Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे? Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

Bihar Board Class 11 Political Science संविधान : क्यों और कैसे? Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है, कि सत्ता में अच्छे लोग आएँ।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर:
(ग) यह सुनिश्चित करता है, कि सत्ता में अच्छे लोग आएँ।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की दलील है, कि संविधान की प्रमाणिकता संसद से ज्यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है, कि संसद कैसे बनायी जाय और इसे कौन-कौन सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर:
(ग) संविधान ही यह बताता है, कि संसद कैसे बनायी जाये और इसे कौन-कौन सी शक्तियाँ प्राप्त हो सकेगी।

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प्रश्न 3.
बताएँ संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत?
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज है।
(ख) संविधान सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में होता है, और उसकी जरूरत ऐसे ही देशों में होती है।
(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज है, और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।
उत्तर:
(क) सही
(ख) गलत
(ग) गलत
(घ) सही

प्रश्न 4.
बताएँ कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सही है, या नहीं। अपने उत्तर का कारण बताएँ।
(क) संविधान सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।
(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।
(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है, क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।
उत्तर:
(क) हमारी संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गए थे, पर उसे अधिक से अधिक प्रतिनिधियात्मक बनाने की कोशिश की गयी थी विभाजन के बाद संविधान सभा में कांग्रेस का वर्चस्व था। कांग्रेस में सभी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व था। अतः यह कहना असत्य होगा कि संविधान सभा भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

(ख) यह बात भी असत्य है, कि संविधान सभा के सदस्य एकमत थे, और उन्हें कोई बड़े निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं थी। वास्तव में संविधान का केवल एक ही ऐसा प्रावधान है, जो बिना किसी वाद-विवाद के पारित हुआ कि मताधिकार किसे प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त प्रत्येक विषय पर गंभीर विचार-विमर्श और वाद-विवाद हुए।

(ग) यह कहना गलत है, कि भारतीय संविधान मौलिक नहीं है, क्योंकि इसका अधिकांश भाग विश्व के अन्य देशों के संविधानों से लिया गया है। वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने आत्य संवैधानिक परम्पराओं से कुछ ग्रहण करने में परहेज नहीं किया। दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से कुछ सीखने में संकोच भी नहीं किया। परन्तु उन विचारों को लेना कोई अनुकरण की मानसिकता नहीं थी, वरन संविधान के प्रत्येक प्रावधान को भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप ग्रहण कर उन्हें अपना बना लिया गया। भारत का संविधान एक विशाल दस्तावेज है। इसकी मौलिकता पर कोई प्रश्न नहीं लगाया जा सकता।

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प्रश्न 5.
भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। इनके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तिओं का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केन्द्र है।
उत्तर:
(क) संविधान का निर्माण उस संविधान सभा ने किया जो विश्वसनीय नेताओं से बनी थी। इस सभी नेताओं ने न केवल राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया था, वरन वे भारतीय समाज के सभी अंगों, सभी जातियों या समुदायों अथवा सभी धर्मों का प्रतिनिधित्व करते थे। भारतीय जनता का इनमें पूर्ण विश्वास था, और राष्ट्रीय आन्दोलन में उठने वाली सभी माँगों का संविधान बनाते समय ध्यान रखा गया। संविधान सभा के सदस्यों ने पूरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार-विमर्श किया।

(ख) संविधान ने शक्तियों का वितरण भी इस प्रकार किया कि जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपना-अपना कार्य समुचित रूप से कर सकें। कार्य वितरण के समय नियंत्रण एवं सन्तुलन के सिद्धान्त को भी महत्त्व दिया गया। कोई एक सरकारी अंग अन्य दूसरे अंगों पर हावी नहीं हो सकता। कार्यपालिका के कार्यों पर संसद नियंत्रण रखती है। न्यायिक पुनरावलोकन द्वारा संसद अथवा मंत्रिमंडल के कार्यों की समीक्षा की जा सकती है। संविधान ने सुनिश्चित किया कि किसी एक समूह के लिए संविधान को नष्ट करना आसान न हो।

(ग) संविधान लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप बनाया गया। संविधान न्यायपूर्ण है। भारत के संविधान में न्याय के बुनियादी सिद्धान्तों का विशेष ध्यान रखा गया। लोगों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें। जनता के उत्थान के लिए राज्य नीति निर्देशक सिद्धान्त, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, वयस्क मताधिकार, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के हितों का विशेष ध्यान रखने के विभिन्न प्रावधान संविधान में दिए गए हैं। इस प्रकार संविधान जनता की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप ही बनाया गया है।

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प्रश्न 6.
किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण क्यों जरूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो, तो क्या होगा?
उत्तर:
किसी भी देश के संविधान में विभिन्न संस्थाओं की शक्तियों का सीमांकन करना अत्यन्त आवश्यक होता है। जब कोई एक समूह या संस्था अपनी शक्तियों को बढ़ा लेती है, तो वह पूरे संविधान को नष्ट कर सकती है। इस समस्या के बचाव के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है, कि संविधान में शक्तियों का सीमांकन विभिन्न संस्थाओं में इस प्रकार किया जाए कि कोई भी समूह या संस्था संविधान को नष्ट न कर सके। संविधान को इस प्रकार बनाया जाए आर्थात् संविधान की रूपरेखा इस प्रकार से तैयार की जाए कि शक्तियों को ऐसी चतुराई से बाँट दिया जाए कि कोई एक संस्था एकाधिकार प्राप्त न कर सके।

ऐसा करने के लिए शक्तियों का विभाजन विभिन्न संस्थाओं में किया जाए। उदाहरणार्थ, भारतीय संविधान में शक्तियों का विभाजन कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के मध्य तथा कुछ स्वतन्त्र संवैधानिक निकायों जैसे निर्वाचन आयोग आदि में किया जाता है। केन्द्र और राज्यों के बीच भी शक्तियों का सीमांकन किया जाता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है, कि यदि कोई एक संस्था संविधान को नष्ट करना चाहे तो अन्य संस्थाएँ उसके अतिक्रमण को रोक सकती हैं। भारतीय संविधान में अवरोध व सन्तुलन का सिद्धान्त भी इसीलिए अपनाया गया है।

जब विधायिका अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करती है तो न्यायापलिका को यह अधिकार है, कि वह उसके द्वारा निर्मित विधान को असंवैधानिका घोषित कर सकती है। कार्यपालिका की शक्तियों को असीम बनने से रोकने के लिए विधायिका को उस पर विभिन्न प्रकार से अंकुश लगाने का अधिकार है। वह प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव लाकर, अविश्वास प्रस्ताव आदि के द्वारा कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों का सीमांकन संविधान द्वारा पहले से ही किया है, और ये सभी संस्थाएँ अपने-अपने कार्यक्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से कार्य करती हैं परन्तु अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकतीं।

दूसरी संस्थाएँ उनके अतिक्रमण को नियंत्रित कर लेती हैं। यदि संविधान में इन शक्तियों का बँटवारा या सीमांकन विभिन्न संस्थाओं में नहीं किया जाता तो कोई एक संस्था या सरकार कोई एक अंग अपनी शक्तियों को बढ़ा लेता और वह संविधान को नष्ट कर सकता था, तथा निरंकुशता पूर्ण शासन करने लगता जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है।

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प्रश्न 7.
शासकों की सीमा का निर्धारण संविधान के लिए क्यों जरूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है, जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे।
उत्तर:
संविधान का एक प्रमुख कार्य यह भी है, कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किए जाने वाले कानूनों पर कुछ सीमाएँ लगाए। ये सीमाएँ इस रूप में मौलिक होती हैं, कि सरकार कभी उनका उल्लंघन नहीं कर सकती। संसद नागरिकों के लिए कानून बनाती है, कार्यपालिका कानूनों के प्रारूप तैयार करती है, और कई बार मंत्रिमंडल के सदस्य अथवा संसद ही इस प्रकार के कानून बनाने का प्रयास करें जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता समाप्त हो जाए तो इसे रोकने के लिए संसद की शक्तियों पर नियंत्रण लगाना अत्यन्त आवश्यक है।

भारतीय संविधान में संशोधान करने के लिए संसद को न्यायपालिका द्वारा निषेध कर दिया गया है, कि संसद संविधान के बुनियादी ढाँचे में परिवर्तन नहीं कर सकती अथवा वह संविधान के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकती। संविधान सरकार की शक्तियों को कई प्रकार से सीमित करता है। संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्टीकरण किया गया है, जिनका उल्लंघन कोई भी सरकार नहीं कर सकती। नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना किसी कारण के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह सरकार की शक्तियों के ऊपर एक बन्धन या सीमा कहलाती है। प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छानुसार अपना व्यवसाय चुनने का अधिकार है।

इस पर सरकार कोई प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती। नागरिकों को जो स्वतन्त्रताएँ मूलतः प्राप्त है जैसे-भाषण की स्वतन्त्रता अन्तरात्मा की अवाज पर काम करने का अधिकार या संगठन बनाने की स्वतन्त्रता या देश के किसी भी भाग में भ्रमण करने की स्वतन्त्रता आदि पर सरकार सामान्य परिस्थिति में प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती।

कोई भी सरकार स्वयं भी किसी से बेगार नहीं ले सकती और न ही किसी व्यक्ति को इस बात की छूट दे सकती कि वह दूसरे व्यक्तियों का शोषण करें, उन्हें बन्धुआ मजदूर बनाए आदि। इस प्रकार के कर्त्तव्यों पर सीमाएँ लगायी जाती हैं। दुनिया का कोई भी संविधान अपने नागरिकों को शक्तिविहीन नहीं कर सकता। हाँ तानाशाह शासक अवश्य संविधान को नष्ट कर देते हैं, और वे नागरिकों की स्वतन्त्रताओं का हनन करने की कोशिश करते हैं, यद्यपि संविधान में नागरिकों को सुविधाएँ प्रदान की जाती है।

प्रश्न 8.
जब जापान का संविधान बना तब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना संभव नहीं था, जो अमेरिको सेना की पसंद न हो। क्या आपको लगता है, कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर:
जापान का संविधान ऐसे समय में निर्मित हुआ था, जब वह अमेरिका की सेना की नियंत्रण में था। अतः जापान के संविधान का कोई भी प्रावधान अमेरिका की सरकार की आकांक्षाओं के विरुद्ध नहीं था। यह सब इस कारण से होता है, क्योंकि अधिकतर देशों में संविधान वह लिखित दस्तावेज होता है, जिसमें राज्य के विषय में कई प्रावधान होते हैं, जो यह बताते हैं, कि राज्य किन सिद्धान्तों का पालन करेगा।

राज्य की सरकार किस विचारधारा पर आधारित नियमों एवं सिद्धान्तों के द्वारा शासन चलाएगी। जब किसी राज्य पर दूसरे राज्य का आधिपत्य हो जाता है, तो उस राज्य के संविधान में शासकों की इच्छओं के विपरीत कोई प्रावधान नहीं रखे जा सकते। अतः यह स्वाभाविक ही है, कि जापान के संविधान में अमेरिकी शासकों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया।

भारत के संविधान को बनाते समय ऐसी कोई बात नहीं थी। भारत ने लोकतन्त्रीय शासन को अपनाया तथा अपने राष्ट्रीय आन्दोलन के समय सामने आने वाली समस्याओं के निराकरण का भी ध्यान रखा। अनेक देशों में संविधान निष्प्रभावी होते हैं, क्योंकि वे सैनिक शासकों या ऐसे नेताओं के द्वारा बनाये जाते हैं, जो लोकप्रिय नहीं होते और जिसके पास लोगों को अपने साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं होती।

यद्यपि भारतीय संविधान को औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने दिसम्बर 1946 ई. और नवम्बर 1949 ई. के मध्य बनाया। पर, ऐसा करने में उसने राष्ट्रीय आन्दोलन के लम्बे इतिहास से काफी प्रेरणा ली, जिसमें समाज में सभी वर्गों को एक साथ लेकर चलने की विलक्षण क्षमता थी। संविधान को भारी वैधता मिली क्योंकि उसे ऐसे लोगों द्वारा बनाया गया जिनकी अत्यधिक सामजिक विश्वसनीयता थी। संविधान का अन्तिम प्रारूप उस समय की राष्ट्रीय व्यापक आम सहमति को व्यक्त करता है।

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प्रश्न 9.
रजत ने अपने शिक्षक से पूछा-‘संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज है, और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है, कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बताएँ की मैं इस दस्तावेज की बातों का पालन क्यों करूँ?’ अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर:
यदि मैं रजत का शिक्षक होता तो उसके प्रश्न का उत्तर निम्न प्रकार से देता-भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है, कि यह कठोर तथा लचीला दोनों का मिश्रण है। संविधान अनेक धाराओं के साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। संशोधन की यह प्रक्रिया संविधान को लचीला बना देती है। कुछ विषय ऐसे भी हैं, जिनमें संशोधन की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। इन धाराओं में संशोधन करने के लिए संसद के स्पष्ट बहुमत तथा उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संशोधन किया जा सकता है। कुछ अनुच्छेद ऐसे भी हैं, जिनमें संशोधन करने के लिए कम से कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों से अनुमोदन कराना आवश्यक है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि 50 वर्षों के बाद भी भारतीय संविधान कोई बीते दिनों की पुस्तक नहीं कही जा सकती क्योंकि यह एक ऐसा संविधान है, जिसमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सकता है, परन्तु उसके अधिकांश प्रावधान इस प्रकार के हैं जो कभी भी पुराने नहीं पड़ सकते। संविधान का मूल ढाँचा तो सदैव ही एक जैसा रहेगा उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता। अतः यह कहना त्रुटिपूर्ण होगा कि भारतीय संविधान 50 वर्षों के बाद बीते दिनों की पुस्तक बनकर रह गयी है।

इसमें अभी तक लगभग 93 संशोधन हो चुके हैं। इस संविधान का निर्माण जिस संविधान सभा के द्वारा किया गया उसमें लगभग 82 प्रतिशत प्रतिनिधि कांग्रेस के सदस्य थे, और इसमें भारत के सभी घटकों, सभी धर्मों, सभी विचारधाराओं तथा सभी जाति एवं जनजातियों व पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधि भी शामिल थे। ये सभी व्यक्ति बड़े योग्य एवं अनुभवी थे। अत: संविधान को इस प्रकार से तैयार किया गया जिससे की वह समय के साथ-साथ सभी चुनौतियों का सामना करता रहेगा।

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प्रश्न 10.
संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष दिए –
(अ) हरबंस-भारतीय संविधान में एक लोकतान्त्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।
(ब) नेहा-संविधान में स्वतन्त्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है। चूंकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।
(स) नाजिमा-संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया। क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बताएँ।
उत्तर:
तीनों व्यक्तियों के इस संवाद में यह दर्शाने की कोशिश की गयी है, कि हमारे संविधान के क्रियाकलाप लाभप्रद हैं, अथवा नहीं। अपने प्रथम अनुभव के आधार पर हरबंश का मानना है, कि भारतीय संविधान हमें एक लोकतन्त्रात्मक सरकार का आधारभूत ढाँचा देने में सफल रहा है। परन्तु दुसरे वक्ता के रूप में नेहा का विश्वास है, कि संविधान में समानता, स्वतन्त्रता एवं बन्धुता के आश्वासन दिए जाने के बावजूद उनको पुरा नहीं किया गया है। ऐसा न होने के कारण संविधान असफल हो रहा है। नाजिमा का कथन कुछ इस प्रकार है, कि यह संविधान नहीं है, जिसने हमें असफल किया है, वरन ये हम हैं जिन्होंने संविधान को ही असफल कर दिया।

हम जानते हैं, कि भारतीय संविधान का निर्माण एक ऐसी संविधान सभा द्वारा किया गया जिसके सदस्य बड़े योग्य तथा राजनीतिक रूप से बड़े अनुभवी व्यक्ति थे। उन्होंने एक ऐसा संविधान तैयार किया जो भारत के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने का साधन हो और भारत के विभिन्नताओं के लोगों को सर्वमान्य हो। अतः सभी वर्गों के कल्याण एवं उसकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संविधान में लोकतन्त्रीय शासन को स्थापित किया गया। संविधान में शासन के विभिन्न अंगों के सम्बन्धों का भी वर्णन किया गया।

व्यक्ति की स्वतन्त्रता को कायम रखने के लिए मौलिक अधिकार, न्यायालय की स्वतन्त्रता, विधि की शासन आदि को अपनाया गया। भारत में लोकतन्त्र की नींव रखी गयी और इसे शक्तिशाली बनाने के हरसम्भव प्रयास किए गए। भारत के संविधान की प्रस्तावना में ही यह भी दर्शाया गया है, कि संविधान का उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करना है, जिससे भारतीय नागरिक अपने को स्वतन्त्र महसूस करें। यह प्रयास किया गया कि संविधान में भारतीय शासन को आदर्श लोकतन्त्रात्मक शासन के रूप में सिद्धान्ततः स्वीकार किया जाए। परन्तु व्यवहार में भारतीय लोकतन्त्र विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक बुराईयों से पीड़ित हो रहा है।

नेहा के विश्वास के अनुसार संविधान में अनेक वायदों को लिया गया। नागरिकों को स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुता एवं धार्मिक उपासना जैसे अधिकारों से सुसज्जित किया गया है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। नागरिकों की स्वतन्त्रता पर सरकार विशेष अवसरों पर प्रतिबन्ध लगा सकती है। समानता का अधिकार हमारे समाज मे अभी भी पूरी तरह से सफल नहीं हुआ। समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुता समाज में कायम नहीं हो पायी अतः संविधान असफल रहा है। आज भी चुनाव के समय धन एवं बाहुबलियों का सहारा लिया जाता है। लोगों की भावनाओं को भड़काकर वोट माँगे जाते हैं, और बाद में उनके हितों की अनदेखी होती रहती है।

नाजिमा को यह विश्वास है, कि संविधान ने हमें असफल नहीं किया वरन हमने ही संविधान को फेल कर दिया है। संविधान के मूल ढाँचे से भी हम छेड़छाड़ करने लगते हैं। संविधान में सबं कुछ लिखा हुआ होते हुए भी हमारी सरकारों ने ईमानदारी से नागरिकों को काम करने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार या एक ही प्रकार के कार्य के लिए स्त्री तथा पुरुष दोनों को समान वेतन आदि कार्यों को पूर्ण नहीं किया। अत: यह संविधान नहीं है, जिसने हमें असफल किया है, वरन यह हम हैं, जिन्होंने संविधान को असफल किया है। परन्तु नाजिमा का यह कथन पूर्णतया सत्य नहीं है। हमारा संविधान तो काफी आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। भले ही भारत में अभी भी 26 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं, परन्तु पहले की अपेक्षा ‘उसमें कमी तो हो रही है। 2020 तक भारत को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के प्रयास हो रहे हैं, तो यह संविधान की सफलता ही तो है।

Bihar Board Class 11 Political Science संविधान : क्यों और कैसे? Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत के संविधान में किन विषयों में संशोधन करने के लिए साधारण प्रक्रिया अपनायी जाती है?
उत्तर:
भारत का संविधान लचीला भी है, कठोर भी अर्थात् लचीले और कठोर का समन्वय है। कुछ प्रावधानों में संशोधन करने की प्रक्रिया केवल साधारण विधेयक पारित करने की प्रक्रिया के सामन ही है। जैसे –

  1. राज्यों के नाम में परिवर्तन करना।
  2. राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करना।
  3. राज्यों में विधान परिषद् की स्थापना या समाप्ति, आदि।

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प्रश्न 2.
भारतीय संविधान के कोई चार एकात्मक लक्षण बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के चार एकात्मक लक्षण निम्नलिखित हैं –

  1. शक्तिशाली केन्द्र: संविधान निर्माता संघात्मक शासन की कमजोरियों से अवगत थे। अतः उन्होंने भारत में शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर तो कानून बनाता ही है, वह विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकता है।
  2. आपातकालीन शक्तियाँ: राष्ट्रपति के द्वारा आपातकाल की घोषणा करने पर भारत संघीय शासन का रूप ले लेते।
  3. राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, और वे विशेष परिस्थितियों में केन्द्र के एजेन्ट के रूप में कार्य करते हैं।
  4. भारत में इकहरी नागरिकता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन सा सर्वाधिक उपयुक्त कारण हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता हो कि संविधान संसद की अपेक्षा सर्वोच्च है?

  1. संविधान संसद से पहले अस्तित्व में आया।
  2. संविधान निर्माता संसद सदस्यों से अधिक महत्त्वपूर्ण नेता थे।
  3. संविधान तय करता है, कि संसद का निर्माण कैसे हो तथा उसकी शक्तियाँ क्या हों।
  4. संविधान संसद द्वारा संशोधन नहीं किया जा सकता।

उत्तर:
संविधान संसद से सर्वोच्च है, क्योंकि संविधान ही तय करता है, कि संसद का निर्माण कैसे हो तथा उसकी शक्तियाँ क्या होंगी।

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प्रश्न 4.
संविधान में प्रस्तावना की आवश्यकता पर एक टिप्पणी लिखो। अथवा, संविधान की प्रस्तावना का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
प्रत्येक देश की मूल विधि का अपना विशेष दर्शन होता है। दर्शन को समझे बिना संविधान समझना कठिन होता है, और इस विशेष दर्शन का वर्णन ‘प्रस्तावना’ में किया जाता है। हमारे देश के संविधान का मूल दर्शन हमें संविधान की प्रस्तावना में मिलता है। संविधान में प्रस्तावना की आवश्यकता इसलिए है, ताकि संविधान के लक्ष्यों, उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन किया जा सके। सरकार के मार्गदर्शक सिद्धान्तों का वर्णन भी प्रस्तावना में ही किया जाता है।

इसके अतिरिक्त संविधान का आरम्भ एक प्रस्तावना से करना एक संवैधानिक प्रथा बन गई है। 1789 ई. के संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान, 1874 ई. के स्विट्जरलैंड के संविधान, 1937 ई. के आयरलैंड के संविधान, 1946 ई. के जापान के संविधान, 1949 ई. के तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी के संविधान, 1954 ई. के समाजवादी चीन के संविधान और 1973 ई. के बंग्लादेश के संविधान का आरम्भ प्रस्तावना से होता है। अतः भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान का आरम्भ भी प्रस्तावना से किया।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय प्रदान करने की बात कही गयी है।
  2. प्रस्तावना में कहा गया है, की भारतीय जनता को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता होगी।
  3. प्रस्तावना में प्रतिष्ठा व अवसर की समानता की बात कही गई है।
  4. प्रस्तावना में बन्धुत्व की कल्पना की गई है।
  5. प्रस्तावना में राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।

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प्रश्न 6.
भारतीय संविधान के दो स्त्रोतों से लिए गए प्रावधानों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत का संविधान 1935 ई. के भारत शासन अधिनियम तथा विभिन्न देशों के संविधानों से प्रभावित संविधान है। इसके विभिन्न स्रोतों में से दो स्रोतें निम्नलिखित हैं –

  1. ब्रिटेन का संविधान
  2. अमेरिका का संविधान

ब्रिटेन के संविधान का प्रभाव तत्कालीन भारतीय नेताओं पर था, और होना भी स्वाभाविक था। इस संविधान से हमने संसदीय शासन प्रणाली, विधि प्रक्रिया, विधायिका के अध्यक्ष का पद, इकहरी नागरिकता और न्यायपालिका के ढाँचे का प्रावधान भारतीय संविधान में लिए हैं। अमेरिका के संविधान से संविधान की सर्वोच्चता, संघीय व्यवस्था, न्यायिक पुनरावलोकन, निर्वाचित राज्याध्यक्ष, राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने की प्रक्रिया, संविधान संशोधन में राज्यों की विधायिकाओं द्वारा अनुमोदन आदि प्रमुख प्रावधान लिए गए हैं।

प्रश्न 7.
संसदीय शासन प्रणाली की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनायी गयी है। संसदात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका का अध्यक्ष नाममात्र का होता है। वास्तविक शक्तियाँ मंत्रिपरिषद् के पास होती हैं। मंत्रिपरिषद् का निर्माण व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। प्रधानमंत्री निम्न सदन के बहुमत दल का नेता होता है। मंत्रियों को सामूहिक उत्तरदायित्व होता है। भारत में इसी प्रकार की शासन व्यवस्था है।

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प्रश्न 8.
इकहरी नागरिकता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इकहरी नागरिकता का अर्थ है, कि किसी राज्य में व्यक्तियों को केवल एक ही नागरिकता प्राप्त होती है। संघात्मक शासन वाले राज्यों में सामान्यतः दोहरी नागरिकता होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में व्यक्ति अमेरिका का नागरिक होने के साथ-साथ अपने उस राज्य का भी नागरिक होता है, जिसका वह निवासी है। भारत में संघात्मक शासन होते हुए भी यहाँ पर नागरिकों को इकहरी नागरिकता ही प्राप्त है।

प्रश्न 9.
क्या संविधान संशोधनों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?
उत्तर:
भारत के संविधान में 42वीं संशोधन करके यह व्यवस्था बना दी गयी है, कि संविधान संशोधन को किसी भी न्यायालय में किसी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकेगी परन्तु मिनर्वा मिल केस (1980 ई.) में उच्चतम न्यायलय ने संविधान की इस धारा को अवैध घोषित कर दिया। इसका अभिप्राय यह है, कि न्यायलय को संविधान की जाँच करने की शक्ति प्राप्त है।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो –
(क) पंथ निरपेक्ष राज्य
(ख) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
(ग) भारतीय संविधान के स्वतंत्र अधिकरण
उत्तर:
(क) पंथ निरपेक्ष राज्य:
जिन राज्यों में किसी धर्म विशेष को राज्य का धर्म स्वीकार न करके सभी धर्मों को समान समझा जाए तथा राज्य के नागरिक अपनी इच्छानुसार अपने धर्म का पालन कर सकें उसे पंथ-निरपेक्ष राज्य कहते हैं।

(ख) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार:
राज्य के द्वारा जब एक निश्चित आयु (वयस्क होने की आयु, भारत में यह 18 वर्ष है) पूरी करने वाले अपने सभी नागरिकों को जाति, रंग, नस्ल, लिंग, शिक्षा तथा आय के भेदभाव के बिना मताधिकार दिया जाता है तो इसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहते हैं।

(ग) भारतीय संविधान के स्वतन्त्र अभिकरण:
भारतीय संविधान में निम्नलिखित स्वतन्त्र अभिकरण दिए गए हैं –

  • निर्वाचन आयोग
  • नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक
  • संघ लोक सेवा आयोग
  • राज्य लोक सेवा आयोग आदि

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प्रश्न 11.
राजनैतिक और आर्थिक न्याय से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में राजनीतिक और आर्थिक न्याय का वर्णन निम्नलिखित सन्दर्भ में किया गया है –

  1. राजनैतिक न्याय-राजनैतिक न्याय का अर्थ है, कि सभी व्यक्तियों को धर्म, जाति, रंग आदि भेदभाव के बिना समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त हों। सभी नागरिकों को समान मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।
  2. आर्थिक न्याय-आर्थिक न्याय से अभिप्राय है, कि प्रत्येक को अपनी आजीविका कमाने के समान अवसर प्राप्त हों तथा कार्य के लिए उचित वेतन प्राप्त हो।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना से क्या तात्पर्य है? प्रस्तावना में लिखे गए प्रमुख आदर्श कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
हमारे देश के संविधान का मूल दर्शन हमें संविधान की प्रस्तावना में मिलता है। संविधान की प्रस्तावना में संविधान के लक्ष्यों, उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन किया गया है। भारत सरकार व राज्य सरकारों के मार्गदर्शक सिद्धान्तों का वर्णन भी प्रस्तावना में ही किया गया है। प्रस्तावना ही हमें यह बतलाती है, कि भारत में सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य की स्थापना की गई है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मुख्य आदर्श हैं, कि भारत प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान की कोई तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय संविधान लिखित तथा विश्व का विशालतम संविधान है।
  2. संविधान के द्वारा भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार और कर्त्तव्यों का वर्णन किया गया है।
  3. भारतीय संविधार कठोर और लचीले संविधानों का मिश्रण है।

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प्रश्न 14.
संविधान सभा के किन्हीं आठ सदस्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संविधान सभा के मुख्य सदस्य थे –

  1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  2. डॉ. भीमराव अम्बेडकर
  3. पण्डित जवाहरलाल नेहरू
  4. सरदार वल्लभ भाई पटेल
  5. मौलाना अबुल कलाम आजाद
  6. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
  7. सरदार बलदेव सिंह
  8. श्रीमती सरोजनी नायडू

प्रश्न 15.
संविधान सभा द्वारा संविधान कब पारित किया गया तथा कब इसे लागू किया गया?
उत्तर:
संविधान सभा द्वारा संविधान को 26 नवम्बर, 1949 को पारित किया गया तथा इसे 26 जनवरी, 1950 ई. को लागू किया गया।

प्रश्न 16.
राजनीतिक समानता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राजनीतिक समानता भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है। राजनीतिक समानता का अर्थ है, कि देश की राजनीतिक क्रिया-कलापों में सभी को बिना किसी भेदभाव के भाग लेने का अधिकार एवं सभी को वोट देने का अधिकार।

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प्रश्न 17.
भारतीय संविधान का जन्म या निर्धारण करने वाली संविधान सभा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
संविधान सभा में जनसंख्या के आधार पर प्रान्तों से 296 और देशी रियासतों से 93 प्रतिनिधियों की व्यवस्था की गई। प्रान्तों के प्रतिनिधियों को प्रान्तों की व्यवस्थापिका के निचले सदन से अप्रत्यक्ष रूप से चुना गया। इन्हें तीन श्रेणियों-सामान्य, मुस्लिम, और सिक्ख, में जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया। रियासतों के प्रतिनिधियों के चुनाव का प्रश्न आपसी समझौते के आधार पर तय होना था।

प्रश्न 18.
संविधान सभा में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विशिष्ट स्थान कैसे थे?
उत्तर:
संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अपना सभापति तथा डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को प्रारूप समिति का सभापति बनाया।

प्रश्न 19.
किसी देश के लिए संविधान का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
किसी भी देश के लिए संविधान बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। इसलिए संविधान को सरकार की शक्ति तथा सत्ता का स्रोत कहा जाता है। संविधान में यह वर्णित है, कि सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियाँ क्या हैं, तथा वे क्या कर सकती हैं। ऐसा करने का उद्देश्य यह होता है, कि सरकार के विभिन्न अंगों में तनाव उत्पन्न न हो। संविधान के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं –

  1. सरकार के विभिन्न अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों का व्याख्या करना।
  2. सरकार और नागरिकों के सम्बन्धों का वर्णन करना। संविधान की सबसे अधिक उपयोगिता यह है, कि वह सरकार द्वारा सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है। इसलिए संविधान देश में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रलेख है।

प्रश्न 20.
संविधान का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संविधान किसी देश के शासन की रीढ़ है। शासन के नियमों का समूह, उसके आधारभूत सिद्धान्तों का संग्रह संविधान कहलाता है। शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए संविधान की रचना की जाती है। इस कार्य में देश की तत्कालीन परिस्थितियों और संविधान निर्माताओं के आदर्शों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

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प्रश्न 21.
लिखित संविधान किसे कहते हैं?
उत्तर:
लिखित संविधान उस संविधान सभा द्वारा पारित होता है, जो इसी उद्देश्य के लिए बुलाई जाती है। भारत का संविधान लिखित है। 1946 में एक संविधान सभा की रचना की गई जिसने इस संविधान का निर्माण किया।

प्रश्न 22.
भारतीय संविधान की अद्वितीय विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
भारत के संविधान की अद्वितीय विशेषताएँ –

  1. भारत का संविधान एकात्मक और संघात्मक दोनों का मिश्रण है।
  2. भारत के संविधान में यद्यपि संसदात्मक शासन को अपनाया गया है, परन्तु इसमें अध्यक्षात्मक शासन के भी तत्व पाये जाते हैं।
  3. भारत एक संघात्मक राज्य है, परन्तु यहाँ इकहरी नागरिकता है।
  4. भारत के संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार एवं मूल स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गई हैं, परन्तु राष्ट्रीय हित में उन पर प्रतिबन्ध भी लगाए जा सकते हैं। आपात स्थिति में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा निलम्बित किया जा सकता है।
  5. भारत का संविधान भारतीय जनता द्वारा निर्मित है। एक संविधान सभा का निर्माण किया गया जो प्रान्तीय विधान सभाओं द्वारा परोक्ष रूप से निर्वाचित की गयी।
  6. देश की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है।
  7. भारत को संविधान द्वारा एक गणराज्य घोषित किया गया है।
  8. संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्व दिए गए हैं।
  9. संघीय तथा राज्य विधानमण्डलों के अधिनियमों और कार्यपालिका के क्रियाकलापों की न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है।
  10. भारतीय संविधान कठोर तथा लचीला दोनों का मिश्रण है।

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प्रश्न 23.
भारतीय संविधान का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
भारतीय संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया। 9 दिसम्बर, 1946 ई. को संविधान सभा बुलाई गई। डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा इसके अस्थायी अध्यक्ष थे। 11 दिसम्बर, 1946 ई. को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा के 2 वर्ष 11 मास और 18 दिन के अथक प्रयास द्वारा 26 नवम्बर 1949 ई. को भारत का संविधान सम्पूर्ण हुआ और ऐतिहासिक दिवस 26 जनवरी, 1950 ई. से इसे लागू किया गया।

प्रश्न 24.
भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 ई. को क्यों लागू किया गया?
उत्तर:
भारत का संविधान 26 नवम्बर, 1949 ई. को बनकर तैयार हो गया था, परन्तु उसे 2 महीने बाद 26 जनवरी, 1950 ई. को लागू किया गया। इसका एक कारण यह था कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के 31 दिसम्बर, 1929 ई. के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग का प्रस्ताव पारित कराया था और 26 जनवरी, 1930 ई. का दिन सारे भारत में ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाया गया था। इसके बाद प्रतिवर्ष 26 जनवरी को इसी रूप में मनाया जाने लगा। इसी पवित्र दिवस की यादगार को ताजा रखने के लिए संविधान सभा ने संविधान को 26 जनवरी, 1950 ई. से लागू किया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना लिखें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना प्रकार है –
“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी धर्म निरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष) शुक्ल सप्तमी संवत् 2006 वि. को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मसमर्पित करते है।”

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प्रश्न 2.
“न्यायिक पुनरावलोकन” के सिद्धान्त से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
न्यायिक पुनरावलोकन-संविधान ने भारत में संघीय व्यवस्था की स्थापना की है। ऐसी व्यवस्था में न्यायपालिका को संविधान के रक्षक के रूप में स्थापित किया जाता है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ है, न्यायपालिका विधानमण्डलों (संसद तथा राज्यों के विधानमण्डल) द्वारा बनाए गए कानून संविधान की दृष्टि से पुनरावलोकन कर सकती है, कि सम्बन्धित विधायिका ने वह कानून संविधान के अनुसार बनाया है या नहीं। यदि न्यायपालिका की दृष्टि में विधायिका द्वारा पारित कोई कानून संविधान की धाराओं के विपरीत है, तो वह उसे निरस्त या रद्द घोषित कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों ने अपने इस अधिकार का काफी प्रयोग किया है। न्यायपालिका का मानना है, कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, परन्तु संविधान के मूलभूत ढाँचे को नहीं बदल सकती।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान की संघात्मक विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के द्वारा भारत में संघात्मक शासन की स्थापना की गई है, या एकात्मक की, इसके बारे में विद्वानों के विचारों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे पूर्णतया संघात्मक मार मानते हैं, तो कुछ उसे इसे अर्द्ध-संघात्मक तथा कुछ विचारक ऐसे भी हैं, जो इसे एकात्मक शासन के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री के. सी. बीहर के अनुसार, “भारत एकात्मक राज्य है, जिसमें संघीय विशेषताएँ नाममात्र की हैं, न कि यह एक संघात्मक राज्य है, जिसमें कुछ एकात्मक ‘विशेषताएँ हैं।” डी. डी. बसु के अनुसार, “भारतीय संविधान न तो पूर्णतया संघात्मक है, और न ही पूर्णतया एकात्मक, यह दोनों का मिश्रण है।

भारतीय संविधान की संघात्मक विशेषताएँ:

1. लिखित संविधान-भारत में एक लिखित संविधान है। इसमें संघात्मक शासन की व्यवस्था विभिन्न इकाईयों (राज्यों) के समझौते द्वारा की जाती है। इसीलिए यहाँ भी संविधान सभा ने अमेरिका, रूस या जापान की तरह एक लिखित: संविधान तैयार किया है।

2. कठोर संविधान-भारत का संविधान लिखित होने के साथ-साथ कठोर भी है। इसमें संशोधन करने की विधि आसान नहीं है। संविधान के महत्त्वपूर्ण विषयों में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत एवं कुल सदस्यों का बहुमत तथा कम से कम आधे राज्यों के विधान मण्डलों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

3. शक्तियों का विभाजन-भारतीय संविधान के अनुसार संघ तथा राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा किया गया है। दोनों के अधिकारों को –

  • संघ सूची
  • राज्य सूची और
  • समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है।
  1. संघ सूची में 97 विषय है। इन विषयों पर संसद को कानून का अधिकार है।
  2. राज्य सूची में 66 विषय हैं, जिन पर राज्य की विधायिकाओं को कानून बनाने का अधिकार है।
  3. समवर्ती सूची में 47 विषय हैं। इस पर केन्द्र तथा राज्य विधान मण्डल दोनों का अधिकार है, परन्तु टकराव की स्थिति में केन्द्र की संसद द्वारा निर्मित कानून लागू होगा।
  4. न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित की गई है।
  5. द्विसदनीय व्यवस्थापिक है। निम्न सदन लोक सभा तथा उच्च सदन राज्य सभा है।

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प्रश्न 4.
भारतीय संविधान संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायपालिका की सर्वोच्चता के बीच से गुजरता है। बताइए, कैसे?
उत्तर:
भारतीय संविधान में ब्रिटेन की तरह संसदीय प्रभुता तथा अमेरिका की तरह न्यायिक सर्वोच्चता इन दोनों के बीच का मार्ग अपनाकर दोनों में समन्वय स्थापित किया गया है। ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है। उसके द्वारा पारित कानूनों को न तो सम्राट वीटो कर सकता है, और न न्यायालय उन्हें अवैध घोषित कर सकता है। उधर अमेरिका में संविधान की व्याख्या और विधियों की संवैधानिकता के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है।

भारतीय संविधान में ब्रिटिश संविधान की भाँति संघात्मक व्यवस्था के आदर्श को अपनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षण तथा व्याख्या करने का अधिकार भी दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय उन विधियों को अवैध घोषित कर सकता है, जो संविधान के विरुद्ध. हों। संसद को भी यह अधिकार है, कि आवश्यकता पड़ने पर विशिष्ट बहुमत के आधार पर संविधान में संशोधन कर सकती है। इस प्रकार भारतीय संविधान अद्भुत ढंग से संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायालय की सर्वोच्चता के बीच का मार्ग अपनाता है।

प्रश्न 5.
भारतीय नागरिकों के कोई पाँच मौलिक कर्त्तव्य लिखें।
उत्तर:
भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह –

  1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्श, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
  2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
  3. भारत की प्रभुसत्ता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
  4. देश की रक्षा करे और आहान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता और भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो।

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प्रश्न 6.
संविधान सभा में ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ किसने प्रस्तुत किया? इसके मुख्य उपबन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव:
संविधान सभा के समक्ष 13 दिसम्बर, 1946 ई. को पं. जवाहर लाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस उद्देश्य प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि “संविधान सभा भारत के लिए एक ऐसा संविधान बनाने का दृढ़ निश्चय करती है जिसमें –
(क) भारत के सभी निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त हो, विचार, भाषण, अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतन्त्रता हो, अवसर और कानून के समक्ष समानता हो और भाईचारा हो,

(ख) अल्पसंख्यक वर्गों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था हो।” 22 जनवरी, 1947 ई. को संविधान सभा ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। पं. जवाहर लाल नेहरू के अनुसार उद्देश्य प्रस्ताव एक घोषणा है, एक दृढ़ निश्चय है, एक शपथ है, एक वचन है, और हम सबका एक आदर्श के लिए समर्पण है। उद्देश्य प्रस्ताव के इन आदर्श को कुछ संशोधित करके संविधान की प्रस्तावना में स्वीकार किया गया है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना लिखकर इसके मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। अथवा, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त निम्नलिखित शब्दों के क्या अर्थ हैं?
(क) न्याय
(ख) स्वतन्त्रता
(ग) समानता
(घ) बन्धुता
(ड.) एकता व अखण्डता।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का विवेचन निम्नलिखित शब्दों में किया गया है-संविधान धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य बनाने तथा इसके सब नागरिकों को …… ।

न्याय:
सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक।

स्वतन्त्रता:
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म पूजा की।

समानता:
प्रतिष्ठा, और अवसर की और उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता, सुनिश्चित करने वाली, बन्धुत्व की भावना बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर, 1949 को इसे अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना के उद्देश्य –

1. न्याय-सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक:
प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय प्रदान करने की बात कही गयी है। सामाजिक न्याय से अर्थ लिया गया है, कि भारतीय समाज में ऐसी स्थिति पैदा की जाए जिसके अनुसार व्यक्ति-व्यक्ति में भेदभाव न हो, ऊँच-नीच की भावना न हो तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हों। आर्थिक न्याय से तात्पर्य लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हों।

आर्थिक न्याय से तात्पर्य उस स्थिति से है, जिसमें देश के धन का यथासम्भव समान बँटवारा हो, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यतानुसार धनोपार्जन के साधन उपलब्ध हों तथा किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का आर्थिक शोषण करने का अधिकार प्राप्त न हो। राजनैतिक न्याय के अनुसार देश के नागरिकों को अपने देश की शासन व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार हो। बात को ध्यान में रखते हुए भारत में वयस्क मताधिकार प्रणाली की व्यवस्था की गयी है।

2. स्वतन्त्रता-विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि “भारतीय जनता को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता होगी।” जिससे भारतीय नागरिकों को व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के अवसर प्राप्त होंगे। संविधान की धारा 25 से 28 तक में भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता का मौलिक अधिकार भी प्रदान किया गया है।

3. समानता-प्रतिष्ठा व अवसर की:
संविधान की धारा 14 के अनुसार नागरिकों को कानूनी समानता प्रदान की गयी तथा धारा 15 के अनुसार सामाजिक समानता की व्यवस्था की गयी है। धारा 16 के अनुसार सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। धारा 18 के आनुसार शिक्षा तथा सैनिक उपाधियों के अतिरिक्त सब प्रकार की उपाधियाँ समाप्त कर दी गयी हैं। प्रस्तावना में इन सबका उल्लेख किया गया है।

4. बन्धुता:
बन्धुत का अर्थ भाईचारे और नागरिकों की समानता से है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति के घोषण पत्र में और फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकारों की घोषणा में किया गया था। भारत के इतिहास में बन्धुता की भावना के विकास का विशेष महत्त्व है। संविधान की प्रस्तावना में जिस बन्धुत्व की कल्पना की गयी है, उसे अनुछेद 17 व 18 में छुआछूत को समाप्त करके, उपाधियाँ प्राप्त करने पर प्रतिबन्ध लगाकर और अनेक सामाजिक बुराईयों को दूर करके भारतीय समाज में स्थापित किया गया है।

5. राष्ट्र की एकता व अखण्डता:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के अनुसार अखण्डता शब्द को जोड़कर भारत में विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी है। इसके द्वारा इस भावना का विकास किया गया है, कि भारत के सभी लोग पूरे देश को अपनी मातृभूमि समझें और इसके विघटन की भावना को मन में न लाएँ।

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प्रश्न 2.
उद्देश्य प्रस्ताव से आप क्या समझते हैं? उद्देश्य प्रस्ताव के मुख्य बिन्दुओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार है। इसे पं. जवाहर लाल नेहरू ने 13 दिसम्बर, 1946 ई. को संविधान सभा में प्रस्तुत किया था। इस उद्देश्य प्रस्ताव को रखकर पं. जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा का मार्ग प्रशस्त किया। इसके द्वारा भावी संविधान की मौलिक रूपरेखा व सिद्धान्तों की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की।

वास्तव में उद्देश्य प्रस्ताव भारतीय स्वाधीनता का घोषण पत्र था। पं. नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव को रखते हुए कहा कि, इस प्रस्ताव के माध्यम से हम देशों की करोड़ों जनता को जो हमारी और निहार रही है, तथा समूचे विश्व को यह बताना चाहते हैं कि हम क्या करेंगे और हमारा लक्ष्य क्या है, और हमें किधर जाना है। प्रस्ताव होते हुए भी यह प्रस्ताव से कहीं अधिक है। यह एक घोषणा है, दृढ़ निश्चय है, प्रतिज्ञा है, और हमारे ऊपर दायित्व है। 22 जनवरी, 1947 ई. को संविधान सभा ने इसे स्वीकार कर लिया।

उद्देश्य प्रस्ताव के प्रमुख बिन्दु –

  1. भारत एक स्वतन्त्र, संप्रभु गणराज्य है।
  2. भारत पूर्व ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों, देशी रियासतों और ब्रिटिश क्षेत्रों तथा देशी रियासतों के बाहर के ऐसे क्षेत्रों जो हमारे संघ का अंग बनना चाहते हैं, का एक संघ होगा।
  3. संघ की इकाइयाँ स्वायत्त होंगी और उन सभी शक्तियों का प्रयोग और कार्यों का सम्पादन करेंगी जो संघीय सरकार को नहीं दी गयी।
  4. सम्प्रभु और स्वतन्त्र भारत तथा इसके संविधान की समस्त शक्तियाँ और सत्ता का स्रोत जनता है।
  5. भारत के सभा लोगों को समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, कानून के समक्ष प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा कानून और नैतिकता की सीमाओं के रहते हुए, भाषण, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्य करने की मौलिक स्वतन्त्रता की गारण्टी और सुरक्षा दी जाएगी।
  6. अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातियों, दलित व अन्य पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा दी जाएगी।
  7. गणराज्य की क्षेत्रीय अखण्डता तथा जल, थल और आकाश में इसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा सभ्य राष्ट्रों के कानून और न्याय के अनुसार की जाएगी।
  8. विश्व शन्ति और मानव कल्याण के विकास के लिए देश स्वेच्छापूर्वक और पूर्ण योगदान करेगा।

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प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के प्रमुख स्रोत बताइए। इनमें से किन्हीं दो स्रोतों की पहचान कीजिए और संक्षेप में बताइए कि इन स्रोतों से कौन-कौन से प्रावधान लिए गए हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान के मुख्य स्त्रोत-भारतीय संविधान निर्माताओं ने विश्व के अनेक देशों के संविधनों का गहन अध्ययन कर उनसे भारत के लिए उपयोगी तत्वों को बिना हिचक अपनाया। इस कारण कुछ लोगों ने भारतीय संविधान को उधार ली गयी वस्तुओं का संकलन मात्र भी कहा है। भारतीय संविधान के मुख्य स्रोत इस प्रकार हैं –

  1. 1935 का भारत सरकार अधिनियम
  2. ब्रिटिश संविधान
  3. संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान
  4. आयरलैण्ड का संविधान
  5. कनाडा का संविधान
  6. आस्ट्रेलिया का संविधान
  7. वीमर संविधान
  8. जापान का संविधान
  9. नेहरू रिपोर्ट का प्रभाव

प्रमुख स्त्रोत और उनसे लिए गए प्रावधान –

1. ब्रिटेन का संविधान:
संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए है –

  • सम्पूर्ण संसदीय व्यवस्था। संवैधानिक अध्यक्ष की धारणा एवं प्रधानमंत्री का पद
  • द्विसदनात्मक संसद
  • संसदीय सम्प्रभुता की धारणा
  • संसद के प्रथम सदन की प्रमुखता
  • विधि का शासन, अभिसमय, विशेषाधिकारों की धारणा
  • लोकसभा के स्पीकर का पद
  • विधि निर्माण प्रक्रिया

2. संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान:
भारतीय संविधान पर अमेरिका के संविधान की व्याख्या की शक्ति, उपराष्ट्रपति का पद तथा कार्य एवं संविधान संशोधन विधि, संविधान का लिखितं स्वरूप, संघीय, धारणा, सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना तथा निर्वाचन राष्ट्रपति के पद का विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान –
(क) संसदीय सर्वोच्चता पर जोर देता है।
(ख) न्यायिक सर्वोच्चता पर जोर देता है।
(ग) संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक सर्वोच्चता के मध्यम मार्ग का अनुसरण करता है।
(घ) इनमें से किसी पर जोर नहीं देता है।
उत्तर:
(ग) संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक सर्वोच्चता के मध्यम मार्ग का अनुसरण करता है।

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प्रश्न 2.
विकसित संविधान का श्रेष्ठ उदाहरण है –
(क) भारत
(ख) अमेरिका
(ग) इंग्लैंड
(घ) रूस
उत्तर:
(ख) अमेरिका

प्रश्न 3.
“भारतीय संविधान वकीलों का स्वर्ग है।” किसने कहा था –
(क) मौरिस जोंस
(ख) ऑस्टिन
(ग) जेनिंग्स
(घ) वीनर
उत्तर:
(ग) जेनिंग्स

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 4.
संविधान की अवधारणा सर्वप्रथम कहाँ उत्पन्न हुई?
(क) ब्रिटेन
(ख) भारत
(ग) चीन
(घ) अमेरिका
उत्तर:
(क) ब्रिटेन

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान स्वीकृत हुआ था –
(क) 30 जनवरी, 1948
(ख) 26 जनवरी, 1949
(ग) 15 अगस्त, 1947
(घ) 26 जनवरी, 1950
उत्तर:
(घ) 26 जनवरी, 1950

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 6.
‘संविधान की आत्मा’ की संज्ञा दी गई है?
(क) अनुच्छेद 14 को
(ख) अनुच्छेद 19 को
(ग) अनुच्छेद 21 को
(घ) अनुच्छेद 32 को
उत्तर:
(घ) अनुच्छेद 32 को

प्रश्न 7.
भारत के मूल संविधान में कितने अनुच्छेद हैं?
(क) 400
(ख) 395
(ग) 390
(घ) 385
उत्तर:
(ख) 395

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प्रश्न 8.
संविधान का संरक्षक किसे बनाया गया है?
(क) सर्वोच्च न्यायालय को
(ख) लोकसभा को
(ग) राज्य सभा को
(घ) उपराष्ट्रपति को
उत्तर:
(क) सर्वोच्च न्यायालय को

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास

Bihar Board Class 11 Political Science विकास Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आप ‘विकास’ से क्या समझते हैं? क्या ‘विकास’ की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ होता है?
उत्तर:
विकास की संकल्पना का एक विस्तृत अर्थ है परन्तु इसका प्रयोग सीमित दृष्टि से किया जाता है। यह समाज के परिवर्तन, उन्नति, वृद्धि और पर्याप्त अग्रसर होने से है। विस्तृत दृष्टिकोण में इस शब्द का अर्थ (विकास की संकल्पना) सुधार, उन्नति, सुखी और अच्छे जीवन के लिए आकांक्षा के विचार से है। विकास का उद्देश्य समाज के उन सपनों पर आधारित है, जो इच्छित और सुनियोजित जीवन के लिए जरूरी है। इसलिए विकास विभिन्न उपायों की प्रक्रिया है, जो समाज के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्प्रेषण से लिया जाता है। यह इस प्रकार ग्रहण किया जाता है कि विकास का लाभ और उन्नति प्रत्येक को प्राप्त हो सके।

लुसियन पाये ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द आस्पेकट्स आफ डेवेलपमेन्ट’ (The Aspects of Development) में विकास को एक आधुनिक समाज के निर्माण में उपलब्ध साधनों के न्यायपूर्ण सदुपयोग के रूप में परिभाषित किया है। उसने विकास को अनेक पहलुओं जैसे पर्यावरणीय परिवर्तन राज्य के निर्माण के रूप में विकास, राष्ट्र के निर्माण के रूप में विकास, आधुनिकीकरण के रूप में विकास, गतिशीलता के रूप में विकास, सांस्कृतिक प्रसाद के रूप में विकास और समाज के आधुनिकीकरण के मशीनीकरण के विकास की व्याख्या की। इसका अन्तिम उद्देश्य सभी समान्य व्यक्तियों के अन्दर वृद्धि और उन्नति को लाना है। इसका लक्ष्य समाज के सभी वर्गों के सभी व्यक्तियों का सुनिश्चित रूप से जीवन बदलना है।

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प्रश्न 2.
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे पड़ने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वस्तुतः विश्व के विभिन्न भागों में विकास की अवधारणा को विभिन्न प्रकार से समझा गया है, इसलिए इसे उसी ढंग से लागू किया जाता है। परन्तु इससे इच्छित परिणाम पर्याप्त वित्तीय लागत के बावजूद नहीं प्राप्त हुए हैं और उन देशों पर पर्याप्त ऋण हो गया है। विकास के सामाजिक लागत और पर्यायवरणीय लागत दो प्रकारों का विवरण निम्नलिखित है –

(क) विकास की सामाजिक लागतें (Social Costs of Development):
विकास की सामाजिक लागत निम्नलिखित कारणों से है –

  • अनेक लोग अपने घर और स्थानीय आवास से विकास के कार्यों जैसे बाँध के निर्माण और औद्योगिक इकाई की स्थापना के कारण स्थानान्तरित हो जाते हैं।
  • जीविका की हानि।
  • परम्परागत व्यवसाय का स्थानान्तरण होना।
  • शहरी और ग्रामीण गरीबी में वृद्धि।
  • जीवन के नये ढंग और नई संस्कृति की ग्राह्यता।
  • परम्परागत कौशल की हानि।
  • विषमताओं और असमानताओं में वृद्धि। इसका विशिष्ट उदाहरण ‘नर्मदा बचाओं आन्दोलन’ है, जो सरदार सरोबर बाँध के विरुद्ध नर्मदा नदी पर चलाया जा रहा है।

(ख) विकास का पर्यावरणीय लागत (Environmental costs of Development):
विकास की आज की विधि पर्यावरणीय लागत की है। इसको निम्नलिखित क्षेत्रों में समझा जा सकता है –

  • यह एक बड़ी जनसंख्या को प्रभावित कर रहा है। इसने बड़े पैमाने पर प्रदूषण पैदा किया है।
  • इससे पारिस्थितिक सन्तुलन में गड़बड़ी आई है।
  • इससे वैश्विक चेतावनी मिली है।
  • हरे भरे क्षेत्र कम होते जा रहे हैं।
  • इसके कारण ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है।
  • प्राकृतिक संकट यथा-बाढ़ और सुनामी का जन्म।

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प्रश्न 3.
विकास की प्रक्रिया ने किन नए अधिकारों के दावों का जन्म दिया है?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक सहभागिता के रूप में नई माँगें-समाज और राजनीति के लोकतान्त्रिक ढाँचे में और आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति अपना अच्छा जीवन व्यतीत करना चाहता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति निर्णय, निर्माण प्रक्रिया, किास के लक्ष्यों के निर्धारण और इसके कार्यान्वयन की प्रणाली में शामिल होना पसन्द करता है। ऐसा सहभागिता के उद्देश्य और शक्तिशाली होने के लिए किया जाता है। विकास और लोकतन्त्र सामान्य हित को अनुभव करने से सम्बन्धित है।

लोकतान्त्रिक राजनीतिक उद्देश्य सामान्य हित के लोगों के अधिकार को प्राप्त करने से है। यह संसाधनों के अधिकतम सदुपयोग द्वारा विकास की प्रक्रिया और सामान्य लोगों को विकास का लाभ लेने से सम्भव है। लोकतान्त्रिक समाजों में लोगों की सहभागिता के अधिकार की प्रशंसा की गई है और इस पर जोर दिया गया है। इस प्रकार की सहभागिता की एक विधि यह बताई जाती है कि स्थानीय क्षेत्रों में विकास की परियोजनाओं के विषय में निर्णय निर्माण संस्था को लेना चाहिए।

इसीलिए अधिकतर संसाधन जो स्थानीय निकायों के हैं, बढ़ाये जा रहे हैं। भारतीय संविधान का 73 वाँ और 74 वाँ संशोधन इस दिशा में किए गए प्रयास हैं। इन संशोधनों के द्वारा सभी वर्ग के लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित करने के लिए प्रयास हो रहे हैं। इसके साथ यह कार्य कमजोर वर्ग जैसे महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए भी किया जा रहा है, जिससे वे विकासगत परियोजनाओं को प्रेरित कर सकें। नीतियों का नियोजन और सूत्रीकरण लोगों को अपनी आवश्यकताओं के लिए संसाधनों के निर्धारण का आदेश देता है। इसलिए विकास के मॉडल को शामिल करने की आवश्यकता है, जो कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लोकतान्त्रिक आधुनिक समाज के उद्देश्यों की सेवा कर सकता है।

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प्रश्न 4.
विकास के बारे में निर्णय सामान्य हित को बढ़ावा देने के लिए किए जाएँ, यह सुनिश्चित करने में अन्य प्रकार की सरकार की अपेक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
लोकतन्त्र ऐसी सरकार है, जो लोगों की है, लोगों के लिए है और लोगों द्वारा निर्मित होती है। इसका तात्पर्य यह है कि लोकतान्त्रिक सरकार केवल लोगों से सम्बन्धित है और सभी अधिकार लोगों के साथ है। यह तानाशाही के विपरीत है, जिसमें सम्पूर्ण शक्ति एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के हाथ में होती है और जहाँ लोगों को निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं होता। इसलिए लोकतान्त्रिक सरकार अन्य सरकारों की अपेक्षा अधिक लाभदायक होती है। विशेष रूप से जनता के हित के मामले में लोकतान्त्रिक सरकार मुख्य रूप से लोगों की रुचियों, अधिकारों और कल्याण से अधिक सम्बन्धित होती हैं।
प्रजातन्त्र निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित होता है –

  1. यह समानता पर आधारित होता है।
  2. यह न्याय पर आधारित होता है।
  3. यह जनता के अधिकारों को प्रेरित करता है।
  4. यह लोगों की स्वतन्त्रता को बढ़ावा देता है।
  5. यह भाई-चारे का बढ़ाता है।
  6. यह एक विस्तृत संविधान उपलब्ध कराता है।
  7. यह वाद-विवाद, बातचीत पर आधारित होता है।
  8. यह अधिकारों के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है।
  9. सर्वाधिक अधिकार लोगों के पास होते हैं।
  10. प्रजातन्त्र में लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार होता है।

उपरोक्त सभी विशिष्ट लक्षण किसी अन्य राजनीतिक व्यवस्था में नहीं मिलते। यही कारण है कि लोगों के हित के लिए लोकतन्त्र को अन्य व्यवस्थाओं की अपेक्षा सबसे अच्छी व्यवस्था माना जाता है। प्रजातान्त्रिक संस्कृति विकासगत प्रक्रिया के प्रसार को बढ़ावा देता है। इसमें व्यक्ति और राष्ट्र के सभी पहलुओं का समावेश होता है।

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प्रश्न 5.
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनवाने में लोकप्रिय संघर्ष और आन्दोलन कितने सफल रहे हैं?
उत्तर:
अनेक राज्यों की सरकारों और यहाँ तक कि केन्द्रीय सरकार ने विकास के नाम पर विभिन्न क्षेत्रों में अनेक महत्त्वकांक्षी परियोजनाएं शुरू की हैं। परन्तु इन परियोजनाओं का अपना ही सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्य है। स्थानीय लोगों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में इन परियोजनाओं के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया है। उदाहरण के लिए मेधापाटेकर और सुन्दरलाल बहुगुणा के आन्दोलन इन परियोजनाओं के खिलाफ चल रहे हैं, फलस्वरूप वे मुद्दे राजनीतिक बन गए हैं। हाल के वर्षों में सरकार की कुछ नई विवासस्पद परियोजनाएँ शुरू हुई हैं। इनमें से एक परियोजना एस.ई.जेड. (Creation of Special Economic Jone) है, जो किसानों के आक्रोश का शिकार है। इसका विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा राजनीतिकरण किया गया है।

स्थानीय लोगों ने इन्हें विकासगत क्रियाओं के रूप में नये भविष्य को स्वीकार नहीं किया है। उनके प्रभाव को सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनाया है। इस प्रकार के आन्दोलनों में ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ सरदार सरोवर बाँध के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण आन्दोलन रहा है। इस बाँध का निर्माण नर्मदा नदी पर विद्युत्त उत्पादन के लिये किया गया है। इसके अलावा एक बड़े क्षेत्र की सिंचाई करने में सहायता मिलेगी और सौराष्ट्र तथा कच्छ क्षेत्र के लोगों को पेय जल मिल सकेगा। परन्तु इसके विरोधी इस योजना से सहमत नहीं हैं और मेघा पाटेकर के नेतृत्व में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आन्दोलन शुरू कर दिया है। इस प्रकार के आन्दोलनों ने निश्चित रूप से सरकार को सभी मुद्दों पर विचार करने के लिए विवश कर दिया है।

Bihar Board Class 11 Political Science विकास Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘समतावादी समाज’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। Write short note on ‘Equalized Society’
उत्तर:
समतावादी समाज (Equalized Society):
जी.डी.एच. कोल के अनुसार समाजवाद भाईचारे की व्यवस्था पर बल देता है, जो वर्ग, जाति व वर्ग-विषयक भेदों को नकारती है, उनका खण्डन करती है। समाजवादी समाज में राजनीतिक शक्ति का उद्देश्य समाज का कल्याण होता है। समानता और स्वतन्त्रता पर बल दिया जाता है। सबको आजीविका कमाने के समान अवसर दिए जाते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम जीवन-स्तर की गारन्टी दी जाती है। इसमें यह मान्यता है कि समानता के बिना वास्तविक स्वतन्त्रता सम्भव नहीं हो सकती। बिना स्वतन्त्रता के सुरक्षा सम्भव नहीं है।

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प्रश्न 2.
समाजवादी समाज का क्या अर्थ है? (What is meant by Socialist Society?)
उत्तर:
श्री जयप्रकाश नारायण के अनुसार समाजवादी समाज एक ऐसा वर्गहीन समाज होता है, जिसमें व्यक्तिगत सम्पत्ति के लिए मजदूरों का शोषण नहीं होता, जिसमें समस्त सम्पत्ति राष्ट्र की होती है, जिसमें किसी को बिना किए कुछ नहीं मिलता, जहाँ आय की अधिक असमानताएँ नहीं होती, जिसमें मनुष्य जीवन की उन्नति योजनानुसार की जाती है और जिसमें सब सबके लिए जीवित रहते हैं। इस प्रकार के समाज में आर्थिक शक्ति कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रित नहीं होने दी जाती।

प्रश्न 3.
लोकतान्त्रिक समाजवाद से क्या अभिप्राय है? (What is meant by Democratic Socialism?) अथवा, लोकतान्त्रिक समाजवाद पर टिप्पणी लिखो। (Write a short note on Democratic Socialism)
उत्तर:
लोकतन्त्रीय समाजवाद उसे कहते हैं, जहाँ समाजवाद के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसा और क्रान्ति को छोड़कर लोकतान्त्रिक साधनों का प्रयोग किया जाता है। इसमें राज्य को व्यक्तिवादी तथा उदारवादियों की भाँति आवश्यक बुराई नहीं माना जाता और न ही अराजकतावादियों की भाँति अनावश्यक बुराई माना जाता है। वे तो राज्य को शुभ मानते हैं और इसका उपयोग जन-कल्याण में करना चाहते हैं। उनका लोकतन्त्र में पूर्ण विश्वास होता है।

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प्रश्न 4.
विकासवादी समाजवाद किसे कहते हैं? (What is Evolutionary Socialism?)
उत्तर:
लोकतन्त्रीय समाजवाद को ही विकासवादी समाजवाद कहते हैं। लोकतन्त्रीय देश कार्ल मार्क्स के विचारों से तो प्रभावित थे किन्तु ये देश अपना लोकतन्त्रीय स्वरूप समाप्त नहीं करना चाहते थे। इनके विचार में पूँजीवादी व्यवस्था में भी समानता की अधिक क्षमता विद्यमान है। वे सर्वहारा की तानाशाही में विश्वास नहीं करते थे। विकासवादी समाजवाद सभी नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक अधिकारों और न्याय की उपलब्धि कराता है। इनके विचार में राज्य एक कल्याणकारी संस्था है। लोकतान्त्रिक समाज का मूलमंत्र क्रमिक विकास है।

प्रश्न 5.
समाजवाद के पक्ष में कोई चार तर्क दीजिए। (Give any four arguments in favour of Socialism)
उत्तर:
समाजवाद के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Socialism):

  1. समाजवाद न्याय का समर्थक है। व्यापार व उद्योग-धंधों का राष्ट्रीयकरण करके यह सभी व्यक्तियों को समान उन्नति का अवसर उपलब्ध कराता है।
  2. बिना समाजवाद के प्रजातन्त्र अर्थहीन है। जब तक आर्थिक प्रजातन्त्र की स्थापना नहीं होती, राजनैतिक प्रजातन्त्र सम्भव नहीं हो सकती।
  3. समाजवादी व्यवस्था अधिक वैज्ञानिक है।
  4. समाजवादी आर्थिक अपव्यय को रोकता है, क्योंकि इसमें उत्पादन के लिए प्रतियोगिता का नहीं, सहयोग का सिद्धान्त अपनाया जाता है।

प्रश्न 6.
‘समाजवाद का उदय पूँजीवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ।’ इस कथन पर टिप्पणी लिखो। (“’Socialism emerged as a reaction of Capitalism.” Comment)
उत्तर:
समाजवाद वास्तव में “पूँजीवाद व आर्थिक असमानता” के विरोध में विकसित हुआ। यूरोप में आद्योगिक विकास ने श्रमिकों के जीवन को नरक बना दिया था। पूँजीवादी उनका शोषण कर रहे थे। अहस्तक्षेप की नीति के कारण श्रमिकों की दशा बिगड़ने लगी। कुछ विचारशील लोगों का ध्यान उनकी दुर्दशा की ओर गया और पूँजीवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई। व्यक्ति के स्थान पर समाज को महत्त्व दिया जाने लगा।

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प्रश्न 7.
मुक्त उद्यम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मुक्त उद्यम (Free enterprise):
बाजार अर्थव्यवस्था मुक्त उद्यम पर आधारित है। इसमें उद्योगपति को उद्योग प्रारम्भ करने, उनकी वृद्धि करने, उनमें पूँजी निवेश करने आदि की पूरी छूट होगी। इस कार्य के लिए उन्हें सरकार से किसी प्रकार के लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी। सरकार केवल कुछ उद्योगों को अपने पास रखती है। इनमें भी वह निजी उद्यमियों से सहयोग प्राप्त कर सकती है।

प्रश्न 8.
मुक्त व्यापार से क्या आशय है? (What did you mean by free trade?)
उत्तर:
मुक्त व्यापार (Free Trade):
बाजार अर्थव्यवस्था मुक्त व्यापार पर आधारित होती है। इसकी मान्यता है कि विश्व को एक बाजार समझा जाए और उसमें सभी देशों को मुक्त रूप से व्यापार करने की सुविधा हो अर्थात् विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले आयात व निर्यात करों से व्यापार प्रतिबन्धित न हो। सामान्यतः सभी देशों में सरकारें अपने उद्योगों को संरक्षण देने के लिए तथा अपने आय के स्रोत के रूप में करों का प्रावधान करती है। बाजार अर्थव्यवस्था ऐसे करों को उदारीकरण के विरुद्ध मानती है, क्योंकि इनसे कीमतों में माँग व पूर्ति द्वारा अवरोध उत्पन्न होता है।

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प्रश्न 9.
विकास क्या है? (What is development?)
उत्तर:
वर्तमान के भौतिकवादी युग में विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास से ही लगाया जाता है, जबकि भारत के सन्दर्भ में यह भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही रहा है।

प्रश्न 10.
तृतीय विश्व क्या है। (What is third world?)
उत्तर:
भौतिक विकास की दिशा में प्रयत्नशील देशों को अनेक नामों से पुकारा जाता है, जैसे-विकासशील देश, उभरते हुए राष्ट्र, तृतीय विश्व के देश आदि।

प्रश्न 11.
विकास के तीन उद्देश्य लिखिए। (Write three objectives of development)
उत्तर:

  1. दरिद्रों के न्यूनतम जीवन को जीवन स्तर तक (Minimum Living Standard) लाना।
  2. बेरोजगारी की समस्या को दूर करना।
  3. विकास प्रक्रिया को लोकतान्त्रिक पद्धति से चलाना।

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प्रश्न 12.
समाजवाद की परिभाषा दीजिए और इसका अर्थ समझाइए। (Define Socialism and discuss meaning)
उत्तर:
समाजवाद की परिभाषा-समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती। विभिन्न विचारकों ने इसकी परिभाषा भिन्न-भिन्न प्रकार से दी है –
1. हमफ्री के शब्दों में, “समाजवाद एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत जीवन के साधनों पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व होता है और पूरा समाज सामान्य जन-कल्याण के उद्देश्य से विकास और प्रयोग करता है।”

2. राबर्ट के अनुसार, “समाजवाद के कार्यक्रम की माँग है कि सम्पत्ति तथा उत्पादन के अन्य साधन जनता की सामूहिक सम्पत्ति हो और उसका प्रयोग भी जनता के द्वारा जनता के लिए ही किया जाए।” इस प्रकार समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है, जो समानता पर आधारित है और जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण समाज का हित है। यह विचारधारा देश की सम्पत्ति तथा उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व को समाप्त करके उस पर सम्पूर्ण समाज का नियन्त्रण चाहती है।

प्रश्न 13.
समाजवाद के दो मूल सिद्धान्त बताइए। (Mention two basic principles of Socialism)
उत्तर:
समाजवाद के दो मूल सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

1. पूँजीवाद का विरोध (Opposition of Capitalism):
समाजवाद पूँजीवाद का विरोध करता है। समाज के हित को अधिक महत्त्व देता है। उत्पादन तथा वितरण के सभी साधनों पर समाज का नियन्त्रण होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजवाद के किन्हीं दो गुणों का उल्लेख कीजिए। (Mention any two merits of Socialism)
उत्तर:
समाजवाद के गुण (Merits of Socialism):

1. समाजवाद आर्थिक समानता पर बल देता है (Socialism consists of Economic Equality):
समाजवादी चाहते हैं कि सभी को रोजगार के अवसर सुलभ हो, राष्ट्रीय सम्पत्ति का उचित बँटवारा हो और सभी को विकास का उचित अवसर मिले। समाजवाद में प्रत्येक व्यक्ति को श्रम करना आवश्यक है। उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व रहता है और इन साधनों का सार्वजनिक हित के लिए उपयोग किया जाता है।

2. समाजवाद अधिक प्रजातन्त्रीय है (Socialism is more democratic):
विद्वानों का कहना है कि बिना समाजवाद के प्रजातन्त्र अस्वाभाविक और अर्थहीन है। वास्तव में समाजवाद प्रजातन्त्र का पूरक हैं। यह राज्य के लोकतांत्रिक स्वरूप में विश्वास रखता है। यह मताधिकार का विस्तार करके संसद में बहुमत प्राप्त दल को सरकार बनाने का अधिकार देने के पक्ष में है। अतः जनता का हित साधन होता रहता है।

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प्रश्न 2.
समाजवाद के दो प्रमुख दोष बताइए। (What are the two main shortcomings of Socialism?)
उत्तर:
समाजवाद के दोष (Short comings of Socialism)

1. कार्य करने की प्रेरणा का अन्त हो जाता है (No incentives to work):
समाजवाद में क्योंकि सभी कार्य सरकार की इच्छा पर निर्भर होते हैं। अत: व्यक्ति को उनके बारे में सोचने, उनकी योजना बनाने, उनमें पहल करने आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। व्यक्ति एक मशीन बनकर रह जाता है और उसकी कार्य करने की प्रेरणा का अन्त हो जाता है।

2. सरकार सभी उद्योग-धंधों का भली प्रकार प्रबन्ध नहीं कर सकती है (All that is managed by the State is not well managed):
समाजवादी व्यवस्था में राज्य का कार्यक्षेत्र बहुत बढ़ जाता है। बहुत अधिक कार्यों के भार से कई बुराईयाँ पैदा हो जाती हैं। सरकार के लिए सभी उद्योग-धंधों का संचालन करना आसान नहीं है। प्रबन्धन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारण भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रमों की हालत खराब हुई है।

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प्रश्न 3.
विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के क्या लाभ होते हैं? (What are the advantages of decentralised economy)
उत्तर:
जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया तथा रॉजर गॉरोड़ी ने अर्थव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण पर अत्यधिक बल दिया है। केन्द्रीयकृत नियोजन आर्थिक विकास की एक ऐसी एकरूपी व्यवस्था निर्मित करता है, जो वैयक्तिक आकांक्षाओं की स्थानीय विविधता पर पूरा ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाती। उत्पादन के बारे में निर्णय का अधिकार एक स्थान पर केन्द्रित न करके यह अधिक लाभदायक होगा। यदि उसे कई केन्द्रों में विभाजित् कर दिया जाए और प्रत्येक केन्द्र अपने क्षेत्र के लोगों की आवश्यकताओं तथा उपलब्ध साधनों को सामने रखकर निर्णय करें। केन्द्रीयकृत अर्थव्यवस्था में वास्तविक शक्ति नौकरशाही के हाथों में चली जाती है, जनता के हाथों में नहीं। आज लोकतन्त्र का युग है और अर्थव्यवस्था का विकेन्द्रीकरण उसका आधार है।

प्रश्न 4.
पूँजीवाद के उदय और विकास के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में समाजवाद का उदय हुआ था। इस कथन की समीक्षा कीजिए। (Socialism emerged as a reaction to the rise and development of capitalism Discuss)
उत्तर:
समाजवाद वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक आन्दोलन है। यह पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था को समाप्त करके, उत्पादन तथा विवरण के साधनों पर समाज के नियन्त्रण का समर्थक है, जिसमें आर्थिक समानता की स्थापना हो। समाजवाद का उदय पूँजीवाद के उदय और विकास के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप प्रकट हुआ था। अहस्तक्षेप (Leissezfaire) के सिद्धान्त ने समाज में गम्भीर संकट पैदा कर दिया था। स्वतन्त्र प्रतियोगिता के कारण विसंगतियाँ प्रकट होने लगी थीं।

आर्थिक शक्ति का केन्द्र होने के कारण अमीर और गरीब का भेद बढ़ता जा रहा था। अधिकांश लोगों की जरूरी आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो रही थी। उद्योगपति पूँजी के बल पर अपने हित साधन में ही लगे हुए थे। इस कारण समाज में अव्यवस्था फैलने लगी और समाज पर जंगल का कानून लागू होने का डर लोगों को सताने लगा था। इस प्रकार स्वयं पूँजीवाद ने उद्यमियों की स्वतन्त्रता को परिसीमित किया है। धीरे-धीरे समाजवाद विकसित होने लगा। व्यक्ति के स्थान पर समाज के कल्याण की बात आई और व्यापार व उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता अनुभव की गई। इस प्रकार पूँजीवाद के उदय और विकास के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप समाजवाद का अभ्युदय हुआ।

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प्रश्न 5.
संसदीय समाजवाद से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by Parliamentry Socialism?)
उत्तर:
समाजवाद के विभिन्न रूप हैं। इनमें से कुछ हिंसा के माध्यम से समाजवाद लाना चाहते हैं। जैसे-साम्यवाद, मार्क्सवाद तथा श्रमिक संघवाद दूसरी ओर विकासवादी समाजवादी हिंसा के माध्यम से समाजवाद स्थापित न करके धीरे-धीरे जन जागरण के माध्यम से समाजवाद स्थापित करना चाहते हैं। संसदीय समाजवाद इन्हीं में एक है।

संसदीय समाजवाद इंग्लैंड के मजदूर दल (Labour Party) की देन है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि समाजवाद की स्थापना के लिए संसदीय पद्धति के मार्ग को अपनाता है। इसका संविधान उपायों में अटल विश्वास रखता है। संसदीय पद्धति के माध्यम से यह न केवल मजदूरों बल्कि अन्य कमजोर वर्गों की मांगों को पूरा करने में विश्वास रखता है। यह समाजवादी पुनर्निर्माण के लिए भी आश्वस्त है। यह दृष्टिकोण मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के स्थान पर मानव बन्धुत्व में आस्था प्रकट करता है और सभी वर्गों को संतुष्ट करने की बात कहता है।

प्रश्न 6.
विकास के उदारवादी लोकतान्त्रिक मॉडल का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विकास के उदारवादी लोकतान्त्रिक मॉडल का अर्थ-पश्चिम के विकसित राष्ट्रों में उदारवादी लोकतन्त्र एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति है उदारवादी विचारधारा व्यक्ति को समाज की तुलना में उच्च नैतिक मूल्य प्रदान करती है। उदारवादी लोकतन्त्र में श्रमिकों को पर्याप्त पारिश्रमिक सम्मानपूर्ण जीवन, निजी संपत्ति के अधिकार अर्थव्यवस्था पर बाजारवाद का प्रभाव उत्पादन एवं वितरण के साधनों निजी शक्तियों द्वारा नियन्त्रण, बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी असमानता की स्थिति में राज्य द्वारा लोकतान्त्रिक भावना के अनुरूप है।

प्रश्न 7.
मानव विकास के चार तत्त्वों का उल्लेख करें।
उत्तर:
मानव विकास का अर्थ है व्यक्ति के विकास के लिए बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करना। मानव विकास के चार तत्त्व हैं – साक्षरता, शैक्षिक स्तर, आयु-सम्भाविता और मातृ मृत्युदर। मानव विकास के इन चार तत्त्वों के अलावे भी अनेक तत्त्व हैं। जैसे-भोजन, वस्त्र एवं आवास जिसको प्राप्त करने का प्रयास प्रत्येक राज्य करता है।

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प्रश्न 8.
स्थायी या सतत् विकास किसे कहते हैं? (What is sustainable development?)
उत्तर:
स्थायी विकास के लिए पर्यावरण तन्त्र और औद्योगिक तन्त्र के मध्य सही सम्बन्ध तथा संयोजन की आवश्यकता है। विकास के नाम पर औद्योगीकरण ने पर्यावरण को दूषित किया है। विकास के लिए आर्थिक रूप और नीतियों का निर्धारण होना चाहिए। मनुष्य के लिए पर्यावरण प्रदूषण को रोकते हुए विकास के कार्यक्रम किए जाने चाहिए। अधिक प्रभावी देशों में जीवन शैली के साथ-साथ जीव-जन्तु और मानव को पर्यावरण प्रदूषण से बचाए रखने का प्रयास होना चाहिए। पर्यावरण को विकास नीतियों के साथ प्रबन्ध के स्तर पर जोड़ दिया जाना चाहिए। वास्तव में पर्यावरण और विकास नीति एक दूसरे के पूरक हैं। स्थायी विकास तभी सम्भव है।

प्रश्न 9.
“विकास का आधार प्राकृतिक दोहन होना चाहिए न कि शोषण।” (The base of development is natural utilisation not the exploitation. Explain)
उत्तर:
भौतिकवादी जगत की मान्यता है कि विश्व में जो भी कुछ है वह उसके उपयोग के लिए है और जितना अधिक उपयोग किया जा सकता है उतना ही भौतिक सुख प्राप्त किया जा सकता है। इसी कारण पश्चिम के लोग प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर शोषण कर रहे हैं। वह भूल जाते हैं कि ईश्वर ने विश्व में मानव, पशुओं; कीट, पतंग, प्रकृति की प्रत्येक वस्तु आदि सभी का सन्तुलन स्थापित किया है। मानव जाति से प्रकृति का उतना ही उपयोग करने की आशा की जाती है जितनी उसकी आवश्यकता है।

अधिकतम उपभोग की प्रकृति देने की शक्ति को कम कर देता है। अधिकतम उपयोग से प्रकृति का विनाश होता है और उसके कारण मानव को अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। वर्तमान में हम इसका अनुभव कर रहे हैं। एक ओर प्रकृति की सम्पदा समाप्त हो रही है और दूसरी ओर प्राकृतिक प्रकोपों से मानव भयभीत है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि प्रकृति की देन की शक्ति बनाए रखने तथा प्राकृतिक प्रकोपों से बचने के लिए प्रकृति का शोषण न करके उसका मात्र दोहन किया जाए। विकास के लक्ष्य निर्धारण का यह महत्त्वपूर्ण आधार है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 10 विकास

प्रश्न 10.
कल्याणकारी राज्य की कोई विशेषताएँ बताइए। (Mention two features of a welfare state)
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

  1. कल्याणकारी राज्य का तात्पर्य उस राज्य से है, जो जन-कल्याण को ध्यान में रखकर अपनी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का निर्धारण करता है। यह समाज के कमजोर वर्गों की सेवाएँ तथा वस्तुएँ सुलभ कराने का सामाजिक दायित्व स्वयं वहन करता है। इसका कार्यक्रम काफी विकसित होता है।
  2. कल्याणकारी राज्य की संरचना स्वायत्तता पर आधारित होती है। यह सामाजिक न्याय तथा समानता के प्रति समर्पित होता है।
  3. कल्याणकारी राज्य सामान्य इच्छा का समर्थक है। यह जाति, वर्ण, साम्प्रदायिक विचारों तथा मान्यताओं से ऊपर उठने की क्षमता रखता है।

प्रश्न 11.
श्रेणी समाजवाद पर टिप्पणी लिखिए। (Write a short not on Guild Socialism)
उत्तर:
श्रेणी समाजवाद, समाजवाद का अंग्रेजी संस्करण है। इस विचारधारा का जन्म इंग्लैंड में हुआ। श्रेणी समाजवाद का उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें वेतन प्रणाली का उन्मूलन कर उद्योगों में मजदूरों की स्वायत्त सरकार की स्थापना की जाएगी, जो राष्ट्रीय श्रेणी संघों द्वारा एक प्रजातन्त्रात्मक प्रणाली पर चलती हुई समाज के अन्य व्यवहारिक संघों के साथ मिलकर कार्य करेगी। श्रेणी समाजवादी की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. उत्पादन के साधनों पर मजदूरों का नियन्त्रण होना चाहिए।
  2. यह एक मध्यममार्गी विचारधारा है, न तो यह पूरी सत्ता मजदूरों के हाथ में देना चाहता है और न ही सम्पूर्ण सत्ता उत्पादकों को देने के पक्ष में है।
  3. श्रेणी समाजवाद पूँजीवादी व्यवस्था का घोर विरोध करता है।
  4. श्रेणी समाजवाद प्रजातन्त्र और प्रादेशिक प्रतिनिधित्व की निन्दा करता है।
  5. श्रेणी समाजवाद व्यावसायिक प्रतिनिधित्व चाहता है।
  6. श्रेणी समाजवाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण का समर्थक है।

वास्तव में समाज में किसी कार्य विशेष को उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से सम्पन्न करने के लिए संगठित और परस्पर निर्भर व्यक्तियों का एक स्वायत्त समुदाय ही श्रेणी है। इन श्रेणियों का उद्देश्य समस्त राज्य की सेवा करना है। प्रत्येक स्तर पर श्रेणी के सदस्य अपनी श्रेणी के संचालन के लिए अधिकारियों और समितियों आदि का चुनाव करेंगे और ऊपर की श्रेणियों के सदस्य नीचे की श्रेणियों द्वारा निर्वाचित और उनके प्रति उत्तरदायी होंगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाजार अर्थव्यवस्था के गुण-दोष संक्षेप में लिखें। (Write merits and demerits of market economy)
उत्तर:
I. गुण (Merits):
बाजार अर्थव्यवस्था के गुणों को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –

  • तकनीक का सुदृढ़ विकास-वस्तु की गुणवत्ता बढ़ाने तथा बड़े पैमाने पर उत्पादन के दृष्टिकोण के कारण उद्योगों में नई-नई तकनीकी के अनुसन्धानों की व्यवस्था की जाती है, जिससे देश में तकनीकी का विकास होता है।
  • उपभोक्ता की पसन्द-यह अर्थव्यवस्था ग्राहक या उपभोक्ता की पसन्द पर अधिक ध्यान देती है। अतः बाजार में ग्राहक को मनपसन्द सन्तुलित कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती हैं।
  • उत्तम वस्तु का उत्पादन-इस अर्थव्यवस्था में प्रत्येक उत्पादक दूसरे उत्पादकों की तुलना में अधिक उत्तम वस्तु का उत्पादन करना चाहता है, जिससे बाजार में उसकी माल की माँग बढ़े।
  • लोकतान्त्रिक पद्धति पर आधारित-बाजार अर्थव्यवस्था पूरी तरह लोकतान्त्रिक है। प्रत्येक व्यापारी व उद्योगपति को बिना बन्धनों के विकास करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
  • कीमतों में सन्तुलन-कीमतों में सन्तुलन इस व्यवस्था का सर्वोत्तम गुण है। कोई भी उत्पादक मनचाही कीमत नहीं रख सकता। अन्य उत्पादों की कीमतों में सन्तुलन बनाए रखने योग्य कीमतें निर्धारित की जाती है।
  • आय में वृद्धि-बाजार की अर्थव्यवस्था में भाग लेने के कारण व्यापार व उद्योग की वृद्धि से सरकार को करों के रूप में धन प्राप्त होता है। सरकार यह धन समाज सेवा व समाज सुरक्षा के कार्यों पर व्यय कर सकती है।
  • निजी क्षेत्र का उपयोग-यह व्यवस्था निजी क्षेत्र में विद्यमान प्रतिभा व साधनों को देश के लिए उपयोग को सम्भव बनाती है। स्वार्थ के जुड़ जाने से समाज का उद्यमी वर्ग देश की समृद्धि में हाथ बँटाता है।

II. हानियाँ (Demerits):
बाजार अर्थव्यवस्था का एक रूप यह भी है, जो अधिक भयावह है। इस व्यवस्था की हानियों को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –

  • उदारीकरण का दुष्परिणाम-बाजार अर्थव्यवस्था उदारीकरण की नीति पर आधारित होती है। इसमें विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने विशाल स्रोतों के माध्यम से नवोदित राष्ट्रों से अधिक लाभ कमाने के लिए आती है। उदारीकरण विकसित देशों के हितों का सन्वर्धन करता है, क्योंकि इन देशों के भारी मात्रा में उत्पाद को नवोदित राष्ट्रों की विशाल जनसंख्या का बाजार प्राप्त हो जाता है।
  • विदेशी मुद्रा भी प्राप्त नहीं होती-नवोदित राष्ट्र विदेशी मुद्रा के लालच में जिन कम्पनियों को आमन्त्रित करते हैं, वे कम्पनियाँ कम से कम मुद्रा का नवोदित राष्ट्रों को लाभ होने देती हैं। वे अधिकांश अपने उन्हीं देशों में जाकर आकर्षक भाव पर जनता से प्राप्त करके अपना कारोबार करती है।
  • निजी लाभ की प्राप्ति-बाजार अर्थव्यवस्था के मूल में निजी लाभ की प्राप्ति करना पाया जाता है। उद्योगपति ऐसे उद्योगों में रुचि लेते हैं, जिनमें लाभ की सम्भावनाएँ अधिक हों। वे ऐसी वस्तुओं का उत्पादन कभी नहीं करना चाहेंगे, जो कम लाभ दे और समाज के दुर्बल वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति करें।
  • तकनीक का आयात नहीं हो सकता-नवोदित राष्ट्र विदेशी आधुनिक तकनीक के आयात के लिए तत्पर रहते हैं। इसी कारण वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आमन्त्रित भी करते हैं, किन्तु ये कम्पनियाँ पाश्चात्य देशों में पुरानी पड़ गई तकनीक को हस्तान्तरित करती हैं और उसी पर आधारित मशीनरी का निर्यात करती हैं।

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प्रश्न 2.
विकास के प्रमुख उद्देश्यों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। (Explain in brief the main objectives of development)
उत्तर:
विकास के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते समय सामान्यतः विकासशील देशों का गरीब वर्ग ही दृष्टि में आता है, किन्तु वास्तव में पश्चिम के धनी देशों की स्थिति भी इस दृष्टि से कुछ अच्छी नहीं है। वहाँ भी व्यक्तिवादी पूँजीवादी व्यवस्था ने एक बड़े वर्ग को आर्थिक दृष्टि से निर्धन बनाया है। वहाँ के प्रत्येक देश में एक अथवा अधिक उपेक्षित वर्ग देखने को मिल जाएंगे, जिनके पास देश का समृद्धि का कुछ भी अंश नहीं पहुँच पाता है और वहाँ की समृद्धि की तुलना में ये वर्ग स्वयं को गरीब पाते हैं। अतः विकास के उद्देश्यों पर विचार करते समय विकसित देशों के इन वर्गों का भी अध्ययन करना समीचीन होगा।

पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि में विश्व के सभी देशों के सामान्य लोग अब आवश्यक वस्तुओं के साथ-साथ विलास की वस्तुओं का भी उपयोग करने लगे हैं। अर्थात् वर्तमान में आर्थिक दृष्टि से दुर्बल व सबल वर्गों की अवधारणा अब अदृश्य होती जा रही है। वास्तव में इन पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि पश्चिम के धनी समाजों तक सीमित है। उन्होंने विकासशील देशों के आर्थिक दृष्टि से दरिद्र लोगों को अपने अध्ययन का केन्द्र बनाया ही नहीं है। विकास के उद्देश्यों को निर्धारित करते समय विश्व के निर्धन लोगों को आधार बनाना आवश्यक है। इन उद्देश्यों का निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया जा सकता है –

1. अन्त्योदय (Development of the last Man):
हम कह सकते हैं कि विकास का कार्य कहाँ से प्रारम्भ किया जाना उचित है। वास्तव में विकास के महत्त्व को तभी समझा जा सकता है, जबकि समाज का निर्धन व्यक्ति विकास की योजना का लाभ प्राप्त कर सके। अतः विकास का लक्ष्य अन्त्योदय होना चाहिए। यदि लक्ष्य अन्त्योदय नहीं रखा गया, तो समाज का विकास तो होगा, किन्तु विकास का लाभ धनी व सामान्य निर्धन वर्ग को ही प्राप्त होगा। अत्यन्त निर्धन तथा निर्धन समाज के अन्त के व्यक्ति की विकास में कोई भागीदारी सम्भव नहीं होगी।

2. जीवन का न्यूनतम स्तर (Minimum Living Standard):
विकास का पहला उद्देश्य दरिद्र लोगों को जीवन के ऐसे न्यूनतम स्तर की प्राप्ति करना चाहिए, जिसमें न केवल नितान्त आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हो बल्कि उनके सुखा सुविधा की भी व्यवस्था हो सके। उन्हें व सामान्य परिस्थितियाँ प्राप्त हों, जिनमें उनकी प्रतिभा के विकास के अवसर विद्यमान हों तथा उनकी कार्यकुशलता को बढ़ाया जा सके।

3. Michalot Here for art facire (Development through Democratic Method):
यह उचित है कि अधिनायकवादी देशों में विकास की गति तीव्र होती है और अधिनायक विकास की जो दिशा निश्चित करता है, उसी दिशा में विकास होता है। भय व आतंक के कारण विकास में किसी प्रकार का अवरोध नहीं होता, किन्तु ऐसे देशों में जन सहयोग के अभाव में न विकास के लाभ का सही वितरण हो पाता है और न ही ऐसे विकास में जनता की रुचि जागृत होतो है।

साम्यवादी देशों के विकास की स्थिति से विश्व भली-भाँति परिचित है कि वहाँ विकास के प्रतिमानों का कितना बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार हुआ, जबकि वास्तविकता इसके सर्वथा विरुद्ध थी। लोकतन्त्र में विकास जनसहयोग से होता है, यह विकास खुला तथा जन हिताय होता है। किसी विशिष्ट वर्ग के लिए किए जाने वाले विकास का लोकतान्त्रिक पद्धति में विरोध होता है।

4. बेरोजगारी की समस्या का हल (Solution of the Problem of Unemployment):
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर मशीनों की सहायता से उत्पादन किया जाता है। इस कारण जिन देशों में जनसंख्या अधिक है वहाँ बेरोजगारी की समस्या का गम्भीर रूप प्रकट हुआ है।

अब तो स्थिति यह है कि पूँजीवादी समृद्ध देशों में, जिनमें अमेरिका व इंग्लैंड भी सम्मिलित हैं, बेरोजगारी की समस्या विकट रूप में सामने आ रही है। यद्यपि कुछ देशों ने अपने बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ते प्रारम्भ किया है, किन्तु यह समस्या का निदान नहीं है। भारत में भी कुछ राज्य बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं। विकास के लक्ष्यों का निर्धारण करते समय बेरोजगारी दूर करने के लक्ष्य को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक देश अर्थव्यवस्था के स्कम का निर्धारण अपने यहाँ के साधनों की प्राप्ति को ध्यान में रखकर करें।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विकास सम्बन्धी मॉडलों का प्रभाव निम्न में से सबसे ज्यादा किस पर पड़ा?
(क) पर्यावरण एवं समाज पर
(ख) व्यक्ति एवं कृषि पर
(ग) मानव एवं सभ्यता पर
(घ) शिक्षा एवं संस्कृति पर
उत्तर:
(क) पर्यावरण एवं समाज पर

प्रश्न 2.
जून 1992 में पर्यावरण और विकास विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया –
(क) जेनेवा
(ख) रियो द जेनेरो
(ग) टोकियो
(घ) न्यूयार्क
उत्तर:
(ख) रियो द जेनेरो

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प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्रसंघ की विश्व जल विकास सम्बन्धी प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ –
(क) मई 2007
(ख) अप्रैल 2006
(ग) मार्च 2006
(घ) फरवरी 2005
उत्तर:
(क) मई 2007

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 9 शांति

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 9 शांति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 9 शांति

Bihar Board Class 11 Political Science शांति Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
क्या आप जानते हैं कि एक शांतिपूर्ण दुनिया की ओर बदलाव के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है? क्या मस्तिष्क शान्ति को बढावा दें सकता है? और, क्या मानव मस्तिष्क पर केन्द्रित रहना शांति स्थापना के लिए पर्याप्त है?
उत्तर:
यह सही कहा जाता है कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है बल्कि व्यक्ति की सोच ऐसा बताती है। इसलिए यह सोचने का ढंग ही है जिससे तनाव या शान्ति होती है। यह सोच ही किसी कार्य का कारण बनती है। सोच आत्मा की उपज है और आत्मा आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों से उत्पन्न और प्रभावित होती है। अंततः वातावरण में यदि सुधार और संशोधन किया जाए तो स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण हो सकता है जिससे सकारात्मक सोच उत्पन्न हो सकती है। व्यक्ति के व्यवहार के निर्माण में मस्तिष्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शान्ति से सम्बन्धित सभी अध्ययन आत्मा, मस्तिष्क और व्यक्ति के व्यवहार की आवश्यकता को मंडित किया है।

गौतम बुद्ध ने बताया, “सभी गलत कार्य मस्तिष्क से उत्पन्न होते हैं। यदि मस्तिष्क को परिवर्तित कर दिया जाए तो गलत कार्य को खत्म किया जा सकता है।” दार्शनिक रूप से ये दोनों काम हुए है अर्थात् अच्छाई और बुराई, हिंसा और अहिंसा, तनाव और शान्ति। पूर्ण शान्ति या अशान्ति या हिंसा परिवर्तनीय है। ऐसे में जरूरत है कि आत्मा और व्यक्ति का व्यवहार इस प्रकार बनाया जाय, सामाजिक, आर्थिक वातावरण को वह रूप दिया जाए कि यह शान्ति के लिए तैयार हो जाए।

विश्व दो पराकाष्ठा की स्थिति में जीवित नहीं रह सकता। वस्तुतः सामान्य वातावरण के साथ सामान्य जीवन की ही आवश्यकता होती है। केवल कुछ दार्शनिकों ने सामाजिक पराकाष्ठा के विषय में सोचा या बात की। हिंसा को रोका और नियंत्रित किया जाना चाहिए जिससे अच्छा व्यवहार और अच्छा वातावरण लाया जा सके। यदि वातावरण अच्छा है तो इससे मस्तिष्क अच्छा होगा जिससे अच्छा व्यवहार उत्पन्न होगा और अंततः शान्ति स्थापित होगी।

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प्रश्न 2.
राज्य को अपने नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा अवश्य ही करनी चाहिए। हालाँकि कई बार राज्य के कार्य इसके कुछ नागरिकों के खिलाफ हिंसा के स्रोत होते हैं। कुछ उदाहरणों की मदद से इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
यदि हम राज्य की प्रकृति और उत्पत्ति के इतिहास में झांके तो राज्य के विषय में विभिन्न कालों में विभिन्न विचाराकों द्वारा विभिन्न अवधारणाएँ दी गई हैं। मूलरूप से अरस्तू. राज्य को एक कल्याणकारी संस्था मानता था। सामाजिक विचारक राज्य के कानून और सम्पत्ति को कायम रखने और लोगों के जीवन तथा सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए मानते थे।

आधुनिक राज्य को भी कानून और व्यवस्था बनाये रखने वाला और आवश्यक कार्य के रूप मे जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा करना माना जाता है। इसके अलावा उसके वैकल्पिक कार्य, विकास करना और कल्याण करना है। राज्य एक प्रभुता संपन्न संस्था है जिसे लोगों की भलाई में निर्णय लेने, कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आदेश जारी करने और लोगों के जीवन की रक्षा करने का पूर्ण अधिकार और उसका अंतिम उत्तरदायित्व भी है।

अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए राज्य कोई भी आवश्यक कार्य या निर्णय ले सकता है जिसे राज्य आवश्यक समझता है। कभी-कभी राज्य के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह गलत लोगों, आक्रमणकारी ओर कानून तोड़ने वालों की हिंसात्मक कार्यवाही रोकने के लिए दण्ड दे। यह माना जाता है कि अपराधियों के विरुद्ध गलत कार्यों के लिए राज्य कठोर कदम उठाए परन्तु यह वैधानिक नियमों और न्याय की. सीमा में होना चाहिए। जब राज्य नियमों का उल्लंघन करता है तो यह राज्य का अतिक्रमण कहलाता है। आधुनिक शब्दावली में यह राज्य का आतंकवाद कहलाता है। पुलिस और सेना को विभिन्न। कार्यों को करना पड़ता है जिससे कानून और व्यवस्था कायम किया जा सके।

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प्रश्न 3.
शान्ति को सर्वोत्तम रूप में तभी पाया जा सकता है जब स्वतंत्रता, समानता और न्याय कायम हो। क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
उत्तर:
यह सही है कि शान्ति के आवश्यक अवयव-स्वतंत्रता, समानता और न्याय हैं। इतिहास में इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि जब सभी स्वतंत्रता, समानता और न्याय का लोप हुआ है वहाँ शान्ति भी लुप्त हो जाती है। असमानता, अन्याय गुलामी से तनाव और संघर्ष उत्पन्न होता है जिससे स्वाभाविक रूप से आशान्त वातावरण उत्पन्न हो जाता है। परम्परागत जाति प्रथा धार्मिक शासन पर आधारित थी जिससे कुछ समूह के लोग अस्पृश्य घोषित कर दिए जाते थे और उनका सामाजिक बहिष्कार होता था और उन्हें निकृष्ट प्रकार का माना जाता था। यह गंभीर समस्या असमानताओं, अन्याय और परतंत्रता पर आधरित था। इन असमानताओं से अंततः तनाव और संघर्ष पैदा होता था। जिससे शान्ति की उपेक्षा होती थी।

इसी प्रकार महिलाएँ पुरुष प्रधानता की शिकार थीं। उससे संबधित अनेक बुराईयों का बोलबाला था जो महिलाओं के विरुद्ध व्यवस्थित अधीनता और भेदभाव उत्पन्न करती थी। महिलाओं का बुरी तरह शोषण होता था और उनकी स्वतंत्रता, न्याय और समानता की उपेक्षा की जाती थी।

उपनिवेशवाद एक अत्यन्त बुरी विचारधारा थी जिसमें लम्बी और प्रत्यक्ष गुलामी शोषण और अन्याय भरा पड़ा था। फलस्वरूप अनेक विद्रोह हुए और शान्ति भंग हुई। इसी प्रकार जातीयता और सम्प्रदायवाद से भी अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हुई और इससे सम्पूर्ण जातीय समूह या समुदाय दमन का शिकार हुआ। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सम्पन्नता का आधार समानता, न्याय और स्वतंत्रता है। यदि इनमें किसी को लुप्त कर दिया जाए तो शान्ति को खतरा उत्पन्न हो सकता है।

प्रश्न 4.
हिंसा के माध्यम से दूरगामी न्यायोचित उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता। आप इस कथन के बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर:
यह कथन सर्वथा सत्य है। हिंसा हमें पत्राचार की ओर ले जाती है अंततः उद्देश्य से दूर ले जाती है। यह सहिष्णुता और अहिंसा है जो न्याय को प्राप्त करने में सहायता करती है। कभी-कभी यह भी कहा जाता है कि हिंसा कुछ उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता करती है। हिंसा कुछ परिस्थितियों में आवश्यक हो जाती है। परन्तु यह स्थाई लक्षण. नहीं है। हिंसा से स्थायी शान्ति नहीं प्राप्त की जा सकती। केवल अहिंसा के द्वारा स्थायी शान्ति आ सकती है। यही कारण है कि अहिंसा के समर्थक शान्ति को एक सर्वोच्च मूल्य मानते हैं। वे हिंसा के विरुद्ध अन्याय में भी नैतिक मार्ग को अपनाते हैं। वे हिंसात्मक आन्दोलनों के विरोध की वकालत करते हैं। परन्तु प्रेम और सहनशीलता के प्रयोग को बढ़ावा देते हैं। वे हृदय परिवर्तन के द्वारा हिंसा को रोकना चाहते हैं। वे हिंसा को अन्तिम साधन मानते हैं।

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प्रश्न 5.
विश्व में शान्ति स्थापना के जिन दृष्टिकोणों की अध्याय मे चर्चा की गई है उनके बीच क्या अंतर है?
उत्तर:
शान्ति को कायम रखने और उसके अनुभवीकरण (Realisation) के लिए अनेक उपागम किए गए हैं। इनमें तीन मुख्य उपागम निम्नलिखित हैं –
1. प्रथम उपागम:
यह राज्य पर जोर देता है और उसकी पवित्रता का सम्मान करता है। जीवन के तथ्य के रूप मे लोगों में प्रतियोगिता होती है। इसका संबन्ध प्रतियोगिता के उचित प्रबन्धन एवं शान्ति के लिये उचित संतुलन स्थापित करना है।

2. द्वितीय उपगम:
द्वितीय उपागम अति लूट वाले राज्य पर ध्यान केद्रित करता है। परन्तु सामाजिक आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

3. तृतीय उपागम:
इसमें इतिहास के बीते कालों पर विचार किया जाता है । यह शांति के सुनिश्चितता के रूप में समुदाय पर विचार करता है।

Bihar Board Class 11 Political Science शांति Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उस विश्व संस्था का नाम बताइए जिसका इस्तेमाल भारत विश्व शान्ति को बढ़ावा देने के लिए करता रहा है। (Name the institution by which India promote world peaces)
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.)।

प्रश्न 2.
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद कौन सा देश विश्व में शक्तिशाली रूप में उभरा? (Which country emerged as powerful after the end of cold war?)
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका।

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प्रश्न 3.
उस संस्था का नाम लिखिए जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति बनाए रखने के लिए दंड की व्यवस्था करती है। (Name the organ of the UN that punished a country who violate the world peace)
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद्।

प्रश्न 4.
अंतर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना कैसे की जा सकती है? (In which manner the world peace established?)
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना सहयोग, समानता तथा स्वतन्त्रता के आधार पर की जा सकती है।

प्रश्न 5.
शान्ति क्या है? (Define peace)
उत्तर:
साधारण शब्दों में शान्ति का अर्थ है “युद्ध रहित अवस्था”। युद्ध या किसी अप्रिय स्थिति की आशंका को शान्ति नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 6.
एक दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता के सम्मान से आप क्या समझते हैं? (What do you know about regional integrity of each other?)
उत्तर:
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक अस्तित्व होता है जिसे दूसरे राष्ट्रों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। इस शर्त की पूर्ति शान्ति स्थापना के लए आवश्यक है।

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प्रश्न 7.
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व क्या है? (What is peaceful co-existance?)
उत्तर:
‘जियो और जीने दो’ का वाक्य शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व है जिसमें युद्ध का कोई स्थान – नहीं है।

प्रश्न 8.
युद्ध की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कोई दो कारण बताइए। (why are the wars necessary? Explain any two causes)
उत्तर:

  1. आत्मरक्षा के लिए
  2. शान्तिवार्ता असफल होने पर।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या शान्ति बनाए रखने के लिए हिंसा की आवश्यकता है? (Are violence is necessary for peace?)
उत्तर:
इस मत को मानने वाले राजनीतिज्ञों का मानना है कि विश्व में शान्ति बनाए रखने के लिए हिंसा की आवश्यकता होती है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून ने सभी राज्यों को अन्य राज्य के आक्रमण के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार दिया है। इस अधिकार के अंतर्गत हर राज्य हर समय अपनी आत्मरक्षा करने के लिए तैयार रह सकता है। सभी राष्ट्रों को सशक्त आक्रमण के विरुद्ध व्यक्तिगत अथवा सामूहिक आत्मरक्षा का अधिकार है। सशक्त आक्रमण को रोकने के लिए किसी भी राष्ट्र को चाहे वह कमजोर हो अथवा सबल, हिंसा का सहारा लेना ही पड़ता है।

व्यवहार में आत्म-संरक्षण में की जा रही कार्यवाही की कोई सीमा नहीं होती। परन्तु आत्मरक्षा का अधिकार किसी राज्य को भी मिलता है जब उस पर सशस्त्र बलों द्वारा आक्रमण किया गया हो और किसी भी राष्ट्र को अपनी आत्मरक्षा करने के लिए आक्रामक राष्ट्र से अधिक शस्त्रों को एकत्र करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में आक्रामक राष्ट्र की शक्ति का अनुमान लगाना कठिन है और क्या वह राज्य आक्रामक राज्य बन सकता है, की भविष्यवाणी करना कठिन है। इसलिए हर हालत में हर राज्य को हर दूसरे राज्य के विरुद्ध आत्मरक्षा के लिए अधिक-से-अधिक हिंसा के लिए तैयार रहना होगा जिससे शान्ति स्थापना संभव हो।

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प्रश्न 2.
युद्ध करना अब न्यायसंगत होता है? (In which circumstances the war is justiflable?)
उत्तर:
विवादों के शान्तिपूर्ण तरीकों से निपटारा न होन के कारण ही युद्ध की परिस्थिति उत्पन्न होती है। युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को निपटाने का अन्तिम साधन मात्र है। युद्ध शस्त्र चलों के प्रयोग के माध्यम से हिंसात्मक संघर्ष है। आक्रमण अथवा युद्ध किन अवस्थाओं में न्यायसंगत होते हैं, यह प्रश्न आज भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना पूर्व में था। युद्ध के न्यायसंगत होने के कई तर्क दिए जाते हैं। जैसा कि पहला तर्क यह दिया जाता है कि शान्ति वार्ताओं के असफल होने के कारण युद्ध जरूरी हो जाता है। कुछ मामलों में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधानों के अंतर्गत राज्य द्वारा बल का प्रयोग विधिपूर्ण है व न्यायसंगत है।

1. आत्मरक्षा (Self Defence):
“आत्मरक्षा में बल प्रयोग करने के लिए राज्य के अधिकारों को बहुत पहले से ही अन्तर्राष्ट्रीय विधि से मान्यता दी गई है।” ग्रोशियस के अनुसार जीवन, स्वतंत्रता व सम्पत्ति की रक्षा तथा सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा का अधिकार सहज प्रकृति पर आधरित है। इस आत्मरक्षा के लिए राज्यों को युद्ध करने का पूरा अधिकार है।

2. चार्टर पर हस्ताक्षरित सदस्यों के दुश्मन (Enemy of the Signatories of the charter):
अनुच्छेद 10 संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर) के तहत संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों के विरुद्ध युद्ध अवैध नहीं होगा।

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प्रश्न 3.
हम कैसे कह सकते हैं कि भारत का शान्ति का दृष्टिकोण व्यापक है? (India’s veiw of peace is comprehensive. How?)
उत्तर:
1. भारत की विदेश नीति का दुष्टिकोण (नजरिया) व्यापक है। भारत की विदेश नीति विश्व-शान्ति के लिए लगातार प्रयासरत है। भारत अन्य देशों की अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर सकारात्मक भूमिका निभाता रहा है। देश की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धान्त हैं-हर तरह का साम्राज्यवाद (Imperialism) का विरोध करना तथा सभी देशों को उपनिवेशी मामलों से स्वतंत्रता रंग-भेद नीति का बहिष्कार, भुखमरी तथा बीमारी को जड़ से उखाड़ना, सभी देशों के साथ मित्रता का संबन्ध स्थापित करना व संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य संगठनों और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी की भूमिका निभाना।

2. भारत की शान्ति नीति का दृष्टिकोण नकारात्मक या युद्ध विरोधी नहीं है, किन्तु हम यह मानते हैं कि युद्ध के कारणों को समाप्त किए बिना विश्व में चिरकालीन स्थायी शान्ति की स्थापना नहीं की जा सकती। भारत चाहता है सभी देश अपने अनावश्यक विनाशकारी हथियारों का विनाश कर दें तथा सभी राष्ट्र स्वेच्छा से निः शस्त्रीकरण संबंधी संधियों पर सच्चे मन से हस्ताक्षर कर दें।

प्रश्न 4.
शीत युद्ध को कम करने में भारत के योगदान का परिक्षण कीजिए। (Examine India’s role in reducing the cold war)
उत्तर:
1. दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व दो प्रमुख गुटों में बंटने लगा। एक गुट पश्चिमी देशों (शक्तियों) का था जिसका नेता संयुक्त राज्य अमेरिका था तो दुसरा गुट साम्यवादी देशों का था जिसका नेता पूर्व सोवियत संघ था।

2. पश्चिम के देश एक-दूसरे के साथ उचित और मैत्रिपूर्ण संबन्ध बनाने के इच्छुक थे। शीतकाल के इस वातावरण में भारत का आग्रह बातचीत के लिए था। हमारे नेताओं ने दोनों गुटों के मतभेदों को वाकयुद्ध तथा हथियारों का इस्तेमाल किए बिना स्वतंत्र तथा सीधी बातचीत के द्वारा सुलझाने का प्रयास किया। भारत ने एक अद्भुत नीति की खोज की, जिसे बाद में गुटनिरपेक्षता की नीति के नाम से जाना गया। इस नीति का अर्थ तटस्थता नहीं है (तटस्थता का अर्थ है कि दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच युद्ध के दौरान समान दूरी बनाए रखना) इसका अर्थ है अन्तर्राष्ट्रीय विषयों से संबंधित सभी मामलों पर स्वतंत्रतापूर्वक निडर होकर निर्णय लेना।

3. इस नीति में सैनिक मुकाबले को प्रोत्साहन देने की अपेक्षा सभी शान्तिपूर्ण तरीकों को अपनाया गया। इस नीति की लोकप्रियता का यह लाभ मिला कि नए स्वतंत्र राष्ट्रों ने शीत युद्ध के दो गुटों का सदस्य बनने की अपेक्षा गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाने को प्राथमिकता दी। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन 1960 ई. मे जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो और मिस्र के नासिर के नेतृत्व में शुरू हुआ। इस आन्दोलन का स्वागत विश्व शान्ति की स्थापना करने वाले सबसे बड़े आन्दोलन के रूप में किया गया। भारत शीत युद्ध के प्रतिद्वंद्वियों को स्वतंत्र तथा नए स्वतंत्र देशों के बीच तनाव पैदा नहीं करने देना चाहता था। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा तथा विकास के लिए प्रतिस्पर्धियों में शीत युद्ध समाप्त करने की वकालत की।

प्रश्न 5.
शांति के खोज के विभिन्न उपाय क्या हैं?
उत्तर:
शान्ति के खोज के विभिन्न उपाय:
शान्तिवादियों की यह मान्यता है कि हिंसा किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। शान्तिवादी और व्यवहारिक राजनीतिक शान्ति स्थापना के सम्बन्ध में अनेक उपायों का सुझाव देते हैं – सर्वप्रथम वे शान्ति संतुलन स्थापित करने का सुझाव देते हैं, जबकि प्रमुख राष्ट्रों का सैनिक और राजनीतिक शक्ति समान हो तो शान्ति की संभावना अधिक होती है दुसरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से भी शान्ति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। तीसरे वैश्विक शासन भी इसका आधार बन सकता है और चौथे संयुक्त राष्टसंघ विश्व में शान्ति स्थापित करने की जिससे शान्ति के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके।

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प्रश्न 6.
क्या हथियार वैश्विक शान्ति को बढ़ावा देते हैं?
उत्तर:
नाभिकीय शक्ति से लैस देश परमाणु बम की विनाशलीला को स्वीकार करते हैं। लेकिन यह तर्क भी देते हैं कि इससे शान्ति स्थापना का उद्देश्य पुरा हो सकता है यानि महाविनाशकारी संभावना उसे शान्ति स्थापना के लिए प्रेरित करता है। वर्तमान परमाणु संपन्न राष्ट्र अमेरिका, फ्रांस, चीन, रूस नाभकीय युद्ध से बचना चाहते हैं। यह माना जाने लगा है कि परमाणु नामक राक्षस ने ही विश्व में शान्ति स्थापित की है। लेकिन यह अस्थायी एवं संदिग्ध है क्योंकि तानाशाही प्रकृति के लोगों के पास परमाणु शक्ति आ जाय तो शान्ति नहीं बल्कि विनाश होगा।

प्रश्न 7.
शान्ति एवं हिंसा में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
समय और परिस्थिति के अनुसार शांति और हिंसा एक दूसरे से सम्बन्धित है। कभी-कभी शांति लाने के लिए हिंसा अपरिहार्य हो जाती है। उदाहारणस्वरूप-हिंसा का सहारा लेना पड़ता है। ऐसी स्थिति में हिंसा उचित और न्यायपूर्ण है। अनेक.ऐसे उदाहरण हैं जब शान्ति के लिए हिंसा का प्रयोग किया गया। 1960 में मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में काले लोगों के साथ भेद-भाव के विरुद्ध हिंसक संघर्ष किया। 1991 में निरंकुश सोवियत व्यवस्था का विघटन। यही कारण है जिसके चलते शान्तिवादी किसी न्यायपूर्ण संघर्ष में भी हिंसा के इस्तेमाल के विरुद्ध नैतिक रूप से खड़े होते हैं तथा शोषकों का दिल-दिमाग जीतने के लिए प्रेम और सत्य की बात करते हैं।

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प्रश्न 8.
शान्ति क्या है? किन दो तरीकों से विश्व मे शान्ति स्थापित की जा सकती है? (What is peace? In which two methods the world peace established?)
उत्तर:
सरल शब्दों में शान्ति से आशय है “युद्ध रहित अवस्था”। शान्ति एक ऐसी अवस्था है जिसमें सभी लोग एक साथ मिलकर रहते हैं तथा एक-दूसरे को सहयोग प्रदान करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी शान्ति का यही अर्थ निकालता है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्ति से आशय है विश्व के सभी राष्ट्र-राज्य एक-दूसरे की सत्ता व स्वतन्त्रता का सम्मान करें तथा आपसी सहयोग को बढ़ावा दें जिससे समानता का अस्तित्व बना रहे। इसी सिद्धान्त को दूसरे शब्दों में ‘जियो और जीने दो’ (Live and Let Live) के नाम से जाना जाता है। सह-अस्तित्व के आधार पर जीने की कला व राष्ट्रों के आपस में होने वाले कार्यकलापों के द्वारा शान्ति को स्थापित किया जाता है।

विश्व में शान्ति-स्थापना के अनेक तरीके हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से वर्णित किया सकता है –

1. दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता व प्रभुसत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान (Mutual respect for each other’s territorial integrity):
विश्व में शान्ति स्थापित करने का सर्वप्रथम सिद्धान्त है कि विश्व के प्रत्येक राष्ट्र-राज्य का कर्तव्य है कि वह अपनी अखण्डता व प्रभुसत्ता को उस राज्य के लिए आवश्यक समझे। प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक अस्तित्व होता है जिसे दूसरे राष्ट्रों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। इस शर्त की पूर्ति शान्ति स्थापना के लिए अत्यन्त आवश्यक है। किसी भी राज्य को दूसरे राज्यों कि विरुद्ध अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

2. आक्रमण न करना (Non-Aggression):
एक दूसरे के प्रति क्षेत्रीय अखण्डता व प्रभुसत्ता के प्रति पारस्परिक सम्मान की दशा में संभव है जब एक राष्ट्र-राज्य स्वयं जीवित रहने के साथ-साथ दूसरे राष्ट्रों को भी जीवित रहने व विकसित होने का अवसर प्रदान करे। किसी भी राज्य को यह अधिकार बिल्कुल नहीं दिया जा सकता कि वह स्वयं की क्षेत्रीय सीमा का विस्तार करने के लिए अन्य राज्यों पर आक्रमण करे अथवा जोर-जबरदस्ती द्वारा अन्य राज्य की भूमि को हड़प ले।

एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेना एक सभ्य देश का कार्य नहीं है। ऐसा व्यवहार सम्पूर्ण विश्व के शान्तिपूर्ण माहौल में बाधा पहुँचाता है। राज्यों के मध्य मतभेद अवश्य होते हैं परन्तु ऐसे मतभेदों को शान्तिपूर्ण तराकों से ही निपटारा करना चाहिए, हिंसात्मक रूप से नहीं। यह सभ्य समाज व राज्य की मुख्य निशानी है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या शस्त्रों की होड़ से विश्व शान्ति स्थापित हो सकती है चर्चा कीजिए। (Is the armament is helpful in World peace. Discuss)
उत्तर”
क्या शस्त्रीकरण वैश्विक शान्ति को जन्म दे सकता है? (Can armament Promote Global peace):
इस प्रश्न को लेकर कि क्या शस्त्रीकरण द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित की जा सकती है अथवा नहीं, राजनीतिक दार्शनिकों के मतों में मतभेद है। कुछ लोगों का मानना है कि शान्ति स्थापित हो सकती है क्योंकि शस्त्रीकरण, आक्रमणकारी राज्य के मन में भय उत्पन्न कर देगा और वह युद्ध नहीं करेगा या किसी भी प्रकार से शान्ति भंग नहीं करेगा। परन्तु इस धारणा को अन्य दार्शनिक ठीक नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि अन्तर्राष्ट्रीय अशान्ति का कारण ही शस्त्रीकरण है।

शस्त्रीकरण न केवल युद्ध के कारणों को प्रभावित करता है वरन् अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए भी खतरा है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी नि:शास्त्रीकरण (Disarmament) की ओर जोर दिया है। शीत युद्ध (Cold War) में पैदा हुए डर के माहौल को कोई भी आज तक भूल नहीं पाया है। अनेक बार ऐसा सोचा जाता है कि शान्ति स्थापित करने के लिए युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए या शस्त्रीकरण करना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि संभी राष्ट्र अपनी सैनिक शक्ति को अधिक बढ़ाएँ। परन्तु ऐसा करने से विश्व में तनाव बना रहेगा और प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के साथ मैत्री सम्बन्ध जोड़ने के स्थान पर एक-दूसरे को डराने व धमकाए. रखने का माहौल तैयार कर लेगा।

इससे शान्ति, विश्वास व प्रेम के स्थान पर भय, डर, अविश्वास आदि का वातावरण उत्पन्न होगा। शान्ति बनाए रखने का पहला कार्य यदि कुछ हो सकता है तो वह है नि:शस्त्रीकरण (disarmament) न कि शस्त्रीकरण। वास्तविक अर्थों में देखा जाए तो शस्त्रीकरण साधन है, साध्य नहीं। साध्य मनुष्य के निजी स्वार्थ से उत्पन्न क्लेश व कलह है। मनुष्य अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिए दूसरे को अपने वशीभूत करना चाहता है। इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए हथियारों को जन्म देता है और युद्धों का अकस्मात् स्वरूप होने के कारण अस्त्र-शस्त्रों के होते हुए युद्धों को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। युद्ध की समाप्ति के लिए निःशस्त्रीकरण को व्यापक पैमाने में प्रेरित करना होगा। विश्व में लोगों को शान्ति का पाठ पढ़ाना होगा तभी वैश्विक शान्ति सम्भव है।

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प्रश्न 2.
विश्व शांति को बढ़ावा देने की दिशा में भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत तथा संयुक्त राष्ट्र (India $ UN):
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों को भारतीय संविधान में भी स्थान दिया गया है तथा भारत शुरू से इसका सदस्य रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्तिशाली बनाना और उसके कार्यों में सहयोग देना भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धान्त रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किए गए शान्ति प्रयासों में भारत ने हर प्रकार से सहायता प्रदान की है। भारत कई बार सुरक्षा परिषद् (संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग) का सदस्य रहा है। 1952 ई० में भारत की श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित साधारण सभा की अध्यक्षा चुनी गई थीं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य के रूप में भारत ने हमेशा दूसरे देशों के साथ झगड़ों का निपटारा शान्तिपूर्वक करने का प्रयत्न किया है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत का कश्मीर मामले पर पाकिस्तान से झगड़ा हुआ। भारत ने इस झगड़े का हल करने के लिए इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ के पास भेजा। सन् 1962 ई. में चीन ने सीमा विवाद को लेकर भारत पर अचानक ही आक्रमण कर दिया और नेफा तथा लद्दाख के बहुत बड़े क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

भारत ने शान्तिपूर्ण ढंग से इस समस्या का समाधान करने का भरसक प्रयत्न किया। 1965 ई. में पाकिस्तान ने भारत पर फिर आक्रमण कर दिया, परन्तु भारत ने इसका मुंहतोड़ जवाब दिया और पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित किया। अन्त में तत्कालीन सोवियत संघ के माध्यम से दोनों देशों में ताशकन्द समझौता हुआ जिसके परिणामस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के जीते हुए क्षेत्र उसे वापस लौटा दिए। इसके बाद भी भारत पाकिस्तान में युद्ध हुआ और पाकिस्तान की पराजय हुई परन्तु भारत ने विश्व में शान्ति बनाए रखने के लिए उससे संधि की।

संयुक्त राष्ट्र ने नि:शस्त्रीकरण के प्रश्न को अधिक महत्त्व दिया है तथा इस समस्या को हल करने के लिए बहुत ही प्रयास किए हैं। भारत ने इस समस्या का समाधान करने के लिए हमेशा संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता की है क्योंकि भारत को यह विश्वास है कि पूर्ण निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही संसार में शान्ति की स्थापना हो सकती है। सातवें गुट-निरपेक्ष शिखर को सम्बोधित करते हुए श्रीमती गाँधी ने कहा था-विकास, स्वतन्त्रता, निःशस्त्रीकरण और शान्ति परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित हैं।

एक नाभिकीय विमानवाहक पर जो खर्च होता है वह 53 देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पादन से अधिक है। नाग ने अपना फन फैला दिया है। समूची मानव जाति भयाक्रांत है और भयभीत निगाहों से इस झूठी आशा के साथ देख रही है कि उसे काटेगी नहीं। इस समय विश्व में बहुत से सैनिक गुट बना रहे हैं। जैसे-नाटो, सैन्टो आदि। भारत का हमेशा यह विचार है कि ये सैनिक गुट विश्व शान्ति मे बाधक हैं। अतः भारत ने इस सैनिक गुटों की केवल आलोचना ही नहीं की अपितु इनका पूरी तरह से विरोध भी किया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनने के लिए भारत ने विश्व के प्रत्येक देश को कहा है भारत ने चीन, बांग्लादेश, हंगरी, श्रीलंका, आयरलैंड और रूमानिया आदि देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत की सक्रियता का प्रमाण यह है कि श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित को महासभा की अध्यक्ष चुना गया। इसके अतिरिक्त मौलाना आजाद यूनेस्को के प्रधान बने, श्रीमती अमृतकौर विश्व स्वास्थ्य संघ की अध्यक्षा बनीं।

डॉ. राधाकृष्णन आर्थिक व सामाजिक परिषद् के अध्यक्ष बनाए गए। भारत को 1950 ई० में सुरक्षा परषिद् का अस्थायी सदस्य चुना गया। अब तक भारत सुरक्षा परिषद् का 6 बार अस्थायी सदस्य रह चुका है। डॉ. नागेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। विश्व शान्ति की स्थापना के सम्बन्ध में भारत का मत है कि जब तक संसार के सभी देशों का प्रतिनिधित्व संयुक्त राष्ट्र संघ में नहीं होगा वह प्रभावशाली कदम नहीं उठा सकता।

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प्रश्न 3.
शान्ति से क्या आशय है? किन तरीकों से विश्व में शान्ति बनाए रखी जा सकती है? (What is peace? Which methods the World peace established?)
उत्तर:
शान्ति क्या है? (What is peace?):
“युद्ध रहित अवस्था” को शन्ति कहा जाता है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें सभी लोग मिल-जुल कर रहते हैं तथा एक-दूसरे को सहयोग देते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्ति का तात्पर्य है विश्व के सभी राष्ट्र-राज्य एक-दूसरे की सत्ता व स्वतन्त्रता का सम्मान करें तथा पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा दें ताकि समानता का अस्तित्व बना रहे। सह-अस्तित्व के आधार पर जीने की कला व राष्ट्रों के आपस में होने वाले क्रिया-कलापों के द्वारा शान्ति स्थापित की जा सकती है। विश्व में शान्ति-स्थापना के अनेक तरीके हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है –

1. एक दुसरे की क्षेत्रीय अखण्डता बनाए रखना:
विश्व में शान्ति स्थापित करने का सबसे पहला सिद्धान्त है कि विश्व के प्रत्येक राष्ट्र-राज्य का कर्तव्य हो कि वह जिस प्रकार अपनी अखण्डता व प्रभुसत्ता को आवश्यक समझता है उसी प्रकार दूसरे राष्ट्रों की अखण्डता व प्रभुसत्ता को उस राज्य के लिए आवश्यक समझे। हर राष्ट्र का अपना एक अस्तित्व होता है जिसे दूसरे राष्ट्रों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। इस शर्त की पूर्ति शान्ति स्थापनों के लिए अति आवश्यक है। किसी भी राज्य को दूसरे राज्य के विरुद्ध अपनी शक्ति का दुरुपयोग या उसको अनावश्यक लाभ नहीं उठाना चाहिए।

2. अन्य देश पर आक्रमण न करना:
एक-दूसरे देश के प्रति अखण्डता व प्रभुसत्ता के प्रति पारस्परिक सम्मान तभी सम्भव है जब एक राष्ट्र-राज्य स्वयं जीवित रहने के साथ-साथ दूसरे राष्ट्रों को भी जीवित रहने व विकसित होने का अवसर प्रदान करे। किसी भी राज्य को यह अधिकार कतई नहीं दिया जा सकता कि वह स्वयं क्षेत्रीय सीमा का विस्तार करने के लिए दूसरे राज्यों पर आक्रमण करे अथवा जोर-जबर्दस्ती द्वारा उस राज्य की भूमि को हथिया ले। एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेना एक सभ्य देश की निशानी नहीं है। ऐसा व्यवहार पूरे विश्व के शान्तिपूर्ण माहौल में बाधा पहुँचाता है। राज्यों के मध्य मतभेद अवश्य होते हैं परन्तु ऐसे मतभेदों का शान्तिपूर्ण तरीकों से ही निपटारा करना चाहिए, हिंसात्मक रूप से नहीं। यही सभ्य समाज व राज्य की मुख्य निशानी है।

3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना:
शान्ति स्थापना के लिए स्वतन्त्र राष्ट्रों का उत्तरदायित्व न केवल अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध आक्रमण करने से है परन्तु उनका यह भी दायित्व है कि वे अन्य राष्ट्र-राज्यों के आन्तरिक गतिविधियों में बिल्कुल भी दखल न दें। निर्बल राष्ट्रों की भी अपनी प्रभुसत्ता व अखण्डता होती है और अन्य राष्ट्रों का यह दायित्व बन जाता है कि वे उन्हें सम्मानित करें। प्रायः यह देखा गया है कि अपने-अपने गुटों की शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से बड़े शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर और निर्बल राष्ट्रों को आर्थिक सहायता देकर उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं। वियतनाम, कोरिया आदि देशों को शक्तिशाली देशों ने आर्थिक सहायता देकर आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है। इस कारण से न केवल अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व्यवस्था को खतरा उत्पन्न होता है अपितु साम्राज्यवाद के फैसले को भी बल मिलता है। इसी कारण राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में अन्य राष्ट्र हस्तक्षेप न करे।

4. समानता तथा पारस्परिक लाभ:
जब तक राष्ट्र, चाहे वह दुर्बल हो अथवा सबल, जब वह दूसरे राज्यों पर आक्रमण नहीं करता है और हर प्रकार के मतभेदों को, अन्तिम रूप से शान्तिपूर्ण तरीकों से सुलझाने का प्रयत्न करता है तो इसका तात्पर्य है कि वह सब राष्ट्रों को समान समझता है। इस व्यवहार से अन्य सभी राष्ट्रों के मध्य समानता का वातावरण उत्पन्न होता है और सभी एक-दूसरे को सहयोग देकर विकास करने का अवसर मिलता है।

5. शान्तिमय सह-अस्तित्व:
सह-अस्तित्व के होने की सम्भावना केवल शान्तिपूर्ण वातावरण पर निर्भर है। अनेक राजनीतिक दार्शनिकों का मानना है कि शान्ति और व्यवस्था स्थापित करने के लिए युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए परन्तु यह वक्तव्य केवल सभी राष्ट्रों को हथियारों के निर्माण व होड़ करने के लिए प्रेरित करेगा। ऐसी स्थिति में शान्ति तो होगी परन्तु इस शान्ति का आधार भय और शंका होगा, एक-दूसरे राज्य के प्रति विश्वास और मैत्री का नहीं। ऐसी स्थिति में सभी राष्ट्र अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाएँगे।

ऐसा करने से ऊपरी तौर से शान्ति तो होगी परन्तु भीतर-ही-भीतर विश्व में तनाव की स्थिति होगी जो किसी भी समय विस्फोटक रूप धारण कर सकती है। मनुष्य युग-युगांतर तक अनेक युद्धों को देख चुका है। अब युद्ध का स्वरूप इतना भयानक हो चुका है कि झेलने, की हिम्मत व सामर्थ्य सभी में नहीं है। इसलिए आज सभी राष्ट्र निःशस्त्रीकरण (disarmament) चाहते हैं। यही नीति उत्तम है। इसी राह पर चलकर हम अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को स्थापित कर सकेंगे जो सह-अस्तित्व व विकास के लिए अतिआवश्यक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मूवमेंट फॉर सखाइवल ऑफ ओगोनी पीपल (ओगोनी लोगों के अस्तित्व के लिए आन्दोलन) 1990 नामक आन्दोलन किसने चलाया?
(क) नेल्सन मंडेला
(ख) आँग-सान सू की
(ग) केन सारो वीवा
(घ) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(ग) केन सारो वीवा

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प्रश्न 2.
2005 का गाँधी शान्ति पुरस्कार दिया गया –
(क) रोबर्ट मुंगावे
(ख) आर्चविशप डेसमंड टूटू
(ग) फिडेल
(घ) नेलसन मंडेला
उत्तर:
(ख) आर्चविशप डेसमंड टूटू

प्रश्न 3.
शीत युद्ध का प्रारंभ कब हुआ –
(क) 1945
(ख) 1960
(ग) 1978
(घ) 1980
उत्तर:
(क) 1945

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

Bihar Board Class 11 Sociology संस्कृति तथा समाजीकरण Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  • संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों के अंतर्गत अंधविश्वास, वैज्ञानिक तथ्य, मिथक, कला तथा धर्म शामिल हैं।
  • विचार संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों की ओर संकेत करते हैं। इसके अन्तर्गत विश्वासों तथा ज्ञान को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 2.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत अपेक्षाओं, नियमों तथा प्रतिमानात्मक पद्धतियों को सम्मिलित किया जाता है।
  • संस्कृति के प्रतिमानित आयामों के द्वारा व्यक्तियों की अंत:क्रिया की पुनरावृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता है।
  • प्रतिमानों को जनरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है तथा इनके द्वारा व्यवहार को निर्देशित किया जाता है।

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प्रश्न 3.
संस्कृति के भौतिक आयाम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत कुछ वस्तुएँ जैसे कि कपड़ा, आवास, उपकरण, आभूषण, रेडियो तथा संगीत के वाद्य-यंत्र आदि आते हैं।
  • भौतिक संस्कृति में उन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है जो भौतिक वस्तुएँ हैं तथा जिनका समाज के सदस्यों द्वारा उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा सांस्कृतिक विलंबना से आप समझते हैं?
उत्तर:
सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा संस्कृतिक विलंबना की अवधारणा का विवरण प्रसिद्ध समाजशास्त्री आगबर्न द्वारा किया गया है। आगबर्न के अनुसार भौतिक संस्कृति जैसे तकनीकी इत्यादि का विकास तथा परिवर्तन तेजी से होता है। दूसरी तरफ, अभौतिक संस्कृति चिंतन के प्रतिमानित तरीकों, भावनाओं तथा प्रतिक्रियाओं, प्रमुख रूप से प्रतीकों द्वारा अर्जित तथा हस्तांतरित, मानव व समूह द्वारा विशिष्ट उपलब्धियों के निर्माण करने वाले तथा व्यक्ति के कौशल का साकार स्वरूप है। संस्कृति के आवश्यक तत्वों में जिसमें परंपरागत जैसे ऐतिहासिक परिणाम तथा श्रेष्ठताएँ एवं विचार मुख्य हैं, उसमें विशेष रूप से उससे जुड़े हुए मूल्यों से निर्मित होती है।

संस्कृति के तीन आयाम बताए गए हैं –

  • संज्ञात्मक आयाम
  • प्रतिमानात्मक आयाम तथा
  • भौतिक आयाम

आगबर्न ने अनुसार संस्कृति के दोनों पहलू अर्थात् भौतिक तथा अभौतिक व्यक्तित्व के निर्माण पर प्रभाव डालती हैं। आगबर्न द्वारा सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा विलंबना की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।

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प्रश्न 5.
प्रौद्योगिकी क्या है?
अथवा
प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते हैं? वे अलग-अलग समाजों में भिन्न-भिन्न क्यों होती है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी का तात्पर्य तकनीकी मानदंडों अथवा तकनीक से होता है। वैचारिक तर्ज पर प्रौद्योगिकी समाज की संस्कृति का समन्वित भाग होती है। प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी मानदंड अलग-अलग समाजों में पृथक्-पृथक पाए जाते हैं। समाजों में विभेदीकरण उनके द्वारा प्राप्त की गई प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 6.
सामाजिक विज्ञान में संस्कृति की समझ, दैनिक प्रयोग के शब्द “संस्कृति” से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
जिस प्रकार सामाजिक विज्ञान में हमें किसी स्थान का पता लगाने के लिए मानचित्र की आवश्यकता होती है उसी प्रकार समाज में व्यवहार करने के लिए हमें संस्कृति की आवश्यकता पड़ती है। संस्कृति एक सामान्य समझ है जिसे समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से सीखा तथा विकसित किया जाता है।

प्रश्न 7.
संस्कृति शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ बताइए।
उत्तर:
संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा में ‘कोलरे’ शब्द से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘जमीन जोतना’ अथवा ‘खेती करना’ है। यंग तथा मैक के अनुसार, “संस्कृति सीखा हुआ तथा भागीदारी का व्यवहार है।” संस्कृति किसी एक व्यक्ति का विशेष व्यवहार नहीं होता है। संस्कृति वह व्यवहार है जिसे व्यक्ति सामाजिक अन्त:क्रिया के माध्यम से समूह में सहभागिता के कारण प्राप्त करता है।

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प्रश्न 8.
संस्कृति के मुख्य तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
संस्कृति के मुख्य तत्त्व हैं –

  • व्यक्तियों द्वारा समाज के सदस्य के रूप में ग्रहण की गई आदतें तथा अक्षमताएँ।
  • भाषा तथा उपकरण बनाने की विधियाँ।
  • ज्ञान, विश्वास, प्रथा, कला, कानून तथा नैतिकता।

रौबर्ट बियरस्टेड ने अपनी पुस्तक ‘The Social Order’ में संस्कृति के तीन तत्व बताए हैं –

  • विचार
  • प्रतिमान
  • पदार्थ

प्रश्न 9.
संस्कृति के तीन मुख्य आयाम बताइए।
उत्तर:
संस्कृति के तीन मुख्य आयाम निम्नलिखित हैं –

  1. संज्ञानात्मक आयाम – संज्ञान अथवा ज्ञान की प्रक्रिया में सभी व्यक्ति अपनी भागीदारी करते हैं। इसमें धर्म, अंधविश्वास, वैज्ञानिक तथ्य, कलाएँ तथा मिथक शामिल किए जाते हैं।
  2. प्रतिमानात्मक आयाम – समाजशास्त्र के प्रतिमानात्मक आयामों के अन्तर्गत सोचने के बजाए कार्य करने के तरीकों को उल्लेख किया जाता है । इसके अन्तर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा प्रतिमानात्मक पद्धतियों को सम्मिलित किया जाता है।
  3. भौतिक आयाम – संस्कृत के भौतिक आयामों के अंतर्गत आवास, औजार, कपड़ा, आभूषण तथा संगीत के उपकरण आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

प्रश्न 10.
संस्कृति के दो प्रमुख भाग कौन-से हैं?
उत्तर:
संस्कृति के दो प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं –

  1. भौतिक संस्कृति – इसके अंतर्गत मूर्त, पार्थिक तथा पदार्थगत संस्कृति को सम्मिलित किया जाता है। संस्कृति का यह पक्ष मनुष्यों द्वारा निर्मित वस्तुगत पदर्थगत होता है। प्रौद्योगिकी, कला, उपकरण तथा वस्त्र आदि इसमें सम्मिलित किए जाते हैं।
  2. अभौतिक संस्कृति – इसे अंतर्गत विचार, ज्ञान, कला, परंपरा तथा विश्वास को सम्मिलित किया जाता है। यह अमूर्त तथा अपदार्थगत पक्ष है।

प्रश्न 11.
संस्कृति की अवधारणा के मुख्य चिंतकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति की अवधारणा की व्याख्या करने वाले चिंताकों निम्नलिखित दो श्रेणियों में बाँटा गया है :

(i) मानवशास्त्री व्याख्या के अनुसार संस्कृति के अध्ययन के माध्यम से व्यक्ति तथा उसमें विभिन्न व्यवहारों को समझा जा सकता है। मानवशास्त्रियों द्वारा संस्कृति की अवधारणा तथा आदिम समुदायों के संदर्भ में संस्कृति के विभिन्न प्रतिरूपों का अध्ययन किया गया है। प्रमुख मानवशास्त्री-चिंतक हैं –

  • टालयर
  • आर. बेनडिक्स
  • लिंटन
  • मैलिनोवस्की
  • क्रोबर

(ii) कुछ समाजशास्त्रियों के द्वारा संस्कृति को समाज के एक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। तथा इन चिंतकों के अनुसार समाज एक व्यापक अवधारणा है तथा जिसका संबंध व्यक्ति तथा समूह के अंतर्संबंध से है। संस्कृति का तात्पर्य प्रतिमानात्मक व्यवस्था, मूल्यों तथा व्यवहारों से है।

इस विचारधारा के चिंतक प्रमुख समाजशास्त्री हैं –

  • समनर
  • दुर्खाइम
  • मैक्स वैबर
  • सोरोकिन
  • पारसंस

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प्रश्न 12.
संस्कृति के चार प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
संस्कृति के चार प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –

  • संस्कृति अर्जित व्यवहार है जिसे सीखा जाता है।
  • संस्कृति परिवर्तनशील, गतिशील तथा सापेक्षिक है।
  • संस्कृति संरचित होती है, इसका निर्माण चिंतन के प्रतिमानों, अनुभवों तथा व्यवहारों से होता है।
  • संस्कृति को विभिन्न पहलुओं में विभाजित किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘स्व’ व्यक्तित्व का केन्द्र है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति अपने बचपन से ही भूमिका की संरचना को सीखता तथा आत्मसात करता है। व्यक्ति के ‘स्व’ का विकास इसी प्रकार होता है। कूले, फ्रायड, मीड तथा पारसंस जैसे विद्वानों का मत है कि ‘स्व’ का विकास व्यक्ति की ग्रहणशीलता तथा समूह द्वारा शिशु के अपने प्रतिमानों के अनुरूप ढालने के प्रयत्नों का मिला-जुला स्वरूप है। ‘स्व’ का अर्थ मैं तथा मुझसे से है लेकिन ‘स्व’ की अवधारणा का विकास बच्चे के मन में स्वाभाविक वृद्धि की प्रक्रिया के कारण नहीं होता है।

वस्तुतः ‘स्व’ की अवधारणा दूसरे व्यक्तियों से संपर्क के कारण ही विभाजित होती है। ‘स्व’ के विकास में भाषा का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है तथा भाषा समाज की देन होती है। सी. एच. कुले का मत है कि ‘स्व’ एक सामाजिक सत्य है जिसका विकास प्राथमिक समूह तथा सामाजिक अंत:क्रिया की भूमिका के कारण होता है।

प्रश्न 2.
‘समाजीकरण के साथ सीखने की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से संबद्ध है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सीखने की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति कुछ बातों को स्वयं सीख जाता है। उदाहरण के लिए, माता के स्तन से दुग्धपान करना, चलना तथा परिवार में माता-पिता तथा अन्य सदस्यों को पहचानना। सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है तथा व्यक्ति की समझ तथा ज्ञान में लगातार विकास होता रहता है। इस प्रकार, समाजीकरण सीखने की ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्यक्ति सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप वांछित व्यवहारों को सीख जाता है।

सीखने की उत्प्रेरक दशाएँ जिसके कारण बच्चा सीखता है –

  • व्यक्ति की स्वयं की आवश्यकताएँ
  • नई बातों के प्रति उत्सुकता तथा सीखने की प्रवृत्ति
  • पुरस्कार तथा दंड
  • नई परिस्थितियों में समायोजन

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प्रश्न 3.
समाजीकरण के विभिन्न स्तर बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री गिडिंग्स ने समाजीकरण के दो स्तर बताए हैं –

  • प्राथमिक समाजीकरण तथा
  • द्वितीयक समाजीकरण

1. प्राथमिक समाजीकरण शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था में होता है। यह समाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक बिन्दु है क्योंकि बच्चा मूलभूत व्यवहार प्रतिमान इसी स्तर पर सीखता है। प्राथमिक समाजीकरण के तीन उप स्तर हैं –

  • मौखिक अवस्था
  • शैशवावस्था तथा
  • किशोरावस्था।

परिवार प्राथमिक समाजीकरण का सशक्त माध्यम है।

2. द्वितीयक समाजीकरण के अंतर्गत व्यक्ति व्यवसाय तथा जीविका के साधनों की खोज में प्राथमिक समूहों के अलावा अन्य समूहों से अपने मूल्यों, प्रतिमानों, आदर्शों, व्यवहारों तथा सांस्कृतिक मानदंडों को ग्रहण करता है। समाजशास्त्री ऐसे समूहों को संदर्भ समूह कहते हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री रॉबर्ट के. मर्टन इस सामाजिक प्रघटना को सदस्यता समूह के स्थान पर असदस्यता समूह की ओर अभिमुखता कहते हैं।

प्रश्न 4.
“व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा निर्णायक होती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की भूमिका –

  • परिवार व्यक्ति के समाजीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा निर्णायक भूमिका निभाता है। परिवार समाज की मूलभूत तथा प्राथमिक इकाई है जो समाज का पूर्ण तथा समेकित प्रतिनिधित्व करती है।
  • बच्चा परिवार में विभिन्न भूमिकाओं तथा प्रतिस्थतियों से अपना तादात्म्य स्थापित करता है।
  • बच्चा शैशवावस्था से तीन वर्ष की अवस्था तक परिवार तक ही सीमित रहता है।

परिवार मे ही वह भाषा, चलना, बोलना तथा परिवार के सदस्यों के बारे में जानता है। यह समाजीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण है। किंबाल यंग के अनुसार, “समाज के अंतर्गत समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सबसे महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता एवं पिता ही साधारणतया अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं।” किंबाल यंग ने आगे कहा है कि, “परिवार की स्थिति के अंतर्गत मौलिक अंत:क्रियात्मक साँचा बच्चे तथा माता का है।”

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प्रश्न 5.
फ्रायड द्वारा व्यक्तित्व की किन तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व के निर्माण की तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं का उल्लेख किया है –

  1. इड
  2. अहं तथा
  3. पराअहं

इड में व्यक्ति की सभी अनुवांशिक तथा मूल प्रवृत्तियों का मनोवैज्ञानिक पहलू सम्मिलित होता है। इड सुख के सिद्धांत पर आधारित होता है। अहं वास्तविकता के सिद्धांत पर आधारित होता है। अहं व्यक्ति की क्रिया को निर्देशित करता है। पराअहं व्यक्तित्व के विकास की तीसरी अवस्था है। पराअहं व्यक्तित्व का नैतिक पहलू है तथा यह आदर्श के सिद्धांत से निर्देशित होता है। इसके द्वारा समाज के आदर्श प्रतिमानों तथा मूल्यों का प्रतिनिधित्व किया जाता है।

प्रश्न 6.
अनुकरण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अनुकरण का अर्थ – अनुकरण सीखने की एक प्रक्रिया है। बच्चों द्वारा दूसरों के व्यवहार का अनुकरण उस स्थिति में किया जाता है, जब उन्हें पुरस्कार मिलता है। कुछ विद्वानों को मत है कि चेतनावस्था अथवा अचेतनावस्था में किए जाने वाले समस्त कार्य अनुकरण के अंतर्गत आते हैं। अनुकरण की परिभाषा-थाउलस के अनुसार, “अनुकरण एक प्रतिक्रिया है जिसके लिए उत्तेजक दूसरे को उसी प्रकार की प्रतिक्रिया का ज्ञान है।”

मैक्डूगल के अनुसार, “अनुकरण केवल एक मनुष्य द्वारा उन क्रियाओं, जो दूसरे के शरीर संबंधी व्यवहार से संबंधित हैं, की नकल करने पर लागू होता है।” मीड के अनुसार, “अनुकरण दूसरों के व्यवहारों या कार्यों को जान-बूझकर अपनाने को कहते हैं।”

अनुकरण का वर्गीकरण-गिंसबर्ग के अनुकरण को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया है –

  • प्राणिशास्त्रीय अनुकरण
  • भाव-चालक अनुकरण तथा
  • विवेकशील अथवा सप्रयोजन अनुकरण।

प्रश्न 7.
अभौतिक संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अभौतिक संस्कृति से तात्पर्य है –

  • अभौतिक संस्कृति का स्वरूप आंतरिक तथा अमूर्त होता है।
  • अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत संज्ञानात्मक प्रतिमान आयामों तथा व्यक्तियों द्वारा रचित अमूर्त वस्तुओं को शामिल किया जाता है।
  • अभौतिक संस्कृति में विचार, भावनाएँ, ज्ञान, कला, प्रथा, विश्वास तथा कानून आदि को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में, विचारों तथा भावनाओं के स्तर पर संस्कृति अमूर्त होती है।
  • व्यक्ति द्वारा समाज के सदस्य के रूप में सीखे तथा विकसित किए गए प्रतीक तथा संचार माध्यम भी संस्कृति में सम्मिलित किए जाते हैं।

भाषा, वर्णमाला, धार्मिक चिह्न जैसे चाँद, सूरज, क्रास तथा स्वास्तिक आदि ऐसे प्रतीक चिह्न जिनके पीछे एक अर्थ छिपा होता है। इस प्रकार संस्कृति को उसके अर्थ के रूप में ही समझा जा सकता है।

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प्रश्न 8.
भौतिक संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भौतिक संस्कृति का तात्पर्य इस प्रकार है –

  1. समाज के सदस्यों के रूप में व्यक्ति जिन वस्तुओं पर अधिकार रखता है वह भौतिक संस्कृति कहलाती है।
  2. भौतिक संस्कृति मानव-निर्मित, वस्तुपरक तथा मूर्त होती है।
  3. कुछ विद्वानों ने संस्कृति के पदार्थगत तथा भौतिक पक्ष पर अधिक बल दिया है।
  4. आदिम समय से लेकर वर्तमान समय तक व्यक्तियों द्वारा निर्मित उपकरण, गृह निर्माण की पद्धति, वस्त्र, संचार तथा यातायात के साधन, आभूषण आदि भौतिक वस्तुएँ हैं । इन भौतिक वस्तुओं को समाज के सदस्य ग्रहण करते हैं तथा उनका उपयोग करते हैं।
  5. इस प्रकार व्यक्तियों द्वारा उचित मूर्त वस्तुओं को भौतिक संस्कृति कहा जाता है। पदार्थ चूँकि अत्यधिक स्पष्ट होता है इसलिए संस्कृति को समझने का सरल स्वरूप है।
  6. जब किसी पुरातत्त्वशास्त्री द्वारा किसी प्राचीन नगर अथवा स्थान की खुदाई की जाती है तो उसे अनेक प्रकार के टेराकोटा, शिल्पकृतियाँ, रंगदार भूरे बर्तन तथा सिक्के इत्यादि मिलते हैं।
  7. वास्तव में ये सभी वस्तुएँ प्राचीन भौतिक संस्कृति के अवशेष कहे जाते हैं। इन वस्तुओं को ‘सांस्कृतिक पदार्थ’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 9.
संस्कृति को समाज से किस प्रकार भिन्न किया जा सकता है?
उत्तर:
संस्कृति तथा समाज दो पृथक् – पृथक् अवधारणाएँ हो सकती हैं, लेकिन उनके बीच पाए जाने वाला संबंध इस अवधारणात्मक पर्दे को खत्म कर देता है। अध्ययन की सुविधा के लिए संस्कृति तथा समाज के संबंधों का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के तहत किया जा सकता है –

  1. समाज तथा संस्कृति दोनों ही व्यक्तियों के बीच पारस्परिक अंत:क्रिया का परिणाम है।
  2. मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।” हॉबेल के अनुसार, “सांस्कृतिक मनुष्य मस्तिष्क में उत्पन्न हुई है।”
  3. संस्कृति तथा समाज एक – दूसरे के पूरक हैं। कोई भी समाज संस्कृति के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता है, ठीक इसी प्रकार संस्कृति भी समाज के बिना सार्थक नहीं हो सकती है।
  4. समाज संस्कृति के हस्तांतरण, गतिशीलता, परिवर्तन, विकास तथा सामंजस्य के लिए सामाजिक वातावरण प्रस्तुत करता है।
  5. दूसरी तरफ, संस्कृति के विकास के बिना सामाजिक परिवेश शून्य हो जाता है।
  6. संस्कृति समाजीकरण की प्रक्रिया का मुख्य तत्व है। जन्म के समय बालक का स्वरूप प्राणिशास्त्रीय होता है।
  7. संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमान ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
  8. संस्कृति सीखे हुए प्रतिमानों का कुल योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुण का नतीजा नहीं है।
  9. संस्कृति वस्तुतः सामाजिक व्यवस्था का आधार होती है लेकिन समाज की अनुपस्थिति में सांस्कृतिक विकास सामाजिक निर्वात में नहीं हो सकता।
  10. इस प्रकार समाज तथा संस्कृति एक-दूसरे के पूरक होने के साथ अपरिहार्य भी हैं। एक की अनुपस्थिति में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 10.
“क्या संस्कृति उच्च और निम्न हो सकती है?” समझाइए।
उत्तर:
समाजशास्त्री रूप से जैसा कि हरस्कोविट्स का मत है, “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है।” प्रत्येक व्यक्ति समाज में रहकर व्यवहार के प्रतिमानों को सीखता रहता है। सीखने की यह प्रक्रिया सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से शिशुकाल से ही शुरू हो जाती है। प्रत्येक समाज की संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमान भिन्न होते हैं जो उसे दूसरे समाज से पृथक करते हैं। संस्कृति एक व्यापक तथा विस्तृत अवधारणा है जैसा कि टायलर ने लिखा है कि संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है “जिसके अन्तर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा एवं सभी प्रकार की क्षमताएँ तथा आदतें, जो मनुष्य समाज के सदस्यों के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

टायलर की परिभाषा से स्पष्ट है कि प्रत्येक संस्कृति ज्ञान, विज्ञान, कला, विश्वास तथा क्षमताओं आदि के आधार पर पृथक् होती है। इस प्रकार संस्कृति की भिन्नता ही अलग-अलग सांस्कृतिक क्षेत्र बना देती है। संस्कृतियों की उपलब्धियाँ भौतिक तथा अभौतिक सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनकी प्रगति से आंकी जाती है। कुछ संस्कृतियों का भौतिक पक्ष अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील हो सकता है। विभिन्न संस्कृतियों के बीच परस्पर आदान-प्रदान सदैव चलता रहता है। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के प्रतिमानों को ग्रहण करती है लेकिन कोई भी संस्कृति अपने मूल्यों का पूर्ण लुप्तिकरण

नहीं चाहती है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान पश्चिमी संस्कृति को भारतीय संस्कृति पर थोपने का प्रयास किया गया, लेकिन इसका विरोध किया गया। इस प्रकार, साधारणतया एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के भौतिक पक्ष को तो ग्रहण कर लेती है, लेकिन अभौतिक पक्ष के संदर्भ में ऐसा नहीं होता है । संस्कृति की संरचना चिंतन के प्रतिमानों, अनुभवों तथा व्यवहारों के माध्यम से होती है। चूँकि इन सभी तत्वों में भिन्नता पायी जाती है अतः विभिन्न संस्कृतियों में भिन्नतां स्वाभाविक है।

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प्रश्न 11.
सांस्कृतिक विलंबन की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक विलम्बन की अवधारणा-प्रसिद्ध समाजशास्त्री विलियम एफ ऑगबर्न द्वारा सांस्कृतिक विलंबन की अवधारणा का विकास किया गया है। समाज का आकार छोटा होने पर परिवर्तन की गति धीमी होती है तथा समाज में एकता पायी जाती है। ऐसी स्थिति में समाज में सामाजिक संतुलन पाया जाता है। दूसरी तरफ समाज में परिवर्तन की गति तीव्र होने पर सांस्कृतिक विलंबन तथा प्रतिमानहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऑगबन का मत है कि समय के संदर्भ में संस्कृति में सदैव परिवर्तन जारी रहता है। जैसा कि हम जानते हैं कि संस्कृति के दो पक्ष होते हैं –

  • भौतिक पक्ष तथा
  • अभौतिक पक्ष।

संस्कृति के भौतिक पक्षों अर्थात् उत्पादन, तकनीक, उपकरण तथा यातायात एवं संचार के साधनों में तेजी से परिवर्तन होता है। जबकि, संस्कृति के अभौतिक पक्षों अर्थात् जनरीतियों, प्रथाओं, विचारों तथा विश्वासों आदि में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत बहुत धीमी होती है।

संस्कृति के दोनों पक्षों अर्थात् भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तन यदि साथ-साथ नहीं हो रहे हैं अथवा संस्कृति के जिस पक्ष में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत धीमी है, तो तनाव तथा दबाव उत्पन्न होता है। इसके फलस्वरूप सांस्कृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।

संस्कृति के दोनों पक्षों के एकीकरण तथा पुनः सामंजस्य के स्तर तक पहुँचने में समय लगता है। ऑगबन ने इस स्थिति को सांस्कृतिक विलंबन का नाम दिया है। सांस्कृतिक विलंबन की स्थिति को एक उदाहरण से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। ब्रिटिश शासन के दौरान अनेक भारतीयों ने अंग्रेजी शिक्षा तथा वेशभूषा को तो स्वीकार किया, लेकिन वे अपनी सामाजिक प्रथाओं तथा जाति व्यवस्था से पृथक् नहीं हो सके । कभी-कभी ऐसा भी होताा है कि तीव्र गति से परिवर्तन होने की स्थिति में पुराने सांस्कृतिक प्रतिमान तो प्रभावहीन हो जाते हैं, लेकिन उनके स्थान पर नए सामाजिक प्रतिमान विकसित नहीं हो पाते हैं। ऐसी स्थिति में प्रतिमानहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 12.
हम कैसे दर्शा सकते हैं कि संस्कृति के विभिन्न आयाम मिलकर समग्र बनाते हैं?
उत्तर:
संस्कृति के तीन आयाम प्रचलित हैं –

  1. संज्ञानात्मक – इसका संदर्भ हमारे द्वारा देखे या सुने गए को व्यवहार में लाकर उसे अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया से है। जैसे अपने मोबाइल फोन की घंटी को पहचानना किसी नेता के कार्टून की पहचान करना।
  2. मानकीय – इसका संबंध आचरण के नियमों से है। जैसे अन्य व्यक्तियों के पत्रों को न खोलना, निधन पर कर्मकांडों का निष्पादन।
  3. भौतिक – इसमें भौतिक साधनों के प्रयोग से संभव कोई भी क्रियाकलाप शामिल है। भौतिक पदार्थों में उपकरण या यंत्र भी शामिल हैं। जैसे इंटरनेट चेटिंग, जमीन पर अल्पना बनाने के लिए चावल के आटे का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 13.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रतिमानात्मक आयामों का अर्थ –

  1. संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।
  2. प्रतिमानात्मक आयाम संस्कृति के दूसरे बड़े तत्त्व के रूप में जाने जाते हैं।
  3. संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों द्वारा व्यक्तियों के बीच अंत:क्रिया की पुनरावृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता है। पूर्वानुमानों का इसमें आलोचनात्मक महत्त्व होता है।
  4. प्रतिमानों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है। प्रतिमान जनरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किए जा सकते हैं।
  5. प्रतिमान की अवधारणा के अंतर्गत चिंतन के बजाए कार्य करने के तरीकों को अधिक महत्त्व प्रदान किया जाता है।
  6. आचरण में प्रतिमानों की उपस्थिति निहित होती है जबकि व्यवहार, आवेग अथवा प्रत्युत्तर हो सकता है।
  7. व्यक्ति के आचरण को मान्यता समाज द्वारा निर्धारित प्रतिमानों से ही प्राप्त होती है।
  8. प्रतिमान सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं। इस प्रकार प्रतिमान तथा मूल्य संस्कृति को समझने हेतु एक केन्द्रीय अवधारणा है।

प्रश्न 14.
समाजीकरण क्या है?
उत्तर:
समाजीकरण का अर्थ – व्यक्तियों द्वारा सामाजिक संपर्कों के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है। समाजीकरण की प्रक्रिया से ही प्राणी सामाजिक प्राणी बनता है।

समाजीकरण की परिभाषा – रोज तथा ग्लेजर के अनुसार, “समाजीकरण समाज तथा संस्कृति के विश्वासों, मूल्यों तथा प्रतिमानों एवं सामाजिक भूमिकाओं को सीखने की प्रक्रिया है।” गुडे के अनुसार, “समाजीकरण के अंतर्गत वे समस्त प्रक्रियाएँ आती हैं जिनसे कोई बचपन से वृद्धावस्था तक अपने सामाजिक कौशल, भूमिका, प्रतिमान, मूल्य तथा व्यक्तित्व के प्रति रूप ग्रहण करता है।”

ऑगबर्न के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिससे कि व्यक्ति समूह के आदर्श नियमों के अनुसार व्यवहार करना सीखता है।” एच. टी. मजूमदार के अनुसार, “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मूल प्रकृति मानव प्रकृति में बदल जाती है तथा पुरुष व्यक्ति बन जाता है।” जॉनसन के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रकार का सीखना है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने के योग्य बनाता है।” उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि समाजीकरण मानवीय शिशु के जैविकीय प्राणी रूप से सामाजिक मनुष्य में रूपांतरण है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका-परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। परिवार समाज का दर्पण है। इसके अंतर्गत समाज में पाए जाने वाले सभी आदर्श, मूल्य, प्रस्थितियाँ, व्यवहार प्रतिमान तथा भूमिकाएँ पायी जाती हैं। यही कारण है कि परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया का सशक्त तथा प्राथमिक माध्यम है।

समाजीकरण सीखने की प्रक्रिया है तथा इसके जरिए समाज की विशेषताओं तथा तत्त्वों को ग्रहण किया जाता है। मेकाइवर के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सामाजिक प्राणी एक-दूसरे के साथ अपने व्यापक तथा घनिष्ठ संबंध स्थापित करते हैं जिसमें वे एक-दूसरे से अधिकाधिक बँध जाते हैं तथा एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की भावना का विकास करते हैं, जिसमें वे अपने एवं दूसरों के व्यक्तित्व को अधिक अच्छी तरह समझने लगते हैं तथा जिसमें वे निकट एवं अधिक साहचर्य की जटिल संरचना का निर्माण करते हैं।”

परिवार समाजीकरण के सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में परिवार समाज का प्राथमिक समूह है। परिवार के सभी सदस्यों की अपनी-अपनी प्रस्थितियाँ तथा भूमिकाएँ होती हैं। उदाहरण के लिए, माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह निर्धारित मापदंडों के अनुरूप करते हैं। बच्चा परिवार के आदर्शों, मूल्यों तथा प्रतिमानों को आत्मसात् करता है तथा उनके साथ अपना तादात्म्य कायम करता है। इस प्रकार परिवार बच्चे के समाजीकरण की प्रक्रिया की नर्सरी है, जहाँ से बच्चा समाजीकरण की प्रक्रिया से निकलकर समाज में अनुकूलन करना सीखत है।

जॉनसन के अनुसार, “परिवार विशेष रूप से इस प्रकार संगठित रहता है जो समाजीकरण को संभव बनाता है।” किंबाल यंग के अनुसार, “पारिवारिक स्थिति के अंतर्गत मौलिक अंत: क्रियात्मक साँचा बच्चे तथा माता का है।” किंबाल यंग ने आगे कहा है कि “समाज के अंतर्गत, समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सबसे महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता एवं पिता की साधारतया अत्यधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। अपने जन्म से लेकर तीन वर्ष तक बालक प्रायः परिवार से बाहर कोई संबंध नहीं रखता है। परिवार के सदस्यों के मूल्यों, प्रतिमानों तथा व्यवहारों आदि का बच्चे के समाजीकरण पर काफी अधिक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, जो माता-पिता परिवार में बच्चों को सशक्त सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार प्रदान करते हैं, उन परिवारों में समाजीकरण की प्रक्रिया निर्दोष। रूप से चलती रहती है।

दूसरी तरफ, जिन परिवारों में बच्चों को संतुलित सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार नहीं मिल पाता, वहाँ समाजीकरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ जाती है। प्रत्येक परिवार अपने बच्चों को समाज के मूल्यों तथा प्रतिमानों के अनुरूप ढालने का प्रयास करता है।

किंबल यंग – के अनुसार सांस्कृतिक अनुकूलन परिवार में ही होता है। किंबाल यंग ने इस बारे में लिखा है कि “यह इस प्रकार से माना गया है जिसमें परिवार के सदस्य और विशेष रूप से माता पिता एक दिए हुए समाज के मौलिक सांस्कृतिक प्रतिमानों का परिचय बच्चे को देते हैं।

अंततः हम कह सकते हैं कि परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण तथा निर्णायक मा

प्रश्न 2.
संस्कृति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति का शाब्दिक अर्थ-संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘कोलरे’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है कृषि कार्य अथवा जमीन जोतना।

(i) संस्कृति का सामान्य अर्थ – मनुष्यों की समस्त कृतियाँ तथा सीखे हुए व्यवहार संस्कृति के अंतर्गत सम्मिलित किए जाते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते हैं। प्रत्येक समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है जो उसे दूसरे समाजों से पृथक् कर देती है। कोई भी व्यवहार जिसे व्यक्ति समाज से प्राप्त करता है अथवा जो समूह में सहभागिता के कारण व्यक्ति की आदत का हिस्सा बना जाता है, उसे सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है। अतः संस्कृति व्यक्ति द्वारा सीखने अथवा विकसित होने की वह प्रक्रिया है जो सामाजिक अंत:क्रिया के साथ-साथ चलती है।

(ii) संस्कृति की परिभाषा – विभिन्न मानवशास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों तो ने संस्कृति की अवधारणा को अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया है यंग तथा मैक के अनुसार, “संस्कृति सीखा हुआ तथा भागीदारी का व्यवहार है।” हॉबेल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है।” हकोविट्स के अनुसार, “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है।” टायलर के अनुसार, “संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा सभी तरह की क्षमताएँ एवं आदतें जो वयक्ति समाज के एक सदस्य के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

राल्फ लिंटन के अनुसार, “संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है, यह विचारों तथा आदतों का संग्रह है, जिन्हें व्यक्ति सीखते हैं, भागीदारी करते हैं तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तांरित करते हैं।”

क्लाइड क्लूखोन – के अनुसार, “संस्कृति व्यक्तियों के समग्र जीवन का एक तरीका है।” संस्कृति की उपरोक्त परिभाषाओं से निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती है –

  • संस्कृति की उत्पत्ति व्यक्ति के मस्तिष्क से हुई है।
  • संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुणों का परिणाम नहीं है।
  • संस्कृति का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को होता है।
  • संस्कृति मनुष्य की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।
  • संस्कृति गतिशील तथा परिवर्तनशील होती है।

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प्रश्न 3.
संस्कृति की अवधारणा का उद्भव कैसे हुआ?
उत्तर:
(i) संस्कृति का अर्थ – संस्कृति के अंतर्गत व्यक्तियों की समस्त कृतियाँ तथा सीखे हुए व्यवहार को सम्मिलित किया जाता है। यंग तथा मैक के अनुसार, “संस्कृति सीखा हुआ और भागीदारी का व्यवहार है।” व्यवहार का तात्पर्य विचार, भावना तथा बाह्य क्रियाओं से है। जहाँ तक किसी भी व्यवहार का संस्कृति का हिस्सा बनने का सवाल है, यह भी होता है जबकि ज्यादातर समूह के सदस्यों की उसमें भागीदारी हो।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति का विशेष व्यवहार संस्कृति नहीं हो सकता है। वास्तव में, जिस व्यवहार को व्यक्ति समाज से प्राप्त करता है या जो समूह में सहभागिता के कारण व्यक्ति की आदत का हिस्सा बन जाता है, उसे सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है।

अत: कहा जा सकता है कि संस्कृति व्यक्ति द्वारा सीखने तथा विकसित करने की वह प्रक्रिया है जो सामाजिक अंत:क्रिया के साथ-साथ चलती है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री टायलर के अनुसार, “संस्कृति एक ऐसी जटिल संपूर्णता है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा समाज के एक सदस्य के रूप में मनुष्य द्वारा प्राप्त अन्य क्षमताएँ तथा आदतें शामिल की जाती हैं। हॉबेल ने भी कहा है कि “संस्कृति सीखे हुए व्यवहारों या प्रतिमानों का कुल योग है।”

हरस्कोविट्स के अनुसार, “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ “राग है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के निम्नलिखित प्रमुख तत्व हैं –

  • व्यक्ति द्वारा समाज के सदस्य के रूप में धारण की गई आदतें तथा क्षमताएँ।
  • भाषा तथ उपकरण बनाने के तरीके।
  • विश्वास, ज्ञान, कला, नैतिकता, प्रथा तथा कानून।
  • सांस्कृतिक प्रतिमान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते हैं।
  • संस्कृति सदैव गतिशील तथा परिवर्तनशील होती है।

(ii) संस्कृति का शाब्दिक अर्थ – संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के कोलरे शब्द से हुई है जिसका तात्पर्य कृषि कार्य करना अथवा जमीन जोतना है। 18वीं तथा 19वीं सदियों में संस्कृति शब्द व्यक्तियों के परिमार्जन के लिए प्रयोग होने लगा। इसी कारण राल्फ लिंटन ने कहा है कि “संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है। इसमें व्यक्ति विचारों तथा व्यवहारों को सीखता है, एक-दूसरे सधे ग्रहण करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तारित करता है।”

(iii) भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति – भौतिक संस्कृति का स्वरूप मूर्त होता है। इसके अन्तर्गत उपकरण, प्रौद्योगिकी, उद्योग तथा यातायात एवं संचार को सम्मिलित किया जाता है अभौतिक संस्कृति का स्वरूप अमूर्त होता है। इसके अंतर्गत विश्वास, ज्ञान विचार, कला, प्रथा तथा कानून आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

(iv) संस्कृति के प्रमुख आयाम – संस्कृति के निम्नलिखित तीन प्रमुख आयाम हैं –

  • संज्ञानात्मक आयाम-संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों के अंतर्गत अंधविश्वासों, वैज्ञानिक तथ्यों, धर्म तथा कलाओं को सम्मिलित किया जाता है।
  • प्रतिमानात्मक आयाम-संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा मानकीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।
  • भौतिक आयाम-संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत मौलिक दशाओं का उल्लेख किया जाता है। इसमें आवास, कपड़ा, उपकरण, आभूषण, यातायात तथा संचार के साधनों को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 4.
संस्कृति की विशेषताओं की सूची दीजिए।
उत्तर:
हरस्कोविट्स का मत है कि “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है।” सी.एस.कून ने कहा है कि “संस्कृति उन विधियों का कुल योग है, जिनमें मनुष्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सीखने के कारण रहता है।”

संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(i) संस्कृति व्यक्तियों की कृति है-संस्कृति का निर्माण, विकास तथा गति व्यक्तियों के बीच सांस्कृतिक अंत:क्रिया के जरिए होती है। होबेल के अनुसार, “संस्कृति व्यक्ति के मस्तिष्क में उत्पन्न हुई है।” व्यक्तियों में संस्कृति का निर्माण करने तथा उसे ग्रहण करने की क्षमता होती है। यही कारण है कि कोत तथा क्रोबर ने व्यक्ति को अतिप्राणी कहा है।

(ii) संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार-संस्कृति को व्यक्तियों द्वारा सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग कहा जाता है । व्यक्ति सांस्कृतिक प्रतिमानों के विभिन्न स्वरूपों को समाज में रहकर ही सीखता है। हॉबेल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों को योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुण का परिणाम नहीं है।”

(iii) संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है-संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण सतत् रूप से चलता रहता है । सी. एस. कून के अनुसार, “संस्कृति उन विधियों का कुल योग है, जिनमें व्यक्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सीखने के कारण रहता है।”

(iv) संस्कृति व्यक्तियों की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है-संस्कृति मनुष्य की सामाजिक तथा प्राणिशास्त्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। मेलिनवॉस्की ने मानव आवश्यकताओं को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बाँटा है

  • प्राथमिक अथवा मौलिक आवश्यकताएँ – भोजन तथा मैथुन आदि मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। ये मनुष्य के सामाजिक तथा प्राणिशास्त्रीय अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।
  • द्वितीयक आवश्यकताएँ – द्वितीयक आवश्यकताओं में उन सभी कार्यों तथा प्रविधियों को सम्मिलित किया जाता है जो मनुष्य के जीवन के सुगम संचालन हेतु आवश्यक हैं। तृतीयक आवश्यकताएँ-तृतीयक आवश्यकताओं के अंतर्गत शिक्षा, धर्म, राजनीति तथा आर्थिक संस्थाएँ, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी आदि आते हैं।

(v) भाषा संस्कृति का मुख्य वाहक है- भाषा के माध्यम से ही संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमानों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण होता रहता है । इस प्रकार, भाषा संचित ज्ञान को हस्तांतरित करने का मुख्य वाहक है।

(vi) संस्कृति की प्रकृति गतिशील होती है-संस्कृति कभी भी स्थिर नहीं होती है। यह सदैव गतिशील रहती है। यह गति कम या अधिक हो सकती है। जैसा कि हम जानते हैं कि भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति गतियों में अंतर आने से सांस्कृतिक विलंबन की स्थिति हो जाती हैं।

(vii) संस्कृति सदैव आदर्शात्मक होती है-संस्कृति व्यक्ति के समक्ष समूह के आदर्श तथ्य प्रस्तुत करती है। ये आदर्श तथा प्रतिमान ही मनुष्य के व्यक्तित्व के प्रमुख तत्व होते हैं। संस्कृति प्रत्येक परिस्थिति के लिए मानव व्यवहार के आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करती है।

(viii) सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार-संस्कृति सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक संरचना तथा सामाजिक व्यवस्था का निर्माण तथा विकास करती है। इस प्रकार, संस्कृति सामाजिक व्यवस्था का आधार है।

हरकोविट्स ने संस्कृति के निम्नलिखित लक्षण बताए हैं –

  • संस्कृति एक सीखा हुआ तथा अर्जित व्यवहार है।
  • संस्कृति मानव अनुभवों के प्राणिशास्त्रीय पर्यावरण संबंधी मनोवैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक तत्वों से प्राप्त होती है।
  • संस्कृति संरचित होती है। इसके अंतर्गत चिंतन, भावनाओं तथा व्यवहारों के संगठित प्रतिमान सम्मिलित होते हैं।
  • संस्कृति को पहलुओं में विभाजित किया जाता है।
  • संस्कृति गतिशील होती है।
  • संस्कृति परिवर्तनशील तथा सापेक्षिक होती है।
  • संस्कृति के द्वारा नियमितताओं को प्रदर्शित किया जाता है जो कि विज्ञान की पद्धतियों के द्वारा इसके विश्लेषण की अनुमति देता है।
  • संस्कृति एक यंत्र है जिसमें व्यक्ति सामंजस्य तथा संपूर्ण समायोजन द्वारा रचनात्मक अनुभवों को प्राप्त करता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 5.
समाजीकरण की प्रक्रिया में व्यक्ति के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया तथा व्यक्ति का विकास –

(i) समाजीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति समाज के आदर्शों, प्रतिमानों, मूल्यों तथा व्यवहारों को सीखता है। जॉनसन के अनुसार, “समाजीकरण एक सोखता है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता है।”

(ii) समाजीकरण प्रत्येक समाज में पाया जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा प्राणी न केवल सामाजिक मनुष्य बनता है वरन् मानव भी बनता है।

(iii) जन्म के समय मनुष्य पशु के समान होता है। समाज में ही मनुष्य का समाजीकरण होता है। प्रसिद्ध विद्वान् अरस्तू के अनुसार, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैक्डूगल ने सामूहिकता की मूल प्रवृत्ति का उल्लेख किया है।

(iv) यदि व्यक्ति को जन्म के समय सामाजिक परिवेश नहीं मिल पाता है तो वह सामाजिक मानव नहीं बन पाता है।

इस संबंध में निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं –

(i) कमला तथा अमला – 1920 ई. में बंगाल में पादरी जे. सिंह को भेड़ियों के पास से दो बच्चे मिले। कमला की आयु 8 वर्ष थी तथा अमला की 12 वर्ष थी । ये बच्चे भेड़ियों के समान ही रहते थे तथा खाते थे। दिन के समय ये बच्चे अधिक चलते-फिरते नहीं थे, जबकि रात के समय घूमते थे। सामाजिक परिवेश में पालन-पोषण के बाद इनके व्यवहार तथा मूल प्रवृत्तियों में परिवर्तन आया । अमला की मृत्यु 15 महीने बाद हो गई । कमला 512 साल तक लगातार सीखने के बाद भी ठीक से नहीं चल पाता थी। दौड़ने के समय हाथों का प्रयोग करती थी। वह केवल 45 शब्द ही सीख पायी। 17 वर्ष की आयु में उसकी भी मृत्यु हो गयी।

(ii) अवेरान का जंगली बालक-फ्रांस के अवेरान जंगल में एक बालक मिला था । वह जानवरों की तरह खाता था तथा उन्हीं की तरह हरकतें करता था। फ्रांस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पिनेल ने इस बालक को जड़बुद्धि कहकर छोड़ दिया। 11 वर्ष की आयु में भी यह बालक 1 साल के बालक की क्षमताएँ रखता था।

ईतार्द ने पिनेल – के विश्लेषण को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि यदि यह बालक जड़बुद्धि होता तो जंगल की विषम परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाता । ईतार्द ने उसे पाला । धीरे-धीरे वह बालक समाजीकरण की धारा में बहने लगा। वह गर्मी तथा सर्दी में अंतर करने लगा । यद्यपि वह बोलना तो नहीं सीख सका तथापि प्रसन्नता तथा क्रोध के उद्वेगों को प्रकट करने लगा।

सांकेतिक भाषा का प्रयोग करने लगा। उदाहरण के लिए, यदि वह बालक दूध चाहता था तो दूध का बर्तन आगे कर देता था। ईतार्द ने The Wild Boy of Aveyron ने लिखा है कि “विक्टर ने एक जंगली से यह सीखा कि किस प्रकार मानव समाज में रहना चाहिए तथा साधारण इच्छाओं को किस प्रकार एक लिखित भाषा में अभिव्यक्त करें, लेकिन उसने अन्य समान आयु के बालकों से कभी योग्यता की बारबरी नहीं की। बचपन में मानव समाज के अभाव ने बालक में इतनी अधिक रुकावटें उत्पन्न कर दी कि अत्यधिक प्रयत्नों के बावजूद भी बहुत कम परिणाम निकले।

इसके अतिरिक्त, अन्ना तथा ईजावेल के उदाहरण भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जन्म के समय मनुष्य केवल एक पशु होता है, समाज ही उसे मानव बनाता है। समाज में अंत:क्रिया द्वारा ही सामाजिक गुणों, व्यवहारों, आदर्शों, प्रतिमानों तथा मूल्यों को सीखता है। गिटलर के अनुसार, “सामाजिक जीव बनने के लिए, मनुष्य को आदतें, विश्वासों, ज्ञान, अभिवृत्तियों तथा स्थायी भावों जैसे उच्च जैविक लक्षणों को प्राप्त करना चाहिए, जो उसमें अन्य व्यक्तियों की संगति से विकसित होते हैं तथा जिनमें ये गुण पाए जाते हैं।”

अंत में कहा जा सकता है कि बचपन से लेकर मृत्यु मनुष्य तक समाज से कुछ न कुछ सीखता रहता है। समाज के मूल्यों, आदर्शों, प्रतिमानों के साथ तादात्म्य ही समाजीकरण कहलाता है।

समाजीकरण के मुख्य चरण – समाजीकरण की क्रिया के निम्नलिखित चरण व्यक्ति के विकास में सहायक हैं –

(i) शिशु का समाजीकरण – शैशवावस्था में समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार में होती है। बच्चा अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों से सामाजिक अंत:क्रिया करता है । परिवार में ही वह भाषा, चलना-फिरना तथा खाना-पीना सीखता है। यह समाजीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण है।

(ii) बालक का समाजीकरण – समाजीकरण के द्वितीय चरण में बालक पड़ोस, मित्रमंडली, विद्यालय, अध्यापकों तथ सहपाठियों के संपर्क में आता है। उसकी सामाजिक अंत:क्रिया का क्षेत्र व्यापक हो जाता है।

(iii) किशोरावस्था में समाजीकरण – समाजीकरण का यह तीसरा चरण है । इस अवस्था में समाजीकरण परिवेश से अत्यधिक प्रभावित होता है। नगरीय, ग्रामीण तथा जनजातीय इलाकों में समाजीकरण के अभिकर्ता पृथक्-पृथक होते हैं।

(iv) वयस्क समाजीकरण-समाजीकरण की प्रक्रिया के इस चरण में समाजीकरण में आयाम तथा अभिकर्ता बदल जाते हैं। समाजीकरण का दायरा अत्यधिक व्यापक हो जाता है। व्यक्ति भविष्य की विभिन्न भूमिकाओं की तैयारी वर्तमान में ही करने लगता है। इस प्रकार के समाजीकरण को पूर्वपेक्षित समाजीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 6.
समाजीकरण के विभिन्न अभिकरणों अथवा संस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज समाजीकरण की प्रक्रिया को संभव बनाता है। इस संबंध में किंबाल यंग ने उचित ही कहा है, “समाज के अंतर्गत, समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता तथा पिता ही साधारणतया अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं।” समाजीकरण के अन्य माध्यमों में पड़ोस, संबंधी, प्राथमिक समूह के सदस्य, साथ ही साथ द्वितीयक समूह बाद की सदस्यता में आते हैं।”

समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण निम्नलिखित हैं –

(i) परिवार – परिवार समाजीकरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। परिवार समाज के आदर्शों, मूल्यों, प्रतिमानों तथा व्यवहारों का प्रतिनिधित्व करता है। समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक है। जॉनसन के अनुसार, “परिवार विशेष रूप से इस प्रकार संगठित रहता है जो समाजीकरण को संभव बनाता है।”

परिवार की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का बच्चों के विकास पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। किंबाल यंग के अनुसार,” जिसमें परिवार के सदस्य तथा विशेष रूप से माता तथा पिता एक दिए हुए समाज के मौलिक सांस्कृतिक नियमों से बच्चे को परिचय दिलाते हैं।”

(ii) समान आयु समूह – समान आयु समूह समाजीकरण का प्राथमिक तथा सशक्त अभिकरण है। बच्चा परिवार से बाहर अपनी आयु के बच्चों के साथ अंत:क्रिया करता है वह अन्य बच्चों के साथ खेलता है तथा पारस्परिकता के नए आयाम सीखता है।

(iii) पड़ोस – पड़ोस भी समाजीकरण का सशक्त माध्यम है। बच्चे पड़ोस में रहने वाले व्यक्तियों के संपर्क में आकर अनेक बातें सीखते हैं।

(iv) नातेदारी समूह – नातेदारी समूह भी समाजीकरण के महत्वपूर्ण अभिकरण हैं। नातेदारी समूहों में बच्चे समाजीकरण की अनेक बातें सीखते हैं।

(v) शिक्षा संस्थाएँ – शिक्षण संस्थाएँ समाजीकरण का द्वितीयक तथा औपचारिक माध्यम हैं । बच्चा स्कूल में अपने सहपाठियों तथा अध्यापकों के संपर्क में आकर अनेक बातें सीखता है।

(vi) अन्य द्वितीयक समूह – प्राथमिक समूहों के अलावा द्वितीयक समूह भी समाजीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। द्वितीयक समूहों के अंतर्गत राजनीतिक दल, जाति, सांस्कृतिक समूह, वर्ग, भाषा समूह, धार्मिक समूह तथा व्यावसायिक समूह आदि आते हैं।

प्रश्न 7.
संस्कृति के मुख्य अंग कौन से हैं ?
उत्तर:
सल्फ लिंटन के अनुसार, “संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है। इसमें व्यक्ति विचारों तथा व्यवहारों को सीखता है, एक-दूसरे से ग्रहण करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरी को हस्तारित करता है।”

संस्कृति के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं –

  • संज्ञानात्मक आयाम
  • प्रतिमानात्मक आयाम
  • भौतिक आयाम

1. संज्ञानात्मक आयाम –
(a) संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम के अंतर्गत अंधविश्वास, वैज्ञानिक तथ्य, मिथक, कला तथा धर्म सम्मिलित हैं।

(b) संज्ञानात्मक आयाम संस्कृति के एक महत्वपूर्ण तत्व हैं जो चिंतन की पद्धतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। विचारों के द्वारा संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम को स्पष्ट किया जाता है जिसमें ज्ञान तथा विश्वास सम्मिलित होते हैं। विचार समाज में रहने वाले व्यक्तियों की बौद्धिक धरोहर होते हैं । शिक्षित समाज में विचारों को पुस्तकों तथा दस्तावेजों के रूप में अभिलेखित कर लिया जाता है।

(c) दूसरी तरफ अशिक्षित समाज में विचारों का निर्माण लोकरीतियों तथा जनजातीय दंत कथाओं से होता है। इस प्रकार विचार संस्कृति का प्रथम मुख्य तत्व है।

(d) जहाँ तक संज्ञान की प्रक्रिया का सवाल है, इसके निर्माण में सभी लोग भागीदारी करते हैं, सभी लोग चिंतन करते हैं, अनुभव करते हैं पहचानते हैं तथा अतीत की वस्तुओं का स्मरण करते हैं व उन्हें वास्तविक तथा काल्पनिक भविष्य के बारे में प्रक्षेपित करते हैं। संज्ञान एक सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्तियों को समझने के योग्य बनाती है तथा उन्हें उनके वातावरण से संबद्ध करती है।

(e) संस्कृति द्वारा सांस्कृतिक विश्वासों को व्यापक आधार पर स्वीकार किया जाता है। कुछ विश्वास, आदतें तथा परम्पराएँ सत्ता की अपील पर माने जाते हैं लेकिन वास्तविक रूप से ये असत्य होते हैं। दूसरी तरफ, जो आदतें तथा परंपराएँ अन्य अधिकारिक स्रोतों पर आधारित होती हैं तथा जिन्हें आलोचनात्मक अवलोकन द्वारा प्रमाणित किया जाता है, उन्हें सत्य-स्वीकार किया जाता है।

2. प्रतिमानात्मक आयाम –
(a) संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।

(b) प्रतिमानात्मक आयाम संस्कृति के दूसरे बड़े तत्व के रूप में जाने जाते हैं। संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों द्वारा व्यक्तियों के बीच अंतःक्रिया को प्रोत्साहित किया जाता है। पूर्वानुमानों का इसमें आलोचनात्मक महत्त्व होता है।

(c) प्रतिमानों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है। प्रतिमान जनरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किए जा सकते हैं। प्रतिमान की अवधारणा के अंतर्गत चिंतन बजाए कार्य करने के तरीकों को अधिक महत्व प्रदान किया जाता है।

(d) आचरण में प्रतिमानों की उपस्थिति निहित होती है जबकि व्यवहार, आवेग अथवा प्रत्युत्तर हो सकता है। व्यक्ति का आचरण मान्य समाज द्वारा निर्धारित प्रतिमानों से ही प्राप्त होती है। प्रतिमान सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं । इस प्रकार, प्रतिमान तथा मूल्य संस्कृति को समझने हेतु एक केन्द्रीय अवधरणा है।

3. भौतिक आयाम –
(a) संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत कुछ वस्तुएँ जैसे कि कपड़ा, आवास, उपकरण, आभूषण, रेडियो तथा संगीत वाद्ययंत्र आदि आते हैं।

(b) भौतिक आयामों में उन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा ग्रहण किया जाता है अथवा जिन्हें वे उपयोग में लाते हैं।

(c) व्यक्तियों द्वारा रचित मूर्त वस्तुओं को भौतिक संस्कृति कहते हैं । पदार्थ अत्यधिक स्पष्ट होने के कारण संस्कृति को जानने का सरलतम स्वरूप है।

(d) भौतिक संस्कृति के साथ अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों तथा प्रतिमानात्मक आयामों को सम्मिलित किया जाता है । भौतिक संस्कृति तक अभौतिक संस्कृति के तत्वों में घनिष्ठ संबंध होता है।

प्रश्न 8.
उन दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों। क्या नृजातीय बनना कठिन नहीं है ?
उत्तर:
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क्या नृजातीय बनाना कठिन नहीं है –
जब संस्कृतियाँ एक-दूसरे के संपर्क में आई तभी नृजातीयता की उत्पति हुई। नृजातीयता से आशय अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग करने से है। इसका अर्थ है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों को मानदंड या मानक के रूप में प्रदर्शित किया गया था उन्हें अन्य संस्कृतियों की आस्थाओं तथा मूल्यों से श्रेष्ठ माना जाता है। इस दृष्टि से नृजातीय बनाना कठिन है।

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प्रश्न 9.
समाजीकरण के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
अथवा
फ्रायड के समाजीकरण की तीन अवस्थाएँ क्या हैं?
उत्तर:
समाजीकरण के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं –

(i) कले का “आत्मदर्पण” का सिद्धात – प्रसिद्ध समाजशास्त्री चार्ल्स एच. कूले ने अपनी पुस्तक ‘Human Nature and the Social Order’ में ‘आत्मदर्पण’ की अवधारणा को उल्लेख किया है। कले के अनसार स्व का विकास व्यक्तित्व तथा समाजीकरण के विकास का सर्वाधिव महत्वपूर्ण प्रश्न है । कूले के अनुसार स्व के विकास तथा व्यक्तित्व निर्माण में निम्नलिखित तीन तत्व महत्वपूर्ण हैं –

  • अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में हमारे स्वरूप तथा आकृति की कल्पना।
  • स्वयं की कल्पना में वह जैसा दिखाई पड़ता है, उस पर वह स्वयं के विषय में क्या निर्णय करता है।
  • गौरव तथा ग्लानि से युक्त आत्मबोध।

कूले का मत है कि ‘स्व’ अथवा ‘मैं’ की अवधारणा का विकास दूसरे व्यक्तियों के संपर्क में आने से ही होता है। इस प्रकार, ‘स्व’ का विचार सामाजिक उत्पाद है, जिसे सामाजिक स्व भी कहते हैं। कूले का मत है कि स्व का विकास समाज में होता है। यह अन्य व्यक्तियों के साथ पारम्परिक अंतःक्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है। नवजात शिशु का अपना कोई ‘स्व’ नहीं होता है। उसकी अपने विषय में उसी समय रुचि जागृत होती है जब वह सचेत होता है।

यदि समाज में बालक के व्यवहार का व्यक्तियों द्वारा प्रशंसा की जाती है तो वह गर्व का अनुभव करता है। दूसरी तरफ, यदि उसके व्यवहार की आलोचना की जाती है तो ग्लानि का अनुभव करता है। बालक के व्यवहार की निरंतर प्रशंसा होने पर उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न होता है तथा बाह्यमुखी व्यक्तित्व का विकास होता है। दूसरी तरफ, निरंतर आलोचना होने की स्थिति में बालक हतोत्साहित हो जाता है तथा अंतर्मुखी व्यक्तित्व का विकास होता है।

समाज में व्यक्ति के विचार, मनोवृत्तियाँ, मूल्य, आदर्श, प्रतिमान तथा आदतें उसके निकट रहने वाले व्यक्तियों के विचारों तथा मनोवृत्तियाँ पर आधारित होते हैं तथा बालक का समाजीकरण इन्हीं कारकों पर निर्भर करता है। कूले का मत है कि प्राथमिक समूह जैसे परिवार, मित्र, समूह तथा पड़ोस आदि समाजीकरण में निर्णायक तथा प्रभावी भूमिका निभाते हैं। प्राथमिक समूहों में आमने-सामने के अनौपचारिक संबंध होते हैं। कूले का मत है कि स्व के विकास में यही जानना आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति किस तरह सोचते हैं तथा क्या निर्णय देते हैं, वरन् स्वयं को दूसरे व्यक्तियों के निर्णय के दर्पण में देखना भी आवश्यक है।

(ii) मीड की भूमिका ग्रहण का सिद्धांत – मीड का मत है कि ‘स्व’ की धारणा का अस्तित्व एवं विकास अन्य व्यक्तियों की भूमिका ग्रहण करने पर निर्भर करता है। दूसरों से भूमिका ग्रहण करने का तात्पर्य है कि हम अन्य व्यक्तियों के विचार तथा भावनाओं को स्वीकार करते हैं। उदाहरण के लिए इस श्रृंखला में सर्वप्रथम माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य तथा फिर मित्र व अध्यापक आदि आते हैं।

मीड का विचार है कि व्यक्तियों की अंतः क्रिया का आधार प्रतीक होते हैं। प्रतीक निर्मित होते हैं एवं वस्तु अथवा घटक की आंतरिक प्रकृति से इनका कोई संबंध नहीं होता है। मानव अंत:क्रिया के लिए प्रतीक अपरिहार्य हैं। अत: हम कह सकते हैं कि समाज के अस्तित्व के लिए प्रतीक आवश्यक हैं। मानव समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतीक भाषा है। इसलिए, प्रतीकों में समाज के सदस्यों द्वारा भाग लिया जाता है। मीड ने इस प्रक्रिया को भूमिका ग्रहण कहा है।

समाज में भूमिका ग्रहण की प्रक्रिया बच्चे के जन्म से ही आरंभ हो जाती है। आरंभ में बच्चों के द्वारा माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिकाओं में तादात्म्य स्थापित किया जाता है । मीड इस प्रकार के तादात्म्य को विशिष्ट अन्य का नाम देता है। बच्चे के विकास के साथ-साथ उसका तादात्म्य सामान्यीकृत अन्य के साथ हो जाता है। जब तक बच्चा दूसरों के साथ तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता या अन्यों की भूमिकाओं को समझ नहीं पाता है वह केवल ‘मैं’ होता है, लेकिन जब बच्चे का सामान्यीकृत अन्य की भूमिकाओं से तादात्म्य हो जाता है तो उसका मैं ‘मुझ’ बदल जाता है। मैं का मुझ में परिवर्तन बच्चे के समाजीकरण के विषय में बताता है।

जॉर्ज हरबर्ट मीड का मत है कि व्यक्ति तथा समाज को पृथक नहीं किया जा सकता है। समाज ही व्यक्ति को एक मानव प्राणी के रूप में परिवर्तित करता है। व्यक्ति द्वारा पहले सामाजिक पर्यावरण की रचना की जाती है, इसके बाद वह उसी से आकृति प्राप्त करता है। समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ अंत:क्रिया से व्यक्ति के स्व का विकास होता है। अंत: क्रिया के लिए संचार आवश्यक है। संचार का आधार प्रतीक होते हैं, जिन्हें व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझा जाता है।

(iii) फ्रायड का विश्लेषणात्मक सिद्धांत – फ्रायड ने समाजीकरण के सिद्धांत में कहा है कि व्यक्तियों का निर्माण व्यक्ति में पायी जाने वाली जैविकीय, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक क्षमताओं के मध्य होने वाली क्रियाओं का परिणाम होता है। फ्रायड का मत है कि बच्चे में व्यक्तित्व का प्रमुख भाग 5 वर्ष की आयु तक विकसित हो जाता है। व्यक्ति के शेष जीवन काल में इसी व्यक्तियों का विस्तार होता है।

  • चेतन
  • अवचेतन तथा
  • अचेतन

मानव मस्तिष्क का चेतन क्षेत्र उसे जीवन की वर्तमान घटना तथा क्रियाओं से संबद्ध होता है। मस्तिष्क के अचेतन क्षेत्र में निकट भूत की घटनाओं तथा अनुभवों के एकत्रीकरण होता है। मस्तिष्क के अवचेतन क्षेत्र में भूतकाल की घटनाओं के अनुभव होते हैं। मानव मस्तिष्क में एकत्रित अनुभव व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अनुभव किसी न किसी रूप में प्रकट होने का प्रयास करते रहते हैं।

फ्रायड व्यक्तियों के निर्माण में निम्नलिखित तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं को महत्त्वपूर्ण मानते हैं –

  • इड
  • अहं
  • पराअहं

उपरोक्त वर्णित अवस्थाएँ परस्पर अंतःक्रिया करती हैं तथा इससे मानव व्यवहार का जन्म होता है। फ्रायड में इड को वास्तविक मानसिक यथार्थ माना है। इसके अंतर्गत व्यति की मनोवैज्ञानिक, आनुवंशिकी तथा मूल प्रवृत्ति सम्मिलित होती है। यह सुख के सिद्धांत पर कार्य करता है। तथा व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक ऊर्जा का भंडार है। इड समाज के नियमों, मूल्यों तथा आदर्शों से दूर रहता है। इसका मूल उद्देश्य किसी भी तरह से अपनी जरूरतों की पूर्ति करना है। भले ही यह पूर्ति कल्पना या स्वप्न में हो, लेकिन मात्र कल्पना से तो जरूरत पूरी होने का तनाव कम हो सकता। उदाहरण के लिए, पानी की कल्पना प्यास शांत नहीं कर सकती।

इसके बाद, द्वितीय मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का निर्माण होता है। इसे अहं कहते हैं। अहं का प्रकार्य वास्तविक सिद्धांत पर आधारित होता है। जहाँ तक इड तथा अहं में अंतर का प्रश्न है; इड मस्तिष्क के विषयक यथार्थ को जानता है, जबकि अहं वस्तगत यथार्थ तथा विषयक यथार्थ में अंतर करता है। अहं की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि मूर्त साधनों पर निर्भर करता है। व्यक्ति की विभिन्न जरूरतें केवल काल्पनिक साधनों से पूर्ण नहीं हो सकतीं। अहं इस बात का भी विश्लेषण करता है कि समाज के लिए क्या उचित या क्या अनचिंत है? अहं इड के लक्ष्यों में रुकावट नहीं डालता वरन उन्हें संगठित रूप में आगे बढ़ाता है।

व्यक्तित्व की तृतीय अवस्था पराअहं है। यह मानव व्यक्तित्व का नैतिक पहलू है, जो आदर्शवाद के सिद्धांत से निर्देशित होता है। पराअहं समाज में उन मूल्यों, आदर्शों तथा प्रतिमानों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें बच्चे ने समाजीकरण की प्रक्रिया के समय आत्मसात् कर लिया है। पराअहं का मुख्य उद्देश्य इस बात का निर्णय करना है कि मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिन साधनों को चुना गया है वे समाज द्वारा स्थापित प्रतिमानों के अनुसार उचित हैं अथवा अनुचित । पराअहं के मुख्य कार्य की उन तीव्र इच्छाओं पर नियंत्रण लगाना है, जो समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है।

इड, अहं तथा पराअहं क्रमशः जैविकीय, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक कारक हैं, जो वस्तुतः एक-दूसरे को संतुलित करने का कार्य करते हैं। इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण तथा विकास होता है। अहं के अव्यवस्थित होने पर व्यक्तित्व का विकास अव्यवस्थित हो सकता है। इस प्रकार की स्थिति में इड अहं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है तो व्यक्तित्व के अनैतिक तथा आपराधिक होने की संभावना बढ़ जाती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 10.
क्या विश्वव्यापीकरण को आप आधुनिकता से जोड़ते हैं ? नृजातीयता का प्रेक्षण करें तथा उदाहरण दें।
उत्तर:
विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया वात्सव में आधुनिकीकरण की ही प्रक्रिया है। विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया में अन्य देशों से जो संस्कृति आयात की गई है उसने आधुनिकता को बढ़ावा दिया है। नृजातीय जब संस्कृतियाँ एक-दूसरे के संपर्क में आईं, तभी नृजातीयता की उत्पत्ति हुई। नृजातीयमा से आशय अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग करने से है। इसका अर्थ है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों को मानदंड या मानक के रूप में प्रदर्शित किया गया था उन्हें अन्य संस्कृतियों की आस्थाओं तथा मूल्यों से श्रेष्ठ माना जाता है।

नृजातीय तुलनाओं में निहित सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना उपनिवेशवाद की स्थितियों में स्पष्ट दिखाई देती है। थॉमस बाबींटोम मेकॉले के ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत की शिक्षा (1835 ई.) के प्रसिद्ध विवरण में नृजातीयता का दृष्टांत दिया है जब वे कहते हैं, “हमें इस समय ऐ ऐसे वर्ग का निर्माण अवश्य करना चाहिए जो हमारे तथा हमारे द्वारा शासित लाखों लोगों के बची द्विभाषियों का काय करे, व्यक्तियों का ऐसा वर्ग जो खून तथा रंग में भारतीय हो परंतु रुचि में, विचार में, नैतिकता तथा प्रतिभा में अंग्रेज हो।”

नृजातीयता विश्वबंधुता के विपरीत है जोकि अंतर के कारण अन्य संस्कृतियों को महत्त्व देती है। विश्वबंधुता में कोई भी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के मूल्यों तथा आस्थाओं का मूल्यांकन अपने मूल्य तथा आस्थाओं के अनुसार नहीं करता । यह विभिन्न सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की मानता तथा उन्हें अपने अंदर समायोजित करता है तथा एक-दूसरे की संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिए सांस्कृतिक विनिमय व लेन-देन को बढ़ावा देता है । विदेशी शब्दों को अपनी शब्दावली में लगातार शामिल करके अंग्रेजी भाषा अंतर्राष्ट्रीय संप्रेषण का मुख्य साधन बनकर उभरी है। पुनः हिन्दी फिल्मों के संगीत की लोकप्रियता को पाश्चात्य पॉप संगीत तथा साथ ही भारतीय लोकगीत की विभिन्न परंपराओं तथा भंगड़ा और गजल जैसे अर्द्धशास्त्रीय संगीत से ली गई देन का परिणाम मान सकते हैं।

एक आधुनिक समाज सांस्कृतिक विभिन्नता का प्रशंसक होता है तथा बाहर से पड़ने वाले सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करता परंतु ऐसे सभी प्रभावों को सदैव इस प्रकार शामिल किया जाता है कि ये देशीय संस्कृति के तत्वों के साथ मिल सकें । विदेशी शब्दों को शामिल करने के बावजूद अंग्रेजी अलग भाषा नहीं बन पाई और न ही हिन्दी फिल्मों के संगीत ने अन्य जगहों से उधार लेने के बावजूद अपना स्वरूप खोया। विविध शैलियों, रूपों, श्रव्यों तथा शिल्पों को शामिल करने से विश्वव्यापी संस्कृति को पहचान प्राप्त होती है। आज सार्वभौमिक विश्व में, जहाँ संचार के आधुनिक साधनों से संस्कृतियों के बीच अंतर कम हो रहे हैं, एक विश्वव्यापी दृष्टि व्यक्ति को अपनी संस्कृति को विभिन्न प्रभावों द्वारा सशक्त करने की स्वतंत्रता देती है।

प्रश्न 11.
आपके अनुसार आपकी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण क्या है ? यह पहले अलग कैसे था? आप इसके चारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर:
हमारी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण विद्यालय है। विद्यालय एक सामान्य प्रक्रिया है, जहाँ पढ़ाए जाने वाले विषयों की एक निश्चित पाठ्यचर्या होती है। विद्यालय समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण होते हैं। कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार औपचारिक पाठ्यक्रम के साथ-साथ बच्चों को सिखाने के लिए कुछ अप्रत्यक्ष पाठ्यक्रम भी होता है।

भारत तथा दक्षिणी अफ्रीका में कुछ ऐसे विद्यालय हैं जहाँ लड़कों की अपेक्षा लड़कियों से अपने कमरे साफ करने की आशा की जाती है। कुछ विद्यालयों में, इसके समाधान के लिए प्रयास किए जाते हैं जिससे तहत लड़के तथा लड़कियों से ऐसे काम करने को कहा जाता है जिनके बारे में सामान्यता उनसे आशा नहीं की जाती है। पहले शिक्षा का अधिक महत्व नहीं था इसलिए यह वर्तमान से हटकर था।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 12.
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए दो विभिन्न उपागमों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए विभिन्न उपागमों का प्रयोग किया जाता है। उनमें से दो प्रमुख हैं –

(i) ऐतिहासिक उपागम – किसी भी विषय के सही ज्ञान के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सहारा लेना ही पड़ता है। इतिहास में मानवजाति की घटनाओं का भंडार छिपा है। संस्कृति की उत्पत्ति, विकास तथा वर्तमान स्वरूप के विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहास के पन्नों को उलटना ही पड़ेगा। यह बात निर्विवाद है कि किसी भी संस्कृति का निर्माण एक साथ एक ही समय में नहीं हुआ है, इसलिए संस्कृति के परिवर्तनों की जानकारी के अध्ययन के लिए ऐतिहासिक उपागम की आवश्यकता पड़ती है।

(ii) दार्शनिक उपागम – सांस्कृतिक परिवर्तनों के अध्ययन के लिए दार्शनिक उपागम पर भी जोर दिया जाता है। कुछ समाजशास्त्री सांस्कृतिक परिवर्तनों को दार्शनिक दृष्टि से भी स्पष्ट का लेते हैं। इस कारण इस उपागम की महत्ता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक अनुसंधन की समस्या निम्नलिखित से कौन-सा है?
(अ) वस्तुनिष्ठता
(ब) चक्रीय
(स) रेखीय
(द) पाराबोलिक
उत्तर:
(द) पाराबोलिक

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में असत्य कथन छाँटिये ………………………
(अ) सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है
(ब) सामाजिक सर्वेक्षण का निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है
(स) सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक पद्धति है
(द) सामाजिक सर्वेक्षण सदैव व्यक्तिगत रूप से किया जाता है
उत्तर:
(द) सामाजिक सर्वेक्षण सदैव व्यक्तिगत रूप से किया जाता है

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प्रश्न 3.
जन्म द्वारा प्रदत्त प्रस्थिति कहलाती है ……………………..
(अ) वर्ण
(ब) संघ
(स) जाति
(द) समूह
उत्तर:
(स) जाति

प्रश्न 4.
समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा हम सीखते हैं ………………………..
(अ) समाज का सदस्य बनना
(ब) राजनीतिक दल का सदस्य बनना
(स) धार्मिक संस्था का सदस्य बनना
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(अ) समाज का सदस्य बनना

प्रश्न 5.
सामान्यतया विस्तृत दल द्वारा किये जानेवाले अनुसंधान हैं ……………………….
(अ) साक्षात्कार
(ब) अनुसूची
(स) सर्वेक्षण
(द) प्रश्नावली
उत्तर:
(द) प्रश्नावली

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प्रश्न 6.
असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता की स्थिति होती है ……………………..
(अ) समूह में शामिल होना
(ब) समूह में शामिल नहीं होना
(स) समूह के साथ अंत:क्रिया करना
(द) समूह से संबंध स्थापित करना
उत्तर:
(द) समूह से संबंध स्थापित करना

प्रश्न 7.
खुली प्रश्नावली में उत्तरदाता अपने उत्तर देने में होता है ……………………….
(अ) बंधा हुआ
(ब) चयन हेतु बाध्य
(स) सीमित
(द) स्वतंत्र
उत्तर:
(द) स्वतंत्र

प्रश्न 8.
समाजीकरण के अभिकरण हैं …………………………
(अ) परिवार
(ब) स्कूल
(स) जाति
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

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प्रश्न 9.
नगरीय समुदाय में जनसंख्या घनत्व पाया जाता है ……………………….
(अ) काफी
(ब) कम
(स) साधारण
(द) विरल
उत्तर:
(अ) काफी

प्रश्न 10.
सहभागी अवलोकन के द्वारा अनुसंधान किया जाता है ………………………
(अ) एक समूह का
(ब) एक पुरुष का
(स) एक महिला का
(द) पशुओं के समूह का
उत्तर:
(अ) एक समूह का

प्रश्न 11.
बंद प्रश्नावली में उत्तरदाता को उत्तर देने की होती है ……………………….
(अ) स्वतंत्रता
(ब) सीमाएँ
(स) छूट
(द) विकल्पों की स्वतंत्रता
उत्तर:
(ब) सीमाएँ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Sociology समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
लंबवत गतिशीलता किसे कहते हैं?
उत्तर:
लंबवत गतिशीलता में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन उच्च अथवा निम्न श्रेणी में हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि एक लिपिक अपने ही कार्यालय या दूसरे कार्यालय में पदोन्नति पर जाता है तो उसे लंबवत गतिशीलता कहा जाएगा।

प्रश्न 2.
अंतरपीढ़ी गतिशीलता का अर्थ बताइए?
उत्तर:
अंतरपीढ़ी गतिशीलता सामाजिक-आर्थिक सोपान पर आधारित गतिशीलता है। अंतरपीढ़ी गतिशीलता परिवार में पृथक् पीढ़ी वाले सदस्यों द्वारा अनुभव की जाती है। उदाहरण के लिए किसी लिपिक के पुत्र का आई.ए.एस. अधिकारी बन जाना अंतरपीढ़ी गतिशीलता का उदाहरण है। दोनों पीढ़ियाँ अलग-अलग हैं तथा दोनों में व्यावसायिक भिन्नता है।

प्रश्न 3.
कार्ल मार्क्स द्वारा किया गया समाज का विभाजन बताइए?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने समाज को निम्नलिखित दो भागें में बाँटा है:

  • जिनके पास है या बुर्जुआ वर्ग।
  • जिनके पास नहीं है या प्रोलीटेरिएट्स।

जिनके पास है उन्हें उत्पादन के साधनों का स्वामी कहा जाता है। जिनके पास नहीं है, उन्हें मजदूर कहा जाता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न आधार बताइए।
उत्तर:
सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न आधार निम्नलिखित हैं:

  • दासता
  • एस्टेट्स
  • वर्ग
  • सत्ता
  • जाति
  • सजातीयता

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प्रश्न 5.
सामाजिक जीवन में सत्ता एक प्रमुख संसाधन किस प्रकार है?
उत्तर:
सामाजिक जीवन में सत्ता एक प्रमुख संसाधन निम्नलिखित प्रकार से है:

  • संयोग जो एक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को समूहों को मिलाता है।
  • जिन्हें सामुदायिक गतिविधियों में अनुभव किया जाता है।
  • सत्ता का प्रयोग दूसरों के विरोध के लिए भी किया जाता है।

प्रश्न 6.
परंपरागत भारत में सामाजिक असमानता का प्रमुख आधार बताइए।
उत्तर:
परंपरागत भारत में सामाजिक असमानता का प्रमुख आधार जाति है।

प्रश्न 7.
भारतीय समाज में पायी जाने वाली वर्णाश्रम व्यवस्था बताइए।
उत्तर:
भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार भारतीय समाज निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा गया है:

  • ब्राह्मण (पुरोहित या विद्वान)
  • क्षत्रिय शासक तथा योद्धा
  • वैश्य व्यापारी
  • शूद्र (कृषक, मजदूर तथा सेवक)

प्रश्न 8.
सजातीयता का शाब्दिक अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सजातीयता शब्द ग्रीक भाष के शब्द एथनिकोस से लिया गया है, जो कि एथनोस का विशेषण है एथनोस का तत्पर्य एक जन समुदाय अथवा राष्ट्र से है। अपने समकालीन रूप में सजातीयता की अवधारणा उस समूह के लिए प्रयोग की जाती है जिसमें कुछ अंशों में सामंजस्य तथा एकता पायी जाती हो । इस प्रकार, सजातीयता का अर्थ सामूहिकता से है।

प्रश्न 9.
बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक समूहों का समाजशास्त्रीय अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र में बहुसंख्यक समूह को सत्ता के अधिकार तथा प्रयोग से परिभाषित किया जाता है तथा अल्पसंख्यक समूह में इन दोनों का अभाव होता है।

प्रश्न 10.
समाज में असमानता पाए जाने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
समाज में असमानता पाए जाने का मुख्य कारण उपलब्ध संसाधनों, जैसे-भूमि, धन-संपत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा आदि का समान वितरण न होना है।

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प्रश्न 11.
सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
टॉलकॉट पारसंस के अनुसार, “सामाजिक स्तरीकरण से अभिप्राय किसी सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों का ऊँचे तथा नीचे के पदासोपानक्रम में विभाजन है।”

प्रश्न 12.
स्तरीकरण शब्द या शाब्दिक अर्थ बताइए।
उत्तर:
अंग्रेजी भाषा में स्ट्रैटिफिकेशन (स्तरीकरण) शब्द भूगर्भशास्त्र से लिया गया है। स्ट्रैटिफिकेशन का मूल शब्द स्ट्रैटन है। स्ट्रैटन का तात्पर्य भूमि की परतों से है। भूगर्भशास्त्रियों द्वारा भूमि की विभिन्न परतों का अध्ययन जिस प्रकार किया जाता है, उसी प्रकार समाजशास्त्र में समाज की विभिन्न परतों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 13.
सामाजिक विभेदीकरण सामाजिक स्तरीकरण में कैसे परिवर्तित हो जाता है?
उत्तर:
सामाजिक विभेदीकरण सामाजिक स्तरीकरण में निम्नलिखित स्थितियों में परिवर्तित हो जाता है:

  • स्थितियों की विभिन्न श्रेणियों तथा मूल्यांकन के द्वारा।
  • किसी को पुरस्कार देना अथवा न देना।

प्रश्न 14.
स्तरीकरण व्यवस्था को किस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
स्तरीकरण व्यवस्था को निम्नलिखित दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • मुक्त स्तरीकरण-स्तरीकरण की इस अवस्था में लचीलापन पाया जाता है।
  • बंद स्तरीकरण-स्तरीकरण की इस अवस्था में दृढ़ता तथा कठो जाती है।

प्रश्न 15.
सामानान्तर गतिशीलता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समानान्तर गतिशीलता में एक व्यक्ति की स्थिति में तो परिवर्तन होता है, लेकिन उसकी श्रेणी पहले जैसा रहती है। उदाहरण के लिए यदि एक लिपिक का स्थानान्तरण एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में होता है, लेकिन उसकी श्रेणी में परिवर्तन नहीं होता है तो इसे समानान्तर श्रेणी कहते हैं।

प्रश्न 16.
सामाजिक संरचना शब्द को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पारसंस के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर संबंधित संस्थाओं, अभिकरणों, सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समूह में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण, किए गए पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमबद्धता को कहते हैं।”

प्रश्न 17.
प्रस्थिति शब्द की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
ऑग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार “एक व्यक्ति की प्रस्थिति, उसका समूह में स्थान तथा दूसरों के संबंध में उसका क्रम है।”

प्रश्न 18.
सामाजिक संरचना के स्तर बताते हुए उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक समाज की संरचना में निम्नलिखित दो स्तर पाये जाते हैं:

  • सूक्ष्म स्तर, यथा किसी विशिष्ट समुदाय अथवा गाँव का अध्ययन।
  • वृहद स्तर, यथा संपूर्ण सामाजिक संरचना जैसे कि भारतीय समाज का अध्ययन।

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प्रश्न 19.
सामाजिक संरचना शब्द का प्रयोग समाजशास्त्र में सर्वप्रथम किस विद्वान के द्वारा किया गया?
उत्तर:
समाजशास्त्र में सामाजिक संरचना शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ब्रिटिश विद्वान हारबर्ट स्पेंसर के द्वारा किया गया था.। उनके द्वारा समाज तथा जीवित प्राणी में समानता देखी गयी थी।

प्रश्न 20.
संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण के सिद्धांत कां मुख्य प्रवर्तक कौन था? इस दृष्टिकोण की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
ब्रिटिश मानवशास्त्री रैडक्लिफ ब्राउन संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण का प्रमुख प्रवर्तक था। इस दृष्टिकोण की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

व्यक्ति सामाजिक संरचना की एक इकाई है।

  • सभी समाजों में संरचनात्मक लक्षण पाए जाते हैं।

प्रश्न 21.
उन मूलभूत प्रकार्यों को बताइए जो समाज की निरंतता तथा उसे बनाए रखने हेतु आवश्यक हैं।
उत्तर:
निम्नलिखित मूल प्रकार्य समाज की निरंतरता तथा उसे बनाए रखने के लिए आवश्यक है –

  • नए सदस्यों की भर्ती।
  • समाजीकरण।
  • वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन तथा वितरण।
  • व्यवस्था की सुरक्षा।

प्रश्न 22.
सामाजिक प्रक्रिया की परिभाषा दीजिए। अथवा, सामाजिक प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हार्टन तथा हंट के अनुसार “सामाजिक प्रक्रिया सामाजिक जीवन में सामान्यतः पाए जाने वाले व्यवहारों की पुनरावृत्ति अन्त:क्रिया है।”

प्रश्न 23.
सामाजिक अन्तःक्रिया का अर्थ बताइए।
उत्तर:
व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से समाज में अनेक व्यक्तियों के साथ संबद्ध होता है तथा समाज के दूसरे सदस्य भी उसके साथ क्रियात्मक संबंध रखते हैं। इसी प्रक्रिया को अन्त:क्रिया कहा जाता है। इस प्रकार अन्त:क्रिया किसी भी विशिष्ट समाज के सामाजिक पर्यावरण में होने वाली प्रक्रिया है। अन्तःक्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।”

प्रश्न 24.
सामाजिक प्रक्रियाओं के विभिनन स्वरूप बताइए। अथवा, सहयोगात्मक . तथा असहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रियाएँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
समाज में निम्नलिखित दो प्रकार की सामाजिक प्रक्रियाएँ पायी जाती हैं –

(i) सहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रियाएँ –

  • सहयोग
  • समायोजन
  • समन्वयन
  • अनुकूलन
  • एकीकरण
  • सात्मीकरण

(ii) असहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रियाएँ –

  • प्रतियोगिता
  • संघर्ष
  • अंतर्विरोध

प्रश्न 25.
सहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में सहयोग की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
ग्रीन के अनुसार, “सहयोग दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा कोई कार्य करने या सामान्य रूप से इच्छित किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किया जाने वाला निरंतर एवं सामूहिक प्रयास है।” एल्ड्रिज तथा मैरिल के अनुसार, “सहयोग सामाजिक अन्त:क्रिया का वह स्वरूप है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति एक सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में एक साथ मिलकर कार्य करते हैं।”

प्रश्न 26.
संघर्ष की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
हॉर्टन तथा हंट के अनुसार, “संघर्ष वह प्रक्रिया है जिसमें प्रतिस्पर्धियों को कमजोर बनाकर या उन्हें प्रतियोगिता से हटाकर स्वयं पुरस्कार मा लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।” ए.डब्लू. ग्रीन के अनुसार, “संघर्ष किसी अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की इच्छा का जान-बूझकर विरोध करने, उसे रोकने अथवा उसे बलपूर्वक कराने से संबंधित प्रयत्न है।”

प्रश्न 27.
संघर्ष के विघटनकारी प्रभाव बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री हॉटर्न तथा हंट ने संघर्ष के निम्नलिखित विघनटकारी प्रभाव बताए हैं –

  • संघर्ष पारस्परिक कटुता बढ़ाता है।
  • संघर्ष हिंसा तथा विनाश पैदा करता है।
  • संघर्ष के द्वारा सहयोग के रास्ते में बाधा उत्पन्न की जाती है।
  • संघर्ष द्वारा सदस्यों का ध्यान समूह के लक्ष्यों से हटा दिया जाता है।

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प्रश्न 28.
संघर्ष के समन्वयकारी प्रभाव बताइए।
उत्तर:
हॉर्टन तथा हंट ने संघर्ष के निम्नलिखित समन्वयकारी प्रभाव बताए हैं –

  • संघर्ष के द्वारा विवाद स्पष्ट किए जाते हैं।
  • संघर्ष समूह की एकता से वृद्धि करता है।
  • संघर्ष के माध्यम से दूसरे समूहों के साथ संधियाँ की जाती हैं।
  • संघर्ष में समूहों को अपने सदस्यों के हितों के प्रति जागरूक बनाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पुरस्कारों का वर्गीकरण समाज में किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
स्तरीकरण के विभाजन में पुरस्कारों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बाँटा गया है –

  1. धन-धन अथवा संपत्ति किसी व्यक्ति या परिवार की कुल आर्थिक पूँजी है, जिसमें आय व्यक्तिगत संपत्ति तथा संपत्ति से होने वाली आय सम्मिलित हैं।
  2. शक्ति-शक्ति के माध्यम से व्यक्ति अथवा समूह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति दूसरों के विरोध के बावजूद करते हैं।
  3. मनोवैज्ञानिक संतुष्टि-मनोवैज्ञानिक संतुष्टि एक अभौतिक संसाधन है। किसी कार्य के द्वारा व्यक्ति को आनंद तथा सम्मान मिलता है। समाज समुचित कार्य के लिए व्यक्ति को पुरस्कृत करता है।

प्रश्न 2.
कुछ समाजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण को अपरिहार्य क्यों मानते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण के निम्नलिखित कारणों को अपरिहार्य मानते हैं। –

  1. मानव समाज में असमानता प्रारम्भ से ही पायी जाती है। असमानता पाए जाने का प्रमुख कारण यह है कि समाज में भूमि, धन, संपत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा जैसे संसाधनों का वितरण समान नहीं होता है।
  2. विद्वानों का मत है कि यदि समाज के समस्त सदस्यों को समानता का दर्जा दे भी दिया जाए तो कुछ समय पश्चात उस समाज के व्यक्तियों में असमानता आ जाएगी। इस प्रकार समाज में असमानता एक सामाजिक तथ्य है।
  3. गम्पलाविज तथा ओपेनहीमार आदि समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण की शुरूआत एक समूह द्वारा दूसरे पर हुई।
  4. जीतने वाला समूह अपने को उच्च तथा श्रेष्ठ श्रेणी को समझने लगा। सीसल नाथ का विचार है कि “जब तक जीवन का शांतिपूर्ण क्रम चलता रहा, तब तक कोई तीव्र तथा स्थायी श्रेणी-विभाजन प्रकट नहीं हुआ।”
  5. प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस का मत है कि सामाजिक अवचेतना अचेतन रूप से अपनायी जाती है। इसके माध्यम से विभिन्न समाज यह बात कहते हैं कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है। इस प्रकार प्रत्येक समाज में सामाजिक स्तरीकरण अपरिहार्य है।

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प्रश्न 3.
प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति में अंतर बताइए। उचित उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
(i) प्रदत्त प्रस्थिति – प्रदत्त प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जो किसी व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर या आयु, लिंग, वंश जाति तथा विवाह आदि के आधार पर प्राप्त होता है। लेपियर के अनुसार, “वह स्थिति जो एक व्यक्ति के जन्म पर या उसके कुछ ही क्षण बाद अभिगेपित होती है, विस्तृत रूप में निश्चित करती है कि उसका समाजीकरण कौन-सी दिशा ‘लेगा-अपनी संस्कृति के अनुसार-पुंल्लिग-स्त्रीलिंग निम्न या उच्च वर्ग के व्यक्ति के रूप में उसका पोषण किया जा सकेगा।

वह कम या अधिक प्रभावशाली रूप में अपनी उस स्थिति से समाजीकृत होगा जो उस पर अभिरोपित है।” प्रदत्त प्ररिस्थति का निर्धारण सामाजिक व्यवस्था के मानकों द्वारा निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उच्च जाति में जन्म के द्वारा किसी व्यक्ति को समाज में जो प्रस्थिति प्राप्त होती है वह उसकी प्रदत्त प्रस्थिति है। इसी प्रकार एक धनी परिवार में जन्म लेने वाले बालक से भिन्न होती है।

(ii) अर्जित प्रस्थिति – अर्जित प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जिसे व्यक्ति अपने निजी प्रयासों से प्राप्त करता है। लेपियर के अनुसार “अर्जित प्रस्थिति वह स्थिति है, जो साधारणतः लेकिन अनिवार्यतः नहीं, किसी व्यक्तिगत सफलता के लिए इस अनुमान पर पुरस्तकार स्वरूप स्वीकृत होती है कि जो सेवाएँ अपने भूत में की हैं वे सब भविष्य में जारी रहेंगी।” उदाहरण के लिए कोई भी व्यक्ति अपने निजी प्रयासों के आधार पर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर या अधिकारी बन सकता है।

प्रश्न 4.
क्या सहयोग हमेशा स्वैच्छिक अथवा बलात् होता है? यदि बलात् है, तो क्या मंजूरी प्राप्त होती है मानदंडों की शक्ति के कारण सहयोग करना पड़ता है? उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर:
सहयोग एक निरंतर चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया है। एक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में सहयोग प्रत्येक समाज में पाया जाता है। सहयोग कुछ स्तरों पर तो स्वैच्छिक होता है। इस स्वैच्छिक सहयोग के आधार पर रक्त संबंध, भावनाएँ तथा पारस्परिक उत्तरदायित्व होते हैं। इस सहयोग में व्यक्तियों में स्वार्थ भिन्नता नहीं पायी जाती है। उद्देश्यों तथा साधनों में समानता पाई जाती है। उदहारण के लिए, स्वैच्छिक सहयोग परिवार में पाया जाता है। इस प्रकार के सहयोग की प्रकृति वैयक्तिक होती है। इस प्रकार के सहयोग के लिए बाध्य नहीं किया जाता।

सहयोग का एक अन्य रूप है-व्यक्ति अन्य समूहों के साथ अपने स्वार्थों तथा उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सहयोग करता है। इसमें स्वीकृति भी होती है, नियमों की शक्ति भी। व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों को उसी सीमा तक सहयाग दिया जाता है जितना उसके स्वार्थों की पूर्ति के
लिए आवश्यक है। आधुनिक समाजों में श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण की प्रक्रियाएँ इसी का उदाहरण है। इसके अलावा ट्रेड यूनियनों, उद्योगों, कार्यालयों में ऐसा ही सहयोग मिलता है।

प्रश्न 5.
कृषि तथा उद्योग के संदर्भ में सहयोग के विभिन्न कार्यों की आवश्यकता की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सहयोग शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दों ‘को’ तथा ऑपेरारी से हुई है। ‘को’ का अर्थ है साथ-साथ तथा ऑपरेरी का अर्थ है कार्य। अपने साधारण अर्थ में सहयोग का तात्पर्य समान हितों की पूर्ति हेतु एक साथ मिलकर कार्य करना है । इमाईल दुखाईम की सावयवी एकता की अवधारणा तथा कार्ल मार्क्स के प्रायः विभाजन की अवधारणा भी ‘सहयोग’ पर आधारित है।

कृषि के संदर्भ में सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता पड़ती है। एक परिवार जो कृषि कार्य में संलग्न है, उसके सभी सदस्य कृषि के कार्यों में सहयोग करते हैं : खेत जोतने, बीज बोने, सिंचाई करने, फसल पकने तक उसकी रखवाली करने, फसल काटने आदि सभी कार्यों में बिना सहयोग के कार्य संपन्न होने में कठिनाई होती है। परिवारिक सदस्यों के सहयोग से ये कार्य शीघ्र संपन्न हो जाते हैं।

इसी प्रकार औद्योगिक कार्यों के संदर्भ में भी सहयोग की आवश्यकता तो देखा जा सकता है। एक रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री तथा एक कार निर्माण फैक्ट्री में बिना कुशल/अकुशल श्रमिकों के बीच सहयोग के उत्पादन कार्य नहीं हो सकता है। कार्ल मार्क्स ने इसलिए कहा है-“बिना सहयोग के मानव जीवन पशु जीवन के समान है।”

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प्रश्न 6.
लिंग के आधार पर स्तरीकरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
लिंग के आधार पर भी सामाजिक संस्तरण किया जाता है। इसके अंतर्गत पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग में अंतर किया जाता है। लिंग की भूमिकाएँ अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, लेकिन लिंग पर आधारित स्तरीकरण सार्वभौमिक होता है। उदाहरण के लिए पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुषों के कार्यों को स्त्रियों की अपेक्षा अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। समाज में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचनाओं पर पुरुषों का दबदबा कायम रहता है।

लिंग की समानता के समर्थक शिक्षा, सार्वजनिक अधिकारों में भागीदारी तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए स्त्रियों को समर्थ बनाए जाने की हिमायती हैं। वर्तमान समय में लिंग पर आधारित असमानताओं को हटाने की बात अधिक जोरदार तरीके से उठायी जा रही है। महिला आंदोलन के कारण लिंग पर आधारित भेदभावों को हटाने का सतत प्रयास किया जा रहा है। वर्तमान समय में लिंग भेद की अवधारणा जैविक भिन्नता के अलग हो गई है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार भिन्नता भूमिकाओं तथा संबंधों के संदर्भ में देखी जानी चाहिए।

प्रश्न 7.
स्तरीकरण की खुली बंद व्यवस्था अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्तरीकरण की खुली तथा बंद व्यवस्था में निम्नलिखित अंतर है –
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प्रश्न 8.
ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहाँ प्रतियोगिता नहीं है। क्या यह संभव है? अगर नहीं तो क्यों?
उत्तर:
समाज में प्रतियोगिता एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने समाज में प्रतियोगिता के महत्व को स्वीकार किया है। प्रतियोगिता किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्राप्न की जाती है। यथा विद्यालय की कक्षा में छात्रों में सर्वप्रथम स्थान पाने के लिए प्रतियोगिता की स्थिति उत्पन्न होती है। हॉकी की दो टीमों के बीच में प्रतियोगिता का अनुभव किया जा सकता है। दो उत्पादकों में प्रतियोगिता का स्वरूप अनुभव किया जा सकता है। हर्टन एवं हंट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पुरस्कार को प्रतिद्वंदियों से प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रतियोगिता है।

प्रतियोगिता का क्षेत्र व्यापक होता है। किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों अथवा समूहों के बीच प्रतियोगिता एक स्वरूप बनता है। स्पष्ट है कि ऐसे समाज की कल्पना असंभव है जहाँ प्रतियोगिता न हो। इसका कारण है कि प्रतियोगिता से जुड़े व्यक्तियों में अपने उद्देश्यों के प्रति समर्पण की भावना पैदा होती है। लोग अपनी गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। जैसे उत्पादकों के बीच में तीव्र प्रतियोगिता की स्थिति बनी रहती है। प्रत्येक उत्पादक अधिक से अधिक उपभोक्ताओं को उपहार प्रदान कर तथा विक्रेताओं को अधिक लाभांश देकर बाजार में सबसे आगे निकलना चाहता है। प्रतियोगिता सबसे आगे निकलने की प्रक्रिया है। प्रतियोगिता के बिना समाज अधूरा है।

प्रश्न 9.
संघर्ष से किस प्रकार सामाजिक विघटन होता है? समझाइए।
उत्तर:
संघर्ष द्वारा सामाजिक एकता के ताने-बाने को खंडित किया जाता है। एक प्रक्रिया के रूप में संघर्ष वस्तुतः सहयोग का प्रविवाद है । गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “संघर्ष वह सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अथवा समूह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अपने विरोधी को हिंसा या हिंसा के भय द्वारा प्रत्यक्ष आह्वान देकर करते हैं” बीसंज तथा बीसंज ने इस संबंध में लिखा है कि “फिर भी अधिक संघर्ष विनाशकारी होता है तथा जितनी समस्याओं को सुलझाता है उससे कहीं अधिक समस्याओं को जन्म देता है।”

वैयक्तिक स्तर पर विघटन-वैयक्तिक स्तर पर पृथक्-पृथक् स्वभाव, दृष्टिकोण, मूल्य, आदर्श तथा हित होने के कारण कोई भी दो व्यक्ति परस्पर समायोजित नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण उनके बीच संघर्ष होता है, इससे व्यक्तियों का सामाजिक विकास बाधित होता है। सामूहिक स्तर पर विघटन-सामूहिक स्तर पर संघर्ष दो समूहों अथवा समाजों के बीच होता है।

सामूहिक संघर्ष के निम्नलिखित उदाहरण है –

  • प्रजातीय संघर्ष
  • सांप्रदायिक संघर्ष
  • धार्मिक संघर्ष
  • मजदूर-मालिक संघर्ष
  • देश के बीच संघर्ष तथा
  • राजनीतिक दलों में संघर्ष

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप भारतीय समाज के संघर्ष के विभिन्न उदाहरण ढूंढ सकते हैं? प्रत्येक उदाहरण में वे कौन से कारण थे जिसने संघर्ष को जन्म दिया? चर्चा कीजिए?
उत्तर:
‘संघर्ष विश्व के सभी समाजों में पाया जाता है। ग्रीन के अनुसार, “संघर्ष जान-बूझकर किया गया वह प्रयत्न है जो किसी भी इच्छा का विरोध करके उसके आड़े आने या उसे दबाने के लिए किया जाता है।” गिलिन और गिलिन के अनुसार, “संघर्ष वह सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति या समूह अपने विरोधी के प्रति प्रत्यक्षतः हिंसात्मक तरीके अपनाकर या उसे हिंसात्मक तरीका अपनाने की धमकी देकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहते हैं।”

इस प्रकार अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हिंसात्मक तरीके अपनाकर दूसरे के इच्छाओं का दमन करना संघर्ष कहलाता है। भारतीय समाज में भी अनेक प्रकार के संघर्ष विद्यमान हैं जिनमें प्रमुख हैं-जाति एवं वर्ग, जनजातीय संघर्ष, लिंग, नृजातीयता, धर्म, सांप्रदायिकता से जुड़े संघर्ष।

प्रमुख संघर्षों की चर्चा निम्नवत है –
(i) जातीय संघर्ष – समाजशास्त्री एच.ची. वेल्स का कहना है कि मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों के आधार पर समाज का स्तरीकरण करने से समाज का विकास तीव्र गति से होता है। प्राचीनकाल में भारतीय समाज ने स्वयं को स्थित तथा शक्तिशाली बनाने के लिए अपने सदस्यों को उनकी योग्यता, पटुता तथा शक्ति के अनुसार चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में बांट दिया । यही प्राचीन वर्णों को चार अलग-अलग सामाजिक कार्य सौंप दिए गए। धीरे-धीरे यह असमानता ऊँच-नीच की भावनाओं का आधार बन गई और समाज में संघर्ष उत्पन्न हो गया। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् ने इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय वर्ण-व्यवस्था में यद्यपि वंशानुगत क्षमताओं का महत्व तो था, तथापि यह व्यवस्था मुख्य रूप से गुण तथा कर्म सिद्धांतों पर आधारित थी।

पौराणिक काल के बाद कर्म सिगन्त का स्थान जन्म सिद्धांत ने ले लिया और वर्ण-व्यवस्था जाति-व्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तित हो गई जाति-व्यवस्था में सामाजिक असमानता का स्वरूप हो गया। ब्राह्मण सबसे उच्च तथा पवित्र माने गए; तो क्षत्रिय का स्थान द्वितीय माना गया, वैश्य का स्थान तीसरा तथा शूद्र का स्थान चौथा माना गया। एक वर्ण में फिर अनेक जातियाँ, उप-जातियों बनी, उनमें उच्चता और निम्नता की सीढ़ियाँ बनती चली गई, इनका आधार जन्म था, इसलिए इस व्यवस्था में दृढ़ता और रूढ़िवादिता आती चली गई, इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में स्तरीकरण के सिद्धांत के अन्तर्गत जाति व्यवस्था का जन्म हुआ।

इस जाति-व्यवस्था के आधार पर भारतीय समाज में विभिन्न प्रकार की सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक असमानताएँ उत्पन्न होती चली गई। अनेक समाजशास्त्रियों का कहना है कि भारतीय समाज में जाति-प्रथा के कारण जो सामाजिक असमानता, भेद-भाव तथा छुआछूत की भावना दिखाई देती है, ऐसे भेदभाव की भावना संसार के अन्य किसी समाज में देखने को नहीं मिलती है जिसने जातिगत संघर्ष को जन्म दिया। इस संघर्ष को जातिवाद नाम दिया गया।

निराकरण-जातिवाद विभिन्न संघर्षों को जन्म देता है। इसके निराकरण के लिए डॉ. जी. एस. घुरिये ने सुझाव दिया था कि अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। समाजशास्त्री पी.एच.प्रभु की मान्यता डालकर जातिवाद को दूर किया जा सकता है। डॉ. राव ने वैकल्पिक समूहों के निर्माण में जातिवाद को समाप्त करने के लिए कहा है। कुछ समाजशास्त्रियों ने जातिवाद से छूट पाने केलिए आर्थिक विकास को अत्यन्त आवश्यक माना है। सरकार ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों, अछूतों की निर्योग्यताओं को समाप्त कर उच्च जातियों के समकक्ष लाने का प्रयत्न किया है जिसके लिए अस्पृष्ठता अधिनियम, 1995 पारित किया गया और इस असमानता को दूर करने में सरकार ने सफलता भी प्राप्त की है।

(ii) नृजातीय संघर्ष – समाजशास्त्रियों ने प्रजातीय दृष्टि से भारत को विभिन्न प्रजातियों का ‘द्रवणपात्र’ और प्रजातियों का अजायबघर की संज्ञा दी है। भारत में संसार की तीनों प्रमुख प्रजातियाँ श्वेत प्रजाति, पीत प्रजाति एवं काली प्रजाति और अनेक उपशाखायें निवास करती हैं। उत्तर भारत में आर्य प्रजातीय भिन्नता होने पर भी भारत में अमेरिका और अफ्रीका की भांति प्रजातीय संघर्ष और दंगे-फसाद नहीं हुए हैं, बल्कि उनमें पारस्परिक सद्भाव एवं सहयोग ही रहा है।

छिटपुट घटनाएँ होना साधारण बात है। भारत में विभिन्न प्रजातियों का मिश्रण भी हुआ है। स्पष्ट है कि भारत में प्रजातिवादी संघर्ष की समस्या नहीं पायी जाती है। भारतीय समाज प्रारंभ से ही मानता रहा है कि भारत में प्रजातिवाद एक अवैज्ञानिक अवधारणा है। भारत की भौगोलिक विशेषताओं एवं आजीविका के प्रचुर साधन विभिन्न प्रजातीय समूहों के लिए प्रारंभ से ही आकर्षण का केन्द्र बन रहे हैं।

(iii) जनजातीय संघर्ष – वर्तमान में सम्पूर्ण जनजातीय भारत संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस संक्रमण के दौरान जनजातियों में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं। इन समस्याओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग जनजातियों में भिन्न-भिन्न हैं। कुछ जनजातियों में जनसंख्या की वृद्धि हो रही है, जैसे-भील और गोंड में तो कुछ जनजातियों में, जैसे-टोडा एवं कोरबा में जनसंख्या घट रही है।

कई जनजातियाँ नगरीय संस्कृति के संपर्क में आई हैं जिसके फलस्वरूप उनकी मूल संस्कृति में कई परिवर्तन हुए हैं। उनमें दिशाहिनता एवं सांस्कृतिक छिन्न-भिन्नता उत्पन्न हुई है और मानसिक असंतोष में वृद्धि हुई है। ब्रिटिश काल में जनजातिय लोगों के संपर्क ईसाई मिशनरियों और राज्य कर्मचारियों के साथ बढ़े। परिणामस्वरूप उन्हें कुछ लाभ तो प्राप्त हुए, किन्तु इनसे उनके जीवन में विघटन भी प्रारंभ हो गया।

जनजातीय लोगों के संपर्क ईसाई मिशनरियों और राज्य कर्मचारियों के साथ बढे। परिणामस्वरूप उन्हें कुछ लाभ तो प्राप्त हुए, किन्तु जनजातियों के निवास क्षेत्र में व्यापारी और ठेकेदार लोग पहुँच गए। उन्होंने जनजातीय लोगों का खूब आर्थिक शोषण किया और कम मजदूरी पर उनसे अधिक श्रम लेने लगे सूदखोरों ने इन लोगों की जमीनें कम दामों में खरीद ली और अपने घर में वे परायों की तरह कृषि मजदूर के रूप में काम करने लगे।

कभी-कभी इनसे बेगारी भी ली जाने लगी। ठेकेदारों एवं व्यापारियों ने कहीं-कहीं जनजातीय स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध भी स्थापित किये जिसके परिणामस्वरूप अनेक जनजातीय लोग गुप्त रोगों से पीड़ित हो गए। इस संपर्क के फलस्वरूप जनजातियों में वेश्यावृत्ति पनपी। ईसाई मिशनरियों ने जनजातीय धर्म के स्थान पर ईसाई धर्म को स्थापित कर आदिवासियों को अपने पड़ोसी समुदाय से अलग कर दिया।

इससे आदिवासियों में धार्मिक और सामाजिक एकता का सकंट पैदा हो गया, सांस्कृतिक और राजनीतिक समस्याएँ खड़ी हुईं, उनमें पृथकता की भावना पनपी और वे पृथक् राज्य की मांग करने लगे। इसके लिए संघर्ष प्रारंभ हुआ। इस संघर्ष के कारण उत्तरांचल, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे नवीन राज्यों का गठन हुआ।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 2.
सामाजिक संरचना किसे कहते हैं? इसके विभिन्न तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक संरचना का अर्थ-सामाजिक संरचना का तात्पर्य उन विभिन्न पद्धतियों से है जिनके अंतर्गत सामूहिक नियमों, भूमिकाओं तथा कार्यों के साथ एक स्थिर प्रतिमान संगठित होता है। प्रमाजिक संरचना अदृश्य होती है, लेकिन यह हमारे कार्यों के स्वरूप को स्पष्ट करती है। सामाजिक संरचना के निम्नलिखित तत्व हमारे कार्यों का निर्देशन करते हैं –

  • सामाजिक प्रस्थितियाँ
  • सामाजिक भूमिकाएँ
  • सामाजिक मानक
  • सामाजिक मूल्य

सामाजिक संरचना की तुलना एक भवन से की जा सकती है। एक भवन के अंतर्गत निम्नलिखित तीन तत्व पाए जाते हैं –

  • भवन निर्माण सामग्री जैसे-ईंटें, गामा, बीम तथा स्तंभ।
  • इन सभी को एक निश्चित क्रम में जोड़ा जाता है तथा एक-दूसरे से मिलाकर रखा जाता है।
  • भवन सामग्री के इन सब तत्वों को मिलाकर भवन का एक इकाई के रूप में निर्माण किया जाता है।

उपरोक्त वर्णित विशेषताओं का प्रयोग सामाजिक संरचना का वर्णन करने में किया जा सकता है। एक समाज की संरचना का निर्माण निम्नलिखित तत्वों से मिलकर बनता है –

  • स्त्री, पुरुष, वयस्क तथा बच्चे, अनेक व्यावहारिक तथा धार्मिक समूह आदि।
  • समाज के विभिन्न अंगों में अंतःसंबंध जैसे जैसे पति-पत्नी के बीच संबंध, माता-पिता तथा उनके बीच संबंध तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संबंध।
  • समाज के सभी अंग मिला दिए जाते हैं ताकि वे एक इकाई के रूप में कार्य कर सकें।

सामाजिक संरचना की परिभाषा –
(i) गिन्सबर्ग के अनुसार, सामाजिक संरचना के अध्ययन का संबंध सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों, यथा समूहों, समितियों तथा संस्थाओं के प्रकारों तथा इनके संकुल जो समाजों के निर्माण करते हैं, से है। सामाजिक संरचना के विस्तृत वर्णन में तुलनात्मक संस्थाओं के समग्र क्षेत्र का अध्ययन समाहित है।”

(ii) रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार “सामाजिक संरचना के घटक मानव प्राणी हैं, स्वयं संरचना तो व्यक्तियों को क्रमबद्धता है, जिनके संबंध संस्थात्मक रूप से परिभाषित एवं नियमित हैं।

(iii) टॉलकॉट पारसंस के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर संबंधित संस्थाओं, अभिकरणों और सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समूह में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण किए गए पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमबद्धता को कहते हैं।”

(iv) जॉनसन के अनुसार “किसी भी वस्तु की संरचना उसके अंगों में पाये जाने वाले अपेक्षाकृत स्थायी अंतःसंबंधों को कहते हैं। इसके अलावे, अंग शब्द स्तंभ स्थिरता की कुछ मात्रा का बोध कराता है। सामाजिक व्यवस्था व्यक्तियों के अंत:संबंधित कार्यों से निर्मित होती है, इसलिए इसकी संरचना की खोज इन कार्यों में नियमितता या पुरावृत्ति की कुछ मात्रा में की जाती है।”

(v) कर्ल मानहीम के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर क्रिया करती हुई सामाजिक शक्तियों का जाल है, जिसमें अवलोकन तथा चिंतन की विश्वप्रणालियों को जन्म होता है।

(vi) रॉबर्ट के. मर्टन ने संरचना पर प्रतिमानहीनता के संदर्भ में विचार किया है। मर्टन के अनुसार सामाजिक संरचना के निम्नलिखित दो तत्व अत्यकि महत्वपूर्ण हैं

  • सांस्कृतिक लक्ष्य तथा
  • संस्थागत प्रतिमान।

सांस्कृतिक तत्व के अंतर्गत वे लक्ष्य तथा उद्देश्य आते हैं जो संस्कृति द्वारा स्वीकृत होते हैं। इसके अलावा, समाज के अनेक सदस्यों में से प्राय:सभी सदस्य उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। संस्थागत प्रतिमान के अंतर्गत लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संस्कृति द्वारा स्वीकृत साधनों/प्रतिमानों को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में सांस्कृतिक लक्ष्यों तथा संस्थागत प्रतिमानों के बीच पाया जाने वाला संतुलन ही सामाजिक संरचना है। मर्टन के विचार में इसके बीच संतुलन की स्थिति भंग होने पर समाज में प्रतिमामहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सामाजिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ –

  • प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था के दो पक्ष होते हैं –
    (a) संरचनात्मक पक्ष तथा
    (b) प्रकार्यात्मक पक्ष
  • मानव आवश्यकताएँ सामाजिक संरचना का मूल आधार हैं।
  • समुदाय, समूह, समिति तथा संगठन सामाजिक संरचना के मुख्य भाग हैं।
  • समुदाय संरचना की प्रकृति मूल्यपरक होती है।
  • सामाजिक संरचना के इस पक्ष के अंतर्गत प्रथाएँ, जनरीतियों, मूल्यों, सांस्कृतिक मापदंडों तथा कानूनों के द्वारा संबद्ध होते हैं।
  • सामाजिक संरचना के विभिन्न भागों जैसे समुदाय, समिति, समूह तथा संगठन आदि परस्पर प्रथाओं, जनरीतियों तथा कानूनों द्वारा संबद्ध होते हैं।
  • इन सभी भागों के अपने प्रकार्य हैं। इन प्रकार्यों का निर्धारण सामाजिक प्रतिमानों तथा मूल्यों के द्वारा होता है।

सामाजिक संरचना के प्रमुख तत्व-सामाजिक संरचना के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं –

(i) आदर्शात्मक व्यवस्था – आदर्शात्मक व्यवस्था समाज के सम्मुख कुछ आदर्शों तथा मूल्यों को प्रस्तुत करती है। इन आदर्शों तथा मूल्यों के अनुसार संस्थाओं तथा समितियों को अंतः संबंति किया जाता है। व्यक्तियों द्वारा समाज स्वीकृत आदर्शों तथा मूल्यों के अनुसार अपनी भूमिकाओं को निभाया जाता है।

(ii) पद व्यवस्था – पद व्यवस्था द्वारा व्यक्तियों की प्रस्थितियों तथा भूमिकाओं का निर्धारण किया जाता है।

(iii) अनुज्ञा व्यवस्था – प्रत्येक समाज में आदर्शों तथ मूल्यों को समुचित तरीके से लागू करने के लिए अनुज्ञा व्यवस्था होती है। वास्तव में सामाजिक संरचना के विभिन्न अंगों का समन्वय सामाजिक आदर्शों तथा मूल्यों को पालन करने पर निर्भर करता है।

(iv) पूर्वानुमानित अनुक्रिया व्यवस्था – पूर्वानुमानित अनुक्रिया व्यवस्था सामाजिक संरचना, स्तरीकरण एवं समाज में सामाजिक प्रक्रियाएँ लोगों से सामाजिक व्यवस्था में भागीदारी की मांग करती है। इसके द्वारा सामाजिक संरचना को गति मिलती है।

(v) क्रिया व्यवस्था – क्रिया व्यवस्था के द्वारा सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को पूर्ण किया जाता है। वह सामाजिक संरचना को आवश्यक गति भी प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
किसी समाज की उत्तरजीविता के लिए विभिन्न प्रकार्यों की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रकार्य वस्तुतः किसी भी समाज की उत्तरजीविका तथा निरंतरता के लिए आवश्यक है। किसी भी संरचना का विशिष्ट कार्य ही उसका प्रकार्य कहलाता है। प्रकार्यों में अंतिनिर्भरता पायी जाती है। प्रकार्य समाज को बनाए रखने तथा उसमें स्थिरता तथा निरंतरता के लिए आवश्यक है। प्रकार्यों की सफलता तथा असफलता का प्रभाव समाज के अन्य संगठनों के प्रकार्यों को प्रभावित करता है। किसी भी समाज की उत्तरजीविका तथा निरंतरता के लिए निम्नलिखित प्रकार्य आवश्कय हैं

(i) सदस्यों की भर्ती – सभी समाजों में प्रजनन नए सदस्यों की भर्ती का मूल स्रोत है। हालांकि अप्रवास तथा नए क्षेत्रों को मिलाकर भी नए सदस्यों को भर्ती की जा सकती है।

(ii) समाजीकरण – ऑग्बर्न के अनुसार, “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिससे कि व्यक्ति समूह के आदर्श नियमों के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है।” सामाजिक व्यवस्था मुख्य रूप से समाजीकरण पर आधारित होती है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा एक जैविक मनुष्य एक सामाजिक प्राणी में बदल जाता है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही व्यक्ति सामाजिक मूल्यों, मानकों, नियमों तथा कुशलताओं को सीखता है। समाजीकरण की प्रक्रिया के दो माम निम्नलिखित हैं

  • अनौपचारिक माध्यम-जैसे-परिवार, मित्र समूह तथा पड़ोस।
  • औपचारिक साधन-जैसे-विद्यालय तथा अन्य संस्थाएँ।

समाजीकरण की प्रक्रिया निरतर रूप से जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।

(iii) वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन एवं वितरण-समाज की उत्तरजीविता तथा निरंतरता हेतु समाज के सदस्यों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक है। आर्थिक आवश्यकताओं के अंतर्गत वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन ही पर्याप्त नहीं है वरन् उनका क्रमबद्ध तरीके से सूक्ष्म वितरण भी आवश्यक है। सभी समाजों में मानकों तथा मूल्यों का समुचित विकास किया जाता है, जिससे वस्तुओं तथा सेवाओं का उपयुक्त निर्धारण हो सके। उत्पादन के अनुपयुक्त वितरण से समाज में भ्रांति तथा अराजकता उत्पन्न हो सकती है।

(iv) व्यवस्था का संरक्षण-व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए सभी समाजों में नियमों की कोई न कोई व्यवस्था अपनायी जाती है। समाज को नष्ट होने से बचाने के लिए उसका संरक्षण जरूरी है। व्यवस्था का संरक्षण औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों के माध्यम से किया जाता है। अनौपचारिक साधनों के अंतर्गत रूढ़ियों, लोकाचार, मानक तथा दबाव समूह आदि आते हैं लेकिन आधुनिक समाजों में व्यवस्थरा के संरक्षण हेतु औपचारिक साधन कानून व न्यायालय हैं।

प्रश्न 4.
संरचना, प्रकार्य व व्यवस्था के संबंधों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संरचना, प्रकार्य तथा व्यवस्था के बीच संबंध-संरचना तथा प्रकार्य सामाजिक व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। यही कारण है कि सामाजिक संरचना की तुलना मानव शरीर या भवन से की जाती है। जिस प्रकार शरीर तथा भवन में अनेक भाग होते हैं, उसी प्रकार सामाजिक संरचना का निर्माण अनेक तत्वों से मिलाकर होता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री स्पेंसर समाज को एक व्यवस्था के रूप में वर्णित करते हैं। एक व्यवस्था के रूप में समाज अपने विभिन्न अंगों के पारस्परिक संबंधों से मिलकर निर्मित होता है।

अपनी धारणा को और अधिक स्पष्ट करने के लिए स्पैंसर समाज की तुलना मानव शरीर से करते हैं। जिस तरह मानव शरीर के विभिन्न अंगों का समुच्चय शरीर है, उसी प्रकार संगठनों, संस्थाओं तथा समूहों के रूप में समाज के अनेक अंग हैं। उनके पारस्परिक संबंधों तथा मिले-जुले स्वरूप को ही सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। स्पेंसर समाज को एक प्रणाली के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन अपनी व्याख्या में उन्होंने व्यवस्था तथा संरचना में अंतर किया है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री पैरेटो व्यवस्था की व्याख्या समाज के विभिन्न अंगों के अंत:संबंधों के रूप में करते हैं। दूसरी तरफ, टालकाट पारसंस ने सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा को तार्किक रूप से परिभाषित किया है। पारसंस के अनुसार, “एक सामाजिक व्यवस्था एक ऐसे परिस्थिति में जिसका कि कम से कम एक भौतिक या पर्यावरण संबंधी पक्ष हो, अपनी आवश्यकताओं की आदर्श पूर्ति से प्रवृति से प्रेरित होने वाले अनेक व्यक्तिगत कर्ताओं की परस्पर अंत:क्रियाओं के फलस्वरूप होती है तथा इन अंत:क्रियाओं में संलग्न व्यक्तियों का पारस्परिक संबंध तथा उनकी स्थितियों के साथ संबंध को सांस्कृतिक रूप से संरचित तथा स्वीकृत प्रतीकों की एक व्यवस्था द्वारा परिभाषित तथा मध्यस्थित किया जाता है।”

संक्षेप में पारसंस ने कहा है कि “सामाजिक व्यवस्था अनिवार्य रूप में अंतः क्रियात्मक संबंधों का जाल है।” – शरीर के संरचनात्मक अध्ययन में शरीर के विभिन्न अंगों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है। हाथ, पैर, आँख, नाक, कान आदि अलग-अलग रहकर शरीर का निर्माण नहीं करते हैं। वस्तुतः इनका मिला-जुला स्वरूप ही शरीर है। उसी प्रकार एक भवन में छत, दरवाजे, दीवारें तथा खिड़कियाँ आदि होते हैं लेकिन अकेली छत, खिड़की या दीवार भवन नहीं हो सकती।

विभिन्न संस्थाएँ, समूह तथा संगठन ही मिलकर सामाजिक संरचना का निर्माण करते हैं। सामाजिक संरचना एक गतिशीलता वास्तविककता है। सामाजिक संरचना बदलती हुई परिस्थतियों से अनुकूलन की क्षमता रखती है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न कार्यों को करते हैं, ठीक उसी प्रकार सामाजिक संरचना के विभिन्न अंग भी विभिन्न आवश्यकताओं तथा प्रकार्यों को पूरा करते हैं।

प्रकार्य का तात्पर्य समाज को निर्मित करने वाले विभिन्न अंगों या इकाईयों के कार्यों से है। प्रकार्य सामूहिक मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक होते हैं रेडिक्लिफ ब्राउन का मत है कि प्रकार्यों द्वारा ही संपूर्ण समाज का अस्तित्व बना रहा है। पैरेटो ने कहा है कि समाज संतुलन की एक व्यवस्था है और इसका प्रत्येक अंग एक-दूसरे पर निर्भर है।

एक अंग में होने वाला परिवर्तन दूसरे अंग को प्रभावित करता है। इसी प्रकार एक भाग जब तक अपने कार्यों का निष्पादन उचित प्रकार से करता रहता है, तब तक संतुलन की स्थिति बनी रहती है तथा सामाजिक व्यवस्था निर्बाध रूप से चलती रहती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 5.
समाज के लिए संरचना व प्रकार्य के महत्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाज के लिए संरचना का महत्व-सामाजित संरचना का तात्पर्य उन विभिन्न पद्धतियों से है जिसके अंतर्गत सामाजिक संरचना के तत्व हमारे कार्यों के साथ एक स्थिर प्रतिमान संगठित होता है। सामाजिक संरचना के तत्व हमारे कार्यों को निर्देशित करते हैं। सामाजिक संरचना के निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण हैं –

  • सामाजिक प्रस्थितियाँ
  • सामाजिक भूमिकाएँ
  • सामाजिक मानक
  • सामाजिक मूल्य तथा
  • आवश्यकताएँ

व्यक्तियों की सामाजिक जीवन में अनेक आवश्यकताएँ होती हैं। इन आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रक्रिया में व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से अंत:क्रिया तथा अंत:संबंध विकसित करता है। इसी संदर्भ में व्यक्ति अनेक भूमिकाओं का संपादन करता है। उदाहरण के लिए परिवार में एक व्यक्ति5 पिता, पुत्र पति तथा भाई आदि की भूमिका निभाता है। भूमिकाओं की इस बहुलता को भूमिकाकुलक कहते हैं। व्यक्तियों की आवश्यकताओं, भूमिकाओं, प्रतिस्थतियों, मानकों तथा मूल्यों के अनुसार सामाजिक प्रणाली की संरचना तथा उप-संरचना में विभेदीकरण तथा विविधता पापी जाती है।

उदाहरण के लिए विवाह की संस्था से संबद्ध पति, पत्नी तथा बच्चों की जो भूमिका तथा प्रस्थिति है, उसी के परिणामस्वरूप परिवार तथा नातेदारी जैसे संबंधों की संरचनात्मक तत्वों का समूहीकरण कहा है। अतः समाज के लिए संरचना का महत्व अत्यधिक है। यह समाज के लिए विकास के लिए अपरिहार्य है। संरचना के माध्यम से समाज के मानकों तथा मूल्यों का विकास होता है।

समाज के लिए प्रकार्यों का महत्व – रॉबर्ट के. मर्टन के अनुसार, “प्रकार्य वे अवलोकित परिणाम हैं जो सामाजिक व्यवस्था से अनुकूलन व सामंजस्य को बढ़ाते हैं।” रैडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “किसी सामाजिक इकाई का प्रकार्य उस इकाई द्वारा किए जाने वाला वह योगदान है जिसे वह सामाजिक व्यवस्था की क्रियाशीलता हेतु सामाजिक जीवन को प्रदान करता है।”

हैरी.एम. जानसन एक विशेष प्रकार का उपसमूह, एक कार्य, एक सामाजिक मान्यता अथवा एक सांस्कृतिक मूल्य का योगदान प्रकार्य कहलाता है, जबकि वह एक सामाजिक व्यवस्था अथवा उपव्यवस्था की एक अथवा अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे।”

उपरोक्त वर्णित परिभाषाओं के आधार पर समाज के लिए प्रकार्यों का महत्व निम्नलिखित है –

  • सामाजिक प्रकार्यों द्वारा सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक संगठन को बनाए रखने में सहायता मिलती है।
  • प्रकार्यों का तार्प्य समाज को बनाने वाले विभिन्न अंगों या कार्यों से होता है।
  • समाज के विभिन्न अंगों तथा संस्थाओं के प्रकार्य अलग-अलग होते हैं लेकिन उनके बीच पारस्परिक संबंध पाया जाता है। इन्हें प्रकार्यात्मक कहते हैं।
  • प्रकार्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक होते हैं।
  • प्रकार्य सकारात्मक सामाजिक अवधारण है इनके द्वारा समाज में मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
  • प्रकार्य समाज के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य हैं।
  • प्रकार्यों के साथ-साथ समाज में अकार्य भी पाये जाते हैं।

मार्टन के अनुसार, “अकार्य निरीक्षण द्वारा स्पष्ट होने वाले परिणाम हैं जो सामाजिक व्यवस्था के अनुकूलन अथवा अभियोजन को कम कर देते हैं।” अकार्य एक नकारात्मक अवधारणा है जिनसे समाज में विघटन उत्पन्न होता है।

प्रकार्य किसी भी समाज की निरंतरता को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य करते हैं –

  • नए सदस्यों की भर्ती-इसका मूल स्रोत प्रजनन है।
  • समाजीकरण-समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा जैविक मनुष्य का एक सामाजिक प्राणी में बदल जाता है।
  • वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन वितरण-समाज को बनाए रखने के लिए. वस्तुओं और सेवाओं का उचित उत्पादन तथा वितरण आवश्यक है।
  • व्यवस्था का संरक्षण-प्रत्येक समाज में सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण हेतु औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों को अपनाया जाता है।
  • आधुनिक समाजों में कानून तथा न्यायालय जैसे औपचारिक साधनों का महत्व बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 6.
प्रतियोगिता की विस्तृत व्याख्या दीजिए।
उत्तर:
हार्टन तथा हंट के अनुसार, “किसी भी पुरस्कार को प्रतिद्वंदीयों से प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रतियोगिता है” सदरलैंड, वुडवर्ड तथा मैक्सवैल के अनुसार, “प्रतियोगिता कुछ व्यक्तियों तथा समूहों के बीच उन संतुष्टियों को प्राप्त करने के लिए होने वाला अवैयक्तिक, अचेतन तथा निरंतन संघर्ष है, जिनकी पूर्ति सीमित होने के कारण उन्हें सभी व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकते।”

मसर तथा वारंडरर ने प्रतियोगिता का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से दिया है –

  • विशुद्ध एवं सीमित प्रतियोगिता
  • निरपेक्ष प्रतियोगिता एवं सापेक्ष प्रतियोगिता
  • वैयक्तिक एवं अवैयक्तिक प्रतियोगिता
  • सृजनात्मक एवं असृजनात्मक प्रतियोगिता

1. विशुद्ध एवं सीमित प्रतियोगिता – सैद्धांतिक तौर पर प्रतियोगिता का स्वरूप विशुद्ध हो सकता है। इसका तात्पर्य है कि प्रतियोगिता बिना सांस्कृतिक बंधनों के भी हो सकती है। विशुद्ध प्रतियोगिता आदर्श प्रतियोगिता होती है। दूसरी तरफ, जब प्रतियोगिता में सहयोग आ जाता है तथा व्यक्ति नियमों के अनुसार प्रतियोगिता में भाग लेते हैं, यह सीमित प्रतियोगिता कहलाती है।

2. निरपेक्ष प्रतियोगिता एवं सापेक्ष प्रतियोगिता – अनेक बार व्यक्ति अथवा समूह द्वारा सीमित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतियोगिता की जाती है। सफल व्यक्ति द्वारा ही उस सीमित लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए हमारे देश में एक ही व्यक्ति उप-राष्ट्रपति के चुनाव में विजय प्राप्त कर सकता है। पराजित व्यक्ति को उस पद का लाभ नहीं मिलता है। उसे निरपेक्ष प्रतियोगिता कहते हैं।

दूसरी ओर, जब व्यक्तियों द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठा, शक्ति तथा धन आदि को प्राप्त करने के लिए प्रयास किया जात है तथा वे अपने प्रयास में सफलता प्राप्त करते हैं लेकिन वह यह आशा नहीं करते हैं कि उनके प्रतियोगितों के पास प्रतिष्ठा, शक्ति तथा धन आदि में से कुछ भी न हो । इन समस्त प्राप्तियों का अनुपाल कम या अधिक हो सकता है। इसे सापेक्ष प्रतियोगिता कहा जाता है।

3. वैयक्तिक एवं अवैयक्तिक प्रतियोगिता – कभी-कभी दो व्यक्तियों के मध्य प्रतियोगिता होती है। दोनों व्यक्ति एक-दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से अन्तः क्रिया करते हैं। इस प्रतियोगिता में एक व्यक्ति अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी एक पद को प्राप्त करने के लिए जब अनेक व्यक्तियों द्वारा प्रयास किया जाता है तो उसे वैयक्तिक प्रतियोगिता कहते हैं।

अवैयक्तिक प्रतियोगिता विशालकाय व्यावहारिक प्रतिष्ठानों के मध्य देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए कार तथा टी.वी. बनाने वाली कंपनियों के बीच अपने-अपने उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए अवैयक्तिक प्रतियोगिता पायी जाती है लेकिन इन कंपनियों के कर्मचारियों के बीच वैयक्तिक अन्त:क्रिया के रूप में प्रतियोगिता नहीं पायी जाती है।

4. सृजनात्मक एवं असृजनात्मक प्रतियोगिता – जिस प्रतियोगिता से विकास को बल मिलता है उसे सृजनात्मक प्रतियोगिता कहा जाता है। उसके विपरीत जिस प्रतियोगिता से विकास के कार्य में बाधा पहुँचती है, उसे असृजनात्मक प्रतियोगिता कहते हैं।

प्रश्न 7.
सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
सदरलैण्ड तथा मैक्सवेल के अनुसार, “सामाजिक स्तरीकरण अन्त:क्रिया तथा विभेदीकरण की प्रक्रिया है, जिसके आधार पर कुछ व्यक्तियों का स्थानक्रम अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा उच्च होती है।”
असमानता का तथ्य सामाजिक स्तरीकरण में अन्तर्निहित होता है।

सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • समाज में शक्ति, प्रतिष्ठा, संसाधनों, पुरस्कारों तथा सुविधाओं का असमान वितरण पाया जाता है।
  • विभेदीकृत वितरणात्मक प्रक्रियाओं के आधार पर समाज में सामाजिक श्रेणियों तथा मूहों का निर्माण होता है।
  • किसी भी समाज की सामाजिक संरचना में श्रेणियों अथवा स्तरों के पदासोपानक्रम का निर्धारण शक्ति, प्रतिष्ठा तथा विशेषाधिकारों के आधार पर होता है।
  • समाज में पायी जाने वाली श्रेणियों तथा स्तरों के बीच अन्तःक्रिया तथा पारस्परिक संबंध उच्चता व निम्नता की अवधारणा पर आधारित होते हैं।
  • किसी भी समाज में श्रेणियों तथा स्तरों के पारस्परिक संबंधों में क्रमबद्ध सामाजिक असमानता पायी जाती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया में श्रेणियों तथा स्तरों की संरचना में प्रत्येक समाज तथा काल में परिवर्तन होते हैं।
  • सामाजिक स्तरीकरण एवं सार्वभौमिक प्रक्रिया है। सामाजिक असमानता इसका मूल आधार है।
  • सामाजिक संरचना तथा स्तरीकरण में अत्यधिक निकटता पायी जाती है।
  • भूमिका तथा प्रस्थिति सामाजिक संस्तरण का मूल आधार है।
  • सामाजिक गतिशीलता तथा संस्तरण एक-दूसरे से संबंधित हैं।

प्रश्न 8.
संघर्ष को किस प्रकार कम किया जा सकता है? इस विषय पर उदाहरण सहित निबंध लिखिए।
उत्तर:
संघर्ष को कम करने के संबंध में हम अंतरपीढ़ी संघर्ष पर विचार-विमर्श कर भलीभाँति समझ सकते हैं – समाज सैदव बना रहता है, लेकिन पीढ़ियाँ निरंतर आती-जाती रहती है। पुरानी पीढ़ी का स्थान नवीन पीढ़ी ग्रहण करती रहती है। यह समाज में निरंतर चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। जन्म, मरण प्राकृतिक घटनाएँ हैं। पुरानी पीढ़ी अनुभवों की दृष्टि से सुदृढ़ होती है।

वह परम्पराओं, प्रथाओं एवं रूढ़ियों से प्रायः बंधी होती है। पुरानी पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से जो विरासत में प्राप्त किया है, वह उनकी धरोहर होती है और वे उस धरोहर को आगामी पीढ़ी को हस्तान्तरित करना चाहते हैं। सामान्यतः ऐसा देखा गया है कि नवीन पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों का आदर करती है और उनकी आज्ञाओं का पालन करती आई है, लेकिन आधुनिक युग में कुछ ऐसी शक्तियाँ कार्य कर रही हैं कि पीढ़ियों के मध्य दूरी बढ़ती जा रही है।

नवीन पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के लोगों का दकियानूस, कम ज्ञापन रखने वाले, परम्परावादी, अंधविश्वासी और रूढ़िवादी समझती है। इसके मुख्य कारण हैं-बढ़ती हुई शिक्षा, विज्ञान का प्रभाव आदि। आधुनिकता के नाम पर नवीन पीढ़ी परम्पराओं का विरोध करती है और पुरानी पीढ़ी जो कि परम्पराओं को बनाये रखने को प्राथमिकमा देती है, उससे उनका संघर्ष होना स्वाभावित हो जाता है। इसे ही अंतर पीढ़ी संघर्ष कहते हैं।

पीढ़ियों के मध्य दूरी से आशय है कि दोनों के विचारों, आस्थाओं, कार्य करने तरीकों और जीवन-पद्धति में अंतर। एक और पुरानी पीढ़ी तो परम्पराओं से बंधकर, पूर्वजों की संस्कृति को आगे और बढ़ाते हुए, सोच-समझकर धैयपूर्वक किसी कार्य को सम्पन्न करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर, नई पीढ़ी अर्थात् युवाओं में स्फूर्ति एवं जोश होता है। वे नवीनता ही हाड़ में आगे निकलना चाहते हैं, अत: वे परम्पराओं की अवहेलना करने में संकोच नहीं करते हैं।

उननके कार्य करने का तरीका भी पुरानी पीढ़ी से भिन्न होता है। ये किसी भी कार्य का अधिक-सोचे-बिना, अधैर्यता से तथा शीघ्र करना चाहते हैं। वास्तप में दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे में दोष व कमियाँ दिखाई देती हैं, फलस्वरूप वे अपने विचारों एवं कार्यप्रणाली में समन्वय एवं ताल-मेल नहीं बैठा पाते, जिसका परिणाम आपसी सम्बन्धी में तनाव, कटुता एवं कभी-कभी संघर्ष भी हो जाता है। कभी-कभी परिवार में इसके गम्भीर प्ररणाम भी दिखाई देते हैं।

वैसे तो पीढ़ियों के मध्य यह दूसरी समाज में सदैव विद्यमान रही है, क्योंकि आज जिन विचारों, वस्तुओं, मूल्यों, भावनाओं आदि को हम नवीनता कहते हैं, अगली पीढ़ी के लिए वे ही तथ्य परम्परा के रूप में परिणत हो जाते हैं। समाज हमेशा अदलता रहता है और उसी के साथ-साथ परम्परा एवं आधुनिकता भी बदलती रहती है। पुरानी पीढ़ी सदैव परम्परा के पक्ष में रहती है और नवीन पीढ़ी आधुनिकता के।

अतः यह स्वाभाविक है कि पीढ़ियों के मध्य दूरी तक न कुछ अंशें में सदैव विद्यमान रहीत है, लेकिन साथ-साथ यह भी कहा जा सकता है कि दोनों पीढ़ियों के व्यक्ति साझेदारी से काम लें और एक-दूसरे के विचारों, भावनाओं तथा समय की मांग को समझें तो यह दूरी निश्चित रूप से कम हो सकती है। शिक्षा के विकास के साथ-साथ भी यह दूरी कम होनी-ऐसा निश्तिच रूप से कहा जा सकता है?

अंतर-पीढ़ी संघर्ष विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है, ये क्षेत्र प्रमुख रूप से निम्नलिखित हैं –

(i) अंतर-पीढ़ी प्रजातीय संघर्ष – जब दो या दो से अधिक प्रजातियाँ एक ही स्थान पर एक साथ निवास करने लगती हैं और उसमें एक-दूसरे की शारीरिक विशेषताओं के प्रति चेतना उत्पन्न हो जाती है तब प्रजातीय संघर्ष की उत्पत्ति होती है। प्रायः अमेरिका में नीग्रो और श्वेत प्रजाति और अफ्रीका में श्वेत एवं वहाँ के मूल निवासियों तथा भारतीयों के बीच संघर्ष चला करता है। इन प्रजातियों में संघर्ष का कारण शारीरिक विभिन्नताओं के अतिरिक्त एवं सांस्कृतिक विभिन्नताएँ भी हैं ये विभिन्नताएँ प्रजातीय संघर्ष को बढ़ावा देती हैं।

श्वेत प्रजाति नीग्रो लोगों को अपने से निम्न समझती है और उनसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक विभेद बनाए रखने का प्रयास करती है। दूसरी और नीग्रो श्वेत या गोरे लोगों के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाते हैं और अपने अधिकारों की मांग करते हैं। ऐसा करने में कई नीग्रो को जीवन से हाथ धो लेना पड़ता है। इस प्रकार प्रजातीय भेद के कारण ही पुरानी एवं नवीन पीढ़ी में अंतर-पीढ़ी संघर्ष पाया जाता है।

(ii) अंतर-पीढ़ी वर्ग संघर्ष – प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी आधार पर वर्ग व्यवस्था पाई जाती है। प्रायः वर्गों का विभाजन आर्थिक आधार पर किया जाता है। इस आधार पर प्रत्येक। समाज में प्रायः तीन वर्ग पाए जाते हैं-उच्च, मध्यम तथा निम्न । इसके मध्य भी अंतर-पीढ़ी संघर्ष पाया जाता है। ‘साम्यवाद’ के समर्थक केवल दो वर्गों का समर्थन करते हैं मजदूर वर्ग तथा पूँजीवादी वर्ग। इन वर्गों में आपस में संघर्ष चलता रहता है। पूँजीवादी वर्ग मजदूरों को नाममात्र की मजदूरी देकर उनका शोषण करते हैं।

मजदूर वर्ग श्रम-संगठन बनाकर इस शोषण के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में इस प्रकार का संघर्ष चलता ही रहता है। साम्यवादी इस संघर्ष को मिटाने के लिए पूँजीपति का जड़ से विनाश करना चाहते हैं।

(iii) अंतर-पीढ़ी जातीय संघर्ष – जातीय आधार पर पुरानी पीढ़ी के बीच संघर्षों का उल्लेख विभिन्न समाजशास्त्रियों ने किया है। प्राचीन समय में कुछ जातियों द्वारा निम्न जातियों का शोषण किया जाता था, जबकि आज की पीढ़ी ने शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई है तथा विभिन्न जातिों के बीच संघर्ष भी देखा जा सकता है। आरक्षण के कारण पुरानी और नई पीढ़ी में भी संघर्ष उत्पन्न हुआ है, हिंसक कार्य-जनित गतिविधियाँ हो रही हैं तथा उच्च और निम्न जातियों में इस बात को लेकर तनाव एवं संघर्ष पाया जाता है।

(iv) अंतर-पीढ़ी धार्मिक संघर्ष – भारत एक विशाल देश है, जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध आदि अनेक धर्मों के अनुयायी निवास करते हैं। भारत में जब से अंग्रेज व मुसलमानों का आगमन हुआ है, तब से धार्मिक संघर्ष की समस्या उत्पन्न हुई है, जिसे सांप्रदायिकता के नाम से जाना जाता है। विभिन्न धर्मों के अलग-अलग आध्यात्मिक सिद्धांत पूजा-पाठ के तरीके, आचार-व्यवस्था, कर्मकाण्ड आदि होते हैं।

मानवता के अनुसार जो व्यक्ति किसी धर्म को मानता है तो उसे उस धर्म के नियमों व आचार-व्यवहार को अपनाने व उनका पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए, किन्तु तब एक धर्मावलम्बी अपने धर्म को श्रेष्ठ व दूसरे धर्म को हीन घोषित करने की चेष्टा कर अपने धर्म के अनुयायियों को दूसरे धर्म के अनुयायियों के विरुद्ध भड़काने का कार्य करता है, तो धार्मिक संघर्ष या साम्प्रदायिकता की समस्या उत्पन्न होती है। भारत में धार्मिक संघर्ष हिन्दू एवं मुसलमानों में ही नहीं, वरन् अन्य धर्मावनलंबियों; जैसे-शिया एवं सुन्नियों, जैनियों, निरंकारियों एवं अकालियों, बौद्धों और ईसाईयों में भी हुए हैं, किन्तु उनकी संख्या बहुत कम है।

(v) अंतर-पीढ़ी राजनैतिक संघर्ष – दो राष्ट्र के माध्यम या एक ही राष्ट्र के विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच भी अंतर-पीढ़ी संघर्ष पाया जाता है। अंतर पीढ़ी राजनैतिक संघर्ष दो भागों में बाँटा जा सकता है

(a) अन्तर्देशीय संघर्ष – प्रजातंत्रीय देशों में विचारों की अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। जनता अपने विचारों के अनुकूल सरकार बनाने के लिए दो या दो से अधिक राजनैतिक दलों को विकसित कर लेती है। प्रायः इन राजनैतिक दलों के नेता तथा सक्रिय समर्थक राज्यसत्ता पर अधिकार करने के उद्देश्य से चुनाव, संसद या विधानसभाओं की बैठक आदि के समय एक-दूसरे से संघर्ष कर बैठते हैं। कभी-कभी चुनाव के समय संघर्ष का रूप इतना विकराल हो जाता हैं कि कई लोगों की हत्याएँ तक हो जाती हैं । राष्ट्र के अंदर ‘क्रांति’ का जन्म होना राजनैतिक संघर्ष का सबसे बड़ा स्वरूप है।

(b) अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष – जब से विज्ञान की प्रगति के परिणामस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों में सम्पर्क स्थापित हुआ, तब से अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष भी प्रारम्भ हो गया है। प्रायः देखा जाता है कि जिन राष्ट्रों के बीच किसी बात पर वैमनस्य हो जाता है, तो उन राष्ट्रों की जनता तथा सरकार एक-दूसरे राष्ट्र की जनता तथा सरकार से घृणा तथा वैमनस्य करने लगती है। कभी-कभी घृणा तथा वैमनस्य का रूप इतना उग्र हो जाता है कि उनकी अभिव्यक्ति ‘युद्ध’ के रूप में होने लगती है। युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष का सबसे भयंकर रूप है।

संघर्ष को कम करने के उपाय – किसी भी संघर्ष को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए :
(i) पुरानी पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह नयी पीढ़ी की आकांक्षाओं व आवश्यकताओं को महसूस करे और नये युग के अनुकूल अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करे।

(ii) पुरानी पीढ़ी को चाहिए कि वह नयी पीढ़ी से सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करे, सद्परामर्श दे और उनके मार्ग में रूढ़ि या प्रथा सम्बन्धी कोई बाधा उपस्थिति न करे। यदि नवीन पीढ़ी के कुछ कार्य उसे पसंद आयें, तो वह उनकी भरपूर प्रशंसा भी करे।

(iii) युवा कल्याण सम्बन्धी नवीन नीतियों का निर्माण करते समय सरकार को युवकों से बातचीत आवश्य करनी चाहिए। बातचीत से समझौते का मार्ग प्रशस्त होगा तथा युवक कम-से-कम गलतफहमी के शिकार नहीं होंगे।

(iv) नवीन पीढ़ी को यह महसूस अवश्य होना चाहिए कि सरकार द्वारा उनके संबंध में जो नीति बनाई जा रही हैं, वह उनके लिए कल्याणकारी है यदि नीतियाँ बनाते समय सरकार युवकों के दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित हो जाये तो फिर युवकों में अंतर-पीढ़ी संघर्ष जन्म ही न लेगा।

(v) नवीन पीढ़ी का समाजीकरण इस प्रकार से किया जाए कि वे समानता एवं राष्ट्रीय विकास के मूल्यों के प्रति आस्था को रख सकें। इससे दोनों पीढ़ियों में संघर्ष के स्थान पर सहयोग उत्पन्न होगा।

(vi) जाति, वर्ण, धर्म, प्रजाति आदि क्षेत्रों में पुरानी पीढ़ी के विचारों का सम्मान करना चाहिए तथा उनके चरित्र निर्माण की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करना चाहिए। नई पीढ़ी को भी चाहिए कि वह पुरानी पीढ़ी के मार्गदर्शन को स्वीकार करे।

(vii) शिक्षा में नैतिक मूल्यों व अध्यात्मवाद की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाये। नवीन युवा पीढ़ी में यह समझ विकसित होनी चाहिए कि जीवन में धन साधन है, साध्य नहीं तथा धन कमाने हेतु अनुचित व अनैतिक साधनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

(viii) सभी राजनैतिक दलों का यह कर्तव्य है कि वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नवीन। युवा पीढ़ी का अपने हित में शोषण न करें।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 9.
समाज के स्तरीकरण में जाति का आधार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जाति एक ऐसे पदसोपानीकृति संबंध को बताती है जिसमें व्यक्ति जन्म लेता है तथा जिसमें व्यक्ति का स्थान, अधिकार तथा कर्तव्य का निर्धारण होता है। व्यक्तिगत उपलब्धियाँ तथा गुण व्यक्ति की जाति में परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। जाति व्यवस्था वस्तुतः हिंदु सामाजिक संगठन का आधार है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी समाजशास्त्री लुई ड्यूमो ने अपनी पुस्तक होमो हाइराकीकस में जाति व्यवस्था का मुख्य आधार शुद्धता तथा अशुद्धता की अवधारणा बताया है। ड्यूमो ने पदसोपानक्रम को जाति-व्यवस्था की विशेषता माना है।

प्रारम्भ में हिंदू समाज निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित था –

  • ब्राह्मण
  • क्षत्रिय
  • वैश्य
  • शूद्र

शुद्धता तथा अशुद्धता के मापदंड पर ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च तथा शूद्र का निम्न होता है। वर्ण व्यवस्था में पदानुक्रम के अनुसार क्षत्रियों का द्वितीय तथा वैश्य का तृतीय स्थान होता है। एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार जिस प्रकार जाति व्यवस्था की इकाई कार्य करती है, उस संदर्भ में वह जाति है, वर्ग नहीं है। हालांकि, जाति-व्यवस्था के लक्षणों को वर्ण व्यवस्था से ही लिया गया है लेकिन वर्तमान संदर्भ में जाति प्रारूप अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

एम.एन. श्रीनिवास ने जाति की परिभाषा करते हुए कहा है, कि –

  • जाति वंशानुगत होती है।
  • जाति अंत:विवाही होती है।
  • जाति आमतौर पर स्थानीय समूह होती है।
  • जाति परंपरागत व्यवस्था से संबद्ध होती है।
  • जाति की स्थानीय पदसोपानक्रम में एक विशिष्ट स्थिति होती है।
  • अतर्जातीय खान-पान पर प्रतिबंध होता है।
  • जातियों में परस्पर संबंध शुद्धता तथा अशुद्धता के नियमों पर आधारित होते हैं।

जातीय संस्तरण को कर्म तथा धर्म के विचार पर विभाजित किया जाता है। कर्म का विचार एक हिंदू को सिखाता है कि वह अपने पिछले जन्म के लिए गए कर्मों के आधार पर एक जाति-विशेष के जन्म लेने का अधिकारी है। कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि व्यक्ति ने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए हैं तो उसे पुस्कारस्वरूप उच्च वर्ग में जन्म मिलता है। इसके विपरीत, उसे कर्मों के आधार पर ही दंड स्वरूप नीची जाति में जन्म मिलता है । यदि व्यक्ति अपने जाति के अनुसार व्यवहार करता है तो उसका जन्म ऊँची जाति में तय हो जाता है। यही कारण है कि परंपरागत भारतीय समाज में जाति संस्तरण की व्यवस्था में लंबवत गतिशीलता अत्यधिक कठिन है।

एम.एन. श्रीनिवास ने जाति-व्यवस्था की नमनीयता अथवा लचीलेपन को संस्कृतीकरण कहा है। संस्कृतीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत निम्न जाति, जनजाति अथवा अन्य समूहों के सदस्य अपने रीति-रिवाजों, विश्वासों, विचारधारा तथा जीवन-शैली में उच्च जाति का अनुसरण करके ऊपर की ओर गतिशीलता कर सकते हैं। श्रीनिवास ने 1960 में अनुभव किया कि भारत में जातीय चेतना तथा जातीय संगठन की भावना बढ़ रही है। वर्तमान समय में जाति राजनीतिक तथा आर्थिक सत्ता प्राप्त करने के सशक्त संसाधन बनती जा रही है।

स्वतंत्रता के पश्चात् बनाए गए कानूनों तथा शिक्षा के प्रकार के कारण जाति संरचना में परिवर्तन हुए हैं । अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लिए शिक्षा तथा रोजगार के विशेष प्रावधान किए गए हैं। इन सबका प्रभाव सामाजिक सरंचना तथा स्तरीकरण पर स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है।

प्रश्न 10.
वर्ग को सामाजिक स्तरीकरण का आधार क्यों माना गया है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
वर्ग सामाजिक स्तरीकरण का आधार स्वीकार करने के महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  • वर्ग एक विस्तारित सामाजिक समूह है जो समान आर्थिक स्रोतों में भागीदार होते हैं।
  • वर्गों की सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण संपत्ति, धन, निजी उपलब्धि तथा व्यक्तिगत क्षमताओं से होता है। वर्ग के आधार प्रतिस्पर्धा तथा व्यक्तिगत क्षमता होता है।
  • समाजवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत वर्ग व्यवस्था को प्रायः अर्जित प्रस्थिति तथा मुक्त स्तरीकरण के साथ संबद्ध किया जाता है।
  • वर्तमान समय की पूँजीवादी औद्योगिक संरचना में वर्ग प्रमुख समूह है।
  • एक वर्ग के व्यक्तियों में समान आर्थिक हित तथा वर्ग चेतना पायी जाती है।

वर्ग व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • वर्ग वास्तव में समूह होते हैं लेकिन उनकी कानूनी मान्यता होती है।
  • वर्ग की सदस्यता विरासत में प्राप्त नहीं होती है।
  • वर्गों के मध्य सुपरिभाषित सीमाएँ नहीं पायी जाती हैं।
  • वर्गों की सदस्यता आमतौर पर अर्जित होती है।
  • वर्ग व्यवस्था अवैयक्तिक संबंधों द्वारा संचालित होती है।

समाजशास्त्री टी.बी. बोटमोर तथा एंथोनी गिडस ने आधुनिक विश्व में निम्नलिखित चार प्रकार के वर्गों का उल्लेख किया है –

  • उच्च वर्ग
  • मध्य वर्ग
  • श्रमिक वर्ग
  • कृषक वर्ग

प्रसिद्ध विद्वान कार्ल मार्क्स के अनुसार, पूँजीवाद औद्योगिक व्यवस्था में निम्नलिखित दो वर्ग पाए जाते हैं –

  • पूँजीपति वर्ग
  • श्रमिक वर्ग

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर की सामाजिक असमानता की अवधारणा मार्क्स की अवधारणा से निम्नलिखित रूप में पृथक है –

  • मार्क्स ने समाज में दो मुख्य वर्गों का उल्लेख किया है। वैबर का मत है कि समाज में दो से अधिक वर्ग पाये जाते हैं।
  • मार्क्स ने वर्गों के बीच पारस्परिक संबंधों को अत्यधिक महत्व दिया है। वैबर वर्गों के पारस्परिक संबंधों के बारे में अत्यधिक संदेह व्यक्त करता है
  • मार्क्स ने सामाजिक असमानता के आर्थिक पहलू को ही अत्यधिक महत्व दिया है।

वैबर ने असमानता के लिए उत्तरदायी अनेक कारण बताए हैं –

  • धन
  • शक्ति
  • प्रतिष्ठा तथा सम्मान

मैक्स वैबर ने वर्ग को व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या के रूप में परिभाषित किया है जिनके पास समान संसाधन होने के कारण समान जीवन संयोग पाये जाते हैं। मैक्स वैबर ने वर्ग के अलावा स्तरीकरण के दो मूल पहलू बताए हैं –

  • प्रस्थिति
  • शक्ति

प्रश्न 11.
संघर्ष से सामाजिक एकीकरण कैसे संभव होता है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संघर्ष न केवल विघटनकारी प्रवृति है, वरन यह सामाजिक एकीकरण भी उत्पन्न करती है। के. डेविस के अनुसार, “इसलिए आंतरिक एकता तथा बाह्य संघर्ष एक ही ढाल के दो पहलू हैं।” पार्क तथा बर्गेस के अनुसार, “संघर्ष अति तीव्र उद्वेग तथा अत्यधिक शक्तिशाली उत्तेजना को जागृत कर देता है तथा ध्यान व प्रयत्न को एकाग्रचित कर देता है।” संघर्ष द्वारा निम्नलिखित प्रकार से एकीकरण की स्थिति भी उत्पन्न की जाती है

(i) संघर्ष सामाजिक परिवर्तनों को जन्म देता है-संघर्ष सामाजिक परिवर्तनों को जन्म देता है। इस प्रकार संघर्ष तथा परिवर्तन सामाजिक प्रक्रिया के मध्य सेतु का कार्य करते हैं। संघर्ष के परिणाम सदैव नकारात्मक नहीं होते हैं, वे कभी-कभी सकारात्मक भी होते हैं। इस संबंध में कोसर ने कहा कि “ढीले संचरित समूहों तथा खुले समाजों में संघर्ष तनावों को कम कर स्थिरता तथा एकता की भूमिका निभाता है।”

(ii) अत्यधिक संघर्ष विघटन के कारणों को समाप्त करने का कार्य करते हैं तथा समाज में पुनः एकता स्थापित करते हैं-विरोधी द्वारा तात्कालिक एकता की अभिव्यक्ति सामाजिक व्यवस्था में असंतोष को समाप्त करके सामाजिक संबंधों में दोबारा समांजस्य कायम करने में सहायक होती है। अतः संघर्ष द्वारा समाज में विघटन के कारणों को समाप्त करके पुनः एकता कायम की जाती है।

(iii) बाह्य संघर्ष से समूह में एकीकरण स्थापित होता है-बाह्य संघर्षों में लिप्त समूहों में एकता उत्पन्न होती है। अंतर समूह संघर्षों द्वारा अंत:समूहों में वैमनस्य तथा शिकायतें कम करने में सहायता की जाती है। बाह्य संघर्षों द्वारा समूह के अंदर सदस्यों को निष्ठापूर्वक सहयोग हेतु बाध्य किया जाता है। सिमेल का मत है कि बाह्य संघर्षों से समूह में एकीकारण स्थापित होता है।

(iv) संघर्ष रचनात्मक व सकारात्मक लक्ष्यों की पूर्ति करता है-प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिमेल संघर्ष को समाज के निर्माण तथा विकास के लिए आवश्यक मानते हैं। उनका मत है कि संघर्ष रहित समरस समूह का अस्तित्व असंभव तथा अयथार्थवादी है। सिमेल का कहना है कि संघर्ष एक प्रकार से सामाजिक एकता प्राप्त करने की पद्धति है।

संघर्ष के द्वारा समाज में फैला हुआ विरोध समाप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए परिवार तथा दंपतियों के मध्य आंतरिक वैमनस्य, विरोध तथा बाहरी विवाद उन्हें परस्पर संबद्ध रखते हैं। सिमेल कहते हैं कि संघर्ष द्वारा अपने आप नई सामाजिक संरचना का सृजन नहीं किया जाता है। वस्तुतः संघर्ष समाज की एकता बढ़ाने वाले विभिन्न कारकों के साथ मिलकर नहीं, सामाजिक संरचना को जन्म देता है।

कोसर का मानना है कि संघर्ष खुले समाजों में तनाव के समाधान द्वारा सामाजिक स्थिरता को मजबूत बनाता है। व्यक्ति तथा समूह संघर्ष के दौरान परस्पर संबंध विकसित करते हैं । राल्फ डाहरण डार्फ का मत है कि सामाजिक संघर्ष द्वारा समाज की वास्तविक स्थिति का प्रकटीकरण किया जाता है। बाह्य संघर्ष के समय सभी समूहों में सहयोग के लिए मित्रता की मनोवृति पायी जाती है, लेकिन शांति काल में यह भावना अनुपस्थिति रहती है। संघर्ष द्वारा समूह में चेतना तथा संगठन उत्पन्न किया जाता है। ग्रीन के अनुसार, “युद्ध सामूहिक चेतना तथा सामूहिक समानता को बढ़ाता है।”

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मजूमदार ने संघर्ष के निम्नलिखित सकारात्मक प्रकार्य बताए हैं –

  • संघर्ष द्वारा अंत:समूह के मनोबल को सुदृढ़ किया जाता है उसकी शक्ति में वृद्धि की जाती है।
  • संघर्ष के द्वारा मूल्य-प्रणालियों की परिभाषा दोबारा हो।
  • संकटों के निवारण हेतु संघर्ष अहिंसात्मक साधनों की खोज के प्रेरित कर सकता है।
  • संघर्षरत पक्षों की सापेक्ष प्रस्थिति में परिवर्तन लाया जा सकता है।
  • संघर्ष के द्वारा नई सहमति की उत्पत्ति हो सकती है।

हार्टन तथा हंट के अनुसार संघर्ष द्वारा विवाद स्पष्ट किए जाते हैं। समूह की एकता में वृद्धि कर सदस्यों के हितों के प्रति चेतना उत्पन्न की जाती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 12.
सामाजिक स्तरीकरण में सजातीयता का आधार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सजातीयता का शाब्दिक अर्थ-सजातीयता शब्द ग्रीक भाषा के शब्द ‘एथनिकोस’ से लिया है, जो कि ‘एथनोस’ का विशेषण है। ‘एथनोस’ का तात्पर्य एक जनसमुदाय अथवा राष्ट्र से है। अपने समकालीन रूप में सजातीयता की अवधारणा उस समूह के लिए प्रयोग की जाती है जिसमें कुछ अंशों में सामंजस्य तथा एकता पायी जाती हो।

इस प्रकार, सजातीयता का अर्थ समूहिकता से है। सजातीयता की परिभाषा-सजातीयता की अवधारणा उस समूह के लिए प्रयुक्त की जाती है जिसमें सामंजस्य तथा आपसी भाईचारा पाया जाता है तथा जिसमें सदस्य अपने समान उद्गम तथा समान हित को स्वीकारते हैं। इस प्रकार, सजातीयता का तात्पर्य सामूहिकता से है।

एंथोनी गिडिंस के अनुसार –

  • सजातीय समूह के सदस्य समाज में स्वयं को एक अलग सांस्कृतिक समूह के रूप में देखते हैं।
  • अन्य व्यक्तियों को इस पृथकता का अनुभव होता है।

सजातीय समूह वस्तुतः एकता की भावना, पारस्परिक जागरुकता, समान उद्भव एवं हितों के कारण अस्तित्व में आते हैं। ए. शेर्मरहोर्न के अनुसार एक सजातीय समूह में एक व्यापक समाज में सामूहिकता है जिनका एक वास्तविक तथा काल्पनिक पूर्वज तथा समान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है।

सजातीय समूह वस्तुतः नातेदारी, गोत्र व्यवस्था, धार्मिक समूह तथा भाषा समूह से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। शिबूतनी ओर क्वान के सजातीय समूह की पहचान हेतु एक अतिरिक्त तत्व का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, “सजातीय समूह के अंतर्गत वे व्यक्ति आते हैं जिनका एक वास्तविक अथवा काल्पनिक पूर्वज होता है तथा उनमें सह-अस्तित्व की भावना पायी जाती है।”

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

Bihar Board Class 11 Sociology सामाजिक संस्थाओं को समझना Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विवाह संस्था की उत्पत्ति के महत्त्वपूर्ण कारण बताइए।
उत्तर:
विवाह संस्था की उत्पत्ति के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  • यौन संतुष्टि-यह जैविक आवश्यकता है।
  • संतानों का वैधानीकरण-यह सामाजिक आवश्यकता है।
  • आर्थिक सहयोग करना-यह आर्थिक आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
विवाह की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:

  • हैरी एम. जॉनसन के अनुसार, “विवाह एक ऐसा स्थायी संबंध है जिससे एक पुरुष और एक स्त्री समुदाय को बिना नुकसान पहुँचाए संतानोत्पत्ति की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होता है।”
  • आर. एच. लॉबी के अनुसार, “विवाह स्पष्टतः स्वीकृत उस संबंध संगठनों को प्रकट कता है जो यौन संबंधी संतुष्टि के उपरांत भी स्थिर रहता है तथा पारिवारिक जीवन की आधारशिला बनाता है।”

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प्रश्न 3.
विवाह संस्था के कोई दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर:

  • विवाह संस्था का मूल उद्देश्य यौन-संबंधों को सामाजिक प्रतिमानों के अनुरूप नियमित करना है। विवाह के माध्यम से परिवार अस्तित्व में आता है।
  • विवाह दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों को यौन संबंध रखने की स्वीकृति देता है तथा। उनसे प्राप्त संतान को सामाजिक वैधता प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
ज्ञात करें कि आपके समाज में विवाह के कौन-कौन से नियमों का पालन किया जाता है? कक्षा में अन्य विद्यार्थियों द्वारा किए गए प्रेक्षणों से अपने प्रेक्षणों की तुलना करें तथा चर्चा करें।
उत्तर:
हमारे समाज में विवाह के अनेक रूप हैं। इन रूपों को विवाह करने वाले साथियों ‘ की संख्या और कौन किससे विवाह कर सकता है, को नियंत्रित किए जाने वाले नियमों के आधार पर पहचाना जा सकता है। वैधानिक रूप से विवाह करने वाले साथियों की संख्या के संदर्भ में विवाह के दो रूप पाए जाते हैं-एकल विवाह तथा बहु-विवाह। एकल विवाह प्रथा एक व्यक्ति को एक समय में एक ही साथी तक सीमित रखती है। इस व्यवस्था में पुरुष केवल एक पत्नी और स्त्री केवल एक पति रख सकती है। यहाँ तक कि जहाँ बहु विवाह की अनुमति है वहाँ भी एक विवाह ही ज्यादा प्रचलित है। व्यावहारिक कार्य-विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 5.
सजातीय विवाह के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
पजातीय विवाह वैवाहिक साथी अर्थात् पति-पत्नी के चुनाव के संबंध में कुछ प्रतिबंध लगाता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति प ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11 – 53 को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ता है। हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” इस प्रकार, सजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति अपनी जाति, धर्म अथवा प्रजाति में ही विवाह कर सकता है। जाति तथा धार्मिक समुदाय भी अंत:विवाही होते हैं।

प्रश्न 6.
विजातीय विवाह के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
विजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह तथा नातेदारी से बाहर विवाह करना पड़ता है। समुदाय के द्वारा अपने सदस्यों पर कुछ विशेष व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। विजातीय विवाह के नियम सभी समुदाय में पाए जाते हैं। हिंदू विवाह में गोत्र तथा सपिण्ड विजातीय विवाह होते हैं। चीन में जिन व्यक्तियों के उपनाम एक ही होते हैं उनके बीच विवाह नहीं हो सकता।

प्रश्न 7.
गोत्र तथा सपिण्ड से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(i) गोत्र – गोत्र से तात्पर्य एक परिवार के ऐसे समूह से होता है जिनके सदस्य अपने वंश की उत्पत्ति एक काल्पनिक पूर्वज से मानते हैं। इस प्रकार हिंदू समाज में गोत्र विवाह वर्जित है।

(ii) सपिण्ड-हिंदू समाज में सपिण्ड विवाह भी वर्जित माना गया है। मिताक्षरा के अनुसार सपिंड उन व्यक्तियों को कहते हैं जिनके द्वारा किसी पूर्वज के शरीर के कणों को अपने शरीर में रखा जाता है। गौतम तथा वरिष्ठ जैसे सूत्रकारों का मत है कि पिता की साथ तथा माता की पाँच पीढ़ियों में विवाह नहीं करना चाहिए।

हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत पिता की पाँच तथा माता की तीन पीढ़ियों तथा विवाह वर्जित कर दिया गया है । इस प्रकार, इन सदस्यों के बीच भी वैवाहिक संबंध वर्जित है।

प्रश्न 8.
निकटाभिगमन निषेध का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:

  • निकटाभिगमन निषेध लगभग सभी समाजों में विजातीय विवाह का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नियम है।
  • सम्पूर्ण विश्व में माता-पुत्र, पिता-पुत्री तथा भाई-बहन के बीच विवाह संबंध निषेध होते हैं।
  • इस प्रकार, प्राथमिक नातेदारों के बीच यौन-संबंधों पर प्रतिबंध को निकटाभिगमन निषेध कहा जाता है। निकटाभिगमन निषेध के नियम का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दंडित किया जाता है।

प्रश्न 9.
निकटाभिगमन निषेध के कारण बताइए।
उत्तर:
विजातीय विवाह के नियमों को स्वतंत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाने के लिए लागू किया जाता है। किंग्सले डेविस के अनुसार, निकटाभिगमन निषेध के द्वारा वैवाहिक संबंधों तथा संवेदनाओं को केवल विवाहित जोड़ों तक ही सीमित करता है। इस प्रकार पिता-पुत्री, भाई-बहन तथा माता-पुत्र के संबंधों को वैवाहिक परिधि से बाहर रखा जाता है। अतः नातेदारी संगठन में आने वाली तमाम भ्रामक स्थितियों को समाप्त कर दिया जाता है। इस प्रकार परिवार संगठन बना रहता है।

निकटाभिगमन निषेध के निम्नलिखित वैज्ञानिक कारण हैं

  • सुजनन विज्ञान की दृष्टि से निकट नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंधों के कारण निषेधात्मक अंत:स्नातिक परिणामों की संभावना बनी रहती है।
  • निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध होने से संतान मंदबुद्धि वाली होती है।

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प्रश्न 10.
विवाह जैविकीय आवश्यकता को सामाजिक वैधता प्रदान करता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यौन संबंध व्यक्ति की मूल जैविकीय आवश्यकताओं में से एक है। सामान्य जीवन के लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों की कामेच्छा सामाजिक मानदंडों के अनुरूप पूरी होती रहे। विवाह के माध्यम से मनुष्य की केवल जैविकीय आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, वरन् मनोवैज्ञानिक संतुष्टि भी होती है।

प्रश्न 11.
बच्चों के वैधानीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. सभ्य समाज में विवाह की संस्था के माध्यम से जहाँ एक तरफ सहवास को नियमित करना आवश्यक समझा जाता है
  2. वहीं दूसरी तरफ पति-पत्नी को आवश्यक समझा जाता है, वहीं दूसरी तरफ पति-पत्नी के संबंधों से उत्पन्न बच्चों को सामाजिक वैधता प्रदान करना भी आवश्यक समझा जाता है।
  3. समाज को निरंतरता प्रदान करने हेतु माता-पिता की यह वैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों की समुचित देखभाल करें।

प्रश्न 12.
आर्थिक सहयोग विवाह संस्था का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार्य है । स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. विवाह संस्था का उद्देश्य मात्र यौन संतुष्टि की जैविकीय आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं है वरन् आर्थिक सहयोग भी इसका एक मुख्य उद्देश्य है।
  2. अर्थव्यवस्था के उत्तरोत्तर विकास, श्रम विभाजन तथा व्यावसायिक भिन्नता के कारण व्यक्तियों के बीच आर्थिक सहयोग की आवश्यकता निरंतर बढ़ती चली जाती है।

प्रश्न 13.
विवाह संस्था के संदर्भ में मार्गन के उद्विकासीय सिद्धांत का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विवाह संस्था के संबंध में लेविस मार्गन का उद्विकासीय सिद्धांत प्रारंभिक जनरीतियों तथा सामाजिक प्रचलनों पर आधारित है। मार्गन का मत है कि व्यक्तियों के समूह के सबसे प्रारंभिक स्वरूप में यौन-संबंधों की प्रकृति पूर्णरूपेण नियंत्रण मुक्त थी। मार्गन का मत है कि मानव समाज का विकास निम्न अवस्था से उच्च अवस्था की ओर होता है।

मार्गन ने विवाह के उद्विकास के विभिन्न चरण बताए हैं –

  • प्रारंभिक काल्पनिक यौन साम्यवादी समाज
  • समूह विवाह
  • बहु विवाह तथा
  • एक विवाह

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प्रश्न 14.
परिवार की संरचना के मुख्य तत्त्व क्या हैं?
उत्तर:
परिवार की संरचना के मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं –
(i) वैवाहिक संबंध –

  • एक सामाजिक संस्था के रूप में परिवार की उत्पत्ति विपरीत लिंगियों के वैवाहिक संबंधों से प्रारम्भ होती है।
  • यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक परिवार एक जैविकीय समूह हो। कभी-कभी बच्चों को गोद भी लिया जाता है।

(ii) रक्त-संबंध – परिवार के सदस्य संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया से परस्पर जुड़े होते हैं। जिस परिवार में व्यक्ति स्वयं जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार कहा जाता है। दूसरी तरफ, जिस परिवार में उसके स्वयं के बच्चे होते हैं उसे प्रजनन का परिवार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
परिवार के दो प्रमुख सामाजिक कार्य बताइए।
उत्तर:
समाज की केंद्रीय इकाई के रूप में परिवार के दो प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नलिखित हैं –
(i) समाजीकरण – जन्म लेते बच्चा परिवार का स्वाभाविक सदस्य बन जाता है। परिवार में – ही अंत:क्रिया के माध्यम से सामाजिकता का पाठ सीखता है। समाज के स्थापित आदर्शों, प्रतिमानों तथा स्वीकृत व्यवहारों को बच्चा परिवार में ही सीखता है। इस प्रकार परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है। बर्गेस तथा लॉक के अनुसार, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली मौलिक समिति है तथा पारिवारिक परंपरा बालक को उसके प्रति प्रारंभिक व्यवहार, प्रतिमान व आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

(ii) सामाजिक नियंत्रण – परिवार एक प्राथमिक समूह है। परिवार सामाजिक नियंत्रण के स्वैच्छिक प्रतिमान विकसित करता है। व्यक्ति इन प्रतिमानों का स्वाभाविक रूप से अनुपालन करते हैं। इस प्रकार परिवार सामाजिक नियंत्रण की स्थायी संस्था है जो अनौपचारिक साधनों के द्वारा सामाजिक नियंत्रण की प्रक्रिया को जारी रखती है।

प्रश्न 16.
परिवार के दो प्रमुख आर्थिक कार्य बताइए।
उत्तर:

  • सामाजिक संरचना की एक महत्त्वपूर्ण तथा मूलभूत प्राथमिक इकाई के रूप में परिवार अनेक आर्थिक कार्य भी करता है। परिवार
  • अपने सदस्यों के लिए रोटी, कपड़ा तथा मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
  • प्राचीन काल से आज तक परिवार आर्थिक क्रियाओं का केंद्र रहा है।
  • परिवार के सदस्य अपनी विभिन्न आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार में ही करते हैं।

प्रश्न 17.
विस्तृत परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
यदि एकाकी या संयुक्त परिवार के सदस्यों के अलावा कोई नातेदार परिवार का हिस्सा बनता है तो उसे विस्तृत परिवार कहते हैं। विस्तृत परिवार में एकाकी नातेदारों के अतिरिक्त दूर के रक्त संबंधी हो सकते हैं या साथ रहने वाले नातेदार और भी अधिक दूर के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सास-ससुर का अपने दामाद के परिवार में रहना।

प्रश्न 18.
मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
बैचोपन तथा मार्गन जैसे समाजशास्त्रियों का मत है कि परिवार का प्रथम स्वरूप मातृक था। मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • मातृवंशीय परिवार में वंशावली माता के माध्यम से चलती है।
  • परिवार में मुख्य सत्ता तथा निर्णय करने का अधिकार माता के पास होती है।
  • बच्चों की देखभल पत्नी के रिश्तेदारों के घर में होती है। इस प्रकार ये परिवार मातृस्थानीय होते हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के नायर परिवार मातृस्थानीय हैं।
  • संपत्ति का उत्तराधिकार स्त्रियों के पास होता है। मेघालय में खासी जनजाति में मातृ-सत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं।

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प्रश्न 19.
विवाह के दो सामान्य स्वरूप कौन से हैं? एकल विवाह के संबंध में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
विवाह के दो स्वरूप हैं –

  • एकल विवाह तथा
  • बहु विवाह

एकल विवाह एक ऐसा वैवाहिक संबंध है जिसमें एक समय में एक पुरुष केवल एक ही स्त्री से विवाह कर सकता है। एकल विवाह के अन्तर्गत पति-पत्नी किसी एक की मृत्यु होने या विवाह-विच्छेद के बाद ही दुबारा विवाह कर सकते हैं। पिडिंगटन के अनुसार, “एकल विवाह, विवाह का वह स्वरूप है जिसमें कोई भी व्यक्ति एक समय में एक व्यक्ति से अधिक के साथ विवाह नहीं कर सकता है।” । हिन्दू समाज में एक विवाह को प्रमुखता प्रदान की जाती है। मैलिनोवस्की के अनुसार, “एक पत्नीत्व विवाह का एकमात्र उचित प्रकार है, रहा है तथा रहेगा।”

प्रश्न 20.
बहु-विवाह के संबंध को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहु-विवाह विवाह का वह संगठन है जिसके अंतर्गत एक पुरुष का दो या दो से अधिक स्त्रियों या एक स्त्री का दो या दो से अधिक पुरुषों अथवा सामूहिक रूप से अनेक पुरुषों के बीच वैवाहिक संबंध होते हैं। बलसारा के अनुसार, “विवाह का वह प्रकार जिसमें सदस्यों की बहुलता पायी जाती है बहु-विवाह कहा जाता है।”

बहु-विवाह के निम्नलिखित चार स्वरूप हैं –

  • बहुपति विवाह
  • बहुपत्नी विवाह
  • द्विपत्नी विवाह
  • समूह विवाह

प्रश्न 21.
बहुपति विवाह के संबंध में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहुपति विवाह के निम्नलिखि दो स्वरूप पाए जाते हैं –

  • भ्रातृत्व बहुपति विवाह तथा
  • गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह

भ्रातृत्व बहुपति विवाह के अंतर्गत स्त्री सभी भाइयों की पत्नी समझी जाती है। सभी भाई संतान के पिता होते हैं।
गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह के अंतर्गत एक स्त्री के कई पति होते हैं, लेकिन वे आपस में भाई नहीं होते हैं। गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह में पतियों में से किसी एक को धार्मिक संस्कार के जरिए बच्चे का सामाजिक पिता माना जाता है।

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प्रश्न 22.
परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
परिवार की रचना ऐसे व्यक्तियों से होती है जिनमें नातेदारों के संबंध पाए जाते हैं। क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता और उनकी संतोनों के बीच पायी जाती है।” मेकावर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो यौन संबंधों पर आधारित है और जो इतना छोटा तथा स्थायी है कि उसमें बच्चों की उत्पत्ति तथा पालन-पोषण हो सके।”

प्रश्न 23.
भारतीय परिवार के विशेष संदर्भ में परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
भारतीय परिवार अपेक्षाकृत अधिक जटिल सामजिक संरचना है जिनमें आमतौर पर दो या तीन पीढ़ियाँ निवास करती हैं। इन्हें संयुक्त परिवार भी कहते हैं। डॉ. इरावती कर्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो सामान्यतः एक भवन में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के स्वामी होते हैं तथा जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं तथा जो किसी-न-किसी प्रकार एक-दूसरे के रक्त संबंधी हैं।”

प्रश्न 24.
परिवार की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. परिवार व्यक्तियों की केवल सामूहिकता नहीं है। परिवार के व्यक्ति एक-दूसरे से परस्पर जैविकीय, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से जुड़े होते हैं।
  2. परिवार एक सार्वभौम सामाजिक प्रघटना है। यह समाज की मूल इकाई है तथा इसमें सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध पाया जाता है।

प्रश्न 25.
“समाज के अस्तित्व हेतु नियंत्रण की व्यवस्था आवश्यक है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नियंत्रण तथा नियमों के अभाव में समाज में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जिसके कारण संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था ही अस्त-व्यस्त हो जाएगी। नियंत्रण के साधन प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही पाए जाते हैं। आधुनिक जटिल समाज में नियंत्रण के औपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावी होते हैं लेकिन अनौपचारिक साधनों का महत्त्व भी काफी अधिक होता है। आदिम समाज में परिवार, समुदाय तथा नातेदारी आदि संस्थाएँ सामाजिक नियंत्रण का कार्य करती हैं। आधुनिक जटिल समाजों में नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों की अपेक्षा औपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

प्रश्न 26.
सत्ता की परिभाषा दीजिए सत्ता के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर:
सत्ता की परिभाषा –

  • सी. राइट मिल्स के अनुसार, “सत्ता का तात्पर्य निर्णय लेने के अधिकार तथा दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को अपनी इच्छानुसार तथा
  • संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के विरुद्ध प्रभावित करने की क्षमता से है।
  • रॉस का मत है कि सत्ता का तात्पर्य प्रतिष्ठा से है। प्रतिष्ठित वर्ग के पास सत्ता भी होती है।

सत्ता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  • प्रतिष्ठा
  • प्रसिद्धि
  • प्रभाव
  • क्षमता
  • ज्ञान
  • प्रभुता
  • नेतृत्व
  • शक्ति

प्रश्न 27.
शक्ति तथा सत्ता में मुख्य अंतर बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने शक्ति तथा सत्ता में अंतर बताया है। वैबर के अनुसार यदि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर उसकी इच्छा के विरुद्ध अपना प्रभाव स्थापित करता है तो इस प्रभाव को शक्ति कहते हैं। दूसरी तरफ, सत्ता वह प्रभाव है जिसे उन व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार किया जाता है जिनके प्रति इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार, सत्ता एक वैधानिक शक्ति है। अतः हम सत्ता को सामाजिक रूप से प्रभाव कह सकते हैं। जब शक्ति को वैधता प्रदान कर दी जाती है तो यह सत्ता का स्वरूप धारण कर लेती है तथा व्यक्ति इसे स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार कर लेता है।

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प्रश्न 28.
पारम्परिक सत्ता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पारंपरिक सत्ता को व्यक्तियों द्वारा आदतन स्वीकार किया जाता है। व्यक्तियों द्वारा किसी की शक्ति को केवल इस कारण से स्वीकार किया जाता है कि उनसे पहले के व्यक्तियों ने भी उसे स्वीकार किया था अतः सत्ता का अनुपालन एक परंपरा बन जाता है। परंपरागत सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा अतार्किक होती है।

पारंपरिक सत्ता के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  • जनजाति का मुखिया
  • मध्यकाल के राजा तथा सामंत
  • परंपरागत पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया आदि।

प्रश्न 29.
करिश्माई सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
करिश्माई सत्ता से युक्त व्यक्ति में असाधारण प्रतिभा, नेतृत्व का जादुई गुण तथा निर्णय लेने की क्षमता पायी जाती है। जनता द्वारा ऐसे व्यक्ति का सम्मान किया जाता तथा उसमें विश्वास प्रकट किया जाता है। यही कारण है कि व्यक्तियों द्वारा करिश्माई सत्ता के आदेशों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। करिश्माई सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा तार्किक होती है। अब्राहम लिंकन, महात्मा गाँधी आदि करिश्माई व्यक्तित्व से युक्त थे।

प्रश्न 30.
पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • पितृवंशीय परिवार में पत्नी विवाह के पश्चात् पति के घर में रहने जाती है।
  • पितृवंशीय परिवार में पिता परिवार का मुखिया तथा संपत्ति का सर्वोच्च स्वामी होता है।
  • परिवार की वंशावली पिता के माध्यम से चलती है।
  • पितृवंशीय परिवार पितृस्थानीय होते हैं।

प्रश्न 31.
बहुपत्नी परिवार के विषय में दो बिन्दु दीजिए।
उत्तर:

  • बहुपत्नी परिवार में एक व्यक्ति एक समय में एक से अधिक पत्नियाँ रखता है।
  • अनेक जनजातियों में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

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प्रश्न 32.
बहुपति परिवार के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहुपति परिवार में एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं। बहुपति परिवार दो प्रकार के होते हैं –
(i) भ्राता बहुपति परिवार – भ्राता बहुपति परिवार में स्त्री के सभी पति आपस में भाई होते हैं। वेस्टर मार्क के अनुसार, “जब एक लड़का किसी स्त्री से शादी कर लेता है तो वह लड़की प्रायः उस समय उसके अन्य सब भाइयों की पत्नी बन जाती है तथा उसी प्रकार बाद में पैदा होने वाला भाई भी बड़े भाईयों के अधिकारों में भागीदार माना जाता है।”
हमारे देश में भ्राता बहुपति परिवार खासी तथा टोडा जनजाति में पाये जाते हैं।

(ii) अभ्राता बहुपति परिवार – अभ्राता बहुपति परिवार में स्त्री के अनेक पति परस्पर भ्राता न होकर अनेक गोत्रों के व्यक्ति होते हैं जो एक-दूसरे से अपरिचित होते हैं। नायर जनजाति में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

प्रश्न 33.
नातेदारी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। नातेदारी के प्रकार बताइए।
उत्तर:
नातेदारी का अर्थ-नातेदारी रक्त तथा विवाह का ऐसा बंधन है जो व्यक्तियों को एक समूह से बाँधता है। इस, प्रकार नातेदारी व्यवस्था किसी परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों तथा इन सदस्यों से जुड़े दूसरे परिवारों के सदस्यों के आपसी संबंधों को संगठित और वर्गीकृत करने की केवल एक प्रणाली है। मुरडाक के अनुसार, “यह मात्र संबंधों की ऐसी रचना है जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे से जटिल आंतरिक बंधन एवं शाखाकृत बंधनों द्वारा जुड़े होते हैं।”

नातेदारी के प्रकार –

  • वैवाहिक नातेदारी-जब किसी पुरुष द्वारा किसी कन्या से विवाह किया जाता है तो उसका संबंध न केवल कन्या से होता है वरन् कन्या के परिवार के अनेक सदस्यों से भी स्थापित हो जाता है।
  • समरक्तीय नातेदारी-समरक्तीय नातेदारी का संबंध रक्त के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए माता-पिता तथा बच्चों के बीच समरक्तीय संबंध होते हैं।

प्रश्न 34.
राजनीतिक संस्थाएँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक समाज में नियंत्रण – उन्मुख नियम तथा संगठन व इन नियमों से संबंधित संगठनात्मक शक्तियाँ पायी जाती हैं, इन्हें ही राजनीतिक संस्थाएँ कहा जाता है।

प्रश्न 35.
धर्म के संबंध में ई. बी. टायलर के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए। अथवा, ‘आत्मवाद’ के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ई. बी. टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमिटिव कल्चर में धर्म की उत्पत्ति के विषय में आत्मवाद के सिद्धांत का वर्णन किया है। आत्मवाद के सिद्धांत के अनुसार धर्म की उत्पत्ति आत्मा की धारणा से हुई है। मृत्यु के तथ्यों तथा स्वप्नों की प्रघटना से आदिम लोगों के मन में विचार की उत्पत्ति हुई कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का देहांतरण होता है। निद्रा के समय इन देहारित आत्माओं द्वारा शरीर का आत्माओं से अर्संबंध स्थापित होता है। वास्तव में, स्वप्न को इसी अन्तःक्रिया की अभिव्यक्ति कहा जाता है।

प्रश्न 36.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में जे. जी. फ्रेजर के विचार बताइए।
उत्तर:
फ्रेजर ने अपनी पुस्तक गोल्डन बो में धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत का उल्लेख किया है। उसने धर्म की उत्पत्ति के बारे में एक नए सिद्धांत ‘जादू से धर्म की संक्रांति’ का प्रतिपादन किया है। फ्रेजर का विचार है कि जादू धर्म से पहले का स्तर है। फ्रेजर के अनुसार, “जादू प्रकृति पर बलपूर्वक नियंत्रण का प्रयास है।”

जादू का संबंध कार्य तथा कारण से है। कार्य तथा कारण की असफलता के कारण ही धर्म की उत्पत्ति हुई है। आदिम लोगों के द्वारा शुरू में जादू के माध्यम से शक्तियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया, लेकिन नियंत्रण में असफल हो जाने के बाद उन्हें किसी अलौकिक शक्ति की सत्ता का अहसास हुआ।

फ्रेजर मानव विचारधारा के विकास की निम्नलिखित अवस्थाएँ बताते हैं –

  • जादुई अवस्था
  • धार्मिक अवस्था तथा
  • वैज्ञानिक अवस्था

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प्रश्न 37.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में मैक्समूलर के सिद्धांत को संक्षेप में लिखिए। अथवा, धर्म की उत्पत्ति के विषय में प्रकृतिवाद के सिद्धांत को लिखिए।
उत्तर:
धर्म की उत्पत्ति के विषय में मैक्समूलर के सिद्धांत को प्रकृतिवाद के नाम से जाना जाता है। मैक्समूलर के सिद्धांत का आधार आदिम मानव की बौद्धिक भूल है। मैक्समूलर का मत है कि आदिम मानव को प्रथम चरण में प्रकृति अत्यधिक भयपूर्ण तथा विस्मयकारी प्रतीत हुई । मूलर का मत है कि प्रकृति भय तथा विस्मय का एक विस्तृत क्षेत्र था। इसी ने प्रारम्भ से ही धार्मिक विचारों तथा भाषा के लिए मनोवेग प्रदान किया। इसी अनंत संवेदना से धर्म की उत्पत्ति हुई।

प्रश्न 38.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में दुर्खाइम के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने अपनी पुस्तक में धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की। दुर्खाइम के अनुसार सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। प्रत्येक समाज में पवित्र वस्तुओं को श्रेष्ठ समझा जाता है तथा उन्हें संरक्षित किया जाता है जबकि साधारण वस्तुओं को निषिद्ध किया जाता है।

दुर्खाइम के अनुसार धर्म का संबंध पवित्र वस्तुओं से होता है तथा धर्म के समाजशास्त्र में साहिकता पर जो दिया जाता है। दुर्खाइम के सिद्धांत में धर्म उपयोगिता को प्रकार्यात्मक ढंग से स्पष्ट किया गया है। दुर्खाइम के अनुसार टोटमवाद धर्म का आदिम स्वरूप था।

प्रश्न 39.
विवेकपूर्ण वैधानिक समाजों में सत्ता का स्वरूप बताइए। अथवा, विवेकपूर्ण वैधानिक सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

  • आधुनिक औद्योगिक समाजों में सत्ता का स्वरूप वैधानिक तथा तार्किक होता है।
  • वैधानिक तथा तार्किक सत्ता औपचारिक होती है तथा इसके विशेषाधिकार सीमित तथा कानून द्वारा सुपरिभाषित होते हैं।
  • वैधानिक-तार्किक सत्ता का समावेश व्यक्ति विशेष में निहित न होकर उसके पद तथा प्रस्थिति में निहित होता है।
  • वैधानिक-तार्किक सत्ता की प्रकृति अवैयक्तिक तथा तार्किक होती है।
  • आधुनिक औद्योगिक समाज में नौकरशाही को वैधानिक तार्किक सत्ता का उपयुक्त उदाहरण समझा जाता है।

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प्रश्न 40.
राज्य की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
राज्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संस्था है। मैक्स वैबर के अनुसार, “राज्य एक ऐसा संघ है जिसके पास हिंसा के वैध प्रयोग का एकाधिकार होता है तथा जिसे अन्य किसी प्रकार से परिभाषित नहीं किया जा सकता है।” आगबर्न के अनुसार, “राज्य एक ऐसा संगठन है जो निश्चित भू-प्रदेश पर सर्वोच्च सरकार द्वारा शासन करता है।”

प्रश्न 41.
राज्य के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर:
राज्य के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –
जनसंख्या – जनसंख्या के अभाव में राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए जनसंख्या एक आवश्यक तत्त्व है।

निश्चित भू – प्रदेश-राज्य के लिए सुपरिभाषित भू-प्रदेश होना अनिवार्य है। इलियट के अनुसार, “अपनी सीमाओं में सब व्यक्तियों के ऊपर सर्वोच्चता अथवा प्रदेशीय प्रभुसत्ता तथा बाह्य नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता आधुनिक राज्य जीवन का मूल नियम है।”

संप्रभुता-संप्रभुता का तात्पर्य है कि सरकार के पास एक निश्चित भू-प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने की सर्वोच्च शक्ति होती है। लॉस्की के अनुसार, “संप्रभुता का तत्व ही राज्य को अन्य संघों से पृथक कर देता है।”

सरकार-राज्य के कार्यों के संचालन तथा नियंत्रण हेतु सरकार का होना अपरिहार्य है। सरकार के अभाव में राज्य की कल्पना निरर्थक है। सरकार का स्वरूप अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न हो सकता है।

प्रश्न 42.
धर्म की परिभाषा लिखें। धर्म की आधारभूत विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
टायलर के अनुसार, “धर्म एक अलौकिक सत्ता में विश्वास है।” दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म विश्वासों की एकबद्धता है तथा इसमें पवित्र वस्तुओं से संबंधित क्रियाएँ होती हैं।”

धर्म की आधारभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • धर्म अलौकिक शक्तियों में विश्वास है।
  • धर्म अंततः समस्याओं के बारे में विचार प्रकट करता है तथा यह मोक्ष की विधि है।
  • प्रत्येक धर्म में कुछ विशिष्ट अनुष्ठान पाए जाते हैं।
  • प्रत्येक धर्म में स्वर्ग-नरक तथा पवित्र-अपवित्र की धारणा विद्यमान होती है।

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प्रश्न 43.
शिक्षा के मूल उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
शिक्षा के मूल उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  • शिक्षा व्यक्ति का समाज से एकीकरण करती है।
  • शिक्षा समूह में परिवर्तन की सकारात्मक प्रक्रिया है।
  • शिक्षा पर्यावरण से समायोजन की प्रक्रिया है।
  • शिक्षा व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि करती है।

प्रश्न 44.
शिक्षा की पद्धतियों के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा की दो प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं :
(i) अनौपचारिक शिक्षा – अनौपचारिक शिक्षा एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अनौपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम, उद्देश्य तथा पद्धति आदि नहीं होते हैं । अनौपचारिक शिक्षा की प्रक्रिया अचेतन रूप से चलती रहती है। परिवार, मित्रमण्डली, पड़ोस सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ अनौपचारिक शिक्षा के प्रमुख अभिकरण हैं।

(ii) औपचारिक शिक्षा-औपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम, पद्धतियों के माध्यम से शिक्षा दी जाती है । औपचारिक शिक्षा चेतन रूप से चलती है। इसके द्वारा अनौपचारिक शिक्षा की कमियों को पूरा किया जाता है। विद्यालय, पुस्तकालय, विचार गोष्ठी तथा संग्रहालय आदि. इसके साधन हैं।

प्रश्न 45.
औपचारिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
औपचारिक शिक्षा की निम्नलिखित विशषताएँ हैं –

  • औपचारिक शिक्षा का स्वरूप संस्थागत होता है।
  • औपचारिक शिक्षा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा मान्यताप्राप्त विद्यालयों के द्वारा दी जाती है।
  • औपचारिक शिक्षा प्रशिक्षित अध्यापकों के द्वारा दी जाती है।
  • औपचारिक शिक्षा में पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए एक निश्चित अवधि होती है। पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् विद्यार्थी को परीक्षा
  • में उत्तीर्ण होना पड़ता है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद विद्यार्थी को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

प्रश्न 46.
आधुनिक शिक्षा के प्रमुख प्रकार्यों को बताइए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • सामाजिकरण
  • ज्ञान तथा सूचना का संप्रेषण
  • व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास
  • मानवीय संसाधनों का समुचित तथा संतुलित विकास
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा नवीन मूल्यों का विकास।

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प्रश्न 47.
पूर्व-औद्योगिक समाजों में शिक्षा की विषय-वस्तु क्या थी?
उत्तर:
पूर्व-औद्योगिक समाजों में शिक्षा की विषय-वस्तु सीमित थी। विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी। शिक्षा की विषय-वस्तु में सम्मिलित किए जाने वाले मुख्य विषय थे-धर्म, दर्शन . अध्यात्म तथा नीतिशास्त्र आदि।

प्रश्न 48.
आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु तर्कपूर्ण, क्रमिक तथा वैज्ञानिक है।
  • विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु सहगामी तथा पाठ्येत्तर क्रियाओं को प्राथमिकता दी जाती है। पाठ्यक्रम में समानता, स्वतंत्रता,
  • अंतराष्ट्रीय बंधुत्व तथा मानवाधिकार के विचारों को महत्त्व दिया जाता है। आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु परिवर्तनोन्मुखी है।
  • शिक्षा के क्षेत्र में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में नए आयाम तथा अवधारणाएँ विकसित किए जा रहे हैं।

प्रश्न 49.
हिंदू धर्म की सामान्य विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू धर्म की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • हिन्दू धर्म विश्व के महान धर्मों में सर्वाधिक प्राचीन है। यह धर्म लगभग 6 हजार वर्ष प्राचीन है।
  • हिन्दू धर्म बहुदेववादी है अर्थात् इसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।
  • हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के चक्र को माना जाता है।
  • जन्म तथा मृत्यु के चक्र को माना जाता है।

प्रश्न 50.
धार्मिक अनुष्ठान का अर्थ बताइए।
उत्तर:
डेविस के अनुसार, “धार्मिक अनुष्ठान धर्म का गतिशील पक्ष है।” धार्मिक अनुष्ठान को अधिप्राकृतिक तथा पवित्र वस्तुओं के संदर्भ में व्यक्तियों के व्यवहार से संबंधित माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठान उपकरणात्मक क्रिया है जिसमें लक्ष्य प्रेरित होती है। धार्मिक अनुष्ठान किसी निश्चित लक्ष्य अथवा कामनाओं को प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं। धार्मिक व्यवहार में विशेष वस्त्र धारण करना उपवास करना, नृत्य तथा भिक्षा आदि को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 51.
पंथ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पंथ का अर्थ-पंथ की उत्पत्ति आमतौर पर पुराने स्थापित धर्मों के विरुद्ध प्रतिवाद के रूप में होती है। पंथ द्वारा प्रचलित धार्मिक आस्थाओं, नियमों तथा विश्वासों से हटकर एक नई मानसिक स्थिति का विकास किया जाता है। पंथ की उत्पत्ति सामाजिक असंतोष में पायी। जाती है। पंथ की सदस्यता ऐच्छिक होती है। पंथ में परंपरागत धर्म के सिद्धांतों को अस्वीकार किया जाता है। पंथ में पंथ की शिक्षाओं का अनुकरण करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है।

हिंदू धर्म में अनेक पंथ पाए जाते हैं, जैसे-नाथ पंथ, कबीर पंथ, नानक पंथ, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन तथा राधा स्वामी आदि। ईसाई धर्म में भी पंथ पाए जाते हैं : जैसे मेथेडिस्ट तथा बैपटिस्ट।

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प्रश्न 52.
धार्मिक संप्रदाय की परिभाषा कीजिए।
उत्तर:
धार्मिक संप्रदाय : धार्मिक संप्रदाय एक धार्मिक संगठन है। इनकी उत्पत्ति किसी नेता विशेष की विचारधारा. तथा चिंतन से होती है। ऐसी विशिष्ट विचारधरा वाले नेता का अनुसरण उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जिनकी विचारधारा समान होती है। एक धार्मिक संप्रदाय के लोग विशिष्ट देवी-देवताओं में विश्वास रखते हैं। एक व्यक्ति के द्वारा एक धार्मिक संप्रदाय का अनुसरण करने केथ-साथः किसी अन्य धर्म के सिद्धांतों में भी आस्था रखी जा सकती है. उदाहरण के लिए हमारे देश में बय गुरुदेव तथाः साई बाबा आदि धार्मिक संप्रदाय मणका कल्ट हैं।

प्रश्न 53.
शिक्षा की सीमान दीजिए।
उत्तर:
मा हिम के अनुसार, यस्क मोदी उस ऐसे व्यक्तियों पर डाला नाका जीवनपोत चलती रहती है.जया जॉन के प्रत्येक अनुभव से इसकी वृद्धि होती है।

प्रश्न 54.
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। शिक्षा के द्वारा व्यक्तियों में. तर्कपूर्ण, कैज्ञानिक तथा गतिशील दृष्टिकोण का विकास किया जाता है। शिक्षा द्वारा व्यक्तियों के रूढ़िवादी; अतार्किक तथा जड़ विचारों को परिमार्जन किया जाता है।

शिक्षा समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में आवश्यक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। शिक्षा मनुष्यों में सामाजिक चेतना का संचार करती है। इस संदर्भ में स्त्री शिक्षा का काफी महत्त्व है। शिक्षा के द्वारा लाए गए परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन व्यक्तियों के अर्जित गुणों को महत्त्व प्रदान करना है। शिक्षा के द्वारा समाज में समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व की भावना का विकास करके सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को एक नयी तथा व्यापक दिशा प्रदान की जाती है।

प्रश्न 55.
विकासशील देशों के संदर्भ में आधुनिक शिक्षा के सम्मुख चुनौतियाँ बताइए।
उत्तर:
विकासशील देशों के संदर्भ में आधुनिक शिक्षा के सम्मुख दो चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं – शिक्षा का लोकतंत्रीकरण करना-इसके अंतर्गत अशिक्षित लोगों को शिक्षित करके साक्षरता की दर में वृद्धि करने का प्रयास किया जाता है। लोगों के जीवन स्तर में सुधर करना ताकि वे शिक्षा की ओर स्वाभाविक रुचि दिखा सकें। स्त्री शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा के लिए विशेष प्रयास करना । सीमित साधनों का यथोचित तथा अधिकतम उपयोग करना।

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प्रश्न 56.
शिक्षा के सांगठनिक ढाँचे अथवा संरचना के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं तथा प्रत्येक स्तर का एक निश्चित सांगठनिक ढाँचा है -\
(i) प्रारंभिक स्तर-इसके निम्नलिखित दो स्तर होते हैं –

  • प्राथमिक स्तर-कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर-कक्षा 6 से 8 तक।

(ii) माध्यमिक स्तर –

  • माध्यमिक स्तर-कक्षा 9 से 10 तक।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर-कक्षा 11 से 12 तक।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर-इसके अंतर्गत विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 57.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा का महत्व बताइए।
उत्तर:
लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुख्य आदर्श हैं –

  • समानता
  • स्वतंत्रता
  • बंधुत्व

शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों में लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश किया जाता है। शिक्षा व्यक्तियों को उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों के बारे में समुचित ज्ञान कराती है। शिक्षित व्यक्तियों में राजनीतिक चेतना का स्तर अपेक्षाकृत अधिक होता है। यही कारण है कि प्रत्येक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने के लिए शिक्षा के सार्वभौमीकरण का गंभीर प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 58.
शिक्षा के प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत समाज पर शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। समाजवादी दुर्खाइम के अनुसार, “समाज उसी स्थिति में जीवित रह सकता है जब समाज के सदस्यों में पर्याप्त अंशों में समरूपंता हो। शिक्षा के द्वारा उस समरूपता को स्थायी बनाया जाता है तथा संवर्धित किया जाता है।

समाज में व्यक्ति निश्चित नियमों के अनुसार अंतःक्रिया करते हैं। टालकॉट पारसंस के अनुसार विद्यालय के द्वारा नवयुवकों का समाज के मूलभूत मूल्यों के साथ समाजीकरण किया जाता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस तथा मूर ने भी समाज में शिक्षा की प्रकार्यवादी भूमिका को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है।

प्रश्न 59.
शिक्षा के मार्क्सवादी दृष्टिकोण के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा व्यवस्था के मूल्यों तथा सिद्धांतों का निर्धारण समाज की वर्ग स्थापना के द्वारा किया जाता है। समाज में अभिजात वर्ग शिक्षा व्यवस्था के सिद्धांतों तथा स्वरूपों पर अपना प्राधिकार रखता है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार अभिजात वर्ग द्वारा शिक्षा के सिद्धांतों तथा संरचना का निर्धारण अपने हितों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। शिक्षा के अंतर्गत केवल उन्हीं कौशलों का विकास किया जाता है जो अभिजात वर्ग के हितों की पूर्ति करते हों।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विजातीय विवाह से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विजातीय विवाह का अर्थ-विजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह के बाहर विवाह करना पड़ता है। यद्यपि हिंदू समाज में जाति के अंदर विवाह करने का प्रावधान है, तथापि अपने गोत्र, प्रवर तथा सपिंड में विवाह करने का निषेध है। प्रत्येक समाज में सदस्यों पर कुछ विशेष व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध है।

के. डेविस के अनुसार परिवारिक व्यभिचार वर्जन इसलिए मौजूद है, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा परिवारिक संरचना का एक भाग है। जॉर्ज मूरडॉक के अनुसार, “लैंगिक प्रतियोगिता तथा ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है। माता-पिता तथा बच्चों के मध्य सहोदरों के बीच यौन ईर्ष्या का अभाव परिवार को एक सहकारी सामाजिक समूह के रूप में मजबूत करता है, इसकी समाज संबंधी सेवाओं की कुशलता में वृद्धि करता है तथा समाज को पूर्ण रूप से शक्तिशाली बनाता है।

इस प्रकार, विजातीय विवाह के अंतर्गत एक जाति के सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी ही जाति के अंतर्गत विवाह करें, लेकिन साथ-साथ अपने निकट रक्त संबंधियों, परिवार के सदस्यों, अपने गोत्र, पिंड तथा प्रवर के मध्य विवाह न करें।

विजातीय विवाह के स्वरूप-भारत में बहिर्विवाह के निम्नलिखित रूप पाए जाते हैं
(i) गोत्र विजातीय विवाह-गोत्र का संबंध प्रायः परिवार के किसी आदिकालीन पुरुष से होता है। जिन व्यक्तियों का आदि पुरुष एक होता है, भाई-बहन समझा जाता है। दूसरे शब्दों : में हम कह सकते है कि एक गोत्र के व्यक्तियों का खून समान होता है। अतः एक ही गोत्र के व्यक्तियों में विवाह निषेध समझा जाता है।

(ii) प्रवर विजातीय विवाह-प्रवर शब्द का तात्पर्य आह्वान करना है। यज्ञ के समय – पुरोहितों द्वारा चुने गए ऋषियों के नाम ही प्रवर हैं। चूँकि यजमान द्वारा पुरोहितों को यश के लिए
आमंत्रित किया जाता है, अतः यजमान तथा पुरोहितों के प्रवर एक समझे जाने के कारण उनके बीच वैवाहिक संबंध नहीं हो सकते थे।

(iii) पिंड विजातीय विवाह-हिंदू धर्म के अनुसार पिंड का तात्पर्य है सामान्य पूर्वज । जो व्यक्ति एक ही पियर को पिंड अथवा श्राद्ध अर्पित करते हैं, उन्हें परस्पर सपिंड कहा जाता है। वशिष्ट तथा गौतम के अनुसार पिता की सात पीढ़ियों तथा माता की पांच पीढ़ियों में विवाह निषेध। हिन्दू विवाह अधिनियम में पीढ़ियों के क्रमशः पाँच तथा तीन कर दिया गया है।

विजातीय विवाह के लाभ –

  • विजातीय विवाह प्राणिशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित है। इससे संतान बलवान तथा बुद्धिमान पैदा होती है।
  • समनर तथा कैलर ने विजातीय विवाह को प्रगतिवादी कहा है।
  • विजातीय विवाह के विभिन्न संस्कृतियों का संपर्क होता है।
  • विजातीय विवाह से हानियाँ –
  • विवाह का क्षेत्र अत्यधिक सीमित हो जाता है।
  • बाल विवाह तथा दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 2.
विजातीय विवाह क्यों प्रचलित है?
उत्तर:
विजातीय विवाह के अंतर्गत एक जाति के सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी ही जाति के अंतर्गत विवाह करें, लेकिन इनके साथ-साथ अपने निकट रक्त संबंधियों, परिवार के सदस्यों, अपने गोत्र, पिंड तथा प्रवर के मध्य विवाह न करें।

विजातीय विवाह के नियम प्रचलित होने के निम्नलिखित कारण हैं –

  • विजातीय विवाह प्राणिशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित माना गया है। इसके कारण संतान हृष्ट-पुष्ट होती है।
  • समनर तथा कैलर ने विजातीय विवाह को प्रगतिवादी माना है।
  • विजातीय विवाह में निकट के रक्त संबंधियों में वैवाहिक संबंधों में पर प्रतिबंध लगाया जाता है । के. डेविस के अनुसार, “पारिवारिक व्यभिचार वर्जन इसलिए मौजूद है, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा पारिवारिक संरचना का एक भाग है।”
  • जॉर्ज मूरडॉक ने इस संबंध में उचित ही कहा है, “लैंगिक प्रतियोगिता तथा ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है।
  • माता-पिता तथा बच्चों के मध्य तथा सहोदरों के बीच यौन इस प्रकार, विजातीय विवाह परिवार को एक संस्था के रूप में बनाए रखता है।
  • सभी समाजों में किसी-न-किसी रूप में विजातीय विवाह के नियमों का पालन किया जाता है।
  • हिंदू विवाह में सगोत्र, प्रवर तथा सपिंड विजातीय विवाह होते हैं।
  • विजातीय विवाह सामाजिक संबंधों में समरसता तथा स्थायीपन बनाए रखता है। इसके कारण नातेदारी संगठन में आने वाली भ्रामक स्थितियाँ समाप्त हो जाती हैं।
  • सुजन विज्ञान की दृष्टि से निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध होने से जो संतानें उत्पन्न होती हैं, वे सामान्यतः मंद बुद्धि वाली होती हैं।

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प्रश्न 3.
विवाह के नियम तथा प्रतिमान समझाइए।
उत्तर:
विवाह के नियम तथा प्रतिमान निम्नलिखित हैं –
(i) अंत: या सजातीय विवाह के नियम-अंतः विवाह के नियम के अंतर्गत एक व्यक्ति आमतौर पर अपनी प्रजाति, जाति तथा धर्म के ही विवाह कर सकता है। फोलसम के शब्दों में, “अंतः विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी ही जाति यः समूह में विवाह करना पड़ेगा हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों में विवाह की अनुमति। नहीं होती है।” भारत में जाति एक अंत:विवाही समूह है। इसका तात्पर्य है कि कोई भी पुरुष अथवा स्त्री अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता।

(ii) बहिर्विवाह या विजातीय विवाह के नियम –

  • बहिर्विवाह के नियम के अंतर्गत ऐसे विवाहों को रोका जाता है जिनमें आपस में रक्त का संबंध अथवा नजदीकी संबंध हो।
  • हिन्दू विवाह में सगोत्र तथा सपिंड विजातीय समूह होते हैं। गोत्र परिवारों का एक समूह हैं जो अपनी उत्पत्ति की समानता काल्पनिक पूर्वज से स्वीकारते हैं।

(iii) निकटाभिगमन निषेध –

  • निकटाभिगमन निषेध का तात्पर्य है कि प्राथमिक नातेदारों के बीच यौन-संबंधों पर प्रतिबंध।
  • निकटाभिगमन निषेध लगभग सभी समाजों में विजातीय विवाहों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नियम है।
  • विश्व के किसी समाज में माता-पुत्र, भाई-बहन, पिता-पुत्री के बीच संबंध नहीं पाए जाते हैं।

प्रश्न 4.
विवाह संबंधों तथा रक्त संबंधों में भेद कीजिए।
उत्तर:
विवाह संबंध तथा रक्त संबंध दोनों ही सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दोनों ही प्रकार से संबंधों में निम्नलिखित भेद हैं –
(i) वैवाहिक संबंध-परिवार का प्रारंभ विपरीत लिंगियों के वैवाहिक संबंधों से प्रारम्भ होता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो लिंग संबंध पर आधारित है तथा काफी छोटा व इतना स्थायी है कि बच्चों की उत्पत्ति और पालन-पोषण करने योग्य है।” क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता और उनकी संतानों के बीच पायी जाती है।”

जहाँ तक परिवार की संरचना का प्रश्न है परिवार में पति-पत्नी संतान के बिना भी हो सकते हैं, लेकिन परिवार संस्था के रूप में फिर भी रहता है। हालांकि, यह आंशिक परिवार कहलाएगा। इस प्रकार प्रत्येक परिवार के लिए एक जैविकीय समूह होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी पति-पत्नी बच्चों को गोद लेते हैं। ये गोद लिए बच्चे भी परिवार के सदस्य होते हैं। इस प्रकार, परिवार में केवल दांपत्य संबंध ही पाए जा सकते हैं।

(ii) रक्त संबंध-परिवार के सदस्य एक-दूसरे से प्रजनन की प्रक्रिया के माध्यम से परस्पर संबद्ध होते हैं। इस प्रकार, जैविकीय अंतर्संबंध रक्त संबंध है जिन्हें सामाजिक दृष्टिकोण से नातेदारी कहा जाता है। अतः परिवार एक नातेदारी समूह कहलाता है। प्रत्येक नातेदारी व्यवस्था में रक्त संबंध तथा निकटता के संबंध पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, पिता तथा पुत्र के संबंध रक्त पर आधारित हैं। नातेदारी संबंधों द्वारा विवाह के नियमों का निर्धारण होता है। नातेदारी संबंधों में परिवर्तन होता रहता है, हालांकि, परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है।

प्रश्न 5.
औद्योगीकरण ने नातेदारी व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर:
समाज लोगों में सामाजिक संबंधों का विकास परिवार, विवाह तथा समान वंश परंपरा के कारण होता है। वास्तव में संबंध तथा संबोधन ही नातेदारी के आधार हैं। उदाहरण के लिए पितामह, पिता, माता, भाई, बहन, चाचा ताऊ आदि संबोधन सामाजिक संबंधों की स्थापना करते हैं। रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “नातेदारी प्रथा वह व्यवस्था है जो व्यक्तियों को व्यवस्थित सामाजिक जीवन में परस्पर संहयोग करने की प्रेरणा देती है।”

चार्ल्स विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आ जाते हैं जो कि अनुमानित तथा वास्तविक, वंशावली संबंधों पर आधारित हैं।”

औद्योगीकरण का नातेदारी व्यवस्था पर प्रभाव :

  • औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण ग्रामीण जनता रोजगार की तलाश में नगरों की ओर पलायन करती है।
  • औद्योगीकरण के कारण प्राथमिक संबंध कमजोर हो जाते हैं तथा द्वितीयक संबंध महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
  • औद्योगीकरण के कारण आर्थिक संबंधों का विकास होता है जिससे सामाजिक संबंध के स्वरूप में परिवर्तन होने लगता है।
  • औद्योगीकरण के कारण नगरीकरण की प्रक्रिया में तेजी आती है। सामाजिक संबंधों तथा सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होने लगता है।
  • औद्योगीकरणं के कारण नए प्रकार के सामाजिक संबंध विकसित होने लगते हैं तथा नातेदारी व्यवस्था कमजोर हाने लगती है।
  • औद्योगीकरण के कारण सामाजिक अलगाव, मापदंडहीनता तथा व्यक्ति में केंद्रित जीवन पद्धति का विकास होने लगता है। इसके कारण संबंधों का महत्त्व बढ़ता चला जाता है।

अंततः हम कह सकते हैं कि औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण नातेदारी संबंध दिन-प्रतिदिन कम महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। द्वितीयक तथा तृतीयक संबंधों को बढ़ता हुआ विस्तार प्राथमिक – संबंधों के दायरे को सीमित कर देता है।

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प्रश्न 6.
नातेदारी के. प्रकार बत्ताइए।
उत्तर:
नातेदारी के प्रकार – नातेदारी को तकनिकी रूप से विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है । मोरंगन द्वारा नातेदारी शब्दावली को निम्नलिखित दो श्रेणियों में बाँटा गया है –

  • वर्गीकृत प्रणाली तथा
  • वर्णनात्मक प्रणाली।

1. वर्गीकृत प्रणाली – वर्गीकृत प्रणाली के अन्तर्गत विभिन्न संबंधियों को एक ही श्रेणी में शामिल किय जाता है। इनके लिए समान शब्द प्रयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए अंकल शब्द एक वर्गीकृत शब्द है जिसका इस्तेमाल मंचा, जाऊ मांथा फूका, मौमा आदि रिश्तेदारों के लिए किया जाता है। अक्ल को प्रति कक्ति, वेश्यू गया सची कपकच मामलों की श्रेणी मो इंगित करता है। इस प्रणाली में एक शब्द दो व्यक्तियों के मध्य निश्चित सबंध का का करता है।

2. वर्णनात्मक प्रणाली – उदाहरण के लिए, माता तथा पिता वर्णनात्मक शब्द है. इसी प्रकार हिंदी भाषा के चाचा, मामा, मौसा, साऊ, साला, अंजा, नंदोई, भाभी, भतीजा सादि वर्णनात्मक शब्द है, जो एक ही मातेदार को निर्दिष्ट करते हैं। निष्कर्षः किसी एक नातेदारी शब्दावली अर्थात् वर्गीकृत प्रणाली या वर्णनात्मक प्रणाली का प्रयोग विशुद्ध रूप से नहीं किया जाता है। दोनों ही प्रणालियाँ मिले-जुले रूप में प्रचलित हैं।

प्रश्न 7.
सजातीय विवाह से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति अपने समूह के अंदर ही विवाह कर सकता है। सजातीय विवाह में बाह्य के सदस्यों के साथ विवाह निषेध होता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी ही जातीय समूह में विवाह करना पड़ेगा हालांकि निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” वस्तुतः सजातीय विवाह तथा विजातीय विवाह सापेक्ष शब्द हैं। एक दृष्टिकोण से जो सजातीय विवाह है, वह दूसरे दृष्टिकोण से विजातीय विवाह है। हमारे देश में जाति एक सजातीय विवाह समूह है अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर के पुरुष अथवा स्त्री से विवाह नहीं कर सकता। जाति की तरह धार्मिक समुदाय भी सजातीय विवाह समूह होता है। इसका तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति अपने धर्म वाले पुरुष या स्त्री से ही विवाह कर सकता है।

सजातीय विवाह के कारण –

  • समूह की सजातीयता को बनाए रखना
  • समूह के संख्याबल को बनाए रखना
  • समूह की रक्त शुद्धता को बनाए रखना
  • समूह में एकता की भावमा को बनाए रखना
  • धर्म की पृथकता के कारण।

सजातीय विवाह के प्रकार –

  • विभागीय अथवा जनजातीय सजातीय विवाह – इस प्रकार के सजातीय विवाह के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपनी जनजाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • जाति सजातीय विवाह – इस प्रकार के विवाह में व्यक्ति अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • उपजाति सजातीय विवाह – इस प्रकार के सजातीय में विवाह उप-जातियों तक सीमित है। डॉ. एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, “जाति से मेरा तात्पर्य वेदों के अनुसार जातियों से नहीं है, वरन् उपजाति से है जो अंत:विवाह की वास्तविक इकाई है।”
  • प्रजाति सजातीय विवाह – सजातीय विवाह के इस प्रकार के अनुसार एक राष्ट्र के व्यक्ति ही परस्पर विवाह कर सकते हैं।

सजातीय विवाह के गुण –

  • समूह में एकता की भावना कायम रहती है
  • समूह के व्यावसायिक रहस्य कायम रहते हैं।

सजातीय विवाह के दोष –

  • राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक
  • जीवन साथी के चुनाव ‘का क्षेत्र सीमित हो जाता है
  • आधुनिक युग में इस सिद्धांत की जरूरत नहीं है।

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प्रश्न 8.
एकाकी परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(i) एकाकी परिवार का अर्थ-एकाकी परिवार व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जिसमें पति, पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे सम्मिलित होते हैं। एकाकी परिवार सबसे छोटी इकाई है। एकाकी परिवार में निम्नलिखित नातेदारी संबंध होते हैं-पति-पत्नी, पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्री, भाई-बहन, बहन-बहन तथा भाई-भाई।

(ii) पूरित एकाकी परिवार-पूरित एकाकी परिवार में एकाकी. परिवार के सदस्यों के अलावा पति की विधवा माता या विधुर पिता या उसके अविवाहित भाई तथा बहन सम्मिलित होते हैं।
प ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11969

(iii) एकाकी परिवार के उदय के कारण –

  • नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की सामाजिक व आर्थिक प्रवृत्तियों के कारण लोग नगरों में आकर बसने लगते हैं।
  • नगरों में स्थानाभाव के कारण संयुक्त परिवार साधारणतया एक साथ नहीं रह पाते हैं।
  • आधुनिक विचारों तथा सभ्यता के कारण एकाकी परिवार लगातार महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। डॉ. आर. के. मुकर्जी के अनुसार, “इस प्रकार संयुक्त परिवार एक महत्त्वपूर्ण विशेषता खो रहा है।” संयुक्त परिवार द्वारा सम्पादित किए जाने वाले अनेक कार्य अन्य
  • सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओं द्वारा किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए बीमा, पेंशन, छोटे बच्चों की देखभाल के लिए केंद्र आदि।
  • जैसे-जैसे गाँवों में कृषि कार्यों का यंत्रीकरण हो रहा है तथा कृषि में लोगों की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती जा रही है, वैसे-वैसे गाँवों में भी एकाकी परिवार की प्रवृत्ति का उदय हो रहा है।

(iv) एकाकी परिवार के गुण –

  • परिवार के सदस्यों में पारस्परिक घनिष्ठता
  • परिवार के सदस्यों में आर्थिक समायोजन
  • परिवार में सदस्यों को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा
  • व्यक्तित्व के विकास में सहायक
  • स्त्री का सम्मानपूर्ण दर्जा
  • बच्चों की अच्छी देख-भाल

(v) एकाकी परिवार के दोष –

  • बच्चों का समुचित पालन-पोषण नहीं हो पाता
  • आपत्तियों का सामना करने में कठिनाई
  • सुरक्षा की भावना का अभाव
  • वृद्धावस्था में सुरक्षा का अभाव

प्रश्न 9.
कौन-सा देश वास्तविक रूप से लोकतंत्र नहीं है और क्यों?
उत्तर:
यद्यपि समकालीन विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था एक प्रतिनिधि राजनीतिक व्यवस्था है तथापि विश्व के अनेक देशों में अभी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं पायी जाती है। विश्व के कुछ देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था क्यों नहीं पायी जाती है इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले लोकतंत्र का अर्थ समझ लेना आवश्यक है।

लोकतंत्र एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषमताओं को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। लोकतांत्रिक सरकार बहुमत के सिद्धांत पर आधारित होती है। सरकार द्वारा निर्णय पारस्परिक सहनशीलता तथा सहमति के आधार पर लिए जाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को भी अपनी पृथक् पहचान बनाए रखने की गारंटी दी जाती है।
देश जो कि वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हैं-विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जो लोकतांत्रिक होने की बात तो कहते हैं, लेकिन उनकी शासन व्यवस्था सत्तावादी है, जैसे-पाकिस्तान, अमेरिका, रूस, ईरान आदि। इन देशों में जनता की इच्छाओं तथा भावनाओं का सम्मान नहीं किया जाता है।

सत्तावादी सरकारें जनहित के बजाए स्वहित में विश्वास करती हैं। जनता को राजनीतिक अधिकार भी प्रदान नहीं किए जाते हैं। लोकतंत्र के सार्वभौम आदर्शों, जैसे–स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व का सत्तावादी सरकारों में कोई स्थान नहीं है। – सत्तावादी सरकारें मानवाधिकारों की अवहेलना भी करती हैं। इन देशों में सरकार विरोधियों का दमन किया जाता है। उदाहरण के लिए म्यांमार (बर्मा) तथा सिंगापुर इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
ज्ञात करें की व्यापक संदर्भ में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन होने से परिवार में सदस्यता, आवासीय प्रतिमान और यहाँ तक कि पारस्परिक संपर्क का सरीका परिवर्तित होता है, उदाहरण के लिए प्रवास।
उत्तर:
हमारे दैनिक जीवन में प्रायः हम परिवार को अन्य क्षेत्रों जैसे आर्थिक या राजनीतिक से भिन्न और अलग देखते हैं। फिर भी हम देखगें कि परिवार, गृह, उसकी संरचना और मानक, शेष समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। एक अच्छा उदाहरण जर्मन एकीकरण के अज्ञात परिणामों का है। सन् 1990 ई. के दशक में एकीकरण के बाद जर्मनी में विवाह प्रणाली में तेजी से गिरावट आई क्योंकि नए जर्मन राज्य ने एकीकरण से पूर्व परिवारों को प्राप्त संरक्षण और कल्याण की सभी योजनाएँ रद्द कर दी थीं।

आर्थिक असुरक्षा की बढ़ती भावना के कारण लोग विवाह से इंकार करने लगे। परिवार के निर्माण पर प्रश्न चिह्न लग गया। इसे अनजाने परिणाम के रूप में भी जाना जा सकता है। इस प्रकार बड़ी आर्थिक प्रक्रियाओं के कारण परिवार और नातेदारी परिवर्तित और रूपांतरित होते रहते हैं लेकिन परिवर्तन की दिशा सभी देशों और क्षेत्रों में हमेशा एक समान नहीं हो सकती। हालांकि इस परिवर्तन का यह अर्थ नहीं है कि पिछले नियम और संरचना पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, क्योंकि परिवर्तन और निरंतरता सहवर्ती होते हैं।

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प्रश्न 11.
आधुनिक राज्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
आधुनिक राज्य केवल नियंत्रणकारी संस्था नहीं है। आधुनिक युग में राज्य के कार्यों तथा उत्तरदायित्वों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। कल्याणकारी राज्य की कल्पना ने राज्य के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि की है। संक्षेप में आधुनिक राज्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(i) राज्य सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का मुख्य आधार-आधुनिक समय में राज्य सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का मुख्य आधार है। राज्य के द्वारा उन समस्त परिस्थितियों का निर्माण करने का प्रयत्न किया जाता है, जिनसे व्यक्तियों को आर्थिक व सामाजिक न्याय प्राप्त हो सके।

(ii) कल्याणकारी राज्य-आधुनिक राज्य कल्याणकारी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि राज्य व्यक्तियों के सर्वांगीण विकास हेतु निरंतर प्रयास करेगा। कल्याणकारी राज्य जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्तियों के कल्याण की बात करता है।

(iii) नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करना-आधुनिक राज्य द्वारा नागरिकों के समुचित तथा सर्वागीण विकास हेतु मौलिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं। हमारे देश में नागरिकों को छः मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

(iv) नियंत्रण तथा संतुलन का सिद्धांत-आधुनिक राज्य में कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक् रखा जाता है। इसके अलावा सरकार के तीनों अंगों (कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका) के संदर्भ में नियंत्रण तथा संतुलन का सिद्धांत अपनाया जाता है। सरकार के तीनों अंगों को एक-दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता आधुनिक
राज्य की विशिष्ट विशेषता है।

प्रश्न 12.
शक्ति और राज्य पर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शक्ति-व्यक्ति द्वारा सामाजिक जीवन में कुछ कार्य स्वेच्छा से किए जाते हैं तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। शक्ति वस्तुतः सत्ता अनुभवात्मक पहलू है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाए जाते हैं। वैधानिक शक्ति राजनीतिक संस्थाओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है। रास्य-जैसा कि एन्डर्सन तथा पार्कर ने कहा है कि “राज्य समाज में वह निकाय है जिसे किसी भू-प्रदेश की सीमा में दमनात्मक नियंत्रण के प्रयोग का अधिकार प्राप्त है।”

राज्य वास्तव में शक्ति का वैधानिक प्रयोग करने का अधिकार रखता है। समाजशास्त्र के शब्दकोष में फेयरचाइल्ड ने “राज्य को ऐसा निकाय, समाज का स्वरूप अथवा उसकी संस्था बतलाया है जिसे बल प्रयोग करने तथा दमनात्मक नियंत्रण प्रयुक्त करने का अधिकार है।” उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शक्ति तथा राज्य एक दूसरे से संबंधित हैं। राज्य ही वैधानिक रूप से शक्ति के प्रयोग का अधिकारी है। राज्य व्यक्ति तथा समाज के हितों की सुरक्षा हेतु शक्ति का प्रयोग करता है।

प्रश्न 13.
आधुनिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चे का सर्वांगीण विकास करना है। श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण के इस युग में शिक्षा व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि करती है तथा उन्हें समाज का उपयोगी सदस्य बनाती है। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “शिक्षा से एक एकीकृत मनुष्य का विकास करने की आशा की जाती है तथा इसके द्वारा समाज में उपयोगी कार्य करने के लिए नवयुवक तैयार किए जाते हैं जिससे वे सामूहिक जीवन में भागीदारी कर सकें।”

(i) आधुनिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्य – आधुनिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं के विश्लेषण हेतु शिक्षा के उद्देश्यों तथा प्रकार्यों का अध्ययन आवश्यक है।

(a) सुकरात, अरस्तू तथा बेकन आदि दार्शनिकों के अनुसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है। अपने व्यापक अर्थ में ज्ञान का तात्पर्य है मानसिक विकास ज्ञान के समुचित विकास से व्यक्ति उचित तथा अनुचित में अंतर कर सकता है।

(b) शिक्षा द्वारा व्यक्तियों का सांस्कृतिक विकास किया जाता है। संस्कृति द्वारा बालक की जन्मजात प्रवृत्तियों का परिमार्जन किया जाता है । संस्कृति द्वारा ही व्यक्ति पर्यावरण से समायोजन सीखता है।

(c) शिक्षा द्वारा चरित्र निर्माण किया जाता है। जॉन डीवी के अनुसार, “विद्यालयी शिक्षा तथा अनुशासन का एक व्यापक उद्देश्य नागरिकों में लोकतंत्रात्मक आदर्शों तथा मूल्यों का विकास करना है, जिससे वे आदर्श नागरिक बन सकें।

(ii) आधुनिक समाज में शिक्षा के प्रकार्य-आधुनिक समाज में शिक्षा के मुख्य प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • संतुलित सामाजिकरण
  • श्रम एवं सूचना का प्रसारण
  • व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तथा चरित्र निर्मा
  • मानव संसाधनों का समुचित विकास
  • प्रभावशाली सामाजिक नियंत्रण
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा मूल्यों का विकास
  • सांस्कृतिक आधार पर निर्माण

आधुनिक शिक्षा ज्ञान के नए आयामों तथा अवधारणाओं का अवलंबन करती हुई विशेषीकरण की ओर निरंतर अग्रसर हो रही है।

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प्रश्न 14.
धर्म पर दुर्खाइम की समाजशास्त्रीय दृष्टि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने धर्म की उत्पत्ति के सभी पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या निम्नलिखित तरीके से प्रस्तुत की
(i) दुर्खाइम का मत है कि धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों ने आदिम मनुष्य को दार्शनिक बना दिया जबकि, आदिम मानव के विचार तथा सामाजिक जीवन अत्यंत सरल थे।

(ii) दुर्खाइम का मत है कि धर्म के सभी पूर्ववर्ती सिद्धांतों में मनोवैज्ञानिक पहलू पर अधिक जोर दिया गया जबकि धर्म की भावना पूर्णरूपेण सामाजिक है।

(iii) दुर्खाइम के अनुसार सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। पवित्र वस्तुएँ विशेष तथा श्रेष्ठ समझी जाती हैं तथा उन्हें संरक्षित व पृथक् रखा जाता है जबकि साधारण वस्तुएँ निषिद्ध समझी जाती हैं तथा उन्हें पवित्र वस्तुओं से दूर रखा जाता है।

(iv) दुर्खाइम टोटमवाद को धर्म का अत्यंत आदित स्वरूप मानते हैं। दुर्खाइम का मत है कि टोटम की उत्पत्ति समूह से हुई है। दुर्खाइम पवित्र तथा अपवित्र, देवी-देवता, स्वर्ग-नरक तथा । टोटम को समूह का सामूहिक प्रतिनिधान मानते हैं। समूह जीवन से संबंधित होने के कारण टोटम को पवित्र समझा जाता है। व्यक्तियों द्वारा टोटम का सम्मान इसलिए किया जाता है क्योंकि वे सामाजिक मूल्यों का सम्मान करते हैं।

इस प्रकार, टोटम के द्वारा सामूहिक चेतना का सम्मान किया जाता है। व्यक्तियों की धर्म में निष्ठा सामूहिक एकता को अधिक मजबूत करती है। समारोह तथा अनुष्ठान लोगों को समुदाय में बंधने का काम करते हैं। दुर्खाइम ने धर्म के समाजशास्त्र में सामूहिकता पर अधिक जोर दिया है। धार्मिक अनुष्ठान तथा उत्सव व्यक्तियों के बीच सामाजिकता की भावना उत्पन्न करते हैं।

(v) अनेक समाजशास्त्रियों द्वारा दुर्खाइम के धर्म के सिद्धांत की आलोचना इसमें अंतर्निहित दार्शनिकता के आधार पर की गई है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैलिनॉस्की तथा रेडक्लिफ ब्राउन ने कहा है कि धर्म सामाजिक समरसता बनाए रखता है तथा व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 15.
धर्म की सामाजिक भूमिका के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
अथवा
“संगठित धर्म का समाज तथा व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
धर्म की सामाजिक भूमिका का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान-संगठित धर्म का व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। धर्म के द्वारा व्यक्ति की आध्यात्मिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है। धर्म के द्वारा वैचारिक स्तर पर सृजन-विनाश, जन्म तथा मृत्यु, सामाजिक तथा वैयक्तिक आदर्शों, लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्यों को व्यापक दर्शन प्रदान किया जाता है।

(ii) सामाजिकरण नियंत्रण का सशक्त साधन-प्रसिद्ध समाजशास्त्री पारसंस के अनुसार धर्म के मूल्य-प्रतिमान समाजीकरण तथा सामाजिक नियंत्रण में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं । धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही व्यक्ति वांछनीय तथा अवांछनीय क्रियाओं में अंतर करना सीखते हैं। दुर्खाइम के अनुसार सामाजिक उत्सवों, कर्मकांडों तथा संस्कारों के माध्यम से धर्म के द्वारा सामाजिक सुदृढ़ता को मजबूत बनाया जाता है।

(iii) सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना-संगठित धर्म के द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने तथा सामाजिक नियंत्रण को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। अपने व्यापक तथा व्यावहारिक संदभ्र में धर्म के द्वारा व्यक्ति और समूह के दृष्टिकोण को नियंत्रित किया जाता है। प्रथाएँ तथा परंपराएँ धर्म के नियंत्रणकारी साधन बन जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप ही सामाजिक व्यवस्था का विकास होता है।

(iv) नैतिकता को बढ़ाता है-धर्म के द्वारा समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाया जाता है। नैतिकता के माध्यम से समूह के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सकारात्मक प्रेरणा मिलती है। धर्म नैतिकता को दिशा तथा निर्देशन प्रदान करता है।

प्रश्न 16.
सामाजिक संरचना किस तरह से आधुनिक शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करती है?
उत्तर:
सामाजिक संरचना निम्नलिखित तरीके से आधुनिक शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करती है –
(i) सामाजिक संरचना के द्वारा शिक्षा के स्वरूप तथा दिशा का निर्धारण किया जाता है। शिक्षा समाज की उप-व्यवस्था है। प्रत्येक समाज की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएँ, इतिहास, मूल्य तथा परंपराएँ होती हैं, इन सबका स्वरूप समाज की विरासत कहलाता है। प्रत्येक समाज अपनी विरासत को न केवल जीवित रखना चाहता है वरन् उसका हस्तांतरण अगली पीढ़ी को भी करना चाहता है।

सामाजिक संरचना का प्रभाव शिक्षा का अवश्य पड़ता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संस्कृति के परंपरागत स्वरूप का प्रभाव आधुनिक शिक्षा पर साफ-साफ दिखाई देता है। आधुनिक शिक्षा द्वारा विद्यालयों में छात्रों को भारत के इतिहास तथा संस्कृति के ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विषयों जैसे-विज्ञान, पर्यावरण, तकनीकी ज्ञान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती है।

(ii) सामाजिक संरचना की आर्थिक आवश्यकताएँ के अनुसार शिक्षा प्रणाली का विकास होता है। प्राचीन तथा मध्यकाल में समाज में धर्म का प्रभाव अत्यधिक था अतः शिक्षा भी धार्मिक आवश्यकताओं के अनुरूप थी। आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन कर दिए अतः शिक्षा के स्वरूप का निर्धारण भी इस प्रकार किया गया है कि वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था की उत्पादन पद्धति तथा आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।

(iii) किसी देश में पायी जाने वाली राजनीतिक व्यवस्था शिक्षा की प्रकृति को निर्धारित करती है। समाज की प्रभावशाली राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव शिक्षा के उद्देश्यों तथा मूल्यों पर साफ-साफ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए एक लोकतांत्रिक समाज में शिक्षा का मौलिक’ उद्देश्य निम्नलिखित तत्त्वों से निर्धारित होता है

  • समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व
  • पंथ-निरपेक्षता
  • आदर्श नागरिकों का निर्माण
  • राष्ट्रीय एकीकरण की भावना का विकास

लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत लोकतांत्रिक मूल्यों तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाता है। शिक्षा के प्रसार से आर्थिक तथा सामाजिक असमानता भी उत्तरोत्तर कम होती चली जाती है।

(iv) सामाजिक संरचना के अनुरूप ही पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाता है। लोकतांत्रिक, साम्यवादी तथा तानाशाही राजनीतिक व्यवस्थाओं में शिक्षा के मूल उद्देश्य तथा मूल्य पृथक-पृथक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में समानता, स्वतंत्रता तथा पंथ-निरपेक्षता शिक्षा के मूल उद्देश्य वर्गविहीन तथा राज्यविहीन समाज की स्थापना है।

(v) कोई भी शिक्षा व्यवस्था सामाजिक संरचना की प्रकृति के प्रतिकूल नहीं जा सकती है। शिक्षा के माध्यम से छात्रों को सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय परंपराओं से परिचित कराया जाता है। सरकार द्वारा शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय लक्ष्यों की जानकारी दी जाती है तथा नागरिकों को इन लक्ष्यों के प्रति सचेत किया जाता है।

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प्रश्न 17.
समाज में शिक्षा की भूमिका पर प्रकार्यवादी समाजशास्त्रियों के विचारों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
प्रकार्यवादी समाजवादी समाजशास्त्रियों द्वारा समाज पर शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “समाज तब तक जीवित रह सकता है जब तक समाज के सदस्यों में पर्याप्त अंशों में समरूपता पाई जाती है। शिक्षा के द्वारा समरूपता को स्थायी बनाया जाता है तथा संवर्धित किया जाता है।”

दुर्खाइम का मत है कि जटिल औद्योगिक समाजों में शिक्षा के द्वारा उन महत्त्वपूर्ण कार्यों को किया जाता है जो परिवार या मित्र समूह नहीं कर सकते हैं। परिवार तथा मित्र समूह में व्यक्ति अपने संबंधियों अथवा मित्रों से पारस्परिक अंतःक्रिया करते हैं जबकि दूसरी तरफ, समाज में व्यक्ति को ऐसे लोगों से भी अंत:क्रिया करनी पड़ती है जो न उसका संबंधी होता है और न ही मित्र। विद्यालय में विद्यार्थी इस तरह के अपरिचितों से अंत:क्रिया करता है तथा सीखता एवं सहयोग करता है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री टालकॉट पारसन्स के अनुसार विद्यालय के द्वारा नवयुवकों का समाज के मूलभूत नियमों का सम्मान करने की शिक्षा के साथ-साथ औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप होने वाली परिस्थितियों तथा दशाओं में आए परिवर्तनों से समायोजन करना भी सिखाया जाता है।

समाज में शिक्षा की प्रकार्यवादी भूमिका को किंग्सले डेविस तथा विल्वर्ट मूर द्वारा भी महत्त्व प्रदान किया गया है। इन दोनों समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत समाज में व्यक्तियों के पदों का निर्धारण उनकी योग्यतानुसार किया जाता है। शिक्षा व्यवस्था समाज में व्यक्तियों के पदों का उनकी योग्यतानुसार निर्धारण करती है ताकि योग्य व्यक्ति महत्त्वपूर्ण पद पा सकें।

प्रश्न 18.
उदाहरणों सहित अनौपचारिक तथा औपचारिक शिक्षा के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) अनौपचारिक शिक्षा का अर् थ- अनौपचारिक शिक्षा के अंतर्गत बालक परिवार, पड़ोस तथा मित्रमंडली में भाषा, परंपरा, प्रथा, लोकगीत तथा संगीत आदि के माध्यम से सीखता है। – अनौपचारिक शिक्षा संस्थागत नहीं होती है। परिवार में ही वर्णमाला, गणित, लेखन, पठनपाठन का संप्रेषण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता रहता है। अनौपचारिक शिक्षा अनवरत जीवनपर्यंत चलती रहती है।

(ii) औपचारिक शिक्षा का अर्थ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत बालक को पूर्व नियोजित पाठ्यक्रम, उद्देश्यों तथा शिक्षा पद्धतियों के द्वारा विद्यालय में अध्यापकों द्वारा प्रदान किया जाता है। औपचारिक शिक्षा में पाठ्यक्रम को पूर्ण करने की निश्चित अवधि होती है। निश्चित अवधि में पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् विद्यार्थियों को परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् विद्यार्थियों को परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात्। विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
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प्रश्न 19.
भारत में संयुक्त परिवार की प्रणाली को बनाए रखने वाले मूल कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित मूल कारक उत्तरदायी हैं –
(i) अर्थव्यवस्था का कृषि पर आधारित होना – भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था संयुक्त परिवार प्रणाली को प्रमुख रूप से बनाए रखने में उत्तरदायी है। आज भी देश की लगभग 70 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी हुई हैं।

(ii) पितृपूजा की परंपरा – हिन्दू समुदाय में प्राचीन काल से ही पितृपूजा अथवा पूर्वजों की पूजा की परंपरा प्रचलित रही है। परिवार के सदस्य संयुक्त रूप से अपने पितरों की पूजा करते हैं।

(iii) धर्म – प्राचीन काल से ही धर्म भारतीय सामाजिक संगठन का मूल आधार रहा है। सामान्य देवी-देवताओं की अराधना तथा अनेक धार्मिक कार्यों को संयुक्त रूप से करने की परंपरा ने संयुक्त परिवार प्रणाली को सशक्त आधार प्रदान किया है।

राधा विनोद पाल के शब्दों में, “धार्मिक विधियों का प्रारंभिक रूप मृत व्यक्तियों की पूजा थी। वंशजों का यह कर्त्तव्य था कि वे उस पूजा को जारी रखें। इसलिए इससे पूर्णरूपेण न सही आंशिक रूप से परिवार के संरक्षण को सर्वत्र अत्यधिक महत्त्व मिला। परिवार के सदस्यों के पितरों के प्रति धर्मपालन के कुछ कर्त्तव्य होते थे। वे उन कर्तव्यों से पारिवारिक भूमि और यज्ञ-वेदी से जुड़े रहते थे। जैसे यज्ञ-वेदी भूमि से संयुक्त रहती थी, उसी प्रकार परिवार भूमि के साथ बंधा रहता था।”

प्रश्न 20.
शक्ति से आप क्या समझते हैं? शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक बताइए।
अथवा
शक्ति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शक्ति की परिभाषा – व्यक्ति सामाजिक जीवन में कुछ कार्यों को स्वेच्छा से करता है तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होता है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाये जाते हैं। शक्ति, सत्ता का अनुभावात्मक तथा भौतिक पहलू होता है । शक्ति के कारण ही संपूर्ण समाज तथा उसके सदस्य सत्ता के निर्णयों को बाध्यता अथवा दबाव के कारण स्वीकार करते हैं।

शक्ति के कारक – शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं –

  • सामाजिक प्रस्थिति
  • सामाजिक प्रतिष्ठा
  • सामाजिक ख्याति
  • शारीरिक भौतिक शक्ति
  • शिक्षा, ज्ञान तथा योग्यता

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प्रश्न 21.
परिवर्तन के उपकरण के रूप में शिक्षा की भूमिका क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का मुख्य उपकरण है। शैक्षिक मूल्य तथा संरचनाएँ सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में उत्प्रेरक का काम करती हैं। परिवर्तन के उपकरण के रूप में शिक्षा की भूमिका का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –

(i) सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना में परिवर्तन – शिक्षा सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचनाओं में परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। आधुनिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों के कट्टर, रूढ़िवादी तथा अवैज्ञानिक विचारों को आधुनिक, तार्किक तथा गतिशील विचारों में परिवर्तित किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारतीय समाज में परिवार तथा जाति-व्यवस्था में आने वाले परिवर्तनों का मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा का प्रसार है।

(ii) सामाजिक चेतना में वृद्धि करना – आधुनिक शिक्षा सामाजिक चेतना में वृद्धि करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। व्यक्तियों को उनके अधिकारों तथा भूमिकाओं के विषय में जानकारी शिक्षा के माध्यम से दी जा रही है। शिक्षा के द्वारा स्त्री-पुरुष की समानता को मुख्य लक्ष्य बनाया गया है। इसके परिणामस्वरूप स्त्रियों को पुरुषों के समान राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था का तो आधार ही सामाजिक तथा आर्थिक समानता है। लिंग भेद समस्या को काफी हद तक कम किया गया है। आज शिक्षित महिलाएं राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण तथा गतिशील भूमिका निभा रही हैं।

(iii) सामाजिक परिवर्तन के नए आयाम – शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के नए आयाम विकसित किए जा रहे हैं। परंपरागत भारतीय समाज में व्यवसायों का निर्धारण भी जाति के आधार पर होता था। इस प्रकार, अंतर्जातीय संबंधों प्रकृति की असमानता तथा शोषणकारी होती थी।

आधुनिक शिक्षा ने समानता तथा स्वतंत्रता को वैचारिकी का मुख्य लक्ष्य बनाया। स्वतंत्र भारत के संविधान में भी समानता, स्वतंत्रता तथा धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों की सूची में सम्मिलित करके इस बात का स्पष्ट संकेत दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को जाति, वंश, लिंग, धर्म तथा रंग आदि में भेदभाव के बिना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्रियाओं में प्रगति के समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।

(iv) शिक्षा का सार्वभौमीकरण – शिक्षा के सार्वभौमीकरण ने सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन किए हैं। साक्षरता की बढ़ती हुई दर ने सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में चेतना के नए आयाम स्थापित किए हैं। स्त्रियों में साक्षरता की बढ़ती हुई दर ने सामाजिक संरचना को गतिशील बनाया है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व के आधार एक शोषण रहित समाज की स्थापना करना है। तार्किक तथा वैज्ञानिक विचारों के प्रसार ने परंपरागत अवैज्ञानिक तथा अतार्किक शृंखलाओं को काफी हद तक कम कर दिया है। परिवर्तन के एक उपकरण के रूप में शिक्षा व्यक्तियों को उनकी अर्जित योग्यताओं के आधार पर सामाजिक स्तर प्रदान कराने में अनवरत रूप से प्रयासरत है।

प्रश्न 22.
सामाजिक संस्थाएँ परस्पर किस प्रकार व्यवहार करती हैं? विवेचना कीजिए। एक उच्च कक्षा के विद्यार्थी के रूप में स्वयं से प्रारम्भ करते हुए, दो विविध प्रकार की सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन कीजिए। क्या वे आप पर नियंत्रण रखती हैं या आप इन संस्थाओं के नियंत्रण में रहते हैं?
उत्तर:
समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक संस्थएँ हैं, जैसे-परिवार, विद्यालय, चर्च आदि ये सभी परस्पर मिलकर कार्य करती हैं। बालक सर्वप्रथम परिवार में शिक्षा ग्रहण करता है। तत्पश्चात् वह विद्यालय जाता है, जहाँ वह विधिवत् शिक्षा ग्रहण करता है। इस प्रकार परिवार व विद्यालय नामक संस्थाएँ आपस में व्यवहार करती हैं।

समाज में अनेक संस्थाएँ व्यक्ति पर नियंत्रण का भी काम करती हैं-जैसे कानून, कानून व्यक्ति की उद्देयता पर नियंत्रण करता है। हम संस्थाओं के नियंत्रण में स्वेच्छा से रहते हैं। क्योंकि सामाजिक बंधन इसके लिए प्रेरित करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक औपचारिक शिक्षा पद्धति के संगठन और पाठ्यक्रम संबंधी विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक औपचारिक शिक्षा पद्धति के संगठन तथा पाठ्यक्रम संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) औपचारिक शिक्षा का अर्थ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा अध्यापन पद्धतियों के माध्यम से समयबद्ध कार्यक्रम के आधार पर विद्यालय में शिक्षक द्वारा ज्ञान प्राप्त कराया जाता है। नियमित तथा स्वीकृत विद्यालयों में निश्चित अवधि में पाठ्यक्रम की समाप्ति के बाद परीक्षा का आयोजन किया जाता है। परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने के बाद विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

औपचारिक शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • संगठनिक संरचना
  • निश्चित तथा स्पष्ट पाठ्यक्रम
  • निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ

(ii) संगठनिक संरचना-शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं –
(a) प्रारम्भिक स्तर – प्रारम्भिक शिक्ष के निम्नलिखित दो स्तर होते हैं –

  • प्राथमिक स्तरः कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर : कक्षा 6 से 8 तक।

हमारे देश में प्रारंभिक स्तर की शिक्षा को बालक साधारणतया 14 वर्ष तक की आयु तक प्राप्त कर लेते हैं। भारत सरकार द्वारा इस स्तर की शिक्षा को नि:शुल्क तथा अनिवार्य बना दिया गया है।

(ii) माध्यमिक स्तर – माध्यमिक शिक्षा के अंतर्गत कक्षा 9 तथा 10 की शिक्षा को सम्मिलित किया जाता है। कक्षा 11 तथा 12 की शिक्षा को उच्चतर माध्यमिक स्तर अथवा इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा में सम्मिलित किया जाता है।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर – उच्चतर माध्यमिक स्तर अथवा इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा के पश्चात् विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा प्रारंभ होती है। इस स्तर पर विद्यार्थी उच्चस्तरीय तथा विशेषीकृत अध्ययन करते हैं।

(iv) निश्चित तथा स्पष्ट पाठ्यक्रम – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत शिक्षा के प्रत्येक स्तर अर्थात् प्रारंभिक स्तर, माध्यमिक स्तर तथा विश्वविद्यालय स्तर के लिए पृथक-पृथक पाठ्यक्रम विकसित किया जाता है।

माध्यमिक शिक्षा आयोग – (1952-53 ई.) ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है कि “पाठ्यक्रम का तात्पर्य विद्यालय में पढ़ाए जाने वाले पारस्परिक विषयों से नहीं है, इसके अंतर्गत उन अनुभवों को पूर्णरूपेण सम्मिलित किया जाता है जिन्हें विद्यार्थी विद्यालय की अनेक गतिविधियों के माध्यम से प्राप्त करता है। ये गतिविधियाँ विद्यालय, कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कार्यशाला, खेल का मैदान और अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के बीच अनौपचारिक संपर्क द्वारा चलती रहती है। इस प्रकार, विद्यालय का पूरा जीवन (गतिविधियाँ) ही पाठ्यक्रम बन जाता है जो कि विद्यार्थियों के जीवन को प्रत्येक बिंदु पर छू सकता है तथा एक संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है।

मुनरो के अनुसार, “पाठ्यक्रम में वे समस्त गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं जिन्हें विद्यालय द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपयोग में लाया जाता है।” लैटिन भाषा में पाठ्यक्रम का तात्पर्य है ‘रेस कोर्स’ अथवा दौड़ का मैदान। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि पाठ्यक्रम रूपी मार्ग पर दौड़कर बच्चा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करता है। पाठ्यक्रम संरचना के मुख्य आधार प्रारंभिक, माध्यमिक तथा विश्वविद्यालय स्तर पर श्रेणीबद्ध क्रम के अंतर्गत बदलते रहते हैं।

ये मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

  • दार्शनिक आधार
  • मनोवैज्ञानिक आधार
  • समाजशास्त्रीय आधार
  • वैज्ञानिक आधार

(v) निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ होती हैं। विद्यार्थियों को किसी भी पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु न्यूनतम योग्यता का निर्धारण किया जाता है। विद्यार्थियों को शिक्षा संस्थाओं के नियमों का पालन करना पड़ता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 2.
अधिकारों के प्रकारों की विवेचना कीजिए। उनका समाज में क्या अस्तित्व है ? वे आपके जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
अधिकार की परिभाषा-व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार बन जाती हैं भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परंतु उसे अधिकार ही माना जाएगा क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बेन तथा पीटर्स ने अधिकार की परिभाषा करते हुए कहा है, “अधिकारों की स्थापना एक सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहते कानून पर आधारित हो या परंपरा पर।” ऑस्टिन के अनुसार, “अधिकार एक व्यक्ति का वह सामर्थ्य है जिसमें वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता है।” लास्की के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं कर सकता।”

अधिकारों के प्रकार –
(i) नैतिक अधिकार – नैतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति की भावना पर आधारित हैं । माता-पिता का यह नैतिक अधिकार है,कि बुढ़ापे की अवस्था में उनकी संतान उनकी सहायता करे । इन अधिकारों के पीछे कोई सत्ता नहीं होती अर्थात् यदि पुत्र अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा न करे तो उसको कानून के अनुसार दंडित नहीं किया जा सकता केवल समाज उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखता।

(ii) वैधानिक अधिकार – जो अधिकार राज्य द्वारा हम पर लागू किए जाते हैं और उनका उल्लंघन करने पर व्यक्ति को कानून के अनुसार दंडित किया जाता है। ये अधिकार निम्नलिखित हैं

(a) मौलिक अधिकार-वे वैधानिक अधिकार जो संविधान द्वारा उस राज्य के नागरिकों को दिए जाते हैं, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। देश का संविधान मौलिक कानून होता है। उसमें मिलने वाले अधिकार भी मौलिक होते हैं। ये अधिकार व्यक्ति के विकास में बहुत उपयोगी होते हैं –

  • समानता का अधिकार
  • स्वतंत्रता का अधिकार
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार, सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार ये सभी अधिकार मौलिक अधिकार हैं।

(b) राजनीतिक अधिकार – चुनाव में भाग लेना, मतदान का अधिकार, उम्मीदवार बनने का अधिकार तथा सरकारी पद ग्रहण करना, सरकार की आलोचना, राजनीतिक दल बनाना आदि राजनीतिक अधिकारों के श्रेणी में आते हैं।

(c) सामाजिक या नागरिक अधिकार-जीवन का अधिकार, भाषण एवं अभिव्यक्ति का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, समुदाय बनाने का अधिकार, आवागमन का अधिकार आदि इन श्रेणी में आते हैं।

(d) आर्थिक अधिकार-काम करने का अधिकार, अवकाश का अधिकार तथा आर्थिक सुरक्षा का अधिकार आर्थिक अधिकार की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 3.
कार्य पर एक निबंध लिखिए। कार्यों की विद्यमान श्रेणी और ये किस तरह बदलती हैं, दोनों पर ध्यान केंद्रित करें?
उत्तर:
बच्चे अक्सर कल्पना करते हैं कि जब बड़े होंगे तो किस प्रकार कौन-सा कार्य करेंगे। यह कार्य वास्तव में ‘रोजगार’ होता है। यह ‘कार्य’ सरल का सर्वाधिक अर्थ है। वास्तव में, यह.एक अत्यधिक सरल विचार है। अनेक प्रकार के कार्य वेतन सहित रोजगार के विचार की पुष्टि नहीं करते। जैसे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में किए जाने वाले अधिकांश कार्य प्रत्यक्षतः किसी औपचारिक रोजगार आँकड़ों में नहीं गिने जाते हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से आशय है नियमित रोजगार के क्षेत्र से हटकर किया जाने वाला कार्य-ब्यवहार। इसमें कभी-कभी किए गए कार्य अथवा सेवा के बदले नकद भुगतान किया जाता है। लेकिन प्रायः इसमें वस्तुओं अथवा सेवाओं का आदान-प्रदान भी किया जाता है।

हम कार्य को शारीरिक और मानसिक परिश्श्रमों के द्वारा किए जाने वाले ऐसे स्वैतनिक या अवैतनिक कार्यों के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिनका उद्देश्य मानव की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करना है।

कार्य के आधुनिक रूप और श्रम विभाजन-प्राचीन समाज में अधिकतर लोग खेतों में कृषि कार्य करते थे अथवा पशुओं की देखभाल करते थे। औद्योगिक रूप से विकसित समाज में जनसंख्या का बहुत छोटा भाग कृषि कार्यों में लगा हुआ है और अब कृषि का भी औद्योगीकरण हो गया है। कृषि कार्य मानव द्वारा करने की अपेक्षा अधिकांशतः मशीनों द्वारा किया जाने लगा है। भारत जैसे देश में आज भी अधिकतर आबादी ग्रामीण और कृषि कार्यों में अथवा अन्य ग्राम आधारित व्यवसायों में संलग्न है। भारत में और भी कई प्रवृत्तियाँ हैं उदाहरण के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार। आधुनिक समाज में अर्थव्यवस्था की एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है, श्रम का जटिल विभाजन।

कार्य असंख्य विभिन्न व्यवसायों में विभक्त हो गया है जिनमें लोग विशेषज्ञ हैं। पारंपरिक समाज में गैर-कृषि कार्य को शिल्प की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। शिल्प लंबे प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जाता था और सामान्यतः श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक सभी कार्य करता था। आधुनिक समाज में भी कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा है औद्योगीकरण से पूर्व, अधिकतर कार्य घर पर किए जाते थे और कार्य पूरा करने में परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से उसमें हाथ बँटाते थे। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास, जैसे बिजली और कोयले से मशीन संचालन से घर पर भी कार्य अलग-अलग होने लगे। पूँजीपति, उद्योगपतियों के उद्योग व औद्योगिक विकास का केंद्र बिंदु बन गए।

उद्योगों में नौकरी करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित थे और इस कार्य के बदले उन्हें वेतन प्राप्त होता था। प्रबंधक कार्यों का निरीक्षण किया करता था क्योंकि उनका उद्देश्य श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाना और अनुशासन बनाए रखना था।

आधुनिक समाज की एक मुख्य विशेषता है आर्थिक अन्योन्याश्रियता का असीमित विस्तार। हम सभी अत्यधिक रूप से श्रमिकों पर निर्भर करते हैं जो हमारे जीवन को बनाए रखने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए संपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधुनिक समाजों में अधिकतर लो अपने भोजन व रहने के मकान का या अपनी उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं।

कार्य का रूपांतरण – औद्योगिक प्रक्रियाएँ उन सरंल प्रक्रियाओं में विभाजित हो गई जिनका सही समय निर्धारण, संगठन और निगरानी संभव है। थोक उत्पादन के लिए थोक बाजारों की आवश्यकता होती है। साथ ही उत्पादन की प्रक्रिया में कई नवपरिवर्तन हुए। संभवतया इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्वचलित उत्पादन की कड़ियों (मूविंग असेंबली लाइन) का निर्माण था। आधुनिक औद्योगिक उत्पादन के लिए कीमती उपकरणों और निगरानी व्यवस्थाओं के माध्यम से कर्मचारियों की निरंतर निगरानी करना आवश्यक है।

विगत कई दशकों से ‘उदार उत्पादन’ और ‘कार्य के विकेंद्रीकरण’ की ओर झुकाव हुआ ‘ है। यह तर्क दिया जाता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में व्यवसाय और देशों के मध्य प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हो रही है इसलिए व्यवसाय के लिए बदलती बाजार अवस्थाओं के अनुकूल उत्पादन को व्यवस्थित करना आवश्यक हो गया है।

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प्रश्न 4.
समाजशास्त्र धर्म का अध्ययन करता है. कैसे?
उत्तर:
धर्म काफी लंबे समय से अध्ययन और चिंतन का विषय रहा है। समाज के बारे में सामाजिक निष्कर्ष धार्मिक चिंतनों से अलग हटकर है। धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन धर्म के धार्मिक या ईश्वरमीमांसीय अध्ययन से कई तरह से भिन्न है।

धर्म समाज में वास्तव में कैसे कार्य करता है और अन्य संस्थाओं के साथ इसका क्या संबंध है, के बारे में यह आनुभाविक अध्ययन करता है।
यह तुलनात्मक पद्धति का उपयोग करता है।
यह समाज और संस्कृति के अन्य पक्षों के संबंध में धार्मिक विश्वासों, रिवाजों और संस्थाओं की जाँच करता है।

अनुभविक पद्धति का अर्थ है कि समाजशास्त्री धार्मिक प्रघटनाओं के लिए निर्णायक उपागम को नहीं अपनाना। यहाँ तुलनात्मक पद्धति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक अर्थ में सभी समाजों को एक-दूसरे के समान स्तर पर रखती है। यह बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के अध्ययन में सहायता करती है। समाजशास्त्री दृष्टिकोण का अर्थ है कि धार्मिक जीवन को केवल घरेलू जीवन, आर्थिक जीवन और राजनीतिक जीवन के साथ संबंद्ध करके ही बोधगम्य बनाया जा सकता है।

धर्म सभी ज्ञात समाजों में विद्यमान है हालांकि धार्मिक विश्वास और रिवाज एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में परिवर्तित होते रहते हैं। सभी धर्मों की समान विशेषताएँ हैं –

  • प्रतीकों का समुच्चय, श्रद्धा या सम्मान की भावनाएँ
  • कर्मकांड या अनुष्ठान
  • विश्वासकर्ताओं का एक समुदाय।

धर्म के साथ संबंद्ध कर्मकांड विविध प्रकार के होते हैं । कर्मकांडीय कार्यों में प्रार्थना करना, भजन गाना, प्रभु का गुणगान करना, विशेष प्रकार का भोजन करना या ऐसा भोजन नहीं करना समाहित होते हैं। कुछ दिनों का उपवास रखना और इसी प्रकार के अन्य कार्यों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। चूँकि कर्मकांडीय धार्मिक प्रतिकों से संबद्ध होते हैं अतः इन्हें प्रायः आदतों

और सामान्य जीवन प्रक्रियाओं से एकदम भिन्न रूप में देखा जाता है। दैवीय सम्मान में मोमबत्ती या दीया जलाने का महत्त्व सामान्यतया कमरे में रोशनी करने से एकदम भिन्न होता है । धार्मिक कर्मकांड प्रायः व्यक्तियों द्वारा अपने दैनिक जीवन में किए जाते हैं लेकिन सभी धर्मों में विश्वासाकर्ताओं द्वारा सामूहिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं । सामान्यतः ये नियमित अनुष्ठान विशेष संस्थानों-चर्चों, मस्जिदों, मंदिरों, तीर्थों में आयोजित किए जाते हैं।

विश्वभर में धर्म एक पवित्र क्षेत्र है। इस बात पर विचार करें कि विभिन्न धर्मों के सदस्य पवित्र क्षेत्र में प्रवेश करने के पूर्व क्या करते हैं। उदाहरण के लिए, सिर को ढंकते हैं या नहीं ढकते, जूते उतारते हैं या विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करते हैं आदि। इन सबमें जो बात समान है वह श्रद्धा की भावना, पवित्र स्थानों या स्थितियों की पहचान और प्रति सम्मान की भावना।

एमिल दुर्खाइम का अनुसरण करने वाले धर्म के समाजशास्त्री उस पवित्र क्षेत्र को समझने में रुचि रखते हैं जो प्रत्येक समाज में सांसारिक चीजों से भिन्न होता है। अधिकतर मामलों में पवित्रता में अलौकिकता का तत्त्व होता है। अधिकांशतः किसी वक्ष या मंदिर की पवित्रता के साथ यह विश्वास जुड़ा होता है कि इसके पीछे कोई अलौकिक शक्ति है, इसलिए यह पवित्र है। फिर भी यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आरंभ में बौद्ध और कंफ्यूशियसवाद में अलौकिकता की कोई संकल्पना नहीं थी लेकिन जिन व्यक्तियों और चीजों को वे पवित्र मानते थे उनके लिए उनमें पूर्णरूपेण श्रद्धा थी।

धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन करते हुए प्रश्न उत्पन्न होता है कि धर्म का अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ क्या संबंध है। धर्म का शक्ति और राजनीति के साथ बहुत निकट का संबंध रहा है। उदाहरण के लिए, इतिहास में समय-समय पर सामाजिक परिवर्तन के लिए धार्मिक आंदोलन हुए हैं, जैसे विभिन्न जाति-विरोधी आंदोलन अथवा लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन। धर्म किसी व्यक्ति के निजी विश्वास का मामला ही नहीं है अपितु इसका सार्वजनिक स्वरूप भी होता है और धर्म को इसी सार्वजनिक स्वरूप के कारण ही यह समाज के अन्य संस्थाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण होता है।

समाजशास्त्र शक्ति को व्यापक संदर्भ में देखता है। अतः राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र के बीच संबंध को जानना समाजशास्त्रीय हित में है। प्राचीन समाजशास्त्रियों को विश्वास था कि जैसे-जैसे समाज आधुनिक होता जाएगा धर्म का जीवन के अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव कम होता जाएगा । धर्म निरपेक्षता की अवधारण इस प्रक्रिया का वर्णन करती है। समकालीन घटनाएँ समाज के विभिन्न पक्षों में धर्म की दृढ़ भूमिका की जानकारी देती हैं।

समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920 ई.) के महत्त्वपूर्ण कार्य दर्शाते हैं कि किस तरह समाजशास्त्र सामाजिक और आर्थिक व्यवहार के न्य पक्षों के साथ धर्म के संबंधों को देखता है । वेबर का तर्क है कि कैल्विनवाद (प्रोटेस्टेंट इसाई धर्म की एक शाखा) आर्थिक संगठन की पद्धति के रूप में पूँजीवाद के उद्भव और विकास को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है। कैल्विनवादियों का मत था कि विश्व की रचना भगवान की महिमा के लिए हुई। इसका अभिप्राय है कि संसार में किया गया कोई भी कार्य उसके गौरव के लिए किया जाता है, यहाँ तक कि सांसारिक कार्य को भी पूजा कार्य बना दिया गया। हालांकि इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कैल्विनवादी भाग्य की अवधारणा में विश्वास करते थे जिसका अर्थ है कि कौन स्वर्ग में जाएगा

और कौन नर्क में, यह पूर्व से ही निश्चित था। चूँकि यह ज्ञात नहीं हो सकता था कि किसे स्वर्ग मिलेगा और किसे नर्क, लोग इस संसार में अपने कार्य में भगवान की इच्छा के संकेत देखने लगे। इस प्रकार व्यक्ति चाहे जो भी व्यवसाय करता हो यदि वह अपने व्यवसाय में दृढ़ और सफल है तो उसे भगवान की प्रसन्नता का संकेत माना जाता था। अर्जित किया गया धन सांसारिक उपभोग में लगाने के लिए नहीं था अपितु कैल्विनवाद का सिद्धांत मितव्ययता से रहने का था।

धर्म का अलग क्षेत्र के रूप में अध्ययन नहीं किया जा सकता। सामाजिक शक्तियाँ हमेशा और अनिवार्यतः धार्मिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक बहस, आर्थिक स्थितियाँ और लिंग संबंधी मानक हमेशा धार्मिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत धार्मिक मानक सामाजिक समझ को प्रभावित और कभी-कभी निर्धारित भी करते हैं। विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है। इसलिए समाजशास्त्रीय रूप से यह पूछना भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि मानव आबादी के इतने बड़े हिस्से का धर्म से क्या संबंध है। धर्म समाज का महत्त्वपूर्ण भाग है और अन्य भागों से अनिवार्यतः संबद्ध है। समाजशास्त्र या समाजशास्त्रियों का कार्य इन विभिन्न अंत:संबंधों को उजागर करना है। धार्मिक प्रतीक एवं कर्मकांड अक्सर समाज की भौतिक और कलात्मक संस्कृति से जुड़े होते हैं।

प्रश्न 5.
सामाजिक संस्था के रूप में विद्यालय पर एक निबंध लिखिए। अपनी पढ़ाई और वैयक्तिक प्रेक्षणों, दोनों का इसमें प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
विद्यालय एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। परिवार से निकलकर बच्चा विद्यालय के अपरिचित वातावरण में पहुँचता है, जहाँ वह धीरे-धीरे सामंजस्य बिठाकर शिक्षा की कई . सीढ़ियों को पार करता है। हमारे विद्यालय का नाम सर्वोदय विद्यालय है। इसका भवन पक्का है। इसमें 25 कमरे हैं। सभी कमरों में खिड़कियाँ एवं रोशनदान हैं। विद्यालय में एक बड़ा हॉल है जहाँ सामूहिक बैठकें होती हैं । सांस्कृतिक कार्यक्रम भी यहीं आयोजित होते हैं।

सभी कक्षाओं में बिजली के पंखे लगे हुए हैं। प्रत्येक कक्षा में एक अलमारी .बनी है। इसमें चॉक, डस्टर एवं उपस्थित रजिस्टर रखा जाता है। हमारे विद्यालय में बहुत अच्छे ढंग से पढ़ाई-लिखाई होती है। यहाँ लगभग 600 छात्र-छात्राएँ हैं। इनमें से लगभग आधी छात्राएँ हैं। हमारे विद्यालय में ग्यारह शिक्षक एवं सात शिक्षिकाएँ हैं। हमारी प्रधानाध्यापिका का नाम श्रीमती सुधा जैन है। सभी अध्यापक अनुशासन प्रिय एवं कार्यकुशल हैं। हमारी समाजशास्त्र की कक्षा डॉ. अमित राज लेते हैं। वे समाजशास्त्र विषय को ऐसे पढ़ाते हैं कि वह शीघ्र ही समझ में आ जाता है।

हमारा विद्यालय एक आदर्श विद्यालय है। यहाँ पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ खेल-कूद की भी अच्छी व्यवस्था है। विद्यार्थियों को समय-समय पर खेल-कूद, शारीरिक शिक्षा एवं योग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। विद्यालय में हर वर्ष मार्च महीने में वार्षिक खेल प्रतियोगिता का आयोजन होता है। बच्चे विद्यालय के मैदान में प्रतिदिन तरह-तरह के खेल खेलते हैं। हमारे खेल शिक्षक हमें नए-नए खेल खेलना सिखाते हैं।

पुस्तकालय का बड़ महत्त्व है। इसलिए हमारे विद्यालय में एक छोटा पुस्तकालय खोला गया है। यहाँ विभिन्न विषयों की पुस्तकों के अलावा कहानियों, नाटकों एवं बाल-कविताओं की पुस्तकें उपलब्ध हैं। पुस्तकालय में बैठकर विभिन्न प्रकार की पुस्तकों का अध्ययन किया जा सकता है।

हमारे विद्यालय में पेय जल एवं शौचालय का अच्छा प्रबंध है। विद्यालय में एक कैंटीन है। यहाँ शिक्षक एवं विद्यार्थी मध्यावकाश के समय जलपान करते हैं। विद्यालय के आँगन में कई सुंदर एवं हरे-भरे पड़े हैं। छोटे बच्चों के लिए यहाँ झूले हुए हैं।

हमारा विद्यालय हर दृष्टिकोण से अच्छा है। हमारे विद्यालय का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत आता है। यहाँ सभी प्रकार की सुविधाएँ हैं। इन सुविधाओं के कारण हमारा विद्यालय पूरे शहर में प्रसिद्ध है। हमारे विद्यालय में दूर-दराज के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। हमारे विद्यालय में निर्धन एवं बेसहारा बच्चों को निःशुल्क किताबें तथा वर्दी दी जाती हैं। मुझे अपने विद्यालय पर गर्व है।

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प्रश्न 6.
विवाह की परिभाषा कीजिए और इसका.सामाजिक महत्त्व बताए।
उत्तर:
विवाह मानव समाज की एक मौलिक, प्राचीन तथा अनिवार्य संस्था है। प्रत्येक समाज में विपरीत लिंगियों के मध्य यौन संबंध स्थापित करने के कुछ नियम होते हैं, इन्हीं नियमों के पुंज को विवाह संस्था कहा जाता है। विवाह के माध्यम से केवल यौन संबंधों का निर्धारण नहीं होता, वरन् पति-पत्नी के कुछ अधिकार तथा कर्त्तव्य भी निर्धारित हो जाते हैं।

विवाह की परिभाषाएँ-हैरी एम. जॉनसन के अनुसार, “विवाह एक ऐसा स्थायी संबंध है जिससे एक पुरुष तथा एक स्त्री को समुदाय की स्थिति को क्षति पहुँचाये बिना संतोनोत्पत्ति की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है।” कॉलिन्स डिक्शनरी ऑफ सोश्योलोजी के अनुसार, “विवाह एक वयस्क पुरुष तथा एक वयस्क स्त्री के मध्य सामाजिक रूप से स्वीकृत तथा कभी-कभी कानूनी रूप से वैध मिलन है।”

ई. ए. हॉबल के अनुसार, “विवाह सामाजिक नियमों का एक पुंज है जो कि विवाहित युग्म के पारस्परिक, उसके रक्त संबंधियों के, उनके बच्चों के तथा समाज के प्रति संबंधों को नियंत्रित तथा परिभाषित करता है। वेस्टर मार्क के अनुसार, “विवाह एक या अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है जो प्रथा अथवा कानून द्वारा स्वीकृत होता है जिसमें संगठन में आने वाले दोनों पक्षों तथा उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकार एवं कर्तव्यों का समावेश होता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “विवाह एक प्रजनन मूलक परिवार के स्थापना की समाज स्वीकृत विधि है।” आर. एच. लॉवी के अनुसार, “विवाह उन स्पष्ट स्वीकृत संगठनों को प्रकट करता है जो लिंग संबंधी संतुष्टि के उपरांत भी स्थिर रहता है एवं पारिवारिक जीवन की आधारशिला का निर्माण करता है।”

बील्स तथा हॉइजर के अनुसार, “विवाह प्रत्येक मानव समाज में जिससे हम परिचित हैं, एक जटिल सांस्कृतिक प्रघटना है जिसमें कि पूर्णतया प्राणिशास्त्रीय यौन संबंधों का निर्वाह होता है, किन्तु इसके अतिरिक्त बच्चों तथा गृहस्थी का पालन-पोषण तथा परिवार पर लादी गई सांस्कृतिक आवश्यकताएँ आदि सामाजिक क्रियाएँ भी होती हैं।” हार्टन तथा हंट के अनुसार, “विवाह एक स्वीकृत सामाजिक प्रणाली है, जिसके अनुसार दो या दो से अधिक व्यक्ति परिवार की स्थापना करते हैं।” मेलीनोवस्की के अनुसार, “विवाह बच्चों की उत्पत्ति तथा देखभाल हेतु समझौता है।” ई. आर. ग्रोब्ज के अनुसार, “विवाह साथी बनकर रहने की सार्वजनिक स्वीकृति तथा कानूनी पंजीकरण है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि विवाह एक सामाजिक संस्था है जो कि –

  • एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रियों के साथ लिंग संबंधों को परिभाषित करता है।
  • पति-पत्नी तथा बच्चों के अधिकारों तथा कर्तव्यों को निर्धारित करता है।

वैवाहित संस्था की उन्नति में निम्नलिखित कारण महत्त्वपूर्ण हैं –

  • यौन संतुष्टि अर्थात् जैविकीय आवश्यकता
  • संतानों का वैधानिक अर्थात् सामाजिक आवश्यकता

विवाह के प्रकार-समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विवाह के निम्नलिखित स्वरूप हैं –
(i) एक विवाह –

  • जोड़ा विवाह
  • मोनोजिनी
  • अस्थायी एक विवाह

(ii) बहु-विवाह –

  • द्विपत्नी विवाह
  • बहुपत्नी विवाह
  • असीमित
  • सशर्त

(iii) बहुपति विवाह –

  • भ्राता संबंधी
  • अभ्राता संबंधी।

(iv) रक्त संबंधी विवाह –

  • देवर अथवा भाभी विवाह
  • कनिष्ठ देवर विवाह
  • ज्येष्ठ देवर विवाह
  • अनुमानतः देवर विवाह

(v) साली विवाह –

  • सीमित
  • एक साथ

विवाह का सामाजिक महत्त्व –

  • एक सामाजिक संस्था के रूप में विवाह सामाजिक ताने-बाने को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है।
  • प्रसिद्ध समाजशास्त्री जी. पी. मुरडॉक के अनुसार विवाह नियमित यौन संबंध तथा आर्थिक सहयो का केंद्र बिंदु है।
  • विवाह के माध्यम से मनुष्य के जैविकीय संबंधों का नियमन हो जाता है।
  • विवाह के माध्यम से बच्चों के प्रजनन को वैधता प्रदान की जाती है तथा इसके द्वारा परिवार की संरचना होती है। परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है।
  • विवाह के माध्यम से समाज नियमबद्ध यौन संतुष्टि की अनुमति प्रदान करता है। इस प्रकार विवाह समाज में संगठन तथा सामाजिक नियमन की स्थायी संस्था है।

प्रश्न 7
सजातीय विवाह और विजातीय विवाह के नियमों से आपका क्या तात्पर्य है? उपयुक्त उदाहरणों के साथ अपने उत्तर को समझाइए।
उत्तर:
प्रत्येक समाज में जीवन साथी के चुनाव के बारे में कुछ प्रतिबंध लगाए जाते हैं। सजातीय विवाह तथा विजातीय विवाह इसी प्रकार के नियम हैं।
(i) सजातीय विवाह – सजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति अपने समूह के अंदर ही विवाह कर सकता है। सजातीय विवाह में बाह्य समूह के सदस्यों के साथ विवाह निषेध होता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है, जिसके अनुसार व्यक्ति को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ेगा। हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” सजातीय विवाह के अंतर्गत जीवन-साथी के चुनाव पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं

  • सामान्यतः एक व्यक्ति अपनी जाति, धर्म तथा प्रजाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • हमारे देश में जाति एक अंत:विवाह समूह है, अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के। बाहर के पुरुष या स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता है।
  • जाति की तरह धार्मिक समुदाय भी सजातीय विवाह होता है, अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के बाहर के पुरुष या स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता।
  • सजातीय विवाह द्वारा दो रेखाओं के बीच विवाह करने की अनुमति प्रदान की जाती है।
  • सजातीय विवाह के द्वारा ऐसी सीमाओं का निर्धारण किया जाता है जिनके द्वारा व्यक्ति को किसी समूह विशेष से बाहर तथा किसी समूह के अंदर विवाह करना पड़ता है।

सजातीय विवाह के निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट करते हैं कि व्यक्ति के विवाह करने की सीमाएँ क्या हैं –

  • विभागीय तथा जनजातीय सजातीय विवाह-इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपने विभाग तथा जनजाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • वर्ग सजातीय विवाह-प्रत्येक व्यक्ति का विवाह उसके वर्ग अथवा श्रेणी के अंतर्गत ही होना चाहिए।
  • जाति-सजातीय विवाह-इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • उपजाति सजातीय विवाह-हमारे देश में विवाह की सीमा उप-जाति तक सीमित हो जाती है।
  • प्रजाति सजातीय विवाह-प्रजाति सजातीय विवाह के अंतर्गत अपनी प्रजाति के अंतर्गत ही विवाह किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय सजातीय विवाह-इस प्रकार के सजातीय विवाह के अंतर्गत एक राष्ट्र के व्यक्ति परस्पर विवाह कर सकते हैं।

(ii) विजातीय विवाह – विजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह से बाहर ही विवाह करना पड़ता है। विजातीय विवाह के नियम निम्नलिखित हैं
(a) अनेक ऐसे नातेदार तथा समूह होते हैं, जिनके साथ व्यक्ति को वैवाहिक संबंध कायम करने की अनुमति नहीं दी जाती है।

(b) प्रत्येक समुदाय अपने सदस्यों पर कुछ व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध कायम करने पर प्रतिबंध लगाता है।

(c) निकट के नातेदारों से वैवाहिक संबंध नहीं कायम किए जा सकते हैं। डेविस के अनुसार पारिवारिक व्यभिचार-वर्जन इसलिए विद्यमान हैं, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा पारिवारिक संरचना का एक भाग है। इनके अभाव में परिवार की संरचना तथा प्रकार्यात्मक कुशलता समाप्त हो जाएगी।

(d) नजदीकी संबंधों में विवाह की अनुमति देने पर संपूर्ण सामाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। यही कारण है कि प्रत्येक समाज में पारिवारिक व्यभिचार पर वर्जनाएँ लगायी जाती हैं। उदाहरण के लिए भाई-बहन, पिता-पुत्री, माता-पुत्र के बीच वैवाहिक संबंधों पर प्रत्येक समाज में प्रतिबंध लगाए जाते हैं। ज़ार्ज मुरडॉक के अनुसार, “लैंगिक प्रतियोगिता एवं ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है। माता-पिता तथा सहोदरों के बीच यौन ईर्ष्या का अभाव परिवार को एक सहकारी सामाजिक समूह के रूप में मजबूत करता है, इसकी समाज संबंधी सेवाओं की कुशलता में वृद्धि करता है तथा समाज को पूर्णरूप से शक्तिशाली बनाता है।”

(iii) विजातीय विवाह के निम्नलिखित प्रकार भारत में प्रचलित हैं –
(a) गोत्र विजातीय विवाह – हिंदुओं में ऐसा विश्वास किया जाता है कि एक ही गोत्र के व्यक्तियों में एक सा खून पाया जाता है, अतः उनके बीच सजातीय विवाह प्रतिबंधित हैं।

(b) प्रवर विजातीय विवाह – प्रवर शब्द का तात्पर्य हाह्वान करना है। यज्ञ के समय पुरोहितों द्वारा चुने गए ऋषियों का नाम ही प्रवर है। चूँकि यजमान द्वारा पुराहितों को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया जाता था; अतः यजमान तथा पुराहितों के प्रवर एक समझे जाने के कारण उनके बीच वैवाहित संबंध नहीं हो सकते।

(c) पिंड विजातीय विवाह – हिन्दू धर्म के अनुसार पिंड का तात्पर्य है सामान्य पूर्वज। जो व्यक्ति एक ही पितर को पिंड अथवा श्राद्ध अर्पित करते हैं. परस्पर सपिंड कहा जाता है। वशिष्ठ तथा गौतम के अनुसार पिडा को संत पौडियों तथा माता की. पाँच पीड़ियों में विवाह निषेध है। हिंदू विवाह अधिनिया में इन पीढ़ियों में विवाह को क्रमशः पाच तथा बैन कर दिया गया है। सवसीय विवाह तथा विजातीय विवाह सापेक्ष याद हैं। इसका हात्पर्य है कि बोका विवाह एक प्रम में अपनाने की सिक्योकि जान माह के कर दिया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण नियम है।

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प्रश्न 8.
परिवार को परिभाषित-जिए। परिवार की मूलभूत विशेषताएँ बंबा हैं?
उत्तर:
परिवार-परिकार शब्द अंग्रेजी भाषा के फैली. शब्द का रूपांतर हैं, जिसकी उत्पत्रि लैटिन भाषा के पुलस’ शब्द से हुई है। इसका अर्थ है नौकर रोमन काननू में मुलस’ शब्द । स्वामियों, दासों, नौकरों व अन्य संबंधित व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता था।

कार्य असंख्य विभिन्न व्यवसायों में विभक्त हो गया है जिनमें लोग विशेषज्ञ हैं। पारंपरिक समाज में गैर-कृषि कार्य को शिल्प की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। शिल्प लंबे प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जाता था और सामान्यतः श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक सभी कार्य करता था। आधुनिक समाज में भी कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा है औद्योगीकरण से पूर्व, अधिकतर कार्य घर पर किए जाते थे और कार्य पूरा करने में परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से उसमें हाथ बँटाते थे। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास, जैसे बिजली और कोयले से मशीन संचालन से घर पर भी कार्य अलग-अलग होने लगे। पूँजीपति, उद्योगपतियों के उद्योग व औद्योगिक विकास का केंद्र बिंदु बन गए।

उद्योगों में नौकरी करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित थे और इस कार्य के बदले उन्हें वेतन प्राप्त होता था। प्रबंधक कार्यों का निरीक्षण किया करता था क्योंकि उनका उद्देश्य श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाना और अनुशासन बनाए रखना था।

आधुनिक समाज की एक मुख्य विशेषता है आर्थिक अन्योन्याश्रियता का असीमित विस्तार। हम सभी अत्यधिक रूप से श्रमिकों पर निर्भर करते हैं जो हमारे जीवन को बनाए रखने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए संपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधुनिक समाजों में अधिकतर लो अपने भोजन व रहने के मकान का या अपनी उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
परिवार के सामाजिक कार्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:एक
संस्था तथा समिति के रूप में समाज के रूप में समाज में परिवार काप केंद्रीय स्थान है। परिवार समाज का सूक्ष्म स्वरूप है। सामाजिक संगठन की इकाई के रूप में परिवार का अत्यधिक महत्त्व है। आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “किसी भी संस्कृति में परिवार के महत्त्व का मूल्यांकन करने के लिए यह मालूम करना जरूरी है कि उसके क्या कार्य हैं तथा किस सीमा तक उन्हें पूर्ण किया जा सकता है।” एक संस्था तथा समिति के रूप में परिवार के विविध कार्य हैं।

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “किसी भी संस्था के विविध कार्य होते हैं। संभवतः सभी संस्थाओं में परिवार अत्यंत विविध कार्यों वाली संस्था है।” डेविस ने अपनी पुस्तक ह्यूमन सोसायटी तथा डब्लू जे. मूर ने अपनी पुस्तक फैमली में परिवार के निम्नलिखित सामाजिक कार्य बताए हैं

(i) प्रजनन कार्य – समाज का अस्तित्व व्यक्तियों से होता है। परिवार में कुछ विशेष व्यक्तियों के बीच यौन संबंध स्थापित करके वह कार्य पूरा किया जाता है। इस प्रकार परिवार व्यक्तियों की यौन आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ समाज को स्थायित्व भी प्रदान करता है।

(ii) परिवार के सदस्यों की देखभाल करना – नवजात शिशुओं का समुचित पालन-पोषण परिवार में ही होता है। गर्भवती स्त्री की देखभाल तथा बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य
परिवार में ही किया जाता है।

प्रश्न 10.
परिवार की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
परिवार व्यक्तियों की केवल सामूहिकता नहीं है। परिवार में व्यक्ति जैविकीय, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से परस्पर अंतर्संबंधित होते हैं । परिवार की मूलभूम विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) सार्वभौमिकता-एक सामाजिक संगठन के रूप में परिवार सार्वभौमिक है। एकं संस्था के रूप में परिवार प्रत्येक समाज में पाया जाता है।

(ii) सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध-परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध पाए जाते हैं। भावनात्मक संबंध त्याग, वात्सल्य तथा पारस्परिक प्रेम पर आधारित होते हैं। भावनात्मक संबंध रूपी सेतु परिवार के सदस्यों को परस्पर अंतर्संबंधित रखता है।

(iii) सीमित आकार-परिवार का आकार सीमित होता है। वर्तमान समय में परिवार में साधारणतया पिता, पत्नी तथा उनकी वैध संतानें सम्मिलित किए जाते हैं। नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रियाओं ने भी परिवार के आकार को सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, भारत में पाए जाने वाले नगरीय परिवारों को एकाकी परिवार नहीं कहा जा सकता है। डॉ. एम. एन. श्रीवास्तव का मत है कि भारत में संयुक्त परिवार टूट नहीं रहे हैं वरन् उनके स्वरूप में परिवर्तन आ रहा है।

(iv) समाज की मूल इकाई के रूप में-परिवार सामाजिक संगठन की मूल इकाई है। परिवार के अंतर्गत ही सामाजिक मूल्यों, आदर्शों तथा प्रतिमानों का विकास होता है। परिवार में . प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं। इस प्रकार, सामाजिक संरचना में परिवार की केंद्रीय स्थिति होती है।

(v) संस्कारों की प्राथमिक पाठशाला-व्यक्ति परिवार में ही सामाजिक तथा सांस्कृतिक संस्कार सीखते हैं। संस्कारों का यह क्रम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनवरत रूप से चलता रहता है। संस्कारों का प्रभाव व्यक्तियों पर अमिट रहता है।

(vi) सदस्यों का पारस्परिक उत्तरदायित्व – एक प्राथमि पूह के रूप में परिवार के सदस्यों के बीच घनिष्ठ तथा आमने-सामने के अनौपचारिक पाए जाते हैं।

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प्रश्न 11.
परिवार के विभिन्न स्वरूपों की विशेषताएँ बताइए
उत्तर:
एक सार्वभौमिक संस्था के रूप में परिवार मानव समाज को मौलिक इकाई है लेकिन विश्व के सभी समाजों में इसका स्वरूप एकसमान नहीं। सामाजिक परिस्थिति तथा सांस्कृतिक भिन्नता के कारण परिवार के अनेक स्वरूप पाए जाते हैं।

वर्तमान समय में परिवार के दो प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं –

  • एकाकी परिवार तथा
  • संयुक्त परिवार

परिवार के अन्य स्वरूप इसके अतिरिक्त, परिवार के निम्नलिखित स्वरूप भी अनेक समाजों तथा जनतातीय समाजों में पाए जाते हैं –

  • विस्तृत परिवार
  • मातृवंशीय तथा मातृस्थानीय परिवार
  • पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय परिवार
  • बहुपत्नी परिवार
  • बहुपति परिवार

(i) एकाकी परिवार-एकाकी परिवार वास्तव में परिवार का सबसे छोटा स्वरूप है। इसमें पति-पत्नी तथा उनके वैध एवं अविवाहित बच्चे होते हैं । एकाकी परिवार में निम्नलिखित नातेदारी संबंध पाए जाते हैं –

  • पति-पत्नी
  • पिता-पुत्र
  • पिता-पुत्री
  • माता-पुत्र
  • माता-पुत्री
  • भाई-भाई
  • भाई-बहन

पूरित एकाकी परिवार भी पाए जाते हैं। इन परिवारों में पति की विधवा माता या विधुर पिता या उसके छोटे अविवाहित भाई-बहन होते हैं।

(ii) संयुक्त परिवार – संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। अति प्राचीन काल से ही संयुक्त परिवारों का अस्तित्व भारतीय समाज में रहा है। डॉ. इरावती कर्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों के समूह है जो सामान्यतः एक भवन में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के स्वामी होते हैं, जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं और जो किसी न किसी प्रकार एक-दूसरे के रक्त संबंधी हैं।”

आई. पी. देसाई के अनुसार, “हम ऐसे परिवार को संयुक्त परिवार कहते हैं, जिसमें पीढ़ी की गहराई की अपेक्षा अधिक लंबाई पायी जाती है और जिसके सदस्य परस्पर संपत्ति, आय तथा पारस्परिक अधिकारों व दायित्वों के आधार पर संबंधित होते हैं।” यद्यपि औद्योगीकरण, नगरीकरण, कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ह्रास, पश्चिम के प्रभाव तथा नवीन सामाजिक विधानों ने संयुक्त परिवार को काफी क्षीण कर दिया है तथापि एक परिवर्तित रूप में उनका अस्तित्व भारतीय समाज में आज भी विद्यमान है।

डॉ. एम. एन. श्रीनिवास का मत है कि भारत में संयुक्त परिवार विघटित नहीं हो रहे हैं अपितु उनके स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है। डॉ. के. एम. कपाड़िया के अनुसार, “अभी तक संयुक्त परिवार ने काफी कष्टमय समय को पार किया है फिर भी उसका भविष्य खराब नहीं है।”

परिवार के अन्य स्वरूप –
(i) विस्तृत परिवार-विस्तृत परिवार के अन्तर्गत एकाकी नातेदारों के अतिरिक्त दूर के रक्त संबंधी भी हो सकते हैं, उदाहरण के लिए सास-ससुर तथा दामाद का. एक साथ रहना। इस प्रकार एकांकी या संयुक्त परिवार के सदस्यों के अलावा कोई अन्य नातेदार परिवार का हिस्सा बनता है तो उसे संयुक्त परिवार कहते हैं।

(ii) मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार-मातृवंशीय परिवार के अंतर्गत पति अपनी पत्नी के साथ पत्नी की माँ अर्थात् अपनी सास के घर में रहता है। मातृवंशीय परिवार में वंशावली माँ के पक्ष में पायी
जाती है तथा परिवार में निर्णय करने की सत्ता भी माँ के पास ही होती है। माँ ही परिवार की मुखिया होती है। हालांकि, इस प्रकार के परिवार अधिक प्रचलन में नहीं हैं। दक्षिण भारत के नायर परिवार तथा मेघालय की खासी जनजाति के लोग ‘मातृसत्तात्मक परिवारों में निवास करते हैं।

(iii) पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार-विश्व के. लगभग सभी समाजों में पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय परिवार पाए जाते हैं। इन परिवारों में वंशावली पिता के पक्ष में पायी जाती है। इन परिवारों में विवाह के बाद पत्नी पति के घर रहती है। परिवार का मुखिया पिता होता है तथा परिवार की सत्ता उसी के पास होती है।

(iv) बहुपत्नी परिवार-बहुपत्नी परिवार में एक व्यक्ति एक समय में एक से अधिक पत्नियाँ . रखता है। इस प्रकार के परिवार अनेक जनजातियों में पाए जाते हैं।

(v) बहुपति परिवार-बहुपति परिवार के अंतर्गत एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं। इन परिवार की संरचना भ्रातृत्व बहुपति विवाह से होती हैं। भारत में इस प्रकार के परिवार खासी तथा टोडा जनजातियों में पाए जाते हैं।

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प्रश्न 12.
नातेदारी में आप क्या समझते हैं? सामाजिक जीवन में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं कि परिवार घनिष्ठ संबंधियों से बना एक संस्था है। परिवार के सदस्यों के बीच परस्पर रक्त अथवा वैवाहिक संबंध पाए जाते हैं। इन बंधनों द्वारा संबद्ध व्यक्तियों को हो नातेदार कहा जाता है लेकिन नावेदारी संबंधों का क्षेत्र परिवार तक ही सीमितन होकरें व्यापक है। वैवाहिक संखों के जरिए एक परिवार के सदस्य दूसरे परिवार के सदस्यों उपरोक्त विवेचन को पर महम कह सकते कि गावर पाक्ति है, हो सका।

बाने नोटर मुरडाक के अनुसार, “यहा (मात्र सम की एक वना है। बिसमें व्यक्ति एक-दूसरे से इंटिलं आंतरिक तथा शाखाकृत अपनी द्वारा संबंध होते हैं। डक्लिफ बाउन के अनुसार, “जावेदारी प्रथा वह व्यवस्था है जो व्यक्तियों को

व्यवस्थित सामाजिक जीवन में परस्पर सहयोग करने की प्रेरणा देती है।
वास्तव में, रैडक्लिफ ब्राउन नातेदारी व्यवस्था को सामाजिक संरचना के एक अंग के रूप स्वीकार करते हैं।
चार्ल्स विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आ जाते हैं जो कि अनुमानित तथा वास्तविक, वंशावली संबंधों पर आधारित हैं।

नातेदारी संबंधों के बदलते आयाम –

  • नातेदारी संबंध जनजातीय समाजों तथा ग्रामीण समुदायों में काफी प्रबल तथा विस्तृत होते हैं।
  • औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा प्रौद्योगिक विकास के कारण नातेदारी संबंधों की प्रगाढ़ता में कमी आयी है।
  • प्राथमिक समूहों के स्थान पर द्वितीयक समूहों के बढ़ते महत्त्व के कारण भी नातेदारी संबंध न केवल शिथिल हुए हैं, वरन् उनका परिवार भी कम हुआ है।

नातेदारी के प्रकार –

  • वैवाहिक नातेदारी तथा
  • रक्त संबंधी नातेदारी।

1. वैवाहिक नातेदारी – वैवाहिक नातेदारी संबंधों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति किसी स्त्री से विवाह करता है तो उसका संबंध न केवल उस स्त्री से स्थापित हो जाता है वरन् स्त्री के परिवार के अन्य सदस्यों से भी उसका संबंध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार विवाह के पश्चात् कोई व्यक्ति न केवल पति बनता है, अपितु वह बहनोई तथा दामाद भी बन जाता है। इसी प्रकार कोई स्त्री विवाह के पश्चात् न केवल पत्नी बनती अपितु पुत्रवधू, चाची, भाभी, जेठानी, देवरानी तथा मामी आदि बन जाती है।

2. रक्त संबंधी नातेदारी – रक्त संबंधी नातेदारी के अंतर्गत रक्त अथवा सामूहिक वंशावली से जुड़े व्यक्ति आते हैं। वैवाहिक नातेदारी में संबंधों का आधार विवाह होता है जबकि रक्त संबंधी नातेदारी में संबंध रक्त के आधार पर होते हैं । उदाहरण के लिए, माता-पिता व उनके बच्चों तथा सहादारों के बीच रक्त संबंध पाए जाते हैं। रक्त संबंध वास्तविक तथा काल्पनिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, गोद लिए हुए बच्चे की पहचान वास्तविक पुत्र की भाँति होती है।

नातेदारी के विभिन्न आधार-हैरी एम. जॉनसन के द्वारा नातेदारी के निम्नलिखित आधार बनाए गए हैं –

  • लिंग-बहन तथा भाई शब्द रक्त संबंधियों के लिंग को बताते हैं।
  • पीढ़ी-पिता तथा पुत्र के द्वारा जहाँ एक तरफ दो पीढ़ियों की ओर संकेत करते हैं, दूसरी तरफ वे रक्त संबंधी भी हैं।
  • निकटता-दामाद तथा फूफा से निकटता के आधार पर संबंध होते हैं, लेकिन ये संबंध रक्त पर आधारित नहीं होते हैं।
  • विभाजन-सभी नातेदारी संबंधे को साधारणतया दो शाखाओं में बाँटा जाता है उदाहरण के लिए पितामह तथा नाना, भतीजी आदि ।
  • पहली शाखा का संबंध पिता के जन्म वाले परिवार से होता है तथा दूसरी शाखा का संबंध माता के जन्म लेने वाले परिवार से होता है।
  • श्रृंखला सूत्र-उपरोक्त वर्णित विभाजन का संबंध संबंधियों की निकटता के साथ है। इन संबंध की श्रृंखला का आधार निकटता अथवा रक्त संबंध है।

नातेदारी का सामाजिक जीवन में महत्त्व –

  • सामाजिक संरचना में नातेदारी संबंधों का विशेष महत्त्व है। यह परिवारिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
  • परिवार में व्यक्तियों की प्रस्थितियों के अनुसार निश्चित अधिकार तथा उत्तरदायित्व होते हैं।
  • नातेदार एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए होते हैं तथा एक-दूसरे की सहायता अन्य संस्थाओं या व्यक्तियों की अपेक्षा अत्यधिक तत्परता से करते हैं।

प्रश्न 13.
नातेदारी संबंधों की विभिन्न श्रेणियों की.सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निकटता अथवा दूरी के आधार पर नातेदारों में विभिन्न श्रेणियाँ पायी जाती हैं। एक व्यक्ति के नातेदारों में कुछ अत्यधिक निकट, कुछ निकट तथा कुछ अपेक्षाकृत कम निकट होते हैं। इसी प्रकार कुछ नातेदारों से दूर तथा कुछ से बहुत दूर के संबंध होते हैं । निकटता अथवा दूरी के आधार पर नातेदारों को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता है

(i) प्राथमिक नातेदारी-एक ही परिवार से संबंधित व्यक्तियों को प्राथमिक नातेदार कहा जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक एकाकी परिवार में आठ प्राथमिक नातेदार हो सकते हैं। डॉ. दुबे ने भी इसी मत का समर्थन किया है। ये आठ नातेदार निम्नलिखित हो सकते हैं –

  • पति-पत्नी
  • पिता-पुत्र
  • माता-पुत्री
  • पिता-पुत्री
  • माता-पुत्र
  • छोटे-बड़े भाई
  • छोटी-बड़ी बहनें
  • भाई-बहन

(ii) द्वितीयक नातेदारी – एक व्यक्ति के प्राथमिक नातेदारों में से प्रत्येक नातेदार के प्राथमिक नातेदार के अथवा संबंधी होते हैं। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि वे प्राथमिक संबंधी न होकर हमारे प्राथमिक संबंधियों के संबंधी होते हैं। इसी प्रकार, वे हमारे द्वितीयक संबंधी कहलाते हैं। उदाहरण के लिए चाचा (पिता या भाई) तथा बहनोई (बहन का पति), द्वितीयक अथवा गौण संबंधी हैं। ठीक इसी प्रकार, पिता-पुत्र का प्राथमिक संबंधी है जबकि चाचा अर्थात् पिता का भाई पिता का प्राथमिक संबंधी है। इस प्रकार चाचा अर्थात् पिता का भाई द्वितीयक संबंधी कहलाता है। ठीक इसी प्रकार बहन भाई की प्राथमिक संबंधी है, लेकिन बहनोई भाई का द्वितीयक संबंधी है।

(iii) तृतीयक नातेदारी – तृतीयक नातेदार प्राथमिक संबंधी के द्वितीयक संबंधी तथा द्वितीयक संबंधी के प्राथमिक संबंधी होते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हमारे प्राथमिक नातेदार के द्वितीयक अथवा गौण नातेदार हमारे तृतीयक नातेदार कहलाएंगे। उदाहरण के लिए, साले की पत्नी जिसे ‘सलाहज’ कहते हैं, तृतीयक नातेदार हैं, क्योंकि साला मेंरा द्वितीयक नातेदार है। एक अन्य उदाहरण के द्वारा भी तृतीयक नातेदारी को स्पष्ट किया जा सकता है-किसी व्यक्ति के भाई के भाई का साला उसका तृतीयक नातेदार होगा, क्योंकि भाई मेरा प्राथमिक नातेदार है तथा उसका साला मेरे भाई का द्वितीयक नातेदार है।

वे समस्त संबंधी जो तृतीयक नातेदारों से भी दूर होते हैं, उन्हें मुरडाक ने दूरस्थ नातेदार का नाम दिया है। मुरडाक ने किसी व्यक्ति के द्वितीयक नातेदारों की संख्या 33 तथा तृतीयक नातेदारों की संख्या 151 बताई है। व्यावहारिक तौर पर तृतीयक श्रेणी के नातेदारों के बीच आमतौर पर सामाजिक अंत:क्रिया पायी जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक श्रेणी के

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प्रश्न 14.
धर्म को परिभाषित कीजिए। धर्म की आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
धर्म एक सावभौमिक तथा मूलभूत सामाजिक प्रघटना है। प्रत्येक समाज में धर्म अवश्य विद्यमान रहा है। धर्म मंदव के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण आयाम है। एक संस्था के रूप में धर्म सामाजिक संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म एक अद्भत तथा अलौकिक शक्ति है।

धर्म की परिभाषाएँ –

  • ई. बी. टायलर के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास है।
  • होबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है, जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।
  • एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की वह समग्र व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संयुक्त करती है।”
  • आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “धर्म अतिमानवीय शक्तियों के प्रति अभिवृत्तियाँ हैं।”
  • फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मैं मनुष्य ने श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना समझता हूँ जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वे प्रकृति तथा मानव जीवन को मार्ग दिखलाती हैं और नियंत्रित करती हैं।”
  • सपीर के अनुसार, “धर्म जीवन की परेशानियों तथा उनके खतरों से परे अध्यात्मिक शांति के मार्ग की खोज करने में मनुष्य का सतत् प्रयास है।”
  • मैलिनावस्की के अनुसार, “धर्म क्रिया का एक तरीका है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म एक समाजशास्त्री प्रघटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।

धर्म की आधारभूत विशेषताएँ – धर्म की आधाभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास है।
  • धर्म से संबंधित वस्तुएँ, प्राणी तथा स्थान पवित्र माने जाते हैं एवं उनके प्रति सम्मान तथा भय-मिश्रित व्यवहार किया जाता है।
  • जो भौतिक वस्तुएँ धार्मिक व्यवहारों में पायी जाती हैं, वे प्रत्येक संस्कृति में पृथक्-पृथक् हो सकती हैं।
  • प्रत्येक धर्म में विशिष्ट अनुष्ठान जैसे-क्रीड़ा, नृत्य, गायन, उपवास तथा विशिष्ट भोजन आदि सम्मिलित होते हैं।
  • आमतौर पर धार्मिक अनुष्ठान एकांत में किए जाते हैं, लेकिन कभी-कभी इनका आयोजन सामूहिक रूप से भी किया जाता है। “
  • प्रत्येक धर्म में एक विशिष्ट पूजा पद्धति पायी जाती है।
  • प्रत्येक धर्म में स्वर्ग-नरक तथा पवित्र-अववित्र की अवधारणा पायी जाती है।
  • धर्म अवलोकण से परे तथा विज्ञानोपरि है।
  • धर्म का आधार विश्वास तथा आस्था है, तर्क से इसका संबंध नहीं है।
  • धर्म अनुभवोपरि है।

प्रश्न 15.
धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांतों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्रीय तथा मानवशास्त्रियों के अनुसार आधुनिक संगठित धर्मों के विकास का प्रमुख कारण आदिम मानव का भय तथा असुरक्षा की भावना, कर्मकांड तथा उपासना पद्धति आदि हैं। धर्म का उत्पत्ति सिद्धांत आमतौर पर उद्विकासीय है। इन सिद्धांतों के द्वारा समाज में धर्म और संस्था के विकास के क्रमिक स्तरों का वर्णन किया जाता है। टायलर तथा स्पेंसर का मत है कि धर्म की उत्पत्ति आदिम मनुष्य के जीवन में आत्मा की अवधारणा के कारण हुई। धर्म की उत्पत्ति के विषय में प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचार निम्नलिखित हैं :

(i) आत्मवाद का सिद्धांत-ई. बी. टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमिटिव कल्चर में धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत का उल्लेख किया है। आत्मवाद के सिद्धांत के अनुसार आदिम मनुष्य के मस्तिष्क में आत्मा के अस्तित्व का विचार मृत्यु तथा जन्म से संबंधित उसकी कल्पना से आया। टायलर का मत है कि आदिम मनुष्य का यकीन था कि मनुष्य शरीर में आत्मा का है जो निद्रार की हालत में बाहर चली जाती है। आदिम मनुष्य के अनुसार जब आत्मा शरीर में वापस लौटकर नहीं आती है तो उसे मृत्यु की स्थिति कहते हैं। यही कारण था कि आदिम मनुष्य अपने निकट संबंधियों के मृत शरीरें का इस उम्मीद में रखता था कि मुमकिन है कि उसकी आत्मा वापस लौटकर आ जाए।

आदिम मनुष्य के मन में मृत्यु की वास्तविकता तथा स्वप्न की प्रघटना से इस विचार की उत्पत्ति हुई कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का देहांतरण होता है। आदिम मनुष्य का यह भी विश्वास था कि यदि उसके पूर्वजों की आत्मा असंतुष्ट तथा दु:खी है तो वह भी दुःखी रहेगा। यही कारण है कि आदिम मनुष्य द्वारा पूर्वजों की आत्मा की संतुष्टि हेतु अनेक कमकांडों तथा अनुष्ठानों की उत्पत्ति हुई। इस संबंध में डॉ. मजूमदार तथा मदान ने कहा है कि “आदिमवासियों का संपूर्ण धार्मिक जीवन एक निश्चित, अज्ञेय, अवैयक्तिक, अलौकिक शक्ति में विश्वास से उत्पन्न हुआ है, जो सभी सजीव तथा निर्जीव वस्तुओं में रहती है जो विश्व में विद्यमान है।”

(ii) प्रकृतिवाद का सिद्धांत – फ्रेजर ने अपनी पुस्तक में धर्म की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया है। फ्रेजर का मत है कि आदिम मनुष्य सदैव प्रकृति से संघर्ष करता रहा। इस संघर्ष में कभी आदिम मनुष्य सफल हो जाता था तो कभी असफल। प्रकृति को नियंत्रित करने के लिए आदिम मनुष्य ने अनेक मंत्रों तथा विधियों का विकास किया। फ्रेजर इन्हें जादू कहते हैं। फ्रेजर का मत है कि जादू, धर्म से पहले का स्तर है।

आदिम मनुष्य ने पहले जादू के द्वारा प्रकृति की शक्तियों पर नियंत्रण का प्रयास किया, लेकिन इस प्रयास में असफलता के बाद उसने अलौकिक शक्ति की सत्ता को पहचाना। फ्रेजर के अनुसार, “जादू प्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक क्रम को प्रभावित करता है तथा विज्ञान के इस मौलिक विश्वींस में भाग लेता है कि यह क्रम पूर्ण तथा स्थिर है किन्तु धर्म एक भिन्न कल्पित वस्तु पर आधारित है अर्थात् मानव से उच्च शक्ति का अस्तित्व जिस पर ऐसा विश्वास किया जाता है कि वह मानव जीवन तथा प्रकृति की घटनाओं को निर्देशित तथा नियंत्रित करती है।

विश्वास का यह स्तर जो जादू में विश्वास के परे है, उस समय आता है जब मनुष्य जादू के व्यवहारों की असारता को महसूस करता है तथा इसके मुकाबले उन शक्तियों का सहारा लेता है जो यह विश्वास करता है, कारण तथा कार्य के साधारण क्रम को अपने आदेश के माध्यम से परिवर्तित कर सकता है।” फ्रेजर के सिद्धांत को जादू से धर्म की संक्रांति भी कहा जाता है। उसने मानव विचारधारा की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ बतायी हैं –

  • जादुई अवस्था
  • धार्मिक अवस्था
  • वैज्ञानिक अवस्था

फ्रेजर के अनुसार प्रकृति से संघर्ष करते समय पराजित होने की स्थिति में आदिम मनुष्य प्रकृति को प्रसन्न करने के लिए उसकी (प्रकृति की) पूजा करता था। इस प्रकार, आदिम मनुष्य द्वारा प्रकृति की पूजा से ही धर्म की उत्पत्ति हुई। पिडिंगटन के अनुसार, “आदिम कालीन धर्म का स्रोत वह (जेम्स फ्रेजर) उचित परिणामों को प्रभावित करने के लिए जादू की असफलता में पाता है। वह विश्वास करता है कि जादू, संपर्क के सिद्धांतों का अनुचित प्रयोग है, जो उचित रूप से प्रयोग में लोने पर विज्ञान की ओर ले जाता है।”

(ii) धर्म का समाजशास्त्रीय सिद्धांत – प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने अपनी पुस्तक में धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की हैं। दुर्खाइम का मत है कि सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। सभी समाजों में पवित्र वस्तुओं को श्रेष्ठ समझा जाता है तथा उन्हें संरक्षित किया जाता है जबकि साधारण वस्तुओं को निषिद्ध किया जाता है।

दुर्खाइम ‘टोटमवाद’ को धर्म का आदिम स्वरूप मानते हैं। दुर्खाइम के अनुसार टोटम तथा सभी धार्मिक विचारों की उत्पत्ति सामाजिक समूह से हुई है। इस प्रकार, देवी-देवता, उचित-अनुचित तथा स्वर्ग-नरक टोटम समूह के सामूहिक प्रतिनिधान हैं। सामूहिक जीवन का प्रतीक होने के कारण टोटम को पवित्र समझा जाता है। व्यक्तियों द्वारा टोटम का सम्मान किया जाता है, क्योंकि वे सामाजिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। इस प्रकार, टोटम सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। समारोह तथा अनुष्ठान समुदाय के लोगों को एक साथ बाँधने का काम करते हैं। धर्म में व्यक्तियों की आस्था समूह एकता को सुदृढ़ करती है।

दुर्खाइम का मत है जन्म, मृत्यु तथा विवाह आदि के समय अनेक नयी सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है। सामूहिक समारोह तथा अनुष्ठान प्रभावित व्यक्तियों को नई परिस्थितियों से समायोजन करने में सहयोगी होते हैं। अनेक विद्वानों ने दुर्खाइम के सिद्धांत में अंतर्निहित दार्शनिकता के कारण इसकी आलोचना भी की है।

प्रश्न 16.
आधुनिक समाज में धर्म का क्या स्वरूप है?
उत्तर:
आधुनिक समाज में धर्म के स्वरूप को समझने से पहले आवश्यक है कि धर्म के अर्थ तथा इसकी मूलभूत विशेषताओं पर प्रकार डाला जाए। हॉबल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है, जिसके अंतर्गत आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित होते हैं।” दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की वह व्यवस्था है, जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संयुक्त करती है।”

मेकाइवर के अनुसार, “धर्म, जैसा कि हम समझते आये हैं, से केवल मनुष्य के बीच का संबंध ही नहीं, एक उच्चतर शक्ति के प्रति मनुष्य का संबंध भी सूचित होता है।” मैलिनोवस्की के अनुसार, “धर्म, क्रिया का एक तरीका है, साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था है तथा समाजशास्त्रीय प्रघटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।”

  • धर्म अलौकिक शक्ति अथवा समाजोपरि उच्चतर शक्ति में विश्वास है।
  • धर्म से संबंधित प्राणी, वस्तुओं तथा स्थान को पवित्र माना जाता है तथा उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
  • धर्म से संबंधित विश्वास उद्वेगपूर्ण तथा भावात्मक होते हैं।

आधुनिक समय में औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा लौकिकीकरण, वैज्ञानिक विचारों तथा तर्कपूर्ण चिंतन के कारण धर्म के स्वरूप में कुछ परिवर्तन आए हैं –

  • परंपरागत समाजों में धर्म जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता था। आधुनिक समाजों में धर्म का प्रभाव क्षेत्र कुछ सीमित हुआ है।
  • परंपरागत समाज में धार्मिक आस्था तथा विश्वास अत्यधिक सुदृढ़ होते थे तथा विभिन्न अनुष्ठानों का पालन संपूर्ण धार्मिक पद्धतियों के द्वारा किया जाता था।
  • आधुनिक समाजों में धार्मिक विश्वास तथा आस्था का सम्मान होना आवश्यक नहीं है। धर्म में विश्वास रखते हुए भी कुछ व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठानों का संपादन अनवार्य नहीं समझते हैं।
  • प्राचीन काल तथा मध्यकाल में धर्म तथा राज्य आमतौर पर अविभाज्य थे। आधुनिक राज्य आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष हैं। धर्म तथा. राज्य की गतिविधियों के क्षेत्र अलग-अलग हैं।

आधुनिक समय में धर्म में निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ तेजी से विकसित हो रही है –

  • धर्म रूढ़ियों, परंपराओं तथा अनुष्ठानों आदि का महत्त्व कम हो रहा है।
  • धर्म में मानवतावाद की प्रवृत्ति का उदय हो रहा है।
  • धर्म में लौकिकीकरण तथा तर्कबाद की प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं।
  • धार्मिक क्रियाओं, पद्धतियों तथा अनुष्ठानों का संक्षिप्तीकरण हो रहा है।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि नवीन धार्मिक मान्यताओं, विचारधाराओं तथा प्रवृत्तियों ने धर्म के प्रभाव को कुछ सीमित किया है लेकिन वैज्ञानिक खोजों के कारण मानवजाति के संपूर्ण विनाश के भय ने तथा आते-भौतिकवादी प्रवृत्तियों के नकारात्मक परिणामों ने व्यक्तियों का रुझान आध्यात्मिक शांति तथा धर्म की ओर पुनः आकर्षित किया है। धार्मिक असहिष्णुता, संकीर्णता तथा धार्मिक कट्टरता ने राष्ट्रीय स्तर पर तनाव भी उत्पन्न किया है।

प्रश्न 17.
धर्म और संस्कृति के संबंधों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि धर्म संस्कृति का अभिन्न अंग है तथापि यह संस्कृति के अधिकांश तत्त्वों को प्रभावित करने की स्वायत्त शक्ति रखता है। यह व्यक्तियों की संपूर्ण जीवन पद्धति को प्रभावित करता है। धर्म के अंतर्गत अभौतिक तथा भौतिक दोनों ही सांस्कृतिक तत्त्व सम्मिलित होते हैं। धर्म के अभौतिक पक्षों में रहस्मयी सर्वोच्च शक्ति, आत्मा का देहांतरण तथा पवित्र और उपवित्र की धारण सम्मिलित होती है। धर्म के भौतिक पक्ष में धार्मिक क्रियाएँ तथा अनुष्ठान सम्मिलित होते हैं।

हॉबल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है।” टालयर ने संस्कृति की व्यापक परिभाषा देते हुए लिखा है कि “संस्कृति वह संश्लिष्ट अभियोजना है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा सभी तरह की क्षमताएं तथा आदतें जो . व्यक्ति समाज के एक सदस्य के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

धर्म का संस्कृति पर प्रभाव – धर्म संस्कृति के अनेक तत्त्वों को प्रभावित करता है । सभी धर्मों में आस्था, अलौकिक शक्ति में विश्वास, ईश्वर की पूजा तथा पवित्र व अपवित्र जैसे सामान्य तत्त्व पाए जाते हैं।

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प्रश्न 18.
धर्म के अकार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म के सकारात्मक पहलू के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी हैं। धर्म रूढ़िवादी प्रवृत्ति के कारण प्रगति की धारा में अवरोध उत्पन्न करता है। धर्म के लिए निम्नलिखित अकार्य किए जाते हैं –
(i) धर्म परंपरागत सामाजिक रूढ़ियों को मान्यता देता है, जिससे प्रगतिवादी विचारों का विकास नहीं हो पाता है।

(ii) धर्म मनुष्य को भाग्यवादी बना देता है। व्यक्ति संसार को मिथ्या समझने लगता है। भाग्यवादी होने के कारण व्यक्ति परिश्रम नहीं करते हैं। यही कारण है कि प्रसिद्ध साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने धर्म को जनता की अफीम कहा है।

(iii) भाग्यवादिता के कारण व्यक्ति कार्य तथा कारण में संबंधस स्थापित नहीं कर पाते हैं। ब्लैकमार तथा गिलिन के अनुसार, “धर्म की कट्टरता तथा हठधर्मिता ने बार-बार सत्य की में बाधा पहुंचाई है तथा जिज्ञासु व्यक्तियों को तथ्यों के अन्वेषण करने से रोका है। इसने विज्ञान की प्रगति को अवरुद्ध किया। विद्वानों तथा स्वतंत्र खोज में धर्म ने हस्तक्षेप किया तथा आम जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का दमन किया।

(iv) धर्म तर्क तथा विज्ञान का विरोध करता है। हैरी एल्मर बार्स के अनुसार, “जबकि रूढ़िवादी धर्म एवं आधुनिक विज्ञान के मध्य परस्पर विरोधी संघर्ष है…..।” यही कारण है कि म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11999 कोपरनिकस तथा गैलीलियो को अपनी खोजों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। गैलीलियों को धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध अपनी बात कहने के कारण फाँसी दी गई। धार्मिक मान्यताओं के चलते डार्विन तथा हक्सले की खोजों को मिथ्या सिद्ध करने का प्रसार किया गया।

(v) धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता, हठधर्मिता तथा अलगाव के कारण समाज में विघटनकारी शक्तियों के ताने-बाने ने अत्यधिक हानि पहुँचाई है। धार्मिक उन्माद मनुष्य को तर्कशून्य बना देता है।

प्रश्न 19.
शिक्षा की परिभाषा दीजिए। शिक्षा के सांगठनिक स्वरूप का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनुष्य को जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार, शिक्षा के माध्यम से पुरानी पीढ़ी द्वारा अपने ज्ञान को नयी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है । प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम का मत है कि “शिक्षा का ऐसा प्रभाव है जिसका उपयोग पुरानी पीढ़ी उस पीढ़ी पर करती है जो अभी वयस्क जीवन के लिए तैयार नहीं है।” शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में उन शारीरिक बौद्धिक तथ नैतिक दशाओं को विकसित एवं जागृत करना है जिसकी अपेक्षा उससे संपूर्ण समाज तथा तात्कालिक सामाजिक पर्यावरण द्वारा की जाती है

शिक्षा की परिभाषा –
पैस्टालॉली के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरस तथा प्रगतिशील विकास है।” एस. एस. मैकेंजी के अनुसार, “अपने व्यापक अर्थ में, यह (शिक्षा) एक प्रक्रिया है जो जीवन-पर्यंत चलती रहती है तथा जीवन के प्रत्येक अनुभव से वृद्धि होती है।” बोगार्डस के अनुसार, “सांस्कृतिक विरासत तथा जीवन के अर्थ को ग्रहण करना ही शिक्षा है।” महात्मा गाँधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन तथा आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है।”

स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही विद्यमान संपूर्णता का प्रकटीकरण है।” अमेरिका के सेकेंड्री स्कूल पुनर्गठन आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार, “शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान, रुचियों, आदर्शों, आदतों तथा शक्तियों का विकास करना है जिससे उसे अपना स्थान मिलेगा तथा वह उस स्थान का प्रयोग स्वयं तथा समाज को बनाने में श्रेष्ठ उद्देश्य हेतु करेगा।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शिक्षा द्वारा बालक की जन्मजात शक्तियों का पूर्ण विकास किया जाता है। शिक्षा द्वारा बालक को वास्तविक जीवन के लिए तैयार किया जाता है . शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तिव का सर्वांगीण विकास करना है।

शिक्षा के मुख्य उद्देश्य –

  • ज्ञान
  • सांस्कृतिक विकास
  • चरित्र निर्माण
  • शारीरिव विकास
  • आत्म-अभिव्यक्ति
  • अवकाश का सदुपयोग।

शिक्षा का सांगठनिक स्वरूप – शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं तथा प्रत्येक स्तर का / एक सांगठनिक ढांचा है –
(i) प्रारंभिक स्तर-प्रारंभिक स्तर के निम्नलिखित दो स्तर है –

  • प्राथमिक स्तर-कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर-कक्षा 6 से 8 तक।

(ii) माध्यमिक स्तर-माध्यमिक स्तर के निम्नलिखित दो स्तर हैं –

  • माध्यमिक स्तर-कक्षा 9 से 10 तक।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर-कक्षा 11 से 12 तक।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर – इसके अंतर्गत विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 20.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 ई. की प्रमुख विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर:
1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्ष के राष्ट्रीय मूल्यों तथा आदर्शों का उल्लेख किया गया है। इस नीति के अंतर्गत समस्त देश के लिए एक समान शैक्षिक ढाँचे को स्वीकृत किया गया है तथा ज्यादातर राज्यों में 10+2+3 शिक्षा प्रणाली अपनाई गई है। 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निम्नलिखित उद्देश्यों पर विशेष बल दिया गया है:

(i) एक गतिशील तथा सुसंगठित राष्ट्र के निर्माण हेतु शिक्षा के माध्यम से भारतीयों में ज्ञान, उद्देश्य की भावना और विश्वास का प्रसार करना।

(ii) शिक्षा का नियोजन इस प्रकार करना है कि वह सामाजिक तथा राजनीतिक विकास, गतिविधियों में वृद्धि, कल्याणकारी गतिविधियाँ, लोकतांत्रिक व्यवस्था, बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा सौंदर्यगत विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

(iii) देश में राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति पर बल दिया गया जिसका तात्पर्य था कि एक निश्चित स्तर तक सभी विद्यार्थियों को चाहे किसी भी जाति, वंश, स्थिति या लिंग के हों, गुणात्मक शिक्षा प्राप्त हो।

(iv) राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड को प्रस्तावित किया गया जिसमें इस आवश्यकता पर बल दिया गया कि एक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम –

  • दो बड़े कमरे हों तथा जो प्रत्येक मौसम में प्रयोग में लाए जा सकें।
  • आवश्यक खिलौने तथा खेल का समान हों।
  • श्यामपट्ट हों।
  • मानचित्र, चार्ट तथा अन्य अध्ययन का समान हो।

(v) राष्ट्रीय नीति में समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया। स्त्रियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षाणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा भारतीय समाज के अल्पसंख्यकों से शैक्षणिक अवसरों की समानता का वायदा किया गया।

(vi) नीति में शिक्षा प्रणाली को इस प्रकार पुनर्गठित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया जिससे संविधान में वर्णित भारतीय जनता की आकांक्षाओं के अनुसार एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सके जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय तथा अवसरों की समानता पर आधारित हो।

(vii) शिक्षा के माध्यम से वैज्ञानिक, नैतिक तथा विवेकपूर्ण सामाजिक मूल्यों में वृद्धि पर बल दिया गया।

(viii) नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास, मूल्यबोध, राष्ट्रीय एकीकरण, सांप्रदायिक तथा जातिगत विभाजन के खतरों तथा भारत की मिली-जुली संस्कृति से परिचित कराना।

(ix) व्यावसायिक शिक्षा का प्रबंध करना जिससे विद्यार्थी हाथ से काम करने के महत्त्व को समझ सके।

(x) छात्रों में अतीत तथा वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में जागरुकता उत्पन्न करना जिससे कि उनमें अपनी क्षमताओं के प्रति विश्वास हो, राष्ट्र की उपलब्धियों के प्रति गौरव की अनूभूति हो। 1992 ई. से 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा की समीक्षा की गई तथा कहा गया कि इस नीति के पुनर्गठन की आवश्यकता नहीं है। 1992 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में “ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड” को उच्च प्राथमिक स्तर तक बढ़ाने की योजना बनाई गई तथा प्रत्येक विद्यालय में कम-से-कम तीन कमरों का प्रावधान किया गया।

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प्रश्न 21.
शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
विभिन्न दार्शनिकों, समाज-सुधारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के विभिन्न उद्देश्य बताए हैं। प्रसित्र समाजशास्त्री गिलीन तथा गिलीन ने शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं –

  • भाषा लिखने, बोलने एवं व्याकरण तथा गणित का ज्ञान देना।
  • जटिल संस्कृति को समझने हेतु ज्ञान देना।
  • बच्चे में सामाजिक अनुकूलन की क्षमता पैदा करना।
  • आर्थिक अनुकूलन की ट्रेनिंग देना।
  • सांस्कृतिक सुधार एवं वृद्धि में सहायता प्रदान करना।

पं. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “शिक्षा द्वारा मानव का एकीकृत विकास किया जाता है तथा नवयुवकों को समाज के लिए तैयार किया जाता है तथा नवयुवकों को समाज के लिए उपयोगी कार्य करने तथा सामूहिक जीवन में भाग लेने के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन जब समाज में दिन-प्रतिदिन परिवर्तन हो रहे हों, यह जानना काफी कठिन है कि नवयुवकों को किस प्रकार तैरूार किया जाए तथा क्या लक्ष्य हों।”

प्रत्येक समाज के अपने मूल्य, आदर्श, संस्कृति, परंपराएं, विरासत तथा विचारधाराएँ होती हैं तथा शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण भी इन्हीं के अनुसार होता है। शिक्षा के कुछ उद्देश्य तो सार्वभौम होते हैं तथा कुछ उद्देश्य स्थानीय आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों के अनुसार होते हैं।

शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
(i) ज्ञान प्रदान करना-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है इसका तात्पर्य है बालक का मानसिक विकास करना। अपने व्यापक अर्थ में ज्ञान प्रदान करने का तार्य है कि मानसिक शक्तियों जैसे चिंतन, तर्क निर्णय आदि का समुचित तथा संतुलित विकास करना। वस्तुतः ज्ञान मानसिक विकास के लिए होता है न कि ज्ञान-ज्ञान के लिए।

(ii) सांस्कृतिक विकास-कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि शिक्षा का उद्देश्य सांस्कृतिक विकास करना अर्थात् व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाना है। महात्मा गाँधी के अनुसार, “संस्कृत प्रारंभिक वस्तु का आधार है। यह आपके व्यवहार के छोटे-से-छोटे हिस्से में परिलक्षित होनी चाहिए।”

(iii) चरित्र निर्माण-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण है। चरित्र का तात्पर्य है कि व्यक्ति में आंतरिक स्थायित्व तथा शक्ति का समुचित विकास हो। व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों का समुचित सामाजिकरण ही शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा के विभिन्न नैतिक गुणों जैसे प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, बलिदान तथा सामाजिक सेवा आदि का सशक्त माध्यम है।

(iv) सर्वांगीण विकास-शिक्षा का उद्देश्य बालक का मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक विकास करना है। महात्मा गाँधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन तथा आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है।”

(v) सामाजिक अनुकूलन की क्षमता विकसित करना-शिक्षा के माध्यम से बालक सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करना सीखता है। लैंडिस के अनुसार, “चूँकि शिक्षा आरंभ से ही कार्य करना प्रारंभ कर देती है तथा यह अभिवृत्तियों व मूल्यों को अत्यधिक प्रभावित करती है, अतः यह सामाजिक नियंत्रण के अन्य प्रकारों की तुलना में अधिक सफल होती है।”

(vi) आत्म-अभिव्यक्ति-आत्म-अभिव्यक्ति का तात्पर्य है कि बालक का विकास स्वतंत्र रूप से उसकी रुचियों, प्रवृत्तियों तथा क्षमताओं के अनुरूप होना चाहिए। आत्म-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सामाजिक नियंत्रण के मापदंडों के दायरे में होनी चाहिए।

(vii) आत्म अनुभूति-शिक्षा का उद्देश्य बालक में ऐसी भावनाओं का विकास करना है जिससे वह उच्च नैतिक गुणों तथा आध्यात्मिक विचारों को प्राप्त कर सके। आत्म-अनुभूति का तात्पर्य है कि प्रकृति तथा मनुष्य को समझना एवं उनके मध्य अंतर्संबंध स्थापित करना। एक प्रजातांत्रिक देश में शिक्षा के उद्देश्य-कोठारी आयोग के द्वारा शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए गए हैं –

  • उत्पादकता में वृद्धि करन
  • सामाजिक तथा राष्ट्रीय एकता का विकास करना
  • लोकतंत्र को सुदृढीकरण करना
  • राष्ट्र का आधुनिकीकरण करना
  • सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास

प्रश्न 22.
क्या शिक्षा का निजीकरण होना चाहिए? अपने विचार दीजिए।
उत्तर:
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु विकासोन्मुखी शिक्षा नीति अपरिहार्य है। शिक्षा का सार्वभौम उद्देश्य व्यक्तित्व तथा चरित्र का संतुलित विकास करना है जिससे सामाजिक विकास की धारा निर्वाध रूप से चलती रहे।

विकासशील देशों के सामने दो चुनौतियाँ प्रमुख हैं –

  • साक्षरता में वृद्धि करना
  • सर्वशिक्षा अभियान

सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु से सभी बच्चों को सन् 2010 ई. तक प्रारंभिक शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद में 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट कहा गया है कि –
(i) एक निश्चित स्तर तक सभी विद्यार्थियों को चाहे वे किसी भी जाति, वंश, स्थिति और लिंग के हों, गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए।

(ii) समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए। स्त्रियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा भारतीय समाज के असंख्यकों से शैक्षिक अवसरों की समानता का वायदा किया गया।

शिक्षा के उद्देश्यों के संदर्भ में हमारा मूल प्रश्न यह है कि शिक्षा के निजीकरण द्वारा इन उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है अथवा नहीं –

(i) शिक्षा के निजीकरण के अंतर्गत शिक्षण संस्थाओं का प्रबंधन तथा प्रशासन निजी संस्थाओं अथवा व्यक्तिगत उद्यमियों के नियंत्रण में होगा।

(ii) विचारणीय प्रश्न यह है कि निजीकरण के माध्यम से शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है ?

(iii) समाज के कमजोर वर्गों, स्त्रियों, अनुसूचित जाति, ग्राम्य समुदायों, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की शिक्षा हेतु प्रयास की दिशा क्या होगी जबकि शिक्षा बाजार के लाभ-हानि के सिद्धांत पर संचालित की जाएगी।

(iv) भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक असमानता है निजीकरण से यह असमानता और बढ़ेगी। अनेक समाज-सुधारक तथा शिक्षाशास्त्री वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर अभिजात्य होने का आरोप लगाते हैं। यदि ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा का निजीकरण कर दिया गया तो शिक्षा संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बन जाएगी।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हमारे देश की परिस्थितियों में शिक्षा के निजीकरण का परिणाम होगा –

  • शिक्षा के सार्वभौमिकरण की प्रक्रिया में बाधा आएगी।
  • कमजोर, वर्गों, जनजातीय तथा सुदूर पहाड़ी इलाकों तथा ग्राम्य समुदायों में शिक्षा का प्रसार अवरुद्ध हो जाएगा।
  • शिक्षा संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी।
  • देश के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विकास में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा।
  • राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न होगी।

अंततः हम कह सकते हैं कि हमारे देश में शिक्षा का पूर्ण निजीकरण शिक्षा की प्रक्रिया को जनसाधारण से दूर कर देगा। भारत एक कल्याणकारी राज्य है, अतः सरकार का पुनीत कर्त्तव्य है शिक्षा के माध्यम से ज्ञान रूपी प्रकाश जन-जन तक पहुँचाए ।

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प्रश्न 23.
समाज में धर्म के संगठन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सभी धर्मों में कोई-न-कोई संगठनात्मक स्वरूप अवश्य पाया जाता है। धार्मिक संगठनों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है
(i) सदस्यता की प्रकृति –

  • अनिवार्य तथा
  • ऐच्छिक

(ii) धार्मिक समूहों का अन्य धार्मिक समूहों के प्रति दृष्टिकोण-एक धार्मिक समूह का दृष्टिकोण दूसरे धार्मिक समूह के प्रति दो प्रकार का हो सकता है –

  • उदार तथा
  • अनुदार

(iii) धर्मांतरण –

  • धर्मोतरण की आज्ञा तथा
  • धर्मांतरण का न होना।

(iv) धार्मिक समूह के संगठन की प्रकृति –

  • नमनीय तथा
  • अनमनीय

(v) पुरोहितों की भूमिक –

  • साधारण सदस्यों के हितों के लिए पुरोहितों की आवश्यकता।
  • साधारण सदस्यों के हितों के लिए पुराहितों की आवश्यकता न होना।

धार्मिक समूहों में संगठन की दृष्टि से रोमन कैथोलिक चर्च सबसे अधिक संगठित धार्मिक समूह है –

  • संपूर्ण विश्व के रोमन कैथोलिक चर्च का प्रधान पोप है, जो वेटिकन सिटी (रोम) में रहता है।
  • रोमन कैथोलिक चर्च में विश्व स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक पदसोपानक्रम पाया जाता है।
  • इसमें नौकरशाही जैसी संरचना पायी जाती है।

ईसाई धर्म में दो प्रमुख पंथ हैं –

  • कैथोलिक तथा
  • प्रोटेस्टेंट

पंथ की सदस्यता ऐच्छिक होती है तथा ये साधारणतया स्वयंसेवी समूह के रूप में कार्य करते हैं। पंथ पारस्परिक भाईचारी, समान उद्देश्य तथा समानता की भावना पर आधारित होते हैं। अन्य धार्मिक समूहों के प्रति असहिष्णुता के बावजूद पंथों का आंतरिक संगठन आमतौर पर लोकतांत्रिक होता है।

(ii) धार्मिक संप्रदाय – धार्मिक संप्रदाय अवयव कल्ट का निर्माण किसी विशिष्ट व्यक्ति की विचारधारा तथा चिंतन के परिणामस्वरूप होता है। समान विचार रखने वाले व्यक्तियों द्वारा इसका अनुसरण किया जाता है। कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए किसी अन्य धर्म में आस्था रख सकता है। पंथ की तुलना में संप्रदाय का आकार छोटा है तथा इसका जीवन भी कम होता है। वर्तमान समय में भारत में साईं बाबा तथा जयगुरुदेव आदि धार्मिक संप्रदाय हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समुदाय को परिभाषित करनेवाला आवश्यक कारक है …………………..
(अ) सामान्य प्रथाएँ
(ब) सामान्य भाषा
(स) सामान्य धर्म
(द) सामान्य मात्रा
उत्तर:
(द) सामान्य मात्रा

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन समिति का उदाहरण नहीं है?
(अ) कॉलेज का छात्रावास
(ब) केन्द्रीय लोक सेवा आयोग
(स) गुप्त मतदान प्रणाली।
(द) भारतीय क्रिकेट टीम
उत्तर:
(ब) केन्द्रीय लोक सेवा आयोग

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 3.
संघ के सदस्यों के बीच संबंध होते हैं ……………………..
(अ) बाहरी और स्थायी
(ब) भतरी और अस्थायी
(स) अन्तः संबंध एवं अस्थायी
(द) अन्तः संबंध तथा स्थायी
उत्तर:
(स) अन्तः संबंध एवं अस्थायी

प्रश्न 4.
खर्चे और बचत की आदतें बनती है …………………….
(अ) सांस्कृतिक रूप से
(ब) लघु अस्थायी अन्त:क्रिया से
(स) दार्शनिक रूप से
(द) मनोवैज्ञानिक रूप से
उत्तर:
(स) दार्शनिक रूप से

प्रश्न 5.
सामाजिक संस्था ‘नैसर्गिक’ है तो वह है …………………….
(अ) वर्ग
(ब) परिवार
(स) राजनैतिक दल
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) राजनैतिक दल

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र में संस्था के रूप में परिभाषित है?
(अ) समुदाय
(ब) विवाह
(स) समाज
(द) व्यक्ति
उत्तर:
(स) समाज

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प्रश्न 7.
भारत में अल्पायु समूह में लड़कियों का मृत्युदर लड़कों से ज्यादा है …………………..
(अ) ज्यादा
(ब) कम है
(स) निश्चित अनुपात में है
(द) अनिश्चित अनुपात में है
उत्तर:
(स) समाज

प्रश्न 8.
किस परिवार शास्त्री का मानना है? परिवार पति, पत्नी का बच्चों सहित अथवा बिना बच्चों का एक संघ है ………………….
(अ) मेकाइवर
(ब) एण्डरसन
(स) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(द) किंग्सले
उत्तर:
(अ) मेकाइवर

प्रश्न 9.
ऐसा परिवार जो स्त्री अथवा माता के विकास स्थान पर बसता है उसे क्या कहते हैं?
(अ) मातृ स्थानीय
(ब) मातृवंशीय
(स) मातृसत्तात्मक
(द) पितृस्थानीय
उत्तर:
(अ) मातृ स्थानीय

प्रश्न 10.
विवाह के रूप में होते हैं …………………..
(अ) दो
(ब) तीन
(स) पाँच
(द) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(अ) दो

प्रश्न 11.
समाजशास्त्री एम. एम. साह का कथन है कि स्वतंत्रता के बाद संयुक्त परिवार में …………………
(अ) निरंतर कमी हुई है
(ब) रूक-रूक वृद्धि हुई है
(स) रूक-रूक कर कमी हुई
(द) निरंतर वृद्धि हुई है
उत्तर:
(द) निरंतर वृद्धि हुई है

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 12.
निम्न में कौन-सा समाज नहीं है ………………
(अ) आर्यसमाज
(ब) ब्रह्म समाज
(स) प्रार्थना समाज
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
संस्था की अवधारणा किसने दिया था?
(अ) हेर्वटस्पेंसर
(ब) कॉर्ल मार्क्स
(स) मैक्स वेबर
(द) वीरकान्त
उत्तर:
(अ) हेर्वटस्पेंसर

प्रश्न 14.
मॉर्गन के अनुसार पविार की प्रथम अवस्था की ………………….
(अ) पुनालुअन परिवार
(ब) एक विवाही परिवार
(स) समरक्त परिवार
(द) सिण्डस्मियन परिवार
उत्तर:
(स) समरक्त परिवार

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science अधिकार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिकार क्या हैं? वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकता?
उत्तर:
अधिकार का अर्थ-अधिकार मनुष्य के सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। जिस देश में नागरिकों को अधिकार प्राप्त नहीं होते, वहाँ के नागरिक अपना विकास नहीं कर सकते। राज्य द्वारा अपने नागरिकों को दिए अधिकारों को देखकर ही उस राज्य को अच्छा या बुरा कहा जा सकता है। अधिकारों की सृष्टि सामज में ही होती है और इनका आधार व्यक्ति और समाज का कल्याण करना है।

इसके सम्बन्ध में कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. लास्की: “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं। जिनके बिना साधारणतः कोई मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता।”
  2. हालैंड: “अधिकार एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के कर्त्तव्यों को समाज के मन और शान्ति द्वारा प्रभावित करने की क्षमता है।”

अधिकार का महत्त्व –

  1. अधिकार से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।
  2. अधिकार से व्यक्ति के अन्दर पाई जाने वाली शक्तियों का विकास होता है।
  3. इससे व्यक्ति और समाज की उन्नति होती है।
  4. अधिकार सरकार को निरन्कुश बनने से रोकते हैं।
  5. अधिकार सामाजिक कल्याण का एक साधन है।
  6. अधिकार व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाता है।

अधिकार के मांग का आधार:

1. मनुष्य अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है, इसी से उसके जीवन का विकास होता है। इन आवश्कयताओं की पूर्ति के लिए उसे अबसर मिलना चाहिए। इस अवसरों की प्राप्ति के लिए वह प्रयत्न करता है। उसकी सबसे पहली मार यही होती है कि उसे ऐसे अवसर मिले जिनसे वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। अधिकारों का निर्माण इन्हीं मांगों के आधार पर होता है।

2. मांग अधिकार तभी बन सकती है जबकि उनकी प्राप्ति उन्हें जीवन के लिए आवश्यक दिखाई दे। यदि कोई ऐसी मांग करता है, जो जीवन के विकास में सहायक के स्थान पर बाधक बन जाए, तो उस मांग को अधिकार के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

3. समाज उस मांग को उचित समझकर स्वीकार करे।

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प्रश्न 2.
किन आधारों पर, यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?
उत्तर:
यद्यपि सभी अधिकार जीवन की परिस्थितियों के रूप मे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हैं परन्तु अधिकारों को सार्वभौमिक कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी सभी कालों में सभी लोगों द्वारा मांग रही है और दावे रहे हैं। वे अपने व्यवहार और सभ्यता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। ये अधिकार मानव अस्तित्व के लिए मौलिक अधिकार हैं। वस्तुतः अधिकार मौलिक शर्ते हैं जो सुरक्षित और सुव्यवस्थित मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं। विस्तृतः अधिकार वे शर्ते हैं जो मानव जाति के लिए आत्मसम्मान और महत्त्वपूर्ण हैं। निम्नलिखित अधिकारों को सार्वभौमिक अधिकार कहा जा सकता है –

  1. जीविका का अधिकार
  2. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता
  3. शिक्षा का अधिकार

1. जीविका का अधिकार:
जीविका का अधिकार व्यक्ति के जीवन का आधार है, जिससे उसका जीवन चलता है। इसलिए यह अति महत्त्वपूर्ण आवश्यक और सार्वभौमिक है। यदि एक व्यक्ति को अच्छा रोजगार प्राप्त है, तो इससे उसको आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनने का अवसर मिलेगा और इससे उसका महत्त्व और स्तर बढ़ जाएगा। जब एक व्यक्ति की आवश्यकताएँ, विशेष रूप से आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं, तो उसके प्रतिभा और कौशल में विकास होता है, और उसका शोषण समाप्त हो जाता है।

2. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता:
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमें विभिन्न प्रकार से अपने को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति रचनात्मक और मौलिक बनता है। इस अधिकार द्वारा लोग अपने को लिखित, बोलकर या कलात्मक रूप से व्यक्त कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकार की प्रजातान्त्रिक सांस्कृतिक और प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का प्रदर्शन है। इस अधिकार के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।

3. शिक्षा का अधिकार:
शिक्षा का अधिकार व्यक्ति को मानसिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक विकास में सहायता करता है। इससे हमें उपयोगी कौशल प्राप्त होते हैं, जिससे हम जीवन के विविध पक्षों के चुनाव में सक्षम हो जाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार को सार्वभौमिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए आदिवासियों के अपने वास और जीने के तरीके को संरक्षित रखने तथा बच्चों के बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार जैसे नए अधिकारों को लिया जा सकता है।
उत्तर:
आज का विश्व प्रजातान्त्रिक सरकार का विश्व है, जिसमें संस्कृति, जाति, रंग, क्षेत्र, धार्मिक और व्यवसाय के प्रति जागरुकता और चेतना बढ़ रही है। व्यक्ति का सर्वागीण विकास शिक्षा, संस्कृति और धर्म के अधिकार से जुड़ा हुआ है। इसलिए लोगों को उनके नये क्षेत्रों जैसे शिक्षा, संस्कृति, बाल अधिकार, महिला अधिकार, बुजुर्गों के अधिकार, मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, कृषक अधिकार, पर्यावरण आदि अधिकार दिए जा रहे हैं। आज का समाज सामान्य रूप से बहवादी समाज है, जिसमें नागरिकों को विकास करने का और लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक आवास की सुरक्षा के अधिकार दिए गए हैं।

भारतीय मक सामान्य संविधान में शिक्षा और संस्कृति को कायम रखने और उनको विकसित करने का अधिकार दिया गया है। वे लोग विभिन्न प्रकार के रहन-सहन से सम्बन्धित होते हैं। वे विभिन्न प्रकार के वेश-भूषा, व्यवहार, त्योहर और अन्य सभ्यताओं में सम्बद्ध होते हैं। वे शिक्षा से अपनी संस्कृति की प्रगति कर सकते हैं। बच्चों को शोषण के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार दिया गया है। जिससे वे पुरानी प्रथाओं एवं बुराईयों जैसे बँधुआ मजदूरी को दूर कर सकते हैं। उनकी सम्मान की रक्षा के लिए मौलिक अधिकार भी दिए गए हैं।

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प्रश्न 4.
राजनितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर बताइए। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
यद्यपि लोगों को विभिन्न प्रकार की दशाओं और सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जिनको वे अधिकार के रूप में प्राप्त करना चाहते हैं, परन्तु सार्वभौमिक रूप से लोगों के सर्वागीण विकास के लिए सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। राजनीतिक अधिकार वे सुविधाएँ और परिस्थितियाँ हैं, जिसमें लोगों को व्यक्तिगत विकास के अधिकार दिए जाते हैं, और प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया जाता है। कुछ महत्त्वपूर्ण राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. कानून के समक्ष समानता
  2. अभिव्यक्ति का अधिकार
  3. मतदान का अधिकार
  4. निर्वाचित होने का अधिकार
  5. संघ बनाने का अधिकार
  6. प्रतिनिधि चुनने का अधिकार
  7. राजनैतिक दल बनाने का अधिकार

आर्थिक अधिकार:
आर्थिक अधिकार वे जीवित दशाएँ और परिस्थितियाँ हैं, जो व्यक्ति के भौतिक विकास जैसे भोजन, कपड़ा, मकान, विश्राम और रोजगार आदि की आवश्यकताओं से सम्बन्धित हैं। आर्थिक अधिकार के अन्तर्गत पर्याप्त मजदूरी भी है जो आवश्यकताओं और उचित कार्यदशाओं से जुड़ा है। राजनैतिक अधिकार और आर्थिक अधिकार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मुख्य आर्थिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. कार्य करने का अधिकार
  2. आवास एवं कार्य करने की उचित दशाएँ
  3. रोजगार का अधिकार
  4. पर्याप्त मजदूरी का अधिकार
  5. विश्राम का अधिकार
  6. न्यूनतम आवश्यकता जैसे-आवास, भोजन, वस्त्र आदि का अधिकार
  7. सम्पत्ति का अधिकार
  8. चिकित्सा सुविधा का अधिकार

सांस्कृतिक अधिकार-आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों के अलावा सांस्कृतिक अधिकार भी मानव विकास, सुव्यवस्थित जीवन मनोवैज्ञानिक और नैतिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है। महत्त्वपूर्ण सांकृतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार
  2. स्थानीय वेशभूषा, त्योहार, पूजा और उत्सव मनाने का अधिकार
  3. शौक्षिक संस्थाओं (स्थानीय भाषायें और भूगोल के विकास के लिए) की स्थापना का अधिकार।

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प्रश्न 5.
अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
क्योंकि अधिकार राज्य से प्राप्त मांग एवं दावे हैं, इसलिए यह स्वाभाविक है, कि राज्य की यह जिम्मेदारी है, कि वह लोगों को सुनिश्चित दशाएँ और सुविधाएँ उनके कल्याण और रोजगार के लिए प्रबन्ध करे। ऐसा करने से राज्य के कार्य में कुछ कमियां आ जाती हैं। नागरिकों के अधिकार सुनिश्चित करते हुए राज्य प्राधिकरण को लोगों के जीवन और स्वतन्त्रमा को अक्षुण्ण रखते हुए अपना कार्य करना चाहिए। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि राज्य अपनी प्रभुता के कारण शक्तिशाली है, परन्तु नागरिकों के साथ सम्बन्ध राज्य की प्रभुता की प्रकृति पर निर्भर है।

राज्य अपनी रक्षा से ही अस्तित्व में नहीं होता बल्कि लोगों की सुरक्षा से ही कायम रह सकता है। यह नागरिक ही होता है, जिसका महत्त्व अधिक होता है, कल्याण और विकास के लिए कार्य करना चाहिए जो राज्य की प्रभुता का क्षेत्र होता है। राज्य के कानून लोगों के लिए उनके कार्य के लिए उत्तरदायी और संतुलित है। कानून राज्य और लोगों के मध्य सम्बन्ध को नियन्त्रित करता है। यह राज्य का कर्त्तव्य है, कि वह आवश्यक दशाएँ उपलब्ध कराए जिनकी नागरिकों द्वारा अपने कल्याण एवं विकास में मांग या दावे किए जाते हैं। राज्य को इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। परन्तु प्राधिकरण द्वारा इसे रोका और सीमित कर दिया जाता है।

Bihar Board Class 11 Political Science अधिकार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन्हीं दो राजनैतिक अधिकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any two political rights)
उत्तर:
दो राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

1. मतदान का अधिकार (Rights to Vote):
जिन देशों में प्रजातंत्रीय शासन है, वहाँ नागरिकों को वयस्कता के आधार पर मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है।

2. चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Contest Election):
लोकतंत्रीय देशों में प्रत्येक व्यक्ति को निर्वाचन में खड़ा होने का अधिकार प्राप्त है। निर्वाचित होने पर उन्हें सरकार के निर्माण में शामिल होने का भी अधिकार है।

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प्रश्न 2.
नागरिक का क्या अर्थ है? (What is meant by citizenship?)
उत्तर:
नागरिकता (Citizenship):
नागरिकता से नागरिक के जीवन की एक स्थिति निश्चित होती है, जिसके कारण वह राज्य द्वारा दिए गए सभी सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग करता है। राज्य के प्रति कुछ कर्त्तव्य का पालन करता है। अतः एक नागरिक को राज्य का सदस्य होने के नाते जो स्तर (Status) अथवा पद प्राप्त होता है, उसे नागरिकता कहते हैं।

प्रश्न 3.
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकार का वर्णन कीजिए। (Describe two religious rights of the citizens)
उत्तर:
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

1. धार्मिक विश्वास का अधिकार (Right to religious belief):
कोई भी मनुष्य अपनी इच्छानुसार धार्मिक विश्वास रख सकता है। धर्म उसका व्यक्तिगत मामला है। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार है।

2. धार्मिक प्रचार का अधिकार (Right to religious preaching):
प्रत्येक धर्म के मानने वालों को अपने धर्म का प्रचार करने का समान अधिकार प्राप्त है। धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिए शान्तिपूर्ण सम्मेलन कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में दिए गए किन्हीं दो मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख कीजिए। (Mention any two fundamental duties as prescribed in the constitution of India) अथवा, नागरिकों के किन्हीं दो कर्तव्यों का उल्लेख करें। (State any two duties performed by a citizen)
उत्तर:
भारत के संविधान में 1976 ई. में नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्यों को 42वीं संशोधन द्वारा जोड़ा गया। उनमें से दो मौलिक कर्तव्यों का विवेचन निम्नलिखित है –

  1. भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है, कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
  2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए और उनका पालन करें।

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प्रश्न 5.
नागरिक द्वारा निभाए जाने वाले कुछ कर्त्तव्यों का उल्लेख कीजिए। (Mention some of the duties which are performed by the citizen)
उत्तर:
नागरिकों द्वारा निभाए जाने वाले कुछ कर्तव्यों का उल्लेख निम्नलिखित है –

  1. हमें अपने राज्य के प्रति निष्ठावान होना चाहिए।
  2. सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करना चाहिए।
  3. सरकार द्वारा लगाए करों को देना चाहिए।
  4. सैनिक सेवा हमारा एक अन्य कर्त्तव्य है।
  5. जन-सम्पत्ति की रक्षा नागरिक का कर्त्तव्य होता है।
  6. नागरिक के अन्य कर्तव्यों में मताधिकार का प्रयोग, सरकार को सहयोग देना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना आदि सम्मिलित किए जा सकते हैं।

प्रश्न 6.
“अधिकार में कर्तव्य निहित है”, स्पष्ट करो। (“Rights imply duties.”Clarify) अथवा, अधिकार और कर्तव्य के आपसी सम्बन्धों के किन्हीं दो उदाहरणों का उल्लेख कीजिए। (Give any two examples of the relations between rights and duties)
उत्तर:
यद्यपि अधिकार और कर्त्तव्य देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तव में वे एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं। अधिकार और कर्त्तव्य सदैव साथ-साथ चलते हैं। अधिकार और कर्तव्यों में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। कर्तव्य के बिना अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। कर्तव्यों के पालन करने के बाद ही अधिकारों की कल्पना की जा सकती है। अतः अधिकारों और कर्तव्यों को एक दुसरे से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का दुसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं। अतः यह ठीक ही कहा गया है, कि “अधिकारों में कर्त्तव्य निहित हैं।” उदाहरणत:

  1. यदि एक नागरिक भाषण की स्वतन्त्रता का अधिकार माँगता है, तो यह उसका कर्त्तव्य है, कि वह अपने भाषण में किसी दुसरे नागरिक का अपमान न करे।
  2. यदि कोई व्यक्ति किसी अधिकार का उपयोग करता है, तो उसका कर्तव्य है, कि यह दुसरे के अधिकारों में बाधा न डाले, जैसे एक व्यक्ति को मतदान का अधिकार है, तो उसका यह कर्त्तव्य है, कि वह दूसरे के मताधिकार में किसी प्रकार की बाधा न डाले।

प्रश्न 7.
‘समानता का अधिकार’ पर टिप्पणी लिखो। (Write a note on ‘Right to Equality’)
उत्तर:
भारतीय संविधान में नागरिकों को 6 मूल अधिकार दिए गए हैं। इनमें सबसे पहला मूल अधिकार समानता का अधिकार है। अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार इस प्रकार दिया गया है –

  1. कानून के समक्ष समानता (Equality before law): यह अनुच्छेद 14 में दिया गया है।
  2. सामाजिक समानता (Social Equality): अनुच्छेद 15 में दिया गया है।
  3. सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार (Equality of opportunity in matter of public employement): अनुच्छेद 16 में दिया गया है।
  4. अस्पृश्यता का अन्त (Abilition of Untouchability): अनुच्छेद 17 में दिया गया है।
  5. अपराधियों की समाप्ति (Abilition of Titles): संविधान के अनुच्छेद 18 में दिया गया है।

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प्रश्न 8.
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखो। (Write a note on Freedom of Speech and Expression)
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों में स्वतन्त्रता का अधिकार भी प्रमुख है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार नागरिकों को भाषण, लेखन, पुस्तक, चलचित्र व अन्य किंसी माध्यम से विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता है। लास्की का कथन है,कि “एक मनुष्य को जो वह सोचता है, उसे कहने का अधिकार देना, उसके व्यक्तित्व की पूर्णता का एकमात्र साधन है।” अनुच्छेद 19 में दी गई छः स्वतन्त्रताओं में भाषण और विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार कुछ सीमाएँ भी लगाई गई हैं –

  1. राज्य की सुरक्षा
  2. विदेशी राज्यों के साथ मैत्री सम्बन्ध
  3. सार्वजनिक व्यवस्था
  4. सदाचार व नैतिकता
  5. विशिष्टता
  6. अपराध करने को उकसाने से रोकना आदि

प्रश्न 9.
कानूनी अधिकार की परिभाषा दें। इसके कोई दो उदाहरण दीजिए। (Define legal rights. Give its two examples)
उत्तर:
कानूनी अधिकार (Legal Rights):
कानूनी अधिकार वे अधिकार हैं, जो किसी भी समाज में राज्य के कानूनों द्वारा निश्चित और सुरक्षित होते हैं। इनमें बाधा डालने वालों को राज्य द्वारा दण्ड दिया जाता है। दो उदाहरण निम्नलिखित हैं –

1. समानता का अधिकार (Right to Equality):
समानता के अधिकार का अर्थ समान अवसरों की प्राप्ति से है। भारत के नागरिक कानून की दृष्टि से समान हैं। जाति, धर्म, लिंग, वंश अथवा जन्म के आधार पर उनमें भेदभाव नहीं किया जाएगा।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Liberty):
प्रत्येक नागरिक को स्वयं के विकास की पूर्ण स्वतन्त्रता है। वह भाषण दे सकता है, सभा कर सकता है, समुदाय बना सकता है। उसे देश के किसी भी, भाग में जाने की स्वतन्त्रता है। व्यवसाय करने के लिए भी वह स्वतन्त्र है। देश के किसी भी भाग में उसे निवास की स्वतन्त्रता है। उसे न्याय प्राप्ति की भी स्वतन्त्रता है।

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प्रश्न 10.
भारत में मतदान का अधिकार किसको है?
उत्तर:
भारत में मतदान का अधिकार प्रत्येक वयस्क स्त्री-पुरुष को प्राप्त है, परन्तु इन सभी वयस्कों में निम्न योग्यताएँ होनी चाहिए।

  1. वह देश का नागरिक हो और देश के प्रति आस्था रखता हो।
  2. वह निर्धारित आयु रखता हो । भारत में यह आयु सीमा 18 वर्ष कर दी गई है।
  3. वह देशद्रोही, सजायाफ्ता पागल, अथवा दिवालिया न हो।
  4. उसका नाम मतदाता सूची में हो।

प्रश्न 11.
कानून के सम्मुख समानता पर एक संक्षित टिप्पणी लिखो। (Write a short note on equality before law)
उत्तर:
कानून के सम्मुख समानता (Equality before law) का अर्थ है:
विशेषाधिकार का अभाव व सभी सामाजिक वर्गों पर कानून की समान बाध्यता। कानून के समक्ष समानता के अन्तर्गत सभी कमजोर व शक्तिशाली समान समझे जाते हैं। इस अधिकार के अन्तर्गत मूल भाव यह है, कि समान व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाए तथा किसी के साथ धर्म, जाति, भाषा, रंग, नस्ल, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस अधिकार में यह तथ्य भी निहित है, कि कमजोर को राज्य का संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। भारत में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के साथ विशेष व्यवहार इस तथ्य का उदाहरण है।

प्रश्न 12.
‘काम का अधिकार’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on ‘Right to Work’)
उत्तर:
काम के अधिकार का अर्थ है, कि सरकार नागरिकों के लिए ऐसी व्यवस्था करे जिससे कि वे कोई सरकारी का गैर-सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकें या उन्हें कोई व्यवसाय करने का अवसर मिल सके और वे अपना जीवन निर्वाह कर सके। अभी तक भारत में काम का अधिकार मूल अधिकार में सम्मिलित नहीं किया गया है, यद्यपि समय-समय पर इसकी माँग उठती रहती है।

प्रश्न 13.
अधिकार से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by rights?)
उत्तर:
अधिकार:
व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त न हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगे भी अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो, परन्तु उसे अधिकार ही कहा जाएगा, क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बैन तथा पीटर्स (Benn and Peters) ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, “अधिकार की स्थापना एक सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहे कानून पर आधारित हो या परम्परा पर।” वास्तव में अधिकार समाज या राज्य द्वारा स्वीकार की गई वे परिस्थितियाँ हैं, जो मानव विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं, और चूँकि समाज का उद्देश्य श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना है, अतः आदर्श समाज उसी को कहा जा सकता है, जिसमें मनुष्य बिना संघर्ष किए इन अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त कर ले।

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प्रश्न 14.
अधिकारों के आवश्यक तत्व बताइए। (Mention the essential elements of rights)
उत्तर:
अधिकारों के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Rights):

  1. किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह की माँग अधिकार होनी चाहिए।
  2. माँग उसके विकसित उच्च जीवन के लिए आवश्यक एवं न्यायोचित हो।
  3. समाज उस माँग को उचित समझकर स्वीकार करे।

प्रश्न 15.
अधिकारों की परिभाषा दीजिए। (Define Rights)
उत्तर:
ऑस्टिन के अनुसार:
“अधिकार एक व्यक्ति की वह सामर्थ्य है, जिसमे वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता हो।” माण लास्की (Laski) के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं, जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं कर सकता।” इस प्रकार अधिकार ऐसी अनिवार्य परिस्थिति है, जो मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक है।

वह व्यक्ति की माँग है, तथा उसका हक है, जिसे समाज, राज्य तथा कानून भौतिक मान्यता देते हैं, और उसकी रक्षा करते हैं। उदाहरणार्थ, यदि मनुष्य जीवित न रहे तो वह कुछ भी नहीं कर सकता और यदि स्वतन्त्रता न मिले तो वह अपनी उन्नति के लिए कुछ भी नहीं कर सकता। अत: व्यक्ति का जीवन, जीविका तथा स्वतन्त्रता उसके व्यक्तित्व के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ हैं। अतः वे मनुष्य के अधिकार हैं।

प्रश्न 16.
अधिकार और दावों में क्या अन्तर है? (What are the difference between rights and claims?)
उत्तर:
अधिकार सामान्य जीवन का एक ऐसा वातावरण है, जिसके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन का विकास नहीं कर सकता। अधिकार व्यक्ति के विकास और स्वतन्त्रता का एक ऐसा दावा है, जो कि व्यक्ति और समाज दोनों के लिए लाभदायक है, तथा जिसे समाज मानता है, और राज्य लागू करता है। अधिकार उन सामाजिक दावों का नाम है, जो यदि व्यक्ति को प्राप्त न हो तो वह विकास नहीं कर सकता। अधिकार और दावों में निम्न अन्तर है –

  1. अधिकार वे दावे हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है, और जो राज्य द्वारा लागू किए जाते हैं। ऐसी मान्यता के अभाव में अधिकार केवल खोखले दावे ही सिद्ध होंगे।
  2. केवल वे ही दावे अधिकार बनते हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है।
  3. दावों को अधिकार कहलाने के लिए यह आवश्यक है, कि उसका उद्देश्य समाज का हित हो।

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प्रश्न 17.
व्यक्ति को प्राप्त किन्हीं तीन अधिकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any three rights of individuals) अथवा, विभिन्न प्रकार के अधिकारों के नाम लिखिए। उनमें से किन्हीं तीन का वर्णन कीजिए।
(Name the different kinds of rights Describe any three of them)
उत्तर:
व्यक्ति को समाज द्वारा अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं। जैसे मौलिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार, सामाजिक अधिकार, आर्थिक अधिकार, धार्मिक अधिकार, कानूनी अधिकार, प्राकृतिक अधिकार, नैतिक अधिकार आदि। इनमें तीन अधिकारों का वर्णन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

1. आर्थिक अधिकार (Economic Rights):
प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को अपना सकता है, परन्तु किसी भी व्यक्ति को समाज विरोधी व्यवसाय अपनाने का अधिकार नहीं है।

2. धार्मिक अधिकार (Religious Rights):
व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार धर्म मानने का अधिकार है। धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को किसी ऐसी सुविधा से वन्चित नहीं किया जा सकता जो कि राज्य अपने नागरिकों को प्रदान करता है।

3. राजनैतिक अधिकार (Political Rights):
जिन देशों में प्रजातंत्र की स्थापना है, उन राज्यों में प्रत्येक व्यक्ति को वयस्कता के आधार पर मताधिकार प्रदान किया गया है। बिना किसी भेदभाव के सरकारी पद पर नियुक्त होने का अधिकार है। चुनाव लड़ने का भी अधिकार है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नैतिक और वैधानिक (कानूनी) अधिकारों में अन्तरं कीजिए। (Distinguish between moral and legal rights)
उत्तर:
अधिकार एक प्रकार की सुविधाएँ हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति अपना विकास सरलता व शीघ्रता से कर सकता है। नैतिक और वैधानिक अधिकारों में निम्नलिखित अन्तर होता है –
नैतिक अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति की नैतिक भावना द्वारा होती है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति के नैतिक आचरण से होता है। ये अधिकार नैतिक सन्हिता (esthical code) पर आधारित होते हैं। इन अधिकारों का अनुमोदन राज्य द्वारा नहीं किया जाता बल्कि समाज की नैतिक भावना, जनमत तथा धर्मशास्त्रों द्वारा इन्हें स्वीकार किया जाता है। दूसरी ओर वैधानिक अधिकार उन अधिकारों को कहा जाता है, जो राज्य द्वारा व्यक्ति को प्रदान किए जाते हैं, और कानून द्वारा जिनको सुरक्षा प्रदान की जाती है। इन अधिकारों का प्रयोग कानून के अन्तर्गत किया जा सकता है, और इनका उल्लंघन अपराध माना जाता है। जिसके लिए राज्य दंड की व्यवस्था कर सकता है।

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प्रश्न 2.
प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। (Explain the theory of Natural Rights)
उत्तर:
अधिकारों के जन्म, उदय तथा विकास से सम्बन्धित अनेक सिद्धान्त बताए जाते हैं। इस सिद्धान्तों में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त भी उल्लेखनीय है। प्राकृतिक अधिकारों से अभिप्राय वे अधिकार जो मनुष्य को प्रकृति एवं ईश्वर की देन होते हैं। ये अधिकार मनुष्य को इसलिए प्राप्त होते हैं, कि वे मनुष्य हैं। इस प्रकार के अधिकारों से सम्बन्धित सिद्धान्त के समर्थकों में हॉब्स, लॉक तथा रूसो का नाम लिया जाता है। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को आज कोई नहीं मानता। इसका कारण यह है, कि समाज से पहले, समाज से ऊपर समाज से बाहर तथा उसके विरुद्ध कोई अधिकार नहीं होता।

प्रश्न 3.
किन परिस्थितियों में नागरिक राज्य के आज्ञा की अवहेलना कर सकता है? (Under what circumstances can a citizen disobey the State?)
उत्तर:
राज्य की अवज्ञा के अधिकार का अर्थ है, गैर-कानूनी सत्ता की अवज्ञा। यह अधिकार जनता को प्राप्त अधिकारों में सर्वाधिक मौलिक माना गया है। एक अच्छे संविधान को ऐसे अधिकार अपने नागरिकों को प्रदान करना चाहिए। ऐसे अधिकारों के कारण लोग तानाशाही व स्वेच्छाचारी सरकार के विरुद्ध आवाज उठा सकते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले, भारत में महात्मा गाँधी ने अवज्ञा के अधिकार का प्रयोग असहयोग आन्दोलन (सन् 1920-22 ई.) तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34 ई.) में किया था।

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प्रश्न 4.
आप यह कैसे कहेंगे कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? (How would you say that rights and duties are two sides of a coin?) अथवा, अधिकार एवं कर्तव्यों के बीच सम्बन्ध बताइए। (Describe the relationship between rights and duties)
उत्तर:
यद्यपि अधिकार और कर्त्तव्य देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। अधिकार एवं कर्त्तव्य सदैव साथ-साथ चलते हैं। जब हम किसी के अधिकारों का उल्लेख करते हैं, तो उसका अर्थ समझा जाता है, कि इस व्यक्ति के कुछ कर्त्तव्य भी हैं। कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों का न कोई प्रश्न है, और न ही काई अस्तित्व।

अधिकार और कर्तव्यों में सम्बन्ध (Relationship between Rights and Duties):

1. अधिकार एवं कर्त्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं (Rights and Duties are complemen tary to each other):
यह बात सर्वमान्य है, कि किसी भी व्यक्ति को कोई भी अधिकार उस समय ही मिल सकता है, जब वह अपने कर्तव्य का पालन करे। अधिकार एवं कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे यदि एक नागरिक भाषण की स्वतन्त्रता का अधिकार माँगता है, तो इस अधिकार में ही उसका यह कर्त्तव्य निहित है, कि वह अधिकार से अनुचित लाभ न उठाए तथा अपने भाषण से सरकार अथवा किसी नागरिक का अपमान न करे।

2. अधिकार एवं कर्तव्यों का एक ही उद्देश्य है (Same Objectives of Rights and Duties):
अधिकारों तथा कर्त्तव्यों की उत्पत्ति मनुष्य को सुखी करने के लिए हुई है। दोनों का उद्देश्य तथा लक्ष्य नागरिकों को सुखी बनाना है। नागरिकों की, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक उन्नति कराना ही मुख्य उद्देश्य है। ये दोनों व्यक्ति के सफल जीवन व्यतीत करने में सहायता देते हैं।

3. कर्तव्यों के बिना अधिकारों का अस्तित्व असंभव है (No Right without Duties):
कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। जहाँ मनुष्य को केवल अधिकार ही मिले हो, वहाँ वास्तव में अधिकार न होकर शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपरोक्त सभी बातों का मनन करने के उपरान्त हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं, कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा एक के बिना दूसरों का न अस्तित्व हो सकता है, और न ही महत्त्व।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों में अन्तर कीजिए। (Distinguish between Civil Rights and Political Rights)
उत्तर:
नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों में निम्नलिखित अन्तर हैं –

1. नागरिक अधिकार (Civil Rights) का अभिप्राय उन अधिकारों से है, जिनके बिना नागरिक या राज्य में रहने वाले अन्य व्यक्ति सभ्य जीवन नही बिता सकते हैं। नागरिक अधिकार में सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार है। लोकतन्त्रीय राज्यों में किसी भी व्यक्ति को कानून के उल्लंघन पर निश्चित कानूनों के आधार पर न्यायालय द्वारा दण्डित किया जा सकता है। इस प्रकार कानून द्वारा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता बनी रहती है।

2. राजनीतिक अधिकार (Political Rights) से अभिप्राय उन अधिकारों से है, जो नागरिक को निश्चित योग्यताएँ प्राप्त करने पर शासन में भागीदारी का अधिकार देते हैं। ये अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त होते हैं। चुनाव में भाग लेने का अधिकार एक राजनीतिक अधिकार है। भारत में नागरिक अन्य योग्यताओं के साथ 25 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद लोकसभा तथा 30 वर्ष की आयु पूरी करने पर राज्य सभा का चुनाव लड़ने का अधिकार रखता है।

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प्रश्न 2.
अधिकार सम्बन्धी प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। (Discuss important theories of rights)
उत्तर:
1. अधिकारों का प्राकृतिक सिद्धान्त (Natural Theory of Rights):
प्राकृतिक अधिकार जन्मजात होते हैं, और उनका अस्तित्व किसी न किसी रूप से राज्य के गठन से पूर्व भी था। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त ने निरन्कुश शासकों की निरन्कुशता पर बन्धन लगाकर मनुष्य की स्वतन्त्रता को प्रकट किया। लॉक (Locke) का मत है, कि प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे। रूसो (Rouseau) प्राकृतिक अवस्था को स्वर्ग के समान समझता है। प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य पर किसी प्रकार के बन्धन नहीं थे। टामस पेन, जेफरसन ने भी जीवन, स्वतन्त्रता, समानता तथा सम्पत्ति के अधिकारों को प्राकृतिक अधिकार माना है।

2. अधिकारों के उदारवादी सिद्धान्त (Liberal Theory of Rights):
लॉक (Locke) को आधुनिक युग के उदारवाद का जन्मदाता कहा जाता है। उसने घोषित किया कि राज्य का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया है, और उसका कार्य शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित करना मात्र है। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण अधिकार व्यक्ति ने अपने पास रखे हैं। राज्य व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता व सम्पत्ति के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कानून नहीं बना सकता। लोगों को यह भी अधिकार है, कि सीमा से बाहर जाने वाले व शक्ति दुरुपयोग करने वाले शासक को वे अपहस्त कर दें।

3. ऐतिहासिक अधिकारों का सिद्धान्त (Historical Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों का जन्म इतिहास से हुआ है। वे उन रीति-रिवाजों और प्रयोगों पर आधारित हैं, जो उपयोगी समझे जाते थे तथा जो काफी समय तक माने जाते रहे।

4. लोक कल्याणकारी अधिकार सिद्धान्त (Social Welfare Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के समर्थकों का विचार है, कि व्यक्ति को अधिकार इसलिए दिया जाता है, ताकि वह समाज का उपयोगी अंग बन जाए। बेन्थम तथा ज. एस. मिल इस सिद्धान्त के समर्थक थे। लास्की (Laski) कहते हैं, “समाज उपयोगिता के बिना अधिकार निरर्थक है।” (Right have no meaning without social utility)

5. आदर्शवादी सिद्धान्त (Idealist Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के समर्थक राज्य को एक दैवी संस्था मानते हैं। हेगेल (Hegal) ने कहा था- “राज्य पृथ्वी पर भगवान् का अवतरण है।” (State is march of God on the earth) इस सिद्धान्त के समर्थक कहते हैं कि व्यक्ति को अधिकार समाज का सदस्य होने के नोते प्राप्त होता है।

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प्रश्न 3.
संवैधानिक अधिकारों तथा प्राकृतिक अधिकारों में अन्तर कीजिए। (Distinguish between Constitutional Rights and Natural Rights)
उत्तर:
संवैधानिक अधिकारों को कानूनी अधिकार भी कह सकते हैं। यह वे अधिकार हैं, जो हमें संविधान द्वारा प्रदान किए जाते हैं। नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकारों का स्रोत “दैवी नियम” या नैतिक मूल्य है। लॉक तथा अन्य कई विचारकों का मत है, कि राज्य की स्थापना से पहले भी व्यक्ति को कुछ अधिकार प्राप्त थे जिन्हें इन विद्वानों ने प्राकृतिक अधिकार माना है। इन दोनों के बीच चार प्रमुख भेद हैं –

  1. दोनों प्रकार के अधिकारों का उद्गम अलग-अलग स्रोतों से हुआ।
  2. संवैधानिक या विधिक अधिकार लिखित रूप में पाये जाते हैं अतः वे निश्चित व स्पष्ट होते हैं। इसके ठीक विपरीत प्राकृतिक अधिकारों का स्वरूप प्रायः अनिश्चित रहता है। अलग-अलग विद्वानों की प्राकृतिक अधिकारों के बारे में अलग-अलग मान्यताएँ हैं। अरस्तू ने तो दासों की खरीद-फरोख्त को भी व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार माना है।
  3. संवैधानिक या विधिक अधिकारों की अवहेलना अपराध है, जिसकी सजा कानून के अनुसार दी जा सकेगी। परन्तु प्राकृतिक अधिकारों का स्वरूप एकदम अस्पष्ट है। अतः उनकी अवहेलना करने वालों को किस आधार पर दण्ड दिया जा सकता है।
  4. प्राकृतिक अधिकारों के समर्थक सम्पत्ति और नागरिक स्वतन्त्रता पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध सहन नहीं करते, जबकि संवैधानिक अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 4.
अधिकार से क्या अभिप्राय है? अधिकार के आधारभूत तत्व (लक्षण) समझाइए। (What are rights? Mention the basic elements (attributes of right)
उत्तर:
व्यक्ति की उन माँगो को, जिन्हें, समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार कहलाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरणार्थ, काम पाने का अधिकार (Rights to work) राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परन्तु उसे अधिकार ही माना जाएगा, क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता। बेन और पीटर्स (Benn and Peters) ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, अधिकारों की स्थापना एक ‘सुस्थापित’ नियम द्वारा होती है, वह नियम चाहे कानून पर आधरित हो या परम्परा पर (Rights is an established rule either legal or conventional, which accords the right)

अधिकार के आवश्यक तत्व (Basic Elements of Right):

1. माँग अथवा दावा (A Claim):
व्यक्ति अथवा समाज की कुछ आवश्यकताएँ होती हैं जिन्हें किसी विशेष स्थिति या अवस्था में ही पूरा किया जा सकता है। व्यक्ति इस प्रकार की स्थिति की माँग कहता है।

2. माँगे न्यायोचित होनी चाहिए (Claim would be justify):
अधिकार केवल एक माँग या दावा ही नहीं है, वरन् वह नैतिक मान्यताओं के अनुकूल माँग या दावा होना चाहिए।

3. राज्य अथवा समाज की स्वीकृति (Social Sanction):
कोई भी माँग तब तक अधिकार का रूप ग्रहण नहीं करती जब तक कि उसे समाज की स्वीकृति न मिल जाए । समाज की स्वीकृति मिलने पर माँगे अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानूनी मान्यता न मिली हो। समाज की स्वीकृति न मिलने से माँगे अधिकार नहीं बन सकती, क्योंकि समाज से पृथक, व्यक्ति का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करता वरन् उसकी पूर्ति के लिए प्रयास भी करता है। समाज उन्हीं माँगों को स्वीकृति देता है, जो सबके हित की अर्थात् समाज हित में हो।

4. अधिकार व कर्त्तव्य आपस में जुड़े रहते हैं (Rights implies duties):
अधिकारों में कर्त्तव्य निहित है। मेरा-कर्त्तव्य है, कि मैं दूसरों को भी उन स्वतन्त्रताओं का उपभोग करने दूं जिनका मैं स्वयं उपभोग कर रहा हूँ। इस प्रकार एक-व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्ति का कर्तव्य तथा एक व्यक्ति का कर्तव्य दूसरे व्यक्ति का अधिकार बन जाता है।

5. काल और देश के अनुसार अधिकारों का स्वरूप बदलता रहता है (Rights change with time and place):
अधिकारों की कोई ऐसी सूची बन सकना असंभव है, जिसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश न हो। एक समय दास खरीदना व बेचना अधिकारों में सम्मिलित था, परन्तु अब यह पूरे विश्व में कहीं भी मान्य नहीं है।

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प्रश्न 5.
किन्हीं तीन ऐसी परिस्थितियों का वर्णन कीजिए जिनमें अधिकारों को प्रतिबन्धित किया जा सकता है। (Describe any three situations in which rights can be restricted)
उत्तर:
अधिकार कभी भी निरन्कुश या असीम नहीं होते, उनके साथ कर्तव्य जुड़े रहते हैं। व्यक्ति के अधिकार दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों से भी बँधे तथा सीमित होते हैं। जैसा मैं चाहता हूँ वैसा दूसरे व्यक्ति भी चाहते हैं। अतः अधिकारों को सीमित किया जा सकता है। जिन तीन परिस्थितियों में अधिकारों को प्रतिबन्धित किया जा सकता है, उनका विवरण निम्नलिखित है –

1. अन्य सदस्यों के अधिकार के लिए (For Other’s Rights):
व्यक्ति समाज का अंग है, और दूसरों के साथ मिल-जुलकर ही वह रह जाता है। व्यक्ति के अधिकार उसके अन्य साथियों के अधिकार से प्रतिबन्धित रहते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार का प्रयोग इस प्रकार नहीं कर सकता जिससे दूसरे लोगों को अपने अधिकार का प्रयोग करने में बाधा पड़े। अधिकार सबको समान रूप से मिले होते हैं अतः उनका प्रयोग भी इस प्रकार किया जा सकता है, कि भी अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें।

2. समाज हित के लिए (For Social Welfare):
अधिकार समाज में ही मिल सकते हैं। समाज से बाहर उनका कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए व्यक्ति के अधिकार सामाजिक कल्याण से ‘सीमित हैं। इसका अर्थ यह है, किसी व्यक्ति को कोई ऐसा अधिकार नहीं दिया जा सकता जो समाज का अहित करता हो। सामाजिक कल्याण की दृष्टि से व्यक्ति के अधिकार पर सीमा लगायी जा सकती है।

3. राज्य की स्वतन्त्रता तथा सूरक्षा हेतु (For the liberty and security of the State):
यदि किसी व्यक्ति के अधिकार की पूर्ति करने से राज्य की स्वतन्त्रता अथवा सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाए तो उस व्यक्ति के ऐसे अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, कि वह अपने राष्ट्र के विषय में सूचनाएँ प्राप्त कर सके, परन्तु किसी सूचना को प्रकट करने पर यदि राज्य की सुरक्षा को खतरा होने की सम्भावना हो तो सूचना गोपनीय रखी जा सकती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन से अधिकारों की विशेषता नहीं है –
(क) असीमित होते हैं
(ख) केवल राज्य में ही संभव है
(ग) परिस्थिति के अनुसर बदलते रहते हैं
(घ) अधिकार विकास का द्योतक है
उत्तर:
(क) असीमित होते हैं

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प्रश्न 2.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त का समर्थन किसने किया था?
(क) रूसो
(ख) वाल्टेयर
(ग) टॉमन पेन
(घ) आस्टिन
उत्तर:
(घ) आस्टिन

प्रश्न 3.
मौलिक अधिकार का वर्णन भारतीय संविधान के किस भाग में है?
(क) भाग-4
(ख) भाग-3
(ग) भाग-2
(घ) भाग-1
उत्तर:
(ख) भाग-3

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प्रश्न 4.
मूल अधिकारों का निम्न कौन-सा वर्ग अस्पृश्यता की समिति है?
(क) धर्म का अधिकार
(ख) समानता का अधिकार
(ग) स्वतन्त्रता का अधिकार
(घ) शोषण के विरुद्ध अधिकार
उत्तर:
(ख) समानता का अधिकार

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख करते हुए निम्न में से किस देश का अनुसरण किया गया है –
(क) ब्रिटेन
(ख) अमेरिका
(ग) आस्ट्रेलिया
(घ) स्विट्जरलैंड
उत्तर:
(क) ब्रिटेन

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प्रश्न 6.
संपत्ति का अधिकार निम्न में से किस वर्ग में आता है –
(क) विधिक अधिकार
(ख) मानव अधिकार
(ग) मूल अधिकार
(घ) नैसर्गिक अधिकार
उत्तर:
(क) विधिक अधिकार

प्रश्न 7.
किसने कहा है? अधिकार एवं कार्य आपस में जुड़े हुए हैं।
(क) लास्की
(ख) लॉक
(ग) हाब्स
(घ) जे. एस. मिल
उत्तर:
(क) लास्की

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

Bihar Board Class 11 Political Science सामाजिक न्याय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ-साथ कैसे बदला?
उत्तर:
न्याय की संकल्पना के विषय में विभिन्न कालों और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक माहौल में विभिन्न अर्थ रहा है। न्याय शब्द की मूल आवश्यकता ‘जस’ से है जिसका अर्थ ‘उचित’ है अर्थात् ‘किसी को देने को’ है। परन्तु क्या ‘किसी को देने को’ (One’s due): का अर्थ विभिन्न अवधि में विभिन्न समाजों में विभिन्न है। उदाहरण के लिए समय के एक बिन्दु पर महिलाओं को समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। परन्तु कालान्तर में इसकी उपेक्षा की गयी और उनकी स्थिति खराब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएँ दी जाने लगीं। वे उदारवादी, प्रजातान्त्रिक और विकासवादी विश्व में अपने उचित स्थान की खोज में हैं। अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक तत्व माने गए हैं।

प्लूटो का न्याय की स्थिति के विषय में अलग दृष्टिकोण है। वह न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग की अपनी क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरी के कार्यों में हस्तक्षेप न करना को माना है। अरस्तु ने उपयोगिता के आधार पर गुलामी को न्यायसंगत ठहराया है। उसने न्याय को स्वामी के द्वारा कार्य को करने और स्वामी का दास के प्रति कर्त्तव्य को न्याय माना है। उसने राजा की सेवा के अर्थ में भी न्याय पर प्रकाश डाला है। उसके अनुसार सेवक का यह कर्त्तव्य है, कि वह अपने राजा की सेवा अच्छी तरह से करे।

मार्क्सवादी विचार न्याय की अवधारणा की दृष्टि से अलग है और इसलिए ‘किसी का उचित स्थान’ का विचार भी अलग है। मार्क्स पूँजीवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था जो अन्याय पर आधारित था। इसलिए उसने न्याय की अलग आवश्यकताएँ बताई। उसने अपने न्याय की योजना में सुझाव दिया कि उत्पादन के साधनों और वितरण पर सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति की मूल आवश्यकताओं को पूर्ति होनी चाहिए। वर्तमान में न्याय की आवधारणा में कुछ तथ्यों का समावेश हो गया है। आज न्याय न केवल सामाजिक, आर्थिक पक्ष की व्याख्या करता है बल्कि नैतिक, मनोविज्ञान, आत्मिक और मानववादी पक्ष की व्याख्या करता है।

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प्रश्न 2.
अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धान्तों की संक्षेप में चर्चा करो। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइए।
उत्तर:
किसी को उसका देना’ न्याय के विचार का केन्द्रीय सिद्धान्त था परन्तु “किसको क्या देना है”-के सम्बन्ध में विभिन्न कालों में विभिन्न विचार रहे हैं। विभिन्न प्रकार के अनेक सिद्धान्त उनके अनुसार बनाये गए हैं। ये निम्नलिखित हैं –

  1. समान के लिए समान व्यवहार
  2. आनुपातिक न्याय
  3. विशेष आवश्यकता की पहचान

1. समान के लिए समान व्यवहार:
समान के लिए सामन व्यवहार अति महत्त्वपूर्ण और न्याय का आवश्यक सिद्धान्त माना जाता है। यह अपेक्षा स्वीकार किया जाता है कि व्यक्ति में कुछ विशेषताएँ मानव जाति के रूप में दिखता है, इसलिए प्रत्येक समान दशाओं में समान व्यवहार कायम रहता है। अधिकांश क्षेत्रों में जिसमें हम समानता के व्यवहार की आशा करते हैं, ये निम्नलिखित हैं –

  • नागरिक अधिकार अर्थात् समान आधार पर मूलभूत आवश्यकताओं की उपलब्धता।
  • राजनीतिक अधिकार जैसे-मतदान का अधिकार और राजनीतिक कार्यों में शामिल होने का अधिकार।
  • सामाजिक अधिकार जैसे-समान व्यवहार और सामाजिक कार्यों में मूलभूत आवश्यकताओं को प्राप्त करने का अधिकार। समान के लिए समान व्यवहार का एक अन्य पहलू यह है कि वर्ग, जाति या लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  • प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रतिभा और कौशल के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए।

2. आनुपातिक न्याय:
समानता का व्यवहार समान हो सकता है। इसे स्वीकार करना चाहिए और आनुपातिक स्तर को ढूढ़ना चाहिए। हम कह सकते हैं कि प्रत्येक को सभी दशाओं में समान व्यवहार की आवश्यकता होती है। आनुपातिक न्याय का तात्पर्य है-लोगों का वेतन और गुण में एक अनुपात होना चाहिए। कर्त्तव्य और पुरस्कार का निर्धारण करना चाहिए और परिभाषित करना चाहिए। वास्तविक न्याय के लिए आधुनिक समाज में समान व्यवहार का सिद्धान्त आनुपातिक सिद्धान्त में सन्तुलित करने की आवश्यकता है।

3. विशेष आवश्यकता की पहचान:
तीसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त विशेष आवश्यकताओं की पहचान है। यह लोगों की विशेष आवश्यकताओं के सन्दर्भ में पहचान करती है। जब किसी को पुरस्कार या कार्य वितरित किया जाता है, तो हमें अपनाया जाता है। कभी-कभी हमें न्याय के लिए सन्शोधित उपायों का सहारा लेना पड़ता है और लोगों के साथ विशेष व्यवहार करना पड़ता है। इसको ही विशेष आवश्यकता की पहचान कहते हैं। इसे असन्तुलन को सन्तुलन करना भी कहा जाता है।

इससे समान व्यवहार के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं होता। यह सकारात्मक कार्य का प्रकार है। लोगों के कुछ प्राकृतिक अयोग्यता के कारण उनके लिए विशेष व्यवहार या इलाज की आवश्यकता होती है। यद्यपि वे असमान दिखाई देते हैं परन्तु न्याय के लिए उनकी विशेष आवश्यकता की पूर्ति जरूरी होती है। वे लोग जो सुविधा सम्पन्न हैं और सुविधाहीन हैं, इन सबको कुछ भिन्न व्यवहार या इलाज देने की आवश्यकता पड़ती है। सुविधाहीन लोगों को विशेष मदद की जरूरत होती है।

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प्रश्न 3.
क्या विशेष जरूरतों का सिद्धान्त सभी के साथ समान बर्ताव के सिद्धान्त के विरुद्ध है?
उत्तर:
लोगों की विशेष आवश्यकता का विचार करने का सिद्धान्त सभी के लिए समान व्यवहार के सिद्धान्त से विरोधाभास उत्पन्न कर सकता है, परन्तु अब इसे विस्तृत दुष्टिकोण से न्याय के विचार से देखते हैं तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। कि किसी व्यक्ति को विशेष आवश्यकता का विचार करने के सिद्धान्त से सभी के लिए समान व्यवहार के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं होता। वस्तुतः यह वितरण योग्य न्याय पर आधारित है। सन्शोधित उपाय के रूप में हम उस व्यक्ति की विशेष सहायता करते हैं जो अयोग्य हैं, और उसे समान स्तर पर लाने की जरूरत होती है।

समान रूप से समाज के साथ व्यवहार लागू हो सकता है कि लोग जो कुछ दृष्टियों से समान नहीं हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार से विचार कर सकते हैं। शारीरिक अयोग्यताएँ, आयु, सफलता की कमी, अच्छी शिक्षा या स्वास्थ्य आदि कुछ महत्त्वपूर्ण कारक हैं, जो विशेष व्यवहार के रूप में विचार किया जा सकता है। यदि दोनों समूहों के लोगों अर्थात् सामान्य लोग और अपंग लोग दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाय तो यह अन्याय होगा। इसलिए यदि अपंग व्यक्तियों को विशेष मदद या उनकी कुछ आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके तो इससे न्याय की आवश्यकता की पूर्ति होगी परन्तु यह न्याय से अलग या समान न्याय नहीं होगा।

प्रश्न 4.
निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में ‘अज्ञानता के आवरण’ के विचार का उपयोग किस प्रकार किया।
उत्तर:
उपेक्षित स्थान के आवरण की योग्यता यह है कि यह लोगों के लिए न्याय की आशा करता है। उनसे यह सोचने के लिए आशा की जाती है कि वे अपनी रुचि के लिए क्या चाहते हैं। वे उपेक्षा के आवरण के अन्तर्गत चुनाव करते हैं, वे यह पायेंगे कि यह उनकी रुचि ही है जो अरुचि की स्थिति से हटकर सोचने के लिए है। इसलिए यह प्रथम चरण है, जिससे सही कानून और नीतियों की व्यवस्था आती है। बुद्धिमान लोग न केवल खराब स्थिति में वस्तुओं को देखेंगें, सही बनाने के लिए प्रयास भी कर सकते हैं। वे जो नीतियां बनाते हैं वह समाज के लिए होती हैं। इसलिए यह कोई नहीं जानता कि भविष्य के समाज में उनकी क्या स्थिति होगी? वे ऐसे कानूनों का निर्धारण करते हैं जो सुरक्षा प्रदान करते हैं चाहे वे भले ही अनैच्छिक लोगों के हों।

इसलिए यह सभी की भलाई में है कि कानून और नीतियों से सम्पूर्ण समाज के लोगों को लाभान्वित करावें। केवल किसी विशेष वर्ग के लिए ऐसा न किया जाय। इस प्रकार की ईमानदारी अच्छे कार्य की उपलब्धि होगी। इसलिए रॉल यह तर्क देते हैं कि यह योग्य विचार है न कि नैतिक, जो समाज के कार्यों और लाभ के वितरण के सन्दर्भ में उचित और पक्षपातरहित हो सकता है। यह उनका सामान्यीकरण है जो रॉल के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण बनाता है और ईमानदारी और न्याय के लिए पहुँच (Approach) प्रदान करता है।

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प्रश्न 5.
आम तौर पर एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी जरूरतें क्या मानी गई हैं? इस न्युनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की क्या जिम्मेदारी है?
उत्तर:
समाज उस समय अन्यायपूर्ण माना जाता है जब व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर इतना बड़ा होता है जो उनके न्यूनतम् आवश्यकताओं के पहुँच के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं होते हैं। इसलिए एक न्यायपूर्ण समाज को लोगों के न्यूनतम मूल आवश्कयताओं के साधन उपलब्ध करना चाहिए जिससे लोग स्वस्थ, सुरक्षित जीवन जी सके तथा अपने प्रतिभा का विकास कर सकें। लोगों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराना चाहिए।

लोगों की आवश्यकताओं, जो जीवन के मूल न्यूनतम दशाएँ होती हैं, संचालन के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा विभिन्न प्रकार के उपाय किए गए। इसमें अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों-विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन आवश्यकताओं में स्वास्थ्य, आवास, खान-पान, पेयजल, शिक्षा और न्यूनतम मजदूरी आदि शामिल हैं। देशवासियों को मूल आवश्यकता की सुविधाएँ प्रदान करना प्रजातान्त्रिक सरकार का उत्तरदायित्व है। आज राज्य एक कल्याणकरी संगठन है। इसलिए लोगों के कल्याण का ध्यान रखना उसका कर्त्तव्य है। प्रजातान्त्रिक सरकार लोगों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करके लोगों के दशाओं में सुधार लाती है।

प्रश्न 6.
सभी नागरिकों को जीवन की न्यूनतम बुनियादी स्थितियाँ उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कार्यवाई को निम्न में से कौन-से तर्क से वाजिब ठहराया जा सकता है?
(क) गरीब और जरूरत मन्दों को निशुल्क सेवाएँ देना एक धर्म कार्य के रूप में न्यायोचित है।
(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है।
(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी, मानवता और मानव अधिकार की स्वीकृति है।
उत्तर:
कथन (ख) और (घ) लोगों के जीवन की न्यूनतम् दशाएँ उपलब्ध कराने में राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में न्यायसंगत है।
(ब) सभी के लिए मूल सुविधाएँ और न्यूनतम स्तर की जीविका प्रदान करना मानवता और मानव अधिकार की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Political Science सामाजिक न्याय Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आनुपातिक न्याय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। (Write a short note on Proportional Justice?)
उत्तर:
आनुपातिक न्याय का अर्थ परिस्थितियों की समता अर्थात् समान मामलों को समान रूप से और असमान को असमान रूप में लिया जाए। निष्पक्षता के रूप में न्याय का अर्थ कठोर समानता नहीं है। इसका अभिप्राय तो न्याय-संगत आनुवादि वितरण से है। इसके अन्तर्गत राज्य कुछ विशिष्ट वर्गीकरणों के आधार पर भेदभाव कर सकता है। ऐसा वर्गीकरण लिंग, आवश्यकता, परिस्थिति, योग्यता, तथा क्षमता के आधार पर किया जा सकता है। समाज के कमजोर लोगों की विशेष सहायता की जानी चाहिए।

प्रश्न 2.
संरक्षणकारी विभेद क्या है? (What is protective discrimination?)
उत्तर:
हमारे संविधान में कानून के समक्ष समानता को एक शासन के आधारभूत सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया गया है। धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। परन्तु जो लोग अधिक पिछड़े हैं उनके लिए संरक्षणात्मक भेदभाव रखे गए हैं। राज्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और अन्य पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए विशेष प्रकार की व्यवस्था कर सकता है। राज्य उन्हें सरकारी नौकरियों में स्थान दिलाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 3.
सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए पूर्ण सुविधाएँ उपलब्ध करवाना तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही सामाजिक न्याय है।

सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of Social Justice):

  1. धर्म, जाति, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त किया जाता है। सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाते हैं।
  2. सार्वजनिक स्थानों के प्रयोग के लिए नागरिकों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  3. व्यक्ति के रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास तथा अन्य निजी मामलों में राज्य द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाता।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के क्या प्रावधान हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सभी भारतीय नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्रदान करना संविधान का सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए –

  1. नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।
  2. प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता प्रदान की गई है।
  3. सरकारी नौकरी पाने के क्षेत्र में सभी नागरिक को समान अवसर प्रदान किए गए हैं।
  4. छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। इसका प्रयोग करने वाले को राज्य द्वारा दण्डित किया जाता है।
  5. समाज में असमानता उत्पन्न करने वाली सभी उपाधियों का अन्त कर दिया गया है।
  6. प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतन्त्रता दी गयी है। धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। राज्य को उसमें हस्तक्षेप करने की मनाही कर दी गई है।
  7. उच्च वर्ग के व्यक्तियों के द्वारा पिछड़े, दलितों तथा कम आयु के बच्चों को शोषण करने की मनाही कर दी गई है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 5.
न्याय से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you understand by Justice?) अथवा, न्याय का अर्थ समझाइए। (Explain the term Justice)
उत्तर:
इतिहास में न्याय की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। किसी ने न्याय को जैसी करनी वैसी भरनी’ के रूप में तो किसी ने उसे ईश्वर की इच्छा कहकर अथवा पूर्वजन्मों का फल कहकर पुकारा है। सालमण्ड के अनुसार “न्याय का अर्थ है, प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग प्रदान करना।” जे. एस. मिल के अनुसार, “न्याय उन नैतिक नियमों का नाम है जो मानव कल्याण की धारणाओं से सम्बन्धित है, और इसलिए जीवन के पथ-प्रदर्शन के लिए किसी भी अन्य नियम से अधिक महत्त्वपूर्ण है।”

प्रश्न 6.
न्याय के किन्हीं दो आधारभूत तत्वों का वर्णन कीजिए। (Describe any two fundamental postulates of Justice)
उत्तर:
न्याय के दो आधारभूत तत्व निम्नलिखित हैं –
1. सत्य (Truth):
सत्य की कसौटी पर खरा उतरने वाला न्याय अमीर-गरीब सबको एक दृष्टि से देखता है। घटनाओं का प्रस्तुतीकरण ज्यों का त्यों किया जाता है।

2. स्वतन्त्रता (Freedom):
राज्य को व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर केवल सामाजिक हित में प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। बहुत से तानाशाह शासक अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाकर न्याय का गला घोंट देते हैं।

प्रश्न 7.
संरक्षणकारी न्याय से क्या तात्पर्य है? (What is meant by Protective Justice?)
उत्तर:
यदि राज्य कमजोर तथा दरिद्र वर्ग के हित में कुछ कार्य करता है तो यह स्पष्ट है कि वह ऐसा उन लोगों की उन्नति के लिए कर रहा है जिन्हें दूसरे वर्गों ने उनको उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है, उसे संरक्षणकारी न्याय कहा जाता है।

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प्रश्न 8.
आर्थिक न्याय का क्या अर्थ है? (What is meant by Economic Justice?)
उत्तर:
आर्थिक न्याय का अर्थ (Meaning of the term Economic Justice):
आर्थिक न्याय से यह अभिप्राय है कि राष्ट्र की सम्पत्ति व आय में सब समान रूप से भागीदार हों। आर्थिक न्याय के अनुसार लोगों की न्यूनतम भौतिक आवश्यकताएँ पूरी होनी चाहिए। एक जैसा काम करने वालों को समान वेतन दिया जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार काम करे और उसे अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति में कोई रूकावट न आए। स्त्रियों और बच्चों का आर्थिक शेषण न हो। बुढ़ापे, बीमारी, व अपंग अवस्था में राज्य उनके कल्याण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करे।

प्रश्न 9.
नैतिक न्याय का अर्थ बताइए। (Discuss the meaning of Moral Justice)
उत्तर:
संसार में कुछ नियम सर्वव्यापी, अपरिवर्तनशील और प्राकृतिक हैं। इनके अनुसार होने वाले आचरण व व्यवहार को ही नैतिक न्याय कहते हैं। उदाहरणस्वरूप, सच बोलना, प्रतिज्ञा-पालन, दया, सहानुभूति, उदारता, क्षमता आदि नैतिक न्याय के अन्तर्गत आते हैं। ऐसे व्यवहार की स्थापना में राज्य को हस्तक्षेप, करने की आवश्यकता ही न पड़ेगी। स्वतः ही सबको नैतिक न्याय की प्राप्ति हो जाएगी।

प्रश्न 10.
कानूनी न्याय से क्या तात्पर्य है? (What is meant by Legal Justice?)
उत्तर:
न्याय की समाज में जो भी मान्यताएँ होती हैं, जब उन्हें विधियों के द्वारा मूर्त रूप दे दिया जाता है, तब वह कानूनी न्याय कहलाता है। कानूनी न्याय-संगत होना चाहिए। कानूनी न्याय निष्पक्ष व सस्ता हो।

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प्रश्न 11.
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में क्या अन्तर है? (What is the difference between the legal justice and the moral Justice?
उत्तर:
कानूनी न्याय और नैतिक न्याय में अन्तर:
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लघु उत्तरीय प्रश एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कानूनी न्याय का तात्पर्य क्या है? (What is the meaning of legal justice?)
उत्तर:
कानूनी न्याय का तात्पर्य यह है कि कानून अपने सैद्धान्तिकता में जहाँ नैतिक मूल्यों के अनुरूप है, वहीं अपने क्रियान्वयन के स्तर पर इसी सैद्धान्तिकता के कारण नैतिक हो। इसलिए कानूनी न्याय का स्थायित्व सिर्फ मूल्यों और नैतिकता पर निर्भर होता है, राज्य का शासक वर्ग इसी के माध्यम से कानून को गठित और उसका क्रियान्वयन करता है लेकिन यह सिद्धान्त कानून की निरंकुशता का मूल तात्पर्य नहीं होता है।

इसलिए कानूनी न्याय का मूल अर्थ है कि कानून नैतिक मूल्यों के अनुरूप हो तथा इसको लागू कराने सम्बन्धी व्यावहारिकता भी नैतिक हो। कानून न्याय जब राज्य के माध्यम से लागू होता है, तो स्वाभाविक है कि राज्य को बलपूर्वक भी न्या को लागू करवाना पड़ता है। इसलिए कानूनी न्याय का अर्थ और परिभाषा का क्षेत्र काफी वृहद होता है, जो न्याय के हर स्तर पर उस व्यावहारिकता को खत्म कर दे, जो न्याय को काल्पनिक यां कानून को निरंकुश बनाना चाहता है। इसलिए कानूनी न्याय का तात्पर्य न्याय से और काफी वृहद् और प्रभावी हो जाता है।

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प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता, समानता और न्याय के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करें। (Find out the inter relationship of liberty, equality and justice)
उत्तर:
न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के सन्दर्भ में इस मौलिक तत्व की और विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है कि न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के मूल्यों का मूल्यांकन करके स्वतन्त्रता और समानता को लोगों पर लागू करवाता है। न्याय वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता के वास्ताविक मूल्यों की पहचान करवाता है। वही न्याय स्वतन्त्रता और समानता को बिना किसी भेदभाव के लागू करवाने का माध्यम बनता है।

स्वतन्त्रता का मूल्य ही स्वतन्त्रता के अस्तित्व और उसके प्रभाव का कारण बनता है तथा स्वतन्त्रता तभी तक हितकर है, जब तक कि उसके साथ न्याय का भाव जुड़ा हुआ है। वैसे ही समानता लोगों पर जब तक न्यायपूर्ण लागू होगी, तभी तक समानता का अस्तित्व है, नहीं तो समानता का अस्तित्व खत्म हो जाएगा क्योंकि समानता का अस्तित्व समानता के मूल्यों पर निर्भर करता है और मूल्यों का सम्बन्ध न्याय से होता है। न्याय वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता को स्थायी रूप से प्रभावी बनाता है इसलिए न्याय की अवधारणा को स्वयं स्वतन्त्रता और समानता नकार नहीं सकते हैं।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता और न्याय के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करें। (Clarify the inter relationship of liberty and justice)
उत्तर:
स्वतन्त्रता और न्याय के बीच का सम्बन्ध इसलिए है, कि स्वतन्त्रता वास्तव में लोगों पर अपने गुण के अनुरूप ढंग से लागू हो सके। स्वतन्त्रता बिना अपने गुणों के असीमित होने से लोगों के लिए अन्यायपूर्ण हो जाती है, और इसी अपार स्वतन्त्रता से इसका प्रयोग करने वाले लोगों का अन्त होता है इसलिए स्वतन्त्रता का न्यायपूर्ण पहलू स्वतन्त्रता के अस्तित्व को कारगर ढंग से लागू कारने में सहायक होता है। स्वतन्त्रता पर अंकुश न्यायपूर्ण ढंग से और कोई नहीं स्वयं स्वतन्त्रता के मूल्य लगते हैं। स्वतन्त्रता के मूल्यों का निर्धारण नैतिक नियमों के स्रोत से ही होता है, इस कारण स्वतन्त्रता का सीमित स्वरूप को सही ढंग से लागू करवाने के लिये न्याय की आवश्यकता होता है।

स्वतन्त्रता का सीमित स्वरूप और उसका न्यायपूर्ण परिपालन राज्य के माध्यम से ही होगा। वह न्याय के आधार पर ही होगा लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि राज्य लोकतान्त्रिक पद्धति के लोक कल्याणाकारी राज्य में विश्वास करता हो। इसलिए न्याय का स्थान, स्वतन्त्रता सम्बन्धी तथ्यों के बावजूद राज्य, व्यक्ति और समाज के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राज्य स्वतन्त्रता के सन्दर्भ के किस प्रकार व्यक्ति और व्यक्तियों के बीच संतुलन करता है यह राज्य की न्याय व्यवस्था पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 4.
न्याय के किन्हीं दो पक्षों का उल्लेख करो। (Mention any two dimensions of Justice)
उत्तर:
न्याय अंग्रेजी शब्द Justice का हिन्दी रूपान्तर है। Justice शब्द लैटिन भाषा के शब्द Jus से बना है जिसका अर्थ होता है बन्धन या बाँधना (Bind or Tie) जिसका अभिप्राय यह है कि ‘न्याय’ उस व्यवस्था का नाम है जिससे व्यक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों का उचित एवं सामंजस्यपूर्ण सन्योजन किया जाता है।

1. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
न्याय का एक पक्ष राजनीतिक न्याय माना जाता है। अरस्तू ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बन्धी न्याय (Distributive Justice) बेताया था जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था। राजनीतिक न्याय का तात्पर्य व्यक्ति का शासन में भाग लेना, चुनाव में खड़े होना, चुनाव में मतदान करना, योग्यता के अनुसार राजकीय पद ग्रहण करना आदि से है। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए उचित एवं निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को हम राजनीतिक न्याय की व्यवस्था कहते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय का होना आवश्यक है।

2. कानूनी न्याय (Legal Justice):
कानूनी न्याय से अभिप्राय है कानून न्याय-संगत हो, समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हो। कानून जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाएँ और उनका औचित्य समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परखा जाए। न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो।

प्रश्न 5.
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में क्या सम्बन्ध है? (What is the relationship between Legal and Moral Justice?)
उत्तर:
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में सम्बन्ध (Relationship between Legal & Moral Justice):
कानूनी तथा नैतिक न्याय में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन दार्शनिकों ने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया कि न्याय नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। अभी भी एक सीमा तक न्याय नैतिकता पर आधारित है परन्तु दोनों एक नहीं हैं। दोनों में अन्तर पाया जाता है। कानूनी न्याय का सम्बन्ध उन सिद्धान्तों और कार्यविधियों से है जो किसी राज्य के कानून द्वारा निर्धारित होती हैं।

कानूनी न्याय का सम्बन्ध कानूनों, रीति-रिवाजों, पूर्व निर्णय तथा मानवीय अभिकरण द्वारा निर्मित कानूनों से होता है। नैतिक न्याय वह होता है जिसके द्वारा हमें पता चलता है, कि क्या ठीक है और क्या गलत है? मनुष्य के रूप में हमारे क्या अधिकार हैं? हमारे क्या कर्त्तव्य हैं? कानूनी न्याय इन अधिकारों और कर्तव्यों को सुरक्षा प्रदान करता है।

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प्रश्न 6.
भारतीय राजनीतिक चिन्तन में न्याय की धारणा समझाइए। (Explain the concept of Justice in Indian political thought)
उत्तर:
भारतीय सामाजिक चिन्तन में राज्य की व्यवस्था के लिए न्याय को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। मनु, कौटिल्य, वृहस्पति, शुक्राचार्य, भारद्वाज एवं सोमदेव आदि उनके महान् भारतीय राजनीतिक चिन्तक हुए हैं। इनकी विशेषता यह रही है कि उन्होंने न्याय के विषय में उस कानूनी दृष्टिकोण को प्राचीनकाल में ही अपना लिया था, जिसे पाश्चात्य जगत् के विचारक आधुनिक युग में आकर ही अपना सके हैं। कौटिल्य ने कहा है, “न्याय की सुव्यवस्था राज्य का प्राण है। जिसके बिना राज्य जीवित नहीं रह सकता।”

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान में न्याय की अवधारणा पर टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on “The concept of Justice in Indian Constitution”)
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों प्रकार के न्याय की गारंटी दी गयी है। राजनैतिक न्याय सुलभ कराने के लिए समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना की गई है। आर्थिक न्याय की व्यवस्था के लिए संविधान में नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन है जो राज्य को अनेक कार्य करने का निर्देश देते हैं। समान कार्य के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को समान वेतन, बाल श्रमिकों का शोषण रोकना, बन्धुआ मजदूरी पर रोक लगाना, वृद्धावस्था या बीमरी, की अवस्था में राजकीय सहायता आदि।

सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए अनुच्छेद 14 के अनुसार सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं। अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलपंथ, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव की मनाही है। अनुच्छेद 16 में सब नागरिकों को राज्य के अधीन पदों पर नियुक्ति का समान अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 17 द्वारा छुआछूत की समाप्ति कर दी गई है। अनुच्छेद 24 व 25 में बेगार तथा शोषण को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।

प्रश्न 8.
सामाजिक न्याय का अर्थ और महत्त्व बताइए। (Discuss the meaning and importance of Social Justice)
उत्तर:
सामाजिक न्याय का अर्थ है कि नागरिकों के बीच सामाजिक दृष्टिकोण से किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए। श्री गजेन्द्र गड़कर के अनुसार ‘सामाजिक न्याय का अर्थ सामाजिक असमानताओं को समाप्त करके सामाजिक क्षेत्र में व्यक्ति को अवसर प्रदान करने से है। सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. धर्म, जाति रंग आदि के आधार पर भेदभाव की समाप्ति।
  2. सार्वजानिक स्थानों के प्रयोग में भेदभाव की समाप्ति।
  3. राज्य के हस्तक्षेप की सीमा अर्थात् रीति-रिवाज या धार्मिक विश्वास जैसे व्यक्तिगत मामालों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

सामाजिक न्याय का महत्त्व-आधुनिक युग में सामाजिक न्याय का बहुत महत्त्व है क्योंकि समाज के अन्तर्गत सबको उचित स्थान प्राप्त होता है। सभी लोग उन्नति करने लगते हैं।

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प्रश्न 9.
न्याय से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you mean by Justice?)
उत्तर:
पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय का अध्ययन प्लेटो से प्रारम्भ किया जा सकता है। प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘रिपब्लिक’ (Republic) में न्याय की स्थापना के उद्देश्य में नागरिकों के कर्त्तव्यों पर बल दिया है। प्लूटो के न्याय सम्बन्धी विवेचन में बार्कर का कथन है कि “न्याय का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उस कर्त्तव्य का पालन, जो उसके प्राकृतिक गुणों तथा सामाजिक स्थिति के अनुकूल है। नागरिक को अपने धर्म की चेतना तथा सार्वजनिक जीवन में उसकी अभिव्यंजना ही राज्य का न्याय है।”

अरस्तू ने न्याय की इस समस्या को व्यक्तियों के आपसी विनिमय में राज्य के पदों के वितरण में किन-किन नियमों का पालन होना चाहिए पर विचार करके ‘न्याय’ को व्यावहारिक रूप प्रदान किया है। जिन राज्यों में न्याय नहीं रह जाता वह डाकुओं के झुण्ड के समान है। एक्वीनाव के अनुसार “न्याय प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार दिए जाने की निश्चित व सनातन इच्छा है।”

प्रश्न 10.
न्याय के विभिन्न रूपों को वर्णित करें। (Describe the different forms of Justice)
उत्तर:
न्याय के विभिन्न रूपों को निम्न विषयों से जाना जाता है, जैसे नैतिक न्याय, सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय, कानूनी न्याय और आर्थिक न्याय। नैतिक न्याय की सर्वोच्च अवधारणा है। नैतिक न्याय का स्रोत प्राकृतिक नियम है, और प्राकृतिक नियम मनुष्यों द्वारा अपरिवर्तनीय हैं। मनुष्यों को वास्तव में सत्य की अवधारणा का पहचानना और लागू करना है तो उसका मूल रास्ता और कोई नहीं सिर्फ नैतिक न्याय ही है। बिना नैतिक मूल्यों के न्याय का न तो व्यावहारिक स्वरूप रह पाता है और न ही सैद्धान्तिक स्वरूप रह पाता है।

इस कारण न्याय की सच्ची अवधारणा को पहचानने का एकमात्र रास्ता और कोई नहीं बल्कि नैतिक मूल्य है। सामाजिक न्याय में समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जब उसके सामाजिक अधिकार के अनुरूप न्यायगत तरीके से अधिकार एक दूसरे से प्राप्त होंगे तो निश्चित है, कि सामाजिक न्याय वास्तव में संबके विकास और स्वयं समाज के विकास का कारण बनेगा। राजनीतिक न्याय वास्तव में केवल प्रजातान्त्रिक शासन पद्धति के ही माध्यम से सम्भव है, क्योंकि राजनीतिक न्याय का. मूल तात्पर्य यह है कि सत्ता में प्रत्येक व्यक्ति को भागीदारी का अधिकार तथा बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों को सार्वजानिक पद प्राप्त होना। कानूनी न्याय में कानून वास्तव में ऐसा हो जो लोगों को न्याय देने में मदद करे न कि न्याय देने में रोड़े अटकाए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्लूटो के न्याय सिद्धान्त पर एक निबन्ध लिखिए। (Write an essay on Plato’s concept of Justice)
उत्तर:
प्लूटो का न्याय सिद्धान्त (Plato’s Concept of Justice):
प्लूटो के अनुसार न्याय का सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दी रिपब्लिक’ (The Republic) में न्याय की विस्तृत व्याख्या की है। प्लूटो के अनुसार भूख (Appetite), साहस (Spirit) व विवेक (Wisdom) मानव आत्मा के तीन तत्त्व हैं। इसी प्रकार राज्य में क्रमशः उत्पादन (Producers) सैनिक (रक्षक) (Guardians) तथा शासक (Rulers) तीन वर्ग होते हैं। तीनों वर्गों को अपने-अपने निर्धारित कार्यों को करना होता है। प्रत्यके वर्ग को ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

मानव आत्मा में निहित न्याय व्यक्तित्व के विविध पक्षों जैसे-क्षुधा, साहस और विवेक का समुचित संतुलन और समन्वय उपलब्ध कराता है। प्लूटो की दृष्टि में राज्य के सन्दर्भ में न्याय विभिन्न सामाजिक वर्गों में सामंजस्य स्थापित करता है। जब हर वर्ग अपने कार्य से ही सम्बद्ध रहता है तथा केवल वही कार्य करता है जिसके लिए वह प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक उपयुक्त होता है और दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है तो उस स्थिति में उस राज्य में न्याय चरितार्थ होता है। प्लूटो के न्याय का सिद्धान्त कानूनी न होकर नैतिक है जो कि यह बताता है कि क्या सही है और क्या गलत, क्या उचित है और क्या अनुचित। उचित और सही कार्य को करना न्याय है जबकि अनुचित और गलत कार्य को करना अन्याय है।

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प्रश्न 2.
पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य में न्याय की अवधारणा का अर्थ समझाइए। (Explain the meaning of the concept of Justice in Western perspective)
उत्तर:
अति प्राचिन काल में न्याय का रूप कबीलाई था। तब “दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख” के सिद्धान्त पर कार्य किया जाता था। प्राचीन यूनानी न्याय में सोफिस्टो, पाइथागोरस, प्लूटो और अरस्तू के द्वारा न्याय की धारणा बताई गयी। सोफिस्टो के द्वारा न्याय शक्तिशाली का हित है। पाइथागोरस ने समानता के आधार पर न्याय को परिभाषित किया है। प्लूटो के अनुसार न्याय समाज को एक सूत्र में रखने वाली शक्ति है। न्याय का अर्थ व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्यों को पूरा करना है। अरस्तू ने न्याय दो प्रकार का बताया। प्रथम, समानान्तर न्याय, वह न्याय है जो सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करता है।

दूसरा आनुपातिक न्याय, वह न्याय है जो राजनीतिक जीवन को व्यवस्थित करता है। मध्य युग में ईसाई धर्म के आधार पर न्याय को सामाजिक गुण के रूप में देखा गया। सन्त ऑगस्टाइन ने कहा, “न्याय केवल इसाई राज्य में होता है। वह चर्च को प्रधानता देता है, उसका विचार है, कि राज्य का चर्च के मामलों में हस्तक्षेप न्याय का उल्लंघन है। रोमन धारणा के अनुसार व्यक्ति के अधिकारों की न्यायपूर्वक सुरक्षा ही न्याय है। बीसवीं सदी में कल्याणकारी राज्यों में न्याय की अवधारणा में कानूनी, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक पक्ष भी सम्मिलित. किए गए। विश्व के सभी राज्य, जिनमें भारत भी शामिल है, आज न्याय की पाश्चात्यो अवधारणा को ही मानते हैं। इस अवधारणा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल, कानून पर आधारित शासन तथा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा आवश्यक है।

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प्रश्न 3.
न्याय की अवधारणा के विविध रूपों का वर्णन कीजिए। (Describe the various forms of the concept of Justice)
उत्तर:
न्याय की अवधारणा के विविध रूप (Various forms of concept of Justice):
न्याय की अवधारणा के विविध रूप निम्न प्रकार हैं –

1. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice):
समाज में व्यवस्था तभी बनी रहेगी यदि व्यक्तियों को स्वतन्त्रता और समानता प्रदान की जाए परन्तु यह अव्यावहारिक है। प्राकृतिक स्वतन्त्रता व्यवस्थित समाज के अस्तित्व में आने से पहले की कल्पना हो सकती है।

2. नैतिक न्याय (Moral Justice):
परम्परागत रूप से न्याय की नैतिक धारणा को ही अपनाया जा रहा है। नैतिक न्याय के प्रमुख नियमों में जो आदर्श सम्मिलित हैं, उनमें सत्य बोलना, प्राणिमात्र के प्रति दया का व्यवहार करना, परस्पर प्रेम करना, प्रतिज्ञा पूरी करना, वचन का पालन करना, उदारता व दान का परिचय देना आदि है।

3. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
अरस्तू ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बन्धी (Distributive) न्याय बताया था, जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था। आधुनिक युग में राजनीतिक समाज के सदस्य होने के नाते व्यक्ति द्वारा उसकी योग्यता के अनुसार शासन में भाग लेने, उसके सम्बन्ध में मत व्यक्त करने, चुनाव में अपना मत देने, चुनाव में स्वयं खड़े होने तथा राजकीय पद ग्रहण करने आदि के अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए तथा निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को ही राजनीतिक न्याय कहते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय अत्यन्त: आवश्यक हैं।

4. सामाजिक न्याय (Social Justice):
सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व है। समाज में जाति, धर्म, वर्ग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। दास प्रथा के समय दासों को अन्य नागरिकों से हेय समझा जाता था। संसार के अनेक भागों में अब भी समाज में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समान नहीं है। ये सब सामाजिक अन्याय की स्थितियाँ हैं। सामाजिक न्याय की स्थिति में सबको समाज में उचित स्थान प्राप्त होता है।

5. आर्थिक न्याय (Economic Justice):
आर्थिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन के साधन और सम्पत्ति के वितरण की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें सबको उनके श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके तथा कोई व्यक्ति, समुदाय या वर्ग किसी अन्य व्यक्ति, समुदाय या वर्ग का शोषण न कर सके। सभी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। आधुनिक युग में आर्थिक न्याय का बड़ा महत्त्व है। आर्थिक विषमता होने पर समाज धनी और निर्धन, पूँजीपति और श्रमिकों एवं शोषक और शोषित के वर्गों में विभाजित हो जाता है। फलतः समाज उन्नति नहीं कर सकता।

6. कानूनी न्याय (Legal Justice):
कानूनी न्याय से अभिप्राय है कि कानून न्याय-संगत हो समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हो। किसी भी वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त न हो। कानून जनता द्वारा समय-समय पर परखा जाए न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो ताकि निर्धन व्यक्ति भी धन के अभाव मे कहीं न्याय से वंचित न रहें और धनी वर्ग के शोषण के शिकार न हो जाए।

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प्रश्न 4.
भारत में नागरिकों के सामाजिक न्याय की सुरक्षा के क्या उपाय किए गए हैं? (With measures have been taken in India to secure social justice to its citizens?)
उत्तर:
सामाजिक न्याय का अर्थ है, कि समाज में निर्बल वर्ग के लोगों, अशिक्षितों, निर्धनों को शक्तिशाली वर्ग, शिक्षितों और धनवानों की भाँति उन्नति के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय दिलाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं –

सामाजिक न्याय के उपबन्ध (Provisions of Social Justice):

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार छुआछूत को पूर्णतया समाप्त कर दिया गया है।
  2. अनुच्छेद 16 के अनुसार सरकार का कर्तव्य है कि हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों कि शिक्षा को अधिक उन्नत कर तथा उनके अधिक हितों की रक्षा करे।
  3. अनुच्छेद 15 के अनुसार सरकार का कर्तव्य है, कि दुकानों, होटलों, सार्वजानिक विश्राम गृहों या भोजनालयों, कुओं, तालाबों, स्नानघरों, सड़कों, मनोविनोद के स्थानों में हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों के प्रवेश के लिए कोई रुकावट है तो उसे दूर करे।
  4. अनुच्छेद 25 के अनुसार हिन्दुओं के सब धार्मिक स्थान हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों के प्रवेश के लिए खोल दिए जाएँ।
  5. हरिजन, कबीले और पिछड़ी हुई जातियाँ कोई भी काम-धन्धा और व्यापार कर सकती हैं और उनपर कोई रूकावट नहीं होगी।
  6. अनुच्छेद 19 के अनुसार हरिजनों, कबीलों और पिछड़ी जातियों को राज्य की ओर से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश की मनाही नहीं की जाएगी।
  7. सरकार का यह परम कर्त्तव्य है, कि नौकरियों में पिछड़ी हुई जातियों तथा जनजातियों को उचित प्रतिनिधित्व दे।
  8. संविधान के आरम्भ होने से 10 वर्ष तक अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्यों के विधानमण्डलों में स्थान आरक्षित किए गए थे। हर 10 वर्ष के बाद फिर से संविधान में संशोधन करके यह आरक्षण अभी तक लागू है।
  9. समान कार्य के लिए समान वेतन की नीति अपनायी जा रही है।
  10. कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन कर सकता है।
  11. प्रत्येक जाति एवं सम्प्रदाय को अपनी संस्कृति, भाषा तथा लिपि को सुरक्षित रखने का अधिकार दिया गया है।

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प्रश्न 5.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में न्याय की आवधारणा का वर्णन कीजिए। (Describe the concept of Justice in Indian Perspective)
उत्तर:
हिन्दू धर्म की स्मृतियाँ के अनुसार कानून धर्म की एक शाखा है। विभिन्न स्मृतियाँ, धर्म के नियमों के अनुसार ही न्याय व्यवस्था को निश्चित करती हैं। स्मृतियों के अनुसार दण्ड की व्यवस्था न्याय से सम्बन्धित है। इनके अनुसार राजा को दैवीय गुणों के अनुसार कार्य करना चाहिए। जो भी प्राणी अपने स्वधर्म का पालन नहीं करता था उसे धर्म के नियमों के अनुसार दण्डित किया जाता था। मनुस्मृति में फौजदारी और दीवानी कानूनों से सम्बन्धित धर्म-कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए कानून विधि, दण्ड-विधि की व्यवस्था की गई है।

मनु ने अपराध के अनुपात के अनुसार दण्ड-फटकार लगाना, जुर्माना करना, वनवास देना तथा मृत्युदण्ड का विधान किया है, परन्तु यह दण्ड वर्णमूलक व्यवस्था के अनुसार समय, स्थान व उद्देश्य के आधार पर दिए जाते थे। समान अपराध पर, जातिगत आधार पर असमान दण्ड की व्यवस्था थी। ब्राह्मणों को मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था, परन्तु भयंकर अपराध के लिए ब्राह्मण को मौत की सजा जल में डुबोकर मारने की थी। जुआ खेलने वालों को कोड़ों की सजा दी जाती थी। उत्तराधिकार कानून की सूक्ष्म व्यवस्था थी जिसमें बड़े भाई की सम्पत्ति के अलावा कुँआरी बहनों का भी भाग होता था। न्याय प्रशासन का उद्देश्य सुधारात्मक था। मनु ने चार प्रकार के दण्ड बताए हैं –

  1. वाक दण्ड
  2. धिक दण्ड
  3. धन दण्ड
  4. मृत्यु दण्ड न्यायालयों के चार श्रेणी थे

1. राजा द्वारा नियुक्त अधिकारी:
सभा की अध्यक्षता राजा करता था। सभा में वेदों, धर्म-शास्त्रों और स्मृतियों के योग्य, निष्पक्ष, अनुभवी ब्राह्मण सलाहकार होते थे।

2. पूग-पूग:
अथवा गण जाति वालों के समूह को कहते थे । इनका अलग न्यायालय होता था।

3. श्रेणी:
एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाला व्यक्ति या समूह चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो, श्रेणी कहलाता था। उनके लिए अलग न्यायालय की व्यवस्था थी।

4. कुल:
चौथे प्रकार का न्यायालय था। इसमें जाति विशेष के बन्धु-बन्धव होते थे। मनुस्मृति में यह भी बताया गया है कि न्यायकर्ताओं की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए। न्यायालयों के संगठन में सबसे नीचे की इकाई एक ग्राम तक ही सीमित थी। इसका न्यायिक अधिकारों के पास विवाद भेजा जाता था। उसके बाद अति, सहस्त्राधिपति के पास विवाद भेज दिया जाता था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा है? न्यायपूर्ण समाज वह है जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान ही घटती हुई भावना मिलकर एक करुणा भरे समाज का निर्माण करें।
(क) डॉ. भीमराव अम्बेदकर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) पंडित जवाहर लाल नेहरू
(घ) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
उत्तर:
(क) डॉ. भीमराव अम्बेदकर

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 2.
‘न्याय का सिद्धान्त’ नामक पुस्तक के लेखक कौन है?
(क) आस्टिन
(ख) प्रोंधा
(ग) जॉन राल्स
(घ) डायसी
उत्तर:
(ग) जॉन राल्स

प्रश्न 3.
“सामाजिक न्याय’ का प्रमुख तत्व क्या है?
(क) अवसर की समानता
(ख) विधि के समक्ष समानता
(ग) विधि की तार्किकता
(घ) कल्याणकारी विधिक प्रावधान
उत्तर:
(क) अवसर की समानता

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 4.
राजनीतिक न्याय का सरोवर है –
(क) कानून न्यायसंगत होने चाहिए
(ख)कानून के अनुसार न्याय मिलना चाहिए
(ग) जनता की राज्य सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए
(घ) बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समाज में समान अवसर एवं सुख सुविधा उपलब्ध है
उत्तर:
(ग) जनता की राज्य सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

Bihar Board Class 11 Sociology समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक श्रेणी को परिभाषित कीजिए?
उत्तर:
सामाजिक श्रेणी के अंतर्गत उन व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है जिनकी समाज में समान प्रस्थिति तथा भूमिका होती है। सामाजिक श्रेणी एक सांख्यिकीय संकलन है। इनमें व्यक्तियों की विशिष्ट विशेषताओं के आधार पर उनका वर्गीकरण किया जाता है। उदाहरण के लिए समान व्यवसाय वाले अथवा समान आय वाले व्यक्ति ।

प्रश्न 2.
‘समग्र’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समग्र ऐसे व्यक्यिों का संकलन है, जो एक ही समय व एक ही जगह पर रहते हैं, लेकिन उनमें एक दूसरे के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं पाए जाते हैं। इरविंग गफमेन के अनुसार समग्र व्यक्तियों का ऐसा संकलन है, जिन्में एक-दूसरे के प्रति अंतः क्रिया नहीं पायी जाती है। उदाहरण के लिए 5 फुट लम्बे सभी पुरुषों का संकलन समग्र कहलाएगा।

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प्रश्न 3.
प्राथमिक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह मे आमने-सामने के घनिष्ठ संबंध होते हैं। प्राथमिक समूह का आकार छोटा होता है। इसके सदस्यों के उद्देश्य एवं इच्छाएँ साधारणतया समान होती हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री कूले के अनुसार, “प्राथमिक समूह से मेरा तात्पर्य उन समूहों से है जो घनिष्ठ, आमने-सामने के संबंध एवं सहयोग के जरिए लक्षित होते हैं। वे प्राथमिक कई दृष्टिकोणों से हैं, लेकिन मुख्य रूप से इस कारण से है कि वे व्यक्ति की समाजिक प्रकृति तथा आदेशों के निर्माण करने में मौलिक हैं……….”

प्रश्न 4.
कूले द्वारा वर्णित प्राथमिक समूह की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री कूले ने अपनी पुस्तक में प्राथमिक समूह की निम्नलिखत विशेषताएँ बतायी हैं –

  • घनिष्ठ आमने-सामने के संबंध
  • तुलनात्मक रूप से स्थापित
  • सीमित आकार एवं सदस्यों की सीमित संख्यासदस्यों के माध्य आत्मीयता
  • सहानुभूति तथा पारस्परिक अभिज्ञान
  • हम की भावना

प्रश्न 5.
द्वितीयक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
द्वितीयक समूह अपेक्षाकृत आकार में बड़े होते हैं। इनमें घनिष्ठता की कमी पायी जाती है। व्यक्तियों के बीच संबंध अस्थायी, अव्यक्तिगत तथा औपाचारिक होते हैं । इनका लक्ष्य विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति होता है तथा सदस्यता ऐच्छिक होती है। आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “वे समूह जो घनिष्ठता की कमी का अनुभव प्रस्तुत करते हैं, तो द्वितीयक समूह कहलाते हैं।”

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प्रश्न 6.
औपचारिक समूह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
औपचारिक समूह या तो विशाल होते हैं, या विशाल संगठन का एक हिस्सा होते हैं, उदाहरण के लिए श्रम-संगठन तथा सेना। औपचारिक समूह में सदैव एक नियामक स्तरीकृत संरचना अथवा प्रस्थिति व्यवस्था पायी जाती है।

प्रश्न 7.
अनौपचारिक स्तरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अनौपचारिक समूह अपेक्षाकृत लघु होते हैं तथा इनका निर्माण अचानक हो जाता है। इन समूहों में समान उद्देश्य तथा पारस्परिक व्यवहार के आधार पर अंतः क्रियाएँ पायी जाती हैं, उदाहरण के लिए बच्चों के खेल समूह तथा टीम आदि अनौपचारिक समूह हैं। अनौपचारिक समूह एक सामाजिक इकाई हैं तथा इनमें समूह की समस्त विशेषताएँ पायी जाती हैं। इसके सदस्यों में अंतर्वैयक्तिक संबंध, संयुक्त गतिविधियाँ तथा समूह से संबद्ध होने की भावना होती है।

प्रश्न 8.
सामाजिक स्तरीकरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सामाजिक स्तरीकरण से तात्पर्य भौतिक या प्रतीकात्मक लाभों तक पहुँच के आधार पर समाज में समूहों के बीच की संरचनात्मक असमानताओं के अस्तित्व से है। अतः स्तरीकरण को सरलतम शब्दों में, लोगों के विभिन्न समूहों के बीच की संरचनात्मक असमानताओं के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
प्रस्थिति किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रस्थिति समाज या एक समूह में एक स्थिति है। प्रत्येक समाज और प्रत्येक समूह में ऐसी कई स्थितियाँ होती हैं और व्यक्ति ऐसी कई स्थितियों पर अधिकार रखता हैं। अतः प्रस्थिति से तात्पर्य सामाजिक स्थिति और इन स्थितियों से जुड़े निश्चित अधिकरों और कर्तव्यों से है। उदाहरण के लिए, माता की एक प्रस्थिति होती है जिसमें आचरण के कई मानक होते हैं और साथ ही निश्चित जिम्मेदारियाँ और विशेषाधिकार भी होते हैं।

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प्रश्न 10.
भूमिका किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूमिका प्रस्थिति का एक सक्रिय रूप हैं। प्रस्थितियाँ ग्रहण की जाती हैं एवं भूमिकाएँ निभाई जाती हैं। हम यह कह सकते हैं। प्रस्थिति एक संस्थागत भूमिका है। यह वह भूमिका है जो समाज में या समाज की किसी विशेष संस्था में नियमित, मानकीय और औपचारिक बन चुकी है।

प्रश्न 11.
सामाजिक नियंत्रण से क्या आशय है?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य सामाजिक प्रक्रियाओं, तकनीकों और रणनीतियों से है जिनके द्वारा व्यक्ति या समूह के व्यवहार को नियमित किया जाता है। इनका अर्थ व्यक्तियों और समूहों के व्यवहार को नियमित करने के लिए बल प्रयोग से है और समाज में व्यवस्था के लिए मूल्यों व प्रतिमानों को लागू करने से है।

प्रश्न 12.
सामाजिक नियंत्रण के कोई दो औपचारिक साधन बताइए?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण के दो औपचारिक साधन निम्नलिखित हैं –
1. कानून – कानून सामाजिक नियंत्रण का एक औपचारिक तथा सशक्त साधन है। वर्तमान समय में द्वितीयक तथा तृतीयक समूह लगातार महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। कानून के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था के लिए प्रारूप नियमों तथा दंडो की व्यवस्था की जाती है। कानून का शासन तथा कानून के सम्मुख समानता आधुनिक युग की विशेषताएँ हैं।

2. राज्य – राज्य सामाजिक नियंत्रण का औपचारिक साधन है। राज्य संप्रभु होता है अतः समस्त संस्थाएँ समितियाँ तथा समुदाय राज्य क अधीन होते हैं। राज्य के नियमों, व्यवस्थाओं तथा कानून के सम्मुख समानता आधुनिक युग की विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 13.
औपचारिक सामाजिक नियंत्रण क्या है?
उत्तर:
औपचारिक सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत राज्य, कानून, सरकार, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका व संवैधानिक व्यवस्थाओं को सम्मिलित किया जाता हैसामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों में विधिसम्मत व्यवस्था का अनुसरण किया जाता है। प्रत्येक संस्था तथा निकाय आदि के कार्य सुपरिभाषित तथा स्पष्ट होते हैं।

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प्रश्न 14.
अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण क्या है?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों का विकास समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वतः होता रहता है। प्राथमिक समूहों तथा आदिवासी समाजों में समाजिक नियंत्रण के अनौपचरिक साधन काफी प्रभावशाली होते हैं।

लोकरीतियों, लोकाचारों, प्रथाओं तथा परम्पराओं आदि को समाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों में सम्मिलित किया जाता है। ई.ए. रॉस के अनुसार, “सहानुभूति, सामाजिकता, न्याय की भावना तथा क्रोध अनुकूल परिस्थितियों में स्वयं एक वास्तविक प्राकृतिक व्यवस्था अथवा वह व्यवस्था है जिसका कोई ढाँचा या योजना नहीं होती ।”

प्रश्न 15.
समाजशास्त्र में हमें विशिष्ट शब्दावली और संकल्पणाओं के प्रयोग की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
समाजशास्त्र के वे विषय जिन्हें सामान्य लोग नहीं जानते तथा जिनके लिए सामान्य भाषा में कोई शब्द नहीं है, उनके लिए यह आवश्यक है कि समाजशास्त्र की अपनी एक शब्दावली हो शब्दावली समाजशास्त्र के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह विषय अपने आपमें अपने अनेक संकल्पनाओं को जन्म देता है।

प्रश्न 16.
सामाजिक समूह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक व्यक्ति सामान्य उद्देश्य या स्वार्थ हेतु एक-दूसरे से अंतः क्रिया करते हैं तथा एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं, तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 17.
सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना
  • लोगों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंधों का होन
  • सदस्यों के बीच स्वार्थ अथवा हित का पाया जाना। पारस्परिक हित समूह के संबंध-सूत्र होते है
  • समूह में श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण पाया जाता है
  • समूह में पारस्परिक जागरूकता पायी जाती है।

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प्रश्न 18.
मानव द्वारा समूहों की रचना क्यों की गई?
उत्तर:
मनुष्यों द्वारा समूहों की रचना निम्नलिखित कारणों से की गई –

  • मानव आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु।
  • मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए प्रारम्भ से ही दूसरे मनुष्यों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए शिशु का पालन-पोषण नहीं हो सकता है।
  • समूह मनुष्यों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • समूह द्वारा भाई-चारे की भावना विकसित होती है जो सामाजिक अंतः क्रिया के लिए जरूरी है।

प्रश्न 19.
समूह की कोई दो विशेषताएँ बताइए?
उत्तर:
समूह की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • कोई एक व्यक्ति समूह की रचना नहीं कर सकता। समूह के सदस्यों के बीच पारस्परिक अंतः क्रिया पायी जाती है। परिवार, जाति तथा नातेदारी आदि समूह के उदाहरण हैं।
  • समूह के सदस्यों के संबंधों में स्थायित्व पाया जाता है। समूह की सदस्यता औपचारिक अथवा अनौपचारिक हो सकती है।

प्रश्न 20.
समूह की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समूह से हमारा तात्पर्य व्यक्तियों के उस संजलन से है जो एक-दूसरे के साथ सामाजिक संबंध रखते हैं।” दूसरे शब्दों में समूह वह है जसमें एकीकृत करने वाले संबंधों के आधार पर कुछ लोग एक स्थान पर एकत्रित होता है।

प्रश्न 21.
सामाजिक नियंत्रण के कोई दो उद्देश्य बताइए?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण के दो उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
(i) सामाजिक व्यवस्था को कायम रखना-किबाल यंग के अनुसार, “सामाजिक नियंत्रण का उद्देश्य एक विशिष्ट समूह अथवा समाज की समरूपता, एकता एवं निरंतरता को लाना है।” अतः प्रत्येक समाज अथवा समूह सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखता है। समाज के सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सामाजिक व्यवस्था, मूल्यों तथा प्रतिमानों के अनुरूप कार्य करें।

(ii) सामूहिक निर्णयों का पालन-सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत समाज के सदस्य सामूहिक निर्णयों का पालन करते हैं। सामूहिक निर्णयों के पालन करने से सामाजिक एकरूपता तथा व्यवस्था कायम रहती है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक युग में प्राथमिक समूह के क्या-क्या कार्य हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह समस्त सामाजिक संगठन का केन्द्र बिंदु है। इसका आकार लघु होता है तथा इसमें सदस्यों की संख्या कम होती है।

प्राथमिक समूहों के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं –

  • व्यक्ति के विकास में प्राथमिक समूहों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, उदाहरण के लिए परिवार व्यक्ति के विकास की नर्सरी है।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक नियंत्रण के महत्त्वपर्ण अभिकरण हैं, उदाहरण के लिए परिवार तथा मित्र मंडली आदि सदस्यों को समाज के आदर्शों तथा मूल्यों से अवगत कराते हैं।
  • प्राथमिक समूह व्यक्तियों को भावनात्मक तथा मानसिक संतुष्टि प्रदान करते हैं।
  • प्राथमिक समूह व्यक्तियों को समाज में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए मंच प्रदान करते हैं प्राथमिक समूहों में व्यक्तियों में समाजिक तथा संस्कारो का पाठ पढ़ाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक समूह और द्वितीयक समूह की तुलना कीजिए?
उत्तर:
प्राथमिक समूह तथा द्वितीयक समूह में निम्नलिखित अन्तर हैं –
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प्रश्न 3.
समूह किस प्रकार बनते है?
उत्तर:
(i) मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जन्म के समय केवल एक जैविक समावयव होता है, लेकिन सामाजिक समूहों में उसका समाजीकरण होता है।

(ii) समूह में मनुष्य की जैविक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इस प्रकार समूहों का निर्माण सामान्य स्वार्थों के कारण होता
है। एडवर्ड सेपीर के अनुसार, “किसी समूह का निर्माण इस तथ्य पर आधारित होता है कि कोई स्वार्थ समूह के सदस्यों को परस्पर बांधे रखता है।”

(iii) समूह निर्माण दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा कुछ सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जाता है। बोगार्डस के अनुसार, “एक सामाजिक समूह दो या दो अधिक व्यक्तियों की ऐसी संख्या को कहते हैं जिनका ध्यान कुछ सामान्य उद्देश्यों पर हो तथा जो एक-दूसरे को प्रेरणा दें, जिनमें सामान्य निष्ठा हो तथा जो सामन्य क्रियाओं में सम्मिलित हों।”

(iv) सामाजिक समूह के निर्माण के लिए सदस्यों में पारस्परिक चेतना तथा अंतः क्रिया का होना बहुत आवश्यक है। केवल भौतिक निकटता के द्वारा समूह का निर्माण नहीं होता है।

(v) समूह के सदस्यों में सहयोग, संघर्ष तथा प्रतिस्पर्धा पायी जाती है।

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प्रश्न 4.
“व्यक्ति का जीवन समूह का जीवन है। चर्चा कीजिए?
उत्तर:
(i) व्यक्ति तथा समूह एक-दूसरे के पूरक हैं। समूह वास्तविक रूप में समाजिक जीवन के केंद्र बिंदु हैं।

(ii) समूह का अर्थ जैसा कि मेकाइवर तथा पेज ने लिखा है कि “मनुष्यों के ऐसे संकलन से है जो एक-दूसरे के साथ सामाजिक संबंध रखते हैं।

(iii) समूह अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिए समूह पर निर्भर रहता है। समूह में ही व्यक्ति अपनी क्षमताओं तथा उपलब्धियों का प्रदर्शन करता है। हॉर्टन तथा हंट के अनुसार, “समूह व्यक्तियों का संग्रह अथवा श्रेणियाँ होती हैं, जिनमें सदस्यता एवं अतः क्रिया की चेतना पायी जाती है।”

(iv) समूहों में पाया जाने वाला विभेदीकरण, श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण सामाजिक जीवन व्यतीत करने का अपरिहार्य तत्त्व है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि समूह द्वारा वह सब प्रस्तुत किया जाता है, जो मानव-जीवन के लिए आवश्यक है।

(v) पारस्परिक संबंध, हम की भावना, अंत: क्रिया, सामान्य हित तथा समूह के आदर्श नियम व्यक्ति के सामजिक तथा जैविक अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। आगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “……. जब कभी दो या दो से अधिक व्यक्ति एक साथ मिलते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।

सारांशः समूह तथा ब्यक्ति इस प्रकार एक-दूसरे के पूरक हैं कि एक के अभाव में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 5.
समूह के लिए मानकों की सार्थकता बताइए?
उत्तर:
मानक समाज तथा समूह में व्यक्ति का वांछित तथा अपेक्षित व्यवहार है। वे निर्देश, जिनका अनुसरण व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के साथ अंतः क्रिया करते समय करता है, मानक कहलाते हैं।

मानक वस्तुतः समाज में व्यवहार के वे पुंजी है जो व्यक्तियों को परिस्थिति में विशेष में व्यवहार करने के बारे में बतलाता है। ब्रूम तथा सेल्जनिक के अनुसार, “आदर्श मानक व्यवहार की वे रूप-रेखाएँ हैं जो उन सीमाओं का निर्धारण करती हैं जिनके अंदर व्यक्ति अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु विकल्पात्मक विधियों की खोज कर सकता है।”

समूह के लिए मानकों की सार्थकता का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) सभी समाजों के मानकों की एक सुपरिभाषित व्यवस्था होती है जो उचित तथा म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11 9 31 अनुचित नैतिक एवं अनैतिक में स्पष्ट भेद करती है। इनका अभाव में सामाजिक व्यवस्था अराजकता ग्रसित हो जाएगी।

(ii) मानक वास्तव में समूह द्वारा मानकीकृत अवधारणाएँ हैं। मानकों के द्वारा व्यक्तियों का व्यवहार सीमित किया जाता है । डेविस के अनुसार, “सामाजिक मानक एक प्रकार का नियंत्रण . है। मानव समाज इन्हीं नियंत्रणों के आधार पर अपने सदस्यों के व्यवहार पर इस प्रकार अंकुश लगाता है, जससे वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान के रूप में कार्य करते रहें, भले ही उनकी प्राणीशास्त्रीय जरूरतों में इसे बाधा पहुँचती है।”

(iii) मानकों का औचित्य समाज तथा समूह के अनुसार बदलता रहता है।

(iv) जो मानक हमें एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करने का निर्देश देते हैं तथा कुछ कार्य करने से रोकते हैं, आदेशात्मक मानक कहलाते हैं। उदाहरण के लिए यातायात के नियमों के अनुसार हम वाहनों को बाई ओर चला सकते हैं लेकिन लालबत्ती होने पर वाहन चलाना यातायात के नियमों के विरुद्ध है। निषेधात्मक मानक है।

(v) मानकों ही द्वारा व्यक्ति के व्यवहार का समाज में निर्धारण होता है। विशेष सामाजिक परिस्थितियों के लिए विशेष मानक निश्चित होते हैं। उहारण के लिए, किसी व्यक्ति के अंतिम संस्कार के समय अन्य व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे उदास तथा दुःखी होंगे।

(vi) मानक सार्वभौम होते हैं। बीरस्टीड के असार, “जहाँ आदर्श मानक नहीं है, वहाँ समाज भी नहीं है।”

(vii) सामाजिक मानकों का संबंध सामाजिक उपयोगिता से है।

(viii) आदर्श मानक सामाजिक ताने-बाने को दृढ़ता प्रदान करते हैं।

(ix) मानक व्यक्तियों की मनोवृत्तियों तथा उद्देश्यों को प्रभावित करते हैं।

(x) मानक विहीन समाज असंभव है।

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प्रश्न 6.
टिप्पणी लिखिए – (i) प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति, (ii) मानक तथा (iii) भूमिका कुलक।
उत्तर:
(i) (क) प्रदत्त तथा अर्जित प्रस्थिति – समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धारण निम्नलिखित दो प्रक्रियाओं के द्वारा होता है

प्रदत प्रस्थिति – लेपियर के अदुसार, “वह परिस्थिति जो एक व्यक्ति के जन्म पर या उसके कुछ क्षण बाद ही प्रदत्त होती है, विस्तृत रूप में निश्चित करती है कि उसका समाजीकरण कौन-सी दिशा लेगा।”

व्यक्ति की प्रदत्त स्थिति क निर्धारण में निम्नलिखित तत्त्व महत्त्वपूर्ण हैं –

  • लिंग
  • आयु
  • नातेदारी तथा
  • सामाजिक कारक

(ख) (ii) अर्जित प्रस्थिति-अर्जित प्रस्थिति व्यक्ति अपने निजी परिश्रम तथा योग्यता के आधार पर प्राप्त करता है। अर्जित प्रस्थिति आधुनिक समाज की विशेषता है। अर्जित प्रस्थिति के अंतर्गत व्यक्ति के समूह में स्थिति उसमें व्यक्तिगत गुणों के आधार पर निश्चित की जाती है। जिन समाजों के श्रम विभाजन, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण उच्च श्रेणी का होता है, वहाँ अर्जित प्रस्थिति अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।

मानक – वे निर्देश जिनका पालन समाज में व्यक्ति अन्य व्यक्यिों के साथ अंतः क्रिया करते समय करता है, मानक कहलाते हैं। मानकों द्वारा इस बात का निर्धारण किया जाता है कि परिस्थिति विशेष में व्यक्ति का किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। समाज तथा समूह की प्रकृति के अनुसार मानक बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए एक सामज में किसी कार्य को सामाजिक मान्यता मिलती है, जबकि दूसरे समाज में वही कार्य निंदनीय हो सकता है। मानक दो प्रकार के होते हैं –

  • आदेशात्मक मानक तथा
  • निषेधात्मक मानक

बर्टन राइट के अनुसार, “सामाजिक मानकों की एक सामान्य यह है कि वे व्यवहार के उचित तरीकों को स्पष्ट करते हैं।”

मानकों की विशेषताएँ –

  • उचित तथा अनुचित के आधार पर व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करना।
  • मानक सामाजिक नियंत्रण के प्रभाव साधन हैं।
  • मानक सामाजिक संरचना को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • मानकों का विकास सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार होता है।
  • कुछ मानकों की प्रकृति सर्वमान्य होती है।
  • मानकों में समाज के नियमों, आदर्शों, विचारों तथा मूल्यों का समावेश होता है।
  • सामाजिक मानक समूह की अपेक्षाएँ हैं।

(iii) भूमिका-कुलक – समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति के अनुसार ही उसका अपेक्षित व्यवहार होता है। लुंडबर्ग के अनुसार, “सामाजिक भूमिका किसी समूह अथवा प्रस्थिति में व्यक्ति से प्रत्याशित व्यवहार का प्रतिमान है।” डेविस के अनुसार, भूमिका वह ढंग है जिसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने पद के दायित्वों को वास्तविक रूप से पुरा करता है।” प्रत्येक प्रस्थिति से भूमिका अथवा भूमिकाएँ जुड़ी रहती हैं। व्यक्ति की प्रस्थिति संबद्ध समस्त भूमिकाएँ मिलकर भूमिका-कुलक का निर्माण करती है।

रॉबर्ट मर्टन के अनुसार, “भूमिका कुलक संबंधों का वह पूरक है जिसे व्यक्ति किसी एक सामाजिक स्थिति के धारक के कारण प्राप्त करता है।” उदाहरण के लिए एक स्कूल का विद्यार्थी होने के कारण उस विद्यार्थी होने के कारण उस विद्यार्थी को कक्षध्यक्ष अन्य शिक्षकाओं के इस कुलक को भूमिका-कुलक कहते हैं। अपने परिवार में इस विद्यार्थी का भूमिका-कुलक पृथक् होगा । वह माता-पिता, भाई-बहन तथा परिवार के अन्य सदस्यों से अंतः क्रिया करेगा।

प्रश्न 7.
अंत: समूह तथा बाह्य समूह में अंतर है –
उत्तर:
अंतः समूह तथा बाह्य समूह में निम्नलिखित अंतर हैं –
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प्रश्न 8.
कुछ समाजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण को अपरिहार्य क्यों मानते हैं?
उत्तर:
कुछ सामजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण को निम्नलिखित कारणों से अपरिहार्य मानते हैं –
(i) मानव समाज में असमानता प्रारम्भ से ही पायी जाती है। असमानता पाये जाने का प्रमुख कारण यह है कि समाज में भूमि, धन, संमत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा जैसे संसाधनों का वितरण . समान नहीं होता है।

(ii) विद्वानों का मत है कि यदि किसी समाज के समस्त सदस्यों को समानता का दर्जा दे भी दिया जाए तो कुछ समय पश्चात् उस समाज के व्यक्तियों में असमानता आ जाएगी। इस प्रकार में असमानता एक सामाजिक तथ्य है।

(iii) गम्पलोविज तथा ओपेनहीमर आदि समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण की शुरूआत एक समूह द्वारा दूसरे समूह पर हुई।

(iv) जीतने वाला समूह अपने को उच्च तथा श्रेष्ठ श्रेणी का समझने लगा। सीसल नार्थ का विचार है कि “जब तक जीवन का शांति पूर्ण क्रम चलता रहा, तब तक कोई तीव्र तथा स्थायी श्रेणी-विभाजन प्रकट नहीं हुआ।”

(v) प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस का मत है कि सामाजिक अचेतना अचेतन रूप से अपनायी जाती है। इसके माध्यम से विभिन्न समाज यह बात कहते हैं कि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पदों पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का नियुक्त किया गया है । इस प्रकार प्रत्येक समाज में सामाजिक स्तरीकरण अपरिहार्य है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

प्रश्न 9.
स्तरीकरण की खुली व बंद व्यवस्था में अंतर स्पष्ट किजिए?
उत्तर:
स्तरीकरण की खुली तथा बंद व्यवस्था में अग्रलिखित अंतर है –
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प्रश्न 10.
औपचारिक तथा अनौपचारिक समूहों में क्या अंतर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
औपचारिक तथा अनौपचारिक समूहों में निम्नलिखित अंतर हैं –
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प्रश्न 11.
प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति में अंतर बताइए ? उचित उदाहरण देकर समझाए ?
उत्तर:
(i) प्रदत्त प्रस्थिति – प्रदत्त प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जो किसी व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर या आयु, लिंग, वंश; जाति तथा विवाह आदि के आधार पर प्राप्त होता है। लेपियर के अनुसार, “वह स्थिति जो एक व्यक्ति जन्म पर या उसके कुछ ही क्षण बाद अभिरोपित होती है, विस्तृत रूप में निश्चित करती है कि उसका समाजीकरण कौन सी दिशा लेगा। अपनी संस्कृति के अनुसार-पुलिंग या स्त्रिीलिंग निम्न या उच्च वर्ग के व्यक्ति के रूप में उसका पोषण किया जो सकेगा। वह कम या अधिक प्रभावशाली रूप में अपनी उस स्थिति से समजीकृत होगा जो उस पर अभिरोपित है।”

प्रदत्त प्रस्थिति का निर्धारण सामाजिक व्यवस्था के मानकों द्वारा निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उच्च जाति में जन्म के द्वारा किसी व्यक्ति को समाज में जो प्रस्थिति प्राप्त होती है वह उसकी प्रदत्त प्रस्थिति है। इसी प्रकार एक धनी परिवार में जन्म लेने वाले बालक की। सामाजिक प्रस्थिति एक निर्धन परिवार में जन्म लेने वाले बालक से भिन्न होती है।

(ii) अर्जित प्रस्थिति अर्जित प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जिसे व्यक्ति अपने निजी प्रयासों से प्राप्त करता है। लेपियर के अनुसार, “अर्जित प्रस्थिति वह स्थिति है, जो साधारणतः लेकिन अनिर्वायता: नहीं किसी व्यक्तिगत सफलता के लिए, इस अनुमान पर पुरस्कारस्वरूप स्वीकृत होती है कि जो सेवाएँ अपने अतीत में की सब भविष्य में भी जारी रहेगी। “उदाहरण के लिए कोई भी व्यक्ति अपने निजी प्रयासों के आधार पर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, अधिकरी आदि बन सकता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक नियंत्रण प्राथमिक समूहों में कैसे कार्य करते हैं?
उत्तर:
(i) प्राथमिक समूहों में सामाजिक नियंत्रण काफी अधिक होता है। परिवार, धर्म वैवाहिक नियम, जनरीतियाँ, रूढ़ियाँ प्रथाएँ गोत्र तथा पड़ोस आदि प्राथमिक समूह हैं।

(ii) प्राथमिक समूह व्यक्ति के व्यवहार तथा सामाजिक आचरण पर कठोर नियंत्रण रखते हैं। पी. एच. लैडिस के अनुसार, “जितना ही एक समूह अधिक समरस होता है उतनी ही अधिक कठोर तथा प्रभावी सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था होती है।”

(iii) प्रेम, स्नेह, सहानुभूति, ईमानदारी, निष्ठा, विनम्रता तथा न्याय आदि समूहों के प्राथमिक आदर्श होते हैं। प्राथमिक समूहों में एक-दूसरे की भावनाओं तथा मान-मर्यादा का ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के लिए परिवार की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए युवक-युवतियाँ अन्तर्जातीय विवाह के पक्ष में होते हुए भी ऐसा इसलिए नहीं करते हैं, क्योंकि इससे उनके माता-पिता की भावनाओं को ठोस पहुंचेगी।

(iv) प्राथमिक समूहों में प्रतिष्ठा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति ऐसे कार्य नहीं करते हैं जिनके उनके परिवार, जाति या समुदाय की प्रतिष्ठा का धब्बा लगे। व्यक्ति यह भी नहीं चाहते हैं कि दूसरे लोग उनका मजाक करें अथवा उनके बारे में अफवाहें उड़ाएँ । प्राथमिक समूह के लोग यह भी सोचते हैं कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं अथवा क्या मत रखते हैं।

(v) हँसी भी एक अत्यधिक प्रभावशाली समाजिक नियंत्रण है। कोई भी व्यक्ति अपने समूह में हँसी का पात्र नहीं बनना चाहता है। लैडिस क अनुसार, “हँसी एक प्रसन्नमुखी सिपाही है, ….. यह व्यक्ति की बुद्धिमत्ता की माप है तथा कभी-कभी एक भंयकर हथियार सिपाही है,” . इस प्रकार हम कह सकते है कि सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन तथा विधियाँ प्राथमिक समूहों में प्रभावशाली ढंग से कार्य करते हैं।

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प्रश्न 13.
सामाजिक नियंत्रण में रीति-रिवाजों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
(i) रीति-रिवाज सामाजिक नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रीति-रिवाज प्राथमिक समूहों में अत्यधिक प्रभावी होते हैं।

(ii) रीति-रिवाज सामूहिक व्यवहार के रूप में समाज में मान्यता प्राप्त कर लेते हैं तथा व्यक्ति इन्हें बिना सोचे-विचारे स्वीकार कर लेता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज से मान्यता प्राप्त कार्य करने की विधियाँ ही समाज की प्रथाएँ हैं।”

(iii) रीति-रिवाजों को सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में स्वीकार कने के पीछे एक मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है। व्यक्ति साधारणतया यह सोचते हैं कि जिस कार्य को उसे पूर्वजों के द्वारा किया गया तथा उसमें उन्हें लाभ हुआ है तो उन कार्यों को जारी रखना चाहिए । इस प्रकार रीति-रिवाजों का पालन करने के पीछे दो भावनाएँ निहित हैं –

  • पूर्वजों की भावनाओं का समान करना।
  • रीति-रिवाजों का स्थायित्व तथा उपयोगिता।

(iv) रीति-रिवाज समाजिक विरासत के. भंडार हैं। इनके द्वारा संस्कृति का संरक्षण किया जाता है तथा उसे (स्वीकृति को) आने वाली पीढ़ी का हस्तांतरित कर दिया जाता है। बोगार्डस के अनुसार, “रीति-रिवाजों तथा परंपराएँ समूह के द्वारा स्वीकृत नियंत्रण की वे पद्धतियाँ है जो सुव्यवस्थिति हो जाती हैं तथा जिन्हें बिना सोचे-विचारे मान्यता प्रदान कर दी जाती है तथा जो. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती हैं।”

(v) रीति-रिवाजों व्यक्ति के संपूर्ण जीवन के चारों तरफ एक ताना-बाना बुन देते हैं। व्यक्ति के जीवन से मृत्यु तक रीति-रिवाजों का न टूटने वाला सिलसिला जारी रहता है। रीति-रिवाज उनकी मनोवृति, संस्कार तथा आचार, व्यवहार को प्रभावित करते हुए सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं। कोई भी समूह, संप्रदाय तथा समाज रीति-रिवाजों से मुक्त नहीं है। बेकन ने रीति-रिवाजों को ‘मनुष्य के जीवन का प्रमुख न्यायाधीश’ माना है जिन-जातियों में रिति-रिवाजों के उल्लंघन की कल्पना की नहीं की जा सकती है।
अतः हम कह सकते हैं कि समाजिक नियंत्रण में रीति-रिवाजों की महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावशाली भूमिका है।

प्रश्न 14.
लिंग के आधार पर स्तरीकरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर:

  • लिंग के आधार पर भी सामाजिक संस्तरण किया जाता है। इसके अंतर्गत पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग में अंतर किया जाता है।
  • महिला आंदोलन के कारण लिंग पर आधारित भेदभावों को हटाने का सतत् प्रयास किया जा रहा है।
  • वर्तमान समाय में लिंग भेद की अवधारणा जैविक भिन्नता से अलग हो गई है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार भिन्नता भूमिकाओं तथा संबंधों के संदर्भ में देखी जानी चाहिए।
  • लिंग की भूमिकाएं अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं लेकिन लिंग आधारित स्तरीकरण सार्वभौमिक होता है। उदाहरण के लिए, पितृसत्तात्मक समाजों में पुरूषों के कार्यों को स्त्रियों की अपेक्षा अधिक महत्त्व प्रदान किया जाता है।
  • समाज में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा संस्कृतिक संरचनाओं पर पुरुषों का दबदबा कायम रहता है।
  • लिंग की समानता के समर्थक शिक्षा, सार्वजनिक अधिकरों में भागीदारी तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए स्त्रियों को समर्थ बनाए जाने के हिमायती हैं।
  • वर्तमान समय में लिंग पर आधारित असमानताओं को हटाने की बात अधिक जोरदार तरीके से उठायी जा रही है।

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प्रश्न 15.
समाजिक नियंत्रण समाज में किस प्रकार कार्य करता है?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण समाज में निम्नलिखित प्रकार से कार्य करता है –

  •  सामाजिक नियंत्रण एक बाह्य शक्ति के रूप में समाज अथवा समूह में व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करता है।
  • लैंडिस के अनुसार, “सामाजिक नियंत्रण, व्यक्ति की स्वयं अपने से रक्षा करने तथा समाज को अव्यवस्था से बचाने के लिए आवश्यक है।”
  • सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक तथा औपचारिक साधन सामाजिक व्यवहार में एकता, समरूपता तथा स्थायित्व बनाए रखने का कार्य करते हैं।
  • के यंग के अनुसार, “समाजिक नियंत्रण का उद्देश्य एक विशिष्ट समूह अथवा सामाज की समरूपता, एकता तथा निरन्तरता का लाना है”
  • सामाजिक नियंत्रण के साधन समाज या समूह के अनुरूप बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिमी समाजों की संरचना भारतीय समाज की संरचना से भिन्न है।
  • इस भिन्नता के कारण सामाजिक नियंत्रण के कार्यों तथा स्वरूपों में भी भिन्नता आ जाती है।
  • सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन अनौपचारिक साधनों के रूप में भी कार्य करते है।
  • ग्रामीण समाजों में प्राथमिक समूह तथा संस्थाएँ जैसे परिवार तथा विवाह संस्था सामाजिक नियंत्रित के प्रभावशाली साधन हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक नियंत्रण क्या है? क्या आप सोचते हैं कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में समाजिक नियंत्रण के साधन अलग-अलग होते हैं? चर्चा करें।
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण का अर्थ – समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। सामाजिक संबंधों को नियमित, निर्देशित तथा सकारात्मक बनाने के लिए उन्हें नियंत्रित किया जाना आवश्यक है। सामाजिक संगठन के अस्तित्व तथा प्रगति के लिए भी नियंत्रिण आवश्यक है। समाजशास्त्रियों द्वारा नियंत्रण के इन प्रकारों को ही ‘सामाजिक नियंत्रण’ कहा गया है।

सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न साधन – सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तथा उसे स्थायित्व एवं निरन्तरता प्रदान के लिए सामाजिक नियंत्रण अपरिहार्य है। वस्तुतः सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न साधन तथा प्रकार सामाजिक संरचना तथा समाज के प्रकार के अनुरूप होते हैं। विभिन्न सामाजशास्त्रियों ने सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न प्रकार बताए हैं

(i) ई० ए० रॉस० के अनुसार –

  • जनमत
  • कानून
  • प्रथा
  • धर्म
  • नैतिकता
  • सामाजिक सुझाव
  • व्यक्तित्व
  • लोकरीतियाँ
  • लोकाचार

(ii) किंबाल यंग के अनुसार –

  • सकारात्मक साधन
  • नकारात्मक साधन

(iii) एफ० ई० लूम्बे के अनुसार –

  • बल पर आधारित साधन
  • प्रतीकों पर आधारित साधन

वर्तमान समय में समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक नियंत्रण के साधनों को निम्नलिखित दो प्रकारों में बाँटा गया है –

  • अनौपचारिक साधन तथा
  • औपचारिक साधन

(i) सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन – समाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों का विकास स्वतः हो जाता है। समाज की आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होने वाले साधन निम्नलिखित हैं –

(a) जनरीतियाँ – जनरीतियाँ सामाजिक व्यवहार की स्वीकृत विधियाँ हैं। सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “जनरीतियाँ समाज में मान्यताप्राप्त अथवा स्वीकृत व्यवहार करने की विधियाँ हैं। जनरीतियाँ सामाजिक संस्कृति की आधारशिलाएँ हैं। जनरीतियों का उल्लंघन आसानी से नहीं किया जा सकता है।

(b) प्रथाएँ – सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में प्रथाएँ भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। वास्तव में, प्रथाएँ जनरीतियों का ही विकसित रूप हैं। प्रथाओं का उल्लंघन करना ‘सामाजिक अपराध’ समझा जाता है। बोगार्डस के अनुसार, “प्रथाएँ तथा परंपराएँ समूह के द्वारा स्वीकृत नियंत्रण की वे पद्धतियाँ हैं जो सुव्यवस्थित हो जाती हैं तथा जिन्हें बिना सोचे-विचारे मान्यता दे दी जाती है और जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं।

(c) रूढ़ियाँ या लोकाचार – रूढ़ियाँ या लोकाचार को समूह कल्याण के लिए आवश्यक समझा जाता है। समाज के लोकाचार समाजिक नियंत्रण के सशक्त साधन हैं। लोकाचार मानव व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। उदाहरण के लिए मद्यनिषेध तथा एक पत्नी विवाह आदि स्थापित लोकाचर हैं। लोकाचार का उल्लघंन करने पर समाज दंड देता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “इसलिये ऐसा तर्क दिया जाता है कि जब जनरीतियाँ अपने साथ में समूह के कल्याण की भावना व अनुचित के मापदंड को जोड़ लेती हैं तो वे रूढ़ियों में बदल जाती हैं।”

(d) धर्म – समाज में मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म आस्थाओं पर आधारित होता है। धर्म सामाजिक संबंधों स्वरूप को प्रभावित करता है। होबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।”

(e) जनमत – जनमत भी समाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक साधन है। सार्वजनिक अपमान तथ उपहास के कारण व्यक्ति जनमत की अवहेलना नहीं करता है । व्यक्ति सामज द्वारा स्वीकृत प्रतिमानों के अनुरूप ही कार्य करता है। द्वितीयक तथा तृतीयक समूहों में जनमत का प्रभाव काफी अधिक होता है।

(ii) सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन –

(a) कानून-सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों में कानून सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। जैसे-जैसे समाज विस्तृत तथा जटिल होता चला जाता है वैसे-वैस प्राथमिक संबंधों के स्थान पर द्वितीयक तथा तृतीयक संबंध अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। आधुनिक समाज में व्यक्तियों के संबंधों को नियमित तथा निर्देशित करने के लिए कानून तथा दंड की व्यवस्था की गई है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि जटिल अथवा आधुनिक समाजों में अनेक जनरीतियों, लोकाचारों तथा प्रथाओं को औपचारीकृत कर कानून का स्वरूप प्रदान कर दिया जाता है।

(b) राज्य – राज्य औपचारिक तरीकों द्वारा सामाजिक नियंत्रण स्थापित करता है। राज्य का कार्यक्षेत्र अत्यधिक व्यापक होता है। राज्य के संवैधानिक कानूनों द्वारा व्यक्तियों पर सामजिक नियंत्रण रखा जाता है।

(c) शिक्षा-शिक्षा औपचारिक सामाजिक नियंत्रण किा अत्यंत सशक्त तथा सर्वव्यापी साधन है। शिक्षा के माध्यम से बच्चों को समाजीकरण किया जाता है। तर्कपूर्ण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण के संतुलित विकास हेतु शिक्षा अपरिहार्य है। शिक्षा द्वारा सामाजिक संरचना के उस आधार को विकसित किया जाता है जो व्यक्तियों को सामाजिक विचलन तथा विघटन के नकारात्मक मार्ग से रोकते हैं।

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प्रश्न 2.
समाज के सदस्य के रूप में आप समूहों में और विभिन्न समूहों के साथ अंतः क्रिया करते होंगे। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इन समूहों को आप किस प्रकार देखते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्र मानव के सामाजिक जीवन का अध्ययन है। मानवीय जीवन की एक पारिभाषिक विशेषता यह है कि मनुष्य परस्पर अंतः क्रिया करता है, बातचीत करता है और सामाजिक सामूहिकता को बनाता भी है। समाजशास्त्र का तुलनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण दो स्पष्ट अहानिकारक तथ्यों को सामने लाता है। प्रथम, प्रत्येक समाज में चाहे वह प्राचीन अथवा सामंतीय तथा आधुनिक हो, एशियन या यूरोपियन अथवा अफ्रीकन हो, मानवीय समूह और सामूहिकता पाई जाती है।

द्वितीय, विभिन्न समाजों में समूहों और सामूहिकताओं के प्रकार अलग-अलग होते हैं। – किसी भी तरह से लोगों का इक्ट्ठा होना एक सामाजिक समूह बनाता है। समुच्चय केवल लोगों का जमावड़ा होता है जो एक समय में एक ही स्थान पर होते हैं लेकिन एक-दूसरे से कोई निश्चित संबंध नहीं रखते। एक रेलवे स्टेशन अथवा हवाई अड्डा अथवा बस स्टॉप पर प्रतीक्षा करते यात्री अथवा सिनेमा दर्शक समुच्चयों के उदाहरण हैं। इन समुच्चयस को प्रायः अर्ध-समूहों का नाम दिया जाता है।

एक अर्ध-समूह एक समुच्चय अथवा संयोजन होता है, जिसमें संरचना अथवा संगठन की कमी होती है और जिसके सदस्य समूह के अस्तित्व के प्रति अनभिज्ञ अथवा कम जागरूकता होते हैं। सामाजिक वर्गों, प्रस्थिति समूहों, आयु एवं लिंग समूहों व भीड़ को अर्थ-समूह के उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है। जैसा कि उदाहरण दर्शाते हैं, अर्ध-समूह समय और विशेष परिस्थतियों में सामाजिक समूह बन सकते हैं।

उदाहरणार्थ यह संभव है कि एक विशेष सामाजिक वर्ग अथवा जाति अथवा समुदाय से संबंधित व्यक्ति एक सामूहिक निकाय के रूप में संगठित न हो.। उनमें अभी ‘हम’ की भावना आना शेष हो, परन्तु वर्गों और जातियों ने समय के बीतने के साथ-साथ राजनीतिक दलों का जन्म दिया है। उसी प्रकार भारत के विभिन्न समुदायों के लोगों ने लंबे उपनिवेशिक विरोधी संघर्ष के साथ-साथ अपनी पहचान एक सामूहिक और समूह के रूप में विकसित की है: एक राष्ट्र जिसका मिला-जुला अतीत और साझा भविष्य है। महिला आंदोलन ने महिलाओं के समूह और संगठनों का विचार सामने रखा। ये सभी उदाहरण इस बात की ओर ध्यान खींचते हैं कि किस प्रकार सामाजिक समूह उभरते हैं, परिवर्तित होते हैं और संशोधित होते हैं।

एक सामाजिक समूह में कम से कम निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए –

  • निरंतरता के लिए स्थायी अंतः क्रिया
  • इन अंत: क्रियाओं का स्थिर प्रतिमान
  • दूसरे सदस्यों के साथ पहचान बनाने के लिए अपनत्व की भावना
  • सांझी रुचि
  • सामान्य मानकों और मूल्यों को अपनाना
  • एक परिभाषित संरचना।

प्रश्न 3.
अपने समाज में उपस्थित स्तरीकरण की व्यवस्था के बारे में आपका क्या प्रेक्षण है? स्तरीकरण से व्यक्तिगत जीवन कि प्रकार प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
हमारे समाज में जाति पर आधारित स्तरीकरण व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति की स्थिति पूरी तरह से जन्म द्वारा प्रदत्त प्रस्थिति पर आधारित होती है न कि उन पदों पर जो व्यक्ति ने अपने जीवन में प्राप्त किए हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि एक वर्ग समाज में उपलब्धि पर कोई योजनाबद्ध प्रतिबंध नहीं होता जो कि प्रजाति और लिंग सरीखी प्रदत्त प्रस्थिति द्वारा थोपा जाता है। हालांकि एक जातिवादी समाज में जन्म द्वारा प्रदत्त एक व्यक्ति की स्थिति को, एक वर्ग समाज की तुलना में ज्यादा पूर्ण ढंग से परिभाषित करती है।

परंपरागत भारतीय समाज में, विभिन्न जातियाँ सामाजिक श्रेष्ठता को श्रेणीबद्ध करती हैं। जाति संरचना में प्रत्येक स्थान दूसरों के संबंध में इसकी शुद्धता या अपवित्रता के रूप में परिभाषित था। इसके पीछे यह विश्वास था कि पुरोहितीय जाति ब्राह्मण जो कि सबसे अधिक पवित्र है, शेष सबसे श्रेष्ठ है और पंचम, जिनको कई बार ‘बाह्य जाति’ कहा गया, सबसे निम्न है। परम्परागत व्यवस्था को सामान्यतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के चार वर्णों; के रूप में व्यक्त किया गया है। वास्तव में व्यवसाय पर आधारित अनगिनत जाति समूह होते हैं जिन्हें जाति कहा जाता है।

स्तरीकरण की इस व्यवस्था से व्यक्तिगत जीवन बहुत अधिक प्रभावित हो रहा है। आज भी बहुत से जातिगत भेदभाव उपस्थित है। समाज में निम्न श्रेणी का कार्य करने वाली जातियों को समाज आज भी हेय दृष्टि से देखता है पर साथ ही लोकतंत्र की कार्य प्रणाली ने जाति व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। जाति समूह के रूप में सुदृढ़ हुई है। भेदभावग्रस्त जातियों को समाज में अपने लोकतंत्रीय अधिकारों के प्रयोग के लिए संघर्ष करते भी देखा गया है।

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प्रश्न 4.
प्राथमिक समूह का अर्थ, विशेषताएँ तथा महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) प्राथमिक समूह का अर्थ – प्रसिद्ध समाजशास्त्री कूले द्वारा प्राथमिक समूह की अवधारणा का प्रतिपादन किया गया। कूले ने अपनी पुस्तक Social Organisation में प्राथमिक समूह की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “प्राथमिक समूह से मेरा तात्पर्य उन समूहों से है जिनकी विशेषता आमने-सामने का घनिष्ठ संपर्क तथा सहयोग है । वे प्राथमिक कई दृष्टिकोणों से हैं, परंतु मुख्यतः इस कारण से हैं कि वे व्यक्ति की सामाजिक प्रकृति एवं आदर्शों के निर्माण करने में मौलिक हैं………जिसके लिए ‘हम’ स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।”

कूले की प्राथमिक समूह की परिभाषा से निम्नलिखित बिन्दु स्पष्ट हो जाते हैं –

  • प्राथमिक समूह में आमने-सामने के घनिष्ठ संपर्क होते हैं।
  • प्राथमिक समूह में ‘हम की भावना’ पायी जाती है।
  • प्राथमिक समूह में सहानुभूति तथा एकता पायी जाती है।
  • प्राथमिक समूहों में घनिष्ठ वैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं, उदाहरण के लिए परिवार, क्रीड़ा मंडली, मित्र-मंडली तथा पड़ोस आदि प्राथमिक समूह हैं।

(ii) प्राथमिक समूह की विशेषताएँ –

  • शारीरिक समीपता-प्राथमिक समूहों में व्यक्तियों के बीच शारीरिक समीपता पायी जाती है। प्राथमिक समूह के सदस्य साथ-साथ रहते हैं तथा उनमें भावनात्मक घनिष्ठता पायी जाती है। सदस्यों के बीच वैयक्तिक संबंध होते हैं।
  • लघु आकार-प्राथमिक समूहों का आकार छोटा होता है तथा सदस्यों की संख्या कम होती है। समूह के सदस्यों के बीच आमने-सामने के संबंध पाए जाते हैं।
  • निरन्तरता तथा स्थिरता-प्राथमिक समूहों में आपसी संबंधां में निरंतरता तथा स्थिरता पायी जाती है। उदाहरण के लिए परिवार के सदस्यों के बीच निरन्तरता तथा स्थिरता पायी जाती है।
  • उद्देश्यों की समानता-प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच उद्देश्यों की समानता पायी जाती है। समूह के सभी सदस्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मिल-जुलकर प्रयत्न करते हैं। पारस्परिक कल्याण तथा हित प्रमुख उद्देश्य होता है।
  • संबंध स्वयं साध्य होता है-प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच संबंध किसी विशिष्ट उद्देश्य के साधन के रूप में न होकर साध्य होते हैं, उन्हें आर्थिक या सामाजिक पैमानों पर नहीं मापा जा सकता है।
  • उदाहरण के लिए, पिता-पुत्र तथा पति-पत्नी के बीच संबंधों को अनिवार्य रूप से स्वीकार नहीं कराया जाता अपितु वे स्वयं विकसित हो जाते हैं।
  • संबंध वैयक्तिक होते हैं-प्राथमिक समूहों में सदस्यों के बीच वैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं। इन संबंधों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, भाई तथा बहन के बीच संबंधों का प्रतिस्थापन नहीं किया जा सकता है।
  • स्वाभाविक संबंध-प्राथमिक समूहों के सदस्यों के बीच स्वाभाविक संबंध पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए परिवार के सदस्यों के बीच संबंध किसी दबाव से स्थापित नहीं होते है, वरन् संबंधों का आधार स्वाभाविक होता है।
  • अत्यधिक नियंत्रण शक्ति-प्राथमिक समूह में नियंत्रण के मानक सामान्य आदर्शों, परंपराओं तथा सांस्कृतिक नियामकों पर आधारित होते हैं।
  • उदाहरण के लिए बच्चों पर माता-पिता का नियंत्रण होता है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि नियंत्रण के सूत्र प्राथमिक संबंधों को बाँधे रखते हैं।

(iii) प्राथमिक समूह का महत्व –

  • प्राथमिक समूह सदस्यों को सामाजिक, मानसिक, आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए बच्चों के संतुलित तथा समुचित विकास के लिए परिवार एक स्वाभाविक वातावरण प्रस्तुत करता है।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक अनुकूलन में सहायक होते हैं। उदाहरण के लिए बच्चा परिवार, पड़ोस, मित्र-मंडली तथा खेल समूहों में अनुकूलन तथा पारस्परिक सामंजस्य का महत्वपूर्ण पाठ सीखता है।
  • प्राथमिक समूह में सदस्य सहानुभूति, दया तथा सहयोग के गुणों को सीखता है। उदाहरण के लिए संतान के प्रति माता-पिता का त्याग अतुलनीय है।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक नियंत्रण तथा संगठन को बनाए रखते हैं। सामाजिक नियंत्रण सामाजिकता को दिशा प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
समूहों का वर्गीकरण करने के लिए किस प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक समूहों का वर्गीकरण एक कठिन समस्या है। फिर भी, अनेक समाजशास्त्रियों ने आकार, सदस्य संख्या, उद्देश्य, साधन, स्थिरता, व्यवहार तथा हितों आदि के आधार पर समूहों का वर्गीकरण किया है। प्रमुख समाजशास्त्रियों द्वारा किए गए समूह के वर्गीकरण निम्नलिखित हैं –

(i) कूले के अनुसार –

  • प्राथमिक समूह-प्राथमिक समूहों में आमने-सामने के घनिष्ठ संबंध होते हैं।
  • द्वितीयक समूह-द्वितीय समूह में परोक्ष संबंध पाए जाते हैं। सदस्यों के बीच सामाजिक दूरी होती है।

(ii) एफ. एच. गिडिंग्स के अनुसार –

  • जननिक समूह-परिवार एक जननिक समूह है।
  • इकट्ठे समूह-यह ऐच्छिक समूह होते हैं।

(iii) मिलर के अनुसार

  • उर्ध्वाधर समूह-से समूह आकार में छोटे होते हैं।
  • क्षैतिज समूह-ये समूह आकार में विशाल होते हैं।

(iv) विलियम ग्राहम समनर के अनुसार

  • अंत: समूह-इनमें सामाजिक निकटता तथा हम की भावना पायी जाती है।
  • बाह्य समूह-इनमें सामाजिक दूरी तथा एकता का अभाव होता है।

कुछ समाजशास्त्रियों ने समूहों को निम्नलिखित रूप में भी बाँटा है –

  • औपचारिक समूह-आकार में छोटे होते हैं तथा सदस्यों के बीच वैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं।
  • अनौपचारिक समूह-आकर में बड़े होते हैं तथा सदस्यों के बीच अवैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं।

(v) जॉर्ज हासन के अनुसार –

  • असामाजिक समूह-असामाजिक समूह समाज के मानकों तथा मूल्यों का विरोधी होता है।
  • आभासी सामाजिक समूह-आभासी सामाजिक समूह अपने हितों के लिए सामाजिक जीवन में भाग लेता है।
  • समाज विरोधी समूह-यह समूह समाज के हितों के विरुद्ध गतिविधियाँ करता है।
  • समाज समर्थक समूह-यह समाज के हितों के लिए रचनात्मक कार्य करता है।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समाजशास्त्रियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से समूहों का वर्गीकरण पृथक-पृथक रूपों तथा आधारों पर किया है। व्यक्तियों के उद्देश्य, हित, स्वार्थ तथा संबंध सदैव परिवर्तनशील तथा गतिशील हैं। मानव-व्यवहार की जटिलता के कारण ही अभी तक समाजशास्त्री समूहों का कोई सर्वमान्य वर्गीकरण नहीं दे पाए हैं। इस संबंध में क्यूबर ने उचित ही कहा है कि “समाजशास्त्रियों ने समूहों का वर्गीकरण करने में काफी समय तथा प्रयत्न लगाया है।

यद्यपि शुरू में तो ऐसा करना आसान प्रतीत होता तथापि आगे सोचने पर इसमें बहुत-सी कठिनाइयाँ महसूस होंगी । वास्तव में ये कठिनाइयाँ इतनी अधिक हैं कि अभी तक हमारे पास समूहों का कोई क्रमबद्ध वर्गीकरण नहीं है जो सभी समाजशास्त्रियों को पूर्णतया स्वीकार्य हो।”

प्रश्न 6.
अनौपचारिक सामाजिकरण नियंत्रण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति एवं समूह के व्यवहारों के नियमन की पद्धति प्रत्येक समाज में पायी जाती है। इसी पद्धति को सामाजिक नियंत्रण कहा जाता है। एच. सी. ब्रियरले के अनुसार, “सामाजिक नियंत्रण उन प्रक्रियाओं, चाहे वे नियोजित अथवा अनियोजित हों के लिए सामूहिक शब्द है जिनके द्वारा व्यक्तियों को समूह के रिवाजों तथा जीवन मूल्यों के अनुरूप बनने के लिए शिक्षा दी जाती है, अनुनय किया जाता है या विवश किया जाता है।”

सामाजिक नियंत्रण के दो प्रमुख रूप हैं –

  • औपचारिक साधन तथा
  • अनौपचारिक साधन

1. औपचारिक साधन – सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों का विकास समाज में स्वतः हो जाता है। उनके निर्माण अथवा विकास के लिए किसी विशेष अभिकरण की जरूरत नहीं होती है। औपचारिक सामाजिक नियंत्रण के साधन गैर-सरकारी होते हैं। ये साधन छोटे अथवा प्राथमिक समूहों में अधिक प्रभावशाली होते हैं । क्रोसबी ने अपनी पुस्तक Interaction in Small Groups में अनौपचारिक नियंत्रण के निम्नलिखित चार मूलभूत प्रकार बताए हैं।

(a) सामाजिक परितोषिक – सामाजिक पारितोषिक के अंतर्गत मुस्कुराना, स्वीकृति की सहमति एवं अधिक परिवर्तन वाले कार्य जैसे कर्मचारी की प्रोन्नति, परितोषिक अनुरूपता आदि सम्मिलित किए जाते हैं। ये सभी कारक प्रत्यक्ष रूप से विचलन को दूर करते हैं।

(b) दंड – दंड के अंतर्गत अप्रसन्नता, आलोचना तथा शारीरिक धमकियाँ आदि सम्मिलित किए जाते हैं। इनमें प्रत्यक्ष रूप से विचलित कार्यों को रोकने का लक्ष्य सम्मिलित किया जाता है।

(c) अनुनय – अनुनय के माध्यम से विचलित व्यक्तियों को सामाजिक नियमों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए कहा जाता है। उदाहरण के लिए, बेसबॉल के खिलाड़ी को जो नियमों का उल्लंघन कता है, खेल के नियमों को गंभीरता पूर्वक पालन करने के लिए अनुनय किया जाता है।

(d) पुनः परिभाषित प्रतिमान-बदली हुई परिस्थितियों तथा मूल्यों में प्रतिमानों को पुनः परिभाषित करना सामाजिक नियंत्रण का एक अन्य जटिल प्रकार है। उदाहरण के लिए, नगरीय परिवेश में काम करने वाली पत्नियों के पति गृह-कार्य करते हैं तथा बच्चों की देखभाल करते हैं। हालांकि, कुछ समय पहले यह सब कुछ अकल्पनीय था।

2. सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन – परिवार, समुदाय, पड़ोस, गोत्र, जनरीतियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, रीतिरिवाज तथा धर्म आदि सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन हैं।

(a) परिवार – परिवार अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण का एक सशक्त तथा स्थायी साधन है। क्लेयर ने कहा है कि “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता तथा उनकी संतानों के बीच पायी जाती है।” परिवार सामाजिक नियंत्रण की प्राथमिक म अनौपचारिक पाठशाला है। बर्गेस तथा लॉक के अनुसार, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली एक मौलिक समिति है तथा पारिवारिक परम्परा बालक को उसके प्रति प्रारंभिक व्यवहार, प्रतिमान एवं आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

(b) समुदाय, पड़ोस तथा गोत्र – समुदाय, पड़ोस तथा गोत्र भी सामाजिक नियंत्रण के अनौपचाकि साधन हैं। उदाहरण के लिए व्यक्ति के व्यवहार तथा कार्यों पर रक्त संबंधों का काफी सामाजिक दबाव रहता है। विवाह के पश्चात् नव-वधू को नए पारिवारिक-परिवेश के साथ अनुकूलन करना पड़ता है। ग्रामीण समुदाय भी अपने सदस्यों पर काफी अधिक नियंत्रण रखते हैं। समुदाय के नियमों की अवहेलना करने पर व्यक्तियों को सामाजिक निन्दा तथा सामाजिक प्रताड़ना अथवा बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।

(c) जनरीतियाँ – जनरीतियाँ समूह के सामूहिक व्यवहार का प्रतिमान हैं तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “जनरीतियाँ समाज में मान्यता प्राप्त या स्वीकृत व्यवहार करने की पद्धतियाँ हैं।” गिडिंग्स जनरीतियों को राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों से भी अधिक प्रभावी मानता है। जनरीतियाँ व्यक्तियों के अवैयक्तिक व्यवहार का नियमन करती हैं।

(d) सामाजिक रूढ़ियाँ – सामाजिक रूढ़ियाँ भी सामाजिक नियंत्रण के प्रभावी साधन हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, जब जनरीतियाँ अपने साथ समूह के कल्याण की भावना तथा उचित व अनुचित के प्रभावों को जोड़ लेती हैं तब वे रूढ़ियों में बदल जाती हैं। रूढ़ियों को समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए जातीय नियमों की अवहेलना करना निन्दनीय समझा जाता है।

(e) धर्म – धर्म भी सामाजिक नियंत्रण का प्रभावशाली साधन है। हॉबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।” दुर्खाइम का मत है कि धर्म जीवन का वह पक्ष है जिसका संबंध पवित्र वस्तुओं से है। धर्म पाप तथा पुण्य की धारणा से जुड़ा है। धर्म का उल्लंघन करना ‘पाप’ है अतः धर्म सामाजिक नियंत्रण का सशक्त अनौपचारिक साधन है।

(f) प्रथाएँ – प्रथाएँ भी अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण के साधन हैं। प्रथाएँ सामाजिक व्यवहार हैं तथा व्यक्ति इन्हें बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेते हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज से मान्यता प्राप्त कार्य करने की विधियाँ ही समाज की प्रथाएँ हैं। प्रथाएँ व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रथाएँ जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति के जीवन को नियमित तथा निर्देशित करती हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

प्रश्न 7.
द्वितीयक समूहों का अर्थ, विशेषताएँ तथा महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) द्वितीयक समूह का अर्थ – द्वितीयक समूह आकार में बड़े होते हैं तथा इनके द्वारा विशिष्ट स्वार्थों की पूर्ति की जाती है। द्वितीयक समूहों में घनिष्ठता, एकता तथा आमने-सामने के संबंधों का अभाव पाया जाता है। संबंधों की प्रकृति अवैयक्तिक होती है। ऑग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “वे समूह जो घनिष्ठता की कमी का अनुभव प्रस्तुत करते हैं, द्वितीयक समूह कहलाते हैं।” केडेविस के अनुसार, “द्वितीयक समूहों को मोटे तौर पर प्राथमिक समूहों के विरोधी समूहों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

एच. टी. मजूमदार के अनुसार, “जब सदस्यों के संबंधों में आमने-सामने के संपर्क नहीं होते हैं, तो द्वितीयक समूह होता है। पी. एच. लैंडिस के अनुसार, “द्वितीयक समूह वे हैं जो संबंधों में अपेक्षाकृत अनिरंतर तथा अवैयक्तिक होते हैं।” रॉबर्ट बीरस्टेड के अनुसार, “वे समूह द्वितीयक हैं, जो प्राथमिक नहीं हैं।”

(ii) द्वितीयक समूहों की विशेषताएँ –
(a) बड़ा आकर – द्वितीयक समूहों का आकार बड़ा होता है इनका विस्तार राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है। उदाहरण के लिए, राजनीतिक दल तथा यूनेस्को आदि द्वितीयक समूह हैं।

(b) सहयोग की प्रकृति – द्वितीयक समूहों के सदस्यों के बीच साधारणतया परोक्ष सहयोग पाया जाता है। द्वितीयक समूहों में व्यक्ति मिलकर काम करने के बजाए एक-दूसरे के लिए कार्य करते हैं। समूह के सदस्यों का सहयोग उद्देश्य विशेष की प्राप्ति तक ही सीमित होता है।

(c) औपचारिक संरचना – द्वितीयक समूह औपचारिक नियमों के द्वारा संचालित होते हैं। सदस्यों के कार्य श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण के नियमों के द्वारा निर्धारित होते हैं।

(d) अस्थायी संबंध – द्वितीयक समूह उद्देश्य की पूर्ति के लिए, कायम किए जाते हैं। सदस्यों के बीच औपचारिक संबंध होते हैं। अतः सदस्यों के बीच स्थायी संबंध नहीं पाए जाते हैं।

(e) सीमित उत्तरदायित्व – द्वितीयक समूहों के सदस्यों के बीच औपचारिक संबंध पाए जाते हैं। वैयक्तिक संबंधों के अभाव में उत्तरदायित्व भी सीमित होता है अतः हम कह सकते हैं कि द्वितीयक समूहों में प्राथमिक समूहों जैसे असीमित उत्तरदायित्व न होकर सीमित उत्तरदायित्व होता है।

(f) ऐच्छिक सदस्यता – द्वितीयक समूहों की सदस्यता आमतौर पर ऐच्छिक होती है। उदाहरण के लिए, लायन्स क्लब या किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेना अनिवार्य नहीं है।

(iii) द्वितीयक समूहों का महत्त्व –

  • द्वितीयक समूह समाजीकरण के व्यापक तथा विस्तृत प्रतिमान प्रस्तुत करते हैं।
  • द्वितीयक समूह मानव प्रगति के द्योतक हैं।
  • द्वितीयक समूह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की व्याख्या करते हैं।
  • द्वितीयक समूह श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण को बढ़ावा देते हैं।
  • द्वितीयक समूह समाज में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देते हैं।

प्रश्न 8.
सामाजिक नियंत्रण के अभिकरणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
अभिकरण एवं साधन संयुक्त रूप से सामूहिक एवं व्यक्तिगत व्यवहार को नियमित करते हैं और सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था को प्रभावशली बनाते हैं। सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख अभिकरणों के उल्लेख निम्नलिखित हैं –
(i) परिवार – परिवार सामाजिक नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण अभिकरण है परिवार को सामाजिक जीवन की सर्वोत्तम पाठशाला कहा गया है। परिवार में बच्चा प्रक्ताओं और परम्पराओं के बीच पतला है। परिवार में माँ का प्यार एवं पिता के संरक्षण में बच्चे पलते हैं। सामाजिक नियंत्रण में परिवार की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।

(ii) धर्म – सामाजिक नियंत्रण में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। धर्म का प्रभाव प्रत्येक समाज में होता है। प्रत्येक धर्म का आधार किसी शक्ति पर विश्वास है और यह मानव से श्रेष्ठ है। धर्म के विरुद्ध कार्य करने से लोग डरते हैं। लोगों को विश्वास है कि धर्म के अनुकूल कार्य करने में ही उनका हित सुरक्षित होता है।

(iii) प्रथा – प्रथा सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक सशक्त अभिकरण है। प्रथा का व्यक्ति पर कठोर नियंत्रण होता है। प्रथाएँ समाज द्वारा मान्यता प्राप्त व्यवहार की विधियाँ हैं। प्रथाओं सामाजिक अनुकूलन में सहायता प्रदान करती हैं, प्रथाओं के पीछे समाज के अनुभवों का लम्बा इतिहास होता है।

(iv) कानून – कानून सामाजिक नियंत्रण का महत्वपूर्ण अभिकरण है। वर्तमान युग में कानून सामाजिक नियंत्रण का प्रमुख आधार है।

(v) नैतिकता – नैतिकता सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक अभिकरण है। नैतिक नियमों की अवहेलना से समाज को भय होता है। वर्तमान समय में नैतिकता का प्रभाव अधिक है।

(vi) शिक्षा – शिक्षा सामाजिक नियंत्रण का प्रभावशाली अभिकरण है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति में अच्छे गुणों का विकास होता है। वर्तमान समय में शिक्षा का महत्व दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहा है।

(vii) नेतृत्व – नेता का प्रमुख कार्य अपने अनुयायियों को मार्गदर्शन करना है। नेता का चरित्र उसके अनुयायी को प्रभावित करता है।

(viii) प्रचार – वर्तमान युग प्रचार का युग है। प्रचार द्वारा वस्तु विशेष के गुणों पर प्रकाश डाला जाता है।

(ix) जनमत – जनमत भी सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में प्रमुख भूमिका अदा करता है। प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे से संबंधित होते हैं । जनमत व्यक्ति के व्यवहारों को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 9.
सामाजिक नियंत्रण की संस्थाओं का वर्णन करें। किसी एक संस्था की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण की संस्थाएँ तथा उनके कार्य-सामाजिक संस्थाओं द्वारा व्यक्ति तथा. समूह के व्यवहार को नियंत्रित एवं नियमित किया जाता है। सामाजिक नियंत्रण की विभिन्न संस्थाओं का अध्ययन करने से पहले संस्था का समाजशास्त्रीय अर्थ जान लेना आवश्यक है।

डब्लू. जी. समनर के अनुसार, “एक संस्था एक अवधारणा (विचार, मत, सिद्धांत या स्वार्थ) तथा एक ढाँचे से मिलकर बनती है।” रॉस के अनुसार, “सामाजिक संस्था सामान्य इच्छा से स्थापित या अभिमति प्राप्त संगठित मानव संबंधों का समूह है।” बोगार्डस के अनुसार, “एक सामाजिक संस्था समाज का वह ढाँचा होता है जो मुख्य रूप से सुव्यवस्थित विधियों द्वारा व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संगठित किया जाता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सामाजिक संस्थाएँ व्यक्तियों अथवा समूह की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जनरीतियों तथा रूढ़ियों का समूह है।

संस्थाओं के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति
  • एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को संस्कृति का हस्तांतरण
  • व्यक्तियों के व्यवहार पर नियंत्रण
  • व्यक्तियों के व्यवहार में एकता तथा अनुरूपता उत्पन्न करना
  • समाज की समसामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा मार्गदर्शन करना
  • संस्थाएँ व्यक्ति तथा समूह के व्यवहारों को सामाजिक प्रतिमानों के अनुरूप ढालती हैं।

सामाजिक नियंत्रण की प्रमुख संस्थाएँ-सामाजिक नियंत्रण की प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं –

  • परिवार
  • नातेदारी
  • जाति
  • धर्म
  • राज्य
  • आर्थिक संगठन और
  • शिक्षा

सामाजिक नियंत्रण की उपरोक्त संस्थाओं में राज्य तथा धर्म की संस्थाएँ संभवतः सर्वाधिक शक्तिशाली हैं। संस्थाएँ अनौपचारिक तथा औपचारिक रूप से सामाजिक नियंत्रण करती हैं। राज्य तथा विद्यालय औपचारिक संस्थाएँ हैं जबकि परिवार, नातेदारी, धर्म आदि अनौपचारिक संस्थाएँ हैं।

संस्थाओं के महत्त्व –

  • संस्थाएँ प्रतिस्थापित, प्रतिमानों, मूल्यों तथा अवधारणाओं का अवलंबन करती हैं।
  • संस्थाएँ सामाजिक स्वास्थ्य की प्रतीक हैं।
  • संस्थाओं के द्वारा विचलन, अलगावाद तथा आपराधिक मनोवृत्तियों पर अंकुश लगाया जाता है।
  • संस्थाएँ सामाजिक ढाँचे तथा तान-बाने को बनाए रखती हैं।
  • संस्थाओं द्वारा स्थापित प्रतिमान समाज, समूह तथा समुदाय को व्यवस्थित तथा निर्देशित करते हैं।

परिवार सामाजिक नियंत्रण की एक सार्वभौमिक संस्था है। यह समाज की प्राथमिक इकाई है। व्यक्ति परिवार में ही भाषा, व्यवहार, पद्धति तथा सामाजिक प्रतिमानों को ग्रहण करता है।

यद्यपि परिवार का स्वरूप सार्वदेशिक होता है, तथापि इसकी संरचना में व्यापक भिन्नताएँ पायी जाती हैं –

  • कृषक समाजों तथा जनजाति समाजों में संयुक्त परिवार पाए जाते हैं।
  • औद्योगिक समाजों तथा नगरीय समुदायों में एकाकी परिवार पाए जाते हैं।

परिवार की परिभाषा –

  • मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो यौन संबंधों पर आधारित है तथा काफी छोटा एवं स्थायी है वह बच्चों को प्रजनन और पालन-पोषण की व्यवस्था करने योग्य है।”
  • आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “परिवार, पति-पत्नी, बच्चों सहित या उनके बिना अथवा मनुष्य अथवा स्त्री अकेले या बच्चों सहित कम या अधिक; स्थिर समिति है।”
  • जुकरमेन के अनुसार, “एक परिवार समूह, पुरुष स्वामी, उसकी स्त्री या स्त्रियों तथा उनके बच्चों को मिलाकर बनता है। कभी-कभी एक या अधिक अविवाहित पुरुषों को भी सम्मिलित किया जा सकता है।”

दी गई परिभाषाओं के आधार पर परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • सार्वभौमिकता
  • भावनात्मक आधार
  • सीमित आकार
  • सामाजिक संरचना में केन्द्रीय स्थिति
  • सदस्यों में उत्तरदायित्व की भावना
  • सामाजिक नियमन
  • स्थायी तथा अस्थायी प्रकृति

परिवार के कार्य – एक संस्था के रूप में परिवार सामाजिक संगठन की महत्त्वपूर्ण ईकाई है। परिवार के प्रकार्य बहु-आयामी हैं। मैरिल के अनुसार “किसी भी संस्था के विविध कार्य होते हैं। सम्भवतया समस्त संस्थाओं में परिवार अत्यन्त विविध कार्यों वाली संस्था है।”

परिवार के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –
(i) डेविस के अनुसार –

  • संतानोत्पत्ति
  • भरण-पोषण
  • स्थान-व्यवस्था
  • बच्चों का समाजीकरण

(ii) मरडोक के अनुसार –

  • यौनगत
  • प्रजननात्मक
  • आर्थिक
  • शैक्षणिक

(iii) गुडे के अनुसार –

  • बच्चों का प्रजनन
  • पविार के सदस्यों की सामाजिक सदस्यों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा
  • परिवार के सदस्यों की स्थिति का निर्धारण
  • समाजीकरण तथा भावनात्मक समर्थन
  • सामाजिक नियंत्रण।

(iv) मेकाइवर ने परिवार के प्रकार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा है –
(a) अनिवार्य प्रकार्य-इसके अनुसार परिवार के निम्नलिखित प्रकार्य हैं –

  • यौन आवश्यकताओं की पूर्ति
  • प्रजनन तथा पालन-पाषण
  • घर की व्यवस्था।

(b) ऐच्छिक प्रकार्य-ऐच्छिक प्रकार्यों में निम्नलिखित प्रकार्य सम्मिलित किए गए हैं –

  • धार्मिक प्रकार्य
  • शैक्षिक प्रकार्य
  • आर्थिक प्रकार्य
  • स्वास्थ्य संबंधी प्रकार्य तथा
  • मनोरंजन संबंधी प्रकार्य

उपरोक्त समाजशास्त्रियों द्वारा बताए गए परिवार के प्रकार्यों के आधार पर निम्नलिखित प्रकार्य प्रमुख हैं –

  • जैविक प्रकार्य
  • सामाजिक प्रकार्य
  • मनोवैज्ञानिक प्रकार्य
  • आर्थिक प्रकार्य

एक संस्था के रूप में परिवार के कार्य व्यापक हैं। आधुनिक युग में नगरीकरण, औद्योगीकरण, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक संस्थाओं के प्रकार्यों में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। अतः आधुनिक परिवार के प्रकार्यों में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

प्रश्न 10.
परिवार के कार्यों की विवेचना करें।
उत्तर:
परिवार समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है। परिवार में ही व्यक्ति का समाजीकरण होता है और वह एक सामाजिक प्राणी बन जाता है। समाज का अस्तित्व बहुत हद तक परिवार नाम की संस्था पर निर्भर है। प्रत्येक समाज की अपनी संस्कृति होती है। जिसे परिवार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित एवं प्रवाहित करता है। परिवार का सार्वभौमिक संस्था के रूप में प्रत्येक समाज में पाया जाता है और परिवार एक संस्था के साथ-साथ समिति भी है। परिवार में प्रेम, सेवा, कर्त्तव्य, सहयोग एवं सहानुभूति की भावना पायी जाती है। परिवार अंग्रेजी शब्द ‘Family’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘Famules’ शब्द से हुई है, जिसके अन्तर्गत माता-पिता, बच्चे नौकर और गुलाम सम्मिलित हैं।

परिवार एक अनोखा संगठन है जिनकी पूर्ति अन्य संगठन, संस्था या समिति द्वारा नहीं हो सकती। परिवार के विभिन्न कार्यों के माध्यम से ही मानव आज सभ्यता के उच्च शिखर पर पहुँच गया है। परिवार के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • जैविकीय कार्य
  • शारीरिक सुरक्षा संबंधी कार्य
  • आर्थिक एवं सामाजिक कार्य
  • सांस्कृतिक कार्य और
  • मनोवैज्ञानिक कार्य

1. जैविक कार्य – इस कार्य के अन्तर्गत परिवार यौन संबंधों की पूर्ति करता है साथ ही मानव अपनी प्रजातीय तत्त्वों की निरंतरता को बनाये रखता है।

शारीरिक सुरक्षा संबंधी कार्य-इस कार्य के अन्तर्गत बूढ़े, असहाय, अनाथ, विधवा तथा रोगी सदस्यों को शारीरिक सुरक्षा मिलती है।

(iii) आर्थिक कार्य-परिवार एक आर्थिक इकाई है। आर्थिक क्षेत्र में भी परिवार के द्वारा महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पादित होते हैं। उत्पादन का कार्य परिवार द्वारा होता है। परिवार अपने सदस्यों के मध्य श्रम विभाजन का कार्य करता है। सम्पत्ति का निर्धारण परिवार द्वारा होता है।

(iv) सामाजिक कार्य-परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार से ही आरंभ होती है। प्रत्येक समाज के अपने नियम और तरीके होते हैं। सामाजिक कार्य के माध्यम से परिवार समाज पर नियंत्रण रखता है। परिवार समाज को अनुशासन की शिक्षा प्रदान करता है।

(v) सांस्कृतिक कार्य-संस्कृति तत्वों को परिवार के माध्यम से हस्तांतरित करती है । परिवार अपने सदस्यों को सांस्कृतिक विशेषताओं को सिखाने का प्रयत्न करता है।

(vi) वैज्ञानिक कार्य-इस कार्य के अन्तर्गत सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानसिक सुरक्षा तथा संतोष प्रदान करना है। अतः उपर्युक्त परिवार के कार्य हैं जो स्वाभाविक रूप से परिवार द्वारा सम्पादित किये जाते हैं।

प्रश्न 11.
समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दार्थ से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में वह जन्म लेता और समाज में ही उसका भरण-पोषण होता है। व्यक्ति समाज से जो कुछ भी सीखता है या अर्जित करता है। उसकी संस्कृति कहलाती है। संस्कृति के अनुरूप ही व्यक्ति अपने आप को ढालने की कोशिश करता है। समाज में अच्छे-बुरे हर प्रकार के लोग निवास करते हैं। बुरे व्यवहारों पर समाज द्वारा जो रोक लगाया जाता है उसे सामाजिक नियंत्रण कहा जाता है।

“दबाव प्रतिमान है जिसके द्वारा समाज में व्यवस्था कायम रखी जाती है तथा स्थापित नियमों को बनाये रखने हेतु जो प्रस्तुत किया जाता है सामाजिक नियंत्रण कहलाता है। “सामाजिक नियंत्रण का अर्थ उस तरीक से है जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में एकता एवं स्थायित्व बना रहता है तथा जिसके द्वारा सम्पूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील संतुलन के रूप में क्रियाशील रहती है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक नियंत्रण एक विधि है, जिसके द्वारा व्यक्तियों के सामाजिक आदर्शों एवं मूल्यों का पालन कराया जाता है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राथमिक समूह की अवधारणा सर्वप्रथम किस समाजशास्त्री ने दिया?
(a) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(b) डेविस
(c) समनर
(d) कूर्ल
उत्तर:
(b) डेविस

प्रश्न 2.
सामाजिक नियंत्रण का अर्थ उस तरीके से है जिसके द्वारा सम्पूर्ण व्यवसायी एक परिवर्तन संतुलन के रूप में क्रियाशील रहती है?
(a) प्लेटो
(b) रॉस
(c) काम्टे
(d) मेकाइवर
उत्तर:
(b) रॉस

प्रश्न 3.
किस विज्ञान का कहना है? सामाजिक परिवर्तनों से तात्पर्य उन परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना एवं प्रकार्यों में उत्पन्न होते हैं ………………..
(a) फिक्टर
(b) मेकाइवर
(c) किंग्सले डेविस
(d) जिन्सवर्ग
उत्तर:
(c) किंग्सले डेविस

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प्रश्न 4.
सामाजिक नियंत्रण हो सकता है …………………..
(a) सकारात्मक केवल
(b) सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों
(c) केवल नकारात्मक
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(b) सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों

प्रश्न 5.
नागरिकता के अधिकारों में शामिल है …………………..
(a) सामाजिक
(b) राजनैतिक
(c) नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
सामाजिक समूह की एक विशेषता है ……………………..
(a) निरंतरता हेतु दीर्घ अत:क्रिया
(b) लघुस्थायी अन्तःक्रिया
(c) लघु अंतःक्रिया
(d) निरंतरता हेतु अस्थायी क्रिया
उत्तर:
(a) निरंतरता हेतु दीर्घ अत:क्रिया

प्रश्न 7.
प्रत्यक्ष सहयोग पाया जाता है।
(a) प्राथमिक समूहों में
(b) द्वितीयक समूहों में
(c) संदर्भ समूहों में
(d) भीड़ में
उत्तर:
(a) प्राथमिक समूहों में

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प्रश्न 8.
गिलिन एवं गिलिन के अनुसार भीड़ एवं श्रोता समूह किस प्रकार के समूह हैं?
(a) संस्कृतिक समूह
(b) अस्थायी समूह
(c) प्राथमिक समूह
(d) संदर्भ समूह
उत्तर:
(d) संदर्भ समूह

प्रश्न 9.
किसने कहा है? जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक-दूसरे से मिलते हैं और एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं तो एक समूह का निर्माण करते हैं।
(a) मेकाइवर
(b) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(c) फिक्टर
(d) वीयर स्टीड
उत्तर:
(b) ऑगबर्न एवं निमकॉफ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Sociology समाजशास्त्र एवं समाज Additional Important Questions and Answers

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्रीय उपागम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्रीय उपागम द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानव समाज का एक व्यवस्था के रूप में मनुष्य तथा मनुष्यों के बीच, मनुष्यों तथा समूहों के बीच तथा विभिन्न समूहों के बीच अंत:क्रिया के रूप में अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
उन महत्त्वपूर्ण परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने समाजशास्त्र का एक विषय के रूप में आविर्भाव अपरिहार्य बना दिया।
उत्तर:
समाजशास्त्र की उत्पत्ति यूरोप में 10वीं सदी में हुई। औद्योगिक क्रांति, नगरीकरण तथा पूँजीवादी व्यवस्था से उत्पन्न होने वाले सामाजिक तथा आर्थिक दुष्परिणामों ने एक विषय के रूप में समाजशास्त्र के आविर्भाव को अपरिहार्य बना दिया।

प्रश्न 3.
उन प्रमुख समाजशास्त्रियों के नामों का उल्लेख कीजिए जिन्हें समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है।
उत्तर:
अगस्त कोंत, एमिल दुर्खाइम, हरबर्ट स्पैंसर, कार्ल मार्क्स तथा बैबर को समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है। इन समाजशास्त्रियों के द्वारा समाज की विभिन्न समस्याओं तथा पहलुओं का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर अध्ययन किया गया।

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प्रश्न 4.
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का अध्ययन कब और कहाँ प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
भारत में समाजशास्त्र का अध्यापन 1908 में कोलकाता (कलकत्ता) विश्वविद्यालय के राजनीतिक, आर्थिक तथा दर्शन विभाग में प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 5.
भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति का इतिहास मुंबई (बंबई) विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से किस प्रकार संबद्ध है?
उत्तर:
पैट्रिक गीड्स को मुंबई (बंबई) विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है। जी. एस. घुर्ये द्वारा गीड्स के समाजशास्त्रीय प्रतिमानों को आगे जारी रखा गया। 1919 में मुंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र को स्नातकोत्तर स्तर पर राजनीति विज्ञान के साथ जोड़ा गया।

प्रश्न 6.
भारतीय समाज को समझने तथा उसका विश्लेषण करने में प्रसिद्ध सामाजिक क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा के योगदान का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा सामाजिक क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने पैट्रिक गीड्स से भी पहले भारतीय समाज को समझने में अपनी रुचि दिखाई थी। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने यूरोप के प्रसिद्ध समाजशास्त्री अगस्त कोंत तथा हरबर्ट स्पैंसर से विचार-विमर्श के पश्चात् ‘इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ नामक शोध पत्रिका का प्रकाशन किया था।

प्रश्न 7.
भारत के किन तीन विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र की प्रथम पीढ़ी तैयार हुई? तत्कालीन प्रसिद्ध समाजशास्त्रीयों के नाम बताइए।
उत्तर:
भारत के तीन विश्वविद्यालय हैं-कोलकाता, मुंबई तथा लखनऊ। इन विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्रियों की प्रथम पीढ़ी तैयार हुई। समकालीन प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों में राधाकमल मुखर्जी, डी. एन. मजूमदार, एम. एन. श्रीनिवास, के. एम. कपाड़िया, एम. आर. देसाई तथा एस. सी. दुबे आदि के नाम प्रमुख हैं।

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प्रश्न 8.
समाजशास्त्र की प्रकृति के विषय में एमिल दुर्खाइम के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र की प्रकृति के विषय में एमिल दुर्खाइम के विचार अधिक स्पष्ट तथा तथ्यात्मक हैं। दुर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र के द्वारा सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 9.
समाज क्या है?
उत्तर:
समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज रीतियों, कार्य प्रणालियों, अधिकार एवं पारस्परिक सहयोग, अनेक समूह और उनके विभागों, मानव व्यवहारों के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है।”

प्रश्न 10.
मानव समाज तथा पशु समाज में दो अंतर बताइए।
उत्तर:
मानव समाज तथा पशु समाज में दो मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं –

  • मानव समाज मूल प्रवृत्तियों को परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित करने की क्षमता रखता है, जबकि पशु सामज पूर्णरूपेण मूल प्रवृत्तियों तथा सहज क्रियाओं पर आधारित है।
  • भाषा का स्पष्ट विकास होने के कारण मनुष्य अपनी एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित कर सकने में सक्षम है जबकि पशु
  • समाज भाषा का विकास न होने के कारण ज्ञान का हस्तांतरण नहीं कर सकता है।

प्रश्न 11.
मेकाइवर तथा पेज के अनुसार समाज के प्रमुख आधार क्या हैं?
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मेकाइवर तथा पेज के अनुसार समाज के प्रमुख आधार इस प्रकार हैं –

  • रीतियाँ
  • कार्यप्रणालियाँ
  • अधिकार
  • आपसी सहयोग
  • समूह तथा विभाग
  • मानव-व्यवहार का नियंत्रण एवं
  • स्वतंत्रता

प्रश्न 12.
जैमिन शैफ्ट का अर्थ बताइए।
उत्तर:
ग्रामीण जीवन में जैमिन शैफ्ट संबंध मिलते हैं। इसमें हम सामूहिक जीवन का वास्तविक तथा स्थायी रूप पाते हैं। सदस्यों के बीच प्राथमिक संबंध पाये जाते हैं। एफ. टॉनीज ने जैमिन शैफ्ट का अर्थ बताते हुए कहा है कि जैमिन शैफ्ट (समुदाय) के समस्त सदस्य आत्मीयता से व्यक्तिगत और अनन्य रूप से साथ रहते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।

प्रश्न 13.
गैसिल शैफ्ट का अर्थ बताइए।
उत्तर:
एफ. टॉनीज के अनुसार गैसिल शैफ्ट का अर्थ बताते हुए कहा है कि –

  • गैसिल शैफ्ट समाज में लोगों का जीवन है।
  • गैसिल शैफ्ट एक नयी सामाजिक प्रघटना है तथा यह अल्पकालिक व औपचारिक है। इसमें सदस्यों के बीच द्वितीयक संबंध पाये जाते हैं।

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प्रश्न 14.
हेरी एम. जॉनसन द्वारा बताई गई समाज की विशेषताएं बताइए।
उत्तर:
हेरी एम. जॉनसन ने समाज की निम्नलिखित विशेषताएँ बतायी हैं –

  • निश्चित भू-क्षेत्र
  • संतति
  • संस्कृति तथा
  • स्वावलंबन

प्रश्न 15.
समाज में संतति का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
समाज में संपति का महत्त्व निम्नलिखित है –

  • मनुष्य अपने जन्म के आधार पर ही एक समूह का सदस्य होता है।
  • अनेक समाजों में मनुष्यों की सदस्यता गोद लेने, दासता, जाति या अप्रवास के जरिए भी मिल जाती है लेकिन समूह में नए सदस्यों के लिए पुनरुत्पादन ही मौलिक स्रोत है।

प्रश्न 16.
समाज को एक प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाज को एक प्रक्रिया के रूप में निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है –

  • समाज में ही व्यक्ति एक-दूसरे से निरंतर अंत:क्रिया करते हैं। समाज को व्यक्तियों पर थोपा नहीं जाता है, अपितु सहभागियों द्वारा इसका अनुमोदन किया जाता है।
  • सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से समाज की रचना तथा पुनर्रचना होती है। संधिवार्ता स्व अन्य तथा प्रतिबिंबिता इसके प्रमुख शब्द हैं।

प्रश्न 17.
क्या समाज स्वतंत्र रूप से स्थिर रह सकता है?
उत्तर:
समाज निश्चित रूप से स्वतंत्र रूप से स्थिर रह सकता है। इस संबंध में निम्नलिखित तथ्य दिये जा सकते हैं –

  • समाज एक मौलिक संस्था है। यह किसी का उप-समूह नहीं है।
  • समाज एक स्थानीय, अपने आप में निहित तथा एकीकृत समूह है।

प्रश्न 18.
समाज का संगठन किस प्रकार सामाजिक नियंत्रणों पर आधारित है?
उत्तर:
समाज के संगठन को सुचारु रूप से चलाने के लिए व्यक्तियों के व्यवहार पर निम्नलिखित परम्पराएँ, रुढ़ियाँ, जनरीतियाँ, संहिताएँ तथा कानून आदि द्वारा समाज की प्रत्येक सामाजिक संरचना सामाजिक नियंत्रण का कार्य करती है।

प्रश्न 19.
अगस्त कोंत को समाजशास्त्र का जनक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
फ्रांस के दार्शनिक अगस्त कोंत सन् 1839 में मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाली सामाजिक विज्ञान की शाखा को समाजशास्त्र का नाम दिया था। इसलिए उन्हें समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है।

प्रश्न 20.
समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दों ‘सोशियस’ तथा ‘लोगोस’ से हुई है। ‘सोशियस’ का अर्थ समाज तथा ‘लोगोस’ का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाजशास्त्र का अर्थ है-समाज का विज्ञान।

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प्रश्न 21.
अपनी या अपने दोस्त अथवा रिश्तेदार को किसी व्यक्तिगत समस्या को चिह्नित कीजिए। इसे सामाजशास्त्रीय समझ द्वारा जानने की कोशिश कीजिए।
उत्तर:
आप कोई भी समस्या लें इस प्रश्न को छात्र या छात्राओं को स्वयं हल करना है। जैसे पढ़ाई में मन न लगना, किसी बात से डर लगना, स्कूल जाने में भव, समय के समायोजन को समग्या आदि। इन सभी पर आप आपने परिवार के लोगों की राय या मशविरा ले सकते हैं, शिक्षक से सलाह भी ले सकते हैं।

प्रश्न 22.
अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र मूल रूप से समाज में मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन करता है। एफ. आर. फेयरचाइल्ड तथा अन्य के अनुसार, “अर्थशास्त्र में मनुष्य की उन क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जो आवश्यकताओं की संतुष्टि हेतु मौलिक साधनों की प्राप्ति के लिए की जाती हैं।”

प्रश्न 23.
अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र मानव समाज का करते हैं। प्रत्येक आर्थिक घटना का सामाजिक पहलू होता है। आर्थिक पहलुओं का व्यापक अध्ययन करने के लिए उनका समाजशास्त्रीय विश्लेषण आवश्यक है।

मेकाइवर के अनुसार, “इकार, आर्थिक घटनाएँ सदैव सामाजिक आवश्यकताओं तथा। क्रियाओं के समस्त स्वरूपों द्वारा निश्चित होती हैं तथा वे (आर्थिक घटनाएँ) सदैव प्रत्येक प्रकार की सामाजिक क्रियाओं को पुनः निर्धारित, सृजित, स्वरूपित तथा परिवर्तित करती हैं।”

प्रश्न 24.
अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र में मौलिक अंतर बताइए।
उत्तर:

  • समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन करता है, इसलिए यह एक सामान्य विज्ञान है। अर्थशास्त्र आर्थिक संबंधों का अध्ययन करता है अतएव यह एक विशेष विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र मनुष्य की समस्त सामाजिक गतिविधियों का अध्ययन करता है। अतः समाजशास्त्र का क्षेत्र व्यापक है।
  • अर्थशास्त्र का अध्ययन-क्षेत्र मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों तक ही सीमित है।
  • अतः अर्थशास्त्र का क्षेत्र समाजशास्त्र की अपेक्षा क व्यापक है।

प्रश्न 25.
राजनीति शास्त्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
राजनीति शास्त्र के अंतर्गत अनेक राजनीतिक संस्थाओं जैसे राज्य सरकार तथा उसके अंगों, संवैधानिक तथा न्यायिक संस्थाओं एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं तथा संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

वेनबर्ग तथा शेबत के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र उन पद्धतियों का अध्ययन है जिनमें कि एक समाज अपने को संगठित करता है तथा राज्य का संचालन करता है।”

प्रश्न 26.
समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में अंतर बताएँ।
उत्तर:
समाजशास्त्र का मनोविज्ञान के साथ घनिष्ठ संबंध है। समाजशास्त्र समाज का अध्ययन करता है तो मनोविज्ञान मानसिक प्रक्रियाओं एवं विचारों का अध्ययन है। मनोविज्ञान की एक प्रमुख शाखा है-सामाजिक मनोविज्ञान इसे मनोविज्ञान समाजशास्त्र भी कहते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान में व्यक्ति मनोविज्ञान और समाजशास्त्र दोनों का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 28.
मैक्स वैबर ने समाजशास्त्र को किस रूप में परिभाषित किया है?
उत्तर:
मैक्स वैबर के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का अर्थपूर्ण बोध कराने का प्रयास करता है।” उनका मत है कि समस्त मानवीय गतिविधियों का संबध क्रिया से होता है। ये क्रियाएँ ही समाजशास्त्र की विषय-वस्तु हैं।

प्रश्न 29.
समाजशास्त्रीय परिपेक्ष्य का अर्थ समझाइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र द्वारा सामाजिक संबंधों का नियामक रूप में तथा प्रयोगात्मक स्तरों पर अध्ययन किया जाता है। इसके अलावा समाजशास्त्रीय अध्ययन के अंतर्गत निरंतरता तथा परिवर्तन का विश्लेषण तथा व्याख्या भी की जाती है। वस्तुतः यही समाजशास्त्रीय परिपेक्ष्य है।

प्रश्न 30.
अगस्त कोंत के प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्र की दो मूल अवधारणाएँ बताइए।
उत्तर:
अगस्त कोंत के प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्र की दो मूल अवधारणाएँ इस प्रकार हैं –

  • सामाजिक स्थितिक (सामाजिक संरचना) तथा
  • सामाजिक गतिशीलता (सामाजिक परिवर्तन)।

प्रश्न 31.
अगस्त कोंत के त्रि-स्तरीय नियम को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
भौतिक शास्त्र के नियमों की तर ही समाज में नियम बनाए जा सकते हैं। इसी धारणा को आधार मानकर कोंत ने त्रि-स्तरीय नियम का प्रतिपादन किया –

  • धर्मशास्त्रीय स्थिति
  • तत्त्व मीमांसा स्थिति तथा
  • प्रत्यक्षात्मक स्थिति

कोंत ने पोजिटिविस्ट फिलॉसोफी द्वारा अपनी उपरोक्त धारणा का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 32.
मैक्स वैबर की एक प्रसिद्ध कृति का नाम बताइए। समाजशास्त्र की उनकी। परिभाषा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मैक्स वैबर की एक प्रसिद्ध कृति ‘थ्योरी ऑफ सोशल ऑरगेनाइजेशन’ है। मैक्स वैबर के समाजशास्त्र की परिभाषा “यह एक विज्ञान है जो सामाजिक क्रियाओं की विवेचनात्मक व्याख्या करने का प्रयत्न करता है, जो अंततः अपने कार्यों के परिणामों में कार्य-कारण सम्बन्धों की व्याख्या प्राप्त करता है।”

प्रश्न 33.
इतिहास की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
इतिहास में अतीत की घटनाओं का क्रमबद्ध तरीके तथा वैज्ञानिक नजरिए से अध्ययन किया जाता है। पार्क के अनुसार, “इतिहास मानव-अनुभवों तथा मानव-प्रकृति का स्थूल विज्ञान है।”

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प्रश्न 34.
‘समाजशास्त्र तथा इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इतिहास तथा समाजशास्त्र मानव समाज का अध्ययन करते हैं। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना का एक सामाजिक पहलू होता है। वर्तमान समय के सामाजिक परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए आवश्यक है कि ऐतिहासिक तथ्यों की समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से व्याख्या की जाए। जी. ई. हॉवर्ड ने सही कहा है कि “इतिहास भूतकाल का समाजशास्त्र है तथा समाजाशास्त्र – वर्तमान इतिहास है।”

प्रश्न 35.
इतिहास तथा समाजशास्त्र में मौलिक अंतर बताइए।
उत्तर:
इतिहासकार के लिए मुख्य अध्ययन की वस्तु ऐतिहासिक घटनाएँ हैं जबकि समाजशास्त्र के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु वे प्रतिमान होते हैं, जिनमें से घटनाएँ घटती हैं। इतिहास में एक जैसी घटनाओं में पायी जाने वाली विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है जबकि समाजशास्त्र में विभिन्न घटनाओं में पायी जाने वाली समानता का अध्ययन किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धर्मशास्त्र, अधिभौतिक तथा प्रत्यक्षवाद अवस्थाओं में विभेद कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्रीय अगस्त कोंत भौतिक शास्त्र के सिद्धांतों की भाँति समाज के सिद्धांतों का निर्धारण करना चाहते थे। उनका मत था कि सभी समाजों में मानवीय बुद्धि का विकास निम्नलिखित तीन सोपानों से होकर गुजरता है –

  • धर्मशास्त्र का सोपान – धर्मशास्त्र के सोपान के अंतर्गत सभी व्याख्याएँ अति प्राकृतिक होती हैं। इस अवस्था में मानव-मन विभिन्न घटनाओं, पदार्थों तथा वस्तुओं की व्याख्या करने का प्रयत्न करता है।
  • अधिभौतिक सोपान – अधिभौतिक अवस्था के अंतर्गत व्याख्याएँ अति प्राकृतिक न होकर परंपराओं, अंतर्ज्ञान तथा अनुमानों पर आधारित होती हैं लेकिन ये व्याख्याएँ किसी प्रमाण द्वारा समर्थित नहीं होती हैं।
  • प्रत्यक्षवाद का सोपान – प्रत्यक्षता के सोपान के अंतर्गत व्याख्याएँ अवलोकित तथ्यों पर आधारित होती हैं। इस सोपान में तार्किक आधार पर निरीक्षण तथ परीक्षण योग्य सिद्धांतों का विकास किया जाता है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र में एमिल दुर्खाइम का मुख्य संबंध किस बात से था?
उत्तर:
एमिल दुर्खाइम (1858-1917 ई.) ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में एकीकरण को समाजशास्त्र के केन्द्रीय अध्ययन की वस्तु स्वीकार किया है। दुर्खाइम का मुख्य संबंध निम्नलिखित बातों से था –

  • सामाजिक तथ्य
  • आत्महत्या तथा
  • धर्म

1. सामाजिक तथ्य – दुर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र वास्तव में सामाजिक तथ्यों का अध्ययन है। दुर्खाइम का कहना है कि समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र कुछ घटनाओं तक सीमित है। इन्हीं घटनाओं को उसने सामाजिक तथ्य कहा है। दुर्खाइम का मत है कि सामाजिक तथ्य कार्य करने, चिंतन तथा अनुभव की ऐसी पद्धति है जिसका अस्तित्व व्यक्ति की चेतना के बाहर होता है। उसने सामाजिक तथ्य की निम्नलिखित दो विशेषताएँ बतायी हैं-बाह्यता तथा बाध्यता।

2. आत्महत्या – दुर्खाइम ने आत्महत्या की व्याख्या सामाजिक एकता, सामूहिक चेतना, सामाजिकता तथा प्रतिमानहीनता के विशिष्ट संदर्भ में की है। दुर्खाइम ने आत्महत्या के निम्नलिखित तीन प्रकार बताए हैं –

  • परमार्थमूलक आत्महत्या
  • अहंवादी आत्महत्या तथा
  • प्रतिमानहीनता मूलक आत्महत्या।

3. धर्म – धर्म की उत्पत्ति के बारे में दुर्खाइम सामूहिक उत्सवों तथा कर्मकाडों को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने धर्म को पवित्रता की धारणा से संबद्ध किया है।

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प्रश्न 3.
“समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की न तो गृह-स्वामिनी है और न ही उनकी दासी है वरन् उनकी बहन मानी जाती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के सम्बन्ध में प्रश्नान्तर्गत पूछी गई बातों का स्पष्टीकरण इसका प्रकार दी जा सकती है –

  • समाजशास्त्र एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है। गिडिंग्स का मत है कि समाजशास्त्र के द्वारा समाज का व्यापक तथा संपूर्ण अध्ययन में किया जाता है।
  • अतः अन्य सामाजिक विज्ञानों से इसका संबंध स्वाभाविक है लेकिन समाजशास्त्र का अपना विशिष्ट दृष्टिकोण है।
    समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण ही समाजशास्त्र को एक विशिष्ट स्थान दिलाता है।
  • इस प्रकार समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों का योग समन्वय मात्र नहीं है।
  • प्रसिद्ध समाजशास्त्री सोरोकिन समाजशास्त्र को एक विशिष्ट सामाजिक विज्ञान मानते हैं।
  • उनका मत है कि समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र के द्वारा ने केवल समाज के सामान्य सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है वरन् विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के मध्य संबंध भी स्थापित किया जाता है।

इस प्रकार, समाजशास्त्र एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है। अन्य सामाजिक विज्ञानों से इसके संबंध समानता के आधार पर हैं। इसकी विशिष्ट अध्ययन पद्धतियाँ तथा दृष्टिकोण इसे एक पृथक् सामाजिक विज्ञान बनाते हैं।

प्रश्न 4.
क्या समाज अमूर्त है?
उत्तर:
निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है समाज अमूर्त है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री यूटर के अनुसार, “समाज एक अमूर्त धारणा है जो एक समूह के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले पारस्परिक संबंधों की संपूर्णता का ज्ञान कराती है।”

मेकाइवर तथा पेज ने समाज को सामाजिक संबंधों का जाल कहा है। सामाजिक संबंधों को न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है, उन्हें केवल अनुभव किया जा सकता है। अतः समाज अमूर्त है। यह वस्तु के मुकाबले प्रक्रिया तथा संरचना के मुकाबले गति है।

राइट के अनुसार, “यह (समाज) व्यक्तियों का समूह नहीं है। यह समूह के सदस्यों के बीच स्थापित संबंधों की व्यवस्था है।” राइट ने समाज को सामाजिक संबंधों के समूह के रूप में परिभाषित किया है न कि व्यक्तियों के समूह के रूप में।

समाज के संबंधों का निर्माण तथा विस्तार सामाजिक अंत:क्रियाओं से होता है। चूंकि सामाजिक अंत:क्रियाओं का स्वरूप अमूर्त है। अतः समाज भी अमूर्त है। निष्कर्षतः राइट के शब्दों में कहा जा सकता है कि समाज सार रूप में एक स्थिति, अवस्था अथवा संबंध है, इसलिए आवश्यक रूप से यह अमूर्त है।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र के उद्भव के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
एक सामाजिक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र का जन्म यूरोप में 19वीं सदी में हुआ। प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक अगस्त कोंत ने 1839 ई. में समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया। हालांकि, कोंत ने शुरू में इस विज्ञान का नाम सामाजिक भौतिकी रखा था। एक पृथक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र का अध्ययन अमेरिका में 1879 में, फ्रांस में 1989 ई. में, ब्रिटेन में 1907 ई. में तथा भारत में 1919 ई. में शुरू हुआ।

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प्रश्न 6.
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की क्या विशेषता है?
उत्तर:
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की विशेषताओं का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –

  1. समाजाशास्त्र के जनक अगस्त कोंत से लेकर वर्तमान समय तक समाजशास्त्रीय समाजशास्त्र की एक स्वीकार्य परिभाषा निर्धारित करने के लिए सतत् प्रयासरत हैं।
  2. समाजशास्त्री समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र तथा उसके अध्ययन के लिए विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों को निर्धारित करने में लगे हुए हैं।
    समाजशास्त्र के द्वारा मानव व्यवहार तथा सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।
  3. दुर्खाइम, सोरोकिन तथा हॉबहाउस का मत है कि समाजशास्त्र भी अन्य प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति एक सामान्य विज्ञान है।
  4. जहाँ तक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का सवाल है, यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र के द्वारा सामाजिक प्रयोगात्मक स्तरों पर अध्ययन किया जाता है।
  5. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अंतर्गत समाज तथा उससे संबंधित तथ्यों का अध्ययन निरंतरता व वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र क्या है?
उत्तर:
समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘सोशियस’ तथा यूनानी भाषा के शब्द ‘लोगोस’ से हुई है। ‘सोशियस’ का अर्थ है। सामाजिक ‘लोगोस’ का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक विज्ञान। समाजशास्त्र समूह में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। विभिन्न विद्वानों का समाजशास्त्र के संबंध में निम्न मत है वार्ड के अनुसार-“समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।” ए. एम. रोज के अनुसार – “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में तथा संबंधों के जाल को हम समाज कहते हैं।” “समाजशास्त्र सामूहिक व्यवहारों का विज्ञान है।” पार्क तथा बर्गेस “समाजशास्त्र सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन करता है।”

एमिल दुर्खाइम अर्थात् सामाजिक संबंधों का नियामक के रूप में तथा प्रयोगात्मक स्तरों पर क्रमबद्ध ज्ञान को समाजशास्त्र कहा जाता है, जो समाज का विज्ञान है और इसमें समाज के सामूहिक व्यवहारों का सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक कारणों सहित क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 8.
समाज के उद्विकास पर स्पेंसर का क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर:
समाज के उद्विकास पर हरबर्ट स्पेंसर (1820-1903 ई.) के विचारों का निम्नलिखित बिन्दुओं के अंतर्गत अध्ययन किया जा सकता है –

  • अगस्त कोंट की भाँति स्पेंसर भी समाज की व्याख्या उद्विकासीय पद्धति के आधार पर करते हैं।
  • स्पेंसर के दृष्टिकोण में समाज अनेक व्यक्तियों का सामूहिक नाम है।
  • स्पेंसर समाज के पृथक-पृथक अंगों की तुलना सजीव शरीर के अलग-अलग अंगों से करते हैं। उनकी मान्यता है कि जिस प्रकार प्राणी का उद्विकास हुआ, उसी प्रकार समाज भी उद्विकास का परिणाम है।

स्पेंसर सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया के निम्नलिखित सोपान बताते हैं –

  • समाज सदैव सरल स्थिति से स्थिति की तरफ आगे बढ़ता है।
  • सामाजिक उद्विकास के साथ-साथ सामाजिक सजातीयता के बजाए सामाजिक विजातीयता की स्थिति बन जाती है।
  • समाज में उद्विकास की प्रक्रिया कम विभिन्नीकृत से अधिक विभिन्नीकृत स्थिति की तरफ तथा निम्न स्तर से उच्च स्तर की तरफ बढ़ती रहती है।

प्रश्न 9.
समाजशास्त्र के उद्गत और विकास का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
समाजशास्त्र का उद्गम यूरोप में हुआ। समाजशास्त्र के अधिकांश मुद्दे एवं सरोकार भी उस समय की बात करते हैं जब यूरोपियन समाज 18वीं और 19वीं सदी के औद्योगिक और पूँजीवाद के आने के कारण गंभीर रूप से परिवर्तन की चपेट में था। जैसे नगरीकरण या कारखानों के उत्पादन, सभी आधुनिक समाजों के लिए प्रासांगिक थे, यद्यपि उनकी कुछ विशेषताएँ हटकर हो सकती थीं, जबकि भारतीय समाज अपने औपनिवेशिक अतीत और अविश्वसनीय विविधता के कारण भिन्न है। भारत का समाजशास्त्र इसे दर्शाता है।

यूरोप में समाजशास्त्र के आरम्भ और विकास को पढ़ना क्यों आवश्यक है? वहाँ से शुरूआत करना क्यों प्रासंगिक है? क्योंकि भारतीय होने के नाते हमारे अतीत अंग्रेजी पूँजीवाद और उपनिवेशवाद के इतिहास से गहरा जुड़ा है। पश्चिम में पूँजीवाद विश्वव्यापी विस्तार पर गया था। उपनिवेशवाद आधुनिक पूँजीवाद एवं औद्योगिकरण का आवश्यक हिस्सा था। इसलिए पश्चिमी समाजशास्त्रियों का पूँजीवाद एवं आधुनिक समाज के अन्य पक्षों पर लिखित दस्तावेज भारत में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों को समझने के लिए सर्वथा प्रासंगिक है। इस प्रकार उपर्युक्त कारकों से समाजशास्त्र के उद्गम और विकास का अध्ययन आवश्यक है।

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प्रश्न 10.
‘सभी सामाजिक विज्ञानों के विषय-वस्तु समान है, फिर भी विभिन्न सामाजिक विज्ञान पृथक-पृथक हैं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सभी सामाजिक विज्ञान जैसे राजनीतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास, मानवशास्त्र, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र आदि समाज में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करते हैं। सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु समान होते हुए भी उनके दृष्टिकोण में अंतर पाया जाता है। जिस प्रकार एक वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ अलग-अलग दिशाओं की ओर संकेत करती हैं ठीक उसी प्रकार ज्ञान रूपी वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ मानव व्यवहार का विभिन्न गतिविधियों का अध्ययन करती हैं।

सामाजिक विज्ञानों को एक-दूसरे से पृथक् करके उनका एकीकृत अध्ययन नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए चिकित्सा के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ हैं। ठीक उसी प्रकार समाज का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग सामाजिक विज्ञान हैं। इस प्रकार, सभी सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु समान होते हुए भी दृष्टिकोणों में विभिन्नता पायी जाती है लेकिन विभिन्न विषयों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नताएँ ज्ञान रूपी नदी हैं जिनके उद्गम का स्रोत एक ही है।

जार्ज सिम्पसन ने अपनी पुस्तक ‘Man in Society’ में लिखा है कि “सामाजिक विज्ञानों के बीच एक अटूट एकता है, यह एकता काल्पनिक एकता नहीं है, यह विभिन्न भागों की गतिशील एकता है तथा एक भाग दूसरे प्रत्येक भाग के लिए तथा अन्य भागों के लिए आवश्यक है।’

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ – समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘सोशियस’ तथा यूनानी भाषा के शब्द ‘लोगोस’ से हुई है। सोशियस का अर्थ है सामाजिक तथा लोगोस का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक विज्ञान।

समाजशास्त्र की परिभाषा – समाजशास्त्र समूह में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समाजशास्त्रियों द्वारा समाजशास्त्र की परिभाषा निम्नलिखित रूपों में दी गई है –
1. समाजशास्त्र समाज एक विज्ञान के रूप में – वार्ड के अनुसार, “समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।” ओडम के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।” गिडिंग्स के अनुसार, “समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।”

2. समाजशास्त्रीय सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में – ए. एम. रोज के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में तथा संबंधों के जाल को हम समाज कहते हैं।”

3. समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के अध्ययन के रूप में – आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।” बेनट तथा ट्यमिन के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन की संरचना तथा कार्यों का विज्ञान है।”

4. समाजशास्त्र समूह में मानव – व्यवहार के अध्ययन के रूप में-पार्क तथा बर्गेस के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक व्यवहारों का विज्ञान है।” किंबाल यंग के अनुसार, “समाजशास्त्र समूह में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करता है।”

5. समाजशास्त्र सामाजिक प्रघटनाओं के अध्ययन के रूप में – एमिल दुर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन करता है।

6. समाजशास्त्र सामाजिक क्रियाओं के अध्ययन के रूप में – मैक्स वैबर के अनुसार समस्त मानवीय गतिविधियों का सामाजिक संबंध क्रिया से होता है।

प्रश्न 2.
चर्चा कीजिए कि आजकल अलग-अलग विषयों में परस्पर लेन-देन कितना ज्यादा है?
उत्तर:
समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है। यह एक दुकानदार और उपभोक्ता के बीच, एक अध्यापक और विद्यार्थी के बीच, दो मित्रों के बीच अथवा परिवार के सदस्यों के बीच की अंतः क्रिया के विश्लेषण को अपना केन्द्रबिन्दु बना सकता है। इसी प्रकार यह राष्ट्रीय मुद्दों जैसे बेरोजगारी अथवा जातीय संघर्ष या सरकारी नीतियों या आदिवासी जनसंख्या के जंगल पर अधिकार या ग्रामीण कों को अपना केन्द्र बिन्दु बना सकता है अथवा वैश्विक सामाजिक प्रक्रिया, जैसे-नए लचीले श्रम कानूनों का श्रमिक वर्ग पर प्रभाव अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का नौजवानों पर प्रभाव अथवा विदेशी विश्वविद्यालयों के आगमन का देश की शिक्षा-प्रणाली पर प्रभाव की जाँच कर सकता है।

इस प्रकार समाजशास्त्र का विषय परिभाषित नहीं होता कि वह क्या अध्ययन (परिवार या व्यापार संघ अथवा गाँव) करता है बल्कि इससे परिभाषित होता है वह एक चयनित क्षेत्र का अध्ययन कैसे करता है। समाजशास्त्र के ये विवेचित विषय अन्य विषयों के भी अंग हैं। इसलिए अन्य विषय आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और विषय-सामग्री का इनमें परस्पर लेन-देन अनिवार्य है।

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प्रश्न 3.
समाजशास्त्र के जनक के रूप में अगस्त कोंत जाने जाते हैं, कैसे?
उत्तर:
समाजशास्त्र शब्द से संसार को सर्वप्रथम परिचित कराने का श्रेय फ्रांसीसी दार्शनिक तथा समाजशास्त्री अगस्त कोंत को है। सर्वप्रथम अगस्त कोंत ही सामाजिक विचारक थे। जिन्होंने सामाजिक घटनाओं के अध्ययन क्षेत्र की कल्पना या आध्यात्मिक विचारों को दृढ़ता से निकालकर उसे वैज्ञानिक तथ्यों से सींचा। वे 1789 ई. के फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप उत्पन्न फ्रांस की राजनीतिक उथल-पुथल सधे प्रभावित थे।

उनकी प्रारंभिक रचनाओं में पुर्नजागरण और परम्पराओं के अवैज्ञानिक विचारों पर प्रत्यक्ष प्रहार किया गया। उन्होंने अवलोकन और प्रयोग पर आधारित समाज के अध्ययन हेतु तार्किक उपागम का विकास किया। कोंत एक ऐसे विज्ञान का सृजन करना चाहते थे जो कि सामाजिक घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से कर सके।

प्रश्न 4.
‘समाज’ शब्द के विभिन्न पक्षों की चर्चा कीजिए। यह आपके सामान्य बौद्धिक ज्ञान की समझ से किस प्रकार अलग है?
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मेकाइवर तथा पेज ने समाज के प्रमुख आधारों को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “समाज रीतियों, कार्य-प्रणालियों, अधिकार-सत्ता एवं पारस्परिक संयोग, अनेक समूह तथा उनके विभागों, मानव-व्यवहार के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है।”

उपरोक्त परिभाषा के समाज के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –
1. रीतियाँ – रीतियों के अंतर्गत समाज के उन स्वीकृत तरीकों को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें समाज व्यवहार के क्षेत्र में उचित मानता है। रीतियाँ अथवा चलन समाज में मनुष्य की एक निश्चित तथा समाज स्वीकृत व्यवहार करने के लिए बाध्य करते हैं। इस प्रकार रीतियाँ सामाजिक संबंधों को निश्चित स्वरूप प्रदान करने में सहयोग देती हैं।

2. कार्य – प्रणालियाँ – कार्य-प्रणालियों का तात्पर्य सामाजिक संस्थाओं से है। संस्थाएँ वास्तव में प्रस्थापित कार्यविधियाँ होती हैं। समाज के सदस्यों से यह अपेक्षित है कि वे प्रचलित कार्य-प्रणालियों के माध्यम से अपने कार्यों को पूरा करें। कार्य-प्रणालियाँ समाज को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करने में सहायक होती हैं।

3. अधिकार – सत्ता-अधिकार-सत्ता भी सामाजिक संबंधों को सुचारू रूप से चलाने तथा नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री जॉर्ज सिमल ने अधिकार-सत्ता पर विशेष जोर दिया है। अधिकार सत्ता तथा अधीनता दो परस्पर संबंधित सामाजिक संबंध हैं। किसी स्थिति में व्यक्ति अधिकार-सत्ता तथा किसी अन्य स्थिति में अधीनता रखता है। अधिकार-सत्ता व्यवहार के प्रतिमानों को परिभाषित तथा परिचालित करती है।

4. पारस्परिक सहयोग – पारस्परिक सहयोग समाज के अस्तित्व को स्थायित्व तथा निरंतरता प्रदान करता है। क्रोप्टकिन ने पारस्परिक सहयोग को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया है। बोगार्डस के अनुसार, “पारस्परिक सहयोग, सहयोग का एक विशिष्ट नाम है।” समाज की प्रगति, श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण की प्रक्रियाएँ पारस्परिक सहयोग पर निर्भर हैं। राइट के अनुसार, “यह (समाज) व्यक्तियों का एक समूह नहीं है। यह समूह के सदस्यों के बीच स्थापित संबंधों की व्यवस्था है।”

पारस्परिक सहयोग की अनुपस्थिति में सामाजिक अंतः क्रियाओं की कल्पना नहीं की जाप सकती है।

5. समूह तथा विभाग – समाज विभिन्न समूहों, विभागों तथा उप-विभागों का समीकरण है। मनुष्य इन समूहों तथा विभागों में रहकर ही सामाजिक व्यवहार करता है। समाज एक व्यापक तथा विस्तृत अवधारणा है तथा इसके अंतर्गत राष्ट्र, नगर, गाँव, विभिन्न समुदाय, समितियाँ तथा संस्थाएँ आदि सभी सम्मिलित होते हैं। समूह तथा विभागों के माध्यम से मानव-व्यवहार को एक निश्चित आधार तथा दिशा मिलती है।

6. मानव – व्यवहार का नियंत्रण-सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए मानव-व्यवहार पर नियंत्रण आवश्यक है। मानव व्यवहार को आपैचारिक तथा अनौपचारिक नियंत्रणें द्वारा नियंत्रित किया जाता है। औपचारिक नियंत्रण के अंतर्गत राज्य द्वारा निर्मित कानून तथा पुलिस व्यवस्था आदि आते हैं। अनौपचारिक नियंत्रण के अंतर्गत परंपराएँ, रूढ़ियाँ जनरीतियाँ तथा रिवाज आदि आते हैं।

7. मानव – व्यवहार की स्वतंत्रताएँ – मानव-व्यवहार में नियंत्रणों के साथ-साथ स्वतंत्रताएँ भी आवश्यक हैं। मनुष्यों को समाज द्वारा प्रतिस्थापित नियमों की संरचना के अंतर्गत व्यवहार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। स्वतंत्रताओं के माध्यम से सामाजिक प्रतिमानों का विकास होता है जो सामाजिक परिवर्तन तथा प्रगति के लिए जरूरी हैं। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मेकाइवर तथा पेज द्वारा दिए गए समाज के विभिन्न आधार सामाजिक संबंधों के जाल को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करने में सहायक हैं।

समाजशास्त्र और सामान्य बौद्धिक ज्ञान-समाजशास्त्रीय ज्ञान ईश्वरमीमांसीय और दार्शनिक अवलोकनों से अलग है। इसी प्रकार समाजशास्त्र सामान्य बौद्धिक अवलोकनों से भी अलग है। सामान्य बौद्धिक वर्णन सामान्यतः उन पर आधारित होते हैं जिन्हें हम प्रकृतिवादी और व्यक्तिवादी वणन कह सकते हैं। व्यवहार का एक प्रकृतिवादी वर्णन इस मान्यता पर निर्भर करता है कि एक व्यक्ति व्यवहार के प्राकृतिक कारणों की पहचान कर सकता है।

अतः समाजशास्त्र सामान्य बौद्धिक अवलोकनों एवं विचारों तथा साथ ही साथ दार्शनिक विचारों दोनों से ही अलग है। यह हमेशा या सामान्यत: भी चमत्कारिक परिणाम नहीं देता लेकिन अर्थपूर्ण और असंदिग्ध संपर्कों की छानबीन द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। समाजशास्त्री ज्ञान में बहुत अधिक प्रगति हुई है। ज्यादा प्रगति तो सामान्य रूप से हुई परंतु कभी-कभी नाटकीय उद्भवों से भी प्रगति हुई है।

समाजशास्त्र में अवधारणाओं, पद्धतियों और आँकड़ों का एक पुरा तंत्र है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह किस तरह संयोजित है। यह सामान्य बौद्धिक ज्ञान से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। सामान्य बौद्धिक ज्ञान अपरावर्तनीय है क्योंकि यह अपने उद्गम के बारे में कोई प्रश्न नहीं पूछता है। या दूसरे शब्दों में यह अपने आप से यह नहीं पूछता–“मैं यह विचार क्यों रखता हूँ?” एक समाजशास्त्री को अपने स्वयं के बारे में तथा अपने किसी भी विश्वास के बारे में प्रश्न पूछने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए चाहे वह विश्वास कितना भी प्रिय क्यों न हों-“क्या वास्तव में ऐसा है?”

समाजशास्त्र के दोनों ही उपागम, व्यवस्थित एवं प्रश्नकारी, वैज्ञानिक खोज की एक विस्तृत परंपरा से निकलते हैं। वैज्ञानिक विधियों के इस महत्व को तभी समझा जा सकता है, जब हम अतीत की तरफ लौटे और उस समय की सामाजिक परिस्थिति को समझें जिसमें समाजशास्त्री दृष्टिकोण का उद्भव हुआ था क्योंकि आधुनिक विज्ञान में हुए विकासों का समाजशास्त्र पर गहरा पड़ा था।

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प्रश्न 5.
समाजशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में संबंध की व्याख्या कीजिए। अथवा, समाजशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में समानताएँ तथा विभिन्नताएँ बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र तथा राजीतिशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं । यही कारण है कि मोरिस गिंसबर्ग ने कहा है कि “ऐतिहासिक दृष्टि से समाजशास्त्र की मुख्य जड़ें राजनीति एवं इतिहास दर्शन में हैं।” समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अभाव में राजनीतिशास्त्र का अध्ययन अधूरा ही रहेगा । बार्स के अनुसार, “समाजशास्त्र तथा आधुनिक राजनीतिशास्त्र के विषय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पिछले 30 वर्षों में राजनीतिक सिद्धांत में जो परिवर्तन हुए हैं, वे सभी समाजशास्त्र द्वारा अंकित तथा सुझाए गए विकास के अनुसार ही हुए हैं।

समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र में समानता –
1. समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र दोनों ही समाज में मनुष्य के व्यवहार तथा गतिविधियों का अध्ययन करते हैं। प्रसिद्ध विद्वान अरस्तू के अनुसार, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।”

2. सामाजिक जीवन तथा राजनीतिक जीवन एक-दूसरे से अत्यधिक जुड़े हुए हैं। जी. ई. जी. कॉलिन के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र तथा समाजशास्त्र एक ही आकृति के दो रूप हैं।’ इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए एफ. जी. विल्सन ने कहा है कि “यह अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि आम तौर पर यह फैसला करना कठिन हो जाता है कि विशिष्ट लेखक को समाजशास्त्री, राजनीतिशास्त्री या दर्शनशास्त्री क्या मान जाए?”

3. समाजशास्त्री संस्थाएँ राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप तथा प्रकृति समाज के स्वरूप तथा प्रकृति से निर्धारित होते हैं । गिडिंग्स के अनुसार, “जिस व्यक्ति को पहले समाजशास्त्र के मूल सिद्धांतों का ज्ञान न हो, उसे राज्य के सिद्धांत की शिक्षा देना वैसा ही है, जैसे न्यूटन के गति सिद्धांत को न जानने वाले को खगोलशास्त्र या ऊष्मा विज्ञान की शिक्षा देना।”

4. मनुष्य के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में अत्यधिक पारस्परिकता तथा अंत:निर्भरता पायी जाती है। दोनों ही एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। प्रसिद्ध विद्वान गिंसबर्ग के अनुसार, “यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र की उत्पत्ति राज्य के अतिरिक्त अन्य संस्थाओं के अध्ययन हेतु राजनीतिक अन्वेषण के क्षेत्र में विकास के परिणामस्वरूप हुई । उदाहरण के लिए परिवार या सम्पत्ति के स्वरूप और संस्कृति और सभ्यता के अन्य तत्त्व जैसे आचार, धर्म और कला, ये सामाजिक उपज माने जाते हैं तथा एक-दूसरे के संदर्भ में इनका अवलोकन किया जाता है।

समाजशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में विभिन्नताएँ अथवा अंतर –
1. समाजशास्त्र का क्षेत्र तथा दृष्टिकोण राजनीतिशास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक तथा विस्तृत है। समाजशास्त्र में सभी सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में राज्य तथा सरकार के संगठन का ही अध्ययन किया जाता है। गार्नर के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र मानव समुदाय के केवल एक रूप-राज्य से संबंधित, समाजशास्त्र मानव समुदाय के सभी रूपों से संबंधित है।”

2. समाजशास्त्र के द्वारा जीवन के समान्य पक्षों का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीतिशास्त्र जीवन के एक विशिष्ट पक्ष का अध्ययन करता है। गिलक्राइस्ट के अनुसार, “समाजशास्त्र मनुष्य का सामाजिक प्राणी के रूप में अध्ययन करता है। चूंकि राजनीति संगठन सामाजिक संगठन का एक विशिष्ट स्वरूप होता है, अतः राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की अपेक्षा अधिक विशिष्ट शास्त्र है।”

3. समाजशास्त्र का दृष्टिकोण समग्र है तथा यह चेतन व अचेतन दोनों ही अवस्थाओं का अध्ययन करता है जबकि राजनीतिशास्त्र का दृष्टिकोण एकपक्षीय है तथा यह केवल चेतन अवस्था का ही अध्ययन करता है।

4. समाजशास्त्रीय अध्ययन तथा ज्ञान जीवन के समस्त क्षेत्रों के लिए लाभदायक हैं जबकि राजनीति शास्त्र का ज्ञान केवल राजनीति के लिए लाभदायक है।

5. समाजशास्त्र के अंतर्गत सामाजिक संगठन तथा विघटन की उत्तरदायी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीतिशास्त्र शास्त्र में मुख्य रूप से राज्य तथा सरकार का अध्ययन किया जाता है जो मूल रूप से संगठित संस्थाएँ हैं।

अंत में गिलक्राइस्ट के शब्दां में हम कह सकते हैं कि “दोनों विज्ञानों की वास्तविक सीमाएँ अनमनीय रूप से परिभाषित नहीं की जा सकतीं। वे कभी-कभी एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं लेकिन दोनों के बीच एक स्पष्ट सामान्य भेद है।”

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र तथा इतिहास में समानताएँ तथा विभिन्नताएँ बताइए। अथवा, समाजशास्त्र तथा इतिहास के बीच संबंध बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र तथा इतिहास दोनों ही मानव समाज का अध्ययन करते हैं । इतिहास द्वारा प्रदान किए गए तथ्यों की व्याख्या तथा उनमें समन्वय समाजशास्त्र के द्वारा किया जाता है।

समाजशास्त्र तथा इतिहास में समानताएँ –

  • दोनों ही विषय मानव समाज का अध्ययन करते हैं।
  • समाजशास्त्रीय विश्लेषण ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
  • समाजशास्त्र तथा इतिहास दोनों ही मानवीय गतिविधियों तथा घटनाओं का अध्ययन करते हैं।
  • सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए ऐतिहिासिक घटनाओं का अध्ययन आवश्यक है।
  • इतिहास तथा समाजशास्त्र की पारस्परिक निर्भरता के विषय में जी. ई. हावर्ड ने लिखा है कि, “इतिहास भूतकाल का समाजशास्त्र है और समाजशास्त्र वर्तमान इतिहास है।”
  • समाजशास्त्र के द्वारा ऐतिहासिक घटनाओं के अध्ययन हेतु सामाजिक पृष्ठभूमि प्रदान की जाती है । इसी प्रकार समाजशास्त्र अपनी अध्ययन सामग्री के लिए इतिहास पर निर्भर करता है।
  • यही कारण है कि बुलो ने समाजशास्त्र को इतिहास से पृथक् मानने से इंकार कर दिया

समाजशास्त्र तथा इतिहास में विभिन्नताएँ अथवा अंतर –

  • समाजशास्त्र विभिन्न घटनाओं में पायी जाने वाली समानताओं का अध्ययन करता है; जबकि इतिहास में समान घटनाओं में पायी जाने वाली भिन्नता का अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र के द्वारा समाज का समाजीकरण किया जाता है जबकि इतिहास के द्वारा विशिष्टीकरण तथा वैयक्तिकता की खोज की जाती है।
  • पार्क के अनुसार, “इतिहास जहाँ मानव अनुभवों तथा मानव प्रकृति का मूर्त विज्ञान है, समाजशास्त्र एवं अमूर्त विज्ञान है।”
  • समाजशास्त्र सामाजिक घटनाओं का अध्ययन सामाजिक संबंधों की दृष्टि से करता है जबकि इतिहास में घटनाओं के समस्त पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  • उदाहरण के लिए समाजशास्त्रीय युद्ध को सामाजिक घटना स्वीकार करके उसका व्यक्तियों के जीवन तथा सामाजिक संस्थाओं पर प्रभाव का अध्ययन करेगा। दूसरी तरफ, इतिहासकार युद्ध तथा उससे संबंधित सभी परिस्थिति का अध्ययन करेगा।

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प्रश्न 7.
समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र का संबंध स्पष्ट कीजिए। अथवा, समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में समानताएँ तथा विभिन्नताएँ बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र तथा इतिहास एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। सामाजिक गतिविधियों तथा व्यवहार आर्थिक गतिविधियों तथा व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। समाजशास्त्र तथा इतिहास के पारस्परिक संबंधों के बारे में मेकाइवर ने लिखा है कि “इस प्रकार की आर्थिक घटनाएँ सदेव सामाजिक आवश्यकताओं तथा क्रियाओं के समस्त रूपों से निश्चित होती हैं तथा वे (आर्थिक घटनाएँ) सदैव प्रत्येक प्रकार की सामाजिक आवश्यकताओं व क्रियाओं को पुनर्निर्धारित, सृजित, स्वरूपीकृत एवं परिवर्तित करती हैं।”

वास्तव में आर्थिक संबंधों तथा गतिविधियों का पर्यावरण से सामाजिक संबंध है। थॉमस के अनुसार, “वास्तव में, अर्थशास्त्र समाजशास्त्र के विस्तृत विज्ञान की एक शाखा है…..”।

समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में समानताएँ –
1. समाजशास्त्रीय अध्ययन तथा अर्थशास्त्रीय अध्ययन समाजरूपी वस्त्र के ताने-बाने हैं। यही कारण है कि सामाजिक कारकों तथा आर्थिक कारकों को पृथक नहीं किया जा सकता है। अनेक विद्वानों ने सामाजिक तथा आर्थिक प्रघटनाओं का मिला-जुला अध्ययन किया है। इन विद्वानों में कार्ल मार्क्स, मैक्स वैबर तथा वेबलन आदि प्रमुख हैं।

2. सामाजिक घटनाओं का आर्थिक पहलू भी होता है। उदाहरण के लिए अपराध, निर्धनता, बेकारी, दहेज आदि सामाजिक घटनाओं का सशक्त आर्थिक पहल है। कार्ल मार्क्स ने तो आर्थिक तत्वों को समाज की एकमात्र गत्यात्मक शक्ति स्वीकार किया है।

समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में विभिन्नताएँ अथवा अंतर –
1. समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन के समस्त पहलुओं तथा गतिविधियों का अध्ययन करता है जबकि अर्थशास्त्र मनुष्य के केवल आर्थिक पहलू का अध्ययन करता है।

2. समाजशास्त्र का अध्ययन, क्षेत्र तथा विषय-सामग्री अधिक व्यापक है जबकि अर्थशास्त्र के अध्ययन की प्रकृति व्यक्तिवादी है।

3. अध्ययन की प्रकृति एवं दृष्टिकोण से समाजशास्त्र समूहवादी सामाजिक विज्ञान है, जबकि अर्थशास्त्र के अध्ययन की प्रकृति व्यक्तिवादी है।

4. समाजशास्त्रीय विश्लेषण बहुकारकीय होते हैं जबकि अर्थशास्त्रीय विश्लेषण में आर्थिक कारकों को ही प्रमुखता तथा महत्त्व प्रदान किया जाता है।

5. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जबकि अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से मनुष्य एक आर्थिक प्राणी है।

प्रश्न 8.
समाजशास्त्र की प्रकृति तथा विषय-क्षेत्र की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(i) समाजशास्त्र की प्रकृति-समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। समाजशास्त्र वैज्ञानिक पद्धति के निम्नलिखित सोपानों का प्रयोग करता है –

  • आनुभाविकता
  • सिद्धांत
  • संचयी ज्ञान तथा
  • मूल्य तटस्थता

जबकि दूसरी तरफ, कुछ विद्वान निम्नलिखित तर्कों के आधार पर समाजशास्त्र को एक विज्ञान स्वीकार नहीं करते हैं –

  • वस्तुनिष्ठता का अभाव
  • अवलोकन का अभाव
  • प्रयोग का अभाव
  • विषय-सामग्री मापने का अभाव तथा
  • भीवष्यवाणी का अभाव

समाजशास्त्र के विरुद्ध उपरोक्त वर्णित उपलब्धियों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाजशास्त्र में विषय-वस्तु का क्रमबद्ध तरीके से वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र में निम्नलिखित विधियों अथवा यंत्रों का प्रयोग किया जाता है –

  • समाजमिति
  • प्रश्नावली
  • अनुसूची
  • साक्षात्कार
  • केस स्टडी

समाजशास्त्री का विषय – क्षेत्र-समाजशास्त्र की परिभाषा तथा प्रकृति की भाँति इसके विषय-क्षेत्र के बारे में भी विद्वानों में मतभेद हैं। वी. एफ. काल्बर्टन का मत है कि “क्योंकि समाजशास्त्र एक ऐसा लचीला विज्ञान है कि यह निर्णय करना कठिन है कि इसकी सीमा कहाँ शुरू होती है तथा कहाँ समाप्त…….”

समाजशास्त्र के क्षेत्र के बारे में समाजशास्त्रियों में निम्नलिखित दो संप्रदाय प्रचलित हैं –
1. विशिष्टीकृत या स्वरूपात्मक संप्रदाय – स्वरूपात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विशिष्ट स्वरूपों का अमूर्त दृष्टिकोण से अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए यदि किसी बोतल में कोई भी द्रव पदार्थ जैसे दूध या पानी आदि डाला जाए तो बोतल के स्वरूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस संप्रदाय के विद्वानों का मत है कि सामाजिक संबंध भी बोतल के समान हैं तथा उनका आकार अंतर्वस्तु के अनुसार नहीं बदलता है।

उदाहरण के लिए संघर्ष, सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा के स्वरूप में कोई अंतर नहीं आएगा, चाहे उनका अध्ययन आर्थिक क्षेत्र में किया जाए अथवा राजनीतिक क्षेत्र में। इस संप्रदाय के प्रमुख समाजशास्त्री हैं-जॉर्ज सिमल, स्माल, वीरकांत, मैक्स वैबर तथा वॉन वीडा आदि।

आलोचना –

  • समाजशास्त्र में सामाजिक संबंधों के स्वरूपों के स्वरूप तथा अन्तर्वस्तु के बीच भेद भ्रामक है।
  • स्वरूपात्मक संप्रदाय ने समाजशास्त्र के क्षेत्र को संकुचित बना दिया है।
  • स्वरूपों का अध्ययन अंतर्वस्तुओं से पृथक नहीं किया जा सकता।

सोरोकिन ने ठीक ही कहा है कि “हम एक गिलास को उसके स्वरूप को बदले बिना शराब, पानी या चीनी से भर सकते हैं, परंतु मैं एक ऐसी सामाजिक संस्था के विषय में कल्पना भी नहीं कर सकता जिसका स्वरूप सदस्यों के बदलने पर भी न बदले।”

2. समन्वयात्मक संप्रदाय – समन्वयात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है जिसका प्रमुख कार्य सामाजिक जीवन की सामान्य दशाओं का अध्ययन करना है। इस संप्रदाय के प्रमुख समाजशास्त्री हैं-दुर्खाइम, हॉबहाउस, सोरोकिन तथा गिंसबर्ग आदि।

आलोचना –

  • समन्वयात्मक संप्रदाय की विचारधारा भ्रामक है।
  • समाजशास्त्र अनेक सामाजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र नहीं हो सकता।

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प्रश्न 9.
समाजशास्त्र के विभिन्न दृष्टिकोणों का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के विभिन्न दृष्टिकोणों का अध्ययन करने के लिए कुछ प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचारों का उल्लेख आवश्यक है –
(i) अगस्त कोंत (-1778-1857 ई.)-फ्रांस के दार्शनिक अगस्त कोंत को समाजशास्त्र का पिता कहा जाता है। उनका मत था कि समाजशास्त्र का स्वरूप वैज्ञानिक है तथा यह समग्र रूप से समाज का अध्ययन करेगा।

कोंत का मत था कि जो उपकरण तथा यंत्र प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा प्रयोग में लाये जाते हैं, उनका प्रयोग समाजशास्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिए।

अगस्त कोत ने समाजशास्त्र के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए निम्नलिखित विधियों का उल्लेख किया –

  • निरीक्षण
  • परीक्षण
  • ऐतिहासिक तथा
  • तुलनात्मक

अगस्त कोत ने सामाजिक यथार्थ को प्रत्यक्षवाद कहा। उसने प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्र की दो मूल अवधारणाएँ बतायीं –

  • स्थिति मूलक तथा
  • गति मूलक

अगस्त कोंत का मत था कि भौतिकशास्त्र के नियमों की भाँति समाज के नियमों का विकास किया जा सकता है तथा इसी आधार पर उन्होंने अपना त्रि-स्तरीय नियम दिया –

  • धर्मशास्त्रीय स्थिति
  • तत्व मीमांसा स्थिति तथा
  • प्रत्यक्षात्मक अथवा वैज्ञानिक स्थिति

अगस्त कोंत के प्रमुख ग्रंथ हैं –

  • Positive Philosophy
  • System of Positive Polity
  • Religion of Humanity

(ii) हरबर्ट स्पेंसर (1820-1903 ई.) –

  • हरबर्ट स्पेंसर का जन्म इंगलैण्ड में हुआ था। कोंत की भाँति उन्होंने भी समाज की व्याख्या उद्विकासीय पद्धति के आधार पर की है।
    स्पेंसर का मत था कि सभी समाज सरलता से जटिलता की ओर बढ़ते हैं।
  • स्पेंसर का विचार था कि जिस प्रकार प्राणी का विकास हआ है, उसी प्रकार समाज का भी विकास हुआ है।
  • स्पेंसर ने समितियों, समुदायों, श्रम-विभाजन, सामाजिक विभेदीकरण, सामाजिक स्तरीकरण, विज्ञान तथा कलात्मक समाजशास्त्र के अध्ययन पर विशेष बल दिया है।
  • स्पेंसर के अनुसार समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र हैं-परिवार, धर्म, राजनीति, सामाजिक नियंत्रण तथा उद्योग आदि।

स्पेंसर के प्रमुख ग्रंथ –

  • Social Statics
  • The study of Sociology
  • The Principles of Sociology

(iii) कार्ल मार्क्स (1818-1883 ई.)-कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी में हुआ था। यद्यपि मार्क्स ने अपने लेखों में कहीं भी समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग नहीं किया है तथापि उन्होंने ‘सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्म निरीक्षण तथा विश्लेषण किया है। – यदि मार्क्स के विचारों को समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के अन्तर्गत रखा जाए तो उनके विचारों का प्रभाव परिवार, संपत्ति, राज्य. विकास तथा स्तरण पर दिखाई देता है।

सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए मार्क्स की निम्नलिखित अवधारणाएँ महत्त्वपूर्ण हैं-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक भौतिकवाद तथ वर्ग तथा वर्ग-संघर्ष की अवधारणा। मार्क्स द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की अवधारणा को आर्थिक प्रघटनाओं की व्याख्या हेतु आवश्यक मानते थे। यही कारण है कि उन्होंने भौतिक जगत में वाद, प्रतिववाद तथा संश्लेषण को प्रमुखता प्रदान की है।

मार्क्स ने कहा है कि आज तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। मार्क्स के अनुसार समाज अपने विकास की प्रक्रिया में इतिहास के निम्नलिखित विकास क्रमों से होकर गुजरता है

  • आदिम साम्यवादी व्यवस्था
  • दास प्रथा
  • कृषि व्यवस्था
  • सामंतवादी व्यवस्था
  • पूँजीवादी व्यवस्था।

मार्क्स का मत था कि वर्ग विहीन समाज संघर्ष के द्वारा प्राप्त हो सकता है। कार्ल मार्क्स के प्रमुख ग्रंथ –

  • The Proverty of Philosophy
  • The Communist Manifesto
  • The First Indian War of Independence

(iv) एमिल दुर्खाइम (1858-1917) – फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खाइम ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में अगस्त कोंत की परंपरा का अनुसरण किया है। उनका मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक समाजशासत्र का विकास करना था।

दुर्खाइम का मत है कि समाजशास्त्र का क्षेत्र कुछ घटनाओं तक सीमित है तथा ये घटनाएँ सामाजिक तथ्य हैं । दुर्खाइम के अनुसार सामाजिक तथ्य कार्य करने, चिंतन तथा अनुभव करने की पद्धति है जो व्यक्ति की चेतना से बाहर होता है। बाह्यता बाध्यता सामाजिक तथ्य की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं।

दुर्खाइम ने धर्म को समाज के सदस्यों के मध्य एक शक्तिशाली एकीकरण का माध्यम बताया है। वे धर्म को एक सामाजिक तथ्य बातते हैं।

दुर्खाइम के चिंतन के दो मुख्य केन्द्र हैं –

  • सामाजिक दृढ़ता एवं
  • सामूहिक चेतना।

दुर्खाइम के मुख्य अध्ययन क्षेत्र थे –

  • सामाजिक तथ्य
  • आत्महत्या एवं
  • धर्म

दुर्खाइम के प्रमुख ग्रंथ –

  • Division of Labour in Society
  • Suicide
  • The Elementary forms of Religious Life.

(v) मैक्स वैबर (1864-1920) – मैक्स वैबर का जन्म जर्मनी में हुआ था। वैबर ने समाजशास्त्र की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “यह एक विज्ञान है, जो सामाजिक क्रियाओं की विवेचनात्मक व्याख्या करने का प्रयास करता है।”

मैक्स वैबर ने समाजशास्त्र को सामाजिक क्रिया का व्याख्यात्मक बोध बताया है। प्रत्येक क्रिया के लक्ष्य होते हैं। सामाजिक क्रिया के निम्नलिखित चार प्रकार हैं –

  • धार्मिक क्रिया
  • विवेकपूर्ण क्रिया
  • परंपरागत क्रिया
  • भावात्मक क्रिया
  • मैक्स वैबर द्वारा अधिकारी तंत्र, प्राधिकार, सत्ता तथा रजानीति आदि की विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है।

मैक्स वैबर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Methodology of Social Sciences में कहा कि समाजशास्त्र को एक विषय के रूप में बोध की पद्धति को अपनाना चाहिए। मैक्स वैबर ने अपनी अध्ययन विधि को आदर्श रूप कहा है। उसने वस्तुपरकता की बजाए आंतरिकता एवं निरीक्षण-परीक्षण की बजाए बोध पर अधिक बल दिया है।

मैक्स वैबर के प्रमुख ग्रंथ –

  • The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism
  • The Theory of Social and Economic Organisation
  • The City

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज

प्रश्न 10.
समाजशास्त्र क्या है? समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र-समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सोशियस’ तथा यूनानी भाषा के ‘लोगोंस’ शब्द से हुई है। ‘सोशियस’ का अर्थ है सामाजिक तथा ‘लोगोस’ का अर्थ है विज्ञान । इस प्रकार शाब्दिक अर्थ के दृष्टिकोण से समाजशास्त्र का अर्थ है सामाजिक अथवा समाज का विज्ञान।

अगस्त कोंत को ‘समाजशास्त्र का पिता’ कहा जाता है। 1839 ई. में उन्होंने समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया था। कोंत का मत था कि समाजशास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक है तथा यह संपूर्ण समाज का समग्रतापूर्ण अध्ययन करेगा।

हॉबहाउस के अनुसार, ‘समाजशास्त्र मानव मस्तिष्क की अंत:क्रियाओं का अध्ययन करता है।” पार्क तथा बर्गेस के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक व्यवहारों का विज्ञान है।” एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधियों का अध्ययन है।”

सोरोकिन के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं, सामान्य स्वरूपों तथा विभिन्न प्रकार के अंत:संबंधों का सामान्य विज्ञान है।” प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने सामाजिक क्रियाओं को समाजशास्त्र का प्रमुख अध्ययन विषय स्वीकार किया है। समाजशास्त्र समूह में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति की व्याख्या-समाजशास्त्र विज्ञान है अथवा नहीं, इस संबंधों में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद हैं।

इस प्रश्न का सही समाधान प्राप्त करने के लिए यह जानना जरूरी है कि विज्ञान किसे कहते हैं तथा विज्ञान द्वारा कौन-कौन सी पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है? जहाँ तक विज्ञान का प्रश्न है-कोई भी विषय सामग्री विज्ञान हो सकती है, यदि उसे क्रमबद्ध तरीके से, वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा प्राप्त किया गया हो।

इस संबंध में गिलिन तथा गिलिन ने लिखा है कि “जिस क्षेत्र में हम अनुसंधान करना चाहते हैं, उसकी ओर एक निश्चित प्रकार की पद्धति ही विज्ञान का वास्तविक चिह्न है।” समाजशास्त्र अन्वेष” हेतु वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता तथा व्यवस्थित सिद्धांतों का अवलंबन करता है।

समाजशास्त्र द्वारा अध्ययन हेतु वैज्ञानिक विविध के निम्नलिखित सोपानों का प्रयोग किया जाता है –
(i) आनुभाविकता – आनुभाविकता का अर्थ है अनुभवों की जानकारी हासिल करना। अवलोकन तथा तार्किकता के आधार पर तथ्यों का सामान्यीकरण किया जाता है। आनुभाविक प्रमाण के आधार पर समाजशास्त्रीय ज्ञान के समस्त पक्षों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है।

(ii) सिद्धांत – सिद्धांत समाजशास्त्रीय अध्ययन का केन्द्रीय बिन्दु है। सिद्धांत आनुभाविक तथा तार्किक दोनों होता है। सिद्धांत तथा तथ्य में घनिष्ठ पारस्परिकता होती है। सिद्धांत के माध्यम से जटिल अवलोकनों को सार रूप में अमूर्त तार्किक अंतर्संबंधित अवस्था में प्रस्तुत किया जाता है। सिद्धांत कार्य-कारण संबंधों के वैज्ञानिक तथा तार्किक विश्लेषण में सहायक सिद्ध हो सकता है। सिद्धांतों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक प्रघटनाओं तथा प्राकल्पनाओं की प्रकृति को समझने के लिए सामाजिक तथ्यों की व्याख्या करना तथा उनमें अंतर्संबंध स्थापित करना है। इन प्राकलपनाओं की वैधता की जाँच पुनः आनुभाविक अनुसंधान के द्वारा की जा सकती है।

(iii) संचयी ज्ञान – समाजशास्त्री के संचयी ज्ञान अथवा ज्ञान भंडार का व्यवस्थित परीक्षण किया जा सकता है। अत: हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र संचयी ज्ञान है क्योंकि इसके सिद्धांत परस्पर संबद्ध हैं। पुराने सिद्धांतों के आधार पर ही नवीन संशोधित सिद्धांतों को विकसित किया जाता है।

(iv) मूल्य तटस्थता – समाजशास्त्र को एक आदेशात्मक या अग्रदर्शी विज्ञान नहीं कहा जा सकता है। समाजशास्त्र का संबंध विषयों से है। मैक्स वैबर का मत है कि मूल्य-तटस्थता उपागम ही वैज्ञानिक विकास को संभव बना सकता है। वास्तव में, समाजशास्त्र के शोधकर्ता को मूल्यों के बारे में तटस्थ रहना चाहिए। मोरिस गिंसबर्ग का भी मत है कि वस्तुनिष्ठता तथा तार्किकता का अवलंबन करके ही समाजशास्त्र को वैज्ञानिक स्थिति प्रदान की जा सकती है। अतः शोधकर्ता को पूर्वग्रहों तथा पक्षपातों से दूर रहना चाहिए। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। समाजशास्त्र के द्वारा समाजमिति के पैमाने, प्रश्नावली, अनुसूची, साक्षात्कार तथा केस स्टडी आदि यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
आप समाज की अवधारण को कैसे स्पट करेंगे?
उत्तर:
समाज की अवधारणा निम्नलिखित बिन्दुओं के द्वारा स्पष्ट की जा सकती है –
(i) समाज एक संरचना के रूप में-समाज को समझने के लिए इसे एक संरचना के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसका अभिप्राय है कि समाज अंतर्संबंधित संस्थाओं का ‘अभिज्ञेय’ ताना-बाना है। इस संदर्भ में अभिज्ञेय शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण तथा सार्थक है।

(ii) समाज पुनरावर्तन के रूप में-यह धारणा कि समाज संरचनात्मक होते हैं, यह उनके पुनरुत्पादन पर निर्भर है। इस संदर्भ में ‘संस्था’ शब्द अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सामाजिक व्यवहार के संस्थागत स्वरूप विश्वास तथा व्यवहार के प्रकारों को बताते हैं तथा जिसकी आवृत्ति तथा पुनरावृत्ति होती रहती है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि उनका सामाजिक पुनरुत्पादन होता रहता है।

(iii) समाज अंतर्विरोध के रूप में यह बात स्वीकार की जाती है कि समाज संरचनात्मक है तथा इसका पुनरुत्पादन होता है लेकिन यह बात नहीं बताई जाती है कि संरचनात्मक तथा पुनरुत्पादन क्यों और कैसे होता है ? प्रसिद्ध विद्वान कार्ल मार्क्स उन आधारों को स्पष्ट करते हैं जिनसे पता चलता है कि विशिष्ट सामाजिक रचनाओं की उत्पत्ति कैसे होती है तथा विशिष्ट उत्पादनों के प्रकारों से इसका क्या संबंध है ? इस प्रकार समाज को स्थायी या शांतिपूर्ण उद्विकास संरचना नहीं कहा जा सकता है लेकिन इसे उत्पादन के बोर में सामाजिक संबंधों के परस्पर विरोधों द्वारा उत्पन्न संघर्षों के एक अस्थायी समाधान के रूप में समझा जा सकता है। इस प्रकार, पूँजीबादी समाज की प्रक्रिया में होने वाली परिवर्तन उत्पादकता के साधनों में होने वाले तनावों तथा अंत:क्रियाओं में पाए जाते हैं।

(iv) समाज संस्कृति के रूप में-समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक संबंधों के सांस्कृतिक पहलुओं को लगातार महत्त्व प्रदान किया गया है। समाज की रचना सदस्यों की पारस्परिक समझदारी से ही संभव है। मनुष्याओं के द्वारा भाषा का निर्माण किया गया है, क्योंकि उनका (मनुष्य का) अस्तित्व भाषा तथा सांकेतिक रूप से विचारों के आदान-प्रदान पर निर्भर करता है। मैक्स वैबर तथा टालकॉप परसंस ने संस्कृति का संबंध समाज के विचारों तथा मूल्यों की धारणाओं से स्वीकार किया है।

(v) समाज एक प्रक्रिया के रूप में-समाज सामाजिक संबंधे का जाल है तथा सामाजिक संबंधों का निर्माण मनुष्यों के बीच अंतःक्रियाओं से होता है। समाज गतिशील हैं, अत: उसमें निरंतर परिवर्तन होते रहता है। इस प्रकार समाज एक प्रक्रिया है। वास्तव में, जब सामाजिक परिवर्तन निरंतर तथा निश्चयात्मक होता है, तो ऐसे परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है।
सामाजिक प्रक्रिया के मुख्य शब्द निम्नलिखित हैं –

  • संधिवार्ता
  • स्व तथा अन्य तथा
  • प्रतिबिंबता।

समाज का निर्माण तथा पुनःनिर्माण सामाजिक अंतःक्रिया के द्वारा होता है। समाज को व्यक्तियों पर थोपा नहीं जाता है, वरन् सहभागियों द्वारा इसे स्वीकार किया जाता है। मेकाइवर तथा पेज ने सामाजिक प्रक्रिया की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “एक प्रक्रिया का तात्पर्य होता है कि अवस्थाओं में अंतर्निहित शक्तियों की क्रियाओं के द्वारा उत्पन्न निरंतर परिवर्तन, जो निश्चित प्रकार से होता है।”
Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र सामाजिक प्रतिनिधियों का अध्ययन है, यह किसका कथन है?
(a) मेकाइवर
(b) दुर्थीम
(c) मैक्स वैबर
(d) कोई नहीं
उत्तर:
(b) दुर्थीम

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प्रश्न 2.
मानवशास्त्र और समाजशास्त्र जुड़वाँ बहनें हैं, किसने कहा है?
(a) मेकाइवर
(b) क्रोवर
(c) हॉवेल
(d) मैक्स बेबर
उत्तर:
(b) क्रोवर

प्रश्न 3.
दोनों विज्ञानों को जोड़नेवाली शाखा कौन है?
(a) समाजशास्त्र और मनोविज्ञान
(b) समाजशास्त्र और मानवशास्त्र
(c) समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र
(d) समाजशास्त्र और इतिहास
उत्तर:
(d) समाजशास्त्र और इतिहास

प्रश्न 4.
किसका कथन है? सामाजिक प्रक्रियाएँ सामाजिक अन्तःक्रिया के विशिष्ट रूप हैं।
(a) मेकाइवर
(b) ग्रीन
(c) लुण्डवर्ग
(d) गिलिन एवं गिलिन
उत्तर:
(b) ग्रीन

प्रश्न 5.
संगठनकारी सामाजिक प्रक्रिया समूह में एकता संतुलन एवं संगठन बनाये रखने में सहयोग देती है …………………..
(a) सहयोग
(b) समायोजन
(c) समाजीकरण
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 6.
समितियों की विशेषता निम्नलिखित में से क्या है?
(a) संगठन
(b) निश्चित उद्देश्य
(c) मनुष्यों का समूह
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र संबंध स्थापित करती है …………………
(a) व्यक्तिगत समस्या एवं जनहित मुद्दों के बीच
(b) समाज एवं परिवार के बीच
(c) व्यक्ति और परिवार के बीच
(d) उपर्युक्त कोई सही नहीं हैं
उत्तर:
(a) व्यक्तिगत समस्या एवं जनहित मुद्दों के बीच

प्रश्न 8.
समाजशास्त्र बँधा हुआ है …………………
(a) दार्शनिक अनुचिंतनों से
(b) ईश्वरवादी व्याख्यानों से
(c) सामान्य बौद्धिक प्रेक्षणों से
(d) वैज्ञानिक कार्यविधियों से
उत्तर:
(d) वैज्ञानिक कार्यविधियों से

प्रश्न 9.
एक समाजशास्त्री का दायित्व है …………………
(a) मूल्यरहित रिपोर्ट तैयार करना
(b) मूल्य रिपोर्ट तैयार करना
(c) सापेक्ष रिपोर्ट तैयार करना
(d) उपर्युक्त सभी तीनों
उत्तर:
(a) मूल्यरहित रिपोर्ट तैयार करना

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प्रश्न 10.
समाजशास्त्र संघ को समझता है …………………..
(a) कला
(b) कला, विज्ञान
(c) कला, विज्ञान और गणित
(d) विज्ञान
उत्तर:
(d) विज्ञान

प्रश्न 11.
समाजशास्त्र में मूल संबंधित होते हैं ………………….
(a) वस्तुओं के नियत से
(b) आचरण के प्रतिमानों से
(c) अनैतिक व्यवहारों से
(d) क्रिया-प्रतिक्रिया से
उत्तर:
(b) आचरण के प्रतिमानों से

प्रश्न 12.
समाजशास्त्र के पिता या जनक कौन थे?
(a) अगस्त कोंत
(b) कार्ल मार्क्स
(c) मैक्स वैबर
(d) हॉव हाउस
उत्तर:
(a) अगस्त कोंत

प्रश्न 13.
समाजशास्त्र के क्षेत्रों को कितने भागों में बाँटा गया है?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(a) दो

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में समाजशास्त्र की विजय सामग्री क्या है?
(a) सभी सामाजिक तथा असामाजिक प्रक्रियाएँ
(b) सभी सामाजिक संस्थाएँ तथा प्रक्रियाएँ
(c) सभी प्रकार की संस्थाएँ
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 15.
किस वैज्ञानिक का मानना है कि समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है?
(a) मेकाइवर
(b) मैक्स बेवर
(c) वार्ड
(d) सारोकिन
उत्तर:
(a) मेकाइवर

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प्रश्न 16.
समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का विज्ञान है, यह किसने कहा है?
(a) सोरोकिन
(b) मेकाइवर
(c) मैक्स बेवर
(d) दुखाईम
उत्तर:
(a) सोरोकिन

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 समानता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 समानता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 समानता

Bihar Board Class 11 Political Science समानता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कुछ लोगों का तर्क है कि असमानता प्राकृतिक है जबकि कुछ अन्य का कहना है कि वास्तव में समानता प्राकृतिक है और जो असमानता हम चारों ओर देखते हैं उसे समाज ने पैदा किया है। आप किस मत का समर्थन करते हैं? कारण दीजिए।
उत्तर:
ये दोनों दृष्टिकोण सही प्रतीत होते हैं। यह कि अमानता प्राकृतिक है और समानता भी प्राकृतिक है। इस दृष्टिकोण के बिन्दु को इस प्रकार समझा जा सकता है। इन दोनों अवधारणाओं में भिन्नता है परंतु स्थान विशेष पर दोनों सत्य हो सकती हैं। प्राकृतिक असमानता कहीं सही हो सकती है तो कहीं गलत। यह वैसे ही है जैसे कहीं रात होती है, तो कहीं दिन।

इस प्रकार कहीं गर्म होता है तो कहीं ठंडा, कुछ स्थान पर भूमि समतल होती है तो कुछ स्थानों पर पहाड़ी होती है। कहीं सुबह होती है तो कहीं शाम होती है। इसी प्रकार एक आदमी काला हो सकता है तो दूसरा गोरा हो सकता है, एक व्यक्ति लम्बा हो सकता है तो दूसरा ठीगना हो सकता है। इसी प्रकार व्यक्ति में भी जैविक असमानता मिलती है यथा कुछ लोग पुरुष होते हैं तो दूसरे स्त्री हो सकती हैं। इन दोनों में जैविक असमानताएँ होती हैं।

प्रकृति ने भी व्यक्ति को योग्यताओं और क्षमताओं में समान बनाया है और प्रत्येक व्यक्ति समान होना चाहता है। समानता एक प्राकृतिक शर्त भी है परंतु समानता पूर्ण दृष्टिकोण है, सामूहिक दृष्टिकोण में सम्भव नहीं है। इसलिए समानता का अर्थ समाज के सामाजिक – आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखकर निकाला जा सकता है। समानता की आवश्यकता व्यक्ति के रहने पर पर्यावरणीय प्रभाव में सुनिश्ति किया जा सकता है। यहाँ तक कि असमान दशा को भी समझा जा सकता है। व्यक्ति द्वारा निर्मित अन्यायपूर्ण समानता को हटाया नहीं जा सकता एक डॉक्टर के काम और मजदूर के काम में अंतर स्वाभाविक है।

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प्रश्न 2.
एक मत है कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो संभव है और न ही वांछनीय। एक समाज ज्यादा से ज्यादा बहुत अमीर और बहुत लोगों के बीच की खाई को कम करने का प्रयास कर सकता है। क्या आप इस तर्क से सहमत हैं? अपना तर्क दीजिए।
उत्तर:
हम इस कथन से कारणों सहित सहमत हैं कि पूर्ण समानता न तो सम्भव है और न ही ऐच्छिक है। इस सम्बन्ध में डाक्टर और मजदूर की उदाहरण ले सकते हैं। एक डाक्टर और एक मजदूर को समान पारिश्रमिक (Wages) न तो सम्भव है और न ऐच्छिक है, क्योंकि डाक्टर ने अधिक निवेश करके अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को बढ़ाया है। यही नहीं, डाक्टर का उत्तरदायित्व और कार्य मजदूर के उत्तरदायित्व और कार्य से अधिक होता है।

एक डाक्टर को 10 हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाता है। यह आशा नहीं की जा सकती कि एक मजदूर को 10000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाय। उसकी न्यायसंगत मजदूरी 3000 रुपये प्रतिमाह हो सकती है इसलिए यहाँ दोनों के पारिश्रमिक में 7000 रुपये प्रतिमाह का अंतर है।

इसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए और इसे समानता के रूप में स्वीकार करना चाहिए। यदि दो मजदूरों में पुरुष मजदूर को 3000 रुपये प्रतिमाह और दूसरे स्त्री मजदूर को 1000 रुपये प्रतिमाह दिया जाता है, तो उस स्थिति को व्यक्ति निर्मित असमानता कहा जा सकता है। यह समानता का अलगाव भी है जो लिंग (Sex) के आधार पर किया जाता है।

सभी व्यक्ति अत्यधिक धनी या अत्यधिक गरीब नहीं हो सकते। यह कल्पना नहीं किया जा सकता कि सभी व्यक्ति महलों में रह सकते हैं या सभी व्यक्ति बिना किसी आवश्यकता के झोपड़ियों में रह सकते हैं। समानता सापेक्षिक शर्त के रूप में होनी चाहिए जिसमें सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। योग्यताओं एवं क्षमताओं के विकास और जीवन की आवश्यकताओं पर ही पूर्ति होनी चाहिए।

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प्रश्न 3.
नीचे दी गई अवधारणा और उसके उचित उदाहरणों में मेल बैठायें।
Bihar Board Class 11 Political Science Chapter 3 समानता Part - 1 Image 1
उत्तर:
(क) – (ii)
(ख) – (iii)
(ग) – (i)

प्रश्न 4.
किसानों की समस्या से संबंधित एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार छोटे और सीमांत किसानों को बाजार से अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। रिपोर्ट में सलाह दी गई कि सरकार को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन यह प्रयास केवल लघु और सीमांत किसानों तक ही सीमित रहना चाहिए।.क्या यह सलाह समानता के सिद्धांत से संभव है?
उत्तर:
यह तथ्य स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है और समानता के सिद्धांत से मेल नहीं खाता। क्योंकि विभिन्न लोगों के लिए दो नीतियों नहीं अपनाई जा सकतीं। एक छोटे और सीमांकित किसानों के लिए और दूसरी बड़े और धनी किसानों के दो नीतियाँ हो जाती हैं। यदि लघु किसान अपनी उपज की अच्छी कीमत नहीं प्राप्त कर रहे हैं, तो इसका कारण भिन्न हो सकता है। लघु और सीमांकित किसानों की कुछ स्वीकृत कार्यों यथा-उच्च रियायत (Subsidiary) और निम्न ब्याज वाले ऋण देकर उनकी सहायता की जा सकती है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस में समानता के किस सिद्धांत का उल्लंघन होता है और क्यों?
(क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पढ़ेगा।
(ख) कनाडा सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से 1960 तक यूरोप के श्वेत नागरिक को कनाडा में आने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया।
(ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की एक खिड़की खोली गई।
(घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उत्तर:
प्रश्न के पैरा में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। कनाडा की सरकार ने रंग के आधार पर भिन्न कार्य अपनाया। उसने केवल गोरे यूरोपीय लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से 1960 तक कनाडा प्रवजन का आदेश दिया। यह स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। प्रश्न के पैरा ‘क’ और पैरा ‘ग’ में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है। प्रश्न के पैरा ‘घ’ में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि इसमें कुछ जंगल केवल जनजाति समुदाय को देने की बात कही गई है जबकि सभी के लिए इस प्रकार प्रावधान करना चाहिए।

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प्रश्न 6.
यहाँ महिलाओं को मताधिकार देने के पक्ष में तर्क दिए गए हैं। इसमें से कौन-से तर्क समानता के विचार से संगत हैं। कारण भी दीजिए।
(क) स्त्रियाँ हमारी माताएँ हैं। हम अपनी माताओं को मताधिकार से वंचित करके अपमानित नहीं करेंगे?
(ख) सरकार के निर्णय पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रभावित करते हैं इसलिए शासकों के चुनाव में उनका भी मत होना चाहिए।
(ग) महिलाओं को मताधिकार न देने से परिवारों में मतभेद पैदा हो जाएंगे।
(घ) महिलाओं से मिलकर आधी दुनिया बनती है। मताधिकार से वंचित करके लंबे समय तक उन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता है।
उत्तर:
प्रश्न के पैरा ‘ख’ और पैरा ‘घ’ समानता से अधिक मेल रखते हैं। पैरा ‘ख’ में कहा गया है कि सरकार के निर्णय पुरुष और महिला दोनों को प्रभावित करते हैं। इसलिए दोनों को शासकों के चुनाव में सहभागी होना चाहिए। पैरा ‘घ’ में कहा गया है महिलाओं के मतदान के अधिकार को इंकार किया जा सकता है जो सम्पूर्ण जनसंख्या का 50% है।

Bihar Board Class 11 Political Science समानता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को स्पष्ट करें। (Explain the concept of equality before law) अथवा, कानून के समक्ष समानता से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by equality before law)
उत्तर:
कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने सब समान होंगे “कानून सबकी एक जैसे तरीके से रक्षा करेगा।” इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा या ऊपर नहीं है। कानून के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। कानून सबको एक समान मानता है। कानून धनी-निर्धन, छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा, शिक्षित-अशिक्षित का भेदभाव नहीं मानता है।

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प्रश्न 2.
असमानता के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. प्राकृतिक असमानता:
सभी व्यक्ति जन्म से ही असमान होते हैं। कोई भी दो व्यक्ति एक समान नहीं हैं। किन्तु कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि जन्म से ही नैतिकता की भावना सबमें समान रूप से होती है। यह माना जा सकता है कि नैतिकता की भावना समान हो, परंतु दो व्यक्तियों की प्रकृति कभी एक समान नहीं होती। एक विकलांग व्यक्ति को कभी भी एक स्वस्थ शरीर की तुलना में नहीं रखा जा सकता है। इस प्रकार यह प्राकृतिक असमानता है।

2. नागरिक असमानता:
नागरिक असमानता के अन्तर्गत एक देश के सभी व्यक्तियों को समान रूप से अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। दूसरा, मौलिक अधिकारों व अन्य अधिकारों से भी जब कुछ नागरिकों को दूर रखा जाए तो उसे नागरिक असमानता कहते हैं। इसलिए सभी को समान रूप से नागरिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए व सभी नागरिक कानून के सम्मुख बराबर होने चाहिए।

प्रश्न 3.
समानता से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by the term equality?)
उत्तर:
साधारण भाषा में समानता का अर्थ है:
सब व्यक्तियों का समान दर्जा हो, सबकी आय एक जैसी हो, सब एक ही प्रकार से जीवन-यापन करें। पर यह सम्भव नहीं है। लास्की ने कहा है, “समानता का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को समान वेतन दिया जाए, यदि ईंट ढोने वाले का वेतन एक प्रसिद्ध गणितज्ञ अथवा वैज्ञानिक के समान कर दिया जाए, तो समाज का उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा। इसलिए समानता का यह अर्थ है कि कोई विशेष अधिकार वाला वर्ग न. रहे। सबको उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों।”

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प्रश्न 4.
समानता के कोई चार रूप बताइए। (Explain any four kinds of equality)
उत्तर:
समानता के चार रूपों की विवेचना निम्नलिखित हैं –

1. प्राकृतिक समानता (Natural of Equality):
प्राकृतिक समानता का अर्थ है कि प्रकृति ने सभी व्यक्तियों को समान बनाया है, परंतु यह विचार ठीक नहीं है। सभी व्यक्तियों के रंग, रूप, बनावट, शक्ति, बुद्धि तथा स्वभाव में असमानता होती है। वास्तव में प्राकृतिक समानता का यह अर्थ है कि प्रत्येक में कुछ मौलिक समानताएँ हैं जिनके कारण सभी व्यक्तियों को समान माना जाना चाहिए।

2. नागरिक समानता (Civil Equality):
सभी व्यक्तियों को समान अधिकार प्राप्त हों और सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हों।

3. सामाजिक समानता (Social Equality):
सामाजिक समानता का अर्थ है कि समाज के सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। ऊँच-नीच की भावना नहीं होनी चाहिए।

4. राजनीतिक समानता (Political Equality):
समाज में सभी व्यक्तियों को समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। चुनाव में खड़े होने या मतदान करने के अधिकार से किसी को वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 5.
आर्थिक समानता के बारे में आप क्या जानते हैं? (What do you know about economic euqality?)
उत्तर:
वर्तमान काल में आर्थिक समानता ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि सब व्यक्तियों की आय अथवा वेतन समान कर दिया जाए। इसका अर्थ है-सबको उन्नति के समान अवसर प्रदान किए जाएँ। सभी की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए। प्रत्येक व्यक्ति को काम मिले।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। (“All men are born equal.” Discuss)
उत्तर:
सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं (All men are born equal):
यह बात साधारण तौर पर भी कही जाती है और अमेरिका के स्वतंत्रता घोषणा-पत्र में भी कही गयी है। सब व्यक्ति समान पैदा हुए हैं। फ्रांस की राष्ट्रीय सभा में मानवीय अधिकारों की घोषणा में इस समानता को स्वीकार किया गया है कि “मनुष्य जन्म से समान पैदा होते हैं और अपने अधिकारों के सम्बन्ध में समान ही रहते हैं।” परंतु इसका आशय यह भी नहीं है कि सब व्यक्ति पूर्ण रूप से समान होंगे। सबको समान नहीं बनाया जा सकता। गोरा-काला, छोटा-बड़ा, बुद्धिमान-निर्बुद्धि सभी प्रकार के व्यक्ति होते हैं।

प्रश्न 2.
“समानता के अभाव में स्वतंत्रता निरर्थक है।” अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए। (“Liberty is meaningless without equality.” Do you agree with this view ? Give reason for your answer)
उत्तर:
लास्की के शब्दों में ‘जहाँ धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित हैं वहाँ पर स्वामी और दास सदैव पाए जाते हैं।’ (Where there are rich and poor, educated and uneducated, we find always master and servant)। समानता ही स्वतंत्रता को सुनिश्चित करती है और उसे लाभदायक बनाती है। निर्बल व्यक्ति शक्तिशाली के सामने और निर्धन व्यक्ति धनवान के सामने अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक प्रयोग नहीं कर सकता। जिसके पास धन की शक्ति होती है उसके पास राजनीतिक शक्ति भी चली जाती है। अतः निर्धन व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तविक नहीं रहती। जहाँ सामाजिक समानता नहीं मिलती वहाँ निम्न श्रेणी के लोगों की स्वतंत्रता व्यर्थ और निरर्थक हो जाती है।

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प्रश्न 3.
समानता किसे कहते हैं? सामाजिक समानता का वर्णन करें। (What is equality? Discuss social equality)
उत्तर:
लास्की ने कहा है कि “समानता का अर्थ सर्वप्रथम तो विशेषाधिकारों का अभाव है और दूसरे उसका अर्थ है कि सभी लोगों को विकास के लिए उपयुक्त अवसर प्राप्त हों।” सामाजिक समानता का अर्थ समाज में जाति, धर्म, रंग, वंश आदि के आधार पर भेदभाव के बिना विकास के समान अवसरों की प्राप्ति है।

सामाजिक समानता (Social Equality):
सामाजिक समानता का अर्थ है कि समाज में जाति, धर्म, वंश, रंग विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होना चाहिए। सबका सामाजिक स्तर समान होना चाहिए। छुआछूत अवैध होनी चाहिए। अमेरिका में गोरे-काले का भेद आज भी सामाजिक असमानता का प्रमाण है।

प्रश्न 4.
प्राकृतिक समानता किसे कहते हैं? (What is Natural Equality?)
उत्तर:
प्राकृतिक समानता (Natural Equality):
कुछ लोग इस बात पर जोर देते हैं कि “सभी व्यक्ति प्राकृतिक रूप से समान हैं” तथा कुछ धार्मिक परम्पराओं तथा विचारकों को समान नहीं बनाया है। यहाँ तक कि जुड़वाँ भाई-बहनों में भी कुछ अंतर मिलता है।

प्रश्न 5.
समानता के राजनीति पक्ष का विवेचन कीजिए। (Describe the poltical dimension of equality)
उत्तर:
राजनीतिक समानता का अर्थ है कि राज्य में सभी नागरिकों को समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। प्रत्येक नागरिक को चुनाव में खड़ा होने का अधिकार होना चाहिए। अपनी योग्यता के अनुसार सरकारी पद प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। सरकार यदि नागरिकों पर अत्याचार करती है तो प्रत्येक नागरिक को उसकी आलोचना करने का अधिकार होना चाहिए। किसी भी नागरिक को उसकी जाति, रंग, लिंग, संपत्ति, शिक्षा तथा धर्म आदि के आधार पर मतदान करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। एशिया और अफ्रीका के अभी ऐसे बहुत से देश हैं जहाँ राजनीतिक समानता स्थापित नहीं हुई है।

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प्रश्न 6.
राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता में सम्बन्ध बताइए। (Define the relation between political freedom and economic freedom)
उत्तर:
स्वतंत्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। लास्की का कहना है कि आर्थिक समानता के बिना राजनैतिक स्वतंत्रता मात्र एक कल्पना है। इस कथन का आशय यह है कि जब तक आर्थिक समानता स्थापित नहीं होती तब तक राजनैतिक स्वतंत्रता व्यर्थ होती है। इस आशय को निम्न तर्कों द्वारा समझा जा सकता है –

  1. पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता से आर्थिक शोषण में वृद्धि होती है तथा उससे आर्थिक असमानता पनपती है।
  2. स्वतंत्रता का अर्थ मात्र बंधनों का अभाव नहीं होता। बंधन मुक्त स्वतंत्रता शक्तिशाली की स्वतंत्रता होती है। ऐसी स्वतंत्रता से आर्थिक समानता नष्ट हो जाती है।
  3. आर्थिक असमानता के वातावरण में व्यक्ति का विकास असम्भव होता है। हॉब्स का कहना है कि भूख से मरते व्यक्ति के लिए स्वंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता।
  4. आर्थिक असमानता के अन्तर्गत लोकतंत्र की सफलता की आशा नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 7.
समानता की परिभाषा कीजिए। इसके विभिन्न प्रकार समझाइए। (Define the equality. What are its type?)
उत्तर:
समानता प्रजातंत्र का एक मुख्य स्तम्भ है। व्यक्तित्व के विकास के लिए यह एक आवश्यक शर्त है। समानता का तात्पर्य ऐसे परिस्थितियों के अस्तित्व से होता है जिसके कारण सब व्यक्तियों के विकास हेतु समान अवसर प्राप्त हो सके और इस प्रकार उस असमानता का अंत हो सके, जिनका मूल कारण सामाजिक वैषम्य है। लास्की ने भी लिखा है कि समानता मूल रूप में समानीकरण की एक प्रक्रिया है। समानता का आशय विशेषाधिकारों के अभाव से है और इसका यह भी आशय है कि सभी व्यक्तियों को विकास हेतु समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।

स्वतंत्रता के समान ही समानता के अनेक प्रकार हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. सामाजिक समानता (Social Equality): सामाजिक दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए और उन्हें सामाजिक उत्थान के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।
  2. नागरिक समानता (Civics Equality): नागरिक समानता के दो भेद हैं। प्रथम राज्य के कानूनों की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए। द्वितीय सभी व्यक्तियों को नागरिकता के अवसर या नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएँ समान रूप से प्राप्त होनी चाहिए।
  3. राजनीतिक समानता (Political Equality): राजनीतिक समानता का अभिप्राय सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार एवं अवसर प्राप्त होने से है।
  4. आर्थिक समानता (Economics Equality): आर्थिक समानता से तात्पर्य है कि मनुष्यों की आय में बहुत अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए।

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प्रश्न 8.
राजनीतिक समानता क्या है? (What is political equality?)
उत्तर:
राजनीतिक समानता का तात्पर्य है कि सभी नागरिकों को राज्य की राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित तथा उसमें भागीदारी करने का अवसर समान रूप से प्राप्त हो। हालांकि यह धारणा सिर्फ लोकतांत्रिक राज्य से ही सम्बन्धित होती है, नहीं तो राजतंत्र, तानाशाही राज्यों में लोकतंत्र की इस राजनीतिक समानता के विचारधारा को उत्पन्न किया जाता है, वह वास्तव में राजनीतिक समानता के गुण को प्रदर्शित करती है, अर्थात् इसके अलावा राज्य और व्यक्ति को लेकर न्यायपूर्ण राजनीतिक समानता का अर्थ नहीं हो सकता है।

लोकतंत्रीय पद्धति में नागरिकों की राजनीतिक समानता का तात्पर्य निम्न तथ्यों से पाया जा सकता है। जैसे मतदान का अधिकार, चुनाव में उम्मीदवार बनने का अधिकार, प्रार्थना पत्र का अधिकार, सार्वजनिक नियुक्ति जो राज्य के माध्यम से हो उसे प्राप्त करने का सभी को समान अधिकार प्राप्त है। विचारों की स्वतंत्रतापूर्ण अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों का स्वतंत्रतापूर्वक निर्माण सम्बन्धी समानता सभी नागरिकों को समान रूप से प्रदान की जाती है, जबकि ऐसी पद्धति राजनीतिक समानता को लेकर निरंकुशवादी राज्यों के संदर्भ में नहीं पायी जाती हैं। अतः उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि राजनीतिक समानता का वास्तविक अर्थ सिर्फ लोकतंत्रीय पद्धति में दिए गए अर्थ के माध्यम से स्पष्ट होता है।

प्रश्न 9.
सामाजिक समानता के अर्थ को वर्णित करें। (Define the social equality)
उत्तर:
सामाजिक समानता का अर्थ-सामाजिक जीवन में सभी व्यक्तियों को समान समझा जाना चाहिए और धर्म, जाति, वंश, लिंग अथवा जन्म के आधार और स्थान पर किसी व्यक्ति का व्यक्ति से कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक समानता के अर्थ में समाज के सभी अधिकार व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हो सकें, यही सामाजिक समानता का मूलभूत उद्देश्य है और इस तथ्य की वास्तविकता सिर्फ लोकतंत्रीय समाज में ही है। भारतीय संविधान में सामाजिक समानता को मूल अधिकार के तहत वर्णित किया गया है।

अर्थात् अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को एक दण्डनीय अपराध माना गया है। सामाजिक समानता के मुख्यतः इन तथ्यों को प्रबल रूप से स्थान दिया जाता है कि वंश, धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या किसी को हेय न समझा जाए। स्त्रियों और पुरुषों में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव न हो। अर्थात् सामाजिक समानता की माँग है कि स्त्रियों और पुरुषों को बराबर सम्मानजनक व्यवहार प्राप्त होना चाहिए।

सामाजिक समानता ही वास्तव में लोगों के बीच राजनीतिक समानता को उत्पन्न करने का कारण बनती है। सामाजिक समानता की अवधारणा निरंकुश राज्य पद्धति में सम्भव नहीं होती, क्योंकि वहाँ पर स्वतंत्रता, समानता और न्याय का कोई अर्थ नहीं रहता है, यहाँ पर यह सब सम्बन्धित अधिकार केवल निरंकुश शासक वर्ग के लिये होते हैं। इस कारण सामाजिक समानता की मूल अवधारणा केवल लोकतंत्रीय पद्धति में ही सम्भव है।

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प्रश्न 10.
आर्थिक समानता से आप क्या समझते हैं? (What do you know about the economic equality?)
उत्तर:
आर्थिक समानता का मूल अभिप्राय रूसो के इस कथन में समझा जा सकता है, अर्थात् रूसो ने कहा, “सरकार की नीति यह होनी चाहिए कि न तो अमीरों की संख्या बढ़ने पाये और न ही भिखमंगों की।” अर्थात् यह कथन आर्थिक समानता के इस रूप को प्रदर्शित करता है कि पूँजी की व्यवस्था और उसका वितरण इस रूप में हो कि पूँजी किसी के शोषण का माध्यम न बन जाए। मार्क्सवादी साम्यवाद ने इसी पूँजीवादी शोषण व्यवस्था को खत्म करने के लिए अपने तरीके से वर्गविहीन समाज को आर्थिक समानता के साथ सम्बद्ध किया।

आर्थिक समानता की मूल अवधारणा यही थी कि समाज का कोई वर्ग दूसरे वर्ग का आर्थिक शोषण न कर सके तथा इसके लिए आर्थिक समानता की यह मूल अवधारणा रही कि आर्थिक स्वतंत्रता सभी वर्गों को इस रूप में प्रदान की गई कि हर व्यक्ति अपनी दक्षता से किसी को अन्यायपूर्ण तरीके से आर्थिक स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। इसलिए आर्थिक समानता की मूल अवधारणा ही आर्थिक समानता की न्यायगत अवधारणा बनी। इस आर्थिक समानता की अवधारणा को लोकतंत्रीय और समाजवादी देशों की शासन व्यवस्था में अपनाया जाता है, न कि निरंकुशवादी व्यवस्था में।

प्रश्न 11.
समानता किन तीन तत्वों पर आधारित है? (On Which three elements is equality based?)
उत्तर:
समानता निम्नलिखित तीन आवश्यक तत्वों पर आधारित है –

  1. विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति-किसी व्यक्ति को वंश, लिंग, धर्म व स्थान के कारण ऐसे विशेष अधिकारों की प्राप्ति न हो, जिससे अन्य लोग वंचित हों।
  2. सभी के लिए उचित अवसरों की प्राप्ति हो।
  3. व्यक्तियों के बीच भेदभाव तर्कसंगत आधार पर हो।

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प्रश्न 12.
समानता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण क्या है? (What is Marxist view of equality?)
उत्तर:
समानता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण (marxist view of Equality):]
समानता के मार्क्सवादी दृष्टिकोण में आर्थिक रूप से समानता पर बल दिया जाता है। उनके अनुसार जब सम्पत्ति कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में केन्द्रित हो जाती है तो समाज में विषमता पैदा होती है और राजनीतिक सत्ता भी कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में आने लगती है। इसलिए सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए ताकि समाज के सभी लोग आर्थिक समानता का उपभोग कर सकें।

प्रश्न 13.
व्यवहार की समानता से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you understand by equality of treatment?)
उत्तर:
व्यवहार की समानता (Equality of Treatment):
साधारण शब्दों में व्यवहार की समानता का यह अर्थ है कि राज्य अथवा सरकार द्वारा किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग के पक्ष या विपक्ष में किसी प्रकार का कोई पक्षपात न किया जाए। राज्य द्वारा अपने नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाए। जाति, धर्म, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर उनमें किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या समानता तथा स्वतंत्रता परस्पर विरोधी हैं? चर्चा कीजिए। (Are equality and liberty opposed to each other? Explain) अथवा, “समानता के अभाव में स्वतंत्रता निरर्थक है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? (“Liberty is meaningless without equality.” Do you agree with this line?)
उत्तर:
हाँ। स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्र के मूल आधार हैं। दोनों के परस्परिक सम्बन्धों का विवेचना निम्नलिखित है –

(क) स्वतंत्रता व समानता परस्पर विरोधी हैं (Liberty and equality are opposed to each other):
इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक लॉर्ड एक्टन व डी. टॉकविल हैं। उनके विचार में स्वतंत्रता और समानता दोनों एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि समानता व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है। इन विचारकों ने निम्न आधारों पर स्वतंत्रता तथा समानता को एक-दूसरे का विरोधी माना है –

1. सभी मनुष्य समान नहीं हैं (All the individuals are not equal):
संसार में सभी व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। असमानता प्राकृतिक देन है। कुछ व्यक्ति शक्तिशाली होते हैं तो कुछ कमजोर। कुछ व्यक्ति बहुत बुद्धिमान होते हैं तो कुछ मूर्ख। इन असमानताओं के होते हुए सभी व्यक्तियों को समान नहीं समझा जा सकता।

2. समान स्वतंत्रता का सिद्धांत अनैतिक हैं (The theory of equal liberty is immoral):
सभी व्यक्तियों की मूल योग्यताएँ समान नहीं होती। अतः सबको समान अधिकार देना या समान स्वतंत्रता प्रदान करना अन्यायपूर्ण होगा।

(ख) स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी नहीं है (Liberty and equality are not opposed to each other):
जो विचारक स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी न मानकर एक-दूसरे का पूरक मानते हैं और इनका आपस में घनिष्ठ संबंध बतलाते हैं, उनमें रूसो, आर, एच. टोनी व पोलार्ड प्रमुख हैं। रूसो के अनुसार, “बिना स्वतंत्रता के समानता जीवित नहीं रह सकती। “आर. एच. टोनी के अनुसार, “समानता की प्रचुर मात्रा स्वतंत्रता की विरोधी नहीं वरन् अत्यन्त आवश्यक है।” प्रो. पोलार्ड के अनुसार “स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही समाधान है और वह समानता।” ये विचारक अपने पक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं –

1. स्वतंत्रता और समानता का विकास एक साथ हुआ है (Liberty and equality have grown simul-taneously):
स्वतंत्रता और समानता का सम्बन्ध जन्म से है। जब निरंकुशता और असमानता के विरुद्ध मानव ने आवाज उठाई और क्रांतियाँ हुईं तो स्वतंत्रता और असमानता के सिद्धांतों का जन्म हुआ।

2. दोनों के उद्देश्य समान हैं (Both have the same objectives):
दोनों का एक ही उद्देश्य है और वह है-व्यक्ति के विकास के लिए सुविधाएँ प्रदान करना ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके। एक के बिना दूसरे का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के बिना समानता असम्भव है और समानता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।

निष्कर्ष (Conclusion):
स्वतंत्रता और समानता के आपसी सम्बन्धों के उपरोक्त विवेचन का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता व समानता एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि दोनों का एक ही उद्देश्य है। दोनों ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने के लिए उचित वातावरण की व्यवस्था करती हैं।

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प्रश्न 2.
राजनीतिक समानता और आर्थिक समानता के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए। (Describe the relationship between Political Equality and Economic Equality)
उत्तर:
समानता के अनेक रूप हैं, परंतु राजनीतिक समानता तथा आर्थिक समानता का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। राजनीतिक समानता का अर्थ है कि सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो, जबकि आर्थिक समानता का अर्थ है कि लोगों में कोई आर्थिक भेदभाव न हो। राज्य में एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण न करे। समाजवादी दलों का आधार आर्थिक समानता ही है। यदि आर्थिक समानता रूपी नीवें पक्की हैं तो राजनीतिक समानता रूपी भवन का निर्माण भी मजबूत हो सकता है। यदि आर्थिक समानता न हो तो राजनीतिक समानता की कल्पना करना ही व्यर्थ है। लास्की (Laski) के शब्दों में, “जहाँ धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित हैं वहाँ स्वामी और दास सदैव पाये जाते हैं।” (Where there are rich and poor, educated and uneducated we find always masters and servants.-Laski)

वर्तमान काल में आर्थिक समानता ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। इसका अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को न्यूनतम आय की गारंटी होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए। सभी लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान सरलता से सुलभ हो जाए। शोषण का अन्त हो। इतिहास बताता है कि जब तक धनी व्यक्ति निर्धनों का शोषण करते रहते हैं अथवा उन्हें शोषण करने की छूट रहती है तब तक समाज शोषक व शोषित, स्वामी तथा सेवक, धनी और निर्धन दो वर्गों में बँटा रहता है। शासन पर उन्हीं शक्तियों का नियंत्रण रहता है जो आर्थिक साधनों पर नियंत्रण रखते हैं।

शासन उन्हीं के इच्छानुसार चलता है। स्टालिन के इस कथन में सच्चाई है कि “बेरोजगार व्यक्ति जिसे उसके परिश्रम का फल नहीं मिलता, जो भूखा रहता है उसके लिए राजनीतिक समानता का कोई अर्थ नहीं।” केवल सिद्धांत रूप में सबको वोट देने का अधिकार देने या चुनाव लड़ने या सरकारी पद पर चुने जाने का समान रूप से अधिकार देने मात्र से कोई व्यक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग नहीं कर सकता जब तक कि उसे आर्थिक रूप से भी समानता प्राप्त नहीं हो जाती। निर्धन राजनीतिक में सक्रिय भाग नहीं लेते। उनको न्याय प्राप्त करने में भी कठिनाई होती है।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता और समानता में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (Discuss the relationship between liberty and equality) अथवा, “समानता का तात्पर्य यह नहीं है कि सभी व्यक्तियों से समान व्यवहार किया जाए।” व्याख्या कीजिए। (“Equality does not mean equal treatment to all the people.” Discuss)
उत्तर:
समानता की भ्रामक धारण (Wrong view of Equality):
कुछ लोग समानता का यह अर्थ लगाते हैं कि जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्हें समान होना चाहिए। सभी समान रूप से शिक्षित हों, सबको समान धन प्राप्त हो, समान नौकरी करें तथा सब समान वेतन प्राप्त करें। किन्तु यह धारणा भ्रामक है। सबको समान नहीं बनाया जा सकता। हाथ की पाँचों उंगलियाँ भी समान नहीं होती हैं। ईश्वर ने भी सबको समान नहीं बनाया है। कोई गोरा, कोई काला, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई दुर्बल है कोई सबल है, कोई बुद्धिमान है, कोई मूर्ख है।

समानता का वास्तविक अर्थ (Correct view of Equality):
अब प्रश्न यह उठता है कि समानता का वास्तविक अर्थ क्या है? वास्तव में समानता एक ओर उस अवस्था का नाम है जिसमें विशेषाधिकारों का अन्त तक दिया गया हो और दूसरी ओर सबको आत्मविकास के समान अवसर प्राप्त हों। समान अवसरों की प्राप्ति से तात्पर्य केवल यह है कि सभी को बिना अवरोध के विकास के समान अवसर प्राप्त हों।

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प्रश्न 4.
“नागरिक समानता स्वतंत्रता की पूर्व शर्त के रूप में” पर टिप्पणी लिखों। (Write shortnote on “Civil equality as a precondition of freedom.”)
उत्तर:
नागरिक समानता अर्थात् कानून के समक्ष समानता और सभी के लिए एक सा कानून लागू होना स्वतंत्रता के उपभोग के लिए एक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक शर्त है। इसके बिना कोई भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक उपभोग नहीं कर सकता। नागरिक समानता अर्थात् किसी भी व्यक्ति के साथ उसके वंश, जाति, धर्म, रंग, जन्म स्थान तथा लिंग के आधार पर कानून कोई भेदभाव नहीं करेगा और कानून का उल्लंघन करने वाले सभी व्यक्तियों को, चाहे उनका सामाजिक स्तर कुछ भी हो, समान दण्ड मिलेगा।

कानूनी दृष्टि से समान समझे जाने पर ही प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति कानून की परवाह न करे और कानून उसका कुछ न बिगाड़ सके तो वह अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात कर सकता है। जब कानून समान रूप से सब व्यक्तियों के जीवन तथा सम्पत्ति की रक्षा करता है तभी वह निर्भीक होकर अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग वास्तविक रूप में कर सकता है। इस प्रकार नागरिक समानता स्वतंत्रता की पूर्व शर्त है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समानता का अर्थ है?
(क) सभी के लिए समान अवसर
(ख) समान शिक्षा
(ग) समान कार्य के लिए समान वेतन
(घ) विशेषाधिकारों का अभाव
उत्तर:
(क) सभी के लिए समान अवसर

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प्रश्न 2.
बीसवीं शताब्दी में निम्नलिखित में से किस पर तुलनात्मक दृष्टि पर जोर दिया गया था?
(क) राजनीतिक समानता पर
(ख) नागरिक समानता पर
(ग) सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर
(घ) राजनीतिक एवं आर्थिक समानता पर
उत्तर:
(ग) सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर

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प्रश्न 3.
राजनीति समानता की सर्वश्रेष्ठ गारंटी है।
(क) लोकतंत्र में
(ख) तानाशाही में
(ग) उच्चतम न्यायालय
(घ) अभिजात तंत्र
उत्तर:
(क) लोकतंत्र में