Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

Bihar Board Class 11 Philosophy विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निर्णायक उदाहरण किससे प्राप्त होता है?
(क) निरीक्षण से
(ख) प्रयोग से
(ग) दोनों से
(घ) किसी से नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों से

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प्रश्न 2.
किसने कहा था- “आगमन में कल्पना का उद्देश्य आविष्कार है, प्रमाण नहीं।”
(क) हेवेल
(ख) मिल
(ग) पियर्सन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) हेवेल

प्रश्न 3.
वैज्ञानिक पूर्वकल्पना आधारित है –
(क) साधारण विश्वास पर
(ख) वैज्ञानिक विश्वास पर
(ग) कारणता नियम पर
(घ) अंधविश्वास पर
उत्तर:
(ग) कारणता नियम पर

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प्रश्न 4.
विधि-संबंधी पूर्वकल्पना का संबंध है –
(क) परिस्थिति से
(ख) कर्त्ता से
(ग) प्रक्रिया से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) प्रक्रिया से

प्रश्न 5.
“निर्णायक उदाहरण केवल एक कल्पना का समर्थन ही नहीं करता है, बल्कि दूसरी कल्पना का खंडन भी करता है।” यह कथन किसका है?
(क) बेन का
(ख) बेकन का
(ग) जेवन्स का
(घ) मिल का
उत्तर:
(ग) जेवन्स का

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प्रश्न 6.
प्राक-कल्पना का लक्ष्य है –
(क) सामान्य नियम की स्थापना
(ख) विशेष नियम की स्थापना
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सामान्य नियम की स्थापना

प्रश्न 7.
किसका कथन है – किसी कल्पना के अति पर्याप्त (Super adequacy) भी इसके सत्य होने के प्रमाण हैं?
(क) मिल
(ख) हेवेल
(ग) पियर्सन
(घ) डेकार्ट
उत्तर:
(ख) हेवेल

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प्रश्न 8.
वह प्रयोग जिससे निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) प्राप्त होता है, कहलाता है –
(क) निर्णायक प्रयोग (Experimentum crucis)
(ख) कल्पना की अतिपर्याप्त (Super adequacy)
(ग) वास्तविक कारण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निर्णायक प्रयोग (Experimentum crucis)

प्रश्न 9.
कल्पना की जाँच निरीक्षण एवं प्रयोग द्वारा किया जाता है। यह रीति क्या है?
(क) साक्षात् रीति
(ख) परोक्ष रीति
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) साक्षात् रीति

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प्रश्न 10.
कर्ता सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis concerning agent) का अभिप्राय है –
(क) घटना घटने की परिस्थिति मालूम हो
(ख) घटना घटने की विधि मालूम हो
(ग) कर्ता (Agent) मालूम नहीं रहता है
(घ) उपर्युक्त तीनों
उत्तर:
(घ) घटना घटने की विधि मालूम हो

प्रश्न 11.
“कल्पना व्याख्या करने का एक प्रयत्न है” यह कथन किसका है?
(क) कॉफी
(ख) बेकन
(ग) न्यूटन
(घ) मिल
उत्तर:
(क) कॉफी

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प्रश्न 12.
घटना एक व्याख्या की दृष्टि में प्राक्-कल्पना कितने प्रकार का होता है?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ग) तीन

प्रश्न 13.
परिस्थिति सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection) होता है?
(क) व्याख्यात्मक
(ख) वर्णनात्मक
(ग) दोनों
(घ) वैज्ञानिक
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 14.
निर्णायक प्रयोग (Crucial experiment) प्राक्-कल्पना का/की –
(क) शर्त है
(ख) प्रमाण है
(ग) दोनों है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्रमाण है

प्रश्न 15.
वैज्ञानिक सत्यता (Scientific truth) की स्थापना में प्राक्कल्पना –
(क) एक अनावश्यक स्थिति है
(ख) आवश्यक शर्त है
(ग) अनावश्यक शर्त है
(घ) अनुपयोगी है
उत्तर:
(ख) आवश्यक शर्त है

Bihar Board Class 11 Philosophy विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा कि आगमन में कल्पना का स्थान प्रमुख नहीं बल्कि गौण है?
उत्तर:
ऐसा कल्पना के सम्बन्ध में जे. एस. मिल (John Stuart Mill) ने कहा।

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प्रश्न 2.
वास्तविक कारण (Vera cause) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
घटना के सम्बन्ध में वह कल्पना जो तर्कसंगत होती है और जिससे घटना के घटने की संभावना रहती है, वास्तविक कारण (Vera cause) कहलाती है।

प्रश्न 3.
“किसी कल्पना की अतिपर्याप्त (Super adequacy) भी इसके सत्य होने के प्रमाण हैं।” ऐसा किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन तर्कशास्त्री हेवेल (Whewell) का है।

प्रश्न 4.
कल्पना की जाँच के साक्षात् रीति (directly) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कल्पना की जाँच साक्षात् रीति से करने का मतलब है निरीक्षण एवं प्रयोग की विधियों का व्यवहार।

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प्रश्न 5.
निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) ऐसे उदाहरण को कहते हैं जो अनेक कल्पनाओं में किसी एक को सत्य प्रमाणित कर देता है।

प्रश्न 6.
कल्पना की जाँच कितने तरह से की जाती है?
उत्तर:
कल्पना की जाँच दो तरह से की जाती हैं। वे हैं-साक्षात् रीति (directly) एवं परोक्ष रीति (indirectly) से।

प्रश्न 7.
प्राक-कल्पना के महत्त्व के सम्बन्ध में हेवेल (Whewell) का क्या कथन हैं।
उत्तर:
प्राक्-कल्पना के महत्व के सम्बन्ध में हेवेल का कहना है कि आगमन में कल्पना का उद्देश्य आविष्कार है, प्रमाण नहीं।

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प्रश्न 8.
निर्णायक प्रयोग (Experimentum Crucis) क्या है?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण जब प्रयोग से पाया जाता है तो इसे निर्णायक प्रयोग कहते हैं।

प्रश्न 9.
कर्ता सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis concerning agent) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब घटना घटने की परिस्थिति और विधि मालूम रहे लेकिन कर्ता (agent) मालूम नहीं रहता है। अतः कर्ता (agent) के बारे में अन्दाज लगाना ही कर्ता सम्बन्धी कल्पना है।

प्रश्न 10.
प्राक्-कल्पना (Hypothesis) की एक परिभाषा दें।
उत्तर:
प्राक्-कल्पना व्याख्या करने का प्रयत्न है। यह सामयिक (provisional) कल्पना है जिसके द्वारा हम वैज्ञानिक दृष्टि से लक्ष्यों या घटनाओं की व्याख्या करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधारण कल्पना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कल्पना दो तरह की होती है –

  1. साधारण कल्पना
  2. वैज्ञानिक कल्पना।

साधारण कल्पना में एक तरह की अटकलबाजी लगानी पड़ती है। इसमें यह जरूरी नहीं है कि जो कल्पना कर रहे हैं वह अंदाजा सही ही हो। इस तरह की कल्पना का रूप पूर्णव्यापी नहीं होता है। बल्कि व्यक्तिगत या अंशव्यापी होता है। इस तरह की कल्पना साधारण लोग लगाते हैं। इसमें सही कारण कोई कार्य के लिए स्वीकार नहीं किया जाता है। इसमें दूसरे कारण को स्वीकार किया जाता है, जो व्यक्तिगत होता है। अतः, इस तरह की कल्पना साधारण कल्पना कहलाती है।

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प्रश्न 2.
निर्णायक उदाहरण क्या है?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण कल्पना का एक प्रमुख कारण माना जाता है। जब किसी घटना के बारे में कल्पना की जाती है। उसमें एक ऐसा ही प्रमाण मिल जाता है जो घटना को सही प्रमाणित कर देता है, उसी को निर्णायक उदाहरण के रूप में माना जाता है।

निर्णायक उदाहरण निरीक्षण या प्रयोग से पाए जाते हैं। एक पात्र में रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, गैस को पाकर इसमें दो प्रकार की कल्पना की जाती है यह ऑक्सीजन गैस या हाइड्रोजन? इसे प्रमाणित करने के लिए जलती हुई मोमबत्ती ले जाते हैं। मोमबत्ती बुझने पर हाइड्रोजन और जलने पर ऑक्सीजन गैस समझते हैं। यही निर्णायक उदाहरण कहलाता है।

प्रश्न 3.
अच्छी और बुरी कल्पना क्या है?
उत्तर:
कल्पना अच्छा होना या बुरा होना उसकी शत्तों पर निर्भर करता है। इसका अर्थ है कि जो कल्पना शर्तों को पूरा करती है वह अच्छी कल्पना कही जाती है और जो कल्पना शर्तों को पूरा नहीं करती है वह बुरा कल्पना नहीं जाती है। जैसे-जब पृथ्वी में कम्पन्न होती है तो कल्पना करें कि पृथ्वी शेषनाग पर अवस्थित है। इस शेषनाग के हिलने-डूबने से पृथ्वी पर कम्पन्न होती है तो इस प्रकार की कल्पना को बुरी कल्पना कहते हैं। क्योंकि इस प्रकार की कल्पना उटपटांग होती है। परन्तु भौगोलिक कारणों से इस कम्पन्न की व्याख्या करने पर इसे अच्छी कल्पना कहते हैं।

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प्रश्न 4.
वैज्ञानिक कल्पना क्या है?
उत्तर:
वैज्ञानिक कल्पना में कारण-कार्य नियम का पालन किया जाता है। यह पूर्णव्यापी होता है। यह कल्पना जनसमुदाय के लिए किया जाता है। इसमें किसी भी कार्य के लिए सह कारण को स्वीकार किया जाता है। इसमें निष्कर्ष को सत्य होने के लिए वैज्ञानिक आधार रहता है। भले ही कल्पित कारण गलत हो जाए, किन्तु उसकी व्याख्या वैज्ञानिक तरीके से की जाती है।

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक आगमन में प्राक्-कल्पना के महत्त्व की विवेचना करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्री हेवेल वैज्ञानिक आगमन में प्राक्-कल्पना के महत्त्व को बहुत अधिक बताते हैं। उनके अनुसार वैज्ञानिक खोज में प्राक्-कल्पना का महत्त्व अत्यधिक है। घटनाओं के बीच कारण-कार्य का सम्बन्ध स्थापित करने हेतु प्राक्-कल्पना की आवश्यकता होती है। प्राक्-कल्पना का दूसरा महत्त्व यह है कि यह हमारे निरीक्षण एवं प्रयोग को नियंत्रित करता है। कभी-कभी हमारे खोज का विषय ऐसा होता है कि हम उसका अध्ययन निरीक्षण एवं प्रयोग से नहीं कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में हम अपनी सूझ के बल पर उस विषय या वस्तु के स्वरूप की कुछ कल्पना करते हैं तथा उस कल्पना के द्वारा आवश्यक परिणामों को निकालते हैं। यदि हमारी कल्पना यथार्थता से मेल खाती है तो कल्पना की सत्यता सिद्ध हो जाती है। वस्तुतः वैज्ञानिक पद्धति में प्राक्-कल्पना तथ्यों के सागर में दिशा सूचक (Compass) की तरह कार्य करता है। ऊर्जा के सापेक्षवाद का सिद्धान्त वस्तुतः प्राक्-कल्पना की ही देन है। इसी तरह, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का संकेत अवलोकन के द्वारा प्राक्-कल्पना से हुआ है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्याय संगत या यथार्थ कल्पना की शर्तों की सोदाहरण व्याख्या करें ।
उत्तर:
आगमन का संबंध सही कल्पना से है। सही कल्पना होने के लिए कुछ शर्तों का पालन करना पड़ता है।

1. कल्पना को आंतरिक विरोध रहित निश्चित एवं स्पष्ट होना चाहिए:
इसमें आंतरिक विरोध रहित का अर्थ है कि इसमें विचारों का आपसी मेल होना चाहिए। तभी उसमें संदेह की कम संभावना होती है। दिन-रात होने के लिए हम यदि यह कल्पना करें कि ‘शायद पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ नहीं घूमती है, तो हमारी यह कल्पना संदेहपूर्ण रहेगी।

वैज्ञानिक कल्पनाएँ संदेह को दूर करना ही निश्चितता को लाना है। ”कल्पना को स्पष्ट होने का अर्थ है कि उटपटांग न होकर युक्ति संगत और सुव्यवस्थित हो। वर्षा के कारण बादल को नहीं मानकर इन्द्र की कृपा को मानें तो ऐसी कल्पना अस्पष्ट होगी। समुद्र का पानी वाष्प बनकर ऊपर जाता है और बादल बनकर वर्षा होती है। कल्पना का यही सही रूप है।

2. कल्पना को किसी स्थापित सत्य का विरोध नहीं होना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पहले से कुछ बातें सत्य हैं जैसे पृथ्वी में एक आकर्षण शक्ति है यह सत्य है। किन्तु, यदि हम यह कल्पना करें कि जहाज जो आकाश में उड़ता है उसमें पृथ्वी की आकर्षण शक्ति काम नहीं करती है, तो असत्य होगी। पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है यह पूर्व स्थापित सत्य है।

3. कल्पना को यथार्थ एवं वास्तविक होना चाहिए। किसी घटना का पता लगाने के लिए कल्पना किया जाता है। यथार्थ कल्पना के लिए यह जरूरी है कि हमें निष्पक्ष भाव से किसी घटना के घटने की कल्पना करनी चाहिए। इसमें वास्तविकता भी होनी चाहिए। अर्थात् घटना का vera cause होना चाहिए। इसका अर्थ है कि सच्चा कारण vera cause जिससे घटना के घटने की संभावना हो। किसी घटना के बारे में वैसा कारण जिससे वह घटना घटती है। जैसे-वर्षा का वास्तविक कारण बादल है। बादल के अभाव में वर्षा नहीं हो सकती है।

4. कल्पना को परीक्षा के योग्य होना चाहिए। इसके अंतर्गत कहा गया है कि कल्पना के सत्य होने के लिए उसकी जाँच या परीक्षा होनी चाहिए। बिना परीक्षा के कल्पना सत्य नहीं हो सकती है। जाँच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से की जाती है। यदि नींद की अवस्था में कोई आवाज आती है तो इसकी परीक्षा करते हैं और देखते हैं कि कहीं चोर तो नहीं है।

या चूहे के द्वारा खट-पट की आवाज आ रही है। अतः, परीक्षा के बाद ही हमारी कल्पना सत्य होती है। कल्पना की ये शर्ते मितव्ययिता नियम (Law of Parsimony) के अनुकूल है। यदि किसी घटना की व्याख्या एक ही कल्पना से हो जाती है तो उसके लिए अधिक अटकलबाजी करने की जरूरत नहीं है। इसलिए सही कारण को जानने के लिए कम-से-कम संख्या में कल्पना को लाना चाहिए।

5. कल्पना को अधिक-से-अधिक सरल होना चाहिये। कल्पना में जटिलता का बहिष्कार करना चाहिए। जैसे-वर्षा के अभाव के कारण अच्छी फसल का नहीं होना सरल कल्पना है। इस तरह कल्पना के सही होने के लिए उपर्युक्त शर्तों की व्याख्या की गई है।

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प्रश्न 2.
कल्पना क्या है? कल्पना के स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर:
साधारण जीवन में साधारण कल्पना के द्वारा मनुष्य अपने या दूसरे के खास व्यक्तिगत जीवन का विभाग खोज सकता है। इस तरह की कल्पना का रूप पूर्णव्यापी न होकर व्यक्तिगत रहता है। इसमें अंधविश्वास का स्थान भी रहता है। किन्तु, आगमन का लक्ष्य पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करना है। इसके लिए कुछ विधियों को बतलाया गया है।

इन्हीं विधियों में से कल्पना भी एक है। कल्पना के माध्यम से हम घटना के कारण का पता लगाना चाहते हैं। इसके लिए छान-बीन भी करना पड़ता है। एक तरह से अटकलबाजी भी करना शुरू कर देते हैं। अतः, घटनाओं के कारण को पता लगाने के लिए जो संभावित कारण को पहले मानते हैं, उसे कल्पना कहते हैं।

कौफी (Coffy) महोदय ने इसकी परिभाषा में कहा है –
“Ahypothesis is an attempt of explanation a provisional supposition made in order to explain scientifi cally some facts or phenomenon.” अर्थात् कल्पना व्याख्या करने का एक प्रयत्न है, यह सामयिक कल्पना है जिसके द्वारा हम वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों या घटनाओं की व्याख्या करते हैं।

इसी कल्पना की परिभाषा Mill महोदय ने इस तरह दिए हैं, “A hypothesis is any supposition which we make in order to endeavour to deduce from its conclusion in accordance with facts which are known to be real under the idea that if the conclusion to which the hypothesis leads are known truths the hypothesis itself either must be or at fast is likely to be true.”

“प्राक्-कल्पना वह कल्पना है जिसे हमलोग इस लक्ष्य से बनाते हैं कि हम उससे वे निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें जो उन तथ्यों के अनुकूल हों, जिन्हें हम सत्य मानते हैं। ऐसा करने में हमारा विचार यह रहता है कि यदि वे निष्कर्ष, जो इस कल्पना के द्वारा प्राप्त करते हैं, वास्तव में सत्य हैं, तो वह कल्पना स्वयं सत्य होगी या कम-से-कम सत्य होने की संभावना होगी।” इस परिभाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित बातें हम पाते हैं।

1. निरीक्षण:
सहज रूप में जब कोई घटना घटती है तो उसके कारण को जानने की इच्छा होती है। उसी के फलस्वरूप कल्पना का जन्म होता है। अतः, जो घटना घटती है उसका सबसे पहले निरीक्षण करना जरूरी हो जाता है, जैसे चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण यदि घटना के रूप में है तो उसके निरीक्षण करने के बाद ही उसके कारण को जानने की कल्पना की गई है। इसी तरह भूकंप के निरीक्षण के बाद ही उसके कारण जानने की प्रक्रिया शुरू करते हैं, जिसे कल्पना कहते हैं।

2. अटकलबाजी या अंदाज:
जब घटी हुई घटना का हम निरीक्षण कर लेते हैं तो उसके कारण को शीघ्र ही जान लेना संभव नहीं होता है। इसके लिए हम तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं, अंदाज करते हैं कि अमुक कारण से अमुक घटना घटी है। यही कल्पित कारण कल्पना का एक मुख्य अंग बनकर काम करता है। इसी के द्वारा सही कारण को भी जानने का संकेत मिलता है। न्यूटन ने जब वृक्ष से फल को पृथ्वी पर गिरते हुए निरीक्षण किया तो उसके कारण को जानने की इच्छा हुई। इससे उन्होंने अंदाज लगाया कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिसके कारण सभी वस्तुएँ नीचे पृथ्वी पर गिरती हैं।

3. कल्पित कारण से निष्कर्ष निकालना:
कल्पित कारण से निष्कर्ष निकालना भी एक प्रमुख तथ्य रहता है इसमें कल्पित कारण के बाद ही एक संभावित कारण का पता लगाया जाता है। यह कल्पना का निष्कर्ष होता है कि पृथ्वी में आकर्षण-शक्ति है। यह निष्कर्ष तभी निकलता है जब हम कल्पित कारण को पहले स्वीकार कर लेते हैं।

4. निष्कर्ष की परीक्षा:
अटकलबाजी के समय बहुत-सी बातें दिमाग में आती हैं, किन्तु निष्कर्ष पर पहुँचने हेतु बहुत-सी संभावित अटकलों को परीक्षा के द्वारा छाँटकर हटा दिया करते हैं। इस तरह परीक्षा के बाद केवल एक ही कारण सामने आती है, जिसका संबंध कल्पना से रहता है। अतः, यह उत्पत्ति आवश्यक अंग है। कल्पना की सत्यता इसी पर निर्भर करती है।

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प्रश्न 3.
कल्पना के विभिन्न प्रमाणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कल्पना को वैज्ञानिक बनाने के लिए निम्नलिखित कुछ प्रमाणों को बताया गया है –

1. परीक्षा योग्य (Verifiable):
किसी परीक्षा के बाद ही कल्पना की सत्यता जानी जा सकती है। परीक्षा दो तरह की हो सकती है – प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष परीक्षा हमें निरीक्षण और प्रयोग द्वारा पूरी होती है। जैसे किसी के सर पर गाँधी टोपी देखकर कल्पना कर लेते हैं कि यह काँग्रेसी है।

फुलवारी में कोयल की आवाज सुनकर वसन्त ऋतु की कल्पना कर लेते हैं। इसी तरह प्रयोग द्वारा विभिन्न बीमारियों के कारणों के बारे में कल्पना की और उसकी सत्यता भी प्रयोग द्वारा हम स्थापित कर सकते हैं। जैसे-मादा अनोफिल मच्छर के काटने से मलेरिया होता है। इसी तरह अप्रत्यक्ष परीक्षा में बहुत-सी बातों को सत्य मानकर उससे बहुत कुछ अनुमान निकालते हैं।

2. कल्पना के लिए सहज बुद्धि और तेजीपन का होना जरूरी है। जैसे – ‘राम घर से भागकर कोलकात्ता चला गया’ क्योंकि उसके बड़े भाई ने डाँट-डपट की थी। यह परीक्षणीय भी है। लेकिन हमें यहाँ सहज बुद्धि और तेजीपन का व्यवहार कर यह सोचना चाहिए। उसके भागने का कारण और भी है। जैसे-घर में माँ-बाप का प्यार नहीं मिलना, स्वभाव से भावुक होना, कोलकात्ता से किसी मित्र या संबंधी की बुलाहट आना आदि। इसलिए कल्पना के लिए बुद्धि का प्रयोग करना भी जरूरी है।

3. कल्पना को समुचित व्याख्या करने की क्षमता हो – कल्पना ऐसी हो कि जिससे किसी वस्तु की पूर्ण और उपयुक्त व्याख्या हो सके। जैसे-परीक्षा में फेल करने का कारण, परीक्षा के समय बीमार रहना, क्लास से बराबर अनुपस्थित रहना, लिखने की आदत में कमी होना, नोट पढ़ना और फेल करना कल्पना की पूरी व्याख्या नहीं है।

4. कल्पना ऐसी हो कि केवल किसी एक ही वस्तु की व्याख्या हो जाए। यदि उसकी व्याख्या और किसी दूसरी पूर्व कल्पना से उसी तरह की जाए तो उसमें यथार्थता नहीं रह पाती है। अतः, इसे दूर करना चाहिए। कभी-कभी दो प्रतिद्वन्द्वी पूर्व कल्पनाओं में किसी काम को गलत या सही सिद्ध करने का काम निर्णायक उदाहरण से कर सकते हैं।

Crucial Instances:
मानलिया कि सिनेमा के मालिक ने शिकायत किया कि कुछ छात्र आधा घंटे पहले सिनेमा हॉल का शीशा और दरवाजा तोड़-फोड़ दिए हैं। हमारे सामने एक साथ दो कल्पनाएँ उठती हैं कि छात्र कॉलेज का है या स्कूल का। इसी समय एक नौकर आकर दर्शनशास्त्र की किताब देते हुए कहा है कि उस छात्र की यह पुस्तक गिर गई है।

इस किताब से हमें तुरत पता चलता है कि वह छात्र कॉलेज का हैं इस हालत में उस पुस्तक को हम निर्णायक उदाहरण कहेंगे क्योंकि उसी पुस्तक से हम कुछ निर्णय कर सके। इसलिए Jevons का कथन है कि “निर्णायक उदाहरण किसी एक पूर्व कल्पना का समर्थन ही नहीं करता बल्कि दूसरी पूर्व कल्पना का निषेध भी करता है।” निर्णायक उदाहरण की प्राप्ति दो तरह से होता है-निरीक्षण और प्रयोग द्वारा।

गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन पाँच मिनट देर से पहुंचते हैं। दो कल्पनाएँ उठती हैं। गाड़ी आकर चली गई या गाड़ी आने में विलम्ब है। दोनों कल्पनाएँ ठीक हैं। सिगनल को देखने पर पता चला कि सिगनल हरा है। इससे पता चलता है कि गाड़ी अभी आ रही है। यहाँ निर्णायक उदाहरण का निरीक्षण किया जिसमें एक कल्पना सत्य और दूसरा असत्य साबित हुआ।

इसी तरह एक बरतन में गैस है। दो कल्पनाएँ उठती हैं। ऑक्सीजन है या हाइड्रोजन गैस। देखने से दोनों रंगहीन, स्वादहीन एवं गंधहीन होती है। एक निर्णायक उदाहरण की खोज करते हैं। एक जलती हुई लकड़ी को बरतन में डालते हैं। गैस प्रज्वलित हो जाती है। इससे सिद्ध हुआ कि गैसें ऑक्सीजन गैस है। जलती लकड़ी निर्णायक उदाहरण है जो प्रयोग से प्राप्त हुआ है।

5. कल्पना में भविष्यवाणी (Power of prediction) की शक्ति हो। अर्थात् भविष्य की व्याख्या हो सके अर्थात् जो कुछ कल्पना की जाए वह भविष्य में सत्य निकले। ज्योतिषी लोग इसी कारण से भविष्य की घटनाओं का वर्णन पहले कर देते हैं। कल्पना में भविष्यवाणी करने की शक्ति रहने से उसे सत्य होने की अधिक संभावना रहती है।

लेकिन मिल साहब का कथन है कि भविष्यवाणी की कल्पना को यथार्थता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए क्योंकि कभी गलत और कभी सत्य होता रहता है। अतः, पूर्वकल्पना, सिद्धांत, नियम और तथ्य (Hypothesis theory, law and fact) के ऊपर के जितने भी नाम हैं सबों का प्रयोग एक मत और एक अर्थ में न होकर बदलते रूप में रहता है। इस तरह निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि उपर्युक्त प्रमाण कल्पना के बारे में जो दिया गया है, वह सत्य है इसके आधार पर ही कल्पना सत्य होती है।

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प्रश्न 4.
कल्पना के कितने भेद हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
घटना की व्याख्या की दृष्टि से प्राक्कल्पना तीन की प्रकार होती हैं –

  1. कर्ता संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Agent)
  2. विधि संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning law of Method)
  3. परिस्थिति संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection)

1. कर्ता संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Agent):
घटना की व्याख्या तब – होती है जब उसके कारण का पता लगता है। इसका कारण कर्त्ता होता है। कारण के संबंध में जो कल्पना करते हैं वहीं कर्ता संबंधी कल्पना कहलाती है। चोरी की व्याख्या के लिए चोर के संबंध में जो कल्पना की जाएगी वह कर्ता संबंधी कल्पना कहलाएगी।

विज्ञान के क्षेत्र में भी इसी तरह के उदाहरण मिलते हैं। जैसे-यूरेनस ग्रह की गति में गड़बड़ी देखी गई। वैज्ञानिकों ने कल्पना की कि कोई दूसरा ग्रह उसकी गति में बाधा डाल रहा है। जिसके चलते ही गड़बड़ी है और पता चला कि यह नेपच्युन ग्रह के चलते ऐसा हो रहा है। यह कल्पनाकर्त्ता-संबंधी कल्पना कहलाता है।

2. विधि संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning law of Method):
घटना घटने की विधि का अर्थ है कि कर्ता ने किस तरीके से किस नियम से घटना को संपादित किया। जैसे-चोर ने चोरी कैसे की? इस संबंध में जो कल्पना करते हैं वह विधि संबंधी कल्पना है। चोर दरवाजे को खोलकर आया था, उसे तोड़कर या सेंध मारकर आदि।

3. परिस्थिति संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection):
कभी-कभी किसी घटना के कर्ता और विधि या तरीके दोनों मालूम रहते हैं किन्तु परिस्थिति मालूम नहीं रहती है, तो ऐसी स्थिति में परिस्थिति का पता लगाना पड़ता हैं जैसे-गाँव में चोरी हुई। चोरी एक घटना है, इसके कर्ता मालूम है, विधि भी मालूम है। चोरी किवाड़ को तोड़कर हुई है, किन्तु परिस्थिति मालूम नहीं है, इसके लिए परिस्थिति का पता लगाना पड़ता है।

परिस्थिति यही है कि परिवार के सभी लोग सिनेमा देखने चले गये थे। रात में देर से आने के कारण चोरी हुई। इस तरह घटना की परिस्थिति संबंधी कारण का पता लगाने को परिस्थिति संबंधी कल्पना कहते हैं। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि कल्पना के तीन भेद हैं, कर्ता, विधि एवं परिस्थिति संबंधी कल्पना। तीनों के बारे में पता लगाने के बाद ही घटना के सही कारण का पता चल जाता है।

दूसरी दृष्टि से कल्पना के दो भेद बताए गए हैं –

  1. साधारण कल्पना एवं
  2. वैज्ञानिक कल्पना।

1. साधारण कल्पना:
साधारण कल्पना का संबंध किसी व्यक्तिगत समस्याओं के सुलझाने से रहता है। जैसे कोई व्यापारी व्यापार में हानि होने के कारण के संबंध में कल्पना करता है। कोई छात्र परीक्षा में फेल होने के कारण के संबंध में कल्पना करता है।

2. वैज्ञानिक कल्पना:
वैज्ञानिक कल्पना का संबंध ऐसी घटनाओं से रहता है, जिनका संबंध सबों से रहता है। वैज्ञानिक कल्पना तर्क प्रमाण पर आधारित रहती है। विज्ञान के क्षेत्र में जो कल्पनाएँ की जाती हैं, वे वैज्ञानिक कल्पना हैं।

तीसरी दृष्टिकोण से कल्पना दो प्रकार की है –

  1. व्याख्यात्मक कल्पना एवं
  2. वर्णनात्मक कल्पना।

इसमें कारण संबंधी या कर्ता संबंधी कल्पना को व्याख्यात्मक कल्पना कहते हैं। विधि या नियम संबंधी कल्पना को वर्णनात्मक कल्पना कहते हैं। व्याख्यात्मक कल्पना यह बतलाती है कि कोई घटना क्यों घटती है और वर्णनात्मक कल्पना बतलाती है कि घटना कैसे घटती है? व्यावहारिक दृष्टि से कल्पना दो तरह की है –

  1. काम चलाऊ कल्पना एवं
  2. सादृश्यानुमान मूलक कल्पना।

1. काम चलाऊ कल्पना (Working hypothesis):
कभी कभी किसी घटना के कारण के लिए कोई उपयुक्त कल्पना नहीं दिखाई पड़ती है तो उस हालत में हम काम चलाने के लिए एक नकली कल्पना कर बैठते हैं उसे जब मन चाहे तब हटाकर बदल सकते हैं।

जैसे-कलम को जेब में नहीं रहने पर अटकल लगाते हैं कि शायद क्लास में छूट गई, या रास्ते में गिर गई या राम ने चुरा लिया। उसमें एक को परीक्षा के बाद सही पाते हैं। इस तरह की कल्पना को काम चलाऊ कल्पना कहते हैं “A working hypothesis means a provisional support tion.”

2. सादृश्यानुमान मूलक कल्पना (Analogical):
इस तरह की कल्पना में हैं कि जो बात एक वस्तु में सत्य है वह दूसरे में भी सत्य होगी। यदि इन दोनों वस्तुनो में और कुछ बातों की समानता हो तो, जैसे-पृथ्वी और मंगलग्रह में कुछ बातों की समानता है, वैसे दोनों ग्रह हैं, दोनों सूर्य के चारों तरफ घूमते हैं। दोनों का वातावरण एक-सा है। दोनों पर पर्वत, नदी, जंगल हैं। इस तरह पृथ्वी पर आदमी हैं तो कल्पना करते हैं कि मंगल ग्रह पर भी आदमी होंगे। इस तरह की कल्पना सादृश्यानुमान मूलक कल्पना कहलाती है।

काल्पनिक प्रतिरूपक कल्पना (Representative fiction):
बेकन ने कल्पना का एक और रूप दिया है जिसे काल्पनिक प्रतिरूपक कहा जाता है जिसका ज्ञान इन्द्रियों से संभव नहीं है। जैसे-अणु, परमाणु। इस तरह की कल्पना के कारण-स्वरूप हमारे सामने आज अणु-परमाणु के सिद्धान्त ईश्वर की कल्पना, मोझ की कल्पना, प्रकाश तरंग सिद्धान्त तथा भूत-प्रेम या आत्मा-परमात्मा के विषय में दिखाई पड़ते हैं। इस तरह कल्पना के कई प्रकार बताए गए हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक विधि में प्राक-कल्पना का स्थान क्या है? अथवा, वैज्ञानिक आगमन में कल्पना के स्थान की विवेचना करें। अथवा, आगमन में कल्पना के महत्त्वों को लिखें।
उत्तर:
अज्ञात वस्तुओं की छानबीन करने की प्रवृत्ति मनुष्य में जन्मजात होती है। वह भिन्न-भिन्न वस्तुओं के बीच छिपे रहस्यों को जानना चाहता है। वस्तुतः मनुष्य खोजी प्रवृत्ति का होता है। इन सभी बातों की पूर्ति तभी हो सकती है जब हम प्राक्-कल्पना की सहायता लेते हैं।

अतः प्राक्-कल्पना की आवश्यकता हमें प्रयोग करने, वैज्ञानिक एवं कलात्मक खोजों में होती है। प्राकृतिक नियमों की खोज, प्राकृतिक जटिलताओं के कारणों की खोज आदि में प्राक्-कल्पना की सहायता लेते हैं। वस्तुतः बिना कल्पना के हम कोई भी वैज्ञानिक खोज आरंभ नहीं कर सकते हैं।

किसी भी वैज्ञानिक विधि यानि वैज्ञानिक खोज में प्राक्-कल्पना का प्रथम स्थान है। वैज्ञानिक आगमन में कार्य-कारण (Causal relation) स्थापित करते हैं। यही कारण-सम्बन्ध स्थापित करना वैज्ञानिक विधि का लक्ष्य होता है। कार्य-कारण सम्बन्ध निश्चित करने के लिए हम प्राक्-कल्पना ही करते हैं। उसके बाद उसकी जाँच करते हैं तथा जब प्राक्-कल्पना जाँच में सही उतरती है तब उसे हम सिद्धान्त का रूप देते हैं फिर उसे नियम के रूप में मानकर वैज्ञानिक खोज में निश्चित निष्कर्ष पर आते हैं।

वैज्ञानिक विधि में निरीक्षण एवं प्रयोग (Observation and experiments) की सहायता लेना आवश्यक होता है। इसके बिना निश्चितता नहीं आती है। व्यवहार में हम देखते हैं कि निरीक्षण एवं प्रयोग आरंभ से ही प्राक्-कल्पना के द्वारा नियंत्रित होते हैं। निरीक्षण की तरह प्रयोग (Experiment) में भी प्राक्कल्पना का स्थान प्रमुख है। प्रयोग में हम कृत्रिम ढंग से घटना उपस्थित करते हैं। इसके लिए हम पहले प्राक्-कल्पना करते हैं और इसकी जाँच के लिए प्रयोग का सहारा लेते हैं।

जैसे हम पहले यह प्राक्-कल्पना करते हैं कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की निश्चित मात्रा को मिलाने के बाद जब हम उससे होकर विद्युतधारा प्रवाहित करते हैं तो ‘जल’ बनता है। इस प्राक-कल्पना की जाँच हम प्रयोग के सहारे करते हैं। प्रयोगशाला में हम आवश्यक परिस्थिति उत्पन्न कर प्राक्-कल्पना की सत्यता का पता लगा लेते हैं। प्रयोग के लिए पहले किसी-न-किसी प्रकार की प्राक्-कल्पना करना आवश्यक है, क्योंकि प्रयोग में प्राक्-कल्पना की ही जाँच की जाती है।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि निरीक्षण और प्रयोग जिसका महत्त्व वैज्ञानिक खोज में अधिक है, प्राक्-कल्पना द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। बेकन प्राक्-कल्पना के महत्त्व को कम आँकते हैं। लेकिन हम उनके विचार को गहराई से देखें तो बहिष्कार एवं निरीक्षण में भी शुद्ध निष्कर्ष प्राप्त करने हेतु प्राक्-कल्पना की आवश्यकता होती है।

महान् वैज्ञानिक न्यूटन का कहना है कि “मैं प्राक्-कल्पना की कल्पना ही नहीं करता हूँ।” लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से प्राक्-कल्पना की स्वीकृति गुरुत्वाकर्षण के नियम को सिद्ध करने में दीखता है। न्यूटन ने जब सेव को जमीन पर गिरते हुए देखा था तो सर्वप्रथम इसके कारण के बारे में प्राक्-कल्पना ही की थी। तर्कशास्त्री जेएस मिल के अनुसार, प्राक्-कल्पना का अधिक महत्त्व खोज के सम्बन्ध में होता है, प्रमाण (Proof) के सम्बन्ध में नहीं। तर्कशास्त्री ह्वेवेल के अनुसार वैज्ञानिक आगमन का संबंध आविष्कार से अधिक है। अतः उनकी नजर में प्राक्-कल्पना का महत्त्व बहुत अधिक है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

Bihar Board Class 11 Home Science पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है –
(क) अंडा
(ख) दाल
(ग) पालक
(घ) सोयाबीन
उत्तर:
(घ) सोयाबीन

प्रश्न 2.
40% प्रोटीन पाया जाता है।
(क) सोयाबीन
(ख) दाल
(ग) दूध
(घ) मूंगफली
उत्तर:
(क) सोयाबीन

प्रश्न 3.
राइबोप्लोबिन और फॉलिक अम्ल में विटामिन काफी मात्रा में पाया जाता है।
(क) विटामिन ‘A’ में
(ख) विटामिन ‘B’ में
(ग) विटामिन ‘C’ में
(घ) विटामिन ‘D’ में
उत्तर:
(ग) विटामिन ‘C’ में

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प्रश्न 4.
वयस्क पुरुष-शरीर भार होता है –
(क) 50 किग्रा
(ख) 60 किग्रा
(ग) 80 किग्रा
(घ) 90 किग्रा
उत्तर:
(ख) 60 किग्रा

प्रश्न 5.
वयस्क स्त्री भार कि. ग्रा. होता है.
(क) 60 किग्रा
(ख) 50 किग्रा
(ग) 40 किग्रा
(घ) 70 किग्रा
उत्तर:
(ग) 40 किग्रा

प्रश्न 6.
कार्टिलेज से अस्थियों में परिवर्तित होने की क्रिया को कहते हैं। [B.M.2009A]
(क) कैल्सिकरण
(ख) गम्यता
(ग) निर्जलीकरण
(घ) अवशोषण
उत्तर:
(क) कैल्सिकरण

प्रश्न 7.
भाप द्वारा पकाया गया भोजन – [B.M.2009A]
(क) स्वादहीन होता है।
(ख) स्वास्थ्य के लिए उत्तम है
(ग) कच्चा होता है
(घ) हल्का होता है
उत्तर:
(ख) स्वास्थ्य के लिए उत्तम है

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प्रश्न 8.
भोजन पकाने से क्या बदलाव आता है ? [B.M.2009A]
(क) भोजन में भौतिक बदलाव आता है
(ख) भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है
(ग) पोषक मूल्य घट जाता है
(घ) सुरक्षित रहता है
उत्तर:
(ख) भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शीघ्र नष्ट होने वाले दो पदार्थों के नाम बताएँ।
उत्तर:
1. दूध
2. मांस।

प्रश्न 2.
शीघ्र नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ कौन-से हैं ?
उत्तर:
अनाज, दालें, तेल, घी, नमक इत्यादि।

प्रश्न 3.
खाद्य पदार्थ खरीदते समय ध्यान रखने योग्य कोई दो बातें बताइए।
उत्तर:
1. खाद्य पदार्थ आवश्यकतानुसार ही खरीदें।
2. संग्रह के लिए उपलब्ध स्थान के अनुसार सामग्री खरीदें।

प्रश्न 4.
शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सामान्य ताप पर रखे जाने पर इन खाद्य पदार्थों के 3 दिन में ही रंग-रूप में परिवर्तन आने लगता है क्योंकि यह शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

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प्रश्न 5.
खाद्य पदार्थ दूषित कब माना जाता है ?
उत्तर:
जब निम्नलिखित परिवर्तन पाए जाएँ:

  1. रंग
  2. स्वाद
  3. गंध
  4. दिखावट
  5. रचना
  6. सघनता
  7. आकार
  8. पोषण मूल्य।

प्रश्न 6.
खाद्य संदूषण को प्रभावित करने वाले चार कारक बताइए।
उत्तर:

  1. जीवाणु तथा एन्जाइमों की उपस्थिति।
  2. रासायनिक क्रियाएँ।
  3. बाह्य चोट।
  4. चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा नुकसान या अजैविक संदूषण।

प्रश्न 7.
खाद्य संदूषण की सहायतार्थ परिस्थितियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  1. जैविक खाद्य पदार्थ
  2. अनुरूप तापमान
  3. नमी/पानी
  4.  हवा।

प्रश्न 8.
खाद्य परिरक्षण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जब किसी खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक –
1. रोगवाहक जीवाणुओं व रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त रखा जा सके।
2. उनके रंग, रचना, स्वाद, सुगंध व पोषण मूल्य बनाये रखा जा सके तो उसे खाद्य परिरक्षण कहते हैं।

प्रश्न 9.
पौष्टिक तत्त्वों के स्तर को बढ़ाने के क्या उपाय हैं ?
उत्तर:
पोषक तत्त्वों का स्तर निम्नलिखित तीन उपायों से बढ़ाया जा सकता है:

  1. अंकुरण (Germination)
  2. खमीरीकरण या किण्वन (Fermentation)
  3. मिला-जुलाकर पकाना (Combination)

प्रश्न 10.
पोषण प्रक्रिया बढ़ाने का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
पोषण को मिलने वाली मात्रा और स्तर में सुधार करना। ये उपाय घर पर या औद्योगिक स्तर पर किए जा सकते हैं।

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प्रश्न 11.
आपने दो महीने पहले 50 किलो चावल खरीदा था। आपको यह कैसे पता चलेगा कि यह खराब हो गया है। इसके खराब होने के दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • चावल में नमी
  • ड्रम में नमी
  • चावल में पहले से ही कीड़ा लगा हो
  •  गर्म अंधेरे वाली जगह पर संगृहीत हो।

प्रश्न 12.
खिचड़ी सादे चावलों से ज्यादा पौष्टिक क्यों है ? एक और व्यंजन का नाम लिखें जिसमें यही सिद्धांत पाया जाता हो।
उत्तर:
खिचड़ी में अच्छी किस्म का प्रोटीन पाया जाता है जिसको मिला जुलाकर खाने वाला सिद्धान्त है। अन्य उदाहरण जैसे –
1. अनाज + दाल
2. अनाज + दूध
3. अनाज + सब्जियाँ।
व्यंजन-दलिया, डोसा, रायता, डोकला, भरवां पराठा।

प्रश्न 13.
दो सुविधाजनक खाद्य पदार्थों के नाम बताएँ। अपने प्रतिदिन के भोजन में इन्हें खाने से एक लाभ व एक हानि लिखें।
उत्तर:
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ-बोतलबन्द या डिब्बा बंद सुरक्षित पदार्थ, जैसे-जैम, जैली, अचार, चटनी, फल-चैरी और फलों का रस।

लाभ –

  • समय की बचत
  • ईंधन की बचत
  • आसानी से संगृहीकरण किया जा सकता है
  • मेहनत कम लगती है 5. देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

हानियाँ:

  • यह महंगे होते हैं।
  • खाद्य परिरक्षकों तथा रासायनिक पदार्थों का हानिकारक प्रभाव
  • कम पौष्टिक होना।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खाद्य पदार्थों को उनके नष्ट होने के समय का किन आधारों पर वर्गीकरण किया जा सकता है ?
उत्तर:

  • विकारीय अथवा शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ (Perishable foods): दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियाँ आदि।
  • अविकारीय अथवा नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ (Non perishable foods): गेहूँ, दालें, चावल, तेल, घी, आदि।
  • अर्ध-विकारीय अथवा नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ (Semi-perishable foods): मैदा, सूजी, बेसन, मक्खन आदि।
  • सुविधाजनक खाद्य पदार्थ (Convenience foods): दूध पाउडर, जमे हुए खाद्य पदार्थ, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, डबल रोटी आदि।

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प्रश्न 2.
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ (Convenience Foods): ऐसे पदार्थ जिससे महिला को किसी भी समय परिवार को भोजन देने की सुविधा की सामर्थ्य हो, सुविधाजनक खाद्य-पदार्थ कहलाते हैं। खाद्य पदार्थ को पहले से तैयार, आधे पके या पकाने की आवश्यकता नहीं होती, केवल गर्म करने पड़ते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थों को साफ करके बनाकर जमा दिया जाता है तथा इस प्रकार वह सुविधाजनक खाद्य पदार्थ बन जाते हैं।

ये पदार्थ हैं –

  • बोतल बन्द या डिब्बा बंद सुरक्षित पदार्थ, जैसे जैम, जैली, अचार, चटनी, फल, चैरी और फलों का रस।
  • साग, पुलाव, पालक-पनीर, मटर-पनीर इत्यादि।
  • सूखे हुए खाद्य पदार्थ जैसे दूध का पाउडर, खोआ, सूप का सूखा पाउडर, गाढ़े रस के सत्तु इत्यादि।

जमे हुए पदार्थ-मटर, गाजर, टमाटर, भिंडी और फूलगोभी आदि। आज के समय में भिन्न-भिन्न कंपनियाँ कई प्रकार के खाद्य बाजार में ला रही हैं। __तुरत प्रयोगार्थ जमे हुए तैयार खाद्य पदार्थ भी मिलते हैं, जैसे कटलेट, कबाब, सीख, सलामी, चटनियाँ इत्यादि।

प्रश्न 3.
मसाले खरीदते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखेंगे?
उत्तर:

  • जहाँ तक सम्भव हो, साबुत मसाले ही खरीदें।
  • यदि पिसे हुए खरीदने हों तो खुले मसाले न खरीदें, पैकेट बन्द ही खरीदें।
  • विश्वसनीय नाम व साख के मसाले खरीदें।
  • पैकेट पर एगमार्क (Agmark) की मोहर लगे मसाले ही खरीदें।
  • रंग व स्वाद परख कर ही मसाले खरीदें, यदि मसाला पुराना है तो सुगन्ध नहीं आएगी।
  • विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें, कम मात्रा में खरीदें ताकि उनकी सुगन्ध बनी रहे।

प्रश्न 4.
सूखे मेवों को खरीदने से पूर्व इनका निरीक्षण कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर:

  • सूखे मेवे साफ प्राकृतिक रंग व चमक वाले होने चाहिए।
  • दाग, धब्बे, कीड़े, मिट्टी, पत्थर न हों।
  • सिकुड़े हुए न हों।
  • क्रय करने से पूर्व इन्हें तोड़ कर इनकी गिरी का निरीक्षण कर लेना चाहिए। यदि उनमें किसी प्रकार का जाला अथवा कीड़ा लगा हो तो उन्हें नहीं खरीदना चाहिए।
  • फफूंदी के लिए भी इनका निरीक्षण करना आवश्यक है क्योंकि सूखे मेवों में फफूंदी विषैला पदार्थ उत्पन्न करती है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक होता है।

प्रश्न 5.
दूध संग्रह (Storage of Milk) करते समय आप किन बातों को ध्यान में रखेंगी?
उत्तर:
दूध एक शीघ्र नष्ट होने वाला खाद्य पदार्थ है। अतः इसे उचित प्रकार से संगृहित किया जाना चाहिए।

  • दूध को उबाल कर ठण्डा करके ठण्डे स्थान पर रखें।
  • यदि फ्रिज नहीं है तो गर्मियों में 5-6 घण्टे पश्चात् दोबारा उबाल कर रखने से दूध खराब नहीं होता।
  • पुराने दूध को ताजे दूध में नहीं मिलाना चाहिए।
  • तेज गन्ध वाले पदार्थों जैसे प्याज, लहसुन, खरबूजा आदि से दूध को दूर रखें क्योंकि यह गन्ध को बहुत जल्द ग्रहण कर लेता है।

प्रश्न 6.
भोजन पकाने के सिद्धांत का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भोजन पकाने के सिद्धांत (Principles of Cooking): प्रतिदिन के पकाने के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों के प्रयोग से परिवार के हर सदस्य का स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जाता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम इन सिद्धांतों को बेहतर समझें और उपभोक्ता की जानकारी के लिए अध्ययन करें।

पकाने के सिद्धान्त निम्न हैं –
1. सुगंध को सुरक्षित रखना (To keep ‘Flavour in’): जब आप खाद्य पदार्थों को ढंककर या खुले में वसा माध्यम में पकाते हैं जैसे कि पकौड़े, कटलट, आलू चिप्स आदि तो खाद्य की सुगंध उसकी कड़क परत के अन्दर ही रह जाती है। यह खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ट बना देती है तथा पाचक द्रव को सावित होने में सहायता होती है, जिससे पोषक तत्त्वों का बेहतर प्रयोग हो जाता है।

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2. सुगंध को बाहर निकालना (To keep ‘Flavour out’): कभी-कभी खाने को पकाया जाता है ताकि उसकी सुगंध ग्रेवी व तरल में चली जाए, जैसे मीट करी, समग्र सब्जियों व मटन ब्रोध आदि धीमे-धीमे पकाया जाना, खाने के आकार को भी बदल देता है। पानी में घुलनशील पोषक तत्त्व तरी में आ जाते हैं, जो पौष्टिक होने के अतिरिक्त स्वादिष्ट भी होते हैं।

3. उचित पकाने के तरीकों द्वारा अधिक से अधिक पौष्टिक खाना बनाना-प्रोटीन, कार्बोज व वसा जैसे पोषक तत्त्वों पर पकाने के प्रभाव का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 7.
खाद्य परिरक्षण प्रश्न (Food Preservation) के महत्त्व, लाभ बताइए।
उत्तर:
खाद्य परिरक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • ताजे खाद्य पदार्थ अधिक स्थान घेरते हैं, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ। इनके भार तथा घनत्व में कमी लाने के लिए इन्हें परिरक्षित करना चाहिए।
  • परिरक्षित खाद्य पदार्थ भोजन में विभिन्नता लाते हैं।
  • परिरक्षित खाद्य पदार्थों के आवागमन में सुविधा होती है।
  • पोषण की दृष्टि से परिरक्षित खाद्य पदार्थों के प्रयोग से भोजन को पूर्णतः संतुलित बनाया जा सकता है।
  • खाद्य पदार्थों के परिरक्षण की विधिया सीखकर बचे हुए खाली समय का सदुपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
मिलाने-जुलाने से खाद्य पदार्थ पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पोषक मान में वृद्धि –

  • एक-दूसरे का पूरक होने के कारण सभी पौष्टिक तत्त्वों की प्राप्ति शरीर को हो जाती है।
  • दो अंशतः या पूर्ण प्रोटीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण प्रोटीन की प्राप्ति हो जाती है।

उदाहरण के लिए, अनाजों में लाइसिन (आवश्यक अमीनो अम्ल) कम मात्रा में तथा अन्य सभी उपयुक्त मात्रा में होते हैं। दालों में आवश्यक अमीनो अम्ल, मिथायोनिन कम मात्रा में तथा अन्य सभी उपयुक्त मात्रा में होते हैं, अतः इनका मिश्रण खाने से वे एक-दूसरे के पूरक का कार्य करते हुए लाइसिन मिथायोनिन सहित अन्य सभी आवश्यक अमीनो अम्लों की पूर्ति हो जाती है।

प्रश्न 9.
खमीरीकरण से खाद्य पदार्थों पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पोषक मान में वृद्धि –

  • खाद्य पदार्थों में उपस्थित विटामिन B समूह (विशेष रूप से थायमिन) (B), राइबोफ्लेविन (B) तथा निकोटिनिक अम्ल (B) की मात्रा बढ़ कर दुगनी हो जाती है।
  • लौह तत्त्व अपने संयोजी बंधनों से मुक्त होकर शरीर को सरल रूप में उपलब्ध हो जाता है।
  • विटामिन ‘सी’ की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 10.
अंकुरण की प्रक्रिया से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
लाभ:

  1. विटामिन बी समूह के विटामिनों की मात्रा दुगनी हो जाती है। नायसिन भी 48 घंटों में 50-100 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
  2. अनाजों तथा दालों में लोहा रासायनिक यौगिक के रूप में होता है तथा शरीर उसे पूर्णतः अवशोषित करने में समर्थ नहीं होता, परन्तु अंकुरण के कारण लोहा अपने यौगिकों से पृथक् होकर स्वतंत्र हो जाता है जिसका शरीर आसानी से उपयोग कर पाता है।
  3. विटामिन ‘सी’ (एस्कॉर्बिक एसिड) जो सूखी दाल में न के बराबर होता है, अंकुरण से 24 घण्टे में 7-8 मिग्रा., 48 घण्टे में 10-12 मिग्रा. तथा 72 घण्टे में 12-14 मिग्रा. प्रति 100 ग्राम तक हो जाता है।
  4. कुछ पॉलीसैक्राइड्स तथा डाइसैक्राइड्स सरलतम रूप (मोनोसैक्राइड्स) में बदल जाते हैं जो खाद्य पदार्थ को पाचनशील बनाते हैं। उदाहरण के लिए स्टार्च का सूक्रोज, फ्रक्टोज तथा ग्लूकोज में बदलना।
  5. अंकुरण के कारण अनाजों व दालों की ऊपरी परत फट जाती है तथा उन्हें पकाना सरल हो जाता है तथा कम समय लगता है।
  6. अंकुरण के द्वारा खाद्य पदार्थों में उपस्थित पोषण विरोधी तत्त्व नष्ट हो जाते हैं तथा पोषक तत्त्वों के उपयोग को बढ़ाते हैं।
  7. भोजन ज्यादा स्वादिष्ट तथा आकर्षक बन जाता है।

प्रश्न 11.
खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर खाने से क्या लाभ है? .
उत्तर:
सभी खाद्य पदार्थों में सभी पौष्टिक तत्त्व उपस्थित नहीं होते हैं परन्तु प्रत्येक में कोई न कोई तत्त्व अवश्य होता है। शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार यदि इन खाद्य पदार्थों का चयन करके मिश्रित रूप से खाया जाए तो न केवल हम पौष्टिक आहार की प्राप्ति कर सकते हैं वरन् धन तथा श्रम भी बचा सकते हैं।

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प्रश्न 12.
डोसे का पौष्टिक मान अधिक होता है। वे विधियाँ बताइए जिसके द्वारा यह पौष्टिक मान बढ़ाया गया है। प्रत्येक का एक पौष्टिक तत्त्व लिखें जो बढ़ा हो।
उत्तर:
डोसा बनाते समय दो विधियाँ –
1. मिला-जुलाकर खाना
2. खमीरीकरण प्रयोग में लाया जाता है जिससे इसका पौष्टिक मान बढ़ता है। मिला-जुला कर खाने से प्रोटीन की किस्म बेहतर हो जाती है तथा खमीरीकरण से विटामिन बी कम्पलेक्स समूह (B-complex) तथा विटामिन सी (Vitamin C) की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 13.
प्रेशर कूकर द्वारा भोजन पकाने की विधियों के चार लाभ लिखें।
उत्तर:
वाष्प के दबाव द्वारा (Pressure Cooking):

  • प्रेशर कूकर में भोजन बनाने से समय, ईंधन व श्रम की बचत होती है।
  • प्रेशर कूकर के साथ मिले सेपरेटर (Separater) से अलग तरह के भोजन एक साथ पकाए जा सकते हैं।
  • प्रेशर कूकर में खाना बनाने से भोजन के पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।
  • कूकर में ताप व भाप भोजन में प्रवेश कर उसे जल्दी पका देते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन पकाने का खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है ? [B.M. 2009A]
उत्तर:
भोजन में विभिन्नता स्वाद, सुगंध और आकर्षण लाने के लिए तथा भोजन को पाचनशील बनाने के लिए उसे पकाना आवश्यक हो जाता है। भोजन पकाना एक कला है, जो हमारी ‘संस्कृति’ का महत्त्वपूर्ण अंग है। भोजन को विभिन्न विधियों द्वारा पकाया जाता है पकाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें उपस्थित पोषक तत्त्व नष्ट न हो। भोजन पकाने पर कुछ पौष्टिक तत्त्व विघटित होकर आसानी से पचने योग्य हो जाते हैं कुछ कड़े होकर अपचित हो जाते हैं तथा कुछ नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों को पकाने में प्रयुक्त हुए ताप से विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है।

1. कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate): आद्र ताप पर खाद्य पदार्थ में उपस्थित स्टार्च मुलायम हो जाती है, कोशिकाएँ फट जाती हैं और स्टार्च बाहर निकल जाता है जबकि शुष्क ताप पे पकाने पर स्टार्च डेक्सटिन में बदल जाता है और अधिक पाचनशील हो जाता है। चीनी, गुड़ शक्कर आदि गर्म होकर पिघल कर भूरे रंग का हो जाता है।

2. प्रोटीन (Protein): पंकने पर प्रोटीन अधिक पाचनशील हो जाते हैं। ताप से अंडे का प्रोटीन और दूध का प्रोटीन जम जाता है। माँस में उपस्थित प्रोटीन कोलेजन और इलास्टिन अघुलनशील शीघ्र होते है तथा ये शुष्क ताप द्वारा कड़ी हो जाते हैं। दालों में पाई जाने वाली प्रोटीन पकाने पर अधिक पौष्टिक तथा पाचनशील हो जाता है।

3. वसा (Fats): पकने पर वसा पर कोई अधिक प्रभाव न पड़ता है केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वयत्युक पदार्थ को उचित ताप पर रखा जाय एवं सुनहरी रंग होने पर ताप से हटा लिया जाए।

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4. विदामिन्स (Vitamins): पकाने पर विटामिन ‘सी’ सबसे अधिक नष्ट होते हैं अतः विटामिन ‘सी’ युक्त फल एवं सब्जियों को ताजा ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए, विटामिन ‘बी’ समूह पकाने पे ताप द्वारा नष्ट हो जाता है साथ ही विटामिन ‘ए’ ‘डी’ ‘ई’ कुछ मात्रा में वसा में घूल जाते हैं।

5. खनिज लवण (Minerals): सामान्यतः पकने पर खनिज लवण पर प्रभाव नहीं पड़ता है किन्तु यदि भोज्य पदार्थ को पकाने के बाद उनका पानी फेंक दिया जाए तो बहुत से खनिज नष्ट हो जाते हैं। अतः खाद्य पदार्थों को वैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर पकाना चाहिए ताकि पोषण मान उपस्थित रहे और पोषक तत्त्व कम-से-कम बर्बाद हो साथ ही जहाँ तक संभव हो बिना पालीस किया चावल, साबूत दाल, चोकर सहित अनाज का ही प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2.
खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक-जैसा खाओगे अन्य, वैसा होगा मन। कोई भी व्यक्ति अपौष्टिक खुराक पर कुछ समय तक बच जाएगा परन्तु शीघ्र ही उसका स्वास्थ्य गिरना शुरू हो जाता है। इसके परिणाम होंगे, कुपोषण, कमी के रोग, रोगग्रस्तता, शीघ्र व असामयिक मृत्यु।
आपके खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कुछ कारक निम्नलिखित हैं –

1. माध्यम (Media): खाद्य पदार्थों के उत्पादक विज्ञापनों पर काफी पैसा खर्च करते हैं ताकि वह अपने पदार्थों को प्रचार करके उसकी मांग बढ़ा सकें। यह प्रचार जनता को मोहने के लिए व आकर्षित करने के लिए किया जाता है। आपको ऐसे कई विज्ञापनों के बारे में पता होगा जिन्हें दूरदर्शन, रेडियो पर देखते/सुनते हैं।

  • कौन-सा खाद्य-पदार्थ वृद्धि के लिए आवश्यक होगा?
  • ऊर्जा और बल के लिए आपको क्या लेना चाहिए?
  • पकाने के कौन-से तेल में PUFA की मात्रा अधिक होती है ?
  • अपनी चाय/कॉफी के लिए कौन-सा दूध पाउडर प्रयोग करना चाहिए?
  • ऊपर लिखित उदाहरणों की तरह बहुत कुछ और भी हैं।
  • उत्पादक समय व ऊर्जा बचाने की भी बात करते हैं, जैसे-मिनट में तैयार आदि।

2. सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्य (Cultural and family food values): इनका प्रभाव आपके भोजन पर प्रत्यक्ष रूप से होता है। अंडे, दूध, मांस और दूसरे अच्छे पदार्थ जीविका कमाने वाले को तथा परिवार के पुरुष सदस्यों को दिये जाते हैं। परिवार के दूसरे सदस्यों में शेष भाग बाँटा जाता है। कुछ राज्यों में दालें, ताजे फल और सब्जियाँ गर्भवती और स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को नहीं दिया जाता।

ऐसे सांस्कृतिक रीति-रिवाज मातृत्व स्तर को नीचे गिरा देते हैं। कई परिवारों में मांसाहारी भोजन को खाने पर अधिक जोर दिया जाता है। सब्जियाँ काफी मात्रा में विटामिन और खनिज लवण देती हैं और इसके अतिरिक्त रूक्षांश भी देती हैं जो शारीरिक प्रक्रिया को नियंत्रित करने में सहायता देता है। यह वांछनीय है कि मूल्यों को भूलकर आगे बढ़ें। मिश्रित, ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थ कम दाम पर अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करते हैं।

3. मित्रसमूह वर्ग (Peer Group): मित्रसमूह का विशेषकर किशोरों की खाने-पीने की आदतों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। विकासशील बच्चों में चॉकलेट, शीतल पेय और पीजा, बर्गर आदि खाने की अधिक इच्छा होती है। अक्सर ये सब खाद्य पदार्थ पौष्टिक नहीं होते हालांकि इन पर काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। यह अक्सर देखने में आया है कि बच्चे अपने मित्रों के साथ वह सब कुछ खा लेते हैं जो उनको स्वादिष्ट नहीं लगता। पोषण के अध्ययन से मित्रसमूह में खाने के चयन में बुद्धिमत्ता आती है।

4. आर्थिक कारण (Economical Factors): एक बुद्धिमत्ती गृहस्वामिनी अपने परिवार के लिए किफायती दामों पर संतुलित आहार का चयन करती है। उसे ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थों की उपलब्धि, उनकी पौष्टिक क्षमता के बारे में सब कुछ पता होता है। वह इनके लिए वही पदार्थ चयन करती है जिससे घर के लोगों को फायदा हो।

जैसे-खीर के लिए टूटे चावल और जैम बनाने के लिए सेब। एक बुद्धिमत्ती मां विशेष मौकों के लिए स्वादिष्ट भोजन घर पर बनाना अधिक पसंद करती है बजाय इसके कि बाहरी होटलों से महंगा खाना मंगाकर खाया जाए। कीमत, मात्रा, समय, ऊर्जा और ईंधन, हर ओर किफायत का ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 3.
खाना पकाने के कौन-कौन-से कारण हैं ?
उत्तर:
खाना पकाने के कारण (Reasons of Cooking Food) :
1. भौतिक और रासायनिक परिवर्तन-पकाने से मांस में प्राकृतिक (भौतिक) बदलाव आता है जिससे इसे खाना आसान हो जाता है। कच्चा मांस खाया नहीं जाता। पकाने से इसका रंग और आकार भी बदल जाता है। आलू, मांस आदि में रासायनिक बदलाव भी आ जाता है। पकाने के बाद वे अधिक मीठे हो जाते हैं। स्टार्च कोशिकाएं फट जाती हैं और सारी मात्रा खाने के योग्य हो जाती हैं।

2. पाचन शक्ति बढ़ जाती है-सख्त खाद्यान्न जैसे सूखे बीज, मटर इत्यादि को नर्म करने के लिए पकाया जाता है। पाचक रस नर्म बीज के अन्दर पहुंच जाता है। यह प्रोटीन और कार्बोज का पूरा उपयोग सुनिश्चित कर लेता है।

3. स्वाद, सुगंध और रुचि में परिवर्तन-पकाने पर शकरकन्द का स्वाद बदल जाता है। मछली और मांस के गन्ध में बेहद सुधार हो जाता है अर्थात् उसकी सुगंध अच्छी हो जाती है तथा अधिक रुचिकर बन जाती है।

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4. पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है-दालों, फलियाँ और सोयाबीन में रोधक ट्राइपसिन होता है। सूखे या नम पकाने पर यह नष्ट हो जाता है तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है।

5.खाद्य पदार्थ को सुरक्षित बनाता है और भण्डारण समय बढ़ जाता है-कच्चा खाद्य पदार्थ खराब होना शुरू हो जाता है तथा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जैसे टमाटर । अगर आप इसको पका लें तो चटनी के रूप में लम्बी अवधि तक खराब नहीं होता। .. जीवाणु की उपस्थिति के कारण दूध फट जाता है। उबालने से वे जीवाणु मर जाते हैं और दूध के खराब होने की अवधि बढ़ जाती है।

6.भिन्नता के लिए पकाना-एक ही प्रकार का खाना खाते-खाते मन ऊब जाता है। पकाने से एक ही खाद्य पदार्थ को विभिन्न रूपों से खाया जा सकता है। जैसे गेहूँ का दलिया, चपाती, पराठा, पूरी-कचौरी और बिस्कुट आदि के रूप में खाया जाता है। पकाने से एक प्रकार से खाने से छुट्टी मिलती है।

प्रश्न 4.
खाद्य पदार्थों का किस प्रकार चयन, क्रय एवं संग्रह करेंगे?
उत्तर:
1. नष्ट होने वाले भोज्य पदार्थों का चयन, क्रय व संग्रह-इसके अन्तर्गत सब्जी, फल, जन्तुजन्य खाद्य पदार्थ जैसे-दूध, मछली, मीट आदि आते हैं। इन खाद्य पदार्थों से हमें प्रोटीन, विटामिन व खनिज लवण प्राप्त होते हैं।

चयन व क्रय (Selection & Purchase) :
1. दूध (Milk): कई प्रकार के दूध बाजार में उपलब्ध हैं। गर्मी पाकर दूध शीघ्र खराब होता है। ताजा दूध की सुगन्ध व स्वाद उत्तम होते हैं व रंग सफेद होता है। बासी दूध की सुगन्ध व स्वाद घटिया होते हैं। दूध का उपयोग करने से पहले उसे उबाल लेना चाहिए।

2. पनीर (Cheese): पनीर में नमी अधिक होती है। इसे स्वच्छ स्थान से ही खरीदना चाहिए व खरीदने के पश्चात् जल्दी ही उपयोग में ले लेना चाहिए। पनीर को छूकर देखें। यह सख्त व पीला न हो।

3. मक्खन (Butter): मक्खन में 11 से 16% नमी होती है। कमरे के तापक्रम पर यह जल्दी ही खराब हो जाता है। घर में बने मक्खन में नमी और भी ज्यादा होती है। नमक वाला प्रोसेस्ड मक्खन कुछ दिन रखा जा सकता है।

पशुजन्य पदार्थ (Animal Product):
1. अण्डा (Egg): यदि अण्डे को प्रकाश, जैसे जलती मोमबत्ती के सामने रखकर देखें तो उसमें उपस्थित वायु कोष (Air cell) छोटा पाएँगे। अण्डों के व्यापारियों द्वारा वर्गीकरण साइज के अनुसार किया जाता है। पुराने अण्डे में वायुकोष बड़ा होता है।

यदि पानी में डालने पर अण्डा ऊपर तैरने लगता है तो इसका अर्थ. अण्डा अन्दर से खराब है। अण्डा ऐसा खरीदें जो ऊपर से साफ व साबुत हो। टूटे अण्डों में जीवाणु प्रवेश पा जाते हैं। ऊपर लगी गन्दगी में उपस्थित जीवाणु साबुत अण्डे के अन्दर प्रवेश पा जाते हैं।
2. मछली (Fish):

  • ताजा मछली का मांस ठोस हो।
  • ऊपर की पर्त (Scales) कसी हुई व त्वचा भी जुड़ी होनी चाहिए।
  • अगर मछली पर अंगुली से दबाव डालें तो गड्ढा नहीं पड़ता।
  • अगर पानी में मरी मछली डालें तो वह डूब जाती है।
  • खरीदते समय देखें कि मछली का गलफड़ा (Gills) चमकीले लाल रंग का हो।
  • आँखें चमकीली हों।
  • यदि छूने पर लसलसी हो तो इसका अर्थ है कि मछली फ्रिज या बर्फ पर नहीं रखी थी व बासी पड़ने लगी है।
  • मछली में किसी प्रकार की गन्ध नहीं होनी चाहिए।

3. मांस (Meat): मांस का रंग चमकीला लाल रंग का होना चाहिए। स्पर्श करने पर चिकना व रेशे महीन प्रतीत होने चाहिए। उसके ऊपर लगा वसा सफेद एवं दृढ़ होना चाहिए। गहरे रंग का मोटे रेशे वाला, पीली नारंगी रंग के वसे वाला व स्पर्श पर अत्यधिक नर्म मांस उपयोग के लिए अच्छा नहीं होता।

मांस निम्न पशु के हो सकते हैं –
एक साल तक भेड़ का मांस (Lambs Meat)। एक साल के ऊपर वाली भेड़ का मांस (Mutton)। सूअर का मांस (Pork)। गाय का मांस (Beef)। पोर्क मांस में छोटे जानवर के मांस का रंग भूरे से गुलाबी रंग का हो सकता है परन्तु बड़े जानवर के मांस का रंग गहरे लाल रंग का होता है। सूअर के मांस को खाने से उसमें उपस्थित जीवाणु (Round worm) शरीर में प्रवेश पाकर Trichinosis नामक रोग उत्पन्न करता है इसलिए इसे अच्छी तरह पकाना चाहिए क्योंकि ऊँचे तापक्रम पर यह जीवाणु नष्ट हो जाता है। मांस सदैव साफ, स्वच्छ दुकानों से ही खरीदें। खास कर ऐसी दुकानों से जहाँ इसे ठण्डा रखने का साधन हो।

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सब्जियाँ और फल (Vegetebles and Fruit): सब्जियों व फलों से भोजन रंग, बनावट व सुगन्ध के कारण अधिक आकर्षक हो जाता है। फल व सब्जियों से आहार में खनिज लवण व बी समूह के विटामिनों के अतिरिक्त विटामिन ए व सी भी पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। फल व सब्जियाँ अधिक दिनों तक रखे नहीं जा सकते।

सब्जियाँ (Vegetables):
1. पत्ते वाली सब्जियाँ (Leafy Vegetables): इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के खाद्य आते हैं। जैसे-बथुआ, पालक, सरसों, हरा धनियाँ, मेथी आदि।

  • पत्ते वाली सब्जी का रंग गहरा हरा हो, पीलापन लिये न हो।
  • पत्तियाँ चमकदार व चिकनी हों व मुरझाई न हों।
  • पत्तियाँ कीड़ों द्वारा खाई हुई या कीटाणुयुक्त नहीं होनी चाहिए।
  • पत्तियाँ आधी टूटी या मिट्टी लगी भी नहीं होनी चाहिए।

2. अन्य सब्जियाँ (Other Vegetables): इनके अन्तर्गत बैंगन, खीरा, लौकी, भिण्डी, टमाटर, मटर, फूलगोभी, बन्दगोभी आदि आते हैं।

  • ठोस, नमकीले रंग की हों।
  • कीड़े या चोट नहीं लगे हों।
  • जरूरत से ज्यादा न पकी हों।
  • सूखी, मुरझाई, बेरंगी सब्जियाँ न खरीदें।
  • फल वाली सब्जियाँ रसदार होनी चाहिए।

सब्जी के आकार देखकर सबसे बड़ी सब्जी न उठाएँ। मध्यम आकार की सब्जी अच्छी रहती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार की विधि से बनानी है उस पर भी चयन निर्भर करेगा। टमाटर सलाद के लिए बड़े व ठोस होने चाहिए, परन्तु सब्जी में डालने के लिए छोटे आकार के भी चलेंगे।

3. फल (Fruits): कई फल सब्जियों की तरह उपयोग में आते हैं, जैसे टमाटर। गहरे पीले-नारंगी फलों में विटामिन ए अधिक होता है। आंवला, अमरूद, अनानास में विटामिन सी की मात्रा अधिक है।

  • फल ताजे, पके, भारी, ठोस तथा चमकदार होने चाहिए।
  • वे अत्यधिक पके न हों तथा फफूंदी आदि न लगी हो।
  • सड़े व दागी फल न खरीदें।
  • फल हरे व अधिक कच्चे भी न हों।

खट्टे रसदार फल जैसे संतरा, मौसमी आदि पतले छिलके वाले तथा मध्य आकार के अनुपात में हों तो ऐसे फल अधिक रसदार होते हैं। अन्य फलों में सेब, अनानास, अंगूर आदि आते हैं। केले पीले, थोड़े सख्त खरीदें व कमरे के तापक्रम पर पकने दें। पकने के पश्चात् केले बहुत जल्दी सड़ने लगते हैं। सेब अब पूरे साल ही उपलब्ध होते हैं। अच्छे सेब दृढ, चमकीले रंग के व भारी होते हैं। सेब को लम्बे समय तक रखने से वे बेस्वाद, सुगन्धरहित व भार में हल्के हो जाते हैं। अंगूर रस से भरे, मोटे, चमकीले, टहनी से लगे व लम्बे होने चाहिए।

अनानास अच्छे आकार का, सुगन्ध से भरपूर, पीले रंग का पका हुआ होना चाहिए। पके होने की जाँच करने के लिए उसके ऊपर की पत्तियों को खींच कर देखें। यदि पत्तियाँ आसानी से खिंच जाए तो समझें कि अनानास पका हुआ है। फल हमेशा मौसम में ही खरीदें। बेमौसम के फलों का स्वाद अच्छा नहीं होता तथा शीतगृहों में पड़े रहने के कारण पौष्टिकता भी कम हो जाती है। संग्रह (Storage) खाद्य पदार्थ एन्जाइम व जीवाणुओं के कारण खराब होता है। एक खराब खाद्य पदार्थ को उसकी खट्टी दुर्गन्ध, ऊपर उगी सफेद पर्त तथा लिसलिसे स्पर्श से पहचाना जा सकता है। निम्न तापक्रम खराब होने की क्रिया को कम कर देता है।

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1. दूध (Milk): दूध को उबाल कर ठण्डा करके बर्तन को ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। गर्मी पाकर दूध शीघ्र खराब हो जाता है। गर्मी के कुप्रभाव से बचने के लिए दूध के बर्तन को पानी से भरी परात में रखना चाहिए। ढक्कन पर गीला रूमाल डाल दें। रेफ्रीजरेटर व आइस बाक्स में भी दूध सुरक्षित रहता है। उबला दूध 12 – 24 घण्टे कमरे के तापक्रम पर रखा जा सकता है।

2. पनीर: पनीर सख्त न हो जाए इसलिए उसे चिकनाई का असर न होने वाले कागज में रखना चाहिए। यह भी जल्दी खराब हो जाता है। इसलिए बर्फ या फ्रिज में दो सप्ताह तक रख सकते हैं।

3. मक्खन: इसे भी मक्खन के कागज या बर्तन में ढंककर ठण्डे स्थान पर दो सप्ताह तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है।

4. पशु जन्य खाद्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, कीमा आदि शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। इन्हें जमाव बिन्दु से कुछ कम तापक्रम पर थोड़े समय के लिए रखा जा सकता है। मांस खरीदते समय यह देखें कि दुकान पर

  • मांस लटका हो ताकि उसे हवा लगती रहे।
  • मक्खियों से बचाने की व्यवस्था हो। मलमल के थैले में लटकाना उचित होगा। थैला मांस से स्पर्श करता हुआ नहीं हो।
  • घरों में रेफ्रीजरेटर में ही रखें।

अण्डों को भी ठण्डे स्थान पर फ्रिज में ही रखें।
फल एवं सब्जियाँ: फल और सब्जियाँ ताजा ही प्रयोग में लाना चाहिए। उन्हें टोकरियों में पृथक् फैलाकर रखें। जिस स्थान पर रखें, वह हवादार हो । आलू, प्याज जैसी जड़दार सब्जियाँ ठण्डे तथा अंधेरे स्थान पर रखें जिससे अंकुर न फूटे। फ्रिज में यदि सब्जियाँ खुली रखी जाती हैं तो वह आकार में छोटी होकर झुरियोंदार हो जाती हैं । फ्रिज में क्रिसपर (Crisper) वाले भाग में सब्जियों व फल को सुखाकर थैलियों में डालकर रखें।

II अर्द्ध नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ (Semi-Perishable Foods): इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भोज्य पदार्थ आते हैं :
1. अनाज-अनाज के अन्तर्गत गेहूँ व उससे बने अन्य पदार्थ आते हैं, जैसे-मैदा, सूजी, आटा, दलिया आदि। यह सब गेहूँ को पीसकर बनाया जाता है। गेहूँ पीसने से उसकी ऊपरी सतह का ज्यादा क्षेत्र वातावरण के संपर्क में आता है। पकाने में समय कम लगता है और संग्रह कम समय के लिए कर सकते हैं।

साबुत गेहूँ को एक साल या अधिक समय तक संग्रह कर सकते हैं परन्तु उससे बने पदार्थ, जैसे-रवा, मैदा आदि को दो सप्ताह से कुछ महीनों तक ही रखा जा सकता है। दलिया एक पौष्टिक आहार है। एक अच्छा गुण (Quality) वाला दलिया स्वाद में मीठा, फफूंदी व दुर्गन्धरहित होता है परन्तु रखने पर इसमें जल्दी कीड़े पड़ जाते हैं।

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सूजी के कण कई प्रकार के होते हैं। बहुत ही महीन कण वाली सूजी हलवा बनाने के उपयोग में लाई जाती है। थोड़े मोटे कण वाली सूजी उपमा, चिड़वा बनाने के काम में आती है। चयन करते समय कणों की एकरूपता, कणों का जाले से बंधना, पत्थर व गेहूँ के छिलके की अनुपस्थिति देखनी चाहिए। मैदे में कम प्रोटीन, लोहा, व बी समूह के विटामिन पाए जाते हैं। इसे सूजी से भी कम समय के लिए संग्रह कर सकते हैं। अच्छे गुण वाला मैदा सफेद, कीड़े रहित होता है। इसके कण आपस में जुड़कर ढीले नहीं बन जाने चाहिए।

चावल से चिड़वा व फूलिया (Rice fibres, rice puffs) बनाए जाते हैं। फूलिया काफी समय तक रखी जा सकती है। यह कुरमुरी, कंकड़ रहित, मिट्टी रहित होनी चाहिए। चिड़वा सफेद, कुरकुरा, कीड़े रहित व गन्दगी रहित होना चाहिए। अनाज में बहुधा कीड़े लग जाते हैं जो इन्हें काट देते हैं और पोषक तत्त्व को बिल्कुल नष्ट कर देते हैं।

कीड़े लग जाने से अनाज का भार भी कम हो जाता है। हमारे देश में अनाज का प्रमुख स्थान है। चावलों के लिए तो यह प्रसिद्ध है कि वह जितना पुराना होता है, उतना ही स्वादिष्ट तथा अच्छा बनता है। भारतीय ऐसा चावल पसंद करते हैं जो पकने के पश्चात् दाना-दाना अलग दिखाई दे। गेहूँ बहुत पुराना बढ़िया नहीं माना जाता। मार्च और अप्रैल के महीनों में जब गेहूँ की फसल होती है, तब बहुत से घरों में एक साल तक के लिए गेहूँ जमा कर लिया जाता है।

अनाज चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें –

  1. दिखावट।
  2. छूकर अनुभव करना।
  3. रंग।
  4. विभिन्न जाति या प्रकार।
  5. सुगन्ध।
  6. मिलावट, मिट्टी आदि।
  7. कीड़े।
  8. कीमत।

अनाज के कणों में एकरूपता होनी चाहिए। साफ, टूटे टुकड़ों की अनुपस्थिति, कीड़ेरहित, मिट्टी, कंकड़, रेत, तिनकेरहित अनाज के कुछ दाने मुँह में डाल कर चबाने से यदि दाना सख्त तथा मीठा है तो अनाज की किस्म अच्छी है। नमीयुक्त एवं कड़वे स्वाद के अनाज को नहीं खरीदना चाहिए। सूजी, मैदा आदि अधिक मात्रा में नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इनमें कीड़े पड़ जाते हैं।

2. दाल (Pulse): दालों में अरहर, चना, उड़द आदि दालें आती हैं। इन्हें भी अनाजों के समान देखकर चयन करना चाहिए। दालें साबुत और दली आती हैं। सूखे डिब्बों में भर कर रखें। नमी में बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं।

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3. वसा व तेल-घी का उपयोग हलवा, तड़का आदि के लिए किया जाता है। मक्खन, डबल रोटी या बेकिंग में उपयोग होता है। तेल सब्जियों के पकाने, तलने आदि के काम में आता है। हर प्रान्त में भिन्न प्रकार का चिकना पदार्थ पकाने के काम में आता है। बंगाल में सरसों का तेल, केरल में नारियल का तेल, गुजरात में मूंगफली का तेल उपयोग में ज्यादा आता है।
वसा या तेल खरीदते समय

  • सुगन्ध
  • वास्तविक रंग
  • अन्य किसी तेल का मिश्रण
  • गन्दगी
  • दुकान पर सफाई से रखा देखकर ही लेना चाहिए।

तेल, घी खुला न लेकर बन्द डिब्बे में ही खरीदना चाहिए क्योंकि खुली चीजों में मिलावट आसानी से की जा सकती है।

संग्रह (Storage): कई घरों में एक भण्डार गृह होता है।

भण्डार (Store Room): घर में संग्रहीकरण हेतु एक भण्डार गृह का होना आवश्यक है। इसमें नमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा वस्तुएँ खराब हो जाएँगी। दीवारों पर यदा-कदा सफेदी कराते रहना चाहिए। भण्डार गृह में वायु तथा धूप आने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। फर्श पक्का होना चाहिए। कच्चे फर्श पर ईंटें या लकड़ी के तख्ने रखकर उस पर डिब्बे, कनस्तर आदि रखने चाहिए।

उसमें अलमारियाँ, एक मेज, तराजू तथा एक हिसाब लिखने की पुस्तिका भी होनी चाहिए। दाल के लिए ऐसे डिब्बें हों जिनमें वायु प्रवेश न कर सके। आटे के लिए कनस्तर तथा गेहूँ के लिए टंकी होनी चाहिए। डिब्बों, कनस्तरों व टंकियों पर पेण्ट कर देना चाहिए तथा उनमें रखी वस्तु के नाम का लेबिल लगाना चाहिए ताकि इन्हें निकालने में सुविधा रहे।

1. अनाज (Cereals): गेहूँ को सुरक्षित रखने के लिए सर्वप्रथम धूप में भली-भाँति सुखा लेना चाहिए तथा ड्रम में भरते समय छाया में सूखी हुई नीम की पत्तियाँ डाल देनी चाहिए। इससे गेहूँ में घुन नहीं लगता। नीम की पत्तियाँ कीटाणुनाशक एवं नि:संक्रामक होती हैं। यदि नीम की पत्ती न हो तो कीटाणुनाशक औषधि डाल कर सुरक्षित रखा जा सकता है परन्तु प्रयोग में लाने से पूर्व धोकर सुखा लेना चाहिए जिससे कीटाणुनाशक औषधि का असर न हो।

आटा अधिक नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि अधिक रहने पर उसमें सीलन आ जाती है और कीड़े पड़ जाते हैं। आटे को सदैव ढककर सूखे स्थान पर रखना चाहिए। नया आटा लाने से पूर्व पुराने को काम में ले लेना चाहिए। चावल इल्लियों द्वारा नष्ट होता है। इनमें गुच्छियाँ बंध जाती हैं। सुरक्षा के लिए हल्दी व तेल का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने से कीड़े चावल को खराब नहीं करते । चावल को धूप में नहीं सुखाना चाहिए। इससे यह टूट जाता है।

2. दाल (Pulse): प्राय: दालों को भी पूरे मास की आवश्यकतानुसार खरीदा जाता है। साबुत दाल को दलने से पूर्व साफ करके तेल और पानी लगाकर रात भर बोरी या अन्य कपड़े में रख देना चाहिए। दूसरे दिन 3-4 घण्टे तक धूप में सुखाकर दल लेना चाहिए। दाल को संग्रह करने से पूर्व छाँट, फटककर दिन भर तेज धूप में सुखाना चाहिए ताकि नमी न रहे। कीड़ों से बचाने के लिए हींग के टुकड़े रख देने चाहिए। फिर इन्हें सूखे डिब्बों में भली प्रकार बन्द करके रखना चाहिए। डिब्बा हवा बन्द (Air tight) हो व नमी वाले स्थान पर न रखें। समय-समय पर दालों का निरीक्षण करते रहें।

3. शक्कर (Sugar): शक्कर शीघ्रता से खराब नहीं होती । इसलिए इसे पर्याप्त मात्रा में खरीद सकते हैं। इसे नमी से दूर रखना चाहिए । इसे इस प्रकार सुरक्षित बर्तन में रखना चाहिए कि चींटियाँ व कीड़े-मकोड़े प्रवेश न कर सकें।

4. चाय तथा कॉफी (Tea and Coffee): इसके लिए किसी ऐसे बर्तन की आवश्यकता है जिसमें वायु प्रवेश नहीं कर सके । इसे नमी से बचाने के लिए टिन या प्लास्टिक के डिब्बे में रखना चाहिए।

5. घी (Ghee): घी को अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए उसे खूब गरम करके छान कर छाछ निकाल दें। तत्पश्चात् उसमें थोड़ा-सा नमक का ढेला डालकर किसी बर्तन में संगृहीत कर सकते हैं। इसे शीतल हवादार स्थान पर रखना चाहिए। अधिक गर्मी से इसका स्वाद बिगड़ जाता है।

6. मसाले (Spices): साधारणतः हल्दी, धनिया, लाल मिर्च आदि मसाले घर में प्रयुक्त किए जाते हैं। सभी मसालों को बाजार से खरीदने के बाद भली प्रकार साफ करना चाहिए । इसके बाद उन्हें आवश्यकतानुसार तब तक कड़ी धूप में सुखाना चाहिए जब तक कि उनमें से नमी पूर्णतः न निकल जाए। तत्पश्चात् उन्हें कूटकर सूखे व ढक्कनदार बर्तनों में रखना चाहिए । धनिया को सुरक्षित रखने के लिए उसमें हींग की डेली डाल देनी चाहिए। मिर्च को जाले से सुरक्षित करने के लिए एक किलो पीसी मिर्च में 100 ग्राम पीसा नमक मिला दें। हल्दी समय-समय पर सुखाते रहें। मसालों को नमी से हमेशा बचाते रहें।

III. अनाशवान भोज्य पदार्थ (Non-Perishable Foods): डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ के लिए ISI: FPO अथवा Agmark वाले खाद्य पदार्थों पर दिए गए पैकिग की तारीख देखकर ही खरीदना चाहिए। सुविधा वाले खाद्य-पदार्थों का क्रय-इन खाद्य पदार्थों का सोच-विचार कर चयन करने के पश्चात् इन्हें क्रय करना होता है। क्रय करते समय कई बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जिनका उल्लेख नीचे किया गया है:

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1. डबल रोटी तथा अन्य सेंके हुए पदार्थ (Bakery Products): इन्हें हमेशा साफ, विश्वसनीय दुकानों से खरीदना चाहिए। क्रय करने से. पूर्व उनकी ताजगी का निरीक्षण कर लेना चाहिए। बासी सेंके हुए पदार्थ कदापि नहीं खरीदने चाहिए क्योंकि एक या दो दिन के भीतर अनुचित परिस्थितियों में फफूंदी इन पर उगने लगती है। प्रारम्भ में यह फफूंदी बहुत कम मात्रा में होने के कारण स्पष्ट दिखाई नहीं देती परन्तु खाने पर शरीर के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है। यदि डबल रोटी को फ्रीज में रखना हो तो एक दिन की पुरानी डबल रोटी लेनी चाहिए क्योंकि ताजी डबल रोटी फ्रिज में रखने से गीली-गीली (Soggy) हो जाती है।

2. डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ (Canned foods): डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ, जैसे-जैम, जैली, मांस, फल, सब्जियाँ आदि क्रय करते समय डिब्बे का निरीक्षण करना चाहिए। यदि डिब्बा कहीं से फूला हुआ या पिचका हुआ हो तो उसे कभी भी नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि वह डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ के खराब होने का सूचक है। डिब्बे पर दी हुई खराब होने की सम्भावित तिथि को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिन पदार्थों की तिथि निकल चुकी हो या निकट भविष्य में हो उन्हें क्रय नहीं करना चाहिए। शीशे, प्लास्टिक एवं पालीथिन में पैक किए गए खाद्य पदार्थों को बाहर से देखा जा सकता है। अतः इनका निरीक्षण करने के पश्चात् इन्हें खरीदना चाहिए।

3. पापड़, चिप्स अथवा सूप, डोसा आदि के तैयार पाउडर-इन खाद्य पदार्थों को खरीदने से पूर्व इनके लेबल पर दिए गए निर्देशों से भली प्रकार परिचित हो जाना चाहिए । इनकी खराब होने की सम्भावित तिथि को पढ़कर ही इन्हें खरीदना चाहिए। क्रय करने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि इनके पैकेट अच्छी तरह से बन्द हैं या नहीं। फटे हुए, पुराने पैकेटों को खरीदना उचित नहीं है क्योंकि इनके शीघ्र खराब होने का भय रहता है।

4. जमे हुए खाद्य पदार्थ (Frozen foods): जमे हुए खाद्य पदार्थ केवल उतनी ही मात्रा में खरीदने चाहिए जितनी मात्रा में उन्हें घर पर सुरक्षित फ्रीज में रखा जा सके। इन्हें अधिक समय तक नहीं रखना चाहिए। क्रय करने के तुरत बाद ही प्रयोग में लाने तक इन्हें इसी जमी हुई दशा में रखनी चाहिए। एक बार जमे हए पदार्थ को बाहर निकालने पर प्रयोग कर लेना चाहिए क्योंकि यह कमरे के तापमान पर शीघ्र ही नष्ट होने लगते हैं। हमारे देश में कम साधनों की उपलब्धि के कारण इनका प्रचलन बहुत कम है।

सुविधा वाले खाद्य पदार्थों का संग्रह (Storage): सुविधा वाले खाद्य पदार्थों को खरीदने के पश्चात् उनका संग्रह करना भी आवश्यक है। डबल रोटी तथा सेंके हुए पदार्थों को अधिक समय के लिए संग्रह नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें उपस्थित नमी के कारण इनके खराब होने का भय बना रहता है। जहाँ तक सम्भव हो इन्हें ताजा खरीदकर ही प्रयोग करना चाहिए। यदि इन्हें संग्रह करना पड़े तो किसी चीज में भली प्रकार लपेट कर किसी ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। डबल रोटी का मिट्टी या चीनी-मिट्टी के बर्तन में रखना चाहिए। धातु के बर्तन में रखने से रोटी पसीजकर धातु की दुर्गन्ध से युक्त हो जाती है।

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बर्तन के ऊपर हवादार ढक्कन होना चाहिए. ताकि उसे मक्खियों से बचाया जा सके। पापड़, चिप्स तथा अन्य सूखे हुए पदार्थों या मिश्रणों को पालीथिन के पैकेटों में किसी साफ स्थान पर रखना चाहिए। इन्हें आवश्यकता से बहुत अधिक मात्रा में नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इनके खराब होने का भय रहता है। डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थों को फ्रिज में रखना चाहिए तथा एक बार खोलने के पश्चात् इन्हें शीघ्र ही प्रयोग कर लेना चाहिए। जमे हुए खाद्य पदार्थों को जमे हुए रूप में ही संगृहीत करना चाहिए। यदि इन्हें जमी हुई स्थिति में न रखा जा सके तो शीघ्र ही इनका प्रयोग कर लेना आवश्यक है। इन खाद्य पदार्थों को खरीदने की तिथि इन पर लिख देनी चाहिए तथा इनका निरीक्षण करते रहना चाहिए। खराब होने से पूर्व इनका उपयोग कर लेना चाहिए।

प्रश्न 5.
खाद्य संदूषण को प्रभावित करने वाले कारकों को विस्तारपूर्वक समझाइए। [B.M.2009A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थ जीवाणुओं तथा उनमें उपस्थित एन्जाइमों के कारण संदूषित होते हैं। खाद्य पदार्थ में तथा उसके आस-पास के वातावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तन उसे दूषित करते हैं। खाद्य पदार्थों को बाह्य चोट भी उनके खराब होने का एक कारण है। खाद्य पदार्थों : को संदूषित करने वाले कारकों की सूची बना सकते है सूची निम्न है –

  • जीवाणु तथा एन्जाइमों की उपस्थिति।
  • रासायनिक क्रियाएँ।
  • बाह्य चोट।
  • चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा नुकसान या अजैविक संदूषण।

1. जीवाणु तथा एन्जाइमों द्वारा संदूषण (Bacterial / Enzymatic Spoilage): कुछ जावाण तो खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूस से ही पाये जाते हैं और कुछ फसल कटने, यातायात, सग्रहण, हम्तन व पकाने के समय खाद्य पदार्थों में प्रवेश कर जाते हैं। ये जीवाणु हैं बैक्टीरिया, उत्प्रेरक, खमीर, फफूंदी आदि। जैव प्रक्रियाओं में कुछ मात्रा में एन्जाइम की उत्पत्ति होती है।

कुछ बैक्टीरिया औरों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ते हैं। जल्द ही इनकी संख्या भोज्य पदार्थ में अत्यधिक बढ़ जाती है। अधिकतर बैक्टीरिया कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों में ही अपने नए वातावरण में पूर्ण रूप से ढल जाते हैं। इसलिए आपको यह निश्चित कर लेना चाहिए कि खरीदे हुए खाद्य पदार्थ को चार घंटों में ही खाने से पहले गर्म करना है या ठंडा।

एन्जाइम खाद्य पदार्थों का अभिन्न अंग है। हम जानते हैं कि टमाटर/आम का पकना एन्जाइम के कारण ही होता है। एन्जाइम क्रियाशील होने पर खाद्य पदार्थ के रंग, स्वाद, सुगंध व रचना में परिवर्तन आने लगते हैं। इनके अधिक समय तक क्रियाशील रहने पर खाद्य पदार्थ अत्यधिक पक कर सड़ने लगते हैं। एन्जाइम क्रिया द्वारा लाए गए इच्छित परिवर्तन ‘सकारात्मक’ कहलाते हैं जबकि अनैच्छिक परिवर्तन जिससे भोज्य पदार्थ सड़ने लगते हैं ‘नकारात्मक’ कहलाते हैं।

2. रासायनिक व जैव-रासायनिक संदूषण (Chemical/Biochemical Spoilage): कीटनाशकों, रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से भी खाद्य पदार्थों में संदूषण हो सकता है। जबकि जैव-रासायनिक संदूषण; जीवाणुओं द्वारा उत्पादित विष तथा उनकी जैव-क्रियाओं के अवशेषों द्वारा उत्पन्न होता है।

3. बाह्य चोट द्वारा खाद्य पदार्थों में संदूषण-प्रकृति ने खाद्य पदार्थों को सुरक्षा कवच प्रदान किए हैं। ये हमारी त्वचा की भाँति ही कार्य करते हैं। आहार हस्तन के गलत तरीकों से ये कवच खराब हो जाते हैं। साथ ही बाह्य चोट खाद्य पदार्थ की रचना तथा दिखावट पर भी प्रभाव डालती है। इससे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होते हैं तथा उनका क्रय मूल्य भी कम होता जाता है।

4. चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा अजैविक खाद्य संदूषण (Rats, Insects, Non Biological Spoilage of food): चूहे फसलों को अत्यधिक नुकसान पहुंचाते हैं। चूहों के मल-मूत्र से होने वाले संक्रमण को “स्पाइरोचीटल संक्रमण” कहते हैं। कीड़े अनाज में छेद करके उसके कार्बोज को खा जाते हैं। इन छेद वाले दानों में से बदबू-सी आने लगती है और यह खाने के योग्य नहीं होते। झींगुरों के लार से अनाज के दाने चिपके हुए-से दिखाई देते हैं। इनसे अनाज में बदबू पैदा हो जाती है। चूहे, कीड़े व झींगुर खाद्य फसलों को प्रति वर्ष काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

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प्रश्न 6.
संदूषण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ (Situations helping in food spoilage) कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:
संदूषण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं –
1. जैविक खाद्य पदार्थ
2. अनुरूप तापमान
3. नमी/पानी
4. हवा और
5. अनुरूप pH

1. जैविक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Biological Foods): सभी जीवित प्राणियों की भाँति जीवाणुओं को भी जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। बैक्टीरिया सूक्ष्म-जीव होते हैं, इसलिए उन्हें बहुत थोड़ा भोजन चाहिए। थोड़ा-बहुत प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट, चाकू के किनारे पर लगा खाद्य पदार्थ, सब्जी काटने के बोर्ड पर अथवा डिब्बों के किनारों पर थोड़ा बहुत लगा खाद्य पदार्थ उनके लिए दावत के समान हैं। इसलिए खाद्यं पदार्थों के संपर्क में आने वाले सभी उपकरण अच्छी तरह से साफ होने चाहिए। साथ ही खाद्य संग्रहण तथा खाद्य हस्तन स्वच्छता के नियमों के अनुसार ही करना चाहिए।

2. अनुरूप तापमान (Favourable Temperature): विभिन्न बैक्टीरिया की वृद्धि के लिए अलग-अलग तापमान की आवश्यकता होती है। साइक्रोफिलिक (Psychrophilic) बैक्टीरिया शीतल तापमान पर बढ़ते हैं। माइक्रोफिलिक (Microphilic) बैक्टीरिया हमारे सामान्य तापमान पर बढ़ते हैं। गर्मी पसंद करने वाले बैक्टीरिया को थर्मोफिलिक (Thermophilic) कहते हैं, क्योंकि ये अत्यधिक गर्म तापमान लगभग 140°F तक सह सकते हैं, खाद्य पदार्थों को संदूषित करने वाले बैक्टीरिया अधिकतर 70°F-80°F में वृद्धि करते हैं। यदि खाद्य पदार्थ में बैक्टीरिया की. संख्या व तापमान कम है तो वह अधिक समय तक रखा जा सकता है। खाद्य पदार्थ जितने समय के लिए स्वादिष्ट व खाने योग्य (फसल कटने के समय से लेकर, सुरक्षित करने के बाद खाने तक) रहते हैं, उसे उसकी ‘शैल्फ लाइफ’ कहते हैं।

3. नमी, पानी की उपलब्धता (Moist/Water Availability): सभी जीवित पदार्थों के जीवन के लिए पानी की आवश्यकता होती है। ताजे खाद्य पदार्थों में अधिक नमी होती है जो जीवाणुओं की वृद्धि में सहायता करती है। जीवाणु में एन्जाइम उसकी कोशिका से निकलकर खाद्य पदार्थ से मिलकर फिर वापस कोशिका में आ जाते हैं।

यह प्रक्रिया निरन्तर जीवाणुओं की वृद्धि के साथ-साथ चलती रहती है। दुग्ध पाउडर, सूप-पाउडर, व सूखे अनाज देर तक खाने योग्य रहते हैं क्योंकि उनमें कुछ सूक्ष्म जीव तो हैं किन्तु उनमें नमी जो कि इसे सूक्ष्म जीवों की वृद्धि में सहायक है, नहीं होती। इसी प्रकार अचार व जैम में नमक व चीनी डालने से सूक्ष्मजीवियों को नमी नहीं मिल पाती और उनकी वृद्धि नहीं होती।

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4. हवा की उपलब्धता (Availability of Air): हवा सभी जीवों के जीवन का अभिन्न अंग है। सूक्ष्म जीवों को अपनी वृद्धि के लिए वायु की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें हवा न मिले तो उनकी प्रक्रिया धीमी हो जाती है। बोतल बंद, डिब्बा बंद व बाँधे हुए खाद्य पदार्थों में हवा प्रवेश नहीं कर पाती, किंतु कुछ अत्यधिक विषाक्त जीवाणु बिना हवा के भी जीवित रह सकते और इनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

5. अनुरूप खाद्य pH की उपलब्धता (Availability of Required pH): खाद्य पदार्थों में pH खाद्य संदूषण को प्रभावित करती है। pH पदार्थों की अम्लता व क्षारता को बताती है। pH-7 होने का तात्पर्य है कि खाद्य पदार्थ उदासीन है। अधिक जीवाणु उन खाद्य पदार्थों को संदूषित करते हैं जिनके माध्यम pH-7 के आसपास हो, जैसे प्रोटीन व मांसाहारी खाद्य पदार्थ, नींबू का रस, सिरका, खटाई इत्यादि खाद्य पदार्थ pH को कम करते हैं तथा उन खाद्य पदार्थों को संदूषण से बचाते हैं। खमीर कम pH वाले खाद्य पदार्थों पर हमला करते हैं जिनमें चीनी होती है, जैसे जैम आदि। ये चीनी से जीवित रहने के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं और उसे एल्कोहल व.CO2 में बदल देते हैं। खमीर के इस गुण को शराब बनाने के उद्योग में भरपूर प्रयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 7.
भोजन पकाने की विधियों का उल्लेख करते हुए उनके लाभ-हानि बताइए।
उत्तर:
भोजन पकाने की विधियाँ (Methods of food preparation): भोजन पकाने के लिए कई विभिन्न प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु सभी विधियों में ताप की आवश्यकता होती है।
पकाने के माध्यम के आधार पर इन विधियों को हम दो मुख्य भागों में बांटते है –

  1. आई ताप द्वारा पकाना (Moist Heat)।
  2. शुष्क ताप द्वारा पकाना (Dry Heat)।

1.आर्द्र ताप द्वारा पकाना-आई ताप द्वारा पकाने के लिए माध्यम के रूप में जल का प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग के अन्तर्गत निम्न विधियाँ आती हैं
(a) उबालना (Boiling)
(b) भाप से पकाना (Steaming)।
(c) धीमी आग पर पकाना या स्टूयिंग (Stewing)

(a) उबालना-इस विधि में खाद्य पदार्थ को जल के सीधे सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है। यह भोजन पकाने की सरल विधि है। पकाने की विधि-किसी बर्तन में जल लेकर उसमें खाद्य पदार्थ डालकर, आग पर रखकर तब तक उबाला जाता है, जब तक गल न जाए। उबालने की विधि में ताप 100° सेंटीग्रेड या 212° फारेनहाइट होना चाहिए। पानी गर्म होने पर जब उसकी सतह पर बुलबुले उठने लगे तो समझना चाहिए कि पानी में उबाल आने लगा है। जब पानी उबलने लगे तो आग धीमी कर देनी चाहिए और खाद्य पदार्थ के गलने पर आग बन्द कर देनी चाहिए।

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उबालने के लाभ (Advantages of Boiling): खाद्य पदार्थ को उबाल कर पकाने से निम्न लाभ हैं –
1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना (Easy to digest): पानी में उबाला गया खाद्य पदार्थ गलने पर सुपाच्य हो जाता है। यह आसानी से पक जाता है तथा रोगियों के लिए विशेषकर श्रेष्ठ समझा जाता है।
2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना (Making the food Nutritious): यदि उबालने की विधि का ठीक ढंग से प्रयोग किया जाए तो खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है।

उबालने से हानियाँ (Losses due to Boiling):
खाद्य पदार्थों को जहाँ उबालकर पकाने से लाभ हैं, वहाँ कुछ हानियाँ भी हैं –

1. खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता में कमी होना (Loss of nutritive value of foods): खाद्य पदार्थों को उबालने से उनके कुछ पोषक तत्त्व, स्वाद एवं सुगन्ध जल में आ जाते हैं जिससे खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनाए रखने के लिए उन्हें छिलकों सहित पर्याप्त जल में ही उबालना चाहिए तथा जिस जल में यह उबाले जाएँ उसे सूप बनाने, आटा गूंथने आदि के काम में लाना चाहिए।

उबालने की विधि से खाद्य पदार्थ में उपस्थित जल में घुलनशील विटामिन जैसे बी समूह के विटामिन और विटामिन सी तथा कुछ खनिज लवपानी में आ जाते हैं तथा इस पानी को फेंक देने से ये पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता को बनाए रखने के लिए उबालते समय उसे ढंककर रखना चाहिए। ढंककर पकाने से उबालने की विधि में कम समय लगता है तथा पानी कम सूखता है।

2. खाद्य पदार्थ का रंग नष्ट होना (Loss of colour of food): उबालने की विधि में कुछ मात्रा में खाद्य पदार्थों का रंग भी नष्ट हो जाता है। विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों को ढंककर पर्याप्त जल में पकाने से उनका रंग कम नष्ट होता है। उबालने की विधि द्वारा चावल, दालें, सब्जियाँ, सूप आदि बनाए जाते हैं।

(b) भाप से पकाना (Steaming): इस विधि में जल के स्थान पर पकाने का कार्य भाप के माध्यम से किया जाता है। इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ को पकाने में समय अधिक लगता है परन्तु खाद्य पदार्थ अधिक सुपाच्य एवं हल्का हो जाता है तथा उसमें उपस्थित पोषक तत्त्व कम मात्रा में नष्ट होते हैं । इस विधि द्वारा पकाया हुआ भोजन रोगियों के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है। भाप द्वारा पकाने की विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है। भाप द्वारा खाद्य पदार्थों को तीन विधियों द्वारा पकाया जाता है

  1. प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Direct Steaming)
  2. अप्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Indirect Steaming)
  3. 9474 o Gala GRT 400191 (Pressure Steaming)

1. प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Direct Steaming): इस विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के सीधे सम्पर्क से पकाया जाता है। विधि-किसी बर्तन में पानी उबाला जाता है तथा उस पर छलनी में खाद्य पदार्थों को रखकर बर्तन को ढक्कन से ढंक देते हैं। पानी से भाप निकलकर छलनी के छिद्रों द्वारा खाद्य पदार्थ के सम्पर्क में आती है और वह खाद्य पदार्थ पक जाता है। यदि जाली न हो तो किसी पतले कपड़े में खाद्य पदार्थों को बाँधकर बर्तन में लटकाया जा सकता है।

बाजार में कुछ विशेष प्रकार के स्टीमर भी मिलते हैं। इसमें ढक्कनदार बर्तन होता है तथा ढक्कन में जालीदार थाली सी लगी होती है। जिस पर खाद्य पदार्थों को रखकर पकाया जाता है। कई स्टीमर में दो या अधिक जाली भी होती है जिससे उनमें एक ही समय में एक साथ दो या तीन खाद्य पदार्थों को.पकाया जा सकता है। भाप के सीधे सम्पर्क में आने के कारण इन खाद्य पदार्थों में से जल में घुलनशील विटामिन बी तथा सी नष्ट हो जाते हैं।

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2. अप्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Indirect Steaming): इस विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के सीधे सम्पर्क में नहीं लाया जाता है। विधि-किसी बर्तन में पानी को उबालने के लिए आग पर रखते हैं। किसी अन्य छोटे बर्तन में खाद्य पदार्थ को रखकर उस बड़े बर्तन में रख दिया जाता है तथा ढक्कन बन्द कर देते हैं। पानी द्वारा बनी भाप छोटे बर्तन में रखे पदार्थों को गर्म करती है तथा पदार्थ अपने जलांश द्वारा पक जाते हैं।

उदाहरण के लिए कस्टर्ड या पुडिंग बनाते समय दूध, अण्डे आदि के मिश्रण को छोटे बर्तन में रखकर इस बर्तन का मुंह ढक्कन या बटर पेपर (Butter Paper) से भली प्रकार बन्द करके किसी पानी से भरे बर्तन में रख देते हैं तथा इस पानी को उबालते हैं और दूध का मिश्रण पक जाता है। इस विधि में क्योंकि खाद्य पदार्थ केवल अपने जलांश द्वारा ही पकता है तथा पानी या भाप के सम्पर्क में नहीं आता है, अतः इनमें से विटामिन और खनिज लवण बहुत कम मात्रा में नष्ट होते हैं।

3. भाप के दबाव द्वारा पकाना (Pressure Steaming): इस विधि में भाप द्वारा बने दबाव की सहायता से खाद्य पदार्थ को पकाया जाता है। दबाव में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ ताप में भी बढ़ोतरी आ जाती है। कई बार किसी खाद्य पदार्थ को जल्दी उबालने के लिए बर्तन के ढक्कन पर कोई भारी वस्तु रखकर दबाव को अधिक किया जाता है जिससे पानी से बनी भाप बाहर न निकलने के कारण अन्दर दबाव अधिक कर देती है जिससे ताप अधिक हो जाता है और वह खाद्य पदार्थ जल्दी पक जाता है।

आजकल भाप के दबाव द्वारा पकाने के लिए प्रेशर कूकर (Pressure Cooker): का प्रयोग किया जाता है। प्रेशर कूकर का ढक्कन बाहर नहीं निकला होता है जिससे भाप अन्दर दबाव को बढ़ाती है जिससे खाद्य पदार्थ जल्दी पक जाता है। प्रेशर कूकर में विभिन्न खाद्य पदार्थों को उनकी क्षमता के अनुसार भिन्न-भिन्न दबाव पर पकाया जाता है।

इसमें 5, 10 और 15 पौंड दबाव किया जा सकता है। 15 पौंड के दबाव पर प्रेशर कूकर के अन्दर का ताप लगभग 250° फारेनहाइट होता है। यह देखा गया है कि प्रत्येक 20 फारेनहाइट ताप की वृद्धि करने पर खाद्य पदार्थ पकाने का समय लगभग आधा हो जाता है। इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते हैं।

भाप द्वारा पकाने के लाभ (Advantages of Boiling):
भाप द्वारा पकाने के कई लाभ हैं:
1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना (Making the food easy to digest): भाप द्वारा पकाया गया भोजन हल्का एवं सुपाच्य होता है। यही कारण है कि रोगियों एवं वृद्धों के लिए भोजन पकाने की इस विधि का प्रयोग किया जाता है।
2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना (Making the food stuff Nutritious): इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन के पोषक तन्व नष्ट नहीं होते और खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है विशेषकर अप्रत्यक्ष भाप द्वारा पकाने एवं भाप के दबाव द्वारा पकाने की विधि सर्वोत्तम मानी जाती है।
3. ईंधन की बचत (Saving of fuel): भाप के दबाव द्वारा पकाने से भोजन शीघ्र बन जाता है तथा ईंधन की बचत होती है।
4. खाद्य पदार्थ के रंग व रूप में परिवर्तन न होना: खाद्य पदार्थ का रंग व रूप वैसा ही बना रहता है।

(C) धीमी आग पर पकाना या स्टूयिंग (Cooking slow heat or stewing): इस विधि में खाद्य पदार्थ को जल के सीधे सम्पर्क से पकाया जाता है।

विधि: जिस खाद्य पदार्थ को स्टूय बनाना हो, उसे छीलकर उसके बारीक-बारीक टुकड़े करके किसी बर्तन में लेकर इतना पानी डालें कि खाद्य पदार्थ भली प्रकार पक जाए । फिर इसे धीमी-धीमी आग पर खाद्य पदार्थ को गलने तक पकाते रहें। उदाहरण के लिए सेब का स्ट्रय बनाने के लिए सेब को छीलकर उसके बारीक-बारीक टुकड़े काट कर उसमें पर्याप्त मात्रा में पानी डाल कर और थोड़ी-सी चीनी डालकर धीमी-धीमी आग पर पकाते रहें। जब सेब गल जाए तो उसे उसमें उपस्थित पानी-रसे के साथ ही परोसें।

स्टूयिंग करने से लाभ (Advantages of Stewing):

  1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना-इस विधि से चूँकि खाद्य पदार्थ धीमी-धीमी आग पर अधिक समय के लिए पकाते हैं, अतः वह सुपाच्य हो जाता है।
  2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना-खाद्य पदार्थ जिस पानी में पकाया जाता है, उसे साथ ही परोस देते हैं। अत: खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है।
  3. श्रम की बचत-इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ पकाने से श्रम कम लगता है तथा खाद्य पदार्थ के जलने का भय नहीं होता है।
  4. ईंधन की बचत-धीमी-धीमी आग पर पकाने के कारण ईंधन की बचत होती है।

स्टूयिंग से हानियाँ (Disadvantages of Stewing) :
1. अधिक समय लगना-इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ बहुत धीमी-धीमी आग पर पकाया जाता है जिससे समय अधिक लगता है।
2. दाँतों का कम कार्य-इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन को खाने के लिए दाँतों को कम कार्य करना पड़ता है। अतः दाँतों के काटने की क्रिया एवं लार रस द्वारा आशिक पाचन की कमी रहती है।

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2. शुष्क ताप द्वारा पकाना (Dry Heat): शुष्क ताप द्वारा पकाने के लिए माध्यम के रूप में वायु एवं चिकनाई का प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग के अन्तर्गत निम्न विधियाँ आती हैं
(क) वायु को माध्यम के रूप में प्रयोग करके निम्न विधियों का प्रयोग करते हैं –

  • भूनना (Roasting)
  • अंगीठी पर भूनना (Grilling)
  • सेंकना (Baking)

(ख) चिकनाई को माध्यम के रूप में प्रयोग करके निम्न विधियों का प्रयोग करते हैं
तलना (Frying):
यह दो प्रकार की होती है:

  • उथली विधि (Shallow frying)
  • गहरी विधि (Deep frying)

(क) वायु को माध्यम के रूप में प्रयोग करना :
1. भूनना (Roasting): इस विधि में खाद्य पदार्थ सीधा आग के सम्पर्क में नहीं आता है, शुष्क गर्म वायु माध्यम का कार्य करती है। भूनने की विधि में खाद्य पदार्थ को गर्म रेत या राख में दबा दिया जाता है। इस विधि द्वारा आलू, शकरकंद, मूंगफली, अरबी आदि भूने जाते हैं। रेत को भट्टी में गर्म करके या अंगीठी के नीचे जो गर्म-गर्म राख निकलती है उसमें खाद्य पदार्थ को दबाकर भूना जाता है। इस विधि द्वारा भोजन छिलकों सहित पकाना चाहिए तथा भूनने के पश्चात् उसे साफ करके छिलका अलग कर देना चाहिए।

भूनने से लाभ (Advantages of Roasting) :
खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना-जब खाद्य पदार्थ छिलके सहित भूना जाता है तो उसकी पौष्टिकता बनी रहती है और कोई भी पोषक तत्त्व बाहर नहीं निकलता है।

भूनने से हानियाँ-(Disadvantage of Roasting):

  1. कई बार खाद्य पदार्थ अधिक गर्म रेत या राख के कारण जल जाता है।
  2. यदि रेत या राख गर्म न हो तो खाद्य पदार्थ कच्चे रहने की सम्भावना रहती है।
  3. यदि खाद्य पदार्थ को बराबर उल्टा-पुल्टा न जाए तो वह कहीं से कच्चा और कहीं से पक जाता है।

2. अंगीठी पर भूनना (Grilling): इस विधि में खाद्य पदार्थ को आग के सीधे सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है तथा शुष्क वायु ही माध्यम का कार्य करती है। जिस खाद्य पदार्थ को ग्रिलिंग द्वारा पकाना हो उसे आग पर रख दिया जाता है तथा उसे थोड़े-थोड़े समय के बाद उलटते-पलटते रहते हैं जिससे वह चारों ओर से बराबर-बराबर पक जाए।

साबुत खाद्य पदार्थों को ग्रिल करने के लिए उन पर थोड़ा सा घी या तेल लगा देते हैं जिससे वह एकदम जले नहीं और उनका रंग बना रहे। ग्रिलिंग करने के लिए एक विशेष प्रकार का उपकरण जिसे ग्रिल कहते हैं, का प्रयोग किया जाता है। ग्रिल में खाद्य पदार्थ रखने से पहले इसके चारों ओर चिकनाई लगा देते हैं जिससे खाद्य पदार्थ इन पर नहीं चिपके। ग्रिल को उलटने-पलटने के लिए इन पर हत्थे लगे होते हैं।

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बैंगन, मछली, मुर्गी आदि खुली आग पर भूने जाते हैं। सींक कबाब बनाने के लिए मांस के तैयार मिश्रण को सींक में पिरोकर घी लगाकर खुली आग पर भूना जाता है। खुली आग पर भूनने के लिए भी खाद्य पदार्थ को छिलका सहित भूनना चाहिए अन्यथा पौष्टिक तत्त्व काफी मात्रा में नष्ट हो जाते हैं। इस विधि द्वारा पकाने से लाभ और हानियाँ भूनने की विधि से होने वाले लाभ और हानियों जैसी हैं।

3. सेंकना (Baking): इस विधि से भी पकाने के लिए माध्यम के रूप में शुष्क वायु का प्रयोग किया जाता है। सेंकने के लिए तन्दूर या भट्टी का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में गर्म वायु से पूरी भट्टी का तापक्रम एक-सा हो जाता है। किसी भी पदार्थ को लेकर उसे गर्म भट्टी में रख देते हैं और भट्टी का मुँह बन्द कर देते हैं। वायु गर्म होकर खाद्य पदार्थ के चारों ओर घूमती है और उसे पका देती है।

इस विधि द्वारा केक, पेस्ट्री, बिस्कुट, नानखटाई, डबल रोटी आदि बनाये जाते हैं। साधारणतया भट्टी का तापमान 250° फारेनहाइट से लेकर 500° फारेनहाइट का होता है तथा प्रत्येक खाद्य पदार्थ को पकाने के लिए अलग-अलग ताप उचित रहता है। आजकल बिजली की भट्टी (Electric Oven) भी बाजार में उपलब्ध हैं जिनमें तापमान को आवश्यकतानुसार नियन्त्रित किया जा सकता है।

सेंकने के लाभ (Advantages of Baking) :
1. भोजन हल्का व सुपाच्य हो जाता है।
2. इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन स्वादिष्ट होते हैं।

सेंकने से हानियाँ (Disadvantages of Baking): कई बार भट्टी का तापमान बहुत अधिक होने पर खाद्य पदार्थ ऊपर से तो बना हुआ प्रतीत होता है परन्तु अन्दर से कच्चा रह जाता है।

(ख) चिकनाई को माध्यम के रूप में प्रयोग करना :
तलना-तलने की विधि से खाद्य पदार्थ के पकाने का प्रमुख माध्यम कोई भी स्निग्ध पदार्थ होता है। अधिकतर घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। इससे भोजन अन्य विधियों की अपेक्षा शीघ्रता से बनता है। स्निग्ध पदार्थ को गर्म करके उसमें खाद्य पदार्थ डाला जाता है जिससे खाद्य पदार्थ की ऊपरी परतें कड़ी हो जाती हैं और ताप के कारण वह भीतर से भी पक जाता है।

तलने के लिए मुख्यतः दो विधियों का प्रयोग करते हैं –
1. उथली विधि
2.  गहरी विधि।

1. उथली विधि (Shallow frying): इस विधि में खाद्य पदार्थ को कम घी या तेल में तला जाता है। किसी भी गहरे बर्तन जैसे तवे, फ्राइंग पैन (Frying pan) आदि में घी या तेल गर्म करके उनमें खाद्य पदार्थ डालकर पकाते हैं। जब खाद्य पदार्थ एक तरफ से पक जाता है तो उसे पलट कर दूसरी तरफ से पकाते हैं। इसमें घी या तेल उतनी ही मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं जितना कि आसानी से सोख सकें। घी व चिकनाई के कारण खाद्य पदार्थ बर्तन से चिपकता नहीं है। इस विधि द्वारा पराठे, पूड़ी डोसा आदि पकाये जाते हैं।

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2. गहरी विधि (Deep-frying): इस विधि में पर्याप्त मात्रा में घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रायः कड़ाही का प्रयोग किया जाता है। जब वह एक तरफ से पक जाता है तो झरनी या पोनी की सहायता से उले पलट देते हैं और दूसरी तरफ से भी पका लेते हैं। तलने के लिए घी का उचित ताप होना आवश्यक है क्योंकि कम ताप पर तलने से, खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में वसा सोख लेता है और देर में पकता है तथा अधिक ताप पर तलने से पदार्थ जल जाता है और वसा भी जल जाती है।

तलने के लाभ (Advantages of frying) :

  • खाद्य पदार्थ बहुत शीघ्र पक जाता है।
  • खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट हो जाता है।
  • खाद्य पदार्थ से पोषक तत्त्व कम मात्रा में बाहर निकलते हैं।

तलने से हानियाँ (Disadvantages of frying):

  • खाद्य पदार्थ में वसा होने के कारण वह शीघ्र नहीं पचता अर्थात् भारी हो जाता है।
  • खाद्य पदार्थ की ऊपरी परत कड़ी हो जाती है।
  • तले खाद्य पदार्थ रोगियों एवं बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।
  • इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ महंगे पड़ते हैं।

प्रश्न 8.
खाद्य परिरक्षण की विधियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:
परिरक्षण की घरेलू विधियों द्वारा खाद्य पदार्थों को छोटे पैमाने पर परिवार में प्रयोग के लिए परिरक्षित किया जा सकता है। गृह विज्ञान के छात्र प्रयोगशाला में इन विधियों को सीख सकते हैं। व्यावसायिक पैमाने पर खाद्य पदार्थों की बड़ी मात्रा को सुव्यवस्थित व उचित उपकरणों से लैस फैक्ट्रियों में परिरक्षित किया जा सकता है। व्यावसायिक तौर पर परिरक्षण का प्रयोग मुनाफा पाने के लिए किया जाता है। वह उद्योग/फैक्ट्रियाँ खाद्य कानूनों व योग्य संस्थाओं के नियमों से . बाध्य होती हैं। – परिरक्षण के नियम घरेलू व व्यावसायिक क्षेत्र में एक समान रहते हैं।

1. विसंक्रमण (Asepsis): विसंक्रमण का अर्थ है उन परिस्थितियों को हटाना जो खाद्य पदार्थ के संदूषण में सहायता करती हैं। यह अत्यावश्यक है कि खाद्य पदार्थ को फसल काटने से लेकर, एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने, संग्रह करने, पकाने तथा अंततः खाने तक सुरक्षित रखा जाए। स्वच्छ वातावरण तथा साफ-सुथरे खाद्य हस्तन से खाद्य संदूषण को न्यूनतम किया जा सकता है। जीवाणु संख्या में कमी लाकर खाद्य पदार्थ को लंबे समय तक परिरक्षित किया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रयुक्त परिरक्षण का नियम निम्नलिखित है-सूक्ष्मजीवियों को हटाना।

2. छीलना, पकाना तथा कीटाणु हनन (Peeking, Cooling & Disinsecting): खाद्य पदार्थ को उबलते पानी में थोड़ी देर तक रखकर उनके एन्जाइम निष्क्रिय किये जाते हैं। इससे एन्जाइमों की क्रियाशीलता को कम करके खाद्य पदार्थ को खराब होने से बचाया जाता है। इस. प्रक्रिया में ‘एन्जाइमों की निष्क्रियता’ का नियम प्रयोग में लाया जाता है। खाना पकाने की सूखी व गीली विधियों से कुछ जीवाणु को नष्ट किया जा सकता है। पके हुए खाद्य पदार्थ की सुरक्षा उन्हें पकाते समय के तापमान व पकाने की अवधि पर निर्भर करती है। अधिक तापमान पर लम्बे समय तक पकाने से जीवाणु संख्या में काफी कमी लाई जा सकती है।

यह परिरक्षण की ‘जीवाणुनाशक’ विधि है। कीटाणु हनन का अर्थ है सभी एन्जाइमों, सूक्ष्मजीवियों व उनके अंडों का हनन। यह घर में प्रेशर कूकर में भोजन पकाने से संभव हो सकती है। क्या आप प्रेशर कूकर में पकाने की विधि जानती हैं ? व्यावसायिक स्तर पर आवों के प्रयोग से कीटाणु हनन किया जाता है। इस प्रकार के खाद्य पदार्थ सूक्ष्मजीवियों से पूर्णतः मुक्त होते हैं।

3. स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्य हस्तन (Handling of clean & healthy food): यह परिरक्षण की एक प्रक्रिया ही नहीं अपितु खाद्य हस्तन की आवश्यकता भी है। खाद्य पदार्थ से संबंधित व्यक्तिगत स्वच्छता. रसोईघर एवं सभी उपकरण साफ एवं स्वच्छ होने चाहि ताकि सूक्ष्मजीवी आदि भोजन के संपर्क में आकर उसे संदूषित न कर पाएँ। हम जानते हैं कि विसंक्रमित परिस्थितियाँ खाद्य परिरक्षण की नीव हैं।

4. ठंडा करना (Refrigeration): यह खाद्य पदार्थों को कम तापमान पर रखकर परिरक्षित करने की प्रक्रिया है। जीवाणु एवं एन्जाइमों की क्रियाशीलता कम तापमान पर धीमी होती है। यह खाद्य परिरक्षण में ऊष्मा कम करने का नियम है जो क्रियाशीलता में आवश्यक है। विभिन्न प्रकार के रेफ्रीजरेटर व गहरे फ्रीजर जो तापमान को निश्चित करते हैं, बाजार में उपलब्ध हैं। शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ फ्रीजर में रखने चाहिए। पकाया हुआ खाना सदैव ढंककर फ्रिज की ऊपरी शेल्फों पर रखना चाहिए।

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ताजे फल एवं सब्जियाँ ‘फ्रिज बैग’ में रखने चाहिए जो उनकी नमी व ताजगी बनाए रखते हैं। फ्रिज में अत्यधिक सामान नहीं रखना चाहिए। ठंडी शीतल हवा यदि फ्रिज में घूमती है तो खाद्य पदार्थ लम्बे समय तक ताजा रखा जा सकता है। गाँवों में लोग खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक परिरक्षित रखने के लिए वे खाद्य पदार्थों को गीले कट्टों में या बर्फ की पेटी में तथा ठंडे स्थान पर रखकर थोड़े समय के लिए परिरक्षित रखते हैं।

5. सुखाना (Drying): इस प्रक्रिया में खाद्य पदार्थ की नमी को हटाया जाता है। सदियों से खाद्य पदार्थों को धूप में रखकर परिरक्षित किया जाता रहा है। विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ, मटर, मछली, टमाटर, आडू आदि को वर्षों से सुखाया जाता रहा है, किन्तु आजकल हम खाद्य पदार्थों को कम समय में निश्चित परिस्थितियों व नवीनतम तकनीकों से सुखा सकते हैं।

इस प्रकार सुखाए गए खाद्य पदार्थ का रंग, स्वाद, सुगंध व पोषण मूल्य नष्ट नहीं होते। खाद्य पदार्थों को अपूर्ण रूप से भी सुखाया जा सकता है, जैसे खोआ, कंडेंस्ड दूध, टमाटर की प्यूरी आदि। अपूर्ण रूप से सुखाये गए खाद्य पदार्थों में नमक/चीनी की मात्रा अधिक होगी। इस माध्यम से सूक्ष्मजीवी क्रियाशील नहीं हो पाते। इस प्रक्रिया में प्रयुक्त परिरक्षण का यह नियम है, नमी/पानी को हटाना।

6. पैकिंग, डिब्बा बंद व बोतल बंद करना (Packing and Canning): इन प्रक्रियाओं से सूक्ष्मजीवियों को हवा उपलब्ध नहीं होती। घरेलू तौर पर हवा बंद डिब्बों में रखे खाद्य पदार्थों का संदूषण न्यूनतम होता है। व्यावसायिक पैमाने पर हवा की उपलब्धता कम करने के अनेक उपाय हैं। किन्तु हवा के बिना जीवित रहने वाले जीवाणुओं से डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ विषाक्त हो सकते हैं। नई तकनीकों द्वारा पैक किए गए खाद्य पदार्थों में हवा के स्थान पर अप्रवृत गैसें भरी जाती हैं।

7. pH को बदलने के लिए रसायनों का प्रयोग:

1. अचार बनाना (Pickles): खट्टे-मीठे स्वाद के अचार व चटनियाँ बनाना भारतीय घरों में प्रचलित है। अचार तेल या तेल के बिना भी बनाए जा सकते हैं। खाद्य पदार्थ पर तेल की सतह उसमें हवा का आवागमन रोक देती है। अम्लीय खाद्य पदार्थों, जैसे आम, नीबू आदि के अचार बनाए जा सकते हैं। सिरका, नींबू का रस, सिट्रिक एसिड व एसिटिक एसिड का प्रयोग सब्जियों का अचार बनाने में किया जाता है।

अचार बनाते समय, पिसी हुई राई के प्रयोग से, खमीरीकरण की प्रक्रिया से अम्लता बढ़ जाती है। अम्लीय खाद्य पदार्थों की pH कम होने के कारण ये देर तक खराब नहीं होते। अचार व चटनियों में नमक प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त होता है। यह जीवाणुओं तक नहीं पहुंचने देता। अचार व चटनियों में मसालों के प्रयोग से विसंक्रमण किया जाता है। अचार खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक परिरक्षित रख सकते हैं, क्योंकि इसमें परिरक्षण के विभिन्न नियमों का प्रयोग करते हैं। ये नियम हैं

(क) नमक का प्रयोग – आर्द्रता हटाना
(ख) अम्लीय पदार्थ मिलाना – pH में बदलाव लाना
(ग) तेल का प्रयोग – हवा उपलब्ध न होने देना
(घ) मसालों का प्रयोग – संक्रमण के कारक हटाना।

2. जैम, जैली व मारमलेड बनाना (Zam, Zelly, Marmalade): इसमें चीनी का प्रयोग किया जाता है। अधिक चीनी नमी को सोखकर जीवाणुओं तक नमी नहीं पहुँचने देती। अम्लीय पदार्थ pH को कम करके जैम आदि को जीवाणुओं से उत्पन्न संदूषण से बचाया जा सकता है। मीठे माध्यम में कभी-कभी फफूंदी आदि से संदूषण हो सकता है। अतः सभी जैम इत्यादि संक्रमित हवा बंद बोतलों में ही संगृहीत किये जाने चाहिए। आप प्रयोगशाला में कुछ घरेलू खाद्य परिरक्षण की विधियाँ सीखें। खाद्य परिरक्षण की कुछ नवीनतम तकनीकें हैं : डीहाइड्रोफ्रीजिंग, प्रकाशमान करना, फ्रीजड्राइंग तथा एंटीबाइटिक के प्रयोग द्वारा।

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प्रश्न 9.
पाक क्रियाओं का भोजन घटकों पर क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर:
“बहुत-से भोज्य पदार्थ अपनी स्वाभाविक स्थिति में मनुष्य के खाने के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। उन्हें खाने के योग्य बनाने के लिए जो क्रिया अपनायी जाती है, वह पाक क्रिया कहलाती है।” प्रत्येक खाद्य-पदार्थ की ताप-ग्रहणता अलग-अलग होती है। अनेक आन्तरिक गुणों पर ताप का पृथक्-पृथक् प्रभाव पड़ता है। ताप की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही भोज्य पदार्थों के स्वाद में वृद्धि होती है तथा उसके स्वरूप में परिवर्तन होता है। भोज्य तत्त्वों अर्थात् वसा, प्रोटीन, श्वेतसार, खनिज लवण, विटामिन आदि पर ताप का निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है :

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन (Colour changes)।
(ख) खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन (Flavour changes)।
(ग) खाद्य पदार्थों की प्रकृति में परिवर्तन (Texture changes)।

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन-खाद्य पदार्थों को पकाने पर उनके रंग में कई परिवर्तन आते हैं। कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जिनसे वह पकने के पश्चात् अधिक आकर्षित हो जाते हैं तथा कुछ खाद्य पदार्थों में ऐसे परिवर्तन आते हैं कि उनका प्राकृतिक रंग नष्ट हो जाता है और वह पहले की भाँति आँचों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते हैं। उदाहरण के लिए फलों और सब्जियों के चमकीले आकर्षक रंग पकने के पश्चात् कुछ मात्रा में नष्ट हो जाते हैं तथा चमकहीन हो जाते हैं। इसके विपरीत राजमा आदि पकने के पश्चात् लाल रंग के हो जाते हैं और उनका रंग पहले की अपेक्षा अधिक आकर्षक हो जाता है।

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन-खाद्य पदार्थों के रंगों पर निम्न प्रकार से प्रभाव पड़ता है :
1. क्लोरोफिल (Chlorophyll): सब्जियों तथा फलों में हरा रंग उनमें उपस्थित क्लोरोफिल के कारण होता है। पकाने के ताप एवं माध्यम के pH के कारण इस हरे रंग में विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों में परिवर्तन आते हैं। इनका रंग पकाने पर पहले कुछ गहरा तथा अधिक पकाने पर भूरा हो जाता है। यदि हरी सब्जियों को पकाते समय माध्यम अम्लीय हो तो इनका रंग जल्दी ही भूरा हो जाता है परन्तु क्षारीय माध्यम में इनके रंग में अधिक परिवर्तन नहीं होता और गहरा हरा ही रहता है।

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यही कारण है कि हरी सब्जियों के रंग को बनाए रखने के लिए कई बार पकाते समय उनमें कुछ खाने वाला सोडा डाल देते हैं जिससे माध्यम क्षारीय हो जाए और उनके रंग में परिवर्तन न हो, परन्तु खाने वाले सोडे या बेकिंग सोडे के प्रयोग से खाद्य पदार्थ में उपस्थित थायमिन और विटामिन सी की काफी मात्रा नष्ट हो जाती है। हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्तम रंग को बनाए रखने के लिए पहले कुछ मिनटों के लिए उन्हें ढकना नहीं चाहिए और खुले बर्तन में ही पकाना चाहिए।

2. कैरोटीनॉयड्स (Carotenoids): सब्जियों या फलों का लाल रंग कैरोटीनॉयड्स के कारण होता है। जब लाल सब्जियाँ या फल जैसे गाजर, आडू आदि को पकाया जाता है तो इनका लाल रंग पानी में बाहर आ जाता है और यह स्वयं पीले रंग के हो जाते हैं। अम्लीय माध्यम में इनका लाल रंग वैसा ही रहता है तथा क्षारीय माध्यम में इनका रंग नीलेपन पर आ जाता है। अतः लाल रंग की गाजर, आडू आदि को पकाते समय थोड़ा सा नींबू डालकर माध्यम को अम्लीय करने से उनका रंग वैसा का वैसा ही बना रहता है।

3. फ्लेवोनॉयड्स (Flevonoids): सब्जियों या फलों का पीला रंग फ्लेवोनॉयड्स के कारण होता है। जब हल्के पीले रंग वाले फल या सब्जियों जैसे प्याज, सेब आदि को क्षारीय पानी में धोते हैं और पकाते हैं तो उनका रंग गहरा पीला या भूरा हो जाता है, अतः इसके क्षारीय माध्यम के प्रभाव को हटाने के लिए इसमें थोड़ा-सा नींबू का रस या टाटरी डाल दी जाती है।
कई बार पानी क्षारीय होने के कारण उसमें पकाए गए चावल पीले हो जाते हैं। इस पीलेपन को चावल पकाते समय उसमें थोड़ा-सा नीबू का रस या टाटरी डालकर रोका जा सकता है।

4. मायोग्लोबिन एवं हीमोग्लोबिन (Mayoglobin and Haemoglobin): मांस का लाल रंग उसमें उपस्थित मायोग्लोबिन एवं हीमोग्लोबिन के कारण होता है। पकाने के ताप द्वारा यह लाल रंग भूरे रंग में बदल जाता है। यही कारण है कि पके हुए मांस का रंग भूरा होता है।

(ख) खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन (Changes in flavour of foods): पकाने पर खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में काफी परिवर्तन आता है तथा यह परिवर्तन उस खाद्य पदार्थ की प्राकृतिक सुगन्ध, उसमें डाले गए मिर्च-मसालों या अन्य पदार्थों पर निर्भर करती है। अच्छी सुगन्ध वाले खाद्य पदार्थ हमारी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करते हैं तथा मुँह में लार रस स्रावित होने लार रस भोजन में उपस्थित कार्बोज के पाचन में सहायता करता है। पकाने पर खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन उनमें हुए कई भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों के कारण होता है।

कच्चे मांस, मछली एवं मुर्गे की गन्ध अच्छी नहीं लगती परन्तु पकने के पश्चात् मिर्च-मसालों की सुगन्ध के कारण उसमें जो सुगन्ध उत्पन्न होती है, उसके कारण वही मांस अच्छा लगने लगता है। कॉफी की विशेष सुगन्ध, कॉफी के बीजों को भूनने और पीसने पर ही उत्पन्न होती है अन्यथा कच्चे कॉफी के बीजों में कोई सुगन्ध नहीं होती है।

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खाद्य पदार्थों की प्राकृतिक सुगन्ध को बनाए रखने के लिए उन्हें आवश्यकता से अधिक नहीं पकाना चाहिए, ठीक ताप पर पकाना चाहिए तथा जहाँ तक सम्भव हो, मिर्च-मसाले खाद्य पदार्थ के पकने के पश्चात् ही डालने चाहिए। यदि मिर्च-मसाले जल्दी डाल दिए जाएँ तो खाद्य पदार्थ की प्राकृतिक सुगन्ध पर कुप्रभाव पड़ता है।

(ग) खाद्य पदार्थों की प्रकृति में परिवर्तन (Changes in nature of foods): पकाने से खाद्य पदार्थ की प्रकृति पर बहुत प्रभाव पड़ता है। कुछ खाद्य पदार्थ पकाने के ताप द्वारा मुलायम हो जाते हैं तो कुछ खाद्य पदार्थ ताप द्वारा कड़े हो जाते हैं। प्रत्येक खाद्य पदार्थ अपनी एक विशेष प्रकृति के कारण ही अच्छा लगता है।

1. कार्बोज (Carbohydrates): कार्बोज स्टार्च एवं शर्करा के रूप में ग्रहण की जाती है। जब कच्ची अवस्था में स्टार्च को ग्रहण किया जाता है तो वह आसानी से नहीं पचता । शुष्क ताप या बेकिंग की विधि को डेक्सट्रीन में परिवर्तित करती है जो कि शीघ्र व सरलता से पचने वाला होता है। उबलने की क्रिया द्वारा श्वेतसार के कण अधिक मुलायम होकर फूल जाते हैं। द्रवणांक बिन्दु (Boiling Point) पर पहुँचने पर सेल्यूलोज का आवरण फट जाता है तथा श्वेतसार निकलकर द्रव पदार्थ में मिल जाता है।

द्रव पदार्थ गाढ़ा हो जाता है। यही कारण है कि किसी तरल खाद्य पदार्थ को गाढ़ा करने के लिए मैदे या किसी अन्य स्टार्च का प्रयोग किया जाता है। शुष्क उष्णता से शक्कर जलकर भूरे रंग की शक्कर (Caramel Sugar) बन जाती है तथा और अधिक गर्म होने पर जल जाती है। आर्द्र विधि में गन्ने की शक्कर द्वारा मुरब्बे इत्यादि बनाए जाते हैं।

2. प्रोटीन (Protein): ताप द्वारा कुछ वानस्पतिक प्रोटीन के पौष्टिक मूल्य में वृद्धि होती है तथा भोज्य पदार्थों को पकाने से अधिक पाचनशील बन जाते हैं । उबला दूध कच्चे दूध की अपेक्षा अधिक पाचनशील है। इसका कारण उबले हुए दूध पर रेनिन की क्रिया से जठर में वह सरल प्रकार के दही के कणों के रूप में फटती है और इस क्रिया द्वारा वह शीघ्र पच जाता है।

प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं –
(अ) घुलनशील
(ब) मांसपेशीय

(अ) घुलनशील प्रोटीन दूध, रक्त प्लाज्मा और अण्डे की सफेदी में पाया जाता है। जब इन्हें गर्म करते हैं तो उनकी रचना में अन्तर आ जाता है। ताप में घुलनशील प्रोटीन जमकर ठोस (Coagulate) हो जाता है। जब अण्डे को अधिक. उबाला जाता है तो उसकी सफेदी का ऐल्ब्यूमिन घुलनशीलता के गुण को त्याग कर सख्त अघुलनशील ठोस पदार्थ का रूप धारण कर लेता है। इसलिए अण्डा चाहे उबाला जाए या फेंटकर घी में पकाया जाए परन्तु पकाने की क्रिया में तापक्रम कम ही होना चाहिए नहीं तो उसका प्रोटीन कड़ा हो जाएगा।

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(ब) मांसपेशियों का प्रोटीन लचीले (elastic) रेशों से बना होता है। पकाने से ये रेशे सिकुड़ जाते हैं। यह आम धारणा है कि पकाने से मांस के प्रोटीन का अभिपचन अधिक सरल हो जाता है। परन्तु ऐसा नहीं है, पकाने से केवल मांसपेशियों के रेशों को घेरे हुए संयोजक ऊतकों (Connective tissues) के मजबूत रेशे नरम व कमजोर हो जाते हैं जिससे पाचक रस प्रोटीनों तक सरलता से पहुँच सकता है। मछली मांस की भाँति पकाने से अधिक पाचनशील हो जाती है। इसके संयोजक ऊतक ताप से छिन्न-भिन्न हो जाते हैं जिससे वह नरम हो जाते हैं। ताप से एक और लाभ होता है कि पकाने में मछली में वह एन्जाइम नष्ट हो जाता है जो थायमिन को नष्ट करता है।

3. वसा (Fats): साधारण पकाने में वसा की रासायनिक रचना और उसके पोषक मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता। जमा हुआ वसा पिघल जाता है और जलांश बुलबुले को आवाज के साथ बाहर निकल जाता है। अधिक गर्म करने पर उसमें से अधिक धुआँ निकलता है और वह जलने लगता है। अत्यधिक ताप पर गर्म करने पर ग्लिसरॉल और स्निग्ध अम्ल तत्त्व विभक्त हो जाते हैं तथा उसमें से एकरोलीन (Acrolein) नामक तत्त्व धुएँ के रूप में निकलता है जो गले. में खरखराहट व अपच उत्पन्न करता है। एकरोलीन अश्रु गैस का कार्य करती है जिससे नेत्रों में कष्ट होता है। जब वसा को बहुत समय तक गर्म किया जाता है तो उसका ऑक्सीकरण हो जाता है। इससे वसा का स्वाद बिगड़ जाता है। ऑक्सीकृत वसा में विटामिन ई नष्ट हो जाता है।

4. खनिज लवण (Mineral Salts): यदि भोज्य पदार्थों को पकाने के बाद उसके पानी को फेंक दिया जाता है तो बहुत से खनिज लवण (मैग्नीशियम, पोटैशियम और सोडियम) नष्ट हो जाते हैं। यदि कठोर जल में सब्जी को उबाला जाता है तो उसका कैल्शियम सब्जी में भी आ जाएगा। पकाने की क्रिया द्वारा लौह लवण आसानी से प्राप्त किया जाता है।

यदि पकाई जाने वाली वस्तु को लोहे की कढ़ाई में पकायी जाए तो लौह लवण की मात्रा में और अधिक वृद्धि हो जाती है। जड़दार तरकारियों को छिलके सहित उबालने से उसमें भोज्य तत्त्वों की मात्रा नष्ट नहीं होती क्योंकि तरकारियों के छिलके ऐसे तत्त्वों से बने होते हैं जिनमें से तत्त्वों का आदान-प्रदान नहीं हो पाता।

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5. विटामिन (Vitamins): विटामिन-ए और डी वसा में घुलनशील तथा जल में अघुलनशील हैं इसलिए सब्जियों को उबालकर पकाने से यह नष्ट नहीं होते, परन्तु घी में तलकर भोज्य पदार्थ बनाने से विटामिन ए नष्ट हो जाता है। विटामिन डी आँच तथा रोशनी के प्रति स्थिर होने के कारण उष्णता से प्रभावित नहीं होता। विटामिन बी जल में अत्यधिक घुलनशील – होता है इसलिए जल में पकाए हुए भोजन में विटामिन बी का बहुत बड़ा भाग जल में ही घुल जाता है।

ऊँचे तापक्रम पर भोज्य पदार्थ पकाने से विटामिन बी अधिक मात्रा में नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त बेकिंग पाउडर में क्षार के कारण भी यह विटामिन शीघ्र नष्ट हो जाता है। धूप में दूध को खुला रखने से राइबोफ्लेविन का कुछ अंश नष्ट हो जाता है। विटामिन सी जल में घुलनशील है और ऊँचे ताप पर नष्ट हो जाता है। भोज्य पदार्थ को जल में घोलकर पकाने से यह घुले हुए जल में घुल जाता है। भोज्य पदार्थ उबालने पर उसके जल को फेंकने से इसकी हानि होती है। हरी पत्तेदार सब्जियों में एक एन्जाइम होता है। जो विटामिन सी को नष्ट कर देता है। इस विटामिन का तनिक से ताँबे की उपस्थिति में भी नाश हो जाता है।

भोजन पकाते समय कुछ सब्जियों में विटामिन की हानि –
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प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थों को पकाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए?
अथवा
खाना पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों का ह्रास न हो तथा उन्हें बचाया जा सके, कोई आठ तरीके सुझाएँ।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों को पकाते समय हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए –
1. अनाज एवं दालें (Cereals & pulses):
(i) आटे को चोकर सहित प्रयोग करना चाहिए क्योंकि चोकर गेहूँ के दाने की ऊपरी परत होती है और इसमें बी समूह के विटामिन उपस्थित होते हैं। चोकर का प्रयोग न करने से यह विटामिन व्यर्थ हो जाते हैं।

(ii) चावल को कम-से-कम पानी में धोना चाहिए तथा पर्याप्त पानी में भिंगो कर उसी पानी में पकाना चाहिए । बी समूह के विटामिन जो चावल की ऊपरी परत में होते हैं, जल में घुल जाते हैं और यदि इस पानी को फेंक दिया जाए तो यह विटामिन भी व्यर्थ हो जाते हैं।

(iii) दालों को पर्याप्त जल में ही पकाना चाहिए तथा इनको जल्दी गलाने के लिए खाने वाले सोडे का प्रयोग कदाचित् नहीं करना चाहिए क्योंकि सोडे के प्रयोग से माध्यम क्षारीय हो जाने के कारण विटामिन काफी मात्रा में नष्ट हो जाते हैं।

(iv) जहाँ तक सम्भव हो, पकाने के लिए प्रेशर कूकर का प्रयोग करना चाहिए जिससे पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन जल्दी पक जाता है।

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2. सब्जियाँ (Vegetables):
(i) सब्जियों को काटने, छीलने से पहले धो लेना चाहिए अन्यथा काफी मात्रा में जल में घुलनशील विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

(ii) सब्जियों का छिलका पतला-पतला उतारना चाहिए क्योंकि मोटे छिलके के साथ बहुत से खनिज लवण और विटामिन भी व्यर्थ हो जाते हैं।

(iii) सब्जियों को हमेशा बड़े-बड़े टुकड़ों में काटना चाहिए जिससे इनकी कम सतह वायु के सम्पर्क में आए तथा ऑक्सीकरण की क्रिया द्वारा अधिक विटामिन ऑक्सीकृत होकर नष्ट न हों।

(iv) सब्जियों को पकाने से बहुत समय पूर्व काट कर नहीं रखना चाहिए। यदि पकाने से बहुत समय पूर्व इन्हें काट कर रख देंगे तो ऑक्सीकरण अधिक होगा और विटामिन अधिक मात्रा में नष्ट होंगे।

(v) सब्जियों को पकाते समय कम-से-कम पानी का प्रयोग करना चाहिए तथा किसी भी दशा में पकाने के लिए प्रयुक्त किए गए पानी को फेंकना नहीं चाहिए। यदि किसी कारणवश पानी अधिक हो जाए तो उसे किसी अन्य कार्य के लिए प्रयोग में लाना चाहिए।

(vi) हरी पत्तेदार सब्जियों में जलांश काफी होता है। अतः जहाँ तक सम्भव हो, इन्हें बिना पानी के ही पकाना चाहिए।

(vii) सब्जियों को पकाने के लिए उबलते हुए पानी में डालना अधिक उचित है क्योंकि उच्च ताप पर एन्जाइम नष्ट हो जाते हैं और विटामिन ऑक्सीकृत नहीं होते तथा नष्ट होने से बच जाते हैं।

(viii) सब्जियों को सदैव ढंक कर पकाना चाहिए परन्तु हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्तम रंग को बनाए रखने के लिए इन्हें केवल कुछ मिनटों तक खुला पकाना चाहिए और फिर ढंक देना चाहिए।

(ix) पकाने के पश्चात् सब्जियों को बार-बार गर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से बहुत से विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

(x) कछ मात्रा में सलाद के रूप में कच्ची सब्जियों का अवश्य प्रयोग करना चाहिए जिससे । पोषक तत्त्वों के साथ-साथ भोजन आकर्षक एवं स्वादिष्ट भी लगे।

3. फल (Fruits):

  • फलों को कच्चा ही प्रयोग में लाना चाहिए। केवल रोगियों को या बच्चों को फलों का स्ट्यू बनाकर दिया जाना चाहिए।
  •  जिन फलों के छिलकों को प्रयोग में लाया जा सके, उन्हें छिलकों सहित ही खाना चाहिए या उनके छिलकों को किसी और रूप में प्रयोग में लाना चाहिए।
  • फलों को खाते समय ही काटना चाहिए तथा काटकर नहीं रखना चाहिए।
  • फलों को ताजा ही खा लेना चाहिए क्योंकि बासी फल की पौष्टिकता कम हो जाती है और इसमें उपस्थित पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

4. दूध (Milk):

  • दूध को धूप के सीधे सम्पर्क में नहीं रखना चाहिए। इसे अंधेरे तथा ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।
  • दूध को आवश्यकता से अधिक नहीं उबालना चाहिए।

5. अंडे (Eggs):

  • अण्डों को बहत अधिक ताप तथा बहत अधिक समय तक नहीं पकाना चाहिए।
  • अण्डों को पोंछकर ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।

6. मांस, मछली, मुर्गा आदि (Meat, fish, chicken) :

  • इन्हें पर्याप्त जल में ही पकाना चाहिए तथा पकाने के लिए प्रयुक्त जल को फेंकना नहीं चाहिए ।
  • इन्हें बहुत अधिक ताप पर नहीं पकाना चाहिए क्योंकि अधिक ताप पर प्रोटीन कड़ा होकर अपचय हो जाता है।

7.चाय, कॉफी आदि (Tea, Coffee):

  • इन्हें बनाते समय पानी के साथ उबालना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कुछ हानिकारक तत्त्व इनमें आ जाते हैं ।
  • पहले से बनी हुई चाय को गर्म करके प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

प्रश्न 11.
भोजन के पौष्टिक मान बढ़ाने के क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
लाभ (Advantages): किसी व्यक्ति को पोषण आहार का ज्ञान हो तो वह कम मूल्य में भी पौष्टिक आहार प्राप्त कर सकता है।
1. आहार का मिश्रण-चावल व दालों को समुचित तालमेल में प्रयोग करने से दालों में उपस्थित अधिक लाइसिन चावल में कमी को पूर्ण कर देता है जिससे दोनों खाद्य पदार्थों चावल व दाल की शरीर में उपयोगिता बढ़ जाती है।

2. खाद्य पदार्थों का अधिक सुपाच्य होना-विभिन्न विधियों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ अधिक सुमपाच्य हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों में उपस्थित पोषक तत्त्वों की रासायनिक संरचना में कुछ ऐसे परिवर्तन आते हैं कि यह पाचक रसों से जल्दी विघटित होकर छोटी आंत से सरलतापूर्वक अवशोषित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए अंकुरण की क्रिया में दालों में उपस्थित कार्बोज में कुछ ऐसे रासायनिक परिवर्तन आते हैं जिससे कार्बोज अधिक पाचनशील हो जाते हैं तथा अंकुरित दाल. कच्ची खाने पर भी पच जाती है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

3. सीमित व्यय में अधिक पौष्टिक तत्त्व प्राप्त होना-भारतीय जनता की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें संतुलित आहार प्राप्ति हेतु सभी खाद्य पदार्थों के सेवन के लिए नहीं कहा जा सकता है। अत: आज के युग की माँग है कि अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उपलब्ध खाद्य पदार्थों का ही पौष्टिक मान बढ़ाया जाए।

4. खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट होना-पौष्टिक मान बढ़ाने के लिए विभिन्न विधियों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट हो जाते हैं तथा व्यक्ति इन्हें अधिक रुचि से खाते हैं। उदाहरण के लिए चावल और उड़द की दाल से बना डोसा, चावल और दाल की खिचड़ी आदि से अधिक स्वादिष्ट लगता है। इसी प्रकार चने की दाल का बड़ा, चने की दाल से अधिक स्वादिष्ट लगता है।

प्रश्न 12.
खाद्य पदार्थों के पोषण मान बढ़ाने की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ?
उत्तर:
खाद्य पदार्थों के पोषण मान बढ़ाने की विधि-भोजन का पौष्टिक मान निम्न प्रकार से बढ़ाया जा सकता है:

  • भोज्य पदार्थों के पौष्टिक मूल्य को बढ़ाना (Enchanging the nutritive value of foods)
  • भिन्न प्रकार के भोज्य समूह को मिलाकर (Nutritious Combination of different kind of food stuffs)
  • भोजन पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों को बचाकर रखना (Adopting methods of cooking which helps to conserve nutrient losses)
  • भोज्य पदार्थों को खरीदते समय सावधानी (Better buying of Foods)

1. भोजन का पौष्टिक मूल्य बढ़ाना:
अंकुरण (Germination): भोजन का पौष्टिक मूल्य बढ़ाने के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण विधि है। अन्न व दालों दोनों को ही अंकुरित कर सकते हैं। भोजन में अन्न का प्रमुख स्थान है। अन्न से शरीर को ऊर्जा एवं आवश्यक पोषक तत्त्व आसानी से मिल जाते हैं। दालों का उपभोग भी लगभग सभी व्यक्ति करते हैं। यह शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन प्राप्ति का अच्छा साधन है।

अंकुरण करने की विधि (Method of Sprouting):
1. अनाज या दाल को बीनकर धो लें। अन्दाज से पानी डालकर 10 से 12 घण्टे तक भिंगों दें।

2. भीगे हुए दाल या अनाज को गीले या मलमल के कपड़े में ढीला बाँध दें। 24-28 घण्टे में अंकुर निकल सकते हैं। बीच-बीच में नमी रखने के लिए पानी छिड़कते रहें। नमी व गर्मी के कारण अंकुर निकल आएँगे। अंकुर निकलने का समय वातावरण के तापमान पर निर्भर करता है। गर्म मौसम में अंकुरण जल्दी निकलते हैं। ठण्डे में समय अधिक लगता है। अंकुरित दाल व अन्न को विभिन्न तरीकों से उपयोग करके भोजन को पौष्टिक एवं स्वादिष्ट बना सकते हैं।

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उपयोग:

  1. गेहूँ के आटे में कुछ मात्रा में अंकुरित दालों अथवा बाजरे के आटे को मिला देने से आहार की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
  2. अंकुरित गेहूँ को छाया में सुखा कर हल्का भून कर दलिया बना लें। यह बच्चों को दे सकते हैं।
  3. अंकुरित दालों एवं रागी इत्यादि को सुखाकर, हल्का भूनकर पीसकर छान लें। यह आटा दूध व चीनी मिलाकर छोटे बच्चों को खिलाइए।
  4. अंकुरित दालों को नीबू का रस व नमक मिला कर कच्चा भी खाया जा सकता है।

अंकुरण से लाभ (Advantages of Germination) अंकुरित करने से दालों में पाए जाने वाले रासायनिक एन्जाइम्स क्रियाशील हो जाते हैं और दालों की पौष्टिकता को बढ़ा देते हैं।

1. विटामिनों की बढ़ोतरी (Increase in Vitamins): दालों व अनाजों में विटामिन सी लगभग न के बराबर होता है। केवल 24 घण्टे अंकुरित करने से विटामिन सी काफी मात्रा में उत्पन्न हो जाता है। अंकुरण के पश्चात् विटामिन सी दस गुना बढ़ जाता है। यह विटामिन हमारी त्वचा व मसूढ़ों की मजबूती बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। नायसिन व बी कम्पलेक्स के अन्य विटामिन 2.3 गुना बढ़ जाते हैं।

अंकरित करने से पौष्टिकता पर प्रभाव –
चना 100 ग्राम
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2. खनिज लवणों की अधिक प्राप्ति-यह देखा गया है कि दालों में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जो पौष्टिक तत्त्वों को ग्रहण करने में बाधा डालते हैं। ऐसे पदार्थ अंकुरित करने पर नष्ट हो जाते हैं। पचने योग्य लोहे खनिज की मात्रा बढ़ जाती हैं।

3. पोषण विरोधी तत्त्वों का नष्ट होना-खाद्य पदार्थों में कुछ पोषण विरोधी तत्त्व होते हैं जो विशेष तत्त्वों के उपभोग में बाधा डालते हैं। अंकुरण की प्रक्रिया के दौरान ये. नष्ट हो जाते हैं। पोषक तत्त्व शरीर में उपयोग हो जाता है।

4. खाद्य पदार्थ अधिक पाचनशील-दालों में उपस्थित प्रोटीन अंकुरण के बाद आसानी से पच जाता है। कठिनाई से पचने वाली दालें जैसे कि सोयाबीन, अंकुरण के बाद आसानी से पच जाती हैं।

5. खाद्य पदार्थों का पकने में कम समय लगना-अंकुरण के दौरान दालों का बाहरी छिलका ढीला पड़ जाता है। परिणामस्वरूप दालें शीघ्र पक जाती हैं।

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6. बच्चों के लिए एक पौष्टिक आहार-अंकुरित दालों को बच्चों के भोजन में निःसंकोच दिया जा सकता है। क्योंकि अंकुरित करने से वायु बनाने वाले पदार्थ कम हो जाते हैं।

7. ईंधन की बचत-अंकुरित दालें शीघ्र पक जाने के कारण ईंधन की बचत भी होती है।

खमीरीकरण (Fermentation): इस विधि द्वारा अनुकूल वातावरण से खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कुछ विशेष प्रकार के वांछनीय (Desirable) जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं। ये जीवाणु सूक्ष्म होते हैं। वायुमण्डल की भाँति यह मिट्टी में विद्यमान रहते हैं। इन्हीं जीवाणुओं के कारण फलों के रस, तरल पदार्थ, शर्करा, आटा आदि में खमीरीकरण की क्रिया होती है।

यह वायु के बुलबुलों के रूप में दिखाई देता है तथा खाद्य पदार्थों के स्वाद में भी अन्तर आ जाता है। जीवाणु उपयुक्त स्थल व तापक्रम पाने से 90°F से 102°F पर) अत्यधिक क्रियाशील हो जाता है। खमीरीकरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस बाहर निकलती है जो कि बुलबुलों के रूप में दिखाई देता है।

खमीरीकरण की विधि (Method of Fermentation):

  • खमीर उठाने के लिए अनाज व दालों को पानी में भिंगों देते हैं।
  • फिर महीन पिट्ठी पीस लें। जितना बारीक खाद्य पदार्थों को पीसा जाएगा, उतना अच्छा खमीर उठेगा।
  • पिट्ठी को एक बड़े बर्तन में डाल कर थोड़ा-सा नमक या चीनी मिलाकर रख दें। नमक व शक्कर खमीर उठाने में सहायता करते हैं। इस क्रिया में जीवाणु कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं जिससे पिट्ठी साधारण मात्रा में दुगनी या तिगुनी बढ़ जाती है। अतः पिट्ठी को बड़े बर्तन में रखते हैं ताकि बर्तन से बाहर न निकले।
  • पिट्ठी को अच्छी तरह फेंट कर खमीर उठाने के लिए रखें। गर्मी के दिनों में खमीर जल्दी उठता है। सर्दी के मौसम में खमीर जल्द उठाने के लिए पिट्ठी में थोड़ा-सा दही भी मिला सकते हैं। बर्तन को चारों ओर से मोटे कपड़े से लपेट कर रखना चाहिए।
  • अनाज व दालों में प्रायः खमीर उठाया जाता है। कभी-कभी दाल व अनाज को अलग-अलग खमीर उठाते हैं और कभी दोनों को मिलाकर। अनाज व दाल के मिश्रित घोल में खमीर उठायें तो अच्छा रहता है क्योंकि इससे स्वाद बढ़ जाता है।

खमीरीकरण से लाभ (Advantages of Fermentation): खमीर उठाने की क्रिया में भोज्य पदार्थ में कुछ परिवर्तन आ जाते हैं जिनके कारण भोज्य पदार्थ अधिक पौष्टिक हो जाते हैं ।

  • खाद्य पदार्थ का पोषक मान बढ़ता है-इस क्रिया से निकोटिनिक अम्ल तथा राइबोफ्लेविन बढ़ जाते हैं।
  • खाद्य पदार्थ का अधिक पाचनशील होना-खमीर की प्रक्रिया में जीवाणुओं द्वारा एन्जाइम बनाते हैं। इनके द्वारा शर्करा तथा प्रोटीन का आशिक पाचन हो जाता है।
  • अधिक प्रोटीन-खमीर से दालों में उपस्थित, ट्रिपसिन प्रतिरोधक भी खण्डित हो जाता है, जिससे शरीर को अधिक मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध हो जाता है।
  • खनिज लवण, लोहे की अधिक प्राप्ति-खमीरीकरण द्वारा खाद्य पदार्थ में उपस्थित लोहे की सम्पूर्ण मात्रा हमें आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
  • खाद्य पदार्थ का अधिक स्वादिष्ट होना-भोज्य पदार्थ का स्वाद तथा बनावट भी अच्छी हो जाती है। खमीरीकरण द्वारा भोज्य पदार्थ में खटास आ जाती है। उदाहरण भठूरे, इडली, डोसा, कांजी आदि।

खमीर का उपयोग (Uses of Fermentation) :

  • डबल रोटी बनाने में यीस्ट या खमीर का उपयोग होता है।
  • अंकुरित जौ (Barley) से बीयर (Beer) बनाई जाती है। जौ को पानी में भिंगोकर उचित ताप में अंकुरित कराते हैं। इसका स्टार्च विकारों के कारण शक्कर में बदल जाता है
  • अंगूर के रस के यीस्ट द्वारा खमीरीकरण से शराब बनाई जाती है। खमीर घर में बनाया जा सकता है तथा बाजार में भी खमीर के पैकेट मिलते हैं जिनकी सहायता से कई खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं।

II. भोजन का मिश्रण (Combination of Foods): यदि भोजन भोज्य समूहों के खाद्यों से मिलाकर तैयार किया जाए तो वह संतुलित और उत्तम श्रेणी का हो जाता है। उदाहरण के लिए अगर गेहूँ का आटा, दाल का आटा और मूंगफली का आटा मिलाकर भोजन का मिश्रण तैयार किया जाए और उस मिश्रण की रोटियाँ बनाई ज्ञाएँ तो उसका प्रोटीन दूध के प्रोटीन के समान गुणकारी बन जाता है।

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लाभ (Advantages):
1. प्रोटीन की उपयोगिता बढ़ाना-विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर प्रयोग करने से उनमें उपस्थित प्रोटीन की उपयोगिता बढ़ जाती है। हम पिछले अध्यायों में पढ़ चुके हैं कि प्रोटीन की किस्म या उपयोगिता उनमें उपस्थित अनिवार्य अमीनो अम्लों पर निर्भर करती है। जिन खाद्य पदार्थों में अधिक अनिवार्य अमीनो अम्ल पाए जाते हैं वह खाद्य पदार्थ प्रोटीन के उतने ही अच्छे साधन माने जाते हैं। खाद्य पदार्थों विशेषकर वानस्पतिक खाद्य पदार्थों में कोई अमीनो अम्ल अधिक मात्रा में उपस्थित होता है तो कोई दूसरा अमीनो अम्ल बहुत कम मात्रा में या बिल्कुल नहीं होता है।

ऐसी स्थिति में एक खाद्य पदार्थ की कमी को दूसरी खाद्य पदार्थ द्वारा पूरा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अनाजों में अमीनो अम्ल लाइसिन तथा दालों में अमीनो अम्ल मिथायोनिन कम मात्रा में पाए जाते हैं और अनाजों में अमीनो अम्ल मिथायोनिन तथा दालों में अमीनो अम्ल लाइसिन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। अतः जब अनाजों और दालों के मिश्रण. का प्रयोग करते हैं तो उनमें दोनों ही अनिवार्य अमीनो अम्ल उचित मात्रा में हो जाते हैं।

2. खाद्य पदार्थ का पौष्टिक मान बढ़ाना-इस अनाज और दाल के मिश्रण में यदि सब्जियों का प्रयोग भी किया जाए तो सब्जियों में पाए जाने वाले खनिज लवण और विटामिन भी उचित मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं।

3. पकाने में कम समय लगना-यदि हम खाद्य पदार्थों को अलग-अलग पकाएं तो उन्हें तैयार करने में अधिक समय लगता है। जब गृहिणी नौकरी करती हो या किसी कारणवश उसके पास समय कम हो तो विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर पकाने से समय तो कम लगता ही है, पोषक तत्त्व भी अधिक मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं।

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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 15 व्यवस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science व्यवस्थापन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन उत्तर श्रेणी का होता है –
(क) चावल
(ख) गेहूँ
(ग) दाल
(घ) खिचड़ी
उत्तर:
(घ) खिचड़ी

प्रश्न 2.
आर्द्र ताप द्वारा भोजन पकाने की मुख्य विधियाँ हैं –
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(ख) 4

प्रश्न 3.
भाप द्वारा भोजन पकाने की विधियाँ हैं –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

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प्रश्न 4.
नमक में मिलाया जाता है –
(क) सोडियम
(ख) आयोडीन
(ग) खनिज लवण
(घ) विटामिन्स
उत्तर:
(ख) आयोडीन

प्रश्न 5.
पोषण मान में वृद्धि के लिए विधियाँ अपनायी जाती हैं –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

प्रश्न 6.
आयोडीन की कमी से होता है –
(क) अन्धापन
(ख) एनेमिया
(ग) स्कर्वी
(घ) घेघा
उत्तर:
(घ) घेघा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवस्था (Management) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
उपलब्ध साधनों का सदुपयोग करते हुए कार्यों को सर्वोत्तम ढंग से करना ताकि अधिकतम लक्ष्यों की पूर्ति हो सके, व्यवस्था कहलाती है।

प्रश्न 2.
व्यवस्था करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
हमारी आवश्यकताएँ असीमित होती हैं और उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साधन सीमित होते हैं। अत: अधिकाधिक लक्ष्यों और आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सीमित साधनों को समुचित रूप से प्रयोग में लाना आवश्यक है। इसलिए व्यवस्थापन आवश्यक है ताकि अधिकाधिक सन्तुष्टि प्राप्त की जा सके।

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प्रश्न 3.
व्यवस्था (Process of Management) की प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों या चरणों के नाम लिखें।
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया एक शृंखला है जिसके विभिन्न चरण निम्नलिखित हैं –

  • आयोजन (Planning)।
  • संयोजन अर्थात् संगठन (Organising)
  • क्रियान्वयन एवं नियंत्रण (Implementary and controlling)
  • मूल्यांकन (Evaluation)।

प्रश्न 4.
मूल्यांकन (Evaluation) की कोई दो विधियाँ लिखें।
उत्तर:
1. निरपेक्ष मूल्यांकन (Absolute Evaluation): जब योजना का मूल्यांकन लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही किया जाता है, उसे निरपेक्ष मूल्यांकन कहते हैं।
2. सापेक्ष मूल्यांकन (Relative Evaluation): जब योजना का मूल्यांकन पहले के अनुभवों या किसी अन्य व्यक्ति की उपलब्धियों की तुलना के आधार पर किया जाता है तो उसे सापेक्ष मूल्यांकन कहते हैं। अधिकतर सापेक्ष मूल्यांकन का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5.
व्यवस्था की प्रक्रिया की श्रृंखला लिखें।
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया की श्रृंखला (Series of process of management)
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प्रश्न 6.
आयोजन (Planning) के चरण लिखें।
उत्तर:
आयोजन के निम्नलिखित चरण हैं :

  •  सबसे पहले दीर्घकालिक व अल्पकालिक लक्ष्यों को निर्धारित कर परिभाषित कर लें।
  • उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उपलब्ध साधनों पर सोच-विचार कर सूची बना लें।
  • सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग कब व किसके द्वारा किया जाएगा, इस पर विचार-विनिमय कर लें।

प्रश्न 7.
मूल्यांकन (Evaluation) से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
मूल्यांकन से अनेक लाभ हैं –

  • इससे निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति या आपूर्ति का ज्ञान होता है।
  • लक्ष्यों की प्राप्ति की असफलता के कारणों का ज्ञान होता है।
  • भविष्य में बनाई जाने वाली योजनाओं हेतु सहायता मिलती है।
  • उचित मूल्यांकन द्वारा लक्ष्यों की पूर्ति या आपूर्ति से क्रमशः प्राप्त सन्तुष्टि या असन्तुष्टि का अंकन होता है जो नयी सूझ-बूझ एवं कल्पनाओं का आधार ही है।

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प्रश्न 8.
व्यवस्था की प्रक्रिया (Process of Management) के मुख्य सोपान आपस में किस प्रकार सम्बन्धित हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया के मुख्य सोपान आयोजन, संगठन, क्रियान्वयन एवं नियंत्रण और मूल्यांकन का पारस्परिक सम्बन्ध होता है। यह चारों सोपान एक-दूसरे पर आश्रित हैं। कोई भी एक सोपान दूसरे के बिना अर्थहीन है। व्यवस्थापन की प्रक्रिया एक श्रृंखला के समान है। अतः जब आयोजन प्रारम्भ होता है तो उसके साथ ही व्यवस्थापन भी आरम्भ होता है तथा जब क्रियान्वन भी हो रहा हो तो साथ-साथ मूल्यांकन भी होता रहता है। इन्हीं सोपानों की सहायता से लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है।

प्रश्न 9.
व्यवस्था की प्रक्रिया से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
गृह व्यवस्था पारिवारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया पारिवारिक साधनों का आयोजन, नियन्त्रण एवं मूल्यांकन है। उपलब्ध साधनों से निर्धारित लक्ष्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया जा सकता है, यह अधिकांशतः पति-पत्नी की प्रबन्ध करने की योग्यता, रुचि तथा नेतृत्व करने की क्षमता पर निर्भर करता है। न्यूमैन व समर ने प्रक्रिया शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया है, “क्रियाओं की ऐसी श्रृंखला जो उद्देश्य की ओर अग्रसरित करती है।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि एक प्रक्रिया में दो प्रमुख तत्त्व होते हैं-कुछ लक्ष्यों की उपस्थिति एवं उनका क्रियान्वयन ।।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रबंध की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर:
प्रबंध की आवश्यकता (Need for Management)-प्रबंध आज की मुख्य आवश्यकता बन गई है। सही प्रबंध की अनुपस्थिति में यह असंभव है कि उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए हम वांछित लक्ष्य तक पहुँच जाएँ। जैसे-जैसे देश विकास करता है, वैसे-वैसे प्रबंध की आवश्यकता भी बढ़ती चली जाती है। उदाहरण के लिए, औद्योगीकरण के परिणाम से महिलाओं के लिए अधिक व लाभप्रद नौकरियाँ, चुनौतीपूर्ण बाजार, घर के उपकरण, परिवार की अधिक गतिशीलता आदि ने महिलाओं के सामने नए विकल्प खोल दिए हैं।

वे सदा अपने आपको बदलाव व चुनौतीपूर्ण वातावरण में पाती हैं। नए वातावरण के अनुसार, समस्या हल करने के लिए उन्हें कई निर्णय करने पड़ते हैं। केवल प्रबंध के द्वारा ही अच्छा परिवर्तन या विकास लाया जा सकता है। बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाने के लिए माता-पिता को भी प्रबंध करना पड़ता है। लोगों को सामाजिक कारणों के लिए भी प्रबंध की आवश्यकता होती है। कुशल प्रबंध व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण, प्रसन्नता और ऊँचे स्तर पर आधारित होता है।

प्रश्न 2.
प्रबंध की क्या प्रक्रिया है ?
उत्तर:
प्रबंध की प्रक्रिया (The process of management):
घरेलू प्रबंध निम्नलिखित प्रबंध प्रक्रिया से प्राप्त किया जा सकता है –
यह प्रक्रिया, कई कार्यों के द्वारा सफलता की ओर ले जाने वाली है। ये कार्य भिन्न-भिन्न निर्णयों पर, प्रक्रिया की समझ पर तथा कार्य के प्रकार पर आधारित होते हैं। विभिन्न परिवारों का लक्ष्य भी भिन्न होता है। परिवार को वांछित लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए गृहिणी को प्रबंध की वह प्रक्रिया अपनानी पड़ती है जिसमें परिवार के सदस्यों के विभिन्न कार्यों को इकट्ठा कर एक मंजिल की ओर ले जाना पड़ता है।

प्रबंध प्रक्रिया में निम्नलिखित पांच चरण हैं जो एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं –

  • आयोजन
  • संयोजन
  • क्रियान्वयन
  • नियंत्रण
  • मूल्यांकन।

प्रश्न 3.
क्रियान्वयन (Implementation) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
क्रियान्वयन-क्रियान्वयन का अर्थ है योजना को क्रियाशील बनाना। यह प्रबंध प्रक्रिया का क्रियाक्षेत्र है। जब किसी भी योजना को बना लिया गया है तथा साधन जुटाने का काम आयोजित हो चुका है तो अब इसके क्रियाशील होने का समय है। ऊपर लिखित उदाहरण को लेते हुए विद्यार्थी को समय और पढ़ाई की प्रणाली पूरी करनी होगी। यह भी समीक्षा करनी होगी कि लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक तैयारी हो गई या नहीं।

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प्रश्न 4.
संयोजन का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
संयोजन (Organisation): संयोजन प्रबंध का एक कठिन चरण है। योजना की सफलता या असफलता अधिकतर इसी तथ्य पर आधारित होती है कि संयोजन किस प्रकार है ? साधारण शब्दों में संयोजन का अर्थ कहा जा सकता है, वस्तुओं को ठीक ढंग से व्यवस्थित करना। घर मैं अथवा जहाँ कई योजनाएँ बनाई जाती हैं तथा कई कार्य किए जाते हैं, कार्य को कुशलता से करने के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था आवश्यक है।

संयोजन की प्रक्रिया अर्थात् संयोजित करने का अर्थ है परिवार के सभी सदस्यों के कार्य को आवश्यक साधनों के साथ मिलाकर कार्य सम्पन्न करना। उपलब्ध साधनों को मिलाकर लक्ष्य तक पहुंचाना ही संयोजन का कार्य है। ऊपर लिखित उदाहरण में संयोजन का अर्थ होगा आर्किटेक्चरल पद्धति के लिए सम्पूर्ण सूचना व पाठ्यक्रम को एकत्रित करना। आपं अपने परिवार से या अध्यापक से सारी सूचनाएँ ले सकते हैं ताकि प्रवेश निश्चित हो जाए। सारांश में कुशल संयोजन ही बहुत-सी समस्याओं का हल है तथा इसका कोई भी दूसरा विकल्प नहीं है।

प्रश्न 5.
व्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ (Meaning and Characteristics of Man agement): व्यवस्था की प्रक्रिया को गृह में, लगभग प्रत्येक देश में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग किया जाता है जिसके अंतर्गत मानवीय तथा भौतिक साधनों का प्रयोग करके इच्छित लक्ष्यों तक पहुँचा जाता है। व्यवस्था की प्रक्रिया आयोजन, व्यवस्थापन, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन का मिश्रण है तथा व्यवस्थापक को इन सभी चरणों से परिचित होना आवश्यक है। गृह व्यवस्था जीवन का प्रशासनिक पक्ष होने के कारण न केवल उपर्युक्त चरणों को बल्कि कार्य को प्रेरित करने वाली, निर्णय करने की प्रक्रिया को भी सम्मिलित करता है।

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प्रश्न 6.
वैकल्पिक समाधानों की खोज का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
वैकल्पिक समाधानों की खोज-व्यवस्थापक को अपने ज्ञान, जानकारियों, अनुभवों तथा सलाहों द्वारा विकल्पों को ढूंढना पड़ता है। जब व्यक्ति विकल्पों की खोज करता है तो सिद्धांततः उसे समस्त संभावनाओं से विज्ञ होना चाहिए, परन्तु अनुभव, समय आदि के सीमित होने के कारण ऐसा बहुत कम होता है। स्थायी व मूल्यवान वस्तुओं को खरीदते समय ही लोग निर्णय करने के इस सोपान की ओर ध्यान देते हैं। चरण (1) में दिए गए छात्रा के उदाहरण को यदि हम आगे बढाएं तो निम्नलिखित कुछ वैकल्पिक हल हो सकते हैं:

  • छात्रा के अभिभावकों को उसकी समस्या से परिचित कराया जाए तथा उसके इलाज के लिए प्रेरित किया जाए।
  • मानवता के नाम पर उसके सहपाठियों से या विद्यालय के विभिन्न छात्र-छात्राओं से चंदा जमा कराया जाए तथा इलाज कराया जाए।
  • छात्रा के निर्धन होने की दशा में प्रधानाध्यापिका द्वारा विद्यालय के छात्रनिधि में से कुछ धन निकलवाकर उसकी सहायता की जाए।
  • इलाज के लिए अध्यापिकाओं द्वारा चंदा एकत्र कर लिया जाए।
  • नजदीक के अस्पताल से स्वयं ही उसका इलाज कराया जाए।

प्रश्न 7.
निर्णय (Decision) क्या है ?
उत्तर:
मनुष्य के जीवन में अनेक समस्याएँ आती हैं। इनका समाधान करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है। निकलवडोसी के अनुसार, “निर्णय लेने का अर्थ किसी समस्या के समाधान के लिए या किसी स्थिति से निपटने के लिए कई विकल्पों में से किसी एक का चयन है।” गौसवकँडल के अनुसार “निर्णय लेना कई कार्यविधियों में से किसी एक का चयन है अथवा किसी को भी अंगीकार न करना है।”

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
गृह-व्यवस्था की प्रक्रिया के कौन-से मुख्य तत्त्व हैं ?
उत्तर:
अधिकांश लोग यह समझते हैं कि गृह-प्रबन्ध परिवार की सभी समस्याओं का पका-पकाया हल तैयार कर देता है। यह धारणा गलत है। वस्तुतः वह केवल उस ढाँचे का निर्माण कर देता है जिससे समस्याएँ स्वाभाविक रूप से हल होती चली जाएँ। निकिल तथा जरसी के अनुसार “गृह-प्रबन्ध के अन्तर्गत परिवार के साधनों का नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन आता है, जिसके द्वारा पारिवारिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।”
गृह-प्रबन्ध के तीन मुख्यं अंग होते हैं –
1. नियोजन
2. नियन्त्रण
3. मूल्यांकन।
ये तीनों प्रक्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं और इनका उपयोग परिवार के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है। ये तीनों मानसिक प्रक्रियाएँ हैं।
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uifraifich gut an unfa (Achievement of family goals) :
(क) नियोजन (Planning): व्यवस्था प्रक्रिया का प्रथम चरण नियोजन है। आज नियोजन से कोई क्षेत्र नहीं बचा है। नियोजन व्यक्तिगत स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पाया जाता है। घर में गृहिणी सुबह उठते ही दिन भर के कार्यक्रमों की योजना का ध्यान रखती है। वास्तव में “नियोजन किसी भावी कार्य का पर्वानमान है” “किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए क्या विधि हो, आयोजन इसका निश्चय करता है।”

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 15 व्यवस्थापन

कून्ज व ओडोनेल के अनुसार “आयोजन किसी व्यक्ति को क्या करना है, उस कार्य को कैसे करना है, उसे कब करना है व उसे कौन करेगा इसका पूर्व निर्धारण है।” नियोजन वर्तमान व भविष्य के बीच की कड़ी है। नियोजन कार्य आरम्भ होने से पहले ही कर लिया जाता है। भविष्य में किए जाने वाले कार्य का यह पूर्वाभ्यास (Mental Rehearsal) है। इससे भावी कार्य की रूपरेखा तैयार हो जाती है।

आयोजन का लक्ष्यों से सीधा सम्बन्ध है। यदि लक्ष्य स्पष्ट हैं तो आयोजन आसान हो जाएगा परन्तु यदि लक्ष्यों को प्राप्त करने के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ एवं अवरोध होते हैं तो आयोजन करने में अधिक कठिनाई होती है। आयोजन निर्माण करने का ही कार्य है। इसमें योजना बनाने वाले को विचारण, स्मरण, निरीक्षण, तर्कता तथा कल्पना आदि मानसिक शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है।

नियोजन में स्मरण-शक्ति के माध्यम से अतीत के अनुभवों का उपयोग किया जाता है, तर्कता के माध्यम से तथ्यों के मध्य सम्बन्धों को देखा जाता है तथा कल्पना के माध्यम से तथ्यों को नवीन सम्बन्धों के संदर्भ में व्यवस्थित किया जाता है। ये मानसिक शक्तियाँ जितनी अधिक विकसित होती हैं, अयोजन उतना ही अधिक यथार्थ एवं सरल होता जाता है।

आयोजन की विधि (Techniques of Planning):
1. पूर्वानुमान (Forecasting): यह भविष्य में सम्भावित परिस्थितियों पर दृष्टिपात है। इसमें पहले अधिकतम जानकारी एकत्रित की जाती है। यह निश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि भविष्य में कैसी स्थितियाँ रहने की अधिकतम सम्भावना है।

2. लक्ष्य बनाना (Developing objective): पहले लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित कर लिया जाता है। लक्ष्य स्पष्ट होने पर ही अग्रसर हुआ जा सकता है।

3. कार्यक्रम (Programme): लक्ष्य तक क्रमिक अवस्थाओं में कैसे पहुँचा जाए यह निश्चित किया जाता है। कार्यक्रम का अर्थ है कार्यों का वह क्रम जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। इसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि कार्य को करने में समय, शक्ति, धन व अन्य साधनों का कितना उपयोग करना होगा।

4. समय-तालिका (Scheduling): यह कार्यक्रम में निर्धारित क्रियाओं को करने का समय-क्रम है। कार्यक्रम में परिस्थितियों के अनुसार संशोधन किया जा सकता है।

5. बजट बनाना (Budgeting): यह नियोजन का आर्थिक पक्ष है। गृह प्रबन्ध के संदर्भ में यह चरण सभी गतिविधियों में आवश्यक नहीं है परन्तु धन से सम्बन्धित सभी लक्ष्यों के आयोजन का यह महत्त्वपूर्ण अंग है।

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6. कार्यविधि (Developing procedures): कार्यविधि यह निर्धारित करती है कि किसी कार्य को सफलता से सम्पन्न करने के लिए कौन-सी विधि उचित रहेगी। यह कार्य को सबसे कुशलतापूर्वक करने की विधि की खोज है।

7. नीतियों का विकास (Developing policies): नीति किसी कार्य को एक विशिष् प्रकार से करने का निर्देश है । लक्ष्यों का निर्धारण करने के उपरान्त ही नीतियों का निर्धारण सम्भट है. चूँकि नीति उस लक्ष्य तक पहुँचने का माध्यम है। संक्षेप में नियोजन के विभिन्न चरणों को निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया उ सकता है

आयोजन की क्रिया – निश्चित करती है –

  • पूर्वानुमान – सम्भावित स्थितियों का अनुभव
  • लक्ष्य बनाना – प्राप्त किए जाने वाले परिणाम
  • कार्यक्रम बनाना – किए जाने वाले कार्यों का क्रम
  • समय तालिका बनाना – कार्यों का समय क्रम
  • बजट बनाना – आवश्यक आर्थिक साधन
  • कार्यविधि विकसित – करना कार्य सरलीकरण आदि
  • नीतियों का विकास – इस सम्बन्ध में लिए गए निर्णय

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1. लम्बी अवधि की योजनाएँ (Long term Planning): ये स्वभाविक रूप से दीर्घकालिक व अधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए रहती हैं। एक परिवार द्वारा बनाई गई एक दस वर्षीय बचत योजना इसका उदाहरण है। ऐसी योजनाओं में लचीलापन भी होना चाहिए ताकि उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सके।

2. अल्प अवधि की योजनाएँ (Short term planning): यह अपेक्षाकृत कम महत्त्व व कम अवधि तक चलने वाली क्रियाओं का आयोजन है। इसमें कार्यों की दैनिक, साप्ताहिक अथवा मासिक सूची बनाना सम्मिलित है। ये लघु योजनाएँ दीर्घकालिक योजनाओं के ही अंग हैं। उन्हें क्रमिक रूप से प्राप्त करने का साधन हैं परन्तु सभी लघु योजनाएँ प्रत्यक्ष रूप से लम्बी अवधि की योजनाओं से सम्बन्धित नहीं होती।

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(ख) नियन्त्रण (Controlling): किसी कार्य के सम्बन्ध में योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जब योजना कार्यान्वित की जाए तो यह देखना भी अनिवार्य है कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कार्य हो रहा है अथवा नहीं। यदि नहों, तो इस प्रकार के निर्देश अथवा सुझाव दिए जाएँ कि कार्य योजनानुकूल हो सके।

नियन्त्रण की प्रमुख तीन अवस्थाएँ हैं :

(अ) बल देना (Energizing): कार्य को प्रारम्भ करके उसे बनाए रखना व्यवस्थापन की एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है। व्यक्तियों में योजना को प्रारम्भ करके कार्य करने की योग्यता व प्रेरणा में भिन्नता पायी जाती है। यदि लक्ष्य अपेक्षाकृत अल्प अवधि के हैं तो उन्हें प्राप्त करने की इच्छा अधिक तीव्र रहती है। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ व प्रसन्नचित्त है तो वह किसी योजना के क्रियान्वयन में अधिक रुचि लेगा। पारिवारिक योजनाओं में परिवार के सदस्यों को प्रेरित करना भी इस चरण का एक भाग है। उत्प्रेरण वह क्रिया है जिसके द्वारा व्यवस्थापक दूसरे सदस्यों को आवश्यक कार्य में सहयोग करने हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।

(ब) निरीक्षण (Checking): समय-समय पर क्रियान्वित योजना का निरीक्षण करते रहने से योजना पर नियन्त्रण-सा बना रहता है। यदि कार्य की प्रगति सन्तोषजनक नहीं है तो कार्य विधि में कुछ परिवर्तन करने पड़ेंगे। नियन्त्रण में लचीला दृष्टिकोण लेकर चलना होता है। इसके अतिरिक्त कार्य के प्रति जागरूकता व अनुशासन के साथ ही लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। कार्य क्रियान्वयन करते समय नेतृत्व देने वाला व्यक्ति नियोजन तथा नियन्त्रण करता है परन्तु हमे परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से।

निरीक्षण करते समय ध्यान को आकर्षित करने के लिए प्रविधियों (Devices) का होना आवश्यक है। उदाहरण-घड़ी ऐसे व्यक्ति के लिए बिल्कुल ही अनावश्यक सिद्ध होगी जिसे यह ज्ञात नहीं है कि आलू को पकाने के लिए सामान्यतः कितना समय चाहिए।

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(स) समायोजन (Adjusting): यदि आवश्यक हो तो योजना का समायोजन करना पड़ता है। उदाहरण-समय न मिलने पर उबले आलुओं की सब्जी न बनाकर परांठे बना दिए। परिस्थिति बदल जाने पर नवीन निर्णय लेने पड़ते हैं। कभी-कभी स्थितियाँ यथावत् रहती हैं, परन्तु योजना में भी दोष हो सकता है। तब योजना में सुधार कर अपने निर्णयों में परिवर्तन करता पड़ता है।

योजना को व्यावहारिक बनाने में निर्देशन व मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है। कुशल निर्देशन द्वारा स्वयं व दूसरों से अपेक्षाओं के अनुरूप काम लिया जाता है। कार्य की प्रकृति को समझना होता है। उसे पूर्ण करने की विधियाँ भी ज्ञात होनी चाहिए। परिवार के सदस्यों में नई स्फूर्ति भी जागृत करनी होती है ताकि कार्य ठीक से हो सके। परिवार के छोटे सदस्यों के लिए मार्ग-दर्शन भी आवश्यक हो जाता है।

नियन्त्रण की सफलता कई बातों पर निर्भर करती है:
1. उपयुक्त निरीक्षण-निरीक्षण दो प्रकार से किया जा सकता है :
(अ) निर्देशन द्वारा (By Direction): सभी प्रकार के आवश्यक निर्देश दिए जाना आवश्यक है ताकि वांछित परिणाम प्राप्त हो सके।
(ब) मार्गदर्शन द्वारा (By Guidance): मार्गदर्शन में कार्य के परिणाम की अपेक्षा व्यक्ति के व्यक्तिगत गुणों के विकास का प्रमुख उद्देश्य होता है।
कुछ स्थितियों में यात्रिक उपकरणों द्वार माप सम्भव है। यदि रसोई में वैज्ञानिक तुला अथवा साधारण तराजू है तो भोज्य विधि में पदार्थ सही मात्रा में लिये जा सकते हैं।
2. निरीक्षण में शीघ्रता।
3. नए निर्णय-निरीक्षण करने पर यदि दोष दिखाई देते हैं तो शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें दूर किया जाना चाहिए।
4. नियन्त्रण में लचीलापन-योजना के लक्ष्यों में तथा नियन्त्रण की विधियों में वांछनीय परिवर्तन करने की सम्भावना बनी रहनी चाहिए।
5. अनुशासन।
6. उचित नेतृत्व।

(ग) मूल्यांकन (Evaluation): मूल्यांकन में सम्पूर्ण योजना व उसके कार्यान्वयन का पुनरीक्षण है। यहाँ यह देखा जाता है कि योजना में अपेक्षित सफलता मिली है या नहीं। यदि नहीं मिली है तो उसके कारणों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
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  1. आगामी समस्या हेतु-निर्णय
  2. सफलता का मूल्यांकन-लक्ष्य
  3. योजना के क्रियान्वयन का नियन्त्रण-क्रिया
  4. समस्या-आयोजन

लेविन के अनुसार मूल्यांकन के चार प्रयोजन होते हैं –

  1. यह देखना कि कितनी उपलब्धि हो चुकी है।
  2. आगामी योजना हेतु आधार का कार्य करना।
  3. पूरी योजना को संशोधित करने हेतु आधार का कार्य करना।
  4. नवीन सूत्र प्राप्त करना।

मूल्यांकन किसका-मूल्यांकन के दो प्रमुख तत्त्व हैं –

  1. स्वयं का मूल्यांकन (Self evaluation)।
  2. व्यवस्था प्रक्रिया का मूल्यांकन (Evaluation of the process of management)।

1. स्वयं का मूल्यांकन-शिक्षा उद्योग अथवा व्यवसाय में मूल्यांकन अपेक्षाकृत सरल है। यहाँ चूंकि एक समूह रहता है, अत: उपलब्धि के आधार पर तुलनात्मक विवेचना सम्भव है। परिवार में स्थिति भिन्न है। परिवार छोटा समूह है और उसमें भी गहकार्य करने वाली ज्यादा अकेली गृहिणी होती है। गृहिणी को स्वयं ही मूल्यांकन करना होगा। परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे की उपलब्धियों का निष्पक्ष विवेचन कर सकते हैं। दूसरी गृहिणियों की कार्यावधि तथा उपलब्धियों का निरीक्षण कर अथवा उनकी चर्चा कर गृहिणी तुलनात्मक मापदण्ड बना सकती है जिसके आधार पर मूल्यांकन सम्भव है।

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2. स्व मूल्यांकन-यहाँ गृहिणी स्वयं से एक प्रश्न पूछ सकती है “यदि मुझे यही कार्य पुनः करना पड़ा तो मैं अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए क्या परिवर्तन करूँगा?”

3. एक डायरी रखना-इसमें गृहिणी प्रतिदिन की उपलब्धियों का विवरण लिख सकती है। उसे अपनी उपलब्धियाँ देखकर सन्तोष होगा। साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि यहाँ कार्य क्षमता के अनुरूप नहीं हो पाए हैं।

(अ) सापेक्ष मूल्यांकन (Relative Evaluation): सापेक्ष मूल्यांकन में पूरी हो चुकी योजना के प्राप्त लक्ष्यों की तुलना किसी आधार से की जाती है अर्थात् योजना की समाप्ति पर लक्ष्यों की प्राप्ति किस अंश तक हुई है इसकी तुलनात्मक विवेचना की जाती है, जैसे-अन्य परिवारों द्वारा प्राप्त लक्ष्य, पिछली योजनाओं में प्राप्त लक्ष्य आदि।
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(ब) निरपेक्ष मूल्यांकन (Absolute Evaluation): इससे प्राप्त लक्ष्यों की तुलना नहीं. की जाती बिना तुलना के ही यह पता लगाया जाता है कि योजना किस सीमा तक सफल रही परन्तु वास्तव में निरपेक्ष मूल्यांकन असम्भव-सा ही है। जब भी गृह-प्रबन्धकर्ता किसी कार्य को अच्छा अथवा बुरा बताता है तो उसके मस्तिष्क में उस कार्य के परिणाम का चित्र अवश्य होता है। यदि कार्य उस विचार से कम हो तो प्रगति को मन्द तथा यदि कार्य सोचे हुए परिणाम से ज्यादा हो तो उसे लक्ष्य प्राप्ति में सफलता समझा जाता है।

प्रश्न 2.
निर्णय-प्रक्रिया को विस्तार से लिखें।
उत्तर:
निर्णय-प्रक्रिया के निम्नलिखित पाँच प्रमुख सोपान हैं :
1. समस्या की व्याख्या (Definition of Problem):
इसमें किसी समस्या के रूप व उसके महत्त्व को स्पष्टतः समझ लेना चाहिए। कई बार स्थिति को ठीक से समझे बिना ही निर्णय ले लिये जाते हैं। ऐसे निर्णय बाद में हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। इस समस्या के मूल में निहित तत्त्वों को पहचान लेना सदा आसान नहीं होता है। कई बार ऐसी समस्या पर विचार करना होता है जिसके विषय में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं होता।

परिणामतः इसमें अस्पष्टता रह जाती है। जिस समस्या को हल करने के लिये निर्णय लिए जाते हैं वह समस्या परिवार के सभी सदस्यों के मस्तिष्क में स्पष्ट होनी चाहिए। समस्या की जड़ तक जाए बिना उसे ठीक से समझा नहीं जा सकता, न ही उचित समाधान खोजा जा सकता है।

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2. विभिन्न सम्भावित हलों की खोज (Search for Altermate Solutions): विभिन्न विकल्प तथा उनके परिणामों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। विकल्प को ढूँढ़ने की सभी सम्भावनाओं पर विचार करना चाहिए।
उदाहरण-यदि गृहिणी बीमार पड़ जाती है तो घर की देखभाल –

  • या तो पति करेगा।
  • नौकर ढूँढना।
  • महिला सम्बन्धी को कुछ दिन के लिए बुलाना।

इनमें से कौन-सा विकल्प सही है, यह परिस्थिति के अनुसार परिवार को निश्चित करना होगा। अनेक विकल्प होने के कारण निर्णय लेने में गड़बड़ी की सम्भावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के पास समय और अनुभव सीमित होते हैं।

3. विभिन्न सम्भावित हलों पर चिन्तन (Thinking about alternate solution): इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए। प्रत्येक विकल्प के अच्छे-बुरे परिणाम क्या हो सकते हैं, इनको सूचीबद्ध भी किया जा सकता है। अच्छा विकल्प वह है जिससे परिवार के अल्पकालीन लक्ष्य पूरे करने में सहायता मिले व दीर्घकालीन लक्ष्यों पर भी विपरीत प्रभाव न पड़े। ‘प्रत्येक विकल्प के परिणाम अनिश्चित भविष्य के गर्त में निहित होते हैं।

भविष्य आंशिक रूप से इसलिए अनिश्चित होता है क्योंकि उसे बाहरी परिवर्तन प्रभावित करते हैं। उनके सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना प्रायः असम्भव है। इसके अतिरिक्त वह इसलिए भी अनिश्चित होता है क्योंकि भविष्य में विकल्प के प्रति व्यक्ति की भावना में परिवर्तन आ सकता है। इस सोपान को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए कल्पना-शक्ति महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

4. उपयुक्त हल का चयन (Selection of possible solution)-अपने सम्भावित विकल्पों में से एक को चुन लेना चाहिए जिससे सबसे अधिक वांछित परिणामों की आशा हो। इसके अतिरिक्त अपनी आवश्यकताओं, लक्ष्यों एवं उपलब्ध साधनों के आधार पर सर्वोत्तम विकल्प का चयन किया जाता है।

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5. निर्णय के परिणामों का स्वीकारण (Acceptance of results of decisions)-जो निर्णय लिये जाते हैं वे सदा आकर्षक नहीं दिखते । कभी-कभी यह होता है कि न चुने हुए विकल्पों में कुछ तत्त्व बड़े आकर्षक लगते हैं। ऐसी स्थिति में निर्णय लेने वाले व्यक्ति को परेशानी अनुभव हो सकती है परन्तु सभी स्थितियों में निर्णयों के परिणाम जो भी हों, उनका स्वीकारण आवश्यक है।

प्रश्न 3.
टोस्टर खरीदने के लिए निर्णय प्रक्रिया के सोपान विस्तार से लिखें।
उत्तर:
टोस्टर खरीदने के लिए निर्णय प्रक्रिया के सोपान –
1. सूचना एकत्रित करना (Obtain Information):
(क) ब्रांड्स का मिलना (Brands available)
(ख) गारंटी (Guarantee)
(ग) मानकीकरण चिह्न (Standardization mark)
(घ) कीमत (Cost)
(ङ) वोल्टेज (Voltage)
2. धनात्मक व ऋणात्मक प्रभाव-प्रत्येक विकल्प का मूल्यांकन करना तथा विभिन्न सम्भावित हलों की खोज।
3. विभिन्न सम्भावित हलों पर चिन्तन।
4. उपयुक्त हल का चयन।
5. सबसे अच्छी ब्रांड का चयन और खरीदना।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

Bihar Board Class 11 Psychology मानव स्मृति Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
कूट संकेतन, भंडारण और पुनरुद्धार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्मृति एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम सीखे हुए ज्ञान तथा प्राप्त अनुभवों को संचित करके भविष्य के लिए रखते हैं। स्मृति नामक प्रक्रिया में तीन स्वतंत्र किन्तु अन्तः संबंधित अवस्थाएँ होती हैं –
(क) कूट संकेतन
(ख) भंडारण तथा
(ग) पुनरुद्धार

हमारे द्वार ग्रहण की जाने वाली सूचनाएं जो स्मृति बनकर भविष्य में प्रयोग की जाने योग्य अवस्था में आ जाती हैं, उन सभी सूचनाओं को इन तीन प्रमुख अवस्थाओं (चरणों) से होकर अवश्य गुजरना होता है।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 1

1. कूट संकेतन:
स्मृति का प्रारम्भ इसी पहली अवस्था के रूप में होता है। वांछित सूचनाएँ कूट संकेतन के द्वारा स्मृति तंत्र तक पहुँचता है। तंत्रिका आवेग की उत्पति ज्ञानेन्द्रियों पर बाह्य उद्दीपक के प्रभाव के कारण होती है। उत्पन्न आवेग मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में पुनः प्रक्रमण के लिए ग्रहण कर लिए जाते हैं।

कूट संकेतन के रूप में आनेवाली सूचनाएँ तंत्रिका तंत्र में ली जाती हैं संचित संकेतनों से अभीष्ट अर्थ पाने का प्रयास किया जाता है तथा उसे भविष्य में पुनः प्रक्रमण के लिए सुरक्षित रखा जाता है। अर्थात् कूट संकेतन एक ऐसी विशिष्ट प्रक्रिया है जिसकी सहायता से सूचनाओं को एक ऐसे आकार या रूप में बदल लिया जाता है ताकि वे स्मृति में स्थान पाकर सार्थक रूप में संचित रहे। इस अवस्था को पंजीकरण भी कहा जा सकता है। यह स्मृति की पहली अवस्था है।

2. भंडारण:
सार्थक एवं उपयोगी सूचनाओं को कूट संकेतन के माध्यम से प्राप्त करने के बाद जिस विशेष प्रक्रिया के द्वारा कुछ समय सीमा तक धारण किये रहने की व्यवस्था की जाती है, उस प्रक्रिया को भंडारण कहते हैं। यह स्मृति की द्वितीय अवस्था है। भंडारित सूचना का उपयोग आवश्यकतानुसार आने वाले समय में किया जाता है। इसे ‘याद रखना’ भी कहा जाता है।

3. पुनरुद्धार:
पुनरुद्धार स्मृति की अंतिम एवं तीसरी अवस्था है। इसे ‘याद आना’ भी माना जा सकता है। समस्या समाधान अथवा किसी आवश्यक प्रपत्र को खोजने में हम अपनी चेतना को जगाकर जानना चाहते हैं कि अमुक व्यक्ति का कागज कहाँ मिलेगा और किस तरह इसका अधिक-से-अधिक उपयोग किया जा सकता है। अतः कूट संकेतन से मिली सूचना का भंडारण करने के पश्चात् संचित सूचना को चेतना में लाने (याद करने) की प्रक्रिया को पुनरुद्धार कहा जाता है। इस प्रक्रिया को स्मरण जैसा नाम भी दिया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
संवेदी, अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक स्मृति तंत्र से सूचना का प्रक्रमण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
मानव स्मृति को कम्प्यूटर की तरह संवेदनशील बनाने के लिए सूचना का पंजीकरण, भंडारण तथा उसमें आवश्यकतानुसार फेर-बदल करने की क्षमता को आधार बनाकर स्मृति को क्रियाशील स्थिति में लाया जाता है। एटकिंशन तथा शिफ्रिन ने सन् 1968 में स्मृति से संबंधित। एक मॉडल तैयार किया जिसे ‘अवस्था मॉडल’ के रूप में जाना जाता है। ‘अवस्था मॉडल’ के आधार परी स्मृति तंत्र को तीन भागों में बाँट कर अध्ययन किया जाने लगा –
(क) संवेदी स्मृति
(ख) अल्पकालिक स्मृति तथा
(ग) दीर्घकालिक स्मृति
तीनों भागें में से प्रत्येक की अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं तथा इनके द्वारा संवेदी सूचनाओं के संबंध में भिन्न प्रकार्य निष्पादित किए जाते हैं।

1. संवेदी स्मृति:
देखकर या सुनकर जो भी सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उसे सर्वप्रथम संवेदी स्मृति को दिया जाता है। संवेदी स्मृति की संचयी क्षमता तो बहुत अधिक होती है लेकिन धारण अवधि एक सेकेण्ड से भी कम होती है। परिशुद्धता इसकी पहली पसंद होती है। संवेदी स्मृति में संचित सूचनाएँ उद्दीपक की प्रतिकृति की तरह जमा रहती है। उसे चित्रात्मक तथा प्रतिध्वन्यात्मक संवेदी तंत्रिका के रूप में भी अनुभव किया जाता है क्योंकि दृश्य-उत्तर-बिम्ब और ध्वनि-प्रतिध्वनि का अभ्यास कारण स्वयं तंत्रिका ही होती है।

2. अल्पकालिक स्मृति:
प्राप्त सूचनाओं में से कुछ सूचनाओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित हो पाता है। ध्यान दी गई सूचनाओं को अल्पकालिक स्मृति के अन्तर्गत स्थान मिलता है। इस श्रेणी की सूचना सामान्यतः 30 सेकेण्ड से भी कम समय के लिए स्मृति तंत्र में बनी रहती है। एटकिंशन एंव शिफ्रिन के मतानुसार अल्पकालिक स्मृति सूचना का कूट संकेतन मुख्यतः ध्वन्यात्मक होता है।

इसे बनाये रखने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अर्थात् अल्पकालिक स्मृति में व्यक्ति किसी अनुभूति को 30 सेकेण्ड तक ही रख सकता है। इसे प्राथमिक स्मृति भी कहा जाता है। जैसे, किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाष संख्या को सुनकर उसे भूल जाना लघुकालिक स्मृति के कारण ही होता है।

3. दीर्घकालिक स्मृति:
कुछ अति आवश्यक सूचनाएँ स्थायी तौर पर अनन्त समय तक संचित रह जाती है। ऐसी सूचनाएँ अल्पकालिक स्मृति की क्षमताएँ धारण अवधि की सीमा को पार कर जाती है, वही दीर्घकालिक स्मृति में प्रवेश कर पाती है। इस श्रेणी की स्मृति के लिए धारण क्षमता व्यापक मानी जाती है दीर्घकालिक स्मृति में जगह पाने वाली सूचनाएँ भूलने से बची रहती है। कभी-कभी पुनरुद्धार विफलता के कारण कुछ सूचनाएँ स्मृति की सीमा से बाहर हो जाते हैं अतः हम उसे भूल जाते हैं। चेतना ग्रन्थि की सहायता से कुछ क्षण तक प्रयास करने पर भूली गई सूचनाएँ स्मृति में आ जाती हैं।

दीर्घकालिक स्मृति को गौण स्मृति भी कहा जाता है। अपना नाम, पता, दूरभाष संख्या, शत्रु-मित्रों के नाम आदि दीर्घकालिक स्मृति में होने के कारण सदा याद रहते हैं। इन तीनों भागों का संक्षिप्त अध्ययन के लिए निम्नांकित तालिका की मदद ली जा सकती है –
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 2

प्रश्न 3.
अनुरक्षण एवं विस्तृत पूर्वाभ्यास में क्या अंतर है?
उत्तर:
अनुरक्षण एवं विस्तृत पूर्वाभ्यास दोनों स्मृति-तंत्र से सम्बन्धित है। दोनों की विशेषताओं को अलग-अलग अनुच्छेदों के द्वारा सूचित करके उनमें अंतर बताने का प्रयास किया गया है –

(क) अनुरक्षण पूर्वाभ्यास:
अनुरक्षण पूर्वाभ्यास की महत्ता अल्पकालिक स्मृति के लिए नियंत्रक का कार्य करता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास के द्वारा सूचना को वांछित समय तक धारित बनाने का प्रयास किया जाता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास सूचना को अनुरक्षित रहने के लिए सूचना को दुहराने का अभ्यास निरंतर करने की सलाह देता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास जब रुक जाता है तब सूचना की स्मृति मिटने लग जाती है।

(ख) विस्तृत पूर्वाभ्यास:
विस्तृत पूर्वाभ्यास के प्रयोग से कोई सूचना, अल्पकालिक स्मृति से दीर्घकालिक स्मृति में प्रवेश करती है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास पूर्वाभ्यास के विपरीत, जिसमें मूक या वाचिक रूप से दुहराया जाता है। विस्तृत पूर्वाभ्यास के द्वारा दीर्घकालिक स्मृति में पूर्व निहित सूचना के साथ धारिता के लिए अभीष्ट सूचना को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। विस्तृत पूर्वाभ्यास के द्वारा किसी सूचना को उससे उद्वेलित विभिन्न साहचयो के आधार पर कोई व्यक्ति विश्लेषित कर पाता है।

सूचनाओं को संगठित करने, तार्किक ढाँचे में विस्तृत करना तथा समान स्मृतियों के साथ मिलाने, उपयुक्त मानसिक प्रतिमा बनाने जैसी क्रियाओं में विस्तारपरक पूर्वाभ्यास का सक्रिय योगदान होता है। अर्थात् दोनों पूर्वाभ्यास में स्पष्ट अंतर के रूप में कहा जा सकता है कि अनुरक्षण पूर्वाभ्यास जहाँ अल्पकालिक स्मृति के नियंत्रक के रूप में जाना जाता है वहीं दीर्घकालिक स्मृति के विश्लेषण में विस्तारपरक पूर्वाभ्यास का योगदान होता है।

अनुरक्षण पूर्वाभ्यास अल्पकालिक स्मृति की धारिता को विकसित करने का काम करता है वहीं विस्तारपरक पूर्वाभ्यास दीर्घकालिक स्मृति के स्तर को विकसित करता है। अनुरक्षण विधि का विकल्प खंडीयन विधि के रूप में उपलब्ध हो चुका है जबकि विस्तारपरक पूर्वाभ्यास के लिए कोई विकल्प नहीं मिल सका है। सूचना के अवस्था परिवर्तन की व्याख्या करने में अनुरक्षण पूर्वाभ्यास का कोई योगदान नहीं होता है जबकि विस्तारपरक पूर्वाभ्यास अवस्था परिवर्तन की कला को समझता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 4.
घोषणात्मक एवं प्रक्रिया मूलक स्मृतियों में क्या अंतर है?
उत्तर:
दीर्घकालिक स्मृति में अनेक प्रकार की सूचनाएं संचित रहती हैं। समुचित अध्ययन के लिए दीर्घकालिक स्मृति का वर्गीकरण किया गया है। पहला वर्गीकर में दो वर्गों को प्राथमिकता दी गई है –
(क) घोषणात्मक तथा
(ख) प्रक्रियामूलक (या अघोषणात्मक)।

इन दोनों वर्गों में मुख्य अंतर निम्न वर्णित हैं –

1. आधार:
घोषणात्मक स्मृति में वैसी सूचनाओं का रखा जाता है जो तथ्य, नाम आदि से संबंधित होते हैं जबकि प्रक्रिया झलक स्मृति में किसी क्रिया के सम्पादन के लिए वांछनीय कौशल से जुड़ी सूचनाएं ली जाती हैं।

2. वर्णन:
घोषणात्मक स्मृति से जुड़ी सूचनाओं का वर्णन मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है जबकि प्रक्रिया मूलक स्मृति के अन्तर्गत जो सूचनाएँ होती हैं उन्हें शब्दों में सहजता से वर्णित नहीं किया जा सकता है।

3. उदाहरण:
घोषणात्मक स्मृति के उदाहरण हैं – आपका नाम क्या है? भारत की राजधानी दिल्ली है। मेढ़क उभयचर प्राणी है। समुद्र में जल भरा रहता है। चिड़िया घोंसला बनाकर रहती है। जबकि प्रक्रिया मूलक के उदाहरण हैं-साइकिल चलाना, चाय बनाना, नीम की पत्तियों तथा मिरचाई के तीखापन में अंतर व्यक्त करना इत्यादि।

प्रश्न 5.
दीर्घकालिक स्मृति में श्रेणीबद्ध संगठन क्या है?
उत्तर:
दीर्घकालिक स्मृति में बड़े पैमाने पर सूचनाओं का संग्रह होता है जिनका उपयोग कुशलतापूर्वक किया जाता है। सूचनाओं के संबंध में भेद और लक्षण जानने के लिए उन्हें संगठित करना आवश्यक होता है। दीर्घकालिक स्मृति के संबंध में निम्नलिखित प्रश्नों के सही उत्तर के आधार पर सूचनाओं को संगठित किया जाता है –

  1. सूचना किसके संबंध में हैं?
  2. सूचना में प्रयुक्त मुख्य पद किस श्रेणी या जाति का है।
  3. किस तरह के प्रश्नों के उत्तर हाँ या नहीं में दिये जा सकते हैं।
  4. सूचना सामाजिक, मानसिक, आर्थिक किस प्रकार के कारकों पर आधारित है।
  5. स्मृति पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देने में कितना समय लिया जाता है।

दीर्घकालिक स्मृति में ज्ञान-प्रतिनिधान की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई संप्रत्यय है जहाँ संप्रत्यय समान लक्षण वाले वस्तुओं अथवा घटनाओं के मानसिक संवर्ग होते हैं। सूचना प्रात्यधिक रूप में प्रतिमाओं के रूप में संकेतित की जा सकती है। सन् 1969 में एलन कोलिन्स तथा रॉस क्युिलियन ने शोध-पत्र के माध्यम से बताया कि दीर्घकालिक स्मृति में सूचना श्रेणीबद्ध रूप से संगठित होती हैं तथा उसकी एक जालीदार संरचना होती है।Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 3

संगठन में सूचनाओं को उनके गुणधर्मों के आधार पर संगठित किया जाता है उन्हें श्रेणी सदस्यता के रूप में व्यक्त करते हैं। उदाहरण के रूप में वाक्य संरचना की व्याख्या करके पता लगाया गया कि जैसे-जैसे विधेय किसी वाक्य में कर्ता से पदानुक्रम में दूर होता गया, लोगों ने सूचना सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने में अधिक समय लिया।

अतः सूचनाओं को निम्न स्तर और उच्च स्तर के आधार पर संगठित कर लिया जाता है। अर्थात् दीर्घकालिक स्मृति में सामग्री संप्रत्यय, श्रेणियों एवं प्रतिमाओं के रूप में प्रस्तुत होती है तथा श्रेणीबद्ध रूप से संगठित होती है। श्रेणीबद्ध संगठन का सामान्य अर्थ है कि सूचनाओं को गुण अथवा संरचना अथवा प्रकृति या प्रतिमा के आधार पर निम्न स्तरीय सूचना से उच्च स्तरीय सूचनाओं का क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण।

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प्रश्न 6.
विस्मरण क्यों होता है?
उत्तर:
विस्मरण या भूलना एक मानसिक क्रिया है जिससे स्मृति तंत्र में संचित स्मृति चिह्न मिट जाते हैं तथा हम ज्ञात साधनों या घटनाओं के संबंध में कोई भी सूचना देने में असमर्थ हो . जाते हैं। विस्मरण के कारण परिचितों को पहचानना या गणितीय सूत्र या नियमों को शुद्ध रूप में बतलाना संभव नहीं रह जाता है।

विस्मरण नामक मानसिक विकृति उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –

1. चिह्न-हास के कारण विस्मरण:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में स्मृति के द्वारा किये जाने वाले संशोधनों के फलस्वरूप शारीरिक परिवर्तन देखे जाते हैं। शारीरिक विकृति के कारण सूचनाओं को उपयोग से बाहर रहने से स्मृति चिह्न मिट जाते हैं।

2. अवरोध के कारण विस्मरण:
स्मृति भंडार में संचित विभिन्न सामग्री के बीच अवरोध के कारण विस्मरण होता है।

विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

(क) अग्रलक्षी:
पहले सीखी गई क्रिया विधि आने वाली नई क्रिया विधि के सम्पादन में अवरोध प्रकट करता है।

(ख) पूर्वलक्षी अवरोध:
पूर्वलक्षी अवरोध में पश्चात् अधिगम, पूर्व अधिगम सामग्री के प्रत्यावान में अवरोध पहुंचाता है।

3. पुनरुद्धार असफलता के कारण विस्मरण:
प्रत्याहान के समय पुनरुद्धार के संकेतों के अनुपस्थित रहने या अनुपयुक्त होने के कारण विस्मरण होता है।

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प्रश्न 7.
अवरोध के कारण विस्मरण, पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
(क) अवरोध के कारण विस्मरण का आधार संचित साहचर्यों के बीच उत्पन्न प्रतिद्वंद्विता होती है जबकि पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण प्रत्याहान के समय पुनरुद्धार के संकेतों के अनुपस्थित रहने या अनुपयुक्त होने के कारण होता है।
(ख) अवरोध के कारण विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

1. अग्रलक्षी:
पहले सीखी गई क्रिया बाद में सीखी जाने वाली क्रिया को याद करने में अवरोध उत्पन्न करती है।

2. पूर्वलक्षी:
पश्चात् अधिगम, पूर्व अधिगम सामग्री के प्रत्याहान में अवरोध पहुँचाता है। पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण को वर्गीकृत नहीं किया जाता है।

(ग)

  • अंग्रेजी सीखने के क्रम में पूर्व में सीखी गई भाषा का ज्ञान अवरोध का काम करता है।
  • इसके साथ यह भी ज्ञात है कि कई लक्षणों वाले शब्दों को निश्चित क्रम में प्रस्तुत करने पर उसे कुछ समय बाद यथावत बतलाना संभव नहीं होता है क्योंकि पुनरुद्धार के संकेत समय बीतने पर लुप्त हो चुके थे।

प्रश्न 8.
‘स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है जहाँ सूचनाएँ व्यक्ति के पूर्व ज्ञान, समझ एवं प्रत्याशों के अनुसार संकेतित एवं संचित की जाती है। मनोवैज्ञानिक बार्टलेट ने क्रमिक पुनरुत्पादन विधि पर आधारित प्रयोग किया जिसमें प्रतिभागी याद की हुई सामग्री को भिन्न-भिन्न समयांतरालों पर प्रत्याहान करते थे। प्रयोग में पाई जाने वाली को बार्टलेट ने स्मृति की रचनात्मक प्रक्रिया को समझने के लिए उपयोगी माना। उन्होंने गलतियों को वांछनीय संशोधनों तथा समयानुकूल अर्थ प्रकट करने का प्रयास मानकर खुशी व्यक्त की।

बार्टलेट ने बताया कि कोई विशिष्ट स्मृति व्यक्ति के ज्ञान, लक्ष्यों, अभिप्रेरणा; वरीयता तथा अन्य कई मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से प्रभावित होते हैं। स्मृति के कारण ही हम भूतपूर्व अनुभवों और ज्ञान के आधार पर नयी सूचना के विश्लेषण, भंडारण तथा पुनरुद्धार में सहयोग करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। इस आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि स्मृति के कारण विकास के लिए कई उपयोगी प्रक्रियाओं को सफलतापूर्ण पूरा करने में सहयोग मिलता है अर्थात् स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है।

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प्रश्न 9.
स्मृति-सहायक संकेत क्या है? अपनी स्मृति सुधार के लिए एक योजना के बारे में सुझाव दीजिए।
उत्तर:
स्मृति को स्थायी, उपयोगी और ऐच्छिक पुनरुद्धार के योग्य बनाने हेतु स्मृति-सुधार संबंधी प्रक्रियाओं का एक संगठन सरल युक्ति पर आधारित होती है। स्मृति सुधार की बहुत सारी युक्तियाँ हैं, जिन्हें स्मृति-सहायक संकेत कहा जाता है। संगठित विधियों की रूप-रेखा पर आधारित ढाँचा बहुत ही उपयोगी होता है। स्मृति सुधार के लिए कई विधियाँ बतलाई गई हैं। जैसे –

1. मुख्य शब्द विधि:
मिलते-जुलते शब्दों का युग्म बनाकर नये शब्दों को अपनी स्मृति में स्थान दिया जा सकता है।

2. स्थान विधि:
स्मृति में रखी जानेवाली सूचनाओं को उनके लिए उपयुक्त स्थानों के साथ याद रखने का प्रयास उपयोगी होता है। जैसे-विद्यालय, अस्पताल, किचेन, बगीचा, दुकान आदि में उपलब्ध सामग्रियों का वर्गीकरण करके नयी सूचना को याद रखना सरल हो जाता है। जैसे, किचन के साथ अंडा, तेल, कड़ाही, ब्रेड, चम्मच आदि नाम सरलता से याद आ जाते हैं।

3. खंडीयन विधि:
यदि सूचना को कई अर्थपूर्ण खण्डों में बाँटकर याद करने का प्रयास किया जाता है तो स्मृति सुगम बन जाती है। जैसे-किसी का दूरभाषा संख्या 186919472004 है तो इसे 1869-1947 तथा 2004 में खंडित करके याद रखना आसान हो जाता है क्योंकि 1869 से गाँधी, 1947 से आजादी तथा 2004 में सुनामी का संबंध है।

4. प्रथम अक्षर तकनीक:
किसी शब्द समूह को याद रखने के लिए प्रत्येक शब्द के पहले अक्षर को लेकर एक नया शब्द बनाकर याद रखना सरल माना जाता है। प्रथम अक्षर तकनीक में शब्द के द्वारा कई शब्दों को स्मृति में रखने की सुविधा मिल जाती है।

जैसे – VIBGYOR से इन्द्रधनुष के सातों रंगों के नाम याद रहते हैं। BISCOMAN से किसी संख्या के सभी लक्षण याद रह जाते हैं। ऊपर वर्णित चार विधियों को स्मृति सहायक-संकेतों पर आधारित माना जाता है जिसे सरल लेकिन जटिल विधियँ मानकर ध्यान से लगभग हटा दिया गया है। स्मृति सुधार के लिए अपेक्षाकृत अधिक बोधगम्य विधियों का प्रचलन प्रारम्भ हो गया है जिसमें स्मृति प्रक्रियाओं में ज्ञान पर बल दिया गया है। नये तकनीकी विधियों से सम्बन्धित सुझाव निम्न वर्णित हैं –

(a) गहन स्तर का प्रक्रमण कीजिए:
मनोवैज्ञानिक कैक एवं लॉकहार्ट के मतानुसार किसी सूचना के सतही गुणों पर ध्यान देने के बजाय उसके अर्थ के रूप में प्रक्रमण किया जाए तो अच्छी स्मृति होती है। सूचना को प्रश्नोत्तर विधि से स्पष्ट करने का प्रयास उपयोगी सिद्ध होता है।

(b) अवरोध घटाइए:
आराम और अभ्यास के बल पर विस्मरण की नौबत आने के पहले ही अवरोध उत्पन्न करने वाले कारकों को निष्क्रिय कर दीजिए।

(c) पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखिए:
थॉमस और रॉबिन्सन से स्मृति को सुदृढ़ बनाने के लिए PQRST विधि को अपनाने की सलाह दी है। विधि के नाम का प्रत्येक अक्षर एक अर्थपूर्ण संदेश देता है। तो P-Preview-पूर्वअवलोकन, Q-Question-प्रश्न करना, RRead-पढ़ना, S Self-recitation-स्वतः जोर से पढ़ना और T Test-परीक्षण करना।

अर्थात् सम्बन्धित विषय के सम्बन्ध में सभी अर्जित ज्ञान का पूर्वअवलोकन करके विषय से सम्बन्धित सभी संभव प्रश्नों का उत्तर जानिए। प्रश्नोत्तर की खोज के बाद स्वयं ध्वनि के साथ जोर-जोर से पढ़िए तथा उन्हें लिखिए। लिखे गये प्रश्नोत्तरों के आधार पर स्वयं परीक्षण कीजिए कि आप विषय के सम्बन्ध में कितना सही जानकारी रखते हैं। स्मृति सुधार के लिए योजना के बारे में सुझाव प्रस्तुत किया जा सकता है। सुझाव के अनुसार –

  • मात्र विधियों अथवा नियमों की जानकारी रखने से स्मति का विकास नहीं होता है।
  • स्वास्थ्य, रुचि, अभिप्रेरणा, शैक्षणिक प्रसाधनों से परिचय आदि पर पर्याप्त समझ रखकर ही स्मृति को मजबूती प्रदान की जा सकती है।
  • स्मृति सुधार सम्बन्धी युक्तियों के लिए वांछित सामाग्रियों की प्रकृति के अनुसार उनका उपयोग करने की कला का ज्ञान भी अति आवश्यक है।
  • शैक्षणिक योजना बनाते समय ध्यान रखना चाहिए ताकि योजना अवरोध मुक्त रहे, स्मृति के अनुकूल वातावरण मिले तथा पर्याप्त सहयोग की गुंजाइश हो।
  • जहाँ तक युक्तियों के चुनाव का प्रश्न है तो पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखने वाली युक्ति (PQRST) सर्वोत्तम है।

Bihar Board Class 11 Psychology मानव स्मृति Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दीर्घकालिक स्मृति किने प्रकार की होती है?
उत्तर:
पहला वर्गीकरण –

  1. घोषणात्मक और
  2. प्रक्रिया मूलक

दूसरा वर्गीकरण –

  1. घटनापरक और
  2. आर्थी स्मृति

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प्रश्न 2.
वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं जो मानव स्मृति की जटिल एवं गयात्मक प्रकृति को प्रदर्शित करती हैं?
उत्तर:

  1. क्षणदीय स्मृतियाँ
  2. जीवनचरित स्मृति और
  3. निहित स्मृतियाँ ऐसी स्मृतियाँ हैं जो जटिल एवं गत्यात्मक प्रकृति को बतलाती है।

प्रश्न 3.
आर्थी स्मृति का परिचय क्या हैं?
उत्तर:
आर्थी स्मृति सामान्य ज्ञान एवं जागरुकता की स्मृति है। सभी प्रकार के संप्रत्यय, विचार तथा तर्कसंगत नियम आर्थी स्मृति में संचित होते हैं।

प्रश्न 4.
स्मृति मापन की प्रमुख विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
स्मृति मापन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. मुक्त प्रत्याह्वान (पुनःस्मरण एवं प्रतिभिज्ञान) विधि-इस विधि का उपयोग तथ्य तथा घटना से संबंधित स्मृति के मापन में होता है।
  2. वाक्य सत्यापन कार्य विधि-इस विधि से आर्थी स्मृति का मापन होता है।
  3. प्राथमिक लेप विधि-इसका उपयोग उन सूचनाओं का मापन करने के लिए होता है जिन्हें शाब्दिक रूप में नहीं बताय जा सकता है।

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प्रश्न 5.
स्मृतियों का संगठन क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति में वृहद मात्रा में सूचनाएं होती हैं। सही समय पर सही सूचना की जानकारी पाने के लिए उन्हें संगठित करना उपयोगी होता है।

प्रश्न 6.
स्कीमा शब्द का प्रयोग किस अर्थ में होता है?
उत्तर:
स्कीमा भूतपूर्व अनुभवों और ज्ञान का एक संगठन है जो आनेवाली नयी सूचना के विश्लेषण, भंडारण तथा पुनरुद्धार को प्रभावित करता है। स्कीमा को एक ऐसी मानसिक ढाँचा के रूप में पहचानते हैं जो इस वस्तु जगत के बारे में अर्जित ज्ञान एवं अभिग्रह का प्रतिनिधिान करता है।

प्रश्न 7.
संज्ञानात्मक लाघव का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक लाघव का तात्पर्य यह है कि दीर्घकालिक स्मृति की क्षमता का अधिकाधिक एवं कुशलतापूर्वक तथा कम-से-कम व्यतिरिक्तता में उपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
बार्टलेट ने स्मृति के सम्बन्ध में क्या बतलाया है?
उत्तर:
बार्टनेट ने स्मृति को रचनात्मक क्रिया माना है।

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प्रश्न 9.
बार्टलेट ने स्मृति समझने के लिए किन अर्थपूर्ण सामग्री का उपयोग किया था?
उत्तर:
बार्टलेट ने अर्थपूर्ण सामग्री के रूप में कहानियाँ, गद्य दंत कथाएँ इत्यादि का उपयोग किया था।

प्रश्न 10.
बार्टलेट ने अपने प्रयोगों से प्राप्त परिणामों की व्याख्या हेतु किस शब्द का उपयोग किया था?
उत्तर:
परिणामों की व्याख्या हेतु बार्टलेट ने स्कीमा शब्द का उपयोग किया था।

प्रश्न 11.
धारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब व्यक्ति किसी विषय को सीखता है तो उसके मस्तिष्क में स्मृति-चिह्नों का निर्माण होता है। अर्थात स्मृति-चिह्नों के रूप में धारण करता है।

प्रश्न 12.
स्मृति क्या है?
उत्तर:
स्मृति एक सामान्य पद है जिसका अर्थ पूर्व अनुभूतियों को दिमाग में इकट्ठा करके रखने की क्षमता होती है।

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प्रश्न 13.
स्मृति की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
स्मरण वह मानसिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा भूतकाल में सीखी गई बातें या पूर्व अनुभूतियाँ मस्तिष्क में स्मृति-चिह्नों के रूप में धारणा की जाती हैं और वर्तमान या भविष्य में उसका प्रत्याह्वान या प्रतिभिज्ञान हो जाती है।

प्रश्न 14.
स्मृति-चिह्न क्या है?
उत्तर:
व्यक्ति जब किसी विषय को सीखता है तो उसे स्मृति-चिह्नों के रूप में मस्तिष्क में धारण करता है। इबिंगहॉस ने कहा है कि सीखे गए विषय को मस्तिष्क में स्मृति-चिह्न के रूप में सुरक्षित करते हैं।

प्रश्न 15.
अल्पकालीन स्मृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति से तात्पर्य वैसी स्मृति से होता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को अधिक से अधिक तीस सेकेण्ड तक याद रखता है।

प्रश्न 16.
दीर्घकालीन स्मृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति के अन्तर्गत वैसी स्मृतियाँ आती हैं जो अधिक समय तक मस्तिष्क में वर्तमान रहती हैं।

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प्रश्न 17.
अल्पकालीन और दीर्घकालीन स्मृति में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति की अधिकतम सीमा तीस सेकेण्ड होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति की कोई अधिकतम समय सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 18.
स्मृति के तीन तत्वों का नाम बताएँ।
उत्तर:
स्मृति के तीन तत्वों के नाम इस प्रकार हैं –

  1. कूट संकेतन
  2. संचयन
  3. पुनः प्राप्ति

प्रश्न 19.
कूट संकेतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कूट संकेतन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके सहारे सूचनाओं को एक ऐसे आकार या। रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे स्मृति में प्रवेश पा सके।

प्रश्न 20.
लघुकालीन स्मृति क्या है?
उत्तर:
लंघुकालीन स्मृति का अर्थ वैसी स्मृति संरचना से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक से अधिक 30 सेकेण्ड तक ही धारण करके रखता है।

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प्रश्न 21.
दीर्घकालीन स्मृति क्या है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति का अर्थ वैसे स्मृति संचयन से होता है जिसमें स्मृति चिह्नों को कम से कम 30 सेकेण्ड तक अवश्य धारण किया जाता है, लेकिन इसकी कोई अधिकतम समय सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 22.
स्मृति के कार्यकारी आधार क्या है?
उत्तर:
किसी सूचना को एक समय तक धारित करना तथा उसका प्रत्याह्वान करना स्मृति का मुख्य कार्यकारी आधार है जो संज्ञानात्मक कार्य की प्रकृति पर निर्भर होता है।

प्रश्न 23.
स्मृति नामक प्रक्रिया में कौन-सी तीन स्वतंत्र किन्तु अंतः संबंधित अवस्थाएँ होती हैं?
उत्तर:

  1. कूट संकेतन
  2. भंडारण तथा
  3. पुनरुद्धार

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प्रश्न 24.
अवस्था मॉडल कब और किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर:
एटकिंसन एवं शिफ्रिन ने 1968 में अवस्था मॉडल प्रस्तुत किया था?

प्रश्न 25.
किस अवस्था की स्मृति स्थायी होती है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति स्थायी होती है।

प्रश्न 26.
प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण को कब और किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण ऊक एवं लॉकहर्ट द्वारा सन् 1972 में प्रतिपादित किया गया था।

प्रश्न 27.
बार्टलेट ने स्मरण को किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया माना है?
उत्तर:
बार्टलेट ने स्मरण को पुनः रचनात्मक मानसिक प्रक्रिया माना है।

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प्रश्न 28.
इबिंगहाँस के अनुसार स्मरण का स्वरूप कैसा होता है?
उत्तर:
इबिंगहॉस के अनुसार स्मरण का स्वरूप रचनात्मक होता है।

प्रश्न 29.
स्मरण में कौन-कौन प्रक्रिया शामिल होती है?
उत्तर:
स्मरण में मुख्य रूप से चार उपक्रियाएँ शामिल होती हैं-सीखना, धारण करना, प्रत्याह्नान करना तथा प्रतिभिज्ञान करना।

प्रश्न 30.
विस्मरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
विस्मरण (भूलना) एक ऐसी मानसिक क्रिया है जिसमें मस्तिष्क में बने स्मृति चिह्न मिट जाते हैं जिसके कारण प्रत्याह्वन तथा पहचानना शून्य स्तर पर पहुँच जाता है।

प्रश्न 31.
विस्मरण में कितने तरह के अवरोध उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

  1. अग्रलक्षी तथा
  2. पूर्वलक्षी

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प्रश्न 32.
विस्मरण के सम्बन्ध में अवरोध सिद्धांत क्या कहता है?
उत्तर:
विस्मरण, प्रत्याह्वान के समय स्वतंत्र रूप से संचित साहचर्यों के बीच प्रतिद्वंद्विता के कारण होता है।

प्रश्न 33.
इबिंगहॉस के अनुसार विस्मरण किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
इबिंगहॉस के अनुसार विस्मरण एक निष्क्रिय मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 34.
इबिंगहॉस के प्रयोग में प्रयोज्य कौन था?
उत्तर:
इबिंगहॉस ने अपना प्रयोग अपने आप पर किया है?

प्रश्न 35.
फ्रायड ने विस्मरण का प्रमुख कारण क्या माना है?
उत्तर:
फ्रायड ने विस्मरण का प्रमुख कारण दमन को माना है।

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प्रश्न 36.
स्मृति सहायक संकेत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। क्यों?
उत्तर:
स्मृति सहायक संकेतों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है क्योंकि ये बहुत सरल हैं तथा शायद स्मृति कार्यों की जटिलताओं और याद करने में होनेवाली कठिनाइयों का न्यूनानुमान करते हैं। साथ ही साथ अब तकनीकी स्तर पर बोधगम्य उपागम भी उपलब्ध हो चुके हैं।

प्रश्न 37.
थॉमस और रॉबिन्सन के द्वारा बताई गई युक्ति में PQRST का अर्थ क्या है?
उत्तर:
P = Preview (पूर्व अवलोकन), Q = Question (प्रश्न), R = Read (पढ़ना), S = Self recitation (स्वतः जोर से पढ़ना) तथा T = Test (परीक्षण)।

प्रश्न 38.
धारण की जाँच किस आधर पर होती है?
उत्तर:
धारण की जाँच प्रत्याह्वान एवं प्रतिभिज्ञान के आधार पर होती है।

प्रश्न 39.
प्रत्याह्वान क्या है?
उत्तर:
प्रत्याह्वान में व्यक्ति पूर्व में सीखे गए विषयों या पाठों को उसकी अनुपस्थिति में वर्तमान चेतना में लाता है।

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प्रश्न 40.
प्रतिभिज्ञान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रतिभिज्ञान एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पूर्व में सीखे गए विषय को किसी नए विषय सधे अपनी यादाश्त के आधार पर अलग करता है।

प्रश्न 41.
प्रत्याह्वान एवं प्रतिभिज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर:
प्रत्याहान में पूर्व में सीखे गए विषय को उसकी अनुपस्थिति में वर्तमान चेतना में लाते हैं, जबकि प्रतिभिज्ञान में पूर्व में सीखे गए विषय नए विषयों के साथ उपस्थित होता है जिसे अपनी यादाश्त से अलग करना होता है।

प्रश्न 42.
संचयन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संकेतन द्वारा प्राप्त सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को: कुछ समय के लिए सचित करके रखा जाता है।

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प्रश्न 43.
पुनः प्राप्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पुनः प्राप्ति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आवश्यकता के अनुसार व्यक्ति संचयन में मौजूद सूचनाओं से विशिष्ट सूचना की खोज करता है और उन तक पहुँचने की कोशिश करता है।

प्रश्न 44.
क्रमिक पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
क्रमिक पुनरुत्पादन विधि में बार्टलेट ने एक कहानी के प्रयोज्य को सुनाई, प्रयोज्य ने कही कहानी दूसरे को, दूसरे ने तीसरे को क्रम में कहानी सुनाई। इस प्रकार कई प्रयोज्यों के बाद कहानी का रूप बदल गया था।

प्रश्न 45.
उत्तरोत्तर पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
इस विधि में एक प्रयोज्य को कहानी सुनाई जाती है और उसका प्रत्याह्वान करवाया जाता है।

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प्रश्न 46.
एकाकी पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
एकाकी पुनरुत्पादन विधि में कई प्रयोज्यों को एक साथ एक ही कहानी सुनाई जाती है, फिर सभी प्रयोज्यों को बारी-बारी से प्रत्याह्वान करवाया जाता है।

प्रश्न 47.
बार्टलेट ने अपने स्मरण से संबंधित अध्ययन किस विधि से किया?
उत्तर:
बार्टलेट ने अपना अध्ययन तीन विधियों से किया-क्रमिक पुनरुत्पादन विधि, उत्तरोत्तर पुनरुपादन विधि तथा एकाकी पुनरुत्पादन विधि।

प्रश्न 48.
केनेरी क्या है?
उत्तर:
केनेरी एक पक्षी है।

प्रश्न 49.
निस्पंद बिन्दु तथा नामपत्रित सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
जालीदार संरचना के तत्वों को निस्पंद बिन्दु कहते हैं। निस्पंद बिन्दु संप्रत्यय होते है किन्तु उनके बीच के सम्बन्ध को नाम पत्रित संबंध कहा जाता है जो संप्रत्ययों के गुणधर्म या श्रेणी सदस्यता दर्शाते हैं।

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प्रश्न 50.
बार्टलेट की अध्ययन-सामग्री क्या थी?
उत्तर:
बार्टलेट ने अपने अध्ययन सामग्री के रूप में कहानियों, चित्रों आदि को रखा।

प्रश्न 51.
इबिंगहॉस की अध्ययन-सामग्री क्या थी?
उत्तर:
इबिंगहॉस की अध्ययन-सामग्री निरर्थक पद थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अल्पकालीन स्मृति की विशेषता का वर्णन करें।
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति की निम्नलिखित विशेषता है, जो इस प्रकार है –

  1. अल्पकालीन स्मृति में स्मृति चिह्नों को अधिकतम 30 सेकेण्ड तक ही संचित करके रखा जाता है।
  2. इस प्रकार की स्मृति में व्यक्ति विषय या पाठ को मात्र एकाध प्रयास में ही सीख लेता है।
  3. इस प्रकार की स्मृति में स्मृति चिह्नों का नाश बहुत तीव्र गति से होता है, क्योंकि वे कमजोर होते हैं।
  4. इस प्रकार की स्मृति का विस्तार सामान्यतः उसे उद्दीपकों से अधिक का नहीं होता है।

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प्रश्न 2.
लघुकालीन स्मृति की प्रकृति का वर्णन करें।
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति जिसे प्राथमिक स्मृति भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसी स्मृति-संरचना से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक-से-अधिक 30 सेकेंड तक ही धारण करके रखता है। इस तरह की स्मृति की विशेषता यह है कि इसमें जो स्मृति चिह्न बनते हैं, उन पर यदि व्यक्ति ध्यान नहीं देता है या मानसिक रूप से उसका रिहर्सल नहीं करता है तो वह उसे तुरंत भूल जाता है।

सामान्यतः इसमें उन विषयों या पाठों से बनने वाले स्मृति चिह्न संचित हो पाते हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयास में सीख लिया होता है। किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाषा संख्या को एक बार सुनकर 4-5 सेकेण्ड के बाद प्रत्याह्वान करने की कोशिश पर सफल न होना, यह बताया है कि उस दूरभाषा संख्या को 4-5 सेकेण्ड से कम समय तक व्यक्ति धारण करके रख सका। इस तरह की स्मृति संचालन लघुकालीन स्मृति का उदाहरण है।

प्रश्न 3.
दीर्घकालीन स्मृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति, जिसे गौण स्मृति (secondeary memory) भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसे स्मृति संचयन (Memory storage) से होता है जिसमें स्मृति चिह्नों को कम-से-कम 30 सेकण्ड तक तो अवश्य धारण किया जाता है। इसकी कोई अधिकतम समय-सीमा नहीं होती है। शायद यही कारण है कि एक वृद्ध व्यक्ति भी अपने बचपन की अनुभूतियों का प्रत्याह्वान (recall) कर लेता है।

दीर्घकालीन स्मृति की विशेषता यह है कि इससे स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है तथा इसमें उन अनुभूतियों का संचयन होता है जो पर्याप्त अभ्यास (practice) के फलस्वरूप मस्तिष्क में बनते हैं। अपनी दूरभाषा संख्या तथा घनिष्ठ संबंधियों की दूरभाषा, संख्या प्रायः दीर्घकालीन स्मृति में ही संचित होती हैं।

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प्रश्न 4.
संचयन क्या है?
उत्तर:
संचयन (Storgae):
स्मृति की दूसरी अवस्था संचयन (storgae) की अवस्था होती है। संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संकेतन द्वारा प्राप्त सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को कुछ समय के लिए संचित कर रखा जाता है। दूसरे शब्दों में, संचयन की अवस्था में स्मृति में प्रवेश पाचकी सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को कुछ समय के लिए धारित (retained) करके रखा जाता अवस्था को धारण (rentention) भी कहा जाता है।

प्रश्न 5.
प्रक्रमण स्तर का सामान्य परिचय संबंधित मनोवैज्ञानिकों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
सन् 1972 में कैक और लौकहर्ट नामक दो मनोवैज्ञानिकों ने प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण को प्रतिपादित किया था। इस दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी नयी सूचना का प्रक्रमण उसके प्रत्यक्षण और विश्लेषण की विधि पर आधारित है। प्रक्रमण का स्तर यह बतलाता है कि सूचना किस सीमा तक धारित की जाएगी। कैक एवं लॉकहर्ट ने बताया कि सूचना का कई स्तरों (भौतिक या संरचनात्मक) पर विश्लेषण संभव है। प्रक्रमण स्तर पर आधारित प्रयोगों से पता चला कि किसी सूचना के अर्थ को समझना तथा उसे दूसरे संप्रत्ययों, तथ्यों एवं अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ना दीर्घकालिक धारण का सुनिश्चित उपाय है।

प्रश्न 6.
आर्थी स्मृति का प्रमुख लक्षण बतावें।
उत्तर:
टालबिन ने घोषणात्मक स्मृति के रूप में आर्थी स्मृति को पहचाना। आर्थी स्मृति का सीधा संबंध उन सूचनाओं की ओर होता है जो सामान्य ज्ञान से संबंध रखते हैं। हमारी जागरुकता से जुड़ी सूचनाएँ आर्थी स्मृति के रूप में संचित रहती हैं। सभी प्रकार के संप्रत्यय, विचार तथा तर्कसंगत नियम आर्थी स्मृति की पूँजी बन जाती है। जैसे, अर्थगत स्मृति के कारण हम अहिंसा का अर्थ स्थायी तौर पर याद रखते हैं। सामान्य ज्ञान के अन्तर्गत हम भारत की राजधानी दिल्ली है, चार और दो मिलकर छः होते हैं, पटना का S.T.D. कोड 0612 है तथा किताब लिखने में ई का प्रयोग गलत है आदि सूचनाओं को हम देर तक नहीं भूलते हैं।

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प्रश्न 7.
विस्मरण में अवरोध के जभाव को स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्मृति भंडार में संचित तरह-तरह की सूचनाओं के लुप्त हो जाने का प्रमुख कारण अवरोध ही होता है। सीखने और याद करने में विभिन्न पदों के बीच साहचर्य स्थापित हो जाता है। भारी संख्या में जमा हो चुके साहचर्यों में आपसी द्वन्द्व के रूप में प्रतिस्पर्धा होती है जो अवरोधक की तरह कार्य करते हैं। पुनरुद्धार के क्रम में प्रतिस्पर्धा बाधक बनकर स्मृति को क्षति पहुँचाते हैं।

विस्मरण का यह प्रधान कारण है। विस्मरण का यह प्रधान कारण है। अग्रलक्षी अवरोध-पूर्व में प्राप्त की गई सूचना आनेवाली नई सूचना के लिए अवरोधक बन जाता है। अर्थात् पूर्व अधिगम, पश्चात् अधिगम के प्रत्याह्वान में अवरोध पहुंचाता है। इन्हीं अवरोधों के कारण एक भाषा के जानकार को दूसरी भाषा को सीखने में कठिनाई होती है।

प्रश्न 8.
स्मृति वृद्धि के लिए अवरोध को किस प्रकार हटाया जा सकता है?
उत्तर:
अवरोध विस्मरण का प्रमुख कारण है। स्मृति वृद्धि के लिए अवरोधों से मुक्त होना लाभकारी होता है। अवरोध से बचने के लिए अध्ययन के विषयों को इस प्रकार व्यवस्थित की जाती है कि एक विषय के तुरंत बाद लगभग समान लक्षण वाले विषय की बारी न आ जाए। भाषा के बाद गणित के बाद सामाजिक विज्ञान जैसी व्यवस्था करना उपयोगी होता है। असुविधा होने पर अधिगम-अभ्यासों का वितरण करना अच्छा होता है। अर्थात् विषय के बदलने के रूप कुछ देर तक मनोरंजन, खेल या बातचीत में समय व्यतीत कर लेने से पूर्व की स्मृति मजबूत हो जाती है तथा इसका प्रभाव अगले विषय पर नगण्य हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 9.
स्मृति क्या है?
उत्तर:
स्मृति (memory) एक सामान्य पद है जिससे तात्पर्य पूर्व अनुभूतियों (past experiences) को मस्तिष्क में इकट्ठा करके रखने की क्षमता होती है। संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक जैसे-लेहमैन, लेहमैन एवं बटरफील्ड (Laechman, Laehman & Buterfield) ने स्मृति को परिभाषित करते हुए कहा है कि विशेष समयावधि के लिए सूचनाओं को संपोषित करके रखना ही स्मृति है। समयावधि एक सेकेंड से कम या सम्पूर्ण जीवन काल की भी हो सकती है। मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के धनात्मक पक्ष से तात्पर्य पूर्व अनुभूतियों को याद करके रखने से माना है। अतः कहा जा सकता है कि स्मृति का धनात्मक पक्ष स्मरण (remembering) है तथा ऋणात्मक पक्ष (negative aspect) विस्मरण (forgetting) है।

प्रश्न 10.
कूट संकेतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कूट संकेतन (Encoding):
कूट संकेतन में किसी सूचना या बाह्य उत्तेजना (external stimulation) का प्रत्यक्ष करण व्यक्ति उसे एक निश्चित रूप (form) या कूटसंकेत (code) के रूप में तंत्रिका तंत्र (nerous system) में ग्रहण करता है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि कूट संकेत एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके सहारे सूचनाओं को एक ऐसे आकार या रूप form में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे स्मृति में प्रवेश पा सकें। साधारण बोलचाल की भाषा में स्मृति-चिह्नों (memory traces) का निर्माण होना ही संकेतन कहलाता है। स्मृति की पहली अवस्था कूट संकेतन (encoding) की होती है। इस अवस्था को पंजीकरण (registration) भी कहा जाता है।

प्रश्न 11.
लघुकालीन स्मृति किसे कहा जाता है?
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति (short-term momory), जिसे प्राथमिक स्मृति (primary memory) भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसी स्मृति संरचना (memory storage) से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक-से-अधिक 30 सेकण्ड तक ही धारण करके रखता है। इस तरह की स्मृति की विशेषता यह है कि इसमें जो स्मृति चिह्न बनते है, उन पर यदि व्यक्ति ध्यान नहीं देता है या मानसिक रूप से उसका रिहर्सल नहीं करता है तो वह उसे तुरंत भूल जाता है।

सामान्यतः इसमें उन विषयों या पाठों से बननेवाले स्मृति चिह्न संचित हो पाते हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयोग में सीख लिया होता है। किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाष संख्या को एक बार सुनकर 4-5 सेकंड के बाद प्रत्याह्वान करने की कोशिश पर सफल न हो, यह बताय है कि 4-5 सेकण्ड से भी कम समय तक व्यक्ति धारण करके रख सका। इस तरह का स्मृति संचयन (memory storage) लघुकालीन स्मृति का उदाहरण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्मृति से आप क्या समझते हैं? स्मृति के विभिन्न तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्मृति का अर्थ एवं परिभाषायें (Introduction and Definition of Memory):
मानव जीवन में मुख्यत: व्यवहार का आधार स्मृति ही होती है। स्मृति के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है तथा अनेक अनुसंधानात्मक कार्य भी स्मृति पर ही आधारित होते हैं। अतः मानव-व्यवहार का अध्ययन करने के लिये स्मृति का अध्ययन करना आवश्यक है। स्मृति शुद्ध मानसिक प्रक्रिया है। जब व्यक्ति कोई व्यवहार करता है तब उसका अनुभव मानव मस्तिष्क में संचित हो जाता है। अनुभवों के अर्द्धचेतन मस्तिष्क में संचित होने के कारण जब उसी व्यवहार से सम्बन्धित कोई व्यवहार सम्मुख आता है तब वह पूर्व अनुभव जागृत हो जाता है।

अर्द्धचेतन में संचित अनुभवों का पुनः जागृत हो जाना ही स्मृति कहलाता है। यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल मानसिक प्रक्रिया होती है जिसमें अनेक क्रियाओं का समावेश रहता है यथा-सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण तथा प्रत्याभिज्ञा। इन चारों क्रियाओं के सम्मिलित सहयोग को ही स्मृति कहते हैं, इसलिये ये स्मृति के मुख्य तत्व भी कहलाते हैं।

इस प्रकार स्मृति का सामान्य परिचय यह है कि व्यक्ति के अर्द्धचेतन मस्तिष्क में पूर्व अभवों के संचित रूप के पुनः जागृत होने की क्रिया स्मृति कहलाती है किन्तु मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए यह परिभाषा पर्याप्त नहीं है। मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के स्वरूप को विभिन्न परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट किया है जिनका अवलोकन करके स्मृति के मनोवैज्ञानिक स्वरूप को समझने में सरलता. होगी। मनोवैज्ञानिकों द्वारा दी गई स्मृति की कुछ मुख्य परिभाषायें निम्नलिखित हैं –

1. स्टाउट महोदय की परिभाषा:
स्टाउट महोदय के अनुसार, “स्मृति वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से पुराने फिर जागृत हो जाते हैं।”

2. स्पीयरमैन की परिभाषा:
स्पीयरमैन ने स्मृति की परिभाषा इस प्रकार दी है कि, “समझ में आनेवाली घटनाओं द्वारा जो स्थायी प्रभाव मस्तिष्क में छोड़ा जाता है, उसके पुनः जागृत होने की स्मृति कहते हैं।” इन दोनों परिभाषाओं में एक अनुभव का मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव तथा उनका पुनः स्मरण जागृत होने की स्मृति कहा गया है।

3. मैक्टूगल के अनुसार:
“घटनाओं की उसी रूप में कल्पना करना जिस रूप में उन्हें पूर्वकाल में अनुभव किया गया तथा उन्हें अपने उसी अनुभव के रूप में पहचानना ही स्मृति है।” इस परिभाषा के अनुसार किसी घटना के पूर्व संचित अनुभव को पुनः उसी रूप में पहचानना स्मृति है।

4. वुडवर्थ की परिभाषा:
वुडवर्थ ने स्मृति की अति सरल परिभाषा करते हुए कहा कि “पूर्व समय में सीखी गई बातों का याद करना स्मृति है।”

उपरोक्त परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट है कि स्मृति वह मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों को पुनः अपनी चेतना स्तर पर अनुभव या याद करता है। इस अनुभव अथवा याद करने की प्रक्रिया में व्यक्तियों से स्तर भेद तो हो सकता है किन्तु स्मृति की क्रिया के क्रियान्वयन में कोई भेद नहीं होता। स्मृति के आधार पर ही कल्पना शक्ति की उपज होती है।

यदि स्मरण शक्ति का अभाव हो जाये तो मानव जीवन निष्क्रिय हो जाता है। पागलों में असामान्य व्यवहार का आधर स्मृति का अभाव होना ही होता है। व्यक्तियों के स्तर भेद के अतिरिक्त आयु की दृष्टि से भी स्मृति के स्तर में उतार-चढ़ाव आते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि, “स्मृति वस्तुतः चेतन मन का अंग है और इसी से जीवन व्यापार सम्भव होता है तथा मस्तिष्क चेतन एवं अर्द्धचेतन शक्तियों के माध्यम से इस क्रिया को अपनाता है।”

स्मृति के तत्व (Factors of Memory) जैसा कि स्मृति की परिभाषा से स्पष्ट है कि स्मृति एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। यह क्रिया अनेक क्रियाओं का सम्मिलित रूप होती है। अतः इसके स्वरूप को समझने के लिये इसके विभिन्न अंगों को समझना भी आवश्यक है। उक्त परिभाषाओं के अनुसार स्मृति की क्रिया के चार मुख्य अंग हैं – सीखना, धारणा, पुनःस्मरण तथा पहचानना। इनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है –

1. सीखना (Learning):
जैसा कि वुडवर्थ की स्मृति की परिभाषा मे स्पष्ट होता है कि, “पूर्व में सीखे गये कार्य को पुनः याद करना ही स्मृति है।” अत: सीखना स्मृति का प्रथम प्रमुख अंग है। सीखने के अभाव में अनुभव का संचय सम्भव नहीं और अनुभव के संचय के बिना स्मृति की क्रिया सम्भव नहीं, इस कारण स्मृति की क्रिया के लिये ‘सीखना’ क्रिया अत्यावश्यक है।

2. धारणा (Retention):
धारणा एक मानसिक क्षमता पर आधरित क्रिया है। कुछ बालक किसी बात को जल्दी याद कर लेते हैं, कुछ बहुत देर से याद कर पाते हैं। धारण कर भेद का कारण अनेक तत्व हैं। इन तत्वों के द्वारा ही धारण की क्रिया होती है, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है –

धारणा शक्ति तत्व या आधार (Factors of Retention):
धारणा शक्ति के छः मुख्य तत्व हैं, जिनके द्वारा धारणा शक्ति का स्तर प्रभावित होता है। इनका विवरण निम्न प्रकार है –

(i) मस्तिष्क:
धारणा शक्ति का मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध होता है। जो अनुभव प्राप्त किये जाते हैं उनमें अधिकांश को मस्तिष्क ग्रहण करता है। वे अनुभव अर्द्धचेतन भाग में रहते हैं। मस्तिष्क सीखे हुए अनुभव को क्रमबद्ध करता है। यदि मस्तिष्क प्रबल होता है तब उसमें धारणा शक्ति प्रबल होगी तथा वह प्राप्त अनुभव को अधिक समय तक सुरक्षित रख सकती है। जिनका मस्तिष्क दुर्बल होगा उनकी धारणा शक्ति भी दुर्बल होती है तथा प्राप्त अनुभव को अधिक समय तक संचित नहीं रख सकती। इस प्रकार व्यक्ति की स्मरण शक्ति का स्तर धारणा शक्ति पर ही आधारित होता है तथा धारणा शक्ति का स्तर मस्तिष्क के ऊपर निर्भर है।

(ii) स्वास्थ्य:
स्वस्थ व्यक्ति के नाड़ी तन्तु गतिशील होते हैं और अपना काम उचित रूप से कर सकते हैं। इस प्रकार यदि शरीर स्वस्थ होता है तब उसकी धारणा शक्ति भी प्रबल होती है, इसके विपरीत अस्वस्थता की दशा में व्यक्ति की धारणा शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। उदाहरणार्थ, लम्बी बीमारी के कारण व्यक्ति के दुर्बल स्वास्थ्य की स्थिति में उसकी धारणा शक्ति भी दुर्बल भी हो जाती है।

(iii) रुचि और चिन्तन:
धारणा शक्ति का सर्वाधिक सम्बन्ध रुचि और चिन्तन से होता है। रुचिपूर्ण अनुभव को व्यक्ति शीघ्र धारण कर लेता है जबकि अरुचिपूर्ण कार्यों को प्रयत्न के बाद भी धारण नहीं कर पाता और यदि धारण कर भी कर लेता है तो यह धारण करना स्थायी नहीं बन पाता।

(iv) विषय का स्वरूप:
धारण शक्ति सम्बन्धित विषय के स्वरूप पर भी निर्भर करती है। विषय के स्वरूप से अभिप्राय उसकी उद्देश्य पूर्णता एवं सार्थकता से है। विषय जितना उद्देश्यपूर्ण सार्थक होता है उसकी धारणा उतनी ही प्रबल होती है। इसके विपरीत विषय के निरर्थक या उद्देश्यहीन होने पर उसकी धारणा शक्ति भी कमजोर होती है।

(v) सीखने की विधि:
धारणा की प्रबलता सीखने की विधि से भी प्रभावित होती है। यदि किसी कार्य के सीखने की विधि उत्तम है तब उसकी धारणा प्रबल होगी। विषय के स्वरूप के आधार पर सीखने की विधि का निर्धारण करने से सीखे गये कार्य का अनुभव अधिक दिन तक संचित रह सकता है। इसे विपरीत अव्यव-स्थिति पद्धति द्वारा सीखे गये कार्य की धारणा अधिक समय नहीं रह पाती।

(vi) अनुभव:
जिस क्रिया का जितना अधिक अनुभव होता है उसकी धारणा भी उतनी ही प्रबल होती है। अतः अनुभव भी धारणा का महत्त्वपूर्ण अंग है।

3. पुनमरण (Recall):
जब अतीत के अनुभव चेतना में आते हैं, तब उन्हें पुनर्मरण की संज्ञा होती है। पुनः स्मरण की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसमें अतीत के अनुभव जैसे वे होते हैं वैसे ही चेतना में नहीं आते। उनमें से अनेक तत्व छूट जाते हैं तथा केवल मुख्य-मुख्य अंश की स्मृति में आते हैं।

कुहलमन ने पुनस्मरण की क्रिया के विषय में कहा कि, “पुनमरण मूल अनुभव की बिल्कुल वैसी की वैसी ही नकल नहीं होती। वस्तुतः वह पुनर्रचना नहीं बल्कि एक रचना मात्र है जो एक ऐसे कल की रचना है, जो मूल वस्तु के पूर्व अनुभव के आधार पर स्वीकृत कर ली जाती है तथा पूर्व प्रत्यक्षीकरण की रचना से बहुत भिन्न होती है।” इस प्रकार पुनमरण पूर्व अनुभवों को याद करने की क्रिया है।

पुनर्मरण के आधार (Factors of Recall):
पुनः स्मरण मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

(i) विचारों का साहचर्य (Association of ideas):
कभी-कभी विचारों के साथ उनसे सम्बद्ध अन्य बातों का भी स्मरण आ जाता है। उदाहरणार्थ ताजमहल के साथ शाहजहाँ का लंका के साथ रावण का तथा महाभारत के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण हो जाता है। विचारों के साहचर्य के तीन मुख्य कारण होते हैं –

(अ) समानता:
दो वस्तुओं की पारस्परिक समानता से एक को देखते ही दूसरे का स्मरण हो आता है। जैसे अहिंसा का नाम लेते हैं तो इस सिद्धांत के प्रतिपादक महात्मा गाँधी तथा महावीर जैन का नाम स्मरण आ जाता है।

(ब) विपरीतता:
एक-दूसरे के विपरीत किन्तु परस्पर सम्बन्धित अनुभव भी कुछ स्मरण कराते हैं। जैसे किसी बदमाश को देखकर सज्जन की याद आती है।

(स) सहचारिता:
जब दो विषयों का अनुभव एक साथ हो जाता है तो उसमें से एक का स्मरण होने पर दूसरा भी याद आ जाता है। इसे सहचारिता कहते हैं।

(ii) मानसिक तत्परता:
मानसिक तत्परता से अभिप्राय विचारपूर्वक स्मरण करने से है। जिस अनुभव को पुनः स्मरण करने के लिये व्यक्ति मानसिक रूप से तत्पर होता है वह क्रिया या अनुभव तुरंत पुनः स्मृति में आ जाता है। अतः पुनमरण के लिये मानसिक तत्परता भी प्रभावशाली तत्व है।

(iii) संवेग:
संवेग भी पुनमरण को प्रभावित करते हैं। यदि संवेग अनुकूल होता है तब उसका पुनमरण आसानी से हो जाता है। उदाहरणार्थ, परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने पर परिवार के अन्य दिवंगत व्यक्ति का पुनमरण हो जाता है। वह पुनमरण शोक के संवेग के परिणामस्वरूप ही होता है। इसमें विशेष बात यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि संवेग की अनुकूल अनुभूतियों का ही इस अवस्था में पुनः स्मरण होता है, विपरीत का नहीं। जैसे, विवाहादि के समय किसी की मृत्यु का स्मरण नहीं होता है और मृत्यु के समय किसी उत्सव का स्मरण नहीं होता अर्थात् रोमांच के संवेग द्वारा रोमांचक पुनः स्मरण और शोक के संवेग द्वारा शोकायुक्त।

4. पहचानना (Recognition):
स्मृति की प्रक्रिया का समापन पहचान से होता है। स्मृति में याद, धारणा और पुनमरण द्वारा यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि विषय क्या है, जब यह निश्चित हो जाता है कि चेतना में आने वाला विषय यह है तब उसे पहचान कहा जाता है। इस प्रकार स्मृति विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुजरती हुई पहचान पर अपना वृत्त पूर्ण करती है।

स्मृति की प्रक्रिया द्वारा ‘प्रतिमा’ हमारे मस्तिष्क में बन जाता है। किन्तु जब प्रक्रिया का वृत्त पूर्ण हो जाता है तो प्रतिमा स्पष्ट हो जाती है। उदाहरणार्थ-जब कोई व्यक्ति हमारे सम्मुख आता है तब व्यक्ति की आकृति हमारे मस्तिष्क में बन जाती है, हम सोचने लगते हैं कि इस व्यक्ति को कहीं देखा है या इससे कहीं भेंट हुई है।

हम विभिन्न प्रकार से उसके विषय में घटनाओं का स्मरण करके उस पर विचार करते हैं तब उनका पुनरर्मरण करके अन्त में निश्चित हो जाता है कि उसे कहाँ देखा है या उसकी कहीं भेंट हुई है। व्यवहार के अंदर भी हम देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति काफी समय बाद हमें मिलता है और हम उसकी ओर अनजान से बने देखते हैं तब वह व्यक्ति अनायास ही कह उठता है कि क्या आपने मुझे ‘पहचाना’ नहीं? यह कहने का उसका अभिप्राय उसकी प्रतिमा के स्पष्ट न होने से ही होता है, तब यकायक हम भी कह उठते हैं कि अरे पहचान लिया कि आप अमुक व्यक्ति हैं, यह उनकी स्मृति के लिए पूर्णता का सूचक होता है।

(i) निश्चित पहचान:
जब हम किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से पहचान लेते हैं तथा उससे सम्बन्धित. घटनाओं का भी हमें स्पष्ट स्मरण हो आता है तब इसको निश्चित पहचान कहते हैं।

(ii) अनिश्चित पहचान:
जब हमारे सम्मुख कोई व्यक्ति या वस्तु आती है और हम उसके लिये स्पष्ट पहचान नहीं बना पाते अर्थात् यह तो पहचान लेते हैं कि वह व्यक्ति अपना परिचित है किन्तु उसके सम्बन्धित स्मरण हमें स्पष्ट नहीं हो पाता तब यह अनिश्चित पहचान होती है।

(iii) असत्य पहचान:
जब हम किसी व्यक्ति को पहचानने में असत्य निर्णय ले लेते हैं तब वह असत्य पहचान होती है। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति हमारे सामने आता है और हम किसी अन्य व्यक्ति के साथ उसकी स्मृति को जोड़कर उसे वही समझ लेते हैं तब यह असत्य पहचान होती है।

मनोविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में स्मृति के अंग के रूप में होने वाली पहचान निश्चित पहचान होती है, शेष दोनों भ्रम के क्षेत्र में आती हैं। अतः निश्चित पहचान की पहचानना क्रिया का मनोवैज्ञानिक रूप है।

स्मृति को उत्तम बनाने के साधन:
स्मृति के पूर्ण स्वरूप को समझाने के लिए इसके अर्थ, परिभाषा तथा अंगों को जानने के अलावा इसको उत्तम बनाने के विषय में जानना भी महत्त्वपूर्ण होगा। अच्छी स्मृति बनाने के मुख्य साधन निम्न प्रकार हैं –

(i) उत्तम विधि द्वारा सीखना:
स्मृति का प्रथम मुख्य अंग ‘सीखना’ है। यदि उचित पद्धति द्वारा किसी बात को सीखा जाये तो उसकी स्मृति अच्छी प्रकार होती है। उदाहरणार्थ, यदि हम किसी विषय को उसके अध्ययन के नियमों के अनुसार व्यवस्थित ढंग से पढ़ते हैं तो उसकी स्मृति शीघ्र हो जाती है। इसके विपरीत सीखने की पद्धतियों का उपयोग न करके अव्यवस्थित ढंग से सीखा गया कार्य स्मृति में कठिनता से आता है। अतः उत्तम विधि द्वारा सीखना उत्तम स्मृति का एक अच्छा साधन है।

(ii) प्रबल धारणा:
स्मृति का दूसरा महत्त्व अंग धारण शक्ति है। यदि व्यक्ति की धारणा शक्ति उत्तम होती है तो सीखी गई क्रिया अधिक स्थायी रह सकती है। अन्यथा दुर्बल धारण शक्ति में उत्तम सीखने की विधि भी अधिक सार्थक सिद्ध नहीं होती है। अत: उत्तम स्मृति के लिये प्रबल धारणा का होना भी आवश्यक है।

(iii) निरर्थक तत्वों का विस्मरण:
निरर्थक तत्वों के विस्मरण से अभिप्रेरक विषय से सम्बन्धित गौण बातों को भूल जाने से है। केवल विषय से सम्बन्धित मुख्य बातों को ही हमेशा स्मरण रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, कक्षा में पढ़ते समय जो विषय पढ़ाया जा रहा है वही मुख्य होता है शेष अध्यापक के हावभाव, विद्यार्थियों की शरारतें या अन्य अनेक सम्बन्धी घटक गौण होते हैं। अतः विद्यार्थी यदि विषय के अतिरिक्त अन्य घटनाओं को भी धारण कर लेता है जो निरर्थक होती है तो वह विषय की अच्छी स्मृति नहीं कर सकता। विषय के निरर्थक तत्वों का विस्मरण ही अच्छी स्मृति में सहायक होता है।

(iv) उपयोगिता:
उपयोगिता-वही विषय सार्थक होता है जो उपयोगी होता है। अतः उपयोगी बातों का धारणा करना अच्छी स्मृति के लिये आवश्यक है क्योंकि उपयोगी बातों की आवश्यकता पड़ने पर चेतना के स्तर पर आ जाना अच्छी स्मृति का एक लक्षण है।

(v) सत्य पुनस्र्मरण:
अच्छी स्मृति वही कहलाती है जिसमें पूर्व अनुभव वैसे के वैसे ही चेतना के स्तर पर आ जाते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि स्मृति को अच्छा बनाने के साधनों का उपयोग किया जाये क्योंकि पुनमरण ‘सीखने की विधि’ और धारणा शक्ति पर निर्भर करता है। इन दोनों को सही प्रकार से क्रियान्वित करने पर ही पुनमरण यथार्थ होता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 2.
स्मृति से क्या तात्पर्य है? स्मृति को उन्नत बनाने के उपाय का वर्णन करें।
उत्तर:
स्मृति वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम अपने गत अनुभव को संग्रहित कर उसे वर्तमान चेतना में लाते हैं।

उन्नत बनाने के उपाय:
स्मृति सुथर की बहुत सारी युक्तियाँ हैं जिन्हें स्मृति सहायक संकेत कहा जाता है जो निम्न है –

प्रतिभा के उपयोग से स्मृति सहायक संकेत:
इस प्रकार की स्मृति सुधार विधि में याद की जानेवाली सामग्री तथा उसके इर्द-गिर्द सुस्पष्ट प्रतिभा की रचना की जाती हैं इसमें 2 प्रमुख विधि है –

1. मुख्य शब्द विधि:
इस विधि में से प्रतिभा विकसित करने में परिचित शब्द से सीखे जाने शब्द का संबंध जोड़ना होता है जैसे MAT शब्द परिचित होने से बच्चा CAT शब्द आसानी से सीख लेता है।

2. स्थान-विधि:
किसी वस्तु को याद करने में उसे संबंधित स्थान से जोड़कर उसकी प्रतिभा मन में लाने से विषय याद रहता है।

संगठन के उपयोग से स्मृति सायक संकेत:
संगठन के अर्थ हैं याद की जानेवाली सामग्री में एक क्रम सुनिश्चित करना है संगठित विषय की स्मृति तेज होती है।

1. खंडीयन विधि:
यदि किसी विषय को याद करना है तो उसे खंड में बाँटकर यादकर उसे क्रम में सजाकर स्मृति को उन्नत बनाया जा सकता है।

2. प्रथम अक्षर तकनीक:
इसमें अक्षर तकनीक को प्रयुक्त करने के लिए याद किए जाने वाले प्रत्येक शब्द के अक्षर को लेकर उससे एक वाक्य या शब्द बनाया जाता है। इसके अलावा स्मृति को उन्नत बनाने के अन्य उपाय हैं –

(a) गहन-स्तर पर प्रक्रमण कीजिए:
किसी सूचना को अच्छी तरह से याद करने के लिए गहन-स्तर पर प्रक्रमण करना चाहिए।

(b) अवरोध घटाएँ:
स्मृति उन्नत बनाने के लिए एक विषय को सीखने के बाद दूसरा ऐसा विषय सीखना चाहिए जिसमें विषय साम्य न हो। इसके अलावा अवरोध को कम करने के लिए अध्ययन के दौरान बीच में आराम करना चाहिए।

(c) पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखिए:
किसी विषय को याद करते समय उस सामग्री में निहित कुछ पुनरुद्धार संकेतों को पहचान से और अपने याद करने की सामग्री के अंशों को इनसे जोड़ने से स्मृति उन्नत होती है। इस प्रकार कई प्रविधि और उपाय जिसकी सहायता से स्मृति को उन्नत बनाया जा सकता है। गत अनुभव का स्मरण न होना विस्मृति कहलाता है। अर्थात् विस्मृति (या धारण की किसी जाँच) की असमर्थता है।

कारण:

1. चिह्न हास के कारण विस्मरण:
जब हम किसी विषय को याद करते हैं तो उसके चिह्न मस्तिष्क में बन जाते हैं जिसे स्मृति-चिह्न कहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है स्मृति-चिह्न कमजोर होते जाते हैं। अतः हम विषय को पूरी तरह से भूल जाते हैं इसे अनुप्रयोग सिद्धांत कहा गया है।

2. अवरोध के कारण विस्मरण:
इसे अवरोध सिद्धांत भी कहते हैं इसके अनुसार स्मृति भंडार में संचित विभिन्न सामग्री के बीच अवरोध के कारण विस्मरण होता है सीखने और याद करने में विभिन्न पदों के बीच साहचर्य स्थापित होता है जिससे विषय स्मृति में अक्षत रहता है पुनरुद्धार के समय इसमें अवरोध उत्पन्न होता है जो 2 प्रकार का होता है।

3. अग्रलक्षी अवरोध:
पहले सीखा गया विषय बाद में सीखी गयी क्रिया को याद करने में अवरोध उत्पन्न करता तो अग्रलक्षी अवरोध कहते हैं।

4. पुर्वलक्षी अवरोध:
इसमें बाद में सीखा गया विषय पहले विषय को याद करने में बाधा डालता है।

5. पुनरुद्धार सफलता के कारण विस्मरण:
विस्मरण का एक कारण प्रत्याह के समय पुनरुद्धार के सति का अनुपस्थित रहना भी है पुनरुद्धार के संकेत वे साधन हैं जो हमें स्मृति में संचित सूचना की पुनः प्राप्त करने में मदद करते हैं टलविंग ने अपने सिद्धांत में इसकी विस्मृत: व्याख्या की है। इसके अलावा विस्मरण के कई कारण हैं जैसे विषय का स्वरूप, सीखने की मात्रा, विषय का भावात्मक मूल्य विषय की लंबाई, सीखने की विधि, विषय में रुचि, मस्तिष्क, अद्यात तथा शारीरिक कष्ट, मानसिक, धक्का एवं चिंता, मानसिक पर्यवेक्षण का अभाव।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 3.
लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति के अर्थ एवं विशेषताओं को बतलाएँ। इन दोनों के अंतर पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति का अर्थ (Meaning of short-term memory of STM):
लघुकालीन स्मृति को विलियम जेम्स (WilliamJames) ने प्राथमिक स्मृति (Primary memory or PM) भी कहा है। लघुकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूतियों को मात्र एकाध प्रयास में ही सीख लेता है। शायद यही कारण है कि ऐसी अनुभूतियाँ कमजोर होती हैं। जब व्यक्ति इन अनुभूतियों पर ध्यान देता है या उनका मानसिक रिहर्सल करता है तब उनका विस्मरण नहीं हो पाता है। परंतु, इन तत्वों के अभाव में लघुकालीन स्मृति-चिह्नों का तुरंत लोप हो जाता है जिसके फलस्वरूप विस्मरण विस्मरण होता है।

इस तरह के विस्मरण को चिह्न-आधुत विस्मरण (trace dependent forgetting) कहा जाता है लघुकालीन स्मृति को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझ सकते हैं-मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति किसी अपरिचित व्यक्ति से किसी कारणवश दूरभाष पर बातचचीत करने के लिए उसकी दूरभाष-संख्या दूरभाष निर्देशिका से प्राप्त करता है। व्यस्त सिगनल मिलने पर वह 15 सेकण्ड के लिए रुककर पुनः उसे डाइल करने की कोशिश करता है।

संभव है इस बार वह दूरभाष-संख्या भूल जाए या संख्या का सही क्रम भूल जाए। यह लघुकालीन स्मृति का उदाहरण होगा, क्योंकि यहाँ व्यक्ति दूरभाष संख्या को अधिकतम समय-सीमा (20-30 सेकंड) से कम ही समय तक संचित रख पाया। लघुकालीन स्मृति को अन्य नामों जैसे सक्रिय स्मृति (active memory) तात्कालिक स्मृति (immediate memory), चयन स्मृति (working memory) एवं लघुकालीन संचयन (short term storage) आदि से भी जाना जाता है। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोधों एवं प्रयोगों से STM की कुछ खास विशेषताओं का पता चला है जिनसे इसका अर्थ और अधिक स्पष्ट हो जाता है। अतः इन विशेषताओं का वर्णन यहाँ अपेक्षित है जो इस प्रकार है –

  1. लघुकालीन स्मृति कमजोर (fragile) होती है, परिणामस्वरूप इससे विस्मरण तेजी से होता है।
  2. लघुकालीन स्मृति-उद्दीपनों (stimuli) को हू-ब-हू संचित न करके उन्हें उनकी आवाज (sound) के आधार पर कूटसंकेतीकृत (coding) कर संचित किया जाता है।
  3. मिलर (Miler) के अनुसार STM की संचयनशक्ति (storage capacity) एक समय में 72 अर्थात् अधिकतम 9 तथा न्यूनतम 5 उद्दीपनों की होती है। इसे मनोवैज्ञानिकों ने जादुई संख्या (magic number) कहा है।
  4. लघुकालीन स्मृति की अवधि अधिक-से-अधिक 25-30 सेकण्ड की होती है। पेटरसन एवं पेटरसन (Peterson & Peterson) तथा ब्राउन (Brown) के अध्ययन से इस तथ्य की संतुष्टि होती है। पेटरसन एवं पेटरसन के अध्ययन में तो STM की अधिकतम अवधि 18-20 सेकण्ड की ही पाई गई थी।

दीर्घकालीन स्मृति का अर्थ (Meaning of long term memory or LTM):
दीर्घकालीन स्मृति को विलियम जैम्स (William James) ने गौण स्मृति (secondary memory of SM) भी कहा है। दीर्घकालीन स्मृति से तात्पर्य वैसे स्मृति-संचयन (memory storage) से होता है जिसमें सूचनाओं को व्यक्ति काफी लम्बी अवधि के लिए संचित करता है। इस लम्बी अवधि की न्यूनतम सीमा 20-30 सेकेण्ड तथा अधिकतम सीमा कुछ निश्चित नहीं होती है। संभव है, व्यक्ति किसी सूचना को मात्र 2 घंटे के लिए LTM में संचित रखे या फिर उसे पूरे जीवनकाल के लिए भी संचित रखे। दीर्घकालीन स्मृति की संचय क्षमता (storage capacity) काफी बड़ी होती है और कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसकी क्षमता को असीमित बतलाया है।

इसमें वैसे सूचनाएँ संचित होती हैं जिन्हें व्यक्ति महत्त्वपूर्ण समझता है या जिन्हें वह अभ्यास करके प्राप्त करता है। व्यक्ति की अपनी दूरभाष-संख्या तथा अपने नजदीकी रिश्तेदारों की दूरभाष-संख्या LTM में मुख्य रूप से दो तरह की सूचनाएँ संचित होती हैं। पहली तरह की सूचनाओं का संबंध वैसी सूचनाओं से होता है जो सामयिक घटनाओं (temporal events) के क्रमों (sequences) से संबंधित होते हैं तथा दूसरी तरह की सूचनाओं का स्वरूप कुछ वैसा होता है जो तरह-तरह के संकेतों (symbols) एवं शब्दों के अर्थ आदि से संबंधित होता है। पहली तरह की सूचनाओं को प्रासंगिक स्मृति (episodic memory) तथा दूसरी तरह की सूचनाओं की स्मृति को अर्थगत स्मृति (semantic memory) कहा जाता है। LTM को निष्क्रिय स्मृति (inactive memory) भी कहा जाता है।

LTM के क्षेत्र में किए गए अध्ययनों से इसकी कुछ विशेषताओं (characteristics) का पता चला है जिनसे उसके अर्थ को ठीक ढंग से जाना जा सकता है। ऐसी विशेषताओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. LTM में संचित सूचनाएँ सापेक्ष रूप से (relatively) स्थायी होती हैं जिसके कारण इसे विस्मरण देरी से होता है।
  2. STM में संचित सूचनाएँ मौलिक उद्दीपन से प्राप्त सूचनाओं की कार्बन कॉपी नहीं होती, बल्कि उन्हें अर्थ के आधार पर कूटसंकेतीकृत करके संचित किया जाता है।
  3. LTM में सूचनाएँ संगठित एवं साहचर्यात्मक ढंग से संचित की जाती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जो सूचनाएँ या एकांश आपस में अर्थपूर्ण ढंग से संबंधित होती हैं उन्हें व्यक्ति एक साथ संचित करता है।
  4. LTM में संचित वैसी सूचनाएँ कम सक्रिय होती हैं जो किसी घटना या कार्य के पूरा होने के बाद प्राप्त होती हैं। परंतु वैसी सूचनाएँ जो किसी घटना या कार्य के अधूरा ही रह जाने के फलस्वरूप प्राप्त होती हैं, अधिक सक्रिय होती हैं।

लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर (Distinction between short term memory and long-term memory):
STM तथा LTM में प्रमुख अंतर निम्नांकित प्रकार के हैं –

1. STM में सूचनाएँ अधिक-से-अधिक:
20-30 सेकण्ड के लिए संचित करके रखी जाता हैं, परंतु LTM में सूचनाओं के संचयन की अधिकतम अवधि अनश्चित होती है। यह एक बेटे की भी हो सकती है, एक दिन की भी या फिर पूरे जीवन-अवधि के लिए।

2. STM में सक्रिय एवं सतत रिहर्सल (rehearsal) की प्रक्रिया चलती रहती है। म प्रक्रिया के बंद होते ही सूचनाओं का विस्मरण प्रारम्भ हो जाता है। LTM के साथ ऐसी बात नहीं है। LIM में ऐसी सक्रियता की जरूरत नहीं पड़ती है, हालांकि यह बात जरूर है कि प्रारम्भ में LTM में सूचनाओं को संचित करने में व्यक्ति को अधिक प्रयास करना आवश्यक हो जाते है, परंतु बाद में यह एक निष्क्रिय प्रक्रिया हो जाती है।

3. STM की संचयन:
क्षमता (storge capacity) सीमित होती है और मिलर की जादुई संख्या (magic number) के अनुसार यह क्षमता 7 ± 2अर्थात् 5 से 9 तक की (किसी एक समय में) होती है। LTM के साथ ऐसी बात नहीं है। LTM की संचयन-क्षमता असीमित (unlimited) होती है। इसकी न तो कोई न्यूनतम और न ही कोई अधिकतम संख्या निश्चित होती है।

4. STM से हुए विस्मरण का आधार स्मृति:
चिह्नों का नाश या ह्रास होना होता है जबकि LTM में हुए विस्मरण का आधार सामान्यतः पुनः प्राप्ति संकेतों (retrieval clues) का अनुपलब्ध होना है। पहली तरह के विस्मरण को चिह्न-आधृत विस्मरण (trace-dependent forgetting) तथा दूसरी तरह के विस्मरण को संकेत-आधृत विस्मरण (clue-dependent forgetting) कहा जाता है।

5. STM में संचित सूचनाओं का प्रत्याह्वान (recall) काफी आसान होता है। व्यक्ति थोड़ा-सा साधारण प्रयास से ही संचित सूचनाओं का प्रत्याह्वान कर लेता है। परंतु LTM से सूचनाओं का सही प्रत्याह्वान (recall) या प्रत्याभिज्ञान (recognition) कर पाता है।

6. STM ध्वनि-संकेतीकरण (phonological or accustic coding) से अधिक प्रभावित होता है जबकि LTM अर्थगत संकेतीकरण (semantic coding) से अधिक प्रभावित होता है। ध्वनि-संकेतीकरण में व्यक्ति शब्दों को उनकी ध्वनि में समानता (जैसे-CAT, MAT, SAT, BAT आदि) के आधर पर मस्तिष्क से संचित करता है तथा अर्थगत समानता में व्यक्ति शब्दों को उनके अर्थ अर्थात् (LARGE, TALL, BIG आदि) के आधार पर मस्तिष्कम में संचित करता है।

7. STM में नवीनता:
प्रभाव (recency effect) अधिक देखने को मिलता है जबकि LTM पर प्राथमिकी प्रभाव (primacy effect) अधिक देखने को मिलता है। शब्दों या एकांशों की सूची अतिम भागों में किया गया प्रत्याह्वान नवीनता-प्रभाव तथा प्रथम भागों से किया गया प्रत्याह्वान प्राथमिकी प्रभाव कहलाता है।

8. STM तथा LTM को न्यूरोदैहिक सबूतों (neurophysiological evidences) के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न किया गया है। मिलनर (Milner) के अनुसार कुछ ऐसे नैदानिक सबूत (clinical evidences) मिले हैं जिनमें देखा गया है कि व्यक्ति का LTM गंभीर रूप से प्रभावित था, परंतु STM ठीक था। उसी तरह एक अन्य नैदानिक ने इसमें यह देखा कि व्यक्ति का STM बुरी तरह प्रभावित था परंतु LTM बिल्कुल ठीक था। इन सबूतों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह बतलाया है कि STM तथा LTM दो स्मृति तंत्र हैं जो अलग-अलग नियमों एवं सिद्धांतों से निर्देशित होते हैं।

स्पष्ट हुआ कि STM तथा LTM एक-दूसरे से भिन्न हैं। इन अंतरों के बावजूद कुछ मनोवैज्ञानिकों जैसे लॉकहार्ट एवं क्रैक (Lockhart & Craick) ने यह दावा किया है कि इन दोनों का दो अलग-अलग तंत्र (system) न मानकर एक ही स्मृति तंत्र के दो संबंधित पहलू मानकर चलना अधिक उचित होगा। परंतु उनके विचारों को अधिक समर्थन प्राप्त नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि फिलहाल इन दोनों को एक-दूसरे से भिन्न समझना ही उपयुक्त है।

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प्रश्न 4.
लघुकालीन स्मृति से आप क्या समझते हैं? लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर बतावें।
उत्तर:
जब किसी पाठ या विषय को व्यक्ति सीखता है तब उससे उत्पन्न स्मृति चिह्न को मस्तिष्क में धारण करके रखता है। स्मृति चिह्न जितना ही अधिक समय के लिए मस्तिष्क में बना रहता है, धारण भी उतने ही अधिक समय के लिए बना रहता है। स्मृति चिह्नों को धारण करके रखने की अवधि को कसौटी मानकर स्मृति के दो प्रकार बताए गए हैं-(क) लघुकालीन स्मृति (short term memory) (ख) दीर्घकालीन स्मृति (long term memory)।

इन दोनों का वर्णन इस प्रकार है –

(क) लघुकालीन स्मृति (Short term memory):
लघुकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को अधिकतम 20 से 30 सेकण्ड के लिए संचित करके रख पाता है तथा अनुभूतियों को वह मात्र एकाध प्रयासों में ही सीख लिया जाता है। कोई भी अनुभूति पहले व्यक्ति की लघुकालीन स्मृति में ही प्रवेश करती है। जब व्यक्ति उस अनुभूति पर ध्यान देता है या उसका मानसिक रिहर्सल करता है तब तो उसका विस्मरण नहीं हो पाता है। परंतु, इन दोनों तत्वों के अभाव में लघुकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश तेजी से होता है। फलस्वरूप, इसे विस्मरण भी काफी तेजी से होता है।

लघुकालीन स्मृति को एक उदारहण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि किसी अपरिचित से दूरभाष पर बातचीत करने के लिए हम उसकी दूरभाष संख्या दूरभाष निर्देशिका से प्राप्त करते हैं। ‘व्यस्त सिंगनल’ (busy signal) मिलने पर 20 सेकण्ड रुककर पुनः उसे डायल करते हैं। संभव है कि हम उसकी दूरभाष संख्या भूल जाएँ या संख्या का सही क्रम भूल जाएँ। यह लघुकालीन स्मृति का उदाहरण होगा क्योंकि इससे दूरभाष संख्या को 20 सेकण्ड से कम ही समय के लिए स्मृति संचयन (memory store) में रखा गया था। विलियम जेम्स (William James) ने इसे प्राथमिक स्मृति (Primary memory) कहा है।

(ख) दीर्घकालीन स्मृति (Long term memory):
दीर्घकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को. कम-से-कम 30 सेकण्ड से अधिक समय के लिए निश्चित रूप से संचित करके रखता है। इस तरह की स्मृति में अधिकतम कितने समय तक किसी स्मृति चिह्न को सचित रख जाता है, इसकी कोई समय-सीमा नहीं होती है। शायद यही कारण है कि एक वृद्ध व्यक्ति भी अपने बचपन की अनुभूतियों का आसानी से प्रत्याह्वान कर लेता है।

दीर्घकालीन स्मृति में वैसी अनुभूतियाँ संचित होती हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयास में नहीं बल्कि कई प्रयासों में हासिल करता है। व्यक्ति की अपनी दूरभाष संख्या तथा अपने नजदीकी संबंधियों की दूरभाष संख्या दीर्घकालीन स्मृति में संचित होती है। विलियम जेम्स ने इसे गौण स्मृति (secondary memory) भी कहा है। ऐसी स्मृति में स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है।

लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर (Distinction between short term memory and long term memory):
इन दोनों तरह की स्मृतियों में मुख्य अंतर निम्नांकित हैं –

  • लघुकालीन स्मृति की संचय अवधि (storage duration) अधिकतम 20 से 30 सेकण्ड की होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति में ऐसी कोई अधिकतम समय-सीमा नहीं होती है।
  • लघुकालीन स्मृति में वैसी अनुभूतियाँ होती हैं जो एकाध बार के प्रयास से उत्पन्न हो जाती हैं। परंतु, दीर्घकालीन स्मृति में केवल वैसी ही अनुभूतियाँ होती हैं जिन्हें व्यक्ति कई प्रयासों में काफी अभिरुचि दिखाकर प्राप्त किए हुए होता है।
  • दीर्घकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश तेजी से होता है जबकि लघुकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है। यही कारण है कि दीर्घकालीन स्मृति से विस्मरण की दर काफी धीमी होती है जबकि लघुकालीन स्मृति से विस्मरण की दर काफी तेज होती है।
  • कोई भी अनुभूति पहले लघुकालीन स्मृति में प्रवेश करती है और जब व्यक्ति उसपर ध्यान देता है या उसका मानसिक रिहर्सल करता है तब उसका स्थानांतरण दीर्घकालीन स्मृति में होता है।
  • लघुकालीन स्मृति की संचयन क्षमता (storgae capacity) काफी सीमित होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति की संचयन क्षमता असीमित होती है।

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प्रश्न 5.
क्षणदीय स्मृतियाँ, जीवन चरित स्मृति तथा निहित स्मृतियों का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
मानव स्मृति की जटिल एवं गत्यात्मक प्रकृति के अध्ययन के आधार पर दीर्घकालिक स्मृति को तीन प्रमुख दशाओं से जोड़ा जाता है –

1. क्षणदीप स्मृतियाँ:
आश्चर्यजनक अथवा विस्मयकारी घटनाओं के कारण उत्पन्न उदीप्त करनेवाली सूचनाओं पर आधारित स्मृतियाँ होती हैं। क्षणदीप स्मृतियाँ किसी विशेष स्थान, तिथि एवं समय से जुड़े ऐसे चित्र होते हैं जिसकी स्मृति लगभग स्थिर होती है। क्षणदीप स्मृतियों को बनाने हेतु लगातार प्रयासरत रहते हैं।

2. जीवन-चरित स्मृति:
यह किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ी स्मृतियाँ होती हैं। प्रथम 4 – 5 वर्षों तक की स्मृतियाँ बताना लगभग कठिन होता है जिसे बाल्यावस्था स्मृतिलेस कहा जाता है। 20 के दशक की स्मृतियों की संख्या बहुत अधिक होती है। वृद्धावस्था की स्मृतियों ताजी और प्रेरणादायक होती हैं।

3. निहित स्मृतियाँ:
ये स्मृतियों जिनके प्रति कोई व्यक्ति अनभिज्ञ होता है तथा जो स्वचालित रूप से पुनरुद्धत होती है। अंधकार में कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियों को दौड़ाना निहित स्मृति कहला सकती है क्योंकि यह अनुभव और अभ्यास से प्राप्त ऐसा गुण है जो कब और क्यों उत्पन्न हुआ कोई नहीं बतला सकता है। यह भी पता चला है कि सामान्य स्मृति वाले साधारण लोगों में भी कुछ निहित स्मृतियाँ होती है।

प्रश्न 6.
दमित स्मृतियाँ क्या होती हैं?
उत्तर:
सिगमंड फ्रायड ने बताया है कि लोगों में कुछ अभिधातज अनुभव होते हैं जो संवेगात्मक रूप से दुखदायी होते हैं। धमकी, चोरी, अकाल मृत्यु, धोखा जैसी घटनाओं की याद – भी कष्टदायक होती है। कोई भी व्यक्ति खतरनाक या दुखदायी स्मृति को बनाये रखना नहीं चाहता है। दुखदायी स्मृतियों को लोग अचेतन मन में दमित सामान्य जिन्दगी जीना चाहते हैं।

किसी व्यक्ति के द्वारा कुछ विशेष प्रकार की स्मृति को दबाकर भूल जाने की स्थिति बना लेता है। इस कृत्रिम विस्मरण को दमित स्मृति कहा जा सकता है। दमित स्मृति का कारक भय, आतंक, चिंता, दुख यानी कोई भी भयावह सूचना होती है। यह स्मृति लोप से अलग अवस्था होती है। यह मानसिक विकार भी उत्पन्न कर सकता है। दमित स्मृति की दशा में कोई व्यक्ति जीवन के कठिन यथार्थ के प्रति अपनी आँखें, कान और मन बंद करके, कठिन स्मृति से मानसिक रूप से पालयन कर जाते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्यकारी स्मृति को वेर्डले के दृष्टिकोण के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सन् 1986 में मनोवैज्ञानिक बेर्डले ने अल्पकालिक स्मृति का बहुघटकीय दृष्टिकोण का प्रस्ताव रखा था। बेर्डले के अनुसार अल्पकालिक स्मृति निष्क्रिय नहीं होती बल्कि यह एक कार्य-मेज है जिस पर स्मृति अपने विभिन्न रूपों वाली सामग्री को साथ लिए सजी रहती है। जब कभी लोग किसी संज्ञानात्मक कार्यों के लिए आवश्यक मानते हैं तब यह भंडार अपनी स्मृति भंडार से उचित सूचना प्रदान करती है। इस कार्य-मेज का दूसरा नाम कार्यकारी स्मृति है।

कार्यकारी स्मृति के कई घटक होते हैं –

1. स्वनिमिक घेरा:
इसमें ध्वनियों की सीमित संख्या होती है जो अभ्यास के अभाव में दो सेकण्ड के बाद मिटना प्रारम्भ कर देता है।

2. दृष्टि:
स्थानिक स्केच पेड-इसमें चाक्षुष और स्थानिक सूचनाएँ जमा रहती हैं।

3. बेर्डले केन्द्रीय प्रबंधक:
यह सूचनाओं को स्वनिमिक घेरे से, दृष्टि-स्थानिक स्केच पैड से तथा दीर्घकालिक स्मृति संग्रहित करता है। एक सच्चे प्रबंधक के रूप में यह अवधानिक साधनों का निमतन, सूचनाओं का सही वितरण तथा व्यवहार का परिवीक्षण, नियोजन और नियंत्रण करने में अपनी कुशलता का परिचय देता है। अर्थात् कार्यकारी स्मृति के सभी तीनों घटक अपने-अपने कार्यों के द्वारा बेर्डले के दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

प्रश्न 8.
विस्मरण या भूलने के स्वरूप एवं कारणों का वर्णन करें। अथवा, भूलना क्या है? भूलने के क्या-क्या कारण हैं?
उत्तर:
भूलना एक ऐसी मानसिक क्रिया है जिसमें मस्तिष्क में बने हुए मृत्यु-चिह्न मिट जाते हैं, जिसके कारण पूर्व सीखे हुए विषय का न प्रत्याह्वान किया जा सकता है और न पहचाना जा सकता है। मनुष्य आजीवन सीखता या भूलता रहता है। वह किसी विषय को चाहे कितनी गहराई से क्यों न सीखे उसे एक दिन अवश्य भूल जाता है। इस प्रकार भूलना मानव जीवन का एक तथ्य माना जाता है।

जब भूलना मानव जीवन का तथ्य है तो उसका स्वरूप क्या है? इसे जानना परमावश्यक है। जब हम किसी विषय को सीखते हैं, तो उसके स्मृति-चिह्न मस्तिष्क में बन जाते हैं। इन्हीं स्मृति-चिह्न के सहारे हम सीखे हुए विषय को याद करते हैं। लेकिन समय के व्यवधान के कारण या मानसिक आघात के कारण ये स्मृति-चिह्न कमजोर होते जाते हैं और मिट जाते हैं। इन्हें मिटने पर सीखे हुए विषय को याद नहीं कर पाते हैं, यानी उसे भूल जाते हैं।

विस्मरण के कारण-विस्मरण के निम्नलिखित प्रधान कारण हैं –

1. पाठ्य-विषय का स्वरूप:
भूलना बहुत अंशों में सीखे गए विषय पर निर्भर करता है। जो विषय अधिक रोचक होता है, उसे व्यक्ति अधिक दिनों तक याद रखता है; क्योंकि उसके स्मृति-चिह्न बहुत दिनों तक बने रहते हैं।

दूसरी ओर, जो विषय निरर्थक या अरोचक होते हैं, उनके स्मृति-चिह्न मस्तिष्क पर दुर्बल बनते हैं और उनका साहचर्य पूर्व अनुभूतियों से मजबूती के साथ स्थापित नहीं हो पाता है। इसका फल यह होता है कि समय-व्यवधान के साथ उन विषयों के स्मृति-चिह्न मस्तिष्क से मिटने लगते हैं और अंत में हम उन्हें भूल जाते हैं। अत: विषय के स्वरूप के कारण सार्थक तथा रोचक विषय की अपेक्षा निरर्थक विषयों को हम जल्दी भूल जाती हैं।

2. शिक्षण की मात्रा:
जिस विषय को पूर्णरूप से नहीं सीखा जाता है, उसे हम शीघ्र भूल जाते हैं। अल्परूप से सीखने के कारण मस्तिष्क में स्मृति-चिह्न अच्छी तरह नहीं बन पाते हैं और शीघ्र ही पुनर्संरचना को (reconstruction) कहा है। चाहे विकृति को या संरचना या पुनसंरचना, इन तीनों प्रतिक्रियाओं से स्मृति में त्रुटि उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों ने इस प्रश्न पर काफी गंभीरता पूर्वक विचार किया है कि स्मृति में इस तरह की त्रुटि के क्या कारण हो सकते हैं। इनके द्वारा इस विषय पर किये गये शोधों के आलोक में निम्नांकित चार कारकों को महत्त्वपूर्ण बतलाया गया है –

  • सरल अनुमान (simple inference)
  • रूढ़ियुक्ति (stereotypes)
  • स्कीमा (Schema)
  • विविध कारक (Miscellaneous factors)

इनका वर्णन इस प्रकार है –

1. सरल अनुमान (Simple inference):
व्यक्ति जब किसी एकांश (items) या घटना को पहली बार देखता है या उसके बारे में सुनता है, तो वह उसके आधार पर कुछ अनुमान (inferences) निकालता है और बाद में जब वह उस मौलिक एकांश या घटना का प्रत्याह्वान करता है, तो उसके स्मृति में उस अनुमान के कारण कुछ त्रुटियाँ अर्थात् संरचनात्मक (construtive) या पुरसँरचनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण उस एकांश या घटना या प्रत्याह्वान किया गया अंश पहले से भिन्न हो जाता है।

2. रूढ़ियुक्ति (Stereotypes):
सामाजिक रूढ़ियुक्ति के कारण भी व्यक्ति अपनी स्मृति को नये ढंग से संरचित करता है तथा उसमें विकृति उत्पन्न करता है। रूढ़ियुक्ति से तात्पर्य व्यक्तियों के किसी पूरे समूह या वर्ग के शारीरिक गुणों या शीलगुणों के बारे में लगाये गये अनुमानों से होता हालांकि ऐसा लगाय गया अनुमान शायद ही कभी उस वर्ग के अधिकतर व्यक्तियों के लिए सही होता हो। समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि रूढ़ियुक्ति का प्रभाव सामाजिक अंत:क्रिया पर तो काफी पड़ती है।

3. स्कीमा (Schema):
स्कीमा से तात्पर्य बाह्य वातावरण की वस्तुओं, उद्दीपकों, घटनाओं आदि के बारे में व्यक्ति के ज्ञान तथा उसके पूर्वकल्पनाओं (assumptions) से होता है। अतः स्कीमा का विकास अनुभव (experience) के आधार पर होता है और यह एक तरह का मानसिक ढाँचे के समान होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति नयी सूचनाओं को संशोधित कर उसे वर्तमान सूचनाओं से संबंधित करता है एक बार स्कीमा का निर्णय हो जाने पर वे स्मृति में सूचनाओं के कूटसंकेतन (encoding) संचयन (storage) तथा पुनः प्राप्ति (retrieval) को काफी प्रभावित करते हैं और स्मृति में विकृति (distortion) उत्पन्न करते हैं।

4. विविध कारक (Miscellaneous factors):
कुछ मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति में उत्पन्न विकृति का कारण उपर्युक्त कारकों के अलावा कुछ अन्य कारकों को मानते हैं। जैसे, कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि कूटसंकेतन (econding) के समय मौजूद प्रक्रिया स्मृति में विकृति उत्पन्न करता है। जब व्यक्ति पहली बार किसी विषय या तथ्य को गहण करता है, तो संभव है कि वह उसके विस्तृत संदर्भ पर न ध्यान देकर और मात्र एक सूचना (अर्थात् कब और कैसे यह सूचना प्राप्त हुई) के रूप में ग्रहण करें।

इसी तरह से कभी-कभी व्यक्ति में बाह्य दुनिया (external world) के बारे में एक स्पष्ट प्रत्यक्षण एवं बोध (understanding) की तीव्र इच्छा होती है। इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति किसी वस्तु या घटना के प्रत्यक्षण की विस्तृत (details) को इस तरह से भर देता है या पूरा करता है कि समग्र पैटर्न काफी अर्थपूर्ण एवं व्याख्या योग्य लगता है।

इसका स्पष्ट परिणाम यह होता है कि व्यक्ति के स्मृति में विकृति उत्पन्न हो जाती है अर्थात् वह कई महत्त्वपूर्ण चीजों को अपनी ओर से मौलिक घटना में जोड़ देता है। स्पष्ट हुआ कि स्मृति में संरचनात्मक तथा पुनर्संरचनात्मक प्रक्रियाएँ (reconstructive processes) होते रहती हैं जिससे उसमें विकृति उत्पन्न हो जाती है। स्मृति में उत्पन्न इस तरह के विकृति का आशय (implication) कानूनी प्रक्रिया खासकर प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य (eyewitness testimony) के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 9.
स्मरण की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्मरण करने के लिए यदि मनमानी पद्धति अपनाई जाये तो उसके परिणामस्वरूप किया गया स्मरण अधिक नहीं रह पाता। मनोवैज्ञानिकों के समक्ष भी स्मृति के सम्बन्ध में यही समस्या उत्पन्न हुई। इस समस्या के समाधान के लिये मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग किये तथा उनके आधार पर स्मरण के लिये विभिन्न प्रद्धतियों का प्रतिपादन किया। इस समस्त विधियों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। अतः स्मरण के लिये निम्नलिखित पद्धतियों को अपनाना चाहिये –

1. पुनरावृत्ति स्मरण विधि:
पुनरावृति से अभिप्राय किसी विषय को बार-बार दोहराने से है। अतः इस विधि में एक विषय को बार-बार दोहराकर याद करना पुनरावृति स्मरण विधि कहलाती है। इस प्रद्धति में स्मरण करने केलिये एक विषय को बार-बार दोहराकर याद किया जाता है। उदाहरणार्थ, बच्चे जब किसी कविता को याद करते हैं तो उसे बार-बार दोहराते हैं तथा उस कविता को याद कर लेते हैं।

इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें दिये गये विषय को एक दो बार पढ़कर दोहराया जाता है तथा इसके बाद उसे मन में दोराहते हैं। ऐसा करने से विषय का चित्र मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। जितनी बार विषय को दोहराया जाता है। उनका चित्र उतना ही स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार वह स्थायी रूप धारण कर लेता है। सार्थक विषयों को स्मरण करने में यह विधि अति उत्तम है। इसके द्वारा दैनिक जीवन के कार्यों को भी बार-बार दोहराकर स्मरण किया जाता है।

2. पूर्ण स्मरण स्मृति:
इस विधि में किसी विषय को एक साथ पूर्ण रूप से याद किया जाता है इसलिये इसको पूर्ण विधि (Whole Method) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-यदि किसी बालक को कोई कविता याद करनी होती है तो वह पूरी की पूरी कविता एक साथ पढ़ता है तथा इसी प्रकार अनेक बार उसको पूर्ण रूप से दोहराता है। ऐसा करने से पूरी कविता एक साथ याद हो जाती है।

इस विधि पर मनोवैज्ञानिक श्री लोट्री स्टीफेंस (Lotti Steffens) ने एक प्रयोग किया। उसने एक कविता को पहले पूर्णरूप से अनेक बार पढ़वाया। हर बार पढ़ने पर कविता के स्मरण करने में होने वाली गलतियों को लिखा जाता रहा। इस प्रयोग के परिणामस्वरूप उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण विधि द्वारा स्मरण जल्दी होता है। आशिक विधि द्वारा स्मरण करने से इस विधि द्वारा कम समय लगा।

3. स्मरण की आंशिक विधि:
इस विधि द्वारा स्मरण करने के लिये विषय को विभिन्न भागों में विभक्त कर लिया जाता है तथा एक बार में एक भाग को याद करके बारी-बारी से सभी भागों को कंठस्थ कर लिया जाता है, इस प्रकार यह विधि पूर्ण विधि से एकदम विपरीत है। पेकस्टाइम (Pechstein) नामक मनोवैज्ञानिक ने आशिक विधि और पूर्ण-विधि का एक प्रयोग द्वारा तुलनात्मक परीक्षण किया।

उन्होंने कुछ निरर्थक विषयों को बारह व्यक्तियों को कंठस्थ करने के लिये दिया उनमें से छ: व्यक्तियों को आंशिक पद्धति से तथा छः को पूर्ण विधि से उस सामग्री को कंठस्थ करने के लिये कहा गया। इस प्रयोग के परिणामस्वरूप उसने देखा कि आंशिक विधि से याद करने में पूर्णविधि द्वारा स्मरण की अपेक्षा कम समय लगा। अत: उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि आंशिक विधि द्वारा स्मरण करने में कम समय लगता है।

इस प्रकार कुछ विद्वानों ने आशिक विधि को उत्तम बताया तथा कुछ ने पूर्ण विधि को। किन्तु इन दोनों विधियों को समझने के पश्चात् यह स्पष्ट है कि कुछ विषय सामग्री के लिए आंशिक पद्धति स्मरण के लिए उत्तम है तथा कुछ विषयों के लिए पूर्ण विधि उत्तम है। जैसे निरर्थक तथा अव्यवस्थित सामग्री को स्मरण करने के लिये आशिक पद्धति उत्तम है और व्यवस्थित तथा सार्थक विषय सामग्री पूर्ण विधि द्वारा जल्दी कंठस्थ हो जाती है। इसके अतिरिक्त अधिक लम्बी विषय-सामग्री अंशों में अच्छी याद होती है और छोटी सामग्री पूर्ण विधि से इन दोनों विधियों की उत्तमता व्यक्तिगत भिन्नता से भी प्रभावित होती है। अतः उपरोक्त दोनों ही स्मरण विधियाँ अपने-अपने विषय क्षेत्र के स्मरण के लिए उत्तम हैं।

4. मिश्रित विधि:
मिश्रित विधि आशिक तथा पूर्ण विधि की मिश्रित पद्धति है। इस विधि में दोनों विधियों को अपनाया जाता है। अधिक लम्बे विषयों को कंठस्थ करने के लिये ही इस विधि का प्रयोग किया जाता है। इस विध में एक विषय को पहले पूर्ण विधि द्वारा कंठसी करने का प्रयास किया जाता है तथा बाद में उसे अंशों में विभाजित करके दोहराया जाता है। इस प्रकार अनेक विषयों में यह विधि उत्तम सिद्ध हुई। इस विधि के विषय में मनोवैज्ञानिक काल्पिन ने कहा है, “ये दोनों विधियाँ (आशिक और पूर्ण) एक साथ चलाकर विषय सुगमता से कंठस्थ किया जा सकता है।”

5. क्रमिक तथा समय विभाजन विधि:
इस पद्धति के अनुसार किसी वस्तु को लगातार एक क्रम में याद करने का प्रावधान है। इसमें मानसिक थकान के कारण विश्राम के लिये समय का विभाजन किया जाता है। ऐसा करने से मस्तिष्क की शक्ति शिथिल नहीं होती। प्रयोगों द्वारा यह देखा गया है कि वस्तु याद करते समय यदि विश्राम किया जाये और उस विश्राम के समय में अन्य कोई काम कर लिया जाये तो भी मस्तिष्क की शक्ति नहीं घटती। इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें मस्तिष्क तो शिथिल होने से बचा ही रहता है। साथ ही मस्किष्क में याद किये विषय के स्मृति चिह्न स्थायी बन जाते हैं। आजकल इस विधि का अधिक उपयोग किया जाता है।

6. निरंतर स्मरण विधि:
यह विधि क्रमिक विधि के एकदम विपरीत है। इस विधि द्वारा स्मरण करने में पूरे के पूरे समय को लगातार एक ही समय में याद किया जाता है। इसमें बीच-बीच में विश्राम नहीं किया जाता। इस प्रकार यह निरंतर चलने वाली विधि है। जब तक पूरा विषय याद नहीं हो जाता इसमें कोई व्यवधन नहीं डाला जाता। यह विधि सामान्य रूप से छोटी विषय सामग्री को याद करने में अधिक उपयोगी सिद्ध होती है।

7. सक्रिय विधि:
इस विधि में स्मरण के समय शारीरिक सक्रियता पर अधिक बल दिया जाता है। बहुधा इस विधि द्वारा जोर-जोर से बोलकर विषय को याद किया जाता है। इस विधि के विषय में एविंग हाउस और उसके अनुयायिों का मत है कि यह विधि स्मरण की उत्तम विधि है। इसमें याद करते समय एक रोचकता बनी रहती है जिसके कारण विषय जल्दी याद हो जाता है। अधिक रोचक बनाने के लिये कभी-कभी इस विधि को लयात्मक भी बनाया जाता है।

8. मनन विधि:
यह विधि सक्रिय-विधि के एकदम विपरीत है। इसमें याद करते समय विषय को मन ही मन में दोहराया जाता है। इसके साथ शरीर और वाणी दोनों इस विधि में शिथिल होते हैं। यदि विधि एक जटिल विधि है और सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति इसका उपयोग नहीं कर सकता, किन्तु फिर भी कुछ विशेष विषयों के स्मरण में यह विधि अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती है। अधिकांश गम्भीर विषयों को समझने में यह विधि प्रयोग में लाई जाती है।

9. बौद्धिक विश्लेषण विधि:
जैसा कि इस विधि के नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें विषय को प्रयास करके बौद्धिक विश्लेषण के द्वारा याद किया जाता है। इस विधि द्वारा यह याद किया गया विषय अधिक स्थायी रूप से चेतना स्तर पर अंकित हो जाता है। अतः यह विधि स्मरण की उत्तम विधि मानी जाती है।

10. यांत्रिक विधि:
इस विधि द्वारा याद करने वाले विषय को बिना बौद्धिक विश्लेषण किये सीधे रूप में याद किया जाता है। इस प्रकार यह विधि बौद्धिक विश्लेषण विधि के एकदम विपरीत है, इसमें विषय को बिना विचार के बार-बार दोहराकर याद किया जाता है। यह विधि स्मरण विधियों में अच्छी विधि नहीं मानी जाती क्योंकि इस विधि द्वारा याद किये गये विषय के स्मृति चिह्न अधिक समय तक मस्तिष्क में नहीं टिक पाते। इस विधि को बोध रहित विधि भी कहा जाता है। इसे यांत्रिक विधि इसलिये कहते हैं क्योंकि इसमें व्यक्ति एक यंत्र की भांति काम करता है।

इस प्रकार हमने स्मृति को विभिन्न विधियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करके यह पाया कि स्मरण की कौन-सी विधि सर्वोत्तम है और कौन-सी न्यूनतम है यह निर्णय नहीं किया जा सकता क्योंकि स्मरण की समस्त विधियों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं जिसके आधार पर सभी विधियाँ उत्तम हैं किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि प्रत्येक विधि का विषय की प्रकृति के आधार पर ही समस्त विधियाँ उत्तम हैं। उदाहरणार्थ-लम्बे विषय के लिये आंशिक विधि तथा छोटे विषय को स्मरण करने के लिए आंशिक और व्यवस्थित, सार्थक एवं लघु विषय-वस्तु के लिये पूर्ण विधि महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार स्मरण विधि की उत्तमता विषय-वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करती है। अत: स्मरण स्मृति की विधियाँ उत्तम हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 10.
विस्मरण के व्यवहारवादी या बाधक सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
बाधक सिद्धांत या जिसे हस्तक्षेप सिद्धांत भी कहा जाता है, विस्मरण का एक प्रमुख सिद्धांत है। इस सिद्धांत में विस्मरण की व्याख्या व्यवहारवादियों के नियमों के अनुकूल की गई है। इसलिए इसे विस्मरण का व्यवहारवादी सिद्धांत (behaviourstic theory) भी कहा जाता है। बाधक सिद्धांत का दावा है कि जब किसी पूर्व सीखी गई अनुक्रिया या विषय अर्थात् मौलिक विषय या पाठ का व्यक्ति प्रत्याह्वान (recall) करता है तो उस समय उन सभी अनुक्रियाओं या विषयों, जिन्हें वह मौलिक विषय के पहले तथा बाद में सीख चुका होता है, से उत्पन्न स्मृति-चिह्न आपस में अन्तःक्रिया (interaction) करते हैं।

इस तरह की अंत:क्रिया के दो परिणाम होते हैं-सरलीकरण (facilitation) तथा बाधा (interference)। विस्मरण इसी बाधक परिणाम की अभिव्यक्ति करता है। इस तरह का बाधक प्रभाव जितना अधिक होता है, विस्मरण की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती है। बाधक सिद्धांत की इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि इसमें विस्मरण का कारण मौलिक विषय के बाद सीखे गए विषय या पाठ (अग्रलक्षी अवरोध) दोनों को बतलाया गया है। फलतः बाधक सिद्धांत के दो मुख्य पहलू हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. बाधक सिद्धांत-पूर्वलक्षी या पृष्ठोन्मुख अवरोध (Interference theory retroac tive inhibition) और
  2. बाधक सिद्धांत-अग्रलक्षी अंवरोध (Interference theory:proactive inhibition) इन दोनों पहलुओं का वर्णन निम्नांकित है –

बाधक सिद्धांत-पूर्वलक्षी या पृष्ठोन्मुख अवरोध (Interference theory: retro active inhibition):
पृष्ठोन्मुख अवरोध की व्याख्या बाधक सिद्धांत के अनुसार सबसे पहले मैकग्यूश (McGeoch) द्वारा की गई। इन्होंने इसकी व्याख्या करने के लिए एक विशेष प्राक्कल्पना (hyothesis) बनाई जिसे स्वतंत्र प्राक्कल्पना (independence hypothesis) कहा गया। इस प्राक्कल्पना के अनुसार मौलिक विषय के सीखने से उत्पन्न स्मृति-चिह्न तथा अवरोधक विषय से उत्पन्न स्मृति-चिह्न दोनों ही एक साथ स्वतंत्र रूप से बिना एक-दूसरे को प्रभावित किए संचित रहते हैं।

जब व्यक्ति मौलिक पाठ का प्रत्याह्वान करता है तो मौलिक पाठ के स्मृति-चिह्नों एवं अवरोधक पाठ के स्मृति-चिह्नों के बीच एक तरह की प्रतियोगिता उत्पन्न होती है जिसका परिणाम यह होता है कि मौलिक विषय का प्रत्याह्वान कम हो जाता है, यानी उसकी विस्मरण हो जाता है। मैकग्यूश ने यह भी बतलाया है कि जब मौलिक विषय तथा अवरोधक विषय के बीच समानता होती है तो प्रत्याह्वान के समय दोनों विषयों के स्मृति-चिह्नों में प्रतियोगिता अधिक होती है जिससे व्यक्ति मौलिक विषयों या पाठों का प्रत्याह्वान कम कर पाता है और उसका विस्मरण हो जाता है।

चूंकि मैकग्यूश के इस सिद्धांत में विस्मरण की व्याख्या मौलिक पाठ तथा अवरोधक पाठ के स्मृति-चिह्नों के बीच उत्पन्न प्रतियोगिता के आधार पर होती है, इसलिए इसे अनुक्रिया की प्रतियोगिता सिद्धांत (competition of response theory) भी कहा जाता है । इसे स्थानांतरण सिद्धांत (transfer theory) भी कहा जाता है। क्योंकि मैकग्यूश ने यह भी बतलाया है कि इस प्रतियोगिता के कारण एक तरह का नकारात्मक अंतरण (negative transfer) हो जाता है जिससे मौलिक विषय के प्रत्याह्वान में कमी आ जाती है।

मैकग्यूश ने अपने सिद्धांत में यह भी स्पष्ट किया कि मौलिक विषय या पाठ के प्रत्याहह्वान के समय स्मृति-चिह्नों के बीच हुई प्रतियोगिता की अभिव्यक्ति तीन तरह के सूचक (indices) द्वारा होती है-प्रकट अंत:सूची बलप्रवेश (over interlist iotrusion) जिसमें मौलिक पाठ का प्रत्याह्वान करते समय अवरोधक पाठ (interfering task), स्मृति-चिह्न एक तरह से बलप्रवेश (intrusion) कहते हैं तथा प्रकट अंतरासूची बलप्रवेश (over intraclist intrusion) जिसमें मौलिक पाठ या सूची का प्रत्याह्वान करते समय जिस पद का या एकांश का प्रत्याह्वान करना चाहिए था, उसका प्रत्याहह्वान न करके उसकी जगह व्यक्ति एक-दूसरे पद का प्रत्याह्वान करता है।

अप्रकट बलप्रवेश (covert intrusion) में मौलिक विषय या पाठ का प्रत्याह्वान करते समय अवरोधक पाठ का पद या एकांश व्यक्ति के मन में अपने-आप आ जाता है, फिर उसे गलत समझकर वह प्रत्याह्वान न करके चुप रह जाता है। इन तीनों तरह के बलप्रवेश में प्रथम दो तरह के बलप्रदेश से विस्मरण अधिक होता है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा मैकम्यूश के इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएं निम्नांकित बिन्दुओं पर की गई हैं –

1. मैकग्यूश की इस अनुक्रिया की प्रतियोगिता सिद्धांत की आलोचना मेल्टन एवं इर्विन (Melton & Irvin) द्वारा की गई है। इन लोगों ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर यह बतलाया है कि विस्मरण का कारण मात्र प्रतियोगिता कारक (competition factor) नहीं होता है, बल्कि अन-अधिगम कारक (unlearning factor) भी होता है जिसकी चर्चा तक इस सिद्धांत में नहीं की गई है।

2. मैकग्यूश के इस सिद्धांत के अनुसार अगर मौलिक विषय या पाठ की लम्बाई अधिक है तो छोटा विषय या पाठ की तुलना में उसका विस्मरण अधिक होगा, क्योंकि बड़ा पाठ या सूची होने पर प्रतियोगी पदों या एकांशों की संख्या अधिक हो जाती है जिससे प्रतियोगिता बढ़ जाती है और उसके प्रत्याह्वान में कमी आ जाती है।

3. बाधक सिद्धांत-अग्रलक्षी प्रावरोध या अवरोध (Interference theory : proac tive inhibition):
बाधक सिद्धांत का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू अग्रलक्षी अवरोध की वख्या करना है। जब मौलिक विषय या सूची के प्रत्याहवान में कमी वैसे विषय या सूची के सीखने से उत्पन्न स्मृति-चिह्नों द्वारा की गई प्रतियोगिता के कारण होती है जिसे व्यक्ति मौलिक विषय या पाठ के पहले सीख चुका होता है तो इसे अग्रलक्षी अवरोध कहा जाता है। ग्रीनवर्ग तथा अंडरवुड (Greenberg & Underwood) ने एक प्रयोग किया 10-10 विषय की चार सूचियाँ तैयार करके प्रयोज्य को एक-एक करके सीखने के लिए दी और एक-एक करके 48-48 घंटे के बाद उसका प्रत्याह्वान 69% किया जबकि अंतिम सूची का प्रत्याह्वान मात्र 25% किया।

इसका मतलब यह हुआ कि पहली सूची का विस्मरण 31% हुआ जबकि दूसरी सूची का विस्मरण 75% हुआ। प्रयोगकर्ताओं के अनुसार चौथी सूची का विस्मरण इसलिए अधिक हुआ, क्योंकि इसके पहले प्रयोज्य तीन और सूचियों को सीख चुका था। अंडरवुड तथा पोस्टमैन (Underwood & Postmen), स्टार्क तथा फ्रेजर ने भी अपने-अपने प्रयोगों के आधार पर बाधक सिद्धांत द्वारा अग्रलक्षी अवरोध की उक्त व्याख्या का समर्थन किया है।

कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बाधक सिद्धांत द्वारा अग्रलक्षी अवरोध (Proactive inhibition) की प्रदत्त व्याख्या द्वारा एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की व्याख्या नहीं होती है। सामान्यतः अवरोधक पाठ विराम अभ्यास (distributed practice) से सीखने पर अविराम अभ्यास (massed practice) से सीखने की अपेक्षा अधिक मजबूत होता है। फलत: ऐसी हालत में अग्रलक्ष्मी अवरोध की मात्रा विराम अभ्यास में अविराम अभ्यास की अपेक्षा अधिक होनी चाहिए। अंडरवुड एवं एक्ट्रैण्ड (Underwood & Ekstrand) ने अपने प्रयोग में इसके विरुद्ध तथ्य पाया है।

दूसरे शब्दों में, इन्होंने प्रयोगात्मक अध्ययन में पाया कि जब अवरोधक सूची को विराम अभ्यास देकर सीखा गया था तो अग्रलक्षी अवरोध की मात्रा कम थी, परंतु जब उसे अविराम अभ्यास देकर सीखा गया तो अग्रलक्षी अवरोध की मात्रा अधिक थी। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि बाधक सिद्धांत में विस्मरण के दोनों पहलुओं अर्थात् पृष्ठोन्मुख अवरोध तथा अग्रलक्षी अवरोध की जो व्याख्या की गई है वह अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्या है। यद्यपि कुछ मनोवैज्ञानिक इस सिद्धांत से कुछ बिन्दुओं पर असंतुष्ट अवश्य रहे हैं, फिर भी उसी इस सिद्धांत का कोई सर्वमान्य एवं संगत विकल्प नहीं है।

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प्रश्न 11.
विस्मरण के अनुप्रयोग सिद्धांत या ह्रास नियम या एबिंगहॉस नियम की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
विस्मरण का यह सिद्धांत सबसे पहला है। जिसका प्रतिपादन जर्मन मनोवैज्ञानिक एबिंगहाँस (Ebbinghaus) द्वारा 1885 में किया गया। इस सिद्धांत का दावा है कि जब व्यक्ति किसी पाठ या विषय को सीखता है तो उससे उसके मस्तिष्क में कुछ दैहिक परिवर्तन (physiological changes) होते हैं जिन्हें ‘स्मृति चिह्न’ (memory traces) कहा जाता है। सीखने के बाद जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तो इन स्मृति-चिह्नों का मूल कारण बीते हुए समय में मौलिक पाठ या याद किए गए पाठ (विषय) का अनुप्रयोग (disuse) है अर्थात् उसका नहीं दोहराना है। अनुप्रयोग के कारण स्वभावतः स्मृति-चिह्न क्षीण हो जाते हैं जिसके कारण सीखे गए पाठ का विस्मरण हो जाता है।

एबिंगहॉस के इस सिद्धांत की उक्त व्याख्या से यह स्पष्ट है कि इसमें विस्मरण के मुख्य तीन कारण बतलाए गए हैं –

  1. सीखने के बाद समय का बीतने जाना। समय-अंतराल जितना ही अधिक होगा विस्मरण की मात्रा उतनी ही अधिक होगी।
  2. बीते हुए समय में मौलिक पाठ या विषय को नहीं दोहराना अर्थात् उसका अनुप्रयोग (disuse) करना।
  3. समय बीतने और उसमें विषय या पाठ का अनुप्रयोग होने से स्मृति-चिह्नों का ह्रास होना।

यद्यपि यह सिद्धांत अपने समय का एक काफी महत्त्वपूर्ण रहा है, किन्तु आज इसकी मान्यता समाप्त हो गई है। इसकी व्याख्या को पौराणिक व्याख्या माना जाता है। इस सिद्धांत की आलोचना भी काफी हो गई है। इसकी व्याख्या को पौराणिक व्याख्या माना जाता है। इस सिद्धांत की आलोचना भी काफी हो गई है। इसकी प्रमुख आलोचनाओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. कई प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि विस्मरण का कारण मात्र समय का बीतना नहीं होता है बल्कि जब व्यक्ति उस समय-अंतराल में नई-नई अनुभूतियों को सीखता है तो इससे पहले सीखे गए पाठ या विषय के प्रत्याह्वान (recall) में बाधा पहुँचती है जिससे भी विस्मरण होता है। मुलर एवं पिल्जेकर (Muller & Pilzecker) ने तथा जेनकिन्स एवं डैलेनबैक (Jankins & Dallenback) ने भी अपने-अपने प्रयोगों से इस तथ्य की संतुष्टि की है कि विस्मरण का कारण समय का बीतना नहीं होता है बल्कि उस समय अंतराल में कुछ नई अनुभूतियों को प्राप्त करना होता है। दूसरे शब्दों में, विस्मरण का कारण पृष्ठोन्मुख अवरोध (retroactive inhibition) होता है।

2. विलोपन (extinction) से मिले तथ्य भी हास या अनुप्रयोग सिद्धांत के प्रतिकूल माने जाते हैं। विलोपन की प्रक्रिया में व्यक्ति के सामने उद्दीपन (stimulus) दिया जाता है और व्यक्ति उस उद्दीपन के प्रति सही अनुक्रिया भी करता है, परंतु अनुक्रिया देने के बाद मात्र पुनर्बलन (reinforcement) नहीं दिया जाता है। इस तरह से इस अध्ययन में उद्दीपन-अनुक्रिया मजबूत होने के बजाय कमजोर होती चली जाती है।

3. स्वतः पुनर्लाभ (spontaneous recovery) तथा संस्मरण (reminiscence) की घटना से भी अनुप्रयोग सिद्धांत की आलोचना होती है। ये दोनों मनोवैज्ञानिक घटनाएँ कुछ ऐसी हैं जिनमें समय बीतने के साथ ही मौलिक विषय या पाठ में हास होने के बदले वृद्धि होती है, हालांकि इस समय-अंतराल में व्यक्ति उस सीखे गए विषय को कभी दोहराता नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में सिद्धांत की व्याख्या के अनुसार सीखे गए विषय या पाठ का विस्मरण होना चाहिए था कि उसकी धारणा में वृद्धि होनी चाहिए थी। उपर्युक्त आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि विस्मरण का कारण समय का बीतना नहीं होता। अत: अनुप्रयोग सिद्धांत को विस्मरण का एक वैज्ञानिक सिद्धांत न मानकर एक अनुपयुक्त सिद्धांत कहना अधिक उचित होगा।

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प्रश्न 12.
याद करने से संबंधित विधियों तथा नियमों के महत्त्व के अतिरिक्त कर्ता में क्या-क्या अतिरिक्त विशेषताएँ होनी चाहिए?
उत्तर:
स्मृति सहायक संकेत तथा आधुनिक बोधगम्य उपागम के परामर्शों का शत-प्रतिशत पालन करने पर भी कुछ घात अच्छे अंक नहीं प्राप्त कर पाते हैं। सच तो यह है कि ऐसी कोई भी विधि या नियम या शैली या पद्धति नहीं है जो याद करने से संबंधित सारी समस्याओं का समाधान बनकर रातोंरात स्मृति में सुधार ला दे। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अपनायी जाने वाली विधियाँ निरर्थक एवं बेकार हैं। अच्छी स्मृति के लिए सभी प्रचलित विधियों के अलावे निम्नांकित कारकों पर भी ध्यान देना आवश्यक है –

  1. शारीरिक स्वास्थ्य
  2. सीखने के प्रति रुचि एवं ललक
  3. सीखने के लिए प्रेरक दृष्टांत
  4. कलम, कागज, पुस्तक, प्रकाश, मेज परिवेश आदि का अनुकूल प्रबंधन

अतः स्मृति के विकास के लिए, सिद्धांत साधन के अलावा सुधार सम्बन्धी युक्तियों को समझने तथा साधनों के संचालन का ज्ञान भी आवश्यक है। आज तकनीकी ज्ञान तो सभी के लिए अनिवार्य बनता जा रहा है।

प्रश्न 13.
विस्मरण वक्र पर नोट लिखें।
उत्तर:
विस्मरण के संबंध में किये गये प्रयोग से यह अनुमान लगाया गया कि शिक्षण के ‘बाद पहले 20 मिनट की अवधि में ही 47% सीखे गए निरर्थक नदों का विस्मरण हो गया, 24 घंटों, अर्थात् 1 दिन के अंतर पर 66%, 2 दिनों में 72%,3 दिनों में 79% विस्मरण हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि सीखने के बाद धारण-मध्यांतर काल के प्रारम्भ में विस्मरण बड़ी तेजी के साथ हुआ और धीरे-धीरे जैसे-जैसे समय अंतराल की अवधि बढ़ती गई, विस्मरण की गति भी धीमी होती गई। ऊपर के आँकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सीखने के तीसरे और 31 वें दिन के बीच भूलने की मात्रा 79% – 72% = केवल 7% हुई, जबकि पहले 2 दिनों के अंदर ही वे सीखे गए पदों में 72% पद भूल गए। एबिंगहॉस द्वारा निर्मित उपर्युक्त वक्र की निम्नलिखित कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं –

1. उपर्युक्त विस्मरण:
वक्र को देखने से यह स्पष्ट पता चलता है कि विस्मरण की गति या दर सदा एक-सी नहीं होती। अर्थात् भूलने की गति एक नियमित या स्थिर गत से नहीं बढ़ती। सीखने की क्रिया के तत्काल बाद भूलने की क्रिया बहुत अधिक तीव्र या तेज होती है और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, सीखे गए विषय के शेष अंश अधिक-से-अधिक दृढ़ या स्थायी (fixed) होते जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति सीखे हुए विषय में से अधिकांश बातों को सीखने के तुरंत बाद ही भूलता है तथा बाद में इसकी (भूलने की) गति धीमी पड़ जाती है, जिससे भूलने की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

2. विस्मरण वक्र (forfetting curve) से यह भी स्पष्ट होता है कि भूलने का एक प्रधान कारण समय व्यवधान या अन्तराल की अवधि है। एबिंगहॉस के अनुसार जो अनुभव जितना पुराना होता है, उसकी स्मृति भी उतनी ही क्षीण होती जाती है। इसका अर्थ यह है कि सीखने की क्रिया समाप्त होने के तुरंत बाद उनका अधिकांश विस्मृत हो जाता है।

फलस्वरूप, जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तत्काल भूले हुए अंश उपयोग में नहीं रहते, क्योंकि व्यक्ति न तो उन अंशों को बाद में दुहरा पाता है और न उन्हें मानसिक रूप से पुनर्जीवित ही कर पाता है। फलतः उन अनुभवों का उपयोग नहीं होता। अतः सीखे गए अनुभवों का अनुप्रयोग ही भूलने का कारण है। इस दृष्टिकोण से भूलना एक निश्चेष्ट या निष्क्रिय प्रक्रिया है। अस्तु, सीखना जितना भी पुराना होता जाता है, उसकी स्मृति भी उतनी ही कमजोर पड़ती जाती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विस्मरण के स्वरूप को समझने का सर्वप्रथम क्रमिक प्रयास किसने किया:
(a) एबिंगहास
(b) गिब्सन
(c) बार्टलेट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) एबिंगहास

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिगम क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिचय एवं परिभाषा-अभ्यास और अनुभव के कारण व्यवहार में या व्यवहार की क्षमता में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन को अधिगम कहा जाता है। कभी-कभी मानवीय व्यवहारों में अस्थायी अथवा क्षणिक परिवर्तन देखे जाते हैं। इस श्रेणी का परिवर्तन अधिगम नहीं कहलाता है जैसे, संगीत के प्रति उत्पन्न रुझान को अधिगम मान सकते हैं।

यदि यह परिवर्तन स्थायी हो जाए और प्रभावित व्यक्ति संगीत के सभी कार्यक्रमों में भाग लेने की तत्परता दिखाने लगे, लेकिन बेटे की गलती के कारण माँ का रौद्र रूप अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि पीटने वाली माँ कुछ ही देर बाद बच्चे को सहलाने लगती है। अर्थात् उत्पन्न गुस्सा से माँ के व्यवहार में आने वाला परिवर्तन बिल्कुल अस्थायी होने के कारण अधिगम नहीं कहला सका।

अधिगम की विशेषताएं-अधिगम की प्रक्रिया से संबंधित कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है:
उदाहरण के रूप में, एक ऐसे व्यक्ति के व्यवहार पर विचार करते हैं जो चाय पीने वाले को देखकर हँसी उड़ाता था और आज वह चाय पीने का लत का स्वयं शिकार बनकर रोज सात बजे सुबह चाय की दुकान पर पहुंचकर बोलता है कि चाय नहीं पीने से सर दर्द होने लगता है। उस व्यक्ति में चाय की लत स्थायी रूप ले चुकी है।

इसी तरह भींगे हाथ से बिजली का स्विच दबाते ही झटका महसूस करने वाला लड़का स्विच को छूने से डरने लगा है। स्विच के प्रति लड़का के आचरण या व्यवहार में आने वाला अन्तर भी अधिगम माना जाएगा। किन्तु, क्रिकेट में भारत की हार का समाचार सुनते ही मूर्च्छित होकर गिर जाने वाले लड़का के व्यवहार में आने वाला अस्थायी अन्तर अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि सभी दुखद समाचार के प्रभाव से वह मूर्च्छित नहीं हो पाता है।

2. अधिगम के कारण व्यवहार में होने वाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं:
थकान, औषधि, आदत के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अस्थायी होने के कारण अधि गम नहीं कहलाते हैं लेकिन नहीं खाने पर कमजोरी महसूस करने वाला परिवर्तन स्थायी होने के कारण अधिगम कहलाने का अधिकार रखते हैं।

3. अधिगम में मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक क्रम होता है:
बच्चे को अंग्रेजी सिखलाने वाला सर्वप्रथम यह जानना चाहता है कि बच्चा कितने बड़े शब्द भंडार या व्याकरण के नियमों की जानकारी रखता है। इसके बाद वह यह जानने का प्रयास करता है कि बच्चा के पास किस प्रकार के शैक्षणिक साधन (किताब, कॉपी, पेन्सिल) उपलब्ध है। तीसरे क्रम में वह पता लगाता है कि बच्चा अंग्रेजी सीखने की ललक रखता है या नहीं।

अंत में वह सभी तरह से संतुष्ट होकर अंग्रेजी पढ़ाने लगता है। कुछ ही दिनों के बाद बच्चा अंग्रेजी में बातचीत करने में गौरव महसूस करने लगता है। अंग्रेजी के प्रति बच्चे के व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक निश्चित क्रम का स्थायी परिणाम है। अतः इसे अधिगम की श्रेणी में रखा जा सकता है।

4. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है:
निष्पादन किसी व्यक्ति का प्रेक्षित व्यवहार या अनुक्रिया है। एक व्यक्ति कार चलाने की कला (ड्राइवरी) सीखने के लिए अपनी माँ से पैसा लेता है। वह कभी प्रशिक्षण में शामिल होता कभी नहीं लेकिन माँ को अच्छी जानकारी का झांसा दिया करता है। समय समाप्त होने पर माँ उसे कार चलाने को कहती है।

वह व्यक्ति कार को शहर के भीड़वाले रास्ते से होकर माँ को मन्दिर तक पहुँचा देता है। कार चला लेना ही प्रशिक्षण का अंतिम पड़ाव था जिसमें वह व्यक्ति सफल रहा। उस व्यक्ति के व्यवहार से माँ प्रयास का सफल निष्पादन मानते हुए लड़के को सफल चालक के रूप में स्वीकार कर लिया। माँ का यह अनुमान कि लड़का कार चलाना सीख चुका है, अधिगम का एक उदाहरण कहलाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन किस प्रकार साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है और एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के आने की सूचना देने वाला बन जाता है। यहाँ एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के घटित होने की सम्भावना प्रकट होती है।

भरपेट भोजन करने के उपरान्त मनपसन्द मिठाई से भरी थाली को देखते ही एक व्यक्ति के मुँह में लार का उत्पन्न होना एक अनुबंधित अनुक्रिया का उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राचीन अनुबंधन कहलाने वाले अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम ईशान पी पावलव ने किया था। उन्होंने कुत्ता को माध्यम बनाकर उद्दीपकों तथा अनुक्रियाओं के पारस्परिक संबंध को पूर्णतः समझना चाहा।

प्रयोग की शुरूआत में उन्होंने एक कुत्ता को एक बॉक्स में बंद कर दिया बॉक्स के अन्दर कुत्ते के लिए भोजन (मांसचूर्ण) वहुँचाया गया। कई दिनों तक भूखा रखने के बाद जब उसे भोजन पाने का अवसर मिला तो कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। पाइप और मापक बेलन की सहायता से उत्पन्न लार की माप रखी जाने लगी। कई दिनों तक कुत्ते को भोजन देने के पूर्व घंटी बजाई जाती। एक दिन घंटी के ध्वनि सुनते ही कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। घंटी का आवाज भोजन पाने की आशा के बीच साहचर्य संबंध स्थापित हो चुका था।
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सारांशतः प्रयोग से पता चला कि प्रारम्भ में दिया गया भोजन अनुबंधित उद्दीपक (US) जैसा बर्ताव किया और परिणामतः लार का निकलना अननुबंधित अनुक्रिया (UR) का काम किया। प्रयोग के अंत में जब घंटी बजाकर भोजन नहीं दिया गया तो ध्वनि की उपस्थिति में लार निकलने लगता है। इस स्थिति में घंटी को अनुबंधित उद्दीपक (CS) तथा लार स्राव को अनुबंधित अनुक्रिया (CR) जैसा बर्ताव करता हुआ पाया गया। यहाँ एक प्राणी दो उद्दीपकों के मध्य साहचर्य को सीखता है। एक तटस्थ उद्दीपक (अनुबंधित उद्दीपक, एक अननुबंधित उद्दीपक (CS) के आने का संकेत देता है। अनुबंधित उद्दीपक के परिवर्तन होते ही वह अननुबंधित उद्दीपक के आने की प्रत्याशा में अनुबंधित अनुक्रिया (CR) करने लगता है।

एक छोटा बच्चा एक फूले हुए गुब्बारे पर ज्योंहि हाथ लगाता है त्योंहि वह तेज ध्वनि के साथ फट जाता है। बच्चा डर जाता है और अब बच्चा किसी दूसरे गुब्बारे को छूने से डरने लगता है। इस स्थिति में अनुबंधित उद्दीपक (CS) के रूप में गुब्बारे तथा अनुबंधित उद्दीपक के (CS) के रूप में तीव्र ध्वनि की पहचान होती है। इस प्रकार प्रयोग एवं प्रक्षेणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन अनुबंधन साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 3.
क्रिया प्रसूत अनुबंधन की परिभाषा दीजिए। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारकों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
क्रिया प्रसूत अनुबंध की परिभाषा-“मानवों अथवा जानवरों द्वारा ऐच्छिक रूप से प्रकट किये जाने वाले व्यवहार या अनुक्रियाओं को जो उनके नियंत्रण में रहती है, क्रिया-प्रसूत माने जाते हैं।” या क्रिया प्रसूत नामक व्यवहार का अनुबंधन ‘क्रिया प्रसूत’ अनुबंधन कहा जाता है। इसमें प्राणी पर्यावरण में सक्रिय रहता है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन का अन्वेषण सर्वप्रथम बी. एफ. स्किनर के द्वारा किया गया था जो पर्यावरण में सक्रियता प्राणियों की ऐच्छिक अनुक्रियाओं पर आधारित प्रयोगों द्वारा पूरा किया गया था। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारक-क्रिया प्रसूत अनुबंधन अधिगम का एक प्रमुख भेद (प्रकार) है जिसमें अनुक्रिया को प्रबलन द्वारा मजबूत बनाया जाता है।

कोई भी घटना या उद्दीपक एक प्रबलक हो सकती है जो किसी वांछित अनुक्रिया को घटित होने की संभावना को बढ़ाता है अर्थात् पूर्वगामी अनुक्रिया को बढ़ाती है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन की हर प्रबलन के प्रकार (धनात्मक या ऋणात्मक) प्रबलित प्रयासों की संख्या, गुणवत्ता (उच्च या निम्न) प्रबलन अनुसूची (सतत अथवा आशिक) और प्रबलन में विलम्ब से प्रभावित होती है। अनुबंधित की जाने वाली अनुक्रिया अथवा व्यवहार का स्वरूप’ को भी एक कारक का स्थान दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अनुक्रिया के घटित होने और प्रबलन के बीच का अंतराल भी क्रिया प्रसूत अधिगम को प्रभावित करनेवाला कारक माना जाता है।

प्रबलन के प्रकार:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो पूर्व में घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं। प्रबलन का विभाजन दो तरह से किया गया है –

(क) धनात्मक प्रबलक और ऋणात्मक प्रबलक तथा
(ख) प्राथमिक प्रबलक और द्वितीयक प्रबलक

प्रत्येक प्रबलन अनुसूची (व्यवस्था) अनुबंधन की दिशा को अपने – अपने ढंग से बदलती है। अर्जन प्रयास के दिये जाने के क्रम के आधार पर पता चला है कि आंशिक प्रबलन, सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति अधिक विरोध प्रदर्शित करता है। विलंबित प्रबलन-किसी भी प्रबलन की प्रबलनकारी क्षमता विलम्ब के साथ-साथ घटती जाती है। अर्थात् प्रबलन प्रदान करने में बिलम्ब से निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है । जैसे, विलम्ब से मिलने वाले बड़े पुरस्कार की तुलना में शीघ्रता से कार्य कारक के तुरंत बाद मिलने वाला छोटा पुरस्कार अधिक पसन्द किया जाता है।

व्यवहार का स्वरूप:
अधिगम के द्वारा मिलने वाले परिणाम को अच्छा या बुरा, हितकारी या हानिकारक ध्वनि में व्यवहार का स्परूप प्रभावी होता है। अच्छा व्यवहार सुन्दर परिणाम का कारण बन जाता है। प्रबलन का बीच का अंतराल-क्रिया प्रसूत अधिगम को सफलतापूर्वक समाप्त किये जाने में प्रयास के रूप प्रबलन आरोपित करने के क्रम तथा दो प्रबलन के बीच की अवधि में विस्तार प्रबलन के प्रभाव को घटा-बढ़ा सकता है। धनात्मक प्रबलक सुखद परिणाम वाले होते हैं क्योंकि ये भोजन, पानी, धन, प्रतिष्ठा, सूचना-संग्रह आदि के माध्यम से विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होते हैं। फलतः एक धनात्मक प्रबलन के मिलने के पहले जो अनुक्रिया घटित होती है, उसकी दर बढ़ जाती है।

ऋणात्मक प्रबलन, परिहार अनुक्रिया अथवा पलायन अनुक्रिया सिखाते हैं, जैसे जाड़े से बचने के लिए स्वेटर पहनना, आग के डर से भाग जाना। अतः खतरनांक उद्दीपकों से दूर भागने की प्रवृत्ति को जगाना क्योंकि यह ऋणात्मक प्रबलन से जुड़ा होता है। अर्थात् ऋणात्मक प्रबलक अपने हटने या समापन से पहले घटित होनेवाली अनुक्रिया की दर को बढ़ा देता है। प्राथमिक प्रबलक जैविक रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है।

द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच संबंध बनाकर प्रबलक की विशेषताओं को स्पष्ट कर देता है। इसके अन्तर्गत धन, प्रशंसा और श्रेणियों का उपयोग जैसी स्वाभाविक वृत्ति को बढ़ावा मिलता है। प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति-प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति से उन प्रयासों का बोध होता है जो उद्दीपन की अनुक्रियता को प्रभावित करता है। उचित परिणाम में भोजन-पानी की उपलब्धता की उपस्थिति में बार-बार का प्रयास एक परिणामी निष्कर्ष को पान में समर्थ हो सकता है। अतः क्रिया-प्रसूत की गति आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है।

प्रबलन की गुणवत्ता:
आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है। क्रिया-प्रसूत अथवा नैमेत्तिक अनुबंधन की गति सामान्यत: जिस अनुपात में उसकी गुणवत्ता बढ़ती है।

प्रबलन अनुसूचियों:
अनुबंधन से सम्बन्धित प्रयासों के क्रम में प्रबलन उपलब्ध कराने की व्यवस्था के रूप में अनुबंधन की दिशा प्रभावित होती है।

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प्रश्न 4.
एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। अधिगम के उस प्रकार पर विचार-विमर्श कीजिए जो इसका समर्थन करता है।
उत्तर:
बच्चे स्वभाव से नकलची होते है। उनकी सम्पूर्ण क्रिया-विधि पर परिवेशीय क्रियाकलापों की गहरी छाप देखने को मिलती है। बच्चे किसी भी क्रिया के सम्पादन विधि को बड़ी ध्यान से देखते हैं और तुरंत बाद स्वयं उस क्रिया को दुहराने के फिराक में रहते हैं। अर्थात् शिशु अपने घर-परिवार अथवा सामाजिक उत्सवों एवं समारोहों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं जहाँ उन्हें मनपसन्द दृश्य और प्रेरणादायक क्रिया-विधि देखने को मिलता है। शिशु प्रौढ़ व्यक्तियों के अनेक प्रकार के व्यवहारों को ध्यान से प्रेक्षण करके सब कुछ सीखने का प्रयास करते हैं।

समारोह एवं उत्सव के अवसर समाप्त हो जाने के बाद वे देखे गये क्रियाकलापों को अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। विवाह पद्धति, जन्मदिन समारोह, चोर-सिपाही, घर में होनेवाले साफ सफाई का जीवंत वित्रण करने के लिए तरह-तरह के स्वांग रचते हैं। यहाँ तक कि माता-पिता को विवाह करते देखकर वे भी काल्पनिक रूप से माता-पिता का अभिनय करके उन्हीं सब बातों को दुहराते हैं जो वे अपने घर में सुन रखा था। अत: बच्चे अधिकांश सामाजिक व्यवहार प्रौढ़ों को प्रेक्षण तथा उनकी नकल करके सीखते है। वे कपड़ा पहनना, शिक्षक बनकर छात्रों को डाँटना, फोन करना, टी.वी. चलाना, अतिथियों का आदर-सत्कार करना जैसे सभी कार्यों को बड़ों की नकल करके ही सीख लेते हैं।

सच तो यह है कि बढ़ते हुए शिशु में व्यक्तित्व का विकास, आचरण की अच्छाई, व्यवहार में कुशलता, चाय-पानी पीने का तरीका, मनपसन्द भोजन का चयन आदि प्रेक्षणात्मक अधिगम के द्वारा ही संभव होता है। दयालुता, परोपकार, आदर, श्रम-साधना, आलस्य का परित्याग के साथ-साथ तम्बाकू खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, आक्रामक व्यवहार को अपनाना जैसी अच्छी-बुरी आदतों या जानकारियों का मुख्य आधार प्रेरणात्मक अधिगम अथवा भूमिका प्रतिरूप ही होता है। अतः एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अधिगम के सभी प्रकारों में सीखने-जानने की विधि भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती है लेकिन उनमें से प्रेरणात्मक अधिगम शिशुओं के स्वभाव और आवश्यकता के अनुकूल होता है। शिशुओं के द्वारा अनुकरण करने की क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रौढ़ों को अच्छे। भूमिका-प्रतिरूप के प्रदर्शन में संकोच नहीं करना चाहिए। प्रेरणात्मक अधिगम का शिशुओं पर इतना अच्छा प्रभाव पाया गया कि इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाने लगा। शिशु दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण करते हैं और यथासंभव प्रौढ़ों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। व्यवसाय क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उपभोक्ता बनाकर पेश करके अपने उत्पादन की खपत को बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

मनोवैज्ञानिक बंदूरा और उनके सहयोगियों ने भी अध्ययन एवं प्रयोग के आधार पर प्रेरणात्मक अधिगम को शिशुओं के विकास के लिए अनुकूल बताया है। बंदूरा ने प्रेक्षण का महत्व समझने के लिए शिशुओं पर आधारित एक प्रयोग किया। प्रयोग में शिशुओं की तीन अलग टोलियों को चंद मिनट का फिल्म दिखाया। एक फिल्म में आक्रामक व्यवहार करनेवाले को इनाम एवं प्रशंसा पाते हुए दिखाया गया। दूसरे फिल्म में गलती करने वाले को दण्ड पाते दिखाया गया। तीसरे फिल्म में दिखाया गया कि आक्रामक रुख की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती है। इसे स्वाभाविक वृत्ति मानकर लोग उस ओर ध्यान नहीं देते है।

प्रयोग के अंत में तीनों टोलियों को एक साथ मिलाकर आक्रामक व्यवहार करने वाले प्रतिरूप (खिलौना) को उनके बीच छोड़ दिया गया। प्रेक्षक छिपकर प्रतिक्रिया का अवलोकन करता रहा। प्रेक्षण के अवलोकन के आधार पर निर्णय किया गया कि जो बच्चा आक्रामक को इनाम पाते देखा था वह शांत रहा और जिसने दंड पाते देखा था वह क्रोध की मुद्रा बनाकर खिलौने को फेंककर उसे आहत करने का प्रयास किया। अतः अनुकरण के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रेक्षण द्वारा अधिगम की प्रक्रिया में प्रेक्षक मॉडल (प्रतिरूप) के व्यवहार का प्रेक्षण करके जानकारी हासिल करता है परन्तु आचरण की दिशा देखे गये दृश्य पर निर्भर करता है।

इसी प्रकार, यदि कागज की नाव बनाने की कला का प्रदर्शन बच्चों के समक्ष किया जाए तो अधिकांश बच्चे कागज उपलब्ध होते ही उसे नाव बनाने में समाप्त कर देंगे। यह भी पाया जाता है कि बच्चे मोबाइल लेकर माता-पिता की भाषा में बात-चीत करने लग जाते हैं। रीमोट का प्रयोग कर माता-पिता के पसन्द का कार्यक्रम देखने का प्रयास करते है। इस प्रकार तय होता है कि विकास करते शिशुओं का भला चाहने वाले सदा प्रेरक कहानियों, सुन्दर आचरण, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग आदि से सम्बन्धित अच्छी भूमिका प्रस्तुत करें जिसे शिशुओं का भविष्य उज्जवल हो।

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प्रश्न 5.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों की व्याख्या कीजिए। या, वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधि का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
मनुष्य अपनी भावना तथा आवश्यकताओं को प्रकट करने में दूसरे के अर्जित झान को अपनाने में तथा संभावित घटनाओं को बतलाने में शब्द को माध्यम बनाता है। मानव बोलकर, सुनकर, लिखकर या पढ़कर शब्दों की महत्ता को बतलाया है। वाचिक अधिगम को अनुबंधन से भिन्न मानते हुए मात्र मनुष्यों तक ही सीमित माना है।

मनोवैज्ञानिक वाचिक अधिगम की प्रक्रिया को समझने तथा प्रयोग में लाने के लिए कई तरह की सामग्रियों का उपयोग करते हैं। जैसे निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, अपरिचित शब्द, वाक्य तथा अनुच्छेद। इस अधिगम को उपयोग में लाने के लिए कई विधियों का विकास किया गया है जिनमें से निम्नलिखित तीन विधियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं –

(क) युग्मित सहचर अधिगम:
परिचय-प्रस्तुत विधि उद्दीपक-उद्दीपक अनुबंधन और उद्दीपक अनुक्रिया अधिगम के समान होती है।

प्रयोग का उद्देश्य:
अपनी मातृभाषा के शब्दों के पर्याय सीखने में इस विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम युग्मित सहचरों की एक सूची बनाई जाती है जिसमें युग्मों का पहला शब्द उद्दीपक तथा दूसरा. शब्द अनुक्रिया के रूप में अपनाया जाता है।
  • उद्दीपक शब्द व्यंजन-स्वर-व्यंजन के रूप में निरर्थक शब्दांश होता है तथा दूसरा शब्द वांछित भाषा के संज्ञा-पद होते हैं।
  • अधिगमकर्ता को उद्दीपक और अनुक्रिया शब्द को एक साथ दिखाया जाता है।
  • दोनों (उद्दीपक और अनुक्रिया) प्रकृति वाले शब्दों को पुनःस्मरण करने का परामर्श दिया जाता है।
  • एक-एक करके उद्दीपक शब्द दिखाकर प्रतिभागी को सही अनुक्रिया शब्द बताने को कहा जाता है।
  • प्रयास में असफल होने की स्थिति में वांछित अनुक्रिया शब्द दिखा दिया जाता है।
  • पहले प्रयास के सभी उद्दीपक पदों को दिखा दिया जाता है।
  • प्रयास का यह क्रम तब तक जारी रखा जाता है जब तक बिना गलती किये सभी अनुक्रिया पद बता दिये जाते हैं।
  • मानक मापदण्ड को पाने के लिए प्रयासों की कुल संख्या को युग्मित सहचर अधिगम मान लिया जाता है।

(ख) क्रमिक अधिगम:
परिचय-उद्दीपक और अनुक्रिया को नियत क्रम में प्रस्तुत करने की यह प्रचलित विधि है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी के द्वारा सीखने की प्रक्रिया को जानना इस विधि का उद्देश्य होता है। अर्थात् प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांश की सूची किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं, जैसे प्रश्नों का सही उत्तर का पता लगाना इस विधि का उपयोग है।

प्रयोग-क्रम:

  • प्रयोग का प्रारम्भ शब्दों की एक सूची को तैयार कर लेने से किया गया जिसमें निरर्थक शब्दांश, अधिक परिचित शब्द, कम परिचित शब्द, परस्पर संबंधित शब्द आदि को जगह दी गई।
  • प्रतिभागी को सूची का पूरा अंश देकर निर्देश दिया गया कि सूची के क्रम को बिना बदले एकांशों को बतलाना है।
  • सूची का मात्र पहला अंश दिखाकर प्रतिभागी से दूसरा एकांश बतलाने को कहा जाता है।
  • प्रतिभागी के असफल हो जाने पर दूसरा एकांश दिखाया जाता है जिससे दूसरा एकांश उद्दीपक बन जाता है।
  • प्रतिभागी तीसरा एकांश (अनुक्रिया शब्द) को ठीक-ठीक बताने का प्रयास करता है।
  • इस बार भी असफल होने की स्थिति में उसे सही एकांश बतला कर उसे चौथा एकांश के लिए उद्दीपक मान लिया जाता है।
  • उद्दीपक-अनुक्रिया के क्रमिक पूर्वाभास विधि क्रम जारी रखा जाता है।
  • अधिगम के प्रयास को तब तक जारी रखा जाता है जब तक प्रतिभागी सभी एकांशों का सही-सही पूर्वाभाव नहीं कर लेता है।

(ग) मुक्त पुनः स्मरण:
परिचय-कुछ निर्धारित शब्दों को स्मरण के द्वारा एक विशिष्ट क्रम में सजाकर बतलाने का प्रयास मुक्त पुनः स्मरण विधि कहलाता है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी शब्दों को किस तरह से संगठित करके उन्हें अपनी स्मृति में संचित करते हैं। स्मृति संबंधी इसी उत्सुकता को मिटाने में पुनः स्मरण विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम दस से अधिक शब्दों की एक सूची प्रतिभागियों को पढ़ने एवं बोलने के लिए दिया जाता है।
  • निश्चित समय तक प्रतिभागी के पास छोड़ा जाता है।
  • प्रतिभागी को किसी भी क्रम में शब्दों को बतलाने का अवसर दिया जाता है।
  • प्रतिभागी द्वारा बतलाये गये शब्दों के क्रम में एक प्रयास से दूसरे प्रयास में भिन्न पाये जाते हैं।
  • शब्दों को स्मृति में संचित करके उनके संगठन करने की प्रक्रिया अथवा विधि का पता लगाया जाता है।
  • प्रेक्षण के निष्कर्ष के रूप में पाया जाता है कि सूची के आरम्भ और अंत में स्थित शब्दों का पुनः स्मरण सूची के बीच में स्थित शब्दों की तुलना में अधिक सरल होता है।
  • स्मरण और शब्दों के संगठन सम्बन्धी तरह-तरह की जानकारियाँ जमा की जाती हैं।

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प्रश्न 6.
कौशल से आप क्या समझते हैं? किसी कौशल के अधिगम के कौन-कौन से चरण होते हैं?
उत्तर:
कौशल का परिचय:
सामान्य अथवा अटिल, साधारण अथवा तकनीकी किसी भी तरह के कार्य को सरलता से दक्षतापूर्ण विधि के द्वारा त्रुटिहीन परिणाम के साथ पूरा करने की कला या क्षमता को कौशल कहा जाता है। जैसे, हवाई जहाज चलाना, आशुलिपि में लिखना, कार चलाना आदि कौशल के उदाहरण हैं। किसी कौशल में अनुभव और अभ्यास के द्वारा प्रात्यक्षिपेशीय अनुक्रियाओं की एक श्रृंखला अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया साहचर्यों की एक श्रेणी प्राप्त की जाती है। अभ्यास एवं प्रयास के द्वारा समय, त्रुटि, अवरोध आदि से बचा जाता है। कौशल प्राप्त हो जाने पर कम समय में उच्चस्तरीय परिणाम मिल जाता है।

कौशल के अधिगम के प्रमुख चरण:
महान मनोवैज्ञानिक फिट्स के अनुसार कौशल अधिगम की प्रक्रिया तीन चरणों में होती हैं –

  1. संज्ञानात्मक
  2. साहचर्यात्मक तथा
  3. स्वायत्त

कौशल अधिगम के विभिन्न चरणों में अलग-अलग तरह की मानसिक क्रियाएँ की जाती हैं लेकिन यह भी माना जाता है कि अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है।

1. संज्ञानात्मक चरण:
अभिकर्ता को प्राप्त होने वाले निर्देशों का पालन करते हुए परिवेश से मिलने वाले सभी संकेतों एवं निर्देशों का माँग तथा अपनी अनुक्रियाओं के परिणामों को सदा अपनी चेतना में रखना होता है। कार्य निष्पादन की एक उत्तम विधि का उपयोग करके यथासंभव अच्छे परिणाम पाने के लिए अपनी समझ का प्रयोग करना होता है।

2. साहचर्यात्मक चरण:
कौशल अधिगम के प्रस्तुत चरण में विभिन्न प्रकार की सांवेगिक सूचनाओं अथवा उद्दीपकों को उपयुक्त अनुक्रियाओं से जोड़ना होता है। अभ्यास, त्रुटियाँ, लागत समय, कार्य निष्पादन के साथ उच्चस्तरीय परिणाम की प्राप्ति के प्रति सदा सतर्क रहना होता है। प्रस्तुत चरण से प्राप्त परिणामों के आधार पर ज्ञात होता है कि अभ्यास की मात्रा बढ़ाने से संभावित त्रुटियों में कमी आती है और निष्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है। अभ्यास के द्वारा किसी अनुक्रिया को करने में लागत समय को घटाया जा सकता है। प्रेक्षण कार्य करने में एकाग्रता रखना वांछनीय हो जाता है।

3. स्वायत्त चरण:
स्वायत्त चरण में निष्पादन संबंधी दो परिवर्तन अधिक प्रमुख माने जाते हैं –
(क) पहला साहचर्यात्मक चरण की अवधानिक माँगें कम हो जाती हैं और
(ख) वाह्य कारकों द्वारा उत्पन्न की गई बाधाएँ घट जाती हैं।
अतः इस चरण में सचेतन प्रयत्न की अल्प माँगों के साथ कौशलपूर्ण निष्पादन स्वचालिता प्राप्त करना प्रमुख उद्देश्य बन जाता है।

निष्कर्ष:

  1. कौशल अधिगम का एक मात्र साधन अभ्यास है।
  2. अधिगम के लिए निरंतर अभ्यास और प्रयोग करते रहने की आवश्यकता होती है।
  3. एकाग्रता, सतर्कता और जिज्ञासा सुन्दर परिणाम के लिए वांछनीय होता है।
  4. त्रुटिहीन निष्पादन की स्वचालित, कौशल का प्रमाणक मानी जाती है।
  5. अभ्यास ही मनुष्य की पूर्ण बनाता है।

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प्रश्न 7.
सामान्यीकरण तथा विभेदन के बीच आप किस तरह अंतर करेंगे?
उत्तर:
सामान्यीकरण और विभेदन की प्रक्रियाएँ प्रायः सभी प्रकार के अधिगम का मुख्य लक्षण होता है। समान उद्दीपकों (घंटी का बजना, आकस्मिक प्रकाश का उत्पन्न होना, टेलीफोन की घंटी का बजना) के प्रति समान अनुक्रिया (लार स्राव, भागना, चौंकना) के गोचर को सामान्यीकरण माना जाता है। माँ के द्वारा छिपाई गई मिठाई को बार-बार खोजने की क्रिया समान अनुक्रिया का बोध कराता है। अत: जब तक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं।

विभेदन को समान्यीकरण का पूरक माना जाता है। समान्यीकरण समानता पर आधारित होती है जबकि विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया मानी जाती है। जैसे यदि कोई बच्चा एक बार मूंछ-दाढ़ी वाले व्यक्ति से डर जाता है तो वह नेक आदमी से भी डरने लगता है यदि वह मूंछ-दाढ़ी वाला हो। दूसरी ओर एक खतरनाक प्रकृतिवाला व्यक्ति भी मूंछ-दाढ़ी साफ कराके सफेद धोती में चश्मा लगाकर प्रकट होता है तो बच्चा उसके चश्मा से खेलने लगता है। यहाँ भय का कारण मूंछ-दाढ़ी को माना जाता है। बच्चे का डरना और नहीं डरना विभेदन का एक उदाहरण बन जाता है। सामान्यीकरण होने का अर्थ विभेदन की विफलता होती है। विभेदन की अनुक्रिया किसी भी प्राणी को विभेदक क्षमता या विभेदन के अधिगम का महत्त्व समझा देता है।

प्रश्न 8.
अधिगम अंतरण कैसे घटित होता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रशिक्षण अंतरण भी माना जाता है। इसके अंतर्गत नए अधिगम पर पूर्व अधिनियम के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। अधिगम अंतरण पर आधारित एक रोचक प्रयोग दो भाषाओं (माना अंग्रेजी और फ्रांसीसी) के सीखने के लिए दो समूहों का चयन किया जाता है। प्रतिभागियों के एक समूह को प्रायोगिक दशा के लिए तथा दूसरे समूह को नियंत्रित दशा के लिए निर्धारित कर लिया जाता है। प्रायोगिक दशा वाले प्रतिभागियों को एक वर्ष का समय अंग्रेजी सीखने के लिए दिया जा रहा है जबकि दूसरे नियंत्रक समूह वाले प्रतिभागियों को फ्रांसीसी भाषा सीखने का अवसर दिया जाता है।

एक वर्ष की समाप्ति पर दोनों समूहों के द्वारा अर्जित भाषा-ज्ञान की जाँच की जाती है। एक वर्ष के बाद दूसरे वर्ष में प्रायोगिक समूह को फ्रांसीसी तथा नियंत्रक समूह को अंग्रेजी भाषा सीखने को कहा जाता है। दो वर्ष बीत जाने पर दोनों समूहों को दोनों विषयों के लिए समान समय उपलब्ध होने की बात मानी जाती है। दोनों समूहों को पुनः लब्धांक प्राप्त करना होता है। लब्धांक के आधार पर तया किया जाता है कि किस भाषा को सीखना सरल या कठिन है। अतः उद्दीपकों और अनुक्रियाओं में परस्पर अन्तर लाकर अधिगम की विशिष्टता को पहचानना अधिगम अंतरण के घटित होने का आधार होता है। इसमें समय, स्थिति, विषयों के क्रम, अनुभव एवं सुविधा में अन्तर लाकर सीखने या प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर जुटाता है।

प्रश्न 9.
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा उसे सुगम बनाने वाले कारकों में से एक है। अभिप्रेरणा का सामान्य अर्थ है व्यक्ति को किसी काम के प्रति रुचि जगाना तथा आवश्यक ऊर्जा का संचार करना। प्राणी की एक ऐसी मानसिक एवं शारीरिक अवस्था अभिप्रेरणा के अन्तर्गत आता है जो वांछनीय लक्ष्य या आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति विशेष को प्रबलता से काम करने की ओर धकेलता है। अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना निम्न कारणों से अनिवार्य होता है –

  1. अभिप्रेरणा व्यक्ति के अन्दर क्रियाशीलता को बढ़ाता है।
  2. अभिप्रेरणा हमारे व्यवहार का चयन करने में मदद करता है।
  3. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति के व्यवहार में सुधार लाता है।
  4. अभिप्रेरणा लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति की रुचि जगाता है।
  5. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति को प्रबलन की महत्ता को सीखाता है।
  6. अभिप्रेरणा से व्यक्ति में श्रम करने की योग्यता तथा कुछ खोजने की प्रवृत्ति जगाता है।

अर्थात् किसी भी व्यक्ति की दक्षता को बढ़ाने के लिए सुरक्षा की समझ देने, लक्ष्य, प्रयास, परिणाम की वास्तविकता को समझना अभिप्रेरणा से संभव है। इसी कारण अभिप्रेरणा एक अनिवार्य कारक के रूप में सर्वप्रिय है।

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प्रश्न 10.
अधिगम के लिए तत्परता के विचार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तत्परता का साधारण अर्थ इच्छाशक्ति अथवा किसी काम के प्रति अनुराग का प्रदर्शन है। यदि कोई व्यक्ति किसी काम को पूरा कर लेने पर संतोष व्यक्त करता है अथवा अवसर पाकर काम को पूरा करने हेतु तैयार हो जाता है ता माना जाता है कि उस व्यक्ति के द्वारा तत्परता दिखाई जा रही है। प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों में अपनी संवेदना क्षमताओं तथा अनुक्रिया करने के लिए परम लक्ष्य होता है वही दूसरों के लिए निरर्थक माना जाता है। प्राणियों के लिए उद्दीपक-उद्दीपक (S-S) अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) का मान साहचर्य को स्थापित करने की दृष्टि से अलग-अलग होती है।

रुचि, क्षमता, लगन, दक्षता, कुशलता आदि में से प्रत्येक मामले में सभी प्राणियों की दशा अलग-अलग होती है। सीखने की दृष्टि से यदि तत्परता पर ध्यान देने की बात चले तो स्पष्ट होगा कि सीखे जानेवाले वैसे कार्य या विषय तथा अवश्यकता या रुचि के प्रतिकूल कार्य या विषय के बीच व्यवहार में भारी अन्तर प्रकट होता है। इच्छा शक्ति और लक्ष्य के अनुकूल कार्य सरलता से अच्छे परिणाम के साथ पूरे किये जाते हैं जबकि लक्ष्यहीन कार्य कठिनाई से एवं अनियमित ढंग से किसी तरह पूर्णता तक पहुँचा दिये जाते हैं।

ईंट ढोने को यदि उदाहरण माना जाय तो यदि तत्परता के साथ ईंट लाया जाएगा तो वह पूर्व आकार में रहेंगे तथा सजाकर रखे जाएँगे लेकिन यदि तत्परता का अभाव होगा तो टूटी-फूटी ईंटों का एक बेडौल ढेर देखने को मिलेगा। दोनों हालतों में पूर्व स्थान से ईंट को हटाने का कार्य पूरा कर लिया गया प्रतीत होता है। अतः तत्परता किसी व्यक्ति की कार्यकुशलता को बढ़ाती भी है तथा अच्छे परिणाम को पाने के लिए प्रेरित भी करती है। तत्परता के साथ किसी विषय को सीखना भी सरल हो जाता है तथा तत्परता के साथ सीखा गया विषय स्थायी भी होता है।

प्रश्न 11.
संज्ञानात्मक अधिगम के विभिन्न रूपों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम को मनोवैज्ञानिक अधिगम का मूल माना जाता है। इसमें कार्यकलापों की जगह ज्ञान में परिवर्तन लाने का प्रयास शामिल है। संज्ञानात्मक अधिगम को दो विभिन्न रूपों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है –
(क) अंतर्दृष्टि अधिगम और
(ख) अव्यक्त अधिगम।

(क) अंतर्दृष्टि अधिगम:
अंतर्दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया का बोध होता है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक प्रकट हो जाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम की व्याख्या अनुबंधन के आधार पर सरलता से नहीं की जा सकती है किन्तु इसका सामान्योकरण अन्य मिलती हुई समस्याओं की परिस्थितियों में हो सकता है। अंतर्दृष्टि अधिगम में अचानक समाधान प्राप्त होना अनिवार्य है। इसे सत्य प्रमाणित करने के लिए कोहलर ने चिम्पैंजी को माध्यम बनाकर प्रयोग को पूरा किया।

उन्होंने एक भूखे चिम्पैंजी को एक बड़े बंद खेल क्षेत्र में डाल दिया। वह भूखा था लेकिन भोज्य पदार्थ उसकी पहुँच से बाहर रख दी गई थी। बन्द क्षेत्र में बक्सा तथा छड़ी रख दिया गया। भूखा होने के कारण चिम्पैंजी भोज्य पदार्थ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगा। शीघ्र ही चिम्पैंजी ने बक्सा तथा छड़ी अपने अधीन कर लिया।

वह बक्सा पर चढ़कर छड़ी की सहायता से बार-बार रोटी गिराने का प्रयास करने लगा। चिम्पैंजी अब बक्सा पर चढ़कर छड़ी से रोटी गिराना सीख चुका था। चिम्पैंजी, अब बन्द किये जाने पर तुरंत रोटी को गिरा कर खा लेता था। किसी प्रयोग से परिणाम की प्राप्ति नहीं होने पर अचानक निष्कर्ष को पाकर प्रयोगकर्ता काफी खुश होता है। सिंचाई के लिए परेशान किसान हठात् की वर्षा पाकर खुश हो जाता है। संज्ञानात्मक अधिगम में साधन और साध्य के बीच एक संबंध का होना प्रतीत होता है।

(ख) अव्यक्त अधिगम:
अव्यक्त अधिगम की प्रमुख विशेषता के रूप में माना जाता है कि इसमें एक नया व्यवहार सीख लिया जाता है, किन्तु व्यवहार दर्शाया नहीं जाता है। अपवर्त्य अधिगम से संबंधित एक प्रयोग टॉलमैन के द्वारा किया गया। टॉलमैन ने चूहों के दो समूहों को भूल-भुलैया नामक कक्ष में छोड़ दिया। चूहों के एक समूह को भोज्य पदार्थ की स्थिति ज्ञात थी लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अज्ञात था। भोजन की लालच में चूहा बहुत भटका। कई अंधपथों में आगे बढ़कर लौट आया।

लेकिन अंत में वह भोज्य पदार्थ तक पहुँच ही गया। बार-बार किये गये प्रयास का फल उसे प्राप्त हो गया। अब वह आसानी से कम समय में द्वार से भोजन तक का रास्ता बिना भटके दौड़कर पूरा कर लेता है। दूसरा चूहा कुछ नहीं जानता था फिर भी वह पहले चूहा की तरह रास्ता तय करने लगा। प्रस्तुत प्रयोग के माध्यम से टॉलमैन अपनी खोज का एक निष्कर्ष निकाला जिसके अनुसार चूहों ने अपने अव्यक्त अधिगम के सहारे भोज्य पदार्थ तक पहुँचने का मार्ग चुन लिया। वह किस प्रकार रास्ता का सही अंदाज लगाया यह अव्यक्त ही रहा। अर्थात् अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उन्हें, जिन दिशाओं और स्थानिक अवस्थितियों की आवश्यकता भी उनका मानस चित्रण किया।

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प्रश्न 12.
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम कैसे करते हैं?
उत्तर:
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर करते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले छात्रों को अक्षरों, शब्दों तथा वाक्यांशों को लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती है।
  2. इस श्रेणी के बच्चे सीखने के लिए कोई मनपसन्द योजना अथवा तरीका खोजने में लगभग अक्षम होते हैं।
  3. ये किसी एक विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाते हैं।
  4. ये विभिन्न आवश्यक सामानों को अनवरत रूप से इधर-उधर हटाते रहते हैं।
  5. इन्हें पेशीय समन्वय तथा हस्तनिपुणता प्रकट करने में कठिनाई होती है।
  6. ये बच्चे काम करने के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  7. सामाजिक संबंधों का मूल्यांकन करने में इनसे भूल हो जाया करती है।
  8. भाषा सीखने एवं समझने में भी ये अक्षम होते हैं।
  9. इनमें प्रात्यक्षिक विकार (दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, ध्वनि, गति) भी पाए जाते हैं।
  10. इनमें पठन वैकल्प के लक्षण पाए जाते हैं। अर्थात् ये शब्दों को वाक्यों के रूप में संगठित करने में अपेक्षाकृत अक्षम होते हैं।

अतः अस्वाभाविक स्वभाव तथा शारीरिक गठन की तुलना में मानसिक दुर्बलता का पाया जाना, अधिगम, अशक्तता वाले छात्रों की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राचीन अनुबंधन का सबसे प्रमुख लक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है।

प्रश्न 2.
सहकालिक अनुबंधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब अनुबंधन तथा अननुबंधित उद्दीपक साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं तो इसे सहकालिक अनुबंधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
दो परिवर्तनों का उदाहरण दीजिए जो अधिगम नहीं माने जाते हैं।
उत्तर:

  1. अत्यधिक शराब पीकर लड़खड़ाते हुए चलना।
  2. आँख में धूलकण के चले जाने से कुछ भी देख पाने में असमर्थता व्यक्त करना।

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प्रश्न 4.
अधिगम की तीन विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है।
  2. अधिगम के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं।
  3. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है।

प्रश्न 5.
युग्मित सहचर अधिगम का उपयोग बतावें।
उत्तर:
युग्मित सहचर अधिगम (वाचिक अधिगम) विधि का उपयोग मातृभाषा (हिन्दी) के शब्दों के किसी विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के पर्याय सीखने में किया जाता है।

प्रश्न 6.
क्रमिक अधिगम का संबंध किस प्रकार की जिज्ञासा से है?
उत्तर:
क्रमिक अधिगम (वाचिक अधिगम) का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांशों की सूची को किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन-सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं।

प्रश्न 7.
वर्ग गुच्छन किसे कहा जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक वॉसफील्ड ने पुनः स्मरण विधि को समझने के लिए साठ शब्दों से चार समूहों में रखा। नाम, पशु, पेशा तथा सब्जी से जुड़े शब्दों को अलग-अलग वर्गों में रखा गया। प्रतिभागियों के द्वारा पुनः स्मरण विधि के क्रम में बतलाये गये शब्द समूहों को वॉसफील्ड ने ‘वर्ग गुच्छन’ कहा।

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प्रश्न 8.
संप्रत्यय क्या है?
उत्तर:
संप्रत्यय एक श्रेणी है, जिसका उपयोग अनेक वस्तुओं अथवा घटनाओं (पशु, फल, भवन, भीड़) के लिए किया जाता है। संप्रत्यय के उदाहरण वे वस्तुएँ, व्यवहार या घटनाएँ होती हैं जिनमें समान विशेषताएँ हों।

प्रश्न 9.
कौशल का सामान्य परिचय क्या है?
उत्तर:
किसी जटिल कार्य को आसानी से और दक्षता से करने की योग्यता कर्ता का कौशल कहलाता है। अभ्यास और अनुभव के आधार पर कौशल की मर्यादा रखी जाती है, जैसे, जहाज, कार चलना, रेडियो बजाना, मोबाइल से संदेश भेजना आदि।

प्रश्न 10.
कौशल अर्जन के प्रमुख चरण क्ग हैं?
उत्तर:
फिट्स के अनुसार संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक तथा स्वायन से सम्बोधिर चरणों में मानसिक क्रिया द्वारा कौशल ग्रहण किया जाता है।

प्रश्न 11.
अधिगम अंतरण का दूसरा नाम क्या हो सकता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रायः प्रशिक्षण अंतरण या अंतरण प्रभाव कहा जाता है।

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प्रश्न 12.
अधिगम को सुगम बनाने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
उत्तर:
अधिगम को सुगम बनानेवाले कारकों में अभिप्रेरणा तथा प्राणी की तत्परता प्रमुख है।

प्रश्न 13.
अधिगम शैलियाँ किस प्रकार व्युत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
अधिगम शैलियाँ मुख्यतः प्रात्यक्षिक प्रकारता, सूचना प्रक्रमण तथा व्यक्तित्व प्रतिरूप से व्युत्पन्न होता है।

प्रश्न 14.
संबंधनात्मक शैली और विश्लेषणात्मक शैली में कार्यान्मुख क्षेत्र की दृष्टि से अन्तर बतावें।
उत्तर:
संबंधात्मक शैली अशैक्षणिक क्षेत्रों में अधिक कार्योन्मुख होते हैं जबकि विश्लेषणात्मक शैली शैक्षणिक संदर्भ में अधिक कार्यान्मुख होते हैं।

प्रश्न 15.
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है या नहीं?
उत्तर:
उपचारी अध्ययन विधि के उपयोग से बहुत लाभ होता है। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों के शिक्षण विधियों से अधिकांश लक्षणों को हटाया जा सकता है।

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प्रश्न 16.
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन किस पर किया था?
उत्तर:
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन कबूतर और चूहा पर किया था।

प्रश्न 17.
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार क्या है?
उत्तर:
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार प्रवर्तन व्यवहार (Operant behaviour) है।

प्रश्न 18.
अननुबंधित उद्दीपकों के दो प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रवृत्यात्मक तथा
  2. विमुखी।

प्रश्न 19.
नैमित्तिक अनुबंधन के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. माँ के द्वारा छिपाकर रखे गये मिठाई के डिब्बे को खोज लेना।
  2. रेडियो, टी.वी. आदि को चलाना।

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प्रश्न 20.
धनात्मक एवं ऋणात्मक प्रबलन के उपयोगों को बतावें।
उत्तर:
धनात्मक प्रबलन का परिणाम सुखद होता है क्योंकि धनात्मक प्रबलक आवश्यकताओं (भोजन, पानी, प्रशंसा, प्रतिष्ठा) की पूर्ति करता है। ऋणात्मक प्रबलक अप्रिय एवं पीड़ादायक उद्दीपक होते हैं। ऋणात्मक प्रबलक के प्रभाव के रूप में सर्दी, चिन्ता, रोग, दुर्घटना, दण्ड आदि मिलते हैं।

प्रश्न 21.
आंशिक प्रबलन की एक विशेषता बतावें।
उत्तर:
आंशिक प्रबलन. सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति ज्यादा विरोध पैदा करता है।

प्रश्न 22.
निष्पादन पर विलम्ब का केसा प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विलम्ब स निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है।

प्रश्न 23.
प्रबलक का परिचय दें।
उत्तर:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 24.
प्रबलकों के नियमित उपयोग से क्या लाभ मिलता है?
उत्तर:
प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

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प्रश्न 25.
अधिगम और विलोप का पारस्परिक आचरण क्या है?
उत्तर:
अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 26.
सामान्यीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

प्रश्न 27.
प्रेरणात्मक अधिगम को सामाजिक अधिगम कहलाने का कारण क्या है?
उत्तर:
प्रेरणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को सीखता है इसी कारण इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

प्रश्न 28.
स्वतः पुनः प्राप्ति की स्थिति कब आती है?
उत्तर:
स्वतः पुनः प्राप्ति किसी अधिगत अनुक्रिया के विलोप होने के बाद होती है।

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प्रश्न 29.
संज्ञानात्मक अधिगम की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्य-कलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन आता है।

प्रश्न 30.
अंतर्दृष्टि अधिगम किसे कहते हैं?
उत्तर:
अंतर्दृष्टि ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक (हठात्) स्पष्ट हो जाता है।

प्रश्न 31.
अव्यक्त अधिगम से संबंधित एक मनोवैज्ञानिक का नाम बतावें जो भूल-भुलैया और चूहा को प्रयोग का आधार बनाया था?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक टॉलमैन ने अव्यक्त अधिगम के संप्रत्यय को अपना प्रारम्भिक योगदान दिया।

प्रश्न 32.
वाचिक अधिगम की प्रक्रिया के अध्ययन में मनोवैज्ञानिक किस प्रकार की सामग्रियों का उपयोग कर रहे हैं?
उत्तर:
निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, वाक्य, अनुच्छेद आदि।

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प्रश्न 33.
सामाजिक शिक्षण क्या है?
उत्तर:
समाज में रहकर सामाजिक नियमों के अनुसार व्यावहारिक जीवन के नियमों को सीखना ही सामाजिक शिक्षण कहलाता है।

प्रश्न 34.
अनुबंधन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ साहचर्य द्वारा सीखना होता है।

प्रश्न 35.
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग बतावें।
उत्तर:
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग संगठन, कुसमायोजित प्रतिक्रियाओं के उपचार, बच्चों का पालन-पोषण तथा विद्यालय अधिगम के लिए किया जाता है।

प्रश्न 36.
मनोविश्लेषण का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनोचिकित्मा की एक विधि जिससे मनोचिकित्सक दमित अचेतन सामग्री को सचेतन स्तर पर लान का प्रयास करता हैं मनोविश्लेषण कहलाता है।

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प्रश्न 37.
पॉवलव ने अपना प्रयोग किस पर किया था?
उत्तर:
पॉवलव ने अपना प्रयोग भूखे कुत्ते पर किया था।

प्रश्न 38.
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर:
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में कहा है कि “सीखना और कुछ नहीं बल्कि संबंध प्रत्यावर्तन की एक लम्बी शंखला मात्र है।”

प्रश्न 39.
पॉवलव ने सीखने का आधार क्या बताया?
उत्तर:
पॉवलव ने सीखने का आधार संबंध प्रत्यावर्तन को बताया जिसमें प्राणी अनुबंधित अनुक्रिया करना सीखता है।

प्रश्न 40.
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक क्या था?
उत्तर:
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक मांस था।

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प्रश्न 41.
पॉवलव के सिद्धान्त एवं स्किनर के सिद्धान्त में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
पॉवलव ने प्रत्यार्थी व्यवहार (Respondent behaviour) को सीखने का आधार माना जबकि स्किनर ने प्रवर्तक व्यवहार (Operant behaviour) को सीखने का आधार माना है।

प्रश्न 42.
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त का प्रतिपादन किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धांत का प्रतिपादन रूस के एक महान मनोवैज्ञानिक पॉवलव ने किया।

प्रश्न 43.
अनुबंध या संबंध के सिद्धांत कौन-कौन हैं?
उत्तर:
अनुबंध या संबंध के दो प्रमुख सिद्धांत हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. प्राचीन अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त
  2. साधनात्मक अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेक्षणात्मक अधिगम का स्वरूप एवं उपयोग बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणात्मक अधिगम दूसरों के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का प्रेक्षण का व्यावहारिक परिणाम हैं। इसके अन्तर्गत अनुकरण, सामाजिक अधिगम तथा मॉडलिंग की प्राथमिकता मिली हुई है।

1. अनुकरण:
दूसरों की क्रिया-विधियों की नकल करना, अनुकरण माना जाता है। जैसे, आँख बन्द करके चलना एक अंधे का अनुकरण करने का प्रयास है।

2. सामाजिक अधिगम:
प्रेक्षणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों (अतिथि सत्कार, पूजा-विधि, विवाह पद्धति) को सरलता से सीखता है। इसी कारण इस अधिगम को सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

3. मॉडलिंग:
मॉडलिंग को स्वांग भरना भी कह सकते हैं। बुढ़िया की तरह खाँसना झुककर चलना, बन्दरवाला बनकर डमरू बजाना, टैम्पूवाला बनकर एक सवारी एक सवारी चिल्लाना आदि मॉडलिंग के विभिन्न रूप हैं जो किसी अन्य की तरह व्यवहार करने के रूप में प्रकट होता है।

प्रेक्षणात्मक अधिगम की उपयोगिता:

1. सीखना:
समाज में रहनेवाले तरह-तरह के व्यक्तियों की कार्य-विधियों को देखकर हम भी वैसा कार्य करना सीख लेते हैं। जैसे-रीमोट चलाना, रेडियो बजाना, कुएँ से पानी खींचना अदि।

2. व्यवसाय की प्रगति:
विज्ञापन के माध्यम से प्रभावकारी हस्तियों के द्वारा उत्पादन का व्यवहार करते हुए दिखाकर उत्पादन की खपत बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

3. अच्छी आदतों से परिचय:
बड़ों को टहलते, व्यायाम करते, व्यायाम करते, चबा-चबाकर खाते, देखकर बच्चे भी टहलने, व्यायाम करने, भोजन ग्रहण करने तथा समय पर सोने-जगने की आदत अपनाने लगते हैं।

4. पर्व-त्योहारों का सम्मान:
दीपावली में दीपों को सजाने, होली में रंग-अबीर का प्रयोग करने, आरती करने तथा शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का आदर-सम्मान देने संबंधी आचरण का ज्ञान प्रेक्षणात्मक अधिगम से सरल हो जाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन के प्रमुख कारकों का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधों के अन्तर्गत समय और कार्य-स्तर की दृष्टि से कई कारकों के द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाये जाते हैं। कुछ प्रमुख कारक निम्न वर्णित हैं –

1. उद्दीपकों के बीच समय-संबंध:
अनुबंधित उद्दीपक और अननुबंधित उद्दीपकों की शुरूआत के बीच समय संबंध पर प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ आधारित होती हैं। प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ मुख्यत: चार प्रकार की होती हैं जिनमें से प्रथम तीन प्रक्रियाएँ अग्रवर्ती अनुबंधन की है तथा चौथी प्रक्रिया पश्चगामी अनुबंधन की है।

(क) सहकालिक अनुबंधक:
जब अननुबंधित तथा अनुबंधित उद्दीपक के साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।

(ख) विलंबित अनुबंधन:
जब अनुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ और अन्त दोनों अननुबंधिक उद्दीपक के पहले होता है।

(ग) अवशेष अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में भी अनुबंधित का प्रारम्भ और अंत अननुबंधित उद्दीपक से पहले होता है। किन्तु दोनों के बीच कुछ समय अंतराल होता है।

(घ) पश्चगामी अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में अननुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ अनुबंधित उद्दीपक के पहले होता है। इन चारों प्रक्रियाओं में से पश्चगामी अनुबंधन प्रक्रिया प्राप्त होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है।

2. अननुबंधित उद्दीपकों के प्रकार:
अननुबंधित उद्दीपक दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रवृत्यात्मक:
यह स्वतः सुगम्य अनुक्रियाएँ उत्पन्न करती है।

(ख) विमुखी अनुबंधित उद्दीपक:
ये परिहार तथा पापन की अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो दुखदायी और क्षतिकारक होते हैं।

3. अनुबंधित उद्दीपकों की तीव्रत:
अनुबंधित उद्दीपक जितना अधिक तीव्र होगा उतने ही कम प्रयासों की आवश्यकता अनुबंधन की प्राप्ति के लिए करना होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाओं का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाएँ निम्न वर्णित हैं –

1. प्रबलन:
किसी प्रयोगकर्ता के द्वारा प्रबलक देने की प्रक्रिया को प्रबलन कहते हैं जहाँ प्रबलक के उद्दीपक अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक धनात्मक प्रबलक प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि ऋणात्मक प्रबलक स्वयं को हटाकर अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक प्राथमिक प्रबल प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच के सम्बन्ध को बतलाती है। प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

2. विलोम:
प्रबलन को हटा लेने के परिणामस्वरूप अधिगत अनुक्रिया के लुप्त होने को विलोप कहते हैं। इसमें सीखे हुए व्यवहार को भी लुप्त होना देखा जा सकता है। अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करती है। सीखते समय प्रबलित प्रयासों की संख्या बढ़ने के साथ विलोप का प्रतिरोध बढ़ता है।

3. सामान्यीकरण:
समान उद्दीपकों के प्रति समान अनुक्रिया करते सम्बन्धी गोचर को सामान्यीकरण कहते हैं। अतः जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण माना जाता है। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

4. विभेदन:
सामान्यीकरण के पूरक के रूप में विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया होती है। विभेदन की अनुक्रिया प्राणी की विभेदन क्षमता यदि भेदन के अधिगम पर निर्भर करता है।

5. स्वतः पुनः प्राप्ति-स्वतः पुनः
प्राप्ति किसी अधिगत के विलोप होने के बाद होती है। उदाहरण एवं प्रयोग के माध्यम से यह पाया गया है कि काफी समय बीत जाने के बाद सीखी हुई अनुबंधित अनुक्रिया का पुनरुद्धार हो जाता है और वह अनुबंधित उद्दीपक के प्रति घटित होती है। स्वतः पुनः प्राप्ति की मात्रा विलोप के बाद बीती हुई समयावधि पर निर्भर करती है। यह अवधि जितनी ही अधिक होती है, अधिगत अनुक्रिया की पुनः प्राप्ति उतनी ही अधिक होती है। इस प्रकार की पुनः प्राप्ति स्वाभाविक रूप से होती है।

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प्रश्न 4.
कृत्रिम संप्रत्यय की विशेषताओं पर आधारित उदाहरणों को व्यक्त करें।
उत्तर:
कृत्रिम संप्रत्यय वे होती हैं जो सुपरिभाषित होते हैं और विशेषताओं को जोड़ने वाले नियम परिशुद्ध और कठोर होते हैं। संप्रत्ययों में जैविक वस्तुएँ, वास्तविक जीवन के उत्पाद तथा मनुष्यों द्वारा बनाई गई विभिन्न कलाकृतियों, जैसे, औजार, कपड़े, मकान आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5.
संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्यकलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन होता है। किसी समस्या का एकाएक समाधान पाना तथा नित्य नया व्यवहार सीखना, कार्य पूरा कर लेने का संकल्प लेना, अनवरत प्रयास के महत्व को समझना आदि संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों से ही संभव हो पाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम एवं अव्यक्त अधिगम के द्वारा इसके विस्तृत प्रभावों को समझा जा सकता है। कोहलर के द्वारा चिम्पैंजी पर किये जाने वाले प्रयोग तथा टॉलमैन के द्वारा चूहे और भूल-भुलैया वाले प्रयोग से संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों का प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों के नाम और परिणाम बतावें।
उत्तर:

  1. युग्मित सहचर अधिगम-मातृभाषा के शब्दों के लिए विदेशी शब्द को पर्याय के रूप में सीखना।
  2. क्रमिक अधिगम-किसी समस्या के समाधान के लिए किए जाने वाले प्रयासों को परिणामी प्रक्रम में सजाकर व्यवहार में लाना।
  3. मुक्त पुनः स्मरण-शब्दों को स्थायी रूप से स्मृति में रखने के लिए उनके क्रम को एक संगठन का रूप देना।

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प्रश्न 7.
अनुबंधित अनुक्रिया तथा स्वाभाविक अनुक्रिया में अंतर करें।
उत्तर:
स्वाभाविक अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन funconditioned stimulus) द्वारा उत्पन्न होता है जैसे भोजन देखकर लारस्राव करन में लारस्राव करना एक स्वाभाविक अनुक्रिया है, जो स्वाभाविक रद्दीपन (भोजन) के प्रति किया जा रहा है। अनुबंधित अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन तथा अनुबंधित उद्दीपन में साहचर्य स्थापित होने के बाद प्राणी अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति करता है।

जैसे-पॉवलव के प्रयोग में जब कुत्ता मात्र घंटी की आवाज पर घंटी तथा भोजन में साहचर्य स्थापित करने के बाद लारस्राव करने लगता है तब लारस्राव की यह अनुक्रिया अनुबंधित अनुक्रिया का एक उदाहरण है। परंतु यही लारस्ताव प्रारंभ में जब भोजन को देखकर किया जाता था तब उसे स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) कहा जाता है।

प्रश्न 8.
पुनर्बलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी के आवश्यकता की पूर्ति जिन वस्तुओं से होती है उसे पुनर्बलन (Reinforce ment) कहा जाता है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है क्योंकि भोजन से ही भूख मिट सकती है। पुनर्बलन प्राप्त करने के उद्देश्य से ही प्राणी उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करने के लिए प्रेरित रहता है। वास्तव में अनुबंधन द्वारा किसी अनुक्रिया को सीखने के लिए पुनर्बलन एक आवश्यक शर्त है जिसका पॉवलव ने अपने प्रयोग में स्पष्टीकरण किया है।

प्रश्न 9.
अविशिष्ट अंतरण से क्या स्पष्ट होता है?
उत्तर:
एक कार्य का सीखना अधिगमकर्ता को अगला कार्य ज्यादा सुविधा से सीखने के लिए स्फूर्ति प्रदान करता है। क्रिकेट खिलाड़ी के खड़े होने की स्थिति तथा परीक्षार्थियों को लिखने के लिए बैठने की विधि के आधार पर लिखने की गति में आने वाले अन्तर को स्फूर्ति परिणाम का कारक मानना अविशिष्ट अंतरण का उदाहरण माना जा सकता है। अर्थात् कोई व्यक्ति एक साथ दो या अधिक कार्यों को सीख सकता है।

प्रश्न 10.
अनुबंधन का अर्थ सोदाहरण बतावें।
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ होता है साहचर्य द्वारा सीखना। जब प्राणी के सामने कोई उद्दीपन, जैसे-भोजन तथा उसके ठीक कुछ पहले एक दूसरा उद्दीपन (stimulus), जैसे-रोशीन (light) दी जाती है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है तब प्राणी रोशनी जलते ही यह समझ जाएगा कि भोजन आनेवाला है। इस प्रत्याशा (expectation) में वह ठीक वैसी ही अनुक्रिया करना प्रारंभ कर देता है जो भोजन की वास्तविक उपस्थिति में वह आमतौर पर करता है। इस तरह के सीखना को अनुबंधन कहा जाता है जिसके लिए स्पष्टतः अन्य बातों के अलावा अभ्यास, उद्दीपन आदि का होना अनिवार्य है।

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प्रश्न 11.
अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन में अंतर बतावें।
उत्तर:
स्वाभाविक उद्दीपक वैसे उद्दीपन को कहा जाता है जो बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के ही प्राणी में एक स्वाभाविक अनुक्रिया उत्पन्न करता है। जैसे-भोजन देखकर भूखे व्यक्ति के मुँह में लार आने की अनुक्रिया में भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन के साथ बार-बार उपस्थित किए जाने पर कुछ प्रयासों के बाद वह अकेले ही वैसी अनुक्रिया उत्पन्न कर लता है जो स्वाभाविक उद्दीपन द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

जैसे-भोजन देने के पहले घंटी बजा दी जाए और यह प्रक्रिया कई प्रयासों में दोहराई जाए तो कुछ देर के बाद मात्र घंटी बजते ही प्राणि लारस्राव की अनुक्रिया करने लगेगा। इस तरह के तटस्थ उद्दीपन (neutral stimulus) को अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) कहा जाता है। अत: इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि स्वाभाविक उद्दीपन बिना प्रशिक्षण के ही अनुक्रिया उत्पन्न करता है, परंतु अनुबंधित उद्दीपन प्रशिक्षण के बाद स्वाभाविक उद्धेपन के समान अनुक्रिया करता है।

प्रश्न 12.
सीखना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सीखने से तात्पर्य व्यवहार में परिवर्तन से होता है, परंतु व्यवहार में हुए सभी तरह के परिवर्तनों को सीखना नहीं कहा जाता है। जैसे-व्यक्ति के व्यवहार में परिपक्वता (maturation) के कारण परिवर्तन हो जाता है, औषधि खा लेने से परिवर्तन आ जाता है, थकान होने से परिवर्तन होता है, आदि-आदि। ऐसे सभी परिवर्तनों को सीखने की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। व्यवहार में केवल उन्हीं परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है जो अभ्यास (practice) या अनुभूति (experience) के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। व्यवहार में ऐसे परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी (relatively permanent) होते हैं।

प्रश्न 13.
शिक्षण वक्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक ऐसा वक्र है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रयासों (trials) या अभ्यासों में हुए सीखने की प्रगति या दर को दिखाया जाता है, सामान्यतः सीखने की दर को तीन कसौटियों के रूप में दिखाया जाता है-सीखने की यथार्थता पर परिशुद्धता (accuracy in learning), त्रुटि में कमी (reduction in error) तथा सीखने में लिया गया समय। इससे तीन तरह के शिक्षण वक्रों का निर्माण होता है।

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प्रश्न 14.
शिक्षक वक्र में पठार का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
किसी पाठ या विषय को सीखने की अवधि के बीच में कभी-कभी ऐसा होता है कि अभ्यास जारी रहने के बावजूद सीखने में कोई प्रगति नहीं होती है। फलस्वरूप, ऐसी परिस्थिति में बननेवाला वक्र आधार के समानांतर हो जाता है। शिक्षण वक्र की इस स्थिति को पठार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
शाब्दिक सीखना किसे कहा जाता है?
उत्तर:
शाब्दिक सीखना का तात्पर्य शब्दों, अंकों, आकृतियों के. अर्थ को समझकर उसके प्रति विशेष अनुक्रिया करने से होता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति ‘हाथी’ शब्द लिखता-पढ़ता है, तथा उसका अर्थ समझता है तथा उस शब्द का सही उपयोग भी करता है तो यह शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण होगा। इस तरह के सीखना में ज्ञानेन्द्रियों (sense organs) की भूमिका शरीर के पेशीय अंगों (motor organs) की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। कविता याद करना शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण है।

प्रश्न 16.
संवेदी-पेशीय सीखना का अर्थ बतावें।
उत्तर:
संवेदी:
पेशीय सीखना से तात्पर्य वैसे सीखना से होता है जिसमें शरीर की ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों (motor organs) का संयुक्त योगदान होता है, परंतु कर्मेन्द्रियों या पेशीय अंगों का तुलनात्मक रूप से अधिक सक्रिय योगदान होता है। जैसे-कार चलाना सीखना, टाइप करना सीखना, तैरना सीखना आदि संवेदी-पेशीय सीखना के कुछ उदाहरण हैं। इस तरह के सीखना में कर्मेन्द्रियों अर्थात् हाथ, पैर आदि का योगदान आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से स्पष्टत: अधिक होता है।

प्रश्न 17.
प्रवर्तन अनुकूलन से आप. क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्किनर (Skineer 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूल कोटि में रखा जा सकता है। बक्से में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्से में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा। लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी। इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन को गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भी भेद है।

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प्रश्न 18.
अभ्यास नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभ्यास नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धांत में किया गया। इस नियम के अनुसार सीखने का आधार अभ्यास (exercise) होता है। इस नियम के दो उपनियम हैं-उपयोग नियम (law of use) तथा अनुपयोग नियम (law of disuse)। उपयोग नियम के अनुसार जब किसी अनुक्रिया को प्राणी बार-बार दोहराता है तब उसे वह करना सीख लेता है। अनुपयोग नियम के अनुसार जब प्राणी किसी अनुक्रिया को बार-बार नहीं दोहराता है तब वह उसे सीख नहीं पाता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति मात्र एक या दो बार टाइप करने का प्रयास करता है, तो वह टाइप करना नहीं सीख पाएगा।

प्रश्न 19.
प्रभाव नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रभाव नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धान्त में किया गया। इस नियमं द्वारा यह पता चलता है कि प्राणी किसी अनुक्रिया को उस अनुक्रिया से उत्पन्न प्रभाव के आधार पर सीखता है। अनुक्रिया करने के बाद यदि उसे संतुष्टि (satisfaction) होती है तो वह उस अनुक्रिया को बार-बार दोहराता है और उसे सीख लेता है। परंतु, यदि उसे अनुक्रिया करने के बाद खीझ (annoyance) होती है तो वे उसे दोहराता नहीं है और उसे नहीं सीख पाता है। थार्नडाइक के प्रयोग में भूखी बिल्ली दरवाजा खोलने की अपक्रिया को इसलिए सीख जाती है, क्योंकि दरवाजा खोलने के बाद उसे भोजन मिलता था जिसे खाकर वह संतुष्ट हो जाती थी।

प्रश्न 20.
अधिगम (सीखने) की परिभाषा दें।
उत्तर:
“सीखना” बहुत व्यापक शब्द है, इस मानसिक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति व्यवहार के सहारे होती है। सीखने से प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन या परिमार्जन होता है। सीखने में व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, वह अनुभव या अभ्यास पर आधारित होता है और उससे समायोजन में सहायता मिलती है। मॉर्गन और गिलीलैंड ने सीखने की परिभाषा इस प्रकार दी है-“सीखना अनुभव के परिणाम स्वरूप जीव के व्यवहार में कुछ परिमार्जन है जो कम-से-कम कुछ समय के लिए भी जीव द्वारा धारण किया जाता है।” उपरोक्त परिभाषा में निहित तथ्य इस प्रकार है –

  1. सीखने से व्यवहार में परिवर्तन होता है।
  2. सीखा हुआ व्यवहार कुछ समय तक व्यक्ति के व्यवहार में स्थायी रूप से बना रहता है।
  3. सीखा हुआ व्यवहार अचानक नहीं होता है। यह अनुभव अथवा अभ्यास पर आधारित होता है।
  4. सीखने के पीछे अभिप्रेरण कार्य करता है।
  5. सीखा हुआ व्यवहार का मापन संभव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सीखने में अनुप्रेरणा (motivation) के प्रभाव का वर्णन करें। अथवा, सीखने में अभिप्रेरणा (motivation) की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
सीखने की क्रिया में तीन तत्व संयुक्त होते हैं, जिन्हें हम इस प्रकार कह सकते हैं –

  1. मनोवैज्ञानिक तत्व
  2. शारीरिक तत्व तथा
  3. वातावरण-सम्बन्धी तत्व। मनोवैज्ञानिक तत्व को हम सीखने में ‘अनुप्रेरणा’ (Motivation) कहते हैं।

सीखना प्राणी की वह क्रिया होती है, जिसके द्वारा वह अपने पर्यावरण से प्रतिक्रिया करता है। सीखने वाले के अन्दर क्रिया को हम प्रेरणा के द्वारा ही उत्पन्न करते हैं। उत्तेजना, रुचि, उद्देश्य इत्यादि अनुप्रेरण के विभिन्न रूपों पर बल देते हैं। ‘प्रेरणा’ ही सीखने की क्रिया का मूल तत्व है। अनुप्रेरणा ही बालक को क्रियाशील बनाती है, प्रतिक्रिया, रुचि, प्रयत्न आदि के परिणाम हैं। जिन्हें शिक्षक पसन्द करता है और यह विद्यार्थियों के लिए भी लाभदायक होते हैं। ये सब अनुप्रेरण से ही जन्म लेते हैं।

शिक्षा में अनुप्रेरणा वह कला है जो बालक के अन्दर रुचि उत्पन्न करती है। जब भी बालक किसी कार्य या वस्तु में रुचि अनुभव नहीं करता, अनुप्रेरणा द्वारा रुचि को उसमें जाग्रत किया जा सकता है। स्वीकृत व्यवहार को जाग्रत करना, बनाये रखना तथा निर्देशन देना विद्यमान की शिक्षा में प्रेरणा का ही कार्य है। व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया जो किसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है, अनुप्रेरणात्मक होती है। चूँकि सभी प्रकार सीखना एक विशेष लक्ष्य रखता है, इसलिए सभी प्रकार का सीखना एक अनुप्रेरित क्रिया होती है।

उत्तेजना की तीव्रता, लक्ष्यों को देखने, विविधता आदि सीखने की क्रिया के प्रभावोत्पादन में अन्तर उत्पन्न करते हैं। अध्यापक का कर्तव्य है कि वह बालकों को अनुप्रेरणा द्वारा सीखने को प्रोत्साहित करें। सीखने की क्रिया के अन्तर्गत अनुप्रेरकों और लक्ष्यों का बुद्धिसंगत योग होता है जो अनुकूल और आनुपातिक वातावरण का निर्माण करता है, संवेगात्मक रुचि उत्पन्न करता है और बालकों के अन्दर संतोष की भावना करता है।

सीखने की क्रिया में अनुप्रेरकों के तीन कार्य (Three functions of Motives in Learming process):
मेटल के मतानुसार, अनुप्रेरक सीखने की क्रिया में तीन कार्य करते हैं। वे इस प्रकार हैं –

1. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को शक्तिशाली बनाते हैं (Motives Energise Behaviour):
अनुप्रेरक शक्ति का वर्द्धन करते हैं, जिससे हमारे अन्दर क्रियाशीलता उत्पन्न होती है। इस प्रकार भूख तथा प्यास भी हमारे अन्दर मांसपेशिक तथा ग्रन्थिक (Musculars and Glandular) प्रतिक्रिया होती है। प्रशंसा, आरोप, पुरस्कार, दण्ड आदि शक्तिशाली उत्तेजक हैं, जो हमारे बहुत-से कार्य को प्रभावित करते हैं। ये हमें किसी विशेष दिशा की ओर कार्य करने को बाध्य करते हैं और सीखने की क्रिया में सहायक होते हैं।

2. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को चुनने वाले होते हैं (Motives are selector of behaviour):
प्रेरक व्यक्ति की किसी उत्तेजना-विशेष के प्रति प्रतिक्रिया करने के लिए उत्तेजित करते हैं.और दूसरी वस्तुओं के प्रति अवहेलना। वे यह भी बताते हैं कि किसी अवस्था-विशेष में व्यक्ति किस प्रकार या करेगा। यदि एक समाचार पत्र विभिन्न व्यक्ति को दिया जाय तो हर व्यवि उसी खण्ड को गढ़ेगा जिसके लिए उसे अनुप्रेरणा प्राप्त है। उदाहरण के लिए, बेरोजगा व्यक्ति आवश्यकता पप्बन्धी खण्ड को ध्यान से देखेगा और बहुत-सी आवश्यकताओं को याद कर लेगाः सके विपरीत एक खिलाड़ी खेल के समाचार की ओर अधिक आकृष्ट होगा।

3. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार का संचालन करते हैं (Motive Direct Our Behaviour):
अनुप्रेरक केवल व्यवहार को सुनते ही नहीं वरन् उनका संचालन भी करते हैं। वह व्यवहार का संचालन इस प्रकार करते हैं कि हमारे अन्दर संतुष्टि की भावना जाग्रत हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने सीखने में उन्नति करने के लिए कार्यशीलता को अपनाये, अपनी संपूर्ण शक्ति को आदर्श ग्रहणीय लक्ष्यों की ओर प्रवाहित करे और उन्हीं में अपनी शक्ति का प्रयोग करे।

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प्रश्न 2.
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रमुख अन्तर निम्न प्रकार से है –

1. प्राचीन अनुबन्धन में कुत्ते को लार का स्राव उचित समय पर भोजन देकर कराया जा सकता है। इससे प्रयोगकर्ता प्रयोज्य को उपयुक्त समय पर उत्तेजना प्रस्तुत करता है तभी अनुक्रिया नियंत्रित होती है। नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रयोगकर्ता के हाथ में ऐसी उत्तेजना नहीं होती जिससे वह अपने प्रयोज्य से छड़ दबाने जैसी प्रतिक्रियाएं करा सके।

2. प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलनं (US) अनुक्रिया पर निर्भर नहीं करता। जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन अनुक्रिया पर निर्भर करता है। डी-अमेटो के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन प्रयोज्य को मिलेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रयोज्य उपयुक्त अनुक्रिया करता है अथवा नहीं।

3. अनेक अध्ययनों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि केवल प्राचीन अनुबन्धन प्रक्रियाओं द्वारा स्वतः चालित अनुक्रियाओं का अध्ययन हो सकता है। स्वतः चालित क्रियाएं जैसे लार स्रावित होना, पलक मारना आदि हैं। स्पेन्स और रॉस के कथनानुसार पलक गिरने की क्रिया स्वतः है तथा पलक मारने की क्रिया ऐच्छिक है। दोनों प्रकार की क्रियाओं की प्रकृति तथा अनुक्रिया काल अलग-अलग है। इन मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि पलक गिरने की क्रिया प्राचीन अनुबन्धन का उदाहरण है तथा पलक मारने की क्रिया नैमित्तिक अनुबन्धन के फलस्वरूप होती है।

4. माउरर के अनुसार सैद्धान्तिक दृष्टि से भी प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर है। माउरर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन में अधिगम समीपता के आधार पर होता है। यह देखा गया कि CS तथा Vs की उपस्थिति में जितना की कम अन्तर होगा, CS तथा US में साहचर्य उतनी ही जल्दी स्थापित हो जायेगा। इस प्रकार के अधिगम प्रक्रम में पुनर्बलन आवश्यक नहीं है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन में CD तथा US के मध्य पुनर्बलन के आधार पर साहचर्य स्थापित होता है। एक अनुबन्धन में साहचर्य स्थापित होने का आधार समीपता है तो दूसरी जगह पुनर्बलन। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों अनुबन्धनों में सैद्धान्तिक दृष्टि से अन्तर है।

5. श्लासवर्ग के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में साहचर्य उत्तेजना-अनुक्रिया के मध्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन में उत्तेजना-उत्तेजना के मध्य साहचर्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन एक प्रकार से Stimulus Substitution होता है।

6. स्किनर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन स्वत: है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन एक प्रतिक्रिया है। प्राचीन अनुबन्धन प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलन का सम्बन्ध उत्तेजना के साथ होता है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में यह स्थिति नहीं होती है। दूसरे प्राचीन अनुबन्धन की कुछ निन्दा करते हुए उसने यह कहा है कि शुद्ध प्राचीन अनुबन्धन में प्रायोगिक प्रमाणों का अभाव है।

नैमित्तिक अनुबन्धन में अनुक्रिया और पुनर्बलन के बीच धनात्मक सम्बन्ध होता है। इसमें पुनर्बलन की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि प्रयोज्य किस प्रकार की अनुक्रिया करता है। स्किनर ने यह भी कहा है कि उद्दीपक प्रकार के अनुबन्धन की सीमा सहज क्रियाओं तक तथा नैमित्तिक अनुबन्धन की सीमा ऐच्छिक पेशीय क्रियाओं तक है।

7. मेडिनिक के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रतिक्रियात्मक (Respondant behaviour) अथवा प्रतिकृत (Elicited) प्रकार का व्यवहार है। इस प्रकार का व्यवहार सहज क्रियात्मक तथा उत्तेजना के नियंत्रण से होता है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रवर्तन (operant) व्यवहार कहलाता है। इस प्रकार का व्यवहार ऐच्छिक होता है।

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प्रश्न 3.
साधनात्मक अनुकूलन या नैमित्तिक अनुबंधन का वर्णन करें।
उत्तर:
डी अमेटो (D’Amato, 1970) के अनुसार:
“नैमित्तिक अनुबंधन (Instrumental Conditioning) ऐसा कोई भी सीखना होता है जिसमें अनुक्रिया अवलम्बित पुनर्बलन.पर आधारित हो तथा जिसमें प्रयोगात्मक रूप से परिभाषित विकल्पों का चयन सम्मिलित न हो।” (Instrumental Conditioning is any learning based on response contingent reinforcement that does not involve choice among experimentally defined alternatives)

नैमित्तिक अनुबंधन की मुख्य विशेषता परिभाषा की पहली लाइन में ही दी हुई है जिसका अर्थ है कि प्रयोज्य के लिए पुनर्बलन या पुरस्कार (Reinforcement) की उपलब्धि प्रयोज्य की अनुक्रियाओं पर आश्रित होती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रयोज्य की अनुक्रियाएँ पुनर्बलन (Reinforcement) का Instrument (निमित्त) बन जाती है। नैमित्तिक अनुबंधन उत्तेजना-अनुक्रिया के बीच साहचर्य स्थापित करने की दूसरी विधि है, प्रथम विधि प्राचीन अनुबंधन है।

पुनर्बलन की प्रकृति धनात्मक अथवा निषेधात्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है। धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) वह उत्तेजना है जिसे प्रयोज्य प्राप्त करने के लिए चेष्टा और कार्य करता है। निषेधात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) वह प्रयोज्य है जिसे प्रयोज्य उपेक्षित करने के लिए कार्य करता है अथवा इस उत्तेजना से बचने के लिए कार्य करता है। इस प्रकार के (Reinforcer प्राय: Aversive or Noxious Stmulus) कहे जाते हैं।

ऐसा नैमित्तिक अनुबंधन जिसमें धनात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, प्रवृत्यात्मक अनुबंधन (Appetitive Conditioning) तथा निषेधात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, उन्हें विमुखी अथवा हानिकारक अनुबंधन (Aversive or Noxiopus Conditioning) कहा जाता है। नैमित्तिक अनुबंधन का वर्गीकरण पुनर्बलन का धनात्मकता (Positiveness) अथवा निषेधात्मक (Negativeness) पर आधारित होने के साथ-साथ अधिगम प्रक्रम की उग्र-गमनता (Forward movement) तथा पृष्ठ-गमनता (Backward-movement) पर भी आधारित है।

कोनोस्र्की (1948) ने साधनात्मक नैमित्तिक अनुबंधन के निम्न तीन प्रकार बतलाए हैं –

1. परिहरण-अनुकूलन (Avoidance conditioning):
यदि घंटी बजे, फिर पाँव में विद्युत-आघात लगे और उसपर.कुत्ता पाँव उठा ले तो कुछ यत्नों के बाद घंटी बजते ही कुत्ता अपना पाँव उठाना सीख लेगा। अधोनुकूलन में पाँव उठा लेने पर भी विद्युत आघात लगेगा। यदि पाँव उठा लेने से वह आघात से बच जाए तो वही साधनात्मक स्वरूप का परिहरण-अनुकूलन कहलाता है।

2. पलायन-अनुकूलन (Escape conditioning):
साधनात्मक अनुकूलन के इस रूप में प्राणी धीरे-धीरे किसी कष्टकर परिस्थिति से बचना सीखता है। मौवरर ने एक प्रयोग में चूहे को पिंजड़े में बन्द किया और उसके फर्श को विद्युत-आवेशित कर दिया फिर धीरे-धीरे विद्युत तीव्रता बढ़ती गई। चूहा विविध प्रकार की क्रियाएँ करने लगा, यहाँ तक कि वह एक लीवर पर चढ़ गया जिससे लीवर दबा और विद्युत-आवेश समाप्त हो गया। यही परिस्थिति फिर दुहरायी गयी। इस बार अपेक्षाकृत शीघ्र ही वह लीवर पर चढ़ गया। एक ऐसी अवस्था भी आ गयी कि जब बिजली का आभास होता था तो चूहा लीवर दबा कर आघात से बचने लगा। यही पलायन-अनुकूलन है।

3. प्रवर्तन अनुकूलन (Operant conditioning):
स्किनर (Skinner 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूलन कोटि में रखा जा सकता है। बक्स में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्स में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा, लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी।

इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन की गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन उत्तेजक और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भेद भी है।

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प्रश्न 4.
पॉवलव के शिक्षण सिद्धान्त की विवेचना करें।
उत्तर:
सीखने के अनुबंधित-अनुक्रिया सिद्धांत का प्रतिपादन रूसी शरीर क्रिया-विज्ञानी पॉवलव (Pavlov) द्वारा किया गया। पॉवलव के इस सिद्धान्त का आधार अनुबंधन (conditioning) है जिससे तात्पर्य साहचर्य द्वारा सीखना (learning by association) होता है। जैसे-जब किसी अस्वाभाविक उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति साहचर्य के आधार पर प्राणी स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) करना सीख लेता है तब इस तरह के सीखना को अनुबंध द्वारा सीखना (conditioning learning) कहा जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मानलिया जाए कि एक भूखा व्यक्ति भोजन को देखता है, तो उसके मुँह में लार आने लगता है। यहाँ भोजन एक स्वभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) है जो व्यक्ति में स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) उत्पन्न कर रहा है। अब थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि एक घंटी बजाकर उसके सामने भोजन दिया जाता है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है।

ऐसी परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति घंटी की आवाज को भोजन आने का सूचक मानकर घंटी की आवाज सुनते ही लारस्राव करने लगे। यदि ऐसा होता है तो यह कहा जाएगा कि व्यक्ति घंटी की आवाज (अस्वाभाविक उद्दीपन) के प्रति एक स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) करना सीख लिया है। इस तरह के सीखना को अनुबंध न द्वारा सीखना (learning by conditioning) कहा जाता है। पॉवलव ने इस सिद्धांत की जाँच करने के लिए एक कुत्ते पर प्रयोग किया है तथा वाटसन एवं रेनर (Watson & Raynor) ने एक छोटे शिशु, जिसका नाम अलबर्ट (Albert) था, उसपर एक प्रयोग किया है। इन दोनों प्रयोगों का वर्णन यहाँ अपेक्षित है।

कुत्ते पर पॉवलव द्वारा किया गया प्रयोग (Pavlov’s experiment on dog):
अनुबंधन अनुक्रिया सिद्धांत के तथ्य के समर्थन में पॉवलन ने एक प्रयोग एक भूखे कुत्ता पर किया। कुत्ता को एक ऐसे कमरे में विशेष उपकरण के सहारे खड़ा किया गया जिसमें बाहर से किसी तरह की आवाज नहीं आने पाए।

कुत्ते द्वारा टपकाई गई लार की मात्रा को मापने के लिए उसके गलफड़े में एक खास किस्म का यंत्र लगा दिया गया जिसे चित्र में दिखाया गया है। कुछ प्रयास तक कुत्ते के सामने भोजन दिया और भोजन देखते ही कुत्ते के मुँह में लार आने लगी। कुछ प्रयास के बाद कुत्ते के सामने भोजन उपस्थित करने के चंद सेकंड पहले तक घंटी बजाई जाने लगी। इस प्रक्रिया को कुछ प्रयासों तक दोहराने के बाद घंटी की आवाज सुनते ही बिना भोजन देखे
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चित्र: पॉवलव द्वारा कुत्ते पर किया गया प्रयोग

ही कुत्ते के मुंह में लार आने लगी। इस तरह कुत्ता ने घंटी की आवाज पर लारस्राव करने की अनुक्रिया को सीख लिया। पॉवलव के अनुसार यहाँ कुत्ता घंटी की आवाज तथा लारस्राव में संबंध स्थापित करना सीख लिया जिसे अनुबंधन (conditioned stimulus या CS), भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus या UCS) तथा लार का स्राव (अनुबंधन के बाद) एक अस्वाभाविक अनुक्रिया (conditioned response या CR) का उदाहरण है। भोजन के प्रति की गई अनुक्रिया (अनुबंधन के पहले) एक स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response या UCR) का उदाहरण है।

वाटसन तथा रेनर द्वारा किया गया प्रयोग (Experiment done by Waston & Raynor):
वाटसन (Watson) ने अपनी पत्नी रेनर (Raynor) के साथ मिलकर अलबर्ट नामक एक बच्चे पर प्रयोग किया। प्रयोग इस प्रकार है-अलबर्ट एक उजले चूहे के साथ खेल रहा था। तभी जोरों की तीव्र आवाज उत्पन्न कर दी गई।

आवाज से बच्चा डर जाता था। कुछ दिनों तक यह प्रक्रिया दोहराने के बाद यह देखा गया कि बच्चा उजले चूहे को देखते ही डरकर रोने लगता था। आगे चलकर अलबर्ट में और तीव्र अनुबंधन होता पाया जिसें अलबर्ट केवल उजले चूहे बल्कि उसे मिलती-जुलती अन्य चीजों, जैसे उजला रोएँदार कोट, उजला खरगोश आदि से भी डरने लगा। इस प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) जोरों की आवाज तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) चूहा है और अनुबंधित अनुक्रिया डर है जो मात्र चूहा देखकर ही उत्पन्न होता था।

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि अनुबंधन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें स्वाभाविक उद्दीपन तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन में एक विशेष संबंध स्थापित हो जाता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अस्वाभाविक उद्दीपन के प्रति ठीक वैसी ही अनुक्रिया करता है जैसी स्वाभाविक उद्दीपन के प्रति।

अनुबंधन के लिए कुछ प्रमुख बातें –
अनुबंधन द्वारा किसी प्रक्रिया को सीखने के लिए निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य है –

1. आवश्यकता (Need):
सीखनेवाले प्राणी में आवश्यकता का होना अनिवार्य है। पॉवलव के प्रयोग में कुत्ता भूखा था। अतः उसमें भोजन की अवश्यकता (need) थी। ऐसी आवश्यकता नहीं होती तो वह घंटी की आवाज के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

2. पुनर्बलन (Reinforcement):
प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति जिस चीज से होती है, उसे पुनर्बलन की संज्ञा दी जाती है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

3. अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन के बीच का समय-अंतराल (Time interval between conditioned stimulus and unconditioned stimulus):
fortit अनुक्रिया का संबंध अनुबंधित उद्दीपन के स्थापित हो, इसके लिए यह भी आवश्यक है कि अनुबंधित उद्दीपन के तुरंत बाद स्वाभाविक उद्दीपन दिया जाए। शायद यही कारण है कि पॉवलव के प्रयोग में घंटी बजने के तुरंत बाद कुत्ते के सामने भोजन दिया जाता था।

4. व्याघातक उद्दीपनों की अनुपस्थित (Absence of disturbing stimulus):
अनुबंधन द्वारा सीखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रयोग करते समय अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) तथा स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) से मिलते-जुलते दूसरे व्याघातक उद्दीपन वहाँ नहीं हों अन्यथा प्राणी अनुबंधित उद्दीपन के साथ स्वाभाविक अनुक्रिया का साहचर्य स्थापित नहीं कर पाएगा।

आलोचनाएं (Criticis):
इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए पुनर्बलन (reinforcement) आवश्यक है। परन्तु, टॉलमैन (Tolman) तथा ब्लोजेट (Blodgett) आदि द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि पुनर्बलन की अनुपस्थिति में भी प्राणी किसी अनुक्रिया को सीखता है। पुनर्बलन की आवश्यकता सीखी गई अनुक्रिया की अभिव्यक्ति के लिए होती है।

(b) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए अभ्यास या पुनरावृत्ति को महत्त्वपूर्ण कारक माना गया है। परन्तु, बहुत अनुक्रियाएं ऐसी होती है जिसे व्यक्ति मात्र एक बार के अनुभव में ही सीख लेता है।

(c) कुंछ आलोचकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा प्रतिपादित सीखना स्थायी तथा आशिक रूप से ही प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। कुत्ता घंटी की आवाज पर तभी तक लार का स्त्राव करता था जबकि घंटी की आवाज के बाद उसे. भोजन दिया जाता था।

(d) कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा सीखी गई अनुक्रिया अस्वाभाविक होती है जिसके आधार पर स्वाभाविक ढंग से सीखने की प्रक्रियाओं की व्याख्या नहीं की जा सकती है। इन अलोचनाओं के बावजूद पॉवलव का सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 5.
अधिगम अन्तरण का क्या स्वरूप है? कुछ प्रायोगिक उदाहरण द्वारा किसी भूत अधिगम के आगामी अधिगम पर प्रभाव की व्याख्या कीजिए। अथवा, अन्तरण के प्रभावों को निर्धारित करने में समानता एक मुख्य परिवर्तनीय है। (अण्डरवुड) अपने उत्तर की पुष्टि में प्रयोगात्मक प्रभाव दीजिए। अथवा, सीखने के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षक बालक को कक्षाओं में ज्ञान देता है। ज्ञान देने की क्रिया के पीछे अध्यापक की यह भावना अवश्य रहती है कि बालक इस ज्ञान अथवा सीखी हुई क्रिया का उपयोग अन्य परिस्थितियों में करेगा। अत: एक क्रिया का दूसरी परिस्थति में उपयोग किया जाना ही सीखने का स्थानान्तरण कहलाता है। उदाहरणार्थ, एक बालक गणित के सभी प्रश्नों को.बिना किसी की सहायता से स्वयं ही हल कर लेता है। गणित के ज्ञान द्वारा वह विज्ञान के विषयों में भी लाभ उठा सकता है।

इस क्रिया को सीखने का स्थानान्तरण कहते हैं। यहाँ तक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि समाज में ज्ञान का स्थानान्तरण न होता तो मनुष्य को हर क्रिया को सीखने के लिए नये सिरे से प्रयत्न करना पड़ता। इसलिए क्रो ने स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है – “सीखने के स्थानान्तरण से यह अभिप्राय है, जब सीखने में प्राप्त विचार, अनुभव या कार्य, ज्ञान अथवा कौशल का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में उपयोग किया जाय।”

शिक्षा-विश्व-कोष में स्थानान्तरण की व्याख्या इस प्रकार दी गई है-“जब कोई विशेष अनुभव व्यक्ति की योग्यता को दूसरी परिस्थिति में प्रतिक्रिया करने के हेतु प्रभावित करता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर वह नई समस्या को हल करने में उत्तेजना प्रदान करता है।” कॉलसानिक ने भी स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है-“स्थानान्तरण पहली स्थिति में अर्जित ज्ञान, कौशल, स्वभाव, मनोवृत्ति अथवा प्रतिक्रयाओं का अन्य परिस्थितियों में प्रयोग करता है।” इन परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि अर्जित अनुभव का लाभ उठाना ही स्थानान्तरण है। इस प्रकार के विचार सोरेन्स ने भी व्यक्त किये हैं – “स्थानान्तरण के द्वारा व्यक्ति उस सीमा तक सीखता है जहाँ से वह अर्जित योग्याताओं की सहायता दूसरी परिस्थितियों में करता है।

इन परिभाषाओं से प्राप्त निष्कार्षों को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। एक व्यक्ति ने ट्रैक्टर चलाना सीख लिया है। वह उसके संचालन की हर विधि को अच्छी तरह जान गया है। यदि उसे कार या ट्रक चलाने को कहा जाय तो उसे कार या ट्रक का संचालन करने में परेशानी होगी। ट्रैक्टर चलाने की क्रिया का उपयोग कार या ट्रक चलाने में किया गया, इसलिए यह ट्रैक्टर चलाने की क्रिया स्थानान्तरण है।

स्थानान्तरण के प्रकार (Types of Transfer) यदि पूर्व सीखने का अनुभव दूसरे सीखने पर प्रभाव डालता है तो दूसरे सीखने में कम समय तथा कम शक्ति का प्रयोग हो सकता है। यदि दूसरे कार्य के अधिगम में सुगमता हो जाय या कार्य दुरूह हो जाय अथवा प्रभाव शून्य हो जाय तो उन्हें क्रमश: भावात्मक या विधेयात्मक (Positive), नकारात्मक (Negative) तथा शुन्यात्मक (Zero) स्थानान्तरण के नाम से पुकारेंगे। इस प्रकार स्थानान्तरण के तीन प्रकार बताये गये।

1. भावात्मक या विधेयात्मक (Positive) स्थानान्तरण:
इस अधिगम स्थानान्तरण का तात्पर्य है कि जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में सहायक होता है तो उसे भावात्मक या विधेयात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। मार्गन (1956) के अनुसार भावात्मक या विधेयात्मक अन्तरण उस अवस्था में उत्पन्न होता है जब पूर्वानुभव अधिगम में सहायक होता है।

उदाहरणार्थ-दाएँ हाथ से लिखना सीख लेने पर बाएँ हाथ से भी लिखने का कार्य थोड़ा बहुत किया जा सकता है। प्रयोगशालाओं में दर्पण चित्रांकन (Mirror drawing) पर प्रायः धनात्मक या विधेयात्मक अन्तरण पाया जाता है। विधेयात्मक अन्तरण का जीवन में अत्यधिक महत्व है। नवीन परिस्थिति में ऐसा अन्तरण अधिक सहायक होता है। बेबर, फेकनर, डक्कन, ग्रिग एवं किम्मेल, हिलगार्ड आदि ने इस प्रकार विशेष कार्य किया है।

2. निषेधात्मक या नकारात्मक (Negative) स्थानान्तरण:
जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में अवरोध या बाधा उत्पन्न करता है तो उसे नकारात्मक या निषेधात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। आसगुड (Osgood) के अनुसार अवरोधक अन्तरण की निषेधात्मक या नकारात्मक अधिगम अन्तरण है। बोरिंग तथा अन्य के अनुसार यदि पूर्व अनुभव नवीन कार्य पर बाधक प्रभाव डालता है तो अन्तरण निषेधात्मक कहलाता है।

यह कई कारणों से हो सकता है। इसमें अनुक्रिया स्पर्धा या विपरीत अनुक्रिया इत्यादि प्रमुख कारण हैं। उदाहरणार्थ-जब हम किसी कार्य को दायें हाथ से करने में अभ्यस्त हो जाते हैं और इसी क्रिया को जब बायें हाथ से करते हैं तो कार्य में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है तथा दुरूहता आ जाती है। यही नकारात्मक या निषेधात्मक अधिगम स्थानान्तरण है।

3. शून्य स्थानान्तरण (Zero Transfer):
कुछ ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं जब एक क्रिया का सीखना किसी अन्य क्रिया में न भावात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है और न नकारात्मक, अर्थात् शून्य स्थानान्तरण की अवस्था में न तो पूर्वानुभाव सहायक होता है न बाधक। ऐसी स्थिति में अन्तरण प्रभावशून्य होगा।

अधिगम स्थानान्तरण के सिद्धान्त (Theories of Transfer of Learning):
अधिगम स्थानान्तरण के संदर्भ में निम्नलिखित सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है –

1. औपचारिक अनुशान का सिद्धान्त (Theory of FormalDiscipline):
शिक्षा-शास्त्रियों की विचारधारा काफी वर्षों तक यह थी मनुष्य का मस्तिष्क विभिन्न संकायों (Faculties) का स्वरूप है। इसमें स्मृति, विश्लेषण, निर्णय, इच्छा, कल्पना तथा तर्क आदि माने जाते हैं। इस विचारधारा को मानने वालों का मत था कि जिस प्रकार व्यायाम से शरीर की मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं उसी प्रकार प्रशिक्षण से मानसिक शक्तियाँ भी विकसित हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, गणित के ज्ञान से व्यवसाय में तथा कविता के ज्ञान से वाक्य के विभिन्न रूपों के समझने में सहायता मिलती है। स्वयं तर्क करने की शक्ति से समस्या समाधान में सहायता मिलती है। बुडवर्थ तथा विलियम जेम्स ने इसकी आलोचना की।

2. समान अंशों का सिद्धान्त (Theory of Identical Elements):
इसके प्रतिपादक थार्नडाइक (Thorndike) महोदय ने बताया कि एक विषय के संस्कार उसी अनुपात में दूसरे विषय में स्थानान्तरित होते हैं जिस अनुपात में दोनों विषयों में समानता पायी जाती है। विद्यार्थियों को ऐसे विषयों का ज्ञान कराया जाना चाहिए जिसके ज्ञान से जीवन के समान क्षेत्रों में स्थानान्तरण हो सके।

स्पीयरमैन (Spearman) ने भी द्वि-तत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन करके यह बताया कि सामान्य बुद्धि हर मनुष्य में एक-सी होती है जिसका उपयोग सामान्य क्रियाओं में होता है। सामान्य बुद्धि ही स्थानान्तरण का आधार है। विशिष्ट बुद्धि को जो मनुष्य में भिन्न होती है उसका उपयोग हर मनुष्य अपने ढंग से करता है। सामान्य विषयों जैसे भूगोल, इतिहास, गणित तथा साहित्य आदि में भी किसी का स्थानान्तरण करने में उसकी मात्रा कम या अधिक होगी।

3. सामान्य अनुभव का सिद्धान्त (Theory of Generalization of Experience):
चार्ल्स जुड (Charles Judd) इस सिद्धान्त के जन्मदाता हैं। इसे “सिद्धान्त द्वारा स्थानान्तरण” कहा जाता है। जिन सिद्धान्तों को व्यक्ति अपने अनुभवों द्वारा सीख लेता है उनका जीवन परिस्थितियों में स्थानान्तरण होता है। जिन सिद्धान्तों काके राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) ने पतंग उड़ाने में सीखा था उन्हीं के आधार पर जहाज बनाने में सहायता प्राप्त की।

सीखने में स्थानान्तरण का महत्त्व

  1. स्थानान्तरण के महत्त्व को देखते हुए विद्यालयों में बालकों का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाना चाहिए कि उनके भविष्य के जीवन से सम्बन्धित हो। पाठ्यक्रम में सामाजिक, शारीरिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, चरित्र-निर्माण आदि जैसे विषयों का समावेश हो सके तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
  2. स्थानान्तरण से एक विषय के बाद दूसरा विषय सरलता से सीख लिया जाता है जिससे अधिक श्रम एवं समय की भविष्य में बचत होती है।
  3. स्थानान्तरण के महत्व को स्वीकार करके विद्यालय के पाठ्यक्रम से ऐसे विषयों को निकाला जा सकता है जिनका विद्यार्थी के जीवन में नकारात्मक स्थानान्तरण होता है।
  4. वातावरण प्रतिकूल है या अनुकूल इसका ध्यान प्रशिक्षण के दौरान महत्त्वपूर्ण होता है। प्रतिकूल वातावरण में स्थानान्तरण नहीं हो पाता है।
  5. शिक्षकों को स्थानान्तरण के महत्त्व को स्वीकार करके पाठ्यक्रम को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए जिससे कि विद्यार्थी की रुचि अध्ययन में लग सके।

विशिष्ट विषय में स्थानान्तरण:
आज की शिक्षा प्रणाली पर एक मुख्य आरोप यह लगाया जाता है कि वह जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती है। गणित, बीजगणित, रेखागणित या विज्ञान हो, जो हम कक्षा में पढ़ते हैं, वह छात्रों के व्यावहारिक जीवन में अनुपयोगी होती है। थॉर्नडाइक ने विभिन्न विषयों के स्थानान्तरण पर प्रयोग किया। उसने हाईस्कूल के पाठ्यविषयों के आधार पर दसवीं, ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा के 13,500 छात्रों पर तर्क (Logic) के परीक्षणों का प्रयोग किया। उसने यह निष्कर्ष निकाला –

  1. विभिन्न विषयों के तुलनात्मक स्थानान्तरण की प्रतिशत में अन्तर कम होता है।
  2. विषय का स्थानान्तरण शिक्षण विधि पर निर्भर करता है।
  3. स्थानान्तरण इस बात पर निर्भर करता है कि प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस सीमा तक हुआ है।

थार्नडाइक के इन विषयों से हम निम्नलिखित सुझावों को कार्यरूप में परिणत करके विशिष्ट विषयों में स्थानान्तरण की प्रक्रिया को लागू कर सकते हैं।

  1. बालकों को किसी विषय या समस्या के प्रत्येक अंग की जानकारी देनी चाहिए।
  2. बालकों को समय पर चिंतन तथा तर्क करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए।
  3. बालकों को समस्या के विश्लेषण का अवसर देना चाहिए और पश्चात् सामान्य सिद्धान्तों के मध्य से स्थानान्तरण का अवसर देना चाहिए।
  4. गणित जैसे विषय को पर्याप्त सहायक सामग्री (Helping Material) के द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 6.
अधिगम सिद्धांत के अनुप्रयोग का वर्णन करें।
उत्तर:
1. बच्चों के पालन-पोषण में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग बच्चों के पालन-पोषण में होता है, शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत का उपयोग कर बच्चों को सिखाया जा सकता है कि कौन-सी वस्तु खतरनाक है तथा उससे कैसे बचना चाहिए। नैमित्तिक अनुबंधन का उपयोग कर बच्चों के अनुचित व्यवहार को सुधारा जा सकता है।

2. विद्यालय में अनुप्रयोग:
विद्यालय में बच्चों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू का विकास किया जाता है इस संबंध में शाब्दिक सीखना, प्रेक्षणात्मक सीखना, कौशल सीखना के नियम बहुत उपयोगी हैं शिक्षक को एक आदर्श परामर्शदाता के रूप आचरण करना पड़ता है जिससे वे विद्यार्थी के आदर्श बन सके। वांछित व्यवहार विकसित करने के लिए पुरस्कार का प्रयोग करना चाहिए। इससे छात्रों में विषय संबंधी पढ़ाई में तेजी आती है तथा उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी उन्नत होती है।

3. संगठन में अनुप्रयोग:
संगठन का अर्थ कार्यालय, उद्योग, संघ से है सीखने के सिद्धांत का प्रयोग कर कर्मचारी के संतोष, मनोबल पारस्परिक संबंध को उन्नत बनाया जाता है, जिससे अनुशासनहीनता घटती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है इसके लिए समय-समय पर प्रबंधन द्वारा आकर्षक पुरस्कार की व्यवस्था की जाती है। सीखने के सिद्धांत विशेषकर प्रोत्साहन एवं प्रवलन का प्रयोग सभी प्रकार के संगठन में स्वस्थ वातावरण एवं उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

4. चिकित्सात्मक उपचार में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग मानसिक चिकित्सा के क्षेत्र में किया गया। मनोवैज्ञानिक समायोजन संबंधी समस्या अनावश्यक भय और गलत आदत, सुधारने में व्यवहार सुधार तकनीक का विकास किया।

भय दूर करने के लिए विलोप का, बच्चों और प्रौढ़ों के भय को दूर करने के लिए आदतावन, अत्यधिक भय से पीड़ित व्यक्ति के लिए क्रमिक-विकास, संवेदनीकरण, अवांछित आदत छुड़ाने के लिए विरूचि चिकित्सा, मानसिक रूप से घबराहट और अशांति अनुभव करने वाले के जैव प्रतिपादित दी जाती है। संक्षेप में मनोचिकित्सा की विभिन्न तकनीकों एवं विधियों में सीखने का सिद्धांत के लाभकारी अनुप्रयोग किए जाते हैं। स्पष्ट है कि सीखने के सिद्धांत एवं नियमों का प्रयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है और इसके उत्पादवर्द्धक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

प्रश्न 7.
विभेदन के अर्थ एवं स्वरूप को बताएँ। विभेदन सीखने की विभिन्न विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अर्थ एवं स्वरूप (Meaning and Nature):
विभेदन (discrimination) सामान्यीकरण (generalization) का विपरीत होता है। अनुबन्धन के क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं ने अपने अध्ययनों में यह देखा है कि प्रशिक्षण की आरंभिक अवस्था में प्राणी CS तथा उससे मिलते-जुलते उद्दीपकों में अन्तर नहीं कर पाता है। फलतः वह CS के समान ही इन सभी उद्दीपकों के प्रति अनुक्रिया करता है जिसे सामान्यीकरण (generalization) कहा जाता है। जैसे-जैसे प्रशिक्षण आगे बढ़ता है, प्राणी में CS को अन्य समान उद्दीपकों से भिन्न करने की क्षमता विकसित हो. जाती है और वह अब सिर्फ CS के प्रति अनुक्रिया करता है अन्य समान उद्दीपकों के प्रति नहीं। इसे ही मनोवैज्ञानिकों ने विभेदन (discrimination) की संज्ञा दी है।

जैसे, मान लिया जाए कि पॉवलोवियन अनुबन्धन में 1000 Hz के आवाज को CS के रूप में उपयोग करके कुत्ता को उस पर लार स्राव करने की अनुक्रिया करना सिखलाया जाता है। इस प्रशिक्षण के प्रारंभिक अवस्था में कुत्ता 800 Hz तथा 1200 Hz पर भी वैसी ही अनुक्रिया करेगा। परंतु प्रशिक्षण की अंतिम अवस्था में वह सिर्फ 1000 Hz के आवाज पर ही लार स्राव की अनुक्रिया करेगा, अन्य उद्दीपकों जैसे 800 Hz एवं 1200 Hz पर नहीं करेगा क्योंकि कुत्ता इस अवस्था में CS तथा उन उद्दीपकों के बीच विभेदन करना सीख लेता है। स्पष्ट है कि विभेदन के स्वरूप के बारे में हमें निम्नांकित तथ्य मुख्य रूप से मिलता है –

  1. विभेदन की प्रक्रिया सामान्यीकरण की प्रक्रिया के विपरीत होती है।
  2. विभेदन में प्राणी CS के प्रति ही अनुक्रिया करता है अन्य किसी भी समान उद्दीपक के प्रति के प्रति नहीं।
  3. विभेदन की अवस्था में CS की विशिष्टता की पहचान स्पष्ट हो जाती है।

विभेदन सीखने की विधियाँ (Methods of Discrimination learning):
विभेदन सीखने का क्रमबद्ध प्रयोगशाला (systematic laboratory) अध्ययन करीब 1900 से प्रारम्भ हुआ है। तब से आज तक किये गये प्रयोगों एवं शोधों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि विभेदन सीखना अध्ययन करने के लिए निम्नांकित तीन तरह की विधियों का प्रतिपादन किया गया हैं –

  1. पृथक प्रयास विधियाँ (discrete trial methods)
  2. स्वचालित विधियाँ (automated methods)
  3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (free operant methods)

1. पृथक प्रयास विधियाँ (Discrete trial methods):
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस विधि में प्राणी दिये हुए उद्दीपकों के बीच विभेदन करना प्रत्येक प्रयास में किये गए पृथक अनुक्रियाओं के आधार पर सीखता है।

2. स्वचालित विधियाँ (Automated methods):
स्वचालित विधियों द्वारा भी विभेदन सीखने का अध्ययन किया गया है। इन विधियों की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि पृथक प्रयास विधि (discrete trial method) द्वारा विभेदन सीखना में काफी समय लगता था और साथ ही इनसे एक प्रयास से दूसरे प्रयास में अनुक्रिया परिवर्तनशीलता (response variability) होने लगती है जिसके कभी-कभी गंभीर परिणाम होते हैं।

स्वचालित विधि में ऐसी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। स्वचालित विधि में स्वचालित स्विचिंग उपकरण (automatic switching equipment) होते हैं और पशुओं को पूर्णतः एक पृथक परिस्थिति (isolated condition) में रखा जाता है। जैसे, चूहा को दो खिड़की या दो रास्तों के बीच चुनने के बजाय उसे दो लीवर या दो बटन में से किसी एक लीवर या बटन को दबाकर अनुक्रिया करना होता है।

3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (Free operant methods):
इस विधि में प्राणी के सामने उद्दीपकों, जिनके बीच विभेदन करना सीखना होता है, बारी-बारी से (successively) या कभी-कभी एक ही साथ (simultaneously) उपस्थित किया जाता है। प्राणी को उन उद्दीपनों को इधर-उधर करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।

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प्रश्न 8.
स्किनर के प्रवर्तन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन सिद्धान्त की आलोचना की व्याख्या करें।
उत्तर:
स्किनर ने सीखने के क्षेत्र में एक नए सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो पॉवलव के सम्बन्ध प्रत्यावर्तन एवं थॉर्नडाइक के सम्बन्ध पर आधारित था। इस सिद्धान्त को प्रबन्धन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त में अनुकूलन के बहुत-से ऐसे प्रत्ययों का व्यवहार किया, जो पॉवलव के सिद्धान्त से लिया गया था तथा थॉर्नडाइक के प्रभाव के नियम को अपने सिद्धान्त का आधार माना।

स्किनर ने पॉवलव तथा थॉर्नडाइक के सिद्धान्तं से कुछ कच्चे माल प्राप्त कर एक नए चीज का आविष्कार किया जो एक सफल सिद्धान्त साबित हुआ। उन्होंने क्लासिकल अनुबन्धन का विरोध किया और प्राणी और प्राणी की प्रतिक्रिया के प्रभाव को प्रधानता दी। उन्होंने व्यवहार की संज्ञानात्मक व्याख्या को अस्वीकार किया और व्यवहारवादी व्याख्या पर बल दिया।

स्किनर ने प्रत्यार्थी-व्यवहार और प्रवर्तन-व्यवहार में अन्तर बताया और कहा कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी अपनी समस्याओं का समाधान प्रवर्तन व्यवहार के द्वारा सीखता है, प्रत्यार्थी व्यवहार के द्वारा नहीं। उन्होंने बताया कि प्रत्यार्थी-व्यवहार वह है जो उत्तेजना के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। जैसे-पॉवलव के प्रयोग में भोजन या घंटी की आवाज के बाद कुत्ते के मुँह से लार निकलता था। परन्तु प्रवर्तन-व्यवहार उसे कहते हैं, जिसे उत्पन्न किया जाता है, वहाँ उत्तेजना की प्रधानता होती है। परन्तु यहाँ उत्तेजना के साथ-साथ प्राणी की भी प्रधानता होती है। स्किनर ने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार साधनात्मक होता है। प्रभाव को उत्पन्न करने में प्राणी साधन का काम करता है।

स्किनर ने अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिए कई प्रयोगात्मक अध्ययन किया। उनका प्रयोग मुख्य रूप से चूहों और कबूतरों पर किया गया। इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रकार के बक्से का निर्माण किया, जिससे स्किनर बॉक्स के नाम से जानते हैं। स्किनर बॉक्स में एक छोटी-सी पीतल की कुंजी होती है, जिसकों दबाने से खाने की गोली निकल आती है। कुंजी का सम्बन्ध एक यंत्र से होता है, जिससे भूखे चूहे द्वारा किये गये प्रयासों का पता चलता है। स्किनर ने एक भूखे चूहे को स्किनर बॉक्स में बन्द किया।

उन्होंने देखा कि प्रारंभ में चूहा इधर-उधर घूमने लगा। इसी बीच उसका पंजा पीतल की कुंजी पर पड़ गया। कुंजी के दबते ही भोजन की गोली बाहर निकल गयी, जिसे चूहा खाकर संतुष्ट हुआ। इस प्रकार जब भी वह कुंजी को दबाता था, उसे भोजन की गोली मिल जाती थी। कई प्रयासों के बाद चूहे ने कुंजी को. दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया। स्किनर ने एक दूसरा प्रयोग कबूतरों पर किया। उसे भी एक बक्से में बन्द किया। बक्से की बनावट पहले वाले बक्से से भिन्न थी।

इसमें पीतल की कुंजी की जगह रौशन प्लास्टिक की कुंजी थी। उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर कबूतर द्वारा चोंच मारने से खाने का दाना निकलता था। प्रारंभ में कबूतर ने इधर-उधर चोंच मारी, परन्तु उसे भोजन नहीं मिला। लेकिन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारते ही भोजन का दाना निकल आया। इस तरह कई प्रयासों के बाद कबूतर ने उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सीख लिया।

स्किनर के उपर्युक्त प्रयोगों से स्पष्ट होता है कि प्राणी प्रवर्तन अनुकूलन के आधार पर ही सीखता है। उन्होंने प्रवर्तन अनुकूलन की कुछ विशेषताओं की चर्चा की है, जो निम्नलिखित हैं –

1. प्रवर्तन व्यवहार:
स्किनर ने दावा किया है कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी का व्यवहार-प्रवर्तन होता है। इस बात की पुष्टि उन्होंने चूहे और कबूतरों के प्रयोग से सिद्ध कर दिया। प्रवर्तन से उस पर प्रभाव पड़ता है और प्राणी इस क्रिया को सीख लेता है।

2. साधनात्मक व्यवहार:
स्किनर ने शिक्षण में साधनात्मक व्यवहार पर भी बल दिया है और कहा है कि प्राणी का व्यवहार प्रबलन प्राप्त करने के लिए साधना का काम करता है। गलत व्यवहार करने पर प्रबलन नहीं मिलता है तथा सही व्यवहार करने पर प्रबलन प्राप्त होता है।

3. प्रबलन:
अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह स्किनर ने भी शिक्षण के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है। उन्होंने दो प्रकार के प्रबलन की चर्चा की है, जिसे सकारात्मक प्रबलन तथा नकारात्मक प्रबलन के नाम से जानते हैं। सकारात्मक प्रबलन उसे कहते हैं, जिससे प्राणी की संतुष्टि मिलती है तथा उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है जबकि नकारात्मक प्रबलन से असंतुष्टि मिलती है। प्राणी उससे बचने का प्रयास करता है।

4. व्यवहार-सुसंगठन:
प्रबलन से प्राणी के व्यवहार को सुसंगठित किया जाता है। इस आधार पर पशुओं को जटिल कार्य सिखलाया जाता है। जैसे-स्किनर ने कबूतर को पहले बक्से से परिचय कराया और फिर प्लास्टिक कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सिखाया और अन्त में उस व्यवहार को सुगठित किया। इसलिए कबूतर को बाद में जब भी स्किनर बॉक्स में बन्द किया जाता था, वह तुरंत ही प्लास्टिक कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त कर लेता था।

उन्होंने व्यवहार-सुगठन के पक्ष में और भी प्रयोग किये हैं। व्यवहार सुगठन केवल पशुओं के लिए ही उपयोगी नहीं, बल्कि मनुष्यों के लिए भी प्रभावशाली सिद्ध हुआ। ग्रीन स्पून ने मनुष्यों पर प्रयोग करके इसे प्रमाणित करने का प्रयास किया। इसी तरह वरप्लांक ने भी मनुष्य के व्यवहार के सुगठन को मौखिक अनुकूलन द्वारा प्रमाणित किया है।

5. उत्तेजना सामान्यीकरण:
जब कोई तटस्थ उत्तेजना किसी अनुक्रिया को उत्पन्न करने के लिए अनुकूलित हो जाती है, तो वह अनुक्रिया उस उत्तेजना से मिलती-जुलती उत्तेजनाओं के प्रति भी होने लगती है, जिसे उत्तेजना सामान्यीकरण कहते हैं। स्किनर ने अपने अध्ययनों में देखा कि जब चूहा कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया, तो उससे कुछ भिन्न दूसरे बक्से में छोड़ा गया। यहाँ भी चूहे ने अपनी उसी प्रतिक्रिया को दुहरायी। ग्राइस एवं राल्ज ने भूल-भुलैया के आधार पर उत्तेजना सामान्यीकरण को सिद्ध किया।

6. उत्तेजना-विभेद:
उत्तेजना-विभेद का अर्थ हुआ कि जब प्राणी एक परिस्थिति में कोई व्यवहार सीख लेता है, तो उस परिस्थिति से भिन्न परिस्थितियों में उसे नहीं दुहराता है। स्किनर ने कबूतर को स्किनर-बॉक्स में दाना प्राप्त करना सिखाया। उसके बाद उस बक्से से भिन्न दूसरे बक्से में कबूतर को रखा तो वहाँ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। ग्राइस एवं राल्ज के अध्ययन से भी यह बात प्रमाणित हो जाती है।

7. विलोप:
पॉवलव के क्लासिकल अनुबन्धन की तरह इसमें भी विलोप की विशेषता पायी जाती है। विलोप से तात्पर्य यह है कि प्राणी उत्तेजना के प्रति व्यवहार करना सीख ले और उसे प्रबलन नहीं मिले, तो धीरे-धीरे व्यवहार समाप्त हो जाता है। स्किनर ने देखा कि चूहों को कुंजी दबाने के बाद भी कई बार भोजन नहीं मिला, तो उसने कुंजी को दबाना छोड़ दिया, इसे ही विलोप कहते हैं।

8. स्वतः पुनाप्ति:
अनुबन्धन होने के बाद यदि उसे प्रबलन नहीं दिया जाता है, तो धीरे-धीरे अनुबंधित अनुक्रिया को प्राणी भूल जाता है। स्किनर ने देखा कि भोजन के अभाव में चूहे ने कुंजी दबाना छोड़ दिया, लेकिन कुछ समय बाद उसने स्वतः कुंजी को दबाया। इस तरह स्किनर का शिक्षण-सिद्धान्त एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है।

उन्होंने वाटसन तथा गथरी की तरह शिक्षण से सम्बन्धित अमूर्त विषयों के व्यवहारिक पक्ष पर बल दिया है। उन्होंने शिक्षण में प्रवर्तन व्यवहार को आवश्यक माना तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह प्रबलन को भी आवश्यक माना है। बच्चों के समाजीकरण की व्याख्या करने में भी यह सिद्धान्त सफल है। व्यवहार परिमार्जन की दिशा में इस सिद्धान्त का कोई मुकाबला नहीं है। परन्तु इन गुणों के बावजूद स्किनर का सिद्धान्त दोषों से मुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के निम्नलिखित प्रमुख दोष हैं –

दोष (Demerits):

1. स्किनर ने सीखने के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है, परन्तु टॉलमैन ने प्रबलन को आवश्यक नहीं माना। उन्होंने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर सिद्ध कर दिया है कि बिना प्रबलन के भी प्राणी सीख सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसे ‘लेटेंट शिक्षण’ कहते हैं।

2. स्किनर ने प्रवर्तन तथा प्रत्यार्थी:
व्यवहारों के बीच अन्तर माना है, परन्तु मिलर और टेरिस उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार और प्रत्यार्थी-व्यवहार के बीच सीमा-रेखा खींचना मुश्किल हैं।

3. इस सिद्धान्त पर एक आरोप यह लगाया जाता है कि इसमें परिधीय यंत्रों पर बल दिया गया है तथा केन्द्रीय यंत्रों को छोड़ दिया गया है, जबकि केन्द्रीय यन्त्रों की शिक्षण में प्रधानता होती है।

4. स्किनर ने सीखने तथा सम्पादन के अन्तर की और ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्धन को प्रबलन का परिणाम माना, जबकि बन्धुश ने कहा कि सम्भव है कि एक बालक अपने विषय को अच्छी तरह जानता हो, परन्तु प्रबलन के अभाव में उसे सम्पादन के रूप में व्यक्त न कर सके। प्रबलन से सम्पादन प्रभावित होता है, शिक्षण नहीं।

5. कौसकी ने इस सिद्धान्त की समीक्षा करते हुए तीन बातों का उल्लेख किया है और कहा कि स्किनर ने प्राणी की आन्तरिक अवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया है, जबकि उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्ध में इसका बहुत बड़ा हाथ होता है।

दूसरी बात उन्होंने कहा कि प्रत्ययों का मूल्य सर्जनात्मक निर्देशन पर निर्भर करता है तथा तीसरी की स्किनर ने अपने चूहे को स्किनर बॉक्स के भीतर प्राप्त प्रत्ययों का बहिर्षण करके मानव के मानसिक जीवन की समस्याओं की व्याख्या करने का असफल प्रयास किया है। स्किनर द्वारा प्रस्तुत बहिर्षण या तो गलत है या लाक्षणिक दोषों से पीड़ित है। इस तरह, हम देखते हैं कि स्किनर के सिद्धान्त में बहुत सारे दोष हैं। परन्तु इसके बावजूद इसका व्यावहारिक महत्व कम नहीं हुआ। शिक्षण के क्षेत्र में आज भी इस सिद्धान्त की अलग मान्यता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 9.
सीखना या शिक्षण के प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत सीखने का एक प्रमुख सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन ई. एल. थार्नडाइक (E. L. Thorndike) द्वारा किया गया। बिल्लियों, चूहों, मुर्गियों आदि पर प्रयोग करके थार्नडाइक ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धांत का सारतत्त्व यह है कि जब प्राणी किसी कार्य या कौशल को सीखना चाहता है तब वह प्रयत्न करता है और इस क्रम में उससे भूलें (erors) होती हैं।

जैसे-जैसे प्रयत्नों या प्रयासों की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे भूलों या त्रुटियों में कमी आती जाती है। एक ऐसा समय आता है जब बिना कोई त्रुटि या भूल किए ही प्राणी उस कौशल या अनुक्रिया को करना सीख लेता है। थार्नडाइक का यह सिद्धांत उनके द्वारा किए गए कुछ प्रयोगों पर आधृत है। इन प्रयोगों में निम्नांकित दो तरह के प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1. पहेली बक्स की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to puzzle-box problem):
यह प्रयोग एक भूखी बिल्ली पर किया गया जिससे पहले बक्से (puzzle box) में रख दिया जाता है। पहेली बक्से के सामने बाहर में एक मछली का टुकड़ा रख दिया गया जिसे बिल्ली देख रही थी।

बिल्ली के सामने यह समस्या थी कि वह किस तरह पहेली बक्से से निकलकर मछली खाकर अपनी भूख मिटा ले। बक्से के अन्दर बंद होते ही बिल्ली बाहर निकलने के लिए प्रयत्न अर्थात् उछल-कूद करने लगी। वह भूख से प्रेरित थी जिसके फलस्वरूप वह पहेली बक्से को दाँत से काटती, कभी अपने पंजे से नोचती-खसोटती थी।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम img 3
चित्र: थार्नडाइक का पहेली बॉक्स

इन व्यर्थ प्रयासों के दौरान उसका पंजा बक्से के एक बटन या सिटकिनी पर पड़ जाता है जिससे बक्से का दरवाजा खुल गया और बिल्ली बाहर निकलकर मछली खा गई। फिर बाद में उसी बिल्ली को उसे बक्से में रखा गया तो देखा गया कि इस बारी में भी बिल्ली द्वारा कुछ उछल-कूद की व्यर्थ क्रियाएँ हुईं, परंतु पहले की अपेक्षा कम हुई।

बिल्ली थोड़ी देर तक छल-कूद करने के बाद ही दरवाजा खोल सकने में समर्थ हो गई । इस प्रक्रिया को जब कई दिनों तक दोहराया गया तब देखा गया कि प्रयास बढ़ने के साथ-ही-साथ त्रुटियों में काफी कमी आई और अंत में एक समय ऐसा भी आया कि बिल्ली को जैसे ही बक्से में रखा गया, वह सीधे सिटकिनी या बटन दबाकर दरवाजा खोल लेती थी और बाहर आकर मछली खा लेती थी। इस तरह, बिना कोई त्रुटि किए कम-से-कम समय में बिल्ली दरवाजा खोलना सीख गयी।

2. भूल-भूलैया सीखने की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to mazeleaming problem):
इस प्रयोग में थार्नडाइक ने एक भूखे चूहे को भूल-भूलैया में रखा। भूल-भूलैया (maze) एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें लक्ष्य तक पहुँचने का एक ही रास्ता होता है। परंतु अंधपथ (blind ways) कई होते हैं। भुल-भुलैया के लक्ष्य स्थान पर भोजन रख दिया गया। भूखे चूहे को भूल-भूलैया के प्रवेश द्वार पर छोड़ दिया जाता था।

यह देखा गया कि जब पहली बार भूखे चूहे को भूल-भुलैया में छोड़ा गया तब वह बहुत देर तक अंधपथों में भटकता रहा और काफी देर के बाद संयोग से सही रास्ता अपनाकर लक्ष्य स्थान पर पहुँच गया, लेकिन, जब कई बार उस चूहे को भूलभुलैया में छोड़ा गया तब देखा गया कि अंधपथ में जाने की व्यर्थ क्रियाओं में काफी कमी आती गई और वह धीरे-धीरे अंधपथ का त्याग करके सही मार्ग में जाना सीख लिया।
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चित्र: भूल-भुलैया का प्रयोग चित्र

उपर्युक्त दोनों प्रयोगों से स्पष्ट है कि प्राणी किसी कार्य को सीखने के लिए बार-बार प्रयल करता है, उसमें उससे अनेक भूलें (errors) होती हैं। अभ्यास जारी रहने से भूलने की संख्या में धीरे-धीरे कमी आती है और अंत में वह कार्य को बिना किसी तरह की त्रुटि किए ही करना सीख जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार सीखने की पूरी प्रक्रिया में निम्नांकित छह अवस्थाएँ होती हैं –

(a) प्रणोद (Drive):
सीखने के लिए प्रणोद (drive) आवश्यक है, क्योंकि यह प्राणी को क्रियाशील या प्रयत्नशील बनाता है। उपर्युक्त प्रयोगों में बिल्ली तथा चूहा में भूख प्रणोद का एक उदाहरण है।

(b) प्रणोद की तुष्टि में बाधा (Interference in satisfaction of drive):
प्रणोद की तुष्टि में जब बाधा पहुँचती है तब इससे प्राणी में क्रियाशीलता बढ़ती है और वह समस्या को सुलझाने का प्रयत्न करता है।

(c) यादृच्छिक क्रियाएँ (Random activities):
समस्या को सुलझाने के पहले प्राणी कई तरह की यादृचिछक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। बिल्ली द्वारा उछलना, कूदना, नोचना, खसोटना ऐसी ही क्रियाओं के उदाहरण है।

(d) आकस्मिक सफलता (Accidental success):
व्यर्थ की क्रियाएँ या यादृच्छिक क्रियाएँ करते समय मात्र संयोग से ही प्राणी सही अनुक्रिया कर देता है जिसे आकस्मिक सफलता कहा जाता है। बिल्ली द्वारा उछल-कूद करते समय संयोगवश सिटकनी दब जाना एक आकस्मिक सफलता का उदाहरण है।

(e) सही अनुक्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition of correct response):
प्रथम बार सफलता प्राप्त कर लेने के बाद प्राणी धीरे-धीरे यादृच्छिक क्रियाओं का परित्याग करता चला जाता है तथा सही अनुक्रिया को दोहराता जाता है।

(f) सही अनुक्रिया स्थायीकरण (Fixation of correct response):
अंतिम अवस्था में प्राणी में सही अनुक्रिया का स्थायीकरण होता है जिसका परिणाम यह होता है कि प्राणी बिना कोई त्रुटि किए ही सही अनुक्रिया कर पाता है।

आलोचनायें (Criticisms):
इस सिद्धांत की कुछ प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) थार्नडाइक ने सीखने की प्रक्रिया को एक यांत्रिक प्रक्रिया (mechanical process) माना है जिसका मतलब यह हुआ कि प्राणी यदि किसी अनुक्रिया को सीखना प्रारंभ करता है तब शुरू में यह यादृच्छिक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। धीरे-धीरे अभ्यास से ऐसी त्रुटियाँ समाप्त हो जाती हैं और वह सही अनुक्रिया को करना सीख लेता है। आलोचकों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक अनुक्रिया को सीखने में इस तरह की निश्चित एवं यांत्रिक क्रियाएँ नहीं होती हैं।

(b) कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रयत्न तथा भूल के सिद्धान्त के आधार पर सभी प्रकार के सीखना की व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ तक सरल क्रियाओं जैसे टाइप सीखन, साइकिल चलाना सीखना आदि का प्रश्न है, वह तो अभ्यास एवं प्रभाव के नियमों के सहारे सीखा जा सकता है, लेकिन जटिल क्रियाओं को मात्र अभ्यास द्वारा सीखना संभव नहीं है। इसके लिए सूझ (insight) की आवश्यकता पड़ती है जिसकी चर्चा तक थार्नडाइक ने नहीं की।

(c) यह सिद्धांत मूलतः पशुओं, जैसे-बिल्ली तथा चूहों पर किए गए प्रयोगों पर आधारित है। अत: इसकी बहुत-सी बातें मानव सीखना के लिए उपयुक्त नहीं हैं। बिल्ली भले की पहले बक्से के भीतर से कैसे निकला जाए, नहीं जानती पर मनुष्य तो किसी भी परिस्थिति को अच्छी तरह समझकर की कोई अनुक्रिया करता है। जो भी हो, इन आलोचनाओं के बावजूद थार्नडाइक का यह सिद्धांत अपना एक अलग स्थान रखता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 10.
शिक्षण वक्र क्या है? इसके प्रकार और उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक प्रकार का ग्राफ है जो सीखने में हुए विकास को दर्शाता है। इसे एक झलक देखने पर ही सीखने से व्यवहार में हुए परिवर्तनों की झांकी मिलती है। थार्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह बतलाया कि सीखने में जैसे-जैसे प्रयास या अभ्यास की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे अशुद्धियों की संख्या कम होती जाती है। इसमें लगे समय में कमी आती जाती है। अन्त में व्यक्ति कम-से-कम समय में बिना कोई गलती किए सही प्रक्रिया सीख जाता है। जहाँ तक शिक्षण वक्र के विभिन्न प्रकारों का प्रश्न है, इसके निम्नलिखित प्रकारों की व्याख्या की जा सकती है –

(क) भूल वक्र (Error-graph):
किसी भी सीखना-वक्र में दो रेखायें होती हैं-उदग्र रेखा तथा आधार रेखा।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम img 5

रेखा पर स्वतंत्र चर लिखा जाता है। स्वतंत्र चर का अर्थ यहाँ अभ्यास या प्रयत्न है। उदग्र रेखा पर आश्रित चर लिखा जाता है। यहाँ आश्रित चर का तात्पर्य भूल, समय या सीखने की मात्रा से है। जब आधार-रेखा पर प्रयत्न तथा उदग्र रेखा पर भूल अंकित करके वक्र बनाया जाता है तो इस वक्र को भूल-वक्र कहा जाता है। यह वक्र उदग्र रेखा के सिरे से शुरू होकर कभी दाहिने तरफ जाता है और कभी आधार रेखा से मिल भी जाता है। ऐसा तब होता है जबकि अंतिम प्रयत्न में भूल शून्य प्रयत्न हो जाता है।

(ख) समय वक्र (Time-graph):
जब आधार रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर समय अंकित करने वक्र बनाया जाता है तो इसे समय-वक्र कहा जाता है। यह वक्र भी भूल-वक्र की तरह उदग्र रेखा के सिरे से आरम्भ होकर दाहिने ओर आधार की तरफ जाती है। परन्तु, यह आधार-रेखा से कभी भी नहीं मिलता है। कारण, अभ्यास से समय चाहे जितना भी कम हो जाए, किन्तु शून्य नहीं होता।
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(ग) उत्पादन वक्र:
जब किसी क्रिया को अभ्यास के द्वारा सीखने का प्रयास किया जाता है तो प्रारंभ में काम की मात्रा या उत्पादन कम होता है। जैसे-जैसे अभ्यास की संख्या बढ़ती जाएगी, उत्पादन की गति भी बढ़ती जाएगी। उत्पादन की इस बढ़ती हुई मात्रा को ग्राफ द्वारा दर्शाया जाए तो इससे उत्पादन वक्र प्राप्त होता है। इस प्रकार का वक्र नीचे से दाहिने ऊपर उठता जाता है। यह उठना एक सीमा तक होता है।

इस तरह शिक्षण वक्र के उपर्युक्त प्रकारों का उल्लेख किया जा सकता है। इसी प्रकार इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ भी होती हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. प्रारंभिक चढ़ाव:
सीखना प्रारंभ करने के बाद व्यक्ति विषया या क्रिया से पूर्ण परिचित हो जाता है जब उसमें सीखने की प्रेरणा जागृत होती है और वह पूरी लगन, उत्साह, अभिरुचि तथा उत्सुकता के साथ विषय को सीखने लगता है। इससे शिक्षण वक्र में चढ़ाव देखा जाता है। इसे ही प्रारंभिक चढ़ाव कहा जाता है। शिक्षण वक्र की यह पहली विशेषता है।

2. मध्यवर्ती चढ़ाव:
जब प्रारंभिक चढ़ाव के बाद व्यक्ति की अभिरुचि, लगन, उत्साह और उत्सुकता में कमी आने लगती है तब शिक्षण वक्र में उतार आने लगता है। लेकिन व्यक्ति अपना प्रयास जारी रखता है और जब फिर उसमें उत्साह, लगन, उत्सुकता आने लगती है तब शिक्षण वक्र में चढ़ाव आने लगता है इस प्रकार, शिक्षण-वक्र में चढ़ाव ऊपर देखा जाता है। इसे मध्यवर्ती चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की दूसरी विशेषता हुई।

3. अंतिम चढ़ाव:
जब सीखने वाले व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि अब विषय समाप्त होने वाला है तो वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति और लगन के साथ विषय या क्रिया को समाप्त करने की कोशिश करता है जिससे शिक्षण-वक्र में चढ़ाव. आ जाता है। इसे ही अंतिम चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की तीसरी विशेषता हुई।

4. पठार:
सीखने की अवधि के बीच कभी-कभी शिक्षण वक्र की यह स्थिति हो जाती है कि व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सीखने में अब आगे प्रगति नहीं हो पाएगी। शिक्षण-वक्र आधार के समानान्तर हो जाता है यानी उत्पादन वृद्धि रुक जाती है। लेकिन विशेष प्रयास के बाद उसके कार्य में प्रगति देखी जाती है। शिक्षण-वक्र की इस स्थिति को सीखने में पठार कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की चौथी विशेषता है।

5. दैहिक सीमा:
सीखने की अवधि में एक ऐसी भी अवस्था आती है जब वक्र का चढ़ाव बिल्कुल रुक जाता है। लाख कोशिश करने के बाद भी वक्र का चढ़ाव आगे नहीं बढ़ता है, तो इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। जैसे- भूल-वक्र में जब अशुद्धियाँ एकदम नहीं होती हैं तब भूल-वक्र में कोई परिवर्तन की गुंजाइश नहीं रह पाती है।

ठीक इसी प्रकार समय-वक्र में जब व्यक्ति ऐसी सीमा पर पहुँच जाता है, जहाँ से आगे तीव्र गति से क्रिया करना संभव नहीं रह जाता है, तो समय-वक्र में भी कोई परिवर्तन नहीं हो पाता है। इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। फिर उत्पादन-वक्र में जब व्यक्ति कुशलता की सीमा पर पहुँच जाता है तो वक्र के ऊपर उठने का प्रश्न ही नहीं उठता है। यह दैहिक सीमा का परिचायक है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 11.
अधिगम अशक्तता किसे कहते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों का उल्लेख करें। क्या अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का इलाज संभव है? यदि हाँ, तो कैसे?
उत्तर:
परिचय:
केन्द्रीय तंत्रिका में उत्पन्न विसंगतियों के कारण किसी व्यक्ति (खासकर बच्चे) में अक्षमता प्रकट करने से संबंधित विकार अधिगम अशक्तता माने जाते हैं जिसके कारण व्यक्ति को पढ़ने, लिखने, गणित के प्रश्नों को हल करने में बहुत ही कठिनाई होती है। बच्चों में पाई जानेवाली अधिगम अशक्तता के कारण बच्चे श्रेष्ठ बुद्धि वाले बच्चों की तुलना में सीखने की प्रवृत्ति, आत्म सम्मान, पेशा, सामाजिक परिवेश के बारे में समुचित निर्णय क्षमता प्रकट नहीं कर सकते हैं। ऐसे बच्चों के संवेदी प्रेरक तंत्र दोषी माने जाते हैं।

अधिगम अशक्तता के लक्षण-बच्चों में बुद्धि, अभिप्रेरण तथा अधिगम के लिए किया जाने वाला परिश्रम निरर्थक की श्रेणी में आता है। इस तरह के बच्चों में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में अक्षरों या शब्दों का सही ज्ञान नहीं होता है। वे अपनी भावना को लिखकर नहीं बता पाते हैं। वे पढ़कर कुछ बतलाने की स्थिति में भी नहीं होते।
  2. अशक्तता के शिकार बच्चे सीखने के लिए भोजन बनाने या सामान्य व्यवहार करनेवाले बच्चे के रूप में कार्य करने की विधि खोजने में असमर्थ होते हैं।
  3. अधिगम अशक्तता से पीड़ित बच्चे किसी निर्धारित विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित करके चिंतन की अवस्था में नहीं रह पाते हैं।
  4. घरेलू सामग्रियों के स्थान को अनियमित ढंग से बदल देना इन बच्चों का विशिष्ट लक्षण है।
  5. इनमें स्थान और समय की समझदारी का अभाव होता है ये अच्छे अवसर पाकर भी उसका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं।
  6. इस श्रेणी के बच्चों का पेशीय समन्वय तथा हस्त निपुणता अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी का होता है। ये शारीरिक संतुलन का अभाव, दरवाजे को खोलने की कला से अनभिज्ञ, साइकिल चलाने में अक्षम जैसी जानकारियों से दूर होते हैं।
  7. ये अभिभावकों के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  8. इन्हें सामाजिक संबंधों का मूल्याकंन करके उचित व्यवहार करने में कठिनाई होती है।
  9. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में प्रात्यहित विकार पाए जाते हैं जिसके कारण ये सुनने, पढ़ने, छूने तथा गति से संबंधित संकेतों के अर्थ नहीं समझ पाते हैं।
  10. अक्षरों को मिलाकर सार्थक शब्द की रचना करने में ये लाचार होते हैं।
  11. इन्हें अक्षरों को पहचानने में भी कठिनाई होती है क्योंकि ये समान रचना वाले अक्षरों (ट-ठ, प-फ) में अन्तर समझने में लाचार बना देते हैं।

उपचार:
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है। उपचारी अध्यापन विधि तथा मनोवैज्ञानिक शिक्षण प्रणाली के प्रयोग से उनमें पहले जाने अधिकांश लक्षणों को दूर किए जा सकते हैं। इनके साक्ष सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार तथा क्षमता को प्रोत्साहन देते हुए भरपूर प्यार की स्थिति प्रकट करना हितकर परिणाम देते हैं। इस श्रेणी के बच्चे प्यार और प्रोत्साहन के भूखे होते हैं। इन्हें प्रेरक बल के द्वारा ऊँचाई पर पहुँचाया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अधिक लंबे विषय के अधिगम के लिए कौन विधि अधिक उपयुक्त है?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाइक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 2.
अधिगम पर कोहलर ने अपना प्रयोग किस पशु पर किया:
(a) चूहा
(b) खरगोश
(c) चिम्पैंजी
(d) कुत्ता
उत्तर:
(c) चिम्पैंजी

प्रश्न 3.
पावलव महोदय ने अधिगम से सम्बन्धित प्रयोग किस जानवर पर किया था?
(a) बिल्ली
(b) कुत्ता
(c) चूहा
(d) वनमानुष
उत्तर:
(b) कुत्ता

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प्रश्न 4.
अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम किसने आरंभ किया?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाईक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

Bihar Board Class 11 Philosophy अवलोकन एवं प्रयोग Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आगमन का वास्तविक आधार है –
(क) प्रयोग
(ख) निरीक्षण
(ग) दोनों
(घ) कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 2.
निरीक्षण तथा प्रयोग को आगमन के वास्तविक आधार के रूप में किसने स्वीकार किया है?
(क) मिल ने
(ख) बेन ने
(ग) कार्बेथ रीड ने
(घ) जेवन्स ने
उत्तर:
(ख) बेन ने

प्रश्न 3.
निरीक्षण है –
(क) किसी प्रकार देखना
(ख) प्राकृतिक घटनाओं का उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण
(ग) तथ्यों का पर्यवेक्षण
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्राकृतिक घटनाओं का उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण

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प्रश्न 4.
प्रयोग है –
(क) प्राकृतिक घटनाओं का निरीक्षण
(ख) मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ख) मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण

प्रश्न 5.
प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष होते हैं –
(क) संभाव्य
(ख) अनिश्चित
(ग) निश्चित
(घ) संदिग्ध
उत्तर:
(ग) निश्चित

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प्रश्न 6.
“निरीक्षण में हम तथ्य को पाते हैं तथा प्रयोग में उसको बनाते हैं।” यह कथन है –
(क) बेन का
(ख) बेकन का
(ग) मिल का
(घ) फाउलर का
उत्तर:
(क) बेन का

प्रश्न 7.
निरीक्षण की शर्त नहीं है –
(क) मानसिक
(ख) शारीरिक
(ग) नैतिक
(घ) आध्यात्मिक
उत्तर:
(घ) आध्यात्मिक

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प्रश्न 8.
निरीक्षण की भूलें (Fallacies) होती है –
(क) अनिरीक्षण की
(ख) मिथ्या निरीक्षण की
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 9.
प्रयोग निरीक्षण से –
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण है
(ख) कम महत्त्वपूर्ण है
(ग) दोनों बराबर महत्त्वपूर्ण है
(घ) अनुपयोगी
उत्तर:
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 10.
निरीक्षण है आगमन का –
(क) आकारिका आधार (Formal ground)
(ख) वास्तविक आधार (Material ground)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) वास्तविक आधार (Material ground)

प्रश्न 11.
किसने कहा था कि आगमन में कल्पना का स्थान प्रमुख नहीं बल्कि गौण है?
(क) जे. एस. मिल
(ख) हेवेल
(ग) पियर्सन
(घ) डेकार्ड
उत्तर:
(क) जे. एस. मिल

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 12.
निरीक्षण में पाया जाता है –
(क) कारण से कार्य की ओर
(ख) कार्य से कारण की ओर
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 13.
इन्द्रियाँ निरीक्षण का एक –
(क) साधन है
(ख) असाधन है
(ग) शारीरिक शर्त है
(घ) (क) एवं (ग) दोनों
उत्तर:
(ग) शारीरिक शर्त है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 14.
निरीक्षण के दोष (Fallacy of observation) है –
(क) गलत निरीक्षण (Mal observation) की भूल
(ख) नहीं निरीक्षण (Non-observation) की भूल
(ग) (क) एवं (ख) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों का

प्रश्न 15.
सही कथन को चुनें –
(क) गलत निरीक्षण की भूल भावनात्मक दोष है
(ख) नहीं-निरीक्षण की भूल निषेधात्मक है
(ग) गलत निरीक्षण इन्द्रीय दोष का कारण है, जबकि नहीं निरीक्षण पक्षपातपूर्ण होने का कारण है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

Bihar Board Class 11 Philosophy अवलोकन एवं प्रयोग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निरीक्षण के दोष (Fallacy of observation) कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण के दोष दो प्रकार के होते हैं। वे हैं-गलत निरीक्षण की भूल एवं नहीं निरीक्षण की भूल।

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प्रश्न 2.
निरीक्षण की मानसिक शर्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण के लिए मानसिक या बौद्धिक लक्ष्य का होना नितांत आवश्यक है। किसी वस्तु या घटना को जानने की इच्छा से ही वह उसका निरीक्षण करना चाहता है। जानने की इच्छा से मानसिक शर्त का निर्माण होता है।

प्रश्न 3.
प्रयोग (Experiment) क्या है? अथवा, प्रयोग की परिभाषा दें।
उत्तर:
मानव-निर्मित परिस्थितियों में कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण है। फाउलर के अनुसार प्रयोग में हम घटना पर निर्भर नहीं करते हैं। बल्कि घटना हम पर निर्भर करती है तथा हम उसका निर्माण करते हैं। जिस प्रकार की हम घटना चाहें, उपस्थित कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
नहीं-निरीक्षण (Non-Observation) की भूल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नहीं-निरीक्षण की भूल में जिस वस्तु को देखना चाहिए उसे नहीं देखते हैं। जिसे देखना चाहिए उसे नहीं देखना ही नहीं-निरीक्षण की भूल है। यह दोषकर्ता की असावधानी या पक्षपातपूर्ण होने से होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 5.
गलत निरीक्षण की भूल एवं नहीं-निरीक्षण की भूल में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
गलत-निरीक्षण की भूल में भावात्मक दोष है जबकि नहीं निरीक्षण की भूल में निषेधात्मक दोष है। गलत-निरीक्षण इंद्रिय-दोष के कारण होता है जबकि नहीं-निरीक्षण पक्षपात पूर्ण होने के कारण होता है।

प्रश्न 6.
निरीक्षण की शारीरिक शर्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण की शारीरिक शर्त का अभिप्राय है कि इंद्रियाँ निरीक्षण के साधन हैं। अतः निरीक्षण के लिए स्वस्थ शरीर का होना अनिवार्य है क्योंकि शरीर के अस्वस्थ रहने पर निरीक्षण दोषपूर्ण हो जाएगा।

प्रश्न 7.
गलत निरीक्षण (Mal-Observation) की भूल क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण में जो वस्तु दी गयी होती है उसे उसके यथार्थ तथा वास्तविक रूप में न देखकर किसी अन्य रूप में देखना ही गलत निरीक्षण की भूल कहलाती है। जैसे-मृगतृष्णा गलत निरीक्षण की भूल है।

प्रश्न 8.
निरीक्षण की परिभाषा दें। अथवा, निरीक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच प्राकृतिक घटनाओं के उद्देश्यपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को ही निरीक्षण कहते हैं। प्रो. बी. एन. राय के अनुसार निरीक्षण नियमित प्रत्यक्षीकरण है।

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प्रश्न 9.
निरीक्षण एवं प्रयोग में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण प्राकृतिक है जबकि प्रयोग कृत्रिम है। निरीक्षण को निष्क्रिय कहा गया है जबकि प्रयोग को सक्रिय कहा गया है। निरीक्षण में परिस्थितियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता है जबकि यहाँ परिस्थितियों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण होता है।

प्रश्न 10.
प्रयोग आगमन का कौन-सा आधार है?
उत्तर:
निरीक्षण की तरह ही प्रयोग आगमन का वास्तविक आधार (Material ground of Induction) है।

प्रश्न 11.
आगमन के वास्तविक आधार किसे कहते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण एवं प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी भी तरह के प्रयोग में प्रयोगकर्ता यंत्रों का प्रयोग करता ही है। इसमें इच्छानुसार हेर-फेर करता है। मनचाहे परिवर्तन भी करता है। इन सभी परिवर्तनों के बाद वह घटना का निरीक्षण करता है। परन्तु, निरीक्षण में प्रयोगकर्ता यंत्र का प्रयोग तो करता ही है, किन्तु उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं करता है। परिवर्तन तो मात्र प्रयोग ही में संभव है। चूंकि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है। प्रयोगकर्ता उस घटना को स्वयं बनाकर उसकी जाँच करता है। अतः, निष्कर्ष है कि प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग प्रयोगकर्ता करता है।

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प्रश्न 2.
स्थायी कारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कारण मुख्यतः दो प्रकार के हैं –

(क) स्थायी कारण और
(ख) अस्थायी कारण

इसमें स्थायी कारण वे हैं जो सृष्टि के समय से ही चले आ रहे हैं। जैसे-सूरज, चाँद, सितारे, पृथ्वी संबंधी। इस तरह बहुत-सी विभिन्न परिस्थितियों में उन स्थायी कारणों से कई तरह के कार्य उत्पन्न होते चले आ रहे हैं। इसका अंत कहाँ और कब होगा, यह मानव के ज्ञानसीमा के बाहर है। मिल साहब ने स्थायी कारण के सत्ता को स्वीकार किया है। उनका कहना है कि यह कोई आवश्यक नहीं है कि स्थायी कारण कोई वस्तु या ठोस पदार्थ ही हो। वह इससे भिन्न भी रह सकता है। पृथ्वी अपनी धूरी पर घुमती है। उसका धूरी पर घुमना एक स्थायी कारण है। इसी तरह सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के स्थायी कारण हैं जो घुमते-घुमते अमावस्या या पूर्णिमा को ही लगेगा।

प्रश्न 3.
अस्थायी कार्य क्या है?
उत्तर:
अस्थायी कार्य कुछ ही क्षणों के लिए रहता है। यह भी कारण से ही उत्पन्न होता है। कुछ क्षणों के बाद इस प्रकार से कार्य समाप्त हो जाते हैं। जैसे-बादलों के संघर्ष से बिजली उत्पन्न होती है या बिजली चमकती है। जो अस्थायी कार्य है। विज्ञान में अस्थायी कार्य को उचित मान्यता नहीं दी गई है। बिजली चमकना और गायब हो जाना क्षणभंगुरता होती है। लेकिन ऐसा सोचना शंकारहित भी नहीं है। बिजली जो एक शक्ति है, वह लुप्त नहीं होती है बल्कि उसका रूप बदल जाता है।

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प्रश्न 4.
प्रगतिशील कार्य क्या है?
उत्तर:
प्रगतिशील कार्य की परिभाषा तार्किक ने दी है। “उस मिश्रित कार्य को प्रगतिशील कार्य कहते हैं जो किसी स्थायी कारण से संचित प्रभाव से उत्पन्न होता है।” किसी वस्तु को एक अवस्था में छोड़ दें। उस पर प्रकाश, हवा, धूप, जल आदि का प्रभाव पड़ता रहता है और वह वस्तु दिन प्रतिदिन क्षीण होती है। कई वर्षों के बाद वह वस्तु टूटकर मिट्टी में मिल जाती है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणांशों के प्रभाव से वस्तु विलीन हो जाती है। यही कार्य प्रगतिशील कार्य कहलाता है। क्योंकि कार्य अपने रूप को धीरे-धीरे प्राप्त करता है। इस प्रकार से प्रगतिशील कार्य आगमन तर्कशास्त्र में कारण-कार्य नियम के अंतर्गत ही आता है।

प्रश्न 5.
निरीक्षण और प्रयोग में अंतर बताएँ।
उत्तर:
आगमन में निरीक्षण और प्रयोग दोनों वास्तविक आधार माने गए हैं। दोनों से वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है। फिर भी दोनों में कुछ अंतर हैं –
1. निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं का होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने प्रस्तुत करती है उसी का निरीक्षण हम करते हैं, जैसे-सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, का निरीक्षण करना, किन्तु प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का प्रयोगशालाएँ होता है। प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं घटना को रचकर बनाकर उसका निरीक्षण करता रहता है।

2. निरीक्षण की घटनाएँ जो होती हैं उसकी सभी परिस्थितयाँ प्रकृति के हाथ में रहती है परन्तु, प्रयोग में घटना की सभी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

3. निरीक्षण में यंत्र का व्यवहार कभी-कभी होता है। परन्तु, उसमें परिवर्तन नहीं होता है जबकि प्रयोग में यंत्र का व्यवहार हमेशा होता है तथा उसमें हेर-फेर या परिवर्तन भी होता रहता है। इस तरह निरीक्षण एवं प्रयोग में अंतर अधिक है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 6.
क्या निरीक्षण चयनात्मक है?
उत्तर:
निरीक्षण प्रायः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने जिस रूप में प्रस्तुत करती है, उसी का पर्यवेक्षण हम करते हैं। प्रकृति बहुत विशाल एवं जटिल है। इसमें नित्य प्रतिदिन कई प्रकार की घटनाएँ घटती रहती हैं। सभी घटनाओं का निरीक्षण हम नहीं कर पाते हैं। अतः, इसके लिए हमें किसी एक घटना का चयन करना पड़ता है। यदि हम चयन नहीं करें तो निरीक्षण संभव नहीं है। जैसे-रात्रि में हम प्रतिदिन आकाश की ओर तारों को देखते हैं, किन्तु जब किसी तारे को चयन कर देखते हैं, जैसे-ध्रुवतारा तो इसे निरीक्षण कहेंगे। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि निरीक्षण चयनात्मक होता है।

प्रश्न 7.
क्या निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित है?
उत्तर:
निरीक्षण मूलतः प्रकृति घटनाओं पर आधारित है, किन्तु कभी-कभी कृत्रिम घटनाओं का भी निरीक्षण होता है। यहाँ पर निरीक्षण का अर्थ या निरीक्षण का विषय अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। जैसे-भूकंप, सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, बाढ़, महामारी आदि का निरीक्षण करते समय प्राकृतिक घटनाओं पर हमारा कुछ अपना दाब नहीं रहता है। बल्कि प्रकृति में घटनाएँ जिस प्रकार से घटती हैं उसका निरीक्षण हम उसी तरह से करेंगे, उसमें परिवर्तन करना हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए निरीक्षण करते समय हम निष्क्रिय और प्रकृति के गुलाम बने रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि निरीक्षण अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है।

प्रश्न 8.
क्या प्रयोग कृत्रिम होता है?
उत्तर:
ऐसा कहा जाता है कि प्रयोग कृत्रिम होता है क्योंकि प्रयोगकर्ता स्वयं किसी घटना को प्रयोगशाला में बनाता है और इच्छानुसार उसका निरीक्षण करता है। प्रयोग प्राकृतिक घटनाओं का संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक घटनाएँ प्रकृति के हाथ में है। जैसे-आकाश में इन्द्र धनुष को हम नहीं बना सकते हैं। यह प्रयोगशाला में भी संभव नहीं है। इसी तरह चन्द्रग्रहण, भूकंप, सूर्यग्रहण, बाढ़ आदि का निर्माण प्रयोगशाला में नहीं किया जा सकता है। अतः, प्राकृतिक घटनाओं पर ही संभव है। क्योंकि प्रयोग में घटना की सारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में ही रहती है। अतः, निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है।

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प्रश्न 9.
कारण और कार्य की पारस्परिकता का वर्णन करें।
उत्तर:
तार्किकों के अनुसार कारण और कार्य की पारस्परिकता का संबंध कारण-कार्य नियम के अंतर्गत ही पाया गया है। कारण और कार्य के बीच एक प्रकार का संबंध पाया जाता है। यदि कारण है तो कार्य भी होगा। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निर्भर करते हैं। जैसे-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी उत्पन्न होता है। फिर उसी पानी से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी उत्पन्न किया जाता है। इस तरह की संभावना को ही हम कारण और कार्य की पारस्परिकता कहते हैं।

प्रश्न 10.
कारण के प्रचलित यंत्रों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण के प्रचलित यंत्र को जनसाधारण यंत्र भी कहते हैं। कारण वही है जो घटना के पहले आवे। यहाँ कारण का केवल अनुमान किया जाता है। उसका वैज्ञानिक निरूपण नहीं करते हैं। खाली घड़ा देखने पर गाड़ी छूट जाना, तेली को देखने से यात्रा खराब होना, बिल्ली को मार्ग काटने से किसी अशुभ घटना का कारण समझना आदि अंधविश्वास। इसी तरह के प्रचलित कारण के रूप भी हैं। कभी-कभी दैवी प्रकोप भी कारण बनता है, जैसे-हैजा, प्लेग आदि का होना भगवती या काली माँ का प्रकोप कहा जाता है। लेकिन आज वैज्ञानिक युग में ऐसे कारणों का तर्कशास्त्र में उचित स्थान नहीं दिया गया है। क्योंकि ये सब आकस्मिक घटनाएँ हैं। जो कभी होती है कभी नहीं भी होती है।

प्रश्न 11.
क्या प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी भी तरह के प्रयोग में प्रयोगकर्ता यंत्रों का प्रयोग करता ही है। इसमें इच्छानुसार हेर-फेर भी करता ही है। मनचाहे परिवर्तन भी करता हैं इन सभी परिवर्तनों के बाद वह घटना का निरीक्षण करता है। परन्तु, निरीक्षण में प्रयोगकर्ता यंत्र का प्रयोग तो करता ही है, किन्तु उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं करता है। परिवर्तन तो मात्र प्रयोग ही में संभव है। चूँकि प्रयोग कृत्रिम.घटनाओं का ही होता है। प्रयोगकर्ता उस घटना को स्वयं बनाकर उसकी जाँच करता है। अतः, निष्कर्ष है कि प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग प्रयोगकर्ता करता है।

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प्रश्न 12.
आगमन का आकारिक आधार क्या है?
उत्तर:
आगमन तर्कशास्त्र में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हेतु आधार की जरूरत होती है। यह आधार दो प्रकार की है-आकारिक आधार और वास्तविक आधार। आकारिक आधार के अंतर्गत प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कार्य-कारण नियम दो प्रकार के आधार हैं। प्रकृति में एक प्रकार की समरूपता है, जिसके आधार समान परिस्थितियों में समान घटनाएँ भविष्य में घटती रहती हैं। इसी तरह कारण-कार्य नियम के अनुसार कारण उपस्थित होने पर कार्य भी अवश्य उपस्थित हो जाएगा। जैसे – यदि बादल आता है तो वर्षा होगी। तीसी, सरसों से तेल अवश्य उत्पन्न होगा। इस तरह प्राकृतिक-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य दो आगमन के आकारिक आधार हैं।

प्रश्न 13.
गलत देखने की भूल क्या है?
उत्तर:
तार्किकों ने निरीक्षण में दो तरह की भूलों का वर्णन किया है, जिसमें एक को गलत देखने की भूल कहा जाता है और दूसरे को नहीं देखने का भूल कहा जाता है। निरीक्षण में ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा कार्य किया जाता है। कर्म करने में कभी ज्ञानेन्द्रियाँ धोखा खा जाती हैं क्योंकि हम किसी वस्तु को गलत देख लेते हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि वस्तु का जो वास्तविक रूप है उसे नहीं देखकर गलत रूप को देखते हैं। अतः, इसे ही Fallacy of mal observation अर्थात् गलत देखने की भूल कहा जाता है। जैसे अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना, ठूठ पेड़ को भूत या चोर समझ लेना आदि गलत देखने की भूल कहा जाता है।

प्रश्न 14.
क्या निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित हैं?
उत्तर:
निरीक्षण मूलतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित है, किन्तु कभी-कभी कृत्रिम घटनाओं का भी निरीक्षण होता है। यहाँ पर निरीक्षण का अर्थ या निरीक्षण का विषय अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। जैसे-भूकंप, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, बाढ़, महामारी आदि का निरीक्षण करते समय प्राकृतिक घटनाओं पर हमारा कुछ अपना दबाव नहीं रहता है। बल्कि प्रकृति में घटनाएँ जिस प्रकार से घटती हैं उसका निरीक्षण हम उसी तरह से करेंगे उसमें परिवर्तन करना हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए निरीक्षण करते समय हम निष्क्रिय और प्रकृति के गुलाम बने रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि निरीक्षण अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है।

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प्रश्न 15.
आगमन का वास्तविक आधार क्या है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र में सत्य दो तरह के होते हैं-आकारिक सत्य तथा वास्तविक सत्य। आगमन में वास्तविक सत्य की प्राप्ति के लिए निरीक्षण और प्रयोग दो विधियों की स्थापना की गई है। जबकि आकारिक सत्यता की प्राप्ति के लिए प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम दो बताए गए हैं। निरीक्षण और प्रयोग के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है जिसके आधार पर प्राप्त ज्ञान को सत्य समझा जाता है। जो सत्य के साथ ही साथ वास्तविक भी होता है। इस प्राप्त ज्ञान में शंका की गुंजाइश किसी तरह की नहीं होती है। अतः, आगमन का वास्तविक आधार निरीक्षण और प्रयोग दोनों हैं।

प्रश्न 16.
क्या प्रयोग कृत्रिम होता है?
उत्तर:
ऐसा कहा जाता है कि प्रयोग कृत्रिम होता है क्योंकि प्रयोगकर्ता स्वयं किसी घटना को प्रयोगशाला में बनाता है और इच्छानुसार उसका निरीक्षण करता है। प्रयोग प्राकृतिक घटनाओं का संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक घटनाएँ प्रकृति के हाथ में है। जैसे-आकाश में इन्द्रधनुष को हम नहीं बना सकते हैं। प्रयोगशाला में कभी संभव नहीं है। इसी तरह चन्द्रग्रहण, भूकंप, सूर्यग्रहण, बाढ़ आदि का निर्माण प्रयोगशाला में नहीं किया जा सकता है। अतः, प्राकृतिक घटनाओं पर प्रयोग कृत्रिम रूप से नहीं हो सकता है। यह कृत्रिम घटनाओं पर ही संभव है। क्योंकि प्रयोग में घटना की सारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में ही रहती है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है।

प्रश्न 17.
क्या निरीक्षण चयनात्मक है?
उत्तर:
निरीक्षण प्रायः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने जिस रूप में प्रस्तुत करतो है, उसी का पर्यवेक्षण हम करते हैं। प्रकृति बहुत विशाल एवं जटिल है। इसमें नित्य-प्रतिदिन कई प्रकार की घटनाएँ घटती रहती हैं। सभी घटनाओं का निरीक्षण हम नहीं कर पाते हैं। अतः, इसके लिए हमें किसी एक घटना का चयन करना पड़ता है। यदि हम चयन नहीं करें तो निरीक्षण संभव नहीं है। जैसे रात्रि में हम प्रतिदिन आकाश की ओर तारों को देखते हैं, किन्तु जब किसी तारे को चयन कर देखते हैं, जैसे-ध्रुवतारा तो इसे निरीक्षण कहेंगे। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि निरीक्षण चयनात्मक होता है।

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प्रश्न 18.
निरीक्षण और प्रयोग में अंतर बताएँ।
उत्तर:
आगमन में निरीक्षण और प्रयोग दोनों वास्तविक आधार माने गए हैं। दोनों से वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है। फिर भी दोनों में कुछ अंतर हैं –

1. निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं का होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने प्रस्तुत करती है उसी का निरीक्षण हम करते हैं, जैसे सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण का निरीक्षण करना, किन्तु प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का प्रयोगशाला में होता है। प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं घटना को रचकर, बनाकर उसका निरीक्षण करता रहता है।

2. निरीक्षण की घटनाएँ जो होती हैं उसकी सभी परिस्थितियाँ प्रकृति के हाथ में रहती हैं परंतु, प्रयोग में घटना की सभी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

3. निरीक्षण में यंत्र का व्यवहार कभी-कभी होता है। परंतु, उसमें परिवर्तन नहीं होता है जबकि प्रयोग में यंत्र का व्यवहार हमेशा होता है तथा उसमें हेर-फेर या परिवर्तन भी होता रहता है। इस तरह निरीक्षण एवं प्रयोग में मात्रा का भेद अधिक है।

प्रश्न 19.
नहीं देखने की भूल क्या है?
उत्तर:
तार्किकों के अनुसार यह भी एक प्रकार से निरीक्षण के दोष के अंतर्गत ही आता है। यह भूल प्रायः तब होती है जब हम उस वस्तु या स्थिति को ठीक से नहीं देखते हैं जिसे हमें देखना चाहिए था। हड़बड़ी, ध्यान का अभाव या पक्षपात के कारण हम बहुत-सी चीजों या परिस्थितियों को नहीं देख पाते हैं जिनके कारण नहीं देखने की भूल होती है। यह दो प्रकार की है –

(क) उदाहरण को नहीं देखने की भूल तथा

(ख) आवश्यक स्थिति या परिस्थिति को नहीं देखने की भूल। कुछ गाढ़े लाल रंग के फूलों को गंधहीन पाकर हम कहते हैं कि सभी गाढ़े लाल रंग के फूल गंधहीन हैं। यहाँ उदाहरण को नहीं देखने की भूल है। इसी तरह कोई गुंडा किसी लड़की के साथ बलात्कार करना चाहता है, किन्तु कोई छात्र उसे बचाने के क्रम में गुंडा उससे चोट खाकर मर जाता है। इस परिस्थिति में यदि उसे सजा मिलती है तो यहाँ आवश्यक परिस्थिति को नहीं देखने की भूल कहा जाएगा।

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प्रश्न 20.
प्रकृति-समरूपता नियम का संक्षिप्त व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राकृतिक समरूपता नियम आगमन का आकारिक आधार है। तार्किकों ने इसकी परिभाषा देकर इसकी व्याख्या किए हैं क्योंकि इसकी परिभाषा देना संभव नहीं है। मूल सिद्धान्त या नियम की परिभाषा नहीं दी जाती है बल्कि उसका वर्णन किया जाता है। प्रकृति में जो भी घटना-घटती है वह समरूपता घटती है। इसमें प्रकार की विभिन्नता नहीं रहती है। अतः प्रकृति एकरूप है। अर्थात् प्राकृतिक घटनाएँ एक समान घटती हैं। भविष्य अतीत की तरह होता है। प्रकृति में घटनाएँ पुनः-पुनः उसी रूप में होती रहती है। भविष्य में घटनेवाली घटना की गारंटी प्राकृतिक समरूपता नियम के कारण ही हैं समान कारण से समान कार्य की उत्पत्ति होती रहती है। प्रकृति में कहीं पक्षपात नहीं है। प्रकृति एकरस है।

प्रश्न 21.
कारण-कार्य नियम की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण-कार्य नियम आगमन का एक प्रबल स्तंभ के रूप में आधार है। इसकी भी परिभाषा तार्किक ने न देकर इसकी व्याख्या किए हैं। कारण-कार्य नियम के अनुसार इस विश्व में कोई घटना या कार्य बिना कारण के नहीं हो सकती है। सभी घटनाओं के पीछे कुछ-न-कुछ कारण अवश्य छिपा रहता है। कारण संबंधी विचार अरस्तू के विचारणीय हैं। अरस्तू के अनुसार चार तरह के कारण हैं –

  1. द्रव्य कारण (Material Cause)
  2. आकारिक कारण (Formal Cause)
  3. निमित कारण (Efficient Cause)
  4. अंतिम कारण (Final Cause)

यही चार कारण मिलकर किसी कार्य को उत्पन्न करते हैं। जैसे-मकान के लिए ईंट, बालू, सीमेंट, द्रव्य कारण हैं। मकान का एक नक्शा बनाना आकारिक कारण है। राजमिस्त्री और मजदूर ईंट, बालू, सीमेंट को तैयार कर उसे एक पर एक खड़ा कर तैयार करते हैं। इसमें एक शक्ति आती है जिसे Efficient Cause या निमित कारण कहते हैं। इसी तरह मकान बनाने का उद्देश्य रहता है-अपना रहना या किराया पर लगाना। जिसे अंतिम कारण (Final Cause) कहते हैं। प्रचलित कारण को स्वीकार नहीं किया गया है।

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प्रश्न 22.
कारण के गुणात्मक लक्षण क्या है?
उत्तर:
कारण के गुणात्मक लक्षण मुख्यतः चार प्रकार के बताए गए हैं –
(क) कारण पूर्ववर्ती होता है
(ख) कारण नियत पूर्ववर्ती होता है
(ग) कारण उपाधिरहित पूर्ववर्ती होता है तथा
(घ) कारण तात्कालिक पूर्ववर्ती होता है।

इन्हीं चारों को आगमन में स्वीकार किया गया है। कारण कार्य की व्याख्या में कहा गया है कि यह एक के उपस्थित में होने पर दूसरा भी उपस्थित होता है। कारण-कार्य के पहले आता है इसलिए इसे पूर्ववर्ती कहा जाता है। कार्य बाद में आता है। इसलिए इसे अनुवर्ती कहा जाता है। कारण नियत पूर्ववर्ती है। क्योंकि हर हालत में बिना कारण के कार्य नहीं होता है। इसके साथ-ही-साथ तार्किकों ने कहा कि कारण उपाधिरहित एवं तात्कालिक पूर्ववर्ती भी होता है।

प्रश्न 23.
कारण के परिमाणात्मक लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
परिमाण के अनुसार कारण और कार्य के बीच मुख्यतः तीन प्रकार के विचार बताए गए हैं –

(क) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में अधिक हो सकता है
(ख) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में कम हो सकता है
(ग) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में कभी अधिक और कभी कम हो सकता है।

अतः इन तीनों को असत्य साबित किया गया है। यदि कारण अपने कार्य से कभी अधिक और कभी कम होता है तो इसका यही अर्थ है कि प्रकृति में कोई बात स्थिर नहीं है। किन्तु, प्रकृति में स्थिरता एवं समरूपता है, अतः यह संभावना भी समाप्त हो जाता है। इसी तरह पहली और दूसरी संभावना भी समाप्त हो जाती है। ये तीनों संभावनाएँ निराधार हैं। अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि कारण-कार्य मात्रा में बराबर होते हैं और यही सत्य भी है।

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प्रश्न 24.
कारण और उपाधि की तुलना करें।
उत्तर:
आगमन में कारण का एक हिस्सा स्थित बतायी गई है। जिस तरह से हाथ, पैर आँख, कान, नाकं आदि शरीर के अंग हैं और सब मिलकर एक शरीर का निर्माण करते हैं। उसी तरह बहुत-सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती हैं। परन्तु, कारण में बहुत-सा अंश या हिस्सा नहीं रहता है। कारण तो सिर्फ एक ही होता है। इसमें स्थिति का प्रश्न ही नहीं रहता है। कारण और उपाधि में तीन तरह के अंतर हैं –
(क) कारण एक है और उपाधि कई हैं
(ख) कारण अंश रूप में रहता है और उपाधि संपूर्ण रूप में आता है
(ग) कारण चार प्रकार के होते हैं जबकि उपाधि दो प्रकार के होते हैं। इस तरह कारण और उपाधि में अंतर है।

प्रश्न 25.
भावात्मक कारणांश या उपाधि क्या है?
उत्तर:
भावात्मक कारणांश उपाधि का एक भेद है। उपाधि प्रायः दो तरह के हैं-भावात्मक तथा अभावात्मक। ये दोनों मिलकर ही किसी कार्य को उत्पन्न करते हैं। यह कारण का वह भाग या हिस्सा है जो प्रत्यक्ष रूप में पाया जाता है। इसके रहने से कार्य को पैदा होने में सहायता मिलती है। जैसे-नाव का डूबना एक घटना है, इसमें भावात्मक उपाधि इस प्रकार है – एकाएक आँधी का आना, पानी का अधिक होना, नाव का पुराना होना तथा छेद रहना, वजन अधिक हो जाना आदि ये सभी भावात्मक उपाधि के रूप है जिसके कारण नाव पानी में डूब गई।

प्रश्न 26.
अभावात्मक कारण या उपाधि क्या है?
उत्तर:
कारणांश या उपाधि के मुख्यतः दो भेद हैं –

(क) भावात्मक कारणांश एवं
(ख) अभावात्मक कारणांश।

इसमें घटना के घटने में जो कारण अनुपस्थित रहते हैं उसे अभावात्मक उपाधि कहते हैं जैसे – नाव डूबना एक घटना है। इसमें भावात्मक तथा अभावात्मक उपाधि मिलकर घटना को घटने में सहायता प्रदान करते हैं। इसमें अभावात्मक उपाधि इस प्रकार है जो अनुपस्थित है – मल्लाह का होशियार नहीं होना, किनारे का नजदीक नहीं होना, नाव का बड़ा नहीं होना। इस प्रकार की अनुपस्थिति उपाधि हैं जिससे नाव को डूबने में अप्रत्यक्ष रूप से सहायता मिलती।

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प्रश्न 27.
कार्यों के सम्मिश्रण का विवेचन करें?
उत्तर:
जब किसी कमरे में बहुत से दीपक या मोमबत्ती जलाते हैं तो उससे अधिक प्रकाश होता है। यहाँ सभी दीपक और मोमबत्ती मिलकर उस प्रकाश को कार्यरूप में पैदा करते हैं। अतः प्रकाश कार्य-सम्मिश्रण के रूप में आता है। ये कार्य-सम्मिश्रण दो प्रकार के होते हैं –

(क) सजातीय कार्य-सम्मिश्रण तथा।
(ख) विविध जातीय कार्य-सम्मिश्रण।

सजातीय कार्य-सम्मिश्रण में हम देखते हैं कि विभिन्न कारणों के मेल से जो कार्य पैदा होता है उसमें समीकरण एक ही तरह या एक ही जाति के होते हैं, जैसे-घर में एक सौ दीपक के जलाने से अधिक प्रकाश होता है। यहाँ सभी दीपक एक ही जाति के हैं, किन्तु जो कार्य विभिन्न कारणों के मेल से बनता है उसे विविध जातीय कार्य सम्मिश्रण कहा जाता है, जैसे-भात, दाल, दूध, दही, घी, सब्जी आदि से खून का बनाना।

प्रश्न 28.
कारणों का संयोग की व्याख्या करें।
उत्तर:
जब बहुत से कारण मिलकर संयुक्त रूप से कार्य पैदा करते हैं तो वहाँ पर कारणों से मेल को कारण-संयोग कहा जाता है। यह भी कारण-कार्य नियम के अंतर्गत पाया जाता है जैसे-भात-दाल, सब्जी, दूध, दही, घी, फल आदि खाने के बाद हमारे शरीर में खून बनता है। इसलिए खून यहाँ बहुत से कारणों के मेल से बनने के कारण कार्य-सम्मिश्रण हुआ तथा दाल, भात आदि कारणों का मेल कारण-संयोग कहा जाता है। अतः कारणों के संयोग और कार्यों के सम्मिश्रण में अंतर पाया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आपके विचार से तूफान और भूकंप प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुकूल है? क्या यह कहना सत्य है कि प्रकृति में एक समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताए है।
उत्तर:
कुछ तार्किकों का कथन है कि प्रकृति समरूपता नियम के अनुकूल तूफान और भूकंप नहीं है। प्रकृति समरूपता नियम का अर्थ होता है कि प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता का होना। प्रकृति में जो घटना आज घटती है हमारा विश्वास है कि भविष्य में भी वही घटना घटेगी। भूकंप, तूफान, आँधी एकाएक आ जाती है। प्रकृति के व्यवहार को एक माना गया तो ऐसी घटनाएँ अचानक नहीं होना चाहिए। 1 जनवरी, 1934 ई. में बिहार में भूकंप हुआ था तो जनवरी 1935-36 के महीने में भूकंप होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं है।

ऐसा विचार प्रकृति समरूपता नियम का गलत अर्थ लगाने के कारण यह सही लगता है। प्रकृति समरूपता नियम का यह अर्थ नहीं है कि जो घटना आज घटती है वह प्रतिदिन घटनी चाहिए। ऐसा सोचना गलत है कि भूकंप, आँधी रोज आना चाहिए। प्रकृति समरूपता का अर्थ है कि समान परिस्थिति में प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता रहती है। भूकंप होने का कारण प्रत्येक . दिन नहीं हो सकता है। इसलिए भूकंप प्रत्येक दिन नहीं होता है। यदि कारण हो और कार्य न हो तो ऐसा कहा जा सकता है कि प्रकृति में समरूपता नहीं है। समान परिस्थिति में प्रकृति के कार्य में समरूपता रहती है न कि प्रत्येक परिस्थिति में।

एकाएक तूफान या भूकंप का होना प्रकृति समरूपता का खंडन नहीं करता है एकाएक हमारी अज्ञानता का द्योतक है न कि प्रकृति समरूपता की असत्यता का। हम आँधी, तूफान के कारण को नहीं जानते हैं इसलिए कह देते हैं कि एकाएक ये घटनाएँ घटती हैं। भूकंप और तूफान, आँधी, भूकंप, बाढ़ इत्यादि का होना प्रकृति समरूपता नियम के विरुद्ध नहीं जाता है बल्कि ये प्रकृति समरूपता नियम के अनुकूल हैं। एक समरूपता या अनेक समरूपताएँ-बेन साहब (Bain) का कहना है कि संसार में एक समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताएँ हैं।

बेन तथा अन्य तार्किकों के अनुसार, प्रकृति के अनेक विभाग हैं। प्रत्येक विभाग के अलग-अलग नियम हैं। अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताएँ हैं। यहाँ विवाद एकवचन और बहुवचन का है प्रकृति में बहुत से विभागों के होते हुए भी उसमें इकाई का रूप पाया जाता है। प्रकृति में अनेकता में भी एकता है। There is unity and wholeness in Nature. हम अपनी सुविधा के लिए प्रकृति को अनेक विभागों में बाँटते हैं और प्रकृति उन विभागों की एक व्यवस्थित समष्टि है। “अनेक समरूपताओं के बीच एक समरूप है”। सभी समरूपताएँ एक समरूपता में आकर मिल जाती है जिस तरह अनेक नदियाँ एक समुद्र में मिल जाती है। अतः, निष्कर्ष यही है कि एक समरूपता है जिसे प्राकृतिक समरूपता नियम कहते हैं।

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प्रश्न 2.
आगमन के आकारिक एवं वास्तविक आधार क्या हैं? उन्हें आकारिक एवं वास्तविक आधार क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
आगमन में हम अंशव्यापी से पूर्णव्यापी की ओर जाते हैं इसमें कुछ उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य नियम की स्थापना करते हैं। प्रश्न है कि किस आधार पर हम ‘कुछ’ से ‘सब’ की ओर जाते हैं? किस आधार पर वर्तमान से भविष्य की ओर जाते हैं? इसका उत्तर है कि हम प्राकृतिक समरूपता नियम के आधार पर कुछ से सब की ओर जाते हैं। हमारा विश्वास प्राकृतिक समरूपता नियम में है। समान परिस्थिति में समान कारण की उत्पत्ति हमेशा होती है। भविष्य की गारंटी इस नियम से मिलती है कि अगर मनुष्य मरणशील है तो भविष्य में भी मरणशील रहेगा। अटूट एवं अनिवार्य संबंध किस आधार पर स्थापित करते हैं? इसका उत्तर है कि कार्य-कारण नियम के आधार पर। कार्य-कारण नियम का अर्थ है कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य उपस्थित होगा।

अतः, प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य कारण नियम आगमन के आकारिक आधार हैं क्योंकि इन नियमों का संबंध आगमन के आकार से है। ये आगमन के स्वरूप को निर्धारित करते हैं। आगमन की आकारिक सत्यता से इन दोनों का संबंध होने के कारण इन्हें आगमन का आकारिक आधार कहते हैं। इसी तरह निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। अनुमान का विषय वास्तविक रूप से सत्य होता है। विषय कल्पित नहीं रहता है। विषय अनुभव पर आश्रित है।

हम अनुभव में पाते हैं कि आग में ताप है। इसी अनुभव के आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं कि “सभी आग में ताप है।” अनुभव के भी दो स्रोत हैं – निरीक्षण और प्रयोग (Observation and experiment) व्यवस्थित एवं नियंत्रित निरीक्षण ही प्रयोग है। निरीक्षण एवं प्रयोग के द्वारा आगमन के विषय की प्राप्ति होती है। इसलिए आगमन निरीक्षण और प्रयोग विषयगत आधार कहलाते हैं। पुनः आगमन के निष्कर्ष की सत्यता की जाँच निरीक्षण और प्रयोग से होती है, इसलिए भी निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहते हैं। अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्राकृतिक समरूपता नियम और कार्य-कारण नियम आगमन के आकारिक आधार हैं तथा निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। आकारिक आधार का संबंध आगमन के आकस्मिक सत्यता से है और निरीक्षण एवं प्रयोग का संबंध आगमन की वास्तविक सत्यता से है।

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प्रश्न 3.
प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम के बीच संबंध की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम दोनों आगमन के आकारिक आधार हैं। प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुसार, समान परिस्थिति में प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता पायी जाती है। समान कारण से समान कार्य की उत्पत्ति होती है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य ही उपस्थित रहेगा। दोनों नियमों के संबंध को लेकर तीन मत हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. मिल तथा बेन साहब के अनुसार प्राकृतिक समरूपता नियम मौलिक है तथा कारणता के नियम प्राकृतिक समरूपंता नियम का एकरूप है। बेन के अनुसार समरूपता तीन प्रकार की है। उनमें एक अनुक्रमिक समरूपता है (Uniformities of succession) इसके अनुसार एक घटना के बाद दूसरी घटना समरूप ढंग से आती है। कार्य-कारण नियम अनुक्रमिक समरूपता है। कार्य-कारण नियम के अनुसार भी एक घटना के बाद दूसरी घटना अवश्य आती है। अतः, कार्य-कारण नियम स्वतंत्र नियम न होकर समरूपता का एक भेद है। जैसे-पानी और प्यास बुझाना, आग और गर्मी का होना इत्यादि घटनाओं में हम इसी तरह की समरूपता पाते हैं।

2. जोसेफ एवं मेलोन आदि विद्वानों के अनुसार कार्य-कारण नियम मौलिक है प्राकृतिक समरूपता नियम मौलिक नहीं है स्वतंत्र नहीं है। बल्कि प्राकृतिक समरूपता नियम इसी में समाविष्ट है। कार्य-कारण नियम के अनुसार कारण सदा कार्य को उत्पन्न करता है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य ही उपस्थित रहता है। प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुसार भी समान कारण समान कार्य को उत्पन्न करता है। अतः कार्य-कारण नियम से जो अर्थ निकलता है। वही प्राकृतिक समरूपता नियम से भी। अतः, कार्य-कारण नियम ही मौलिक है और प्राकृतिक समरूपता नियम उसमें अतभूत (implied) है।

3. वेल्टन, सिगवर्ट तथा बोसांकेट के अनुसार दोनों नियम एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं दोनों मौलिक हैं। दोनों का अर्थ भिन्न हैं। दोनों दो लक्ष्य की पूर्ति करता है। कार्य-कारण नियम से पता चलता है कि प्रकृति में समानता है। अतः, ये दोनों नियम मिलकर ही आगमन के आकारिक आधार बनते हैं। आगमन की क्रिया में दोनों की मदद ली जाती है। जैसे – कुछ मनुष्य को मरणशील देखकर सामान्यीकरण कहते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील है। कुछ से सब की ओर जाने में प्राकृतिक समरूपता नियम का मदद लेते हैं। प्रकृति के व्यवहार में समरूपता है।

इसी विश्वास के साथ कहते हैं कि मनुष्य भविष्य में भी मरेगा। सामान्यीकरण में निश्चितता आने के लिए कार्य-कारण नियम की मदद लेते हैं। कार्य-कारण नियम के अनुसार कारण के उपस्थित रहने पर अवश्य ही कार्य उपस्थित रहता है। मनुष्यता और मरणशीलता में कार्य-कारण संबंध है। इसी नियम में विश्वास के आधार पर कहते हैं कि जो कोई भी मनुष्य होगा वह अवश्य ही मरणशील होगा। अतः दोनों स्वतंत्र होते हुए भी आगमन के लिए पूरक हैं। दोनों के संयोग से आगमन संभव है। अतः दोनों में घनिष्ठ संबंध है।

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प्रश्न 4.
कारण के गुणात्मक लक्षणों की सोदाहरण व्याख्या करें। अथवा, “कारण तात्कालिक अनौपाधिक और नियत पूर्ववर्ती घटना है।” इस – परिभाषा को ध्यान में रखते हुए कारण के विभिन्न लक्षणों का सोदाहरण वर्णन करें।
उत्तर:
गुण के अनुसार हम कारण गुण का वर्णन करने में कार्य-कारण के गुणात्मक स्वरूप का वर्णन करते हैं। इसमें कार्वेथ रीड तथा मिल की परिभाषाओं पर विचार करते हैं। मिल ने कारण में पूर्ववर्ती एवं अनौपाधिक लक्षणों पर बल दिया तो कार्वेथ रीड ने पूर्ववर्तिता, नियतता, अनौपाधिता एवं तात्कालिकता चार लक्षणों पर बल दिया है।

इसमें कार्वेथ रीड के अनुसार – “The cause of an event is qualitatively” the immediate, unconditional invariable anticedent of an effect.” अर्थात् गुणात्मक दृष्टि से किसी भी घटना का कारण “कार्य का तात्कालिक, अनौपाधिक नियतपूर्ववर्ती है तथा मिल साहब के अनुसार – The cause of a phenomenon to be “the anticedent or the concurrence of anticedents on which it is invariably and unconditionally consequent.” अर्थात् किसी घटना का कारण “वह पूर्ववर्ती या पूर्ववर्तियों का समूह है जिसके या जिनके होने के बाद कारण के निम्नलिखित लक्षण पाते हैं –

1. पूर्ववर्ती होना (Anticedent):
कारण और कार्य सापेक्ष पद है। एक के बाद दूसरा एक क्रम में पाया जाता है जिसका आदि और अंत हमें नहीं पता चलता हैं अतः, किसे कारण समझा जाए? इस समस्या को समझने के लिए मिल साहब का कहना है कि किसी घटना के पहले घटनेवाली घटना को कारण समझ लेना ठीक होगा। जैसे-शान्त तालाब में पत्थर फेंकने पर पानी में जो कंपन होता है उसका कारण पत्थर फेंकना ही कहा जाएगा।

यह भी सही है कि कारण और कार्य दोनों अलग-अलग नहीं पाए जाते हैं। इसलिए मेलोन साहब (Mellone) का विचार है कि कारण और कार्य के बीच एक गणित की रेखा है जिसमें चौड़ाई नहीं होती है, “अर्थात् कारण और कार्य एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक तथ्य के दो छोर हैं। जो हमें पूर्ववर्ती के रूप में पहले दिखाई पड़ता है उसे कारण कहते हैं और बाद में जो अनुवर्ती के रूप में दिखाई पड़ता है उसे कार्य का रूप देते हैं। अतः, इसके अनुसार कारण-कार्य के पहले आता है।”

2. नियत अनियत होना (Invariable):
पहले घटनेवाली घटना को कारण तो कहा जाता है लेकिन सभी पहले घटने वाली घटना कारण नहीं हो सकता है। ऐसा कहने से अंधविश्वास का जन्म हो सकता है। पहले घटनेवाली घटनाएँ दो तरह की है –

(क) अनियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent)
(ख) नियत पूर्ववर्ती (Variable anticedent)।

(क) अनियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent):
वे घटनाएँ हैं जो कार्य के पहले नियमित रूप से नहीं पायी जाती है। कभी होता है कभी नहीं भी। जैसे-वर्षा के पहले घटनेवाली घटनाओं के रूप में हम फुटबॉल मैच, राम की शादी, कॉलेज में सभा इत्यादि को पा सकते हैं लेकिन नियमित रूप से वर्षा के पहले हमेशा नहीं आते हैं इसलिए ये कारण भी हो सकते हैं। अनियत घटनाएँ कारण कभी नहीं भी हो सकते हैं। अतः, अनियत घटनाएँ कारण कभी नहीं हो सकती है।

(ख) नियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent):
वे घटनाएँ हैं जो किसी कार्य के पहले देखा या निश्चित रूप से पायी जाती है, जैसे-वर्षा के पहले बादल का घिर जाना। जब कभी भी वर्षा होगी आकाश में बादल का रहना जरूरी है। अतः बादल का होना नियत पूर्ववर्ती घटना है। ऐसा विचार ह्यूम (Hume) का है। घटना के पहले जो भी आवे जो कुछ भी घटे सबों को बिना विचारे कारण मान लेना एक दोष पैदा कर सकता है। जिसे हम पूर्ववर्ती घटनाओं के रूप में पाते हैं, परन्तु वे सभी आकस्मिक या परिवर्तनशील हैं। इसलिए अनियत पूर्ववर्ती घटना के कारण बनने का योग कभी भी प्राप्त नहीं होगा। इसलिए ह्यूम साहब ने हमेशा की नियम पूर्ववर्ती घटना को कारण मानना उचित बताया है।

3. अनौपाधिक होना (Unconditional):
कभी-कभी ह्यूम के विचारों को मानने से एक समस्या आ जाती है जिसे Carveth Read ने हमारे सामने दिन और रात का उदाहरण रखा। है। दिन के पहले रात और रात के पहले दिन नियम पूर्ववर्ती घटना के रूप में पाए जाते हैं। यदि हम ह्यूम की बात को न माने तो दिन का कारण रात और रात का कारण दिन का होना ही होगा।

ऐसा कहना हास्यास्पद होगा। क्योंकि दिन और रात का होना एक शर्त पर निर्भर करता है-वह है पृथ्वी का चौबीस घंटे में अपनी कील पर सूरज के चारों तरफ एक बार घूम जाना। वास्तव में यही दिन और रात का अलग-अलग कारण हो सकता है। इस समस्या को दूर करने के लिए मिल साहब कहते हैं कि इसी प्रकार की घटना को नियमपूर्ववर्ती घटना का कारण माना जा सकता है जो किसी शर्त पर निर्भर नहीं करे अर्थात् वह अनौपाधिक (Unconditional) हो।

4. तात्कालिक होना (Immediate):
तात्कालिक कारण का अंतिम गुणात्मक लक्षण तात्कालिकता है। कारण को कार्य तात्कालिक पूर्ववर्ती होना चाहिए। अतः, कारण से तुरन्त पहले आनेवाली पूर्ववर्ती में खोजना चाहिए। दूरस्थपूर्ववर्ती को कारण नहीं मानना चाहिए। जैसे-कॉलेज में सुबह पढ़ना, शाम को टहलना, रात को ओस में सोना इत्यादि घटनाओं के बाद हमें खूब जोर से सर दर्द होता है। यहाँ सर दर्द के पहले ओस में सोना तात्कालिक घटना है और अन्य घटनाएँ दूर की है। इस तरह पूर्ववर्ती नियम अनौपाधिक एवं तात्कालिक मिश्रण है।

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प्रश्न 5.
कारण सभी उपाधियों-भावात्मक एवं अभावात्मक का दर्शन है। इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मिल साहब के अनुसार हमें कारण और स्थिति (Cause and condition) को ठीक से समझना होगा।

स्थिति उपाधि (Condition):
कारण का एक हिस्सा स्थिति या उपाधि होता है। जिस तरह हाथ, पैर, आँख, नाक, कान इत्यादि मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं उसी तरह बहुत-सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती है। अतः, दोनों में पूर्ण और हिस्से (Whole and part) का संबंध है। स्थिति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी कारण को कार्य के रूप में परिणत होने के लिए सहायक होता है, जैसे यदि बीज (Seed) कारण है और वृक्ष कार्य है तो बीज में धूप हवा, पानी, खाद्य इत्यादि से सहायता मिलती है, जिन्हें हम स्थितियों के रूप में ही पाते हैं।

इसलिए कार्वेथ रीड ने कहा है – “स्थिति कारण का कोई आवश्यकीय भाग है” (Conditions is any necessary factor of the cause) Conditions के दो रूप बताए गए हैं-भावात्मक और अभावात्मक (Positive and Negative)। भावात्मक स्थिति-यह कारण का वह हिस्सा है जो प्रत्यक्ष रूप में पाया जा सकता है। उसके रहने से कार्य को पैदा होने में सहायता मिलती है। जैसे-बीज से वृक्ष होने में खाद्य, पानी, हवा, धूप आदि भावात्मक स्थितियाँ है। नाव से पानी में झांकना और ऐसा करने से पानी में डूबकर मरना भावात्मक स्थिति है। इस तरह भावात्मक स्थिति स्पष्ट रहती है।

अभावात्मक स्थिति (Negative Condition):
यह कारण का वह हिस्सा है जिसकी अनुपस्थिति में कोई कार्य होता है। इसलिए मिल साहब के अनुसार, “बाधा उत्पन्न करनेवाली परिस्थिति का अभाव ही अभावात्मक स्थिति है। जैसे – बीज के वृक्ष होने में हवा, पानी, तूफान का नहीं आना, कड़ी धूप का नहीं होना, जानवरों का नहीं खाना आदि बातें भी अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करती रहती है।

इसलिए वे बीज के लिए अभावात्मक स्थितियाँ हैं। इनका अभाव ही कारण के लिए सहायक होता है। इसी तरह नाव से नदी की धारा में गिरना भावात्मक स्थिति है तो उस आदमी को तैरने नहीं आना, और घबड़ा जाना अभावात्मक स्थिति है। अगर वह तैरना जानता तो डूबता नहीं। इसलिए डूबने का कारण उसका तैरना नहीं आना भी होगा। इसे अभावात्मक स्थिति कहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर भावात्मक और अभावात्मक स्थिति की समान जरूरत है। इसलिए मिल साहब ने कहा कि भावात्मक और अभावात्मक स्थितियों का योगफल ही कारण कहलाता है।

आलोचना –

  1. अभावात्मक स्थितियों को कारण का एक अंश मानना एक उलझन पैदा कर सकता है। क्योंकि जो कारण अनुपस्थित है वह किसी भी कार्य के कारण का एक अंग कैसे बन सकता है?
  2. सभी अभावात्मक स्थितियों का वर्णन करना एक अत्यंत कठिन कार्य है। यह कभी भी पूरा नहीं हो सकता है। सभी अभावात्मक स्थितियों की गणना संभव नहीं है।
  3. भावात्मक उपाधियों में भी एक दिक्कत है सभी गणना संभव नहीं है।

कारण एवं उपाधि में संबंध-उपाधि की परिभाषा से ही संबंध स्पष्ट होता है। उपाधि कारण का अंश है। अनेक उपाधियों के योग से कारण बनता है। अतः, दोनों में वही संबंध है जो संबंध शरीर और अंगों के बीच है। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न अंगों के जोड़ से पूर्ण शरीर बनता है उसी प्रकार उपाधियों में है। अंगों के निकाल देने पर शरीर का अंत हो जाता है। उसी प्रकार उपाधियों को हटा देने से कारण नाम की कोई वस्तु नहीं बचती है।

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प्रश्न 6.
कारण और कार्य दोनों बराबर है। इसकी व्याख्या करें। अथवा, कार्य-कारण से अन्तर्निहित है और कारण कार्य में अभिव्यक्त रहता है इस कथन की व्याख्या करें। अथवा, कार्य-कारण नियम के परिमाणगत लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण और कार्य दोनों परिणाम के अनुसार बिल्कुल बराबर होते हैं (A cause is equal to effect quantity) इसका अर्थ यही हुआ कि कारण और कार्य, द्रव की मात्रा हमेशा ही एक समान रहती है। वह कभी घटती-बढ़ती नहीं है बल्कि उसका रूप परिवर्तन होते रहता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन दो गैस है जिनके मिलाने से पानी बनता है। यहाँ पर भी पानी दोनों गैसों की मात्रा के बराबर रहता है। इसी तरह शक्ति की अविनाशिता का नियम (Law of conservation of Energy) यह कहता है कि दुनिया में शक्ति का विनाश कभी नहीं होता है। वह हमेशा एक ही समान रहती है। केवल उसके रूप में परिवर्तन होता रहता है। शक्ति दो तरह की होती है –

(क) गति संबंधी (Kinetic)
(ख) संभावित शक्ति (Potential Energy)

एक में गति रहती है दूसरे में नहीं। एक किसी वस्तु को गतिशील बनाता है दूसरी स्थिर। इन्हीं दोनों में शक्ति का रूप परिवर्तन होता रहता है। उसका नाश कभी नहीं होता है। दोनों मात्रा में भी बराबर पा सकते हैं।
थोड़ी देर के लिए यदि हम मान लें कि कारण और कार्य बराबर नहीं है तो इसके बाद तीन संभावनाएँ हो सकती है।

(क) कारण-कार्य से मात्रा में बड़ा होता है।
(ख) कारण-कार्य से मात्रा में छोटा होता है।
(ग) कभी कारण बड़ा होता है और कभी छोटा।

इसमें यदि हम पहले को सही मान लें तो बहुत-सी असंभव घटनाएँ हमारे सामने आ जाएँगी। इसी तरह दूसरी संभावना भी गलत है कि जिसमें कारण-कार्य से छोटा कहा गया है। इसी तरह तीसरी संभावना भी नहीं मानी जा सकती है। क्योंकि उसे मान लेने से प्राकृतिक समरूपता नियम का उल्लंघन होता है। प्रकृति की घटनाओं में एकरूपता हो। अतः तीनों को देखने के बाद सही मानना पड़ता है कि कारण और कार्य परिणाम के अनुसार बिल्कुल बराबर होते हैं।

इसे मान लेने के बाद हमें यह भी कहने का अवसर मिलता है कि कारण में कार्य छिपा रहता है और कार्य में कारण का छिपा हुआ रूप रहता है। (Cause is nothing but effect can cealed and effect is nothing but cause evealed) कारण और कार्य परिणामों के अनुसार बराबर होते हैं। कार्य कारण में पहले से ही निवास करता है जैसे-बीज में वृक्ष, सरसों में तेल। वृक्ष बीज का खुला हुआ रूप है और तेल सरसों का। वृक्ष और तेल कोई नया चीज नहीं है। अतः परिणाम के अनुसार कारण और कार्य बिल्कुल बराबर होते हैं केवल उनके रूप में परिवर्तन होता हैं अतः दोनों बराबर है।

कार्य-कारण नियम और प्राकृतिक समरूपता नियम के बीच संबंध (Relation between in law of causation and this Law of uniformity of Nature):
दोनों नियम आगमन की आकस्मिक आधार हैं। इन दोनों की सहायता से ही आगमन में अत्यधिक सत्यता की स्थापना की जाती है। इन दोनों के बीच के संबंध को लेकर विद्वानों में दो मत हैं।

(क) मिल, बेन और वेन आदि विद्वानों के अनुसार कार्य-कारण नियम को प्राकृतिक समरूपता नियम का ही हिस्सा माना गया है। इन लोगों का कहना है कि प्राकृतिक समरूपता नियम एक मूल नियम है जो प्रकृति के सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। अतः, कार्य-कारण का नियम भी उसी का एक अंग है।

(ख) Sigwart, Bossanquet, Welton आदि विद्वानों के अनुसार कार्य:
कारण का नियम और प्राकृतिक समरूपता नियम दो अलग-अलग नियम हैं इसमें कोई एक-दूसरे का अंग या अंश नहीं है। ये दोनों नियम अलग-अलग रूप में आगमन की आकारिक सत्यता को पाने में मदद करते हैं। इन दोनों मतों को देखने से पता चलता है कि प्राकृतिक समरूपता नियम सभी प्रकार से आगमन का आधार है और कार्य-कारण नियम वैज्ञानिक आगमन का आधार है। वास्तव में दोनों नियम एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक के रूप में हैं।

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प्रश्न 7.
बहुकारणवाद की व्याख्या एवं परीक्षण करते हुए उसकी कठिनाइयों का उल्लेख करें। या एक ही घटना विभिन्न कारणों से विभिन्न समय में उत्पन्न होती है। विवेचना करें।
उत्तर:
बहुकारणवाद के अनुसार एक ही घटना अलग-अलग समय में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है। एक कार्य को अनेक कारणों का बहुकारणवाद कहते हैं। जैसे-मृत्यु एक कार्य है जिसकी उत्पत्ति अनेक कारणों से होती है। मृत्यु कभी बीमारी से, कभी विष खाने से, कभी गोली लगने से, कभी दुर्घटना होने से और कभी गिरने से होती है। अतः विभिन्न समय के मृत्यु के विभिन्न कारण हैं। रोशनी, सूर्य, चन्द्र, लालटेन, दीपक, बिजली-मोमबत्ती, अनेक कारणों से उत्पन्न होती है। इस पर कार्वेथ रीड ने कहा है The same event may be due at different times to different antecedents, that in fact there may be various cause अर्थात् एक ही घटना भिन्न-भिन्न समय में अलग-अलग पूर्ववर्ती अवस्थाओं से घटती है।

अतः उसके भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं। मिल साहब ने भी बहुकारणवाद का समर्थन किया है। इनके शब्दों में “Many causes may produce mechanical mot on, many causes may produce. Produce same kind of sensation, many causes may produce death” अर्थात् अनेक कारण यांत्रिक गति उत्पन्न कर सकते हैं, कई कारण समान संवेदना उत्पन्न कर सकते हैं, कई कारणों से मृत्यु हो सकती है। स्पष्ट है कि एक ही घटना विभिन्न समय में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है। जैसे मृत्यु एक घटना है इसके कई कारण हो सकते हैं नदी में डूबना, टी.बी., हैजा, प्लेग, जहर खाना, ट्रेन से कट जाना आदि इसके अनेक कारण बताए जा सकते हैं।

बहुकारणवाद सिद्धांत की कठिनाइयों की आलोचना-() बहुकारणवाद कारण की नियतता के विरूद्ध है। कारण नियम पूर्ववर्ती है। नियम पूर्ववर्ती का अर्थ है कि वही पूर्ववर्ती कारण है जो अपरिवर्तनशील है, जो किसी घटना के पहले सर्वदा उपस्थित है। इसका अर्थ है कि एक कार्य का संबंध सर्वदा एक कारण से रहता है, परन्तु बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य का संबंध अनेक कारण से रहता है। इस सिद्धांत को मान लेने पर Valiable अनियत हो जाता है। अतः यह सिद्धांत कारण की नियतता के विरुद्ध जाता है।

1. यह सिद्धांत विज्ञान के विरुद्ध जाता हैं। विज्ञान के अनुसार एक घटना का एक कारण होता है तथा एक कारण का एक कार्य होता है। बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य में अनेक कारण होते हैं। अतः, सिद्धांत विज्ञान की मान्यता के विरुद्ध जाता है।

2. यह सिद्धांत प्राकृतिक समरूपता नियम के विरुद्ध भी जाता है। समान परिस्थिति में समान कारण से सफल कार्य की उत्पत्ति होती हैं इसका अर्थ होता है कि एक कार्य का एक कारण होता है। लेकिन बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य के अनेक कारण होते हैं। अतः, यह सिद्धांत प्राकृतिक समरूपता नियम के विरुद्ध जाता है जो कठिनाइयों को दूर कर सकते हैं? बहुकारणवाद में जो सत्यता दिखाई पड़ती है वह वास्तविक सत्यता नहीं है। यह तो हमारी असावधानी और अज्ञानता पर आधारित है। वस्तुतः प्रकृति में एक घटना का एक ही कारण है। बहुकारणवाद की असत्यता को दो तरह से दूर किया जा सकता है।

  • कार्यों का विशेषीकरण (specialisation of effects) तथा
  • कारणों के सामान्यीकरण द्वारा (Generalisation of causes) द्वारा।

(i) कार्यों का विशेषीकरण:
हमलोग प्रायः कारण में भेद करते हैं, किन्तु कार्य में भेद नहीं करते हैं। अलग-अलग कारणों से उत्पन्न कार्य जिसे हम एक समझते हैं वास्तव में एक नहीं बल्कि अनेक प्रकार का है। सूर्य, चन्द्र, लालटेन, बिजली, मोमबत्ती, दीपक से उत्पन्न प्रकाश को एक समझते हैं। परन्तु ध्यान से देखने पर भिन्नता दिखाई पड़ती है। बिजली का प्रकाश दीपक से प्रकाश से भिन्न है। दीपक की रोशनी, लालटेन की रोशनी से भिन्न है जब भिन्नता है तो फिर उसे एक नाम से नहीं परखना चाहिए। हमें सूर्य का प्रकाश, बिजली का प्रकाश, लालटेन की रोशनी, दीपक का प्रकाश अलग-अलग कहना चाहिए। जब ऐसा करते हैं तो एक कार्य का एक कारण होगा न कि अनेक।
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इस तरह एक कार्य का एक ही कारण सिद्ध होता है न कि अनेक। विभिन्न कार्यों की विशेषता बतलाना कार्यों का विशेषीकरण कहलाता है। अतः, कार्य का साफ-साफ व्यक्त करना ही कार्य का विशेषीकरण कहलाता है।

(ii) कार्यों का सामान्यीकरण:
इसका अर्थ है विभिन्न कारणों में निहित सामान्य (Common) तत्त्व का पता लगाना। यदि कारणों में सामान्य तत्त्व का पता लगता है तब एक कार्य का एक कारण होगा। विभिन्न कार्यों की भिन्नता पर ध्यान न देकर उसे एक नाम से पुकारते हैं। यहाँ न्याय का अंतर है कि विभिन्न कारणों की भिन्नता पर ध्यान न देकर उनके सामान्य तत्त्व का पता लगाकर उन्हें एक नाम से जान सकते हैं। जैसे मृत्यु का अनेक कारण कहते हैं-हैजा, प्लेग, विषपान, गोली लगना, नदी में डूबकर आदि, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि उन कारणों में एक सामान्य बात है “हृदय की गति का रुकना या प्राण शक्ति समाप्त होना” यहाँ मृत्यु का एक ही कारण है-प्राण शक्ति का समाप्त हो जाना।

इस तरह कारणों के सामान्यीकरण तथा कार्यों के विशेषीकरण के द्वारा बहुकारणवाद की असत्यता को प्रमाणित किया जा सकता है। बेन ने कहा है “Plurality of causes is more an ancident of our imperfect knowledge than a fact in the nature of things” अर्थात् कारणों की अनेकता वस्तुओं के विषय में कोई सत्यता नहीं हैं बल्कि अधूरे ज्ञान का परिणाम है। इसी तरह जाजेफ के शब्दों में “Plurality is more apparent than real.” अर्थात् अनेक कारण केवल दिखावटी हैं, यथार्थ नहीं। इसी तरह कार्वेथ रीड ने भी कहा है कि “यदि हम तथ्यों को पर्याप्त सूक्ष्मता से समझेंगे तो हम देखेंगे कि प्रत्येक कार्य का एक ही कारण होता है।” अतः, बहुकारणवाद सही सिद्धान्त नहीं है, कार्यों कि यह विज्ञान के विरुद्ध है।

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प्रश्न 8.
कारण-संयोग एवं कार्य सम्मिश्रण की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
जब बहुत से कारण मिलकर संयुक्त रूप में कार्य पैदा करे तो वहाँ पर कारणों से मेल को कारण-संयोग (conjunction of causes) कहते हैं और उनसे उत्पन्न कार्य को कार्य-सम्मिश्रण (Intermixture of effects) कहते हैं। अतः, अनेक कारणों को मिलकर कार्य करना, कारणों का संयोग कहलाता है। B.N. Roy ने कहा है “The acting together of serveral of causes producing a joint effect is called conjunction of causes.” जैसे दाल, भात, दूध, घी, दही, तरकारी खाने के बाद हमारे शरीर में खून बनता है। इसलिए यहाँ पर ‘खून’ बहुत कारणों के मेल से बनने का कारण कार्य-सम्मिश्रण हुआ भात, दाल, दूध, दही, घी, तरकारी आदि कारणों का मेल कारण-संयोग कहलाया।

इसी तरह यदि हम अपने रूम में एक सौ दीपक जला दें तो उससे एक अच्छा प्रकाश होगा। यहाँ सभी दीपक मिलकर उन प्रकाश को कार्य रूप में पैदा करते हैं। इसलिए वे प्रकाश-सम्मिश्रण कार्य और सभी दीपक कारण संयोग के रूप में होगा। कार्य-सम्मिश्रण (Intermixture of Effects) दो तरह के हैं –

  1. सजातीय
  2. विजातीय।

1. सजातीय कार्य सम्मिश्रण (Homogeneous):
इसमें विभिन्न कारणों के मेल से जों कार्य पैदा होता है उसमें समीकरण एक ही तरह या जाति के होते हैं। जैसे-यदि हम अपने कमरे में एक सौ दीपक जला दें तो उससे खूब प्रकाश होगा। यहाँ प्रकाश कार्य है और इसके कारण सभी एक ही तरह के दीपक हैं इसे सजातीय कार्य सम्मिश्रण कहा जाता है।

2. विजातीय कार्य सम्मिश्रण (Heterogeneous):
इसमें कार्य विभिन्न कारणों के मेल से बनता है। वे सभी कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। जैसे ‘खून’ का कार्य-सम्मिश्रण लेने पर पता चलता है कि इसके कारण भात, दाल, दूध, घी, पानी, तरकारी आदि हैं ये सभी भिन्न-भिन्न जाति के हैं फिर भी इन सबों के मेल से ही ‘खून’ बनता है इसलिए यह विविध जाति जातीय कार्य सम्मिश्रण कहलाएगा।

कारण संयोग एवं बहुकारणवाद में अंतर (Difference between conjunction of causes and plurality):
दोनों में निम्नलिखित अंतर हैं –

(i) बहुकारणवाद में बहुत से कारण मिलते हैं, जैसे – मृत्यु के लिए नदी में डूबना, हैजा, प्लेग, ट्रेन से कटना आदि। किन्तु, एक समय में एक ही कारण काम करते हैं। दूसरी तरफ कारण संयोग में जो अनेक कारण मिलते हैं वे सभी एक-दूसरे से मिलकर ही उस कार्य को पैदा करते हैं अकेले नहीं।

(ii) बहुकारणवाद में जो कारण हमें मिलते हैं उनमें एक कारण अकेला ही उस तरह के कार्य को पैदा करने की ताकत रखता हैं जैसे नदी में डूबना या हैजा या प्लेग आदि में कोई एक अकेले वह कार्य पैदा कर सकता है, परन्तु ऐसी व्यक्ति संयोग में एक कारण के पास नहीं मिलती है। अकेले भात या दाल उस तरह का खून नहीं पैदा कर सकता है अकेलें ऑक्सीजन या हाइड्रोजन पानी पैदा नहीं कर सकता है।

(iii) बहुकारणवाद के कार्य में सरलता रहती है, क्योंकि एक समय में सूर्य के लिए एक ही कारण काम करता है दूसरी तरह कारण-संयोग में सभी कारण मिलकर कार्य करता है इसलिए उससे जो कार्य पैदा होता है वह जटिल या मिश्रित होता है।

(iv) बहुकारणवाद की आलोचना करते हुए इसे गलत और अवैज्ञानिक बताया गया है। परन्तु कारण-संयोग सही और वैज्ञानिक होने का दावा कर सकती है।

अतः, बहुकारणवाद में अनेक कारण Separately and independently कार्य को उत्पन्न करते हैं, किन्तु कारण-संयोग में अनेक कारण Jointly कार्य को उत्पन्न करते हैं। जैसे –
कारण संयोग – A + B + C Produce ‘X’
बहुकारणवाद – A or B or C Produces ‘X’

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प्रश्न 9.
कारण और कारणांश क्या है? दोनों में भेद बतावें।
उत्तर:
कारण और कार्य एक सापेक्ष पद है। एक के आने के बाद दूसरा आता है। कारण उपस्थित होने पर कार्य की उपस्थिति होती है। कारण एक घटना है। दो घटनाओं का संबंध इस तरह है कि जो पहले आता है, वह कारण कहा जाता है और जो बाद में आता है उसे कार्य कहा जाता है। बादल और वर्षा दोनों एक प्रकार के घटना हैं। बादल पहले आता है इसलिए बादल कारण है, वर्षा बाद में होती है, इसलिए वर्षा कार्य है। कारण एक हिस्सा है जो एक अर्थ के रूप में रहता है कारणांश एक प्रकार की स्थिति है यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी कारण को कार्य के रूप में परिणत होने के लिए सहायक होता है जैसे यदि बीज कारण है तो वृक्ष कार्य है। कारणांश के दो भेद हैं –

  1. भावात्मक कारणांश
  2. अभावात्मक कारणांश।

1. भावात्मक कारणांश:
यह कारण का वह भाग है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी भी कार्य को होने में सहायक होती है। जैसे बीज से वृक्ष होने में हवा, पानी, धूप, खाद्य आदि भावात्मक स्थितियाँ हैं।

2. अभावात्मक कारणांश:
यह कारण का वह हिस्सा है जो किसी भी कार्य में अनुपस्थित होकर कार्य को करने में सहायता प्रदान करती है। बीज से वृक्ष होने में भावात्मक स्थिति के साथ-साथ अभावात्मक स्थिति का भी होना जरूरी है, जैसे-बीज से वृक्ष होने में धूप, हवा, पानी इत्यादि के साथ-ही-साथ आँधी, तूफान का नहीं आना कड़ी धूप का नहीं होना, जानवरों द्वारा नहीं खाया जाना इत्यादि बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है। अतः, कारणांश में भावात्मक और अभावात्मक दोनों के हाथ हैं। कारण और कारणांश दोनों में निम्नलिखित अंतर भी हैं –

  • कारण एक होता है, किन्तु कारणांश में कई कारण मिलकर किसी कार्य को करते हैं।
  • कारण अंश के रूप में रहता है, किन्तु कारणांश संपूर्ण के रूप में रहता है।
  • अरस्तू ने चार प्रकार के कारण बताए हैं-द्रव्य कारण, आकारिक कारण, विभिन्न निमित कारण और अन्तिम कारण। ये चारों प्रकार के कारण एक साथ मिलकर किसी भी कार्य को करते हैं। लेकिन कारणांश दो प्रकार के हैं भावात्मक और अभावात्मक कारणांश।

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प्रश्न 10.
समरूपता के मूल भेद क्या हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन में प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कार्य-कारण नियम आकारिक आधार के दो प्रमुख भेद बताएँ गए हैं। आगमन के दो मुख्य आधार भी हैं-आकारिक आधार तथा वास्तविक आधार। आकारिक आधार के अंतर्गत हम लोग प्राकृतिक समरूपता नियम में विश्वास करते हैं क्योंकि प्रकृति हमेशा एक समान व्यवहार करती है। इसमें कभी किसी तरह का हेर-फेर नहीं होता है। इस नियम की परिभाषा नहीं, किन्तु व्याख्या की गई है। प्रकृति एकरूप है। प्रकृति की घटनाएँ समान रूप से घटती है, जो अनुपस्थित है, वह उपस्थित के बराबर है। प्रकृति अपने आप में निष्पक्ष एवं ईमानदार है।

समानकारण से समान कार्य पैदा होता है इसका अर्थ यही हुआ कि जिस कारण से जो घटना आज घटती है यदि वही कारण कल भी उपस्थित हो जाए तो वही घटना घटेगी, जैसे यदि आज सरसों से तेल निकलता है तो कल भी निकलेगा। प्रकृति में जिस कारण से जो घटनाएँ घटती है वही कारण उपस्थित होने पर वही कार्य अवश्य होगा। इस तरह प्रकृति में किसी तरह की भिन्नता नहीं की गई है। यदि आज पानी में प्यास बुझाने की क्षमता है तो कल भी पानी में प्यास बुझाने की क्षमता रहेगी। इसी तरह आज आग में जलाने की शक्ति है तो भविष्य में भी आग में जलन शक्ति रहेगी। – अतः, संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जिन कारणों से जो घटना, आज घटती है कल भी वही कारण से वही घटना अवश्य घटेगी। इसकी गारंटी हम प्राकृतिक समरूपता से प्राप्त करते हैं। यहाँ समरूपता के मुख्यतः तीन मूल भेदों का वर्णन किया गया है।

  1. अनुक्रमिक समरूपताएँ
  2. समसत्ता की समरूपताएँ
  3. समान घटनाओं की समरूपताएँ।

1. अनुक्रमिक समयरूताएँ (Uniformities of succession):
इसे कारणता कहते हैं। इस प्रकार की समरूपता में जहाँ पहली घटना घटेगी वहाँ दूसरी घटना अवश्य घटेगी। जैसे – पानी और व्यास का बुझाना। आग का होना और गर्मी का होना। ये सब अनुक्रमिक समरूपताएँ हैं। इसमें प्राकृतिक समरूपता है।

2. समसत्ता की समरूपताएँ (Uniformities of co-existence):
प्रकृति में कुछ घटनाएँ इस प्रकार की घटती हैं जिन्हें साथ-साथ पायी जाती है या धातु के साथ पारदर्शिता सर्वदा रहती है। इसी तरह कुछ उदाहरण है जिनमें दो बातों की समसत्ता देखकर यह कहते हैं कि उनमें समसत्ता की एकरूपता पायी जाती है।

3. समान घटनाओं की समरूपताएँ (Uniformities of Equality):
इसके अंतर्गत देखा गया है कि अगर समान वस्तुओं के बराबर जितनी वस्तुएँ हैं ये सभी आपस में बराबर हैं। जैसे-गणित, विज्ञान जो अंकों के संबंध पर आधारित है, वह उसी प्रकार के उदाहरण से मिलता-जुलता नजर आता है। रेखा गणित में भी इस प्रकार के उदाहरण मिलते हैं। जैसे किसी चतुर्भुज के आमने-सामने वाले कोण यदि बराबर हों तो आमने-सामने वाली भुजाएँ भी समांतर और बराबर होंगी।

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प्रश्न 11.
प्रयोग के ऊपर निरीक्षण के लाभ की व्याख्या करें।
उत्तर:
निरीक्षण और प्रयोग में केवल मात्रा का भेद है फिर भी एक का फायदा दूसरे पर दिखलाया जा सकता है। प्रयोग की अपेक्षा निरीक्षण की विशेष सुविधाएँ या प्रयोग के ऊपर निरीक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं।

1. निरीक्षण का क्षेत्र प्रयोग से बड़ा और व्यापक है। निरीक्षण सभी घटनाओं का किया जा सकता है, किन्तु सभी घटनाओं पर प्रयोग नहीं किया जा सकता है। जैसे-सामाजिक, राजनीतिक एवं ग्रह-नक्षत्र-संबंधी घटनाओं पर प्रयोग संभव नहीं है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। इसी तरह अपराध, पाप, आत्महत्या, मानसिक रोग आदि को प्रयोग द्वारा उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन घटनाओं का केवल निरीक्षण ही संभव है।

2. निरीक्षण में कारण से कार्य तथा कार्य से कारण दोनों की ओर जाते हैं, परन्तु प्रयोग में केवल कारण से कार्य की ओर जाते हैं। जैसे किसी पशु को विष की सूई देकर हम देखते हैं कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है। किन्तु, मरे हुए पशु पर प्रयोग कर यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि उसकी मृत्यु किस कारण से हुई। लेकिन निरीक्षण में शव को देखकर उसकी मृत्यु के कारण का अनुमान निरीक्षण के आधार पर कर सकते हैं। यहाँ कार्य से कारण की ओर जाते।

3. आगमन में पूर्णव्यापी वास्तविक वाक्य की स्थापना निरीक्षण के आधार पर की जाती है, जैसे-राम, श्याम, मोहन, यदु को मरते देखकर सभी मनुष्य मरणशील हैं, ऐसा निरीक्षण पर ही हम करते हैं। यहाँ प्रयोग से काम नहीं लेते हैं। प्रयोग तो निरीक्षण का संशोधित एवं नियंत्रित।

4. निरीक्षण का दावा है कि वह प्रयोग से पहले (Prior) आता है। प्रयोग करते समय भी हम निरीक्षण करते हैं। अतः, निरीक्षण प्रयोग के पहले आने का सही अधिकार रखता है। प्रयोग करने के पहले यंत्रों तथा उपादानों का निरीक्षण करने के बाद ही प्रयोग किया जाता है। ज्ञान का. प्रारंभ निरीक्षण से होता है। बाद में बुद्धि विकसित होने पर प्रयोग से काम लेते हैं।

5. निरीक्षण सबों के लिए सुलभ है इसके लिए विशेष योग्यता और कुशलता की जरूरत नहीं है। जबकि प्रयोग के लिए विशेष योग्यता एवं कुशलता की जरूरत रहती है। अतः, प्रयोग सबों के लिए सुलभ नहीं है।

6. निरीक्षण में घटनाओं को स्वाभाविक तथा शुद्ध रूप में देखते हैं। उनमें कृत्रिमता नहीं रहती है। जैसे-सूर्योदय, सूर्यास्त, वर्षा के मौसम में रिमझिम वर्षा का निरीक्षण आनन्ददायक होता है। किन्तु, प्रयोग में घटना को कृत्रिम ढंग से बनाते हैं। इसलिए उसमें स्वाभाविकता नहीं रहता है।

7. निरीक्षण से एक विशेष सुविधा मिलती है जो प्रयोग में नहीं मिलती है। प्रयोग की अपेक्षा निरीक्षण में कम मेहनत करनी पड़ती है। प्रयोग में अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

परिस्थितियों एवं प्रयोगशालाओं का प्रबंध करना पड़ता है। इसमें यंत्रों की सहायता ली जाती है। अतः, यंत्रों का प्रबंध भी जरूरी है। इसमें बहुत झंझट एवं परेशानी है जबकि निरीक्षण का कार्य सुविधाजनक एवं आसान है। इस तरह निरीक्षण से विशेष लाभ प्रयोग की अपेक्षा है।

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प्रश्न 12.
निरीक्षण संबंधी दोषों की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
निरीक्षण में घटनाओं को निष्पक्ष होकर देखा जाता है, किन्तु साधारण लोगों के द्वारा निरीक्षण की क्रिया गलत रूप से भी हो जाती है। इसे निरीक्षण का दोष कहते हैं। निरीक्षण में प्रायः दो तरह के दोष होते हैं। गलत निरीक्षण की भूल और नहीं निरीक्षण की भूल।

1. गलत निरीक्षण की भूल या दोष (Fallacy of mal observation):
निरीक्षण में हमारी ज्ञानेन्द्रियों को बहुत ही काम करना पड़ता है जिसमें कभी-कभी धोखा भी हो जाती है जिससे किसी वस्तु या घटना का गलत ज्ञान हो जाता है जिससे निरीक्षण दोषपूर्ण हो जाता है।

जैसे-चाँदनी रात में शांत वातावरण में बालू के सूखी रेत को पानी, या पानी को ही बालू समझना। अंधेरी रात में रस्सी को साँप या साँप को रस्सी समझना ये सब गलत निरीक्षण का नमूना है। साधारण लोग कहते हैं कि सूर्य पूरब उदय होकर धीरे-धीरे चलकर पश्चिमी में डूब जाता है। ऐसा समझना निरीक्षण का दोष है।

(ii) नहीं निरीक्षण की भूल (Fallacy of non observation):
निरीक्षण के समय हम कभी-कभी बहुत असावधान रहते हैं। इसमें उसके पूरे तथ्य को न देखकर उसमें कुछ ही अंश को देखते हैं। इसमें सत्य के एक पहलू को देखा जाता है तथा दूसरे का निरीक्षण बिल्कुल नहीं करते हैं। यह दोष दो तरह के हैं।

(क) उदाहरणों को नहीं देखना (Non-observation of instances):
सही और वैज्ञानिक निरीक्षण के लिए हमें पक्षपात से दूर रहना पड़ता है। किसी व्यक्ति को ठीक से बताने के लिए उसके भावात्मक तथा अभावात्मक गुणों का वर्णन होना चाहिए। उसके अच्छे-बुरे गुणों का वर्णन होना जरूरी है। यदि उसके बुरे गुणों का वर्णन नहीं करते हैं तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है। अभावात्मक उदाहरणों को छोड़ देना वैज्ञानिक निरीक्षण नहीं है।

जैसे-जब कोई शादी हेतु लड़की वाला लड़का वाला के यहाँ जाता है तो लड़के का गुण बताता है कि लड़का एम. ए. पास है, खिलाड़ी है, समाज सेवक है, सुशील है, गायक है, तेज है। ये सभी उसके गुण हैं। किन्तु, वह शराबी है, झगड़ालू है, बीमार अधिक रहता है, गाली देने का स्वभाव एवं मारपीट करने में आगे रहता है। इन सब उदाहरणों को नहीं देखना केवल एक ही पक्ष देखने से निरीक्षण दोष पूर्ण है, जिसे – Non-observation of fallacy कहते हैं।

(ख) आवश्यक वस्तुओं को नहीं देखना (Non observation of the essential circumstances):
किसी घटना के होने में परिस्थिति का बहुत बड़ा हाथ रहता है। यदि परिस्थिति को तुच्छ और बेकार समझकर ध्यान में नहीं लाते हैं तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है। जैसे-एक छात्र शाम को हॉकी खेलकर हाथ में डंडा लेकर सुनसान बगीचे से गुजर रहा है। एक बदमाश आदमी रुपये के लालच में एक लड़की की हत्या करके उसके आभूषणों को लूटना चाहता है। दोनों में भिड़त हो जाती है। छात्र के डंडे से वह गुंडा चोट खाकर मर जाता है।

इस हालत में परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उस छात्र को निर्दोष पाया जाएगा। उसे खून की सजा नहीं मिलेगी। यदि जज उस परिस्थिति को ध्यान में न रखकर सजा दे देता है तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है, जिसे हम आवश्यक अवस्थाओं के नहीं, निरीक्षण का दोष कहेंगे। इस तरह अनेक परिस्थितियाँ चोरी, डकैती, हत्या की वृद्धि के लिए जिम्मेवार है।

गरीबी का बढ़ना, बेरोजगारी का बढ़ना, महँगाई, सरकार की कमजोरी, बेकारी की समस्या। इसमें केवल एक परिस्थिति सरकार की कमजोरी पर ध्यान देते हैं तथा अन्य परिस्थितियों का निरीक्षण नहीं करते हैं। अतः निरीक्षण के दोष के कारण जो सामान्यीकरण किया जाता है वह वैज्ञानिक नहीं है। सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में जो सिद्धान्त स्थापित किये जाते हैं उसमें निश्चितता नहीं रहती है।

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प्रश्न 13.
निरीक्षण के ऊपर प्रयोग के लाभ की व्याख्या करें?
उत्तर:
1. प्रयोग में जितनी बार चाहें उतनी बार घटनाओं को बार-बार दुहरा सकते हैं इसमें घटना हमारे हाथ में रहती है। किन्तु, निरीक्षण हमारे हाथ में नहीं रहता है। ऐसा मौका मिलता भी नहीं है। परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

2. प्रयोग में जाँच की जानेवाली घटना का अध्ययन दूसरी घटनाओं या परिस्थितियों से अलग करके कर सकते हैं। प्रकृति जटिल है। एक घटना दूसरी घटना से मिली रहती है। निरीक्षण में यह संभव नहीं है कि एक तत्त्व को दूसरे तत्त्व से अलग कर अध्ययन करें। प्रयोग में परिस्थितियाँ अलग की जा सकती हैं। किन्तु, निरीक्षण में ऐसा संभव नहीं है। हवा में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बनडाऑक्साइड इत्यादि मिले रहते हैं। एक बरतन में नाइट्रोजन रखते हैं और दूसरे बरतन में ऑक्सीजन। एक जलती मोमबत्ती नाइट्रोजन के बरतन के नजदीक जाने पर बुझ जाती है, किन्तु ऑक्सीजन के बरतन के नजदीक जाने पर तेज होकर जलने लगती है।

3. निरीक्षण की तुलना में प्रयोग से लाभ यह है कि घटना की जाँच परिस्थितियों से बदल-बदल कर करते हैं। परिस्थिति के परिवर्तन से बतलाता है कि किस परिस्थितियों का संबंध जाँच की जानेवाली घटना से है। जैसे-वैज्ञानिकों ने परिस्थिति को बदल करके पता लगाया कि नाइट्रिक एसिड, पीतल, लोहा, ताँबा, चाँदी को गला सकता है, परन्तु सोना को नहीं। निरीक्षण में परिस्थिति को बदली जा सकती है।

4. निरीक्षण की तुलना में प्रयोग से लाभ है कि प्रयोग में घटना की जाँच प्रयोगकर्ता धैर्य, सावधानी, सतर्कता एवं स्थिरता से करता है। इसमें जल्दीबाजी नहीं रहती है। किन्तु, निरीक्षण में यह सुविधा नहीं है।

5. प्रयोग से जो निष्कर्ष निकलते हैं वे निश्चित एवं संदेह रहित होते हैं। प्रयोग पर आधारित जाँच विश्वसनीय होता है। किन्तु, निरीक्षण से जो निष्कर्ष प्राप्त होता है वह संभाव्य होता है। वह सत्य भी हो सकता है और असत्य भी।

6. विज्ञान का जो कुछ विकास हुआ है उसमें प्रयोग का बहुत बड़ा हाथ है। निरीक्षण से उतना लाभ विद्वानों को नहीं पहुँच पाता है। इसलिए प्रयोग की वैज्ञानिक महत्ता निरीक्षण से अधिक है। भौतिकी एवं रसायन विज्ञान प्रयोग पर आधारित है इसलिए इसकी उन्नति अधिक हुई है। किन्तु मनोविज्ञान के सभी क्षेत्रों में प्रयोग संभव नहीं है इसलिए इसका विकास कुछ कम हुआ अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग निरीक्षण की अपेक्षा अधिक लाभदायक है। जहाँ प्रयोग संभव है वहाँ प्रयोग की मदद लेनी चाहिए।

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प्रश्न 14.
निरीक्षण की परिभाषा दें। निरीक्षण की मुख्य विशेषताओं की विवेचना करें। अथवा, निरीक्षण क्या है? निरीक्षण के लक्षणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
निरीक्षण का अर्थ प्रायः देखना या प्रत्यक्षीकरण होता है। ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जो प्रत्यक्षीकरण होता है, उसे निरीक्षण कहते हैं। ये देखना या प्रत्यक्षीकरण दो तरह से होता है। “Observation is the equalited perception of natural events under conditions arrange by natures with an end in view.” अर्थात् प्राकृतिक, स्थितियों के बीच प्राकृतिक घटनाओं के उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण को निरीक्षण कहते हैं।” इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं।

1. निरीक्षण उद्देश्यपूर्ण-निरुद्देश्यपूर्ण देखना निरीक्षण नहीं है। जैसे-बाजार में अनेक दुकानों को प्रत्येक दिन देखता हूँ, परन्तु यह देखना साधारण देखना है। यह देखना निरीक्षण नहीं कहला सकता है। यदि किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी दुकान को देखता हूँ। जैसे कपड़ा खरीदने के लिए तो वह निरीक्षण कहलाएगा। अतः, निरीक्षण उद्देश्यपूर्ण होता है।

2. निरीक्षण नियमित एवं व्यवस्थित होता है-लक्ष्य की पूर्ति निरीक्षण को नियमित और व्यवस्थित करती है। जैसे-कोई ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी एवं नक्षत्रों को ध्यान से नियमित रूप से उनकी गतिविधि को अध्ययन के विचार से उनका प्रत्यक्षीकरण करता है तो यह निरीक्षण कहलाता है। लेकिन लोग रात में चाँद और तारे को प्रतिदिन अनियमित रूप से देखते हैं, जिसे निरीक्षण नहीं कहा जाएगा। अतः निरीक्षण नियमित प्रत्यक्षीकरण (Regulated perception) है।

3. निरीक्षण चयनात्मक क्रिया (Selective process):
प्रकृति में अनेक घटनाएँ घटती हैं। प्रकृति में अनेक वस्तुएँ हैं। निरीक्षण में हम सभी वस्तुओं पर ध्यान न देकर केवल उन्हीं वस्तुओं या घटनाओं पर ध्यान देते हैं जिससे लक्ष्य की पूर्ति होती है। अतः, प्रकृति में से घटनाओं का चयन करते हैं और उन्हें ध्यानपूर्वक निरीक्षण भी करते हैं, अतः निरीक्षण एक चयनात्मक क्रिया है।

4. स्वाभाविक स्थिति:
निरीक्षण में जिन वस्तुओं या घटनाओं को देखते हैं उन्हें स्वाभाविक स्थिति में देखते हैं। उसे बिना परिवर्तन के देखते हैं। प्रकृति में घटनाएँ जिस रूप में पस्थित होती हैं उन्हें उसी रूप में देखते हैं। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, सूर्योदय, सूर्यास्त, बाढ़, वर्षा आदि को हम स्वाभाविक स्थिति में ही देखते हैं। अतः, निरीक्षण में प्राकृतिक घटनाओं को प्राकृतिक अवस्था में देखते हैं।

5. निरीक्षणकर्ता की निष्पक्षता:
वैज्ञानिक तटस्थ होकर घटनाओं का निरीक्षण करता है। अपने भाव, संवेग एवं पूर्वाग्रह से अलग होकर वह घटनाओं का अध्ययन करता है। निष्पक्ष हुए बिना निरीक्षण संभव नहीं हो सकता है।

6. ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निरीक्षण:
निरीक्षण ज्ञानेन्द्रियों द्वारा किया जाता है और ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति सीमित होती है। अतः निरीक्षण का स्पष्ट एवं प्रभावशाली बनाने के लिए वैज्ञानिक विभिन्न यंत्रों की सहायता भी लेते हैं। जैसे-दूरबीन का व्यवहार, थर्मामीटर, स्टेथेस्कोप का व्यवहार आदि।

7. निरीक्षण बाह्य घटनाओं तक ही सीमित नहीं है:
हम आंतरिक मनोदशा का भी निरीक्षण करते हैं। जैसे-सुख, दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, इच्छा, घृणा आदि। मनोविज्ञान में इसे अंतर्निरीक्षण कहते हैं। इस तरह हमें उन तथ्यों को, जिनका हम निरीक्षण करते हैं, उन तथ्यों से भिन्न समझना चाहिए जिनका हम निरीक्षित तथ्यों (Observed facts) से अनुमान करते हैं। Jevons का कथन है कि जबतक हम केवल उन्हीं तथ्यों का वर्णन करते हैं, जिन्हें हमने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से निरीक्षित किया है, तो हम त्रुटि नहीं करते हैं, परन्तु जैसे ही हम अन्दाज लगाते हैं या कल्पना करने लगते हैं, वैसे ही गलती कर बैठते हैं।

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प्रश्न 15.
प्रयोग की परिभाषा दें। प्रयोग की विशेषताओं को लिखें।
उत्तर:
प्रयोग भी आगमन का वास्तविक आधार है। यह भी एक प्रकार का निरीक्षण ही है। इसमें भी एक लक्ष्य रहता है, यह भी निरीक्षण की तरह लक्ष्यपूर्ण होती है। यहाँ पर नियंत्रित परिस्थिति में घटना को, कृत्रिम ढंग से उत्पन्न कर अध्ययन किया जाता है। प्रयोग की परिभाषा इस प्रकार दी गई है (Experiment is the observation of this artificial production of events under conditions prearranged by man”) अर्थात् मनुष्यों द्वारा निर्मित स्थितियों में कृत्रिम स्थितियों में कृत्रिम घटनाओं के निरीक्षण को प्रयोग कहते हैं।” इस परिभाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित लक्षण पाते हैं।

  1. प्रयोग भी एक तरह का निरीक्षण ही है। इसमें भी किसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु ध्यानपूर्वक किसी घटना या वस्तु को नियंत्रित पर्यवेक्षण (Regulated Perception) कहते हैं।
  2. प्रयोग में घटना को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न किया जाता है। जैसे निश्चित मात्रा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर पानी बनाया जाता है। यह पानी कृत्रिम होता है। बिजली, बादल को प्रयोग में उत्पन्न करना प्रयोग है, अतः निरीक्षण में घटना पाते हैं, किन्तु प्रयोग में घटना को बनाते हैं।
  3. घटना की उत्पत्ति हेतु जिन परिस्थितियों एवं स्थान की जरूरत पड़ती है उसका प्रबंध एवं चयन प्रयोगकर्ता स्वयं पहले से करता हैं जैसे-पानी या बिजली उत्पन्न करने के लिए प्रयोगकर्ता उनका प्रबंधन पहले करता है, अतः प्रयोग में वातावरण एवं परिस्थिति पर प्रयोगकर्ता का नियंत्रण रहता है। प्रयोगकर्ता अपनी इच्छानुसार परिवर्तन कर घटना का निरीक्षण कर सकता है।
  4. प्रयोग में घटना की उत्पत्ति के बाद उसका निरीक्षण किया जाता है। घटना का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है। प्रयोग के बाद निष्कर्ष निकाला जाता है।
  5. प्रयोग के लिए वैज्ञानिक औजारों तथा विज्ञानशाला का रहना जरूरी है। घास पर बैठकर कोई प्रयोग खाली हाथ नहीं कर सकते हैं।

इस तरह निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहा जाता है। निरीक्षण और प्रयोग आगमन को विषय प्रदान करते हैं। आगमन में विशिष्ट उदाहरणों के निरीक्षण में आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं। निरीक्षण और प्रयोग ही विशिष्ट उदाहरण प्रदान करते हैं जिनके आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं।

जैसे-कुछ मनुष्यों को मरते देखकर ही सामान्य नियम बनाते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। कुछ उदाहरणों के प्रयोग के आधार पर ही विज्ञान में सामान्य नियम बनाते हैं। इसलिए निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार कहलाते हैं। पुनः आगमन के निष्कर्ष की वास्तविक सत्यता की जाँच निरीक्षण और प्रयोग से होती है। इसलिए भी निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहते हैं। आगमन की वास्तविक सत्यता निरीक्षण और प्रयोग पर निर्भर करती है, इसलिए ये आगमन के वास्तविक आधार कहलाते हैं।

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प्रश्न 16.
निरीक्षण और प्रयोग में प्रकार का भेद नहीं बल्कि मात्रा का है, विवेचन करें। अथवा, निरीक्षण और प्रयोग में अन्तर बताएँ। अथवा, निरीक्षण की तुलना प्रयोग से करें।
उत्तर:
निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। दोनों के द्वारा आगमन की वास्तविक सत्य निर्धारित होती है। निरीक्षण की विशेषतापूर्ण अवस्था ही प्रयोग है। दोनों मिलकर आगमन के तथ्य की पूर्ति करते हैं फिर भी दोनों में कुछ मुख्य अंतर हैं।

1. निरीक्षण प्राकृतिक है जबकि प्रयोग कृत्रिम है। जो घटना जिस रूप में प्रकृति में घटती है उसे उसी रूप में देखते हैं। घटनाओं में हेर-फेर नहीं करते हैं। जैसे – प्रयोगशाला में बिजली, बादल, पानी कृत्रिम ढंग से बनाते हैं। आकाश में बादल, नक्षत्र, चाँद-सितारों का देखना निरीक्षण है, अतः निरीक्षण प्राकृतिक है, जबकि प्रयोग कृत्रिम है।

2. निरीक्षण में हम प्रकृति के दास रहते हैं, परन्तु प्रयोग में ऐसी बात नहीं है। निरीक्षण में हमें प्रकृति पर निर्भर करना पड़ता है। जब प्रकृति में घटना घटेगी तब हम निरीक्षण कर सकते हैं। प्रकृति में जब चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, भूकम्प होगा तब ही हम उन घटनाओं का निरीक्षण कर सकते हैं। अतः यहाँ हम प्रकृति के दास बने रहते हैं। लेकिन प्रयोग में घटना को उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ हमारे नियंत्रण में रहती हैं। इसलिए इच्छानुसार घटना को उत्पन्न करते हैं। हम प्रकृति पर निर्भर नहीं रहकर प्रकृति को ही प्रयोग के अधीन रखते हैं।

3. निरीक्षण में हम परिस्थितियों को उत्पन्न नहीं करते हैं। परिस्थितियाँ प्रकृति के द्वारा प्रदान की जाती हैं। जिस वातावरण में घटना घटती है, उसी वातावरण और परिस्थिति में घटना का निरीक्षण करना पड़ता है, किन्तु प्रयोग में परिस्थितियों और वातावरण को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न किया जाता है। अतः निरीक्षण और प्रयोग में अंतर परिस्थितियों को उत्पन्न करने के विषय में है। निरीक्षण में परिस्थिति प्राकृतिक है, परन्तु प्रयोग में परिस्थिति कृत्रिम है।

4. निरीक्षण में हम घटना को पाते हैं, परन्तु प्रयोग में घटना को बनाते हैं (Observa tion is finding fact an experiment is making one)

5. निरीक्षण में प्रासंगिक परिस्थिति को अप्रासंगिक परिस्थिति से अलग नहीं कर सकते हैं। प्रयोग में परिस्थिति को अप्रासंगिक परिस्थिति से अलग कर घटना का अध्ययन करते हैं।

6. बेकन का कथन है कि प्रयोग में हम प्रकृति से प्रश्न पूछते हैं।

7. स्टॉक साहब का कथन है कि निरीक्षण निष्क्रिय है और प्रयोग सक्रिय है। निष्क्रिय इसलिए कहा जाता है कि निरीक्षणकर्ता प्रकृति की घटनाओं को घटते हुए मात्र देखता है। उसे घटना को उत्पन्न करने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता है। प्रयोग में सक्रिय इसलिए रहना पड़ता है कि घटना को उत्पन्न करना पड़ता है। उत्पन्न करने में स्वाभाविक है कि प्रयोगकर्ता को सक्रिय रहना पड़ता है।

8. निरीक्षण और प्रयोग में अंतर है कि निरीक्षण प्रयोग से पहले आता है। निरीक्षण के द्वारा जिस सत्य का पता लगता है उसे ही प्रयोग के द्वारा परीक्षण करते हैं, अर्थात् सत्यापन करते हैं। फिर भी इतना अन्तर होते हुए भी तार्किकों ने कहा कि दोनों में प्रकार का नहीं, मात्रा का भेद है। दोनों में जो अन्तर दिखाये गए हैं वे सही नहीं हैं। निरीक्षण को प्राकृतिक और प्रयोग को कृत्रिम कहना ठीक नहीं है। दोनों पूर्णतः प्राकृतिक और कृत्रिम नहीं हैं।

निरीक्षण में भी कृत्रिमता की कुछ मात्रा है और प्रयोग में भी प्राकृतिक की कुछ मात्रा है। जब निरीक्षण में यंत्रों-दूरबीन, स्टेथेस्कोप, थर्मामीटर, माइक्रोस्कोप आदि का व्यवहार करते हैं तब निरीक्षण भी कृत्रिम हो जाता है। प्रयोगकर्ता स्वयं कृत्रिम नहीं है। बल्कि प्राकृतिक जीता-जागता बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति है। जिसे हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि प्रकृति प्रदत्त हैं।

अतः प्रयोग शुद्ध रूप से कृत्रिम नहीं है इसमें भी प्राकृतिक व्यक्तियों की सहायता की जाती है। निरीक्षण भी शुद्ध रूप से प्राकृतिक नहीं है। अतः निरीक्षण अधिक प्राकृतिक है और कृत्रिम कम है जबकि प्रयोग अधिक कृत्रिम है और कम प्राकृतिक है। अतः, दोनों में प्रकार का भेद नहीं है, बल्कि मात्रा का भेद है।

स्टाक महोदय का विचार है कि निरीक्षण निष्क्रिय और प्रयोग सक्रिय है। ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। निरीक्षण को निष्क्रिय इसलिए कहा गया है कि इसमें हम कुछ करते नहीं हैं, घटना को मात्र घटते हुए देखते हैं। परन्तु, यह कहना ठीक नहीं है। निरीक्षण में मानसिक रूप से सक्रिय रहना पड़ता है। क्योंकि इसमें चुनाव की क्रिया होती है। पुनः निरीक्षण नियमित और व्यवस्थित क्रिया है। इसके लिए सक्रिय होना जरूरी है। निरीक्षण में ध्यान की क्रिया भी सम्मिलित है। ध्यान स्वयं सक्रिय क्रिया है। इसी तरह कुछ वस्तुओं या घटनाओं के लिए हमें शारीरिक रूप से सक्रिय रहना पड़ता है। जैसे, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण के लिए सचेत रहना पड़ता है।

अतः, निरीक्षण पूर्ण रूप से निष्क्रिय नहीं है और प्रयोग पूर्ण रूप से सक्रिय भी नहीं है। प्रयोग में भी प्रयोगकर्ता चुपचाप बैठकर घटना को घटते हुए देखता है। अतः, प्रयोग अधिक सक्रिय है और कम निष्क्रिय। अतः, दोनों में प्रकार का अन्तर नहीं है, बल्कि मात्रा का है। दोनों में विरोध नहीं है दोनों एक ही जाति की दो उपजातियाँ हैं। निरीक्षण जाति है, Genus है। साधारणतः निरीक्षण तथा प्रयोगात्मक निरीक्षण इसका दो उपजातियाँ हैं जिसे हम प्रयोग कहते हैं। यह वास्तव में विशिष्ट निरीक्षण हैं। निरीक्षण को नियमित कर देते हैं तो वह प्रयोग हो जाता है।

प्रयोग में घटना को इच्छानुसार देखना है “Experiment is nothing but observation of facts under condition produced by the observer at will.” पुनः निरीक्षण प्रयोग में बदल जाता है। जब इच्छानुसार परिस्थितियों में लाते हैं, “Observation passes into experiment when we can manipulates the facts as we like.” अतः, निरीक्षण और प्रयोग में प्रकार का भेद नहीं बल्कि मात्रा का है।

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प्रश्न 17.
प्राकृतिक समरूपता नियम की व्याख्या करें। इसे आगमन का आकस्मिक आधार क्यों कहा जाता है? इसकी महत्ता का वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन का लक्ष्य एक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करना है जिसमें वास्तविक सत्यता पायी जाए। आगमन में आजीवन सत्यता का अर्थ है उन व्यापक नियमों का पाना जिनके द्वारा हम पूर्णव्यापी वास्तविक वाक्य की स्थापना करते हैं। उन नियमों के रूप में प्राकृतिक समरूपता नियम (Law of use formality of Nature) की सहायता लेते हैं। यह एक मूल सिद्धान्त है इसकी परिभाषा नहीं दी जा सकती है। बल्कि व्याख्या की जा सकती है। इस व्याख्या में प्राकृतिक समरूपता नियम के निम्नलिखित रूप पाते हैं।

(क) प्रकृति एकरूप है (Nature is uniform) अर्थात् प्रकृति की घटनाएँ एक समान घटती हैं।

(ख) प्रकृति में समान घटनाएँ घटती है (Same events happen in the Nature) आज जिस तरह की घटना घटती है उसी तरह की घटना भविष्य में भी घटेगी।

(ग) भविष्य अतीत के समान होगा (The future will reseneble the past) भूतकाल में जो घटनाएँ घटती हैं, वे भविष्य में भी घटेगी। भूत, वर्तमान और भविष्य में एक मेल पाया जाता है।

(घ) प्रकृति अपनी पुनरावृत्ति करती है (Nature repeats it self) एक तरह की घटना बार-बार घटती हुई दिखाई पड़ती है।

(ङ) अज्ञात ज्ञात के बाद होता है (The unknown is like the known) प्राकृतिक घटनाएँ जो घट चुका है वे तो ज्ञात हैं; किन्तु उसके आधार पर अज्ञात को जान सकते हैं।

(च) ब्रह्माण्ड नियमों द्वारा संचालित हैं (The universe is governed by laws) सारा ब्रह्माण्ड नियमों से संचालित होता है सूर्य, चाँद, ग्रह, ऋतु, तारे, पृथ्वी सभी नियमों में बँधे हुए

(छ) समानकारण से समान कार्य पैदा होता है (The same cause will produce the same effect) इसका अर्थ है कि जिस कारण से जो घटना घटती है घटती रहेगी। प्रकृति में जो घटनाएँ घटेगी वह नियमबद्ध मनमाने ढंग से अंधी घटनाएँ नहीं घट सकती हैं। विभिन्नता इस रूप में नहीं हो तो यही प्राकृतिक समरूपता नियम है।

(ज) जो अनुपस्थित है वह उपस्थित के बराबर है। (The absent is like the present) अर्थात् जो घटना या वस्तु आज अनुपस्थित है, वह समान परिस्थिति में उपस्थिति अवश्य होती है। इस तरह का विश्वास जिस आधार पर चलता है, उसे ही प्राकृतिक नियम कहते हैं।

इन सभी विभिन्न व्याख्याओं का एक ही निचोड़ है कि प्रकृति समान परिस्थिति में समान रूप से व्यवहार का कार्य करती है। (Nature behaves in the same way under similar circumstances) इस तरह प्राकृतिक समरूपता नियम की व्याख्या भिन्न-भिन्न रूपों में की गईं हैं जिसका अर्थ स्पष्ट है कि समान कारण समान कार्य को उत्पन्न करता है। (Same cause will produce same effect) जैसे आग में गर्मी, वर्षा में ठंढक, पानी से प्यास बुझाना, जाड़े के दिनों में जाड़ा, गर्मी के मौसम में गर्मी आदि प्राकृतिक घटनाएँ बिल्कुल नियमित रूप से पायी जाती हैं।

इसलिए तार्किकों ने कह डाला कि “प्रकृति में कोई सनक नहीं है। (There is no such thing as whim or caprice in Nature) इसका समर्थन कुमारी स्टेविंग भी करती हैं। “प्रकृति में जो कुछ भी होता है वह नियमानुकूल होता है और ये नियम इस तरह के होते हैं कि इनका पता लगाया जा सकता है। (What happens, happens in accordance with laws and there laws all such that we can discover them”) प्राकृतिक समरूपता नियम की सत्यता पर कुछ लोग संदेह करते हैं जिसमें पहली आपत्ति है-जब प्रकृति की घटनाएँ एक समान घटती हैं तो कभी कड़ी धूप, कभी भूकंप, कभी गर्मी, कभी खूब वर्षा, कभी कम वर्षा, कभी अकाल, कभी सुखाड़, तो कभी बाढ़ और कभी वे एक दम नहीं पाए जाते हैं।

1934 ई. में बिहार में भूकंप हुआ फिर नहीं हुआ ऐसा क्यों? अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं है। Mill साहब कहते हैं कि कोई भी मनुष्य इस बात पर विश्वास नहीं करता है कि इस वर्ष जैसी अच्छी वर्षा और ऋतु हुई आगामी वर्षों में भी ऐसी ही बात पायी जाएगी…कोई भी यह आधार नहीं रखता है कि प्रत्येक रात में मनुष्य एक ही तरह का स्वप्न देखता रहेगा…वस्तुतः प्रकृति की गति केवल एक रूप नहीं बल्कि भिन्न भी है। इसी तरह Carveth Read भी कहते हैं कि-“विभिन्न प्रकार से प्रकृति एक रूप नहीं प्रतीत होती है। वस्तुओं के गुण, आकार, रंग आदि में विभिन्नता पायी जाती है। जलवायु तो अनिश्चित होती है-यहाँ तक कि व्यवसाय और राजनीतिक की घटनाएँ भी एक समान नहीं होती हैं। अतः, प्रकृति में समरूपता पाया जाना असंभव है।

इसका उचित उत्तर है कि ये आपत्तियाँ बेकार हैं। प्रकृति इतना विशाल है कि इसमें विभिन्नताओं का होना जरूरी है। प्रकृति समान परिस्थिति में एक समान व्यवहार करती है (Nature acts or behaves in the same way under similar circumstances”)। भूकंप जिस कारण से 1934 में आया था वही कारण यदि पैदा हो गया तो भूकंप होगा। इसका अर्थ है प्राकृतिक समरूपता अर्थात् कार्य-कारण की समरूपता। प्रकृति के कारण जटिलता ज्ञात नहीं होते हैं। सभी घटनाएँ नियमित और कारणवश ही होती हैं।

दूसरी आपत्ति है कि प्रकृति में कोई एक समरूपता नहीं बल्कि बहुत-सी समरूपताएँ हैं। ऐसा Bain साहब कहते हैं कि The course of the world is not a uniformity but uniformities. प्रकृति में भिन्न-भिन्न नियम हैं नदी, जंगल, पहाड़, कीड़े और मनुष्य में अनेक अलग-अलग नियम हैं और इस तरह नियमों की संख्या भी असंख्य हैं। हमारे सामने आपत्ति के रूप में प्रश्न है कि नियम एक नहीं अनेक हैं। यह झगड़ा एक वचन और बहुवचन का है। दर्पण में तो अनेकताओं में एकता पाना साधारण-सी बात है (One in many) प्राकृतिक का क्षेत्र बहुत ही विशाल और जटिल है। हम उसे संपूर्णता में नहीं जान सकते हैं। उससे कई विभागों में बाँटकर ही उसे उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए एक नियम के अंतर्गत ही अनेक नियम उपनियम बना लेते हैं। प्रकृति में समरूपताएँ बाह्रा हैं वास्तव में समरूपता ही है जिसे Ram of uniformity of Nature कहते।

बेल्टन के अनुसार भी प्रकृति, समरूपता में विविधता एवं अनेकता के लिए स्थान है। महत्त्व-प्रकृति समरूपता को आगमन का आधार माना गया है। इसका महत्त्व इतना अधिक है कि इसे बिना माने आगमन की क्रिया संभव ही नहीं है। आगमन में ‘कुछ’ से ‘सब’ की ओर गणना, भविष्य की गारंटी कहाँ से मिलती हैं? प्राकृतिक समरूपता नियम में विश्वास के आधार पर ही सामान्यीकरण करते हैं। विश्वास पर ही निरीक्षित से अनिरीक्षित की ओर जाते हैं। मिल ने भी इसकी महत्ता स्वीकारा है। विज्ञान भी प्राकृतिक समरूपता नियम पर ही आधारित है। इसी पर आगमन और विज्ञान की क्रियाएँ संभव है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जिस वाक्य में उद्देश्य विधेय पद की गुणवाचकता को व्यक्त न कर उद्देश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देता है, कहलाता है –
(क) यथार्थ वाक्य
(ख) शाब्दिक वाक्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थ वाक्य

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प्रश्न 2.
जिस वाक्य में विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता (Connotation) को व्यक्त करता है, उसे कैसा वाक्य कहते हैं?
(क) शाब्दिक वाक्य
(ख) यथार्थ वाक्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) शाब्दिक वाक्य

प्रश्न 3.
आगमन का सार (Essence of induction) है –
(क) आगमनात्मक कूद
(ख) सामान्य वाक्य की स्थापना
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आगमनात्मक कूद

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प्रश्न 4.
यथार्थ वाक्य क्या है?
(क) उद्देश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देनेवाला
(ख) विधेय में उद्देश्य पद की गुणवाचकता को व्यक्त करनेवाला
(ग) विधेय में उद्देश्य पद की गुणवाचकता को व्यक्त नहीं करनेवाला
(घ) (क) एवं (ख) दोनों
उत्तर:
(घ) (क) एवं (ख) दोनों

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) के मुख्य लक्ष्य क्या हैं?
(क) यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना
(ख) वैज्ञानिक पद्धति का अवलोकन
(ग) यथार्थ व्यापक वाक्य को परिभाषित करना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना

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प्रश्न 6.
“विद्वान का सम्बन्ध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि अध्ययन विषय से” यह कथन किसका है?
(क) कार्ल पियर्सन
(ख) डिल्थे
(ग) गुडे एवं हाट
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कार्ल पियर्सन

प्रश्न 7.
प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान का लक्ष्य है –
(क) एक
(ख) अनेक (भिन्न)
(ग) एक-दूसरे का विरोध
(घ) एक-दूसरे का पूरक
उत्तर:
(क) एक

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प्रश्न 8.
कुछ विशेष उदाहरणों के आधार पर पूर्णव्यापी नियम का यथार्थ अनुमान ही आगमन (Induction) है। यह कथन किसका है?
(क) ज्वाइस (Joyce)
(ख) फाउलर (Fowler)
(ग) मिल (Mill)
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ज्वाइस (Joyce)

प्रश्न 9.
वैज्ञानिक आगमन की विशेषताएँ हैं –
(क) किसी वाक्य की स्थापना करता है
(ख) विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है
(ग) इसमें आगमनात्मक छलाँग (Inductive leap) होता है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 10.
सरल गणनामूलक आगमन (Induction per simple Enumeration) में अभाव होता है –
(क) कारण-कार्य नियम का
(ख) प्रकृति समरूपता सिद्धान्त का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कारण-कार्य नियम का

प्रश्न 11.
आगमन एवं सरल गणनामूलक आगमन के आधार में अंतर है –
(क) सिर्फ कारण कार्य नियम का
(ख) प्रकृति समरूपता सिद्धान्त का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सिर्फ कारण कार्य नियम का

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प्रश्न 12.
“तर्कशास्त्र” (Logic) तर्क करने की कला एवं विज्ञान दोनों हैं, यह किसने कहा था?
(क) हेटली (Whately) ने
(ख) हैमिल्टन (Hamilton) ने
(ग) थॉमसन (Thomson) ने
(घ) मिल (Mill) ने
उत्तर:
(क) हेटली (Whately) ने

प्रश्न 13.
निगमन एवं आगमन का लक्ष्य –
(क) समान है
(ख) भिन्न है
(ग) एक-दूसरे का विरोधी है
(घ) एक-दूसरे का पूरक है
उत्तर:
(घ) एक-दूसरे का पूरक है

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प्रश्न 14.
“तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी विषयों का विज्ञान है।” तर्कशास्त्र की यह परिभाषा किसने दी?
(क) ए. सी. मित्रा
(ख) जे. एस. मिल
(ग) थॉमसन
(घ) हैमिल्टन
उत्तर:
(घ) हैमिल्टन

प्रश्न 15.
“तर्कशास्त्र तर्क करने की कला है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) हेटली ने
(ख) यूबरबेग
(ग) जे. एस. मिल ने
(घ) एल्ड्रीच ने
उत्तर:
(घ) एल्ड्रीच ने

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प्रश्न 16.
तर्कशास्त्र के अध्ययन का विषय है:
(क) साक्षात् ज्ञान
(ख) परोक्ष ज्ञान
(ग) आध्यात्मिक ज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 17.
तर्कशास्त्र का सम्बन्ध –
(क) वास्तविक सत्यता से है
(ख) आकारिक सत्यता से
(ग) दोनों से है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों से है

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प्रश्न 18.
वास्तविक (Material Truth) का अर्थ है?
(क) विचारों का बाह्य पदार्थ से संगति
(ख) विचारों की संगति
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) विचारों का बाह्य पदार्थ से संगति

Bihar Board Class 11 Philosophy प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Science’ की उत्पत्ति किस मूल शब्द से हुई है?
उत्तर:
विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर Science का मूल शब्द लैटिन भाषा का ‘Scientia’ है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान या Knowledge।

प्रश्न 2.
आगमनात्मक कूद क्या है? अथवा, आगमनात्मक छलांग (Inductive leap) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आगमनात्मक कूद (Inductive leap) आगमन का सार (essernce of induction) है। ‘कुछ’ को देखकर जब हम ‘सभी’ के बारे में कहते हैं तो यही आगमनात्मक छलांग है।

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प्रश्न 3.
वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) का मुख्य लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना करना वैज्ञानिक आगमन का प्रमुख लक्ष्य है।

प्रश्न 4.
शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में विधेय पद की गुणवाचकता (Connotation) को व्यक्त करता है उसे शाब्दिक (Verbal) वाक्य कहते हैं। इस वाक्य से कोई नया ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जैसे-सभी मनुष्य मरणशील होते हैं।

प्रश्न 5.
यथार्थ (real) वाक्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को नहीं व्यक्त करता है बल्कि उद्देश्य के सम्बन्ध में कोई नया ज्ञान देता है उसे यथार्थ (real) वाक्य कहते हैं। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील होते है’ – यह एक वास्तविक वाक्य है।

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प्रश्न 6.
वैज्ञानिक पद्धति (Scientific method) का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
घटनाओं को समझाना, उनसे संबद्ध सामान्य सिद्धान्तों का निरूपण करना वैज्ञानिक पद्धति के उद्देश्य हैं, इसके साथ ही भविष्यवाणी एवं नियंत्रण भी वैज्ञानिक पद्धति के उद्देश्य हैं।

प्रश्न 7.
विज्ञान क्या है? अथवा, विज्ञान की परिभाषा दें।
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा क्रमबद्ध रूप से ज्ञान का संग्रह ही विज्ञान है।

प्रश्न 8.
वैज्ञानिक आगमन की परिभाषा दें।
उत्तर:
विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के पश्चात् कारण-कार्य नियम एवं प्रकृति-समरूपता के वल पर आगमनात्मक कूद लेकर यथार्थ (सामान्य) वाक्य की स्थापना को वैज्ञानिक आगमन कहते हैं।

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प्रश्न 9.
अवैज्ञानिक आगमन (Unscientific Induction) किसे कहते हैं? अथवा, सरल गणनात्मक आगमन (Induction per simple Enumeration) की परिभाषा दें।
उत्तर:
विशेष उदाहरण के निरीक्षण के पश्चात् अखंडित अनुभव तथा प्रकृति-समरूपता नियम के आधार पर बिना कारण-कार्य सम्बन्ध को जानते हुए जब यथार्थ सामान्य वाक्य की स्थापना की जाती है तो उसे अवैज्ञानिक या सरल गणनात्मक आगमन कहते हैं।

प्रश्न 10.
किसने कहा कि “विज्ञान का संबंध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि अध्ययन विषय से”?
उत्तर:
यह कथन कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) का है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निगमन एवं आगमन में कौन अधिक मौलिक है? वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों के मत की विवेचना करें।
उत्तर:
मिल, बेन आदि वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों के मत में निगमनात्मक अनुमान के लिए, कम-से-कम एक सामान्य (universal) वाक्य की आवश्यकता पड़ती है और इस सामान्य वाक्य की स्थापना आगमन को आधार प्रदान करता है। आगमन के द्वारा ही सामान्य नियम की स्थापना होती है और निगमन केवल इसी नियम को व्यक्तिविशेषों पर लागू करता है। जब आगमन के द्वारा यह सामान्य वाक्य स्थापित हो जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं, तो निगमन इसे राम, मोहन आदि व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके कहता है कि राम भी मनुष्य होने के नाते मरणशील है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आगमन ही अधिक मौलिक (fundamental) है और निगमन गौण (secondary)।

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प्रश्न 2.
“निगमन आगमन का पूर्ववर्ती है।” विवेचना करें।
उत्तर:
जेवन्स (Jevons) के अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है। इसकी पुष्टि के लिए इन्होंने अपना तर्क इस प्रकार दिया है-आगमन में सामान्य नियम स्थापित किया जाता है। इसके लिए प्राक्कल्पना का सहारा लेकर सामान्यीकरण कर दिया जाता है। किन्तु, बिना जाँच या परीक्षा के कोई सामान्य नियम नहीं बन जाता। प्राक्कल्पना को सत्य मानकर उससे संभावित निष्कर्ष निकालते हैं और इन निष्कर्षों की जाँच वास्तविक घटनाओं से करते हैं। यदि ये निष्कर्ष इन यथार्थ घटनाओं के अनुकूल होते हैं तो हम अपनी प्राक्कल्पना को सही मान लेते हैं। यदि ये अनुकूल या संगत नहीं होते, तो प्राक्कल्पना असत्य सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार, निगमन द्वारा ही प्राक्कल्पना की परीक्षा करके आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसीलिए, निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती कहा जाता है।

प्रश्न 3.
“निगमन अवरोही क्रिया है और आगमन आरोही क्रिया।” बेकन के इस मत की व्याख्या करें।
उत्तर:
बेकन ने निगमन को ‘उतरनेवाली क्रिया’ (descending process) और आगमन को ‘चढ़नेवाली क्रिया’ (ascending process) कहा है। निगमन में सामान्य से विशेष निष्कर्ष निकालते हैं। इसमें हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर आते हैं। जैसे, सभी मनुष्यों को मरणशील पाकर राम को मनुष्य होने के नाते मरणशील बताते हैं। इसीलिए निगमन को उतरने की क्रिया कहा जाता है। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के द्वारा सामान्य नियम की स्थापना की जाती है।

इसमें कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर (from less general to more general) जाते हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत पर चढ़कर वहाँ से हमें नीचे का सामान्य रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार आगमन के निष्कर्ष पर पहुँचते ही हमें एक सामान्य नियम दृष्टिगोचर होता है। ज्यों-ज्यों पर्वत से नीचे उतरने लगते हैं, त्यों-त्यों विशेष पर नजर पड़ने लगती है। इसलिए निगमन को उतरनेवाली क्रिया और आगमन को चढ़नेवाली क्रिया कहा गया है।

प्रश्न 4.
“आगमन और निगमन एक-दूसरे में समाविष्ट हैं।” विवेचना करें।
उत्तर:
जेवन्स के अनुसार आगमन विधि का अंत सत्यापन या जाँच में होता है। इसीलिए, ये निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती मानते हैं। इसके विपरीत, मिल के अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण अंतिम सोपान है और इसके लिए परीक्षा या जाँच की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी कारण इन्होंने आगमन को निगमन का पूर्ववर्ती कहा है। निगमन और आगमन में वस्तुतः न तो कोई पूर्ववर्ती है और न कोई अनुवर्ती। दोनों में परस्पर विरोध का संबंध नहीं है। दोनों परस्पर पूरक हैं। इनके बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। दोनों में परस्पर सहयोग अपेक्षित है। इसलिए, यह कहा गया है कि “दोनों एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं।” (Both run into each other)

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प्रश्न 5.
निगमन और आगमन का भेद सिद्धान्त का नहीं बल्कि आरंभ बिन्दु का है। इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
किसी भी विषय का अध्ययन दो तरीके से किया जा सकता है – विश्लेषणात्मक एवं संश्लेषणात्मक तरीके से। निगमन में हम विश्लेषणात्मक विधि को अपनाते हैं और आगमन में संश्लेषणात्मक विधि का सहारा लेते हैं। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य वाक्य की स्थापना करते हैं, जो सत्यापित होने के बाद सामान्य नियम बन जाते हैं। निगमन में सामान्य नियम का विश्लेषण कर उसे विशेष उदाहरणों पर लागू किया जाता है। दोनों विधियों के संयोग एवं सहयोग से ही पूर्ण तत्व का ज्ञान होता है इसलिए यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि आगमन और निगमन दोनों का लक्ष्य एक है, परंतु दोनों के आरंभ बिन्दु में भिन्नता है।

प्रश्न 6.
फाउलर किस प्रकार आगमन और निगमन में भेद करते हैं?
उत्तर:
फाउलर ने आगमन और निगमन में भेद इस आधार पर किया है कि आगमन में हम कार्य से कारण की ओर जाते हैं और निगमन में कारण से कार्य की ओर। आगमन में घटनाविशेष का निरीक्षण करके इसका कारण बताते हैं। इसीलिए आगमन में कार्य से कारण की ओर जाने की बात कही गई है। निगमन में सामान्य नियम यानी कारण से विशेष (कार्य) निष्कर्ष प्राप्त करते हैं। इसलिए निगमन में कारण से कार्य की ओर जाने की बात कही गई है। फाउलर के मत की आलोचना-फाउलर का कहना सही नहीं है। आगमन में केवल कार्य से कारण का पता नहीं लगाया जाता। आगमन में हम दोनों तरफ बढ़ सकते हैं। कार्य ज्ञात रहने पर उसके कारण का पता लगाया जा सकता है और कारण ज्ञात रहने पर आगमन के द्वारा कार्य का भी पता लगाया जा सकता है। अतः, यह कहना भूल है कि आगमन द्वारा केवल कार्य से कारण का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 7.
आगमन और निगमन के संबंध में बक्ल के मत की विवेचना करें।
उत्तर:
बक्ल के अनुसार हम आगमन में विशेष तथ्यों से नियमों पर (from facts to laws) जाते हैं और निगमन में नियमों से विशेष तथ्यों पर (from laws to facts) जाते हैं। इसी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है आगमन में वस्तुविशेष (facts) से विचार (ideas) की ओर जाते हैं और निगमन में विचार से वस्तुविशेष का अनुमान लगाया जाता हैं आगमन द्वारा स्थापित नियम सैद्धान्तिक होते हैं और इनका प्रत्यक्ष घटनाविशेषों के द्वारा होता है। किन्तु, हमें इससे यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आगमन के निष्कर्ष केवल सैद्धांतिक या मानसिक होते हैं, यथार्थ नहीं। आगमन के निष्कर्ष यथार्थ होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक सत्यता (material truth) पाई जाती है। निगमन में भी सैद्धांतिक या मानसिक तत्त्व पाए जाते हैं, जिस प्रकार आगमन में यथार्थता के तत्त्व रहते हैं।

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प्रश्न 8.
आगमन तर्कशास्त्र में ‘आगमनात्मक छलांग’ का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
आगमन तर्कशास्त्र में आगमनात्मक छलांग का बहुत अधिक महत्व है। आगमनात्मक छलांग (inductive leap) में हम ज्ञात से अज्ञात की ओर अथवा कुछ से सब की ओर पहुँचते हैं और यथार्थ वाक्यों की स्थापना करते हैं। आगमनात्मक छलांग के द्वारा ही हम कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। यदि आगमनात्मक छलांग नहीं लगाई जाए तो यथार्थ व्यापक वाक्यों की स्थापना नहीं हो पाएगी।

‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ में मनुष्य जाति के कुछ ही उदाहरणों के आधार पर संपूर्ण मनुष्य जाति के संबंध में जो निष्कर्ष निकाला गया है वह आगमनात्मक छलांग द्वारा ही संभव है। यद्यपि इस छलांग में जोखिम की संभावना रहती है तथापि तर्कशास्त्रियों ने इसे आगमन का प्राण (Essence of Induction) कहा है। जब आगमनात्मक छलांग का निष्कर्ष प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम द्वारा सत्यापित हो जाता है तो कोई भी खतरा नहीं रह जाता। आगमन तर्कशास्त्र में आगमनात्मक छलांग का महत्व मुख्य और सार रूप से इसलिए है कि इसके कारण कुछ निरीक्षित उदाहरणों के आधार पर अनिरीक्षित उदाहरणों के संबंध में सभी सामान्य निष्कर्ष निकल जाता है जो वर्तमान के लिए ही नहीं बल्कि भूत और भविष्य के लिए भी सत्य होता है।

प्रश्न 9.
आगमन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
आगमन का मुख्य उद्देश्य है नए सत्य की खोज करना अर्थात् ज्ञात के आधार पर अज्ञात के संबंध में अथवा ‘कुछ’ के आधार पर ‘सब’ के संबंध में नया ज्ञान प्राप्त करना। संसार में तरह-तरह की वस्तुएँ हैं-ये सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से असंबंधित प्रतीत होती हैं, परन्तु वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। सभी वस्तुएँ नियमित हैं। इन वस्तुओं के अपने-अपने नियम हैं। मनुष्य जगत्, वनस्पति जगत्, पशुजगत्, सभी के अपने-अपने निश्चित नियम हैं जिनके द्वारा ये संचालित होते हैं। आगमन का उद्देश्य है वैसे निष्कर्ष-वाक्य को सत्यापित करना जो प्रकृति-समरूपता नियम के पहल कुलतः ज्ञान एवं इसमें सतत् वान इसके अंतर्गत साथ-साथ कारण-कार्य नियम पर भी आधारित होता हो अथवा जिनका सामान्यीकरण इन दोनों नियमों के आधार होता हो।

संसार में प्रत्येक वस्तु की जाति या वर्ग में एक सामंजस्य है, एक निश्चित व्यवस्था है – आगमन का मुख्य उद्देश्य है इसी सामंजस्य और निश्चित व्यवस्था के नियमों की खोज करना तथा उनके आधार पर निष्कर्ष वाक्यों को प्रमाणित करना। आगमन अपने इसी मुख्य उद्देश्य के द्वारा एक तरफ सभी हंसों के (भविष्य में) उजाले होने का संभाव्य बताता है वहीं दूसरी तरफ सभी मनुष्यों के (भविष्य में) मरणशील होने को सत्यापित करता है। आगमन का उद्देश्य है तरह-तरह के यथार्थ सामान्य वाक्यों की स्थापना करना और अंततः कारण-कार्य के आधार पर उनकी त्रैकालिक सत्यता को प्रमाणित करना।

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प्रश्न 10.
विज्ञान क्या है? अथवा, विज्ञान (Science) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हिन्दी के ‘विज्ञान’ शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Science’ मूल शब्द लैटिन भाषा का ‘Scientia’ है जिसका अर्थ ज्ञान यानि Knowledge होता है। इस प्रकार, विज्ञान ज्ञान से संवद्ध है। इसलिए पद्धतिशास्त्री गुडे एवं हाट ने विज्ञान को एक ‘व्यवस्थित ज्ञान’ के रूप में परिभाषित किया है। विज्ञान के अर्थ के संबंध में दो प्रकार की वैचारिक धारणाएँ हैं। वे हैं स्थिर विचार एवं गत्यात्मक विचार। स्थिर विचार के अनुसार विज्ञान एक ऐसी क्रिया है जिससे विश्व की क्रमबद्ध सूचना प्राप्त होती है।

इस दृष्टि से विज्ञान एक व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान है। गत्यात्मक विचार (Dynamic View) के अनुसार, विज्ञान एक क्रिया है, एक पद्धति है, जो वैज्ञानिकों द्वारा संपादित की जाती है। इसके अंतर्गत न केवल ज्ञान की वर्तमान स्थिति पर बल दिया गया है, बल्कि इसमें सतत् वृद्धि एवं निरंतरता पर जोर दिया गया है। मूलतः ज्ञान एवं वैज्ञानिक गतिविधि, जिसके आधार पर ज्ञान का संचय होता है, विज्ञान के पहलू हैं। विज्ञान ज्ञान का संचय भी है और एक निश्चित विधि या पद्धति भी है। ये दोनों पक्ष अंतः सम्बन्धित हैं। विज्ञान का संबंध ऐसे ज्ञान से है, जिसका संचय व्यवस्थित, नियंत्रित एवं आनुभविक ढंग से किया जाता है। वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता एवं आनुभाविकता विज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 11.
यथार्थ वाक्य से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिस व्यापक अथवा सामान्य वाक्य (general proposition) में विधेय (Predi cate) उद्देश्य (Subject) पद की गुणवाचकता (connotation) को प्रकट नहीं करता है बल्कि उद्देश्य के संबंध में नया ज्ञान देता है, उसे यथार्थ वाक्य कहते हैं। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक यथार्थ वाक्य है, क्योंकि इसमें विधेय’ (मरणशीलता) अपने ‘उद्देश्य’ (मनुष्य) के संबंध में नया ज्ञान देता है। दूसरी तरफ यदि हम यह कहें कि ‘सभी मनुष्य विवेकशील होते हैं तो यह यथार्थ वाक्य नहीं है, क्योंकि इसमें विवेकशीलता’ ‘मनुष्य’ पद के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं देता है।

‘विवेकशीलता’ तो ‘मनुष्य पद में ही निहित है, क्योंकि ‘मनुष्य’ पद का सार गुण ‘विवेकशीलता’ है, जिसे मनुष्य पद की गुणवाचकता (connotation) कहते हैं। चूँकि उपर्युक्त वाक्य (सभी मनुष्य मरणशील हैं) में ‘मरणशीलता’ ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता को व्यक्त न कर इसके संबंध में नया ज्ञान देता है, इसलिए यह यथार्थ वाक्य है।

‘सभी मनुष्य विवेकशील होते हैं। एक शाब्दिक वाक्य है, क्योंकि ‘विवेकशीलता’ मनुष्य के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं है। शाब्दिक वाक्य की स्थापना आगमन नहीं करता बल्कि यह ऐसे वाक्य की स्थापना करता है जिसमें विधेय अपने उद्देश्य के संबंध में नया ज्ञान देता है और जिसे यथार्थ वाक्य कहते हैं। जिस अनुमान से ज्ञान की वृद्धि होती है उसे आगमनात्मक अनुमान कहते हैं और इसीलिए यथार्थ वाक्य की स्थापना आगमनात्मक अनुमान द्वारा होती है।

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प्रश्न 12.
कारण-कार्य-नियम किस प्रकार वैज्ञानिक आगमन का मुख्य आधार है?
उत्तर:
कारण-कार्य-नियम वैज्ञानिक आगमन का मुख्य आधार इसलिए है क्योंकि आगमन का निष्कर्ष मुख्य रूप से कारण-कार्य-नियम द्वारा ही सत्यापित होता है। सभी आगमनों में वैज्ञानिक आगमन को सबसे अधिक सत्य इसलिए माना गया है क्योंकि इसका सामान्य वाक्य कारण-कार्य-नियम पर आधारित होता है। मनुष्य और मरणशीलता में कारण-कार्य का संबंध है; क्योंकि ‘मनुष्य’ होना ही ‘मरणशीलता’ का कारण है।

यदि मनुष्य होना मरणशीलता का कारण है तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि भविष्य में भी मनुष्य रहेगा तो वह मरणशील होगा। वैज्ञानिक आगमन का सामान्य वाक्य ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ जब प्रकृति-समरूपता नियम के द्वारा सत्यापित होता है, तब भी यह अवैज्ञानिक ही रह जाता है क्योंकि तबतक निष्कर्ष की सत्यता संभाव्य रहती है।’ परंतु, जब इसका सामान्य वाक्य कारण-कार्य नियम द्वारा सत्यापित हो जाता है, कि मनुष्य होना ही मरणशीलता का कारण है तो यह पूर्ण वैज्ञानिक हो जाता है। इस प्रकार कारण-कार्य-नियम वैज्ञानिक आगमन की मुख्य आधार है।

प्रश्न 13.
अव्याघातक अनुभव क्या है?
उत्तर:
आज तक जो बात सत्य होती आयी है और उसका कोई भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है तो विरोधी उदाहरण का नहीं मिलन अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experi ence) कहलाता है जिसके सहारे अनुमान कर लिया जाता है कि यह बात भविष्य में भी सत्य रहेगी। सरल परिगणनात्मक आगमन अथवा अवैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष अव्याघातक अनुभव ही आधारित होता है। अव्याघातक अनुभव पर आधारित वाक्य प्रकृति-समरूपता नियम द्वारा तो सत्य सिद्ध होते हैं, परंतु कारण-कार्य नियम के अभाव में कारण संभाव्य साबित होते हैं अर्थात् निष्कर्ष के संबंध में निश्चितता नहीं रहती कि यह भविष्य में भी सत्य रहेगा या नहीं।

जैसे – सभी काग काले होते हैं अव्याघातक अनुभव पर आधारित निष्कर्ष है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार यह संभावना रहती है कि भविष्य में सभी काग काले ही होंगे, परंतु इस निष्कर्ष के साथ कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण यह सत्यापित नहीं हो पाता कि भविष्य में काग अवश्य ही काले ही दिखाई पड़ेंगे अथवा होंगे। अतः, अव्याघातक अनुभव पर आधारित यथार्थ सामान्य वाक्य का निष्कर्ष भविष्य में सत्य भी हो सकता है और असत्य भी। अव्याधातक अनुभव पर आधारित निष्कर्ष की सत्य में निश्चितता नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक माना गया है। क्योंकि वैज्ञानिक निष्कर्ष की सत्यता में निश्चितता रहती है।

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प्रश्न 14.
मिल के अनुसार आगमन निगमन के पहले आता है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
मिल की यह सुदृढ़ मान्यता है कि आगमन निगमन के पहले आता है। मिल साहब का मत जेवन्स के मत से भिन्न है। इनके अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। इसी कारण ये आगमन को निगमन के पहले रखते हैं। न्याय (syllogism) निगमन का मुख्य रूप है और इसके लिए आधार के रूप में कम-से-कम एक पूर्णव्यापी (universal) वाक्य की आवश्यकता होती है और इस वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा ही होती है। इस प्रकार आगमन ही निगमन को आधार प्रदान करता है। इसलिए यह कहना उचित है कि आगमन निगमन के पहले आता है (Induction is prior to Deduction)।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“तर्कशास्त्र सभी विज्ञानों का विज्ञान है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
डन्स स्कॉटस (Dunsscotus) ने तर्कशास्त्र को सभी विज्ञानों का विज्ञान कहा है (Logic is the science of all sciences) यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है। इसका कारण है कि सभी विज्ञानों की आधारभूत मौलिक मान्यताओं का अध्ययन तर्कशास्त्र में किया जाता है। तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु की सहायता से ही विज्ञान को पद्धति को और अधिक सुसंगत बनाया जाता है। इसीलिए विज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। अतः प्रत्येक विज्ञान किसी-न-किसी रूप में तर्कशास्त्र पर निर्भर करता है। अतः तर्कशास्त्र विज्ञानों का विज्ञान है। तर्कशास्त्र को सभी विज्ञानों की सामग्री के रूप में भी स्वीकार किया गया है। प्रत्येक विज्ञान को चाहे वह भौतिक हो या प्राकृतिक तर्कशास्त्र की विषय वस्तु की आवश्यकता होती है। इसी विषय वस्तु को आधार मान कर विज्ञान अपना निष्कर्ष निष्पादित करता है।

विज्ञान दो प्रकार के होते हैं। वे है-यथार्थपरक तथा आदर्शपरक। जब किसी पदार्थ को देखकर उसके सम्बन्ध में हू-ब-हू चित्रण प्रस्तुत किया जाता है तब वह यथार्थपरक कहलाता है। इसका सम्बन्ध वस्तु जिस रूप में होती है, उसी से है। यहाँ पर वास्तविक वर्णन होता है, इसलिए यथार्थपरक विज्ञान को है “है (is) विज्ञान” भी कहा जाता है। जैसे-‘कमल’ लाल है’ यानि कमल को हमने जिस रूप में देखा उसे उसी रूप में चित्रित और वर्णित किया। यथार्थपरक विज्ञान में घटनाओं का अध्ययन उसी रूप में किया जाता है जिस रूप में वे घटती हैं। इसे वस्तुपरक विज्ञान भावात्मक विज्ञान या वर्णनात्मक विज्ञान भी कहा जाता है।

दूसरी ओर आदर्शपरक विज्ञान का सम्बन्ध चाहिए से होता है, क्योंकि यह विज्ञान वस्तुओं का स्वरूप “कैसा होना चाहिए” का अध्ययन करता है। यह विज्ञान उस आदर्श को बताता है जिसके अनुरूप वस्तुओं को होना चाहिए। चूँकि इस विज्ञान का संबंध चाहिए (Cought) से है, इसीलिए इसे ‘चाहिए विज्ञान’ भी कहा जाता है। जैसे-‘हमें सत्य बोलना चाहिए’। यह आदर्श का निरूपन करता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि क्या होना चाहिए।

तर्कशास्त्र भी वस्तुतः आदर्शपरक विज्ञान है। यह बताता है कि अनुमान किस प्रकार का होना चाहिए जिससे कि वह सत्य, वास्तविक और यथार्थ हो। वस्तुतः तर्कशास्त्र विज्ञान तथा कला दोनों ही है। विज्ञान और कला में किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है। विज्ञान का संबंध जानने तथा कला का सम्बन्ध करने से है। विज्ञान पदार्थों की वास्तविकता से तथा उसके सुव्यवस्थित ज्ञान से संबंधित है तथा कला इस ज्ञान के द्वारा किसी उद्देश्य की प्राप्ति करती है।

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प्रश्न 2.
सरल परिगणनात्मक आगमन क्यों ‘अपूर्ण आगमन’ कहलाता है? इसे वैज्ञानिक आगमन क्यों नहीं समझा जाता है?
उत्तर:
पूर्ण आगमन के विरोधी अथवा विपरीत अर्थ के रूप में सरल परिगणनात्मक आगमन अपूर्ण आगमन भी कहलाता हैं यह अपूर्ण आगमन इसलिए कहलाता है, क्योंकि इसमें कारण-कार्य सम्बन्ध का अभाव होता है। कारण-कार्य नियम के संबंध नहीं रहने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष निश्चित नहीं होता। ‘सभी काग काले होते हैं’ में यह प्रमाणित होता है कि अबतक जितने भी कौए दिखाई पड़े हैं, सभी काले ही दिखाई पड़े हैं।

प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार भविष्य में भी सभी कौए काले ही दृष्टिगोचर होने चाहिए, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन चूँकि कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं होता, इसलिए भविष्य में सभी कौओं के काले होने की केवल संभावना ही होती है, निश्चितता नहीं। अपूर्ण आगमन वह आगमनात्मक आगमन होता है। जिसमें कुछ ही विशेष उदाहरणों की जाँच के बाद पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना कर दी जाती है। इस तरह के निष्कर्ष अपूर्ण इसलिए कहलाते हैं क्योंकि ये कारण-कार्य सम्बन्ध के ज्ञान पर आधारित नहीं होते। सरल परिगणनात्मक आगमन का तर्क अथवा निष्कर्ष इसी प्रकार का होता हैं।

इसी प्रकार हम कह सकते हैं कि सरल परिगणनात्मक आगमन अपूर्ण आगमन इसलिए होता है कि इसका सामान्यीकरण कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित न होकर अपूर्ण उदाहरणों की गणना पर निर्भर करता है। इसमें पूर्ण आगमन की तरह सभी उदाहरणों की गणना से सामान्यीकरण नहीं किया जाता। चूंकि इसमें कुछ ही उदाहरणों की गणना पर सामान्य यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है, इसलिए इसे अपूर्ण आगमन कहा जाता है।

अत: सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ अपूर्ण आगमन है, क्योंकि वस्तुतः इसमें संसार के सभी हंसों की गणना नहीं की गई है बल्कि कुछ ही हंसों को सफेद देखकर यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ पूर्ण आगमन में पूर्ण उदाहरणों की गणना की जाती है, जैसे-‘सभी विद्यार्थी उपस्थित हैं’ इस सामान्य वाक्य में सभी विद्यार्थियों की गणना की गयी है। अतः सरल परिगणनात्मक आगमन को अपूर्ण आगमन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें पूर्ण आगमन की भाँति सामान्य वाक्य स्थापित करने में सभी उदाहरणों की गणना नहीं की जाती। सरल परिगणनात्मक आगमन को हम वैज्ञानिक आगमन इसलिए नहीं समझते, क्योंकि –

1. यह कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं है (It is not based on a casual connection):
वैज्ञानिक आगमन कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित होता है-यह कारण-कार्य नियम के आधार पर किसी घटना की व्याख्या करता है कि यदि कार्य (effect) है तो उसका कोई-न-कोई कारण अवश्य होगा। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ वैज्ञानिक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य है-इसका विरोधी उदाहरण नहीं मिल सकता क्योंकि मनुष्यता ही मरणशीलता का कारण है अर्थात् मनुष्य जन्म लेगा तो मरेगा अवश्य ही। परन्तु, सरल परिगणनात्मक आगमन कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं होता।

केवल कारण-कार्य नियम के लागू नहीं होने के कारण ही इसका निष्कर्ष वैज्ञानिक नहीं होता। जैसे-“इसके निष्कर्ष ‘सभी काग काले होते हैं’ में ‘काग’ और ‘कालापन’ के बीच कारण-कार्य का सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ‘काग’ का होना ‘कालेपन’ का कारण नहीं है। वैज्ञानिक आगमन में कारण-कार्य का नियम लागू होने के कारण हम निश्चिततापूर्वक कह सकते हैं कि मनुष्य मरता है इसलिए क्योंकि वह जन्म लेता है अर्थात् ‘मृत्यु’ इसलिए है क्योंकि ‘मनुष्य’ है और भविष्य में भी यदि ‘मनुष्य’ रहेंगे तो ‘मृत्यु’ अवश्य ही रहेगी।”

लेकिन सरल परिगणनात्मक आगमन में कारण-कार्य का नियम लागू नहीं होने के कारण हम यह नहीं कह सकते कि काग का होना ही कालेपन का कारण है (अर्थात् काला इसलिए है कि क्योंकि काग है)। यह अवैज्ञानिक आगमन इसलिए है कि क्योंकि इसमें निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि भविष्य में यदि कागों का निरीक्षण किया जाएगा तो वे अवश्य ही काले पाये जाएँगे। अतः कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित नहीं रहने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य वैज्ञानिक सत्यापित नहीं हो पाता, यह अवैज्ञानिक ही रह जाता है।

2. यह वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक भी नहीं पहुंच सकता (It can never reach the certainty of Scientific Induction):
सरल परिगणनात्मक आगमन को वैज्ञानिक आगमन इसलिए नहीं समझा जाता, क्योंकि इसका निष्कर्ष निश्चित न होकर संभाव्य (prob able) होता है। कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण इसके निष्कर्ष की निश्चितता नहीं रहती और न अनिश्चितता ही अर्थात् निष्कर्ष सत्य भी प्रमाणित हो सकता है और असत्य भी। क्योंकि सरल परिगणनात्मक आगमन में हम मात्र विश्वास कर लेते हैं कि अनिरीक्षित उदाहरण निरीक्षित उदाहरणों के समान ही होंगे।

यदि भविष्य में कोई हंस काला, लाल या पीला दिखाई पड़ जाए तो सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष असत्य प्रमाणित हो जाएगा कि ‘सभी हंस सफेद होते हैं’। परन्तु, भविष्य में यदि हंस का रंग केवल सफेद ही रहे तो यह निष्कर्ष सत्य ही रहेगा। सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक इसलिए भी नहीं पहुँच सकता, क्योंकि इसके निष्कर्ष की सत्यता उदाहरणों की गणना पर निर्भर करती है। अतः यह किसी भी हालत में वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक नहीं पहुंच सकता।

सरल परिगणनात्मक आगमन में हम इस विश्वास पर ‘सभी काग काले होते हैं’, ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ आदि सामान्य यथार्थ वाक्यों की स्थापना कर लेते हैं कि काग और कालेपन तथा हंस और उजलेपन में अवश्य ही कोई महत्त्वपूर्ण संबंध है। लेकिन यह संबंध भविष्य में भी रहेगा, इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन नहीं कहलाता। यदि इसमें कभी कारण-कार्य संबंध का पता चल जाए तो इसका निष्कर्ष सत्यापित हो जाएगा और तब यह वैज्ञानिक आगमन का रूप ले लेगा। सरल परिगणनात्मक आगमन को अपूर्ण आगमन माना जाता है। जब हम निश्चित रूप से जान जाते हैं कि इसमें कारण-कार्य का संबंध नहीं है तो इसके अनुमान का उचित कारण नहीं बताया जा सकता।

सरल परिगणनात्मक आगमन में हम सन्देह में घिरे रहते हैं क्योंकि हम विश्वास के आधार पर ही निष्कर्ष निकाल लेते हैं ज्ञान के आधार पर नहीं। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष निश्चितता और अनिश्चितता के दोराहे पर स्थित रहता है। यदि इसमें पूर्णता आ जाए अर्थात् विश्वास ज्ञान में बदल जाए तो यह वैज्ञानिक आगमन बन जाएगा नहीं तो इसकी सामान्यता और यथार्थता समाप्त हो जाएगी। पुनश्चः, सरल परिगणनात्मक आगमन चूँकि वैज्ञानिक आगमन की तरह निश्चित और सत्य निष्कर्षों की स्थापना न कर केवल स्वीकारात्मक (assertory) निष्कर्षों की ही स्थापना करता है, इसलिए इसे वैज्ञानिक आगमन नहीं कहा जा सकता।

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प्रश्न 3.
सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के बीच के भेद और समानता का वर्णन करें। सरल परिगणनात्मक आगमन का क्या महत्त्व (मूल्य) है?
उत्तर:
निम्नलिखित वर्णन के द्वारा सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के भेद को स्पष्ट किया जा सकता है –
वैज्ञानिक आगमन प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम पर आधारित होता है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन केवल प्रकृति-समरूपता नियम पर आधारित होता है, उसमें कारण-कार्य नियम लागू नहीं होता। जब हम वैज्ञानिक आगमन में यह निष्कर्ष स्थापित करते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ तो इस सामान्य वाक्य में ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य संबंध होने का ज्ञान रहता है। लेकिन जब हम परिगणनात्मक आगमन में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी हंस उजले होते हैं तो इस सामान्य वाक्य में ‘हंस’ और ‘उजलेपन’ में कारण-कार्य का संबंध है या नहीं, इसका हमें निश्चित ज्ञान नहीं रहता। वैज्ञानिक आगमन में सामान्य वाक्यों की स्थापना कारण-कार्य के ज्ञान के आधार पर होती है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्यों में इस ज्ञान को आधार नहीं बनाया जाता।

जब हम कहते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं तो इस सरल परिगणनात्मक आगमन में हमें यह पता नहीं रहता कि ‘काग’ कालेपन का कारण है या नहीं। ‘काग’ और ‘कालेपन’ के बीच में कारण-कार्य संबंध होने की निश्चितता नहीं रहती। यदि हमें इस बात की जानकारी हो जाए कि सरल गणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्य में कारण-कार्य का संबंध है तो यह वैज्ञानिक आगमन कहलाएगा। सरल गणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्य का सामान्यीकरण प्रकृति-समरूपता नियम की जानकारी के आधार पर होता है, परन्तु वैज्ञानिक आगमन में सामान्यीकरण कारण-कार्य नियम के आधार पर होता है। वैज्ञानिक आगमन के सामान्य वाक्यों पर प्रकृति-समरूपता नियम और कारण-कार्य नियम दोनों ही लागू होते हैं, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्यों पर केवल प्रकृति-समरूपता नियम ही लागू होता है।

सरल गणनात्मक आगमन जब पूर्णता प्राप्त करता है तब वैज्ञानिक आगमन बन जाता है। इसीलिए इसे वैज्ञानिक आगमन का आरम्भ बिन्दु कहा गया है। कारण-कार्य संबंध पर आधारित न होने के कारण सरल गणनात्मक आगमन का निष्कर्ष संभाव्य होता है, परन्तु कारण-कार्य संबंध पर आधारित रहने के कारण वैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष निश्चित होता है। वैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष सदा सत्य होता है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष के सत्य होने की सम्भावना रहती है, क्योंकि निरीक्षण का क्षेत्र जितना ही अधिक विस्तृत होता है, निष्कर्ष के सत्य होने की सम्भावना उतनी ही बढ़ जाती है। सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के बीच उपर्युक्त भेद तो हैं ही, इसके अतिरिक्त इनके बीच कुछ समानताएँ भी हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. सरल परिणगनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में ही सामान्य यथार्थ वाक्य (general proposition) की स्थापना की जाती है। जैसे-‘सभी काग काले होते हैं’ और ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ – दोनों ही सामान्य यथार्थ वाक्य हैं।

2. दोनों वास्तविक घटनाओं के निरीक्षण पर आधारित होते हैं। जैसे अब तक जितने भी काग दिखाई पड़े हैं, सभी काले ही दिखाई पड़े हैं इसलिए ‘सभी काग काले होते हैं’ वास्तविक घटना के निरीक्षण के आधार पर स्थापित हुआ है। आजतक जितने भी मनुष्य हुए हैं सभी मृत्यु को प्राप्त हुए हैं इसलिए ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ वास्तविक घटना पर आधारित सामान्य यथार्थ वाक्य है।

3. सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में ही ‘विशेष’ से ‘सामान्य’ की ओर अथवा ‘कुछ’ से ‘सव’ की ओर आगमनात्मक छलांग (Inductive leap) लगाई जाती है। जैसे-कुछ ही कागों को काला देखकर निष्कर्ष दे दिया जाता है कि ‘सभी काग काले होते हैं’ तथा कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर सामान्य निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ – दोनों में आगमनात्मक छलांग द्वारा निष्कर्ष निकाला जाता है।

4. सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में प्रकृति-समरूपता नियम लागू होता है। प्रकृति-समरूपता नियम लागू होने के कारण ही भविष्य में सभी कागों के काला होने तथा सभी मनुष्यों के मरणशील होने की सत्यता पर विश्वास कर लिया जाता है।

सरल परिगणनात्मक आगमन का महत्त्व (मूल्य) (Importance (value) of Induc tion per Simple Enumeration):
यद्यपि सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष सदा सत्य नहीं होता (अर्थात् भविष्य में निष्कर्ष के सत्य होने की केवल संभावना रहती है), तथापि आगमन तर्कशास्त्र में इसका बहुत ही महत्त्व है। व्यावहारिक जीवन में इसका प्रयोग बहुत आसानी से कर लिया जाता है और इसे सत्य मान लिया जाता है, यद्यपि तार्किक दृष्टिकोण से यह सत्य भी हो सकता है और नहीं भी। आगमन तर्कशास्त्र में कई उप-नियमों की स्थापना करने के लिए इसका सहारा लेना पड़ा है। तर्कशास्त्रियों ने सरल परिगणनात्मक आगमन को ‘वैज्ञानिक आगमन तक पहुँचने की आरोहण-शिला’ कहा है।

सरल परिगणनात्मक आगमन को कुछ विद्वानों ने स्वीकारात्मक निष्कर्ष (Assertory Conclusion) कहा है। किसी समूह के सभी उदाहरणों का निरीक्षण करना संभव नहीं है, इसलिए हम दैनिक जीवन में सरल परिगणनात्मक आगमन द्वारा कुछ ही उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाल लेते हैं। इस तरह निष्कर्ष निकालने में समय की बचत होती है। चूँकि सरल परिगणनात्मक आगमन व्यावहारिक जीवन में उपयोगी साबित होता है, इसलिए तर्कशास्त्रियों ने इसे व्यावहारिक आगमन (Popular Induc tion) भी कहा है। नवीन परिस्थितियों के संबंध में निष्कर्ष निकालने में सरल गणनात्मक आगमन का प्रयोग निष्कर्ष की सत्यता के लिए बहुत ही उपयुक्त होता है।

सरल परिगणनात्मक आगमन का महत्त्व इसलिए भी है कि यह वैज्ञानिक आगमन का आरम्भ बिन्दु है। जैसे ही इसका निष्कर्ष कारण-कार्य नियम पर आधारित हो जाता है वैसे ही इसका निष्कर्ष निश्चित हो जाता है और यह वैज्ञानिक आगमन का रूप ले लेता है। सरल परिगणनात्मक आगमन यद्यपि कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं होता तथापि यह कारण-कार्य संबंध की ओर संकेत करता है। इसका मुख्य महत्त्व कारण-कार्य संबंध की तरफ संकेत करने में ही है। इस संबंध में Grumley (ग्रमली) का निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय है –

“The chief value of the enumerative method lies in its power to suggest casual relation. The condition that two phenomenon (subject and predicate)
are always or very frequently connected seems sufficient ground for enter taining the hypothesis that they are casually related.” “इस गणनात्मक विधि का मुख्य महत्त्व कारण-कार्य संबंध को प्रस्तावित करने की सामर्थ्य में है। दो वस्तुओं (उद्देश्य और विधेय) के हमेशा अथवा प्रायः संबंधित रहने की स्थिति इस अनुमान को स्थापित करने के पर्याप्त आधार जान पड़ते हैं कि वे कारण-कार्य द्वारा संबंधित हैं।”

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प्रश्न 4.
सरल परिगणनात्मक आगमन का क्या तात्पर्य है? इसके मुख्य लक्षणों का वर्णन करें। अथवा, अवैज्ञानिक आगमन को परिभाषित करते हुए इसकी विशिष्टताओं की विवेचना करें।
उत्तर:
सरल परिगणनात्मक आगमन हमारे अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है। अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experience) वह अनुभव है जिसमें यह निरीक्षण किया जाता है कि कुछ वस्तुएँ अथवा घटनाएँ ऐसी हैं जिनका विरोधी उदाहरण नहीं मिलता है। सरल परिगणनात्मक आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम (The Law of the uniformity of Nature) के आधार पर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है। सरल गणनात्मक आगमन को ‘मिल’ (Mill) ने इस प्रकार परिभाषित किया है –

“इसका संबंध उन सभी वाक्यों की व्यापक सच्चाइयों की प्रकृति का आरोपण करने में है जो उस प्रत्येक उदाहरण के लिए सत्य होती है, जिनके बारे में हम जान पाते हैं।” (“It consists in ascribing the character of general truths to all proposi tions which are true in every instance that we happen to know of”) बी. एन. राय के अनुसार-“सरल परिगणनात्मक आगमन वह है जिसमें विना कारण-कार्य संबंध की व्याख्या का प्रयास किए ही मात्र एक समान अथवा अव्याघातक अनुभव के आधार पर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है।” (“Induction per simple Enumeration is the establishment of a general read proposition on the ground of mere uni form or uncontradicted experience without any attempt at explaining a casual connection”)

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सरल गणनात्मक आगमन में निरीक्षित घटनाओं को एक ही तरह का पाकर तथा उसका विरोधी कभी कुछ नहीं पाकर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है। सरल गणनात्मक आगमन में विपरीत अथवा विरोध का अनुभव नहीं होता। जब हम हंस को देखते हैं तो उसे सफेद पाते हैं तथा इसके विपरीत अथवा विरोधी रंग का कोई हंस दिखाई नहीं पड़ता। इस प्रकार, हम आजतक निरीक्षित हंसों के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि ‘सभी हंस उजले होते हैं। काग को बराबर काला देखकर तथा उसे इसके विरोधी रंग का कभी न देखकर ही सरल गणनात्मक आगमन में व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है कि सभी काग काले होते हैं।

परन्तु, जब हम सरल गणनात्मक आगमन के निष्कर्ष की सत्यता को सत्यापित करना चाहते हैं तो यह प्रकृति-समरूपता नियम के आधार पर प्रमाणित हो जाता है लेकिन कारण-कार्य सिद्धान्त द्वारा प्रमाणित नहीं होता। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार यह प्रमाणित होता है कि भूतकाल में सभी हंस सफेद तथा सभी काग काले रहे थे, वर्तमान में हैं तथा भविष्य में रहेंगे। लेकिन कारण-कार्य सिद्धान्त के अनुसार इस निष्कर्ष की त्रैकालिक सत्यता सत्यापित नहीं होती।

चूँकि सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष पर कारण-कार्य नियम लागू नहीं होता अर्थात् ‘उजलापन’ और ‘हंस’ अथवा ‘कालापन’ और ‘काग’ के बीच कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं होता, इसलिए यह निश्चित रूप से सत्य नहीं माना जा सकता कि भविष्य में सभी हंस उजले ही होंगे अथवा सभी काग काले ही रहेंगे या लाखों वर्ष पहले सभी हंस उजले ही होंगे अथवा सभी काग काले ही रहेंगे या लाखों वर्ष पहले सभी हंस उजले अथवा सभी काग काले ही थे। आगमनात्मक निष्कर्ष तभी त्रैकालिक सत्य माना जाता है, जब वह प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष भविष्य में सत्य रहेगा या नहीं इसके संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है अर्थात् कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण सरल गणनात्मक आगमन का निष्कर्ष संभाव्य रह जाता है, निश्चित नहीं रहता।

वैज्ञानिक आगमन की तरह इसमें, निष्कर्ष की निश्चितत नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक आगमन कहा गया है। इसे सरल परिगणनात्मक आगमन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी विधि उदाहरणों की गणना पर आधारित होती है। ऐसे आगमन के. निष्कर्ष की सत्यता उदाहरणों की संख्या पर निर्भर करती है। जैसे-जितनी ही अधिक संख्या में हंसों को सफेद या कागों को काला देखेंगे उतना ही अधिक उपर्युक्त निष्कर्षों की सम्भाव्यता बढ़ जाएगी। सरल परिगणनात्मक आगमन में अनुमान करने की निम्नलिखित विधि अपनायी जाती है –

अमुक सदा सत्य पाया गया है
इसका एक भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है
∴ अमुक सदा सत्य है
∴ [Such and such has always been found true,
No instance to the contrary has been met with
∴ Such and such is always true]

सरल परिगणनात्मक आगमन अथवा अवैज्ञानिक आगमन के मुख्य लक्षण (Chief characteristics of Induction per simple Enumeration or Unscientific Induction):

सरल परिगणनात्मक़ आगमन की उपर्युक्त विवेचना के आधार पर इसके निम्नलिखित लक्षण परिलक्षित होते हैं –

1. यह सामान्य वाक्य की स्थापना करता है (It establishes a general proposition):
वैज्ञानिक आगमन की तरह सरल परिगणनात्मक आगमन भी सामान्य वाक्य की स्थापना करता है। कुछ कागों को काला देखकर हम सामान्य वाक्य की स्थापना कर देते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं’। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक सामान्य वाक्य (general proposition) इसलिए है, क्योंकि इसमें उद्देश्य पद को संपूर्ण वस्तुवाचकता में काला होने का अनुमान किया गया है। इसमें उद्देश्य पद ‘काग’ है और संपूर्ण वस्तुवाचकता सभी ‘काग’ हैं।

2. यह यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है (Itestablishes a real proposition):
सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन की तरह की यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक यथार्थ वाक्य भी है। यह यथार्थ वाक्य इसलिए है, क्योंकि इसमें विधेय ‘काला होना’ उद्देश्य पद ‘काग’ की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता। सरल परिगणनात्मक आगमन अव्याघाती अनुभव पर आधारित होता है, इसलिए इसमें जिस सामान्य वाक्य की स्थापना होती है वह यथार्थ या वास्तविक होता है। इस प्रकार यह वास्तविक वस्तुओं का निरीक्षण करता है, और यथार्थ वाक्य (real proposition) की स्थापना करता है। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक यथार्थ वाक्य है, क्योंकि वास्तविक रूप से सभी काग काले होते हैं।

3. इसमें आगमनात्मक छलांग होती है (In it, there is an inductive leap):
वैज्ञानिक आगमन की तरह सरल गणनात्मक आगमन में भी ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लगाई जाती है। जैसे-हमें कुछ कागों का काला होना ही ज्ञात होता है और इसी आधार पर हम अज्ञात की ओर छलांग लगाकर निष्कर्ष स्थापित कर देते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं।

4. यह उदाहरणों की गणना पर आधारित होता है। (It is based on the enumeration of instrances):
सरल परिगणनात्मक आगमन में वस्तुओं के गुणधर्म की जाँच नहीं की जाती बल्कि इसमें उदाहरणों की गणना की जाती है। निरीक्षित उदाहरणों की संख्या जितनी ही अधिक होगी सरल परिगणनात्मक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य उतना ही सत्य के निकट होगा। हम जितनी ही अधिक संख्या में कागों को काला पाएँगे उतना ही निश्चिय के साथ कह सकेंगे कि सभी काग काले होते हैं।

5. यह प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the principles of the uniformity of Nature):
प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त यह है कि ‘सामान्य स्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है’ (Under similar conditions the same cause produces the same effect’)। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त पर आधारित होता है। इसमें हम ‘सभी काग काले होते हैं’ की सत्यता की जाँच प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त के द्वारा करते हैं तो इसकी सत्यता प्रमाणित हो जाती है कि यदि आजतक काग काले पाये गये हैं तो भविष्य में भी काग काले ही पाये जाएँगे, क्योंकि प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त के अनुसार प्रकृति का नियम सभी कालों में एक समान रहता है अर्थात् समान स्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है।

6. यह अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है (It is based on uncontra dicted experience):
आजतक जो बात सत्य होती आयी है तथा उसका कोई भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है, तो वह अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experience) कहलाता है। सरल परिगणनात्मक अव्याघातक आगमन अनुभव पर आधारित होता है और इसी अनुभव के आधार पर सामान्य यथार्थ की स्थापना करता है। जैसे-सरल परिगणनात्मक निष्कर्ष (Induction per simple Enumerative conclustion) ‘सभी काग काले होते हैं।

इस अव्याघातक अथवा एक समान (Uniform experience) पर आधारित है कि आजतक जितने भी काग मिले हैं सभी काले रंग के पाए गए हैं और इसके विपरीत या व्याघाती रंग (उजला, पीला आदि) के नहीं पाये गये हैं। सरल परिगणनात्मक आगमन में एक ही तरह का अनुभव होने से अथवा इसके विरोधी अनुभव के अभाव के आधार पर सामान्यीकरण (generalisation) कर सामान्य यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है। बराबर सफेद हंस को पाकर तथा किसी दूसरे रंग के हंस को नहीं पाकर सामान्यीकरण कर दिया जाता है कि ‘सभी हंस उजले होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सरल परिगणनात्मक आगमन अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है।

7. यह कारण-कार्य से संबंध नहीं रखता (It does not ascribe in the Law of Causation):
सरल परिगणनात्मक आगमन कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं होता। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष यद्यपि सामान्य यथार्थ वाक्य होता है तथापि उसमें विधेय और उद्देश्य पद के बीच कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं होता। उदाहरण के लिए काग काले होते हैं, सामान्य वास्तविक वाक्य में ‘काग’ और ‘काला’ के वीच कारण-कार्य का संबंध नहीं है। सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य यथार्थ (वास्तविक) वाक्य उदाहरणों की गणना और अव्याघातक अनुभव पर आधारित होते हैं। कारण-कार्य नियम पर सरल परिगणनात्मक आगमन के आधारित नहीं रहने के कारण हम ऐसा नहीं कह सकते कि भविष्य में सभी काग काले ही मिलेंगे।

8. यह संभाव्य निष्कर्ष की स्थापना करता है (It establishes probable conclustion):
सरल परिगणनात्मक आगमन संभाव्य निष्कर्ष की स्थापना करता है अर्थात् इसका निष्कर्ष अनिश्चित होता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष के सत्य होने की केवल संभावना भर रहती है। कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक आगमन कहा गया है। अवैज्ञानिक आगमन के निष्कर्ष ‘सभी हंस उजले होते हैं’ में भविष्य में सभी हंसों के उजले होने की केवल संभावना व्यक्त होती है निश्चितता नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक विधि (Scientific method) से आप क्या समझते हैं? वैज्ञानिक विधि की प्रकृति को स्पष्ट करें। अथवा, वैज्ञानिक पद्धति क्या है? वैज्ञानिक पद्धति के लक्ष्यों (aims) को स्पष्ट करें। अथवा, वैज्ञानिक पद्धति के क्या कार्य (functions) हैं?
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति ही किसी विषय-वस्तु को विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रमुख आधार है। यह पद्धति प्रत्येक विज्ञान में समान है। केवल तथ्य ही विज्ञान नहीं है बल्कि उन तथ्यों का व्यवस्थित संकलन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण उन्हें विज्ञान की श्रेणी में रखता है। वस्तुतः वैज्ञानिक पद्धति विज्ञान की समस्त शाखाओं में एक होती है। चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान हो अथवा सामाजिक विज्ञान। कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) के अनुसार, The scientific method is one and the same in all branches.

वैज्ञानिक पद्धति एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत तथ्यों का संकलन, सत्यापन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति का उद्देश्य सामान्य नियमों की खोज या विवरण प्रस्तुत करना है, जिससे विषय-वस्तु को समझा जा सके। नियंत्रित रूप से पूर्वानुमान के लिए प्रयुक्त किया जा सके। स्पष्टतः वैज्ञानिक पद्धति द्वारा संकलित ज्ञान ही विज्ञान है। वैज्ञानिक पद्धति की प्रकृति या लक्ष्य (Nature or aims of Scientific methods) उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर हम वैज्ञानिक पद्धति के निम्नलिखित प्रकृति या उद्देश्य की चर्चा कर सकते हैं।

1. विवरण एवं समझ:
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किसी भी विषय-वस्तु की व्यापक जानकारी हेतु विवरण (description) एवं समझ (understanding) देने की कोशिश की जाती है। दूसरे शब्दों में विषय-वस्तु को समझने एवं वर्गीकृत करने का प्रयत्न किया जाता है। तथ्यों के संकलन के आधार पर घटनाओं के विभिन्न पक्षों को वर्णित करना, उनके स्वरूपों एवं विविधताओं को स्पष्ट करना प्रत्येक वैज्ञानिक पद्धति का मुख्य कार्य है। किसी भी विषय के विविध स्वरूपों को वर्गीकरण द्वारा स्पष्ट किया जाता है।

2. व्याख्या यानि विश्लेषण (Explanation):
तथ्यों के आधार पर विषय-वस्तु के पारस्परिक सम्बन्धों की अर्थपूर्ण व्याख्या वैज्ञानिक पद्धति का दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है। विज्ञान केवल अनेक तथ्यों का संकलन नहीं है बल्कि उन तथ्यों के अर्थपूर्ण सम्बन्धों की खोज भी है, जिससे सामान्य नियमों एवं तथ्यों की खोज की जा सके। वैज्ञानिक पद्धति चरों (variables) के पारस्परिक संबंधों को अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।

3. भविष्यवाणी एवं नियंत्रण:
वैज्ञानिक पद्धति की महत्त्वपूर्ण प्रकृति भविष्यवाणी एवं नियंत्रण (prediction and control) भी होती है। जब हम विषय-वस्तु की प्रकृति, स्वरूप एवं विविधताओं को समझकर, स्पष्टकर साथ ही उनके अर्थपूर्ण विश्लेषण एवं सिद्धान्तों के विकास के आधार पर अपनी विषय-वस्तु के बारे में पूर्वानुमान लगा सकते हैं तो उनके सम्बन्ध में भविष्यवाणी कर सकते हैं।

भविष्यवाणी की क्षमता का संबंध वैज्ञानिक ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग से है। विषय-वस्तु से संबंधित विश्लेषण एवं भविष्यवाणी के आधार पर घटनाक्रम पर नियंत्रण भी कर सकते हैं। इसका प्रयोग हम इच्छित उद्देश्य (desired aim) मानव कल्याण की दृष्टि से भी कर सकते हैं। संक्षेप में हम कह सकते कि वैज्ञानिक पद्धति का उद्देश्य घटनाओं की समझ एवं वर्णन, व्याख्या, भविष्यवाणी एवं नियंत्रण है। कहने का अभिप्राय विषय-वस्तु को समझना, संबद्ध सिद्धान्तों का निरूपण, भविष्यवाणी तथा नियंत्रण वैज्ञानिक पद्धति का अंतिम लक्ष्य है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 6.
अध्ययन पद्धति की दृष्टि से प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) एवं समाज विज्ञान (Social Science) में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) एवं सामाजिक विज्ञान (Social Science) के बीच अन्तर का मुख्य आधार यह है कि प्राकृतिक घटनाएँ एवं सामाजिक घटनाएँ एक जैसी नहीं हैं। प्राकृतिक यानि भौतिक विषय-वस्तु का अध्ययन काफी विशिष्टता से किया जाता है। इस वजह से जब भी हम विज्ञान की बात करते हैं तो लोगों का ध्यान भौतिक, रसायन आदि प्राकृतिक विज्ञानों की ओर चला जाता है। यहीं यह सवाल उठता है कि समाज विज्ञान जिसे हम व्यवहार विज्ञान (Behavioural Science) भी कह सकते हैं, का प्राकृतिक विज्ञानों की तरह अध्ययन संभव है कि नहीं। समाज विज्ञान की प्रकृति की भिन्नता के आधार वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग के संबंध में काफी आपत्तियाँ उठाई जाती हैं।

पश्चिमी दार्शनिक डिल्थे (Dilthey) के सामने भी यह प्रश्न था कि सामाजिक घटनाओं का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान की पद्धति से नहीं किया जा सकता है। क्योंकि दोनों की विषय-वस्तु की प्रकृति एवं दृष्टिकोण भिन्न हैं। प्राकृतिक विज्ञान तथ्यों का अध्ययन करते हैं जबकि सामाजिक विज्ञान का संबंध अर्थपूर्ण व्यवहार से है, जिसकी समझकर ही व्याख्या की जा सकती है। डिल्थे के समकालीन रिकर्ट (Rickert) के विचार उनसे भिन्न थे। उनके अनुसार घटना या विषय-वस्तु अलग हो सकते हैं लेकिन उनकी अध्ययन-पद्धति में समानता संभव है। उनकी दृष्टि में प्राकृतिक घटनाओं की तरह सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन संभव है।

प्राकृतिक विज्ञान एवं समाज विज्ञान में अंतर हम निम्नलिखित ढंग से कर सकते हैं –

1. प्राकृतिक विज्ञान की विषय:
वस्तु मूर्त (concrete) एवं वस्तुनिष्ट होती है। जबकि समाज विज्ञान की प्रकृति अमूर्त (Abstract) एवं जटिल होती है। समाजविज्ञान की अमूर्तता एवं व्यक्तिनिष्ठता के कारण सामाजिक घटना का प्रत्यक्ष अवलोकन एवं निश्चित माप थोड़ा कठिन कार्य है।

2. प्राकृतिक विज्ञान की विषय:
वस्तु की जटिलता एवं परिवर्तनशीलता, समाजविज्ञान की तुलना में कम है। लेकिन गहराई से देखें तो किसी भी विषय की जटिलता सापेक्ष होती है, जैसे-जैसे उनका अध्ययन किया जाता है, वे सरल होती जाती हैं। भौतिक विज्ञान में भी तो ऐसे विषय हैं जो जटिल हैं। उदाहरण के लिए अणुकेन्द्र के चारों ओर घूमने वाले परमाणु की गति के बारे में वैज्ञानिक अभी तक निश्चित अनुक्रम ढूँढ नहीं पाए हैं।

3. वैज्ञानिक शुद्धता के लिए आवश्यक है कि विषय:
वस्तु की गणना एवं माप की जाए। भौतिक विज्ञान की वस्तुएँ गणनात्मक (Quantitative) रूप से विश्लेषित की जा सकती हैं, जबकि सामाजिक विज्ञान की प्रकृति गुणात्मक है। उसके गुणात्मक अध्ययन में परेशानी होती है।

4. प्राकृतिक विज्ञान में कार्य:
कारण सम्बन्ध को प्रदर्शित यानि खोजने हेतु प्रयोगशाला है जहाँ नियंत्रित अवस्था में अध्ययन किया जा सकता है। दूसरी ओर, समाज विज्ञान में मानव-व्यवहार के साथ प्रयोग करना कई सांस्कृतिक एवं नैतिक समस्या उत्पन्न कर सकता है।

5. प्राकृतिक विज्ञान में पूर्वानुमान (Prediction) की पूरी क्षमता होती है, दूसरी ओर, समाज विज्ञान में भौतिक विज्ञान की अपेक्षा मानव व्यवहार के संबंध में पूर्वानुमान लगाना अधिक कठिन होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सामाजिक घटनाओं की जटिलता, परिवर्तनशीलता, अमूर्तता आदि गुणों के कारण उनके संबंध में यथार्थ पूर्वानुमान कठिन है।

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प्रश्न 7.
आगमन क्या है? वैज्ञानिक आगमन की परिभाषा दें तथा इसकी मुख्य विशेषताओं (लक्षणों) का वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन सामान्य वाक्यों की स्थापना करता है। एक ओर जहाँ निगमन अपने सर्वव्यापी आधार वाक्य की वास्तविक सत्यता की कल्पना करता है, वहीं दूसरी ओर आगमन उसकी वास्तविक सत्यता को प्रमाणित करता है। सामान्य वाक्यों (general proposition) की वास्तविक सत्यता (Material Truth) को प्रमाणित करने के लिए आगमन विशेष उदाहरणों को खोजता है। कुछ निरीक्षित घटनाओं के अनुभव के आधार पर जिस सर्वव्यापी अथवा पूर्णव्यापी वाक्य (Universal Proposition) की स्थापना की जाती है, उसे सामान्यीकरण (generalisation) कहते हैं। सामान्यीकरण द्वारा स्थापित पूर्णव्यापी वाक्य सामान्य अथवा व्यापक यथार्थ वाक्य (general proposition) होता है।

आगमन में हम अंशव्यापी वाक्य से पूर्णव्यापी वाक्य (Universal Proposition) की ओर बढ़ते हैं। इसमें हम कुछ उदाहरणों का निरीक्षण कर सबों के बारे में निष्कर्ष निकालते हैं। ज्वाइस ने आगमन को परिभाषित करते हुए कहा है, “Induction is the legitimate derivation of universal laws from individual cases.” (कुछ विशेष उदाहरणों के आधार पर पूर्णव्यापी नियम का यथार्थ अनुमान ही आगमन है।) फाउलर ने आगमन की परिभाषा इस प्रकार दी “Induction is the legitimate inference of the general from the particular or of the more general from the less general.” (विशेष के आधार पर सामान्य अथवा कम व्यापक के आधार पर अधिक व्यापक का यथार्थ अनुमान ही आगमन है)

श्याम, गोपाल, राम आदि मनुष्यों को मरते देखकर हम आगमन में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। यह एक पूर्णव्यापी वाक्य है और वास्तविक भी। सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) की वास्तविकता आगमनात्मक अनुमान द्वारा प्रमाणित की जाती है। आगमन का मुख्य लक्ष्य है आगमनात्मक अनुमान (Inductive Inference) द्वारा वास्तविक सामान्य वाक्य (Real general proposition) की स्थापना करना। ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक वास्तविक सामान्य वाक्य है, जो पूर्णव्यापी (Universal) है। आगमन प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम के सहारे पूर्णव्यापी वाक्यों की सत्यता को प्रमाणित करता है और उसका निष्कर्ष (Conclusion) वास्तविक पूर्णव्यापी अथवा सामान्य वाक्य (real general proposition) होता है।

वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction):
सामान्य (व्यापक) वाक्यों की स्थापना के कई तरीके हैं जिनमें एक ही तरीका ऐसा है जो वैज्ञानिक (Scientific) है, जिसे वैज्ञानिक आगमन (Scientific induction) कहा जाता है। मिल ने वैज्ञानिक आगमन को परिभाषित करते हुए कहा है – “Scientific Induction is the establishment of a general real proposition, based on the observation of particular instances, in reliance on the Law of Uniformity of Nature and the law of Causation.” (प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य के नियमानुसार विशेष उदाहरणों के निरीक्षण पर आधारित सामान्य वाक्य की स्थापना ही आगमन है।) वैज्ञानिक आगमन का उदाहरण है –

श्याम मर गया
करीम मर गया
जौन मर गया
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं

उपर्युक्त उदाहरण में श्याम, करीम, जौन को मरते हुए देखकर सभी मनुष्यों के मरणशील होने का जो अनुमान किया गया है वह वैज्ञानिक आगमनात्मक अनुमान है। इसमें हम कुछ मनुष्यों को मरते देखकर एक सामान्य निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। यह एक सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) है। यह वाक्य केवल श्याम, करीम और जौन के लिए ही सत्य नहीं है बल्कि संसार के सभी मनुष्यों के लिए सत्य है।

सभी मनुष्यों की मरणशीलता का ज्ञान प्रत्यक्ष से संभव नहीं है क्योंकि सभी मनुष्यों को मरते हुए देखा नहीं जा सकता। आगमनात्मक अनुमान में प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान प्राप्त किया जाता हैं आगमनात्मक अनुमान का निष्कर्ष आधार से अधिक व्यापक होता है। ‘श्याम मर गया’ (आधार वाक्य) से अधिक व्यापक है ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ जो निष्कर्ष वाक्य है। ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ निष्कर्ष वाक्य एक सामान्य वाक्य है जो वर्तमान, भूत और भविष्यत् सभी कालों के लिए सत्य है। ‘कुछ’ के आधार पर ‘सभी’ के संबंध में सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) की स्थापना करने की क्रिया ही आगमन कहलाती है।

परन्तु आगमनात्मक अनुमान में ज्ञात के आधार पर अज्ञात की ओर अथवा विशेष के आधार पर सामान्य की ओर छलांग लगाने में गलती की संभावना रहती है, जिसे आगमनात्मक खतरा (inductive Risk) कहा जाता है। हम कुछ ही घटनाओं के आधार पर किस प्रकार सबों के संबंध में निष्कर्ष निकाल सकते हैं? प्रत्यक्ष के आधार अप्रत्यक्ष के संबंध में निष्कर्ष निकालने में गलती हो सकती है। ज्ञात के आधार पर अज्ञात के संबंध में निष्कर्ष निकालने के लिए आगमन के ठोस वैज्ञानिक आधार हैं। ये हैं-प्रकृति-समरूपता नियम (Law of the Uniformity of Nature) तथा कारण-कार्य नियम (Law of Causation)।

इन दोनों नियमों के आधार पर जिस सामान्य वाक्य की स्थापना की जाती है वह सभी स्थान और काल के लिए सत्य होता है। यथार्थ उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य वाक्य की स्थापना होती है, इसलिए सामान्य वाक्यों में वास्तविक सत्यता भी होती है। इसलिए इन नियमों पर आधारित सामान्य अथवा व्यापक वाक्य यथार्थ सामान्य वाक्य अथवा वास्तविक व्यापक वाक्य (real general proposition) कहलाते हैं। वैज्ञानिक आगमन में जो बात विशेष उदाहरण के लिए सत्य होती है वह उस तरह के सभी उदाहरणों के लिए सत्य होती है। आगमनात्मक अनुमान के अनुसार यदि ‘मरणशीलता’ कुछ मनुष्यों के लिए सत्य है तो यह मनुष्य जाति के सभी व्यक्तियों के लिए सत्य होगी।

वैज्ञानिक आगमन की विशेषताएँ (Characteristics of Scientific Induction):
वैज्ञानिक आगमन के संबंध में मिल (Mill) ने जो परिभाषा दी है उसके आधार पर इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं –

1. वैज्ञानिक आगमन किसी वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes a proposition):
आगमनात्मक निष्कर्ष कोई वाक्य होता है। दो प्रत्ययों (ideas) का योग कोई वाक्य होता है। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ में ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ दो प्रत्यय हैं, जिसमें ‘मनुष्य’ उद्देश्य के स्थान पर है तथा ‘मरणशीलता’ विधेय के स्थान पर। इन दोनों प्रत्ययों के बीच आगमनात्मक अनुमान द्वारा संबंध स्थापित करने पर एक वाक्य की स्थापना होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आगमन सर्वप्रथम किसी वाक्य की स्थापना करता है।

2. वैज्ञानिक आगमन सामान्य वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes a general proposition):
वाक्य दो प्रकार के होते हैं अंशव्यापी (Particu lar) तथा पूर्णव्यापी (Universal)। जैसे-‘कुछ मनुष्य मरणशील हैं’ एक अंशव्यापी वाक्य है, क्योंकि इसमें ‘मरणशील’ कुछ ही व्यक्तियों को कहा गया है। इस वाक्य में विधेय सम्पूर्ण उद्देश्य के संबंध में ज्ञान नहीं देता है। ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं।’ एक पूर्णव्यापी वाक्य है, क्योंकि इस वाक्य में विधेय सम्पूर्ण उद्देश्य के संबंध में ज्ञान देता है। इस वाक्य में ‘मरणशील’ सभी व्यक्तियों को कहा गया है। पूर्णव्यापी वाक्य का ज्ञान अनुभव द्वारा नहीं होता, क्योंकि हम कुछ ही व्यक्तियों को मरते हुए (अनुभव द्वारा) देख सकते हैं सबों को नहीं।

‘सबों’ के संबंध का ज्ञान आगमनात्मक अनुमान द्वारा होता है जिसका निष्कर्ष सर्वव्यापी अथवा पूर्णव्यापी वाक्य होता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक पूर्णव्यापी वाक्य है और यही आगमन का निष्कर्ष है। आगमन का निष्कर्ष सामान्य वाक्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) कहलाता है। अतः यह स्पष्ट होता है कि आगमन का संबंध अंशव्यापी वाक्यों से न होकर पूर्णव्यापी वाक्यों से होता है। इस तरह आगमन सामान्य अथवा व्यापक वाक्य की स्थापना करता है। सामान्य वाक्य की पूर्णव्यापी वाक्य अथवा व्यापक वाक्य कहलाता है।

3. वैज्ञानिक आगमन वास्तविक वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induc tion establishes a real proposition):
सामान्य वाक्य अथवा व्यापक वाक्य दो प्रकार के होते हैं-शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) तथा वास्तविक वाक्य (real proposition)। शाब्दिक वाक्य उसे कहा जाता है जिसमें विधेय अपने उद्देश्य के संबंध में कोई नई जानकारी नहीं देता।

शाब्दिक वाक्य में विधेय (predicate) अपने उद्देश्य पद (Subject) की केवल गुणवाचकता को व्यक्त करता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य विवेकशील हैं’ एक शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) है, क्योंकि इसमें विधेय अपने उद्देश्य पद के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं देता बल्कि उसकी गुणवाचकता (Connotation) को प्रकट करता है (विवेकशीलता मनुष्य ही गुणवाचकता होती है)। वैज्ञानिक आगमन इस तरह के वाक्यों की स्थापना नहीं करता। वैज्ञानिक आगमन शाब्दिक वाक्यों की स्थापना न कर वास्तविक वाक्यों (real proposition) की स्थापना करता है।

वास्तविक वाक्य (Real proposition) उसे कहते हैं, जिसमें विधेय (predicate) अपने उद्देश्य (Subject) के संबंध में नई जानकारी देता है। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक वास्तविक या यथार्थ वाक्य (real proposition) हैं, क्योंकि ‘मरणशीलता’ ‘सभी मनुष्यों’ के संबंध में एक नवीन ज्ञान है। ‘मरणशीलता’ ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता नहीं है, मनुष्य पद की गुणवाचकता तो ‘विवेकशीलता’ और पशुता’ है। वास्तविक वाक्य (real proposition) में विधेय अपने उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट न कर उसके संबंध में कोई नया ज्ञान देता है। उपर्युक्त वाक्य में ‘मरणशीलता’ उद्देश्य पद (सभी मनुष्यों) के संबंध में एक नया ज्ञान है। इस तरह वैज्ञानिक आगमन वास्तविक अथवा यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है।

4. वैज्ञानिक आगमन विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है (Scientific Induc tion observes particular instances):
आगमन सामान्य और वास्तविक वाक्य की स्थापना विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर करता है। किसी सम्पूर्ण जाति या वर्ग के प्रत्येक उदाहरण का निरीक्षण करना संभव नहीं है। इसलिए आगमन कुछ ही या विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है जिनके आधार पर सामान्य वास्तविक वाक्य अथवा व्यापक यथार्थ वाक्य (general real proposition) की स्थापना होती है।

5. वैज्ञानिक आगमन में आगमनात्मक छलांग होती है (In Induction there is an Inductive leap):
वैज्ञानिक आगमन में ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लगाई जाती है, जिसे आगमनात्मक छलांग कहा जाता है। आगमन में किसी जाति या वर्ग के सभी उदाहरणों का निरीक्षण नहीं होता है, फिर भी उस जाति के अनिरीक्षित उदाहरणों के लिए सत्य मान ली जाती है। कुछ ही मनुष्यों को मरते देखना निरीक्षित उदाहरण होते हैं, सभी मनुष्यों को मरते नहीं देखना अनिरीक्षित उदाहरण हैं – हम निरीक्षित उदाहरणों के आधार पर ही अनिरीक्षित उदाहरणों को आगमनात्मक अनुमान में सत्य मान लेते हैं अर्थात् ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लेते हैं अथवा कुछ के आधार पर सब की ओर छलांग लगाते हैं।

‘सभी मनुष्य मरणशील है’ एक व्यापक वाक्य है, परन्तु यह मनुष्य जाति के सभी उदाहरणों के निरीक्षण पर आधारित नहीं है। इस तरह कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर सभी मनुष्यों की मरणशीलता का व्यापक अथवा सामान्य निष्कर्ष निकालने (ज्ञात से अज्ञात) की ओर छलांग लगाने में गलती होने की संभावना रहती है, जिसे आगमनात्मक जोखिम (Inductive Hazard) कहा जाता है। परन्तु, आगमनात्मक जोखिम को मिल (Mill) ने ‘आगमन का प्राण’ (Essence of Induction) कहा है, क्योंकि इसी के आधार पर अंततः व्यापक वास्तविक वाक्यों की स्थापना होती है।

6. वैज्ञानिक आगमन कारण:
कार्य नियम तथा प्रकृति-समरूपता सिद्धांत पर आधारित होता है (Scientific Induction is based on the Law of Causation and the Principle of the Uniformity of Nature):
विशेष उदाहरणों के आधार पर किसी सामान्य वाक्य की स्थापना करने के लिए आगमन कारण-कार्य नियम तथा प्रकृति-समरूपता नियम को सत्य मानता है। कारण-कार्य नियम के अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। जैसे – ‘मनुष्यता’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है और ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य (general proposition) के रूप में इसी नियम के बल पर प्रतिस्थापित होता है।

आगमन प्रकृति-समरूपता नियम पर भी आधारित होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार समान परिस्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है। जब हम यह देखते हैं कि ‘मनुष्यता’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है तब हम यह मान लेते हैं कि कारण-कार्य का यह संबंध समान परिस्थितियों में सभी घटनाओं के लिए सत्य होगा। “सभी मनुष्य मरणशील हैं’, सामान्य वाक्य में मनुष्य होना ही मरणशीलता का कारण है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार जो कारण आज तक जो कार्य उत्पन्न करता रहा है, उसे वह भविष्य में भी उत्पन्न करेगा। इस नियम के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि आज तक मनुष्य मरणशील रहा है तो वह भविष्य में भी मरणशील रहेगा। इन दोनों नियमों के आधार पर प्रत्यक्ष के द्वारा अप्रत्यक्ष के संबंध में सामान्य निष्कर्ष निकालने में कोई आगमनात्मक जोखिम (inductive hazard) नहीं होता है।

7. वैज्ञानिक आगमन नए तथ्यों की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes new facts):
वैज्ञानिक आगमन में ज्ञात के आधार पर अज्ञात का अथवा कुछ के आधार पर सब का जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वे नए तथ्य होते हैं। तर्कशास्त्रीय दृष्टिकोण से ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक सामान्य वाक्य है जिसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य पद की गुणवाचकता (connotation) नहीं है और जब विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता तो वह उसके संबंध में किसी नए तथ्य की जानकारी देता है ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य है जिसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य पद की गुणवाचकता connotation नहीं है और जब विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता तो वह उसके संबंध में किसी नए तथ्य की जानकारी देता है ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य है जो आगमनात्मक अनुमान द्वारा स्थापित किया गया है और इसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य के संबंध में एक नया तथ्य है। इस तरह देखा जाता है कि वैज्ञानिक आगमन अपने सामान्य वास्तविक वाक्य के द्वारा नए तथ्यों की स्थापना करता है।

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प्रश्न 8.
आगमन का परिचय दें तथा इसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
आगमन वह अनुमान है जिसमें हम कुछ (some) के आधार पर सब (all) के संबंध में अर्थात् विशेष (Particular) के आधार पर सामान्य (universal) संबंध में ज्ञान प्राप्ति करते हैं। आगमन पूर्णव्यापी वाक्य की वास्तविक सत्यता (material truth) की स्थापना करता है। हम जानते हैं कि पूर्णव्यापी वाक्य हमारे अनुभव पर आधारित होते हैं और हमें अनुभव विशेष घटनाओं का ही होता है सबों का नहीं। न्यूटन ने कुछ . ही फलों को वृक्ष से धरती की ओर गिरते देखा था। हम कुछ ही व्यक्तियों को मरते हुए देख सकते हैं, एक ही साथ सबों को नहीं। इस तरह निगमन में एक ही विशेष घटना के निरीक्षण के आधार पर पूर्णव्यापी वाक्य (universal proposition) की स्थापना कर दी जाती है। उदाहरण के लिए,

रमेश मरणशील है।
सुरेश मरणशील है।
महेश मरणशील है।
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

उपर्युक्त उदाहरण में ‘कुछ’ मनुष्यों को मरते देख कर ‘सभी’ मनुष्यों की मरणशीलता के संबंध में अनुमान किया गया है अर्थात् विशेष (Particular) के आधार पर सामान्य (universal) का अनुमान किया गया है। इस तरह के अनुमान को आगमन का अनुमान कहा जाता है। आगमनात्मक अनुमान द्वारा वास्तविक सत्यता की स्थापना होती है। इसमें आकारिक और वास्तविक सत्यता दोनों होती है। निगमनात्मक अनुमान में केवल आकारिक सत्यता होती है तथा इसमें व्यापक वाक्य के आधार पर निष्कर्ष निकालने की विधि बतायी जाती है। परन्तु, आगमनात्मक अनुमान का आकार तथा विषयवस्तु दोनों ही शुद्ध होते हैं। आगमन में ‘विषय’ के दृष्टिकोण से शुद्ध निष्कर्ष निकालने की विधि बतायी जाती है। आगमनात्मक अनुमान वास्तविक सत्यता से संबद्ध होता है और वास्तविक सत्यता विचार की दुनिया तथा वास्तविक जगत् दोनों में सत्य होती है।

उदाहरण के लिए, ‘सोने की अंगूठी’ विचार जगत तथा वास्तविक जगत दोनों में सत्य है। परन्तु ‘सोने का पहाड़’ विचार जगत में सत्य हो सकता है लेकिन वास्तविक जगत में नहीं। इस प्रकार ‘सोने का पहाड़’ निगमनात्मक अनुमान है क्योंकि इसमें – आकारिक सत्यता वास्तविक सत्यता नहीं। परन्तु, ‘सोने की अंगूठी’ ‘पत्थर का पहाड़’ आदि आगमनात्मक अनुमान है, क्योंकि इसमें आकारिक और वास्तविक सत्यता दोनों है। निगमनात्मक अनुमान में विचार और वास्तविक में अनुकूलता नहीं रहती, परन्तु आगमनात्मक अनुमान में विचार और वास्तविकता में अनुकूलता रहती है।

‘दुनिया की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ – इस परम व्यापक वाक्य को निगमनात्मक अनुमान द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सकता अर्थात् वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना निगमन विधि से नहीं हो सकती; आगमन विधि द्वारा ही पूर्णव्यापी वाक्य की वास्तविक सत्यता की स्थापना हो सकती है। व्यावहारिक जीवन में हम ऐसा अनुमान करना चाहते हैं जो आकार और विषय दोनों दृष्टिकोण से सही हो। अनुमान के द्वारा सत्यता की प्राप्ति तब होती है जब अनुमान करने का तरीका और अनुमान का विषय वास्तविक होता है। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन मरणशील है।

उपर्युक्त उदाहरण में अनुमान के दोनों आधार वाक्य (premises) वास्तविक हैं, इसलिए निष्कर्ष ‘मोहन मरणशील है’ भी सत्य है। अनुमान के निष्कर्ष को सत्य होने के लिए यह आवश्यक है कि उसके आधार वाक्य भी वास्तविक हों। उपर्युक्त उदाहरण न्याय (syllogism) का उदाहरणं है। इसके दोनों आधार वाक्य (‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ ‘मोहन मनुष्य है’) वास्तविक हैं, इसलिए निष्कर्ष भी वास्तविक है। न्याय के आधार वाक्यों में से कम-से-कम एक आधार वाक्य अवश्य ही व्यापक होता है।

व्यापक वाक्य की वास्तविकता को अनुभव से नहीं जाना जा सकता बल्कि इसके लिए आगमनात्मक अनुमान का सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि इसके द्वारा वास्तविक व्यापक वाक्य की स्थापना की जाती है। उपर्युक्त उदाहरण में ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ एक व्यापक वाक्य (general proposition) है, जिसके द्वारा वास्तविक व्यापक वाक्य-:मोहन मरणशील हैं’ की स्थापना की गयी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आगमनात्मक अनुमान के द्वारा व्यापक वाक्यों की वास्तविकता को प्रमाणित किया जाता है।

मिल (Mill) ने आगमन के दो प्रकार बतालए हैं उचितार्थक आगमन (induction proper) तथा अनुचितार्थक आगमन (induction improper)। उचितार्थक आगमन वह आगमन होता है, जिसमें ‘कुछ से सब की ओर’ (from ‘some’ to ‘all’) छलांग लगायी जाती है। इसे आगमनात्मक छलाँग (inductive leap) कहा जाता है, जो ज्ञात से अज्ञात की ओर होता है। उचितार्थक आगमन में ज्ञात के आधार पर अज्ञात का अनुमान किया जाता है। अनुचितार्थक आगमन वह है जिसमें उचितार्थक आगमन जैसी छलांग (leap) नहीं पायी जाती; क्योंकि इसके अनुमान वस्तुओं के निरीक्षण पर आधारित नहीं होते। उचितार्थक आगमन (induction proper) के चार भेद किए गए हैं।

ये हैं-वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction), अवैज्ञानिक आगमन (Unscientific Induction), सादृश्यानुमान (Argument from Anal ogy) तथा सम्भावना सिद्धान्त (Argument from probability)। अनुचितार्थक आगमन (Induction improper) के भी तीन भेद किए गए हैं – पूर्ण आगमन (Perfect Induction), तर्कसाम्यमूलक आगमन (Induction by parity of Reasoning) तथा अंश-संकलन आगमन (Induction improper) के भी तीन भेद किए गए हैं – पूर्ण आगमन (Perfect Induction), तर्कसाम्यमूलक आगमन (Induction by parity of Reasoning) तथा अंश-संकलन आगमन (Induction by colligavission of facts)।

उचितार्थक आगमन कार्य-करण सम्बन्ध पर आधारित होता है परन्तु अनुचितार्थक आगमन कार्य-कारण संबंध पर आधारित नहीं होता। आगमन का सही रूप उचितार्थक आगमन (induction proper) आगमन (induction) जैसा लगता है, तथापि इसमें आगमन के मुख्य लक्षणों का सर्वदा अभाव पाया जाता है। वैज्ञानिक आगमन, जो उचितार्थक आगमन का प्रमुख प्रकार होता है, ही आगमन का सर्वोत्तम रूप होला है। वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) की विधि से जिस सामान्य वाक्य (universal proposition की स्थापना होती है वह आगमन (Induction) का सही निष्कर्ष (valid conclusion) होता है।

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प्रश्न 9.
निगमन और आगमन के बीच क्या संबंध है? दोनों में कौन अधिक मौलिक है? अथवा, निगमन और आगमन की तुलना करें। इनमें पहले कौन आता है?
उत्तर:
निगमन और आगमन में संबंध (Relation between Deduction and Induction):
इन दोनों के बीच संबंध की विवेचना यहाँ की जा रही है। यहाँ मुख्य रूप से दो प्रश्न उठते हैं –

(a) दोनों में अधिक मौलिक कौन है (Which of the two is more fundamental)?
(b) दोनों में प्राथमिक या पूर्ववर्ती कौन है (Which of the two is prior)?

पहले और दूसरे प्रश्नों को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद पाया जाता है तार्किकों के दो दल हैं-एक दल अनुमान में केवल आकारिक सत्यता (formal truth) ढूँढता है और दूसरा दल वास्तविक सत्यता (material truth) पर जोर देता है। इन दोनों दलों के मत प्रस्तुत प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न हैं।

दोनों में अधिक मौलिक कौन है (Which of the two is more fundamental):

1. आकारवादी तार्किकों (Formal logicians) का मत:
इस मत के अनुसार निगमन (Deduction) अधिक मौलिक है और आगमन (Induction) कम मौलिक या गौण है। इस मत के माननेवाले हेटले (Whateley), हेमिल्टन (Hamilton), मैनसेल (Mansel) इत्यादि, आकारवादी तार्किक हैं। इन लोगों के अनुसार, आगमन तीसरे आकार का ही एक योग है; आगमन कोई स्वतंत्र अनुमान नहीं कहा जा सकता। यह निगमन का ही एक रूप है। इसके अतिरिक्त, आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम और कार्य-कारण नियम को आधार मानकर हम ‘कुछ’ से ‘सब’ का जो निष्कर्ष निकालते हैं उसे निगमनात्मक ढंग से निकाला जा सकता है।

‘मनुष्यत्व’ और ‘मरणशीलता’ में कार्य-करण संबंध (causal relation) देखकर और इस नियम को प्रकृति में हमेशा समान होने का विश्वास करके ही हम आगमन में ‘कुछ’ (some) से “सब’ (all) की संभावना का अनुमान करते हैं और कहते हैं, ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। इसीलिए यह कहा जाता है कि आगमन मूल रूप में निगमनात्मक होता है। (Induction in essence is Deduction in nature)

2. वस्तुवादी तार्किकों (Material logicians) का मत:
इस मत के अनुसार आगमन (Induction) ही अधिक मौलिक है और निगमन इसी का एक रूप है। इसके समर्थक मिल (Mill), बेन (Bain) आदि वस्तुवादी तार्किक हैं। निगमनात्मक अनुमान के लिए कम-से-कम एक सामान्य (universal) वाक्य की आवश्यकता पड़ती है और इस सामान्य वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा होती है। इस प्रकार, निगमन के आधार के रूप में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करके आगमन निगमन को आधार प्रदान करता है। आगमन के द्वारा ही सामान्य नियम की स्थापना होती है, और निगमन केवल इसी नियम को व्यक्ति विशेषों पर लागू करता है।

जब आगमन के द्वारा यह सामान्य वाक्य सत्यापित हो जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं, तो निगमन इसे राम, मोहन आदि व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके कहता है कि राम भी मनुष्य होने के नाते मरणशील है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आगमन ही अधिक मौलिक है और निगमन गौण (secondary)। वास्तव में, निगमन और आगमन के विषय में दिए गए उपर्युक्त दोनों मत एकांगी (one sided) हैं।

इन दोनों में किसी एक को अधिक मौलिक और दूसरे को कम मौलिक या गौण बताना उचित नहीं है। दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। ये एक-दूसरे के पूरक हैं और इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है। इनमें किसी एक को दूसरे में परिवर्तित करने से इन दोनों की ही मौलिकता नष्ट हो जाती है। अतः, इनके विषय में अधिक या कम मौलिकता का प्रश्न उठाना व्यर्थ है। दोनों में पूर्ववर्ती कौन है (which of the two is prior)। इस प्रश्न पर तर्कवेत्ताओं में – मतभेद है। यहाँ जेवन्स (Jevons) एवं मिल (Mill) के मतों की विवेचना अपेक्षित है।

जेवन्स (Jevons) का मत:
इनके अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है। (Deduc tion is prior to Induction)। इनका तर्क इस प्रकार है-आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसके लिए प्राक्कल्पना (Hypothesis) का सहारा लेकर हम सामान्यीकरण (generalisation) कर देते हैं। किन्तु, बिना परीक्षा या जाँच (verification) के कोई सामान्य नियम नहीं बन जाता। प्राक्कल्पना की जाँच निगमनात्मक विधि द्वारा की जाती है।

निर्मित प्राक्कल्पना को सत्य मानकर उससे संभावित निष्कर्ष निकालते हैं और इन निष्कर्षों की जाँच वास्तविक घटनाओं में करते हैं। यदि ये निष्कर्ष इन घटनाओं से मेल खाते हैं, तो हम अपनी प्राक्कल्पना को सही मान लेते हैं और संगति या मेल नहीं बैठने पर प्राक्कल्पना असत्य सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार, निगमन विधि के द्वारा ही प्राक्कल्पना की परीक्षा करके आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसलिए निगमन का स्थान आगमन से पहले आता है।

मिल का मत:
मिल साहब का मत जेवन्स के मत के भिन्न है। इनके अनुसार, आगमनिक खोज में सामान्यीकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। इसी कारण, ये आगमन को निगमन के पहले रखते हैं। न्याय (syllogism) निगमन का मुख्य रूप है और इसके लिए आधार के रूप में कम-से-कम एक पूर्णव्यापी (universal) वाक्य की आवश्यकता होती है और इस वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा ही होती है। इस प्रकार आगमन ही निगमन को आधार प्रदान करता है।

इसलिए यह कहना उचित है कि “आगमन निगमन के पहले आता है।” (Induction is prior: to dedaction) वास्तव में, जेवन्स और मिल के कथन में आंशिक सत्यता (partial truth) है, न कि पूर्ण सत्यता। जेवन्स साहब के अनुसार, आगमन विधि का अंत सत्यापन या जाँच (verification) में होता है। इसी कारण वे निगमन को आगमन के पहले मानते हैं। किन्तु, मिल साहब के अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण ही अंतिम सोपान है और इसके लिए परीक्षण या जाँच की कोई आवश्यकता निगमन और आगमन में किसी एक को पूर्ववर्ती बताना उचित नहीं जान पड़ता। निगमन और आगमन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

निगमन और आगमन के संबंध में कुछ अन्य मत –

1. तार्किकों का कहना है कि निगमन तर्कशास्त्र में विश्लेषणात्मक विधि (analytical method) अपनाई जाती है और आगमन में संश्लेषणात्मक विधि (synthetic method) अपनाई जाती है। आगमन में विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करके सामान्य नियम बनाए जाते हैं और निगमन में सामान्य नियम का विश्लेषण करके विशेष निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं। पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए विश्लेषणात्मक और संश्लेषणात्मक दोनों विधियों का उपयोग आवश्यक है। अतः, निगमन और आगमन परस्पर पूरक हैं।

2. जेवन्स का मत:
जेवन्स महोदय के अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है और आगमन निगमन का ही उत्क्रमिक (inverse) रूप है। सीधी क्रिया (direct process) और उत्क्रमिक क्रिया (inverse process) गणित से ली गई है। सीधी क्रिया वह है जिसमें निश्चित संख्या (data) दी हुई है और उससे निष्कर्ष निकालना रहता है। जैसे, 2 और 4 दिए हुए हैं जिनका गुणनफल 8 होता है उत्क्रमिक क्रिया में फल या परिणाम (result) पहले से दिया रहता है और उन संख्याओं को निकालना पड़ता है, जिनका वह फल या परिणाम है। जैसे, 8 दिया हुआ है और इसके अवयवों (constituents) को ज्ञात करना है। इसके अवयव हो सकते हैं –

4 × 2. 1 × 8 इत्यादि। सीधी क्रिया द्वारा प्राप्त निष्कर्ष निश्चित होता है, किन्तु, उत्क्रमिक क्रियाओं के अर्थ में आगमन को निगमन की उत्क्रमिक (inverse) रूप कहा जाता है। आगमन को निगमन का उत्क्रमिक रूप मानने का यह भी एक आधार है कि निगमन में हम कारण से कार्य की ओर जाते हैं, किन्तु, आगमन में कार्य से कारण की ओर जाते हैं। कारण (cause) का पता रहने पर इसके निश्चित फल (effect) का पता लगाना अत्यंत कठिन काम है और इसमें दोष होने की संभावना बनी रहती है, क्योंकि एक ही कार्य के कई कारण हो सकते हैं।

जेवन्स के मत की आलोचना:
निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती कहना उचित नहीं है। आगमन को निगमन का उत्क्रमिक रूप (inverse process) भी कहना ठीक नहीं है। निगमन और आगमन एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनमें पूर्ववर्ती (antecedent) और (conse quent) का प्रश्न उठाना ही व्यर्थ है। जेवन्स का यह कहना भी ठीक नहीं है कि कार्य (effect ज्ञात रहने पर उससे निश्चित कारण (cause) ज्ञात नहीं हो सकता, क्योंकि एक कार्य के कई कारण हो सकते हैं।

यह कहना ही दोषपूर्ण है कि एक कार्य के कई कारण होते हैं। वास्तव में, निगमन और आगमन में विरोध लाकर आगमन को निगमन की उत्क्रमिक क्रिया (inverse process) बताना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जा सकता। आगमनिक खोज (inductive enquiry) में निगमन और आगमन दोनों का समान महत्त्व है। ये दोनों परस्पर पूरक हैं। इन्हें विरोधी कहना इनके सही अर्थ को ठुकराना है। बेकन का मत-बेकन ने निगमन को ‘उतरनेवाली क्रिया’ (descending process) और आगमन को ‘चढ़नेवाली क्रिया’ (ascending process) कहा है। निगमन में सामान्य से विशेष निष्कर्ष निकलते हैं। इसमें हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर आते हैं।

जैसे, सभी मनुष्यों को मरणशील पाकर राम को मनुष्य होने के नाते मरणशील बताते हैं। इसलिए निगमन को उतरने की क्रिया कहा जाता है। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के द्वारा सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसमें कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर (form less general to more general) जाते हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत पर चढ़कर वहाँ से हमें नीचे का सामान्य रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार, आगमन के निष्कर्ष पर पहुँचते ही हमें एक सामान्य नियम दृष्टिगोचर होता है। ज्यों-ज्यों पर्वत से नीचे उतरने लगते हैं, त्यों-त्यों विशेष वस्तुओं पर नजर पड़ने लगती है। इसलिए निगमन को उतरनेवाली क्रिया और आगमन को चढ़नेवाली क्रिया कहा गया है।

बेकन के मत की आलोचना-बेकन का मत सही नहीं कहा जा सकता। पर्वत पर चढ़ने और उतरने का मार्ग एक ही रह सकता है। इसलिए चढ़ने और उतरने की क्रियाएँ परस्पर विरोधी नहीं कही जा सकती। इसी प्रकार, आगमन और निगमन में भी विरोध नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि हम आगमन में उदाहरणविशेष से सामान्य नियम पर पहुँचते हैं और निगमन में सामान्य नियम से व्यक्तिविशेष पर पहुंचते हैं। पर, इसका अर्थ यह नहीं होता कि आगमन और निगमन परस्पर विरोधी हैं। इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है।

ये एक-दूसरे के सहयोगी एवं पूरक फाउलर (Fowler) का मत-फाउलर ने आगमन और निगमन में भेद इस आधार पर किया है कि आगमन में हम कार्य से कारण की ओर जाते हैं और निगमन में कारण से कार्य की ओर। आगमन में घटनाविशेष का निरीक्षण करके इसका कारण बताते हैं। इसीलिए आगमन ‘में कार्य से कारण की ओर जाने की बात कही गई है।

निगमन में सामान्य नियम यानी कारण से कार्य की ओर जाने की बात कही गई है। फाउलर के मत की आलोचना-फाउलर (Fowler) का कहना सही नहीं है। आगमन में केवल कार्य से कारण का पता नहीं लगाया जाता। आगमन में हम दोनों तरफ बढ़ सकते हैं। कार्य ज्ञात रहने पर उसके कारण का पता लगाया जा सकता है और कारण ज्ञात रहने पर आगमन के द्वारा कार्य का भी पता लगाया जा सकता है। अतः यह कहना भूल है कि आगमन द्वारा केवल कार्य से कारण का पता लगाया जाता है।

बक्कल (Buckle) का मत-इनके अनुसार हम आगमन में विशेष तथ्यों से नियमों पर (from facts to laws) जाते हैं और निगमन में नियमों से विशेष तथ्यों पर (from laws to facts) जाते हैं। इसी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-आगमन में वस्तुविशेष (facts) से विचार (ideas) की ओर जाते हैं और निगमन में विचार से वस्तुविशेष का अनुमान लगाया जाता है। आगमन द्वारा स्थापित नियम सैद्धांतिक होते हैं और इनका प्रत्यक्ष घटनाविशेषों के द्वारा होता है।

किन्तु, हमें इससे यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आगमन के निष्कर्ष केवल सैद्धान्तिक या मानसिक होते हैं, यथार्थ नहीं। आगमन के निष्कर्ष यथार्थ होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक सत्यता (material truth) पाई जाती है। निगमन में भी सैद्धान्तिक या मानसिक तत्त्व पाए जाते हैं, जिस प्रकार आगमन में यथार्थता के तत्त्व रहते हैं। उपर्युक्त मतों की विवेचना करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि आगमन और निगमन में विरोध का संबंध दिखाना भ्रामक है। इन दोनों में पूर्ण सहयोग अपेक्षित है। ये एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं (both run into each other)। इनके बीच कोई कृत्रिम रेखा खींचकर इनको एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 10.
निगमन से आगमन किन-किन बातों में भिन्न है? अथवा, निगमन के बाद आगमन की क्या आवश्यकता है? व्याख्या करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र का लक्ष्य सत्यता की प्राप्ति है। इसकी पूर्ति के लिए अनुमान का सहारा लिया जाता है। सत्यता दो प्रकार की होती है –

  1. आकारिक सत्यता (formal truth) और
  2. वास्तविक सत्यता (material truth)।

निगमन तर्कशास्त्र मुख्यतः आकारिक सत्यता से संबद्ध रहता है। सत्यता का आंशिक अध्ययन ही यहाँ हो पाता है। आगमन तर्कशास्त्र में वास्तविक सत्यता प्राप्त करना हमारा लक्ष्य रहता है। इस प्रकार निगमन और आगमन के संयुक्त प्रयास से ही तर्कशास्त्र का लक्ष्य पूरा हो सकता है। अतः, निगमन और आगमन में अत्यधिक घनिष्ठ संबंध है। फिर भी, दोनों में कई अंतर दीख पड़ते हैं।

निगमन और आगमन में अंतर (Distinction between Deduction and Induction):
दोनों में निम्नलिखित अंतर उल्लेखनीय हैं –

1. निगमन के आधार:
वाक्य मान लिए जाते हैं, किन्तु आगमन के आधार-वाक्य निरीक्षण (observation) तथा प्रयोग (experiment) पर आधृत रहते हैं। निगमन के आधार-वाक्यों को सत्य मानकर उनसे निष्कर्ष निकाला जाता है। यहाँ आधार-वाक्यों को बिना निरीक्षण-परीक्षण के ही आँख मूंदकर सत्य मान लेते हैं और इनसे निष्कर्ष निकालते हैं। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
राम एक मनुष्य है
∴ राम मरणशील है।

यह निगमनात्मक अनुमान का उदाहरण है। यहाँ ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ और ‘राम एक मनुष्य है’ आधार-वाक्य (premises) हैं, जिन्हें पहले ही सत्य मान लिया गया है और उनसे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘राम मरणशील है’। किन्तु, आगमन के आधार-वाक्य अनुभव द्वारा प्राप्त होते हैं। बिना निरीक्षण-परीक्षण के आधार-वाक्यों को सत्य नहीं माना जा सकता है। जैसे –

राम मरणशील है
यदु मरणशील है
श्याम मरणशील है
केदार मरणशील है
……………………..
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

यहाँ सभी आधार-वाक्य अनुभव, अर्थात् निरीक्षण और प्रयोग पर आधृत हैं। हम इन व्यक्तियों को मरते हुए देखकर ही यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं।

2. निगमन में हम सामान्य (universal) से विशेष (particular) या अधिक व्यापक से कम व्यापक की ओर जाते हैं, किन्तु आगमन में कम से सामान्य या विशेष से सामान्य की ओर जाते हैं। निगमन में हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर जाते हैं, किन्तु आगमन में कम व्यापकता से अधिक व्यापकता की ओर प्रस्थान करते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण से यह अंतर स्पष्ट हो जाता है। निगमनात्मक अनुमान में हम सभी मनुष्यों को मरणशील मानकर राम को मरणशील सिद्ध करते हैं। राम की व्यापकता अवश्य ही सभी मनुष्यों की व्यापकता से कम है। इसीलिए निगमन में अधिक से कम की ओर जाने की बात कही गई है। आगमन के उदाहरण से हम देखते हैं कि राम, यदु, श्याम, केदार इत्यादि व्यक्तिविशेषों को मरणशील पाकर सभी मनुष्यों के मरणशील होने का अनुमान किया गया है। अतः, यहाँ विशेष से सामान्य की ओर प्रस्थान किया गया है।

3. निगमन में आधार-वाक्यों की संख्या निश्चित रहती है, किन्तु आगमन में आधार-वाक्यों की संख्या अनिश्चित रहती है। निगमनात्मक अनुमान के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं साक्षात अनुमान (immediate inference) और असाक्षात अनुमान (mediate inference)। साक्षात अनुमान में एक आधार-वाक्य रहता है और असाक्षात अनुमान में दो आधार-वाक्य होते हैं। किन्तु, आगमन में आधार-वाक्यों की संख्या कोई निश्चित नहीं है। कभी-कभी कार्य-कारण संबंध का पता चलाने के लिए दो, तीन, चार या इनसे अधिक उदाहरणों को देखने की आवश्यकता पड़ती है।

4. निगमन का संबंध आकारिक सत्यता (formal truth) से है; किन्तु आगमन का संबंध वास्तविक सत्यता (material truth) से रहता है-निगमन में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि दिए हुए आधार-वाक्य से निष्कर्ष नियमानुकूल निकाला गया है कि नहीं। यदि निष्कर्ष निकालने में नियमों का पूर्ण पालन किया गया हो तो उस अनुमान का निष्कर्ष सही माना जाता है। इस निष्कर्ष में वास्तविक सत्यता का रहना कोई आवश्यक नहीं है। जैसे –

सभी विद्यार्थी बंदर है,
मोहन एक विद्यार्थी है,
∴ मोहन एक बंदर है।

इस अनुमान में अनुमान के नियमों का पालन किया गया है। इसलिए इसका निष्कर्ष आकारिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही है। इस निष्कर्ष में वास्तविक सत्यता का पूर्ण अभार है; क्योंकि इसके आधार अनुभवसिद्ध नहीं हैं। आगमन का लक्ष्य वास्तविक सत्यता को प्राप्त करना है। इसके आधार-वाक्य निरीक्षण और प्रयोग पर आधृत होने के कारण ऐसे निष्कर्ष देते हैं जो वास्तविक दृष्टिकोण से सही होते हैं। आगमन में आकारिक सत्यता को भी ठुकराया नहीं जाता। आकारिक और वास्तविक दोनों सत्यता की प्राप्ति आगमन में होती है।

5. निगमन के निष्कर्ष आधार-वाक्यों से कम व्यापक (universal) होते हैं, किन्तु आगमन के निष्कर्ष अपने आधार-वाक्यों से सदा अधिक व्यापक होते हैं। इसका कारण यह है कि निगमन के आधार-वाक्यों में ही इसका निष्कर्ष निहित रहता है, किन्तु आगमन के निष्कर्ष में ही इसके आधार-वाक्य चले जाते हैं।

6. निगमन और आगमन के आधारों में भी भिन्नता रहती है-विचार के नियमों (laws of thought) पर निगमन आधृत है। विचार के नियम ये हैं-व्याघातक नियम (law of contradiction), तादात्म्य नियम (law of identity) और मध्यदशा-निषेध नियम (law of excluded middle)। आगमन के आधारस्वरूप के दो नियम हैं-प्रकृति-समरूपता नियम (law of uniformity of nature) और कार्य-कारण नियम (law of causation)।

उपर्युक्त अंतरों को ध्यानपूर्वक देखने से यह संकेत मिल जाता है कि निगमन के बार आगमन की क्या आवश्यकता है। निगमन अनुमान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। परन्तु. अकेले निगमन द्वारा सत्य की प्राप्ति संभव नहीं है। इसमें कुछ कमियाँ रह जाती हैं, जिनकी पूर्ति आगमन द्वारा की जाती है। आगमन की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं, जिनका निगमन में अभाव रहता है। निगमन के बाद आगमन की आवश्यकता इसीलिए और अधिक बढ़ जाती है।

निगमन तथा आगमन दोनों का लक्ष्य सत्य की स्थापना करना है। इस प्रयास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। निगमनात्मक अनुमान सत्य की स्थापना के लिए आगमनात्मक अनुमान पर आश्रित रहता है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है –

(a) निगमन तर्कशास्त्र साधारणतः
आकारिक सत्यता से संबद्ध है। यदि निष्कर्ष निगमन तर्कशास्त्र के नियमों के अनुकूल है, तो इसमें आकारिक सत्यता रहती है। परन्तु, अनुमान में केवल आकारिक सत्यता (formal truth) से काम नहीं चल सकता। इसमें वास्तविक सत्यता (material truth) का होना भी आवश्यक है। इसके निष्कर्ष को यथार्थ घटनाओं से मेल खाना चाहिए। आगमन तर्कशास्त्र में वास्तविक सत्यता की प्राप्ति हमारा प्रमुख लक्ष्य रहता है। इसमें आकारिक सत्यता की उपेक्षा नहीं की जाती। यहाँ वास्तविक सत्यता के साथ-साथ आकारिक सत्यता की प्राप्ति के प्रयत्न किए जाते हैं। इस प्रकार, निगमन के साथ-साथ आगमन का उपयोग करने से संपूर्ण सत्यता की प्राप्ति संभव है।

(b) निगमन के आधार:
वाक्य आँख मूंदकर बिना किसी छानबीन के सत्य मान लिए जाते हैं और उनसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं। ऐसे आधार-वाक्यों से विश्वसनीय निष्कर्ष नहीं प्राप्त हो सकते। आगमन तर्कशास्त्र में आधार-वाक्य निरीक्षण एवं प्रयोग द्वारा प्राप्त होते हैं। इन्हें यों ही सत्य नहीं मानलिया जाता।

(c) निगमन में निष्कर्ष इसके आधार:
वाक्यों में ही पहले से छिपा रहता है। ऐसा होने से अनुमान में नयापन की मात्रा कम हो जाती है। आगमन इस कमी को दूर करता है। इसके आधार-वाक्यों में निष्कर्ष निहित नहीं रहता। अनुभव द्वारा प्राप्त आधार-वाक्यों से प्राप्त निष्कर्ष में नयापन रहता है।

(d) निगमन द्वारा किसी सामान्य वाक्य या नियम की स्थापना नहीं होती। यह सामान्य वाक्य को पहले ही सत्य मानकर आगे बढ़ता है। यहाँ सामान्य से विशेष की ओर अथवा अधिक व्यापक से कम व्यापक की ओर जाते हैं। आगमन विशेष तथ्यों का अवलोकन करके सामान्य वाक्य या नियम की स्थापना करता है। इससे अनुमान या तर्क का महत्त्व अधिक हो जाता है।

(e) निगमन तर्कशास्त्र का कोई आधार नहीं दीख पड़ता। बिना आधार के इसका महत्त्व उतना अधिक नहीं रहता। आगमन के दो प्रकार के आधार (grounds) हैं – आकारिक आधार (formal grounds) और वास्तविक दोनों प्रकार की सत्यता पाई जाती है।

(f) निगमन में वैज्ञानिक नियमों का सहारा नहीं लिया जाता। इसीलिए इसके निष्कर्षों में वास्तविक सत्यता एवं प्रामाणिकता का अभाव रहता है। आगमन तर्कशास्त्र इस कमी को महसूस करते हुए प्रकृति-समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम का सहारा लेता है। इसलिए इसके निष्कर्षों में विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता की मात्रा अधिक रहती है। किसी भी न्याय (syllogism) में निष्कर्ष की सत्यता उसके आधार-वाक्यों की सत्यता पर आधृत है। प्रश्न उठता है कि यह कैसे जाना जा सकता है कि आधार-वाक्य सत्य है। यदि निगमन के आधार पर आधार-वाक्य की सत्यता स्थापित की जाए तो हमारे चिंतन आकारिक मात्र रहता है और उसमें वास्तविक सत्यता का अभाव रहता है।

आगमन के आधार पर हमें वास्तविक सत्यता की प्राप्ति होती है। आगमन हमारे अनुभव पर निर्भर है। निगमन आगमन के बिना संभव प्रतीत नहीं होता। यहीं पर निगमन से आगमन में प्रवेश की आवश्यकता होती है। फ्रांसिस बेंकन आगमनात्मक विधि के प्रणेता माने जाते हैं। उनसे पूर्व अरस्तू ने निगमन को प्रतिपादित किया था। बेकन ने निगमन के आगमन में प्रवेश पर बल दिया, क्योंकि निगमन के सामान्य वाक्य आगमन से ही प्राप्त होते हैं। आगमन में वास्तविक सत्यता पर पहुँचने के लिए विशेष घटनाओं की जाँच की जाती है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि निगमन के बाद आगमन की आवश्यकता रह ही जाती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 11.
क्या स्वयंसिद्ध वाक्यों तथा निगमन के द्वारा वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हो सकती है? वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना में आगमन की क्या भूमिका है?
उत्तर:
वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना स्वयंसिद्ध वाक्यों तथा निगमन के द्वारा नहीं हो सकती –

स्वयंसिद्ध (Axioms):
कुछ ही वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयंसिद्ध होते हैं। जैसे-‘कोई वस्तु एक ही समय और स्थान में दो विरोधात्मक गुणों को नहीं रख सकती है। यह वाक्य स्वयंसिद्ध है। ऐसे वाक्य के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अधिकांश वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य (real universal proposition) स्वयं सिद्ध नहीं होते। जैसे-‘पृथ्वी में आकर्षण शक्ति’, ‘पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है’ आदि। जो वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयं सिद्ध नहीं होते, उनकी स्थापना नहीं होती है। चूंकि अधिकांश वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयं सिद्ध नहीं होते, इसलिए उनकी स्थापना स्वयंसिद्ध वाक्यों द्वारा नहीं हो सकती।

निगमन (Deduction):
एक निगमनात्मक अनुमान का आधार-वाक्य दूसरे निगमनात्मक अनुमान का निष्कर्ष होता है। उदाहरणस्वरूप यदि हमें यह प्रमाणित करना है कि ‘सभी कवि मरणशील हैं तो निगमनात्मक अनुमान के द्वारा हम इसे इस तरह प्रमाणित कर सकते हैं –

सभी मनुष्य मरणशील हैं,
सभी कवि मनुष्य हैं,
∴ सभी कवि मरणशील हैं।

लेकिन अब प्रश्न उठता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ कैसे प्रमाणित होगा ? इसे हम दूसरे निगमनात्मक अनुमान द्वारा निम्नलिखित ढंग से प्रमाणित कर सकते हैं –

सभी जानवर मरणशील हैं,
सभी मनुष्य जानवर हैं,
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

फिर प्रश्न उठता है कि ‘सभी जानवर मरणशील हैं’ कैसे प्रमाणित होगा ? निगमनात्मक अनुमान के द्वारा यह इस तरह प्रमाणित होगा –

सभी जीव मरणशील हैं,
सभी जानवर जीव हैं,
∴ सभी जानवर मरणशील हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि निगमन में एक व्यापक वाक्य की स्थापना करने के लिए दूसरे अधिक व्यापक वाक्य का सहारा लेना पड़ता है और फिर दूसरे व्यापक वाक्य को स्थापित करने के लिए तीसरे अधिक व्यापक वाक्य का सहारा लेना पड़ता है। उपर्युक्त उदाहरणों में हम देखते हैं कि ‘सभी कवि मरणशील हैं’ को प्रमाणित करने के लिए इससे अधिक व्यापक वाक्य ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ की सहायता ली गई है। फिर ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ को प्रमाणित करने के लिए इससे अधिक व्यापक वाक्य ‘सभी जीव मरणशील हैं’ का सहारा लिया गया है।

इसी तरह यदि. ‘सभी जीव मरणशील हैं’ व्यापक वाक्य को प्रमाणित करना हो, तो हम परम व्यापक वाक्य ‘संसार की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ का सहारा लेते हैं। फिर यदि यह प्रश्न उठे कि इस परम व्यापक वाक्य का क्या प्रमाण है, तो इसका उत्तर निगमनात्मक अनुमान द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस प्रकार हम पाते हैं कि सभी वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना निगमन के द्वारा नहीं हो सकती है।

आगमन की भूमिका (The role of Induction):
वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना स्वयंसिद्धि वाक्यों तथा निगमनात्मक अनुमान द्वारा नहीं हो सकती; आगमनात्मक अनुमान के द्वारा ही वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना हो सकती। आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण कार्य नियम के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना होती है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार प्रकृति का व्यवहार समान परिस्थिति में सदा समान होता है तथा कारण-कार्य नियम के अनुसार संसार में जो भी घटना घटित होती है उसका कुछ-न-कुछ कारण अवश्य होता है।

ये दोनों नियम आगमनात्मक अनुमान में प्रयुक्त होते हैं जिनके द्वारा आगमन विशेष घटनाओं के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करता है। कारण-कार्य नियम के अनुसार यदि ‘मृत्यु’ है तो उसका वास्तविक सर्वव्यापी कारण अवश्य होगा। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार प्रकृति का व्यवहार सदा समान रहता है यदि जीव है तो वह मरेगा अवश्य ही। आगमन में इन दोनों नियमों के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना की जाती है जिसकी सत्यता में कोई सन्देह नहीं रह जाता।

मानलिया कि हमें परम व्यापक वाक्य ‘संसार की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ को प्रमाणित करना है। संसार की सभी वस्तुएँ समाप्त हो जाती हैं’ – यदि यह कार्य है तो इसका कारण अवश्य ही होना चाहिए। आगमनात्मक अनुमान के द्वारा कारण निर्धारित करने का जो तरीका है उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि संसार में वस्तुओं का होना ही उनके समाप्त होने का कारण है। मनुष्य या किसी जीव का होना ही मर जाने का कारण है।

‘वस्तु’ और ‘नाशवान’ में कारण-कार्य का संबंध है-अर्थात् वस्तु है तो वह नाशवान होगी ही। ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है और यह संबंध भविष्य में भी रहेगा, क्योंकि प्रकृति समरूप है। चूंकि प्रकृति का व्यवहार समान परिस्थिति में समान होता है, यदि आज मनुष्य होना मर जाने का कारण है तो भविष्य में भी मनुष्य होना मर जाने का कारण होगा। इस तरह इन दोनों नियमों के आधार पर आगमनात्मक अनुमान के द्वारा वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना की जाती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

Bihar Board Class 11 Psychology अभिप्रेरणा एवं संवेग Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अभिप्रेरणा के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अभिप्रेरणा का संप्रत्यय इस बात पर प्रकाश डालता है कि किसी व्यक्ति के व्यवहार में गति कैसे आती है? किसी विशेष लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट सतत व्यवहार की प्रक्रिया, जो किन्हीं अंतर्नाद शक्तियों का नतीजा होती है, उसे अभिप्रेरणा कहते हैं। अभिप्रेरणा के लिए प्रयुक्त अभिप्रेरक वे सामान्य स्थितियाँ होती हैं जिनके आधार पर विभिन्न प्रकार के व्यवहारों के लिये पूर्वानुमान लगा सकते हैं। इसी कारण अभिप्रेरणा को व्यवहारों का निर्धारक माना जाता है। मूल प्रवृत्तियाँ, अंतर्नाद, आवश्यकताएँ, लक्ष्य एवं उत्प्रेरक अभिप्रेरणा के विस्तृत दायरे में आते हैं।

किसी आवश्यक वस्तु का अभाव (भूख, प्यास, तृष्णा) या न्यूनता ही आवश्यकता कहलाते हैं। आवश्यकता अन्तर्नाद (आन्तरिक बल) को जन्म देती है। किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किए गए प्रयासों अथवा उत्पन्न तनाव या उद्वेलन को अन्तर्नाद रूपी बल की तरह प्रयोग करके लक्ष्य की प्राप्ति की जाती है। लक्ष्य मिलने के बाद आवश्यकता की तीव्रता शून्य हो जाती है, प्रयास घट जाता है। अर्थात् व्यक्ति सामान्य स्थिति में पहुँच जाता है।
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चित्र: अभिप्रेरणात्मक चक्र

जैसे-एक छात्र बरसात में कीचड़ भरे रास्ते से होकर पैदल विद्यालय चला जाता है। विद्यालय जाने की इच्छा जताने का कारण किसी प्रकार के लक्ष्य की पूर्ति करना है। ज्ञान प्राप्ति, मित्र से मिलना, घर के कामों से मुक्त होना, माता-पिता को खुश करना आदि में से किसी लक्ष्य की प्राप्ति इच्छा से एक आंतरिक बल का आभास होता है जिसके प्रभाव में छात्र विद्यालय जाने को तत्पर हो जाता है। जहाँ क्रियाशील आंतरिक बल को ही अभिप्रेरणा मान सकते हैं।

अर्थात् अभिप्रेग्णा एक आन्तरिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के व्यवहार को अभीष्ट दिशा या गति के साथ बदलने के लिए शक्ति प्रदान करता है तथा किसी विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति के व्यवहार को मोड़ने का कार्य करता है। भूखे के द्वारा भोजन खोजने के लिए, प्यासे को पानी नीचे के लिए जो आन्तरिक बल उकसाता है, प्रोत्साहित करता है, उसे अभिप्रेरणा मान सकते हैं। जीवन में अधिकांश व्यवहारों की व्याख्या अभिप्रेरणा या अभिप्रेरकों के आधार पर की जाती है। अभिप्रेरक व्यवहारों का पूर्वानुमान करने में भी सहायता करते हैं।

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प्रश्न 2.
भूख और प्यास की आवश्यकताओं के जैविक आधार क्या हैं?
उत्तर:
किसी भी प्राणी की आवश्यकताएँ अंतर्नाद उत्पन्न करती है। व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति कुछ कार्य करने के अंत:प्रेरण को प्रदर्शित करता है। मूल प्रवृत्ति का एक बल यह आवेग होता है जो प्राणी को कुछ ऐसी क्रिया करने के लिए चालित करता है जो उस बल या आवेग को कम कर सके। भूख और प्यास दो प्रमुख जैविक आवश्यकताएँ हैं।

भूख:
जीवधारियों के शरीर में किसी चीज की कमी को आवश्यकता कहा जाता है। जीवन रक्षा तथा शक्ति संचार के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन की आवश्यकता को भूख का कारण माना जा सकता है। भूख लगने पर व्यक्ति को भोजन प्राप्त करने तथा उसे खाने के लिए अभिप्रेरणा करती है। भूख के उद्दीपकों में अमाशय का संकुचन, ग्लुकोज की सान्द्रता में कमी, वस्त्र के स्तर में गिरावट, ईंधन की कमी के प्रति यकृत की प्रतिक्रिया अहम भूमिका अदा करते हैं। यकृत के उपाचचयी क्रियाओं में होने वाला परिवर्तन को भूख की अनुभूति कराने वाला माना जाता है। भोज्य पदार्थों की उपलब्धता, रंग, स्वाद, उपयोग आदि भूख की तीव्रता बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं। हमारी भूख अधश्चेतक में स्थित पोषण तृप्ति की जटिल व्यवस्था, यकृत और शरीर के कुछ अन्य अंगों तथा परिवेशीय कारकों के द्वारा नियंत्रित होती है।

पाश्विक अधश्चेतक भूख संदीपन को समझता है जबकि मध्य अधश्चेतक भूख के अंतर्नाद को विरुद्ध बनाकर भूख को नियंत्रित रखता है। अतः सारांशतः यह माना जा सकता है कि भूख को शान्त करके हम जीवन की सुरक्षा के साथ संतुलित शरीर के लिए आवश्यक तत्त्वों को ग्रहण करके भूख के कारण होनेवाले कष्ट को मिटा पाने में समर्थ होते हैं। प्यास-शरीर को जब पानी की आवश्यकता महसूस होती है तो हम प्यास का अनुभव करते हैं। प्यास को जन्मजात प्रेरक माना जा सकता है।

प्यास लगने पर हमारा मुँह और गला सूखने लगता है और शरीर के उत्तकों में निर्जलीकरण की अवस्था आ जाती है। इन कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए प्यास बुझाने के लिए पानी पीना आवश्यक हो जाता है। पानी नहीं पीने से कोशिकाओं से.पानी का क्षय होना जारी हो जाता है तथा रक्त में पानी का अनुमान लगाकर घटने लगता है। पानी पी लेने के परिणामस्वरूप आमाशय में उत्पन्न उद्दीपन रुक जाता है, परसारग्राही के द्वारा निर्जलीकरण नियंत्रित हो जाता है। प्यास की अवस्था में कोई भी व्यक्ति अधिक कार्यशील बन जाता है। लार का अभाव उसे बेचैन कर देते हैं। अर्थात् प्यास की जैविक आवश्यकता के रूप में संतोषप्रद जीवन जीने के साथ-साथ निर्जलीकरण से मुक्ति के लिए उपाय ढूँढ़ना है। शरीर के उत्तकों को स्वाभाविक कार्य करते रहने के योग्य बनाया जाता है।

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प्रश्न 3.
किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताएँ कैसे प्रभावित करती हैं? उदाहरणों के साथ समझाइये।
उत्तर:
बाल्यावस्था तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य का संक्रमण काल (11 से 21 वर्ष तक की उम्र) किशोरावस्था कहलाता है। इसे जैविक तथा मानसिक दोनों ही रूप से तीव्र परिवर्तन की अवधि माना जाता है। इस अवस्था की एक मुख्य विशेषता मौन परिपक्वता है। यह भी माना जाता है कि किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं। प्रयत्न-त्रुटि उपागम के विपरीत समस्या समाधन करने में किशोरों का चिंतन अधिक व्यवस्थित होता है। किशोर वैकल्पिक नैतिक संहिता को भी जानते हैं। किशोरों के व्यवहारों में लचीलापन, प्रदर्शन, प्रतियोगिता जैसी भावनाओं का प्रभाव देखने को मिलता है। किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताओं को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

1. उपलब्धि अभिप्रेरक:
उत्कृष्टता के मापदंड को प्राप्त कर लेने की आवश्यकता उपलब्धि अभिप्रेरक कहलाते हैं। किशोर अपने माता-पिता, मित्र, पड़ोसी, शुभचिंतक जैसे व्यवहार-निपुण लोग से प्रेरित होकर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का उपयोग करके व्यवहारों का अर्जन तथा निर्देशन की युक्ति सोखते हैं। उपलब्धि को पाने के लिए किशोर चुनौती भरे कठिन कार्यों को भी पूरा कर लेना चाहते हैं। जैसे-वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए किशोर अध्ययन के विकास के लिए तरह-तरह के प्रस्तावों का अध्ययन करते हैं, साथियों से सहयोग माँगते हैं।

माता-पिता से उचित परामर्श तथा आर्थिक सहयोग चाहते हैं। कई समस्याओं से घिरे होने पर भी किशोर अपने संकल्प की दृढ़ता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते हैं। अंत में वे वर्ग में प्रथम स्थान पाकर स्वयं तो खुश होते ही हैं और वे प्रशंसा के शब्द भी सुनते हैं। अर्थात् किशोर अपने व्यवहारों में किसी भी तरह का परिवर्तन स्वीकारते हैं जिससे उनका लक्ष्य उपलब्धि के रूप में उन्हें अवश्य मिल जाए।

2. संबंधी:
समूहों का निर्माण मानव व्यवहार की एक विशेषता होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किशोर का प्रयास किस प्रकार से संबंध बनाना होता है। किशोर कभी भी अकेला रहना पसंद नहीं करता है। सच तो यह है कि दूसरों को चाहना तथा भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से उनके निकट आने की चाह को संबंधन माना जाता है। संबंधन में सामाजिक सम्पर्क की अभिप्रेरणा अंतनिर्हित होती है। संबंधन की आवश्यकता उस समय उद्दीपन कहलाती है जब कोई किशोर अपने को खतरे में अथवा असहाय अवस्था में पाता है। कभी-कभी अपनी खुशी को प्रकट करने केलिए भी संबंधन की आवश्यकता महसूस करते हैं।

किशोरों को ऐसे अवसर आते हैं जब वे मित्रातापूर्ण संबंधन के महत्त्व मानते हैं। जैसे, मोटरसायकिल से गिरने के बाद उसे मानव सहायता की आवश्यकता होती है। नौकरी पाने के लिए सही स्थान या मार्गदर्शन बतलाने वाले मित्रों की आवश्यकता होती है। सफलता के कारण मिलने वाले पदक को दिखलाने या अपनी कविता को सुनाने हेतु मित्रों की याद आती है। किसी भी कठिन परस्थितियों (चोर, आतंकवादी, चेकिंग) में किशोर संबंधन का उपयोग करना चाहता है।

3. शक्ति अभिप्रेरक:
शक्ति की आवश्यकता व्यक्ति की वह योग्यता है जिसके कारण वह दूसरों के संवर्गों तथा व्यवहारों पर अभिप्रेत प्रभाव डालता है। डेविड मैकक्लीलैंड ने शक्ति अभिप्रेरक की अभिव्यक्ति के चार सामान्य बताए हैं –

(क) शक्ति पर बाहरी स्रोतों का प्रभाव
(ख) शक्ति पर व्यक्ति को आंतरिक क्षमता का प्रभाव
(ग) शक्ति के प्रयोग में प्रदर्शन की झलक
(घ) संगठन के द्वारा शकित प्रदर्शन का प्रभाव अर्थात् किशोर अपनी शक्ति को समझने के लिए बाहरी साधनों का उपयोग करता है।

जैसे, पत्र-पत्रिकाओं में छपे स्तंभों के पढ़कर किसी लोकप्रिय व्यक्ति के सम्बन्ध में सब कुछ जान लेना चाहता है। कभी-कभी किशोर शारीरिक गठन करके अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना चाहता है। इसमें किशोरों को भावना या संवेग पर नियंत्रण रखना के समीप होता है। प्रतियोगिता, खेल, परीक्षा, इन्टरव्यू, राजनीतिक दल जैसी विभिन्न स्थितियों में किशोर अपनी योग्यता, समझ अथवा निर्णय को सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहता है ताकि लोग उससे प्रभावित हो जाएँ। अर्थात् किशोरों के व्यवहार में नया मोड़ लाने के लिए उपलब्धि (जैसे-एम. ए. की डिग्री), संबंधन (मित्र या शुभचिंतक) और शक्ति, (प्रभाव और प्रदर्शन) की आवश्यकता वांछनीय प्रतीत होती है।

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प्रश्न 4.
मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार क्या हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘भूखे भजन न होय गोपाला’ अर्थात् भोजन की तुलना में भजन निरर्थक है चाहे वह कितना भी गरिमामयी क्यों न हो। मैस्लो ने भी आवश्यकताओं को महत्त्व के आधार पर श्रेणीबद्ध करके बतलाना चाहा है कि जीवन निर्वाह के लिए मूल शरीर क्रियात्मक मूल आवश्यकता है। मैस्लो का पिरामिड संप्रतययित रूप है एक लोकप्रिय मॉडल का जिसमें पदानुक्रम के तल में मूल जैविक आवश्यकताओं को जगह मिली है।
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चित्र: अभिप्रेरणात्मक चक्र

मैक्लो (1968, 1970) ने मानव व्यवहार को चित्रित करने के लिए आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित किया है। आवश्यकताओं की व्यवस्था से पता चलता है कि मानव अपने स्वभाव से महत्त्वाकांक्षी होता है। भूख समाप्त होते ही वह सुरक्षा की चिन्ता करने लगता है। सुरक्षा की उचित व्यवस्था पाकर वह शुभचिंतकों का समूह पाना चाहता है। इसके बाद सम्मान और आत्मसिद्धि की इच्छा जागती है। मैस्लो के पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार बहुत ही स्वाभाविक है। पदानुक्रम में व्यवस्थित निम्न स्तर की आवश्यकता जब नहीं हो जाती तब तक कोई व्यक्ति उच्चस्तरीय आवश्यकता की ओर सोचता तक नहीं है। किसी आवश्यकता की पूर्ति से ज्योंहि व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि उच्चस्तरीय आवश्यकता उसकी चिंता का कारण बन जाती है।

जैसे, भूखे व्यक्ति को रडियो नहीं चाहिए, क्योंकि वह तो रोटी की खोज में व्यस्त है। खा-पीकर जब आदमी संतुष्ट हो जाता है तो उसे मनोरंजन, नाच-गाना सभी कुछ अच्छा लगने लगता है। एक व्यक्ति टमटम चलाता है। सबसे पहले उसे यात्री मिलने की चिन्ता रहती है। ज्योहि उसे एक साथ पाँच यात्री मिल जाते हैं तो वह घर से मिलने के बारे में सोचने लगना है। घर के बच्चे के लिए मिठाई का चयन उसे परेशान कर देते हैं। जब मिठाई लेकर घर पहुँचता है तो किवाड़ नहीं बंद हो सकने की चिन्ता हो जाती है। अत: उसकी चिन्ता बदलती रहती है लेकिन वह पूर्णतः समाप्त नहीं हो पाती है।

प्रश्न 5.
क्या शरीर क्रियात्मक उद्वेलन सांवेगिक अनुभव के पूर्व या पश्चात घटित होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक एवं परिष्कृत उपकरणों की सहायता से शरीर क्रियात्मक परिवर्तनों (क्रोध से शरीर का काँपना, पसीना निकलना, हृदय गति का तेज होना) का यथार्थ मापन किया जा सकता है जो संवेग की शरीर क्रियात्मक सक्रियकरण की श्रृंखला पर निर्भर करता है, जिसमें चेतक, अधश्चेतक, उपवल्कुटीय व्यवस्था का प्रमस्तिष्कीय वल्कुट महत्त्वपूर्ण रूप से अंतर्निहित हो जाते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी विचार या घटना के बारे में सोचते ही उत्तेजित या क्रुद्ध होते हैं तो उसकी हृदय गति बढ़ जाती है। मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में चयनात्मक सक्रियकरण, भिन्न-भिन्न संवेगों का उद्वेलन प्रदर्शित करता है।

जेम्स लांजे सिद्धांत के अनुसार पर्यावरणी उद्दीपक हृदय या फेफड़े जैसे आंतरिक अंग में शरीर क्रियात्मक अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो पेशीय गति से सम्बद्ध होते हैं। जैसे अचानक तीव्र शोर या उच्च तीव्रता वाली ध्वनि सुनने के साथ ही अंत- संगी तथा पेशीय अंगों में सक्रियकरण उत्पन्न हो जाता है जिसका अनुसरण संवेगात्मक उद्वेलन करता है। जेम्स लांजे का तर्कना कि शारीरिक परिवर्तनों का व्यक्ति द्वारा किया गया प्रत्यक्षण (साँस का तेज होना, अंगों का हिलना) संवेगात्मक उद्वेलन उत्पन्न करता है। अर्थात् विशिष्ट घटनाएँ या उद्दीपक विशिष्ट शरीर क्रियात्मक परिवर्तनों के उत्तेजित करती है जो प्रत्यक्षण और संवेगों की अनुभूति से ताल-मेल करता है।

कैननबार्ड सिद्धांत के अनुसार संवेगों की सारी प्रक्रिया की मध्यस्थता चेतक के द्वारा की जाती है जो कि संवेग उद्दीपक करने वाले उद्दीपकों के प्रत्यक्षण के पश्चात् यह सूचना सहकालिक रूप से प्रमस्तिष्कीय वल्कुट, कंकाल पेशियों तथा अनुरूपी तंत्रिका तंत्र को देता है। इसके बाद प्रत्यक्षित अनुभव की प्रकृति का पता लगाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका के द्वारा शरीर की क्रियात्मक उद्वेलन उत्प्रेरित होता है। आजकल जेम्स-लांजे सिद्धांत की अपेक्षा कैननबार्ड सिद्धांत पर ज्यादा विश्वास किया जाता है। कैननबार्ड सिद्धांत के अनुसार अत: अनुकंपी एवं परानुकंपी तंत्र यद्यपि परस्पर विरोधी तरीके से कार्य करते हैं, किन्तु वे संवेगों के अनुभव और अभिव्यक्ति की प्रक्रिया को पूरा करने में परस्पर पूरक हैं।
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चित्र: कैनन-बार्ड का संवेग सिद्धांत

अर्थात् अन्ततः यही सच है कि संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार साथ-साथ होता है। कैननबार्ड ने भी माना है कि सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों साथ-साथ होता है। स्टैनली शैक्टर तथा जेरोम सिंगार ने संवेगों के द्विकारक सिद्धांत के माध्यम से माना है कि हमारे संवेगों में शरीर क्रियात्मक समानता होती है, क्योंकि हृदय तभी धड़कता है जब हम भयभीत होते हैं।

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प्रश्न 6.
क्या संवेगों की चेतन रूप से व्याख्या तथा नामकरण करना उनको समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है? उपयुक्त उदाहरण देते हुए चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हमारे संज्ञान अर्थात् हमारे प्रत्यक्षण, स्मृतियाँ एवं व्याख्याएँ हमारे संवेग के आवश्यक हैं। संवेग और उसके कारण और प्रभाव का पता बताने के लिए संवेगात्मक क्रिया-कौशल की व्याख्या संवेगों को स्पष्टतः समझने में सहायक होता है। स्टैनली शैक्टर तथा जेरोम सिंगर ने शारीरिक और संज्ञानात्मक संवेगों का अध्ययन कर बताया कि संवेगों की अनुभूति हमारे तात्कालिक उद्वेलन के प्रति जागरुकता के द्वारा उत्पन्न होती है। उन दोनों का मत है कि किसी संवेगात्मक अनुभव के लिए उद्वेलन की चेतना व्याख्या की आवश्यकता होती है।

माना कोई व्यक्ति किसी कविता की रचना करके श्रोता को संगीत-स्वर में सुनाता है। वह अपनी करनी से बहुत खुश और गौरवान्वित है। इसी क्रम में कोई श्रोता उसके प्रयास को फूहर प्रदर्शन कह डाला। व्यक्ति, श्रोता और आलोचना के बीच संवेगात्मक दशा में अंतर आना स्वाभाविक है। हमें इसके कारण, प्रभाव और परिणाम की स्पष्ट जानकारी के लिए सम्पूर्ण घटना की विस्तृत व्याख्या करनी चाहिए।

इसी आवश्यकता अथवा प्रयास के सम्बन्ध में शैक्टर तथा सिंगर (1962) ने प्रतिभागियों को उच्च स्तर का उद्वेलन उत्पन्न करने वाली दवा ‘एपाइनफ्राइन’ की सूई देकर उसे दूसरे से व्यवहारों का प्रेक्षण करने को कहा गया। प्रेक्षण के क्रम में उल्लासोन्माद को व्यक्त करने वाला रद्दी को टोकरी पर कागज फेंक कर अपनी खुशी को व्यक्त किया तथा दूसरा क्रोध का प्रदर्शन करते हुए पैर पटकते हुए कमरे से बाहर निकल गया। इस तरह का व्यवहार संवेगों की चेतना व्याख्या का अवसर जुटा दिया।

संवेगों का नामकरण-कुछ मूल संवेग (भूख, प्यास) सभी लोगों में समान रूप से अभिव्यक्ति का अवसर देता है। चाहे व्यक्ति किसी उम्र, जाति या श्रेणी का हो किन्तु कुछ संवेग विशिष्ट होते हैं। विशिष्ट संवेगों के लक्षणों पर पर्यावरण, स्थान, समझ तथा संस्कार का प्रभाव मिलता है। जैसे-सुख, दुख, प्रसन्नता, क्रोध, घृणा आदि को मूल संवेग और आश्चर्य, अवमानना, शर्म तथा अपराध को विशिष्ट संवेग के रूप में जाना जाता है। क्योंकि भारत में जिस क्रिया के लिए शर्म या आश्चर्य प्रकट किया जाता है, अमेरिका में उसे आधुनिकता मान-लिया जाता है।

संवेगों के स्वरूप की सही पहचान के लिए उनका नामकरण वांछनीय है। जैसे–पत्र-पत्रिकाओं से लगभग दो सौ चित्रों को काटकर उन्हें कूट पर चिपका कर चित्रकार्ड का रूप दे दिया गया। अब उन्हें अलग-अलग संवेगों पर आधारित चित्रों का समुच्चय बना लिया गया। माना हँसता हुआ 20 कार्ड, रोता हुआ 50 कार्ड, क्रोध का मुद्रा वाला 80 चित्र तथा अन्यान्य मुद्रा वाले शेष चित्रों का समूह बनाकर संचित कर लिया गया। अब हमें किस समूह की आवश्यकता है उसे बिना नामकरण का कैसे व्यक्त करना संभव है। अर्थात् संवेगों की चेतन रूप से व्याख्या तथा नामकरण करना उन्हें समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 7.
संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
संवेगों की अभिव्यक्ति में पूरी शक्ति से प्रभाव डालती है। चूंकि संवेग एक आन्तरिक अनुभूति होती है, अतः संवेगों का अनुमान वाचिक तथा अवाचिक अभिव्यक्तियों के द्वारा ही होती है। वाचिक तथा अवाचित अभिव्यक्तियाँ संचार माध्यम का कार्य करती हैं। संचार के वाचिक माध्यम में स्वरमान और बोली का ऊँचापन, दोनों सन्निहित होते हैं।

अवाचिक माध्यकों में चेहरे का हाव-भाव, मुद्रा, भंगिमा तथा शरीर की गति तथा समीपस्थ व्यवहार शामिल रहते हैं। चेहरे के हाव-भावों से होने वाली अभिव्यक्ति सांवेगिक संचार का सबसे अधिक प्रचलित माध्यम है। व्यक्ति के संवेगों का सुखद या दुखद होना, क्रोधित होना, काफी खुश रहना, गौरव महसूस करना, आदि चेहरे को देखकर समझा जा सकता है। भूख द्वारा अभिव्यक्तियों में हर्ष, भय, क्रोध, विरुचि, दुख तथा आश्चर्य आदि जन्मजात तथा सार्वभौम होती है।

शारीरिक गति अर्थात् हाथ:
पैर हिलाना, संवेगों के संचार को अधिक सरल बना देती है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य शरीर की गति के माध्यम से अपनी भावनाओं को सरलता से पेश करने में समर्थ होता है। संवेगों में अन्तर्निहित प्रक्रियाएँ संस्कृति द्वारा काफी प्रभावित होती हैं। स्मृति शोध, मुख की अभिव्यक्ति, जटिलता से मुक्त प्रदर्शन आदि संवेगों का स्वाभाविक चित्र दिखाते हैं। संवेग के आत्मनिष्ठ अनुभव तथा प्रकट अभिव्यक्ति के बीच मुख का प्रदर्शन एक कड़ी का काम करता है।

संवेगों की अभिव्यक्ति में अन्य अवाचिक माध्यमों का प्रभावों भी असरदार होती है। जैसे-टकटकी लगाकर देखने, तरह-तरह की चेष्टा (शारीरिक भाव) का प्रदर्शन, पराभाषा तथा समीपस्थ व्यवहार इत्यादि के माध्यम से भी संवेगों की अभिव्यक्त की जा सकती है। चीन में ताली बजाना आकुलता या निराशा का सूचक है तथा क्रोध को विचित्र हँसी के द्वारा व्यक्त किया जाता है। भारत में मौन रहकर गहरे संवेग को अभिव्यक्ति किया जाता है। संवेगात्मक आदान-प्रदान के दौरान, शारीरिक दूरी (सान्निध्य) विभिन्न प्रकार के संवेगात्मक अर्थों को व्यक्त करती है।

जैसे- भारत के लोग खुशी जाहिर करने के लिए गले मिलते हैं। स्पर्श से संवेगात्मक उष्णता का बोध होता है। कभी विमुखता महसूस करने वाला व्यक्ति दूर से ही अंतःक्रिया करना चाहता है। सारांशतः माना जा सकता है कि संवेगों की अभिव्यक्ति में संस्कृति का प्रबल योगदान है। यह सच है कि संस्कृति की भिन्नता के कारण स्थान बदलने से उनके अर्थ एवं विधियाँ बदल जाते हैं। संवेगों की अभिव्यक्ति मुख, संकेत, हाव-भाव तथा शारीरिक क्रिया के माध्यम से सरलता से संभव होता है। जैसे-कृपया कहने वाला, गाली देने वाले से अलग-संवेग का प्रदर्शन करता है।

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प्रश्न 8.
निषेधात्मक संवेगों का प्रबंधन क्यों महत्त्वपूर्ण है? निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय सुझाएँ।
उत्तर:
संवेग हमारे दैनिक जीवन तथा अस्तित्व के अंश हैं एवं संवेग एक सांतात्मक के प्रमुख हिस्सा बनकर हमें तरह-तरह के अनुभवों से परिचित कराता है। दैनिक जीवन में कई द्वन्द्वात्मक दशाओं तथा कठिन और दबावमय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। भय, दुश्चिता, विरुचि जैसी प्रवृत्ति उत्पन्न होकर निषेधात्मक संवेग के घनत्व को बढ़ा देती है।

यदि निषेधात्मक संवेगों को लम्बी अवधि तक किनारों के अनवरत चलते रहने दिया जाए, तो सम्बन्धित व्यक्ति के शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। हीनता की भावना, द्वेष, क्रोध, चिड़चिड़ापन, रक्तचाप, भोजन से अरुचि जैसी विषय तथा कष्टदायक स्थिति उत्पन्न होने लगती है। संवेगों के उत्तम प्रबंधन के द्वारा निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक संवेगों (भरोसा, आशा, खुशी, सर्जनात्मकता, साहस, उमंग, उल्लास) में वृद्धि लाने का प्रयास करना प्रमुख लक्ष्य माना जाता है।

क्रोध, भय, दुश्चिता, असमर्थता, हीनता की भावना जैसे निषेधात्मक संवेगों से मौन मुक्ति तथा क्रियाकलापों को आशा, उत्साह, खुशी, उमंग आदि से जोड़कर पूरा कर लेने की प्रवृत्ति का सराहनीय विकास निषेधात्मक संवेगों से उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं मानसिक विकारों से यथासंभव मुक्ति मिल सकती है। आजकल सफल संवेग प्रबंधन को प्रभावी सामाजिक प्रबंधन का मुख्य आधार माना जा रहा है ताकि समाज में मनोविकार वाले व्यक्तियों की संख्या में होने वाली वृद्धि को रोका जा सके।

निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय-निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक संवेगों में वृद्धि करके वांछित प्रबंधन को सुपरिणामी और सार्थक स्वरूप प्रदान किया जा सकता है जिसके लिए निम्नलिखित युक्तियाँ सफल हो सकती हैं –

1. आत्म-जागरुकता में वृद्धि:
किसी भी परिस्थिति को समझकर उससे संबंधित धनात्मक या ऋणात्मक प्रभावों को जानने तथा उसके प्रति अनुकूलता प्रदर्शित करने के लिए सदा जागरुक रहना खतरा से मुक्ति दिलाने में तथा संभावित लाभप्रद परिणामों के सदुयोग में सरल मार्ग मिल जाता है।

2. परिस्थिति की सम्पूर्ण पहचान:
कोई परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई, इसका क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसका उपयोग किस स्थिति में लाभप्रद या हानिकारक होगा जैसे जिज्ञासु प्रश्नों के. सही उत्तर जानकर उत्पन्न परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने की प्रवृत्ति को बढ़ाना चाहिए।

3. आत्म-परीक्षण:
व्यक्ति को अपनी दक्षता, कौशल या योग्यता का सही अनुमान होना चाहिए। अपने विचारों तथा कला-कौशल को पहचानकर उसके सही प्रयोग की ओर उचित ध्यान देने से ऋणात्मक प्रभाव से मुक्ति मिल सकती है।

4. ऋणात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति:
अपने आपको आत्मग्लानि, भय, चिंता, अवसाद जैसी भावनाओं से मुक्त रखकर सृजनात्मक कार्यों में जुट जाइए। अपनी रुचि या शौक के अनुसार किसी अच्छे कार्य का चयन करके उसे पूरा करने में व्यस्त रहिए।

5. शुभचिंतकों की संख्या में वृद्धि:
अपनी भाषा एवं व्यवहार से लोगों को प्रभावित करके उन्हें शुभचिंतकों की श्रेणी में लाकर लाभ उठाने का प्रयास कीजिए।

6. उत्तम आदत:
पूजा, व्यायाम, निद्रा, सफाई, भोजन आदि से संबंधित अच्छी आदतों को अपनाकर शेष व्यक्तियों के लिए आदर्श बन जाइए। लोगों की प्रशंसा, खुशामद, श्रद्धा के कारण आपका मनोबल बढ़ेगा और आपकी सोच सर्जनात्मक हो जाएगी।

निषेधात्मक संवेगों के कुप्रभाव से बचाने के लिए सबसे सरल उपाय है कि किसी भी प्रभाव को आप स्वाभाविक क्रिया मानकर स्वीकार कीजिए। यह मानकर चलिए कि बहुत से लोग हैं जो हारते हैं, बहुतों के घर में चोरी हुई है। आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सहयोग, परोपकार, दया, कर्मठता, चिंतन आदि को अपने जीवन में जगह देकर आप अपनी जिन्दगी को गति दे सकते हैं। जमाना बदल रहा है, आप भी बदलिये। किसी को दोषी मानने के पहले, अपनी गलतियों को पहचानिये। अभ्यास और चिंतन समस्याओं से निबटने का महामार्ग है।

Bihar Board Class 11 Psychology अभिप्रेरणा एवं संवेग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेरणा से उत्पन्न व्यवहार कब तक जारी रहता है?
उत्तर:
प्रेरणा से उत्पन्न व्यवहार प्रोत्साहन की प्राप्ति तक जारी रहता है।

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प्रश्न 2.
प्रेरणा प्राणी की किस प्रकार की अवस्था है?
उत्तर:
प्रेरणा प्राणी की आन्तरिक अवस्था है जो व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
प्रेरणा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रेरणा एक आन्तरिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करती है तथा किसी विशेष उद्देश्य की ओर व्यवहार को ले जाती है।

प्रश्न 4.
प्रेरण-चक्र क्या है?
उत्तर:
आवश्यकता-प्रणोदन और प्रोत्साहन-सूत्र को प्रेरण-चक्र कहते हैं।

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प्रश्न 5.
प्रेरणा की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
प्रेरणा की उत्पत्ति आवश्यकता से होती है।

प्रश्न 6.
संवेग की उत्पत्ति किस ढंग से होती है?
उत्तर:
संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक ढंग से होती है।

प्रश्न 7.
संवेग में क्या सन्निहित होता है?
उत्तर:
संवेग में चेतन अनुभव व्यवहार और अन्तरावयव संबंधी कार्य सन्निहित होता है।

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प्रश्न 8.
संवेग की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
संवेग सतत होता है, संवेग सम्पूर्ण रूप से होता है, संवेग संचयी होता है तथा संवेग का स्वरूप प्रेरणात्मक होता है।

प्रश्न 9.
संवेग का कौन सिद्धांत है जिसमें हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र माना गया है?
उत्तर:
कैनन-बार्ड ने अपने सिद्धांत में हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र माना है।

प्रश्न 10.
वाटसन ने किस संवेग को मौलिक माना है?
उत्तर:
वाटसन ने क्रोध, भय और प्रेम को मौलिक संवेग माना है।

प्रश्न 11.
विलियन जेम्स और कार्ल कहाँ के निवासी थे?
उत्तर:
विलियन जेम्स अमेरिका तथा कार्ल लाँजे डेनमार्क के निवासी थे।

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प्रश्न 12.
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के विरोध में किस सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ है?
उत्तर:
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के हाइपोथैलेमिक सिद्धांत का प्रतिपादन कैनन-बार्ड ने किया है।

प्रश्न 13.
जेम्स-लाँजे के अनुसार संवेग का क्रम क्या है?
उत्तर:
जेम्स-लाँजे के अनुसार सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद शारीरिक परिवर्तन और अन्य में संवेगात्मक अनुभूति होती है।

प्रश्न 14.
कैनन-बार्ड के अनुसार संवेग का क्रम क्या है?
उत्तर:
कैनन-बार्ड के अनुसार सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों साथ-साथ होता है।

प्रश्न 15.
प्रो. मैस्लो द्वारा आवश्यकता के सम्बन्ध में दिये गये विचार को बतायें।
उत्तर:
प्रो. मैसलो ने आवश्यकता पर अधिक बल दिया। उसने आवश्यकता की तीव्रता को आधार बनाया है। उनके अनुसार कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना होता है। कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जो फुर्सत से पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 16.
प्रो. मैस्लो ने अभिप्रेरकों को कितने भागों में बाँटा है?
उत्तर:
प्रो. मैस्लो ने अभिप्रेरकों को दो भागों में बाँटा है-जन्मजात अभिप्रेरक और अर्जित अभिप्रेरक।

प्रश्न 17.
प्रेरकों का द्वन्द्व क्या है?
उत्तर:
प्रेरकों का द्वन्द्व का अर्थ उस अवस्था से है जिसमें दो से अधिक बेमेल व्यवहार प्रकट होते हैं जो एक समय में पूर्ण रूप से संतुष्टि नहीं पा सकते।

प्रश्न 18.
प्रेरणा की विफलता क्या है?
उत्तर:
मनुष्य को कभी-कभी विलम्ब से लक्ष्य की प्राप्ति होती है। कभी-कभी अपने बहुत प्रयासों के बाद भी व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति नहीं कर पाता है। इसे ही प्रेरणा की विफलता कहते हैं।

प्रश्न 19.
सम्प्रत्यय क्या है?
उत्तर:
सम्प्रत्यय व्यक्ति के मानसिक संगठन में एक प्रकार का चयनात्मक तंत्र है जो पूर्व अनुभूतियों तथा वर्तमान उत्तेजना में एक संबंध स्थापित करता है।

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प्रश्न 20.
संचार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भाषा, संकेत एवं चिह्नों आदि के माध्यम से अपने चिंतन एवं विचार को दूसरों तक पहुँचाने एवं दूसरों के चिंतन एवं विचार से अवगत होना ही संचार है।

प्रश्न 21.
अन्तर्नाद या प्रणोदन क्या हैं?
उत्तर:
अन्तर्नोद या प्रणोदन एक ऐसी अवस्था है, जिससे प्राणी में क्रियाशीलता आती है और उसका व्यवहार एक निश्चित दिशा की ओर क्रियाशील हो जाता है।

प्रश्न 22.
प्रेरणा में प्रोत्साहन क्या है?
उत्तर:
प्रोत्साहन एक बाह्य लक्ष्य या वस्तु है, जिससे ऐसी उत्तेजना प्राप्त होती है जो प्राणी को लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है और जिससे आवश्यकताओं की संतुष्टि होती है।

प्रश्न 23.
प्रेरणा कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
अभिप्रेरकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-जन्मजात अभिप्रेरक तथा अर्जित अभिप्रेरक।

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प्रश्न 24.
जैविक अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
जैविक या जन्मजात अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो प्राणी में जन्म के समय से ही वर्तमान रहता है।

प्रश्न 25.
सामाजिक या अर्जित अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामाजिक या अर्जित अभिप्रेरक से तात्पर्य उन प्रेरकों से है, जिसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अर्जित करता है; क्योंकि इसके अभाव में उसका सामाजिक जीवन अर्थहीन हो जाता है।

प्रश्न 26.
जैविक अभिप्रेरक कौन-कौन हैं?
उत्तर:
जैविक अभिप्रेरक के अन्तर्गत भूख, प्यास, यौन, मातृक प्रणोदन आदि आते हैं।

प्रश्न 27.
अर्जित प्रेरक के अन्तर्गत कौन-कौन प्रेरक आते हैं?
उत्तर:
अर्जित प्रेरक के अन्तर्गत सामुदायिक, अर्जनात्मकता, कलह, आत्म स्थापना आदि आते हैं।

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प्रश्न 28.
उपलब्धि अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
उपलब्धि अभिप्रेरक से तात्पर्य श्रेष्ठता का एक खास स्तर प्राप्त करने की इच्छा से है।

प्रश्न 29.
कोई व्यक्ति किस प्रकार के अभिप्रेरक के कारण विभिन्न परिस्थितियों में कठोर श्रम करेगा?
उत्तर:
कोई व्यक्ति तीव्र उपलब्धि अभिप्रेरक के कारण विद्यालय में, खेल में, संगीत में तथा अन्य कई भिन्न परिस्थितियों में कठोर श्रम करेगा।

प्रश्न 30.
आवश्यकता की उत्पत्ति कब होती है?
उत्तर:
मानव जीवन के लिए किसी वांछनीय वस्तु का अभाव या न्यूनता आवश्यकता की उत्पत्ति का कारण होता है।

प्रश्न 31.
यादृच्छिक क्रिया-कलाप को किसके कारण ऊर्जा उपलब्ध होती है?
उत्तर:
आवश्यकता के कारण उत्पन्न तनाव या उद्वेलन के रूप में जो अंतर्नाद जन्म लेता है, उसी के कारण यादृक्षिक क्रिया-कलाप को ऊर्जा मिलती है।

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प्रश्न 32.
अभिप्रेरक के दो प्रकार क्या हैं?
उत्तर:

  1. जैविक तथा
  2. मनोसामाजिक अभिप्रेरक।

प्रश्न 33.
सामान्य मानवीय मूल प्रवृत्ति के चार उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. जिज्ञासा
  2. पलायन
  3. प्रतिकर्षण और
  4. प्रजनन।

प्रश्न 34.
भूख की अनुभूति को तीव्र बनाने में किन बाह्य कारकों का हाथ होता है?
उत्तर:
भोजन का स्वाद, रंग, सुगंध तथा दूसरे को भोजन करते हुए देखना आदि खाने की इच्छा को बढ़ाने वाले कारक हैं।

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प्रश्न 35.
जैविक प्रेरकों का मापन किस विधि से होता है?
उत्तर:
जैविक प्रेरक को मापने की कई विधियाँ हैं जिनमें पसंद विधि, अवरोधन विधि, शिक्षण विधि, क्रिया पिंजड़ा विधि आदि मुख्य हैं।

प्रश्न 36.
संवेग की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
संवेग व्यक्ति में एक तीव्र उपद्रव की अवस्था है, जिसका प्रभाव उस पर संपूर्ण रूप से पड़ता है । इसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक ढंग से होती है और जिसमें चेतन अनुभव, व्यवहार और अन्तरावयव संबंधी कार्य सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 37.
प्रभावशाली संचार की बाधाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वैसे कारक जो संचार को प्रभावशाली बनने में बाधा उत्पन्न करती है उसे संचार की बाधाएँ कहा जाता है।

प्रश्न 38.
प्रभावशाली संचार की बाधाएँ क्या हैं?
उत्तर:
सूचना में अस्पष्टता, ग्रहणकर्ता के क्षमता की सीमाएँ, भौतिक बाधाएँ, माध्यम में गुणवत्ता का अभाव, वैयक्तिक बाधाएँ आदि प्रभावशाली संचार की बाधाएँ हैं।

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प्रश्न 39.
संचार स्रोत की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर:
संचार स्रोत की विशेषताओं में विश्वसनीयता, आकर्षण तथा समानता आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 40.
संचार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
सूचना भेजने वाले तथा सूचना प्राप्त करने वाले के बीच विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम को संचार कहा जाता है।

प्रश्न 41.
प्रभावशाली संचार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जिस संचार से लक्ष्य की प्राप्ति हो उसे प्रभावशाली संचार कहा जाता है।

प्रश्न 42.
संचार के माध्यम क्या हैं?
उत्तर:
संचार के माध्यम का मतलब यह होता है कि सूचना किस तरह से स्रोत द्वारा व्यक्ति या सूचना प्राप्तकर्ता को दिया जाता है।

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प्रश्न 43.
द्विवैयक्तिक संचार किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब दो व्यक्तियों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है तो उसे द्विवैयक्तिक संचार कहते हैं।

प्रश्न 44.
संचार को कितने भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
संचार को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है-शाब्दिक संचार एवं अशाब्दिक संचार।

प्रश्न 45.
अशाब्दिक संचार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अशाब्दिक संचार का मतलब वैसे संचार से है जिसमें व्यक्ति अशाब्दिक संकेतों का उपयोग कर अपने विचारों एवं भावों को अभिव्यक्त करता है।

प्रश्न 46.
शाब्दिक संचार किसे कहते हैं?
उत्तर:
शाब्दिक संचार उस संचार को कहते हैं जिसमें विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति लिखित या मौखिक रूप से शब्दों या वाक्यों को बोलकर किया जाता है।

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प्रश्न 47.
आनन अभिव्यक्ति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
चेहरे में परिवर्तन के आधार पर अपने भावों को अभिव्यक्त करना आनन अभिव्यक्ति है।

प्रश्न 48.
संचार की प्रभावशीलता को कौन-कौन कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सूचना को विषय-वस्तु स्रोत की विशेषता, संचार का माध्यम, ग्रहणकर्ता की विशेषताएँ संचार की प्रभावशीलता. को प्रभावित करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आवश्यकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी भी अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की उत्पत्ति आवश्यकता (need) से होती है। प्राणी के शरीर में किसी चीज की कमी या अति की अवस्था को आवश्यकता (need) कहा जाता है। जब व्यक्ति के शरीर में पानी की कमी हो जाती है तब उसमें प्यास की आवश्यकता (need) का अनुभव होता है। उसी तरह जब शरीर में अनावश्यक चीजों जैसे मल-मूत्र का जमाव अधिक हो जाता है तब मल-मुत्र त्यागने की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

ये सभी जैविक आवश्यकता (biological need) के उदाहरण हैं। इन जैविक आवश्यकताओं के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक आवश्यकता (Psychological need) भी होते हैं। जैसे, धन कमाने की आवश्यकता, सामाजिक प्रतिष्ठा पाने की आवश्यकता, स्नेह पाने की आवश्यकता मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के उदाहरण हैं जिनसे भी व्यक्ति का व्यवहार अभिप्रेरित होता है।

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प्रश्न 2.
अभिप्रेरणा का अर्थ बतायें।
उत्तर:
अभिप्रेरणा एक ऐसा आंतरिक बल (intermal force) होता है जो व्यक्ति को किसी उद्देश्य (goal) की ओर व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे, एक भूखे व्यक्ति का उदाहरण लें। भूखे व्यक्ति को होटल या किसी ऐसी जगह जहाँ उसे भोजन मिल सकता है, की ओर ले जाता है। जबतक उसे भोजन नहीं मिल जाता है, उसका व्यवहार भोजन खोजने में लगा रहता है।

इस उदाहरण में भूख आवश्यकता (need) है। इससे व्यक्ति में जो तनाव (tension) की अवस्था उत्पन्न होती है जिसके कारण वह भोजन ढूँढने का व्यवहार करता है, प्रणोद (drive) कहलाता है। भोजन एक प्रोत्साहन (incentive) है जिसके पाने से प्रणोद में कमी तथा आवश्यकता की तुष्टि हो जाती है। इस तरह, प्रत्येक अभिप्रेरण में आवश्यकता-प्रणोद-प्रोत्साहन (need-drive-incentive) का एक क्रम पाया जाता है।

प्रश्न 3.
जन्मजात अभिप्रेरक का अर्थ उदाहरण सहित बताएँ।
उत्तर:
जन्मजात अभिप्रेरक से तात्पर्य वैसे अभिप्रेरक से है जो व्यक्ति में जन्म से ही पाए जाते हैं तथा इनके अभाव में व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है। भूख, प्यास, काम जन्मजात अभिप्रेरक के उदाहरण हैं। इन तीनों के अभाव में व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है। कोई भी व्यक्ति भूख, प्यास तथा काम की आवश्यकता को संतुष्टि किये बिना जिन्दा नहीं रह सकता है।

प्रश्न 4.
प्रणोद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रणोद (drive) एक ऐसी मानसिक तनाव की अवस्था है जो आवश्यकता के कारण उत्पन्न होती है तथा जो व्यक्ति को क्रियाशील बना देती है। जैसे, भूख की आवश्यकता में व्यक्ति भोजन खोजने के लिए क्रियाशील हो उठता है तथा उसमें एक मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। प्रणोद का स्वरूप जैविक तथा मनोवैज्ञानिक कुछ भी हो सकता है। जब जैविक आवश्यकता अर्थात् भूख, प्यास, काम आदि द्वारा प्रणोद उत्पन्न होता है तो उसका स्वरूप जैविक होता है, परंतु यदि अर्जित आवश्यकता जैसे संबंधन (affiliation) की आवश्यकता, उपलब्धि की आवश्यकता आदि द्वारा प्रणोद उत्पन्न होता है जब उसका स्वरूप मनोवैज्ञानिक या सामाजिक होता है।

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प्रश्न 5.
आवश्यकता-प्रणोदन-प्रोत्साहन सूत्र का वर्णन करें।
उत्तर:
किसी भी अभिप्रेरित व्यवहार में तीन महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय होता है-आवश्यकता, प्रणोदन तथा प्रोत्साहन। आवश्यकता से तात्पर्य कमी या अति की शारीरिक अवस्था से होता है। जैसे, प्यास की आवश्यकता उत्पन्न होने पर व्यक्ति के शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी पायी जाती है। प्रणोदन जो आवश्यकता से उत्पन्न होता है, एक ऐसी मानसिक तनाव की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए जल की तलाश में तरह-तरह का व्यवहार करता है। जैसे, एक प्यासा व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए जल की तलाश में इधर-उधर भटकता है। प्रोत्साहन से तात्पर्य उस लक्ष्य से होता है जिसकी प्राप्ति से प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति होती है। जैसे प्यासे व्यक्ति के लिए जल एक प्रोत्साहन है, जिससे प्रणोदन में कमी होती है तथा आवश्यकता की संतुष्टि होती है।

प्रश्न 6.
जन्मजात अभिप्रेरक तथा अर्जित अभिप्रेरक में अंतर बतायें।
उत्तर:
जन्मजात अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो प्राणी में जन्म से ही मौजूद होते हैं। ऐसे अभिप्रेरकों का मुख्य कार्य प्राणी के दैहिक अस्तित्व (physiological existence) को कायम रखना है। भूख, प्यास, काम (sex) तथा मल-मूत्र त्यागना आदि जन्मजात अभिप्रेरक के उदाहरण हैं। अर्जित अभिप्रेरकरक इनसे भिन्न होते हैं। अर्जित अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो व्यक्ति में जन्म से तो मौजूद नहीं रहते हैं, परंतु उन्हें व्यक्ति जन्म के बाद अन्य लोगों से सामाजिक अंत:क्रिया (interactions) करने पर विकसित कर लेते हैं। उपलब्धि की आवश्यकता सत्ता तथा सम्मान की आवश्यकता, संबंधन या सामुदायिकता की आवश्यकता अर्जित आवश्यकता के कुछ उदाहरण हैं।

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प्रश्न 7.
प्यास की अभिप्रेरक में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्यास एक ऐसा अभिप्रेरक है जिसमें स्पष्टतः कुछ शारीरिक परिवर्तन (bodily changes) होते हैं। कुछ शारीरिक परिवर्तन बाह्य (external) होते हैं तथा कुछ शारीरिक परिवर्तन आन्तरिक (internal) होते हैं। बाह्य शारीरिक परिवर्तनों में जीभ चटपटाना, कंठ सूखना तथा पानी के लिए दौड़-धूप करना प्रमुख हैं। आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन में लार-ग्रन्थियों से कम लार स्राव होना, प्राणी के शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी होना, रक्त की मात्रा (volume) में कमी आना प्रधान है। सामान्यतः तीव्र प्यास की स्थिति में रक्तचाप (blood pressure) में भी कमी आ जाती है।

प्रश्न 8.
अर्जित अभिप्रेरक का अर्थ उदाहरण सहित बतलाएँ।
उत्तर:
अर्जित अभिप्रेरक से तात्पर्य वैसे अभिप्रेरक से होता है जो व्यक्ति में जन्मजात नहीं होते हैं, परंतु जिसे व्यक्ति जीवनकाल में अर्जित करता है। वह सामाजिक मूल्यों के अनुरूप तरह-तरह के व्यवहार करने की प्रेरणा विकसित कर लेता है, इसे ही अर्जित अभिप्रेरक कहते हैं। आक्रमणशीलता, सामुदायिकता, संग्रहशीलता, उपलब्धि अभिप्रेरक, आदत, आकांक्षास्तर, मनोवृत्ति, अभिरुचि आदि अर्जित अभिप्रेरक के उत्तम उदाहरण हैं। इन अभिप्रेरकों से व्यक्ति का सामाजिक जीवन अधिक प्रभावशाली हो पाता है।

प्रश्न 9.
संवेग का अर्थ बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग एक भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है। साधारण अर्थ में संवेग व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था का दूसरा नाम है। लेकिन मनोवैज्ञानिकों ने संवेग का अर्थ इससे भिन्न बतलाया है। इस विशिष्ट अर्थ में संवेग व्यक्ति में समग्र रूप से तीव्र उपद्रव की अवस्था है जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिकों कारकों से होती है तथा जिसमें व्यवहार, चेतनानुभूति तथा अन्तरावयवी कार्य होते हैं। इस परिभाषा से संवेग के कई पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है, जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. संवेग में तीव्र उपद्रव की अवस्था होती है।
  2. संवेग में समग्र रूप से शारीरिक उपद्रव होता है।
  3. संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है।
  4. संवेग में चेतना, अनुभव, व्यवहार तथा अन्तरांगों के कार्यों में परिवर्तन होता है। भय, क्रोध, प्रेम आदि संवेग के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

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प्रश्न 10.
उपलब्धि अभिप्रेरक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
उपलब्धि अभिप्रेरक से तात्पर्य श्रेष्ठता का विशेष स्तर प्राप्त करने से होता है। जिस व्यक्ति में यह अभिप्रेरक अधिक होता है, वह जिन्दगी में अधिक-से-अधिक सफलता प्राप्त करने में सक्षम होता है। सभी व्यक्तियों में उपलब्धि अभिप्रेरक एक समान नहीं होता है। कुछ में कम होता है तो कुछ में अधिक होता है। जिन व्यक्तियों को बचपन में स्वतंत्र प्रशिक्षण (independent training) अधिक मिली होती है, वयस्कावस्था में आने पर उनमें उपलब्धि अभिप्रेरक (achievement motive) अधिक होता है।

प्रश्न 11.
संवेग में होनेवाले शारीरिक मुद्रा में परिवर्तन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने यह स्पष्टतः दिखलाया है कि प्रत्येक संवेग में एक खास प्रकार की शारीरिक मुद्रा (bodily posture) होती है। विभिन्न संवेगों में विभिन्न तरह की शारीरिक मुद्राएँ पायी जाती हैं। इन शारीस्कि मुद्राओं को देखकर संबंधित संवेग का अनुमान लगाया जाता है। जैसे, दु:ख के संवेग में व्यक्ति का शरीर कुछ झुका हुआ तथा क्रोध में उसका शरीर कुछ अकड़ा एवं तना हुआ दिखाई पड़ता है। भय के संवेग में व्यक्ति भागने की मुद्रा बना लेता है। स्पष्ट हुआ कि संवेग में कई तरह के शारीरिक परिवर्तन व्यक्ति में होते पाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
संवेग में होने वाले आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों का अर्थ. उदाहरणसहित बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग में कुछ शारीरिक परिवर्तन ऐसे होते हैं जिसे व्यक्ति बाहर से नहीं देख सकता है। इसका प्रेक्षण करने के लिए विशेष यंत्र या उपकरण की जरूरत होती है, क्योंकि ऐसे परिवर्तन शरीर के भीतर में होते हैं। ऐसे परिवर्तनों को आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन कहा जाता है। जैसे, क्रोध के संवेग में यह अन्य संवेगों, जैसे-डर, प्रेम आदि में व्यक्ति के रक्तचाप का स्तर सामान्य से भिन्न हो जाता है। उसी तरह से हृदय की गति, नाड़ी की गति, श्वसन गति आदि में परिवर्तन हो जाते हैं, जिसका सही-सही प्रेक्षण विशेष उपकरण से किया जाता है। ये सभी आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन के उदाहरण हैं।

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प्रश्न 13.
कैनन-बार्ड सिद्धांत का स्वरूप बतलाएँ।
उत्तर:
कैनन-बार्ड सिद्धांत के अनुसार संवेग का केन्द्र हाइपोथैलेमस (hypothalamus) होता है। जब व्यक्ति किसी ऐसे उद्दीपन (stimulus) को देखता है, जिससे संवेग उत्पन्न हो सकता है, तो उससे उसका हाइपोथैलेमस उत्तेजित हो उठता है। हाइपोथैलेमस से एक ही साथ कुछ स्नायु प्रवाह (nerve impulse), प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुंचते हैं तथा कुछ स्नायु-प्रवाह अन्तरावयव (visceral organs) तथा मांसपेशियों में एक साथ पहुंचते हैं। प्रमस्तिष्क में स्नायु-प्रवाह के पहुँचने से संवेगात्मक व्यवहार होते हैं। अतः इस सिद्धांत के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते हैं बल्कि दोनों ही एक साथ उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 14.
जेम्स-लांजे सिद्धांत का स्वरूप बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के अनुसार जब व्यक्ति किसी ऐसे उद्दीपन को देखता है जिससे संवेग उत्पन्न होता है, तो उस उद्दीपन को देखने से उसमें संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) पहले होता है तथा संवेगात्मक व्यवहार बाद में होता है। इसका मतलब यह हुआ कि संवेगात्मक व्यवहार का होना संवेगात्मक अनुभूति के होने पर निर्भर करता है। जैसे, व्यक्ति भालू देखता है, डर जाता है इसलिए भाग जाता है। स्पष्टतः इस सिद्धांत की यह व्याख्या संवेग के सामान्य व्याख्या के विपरीत है।

प्रश्न 15.
अभिप्रेरक के प्रकार बतलाइये।
उत्तर:
अभिप्रेरकों का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जाता है। थामसन के अनुसार अभिप्रेरकों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। ये निम्न प्रकार हैं –

  1. प्राकृतिक, एवं
  2. कृत्रिम।

थामसन ने अभिप्रेरकों को चार भागों में बाँटा है –

  1. सुरक्षा
  2. प्रतिक्रिया
  3. प्रतिष्ठा और
  4. नई अनुभूतियाँ

शेफर महोदय ने अभिप्रेरकों को निम्न चार भागों में बाँटा है –

  1. पुष्टिकरण
  2. विशिष्टता
  3. आदत और
  4. संवेग

विभिन्न प्रकार का वर्गीकरण दो वर्गों में इस प्रकार दिया जा सकता है –

1. जैविक अभिप्रेरक:
वह हैं जो जैविक आवश्यकताओं के कारण उत्पन्न होते हैं। वे हैं-भूख, प्यास, काम, विश्राम, मलमूत्र त्यागने की इच्छा, तापक्रम इत्यादि। इन अभिप्रेरकों का आधार शारीरिक होता है।

2. सामाजिक अभिप्रेरक:
यह सामाजिक अभिप्रेरणा के कारण उत्पन्न होते हैं। ये हैं-प्रतिष्ठा, सुरक्षा, संग्रहता, विशिष्टता, सामाजिकता, पुष्टिकरण, सामाजिक मूल्य, समुदाय के साथ एकीकरण इत्यादि।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 16.
संवेग में हाइपोथैलेमस की क्रियाओं के महत्त्व को बताएँ।
उत्तर:
संवेग की अवस्था में हाइपोथैलेमस की क्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कैनन (Cannon), बार्ड (Bard) इत्यादि ने भी प्रयोगात्मक आधारों पर इस भाग के महत्व पर बल दिया है। देखा गया है कि जिन जानवरों के मस्तिष्क में से हाइपोथैलेमस भाग निकाल दिया गया वे संवेगात्मक प्रकार्य करने में असमर्थ रहे। यह भी देखा गया कि जब मस्तिष्क के दूसरे भाग हटाए गए तो यह असमर्थता रही नहीं।

यह पाया गया कि जब मस्तिष्क के दूसरे भाग को हटाया गया तो हटाने से इस प्रकार की असमर्थता नहीं रही। इस प्रकार संवेगात्मक प्रकाशन में यह भाग अत्यन्त महत्त्व का सिद्ध हुआ। परंतु यहाँ यह याद रखना चाहिए कि संवेग की अवस्था में केवल यही भाग महत्त्वपूर्ण नहीं है। बल्कि वृहत मस्तिष्कीय ब्लॉक तथा स्वतः चालित नाड़ीमण्डल भी संवेगात्मक अनुभूति के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 17.
प्रेरणा की परिभाषा दें तथा उसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेरणा का शाब्दिक अर्थ, जो प्रेरित करें वह प्रेरक है, परंतु यह प्रेरणा का पूर्ण अर्थ स्पष्ट नहीं करता अतः प्रेरणा की परिभाषा तक जारी रखती है। उपरोक्त परिभाषा से निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं –

  1. प्रेरणा एक आंतरिक अवस्था है।
  2. प्रेरणा से क्रिया की उत्पत्ति होती है।
  3. प्रेरणा की क्रिया खास दिशा में होती है।
  4. प्रेरणा का संबंध किसी उद्देश्य से रहता है।
  5. प्रेरणा उद्देश्य प्राप्ति तक जारी रहती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अभिप्रेरणा क्या है? अभिप्रेरणा की परिभाषा दीजिये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा के दो महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं –

1. अभिप्रेरणा व्यक्ति की आन्तरिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया ज्ञान हमें निरीक्षित व्यवहार की व्याख्या भी देता है और व्यक्ति के भविष्य सम्बन्धी व्यवहार के सम्बन्ध में जानकारी देता है।

2. हम अभिप्रेरणा की प्रकृति निरीक्षित व्यवहार से अनुमान लगाकर. निर्धारित करते हैं। इस अनुमान की सत्यता हमारे निरीक्षणों की विश्वसनीयता पर निर्भर है। यह सत्यता उस समय स्थापित हो जाती है, जब हम दूसरे व्यवहार की व्याख्या करने में उसका प्रयोग कर सकते हैं।

अभिप्रेरणा की परिभाषा (Definition of Motivation):
अभिप्रेरणा की अनेक परिभाषायें विद्वानों ने दी है, जो निम्न प्रकार हैं –

1. बर्नार्ड:
“अभिप्रेरणा द्वारा उन विधियों का विकास कियण जाता है जो व्यवहार के पहलुओं को प्रभावित करती हैं”

2. जानसन:
“अभिप्रेरणा सामान्य क्रिया-कलापों का प्रभाव है जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती हैं।”

3. मैगोच:
“अभिप्रेरणा शरीर की वह दशा है जो कि दिय गये कार्य के अभ्यास की ओर संकेत करती है और उसके संतोषजनक समापन को परिभाषित करती है।”

4. वुडवर्थ:
“अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह भग है जो किसी निश्चित उद्देश्य की शर्त के लिये निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।’

5. शेफर तथा अन्य:
“अभिप्रेरणा क्रिया की एक ऐसी प्रकृति है जो कि प्रणोदन द्वारा उत्पन्न होती है एवं समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

6. मेग्डूगाल:
“अभिप्रेरणा वे शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दशाएँ हैं जो किसी कार्य को करने के लिये प्रेरित करती हैं।”

7. थामसन:
“अभिप्रेरणा आरम्भ से लेकर अन्त तक मानव व्यवहार के प्रत्येक प्रतिकारक को प्रभावित करती है, जैसे अभिवृत्ति, आधार, इच्छा, रुचि, प्रणोदन, तीव्र इच्छा आदि जो उद्देश्यों से सम्बन्धित होती है।”

8. गिलफोर्ड:
“अभिप्रेरणा कोई भी एक विशेष आन्तरिक कारक अथवा दशा है जो क्रिया को आरम्भ करने अथवा बनाये रखने के लिए प्रेरित होती है।”

यदि हम इन परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो निम्नलिखित आधार प्रकट होंगे –

  • अभिप्रेरणा साध्य नहीं साधन है। वह साध्य तक पहुंचने का मार्ग प्रस्तुत करती है।
  • अभिप्रेरणा अधिगम का मुख्य नहीं सहायक अंग है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करती है।
  • अभिप्रेरणा से क्रियाशीलता प्रकट होती है।
  • अभिप्रेरणा पर शारीरिक तथा मानसिक, बाह्य एवं आन्तरिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति के अंदर शक्ति परिवर्तन से प्रारम्भ होती है।
  • अभिप्रेरणा अभिप्रेरणों भावात्मक जागृति द्वारा वर्णित होती है।
  • अभिप्रेरणा पूर्वानुमान द्वारा वर्णित होती है।

अभिप्रेरणा प्रणाली को संगठित उद्देश्य तक पहुँचाने के लिए व्यवहार करने के लिये प्रेरित करती है। अभिप्रेरणा के तीन पक्ष हैं –

  1. प्राणी में निहित प्रेरक अवस्था गति में होती है, शारीरिक आवश्यकता वातवरणीय उद्दीपक, घटनाएँ तथा शृंखला अभिप्रेरणा के लिये उत्तरदायी हैं।
  2. इस अवस्था में व्यवहार उत्पन्न होता है और वांछित दिशा में उसका अग्रेषण होता है।
  3. वांछित उद्देश्य प्राप्ति हेतु व्यवहार उत्पन्न होता है।

अभिप्रेरित व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है जो उसको अपने उद्देश्य की ओर ले जाती हैं। इन प्रतिक्रियाओं द्वारा व्यक्ति में वह तनाव कम हो जाता है जो शक्ति परिवर्तन से उत्पन्न होता है।

  1. “अभिप्रेरण एक शब्दावली है जो व्यक्ति को शक्ति प्रदान करने में उसके कार्यों को निर्देशित करने को वर्णित करती है।”
  2. “अभिप्रेरण की तुलना कभी-कभी एक इंजन तथा स्वचालित यंत्र के चलाने वाले पहिये से की जाती है।”
  3. “शक्ति एवं निर्देशन अभिप्रेरणा के केन्द्र हैं।”

अभिप्रेरणा:
विभिन्न मत (Motivation : Different Views):
अभिप्रेरणा के विषय में अनेक मत तथा धारणाएँ समाज में प्रचलित रही हैं। उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं –

1. भग्यवादी मत:
मनुष्य किसी भी कार्य को इसलिये करता है कि वह उसके भाग्य में है। यह मत दैवी शक्तियों और उसके प्रभाव पर आधारित इस बात पर बल देता है कि “मानव दैवी शक्तियों के हाथ की कठपुतली है और अभिप्रेरणा व्यक्ति की बाह्यशक्ति है।” यह मत भाग्य लेखे पर बल देता है।

2. मानव विवेकशील है:
मानव में समय के विकास के साथ-साथ वह विचार भी विकसित हुआ कि वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इस मत का आधार मानव मस्तिष्क है।

3. मानव एक यंत्र है:
वैज्ञानिकों ने मनुष्य को एक यंत्र माना है। इस यंत्र का संचालन उद्दीपनों द्वारा होता है। मनुष्य, वातावरण के विभिन्न उद्दीपनों से क्रियाशील होता है।

4. मानव पशु:
इस मत का प्रतिपादन डार्पिन ने किया था। उसके अनुसार पशुओं और मनुष्य की क्रियाओं में भेद नहीं है। मानव का विकास पशुओं से हुआ है। डार्विन “शक्तिशाली की विजय” पर विश्वास करता है। डार्विन के अनुसार तीन बातें प्रमुख हैं –

  • शारीरिक प्रणोदन (Biological) प्रेरक जो व्यक्ति को क्रियाशील बनाते हैं-भूख, प्यास, भय आदि इसी प्रेरक से दूर होते हैं।
  • अर्जित प्रेरक (Acquired Drives) जो शारीरिक प्रेरक से ही उत्पन्न होते हैं।
  • पशु और मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ एक-सी हैं।
  • मानव सामाजिक प्राणी है-मनुष्य का जन्म समाज में होता है और समाज में ही उसकी मान्यताओं के अनुसार वह अपना विकास करता है। मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक प्रभावों के कार्य करने के लिए अभिप्रेरित होता है।
  • अचेतन का मत-फ्रायड ने इस मत का प्रतिपादन किया था। मानव की क्रियाशीलता का एक मात्र कारण उसकी अचेतन अभिप्रेरणा है। उसके व्यवहार को अचेतन शक्तियाँ नियंत्रित करती हैं। इस मत के अनुसार अभिप्रेरणा का स्रोत व्यक्ति स्वयं ही है।

अभिप्रेरणा: सम्बन्धित शब्द (Motivation : Glossary):
अभिप्रेरण की विवेचना में कई शब्छ बार-बार आते हैं। इन शब्दों की व्याख्या एवं जानकारी आवश्यक है। ये शब्द इस प्रकार हैं –

1. मानसिक स्थिति (Mental Set):
इस शब्द का अर्थ है व्यक्ति का मानसिक रूप से स्वस्थ होना। मनुष्य जब तक मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा तब तक किसी भी कार्य को करने के लिए अभिप्रेरित नहीं होगा।

2. प्रेरक (Drives):
प्रेरक अभिप्रेरकों को विकसित करने में बहुत सहयोग देते हैं। प्रेरक का सम्बन्ध कार्य या वस्तुओं से होता है। प्रेरक का सम्बन्ध बाह्य परिस्थितियों से होता है। प्रेरकों को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकता।

3. प्रणोद (Incentive):
प्राणी की आवश्यकताओं से प्रणोदन का उत्पत्ति होती है। पानी की आवश्यकता से प्यास की और भोजन की आवश्यकता से भूख की उत्पत्ति होती है। इसीलिये प्रणोदन के बारे में विद्वानों ने कहा है –

(अ) गिबनर एवं सेहोन-“प्रणोदन वह शक्तिशाली उद्दीपन है जो माँग एवं उसकी अनुक्रिया उपस्थित करता है।”
(ब) लैगफील्ड एवं वील्ड-“प्रणोदन आन्तरिक, शारीरिक क्रिया या दशा है जो उद्दीपन के द्वारा विशेष प्रकार का व्यवहार उत्पन्न करती है।”
(स) डैशिल-“मानव जीवन में प्रणोदन शक्ति का मूल स्रोत है जो कि जीव को किसी क्रिया के करने के लिये प्रेरित करता है।”

मनोवैज्ञानिकों ने प्रणोद का वर्गीकरण इस प्रकार किया है –

1. साइमॉड द्वारा किया गया वर्गीकरण –

  • सामूहिकता
  • अवधान केन्द्रितता
  • सुरक्षा
  • प्रेम तथा
  • उत्सुकता

2. कैसल द्वारा किया गया वर्गीकरण:

  • संवेगात्मक सुरक्षा
  • ज्ञान प्राप्ति
  • समाज में स्थान प्राप्त करना
  • शारीरिक संतोष

3. थोर्प द्वारा किया गया वर्गीकरण:

  • शारीरिक क्रियायें
  • जीवन का उद्देश्य एवं कार्य तथा
  • कार्य में स्वतंत्रता

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प्रश्न 2.
जेम्स-लॉर्ज सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
संवेग का यह एक लोकप्रिय सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन विलियम जेम्स (William James) तथा कार्ल-लांजे (Kari Lange) द्वारा स्वतंत्र रूप से अलग-अलग किया गया था। चूँकि संवेग के बारे में इन दोनों मनोवैज्ञानिकों के विचार लगभग एक समान थे, अतः इस सिद्धांत का नाम जेम्स-लॉजे रखा गया।

इस सिद्धांत द्वारा संवेग की व्याख्या संवेग के सामान्य व्याख्या के विपरीत है। सामान्यतः हम यही समझते हैं कि व्यक्ति जब कभी भी संवेदन उत्पन्न करने वाला उद्दीपन (Stimulus) को देखता है, तो पहले उसमें संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होता है तब संवेगात्मक व्यवहार होता है। जैसे, व्यक्ति भालू या बाघ (संवेगात्मक व्यवहार) है।

जेम्स-लॉजे सिद्धांत की व्याख्या ठीक इसके विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति बाघ या भूल को देखता है, भाग जाता है इसलिए डर जाता है। इससे स्पष्ट है कि इस सिद्धांत के अनुसार किसी संवेगात्मक उद्दीपन को देखने के बाद व्यक्ति में पहले संवेगात्मक अनुभूति होती है और तब संवेगात्मक व्यवहार होता है। संक्षेप में, इस सिद्धांत द्वारा संवेग की व्यख्या का विस्तृत इस प्रकार है –

  1. संवेग की उत्पत्ति के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति संवेग उत्पन्न करने वाले उद्दीपन (stimuls) का प्रत्यक्षण करें। इसके फलस्वरूप ज्ञानेन्द्रियों में स्नायु-प्रवाह (nerve impulse) पैदा होती है।
  2. जब स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है, तो यहाँ से वह फ़िर शरीर के अन्तरावयवों (visceral organs) तथा मांसपेशियों (muscles) में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति संवेगात्मक व्यवहार (emotional behaviour) करता है।
  3. संवेगात्मक व्यवहार उत्पन्न होने के बाद उसकी सूचना स्नायु-प्रवाह द्वारा मस्तिष्क में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होती है।

जेम्स-लाँजे सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. इस सिद्धांत के अनुसार संवेग की अनुभूति अर्थात् संवेगात्मक अनुभूति संवेग के व्यवहार अर्थात् संवेगात्मक व्यवहार पर निर्भर करता है। परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। प्रायः यह देखा जाता है कि कई तरह के संवेगों में व्यक्ति में लगभग एक ही समान का व्यवहार पाया जाता है। यदि संवेग का अनुभव शारीरिक व्यवहार पर निर्भर करता तो एक तरह के शारीरिक व्यवहार से एक ही तरह के संवेग का अनुभव होना चाहिए था। परंतु एक ही तरह के शारीरिक व्यवहार से भिन्न-भिन्न प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति का होना इस बात का द्योतक है कि संवेगात्मक व्यवहार या संवेगात्मक परिवर्तन पर निर्भर नहीं करता है।

2. इस सिद्धांत के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति शारीरिक परिवर्तनों पर आधारित होता है। अगर यह बात सच्ची होती तो जब-जब व्यक्ति में किसी कारण से शारीरिक परिवर्तन होता, उसमें संबंधित संवेग की अनुभूति होती। ब्रेडी (Brady, 1958) द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि प्राणी में जब-जब शारीरिक परिवर्तन होता है, तब-तब उसमें संवेग की अनुभूति नहीं होती है। इसका मतलब यह हुआ कि इस सिद्धांत का दावा गलत है।

3. मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभव शरीर के भीतरी अंगों में परिवर्तन होने के कुछ पहले ही हो जाता है। इसका स्पष्ट मतलब यह हुआ कि संवेगात्मक अनुभव पहले हो जाते हैं तथा संवेगात्मक परिवर्तन बाद में होते हैं। ऐसी हालत में इस सिद्धांत का यह दावा कि संवेगात्मक अनुभूति संवेगात्मक परिवर्तन द्वारा उत्पन्न होता है, ठीक एवं अर्थपूर्ण नहीं लगता है।

4. इस सिद्धांत के अनुसार, यदि शारीरिक परिवर्तन न हो या उसकी सूचना मस्तिष्क को किसी कारण से नहीं मिलता है, तो संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) नहीं होती है अर्थात् व्यक्ति में किसी प्रकार संवेग नहीं होता है। परंतु कुछ लोगों, जैसे शेरिंगटन (Sherriangton) द्वारा कुत्ते पर किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हो चुका है कि सिद्धांत का यह दावा गलत है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि जेम्स-लाँजे सिद्धांत की आलोचना की गयी है, फिर भी यह सिद्धांत संवेग का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है।

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प्रश्न 3.
अभिप्रेरणा का वर्गीकरण क्या है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से अभिप्रेरणा का वर्गीकरण किया है। आगे कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रतिपादित वर्गीकरण प्रस्तुत कर रहे हैं –

1. थामसन द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classication by Thomson):
थामसन ने अभिप्रेरकों को दो भागों में विभाजित किया है –

(i) प्राकृतिक अभिप्रेरक (Natural Motives):
वे अभिप्रेरक हैं जो जन्म से ही व्यक्ति में पाये जाते हैं। भूख, प्यास, सुरक्षा आदि अभिप्रेरकों से मानव जीवन का विकास होता है।

(ii) कृत्रिम अभिप्रेरक (Artificial Motives):
वे अभिप्रेरक होते हैं, जो वातावरण में विकसित होते हैं। इनका आधार तो प्राकृतिक अभिप्रेरणा होते हैं, परंतु सामाजिकता के आवरण में इनकी अभिव्यक्ति का रूप बदल जाता है। जैसे समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करना, सामाजिक सम्बन्ध बनाना आदि।

2. मैस्लो द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classification by Maslow):
मैस्लो ने आवश्यकताओं पर अधिक बल दिया है। उसने आवश्यकताओं की तीव्रता को आधार बनाया है। कुछ आवश्यकताओं ऐसी होती हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना पड़ता है। कुछ आवश्यकतायें ऐसी होती हैं जो फुसत से पूरी की जा सकती है। उदाहरणार्थ-भूखा व्यक्ति पहले अपने भोजन की व्यवस्था करता है। भूख मिट जाने के पश्चात् वह सुरक्षा या अन्य किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।

मैस्लो ने अभिप्रेरकों को दो भागों में बाँटा है –

(i) जन्मजात अभिप्रेरक (Inborm Moties):
इसके अन्तर्गत भूख, प्यास, सुरक्षा यौन आदि आ जाते हैं।

(ii) अर्जित अभिप्रेरक (Acquired Motives):
इसके अन्तर्गत वातावरण से प्राप्त अभिप्रेरक आते हैं इनको भी उसने सामाजिक तथा व्यक्तिगत (Social and individual) भागों में बाँटा है। सामाजिक अभिप्रेरकों के अन्तर्गत सामाजिकता, ययुत्सा और आत्मस्थापना एवं व्यक्तिगत अभिप्रेरकों में आदत, रुचि, अभिवृत्ति तथा अचेतन अभिप्रेरक आते हैं।

3. क्रेच एवं क्रचफील्ड द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classification by Krech and Crutchfied):
इस प्रकार का वर्गीकरण अभिप्रेरकों की न्यूनता तथा अधिकता पर आधारित है –

(i) न्यूनता (Deficiency) अभिप्रेरक:
अभिप्रेरक मानव के अभाव तथा कमियों को दूर करने में सहायक होते हैं। क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार, “न्यूनता का अभिप्रेरक आवश्यकताओं से सम्बन्धित है जिनके द्वारा चिन्ता, डर, धमकी या और कोई मानसिक द्वन्द्व दूर हो जाता है।”

इसका ध्येय मानव का संसार में रहना एवं सुरक्षा प्राप्त करना है। इस प्रकार इन अभिप्रेरकों को चार प्रमुख रूपों में बाँटा गया है –

  • शरीर से सम्बन्धित
  • वातावरण से सम्बन्धित
  • समय से सम्बन्धित और
  • स्वयं से सम्बन्धित

(ii) अधिकता (Abundancy) अभिप्रेरक:
इन अभिप्रेरकों का ध्येय संतोष एवं उत्साह है। क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार-“अधिकता के अभिप्रेरक का उद्देश्य संतोष प्राप्ति, सीखना, अवबोध, अन्वेषण तथा अनुसंधान रचना एवं प्राप्ति है।”

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प्रश्न 4.
अभिप्रेरणा की अवधारणाएँ तथा प्रकार बताइये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा की अवधारणायें (Concepts of Motivation)-अभिप्रेरणा की एक विस्तृत अवधारणा है जो शक्ति एवं व्यवहार के निर्देशन के कारकों से जोड़ दी जाती है। जैसे-अभिरुचि, आवश्यकता, मूल्य, प्रवृत्ति, आकांक्षायें, लक्ष्य आदि।

अभिप्रेरणा का व्यवहार प्रभाव –

  1. अभिप्रेरणा व्यवहार को शक्तिशाली बनाती है।
  2. अभिप्रेरणा व्यवहार को उद्देश्य के प्रति निर्देशित करती है।
  3. अभिप्रेरणा व्यवहार के विभिन्न कार्यों की पूर्ति के लिये समय की मात्रा को निर्धारित करती है।

अभिप्रेरणा के प्रकार –

  1. एक-मात्र अभिप्रेरक अवधारणा-फ्रायड के अनुसार मानव के अंदर काम वासना शक्ति का होना है। दूसरे मनोवैज्ञानिकों द्वारा कहा गया है कि मानव व्यवहार चाहे भूख, प्यास, प्रेम आदि से प्रेरित हो इनमें कोई अंतर नहीं आता। तीसरे वह अवधारणा जी सब अभिप्रेरकों को मिलाकर एक सामान्य चिन्ता में बदल देती है।
  2. द्वि-अभिप्रेरक अवधारणा-दो मुख्य विरोधी शक्तियों के रूप में बताया गया है, जैसे-जन्म-मृत्यु, पुरुषत्व-स्त्रीत्व आदि।
  3. बहु-अभिप्रेरक अवधारणा-मेडसन, मेर आदि अनेक विद्वानों ने आवश्यकताओं को मनोवैज्ञानिक प्रकार से सम्मिलित करके उदाहरण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 5.
अभिप्रेरणा के व्यवहार के लक्षण बतलाइये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा: व्यवहार के लक्षण (Motivation : Behaviour Patterns) अभिप्रेरणा देने के पश्चात् कैसे ज्ञात करेंगे कि उत्प्रेरित व्यक्ति किसी कार्य के लिये तैयार हो गया अथवा नहीं। यह ज्ञात करने के साधन अथवा लक्षण इस प्रकार हैं –

1. उत्सकता (Eagermess):
जब बालक क्रिया को करने के लिये अभिप्रेरित किये जाते हैं तो क्रिया के प्रति उत्सुकता दिखाई देती है। जब उत्सुकता दिखाई दे तो समझे कि बालक क्रियाशील हो गया।

2. शक्ति संचालन (Energy mobilisation):
अभिप्रेरणा प्राप्त होत ही व्यक्ति में अतिरिक्त शक्ति उत्पन्न होती है। अभिप्रेरणा प्राप्त होते ही व्यक्ति घंटों तक बिना थकान के काम करते हैं। शक्ति संचालन में व्यक्ति में बड़े-बड़े कार्य करने की क्षमता पैदा हो जाती है। अभिप्रेरणा प्राप्त करके व्यक्ति श्रेष्ठतम कार्य कर सकते हैं।

3. निरन्तरता (Consistency):
जब तक व्यक्ति को अभिप्रेरणा प्राप्त होती है, तब तक वे कार्य में निरंतर लगे रहते हैं।

4. लक्ष्य प्राप्ति से बैचेनी दूर होना (Reduction of Tension by Achievement of Goal):
अभिप्रेरणा से जो व्यवहार प्रकट होते हैं वे लक्ष्य प्राप्ति के बाद संतोष अनुभव करते हैं। समस्या होते ही बेचैनी दूर हो जाती है।

5. केन्द्रित ध्यान (Concentrated Attention):
अभिप्रेरणा प्राप्त करते ही व्यक्ति क्रिया में ध्यानरत हो जाता है। अभिप्रेरित व्यवहार में व्यक्ति कई प्रकार से उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

अभिप्रेरणात्मक व्यवहार (Motivated Behaviour):
इस प्रकार के. व्यवहार की विशेषतायें निम्न प्रकार हैं –

  • अभिप्रेरकों का निर्माण किया जाता है। इससे शक्ति के विकास तथा वृद्धि में गति मिलती है।
  • अभिप्रेरित व्यवहार में आन्तरिक परिवर्तन होता है। भूख के अभिप्रेरक से शरीर में रासायनिक क्रिया होती है और मुख मुद्रा तथा शरीर के अवयवों में परिवर्तन प्रतीत होता है।
  • भूख के प्रेरक के समान ही यौन अथवा सेक्स का अभिप्रेरक होता है। यौन के प्रति आकर्षण से शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होती है। व्यक्ति किसी भी प्रकार से उसे शान्त करने का प्रयास करता है। अभिप्रेरित व्यवहार में व्यक्ति-व्यक्ति तथा संस्कृति-संस्कृति की भिन्नता पाई जाती है।
  • मनोवैज्ञानिकों अभिप्रेरकों में समस्या की कठिनाई, वर्गीकरण तथा विश्लेषण निहित होता है।
  • मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक व्यवहार में व्यवहार की दशा का निर्धारण करते हैं।
  • संग्रह करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा तथा ऐश्वर्य प्राप्त के लिये प्रयत्न करता है।
  • अभिप्रेरित व्यवहार में प्राथमिकता पाई जाती है।

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प्रश्न 6.
अभिप्रेरकों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरकों से तात्पर्य (Meaning of Motives) अभिप्रेरक वह शक्ति है जो एक व्यक्ति को कार्य करने के लिये उत्तेजित करती है। वे व्यक्ति के व्यवहार की दिशाओं को निर्धारित करते हैं और उनकी क्रियाओं की गति का संचालन करते हैं। जब किसी व्यक्ति को अभिप्रेरक मिलते हैं तो वह एक तनाव एवं असंतुलन अनुभव करता है। व्यक्ति की लगभग सभी क्रियाएँ अभिप्रेरकों से ही होती हैं। अभिप्रेरक तीन प्रकार से कार्य करते हैं –

  1. यह कार्य का प्रारम्भ करते हैं।
  2. क्रियाओं को गतिशीलता देते हैं और
  3. जब तक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होती, क्रियाओं को एक निश्चित दिशा की ओर प्रेरित किये रहते हैं।

इस प्रकार हम एक अभिप्रेरक की परिभाषा इस तरह दे सकते हैं-“यह क्रिया करने की वह प्रवृत्ति है जो एक उद्दीपन द्वारा प्रारम्भ होती है तथा अनुकूलन द्वारा समाप्त होती है।” आवश्यकता, अन्तर्नोद, प्रोत्साहन तथा अभिप्रेरकों में अंतर-वास्तव में अभिप्रेरक के सम्बन्ध में बहुत से शब्द प्रयोग किये जाते हैं-क्षुधा, आवश्यकतायें, अन्तर्नाद एवं अभिप्रेरक।

अन्तर्नोद शब्द उस समय प्रयोग किया जाता है जब हमें शरीर की आवश्यकताओं से उत्पन्न मानसिक तनाव की अनुभूति हो, जैसे-भूख, प्यास आदि। वातावरण का वह तत्त्व जो एक अन्तर्नाद को सन्तुष्टि करता है, प्रोत्साहन कहलाता है। “भूख” के अन्तर्नोद के लिये भोजन “प्रोत्साहन” है। अभिप्रेरक में “आवश्यकता” और “अन्तर्नाद” के साथ-साथ लक्ष्य की प्राप्ति की भावना का समावेश हो जाता है। इस अवस्था को “अभिप्रेरक” की संज्ञा देते हैं।

अभिप्रेरक के आवश्यक अंग निम्नलिखित हैं –

  1. आवश्यकता एवं अन्तर्नाद जो व्यक्ति में सक्रियता उत्पन्न करती है।
  2. उद्देश्य-प्राप्ति के ओर व्यवहारों की दिशा का नियंत्रण।
  3. उद्देश्य प्राप्त कर लेने के पश्चात् क्रियाओं का अन्त।

प्रश्न 7.
जेम्स-लॉजे सिद्धांत की सीमाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जेम्स-लॉजे सिद्धांत की कड़ी आलोचना की गई है और इसके अनेकों दोषों का उल्लेख किया गया है –

  1. इस सिद्धांत की आलोचना Cannon तथा Bard ने कड़े शब्दों में की है उन्होंने कहा है कि संवेग का आधार सहानुभूतिक मंडल नहीं है बल्कि Hypothalamus है। बिल्ली पर प्रयोग करते हुए इन्होंने जेम्स लौपे के सिद्धांत को खंडित किया।
  2. इस सिद्धांत की आलोचना Cannon ने करते हुए कहा है कि संवेगात्मक अनुभूति तथा । संवेगात्मक व्यवहार एक ही साथ होते हैं। अतः जेम्स-लॉजे का यह विचार गलत है कि संवेगात्मक व्यवहार पर संवेगात्मक अनुभूति आधारित है।
  3. इस सिद्धांत की आलोचनात्मक रोरिंगटन ने भी की है। उन्होंने अपने प्रयोगों के आधार पर प्रमाणित किया कि सहानुभूतिक मंडल वास्तव में संवेग का केन्द्र का केन्द्र ही है।
  4. शारीरिक परिवर्तनों की चेतना के अभाव में संवेगात्मक अनुभूति संभव नहीं है।

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प्रश्न 8.
अभिप्रेरणा के प्रभावक प्रतिकारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरणा: प्रभावक प्रतिकारक (Motivation : Influencing Factors):
अभिप्रेरणा किस प्रकार प्रभावशाली कार्य करती है, इसका निणर्य अनेक प्रभावक प्रतिकारक करते हैं। अभिप्रेरणा पर कई बातें प्रभाव डालती हैं। प्रमुख प्रभावक तत्त्व निम्न प्रकार हैं –

1. आवश्यकतायें (Needs):
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। बालकों तथा बड़ों की भी यही प्रवृत्ति होती है कि वे आवश्यकता के वशीभूत होकर कार्य करते हैं। कार्य से पूर्व आवश्यकता महसूस कराई जाये।

2. अभिवृत्ति (Attitudes):
अभिप्रेरणा व्यक्ति में अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक करती है। अभिवृत्ति का विकास होने से वे कार्य को अच्छी तरह करते हैं।

3. रुचि (Interest):
व्यक्ति की जिस काम में रुचि होती है उसे वह तुरंत सीख लेते हैं। प्रस्तुतीकरण से पूर्व व्यक्ति में रुचि पैदा करना आवश्यक है।

4. आदतें (Habits):
आदतें नये ज्ञान को प्रदत्त करने में सहायक होती हैं। नया ज्ञान पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिये।

5. संवेगात्मक (Emotional):
स्थिति-संवेगात्मक स्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है। सीखे जाने वाले ज्ञान का संवेगात्मक सम्बन्ध स्थापित करने के पश्चात् अभिप्रेरण प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करेगा।

6. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment):
पुरस्कार एवं दण्ड का अभिप्रेरणा में अधिक महत्त्व है। ये भावी व्यवहार पर असर डालते हैं। कार्य में अभिवृत्ति उत्पन्न होने से पुरस्कार के प्रति लालच पैदा नहीं होता। पुरस्कार से लाभ इस प्रकार है –

  • पुरस्कार से आनन्द प्राप्त होता है।
  • पुरस्कार व्यक्ति को कार्य की अभिप्रेरणा देते हैं।
  • पुरस्कार रुचिवर्द्धक एवं उत्साहवर्द्धक होते हैं।
  • पुरस्कार मनोबल उत्पन्न करते हैं एवं व्यक्ति के अहंकार को सन्तुष्ट करते हैं।

पुरस्कार से हानियाँ इस प्रकार हैं –

  • पुरस्कारों से कार्य में अभिरुचि पैदा नहीं होती है।
  • पुरस्कार प्राप्ति के लिये धोखा भी दिया जा सकता है।
  • बिना त्याग प्राप्ति के भावना को प्रोत्साहन मिलता है।
  • केवल पुरस्कार प्राप्ति के लिये कार्य किया जाता है।

विद्यार्थियों में दण्ड के लाभ कुछ इस प्रकार हैं –

  • दण्ड अवांछित कार्य करते से रोकते हैं।
  • अनुशासन का स्वरूप होते हैं।
  • बच्चों को अवांछनीयता. का विश्वास दिलाते हैं।

दण्ड की हानियाँ भी इस प्रकार हैं –

  • दण्ड का आधर भय होता है।
  • दण्ड ग्रहण करने को तैयार व्यक्ति के लिये दण्ड का महत्त्व समाप्त हो जाता है।
  • इससे अप्रिय एवं दुखद अनुभूति पैदा होती है।
  • दण्ड के परिणाम स्थायी नहीं होते।
  • दण्ड से दुर्भावना पैदा होती है।
  • दण्ड की कठोरता की कोई माप नहीं है।

वास्तव में पुरस्कार एवं दण्ड, दोनों का उद्देश्य एक ही है, यानी भावी व्यवहार पर अनुकूल प्रभाव डालना। पुरस्कार व्यवहार पर वांछित प्रभाव डालने के लिये तथा दण्ड एक अवांछित कार्य को रोकने के लिये उसके साथ एक अप्रिय अनुभूति को जोड़ता है।

7. प्रतियोगिता (Competition):
प्रतियोगितायें ज्ञान प्राप्ति की अभिप्रेरणा दे सकती है। प्रतियोगितयों दो प्रकार की होती हैं –

  • व्यक्तिगत प्रतियोगिता एवं
  • सामूहिक प्रतियोगिता

8. प्रगति का ज्ञान (Knowledge of Progress):
व्यक्ति को अपने ज्ञानार्जन की प्रगति को बताये रहना चाहिये। ऐसा करने से क्रियाशीलता आती है।

9. असफलता का भय (Threat of Fear):
व्यक्ति को कभी उसकी असफलताओं का भय भी दिखाते रहना चाहिये।

10. आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiration):
व्यक्ति को यह अभिप्रेरित करना चाहिये कि उसकी आकांक्षाओं का आधार उसकी शारीरिक, मानसिक परिपक्वता के अनुकूल होना चाहिये। स्तर से ऊपर होने से कार्य में अरुचि एवं अनिच्छा विकसित हो जाती है।

11. परिचर्चायें तथा सम्मेलन (Seminars and Conferences):
सामूहिक कार्य करने के लिये सीखने पर अधिक बल दिया जाता है। समूह में अधिक ज्ञान प्राप्त किया जाता है। परिचर्चायें एवं सम्मेलन ज्ञानवर्धन के लिये अतिआवश्यक हैं।

12. वातावरण (Environment):
वातावरण इतना आकर्षण हो कि सीखने वाले को स्वयं अभिप्रेरणा प्राप्त हो। व्यक्ति तथा समूह ही वातावरण का निर्माण करते हैं।

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प्रश्न 9.
संवेग के कैनन-बार्ड सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
संवेग के इस सिद्धांत की व्यख्या कैनन (Canon) तथा बॉर्ड (Bard) द्वारा किया गया है। इस सिद्धांत द्वारा प्रदत्त व्याख्या जेम्स-लांजे सिद्धांत की व्याख्या के विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार हाइपोथैलेमस (hypothalamus) ही संवेग का केन्द्र (centre) होता है। संवेग में हाइपोथैलेमस के इस महत्त्व के कारण ही इसे हाइपोथैलेमिक सिद्धांत (hyphothamic theory) भी कहा जाता है। इस सिद्धांत द्वारा संवैग की व्याख्या निम्नांकित चरणों में की गयी है –

  • संवेग उत्पन्न करने वाला उद्दीपन (stimulus) को व्यक्ति प्रत्यक्षण करता है जिसके परिणामस्वरूप तंत्रिका आवेग (nerve impuse) व्यक्ति में उत्पन्न होता है।
  • तंत्रिका आवेग हाइपोथैलेमस (hypothalamus) होते हुए मस्तिष्क वल्क (cerebral cortex) में पहुँचता है। इससे हाइपोथैलेमस में हल्का-फुल्का उत्तेजना उत्पन्न हाता है।
  • प्रमस्तिष्क वल्क से विशेष तंत्रिका आवेग पुनः हाइपोथैलेमस (hypothalamus) में पहुँचता है। इस तंत्रिका आवेग के पहुँचते ही पहले से क्रियाशील हाइपोथैलेमस पर से प्रमिस्तिष्क वल्क का नियंत्रण पूर्णतः हट जाता है जिसके परिणामस्वरूप हाइपोथैलेमस पूर्णतः क्रियाशील या उत्तेजित हो उठता है।
  • हाइपोथैलेमस के क्रियाशील होने से वहाँ से एक समय तंत्रिका आवेग दो दिशाओं में जाता है-ऊपरी दिशा तथा निचली दिशा।
  • ऊपरी दिशा में जाने वाला तंत्रिका का आवेग प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचता है तथा निचली दिशा में जाने वाला तंत्रिका आवेग अन्तरावयव (visceral organs) तथा मांसपेशियों में पहुंचता है।
  • प्रमस्तिष्क में तंत्रिका आवेग को पहुँचने के परिणामस्वरूप व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होता है तथा अन्तरावयव एवं मांसपेशियों में पहुंचने वाले तंत्रिका आवेग से व्यक्ति में संवेगात्मक व्यवहार दोनों ही एक साथ उत्पन्न होते हैं न कि इसमें से संवेगात्मक अनुभूति का होना संवेगात्मक व्यवहार पर निर्भर करता है, जैसा कि जेम्स-लाँजे सिद्धांत की मान्यता है।

इस सिद्धांत के समर्थन में कैनन तथा बार्ड द्वारा स्वतंत्र रूप से कुत्ता पर प्रयोग किया गया। प्रयोग काफी सरल था। प्रयोग में कुत्ते के मस्तिष्क से हाइपोथैलेमस को काटकर निकाल दिया गया या कुछ कुत्ते के हाइपोथैलेमस में घाव (wound) उत्पन्न कर दिया गया। इसके बाद इन कुत्तों के सामने बिल्ली (cat) लायी गयी। परिणाम में देखा गया कि कुत्ता शांतभाव से बिना क्रोध दिखलाये चुपचाप बैठा रहा। इन प्रयोगों के परिणाम के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संवेग का केन्द्र हाइपोथैलेमस होता है।

इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ हैं जिसमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. मासरमैन (Masserman) द्वारा किये गये प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ है कि हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र मानना अधिक वैज्ञानिक नहीं है। उन्होंने बिल्ली पर प्रयोग करके यह दिखला दिया है कि सिर्फ हाइपोथैलेमस को उत्तेजित करने से जो संवेग उत्पन्न होता है, वह अस्पष्ट, विकीर्ण, यांत्रिक तथा लगभग अर्थहीन होता है।

इनके प्रयोग में देखा गया कि बिल्ली के हाइपोथैलेमस को बिजली से उत्तेजित करने से उसके शरीर के बाल खड़े हो गए मानो वह क्रोधित हो गयी है। परंतु सचमुच में क्रोध या अन्य कोई संवेग के उत्पन्न होने का कोई निश्चित लक्षण उसमें नहीं था जिसका सबूत यह था कि बिल्ली लगभग सामान्य अवस्था में समान भोजन कर रही थी।

2. कुछ मनोवैज्ञानिकों जैसे किंग तथा मेयर (King & Mayer) द्वारा किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ है कि हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र मानना उचित नहीं है, क्योंकि मस्तिष्क के अन्य भाग जैसे लिम्बिक तंत्र, ऐमिगडाला आदि को उत्तेजित करने से भी प्राणी में संवेग उत्पन्न होता है। इन आलोचनाओं के बावजूद कैनन-बार्ड सिद्धांत संवेग का एक प्रमुख सिद्धांत है तथा अनेक मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस सिद्धांत की मान्यता स्वीकार की गयी है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जीन प्याजे के अनुसार सभी बच्चे ‘स्कीमा’ से प्रभावित होते है। [B.M. 2009A]
(क) बड़े होने पर
(ख) जन्म से ही
(ग) किशोर होने पर
(घ) दुबले होने पर
उत्तर:
(ख) जन्म से ही

प्रश्न 2.
मानव शरीर में कितने प्रकार के अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) 40
(ख) 36
(ग) 22
(घ) 15
उत्तर:
(ग) 22

प्रश्न 3.
‘जीरोपथेल्मिया’ किस विटामिन की कमी के कारण होता है। [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘K’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) विटामिन ‘A’
उत्तर:
(घ) विटामिन ‘A’

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प्रश्न 4.
वसा में घुलनशील विटामिन होता है । [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘डी’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘बी,’
(घ) विटामिन ‘बी,,’
उत्तर:
(क) विटामिन ‘डी’

प्रश्न 5.
ग्राम कार्बाहाइड्रेड के विघटन से कितनी ऊर्जा प्राप्त होती है। [B.M.2009A]
(क) 2 कैलोरी ऊर्जा
(ख) 6 कैलोरी ऊर्जा
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा
(घ) 10 कैलोरी ऊर्जा
उत्तर:
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा

प्रश्न 6.
दुबली-पतली शरीर रचना वाले व्यक्ति कहलाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) मीसोमोरफिक
(ख) एकटोमोरफिक
(ग) इण्डोमोरफिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) एकटोमोरफिक

प्रश्न 7.
एक साधारण कार्य करने वाले व्यस्क पुरुष को प्रतिदिन कितना ग्राम अनाज ग्रहण करना चाहिए। [B.M.2009A]
(क) 175 ग्रा.
(ख) 270 ग्रा
(ग) 380 ग्रा.
(घ) 520 ग्रा.
उत्तर:
(घ) 520 ग्रा.

प्रश्न 8.
खाद्य वर्गों को मिला-जलाकर खाने से – [B.M.2009A]
(क) विभिन्न स्वाद मिलता है
(ख) पकाने में समय की बचत होती है
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है
(घ) पोषक मान अधिक होता है
उत्तर:
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है

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प्रश्न 9.
खाद्य पदार्थों को कितने वर्ग में बाँटा जा सकता है ? [B.M.2009A]
(क) तीन
(ख) आठ
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर:
(ग) पाँच

प्रश्न 10.
पशु जन्य प्रोटीन में किस तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ? [B.M.2009A]
(क) अनिवार्य अमीनो अम्ल
(ख) ऊर्जा
(ग) पेप्टोन
(घ) एंजाइम
उत्तर:
(घ) एंजाइम

प्रश्न 11.
कैल्सियम का उत्तम स्रोत है –
(क) रागी
(ख) मकई
(ग) दाल
(घ) चावल
उत्तर:
(क) रागी

प्रश्न 12.
अंडे से प्राप्त होनेवाले प्रोटीन को प्रोटीन माना जाता है –
(क) A ग्रेड.
(ख) B ग्रेड
(ग) C ग्रेड
(घ) D ग्रेड
उत्तर:
(क) A ग्रेड.

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प्रश्न 13.
वसा वयस्क स्त्री एवं पुरुष को ग्राम में चाहिए –
(क) 20 ग्रा.
(ख) 30 ग्रा.
(ग) 45 ग्रा.
(घ) 50 ग्रा.
उत्तर:
(क) 20 ग्रा.

प्रश्न 14.
इडली डोसा खाया जाता है –
(क) आंध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर:
(घ) तमिलनाडु

प्रश्न 15.
खाद्य वर्ग मुख्यतः [B.M. 2009A]
(क) दो है,
(ख) चार है
(ग) पाँच है
(घ) आठ है
उत्तर:
(ग) पाँच है

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प्रश्न 16.
खाद्य पदार्थों के सही संग्रह की आवश्यकता क्यों है ? [B.M.2009A]
(क) उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए
(ख) आर्थिक लाभ के लिए
(ग) गुणवत्ता बढ़ाने के लिए
(घ) सुविधा के लिए
उत्तर:
(घ) सुविधा के लिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन का रासायनिक संगठन (Composition of Protein) क्या है ?
उत्तर:
प्रोटीन मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। प्रोटीन के कुछ समूहों में सल्फर, फॉस्फोरस तथा ताँबा, लोहा आदि लवण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 2.
प्रोटीन का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का वर्गीकरण (Classification of Proteins) निम्नलिखित के अनुरूप होता है –
(a) भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ।
(b) अमीनो अम्ल की मात्रा।

(a) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं –

  • साधारण प्रोटीन (Simple)
  • युग्म प्रोटीन (Conjuguated)।
  • प्राप्त प्रोटीन (Derived)।

(b) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं:

  • पूर्ण प्रोटीन (Complete Proteins)।
  • siera: yuf sitzta (Partially Complete)
  • 37 of stata (Incomplete proteins)

प्रश्न 3.
प्रोटीन के कोई तीन कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रोटीन के कार्य (Functions of Proteins):

  • प्रोटीन नए तंतुओं के उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
  • यह टूटे-फूटे व पुराने तंतुओं की मरम्मत के लिए भी उत्तरदायी है।
  • ग्लोबिन प्रोटीन रक्त के हीमोग्लोबिन तंतुओं का एक आवश्यक हिस्सा है।

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट कई रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना यौगिक है। यह पदार्थ कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के रासायनिक संयोग से मिलकर बनता है।

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प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट का किस आधार पर वर्गीकरण कर सकती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट को परमाणुओं की संख्या के आधार पर निम्न तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)।
  • डाइ-सैक्राइड (DiSaccharide)।
  • पोली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)।

प्रश्न 6.
वसा (Fats) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना होता है। वसा में नाइट्रोजन का अभाव होता है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन की मात्रा अधिक होती है लगभग दुगुनी और इसलिए यह कार्बोज से दुगुनी ऊर्जा उत्पादित कर पाते हैं। वसा का सुरक्षित कोष चर्बी के रूप में शारीरिक वजन का लगभग 13.8% होता है।

प्रश्न 7.
संतृप्त वसीय अम्ल (Saturated Fatty Acid) और असंतृप्त वसीय अम्ल (Unsaturated Fatty Acid) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संतृप्त वसीय अम्ल-जिन वसीय अम्ल में कार्बन अणुओं की बराबर संख्या में हाइड्रोजन अणु उपस्थित रहते हैं, उनको संतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, अर्थात् इनके कार्बन हाइड्रोजन ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। असंतृप्त वसीय अम्ल-वह अम्ल जिनमें हाइड्रोजन तथा कार्बन अणुओं की संख्या असमान हो अर्थात् हाइड्रोजन अणुओं की संख्या कार्बन अणुओं से कम हो, उसे असंतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, जैसे ओलेइक ऐसिड (Oleic Acid)।

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प्रश्न 8.
वसा और तेल में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वसायुक्त भोज्य पदार्थों को दो समूहों में बाँटा गया है। 1. वसा, 2. तेल। यह विभाजन तापक्रम से होने वाली क्रियाओं के अनुसार किया गया है। वसायुक्त पदार्थ यदि 20°C पर ठोस हो तो वह वसा कहलाता है। यदि इसी तापक्रम पर पदार्थ तरल हो तो वह तेल कहलाता है।

प्रश्न 9.
विटामिन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सन्तुलित भोजन में विटामिन आवश्यक पदार्थ हैं । इनके द्वारा शरीर की कोशिकाओं तथा तन्तुओं से अनेक कार्य होते रहते हैं। प्रत्येक विटामिन एक अलग रासायनिक तत्त्व है, इसके अपने निजी गुण होते हैं। ओसर नामक वैज्ञानिक ने विटामिनों की परिभाषा इस प्रकार की है, “यह एक ऐसा सशक्त मिश्रण है जो प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है किन्तु शरीर के लिए अनिवार्य है।”

प्रश्न 10.
विटामिन ‘ए’ पर नोट लिखें।
उत्तर:
विटामिन-‘ए’ पीलापन लिये हुए वह पदार्थ है, जो कि पानी में अघुलनशील, वसा में घुलनशील और आग के प्रति स्थिर (Stable) है । साधारण तापक्रम पर यह नष्ट नहीं होता लेकिन Oxidation की क्रिया से यह नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य की किरणों के सम्पर्क से भी यह नष्ट हो जाता है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में विटामिन एक साधारण तापक्रम पर भी नष्ट होता रहता है। लेकिन O2 की अनुपस्थिति में विटामिन-‘ए’ युक्त भोज्य पदार्थों को 120°C तक गर्म करने पर इसकी मात्रा और गुण यूँ ही बना रहता है। ”

प्रश्न 11.
विटामिन ‘डी’ के गुण क्या हैं ?
उत्तर:
गुण (Property): शुद्ध विटामिन-डी सफेद रवेदार, गन्ध रहित तथा वसा घुलित पदार्थों में घुलनशील है। आग के प्रति स्थिर, अम्ल तथा क्षार से यह नष्ट नहीं होता । CH तथा C2 के संयोग से यह बनता है। भोजन बनाने की साधारण विधियों में भी विटामिन-डी नष्ट नहीं होता। दूध को उबालने से, पाश्चुरीकरण से तथा पाउडर के रूप से सुखाए जाने पर भी इस विटामिन की मात्रा बनी रहती है।

प्रश्न 12.
जल में घुलनशील विटामिन बताइए।
उत्तर;
इन विटामिनों को हम दो श्रेणी में विभक्त करते हैं :
1. विटामिन बी श्रेणी-थायमिन, राइबोफ्लेविन, नायसिन, पारिडेक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालमिन, पैटोथीन अम्ल, बायोटिन, कोलीन।
2. विटामिन सी श्रेणी-ये जल में घुलने वाले विटामिन हैं। इनका मुख्य कार्य शरीर में ऊर्जा प्राप्ति में सहायक होना है।

ये विटामिन शरीर में उत्पादित नहीं हो सकते, अतः इन्हें प्रतिदिन आहार के द्वारा ही प्राप्त करना आवश्यक है। यदि शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच भी जाते हैं तो जल में घुलनशील होने के कारण जल-निष्कासन द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

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प्रश्न 13.
विटामिन B1 (Thiamine) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह विटामिन पूर्ण रूप से चावलों के परिस्तर (Pericarp) से सन् 1926 ई० में निकाला गया और 1937.ई० में व्यावसायिक रूप में तैयार किया गया । चूँकि इसमें एमाइन-नाइट्रोजनीय तत्त्व होने के साथ-साथ कुछ थोड़ा-सा अंश गन्धक का भी है, अतः इसे थायमीन कहा गया क्योंकि यह तन्त्रिकाओं (Nerves) पर कार्बोज से उत्पन्न पाइरुविक एसिड के प्रभाव को मिटाता है। इसे एन्युरिन (Aneurin) भी कहा जाता है।

प्रश्न 14.
विटामिन B1 (Riboflavin) के भौतिक गुण क्या हैं ?
उत्तर:
विटामिन के अणु के दो भाग हैं, राइबो (Ribo) शर्करा खण्ड व फ्लेविन (Flavin)। यह कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन (C1, H1, N2) और दो मेथिल समूह से मिलकर बनता है। सन् 1935 ई० से यह प्रयोगशालाओं में बनाया जाने लगा । अम्ल, ताप तथा वायु का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘सी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर:
विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल ताजे खट्टे रसदार फलों में ही उपस्थित होता है और रखे जाने पर या फलों के बासी हो जाने पर 50% तक नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 17.
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन कौन-सा है ?
उत्तर:
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन आँवला है जिसमें सन्तरे से 20 गुना विटामिन सी अधिक पाया जाता है।

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प्रश्न 18.
कैल्शियम के भौतिक गुणों का आधार क्या है ?
उत्तर:
कैल्शियम (Calcium): कैल्शियम एक अकार्बनिक पदार्थ है जिससे लवण तैयार किए जा सकते हैं। हमारे शरीर में मुख्यतः हाइड्रोक्सि-ऐपेटाइड Ca10 (Pou)6 (OH)2 के रूप में काम आता है। कार्बोनेट, साइट्रेट, फॉस्फेट और बाईकार्बोनेट काम में आने वाले अन्य लवण हैं। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लगभग दो किलो और फॉस्फोरस डेढ़ किलो तक पाया जाता है। कैल्शियम का लगभग 99 प्रतिशत भाग हड्डियों और दांतों को सुदृढ़ बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 19.
एनीमिया रोग किसकी कमी से होता है ?
उत्तर:
एनीमिया या रक्त में हीमोग्लोबिन का कम होना प्रमुखतः लोहे की कमी से होता है। इसके अतिरिक्त यह फोलिक अम्ल व सायनोकोबालामीन’ की कमी से भी होता है।

प्रश्न 20.
कैल्शियम के अवशोषण में कौन-सा विटामिन सहायक है ? बच्चों में इसकी कमी से होने वाले दो प्रमुख लक्षण लिखें।।
उत्तर:
कैल्शियम के अवशोषण हेतु शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता पड़ती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स नामक रोग हो जाता है। इसके दो प्रमुख लक्षण निम्न हैं :

  • टांगों की हड्डियाँ नर्म पड़ जाती हैं। शरीर का भार सहन न कर सकने के कारण मुड़कर धनुष के आकार की हो जाती हैं।
  • छाती की हड्डियाँ आगे की ओर बढ़ जाती हैं जिसके कारण वक्ष भाग कबूतरनुमा दिखने लगता है।

प्रश्न 21.
खनिज लवण कैल्शियम पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
कैल्शियम श्वेत खड़िया (Chalk) के पाउडर जैसा होता है। कैल्शियम की मात्रा शारीरिक वजन की 1.5 से 2.0% तक होती है, जिसमें 99% हड्डियों व दाँतों में और शेष 1% अन्य ऊतकों व द्रवों में होता है।

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प्रश्न 22.
कैल्शियम की शरीर में प्रतिदिन की मात्रा बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की प्रतिदिन की मात्रा (Daily intake of Calcium) –
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प्रश्न 23.
रक्त का रंग लाल क्यों होता है ?
उत्तर:
लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन की उपस्थिति ही रक्त को लाल रंग प्रदान करती है।

प्रश्न 24.
लोहे की प्रतिदिन कितनी मात्रा आवश्यक है ?
उत्तर:
शरीर में लोहे की आवश्यकता (Requirement of iron in the body): लोहा प्रतिदिन आहार से प्राप्त करना आवश्यक है। विभिन्न आयु व स्थिति के अनुसार लोहे की प्रतिदिन की मात्रा (mg)
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आकस्मिक दुर्घटना के घटित होने अथवा डॉक्टरी ऑपरेशन के पश्चात् रक्त के ह्रास को प्राकृतिक अवस्था में लाने के लिए कुछ मास तक व्यक्ति के भोजन में लोहे की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 25.
‘लोहे’ के भौतिक गुण (Physical properties) लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे की उपयोगिता के विषय में विस्तत ज्ञान प्राप्त करने के लिए 19वीं शताब्दी में अनेक प्रयोग व अनुसंधान हुए जिससे शरीर में लोहे के महत्त्वपूर्ण कार्यों का पता लग सका। खनिज लवणों में लोहे का विशेष महत्त्व है। यद्यपि लोहा बहुत कम मात्रा में शरीर में पाया जाता है परन्तु शरीर में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। शरीर के कुल वजन का 90.04% भाग आयरन का होता है। इसका 70% भाग रक्त के लाल कण में, 4% मांस-पशियों में, 25% यकृत अस्थिमज्जा, प्लीहा व गुर्दे में संचित भण्डार के रूप में और बाकी 1% रक्त प्लाज्मा व कोशिकाओं के इन्जाइम में रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन के मुख्य साधन (Main sources) कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • प्रोटीन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के प्रोटिअस शब्द से हुई है जिसका अर्थ खाद्य पदार्थों में से सर्वोत्तम पदार्थ है।
  • प्रोटीन मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन में पायी जाती है। सबसे अधिक प्रोटीन मांस, मछली, दूध व पनीर में पाया जाता है। इसके
  • अतिरिक्त सोयाबीन, सभी दालों में, गेहूँ, मटर, चावल, अरारोट, बादाम, मूंगफली आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रोटीन के अभाव में शरीर में कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन के अभाव में निम्नलिखित लक्षण उत्पन्न होते हैं –

  • उम्र के अनुपात में शारीरिक गठन, वृद्धि व विकास में कमी।
  • मांस-पेशियों की शिथिलता।
  • त्वचा का सूखापन-झुर्रियाँ पड़ना।
  • रक्तहीनता।
  • मानसिक विकास में कमी।
  • चिड़चिड़ापन, क्रोध, भावुकता आदि।
  • बालों का सूखापन और कंघी करने पर अधिक टूटना।
  • नाखून का सूखापन और उन पर सफेद दाग।
  • एन्जाइम्स की कमी के कारण पाचन शक्ति में कमी।
  • जल जमाव-शोफ (Nutritional Oedema)।

प्रश्न 3.
आवश्यक व अनावश्यक अमीनो अम्ल (Essential and Non-essential amino-acid) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आवश्यक अमीनो अम्ल से तात्पर्य है कि यह अमीनो अम्ल हमें खाद्य पदार्थों द्वारा अनिवार्य रूप से मिलने ही चाहिए क्योंकि इनका हमारे शरीर में संकलन (Synthesis) नहीं हो पाता। इन अमीनो अम्ल की भोजन में कमी होने से बच्चों का विकास रुक जाता है तथा प्रौढ़ों में तोड-फोड की मरम्मत नहीं हो पाती। बच्चों के लिए 10 अमीनो अम्ल आवश्यक होते हैं तथा प्रौढ़ों के लिए 8, क्योंकि हिस्टीडिन (Histidine) व आर्जिनिन (Arginine) को शिशुओं के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल माना जाता है।

सिस्टिन (Cystine) व टाइरोसिन (Tyrosin) को अर्द्ध-आवश्यक अमीनो अम्ल माना गया है। अनावश्यक अम्ल शरीर में होने वाली तोड़-फोड़ की मरम्मत कर सकते हैं। शरीर का निर्माण इनके द्वारा नहीं हो सकता । कुछ अनावश्यक अम्ल शरीर में कुछ आवश्यक अमीनो अम्ल की उपस्थिति में उत्पादित होते हैं।

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प्रश्न 4.
कार्बोज (Carbohydrates) का शरीर में क्या कार्य है ?
उत्तर:

  • कार्बोज ऊर्जा उत्पत्ति में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। शरीर की सारी ऐच्छिक व अनैच्छिक क्रियाओं के लिए गति व शक्ति प्रदान करते हैं।
  • यह वसा के पाचन में सहायक होते हैं।
  • ग्लूकोज अनावश्क अमीनो अम्ल के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • कार्बोज भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  • यह वसा के साथ मिलकर सन्तुष्टि की अनुभूति भी कराते हैं।
  • इसलिए अधिकांश मिष्ठान्न भोजन के अन्तिम दौर में परोसा जाता है।

प्रश्न 5.
कार्बोज की दैनिक मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
कार्बोज की मात्रा कोई निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की गई है, फिर भी 70% कैलोरीज कार्बोज से प्राप्त कर लेना चाहिए । उदाहरणार्थ एक साधारण काम-काज करने वाले व्यक्ति को कुल 2400 कैलोरी की आवश्यकता होती है तो इसका 70% 1680 कैलोरी हुई और चूँकि 10 ग्राम कार्बोज से 4 कैलोरी प्राप्त होती हैं, अतः उसे 1680 + 4 = 420 ग्राम कैलोरी की आवश्यकता होगी। वैसे भी 400 से 450 ग्राम तक की कार्बोज की मात्रा उपयुक्त समझी जाती है।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से शरीर का भार कम हो जाता है ? उनकी स्फूर्ति जाती रहती है और व्यक्ति आलस्य का शिकार हो जाते हैं और शारीरिक विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। शारीरिक कार्यों के लिए ऊर्जा न मिलने पर हर समय थकान महसूस होती है। कार्बोज की कमी होने पर प्रोटीन ऊर्जा के लिए उपयोग होता है और अपने शरीर निर्माण के विशिष्ट कार्य को सम्पन्न नहीं कर पाता है। इसके अतिरिक्त सेल्यूलोज की कमी होने पर मनुष्य कब्ज का शिकार हो जाता है। शरीर में संचित वसा गर्मी व शक्ति उत्पन्न करने हेतु व्यय हो जाता है। परिणामस्वरूप शरीर दुबला हो जाता है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, गालों की चमक जाती रहती है तथा व्यक्ति में दुर्बलता के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्बोहाइड्रेट्स के प्राप्ति स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
सभी भोज्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट्स के अतिरिक्त एक या एक से अधिक पोषक तत्त्व होते हैं। रोटी जो कि कार्बोहाइड्रेट्स की प्राप्ति का मुख्य साधन है उसमें अन्य पोषक तत्त्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। कुछ विशेष भोज्य पदार्थों को ज्वलन या ऊर्जा भोजन के नाम से पुकारते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें ऊर्जा उत्पादन तत्त्व अधिक होने से उनका मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है।

ऐसे पदार्थों में रोटी, आटा, छिलकेदार अनाज, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, चने आदि हैं। इसके अतिरिक्त सोयाबीन, सूखे मटर की फलियाँ आदि हैं। सूखे फलों में अंजीर, मुनक्का, खजूर, किशमिश, अंगूर, सूखी खुमानी आदि हैं। अन्य पदार्थों में शकरकन्द, अखरोट, शहद, गुड़, पहाड़ी आलू, जड़दार सब्जियाँ, पत्तीदार सब्जियाँ आदि हैं।

प्रश्न 8.
आहार में वसा की दैनिक आवश्यकता क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने अनुसंधानों के आधार पर यह अनुशंसा की है कि दैनिक आहार में 30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होनी चाहिए। प्रयुक्त की जाने वाली कुल वसा का 50% भाग वनस्पति तेलों से प्राप्त होना चाहिए ताकि आवश्यक वसीय अम्ल प्राप्त हो सके। विभिन्न आयु के व्यक्तियों के आहार में वसा का निम्नलिखित प्रतिशत होना चाहिए –
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प्रश्न 9.
वसा के मूल स्रोत (Sources) क्या हैं ?
उत्तर:
ऐसे भोज्य पदार्थ बहुत कम हैं जो पूर्णतः वसा तत्त्व से ही निर्मित हुए हैं। सामान्यतः विभिन्न चिकने भोज्य पदार्थों में प्रोटीन, वसा में घुलनशील विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और खजिन लवण आदि का संयोग रहता है परन्तु जिन पदार्थों में वसा की पर्याप्त मात्रा रहती है, उन्हें वसा का स्रोत माना जाता है।
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1. पशुजन्य स्रोत के अन्तर्गत माँस, मछली, मुर्गी के अण्डे, अण्डे की जर्दी, दूध और दूध से बने व्यंजन आते हैं।
2. वानस्पतिक स्रोत में वसा बीजों, सूखे मेवों (Nut), अनाजों और फलों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 10.
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर निम्न प्रकार हैं  –

वसा विलेय (Fat Soluble)।

  • वसा या वसा को घोलने वाले द्रवों में घुलनशील है।
  • आवश्यकता से अधिक खाये जाने पर शरीर में अधिकांश यकृत में संचित हो जाते हैं।
  • अभाव के दुष्परिणाम या लक्षण काफी विलम्ब से प्रकट होते हैं।
  • इनमें केवल ‘C, H, O अणु होते हैं।
  • अधिकता का शरीर पर कुप्रभाव पड़ता है।
  • यह विटामिन पूर्वगामी (Precursor) रूपों में भी पाए जाते हैं।

वारि विलेय (Water Soluble):

  • केवल वारि जल में घुलनशील है।
  • अधिकांश संचित नहीं होते। मूत्र में निष्कासित हो जाते हैं।
  • अभाव लक्षण तुरत ही प्रकट हो जाते हैं।
  • इनमें C, H, व O के अतिरिक्त N भी होता है, और कुछ में Sulphur व Cobalt भी।
  • अधिकता का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • यह पूर्वगामी रूपों में नहीं पाए जाते हैं।

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प्रश्न 11.
विटामिन ‘D’ के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions):
शरीर की उचित वृद्धि के लिए विटामिन डी की आवश्यकता है। इसकी अनुपस्थिति में विकास की गति रुक जाती है। चूहों के प्रयोग से पता चला है कि जिन चूहों को भोजन द्वारा विटामिन डी उपलब्ध कराई गई उनकी वृद्धि द्वितीय समूह के चूहों जिनके आहार में विटामिन डी अनुपस्थित थी, से बहुत अच्छी हुई।

  • कैल्शियम और फास्फोरस खनिज पदार्थों के अवशोषण में सहायक होते हैं जिससे हड्डियों व दाँतों को खनिज पदार्थ वांछित मात्रा में प्राप्त हो सकें।
  • इन्हीं तत्त्वां विशेषकर फास्फोरस गुर्दे (Kidney) के निकास को नियमित करता है। कैल्शियम उचित अनुपात में बना रहता है, जिससे हड्डियों की मजबूती बनी रहती है।
  • रक्त में भी कैल्शियम की मात्रा को. नियमित बनाए रखता है।
  • रक्त के अल्कंन फॉस्फेट इन्जाइम को नियमित बनाये रखता है जिसमें यह कैल्शियम व फॉस्फोरस को हड्डियों व दाँतों में संचित किए रखता है।

प्रश्न 12.
विटामिन ‘डी’ की दैनिक आवश्यकता क्या है ?
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता (Daily Requirement):

  • इस विटामिन की आवश्यकता जब शरीर में विकास हो रहा होता है, होती है।
  • गर्भवती स्त्री को भी इसकी आवश्यकता होती है।
  • एक स्वस्थ सामान्य वयस्क व्यक्ति.को इसकी थोड़ी आवश्यकता होती है। पोषण विज्ञान परिपद ने 18 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयु वर्गों के लिए
  • 200 आई. यू. (I.U) निश्चित किये हैं परन्तु प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए कुछ नहीं बताया।

प्रश्न 13.
विटामिन ‘बी’ (थायमिन) की भोजन में क्या उपयोगिता है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. इस विटामिन का विशेष कार्य कार्बोज के उपापचयन में सहायता करना है। इसके अभाव में शरीर में कार्बोज का पूर्ण अवशोपण नहीं हो पाता।
  2. यह विटामिन तान्त्रिका तंत्र के स्वास्थ्य तन्त्रिका तन्तु में संवेदन संचार तथा आँतों की स्वाभाविक क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है।
  3. थायमिन को मौरेल (Morale) विटामिन भी कहा जाता है। इसकी कमी से चिड़चिड़ापन, झगड़ालू प्रवृत्ति, अरुचि आदि लक्षण मनुष्यों में पाए जाते हैं। विलियम ने मनुष्यों पर प्रयोग करके बतलाया कि थायमिन पागलपन को ठीक नहीं करता लेकिन जब पागलों को इसकी कमी का आहार दिया जाता है तो उनके पागलपन की तीव्रता बढ़ जाती है।
  4. इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है। यह विटामिन शरीर की वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
  5. इसकी कमी से भूख नहीं लगती।
    B, के अभाव से राइबोफ्लेविन (Riboflavin) के संग्रह में कमी हो जाती है।
  6. रक्त में श्वेताणुओं की रोगाणु-भक्षण क्षमता की वृद्धि हेतु भी यह आवश्यक है।
  7. शरीर के आन्तरिक अवयवों की आवश्यक क्रियाशीलता हेतु शक्ति पहुँचाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 14.
“विटामिन ‘बी1‘ (थायमिन) की दैनिक आवश्यकता (Daily requirement) निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता-इस विटामिन की मात्रा, कैलारीज की मात्रा के अनुपात में निर्धारित की जाती है, अधिक शारीरिक श्रम करने वाले, अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट की खुराक खाने वाले और अधिक शराव सेवन करने वाले व्यक्ति को सामान्य से कुछ अधिक ही मात्रा की आवश्यकता होती है।
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प्रश्न 15.
विटामिन ‘बी2‘ (Riboflavin) के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions)”:

  • राइबोफ्लेविन प्रोटीनों व वसा के उपापचयन में सहायक है।
  • यह नायसिन के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • यह शारीरिक वृद्धि में सहायक है।
  • राइबोफ्लेविन की कमी से त्वचा स्वस्थ नहीं रह सकती।
  • यह अन्य शारीरिक इन्जाइमों से मिलकर शरीर की विभिन्न क्रियाओं में भाग लेता है।
  • यह ऑक्सीकरण प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है तथा कोशिकाओं के श्वसन के लिए अति आवश्यक है।

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प्रश्न 16.
राइबोफ्लेविन की दैनिक शारीरिक आवश्यकताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
शारीरिक आवश्यकता-(Requirement in the body): राइबोफ्लेविन की आवश्यकता मनुष्य के कार्य तथा आयु पर निर्भर करती है।
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प्रश्न 17.
विटामिन C के भौतिक गुणों (Physical Properties) का वर्णन करें।
उत्तर:
विटामिन सी को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे एस्कार्बिक अम्ल (Ascorbic Acid), सिविटामिस एसिड (Cevitamic Acid) या हेक्जुरोनिक एसिड (Hexuronic Acid) आदि। चूँकि यह स्कर्वी (Scurvy) नामक बीमारी का निराकरण करता है, अतः इसे एण्टी स्कोरब्यूटिक विटामिन (Anti Scorbutic Vitamin) भी कहते हैं। सन् 1932 ई० में इसका नींबू के रस से पृथक्करण किया गया और उसी वर्ष इसे रासायनिक रूप में भी तैयार किया गया।

विटामिन सी का रसायनिक नाम एस्कॉर्बिक अम्ल है। शुद्ध विटामिन सी सफेद स्वेदार, गन्ध रहित, पानी में घुलनशील, आग के प्रति अस्थिर, धूप एवं रोशनी में यह नष्ट हो जाता है। ताप, वायु, धातु में यह स्थिर है लेकिन तरल अवस्था में जबकि पानी के साथ इसका घोल बनाया जाता है, तो यह नष्ट हो जाता है। क्षार के माध्यम में यह अस्थिर है। अम्ल के माध्यम में यह नष्ट नहीं होता। जल में घुलनशील है।

प्रश्न 18.
विटामिन सी की दैनिक मात्रा मानव शरीर में कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
दैनिक मात्रा (Daily Requirement): बालकों के लिए शरीर विकास के साथ इस विटामिन की आवश्यकता बढ़ती रहती है।
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प्रश्न 19.
विटामिन C के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): यह समस्त रसीले फलों में विशेषकर नींबू, सन्तरा, आँवला, कमरख, अमरूद, चकोतरा, टमाटर में पाया जाता है, केले में भी यह पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहता है। हरी शाक-सब्जियों व ताजे फलों में जैसे पालक, सलाद आदि में यह पर्याप्त मात्रा में रहता है। अंकुरित अनाजों से यह अत्यधिक अंशों में प्राप्त किया जा सकता है। सूखे फलों में यह बिल्कुल नहीं रहता।

विभिन्न भोज्य पदार्थों में विटामिन (Vitamins in Different Food Stuffs)
अति उत्तम स्त्रोत – आँवला, अमरूद।
उत्तम स्रोत – नींबू का रस, पका पपीता, सन्तरा, काजू, अनानास, पका टमाटर, पका आम, मूली के पत्ते पालक, हरी पत्ती वाली शाक भाजी। .
सामान्य स्त्रोत – केला, सेब।

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प्रश्न 20.
लोहे के खाद्य स्रोत लिखें।
उत्तर:
खाद्य स्रोत:

  1. प्राणिज पदार्थों में यकृत (Liver) उत्तम स्रोत है। मांस, अण्डे की जर्दी, मछली आदि अन्य स्रोत हैं।
  2. फलों में सेब, आडु, खुबानी, अंगूर आदि से कुछ लोहा मिल जाता है।
  3. पालक व हरी पत्तीदार सब्जी लोहे के स्रोत हैं। पत्ते जितने अधिक हरे होंगे, उतना ही अधिक लोहा उनमें होगा।
  4. साबुत अनाजों व गुड़ में भी लोहा पाया जाता है।
  5. दालों में थोड़ी मात्रा में लोहा पाया जाता है।
  6. दूध, पनीर आदि में लोहा बहुत कम होता है।

प्रश्न 21.
खाद्य सम्मिश्रण क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट करें । [B.M. 2009 A]
उत्तर:
पर्याप्त पोषण के लिए यदि हम भोज्य पदार्थों को मिलाकर प्रयोग करें तो जो एक दूसरे. के पोषक तत्त्व की कमी को पूरा करते है उसे ही खाद्य सम्मिश्रण कहते हैं। इस विधि से पौष्टिक मान बढ़ाने से सबसे अधिक प्रभाव प्रोटीन की पौष्टिकता पर पड़ता है। अर्थात् प्रोटीन के द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी के स्रोतों को मिलाकर प्रथम श्रेणी का प्रोटीन प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर अनाज और दाल को मिलाकर दाल-रोटी दाल-चावल, खिचड़ी, डोसा इडली बड़ा बनाया जा सकता है इसी प्रकार से सब्जी और दूध के बने पदार्थ जैसे-गाजर का हलवा, टोमैटो क्रीम सूप। फल और अनाज से फ्रूट केक फलों का जैम ब्रेड इत्यादि बनाय जा सकता है। इस विधि से भोजन पकाने में पौष्टिकता तो बढ़ती ही साथ ही पकाने एवं खाने दोनों का ही समय कम लगता है और भोजन स्वादिष्ट, आकर्षक एवं रुचिकर भी हो जाता है।

प्रश्न 22.
लोहे की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
अथवा,
एक गर्भवती महिला अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाती। उसको कौन-सा रोग तत्त्वों की कमी से हो सकता है ? उसके दो लक्षण लिखें तथा एक खाद्य पदार्थ सुझाएँ।
उत्तर:
शरीर में कमी का प्रभाव (Effect of deficiency in the body):शरीर में लोहे ‘का अभाव कई कारणों से हो सकता है –

  • भोजन में लोहे की कमी।
  • लोहे का शरीर में पूर्णतः अवशोषण न होना।
  • शरीर में लोहे की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता हो।

लोहे की कमी से रक्तक्षीणता (Anaemia) रोग हो जाता है। इस रोग में लाल रक्त कण संख्या में बहुत कम हो जाते हैं, त्वचा पीली दिखाई देने लगती है, हीमोग्लोबिन का पर्याप्त रूप से निर्माण नहीं हो पाता। रक्त ऑक्सीजन वहन में असमर्थ हो जाता है। ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से शारीरिक क्रियाएँ क्षीण होने लगती हैं।

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ऊर्जा उत्पत्ति की कमी, शारीरिक कमजोरी, थकावट, भूख की कमी, साँस फूलने और हृदय धड़कने की शिकायत, आँखों की पलकों में लाली की कमी, चेहरा पीला, नाखून सफेद से और हाथों-पाँवों पर जल जमाव के कारण सूजन हो जाया करती है। व्यक्ति उत्साहहीन, सुस्त और बेचैन-सा रहने लगता है, वे लक्षण लोहे की कमी के ही लक्षण हैं।

प्रश्न 24.
लोहे की आवश्यकता शरीर में क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:

  • गर्भकाल में तथा जन्म पश्चात् शिशु और स्वयं के लिए भी माता को आवश्यक मात्रा में लोहा प्रदान करने के लिए।
  • बढ़ते बालकों के विकास के साथ-साथ लोहे की बढ़ती आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए।
  • विभिन्न व्यक्तियों की विशेष परिस्थितियों में लोहे की हानि को पूरा करने के लिए।
  • शरीर में लोहे की पर्याप्त मात्रा संचित करके भविष्य के संभाव्य अभावों के लिए पूर्ण व्यवस्था करने के लिए।

प्रश्न 25.
आयोडीन की शरीर में क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
शरीर में आवश्यकता (Requirement in the body)-समुद्रतटीय निवासियों को आयोडीन की अधिक आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके भोजन में आयोडीन की अधिक मात्रा उपस्थित रहती है। एक वयस्क व्यक्ति को 0.15 से 0.2 मिली ग्राम, छोटे बच्चे और अन्य बालकों को 0.05 से 0.10 मिलीग्राम एक अच्छे संतुलित आहार द्वारा प्राप्त होती है।

प्रश्न 26.
आप अपने लिए संतुलित भोजन का आयोजन करना चाहते हो। आपको ICMR खाद्य पदार्थ किस प्रकार मदद करेगी?
उत्तर:

  • प्रत्येक आहार में प्रत्येक खाद्य ग्रुप को सम्मिलित करने में।
  • भोजन में विभिन्नता लाने में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में प्रोटीन के क्या कार्य (Function) हैं ?
उत्तर:
1. मानव शरीर का लगभग 18% भाग प्रोटीन से बना होता है जो शरीर के विभिन्न भागों के कार्यों के अनुसार कई रूपों में पाया जाता है। शरीर में कोशिकाओं और ऊतकों का निर्माण करना प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसीलिए स्त्री को गर्भावस्था व स्तनपान काल में तथा बालक को बाल्यावस्था में शरीर के निर्माण और विकास के लिए प्रोटीन की विशेष रूप से अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. मनुष्य की बाह्य क्रियाशीलता तथा शरीर के अन्दर निरन्तर होती रहने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप ऊतकों में जो कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती रहती हैं उनकी पूर्ति तथा मरम्मत प्रोटीन द्वारा होती है। अस्थियाँ, दाँत, त्वचा, नाखून, रक्तकण, मांसपेशियां और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि की रचना में प्रोटीन का मुख्य भाग होता है। मूत्र और पित्त को छोड़कर शरीर के सभी तरल पदार्थों में अधिक या कम मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।

3. शरीर की क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में सहायता करना भी प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में प्रोटीन निम्न प्रकार से सहायता करता है –

(क) हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) इस प्रकार का प्रोटीन है जो रक्त के लाल कणों का एक मुख्य भाग है। इसमें लोहा भी सम्मिलित होता है। इसका कार्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है। रक् द्वारा यह ऑक्सीजन को विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है जिससे मिलकर कार्बोहाइड्रेट्स और वसा का ज्वलन होता है और परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है।
(ख) रक्त में जो प्रोटीन पाए जाते हैं वे रक्त की सामान्य क्षारीय प्रतिक्रिया (alkaline reaction) की स्थिति बनाए रखने में सहायता करते हैं।
(ग) एन्जाइम (enzyme) भी जो पाचन तथा उपापचयन (Matabolism) क्रियाओं में विशेष रूप से सहायक होती है, प्रोटीन से ही बने होते हैं।
(घ) विभिन्न हारमोन (Hormones) भी प्रोटीन से ही निर्मित होते हैं। वे नाइट्रोजन युक्त रासायनिक यौगिक हैं। शरीर की आन्तरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखने में इनका बहुत महत्त्व है।
(ङ) प्रोटीन आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव व हारमोन्स की बनावट में भाग लेते हैं। इन्सुलिन (Insulin), एनिलिन (Adrenaline), थायरॉक्सिन (Thyroxine) व अन्य हारमोन्स में विद्यमान रहते हैं।

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4. शरीर में रोगों से बचाव के लिए कुछ प्रतिरोधी (anti bodies) भी पाए जाते हैं। ये पदार्थ प्रोटीन से ही बनते हैं।

5. आवश्यकता पड़ने पर शरीर को काम करने के लिए प्रोटीन शक्ति भी प्रदान कर सकता है, परन्तु सामान्य दशा में प्रोटीन से ऊर्जा उत्पादक पदार्थों का काम लेना लाभकारी नहीं होता। यदि प्रोटीन ऊर्जा की उत्पत्ति के लिए प्रयुक्त कर लिए जाते हैं तो शरीर निर्माण के लिए प्रोटीन नहीं बचते हैं।
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प्रश्न 2.
प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर:
प्रोटीन की आवश्यकता कई बातों पर निर्भर करती है –

  • वृद्धि एवं विकास के समय अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • प्रोटीन की प्रतिदिन की आवश्यकता आहार में उपयोग की गई प्रोटीन के गुण पर भी निर्भर करती है। प्रतिदिन के आहार में उपयोग की गई प्रोटीन का आधा भाग प्राणी जगत के साधन से आना चाहिए।
  • प्रोटीन की आवश्यकता आहार में उपस्थित अन्य पौष्टिक तत्त्व जैसे कैलोरीज की मात्रा पर भी निर्भर करती है। आहार में कैलोरीज की कमी से प्रोटीन ऊष्मा प्रदान करने का कार्य करेगी।
  • संक्रामक बीमारियों में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की दैनिक मात्रा-1 ग्राम प्रतिकिलो वजन के अनुपात से लेना चाहिए। 1 ग्राम प्रोटीन = 4 KCal प्राप्त करता है।
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प्रश्न 3.
कार्बोहाइड्रेट को किस आधार पर वर्गीकृत (Classify) कर सकते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
कार्बोज को परमाणुओं की संख्या के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)
  • डाइ-सैक्राइड (Di-Saccharide)
  • पौली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)

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I. मोनो सैक्राइड (Mono-Saccharide): मोनो सैक्राइड कार्बोज है जिसके अणु में एक शर्करा इकाई है। इन्हें सरल शर्करा भी कहते हैं। इनका अभिपचन इन्हें खाने के पश्चात् तुरन्त ही हो जाता है। यह स्वाद में मीठा और जल में घुलनशील है।

(अ) ग्लूकोज (Glucose): यह मीठे फलों जैसे अंगूर में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। अतः इसको शक्कर (Grape) भी कहते हैं। यह मक्का, चुकन्दर, गन्ना आदि में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। ग्लूकोज श्वेतसार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। सभी श्वेतसार पाचन तथा पोषण के पश्चात् ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं।

रक्त में ग्लूकोज की एक निश्चित मात्रा होती है। यह मात्रा घटने तथा बढ़ने से शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में होने से यह मूत्र द्वारा वाहर निकलने लगता है। ये लक्षण डायबिटीज रोग के हैं। ग्लूकोज की आवश्यकता से अधिक मात्रा आहार में लेने से यह शरीर में ग्लाइकोजन (Glycogen) के रूप में एकत्रित हो जाता है।

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ग्लाइकोजन अधिकतर यकृत तथा मांसपेशियों में जमा रहता है । उपवास या बीमारियों में यही ग्लाइकोजन ग्लूकोज में बदल जाता है तथा ऑक्सीजन के पश्चात् ऊर्जा प्रदान करता है। ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा लेने से पाचन के पश्चात् वह वसा में परिवर्तित हो जाता है तथा वसा शरीर में जमा होकर अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न करती है। अत्यन्त दुर्बल रोगियों या मूर्छा आदि की दशा में ग्लूकोज को देने के लिए बाजार से बनी बनाई ग्लूकोज उपलब्ध हो जाती है। यह तुरंत रक्त में पहुँचकर रोगी को शक्ति प्रदान करता है क्योंकि इसे पचाने की आवश्यकता नहीं होती।

(ब) ग्लैक्टोज (Glactose): यह शक्कर ग्लूकोज व फ्रक्टोज की तरह प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। यह दूध में पाई जानेवाली शक्कर लैक्टोज के पाचन से प्राप्त होता है। इसको औद्योगिक विधि से भी तैयार किया जाता है।

(स) फ्रक्टोज (Fructose): यह फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। अत: फलों को शक्कर भी कहते हैं। यह इस समूह की सबसे मीठी शक्कर है। यह शहद, गुड़ आदि में पाया जाता है। फ्रक्टोज भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिनकी ग्लूकोज करता है। दोनों परस्पर परिवर्तनशील हैं।

II. डाइसैकराइड्स (Disaccharides) (C12 H2 O11 ): इन कार्बोहाइड्रेटों के अणुओं में शर्करा की दो इकाइयाँ होती हैं। इसलिए इन्हें दोहरी शर्करा या द्विशर्करा भी कहते हैं। ये सरल शर्करा से कुछ अधिक मीठी होती हैं तथा पानी मेंघुलनशीलस्फटिक (Crystals) बनने योग्य तथापाचन योग्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत ये सरल शर्कराओं में परिवर्तित हो जाती हैं।

(अ) लैक्टोज (Lactose): यह अन्य दूसरी शर्कराओं की अपेक्षा कम घुलनशील एवं कम मीठी होती है। साधारणतः यह रक्त या शरीर के ऊतकों में नहीं पायी जाती है। इसे दूध शक्कर भीकहते हैं। दूध में लैक्टोज 2 से 8% तक उपस्थित होती है। लैक्टोज का पाचन हो जाने के पश्चात् इसमें ग्लूकोज तथा ग्लैक्टोज बराबर अनुपात में मिलती है। लैक्टोज = ग्लूकोज + ग्लैक्टोज

(ब) सुक्रोज (Sucrose): यह अधिकतर गन्ने की शक्कर और चुकन्दर की शक्कर में पायी जाती है। यह साधारण चीनी का वैज्ञानिक नाम है। अभिपाचन के उपरान्त यह ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रक्त द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। इसकी अतिरिक्त मात्रा यकृत में ग्लाइकोजन बनकर संचित हो जाती है। सुक्रोज ग्लूकोज और फ्रक्टोस के संयोग से बनता है। सुक्रोज = ग्लूकोज + फ्रक्टोज

(स) माल्टोज (Maltose): इसे माल्ट या जवा शक्कर भी कहा जाता है। अंकुरित अनाजों में उपस्थित शक्कर है। अंकुरित होने की क्रिया के अन्तर्गत अनाजों के स्टार्च, माल्टोज शर्करा में परिवर्तित होते हैं जो अधिक सुपाच्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत अनाज का स्टार्च पहले माल्टोज में और फिर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है। माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज

III. पौली सैकराइड्स (Polysaccharides (C6H10O6): यह एक जटिल पदार्थ है। इस श्वेतसार में दो से ज्यादा शक्कर की इकाई रहती है। इनमें मिठास कम होती है तथा इसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

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(अ) स्टार्च (Starch): जड़, वीज, कन्द अनाजों आदि में ये काफी मात्रा में उपस्थित रहते हैं। स्टार्च पानी में अघुलनशील हैं। गर्म पानी के साथ घोलने पर स्टार्च पेस्ट के रूप में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च पकाने के पश्चात् उसके चारों ओर उपस्थित सेल्यूलोज की दीवार टूट जाती है तथा स्टार्च कण पानी शोषित करके फूल जाते हैं। स्टार्च को अधिक पकाने से वह चिपचिपे पदार्थ में बदल जाता है।

पका हुआ स्टार्च खाने में स्वादिष्ट होता है तथा इसका पाचन शीघ्र ही हो जाता है। कच्चे स्टार्च का पाचन नहीं होता क्योंकि लार में उपस्थित एन्जाइम टायलिन केवल पके स्टार्च पर ही कार्य करता है। स्टार्च के कणों का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। इसके कुछ कण गोल, कुछ अण्डाकार तथा कुछ बेढंगी शक्ल के होते हैं।

(ब) डेक्सट्रीन (Dextrin): डेक्सट्रीन प्रकृति में प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलता है। जब स्टार्च युक्त पदार्थों को पकाया या भूना जाता है तो स्टार्च डेक्सट्रिन में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च का उद्विच्छेदन होने से स्टार्च पहले माल्टोज में, फिर डेक्सट्रिन में तथा अन्त में ग्लूकोज के रूप में प्राप्त होता है। इस प्रकार डेक्सट्रिन की प्राप्ति स्टार्च के उविच्छेदन से भी होती है। डबलरोटी या चपाती की बाहरी पपड़ी भीतरी भाग की अपेक्षा अधिक पाचनशील होती है।

(स) सेल्यूलोज (Cellulose): यह स्टार्च कोशिकाओं की बाहरी पर्त पर कड़े आवरण के रूप में उपस्थित रहता है। यह एक अत्यन्त जटिल पदार्थ है। इस कारण इसका शरीर में पाचन नहीं होता। सेल्यूलोज का भोज्य-मूल्य नहीं होता लेकिन भोजन में इसका होना अति आवश्यक है। सेल्यूलोज के रेशे आहार में भूसी की मात्रा बढ़ाते हैं जिससे आंत की मांसपेशियों में कुंचन गति (Penstalistic Movement) तेजी से होती है और मल आँत से आसानी से बाहर निकल जाता है। भूसी आँत में पानी शोषित करके फूल जाती है तथा बड़ी आँत को बली प्रदान करती है जिससे बड़ी आँत में मल आसानी से निकल जाता है। साबुत अनाजों, दालों, ताजे फलों एवं सब्जियाँ, सूखे मेवे आदि में सेल्यूलोज अधिक पाया जाता है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन आहार में 4 से 7 मि. रेशा लेना चाहिए।

प्रश्न 4.
आहार द्वारा क्वाशिरक्योर का इलाज तथा मरस्मस रोग के लक्षण बताएँ।
उत्तर:
क्वाशिक्योर के रोगी को आहार देते समय निम्न दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए
1. आहार पाचनशील हो। शुरू के कुछ हफ्ते में सिर्फ तरल आहार देना चाहिए। तरल आहार में प्रोटीन, कैलोरीज तथा विटामिन अधिक मात्रा में हों।
2. जीवाणुनाशक तथा परजीवीनाशक दवाई देनी चाहिए।

आहार (Diet): बच्चे को शुरू में वसा रहित पाउडर दूध देना चाहिए। अच्छी तरह पकाए हुए अनाज, खिचड़ी, दाल का सूप आदि देना चाहिए । वसा युक्त भोज्य पदार्थ दूसरे या तीसरे हफ्ते से शुरू करना चाहिए। बच्चे को हरी पत्ते वाली पीली सब्जियाँ भी देनी चाहिए। इससे बच्चे को लौह, लवण, कैल्शिम, विटामिन ए आदि प्राप्त होंगे।

कैलोरीज (Calories): बच्चे को उसके भार के अनुसार कैलोरीज देनी चाहिए। प्रति किलो भार पर 140-150 कैलोरीज प्रतिदिन आहार में देनी चाहिए। अधिक कैलोरीज देने से बच्चा जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

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प्रोटीन (Protein): प्रोटीन उस स्रोत से दी जाए जिसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल उचित मात्रा में उपस्थित हों। प्रोटीन मुख्य रूप से प्राणी जगत् से दिया जाना चाहिए। प्रतिदिन प्रोटीन 3-5 ग्राम/कि.ग्राम के वजन में दिया जाना चाहिए।

विटामिन (Vitamin): विटामिन ए की कमी क्वाशिक्योर में अधिकांश रूप में देखी गई है। विटामिन ए की कमी की पूर्ति के लिए दवाई के रूप में विटामिन ए जैसे कॉड लिवर तेल (Cod liver oil) देना चाहिए। 50,000 IU विटामिन ए प्रतिदिन देना चाहिए।

अन्य खनिज लवण (Other minerals): मैग्नीशियम तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। प्रतिदिन बच्चे को 3-4 ग्राम पोटैशियम क्लोराइड तथा 5 से 10 ग्राम मैग्नीशियम क्लोराइड देना चाहिए। ये खनिज लवण तब तक देने चाहिए जब तक कि बच्चा पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाए।

मरास्मस (Marasmus): मरास्मस का मुख्य कारण आहार में प्रोटीन व कैलोरीज दोनों की कमी या अभाव है। एक वर्ष के बच्चे अधिकांशतः इस बीमारी से पीड़ित होते हैं। छ: महीने के पश्चात् बच्चे को पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता अधिक होती है परन्तु उनको उस समय उचित आहार नहीं मिल पाता। इनके आहार में मुख्य रूप से चावल का समावेश रहता है जिससे न तो पूर्ण प्रोटीन मिलता है और न ऊष्मा की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। इस आयु में बच्चों को अनेक संक्रामक बीमारियाँ भी होती हैं जिसमें डायरिया मुख्य है। डायरिया रोग में भोजन का पोषण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बच्चा कमजोर होता जाता है।

बच्चा दो प्रकार के अभाव से पीड़ित होता है –
1. आहार की कमी।
2. आहार का पोषण उचित न होना। रोग के लक्षण (Symptoms of the disease)

1. माँसपेशियों का कमजोर होना-बच्चे की माँसपेशियाँ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं तथा शरीर पर केवल अस्थि कंकाल ही रह जाता है। आहार में प्रोटीन की कमी के कारण माँसपेशियों में उपस्थित ग्लाइकोजिन (Glycogen) का निरन्तर उपयोग होता रहता है।

त्वचा में उपस्थित वसा जलकर शरीर को ऊष्मा प्रदान करती है। इस प्रकार शरीर में कार्बोज तथा वसा की कमी होती रहती है जिससे माँसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।

2. वृद्धि रुक जाती है-बच्चे के शरीर का भार तथा लम्बाई अत्यन्त कम हो जाती है। इस दशा को बौनापन भी कहते हैं।

3. अन्य लक्षण-बच्चे का यकृत बढ़ जाता है जिसके कारण उसका पेट बाहर निकल आता है। शरीर में केवल आगे निकला हुआ पेट ही दिखाई पड़ता है। बच्चे की शक्ल बन्दर की तरह भयानक हो जाती है। त्वचा खुरदरी हो जाती है।

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उस पर घाव हो जाते हैं। पानी की कमी से त्वचा सूख जाती है और उस पर दरारें पड़ जाती हैं। त्वचा ढीली पड़ कर लटक जाती है। हाथ-पैर एकदम कमजोर हो जाते हैं। विटामिन ए के अभाव के कारण आँखों में खुरदरापन आ जाता है। बच्चों में रक्तहीनता भी हो जाती है क्योंकि नए रक्त कणों का निर्माण उस समय ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

4. रक्त में परिवर्तन-सीरम एल्ब्यूमिन की मात्रा की रक्त में कमी हो जाती है। आहार द्वारा इलाज (Treatment through diet): इसमें वही आहार तथा पौष्टिक तत्त्व देनी चाहिए. जो क्वाशिक्योर में दिए जाते हैं।
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प्रश्न 5.
विस्तार से प्रोटीन कैलोरी कुपोषण के लक्षण लिखें। उत्तर-प्रोटीन व कैलोरी कुपोषण से निम्न दो बीमारियों के लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. क्वाशिक्योर (Kwashikior) – यह मुख्य रूप से आहार में प्रोटीन की कमी के कारण होता है।
2. मरास्मस (Marasmus) – मरास्मस आहार में प्रोटीन तथा कैलोरी दोनों की कमी के कारण होता है।

1. क्वाशिक्योर (Kwashikior): डॉ. सिसले विलियम (Dr. Cicely William) ने क्वाशिक्योर रोग की खोज की और उन्होंने देखा कि यह रोग अधिकतर 1 से 3 वर्ष की अवस्था के बच्चों को होता है। उन्होंने बताया कि माता का दूध छुड़ाने के पश्चात् जब बच्चों को ऊपरी दूध नहीं मिलता तब उन्हें माँड (Starch) वाले भोजन देने शुरू किए जाते हैं, जिससे उनमें इस रोग के होने की सम्भावना रहती है।

इसके अतिरिक्त जिन बच्चों को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार दूध नहीं मिलता और उन्हें जौ का पानी, साबूदाने का पानी या खिचड़ी दी जाती है जिसरं उनकी भूख शान्त नहीं हो पाती। उन्हें भी क्वाशिक्योर रोग हो जाता है। यह रोग अधिकतर गरीब तथा मध्यम वर्ग के बच्चों को जिन्हें शारीरिक आवश्यकतानुसार प्रोटीन नहीं मिल पाता, हो जाता है।

रोग के लक्षण (Symptoms of the disease): इस रोग से पीड़ित बच्चों के शरीर में निम्नलिखित लक्षण देखने में आते हैं –

  1. वृद्धि न्यूनता (Growth Failure): यह रोग का मुख्य लक्षण है। प्रोटीन की कमी के कारण शरीर की लम्बाई तथा भार कम हो जाता है।
  2. सूजन (Oedema): प्रथम पंजों तथा पैरों में सूजन आती है। तत्पश्चात् शरीर के अन्य भाग जैसे जाँघ, हाथ तथा मुख भी सूज जाते हैं । सूजन का मुख्य कारण रक्त में सीरम एल्ब्यूमिन की कमी है।
  3. चन्द्रमा के समान मुख (Moon Face): मुख चन्द्रमा के समान गोल हो जाता है । इसका मुख्य कारण मुख पर सूजन की उपस्थिति है।
  4. मानसिक परिवर्तन (Mental changes): मानसिक परिवर्तन के कारण रोगी में उदासीनता तथा चिड़चिड़ापन आ जाता है। रोग तीव्र होने के कारण रोगी आलसी व उदासीन हो जाता है। अपने आस-पास के वातावरण में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता।
  5. त्वचा तथा बालों में परिवर्तन (Skin and Hair changes): त्वचा रूखी, एवं खुरदरी हो जाती है।
  6. माँसपेशियों का क्षय होना (Muscle Wasting): शरीर की माँस-पेशियों का क्षय होने लगता है। इसका प्रभाव मुख्यतः हाथों पर पड़ता है।
  7. यकृत में परिवर्तन (Liver Changes): यकृत का आकार बढ़ जाता है जो कि Fatty Liver कहलाता है। वसा का पाचन ठीक नहीं हो पाता ।
  8. आमाशयिक आंत्रिक अंग पर प्रभाव (Gastro-Intestinal Tract): भूख कम हो जाती है। वमन तथा अतिसार खास लक्षण हैं। बच्चा. भोजन पचाने में असमर्थ होता है।
  9. रक्तहीनता (Anaemia): रक्तहीनता का मुख्य कारण लौह लवण तथा फेरिक अम्ल की कमी है।
  10. विटामिन की कमी (Vitamin Deficiency): विटामिन ए की कमी के लक्षण सामने आते हैं। राइबोफ्लेविन की कमी से होने वाले लक्षण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 6.
शरीर में वसा के प्रमुख कार्य कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
वसा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –
1. शरीर को ऊर्जा प्रदान करना (Give energy to the body): वसा का प्रमुख कार्य व्यक्ति को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना है। वसा कार्बोज और प्रोटीन से दुगुनी मात्रा में शक्ति व गर्मी प्रदान करती है। एक ग्राम वसा में 9 कैलोरी मिलती है।

2. अधिक मात्रा होने पर यह शरीर में जमा हो जाती है (Deposit as fat in the body): जब वसा शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच जाती है तो यह एकत्र होती रहती है। यह एडीपस (Adepose) तन्तुओं के रूप में शरीर में एकत्रित होती रहती है। जब कभी उपवास अथवा रुग्णावस्था में शरीर में वसा की कमी हो जाती है तो उस समय संचित की गई वसा ऑक्सीकरण (Oxidation) क्रिया द्वारा शरीर को गर्मी व शक्ति प्रदान करती है।

3. वसा तह का काम करती है (Fat actsas a layer): हमारा शरीर माँस से ढका रहता है, जिसे चर्म कहते हैं। इस चर्म के नीचे वसा एक तह के रूप में एकत्रित होती रहती है। जो ताप कुचालक होने के कारण शरीर की गर्मी का तापक्रम 88.4 FH बनाये रखता है।

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4. कोमल अंगों की रक्षा करना (Protection of delicate organs): शरीर के अन्दर अनेक कोमल अंग पाए जाते हैं, जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे । इनके ऊपर वसा की दोहरी पर्त चढ़ी
रहती है। यह पर्त कोमल अंगों को झटकों से बचाती है ताकि चोट व आघातों से कोमल अंग सुरक्षित रहें।

5. वसा अनिवार्य अम्ल प्रदान करता है (Provide essential fatty acids): वसा अनिवार्य अम्ल जो स्वास्थ्य एवं शरीर निर्माण के लिए बहुत आवश्यक है, भोजन में उपस्थित वसा द्वारा प्राप्त होता है। यह शारीरिक वृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

6. वसा में घुलनशील विटामिन प्रदान करना (Provide fat soluble vitamin): वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, ई और के अवशोषण में सहायक होते हैं। भोजन में वसा की कमी की स्थिति में यह वसा विलेय विटामिन अवशोषण नहीं हो पाते हैं।

7. शरीर अंगों को स्निग्धता प्रदान करना (Provide lubrication to different organs): वसा हमारे विभिन्न अंगों जैसे पाचन संस्थान के अंगों को स्निग्धता प्रदान करते हैं।

8. भोजन को स्वादिष्ट बनाना (Makes food tasty): वसा का प्रयोग करके जब हम खाद्य पदार्थ पकाते हैं तो स्वादिष्ट होता है।

9. भूख से सन्तुष्टि प्रदान करना (Gives food a satisfy value): वसा का पाचन धीरे-धीरे विलम्ब से होता है जिसके कारण वसायुक्त भोजन अधिक समय तक आमाशय में स्हता है और भूख देर से लगती है।

10. कोशिकाओं की रचना में भाग लेते हैं (Take part in the formation of cell): कोशिका झिल्ली का भाग बनाते हैं। उसे पारगम्यता (Permebility) प्रदान करते हैं, जिससे पोषक तत्त्व उसमें होकर आसानी से अन्दर व बाहर आ-जा सकें।

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ के कार्य लिखिए।
उत्तर:
कार्य (Functions):
1. विटामिन ए की अनुपस्थिति में कई प्रकार के आँख से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं। इन रोगों में से रात्रि-अन्धापन (night blindness) और जेरोफ्थालमिया Zerophthalmia) मुख्य हैं।

2. शारीरिक वृद्धि में सहायक होता है। इस विटामिन की विद्यमानता में शरीर की हड्डियाँ ठीक से पनपती हैं और उनकी लम्बाई यथोचित हो पाती है, जिससे व्यक्ति की शारीरिक वृद्धि सामान्य हो पाती है। हड्डियों के साथ-साथ यह अन्य अवयवों और अंग-प्रत्यंगों को भी विकसित करने में सहायक होता है। गर्भ में बच्चे के अंग-प्रत्यंगों को बनाने में मददगार होता है। इसीलिए इसे वृद्धिवर्धक कारक (Growth Promoting Factor) भी कहा गया है।

3. पृष्ठाच्छादक तन्तुओं या उपकला (epithelial tissues) के स्वास्थ्य के लिए-उपकला कोशिकाओं को मजबूत बनाने में और उनके पुनर्निर्माण में सहायक होता है। हमारी त्वचा की ऊपरी परत उपकला और शरीर के सभी खोखले अवयवों की भीतरी झिल्लियाँ तन्तुओं की बनी होती हैं।

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बाहरी उपकला धूप, गर्मी, सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं, भीतरी तन्तु श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में से निकलने वाले रसों की क्रियाओं में सहायक हैं। विटामिन ए की कमी से उपकला तन्तुओं की दशा अप्राकृतिक (abnormal) हो जाती है, त्वचा में रुखापन आ जाता है। समस्त त्वचा पर सींग के से उभार (Horny Structure) बन जाते हैं।

4. प्रोटीन को विभक्त करने वाले एन्जाइम्स की उत्पत्ति में सहायक होता है।

5. हार्मोन विशेषकर कोर्टीकोस्टीरान (Corticosteron) हार्मोन बनाने में सहायक होता है।

6. शरीर के अंगों पर कीटाणुओं के संक्रमण से बचाता है।

7. श्वास संस्थान की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में विटामिन ए की कमी से परिवर्तन के फलस्वरूप मनुष्यों को तथा जानवरों को ब्रकोन्यूमोनिया तथा अन्य संक्रमण जनित रोग होने की बार-बार सम्भावना रहती है।

8. दाँत और मसूढ़े (Teeth & gums) दाँतों के ऊपर एनामेल (enamel) की पर्त चढ़ी रहती है जो दाँतों में चमकीलापन लाती है। यदि यह ठीक प्रकार से नहीं बनता तो दाँत पीले हो जाते हैं। एनामेल के निर्माण के लिए विटामिन ए का भोजन में पाया जाना आवश्यक है। इसके प्रभाव में मसूढ़े अस्वस्थ रहते हैं।

9. मूत्र नलियों (Urinary Tubes) में पथरी बनने की सम्भावना-प्रयोग द्वारा सिद्ध हो चुका है कि भोजन में विटामिन ए की मात्रा ठीक न लेने पर पेशावनलियों में पथरी (Stone) बन जाती है जिससे पेशाब रुक-रुक कर आता है। बाद में इसके परिणाम बड़े घातक सिद्ध होते हैं।

10. स्नायु संस्थान (Nervous System) विटामिन ए की कमी से स्पाइनल कॉर्ड (Spinal Cord) में टॉक्सिन (Toxin) पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं, जिनका प्रभाव सम्पूर्ण संस्थान पर पड़ता है। लैथरिज्म की बीमारी भी इस विटामिन की कमी से बताई जाती है। इस रोग में दोनों पैरों में Paralysis हो जाता है।

11. पाचन संस्थान (Digestive System) विटामिन ए के अभाव में मनुष्य की आमाशय में अम्ल का अभाव पाया जाता है, जिससे भोजन के पाचन में व्यवधान होता है।

12. यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचयन में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘ए’ के अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms) के बारे में विस्तार से लिखिए।
अथवा
यदि एक बच्चा लाल-पीले रंग की फल-सब्जियाँ और हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाता है तो उसे कौन-से तत्त्व की कमी हो जाती है ? उसके लक्षण लिखें।
उत्तर:
1. रात्रि अन्धापन या रतौंधी (Night Blindness): आँख का भीतरी भाग जिसे रेटिना (Retina) कहते हैं वह दो प्रकार के कोषों छड़ (Rods) और सूचियों (Lons) से मिलकर बना है। इसमें रंग देने वाले कण पाए जाते हैं। वह रंग देने वाले कण (Colour pigments) जो छड़ में हैं, उन्हें रोडप्सिन (Rhodopsin) कहते हैं।

सूचियों में पाए जाने वाले रंग कणों को इडाप्सिन (Idopsin) कहते हैं। यह दोनों प्रकार के रंग कण विटामिन ए और प्रोटीन से बनते हैं। छड़ मध्यम रोशनी को ग्रहण करते हैं और सूची तेज रोशनी तथा रंग ग्रहण करते हैं। अन्धेरे से उजाले में देखते हैं, तो प्रोटीन से रोडोप्सिन (Rhodopsin) संयुक्त (Combined) हो जाते हैं। विटामिन ए की थोड़ी-सी मात्रा नष्ट हो जाती है, पुन: रोडोप्सिन की भरपाई के लिए विटामिन ए की आवश्यकता पड़ती है।

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यदि भोजन में विटामिन ए की मात्रा की प्राप्ति उचित प्रकार से शरीर में नहीं हो पाती तो रात्रि अन्धापन का रोग होने की सम्भावना रहती है। तीव्र या मध्यम प्रकाश में देखने के पश्चात् धुंधले प्रकाश में हमें कुछ समय तक चीजें दिखाई नहीं देतीं। यदि इस विटमिन की कमी अधिक हो तो यह समय काफी अधिक हो जाता है और कमी बढ़ने के साथ-साथ धीमी रोशनी में दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाता है।

2. जेरोफ्थालमिया (Zerophthalmia): इन रोग में अश्रु ग्रन्थियाँ ठीक प्रकार से काम नहीं करतीं। आँखों में शुष्कता (dryness) आ जाती है, जिससे खुजली का अनुभव होता है। आँखों में छोटी-छोटी फुन्सियाँ होकर पस पड़ने की सम्भावना रहती है। आँख का कॉर्निया (Cornea) वाला भाग शुष्क होकर पारदर्शी (Transparent) हो जाता है। आँख की गति में बाधा पहुँचती है।

ऐसी अवस्था में यदि विटामिन A की मात्रा की कमी अधिक बढ़ जाए तो अन्धापन आ जाता है। रोगाणु तीव्र गति से वृद्धि करने लगते हैं, क्योंकि अश्रु ही रोगाणुओं को आँख में प्रवेश नहीं करने देते हैं। संक्रमण के कारण कॉर्निया (काला भाग) में जख्म हो जाता है। आँख के सफेद भाग को ढकने वाली झिल्ली कनजक्टिवा (Conjuctiva) सूख जाती है तथा चमकहीन हो जाती है।

3.बीटोट्स बिन्द (Bitots Spot): कई बार जेरोफ्थाल्मिया के साथ-साथ बीटोट्स बिन्दु भी हो जाते हैं। विटामिन ए की कमी के कारण आँखों के भीतरी भाग की झिल्ली की पर्त पर भूरे अथवा सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इनका आकार तिकोना होता है और ये कनजक्टिवा (Conjuctiva) से चिपक जाते हैं। कॉर्निया पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ निकल आती हैं। उनमें रस पैदा होने लगता है इसलिए पलकें चिपक जाती हैं। बीटोट्स नामक व्यक्ति ने इसके बारे में 1863 ई० में प्रथम बार बताया था।

4 .किराटामलेसिया (Keratamalacia): यह रोग की अन्तिम स्थिति है, कॉर्निया अपारदर्शक हो जाता है, रक्तवाहिनियाँ सम्पूर्ण कॉर्निया को घेर लेती हैं। कॉर्निया लाल होकर सूज जाती है और घाव हो जाता है। संक्रमण (infection) आसानी से हो सकता है। कॉर्निया नष्ट हो जाती है तथा आँखों की रोशनी समाप्त हो जाती है। अश्रु ग्रन्थि ठीक प्रकार से काम नहीं करती, आँखें शुष्क हो जाती हैं और खुजली का अनुभव होता है।

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5. टोड त्वचा (Toad skin): विटामिन ए की कमी होने पर त्वचा में बहुत से परिवर्तन आते हैं जैसे त्वचा शुष्क, खुरदरी और चितकबरी हो जाती है। विशेषकर कन्धों, पेट, पीठ, गर्दन आदि पर बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं और यह मेंढक (Toad) की त्वचा के समान लगने लगती है।

6. अन्य परिवर्तन-नाक, गले, ट्रेकिया (Trachea), ब्रांकिस (Bronchis) की श्लेष्मिक झिल्ली सूख जाती है और उनमें रोगाणु के संक्रमण की आशंका बनी रहती है। पाचक रस कम मात्रा में स्रावित होते हैं तथा सभी पौष्टिक तत्त्वों के अवशोषण में रुकावट होती है।

प्रश्न 9.
विटामिन ‘ए’ के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): विटामिन ए हल्के-पीले रंग का और कैरोटीन लाल-पीले रंग का होता है। कैरोटीन पशु जगत और वनस्पतियाँ दोनों में पाया जाता है। कैरोटीन हरी पत्तेदार सब्जियों में भी पाया जाता है परन्तु इनके हरे रंग में पीला रंग घुल जाता है। डालडा (घी) जो हाइड्रोजनीकरण क्रिया द्वारा तेल से बनता है, ऊपर से विटामिन ए मिलाया जाता है। पशुजन्य पदार्थों में मछली के यकृत के तेल में सर्वाधिक पाया जाता है। दूध, मक्खन, पनीर, दही, यकृत आदि में भी पाया जाता है।

विटामिन
दुध, मक्खन, पनीर, दही, डालडा घी, अण्डे की जर्दी, यकृत, कॉड मछली का तेल।

कैरोटीन
सूखी खुमानी, आडू, शकरकन्द, आम, गाजर, पालक, टमाटर, पोदीना, धनिया की पत्ती, चकन्दर की पत्ती, हरी मटर आदि।

यह उन सब्जियों व फलों में पाया जाता है जो पीले रंग के हों जैसे गाजर, टमाटर, कद्, शकरकन्द, आम, खुमानी, आडू और हरी पत्तेदार सब्जियाँ। फलों व तरकारियों को जितनी अधिक धूप मिलेगी, उतना ही अधिक कैरोटीन उनमें पाया जाएगा।

अति उत्तम साधन (Rich Source): मछली का तेल।
उत्तम साधन (Good Source): मक्खन, घी, अण्डा, दूध का पाउडर।
अच्छे साधन (Fair Source): गाय या भैंस का दूध।

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शरीर में अवशोषण (Utilization in the body): विटामिन ए के शोषण में लगभग 5 घण्टे लगते हैं। भोजन में विटामिन और कैरोटीन प्राप्त होते हैं। छोटी आंत की दीवारों में ही कैरोटीन विटामिन ए में परिवर्तित होता है। विटामिन ए वसा के माध्यम से शरीर में पहुँचता है। इसलिए इसके अवशोषण के साथ-साथ वसा का अवशोषण अनिवार्य है। आवश्यकता से अधिक विटामिन का 99% भाग यकृत में जमा हो जाता है। विटामिन ए का विसर्जन आँखों में व्यर्थ पदार्थ के साथ हो जाता है।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘डी’ के अभाव से होने वाली बीमारियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms):
1. रिकेट्स (Rickets): यह रोग प्रायः पाँच वर्ष तक की आयु के बालकों को होता है। यह रोग भोजन में विटामिन डी, कैल्शियम या फॉस्फोरस लवण की कमी या सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण होता है।

कारण:
1. कम या दोषपूर्ण भोजन, शैशवावस्था में डिब्बे के दूध का प्रयोग, ताजे दूध और वसायुक्त भोजन की कमी और माङयुक्त भोजन की अधिकता।
2. घर में अस्वस्थ वातावरण, ताजी शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश की कमी।
3. यदि गुर्दो के कार्य में व्यवधान पहुंचता है तो गुर्दे से सम्बन्धित रोगों के कारण पेशाब के साथ फॉस्फोरस का विसर्जन बढ़ जाता है जिससे खून के फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शरीर की वृद्धि रुक जाती है और अस्थियों (Bones) में विकृति देखने में आती है।

इसमें आँतों में वसा के शोषण की शक्ति नहीं रहती जिससे शरीर में कैल्शियम (Ca) तथा विटामिन डी के शोषण में बाधा होने के कारण अस्थियों का निर्माण नहीं हो पाता।

लक्षण (Symptoms): विटामिन डी की कमी से बालक की अस्थियों में कैल्शियम के एकत्र होने में व्याघात होता है। साधारणत: अस्थि में होने वाले परिवर्तन निम्नलिखित हैं –

1.चौकोर सिर-सिर की अस्थि-विकृत होकर चपटी और चौकोर हो जाती है और ललाट की अस्थि आवश्यकता से अधिक उभर जाती है।

2. कबूतरी वक्ष (Pigeon Chest): संधि-स्थल (Joints) से अस्थियाँ मोटी हो जाती हैं। पसली की अस्थियाँ (Ribs) छाती के दोनों ओर माला की तरह ढाँचा (Beaded Ribs) बना लेती हैं। फलस्वरूप कबूतर-सा सीना दिखाई देने लगता है।

3. झुका मेरुदण्ड (Spinal cord bends): मेरुदण्ड की अस्थि नर्म होकर लचक जाती है और कूबड़ (Kyphosis) निकल आता है, या मेरुदण्ड एक तरफ मुड़ जाता है।

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4. कोमल अस्थियाँ: अस्थियाँ कोमल होकर दबाव के कारण उनके टेढ़े और विकृत हो जाने का भय रहता है। जब बालक चलना आरम्भ करता है तो भार के कारण अस्थियाँ टेढ़ी हो जाती है। चपटे पैर, मोटे घुटने आदि विकृतियाँ इनके परिणाम हैं।

अन्य लक्षण (Other Symptoms):

  • बालक चिड़चिड़ा, थका व अप्रसन्न दिखाई देता है। मस्तिष्क पर पसीना आने लगता है। विशेषकर जब बच्चा सोता रहता है।
  • सामान्य अशक्तता और पीलापन-पेशियों का पूर्ण विकास नहीं होता और वे अशक्त रोगी हो जाते हैं। अस्थि बन्धन भी कमजोर पड़ जाते हैं, दूध के दाँतों के निकलने में देर होती है, और जब वे निकलते हैं तो आसानी से दूषित हो जाते हैं।
  • उभरा हुआ पेट-पाचनतन्त्र में भी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है और पीले बदबूदार दस्त आने लगते हैं। कोमल तथा अशक्त पेशियों के परिणामस्वरूप पेट बाहर को निकल आता है।
  • रोग से बचने की शक्ति का कम हो जाना-जुकाम, खाँसी, शीघ्र ही हो जाते हैं और तरह-तरह के रोग सरलता से शरीर को जकड़ लेते हैं। विशेषकर फुफ्फुसों के रोग जैसे ब्रोन्काइटिस और निमोनिया आदि।

प्रश्न 11.
विटामिन डी के खाद्य स्रोत कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
विटामिन डी के स्रोत (Food Sources): विटामिन डी दो प्रकार से प्राप्त होता है –
1. विटामिन युक्त भोजन के खाने से।
2. चर्म द्वारा सूर्य की सीधी किरणें ग्रहण करने से।

1. यह केवल पशुजन्य भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। यह किसी तरकारी में पर्याप्त मात्रा में नहीं पाया जाता। इसकी प्राप्ति मक्खन, मछली के जिगर के तेल, कुछ मछलियों, माँस तथा अण्डे की जर्दी से होता है। दूध में यह बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है।
कुछ खाद्यों में विटामिन डी:
मछली का यकृत तेल।
कॉड यकृत तेल।
शार्क यकृत तेल।
अन्य भोज्य पदार्थ।
मछली, अण्डा, अण्डे का पीला भाग, मक्खन, घी, दूध।

2. यह विटामिन सबसे अधिक सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें में पाया जाता है। यह किरणें निकलते हुए सूर्य की किरणों में सबसे अधिक होती हैं। प्रातःकाल अपने शरीर पर किरणों को ग्रहण करने से शरीर में विटामिन डी पहुंचता है। चर्म की भीतरी तह में स्थित वसा में एक पदार्थ होता है, जिसे आर्गस्ट्रॉल (Ergasterol) कहते हैं। जब चर्म पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वे वस्त्र की तह में प्रवेश कर जाती हैं और आर्गस्ट्रॉल को विटामिन डी में परिवर्तित कर देती हैं।

सूर्य के प्रकाश ग्रहण करने पर इस विटामिन की कमी को कुछ सीमा तक पूरा किया जा सकता है। यही कारण है कि घनीबस्ती वाले शहरों की अपेक्षा पहाड़ी स्थानों, समुद्र तट और गाँवों में रहने वाले व्यक्तियों के शरीर में विटामिन डी का निर्माण अधिक मात्रा में होता है। मुसलमान स्त्रियाँ बन्द अंधेरे कमरों में दिन व्यतीत करती हैं और बुरका पहनकर बाहर जाती हैं परिणामतः वे विटामिन डी के इस स्रोत के लाभ से वंचित रह जाती हैं।

अवशोषण (Absorption): यह चिकनाई में घुलनशील है, यह छोटी आंत से बहुधा वसा के साथ-साथ यकृत में पहुँचकर वहीं संगृहीत हो जाता है। इसका अधिकांश यकृत में और कम भाग अस्थियों, मस्तिष्क और त्वचा में जमा होता है। आवश्यकता होने पर इन भण्डारों से यह विटामिन रक्त में मिलकर सम्पूर्ण शरीर की कमी की पूर्ति करता है। दीर्घकाल तक इस संचित हुईं विटामिन पर निर्भर करना सम्भव नहीं। – पित्त रस (Bile) की उपस्थिति में स्निग्ध Lipid शोषण शीघ्र हो जाता है।

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प्रश्न 12.
विटामिन ‘बी-1’ (थायमिन) की कमी से होने वाले रोग के बारे में बताइए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms): थायमिन की कमी से बेरी-बेरी (Beri-Beri) रोग हो जाता है। प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों का मुख्य भोजन चावल है, वे अधिकांश इस रोग से ग्रस्त रहते हैं। इसका कारण है जो चावल खाते हैं, वह मशीन से साफ किया हुआ होता है जिसके कारण यह चावल थायमिन रहित हो जाता है। इसके अतिरिक्त खाद्य तत्त्वों की कमी के कारण, गरीबी, अत्यधिक शारीरिक परिश्रम, संक्रमण जनित रोग, ज्वर, पाचन-सम्बन्धी विकार, गलत आदतें आदि कारणों से इस विटामिन का अभाव हो सकता है व रोग के लक्षण सामने आते हैं।

थायमिन की बहुत कमी होने पर बेरी-बेरी नामक रोग हो जाता है। यह रोग तीन प्रकार का होता है –
1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri)।
2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri)।
(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri)।
(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri)।
3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri)

1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri): फिलीपाइन द्वीप समूह तथा जापान में सर्वप्रथम बच्चों में यह रोग देखा गया । रोग के लक्षण तीसरे व चौथे सप्ताह में प्रकट होते थे। भूख की कमी, वमन, पेशाब कम मात्रा में होना, अतिसार और कब्ज भी हो सकता है। परिणामतः बच्चा निर्बल और बेचैन हो जाता है और पीला पड़ जाता है, शरीर पर मुख्यतः चेहरे, हाथों और पैरों पर सूजन आ जाती है, हृदय दुर्बल हो जाता है। शिशु रोता हुआ प्रतीत होता है परन्तु रोने की आवाज नहीं आती है, सांस लेने में कठिनाई होती है। माँसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं और शीघ्र ही ऐंठन से पीड़ित होकर मृत्यु हो सकती है।

2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri): इसके साधारणतः निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • पोलीन्यूराइटिसिस (Polyneuritisis)।
  • ओडीमा (Oedema)।
  • दिल की धड़कन बढ़ जाना (Disturbances of the heart)।

(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri): माँसपेशियों में सूजन आ जाती है। हाथों और पैरों में सनसनाहट, जलन तथा चैतन्य शून्यता आ जाती है, त्वचा में संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है, रोग के तीव्र रूप धारण कर लेने पर रोगी उठ-बैठ भी नहीं सकता और चल भी नहीं सकता। शुष्क बेरी-बेरी में ओडीमा की सम्भावना अधिक होती है।

(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri): सर्वप्रथम पैरों में सूजन आ जाती है। फिर समस्त शरीर में धीरे-धीरे सूजन आने लगती है। सूजन का कारण कोशिकाओं में जल-जमाव है। सूजा हुआ स्थान दबाने पर वहाँ गड्ढा-सा पड़ जाता है तथा थोड़ी देर पश्चात् वह फिर पहले की तरह हो जाता है । श्वास उथली व धड़कन की गति बढ़ जाती है, शरीर की वृद्धि रुक जाती है तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। बेचैनी, वमन या पेचिस भी हो सकती है। सहसा हृदय की गति बन्द हो जाने के कारण मृत्यु भी हो सकती है।

3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri): शराब का अधिक सेवन करने से भूख कम लगती है। विटामिन बी की हीनता हो जाती है जिससे बेरी-बेरी रोग हो जाता है। इस रोग के लक्षण प्रकट होने में साधारणत: दो से तीन महीने लग जाते हैं। प्रारम्भ में पाचन संस्थान संबंधी लक्षण प्रकट होते हैं-भूख न लगना, जी मिचलाना, वमन, पेट में अफारा, मलावरोध तथा दस्त आदि। बाद में रक्ताल्पता भी हो जाती है।

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प्रश्न 13.
विटामिन-‘बी1 (राइबोफ्लेविन) से होने वाले रोगों के बारे में बताइए।
उत्तर:
रोग के लक्षण (Effect of disease): प्रयोगों द्वारा ज्ञात हो गया है कि राइबोफ्लेविन के अभाव में व्यक्ति दुर्बल तथा वृद्ध जैसा दिखाई देने लगता है। यौवन का विकास अवरुद्ध हो जाता है। भोजन करने की इच्छा नष्ट हो जाती है तथा पाचन-शक्ति क्षीण हो जाती है, व्यक्ति अनेक चर्म और नेत्र रोगों का शिकार हो जाता है।

आँखों (Eyes) में-इसके अभाव में कॉर्निया (Cornea) के चारों ओर ललाई पैदा हो जाती है, आँखों में से पानी बहने लगता है, रोशनी अच्छी नहीं लगती। धीरे-धीरे ललाई बढ़ने लगती है और कॉर्निया पर छोटी-छोटी रक्त कोशिकाओं (Capillaries) का फैलाव होने लगता है। हमारे शरीर में कॉर्निया व आँख के लेंस ही ऐसे ऊतक हैं, जिन्हें अपने पोषण के लिए रक्त की आवश्यकता नहीं होती। अतः इनको पोषक तत्त्व अश्रु ग्रन्थि के स्राव ही से प्राप्त होते हैं।

अश्रुस्राव से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शरीर की बचाव शक्ति कम हो जाती है। स्वाभाविक तौर पर कॉर्निया को समुचित पोषण प्राप्त कराने के लिए उसके चारों ओर अतिरिक्त रक्त कोशिकाओं का जाल बिछने लगता है और इसी कारण आँख में ललाई, रेतीले कणों के गिरने का सा आभास आदि होने लगता है। पलकें खुरदरी रहती हैं और दृष्टि भी अस्पष्ट होने लगती है।

मुँह (Mouth)पर: होठों के मिलन स्थान पर कटाव होने लगता है। होठों पर सफेद दाग पड़ने लगते हैं, जैसे-कीलोसिस (Cheilosis)। जिह्वा की सतह पर दरारें पड़ जाती हैं और उसमें जलन व दर्द होता रहता है। जुबान का रंग बैंगनी लाल-सा हो जाता है। भोजन खाने पर जीभ में पीड़ा तथा जलन होती है। अन्त में जुबान से श्लैष्मिक झिल्ली हट जाती है। इस अवस्था को ज्योग्रेफिकल रंग कहते हैं।

त्वचा (Skin)पर: त्वचा स्वस्थ नहीं रहती। खुजली, काले दाग व एक प्रकार का त्वकशोध (Dermatitis) होता है जिसमें से पानी निकलता रहता है। ऐसे त्वकशोध ललाट, नाक के दोनों ओर तथा बगल आदि पर होते हैं जिनमें खुजली होने लगती है।

प्राप्ति साधन (Food Sources): कुछ राइबोफ्लेविन आँतों में भी निर्मित होता है। यह विटामिन बहुत से प्राणिज और वानस्पतिक भोज्य पदार्थों में पाया जाता है।

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विभिन्न भोज्य पदार्थों में उपस्थितिः अति उत्तम स्रोत: यकृत (Liver), अण्डे का पाउडर (Egg powder), शुष्क खमीर (Yeast), दूध का पाउडर। उत्तम स्त्रोत: दूध, मछली, अण्डा, साबुत अन्न, मांस, फलियाँ, हरी पत्तेदार सब्जी। सामान्य स्रोत: मिल का अन्न, मूलकन्द, अन्य शाकसब्बी। दूध इस विटामिन का अच्छा साधन है परन्तु मक्खन व घी में यह विटामिन नहीं होता यह पानी में घुलनशील है और छाछ में रह जाता है।

शरीर में अवशोषण (Absorption in the body): इसके अवशोषण के लिए अमाशय में पाया जाने वाला आमाशयिक अम्ल विद्यमान होना अनिवार्य है। इसका शोषण आँतों में होता है, विटामिन का अधिकांश हृदय यकृत में संगृहीत होता है, शेष भाग का संग्रह रक्त तथा तन्तु कोषों में होता है। राइबोफ्लेविन के संग्रह की प्रतिक्रिया भोजन में पैटोथोनिक अम्ल तथा विटामिन बी, की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इसकी संगृहीत मात्रा एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं हो सकती है। मूत्र के माध्यम से यह शरीर से निष्कासित हो जाती है।

प्रश्न 14.
विटामिन सी के कार्य लिखें।
उत्तर:
कार्य (Functions):

  1. कोलेगन (Collagen) का निर्माण-कोलेगन (Collagen) का निर्माण एवं उसे उचित अवस्था में रखने का कार्य विटामिन सी का ही है। कोलेगन शरीर में बनाने वाले कोषों को पारस्परिक सम्बद्ध करने का साधन है। यह लम्बी हड्डियों के सिरे तथा दाँत के भीतर सीमेंट वाला भाग बनाता है। साधारण कोषों के बन्धक तन्तुओं को कोलेगन की आवश्यकता है। यह जख्म को भरने का भी कार्य करता है। विटामिन सी के अभाव में जख्म देर से भरता है।
  2. अमीनो अम्ल (Amino Acid) जैसे फिनाइल एलानिन व टाइरोसीन (Alanine & Tyrosin) का ऑक्सीकरण करने में सहायक होता है।
  3. लोहे (Iron) व कैल्शियम के अवशोषण कराने में सहायक होता है।
  4. एड्रिनल व थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) का स्राव बढ़ाने और अन्य ग्रन्थियों के हारमोन्स (Hormones) पैदा कराने में सहायक होता है। .
  5. रक्त धमनियों की भीतरी भित्तियों पर कोलेस्टेरॉल के जमाव को रोकता है।
  6. त्वचा प्रतिरोपण (Skin Grafting) की सफलता में अत्यधिक सहायक होता है।
  7. नाक, गले व सांस नलिकाओं की कोशिकाओं को दृढ़ता प्रदान करता है जिससे बार-बार नजला, जुकाम, खाँसी आदि न हों।
  8. यह विटामिन अस्थियों के स्वरूप, विकास और निर्माण के लिए अत्यन्त आवश्यक है। स्कर्वी रोग में अस्थियों के अन्तिम सिरे प्रभावित होते हैं।
  9. इसके अभाव में पुराने भरे हुए घावों के पुनः खुल जाने की सम्भावना रहती है।
  10. दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। यह दाँतों के निर्माण एवं विकास में भी सहायता करता है।
  11. यह विटामिन मनुष्य को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
जल में घुलनशील विटामिनों की प्राप्ति, आवश्यकता एवं प्रभाव के परिणाम लिखें।
उत्तर:
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प्रश्न 16.
कैल्शियम के कार्य विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
कैल्शियम के कार्य (Functions of Calcium)
1. फॉस्फोरस के साथ हड्डियाँ बनाने, बढ़ाने और ठोस व दृढ़ करने में काम आता है।

2. दाँतों की रचना में भी यह ऐसी ही भूमिका निभाता है।

3. शरीर वृद्धि कराता है। हड्डियों में जब वृद्धि होती है तो स्वाभाविक है कि शरीर वृद्धि भी हो।

4. सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के साथ माँसपेशियों में संकुचन (Contraction) पैदा करता है, जिससे हमारे हाथ, पाँव, गर्दन, कमर व अन्य सभी अंग कार्य कर सकते हैं।

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5. आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव-निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है और एन्जाइम्स निर्माण में भी सहायक का कार्य करता है।

6. कोशिका झिल्ली की पारगम्यता पैदा करने में सहायक होता है।

7. रक्त का थक्के के रूप में जमना-रक्त में पायी जाने वाली सीरम में 100 मिली लीटर रक्त में 10 ग्राम कैल्शियम पाया जाता है। रक्त थक्के के रूप में परिवर्तित होने के लिए फाइब्रिन को फाइब्रीनोजन में बदलना पड़ता है।

इस परिवर्तन के लिए थ्रॉम्बिन एन्जाइम की आवश्यकता पडती है। यह थ्रॉम्बिन एन्जाइम प्रोथ्राम्बिन (Prothrombin) के रूप में निष्क्रिय दशा (Inactive Form) में रक्त में पाया जाता है। प्रोथ्राम्बिन को थ्रॉम्बिन में बदलने की क्रिया के लिए कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है।

8. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त हो तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स कहते हैं।

9. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है। इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाती हैं। इस दशा को आस्टोमलेश्यिा (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है।

10. दाँत सुडौलता रहित और कमजोर हो जाते हैं।

11. रक्त जमने में अधिक समय लगता है।

12. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

13. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 17.
कैल्शियम प्राप्ति के कौन-कौन-से साधन हैं ?
उत्तर:
कैल्शियम के साधन (Sources of Calcium): कैल्शियम की प्राप्ति निम्न वस्तुओं से होती है :

  • दूध और दूध से बनी चीजों में कैल्शियम पाया जाता है, क्योंकि दूध में कैल्शियम अकार्बनिक लवण के रूप में मिलता है।
  • यह अण्डे विशेषकर अण्डे की जर्दी वाले भाग में उपस्थित रहता है।
  • हरी पत्तीदार तरकारियों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। पालक में आक्जेलिक अम्ल की मात्रा . अधिक होने से शरीर में कैल्शियम का शोषण नहीं हो पाता है।
  • कुछ मछलियों में भी कैल्शियम पाया जाता है। .. 5. सूखे फलों, मेवों जैसे बादाम गिरी में भी यह लवण उपस्थित रहता है।
  • दालों में थोड़ी मात्रा में पाया जाता है लेकिन तेल निकालने वाले बीजों में यह काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • कुछ मात्रा में अनाजों द्वारा भी प्राप्त होता है। इनमें से रागी उत्तम साधन है।
  • अम्ल और क्षार की मात्रा को शरीर में एक-सा बनाए रखने का कार्य कैल्शियम करता है। शरीर में क्षार की मात्रा में वृद्धि हो जाने से अपच हो जाती है।

प्रश्न 18.
कैल्शियम की कमी से हानियाँ बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की कमी से हानि (Effect of Calcium deficiency):

1. कैल्शियम की कमी से शरीर छोटा रह जाता है।

2. हड्डियों का कैल्सीकरण अपूर्ण रहता है, जिसके फलस्वरूप वे निर्बल व लचकदार रहती हैं।

3. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त होत तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स (Rickets) कहते हैं।

4. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में कैल्शियम की माँग बढ़ जाती है। जब इसकी आवश्यकता की पूर्ति भोज्य पदार्थों द्वारा नहीं हो पाती तो इनकी पूर्ति के लिए गर्भवती तथा दूध पिलाती माँ की अस्थियों में से कैल्शियम का प्रत्याहरण होने लगता है। बच्चा अपने शरीर की वृद्धि के लिए कैल्शियम की आवश्यकता की पूर्ति माँ के शरीर में से कर लेता है।

इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाता । इसी दशा को आस्टोमलेशिया (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होती है।

5. दाँत सुडौलतारहित और कमजोर हो जाते हैं।

6. रक्त ‘जमने में अधिक समय लगता है।

7. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

8. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में से निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 19.
शरीर में लोहे के कार्य लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे के कार्य (Functions of iron in the body) :

  • यह रक्त में पाए जाने वाले तत्त्व हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। जब रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन समुचित मात्रा में होता है तब वह वांछित मात्रा में ऑक्सीजन अवशोषित कर कोशिकाओं में पहुँचाता है और कार्बनडाइऑक्साइड को शरीर के बार निकालता है
  • यह मांसपेशियों (Muscles) में पाए जाने वाले तत्त्व मायोग्लोबिन (Myoglobin) का आवश्यक तत्त्व है। मायोग्लोबिन में 3% लोहा रहता है।
  • लोहा प्रत्येक कोष में उपस्थित क्रोमेटीन पदार्थ का एक आवश्यक तत्त्व है।
  • शरीर में पाए जाने वाले कुछ एन्जाइम का लोहा एक आवश्यक भाग है।
  • लोहा तन्तुओं के ऑक्सीकरण (Oxidation) तथा कटौती (Reduction) की क्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में भाग लेता है।

प्रश्न 20.
आयोडीन (Iodine) के शरीर में क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
आयोडीन के कार्य (Functions of Iodine):

  • मनुष्यों के उचित शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए थाइरॉक्सिन (Thyroxin) अनिवार्य है। शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland) में ये हारमोन न निकलने पर शारीरिक और मानसिक विकास की गति में बाधा पहुँचती है।
  • शरीर के कोषों में होने वाली ऑक्सीकरण की क्रिया की दर को थाइरॉक्सिन प्रभावित करता है। थाइरॉक्सिन आवश्यकता से अधिक निकलने पर शक्ति की दर की गति बढ़ जाती है जिससे शरीर दुबला हो जाता है। इसके विपरीत जब थाइरॉक्सिन शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइराइड ग्रन्थि में से नहीं निकलता तो शक्ति उपापचयन की दर की गति कम हो जाती है। अतः शरीर मोटा हो जाता है।
  • मनुष्यों और जानवरों की सन्तानोत्पादन शक्ति के लिए आयोडीन आवश्यक है।
  • आयोडीन की कमी से बालों की वृद्धि नहीं हो पाती अथवा बाल उगते ही नहीं।
  • आयोडीन के अभाव से प्रौढ़ व्यक्ति भी प्रभावित हो जाते हैं। वे सुस्त हो जाते हैं। उनके हाथ-पाँव सूज जाते हैं।

प्रश्न 21.
आयोडीन की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
उत्तर:
रोग (Diseases):
1. गलगण्ड (Goiter): आयोडीन की आवश्यकता शरीर में स्थित थायराइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए होती है। इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन नामक हारमोन्स स्रावित होता है। शरीर में आयोडीन की कमी से यह हारमोन स्रावित होना बन्द हो जाता है और गले में घेघा निकल आता है, जिसे घेघा रोग कहते हैं। यह स्थिति अधिकतर किशोरावस्था या वयस्क महिलाओं में ही होती है। थायराइड ग्रन्थि का औसत वजन 25 ग्राम होता है, वह रोग की अवस्था में बढ़कर 200 से 500 ग्राम भी हो सकता है। घेघा बढ़ने पर यह दूर से ही दिख जाता है।

2. क्रोटिन (Cretinism): आयोडीन की कमी से बच्चों को क्रोटीन अथवा बौनापन (Cretinism) का रोग हो जाता है। बच्चों की वृद्धि, शारीरिक एवं मानसिक विकास रुक जाता है। त्वचा. मोटी और खुरदरी हो जाती है। चेहरे और समस्त शरीर में सूजन आ जाती है, त्वचा कार्य म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) गृह विज्ञान, वर्ग-119135 में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, चेहरे का भाव बिगड़ जाता है, जबान बड़ी हो जाती है, होंठ मोटे हो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी अवस्था में होठों का बन्द करना भी कठिन होता है।

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बच्चों की तरह बड़ों को मिक्सोडीमा (Myxoedema) का रोग हो जाता है। चेहरा भावहीन हो जाता है, हाथ-पाँव तथा चेहरे में सूजन आ जाती है। रोगी आलसी तथा सुस्त हो जाता है। आयोडीन की कमी से शरीर व दिमाग में और भी कई खराबियाँ पैदा हो सकती हैं जिनमें कुछ मामूली होती हैं तो कुछ खतरनाक जैसे, मानसिक विकृति, बहरा, गूंगापन, ठीक से खड़े न होना आदि।

प्रश्न 22.
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोग कौन से हैं?
उत्तर:
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोगपोषक तत्त्व | प्राप्ति स्रोत कमी से होने वाले रोग
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प्रश्न 23.
विभिन्न खाद्य वर्ग कौन-कौन से हैं वर्णन करें? [B.M. 2009 A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्ग में बाँटा गया है। जो निम्न प्रकार हैं-

  1. वर्ग-खाद्यान्न, अनाज-गेहूँ चावल, ज्वार बाजरा मक्का रागी एवं
  2. वर्ग-दाल एवं मेवा फलियाँ-सभी प्रकार की साबुत एवं घुली जाने तथा फलिया सूखी मेवा, मूंगफली, तिल बादाम इत्यादि।
  3. वर्ग-दूध और माँस-दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, खोया, दही। मांस, मछली, अंडा।
  4.  वर्ग-फल और सब्जियाँ-फल विभिन्न प्रकार के विटामिन ‘ए’ एवं विटामिन ‘सी’ भरपूर होते हैं। सब्जियों को तीन भाग में बाँटा जा सकता है।
    (a) हरी पत्तेदार सब्जियाँ,
    (b) गहरी पीली एवं लाल सब्जियाँ,
    (c) जड़ वाली सब्जियाँ
  5.  वर्ग-चीनी और वसा-चीनी, शक्कर, गुड़, वसा, घी, तेल, मक्खन।

वर्ग 1 – कार्बोज शक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन है।
वर्ग 2 – प्रोटीन प्राप्ति का वानस्पतिक साधन है। दालों में 40 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। मेवे से प्राप्त प्रोटीन उत्तम कोटि का होता है।
वर्ग 3 – पशु से पाये जाने वाले प्रोटीन के आधार पर, बनाया गया है। इस वर्ग से प्राप्त प्रोटीन उत्तम श्रेणी का है । अंडा से प्राप्त प्रोटीन को ‘ए’ ग्रेड का प्रोटीन माना गया है।।
वर्ग 4 – फल इनसे विटामिन खनिज लवण पाया जाता है। सब्जियाँ इनसे विटामिन ‘ए’ बी तथा सी से प्राप्त किया जा सकता है । जड़ वाली सब्जियाँ में कार्बन अधिक पाया जाता है। इनमें विटामिन एवं खनिज लवण कम होता है।
वर्ग 5 – इस वर्ग के खाद्य समूह से ऊर्जा प्राप्त होती है। गुड़ से लौह तत्त्व प्राप्त होता है।

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प्रश्न 24.
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting selection of food)-उत्तम पोषण का महत्त्वपूर्ण आधार विभिन्न भोज्य पदार्थों का चुनाव होता है। अतः आहार में ऐसे भोज्य पदार्थों का समावेश आवश्यक है जो परिवार की पौष्टिक आवश्यकताओं के साथ-साथ पूर्ण सन्तुष्टि भी प्रदान कर सकें। किन्हीं दो परिवारों का आहार समान नहीं होता। भिन्न प्रान्तों, देश-विदेश में यह अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है। विभिन्न परिवारों की आहार-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिन्न खाद्य पदार्थों का चयन इसका एक प्रमुख कारण है।

यह चयन कई कारकों पर आधारित है, जो निम्न हैं –
1. परिवार के आहार सम्बन्धी मूल्य (Family Food Values): किसी खाद्य पदार्थ को अपने आहार में सम्मिलित करना न करना परिवार के आहार-सम्बन्धी मूल्यों पर आधारित होता है। आहार-सम्बन्धी मूल्य भौगोलिक स्थिति या जलवायु, धार्मिक विश्वास, परम्परा, दूसरों की नकल आदि के कारण बनते हैं। उदाहरणार्थ किसी प्रान्त में अनाज यदि जलवायु उत्तम होने से काफी मात्रा में पैदा होता है तो वहाँ रहने वाले लोगों को शाकाहारी भोजन (अनाज) से लगाव हो जाता है।

इसमें भी यदि गेहूँ अधिक होता है तो रोटी खाने की आदत पड़ जाती है, जैसे पंजाबियों में । आदिवासी तथा बंगाली इलाकों में मांस, मछली, शराब आदि की ओर लोगों का अधिक झुकाव रहता है। दक्षिण में चावल अधिक खाया जाता है। प्रत्येक परिवार की जीवन-शैली (Life-style) भी भिन्न होती है जो आहार-सम्बन्धी मूल्यों को प्रभावित करती है। जैसे एक दिन में खाए जाने वाले आहारों की संख्या व समय । किसी परिवार में तीन समय भोजन पकता है तो किसी में दो समय । यह मूल्य किसी भी परिवार के शाकाहारी या मांसाहारी होने को भी प्रभावित करते हैं।

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2. खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Food Stuffs): बहुत से खाद्य पदार्थों, विशेषकर फल और सब्जियों की उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है। मौसमी चीजें सस्ती होती हैं और पौष्टिक भी। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी, साग, शलगम आदि अधिक मात्रा में मिलते हैं तो गर्मियों में घीया, तोरी, पेठा, अरबी, टिंडा, शिमला मिर्च, करेले आदि। मौसम के अतिरिक्त स्थानीय उपज का प्रभाव भी खाद्य पदार्थों के चयन पर पड़ता है।

यह पदार्थ सस्ते, स्वादयुक्त और जलवायु के अनुकूल होते हैं। उदाहरणार्थ तटवर्ती क्षेत्रों में मछली तथा अन्य समुद्री पदार्थ आसानी से और सस्ते मिल जाते हैं। इसलिए यह इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के आहार का मुख्य अंग बन जाते हैं। आज यातायात के साधनों में वृद्धि, उचित संरक्षण और संग्रह के तरीकों के कारण खाद्य पदार्थों की उपलब्धि हर जगह काफी बढ़ गई है।

3. क्रय शक्ति (Purchasing Power): भोज्य पदार्थों का चुनाव उन्हें खरीदने की सामर्थ्य पर काफी हद तक निर्भर करता है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति खाद्य पदार्थों चाहे वह मौसम के हों या बिना मौसम के, स्थानीय हों या अन्य प्रान्तों के, में से अपनी पसन्द के खाद्य पदार्थों का चयन कर सकता है, परन्तु निम्न आय वर्ग वाले व्यक्ति अपने भोजन में अधिक महँगे खाद्य पदार्थ सम्मिलित नहीं कर सकते, जैसे-दूध, मांस, फल आदि। इसलिए उन्हें ऐसे उपाय अपनाना आवश्यक है जिनसे कम कीमत में पौष्टिक आहार की प्राप्ति हो सके, जैसे-चीनी के स्थान पर गुड़, बादाम के स्थान पर मूंगफली का प्रयोग करना।

4. मिथ्या धारणाएँ: भोजन सम्बन्धी अन्ध-विश्वास कुछ ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जो गलत होती हैं । खाद्य पदार्थों का पोषक तत्त्वों के बारे में अज्ञानता के कारण विकास होता है। परम्परा से चले आए विश्वासों के कारण बातें अभी भी मान्य हैं। उदाहरणार्थ मछली खाने के बाद दूध पीने से चर्म रोग हो जाता है, चावल खाने से मोटापा बढ़ता है, सर्दी को भोजन से और बुखार को भूख से ठीक किया जा सकता है आदि। इस तरह की मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके कारण हम भोजन का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।

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5. संस्कृति (Culture): खाद्य पदार्थों का चयन धर्म, जाति व संस्कृति से प्रभावित होता है। जैसे पंजाबी के भोजन में मक्की की रोटी और साग, बंगाली के भोजन में चावल, मछली, दक्षिण भारतीय भोजन में सांभर, इडली आदि का अपना एक विशिष्ट स्थान है। – भोज्य पदार्थों की स्वीकृति में धर्म भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जैसे कुछ सम्प्रदायों में मांसाहारी खाद्य पदार्थ खाने की सख्त पाबंदी है। कुछ में लहसुन, प्याज खाना मना है। इस्लाम धर्म में लोग सूअर का मांस नहीं खाते, हिन्दू धर्म में गौ का मांस नहीं खाते । धार्मिक त्योहारों पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। शुभ अवसरों पर कुछ मीठा बनाया जाता है आदि।

6. समवयस्कों या मित्रों का प्रभाव (Peer Group): भोजन के विषय में मित्रों और जान-पहचान वाले लोगों की स्वीकृति बहुत महत्त्व रखती है, विशेष रूप से किशोरों के लिए। कई खाद्य पदार्थ व्यक्ति केवल इसलिए खाता है क्योंकि उसके साथी खाते हैं। जैसे आजकल किशारों में अनुपयोगी व्यंजन (Junk goods), जल्द तैयार किये जाने वाले व्यंजन (Fast Foods), जैसे-पिज्जा, नूडल्ज आदि खाये जाते हैं।

मित्रगणों के प्रभाव से व्यक्ति दूसरे प्रान्तों, दूसरे देशों के लोगों द्वारा खाये जाने वाले खाद्य पदार्थ भी अपने आहार में शामिल कर लेते हैं। उत्तर भारत में इडली, डोसा, सांभर का अधिक प्रचलन तथा मांसाहारी व्यक्ति का शाकाहारी और शाकाहारी व्यक्ति का मांसाहारी हो जाना इसके उदाहरण हैं।

6. संचार माध्यम (Media): टी.वी., रेडियो, फिल्म, समाचार-पत्र, गोष्ठियों आदि के माध्यम से पोषण-सम्बन्धी जानकारी आम जनता तक पहुँचाई जाती है। लोग, विशेष रूप से गृहिणियाँ इन्हें पढ़ती, सुनती या देखती हैं। उनके ऊपर इनका काफी प्रभाव देखने को मिलता है। वह अपने परिवार के पोषण स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करती हैं और उत्तम पोषक पदार्थों को अपने आहार में शामिल करती हैं।

इन संचार माध्यमों का कई बार विपरीत प्रभाव भी देखने को मिलता है। आकर्षित विज्ञापनों से प्रभावित होकर कई बार बच्चे, किशोर आदि अपने आहार में उन वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, जिनसे लाभ न होकर केवल धन का अपव्यय ही होता है। जैसे ठण्डे पेय पदार्थ (Soft Drinks), नूडल्स (Noodles), टॉफी और चॉकलेट आदि।

प्रश्न 25.
संतुलित आहार किसे कहते हैं ? भिन्न-भिन्न खाद्य वर्गों का भोजन में क्या योगदान है ?
उत्तर:
संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व-कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन और जल उचित मात्रा में प्राप्त हों । आहार मनुष्य की केवल भूख ही नहीं मिटता बल्कि उसे पूर्णतः स्वस्थ, नीरोग एवं पुष्ट बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त कुछ अधिक पोषक तत्त्व भी शरीर को मिलते हैं जो आपातकाल में प्रयोग किए जाते हैं। परिभाषा के अनुसार, संतुलित भोजन अधिक पोषक तत्त्व एकत्र कर देता है ताकि कभी-कभी असंतुलित भोजन का प्रभाव न पड़े।

खाद्य वर्ग (Food Groups): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने खाद्य पदार्थों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है :
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वर्ग 1. खाद्यान्न, अनाज और इसके उत्पाद (Cereals, grains and its products): अनाज कई प्रकार का होता है तथा गुणवत्ता और पसंद के अनुसार चुना जा सकता है। भारत में आमतौर से प्रयोगों में आने वाले अनाज गेहूँ, चावल, रागी, ज्वार और बाजरा हैं। खाद्यान्न में तीन हिस्से हैं, जैसे भूसा, बीज और भ्रूणपोष। अधिकतर भोजमों में खाद्यान्न की मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार यह भोजन में कैलोरी देने वाला मुख्य साधन है। – खाद्यान्नों में अलग-अलग प्रोटीन की मात्रा होती है।

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आमतौर पर प्रयोग में लिये जाने वाले खाद्यान्नों की प्रोटीन निम्नलिखित हैं –
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खाद्यान्नों के प्रोटीन शारीरिक क्रिया के लिए उत्तम नहीं हैं क्योंकि उनमें लाइसिन, मिथियोनिन, ट्रिप्टोफन और थ्रीओनिन जैसे अमीनो अम्ल बहुत कम होते हैं। खाद्यान्न की प्रोटीन मात्रा सुधर जाती है जब इनको प्रोटीनयुक्त खाद्यों के साथ मिलाया जाए, जैसे चावल और दाल, चावल और मांस या रोटी और दाल इत्यादि। खाद्यान्नों से काफी मात्रा में खनिज लवण मिल जाते हैं। हड्डियों और दांतों को स्वस्थ रखने के लिए ये कैल्शियम और फॉस्फोरस देते हैं। रागी तो कैल्शियम का भरपूर स्रोत है। हर 100 ग्राम वाले खाने के हिस्से में 344 मि० ग्राम कैल्शियम होता है।

बाजरा में लोहा होता है तथा अक्सर भोजन में लेने से लाभदायक सिद्ध हो सकता है। खाद्यान्न में विटामिन A और C की कमी होती है। पीली मक्की में कैरोटीन होती है। खाद्यान्नों को अंकुरित करने से उनमें विटामिन सी की मात्रा बढ़ जाती है। भूसी और बीज में बी-समूह के विटामिन काफी मात्रा में होते हैं। खाद्यान्नों को दलने, पालिश करने से बी-समूह के विटामिन नष्ट हो जाते हैं। सेला करते समय विटामिन अंदर के हिस्से में चला जाता है तथा दलने के समय अधिक विटामिन नष्ट नहीं होता। भूसी रूक्षांश देता है जो शरीर के उपापचय क्रिया में सहायक होता है।

कुछ कंदमूल हैं-आलू, शकरकंद, टपायका, जिमीकंद और कचालू। ये सभी स्टार्चयुक्त खाद्य आसानी से पच जाते हैं। ताप उसकी रासायनिक संरचना बदल देता है। स्वाद व आकार भी बदल जाता है। कंद और मूल कुछ समय के लिए खाद्यान्न का स्थान ले सकते हैं। भगवान राम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान कंद-मूल-फल खाकर ही जिये थे। यहां पर कन्द का अर्थ है टपायका, यह केरल में अधिक मात्रा में उगता है तथा इसमें स्टार्च और कैलोरी की मात्रा भरपूर होती है। आलू सबसे सामान्य कंद-मूल है तथा विश्व भर में लोग इसे पसन्द करते हैं। भोजन की अधिकांश कैलोरी इसी वर्ग में पायी जाती है।

वर्ग – 2. दालें और फलियाँ (Pulses and Legumes): दालों के प्रोटीन स्तर में तथा मात्रा में खाद्यान्न की प्रोटीन से बेहतर होती है। दालों में मिथिओनीन अमीनो अम्ल की कमी होती है। अरहर में तो ट्रिपटोफन भी कम होती है। जब दालों को खाद्यान्नों के साथ खाया जाता है तो इनका पौष्टिक स्तर बढ़ जाता है। लगभग 40 प्रतिशत दालों में थायमिन और फोलिक अम्ल जैसे विटामिन काफी मात्रा में पाए जाते हैं। चीनी लोग सोयाबीन की कई प्रकार की चटनी तथा पेस्ट प्रयोग करते हैं।

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सोयाबीन की थोड़ी मात्रा भी शारीरिक क्रिया के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो सकती है। दालों में विटामिन C की कमी होती है। अंकुरित करने से दालों में विटामिन C की मात्रा बढ़ जाती है तथा उनका आकार बदल जाता है, पाचन क्षमता सहज हो जाती है तथा लोहा और बी-समूह के विटामिन’ भी बढ़ जाते हैं। गिरियां और तेल के बीज वसा और प्रोटीन की मात्रा से भरपूर होते हैं । गिरियों में से वसा निकल जाने के बाद प्रोटीन अधिक हो जाते हैं। यह वर्ग मरम्मत के लिए प्रोटीन देते हैं। यह प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैं।

वर्ग – 3. दूध और मांस के उत्पाद (Milk and Meat Products): स्तनधारियों के दूध लैक्टोज, लैक्टलबूमिन और लैक्टोग्लोबिन की मात्रा से भरपूर होते हैं । दूध में सारे आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं। इसीलिए इसे पूर्ण आहार कहा जाता है। दूध में विटामिन सी और लोहा कम होता है । लैक्टोज कम मीठा तो होता है, किन्तु लैक्टिक अम्ल जीवाणु की वृद्धि में भी सहायक है। इस प्रकार रोगग्रस्त जीवाणु की वृद्धि को यह रोकता है। दूध से बी-समूह के विटामिन अच्छी मात्रा में मिल जाते हैं विशेषकर थायमिन, राइबोफ्लेविन और पायरीडोक्सिन। बी-समूह के विटामिन रोशनी में नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए यह अच्छी आदत है कि दूध को साफ, ठंडे, ढके हुए और अंधेरी जगह में रखा जाए। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्पूर्ण क्रीमयुक्त, मानक और टोन्ड दूध ले सकते हैं। उपभोग के लिए पाश्चुराइज्ड या मानकीकृत दूध लेना सुरक्षित है। दही-दूध को ‘जमने’ के लिए थोड़ी दही डालकर कमरे के ताप पर 4-12 घंटे तक रखने से दही बन जाता है। दही किसी भी प्रकार के दूध से बनाया जा सकता है। पाउडर से दूध बनाकर उसकी दही बना सकते हैं। दही को मथने से मक्खन बनाया जा सकता है। मक्खन दूध की अपेक्षा आसानी से पच जाता है। पनीर-दूध को दही, नींबू जूस, सिरका या सिट्रिक अम्ल से क्रिया करके पनीर प्राप्त होता है।

पनीर अवक्षेपित प्रोटीन है तथा इसमें वसा और लैक्टोज लगभग बिल्कुल नहीं होता। पनीर को पचाने की आवश्यकता नहीं होती तथा वह आसानी से पच जाता है। पनीर निकलने के बाद बचे हुए तरल को दही का पानी या छाछ (Whey) कहते हैं। छाछ में खनिज लवणों व दूध की वसा की भरपूर मात्रा होती है। इससे करी या ग्रेवी बनाना अच्छा तरीका है। प्रोसेस्ड पनीर वह पनीर है जो सन्तुलित अवस्था में बनाया जाता है। प्रोसेस्ड पनीर में पनीर से अधिक मात्रा में वसा होती है। इसलिए मोटे व्यक्तियों को इससे परहेज करना चाहिए। दूध और दूध के उत्पाद भोजन में कैल्शियम और विटामिन A का योगदान देते हैं।

मांस. उत्पाद (Meat Products): अंडे, मांस और मछली में उत्तम प्रकार के प्रोटीन होते हैं। हर प्रकार के मांस में रेशेदार जुड़ने वाले तन्तु होते हैं जो कोलेगन से भरपूर होते हैं। मीट को पकाने पर कोलेगन जैलेटिन में बदल जाता है। माँस में लोहा और फॉस्फोरस भी काफी मात्रा में होते हैं। अंगों के माँस (यकृत, हृदय, गुर्दे) विटामिन A की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। अंडों का प्रोटीन आसानी से शरीर में एकत्र हो जाता है।

सफेद माँस यानि कि मछली और मुर्गा को लाल माँस से बेहतर समझता जाता है और रोगियों तथा हृदय रोगियों के लिए उचित होता है। सामान्य माँस पदार्थ, हैम (ham), सौसेजिस (Sausages), सलामी (salami) और मछली होते हैं। इस वर्ग से उत्तम प्रोटीन मिलता है जो कि शारीरिक विकास और तन्तुओं की मरम्मत की योग्यता रखती है। अंडे व अंगों का मीट लोहे का भरपूर स्रोत है, इसलिए यह रक्त का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यह ऑक्सीकरण क्रियाओं के लिए उत्तरदायी है।

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वर्ग 4. फल और सब्जियाँ (Fruits and Vegetables): फलों का भोजन में एक विशेष स्थान है। भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वाद व सुगन्धों वाले फल उपलब्ध हैं। पके आम, पपीता और अंजीर विशेषकर कैरोटीन से भरपूर फल हैं। संतरे तथा नीबू प्रजाति के फलों में विटामिन C की मात्रा भरूपर होती है। ताजे फलों का रस स्वस्थ मसूड़ों, दांतों के लिए है। इसके अतिरिक्त घाव को शीघ्रता से भरना तथा साफ चेहरे के लिए भी फलों का रस आवश्यक है।

केला कार्बोज का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अफ्रीका में बच्चे अधिक केले खाते हैं और इसलिए क्वाशियोरकर रोग से ग्रस्त होते हैं। सेबों व आलू बुखारों में पैक्टिन की भरपूर मात्रा होती है जो जैम और जैली बनाने के लिए आवश्यक है। फलों से फल-शर्करा औरे लैवरोलोज मिलता है। वह कुछ रूक्षांश भी देते हैं जो शारीरिक क्रिया संतुलित करता है। फलों की तरह सब्जियों में भी कई किस्में होती हैं।

सब्जियाँ आकार में, स्वाद में, सुगंध में और पोषक तत्त्वों की मात्रा में भिन्न-भिन्न होती हैं। वह मौसम के कारण भी भिन्न होती हैं। पौधों के विभिन्न हिस्से सब्जियों की तरह खाए जाते हैं। पत्ते-पालक, चौलाई, पुदीना, धनिया, मेथी और सलाद इत्यादि । कंद और मूल-प्याज, शलजम, मूली और आलू। फल-बैंगन, भिंडी, खीरा, चिचिण्डा और अन्य कदू वर्गीय पदार्थ। फूल-फूल गोभी, कचनार और केले के फूल । हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम और लोहे के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

इनकी पर्याप्त मात्रा इन सब्जियों से प्राप्त हो जाती है। अधिकतर पत्तेदार सब्जियों में राइबोफ्लेविन भरपूर मात्रा में होती है। इनके सेवन से मुखपाक अर्थात् होठों के फटने (Cracking of lipsat-the cover of mouth) की चिन्ता नहीं रहती। अधिक रेशों की मात्रा होने के कारण हरी पत्तेदार सब्जियां सारक का काम करती हैं। इनमें ऑक्जीलेट की मात्रा बहुत अधिक होती है जो कि लोहा, कैल्शियम, तांबा व मैग्नीशियम के अवशोषण में बाधा डालते हैं। जड़ वाली सब्जियों में कार्बोज व कैरोटीन की भरपूर मात्रा होती है। सब्जियों में विटामिन C भी भरपूर होता है। विटामिन A और C दालों में कम होता है। दालों व अनाज के साथ सब्जियों का खाना भोजन की पौष्टिकता बढ़ा देता है। सब्जियां भिन्नता देती हैं तथा भोजन को आकर्षक बनाती हैं।

वर्ग 5. वसा और शर्करा (Fats and Sugars): वसा, मक्खन और घी की तरह भोजन को स्वादिष्ट तो बनाती ही है, वसा में घुलनशीन विटामिन भी हैं तथा यह कैलोरी भी देती है। कुछ लोग पशुजन्य वसा को भी पकाने का माध्यम बनाते हैं। तेल व वसा महंगे होते हैं। इसी कारण गरीब लोग 20 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा इनसे नहीं लेते। भोजन में वसा अमीर लोग अधिक खाते हैं जिससे अक्सर मोटापा तथा हृदय रोग पनपते हैं। अधिकतर तेलों में विटामिन नहीं होते।

लाल खजूर का तेल अलग है तथा उसमें विटामिन A (कैरोटीन) होता है। आर्थिक कारणों से तेल का भोजन में अधिक प्रयोग होता जा रहा है। तेलों में रक्त के कालेस्ट्रॉल स्तर को कम करने की क्षमता भी होती है। शर्करा-सुक्रोज साफ, सफेद पदार्थ है जिसमें न कोई अशुद्धता है और न ही कोई पोषक तत्त्व। अधिक शर्करा के प्रयोग से दाँतों के रोग में वृद्धि होती है। गुड़ में प्राकृतिक सुगंध होती है तथा कुछ मात्रा में खनिज लवण और विटामिन भी होते हैं तथा अधिक कैलोरी देती है। मिठाइयाँ अपने स्वाद के लिए मशहूर हैं, इसीलिए भोजन के बाद मीठा खाने की महत्ता है।
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यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रतिदिन भोजन में इन सभी खाद्य वर्गों से पदार्थ मिलाए । ऐसे भोजन में सभी पोषक तत्त्व अपना संतुलन बनाए रखते हैं। ऐसे भोजन को संतुलित आहार कहते हैं।

प्रश्न 26.
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting nutritional requirement) :
1. आयु (Age): बच्चों को उनके शरीर-भार को देखते हुए प्रौढ़ों की अपेक्षा अधिक मात्रा में भोज्य तत्त्वों की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका शरीर वृद्धि की अवस्था में होता है। वृद्धावस्था में आहार की मात्रा और पोषक तत्वों की आवश्यकता कम हो जाती है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ शिथिल पड़ जाती हैं।

2. लिंग (Sex): सामान्यतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा कम आहार की आवश्यकता होती है क्योंकि वह पुरुषों की अपेक्षा लम्बाई व भार में कम होती हैं तथा शारीरिक श्रम भी कम करती हैं।

3.  शरीर का आकार और बनावट (Size and Composition of the Body): लम्बे व भारी मनुष्य के शरीर में मांसपेशियाँ और ऊतक अधिक होते हैं, अतः उनकी भोजन की आवश्यकता ठिगने व दुबले-पतले मनुष्य की अपेक्षा अधिक होती है।

4. जलवायु (Climate): ठण्डे प्रदेशों में आहार की आवश्यकता गर्म प्रदेशों की अपेक्षा अधिक होती है क्योंकि शरीर के ताप को बनाए रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है। यही कारण है कि हम सर्दियों में अधिक खाते हैं।

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5. व्यवसाय (Occupation): अधिक शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों को कम श्रम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत मानसिक श्रम अधिक रखने वाले व्यक्तियों को अधिक प्रोटीन और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

6. विशेष शारीरिक अवस्थाएँ (Specific Body Conditions): कुछ विशेष शारीरिक अवस्थाएँ पोषक तत्त्वों की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में पोषक तत्त्वों की माँग काफी बढ़ जाती है।

ऑपरेशन के बाद की अवस्था व जल जाने की अवस्था में शरीर-निर्माणक तत्त्वें विशेष रूप से प्रोटीन की आवश्यकता अधिक रहती है। सन्तुलित आहार सर्वोत्तम आहार है परन्तु इसका तात्पर्य महँगा आहार नहीं है क्योंकि खाद्य पदार्थों की कीमत उनके उपलब्ध होने पर और मौसम पर निर्भर करती है न कि पौष्टिकता पर। अतः कम धन से भी सन्तुलित आहार की प्राप्ति की जा सकती है।

इसके लिए आवश्यकता है समान पोषक मूल्यों के सस्ते साधनों को जानने की। जैसे बादाम की जगह मूंगफली का प्रयोग करना। दूध की जगह दालों से प्रोटीन प्राप्त करना। महँगे भोजन भी असन्तुलित हो सकते हैं, जैसे बेमौसमी खाद्य पदार्थ। सन्तुलित आहार ग्रहण करने पर शरीर द्वारा उसका उपयोग हो सके इसके लिए यह ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है कि आहार पाचनशील, स्वादयुक्त, ताजा और दूषण रहित हो।

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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science भोजन के कार्य Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग कैलोरी उत्पन्न करता है –
(क) 4 कैलोरी
(ख) 2 कैलोरी
(ग) 6 कैलोरी।
(घ) 8 कैलोरी
उत्तर:
(क) 4 कैलोरी

प्रश्न 2.
विटामिन ‘C’ का सबसे बढ़िया स्रोत है –
(क) आँवला
(ख) संतरा
(ग) नींबू
(घ) दूध
उत्तर:
(क) आँवला

प्रश्न 3.
मानव शरीर में अमीनो अम्ल होते हैं –
(क) 22
(ख) 23
(ग) 25
(घ) 26
उत्तर:
(क) 22

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प्रश्न 4.
अंडे की सफेदी में मिलता है –
(क) अल्बुमिन
(ख) ग्लोबिन
(ग) फाइबरिन
(घ) जेलिटिन
उत्तर:
(क) अल्बुमिन

प्रश्न 5.
चांवल में उपस्थित प्रोटीन –
(क) ओराजेनिन है
(ख) होरडेनिन है
(ग) ग्लूटेनिन
(घ) ग्लायडिन
उत्तर:
(क) ओराजेनिन है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शरीर वर्धक तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन, खनिज लवण व जल शरीर की वृद्धि एवं मरम्मत हेतु आवश्यक हैं इसलिए इन्हें शरीरवर्धक तत्त्व भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर:
बाहरी व आन्तरिक क्रियाओं को सम्पादित करने हेतु शरीर को ऊर्जा चाहिए।

प्रश्न 3.
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में कितनी ऊर्जा देती हैं ?
उत्तर:
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में क्रमशः 4 कैलोरी, 9 कैलोरी व 4 . कैलोरी ऊर्जा देते हैं।

प्रश्न 4.
भोजन के स्वरूप का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
1. शारीरिक कार्य।
2. मनोवैज्ञानिक कार्य।
3. सामाजिक व सांस्कृतिक कार्य।

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प्रश्न 5.
शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यक्ति की जीवन क्रियाएँ, जैसे सांस लेना, परिसंचरण, पाचन और चूसना, सोखना के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
शारीरिक कार्यों के आधार पर चार विभिन्न तरह के भोजन कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • ऊर्जा प्रदान करने के लिए भोजन
  • शरीर के निर्माण के लिए भोजन
  • संरक्षात्मक भोजन
  •  नियंत्रित भोजन।

प्रश्न 7.
मनोवैज्ञानिक कार्य का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
भोजन व्यक्ति की भावात्मक आवश्यकता को पूरा करता है। जब कोई प्रसन्न होता है या मित्रों की संगति में होता है तो वह अधिक खाना खाता है।

प्रश्न 8.
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण में किन तत्त्वों का विशेष महत्त्व है ?
उत्तर:
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण हेतु विटामिन, खनिज लवण, जल और प्रोटीन का विशेष महत्त्व है। इसके अतिरिक्त शरीर के नियंत्रण हेतु फोक का अपना विशेष स्थान है।

प्रश्न 9.
हमें अपने आहार में अधिकांश वसायुक्त पदार्थों को क्यों नहीं सम्मिलित करना चाहिए?
उत्तर:
वसायुक्त पदार्थ सबसे अधिक ऊर्जा देते हैं। 1 ग्राम वसा 9 कैलोरी यानि कार्बोज से सवा दो गुणा अधिक कैलोरी देता है। यदि हम कैलोरी प्राप्ति हेतु शरीर की आवश्यकता वसा द्वारा पूरी कर लें तो अन्य तत्त्वों का अभाव रह जाएगा और हम रोगग्रस्त हो जाएंगे।

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प्रश्न 10.
भोजन में दीर्घजीवी और नैतिकता का परस्पर संबंध लिखें।
उत्तर:
अच्छा भोजन ज्यादा जीवन जीने के अवसर बढ़ा देता है। गन्दा भोजन बीमारियाँ फैलाता है। अस्वस्थ जीवन मृत्यु का कारण बन सकता है।

प्रश्न 11.
भोजन को पौष्टिक तत्त्वों के कार्यों के आधार पर किस प्रकार विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर:
पौष्टिक तत्त्व – कार्य
1. प्रोटीन – शारीरिक वृद्धि
2. कार्बोज, वसा – ऊर्जा देना
3. विटामिन – रोगों से बचाव
4. खनिज लवण – शारीरिक कार्यों पर नियंत्रण

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन व हमारी भावनाओं (Food & Emotions) में आपसी क्या सम्बन्ध है ?
अथवा
भोजन हमें मानसिक संतोष (Mental Satisfaction) कैसे प्रदान करता है ?
उत्तर:
भोजन न केवल शारीरिक व सामाजिक कार्य ही अदा करता है परन्तु यह मनोवैज्ञानिक कार्य करने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि हमारे लिए कोई भी व्यक्ति मनपसन्द वस्तु बना कर परोसता है तो हमें प्रसन्नता होती है। भोजन के माध्यम से वह अपने प्रेमभाव और मैत्री को व्यक्त करता है। अतः भोजन हमें मानसिक संतोष भी प्रदान करता है। जैसे एक बच्चा माँ की गोद में दूध पीकर सुरक्षित महसूस करता है।

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प्रश्न 2.
भोजन व त्यौहार (Food & festivals) का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
प्रत्येक त्यौहार में भोजन का अपना विशिष्ट महत्त्व है क्योंकि भोजन उत्सवों और त्यौहारों का अभिन्न अंग है। प्रत्येक त्यौहार में विशेष पकवान बना कर ही त्यौहार मनाने की प्रथा है। इन पकवानों का आदान-प्रदान कर सभी परिवार अपनी मैत्री की भावनाएँ व्यक्त करते हैं। रीति-रिवाजों को इतना नहीं याद करते जितना उन त्यौहारों पर बने पकवानों को। होली के त्यौहार पर गुझिया, संक्रान्ति व लोहड़ी पर तिल व गुड़ के व्यञ्जन, बैसाखी पर पीले केसरिया चावल, ईद पर सेवइयों की खीर आदि बनाने का प्रचलन है।

प्रश्न 3.
भोजन व कोशिकाओं का पुनर्निर्माण (Food and cell formation) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शरीर की वृद्धि व टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत हेतु भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन में उपस्थित प्रोटीन, खनिज लवण व जल यही कार्य करते हैं। व्यक्ति शैशवकाल से प्रौढ़ावस्था तक वृद्धि और विकास की दिशा में अग्रसर होता है। शरीर का भार व ऊँचाई में वृद्धि इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रश्न 4.
भोजन व कार्यक्षमता (Food & work efficiency) का परस्पर क्या . सम्बन्ध है ?
उत्तर:
भोजन व कार्यक्षमता-अच्छा भोजन अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और अच्छे स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्षण है, शरीर की उत्तम क्रियाशीलता या शरीर की कार्यक्षमता। अत: भोजन पर शरीर की कार्यक्षमता निर्भर करती है। सुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता कुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता से निश्चित ही अधिक होती है। अमेरिका में एक अध्ययन में यह देखा गया कि कारखाने के कर्मचारी जो उत्तम नाश्ता करके आते थे, अधिक काम कर पाते थे। उन्हें थकावट भी कम और देर से होती थी।

प्रश्न 5.
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण –
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प्रश्न 6.
पोषण और मृत्यु-दर से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
पोषण और मृत्यु दर (Nutrition and mortality): कुपोषण के कारण आवश्यक पोषक तत्त्व आवश्यक मात्रा व अनुपात में प्राप्त नहीं होता है। शरीर क्षीण पड़ जाता है और अंततः मृत्यु हो जाती है। दिशाभारती 2 नवम्बर, 1975 के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग दस लाख बच्चों की पोषक आहार के अभाव में मृत्यु हो जाती है।

पौष्टिक आहार संबंधी हैदराबाद के राष्ट्रीय संस्थान द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार निम्न आय वर्ग वाले भारतीयों के 65 प्रतिशत बच्चे साधारणतः और 18 प्रतिशत बच्चे गम्भीर रूप से पौष्टिक आहार के अभाव में पीड़ित रहते हैं और कालान्तर में सूख-सूख कर मर जाते हैं। हरियाणा जैसे खुशहाल प्रदेश में भारतीय चिकित्सा शोध परिषद और राज्य सरकार द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 50 प्रतिशत बच्चों को प्रोटीन और पर्याप्त पौष्टिक आहार उपलब्ध नहीं होते।

डॉक्टर हिंगोरानी के अनुसार, कुपोषित शरीर रोगाणुओं से जूझने के लिए निर्बल प्रतिपिण्ड बनाता है जिसके कारण शरीर रोगी हो जाता है तथा अंततः मृत्यु हो जाती है । मृत्यु दर विकसित देशों में कम होने का प्रमुख कारण उनका उच्च पोषक स्तर है। भारत जैसे विकासशील देश में भी अब कुपोषण के कारण होने वाली मृत्यु-दर में भारी कमी हुई है।

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प्रश्न 7.
पोषण और मानसिक स्तर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पोषण और मानसिक स्तर (Nutrition and Psychological status)
मानसिक स्थिरचित्तता (Static Mental Tension)-उन सैनिकों में जिनको प्रयोग के लिए 6 माह तक कम खाना दिया गया था, मानसिक दृष्टि से भी बहुत परिवर्तन पाया गया। वे अधीर, चिड़चिड़े, उदास व हठी थे तथा संकल्प-शक्ति को खो बैठते थे। जब प्रतिबंध हटा तो उनका व्यवहार सामान्य हो गया।

मानसिक संलग्नता (Mental Imbalance): कुपोषण के कारण पाया गया कि बालक अपनी पढ़ाई में पूर्णरूपेण ध्यान नहीं दे रहे थे। मानसिक संलग्नता की कमी के कारण वे पाठ की गहराई तक पहुँचकर उसके गूढ अर्थ को नहीं समझ पा रहे थे। अधिक समय तक एकाग्रचित्तता भी उनके लिए संभव नहीं थी क्योंकि वे मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते थे। अतः संक्षेप में संतुलित भोजन के अभाव में मानसिक स्तर पर असाधारण प्रभाव पाया गया जिससे कि कार्यक्षमता और कुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 8.
पोषण और शारीरिक स्तर का क्या संबंध है?
उत्तर:
पोषण और शारीरिक स्तर (Nutrition and Physical Status): डील-डौल-जापानी प्रायः छोटे कद के होते हैं। यह निश्चित रूप से जानने के लिए कि क्या उनका छोटा डील-डौल उनके भोजन का प्रभाव है, कैलिफोर्निया शहर में 6 से 9 वर्ष के उन जापानी बालकों का जो अमेरीका में जन्मे और वहीं पले, अध्ययन किया गया और परिणामों की तुलना उसी आयु के जापान में जन्मे तथा वहीं रहने वाले बालकों से की गयी तो कैलीफोर्निया के बालकों का कद और शारीरिक भार अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। यह अंतर दोनों वर्गों के भोजन की पौष्टिकता में अन्तर के कारण सिद्ध हुआ।

हड्डियाँ (Bones): जर्मन के एक स्कूल में विशेष आहार दिया गया। अतः आहार को विटामिन डी युक्त बनाया गया जिससे इन बालकों का विकास तीव्र हुआ ।
त्वचा (Skin): चर्बी की तह जो बाह्य त्वचा के नीचे होती है, उसकी मोटाई से शारीरिक स्तर का ज्ञान भली-भाँति हो सकता है।
माँसपेशियाँ (Muscles): मांसपेशियों का विकास एवं उनके ठोसपन की स्थिति से भी यह पता लगता है कि पोषण स्तर कैसा है।

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प्रश्न 9.
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ निम्नलिखित हैं :
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन के कार्य विस्तारपूर्वक समझाइए।
भोजन के कार्य (Functions of Food): शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कार्यों को सम्पन्न करने हेतु भोजन हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग है।
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I. शारीरिक कार्य (Physical functions): भोजन के शारीरिक कार्यों को मुख्य चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –
(क) ऊर्जा प्रदान करना
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना
(ग) रोगों से बचाना
(घ) शारीरिक कार्यों का सुसंचालन करना।
भोजन में उपस्थित छः पोषक तत्त्व कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण तथा जल इन कार्यों को सम्पन्न करते हैं। उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए मनुष्य के आहार में इन पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है।

(क) ऊर्जा प्रदान करना (Providing energy): जीवित प्राणियों के आन्तरिक व बाह्य शारीरिक कार्यों के संचालन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो उन्हें भोजन द्वारा प्राप्त होती है। अतः भोजन का एक मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा देना है। विभिन्न बाह्य कार्यों जैसे खाना पकाने, खेलने, पढ़ने तथा अन्य दैनिक कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा भोजन से ही प्राप्त होती है।

विभिन्न आन्तरिक कार्यों, जैसे-श्वसन, भोजन का पाचन, रक्त का परिसंचरण आदि के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर के ये आन्तरिक कार्य निरन्तर चलते रहते हैं तथा हमारी इच्छा व अनिच्छा का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः जब हम सो रहे होते हैं या आराम कर रहे होते हैं तब भी हमें इन अनैच्छिक रूप से कार्यरत अंगों, जैसे हृदय, फेफड़े आंत, गुर्दे आदि के आंतरिक कार्यों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

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1. कार्बोज (Carbohydrates): जैसे अनाज (गेहूँ, चावल, बाजरा, आदि), शक्कर, ग्लूकोज, शहद, गुड़, आलू आदि। एक ग्राम कार्बोज शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

2. प्रोटीन (Proteins): जैसे दालें, दूध और दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली आदि। प्रोटीन निम्न स्थितियों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है

  • जब आहार में कार्बोज की कमी हो।
  • जब आहार में प्रोटीन शारीरिक आवश्यकताओं से अधिक हो।।
  • जब भोजन की प्रोटीन घटिया किस्म की हो और शारीरिक प्रोटीन बनाने में असमर्थ हो। एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

3. वसा (Fats): जैसे घी, तेल, मक्खन, क्रीम आदि। यह कार्बोज से सवा दो (214) गुना अधिक ऊर्जा देता है तथा एक ग्राम वसा शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 9 कैलोरी उत्पन्न करता है।
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना (Building tissues): मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन काल अर्थात् जन्म से लेकर मृत्यु तक तन्तुओं का निर्माण होता रहता है। इन नए तन्तुओं का निर्माण निम्नलिखित कार्यों के लिए होता है –

  • शारीरिक वृद्धि।
  • टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत।

एक छोटा-सा शिशु आयु बढ़ने पर पूर्ण प्रौढ़ बन जाता है तथा उसके शारीरिक नाप व भार में परिवर्तन नए तन्तुओं के निर्माण के कारण होता है। मनुष्य के शारीरिक अंग हर समय कार्य करते रहते हैं जिसके कारण शरीर के तन्तु टूटते-फूटते रहते हैं। इन पुराने टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत का कार्य भी भोजन करता है।

हमारे शरीर में तन्तुओं के निर्माण का कार्य भोजन में उपस्थित निम्न पोषक तत्त्व करते हैं:
1. प्रोटीन (Proteins): जैसे दूध, दूध से बने पदार्थ, अण्डा, मांस, मछली, दालें, सोयाबीन आदि का प्रोटीन शरीर के निर्माण में सर्वोच्च स्थान पर आता है।
2. खनिज लवण (Minerals): नए तन्तुओं के निर्माण कार्य में कुछ खनिज लवणों का विशेष स्थान है। यह प्रमुख खनिज लवण हैं कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा आदि, जो दांतों, अस्थियों तथा रक्त के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। ये खनिज लवण हमें दूध से बने पदार्थ मांस, मछली, कलेजी, अण्डा, दालें, अनाज आदि से प्राप्त होते हैं।

(ग) रोगों से बचाव (Protection against diseases): भोजन के विभिन्न कार्यों में एक कार्य शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करना है। हम जानते हैं कि एक कमजोर व्यक्ति को एक स्वस्थ व्यक्ति की अपेक्षा बीमारियाँ जल्दी घेरती हैं। हमारे शरीर को रोगों से बचाव क्षमता निम्न पोषक तत्त्वों द्वारा प्राप्त होती है।

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1. विटामिन (Vitamins): इनकी आवश्यकता हमें बहुत ही न्यून मात्राओं में होती है। यह कई प्रकार के होते हैं तथा प्रायः सभी भोज्य पदार्थों द्वारा प्राप्त होते हैं, परन्तु प्रत्येक भोज्य पदार्थों में कोई एक विटामिन अधिक मात्रा में होता है तो कोई दूसरा विटामिन कम मात्रा में होता है। जैसे विटामिन-ए दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियों, गहरी पीली सब्जियों, अण्डा, मांस आदि में अधिक होता है परन्तु दालों में यह कम मात्रा में पाया जाता है। इसी प्रकार विटामिन-सी आंवला, सन्तरा, नींबू आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है और अनाज, दालों, दूध आदि में इसकी मात्रा कम होती है।

2. खनिज लवण (Minerals): विटामिनों की भाँति खनिज लवणों की आवश्यकता भी कम मात्रा में होती है परन्तु रोगों से बचाव क्षमता के लिए यह शरीर हेतु अति आवश्यक हैं। खजिन लवण कई प्रकार के होते हैं तथा यह भी प्रायः सभी भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं। दूध, फल तथा सब्जियों में सभी प्रकार के खनिज लवण अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

विभिन्न अंगों के सुसंचालन के लिए खनिज लवणों तथा विटामिनों की आवश्यकता होती है क्योंकि शरीर की विभिन्न रासायनिक प्रतिक्रियाएँ इनके द्वारा नियन्त्रित होती हैं। इसी कारण इन पोषक तत्त्वों के नियमित प्रयोग से शरीर स्वस्थ बनता है तथा बीमारियों से मुक्त रखता है। यही कारण है कि विटामिन और खनिज लवण संरक्षक पोषक तत्त्वों के नाम से जाने जाते हैं।

(घ) शरीर को सुचारू रूप से चलाना (Monitoring the body): जिस प्रकार शरीर को विभिन्न पोषक तत्त्वों जैसे कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज लवणों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए जल और फोक की भी आवश्यकता होती है। शारीरिक क्रियाओं के नियमन के लिए जल अति आवश्यक है तथा मल निर्माण एवं निष्कासन के लिए आहार में फोक का होना आवश्यक है। फोक हमें हरी पत्तेदारसब्जियों, दालों तथा अनाजों के छिलकों से प्राप्त होता है।

II. मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological functions): शारीरिक कार्यों को पूर्ण करने के साथ-साथ भोजन हमें मानसिक सन्तोष और सुरक्षा भी प्रदान करता है। बच्चा सदैव अपनी मां की गोद में दूध पीकर ही अधिक सुरक्षित और प्रसद अनुभव करता है। बाजार में नाना प्रकार के पकवान खाकर भी मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती जो घर के सात्विक व सादे भोजन के खाने से प्राप्त हो जाती है। भूख की सन्तुष्टि करके भोजन मनुष्य को मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो पौष्टिक तत्त्वों की गोलियां खाने से कदापि प्राप्त नहीं हो सकती । मनुष्य का खान-पान उसकी संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं भोजन संबंधी आदतों पर निर्भर करता है।

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जो मनुष्य चावल खाना अधिक पसन्द करता है उसे यदि रोटी दी जाए तो उसे मानसिक सन्तुष्टि नहीं मिलती है और वह चावल प्राप्त करने की कोशिश करता है जिसे वह वर्षों से खाता आया है। मनुष्य को वही भोजन अधिक मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो वह प्रतिदिन खाता है और यही कारण है कि मनुष्य किसी भी प्रकार के परिवर्तन या नए भोजन को अपनाने में संकोच महसूस करता है।

III. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य (Socio-cultural functions): भोजन के सामाजिक कार्य का महत्त्व शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कार्यों से किसी भी प्रकार कम नहीं है। भोजन व्यक्तियों में आपसी संबंध बढ़ाकर उनकी मैत्री सुदृढ़ करने में सहायक होता है। प्राचीन युग से ही खाना बांटकर खाना मित्रता का प्रतीक माना गया है जो आज के आधुनिक युग में भी यथावत है।

हम सभी घर पर आए अतिथि का सत्कार भोजन से करते हैं और अतिथि के लिए अच्छे-से-अच्छा भोजन ही परोसा जाता है। बच्चे के जन्म दिन, शादी आदि के उत्सव पर भी भोजन परोसा जाता है जिससे सामाजिक सम्बन्ध बढ़ते हैं। प्रायः किसी नए परिचित व्यक्ति से मैत्री बढ़ाने के लिए उसे घर पर भोजन के लिए ही आमंत्रित किया जाता है।

बड़े-बड़े भोजों पर व्यक्तियों को आमंत्रित करना सामाजिक प्रतिष्ठा का सूचक है। इसके अतिरिक्त अनेक त्यौहारों जैसे दीवाली, होली, रक्षाबन्धन आदि पर मिठाईयों का आदान-प्रदान मैत्री का सूचक माना जाता है। सामाजिक उत्सवों के लिए भी भोजन का आयोजन करना अनिवार्य-सा हो गया है। हमारे देश के भिन्न-भिन्न प्रान्त में भिन्न-भिन्न जातियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन खाते हैं।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के प्रकार (Dimensions of Health) कौन-से हैं ?
उत्तर:
आज के युग में पूर्ण स्वस्थता (Complete well being) की स्थिति के लिए आध्यात्मिक पहलू के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
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1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health): स्वास्थ्य के शारीरिक पक्ष से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। जब हम यह कहते हैं कि वह व्यक्ति स्वस्थ है तो हम साधारणतया स्वास्थ्य के इसी पक्ष की बात करते हैं। कोई भी व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ माना जाता है यदि वह सक्रिय, चुस्त व फुर्तीला है।
वह किसी शारीरिक रोग से ग्रस्त नहीं है तथा उसमें निम्न शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं –

  • आयु के अनुपात में वजन और लम्बाई।
  • मांसपेशियाँ सुदृढ़ और विकसित।
  • हड्डियाँ मजबूत और वृद्धि सामान्य।
  • त्वचा स्वस्थ, सुन्दर व चिकनी।
  • आँखें स्वस्थ और दोषरहित।
  • बाल चमकीले और चिकने।
  • दाँत साफ, सामान्य एवं दोषरहित।
  • चाल-ढाल सीधी तनी हुई, पेट अन्दर।
  • गहरी नींद।
  • भूख सामान्य।
  • रोग निरोधक क्षमता उत्तम ।
  • उत्साही, सक्रिय एवं शक्ति से भरपूर ।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health): कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ माना जाता है, यदि उसमें निम्न लक्षण पाए जाते हैं –

  • तनाव तथा चिन्ता से. गुक्त।
  • मानसिक रूप से सके और क्रियाशील।
  • दिमागी रोगों से मुक्त।
  • दूसरों के प्रति भातुक।
  • आन्तरिक अन्त से मुक्त।
  • विभिन्न लोगों और विभिन्न परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम।
  • अच्छी मानसिक योग्यता।
  • संवेगात्मक स्थिरता।

मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान लगाना शारीरिक स्वास्थ्य की तुलना में कठिन है। यह कहा जाता है कि “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” (Healthy mind lives in a healthy body) इस परिभाषा से स्पष्ट है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आपस में सीधा सम्बन्ध है। मानसिक अस्वस्थता के कारण शारीरिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है।

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उदाहरणार्थ, अधिक चिन्ता और तनाव से शरीर में उच्च रक्तचाप अथवा हृदय रोग हो जाता है। इसके विपरीत स्थिति में शारीरिक अस्वस्थता से मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्थ एक पोलियो से ग्रस्त बच्चा खुद को सामान्य बच्चों से हीन अनुभव करता है और यही भावना उसे डर या आत्म-दयनीयता (Self-pity) की स्थिति में पहुँचा देती है । यह स्थिति मानसिक अस्वस्थता की स्थिति है।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health): सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में निम्न लक्षण पाए जाते हैं।

  • वह समाज के दूसरे लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी अनुभव करता है।
  • वह सबके साथ सहयोग और सहनशीलता से रहता है।
  • उसका व्यवहार आनन्ददायक होता है।
  • वह आस-पास के लोगों से प्रेम से मिलता है।

मानसिक स्वास्थ्य के बिना सामाजिक स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त करना असम्भव है। उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति अपनी परेशानियों से चिन्ताग्रस्त और तनावयुक्त है, तो वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम नहीं हो सकता। इसी प्रकार प्रायः शारीरिक अस्वस्थता भी सामाजिक स्वस्थता में बाधक होती है। उदाहरणार्थ शारीरिक रोग व्यक्ति को चिड़चिड़ा, मायूस और दूसरों के साथ सामान्य व्यवहार के अयोग्य बना देता है। अपराधी व्यक्ति जैसे चोर, डाकू आदि सामाजिक अस्वस्थता के उदाहरण हैं। उनका व्यवहार समाज द्वारा मान्य नहीं होता इसीलिए उन्हें असामाजिक तत्त्व कहा जाता है।

4. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health): आध्यात्मिक स्वास्थ्य को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अधिकतर नैतिक सिद्धांतों का पालन करता है, जैसे-सच बोलना, भलाई करना, अपने कर्तव्यों का दृढ़ता से पालन करना, दूसरों को दुख न देना आदि। धैर्य और आत्मिक शांति आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं। उन्हें प्रार्थना, चिन्तन और कर्तव्यपरायणता से प्राप्त किया जा सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति परिवार, समाज व देश के लिए सम्पत्ति होता है जबकि अस्वस्थ व्यक्ति एक बोझ।

प्रश्न 3.
उत्तम स्वास्थ्य के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लक्षण (Signs of good health): उत्तम स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि व्यक्ति शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हो। एक उत्तम पोषित व्यक्ति का ही उत्तम स्वास्थ्य हो सकता है। मानव कल्याण के लिए वैज्ञानिक पोषण विज्ञान से सम्बन्धित क्षेत्रों में निरन्तर अनुसंधान, अध्ययन व अन्वेषण कर रहे हैं। इसी के फलस्वरूप व्यक्ति के शरीर की बनावट, सबलता, आयु अवधि तथा मानसिक व व्यावहारिक लक्षणों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, जिनका उल्लेख आगे किया गया है –

1. शारीरिक विकास एवं वृद्धि (Body growth and development) : एन.सी.एच.एस. के अनुसार बच्चों व किशोरों की अपेक्षित ऊँचाई व भार (Expected Height & Weight of Children & Adolescents according to N.C.H.S)
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(क) शारीरिक भार व ऊँचाई (Body weight & height): किसी भी व्यक्ति के शारीरिक भार व ऊँचाई को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में से उत्तम पोषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है तो उसका शरीर भार एवं ऊँचाई सामान्य स्तर से कम रह जाता है।

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इसी प्रकार अत्यधिक पोषण भी व्यक्ति के लिए अत्यन्त हानिकारक है क्योंकि इससे शारीरिक भार सामान्य स्तर से अधिक होने के कारण मोटापा आ जाता है। तालिका में विभिन्न आयु वर्गों के लिए सामान्य शरीर भार एवं ऊँचाई का उल्लेख किया गया है। आप इस तालिका की सहायता से अपने शरीर का भार व ऊँचाई की तुलना सामान्य स्तर से करके अपने स्वास्थ्य की दशा ज्ञात कर सकते हैं तथा प्रयत्न करके अपने शरीर के भार को सामान्य स्तर में रख सकते हैं।

(ख) अस्थियों का ढाँचा (Skeletal system): एक स्वस्थ व्यक्ति की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। भोजन में उपस्थित कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन डी हड्डियों का कैल्सीकरण करके उन्हें .मजबूत बनाते हैं। अतः एक सुपोषित स्वस्थ व्यक्ति का डील-डौल प्रभावित होता है। उसका सिर तना हुआ, छाती चौड़ी व उठी हुई, कन्धे सपाट व पेट अन्दर होता है।

(ग) त्वचा (Skin): स्वस्थ व्यक्ति की.त्वचा मुलायम व चमकीली होती है। बाहरी त्वचा के नीचे की तह की मोटाई से पोषण की स्थिति ज्ञात हो जाती है। इस निचली तह की मोटाई वसा के कारण होती है। जब व्यक्ति को उपयुक्त मात्रा में भोजन नहीं मिलता तब यह वसा जल कर उसे ऊर्जा प्रदान करती है और यह निचली तह पतली होती जाती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण करता है तो वसा त्वचा की निचली तह में चर्बी के रूप में जम जाती है।

(घ) मांसपेशियां (Muscles): एक स्वस्थ व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित व सुगठित होती हैं। उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती तथा ढीली पड़ जाती हैं।

(ङ) रक्त (Blood): भोजन में उपस्थित पोषक तत्त्व पाचन के पश्चात् रक्त में अवशोषित होते हैं तथा रक्त ही इन पोषक तत्त्वों को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाकर उनका पोषण करता है। अतः रक्त में उपस्थित पोषक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर किसी भी व्यक्ति के पोषण स्तर तथा स्वास्थ्य स्तर का पता लगाया जा सकता है। शरीर पोषण के अतिरिक्त व्यक्ति के फेफड़ों से ऑक्सीजन लेने तथा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने का कार्य रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

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एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति में सामान्यतः लगभग 1214 ग्राम हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) प्रति 100 मिली रक्त में होता है। उससे कम हीमोग्लोबिन की मात्रा अस्वस्थता का प्रतीक है जिससे व्यक्ति को जल्दी थकावट आती है और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। सारांश में एक स्वस्थ व्यक्ति (जिसका पोषण स्तर बाल्यावस्था से ही उचित रहा हो) का पूर्ण विकसित अस्थि कंकाल, टांगें व बाँहें सुडौल, दाँत सुन्दर व सुदृढ, त्वचा चिकनी तथा मांसपेशियां ठोस व सबल होती हैं।

2. शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता (Physical efficiency and capability): अनुसंधानों एवं प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पोषण का प्रत्यक्ष प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता पर पड़ता है। अमेरिका में कुछ सैनिकों को सीमित आहार देने पर ज्ञात हुआ कि उनकी कार्यक्षमता बहुत कम हो गयी है। इसी प्रकार एक कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के प्रात:कालीन नाश्ते का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि सन्तुलित प्रात:कालीन नाश्ता खाने वाले मजदूरों की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता अन्य मजदूरों की अपेक्षा अधिक है।

3. मानसिक स्थिरचित्तता (Constant mental tension): उत्तम स्वास्थ्य का मनुष्य के व्यवहार से सीधा सम्बन्ध है। एक अस्वस्थ व्यक्ति प्रायः उदांस, अधीर, चिड़िचिड़ा, खिन्न व हठी होता है तथा वह किसी भी कार्य में रुचि नहीं लेता है और उसकी संकल्प-शक्ति भी कम हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों के भोजन में सुधार लाने पर. उनका व्यवहार धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है। बच्चों में अस्थिर चित्त, अधीरता व उदण्डता का कारण भी अस्वस्थता है। एक स्वस्थ बच्चा अधिक सतर्क, क्रियाशील तथा उत्साही होता है। अनुसंधानों द्वारा व्यक्ति के मानसिंक . सन्तुलन में विटामिनों की भूमिका का अत्यधिक महत्त्व सिद्ध हुआ है।

4. मानसिक संलग्नता (Mental concentration): किसी भी बच्चे की मानसिक क्षमता अथवा बुद्धि उसकी अनुवांशिकता पर निर्भर करती है परन्तु उसका मानसिक विकास पूर्ण रूप से हो यह उसके पोषण पर निर्भर करता है। जिन बच्चों को उचित आहार नहीं मिलता वह अपनी पढ़ाई पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं, वे अधिक समय तक एकाग्रचित नहीं रह सकते हैं और मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते हैं। अध्ययनों द्वारा यह पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुका है कि उचित पोषण का प्रभाव बच्चों की पढ़ाई पर सर्वाधिक पड़ता है। एक स्वस्थ बच्चा एकाग्रचित होकर पढ़ाई में पूर्ण रुचि लेता है।

5. मृत्यु आंकड़े व दीर्घ आयु (Death rate & Longivity): यदि सम्पन्न देशों के मृत्यु आंकड़ों एवं आयु की तुलना विकासशील देशों से की जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उत्तम स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध दीर्घ आयु व मृत्यु-दर में कमी से है। भारत में भी माता व शिशु को पौष्टिक आहार मिलने से मातृ व शिशु मृत्यु-दर में कमी आई है तथा आयु अवधि में बढ़ोतरी हुई है। प्रौढ़ व्यक्तियों के जीवन का अकाल अन्त बहुधा हृदय सम्बन्धी रोगों के कारण होता है जिसका सीधा सम्बन्ध आहार से है क्योंकि अधिक कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन करने से धमनियों में धीरे-धीरे विकार आने लगते हैं जिसके कारण हृदय की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 4.
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के अतिरिक्त स्वास्थ्य पर और किन बातों का प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के महत्त्व के बारे में तुम्हें पूर्ण जानकारी हो गई है परन्तु पौष्टिक भोजन के साथ-साथ निम्नलिखित बातें भी हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं –
1. शुद्ध वायु (Fresh Air): अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुद्ध वायु में श्वास लेना अति आवश्यक है। वायु में कार्बनिक पदार्थ व विषैली गैसों जैसे कार्बनडाइ ऑक्साइड (Carbon dioxide), कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon Mono-oxide), मीथेन (Methane), हाइड्रोजन सल्फाइड (Hydrogen Sulphide) आदि की मात्रा कम से कम तथा ऑक्सीन (Oxygen) की मात्रा लगभग 20.96 प्रतिशत तक होनी चाहिए। यदि वायु में कार्बनिक पदार्थों व विपैली गैसों की मात्रा अधिक होती है तो व्यक्ति को सिरदर्द, बदनदर्द, आलस्य व थकावट की शिकायत होती है। अशुद्ध वायु जिसमें मिट्टी के कणों व रोग के जीवाणुओं की अधिकता.होती है, में सांस लेने से व्यक्ति कई रोगों से ग्रस्त हो सकता है।

2. शुद्ध जल (Fresh Water): हमारे देश में पीने के लिए जल विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त किया जाता है, जैसे-तालाब, कुएँ, नदियाँ, नलकूप, नल आदि । जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ तथा रोगाणु पाए जाते हैं जिनके द्वारा व्यक्ति को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। अतः हमें इस वात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जल चाहे किसी भी स्रोत द्वारा लिया जाए स्वच्छ तथा. रोगाणुरहित हो।

3. व्यक्तिगत एवं वातावरण की स्वच्छता (Personal & Environmental sanitation): प्रकृति में रोग उत्पन्न करने वाले अनेक जातियों के सूक्ष्म रोगाणु होते हैं जो अंधेरी जगह, नमी तथा गन्दगी में शीघ्रता से बढ़ते हैं और विभिन्न माध्यमों द्वारा संक्रमण फैलाते हैं। अतः गन्दगी के कारण मनुष्य अनेक रोगों का शिकार हो सकता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ वातावरण की स्वच्छता का भी पूर्ण ध्यान रखना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercise): अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन अपनी आयु, कार्य व निजी आवश्यकतानुसार शुद्ध वायु में नियमित रूप से व्यायाम करना आवश्यक है क्योंकि व्यायाम द्वारा फेफड़ों में शुद्ध वायु पहुँचती है, रक्त परिसंचरण की गति तेज होती है, जिससे विभिन्न अंगों में पोषक तत्त्व तीव्रता से पहुंचते हैं और व्यर्थ पदार्थों का निष्कासन भी तीव्रता से होता है।

5. नियमित विश्राम व निद्रा (Regular Rest & Sleep): दैनिक कार्यों से होने वाली थकावट को दूर करने तथा दोबारा कार्य करने के लिए ऊर्जा अर्जित करने के लिए उचित मात्रा में विश्राम व निद्रा आवश्यक है क्योंकि इन अवस्थाओं में शरीर में होने वाले मरम्मत के कार्य सुचारु रूप से होते हैं। यही कारण है कि बच्चों, बूढों व कमजोर व्यक्तियों को अधिक विश्राम व निद्रा की आवश्यकता होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 6 घण्टे से 8 घण्टे तक की नियमित निद्रा आवश्यक है। इसके विपरीत आवश्यकता से अधिक विश्राम व निद्रा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

6. रोगों से रक्षा (Protection against diseases): प्राय: देखा गया है कि हम चाहे अपने स्वास्थ्य का कितना भी ध्यान रखें फिर भी कोई न कोई रोग हमें घेर लेता है। अतः रोगों जैसे तपेदिक, हैजा, टाइफाइड, पोलियो आदि से बचने के लिए बच्चों को नियमित रूप से टीके लगवाकर रोगों से रक्षा प्रदान करनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

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प्रश्न 1.
विकासवादी परिप्रेक्ष्य व्यवहार के जैविक आधार का किस प्रकार व्याख्या करता है।
उत्तर:
संसार में जीवों की करोड़ों विभिन्न प्रजातियाँ हैं जो अपने पूर्ववर्ती प्रारूपों से आज के रूप में विकसित हुई हैं। जैविकीय परिवर्तन किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है। जीवों में व्यवहारात्मक परिवर्तन इतना मंद होते हैं कि सैकड़ों पीढ़ियों के बाद ही दिखाई पड़ता है।

आधुनिक मानवों के तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण उन्हें अपने पूर्वजों से अलग करते हैं –

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क जिसमें संज्ञानात्मक व्यवहार (प्रत्यक्षण, स्मृति, तर्कन) तथा भाषा के उपयोग करने की क्षमता का पाया जाना।
  2. काम करने योग्य विपरी अंगूठे के साथ मुक्त हाथ रखने वाला प्राणी बन जाना। मानव का व्यवहार बहुत जटिल और विकसित होता है। मस्तिष्क का वजन हमारे शरीर के सम्पूर्ण वजन का 2.35 प्रतिशत होता है जो सर्वाधिक होता है। मनुष्य का प्रमस्तिष्क के अन्य भागों से अधिक विकसित होता है।

हमारे व्यवहार को प्रभावित करने शारीरिक संरचना के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति अनुकूलन और आनुवंशिकता का सामूहिक योगदान रहता है। आहार जुटाने की योग्यता, पूरे परिवार की सुरक्षा, परभक्षों को अपने से अलग रखने की प्रवृत्ति जैसे अनेक प्रक्रियाएँ एवं विधियाँ हैं जो जीवों के व्यवहार को बदलने का कारण बने हुए हैं। जीवों के व्यवहार में अन्तर लाने का कार्य मुख्यत: पर्यावरण और जीन की योग्यता से करते रहता है। जीन के माध्यम से व्यवहार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवर्तन होता रहता है।

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प्रश्न 2.
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को किस प्रकार संचारित करती हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को विद्युत संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य निपुणता के साथ पूरा करती है। ये संबंधित अंगों के माध्यम से सूचना प्राप्त करके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है जो प्राप्त सूचना को पेशीय अंगों तक ले जाती है।

तंत्रिका तंत्र के प्रमुख घटक पार्श्व तंतु विद्युत रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं और प्राप्त संकेतों को दूसरे घटक काय कोशिका में भेज देते हैं। अक्ष तंतु के अंतिम सिरे पर स्थित अंतस्थ वहन प्राप्त संकेतों को अन्य ग्रन्थियों और मांसपेशियों को दे देते हैं। पेशीय तंत्रिका स्नायविक आदेशों का संवहन करती है।
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चित्र: तंत्रिका कोशिका की संरचना
अर्थांत तंत्रिका तंत्र में सूचनाएं तंत्रिका आवेगा के रूप में प्रवाहित होती है जो उपिहक ऊर्ज के रूप में ग्राहकों तक पहुंचती है

प्रश्न 3.
प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के चार पालियों के नाम बताइये। ये क्या कार्य करते हैं?
उत्तर:
मस्तिष्क के चार प्रमुख भागों में से एक प्रमस्तिष्क कहलाने वाले भाग को प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के नाम से भी समझा जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट सभी उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों (अवधान, प्रत्यक्षण, अधिगम, स्मृति, भाषा-व्यवहार, तर्कना, समस्या समाधान) को नियमित करने का कार्य करता है।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की संरचना को चार मुख्य पालियों में बाँटा जा सकता है –

  1. ललाट या अग्र पालि
  2. पाश्विक या मध्य पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्वकपाल पालि

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की चार पालियों के कार्य भिन्न माने जाते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

1. ललाट अथवा अग्र पालि-ललाट पालि मुख्यतः
संज्ञानात्मक कार्यों (चिंतन, स्मृति, तर्कना, अधिगम, अवधान आदि) में सहायता करता है। किन्तु स्वायत्त और संवेगात्मक अनुक्रियाओं पर अवरोधात्मक प्रभाव डालता है।

2. पार्श्विक पालि या मध्य पालि:
पार्श्विक पालि त्वचीय संवेदनाओं और उनका चाक्षुष और श्रवण संवेदनाओं के साथ समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है। अर्थात् गर्मी, ठंढक, ददे आदि की अनुभूति इसी पालि पर आधारित होता है।
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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

3. शंख पालि:
शंख पालि का सीधा संबंध श्रवणात्मक सूचनाओं से होता है। प्रतीकात्मक शब्दों तथा भिन्न-भिन्न ध्वनियों का सही अर्थ समझने का कार्य शंख पालि का ही है। यह लिखित भाषा और वाणी का अर्थ समझने में निपुण होता है। अर्थात् शंख पालि के द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

4. पश्च कपाल पालि या पृष्ठ पालि:
पश्च कपाल पालि मुख्यतः चाक्षुष सूचनाओं से संबद्ध रहता है। इसी पालि के द्वारा चाक्षुष आवेगों की व्याख्या, चाक्षुष उद्दीपकों की स्मृत्ति और रंग चाक्षुष उन्मुखता आदि सम्पन्न की जा सकती है। इसके नष्ट होने से अंधापन का भय उत्पन्न हो जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के प्रमुख पालियों के कार्य को कार चलाने के उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। कार चलाते समय बालक पश्च कपाल की सहायता से सड़क और अन्य गाड़ियों को देखता है, शंख पालि की मदद से हार्न या सचेतक की ध्वनि को सुन लेता है।

पार्श्विक पालि की सहायता से चालक गाड़ी को नियंत्रित रखने के लिए पेशीय क्रियाकलाप करता है। गाड़ी को रोकना या ओवरटेक करना आदि जैसे निर्णय के लिए ललाट पालि की मदद लेता है। इस तरह माना जा सकता है कि मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित होते हैं। प्रत्येक पालि की अपनी विशिष्ट कार्य-क्षमता होती है।

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प्रश्न 4.
विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियों और उनसे निकलने वाले अन्तःस्त्रावों के नाम बताएँ। अंतःस्त्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (नलिकाविहीन ग्रन्थियों) के नाम तथा उनसे निकलने वाले अन्तःस्रावों के नाम क्रमानुसार अंकित किए गए हैं –
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अन्तःस्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं – पीयूष ग्रंथि मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को प्रभावित करके हमें व्यवहार में अन्तर लाने को बाध्य कर देते हैं। अवटु ग्रंथि से निकलने वाला थाइरॉक्सिन नामक हॉर्मोन शरीर में चयापचय की दर को प्रभावित करता है जिसके कारण ऊर्जा का उत्पादन होता है। इसकी सक्रियता बढ़ जाती है। इसके विपरीत थाइरॉक्सिन की कमी से शारीरिक और मानसिक सुस्ती आ जाती है। अधिवृक्क ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोनों के कारण तंत्रिका तंत्र के प्रकार्यों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह अधश्चेतक को उद्दीप्त करते हैं जिससे व्यक्ति का संवेग घटता बढ़ता –
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चित्र: मुख्य अंतःस्त्रावी ग्रंथियाँ
अग्नाशय से निकलनेवाले इन्सुलिन में यह क्षमता होती है कि वह भूख और दर्द से निश्चित रखकर खुश रहने की प्रवृत्ति जगाता है। इसके विपरीत मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति इन्सुलिन के उपयोग में गड़बड़ी को मुख्य कारण मानता है। जनन ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोन के कारण हमारा व्यवहार उत्तेजित तथा आक्रामक हो जाता है। हमारे व्यवहार में सुन्दर, समर्थ एवं विकसित व्यक्ति कहलाने के लिए कृत्रिम प्रदर्शन के द्वारा आकर्षन उत्पन्न करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

सभी अन्तःस्रावों का सामान्य प्रकार्य हमारे व्यवहारपरक कल्याण के लिए निर्णायक होता है। शरीर का आंतरिक संतुलन बनाये रखने के लिए हमारे व्यवहार को दवाब मुक्त, भय मुक्त, विकसित रखने में हमारी सहायता करता है। सारांशतः अंतःस्रावी ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के चलते हम अपने व्यवहार पर मानसिक असंतुलन उत्तेजना, भूख, रक्तचाप, उदासीनता, संवेग, सक्रियता, मोटापन, बेचैनी, चिन्ता आदि प्रभावकारी कारकों का कुप्रभाव नहीं पड़ने देते हैं और इस सर्वप्रिय व्यवहार के प्रदर्शन के योग्य बने रहते हैं।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र किस प्रकार आपातकालीन स्थितियों में कार्य-व्यवहार में हमारी सहायता करता है?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति में हम भय, अनहोनी, अशांति, दुर्घटना आदि के प्रभाव के कारण अव्यवस्थित हो जाते हैं। हमारी शारीरिक क्रिया स्वाभाविक कार्य नहीं कर पाती है और हम कई रोग अथवा विषमताओं के चक्कर में पड़ जाते हैं। ज्ञात है कि स्वायत्त तंत्र, जो तंत्रिका तंत्र का एक प्रमुख घटक होता है, उन क्रियाओं का संचालन करता है जिनपर हमारे प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होते हैं। जैसे, सॉस लेना, रक्त संचार, लार स्राव, उदर संकुचन और प्रायोगिक प्रतिक्रियाओं का नियंत्रण हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है। आपातकाल में तेजी से हृदय का धड़कना, कई वीभत्स घटनाओं को देखना, रक्तचाप का बढ़ जाना, मुँह सूखना, भूख न लगना, बार-बार प्यास लगना, चिड़चिड़ापन का बढ़ जाना जैसी अस्वाभाविक स्थितियाँ आ जाती हैं।

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐसी स्थिति में अपनी स्वाभाविक वृत्ति को छोड़कर हमारी सहायता करते हैं। अधिक ऊर्जा का संचार करके, अनुकंपी तंत्र की सक्रियता को कम करके, पाचन-क्रिया की गड़बड़ी को सुधार कर प्रभावित व्यक्ति को शांत कर उसे सामान्य स्थिति में लाता है। स्वायत्त तंत्रिका के दोनों प्रमुख खण्ड-अनुकम्पी और परानुकम्पी खण्ड अपने विपरीत प्रभाव की प्रवृत्ति को छोड़कर मानवीय व्यवहार में संतुलन बनाये रखने के लिए मिल-जुलकर कार्य करने लगते हैं। स्वायत्त तंत्र के दोनों खण्डों के सामूहिक प्रयास से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सभी शारीरिक क्रियाएँ (हृदय गति, श्वास गति, रक्तचाप, रक्त की संरचना) आदि सामान्य स्तर में आ जाती है। अर्थात् स्वायत्त् तंत्र की सक्रियता से प्रबल और त्वरित कार्यवाही के माध्यम से प्रभावित व्यक्ति परिस्थिति से जूझने की क्षमता बढ़ा पाता है।

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प्रश्न 6.
संस्कृति का क्या अर्थ है? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति का सामान्य अर्थ एक विशिष्ट अवधारणा मानी जाती है जहाँ अच्छे व्यवहार या आचरण करने वाले को सुसंस्कृत कहा जाता है। संस्कृति का सही अर्थ जानने के लिए भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने-अपने तरह से संस्कृति को परिभाषित किया है जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत हैं –

1. वूम और सेल्जनिक:
समाज में संस्कृति का अर्थ मनुष्य की सामाजिक विरासत से लिया जाता है जिसमें सभी प्रकार के ज्ञान, विश्वास, प्रथाएँ एवं प्रथा आती हैं जिसे व्यक्ति समाज के एक सदस्य के रूप में ग्रहण करता है। आज संस्कृति लोगों की जीवन-शैली के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसे परम्परा की धरोहर के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किए जाते रहे हैं।

2. टॉयलर (Taylor):
“संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, आचार, कानून, प्रथा तथा ऐसी ही अन्य क्षमताओं और आदतों का समावेश रहता है जिसे मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है।” टॉयलर की इस परिभाषा में भौतिक तत्वों को संस्कृति में शामिल नहीं किया गया है। आज के मानवशास्त्रियों ने संस्कृति में भौतिक तत्वों को भी शामिल किया है।

3. पिडिंग्टन (R. Piddington):
“मानव संस्कृति उन भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों का संपूर्ण योग है जिसके द्वारा मानव अपनी जैविकीय और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और साथ ही अपने को पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।” पिडिंग्टन की इस परिभाषा में –

  • भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों को संस्कृति का अंग माना गया है।
  • मनुष्य संस्कृति के माध्यम से अपने को पर्यावरण (Environment) के अनुकूल बनाता है।
  • संस्कृति के तत्वों को मनुष्यमात्र की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन माना गया है।

4. डॉ. श्यामचरण दूबे:
प्रसिद्ध भारतीय विद्वान डॉ. दूबे के शब्दों में, “सीखे हुए व्यवहार-प्रकारों की उस समग्रता को जो किसी समूह को विशिष्टता प्रदान करती है, संस्कृति की संज्ञा दी जा सकती है। दूसरे शब्दों में, किसी समूह के ऐतिहासिक विकास में जीवन-यापन के जो विशिष्ट स्वरूप विकसित होते हैं, वे ही उस समूह की संस्कृति हैं।” पिडिंग्टन तथा दूबे के अनुसार मानव द्वारा निर्मित सभी भौतिक एवं अभौतिक वस्तुएँ संस्कृति में आती हैं।

5. रॉबर्ट बीयस्टेंड (Robert Bierstedt):
“संस्कृति एक जटिल समग्रता (the com plex whole) है जिसमें उन सभी चीजों का समावेश हैं जिनपर हम सोचते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते उन्हें अपने पास रखते हैं।”

6. हस्कोविट्स (Herskovits):
“संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित व्यवहार है।”

7. मेकाइवर तथा पेज (Maclver and Page):
मेकाइवर तथा पेज ने संस्कृति को सभ्यता से अलग माना है। उनका कहना है कि “हमारी संस्कृति वही है जो हम हैं और हम प्रयोग करते हैं, वही हमारी सभ्यता है” (Our culture is what we are, our civilization is what we use)। उन्होंने कलम, घड़ी, टाइपराइटर मशीन आदि को सभ्यता माना है जबकि ज्ञान, नैतिक आचार शास्त्र, कला, धर्म आदि को संस्कृति का तत्व स्वीकार किया है।

संस्कृति की विशेषताएँ:
संस्कृति के सम्बन्ध में प्राप्त अवधारणों तथा अनेक परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के सम्बन्ध में कुछ विशिष्ट विशेषताओं की संभावना मिलती है जो इस प्रकार व्यक्त किये जा सकते हैं –

  1. संस्कृति उन लोगों के व्यवहारात्मक उत्पादों को सम्मिलित करती है जो हमसे पहले आ चुके हैं। अर्थात् जैसे ही हम जीवन प्रारम्भ करते हैं, संस्कृति वहाँ पहले से ही उपस्थित होती है।
  2. संस्कृति एक जीवन-पद्धति है जो किसी निश्चित परिवेश में रहने वाले लोगों द्वारा अपनाई जाती है।
  3. संस्कृति को कुछ प्रतीकों में अभिव्यक्त अर्थों के रूप में समझा जाता है जो कि ऐतिहासिक रूप से लोगों में संचालित होते हैं।
  4. संस्कृति समय, स्थान, पर्यावरण और परिस्थिति के कारण भिन्नता बनाए रह सकती है।
  5. संस्कृति एक समाज से दूसरे समाज के मनुष्यों के व्यवहारों का निरूपण करती है।

इन विशेषताओं को स्पष्टतः व्यक्त करने के उपरान्त निम्न विशेषताओं को भी व्यक्त किए जा सकते हैं –

1. संस्कृति सीखे हुए आचरणों का नाम है:
जैसे-अभिवादन, गायन, वस्त्र पहनना, नृत्य करना आदि सीखे हुए आचरण कहलायेंगे; क्योंकि हम इन्हें समाज से सीखते हैं। गैर सीखे हुए आचरण वे कहलायेंगे जो कि स्वाभाविक प्रवृत्ति से सम्बन्धित होते हैं। जैसे-रोना, क्रोध करना आदि। समस्त सीखे हुए आचरण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं; जैसे कि गुरु-शिष्य का आचरण, मालिक-मजदूर का आचरण आदि और इन्हीं के आध पर पर हम आचरणों के प्रतिमान निर्धारित करते हैं, जैसे-बच्चों का आचरण, स्त्रियों का आचरण, शिष्यों का आचरण इत्यादि।

2. संस्कृति के छिपे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप होते हैं:
किसी भी व्यक्ति के आचरण का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता है वरन् इनका महत्त्व अन्य लोगों के सम्बन्धों में’ ही होता है। एक आचरण अन्य आचरणों से भी सम्बन्धित होता है। हर व्यक्ति के आंचरण निर्धारित हो जाने पर समाज तथा उनकी संस्कृति उससे यह आशा करती है कि वह उसी के अनुसार आचरण करें। इसी के आधार पर उनके आचरणों का नामांकन होता है। जैसे कि बच्चों की तरह आचरण करने वाले युवक के कार्यों को बचकाना आचरण कहा जायगा। कुछ विशेष आचरण तथा संस्कृति द्वारा स्त्री तथा पुरुषों के लिए निर्धारित किये गये हैं। यदि कोई पुरुष स्त्रियो के अनुसार आचरण करते हैं तो उसे जनाना आचरण कहते हैं।

3. संस्कृति प्रतिमान आदर्शात्मक होते हैं:
भला-बुरा, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, विचार की शिक्षा छोटे को बड़े से मिलती है। उचित-अनुचित की धारणा परिणाम पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के कार्य का परिणाम यदि अच्छा होता है तो मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार जनरीति, प्रथा, परम्परा, संस्था का रूप लेकर वह विचार संस्कृति का अंग बन जाता है।

4. संस्कृति के प्रतिमान भौतिक एवं अभौतिक दोनों ही होते हैं:
वस्तुवादी चीजें भौतिकवादी प्रतिमान में आयेंगी और विचारवादी सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली अभौतिक प्रतिमान में आयेंगी। इस प्रकार से रेडियो, टेलीविजन के आचरण, विचार, प्रथा, परम्परा आदि वस्तुएँ अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत आयेंगी, क्योंकि ये निराकार होती हैं।

5. सार्वभौमिक स्वीकृति:
कोई भी आचरण संस्कृति का अंग तभी कहलाता है जबकि पर्याप्त लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं।

6. व्यवहार के प्रतिमान हस्तांतरति होते हैं:
एक पीढ़ी अपने आचरण दूसरी पीढ़ी को सिखाती है और युग-युग से यह हस्तांतरण चल रहा है। माता-पिता, वयोवृद्धों तथा शिक्षकों के माध्यम से अभौतिक, भौतिक संस्कृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं।

7. संस्कृति का स्वरूप हमेशा परिवर्तनशील होता है:
संस्कृति समाज तथा व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम है। इसलिये यह हमेशा परिवर्तनशील होती है।

8. संस्कृति सामाजिक है:
संस्कृति सामाजिक है; क्योंकि व्यक्ति समूह के बाहर किसी भी प्रकार की सृष्टि नहीं कर सकता। यह समूह का आदर्शात्मक गुण होता है, व्यक्ति उसे अपनाने का प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 7.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि “जैविक कारक हमें समर्थ बनाने की भूमिका निभाती है जबकि व्यवहार के विशिष्ट पहलू सांस्कृतिक कारकों से जुड़े हैं।” अपने उत्तर के समर्थन के लिए कारण दीजिए।
उत्तर:
दिये गये कथन में सच्चाई है, क्योंकि जैवकीय उत्तराधिकारी जीन के माध्यम से घटित होते हैं जबकि सांस्कृतिक उत्तराधिकार पर्यावरण की भिन्न-भिन्न घटनाओं के कारण उत्पन्न होता है। जैविक कारक प्रकृति प्रदत्त होते हैं जबकि व्यवहार को परिवेश के आधार पर कृत्रिम दशा में उपलब्ध किया जाता है। जैविक कारक मनुष्य को ही नहीं बल्कि सभी जीवों को भी जीवन-संबंधी क्रियाकलाप (सांस लेना, भोजन खोजना, स्वयं को सुरक्षित रखना, स्वतंत्र एवं न्यायपूर्ण जीवन जीना) के प्रति समर्थ बनाता है।

सभी जीवों में माता-पिता से मिले जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक बनने का अवसर मिलता है तथा वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के प्रति स्वयं को समर्थ बना पाता है। जीन के रूप में प्राप्त होने वाले गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व के रूप में सहयोग करता है। गुणसूत्र के माध्यम से जीनोटाइप और फीनोटाइप जैसे लक्षण प्रकट होते हैं तथा जैविक कारक में सुरक्षा सम्बन्धी गुण उत्पन्न हो जाते हैं। इस तरह माना जा सकता है कि जैविक कारकों को उपलब्ध सामर्थ्य आनुवंशिक कारणों से संभव होते हैं।

सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव में जीवन अनुकूलन के लिए अपने व्यवहार में परिस्थिति के अनुसार अन्तर उत्पन्न कर लेता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखकर काम व्यवहार सम्बन्धी नियमों, मूल्यों तथा कानूनों की रचना कर परिवेश में अनुकूल परिवर्तन लाने का प्रयास करते रहते हैं। पर्यावरण के विभिन्न घटकों से प्रभावित होकर जीवन अपनी जीव-पद्धति को बदलकर जीने का प्रयास करता है।

मानव का स्वभाव प्राकृतिक दशा के अधीन होती है जबकि शारीरिक क्षमता उसे बचपन से ही उपलब्ध रहती है। माँ-बाप की क्षमता, पालन-पोषण के लिए प्रयुक्त विधि और साधन जीवों को समर्थ बनाता है जो स्वाभाविक वृत्ति मानी जाती है। व्यवहार एक कृत्रिम प्रक्रिया होती है जो परिस्थितिवश उदंड, नम्र, सर्वप्रिय, कटु, किसी श्रेणी में रूपान्तरित हो सकता है।

प्रश्न 8.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज के हित में किये जाने वाले कार्य – विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारक कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

1. माता-पिता:
बालक के विकास पर सबसे अधिक प्रत्यक्ष और महत्त्वपूर्ण प्रभाव माता-पिता का पड़ता है। वे विभिन्न स्थितियों में माता-पिता के प्रति भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं। माता-पिता उनके कुछ व्यवहारों को, शाब्दिक रूप से पुरस्कृत करके जैसे-प्रशंसा करना या अन्य मूर्त तरह से पुरस्कृत करके जैसे-चॉकलेट, खिलौने या बच्चे की पसंद की वस्तु खरीदना प्रोत्साहित करते हैं। वे कुछ अन्य व्यवहारों का अनुमोदन करके, निरुत्साहित करते हैं। वे बच्चों को भिन्न प्रकार की स्थितियों में रखके उन्हें विध्यात्मक अनुभव, सीखने के अवसर और चुनौतियाँ प्रदान करते हैं।

बच्चों से अन्योन्यक्रिया करते समय माता-पिता विभिन्न युक्तियाँ अपनाते हैं जिन्हें पैतृक शैली कहा जाता है। माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति व्यवहारों में स्वीकृति और नियंत्रण की हद के विषय में बहुत भिन्नताएँ होती हैं। माता-पिता अपने बच्चों को समाजीकृत करने के लिए जो शैली अपनाते हैं वे उनकी आर्थिक दशा, स्वास्थ्य, कार्य-दबाव, परिवार का स्वरूप आदि से प्रभावित होते हैं। दादा-दादी एवं नाना-नानी के समीपता तथा सामाजिक संबंधों का ढाँचा, बच्चे के समाजीकरण में प्रत्यक्षतः या माता-पिता के माध्यम से बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।

2. विद्यालय:
बच्चे विद्यालय में लंबा समय व्यतीत करते हैं, जो उन्हें अपने शिक्षकों और समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया करने का एक सुसंगठित ढाँचा प्रदान करता है। विद्यालय में बच्चे न केवल संज्ञानात्मक कौशल जैसे-पढ़ना, लिखना, गणित को करना ही नहीं सीखते हैं बल्कि बहुत से सामाजिक कौशल जैसे-बड़ों तथा समवयस्कों के साथ व्यवहार करने के ढंग, भूमिकाएँ स्वीकारणा, उत्तरदायित्व निभाना भी सीखते हैं।

वे समाज के नियमों और मानकों को भी सीखते हैं और उनका आंतरीकरण भी करते हैं। स्वयं पहल करना, आत्म-नियंत्रण, उत्तरदायित्व लेना और सर्जनात्मकता आदि गुण भी बच्चे विद्यालय में सीखते हैं। ये गुण बच्चे को अधिक आत्मनिर्भर बनाते हैं। वास्तव में, एक अच्छा विद्यालय बच्चे के व्यक्तित्व के पूर्णतया ही रूपांतरण कर सकता है।

3. समसमूह:
समसमूह बच्चे के समाजीकरण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है। यह बच्चों को न केवल दूसरों के साथ होने का अवसर प्रदान करता है बल्कि अपनी उम्र के साथियों के साथ सामूहिक रूप से विभिन्न क्रियाकलापों जैसे-खेल को आयोजित करने का भी अवसर प्रदान करती है। ऐसे गुण; जैसे-सहभाजन, विश्वास, आपसी समझ, भूमिका स्वीकृति एवं निर्वहन भी समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान विकसित होते हैं। बच्चे, अपने दृष्टिकोण को दृढ़तापूर्वक रखना और दूसरों के दृष्टिकोण को स्वीकार करना और उनसे अनुकूलन करना भी सीखते हैं। समसमूह के कारण आत्म-तादाम्य का विकास बहुत सुगम हो जाता है।

4. जनसंचार का प्रभाव:
दूरदर्शन, समाचारपत्रों, पुस्तकों और चलचित्रों के माध्यम से बच्चे बहुत सारी बातें सीखते हैं। किशोर और युवा प्रौढ़ अक्सर इन्हीं में से अपना आदर्श प्राप्त करते हैं, विशेषकर दूरदर्शन और चलचित्रों से। दूरदर्शन और चलचित्रों में दिखाई जानेवाली हिंसा बच्चों में आक्रामक व्यवहार को बढ़ाता है। अतः समाजीकरण के इस कारक को अधिक तरह से उपयोग करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों में अवांछित व्यवहारों के विकास को रोका जा सके।

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प्रश्न 9.
संस्कृतिकरण और समाजीकरण में हम किस प्रकार विभेद कर सकते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संस्कृतिकरण का संदर्भ उन समस्त अधिगमों से है जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सोद्देश्य शिक्षण के होता है जबकि समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति ज्ञान, कौशल और शील गुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज एवं समूहों में प्रभावशाली सदस्यों की तरह भाग लेने में सक्षम बनाती है।

  1. संस्कृतिकरण के मुख्य तत्व प्रेक्षण द्वारा सीखना है जबकि सबसे महत्त्वपूर्ण समाजीकरण कारक माता-पिता, विद्यालय समसमूह, जन-संचार आदि होते हैं।
  2. संस्कृतिकरण के प्रभाव काफी स्पष्ट दिखाई देते है तथापि लोग सामान्यतः इन प्रभावों के प्रति सजग नहीं हो पाते हैं। समाजीकरण के प्रभाव के रूप में माता-पिता का व्यवहार, विद्यालय का कार्यक्रम, सामाजिक जालक्रम का विस्तार, अवांछित व्यवहारों का विकास आदि से जुड़े होते हैं।
  3. संस्कृतिकरण का प्रत्यक्ष विरोधाभास को जन्म देता है जबकि समाजीकरण किसी व्यक्ति में सुरक्षा, देखभाल, पालन-पोषण, योग्यता का विकास आदि को समझने तथा अपनाने का अवसर जुटाता है।
  4. पूर्ववर्ती पीढ़ियों के माध्यम से चीजों का सांस्कृतिक निरूपण किया जाता है जबकि समाजीकरण सदस्यों के व्यवहार, विकास, अनुप्रयोग आदि पर ध्यान देता है।
  5. संस्कृतिकरण पूरी जीवन विस्तृति तक निरन्तर चलती रहती है जबकि समाजीकरण आवश्यकता एवं दशा पर आश्रित होता है।
  6. संस्कृतिकरण एक प्रकार का सजग एवं उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है जबकि समाजीकरण समाजीकृत करने की शक्ति रखता है जो भाषिक व्यवहार के रूप में जाना जाता है।
  7. अर्थात् संस्कृतिकरण और समाजीकरण में विभेद बतलाने के लिए उनकी प्रकृति एवं विशेषताओं (लक्षण एवं प्रभाव) को इंगित करना होता है।

प्रश्न 10.
परसंस्कृति ग्रहण से क्या तात्पर्य है? क्या परसंस्कृति ग्रहण एक निर्बाध प्रक्रिया है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
दो भिन्न संस्कृतियों में से कोई एक जब दूसरी के सम्पर्क में आता है तो सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आना परसंस्कृति ग्रहण के सामान्य धारणा है। अभीष्ट सम्पर्क प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कुछ भी हो सकता है। परसंस्कृति ग्रहण की रूप में नयी संस्कृति में स्थानांतरण अथवा जन-संचार के माध्यमों से होनेवाले में प्रयुक्त माध्यमों में हो सकता है। उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना, प्रशिक्षण, नौकरी या व्यापार के लिए स्थान बदलना ऐच्छिक ग्रहण माना जाता है। औपनिवेशिक अनुभव, आक्रमण या राजनीतिक शरण के द्वारा अनैच्छिक ग्रहण कहलाता है।

परसंस्कृति ग्रहण को स्पष्टतः समझने के लिए कुछ नया सीखने की आवश्यकता हो जाती है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण की स्थिति में कोई व्यक्ति समस्यारहित माना जाता है। इसमें यदा-कदा द्वन्द्व की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

व्यवहार संबंधी ज्ञान की पुनरावृत्ति को जारी रखने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है। इसे परिवर्तन मुक्त भी रखा जा सकता है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण का तात्पर्य दूसरी संस्कृतियों के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए हुए सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों से है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष; ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक किसी भी श्रेणी में रहकर कुछ नया सीखने के लिए बाध्य कर देता है।

दूसरी संस्कृति के लोगों से मिलने पर उसकी संस्कृति को समझना तथा उसके साथ जीवन व्यतीत करने की सही स्थिति का पता लगाना परसंस्कृति ग्रहण की प्रमुख विशेषता है। ब्रिटिश शासनकाल में लोग इसी कारण इसके लक्षणों एवं आदर्शों को ग्रहण करना सरल, सत्य एवं अभीष्ट माना गया। इस प्रकार ब्रिटिश संस्कृति के साथ रह जाने से उसकी जीवन-शैली संबंधी प्रेक्षण किया जाता है।

परसंस्कृति ग्रहण की व्याख्या पर्यावरण को रूपान्तरित करना होता है। यह निर्बाध प्रतिक्रिया को नकारते हुए किसी के जीवन में किसी भी समय घटित हो सकती है। यह जब कभी भी घटित होता है तब इसमें मानकों, मूल्यों, गुणों और व्यवहार के प्रारूपों को पुनः सीखना होता है। इसकी सफल-व्याख्या करने के लिए समाजीकरण की मदद ली जाती है। परिवर्तन की दिशा एवं प्रभाव के बदलने से परसंस्कृति ग्रहण के प्रति समझ भी बदल जाती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

प्रश्न 11.
परसंस्कृतिग्रहण के दौरान लोग किस प्रकार की परसंस्कृतिग्राही युक्तियाँ अपनाते हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
परसंस्कृतिकरण के अवसर पर अक्सर कुछ द्वन्द्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे मुक्ति पाना आवश्यक हो जाता है। अध्ययन से ज्ञात है कि लोगों के पास परसंस्कृतिग्राही परिवर्तन का मार्ग बदल जा सकता है। लोगों के पास परसंस्कृति ग्रहण से संबंधित कई विकल्प होते हैं। परसंस्कृति ग्रहण एक विशिष्ट नैतिक घटना है जिसका अध्ययन आत्मनिष्ठ तथा वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। भाषा, वेशभूषा, जीवन-शैली, जीवन-यापन के साधन, घर का प्रबंध, घर के साधन (आभूषण, फर्नीचर, रेडियो, टी.वी.), यात्रा के अनुभव, चलचित्रों का प्रदर्शन इत्यादि जीवन-यापन में अपनाये जाने वाले परिवर्तनों की सूचना देते हैं।

परिवर्तनों का परीक्षण या अभिवृतियाँ द्वन्द्व की समस्या से छुटकारा दिलाने में समर्थ हैं। इन्हें एक प्रमुख युक्ति माना जाता है। जीवन पद्धति से जुड़े परिवर्तनों के प्रति सजग रहना परसंस्कृति ग्रहण का मार्ग खोल देता है। साथ ही साथ समाकलन, आत्मसात्करण, पृथक्करण तथा सीमांतकरण नामक चार युक्तियों का उपयोग करके परसंस्कृति ग्रहण की संभावना को और अधिक पुष्ट बनाया जा सकता है। समाकलन नामक युक्ति में दो भिन्न संस्कृतियों को समान मूल्य दिया जाता है। आत्म सात्करण नामक युक्ति के द्वारा अपनी सांस्कृतिक अनन्यता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

पृथक्करण:
लोगों को दूसरे सांस्कृतिक समूहों के अन्यान्य क्रिया से बचना चाहिए।

सीमांतकरण:
अनिश्चय की स्थिति में रहने वाले लोग दो तरह के प्रश्नों के उत्तर जानने को उत्सुक रहते हैं।

(क) उन्हें क्या करना चाहिए?
(ख) वे क्यों दयनीय स्थिति में कैसे बने रहते हैं?

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तंत्रिका-कोष सन्धि का परिचय दें।
उत्तर:
किसी सूचना के प्रसारण की स्थिति में तंत्रिका आवेग को संचारित करना होता है। इस प्रक्रिया में एक तंत्रिका कोशिका निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका को संदेश दे देती है। पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अक्ष तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध या तंत्रिका कोष-संधि बनाते हैं।

प्रश्न 2.
तंत्रिका तंतु का क्रमबद्ध प्रतिरूपण एक आरेख के रूप में किस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है।
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र है जिसके प्रमुख अंश अलग-अलग तरह से व्यवस्थित रहकर विभिन्न प्रकार्यों से संलग्न रहते हैं। जैसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कठोर हड्डी के खोल (कपाल) के अन्दर पाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का कार्य ऐच्छिक नियंत्रण से बाहर होता है।

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प्रश्न 3.
परिधीय तंत्रिका तंत्र में क्या पाए जाते हैं?
उत्तर:
परिधीय तंत्रिका तंत्र में वे समस्त तंत्रिका कोशिकाएँ तथा तंत्रिका तंतु पाए जाते हैं जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को पूरे शरीर से जोड़ते हैं। कायिक तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र इसके प्रमुख भाग होते हैं।

प्रश्न 4.
कायिक तंत्रिका तंत्र के तीन प्रमुख हिस्से क्या हैं?
उत्तर:
कायिक अथवा कपालीय तंत्रिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं –

  1. संबेदी: जो संवेदी सूचनाओं का संग्रह करती है।
  2. पेशीय: जो पेशीय आवेगों को सिर के क्षेत्र में पहुँचाती है।
  3. मिश्रित: जो मेरुरज्जू के 31 समुच्चयों के रूप में संवेदी तथा संवहन दो तरह के कार्यों को पूरा करती है।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका के दो खण्ड क्या हैं? उनका तुलनात्मक अध्ययन किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के दो प्रमुख खण्ड हैं –

  1. अनुकम्पी खण्ड तथा
  2. परानुकंपी खण्ड विपरीत प्रभाव डालने वाले दोनों खण्डों का संतुलन बनाये रखने के लिए मिलकर कार्य करने होते हैं। परानुकंपी खण्ड मुख्यतः ऊर्जा के संरक्षण से सम्बद्ध होते हैं। अनुकंपी खण्ड आपातकालीन स्थितियों को नियंत्रित रखता है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र किनकी सहायता से तथा किस प्रकार के कार्य करते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क और मेरुरज्जु की सहायता से समस्त संवेदी सूचनाओं को संगठित करके मांसपेशियों तथा ग्रंथियों को प्रेरक आदेश देने का काम करता है।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात क्या है?
उत्तर:
एक वयस्क मस्तिष्क का भार 1.36 किग्रा होता है तथा इसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। उसकी मानव व्यवहार और विचार को दिशा प्रदान करने की योग्यता आश्चर्यजनक मानी जाती है।

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प्रश्न 8.
तंत्रिक तंत्र को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है-केंद्रीय तंत्रिकातंत्र, स्वचालित तंत्रिकातंत्र एवं परिधीय तंत्रिकातंत्र।

प्रश्न 9.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन भाग होते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को दो भागों में विभाजित किया गया है-सुषुम्ना नाड़ी एवं मस्तिष्क।

प्रश्न 10.
संवेदी तंत्रिकाएँ कहाँ अवस्थित होती हैं तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
संवेदी तंत्रिका शरीर के सभी भागों में स्थित होती है। इसका मुख्य कार्य ज्ञानेन्द्रियों रे स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाना है।

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प्रश्न 11.
गति तंत्रिका कहाँ अवस्थित होती है तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
गति तंत्रिका पूरे शरीर में पायी जाती है। यह मस्तिष्क से उत्पन्न हुए तंत्रिका आवेगों को मस्तिष्क या सुषुम्ना से ग्रहण करके माँसपेशियों, ग्रंथियों तथा शरीर के विभिन्न केन्द्रों तक ले जाने का कार्य करता है।

प्रश्न 12.
मस्तिष्क को किन तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क
  2. मध्य मस्तिष्क तथा
  3. अग्र मस्तिष्क उनके उपभागों के नाम मेडुला, ऑबलांगाटा, सेतु अनुमस्तिष्क आदि होते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी आकस्मिक उद्दीपनों के प्रति संवेदी अंगों के द्वारा अनैच्छिक क्रिया के रूप में प्रकट की जाने वाली प्रतिक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं। जैसे-आँख झपकने की क्रिया।

प्रश्न 14.
साहचर्य तंत्रिका का क्या कार्य है?
उत्तर:
साहचर्य तंत्रिका का स्थान मस्तिष्क में तथा कुछ सुषुम्ना नाड़ी में होता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तंत्रिका से स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके दूसरे साहचर्य तंत्रिका या गति तंत्रिका तक पहुँचाना होता है।

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प्रश्न 15.
अंतःस्रावी ग्रन्थि (Endocrine gland) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर में वैसी ग्रन्थियाँ जिनसे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। ऐसी ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहा जाता है।

प्रश्न 16.
आनुवंशिकता की विशेषताएं बतायें।
उत्तर:
हम अपने माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में पाते हैं। अपने पूर्वजों से प्राप्त उत्तराधिकार में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ मिली रहती हैं। आनुवांशिक तत्व के प्रमुख तत्व गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में उपस्थित रहते हैं। जीन में उत्परिवर्तन की क्षमता होती है।

प्रश्न 17.
हमारे व्यवहार किससे प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
हमारे कई व्यवहार अंत:स्रावों से प्रभावित होते हैं तो कई व्यवहार प्रतिवर्ती अनुक्रियाओं के कारण होते हैं। हालाँकि हार्मोन तथा प्रतिवर्ती हमारे व्यवहार में आनेवाले अन्तरों की स्पष्ट व्याख्या नहीं कर पाती हैं। हमारे व्यवहार पर सांस्कृतिक शक्तियों का प्रभाव भी स्वाभाविक है। मानव काम-व्यवहार अनेक नियमों, मान, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित रहते हैं।

प्रश्न 18.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों की चर्चा करें।
उत्तर:

  1. माता-पिता तथा घर के अन्य सदस्य
  2. विद्यालय
  3. समसमूह
  4. जन-संचार आदि समाजीकरण के प्रमुख कारक माने जाते हैं

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प्रश्न 19.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियों को किन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
परसंस्कृति ग्रहण के मार्ग में लोगों द्वारा जो परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ अपनाई जाती हैं वे हैं –

  1. समाकलन
  2. आत्मसात्करण
  3. पृथक्करण तथा
  4. सीमांतकरण

प्रश्न 20.
अंतःस्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखें।
उत्तर:
अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. थाइरायड ग्रन्थि
  2. पाराथायरायड ग्रंथि
  3. पिट्यूटरी ग्रन्थि
  4. एड्रीनल ग्रन्थि
  5. गोनाड्स (यौन ग्रन्थि)

प्रश्न 21.
लोग शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। क्यों?
उत्तर:
लोगों की विशिष्टताएँ, उनकी आनुवांशिक और पर्यावरण की माँगों के बीच अंतःक्रिया का परिणाम होती है। अर्थात् किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित होती हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जैविकीय परिवर्तन तथा विकास होता रहता है।

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प्रश्न 22.
आधुनिक मानव के किन तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों के कारण वे अपने पूर्वजों से अलग प्रतीत होते हैं?
उत्तर:

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क
  2. दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलने की क्षमता तथा
  3. काम करने योग्य विपरीत अँगूठे के साथ मुक्त हाथ

प्रश्न 23.
हमारे व्यवहार का महत्त्वपूर्ण निर्धारक किसे माना जा सकता है?
उत्तर:
हमारी जैविकीय संरचना, जो हमें हमारे पूर्वजों से एक विकसित शरीर और मस्तिष्क के रूप में प्राप्त हुई है, हमारे व्यवहार का निर्धारक बनकर हमारी सहायता करती है। हम अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर पर्यावरण से समझौता करते हुए जीवन की विकास पथ अग्रसरित करते है।

प्रश्न 24.
तंत्रिका कोशिकाएँ क्या हैं?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई है। ये उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है तथा प्राप्त सूचना को विद्युत रासायनिक संकेतों में बदलकर अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करती है।

प्रश्न 25.
मानव तंत्रिका तंत्र में कितनी कोशिकाएँ हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र में आकार, संरचना एवं कार्य करने की प्रवृत्ति और क्षमता की दृष्टि से भिन्न मानी जानेवाली लगभग बारह अरब तंत्रिका कोशिकाएँ हैं।

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प्रश्न 26.
वे तीन मूलभूत घटक क्या हैं जो तंत्रिका कोशिकाओं में भिन्नता पाई जाने पर भी समान रूप से पाए जाते हैं?
उत्तर:
सभी तंत्रिका कोशिकाओं में समान रूप से पाए जाने वाली तीन घटक हैं –

  1. काय (soma)
  2. पार्श्व तंतु (dendrites) तथा
  3. असतंतु (axon) ये कार्य की दृष्टि से अलग-अलग महत्त्व रखते हैं।

प्रश्न 27.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र में प्रवाहित होने वाली सूचनाओं के परिवर्तित रूप को तंत्रिका आवेग कहते हैं जो उद्दीपक ऊर्जा के सशक्त होने पर ही उत्पन्न होती है। इसकी शक्ति तंत्रिका तंतु के साथ-साथ स्थिर रहती है।

प्रश्न 28.
सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम (All or non law) क्या है?
उत्तर:
जब कोई स्नायु-प्रवाह चलता है अर्थात एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन में जाता है तो अपनी पूरी शक्ति के साथ जाता है, अन्यथा रुक जाता है। इसे ही सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम कहते हैं।

प्रश्न 29.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
नयूरॉन का वह हिस्सा जो तांत्रिक आवेग को दूसरे न्यूरॉन में छोड़ता है, उसे एक्सॉन कहा जाता है।

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प्रश्न 30.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक मस्तिष्क में होती है।

प्रश्न 31.
संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संस्कृति उन प्रतीकात्मक एवं सीखे हुए पक्षों को बिंबित करती है जिसमें भाषा, प्रथा, परम्पराओं आदि का समावेश किया जाता है।

प्रश्न 32.
संस्कृति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है – एक समाज विशेष के सदस्यों के सम्पूर्ण व्यवहार प्रतिमानों और समग्र जीवन विधि को ही संस्कृति कहा जाता है जो सामाजिक विरासत के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है।

प्रश्न 33.
भौतिक संस्कृति क्या है?
उत्तर:
भौतिक संस्कृति का संबंध उन बुनियादी दशाओं से है जिसमें भौतिक वस्तुएँ होती. हैं, जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है तथा जिन्हें देखा जा सकता है।

प्रश्न 34.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम में नियम, अपेक्षाएँ और मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।

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प्रश्न 35.
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम का अभिप्राय मिथकों, अंधविश्वासों, वैज्ञानिक तथ्यकलाओं एवं धर्म से जुड़े हुए विचार हैं।

प्रश्न 36.
समाजीकरण का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक नवजात शिशु जो जन्म के समय न सामाजिक होता है और न असामाजिक, किसी विशिष्ट समाज का क्रियाशील सदस्य बन जाता है जो जन्म के बाद प्रारंभ होता है।

प्रश्न 37.
संस्कृति और मानवीय व्यवहार का क्या संबंध है?
उत्तर:
संस्कृति मनुष्य को विरासत में प्राप्त होती है इसलिये जिस संस्कृति में मनुष्य जीवन-यापन करता है उसी के अनुसार उसका सम्पूर्ण सामाजिक व्यवहार भी हो जाता है। इस पर मनोवैज्ञानिक व्यवहार का प्रभाव अवश्य पड़ता है।

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प्रश्न 38.
संस्कृतिकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संस्कृतिकरण सामाजिक परिवर्तन का एक स्वाभाविक आयाम है। अपनी संस्कृति के सभ्य लोगों के अनुरूप अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन लाने और उनकी संस्कृति के मानदण्डों के अनुरूप व्यवहार करने को संस्कृतिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 39.
आधुनिकीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आधुनिकीकरण मानवीय सामाजिक व्यवहार की एक ऐसी क्रिया है जिसमें मनुष्य आधुनिक विचारों और तकनीक के आधार पर सामाजिक व्यवहार करता है। मनुष्य आधुनिक विचारों से प्रभावित हो जाता है।

प्रश्न 40.
मस्तिष्क को कितने मुख्य भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
मस्तिष्क को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है-पश्च मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क तथा अग्र मस्तिष्क।

प्रश्न 41.
पश्च मस्तिष्क में मस्तिष्क के कौन-कौन से भाग आते हैं?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क के अन्तर्गत मेडुला, सेतु एवं लघु मस्तिष्क आते हैं।

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प्रश्न 42.
मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा कौन होता है?
उत्तर:
मस्तिष्क का सबसे नीचे तथा पीछे सुषुम्ना शीर्ष (Medulla) अवस्थित होते हैं !

प्रश्न 43.
लघु मस्तिष्क का क्या कार्य है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क का सबसे प्रमुख कार्य शारीरिक संतुलन को बनाए रखना होता है।

प्रश्न 44.
लघु मस्तिष्क कितने खण्डों में बँटा होता है तथा इसे मिलाने का कार्य कौन करता है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क दो खण्डों में विभाजित रहता है जिसे मिलाने का काम सेतु करता है।

प्रश्न 45.
मध्य मस्तिष्क को कितने भागों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर:
मध्य मस्तिष्क को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। इसके ऊपरी भाग को रूफ या टेक्टम कोने हैं तथा नीचे का भाग फ्लोर कहलाता है।

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प्रश्न 46.
पश्च मस्तिष्क (Hind brain) तथा मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर क्या कहा जाता है?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क और मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर मस्तिष्क स्तम्भ कहा जाता है।

प्रश्न 47.
किसके द्वारा लघु मस्तिष्क (Cerebelum) तथा प्रमस्तिष्क (Cerebrum) आपस में मिलते हैं?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क तथा प्रमस्तिष्क हाइपोथैलेमस द्वारा आपस में मिलते हैं।

प्रश्न 48.
प्रमस्तिष्क (Cerebrum) में कितने गोलार्द्ध (Hemisphere) होते हैं?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं।

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प्रश्न 49.
संधि-स्थल (Synapse) क्या है?
उत्तर:
जहाँ दो या दो से अधिक तंत्रिकाएं आपस में मिलती हैं उस स्थान को संधि-स्थल कहते हैं।

प्रश्न 50.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई किसे कहा जाता है?
उत्तर:
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन कहा जाता है।

प्रश्न 51.
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से कितनी होती है?
उत्तर:
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से 100 मीटर प्रति सेकेण्ड होती है।

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प्रश्न 52.
थैलेमस का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
थैलेमस का मुख्य कार्य शरीर के विभिन्न भागों से आए हुए स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क में निश्चित स्थान पर भेजना है। इसका संबंध संवेगों से भी होता है।

प्रश्न 53.
न्यूरॉन में शाखिकाएं (Dendrites) कहाँ होती हैं?
उत्तर:
शाखिकाएँ कोश शरीर के चारों तरफ शाखा की तरह फैल जाती हैं। इसका आकार बहुत छोटा होता है तथा इसकी भी कई उप-शाखाएँ होती हैं।

प्रश्न 54.
ऐक्सॉन (Axon) क्या है?
उत्तर:
यह न्यूरॉन का एक पतला लम्ब भाग है। इसका एक छोर कोश शरीर से जुड़ा होता है तथा दूसरे छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिसे एण्डल ब्रम कहते हैं।

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प्रश्न 55.
समाजीकरण की प्रक्रिया जन्मजात होती है या अर्जित?
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया अर्जित होती है, क्योंकि मनुष्य समाज में होनेवाले परिवर्तन के अनुसार अपने-आपको समायोजित करने का प्रयत्न करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक की स्थिति बतावें –
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ
(ख) पार्श्व तंतु
(ग) अवटु ग्रंथि
(घ) मेडुला
उत्तर:
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ:
मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के द्रव्य के ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं।

(ख) पावं तंतु:
मानव तंत्रिका तंत्र के तीन मूलभूत घटकों में से एक पार्श्व तंतु का नाम लिया जाता है। तंत्रिका कोशिका का अधिकांश कोशिका द्रव्य काय (soma) कोशिका में होती है। पार्श्व तन्तु (Dendrites) शाखाओं की तरह की विशिष्ट संरचना के साथ काय कोशिका से निकलते हैं। पाव तंतु में विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो किसी विद्युत-रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अवटु ग्रंथि:
अवटु ग्रन्थि गले में स्थित होती है। यह भाइरॉक्सिन नामक अंतःस्राव उत्पन्न करती है जो शरीर में चपापचय की दर को प्रभावित करता है।

(घ) मेडुला आबलांगाटा:
पश्च मस्तिष्क का एक प्रमुख हिस्सा बनकर मेडुला आबलांगाटा मूलभूत जीवन सहायक गतिविधियों को नियमित करने में सहायक होते हैं। मेडुला मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा है। इसे मस्तिष्क का जीवनधार केन्द्र माना जाता है।

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प्रश्न 2.
आनुवंशिकता के प्रति जीवन एवं गुणसूत्र के व्यवहार का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
एक बच्चा अपने जन्म के समय.अपने माता-पिता से प्राप्त जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। उसे माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में मिलता है। यह उत्तराधिकार व्यक्ति के विकास को जैविक नक्शा और समय सारणी प्रदान करता है। आनुवंशिकी की रूप में बच्चा को कुछ शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ उपलब्ध हो जाती हैं। निषेचित युग्मनज के गुणसूत्र प्रत्येक कोशिका के केन्द्र में होता है। गुणसूत्र को शरीर का आनुवंशिक तत्व माना जाता है। गुणसूत्र की संरचना धागे जैसी होती है। युग्मक-कोशिकाओं। में 23 गुणसूत्र पाए जाते हैं।

जीन अथवा DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। गुणसूत्र के एक विशेष जोड़े के प्रत्येक गुणसूत्र पर एक जीन स्थित होता है। लिंग गुणसूत्रों का जोड़ा आनेवाले बच्चे का लिंग निर्धारण करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। कुछ विशिष्ट जीन नियंत्रक जैसा कार्य करता है। जीनोटाइप और फीनोटाइप के माध्यम से वह कायिक संरचना तथा व्यवहार की कुशलता का निर्धारण करता है। उत्परिवर्तन कहलाने वाली क्रिया के माध्यम से जीन में रूपान्तरण संभव होता है। फलतः नयी जातियों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार आनुवंशिक नामक प्रवृत्ति के विकास में जीन और गुणसूत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी व्यक्ति का कद, स्मृति, चेहरा, क्रोध जैसे गुण जीन अथवा गुणसूत्रों की देन होती है।

प्रश्न 3.
समाज जीव विज्ञान का क्षेत्र बतलावें।
उत्तर:
जीव विज्ञान और समाज की अन्योन्य क्रिया से संबंधित आधुनिक विद्याशाखा को समाज मनोविज्ञान कहकर संबोधित करते हैं। समावेशी उपयुक्तता के आधार पर यह विद्याशाखा मनुष्य के सामाजिक व्यवहार की व्याख्या करता हैं। समाज के प्रति सर्वप्रिय व्यवहार की कला को प्रभावित करने वाले जैविक कारकों का समुचित अध्ययन करके ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। इसी कारण हम संस्कृति के संदर्भ में उपलब्ध कुछ विचारों तथा मूल्यों को सामाजिक परिवेश में सीखना-समझना चाहते हैं।

माता-पिता, विद्यालय, समसमूह, जनसंचार के अतिरिक्त पर्यावरण की विविधता हमें समाज जीवन विज्ञान के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है। सफल जीवन के लिए हमें संस्कृतिकरण और समाजीकरण की विधियों, नियमों, मूल्यों की दृष्टि से स्पष्टतः समझना होगा। अध्ययन की प्रगाढ़ता के क्रम में हमें पता लगेगा कि प्रत्येक जीवन से अच्छे व्यवहार की प्रत्याशा की जाती है जिससे प्रजनन और पालन-पोषण से सम्बन्धित सभी प्रकार की जानकारियाँ मिल सकें।

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प्रश्न 4.
“हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं।” कैसे?
उत्तर:
हमारे पास बड़ा और अधिक विकसित मस्तिष्क है। हमारे मस्तिष्क का वर्जन हमारे शरीर के कुल भार का 2.35 प्रतिशत है जो अन्य प्रजातियों की तुलना में सर्वाधिक है। मनुष्य के प्रमस्तिष्क को अन्य भागों की तुलना में अधिक विकसित और उपयोगी माना जाता है। मानव अपने व्यवहार से पर्यावरण के साथ संतुलन बनाते हुए जीवन-क्रिया को आगे बढ़ा लेता है।

हम अपने सार्थक एवं विकसित व्यवहार के कारण आहार की व्यवस्था करने में, परभक्षी से स्वयं को सुरक्षित रखने में, बच्चों को शिक्षा एवं सुरक्षा प्रदान करने में अन्य प्रजातियों की तुलना में स्थिति के अनुसार विधियों एवं साधनों को बदल लेने की क्षमता अधिक विकसित रूप में रखते हैं।

आनुवांशिकता, जीन, गुणसूत्र आदि के महत्व को समझाते हुए सांस्कृतिक दशा के अनुकूल बनाने में हम सक्षम हैं। अनुभव प्राप्त करने अथवा कुछ सीखने-समझने की प्रवृत्ति हममें अपेक्षाकृत अधिक होती है। हमारे पास न केवल समान जैविकीय तंत्र, बल्कि निश्चित सांस्कृतिक तंत्र भी होते हैं। उत्तरजीविता से सम्बन्धित उद्देश्यों को पूरा करने में हमारी सतर्कता एकाधिकार रखती है।

प्रश्न 5.
अंतस्थ बटन (Terminal buttons) किसे कहते हैं? कार्य के आधार पर परिचय दें।
उत्तर:
मेरुरज्जु के अंतिम सिरे पर अक्ष तंतु छोटी-छोटी कई शाखाओं में बँट जाती है जिन्हें अंतस्थ बटन कहा जाता है। अंतस्थ बटन में अन्य तंत्रिका कोशिकाओं, ग्रन्थियों और मांसपेशियों में सूचना भेजने की क्षमता होती है। अक्षतन्तु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है जो मेरुरज्जु में कई फीट तक और मस्तिष्क में एक मिली मीटर से कम हो सकते हैं। इस असमर्थता की स्थिति में अंतस्थ बटन सूचना संवहन में निर्णायक कार्य करता है।

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प्रश्न 6.
तंत्रिका तंत्र का कौन-सा भाग ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है?
उत्तर:
सभी प्राणियों में मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र होता है। यद्यपि तंत्रिका तंत्र समग्र रूप से कार्य करता है फिर भी इसके अलग-अलग विभागों में अलग-अलग तरह के कार्य करने की प्रवृत्ति होती है। केन्द्रीय तंत्रिका के साथ परिधीय तंत्रिका तंत्र के अस्तित्व को पहचानने के बाद कायिक तंत्रिका तंत्र तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है।

कायिक तंत्रिका तंत्र में कपालीय तथा मेरु तंत्रिका संलग्न होते हैं। संवेदी, पेशीय और मिश्रित तंत्रिकाओं के द्वारा देखने, सुनने के क्रम में नियंत्रण की आवश्यकता पूरी की जाती है। कपालीय तंत्रिकाओं के 12 समुच्चय होते हैं जबकि मेरु तंत्रिकाओं के 31 समुच्चय मिलते हैं। ये दोनों मिलकर संवाद का संवहन तथा संचरण करते हैं। अर्थात् कायिक तंत्रिका तंत्र संवेदी और पेशीय होने के साथ-साथ ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क की प्राचीनतम तथा नवीनतम संरचनाओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
मस्तिष्क की प्राचीनतम संरचनाएँ उपवल्कुटीय यंत्र, मस्तिष्क स्तम्भ तथा अनुमस्तिष्क को प्राचीनतम संरचनाएँ मानी जाती हैं। लगातार चलनेवाली विकासात्मक प्रक्रियाओं के कारण प्रमस्तिष्कीय वल्कुट नामक परिवर्धन का पता चला है जो मस्तिष्क की नवीनतम परिवर्धन माना जाता है। विकास क्रम में यह भी पता चला है कि एक वयस्क मस्तिष्क का भार लगभग 1.36 किग्रा. है जिसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ सक्रिय रहती हैं। मस्तिष्कीय क्रम वीक्षण से पता चलता है कि कुछ मानसिक प्रकार्य मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में वितरित हैं। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट को चार पालियों में विभक्त किया गया है –

  1. ललाट पालि
  2. पार्विक पालि
  3. शंख पालि और
  4. पश्च कपाल पालि

अवधान, चिंतन, स्मृति, तर्कना, देखना, सुनना, सूचनाओं का संवहन, चाक्षुष आवेगों की व्याख्या करना प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की विभिन्न पालियों के माध्यम से सरलता से पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 8.
संधिस्थल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक न्यूरोन के एक्सॉन तथा दूसरे न्यूरोन की शाखिकाओं के मिलन-स्थल को संधिस्थल कहा जाता है। संधिस्थल की विशेषता यह होती है कि एक्सॉन तथा शाखिकाएँ एक-दूसरे से सटी हुई नहीं होती फिर भी तंत्रिका आवेग का संचरण एक्सॉन से शाखिकाओं में हो जाता है। ऐसा संभव इसलिए हो पाता है, क्योंकि एक्सॉन की छोटी-छोटी पुस्तिकाओं से एक विशेष रासायनिक तरल पदार्थ जिसे न्यूरोट्रांसमीटर (neurotransmitter) कहा जाता है, निकलता है जिसके कारण यह स्थान गीला हो जाता है तथा दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है। फलस्वरूप, आसानी से तंत्रिका आवेग आगे बढ़ जाता है। इस तरह, संधिस्थल तंत्रिका आवेग को पहले रोकता है तथा फिर उसका मार्ग प्रशस्त कर आगे बढ़ने देता है।

प्रश्न 9.
पूर्ण या शून्य नियम क्या है?
उत्तर:
पूर्ण या शून्य नियम तंत्रिका आवेग (nerve impulse) के संचरण (conduction) का एक नियम है जो यह बताता है कि जब कोई न्यूरोन किसी उपयुक्त उद्दीपन से उत्तेजित होता है तब वह या तो अपनी पूरी शक्ति के साथ उत्तेजित होता है या फिर बिल्कुल ही उत्तजित नहीं होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि उद्दीपन की शक्ति काफी कमजोर होती है जो न्यूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न ही नहीं कर पाती है। परंतु, यदि उससे नयूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न हो गया तो वह अपनी पूर्ण शक्ति के साथ उत्पन्न होगा न कि उद्दीपन की शक्ति के समान क्षीण मात्रा में।

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प्रश्न 10.
प्रतिवर्त क्रिया किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया वह स्वचालित (automatic) या अनैच्छिक (invol untary) अनुक्रिया है जो किसी उद्दीपन (stimulus) द्वारा उत्पन्न होती है। जैसे, आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक का अपने-आप बंद हो जाना, गर्म वायु से अंगुली का स्पर्श होने पर हाथ को झट पीछे खींच लेना आदि प्रतिवर्त क्रिया के उदाहरण हैं। प्रतिवर्त क्रिया की मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित हैं –

  1. प्रतिवर्त क्रिया अर्जित (acquired) न होकर जन्मजात होती है।
  2. यह स्वचालित या अनैच्छिक होती है।
  3. इस क्रिया की उत्पत्ति के लिए उद्दीपन (stimulus) का होना अनिवार्य है।
  4. प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन मस्तिष्क से न होकर सुषुम्ना से ही होता है।

प्रश्न 11.
प्रतिवर्त अनुक्रिया तथा प्रतिवर्त धनु में अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रतिवर्त अनुक्रिया या सहज अनुक्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति किया गया एक स्वचालित (automatic) जन्मजात अनुक्रिया है। जैसे आँख पर तीव्र रोशनी पड़ते ही आँख के पटल का अपने आप बंद हो जाना, हाथ में पिन चुभने या किसी के द्वारा चुभाये जाने पर हाथ का झट से पीछे खींच लेना एक प्रतिवर्त अनुक्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) जिन प्रक्रियाओं एवं अंगों से होकर गुजरता है उसे ही प्रतिवर्ष धनु (reflex arc) कहा जाता है। इसमें ज्ञानेन्द्रिय, संवेदी न्यूरॉन, सुषुम्ना तथा विशेष भाग, साहचर्य न्यूरॉन, कर्मेन्द्रिय आदि अंग सम्मिलित रहते हैं।

प्रश्न 12.
अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर की विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों का नाम बतायें।
उत्तर:
शरीर के विभिन्न भागों में उपस्थित नलिकाविहीन ग्रन्थिं जो हार्मोन को अन्तःस्रावित करता है, अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहलाता है। शरीर में निम्नलिखित अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. थायराइड ग्रंथि
  3. पाराथायरायड ग्रन्थि
  4. अधिवृक्क ग्रन्थि

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प्रश्न 13.
बहिःस्त्रावी ग्रंथि तथा अंतःस्रावी ग्रंथि में अंतर करें।
उत्तर:
बहिःस्रावी ग्रंथि वैसी ग्रंथि को कहा जाता है जिसके स्राव को निकलने के लिए विशेष मार्ग या नली बनी होती है। यही कारण है कि इसे नलिका विहीन ग्रंथि भी कहा जाता है। अंतःस्रावी ग्रंथि से तात्पर्य वैसी ग्रंथि से होता है जिसका स्त्राव निकलने के लिए किसी तरह की नली या मार्ग नहीं होता है। फलस्वरूप इसका स्राव सीधे खून में मिल जाता है तथा महत्त्वपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक प्रभाव उत्पन्न करता है। शारीरिक एवं मानसिक विकास के दृष्टिकोण से अंतःस्रावी ग्रंथियाँ बहिःस्रावी ग्रंथियों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 14.
तंत्रिका तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी जब कोई अनुक्रिया करता है तब इसमें तीन तरह के अंगों का समन्वय होता है-ग्राहक (receptor) या ज्ञानेन्द्रिय, प्रभावक (effectors) अर्थात् मांसपेशियाँ एवं ग्रंथि तथा समायोजक (adjustor)। समायोजक का काम ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रभावक के बीच संबंध स्थापित करना होता है। समायोजक का दूसरा नाम तंत्रिका (nerve) है। अनेक तंत्रिकाएँ आपस में मिलकर ग्राहक तथा प्रभावक में विशेष संबंध स्थापित करती हैं और व्यक्ति सही-सही अनुक्रिया कर पाता है। इन तंत्रिकाओं के समूह या गुच्छा को तंत्रिका तंत्र या स्नायुमंडल (nervous system) कहा जाता है।

प्रश्न 15.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
प्रत्येक न्यूरोन एक छोटी पतली आवरण से ढंका होता है। जब कोई उपयुक्त उद्दीपन उस आवरण को उत्तेजित करता है तब उससे न्यूरोन भी उत्तेजित हो जाता है। इससे एक तरह का वैद्यत रासायनिक आवेग (electro chemical impulse) पैदा होता है जिसे तंत्रिका आवेग (nerve impulse) कहा जाता है। तंत्रिका आवेग की गति सामान्यतः 100 मीटर प्रति सेकंड होती है।

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प्रश्न 16.
सुषुम्ना की संरचना का वर्णन करें।
उत्तर:
सुषुम्ना (spinal cord) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का एक प्रमुख भाग है। रीढ़ की हड्डी जो गर्दन से कमर तक फैली हुई है, में एक विशेष तरल पदार्थ भरा हुआ होता है और उसमें एक मोटा तंतु (Fibres) होता है। इसे सुषुम्ना कहा जाता है। रीढ़ की हड्डी में 31 जोड़ (Joints) होते हैं और प्रत्येक जोड़ के बाएँ तथा दाएँ भाग से एक-एक तंतु सुषुम्ना तंत्रिका के भी 31 जोड़ होते हैं। प्रत्येक जोड़ा में एक संवेदी तंत्रिका (sensory nerve) तथा दूसरा गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) होती है।

संवेदी तंत्रिका का संबंध ज्ञानेन्द्रियों से तथा गतिवाही तंत्रिका का संबंध कर्मेन्द्रिय (motor organs) से होता है। सुषुम्ना को कहीं से भी काटकर देखा जाए तो इसकी भीतरी संरचना (internal structure) एक ही समान दीख पड़ती है।सुषुम्ना के इस कटे हुए बीच के भाग का आकार तितली (butter fly) के समान होता है और इस भाग का रंग भूसर (gray) होता है। इसके बीच के भाग के चारों तरफ तरल पदार्थ होते हैं जिसे अनेक तंत्रिका तंत्र ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखलाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सुषुम्ना को तथा नीचे से ऊपर जाने वाले तंत्रिका तंतु द्वारा सुषुम्ना से मस्तिष्क को सूचनाएँ मिलती हैं।

प्रश्न 17.
शाखिका तथा एक्सॉन में अंतर बतलाएँ।
उत्तर:
न्यूरॉन के दो महत्त्वपूर्ण भाग (dendrite) तथा एक्सॉन (axon) हैं। शाखिका के आकार पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होते हैं जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं। इसके द्वारा न्यूरॉन दूसरे न्यूरॉन से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है। न्यूरॉन के उस भाग को एक्सॉन कहा जाता है जो कोश शरीर (cell body) से निकलकर आगे की ओर लम्बत: बढ़ा हुआ होता है। यह एक ऐसे परत या आवरण से ढंका होता है जो प्रत्येक दो मिलीमीटर पर कुछ दबा हुआ-सा होता है। एक्सॉन द्वारा तंत्रिका आवेग न्यूरॉन से निकलकर दूसरे न्यूरॉन की शाखिका में जाते हैं। अत: एक्सॉन न्यूरॉन का एक सुपुर्दगी केन्द्र (delivery centre) होता है।

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प्रश्न 18.
तंत्रिका कोशिका क्या कार्य करती है?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई मानी जाती है। तंत्रिका कोशिकाएँ विशिष्ट कोशिकाओं के रूप में विभिन्न प्रकार के उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है। ये सूचना को विद्युत-रासायनिक संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक भेजने में भी निपुण होते हैं। ये ज्ञानेन्द्रियों से सूचना प्राप्त करती है तथा उसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है।

प्रश्न 19.
मानव तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन से तीन मूलभूत घटक पाये जाते हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका में 12 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं जिनकी आकृति, आकार, रासायनिक संरचना और प्रकार्य में काफी भिन्नता होती है। इन भिन्नताओं के मिलने पर भी तीन मूलभूत घटक समान रूप से पाए जाते हैं –

(क) काय (Soma):
निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करते हैं। ये पार्श्व तन्तु शाखाओं की तरह विशिष्ट संरचना वाले होते हैं।

(ख) पार्श्व तन्तु (Dendrites):
इसमें विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो जैव रासायनिक संकेत (विद्युत रासायनिक) के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अक्ष तन्तु (Axon):
अक्ष तंतु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है। इसके अंतिम सिरे पर अंतस्थ बटन के रूप में छोटी-छोटी शाखाओं के पुंज होते हैं।

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प्रश्न 20.
तंत्रिका कोष सन्धि का निर्माण किस प्रकार से होता है?
उत्तर:
पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अग्र तंतु के संकेत दूसरी तंत्रिका के पार्श्व तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध बनाते हैं जिसे तंत्रिका कोष सन्धि भी कहते हैं। सन्धि स्थलीय संचरण की प्रकृति रासायनिक होती है जो रासायनिक पदार्थ तंत्रिका-संचारक कहलाते हैं। तंत्रिका कोष सन्धि के मध्य भाग में पाये जाने वाले खाली स्थान को सन्धि स्थलीय खण्ड कहा जाता है।

प्रश्न 21.
परिधीय तंत्रिका तंत्र का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका को पूरे शरीर से जोड़ने वाले समस्त तंत्रिका कोशिकाओं तथा तंत्रिका तन्तु को परिधीय तंत्रिका तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 22.
मस्तिष्क की संरचना उसके तीन प्रमुख हिस्सों में स्थित भिन्न-भिन्न उपभागों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख हिस्से होते हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क-इसके उपभाग मेडुला ऑबलांगाटा सेतु तथा अनुमस्तिष्क होते हैं। इनके कारण श्वास प्रक्रिया, स्वमित क्रिया, श्रवण क्रिया, शारीरिक मुद्रा आदि वांछनीय विधि से उपयुक्त कार्य करते हैं।
  2. मध्य मस्तिष्क-इसमें रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (R.A.S.) भाव प्रबंधन में सहयोग देता है। पर्यावरण से मिलने वाली सूचनाओं के चयन में भी यह सहायक होता है।
  3. अन मस्तिष्क-मस्तिष्क के इस भाग के चार उपविभाग होते हैं –

(क) अधश्चेतक-सांवेगिक तथा अभिप्रेरणात्मक व्यवहारों को नियमित रखने में मदद करता है।
(ख) चेतक-यह सूचना प्रसारण केन्द्र की तरह कार्य करता है।
(ग) उपवल्कुटीय तंत्र-यह तापमान, रक्तचाप और रक्तशर्करा के स्तर को समस्थिति में रखकर शारीरिक क्रिया को संतुलित रखता है। इसमें हिप्पोकेम्पस और गल तुडिका भी समाविष्ट हैं जो दीर्घकालिक स्मृति और संवेगात्मक व्यवहार को नियंत्रित रखता है।

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प्रश्न 23.
कारपस कैलोजम किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं:
बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere)। ये दोनों गोलार्द्ध एक-दूसरे से तंत्रिका के एक विशेष गुच्छा से जुड़े होते हैं। इसी विशेष गुच्छा (bundle) का नाम कारपस कैलोजम है।

प्रश्न 24.
प्रमस्तिष्क का विभिन्न पालियों के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क के दोनो गोलार्द्ध केंद्रीय सुलकस तथा लेट्रल दरार की मदद से चार पालियों में बँटे हैं जिनके कार्यों का वर्णन निम्नांकित हैं –

  1. अग्रपालि (Frontal lobe): यह केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर का भाग होता है तथा इसके द्वारा उच्च मानसिक प्रक्रियाओं (higher mental processes) का ज्ञान होता है।
  2. मध्यपालि (Parietal lobe): यह पालि केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर होता है । इसके द्वारा मूलतः त्वक संवेदन (touch sensation) अर्थात् ठंड, गर्म, दर्द आदि का ज्ञान होता है।
  3. शंखपालि (Temporal lobe): यह पालि लेट्रल दरार के नीचे जिसे हम कन्पट्टी कहते हैं, में होती है तथा इसके द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

प्रश्न 25.
न्यूरॉन किसे कहते हैं?
उत्तर:
तंत्रिकातंत्र (nervous system) की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन (neuron) या तंत्रिका कोश कहा जाता है। इसके द्वारा तंत्रिका आवेग प्राणी में एक जगह से दूसरे जगह संचारित होते हैं। अध्ययनों के अनुसार पूरे मानव में न्यूरॉन की संख्या 12.5 अरब (Billion) है जिसमें से करीब 10 अरब सिर्फ मस्तिष्क में ही है। शाखिका (dendrite), जीवकोश (cell body) तथा एक्सॉन (axon) न्यूरॉन के तीन प्रमुख संरचना होते हैं। शाखिका तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है और शरीर (cell body) के ओर भेज देता है। कोश शरीर उसे एक्सॉन (axon) की ओर भेज देता है जो तंत्रिका आवेग को बाहर निकालकर दूसरे न्यूरॉन के शाखिका को सुपुर्द कर देता है।

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प्रश्न 26.
न्यूरॉन के कितने प्रकार होते हैं? संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
(क) संवेदी न्यूरॉन (Sensory of afferent neuron):
इसे ज्ञानवाही न्यूरॉन भी कहा जाता है। संवेदी या ज्ञानवाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेश (nerve impulse) को ज्ञानेंद्रीय (sense organ) से सुषुम्ना एवं मस्तिष्क तक पहुँचता है।

(ख) साहचर्य न्यूरॉन (Association neuron):
इस तरह का न्यूरॉन सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। साहचर्य न्यूरॉन संवेदी न्यूरॉन तथा गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (motor impulse) से साहचर्य स्थापित करता है। संवेदी न्यूरॉन से तंत्रिका आवेश को ग्रस्त करके साहचर्य न्यूरॉन उसे गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन में छोड़ता है।

(ग) गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (Motor neuron):
गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना या मस्तिष्क से केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई वांछित अनुक्रिया कर पाता है।

प्रश्न 27.
न्यूरॉन तथा तंत्रिका में अंतर करें।
उत्तर:
न्यूरॉन स्नायुमंडल (nervous neuron) की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) है जिसमें शाखिका (dendrite), कोश शरीर (cell body), तथा एक्सॉन (axon) होता है। न्यूरॉन संवदी (sensory), पेशीय (motor) या साहचर्य (association) किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। तंत्रिका (nerve) की संरचना इससे भिन्न होती है। सैकड़ों या हजारों न्यूरॉन के एक्सॉन (axon) आपस में मिलकर एक गुच्छा.(bundle) तैयार करते हैं जिसे तंत्रिका (nerve) कहा जाता है। एक ही तंत्रिका में संवेदी तथा पेशीय दोनों तरह के न्यूरोन के एक्सॉन सम्मिलित हो सकते हैं।

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प्रश्न 28.
आनुवंशिकता के लिए जीन एवं गुणसूत्र की क्या भूमिका होती है?
उत्तर:
माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार के रूप में जीन के माध्यम से मिलता है। बच्चा जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। युग्मनज के मध्य भाग में केन्द्रक होता है जिसमें गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व माने जाते हैं जो मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों जीन होते हैं।

एक शुक्राणु कोशिका और एक अंडाणु कोशिका के मिलने से एक नयी पीढ़ी का जन्म होता है। गर्भ धारण के समय जीवन 3 गुणसूत्र माता से और 23 गुणसूत्र पिता से प्राप्त करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवंशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। जीव के विकास में जीन से संयुक्त प्रोटीन महत्त्वपूर्ण काम करते हैं। जीन कई भिन्न रूपों में जीवित रह सकते हैं। जीन के रूपान्तरण को उत्परिवर्तन कहा जाता है। उत्परिवर्तन जीन में पुनः संयोजन के अवसर जुटाती है।

प्रश्न 29.
व्यवहार का जैवकीय आधार तथा सांस्कृतिक आधार को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनुष्य को जीवन-रक्षा एवं समान रक्षा के लिए कई प्रकार के व्यवहार का कर्त्ता बनना होता है। आहार ढूँढने की योग्यता, परभक्षी से दूर रहने की प्रवृत्ति, छोटे बच्चों का संरक्षण एवं पालन-पोषण पर आधारित जैवकीय व्यवहार में अपनी रुचि एवं क्रियाशीलता का प्रदर्शन करना होता है। अतिथियों को पसन्द का भोजन ऐच्छिक परिवेश में कराना हमारे लिए सांस्कृतिक व्यवहार माना जाता है। निर्धारित साधन के अभाव में उचित विकास को खोजकर प्रबंधक की मदद करना हमारा नैतिक व्यवहार है। वर्ग में बैठने की कला, प्रश्न पूछने का तरीका, खेल को खेल की भावना से खेलना, दुखी व्यक्ति को सांत्वना दे देना आदि सांस्कृतिक व्यवहार के अन्तर्गत माने जा सकते हैं।

प्रश्न 30.
संस्कृतिकरण या परसंस्कृतिकरण में क्या अंतर है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण-उन सभी प्रकार के अधिगम को कहते हैं जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के होता है। परसंस्कृतिकरण-परसंस्कृतिकरण का अर्थ है किसी अन्य संस्कृति की धारणा, विचार तथा व्यवहार को स्वीकारना तथा उसे अपनाना। जब व्यक्ति दूसरी संस्कृति की भाषा, विश्वास को अपनाता है तो इसे परसंस्कृतिग्रहण कहते है।

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प्रश्न 31.
संस्कृतिकरण का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण उन सभी प्रकार के अधिगमों को कहते हैं जो व्यक्ति के जीवन में बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के इसलिए घटित होता है कि वे हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भो में हमें प्राप्त होते हैं। संस्कृतिकरण के दो मुख्य आधार हैं –

  1. प्रेक्षण और
  2. सीखना परिवारों, पूर्वजों अथवा पड़ोसियों के उत्तम व्यवहारों को पता लगाकर उसे ग्रहण करना संस्कृतिकरण माना जाता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखते हैं।

प्रश्न 32.
प्रमस्तिष्क पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क को प्रमस्तकीय वल्कुट भी कहा जाता है। यह अवधान, अधिगम, स्मृति एवं भाषा व्यवहार जैसे उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों को नियमित करता है। इसमें तंत्रिका कोशिकाएँ, अक्ष तंतुओं के समूह और तंत्रिका जाल होते हैं। प्रमस्तिष्क दो अर्ध भागों में विभक्त है। बायाँ गोलार्ध भाषा संबंधी व्यवहारों को तथा दायाँ गोलार्द्ध प्रारूप प्रत्यभिज्ञान को संभालते हैं।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट चार पालियों में बँटा रहता है –

  1. ललाट पालि
  2. पाश्विक पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्च कपाल पालि जो चिंतन, स्मृति, दृष्टि, श्रवण, सूचनाओं के प्रक्रमण, उद्दीपकों का नियंत्रण जैसे कार्यों में संलग्न रहते हैं।

मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित नहीं होती। किन्तु एक विशेष कार्य के लिए वल्कुट का कोई एक विशेष भाग, दूसरे भागों की अपेक्षा अधिक निपुणता से कार्य पूरा कर लेता है।

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प्रश्न 33.
मेरुरज्जु की संरचना और कार्य बतावें।
उत्तर:
मेरुरज्जु की संरचना एक लम्बी रस्सी की तरह का होती है जो मेरुदंड के अन्दर पूरी लम्बाई में फैला रहता है। मेरुरज्जु का एक सिरा मेडुला से जुड़ा होता है जबकि दूसरा सिरा मुक्त रहता है। मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के प्रत्येक ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। मेरुरज्जु के दो प्रमुख को हैं –

  1. शरीर के निचले भागों से आनेवाले संवेदी आवेगों को मस्तिष्क तक पहुँचाना और
  2. मस्तिष्क में उत्पन्न होनेवाले पेशीय आवेगों को सारे शरीर तक पहुँचाना।

प्रश्न 34.
परिवर्ती क्रिया को समझने के लिए एक स्पष्ट उदाहरण दें।
उत्तर:
परिवर्ती क्रिया उद्दीपन के प्रतिक्रिया स्वरूप घटित होनेवाली अनैच्छिक क्रिया है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारे तंत्रिका तंत्र में विकासवादी प्रक्रिया के माध्यम से वंशानुगत होती है।

उदाहरण:
तेज प्रकाश के आने के कारण आँखों की पलकों का झपकना अथवा बहुत गर्म या ठंढा पिण्ड पर हाथ पड़ते ही हाथ को झटके के साथ हटाना परिवर्ती क्रिया कहलाती है। इसी प्रकार सांस लेना, अंगों को फैलाना, घुटनों में झटका लगना आदि परिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु के द्वारा सम्पादित होती है जिनमें मस्तिष्क भाग नहीं लेता है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ जीव को किसी भी संभावित खतरे से बचाकर जीवन की रक्षा करता है।

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प्रश्न 35.
अन्तःस्रावी तंत्र में सन्निहित विभिन्न ग्रन्थियों के नाम एवं कार्य बतावें।
उत्तर:
मानव शरीर की मुख्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि-संवृद्धि, अंत:स्राव के माध्यम से मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को नियंत्रित किया जाता है।
  2. अवटु ग्रन्थि-थाइरॉक्सिन नामक अन्तःस्राव उत्पन्न करके शरीर कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करता है।
  3. अधिवृक्क ग्रन्थियाँ-इसके दो प्रमुख भाग अधिवृक्क वल्कुट और अधिवृक्क मध्यांश कहे जाते हैं जो क्रमशः ACTH और कार्टिकोयड के माध्यम से तंत्रिका तंत्र में उद्दीपन उत्पन्न करता है।
  4. अग्नाशय-यह इन्सुलिन के माध्यम से यकृत में ग्लुकोज का विखंडन करता है। इसकी अनियमित आचरण के कारण मधुमेह नामक रोग से मनुष्य ग्रसित हो जाता है।
  5. जनन ग्रन्थियाँ-शुक्र ग्रन्थि और डिंब ग्रन्थि के संयोजन से प्रजनन सम्बन्धी क्रिया सम्पादित होती है। इसके लिए एस्ट्रोजन, पोजेस्ट्रान, एण्ड्रोजन और टेस्टोस्ट्रोन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 36.
परसंस्कृतिकरण से क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी अन्य संस्कृति के संपर्क में आकर जो भी सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों के प्रभाव में पड़ते हैं उन्हें परसंस्कृतिकरण कहते हैं। परसंस्कृतिकरण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अथवा स्थायी या अस्थायी रूप में, ऐच्छिक या अनैच्छिक रूप में घटित होता रहता है। ये लाभ और हानि दोनों के कारण होते हैं। परसंस्कृतिकरण के माध्यम से नई विधियों या नये संस्कार से मुलाकात होती है। यह कभी-कभी कष्ट और कठिनाइयाँ उत्पन्न करती हैं। यदि इसे हानिकारक परिणाम वाला समझकर छोड़ने की इच्छा होती है तो कई विकल्प मिल जाते हैं।

प्रश्न 37.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ क्या-क्या हैं?
उत्तर:
निम्नलिखित चार युक्तियों के द्वारा परसंस्कृतिकरण सरलता से संभव हो जाता है –

  1. समाकलन-नई-पुरानी दोनों संस्कृति के प्रति रुचि रखना।
  2. आत्मसात्करण-अपनी संस्कृति का त्याग कर नई संस्कृति को अपनाना।
  3. पृथक्करण-दोनों संस्कृतियों को मिश्रित प्रभाव।
  4. सीमांतकरण-अनिश्चित स्थिति में।

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प्रश्न 38.
संस्कृति और समाज में क्या अंतर है?
उत्तर:
संस्कृति समाज में जीने एवं सामूहिक व्यवहार करने का ढंग है यह मानव-निर्मित होता है जिसके अंतर्गत धार्मिक विश्वास, रीति-रिवाज, रहन-सहन, मूल्य, रूढियाँ एवं परंपरा आती हैं। समाज-समाज लोगों का एक समूह है जिसकी एक विशेष सीमा होती है। वे एक सामान्य भाषा होती है जो उनके पड़ोसी लोग नहीं समझ पाते हैं एक समाज एकल राष्ट्र हो सकता है या नहीं हो सकता है।

प्रश्न 39.
समाजीकरण किसे कहते हैं? समाजीकरण के प्रमुख कारक क्या-क्या हैं?
उत्तर:
समाजीकरण-समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोग ज्ञान, कौशल और शीलगुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज और समूहों के प्रभावी सदस्यों के रूप में भाग लेने के योग्य बनाते हैं। समाजीकरण नामक प्रक्रिया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सामाजिक-सांस्कृतिक संचरण का आधार तैयार करता है। जैसे कई भाषाओं की जानकारी रखनेवाले को किसी निश्चित क्षेत्र में जाकर उसी क्षेत्र की भाषा का व्यवहार करना होता है। समाजीकरण के प्रमुख कारक-समाज के हित में किये जाने वाले कार्य-विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारण कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘मानव व्यवहार जानवरों के व्यवहार से अधिक जटिल होते हैं। इस कथन को सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:
मानव व्यवहार की एक महत्त्वपूर्ण निर्धारिका हमारी जैवकीय संरचना है जो पूर्वजों से उत्तराधिकार के रूप में विकसित शरीर और मस्तिष्क के साथ मिलती है। हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं क्योंकि हमारे पास एक बड़ा और विकसित मस्तिष्क है । हमें पर्यावरण को समझने तथा उसके प्रभाव के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता है। एक मनुष्य होने के कारण हमारे पास न केवल जैवकीय तंत्र है बल्कि निश्चित सांस्कृतिक क्षेत्र भी होते हैं।

हम जानवरों की तुलना में अधिक सरलता से सीखे सकते हैं, अवसर को पहचान कर व्यवहार निश्चित कर सकते हैं। विविध माँगें, अनुभव और अवसर हमारे व्यवहार को अत्यन्त प्रभावित करते हैं। मानवीय व्यवहार के लिए जैविकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी होते हैं। अर्थात् मानव के व्यवहार की जटिलता का एक प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए एक संस्कृति है जो जानवरों में नहीं है।

उदाहरणार्थ, भूख से उत्पन्न वेदना के प्रति किये जाने वाले व्यवहार को समझा जा सकता है। मानव भूख की शांति के लिए विवेकपूर्ण विधि अपनाता है। शाकाहारी और मांसाहारी मानव अपनी भूख को अलग-अलग तरीके शान्त करके सन्तुष्ट होते हैं। खाद्य सामग्रियों के संग्रह और संरक्षण करना केवल मनुष्य के वश की बात है। मानव अपनी भूख की शान्ति के लिए सभ्य तरीका अपनाता है जबकि जानवर भूखा होने पर हिंसक और भयानक बन जाता है। मानव काम-व्यवहार कई नियमों, मानकों, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित होता है जबकि जानवर भोजन पाने के क्रम में किसी नियम और मूल्यों को नहीं अपनाता है।

मानव अपने काम-व्यवहार के लिए भरोसेमन्द साथी का चयन कर लेता है लेकिन जानवर मिल-जुल कर कोई व्यवस्था नहीं कर पाता है। अत: जैविकीय और सांस्कृतिक शक्तियों की परस्पर-क्रिया के द्वारा मानव प्रकृति विकसित होती है जिसके कारण मानव अपना स्वभाव निश्चित करके उचित व्यवहार करता है। मानव अपने व्यवहार को प्रयोगात्मक बनाने के लिए भौतिक वस्तुओं (औजार मूत्तियाँ), विचार (श्रेणियाँ, मानक, परोपकार, दया, धर्म) तथा सामाजिक संस्थान (परिवार, विद्यालय, सहाकारिता विभाग, पंचायत भवन) का उपयोग करने की क्षमता रहता है जो जानवरों को नसीब नहीं होता है।

भवन निर्माण हो या उपस्कर का निर्माण हो हम परिणामी उत्पाद के प्रति सुरक्षा और उपयोग की दृष्टि से सदा सतर्क व्यवहार करते हैं। हम किसी व्यवहार के लिए पूर्व निर्धारित साधनों या विधियों का इन्तजार नहीं करते हैं। वाशिंग मशीन के अभाव में हम बाल्टी-पानी के द्वारा ही सफाई का काम निबटाना जानते हैं। कुर्सी के अभाव में हम शिक्षण कार्य या यात्रा की योजना को बन्द नहीं कर देते हैं।

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प्रश्न 2.
जैवकीय तथा सांस्कृतिक मूल का सामान्य अर्थ एवं उद्देश्य बतावें।
उत्तर:
कोई बच्चा अपने पूर्वजों से एक विकसित शरीर और उन्नत मस्तिष्क पाकर अच्छे व्यवहार के प्रदर्शन के योग बनता है। अर्थात् हमारे व्यवहार का महत्वपूर्ण निर्धारक हमारी जैवकीय संरचना होती है। व्यवहार सम्बन्धी कला एवं आदतें हमें आनुवंशिक रूप में उपलब्ध होती हैं। जैसे माता-पिता के अशक्त रहने के कारण मंद बुद्धि वाले बच्चे जन्म लेते हैं तथा असामान्य लक्षण प्रकट करते हैं। किसी कारण मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त हो जाने पर जैवकीय आधारों का महत्त्व जानने का अवसर मिलता है।

किसी व्यक्ति का व्यवहार जैवकीय यंत्र के अलावे सांस्कृतिक तंत्र से भी प्रभावित होता है। पूर्वज से मिला संस्कृति से समझौता करते हुए हम अपने व्यावहारिक आचरण का निर्धारण करते हैं। विकट स्थितियों का मुकाबला करना, आकस्मिक घटना के बाद भी धैर्य बनाए रखना, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहने की युक्ति सोचना आदि ऐसी परिस्थिति है जहाँ जैविकीय ज्ञान के साथ-साथ सांस्कृतिक सहायता की आवश्यकता महसूस होने लगती है।

माँगें, अभाव, अनुभव, अवसर, लोगों की प्रतिक्रिया, मिलने वाला पुरस्कार आदि हमारे व्यवहार को प्रभावित किए बिना रहते हैं। ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा होने लगता है, इसकी समय विकसित होने लगती है और वह उक्त प्रभावों के स्पष्ट लक्षण और क्षमता को समझने लगता है। कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं जब सांस्कृतिक ज्ञान से ही हम समस्या को सरलता से सुलक्षा लेते हैं। मनोवैज्ञानिक की मानें तो जैवकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी व्यवहार के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। दोनों का साक्षा प्रयास हमारे व्यवहार को उन्नत दर्जा दिलाने में हमारी सहायता करते हैं।

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प्रश्न 3.
स्वतः संचालित स्नायु संस्थान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
स्वतंत्र स्नायु संस्थान मस्तिष्क का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह केन्द्रीय स्नायु संस्थान स्वतंत्र रहकर क्रिया करता है। शरीर में संवेगावस्था में होनेवाले अनेक परिवर्तनों को स्वतंत्र स्नायु संस्थान ही संचालित करता है। इस संचालन में केन्दीय स्नायु संस्थान का कोई हाथ नहीं रहता है।

परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि स्वतंत्र स्नायु संस्थान का केन्द्रीय स्नायु संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान के भाग सुषुम्ना का स्वतंत्र स्नायु संस्थान में महत्वपूर्ण स्थान है। अतएव इस स्नायु संस्थान को स्वतंत्र केवल इसलिए समझा जाता है, क्योंकि जिन क्रियाओं के संचालन एवं नियंत्रण में मस्तिष्क काम नहीं करते वे स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती हैं।

इस संस्थान के कार्य को रोका नहीं जा सकता। यह संस्थान स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करता है। यह मानव शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं में समायोजन करता है। इसकी बहुत-सी नाड़ियाँ मस्तिष्क और सुषुम्ना से चलकर आमाशय और रक्तवाहिनी नाड़ियों से आकर मिलती हैं। इन नाड़ियों द्वारा आन्तरिक एवं बाह्य मांसपेशियों की क्रियाओं का संचालन होता है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा स्राव ग्रन्थियों तथा आमाशंय और रक्त कोषों आदि की क्रिया का संचालन होता है। इसी से फेफड़े, दिल, यकृत, तित्ली, आमाशय, बड़ी आँत, प्रस्वेद ग्रन्थियाँ आदि की क्रिया चलती हैं। वस्तुतः यह संस्थान क्रियावाहक स्नायु संस्थान के बाहर स्थित है और उनकी क्रिया में केन्द्रीय स्नायु संस्थान कोई हाथ नहीं बँटांता। स्वतंत्र स्नायु संस्थान के बायें भाग को तीन भागों में बाँटा गया हैं –

  1. कापालिक
  2. माध्यमिक स्नायु तंत्र या थौरेको लम्बर और
  3. अनुब्रिका

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चित्र चित्र में सबसे ऊपर कापालिक है।

इससे जुड़े स्नायु कापालिक स्नायु कहलाते हैं। इसके नीचे सुषुम्ना है। इससे सम्बन्धित स्नायु सुषुम्ना स्नायु कहलाते हैं। सुषुम्ना शीर्ष से लेकर अनुत्रिका का भाग थौरेका लम्बर अथवा माध्यमिक स्नायु तंत्र कहलाता है। इसे थौरेका लम्बर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस भाग में स्नायु सुषुम्ना चलकर थोरेक्स तक पहुँचता है। सुषुम्ना का अंतिम भाग अनुत्रिका कहलाता है। स्वतंत्र स्नायु कोष गुच्छिका तथा शरीर के विभिन्न अंग सुषुम्ना से जुड़े होते हैं।

स्वतंत्र स्नायु का फैलाव नेत्र, रालवाही ग्रन्थियाँ, मुख, त्वचा और रक्त कोष, हृदय, श्वासनली, यकृत, आमाशय, क्लोम, आँत, अभिवृक्क, गुर्दे, थैली, कोलोन और गुर्दा तथा जननेन्द्रियों तक है। ये पसीने की ग्रन्थियों तथा त्वचा कोशों में भी फैले हुए हैं। ये पुच्छिंका लड़ी तथा सुषुम्ना को स्नायु सूत्र में जोड़ते हैं। जिन सूत्रों से ये इन्हें जोड़ते हैं वे सूत्र सुषुम्ना से निकलकर पुच्छिकाओं तक जाते हैं। पुच्छिकाओं की लड़ी में 22 अनुकम्पिक पुच्छिकायें होती हैं। मेंगेलियन लड़ी सुषुम्ना के समानान्तर में उसकी लम्बाई में होती है। अनुकम्पिक पुच्छिका लड़ी में माइलीन नामक श्वेत पदार्थ ऊपर से लिपटे रहते हैं। पुच्छिका लड़ी से निकलकर लागूल सूत्र वापस सुषुम्ना के स्नायु में जाकर मिलते है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान के दो भाग हैं –

  1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान तथा
  2. परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान। ये दोनों भाग एक-दूसरे के विपरीत क्रियायें करते हैं।

अनुकम्पिक स्नायु संस्थान शरीर को कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है और खतरे का सामना करने के लिए तैयार करता है। यह संस्थान शरीर की खतरे से रक्षा भी करता है। संवेग की दशा में संस्थान अधिक क्रियाशील रहता है। इसकी क्रियाशीलता से ही खतरे के समय आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और आमाशय की रक्तवाहिनी नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती है। ये नाड़ियाँ आमाशय को रक्त न पहुँचाकर माँसपेशियों और मस्तिष्क को अधिक रक्त पहुँचाती हैं। परिणामस्वरूप आमाशय में भोजन पचना बन्द हो जाता है, भूख नहीं लगती है।

मांसपेशियों एवं मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। आँत निष्क्रिय हो जाती है। आमाशय को रस प्रदान करने वाली ग्रन्थियाँ रस देना बन्द कर देती हैं। हृदय अधिक तेजी से रक्त फेंकने लगता है जिससे उसकी गति में तीव्रता आ जाती है। अभिवृक्क ग्रन्थियाँ अभिवृक्की रस का अधिकांश खून में पहुँचाने लगती हैं। परिणामस्वरूप रक्त शर्करा बढ़ जाती है। मनुष्य की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।

आवेश के कारण कोश अधिक नष्ट होते हैं। साँस की गति तीव्र हो जाती है, हाँफने की क्रिया होने लगती है और कभी-कभी तो मल-मूत्र भी निकलने लगता है। लार ग्रन्थियों से रस निकलना बंद हो जाता है। गला और मुख सूख जाता है। ये क्रियायें कलह की अवस्था में, क्रोध एवं भय की अवस्था में देखी जाती है। संवेग की अवस्था में त्वचा की विद्युत-प्रतिशोधन शक्ति में भी कमी आ जाती है जिसे हम गाल्वनिक त्वचा अनुक्रिया के नाम से जानते हैं।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान का दूसरा भाग परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान है। इसका सम्बन्ध कापालिक तथा अनुत्रिक से है। यह संस्थान एनाबोलिज्म की क्रिया करता है। यह संस्थान शरीर की शक्ति का संचय कर शरीर के विभिन्न भागों के पदार्थ को पुष्ट करता है। इस संस्थान की क्रिया में हृदय की धड़कन कम होती है और रक्त-चाए कम हो जाता है।

परिणामस्वरूप शरीर में भोजन की मात्रा कम खर्च होती है, लार ग्रन्थियों की क्रिया बढ़ जाती है, जिससे भोजन पचने की क्रिया में सहायता मिलती है। फलतः शरीर का वजन बढ़ जाता है, आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं। फलतः आँख में कम प्रकाश प्रवेश कर पाता है और आँखों को लाभ होता है। यह संस्थान अनुत्रिका विभाग के कार्य का संचालन करता है। यह ब्लेडर और कोलन तथा बड़ी आँतों को स्वस्थ रखता है। इसकी सहायता से शरीर से मल-मूत्र तथा विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं। अनुकम्पिक और परिअनुकम्पिक संस्थान में अन्तर है जो निम्न हैं –

1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान में स्नायु कोश गुच्छिका सुषुम्ना के अन्दर होती है अथवा शरीर के उन आन्तरिक अंगों के पास होती है जिनको वे उत्तेजित करती है। परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान के कोश गुच्छिकायें सुषुम्ना के अन्दर न होकर अंगों के पास ही होती हैं।

2. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान की क्रिया में सम्पूर्ण संस्थान काम करता है। परिअनुकम्पिक संस्थान की क्रिया में उस स्थान के विभिन्न भाग स्वतंत्र होते हैं। परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ये दोनों संस्थान एक-दूसरे के विरुद्ध ही हैं, इनमें कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है। वास्तव में ये एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं। मॉगर्न के अनुसार ये दोनों संस्थान कभी भी एक-दूसरे से स्वतंत्र कार्य नहीं करते बल्कि परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न मात्रा में सहयोग करते हैं। पर्यावरण में संघर्ष के समय जीव में अनुकम्पिक संस्थान की क्रिया अधिक और परिअनुकम्पिक संस्थान की कमी हो जाती है। इस सहयोग से शरीर में कार्य और विश्राम दोनों अवस्थाओं में संतुलन रहता है।

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प्रश्न 4.
मानव मस्तिष्क की संरचना या बनावट तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग मस्तिष्क है जिसके माध्यम से व्यक्ति सभी तरह की क्रियाओं का संचालन करता है। शरीर में मस्तिष्क का स्थान सुषुम्ना के ऊपर तथा खोपड़ी (skull) के भीतर होता है। मस्तिष्क की बनावट तथा उसके कार्यों का अध्ययन निम्नांकित सात प्रमुख भाग में बाँटकर कर सकते हैं –

  1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata)
  2. सेतु (pons)
  3. लघुमस्तिष्क (cerebellum)
  4. थैलेमस (thalamus)
  5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus)
  6. मध्यमस्तिष्क (midbrain)
  7. प्रमस्तिष्क या प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebrum or cerebral cortex)

इन सबों का वर्णन निम्नांकित है –

1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata):
मेडुला सुषुम्ना के ठीक ऊपर होता है। इसकी लम्बाई लगभग एक इंच होती है। यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को जोड़ता है। इसके द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। जैसे, यह सुषुम्ना का मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों से सम्पर्क स्थापित करता है, क्योंकि सुषुम्ना से मस्तिष्क की ओर जानेवाले सभी तंत्रिका आवेग मेडुला होकर ही गुजरते हैं। यह शरीर की रक्षा-संबंधी सभी क्रियाओं का जैसे रक्त-संचालन, साँस की गति, निगलने, हृदय की धड़कन आदि का संचालन एवं नियंत्रण करता है। यह शरीर में कुछ हद तक संतुलन भी बनाए रखने में मदद करता है तथा अपने क्षेत्र की प्रतिवर्त क्रियाओं को भी कुछ हद तक नियंत्रित करता है।

2. सेतु (pons):
यह मेडुला शीर्ष के ठीक ऊपर से होता है। इसमें कई तरह के तंतु पाए जाते हैं जिनके माध्यम से यह लघुमस्तिष्क (cerebellum) तथा प्रमस्तिष्क (cerebrum) के भागों को आपस में मिलाता है। इस तरह, यह वास्तविक अर्थ में सेतु या पुल का कार्य करता है। यह श्रवण कार्यों (auditory functions) के लिए एक तरह का प्रसारण स्टेशन (relay station) का कार्य करता है। इसमें कुछ ऐसे केन्द्रक (nuclei) भी होते हैं जिनमें प्रमुख श्वसन गति तथा आनन अभिव्यक्तियों (facial expressions) की क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
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चित्र: मानव मस्तिष्क के भागों का चित्र

3. लघुमस्तिष्क (cerebellum):
लघुमस्तिष्क या अनुमस्तिष्क प्रमस्तिष्क (cerebrum) या वृहत मस्तिष्क के नीचे और पीछे की ओर होता है। कुछ स्नायुतंतुओं द्वारा लघुमस्तिष्क का संबंध एक आरे प्रमस्तिष्क से तथा दूसरी ओर सुषुम्ना (spinal cord) से होता है। इसकी ऊपरी सतह पर धूसर पदार्थ (grey matter) होता है तथा उजला पदार्थ उसकी भीतर तह पर होता है। लघु मस्तिष्क का मुख्य कार्य शारीरिक संतुलन (bodily balance) बनाए रखना होता है। शराब के नशे में हो जाने पर लघुमस्तिष्क प्रभावित हो जाता है। फलस्वरूप, व्यक्ति की चाल-ढाल में लड़खड़ाहट आ जाती है।

4. थैलेमस (thalamus):
थैलेमस प्रमस्तिष्क (cerebrum) के नीचे और हाइपोथैलेमस के बगल में होता है। थैलेमस दोनों प्रमस्तिष्कीय गोलार्डों (cerebral hemispheres) के बीच एक अंडाकार संरचना है जिसे ऊपर से देखा नहीं जाता है। इसका कार्य बिजली के स्विचबोर्ड के समान है। जैसे स्विचबोर्ड का स्विच दबातें हैं, बिजली की धारा उपयुक्त जगह पर पहुंचकर बल्ब को प्रकाशमय कर देती है या पंखे को चला देती है, ठीक उसी प्रकार थैलेमस में जो तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं, वह उन्हें मस्तिष्क के उचित स्थान पर पहुँचा देता है।

अतः थैलेमस का मुख्य कार्य भिन्न-भिन्न संवेदी प्रक्रियाओं (sensory processes) से संबंधित आवेग को ग्रहण करके प्रमस्तिष्क (cerebrum) के उपर्युक्त केन्द्रों में प्रसारण (relay) करना होता है। इतना ही नहीं, यह लघुमस्तिष्क से भी आवेगों को ग्रहण करके उन्हें प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचाता है।

5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus):
थैलेमस के नीचे एक छोटा परंतु अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण तंतु है जिसे हाइपोथैलेमस (hypothalamus) कहा जाता है। यह थैलेमस तथा मध्यमस्तिष्क (midbrain) को एक तरह एक जोड़ता है। हाइपोथैलेमस द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। इसके द्वारा जैविक अभिप्रेरकों जैसे भूख, प्यास, काम आदि को समजित (regulate) किया जाता है। शरीर के भीतर सामान्य संतुलन बनाए रखने में भी यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाइपोथैलेमस संवेग की उत्पत्ति एवं नियंत्रण का मुख्य केन्द्र माना गया है। इसके द्वारा अंतःस्रावी ग्रन्थियों (endocrine glands) को भी समंजित किया जाता है।

6. मध्यमस्तिष्क (midbrain):
मध्यमस्तिष्क का स्थान मस्तिष्क के बीच में होता है। इसमें दो सतहें होती हैं-निचली सतह (floor) तथा ऊपरी सतह (roof or tectum)। निचली सतह संवेदी तंत्रिका आवेगों (sensory nerve impulses) को मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों में आने-जाने का काम करता है। जहाँ तक ऊपरी सतह या टेक्टम (tectum) का प्रश्न है, इसके द्वारा दृष्टि तथा श्रवण क्रियाओं के संचालन में मदद मिलती है।

जब मस्तिष्क का दृष्टिक्षेत्र या श्रवणक्षेत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इन क्रियाओं का संचालन यहीं से होता है। मध्यमस्तिष्क का एक विशिष्ट भाग जो घना एवं मोटा जाल-सा दिखता है, उसे रेटिकुलर फॉरमेशन (reticular formation) कहा जाता है जो व्यक्ति में सतर्कता की अवस्था को बनाए रखने में सक्षम होता है। इसमें नींद आदि के संचालन में भी मदद मिलती है।

7. प्रमस्तिष्क (cerebrum):
मानव मस्तिष्क का सबसे बड़ा तथा सबसे प्रमुख भाग प्रमस्तिष्क या वृहत मस्तिष्क है। इसे प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebral cortex) भी कहा जाता है। एक विशेष दरार (fissure), जिसे अनुदैर्ध्य दरार (longitudinal fissure) कहा जाता है, द्वारा प्रमस्तिष्क दो गोलार्डों (hemispheres) में बँटा होता है – बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere), इन दोनों गोलार्डों के ऊपर न्यूरोन का एक पतला आवरण होता है जिसकी मोटाई लगभग 3 मिलीमीटर होती है।

इस आवरण का रंग धूसर (grey) होता है। बायाँ गोलार्द्ध तथा दायाँ गोलार्द्ध तंत्रिका तंतु (nerve fibre) के एक विशेष गुच्छा या बंडल (bundle) से जुड़े होते हैं जिसे कारपस कैलोजम (corpus callosum) कहा जाता है। यह उजले पदार्थ (white matter) का बना होता है। प्रत्येक गोलार्द्ध दो गहरी दरारों (fissure) अर्थात् रोलैण्डो की दरार (fissure of Rolando) या केन्द्रीय सुलकस (central sulcus) तथा सिलभियस की दरार (fissure of Sylvius) या लेट्रल दरार (lateral fissure) की मदद से निम्नांकित चार पालियों (lobes) में बँटा होता है –

  1. अग्रपालि (frontal lobe)
  2. मध्यपालि (parietal lobe)
  3. शंखपालि (temporal lobe)
  4. पृष्ठपालि (occipital lobe)

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चित्र : प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

इन खंडों के कार्य अलग-अलग हैं। इन्हें इन कार्यों के विभाजन के दृष्टिकोण से निम्नांकित तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है –

  1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र (sensory area)
  2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र (motor area)
  3. साहचर्य क्षेत्र (association area)

1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र के कार्य (Functions of sensory area):
इस क्षेत्र द्वारा संवेदी क्रियाएँ होती हैं जिसके फलस्वरूप हमें तरह-तरह के उद्दीपकों का ज्ञान होता है। इसके क्षेत्र द्वारा निम्नांकित तीन तरह के ज्ञान या संवेदनाएँ होती हैं –

(a) दृष्टि संवेदन (Visual sensation):
दृष्टि संवेदन का ज्ञान हमें पृष्ठपालि (occipital lobe) द्वारा होता है। इसलिए पृष्ठपालि की दृष्टि ज्ञानपालि कहा जाता है। आँख में जो तंत्रिका आवेग उत्पन्न होते हैं वे दृष्टि तंत्रिका (optic nerve) द्वारा पृष्ठपालि में पहुँचते हैं जिससे व्यक्ति में दृष्टि संवेदन का ज्ञान होता है। यदि किसी कारण से पृष्ठपालि नष्ट हो जाए तो व्यक्ति को दृष्टि संवेदन नहीं होगा।

(b) श्रवण संवेदन (Auditory sensation):
सुनने की क्रिया का नियंत्रण शंखपालि (temporal lobe) से होता है। अतः, शंखपालि को श्रवण ज्ञानकेन्द्र भी कहा जाता है। जब ध्वनि या आवाज कान में श्रवण तंत्रिका आवेग उत्पन्न करता है, तब वह शंखपालि में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को श्रवण संवेदन होता है। यदि यह शंखपालि पूर्णत: नष्ट हो जाए तब व्यक्ति को इससे श्रवण-संबंधी संवेदन या ज्ञान नहीं हो सकता है।

(c) त्वक संवेदन (Cutaneous sensation):
व्यक्ति को स्पर्श का ज्ञान या त्वक संबेदन का ज्ञान मध्यपालि (parietal lobe) से होता है। जब हमारे त्वक को कोई चीज उत्तेजित करता है, तब इससे तंत्रिका आवेग उत्पन्न होकर मध्यपालि (parietal lobe) में पहुँचता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्पर्श ज्ञान होता है।

2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र के कार्य (Functions of motor area):
व्यक्ति जो भी शारीरिक क्रिया या व्यवहार स्वेच्छा से करता है, उसका आदेश प्रमस्तिष्क के जिस भाग से मिलता है, उसे क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र कहा जाता है। क्रियावाही क्षेत्र रोलैण्डो की दरार के बगल में एक लंबा-सा हिस्सा में अवस्थित है।

इस क्षेत्र में पिरामिड के आकार के बड़े-बड़े कोश (cells) पाए जाते हैं जिनके सहारे शारीरिक क्रियाओं एवं व्यवहारों का नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि पेशीय क्षेत्र के सबसे ऊपर का भाग शरीर के सबसे निचले हिस्से जैसे पैर की अंगुलियों तथा पैर की मांसपेशियों आदि का नियंत्रण एवं संचालन करता है और सबसे नीचे का भाग शरीर के ऊपर के हिस्से जैसे मुँह, गर्दन, चेहरा आदि की क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण करता है।

3. साहचर्य क्षेत्र के कार्य (Functions of association area):
अग्रपालि में एक बड़ा-सा साहचर्य क्षेत्र है जिसके द्वारा उत्त्व मानसिक क्रियाओं (higher mental processes) जैसे सोचना, तर्क करना, चिंतन करना, कल्पना करना, स्मरण करना आदि का संचालन एवं नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह क्षेत्र किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाने से प्राणी वर्तमान संबद्ध सभी बातों, घटनाओं एवं अर्थों को भूल जाता है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि मानव मस्तिष्क की संरचना काफी जटिल है तथा इसके द्वारा प्राणी की सभी तरह की शारीरिक क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

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प्रश्न 5.
स्नायुकोश या तंत्रिका कोश या न्यूरोन की संरचना तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव शरीर में बहुत तरह के जीवित कोश (living cells) हैं जिनके अलग-अलग कार्य हैं। इनमें एक विशेष तरह के जीवित कोश का कार्य स्नायु आवेग (nerve impulse) को ढोना है। इस तरह के जीवित कोश को स्नायुकोश या तंत्रिका कोश (neuron) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, तंत्रिका कोश या जिसे न्यूरोन (neuron) कहा जाता है, एक ऐसा कोश होता है जिसके माध्यम से तंत्रिका आवेग के रूप में सूचनाएँ शरीर के एक अंग से दूसरे अंग में जाती हैं। न्यूरोन तंत्रिका तंत्र की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) होती है।

संरचना या बनावट के दृष्टिकोण से तंत्रिका कोश को निम्नांकित तीन भागों में बाँटा गया है –

  1. शाखिकाएँ (dendrites)
  2. कोश शरीर (cell body)
  3. एक्सॉन (axon)

1. शाखिकाएँ (dendrites):
शाखिका की संरचना पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होती है जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं (जैसा कि चित्र में दिखाया गया है)। शाखिका दो तरह के कार्य करती है। पहला, यह तंत्रिका आवेगों (nerve impulse) को ग्रहण करती है तथा दूसरी उसे जीवकोश (cell body) की ओर भेज देती है। इस तरह, शाखिका कि मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को ग्रहण करना और उसे कोशशरीर की ओर भेजना होता है।

2. कोश शरीर (cell body):
कोशशरीर न्यूरोन का दूसरा प्रमुख भाग है। इसे सोमा (soma) भी कहा जाता है। कोशशरीर चारों तरफ से एक झिल्ली से ढंका होता है जिसे कोश की झिल्ली (membrane) कहा जाता है। इस झिल्ली के भीतर एक तरल पदार्थ होता है जिसे साइटोप्लाज्म (cytoplasm) कहा जाता है। कोशशरीर के बीच में केंद्रक (nucleus) होता है जो कोशशरीर का सबसे प्रधान भाग है। कोशशरीर के मुख्य दो कार्य होते हैं। पहला, शाखिका द्वारा लाए गए तंत्रिका आवेग को ग्रहण कर उसे आगे की ओर अर्थात एक्सॉन की ओर बढ़ाना तथा दूसरा कार्य न्यूरोन को स्वस्थ तथा जीवित रखना है।
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3. एक्सॉन (axon):
एक्सॉन तंत्रिका कोश या न्यूरोन के उस भाग को कहा जाता है जो कोशशरीर (cell body) से निकलकर आगे की कला हुआ दिखाई पडता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, इसका आकार छोटा भी होता है तथा बड़ा भी। एक्सॉन एक विशेष तरह की उजली परत या आवरण से ढंका होता है। यह परत सतत (continuous) नहीं होती है। बल्कि कुछ-कुछ दूर पर लगभग समाप्त हो जाती है या पतली हो जाती है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। एक्सॉन के अंतिम छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिन्हें एण्डब्रश (endbrush) या एण्डप्लेट (endplate) कहा जाता है।

एक्सॉन का मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को शरीर से निकालकर न्यूरोन के अंतिम छोर अर्थात् एण्डब्रश तक पहुँचा देना होता है। इस तरह, तंत्रिका आवेग एक्सॉन द्वारा बाहर निकल जाता है। इस तरह एक न्यूरोन इस क्रम में कार्य करता है-तंत्रिका आवेग (nerve impulse) को पहले शाखिका (dendrite) द्वारा ग्रहण किया जाता है और उसे कोशशरीर (cell body) की ओर भेज दिया जाता है। कोशशरीर उसे ग्रहण कर लेता है तथा एक्सॉन कोशशरीर से आ रहे तंत्रिका आवेग को एण्डब्रश होते हुए बाहर निकाल देता है अर्थात् दूसरे न्यूरोन में भेज देता है। स्पष्ट हुआ कि शाखिका तंत्रिका आवेग का एक ग्रहण केन्द्र (receiving centre) है जबकि एक्सॉन (axon) एक सुप्दगी केन्द्र (delivery centre) है।

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प्रश्न 6.
मस्तिष्क के कार्यों के अध्ययन के लिए किन-किन विधियों का उपयोग होता है। उनकी विवेचना करें।
उत्तर:
स्नायुमंडल या तंत्रिका तंत्र या मस्तिष्क की रचना एवं इसके कार्य के अध्ययन के लिए कई प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ प्रमुख विधियों का वर्णन यहाँ किया जा रहा है –

1. वर्णनात्मक विधि या अभिरंजन विधि (Staining method):
यह विधि तंत्रिका तंत्र की रचना के अध्ययन की सबसे प्राचीन विधि है। इस विधि का व्यवहार गोल्गी (Golgi) ने स्नायु-मंडल के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा उनके कार्य के अध्ययन में किया। इस विधि में स्नायु-कोश को रजित करने (रंगने) का प्रयास किया जाता है। चूँकि स्नायु-कोश पर किसी रंग का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता है, इसलिए स्नायु के माइलीन आवरण को रंगने का प्रयास किया जाता है। रंगों का व्यवहार दो प्रकार से किया जाता है। एक तो यह कि केवल तन्तुओं (Fibres) को रंगा जाता है और दूसरे प्रकार के रंग से केवल कोशिका-शरीर (Cell body) को रजित किया जाता है।

पहले प्रकार की कार्य-विधि को वेगर्ट विधि कहते हैं और दूसरे प्रकार की कार्य-विधि को नीसिल विधि (Nissil method) कहते हैं। रेजित तंतु या कोशिका-शरीर को माइक्रोस्कोप की मदद से देखा जाता है। रंगे हुए तन्तु या कोशिका-शरीर को देखने में आसानी होती है और इस आधार पर उनकी रचना को समझने का प्रयास किया जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके द्वारा तंतुओं तथा कोशिका-शरीर का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से संभव होता है। लेकिन इस विधि का दोष यह है कि इसके द्वारा सभी तन्तुओं का अध्ययन नहीं किया जा, सकता है। कारण यह है कि कुछ ऐसे तंतु हैं जिन पर माइलिन आवरण नहीं होता है। अत: इस प्रकार के तन्तुओं पर रंगों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

2. मस्तिष्क परिवर्तन-विधि (Brain changes method):
मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा इनके कार्यों के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार किया जाता है। यहाँ यह देखने का प्रयास किया जाता है कि मनोवैज्ञानिक परिचालन (Manipulation) के कारण प्राणी के मस्तिष्क में कोई परिवर्तन होता है या नहीं और यदि परिवर्तन होता है तो मस्तिष्क के किस भाग में होता है। प्राणी को संवेदी वचन या संवेदी समृद्धि (Sensory Enrichment) से प्रभावित किया जाता है और यह देखने का प्रयास किया जाता है कि प्राणी के मस्तिष्क में कोई रचनात्मक या रसायन परिवर्तन होता है या नहीं।

लेकिन, इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसका उण्योग मनुष्य पर नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क में वातावरण के कारण होनेवाले रसायन-परिवर्तन तथा संरचनात्मक परिवर्तन का अध्ययन कठिन है। इसीलिए इस विधि का उपयोग केवल चूहे आदि छोटे-छोटे पशुओं पर किया जाता है। लेकिन पशुओं पर प्राप्त निष्कर्ष को मनुष्यों पर उसी रूप में लागू करना पूरी तरह सही नहीं हो पाता है।

3. विद्युत अभिलेखन-विधि (Electrical recording method):
स्नायुमंडल और खासकर मस्तिष्क के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार बड़े पैमाने पर होता है। इस विधि में स्नायुकोष या मस्तिष्क के किसी भाग में होने वाले विद्युत-प्रवाह को रेकार्ड (Record) कर लिया जाता है। प्राणी को किसी उत्तेजना से प्रभावित किया जाता है और मस्तिष्क के किसी भाग में उत्पन्न विद्युत-परिवर्तन को एलेक्ट्रोड (Electrode) द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है। इस प्रकार के विद्युत परिवर्तन को उत्पन्न अन्तःशक्ति (Evoke Potential) कहते हैं।

यह विधि स्नायु मंडल या मस्तिष्क के अध्ययन के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुई है। टोवे ने इस विधि का उपयोग बिल्ली पर किया और ज्ञानवाही कॉर्टेक्स के कार्य को देखने का प्रयास किया। उन्होंने बिल्ली के ज्ञानवाही कॉर्टेक्स में एक बड़े आकार का एलेक्ट्रोड लगा दिया, फिर उसके ज्ञानवाही मार्ग (Sensory Path) को उत्तेजित करके अन्तःशक्ति जमा हो गयी। इससे पता चला कि ज्ञानवाही कार्य वास्तव में ज्ञानवाही कॉर्टेक्स द्वारा नियंत्रित होता है। लेकिन, यह विधि खतरनाक है। इसलिए मनुष्य पर इसका व्यवहार करना कठिन है। दूसरी बात यह है कि इस विधि के उपयोग के लिए बड़े प्रशिक्षित तथा योग्य स्नायु-विशेषज्ञ (Neurologist) की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में अध्ययन के गलत हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।

4. उत्तेजना-विधि (Stimulation method):
स्नायुमंडल और विशेष रूप से मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए उत्तेजना करके यह देखने का प्रयास किया जाता है कि इससे प्राणी के व्यवहार में कोई परिवर्तन होता है या नहीं। उत्तेजन को स्वतंत्र चर (Independent Variable) और इससे उत्पन्न प्रतिक्रिया को आश्रित चर माना जाता है। साधारण अर्थ में उत्तेजन को कारण तथा प्रतिक्रिया को प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स के भिन्न-भिन्न भागों के कार्यों को जानने का प्रयास किया जाता है और देखा जाता है कि इससे प्राणी में कौन-सी नई प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।

विश्वास कर लिया जाता है कि उस प्रतिक्रिया का नियंत्रण कॉर्टेक्स के उसी भाग द्वारा होता है। जैसे-किसी चूहे के पृष्ठ-खण्ड (Occipital Lobe) को बिजली द्वारा उत्तेजित करने से यदि चूहे में देखने संबंधी क्रिया का आधार कॉर्टेक्स का पृष्ठ-खण्ड है। लेकिन इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसको व्यवहार में लाने के लिए कुशल तथा प्रशिक्षित शारीरिक मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है।

5. क्षति-विधि (Lesion method):
स्नायु-मंडल या मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार व्यापक रूप से होता रहा है। फ्लोरेंस तथा रोलैन्डो को इस विधि का पथप्रदर्शक समझा जाता है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को नष्ट कर दिया जाता है और देखा जाता है कि इसके कारण प्राणी की कौन-सी क्रिया क्षतिग्रस्त होती है। जैसे-कॉर्टेक्स के पृष्ठ-खण्ड को काट देने पर यदि प्राणी में देखने की क्षमता समाप्त हो जाती है तो समझा जाता है कि दृष्टि-संवेदना का नियंत्रण पृष्ठ-खण्ड द्वारा होता है। इसी तरह मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों द्वारा होने वाले कार्यों को निर्धारित कर लिया जाता है।

6. क्यूरेर-विधि (Curare method):
मस्तिष्क के अध्ययन के लिए हार्लो एवं स्टेगनर (Halow and Stegner) ने 1933 में एक विधि निकाली जिसको क्यूरेर-विधि कहते हैं। क्यूरेर एक प्रकार की औषधि है जो मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका में अधिक व्यवहार किया जाता है। इसके उपयोग से दैहिक मांसपेशियाँ निष्क्रिय (Inactive) हो जाती हैं। इसका प्रभाव उप-कॉर्टेक्स पर नहीं पड़ता है। इसलिए जब उप-कॉर्टेक्स से संबंधित कार्य का अध्ययन करना होता है तो कॉर्टेक्स को क्यूरेर के प्रभाव से निष्क्रिय बना दिया जाता है। इससे कॉर्टेक्स से होनेवाली क्रियाएँ रुक जाती हैं। फिर प्राणी को कोई क्रिया सिखाई जाती है।

प्राणी जब उस क्रिया को सीखने में सफल होता है तो इससे साबित हो जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उप-कॉर्टेक्स द्वारा होता है। क्यूरेर के प्रभाव के समाप्त हो जाने के बाद भी यदि वह क्रिया जारी रहती है तो समझा जाता है कि उस क्रियापर कॉर्टेक्स का कोई बाधक प्रभाव नहीं है तो समझा जाता है कि उस पर उप-कॉर्टेक्स के साथ-साथ कॉर्टेक्स का भी नियंत्रण रहता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स तथा उप-कॉर्टेक्स द्वारा होनेवाले कार्यों का अध्ययन किया जाता है।

इस विधि का एक लाभ यह है कि इससे पशु को कोई हानि नहीं होती है। कारण यह है कि क्यूरेर का प्रभाव जब समाप्त हो जाता है तो मस्तिष्क का वह भाग पहले की तरह काम करने लगता है। यह गुण ‘उन्मूलन या क्षति-विधि’ में नहीं है, क्योंकि उस विधि में स्नायु को एक बार जब काट दिया जाता है तो फिर वह काम के लायक नहीं हो पाता है। इस प्रकार, क्यूरेर विधि में पशुओं की क्षति नहीं होती है, जबकि उन्मूलन विधि में पशुओं की क्षति होती है। लेकिन, इतना होने पर भी क्यूरेर-विधि की उपयोगिता बहुत सीमित है।

7. अपकर्षण विधि (Degeneration method):
स्नायु-मंडल के अध्ययन के लिए अपकर्षण-विधि या अप-विकार विधि का भी व्यवहार किया जाता है। अपकर्षण का अर्थ यह है कि जब स्नायु-मंडल के किसी क्षेत्र को नष्ट किया जाता है या काटा जाता है तो उस क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्र भी विघटित या अपकर्षित हो जाता है। उस क्षेत्र के बर्बाद होने से या विघटित होने से यदि कोई क्रिया रुक जाती है तो समझा जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उसी क्षेत्र द्वारा होता है। इस प्रकार, स्नायुओं के अपकर्षण के आधार पर स्नायु-कोशों के संबंधों का पता लगाया जाता है और उनके द्वारा संचालित होनेवाली क्रियाओं का निरूपण किया जाता है।

8. रासायनिक विधि (Chemical method):
स्नयु-मंडल अथवा मस्तिष्क के अध्ययन के लिए रसायन-विधि का व्यवहार भी किया जाता है। वास्तव में यह विधि विद्युत-उत्तेजन विधि का ही एक रूप है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को बिजली से उत्तेजित न करके किसी रासायनिक पदार्थ से उत्तेजित किया जाता है। जैसे-कुचालक एक काफी प्रभावशाली रासायनिक पदार्थ है जिसके द्वारा मस्तिष्क के किसी भाग को उत्तेजित किया जाता है और इससे जो परिवर्तन होता है उसे एलेक्ट्रोड द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है।

कभी-कभी एलेक्ट्रोड के बदले छोटे पिपेट से होकर रासायनिक पदार्थ को थोड़ी मात्रा में मस्तिष्क के किसी विशेष भाग पर डालकर उसे उत्तेजित करता है तथा उससे संचालित होनेवाली क्रिया का अध्ययन करता है। इस विधि का उपयोग भिन्न-भिन्न प्रेरक संरचना (Mechanism) से संबंधित प्रयोग में किया गया है।

ग्रौसमैन (Grossman 1960) ने इस विधि का व्यवहार प्यास तथा भूख प्रेरकों को संचालित करनेवाले मस्तिष्क के भागों को निर्धारित करने के लिए किया और देखा कि इस तरह के अध्ययन के लिए यह विधि काफी उपयोगी है। इस प्रकार, मस्तिष्क या स्नायु मंडल के अध्ययन के लिए कई विधियों का व्यवहार किया जाता है। प्रत्येक विधि के अपने गुण-दोष हैं। अत: आवश्यकता के अनुसार अधिक-से-अधिक विधियों का व्यवहार करके विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
प्रतिवर्त धनु से आप क्या समझते हैं? इस धनु में सम्मिलित शारीरिक अंगों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति एक एक स्वचालित (automatic) एवं जन्मजात अनुक्रिया है। आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने से पलक का बंद हो जाना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के शारीरिक आधार (bodily base) को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में स्नायु प्रवाह स्नायुओं और अंगों से होकर गुजरता है, उन सभी को प्रतिवर्त धनु के अंदर समझा जाता है।

वास्तव में सहज क्रिया एक सरलतम मानसिक क्रिया है। इसके होने के लिए सर्वप्रथम उद्दीपन ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) को उत्तेजित करता है जिससे ज्ञानेन्द्रिय में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (sensory nerve) से होता हुआ सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका (association nerve) होते हैं। वे तंत्रिका आवेग को गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देते हैं।

तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रिया न्यूरोन द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों या कर्मेन्द्रियों में पहुँचाए जाते हैं। इसके फलस्वरूप व्यक्ति सहज क्रिया कर पाता है। इस प्रक्रिया में ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) से सुषुम्ना तथा सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों तक के सभी रास्तों को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। प्रतिवर्त धनु के उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके संचालन में शरीर के निम्नांकित छह अंगों की भूमिका प्रधान होती है –

1. ज्ञानेन्द्रिय (Sense organ):
मानव शरीर में कुछ खास-खास अंग हैं जो विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाओं को ग्रहण करते हैं। इन अंगों को ज्ञानेन्द्रिय या ग्राहक (receptor) कहा जाता है। व्यक्ति की प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय द्वारा एक विशेष प्रकार की उत्तेजना ग्रहण की जाती है जिसके कारण ही संबंधित उद्दीपण (stimulus) का ज्ञान होता है। जैसे, आँख द्वारा प्रकाश या रोशनी को, कान द्वारा आवाज को, नाक द्वारा गंध को, जीभ द्वारा स्वाद को तथा त्वचा द्वारा स्पर्श को ग्रहण किया जाता है।

2. संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (Sensory nerve):
ज्ञानेन्द्रिय से सुषुम्ना तथा मस्तिष्क तक आने वाली तंत्रिका को संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका कहा जाता हैं। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय का संबंध ऐसी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना से होता है। जब उपयुक्त उद्दीपन (appropriate stimulus) किसी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करता है, तब उसमें तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है जो संबद्ध संवेदी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। जैसे, वस्तु से हमारी त्वचा जब छू जाती है तब त्वचा में उत्पन्न तंत्रिका आवेग वेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुबुन्ना में पहुँचता है।

3. साहचर्य तंत्रिका (Association nerve):
साहचर्य तंत्रिका सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तथा गति तंत्रिकाओं से संबंध स्थापित करना है, क्योंकि कार्यात्मक रूप से इनका एक छोर संवेदी तंत्रिका से तथा दूसरा छोर गति तंत्रिका से मिला होता है। सुषुम्ना इन्हीं के द्वारा प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन करता है। तब तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है तब साहचर्य तंत्रिका उसे सुषुम्ना गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देता है।

4. गतिवाही तंत्रिका (Motor nerve):
गतिवाही तंत्रिका मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों (motor organs) से जोड़ता है। जब सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका द्वारा तत्रिका आवेग गतिवाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है, तब गतिवाही तंत्रिका उसे तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों (मांसपेशियों) तक ले जाता है। फलस्वरूप, सुषुम्ना का आदेश कर्मेन्द्रिय को प्राप्त होता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई अनुक्रिया करता है।

5. कर्मेन्द्रिय (Motor organ):
कर्मेन्द्रियों द्वारा व्यक्ति अनुक्रियाएँ करता है। कर्मेन्द्रियों में सामान्यत: पेशियों एवं ग्रन्थियों को रखा जाता है। इन्हें प्रभावक (effectors) भी कहा जाता है। प्रतिवर्त क्रिया में सुषुम्ना का आदेश इन कर्मेन्द्रियों तक पहुँचता है और व्यक्ति अनुक्रिया कर बैठता है। प्रतिवर्त धनु में इस तरह से शरीर के छह अंगों की क्रियाशीलता होती है जिसे एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि रात्रि में हम कहीं जा रहे हैं।

अचानक कोई व्यक्ति आँख पर टॉर्च से तीव्र रोशनी डालता है। ऐसी परिस्थिति में आँख का पलक स्वतः बंद हो जाएगा जो एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। इस उदाहरण में सर्वप्रथम टॉर्च की रोशनी आँखों पर पड़ती है जिससे आँखें उत्तेजित हो जाती हैं और तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न हो जाता है।

यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में स्थित साहचर्य तंत्रिका के द्वारा यह तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है जो इसे आँख एवं पलक की मांसपेशियों (muscles) तक पहुँचा देता है और उसके फलस्वरूप पलक बंद हो जाता है। टॉर्च की रोशनी आँख पर पड़ने के बाद पलक बंद होने की अनुक्रिया इतनी तेजी से होती है कि यह पता नहीं चलता कि इसका संचालन तथा नियंत्रण कहीं से (अर्थात सुषुम्ना से) हो रहा है।

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प्रश्न 8.
सुषुम्ना या मेरुरज्जु की संरचना या बनावट तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) को दो भागों में बाँटा गया है सुषुम्ना (spinal cord) तथा मस्तिष्क (brain):
सुषुम्ना की संरचना-सुषुम्ना रीढ़ की हड्डी, जो कमर से गर्दन तक फैली है, के भीतर उपस्थित होती है। इस हड्डी के भीतर एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसमें लगभग 18 इंच लंबा एक मोटा तंतु है। इसे ही सुषुम्ना कहा जाता है। इसका रंग ऊपर से उजला तथा भीतर से धूसर (grey) होता है। ऊपर से नीचे तक सुषुम्ना में कुल 3 भाग (divisions) होते हैं। प्रत्येक भाग से मेरुदण्डीय तंत्रिका (spinal nerves) का एक जोड़ा (pair) निकलता है। इस जोड़े में एक तंत्रिका भाग शरीर के बाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं तथा दूसरी तंत्रिका द्वारा शरीर के दाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं।
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चित्र: सुषुम्ना का कटा हुआ भाग का चित्र

सुषुम्ना को यदि कहीं से काटा जाए, तब इसकी भीतरी संरचना या बनावट एक ही समान दीख पड़ती है। चित्र में सुषुम्ना के एक ऐसे कटे हुए भाग को दिखाया गया है। इस चित्र में गौर करने से यह स्पष्ट हो जाता है। सुषुम्ना के बीच का भाग, जिसका रंग धूसर (grey) होता है, एक तितली के समान होता है। सुषुम्ना के बीच के भाग के चारों तरफ उजला पदार्थ (white matter) होता है जिससे होकर अनेक तंत्रिका तंतु ऊपर से नीचे की ओर और नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सूचनाएँ सुषुम्ना में आती हैं तथा नीचे से ऊपर जानेवाली तंत्रिका तंतु से सूचनाएँ सुषुम्ना से मस्तिष्क में जाती हैं।

सुषुम्ना द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. तंत्रिका आवेग का संरचण (Transmission of nerve impulse):
सुषुम्ना का प्रधान काम तंत्रिका आवेग का संचरण करना है। ऐसे संचरण के माध्यम से वह मस्तिष्क का संबंध शरीर के अन्य भागों से जोड़ पाता है। संचरण का अर्थ होता है शरीर से आनेवाले तंत्रिका आवेगों को मांसपेशियों तथा ग्रथियों से भेजना। शरीर के भिन्न-भिन्न भागों (सिर एवं गर्दन को छोड़कर) से आनेवाले तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उसे मस्तिष्क में पहुँचाता है।

फिर मस्तिष्क द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों को भेजी जानेवाली सूचनाओं को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उपयुक्त अंगों में ले जाने के लिए उन्हें पेशीय या गति न्यूरोन (motor neuron) में छोड़ देता है। इस तरह, सुषुम्ना द्वारा तंत्रिक आवेग के संचरण का कार्य संपन्न होता है।

2. प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संरचण (Conduct and control of reflex action):
प्रतिवर्त क्रिया का नियंत्रण एवं संचालन भी सुषुम्ना द्वारा किया जाता है। प्रतिवर्त क्रिया से तात्पर्य एक ऐसी जन्मजात, सरल एवं अनैच्छिक (involuntary) क्रिया से होती है जो किसी उद्दीपन के प्रति की जाती है।

जैसे किसी गर्म वस्तु से अंगुली स्पर्श हो जाने से अंगुली. को खींच लेना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। उसी तरह आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक बंद होना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रियाएँ इतनी जल्दी हो जाती हैं कि लगता है मानो वे अपने-आप हो गईं। परंतु, सच्चाई यह है कि इसका नियंत्रण एवं संचालन इसी सुषुम्ना द्वारा होता है।

चूँकि सुषुम्ना ऐसी क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण अपने स्तर से मस्तिष्क से मिलनेवाली सूचना के बिना इंतजार किए ही करता है, अतः यह स्वचालित (automatic) होता प्रतीत होता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सुषुम्ना की संरचना तथा बनावट में थोड़ी जटिलता है तथा इसके द्वारा तंत्रिका आवेगों का संचरण तथा प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संचालन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं।

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प्रश्न 9.
वृहत मस्तिष्क की बनावट और क्रियाओं का वर्णन करें।
Or, मानव वृहत मस्तिष्क की ज्ञानवाही एवं गतिवाही क्रियाओं की व्याख्या कीजिए।
Or, प्रमस्तिष्क की बनावट या कार्यवाही की व्याख्या करें।
उत्तर:
वृहत मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) मनुष्य मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख भाग मस्तिष्क है जिसे मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) भी कहते हैं। हमारी सभी चेतन क्रियाओं का संचालन और विभिन्न मानसिक अनुभवों का नियंत्रण प्रमस्तिष्क के ही द्वारा होता है। उदाहरणार्थ, प्रत्यक्षण, सोचना, विचारना, तर्क करना, कल्पना करना आदि हमारी सभी मानसिक क्रियाओं का संचालन प्रमस्तिष्क का उद्गम स्थान है। ऊपर की सतह को देखने से मस्तिष्क का यह भाग कहीं दबा हुआ तो कहीं उभरा हुआ मालूम होता है।

दबे हुए भाग को दरार या फिसर या सलकस (Fissure or Sulcus) कहते हैं। इस तरह के दो दबे हुए भागों के बीच के भाग को ‘गाइरस’ (Gyrus) की संज्ञा दी जाती है। उभरे हुए भागों को रीजेज (Ridges) कहते हैं। कोर्टेक्स की दरारें या फिसर दो भागों में बँटती हैं। दो भागों में बाँटने वाली लम्बी दरार का नाम रोलैण्डो या मध्य दरार (Rolando or central) है। एक दूसरी दरार या फिसर भी है, जिसे सिलभीयस (Fissure or Sylvius) की दरार कहते हैं। इन दरारों द्वारा कोर्टेक्स चार भागों में बँटा है –

  1. पृष्ठ पालि (Occipital lobe)
  2. मध्यपालि (Pariental lobe)
  3. अग्र-पालि (Frontal lobe) तथा
  4. शंख पालि (Temporal lobe)

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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

वृहत मस्तिष्क के विभिन्न भागों के कार्यों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवेदी कार्य (Sensory functions)
  2. पेशीय कार्य (Motor functions) तथा
  3. साहचर्यात्मक कार्य (Associative functions)

इन तीनों प्रकार के कार्यों का संचालन एवं नियंत्रण प्रमस्तिष्क के कुछ खास केन्द्रों के द्वारा होता है।

(I) मस्तिष्क द्वारा संचालित ज्ञानात्मक क्रियाएँ (Sensory functions of the cortex):
किसी भी उद्दीपन का ज्ञान होने के पीछे कुछ खास क्रियाएँ होती हैं। सबसे पहले उद्दीपन किसी ज्ञानेन्द्रिय के सहारे ग्रहण किया जाता है। फलतः ज्ञानेन्द्रिय तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग जब किसी खास तरह की तंत्रियों के सहारे वृहत मस्तिष्क या प्रमस्तिष्क के किसी भाग में पहुँचता है तो प्रमस्तिष्क के सहारे उस उद्दीपन का संवदेन और ज्ञान होता है। इस प्रकार किसी भी उद्दीपन का ज्ञान प्रमस्तिष्क के द्वारा ही होता है।

प्राणी के वर्तमान सम्पूर्ण ज्ञानात्मक अनुभवों को तीन वर्गों में रखा गया है –

(क) शारीरिक परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न अनुभव जिसके अन्तर्गत ताप, स्पर्श एवं शारीरिक गति का अनुभव रखा गया है।
(ख) दृष्टि-सम्बन्धी अनुभव, जैसे-रंग को देखना या रंगों को ठीक से नहीं पहचानना आदि।
(ग) श्रवण-सम्बन्धी अनुभव (Auditory Sensitivity), जैसे-ठीक से सुनना या सुनने में कमजोरी आदि।

इन तीन वर्गों का ज्ञानात्मक अनुभव या आधार-स्थान भी मस्तिष्क में अलग-अलग पाया गया है। उदाहरणार्थ, शारीरिक परिवर्तन में उत्पन्न अनुभव का आधार मस्तिष्क का वह भाग है जो रोलैण्डों के फीसर के ठीक पीछे पैरीटल कौर्टेक्स में स्थित है। शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा में स्थित ग्राहक कोशों से चलकर जो स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क के इस भाग में पहुँचते हैं वे हममें ताप एवं स्पर्श के अनुभव को उत्पन्न करते हैं। साथ ही साथ, शारीरिक अंगों के संचालन से उत्पन्न अनुभव की भी आधारशिला पैरीटल कौर्टेक्स का वही भाग है जो रोलैंडो के ठीक पीछे है। पैरीटल कौर्टेक्स के इस भाग को हम सोमेस्थेटिक (Somesthetic) भाग कहते हैं।

सोमेस्थेटिक भाग के कार्य –

1.  सोमेस्थेटिक भाग ताप एवं स्पर्श की संवेदनाओं का नियंत्रण एवं संचालन करता है। पीड़ा के अनुभव के लिए कौर्टेक्स का नहीं, बल्कि थैलेमस की आवश्यकता होती है।

2. दाहिने सोमेस्थेटिक भाग के द्वारा शरीर के बायें भाग में उत्पन्न ताप एवं गति के अनुभव नित्रित एवं संचालित होते हैं। बायें सोमेस्थेटिक भाग का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से रहता है।

3. त्वचा सम्बन्धी उत्तेजनाओं की शक्ति के लिए कौर्टेक्स की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि थैलेमस की है, कारण कि थैलेमस में इतनी सामर्थ्य है कि वह त्वचा सम्बन्धी संवेदनाओं को उत्पन्न, नियंत्रण एवं संचालित कर सकता है। इसलिए असाधारण स्थिति में कौर्टेक्स का सहयोग त्वचा संबंधी संवेदना की उत्पत्ति एवं नियंत्रण में रहते हुए भी इसके अभाव से उनकी उत्पत्ति एवं नियंत्रण में किसी प्रकार की बाधा नहीं होती है।

4. दृष्टि सम्बन्धी संवेदना प्रमस्तिष्क की पृष्ठ-पालि के द्वारा होती है। यही कारण है कि पृष्ठ-पालि को दृष्टि-संवेदन क्षेत्र कहा गया है। आँख में आनेवाले तंत्रिका आवेग प्रमस्तिष्क के इसी खण्ड से आते हैं जिनके फलस्वरूप हमें दृष्टि संबंधी प्रेरणा होती है। पृष्ठ-पालि के दो भाग हैं-बायाँ भाग और दाहिना भाग। दोनों आँखों में बायीं ओर आने वाला तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के बायें भाग में जाता है और दोनों आँखों की दाहिनी ओर से उत्पन्न तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के दाहिने भाग में जाता है।

अतः पृष्ठ-पालि का यदि कोई एक भाग क्षतिग्रस्त हो जाय तो दोनों आँखों की आधी रोशनी समाप्त हो जायेगी। पेनफील्ड एवं इरीक्शन महोदय ने अपने प्रयोग द्वारा मस्तिष्क के दृष्टि भाग और दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों के बीच स्पष्ट सम्बन्ध दिखलाया है। एक औरत जिसका दृष्टि भाग कौर्टेक्स को चीर-फाड़ के लिए खोला गया था, उसके उस दृष्टि भाग के विभिन्न हिस्सों पर बिजली से उत्तेजनाएँ हो गयीं। इस प्रकार उन हिस्सों को बिजली द्वारा उत्तेजित किये जाने पर औरत ने लाल, नीले आदि रंगों के अनुभव को प्राप्त किया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कोर्टेक्स की दृष्टि भाग का सम्बन्ध दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों से है।

5. श्रवण:
सम्बन्धी अनुभवों का आधार मस्तिष्क की शंख-पालि (Temporal lobe) है। यही कारण है कि इसे मस्तिष्क का श्रवण-संवेदी क्षेत्र भी कहते हैं। यह शंख-पालि दो भागों में बँटी रहती है, किन्तु प्रत्येक भाग में दोनों कानों से तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं। इसलिए शंख पालि के किसी एक भाग के क्षतिग्रस्त होने से श्रवण सम्बन्धी संवेदना में कुछ कमी आ जाती है। किन्तु, इससे व्यक्ति पूर्णतः बहरा नहीं हो जाता है। जबकि शंख पालि के दोनों भागों के क्षतिग्रस्त हो जाने पर व्यक्ति पूर्णतः बहरा हो जाता है।

(II) कौटॅक्स द्वारा नियंत्रित एवं संचालित गतिवाही क्रियाएँ (Motor functions of the cortex):
मनुष्यों के गतिवाही क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण रौलेंडो दरार (Fissure of Rolando) के अग्र भाग से लगे पतले से लम्बे भाग द्वारा होता है। इन कोशों से लगे हुए मुख्य तंतु (Axon) होते हैं। पिरामिड की शक्ल के इन कोशों को अगर नष्ट कर दिया जाता है तो वे मुख्य तंतु जो बिल्कुल इनसे सटे रहते हैं, मरने लगते हैं। ऐसे मरे हुए स्नायु तंतु सुषुम्ना एवं सुषुम्नाशीर्ष में भी पाये जाते हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पिरामिड की शक्ल के जीव कोशों का सम्बन्ध सुषुम्ना एवं सुषुम्ना शीर्ष में पाये जानेवाले स्नायु-तंतुओं से भी है।

मस्तिष्क के दायें अर्द्धखण्ड में स्थित गतिवाही क्षेत्र (Motor area) के नष्ट होने से शरीर के बायें अंग में होने वाली ऐच्छिक क्रियाओं में ह्रास देखा जाता है। इसी प्रकार दायें अंगों में होनेवाली ऐच्छिक क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार क्रियाओं का संचालन सहज धनु ही करता है। जिसके लिए वर्तमान सभी शारीरिक अवयव, जैसे-ग्राहक इन्द्रिय ज्ञानवाही स्नायु कोश, सुषुम्ना, गतिवाही स्नायु कोष, मांसपेशियाँ एवं पिंड अपने कार्यों के बिना किसी रुकावट के करतें ‘घाये जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को नष्ट कर देने पर कुछ क्रियाओं का सम्पन्न होना बिल्कुल असम्भव-सा हो गया है। किन्तु व्यक्ति में यह अवस्था बहुत दिनों तक नहीं रहती है। धीरे-धीरे ऐसा होता है कि विनष्ट भाग के निकट जीव-कोष नष्ट हुये जीव कोशों के कार्य-भार को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, जिससे वे असम्पन्न हुई क्रियाएँ भी सम्पन्न होने लगती हैं।

मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को जब बिजली द्वारा उत्तेजित किया गया तो इससे निम्नलिखित परिणाम निकले –

(क) जब मस्तिष्क के ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों को उत्तेजित किया जाता है तो शरीर के निचले अंगों में क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दाहिने अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के बायें हिस्से के निचले अंगों की क्रियाओं का संचालन होता है तथा बायें अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के दाहिने भाग के अंगों का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

(ख) मस्तिष्क के निचले भाग का गतिवाही क्षेत्र चेहरे से सम्बन्धित रहता है। अतः इसके उत्तेजित किये जाने पर चेहरा का फड़कना, मुँह का खुलना और बन्द हो जाना आदि क्रियाएँ शुरू हो जाती हैं। ऊपर के वर्णन से यह स्पष्ट है कि दाहिने गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से और बायें गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के दाहिने भाग से रहता है। साथ ही साथ ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के निचले अंगों से और निचले गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के ऊपरी भागों से रहता है।

(III) कौटॅक्स द्वारा सम्पादित एवं नियंत्रित साहचर्य क्रियाएँ (Associative functions of the cortex):
प्रामाणिक अग्रपालि (Frontal lobe) में जो बड़ा-सा क्षेत्र पाया जाता है उसका कार्य हमारे उच्च मानसिक प्रक्रमों के सम्पादन में सहायता करता है। कौर्टेक्स के विभिन्न भाग जटिल मानसिक-क्रियाओं का सम्पादन करते हैं। पढ़ने के बाद समझने की क्रिया का सम्पादन दृष्टि साहचर्य भाग (Visual associative area) करता है, सार्थक रूप से बोलने और लिखने की क्रिया का सम्पादन गतिवाही साहचर्य (frontal association) करता है।

इस सभी भागों में किसी एक भाग को ही अगर नष्ट कर दिया जाय तो उसपर आश्रित क्रियाएँ सम्पादित नहीं हो सकेंगी। अन्य प्रकार की क्रियाओं का सम्पादन बड़ी आसानी से हो जाता है। अत: गतिवाही साहचर्य क्षेत्र के नष्ट करने पर व्यक्ति आवाज पैदा कर सकता है, हाथों में कलम देने पर इधर-उधर चला जा सकता है, परन्तु वह सार्थक शब्द-समूह को नहीं उत्पन्न कर सकता है और न ही कलम से दो-चार-दस शब्द लिख ही सकता है, जिसका कोई अर्थ हो। इस प्रकार साहचर्य भाग के विनाश के साथ-साथ जटिल मानसिक क्रियाओं की सार्थकता भी जाती रहती है।

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प्रश्न 10.
परिधीय स्नायु-मंडल क्या है? इसके कौन-कौन प्रकार हैं?
उत्तर:
स्नायु-मंडल का यह भाग शरीर के परिधीय भागों में रहता है। इसलिए इसे हम परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। यह मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर सीमान्त प्रदेशों या शरीर की परिधि में फैले हुए हैं। इसी कारण शरीर की परिधि में पाये जाने वाले स्नायु कोशों के संगठन को परिधीय स्नायु-मण्डल कहा जाता है। इस स्नायु-मण्डल का सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का सम्बन्ध केन्द्रीय स्नायु-मण्डल से ज्ञानवाही एवं क्रियावाही स्नायु-कोशों द्वारा स्थापित करता हैं। इस प्रकार परिधीय स्नायु-मण्डल के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं –

(क) ग्राहकेन्द्रियाँ
(ख) ज्ञानवाही स्नायु-कोश
(ग) कर्मेन्द्रियाँ-माँसपेशियाँ और ग्रन्थियाँ तथा
(घ) गतिवाही स्नायु-कोश

परिधीय स्नायु-मण्डल को उसके कार्यों के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है –

  1. ज्ञानवाही परिधीय.स्नायु-मण्डल
  2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल

1. ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल-परिधीय स्नायु-मण्डल के इस भाग का सम्बन्ध शरीर के विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों का संबंध केन्द्रिय स्नायु-मण्डल से स्थापित करता है। इस बात के स्पष्टीकरण के लिए एक उदाहरण लें। किसी मंदिर में घंटी बजती है। हम उस घंटी की आवाज को कान से सुनते हैं। कान ही आवाज को ग्रहण करते हैं। अतः कान आवाज के ग्राहक हैं। परन्तु इस आवाज का ज्ञान हमें मस्तिष्क से प्राप्त होता है।

कान और मस्तिष्क के बीच ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कार्य करता है। जब कान आवाज को ग्रहण करते हैं तब कान के ग्राहक कोष उत्तेजित हो जाते हैं। फलतः ज्ञानवाही स्नायु-प्रवाह उत्पन्न होते हैं। इस स्नायु-प्रवाह को मस्तिष्क में पहुँचाने का काम ज्ञानवाही स्नायु करता है। इन क्रियाओं के बाद ही हमें मंदिर की घंटी की आवाज का ज्ञान होता है। ज्ञानवाही स्नायु-कोष स्नायु प्रवाहों को ज्ञानेन्द्रियों से मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं इसलिए इसे ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल अन्य ज्ञानेन्द्रियों का भी सम्बन्ध सुषुम्ना और मस्तिष्क के साथ स्थापित करता है।

2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल:
परिधीय स्नायु-मण्डल का जो भाग मस्तिष्क एवं सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों तथा मांसपेशियों और ग्रन्थियों से सम्बन्धित करता है उसे हम गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। इस स्नायु-मण्डल का कार्य मस्तिष्क या सुषुम्ना के आदेश को कर्मेन्द्रियों तक पहुँचाना है। इसके ऐसा करने पर ही व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है। इसे एक उदाहरण की सहायता से हम स्पष्ट कर सकते हैं। मान लीजिए आप पढ़ रहे हैं। कोई व्यक्ति दरवाजा खटखटाता है।

दरवाजा खटखटाने की आवाज को आपके कान ग्रहण करते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है। मस्तिष्क दरवाजा खोलने का आदेश देता है। यह आदेश गतिवाही स्नायु-प्रवाह के रूप में गतिवाही स्नायु-कोश द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों तक पहुँचता है। तदुपरान्त आप दरवाजा खोलने की क्रिया करते हैं। इस प्रकार गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के क्रियात्मक आवेग गतिवाही अवयवों, मांसपेशियों और ग्रन्थियों तक पहुँचाये जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

परिधीय स्नायु-मण्डल के कुछ ज्ञानवाही और गतिवाही स्नायुओं का कार्य मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित कराना है और कुछ को सुषुम्ना के साथ। मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को मस्तिष्क-स्नायु तथा सुषुम्ना के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को सुषुम्ना-स्नायु कहते हैं। चूँकि स्नायु कोश पूर्णत: स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं अतः परिधीय स्नायुमण्डल को दो भागों में बाँटा गया है –

  1. परिधीय दैहिम स्नायुमंडल तथा
  2. परिधीय स्वतः संचालित स्नायुमण्डल।

परिधीय दैहिक स्नायुमण्डल के स्नायु-कोशों की क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों द्वारा संचालित होती हैं। परन्तु ये स्नायु कोश मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर शरीर के परिधीय भागों में स्थित हैं। व्यक्ति को इन स्नायुओं द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाओं का ज्ञान होता है। व्यक्ति इन क्रियाओं पर अपना नियंत्रण भी रखता है। ये स्नायु बाहरी वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। प्रत्येक स्नायु कोश स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत रूप से कार्य करता है। इसमें ज्ञानवाही तथा गतिवाही दोनों प्रकार के स्नायु रहते हैं।

परिधीय स्वतः
संचालित स्नायु-मण्डल का निर्माण ऐसे स्नायु कोशों से हुआ है जिनकी क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों के अधीन नहीं रहती हैं। अत: व्यक्ति को इन स्नायुकोशों द्वारा होनेवाली क्रियाओं का ज्ञान नहीं होता। व्यक्ति का इन पर नियंत्रण भी नहीं रहता है। ये मस्तिष्क और सुषुम्ना के बाहर ही रहते हैं। ये शरीर के आंतरिक वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। इनके स्नायु-कोश सामूहिक रूप से कार्य करते हैं। इसमें केवल गतिवाही स्नायुकोश ही रहते हैं।

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प्रश्न 11.
अन्तःस्रावी ग्रंथि से आप क्या समझते हैं? इसके प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं, जिससे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। इस तरह की ग्रंथियों को अंतःस्रावी ग्रंथि तथा इससे निकलने वाले स्राव को हॉरमोन्स कहते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रंथियों में निम्नलिखित प्रमुख हैं –

1. थाइरॉयड ग्रंथि:
जब ग्रंथि का स्थान कण्ठ के निकट होता है। इससे थाइरॉक्सिन का स्राव होता है। थायरॉयड ग्रंथि से जब स्राव बहुत कम मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति में मानसिक मन्दता तथा उदासीनता छा जाती है। जब इससे स्राव अधिक मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति अधिक क्रियाशील रहता है। उसका रक्तचाप बढ़ा रहता है, भूख अधिक लगती है, ऐसा व्यक्ति चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है।

2. पाराथायरॉयड ग्रंथि:
पारा थायरॉयड ग्रन्थि का स्थान भी कण्ठ के समीप ही रहता है जिसमें चार छोटी-छोटी ग्रंथियों होती हैं। पाराथायरॉयड का स्राव शरीर में कैलसियम की मात्रा को निर्धारित करता है। इस ग्रंथि से अधिक मात्रा में स्राव होता है, जिससे व्यक्ति में शिथिलता बढ़ जाती है तथा कम मात्रा में स्राव होने से तनाव होती है। व्यक्ति में घबराहट होती है तथा चिड़चिड़ा हो जाता है।

3. पिट्यूटरी ग्रंथि:
पिट्यूटरी ग्रंथि का स्थान मस्तिष्क में होता है। यह ग्रंथि शरीर के सभी ग्रंथियों को नियंत्रित करती है, इसीलिए इसे Master gland भी कहा जाता है। यदि किसी बच्चे के पिट्यूटरी ग्रंथि का स्राव कम मात्रा में होता है तो उसका शारीरिक विकास रुक जाता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः बौना रह जाता है। उसमें आलसी के लक्षण विकसित हो जाते हैं तथा यौन अंगों का विकास अवरुद्ध हो जाता है और यदि अधिक मात्रा में स्राव होता है, तो व्यक्ति का कद काफी लम्बा हो जाता है और उसमें क्रियाशीलता अधिक हो जाती है।

4. एड्रिनल ग्रंथि:
एड्रिनल ग्रंथि किडनी के ठीक ऊपर होता है। यह एक महत्त्वपूर्ण ग्र!ि है। इसे Emergency gland भी कहा जाता है। एड्रिनल ग्रंथि से दो प्रकार के स्राव निकल है जिसको कार्टिन तथा एड्रीनलिन कहा जाता है । एड्रीनलिन हमारे शरीर के लिए काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इससे रक्तचाप, हृदय गति, शरीर में रक्त की आपूर्ति अधिक होती है। इसमें संवेग की अवस्था में समायोजन में सहायता मिलती है।

5. गोनाड्स ग्रंथि:
गोनाड्स को यौन-ग्रंथि भी कहा जाता है। यह स्त्रियों और पुरुषों में अलग-अलग होता है। पुरुषों के यौन-ग्रंथि को Testes तथा स्त्रियों के यौन-ग्रंथि को Ovary कहा जाता है। पुरुषों में पुरुषों के गुण तथा स्त्री में स्त्रियों के गुणों का विकास होना इन्हीं ग्रंथियों पर निर्भर करता है। पुरुषों में मूंछों का निकलना, आवाज का मोटा होना तथा स्त्रियों में स्तनों का विकास, जाँघों की गोलाई इसी के स्राव पर निर्भर करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद की नींव किसने डाली –
(a) वुण्ट
(b) कोहल
(c) वाटसन
(d) मैस्लो
उत्तर:
(c) वाटसन

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प्रश्न 2.
गुणसूत्र किस पदार्थ से बने होते हैं –
(a) जीन
(b) डी एन ए
(c) खत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) डी एन ए

प्रश्न 3.
हमारी आँखों कितनी परतों से बनी होती है –
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 4
उत्तर:
(c) 3

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प्रश्न 4.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई है –
(a) न्यूरोन
(b) कपाल
(c) टेक्टम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) कपाल

प्रश्न 5.
मानव शरीर में कोशों की संख्या है –
(a) लगभग 1 करोड़
(b) लगभग 10 करोड़
(c) लगभग 10 अरब
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) लगभग 10 अरब

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प्रश्न 6.
मानव मस्तिष्क में संधि की संख्या कितनी होती है?
(a) 1 लाख
(b) 1 करोड़
(c) 10 करोड
(d) 1 अरब
उत्तर:
(c) 10 करोड

प्रश्न 7.
कान के नली की लंबाई होती है –
(a) 20 मी०मी०
(b) 25 मी०मी०
(c) 30 मी०मी०
(d) 32 मी०मी०
उत्तर:
(b) 25 मी०मी०

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प्रश्न 8.
आँख में पटलों की संख्या कितनी होती है?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 9.
जो प्रयोग करता है उसे कहा जाता है –
(a) प्रयोगकर्ता
(b) प्रयोग
(c) चर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रयोगकर्ता