने पर इलेक्ट्रॉन कोशों की क्रमिक वृद्धि के कारण परमाणु त्रिज्या बढ़ती है। इसके अतिरिक्त आवरण प्रभाव का परिमाण भी बढ़ता है जो परमाणु के नाभिक के साथ संयोजी 5-इलेक्ट्रॉनों के आकर्षण को कम कर देता है, इसके साथ-साथ नाभिकीय आवेश भी बढ़ता है जो नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण को बढ़ा देता है। परन्तु इसका परिमाण आवरण प्रभाव की तुलना में अत्यन्त कम होता है। इस प्रकार परमाणु आकार पर कुल परिमाण द्वारा यह प्रेक्षित होता है – कि वर्ग में नीचे जाने पर तत्वों के परमाणु आकार बढ़ते हैं।

2. आयनिक त्रिज्या (Ionic radii):
क्षार धातु परमाणु संयोजी s (ns1)इलेक्ट्रॉन खोकर एकल-संयोजी धनायन बनाते हैं। ये धनायनी त्रिज्या मूल परमाणु की तुलना में छोटी होती हैं। सारणी-1 के अनुसार आयनिक त्रिज्या के मान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ते हैं। चूँकि एकलसंयोजी धनायनों का निर्माण परमाण के संयोजकता कोश में उपस्थित केवल एक इलेक्ट्रॉन के निष्कासन पर होता है; अतः शेष इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक द्वारा अधिक आकर्षित होकर उसके समीप हो जाते हैं। परिणामस्वरूप धनायनों का आकार कम हो जाता है। जैसा कि आयनों का आकर अपने मूल परमाणुओं से सम्बद्ध होता है; इसलिए आयनिक त्रिज्या भी परमाणु त्रिज्या के समान वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ती है।

3. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpies):
गैसीय अवस्था में किसी उदासीन विलगित परमाणु से सर्वाधिक शिथिल बद्ध (loosely bound) इलेक्ट्रॉन हटाने के लिए आवश्यक ऊर्जा की न्यूनतम मात्रा, आयनन एन्थैल्पी कहलाती है। इसे kJ mol-1 या eV इकाइयों में व्यक्त किया जा सकता है।

1eV = 96.472kJmol-1

क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी अपने आवर्तों में न्यूनतम होती है तथा वर्ग में नीचे जाने पर यह घटती है। इन तत्वों के प्रथम आयनन ऊर्जा के मान सारणी-1 में दिए गए हैं। क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी के मान कम होने का कारण इनका परमाणु आकार अधिक होना है जिसके कारण संयोजी s-इलेक्ट्रॉन (ns1) को सरलता से निकाला जा सकता है। आयनन एन्थैल्पी के मान वर्ग में नीचे जाने पर भी घटते हैं; क्योंकि परमाणु त्रिज्या के बढ़ने तथा आवरण प्रभाव का परिमाण अधिक होने पर नाभि के आकर्षण बल का परिमाण घट जाता है। इसके अतिरिक्त एक ही तत्व के लिए प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों में बहुत अधिक अन्तर होता है।

उदाहरणार्थ-सोडियम के लिए प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान 496kJmol-1 है, जबकि इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का मान 4562kJmol-1 है। इसका प्रमुख कारण है कि एक इलेक्ट्रॉन खोकर बनने वाला एकलसंयोजी धनायन (M+) उच्च सममिताकार तथा समीपवर्ती उत्कृष्ट गैस की स्थायी संरचना को प्राप्त कर लेता है। परिणामस्वरूप दूसरे इलेक्ट्रॉन का निष्कासन अत्यन्त कठिन प्रक्रिया हो जाती है जैसा कि उपर्युक्त उदाहरण में दिए सोडियम के प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों से स्पष्ट हो जाता है।

4. विद्युत-ऋणात्मकता (Electronegativity):
किसी तत्व की विद्युत-ऋणात्मकता इसके परमाणु की इलेक्ट्रॉनों (बन्ध के साझे युग्म के लिए) को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता को कहते हैं। क्षार धातुओं की विद्युत-ऋणात्मकता कम होती है जिसका अर्थ है कि इनकी इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने की क्षमता कम होती है। विद्युत-ऋणात्मकता के मान वर्ग में नीचे जाने पर घटते क्षार धातु परमाणुओं का ns1 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है जिसका अर्थ है कि इनकी प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन त्यागने की होती है न कि ग्रहण करने की। अतः इनकी विद्युत-ऋणात्मकता के मान कम होते हैं। चूँकि वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ते हैं; अतः परमाणु की संयोजी इलेक्ट्रॉन को थामे रखने की क्षमता में क्रमिक कमी आती है। इसलिए वर्ग में नीचे जाने पर विद्युत-ऋणात्मकता घटती है।

5. ऑक्सीकरण-अवस्था एवं धन विद्युती गुण (Oxidation states and electropositive characters):
क्षार धातु परिवार के सभी सदस्य अपने यौगिकों में +1 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं तथा प्रबल धन-विद्युती होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धन-विद्युती गुण बढ़ता है। क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी के मान बहुत कम होने के कारण इनके परमाणुओं में संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर एकलसंयोजी धनायन बनाने की प्रवृति बहुत अधिक होती है। परिमाणस्वरूप एन्थैल्पी का मान घटता है; अतः धन-विद्युती गुण बढ़ता है।
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6. धात्विक लक्षण (Metallic character):
वर्ग 1 के तत्व प्रारूपिक धातुएँ हैं तथा अत्यन्त कोमल हैं। इन्हें चाकू द्वारा सरलता से काटा जा सकता है। वर्ग में ऊपर नीचे जाने पर इनके धात्विक लक्षणों में अत्यधिक वृद्धि होती है। किसी तत्व का धानित्व गुण उसके इलेक्ट्रॉन त्याग कर धनायन बनाने की प्रवृत्ति से सम्बन्धित होता है। धात्विक बन्ध की प्रबलता इलेक्ट्रॉन समुद्र (electron sea) में उपस्थित संयोजी इलेक्ट्रॉनों तथा करनेल (kernal) के मध्य आकर्षण बल पर निर्भर करती है।

करनेल का आकार जितना छोटा होगा तथा संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होगी, धात्विक बन्ध उतना ही प्रबल होगा। दूसरे शब्दों में धातु की कठोरता धात्विक बन्ध के प्रबल होने पर अधिक होगी। क्षार धातुओं में करनेल बड़े आकार के होते हैं तथा इनमें केवल एक संयोजी इलेक्ट्रॉन होता है। अतः क्षार धातुओं में धात्विक बन्ध दुर्बल होते हैं तथा क्षार धातुएँ कोमल होती हैं। लीथियम सबसे कठोर होता है, चूँकि इसका करनेल सबसे छोटे आकार का होता है।

7. गलनांक तथा क्वथनांक (Melting and boiling points):
क्षार धातुओं के गलनांक तथा क्वथांक अत्यन्त कम होते हैं, जो वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटते हैं। क्षार धातुओं के परमाणुओं का आकार अधिक होता है; अतः क्रिस्टल-जालक में इनकी बन्धन ऊर्जा बहुत कम होती है। परिणामस्वरूप इनके गलनांक कम होते हैं। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार में वृद्धि के साथ-साथ गलनांक के मान घटते हैं। क्वथनांक कम होने का कारण भी यही होता है।

8. घनत्व (Density):
क्षार धातुएँ अत्यन्त हल्की होती हैं। इस परिवार के पहले तीन सदस्य जल से भी हल्के होते हैं। वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घनत्व बढ़ता है। क्षार धातुओं के परमाणुओं का आकार अधिक होता है; अतः वे अन्तराकाश से अधिक संकुलित (closely packed) नहीं होते हैं तथा इनका घनत्व कम होता है। वर्ग में नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ने के कारण घनत्व कम होना चाहिए; परन्तु यह बढ़ता है। चूंकि परमाणु आकार के साथ-साथ परमाणु भार भी बढ़ता है जिसका प्रभाव अधिक है; अतः घनत्व (भार/आयतन) वर्ग में नीचे जाने पर बढ़ता है। इसका एक अपवाद पोटेशियम (K) है जिसका घनत्व सोडियम से कम है। इसका मुख्य कारण पोटैशियम के परमाणु आकार तथा परमाणु आयतन में असामान्य वृद्धि है।

9. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy):
जलयोजन एन्थैल्पी (∆Hhyd) वह ऊर्जा है जो जलीय विलयन में आयनों के जलयोजित होने पर मुक्त होती है। क्षार धातु आयनों की जलयोजन एन्थैल्पी निम्नलिखित क्रम में होती है –
Li+ > Na+ > K+ > RB+ > Cs+

जलयोजन में आयनों तथा चारों ओर उपस्थित जल अणुओं के मध्य आकर्षण होता है। अत: आयन का आकार छोटा होने पर, इस पर आवेश का परिमाण अधिक होगा तथा इनकी जलयोजित होने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी। क्षार धातुओं में Li+ आयन की जलयोजन एन्थैलपी सर्वाधिक होती है। इसलिए लीथियम के लवण अधिकतर जलयोजी प्रवृत्ति के होते हैं (LiCl.2H2O)

10. ज्वाला में रंग देना (Colouration to the flame):
क्षार धातुओं के यौगिकों (मुख्य रूप से क्लोराइड) को प्लैटिनम के तार पर गर्म करने पर ये ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ –
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चूँकि क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी बहुत कम होती है; अत: इनके इलेक्ट्रॉनों को उच्च ऊर्जा स्तर तक उत्तेजित करना सरल होता है। जब इन धातुओं को प्लैटिनम की तार पर रखकर ज्वाला दी जाती है तो ज्वाला की ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर उच्च ऊर्जा स्तर पर पहुँच जाते हैं। पुनः जब ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर आते है तो विकिरण के रूप में दृश्य प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। फलस्वरूप क्षार धातुएँ ज्वाला को विशिष्ट रंग प्रदान करती हैं।

11. प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric effect):
लीथियम के अतिरिक्त सभी क्षार धातुएँ प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करती हैं। प्रकाश-विद्युत प्रभाव को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है-“जब किसी धातु की सतह पर निश्चित आवृत्ति की किरणें टकराती हैं तो धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होकर निकलते हैं। इसे प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहते हैं।” दूसरे शब्दों में धातु की सतह पर फोटॉन के प्रहार से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहलाता है।

प्रकाश-विद्युत प्रभाव का कारण क्षार धातुओं की न्यूनतम आयनन एन्थैल्पो है। धातु की सतह पर गिरने वाले फोटॉनों के पास इतनी ऊर्जा होती है कि वे इलेक्ट्रॉनों को धातु की सतह से उत्सर्जित कर देते हैं। चूँकि लीथियम के छोटे आकार के कारण इसकी आयनन ऊर्जा अधिक होती है; अत: इस धातु पर गिरने वाला फोटॉन नाभिक और इलेक्ट्रॉनों के बीच आकर्षण बल को कम करने में सक्षम नहीं होता है। इस प्रकार प्रकाश के दृश्य क्षेत्र में यह धातु प्रकाश-विद्युत प्रभाव प्रदर्शित नहीं करती।

रासायनिक गुण (Chemical Properties):
क्षार धातुएँ बड़े आकार तथा कम आयनन एन्थैल्पी के कारण अत्यधिक क्रियाशील होती हैं। इनकी क्रियाशीलता वर्ग में ऊपर से न नीचे क्रमश: बढ़ती जाती है। इस वर्ग के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण रासायनिक गुण निम्नलिखित हैं –

(1) वायु के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air):
क्षार धातुएँ वायु की उपस्थिति में मलिन (exposed) हो जाती हैं, क्योंकि वायु की उपस्थिति में इन पर ऑक्साइड तथा हाइड्रॉसाइड की पर्त बन जाती है। ये ऑक्सीजन में तीव्रता से जलकर ऑक्साइड बनाती हैं। लीथियम और सोडियम क्रमशः मोनोक्साइड तथा परॉक्साइड का निर्माण करती हैं, जबकि अन्य धातुओं द्वारा सुपर ऑक्साइड आयन का निर्माण होता है। सुपर ऑक्साइड O2, बड़े धनायनों; जैसे – K+, Rb+ या Cs+ की उपस्थिति में स्थायी होता है।
4Li + O2 → 2Li2O (ऑक्साइड)
2Na + O2 → Na2O2 (परॉक्साइड)
M + O2 → MO2 (सुपर ऑक्साइड) (M =K,Rb,Cs)
इन सभी ऑक्साइडों में क्षार की ऑक्सीकरण अवस्था +1 होती है। लीथियम अपवादस्वरूप वायु में उपस्थित नाइट्रोजन से ‘अभिक्रिया करके नाइट्राइड, Li3 N बना लेता है। इस प्रकार लीथियम भिन्न स्वभाव दर्शाता है। क्षार धातुओं को वायु एवं जल के प्रति उनकी अति सक्रियता के कारण साधारणतया रासायनिक रूप से अक्रिय विलायकों; जैसे-किरोसिन में रखा जाता है।

(2) जल के साथ अभिक्रियाशीलता (Reactivity with water):
क्षार धातुएँ, इनके ऑक्साइड, परॉक्साइड तथा सुपर ऑक्साइड भी जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड, जो घुलनशील होते हैं तथा क्षार (alkalies) कहलाते हैं, बनाती हैं।
2Na + 2H2O → 2Na+ + 20H + H2
Li2O + H2O → 2LiOH
Na2O2 + 2H2O → 2NaOH + H2O2
2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O2 + O2

यद्यपि लीथियम के मानक इलेक्ट्रोड विभव (EΘ) का मान अधिकतम ऋणात्मक होता है, परन्तु जल के साथ इसकी अभिक्रियाशीलता सोडियम की तुलना में कम है, जबकि सोडियम के EΘ का मान अन्य क्षार धातुओं की अपेक्षा न्यून ऋणात्मक होता है। लीथियम के इस व्यवहार का कारण इसके छोटे आकार तथा अत्यधिक जलयोजन ऊर्जा का होना है। अन्य क्षार धातुएँ जल के साथ विस्फोटी अभिक्रिया करती हैं। चूँकि अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होती है तथा विमुक्त होने वाली हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है, इसलिए क्षार धातुओं को जल के सम्पर्क में नहीं रखते। क्षार धातुएँ प्रोटॉनदाता (जैसे-ऐल्कोहॉल, गैसीय अमोनिया, ऐल्काइन आदि) से भी अभिक्रियाएँ करती हैं।

(3) डाइहाइड्रोजन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen):
लगभग 673K (लीथियम के लिए 1073K) पर क्षार धातुएँ डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाती हैं। सभी क्षार धातुओं के हाइड्राइड रंगहीन, क्रिस्टली एवं आयनिक होते हैं। इन हाइड्राइडों के गलनांक उच्च होते हैं।
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हाइड्राइडों का आयनिक गुण Li से Cs तक बढ़ता है। क्षार धातुओं की कम आयनन एन्थैल्पी के कारण इनके परमाणु सरलता से संयोजी इलेक्ट्रॉन खोकर आयनिक हाइड्राइड (M+H) बनाते हैं। चूँकि आयनन एन्थैल्पी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटती है; अत: धनात्मक आयन बनाने की प्रवृत्ति उसी अनुसार बढ़ती है। इसलिए हाइड्राइडों का आयनिक गुण भी बढ़ता है।

(4) हैलोजेन से अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens):
क्षार धातुएँ हैलोजेन से शीघ्र प्रबल अभिक्रिया करके आयनिक ऑक्साइड हैलाइड M+ X बनाती हैं।
2M + X2 → 2M+X
यद्यपि लीथियम के हैलाइड आंशिक रूप से सहसंयोजक होते हैं। इसका कारण लीथियम की उच्च ध्रुवण-क्षमता है। (धनायन के कारण ऋणायन के इलेक्ट्रॉन अभ्र का विकृत होना ‘धुवणता’ (polarisation) कहलाता है।) लीथियम आयन का आकार छोटा है; अत: यह हैलाइड आयन के इलेक्ट्रॉन अभ्र को विकृत करने की अधिक क्षमता दर्शाता है। चूंकि बड़े आकार का ऋणायन आसानी से विकृत हो जाता है, इसलिए लीथियम आयोडाइड सहसंयोजक प्रकृति सबसे अधिक दर्शाते हैं। अन्य क्षार धातुएँ आयनिक प्रवृत्ति की होती हैं। इनके गलनांक तथा क्वथनांक उच्च होते हैं। गलित हैलाइड विद्युत के सुचालक होते हैं। इनके प्रयोग क्षार धातुएँ बनाने में किया जाता है।

(5) अपचायक प्रकृति (Reducing nature):
क्षार धातुएँ प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करती हैं, जिनमें लीथियम प्रबलतम एवं सोडियम दुर्बलतम अपचायक है। मानक इलेट्रोड विभव (EΘ), जो अपचायक क्षमता का मापक है, सम्पूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है –
M(s) →M(g) ऊर्ध्वपातन एन्थैल्पी
M(g) → M+ (g) + e
M+ (g) + H2O → M+ (aq) जलयोजन एन्थैल्पी
स्पष्ट है कि EΘ का मान जितना कम होगा अपचायक गुण उतना ही अधिक होगा। लीथियम आयन का आकार छोटा होने के कारण इसकी जलयोजन एन्थैल्पी का मान अधिकतम होता है, जो इसके उच्च ऋणात्मक E मान तथा इसके प्रबल अपचायक होने की पुष्टि करता है।

(6) द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia):
क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं। अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है।
M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x] + [e(NH3)y] विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त करता है। फलस्वरूप विलयन में ऐमाइड बनता है।
M+ (am) + e + NH3 (l) → MNH2 (am) + 1/2H2 (g)
जहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है। सान्द्र विलयन में नीला रंग ब्रॉन्ज रंग में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) हो जाता है।

(7) सल्फर तथा फॉस्फोरस के साथ अभिक्रिया (Reaction with sulphur and phosphorus):
क्षार धातुएँ सल्फर तथा फॉस्फोरस से गर्म करने पर अभिक्रिया करके सम्बन्धित सल्फाइड तथा फॉस्फाइड बनाती हैं।
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सोडियम फॉस्फाइड सल्फाइड तथा फॉस्फाइड दोनों जल द्वारा जल अपघटित हो जाते हैं।
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प्रश्न 10.2
क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण एवं गुणों में आवर्तिता की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
वर्ग 2 के तत्व :क्षारीय मृदा धातुएँ (Elements of Group 2 : Alkaline Earth Metals):
आवर्त सारणी के वर्ग 2 के तत्व हैं – बेरिलियम (Be), मैग्नीशियम (Mg), कैल्सियम (Ca), स्ट्रॉन्शियम (Sr), बेरियम (Ba) एवं रेडियम (Ra) बेरिलयम के अतिरिक्त अन्य तत्व संयुक्त रूप में मृदा धातुएँ’ कहलाती हैं। प्रथम तत्व बेरिलियम वर्ग के अन्य तत्वों से भिन्नता दर्शाता है एवं ऐलुमिनियम के साथ विकर्ण सम्बन्ध (diagonal relationship) दर्शाता है। वर्ग का अन्तिम तत्व रेडियम रेडियोऐक्टिव प्रकृति का है। इन तत्वों को विशिष्ट नाम निम्नलिखित कारणों से दिया जाता है –

  1. इन तत्वों के ऑक्साइड क्षार धातुओं के समान जल में घुलकर हाइड्रॉसाइड अथवा क्षार बनाते हैं।
  2. “मृदा” नाम इन्हें इसलिए दिया गया; क्योंकि ऐलुमिना (Al2O3) जैसे पदार्थ ऊष्मा के प्रति अधिक स्थायी होते हैं।

कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम तथा बेरियम के ऑक्साइड भी ऊष्मा के प्रति स्थायी होते हैं तथा अत्यधिक गर्म किए जाने पर भी अपघटित नहीं होते। ये धातु ऑक्साइड तथा धातुएँ भी क्षारीय मृदा कहलाती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration):
इन तत्वों के संयोजकता-कोश के s – कक्षक में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। इनका सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (उत्कृष्ट गैस) ns2 होता है। क्षार धातुओं के सामन ही इनके यौगिक भी मुख्यतः आयनिक प्रकृति के होते हैं।
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क्षारीय मृदा धातुओं के सामान्य अभिलक्षण तथा गुणों में आवर्तिता इनके भौतिक तथा रासायनिक गुणों से स्पष्ट होती है। इनकी विवेचना निम्नवत् है –

भौतिक गुण (Physical Properties):
क्षारीय मृदा धातु-परिवार के सदस्यों के महत्त्वपूर्ण भौतिक गुण सारणी-2 में सूचीबद्ध हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है –

1. परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्या (Atomic and ionic radii):
आवर्त सारणी के संगत आवर्तों में क्षार धातुओं की तुलना में क्षारीय मृदा धातुओं की परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्याएँ छोटी होती हैं। ये वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती हैं। इसका कारण इन तत्वों के नाभिकीय आवेशों में वृद्धि होना है।

2. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpies):
क्षारीय मृदा धातुओं के परमाणुओं के बड़े आकार के कारण इनकी आयनन एन्थैल्पी के मान न्यून होते हैं। चूँकि वर्ग में आकार ऊपर से नीचे क्रमश: बढता जाता है; अतः इनकी आयनन एन्थैल्पी के मान कम होते जाते हैं जैसा कि सारणी में स्पष्ट है। क्षारीय मृदा धातुओं के प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान क्षार धातुओं के प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में अधिक है। यह इनकी क्षार धातुओं की संगत तुलनात्मक रूप से छोटे आकार होने के कारण होती है, परन्तु इनके द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मान क्षार धातुओं के द्वितीय आयनन एन्थैल्पी के मानों की तुलना में कम हैं।

उदाहरणार्थ:
Mg के प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान Na से अधिक है जिसका कारण Mg का छोटा आकार तथा सममिताकार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है। परन्तु एक इलेक्ट्रॉन खोकर Na+ आयनन उत्कृष्ट गैस निऑन का विन्यास (1s2, 2s2 2p6 प्राप्त कर लेता है, जबकि Mg के संयोजकता कोश में अभी भी एक इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता है (1s2, 2s2 2p6, 3s1)। सोडियम के द्वितीयक आयनन एन्थैल्पी का उच्च मान इसके सममितकार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के कारण होता है।

3. जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration enthalpy):
क्षार धातुओं के समान इसमें भी वर्ग में ऊपर से नीचे आयनिक आकार बढ़ने पर इनकी जलयोजन एन्थैल्पी के मान कम होते जाते हैं।
Be2+ > Mg2+ > Ca2+ > Sr2+ > Ba2+

क्षारीय मृदा धातुओं की जलयोजन एन्थैल्पी क्षार धातुओं की जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में अधिक होती है। इसीलिए मृदा धातुओं के यौगिक क्षार धातुओं के यौगिकों की तुलना में अधिक जलयोजित होते हैं, जैसे –
MgCl2 एवं CaCl2 जलयोजित अवस्था MgCl2.6H2O एवं CaCl2.6H2O में पाए जाते हैं, जबकि NaCl एवं KCl ऐसे हाइड्रेट नहीं बनाते हैं।

4. धात्विक गुण (Metallic character):
क्षारीय मृदा धातुएँ सामान्यतया चाँदी की भाँति सफेद चमकदार एवं नर्म, परन्तु अन्य धातुओं की तुलना में कठोर होती हैं। बेरिलियम तथा मैग्नीशियम लगभग धूसर रंग (greyish) के होते हैं। क्षारीय मृदा धातुओं में समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं की तुलना में प्रबल धात्विक बन्ध होते हैं। उदाहरणार्थ-मैग्नीशियम, सोडियम की तुलना में अधिक कठोर तथा सघन होता है।

5. गलनांक तथा क्वथनांक (Melting and boiling points):
इनके गलनांक एवं क्वथनांक क्षार धातुओं की तुलना में उच्च होते हैं; क्योंकि इनके आकार छोटे होने के कारण ये निबिड़ संकुलित (closely packed) होते हैं तथा इनमें प्रबल धात्विक बन्ध होते हैं। फिर भी इनके गलनांकों तथा क्वथनांकों में कोई नियमित परिवर्तन नहीं दिखता है।

6. धन-विद्युती गुण (Electro-positive character):
निम्न आयनन एन्थैल्पी के कारण क्षारीय मृदा धातुएँ प्रबल धन-विद्युती होती हैं। धन-विद्युती गुण ऊपर से नीचे Be से Ba तक बढ़ता है।

7. ज्वाला को रंग प्रदान करना (Colouration to the flame):
कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम ज्वाला को क्रमश: ईंट जैसा लाल (brick red) रंग, किरमिजी लाल (crimson red) एवं हरा (apple green) रंग प्रदान करते हैं। ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प-अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा-स्तर पर चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुनः अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सार्जित होती है। परिणामस्वरूप ज्वाला रंगीन दिखने लगती है।

बेरिलियम तथा मैग्नीशियम के बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी प्रबलता से बँधे रहते है कि ज्वाला की ऊर्जा द्वार इनका उत्तेजित होना कठिन हो जाता है। अतः ज्वाला में इन धातुओं का अपना कोई अभिलाक्षणिक रंग नहीं होता है। गुणात्मक विश्लेषण में Ca, Sr एवं Ba मूलकों की पुष्टि ज्वाला-परीक्षण के आधार पर की जाती है तथा इनकी सान्द्रता का निर्धारण ज्वाला प्रकाशमापी द्वारा किया जाता है। क्षारीय मृदा धातुओं की क्षार धातुओं की तरह विद्युत एवं ऊष्मीय चालकता उच्च होती है। यह इनका अभिलाक्षणिक गुण होता है।

सारणी-2 : क्षारीय मृदा धातुओं के परमाण्वीय एवं भौतिक गुण (Atomic and Physical Properties of the Alkaline Earth Metals):
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8. विद्युत-ऋणात्मकता (Electronegtativity):
क्षारीय मृदा धातुओं के विद्युत-ऋणात्मकता मान क्षार धातुओं के लगभग समान होते हैं (कुछ अधिक)। विद्युत-ऋणात्मकता मान बेरिलियम से रेडियम तक घटते हैं तथा आयनिक यौगिक बनाने की प्रवृति में वृद्धि व्यक्त करते हैं। बेरिलियम का उच्च विद्युतऋणात्मकता मान (1.5) प्रदर्शित करता है कि यह धातु आयनिक यौगिक बनाती है।

रासायनिक गुण (Chemical Properties):
क्षारीय मृदा धातुएँ क्षार धातुओं से कम क्रियाशील होती हैं। _इन तत्वों की अभिक्रियाशीलता वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर बढ़ती है –

(1) वायु एवं जल के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with air and water):
बेरिलियम एवं मैग्नीशियम गतिकीय रूप से ऑक्सीजन तथा जल के प्रति निष्क्रिय हैं; क्योंकि इन धातुओं के पृष्ठों (surfaces) पर ऑक्साइड की फिल्म जम जाती है। फिर भी, बेरिलियम चूर्ण रूप में वायु में जलने पर BeO एवं Be3N2 बना लेता है। मैग्नीशियम अधिक धनविद्युतीय है, जो वायु में अत्यधिक चमकीले प्रकाश के साथ जलते हुए MgO तथा Mg3N2 बना लेता है। कैल्सियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम वायु से शोघ्र अभिक्रिया करके ऑक्साइड तथा नाइट्राइड बनाते हैं। ये जल से और भी अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करते है; यहाँ तक कि ठण्डे जल से अभिक्रिया कर हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।

(2) हैलोजेन के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with halogens):
सभी क्षारीय मृदा धातुएँ हैलोजन के साथ उच्च ताप पर अभिक्रिया करके हैलाइड बना लेती हैं –
M + X2 → MX2 (X = F, Cl, Br, I)
BeF2 बनाने की सबसे सरल विधि (NH4), BeF4 का तापीय अपघटन है, जबकि BeCl2, ऑक्साइड से सरलतापूर्वक बनाया जा सकता है –
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इन धातुओं के ऑक्साइडों, हाइड्रॉक्साइडों तथा कार्बोनेटों पर हैलोजेन अम्लों (HX) की प्रतिक्रिया द्वारा भी हैलाइड बनाए जा सकते हैं।
M + 2HX → MX2 + H2
MO + 2HX → MX2 + H2O
M(OH)2 + 2HX → MX2 + 2H2O
MCO3 + 2HX → MX2 + H2O + CO2

(3) हाइड्रोजन के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with dihydrogen):
बेरिलियम के अतिरिक्त सभी क्षारीय मृदा धातुएँ गर्म करने पर डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया करके हाइड्राइड बनाती हैं।
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BeH2 को BeCl2 एवं LiAlH4 की अभिक्रिया से बनाया – जा सकता है –
2BeCl2 + LiAlH4 → 2BeH2 + LiCl + AlCl3

BeH2 तथा MgH2 प्रवृत्ति में सहसंयोजी होते हैं, जबकि अन्य धातुओं के हाइड्राइडों की आयनिक संरचना होती है। आयनिक हाइड्राइड; जैसे – CaH2 (यह हाइड्रोलिथ भी कहलाता है।) जल से क्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।
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(4) अम्लों के प्रति अभिक्रियाशीलता (Reactivity with acids):
क्षारीय मृदा धातुएँ शीघ्र ही अम्लों से अभिक्रिया कर डाइहाड्रोजन गैस मुक्त करती हैं।
M + 2HCl → MCl2 + H2

(5) अपचायक प्रकृति (Reducing nature):
प्रथम वर्ग की धातुओं के समान क्षारीय मृदा धातुएँ प्रबल अपचायक हैं। इसका बोध इनके अधिक ऋणात्मक अपचयन विभव के मानों से होता है। यद्यपि इनकी अपचयन-क्षमता क्षार धातुओं की तुलना में कम होती है। बेरिलियम के अपचयन विभव का मान अन्य क्षारीय मृदा धातुओं से कम ऋणात्मक होता है फिर भी इसकी अपचयन-क्षमता का कारण Be2+ आयन के छोटे आकार, इसकी उच्च जलयोजन ऊर्जा एवं धातु की उच्च परमाण्वीयकरण ‘एन्थैल्पी का होना है।

(6) द्रव अमोनिया में विलयन (Solution in liquid ammonia):
क्षार धातुओं की भाँति क्षारीय मृदा धातुएँ भी द्रव अमोनिया में विलेय होकर गहरे नीले-काले रंग का विलयन बना लेती हैं। इस वियलन से धातुओं के अमोनीकृत आयन प्राप्त होते है –
M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x]2+ + 2[e(NH3)y]
इन विलयनों से पुन: अमोनिएट्स (ammoniates) [M(NH3)6]2+ प्राप्त किए जा सकते हैं।

(7) कार्बोनेटों का बनना (Formation of carbonates):
धातु के हाइड्रॉक्साइडों के जलीय विलयनों में CO2 की वाष्प की सीमित मात्रा प्रवाहित करने पर धातुओं के कार्बोनेट सफेद अवक्षेप के रूप में प्राप्त किए जा सकते हैं।
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प्रश्न 10.3
क्षार धातुएँ प्रकृति में क्यों नहीं पाई जाती हैं?
उत्तर:
क्षार धातुएँ प्रबल धन विद्युती तथा कम आयनन एन्थैल्पी गुण के कारण अधिक क्रियाशील होती हैं। ये अन्य तत्वों के साथ संयुक्त अवस्था में पाई जाती हैं। अत: ये प्रकृति में नहीं पाई जाती हैं।

प्रश्न 10.4
Na2O2 में सोडियम की ऑक्सीकरण अवस्था ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना Na2O2 में Na की आ०सं० x है।
∴ 2x + 2(-1) = 0
या 2x = 2 या x = +1

प्रश्न 10.5
पोटैशियम की तुलना में सोडियम कम अभिक्रियाशील क्यों है? बताइए।
उत्तर:
चूँकि पोटैशियम की तुलना में सोडियम की आयन एन्थैल्पी कम है, अतः सोडियम पोटैशियम अधिक धन-विद्युती तथा प्रबल अपचायक हैं। सोडियम की तुलना में पोटैशियम जल से अधिक तीव्रता से क्रिया करता है। अतः पोटैशियम की तुलना में सोडियम कम अभिक्रियाशील है।

प्रश्न 10.6
निम्नलिखित के सन्दर्भ में क्षार धातुओं एवं क्षारीय मृदा धातुओं की तुलना कीजिए –
(क) आयनन एन्थैल्पी
(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता
(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता।
उत्तर:
(क) आयनन एन्थैल्पी (lonisation enthaply):
क्षारीय मृदा धातुओं (वर्ग 2) की आयनन एन्थैल्पी समान आवर्त में उपस्थित क्षार धातुओं (वर्ग 1) की तुलना में अधिक होती है। इसका कारण क्षारीय मृदा धातुओं के परमाणुओं का छोटा आकार तथा अधिक सममिताकार विन्यास है।

उदाहरणार्थ –
सोडियम (Na) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी = 496 kJmol-1
मैग्नीशियम (Mg) की प्रथम आयनन एन्थैल्पी = 737 kJmol-1

(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता (Basicity of oxides):
क्षार धातुओं के ऑक्साइड समान आवर्त में उपस्थित क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइडों की तुलना में प्रबल क्षारक होते हैं। उदाहरणार्थ-जब Na2O को जल में घोला जाता है, NaOH प्राप्त होता है जो एक प्रबल क्षारक है, जबकि MgO को जल में घोलने पर दुर्बल क्षारक, Mg(OH2) प्राप्त होता है।

(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता (Solubility of hydroxides):
क्षार धातु हाइड्रॉसाइड समान आवर्त में उपस्थित क्षारीय मृदा धातु हाइड्रॉसाइड की तुलना में जल में अधिक विलेय होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की जालक ऊर्जा (lattice energy) क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइडों की तुलना में उच्च होती है।

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प्रश्न 10.7
लीथियम किस प्रकार मैग्नीशियम से रासायनिक गुणों में समानताएँ दर्शाता है?
उत्तर:
लीथियम तथा मैग्नीशियम के रासायनिक गुणों में समानताएँ –
1. लीथियम तथा मैग्नीशियम दोनों के कार्बोनेट गर्म करने पर अपघटित हो जाते हैं।
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2. दोनों नाइट्रोजन में जलकर नाइट्राइड बनाते हैं।
6Li + N2 → 2Li3N
3Mg + N2 → Mg3M2

3. LiCl तथा MgCl2 दोनों ही प्रस्वेद्य यौगिक हैं। ये जलीय विलयन में LiCl.2H2O तथा MgCl2. 8H2O के रूप में क्रिस्टलीकरण होते हैं।

प्रश्न 10.8
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ रासायनिक अपचयन विधि से क्यों नहीं प्राप्त की जा सकती हैं? समझाइए।
उत्तर:
क्षार धातुएँ तथा क्षारीय मृदा धातुएँ परिवार के प्रबल अपचायक होते हैं, अतः इनके ऑक्साइडों को साधारण अपचायकों; जैसे-कार्बन (कोक), जिंक आदि की अभिक्रिया द्वारा अपचयित नहीं किया जा सकता है। इनके लवणों को गलित अवस्था में विद्युत-अपघटन कराने पर किया जा सकता है।

प्रश्न 10.9
प्रकाश-विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम एवं सीजियम क्यों प्रयुक्त किए जाते हैं?
उत्तर:
लीथियम की आयनन एन्थैल्पी अत्यन्त उच्च होती है। इस कारण प्रकाश के फोटॉन लीथियम धातु की सतह से इलेक्टॉन निष्कासित नहीं कर पाते हैं। अतः लीथियम धातु को प्रयोग करने पर प्रकाश-विद्युत प्रभाव नहीं देखा जाता है। पोटैशियम तथा सीजियम की आयनन एन्थैल्पी अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए जब निश्चित न्यूनतम आवृत्ति के फोटॉन इन धातुओं की सतह से टकराते हैं तो इन धातुओं की सतह से इलेक्ट्रॉन सरलता से उत्सर्जित हो जाते हैं। इस कारण प्रकाश-विद्युत सेल में लीथियम के स्थान पर पोटैशियम एवं सीजियम प्रयुक्त किए जाते हैं।

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प्रश्न 10.10
जब एक क्षार धातु को द्रव अमोनिया में घोला जाता है, तब विलयन विभिन्न रंग प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार के रंग-परिवर्तन का कारण बताइए।
उत्तर:
क्षार धातुएँ द्रव अमोनिया में घुलनशील हैं अमोनिया में इनके विलयन का रंग गहरा नीला होता है एवं विलयन प्रकृति में विद्युत का सुचालक होता है –
M + (x + y)NH3 → [M(NH3)x]+ + [e(NH3)y]
विलयन का नीला रंग अमोनीकृत इलेक्ट्रॉनों के कारण होता है, जो दृश्य प्रकाश क्षेत्र की संगत ऊर्जा का अवशोषण करके विलयन को नीला रंग प्रदान करते हैं। अमोनीकृत विलयन अनुचुम्बकीय (paramagnetic) होता है, जो कुछ समय पड़े रहने पर हाइड्रोजन को मुक्त होता है। फलस्वरूप विलयन में ऐमाइड बनता है।
M+ (am) + e + NH3 (l) → MNH2 (am) + \(\frac{1}{2}\)H2 (g) (यहाँ ‘am’ अमोनीकृत विलयन दर्शाता है।) सान्द्र विलयन का नीला रंग ब्रॉन्ज में बदल जाता है और विलयन प्रतिचुम्बकीय हो जाता हैं।

प्रश्न 10.11
ज्वाला को बेरिलियम एवं मैग्नीशियम कोई रंग नहीं प्रदान करते हैं, जबकि अन्य क्षारीय मृदा धातुएँ ऐसा करती हैं, क्यों?
उत्तर:
Be तथा Mg परमाणुओं का आकार छोटा होता है। इससे इन दोनों के बाह्यतम कोशों के इलेक्ट्रॉन इतनी प्रबलता से बँधे रहते हैं जिससे ज्वाला की ऊर्जा द्वारा इनका उत्तेजित होना कठिन होता है। अतः ज्वाला को Be तथा Mg कोई रंग प्रदान नहीं करते हैं।

Be तथा Mg के अतिरिक्त क्षय मृदा धातु परिवार के अन्य सदस्य, कैल्शियम, स्ट्रॉन्शियम एवं बेरियम ज्वाला को क्रमशः ईंट जैसा लाल (brick red) रंग, किरमिची लाल (crimson red) एवं हरा (apple green) रंग प्रदान करते हैं। ज्वाला में उच्च ताप पर वाष्प-अवस्था में क्षारीय मृदा धातुओं के बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर उच्च ऊर्जा स्तर पर चले जाते हैं। ये उत्तेजित इलेक्ट्रॉन जब पुन: अपनी तलस्थ अवस्था में लौटते हैं, तब दृश्य प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित होती है। फलस्वरूप ज्वाला रंगीन दिखाई देने लगती है।

प्रश्न 10.12
सॉल्वे प्रक्रम में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
नमक के विलयन (ब्राइन विलयन) को अमोनिया से संतृप्त करके इसमें CO2 गैस प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट बनता है जिसे गर्म करने पर सोडियम कार्बोनेट प्राप्त हो जाता है।
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इस प्रक्रम में NH4Cl विलयन को Ca(OH)2 की अभिक्रिया से अमोनिया को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
2NH4Cl + Ca(OH)2 → CaCl2 + 2H2O + 2NH3

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प्रश्न 10.13
पोटैशियम कार्बोनेट सॉल्वे विधि द्वारा नहीं बनाया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
चूँकि पोटैशियम बाइकार्बोनेट के जल में अधिक विलेय होने के कारण इसे KCl के संतृप्त विलयन में अमोनियम बाइकार्बोनेट के संयोग द्वारा अवक्षेपित करना सम्भव नहीं है अतः साल्वे विधि द्वारा पोटैशियम कार्बोनेट नहीं बनाया जा सकता।

प्रश्न 10.14
Li2CO3 कम ताप पर एवं Na2CO3 उच्च ताप पर क्यों विघटित होता है?
उत्तर:
गर्म करने पर Li2CO3 विघटित होने पर Li2O तथा CO2 देता है। Li+ आयन का आकार छोटा होता है जिससे Li2O के जालक को Li2CO3 के जालक से अधिक स्थायी बनाता है जबकि Na+ आयन का आकार बड़ा होने के कारण Na2O के जालक को Na2CO3 के जालक से कम स्थायी बनाता है। अतः Li2CO3 कम ताप पर और Na2CO3 अधिक ताप पर विघटित होते हैं।

प्रश्न 10.15
क्षार धातुओं के निम्नलिखित यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर कीजिए –
(क) नाइट्रेट
(ख) कार्बोनेट
(ग) सल्फेट।
उत्तर:
विलेयता एवं तापीय स्थायित्व के आधार पर क्षार धातुओं के यौगिकों की तुलना क्षारीय मृदा धातुओं के संगत यौगिकों से निम्नलिखित प्रकार की जा सकती है –
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प्रश्न 10.16
सोडियम क्लोराइड से प्रारम्भ करके निम्नलिखित को आप किस प्रकार बनाएँगे?

  1. सोडियम धातु
  2. सोडियम हाइड्रॉक्साइड
  3. सोडियम परॉक्साइड
  4. सोडियम कार्बोनेट।

उत्तर:
1. सोडियम क्लोराइड से सोडियम धातु प्राप्त करना:
सोडियम क्लोराइड लवण का गलित अवस्था में विद्युत-अपघटनी अपचयन करने पर सोडियम धातु पर सोडियम धातु कैथोड पर प्राप्त होती है।
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कैथोड पर: Na+ + e → Na
ऐनोड पर: Cl → Cl + e
Cl + Cl → Cl2

2. सोडियम क्लोराइड से सोडियम हाइड्रॉक्साइड प्राप्त करना-सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन का नेलसन सेल विद्युत अपघटन पर प्राप्त होता है।
NaCl → Na+ + Cl
H2O ⇄ H+ + OH
Na+ + OH → NaOH

3. सोडियम क्लोराइड से सोडियम परॉक्साइड प्राप्त करना-सर्वप्रथम सोडियम क्लोराइड के विद्युत अपघटनी अपचयन द्वारा सोडियम प्राप्त करते हैं। फिर धातु को 573K पर ऑक्सीजन के आधिक्य के साथ नमी तथा CO2 से मुक्त वायुमण्डल में गर्म करने पर सोडियम परॉक्साइड बनता है।
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4. सोडियम क्लोराइड से सोडियम कार्बोनेट प्राप्त करना:
सर्वप्रथम सोडियम क्लोराइड के सान्द्र विलयन (लगभग 30%) CO2 में प्रवाहित करने पर सोडियम बाइकार्बोनेट का अवक्षेप प्राप्त हो जाता है।
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विलयन में Na+ आयनों की उपस्थिति में सोडियम बाइकार्बोनेट है। अवक्षेप को छानकर अलग करके गर्म करने पर सोडियम कार्बोनेट प्राप्त होता है।
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प्रश्न 10.17
क्या होता है, जब –

  1. मैग्नीशियम को हवा में जलाया जाता है –
  2. बिना बुझे चूने को सिलिका के साथ गर्म किया जाता है।
  3. क्लोरीन बुझे चुने से अभिक्रिया करती है।
  4. कैल्शियम नाइट्रेट को गर्म किया जाता है।

उत्तर:
1. मैग्नीशियम ऑक्साइड तथा मैग्नीशियम नाइट्राइड बनते हैं।
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2. कैल्शियम सिलिकेट प्राप्त होता है।
CaO + SiO2 → CasiO3

3. कैल्शियम ऑक्सी-क्लोराइड (विरंजक चूर्ण) बनता है।
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4. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन मुक्त होती है।
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प्रश्न 10.18
निम्नलिखित में से प्रत्येक के दो-दो उपयोग बताइए –

  1. कॉस्टिक सोडा
  2. सोडियम कार्बोनेट
  3. बिना बुझा चूना।

उत्तर:
1. कॉस्टिक सोडा के उपयोग –
(क) साबुन, कुछ, कृत्रिम रेशम तथा कई अन्य रसायनों के निर्माण में।
(ख) पेट्रोलियम के परिष्करण में।
(ग) प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।

2. सोडियम कार्बोनेट के उपयोग –
(क) जल के मृदुकरण, धुलाई एवं निर्मलन में।
(ख) काँच, साबुन बोरेक्स एवं कॉस्टिक सोडा के निर्माण में।
(ग) प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में।

3. बिना बुझा चूना के उपयोग –
(क) सीमेण्ट के निर्माण के लिए प्राथमिक पदार्थ के रूप में तथा क्षार के सबसे सस्ते रूप में।
(ख) शर्करा के शुद्धिकरण में एवं रंजकों के निर्माण में।
(ग) शर्करा के शुद्धिकरण में तथा रंजकों के निर्माण में।

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प्रश्न 10.19
निम्नलिखित की संरचना बताइए –

  1. BeCl2 (वाष्प)
  2. BeCl2 (ठोस)।

उत्तर:
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प्रश्न 10.20
सोडियम एवं पोटैशियम के हाइड्रॉक्साइड एवं कार्बोनेट जल में विलेय हैं, जबकि मैग्नीशियम एवं कैल्शियम के संगत लवण जल में अल्प विलेय हैं,समझाइए।
उत्तर:
दिए गए सभी यौगिक क्रिस्टलीय ठोस हैं तथा इनकी जल में विलेयता जालक एन्थैल्पी तथा जलयोजन एन्थैल्पी दोनों के द्वारा निर्धारित होती है। सोडियम तथा पोटैशियम यौगिकों की स्थिति में जालक एन्थैल्पी का परिमाण जलयोजन एन्थैल्पी की तुलना में अत्यन्त कम होता है। चूंकि धनायनों का आकार बड़ा होता है, इसलिए सोडियम तथा पोटैशियम के यौगिक जल में तुरन्त विलेय हो जाते हैं।

यद्यपि संगत मैग्नीशियम तथा कैल्शियम यौगिकों की स्थिति में धनायनों का आकार कम होता है तथा धनावेश का परिमाण अधिक होता है। इसका अर्थ है कि इनकी जलाक ऊर्जा (एन्थैल्पी) सोडियम तथा पोटैशियम के यौगिकों की तुलना में अधिक होती है। इसलिए इन धातुओं के हाइड्रॉक्साइड तथा कार्बोनेट जल में अल्प विलेय होते हैं।

प्रश्न 10.21
निम्नलिखित की महत्ता बताइए –

  1. चूना पत्थर
  2. सीमेण्ट
  3. प्लास्टर ऑफ पेरिस।

उत्तर:
1. चूना पत्थर की महत्ता:

  • संगमरमर के रूप में भवन के निर्माण में।
  • बुझे चूने के निर्माण में।
  • कैल्शियम काबोंनेट को मैग्नीशियम कार्बोनेट के साथ लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण में फ्लक्स (flux) के रूप में।
  • विशेष रूप में अवक्षेपित CaCO3 के प्रयोग से वृहद् रूप में गुणवत्ता वाले कारज के निर्माण में।
  • ऐन्टासिड, टूथपेस्ट में अपमार्जक के रूप में, च्यूइंगम के संघटक एवं सौन्दर्य प्रसाधनों में पूरक के रूप में।

2. सीमेण्ट की महत्ता:
लोहा तथा स्टील के पश्चात् सीमेण्ट ही एक ऐसा पदार्थ है, जो किसी राष्ट्र की उपयोगी वस्तुओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसका उपयोग कंक्रीट (concrete), प्रबलित कंक्रीट (Reinforced concrete), प्लास्टरिंग, पुल-निर्माण आदि में किया जाता है।

3. प्लास्टर ऑफ पेरिस की महत्ता प्लास्टर ऑफ पेरिस का वृहत्तर उपयोग भवन निर्माण उद्योग के साथ-साथ टूटी हुई हड्डियों के प्लास्टर में भी होता है। इसका उपयोग दन्त-चिकित्सा-अलंकरण-कार्य एवं मूर्तियों तथा अर्द्ध-प्रतिमाओं को बनाने में भी होता है।

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प्रश्न 10.22
लीथियम के लवण साधारणतया जलयोजित होते हैं, जबकि अन्य क्षार धातुओं के लवण साधारणतया निर्जलीय होते हैं, क्यों?
उत्तर:
लीथियम लवणों में Li+ आयन का आकार छोटा होता है। इस कारण ये लवण जल के साथ सम्पर्क में आने पर तुरन्त जलयोजित हो जाते हैं। परन्तु आयन क्षार धातु आयन अपेक्षाकृत बड़े आकार के होने के कारण जलयोजित नहीं होते हैं। अतः ये लवण निर्जलीय होते हैं।

प्रश्न 10.23
LiF जल में लगभग अविलेय होता है, जबकि LiCl न सिर्फ जल में, बल्कि ऐसीटोन में भी विलेय होता है। कारण बताइए।
उत्तर:
जल में LiF की अल्प विलेयता इसकी उच्च जालक एंथैल्पी के कारण होती है क्योंकि F आयन का आकार बहुत छोटा होता है। दूसरी ओर LiCl में जालक एंथैल्पी कम Cl के अपेक्षाकृत बड़े आकार के कारण होती है। इससे यह तात्पर्य है कि जलयोजन एंथैल्पी का परिमाण अधिक है। यह LiCl द्विध्रुवीय आकर्षण के कारण जल एवं ऐसीटोन दोनों में घुल जाता है।

प्रश्न 10.24
जैव-द्रवों में सोडियम, पोटैशियम मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की सार्थकता बताइए।
उत्तर:
सोडियम एवं पोटैशियम का जैव-द्रवों में सार्थकता:
70 किग्रा भार वाले एक सामान्य व्यक्ति में लगभग 90 ग्राम सोडियम एवं 170 ग्राम पोटैशियम होता है, जबकि लोहा केवल 5 ग्राम तथा ताँबा 0.06 ग्राम होता है। सोडियम आयन मुख्यत: अन्तराकाशीय द्रव में उपस्थित रक्त प्लाज्मा जो कोशिकाओं को घेरे रहता है, में पाया जाता है। ये आयन शिरा संकेतों के संचरण में भाग लेते हैं, जो कोशिका झिल्ली में जलप्रवाह को नियमित करते हैं तथा कोशिकाओं में शर्करा और ऐमीनों अम्लों के प्रवाह को भी नियन्त्रित करते हैं।

सोडियम एवं पोटैशियम रासायनिक रूप में समान होते हुए भी कोशिका झिल्ली को पार करने की क्षमता एवं एन्जाइम को सक्रिय करने में मात्रात्मक रूप से भिन्न हैं। इसीलिए कोशिकाद्रव्य में पोटैशियम धनायन बहुतायत में होते हैं, जहाँ ये एन्जाइम को सक्रिय करते हैं तथा ग्लूकोस के ऑक्सीकरण से ATP बनने में भाग लेते हैं। सोडियम आयन शिरा-संकेतों के संचरण के लिए उत्तरदायी हैं।

कोशिका झिल्ली के अन्य भागों में पाए जाने वाले सोडियम एवं पोटैशियम आयनों की सान्द्रता से अत्यधिक भिन्नता पाई जाती है। उदाहरण के लिए-रक्त प्लाज्मा में लाल रक्त कोशिकाओं में सोडियम की मात्रा 143 mmol L-1 है, जबकि पोटैशियम का स्तर केवल 5mmol L-1 है। यह सान्द्रता 10mmol L-1 (Na+) एवं 105mmol L-1 (K+) तक परिवर्तित हो सकती है।

यह असाधारण आयनिक उतार-चढ़ाव, जिसे सोडियम-पोटैशियम पम्प कहते हैं, कोशिका झिल्ली पर कार्य करता है, जो मनुष्य की विश्रामावस्था के कुल उपभोगित ATP को एक-तिहाई से ज्यादा का उपयोग कर लेता है, जो मात्र लगभग 15 किलो जूल प्रति 24 घण्टे तक हो सकती है।

मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की जैव द्रवों में सार्थकता:
एक वयस्क व्यक्ति में लगभग 25 ग्राम मैग्नीशियम एवं 1200 ग्राम कैल्शियम होता है, जबकि लोहा मात्रा 5 ग्राम एवं ताँबा 0.06 ग्राम होता है। मानव-शरीर में इनकी दैनिक आवश्यकता 200-300 मिग्रा अनुमानित की गई है। समस्त.एन्जाइम, जो फॉस्फेट के संचरण में ATP का उपयोग करते हैं, मैग्नीशियम का उपयोग सह-घटक के रूप में करते हैं। पौधों में प्रकाश-अवशोषण के लिए मुख्य रंजक (pigments) क्लोरोफिल में भी मैग्नीशियम होता है।

शरीर का 99% कैल्शियम दाँतों तथा हड्डियों में होता है। यह अन्तरतांत्रिकीय पेशीय कार्यप्रणाली, अन्तरतांत्रिकीय प्रेषण, कोशिका झिल्ली अखण्डता (cell membrane integrity) तथा रक्त-स्कन्दन (blood-coagulation) में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्लाज्मा में कैल्शियम की सान्द्रता लगभग 100mg L-1 होती है। दो हॉर्मोन कैल्सिटोनिन एवं पैराथायरॉइड इसे बनाए रखते हैं। चूँकि हड्डी अक्रिय तथा अपरिवर्तनशील पदार्थ नहीं है, यह किसी मनुष्य में लगभग 400 मिग्रा प्रतिदिन के अनुसार विलेयित और निक्षेपित होती है। इसका सारा कैल्शियम प्लाज्मा में से ही गुजरता है।

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प्रश्न 10.25
क्या होता है जब –

  1. सोडियम धातु को जल में डाला जाता है।
  2. सोडियम धातु को हवा की अधिकता में गर्म किया जाता है।
  3. सोडियम परॉक्साइड को जल में घोला जाता है।

उत्तर:
1. हाइड्रोजन गैस मुक्त होती है।
2Na + 2H2O → 2NaOH + H2

2. सोडियम परॉक्साइड बनाता है।
2Na + O2 → Na2O2

3. ऑक्सीजन मुक्त होती है।
2Na2O2 + 2H2O → 4NaOH + O2

प्रश्न 10.26
निम्नलिखित में से प्रत्येक प्रेक्षण पर टिप्पणी लिखिए –
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता Li+ < Na+ < K+ < Rb+ < Cs+ क्रम में होती है।
(ख) लीथियम ऐसी एकमात्र क्षार धातु है, जो नाइट्राइड बनाती है।
(ग) M2+ (aq) + 2e → M(S) हेतु EΘ (जहाँ M = Ca, Sr या Ba) लगभग स्थिरांक है।
उत्तर:
(क) जलीय विलयनों में क्षार धातु आयनों की गतिशीलता निम्नलिखित क्रम में होती है –
Li+ < Na+ < K+ < Rb+ < Cs+
इसे धनायनों के जल में जलयोजित होने के आधार पर समझाया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप धनायन का आकार बढ़ने पर इसकी गतिशीलता घटती है। Li+ आयन छोटे आकार के कारण अधिकतम जलयोजित होता है तथा न्यूनतम गतिशीलता रखता है, जबकि Cs+ न्यूतनम जलयोजन के कारण अधिकतम गतिशीलता रखता है।

(ख) लीथियम एक प्रबल अपचायक है; अत: यह नाइट्रोजन से सीधे संयोग करे नाइट्राइड (Li3N) बनाता है।
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(ग) क्षार धातुओं के इलेक्ट्रोड विभव (EΘ), जो M(s) से M+ (aq) तक सभी परिवर्तनों में अन्य धातुओं द्वारा प्रदर्शित अपचायक क्षमता को मापते हैं, तीन कारकों पर निर्भर करते हैं –
(a) ऊर्ध्वपातन
(b) आयनन तथा
(c) जलयोजन एन्थैल्पी। समीकरण
M2+ (aq) + 2e → M(s)
प्रदर्शित करती है कि Ca, Sr तथा Ba के मानक इलेक्ट्रोड विभव सदैव समान होते हैं।

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प्रश्न 10.27
समझाइए कि क्यों –
(क) Na2CO3 का विलयन क्षारीय होता है।
(ख) क्षार धातुएँ उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत-अपघटन से प्राप्त की जाती हैं।
(ग) पोटैशियम की तुलना में सोडियम अधिक उपयोगी हैं।
उत्तर:
(क) Na2CO3 का जलीय विलयन जल अपघटन पर प्रबल क्षार तथा दुर्बल अम्ल देता है।
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(ख) चूँकि क्षार धातुओं का मानक अपचयन विभव ऋणात्मक होता है, अतः क्षार धातुओं के क्लोराइड केवल गलित अवस्था में विद्युत अपघटन के रूप में से अपचयित होते हैं। अतः क्षार धातुएँ उनके संगलित क्लोराइडों के विद्युत अपघटन से प्राप्त की जाती है।

(ग) सोडियम के निम्नलिखित उपयोग हैं –

  • इसे रंजक उद्योग में प्रयुक्त करते हैं।
  • द्रव सोडियम धातु को नाभिकीय रिएक्टर में शीतलक के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
  • इसे प्रबल अपचायक सोडियम अमलगम के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
  • इसका उपयोग कार्बनिक यौगिकों में नाइट्रोजन सल्फर तथा हैलोजनों तत्त्वों की उपस्थिति के निर्धारण में करते हैं। पोटैशियम की जैवीय क्रियाओं में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 10.28
निम्नलिखित के मध्य क्रियाओं के संतुलित समीकरण लिखिए –
(क) Na2CO3 एवं जल
(ख) KO2 एवं जल
(ग) Na2O एवं CO2
उत्तर:
(क) Na2CO3 + H2O → 2NaOH + H2O + CO2
(ख) 2KO2 + 2H2O → 2KOH + H2O + O2
(ग) Na2O + CO2 → Na2CO3

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प्रश्न 10.29
आप निम्नलिखित तथ्यों को कैसे समझाएँगे –
(क) BeO जल में अविलेय है, जबकि BeSO4 विलेय है।
(ख) BaO जल में विलेय है, जबकि BaSO4 अविलेय है।
(ग) एथेनॉल में LIL, KI की तुलना में अधिक विलेय है।
उत्तर:
(क) BeO की जालक ऊर्जा BesO4 की तुलना में उच्च होती है; क्योंकि O2- आयन का आकार छोटा होता है, जबकि SO42- आयन बड़े आकार का होता है। चूंकि उच्च जालक ऊर्जा पदार्थ के जल में विलेय होने का विरोध करती है; इसलिए BeO लगभग अविलेय होता है, जबकि BeSO4 जल में विलेय होता है।

(ख) बेरियम ऑक्साइड (BaO) जल में विलेय होता है; क्योंकि इसकी जलयोजन ऊर्जा इसकी जालक ऊर्जा से अधिक होती है। दूसरी ओर BaSO4 की जालक ऊर्जा इसके द्विसंयोजी आवेशों के कारण उच्च होती है; इसलिए मुक्त होने वाली जलयोजन ऊर्जा जालक ऊर्जा से अधिक नहीं हो पाती तथा बन्ध टूट नहीं पाते हैं। इस कारण BaSO4 अविलेय होता है।

(ग) लीथियम आयोडाइड प्रवृत्ति में थोड़ा सहसंयोजी होता है। इसका कारण इसकी ध्रुवणता है (Li+ छोटे आकार के कारण सर्वाधिक ध्रुवण-क्षमता रखता है तथा आयोडाइड आयन बड़े आकार के कारण अधिकतम ध्रुवित किया जा सकता है)। Li+ आयन की जलयोजन ऊर्जा K+ आयन से अधिक होती है; अत: Li+ आयन K+ आयन से बहुत अधिक जलयोजित हो जाते हैं। इसलिए LiI, KI की तुलना में अधिक विलेय है।

प्रश्न 10.30
इसमें से किस क्षार-धातु का गलनांक न्यूनतम है?
(क) Na
(ख) K
(ग) Rb
(घ) Cs
उत्तर:
(घ) Cs

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प्रश्न 10.31
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षार धातु जलयोजित लवण देती है?
(क) Li
(ख) Na
(ग) K
(घ) Cs
उत्तर:
(क) Li

प्रश्न 10.32
निम्नलिखित में से कौन-सी क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट ताप के प्रति सबसे अधिक स्थायी है?
(क) MgCO3
(ख) CaCO3
(ग) SrCO3
(घ) BaCO3
उत्तर:
(घ) BaCO3

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 9 हाइड्रोजन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry हाइड्रोजन Text Book Questions and Answers

अभ्याम के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 9.1
हाइड्रोजन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर आवर्त सारणी में इसकी स्थिति को युक्तिसंगत ठहराइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन एक विशिष्ट तत्व है, जो आवर्त सारणी के वर्ग 1 की क्षार धातुओं तथा वर्ग 17 के हैलोजेन गैसों के गुण प्रदर्शित करता है। इस दोहरे गुण का कारण हाइड्रोजन की आवर्त सारणी में स्थिति विवादास्पद बनी हुई है।

हाइड्रोजन के दोहरे व्यवहार का कारण इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है। हाइड्रोजन s – ब्लॉक का प्रथम तत्व है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s1 है अर्थात् हाइड्रोजन परमाणु के बाहरी कोश, जो पहला कोश भी है, में केवल एक इलेक्ट्रॉन है। हाइड्रोजन एक इलेक्ट्रॉन त्याग कर H+ आयन या धनायन अर्थात् प्रोटॉन दे सकता है और एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके H आयन या ऋणायन बना सकता है।
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हाइड्रोजन के सन्दर्भ में उपर्युक्त तथ्य से आवर्त सारणी में इसकी स्थिति निम्नलिखित बिन्दुओं से समझी जा सकती है –
हाइड्रोजन की क्षार धातुओं (वर्ग 1 के तत्वों) से समानता (Similarities of Hydrogen with Alkali Metals)

1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration):
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान है और इनके अन्तिम कोश में एक इलेक्ट्रॉन s1 है।
1H = 1s1 11Na = 1s2, 2s2 2p6, 3s1

2. विद्युत-धनात्मक गुण (Electropositive character):
एक इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन देते हैं।
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इस व्यवहार को इस तथ्य से प्रबल समर्थन मिलता है कि जब अम्लीकृत जल का विद्युत-अपघटन किया जाता है तो कैथोड पर हाइड्रोजन मुक्त होती है। इसी प्रकार गलित सोडियम क्लोराइड के विद्युत अपघटन पर कैथोड पर सोडियम (क्षार धातु) मुक्त होती

3. Berita PUT STARIT (Oxidation state):
हाइड्रोजन तथा क्षार धातु अपने यौगिकों में +1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं।
उदाहरणार्थ:
HCl, NaCl आदि।

4. रासायनिक बन्धुता (Chemical affinity):
हाइड्रोजन तथा क्षार धातुएँ विद्युत धनात्मक प्रकृति के होते हैं। अतः इनमें विद्युत-ऋणी तत्वों के प्रति बन्धुता पाई जाती है अर्थात् ये तीव्रता से इनकी साथ संयोग करते हैं।
उदाहरणार्थ –
सोडियम के यौगिक: Na2O, NaCl, Na2S
हाइड्रोजन के यौगिक: H2O, HCl, H2S

5. अपचायक प्रकृति (Reducing nature):
हाइड्रोजन तथा अन्य क्षार धातु वर्ग के सदस्य प्रबल अपचायक होते हैं; क्योंकि वे उनके यौगिकों से ऑक्सीजन को हटाते हैं।
उदाहरणार्थ –
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क्षार धातुओं से असमानता (Dis-similarities with Alkali Metals)
हाइड्रोजन क्षार धातुओं से भिन्न भी दर्शाता है। इनका वर्णन निम्नवत् है –

  • क्षार धातुएँ प्रारूपिक धातुएँ (typical metals) होती हैं, जबकि हाइड्रोजन एक अधातु है।
  • हाइड्रोजन द्विपरमाणुक (diatomic) होती है, जबकि क्षार धातुएँ एकपरमाणुक होती हैं।
  • क्षार धातुओं की आयनन ऊर्जा (सोडियम की आयनन ऊर्जा = 496 kJmol-1) हाइड्रोजन (1312 kJmol-1) की तुलना में बहुत कम होती है।
  • हाइड्रोजन के यौगिक सामान्यतः सहसंयोजक होते हैं (जैसे – HCI, H,O आदि), जबकि क्षार धातुओं के यौगिक सामान्यत: आयनिक होते हैं (जैसे – NaCl, KF आदि)।

हाइड्रोजन तथा हैलोजेन की समानता (Similarities of Hydrogen & Halogens):

1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic configuration):
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस कारण से समान होते हैं कि इनके बाहरी कोश में अक्रिय गैस से एक इलेक्ट्रॉन कम होता है और ये एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके अक्रिय गैस की स्थायी संरचना प्राप्त कर लेते हैं।
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2. विद्युत्-ऋणात्मक गुण. (Electronegative character):
ये एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन देते हैं।
H + e → H, X = e → X (X = हैलोजेन)

3. द्विपरमाणुक प्रकृति (Diatomic nature):
हाइड्रोजन तथा हैलोजेन दोनों द्वि-परमाणुक अणु बनाते हैं, जिसमें सहसंयोजक बन्ध होते हैं।
H – H या H2, Cl – C या Cl2

4. ऐनोड पर विमुक्ति (Liberation at anode):
हैलाइडों के जलीय विलयन विद्युत्-अपघटन पर ऐनोड पर ऋणायन देते हैं। इसी प्रकार NaH विद्युत्-अपघटन पर ऐनोड पर H आयन देता है।
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5. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation enthalpy):
आयनन ऊर्जा लगभग समान होती है, किन्तु क्षार धातुओं से अधिक होती हैं।
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6. ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation state):
हैलोजेन यौगिकों में -1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं तथा हाइड्रोजन भी अपने यौगिकों में (धातुओं के साथ) -1 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है।
उदाहरणार्थ –
Na+ H तथा Na+F I

7. अधात्विक प्रकृति (Non-metallic nature):
हाइड्रोजन तथा हैलोजेनों का सबसे महत्त्वपूर्ण सामान्य गुण अधात्विक प्रकृति है। दोनों प्रारूपिक अधातु हैं।

8. Aiiftant atyronta (Nature of compounds):
हाइड्रोजन तथा हैलोजन के अनेक यौगिक सहसंयोजी प्रकृति के होते हैं।
उदाहरणार्थ –
हाइड्रोजन के सहसंयोजक यौगिक: CH4, SiH4, GeH4
क्लोरीन के सहसंयोजक यौगिक: CCl4, SiCl4, GeCl4

यहाँ यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि हाइड्रोजन तथा हैलोजेन परमाणु सरलता से प्रतिस्थापित किए जा सकता हैं।
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हैलोजेनों से असमानता (Dis-similarities with Halogens):
निम्नलिखित गुणधर्मों में हाइड्रोजन हैलोजेनों से भिन्नता रखता है –
1. हैलोजेन तीव्रता से हैलाइड आयन (X) बना लेते हैं, परन्तु हाइड्रोजन केवल क्षार तथा क्षारीय मृदा धातुओं के साथ यौगिकों में हाइड्राइड आयन (H) बनाता है।

2. आण्विक रूप में, H परमाणुओं पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म नहीं होता, जबकि X परमाणुओं पर ऐसे तीन युग्म होते हैं। उदाहरणार्थ –
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3. हैलोजेन के ऑक्साइड सामान्यतयां अम्लीय होते हैं, जबकि हाइड्रोजन के ऑक्साइड उदासीन होते हैं।

निष्कर्षतः
हाइड्रोजन दोनों समूहों के साथ समान लक्षण रखता है। अतः इसे आवर्त सारणी में एक निश्चित स्थान देना कठिनाई का विषय है। चूँकि तत्वों के आवर्ती वर्गीकरण का आधार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है; अतः हाइड्रोजन को क्षार धातुओं के साथ वर्ग 1 में सबसे ऊपर रखा गया है, परन्तु हाइड्रोजन की यह स्थिति पूर्ण रूप से न्यायोचित नहीं है।

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प्रश्न 9.2
हाइड्रोजन के समस्थानिकों के नाम लिखिए तथा बताइए कि इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात क्या है?
उत्तर:
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं जिनके नाम प्रोटियम \(\left({ }_{1}^{1} \mathrm{H}\right)\) ड्यूटीरियम \(\left({ }_{2}^{1} \mathrm{H}\right)\) तथा ट्राइटियम \(\left({ }_{3}^{1} \mathrm{H}\right)\) हैं। इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात निम्नवत् है –
\(\left({ }_{1}^{1} \mathrm{H}\right)\) : \(\left({ }_{2}^{1} \mathrm{H}\right)\) : \(\left({ }_{3}^{1} \mathrm{H}\right)\) : : 1.008 : 2.014 : 3.016

प्रश्न 9.3
सामान्य परिस्थितियों में हाइड्रोजन एक परमाण्विक की अपेक्षा द्विपरमाण्विक रूप में क्यों पाया जाता है।
उत्तर:
एक-परमाणु रूप में हाइड्रोजन के पास K कोश में केवल एक इलेक्ट्रॉन (1s1) होता है, जबकि द्विपरमाणुक अवस्था में K कोश पूर्ण (1s2) होता है। इससे तात्पर्य है कि द्विपरमाणुक रूप में हाइड्रोजन (H2) उत्कृष्ट गैस हीलियम का विन्यास प्राप्त कर लेती है। अतः यह स्थायी होती है और यह एक परमाण्विक अस्थाई होता है।

प्रश्न 9.4
‘कोल गैसीकरण’ से प्राप्त डाइ-हाइड्रोजन का उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
कोल से संश्लेषण गैस या सिन्गैस का उत्पादन करने की क्रिया कोलगैसीकरण कहलाती है।
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सिन्गैस की उपस्थिति CO को आयरन क्रीमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से क्रिया कराने पर डाइ-हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
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यह भाप अंगार गैस सृति-अभिक्रिया कहलाती है।

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प्रश्न 9.5
विद्युत-अपघटन विधि द्वारा डाइहाइड्रोजन वृहद् स्तर पर किस प्रकार बनाई जा सकती है? इस प्रक्रम में विद्युत-अपघट्य की क्या भूमिका है?
उत्तर:
विद्युत-अपघटन विधि द्वारा डाइहाइड्रोजन का निर्माण (Formation of Dihydrogen by electrolytic process):
सर्वप्रथम शुद्ध जल में अम्ल तथा क्षारक की कुछ बूंदें मिलाकर इसे विद्युत का सुचालक बना लेते हैं। अब इसकी विद्युत-अपघटन (वोल्टामीटर में) करते हैं। जल के विद्युत अपघटन से ऋणोद (कैथोड) पर डाइहाइड्रोजन और धनोद (ऐनोड) पर ऑक्सीजन (सहउत्पाद के रूप में) एकत्रित होती है। ऐनोड तथा कैथोड को एक ऐस्बेस्टस डायफ्राम की सहायता से पृथक्कृत कर दिया जाता है जो मुक्त होने वाली हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन को मिश्रित नहीं होने देता।
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चित्र-अम्लीय जल के विद्युत-अपघटन द्वारा H2 प्राप्त करना।
H2O ⇄ H+ + OH
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इस प्रकार प्राप्त डाइहाइड्रोजन पर्याप्त रूप से शुद्ध होती है।

विद्युत-अपघट्य की भूमिका (Role of electrolyte):
शुद्ध जल विद्युत-अपघट्य नहीं होता और न ही विद्युत का चालक होता है। शुद्ध जल में अम्ल या क्षार की कुछ मात्रा मिलाकर इसे विद्युत अपघट्य बनाया जाता है।

प्रश्न 9.6
निम्नलिखित समीकरणों को पूरा कीजिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 9.7
डाइहाइड्रोजन की अभिक्रियाशीलता के पदों में H – H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी के परिणामों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
डाइहाइड्रोजन की अभिक्रियाशीलता के पदों में H – H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी के परिणाम की विवेचना निम्न प्रकार की जा सकती है-
H – H बन्ध वियोजन एन्थैल्पी किसी तत्व के दो परमाणुओं के एकल बन्ध के लिए अधिकतम है। इसका कारण डाइहाइड्रोजन का इसके परमाणुओं में वियोजन केवल 2000K के ऊपर लगभग 0.081 प्रतिशत ही होता है, जो 5000K पर बढ़कर 955 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। उच्च H – H बन्ध एन्थैल्पी के कारण कक्ष ताप पर डाइहाइड्रोजन अपेक्षाकृत निष्क्रिय है। यह केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही रासायनिक क्रिया में भाग लेता है।

प्रश्न 9.8
हाइड्रोजन के –

  1. इलेक्ट्रॉन न्यून
  2. इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध तथा
  3. इलेक्ट्रॉन समृद्ध यौगिकों से आप क्या समझते हैं? उदाहरणों द्वारा समझाइए।

उत्तर:
1. इलेक्ट्रॉन न्यून:
इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड, जैसा नाम से पता चलता है, परम्परागत लूईस-संरचना लिखने के लिए इनमें इलेक्ट्रॉन की संख्या अपर्याप्त होती है। इसका उदाहरण डाइबोरेन (B2H6) है। वस्तुतः आवर्त सारणी के 13 वें वर्ग के सभी तत्व इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक बनाते हैं। ये लूईस अम्ल की भाँति कार्य करते हैं अर्थात् ये इलेक्ट्रॉनग्राही होते हैं।

2. इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध:
इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध हाइड्राइड में परम्परागत लूईस संरचना के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन की संख्या होती है। आवर्त सारणी के 14 वें वर्ग के सभी तत्व इस प्रकार के यौगिक (जैसे – CH4) बनाते हैं, जो चतुष्फलकीय ज्यामिति (tetrahedral geometry) के होते हैं।

3. इलेक्ट्रॉन समृद्ध:
इलेक्ट्रॉन समृद्ध हाइड्राइड इलेक्ट्रॉन आधिक्य एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म के रूप में उपस्थिति होते हैं। आवर्त सारणी के 15 वें से 17 वें वर्ग तक के तत्व इस प्रकार के यौगिक बनाते हैं –

(NH3 के एकाकी युग्म, H2O में दो तथा HF में तीन एकाकी युग्म होते हैं)। ये लूईस क्षार के रूप में व्यवहार करते हैं। ये इलेक्ट्रॉनदाता होते हैं। उच्च विद्युत-ऋणात्मकता वाले परमाणु जैसे-नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा फ्लुओरीन के हाइड्राइड पर एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म होने के कारण अणुओं में हाइड्रोजन बन्ध बनता है, जिनके कारण अणुओं में संगुणन होता है।

प्रश्न 9.9
संरचना एवं रासायनिक अभिक्रियाओं के आधार पर बताइए कि इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड के कौन-कौन से अभिलक्षण होते हैं?
उत्तर:
वे आण्विक हाइड्राइड जिनमें केन्द्रीय परमाणु पर अष्टक नहीं होता, इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइस कहलाते हैं। वर्ग 13 के तत्वों हाइड्राइड; जैसे –
B2H6, (AlH3)n, आदि, इलेक्ट्रॉन न्यून अणु होते हैं तब इसीलिए किसी दाता अणु; जैसे – NR3, PF3, CO आदि से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृति रखते हैं तथा योगात्मक यौगिक बनाते हैं। इन योगात्मक यौगिकों के निर्माण में इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड लूईस अम्लों को भाँति तथा दाता अणु लूइस क्षारकों की भाँति व्यवहार करते हैं।
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प्रश्न 9.10
क्या आप आशा करते हैं कि (CnH2n+2) कार्बनिक हाइड्राइड लूईस अम्ल या क्षार की भाँति कार्य करेंगे? अपने उत्तर को युक्तिसंगत ठहराइए।
उत्तर:
यदि दिए गए अणु के केन्द्रीय परमाणु की संयोजकता-कोश में रिक्त d – कक्षक नहीं होते तो यह दाता परमाणु अथवा दाता आयन से इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्मों को ग्रहण करके योगात्मक यौगिकों का निर्माण नहीं कर सकता; अतः यह लूईस अम्ल की भाँति व्यवहार प्रदर्शित नहीं करता।

अब चूँकि CnH2n+2 में C – परमाणु (2s2 \(2 p_{x}^{1}\) \(2 p_{y}^{1}\) \(2 p_{z}^{0}\) को संयोजकता कोश में d – कक्षक नहीं हैं; इसलिए CnH2n+2 में यह परमाणु इलेक्ट्रॉनों का एकाकी युग्म ग्रहण करने योग्य नहीं है तथा लूईस अम्ल व्यवहार प्रदर्शित नहीं करता। ये हाइड्राइड सामान्य सहसंयोजी हाइड्राइडों की भाँति व्यवहार करते हैं। ये लूईस अम्ल अथवा क्षारक की भाँति कार्य नहीं करेंगे। ये इलेक्ट्रॉन-परिशुद्ध हाइड्राइड होते हैं।

प्रश्न 9.11
अरसमीकरणमितीय हाइड्राइड (nonstochiometric hydride) से आप क्या समझते हैं? क्या आप क्षारीय धातुओं से ऐसे यौगिकों की आशा करते हैं? अपने उत्तर को न्यायसंगत ठहराइए।
उत्तर:
अरसमीकरणमितीय हाइड्राइड-ऐसे हाइड्राइड जिनका निश्चित संघटन नहीं होता, अरसमीकरणमितीय हाइड्राइड कहलाते हैं। ये स्थिर अनुपात के नियम का पालन नहीं करते चूँकि इनमें रिक्त कक्षक होते हैं, अतः ये संक्रमण धातुओं द्वारा बनाए जाते हैं।

प्रश्न 9.12
हाइड्रोजन भण्डारण के लिए धात्विक हाइड्राइड किस प्रकार उपयोगी है? समझाइए।
उत्तर:
हाइड्रोजन के उच्च ज्वलनशील होने के कारण इसका भण्डारण करना एक कठिनाई का विषय है। इस कठिनाई का एक हल यह है कि हाइड्रोजन का भण्डारण इसके मैग्नीशियम, मैग्नीशियम – निकिल तथा आयरन-टाइटेनियम मिश्र-धातु के साथ बने यौगिक के टैंक (tank) के रूप में किया जाए। ये धातु-मिश्रधातु छिद्रों की भाँति हाइड्रोजन की वृहद् मात्रा को अवशोषित कर लेती हैं तथा धात्विक हाइड्राइड बनाती हैं।

धात्विक हाइड्राइड तन्त्र को जलाना अथवा इसका विस्फोट होना सम्भव नहीं होता; अतः इसे हाइड्रोजन भण्डारण की सुरक्षित युक्ति माना. जा सकता है। चूँकि हाइड्रोजन इन धातुओं से रासायनिक रूप से जुड़ी रहती है तथा यह धातु में तब तक भण्डारित रहती है जब तक कि इसे अतिरिक्त ऊर्जा न दी जाए। अतः हाइड्रोजन भण्डारण के लिए धात्विक हाइड्राइड अत्यन्त उपयोगी होते हैं।

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प्रश्न 9.13
कर्तन और वेल्डिंग में परमाण्वीय हाइड्रोजन अथवा ऑक्सी हाइड्रोजन टॉर्च किस प्रकार कार्य करती है? समझाइए।
उत्तर:
परमाण्विक हाइड्रोजन तथा ऑक्सी – हाइड्रोजन टॉर्च का उपयोग कर्तन तथा वेल्डिंग में होता है। परमाण्विक हाइड्रोजन परमाणु (जो विद्युत आर्क की सहायता से डाइहाइड्रोजन के वियोजन से बनते हैं) का पुनर्संयोग वेल्डिंग की जाने वाली धातुओं की सतह पर लगभग 4000K तक ताप उत्पन्न कर देता है ऑक्सी-हाइड्रोजन टॉर्च की ज्वाला अत्यन्त उच्च ताप (3000K से भी अधिक) उत्पन्न करती है जो वेल्डिंग कार्य में प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 9.14
NH3, H2O तथा HF में से किसका हाइड्रोजन बन्ध का परिमाण उच्चतम अपेक्षित है और क्यों?
उत्तर:
हाइड्रोजन बन्ध HF अणुओं में अधिक परिमाण का होता है क्योंकि फ्लुओरीन सर्वाधिक विद्युत ऋणी तत्व है। इस कारण H – F बन्ध प्रबल ध्रुवी होने के कारण प्रबल अन्तर-आण्विक हाइड्रोजन बन्ध प्रदर्शित करता है।
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गैसीय अवस्था में भी HF अणु H-बन्ध द्वारा संगुणित रहते हैं।

प्रश्न 9.15
लवणीय हाइड्राइड जल के साथ प्रबल अभिक्रिया करके आग उत्पन्न करती है। क्या इसमें CO2 (जो एक सुपरिचित अग्निशामक है) का उपयोग हम कर सकते हैं? समझाइए।
उत्तर:
जब लवणीय हाइड्राइड जल के साथ प्रबल अभिक्रिया करता है तो अभिक्रिया उच्च ऊष्माक्षेपी होने के कारण इसमें उत्पन्न हाइड्रोजन आग पकड़ लेती है। इस अभिक्रिया का समीकरण निम्नवत् है –
NaH(s) + H2O(aq) → NaOH(aq) + H2 (q)
CO2 को सामान्यतया अग्निशामक की तरह प्रयोग करते हैं। क्योंकि इसमें बने हाइड्रॉक्साइड से क्रिया कर काबोनेट बनाती है,
अत: CO2 को प्रयुक्त कर सकते हैं।
2NaOH(aq) + CO2 (g) → Na2SO3 (aq) + H2O (aq)

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प्रश्न 9.16
निम्नलिखित को व्यवस्थित कीजिए –

  1. CaH2, BeH2 तथा TiH2 को उनकी बढ़ती हुई विधुतचालकता के क्रम में।
  2. LiH, NaH तथा CSH को आयनिक गुण के बढ़ते हुए क्रम में।
  3. H – H, D – D तथा F – F को उनके बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी के बढ़ते हुए क्रम में।
  4. NaH, MgH2, तथा H2O को बढ़ते हुए अपचायक गुण के क्रम में।

उत्तर:

  1. BeH2 < TiH2 < CaH2: विद्युत चालकता का बढ़ता क्रम।
  2. LiH < NaH < CSH: आयनिक गुण का बढ़ता क्रम।
  3. F – F < H – H < D – D: बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी का बढ़ता क्रम।
  4. H2O < MgH2 < NaH: अपचायक गुण का बढ़ता क्रम।

प्रश्न 9.17
H2O तथा H2O2 की संरचनाओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
जल की संरचना:
गैस-प्रावस्था में जल एक बंकित अणु है। आबन्ध कोण तथा O – H आबन्ध दूरी के मान क्रमश: 104.5° तथा 95.7pm हैं, जैसा चित्र (a) में प्रदर्शित किया गया है।
अत्यधिक ध्रुवित अणु चित्र – (b) में तथा चित्र – (c) में जल के अणु में ऑर्बिटल अतिव्यापन दर्शाया गया है।
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चित्र:
(a) जल की बंकित संरचना, (b) जल-अणु द्विधुव के रूप में और (c) जल के अणु में ऑर्बिटल अतिव्यापन

हाइड्रोजन परॉक्साइड की संरचना:
हाइड्रोजन परॉक्साइड की संरचना असमतलीय (खुली पुस्तक के समान) होती है। गैसीय प्रावस्था तथा ठोस में इसकी आण्विक संरचना को चित्र में दर्शाया गया है।
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चित्र –
(a) गैसीय प्रावस्था में H2O2 की संरचना द्वितल, कोण 111.5° है।
(b) ठोस, प्रावस्था में 110K ताप पर H2O2, की संरचना द्वितल, कोण 90.2 है।

प्रश्न 9.18
जल के स्वतः प्रोटीनीकरण से आप क्या समझते हैं? इनका क्या महत्व है?
उत्तर:
जल कर स्वतः
प्रोटीनीकरण:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें एक जल-अणु किसी दूसरे जल-अणु से प्रोटॉन ग्रहण करके H3O+ तथा OH बनाता है। जल का स्वत: प्रोटोनीकरण कहलाती है।
H2O(l) + H2O(l) → H3O+ (aq) + OH (aq)
महत्व: जल अम्ल क्षार दोनों तरह कार्य करता है। उपर्युक्त अभिक्रिया को एक साम्य स्थिरांक अर्थात् आयनिक गुणनफल (Kw) द्वारा निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है –
Kw = [H3O+] [OH]
298K पर Kw = 1.0 × 10-14 mol2 L-2
इसका अम्ल-क्षार रसायन में बहुत अधिक महत्त्व है।

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प्रश्न 9.19
F2 के साथ जल की अभिक्रिया में ऑक्सीकरण तथा अपचयन के पदों पर विचार कीजिए एवं बताइए कि कौन-सी स्पीशीज ऑक्सीकृत/अपचयित होती है।
उत्तर:
फ्लुओरीन की जल के साथ अभिक्रिया निम्नवत् है –
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चूँकि F की आ० सं० 0 से -1 तक घटती है तथा O की आ० सं० -1 से 0 तक बढ़ती है, अत: F2 ऑक्सीकरण है तथा H2O अपचायक है। H2O का O2, में ऑक्सीकरण होता है। और F2 का HF में अपचयन होता है।

प्रश्न 9.20
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए –

  1. PbS (s) + H2O2 (aq) →
  2. MnO4 (aq) + H2O2 (aq) →
  3. CaO(s) + H2O (g) →
  4. AlCl3 (g) + H2O (l) →
  5. Ca3N2 (s) + H2O (l) →

उपर्युक्त को (क)जल – अपघटन
(ख) अपचयोपचय (redox) तथा
(ग) जलयोजन अभिक्रियाओं में वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:

  1. PbS (s) + 4H2O2 (aq) → PbSO4 (s) + 4H2O (aq)
  2. 2MnO4- (aq) + 3H2O2 (aq) → 2MnO2 (aq) + 3O2 (g) + 2H2O (l) + 2OH (aq)
  3. CaO(s) + H2O (g) → Ca(OH)2 (s)
  4. AlCl3 (g) + 3H2O (l) → Al(OH)3 (s) + 3HCl (l)
  5. Ca3N2 (s) + 6H2O(l) → 3Ca(OH)2 (aq) + 2NH2 (g)

उपर्युक्त अभिक्रियाओं को इस प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है –
(क) जल अपघट –
AlCl3 (g) 3H2O → (l) Al(OH)3 (s) + 3HCl (l)
Ca3N2 (s) + 6H2 O (l) → 3Ca(OH)2 (aq) + 2NH2 (g)

(ख) अपचयोपचक अभिक्रिया –
Pbs(s) + 4H2O2 (aq) → PbSO4 (s) + 4H2O (aq)
2MnO4 (aq) + 3H2O2 (aq) → 2MnO2 (aq) + 3O2 (g) + 2H2O (l) + 2OH (aq)

(ग) जलयोजन अभिक्रिया –
CaO(s) + H2O (g) → Ca(OH)2 (s)

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प्रश्न 9.21
बर्फ के साधारण रूप की संरचना का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बर्फ की संरचना:
बर्फ एक अतिव्यवस्थित, त्रिविम, हाइड्रोजन आबन्धित संरचना (highly ordered, three dimensional, hydrogen bonded structure) है –
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चित्र-बर्फ की संरचना
x – किरणों द्वारा परीक्षण से पता चला है कि बर्फ क्रिस्टल में ऑक्सीजन परमाणु चार अन्य हाइड्रोजन परमाणुओ से 276pm दूरी पर चतुष्फलकीय रूप से घिरा रहता है।
हाइड्रोजन आबन्ध बर्फ में बृहद् छिद्र एक प्रकार की खुली संरचना बनाते हैं। ये छिद्र उपयुक्त आकार के कुछ दूसरे अणुओं का अन्तरांकाश में ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 9.22
जल की अस्थायी एवं स्थायी कठोरता के क्या कारण हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अस्थायी कठोरता:
अस्थायी कठोरता जल में कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के हाइड्रोजन कार्बोनेट की उपस्थिति के कारण होती है। इसे उबालकर दूर किया जा सकता है।

स्थायी कठोरता:
स्थायी कठोरता जल में विलेयशील कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट के रूप में घुले रहने के कारण होती है। इसे धावन सोडा की क्रिया से दूर किया जा सकता है।

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प्रश्न 9.23
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि द्वारा कठोर जल के मृदुकरण के सिद्धान्त एवं विधि की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि (Synthetic lon-Exchange Method):
संश्लेषित आयन विनिमयक विधि द्वारा जल में विद्यमान कठोरता के लिए उत्तरदायी आयनों को उन अन्य आयनों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है जो जल की कठोरता के लिए उत्तरदायी नहीं होते। इस विधि में दो प्रकार के आयन विनिमयक प्रयोग किए जाते हैं –

  1. अकार्बनिक आयन विनिमयक तथा
  2. कार्बनिक आयन विनिमयक।

1. अकार्बनिक आयन विनिमयकःपरम्यूटिट विधि (Inorganic lon-Exchanger: Permutit Method)
इस विधि को ‘जियोलाइट/परम्पटिट विधि’ भी कहते हैं। यह व्यापारिक मात्रा में कठोर जल का मृदु करने की विधि है। इस विधि में सोडियम जियोलाइट का प्रयोग किया जाता है। यह वास्तव में सोडियम ऐलुमिनियम सिलिकेट नामक पदार्थ है। इसका सूत्र Na2 Al2 Si2 O8 है। यह या तो प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है अथवा इसे सोडे की राख (Na2CO3), सिलिका (SiO2) तथा ऐलुमिना (Al2O3) के मिश्रण से कृत्रिम रूप से बनाया जा सकता है।

इस मिश्रण के संगलित पदार्थ को जल से धोकर शेष बचे छिद्रित पदार्थ को ही परम्यूटिट कहते हैं। सरलता की दृष्टि से ऐलुमिनियम सिलिकेट अथवा जियोलाइट आयन (Ai2 Si2 O8) के स्थान पर ‘Z’ लिखकर सोडियम जियोलाइट को Na2Z सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। परम्यूटिट विधि से दोनों प्रकार की कठोरता दूर कर सकते हैं। सोडियम जियोलाइट में उपस्थिति सोडियम लवणों का यह गुण है कि ये अन्य आयनों द्वारा विस्थापित हो जाते हैं।
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चित्र – परम्यूटिट विधि से कठोर जल को मृदु बनाना।

परम्यूटिट को एक विशेष बेलनाकार पात्र में रखते हैं जिसमें मोटी रेत तथा परम्यूटिट भरा होता है। कठोर जल को इसमें से प्रवाहित करते हैं तो जल में उपस्थित कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के लवण इसके साथ क्रिया करते हैं। सोडियम परमाणुओं के स्थान पर कैल्सियम मैग्नीशियम परमाणु आ जाते हैं तथा कैल्सियम या मैग्नीशियम परम्यूटिट बन जाता है।
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वह जल जो परम्यूटिट पर से ऊपर उठता है, वह Ca2+ व Mg2+ आयनों से मुक्त होता है; अतः वह मृदु जल होता है जिसे पाइप द्वारा बाहार निकाला जा सकता है।

परम्यूटिट का पुनः
निर्माण (Regeneration of Permutit):
कुछ समय बाद सम्पूर्ण Na2Z, CaZ व MgZ में परिवर्तित हो जाता है, परन्तु परम्यूटिट लम्बे समय तक कार्य नहीं करता। Na2Z के पुननिर्माण के लिए कठोर जल के प्रवेश को रोककर इसके स्थान पर 10% NaCl विलयन मिला दिया जाता है, तब Ca2+ व Mg2+ आयन Na+ आयनों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाते हैं, जिससे परम्यूटिट का पुनः निर्माण हो जाता है।
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Ca+ व Mg2+ आयन जल द्वारा धो दिए जाते हैं तथा पुनर्निर्मित परम्यूटिट का उपयोग पुनः कठोर जल को मृदु करने में किया जा सकता है।

2. कार्बनिक आयन विनिमयक: संश्लेषित रेजिन विधि (Organic Ion-Exchanger : Synthetic Resin Method):
आजकल इस अधुनिक विधि का प्रयोग काफी हो रहा है। परम्यूटिट केवल उन लवण के धनायनों (Ca2+ व Mg2+) को हटाता है जो जल को कठोर बनाते हैं। कार्बनिक रसायनज्ञों ने कुछ विशेष पदार्थ विकसित किए हैं, इन्हें आयन विनिमयक रेजिन (ion-exchanger resins) कहते हैं। ये लवण में उपस्थित ऋणायनों को भी हटा सकते हैं। जो धनायनों की भाँति ही जल की कठोरता के लिए उत्तरादायी होते हैं। इस विधि से जल के मृदुकरण में निम्नलिखित दो प्रकार की रेजिन प्रयोग की जाती है –

(i) ऋणायन-विनिमयक रेजिन (Anion-exchanger resins):
वे रेजिन ऋणायन विनिमयक रेजिन कहलाते हैं, जिनमें हाइड्रोकार्बन समूह के साथ क्षारीय समूह – OH अथवा -NH2 जुड़े रहते हैं, जिन्हें – OH रेजिन के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
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चित्र-आयन-विनिमय रेजिन द्वारा जल की कठोरता का निवारण।

(ii) धनायन-विनिमयक रेजिन (Cation-exchanger resins):
ये हाइड्रोजन समूह ही हैं जिनके साथ अम्लीय समूह; जैसे – COOH या -SO3H समूह जुड़े रहते हैं तथा इन्हें धनायन विनिमयक रेजिन (H+ रेजिन) कहते हैं। धनायन रेजिन, जल की कठोरता के उत्तरदायी धनायनों का विनिमय करते हैं, जबकि ऋणायन रेजिन, कठोरता के लिए उत्तरदायी ऋणायनों को हटाते हैं।

इसमें एक टंकी को एक रेजिन R से लगभग आधा भरकर उसमें ऊपर से जल प्रवाहित करते हैं। रेजिन धनायनों को अवशोषित कर लेता है तथा टंकी से बाहर निकलने वाले जल में कैल्सियम और मैग्नीशियम धनायन नहीं होते; अतः जल मृदु हो जाता है। यह जल अलवणीकृत जल या अनआयनीकृत जल (demineralised water or deionised water) कहलाता है। इसके पश्चात् इस मृदु जल को दूसरे ऐसे रेजिन R+ में प्रवाहित करते हैं जो ऋणायनों को अवशोषित कर लेता है।

कार्यविदी (Working procedure):
रेजिन R विशाल कार्बनिक अणु होते हैं तथा उनमें अम्लीय क्रियात्मक समूह (-COOH, कार्बोक्सिलिक समूह) सम्मिलित रहते हैं। कठोर जल में उपस्थित धनायन Ca2+, Mg2+ इन अम्लीय क्रियात्मक समूहों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं तथा अम्ल से जल में H+ आयन आ जाते हैं।
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अब पात्र में से जो जल निकलता है, वह धनायनों से मुक्त होता है, परन्तु इसमें ऋणात्मक आयन होते हैं। रेजिन R+ में विशाल कार्बनिक अणुओं के बीच विस्थापित अमोनियम हाइड्रॉक्साइड के दाने होते हैं जिनसे क्रियात्मक हाइड्रॉक्सिल समूह (OH) संलग्न रहते हैं। कठोर जल में उपस्थित लवणों के ऋण विद्युती आयन, रेजिन R+ के अमोनियम आयनों (NH4+) से संयुक्त हो जाते हैं।
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H+ आयन; जो धनायन रेजिन टैंक से आते हैं, इन OH आयनों के साथ जुड़कर जल-अणु बना लेते हैं। अत: इस प्रकार प्राप्त जल उन सभी आयनों से मुक्त होता है जो कि जल को कठोर बनाते हैं।

रेजिन का पुनः निर्माण (Regeneration of resins):
कुछ समय बाद दोनों टैंकों में उपस्थित रेजिन पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं; क्योंकि H+ व OH पूरी तरह प्रतिस्थापित हो जाते हैं। वे लम्बे समय तक जल की कठोरता को दूर नहीं कर सकते। इन्हें पुन: प्राप्त करने के लिए कठोर जल का प्रवेश रोक देते हैं। प्रथम टैंक में तनु HCl की धारा प्रवाहित करते हैं।

अम्ल के H+ आयन्स समाप्त हो चुके रेजिन (exhausted resin) में Ca2+ व Mg2+ को प्रतिस्थापित कर H+, रेजिन का निर्माण करते हैं।
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इसी प्रकार दूसरे टैंक में समाप्त हो चुके रेजिन को तुन सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में प्रवेश करा कर पुनर्निर्मित किया जा सकता है।
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जब दोनों टैंकों में रेजिन पुनर्निर्मित हो जाता है तो अम्ल व क्षारक का प्रवेश रोक दिया जाता है। इनके स्थान पर पुनः धनायन रेजिन टैंक में कठोर जल को प्रवेश कराया जाता है। इस प्रकार एकान्तर क्रम में क्रियाएँ चलती हैं तथा मृदु जल प्राप्त होता रहता है।

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प्रश्न 9.24
जल के उभयधर्मी स्वभाव को दर्शाने वाले रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
जल अम्ल तथा क्षार दोनो रूपों में कार्य करता है। अतः यह उभयधर्मी है। ब्रान्स्टेड की अवधारणा के अनुसार जल NH3 के साथ अम्ल के रूप में तथा H2S के साथ क्षार के रूप में कार्य करता
है –
H2O (l) + NH3 (aq) → NH4+ (aq) + OH (aq) … (i)
H2O (l) + H2S (aq) → H3O+ (aq) + HS (aq) … (ii)
अभिक्रिया (i) के अनुसार जल अणु एक प्रोटॉन त्यागता है जिसे NH3 ग्रहणं करके NH4+ आयन बनाता है। अभिक्रिया (ii) के अनुसार जल अणु H2O+ आयन बनाता है।

प्रश्न 9.25
हाइड्रोजन परॉक्साइड के ऑक्सीकारक एवं अपचायक रूप को अभिक्रियाओं द्वारा समझाइए।
उत्तर:
चूँकि H2O2 में ऑक्सीजन परमाणु की आ० सं० में वृद्धि तथा कमी होने के कारण, यह ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों का कार्य करता है। इसे निम्नलिखित अभिक्रियाओं द्वारा समझाया जा सकता है –
1. अम्लीय माध्यम में H2O2 ऑक्सीकारक के रूप में –
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2. अम्लीय माध्यम में अपचायक के रूप में –
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3. क्षारीय माध्यम में ऑक्सीकारक के रूप में –
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4. क्षारीय माध्यम में अपचायक के रूप में –
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प्रश्न 9.26
विखनिजित जल से क्या अभिप्राय है? यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:
वह जल जो सभी विलेयशील खनिज अशुद्धियों से पूर्णतया मुक्त हो, विखनिजित जल (demineralised water) कहलाता है। दूसरे शब्दों में धनायनों (Ca2+, Mg2+ आदि) तथा ऋणायनों (Cl, SO42-, HCO3 आदि) से पूर्णतया विमुक्त जल विखनिजित जल कहलाता है।

विखनिजित जल को आयन-विनिमयक रेजिन विधि से प्राप्त किया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत आयन-विनिमयक रेजिनों द्वारा जल में उपस्थित सभी धनायनों तथा ऋणायनों को हटा दिया जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम कठोर जल को धनायन विनियम परिवर्तक (रेजिनयुक्त) में प्रवाहित किया जाता है, यहाँ SO3H तथा – COOH समूहों वाले विशाल काबनिक अणु (रेजिन), Na+, Ca2+, Mg2+ तथा अन्य धनायनों को हटाकर H+ आयनों को प्रतिस्थापित कर देते हैं।

इस प्रकार प्राप्त जल को पुनः ऋणायन विनिमय परिवर्तक से गुजारा जाता है, जहाँ – NH2 समूह वाले विशाल कार्बनिक अणु (रेजिन) Cl SO42-, HCO3 आदि ऋणायनों को हटाकर OH आयनों को प्रतिस्थापित कर देते हैं। जल के उत्तरोत्तर धनायन-विनिमयक (H+ आयन के रूप में) तथा ऋणायन-विनिमयक (OH के रूप में) रेजिन से प्रवाहित करने पर शुद्ध विखनिजित तथा विआयनित जल प्राप्त किया जाता है।

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प्रश्न 9.27
क्या विखनिजित या आसुत जल पेय-प्रयोजनों में उपयोगी हैं? यदि नहीं तो इसे उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है?
उत्तर:
विखनिजित या आसुत जल पेय-प्रयोजनों में उपयोगी नहीं है। यह स्वादहीन होता है। इसके अतिरिक्त कुछ आयन जैसे –
Na+, K+ आदि शरीर के लिए अनिवार्य हैं। इसे उपयोगी बनाने के लिए इसमें कुछ लवण; जैसे-सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम क्लोराइड आदि मिलाने चाहिए।

प्रश्न 9.28
जीवमण्डल एवं जैव-प्रणालियों में जल की उपादेयता को समझाइए।
उत्तर:
जीवमण्डल एवं जैव-प्रणालियों में जल की उपादेयता (Usefulness of Water in Bio-sphere and Biological systems):
सभी सजीवों का एक वृहद् भाग जल द्वारा निर्मित है। मानव शरीर में लगभग 65 प्रतिशत एवं कुछ पौधों में लगभग 95 प्रतिशत जल होता है। जीवों को जीवित रखने के लिए जल एक महत्त्वपूर्ण यौगिक है। संघनित प्रावस्था (द्रव तथा ठोस अवस्था) में जल के असामान्य गुणों का कारण तथा अन्य तत्वों के हाइड्राइड H2S तथा H2Se की तुलना में जल का उच्च हिमांक, उच्च क्वथनांक, उच्च वाष्पन ऊष्मा, उच्च संलयन ऊष्मा का कारण इसमें हाइड्रोजन-बन्धन का उपस्थित होना है।

अन्य द्रवों की तुलना में जल की विशिष्ट ऊष्मा, तापीय चालकता, पृष्ठ-तनाव, द्विध्रुव आघूर्ण तथा पराविधुतांक के मान उच्च होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण जीवमण्डल में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। जल की उच्च वाष्पन ऊष्मा उच्च ऊष्माधारिता ही जीवों के शरीर तथा जलवायु के सामान्य ताप को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। वनस्पतियों एवं प्राणियों के उपापचय (metabolism) में अणुओं के अभिगमन के लिए जल एक उत्तम विलायक का कार्य करता है। जल ध्रुवीय अणुओं के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाता है जिससे सहसंयोजक यौगिक; जैसेऐल्कोहॉल तथा कार्बोहाइड्रेट यौगिक जल में विलेय होते हैं। अत: जैव-प्रणालियों के लिए भी यह आवश्यक होता है।

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प्रश्न 9.29
जल का कौन-सा गुण इसे विलायक के रूप में उपयोगी बनाता है? यह किस प्रकार के यौगिक –

  1. घोल सकता है और
  2. जल-अपघटन कर सकता है?

उत्तर:
जल के गुण (Properties of Water):
जल के निम्नलिखित गुण इसे विलायक के रूप में अतिमहत्त्वपूर्ण बनाते हैं –

  1. इसकी वाष्पन एन्थैल्पी तथा ऊष्मा-धारिता उच्च होती है।
  2. यह ताप की एक दीर्घ परास (0°C से 100° C तक) के अन्तर्गत द्रव-अवस्था में होता है।
  3. यह ध्रुवी प्रकृति का होता है तथा इसका पराविद्युतांक उच्च (78.39) होता है।
  4. अन्य यौगिकों के साथ हाइड्रोजन बन्ध बना सकता है।

जल विलायक के रूप में (Water as a Solvent):

  1. यह हाइड्रोजन बन्ध के कारण ध्रुवी पदार्थों तथा कुछ कार्बनिक यौगिकों को घोल सकता है। यह आयनिक पदार्थों तथा उन यौगिकों को घोल सकता है जो इसके साथ H – बन्ध बनाते हैं।
  2. इसमें उपस्थित ऑक्सीजन की अनेक तत्वों से अत्यधिक बन्धुता के कारण यह सहसंयोजी यौगिकों को जल-अपघटित कर देता है। यह ऑक्साइडों, हैलाइडों, फॉस्फाइडों, नाइट्राइडों आदि को जल-अपघटित कर देता है।

प्रश्न 9.30
H2O एवं D2O के गुणों को जानते हुए क्या आप मानते हैं कि D2O का उपयोग पेय-प्रयोजनों के रूप में लाया जा सकता है?
उत्तर:
नहीं, भारी जल (D2O) पेय-प्रयोजनों के रूप में उपयोगी नहीं होता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं –

  1. भारी अणु होने के कारण, D2O में आयनन H2O की तुलना में एक-तिहाई ही होता है।
  2. D2O में बन्ध H2O की तुलना में अत्यन्त धीमी गति से टूटते हैं।
  3. कम पराविद्युतांक के कारण इसमें आयनिक पदार्थ जल की तुलना में कम विलेय होते हैं।

उपर्युक्त कारणों से भारी जल शरीर में होने वाली अपचयोपचयी अभिक्रियाओं को साधारण जल की तुलना में अति मन्द दर से करता है जिससे से असन्तुलित हो जाती हैं। अतः यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसके अतिरिक्त इससे बीजों का अंकुरण रुक जाता है, इसमें रहने वाले टैडपोल तथा अन्य छोटे-छोटे जीव मर जाते हैं तथा यह पेड़-पौधों का विकास रोक देता है।

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प्रश्न 9.31
‘जल अपघटन’ (Hydrolysis) तथा ‘जल योजन’ (Hydration) पदों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
जल-अपघटन:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें एक पदार्थ अम्लीय अथवा क्षारीय अथवा उदासीन माध्यमों में जल से क्रिया करे, जल-अपघटन कहलाता है।

उदाहरणार्थ:
एल्यूमीनियम क्लोराइड (AlCl3) जल अपघटित हो जाता है।
ACl3 + 3H2O → Al(OH)3 + 3HCl
अभिक्रिया के पश्चात् प्राप्त विलयन का pH बदल जाता है।

जल-योजन:
किसी पदार्थ के ऐसे गुण को जिसमें क्रिस्टलन जल के अणु ग्रहण करके जल योजित हो जाये, जल-योजन कहते हैं।

उदाहरणार्थ:
सफेद रंग का निर्जलीय कॉपर सल्फेट (CuSO4) जल के पाँच अणु ग्रहण करके नीले रंग का जलयोजित कॉपर सल्फेट (AuSO4.5H2O) बनाता है। अभिक्रिया पश्चात् प्राप्त विलयन का pH अपरिवर्तित रहता है।

प्रश्न 9.32
लवणीय हाइड्राइड किस प्रकार कार्बनिक यौगिकों से अति सूक्ष्म जल की मात्रा को हटा सकते हैं?
उत्तर:
लवणीय हाइड्राइडों में H2O के लिए अत्यधिक बन्धुता होती है। लवणीय हाइड्राइड जैसे – NaH, H आयनों को मुक्त करता है जो प्रबल ब्रान्स्टेड क्षारकों की भाँति कार्य करते हैं (H4O एक दुर्बल ब्रान्स्टेड अम्ल होता है)। NaH जल से संयुक्त होकर हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है। लवणीय हाइड्राइडों का यह गुण कार्बनिक यौगिकों से अति सूक्ष्म जल की मात्रा को हटाने में प्रयुक्त होता है।
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प्रश्न 9.33
परमाणु क्रमांक 15,19, 23 तथा 44 वाले तत्व यदि डाइहाइड्रोजन से अभिक्रिया कर हाइड्राइड बनाते हैं तो उनकी प्रकृति से आप क्या आशा करेंगे? जल के प्रति इनके व्यवहार की तुलना कीजिए।
उत्तर:
परमाणु क्रमांक 15 वाला तत्व फॉस्फोरस (P) है। इसका हाइड्राइड PH3 है जो सहसंयोजी होता है। परमाणु क्रमांक 19 वाला तत्व पोटैशियम (K) है। इसका हाइड्राइड KH3 है जो आयनिक होता है। परमाणु क्रमांक 23 वाला तत्व वैनेडियम (V) है। इसका हाइड्राइड धात्विक है। परमाणु क्रमांक 44 वाला तत्व रूथेनियम (Ru) है। इसका हाइड्राइड धात्विक है।

जल के प्रति व्यवहार:
P का सहसंयोजी हाइड्राइड PH3 है जो जल में अल्प विलेय है –
K का आयनिक हाइड्राइड KH है जो जल से क्रिया करके डाइहाइड्रोजन गैस देता है।
KH(s) + H2O (aq) → KOH(aq) + H2 (g)
V तथा Ru धात्विक हाइड्राइड बनाते हैं जो जल को संगुणित करते हैं।

प्रश्न 9.34
जल एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड एवं पोटैशियम क्लोराइड को अलग-अलग –

  1. सामान्य जल
  2. अम्लीय जल
  3. क्षारीय जल से अभिकृत कराया जाएगा तो आप किन-किन विभिन्न उत्पादों की आशा करेंगे? जहाँ आवश्यक हो, वहाँ रासायनिक समीकरण दीजिए।

उत्तर:
1. सामान्य जल में:
एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड निम्नलिखित अभिक्रिया देता है –
AlCl3 + 3H2O → Al(OH)3 + 3HCI
KCI जल में घुल कर जलयोजित आयन बनायेगा।
KCl (s) + H2O → K+ (aq) + Cl (aq)

2. अम्लीय जल में:
एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड अम्लीय जल अपघटित होकर Al3+ तथा Cl आयन बनायेगा।
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3. क्षारीय जल में:
एल्यूमीनियम (III) क्लोराइड क्षारीय जल में अपघटित होकर टेट्राऑक्साइड-ऐल्यूमिनेट बनाता है।
AlCl3 + 2KOH → Al(OH)3 + 3KCI
Al(OH)3 + OH → [Al(OH)4]
KCl पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

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प्रश्न 9.35
H2O2 विरंजन कारक के रूप में कैसे व्यवहार करता है? लिखिए।
उत्तर:
H2O2 अपघटित होकर नवजात ऑक्सीजन देता है, जो रंगीन पदार्थों को रंगहीन कर देती है। इसकी विरंजन क्रिया ऑक्सीकरण गुण के कारण है।
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ऊन, पंख, बाल, रेशम आदि इसकी सहायता से रंगहीन हो जाते हैं।

प्रश्न 9.36
निम्नलिखित पदों से आप क्या समझते हैं –

  1. हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था
  2. हाइड्रोजनीकरण
  3. सिन्गैस
  4. भाप अंगार गैस सृति अभिक्रिया तथा
  5. ईंधन सेल।

उत्तर:
1. हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था:
दहन के फलस्वरूप अनेक विषाक्त गैसें –
CO2N2 तथा सल्फर के ऑक्साइड वायुमण्डल में मिल जाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए भावी विकल्प ‘हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था’ है। हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धान्त ऊर्जा का द्रव हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धान्त ऊर्जा का द्रव हाइड्रोजन अथवा गैसीय हाइड्रोजन के रूप में अभिगमन तथा भण्डारण है।

हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का मुख्य ध्येय तथा लाभ-ऊर्जा का संचरण विद्युत ऊर्जा के रूप में न होकर हाइड्रोजन के रूप में होना है। हमारे देश में पहली बार अक्टूबर, 2005 में आरम्भ परियोजना में डाइहाइड्रोजन से चालित वाहनों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया गया। प्रारम्भ में चौपहिया वाहन के लिए 5% डाइहाइड्रोजन मिश्रित CNG को प्रयोग किया गया। बाद में डाइहाइड्रोजन की प्रतिशतता धीरे-धीरे अनुकूलतम स्तर तक बढ़ाई जाएगी।

2. हाइड्रोजनीकरण:
ऐसी अभिक्रिया जिसमें असंतृप्त कार्बनिक यौगिक हाइड्रोजन के संयोग से संतृप्त यौगिक बनाते हैं, हाइड्रोजनीकरण अभिक्रिया कहलाती है। यह अभिक्रिया उत्प्रेरक की उपस्थिति में होती है। इस अभिक्रिया का उपयोग निम्नवत् है –

वनस्पति तेलों का हाइड्रोजनीकरण:
473K पर Ni उत्प्रेरक की उपस्थिति में वनस्पति तेलों में H2 गैस प्रवाहित करने पर वनस्पति घी बनता है –
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3. सिन्गैस:
हाइड्रोकार्बन अथवा कोक की उच्च ताप पर एवं उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से अभिक्रिया कराने पर डाइहाइड्रोजन प्राप्त होती है।
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CO एवं H2 के मिश्रण को वाटर गैस कहते हैं। CO एवं H2 का यह मिश्रण मेथेनॉल तथा अन्य कई हाइड्रोकार्बनों के संश्लेषण में काम आता है। अत: इसे ‘संश्लेषण गैस’ या ‘सिन्गैस’ (Syngas) भी कहते हैं। आजल सिन्गैस वाहितमल (sewage waste), अखबार, लकड़ी का बुरादा, लकड़ी की छीलन आदि से प्राप्त की जाती है। कोल से सिन्गैस का उत्पादन करने की प्रक्रिया को ‘कोलगैसीकरण’ (Coal-gasification)
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4. भाप अंगार गैस साति अभिक्रिया:
सिनस CO गैस तथा आयरन क्रोमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप की क्रिया कराने पर डाइहाइड्रोजन के उत्पादन की वृद्धि की जा सकती है।
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इस अभिक्रिया को भाप-अंगार गैस सृति अभिक्रिया कहते हैं। डाइहाइड्रोजन के उत्पाद स्रोत शैल रसायन, जलविलयनों के विद्युत-अपघटन आदि हैं।

5. ईंधन सेल:
ऐसा प्रक्रम जिसमें ईंधन को रासायनिक ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में बदलता है, ईंधन सेल कहलाता है। इसका उपयोग ईंधन सेलों में विद्युत उत्पादन में करते हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry अपचयोपचय अभिक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 8.1
निम्नलिखित स्पीशीज में प्रत्येक रेखांकित तत्व की ऑक्सीकरण – संख्या का निर्धारण कीजिए –
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
उत्तर:
(क) माना NaH2PO4 में P की आ० सं० x है।
1 + 2 × 1 + x + 4 × (-2) = 0
1 + 2 + x – 8 = 0
या x – 5 = 0 या x = +5

(ख) माना NaHSO4 में S की आ० सं० x है।
1 + 1 + x4(-2) = 0
या x = + 6

(ग) माना N4P2O7 में P की आ० सं० x है।
4 × 1 + 2 × x + 7(-2) = 0
या 2x – 10 = 0
या x = +5

(घ) माना K2MNO4 में Mn की आ० सं० x है।
2 × 1 + x + 4(-2) = 0
या x – 6 = 0
या x = +6

(ङ) माना CaO2 में O की आ० सं० x है।
2 + 2x = 0
x = -1

(च) माना NaHB4 में S की आ० सं० x है।
1 + x + 4(-1) = 0
x = +3

2 × 1 + 2 × x + 7(-2) = 0

(छ) माना H2S2O7 में S की आ० सं० x है।
2 × 1 + 2 × x + 7(-2) = 0
या 2x – 12 = 0
या x = +6

(ज) माना KAI(SO4)2.12H2O में S की आ० सं० x
1 + 3 + 2(x – 8) + 12 × 2 + 12(-2) = 0
या 4 + 2x – 16 = 0
या x = +6

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 8.2
निम्नलिखित यौगिकों के रेखांकित तत्वों की ऑक्सीकरण-संख्या क्या है तथा इन परिणामों को आप कैसे प्राप्त करते हैं?
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
उत्तर:
(क) माना KI3 में I की ऑक्सीकरण संख्या x है।
+ 1 + 3x = 0
या x = –\(\frac{1}{3}\)

(ख) माना H2S4O6 में माना S की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या 2(+1) + 4x + 6(-2) = 0
4x – 10 = 0
या x = \(\frac{+5}{2}\) या 2.5

(ग) माना Fe3O4 में माना Fe की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या 3x + 4(-2) = 0
3x – 8 = 0
या x = +\(\frac{8}{3}\)

(घ) माना CH3CH2OH में C की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या x + 3(+1) + x + 2(+1) + 1(-2) + 1 = 0
x – 4 = 0
x = 2

(ङ) माना CH3COOH में C की ऑक्सीकरण संख्या x है।
या x + 3(+1) + x + (-2) + (-2) + 1 = 0
या 2x + 4 – 4 = 0
या x = 0

उपर्युक्त यौगिकों में निर्दिष्ट तत्व की ऑक्सीकरण संख्या भिन्नात्मक होती है। परन्तु हमें ज्ञात है कि भिन्नात्मक ऑक्सीकरण संख्या स्वीकार्य नहीं है; क्योकि इलेक्ट्रॉनों का सहभाजन अथवा स्थानान्तरण आंशिक नहीं हो सकता।

वास्तव में भिन्नात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रेक्षित किए जा रहे तत्व की ऑक्सीकरण संख्याओं का औसत होता है तथा संरचना प्राचलों से ज्ञात होता है कि वह तत्व जिसकी भिन्नात्मक ऑक्सीकरण अवस्था होती है, अलग-अलग ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित होता है। अतः उपर्युक्त ऑक्सीकरण संख्याओं से औसत ऑक्सीकरण अवस्थाएँ व्यक्त होती हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 8.3
निम्नलिखित अभिक्रियाओं का अपचयोपचय अभिक्रियाओं के रूप में औचित्य स्थापित करने का प्रयास कीजिए –
(क) CuO(s) + H2(g) → Cu(s) + H2O(g)
(ख) Fe2O3(s) + 3CO(g) → 2Fe(s) + 3CO2(g)
(ग) 4BCl3(g) + 3 LiAIH4(s) → 2B2H6(g) + 3LiCl(s) + 3AlCl3(s)
(घ) 2K(s) + F2(g) → 2K+F(s)
(ङ) 4NH3(g) + 5O2(g) → 4NO(g) + 6H2O(g)
उत्तर:
(क)
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चूँकि यहाँ \(\mathrm{Cu}^{2+}\) की आ० सं० की +2 से 0 में कमी और H2 की आ० सं० की 0 से +1 तक वृद्धि हो रहीं, अतः \(\mathrm{Cu}^{2+}\) की Cu(s) में अपचयन तथा H2 का ऑक्सीकरण होता है।
अत: यह अभिक्रिया एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

(ख)
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चूँकि यहाँ \(\mathrm{Fe}^{3+}\) का Fe(s) में अपचयन तथा C2+ का C4+ में ऑक्सीकरण हो रहा है; अत: यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।
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(ग)
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चूँकि इस अभिक्रिया में आ० सं० में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है, अत: यह अपचयोपचय अभिक्रिया नहीं है।

(घ)
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चूँकि यहाँ K(s) का K+ में ऑक्सीकरण और F2(g) का F में अपचयन हो रहा है, अतः यह अभिक्रिया एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

(ङ)
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चूंकि इस अभिक्रिया में O2(g) का O2- में अपचयन और N3- का N+ में ऑक्सीकरण हो रहा है, अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

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प्रश्न 8.4
फ्लुओरीन बर्फ से अभिक्रिया करके यह परिवर्तन लाती है –
H2O(s) + F2(g) → HF(g) + HOF (g)
इस अभिक्रिया का अपचयोपचय औचित्य स्थापित कीजिए –
उत्तर:
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चूँकि फ्लुओरीन, ऑक्सीकरण तथा अपचयन दोनों प्रदर्शित करता है, अतः यह एक अपचयोपचय अभिक्रिया है।

प्रश्न 8.5
H2SO5, \(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) तथा \(\mathrm{NO}^{3-}\) में सल्फर, क्रोमियम तथा नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण संख्या की गणना कीजिए। साथ ही इन यौगिकों की संरचना बताइए तथा इसमें हेत्वाभास (fallacy) का स्पष्टीकरण दीजिए।
उत्तर:
H2SO5 में सल्फर की आ० सं० की गणना:
माना H2SO5 में S की आ० सं० x है।
2(+1) + x + 5(-2) = 0
x – 8 = 0
x = +8
यह ऑक्सीकरण संख्या ठीक नहीं है। चूंकि सल्फर की ऑक्सीकरण संख्या +6 से अधिक नहीं हो सकती। चूंकि H2SO5 में दो ऑक्सीजन परमाणु परॉक्साइड के रूप में होते हैं; अतः इनकी ऑक्सीकरण संख्या -1 होगी।
∴ 2(+1) + x + 3(-2) + 2(-1) = 0
2 + x – 6 – 2 = 0
x = 6

∴ H2SO5 की संरचना निम्नवत् है –
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\(\mathrm{Cr}_{2} \mathrm{O}_{7}^{2-}\) में क्रोमियम की आ० सं० की गणना:
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\(\mathrm{NO}^{3-}\) में नाइट्रोजन की आ० सं० की गणना:
माना \(\mathrm{NO}^{3-}\) में N की आ० सं० x है।
x + 3(-2) = -1
या x = +5
प्राप्त आ० सं० का मान सही है।

अत: \(\mathrm{NO}^{3-}\) की संरचना निम्नवत् है –
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प्रश्न 8.6
निम्नलिखित यौगिकों के सूत्र लिखिए –
(क) मरक्यूरी (II) क्लोराइड
(ख) निकिल (II) सल्फेट
(ग) टिन (IV) ऑक्साइड
(घ) थैलियम (I) सल्फेट
(ङ) आयरन (III) सल्फेट
(च) क्रोमियम (II) ऑक्साइड
उत्तर:
(क) HgCl2
(ख) NiSO4
(ग) SnO2
(घ) TI2SO4
(ङ) Fe2(S4)3
(च) Cr2O3

प्रश्न 8.7
उन पदार्थों की सूची तैयार कीजिए, जिनमें कार्बन -4 से +4 तक की तथा नाइट्रोजन -3 से + 5 तक की ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
उत्तर:
कार्बन की आ० सं० (-4 से +4 तक) वाले यौगिक निम्नवत् हैं –
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नाइट्रोजन की आ० सं० -3 से +3 तक वाले यौगिक निम्नवत् हैं –
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प्रश्न 8.8
अपनी अभिक्रियाओं में सल्फर डाइऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड ऑक्सीकारक तथा अपचायकदोनों ही रूपों में क्रिया करते हैं, जबकि ओजोन तथा नाइट्रिक अम्ल केवल ऑक्सीकारक के रूप में ही क्यों?
उत्तर:
सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) तथा हाइड्रोजन परॉक्साइड (H2O2) में सल्फर तथा ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ क्रमश: +4 तथा -1 हैं। चूँकि इन यौगिकों की रासायनिक अभिक्रियाओं में ऑक्सीकरण में वृद्धि या कमी हो सकती है, अतः ये ऑक्सीकारक तथा अपचायक दो रूपों में कार्य करते हैं।

उदाहरणार्थ –
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ओजोन (O3) में ऑक्सीजन की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है तथा नाइट्रिक अम्ल में नाइट्रोजन की ऑक्सीकरण अवस्था +5 है। चूँकि ये दोनों आ० सं० में कमी तो प्रदर्शित करते हैं, परन्तु वृद्धि नहीं करते, अत: ये केवल ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करते हैं, अपचायक के रूप में नहीं।

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प्रश्न 8.9
इन अभिक्रिया को देखिए –
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2 → H2O(l) + 2O2(g)
बताइए कि इन्हें निम्नलिखित ढंग से लिखना ज्यादा उचित क्यों है?
(क) 6CO2(g) + 12H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6H2O(l) + 6O2(g)
(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + O2(g) + O2(g)
उपरोक्त अपचयोपचय अभिक्रियाओं (क) तथा (ख) के अन्वेषण की विधि सुझाइए।
उत्तर:
(क) 6CO2(g) + 6H2O(l) → C6H12O6(aq) + 6O2(g)
इस समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा सन्तुलित करते हैं –
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ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाएँ लिखने पर,
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ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को सन्तुलित करने पर,
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उपर्युक्त दोनों सन्तुलित अर्द्ध-अभिक्रियाएँ जोड़ने पर,
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यह अभिक्रिया के अन्वेषण की विधि सुझाता है अर्थात् किस प्रकार इलेक्ट्रॉन त्यागे अथवा ग्रहण किया जाते हैं। इसके साथ-साथ अभिक्रिया को उपर्युक्त संशोधित रूप में लिखने का उचित कारण स्पष्ट करता है।

(ख) O3(g) + H2O2(l) → H2O(l) + 2O2(g)
इस समीकरण को आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा सन्तुलित करते हैं –
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सन्तुलित ऑक्सीकरण तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रियाएँ लिखकर उन्हें जोड़ने पर,
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* इस अभिक्रिया में O3 ऑक्सीकारक की भाँति तथा H2O2 अपचायक की भाँति कार्य करते हैं।
* यदि दो समान परमाणुओं के मध्य एक उपसहसंयोजी आबन्ध उपस्थित होता है तो दाता परमाणु +2 ऑक्सीकरण संख्या प्राप्त करता है तथा ग्राही -2 ऑक्सीकरण संख्या प्राप्त करता है। इस प्रकार अभिक्रिया के अन्वेषण की विधि स्पष्ट हो जाती है तथा इसे संशोधित रूप में लिखने का कारण भी स्पष्ट हो जाता है।

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प्रश्न 8.10
AgF2 एक अस्थिर यौगिक है। यदि यह बन जाए तो यह यौगिक एक अतिशक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है? क्यों?
उत्तर:
AgF2 वियोजित होकर Ag+ तथा 2F देता है।
Ag2+ एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके Ag+ में अपचयित हो जाता हैं –
Ag2+ + e → Ag+
Ag+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नवत् है –
1s2, 2s22p6, 3s2 3p6 3d10, 4s2 4p6 4d10
चूंकि यह इलेक्ट्रॉनिक विन्यास d – कक्षकों के पूर्णतया भरे होने के स्थाई है, अत: AgF2 एक अतिशक्तिशाली ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है।

प्रश्न 8.11
“जब भी एक ऑक्सीकारक तथा अपचायक के बीच अभिक्रिया सम्पन्न की जाती है, तब अपचायक के आधिक्य में निम्नतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक तथा ऑक्सीकारक के आधिक्य में उच्चतर ऑक्सीकरण अवस्था का यौगिक बनता है।” इस वक्तव्य का औचित्य तीन उदाहरण देकर दीजिए।
उत्तर:
1. Fe तथा O2 के मध्य अभिक्रिया –
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2. Fe तथा Cl2 के मध्य अभिक्रिया –
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3. NH3 तथा Cl2 के मध्य अभिक्रिया –
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प्रश्न 8.12
इन प्रेक्षणों की अनुकूलता को कैसे समझाएँगे?
(क) यद्यपि क्षारीय पोटेशियम परमैंगनेट तथा अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट दोनों ही ऑक्सीकारक हैं। फिर भी टॉलूईन से बेन्जोइक अम्ल बनाने के लिए हम ऐकोहॉलिक पोटैशियम परमैंगनेट का प्रयोग ऑक्सीकारक के रूप में क्यों करते हैं? इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित अपचयोपचय समीकरण दीजिए।
(ख) क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल डालने पर हमें तीक्ष्ण गन्ध वाली HCl गैस प्राप्त होती है, परन्तु यदि मिश्रण में ब्रोमाइड उपस्थिति हो तो हमें ब्रोमीन की लाल वाष्प प्राप्त होती है, क्यों?
उत्तर:
(क) उदासीन माध्यम में KMnO4 निम्नलिखित प्रकार से ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है –
Mn\(\mathrm{O}^{4-}\) + 2H2O + 3e2- → MnO2 + 4OH
प्रयोगशाला में टॉलूईन को बेन्जोइक अम्ल में ऑक्सीकृत करने के लिए क्षारीय KMnO4 का प्रयोग किया जाता है –
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औद्योगिक निर्माण के दौरान ऐल्कोहॉलिक KMnO4 को प्रयोग करने के निम्नलिखित दो कारण हैं –
1. अभिक्रिया के दौरान क्षार (OH आयन) स्वत: उत्पन्न हो जाता है; अतः क्षार मिलाने का अतिरिक्त व्यय नहीं होता।
2. एक कार्बनिक ध्रुवी विलायक, एथिल ऐल्कोहॉल, दोनों अभिकारकों, KMnO4 (इसकी ध्रुवी प्रकृति के कारण) तथा टॉलूईन (इसके कार्बनिक यौगिक होने के कारण) का मिक्षित करने में सहायता प्रदान करता है।

(ख) एक क्लोराइडयुक्त अकार्बनिक यौगिक; जैसे –
NaCl, जब सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करता है, तब हाइड्रोजन क्लोराइड गैस उत्पन्न होती है।
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ब्रोमाइड (जैसे – NaBr) की H2SO4 से अभिक्रिया पर भी HBr की वाष्प उत्पन्न होती हैं, परन्तु HBr के प्रबल अपचायक होने के कारण, यह सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकृत होकर ब्रोमीन की लाल वाष्प मुक्त करता है।
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प्रश्न 8.13
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में ऑक्सीकृत, अपचयित, ऑक्सीकारक तथा अपचायक पदार्थ पहचानिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 8.14
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में एक ही अपचायक थायोसल्फेट, आयोडीन तथा ब्रोमीन से अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया क्यों करता है?
\(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{3}^{2-}\) (aq) + I2(s) → \(2 \mathrm{S}_{4} \mathrm{O}_{6}^{2-}\) (aq) + 2I (aq)
\(\mathbf{s}_{2} \mathbf{o}_{3}^{2-}\) (aq) + 2Br2(l) + 5H2O(l) → \(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{4}^{2-}\) (aq) + 4Br (aq) + 10H+ (aq)
उत्तर:
चूँकि \(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{3}^{2-}\) में S की ऑक्सीकरण संख्या +2 से \(2 \mathrm{S}_{4} \mathrm{O}_{6}^{2-}\) आयन में S की ऑक्सीकरण संख्या +\(\frac{5}{2}\) में परिवर्तित हो जाती है, अत: आयोडीन थायोसल्फेट आयन को टेट्राथायेनेट आयन में ऑक्सीकृत कर देती है –
चूँकि S की ऑक्सीकरण संख्या +2(\(2 \mathrm{S}_{2} \mathrm{O}_{3}^{2-}\) में) से +6(\(\mathrm{SP}_{4}^{2-}\) आयन में) परिवर्तित हो जाती है, अत: ब्रोमीन (Br2) थायोसल्फेट आयन को सल्फेट आयन में ऑक्सीकृत कर देती है।
अतः ब्रोमीन, आयोडीन की तुलना में प्रबल ऑक्सीकारक है –
(E0Br2/2\(\overrightarrow{\mathrm{Br}}\) = 1.09V तथा E0I2/2I = 0.54V)

प्रश्न 8.15
अभिक्रिया देते हुए सिद्ध कीजिए कि हैलोजनों में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक तथा हाइड्रोहैलिक ‘यौगिकों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है।
उत्तर:
हैलोजेनों की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति प्रबल होती है। अतः ये शक्तिशाली ऑक्सीकारक होते हैं। हैलोजेनों की ऑक्सीकारक क्षमता का आपेक्षिक क्रम निम्नलिखित है –
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हैलोजेनों में फ्लुओरीन श्रेष्ठ ऑक्सीकारक है, इस तथ्य की पुष्टि इस प्रकार हो सकता है कि यह अन्य हैलोजेनों को उनके यौगिकों से मुक्त कर देता है। उदाहरणार्थ –
2KCl + F2 → 2KF + Cl2
2KBr + F2 → 2KF + Br2
2KI + F2 → 2KF + I2
हाइड्रोहैलिक अम्लों में हाइड्रोआयोडिक अम्ल श्रेष्ठ अपचायक है; क्योंकि इसकी आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी न्यूनतम (299kJmol-1) होती है।
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मेथेन का आयोडीनीकरण (iodination) उत्क्रमणीय प्रकृति का होता है; क्योंकि अभिक्रिया में उत्पन्न HI, प्रबलतम अपचायक होने के कारण आयोडो-मेथेन को पुनः मेथेन में परिवर्तित कर देता है।
या CH4 + I2 → CH3I + HI
CH3 + HI → CH4 + I2
CH4 + I2 ⇄ CH2I + HI

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प्रश्न 8.16
निम्नलिखित अभिक्रिया क्यों होती है?
\(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) (aq) + 2F (aq) + 6H+ (aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(l)
यौगिक Na4XeO6 (जिसका एक भाग \(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) है) के बारे में आप इस अभिक्रिया में क्या निष्कर्ष निकाल सकते है।
उत्तर:
\(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) (aq) + 2F (aq) + 6H+ (aq) → XeO3(g) + F2(g) + 3H2O(l)
यह अभिक्रिया F2 के रासायनिक विधियों द्वारा निर्माण की हाल ही में विकसित की गई रासायिकन विधियों की श्रेणी में से एक है। यह प्रचलित विद्युत-रासायनिक विधि नहीं है। इस अभिक्रिया में \(\mathrm{XeO}_{6}^{4-}\) एक प्रबल ऑक्सीकरण के रूप में कार्य करते हुए F को F2 में ऑक्सीकृत कर देता है जो विद्युत-रासायनिक श्रेणी में सर्वाधिक अपचायक क्षमता वाला तत्व है।
F2 के निर्माण की एक अन्य रासायनिक विधि में अन्य प्रबल ऑक्सीकारक K2MnF6 प्रयुक्त होता है –
2K2MDF6 + 4SbF5 → 4KSbF6 + 2MnF3 + F2

प्रश्न 8.17
निम्नलिखित अभिक्रियाओं में –
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उत्तर:
(क) Ag+ आयन Ag में अपचयित हो अवक्षेपित हो जाते हैं।
(ख) Cu2+ आयन Cu में अपचयित हो जाता हैं अवक्षेपित हो जाता है।
(ग) संकर में उपस्थित Ag+ (aq).Ag में अपचयित हो जाते हैं जो अवक्षेपित हो जाता है।
(घ) Cu2+ (aq) आयतन (CH6H5OCHO) द्वारा अपचयित नहीं होते एक दुर्बल अपचायक है।

प्रश्न 8.18
आयन-इलेक्ट्रॉन विधि द्वारा निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रियाओं को सन्तुलित कीजिए –
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उत्तर:
(क) दी हुई अभिक्रिया है –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + I (aq) → MnO2(s) + I2(s)

पद 1.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 2.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में I परमाणु का सन्तुलन करने पर इस प्रकार लिखते हैं –
2I (aq) → I2(s)

पद 3.
O परमाणुओं के सनतुलन करने के लिए अपचयन अभिक्रिया में दाईं ओर 2 जल-अणु जोड़ते हैं –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) → MnO2(s) + 2H2O(l)

H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए बाईं ओर चार H+ आयन जोड़ते हैं –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 4H+ (aq) → MnO2 (s) + 2H2O(l)

चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है, अत: 4H+ के लिए समीकरण के दोनों ओर हम 4OH जोड़ देते हैं।
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 4H+ (aq) + OH (aq) → MnO2 (s) 2H2O(l) + 4H (aq)

H+ तथा OH आयनों के योग को H2O से बदलने पर परिणामी समीकरण इस प्रकार है –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 2H2O(l) + 3e → MnO2 (s) + 4OH (aq)

पद 5.
दोनों अभिक्रियाओं के आवेशों द्वारा संतुलित करते हैं जिसे निम्न प्रकार से दर्शाया गया है –
2I (a) → I2 (s) + 2e
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 2H2O(l) + 3e → MnO2 (s) + 4OH (aq)

अब दोनों इलेक्ट्रॉनों की संख्या को बराबर करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 3 से तथा अपचयन अर्द्ध अभक्रिया को 2 से गुणा करके जोड़ने पर –
6l (aq) + \(\mathrm{2MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 4H2O(l) → 3l2 (s) + 2MnO2 (s) + 8OH (aq) जो कि अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

(ख) दी हुई अभिक्रिया है –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 2SO2 (g) → Mn2+ (aq) + \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq)

पद 1.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 2.
ऑक्सीजन परमाणु के सन्तुलन के लिए अर्द्ध ऑक्सीकरण अभिक्रिया (i) में बाईं ओ 2 जल अणु जोड़ने पर –
SO2 (g) + 2H2O(l) → \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq)

हाइड्रोजन परमाणुओं के सन्तुलन के लिए ऑक्सीकरण अभिक्रिया (ii) में दाईं ओर 3H+ आयन जोड़ने पर
SO2 (g) + 2H2O(l) → \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq) + 3H+ (aq)

पद 3.
ऑक्सीजन परमाणुओं के सन्तुलन के लिए अपचयन अभिक्रिया के दाईं ओर चार जल-अणु जोड़ने पर –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) → Mn2+ (aq) + 4H2O(l)

हाइड्रोजन परमाणुओं के सन्तुलन के लिए अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया के बाईं ओर 8H+ आयन जोड़ने पर –
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 8H+ (aq) → Mn2+ (aq) + 4H2O(l)

पद 4.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेशों का संतुलन इलेक्ट्रॉनों द्वारा करते हैं –
SO2 (g) + 2H2O(l) → \(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq) + 3H+ (aq) + 2e
\(\mathrm{MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 8H+ (aq) + 5e → Mn2+ (aq) + 4H2O(l)

दोनों इलेक्ट्रॉनों की संख्या एकसमान बनाने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 5 से तथा अपचयन अर्द्धअभिक्रिया को 2 से गुणा करके जोड़ने पर –
\(\mathrm{2MnO}_{4}^{-}\) (aq) + 5SO2 (g) + 2H2O (l) + H+ (aq) → 5\(\mathrm{HSO}_{4}^{-}\) (aq) + 2Mn2+ (aq) जो अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

(ग)
पद 1. पहले हम ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
H2O2 (aq) + Fe2+ (aq) → Fe3+ (aq) + H2O (l)

पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में Fe परमाणु का सन्तुलन करने पर हम लिखते हैं –
Fe2+ (aq) → Fe3+ (aq)

पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम समीकरणं को इस प्रकार लिखते हैं –
H2O2 (aq) → 2H2O (l)

H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर दो H+ आयन जोड़ देते हैं –
H2O2 (aq) + 2H+ (aq) → 2H2O (l)

पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन दर्शाई गई विधि द्वारा करते हैं –
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इलेक्ट्रॉन की संख्या को एकसमान बनाने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 2 से गुणा करते हैं –
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पद 6.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम अत्यापन दर्शाता है कि दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

(घ)
पद 1.
पहले हम ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
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पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणओं के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं –
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H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर 4H+ आयन जोड़ देते हैं –
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पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर सात जल अणु जोड़ते हैं तथा Cr परमाणु को भी सन्तुलित करते हैं –
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H परमाणु के सन्तुलन के लिए हम बाईं ओर चौदह H+ आयन जोड़ देते हैं –
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पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन इस प्रकार करते हैं –
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पद 6.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

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प्रश्न 8.19
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के समीकरणों को आयन-इलेक्ट्रॉन तथा ऑक्सीकरण संख्या विधि (क्षारीय माध्यम में) द्वारा सन्तुलित कीजिए तथा इनमें ऑक्सीकरण और अपचायकों की पहचान कीजिए –
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उत्तर:
(क) आयन इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
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पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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P ऑक्सीकारक अपचायक दोनों की भाँति कार्य करता

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में पहले P परमाणुओं को सन्तुलित करके O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम बाई ओर आठ जल अणु जोड़ते हैं।
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इस अभिक्रिया में H परमाणु सन्तुलित करने के लिए आठ H+ आयन दाईं ओर जोड़ते हैं।
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अब चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अत: दोनों ओर OH आयन जोड़ते हैं –
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पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में P परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –
P4 → 4PH3 (g)

H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम उपर्युक्त अभिक्रिया में बाईं ओर बारह H+ आयन जोड़ देते हैं –
P4 (s) + 12H+ (aq) → 4PH3 (g)

क्योंकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अत: 12H+ आयनों के लिए 12OH आयन समीकरण के दोनों ओर जोड़ते –
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H+ तथा OH+ के संयोग से जल अणु बनाने के कारण परिणामी समीकरण निम्नलिखित प्रकार से होगी –
P4 (s) + 12H2O (l) → 4PH3 (g) + 12OH (aq)

पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं –
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पद 6.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण में दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है –
P4 (s) + OH (aq) → PH3 (g) + H2PO2 (aq)

पद 2.
अभिक्रिया में P की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं –
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यह इस बात का सूचक है कि P ऑक्सीकारक तथा अपचायक दोनों रूपों में कार्य करता है।

पद 3.
P की ऑक्सीकरण अवस्था 3 घटती है तथा 1 बढ़ती है। अतः हमें H2PO2 की गुणा 3 से करनी होगी।
P4 (s) + OH (aq) → PH3 (g) + 3H2PO2 (aq)

पद 4.
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा दोनों ओर के आयनों का आवेश एकसमान नहीं है। अत: हम बाई ओर दो OH आयन जोड़ेंगे जिससे आवेश एकसमान हो जाए।
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पद 5.
इस पद में हाइड्रोजन आयनों को सन्तुलित करने के लिए हम तीन जल अणुओं को बाईं ओर जोड़ते हैं –
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(ख) आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
N2H4 (l) + ClO3 (aq) → NO(g) + Cl (g)

पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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(N2H4 अपचायक तथा ClO3 ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करता है।)

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में N – परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –
N2H4(l) → 2NO(g)
अब O परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में बाईं ओर दो जल अणु जोड़ते हैं –
N2H4(l) + 2H2O(l) → 2NO(g)
अब H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण में दाईं ओर 8H+ जोड़ते हैं –
N2H4(l) + 2H2O(l) → 2NO(g) + 8H+(aq)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है; अतः समीकरण के दोनों ओर 8OH आयन जोड़ते हैं –
N2H4(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 8H+ + 8OH(aq)
H+ तथा OH+ आयनों के संयोग पर जल अणु बनने के कारण समीकरण निम्नवत होगी –
N2H4(l) + 8OH(aq) → 2NO(g) + 6H2O(aq)

पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए समीकरण के दाईं ओर तीन जल अणु जोड़ते हैं –
ClO3 (aq) → Cl (g) + 3H2O(l)
H परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिए समीकरण के बाईं ओर छह H+ आयन जोड़ते हैं –
ClO3 (aq) + 6H+ (aq) → Cl (g) + 3H2O(l)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में होती है; अतः समीकरण में दोनों ओर छह OH आयन जोड़ते हैं –
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पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं के आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं –
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इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया को 3 से तथा अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया को 4 से गुणा करते हैं –
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पद 6.
दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि उपर्युक्त समीकरण परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है –
N2H4(l) + ClO3 (aq) → NO(g) + Cl (g)

पद 2.
अभिक्रिया में N तथा Cl की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं –
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स्पष्ट है कि N2H4 अपचायक तथा ClO3 ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं।

पद 3.
ऑक्सीकरण संख्या में होने वाली वृद्धि तथा कमी की गणना करते हैं तथा इन्हें एकसमान बनाते हैं।
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पद 4.
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा अभिक्रिया आवेश की दृष्टि से सन्तुलित है; अतः O तथा H परमाणु के सन्तुलन के लिए अभिक्रिया में दाईं ओर 6 जल अणु जोड़ देने पर पूर्णतया सन्तुलित समीकरण प्राप्त हो जाएगी।
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यह सन्तुलित समीकरण है।

(ग) आयन-इलेक्ट्रॉन विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
पहले ढाँचा समीकरण लिखते हैं –
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पद 2.
दो अर्द्ध-अभिक्रियाएँ इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
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2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
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(H2O2 आपचायक तथा Cl2O7 ऑक्सीकारक की भाँति कार्य करते हैं।)

पद 3.
ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया में H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दो H+ दाईं ओर जोड़ते हैं –
H2O2 (aq) → O2 (g) + 2H+ (aq)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में सम्पन्न होती है; अतः दोनों ओर OH आयन जोड़ने पर –
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H+ तथा OH आयन के संयोग से जल अणु बनने पर परिणामी समीकरण निम्नवत् होगी –
H2O2 (aq) + 20H (aq) → O2 (g) + 2H2O (l)

पद 4.
अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया में सर्वप्रथम Cl परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –
Cl2O7 (g) → 2ClO2 (aq)
O परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम दाईं ओर तीन जल-अणु जोड़ते हैं –
Cl2O7 (g) → 2ClO2 (aq) + 3H2O (l)
H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए हम 6H+ बाईं ओर जोड़ते हैं –
Cl2O7 (g) + 6H+ (aq) → 2ClO2 (aq) + 3H2O (l)
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में सम्पन्न होती है; अत: 6H+ के लिए दोनों ओर 6OH+ जोड़ते हैं –
Cl2O7 (g) + 6H+ (aq) + 6OH (aq) → 2ClO2 (aq) + 3H2O(l) + 6OH (aq)
H+ तथा OH के संयोग से जल अणु बनने पर परिणामी समीकरण निम्नवत् करते हैं –
Cl2O7 (g) + 3H2O (l) → 2ClO2(aq) + 6OH (aq)

पद 5.
इस पद में हम दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेश का सन्तुलन निम्नवत् करते हैं –
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इलेक्ट्रॉनों की संख्या एकसमान करने के लिए ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया की गुणा 4 से करते हैं।
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पद 6.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं को जोड़ने पर –
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अन्तिम सत्यापन दर्शाता है कि समीकरण में दोनों ओर के परमाणुओं की संख्या तथा आवेश की दृष्टि से समीकरण सन्तुलित है।

ऑक्सीकरण संख्या विधि से समीकरण सन्तुलित करना –

पद 1.
अभिक्रिया का ढाँचा इस प्रकार है –
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पद 2.
अभिक्रिया में Cl तथा O की ऑक्सीकरण संख्या लिखते हैं –
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स्पष्ट है कि H2O2 अपचायक तथा Cl2O7 ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करते हैं।

पद 3.
ऑक्सीकरण संख्या में होने वाली कमी तथा वृद्धि की गणना करते हैं तथा उन्हें एकसमान बनाते हैं –
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पद 4.
चूँकि अभिक्रिया क्षारीय माध्यम में हो रही है तथा दोनों ओर के आयनों का आवेश एकसमान नहीं है; अतः हम दो OH आयन बाईं ओर जोड़ देते हैं –
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H परमाणुओं के सन्तुलन के लिए दाईं ओर पाँच जल-अणु जोड़ते हैं।
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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 8 अपचयोपचय अभिक्रियाएँ

प्रश्न 8.20
निम्नलिखित अभिक्रिया से आप कौन-सी सूचनाएँ प्राप्त कर सकते हैं –
(CN)2 (g) + 20H (aq) → CN (aq) + CNO (aq) + H2O
उत्तर:
दी हुई अभिक्रिया से निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं –
(a) अभिक्रिया में क्षारीय माध्यम में सायनोजन (CN2) का वियोजन हो रहा हैं।
(b) (CN)2 तथा CN दोनों प्रकृति में छद्म हैलोजन (pseudo halogen) हैं।
(c) यह एक असमानुपातन अभिक्रिया है। क्योंकि सायनोजन (CN)2 का CNO में ऑक्सीकरण तथा CN में अपचयन होता है।

प्रश्न 8.21
Mn3+ आयन विलयन में अस्थायी होता है तथा असमानुपातन द्वारा Mn2+, MNO2, और H+ आयन देता है। इस अभिक्रिया के लिए सन्तुलित आयनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
असमानुपातन अभिक्रिया का प्रमुख समीकरण हैं –
Mn3+ (aq) → Mn2+ (aq) + MnO2 (s) + H+ (aq)

पद 1.
दो अर्द्ध समीकरण निम्नवत हैं –

1. ऑक्सीकरण अर्द्ध-अभिक्रिया:
Mn3+ → MnO2

2. अपचयन अर्द्ध-अभिक्रिया:
Mn3+ → Mn2+

पद 2.
अर्द्ध-अभिक्रिया (i) में O परमाणुओं को संतुलित करने के लिए बाईं ओर 2 जल अणु जोड़ते हैं –
Mn3+ + 2H2O → MnO2

अर्द्ध समीकरण (ii) में H परमाणुओं को संतुलित करने के लिए 4H+ दाईं ओर जोड़ते हैं –
Mn3+ + 2H2O → MnO2 + 4H+

पद 3.
उपर्युक्त अर्द्ध समीकरणों में आवेशों का इलेक्ट्रॉनों द्वारा संतुलन निम्न प्रकार से करते हैं –
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पद 4.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध समीकरणों को जोड़ने पर
2Mn3+ + 2H2O → MnO2 + Mn2+ + 4H+ जो अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

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प्रश्न 8.22
Cs, Ne, I तथा F में ऐसे तत्व की पहचान कीजिए, जो –
(क) केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
उत्तर:
(क) F केवल ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ख) Cs केवल धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(ग) I ऋणात्मक तथा धनात्मक दोनों ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।
(घ) Ne न ऋणात्मक और न ही धनात्मक ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 8.23
जल के शुद्धिकरण में क्लोरीन को प्रयोग में लाया जाता है। क्लोरीन की अधिकता हानिकारक होती है। सल्फर डाइऑक्ससाइड से अभिक्रिया करके इस अधिकता को दूर किया जाता है। जल में होने वाले इस अपचयोपचय परिवर्तन के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए।
उत्तर:
पद 1.
अभिक्रिया का ढांचा समीकरण निम्नवत् –
Cl2 + SO2 → Cl + \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\)

पद 2.
दो अर्द्ध समीकरण इस प्रकार हैं –
1. ऑक्सीकरण अर्द्ध अभिक्रिया:
SO2 → \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\)

2. अपचयन अर्द्ध अभिक्रिया:
Cl2 → Cl

पद 3.
अर्द्ध अभिक्रिया (i) में O परमाणुओं को संतुलित करने के लिए समीकरण में बाई ओर 2 जल अणु जोड़ते हैं –
SO2 + 2H2O → \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\) + 4H+

पद 4.
अभिक्रिया (ii) की संतुलित अर्द्ध-अभिक्रिया इस प्रकार है –
Cl2 → 2Cl

पद 5.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध-अभिक्रियाओं में आवेशों का संतुलन इस प्रकार करते हैं –
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पद 6.
उपर्युक्त दोनों अर्द्ध अभिक्रियाओं के समीकरणों को जोड़ने पर
Cl2 + SO2 + 2H2O → 2Cl + \(\mathrm{SO}_{4}^{2-}\) + 4H+ जो अभीष्ट संतुलित समीकरण है।

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प्रश्न 8.24
इस पुस्तक में दी गई आवर्त सारणी की सहायता से निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(क) सम्भावित अधातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन की अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
(ख) किन्ही तीन धातुओं के नाम बताइए, जो असमानुपातन अभिक्रिया प्रदर्शित कर सकती हों।
उत्तर:
(क) ऐसा अधातुएँ जो परिवर्ती ऑक्सीकरण संख्याओं में रह सकती हैं, असमानुपातन की अभिक्रिया कर सकती हैं। उदाहरणार्थ: फॉस्फोरस, क्लोरीन तथा सल्फर।
(ख) संक्रमण श्रेणी (d – बलॉक तत्व) से सम्बद्ध धातुएँ असमानुपातन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित कर सकती हैं। उदाहरणार्थमैगनीज, आयरन तथा कॉपर।

प्रश्न 8.25
नाइट्रिक अम्ल निर्माण की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीकरण से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प बनती है। 10.0g अमोनिया तथा 20.00g ऑक्सीजन द्वारा नाइट्रिक ऑक्साइड की कितनी अधिकतम मात्रा प्राप्त हो सकती है?
उत्तर:
नाइट्रिक अम्ल की ओस्टवाल्ड विधि के प्रथम पद में अमोनिया गैस के ऑक्सीजन गैस द्वारा ऑक्सीजन से नाइट्रिक ऑक्साइड गैस तथा जलवाष्प का बनना निम्नलिखित अभिक्रिया के अनुसार है –
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∵ 68g NH2 के लिए आवश्यक ऑक्सीजन = 160g
∴ 10g MH3 के लिए आवश्यक ऑक्सीजन = \(\frac{160}{68}\) × 10
= 23.6g
चूँकि ऑक्सीजन की उपलब्ध मात्रा 20g आवश्यक मात्रा 23.6g से कम है, अत: ऑक्सीजन सीमान्त अभिकर्मक है।
∵ 160g O2 से NO बनी है = 120g
∴ 20g O2 से NO बनेगी = \(\frac{120}{160}\) × 20
= 15g

प्रश्न 8.26
पाठ्य-पुस्तक की सारणी 8.1 में दिए गए मानक विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या इन अभिकारकों के बीच अभिक्रिया सम्भव है?
(क) Fe3+ तथा I (aq)
(ख) Ag+ तथा Cu(s)
(ग) Fe3+ (aq) तथा Br (aq)
(घ) Ag(s) तथा Fe3+ (aq)
(ङ) Br2 (aq) तथा Fe2+
उत्तर:
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प्रश्न 8.27
निम्नलिखित में से प्रत्येक के विद्युत अपघटन से प्राप्त उत्पादों के नाम बताइए –
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन
(ख) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन
(ग) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ H2SO4 का तनु विलयन
(घ) प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के साथ CuCl2 का जलीय विलयन।
उत्तर:
(क) सिल्वर इलेक्ट्रोड के साथ AgNO3 का जलीय विलयन देता है –
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प्रश्न 8.28
निम्नलिखित धातुओं को उनके लवणों के विलयन में से विस्थापन की क्षमता के क्रम में लिखिए –
Al, Cu, Fe Mg तथा Zn
उत्तर:
Mg > AI > Zn > Fe > Cu

प्रश्न 8.29
नीचे दिए गए मानक इलेक्ट्रोड विभवों के आधार पर धातुओं को उनकी बढ़ती अपचायक क्षमता के क्रम में लिखिए –
K+ / K = -2.93 V, Ag+ / Ag = 0.80V,
Hg2+ / Hg = 0 79V,
Mg2+ / Mg = -2.37V, Cr3+ / Cr = -0.74V
उत्तर:
Ag < Hg < Cr < Mg < K

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प्रश्न 8.30
उस गैल्वेनी सेल को चित्रित कीजिए, जिसमें निम्नलिखित अभिक्रिया होती है –
Zn(s) + 2Ag+ (aq) → Zn2+ (aq) + 2Ag(s) अब बताइए कि –
(क) कौन-सा इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है?
(ख) सेल में विद्युत-धारा के वाहक कौन हैं?
(ग) प्रत्येक इलेक्ट्रोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ क्या है?
उत्तर:
Zn(s)|Zn2+(aq)||Ag+ (aq)|Ag(s)
(क) Zn इलेक्ट्रोड ऋण आवेशित है।
(ख) इलेक्ट्रॉन।
(ग)
ऐनोड पर: Zn → Zn2+ + 2e
कैथोड पर: Ag+ + e → Ag

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Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 4 प्राणि जगत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology प्राणि जगत Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
यदि मूलभूत लक्षण ज्ञात न हों तो प्राणियों के वर्गीकरण में आप क्या परेशानियाँ महसूस करेंगे?
उत्तर:
विश्व में लगभग 10 लाख प्रकार के जन्तुओं को पहचाना जा चुका है। इतनी अधिक विविधता वाले जीवों का अलग-अलग अध्ययन किसी के लिए भी सम्भव नहीं है; अतः जीवधारियों को कुछ महत्त्वपूर्ण लक्षणों के आधार पर इस प्रकार वर्गीकृत करते हैं कि एक समूह के मुख्य लक्षण उस समूह के. सभी जीवों में पाए जाते हैं।

इस प्रकार किसी एक जीव का विस्तृत अध्ययन कर लेने से उस समूह के अन्य जीवों का सामान्य ज्ञान हो जाता है। जिन लक्षणों के आधार पर जन्तुओं को वर्गीकृत करते हैं, वे लक्षण उनके मूलभूत लक्षण कहलाते हैं; जैसे – संगठन का स्तर, सममिति, कोशिका संगठन, गुहा की प्रकृति, खण्डीभवन, पाचन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, जनन तन्त्र, पृष्ठ रज्जु आदि।

मूलभूत लक्षणों के ज्ञात न होने पर प्राय: ऐसे जीव जिनका आपस में दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं होता, एक ही समूह में वर्गीकृत हो जाते हैं; जैसे-पंखों के आधार पर कीट, उड़ने वाली छिपकली, पक्षी चमगादड़ को उड़ने वाले जन्तुओं के समूह में वर्गीकृत किया जाता है, लेकिन इनमें परस्पर कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाता।

इसी प्रकार अनेक आर्थोपोडा, मोलस्का जन्तुओं, मछलियों, जलसर्प, व्हेल, हॉल्फिन आदि को जलीय जीवों के अन्तर्गत वर्गीकृत करते हैं, जबकि उनमें परस्पर अनेक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। अतः आधुनिक समय में प्राणियों का वर्गीकरण उनके मूलभूत लक्षणों के आधार पर ही किया जाता है।

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प्रश्न 2.
यदि आपको एक नमूना (स्पेसिमेन) दे दिया जाए तो वर्गीकरण हेतु आप क्या कदम अपनाएँगे?
उत्तर:
किसी नमूने या स्पेसिमेन का वर्गीकरण करने के लिए हम उसके मुख्य लक्षणों का प्रेक्षण करेंगे। इसके पश्चात् उसका वर्गीकरण निम्नलिखित मूलभूत लक्षणों के आधार पर करेंगे–कोशिका व्यवस्था, संगठन का स्तर, शारीरिक सममिति, प्रगुहा की प्रकृति, पाचन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, श्वसन तन्त्र, जनन तन्त्र, पृष्ठ रज्जु आदि।

प्रश्न 3.
देहगुहा एवं प्रगुहा का अध्ययन प्राणियों के वर्गीकरण में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर:
देहगुहा प्रगुहा (Body Cavity or Coelome):
शरीर भित्ति तथा आहारनाल के मध्य तरल से भरी गुहा को देहगुहा या प्रगुहा (coelome) कहते हैं। यह भी भ्रूणीय परिवर्धन के समय मीसोडर्म (mesoderm) से बनती है। देहगुहा (सीलोम) शरीर को लचीलापन प्रदान करती है और इसमें स्थित अंगों को बाह्य आघातों से बचाती है।

इससे युक्त प्राणियों को प्रगुही (coelomate) कहते हैं, और जिनमें इसका अभाव होता है उन्हें अगुहीय कहते हैं। देहगुहा (सीलोम) की प्रकृति के आधार पर जन्तुओं को निम्नलिखित तीन समूहों में बाँटा जा सकता है –
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चित्र – (क) प्रगुहीय, (ख) कूटगुहिक, (ग) अगुहीय की अनुप्रस्थ काट का रेखाचित्र

1. अगुहीय या एसीलोमेट (Acoelomate):
पोरोफेरा, सीलेन्ट्रेटा तथा प्लेटीहेल्मिन्थीज (platyhelminthes) में देहगुहा का अभाव होता है। इन जन्तुओं को अगुहीय या एसीलोमेट कहते हैं। स्पंज की गुहा को स्पंजगुहा, सीलेन्ट्रेटा जन्तुओं की गुहा को सीलेन्ट्रॉन कहते हैं। प्लेटीहेल्मिन्थीज कृमियों में देहभित्ति तथा आहारनाल के मध्य मृदूतकीय स्पंजी ऊतक भरा होता है।

2. कूटगुहिक या स्यूडोसीलोमेट (Pseudocoe lomate):
कुछ जन्तुओं में देहभित्ति तथा आहारनाल के मध्य कूटगुहा या स्यूडोसील (pseudocoel) होती है, जो भ्रूण की ब्लास्टोसील (blastocoel) से विकसित होती है। इस पर मीसोडर्म का स्तर नहीं होता; जैसे-ऐस्केल्मिन्थीज (aschelminthes) कृमियों में।

3. प्रगुहीय या सीलोमेट (Coelomate):
जिन जन्तुओं में वास्तविक देहगुहा (सीलोम) होती है उन्हें प्रगुहीय (सीलोमेट) कहते हैं। यह मीसोडर्म से आच्छादित होती है; जैसे-ऐनेलिडा, मोलस्का, आर्थोपोडा इकाइनोडर्मेटा तथा हेमीकॉर्डेटा तथा कॉडेंटा जन्तुओं में।

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प्रश्न 4.
अन्तःकोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में विभेद कीजिए।
उत्तर:
अन्तःकोशिकीय एवं बाह्य कोशिकीय पाचन में अन्तर (Difference between Intracellular and Extracellular Digestion)
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प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष परिवर्धन में अन्तर (Difference between Direct and Indirect Development)
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प्रश्न 6.
परजीवी प्लेटीहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण बताइए।
उत्तर:
परजीवी प्लेटीहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण (Peculiar Characters of Parasitic Platyhelminthes)
परजीवी प्लेटीहेल्मिन्थीज के विशेष लक्षण निम्नवत् हैं –

  1. शारीरिक संगठन ऊतक-अंग स्तर का होता है।
  2. शरीर त्रिस्तरीय (triploblastic), द्विपार्श्वसममित, अगुहिकीय (acoelomate) होता है। देहभित्ति या आहारनाल के मध्य मृदूतकीय स्पंजी ऊतक भरा होता है।
  3. शरीर पृष्ठधारी रूप से चपटा होता है। यह खण्डयुक्त या पत्ती सदृश होता है।
  4. इनमें आसंजक अंग (adhesive organs) चूषक, हुक आदि पाए जाते हैं।
  5. आहार-नाल अपूर्ण या अनुपस्थित होती है। ये पोषक से पोषक पदार्थों का अवशोषण करते हैं।
  6. ज्वाला कोशिकाएँ (flame cells) उत्सर्जी संरचनाएँ होती हैं। ये जल सन्तुलन में सहायक होती हैं।
  7. कंकाल, श्वसन और परिसंचारी तन्त्र का अभाव होता
  8. जनन तन्त्र जटिल होता है। अधिकतर द्विलिंगी होते हैं। इनमें उच्च जनन दर पाई जाती है।
  9. निषेचन (fertilization) आन्तरिक होता है।

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चित्र – प्लेटीहेल्मिन्थीज के उदाहरण – (अ) फीताकृमि (टीनिया) – (ब) यकृतकृमि (फैसियोला)

10. परिवर्धन (development) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष। जीवन-चक्र जटिल तथा दो या अधिक चक्रों में पूर्ण होता है।

उदाहरण:
फीताकृमि (Taenia solium), यकृतकृमि (Fasciola hepatica)

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प्रश्न 7.
आर्थोपोडा प्राणी समूह का सबसे बड़ा वर्ग है, इस कथन के प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
संघ आर्थोपोडा (Phylum-Arthropoda):
यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है। 2/3 जन्तु प्रजातियाँ संघ आर्थोपोडा में आती है। इसके सदस्य सभी प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं; जैसे – स्थल, जल, वायु, मृदा के नीचे वृक्षों पर आदि। अन्य प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

  1. इनका शरीर त्रिस्तरीय, द्विपार्श्व सममित, प्रगुहीय, समखण्डों में विभक्त होता है।
  2. शरीर का संगठन अंग तंत्र स्तर का होता है।
  3. शरीर पर बाह्य कंकाल पाया जाता है।
  4. शरीर पर विविध कार्यों के लिए रूपान्तरित सन्धियुक्त उपांग पाए जाते हैं।
  5. देहगुहा को हीमोसिल (haemocoel) तथा इसमें पाए जाने वाले तरल को हीमोलिम्फ (hemolymph) कहते हैं। यह रक्त तथा लसीका दोनों का कार्य करता है।
  6. रक्त परिसंचरण तन्त्र खुले प्रकार (open type) का होता है।
  7. श्वसन अंग क्लोम, बुक-लंग्स (Book-lungs), ट्रेकिया (trachea) होते हैं।
  8. उत्सर्जन मैल्पीघी नलिकाओं (Malpighian tubules), ग्रीन ग्रन्थियों (green) द्वारा होता है।
  9. संयुक्त नेत्र (compound eyes) पाए जाते हैं।
  10. जन्तु एकलिंगी, अण्डज (oviparous) होते हैं। परिवर्धन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष होता है।

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चित्र – आर्थोपोडा के उदाहरण – (A) टिड्डा, (B) तितली, (C) बिच्छू, (D) झींगा

उदाहरण:
बिच्छु (पैलेम्निअस – Palamnaeus), झींगा मछली (पैलीमोन – Palaemon), टिड्डा (सिसटोसिर्का| Schistocerca), तितली (butterfly) आदि।

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प्रश्न 8.
जल संवहन तन्त्र किस वर्ग का मुख्य लक्षण है?
(अ) पोरीफेरा
(ब) टीनोफोरा
(स) इकाइनोडर्मेटा
(द) कॉर्डेटा।
उत्तर:
(स) इकाइनोडर्मेटा (Echinodermata)।

प्रश्न 9.
सभी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स) रज्जुकी (कॉर्डेट्स) हैं, लेकिन सभी रज्जुकी कशेरुकी नहीं है। इस कथन को सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
सभी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स) रज्जुकी (कॉडेंट्स) है; क्योंकि इनमें रज्जुकी या कॉडेंट्स के समान निम्नलिखित तीन मुख्य लक्षण पाए जाते हैं –

  1. सभी रज्जुकी या कॉडेंट्स जन्तुओं के जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में छड़नुमा, लचीला नोटोकार्ड (notochord) पाई जाती है।
  2. सभी रज्जु की कार्डेट्स में शरीर की मध्य पृष्ठ रेखा पर पृष्ठीय नाल तन्त्रिका रज्जु स्थिर होता है, यह नोटोकार्ड के ऊपर स्थित होती है।
  3. जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में ग्रसनीय क्लोम दरारें (pharyngeal gill cleft) पाई जाती हैं।

सभी रज्जुकी कशेरुकी (वर्टीब्रेट्स-vertebrates) नहीं होते; क्योंकि –
वर्टीब्रेट्स में कशेरुकदण्ड (vertebral column) पूर्ण विकसित होता है, जबकि प्रोटोकॉर्डेटा (protochordata) तथा एग्नैथा (agnatha) प्राणियों में कशेरुकदण्ड अनुपस्थित या अविकसित होता है। कशेरुकदण्ड का निर्माण नोटोकार्ड से होता है।

प्रश्न 10.
मछलियों में वायु आशय-एयर ब्लैडर की उपस्थिति का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अस्थिल मछलियों में वायु आशय पाया जाता है। वायु आशय के कारण मछलियों का सन्तुलन बना रहता है, और इनको निरन्तर तैरना नहीं पड़ता। वायु आशय के अभाव में मछलियों को निरन्तर तैरते रहना होता है, जिससे वे डूबने से बची रहती है। कुछ मछलियों में वायु आशय श्वसन में भी सहायता करती है।

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प्रश्न 11.
पक्षियों में उड़ने हेतु क्या-क्या रूपान्तरण हैं?
उत्तर:
पक्षियों में उड़ने के लिए रूपान्तरण (Modifications in Birds that help in Flying):

  1. पक्षियों का शरीर धारारेखित, सिर छोटा, गर्दन लचीली होती है।
  2. पक्षियों के अग्रपाद पंखों में रूपान्तरित हो जाते हैं। पंख परयुक्त (feathered) होते हैं। पंख उड़ने में सहायक होते हैं। पक्षी उड्डयन पेशियों (flight muscles) की क्रियाशीलता के कारण उड़ते हैं।
  3. पूँछ उड़ते समय दिशा-परिवर्तन में सहायक होती है।
  4. शरीर पर परों (feathers) से बना बाह्य कंकाल होता है। यह शरीर ताप नियमन में सहायक होता है।
  5. पक्षियों के नेत्र बड़े तथा पार्श्व में स्थित होते हैं।
  6. पक्षियों की अस्थियाँ खोखली तथा मजबूत होती हैं।
  7. स्टर्नम नौकाकार होता है, उड़ने में सहायक होता है।
  8. पक्षियों के फेफड़ों से वायुकोश जुड़े रहते हैं। ये श्वसन में सहायता करने के अतिरिक्त शरीर को हल्का रखकर उड़ने में सहायता करते हैं।
  9. पश्चपाद पर शल्क पाए जाते हैं। पश्चपाद की नखरयुक्त अंगुलियाँ वृक्षीय जीवन के अनुकूल होती हैं।
  10. हृदय चार वेश्मी होता है। शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त पृथक् रहते हैं।
  11. मुख पर चोंच होती है। चोंच में दाँत नहीं होते।
  12. ये उत्सर्जी पदार्थ यूरिक अम्ल को ठोस के रूप में मल के साथ त्याग देते हैं।
  13. ये एकलिंगी (unisexual) तथा अण्डज (oviparous) होते हैं।
  14. पक्षी अण्डों को सेते हैं।
  15. शुतुरमुर्ग (स्टुथियो), कैसोवरी (Cassowary), ईमू (Emu), रीआ (Rhea), कीवी (Apteryx) आदि न उड़ने वाले पक्षी हैं।

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चित्र – कुछ पक्षी – (A) चील, (B) शतुरमुर्ग, (C) तोता, (D) मोर

प्रश्न 12.
अण्डजनक तथा जरायुज द्वारा उत्पन्न अण्डे या बच्चे संख्या में बराबर होते हैं? यदि हाँ तो क्यों? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर:
अण्डजनक (oviparous) प्राय: अधिक संख्या में अण्डे देते हैं; क्योंकि अण्डे परभक्षी जन्तुओं द्वारा आहार के रूप में खा लिए जाते हैं अथवा विपरीत परिस्थितियों में अण्डे नष्ट हो जाते हैं। जरायुज (viviparous) पूर्ण विकसित शिशुओं को जन्म देते हैं। इनके जीवित रहने की सम्भावनाएँ अधिक होती है। इस कारण जरायुज प्राणी कम संख्या में सन्तान उत्पन्न करते हैं।

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प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से शारीरिक खण्डीभवन किसमें पहले देखा गया?
(अ) प्लेटीहेल्मिन्थीज
(ब) ऐस्केल्मिन्थीज
(स) ऐनेलिडा
(द) आर्थोपोडा।
उत्तर:
(स) ऐनेलिडा (Annelida)

प्रश्न 14.
निम्नलिखित का मिलान कीजिए –
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उत्तर:

  1. (घ) ऑस्टिक्थीज
  2. (क) ऐनेलिडा
  3. (द) रेप्टीलिया
  4. (अ) टीनोफेरा
  5. (ब) मोलस्का
  6. (ग) मैमेलिया
  7. (स) पोरीफेरा
  8. (ख) साइक्लोस्टोमेटा एवं कॉन्ड्रिक्थीज।

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प्रश्न 15.
मनुष्यों पर पाए जाने वाले कुछ परजीवियों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मनुष्यों के शरीर में पाए जाने वाले परजीवी (Parasites of Human body):
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Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 2 जीव जगत का वर्गीकरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology जीव जगत का वर्गीकरण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वर्गीकरण की पद्धतियों में समय के साथ आए परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जीवों के वर्गीकरण की पद्धतियाँ (Systems of Classification of livings):
अरस्तू ने जीवधारियों को दो समूहों-जन्तुओं एवं वनस्पतियों में विभाजित किया। लीनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Naturae) नामक पुस्तक में द्विजगत पद्धति प्रस्तुत की। जन्तु जगत में एककोशिकीय प्रोटोजोआ एवं बहुकोशिकीय जन्तुओं को तथा पादप जगत में हरे पौधे, मॉस, समुद्री घास-पात, मशरूम, लाइकेन; कवक, जीवाणु आदि को रखा गया है। द्विजगत पद्धति में प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिका वाले जीवों को एक साथ रखा गया है।

इस वर्गीकरण में हरे पादपों एवं कवकों को, एककोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीवों को तथा प्रकाश संश्लेषी एवं अप्रकाश संश्लेषी जीवों को एक साथ रखा गया है। युग्लीना, क्लैमाइडोमोनास, माइकोप्लाज्मा आदि को कुछ वैज्ञानिक जन्तु जगत में और कुछ पादप जगत में वर्गीकृत करते हैं। इसलिए जीव-वैज्ञानिक हीकल (Haeckal 1886) ने तीसरे जगत प्रोटिस्टा (protista) का प्रस्ताव रखा। इसमें जीवाणुओं, कवक, शैवाल तथा प्रोटोजोआ को सम्मिलित किया गया।

आर० एच० हीटेकर ने दो और तीन जगत वाले वर्गीकरण की कमियों को दूर करने के लिए पाँच जगत वाली प्रणाली का प्रस्ताव किया। जीवधारियों को पाँच जगत –

  1. मोनेरा
  2. प्रोटिस्टा
  3. प्लान्टी
  4. फंजाई
  5. एनिमेलिया में वर्गीकृत किया। यह वर्गीकरण कोशिका के प्रकार, कोशिकीय या शारीरिक संगठन, कोशिका भित्ति, पोषण, प्रचलन, पारिस्थितिक भूमिका, जनन एवं जातिवृत्तीय सम्बन्धों पर आधारित है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित के बारे में आर्थिक दृष्टि से दो महत्त्वपूर्ण उपयोगों को लिखिए –
(क) परपोषी बैक्टीरिया
(ख) आद्य बैक्टीरिया।
उत्तर:
(क) परपोषी बैक्टीरिया (Heterotrophic Bacteria):
ये प्रकृति में बहुतायत में पाए जाते हैं। इनमें से अधिकतर अपघटक (decomposers) होते हैं। ये मृतजीवी होते हैं। ये पौधों और जन्तुओं के मृत शरीर पर आक्रमण करके उनके जटिल यौगिकों को सरल पदार्थों में बदल देते हैं। इसके फलस्वरूप खनिज तत्वों का पुन: चक्रीकरण होता रहता है।

अनेक परजीवी बैक्टीरिया मृदा की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को नाइट्रोजन यौगिकों में बदलकर भूमि की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होते हैं। जीवाणु दूध को दही में बदलने में, चाय तथा तम्बाकू की पत्तियों के किण्वन द्वारा स्वाद और सुगन्ध को बढ़ाने में; जूट, पटसन, सन आदि से रेशे प्राप्त करने; चमड़ा तैयार करने में प्रतिजैविक औषधियाँ तैयार करने आदि क्रियाओं में सहायक होते हैं।

अनेक परपोषी बैक्टीरिया रोगजनक होते हैं। ये परजीवी होते हैं। इनसे मनुष्य में तपेदिक, निमोनिया, टाइफॉइड, हैजा, पेचिश, कुष्ठरोग, सिफलिस आदि रोग हो जाते हैं। अनेक मृतजीवी हानिकारक जीवाणु खाद्य पदार्थों को नष्ट करते हैं। संक्रमित खाद्य पदार्थों के उपयोग से खाद्य विषाक्तता (food poisoning) हो जाती है।

(ख) आद्य बैक्टीरिया (Archaebacteria):
ये विशिष्ट प्रकार के बैक्टीरिया होते हैं। ये अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहते हैं; जैसे-अत्यन्त लवणीय क्षेत्र (हैलोफी), गर्म जल स्रोतों (थर्मोएसिडोफिलस) एवं कच्छ क्षेत्र (मेथेनोजन) आदि में। मेथेनोजन अनेक जुगाली करने वाले पशुओं (रूमिनेट) की आंत्र में पाए जाते हैं। ये गोबर से मेथेन (methane) का उत्पादन करते हैं। मेथेन को बायोगैस कहते हैं।

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प्रश्न 3.
डायटम की कोशिका भित्ति के क्या लक्षण हैं?
उत्तर:
डायटम की कोशिका भित्ति दो अविछादित कवच बनाती है। कोशिका भित्ति में सिलिका पाया जाता है। मृतडायटम के अवशेष डायटमी मृदा बनाते हैं।

प्रश्न 4.
‘शैवाल पुष्पन’ (Algal Bloom) तथा ‘लाल तरंगे’ (red-tides) क्या दर्शाती हैं?
उत्तर:
शैवाल पुष्पन:
जलाशयों में पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा के कारण शैवालों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि को शैवाल पुष्पन कहते हैं। यह जलाशय के अन्य छोटे जन्तुओं के लिए हानिकारक होता है क्योंकि रात्रि में ऑक्सीजन की कमी होने से जन्तुओं की मृत्यु हो जाती है।

लाल तरंगे:
अधिकतर लाल डायनोफ्लैजिलेट में तेजी से जनन के कारण संख्या में वृद्धि होती है, जिससे समुद्र का जल लाल दिखाई देने लगता है। इसे लाल तरंग कहते हैं।

प्रश्न 5.
वाइरस से विरोइड कैसे भिन्न होते हैं?
उत्तर:
वाइरस तथा विरोइड में अन्तर (Difference between Virus and Viroid):
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प्रश्न 6.
प्रोटोजोआ के चार प्रमुख समूहों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रोटोजोआ जन्तु (Protozoans):
ये जगत प्रोटिस्टा (protista) के अन्तर्गत आने वाले यूकैरियोटिक, सूक्ष्मदर्शीय, परपोषी सरलतम जन्तु हैं। ये एककोशिकीय होते हैं। कोशिका में समस्त जैविक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। ये परपोषी होते हैं। कुछ प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं। इन्हें चार प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है –
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चित्र-अमीबा

(क) अमीबीय प्रोटोजोआ (Amoebic Protozoa):
ये स्वच्छ जलीय या समुद्री होते हैं। कुछ नम मृदा में भी पाए जाते हैं। समुद्री प्रकार के अमीबीय प्रोटोजोआ की सतह पर सिलिका का कवच होता है। ये कूटपाद (pseudopodia) की सहायता से प्रचलन तथा पोषण करते हैं। एण्टअमीबा जैसे कुछ अमीबीय प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं। मनुष्य में एण्टअमीबा हिस्टोलाइटिका के कारण अमीबीय पेचिश रोग होता है।

(ख) कशाभी प्रोटोजोआ (Flagellate Protozoa):
इस समूह के सदस्य स्वतन्त्र अथवा परजीवी होते हैं। इनके शरीर पर रक्षात्मक आवरण पेलिकल होता है। प्रचलन तथा पोषण में कशाभ (flagella) सहायक होता है। ट्रिपैनोसोमा (Trypanosoma) परजीवी से निद्रा रोग, लीशमानिया से कालाअजार रोग होता है।

(ग) पक्ष्माभी प्रोटोजोआ (Ciliate Protozoa):
इस समूह के सदस्य जलीय होते हैं एवं इनमें अत्यधिक पक्ष्माभ (cilia) पाए जाते हैं। शरीर दृढ़ पेलिकल से घिरा होता है। इनमें स्थायी कोशिकामुख (cytostome) व कोशिकागुद (cytopyge) पाई जाती हैं। पक्ष्माभों में लयबद्ध गति के कारण भोजन कोशिकामुख में पहुँचता है। उदाहरण-पैरामीशियम (Paramecium)।
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चित्र-पैरामीशियम

(घ) स्पोरोजोआ प्रोटोजोआ (Sporozoans):
ये अन्त:परजीवी होते हैं। इनमें प्रचलनांग का अभाव होता है। कोशिका पर पेलिकल का आवरण होता है। इनके जीवन चक्र में संक्रमण करने योग्य बीजाणुओं का निर्माण होता है। मलेरिया परजीवी-प्लाज्मोडियम (Plasmodium) के कारण कुछ दशक पूर्व होने वाले मलेरिया रोग से मानव आबादी पर कुप्रभाव पड़ता था।

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प्रश्न 7.
पादप स्वपोषी हैं। क्या आप ऐसे कुछ पादपों को बता सकते हैं, जो आंशिक रूप से परपोषित हैं?
उत्तर:
पादप स्वपोषी यूकैरियोटिक होते हैं। इनमें पर्णहरित पाया जाता है। सौर प्रकाश तथा पर्णहरित की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा ये अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। कुछ पौधे परपोषी होते हैं। ये परजीवी, मृतजीवी, सहजीवी या कीटभक्षी होते हैं।

परजीवी पौधे (Parasitic plants):
ये पूर्ण आंशिक परजीवी होते हैं। अमरबेल (Cuscuta); रैफ्लीसिया (Rafflesia), गँठवा (Orabanche) पूर्ण परजीवी होते हैं। विस्कम (Viscum), चन्दन (Santalum) अपूर्ण परजीवी होते हैं। स्प्लेक्नम (Splachnum), निओशिया (Neotia) मृतपोषी होते हैं। लाइकेन, मटरकुल के पौधों की जड़ों पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु, सहजीवी (symbiont) पादप के उदाहरण हैं। कीटभक्षी पौधे; जैसे-नेपेन्थीस (Nepenthes), ड्रोसेरा (Drosera), यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) आदि नाइट्रोजन की पूर्ति हेतु कीटों का भक्षण करते हैं।

प्रश्न 8.
शैवालांश तथा कवकांश शब्दों से क्या पता लगता है?
उत्तर:
लाइकेन सहजीवी पादप होते हैं, जो शैवाल तथा कवक के परस्पर सहयोग से बनते हैं। शैवलांश लाइकेन में शैवाल घटक है। यह लाइकेन का स्वपोषी भाग है जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करता है। कवकांश लाइकेन में कवक घटक है। यह परपोषी भाग है जो शैवाल को सुरक्षा प्रदान करता है और खनिज लवण तथा जल का अवशोषण करता है।

प्रश्न 9.
कवक (फंजाई) जगत के वर्गों का तुलनात्मक विवरण निम्नलिखित बिन्दुओं पर करो –
(क) पोषण की विधि
(ख) जनन की विधि।
उत्तर:
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प्रश्न 10.
यूग्लीनॉइड के विशिष्ट चारित्रिक लक्षण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
यूग्लीनॉइड के चारित्रिक लक्षण (Characteristic Features of Euglenoids)

  1. अधिकांश स्वच्छ, स्थिर जल (stagnant fresh water) में पाए जाते हैं।
  2. इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है।
  3. कोशिका भित्ति के स्थान पर रक्षात्मक प्रोटीनयुक्त लचीला आवरण पेलिकल (pellicle) पाया जाता है।
  4. इनमें 2 कशाभ (flagella) होते हैं, एक छोटा तथा दूसरा बड़ा कशाभा।
  5. इनमें क्लोरोप्लास्ट पाया जाता है।
  6. सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ये प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा भोजन निर्माण कर लेते हैं और प्रकाश के अभाव में जन्तुओं की भाँति सूक्ष्मजीवों का भक्षण करते हैं अर्थात् परपोषी की तरह व्यवहार करते हैं। उदाहरण-यूग्लीना (Euglena)।

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प्रश्न 11.
संरचना तथा आनुवंशिक पदार्थ की प्रकृति के संदर्भ में वाइरस का संक्षिप्त विवरण दो। वाइरस से होने वाले चार रोगों के नाम भी लिखें।
उत्तर:
वाइरस (Virus):
ये अकोशिकीय सजीव संरचनाएँ हैं। ये जीवित कोशिका को संक्रमित करके पोषद् कोशिका की उपापचय क्रियाओं को नियन्त्रित करके अपनी प्रतिकृति बनाते हैं, अर्थात् जनन करते हैं। वाइरस न्यूक्लियोप्रोटीन्स से बने होते हैं। इनमें DNA या RNA आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है। न्यूक्लिक अम्ल (DNA या RNA) चारों ओर से प्रोटीन के आवरण से घिरा रहता है। किसी भी वाइरस में DNA तथा RNA दोनों नहीं पाए जाते।
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चित्र – टोबैको मोजेोक वाइरस
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चित्र – जीवाणुभेजी

सभी पादप वाइरस में एकरज्जुकी (single stranded) RNA होता है। सभी जन्तु वाइरस में एक अथवा दो रज्जुकी RNA अथवा DNA होता है। जीवाणुभोजी या जीवाणु वाइरस में द्विरज्जुकी (double stranded) DNA अणु होता है। वाइरस में पाए जाने वाला DNA या RNA आनुवंशिक होता है।

वाइरस से होने वाले रोग (Disease caused by Virus):
मनुष्य में एड्स, हिपैटाइटिस, चेचक, मम्प्स (mumps), हपीज, इन्फ्लु एन्जा (influenza) नामक रोग वाइरस के कारण होते हैं। पौधों में मोजैक रोग, अवरूद्ध वृद्धि, पत्तियों का मुड़ना तथा कुंचन आदि वाइरस के कारण होने वाले रोग हैं।

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प्रश्न 12.
अपनी कक्षा में इस शीर्षक “क्या वाइरस सजीव है अथवा निर्जीव”, पर चर्चा करें।
उत्तर:
वाइरस (Virus):
इनकी खोज सर्वप्रथम इवानोवस्की (Iwanovsky, 1892), ने की थी। ये प्रूफ फिल्टर से भी छन जाते हैं। एम० डब्ल्यू. बीजेरिन्क (M.W. Beijerinck, 1898) ने पाया कि संक्रमित (रोगग्रस्त) पौधे के रस को स्वस्थ पौधों की पत्तियों पर रगड़ने से स्वस्थ पौधे भी रोगग्रस्त हो जाते हैं। इसी आधार पर इन्हें तरल विष या संक्रामक जीवित तरल कहा गया। डब्ल्यू० एम० स्टैनले (W. M. Stanley, 1935) ने वाइरस को क्रिस्टलीय अवस्था में अलग किया। डार्लिंगटन (Darlington, 1944) ने खोज की कि वाइरस न्यूक्लियोप्रोटीन्स से बने होते हैं।

वाइरस को सजीव तथा निर्जीव के मध्य की कड़ी (connecting link) मानते हैं।

वाइरस के सजीव लक्षण (Living Characters of Virus):

  1. वाइरस प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल (DNA या RNA) से बने होते हैं।
  2. जीवित कोशिका के सम्पर्क में आने पर सक्रिय हो जाते हैं। वाइरस का न्यूक्लिक अम्ल पोषक कोशिका में पहुंचकर कोशिका की उपापचयी क्रियाओं पर नियन्त्रण स्थापित करके स्वद्धिगुणन करने लगता है और अपने लिए आवश्यक प्रोटीन का संश्लेषण भी कर लेता है।
  3. इसके फलस्वरूप विषाणु की संख्या की वृद्धि अर्थात् जनन होता है।
  4. वाइरस में प्रवर्धन केवल जीवित कोशिकाओं में ही होता है।
  5. इनमें उत्परिवर्तन (mutation) के कारण आनुवंशिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
  6. वाइरस ताप, रासायनिक पदार्थ, विकिरण तथा अन्य उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया दर्शाते हैं।

वाइरस के निर्जीव लक्षण (Non-living Characters of Virus):

  1. इनमें एन्जाइम्स के अभाव में कोई उपापचयी क्रिया स्वतन्त्र रूप से नहीं होती।
  2. वाइरस केवल जीवित कोशिकाओं में पहुँचकर ही सक्रिय होते हैं। जीवित कोशिका के बाहर ये निर्जीव रहते हैं।
  3. वाइरस में कोशा अंगक तथा दोनों प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल (DNA और RNA) नहीं पाए जाते।
  4. वाइरस को रवों (crystals) के रूप में निर्जीवों की भाँति सुरक्षित रखा जा सकता है। रवे (crystal) की अवस्था में भी इनकी संक्रमण शक्ति कम नहीं होती।

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प्रश्न 1.
जीवों को वर्गीकृत क्यों करते हैं?
उत्तर:
विश्व में कई मिलियन पौधे तथा प्राणी हैं, जो आकृति, आकार तथा रंग आदि में भिन्न होते हैं। अब तक लगभग 1.7-1.8 मिलियन स्पीशीज ज्ञात हो सकी हैं। इसे हम जैविक विविधता (biological diversity) कहते हैं। विविधता का लैटिन भाषा में तात्पर्य प्रकार (variety) से है। अभी भी ऐसे अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पर पाए जाने वाले प्राणी तथा पौधे अज्ञात हैं।

जैसे-जैसे हम नए और पुराने क्षेत्रों में खोज करते हैं, नए-नए जीवों का पता लगता रहता है। जैविक विविधता जैव विकास (evolution) तथा अनुकूलनता का प्रमाण है। विश्व में पाए जाने वाले सभी जीवों का अध्ययन करना असम्भव है, इसीलिए वर्गीकरण की आवश्यकता पड़ती है। वर्गीकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें दृश्य गुणों के आधार पर _सुविधाजनक वर्ग में जीवधारियों को वर्गीकृत किया जाता है।

वर्गीकरण के मानक समय और आवश्यकता के अनुरूप बदलते रहे हैं। वर्गीकरण के कारण ही एक वर्ग के किसी एक जीव का अध्ययन कर लेने से उस वर्ग के अन्य सभी जीवों के सामान्य लक्षणों का ज्ञान हो जाता है। वर्गीकरण से विकास क्रम का ज्ञान होता है। वर्गीकरण से ही ज्ञात होता है कि पहले जलीय जीवों का उद्भव हुआ और उनसे बाद में उभयचर तथा उनसे स्थलीय जीवों का विकास हुआ है। वर्गीकरण के फलस्वरूप जीवधारियों के विकासीय सम्बन्धों का ज्ञान होता है।

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प्रश्न 2.
वर्गीकरण प्रणाली को बार-बार क्यों बदलते हैं?
उत्तर:
आदिकाल से ही मानव जीवों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयत्न करता रहा है। आदिकाल में मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं; जैसे-भोजन, वस्त्र, आश्रय के आधार पर जीवों को वर्गीकृत करता था। मनुष्य ने जन्तुओं को घातक-अघातक, भक्ष्य-अभक्ष्य, लाभदायक-हानिकारक आदि अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया। आयुर्वेद आचार्य चरक ने लगभग 200 प्रकार के जन्तुओं और 340 प्रकार के पौधों का उल्लेख उनके महत्त्व के आधार पर किया। अरस्तू ने पौधों को शाक (herb), झाड़ी (shrub) तथा वृक्ष (tree) में वर्गीकृत किया।

प्रारम्भ में जीवधारियों का कृत्रिम वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया; जैसे –

1. आकार व आकृति के आधार पर पौधों को शाक, झाड़ी तथा वृक्ष में वर्गीकृत किया गया।

2. जीवन-अवधि के आधार पर पौधों को एकवर्षी, द्विवर्षी तथा बहुवर्षी में वर्गीकृत किया गया।

3. आवास के आधार पर जीवों को जलीय, स्थलीय, वायवीय में वर्गीकृत किया गया। उपर्युक्त कृत्रिम वर्गीकरण से कोई स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती और न ही किसी वर्ग के सदस्यों के बीच प्राकृतिक सम्बन्धों का ज्ञान होता है; जैसे-कीट, पक्षी और चमगादड़ को पंखों के आधार पर उड़ने वाले प्राणियों के समूह में वर्गीकृत कर दिया गया, लेकिन इनमें परस्पर सम्बन्ध प्रदर्शित नहीं होता।

इसके पश्चात् जीवों का वर्गीकरण उनकी प्राकृतिक संरचना, कार्यिकी, स्वभाव, व्यवहार तथा परिवर्धन में समानताओं और विभिन्नताओं के आधार पर किया गया। इसे प्राकृतिक वर्गीकरण कहते हैं। आधुनिक वर्गीकरण जीरों के जातिवृत्त सम्बन्धों पर आधारित हैं; क्योंकि मनुष्य जैव विविधता और जीवधारियों के पारस्परिक सम्बन्धों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।

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प्रश्न 3.
जिन लोगों से आप प्रायः मिलते रहते हैं, आप उनको किस आधार पर वर्गीकृत करना पसन्द करेंगे? (संकेत-ड्रेस, मातृभाषा, प्रदेश जिसमें वे रहते हैं, आर्थिक स्तर आदि)।
उत्तर:
जीवधारियों को उनकी समानता एवं भिन्नता के आधार पर विभिन्न समूहों एवं वर्गों में रखना ही वर्गिकी (systematics) है। जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर जीवधारियों को वर्गीकृत किया जाता है। इसके लिए जीवधारी के लक्षणों का ज्ञात होना अति आवश्यक है। लक्षणों की समानता और भिन्नता के आधार पर किसी जीवधारी को पहचाना जा सकता है।

अगर व्यक्तियों को ड्रेस, मातृभाषा, प्रदेश, आर्थिक स्तर आदि के आधार पर वर्गीकृत करना पड़े तो प्रदेश के आधार पर उसे वर्गीकृत करना अधिक उपयुक्त होगा; क्योंकि प्रदेश के भौगोलिक वातावरण, वहाँ की भाषा का व्यक्ति-विशेष पर प्रभाव पड़ता है; ड्रेस तो प्रदेश की जलवायु के अनुसार बदल जाती है। एक ही स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों का आर्थिक स्तर भी भिन्न-भिन्न होता है।

प्रश्न 4.
व्यष्टि तथा समष्टि की पहचान से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
व्यष्टि (Individual) तथा समष्टि (Population):
व्यष्टि तथा समष्टि की पहचान से हमें जीवधारी के वैज्ञानिक नाम तथा उसकी विशेषताओं (characters) का ज्ञान होता है। जीवधारियों के आकार, रंग, आवास, कोशिकीय संगठन, शरीर क्रियात्मक तथा आकारिकीय लक्षणों के आधार पर जीवों की व्याख्या की जाती है।

व्यष्टि या जाति जीवधारियों के उस समूह को कहते हैं जो प्रकृति में परस्पर जनन करके प्रजनन योग्य सन्तान उत्पन्न करते हैं। एक ही जाति के सदस्य जब अलग-अलग भौगोलिक वातावरण में रहते हैं तो उनके रंग, रूप तथा आकार में भिन्नता आ जाती है, इस समूह को समष्टि या आबादी (Population) कहते हैं। समष्टि में जीवों की संख्या अस्थिर रहती है अर्थात् यह अधिक या कम हो सकती है।

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प्रश्न 5.
आम का वैज्ञानिक नाम निम्नलिखित है। इसमें से कौन-सा सही है? मेंजीफेरा इंडिका (Mangiferra indica) मेंजीफेरा इंडिका (Mangiferra indica)
उत्तर:
आम का वैज्ञानिक नाम मेंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica) है।

प्रश्न 6.
टैक्सॉन की परिभाषा लिखिए। विभिन्न पदानुक्रम स्तर पर टैक्सा के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
टैक्सॉन (Taxon):
वर्गीकरण में अनेक पदानुक्रम सोपान होते हैं, जिसका प्रत्येक संवर्ग एक सोपान को प्रदर्शित करता है। इसे वर्गिकी संवर्ग या टैक्सॉन (taxon) कहते हैं। वर्गीकरण अध्ययन में विभिन्न स्तर के वर्गक या टैक्सॉन निम्न हैं –
जाति (species), वंश (genus), कुल (family), गण (order), वर्ग (class), संघ (phylum), जगत (kingdom)

उदाहरण:
आलू, टमाटर, बैंगन अलग-अलग जातियाँ हैं किन्तु इन सभी को एक वंश सोलेनम के अन्तर्गत रखते हैं क्योंकि इनमें अनेक समानताएँ पाई जाती हैं। सोलेनम, पिटूनिआ, धतूरा अलग-अलग वंश है किन्तु इन सभी को जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर एक ही कुल सोलेनेसी के अन्तर्गत रखते है।

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प्रश्न 7.
क्या आप वर्गिकी संवर्ग का सही क्रम पहचान सकते हैं?
(अ) जाति (स्पीशीज) → गण (आर्डर) → संघ (फाइलम) → जगत (किंगडम)
(ब) वंश (जीनस) → जाति → गण → जगत (स) जाति → वंश → गण → संघ
उत्तर:
सही वर्गिकी संवर्ग है –
(स) जाति → वंश → गण → संघ।

प्रश्न 8.
जाति शब्द के सभी मानवीय वर्तमान कालिक अर्थों को एकत्र कीजिए। क्या आप अपने शिक्षक से उच्चकोटि के पौधों, प्राणियों तथा बैक्टीरिया की स्पीशीज का अर्थ जानने के लिए चर्चा कर सकते हैं?
उत्तर:
जाति (Species):
जॉन रे (John Ray) ने सर्वप्रथम किसी एक प्रकार के जीवधारी के लिए जाति या स्पीशीज शब्द का प्रयोग किया। जाति वर्गीकरण की मूल इकाई है। पुरानी धारणा के अनुसार जाति एक स्थायी इकाई है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार जाति एक गतिशील तथा परिवर्तनशील इकाई है, जिसमें वातावरण के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। ये परिवर्तन लाखों-करोड़ों वर्षों में एक नई जाति का निर्माण करते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकृति में जितनी भी जातियाँ हैं वे सभी आदिकाल में पाई जाने वाली जातियों से विकसित हुई हैं।

मेयर (1942) के अनुसार, “जाति जीवधारियों का वह समूह है जो परस्पर जनन करके प्रजनन योग्य सन्तानें उत्पन्न कर सकें।” एक जाति के सदस्यों को अन्य जाति के सदस्यों से आकारिकीय लक्षणों के आधार पर एक-दूसरे से पृथक कर सकते हैं। उच्च श्रेणी के पौधों, प्राणियों तथा बैक्टीरिया की जातियाँ आकारिकीय लक्षणों; जैसे – कोशिका संरचना, शारीरिक संगठन, पोषण प्राप्त करने की विधि, पर्यावरणीय जीवन-शैली तथा जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर भिन्न होती है। पादप स्वपोषी एवं उत्पादक कहलाते हैं। प्राणी परपोषी एवं उपभोक्ता होते हैं। बैक्टीरिया प्रायः परपोषी एवं अपघटक होते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित शब्दों को समझिए तथा परिभाषित कीजिए –

  1. संघ
  2. वर्ग
  3. कुल
  4. गण
  5. वंश।

उत्तर:
1. संघ:
यह विभिन्न सम्बन्धित वर्गों का समूह है जिसमें कुल गुण समान होते हैं। जैसे-पिसीज, एम्फीबिया, रेप्टीलिया, एवीज तथा मैमेलिया वर्ग के सदस्यों को संघ काटा में रखते हैं क्योंकि इन सभी में पृष्ठ रज्जु युक्त खोखला तन्त्रिका तन्त्र, ग्रसनीय गिल दरारें पायी जाती हैं।

2. वर्ग:
यह अनेक सम्बन्धित गणों का समूह है। जैसे – मैमेलिया वर्ग में सिटेसिया, काइरोप्टेरा, कार्नीवोरा तथा प्राइमेटा गण आते हैं। सिटेसिया में समुद्री स्तनी, काइरोप्टेरा में उड़ने वाले स्तनी, कार्नीवोरा में मांसाहारी स्तनी तथा प्राइमेटा में बुद्धिमान स्तनी आते हैं। इन सभी के शरीर पर बाल, बाह्य कर्ण तथा स्तनग्रन्थियाँ पाई जाती हैं।

3. कुल:
इसके अन्तर्गत सम्बन्धित वंश आते हैं। जैसे – सोलेनेसी कुल में सोलेनम, पिटूनिआ तथा धतूरा रखते हैं।

4. गण:
यह समान लक्षण वाले कुलों का समूह है। जैसे-कार्नीवोरा गण के अन्तर्गत फेलिडि तथा कैनसीडी कुलों को रखा गया है।

5. वंश:
बहुत सी जातियों के समूह को वंश कहते हैं। इनके कुछ लक्षण समान तथा अन्य लक्षण भिन्न होते हैं। जैसे-शेर, चीता तथा तेंदुआ अलग जातियाँ हैं किन्तु ये सभी एक ही वंश पेंथेरा के अन्तर्गत आते हैं।

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प्रश्न 10.
जीव के वर्गीकरण तथा पहचान में कुंजी किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
वर्गीकरण तथा पहचान में जो लक्षण वर्गिकी में सहायक होते हैं उन्हें वर्गीकरण की कुंजी (key of classification) कहते हैं। यह अज्ञात जीवधारी की पहचान में सहायक होती है। यह तुलनात्मक लक्षणों पर आधारित होती है। वर्गीकरण संवर्ग के प्रत्येक टैक्सॉन (taxon); जैसे-जाति, वंश, कुल, गण, वर्ग, संघ के लिए अलग-अलग कुंजी (key) का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
पौधों तथा प्राणियों के उचित उदाहरण देते हुए वर्गिकी पदानुक्रम का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
वर्गिकी पदानुक्रम-वर्गीकरण में अनेक पदानुक्रम सोपान होते हैं, जिसका प्रत्येक संवर्ग एक सोपान को प्रदर्शित करता है। इसे वर्गिकी संवर्ग या टैक्सॉन (taxon) कहते हैं। इसमें विभिन्न टैक्सा उच्चतम से निम्नतम श्रेणी में निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते हैं। वर्गीकरण की आधारभूत इकाई जाति है तथा उच्चतम इकाई जगत है। जीवों को विभिन्न टैक्सा में रखने के लिए मूलभूत आवश्यक व्यष्टि अथवा उस टैक्सा के गुणों का ज्ञान होना आवश्यक है। इसके द्वारा समान प्रकार के जीवों तथा अन्य प्रकार के जीवों में समानता तथा विभिन्नता को पहचानते हैं।

आरोही क्रम में पदानुक्रम वर्गिकी संवर्ग को निम्न प्रकार प्रदर्शित करते हैं –
जाति (species) → वंश (genus) → कुल (family) → गण (order) → वर्ग (class) → संघ (phylum) → जगत (kingdom)।

उदाहरण:
शेर (Panthera leo), चीता (Panthera tigris), तेंदुआ (Panthera pardus) अलग-अलग जाति के सदस्य हैं किन्तु ये सभी एक ही वंश (genus) पेंथेरा के अन्तर्गत आते हैं। बिल्ली का वंश फेलिस इनसे भिन्न है। लेकिन इन दोनों को ही एक ही कुल फेलिडि में रखते हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry पर्यावरणीय रसायन Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.1
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र, विज्ञान की वह शाखा है, जो पर्यावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों से सम्बन्धित है। इसमें हमारे चारों ओर का वातावरण सम्मिलित होता है; जैसे-वायु, जल, मिट्टी, जंगल, सूर्य का प्रकाश आदि।

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प्रश्न 14.2
क्षोभमण्डलीय प्रदूषण को लगभग 100 शब्दों में समझाइए।
उत्तर:
क्षोभमण्डलीय प्रदूषण वायुमण्डल का सबसे निचला क्षेत्र, जिसमें मनुष्य तथा अन्य प्राणि रहती हैं, क्षोभमण्डल कहलाता है। यह समुद्र-तल से 10 किमी की ऊँचाई तक होता है। क्षोभमण्डल धूलकणों से युक्त क्षेत्र होता है जिसमें वायु, अधिक जलवाष्प तथा बादल उपस्थित होते हैं। इस क्षेत्र में वायु का तीव्र प्रवाह एवं बादलों का निर्माण होता है। वस्तुतः वायु में उपस्थित अवांछनीय ठोस अथवा गैस कणों के कारण क्षोभमण्डलीय प्रदूषण होता है। क्षोभमण्डल में मुख्यतः निम्नलिखित गैसीय तथा कणिकीय प्रदूषक उपस्थित होते हैं –

(क) गैसीय वायुप्रदूषक:
ये सल्फर, नाइट्रोजन तथा कार्बन के ऑक्साइड, हाइड्रोजन, सल्फर, हाइड्रोकार्बन, ओजोन तथा अन्य ऑक्सीकारक हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम आदि) के दहन के परिणामस्वरूप सल्फर के ऑक्साइड (मुख्यत: सल्फर ऑक्साइड SO2) उत्पन्न होते हैं। SO2 की सूक्षम सान्द्रता मनुष्य में विभिन्न श्वसन-रोगों (जैसे-अस्थमा, श्वसनी शोथ, ऐम्फाइसीमा आदि) का कारण होती है। इसके कारण आँखों में जलन होती है तथा आँखें लाल हो जाती हैं। SO2 की उच्च सान्द्रता फूलों की कलियों में कड़ापन उत्पन्न करती है।

जिससे ये पौधों से शीघ्र गिर जाती है। यातायात तथा सघन स्थानों पर उत्पन्न तीक्ष्ण लाल धूम्र नाट्रोजन ऑक्साइड के कारण होता है। NO2 की अधिक सान्द्रता होने पर पौधों की पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा प्रकाश-संश्लेषण की दर कम हो जाती है। कार्बन मोनोक्साइड भी एक प्राणघातक गैस है। इसके स्त्रोत मोटरवाहनों से निकला धुआँ तथा कोयला, ईंधन-लकड़ी, पेट्रोल का अपूर्ण दहन हैं इसकी 1300 ppn सान्द्रता आधे घण्टे में प्राणघातक हो जाती हैं। इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड की वायुमण्डल में बढ़ी हुई मात्रा भूमण्डलीय तापवृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

(ख) कणिकीय प्रदूषक:
कणिकीय पदार्थ वायु में निलम्बित सूक्ष्म ठोस कण अथवा द्रवीय बूंद होते हैं। यह मोटरवाहनों के उत्सर्जन, अग्नि के धूम्र, धूल कण तथा उद्योगों की राख होते हैं। वायुमण्डल में कणिकाएँ जीवित तथा अजीवित दोनो ‘प्रकार की हो सकती हैं। जीवित कणिकाओं में जीवाणु, कवक, फफूंद, शैवाल आदि सम्मिलित हैं।

हवा में पाए जाने वाले कुछ कवक मनुष्य में एनर्जी उत्पन्न करते हैं। ये पौधों के रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं। कणिकीय प्रदूषकों का प्रभाव मुख्यतया उनके कणों के आकार पर निर्भर करता है। हवा में ले जाए जाने वाले कण; जैसे-धूल, धूम, कोहरा आदि मानवीय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। 5 माइक्रोम से बड़े कणिक प्रदूषक नासिका द्वार में जमा हो जाते हैं, जबकि लगभग 1.0 माइक्रोन के कण फेफड़ों में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।

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प्रश्न 14.3
कार्बन डाइ-ऑक्साइड की अपेक्षा कार्बन मोनोक्साइड अधिक खतरनाक क्यों है? समझाइए।
उत्तर:
कार्बन डाइ-ऑक्साइड की अपेक्षा कार्बन मोनोक्साइड अधिक खतरनाक है; क्योंकि यह श्वसित किए जाने पर हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक प्रबलता से संयुक्त हो जाती है तथा कॉर्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है, जो ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन से लगभग 300 गुना अधिक स्थायी संकुल है।

जब रक्त में कोर्बोक्सीहीमोग्लोबिन की मात्रा 3.4% तक पहुँच जाती है, तब रक्त में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता काफी कम हो जाती है। ऑक्सीजन की इस न्यूनता से सिरदर्द, नेत्रदृष्टि की क्षीणत, तंत्रकीय आवेश में न्यूनतम हृदयवाहिका में तन्त्र अव्यवस्था आदि की विसंगतियाँ हो जाती हैं। कार्बन मोनोक्साइड की 1300 ppm सान्द्रता आधे घण्टे में प्राणघातक हो जाती है। दूसरी ओर, कार्बन डाइ-ऑक्साइड का हानिकारक प्रभाव केवल यह है कि इसकी वायुमण्डल में बढ़ी हुई मात्रा भूमण्डलीय तापवृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 14.4
ग्रीनहाउस-प्रभाव के लिए कौन-सी गैसें उत्तरदायी हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
ग्रीनहाउस-प्रभाव के लिए कार्बन डाइ-ऑक्साइड, मेथेन, ओजोन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन यौगिक आदि उत्तरदायी हैं। ये गैसें वायुमण्डल में विकिरित सौर-ऊर्जा की कुछ मात्रा ग्रहण करके भूमण्डल का ताप बढ़ा देती हैं।

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प्रश्न 14.5
अम्लवर्षा मूर्तियों तथा स्मारकों को कैसे दुष्प्रभावित करती हैं?
उत्तर:
अम्लवर्षा में वायुमण्डल से पृथ्वी-सतह पर अम्ल निक्षेपित हो जाती है। अम्लीय प्रकृति के नाइट्रोजन एवं सल्फर के ऑक्साइड वायुमण्डल में ठोस कणों के साथ हवा में बहकर या तो ठोस रूप में अथवा जल में द्रव रूप में कुहासे से या हिम की भाँति निक्षेपित होते हैं। नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड ऑक्सीकरण के पश्चात् जल के साथ अभिक्रिया कर अम्लवर्षा में प्रमुख योगदान देते हैं, क्योंकि प्रदूषित वायु में सामान्यतया कणिकीय द्रव्य उपस्थित होते हैं, जो ऑक्सीकरण को उत्प्रेरित करते हैं।

2SO2 (g) + O2 (g) + 2H2O (l) → 2H2SO4 (aq)
4NO2 (g) + O2 (g) + 2H2O (l) → 4HNO3 (aq)

अम्लवर्षा पत्थर एवं धातुओं से बनी संरचनाओं; जैसेमूर्तियों तथा स्मारकों को नष्ट करती है। जोकि संगमरमर (CaCO3) से निम्नलिखित अभिक्रिया करती है –
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प्रश्न 14.6
धूम कुहरा क्या है? सामान्य धूम कुहरा प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
धूम कोहरा-‘धूम-कोहरा’ शब्द ‘धूम’ एवं “कोहरे’ से मिलकर बना है। अतः जब धूम, कोहरे के साथ मिल जाता है तब यह धूम-कोहरा कहलाता है। विश्व के अनेक शहरों में प्रदूषण इसका आम उदाहरण है। धूम कोहरे दो प्रकार के होते है –

1. सामान्य धूम कोहरा:
यह ठण्डी नम जलवायु में होता है तथा धूम, कोहरे एवं सल्फर डाइऑक्साइड का मिश्रण होता है। रासायनिक रूप से यह एक अपचायक मिश्रण है। अतः इसे ‘अपचायक धूम-कोहरा’ भी कहते हैं।

2. प्रकाश रासायनिक धूम कोहरा:
उष्ण, शुष्क एवं साफ धूपमयी जलवायु में होता है। यह स्वचालित वाहनों तथा कारखानों से निकलने वाले नाइट्रोजन के ऑक्साइडों तथा हाइड्रोकार्बनों पर सूर्यप्रकाश की क्रिया के कारण उत्पन्न होता है। प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे की रासायनिक प्रकृति ऑक्सीकारक है। चूंकि इसमें ऑक्सीकारक अभिकर्मकों की सान्द्रता उच्च रहती है; अतः इसे ‘ऑक्सीकारक धूम कोहरा’ कहते हैं।

प्रश्न 14.7
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के निर्माण के दौरान होने वाली अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के निर्माण के दौरान होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –
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ओजोन एक जहरीली गैस है। NO2 तथा O3 दोनों ही प्रबल ऑक्सीकारक हैं। इस कारण प्रदूषित वायु में उपस्थित अदहित हाइड्रोकार्बनों के साथ अभिक्रिया करके कई रसायनों जैसे-फार्मेल्डिहाइड, एक्रोलीन एवं परॉक्सी ऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) का निर्माण करते हैं।
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प्रश्न 14.8
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के दुष्परिणाम क्या हैं? इन्हें कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है?
उत्तर:
प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के दुष्परिणामप्रकाश रासायनिक धूम कोहरे के सामान्य घटक ओजोन, नाइट्रिक ऑक्साइड, सक्रोलीन, फॉर्मेल्डिहाइड एवं परॉक्सीऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) हैं। प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के कारण गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं। ओजोन एवं नाइट्रिक ऑक्साइड नाक एवं गले में जलन पैदा करते हैं।

इनकी उच्च सान्द्रता से सरदर्द, छाती में दर्द, गले का शुष्क होना, खाँसी एवं श्वास अवरोध हो सकता है। प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरा रबर में दरार उत्पन्न करता है एवं पौधों पर हानिकारक प्रभाव डालता है। यह धातुओं, पत्थरों; भवन-निर्माण के पदार्थों एवं रंगी हुई सतहों (painted surfaces) का क्षय भी करता है।

प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के नियंत्रण के उपायप्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे को नियन्त्रित या कम करने के लिए कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यदि हम प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के प्राथमिक पूर्वगामी; जैसे – NO2, एवं हाइड्रोकार्बन को नियन्त्रित कर लें, तो द्वितीयक पूर्वगामी; जैसेओजोन एवं PAN तथा प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरा स्वतः ही कम हो जाएगा।

सामान्यतया स्वचालित वाहनों में उत्प्रेरित परिवर्तक उपयोग में लाए जाते हैं, जो वायुमण्डल में नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन को रोकते हैं। कुछ पौधों (जैसे-पाइनस, जुनीठर्स, क्वेरकस, पायरस तथा विटिस), जो नाइट्रोजन ऑक्साइड का उपापचय कर सकते हैं, का रोपण इस सन्दर्भ में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 14.9
क्षोभमण्डल पर ओजोन परत के क्षय में होने वाली अभिक्रिया कौन-सी है?
उत्तर:
ओजोन परत में अवक्षय का मुख्य कारण क्षोभमण्डल से क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) यौगिकों का उत्सर्जन है। CFC वायुमण्डल की अन्य गैसों से मिश्रित होकर सीधे समतापमण्डल में पहुँच जाते हैं। समतापमण्डल में ये शक्तिशाली विकिरणों द्वारा अपघटित होकर क्लोरीन मुक्त मूलक उत्सर्जित करते हैं।
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क्लोरीन मुक्त मूलक तब समतापमण्डलीय ओजोन से अभिक्रिया करके क्लोरीन मोनोक्साइड मूलक तथा आण्विक ऑक्सीजन बनाते हैं।
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क्लोरीन मोनोक्साइड मूलक परमाण्वीय ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके अधिक क्लोरीन मूलक उत्पन्न करता है।
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प्रश्न 14.10
ओजोन छिद्र से आप क्या समझते हैं? इसके परिणाम क्या हैं?
उत्तर:
ओजोन-छिद्र:
सन् 1980 में वायुमण्डलीय वैज्ञानिकों ने अटार्कटिका पर कार्य करते हुए दक्षिणी ध्रुव के ऊपर ओजोन परत के क्षय जिसे सामान्य रूप से ‘ओजोन-छिद्र’ कहते हैं, के बारे में बताया। यह पाया गया कि ओजोन छिद्र के लिए परिस्थितियों का एक विशेष समूह उत्तरदायी था। गर्मियों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड परमाणुओं [अभिक्रिया (i)] एवं क्लोरीन परमाणुओं [अभिक्रिया (ii)] से अभिक्रिया करके क्लोरीन सिंक बनाते हैं, जो ओजोन-क्षय को अत्यधिक सीमा तक रोकता है।

जबकि सर्दी के मौसम में विशेष प्रकार के बादल, जिन्हें ‘ध्रुवीय समतापमण्डलीय बादल’ कहा जाता है, अंटार्कटिका के ऊपर बनते हैं। ये बादल एक प्रकार की सतह प्रदान करते हैं, जिस पर बना हुआ क्लोरीन नाइट्रेट [अभिक्रिया (i)] जलयोजित होकर हाइपोक्लोरस अम्ल बनाता है। [अभिक्रिया (iii)] अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन क्लोराइड से भी अभिक्रिया करके यह आण्विक क्लोरीन देता है।

ClO(g) + NO2 (g) → ClONO2 (g) … (i)
Cl (g) + CH4 (g) → CH3 (g) + HCl (g) … (ii)
ClONO2 (g) + H2O (g) → HOCl(g) + HNO3 (g) … (iii)
ClONO2 (g) + HCl(g) → Cl2 (g) + HNO3 (g) … (iv)

वसन्त में अंटार्कटिका पर जब सूर्य का प्रकाश लौटता है, तब । सूर्य की गर्मी बादलों को विखण्डित कर देती है एवं HOCl तथा Cl2 सूर्य के प्रकाश से अपघटित हो जाते हैं [अभिक्रिया तथा vi]
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इस प्रकार उत्पन्न क्लोरीन मूलक, ओजोन-क्षय के लिए श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ कर देते हैं। ओजोन छिद्र के परिणाम (Results of Ozone hole) ओजोन परत के साथ अधिकाधिक पराबैंगनी विकिरण क्षोभमण्डल में छनित होते हैं। पराबैंगनी विकिरण से त्वचा का जीर्णन, मोतियाबिन्द, सनबर्न, त्वचा-कैन्सर, कई पादपप्लवकों की मृत्यु, मत्स्य उत्पाद की क्षाति आदि होते हैं।

यह भी देखा गया है कि पौधों के प्रोटीन पराबैंगनी विकिरणों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे कोशिकाओं का हानिकारक उत्परिवर्तन होता है। इससे पत्तियों के रंध्र से जल का वाष्पीकरण भी बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी की नमी कम हो जाती है। बढ़े हुए पराबैंगनी विकिरण रंगों एवं रेशों की भी हानि पहुँचाते हैं, जिससे रंग जल्दी हल्के हो जाते हैं।

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प्रश्न 14.11
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं? समझाइए।
उत्तर:
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण:

1. रोगजनक:
सबसे अधिक गम्भीर जल-प्रदूषक रोगों के कारकों को ‘रोगजनक’ कहा जाता है। रोगजनकों में जीवाणु एवं अन्य जीव हैं, जो घरेलू सीवेज एवं पशु-अपशिष्ट द्वारा जल में प्रवेश करते हैं। मानव-अपशिष्ट एशरिकिआ कोली, स्ट्रेप्टोकॉकस फेकेलिस आदि जीवाणु होते है, जो जठरांत्र बीमारियों के कारण होते हैं।

2. कार्बनिक अपशिष्ट:
अन्य मुख्य जल-प्रदूषण कार्बनिक पदार्थ; जैसे-पत्तियाँ, घास, कूडा-करकट आदि हैं। ये जल को प्रदूषित करते हैं। जल में पादप-प्लवकों की अधिक बढ़ोत्तरी भी जल-प्रदूषण का एक कारण है।

प्रश्न 14.12
क्या आपने अपने क्षेत्र में जल-प्रदूषण देखा है? इसे नियन्त्रित करने के कौन-से उपाय हैं?
उत्तर:
हाँ, हमारे क्षेत्र में जल प्रदूषित है। जल के प्रदूषित होने की जाँच भी हम स्वयं ही कर सकते हैं। इसके लिए हम स्थानीय जल-स्त्रोतों का निरीक्षण कर सकते हैं। जैसे कि नदी, झील, हौद, तालाब आदि का पानी अप्रदूषित या आंशिक प्रदूषित या सामान्य प्रदूषित अथवा बुरी तरह प्रदूषित है। जल को देखकर या उसकी pH जाँचकर इसे देखा जा सकता है। निकट के शहरी या औद्योगिक स्थल, जहाँ से प्रदूषण उत्पन्न होता है, के नाम का प्रलेख करके इसकी सूचना सरकार द्वारा प्रदूषण-मापन के लिए गठित ‘प्रदूषण नियन्त्र बोर्ड’ कार्यालय को दी जा सकती है तथा समुचित कार्यवाही सुनिश्चित की जा सकती है।

हम इसे मीडिया को भी बता सकते हैं। जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए हमें नदी, तालाब, जलधारा या जलाशय में घेरलू अथवा औद्योगिक अपशिष्ट को सीधे नहीं डालना चाहिए। बगीचों में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट का प्रयोग करना चाहिए। डी०डी०टी०, मैलाथिऑन आदि कीटनाशी के प्रयोग से बचना चाहिए तथा यथासम्भव नीम की सूखी पत्तियों का प्रयोग कीटनाशी के रूप में करना चाहिए। घरेलू पानी टंकी में पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) के कुछ क्रिस्टल अथवा ब्लीचिंग पाउडर की थोड़ी मात्रा डालनी चाहिए।

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प्रश्न 14.13
आप अपने ‘जीव रसायनी ऑक्सीजन आवश्यकता’ (BOD) से क्या समझते हैं?
उत्तर:
जल के एक नमूने के निश्चित आयतन में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ को विखण्डित करने के लिए जीवाणु द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन को जैव – रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD) कहा जाता है। अत: जल में BOD की मात्रा कार्बनिक पदार्थ को जैवीय रूप में विखण्डित करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा होगी। स्वच्छ जल की BOD का मान 5ppm से कम होता है जबकि अत्यधिक प्रदूषित में यह 17 ppm या इससे अधिक होता है।

प्रश्न 14.14
क्या आपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है? आप भूमि-प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए क्या प्रयास करेंगे?
उत्तर:
हाँ, हमने अपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है।

भूमि प्रदूषण की रोकथाम के उपाय
मृदा प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय है –

  1. फसलों पर विषैले कीटनाशकों का छिड़काव सावधानीपूर्व करना चाहिए।
  2. डी० डी० टी० का प्रयोग बहुत अधिक न करें।
  3. सिंचाई तथा उर्वरकों का प्रयोग करने के पूर्व मिट्टी और जल का परीक्षण करा लेना चाहिए।
  4. रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट तथा हरी खाद को वरीयता देनी चाहिए।
  5. खेतों में जल के निकास की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
  6. क्षारीय भूमि को वैज्ञानिक ढंग से शोधित किया जाना चाहिए। जिप्सम, सिंचाई तथा रासायनिक खादों का प्रयोग करके क्षारीय मिट्टी को उर्वर बनाया जा सकता है।
  7. मिट्टी के कटाव को रोकने के उपाय किए जाने चाहिए।
  8. खेतों के किनारे (मेंडों पर) तथा ढालू भूमि पर वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 14.15
पीडकनाशी तथा शाकनाशी से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
पीडकनाशी (Pesticides):
पीडकनाशी मूल रूप से संश्लेषित रसायन होते हैं। इनका प्रयोग फसलों को हानिकारक कीटों तथा कई रोगों से बचाने हेतु किया जाता है। ऐल्ड्रीन, डाइऐल्ड्रीन, बी०एच०सी० आदि पीडकनाशी के कुछ उदाहरण हैं। ये कार्बनिक जीव-विष जल में अविलेय तथा अजैवनिम्नीकरणीय होते हैं। ये उच्च प्रभाव वाले जीव-विषय भोजन श्रृंखला द्वारा निम्नपोषी स्तर से उच्चपोषी स्तर तक स्थानान्तरित होते हैं। समय के साथ-साथ उच्च प्राणियों में जीव-विषों की सान्द्रता इस स्तर तक बढ़ जाती है कि उपापचयी तथा शरीर क्रियात्मक अव्यवस्था का कारण बन जाते हैं।

शाकनाशी (Herbicides):
वे रसायन जो खरपतवार (weeds) का नाश करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं, शाकनाशी कहलाते हैं। सोडियम क्लोरेट (NaClO3) सोडियम आर्सिनेट (Na3AsO3) आदि शाकनाशी के उदाहरण हैं। अधिकांश शाकनाशी स्तनधारियों के लिए विषैले होते हैं, परन्तु ये कार्ब-क्लोराइड्स के समोन स्थायी नहीं होते तथा कुछ ही माह में अपघटित हो जाते हैं। मानव में जन्मजात कमियों का कारण कुछ शाकनाशी हैं। यह पाया गया है कि मक्का के खेत, जिनमें शाकनाशी का छिड़काव किया गया हो, कीटों के आक्रमण तथा पादप रोगों के प्रति उन खेतों से अधिक सुग्राही होते हैं, जिनकी निराई हाथों से की जाती है।

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प्रश्न 14.16
हरित रसायन से आप क्या समझते हैं? यह वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
हरित रसायन यह सर्वविदित है कि हमारे देश ने 20वीं सदी के अन्त तक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपयोग तथा कृषि की उन्नत विधियों का प्रयोग करके अच्छी किस्म के बीजों, सिंचाई आदि से खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है। परन्तु मृदा के अधिक शोषण एवं उर्वरकों तथा कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से मृदा, जल एवं वायु की गुणवत्ता घटी है। इस समस्या का समाधान विकास के प्रारम्भ हो चुके प्रक्रम को रोकना नहीं अपितु उन विधियों को खोजना है, जो वातावरण के असन्तुलन रोक सके। रसायन विज्ञान तथा अन्य विज्ञानों के उन सिद्धान्तों का ज्ञान, जिससे पर्यावरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके, ‘हरित रसायन’ कहलाता है।

हरित रसायन उत्पाद का वह प्रक्रम है, जो पर्यावरण में न्यूनतम प्रदूषण या असन्तुलन लाता है। इसके आधार पर यदि एक-प्रक्रम में उत्पन्न होने वाले सह-उत्पादों को यदि लाभदायक रूप से उपयोग नहीं किया गया है तो वे पर्यावरण प्रदूषण के कारक होते हैं। ऐसे प्रक्रम न सिर्फ पर्यावरणीय दृष्टि से हानिकारक हैं अपितु महँगे भी हैं।

विकास कार्यों के साथ-साथ वर्तमान ज्ञान का रासायनिक हानि को कम करने के लिए उपयोग में लाना ही हरित रसायन का आधार है। एक रासायनिक अभिक्रिया की सीमा, ताप, दाब उत्प्रेरक के उपयोग आदि भौतिक मापदण्ड पर निर्भर करती हैं। हरित रसायन के सिद्धान्तों के अनुसार यदि एक रासायनिक अभिक्रिया में अभिकारक एक पर्यावरण अनुकूल माध्यम में पूर्णत: पर्यावरण अनुकूल उत्पादों में परिवर्तित हो जाए, तो पर्यावरण में कोई रासायनिक प्रदूषक नहीं होगा।

संश्लेषण के दौरान प्रारम्भिक पदार्थ का चयन करते समय हमें सावधानी रखनी चाहिए, जिससे जब भी वह अन्तिम उत्पाद परिवर्तित हो तो अपविष्ट उत्पन्न ही न हो। यह संश्लेषण के दौरान अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त करके किया जाता है। जल की उच्च विशिष्ट ऊष्मा तथा कम वाष्पशीलता के कारण इसे संश्लेषित अभिक्रियाओं के माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जाना वांछित है। जल सस्ता अज्वलनशील तथा अकैंसरजन्य प्रभाव वाला माध्यम है। हरित रसायन के उपयोग से वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किए जाने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयासों का वर्णन निम्नलिखित है –

1. कपड़ों की निर्जल धुलाई में-टेट्राक्लोरोएथीन [Cl2C = CCl2] का उपयोग प्रारम्भ में निर्जल धुलाई के लिए विलायक के रूप में किया जाता था। यह यौगिक भू-जल को प्रदूषित कर देता है। यह एक सम्भावित कैंसरजन्य भी है।

धुलाई की प्रक्रिया में, इस यौगिक का द्रव कार्बन डाइ-ऑक्साइड एवं उपयुक्त उपमार्जक द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। हैलोजेनीकृत 1 लायक का द्रवित CO2 से प्रतिस्थापन भू-जल के लिए कम ह निकारक है। आजकल हाइड्रोजन परॉक्साइड का उपयोग लॉण्ड्री में कपड़ों के विरंजन के लिए किया जाता है, जिससे परिणाम तो अच्छे नि कलते ही हैं, जल का भी कम उपयोग होता है।

2. पेपर का विरंजन:
पूर्व में पेपर के विरंजन के लिए क्लोरीन गेस उपयोग में आती थी। आजकल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन परॉक्साइड, जो विरंजन क्रिया की दर को बढ़ाता है, उपयोग में लाया जाता है।

3. रसायनों का संश्लेषण:
औद्योगिक स्तर पर एथीन का ऑक्सीकरण आयनिक उत्प्रेरकों एवं जलीय माध्यम की उपस्थिति में करवाया जाए, तो लगभग 90% ऐथेनॉल प्राप्त होता है –
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इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हरित रसायन एक कम लागत उपागम है, जो कम पदार्थ, ऊर्जा-उपभोग एवं अपविष्ट जनन से सम्बन्धित है।

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प्रश्न 14.17
क्या होता, जब भू-वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसें नहीं होती? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जब भू-वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसें न होती तो पृथ्वी का ताप घट जाता है। इससे पौधे प्रकाश-संश्लेषण नहीं कर पाते। इससे पौधों की अनुपस्थिति में मानव-जीवन सम्भव नहीं होता।

प्रश्न 14.18
एक झील में अचानक असंख्य मृत मछलियाँ तैरती हई मिलीं। इसमें कोई विषाक्त पदार्थ नहीं था, परन्तु बहुतायत में पादप्लवक पाए गए। मछलियों के मरने का कारण बताइए।
उत्तर:
जल प्रदूषक कार्बनिक पदार्थ; जैसे-पत्तियाँ, घास, कूड़ा-करकट आदि हैं। इनकी उपस्थिति में पादपप्लवक विकसित हो जाते हैं। ये जल में घुलित ऑक्सीजन की अत्यधिक मात्रा का उपभोग कर लेते हैं जो जलीय जीवों; जैसे-मछली के जीवन हेतु अत्यन्त आवश्यक होती है। यदि जल में घुली ऑक्सीजन की सान्द्रता 6 पीपीएम से नीचे हो जाए, तो मछलियों का विकास रुक जाता है।

जल में ऑक्सीजन या तो वातावरण या कई जलीय पौधों द्वारा दिन में प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रम से पहुँचती है। रात में प्रकाश-संश्लेषण रुक जाता है परन्तु पौधे श्वसन करते हैं, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। घुलित ऑक्सीजन सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा कार्बनिक यौगिकों के ऑक्सीकरण में भी उपयोग में ली जाती है। इस प्रकार पादपप्लवकों तथा अन्य कारणों से जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाने के कारण मछलियाँ मृत पाई गईं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

प्रश्न 14.19
घरेलू अपशिष्ट किस प्रकार खाद के रूप में काम आ सकते हैं?
उत्तर:
घरेलू अपशिष्ट में जैवनिम्नीकरण तथा अजैवनिम्नीकरण, दोनों घटकों का समावेश होता है। अपशिष्ट में से दोनों घटक को छाँटकर पृथक् कर लेते हैं। जैव अनिम्नीकरण पदार्थों जैसे – प्लास्टिक, काँच, धातु, छीलन आदि को पुनर्चक्रण के लिए भेज दिया जाता है। जैवनिम्नीकरण अपशिष्टों को खुले मैदानों में मिट्टी में दबा दिया जाता है। जैवनिम्नीकरण अपशिष्ट में कार्बनिक द्रव्य होते हैं, जो कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 14.20
आपने अपने कृषि-क्षेत्र अथवा उद्यान में कम्पोस्ट खाद के लिए गड्डे बना रखे हैं। उत्तम कम्पोस्ट बनाने के लिए इस प्रक्रिया की व्याख्या दुर्गंध, मक्खियों तथा अपविष्टों के चक्रीकरण के सन्दर्भ में कीजिए।
उत्तर:
यदि अपशिष्ट को कम्पोस्ट में परिवर्तित न किया जाए तो वह नालियों में चला जाएगा। इसमें से कुछ मवेशियों द्वारा खा लिया जाता है। कम्पोस्ट खाद बनाने की प्रक्रिया दुर्गन्धपूर्ण होती है। इस पर मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, परन्तु इसे दुर्गन्ध तथा मक्खियों से बचाने के लिए मिट्टी से ढक दिया जाता है। अपशिष्ट के कम्पोस्ट खाद में परिवर्तन के पश्चात् इस पर डाली गई मिट्टी को हटा दिया जाता है तथा कम्पोस्ट खाद प्राप्त कर ली जाती है। यह खाद पौधों के लिए अत्यन्त उपयोगी होती है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 13 हाइड्रोकार्बन्स

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 13 हाइड्रोकार्बन्स Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry हाइड्रोकार्बन्स Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 13.1
मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
मेथेन का क्लोरीनीकरण मुक्त मूलक क्रियाविधि द्वारा किया जाता है। मेथिल मूलक श्रृंखला समापन पद के योग एथेन में परिवर्तित हो जाता है।
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प्रश्न 13.2
निम्नलिखित यौगिकों के I. U. P. A. C नाम लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 13.3
निम्नलिखित योगकों, जिनमें द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की संख्या दर्शाई गई है, के सभी सम्भावित स्थिति समावयवों के संरचना सूत्र एवं I. U. P.A. C नाम दीजिए –
(क) C4H8 (एक त्रिआबन्ध)
(ख) C5H8 (एक त्रिआबन्ध)
उत्तर:
(क) C4H8 (एक द्विआबन्ध)
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(ख) C5H8 (एक त्रिआबन्ध)
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प्रश्न 13.4
निम्नलिखित यौगिको के ओजोनीअपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए –

  1. पेन्ट-2-ईन
  2. 3, 4-डाइमेथिल-हेप्ट-3-ईन
  3. 2-एथिल ब्यूट-1-ईन
  4. 1-फेनिल ब्यूट-1-ईन

उत्तर:
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प्रश्न 13.5
एक ऐल्कीन ‘A’ के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा एथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। ‘A’ का I. U. P. A. C नाम तथा संरचना दीजिए।
उत्तर:
ऐल्कीन ‘A’ 3 – एथिल पेन्ट – 2 – ईन है। इसकी संरचना तथा होने वाली ओजोनी अपघटन अभिक्रिया निम्नलिखित है –
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प्रश्न 13.6
एक ऐल्केन A में तीन C – C आठ C – H सिग्मा आबन्ध तथा एक C – C पाई आबन्ध हैं। A ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का आई०यू०पी०ए०सी० का नाम लिखिए।
उत्तर:
44 मोलर द्रव्यमान वाला ऐल्डिहाइड (ओजोन अपघटन का उत्पाद) CH3CHO है। चूँकि ऐल्कीन ‘A’ एक ही ऐल्डिाइड के दो अणु बनाता है, अत: ऐल्कीन का संरचना सूत्र निम्नवत् हैं –
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प्रश्न 13.7
एक ऐल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
उत्तर:
ऐल्कीन का नाम 3-एथिल हेक्स-3-ईन है। जिसका संरचनात्मक सूत्र तथा ओजोनी अपघटन अभिक्रिया निम्नवत् है –
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प्रश्न 13.8
निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए –

  1. ब्यूटेन
  2. पेन्टीन
  3. हेक्साइन
  4. टॉलूईन

उत्तर:
1. ब्यूटेन:
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2. पेन्टीन:
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3. हेक्साइन:
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4. टॉलूईन:
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प्रश्न 13.9
हेक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएँ बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?
उत्तर:
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समपक्ष (सिम)-हेक्स-2-ईन का क्वथनांक उच्च होता है; अतः इसमें उच्च द्विध्रुव-आघूर्ण होता है। अतः इसमें वान्डर-वाल्स आकर्षण बल अधिक होता है।

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प्रश्न 13.10
बेन्जीन में तीन द्वि-आबन्ध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
उत्तर:
बेन्जीन विभिन्न अनुनादी संरचनाओं का संकर है। केकुले द्वारा दो मुख्य संरचनाएँ (क) तथा (ख) दी गईं। अनुनाद संरचना को षट्भुजीय संरचना में वृत्त या बिन्दु-वृत्त द्वारा (ग) में प्रदर्शित किया गया है।
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वृत्त, बेन्जी वलय के छह कार्बन परमाणु पर विस्थानीकृत (delocalised) छह इलेक्ट्रॉनों को दर्शाता है। अनुनाद के कारण द्विबन्धों को प्रदर्शित करने वाले इलेक्ट्रॉनों की कार्बन परमाणुओं के मध्य उपस्थिति निश्चित नहीं होती, जैसा कि साधारण ऐल्कीनों में होता है। ये एक बड़े क्षेत्र में वितरित रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप आवेश-घनत्व घटता है। इसके अतिरिक्त अनुनादी संकर की ऊर्जा भी घटती है। बेन्जीन की अनुनादी ऊर्जा, जो सम्मिलित संरचनाओं की ऊर्जा तथा अनुनादी संकर की ऊर्जा का अन्तर होती है, का मान 150kJmol-1 पाया गया है। यह दहन की ऊष्मा तथा हाइड्रोजनीकरण की ऊष्मा के उपलब्ध आँकड़ों से पुन: निश्चित होता है। अत: बेन्जीन तथा ऐरीन परिवार के अन्य सदस्य स्थायी यौगिकों की भाँति व्यवहार करते हैं तथा योगात्मक अभिक्रियाओं के स्थान पर प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं।

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प्रश्न 13.11
किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्ते क्या हैं?
उत्तर:
सामान्यतः एक यौगिक ऐरोमैटिक कहलाता है, जबकि वह निम्नलिखित शर्तों का पालन करता है –

  1. यौगिक आवश्यक रूप से चक्रीय होना चाहिए तथा वलय में एक या अधिक द्विबन्ध होने चाहिए।
  2. असंतृप्तता के विपरीत, जैसा कि आण्विक सूत्र से सिद्ध होता है, इन्हें संतृप्त यौगिकों की भाँति व्यवहार करना चाहिए अर्थात् इन्हें योगात्मक अभिक्रियाओं का विरोध करना चाहिए तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में भाग लेना चाहिए।
  3. यौगिक अनुनाद प्रदर्शित करने में सक्षम होना चाहिए।
  4. ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए सबसे आवश्यक शर्त यह है कि यौगिक को हकल के नियम का अनुसरण करना चाहिए। इसके अनुसार यदि एक चक्रीय यौगिक के पास (4n + 2) π – इलेक्ट्रॉन हों तो वह ऐरोमैटिक यौगिक की भाँति व्यवहार करेगा। यहाँ n = 0, 1, 2, 3 ….. आदि हो सकते हैं।

प्रश्न 13.12
इनमें से कौन से निकाय ऐरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिए –
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उत्तर:

  1. इसमें (4n+2) π – इलेक्ट्रॉन हैं अर्थात् 6-2 इलेक्ट्रॉन हैं जो कि विस्थानीकृत नहीं हैं। अतः यह ऐरोमैटिक नहीं
  2. इसमें 4-1 इलेक्ट्रॉन हैं। जिससे हकल के नियम का पालन नहीं होता है। अतः यह ऐरोमैटिक नहीं है।
  3. इसमें 8-7 इलेक्ट्रॉन हैं जिससे हकल के नियम का पालन नहीं होता है। अतः यह ऐरोमैटिक नहीं है।

प्रश्न 13.13
बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे –

  1. P – नाइट्रोनोमोबेन्जीन
  2. m – नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
  3. p – नाइट्रोटॉलूईन
  4. ऐसीटोफीनोन

उत्तर:
1. बेन्जीन से p – नाइट्रोनोमोबेन्जीन:
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2. बेन्जीन से p – नाइट्रोटॉलूईन:
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3. बेन्जीन से p – नाइट्रोबोमोबेन्जीन:
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4. बेन्जीन से ऐसीटोफीनोन:
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प्रश्न 13.14
ऐल्केन H3C – CH2 – C(CH3)2 – CH2 – CH(CH3)2 में 1,2° तथा 3°कार्बन परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबन्धित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।
उत्तर:
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  1. एक हाइड्रोजन परमाणु से जुड़ा 3° कार्बन परमाणु होता
  2. दो हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा 2° कार्बन परमाणु होता है।
  3. तीन हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा 1° कार्बन परमाणु होता है।

प्रश्न 13.15
क्वथनांक पर ऐल्केन की श्रृंखला के शाखन का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
ऐल्केनों के क्वथनांकों में आण्विक द्रव्यमान में वृद्धि के साथ नियत वृद्धि होती है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि आण्विक आकार अथवा अणु का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने के साथ-साथ उनमें अन्तराण्विक वान्डरवाल्स बल बढ़ते हैं। शाखित श्रृंखलाओं की संख्या के बढ़ने के साथ-साथ अणु की आकृति लगभग गोल हो जाती है, जिससे गोलाकार अणुओं में कम आपसी सम्पर्क स्थल दुर्बल अन्तराण्विक बल होते हैं।

इसलिए इनके क्वथनांक कम होते हैं। उदाहरणार्थ-पेन्टेन के तीन समावयव ऐल्केनों (पेन्टेन, 2 – मेथिल ब्यूटेन तथा 2, 2 – डाइमेथिल प्रोपेन) के क्वथनांकों को देखने से यह पता चलता है कि पेन्टेन में पाँच कार्बन परमणुओं की एक सतत श्रृंखला का उच्च क्वथनांक (309.1K) है, जबकि 2, 2 – डाइमेथिल प्रोपेन 282.5K पर उबलती है।

प्रश्न 13.16
प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2 – ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेंजॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1 – ब्रोमोप्रोन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रथम स्थिति:
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इस स्थिति में क्रियाविधि निम्नानुसार दर्शाई जा सकती है –
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द्वितीय स्थिति –
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प्रश्न 13.17
1, 2 – डाइमेथिलबेन्जीन (o – जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार करता है?
उत्तर:
1, 2 डाइमेथिल बेन्जीन (o – जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप ब्यूटेन – 2,3 – डाइऑन तथा एथेन डाइ-अल (ग्लाइआक्सिल) बनते हैं।
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ये सभी उत्पाद वलय में तभी सम्भव होते हैं यदि एकान्तर क्रम में तीन द्विबन्ध हों। ओजोनी अपघटन के उत्पाद केकुल संरचना की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 13.18
बेन्जीन, हैक्सेन तथा एथाइन को घटतें हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।
उत्तर:
अम्लीय व्यवहार का घटता क्रम –
एथाइन > बेन्जीन > n – हेक्सेन
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एथाइन में, ‘C’ sp – संकरित है जो सर्वाधिक विद्युत-ऋणी होता है, यह इलेक्ट्रॉनों के साझे युग्म को अपनी ओर आकर्षित करता है तथा सरलतापूर्वक H+ मुक्त कर देता है। बेन्जीन में, प्रत्येक ‘C’ sp2 संकरित है अर्थात् कम विद्युत-ऋणी है, यह कम सरलता से H+ मुक्त करता है। हेक्सेन में, प्रत्येक ‘c sp3 संकरित है अर्थात् न्यूनतम विद्युत-ऋणी है, यह सरलता से H+ मुक्त नहीं करता। इसलिए सबसे कम अम्लीय व्यवहार दर्शाता है।

प्रश्न 13.19
बेम्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती हैं, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
उत्तर:
बेन्जीन में द्विआबन्ध व्यक्त करने वाले तीन π – इलेक्ट्रॉनों के युग्मों की उपस्थिति के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च होता है। यद्यपि इलेक्ट्रॉन-घनत्व अनुनाद के कारण बहुत अधिक विस्थानीकृत हो जाता है, परन्तु फिर भी इलेक्ट्रॉनस्नेही इस पर सरलता से आक्रमण करके इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि बेन्जीन नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन प्रदर्शित नहीं करता; क्योंकि नाभिकस्नेही कम इलेक्ट्रॉन घनत्व केन्द्र पर आक्रमण को प्राथमिकता देते हैं।

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प्रश्न 13.20
आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?

  1. एथाइन
  2. एथीन
  3. हेक्सेन

उत्तर:
1. एथाठन से बेन्जीन:
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2. एथीन से बेन्जीन:
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3. हेक्सेन से बेन्जीन:
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प्रश्न 13.21
उन सभी एल्कीनों की संरचनाएँ लिखिए, जो हाइड्रोजेनीकरण करने पर 2 – मेथिल ब्यूटेन देती हैं।
उत्तर:
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प्रश्न 13.22
निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E+) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
(क) क्लोरोबेन्जीन, 2, 4 – डाइनाइट्रोक्लोरो-बेन्जीन, p – नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(ख) टॉलूईन, P – H3C – C6H4 – NO2, P-O2N – C6H4 – NO2
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन की ओर क्रियाशीलता का घटता क्रम निम्नवत् है –
(क) क्लोरोबेंजीन > p – नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन > 2,4 – डाइनाइट्रोक्लोरो बेन्जीन
(ख) टॉलूईन > p – नाइट्रोटॉलूईन > p – डाइनाइट्रो-बेन्जीन

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प्रश्न 13.23
बेन्जीन, m – डाइनाइट्रोबेंजीन तथा टालूईन में से किसका नाइटीकरण आसानी से होता है और क्यों?
उत्तर:
चूँकि – CH3 समूह इलेक्ट्रॉन विमुक्तन समूह होता है, अत: टालूईन का नाइट्रीकरण आसानी से हो जाता है। – CH3 समूह में +I प्रभाव होता है जो कि वलय को सक्रिय कर देता है।

प्रश्न 13.24
बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल AlCl3 के स्थान पर कोई दूसरा लूईस अम्ल सुझाइए।
उत्तर:
निर्जल AlCl3 के स्थान पर फेरिक क्लोराइड अन्य लुईस अम्ल है, को प्रयोग कर सकते हैं। यह इलेक्ट्रॉन स्नेही (C2H5+) उत्पन्न करने में सहायक है।

प्रश्न 13.25
क्या कारण है कि वुर्ट्स अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशद्ध ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वु अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन बनाने के लिए दो भिन्न हैलोऐल्केनों की आवश्यकता होती है, इनमें से एक विषम संख्या तथा दूसरा सम संख्या कार्बन परमाणु होना चाहिए। उदाहरणार्थ-ब्रोमोएथेन तथा 1-ब्रोमोप्रोपेन अभिक्रिया के परिणामस्वरूप पेन्टेन देते हैं।
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परन्तु सहउत्पाद भी बनेंगे जबकि अभिक्रिया में भाग ले रहे सदस्य पृथक् रूप में भी अभिक्रिया करेंगे। उदाहरणार्थ-ब्रोमोएथेन, ब्यूटेन देता है तथा 1 – ब्रोमोप्रोपेन हेक्सेन देता है।
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अत: ब्यूटेन, पेन्टेन तथा हेक्सेन का मिश्रण प्राप्त होगा। इस मिश्रण से प्रत्येक घटक को पृथक् करना अत्यधिक कठिन कार्य होगा।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 3 वनस्पति जगत

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 3 वनस्पति जगत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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प्रश्न 1.
शैवाल के.वर्गीकरण का क्या आधार है?
उत्तर:
शैवालों को मुख्य रूप से प्रकाश संश्लेषी वर्णक, संचित भोज्य पदार्थ, कोशिका भित्ति की संरचना तथा कशाभ की उपस्थिति, अनुपस्थिति एवं संख्या के आधार पर वर्गीकृत करते हैं।

ह्वीटेकर वर्गीकरण के अनुसार शैवालों को तीन प्रमुख भागों में बाँटते हैं – क्लोरोफाइसी (chlorophyceae), फिओफाइसी (phaeophyceae) तथा रोडोफाइसी (rhodophyceae) तालिका शोवाल के दिवसों तथा उनके प्रमुख अभिलक्षण (Divison of Alagae and their Main Characteristics)
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प्रश्न 2.
लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म के जीवन चक्र में कहाँ और कब निम्नीकरण विभाजन होता है?
उत्तर:
1. लिवरवर्ट (Liverwort):
बीजाणुउद्भिद् के सम्पुट (capsule) में बीजाणु मातृ कोशिकाओं में बीजाणु (spores) बनते समय।

2. मॉस (Moss):
बीजाणुउद्भिद् के सम्पुट में बीजाणु बनते समय बीजाणु मातृ कोशिकाओं में निम्नीकरण (meiosis) विभाजन होता है।

3. फर्न (Fern):
बीजाणुधानी में बीजाणु मातृ कोशिकाओं में निम्नीकरण होता है।

4. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms):
लघु बीजाणुधानी में परागकण बनते समय लघु-बीजाणु मातृ कोशिका में निम्नीकरण उपस्थिति, अनुपस्थिति एवं संख्या के आधार पर वर्गीकृत करते हैं। ह्वीटेकर वर्गीकरण के अनुसार शैवालों को तीन प्रमुख भागों में बाँटते हैं – क्लोरोफाइसी (chlorophyceae), फिओफाइसी (phaeophyceae) तथा रोडोफाइसी (rhodophyceae) विभाजन होता है।

बीजाण्ड (ovule) के बीजाण्डकाय (nucellus) की गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में निम्नीकरण विभाजन होता है। इससे गुरुबीजाणु बनते हैं। एक गुरुबीजाणु वृद्धि करके मादा युग्मकोद्भिद् अथवा भ्रूणपोष बनाता है।

5. एन्जियोस्पर्म (Angiosperms):
परागकोष की पराग मात कोशिकाओं (pollen mother cells) में निम्नीकरण विभाजन होता है। इससे परागकण अथवा लघुबीजाणु बनते हैं। बीजाण्डकाय की गुरुबीजाणु मातृ कोशिका निम्नीकरण विभाजन द्वारा विभाजित होकर चार अगुणित गुरुबीजाणु बनाती है। अगुणित बीजाणु भ्रूणकोष का निर्माण करता है।

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प्रश्न 3.
पौधे के तीन वर्गों के नाम लिखो, जिनमें स्त्रीधानी होती है। इनमें से किसी एक के जीवन-चक्र का संक्षिप्त वर्णन करो।
उत्तर:
ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा तथा जिम्नोस्पर्म वर्ग के पौधों में स्त्रीधानी पाई जाती है।
मॉस (ब्रायोफाइट पादप) का जीवन-चक्र (Life Cycle of Moss – A Bryophyte):

इसकी प्रमुख अवस्था युग्मकोभिद् (gametophyte) होती है। युग्मकोद्भिद् की दो अवस्थाएँ पाई जाती हैं –

(क) शाखामय, हरे, तन्तुरूपी, प्रोटोनीमा (protonema) का निर्माण अगुणित बीजाणुओं के अंकुरण से होता है। इस पर अनेक कलिकाएँ विकसित होती हैं जो वृद्धि करके पत्तीमय अवस्था का निर्माण करती है।

(ख) पत्तीमय अवस्था पर नर तथा मादा जननांग समूह के रूप में बनते हैं। नर जननांग को पुंधानी (antheridium) तथा मादा जननांग को स्त्रीधानी (archegonium) कहते हैं। पुंधानी में द्विकशाभिक घुमणु (antherozoids) तथा स्त्रीधानी में अण्डाणु (ovum) बनता है। निषेचन जल की उपस्थिति में होता है। घुमणु तथा अण्डाणु संलयन के फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (oospore) बनाते हैं। युग्मनज से वृद्धि तथा विभाजन द्वारा द्विगुणित बीजाणुउद्भिद् (sporophyte) का निर्माण होता है। यह युग्मकोद्भिद् पर अपूर्ण परजीवी होता है। बीजाणुउद्भिद् के तीन भाग होते हैं –

  1. पाद (foot)
  2. सीटा (seta) तथा
  3. सम्पुट (capsule)

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चित्र – फ्यूनेरिया (मॉस) के जीवन-चक्र का रेखाचित्र

सम्पुट के बीजाणुकोष्ठ में स्थित द्विगुणित बीजाणु मातृ कोशिकाओं से अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित बीजाणु (spores) बनते हैं। सम्पुट के स्फुटन से बीजाणु मुक्त हो जाते हैं। बीजाणुओं का प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर तन्तुरूपी, स्वपोषी प्रोटीनीस (protenema) बनाते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित की सूत्रगुणता बताओ –

  1. मॉस के प्रथम तन्तुक कोशिका
  2. द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक
  3. मॉस की पत्तियों की कोशिका
  4. फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ
  5. मार्केन्शिया की जेमा कोशिका
  6. एकबीजपत्री की मैरिस्टेम कोशिका
  7. लिवरवर्ट के अण्डाशय
  8. फर्न के युग्मनज।

उत्तर:

  1. माँस के प्रथम तन्तुक कोशिका-अगुणित (x) होती है।
  2. द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक-त्रिगुणित (3x) होता है।
  3. मॉस की पत्तियों की कोशिका-अगुणित (x) होती है।
  4. फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ-अगुणित (x) होती है।
  5. मार्केन्शिया की जेमा कोशिका-अगुणित (x) होती
  6. एक बीजपत्री की मैरिस्टेम कोशिका-द्विगुणित (2x) होती है।
  7. लिवरवर्ट का अण्डाशय–द्विगुणित (2x) होता है।
  8. फर्न का युग्मनज-द्विगुणित (2x) होता है।

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प्रश्न 5.
शैवाल तथा जिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शैवाल का आर्थिक महत्त्व (Economic importance of Algae):

1. भोजन के रूप में (Algae as Food):
पृथ्वी पर होने वाले प्रकाश संश्लेषण का 50% शैवालों द्वारा होता है। शैवाल कार्बोहाइड्रेट, खनिज तथा विटामिन्स से भरपूर होते हैं। पोरफाइरा (Porphyra), एलेरिया (Alaria), अल्वा (Ulva), सारगासम Sargassum), लेमिनेरिया (Laminaria) आदि खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।

क्लोरेला (Chlorella) में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन्स तथा विटामिन्स पाए जाते हैं। इसे भविष्य के भोजन के रूप में पहचाना जा रहा है। इससे हमारी बढ़ती जनसंख्या की खाद्य समस्या के हल होने की पूरी सम्भावना है।

2. शैवाल व्यवसाय में (Algae in Industry):

(i) डायटम के जीवाश्म/मृत शरीर डायटोमेशियस मृदा (diatomaceous earth or Kiselghur) बनाते हैं। यह मृदा 1500°C ताप सहन कर लेती है। इसका उद्योगों में विविध प्रकार से उपयोग किया जाता है; जैसे-धातु प्रलेप, वार्निश, पॉलिश, टूथपेस्ट, ऊष्मारोधी सतह आदि।

(ii) कोन्ड्रस (Chondrus), यूक्यिमा (Eucheuma) आदि शैवालों से केरागीनिन (carrageenin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग श्रृंगार-प्रसाधनों, शैम्पू आदि बनाने में किया जाता है।

(iii) एलेरिया (Alaria), लेमिनेरिया (Laminaria) आदि से एल्जिन (algin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग अज्वलनशील फिल्मों, कृत्रिम रेशों आदि के निर्माण में किया जाता है। यह शल्य चिकित्सा के समय रक्त प्रवाह रोकने में प्रयोग किया जाता है।

(iv) अनेक समुद्री शैवालों से आयोडीन, ब्रोमीन आदि प्राप्त की जाती है।

(v) क्लोरेला से प्रतिजैविक (antibiotic) क्लोरीन (chlorellin) प्राप्त होती है। यह जीवाणुओं को नष्ट करती है। कारा (Chara) तथा नाइटेला (Nitella) शैवालों की उपस्थिति से जलाशय के मच्छर नष्ट होते हैं; अतः ये मलेरिया उन्मूलन में सहायक होते हैं।

(vi) लाल शैवालों से एगार-एगार (agar-agar) प्राप्त होता है, इसका उपयोग कृत्रिम संवर्धन के लिए किया जाता है।

जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Gymnosperm):

1. सजावट के लिए (Ornamental Plants):
साइकस, पाइनस, एरोकेरिया (Araucaria), गिंगो (Ginkgo), थूजा (Thuja), क्रिप्टोमेरिया (Cryptomeria) आदि पौधों का उपयोग सजावट के लिए किया जाता है।

2. भोज्य पदार्थों के लिए (Plants of Food Value):
साइकस, जैमिया से साबूदाना (sago) प्राप्त होता है। चिलगोजा (Pinus gerardiana) के बीज खाए जाते हैं। नीटम (Gnetum), गिंगो (Ginkgo) व साइकस के बीजों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है।

3. फर्नीचर के लिए लकड़ी:
चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus), कैल (Pinus wallichiana), फर (Abies) से प्राप्त लकड़ी का उपयोग फर्नीचर तथा इमारती लकड़ी के रूप में किया जाता है।

4. औषधियाँ (Medicines):
साइकस के बीज, छाल व गुरुबीजाणुपर्ण को पीसकर पुल्टिस बनाई जाती है। टेक्सस ब्रेवफोलिया (Tarus brevfolia) से टेक्साल औषधि प्राप्त होती है जिसका उपयोग कैन्सर में किया जाता है। थूजा (Thuja) की पत्तियों को उबालकर बुखार, खाँसी, गठिया रोग निदान के लिए प्रयोग किया जाता है।

5. एबीस बालसेमिया (Abies balsamea) से कनाडा बालसम जूनिपेरस (Juniperus) से सिडारवुड ऑयल (cedar wood oil), पाइनस से तारपीन का तेल प्राप्त होता है।

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प्रश्न 6.
जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं, फिर भी उनका वर्गीकरण अलग-अलग क्यों है?
उत्तर:
जिम्नोस्पर्म में बीजाण्ड अण्डाशय भित्ति से ढका नहीं होता है जबकि एन्जियोस्पर्म में बीजाण्ड ढका होता है।

प्रश्न 7.
विषमबीजाणुता क्या है? इसकी सार्थकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। इसके दो उदाहरण दो।
उत्तर:
विषमबीजाणुता (Heterospory)-टेरिडोफाइटा वर्ग के पौधों में बीजाणुओं का निर्माण बीजाणुधानियों में होता है। कुछ जातियों में समबीजाणुता (homospory) पाई जाती है। कुछ जातियों में विषमबीजाणुता पाई जाती है। इसमें दो प्रकार के बीजाणु बनते हैं, इन्हें लघुबीजाणु (microspoeres) तथा गुरुबीजाणु (megaspores) कहते हैं। लघुबीजाणु का निर्माण लघुबीजाणुधानी. (microporangia) में तथा गुरुबीजाणु का निर्माण गुरुबीजाणुधानी (megasporangia) में होता है।

लघु तथा गुरुबीजाणु वृद्धि तथा विभाजन द्वारा क्रमशः नरयुग्मकोद्भिद् तथा मादा युग्मकोद्भिद का निर्माण करते हैं। मादा युग्मकोद्भिद् कुछ समय तक मातृ बीजाणुउद्भिद् पादप पर लगा रहता है।

निषेचन के फलस्वरूप युग्मनज (zygote) का निर्माण तथा नवोद्भिद् पादप (young embryo) मादा युग्मकोद्भिद् से ही भोजन प्राप्त होता है। अतः यह बीज-निर्माण प्रक्रिया में जैव विकास को प्रदर्शित करता है। विषमबीजाणुता सिलैजिनेला (Selaginella), साल्वीनिया (Salvinia) नामक टेरिडोफाइट्स में पाई जाती है। इसके अतिरिक्त जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म भी विषमबीजाणुता को प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 8.
उदाहरण सहित निम्नलिखित शब्दावली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए –

  1. प्रथम तन्तु
  2. पुंधानी
  3. स्त्रीधानी
  4. द्विगुणितक
  5. बीजाणुपर्ण
  6. समयुग्मकी।

उत्तर:
1. प्रथम तन्तु (Protonema):
यह मॉस के युग्मकोद्भिद् की प्रथम अवस्था है। बीजाणु अंकुरित होकर शाखामय, तन्तुरूपी, हरे रंग स्वपोषी प्रथम तन्तु बनाते हैं। इन पर कलिकाएँ विकसित होती हैं। कलिकाएँ पत्तीमय अवस्था (leaf stage) में विकसित हो जाती हैं।

2. पुंधानी (Antheridium):
ब्रायोफाइट तथा टेरिडोफाइट्स में नर जननांग पुंधानी (antheridium) में होते हैं। ये युग्मकोद्भिद् पर विकसित होती हैं। ये नाशपाती के आकार की या गोलाकार संरचनाएं होती हैं। इनके चारों ओर एकस्तरीय चोलक स्तर (jacket layer) होता है। पुमणु मातृ कोशिकाओं से पुमणु (antherozoids) बनते हैं। पुमणु नर युग्मक होते हैं। मॉस के पुमणु द्विकशाभिक तथा फर्न के पुमणु बहुकशाभिक होते हैं।

3. स्त्रीधानी (Archegonium):
यह ब्रायोफाइट्स ‘तथा टेरिडोफाइट्स में पाई जाने वाली मादा जननांग है। ये फ्लास्क रूपी होती है। इनका आधारीय चौड़ा भाग अण्डधानी (venter) तथा ऊपरी सँकरा भाग ग्रीवा (neck) कहलाता है। अण्डधानी में एक अण्डाणु (ovum or egg cell) बनती है। स्त्रीधानियाँ युग्मकोद्भिद् पर विकसित होती हैं।

4. द्विगुणितक (Diplontic):
जब बीजाणुउद्भिद् पीढ़ी स्वतन्त्र, प्रभावी तथा प्रकाशसंश्लेषी होती है, तब इससे अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा बीजाणु बनते हैं। अगुणित बीजाणु युग्मकोद्भिद् पीढ़ी का निर्माण करते हैं तथा युग्मक बनाते हैं। नर तथा मादा युग्मक मिलकर युग्मनज बनाते हैं। युग्मनज से बीजाणुउद्भिद् पीढ़ी का पुनः निर्माण होता है। इस प्रकार के जीवन-चक्र को द्विगुणित (diplontic) कहते हैं; जैसे जिम्नोस्पर्म, एन्जियोस्पर्म में।

5. बीजाणुपर्ण (Sporophyll):
बीजाणुउद्भिद् अवस्था; जैसे – फर्न में; वास्तविक जड़, तना और पत्तियों में विभेदित होती है। परिपक्व पत्तियों पर बीजाणुओं का निर्माण बीजाणुधानी में होता है। बीजाणुधानी के समूह सोराई (sori) कहलाते हैं। बीजाणुओं का निर्माण करने वाली इन पत्तियों को बीजाणुपर्ण (sporophyll) कहते हैं। जिम्नोस्पर्म में लघु तथा गुरु बीजाणुपर्ण क्रमशः नर शंकु तथा मादा शंकु (cone or strobila) बनाते हैं।

6. समयुग्मकी (Isogamy):
आकृति तथा आकार में समान युग्मकों के संलयन को समयुग्मकी संलयन (isogamous syngamy or fertilization) कहते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में अन्तर कीजिए –

  1. लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल
  2. लिवरवर्ट तथा मॉस
  3. विषणबीजाणुक तथा समबीजाणुक टेरिडोफाइट
  4. युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन

उत्तर:
1. लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल में अन्तर (Difference between Red Algae and Brown Algae):
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2. लिवरवर्ट तथा मॉस अन्तर (Difference between Liverwort and Moss)
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3. विषणबीजाणुक तथा समबीजाणुक टेरिडोफाइट अन्तर (Difference between Heterosporous and Homosporous Pteridophytes)
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4. युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन अन्तर (Difference between Syngamy and Triple fusion)
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प्रश्न 10.
एकबीजपत्री को द्विबीजपत्री से किस प्रकार विभेदित करोगे?
उत्तर:
एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में भिन्नता (Difference between Monocot and Dicot Angiosperms)
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प्रश्न 11.
स्तम्भ I में दिए गए पादपों का स्तम्भ II में दिए गए वर्गों से मिलान करो –
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उत्तर:
(अ) (iii), (ब) (iv), (स) (ii), (द) (i)

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प्रश्न 12.
जिम्नोस्पर्मस के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिम्नोस्पर्मस के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण –

  1. इनको सामान्यतया नग्न बीजी पौधे कहते हैं। ये मुख्यतया मरूदभिदी, काष्ठीय, बहुवर्षी होते हैं।
  2. इनमें सामान्य मूसला जड़ पायी जाती है। कुछ पौधों में प्रवाल जड़े भी पायी जाती हैं।
  3. पत्तियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं –
    • शल्क पर्ण तथा
    • वास्तविक पर्ण।
  4. रन्ध्र पत्तियों की निचली सतह पर गड्ढों में धंसे हुए होते है।
  5. पत्तियाँ प्राय: संकरी, सुई सदृश्य होती हैं। इन पर उपचर्म का मोटा आवरण होता है।
  6. संवहन ऊतक जाइलम में वाहिकाओं (vasseles) तथा फ्लोएम में सहकोशिकाओं (companion cells) का अभाव होता है।
  7. पौधे विषमबीजाणुक होते हैं।
  8. पुष्प शंकु (cone) कहलाते हैं। ये एकलिंगी होते हैं। नर शंकु का निर्माण लघुबीजाणु पर्णो से तथा मादा शंकु का निर्माण गुरु बीजाणु पर्तों से होता है।
  9. वायु परागण होता है।
  10. भ्रूणपोष अगुणित होता है। यह निषेचन से पहले बनता
  11. प्राय: बहुभ्रूणता (Polyembryony) पाई जाती है।
  12. बीजाण्ड नग्न होता है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 6 ऊष्मागतिकी

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 6 ऊष्मागतिकी Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 6 ऊष्मागतिकी

Bihar Board Class 11 Chemistry ऊष्मागतिकी Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 6.1
सही उत्तर चुनिए –
ऊष्मागतिकी अवस्था फलन एक राशि है –

  1. जो ऊष्मा-परिवर्तनों के लिए प्रयुक्त होती है
  2. जिसका मान पथ पर निर्भर नहीं करता है
  3. जो दाब-आयतन कार्य की गणना करने में प्रयुक्त होती है
  4. जिसका मान केवल ताप पर निर्भर करता है

उत्तर:
2. जिसका मान पथ पर निर्भर नहीं करता है

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प्रश्न 6.2
एक प्रक्रम के रूद्धोष्म परिस्थितियों में होने के लिए –

  1. ∆T = 0
  2. ∆p = 0
  3. q = 0
  4. w = 0

उत्तर:
3. q = 0

प्रश्न 6.3
सभी तत्वों की एन्थैल्पी उनकी सन्दर्भ-अवस्था में होती है –

  1. इकाई
  2. शून्य
  3. < 0
  4. सभी तत्वों के लिए भिन्न होती है।

उत्तर:
2. शून्य

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प्रश्न 6.4
मेथेन के दहन के लिए ∆UΘ का मान – X kJ mol-1 है। इसके लिए ∆HΘ का मान होगा –

  1. = ∆UΘ
  2. > ∆UΘ
  3. < ∆UΘ
  4. = 0

उत्तर:
3. < ∆UΘ

प्रश्न 6.5
मेथेन, ग्रेफाइट एवं डाइहाइड्रोजन के लिए 298 K पर दहन एन्थैल्पी के मान क्रमशः -890.3 kJ mol-1, -393.5kJ mol-1 एवं -285.8kJ mol-1 हैं। CH4 (g) की विरचन एन्थैल्पी क्या होगी?

  1. – 74.8kJ mol-1
  2. – 52.27kJ mol-1
  3. + 74.8kJ mol-1
  4. + 52.26kJ mol-1

उत्तर:
1. – 74.8kJmol-1

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प्रश्न 6.6
एक अभिक्रिया A + B → C + D + q के लिए एन्ट्रॉपी परिवर्तन धनात्मक पाया गया। यह अभिक्रिया सम्भव होगी –

  1. उच्च ताप पर
  2. केवल निम्न ताप पर
  3. किसी भी ताप पर नहीं
  4. किसी भी ताप पर

उत्तर:
4. किसी भी ताप पर

प्रश्न 6.7
एक प्रक्रम में निकाय द्वारा 701J ऊष्मा अवशोषित होती है एवं 394J कार्य किया जाता है। इस प्रक्रम में आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
उत्तर:
प्रश्नानुसार, निकाय द्वारा कृत कार्य (W) = -394J
तथा अवशोषित ऊष्मा (q) = 701J
अतः आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन (∆U) = q + w
= 701 + (-394)
= 3307J

प्रश्न 6.8
एक बम कैलोरीमीटर में NH2 CN(S) की अभिक्रिया डाइऑक्सीजन के साथ की गई एवं ∆U का मान – 742.7kJ mol-1 पाया गया (298K पर)। इस अभिक्रिया के लिए 298K पर एन्थैल्पी परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
NH2 CN(g) + \(\frac{3}{2}\)O2 (g) → N2 (g) → H2O(l)
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
∆U = -742.7 kJ mol-1
∆ng = 2 – \(\frac{3}{2}\) = +\(\frac{1}{2}\)
R = 8.314 × 10-3 kJ k-1 mol-1
तथा T = 298K
जब सम्बन्ध ∆H = ∆U + ∆ng RT से
∆H = (-742.7kJ mol-1) + (1/2) × (8.314 × 10-3 kJ k-1 mol-1) × (298K)
= -741.46 kJmol-1

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प्रश्न 6.9
60.0g ऐलुमिनियम का ताप 35°C से 55°C करने के लिए कितने kJ ऊष्मा की आवश्यकता होगी? AI की मोलर ऊष्माधारिता 24-1Jmol K-1 है।
उत्तर:
ऐलुमिनियम का द्रव्यमान = 60.0g
ताप में वृद्धि = 55°C – 35°C
= 20° C = 293K
AI की मोलर ऊष्मा – धारिता = 24Jmol-1K-1
AI की विशिष्ट ऊष्मा-धारिता = \(\frac{24}{27}\) Jg-1K-1
आवश्यक ऊष्मा q = C × m × ∆T
= (\(\frac{24}{27}\) Jg-1K-1) × (60.0g) (293 K)
= 15626.67J
= 15.627kJ

प्रश्न 6.10
10.0°C पर 1 मोल जल की बर्फ – 10°C पर जमाने पर एन्थैल्पी-परिवर्तन की गणना कीजिए।
fusH = 6.03 kJ mol-10°C पर
Cp[H2(l)] = 75.3J mol-1K-1
Cp[HpO(s)] = 36.8J mol-1K-1
उत्तर:
परिवर्तन को निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है –
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हेस नियम के अनुसार,
∆H = ∆H1 + ∆H2 + ∆H3
∆H1 = Cp [H2 O(l) × ∆T
= 75.3 Jmol-1K-1(10k)
= 753 Jmol-1
∆H2 (ठोसीकरण ) = -603 kJmol-1
(चिह परिवर्तता) =  -603 kJmol-1
∆H3 = Cp [H2O(s)] × ∆T
= 36.8 Jmol-1K-1(-10k)
= 36.8 Jmol-1
∴ ∆H = (753 – 5030 – 368)Jmol-1
= -5645 Jmol-1
= 5.645 Jmol-1

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प्रश्न 6.11
CO2 की दहन एन्थैल्पी – 393.5kJ mol-1 है। कार्बन एवं ऑक्सीजन से 35.2gCO2 बनने पर उत्सर्जित ऊष्मा की गणना कीजिए।
उत्तर:
C तथा O2 का दहन समीकरण निम्नवत् है –
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∵ 44g CO2 के निर्माण में मुक्त हुई ऊष्मा = 393.5kJ
∴ 35.2g CO2 के निर्माण में मुक्त ऊष्मा होगी
= \(\frac{393.5KJ×(35.2g)}{(44g)}\)
= 314.8kJ

प्रश्न 6.12
CO(g), CO2(g), N2O(g) एवं N2O4(g) की विरचन एन्थैल्पी क्रमशः -110, -393, 81 एवं 9.7kJ mol-1 हैं अभिक्रिया N2O4(g) + 3CO(g) → N2O(g) + 3CO2(g) के लिए ∆rH का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
अभिक्रिया एन्यैल्पी
(∆rH) = [81 + 3(-393)] – [9.7 + 3(-110)]
= (81 – 1179) – (9.7 – 330)
= 777.7kJ mol-1

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प्रश्न 6.13
N2 (g) + 3H2 (g) → 2NH3 (g) ∆rHΘ = -92.4kJ mol-1 NH3 गैस की मानक विरचन एन्थैल्पी क्या है?
उत्तर:
NH3 गैस की मान विरचन एन्थैल्पी
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प्रश्न 6.14
निम्नलिखित आँकड़ों से CH3OH(l) की मानक विरचन एन्थैल्पी ज्ञात कीजिए –
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उत्तर:
CH3OH(l) की मानक विचरन एंथैल्पी निम्नलिखित से ज्ञात कर सकते हैं –
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समीकरण (iii) को 2 से गुणा करके समीकरण (ii) में जोड़ने पर
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प्रश्न 6.15
CCl4(g) → c(g) + 4Cl(g) अभिक्रिया के लिए एन्थैल्पी-परिवर्तन ज्ञात कीजिए एवं CCl4 में C – Cl की आबन्ध एन्यल्पी की गणना कीजिए –
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उत्तर:
दिये हुए रासायनिक समीकरण के अनुसार,
CCl4(g) → c(g) + 4Cl(g)
CCl4 में चार C – Cl आबन्धों के टूटने के लिए आवश्यक ऊष्मीक ऊर्जा
= \(\frac{1}{4}\) × ∆H
अब अभिक्रिया CCl4(g) → C(g) + 4Cl(g) के लिए आबन्ध एंथैल्पी
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= 30.5 – (715.0 + 4 × 242)kJmol-1
= (30.5 – 1683)kJmol-1
= -165.5 kJmol-1

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प्रश्न 6.16
एक विलगित निकाय के लए ∆U = 0, इसके लिए ∆S क्या होगा?
उत्तर:
चूँकि विलगित निकाय में यदि दो गैसों को मिश्रित किया जाये तो ∆U = 0 तथा एण्ट्रापी बढ़ती है, अत: ∆S शून्य से अधिक होगा।

प्रश्न 6.17
298K पर अभिक्रिया 2A + B → C के लिए ∆H = 400 kJ mol-1 एवं ∆S = 0.2 kJK mol-1 ∆H एवं ∆S को ताप-विस्तार में स्थिर मानते हुए बताइए कि किस ताप पर अभिक्रिया स्वतः होगी?
उत्तर:
दी गई अभिक्रिया 2A + B → C
प्रश्नानुसार
∆H = 400kJmol-1 तथा ∆S = 0.2kJmol-1
∆G = ∆H – T∆S
0 = 400 – 0.2 × T (∵∆G = 0, साम्यावस्था पर)
या 0.27 = 400
T = 400 = 2000K
या T = \(\frac{400}{0.2}\) = 2000k
अत: ताप 2000K से अधिक पर अभिक्रिया स्वतः होगी।

प्रश्न 6.18
अभिक्रिया 2Cl(g) → Cl2(g) के लिए ∆H एवं ∆S के चिन्ह क्या होंगे?
उत्तर:
चूँकि अभिक्रिया में आबन्धों का निर्माण होता है, अतः यह ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है। Cl परमाणु के दो मोलों की एण्ट्रापी Cl2 अणु के एक मोल से अधिक होती है। अत: ∆H तथा ∆S दोनों के चिन्ह ऋणात्मक होंगे।

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प्रश्न 6.19
अभिक्रिया 2A(g) + B(g) → 2D(g) के लिए \({ \triangle U }^{ Θ }_{ 298 }\) एवं ∆SΘ = -44.1JK-1 अभिक्रिया के लिए की गणना कीजिए और बताइए कि क्या अभिक्रिया स्वतः प्रवर्तित हो सकती है?
उत्तर:
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चूँकि ∆GΘ धनात्मक है; अतः अभिक्रिया की प्रकृति स्वतः प्रवर्तित नहीं होगी।

प्रश्न 6.20
300K पर एक अभिक्रिया के लिए साम्य स्थिारांक 10 है। ∆GΘ का मान क्या होगा? (R = 8.314JK-1mol-1)
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
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प्रश्न 6.21
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के आधार पर NO(g) तथा NO2(g) के ऊष्मागतिकी स्थायित्व पर टिप्पणी कीजिए –
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उत्तर:
चूँकि ∆rHΘ धनात्मक है, अत: NO2 ऊष्मागतिक रूप से अस्थाई है।
चूंकि NO का NO2 में ∆rHΘ ऋणात्मक है, अत: NO2 ऊष्मागतिक रूप से अस्थाई है।

प्रश्न 6.22
जब 1.00 mol H2O(l) को मानक परिस्थितियों में विरचित किया जाता है, तब परिवेश के एन्ट्रॉपी-परिवर्तन की गणना कीजिए –
(∆rHΘ = -286.KJ mol-1)
उत्तर:
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