Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions प्रतिपूर्ति Chapter 1 पागल की डायरी

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions प्रतिपूर्ति Chapter 1 पागल की डायरी (लू शुन)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions प्रतिपूर्ति Chapter 1 पागल की डायरी (लू शुन)

पागल की डायरी पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
30 वर्ष तक अन्धकार में रहने के पश्चात् जब पागल की डायरी कहानी का नायक बहार निकला तो उसे क्या अनुभव हुआ ?
अथवा,
‘पागल की डायरी’ के नायक को क्यों ऐसा अनुभव हुआ कि सभी लोग उसी की बात कर रहे हैं।
उत्तर-
‘पागल की डायरी’ कहानी का नायक तीस वर्षों तक अन्धकार में समय गुजारने के पश्चात् जब बाहर कदम रखा तो उसे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सभी लोग उसे एक विचित्र नजर से घूरते थे। यहाँ तक कि चाओ साहब भी उसे देखकर डर गए। उनके घर के आस-पास सात-आठ दूसरे लोग भी थे जो उसी के विषय में डरे हुए से फुसफुसा कर आपस में बातें कर रहे थे। कोई भी व्यक्ति उसके सामने आने की हिम्मत नहीं करते लेकिन सभी उसका खून कर देना चाहते थे। लेकिन वह डरा नहीं, साहस नहीं खोया, अपनी राह चलता गया।

कुछ बच्चे उसके आगे आगे जा रहे थे, वे भी सहमे हुए डरे हुए उसी की ही बात कर रहे थे। उसने सोचा कि इन बच्चों का मैंने क्या बिगाड़ा है। इन्होंने तो मुझे पहले कभी देखा भी नहीं है। हठात् उसने बच्चों के पुकारा, मरग सभी बच्चे भाग गए। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था उसका किसी से झगड़ा भी नहीं है। तीस वर्ष पहले सिर्फ पुराने पंथी समाज का, सामन्ती उत्पीड़न का विरोध किया था। लेकिन उस विराध से चाओ साहब का क्या लेना-देना। वह राह चलते लोगों का उसके विरुद्ध भड़काते रहते हैं। अजीब परिस्थिति है। वह जिधर नजरें उठाता है, उधर ही लोग उसकी हत्या करने के घात में हैं। इस तरह, वह अजीब परेशानी का अनुभव कर रहा था।

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प्रश्न 2.
‘पागल की डायरी’ में तत्कालीन समाज का कैसा चित्र प्रस्तुत किया गया है?
उत्तर-
प्राचीन काल में चीन में सामन्ती प्रथा थी। सामंत अत्यन्त क्रूर और अत्याचारी थे। बिना अच्छी तरह साचे-विचारे कभी भी किसी को कठघरे में बन्द करवा देते। लोगों से बेगार लिया करते। कहानीकार ने लिखा है-“इन लोगों को देखा-कई लोगों को मजिस्ट्रेट कठघरे में. बन्द करवा चुके हैं। बहुत से लोग आस-पास के अमीर-उमरावों से मार खा चुके हैं, बहुतों की बीबियों को सरकारी अमले के लोग छीन ले गए हैं।” जहाँ तक सेठ साहूकारों की बात है, वे भी कम अत्याचारी नही थे। कर्ज समय पर नहीं चुकाने पर उनके चिह्न अमानवीय व्यवहार करते ‘थे। यही कारण है कि साहूकारों के जुर्म से बचने के लिए लोग आत्महत्या करने से भी नहीं चुकते थे। लेकिन आम जनता मूक थी।

वे इनके अन्याय सहन के अभ्यस्त हो चुके थे। किसी में भी उनके विरुद्ध प्रतिवाद का स्वर मुखरित करने की हिम्मत नहीं थी। समाज के लोग आदमखोर बन चुके थे। भूख की ज्वाला शान्त करने के लिए अपनी संतान तक को नहीं बख्सते, उन्हें भी मार कर खा जाते। एक औरत अपने बेटे को पीट-पीटकर कर चीखकर कहती है, “बदमाश कहीं का तेरी चमड़ी उधेड़ दूंगी। तेरी बोटी-काट डालूँगी।”

इतना ही नहीं वे लोग निरीह राहगीरों तक को भी नहीं छोड़ते थे। जैसा कि कहानीकार में लिखा है-“कुछ दिन पहले की बात है। शिशु भेड़िया गाँव से हमारा एक आसामी फसल के चौपट होने की खबर देने आया था। उसने मेरे बड़े भाई को बताया कि गांव के सब लोगों ने मिलकर देहात के एक बदनाम दिलेर गुंडे को घेर लिया और कलेजा निकाल दिया, उन्हें तेल में तला और बाँट कर खा गए कि उनका हौसला भी बढ़ जाए।”

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इस तरह हम पाते हैं कि चीन की तत्कालीन समाज बर्बर, आदमखोर, विचारहीन तथा क्रूरता की पराकाष्ठा पर था।

प्रश्न 3.
‘पागल की डायरी’ कहानी के नायक को कैसे ज्ञात हुआ कि उसका बड़ा भाई आदमखोर है और उसकी हत्या करना चाहता है?
उत्तर-
एक दिन कहानी का नायक कोठरी में बंद रहते-रहते ऊब गया। वहाँ उसका दम घुट रहा था। उसने छन से आँगन में निकलने की इच्छा प्रकट की। छन ने उसके बड़े भाई की सहमति पर उसे घर से बाहर निकलने के लिए दरवाजा खोल दिया। उसी क्षण उसका बड़ा भाई एक बुजुर्ग को साथ लेकर आ गया। बुजुर्ग का परिचय उसने हकीम के रूप में भाई से कराया। दरअसल वह बुजुर्ग कोई और नहीं एक जल्लाद था। वह नब्ज टटोलने के बहाने उसके शरीर में माँस का अनुमान लगा रहा था।

वह अभी दुबला पतला था, अत: उसे बेफिक्र होकर खाने और आराम करने की सलाह देकर वहाँ से चला जाता है। बाहर आने पर हकीम और बड़े भाई में जो बातचीत हुई उससे स्पष्ट हो गया कि उसका भाई उसे खा जाने के लिए षड्यंत्र रच रहा था। लेकिन कायरता के कारण घटना को अंजाम देने में असमर्थ था। बड़े भाई ने पाँच वर्ष की छोटी बहन को मार कर खा गया था। उसकी माँ सिर्फ रोती रही, बोली कुछ भी नहीं। इन बातों से कहानी के नायक को पता चला कि उसका भाई आदमखोर है और उसकी भी हत्या करने को तत्पर है।

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प्रश्न 4.
‘पागल की डायरी’ के नायक का भाई ने कब और किस बात पर क्रोधित होकर उसे पागल घोषित कर दिया?
उत्तर-
एक दिन कथा-नायक अपने भाई से कुछ कहने की अनुमति मांगी। भाई का आदेश पाकर, कहना प्रारंभ किया। आदिम अव्यवस्था में प्रायः लोग नर-माँस खा लेते होंगे। पर जब लोगों का जीवन बदला उनके विचार बदले तो वे नर-माँस खाना छोड़ दिया। वे अपना जीवन सुधारना चाहते थे, अतः उनमें मानवता आ गई। लेकिन कुछ लोग आज भी मरगमच्छों की तरह नर-मांस खाए जा रहे हैं। नर-मांस नहीं खाने वाले लोग, नर-माँस खाने वाले को हेय की दृष्टि से देखते हैं।

प्राचीन अभिलेख के अनुसार ई या ने अपने बेटे का माँस ही राज्य के राजा हान को परोसा था। लेकिन अब तो सब कुछ बदल गया है, सिर्फ नहीं बदले हैं यहाँ के लोग। पिछले साल भी शहर में एक अपराधी की गर्दन काट दी गई थी। खून बहता देख तपेदिक का एक मरीज ने उसके खून में रोटी डुबोकर खायी थी। आप लोग आज मुझे खाने को व्याकुल हैं। फिर कल आपकी बारी आएगी। ये लोग आपको भी खा जायेंगे। फिर ये लोग आपस में एक-दूसरे को नहीं छोड़ेंगे। अगर आप लोग इस मार्ग को छोड़ दें तो सभी सुख-चैन से रह सकेंगे।

हमलोग आपस में एक दूसरे पर दया कर सकते हैं। पर आप लोग अपनी लालच नहीं दबा पा रहे हैं। छोटे भाई की इन उपदेशात्मक बातों को सुनकर बड़ा भाई क्रोधित हो गया। वह अपने छोटे भाई को पागल घोषित कर दिया क्योंकि वह तो आदमखोर था। अपने भाई का माँस खाने के लिए व्याकुल था।

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पागल की डायरी पाठ का सारांश – लू शुन (1880-1936)

प्रश्न-
लू शुन द्वारा लिखित ‘पागल की डायरी’ नामक पाठ का सारांश लिखें।
उत्तर-
लू शुन (1880-1936) चीनी कथाकारों में सर्वाधिक ख्यात हैं। साहित्यकार और विचारक के रूप में वे जितने महान थे उतनी ही महानता उन्हें एक क्रांतिकारी लेखक के रूप में भी प्राप्त है। चीन की सांस्कृतिक क्रांति के मुखिया होने के कारण वे राष्ट्रनायक के रूप में मान्य है। उनकी कहानियाँ समाज के प्रति मानवीय संवेदना को उजागर करती है। उनकी अधि कांश कहानियाँ सन् 1918 से लेकर 1925 के मध्य लिखी गई हैं। चीनी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद को प्राप्त है, वही पहचान चीनी कहानी-साहित्य के क्षेत्र में लू शुन को प्राप्त है। उनकी कहानियों में खुग-इ-ची, औषधि मेरा पुराना घर, गुजरे जमाने का दर्द, नववर्ष की पूजा, एक पागल की डायरी प्रमुख हैं।

‘पागल की डायरी’ महान क्रांतिकारी कहानीकार लू शुन की सर्वाधिक सशक्त, यथार्थवादी और प्रभावकारी कहानी है। इसमें पुरातनपंथी समाज का यथार्थ विश्लेषित हुआ है। सामाजिक यथार्थ का ऐसा निर्मम विश्लेषण अन्यत्र दुर्लभ है। इस कहानी में किये गये पागल के निम्न कथन में सामंतवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का उद्घोष स्पष्ट ध्वनित होता है-“मैं इस ओर ध्यान देता हूँ पर हमारे इतिहास में तो इसका कोई क्रमबद्ध विवरण है ही नहीं, फिर मैंने शब्दों के भीतर छिपे अर्थों को पढ़ना शुरू किया तो पाया कि पूरी किताब तीन ही शब्दों से भरी पड़ी है-लोगों को खाओ।”

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लेखक ने स्कूल के दिनों के दो साथी थे। दोनों भाई थे जिनके नाम अज्ञात हैं, जो लेखक नहीं बताता है। उन दोनों भाइयों से लेखक या काफी मेल-मिलाप रहता था पर इधर दोनों से संपर्क प्रायः टूट गया था। जब कहीं से लेखक ने उन दोनों भाइयों में से एक बीमार होने के बारे में सुना तो अपने गाँव जाते हुए लेखक ने दोनों साथियों से मिलने का मन बनाया। बल्कि वहाँ पहुँचकर लेखक एक भाई से मिला भी जिससे लेखक को यह जानकारी मिली कि उसका छोटा भाई बीमार है। दूर से मिलने आये अपने लेखक साथी से मिलकर मित्र को अपने प्रति लेखक का स्नेह कहीं अधिक महसूस हुआ।

बाद में अपने मित्र से लेखक को यह मालूम हुआ कि उसका छोटा भाई अब ठीक है और वह सरकारी नौकरी में लग गया है। यह बताने के बाद लेखक को उसके मित्र ने हँसते-हँसते मोटी-मोटी जिल्दों में लिखी दो डायरी दिखायी तत्पश्चात् दोनों डायरी लेखक की ओर बढ़ाते हुए उसके मित्र ने यह कहा कि-“अगर कोई इस डायरी को पढ़ ले तो भाई की बीमारी का रहस्य समझ जाएगा और अपने पुराने दोस्त को दिखा देने में हर्ज क्या है।”

अपने घर लाकर लेखक ने दोनों डायरी आद्यंत पढ़ डाली जिसमें मित्र के भाई की बीमारी का रहस्य यह मालूम हुआ कि-“बेचारा नौजवान अजीब आतंक और मानसिक यंत्रणा से पीड़ित था। लिखावट बहुत उलझी-उलझी असंबद्ध थी। कुछ बेसिरपैर के आरोप भी थे। पृष्ठों पर तारीखें नहीं थीं। जगह-जगह स्याही के रंग और लिखावट के अंतर से अनुमान हो सकता था किये जब-तब आगे-पीछे लिखी गई चीजें होंगी। कुछ बातें संबद्ध भी जान पड़ती थीं और समझ में आ जाती थीं।”

लेखक के उस मित्र का छोटा भाई नौकरी मिलने से पूर्व बीमार था। उसकी बीमारी का रहस्य यह था कि वह युवा बेरोजगारी के दिनों में डिप्रेशन का शिकार था। आतंक और मानसिक यंत्रण से पीड़ित उस युवा को अपनी ओर घूरते चाओ परिवार का कुत्ता देखकर यह लगता कि वह उसका खून करना चाहता है। भय और आतंक के कारण उसे लगता कि दिखायी देने वाले सारे लोग आदमखोर हैं-

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“मैं निडर हूँ, साहसी हूँ, इसीलिए तो वे लोग मुझे खा जाने के लिए और अधिक आतुर हैं, ताकि मेरा दमदार कलेजा खाकर उनका हौसला और बढ़ सके। बूढा हकीम उठकर चल दिया। जाते-जाते भैया के कान में कहता गया, “इसे अभी खाना है!” भैया ने झुककर हामी भर दी। अब समझ में आया! विकट रहस्य खुल गया। मन को धक्का तो लगा, पर यह तो होना ही था। मुझे मालूम ही था, मेरा अपना ही भाई मुझे खा डालने के षड्यंत्र में शामिल है! यह आदमखोर मेरा अपना ही बड़ा भाई है! मैं एक आदमखोर का छोटा भाई हूँ!

मुझे दूसरे लोग खा जाएंगे, लेकिन फिर भी मैं एक आदमखोर का छोटा भाई हूँ!” अपना बड़ा भाई भी उस युवा को आदमखोर दिखायी दिया! तभी तो वह कहता है-“बड़ा भाई का क्या कहना, वे तो आदमखोर हैं ही। जब मुझे पढ़ाते थे तो अपने मुँह से कहते थे, “लोग अपने बेटों को एक-दूसरे से बदलकर उन्हें खा जाते हैं” और.एक बार एक बदमाश के लिए उन्होंने कहा था कि उसे मार डालने से ही क्या होगा, “उसका गोश्त खा डालें और उसकी खाल का बिछावन बना डालें” तब मेरी उम्र कच्ची थी। सुनकर दिल देर तक धड़कता रहा।

जब शिशु-भेड़ियाँ गाँव के आसामी ने एक बदमाश का कलेजा निकालकर खा जाने की बात कही थी-तब भी भैया को कुछ बुरा नहीं लगा था। सुनकर चुपचाप सिर हिलाते रहे थे, जैसे ठीक ही हुआ हो। मुझसे छिपा गया है, वे तो पहले की तरह खूखार है। चूँकि “बेटों को एक-दूसरे से बदलकर उन्हें खा जाना” संभव है, तो फिर हर चीज को बदला जा सकता है, हर किसी को खाया जा सकता है। उन दिनों भैया जब ऐसी बातें समझाते थे तो मैं सुन लेता था, सोंचता नहीं था।

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पर अब खूब समझ में आता है कि ऐसी बातें कहते समय उनके मुँह में नर-माँस का स्वाद भर आता होगा और उनका मन मनुष्य को खाने के लिए व्याकुल हो उठता होगा।” ___कभी उसे लगता कि चाओ परिवार का कुत्ता जो बबरशेर की तरह खूखार, खरहे की तरह कातर, लोमड़ी की तरह धूर्त है फिर उसकी ओर घूरते हुए भौंक रहा है। उसे यह भी लगता है कि परिणाम के भय से वे (चाओ) मार डालने को तैयार नहीं है, पर षड्यंत्र रचकर जाल बिछाने में पीछे नहीं है। आत्महत्या कर लेने के लिए जैसे विवश कर रहे हैं। अनेक पुरुषों और स्त्रियों के बर्ताव के साथ वह अपने बड़े भाई का रंग-ढंग भी काफी गंभीरता से भाँप रहा है।

नर-माँस खाने वाले आदिम लोग की बात याद करने की कोशिश वह अवश्य करता है पर उसका क्रमबद्ध इतिहास उसे नहीं मिलता है। फिर भी उसे यह लगता है कि सारे लोग उसे खा जाना चाहते हैं बल्कि सारे लोगों में उसे अपना बड़ा भाई भी शामिल नजर आता है तभी तो वह भाई से कहता है-

“बात कुछ खास नहीं है, पर कह नहीं पा रहा हूँ। भैया, आदिम व्यवस्था में तो शायद सभी लोग थोड़ा बहुत नर-माँस खा लेते होंगे। जब लोगों को जीवन बदला, उनके विचार बदले, तो उन्होंने नर-माँस त्याग दिया। वे लोग अपना जीवन सुधारना चाहते थे। इसलिए वे सभ्य बन गए, उनमें मानवता आ गई। परंतु कुछ लोग अब भी खाए जा रहे हैं मगरमच्छों की तरह।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions प्रतिपूर्ति Chapter 1 पागल की डायरी (लू शुन)

कहते हैं जीवों का विकास होता है, एक जीव से दूसरा जीव बन जाता है। कुछ जीव विकास करके मछली बन गए हैं, पक्षी बन गए हैं, बदर बन गए हैं। ऐसे ही आदमी भी बन गया है।” एक पुरानी कहानी का हवाला देते हुए वह यह भी कहता है कि-“पुराने समय में ई या ने अपने बेटे को उबालकर च्ये और चओ के सामने परोस दिया था।”

एक दिन दरवाजे बंद कोठरी में खाना खाते हुए चापस्टिके ने जैसे ही उठाई तो उसे अपनी छोटी बहन की मृत्यु की घटना स्मृत हो आयी-“वह भैया की ही करतूत थी। तब मेरी बहन केवल पाँच वर्ष की थी। कितनी प्यारी और निरीह थी वह ! याद आती है तो चेहरा आँखों के सामने घूम जाता है।

माँ रो-रोकर बेहाल हो रही थी। भैया माँ को सांत्वना देकर समझा रहे थे, कारण शायद यह था कि स्वयं ही बेचारी को खा गए थे। इसलिए माँ को इस तरह रोते देखकर उन्हें शर्म आ रही थी।” उसे नर-माँस खाने वाले आदमखोर के रूप में अपने पूर्वज भी दिखायी देते हैं जो धीरे-धीरे सभ्य हुए। वह नहीं चाहता है कि नई पीढ़ी के छोटे बच्चे नर-माँस खाने की ओर बढ़ें।

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प्रस्तुत कहानी में चीन में लंबे समय तक चले सामंती उत्पीड़न के इतिहास की प्रस्तुति हुई है। ‘नर-माँस खाने’ की बात से यहाँ सामंती उत्पीड़न ही संकेतित हुआ है। अपनी बेराजगारी के दिनों में डिप्रेशन का शिकार वह युवा लोगों को देखकर लगातार यही सोचता रहा कि सभी लोग जिनमें उसका अपना भाई भी शामिल है, उसे खा जाना चाहते हैं। वस्तुतः इस कहानी में चीन के तत्कालीन सामन्ती समाज में शोषण को दर्शाया गया है।

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

मातृभूमि पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यह कविता किसे संबोधित है?
उत्तर-
यह कविता माता, मातृभूमि और मातृभाषा को सम्बोधित है।

प्रश्न 2.
कवि ने स्वयं को मेले में खोए बच्चे-सा दौड़ना कहा है। उन्होंने अपनी गति की तुलना समुद्र से की है। कवि ने ऐसी तुलना क्यों की है? काव्य पंक्तियों को उद्धत करते हुए स्पष्ट करें।
उत्तर-
कवि ने स्वयं को मेले में खोए बच्चे-सा दौड़ता कहा है। उन्होंने अपनी गति की तुलना समुद्र से करते हुए कहा है कि-“और मैं मेले में खोए बच्चे-सा दौड़ता हूँ तुम्हारी ओर जैसे वह समुद्र जो दौड़ता आ रहा है छाती के सारे बटन खोले हहाता।”

कवि आर्थिक उदारीकरण के आधुनिक युग में सामाजिक विषमता के मेले में खो गया है। मेले में खोए बच्चे को अगर उसकी जननी का अक्स अकस्मात दिखाई पड़े तो उत्कट अभिलाषा से आवेशित होकर वह तूफानी वेग से अपनी माता की ओर दौड़ पड़ता है-अपनी मैया के ममता भरी आँचल के शीतल छाँव में। समुद्री तूफान को कोई सीमा या दिशा रुकावट नहीं डाल सकती वैसे ही माँ और शिशु का मिलन कवि द्वारा बच्चे की गति की तुलना समुद्री गति से कर कवि ने वात्सल्य की वाटिका को गौरवान्वित किया है।

वस्तुतः कवि के दृष्टिकोण, सोच और संवेदना एक स्वावलम्बी, समृद्ध और समतामूलक समाज का मूर्त रूप देखना चाहता है और आशा की किरण देखते ही समुद्री वेग से अपने लक्ष्य को पाने के लिए दौड़ता है। कवि वैश्विकता से उपजे घोर आर्थिक विषमता के बीच अपने को मेले में खोए बच्चों के रूप में पाता है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

प्रश्न 3.
‘वे मजदूर सो सोख रहे हैं बारिश मिट्टी के ढेले की तरह’ कवि ने मजदूरों के लिए ऐसी उपमा क्यों दी हैं?
उत्तर-
कवि ने मजदूर को मिट्टी के ढेले सादृश्य प्रतिपादित किया है। इस कविता में आर्थिक विषमता पर करारा व्यंग किया गया है। मिट्टी के ढेले के समान मजदूर अतृप्त रहता है। मिट्टी के ढेले पर बारिश पड़ने पर वह सोख लेता है उसी प्रकार मजदूर जो कि आर्थिक विपन्नता से भरे हैं, थोड़ी सी मजदूरी से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। आर्थिक उदारीकरण के वर्तमान युग में आर्थिक गति की बाढ़ सी आ गई है, परन्तु मजदूरों का उनका उचित मेहताना भी नहीं मिलता; वे आर्थिक विषमता से अभिशप्त है।

वैश्विकता के इस युग में वर्षा (अर्थ) का अधिक से अधिक हिस्सा हड़प लेने की मनसा लिए हमारे प्रतिनिधि (साँद) खुलेआम विचरण कर रहे हैं। हमारे परिवेश में उपलब्ध साधन केवल दबंगों के निमित्त ही रह जाता है। मजदूर तो कोमल हाड़-मांस से सृजित है परन्तु अभिशप्त है, वर्षा की बूंदे सोखने के लिए। जब तक वे वर्षा में भीगेगे नहीं तबतक उनके परिवार की जठराग्नि शान्त नहीं होगी। मजदूरी रूपी वर्षा तो उनके परिवार में ऐसे ही विलीन हो जाता है जैसे वर्षा की बूंदों को मिट्टी की ढेले सोख लेता है।

प्रश्न 4.
नीचे उद्धत काव्य पंक्तियों का मर्म उद्घाटित करें
“घर के आँगन में वो नवोढ़ा भींगती नाचती और काले पंखों के नीचे कौवो के सफेद रोएँ तक भीगते और इलाइची के छोटे-छोटे दाने इतने प्यार से गुत्थमगुत्था ये सब तुम्ही तो हो”
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी भावधारा के ध्वजावाहक कविवर अरुण कमल रचित ‘मातृभूति’ शीर्षक कविता से उद्धत हैं। कवि व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए जड़ और चेतन दोनों में मातृभूमि की तस्वीर देखता है।

वर्षा प्रकृति का वरदान है जिससे पृथ्वी पर जीवन का संचार होता है। परन्तु वर्षा में घर के आँगन में नव नवेली दुल्हन भींगती है और कौओं के उपरी पंख भिंगने के बाद आवरण से ढंका सफेद रोएँ भी भीग गये हैं। इलाइची के दाने भी वर्षा की बूंदों से तृप्त होकर आपस में गुथमगुत्था हो गए हैं। इन सभी रूपों में “हे मातृभूमि तुम्हीं तो प्रतिबिंबित होती हो।”

कवि ने समाज में विभाजित आर्थिक विषमता जो कि क्रमशः उच्चवर्ग, मध्यम वर्ग तथा निम्नवर्गों की दशा और दिशा की ओर संकेत किया है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

प्रश्न 5.
“आज जब भीख में मुट्ठी भर अनाज भी दुर्लभ है तब चारों तरफ क्यों इतनी भाप फैल रही है गर्म रोटी की”-यह कैसी भाप है? इस भाप के इतना फैलने में किस तरह की व्यंजना है?
उत्तर-
कवि समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता से व्याकुल है। वह परोक्ष रूप से हमारी शोषणपूर्ण तथा घोर विषम अर्थव्यवस्था पर की करारी चोट की है। साथ ही साथ हमें आर्थिक विषमताजन्य स्थिति और परिस्थिति को समाप्त करने की दिशा में सोचने के लिए वाध्य करती है।

कवि का इशारा आर्थिक उदारीकरण की ओर है। कवि कहना चाहता है जब भीख माँगने आशय है कि औद्योगिक क्रान्ति, बौद्धिक जागरण और वैश्विकता के इस दौड़ में मानवीय संवेदना स्वयं तक सिमट कर रह गई है। बौद्धिक छल-बल के बीच मानव कराह रही है।

प्रश्न 6.
कई दिनों से भूखे-प्यासे कवि को माँ किस रूप में दिखलाई पड़ती है? कवि ने किन स्थानों के बच्चों का उल्लेख कविता में किया है, और क्यों?
उत्तर-
कविवर अरुण कमल ने विपन्नता की मार से त्रस्त भूखे बच्चों की मार्मिक चित्रण किया है। भूखे बच्चे माँ की ओर मेवा, अखरोट, मखाना और काजू अर्थात सुख समृद्धि देने वाली करुणामय देवी के रूप दिखलाई पड़ती है।

कवि ने प्रकृति के क्रूर मजाक का शिकार आन्ध्रप्रदेश के किसानों के बच्चे, उड़ीसा के कालहाँड़ी के बच्चे और झारखण्ड के पलामू के बच्चे की दारुण दशा का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। प्रकृति के श्राप से अभिशप्त इन क्षेत्रों में पानी का तल काफी नीचे और जमीन ऊपर होने के कारण इन्हें ‘मौत का दूत’ के रूप में दुनियाँ देखती है। कवि चाहता है कि इन क्षेत्रों का भी उद्धार हो और वहाँ भी विकास की रोशनी पहुँचाई जाय।

प्रश्न 7.
“ये यतीम ये अनाथ ये बंधुआ
इनके माथे पर हाथ फेर दो माँ
इनके भींगे केश सँवार दो अपने श्यामल हाथों से”
-इन पंक्तियों का अर्थ लिखें। कवि ने यहाँ ‘भींगे केश’ क्यों लिखा है? अपनी कल्पना से उत्तर दें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी विचारधारा के कवि अरुण कमल रचित ‘मातृभूमि’ शीर्षक कविता से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि का दृष्टिकोण, सोच और संवेदना में दृढ़ता, गहराई, व्यापकता और अमोघता परिलक्षित होती है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

कवि कहना चाहता है कि मामूली कर्ज के बदले में पराधीन बेगारी की जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त अपने यतीम और अनाथ बच्चों को अपने श्यामल हाथों से आशीर्वाद देकर उनको बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराकर उसके जीवन को सँवार दो हे मातृभूमि।

कवि ने मातृभूमि से अपनी हाथों से ‘भीगे केश’ संवारने का अनुरोध किया है। ‘भीगे केश’ से कवि का अभिप्राय ‘गरीबी का बवंडर में उलझी जिंदगी’ से है। औद्योगीकरण, बौद्धिक जागरण और वैश्विकता के चक्रव्यूह में शोषित, दलित मानवता को पीसते देखकर कवि व्यथित हो उठा है। आधुनिक जीवन-शैली में जो त्वरित गति रो परिवर्तन हो रहा है उसका दुःप्रभाव समाज के साधनहीन वेवश गरीब मजदूर और किसानों पर पड़ रहा है।

बौद्धिक छल-बल के कारण व्यवहार और विचार में कहीं साम्यता नहीं है। समाज का एक बड़ा वर्ग कृषि जमीदारों तथा आधुनिक औद्योगिक जमींदारों की चक्की के दो पाटों के बीच उनकी स्वार्थपरता का शिकार हो रहा है। उनकी जिन्दगी ‘भींगे केश’ की भाँति इलझ कर खुद तक सिमट गई सी प्रतीत होती है।

प्रश्न 8.
‘तुम किसकी माँ हो मातृभूमि’-इस प्रश्न का मूल भाव आपके विचार में क्या है?
उत्तर-
‘तुम किसकी माँ हो मेरी मातृभूमि’ के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि वैश्विकता के इस आधुनिक युग में आज समाज का एक बड़ा तबका यतीम अंत अनाथ सदृश कृषि अथवा औद्योगिक बंधुआ मजदूर बनने को अभिशप्त है। समाज का एक तबका विकास की बाढ़ से सिंचित है तो दूसरा तबका शोषण, उत्पीड़न तथा भुखमरी का शिकार है।

वह मातृभूमि से पूछता है कि तुम किसकी माँ हो-सम्पन्नता के साँढ़ की या निर्धनता रूपी बकरा की। एक तरफ विकास का गगा बह रही है तो दूसरे तरफ साधनहीनता का रेगिस्तान। वस्तुतः कवि कहना चाहता है कि मानवीय जीवन में हम विकास की अनगिनत सोपानों पर बढ़े परन्तु बौद्धिक छल-बल के बीच मानवता पीस रही है, कराह रही है। संक्रमण के इस काल में मातृभूमि को ही फैसला लेना है ताकि मानवता खुशियों से लहलहा उठे।

प्रश्न 9.
और मैं भींज रहा हूँ
नाच रही धरती नाचता आसमान मेरी कील पर नाचता-नाचता
मैं खड़ा रहा भीजता बीचों-बीच।
-इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
कविवर अरुण कमल ने समाज में व्याप्त विषमता पर करारा चोट किया है। कवि आसमान और धरती के बीच खड़ा भीग रहा है। समाज का एक वर्ग अट्टालिकाओं और महलों के साये में विलासी जिन्दगी बिता रहा है तो दूसरा वर्ग आश्रय देने में असमर्थ झोपड़ी में शोषण पूर्ण तथा घोर विषम अर्थव्यवस्था में जी रहा है। कवि दोनों के बीच का केन्द्र अर्थात मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। कवि का भाव दोनों के बीच अर्थात् धरती और आसमान के बीच ‘भीजना’ है। कवि की संवेदना में व्यापक गहराई, अक्षुण्ण दृढ़ता, व्यापकता और अमोघता यथार्थ रूप में परिलक्षित होता है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

प्रश्न 10.
कविता में कवि ने स्वयं के भींगने को ‘भींजना’ कहा है जबकि सिंधु घाटी का चौड़े पट्टे वाला साँढ़, बच्चों के केश, नवोढ़ा या कौए के पंखों के लिए ‘भींगना’ ऐसा क्यों? क्या इसका कोई भौगोलिक भाषाई आधार है?
उत्तर-
कविता में कवि ने सिंधु घाटी का चौड़े पट्टे वाला साँढ़ को कृषि और औद्योगिक जमींदार तथा बच्चे, नवोढ़ा या कौए को यतीम, अनाथ और बंधुआ मजदूर का प्रतीक और खुद को दोनों के बीच अर्थात् मध्यम वर्ग का प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित किया है।

कवि ने स्वयं के लिए ‘भींजना’ कहकर अपने गँवई भाषा भोजपुरी के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित किया है। सिंधु घाटी की सभ्यता प्राचीन काल से ही समुन्नत एवम् सपन्नता के शिखर पर है। कवि का भोजपुर क्षेत्र अभी भी विकास की रोशनी से कोशों दूर है। दोनों क्षेत्रों के भौगोलिक और भाषाई आधार में जमीन और आसमान का अन्तर है।

प्रश्न 11.
शब्दों के प्रयोग में कवि अपनी पीढ़ी में अतिशय सावधान है। उसके सावधान शब्द प्रयोगों के कुछ उदाहरण कविता से चून कर उनका अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रगतिशील यथार्थवादी कवि अरुण कमल ने शब्दों के प्रयोग में परंपरा से अपना एक जीवंत और स्वतंत्र संबंध बनाया है। उनके शब्दों में हिन्दी और भारतीय धातु और प्रकृति है, तो वैश्विक उसका परिवेश और प्रत्यय। शब्दों के प्रयोग में कवि अपनी पीढ़ी में अतिशय सावधानी बरतने के कारण इनकी उपलब्धियाँ चढ़ती दोपहरी के समान है। भोजपुरी शब्दों का कविता में अतिशय प्रयोग कर कवि ने अपनी गँवई भाषा के प्रति श्रद्धा अर्पित की है।

कवि के सावधान शब्द प्रयोगों के उदाहरण भीजता, बँक, हहाता, ओट, छेके, बारिश, नवोदा, गुत्थमगुत्था, खुबनियाँ, चौखट, श्यामल, धूसर, छप्परों, देहरी, टेक, बंधुआ, अनाथ, सँवार और तकती आदि हैं। जिसका अर्थ क्रमशः भींजना, आच्छादित, उत्कट अभिलाषा से भरना, हलचल पैदा करती, सहारा, आरक्षित, वर्षा, नई नवेली दुल्हन, एक दूसरे से गुंथा हुआ, एक प्रकार का मेवा, कमरा का निकास द्वारा, साँवला, धूल से भरा, झोपड़ी का छत, दरवाजा, सहारा, मामूली कर्ज के बदले पराधीन बेगारी जिन्दगी जीने के लिए अभिषप्त व्यक्ति, सजाना है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

प्रश्न 12.
इस कविता में ‘माँ’ और मातृभूमि की छवियाँ एक-दूसरे में घुल-मिलकर एकाकार हो जाती है। तथा देश और काल के पटल पर माँ की प्रतिमा व्याप्ति और विस्तार पा जाती है। इस दृष्टि से कविता पर विचार करें और एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी भावधारा के उन्नायक कवि अरूण कमल ने ‘मातृभूमि’ कविता में आधुनिक भावबोध, सामयिक जीवनानुभव, संवेदना और कलात्मक उत्कृर्ष की प्राणाणिक और प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। इस कविता में जननी, जनमभूमि की मातृ-प्रतिमाएँ बिना अधिदैविक अथवा धार्मिक-दार्शनिक प्रतिपत्तियों, आशयों या विवक्षाओं के, एक दुसरे में घुल-मिलकर एकाकार हो जाती हैं।

मातृभूमि के संदर्भ में कवि के वैचारिक बिन्दुओं की आधुनिक परिवेश में अनन्य प्रस्तोता सदृश दिखते हैं। इस कविता में भारतीय सामाजिक और आर्थिक विषमता का अतीत तथा वर्तमान के सन्दर्भ में व्यंगात्मक चित्र प्रतिबिंबित किया गया है। हमारी मातृभूमि अपनी समृद्धि तथा उत्कर्ष के कारण विश्व के तल पर अतुलनीय तथा अन्यतम वर्तमान समय सुख-समृद्धि के साध्य की प्राप्ति के लिए अपेक्षित साधनों के वहन का सुखद काल है जिसका समुचित उपयोग से इसका भविष्य भी सिद्धि और सफलता का स्वर्णिम काल होगा।

कवि जननी और जन्मभूमि से आग्रह करता है कि औद्योगिक क्रान्ति, बौद्धिक जागरण और वैश्विकता के इस युग में भी समाज का एक बड़ा तबका शोषित, दलित तथा दारुण जीवन जीने को अभिशप्त है, उसकी जिन्दगी सँवार दो माँ! माँ तो वात्सल्य की वाटिका होती है। जिससे उसके पुत्र चैन की नींद लेते हैं। कवि ममता की मंजूषा से आग्रह करता है कि हे माँ, करूणामयी छाँव में तुम्हारी संतानों को तुम्हारे अलावे कोई भी देख नहीं सकता, एक तुम ही हो जो इन्हें शान्ति के शिविर और स्नेह के सुख-सदन तक पहुँचा सकती हो। माँ को बच्चों के दुःख से द्रवित होना पड़ता है।

कवि कहना चाहता है बौद्धिक छल-बल के बीच माँ की संतानों का एक तबका आर्थिक उदारीकरण की चक्का में पिसकर कराह रहा है। संकट की इस घड़ी से मुक्ति की युक्ति के लिए अन्वेषण-कार्य करने के लिए कवि माँ से प्रार्थना करता है।

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वस्तुतः कविवर अरुण कमल आधुनिक समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता, सामाजिक तनाव और वैमनस्यता को दूर करने के लिए माँ का आशीर्वाद चाहता है। उनका कहना है कि समाज के सारे अनर्थों की जड़ समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता और बौद्धिक छल-बल है। अगर हम प्रत्येक मनुष्य को अधिकार दें तो सारे अनर्थ एक ही साथ समाप्त हो जाएँगे।

हमें ऐसा समझना चाहिए कि भिन्न-भिन्न तबके के लोग एक दूसरे से भिन्न नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे-शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में किसी भी अंग के पीड़ित अथवा आनंदित होने से पूरा शरीर पीड़ित अथवा आनंदित होता है, उसी प्रकार किसी भी तबका के पीड़ित तथा आनंदित होने से सम्पूर्ण भारतवासियों को पीड़ा अथवा आनन्द की अनुभूति होनी चाहिए।

अगर कोई तबका आहत हो जाए तो दूसरे तबके का कर्तव्य है कि उसके जख्मों पर स्नेह का लेप लगा दे तो आहतों को पीड़ा अनुभव न हो पाएगा। कवि भारतवासियों से संकीर्णता के दायरे से ऊपर उठकर अपने विशाल हृदय का परिचय देने की आशा करता है, ताकि गरीब और अमीर घुल-मिल-कर एकाकार हो जाएँ।

प्रश्न 13.
मातृभूमि कविता का भावार्थ लिखिए? [B.M.2009(A)]
उत्तर-
अपने समकालीन समाज के विद्रूप चेहरे को प्रस्तुत करने वाली कविता मातृभूमि है, जिसके यशस्वी रचनाकार अरुण कमल हैं।

यहाँ कवि भारत के बच्चों के उस वर्ग की चर्चा करता है जो प्राकृतिक आपदाओं में अपने माँ-बाप खो चुका है और वर्तमान में पेट भरने के लिए कहीं बाल मजदूरी या बंधुआ मजदूरी कर रहा है। इनके दु:खों का कहीं अंत नहीं। ये बच्चे ममता से वंचित हैं। इनके सिर पर छत नहीं है। वर्षा में भीगते हुए ये अपना शोषण करा रहे हैं। कवि का ‘भींगे केश’ का उपयोग इस संदर्भ में है कि मौसम की मार से इनका बचाव करने वाला कोई नहीं। ये बच्चे ममता से पूर्णतः वंचित है। इन्हें भी स्नेह, प्यार, ममत्व भरा स्पर्श चाहिए, जो मातृभूमि ही दे सकती है। इसलिए मातृभूमि से कवि इन बच्चों के जीवन में प्रेम, आशा, ममता का संचार करने का आग्रह करता है।

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मातृभूमि भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के वचन परिवर्तित करें
पौधों, रास्ता, बकरियाँ, पेड़, मजदूर, पंखों, कौवों, रोटी, रूमाल, तश्तरी, गिलास, छप्परों, हाथों, किसानों।
उत्तर-
पौधों-पौधा, रास्ता-रास्ते, बकरियाँ-बकरी, पेड़-पेड़ों, मजदूर-मजदूरों, पंखों-पंख, कौवों-कौवा, रोटी-रोटियाँ, रूमाल-रूमालें, तश्तरी-तश्तरियाँ, गिलास-गिलासों, छप्परों, छप्पर, हाथों-हाथ, किसानों-किसान।

प्रश्न 2.
अनाथ शब्द में कौन-सा समास है?
उत्तर-
अनाथ शब्द में न समास है। नञ् समाज तत्पुरुष समास का वह भेद है जिसका प्रथम पद न, ना, अन् जैसे निषेधवाचक होता है।

  • अनाथ = न, नाथ
  • अनिष्ठ = न, इष्ट
  • अनजाना = न, जाना आदि।

प्रश्न 3.
कविता में उनपंक्तियों को चुनें जिनमें निजवाचक सर्वनामों का प्रयोग हुआ है?
उत्तर-
निवाचक सर्वनाम ‘आप’ है, जिसका उपयोग निश्चय, निरकारण, सर्वसाधारण और अवधारणा के अर्थ में होता है।

मातृभूमि कविता में निजवाचक सर्वनाम (आप) का प्रयोग हुआ ही नहीं है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखें आसमान, धरती, समुद्र, पेड़, माँ, दूध।
उत्तर-

  • आसमान – गगन, व्योम, आकाश
  • धरती – धरा, धरित्रि, पृथ्वी, भूमि
  • समुद्र-सागर, अर्णव, अम्बुपति
  • पेड़ – वृक्ष, रुख, तरु
  • माँ – माता, जननी
  • दूध – पय

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों से विशेषण चनें
उत्तर-
(क) और काले पंखों के नीचे कौवों के सफेद रोयें तक भीगते।
विशेषण-काले, सफेद

(ख) तब चारों तरफ क्यों इतनी भाप फैल रही है गर्म रोटी की।
विशेषण-इतनी गर्म।

(ग) धरती. का रंग हरा होता है, फिर सुनहला फिर धूसर।
विशेषण-हरा, सुनहला, धूसर।

(घ) इनके भीगे केश सँवार दो अपने श्यामल हाथों से।
विशेषण-भींगे, श्यामल।

(ङ) मेरे थके माथे पर हाथ फेरती तुम्हीं तो हो मुझे प्यार से तकती।
विशेषण-थके।

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अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

मातृभूमि दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मातृभूमि शीर्षक कविता का परिचय संक्षेप में दीजिए।
उत्तर-
अरुण कमल द्वारा रचित ‘मातृभूमि’ शीर्षक कविता समसामयिक कविता में एक दुर्लभ उदाहरण है। इसकी संवेदना, विषय-वस्तु और कलात्मकता अपने ढंग की अकेली है। इस कविता में मातृभूमि, जननी और मातृभाषा की मातृ-प्रतिमाएँ एक-दूसरे से घुलमिल गई है। मातृभूमि का चित्रण यहाँ कवि ने पारम्परिक ढंग से आधिदैविक अथवा धार्मिक-दार्शनिक भावभूमि पर नहीं किया है। इस कविता में माँ, मातृभूमि और अंशत: मातृभाषा की मिली-जुली प्रतिमा व्यक्ति, देश और काल की सीमित परिधियों से अलग होकर एक विशद् चेतन सत्ता बन जाती है, जो दुःख-ताप, रोग-शोक को हरने वाली करुणा तथा तृप्ति-सुख, शान्ति-प्रेम और वात्सल्य से परिपूर्ण है।

अरुण कमल की यह कविता प्रतिपादित करती है कि आज का सामान्य मानव अपनी त्रासद स्थितियों से भयभीत है। यहाँ के बच्चे यतीम, अनाथ है, दुख-दर्द से आहत है। कवि मातृभूमि की दया के प्रति आस्थावान है। उसे विश्वास है कि अभावग्रस्त भारत की संतानों का जीवन ज्यांतित होगा, नई आशा की ज्योति फूटेगी, और कलुषित जीवन का क्रन्दर दूर होगा, अंधेरे से प्रकाश की ओर लोग बढ़ेगे। इसीलिए तो कवि कहता है-“ये यतीम, ये अनाथ, ये बंधुआ, इनके माथे पर हाथ फेर दो माँ”।

प्रश्न 2.
मातृभूमि शीर्षक कविता की समीक्षा करें।
उत्तर-
अरुण कमल की ‘मातृभूमि’ कविता पारस्परिक ढंग से मातृभूमि की वंदना एवं उनकी उपादेयता स्पष्ट करने वाली कविताओं से सर्वथा भिन्न है। यह समसामयिक कविताओं में अपनी विषय-वस्तु, संवेदना और अप्रतिम कलात्मकता के कारण अत्यन्त ही दुर्लभ उदाहरण है। यह मातृभूमि ही है, जिसके कण-कण में हमारी जिन्दगी की धड़कनें कैद हैं। पग-पग पर हम इसके उपकारों में उपकृत होते रहते हैं। जीवन शतदल का खिलना, इसी पर निर्भर है। हम अपनी पीड़ा, वेदना और अन्तर्दाह को मातृभूमि की छत्र-छाया में ही भूल जाते हैं।

मातृभूमि में अगाध ममत्व है, प्रेम और दया है। इसकी गोद में असंतोष के कांटे नहीं फूल ही फूल है। हमारी मातृभूमि का धरातल सुविस्तृत है। पीड़ित मन की वेचैनी एवं उसके अभावग्रस्त जीवन, उपेक्षित शोषितों के अन्तर्दाह को शामिल करनेवाली यह मातृभूमि ही है। कवि ने स्पष्ट किया है कि सभी अनाथ, यतीम व्यक्ति जो जीवनव्यापी विसंगतियों एवं विकृतियों को झेलते हुए जी रहे हैं, उसके लिए मातृभूमि आस्थामयी माँ की तरह है, जो उसके कष्टों को दूर करती है। तभी तो कवि कहता है-

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“कई दिनों से भूखा-प्यासा तुम्हें ही तो ढूँढ रहा था चारों तरफ
आज जब भीख में मुट्ठी भर अनाज भी दुर्लभ है
तब चारों तरफ क्यों इतनी भाप फैल रही है गर्म रोटी की,
लगता है मेरी माँ आ रही है, नक्काशीदार रुमाल से ढंकी तश्तरी में,
खुबानियाँ अखरोट मखाने और काजू भरे।”

इस कविता में मातृभूमि का स्वरूप एक आस्थामयी माँ के रूप में अंकित है, जो हमारी हताशा को दूर करती है। माँ की तरह हमारी धरती माँ हमें दुलार देती है, प्यार और स्नेह देती है। जीवन को जीवन बनाये रखने की शक्ति हम मातृभूमि से ही प्राप्त करते हैं। कवि मातृभूमि रूपी माँ की करुणा का आकांक्षी है। वह अभावग्रस्त यतीम, अनाथ, बन्धुता लोगों के प्रति अत्यधि क संवेदनशील है। वह चाहता है कि मातृभूमि इन यतीमों, अनाथों के दुःख-दर्द को दूर कर दे। माँ वात्सल्यमयी है, वह रोग-शोक को हरने वाली एक विराट् चेतना सत्ता है।

मातृभूमि लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘मातृभूमि’ कविता में प्रकृति का कैसा चित्रण किया गया है?
उत्तर-
प्रस्तुत कविता में प्रकृति को माँ माना गया है। वह माँ रूपा प्रकृति वर्षा के रूप में स्नेह वर्षा कर रही है। धान के पौधों से वह इस तरह ढंकी हैं कि रास्ता तक नहीं दिखाई पड़ता है। सत् होती वर्षा में पशु, पक्षी मनुष्य सब भीग रहे हैं। साँढ़ बीच सड़क पर खड़ा भीग रहा है। कौओं के रोंये तक भींग गये हैं।

प्रश्न 2.
‘मातृभूमि’ कविता में वर्षा के विवरण की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
‘मातृभूमि’ कविता में मूलतः वर्षा में भींगने का वर्णन हुआ है। कवि स्वयं के भींगने शाग्रस्त पत्र उन्ह हम धरती भीगते साँढ़ तथा मजदूर के भींगने, नवोढ़ा स्त्री के भीगते नाचन तथा कौओं के भींगने का वर्णन करता है।

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प्रश्न 3.
‘मातृभूमि’ कविता में बच्चे का कैसा चित्रण किया गया है?
उत्तर-
‘मातृभूमि’ कविता में बच्चों का कई बार उल्लेख हुआ है। बच्चे उन स्थानों के किसानों के बच्चे है जिन किसानों ने अलाभकर खेती से ऊबकर आत्महत्या कर ली है। अतः ये बच्चे अनाथ हैं, यतीम हैं और बंधुआ हैं। वस्तुत: कवि ने यहाँ बच्चे को प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया है। ये धरती पर कृषि-कर्म पर आरित जितने भी किसान हैं उन्हें हम धरती-पुत्र भी कहते हैं। इसीलिए कवि ने किसानों को माँ धरती का दुर्दशाग्रस्त पुत्र कहा है।

मातृभूमि अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वर्षा में भींगने का सुख कौन-कौन ले रही हैं?
उत्तर-
वर्षा में भींगने का सुख मजदूर, नवोढ़ा स्त्री, कौए और साँढ़ ले रहे हैं। स्वयं कवि भी यह सुख ले रहा है।

प्रश्न 2.
आंध्र के किसानों के बच्चे कैसे हैं?
उत्तर-
आंध्र के किसानों के बच्चे भूखे, यतीम और अनाथ हैं, बंधुआ हैं।

प्रश्न 3.
कवि को रास्ता क्यो नहीं सूझ रहा है?
उत्तर-
धान के पौधों से धरती हँकी है। बढ़े हुए पौधों ने अधिक फैलकर रास्तों को भी बैंक लिया है। इसलिए कवि को रास्ता नहीं सूझता है।

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प्रश्न 4.
बच्चे रसोई घर की देहरी पर क्यों खड़े हैं?
उत्तर-
बच्चे यतीम और अनाथ हैं। इनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। अतः ये भोजन की आशा में रसोईघर की देहरी पर खड़े हैं।

प्रश्न 5.
कवि मातृरूप भूमि के बच्चों के विषय में क्या अनुरोध करता है?
उत्तर-
कवि मातृरूपा भूमि से बच्चों के माथे पर हाथ फेरने तथा इनके भींगे केशों को अपने श्यामल हाथों से सँवार देने का अनुरोध करता है।

प्रश्न 6.
मातृभूमि शीर्षक कविता किससे संबोधित है?
उत्तर-
मातृभूमि शीर्षक कविता मातृभूमि के साथ-साथ मातृप्रतिमाओं को सम्बोधित है।

प्रश्न 7.
मातृभूमि में किन बातों का समावेश है?
उत्तर-
मातृभूमि में इन बातों का समावेश है-
(क) अगाध ममता
(ख) प्रेम और दया
(ग) फूल-ही-फूल इत्यादि।

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मातृभूमि वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएं

प्रश्न 1.
‘मातृभूमि’ कविता के कवि कौन हैं?
(क) विद्यापति
(ख) मीराबाई
(ग) अरुण कमल
(घ) कबीर
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 2.
अरुण कमल का जन्म कब हुआ था?
(क) 1950 ई०
(ख) 1953 ई०ई०
(ग) 15, फरवरी, 1954
(घ) 1952 ई०
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 3.
अरुण कमल का जन्म स्थान कहाँ है?
(क) झारखंड
(ख) बनारस
(ग) बलिया
(घ) बिहार
उत्तर-
(घ)

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प्रश्न 4.
अरुण कमल की माता का नाम क्या था?
(क) सुरेश्वरी देवी
(ख) सरस्वती देवी
(ग) वीणा देवी
(घ) मीना देवी
उत्तर-
(क)

प्रश्न 5.
अरुण कमल के पिता का नाम क्या था?
(क) भरद्वाज मुनि
(ख) बाल्मीकि
(ग) कपिल देव मुनि
(घ) जाझवल्क्य मुनि
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 6.
अरुण कमल को पुरस्कार मिला
(क) भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार (1980)
(ख) सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार (1989)
(ग) श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (1996)
(घ) रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1996)
(ङ) शमशेर सम्मान (1997)
उत्तर-
(सभी)

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
…………… हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी भावधारा के महत्वपूर्ण कवि हैं।
उत्तर-
अरुण कमला

प्रश्न 2.
तपोमय इसलिए कि इसमें रात-दिन का …………… है।
उत्तर-
होम और पावनता।

प्रश्न 3.
अरुण कमल ने ………. अपना एक जीवंत स्वतंत्र संबंध बनाया है।
उत्तर-
परंपरा से।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कविता नवीनतम कविता संग्रह …………….. से ली गई है।
उत्तर-
पुतली में संसार।

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प्रश्न 5.
हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी भावधारा के उन्नयाक कवि द्वारा रचित …….. उत्कृष्ट रचना है।
उत्तर-
मातृभूमि।

प्रश्न 6.
इस कविता में कवि ने माता के सम्पन्न एवं समृद्ध भंडार तथा उनके विपन्न संतानों की ……………. चर्चा की है।
उत्तर-
मार्मिक।

प्रश्न 7.
यह कविता …………….. को संबोधित है।
उत्तर-
माता और मातृभूमि।

प्रश्न 8.
कवि व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए ……………. में मातृभूमि की तस्वीर देखता है।
उत्तर-
जड़ और चेतन दोनों।

प्रश्न 9.
प्रकृति के श्राप से अभिशप्त इन क्षेत्रों में पानी का तल काफी नीचे और जमीन ऊसर होने के कारण इन्हें ……………. के रूप में दुनियाँ देखती है।
उत्तर-
मौत का दूत।

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मातृभूमि कवि परिचय – अरूण कमल (1954)

अरुण कमल का जन्म 15 फरवरी, 1954 को बिहार के नासरीगंज में हुआ था। वे हिन्दी की प्रगतिशील यथार्थवादी भाव धारा के प्रबल समर्थक और महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। इनका लेखन आँठवें दशक से शुरू हुआ, जो बिना किसी रुकावट के जारी है। समय के साथ सोच चिंतन में निखार, दृष्टि विस्तार, संवेदना की गहनता, सबका परिचय इनके क्रमागत लेखन से प्राप्त होता है।

कवि अपने कर्म क प्रति आस्थावान है, वह किसी दूसरे की संवेदना का वाहक नहीं है। वह जो कुछ है, पूरी निष्ठा से है। कवि श्रम में निष्ठा रखता है। उसे विश्वास है कि अपने पर विश्वास जमाकर हम अपना और संसार दोनों का भाग्य बदल सकते हैं। कवि स्वांतः सुखाय से प्रेरित होकर कविता नहीं करता, बल्कि वह जग को देखता है, भोगता है, भोगे जा रहे सुख-दुःख से गहरे प्रभावित होकर, तब उसे कविता का रूप देता है। इसीलिए उसमें ऊष्मा है, वजन है, प्रभावोत्पादकता है।

अरुण कमल हिन्दी के होकर भी अपनी माटी, मातृभाषा के दामन को लेकर चलने में विश्वास रखते हैं, इसलिए वे परम्परा से लोहा लेते भी नजर आते हैं। उनकी कविताओं में विषय-वस्तु, संवेदना, कलात्मक और समसामयिकता तीनों का मणिकांचन संयोग मिलता है। कवि को अपने पर भरोसा है, अपनी कलम पर विश्वास है। अरुण जी विश्व नियामक का एक अंश मानते हुए लिखते हैं-

“चारों ओर अंधेरा छाया
मैं भी उठू जला लूँ बत्ती
जितनी भी है दीप्ति भुवन में
सब मेरी पुतली में कसती”

स्वदेश के अनेक भागों तथा विदेशों की साहित्यिक यात्राएँ करने वाले अरूण जी अंग्रेजी के शिक्षक और हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका आलोचना के सम्पादक हैं। पत्रकारिता ने उनकी दृष्टि को और पैना कर दिया है। महान् लेखिका महाश्वेता देवी की टिप्पणी है-“अरुण कमल ने जीवन और संघर्ष दोनों को नये बिम्बों में प्रकट किया है। वे खेतों, बधारों और मैदानों के कवि हैं, उनकी कविताएँ मनुष्य के स्वाभिमान के लिए संघर्ष करती हैं।”

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अरुण कमल जी का सृजन अभी जारी है। अभी वैचारिकता के कई पड़ाव आयेंगे। कल्पनाओं की नई ऊँचाइयाँ वे छूते दिखेंगे। अभी उनको लेकर कोई अन्तिम राय नहीं बनायी जा सकती। मातृभूमि के प्रति आज कवि संवेदनाशील है तो कल उसके भाव कुछ और हो सकते हैं।

अरुण कमल वास्तविकता के धरातल पर संभावनाओं के कुशल चितेरे हैं। वस्तुतः कवि अरुण कमल आधुनिक हिन्दी के हितों के एक सशक्त हिन्दी कवि हैं।

मातृभूमि कविता का सारांश

हमारे पाठ्य-पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित आधुनिक काल के चिंतक, कवि अरुण कमल रचित. मातृभूमि शीर्षक कविता एक ही साथ वर्षा ऋतु, शिशु-माँ सम्बन्ध और मन को झकझोर देने वाली घटनाओं तथा समस्याओं का दस्तावेज है।

संध्या का समय, वर्षा की झड़ी लगी है और कवि धरती से ऊपर और आसमान के नीचे उसमें भीग रहा हैं। जिस तरह से भींगने की प्रक्रिया चल रही है, कवि कल्पना लोक में चला जाता है और यह धरती उसे अपनी माँ नजर आने लगती है, जो कहीं दूरी पर है और बीच में धान के बड़े-बड़े पौधे से रास्ता दीख नही रहा है। अचानक माँ तक पहुँचने के लिए लड़का बदहवास होकर दौड़ता है, जैसे समुद्र अपनी लहरों के माध्यम से अनर्गलाओं को तोड़ता किनारे की ओर दहाता हुआ दौड़ता है।

दूर कहीं कंदराओं से पूजा के क्रम में शंख घोष होता है, जो अंधकार के बितान में आलोड़न उत्पन्न करती है। – बकरियाँ पहली ही बौछार से अपने को बचाती पेड़ों की शरण में है तो लम्बा-चौड़ा हट्टा-कट्टा साँढ़ जिसकी तस्वीर सिन्धु घाटी की सभ्यता पढ़ते समय देखा था, वह बेखबर सड़क के बीचो-बीच रास्ता रोके खड़ा है। मजदूर अभी-भी अपने काम पर डटे हुए हैं। दिन-भर श्रम करने से उसके शरीर की नमी समाप्त हो गयी है। उनके ऊपर वर्षा की बूंदें पड़ती हैं और उनके शरीर के द्वारा सोख ली जाती है। जैसे सूखी मिट्टी का ढेला पानी सोख लेता है।

आँगन में बिखरे सामानों को बचाने के लिए एक नयी-नवेली दुल्हन अपने पूरे शृंगार के साथ वर्षा में भीगते हुई बिखरे सामानों को इकट्ठा करने में आँगन में दौड़ती नाचती आती है। पेड़ों पर पत्ती की मुरझट में छिपे कौवे अब अपने रोमान्त (पंख के नीचे के ऊजले रोये) तक भीग चुके हैं। कवि को यह सारा कुछ मातृभूमि का ही विस्तृत रूप दीखता है, जो एक-दूसरे से इलायची के दानों की तरह एक-दूसरे से सम्बद्ध (गुत्थम गुत्थ) हैं।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 मातृभूमि (अरुण कमल)

कवि बच्चा, बना कह रहा है कि कई दिनों से भूखा-प्यासा वह माँ को खोज रहा था, क्योंकि चारों तरफ रोटी की गर्म भाप का आभास तो होता था, किन्तु वास्तविकता में एक मुट्ठी अनाज भी कहीं से नहीं मिला। लेकिन हे मातृभूमि ! जबसे तुम्हें देखा है, लगता है तश्तरी में सूखे मेवे को समाप्त कर रुका ही है कि तुम गर्म दूध से भरा गिलास लिए तुम मेरे लिए आ रही हो। फिर कवि कल्पना करता है कि उसकी तरह सैकड़ों बच्चे तुम्हारी रसोई के दरवाजे पर खाना पाने के लिए खड़े हैं। हरी-भरी धरती पर फसल उगती है, पकती है और फिर खेत खाली हो जाते हैं। घरों में अन्न पकाने की प्रक्रिया शुरू होती है। फिर भी बच्चों को भोजन नहीं मिल पाता।

आखिर, काला-हाँडी, आन्ध्र, पलामू के पट्टन नरौदा पटिया के बच्चों के लिए अन्न क्यो नहीं है। इनका जीवन इतना रूखा-सूखा क्यों है? ये बंधुओ बने अपने बचपन को बेच रहे हैं। इन अनाथ-यतीम बच्चों को भी तुम्हारी ममता की आवश्यकता है। ऐसा तो नहीं कि तुम केवल मेरी माँ हो, तुम्हारा हाथ मेरे माथे पर फिर रहा है और मैं तुम्हारी ममता की बौछार में भींज रहा हूँ। लगता है आज धरती और आसमान दोनों मेरी धूरी पर मेरे इंगित पर नाच रहे हैं।

कविता अति बौद्धिक और वैचारिक पृष्ठ-भूमि की है। कवि एक ही साथ बच्चा और वयस्क दोनों नजर आता है। मातृभूमि कभी धरती तो कभी कवि को माँ के रूप में अनुभूत होती है।

किन्तु मुख्य कथ्य यही है कि इस धरती पर असमानता क्यों है। प्रकृति काला हाँडी, आन्ध्रप्रदेश आदि स्थानों पर इतनी निष्ठुर क्यों है। भोजन के अभाव में बेटा मर जाए तो माँ की ममता का महत्त्व ही क्या रह जायेगा। वास्तव में मातृभूमि के सभी सपूतों को अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन अवश्य उपलब्ध रहना चाहिये जिससे जीवन-स्तर में सुधार हो सके।

मातृभूमि कठिन शब्दों का अर्थ

हहाना-उत्कट अभिलाषा से भर उठना। कंदरा-गुफा। हिलाइती-हिलाती, हचचल पैदा करती। नवोढ़ा-नयी-नवेली दुलहन। नक्काशीदार-बेल-बूटेदार। यतीम-बेसहारा। श्यामल-साँवला। तकती-देखती। गुत्थमगुत्था-एक-दूसरे में गुंथा हुआ। दुर्लभ-आसानी से न मिलने वाला। खुबानियाँ-एक प्रकार का मेवा। कालाहाँडी-उड़ीसा का एक क्षेत्र जहाँ की जमीन ऊसर है, वहाँ पानी का तल नीचे है, वहाँ जीवन बहुत दूभर है, यह स्थान भूख से मरने वाले निवासियों का पर्याय बन चुका है। बंधुआ-जो मामूली कर्ज के बदले में पराधीन बेगारी की जिंदगी जीने के लिए अभिशक्त हो।

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मातृभूमि काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. आज इस शाम …………….. मेरी माँ मेरी मातृभूमि।
व्याख्या-
अरुण कमल रचित ‘मातृभूमि’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों का चित्र यह है कि संध्या काल में हो रही वर्षा में कवि भीग रहा है। स्वभावतः ऊपर आसमान है और पैरों तले धरती। वह बीचों बीच हैं। इस भींगत क्षण में अचानक उसके भीतर एक अनुभूति कौंधती है। इस अनुभूति में वह मातृभूमि अर्थात अपनी जन्मभूमि का जननी के रूप में अनुभव करता है। कवि का अभिप्राय यह है कि धरती और माँ दोनों दो भौतिक अस्तित्व हैं। इन दोनों को एक अनुभव करना किसी विशिष्ट क्षण में संभव होता है। कवि के जीवन में इस एकात्मकता की अनुभूति वर्षा में भी गाते हुए क्षण में संभव हुई है।

2. धान के पौधों ने तुम्हें …………….. अंधकार को हिलोरती।
व्याख्या-
‘मातृभूमि’ शीर्षक कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अरुण कमल ने एक चित्र खींचा है। चित्र के अनुसार धरती, धान की फसल से इनती भरी हुई है कि धरती पूरी तरह ढक गयी है। रास्ता तक इतना ढंक गया है कि दिखाई नहीं पड़ता है कवि अपने को मेले में खो गये बच्चे की तरह अनुभव करता है। ऐसे बच्चे में अपनी माँ को खोजने की तीव्र उत्कंठा होती है और पा जाने पर वह बेतहाशा माँ की तरफ दौड़ पड़ता है। कवि इसी प्रकार की आतुरता से ध रती की ओर दौड़ पड़ता है। इस दौड़ने की ललक और तीव्रता को व्यक्त करने के लिए यह दूसरा चित्र देता है।

वह चित्र है समुद्र का। समुद्र में जब ज्वार उठता है तो पानी का आवेग बड़ी तीव्रता से तट की ओर दौड़ता है और तट की धरती को अपने भीतर समेट लेता है। ऐसा लगता है मानो समुद्र ने कोई कोट पहन रखा हो और उसके सारे बटन खोलकर हटाता हुआ तट की और उसे अपनी छाती में चिपका लेने के लिए दौड़ रहा हो।

यहाँ यह टिप्पणी करना आवश्यक समझता है कि छाती के सारे बटन खोले हहाते समुद्र के दौड़ते आने का यह बिम्ब कहीं से भी कविता की सुन्दरता में कोई योगदान नहीं देता। यदि बटन खोलने से कवि का कोई विशेष अभिप्राय है, तो वह स्पष्ट नहीं है। इसी तरह कन्दराओं से अन्धकार को हिलोरती आने वाली शंख-ध्वनि का क्यों वर्णन हुआ है यह स्पष्ट नहीं है। यदि इसका अर्थ प्रकाश का शंखनाद है और अन्धेरेपन को तोड़ने का उपक्रम है तो उसका प्रयोजन व्यक्त नहीं है।

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3. वे बकरियाँ जो पहली बूंद …………….. पूरी सड़क छेके।
व्याख्या-
‘मातृभूमि’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में बारिश होने से घटित दो चित्र दिये गये हैं। प्रथम वर्षा की पहली बूंद गिरते हो बकरियाँ भागकर किसी घर या वृक्ष के नीचे छिप जाती हैं। यह उनकी स्वाभाविक वृत्ति हैं। इसके विपरीत साँढ़ बड़े मजे से सड़क पर भींगता खड़ा रहता है। साँढ़ के प्रसंग में कवि ने तीन विशेषताओं का उल्लेख किया है। प्रथम यह कि उसके अगले पैरों से लेकर मुँह के बीच गले के नीचे पट्टा जैसा भाग लटका है वह काफी चौड़ा है।

अर्थात् साँढ़ लम्बे चौड़े डील डौल वाला है। द्वितीय यह कि कवि को सड़क पर भींगता वह भारी-भरकम साँढ़ सिन्धु घाटी की खुदाई में मिले उपादान पर बने साँढ़ के चित्र की याद दिलाते हैं। तृतीय साँढ़ पूरी सड़क छेककर खड़ा है। इन चित्रों के माध्यम से संभवतः कवि यह बताना चाहता है वर्षा क्रान्ति का विस्फोट है। जब क्रान्ति होती है तो बकरी जैसे लोग भाग खड़े होते हैं जबकि साँढ़ जैसे बलवान लोग पर्वत की तरह अडिग भाव से डटे रहते हैं। साँढ़ और बकरी के इस बिम्ब को ‘योग्य जन जीता है’ की उक्ति की व्याख्या के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है।

4. वे मजदूर जो सोख रहे हैं ……………. वे सब तुम्हीं तो हो।
व्याख्या-
अरुण कमल ने अपनी मातृभूमि कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में वर्षा भीगते कुछ . लोगों के चित्र दिये हैं। प्रथम चित्र उस मजदूर का है जिसका शरीर ढेले की तरह वर्षा के जल को सोख रहा है अर्थात् मजदूर भीगता हुआ भी अपने काम में तन्मय है। दूसरा चित्र उस नवविवाहिता का है जो घर से बाहर न निकलने के लिए विवश है।

अतः वह घर के आँगन में भीग रही है और भींगने की प्रसन्नता को नाच-नाच कर व्यक्त कर रही है। अर्थात् वर्षा उस नवोढ़ा के लिए आनन्ददायक है। तीसरा चित्र कौवे का है। वह कहीं बैठा भीग रहा है। उसके पंख तो गीले हो ही गये हैं। पंखों के नीचे जो हल्के सफेद रंग के रोये हैं वे भी भींग गये हैं। अत: वह भींगते रहने को विवश है।

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चौथा चित्र इलायची का जिसके भीतर दाने आपस में इस तरह चिपके हैं मानो प्यार के अतिरेक में गुत्थमगुत्था हो गये हैं। कवि बताना चाहता है कि हे मातृरूपा मातृभूमि इन सभी चित्रों में तुम्हारी ही अभिव्यक्ति है तुम्हारी ही तन्मयता तुम्हारा ही उल्लास और प्यार व्यक्त है।

5. कई दिनों से भूखा प्यासा …………….. दूध का गिलास लिए।
व्याख्या-
अरूण कमल ने अपनी प्रस्तुत पंक्तियों में धरती के मातृरूप को चिह्नित करने के लिए एक चित्र दिया है। कवि के माध्यम से भूखे प्यासे लोग कई दिनों से चारों तरफ मातृरूपा भूमि को ढूँढ रहे हैं। दूँढने का कारण स्पष्ट है। कवि इच्छा और यथार्थ की विषमता का विडम्बना भरा चित्र अंकित करता है कि आज जब भूखे लोगों को भीख में एक मुट्ठी अनाज दुर्लभ है। तब चारों तरफ गर्म रोटी की, इतनी भाप क्यों फैल रही है? कवि का तात्पर्य संभवतः यह है कि एक तरफ लोग रोटी के लिए तड़प रहे हैं और दूसरों की भूख को उत्तेजित कर रही है।

लेकिन शायद यह अभिप्राय कवि का नहीं है। रोटियों की भाप से भूखे लोगों को अनुमान होता है कि शायद माँ नक्काशीदार रूमाल से ढंकी तश्तरी में खुबानी, अखरोट, काजू भरे और हाथ में गर्म दूध का गिलास लिए आ रही है।

6. ये सारे बच्चे तुम्हारी रसोई ……………. फिर टोकसो रहे माँ।
व्याख्या-
कवि अरुण कमल ने अपनी ‘मातृभूमि’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में भूमि को माँ के रूप में चित्रित किया है। जिस तरह भूख लगने पर बच्चे रसोई घर की चौखट पर जाकर खड़े तो जाते हैं भोजन पाने की प्रत्याशा में, उसी तरह भारतमाता के भूखे बेटे गरीब बेटे न जाने कवि से इसके रसोई घर की चौखट पर खड़े इस बात के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं कि धरती माँ के द्वारा दिये गये अन्न-धन में से उन्हीं भी उनका उचित भाग मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। धरती पौधों से हरी होती है, फिर अन्न की बालियों से सुनहली और फिर उनके कट जाने पर धूसर।

उसका रंग बदलता रहता है अर्थात् इसी तरह प्रत्येक वर्ष बीतता जाता है। जिनके पास अन्न होता है वे पकाते हैं जिसका धुंआ छप्परों से निकलता है और इसी तरह क्रम चलता रहता है। लेकिन जो बच्चे बेघर हो गये हैं वे वहीं के नहीं हैं। वे मातृरूपा धरती की देहरी पर भूखे ही सो गये हैं। अर्थात् उनकी दशा नहीं बदली है।

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ये बच्चे कालाहांडी, आंध्रप्रदेश, पलामू आदि स्थानों के उन किसानों के, धरती पुत्रों के बेटे हैं जिनके पिताओं ने कृषि-कर्म की निरन्तर उपेक्षा की है। बढ़ती लागत और कम होती आय तथा कर्ज से ऊबकर आत्महत्या कर ली है। यहाँ कवि का तात्पर्य कम उम्र वाले बच्चों से नहीं है। उसका आशय कृषि-कर्म से जुड़े उन हजारों किसानों से है जो अब तक आत्महत्या कर चुके हैं या कर रहे हैं।

7. ये यतीम ये अनाथ ये बंधुआ ……………. तुम किसकी माँ हो मेरी मातृभूमि?
व्याख्या-
अरुण कमल की ‘मातृभूमि’ शीर्षक कविता की प्रस्तुत पंक्तियाँ अत्यन्त मार्मिक हैं। कवि भूखे किसानों को यतीम, अनाथ और बंधुआ मानते हुए धरती माँ से प्रार्थना करता है कि अपने श्यामल हाथ इनके माथे पर फेर दो, इनके भीगे केशों को सँवार दो। अर्थात् इन्हें विपन्नता से मुक्ति का आशीर्वाद दो। यहीं कवि एक ज्वलन्त प्रश्न उठता है।

तुम किसकी माँ हो मेरी मातृभूमि? स्पष्टतः वह सीधा सवाल पूछना चाहता है समाज से, व्यवस्था से कि धरती किसकी है उपजाते-बेकार अन्न, उपजाने वाले किसानों को या उनके द्वारा उपजाये अन्न को शोषण के बल पर हस्तगत कर मौज उड़ाने वाले अमरलता सदृश परजीवी लोगों की? प्रश्न की भंगिमा में आक्रोश है। कृषक-विरोधी सारे तत्त्वों के प्रति और यह स्पष्ट घोषणा भी कि धरती की सेवा करने वाले पुत्रों की है शोषकों की नहीं।

8. मेरे थके माथे पर हाथ फरेती …………….. भीगता बीचोंबीच।
व्याख्या-
‘मातृभूमि’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अरुण कमल ने माँ और मातृभूमि में तदाकारता का बोध व्यक्त किया है। अनुभव करता है कि मातृरूपा भूमि उसे प्यार से ताक रही है, उसके माथे पर हाथ फेर रही है और वह भींग रहा है। उसे लगता है कि वह ध रती-आसमान के बीचोंबीच कील की तरह खड़ा है और उसी कील पर धरती नाच रही है, आसमान नाच रहा है।

यहाँ कवि को ऐसी प्रतीति दो कारणों से होती है। प्रथम यह कि वर्षा में मग्न धरती के स्नेह से उत्पन्न आनन्द की अभिव्यक्ति हो रही है। दूसरे कवि सारी प्रकृति में लय की विराट कल्पना करता है जिस लय के फलस्वरूप यह सारा संसार किसी विराट् सत्ता के संकेत पर नृत्य करता होता है।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 11 पृथ्वी

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 11 पृथ्वी (नरेश सक्सेना)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 11 पृथ्वी (नरेश सक्सेना)

पृथ्वी पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कवि को पृथ्वी की तरह क्यों लगती है?
उत्तर-
विद्वान कवि नरेश सक्सेना रचित पृथ्वी शीर्षक कविता में पृथ्वी और एक आम स्त्री के गुण-धर्म का साम्य स्थापित किया गया है। ऊपरी तौर पर बात पृथ्वी की हुई है, जबकि तात्पर्य स्त्री से है। कवि को पृथ्वी स्त्री की तरह लगती है, क्योंकि एक स्त्री अपने पूरे जीवनकाल अनेक भूमिकाओं में अनेक केन्द्रों (धूरियों) के चारों तरफ घूमती रहती है। क्षमा, दया, प्यार, ममता, त्याग, तपस्या की प्रति नें बनी स्त्री अपना सर्वस्व औरों को पूर्ण करने में, बुरे को अच्छा बनाने में, गुणी को और अधिक गुणवान बनाने में न्योछावर कर देती है।

इस प्रक्रिया में उसे जो उपेक्षाएँ मिलती हैं तनाव मिलता है, सहानुभूति की जगह आलोचना मिलती है, उससे उसके भीतर आक्रोश-विद्रोह की ज्वाला भी धधकती है। कभी-कभी वह अपना संतुलन खो देती है और अपने ही संसार को बिखरने के कगार पर आ जाता है। किन्तु दूसरे ही क्षण वह अपने आक्रोश-विद्रोह की आग को शिवम् बनाकर, नया रूप देकर ऐसा कुछ सार्थक मूल्यवान प्रस्तुत करती है कि संसार चकित रह जाता है। यही सब कुछ पृथ्वी भी बड़े फलक पर करती है। यही कारण है कि कवि को पृथ्वी स्त्री की तरह लगती है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के काँपने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
पृथ्वी के भीतर की बनावट स्थायी न होकर परतदार है। हवा, पानी (समुद्र का) और भूगर्भ ताप के प्रभाव से परतों का स्थान बदलता रहता है। जिसके प्रभाव से प्रतिदिन दुनिया के किसी-न-किसी हिस्से में भूकंप के झटके आते रहते हैं। किन्तु जब यह प्रक्रिया बहुत तीव्रता से होती है, तब भयंकर तबाही वाला भूकंप आता है, इसी को कवि ने पृथ्वी का काँपना कहा है!

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प्रश्न 3.
पृथ्वी की सतह पर जल है और सतह के नीचे भी। लेकिन उसके गर्भ के केन्द्र में अग्नि है। स्त्री के सन्दर्भ में इसका क्या आशय है?
उत्तर-
कविवर सक्सेना ने ‘पृथ्वी’ शीर्षक कविता में नारी की सहनशीलता और उग्रता को पृथ्वी के माध्यम से रेखांकित एवं विश्लेषित किया है। जिस प्रकार पृथ्वी के सतह और सतह के नीचे जल है, ठीक उसी प्रकार नारी का हृदय करुणा, दया, सहनशीलता, ममता का अथाह सागर है। पृथ्वी के गर्भ के केन्द्र में अग्नि है, जो ज्वालामुखी के रूप विस्फोटित होता है। नारी भी जब क्रोधाग्नि से आवेगित होती है, तो गृहस्थी-रूपी गाड़ी चरमरा जाती है। कवि ने नारी के गौरव का अंकन उसके कर्ममय जीवन के आँगन में स्वस्थ रूप में प्रतिबिंबित किया है। पृथ्वी और नारी के रहस्यों का अन्वेषण-कार्य कवि की तकनीकी दृष्टिकोण से कर दोनों के समानता को उद्घाटित किया है।

प्रश्न 4.
पृथ्वी कायेलों को हीरों में बदल देती है। क्या इसका कोई लक्ष्यार्थ है? यदि हाँ तो स्पष्ट करें।
उत्तर-
कोयला और हीरा रासायनिक भाषा में कार्बन के अपरूप (Altropes) है। पृथ्वी के गर्भ में प्राकृतिक वानस्पतिक जीवाश्म जब गर्भस्थ ऊष्मा ऑक्सीजन की अल्पता तथा भूगर्भीय मा दबाव से जब जल जाते हैं तो कोयला बना जाता है। यही जीवाश्म यदि बहुत अधिक दाब और ताप झेलता है तो हीरा जैसी कीमती कठोर पदार्थ बन जाता है।

कवि के इस पंक्ति लक्ष्यार्थ है कि नारी अपने त्याग, अपनी तपस्या और बलिदान की अग्नि में साधारण पात्र को भी सुपात्र बना देती है। संसार में जितनी भी महान् विभूतियाँ हैं। सबका निर्माण माँ रूपी धधकती भट्ठी में ही हुआ है। स्त्रियों ने सारा दुःख गरल अपमान पीकर सहकर एक से बढ़कर एक नवरत्न उत्पन्न किए हैं। कोयले को हीरा अर्थात् मूर्ख को विद्वान बनाने की साधनात्मक कला स्त्रियों को ही आती है।

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प्रश्न 5.
“रलों से ज्यादा रत्नों के रहस्यों से भरा है तुम्हारा हृदय” -कवि ने इस पंक्ति के माध्यम से क्या कहना चाहा है?
उत्तर-
महाकवि नरेश सक्सेना ने पृथ्वी के विषय में कहा है कि ‘रत्नों से ज्यादा रत्नों के रहस्यों से भरा है, तुम्हारा हृदय’-पृथ्वी की रहस्यों की गूढ़ती को प्रतिबिंबित करता है। पृथ्वी के गर्भ से प्राप्त हीरा, कोयला, सोना, लोहा इत्यादि जैसे दृश्य रत्नों से तो व्यक्ति परिचित हो जाता है, परन्तु पृथ्वी के हृदय (अन्दर) में पानी, अग्नि जो एक दूसरे के प्रबल शत्रु हैं, वे एक साथ कैसे रह पाते हैं। कवि विस्मय प्रकट करते हुए कहता है कि रत्नों का निर्माण प्रक्रिया के दौरान पृथ्वी को कितना दबाव, आर्द्रता और ताप को सहना पड़ता है, यह भी अज्ञात (पृथ्वी की जानता) है।

पृथ्वी के रहस्यों का समय-समय पर जनहित में कुछ महामानव (वैज्ञानिक) उद्घाटित करने का अंशतः प्रयास किया है। अनेकों रहस्यों से परिचित होने के बावजूद अभी भी पृथ्वी के सम्पूर्ण रहस्य को जानना एक अनछुआ पहलू, शोध का विषय है। कवि कहना चाहता है कि पृथ्वी के गर्भ से निकले रत्नों के गुण-दोष से हम परिचित हो जाते हैं परन्तु उसके हृदय के अन्दर व्याप्त रहस्यों का जटिलता से पूर्णत: परिचित होने में हम अब भी असफल हैं।

प्रश्न 6.
“तुम घूमती हो तो घूमती चली जाती हो” यहाँ घूमना का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कविवर नरेश सक्सेना ने यहाँ पृथ्वी और नारी की समानता का बिंबात्मक चित्र प्रस्तुत किया है। कवि कहता है कि पृथ्वी अपने केन्द्र मे घूती हुई अपनी दैनिक और वार्षिक गति के द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है। खनिज सम्पदा, वन सम्पदा और थल सम्पदा को अपने ऊपर निवास करने वाले जीव-जन्तुओं को पृथ्वी मुफ्त में उपहार स्वरूप देकर दनका लालन-पालन में सदा गतिमान रहती है।

कवि के अनुसार नारी भी अपनी गृहस्थी के केन्द्र में गतिमान रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है। अपनी सेवा, त्याग, ममता, सहिष्णुता, स्नेह की बारिश अपने परिवार को पुष्पित एवं पल्लवित करती है। वह सदा पृथ्वी की तरह बिना थके हुए अपने कर्तव्य-पथ पर घूमती रहती है। कवि ने पृथ्वी और नारी के कर्तव्य निर्वहन को ‘घूमना’ से प्रतिबिंबित किया है।

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प्रश्न 7.
क्या यह कविता पृथ्वी और स्त्री को अक्स-बर-अक्स रखकर देखने में सफल रही है इस कविता का मूल्यांकन अपने शब्दों में करें।
उत्तर-
आधुनिक संश्लिष्ट जीवन पद्धति के हिस्सेदार विद्वान कवि नरेश सक्सेना का कवि अभियंता एक तीर से दो शिकार सफलतापूर्वक कर लेता है।

पृथ्वी शीर्षक कविता समानान्तर चलने वाली दो कविताओं का संयोजन है। कवि को ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी में जितने गुण-अवगुण हैं उसी का लघु संस्करण एक आम स्त्री है। पृथ्वी की जो भी गतिविधियों हैं, जो भी अवदान है ठीक वैसी ही गतिविधियों स्त्री की भी हैं। पृथ्वी भी धारण करती है (इसीलिए इसका एक नाम धरती है) स्त्री भी धारण करती इसलिए इसका भी एक नाम है।

पृथ्वी एक से बढ़कर एक अमूल्य-बहुमूल्य रत्न अपने गर्भ से निकाल कर धरणी दे चुकी है जिससे अपने संतान को उसका जीवन अधिक सुख-सुविधा सम्पन्न हो सका है। पृथ्वी जीवन के उपकरण साधन संसाधन उपलब्ध कराती है। पानी, वायुमंडल, प्राकृतिक सम्पदा सब कुछ पृथ्वी के अवदान हैं।

एक स्त्री पृथ्वी की तरह मसृण भावनाओं संवेदनाओं को अपने हृदय में धारण करती है। आदर्श, सर्वोच्च जीवन मूल्यों की वह उत्पादिका, संरक्षिका और वाहिका है। सृष्टि का वस्तुजगत सत्य है जिसे स्त्री अपनी कल्पना, ममता, कठोरता, अनुशासन, उद्बोधन, प्रेरणा, सहायता, सहचरता आदि के द्वारा सत्यम, शिवम् और सुन्दरम में परिणत कर देती है।

पृथ्वी की गतिद्वय सतत् है और इसी सातत्य के कारण जीवन शेष है जीवन प्रवाहमान है। एक स्त्री का तपसचर्या वाला जीवन भी सतत् है जिसके कारण सृष्टि का सृजन का महत् यज्ञ जारी है।

इस प्रकार निश्चय ही पृथ्वी और स्त्री एक-दूसरे के बिम्ब प्रतिबिम्ब ही हैं।

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पृथ्वी भाषा की बात।

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची लिखें पृथ्वी, जल, अग्नि, स्त्री, दिन, हीरा।
उत्तर-

  • पृथ्वी – धरती,
  • जल – पानी,
  • अग्नि – आग,
  • स्त्री – पत्नी,
  • दिन – दिवस,
  • हीरा – हीरक।

प्रश्न 2.
कभी-कभी कांपती हो’ में ‘कभी-कभी’ में कौन-सा समास है? ऐसे चार अन्य उदाहरण दें।
उत्तर-
‘कभी-कभी’ में अव्ययीभाव समास है। व्याकरण का नियम है कि ‘संज्ञा की द्विरूक्ति वाले शब्द अव्ययी भाव होते हैं अव्ययीभाव समास वहाँ होता है जहाँ समस्त सामासिक पद क्रिया विशेषण (अव्यय) के रूप में प्रयुक्त होता है। अव्ययीभाव सामासिक पद का रूप लिंग, वचन आदि के कारण कभी-कभी नहीं बदलता।

अन्य उदाहरण-कभी-कभी, हाथों-हाथ, दिनों-दिन, रातों-रात, कोठे-कोठे, आप-ही-आप, एका-एक, मुहाँ-मुँह आदि।

प्रश्न 3.
इन शब्दों से विशेषण बनाएँ-
स्त्री, पृथ्वी, केन्द्र, पर्वत, शहर, सतह, अग्नि
उत्तर-

  • संज्ञा – विशेषण
  • स्थी – स्त्रैण
  • पृथ्वी – पार्थिव
  • केंद्र – केन्द्रीय
  • पर्वत – पर्वतीय
  • शहर – शहरी
  • सतह – सतही
  • अग्नि – आग्नेय

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प्रश्न 4.
इस कविता में पृथ्वी प्रस्तुत है और स्त्री अप्रस्तुत। आप प्रस्तुत और अप्रस्तुत के भेद स्पष्ट करते हुए इस कविता से अलग चार उदाहरण दें।
उत्तर-
काव्य शास्त्र के अनुसार प्रस्तुत को ही उपमेय और अप्रस्तुत को उपमान कहा जाता है। उपमेय उपमान का उपयोग अपना और रूपक अलंकार में सर्वाधिक होता है।

कतिपय उदाहरण-

  • प्रस्तुत – अप्रस्तुत
  • आँख – मीन, पंकज (कमल के फूल)
  • मुख – चन्द्र
  • मन – मयर
  • उरोज – शीर्षफल (बेल)
  • जंध – कदली स्तम्भ

प्रश्न 5.
‘पृथ्वी क्या तुम कोई स्त्री हो’-यह प्रश्न वाचक वाक्य है या संकेत वाचक। उदारण के साथ इन दोनों वाक्य प्रकारों का अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
पृथ्वी शीर्षक कविता में ‘पृथ्वी क्या तुम कोई स्त्री हो’ वाक्य तीन बार प्रयुक्त हुआ है। ‘क्या’ का प्रयोग होने के बावजूद यह प्रश्न वाचक वाक्य नहीं है क्योंकि कहीं भी प्रश्न वाचक चिह्न का उपयोग नहीं हुआ है। प्रश्न वाचक वाक्य से किसी प्रकार प्रश्न पूछे जाने का बोध होता है और वाक्यांत में प्रश्न वाचक चिह्न लगा रहता है। जैसे-

क्या तुम पढ़ रहे हो? तुम क्या पढ़ रहे हो?
तुम जी रहे हो न? तुम्हें कौन नहीं जानता?
कौन क्या जानता है?

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 11 पृथ्वी (नरेश सक्सेना)

संकेत वाचक वाक्य का ही उदाहरण है “पृथ्वी क्या तुम कोई स्त्री हो”। संकेत वाचक वाक्य में कोई संकेत या शर्त सूचित होता है।

यदि बचाया होता तो आज मजा करते।
तुम क्या खयाली पुलाव पकाते हो कुछ काम करो।
आपकी दृष्टि में क्या करना चाहिए।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य-प्रयोग द्वारा लिंग-निर्णय करें पृथ्वी, स्त्री, केन्द्र, गर्भ, जल, अँधेरा, उजाला, ताप, हृदय, प्रक्रिया, गृहस्थी, घरबार।
उत्तर-
पृथ्वी (स्त्री.)-हमारी पृथ्वी गोल है।
स्त्री (स्त्री)-राम की स्त्री मर गई।
केन्द्र (पु.)- पृथ्वी का केन्द्र कहाँ स्थित है।
गर्भ (पु.)-पृथ्वी के गर्भ में रत्न भरा है।
जल (पु.)- इस तालाब का जल मीठा है।
अँधेरा(पु.)-यहाँ दिन में भी अँधेरा है।।
उजाला(पु.)-यहाँ दिन-रात उजाला ही रहता है।
ताप (पु.)- सूर्य के ताप से जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
हृदय (पु.)-आपका हृदय महान है।
प्रक्रिया (स्त्री.)-तुम्हारी ऐसी प्रक्रिया अशोभनीय है।
गृहस्थी (स्त्री.)-आपकी गृहस्थी कैसी है।
घरबार (पु.)-उसका घरबार सँवर चुका है।

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अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

पृथ्वी दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी के नारीरूप का संक्षेप में विवेचन करें।
उत्तर-
पृथ्वी कविता में इस पंक्ति की आवृत्ति हुई है-“पृथ्वी क्या तुम कोई स्त्री हो” इससे स्पष्ट है कि पृथ्वी को स्त्री मानने के प्रति कवि के मन में आग्रह है। इस आग्रह के कारण कवि ने पूरी कविता में पृथ्वी को नारीपरक अर्थ देने का प्रयास किया है।

पृथ्वी को नारी मानकर कवि ने धरती पर उगे पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं तथा बसे हुए नगरों तथा गाँवों के सम्मिलित रूप को उसकी गृहस्थी कहा है।

इसी तरह नारी भीतर-बाहर तरल होती है। लेकिन कभी-कभी प्रचण्ड रूप धारण कर अपने अग्निगर्भा होने का प्रमाण देती है। ज्वालामुखी मों फूटनेवाली पृथ्वी भी अग्निगर्भा है।

धरती रत्नगर्भ है। अनेक रत्न उसे खोदने पर प्राप्त होते है।। स्त्री भी एक से एक तेजस्वी और मूल्यवान संतानों को जन्म देने के कारण रत्नगर्भा है। इन तीन विशेषताओं के आलोक में हम कह सकते हैं कि कवि ने स्त्री और पृथ्वी में साम्य अनुभव कर पृथ्वी को नारीरूप माना है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी शीर्षक कविता का समीक्षात्मक विवेचन कीजिए।
उत्तर-
समीक्षा : ‘पृथ्वी’ नरेश सक्सेना की एक ऐसी सशक्त कविता है जो उनकी मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। पृथ्वी में निरंतर गतिशीलता बनी रहती है, वह अपने केन्द्र पर सतत घूमने के साथ ही एक ओर केन्द्र के चारों ओर घूमती रहती है। वह कभी-कभी अपने अन्तर की ज्वालाओं से द्रवित हो, अपनी ऊपरी सतह पर कंपन उत्पन्न पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

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पृथ्वी की तुलना कवि ने एक स्त्री से की है, और एक कटु सत्य का अन्वेषण किया है। कवि का दृष्टिकोण आस्थामूलक दिशा की खोज करने का है। स्त्री में जिजीविषा है, आस्था है, वह अपने मन की गहराइयों में उठनेवाली आकुल तरंगों को रोक कर जीवन के सारे प्रश्नों को हल करती है। पृथ्वी की ऊपरी सतह पर जल है, और नीचे भी जल है, लेकिन उसके गर्भ में, गर्भ के केन्द्र में अग्नि है, यही अग्नि उसे उपादेय बनाती है।

वस्तुतः इसी ताप और आर्द्रता से कोयले को हीरे में बदलने की क्षमता होती है। कवि ने कविता में पृथ्वी की तुलना नारी से की है, जो नर को शक्तिवान बनाती है, जिसमें ममता, वात्सल्य, के लिए त्याग, कोमलता एवं मधुरता की मात्रा पुरुषों की उपेक्षा अधिक होती है। स्त्री हमें पुत्ररत्न देती है। वह जीवन की प्रत्येक धड़कनों से कल्याणकारिणी होती है उसका हृदय पृथ्वी की तरह ही रहस्यों से भरा रहता है।

प्रश्न 3.
नरेश सक्सेना की कविता ‘पृथ्वी’ का भाव-सारांश प्रस्तुत करें।
उत्तर-
देखें-कविता-परिचय, सारांश एवं समीक्षा।

पृथ्वी लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि पूरे विश्वास के साथ पृथ्वी को स्त्री क्यों नहीं मान पाता है?
उत्तर-
कवि नयी कविता का कवि है। वह आशंका, जिज्ञासा और यथार्थता की भूमि पर स्थित है। वह पृथ्वी और स्त्री में इतनी समानता नहीं अनुभव कर पाता कि पूरे विश्वास से पृथ्वी का मानवीकरण कर उसे स्त्री मान ले।

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प्रश्न 2.
पृथ्वी शीर्षक कविता का संक्षेप में परिचय दीजिए।
उत्तर-
नरेश सक्सेना की ‘पृथ्वी’ शीर्षक कविता ‘समुद्र पर हो रही बारिश’ संकलन में संकलित है इस कविता में प्रकृति (पृथ्वी) मानवीय रागों एवं संवेदनाओं की प्रतिच्छाया के रूप में उभरी है। पृथ्वी और स्त्री में एकरूपता स्थापित करते हुए कवि ने भारतीय नारी के आत्म-संघर्ष, आत्मदान और त्याग का अत्यन्त ही सादगीपूर्ण चित्रण किया है कवि की यह कविता अनुभूति की गंभीरता एवं तन्मयता की दृष्टि से अत्यन्त मार्मिक है।

पृथ्वी तो मानो एक भारतीय नारी है, जिसके बाहर भी (आँखों में) जल है और सतह के नीचे भी जल है, लेकिन नारी अग्निगर्भा भी है। पृथ्वी के नीचे जैसे आग है, वैसे ही भारतीय नारी के भीतर आग है जो रत्नों को उत्पन्न करती है। नारी में अगर कोमलता, महणता है, जो कठोरता भी है। पठित कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि पृथ्वी की तरह स्त्री भी अद्भुत गरिमा एवं गौरव से परिपूर्ण होती है।

पृथ्वी अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि क्यों पृथ्वी से बार-बार पूछता है कि क्या तुम कोई स्त्री हो?
उत्तर-
कवि पृथ्वी की गति और क्रियाकलाप में जो विशेषताएँ पाता है वही स्त्रियों में भी पाता है। अतः वह बार-बार स्त्री होने की बात पूछता है।

प्रश्न 2.
पृथ्वी शीर्षक कविता किस काव्य संकलन से ली गई है?
उत्तर-
नरेश सक्सेना द्वारा लिखित पृथ्वी नामक कविता समुद्र पर हो रही है बारिश नामक काव्य संकलन से ली गई है।

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प्रश्न 3.
पृथ्वी शीर्षक कविता में किस बात की अभिव्यक्ति हुई है?
उत्तर-
पृथ्वी शीर्षक कविता में पृथ्वी की गतिशीलता और उसके चक्र की अभिव्यक्ति हुई है। साथ ही इसमें स्त्री के आत्म-संघर्ष की भी अभिव्यंजना हुई है।

प्रश्न 4.
पृथ्वी शीर्षक कविता में पृथ्वी के साथ किसकी एकरूपता स्थापित हुई है।
उत्तर-
पृथ्वी शीर्षक कविता में पृथ्वी के साथ स्त्री की एकरूपता स्थापित हुई है।

प्रश्न 5.
पृथ्वी के घूमते रहने से क्या होता है?
उत्तर-
पृथ्वी के घूमते रहने से दिन और रात तथा मौसम में परिवर्तन होता है। .

पृथ्वी वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
‘पृथ्वी’ कविता के कवि हैं
(a) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(b) नागार्जुन
(c) त्रिलोचन
(d) नरेश सक्सेना
उत्तर-
(d) नरेश सक्सेना

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प्रश्न 2.
नरेश सक्सेना का जन्म कब हुआ था?
(a) 1939 ई.
(b) 1945 ई.
(c) 1936 ई.
(d) 1940 ई.
उत्तर-
(a) 1939 ई.

प्रश्न 3.
नरेश सक्सेना की शिक्षा कहाँ हुई?
(a) पटना
(b) राँची
(c) जबलपुर
(d) बनारस
उत्तर-
(c) जबलपुर

प्रश्न 4.
नरेश सक्सेना का जन्मस्थान है
(a) उत्तरप्रदेश
(b) हिमाचल प्रदेश
(c) दिल्ली
(d) मध्यप्रदेश
उसर-
(d) मध्यप्रदेश

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प्रश्न 5.
नरेश सक्सेना की वृत्ति है
(a) जल निगम में उपप्रबंधक
(b) टेक्नोलॉजी कमिशन के कार्यकारी निदेशक
(c) त्रिपोली के वरिष्ठ सलाहकार
(d) सरकारी सेवा से निवृत्ति
उत्तर-
(a) जल निगम में उपप्रबंधक

प्रश्न 6.
नरेश सक्सेना को ‘पहला सम्मान’ कब मिला?
(a) 2006 में
(b) 1990 में
(c) 2004 में
(d) 1995 में
उत्तर-
(a) 2006 में

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
नरेश सक्सेना बीसवीं शती के सातवें दशक में ……………………… के रूप में आए है।
उत्तर-
महत्वपूर्ण कवि।

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प्रश्न 2.
प्रस्तुत कविता ……………………… कवि का ठोस साक्ष्य है।
उत्तर-
पृथ्वी।

प्रश्न 3.
यह कविता ………………… से संकलित है।
उत्तर-
समुद्र पर हो रही है बारीश।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कविता को कवि ने ……………… के साथ ढालकर दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत किया
उत्तर-
विज्ञान और तकनीक।

प्रश्न 5.
…………………… शीर्षक कविता में पृथ्वी की गति की चर्चा करते हुए भारतीय नारी की जीवन-शैली के ऊपर प्रकाश डाला है।
उत्तर-
पृथ्वी

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प्रश्न 6.
प्रस्तुत कविता में पृथ्वी की तुलना ……………………… से की गई है।
उत्तर-
स्त्री।

प्रश्न 7.
नारी और पृथ्वी दोनों के ……………………… का भण्डार से भरा पड़ा है।
उत्तर-
रहस्यों।

प्रश्न 8.
नारी की तुलना पृथ्वी से करना कवि की ……………………… नहीं है।
उत्तर-
अतिशयोक्ति।

प्रश्न 9.
नारी पृथ्वी की ……………………… है।
उत्तर-
प्रतिमूर्ति।

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पृथ्वी कवि परिचय – नरेश सक्सेना (1939)

नरेश सक्सेना का जन्म 1939 ई. में ग्वालियर मध्य प्रदेश में हुआ है। वे बीसवीं शदी के सातवें दशक में एक अच्छे और विश्वसनीय कवि के रूप में जाने जाते हैं।

जिस कवि ने आजादी के 20 वर्षों के बाद का भारत देखा हो, पहली बार उस कवि की कविताओं में कल्पना का अंश, मनोरंजन का अंश आ ही नहीं सकता। पाकिस्तान का दो-दो बार हमला करना, चीन का भारत पर हमला करना, भुखमरी, अकाल सबको देखने, भोजने वाले नरेश मेहता को मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था उत्पन्न होती है और मानवीय मूल्यों, आदर्शों का उत्स नारी है।

नारी का हृदय है तो वे नाम की वर्तमान विपन्न विषण्ण स्थिति को देखकर क्षुब्ध हो उठते हैं। आरम्भिक दौर में नरेश सक्सेना काव्यान्दोलन से जुड़े। किन्तु समय की कटु कठोर सच्चाइयों ने इन्हें बाध्य किया और ये अपेक्षाकृत अधिक बौद्धिकता, वैचारिकता और संवेदनशीलता के साथ कविता रचने लगे। समकालीन घटनाओं पर इनकी लेखनी खूब चली। कोई घटना, अनछुई नहीं रह सकी।

सक्सेना जी ने “मैं” को अपने काव्य का उपजीव्य नहीं बनाया। ये पूर्णतः निर्वैयक्तिक और वस्तुपरक होकर, तटस्थ होकर लिखते हैं। उन्हें कवि कर्म और उत्पाद के बीच के सम्बन्ध पर संदेह है।

“जैसे चिड़ियों की उड़ान में
शामिल होते हैं पेड़”

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क्या कविताएँ होंगी मुसीबत में हमारे साथ? कवि को लगता है कि कविताओं से जीवन को नहीं चलाया जा सकता। कविता के सहारे संघर्ष नहीं किया जा सकता। नरेश सक्सेना को अपनी रचनाओं से राग, मोह नहीं है। कवि की प्रतीक्षा आगे के कई विषय करते मिलते हैं।

आज का जीवन कितना संघर्षपूर्ण प्रतियोगितात्मक है, इसे स्वयं नरेश सक्सेना ने भोगा। जल निगम के उपप्रबंधक पत्रिकाओं के सम्पादक और टेलीविजन रंगमंच के लेखक के रूप में चुनौतियों से दो-चार होना आज भी जारी है। फिर भी उनका हृदय कटु भावनाओं से भरा नहीं है, बल्कि उनमें मानवीय संवेदनाएँ भरी पड़ी हैं।

वस्तुतः ये दृष्टिकोण के विस्तार और संवेदनाओं की प्रगाढ़ता के भीतर ही युगधर्म के प्रचलित सरोकारों यथा, राजनीति, सामाजिकता एवं प्रतिबद्धताओं और उनके वास्तविक अर्थपूर्ण रुख, रुझानों को अपना बनाते चलते हैं। अभियंता का जीवन जीने वाला जब कवि कर्म को अपनाता है तो उसकी रचना दृष्टि ज्यादा तथ्यपरक होती है। वस्तु को वह वस्तुपरक ढंग से रखता है। भाषा नपी-तुली होती है। कविता में ज्ञान-विज्ञान के तथ्यों का – समायोजन एक कठोर संयमित साधना का ही प्रतिफलन है।

नरेश मेहता का काव्य संसार ठोस साक्ष्यों पर आधारित है। किन्तु प्रभाव में वही मसृणता . प्राप्त होता है।

मेहता भी बिम्बों के सृजनहार है। मुक्त छंद तो आजादी के बाद का कविता धर्म ही बन गया। किन्तु मुक्त छंद में भी बातें प्रभावशाली बन जाती हैं, मारक क्षमता प्राप्त कर लेती हैं।

मेहता जी का मुक्त छंद भी हमें नई वैचारिक भूमि उपलब्ध कराता है। वास्तव में समसामयिक जीवन की समस्याओं और संघर्षों से नरेश का गहरा लगाव स्पष्ट होता है। ऐसा करते हुए उनका दृष्टिकोण संवेदना मानवीय पक्ष का उजागर करता है।

पृथ्वी कविता का सारांश

नरेश सक्सेना रचित ‘पृथ्वी’ शीर्षक कविता समसामयिक जीवन की समस्याओं और संघर्षों से हमारा अद्भुत तरीके से साक्षात्कार करती है।

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प्रस्तुत कविता में कवि पृथ्वी को सम्बोधित करते हुए उसकी भौगोलिक बनावट, उसकी नियति, उसके आक्रोश आदि का लेखा-जोखा तो लेता ही है। कवि पृथ्वी के बहाने नारी, स्त्री जीवन की उच्चता और विडंबना को भी प्रस्तुत करता है।

भूगोल और विज्ञान के सत्य के साथ कवि पृथ्वी से कहता है कि तुम घुमती हो और लगातार। बिना रुके अपने केन्द्र पर तो तुम घूर्णन करती ही हो एक अन्य बाह्य केन्द्र (सूर्य) के परितः पर चक्रण करती है। एक ही साथ दो अलग प्रकृति के घुमाव से क्या तुम्हें चक्कर नहीं आते? तुम्हारी आँखों के आगे अंधेरा नहीं छाता? तुम हमेशा दो विपरीत प्रकृतियों को साथ लिए चलती है। तुम्हारे आधे भाग में सूर्य के कारण उजाला और आधे भाग में तुम्हारी बनावट के कारण अँधेरा होता है। तुम रात-दिन एक करते हुए दिन को रात और रात को दिन में बदलने के लिए गतिमान रहती हो।

अनथक परिश्रम रत रहती हो। तुम्हें हमने कभी चक्कर खाकर गिरते नहीं देखा। हाँ कभी-कभी तुम कॉपती हो जब तुम्हारी आन्तरिक बनावट में कोई विक्षोभ उत्पन्न होता है। तब लगता है कि सम्पूर्ण अस्ति को नास्ति में बदलकर ही दम लोगी। तुमने अपनी गृहस्थी को सजाने-संवारने के लिए पेड़, पर्वत, नदी, गाँव, टीले की व्यवस्था की है लगता है भूकंप की स्थिति में तु अति क्रोध में आकर इन्हें नष्ट करने पर उद्धत हो प्रतिबद्ध हो गई हो।

तुम्हारा सारा स्वभाव एक स्त्री से मिलता है। क्या तुम भी स्त्री हो। स्त्री के भी कम-से-कम दो व्यक्तित्व होते हैं। वह भी पूरे जीवन नर्तन घूर्णन चक्रण में व्यस्त रहती है वह भी विन्यास करती है और आक्रोश की पराकाष्ठा पर वह भी अपने ही संसार को नष्ट करने पर उतारू हो जाती है।

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पृथ्वी तुम्हारी सतह पर जीवन के लिए अपरिहार्य तत्त्व जल प्रचुरता में उपलब्ध है। यह जल तत्व तुम्हारी सतह के नीचे भी है जो शीतलता संचरण संतुलन में लगा है। किन्तु तुम्हारे भी केन्द्र में एक स्त्री की तरह केवल आग दहकता है। क्या तुम्हें भी सदियों से उपेक्षा, तिरस्कार का सामना करना पड़ रहा है जो आक्रोश का पूँजीभूत रूप अग्नि बन गया है। पृथ्वी तुम एक स्त्री की तरह तपस्या साधना करने वाली हो।

एक स्त्री अपने कठोर अनुशासन और मसृण ममत्व के बल पर अपने बच्चे को सर्वगुण सम्पन्न बना देती है। वैसे ही तुम भी अपने क्रोड के चरम ताप, दाब और जल तत्त्व के आर्द्रगुण के सहयोग से वह भी बिना किसी विज्ञापन के कष्टकर जटिल प्रक्रियाओं से गुजर कर कोयले को हीरा बना देती हो। तुम्हारे गर्भ में हृदय में हीरा ही नहीं अन्य अनेक असंख्य रत्न, धातु संरक्षित हैं। उनका रहस्यमय संसार तुम्हारे हृदय की रहस्यमयता को कई गुणा बढ़ा देता है। ठीक जैसे एक स्त्री के असली और सम्पूर्ण भावों की कोई लाख कोशिका करके नहीं पकड़ सकता, पढ़ना-समझना तो बहुत दूर की बात है।

पृथ्वी तुम अपनी अनंत रहस्यमयता के साथ एक स्त्री की तरह ही लगातार सतत् चलायमान हो, घूर्णनरत हो। कवि ने विज्ञान के सायों को मानवीय भावनाओं, क्रियाओं की संगति में रखकर स्वयं एक स्त्री के श्वेत-श्याम पक्ष को सतर्क ढंग से प्रस्तुत किया है।

एक स्त्री का सम्पूर्ण दाम त्यागमय है, गरिमामय है। किन्तु बदले से उसे क्या मिला है? और चाहकर भी, चिड़चिड़ा कर भी एक स्त्री अपने ही घरौंदे को क्यों नहीं रौंदती। शायद इसी लिए कि एक स्त्री का ही वृहत् रूप पृथ्वी. है सकल जीव जड़ चेतन की माँ है।

पृथ्वी कवि की प्रस्तुति बेजोड़ है।

आधुनिक कविता में अलंकारों का वैसे भी कोई महत्त्व नहीं है। जहाँ वैचारिकता का प्रधान्य हो वहाँ तो अलंकार भार स्वरूप ही लगते हैं। फिर भी अनायास रूप से अनुप्रास, उत्प्रेक्षा जैसे अलंकार ‘पृथ्वी’ शीर्षक कविता में प्राप्त हो ही जाते हैं।

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वास्तव में इस कविता में कवि ने पृथ्वी और स्त्री का तुलनात्मक विवेचन करते हुए भारतीय स्त्री के आत्मसंघर्ष, आत्मदान और त्याग को त्याग पर प्रकाश डाला है।

पृथ्वी कठिन शब्दों का अर्थ

आर्द्रता-नमी। गृहस्थी-गृह-व्यवस्था। सतह-ऊपरी तल। प्रक्रिया-किसी काम को करने की प्रणाली।

पृथ्वी काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. पृथ्वी तुम घूमती हो ……… नहीं आते।
व्याख्या-
पृथ्वी’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में नरेश सक्सेना कहते है। कि पृथ्वी निरन्तर घूम रही है। भौगोलिक तथ्य के अनुसार पृथ्वी की दो गतियाँ हैं-प्रथम वह अपनी धुरी पर घूम रही है, द्वितीय वह वह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रही है। प्रथम से दिन-रात होते हैं और दूर से ऋतु परिवर्तन। इस तथ्य को व्यक्त करते हुए कवि एक शब्द को पकड़ता है-घूमना। पृथ्वी न जाने कब से, अनन्त काल से घूम रही है। इस आधार पर कवि एक जिज्ञासा करता है-पृथ्वी क्या इस तरह निरन्तर घूमते रहने से तुम्हें चक्कर नहीं आते और इस जिज्ञासा के द्वारा कवि पृथ्वी की जड़ता में मानव-चेतना भर देता है।

2. कभी-कभी काँपती हो……… कोई स्त्री हो।
व्याख्या-
नरेश सक्सेना ने अपनी ‘पृथ्वी’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में पृथ्वी को एक मानवी के रूप में देखा है। पृथ्वी काँपती है तो भूकम्प होता है जिससे धरती की सतह भी प्रभावित होती है और उस पर बसे-उगे नगर गाँव पेड़-पौधे आदि भी। इस सहज कम्पन की घटना को चेतना से जोड़ते हुए कवि मानता है कि पृथ्वी कभी-कभी काँपती है। उसका यह काँपना प्राकृतिक सहजता नहीं उसकी चेतना सत्ता का विषय है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 11 पृथ्वी (नरेश सक्सेना)

इस काँपने के कारण कवि को लगता है कि यह एक ऐसी स्त्री का क्रोध में काँपना है जो क्रोध के आवेग में अपनी ही गृहस्थी को नष्ट-भ्रष्ट करती है। यहाँ कवि ने पेड़, पर्वत, नदी, टीले गाँव, शहर आदि के सम्मिलित रूप को पृथ्वी की गृहस्थी माना है और पृथ्वी को गृहस्थिन नारी। मानवीकरण की इस संभावना के बीच कवि प्रश्न करता है कि क्या तुम एक स्त्री हो? स्पष्टतः कवि की दृष्टि में पृथ्वी का आचरण तक तेजस्विनी अग्नि गुण प्रधान नारी का है।

3. तुम्हारी सतह पर कितना जल है …….. सिर्फ अग्नि।
व्याख्या-
‘पृथ्वी’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में नरेश सक्सेना ने भौगोलिक तथ्य को काव्यत्व में परिवर्तित किया है। पृथ्वी की सतह पर प्रायः दो-तिहाई भाग में जल है। इसके नीचे भी विभिन्न स्तरों पर जल है जो खुदाई द्वारा ज्ञात होता है। लेकिन यह भी भौगोलिक सच है कि पृथ्वी के भीतर स्थित जल की सतहों से बहुत नीचे भारी मात्रा में आग है। इसलिए धरती अग्निगर्भा है।

कवि की दृष्टि में स्त्री ऊपर से भी जल की तरह तरल है और हृदय के स्तर पर भीतर भी भावनाओं के कारण तरल है। लेकिन उसमें भीतर अग्नि-तत्त्व भी प्रबल है जो प्रायः विशेष परिस्थितियों में उसे ज्वालामुखी बनता देती है और वह चण्डी बन जाती है। इस तरह सभी पृथ्वी में समानता तलाशते हुए कवि पृथ्वी से पूछता है-“क्या तु कोई स्त्री हो?”

4. कितने ताप कितने दबाव ……………… कोई स्त्री हो।
व्याख्या-
‘पृथ्वी’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में नरेश सक्सेना ने पृथ्वी के रत्नगर्भा रूप का वर्णन किया है। भौगोलिक सच के अन्तर्गत हम जानते हैं कि धरती के नीचे से कोयला निकलता है। वैज्ञानिकों ने अधिक ताप के स्तर पर कोयला से हीरा बनाकर यह सिद्ध किया है कि उच्चतम ताप की स्थिति होने पर विशेष उपादानों के संयोग के कारण कोयला हीरा बन जाता है। धरती के भीतर से खोदकर ही हम अन्य कई रत्न निकालते हैं ये रत्न ताप, आर्द्रता और दबाव की प्रक्रियाओं के कारण निर्मित होते हैं और धरती का रत्नगर्भा नाम सार्थक करते हैं। यह प्रक्रिया अप्रकट घटित होती है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 11 पृथ्वी (नरेश सक्सेना)

अतः कवि मानता है कि एक चतुर स्त्री की तरह चुपचाप पृथ्वी विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरकर रत्नों का निर्माण कर लेती है। अतः रत्नों से ज्यादा रत्नों की रचना से रहस्य से पृथ्वी का हृदय भरा है। यही स्थिति नारी की होती है वह भी रहस्यमय हृदयवाली होती है। अतः कवि विश्वासपूर्वक जिज्ञासा करता है-“पृथ्वी क्या तुम कोई स्त्री हो?”

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 जगरनाथ

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 जगरनाथ (केदारनाथ सिंह)

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जगरनाथ पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कवि को क्यों लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है?
उत्तर-
कवि अपने बचपन के बीते दिनों की तुलना वर्तमान औद्योगिक क्रान्ति, बौद्धिक जागरण और वैश्विकता के प्रभाव से जो असमानता की खाई बन-सी गयी है, तत्सबन्धित परिवर्तनों से कवि को आशंका होती है कि कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ गड़बड़ी अवश्य है। जीवन-मूल्यों के क्षरण और मानवीय अस्तित्व और अस्मिता को संकट में घिरते हुए देखकर कवि व्यथित है।

इस संबंध में कवि जगरनाथ भाई से प्रश्नोत्तर की आकांक्षा लिए हुए पत्र शैली में कविता के माध्यम से संवाद स्थापित कर अपनी शंका-समाधान चाहता है। प्रश्नोत्तर की जगह जगरनाथ भाई की खामोशी उसे चिन्ता में डाल देता है और उसका ध्यान सामाजिक विषमता से होने वाली गड़बड़ियों पर आकृष्ट हो जाता है। बौद्धिक विकास के क्रम में मानवीय जीवन में। जो उतार-चढ़ाव प्रतिबिम्बित होता है, वह गड़बड़ी का स्पष्ट संकेत है।

प्रश्न 2.
“वह बनसुग्गों की पाँत थी
जो अभी-अभी उड़ गई हमारे उपर से
वह है तो है
नहीं है तो भी चलती रहती है जिंदगी”
-इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट करें और इसकी काव्य चेतना पर भी विचार रखें।
उत्तर-
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ ‘नई कविता’ आन्दोलन के ध्वजवाहक और अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि श्री केदारनाथ सिंह द्वारा विरचित ‘जगरनाथ’ शीर्षक कविता से उद्धत है। पस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने समाज में पल रहे परजीवी-ललबबुओं पर व्यंग-वाण चलाया है। समाज में रहने वाले इन सामाजिक भार बन चुके मनुष्य रूपी मृग से कवि को कोई आशा नहीं है।

पालतू सुग्गे की तुलना में बनसुग्गे केवल देखने और क्षति पहुँचाने के लिए है। समाज में पल रहे ललबुओं की फौज भी सामाजिक विद्रूपता फैलाती हैं, उनसे समाज किसी प्रकार लाभान्वित नहीं हो सकता। बनसुग्गों के समान ही ये कभी यहाँ और कभी वहाँ निरूद्देश्य भटकते हैं। इन सामाजिक बनसुग्गों के रहने और नहीं रहने से कोई तब्दिली नहीं आ सकती, ऐसा कवि का अभिमत है।

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इन पंक्तियों में रूपकातिशयोक्ति अलंकार का कुशलता पूर्वक प्रयोग हुआ है। ‘बनसुग्गों’ सामाजिक ललबबुओं का, ‘पांत’ जमात का उपमान है। ‘बनसुग्गा’ भोजपुरी भाषा का शब्द है। ‘ललबबुओं के लिए यह सुन्दर व्यंगात्मक प्रयोग है। भाषा, शैली और शिल्प पर चौकन्नी सजगता के कारण गहरे यथार्थ बोध का स्वाभाविक संप्रेषण होता है। कवि ने जीवन के मूल्यों में हास की ओर संकेत किया है। साथ ही समाज में पल रहे ललबबुओं पर अपने व्यंगवाणों की वर्षा की है। कवि केदानाथ सिंह ने इन पंक्तियों में बनसुग्गों पर कटाक्ष; क्रान्तिकारी हथौड़े से नहीं बल्कि मृत्यु संशोधन, निपुण वैध की भाँति रोगी की नाजुक स्थिति की ठीक-ठाक जानकारी प्राप्त कर उसकी रूची के अनुसार उचित पथ्य की व्यवस्था की है, जिससे इन पंक्तियों की जीवंतता सहज की दृष्टिगोचर होता है।

प्रश्न 3.
कवि को आसमान में लाल-पीले डैने वाले पक्षियों को देखकर राहत मिलती है तो वह बनसुग्गों की पाँत की उपेक्षा क्यों करता है? आप इसका क्या कारण समझते हैं?
उत्तर-
कविवर केदार नाथ सिंह प्रगतिशील विचारधारा के कवि हैं। कवि आधुनिक परिवेश में जी रहा है। कवि की मुलाकात अपने बचपन के साथी भाई जगरनाथ से होती है। भाई जगरनाथ से अपना और उसका हाल-चाल लेते हुए कवि के माथे के ऊपर से बनसुग्गों की फौज गुजरती है। कवि उसे देखकर कहता है कि जिस प्रकार समाज में पल रहे परजीवियों के रहने या न रहने का कोई महत्व नहीं है ठीक उसी प्रकार बनसुग्गों को चले जाने का कोई महत्व नहीं है।

अचानक कवि को आकाश में उड़ते हुए लाल-पीले डैनेवाले पक्षियों अर्थात् मनुजता के पुजारी की ओर जाता है और उसे आशा की किरण स्पष्ट नजर आती है। निराशा का बादल छूटते ही मानव-मन आशा की सप्तरगिनी सपने देखकर सहज ही आत्मविभोर हो जाता है। वह पीछे घूमकर नहीं देखना चाहता अर्थात निराशा के अंधकूप में वह पुनः नहीं जाना चाहता है। मानव स्वभाववश कवि आसमान में लाल-पीले डैने वाली पक्षियों (आशा की किरण) को देखकर बनसुग्गों (निराशा की बदली) की उपेक्षा करता है।

प्रश्न 4.
कवि को अपने शब्दों से झूठ की गंध आने का संशय क्यों होता है?
उत्तर-
कवि अपनी मूल धरती-गाँवों और वहाँ की जिन्दगी को भूला नहीं है। आधुनिक समय में गँवई जीवन के बदलते स्वरूप को रेखांकित करते हुए कवि कहता है कि आजादी के पूर्व और आजादी के बाद का गाँव, दोनों में काफी असमानता है। कवि अपने बचपन के बीते दिनों की स्मृति के आधार पर तत्सम्बन्धित प्रश्न भाई जगरनाथ से करता है। सुख-सुविधाओं की आधुनिकतम वस्तुओं को निस्सार बताकर गवई जीवन को सरस, सहज और विनोदपूर्ण बताते हुए कवि प्रश्नोत्तर की आशा भाई जगरनाथ से करता है।

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भाई जगरनाथ की ओर आशा पूर्ण निगाहों से देखते कवि को उनके चेहरे पर दुनिया भर की मूक बेबसी और लाचारी स्पष्टतः झलकती है। जगरनाथ भाई का मौन से उत्पन्न जबाब जिसमें आधुनिक जीवन के जड़ तक फैल चुके ईष्या, द्वेष, संकीर्णता, स्वार्थपरता, घृणा तथा सामाजिक विषमता के चिह्न का स्पष्ट छाप उभर आती है। जगरनाथ भाई को उत्तर न देकर खामोशी धारण कर लेने के कारण कवि को अपने शब्दों से झूठ की गंध आने का संशय उत्पन्न होता है।

प्रश्न 5.
जगरनाथ की चुप्पी और उसके होठों के फड़कने में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
कवि के अनुसार निश्चल ग्रामीण, बौद्धिक छल-बल वाले शहरी से आशंकित रहते है। कवि ग्रामीण जीवन और गाँव के निश्चल ग्रामीणों के प्रति अपना भावुकतापूर्ण विचार व्यक्त किया है। उन्होंने आधुनिकतम सुख-सुविधाओं की बनसुग्गा कहते हुए निस्सार किया है। कवि अपने आपको जगरनाथ भाई के स्तर में लाकर दूरी को पाटने का अथक प्रयास करता है। जगरनाथ भाई अपने गँवई स्वभाव से उबर नहीं पाते जिस कारण होठ तो फड़फड़ाता है परन्तु प्रस्फुटित नही हो पाते, जिसे देखकर कवि का हृदय फट पड़ता है।

प्रश्न 6.
कवि को अपनी दिनचर्या से असंतोष क्यों हैं?
उत्तर-
कवि वृति से प्राध्यापक हैं, इसका पता जगरनाथ भाई से वार्तालाप के क्रम में चलता है। अतीत की गवई स्मृतियाँ कवि के मनः मस्तिष्क-पटल पर चलचित्र की भाँति विचरण करने लगती है। कवि को गाँव-गबई के प्रति सहज और निश्चल प्रेम की अनुभूति होती है। शहरी वातावरण में फैले ईया, द्वेष, लकीर्णता, स्वार्थपरता, घृणा आदि के कारण कवि का मन उच्चाटपूर्ण संशय में पड़ जाता है। कवि प्राध्यापक होने के नाते केवल खानापूर्ति के लिए वर्ग में जाकर बक-बक कर आता है और अवसर हाथ आते ही एक-दो झपकियाँ भी मार लेता है।

इस प्रकार कवि व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों की कर्तव्यहीनता पर चोट करता है। व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण व्यक्ति कार्य-निष्पादन निष्ठा के साथ नहीं करता है। चूंकि लेखक भी इसी व्यवस्था का एक अंग है, जिसमें व्यक्ति अपने जिम्मेवारी को ढंग से नहीं निभा पाता। कवि चाहता है कि उच्च पदासीन लोग अपने आदर्शों से समाज में एक मिसाल कायम करना चाहिए परन्तु ऐसा संभव नहीं हो पाता है, यह कवि के लिए असंतोष का विषय है।

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प्रश्न 7.
जगरनाथ को जाते हुए कवि को ऐसा क्यों लगता है कि वह उसे चीरता-फाड़ता हुआ जा रहा है?
उत्तर-
कविवर केदार नाथ सिंह ने गाँव-गवई की आँचल में पल रहे निश्छलता का यहाँ बिंबात्मक चित्र उपस्थित किया है। कवि अपने लंगोटिया मित्र जगरनाथ से उसका हाल-चाल पूछता है। ललाट पर गुम्मट, नीम के पेड़ और उसे नीचे बँधी बकरियों के संदर्भो में भी वह प्रश्न पूछता है। प्रत्युत्तर न पाकर वह असहज अवस्था में अपने सामान्य दिनचर्या की चर्चा करता है। कवि की वाणी मे दुनियाँ भर की बेबसी और लाचारी स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। कवि अपने को जगरनाथ भाई के स्तर पर लाकर उससे संवाद स्थापित कर अपने संशय को दूर करना चाहता है। जगरनाथ भाई अपने गँवई स्वभाव से उबर नहीं पाते और नि:शब्द ही चले जाते हैं।

इस प्रकार गँवई जिन्दगी में शहरी जीवन की अपेक्षा हीन-भावना की बहुलता जगरनाथ भाई के मौन और कातर नेत्रों से सहज की दृष्टिगोचर होता है। जगरनाथ की खामोशी पूर्ण जाना शहर और गाँव के बीच की खाई को परिलक्षित करता है। भाई जगरनाथ जो कवि के बचपन का साथी है। समय के अन्तराल ने जहाँ एक को जीवन की बुलन्दी के शिखर पर पहुंचा दिया है, वहीं दूसरा दारूण-दशा झेलने को अभिशप्त मानवीय जीवन के बीच फैल चुके स्वार्थपरता, संकीर्णता, द्वेष, घृणा, अविश्वास का प्रतीक बनकर जगरनाथ भाई कवि को चीरता-फाड़ता जाता हुआ दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 8.
कविता का नायक कौन है?
उत्तर-
कविवर केदार नाथ सिंह द्वारा विरचित ‘जगरनाथ’ शीर्षक कविता का नायक भाई जगरनाथ हैं।

प्रश्न 9.
कविता का शीर्षक ‘जगरनाथ’ क्यों है?
उत्तर-
शीर्षक किसी भी रचना-भवन का मुख्य द्वारा होता है। शीर्षक पढ़कर ही पाठक सर्वप्रथम उस रचना के मूल तथ्य और कव्य से परिचित होता हैं। शीर्षक की लघुता में ही रचना की गुरूता या विशालता-व्यापकता मुख्य बिंदु के रूप में केंद्रित रहती है। रचनाकार शीर्षक का चयन मुख्य पात्र, मुख्य घटना, घटना-स्थल मुख्य उद्देश्य या मुख्य बिन्दु के आधार पर करता है। शीर्षक की सफलता, औचित्य या सार्थकता के सम्बन्ध में सभी विद्वान एकमत हैं कि शीर्षक को लघु, सटीक, मुख्य विचार या भाव अभिव्यंजक तथा सार्थक होना चाहिए।

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प्रस्तुत व्यंगात्मक कविता का जगरनाथ का काल्पनिक पात्र है। सम्पूर्ण कविता पर जगरनाथ के जीवन का सारगर्भित तथ्य छाया हुआ है। वह कविता के कवि का लंगोटिया दोस्त है। भाई जगरनाथ कविता के मूल कथ्य का केन्द्र बिन्दु है जिसके माध्यम से कवि सामाजिक परिवर्तन और उसके प्रभाव को इंगित करता है। सम्पूर्ण कविता जगरनाथ के इर्द-गिर्द ताना-बाना बुनती दृष्टिगोचर होती है।

कवि ने जगरनाथ के माध्यम से ग्रामीण और शहरी वातावरण के बीच की खाई, व्यवस्था का दोष तथा ग्रामीण जीवन की संघर्षपूर्ण किन्तु निश्चल हृदय की संवेदनशीलता हमारे अंतस् पर रेखांकित किया है। साथ ही साथ शीर्षक ‘जगरनाथ’ गाँव की जिन्दगी की महत्ता को प्रदर्शित करता है और गवई भाषा के प्रति कवि की श्रद्धा को भी परिलक्षित करता है।

प्रश्न 10.
इस कविता में आपको प्रिय लगती पंक्तियाँ कौन-कौन-सी है और क्यों?
उत्तर-
कविवर केदार नाथ सिंह ने प्रस्तुत कविता ‘जगरनाथ’ में गवई किसान के जीवन और संस्कृति को प्रतिबिम्बित किया है। महानगर में रहने-जीने और वहाँ के विषयों-कथ्यों का इस म कविता में समावेश के साथ-साथ मूल धरती-गाँवों की जिन्दगी की सच्चाईयों का यथार्थ चित्रण कवि ने किया है।

कविता का शीर्षक जगन्नाथ के बदले ठेठ भोजपुरी गवई शब्द ‘जगरनाथ’ का प्रयोग कर कवि ने ग्रामीण भाषा के प्रति श्रद्धा को व्यक्त किया है। प्राध्यापक जैसे उच्च पद पर पदासीन और शहरी वातावरण में रहने वाला कवि गाँव-गवई के संगी-साथियों को नहीं भूला है। लम्बे अरसे के बाद भाई जगरनाथ से उसकी मुलाकात होती है तो वह आत्मीय भाव से पूछता है कैसे हो भाई जगरनाथ?

कितने बरस बाद तुम्हें देख रहा हूँ। कवि बाल्यावस्था में देखे गए नीम के पेड़ के नीचे बँधी बकरी जो कभी रहा करती थी उसको भी नहीं भूला है। जन्मभूमि के एक-एक वस्तु से कवि अपना प्यार और लगाव स्पष्ट करते हुए भाई जगरनाथ से पूछता है-

कैसा है वह नीम का पेड़
जहाँ बंधाती थी तुम्हारी बकरी?

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कवि प्रकृति के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हुए उसके अनूठे उपहार ‘आम’ की चर्चा करता है। कवि कहता है कि आम का खुशबू और निराला स्वाद मन को आनंदातिरेक और वातावरण को सुवासित करता है। आम की महत्ता का चर्चा करते हुए कवि कहता है-

क्या शुरू हो गया आम का पकना?
यह एक अजब-सा फल है मेरे भाई
सोचो तो एक स्वाद और खुशबू से
भर जाती है दुनियाँ।

इस प्रकार प्रस्तुत कविता गँवई और कसबाई जिन्दगी की विस्मयजनक वास्तविकता का उत्कृष्ट मानवीय दस्तावेज है। यह कविता हमारे जातीय और सामाजिक जीवन का दर्पण भी है। यह हमारे संक्रमणशील समाज के अंत: सघंर्षों तथा उसकी जीजीविषा का साक्ष्य भी है।

प्रश्न 11.
कवि का पेशा क्या है?
उत्तर-
कविवर केदार नाथ सिंह वृत्ति से विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। उनकी वृत्ति का पताजगरनाथ भाई से उनके वार्तालाप के क्रम में चलता है।

प्रश्न 12.
कविता में जगरनाथ के ललाट पर उगे और गुम्मट का विवरण क्यों दिया है?
उत्तर-
बहुत दिनों बाद जगरनाथ भाई से कवि की मुलाकात होती है, जिसके ललाट पर गुम्मट-सा उग आया है जो उसे कर्मठता तथा दीनता का प्रतीक है। जगरनाथ भाई के ललाट पर उभरी-गुम्मट हमारे संक्रमणशील समाज के अंत: संघर्षों तथा उसकी जिजीविषा का साक्ष्य भी है यह गुम्मट सामाजिक विषमता का विद्रूप चित्र है।

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गुम्मट के माध्यम से कवि का अभीष्ट है-दलित, शोषित और पीड़ित ग्रामीण कृषक-जीवन की संवेदनाओं को लोगों के सामने रखना तथा उसकी मार्मिकता के संबंध में कुछ करने और सोचने के लिए उन्हें बाध्य करना। कविता में जगरनाथ के ललाट पर उग आए गुम्मट का विवरण सारगर्भित और उद्देश्यपूर्ण है।

प्रश्न 13.
कविता में जगरनाथ का केवल चित्रण है और कवि का एकालापी वक्तव्य, जबकि कविता का शीर्षक ‘जगरनाथ’ है। यहाँ जगरनाथ का वक्तव्य क्यों नहीं आ सका?
उत्तर-
कविता में जगरनाथ का केवल चित्रण है और कवि का एकालापी वक्तव्य; जबकि कविता का शीर्षक ‘जगरनारथ’ है। वस्तुतः जगरनाथ इस कविता का काल्पनिक पात्र है जिसके माध्यम से कवि ने सामज ने व्याप्त साधनहीनता का सफल, सार्थक और मुख्य भावाभिव्यंजन चित्र खींचा है। कवि ने ग्रामीण जीवन के शोषण, उत्पीड़न तथा गरीबी के साये में घुट-घुटकर जी रहे एक गरीब किसान के जीवन की व्यथा-कथा का अंकन किया है। भाई जगरनाथ को मूक रखकर कवि ग्रामीण जीवन के दुःख दर्द का दस्तावेज पाठकों के सामने यथार्थ रूप में चित्रित किया है। इस कविता में समाज के दलित-शोषित जीवन का मूक प्रतिबिंब खींचा गया है।

प्रश्न 14.
कविता में प्रश्नवाचक चिन्हों के प्रयोग बहुत है। उसकी सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर-
कवि केदार नाथ सिंह रचित ‘जगरनाथ’ शीर्षक कविता ग्रामीण जीवन की एक यथार्थवादी कविता है। इस चर्चित कविता में कवि ने जगरनाथ भाई के माध्यम से जीवन-मूल्यों के क्षरण और मानवीय अस्तित्व और अस्मिता के संकट का सजीव चित्रण किया है। अपने बचपन के बीते दिनों को याद करते हुए वर्तमान से तुलना कर कवि जगरनाथ भाई से प्रश्नोत्तर की आकांक्षा लिए हुए पत्र-शैली में कविता के माध्यम से संवाद स्थापित करना चाहता है। प्रश्नोत्तर की आकांक्षा में जगरनाथ भाई से बराबर आग्रह कर अपने संशय को दूर करना चाहता है।

कवि प्रश्नों के माध्यम से बौद्धिक विकास के क्रम में मानवीय जीवन में उतार-चढ़ाव की जानकारी लेना चाहता है। भाई जगरनाथ के उत्तर से ही कवि को ग्राम-परिवेश का पूरा सामाजिक, आर्थिक तथा परिवारिक परिदृश्य हमारे सामने साकार करना चाहता है। प्रश्नों के प्रयोग से यह कविता काल्पनिक तथा अस्वाभाविक न होकर बिल्कुल स्वाभाविक तथा यथार्थवादी बन गया है। कवि के द्वारा प्रश्नवाचक चिन्हों के प्रयोग ने इस कविता पर कहीं भी आदर्श का रंग नहीं चढ़ने दिया है। साथ ही प्रश्नों का भरमार कर कवि ग्रामीण समस्याओं के प्रति अपनी खोजी सोच को परिलक्षित करने का सार्थक प्रयास किया है।

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प्रश्न 15.
कविता का शीर्षक है ‘जगरनाथ’ जिसका शुद्ध रूप जगन्नाथ है। शीर्षक में इस तद्भव रूप का प्रयोग कवि ने क्यों किया है?
उत्तर-
रूप जगरनाथ का प्रयोग कर कविता के माध्यम से एक दृष्टांत प्रस्तुत करने का प्रयास किया है कि शहरी ललकों से ओत-प्रोत होने के बावजूद अपने गाँव-गवई की भावुकतापूर्ण स्मृति उनके भीतर संजो रखा है। उनकी जमीन, उनका परिवेश और उनके संबंधों का राग उनके भीतर बदस्तूर महफूज है। तद्भव रूप जगरनाथ का प्रयोग से दुनिया में अंतर्विभाजन की कोई फाँक इस कविता में कही नहीं दिखती है।

प्रस्तुत शीर्षक ‘जगरनाथ’ कवि के गाँव की जिन्दगी के प्रति लगाव तथा गाँवों में व्याप्त साधनहीनता को प्रतिबिंबित करता है। कवि ने जगन्नाथ के स्थान पर उसका तद्भव रूप जगरनाथ का प्रयोग कर ग्रामीण भाषा के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त किया है। यहाँ प्रस्तुत कविता का शीर्षक ‘जगरनाथ’ ऊपर कही बातों की तस्दीक-सी करती है।

जगरनाथ भाषा की बात।

प्रश्न 1.
बक-बक, अभी-अभी में कौन-सा समास है?
उत्तर-
द्वन्द्व।

प्रश्न 2.
बक-बक करना, ठीक ही होना, इस तरह के कई मुहावरे कविता में हैं। आप उन मुहानवरों को छाँट कर लिखिए और उनका वाक्य-प्रयोग कीजिए।
उत्तर-
जगरनाथ शीर्षक कविता में निम्नलिखित मुहावरे आये हैं-

  • बक-बक करना-कुछ मेरी भी सुनोगे कि बक-बक करते रहोगे?
  • ठीक ही होना-आमदनी’ बस ठीक ही है, चल जाता है।
  • समय मिलना-क्या करू, काम का इतना बोझ है कि समय नहीं मिल पाता आने का।
  • मार लेना-तुम देखते रह जाओगे और कोई तुम्हारा पाकेट मार लेगा।
  • होंठ फड़कना-मरते समय वह कुछ कहना चाह रहा था, लेकिन बस होंठ फड़क कर रह गये।

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प्रश्न 3.
कविता में प्रयुक्त अव्ययों को चुन कर लिखें।
उत्तर-
जगरनाथ शीर्षक कविता में निम्नलिखित अव्यय प्रयुक्त हुए हैं
बक-बक, अभी-अभी, आजकल, जाओ-जाओ, चीड़ता-फड़ता, इस तरह आदि।
ललाट, पेड़, क्लास, पाँत, आसमान, राहत, बारिश, खुशबू, साथी।

प्रश्न 4.
इन शब्दों को पर्यायवाची लिखों?
उत्तर-
ललाट-कपाल, क्लास-वर्ग, पाँत-पंक्ति, आसमान-गगन, राहत-आराम, बारिश-वर्षा, खुशबू-सुगन्ध, साथी-मित्र।

प्रश्न 5.
कविता में कई सर्वनाम हैं। आप उन सर्वनामों को छाँटें और बताएं कि वे किस प्रकार के सर्वनाम हैं?
उत्तर-

  • मैं, तुम, वह – पुरुषवाचक सर्वनाम
  • मेरा, तुम्हारा – संबंधवाचक सर्वनाम
  • क्या, क्यों – प्रश्नवाचक सर्वनाम
  • यह, वह, जहाँ – निश्चयवाचक सर्वनाम
  • कोई, कौन – अनिश्चयवाचक सर्वनाम
  • स्वयं, आप – निजवाचक सर्वनाम।

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प्रश्न 6.
कवि यहाँ उत्तम पुरुष की भूमिका में हैं। उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष का अंतर वाक्य प्रयोग द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर-
पुरुष (Person) सर्वनाम (जिन शब्दों का संज्ञा के स्थान पर प्रयोग होता है) के भेद हैं। इनकी संख्या तीन है-

उत्तम पुरुष-जिस सर्वनाम से वक्ता या लेखक का बोध हो। जैसे-मैं, हम। मैं खाता हूँ। हम टहलते हैं।
मध्यम पुरुष-जिस सर्वनाम से सुनने वाले का बोध हो। जैसे-तू, आप, तुम, तुमलोग। तू कहाँ गया था? आप बैठिये। तुम लोग जा रहे हो।
अन्य पुरुष-जिस सर्वनाम से वक्ता या श्रोता के अतिरिक्त किसी अन्य का बोध हो, अर्थात् जिसके बारे में वक्ता कहे और श्रोता सुने, वह अन्य पुरुष है। जैसे-वह, यह, जो, सो, कुछ, कौन, कोई, वे, वे लोग, वे सब आदि।

  • वह – वह चला गया।।
  • यह – यह टलेगा नहीं।
  • जो – जो करना हो, जल्दी करो।
  • सो – जो अच्छा लगे, सो करो।
  • कुछ – कुछ भूल गया है।
  • कौन – कौन पुकार रहा है?
  • कोई – कोई आने वाला है।
  • वे – वे बहुत अच्छे हैं।
  • वे लोग/वे सब – वे लोग/वे सब बस म के हैं, काम के नहीं

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

जगरनाथ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जगरनाथ’ कविता में प्रकृति वर्णन का परिचय दें।
उत्तर-
जगरनाथ’ कविता में केदारनाथ सिंह ने जगरनाथ के माध्यम से प्रकृति को भी याद किया है। वह नीम के पेड़ के विषय में जगरनाथ से पूछता है जहाँ बकरी उसकी बँधती थी। फिर वह आम के विषय में पूछता है कि आम पकने लगे हैं या नहीं। वार्तालाप के बीच सिर पर से वनसुग्गों की एक टोली गुजर जाती है और मन में हरापन दौड़ जाता है। आसमान में पक्षियों को उड़ते देखने पर उसको बहुत राहत अनुभव होती है। प्रकृति-चित्र के इन चन्द टुकड़ों के सहारे कवि ने प्रकृति को याद किया है। इसमें सीधा वर्णन नहीं प्रकृति-चित्रों का स्मरण है।

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प्रश्न 2.
कवि की जिज्ञासाएँ क्या हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर-
लेखक हालचाल पूछने के क्रम में जगरनाथ से अनेक जिज्ञासाएँ करता है। इनमें कई तरह के प्रश्न हैं। प्रथमतः कवि उसका हालचाल पूछता है-कैसे हो जगरनाथ भाई? फिर बच्चों का समाचार पूछता है-बच्चे कैसे हैं? फिर उसके घर के सामने खड़े नीम के पेड़ के विषय में जिज्ञासा करता है। यह क्रम आगे बढ़ता है और उसके स्वास्थ्य के विषय में, वर्षा होने के विषय में, आमों के पकने के विषय में कवि जिज्ञासाएँ करता चला जाता है। इस तरह कवि ने जिज्ञासा के वृत्त में जगरनाथ, उसके घ र और गाँव की प्रकृति तथा मौसम को समेटा है।

जगरनाथ लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘जगरनाथ’ कविता में कवि की दिनचर्या का संक्षेप में विवेचन करें।
उत्तर-
‘जगरनाथ’ कविता में कवि जगरनाथ का हालचाल पूछता है और संवाद पैदा करने हेतु अपने विषय में बताता जाता है। इसी क्रम में वह अपनी दिनचर्या बतलाता है कि वह क्लास में बकझक कर आता है अर्थात् पेशे से वह अध्यापक है। पढ़ाने के काम से फुरसत मिलने पर दिन में भी एक झपकी मार लेता है। खाता-पीता है और सब मिलाकर ठीक-ठाक दिनचर्या के सहारे जीवन चल रहा है।

प्रश्न 2.
कवि अपनी ही बातों में झूठ की गन्ध की बात क्यों कहता है?
उत्तर-
कवि के मन में एक चोर बैठा है नकली आत्मीयता या दिखावेपन का उसे लगता है कि जगरनाथ उसके खोखले आत्मीयतापूर्ण शब्दों की सच्चाई अनुभव कर रहा है और इसीलिए चुप है। इसी की प्रतिक्रिया में उसका असली रूप बाहर आ जाता है।

जगरनाथ अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि की जिज्ञासाओं के उत्तर में जगरनाथ क्या कहता है?
उत्तर-
जगरनाथ कोई उत्तर नहीं देता है। उसके ओठ फड़फड़ा कर रह जाते हैं और वह अजीब दृष्टि से कवि को ताकता है जिसे कवि सह नहीं पाता है।

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प्रश्न 2.
‘जगरनाथ’ कविता में कवि ने किस तत्त्व को केन्द्र में रखा है?
उत्तर-
‘जगरनाथ’ कविता में कवि ने जगरनाथ से आत्मीयता का सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा को केन्द्र में रखा है।

प्रश्न 3.
जगरनाथ द्वारा कवि की भावना की प्रतिक्रिया में क्या उत्तर प्राप्त होता है?
उत्तर-
जगरनाथ कोई उत्तर नहीं देता है। उसके मन में यह स्नेह नहीं मात्र प्रदर्शन है। इसलिए यह अविश्वसनीय है। दोनों के धरातल दो हैं अत: बचपन की आत्मीयता का उल्लास उसके मन
में ही उमड़ता।

प्रश्न 4.
कविता के अन्त में जगरनाथ क्या करता है?
उत्तर-
वह कवि को ऐसी दृष्टि से ताकत हुआ चला जाता है जो दृष्टि कवि को भीतर तक . -काड़ देती है।

प्रश्न 5.
जगरनाथ शीर्षक कविता में किस परिवेश का चित्रण हुआ है?
उत्तर-
जगरनाथ शीर्षक कविता में गवई (ग्रामीण) परिवेश का चित्रण हुआ है।

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प्रश्न 6.
जगरनाथर किसका प्रतीक है?
उत्तर-
जगरनाथ सामान्य आदमी का प्रतीक है।

प्रश्न 7.
जगरनाथ शीर्षक कविता में कौन-सा बोध है?
उत्तर-
जगरनाथ शीर्षक कविता में यथार्थबोध और सौन्दर्य बोध दोनों पाई जाती है।

जगरनाथ वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
‘जगरनाथ’ कविता के कवि हैं
(क) विद्यापति
(ख) कबीर
(ग) केदारनाथ सिंह
(घ) सहजोबाई
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 2.
केदारनाथ सिंह का जन्म कब हुआ था?
(क) 1932 ई०
(ख) 1936 ई०
(ग) 1942 ई०
(घ) 1937 ई०

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प्रश्न 3.
केदारनाथ सिंह का जन्म स्थान है
(क) मध्यप्रदेश
(ख) अरुणाचल प्रदेश
(ग) झारखंड
(घ) उत्तर प्रदेश
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 4.
केदारनाथ सिंह की शिक्षा हुई थी
(क) स्वतंत्र लेखन
(ख) गद्य-लेखन
(ग) कहानीकार
(घ) व्यंग्यकार
उत्तर.
(क)

प्रश्न 5.
केदारनाथ सिंह की कृतियाँ हैं
(क) जमीन पक रही है
(ख) यहाँ से देखो
(ग) अकाल में सारस
(घ) कल्पना और छायावाद
उत्तर-
(क)

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प्रश्न 6.
केदारनाथ सिंह की प्रतिनिधि कविताएँ प्रकाशित हैं
(क) भारती भवन
(ख) राजकमल प्रकाशन
(ग) भारतीय प्रकाशन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 7.
केदारनाथ सिंह कार्यरत हैं
(क) भारतीय भाषा विभाग
(ख) कृषि विभाग
(ग) वाणिज्य विभाग
(घ) आयकर विभाग
उत्तर-
(क)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
बीसवीं शदी के छठे दशक में ये …………….एक महत्वपूर्ण कवि हैं
उत्तर-
नई कविता।

प्रश्न 2.
कवि का अपनी खो चुकी जमीन के लिए ……………. उनके भीतर नहीं दिखती।
उत्तर-
हूक या तड़पा

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 जगरनाथ (केदारनाथ सिंह)

प्रश्न 3.
उनकी कविताओं की दुनियाँ में …………… कोई फाँक नहीं दिखती।
उत्तर-
अंतर्विभाजन।

प्रश्न 4.
उनकी जमीन उनका परिवेश और उनके संबंधों का राग उनके भीतर ………….. रहा है।
उत्तर-
बदस्तूर महफूज।.

प्रश्न 5.
प्रस्तुत कविता जगरनाथ ऊपर कहीं बातों की ………….. करती है।
उत्तर-
तस्दीक सी।

प्रश्न 6.
कवि ने अपनी कविता में …………….. शैली का भरपूर उपयोग साधा है।
उत्तर-
नाटकीया

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प्रश्न 7.
आठवीं शदी में वे अपनी पीढ़ी के …………… के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
उत्तर-
प्रतिनिधि कवि।

प्रश्न 8.
बिम्बों के कारण कल्पना और मूर्ति विधान की उनकी कविता में एक ………….. भूमिका
उत्तर-
सक्रिय रचनात्मक।

प्रश्न 9.
वे एक ……………. कवि हैं।
उत्तर-
जन प्रतिनिधि।

जगरनाथ कवि परिचय – केदारनाथ सिंह (1932)

प्रश्न-
कवि केदारनाथ सिंह का कवि-परिचय दीजिए।
उत्तर-
हिन्दी साहित्य में प्रयोगवादी काव्य आन्दोलन के गर्भ से ही नयी कविता आन्दोलन उपजा, जिसके प्रमुख कवि के रूप में केदारनाथ सिंह का नाम लिया जाता है। नयी कविता को अति यथार्थवादी आन्दोलन कहा गया है। जिसके प्रवर्तक सच्चिदानन्द हीरानंदन वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने (1959 ई.) में तीसरे सप्तक का संपदान किया, जिसमें एक कवि के रूप में केदारनाथ सिंह और उनकी रचनाओं को स्थान प्राप्त हुआ।

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वस्तुत: नयी कविता आन्दोलन का पाठक वर्ग मिला ही नहीं। सही ढंग के आलोचक भी . नहीं मिले। तीनों ही सप्तकों के कवियों ने अपने तरीके से अपने आन्दोलन को सार्थक बताया और स्वयं को स्थापित, व्यख्यायित किया, दार्शनिक के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान बिम्बों के निर्माण और कविता में गतिशील नाटकीय रचना पर देते थे।

सौभाग्य से केदारनाथ सिंह की कविता में क्लिष्टत्व और संश्लेषण के बावजूद एक अपनापन मिलता है। इनके बिम्ब श्रम साध्य नहीं है। इनके प्रतीक सर्वथा अपरिचित नहीं है। इसका कारण है कि इनका सीधा सरोकर गाँव से है। ग्रामीण संस्कृति संस्कार से इनका नाभि-नाल का सम्बन्ध है। गाँव से सम्बद्ध परिचित, परन्तु अधूरे इनके विम्ब इनको सम्भावनाओं से सम्पन्न कवि बनाते हैं।

उनका उत्तरवर्ती जीवन तथा कथित बुद्धिजीवियों के बीच, दार्शनिकों, चिंतकों के बीच भले ही गुजरता रहा कि नागार्जुन की तरह इनके हृदय में, मन प्राण में इनका ‘बलिया’ (यू. पी.) बसा रहा है। “मांझी का पूल” कभी विस्तुत नहीं हो सका। जगरनाथ हो अथवा नूर मियां हो अथवा अपने गाँव-जवार का कोई हो, यदि वह हृदय की तंत्री को झकार चुका है, मन की बगिया को महका चुका है अथवा जिसने अपने चतुर्दिक वातावरण को अपनी उपस्थिति से प्रभावित प्रोत्साहित किया है तो उसे केदारनाथ सिंह ने अपनी कविता का विषय बना लिया है।

केदारनाथ सिंह में तीन बातें स्पष्ट होती हैं-(1) गहरा यथार्थबोध, (2) अनुभूति का वास्तविक धरातल और (3) बेजोड़ टटके बिम्बों के माध्यम से कविता को गतिशीलता प्रदान करना।

कवि ने एकालाप शैली अपनायी है। किन्तु यह विलाप की तरह नहीं है। मैं, तुम, वह तीनों या कोई दो अवश्य उपस्थित है। जगरनाथ शीर्षक कविता में कवि और गांव का जगरनाथ दोनों है। छोटी-सी कविता जिसमें हिमालय की दिशा तय होती है, वहाँ भी बच्चा (वह) के साथ ‘मैं’ उपस्थित है। नूर मियां कविता में नूर मियां के साथ एक ‘तुम’ भी उपस्थित हैं, जिसके साथ केदारनाथ, नूर मियां और उनके बहाने रामगढ़ बाजार, मदरसा, इमली का पेड़, भूली हुई स्लेट, उन्नीस का पहाड़ा सबकी याद ताजा करते हैं। किन्तु साथ ही वर्तमान से जुड़े भी रहते हैं। पाकिस्तान के हालात पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहते हैं

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“हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में।”

यहाँ पत्ता गिरना सत्ता परिवर्तन का संकेत करता है, जिसके पीछे असंख्य बेकसूर लोग मारे जाते हैं।

“बच्चा तुम्हारा गणित कमजोर है” यह कहकर पड़ोस की सच्चाई से मुँह फेरने की भारत की नीति पर प्रहार है कि यह पाक का निजी मामला है।

केदारनाथ सिंह की कविता में एक ही साथ विरोधी प्रवृत्तियाँ नजर आती हैं। वे अतीत की स्मृति को जीवित भी रखना चाहते हैं और अपनी वर्तमान स्थिति से जुड़े भी रहना चाहते हैं। जगरनाथ के ललाट के गुम्मट से सहानुभूति भी है, और उससे पीछा भी छुड़ाना चाहते हैं। क्योंकि जगरनाथ की उपस्थिति मात्र से उनका व्यक्तिगत अस्तित्व खडित हो रहा है।

वस्तुतः हर जगह केदारनाथ सिंह परिवेश, चरित्र और सम्बन्धों का एक ही सच देखते हैं, जहाँ उनपर समय और यथार्थ की मार पड़ती रहती हैं और वे उसे झेलते-भुगतते अपने को सुरक्षित रखने की संघर्ष में लगे भिड़े हैं।

जगरनाथ कविता का सारांश

प्रश्न-
केदारनाथ सिंह द्वारा रचित ‘जगरनाथ’ नामक कविता का सारांश लिखें।
उत्तर-
प्रस्तुत कविता ‘जगरनाथ’ कवि के गाँवों की जिन्दगी के प्रति लगाव को प्रतिबिम्बित करता हैं जिसमें कवि ने जगन्नाथ के स्थान पर ग्रामीण भाषा के शब्द ‘जगरनाथ’ का प्रयोग कर ग्रामीण भाषा के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त किया है। साथ ही इस कविता में प्रश्नों का भरमार कर कवि ग्रामीण समस्याओं के प्रति अपनी खोजी-सोच को परिलक्षित करने का प्रयास किया है। वस्तुतः ‘जगरनाथ’ कवि को इस कविता में काल्पनिक पात्र है जिसके माध्यम से पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने का प्रभूत प्रयास किया गया है।

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बहुत दिनों के बाद जगरनाथ भाई से कवि को भेंट हुई है जिसके ललाट पर गुम्मट-सा उग आया है जो जगरनाथ भाई के कठिन कर्मठता और दीनता का प्रतीक है। कवि बाल्यावस्था में देखे गए नीम के पेड़ के नीचे बंधी बकरी जो कभी रहा करती थी, उसको भी नहीं भूला है। इन प्रतीक चिह्नों के माध्यम से कवि का स्पष्ट करना चाहता है कि गाँव-गाँवई की चीजों को आज भी अपनी स्मृति-पटल में संजों कर रखा है। केदार नाथ सिंह वृति से प्राध्यापक है जो जगरनाथ भाई से वार्तालाप के क्रम में स्पष्ट होता है। इसी क्रम में वे आधुनिक सुख-सुविधा रूपी ‘बनसुग्गों की पांत’ को अनावश्कय बताते हुए समाज में अपने परिश्रम से प्राप्त वस्तुओं की जीवन के लिए आवश्यक बताया है। साथ ही दृष्टांत रूप में गाँव-गवई में उपजाए जाने वाले आमो की खुशबू एवं स्वाद का सुन्दर वर्णन किया है।

कवि-यद्यपि सुख-सुविधाओं की आधुनिकतम वस्तुओं को निस्सार बताकर गवई जीवन को सुस्वादु बताया है, तथापि जगरनाथ भाई अपनी गवई स्वभाव से उबर नहीं पाते जिस कारण होठ तो फड़फड़ाता है किन्तु शब्द प्रस्फुटित नहीं हो पाते। फलतः जगरनाथ भाई निःशब्द ही चले जाते हैं। जिसे देखकर कवि का हृदय फट पड़ता है क्योंकि कवि ने अपने-आप को जगरनाथ भाई के स्तर में लाकर बीच की दूरी को पाटने का जो अथक-प्रयास किया था वह हो न सका।

वस्तुत: इस कविता से यह शिक्षा मिलती है कि गवई जीवन में शहरी जीवन की अपेक्षा व्याप्त हीन-भावना बहुलता से दृष्टिगोचर होती है, जिसको दूर करने की चिन्ता विवेकियों को साथ-साथ सरकारी-व्यवस्था को भी होनी चाहिए। वास्तव में शहरी क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ गाँव के क्षेत्रों का समुचित विकास करके ही भारत के विकास का सपना साकार हो सकता है।

कठिन शब्दों का अर्थ
गुम्मट-चोट लगने से उभर आने वाली गिल्टी। बनसुग्गा-वन में रहने वाला गैरपालतू तोता। पाँत-कतार। डैना-पंख। बकबक करना-व्यर्थ बोलना, फालतू बोलना। झपकी-ऊँघना। राहत-आराम, सुख। धार-तीक्ष्णता पैनापन।

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जगरनाथ काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. कैसे हो मेरे भाई जगरनाथ …………… बँधती थी तुम्हारी बकरी?
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक युगीन कवियों में एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह की कविता ‘जगरनाथ’ से ली गयी है। इसमें कवि ने बचपन के ग्रामीण साथी जगरनाथ दुसाध को परोक्ष माध्यम बनाकर अपनी बात कहने की चेष्टा की है। जगरनाथ से कवि की अकस्मात भेंट हो जाती है बहुत दिनों पर। स्वभावतः वह उसे रोककर समाचार पूछता है कि तुम कैसे हो? बहुत दिनों के बाद भेंट हुई है। मिलन के लम्बे अन्तराल में जगरनाथ के शरीर में हुए परिवर्तन को लक्षित कर कवि पूछता है कि यह तुम्हारे ललाट पर यह गुम्मट सा क्या उग आया है?

फिर वह बच्चों के बारे में पूछता है, दरवाजे के नीम गाछ के बारे में पूछता है जहाँ जगरनाथ की बकरियाँ बँधी रहती थीं। इस पूरे कथन में कवि ने माथे के गुम्मट, बच्चों के समाचार तथा दरवाजे के नीम वृक्ष का हाल पूछकर स्वाभाविकता लाने का प्रयास किया है। वहीं भाई सम्बोध न के द्वारा आत्मीयता स्थापित कर सम्बन्ध का अनौपचारिक बनाया गया है। संवाद की आत्मीयता समय के लम्बे अन्तराल से उत्पन्न तथा स्तर-भेद से उत्पनन औपचारिकता को तोड़ती है।

2. मैं तो बस ठीक ही हूँ ………………. कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है।
व्याख्या-
केदारनाथ सिंह रचित कविता ‘जगरनाथ’ उनके तथा उनके बचपन के ग्रामीण मित्र जगरनाथ दुसाध के बीच एकालापी संवाद के रूप में रचित है। इन पंक्तियों में सूच्य रूप में व्यक्त किया गया है कि कवि के द्वारा कुशल समाचार पूछे जाने के उत्तर में जगरनाथ कवि से समाचार पूछता है।

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इन पंक्तियों में कवि अपना हाल बताते हुए कहता है कि मैं ठीक हूँ, खाता-पीता हूँ और क्लास में पढ़ा आता हूँ, अवसर मिलता है तो दिन में भी एकाध नींद सो लेता है। इन बाहरी बातों के अतिरिक्त वह अपनी बौद्धिक सामाजिक जागरूकता प्रदर्शित करने के लिए यह भी जोड़ देता है कि मुझे हमेशा लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। कवि का संकेत सामाजिक राष्ट्रीय जीवन में आ रही गिरावट, जीवन की भागदौड़ और आर्थिक रवैये से उत्पन्न विकलता और उनके कारण मूल्यहीनता की बाढ़ है।

3. पर छोड़ो तुम कैसे हो? ………………. चलती ही रहती है जिन्दगी।
व्याख्या-
‘जगरनाथ’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में जगरनाथ से बातें करते हुए कवि अपना हाल बताने के बाद पुनः जगरनाथ की ओर मुड़ता है और उसके सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने की कड़ी को आगे बढ़ाता हुआ पूछता है कि तुम्हारा कामधाम कैसा चल रहा है? इसी बीच वनसुग्गों की एक पंक्ति उसके ऊपर से उड़ती निकल जाती है। वह उनकी ओर थोड़ा ध्यान देता है मगर शीघ्र ध्यान हटा लेता है, “वह है तो नहीं है तो भी चलती ही रहती है जिन्दगी” कहकर अपनी लापरवाही व्यक्त करता है। इस कथन से स्पष्ट है कि वन-सुग्गों को टें 2 करते उड़ना उसे अच्छा लगता है लेकिन उनके न होने से भी जिन्दगी की चाल में कोई व्यवधान नहीं आता है। उसके कहने के ढंग से स्पष्ट है कि अब की जिन्दगी में पशु-पक्षी, प्रकृति आदि जीने की अनिवार्य शर्त नहीं रह गये हैं।

4. पर यह भी सच है मेरे भाई ………………. बड़ी राहत मिलती है जी को।
व्याख्या-
‘जगरनाथ’ कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में केदारनाथ सिंह कहना चाहते हैं कि जीवन की प्राथमिकताएँ और परिस्थितयाँ बदल जाने के कारण अनेक ऐसी चीजों से लगाव का आग्रह कम करना पड़ता है जो जीवन के लिए आवश्यक होते हैं। ऐसी ही एक उड़ते हुए वन-सुग्गों की उड़ती पंक्ति को देखना।

इसे स्वीकार करते हुए लेखक कहता है कि वन-सुग्गों को देखने का आग्रह दबा देने के बावजूद सच्चाई यही है कि जब कभी आसमान में लाल या पीले या किसी रंग का कोई पक्षी उड़ता हुआ दीख जाता है तो मन को राहत अनुभव होती है।

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यहाँ लेखक यह बताना चाहता है कि मन की नैसर्गिक इच्छाओं की पूर्ति का अवसर न मिलने पर उनके प्रति आग्रह घट जाता है और एक उदासीन भाव आ जाता है। लेकिन उनके प्रति सम्मोहन कम नहीं होता। अवसर मिलने पर वे इच्छाएँ यदि पूर्ण होती हैं तो मन को जो आनन्द प्राप्त होता है वह जीवन में सन्तुष्टि और सन्तोष देता है।

5. पर यह तो बताओ ………………. भर जाती है दुनिया।
व्याख्या-
‘जगरनाथ’ शीर्षक कविता की प्रस्तुत पंक्तियाँ मे केदारनाथ सिंह पुनः जगरनाथ की ओर मुखातिब होकर उससे उसके स्वास्थ्य का हाल पूछते हैं कि तुम्हारा जी आजकल कैसा है? इससे लगता है कि जगरनाथ प्रायः अस्वस्थ रहता होगा लेकिन आत्मीयता का यह ज्वार एक क्षण भी नहीं टिकता। कवि तुरंत जगरनाथ को छोड़कर बारिश पर उतर आता है और जानना चाहता है कि क्या इधर बारिश हुई थी फिर जल्दी आमों की ओर चला जाता है और पूछता है कि क्या आमों का पकना शुरू हो गया? और फिर जगरनाथ को भूलकर आमों के स्वाद में खो जाता है। उसकी टिप्पणी के अनुसार यह एक अजीब-सा फल है जिसमें सुगन्ध और स्वाद दोनों का विरल संयोग है जिससे मन की दुनिया भर जाती है पूर्ण परितृप्ति प्राप्त होती है।

इन पंक्तियों में लक्ष्य करने की बात यह है कि कवि के मन में जगरनाथ के प्रति अभिरुचि और संवेदना कम है तथा वर्षा और आम की रस-गंध में ज्यादा रुचि है। यह बतलाता है कि कवि की दृष्टि जगरनाथ में जगरनाथ से ज्यादा महत्त्व वनसुग्गे, बारिश और आम का है। इनके बारे में कहने के लिए उसने जगरनाथ का बहाना बनाया है।

6. पर यह क्या? ………………. जाओ ………………. जाओ।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक की ‘जगरनाथ’ शीर्षक से पंक्तियाँ ली गयी है। इसके कवि केदारनाथ सिंह हैं। केदारनाथ सिंह जगरनाथ को रोककर ढेर-सारी जिज्ञासाएँ करते हैं जिनमें कुछ जगरनाथ से सम्बन्धित हैं और कुछ ग्राम-प्रसंग से। इन सबके उत्तर में जगरनाथ कुछ बोलता नहीं, केवल उसके ओठ फड़कते हैं बोलने के लिए। कवि इस पर आश्चर्य व्यक्त करता हुआ अनेक प्रश्न पूछ जाता है, जैसे-तुम्हारे होंठ क्यों फड़क रहे हैं? तुम अब तक चुप क्यों हो? इस तरह खड़े क्यों हो? इत्यादि। फिर वह जगरनाथ को पास बुलाता है क्योंकि उसे बहुत कुछ कहना है।

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मगर जगरनाथ कुछ बोलता नहीं केवल एक विचित्र दृष्टि से देखता है। कवि को लगता है कि जगरनाथ को मेरी आत्मीयता भरी आतुरता पर विश्वास नहीं हो रहा है, उसे झूठ की गन्ध अनुभव हो रही है। यह कवि के सन्तुलन को गडबड़ा देता है। वह पूछता है क्या तुम्हें जल्दी है? क्या काम पर जाना है? और फिर बिना उसके मन्तव्य जाने अपनी ओर से अनुमति भी दे देता है जाओ मेरे भाई जाओ। मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा।

इन पंक्तियों से यह धारणा बनती है कि कवि को स्वयं यह आत्मीयता-प्रदर्शन नकली लगता है। उसकी सारी जिज्ञासाओं में बनावटीपन और जगरनाथ के बहाने अपनी बात कहने की आतुरता है जो उसकी अभिजात वृद्धि और कृत्रिम सहानुभूति की पोल खोल रही है।

7. और इस तरह ………………. जगरनाथ दुसाध।
व्याख्या-
‘जगरनाथ’ कविता की ये अंतिम पंक्तियाँ हैं। इसमें कवि की सारी जिज्ञासाओं के उत्तर में जगरनाथ के चुपचाप चले जाने का वर्णन है। कवि कहता है कि जगरनाथ इस तरह चला जा रहा था मानो उसने मुझे देखा ही न हो। और उसके द्वारा अनदेखी किए जाने की मुद्रा इतनी तीखी और धारदार भी कि कवि को चीरता-फाड़ता चला जा रहा हो। इन पंक्तियों का निहितार्थ स्पष्ट है-कवि जगरनाथ का बचपन का साथी है लेकिन वह अब उससे भिन्न है, विशिष्ट है, अध्यापक है।

जगरनाथ इस भेद को समझता है कि दोनों दो धरातल के जीव हैं जिनके जीवन-स्तर और बोध में अन्तर है। इस विषमता के कारण जगरनाथ के मन में कवि के लिए कोई आत्मीयता नहीं है। वह प्रतिक्रिया तो व्यक्त नहीं करता लेकिन लगातार चुप रहकर और चुपचाप चले जाकर सारी बातें कह जाता है। उसकी न देखने वाली दृष्टि की धार से चीरा जाकर कवि आहत हो उठता है।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 9 गालिब

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 9 गालिब (त्रिलोचन)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 9 गालिब (त्रिलोचन)

गालिब पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘गालिब गैर नहीं हैं, अपनों से अपने हैं, के द्वारा कवि ने क्या कहना चाहता है?’
उत्तर-
प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख कवि त्रिलोचन ने उर्दू के महान शायर ‘मिर्जा गालिब’ की गैर नहीं अपनों से अपने कहा है। कवि के अनुसार गालिब हिन्दी साहित्य के लेखकों से अलग नहीं है। गालिब अन्य हिन्दी कवि और साहित्यकारों के समान ही जीवन-दर्शन, सामाजिक दर्शन तथा प्रकृति के रहस्यों को जनहित में उद्घाटित करने का कार्य अपने शायरों के माध्यम से किया है। शायरी के हल्केपन से दूर गालिब और कथ्य का सारगर्भित चित्रण बड़े ही सहज, स्वाभाविक और ठेठपन में किया है जो कल्याणकारी और शिक्षाप्रद है। वस्तुत: गालिब ने जनहित में लेखक कार्य कर हिन्दी जनता के होताय कवि होने का गौरव प्राप्त कर लिया है।

प्रश्न 2.
‘नवीन आँखों में जो नवीन सपने हैं’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
प्रगतिशील काव्य धारा के कवि त्रिलोचन ने मिर्जा गालिब के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का चित्रण ‘गालिब’ शीर्षक सॉनेट में किया है। कवि के अनुसार आधुनिक भारत के नौनिहालों के सपने जिसमें एक स्वावलम्बी- स्वाभिमानी और शक्ति सम्पन्न भारत के उज्जवल भविष्य का जो सपना है वही सपना गालिब को भी थी। गालिब ने अपनी शायरी के माध्यम से जीवन के जटिल गाँठ को खोलकर भविष्य निर्माण के लिए आवश्यक क्रिया-कलापों के लिए सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत किया है। नवीन भारत के नौनिहालों के नवीन सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने अक्षर की महिमा का दिग्दर्शन ही कराया है। अपनी भाषा और लक्ष्य में एकरूपता के कारण ही गालिब की बोली ही आज हमारी बोली बन गई है।

प्रश्न 3.
‘सुख की आँखों ने दुःख देखा और ठिठोली की’ में किन दुखों की ओर संकेत है?
उत्तर-
पतंत्रता की बेड़ी में जकड़ी भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन में व्याप्त दुखों का वर्णन गालिब की रचनाओं में उल्लेखित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के सुख को देखनेवाली आँखें, भारत की दारुण-दशा से व्यथित है। मिर्जा गालिब के ‘अंटी में दाम’ नहीं है वे साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। अपने जीवन की कठिनाइयों भरे मार्ग से उतना दुःख नहीं है, वे तो जीवन का साधक कवि है जिसकी आँखों में एक सबल, सजग, सुशिक्षित, स्वावलम्बी तथा सर्वशक्तिसम्पन्न भारत का सपना है। उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन के दुःखों से ठिठोली करने की आदत-सी पड़ गई है।

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प्रश्न 4.
गालिब ने अक्षर से अक्षर की महिमा किस प्रकार जोड़ी?
उत्तर-
कविवर त्रिलोचन ने उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब के शायरों का भारतीय साहित्य, भारतीय जीवन तथा भारतीय दर्शन पर गहरा और व्यापक छाप को सहज ही परिलक्षित किया है। गालिब का व्यक्तित्व सहज, सादगीपूर्ण तथा शिक्षाप्रद था। उनकी रचनाओं में हिन्दी, उर्दू तथा फारसी का घालमेल है। गालिब ने जो कुछ लिखा है वह जीवन के सत्य के अत्यन्त करीब है। अन्य उर्दू शायरों की भाँति उनकी शायरी में फूहड़पन और हल्केपन का समावेश न होकर तथ्य और कथ्य पर आधारित है। उनकी रचनाओं में नैसर्गिक रूप से भारतीय परम्परा सहज ही दृष्टिगोचर होता है।

उनकी भाषा की सशक्ता सार एवं चित्रण दुनिया के लिए एक दुर्लभ उदाहरण है। शब्द से शब्द जोड़कर उसकी महिमा को व्यापक अर्थ में जनहित में उद्घाटित करनेवाले कवियों के श्रेणी में गालिब प्रतिष्ठित हैं। कवि के रूप में उन्होंने हिन्दी, उर्दू तथा फारसी शब्दों के समायोजन कर व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। महान उर्दू शायर गालिब के शब्द .का समुचित आधार बनाकर तथा शब्द से शब्द को जोड़कर तथ्य और कथ्य को सहजता से पाठक के सामने प्रस्तुत करने में महारत हासिल था।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए-“अपना कहने को क्या था, धान-धान नहीं था, सत्य बोलता था, जब-जब मुँह खोल रहे थे।”
उत्तर-
प्रस्तुत व्याख्येन पंक्तियाँ प्रगतिवाद काव्यधारा के प्रमुख कवि त्रिलोचन द्वारा विरचित ‘गालिब’ शीर्षक सॉनेट से ली गई है। इस कविता में कवि ने उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब के व्यक्त्वि एवं कृतित्व को निखारने-सँवारने तथा गहराई से अनुशीलन किया है। गालिब की जिन्दगी का चित्रण करते हुए कवि कहता है कि भले ही गालिब के पास धन-धान नहीं था, अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं था; परन्तु उन्होंने अपनी सत्यनिष्ठा के संबल को कभी नहीं छोड़ा।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 9 गालिब (त्रिलोचन)

गालिब की शायरी सत्य और समयानुरूप थी, जहाँ से मानव-जीवन के तार सहज ही झंकृत होते हैं। उन्होंने जब भी मुँह खोला अर्थात् रचना की वह सत्य पर आधारित भारतीय जनजीवन का सारगर्भित तत्व थे। गालिब सरलता, सादगी तथा सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण वे हिन्दी साहित्य के करीब उनकी रचना पहुँच सकी और हिन्दी कवि ने उन्हें ‘अपनों से अपना’ कहा है।

प्रश्न 6.
इस रचना के आधार पर गालिब के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएँ उभर कर सामने आती है।
उत्तर-
प्रस्तुत सॉनेट ‘गालिब’ त्रिलोचन की गालिब के प्रति श्रद्धा और निष्ठा का दर्पण है। मिर्जा गालिब उर्दू के महान शायर थे जिन्होंने उर्दू शायरी के माध्यम से अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व का महान छाप भारतीय सभ्यता-संस्कृति पर छोड़ी। मिर्जा गालिब सरल, सहज एवं सादगी के प्रतिमूर्ति थे। धनहीन होने के बाबजूद गालिब ने सत्यनिष्ठा से कभी मुँह नहीं मोड़ा। गालिब ने अपनी रचनाओं को जनहित में उद्घाटित कर एक नवीन चेतना, नवीन आशा एवं नवीन ध्येय से जन-मानस को जोड़ने का प्रयास किया है।

उन्होंने अपनी गरीबी से ठिठोली करते हुए निराले अंदाज में जीवन-पथ पर संघर्षरत होकर भावी भविष्य के लिए नवीन सपने संजोने का कार्य किया था। उनकी रचनाओं में भारतीय अस्मिता, भारतीय संस्कृति तथा भारतीय समाज का स्पष्ट छाप सहज ही प्रतिबिंबित होता है। उन्होंने सत्य पर आधारित भारतीय जीवन-दर्शन को दर्शाया है। वे पुरोधा शायर के रूप में अक्षर से अक्षर की महिमा को जोड़ने का कार्य किया था।

उनकी शायरी में पकृति तथा मानव-जीवन-संघर्षों में जूझते भारतीय समाज के अद्भुत चित्र प्रतिबिम्बत है। जीवन को प्रतिकूल दशाओं में भी परम्परागत नैतिकता का मूल्यबोध के सहारे आगे बढ़ते रहने की कला का गालिब दुर्लभ और अद्वितीय उदाहरण थे। गालिब को भारतीय जनमानस अक्षर में अक्षर की महिमा जोड़ने वाला जीवन का साधक कवि के रूप में चिरस्मृत करता रहेगा।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 9 गालिब (त्रिलोचन)

प्रश्न 7.
‘गालिब होकर रहे’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-
प्रगतिशील काव्यधारा के पुरोधा कवि त्रिलोचन में ‘गालिब’ शीर्षक सॉनेट में उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला है। मिर्जा गालिब युग-पुरुष थे, जिन्होंने समाज की कुरीतियों पर ठोकर मारे, परन्तु उनका सामाजिक जीवन कैसा था; इसका वर्णन त्रिलोचन ने यथार्थ रूप में किया है। सामाजिक अन्धविश्वास तथा जड़ता से दु:खी गालिब को स्वयं की दीनता नजर नहीं आई। गालिब ने आधुनिक जीवन के नवीन सपने देखे। गालिब ने जीवन की जटिल गाँठ को जनहित में उद्घाटित कर मानवता की अकूत सेवा की।

भारतीय संस्कृति जोड़ने वाले साधक कवि थे, जिन्होंने अपनी सत्यनिष्ठा पर आधारित रचनाओं से भारतीय मानस को उद्वेलित एवं झंकृत किया। अपनी सरलता, सादगी तथा भारतीय जीवन दर्शन के उद्घोषक कवि के रूप में गालिब हिन्दी जनता का जातीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। गालिब ने हिन्दी और उर्दू के बीच महासेतु बनकर इनके बीच की दूरी को पाटने का सार्थक प्रयास किया है।

गालिब के करिश्माई व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रभावित कवि गालिब के समान अपने जीवन और चरित्र का निर्माण करने हेतु प्रेरित किया है ताकि महान उर्दू शायर के समान भारत का प्रत्येक नागरिक सत्य, निष्ठा और कर्तव्य-परायणता का मेरुदण्ड बन सके। इस प्रकार गालिब का सम्पूर्ण व्यक्तित्व शिक्षाप्रद और अनुकरणीय है।

प्रश्न 8.
अपना कहने को क्या था, धन-धान नहीं था। सत्य बोलत था, जब-जब मुँह खोल रहे थे। [B.M.2009 (A)]
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे पाठ्य-पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित प्रयोगधर्मी कवि त्रिलोचन रचित ‘गालिब’ शीर्षक सॉनेट से उद्धत है। कवि ने उर्दू के महान शायर और शख्सियत मिर्जा गालिब की आर्थिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति और आत्मिक स्थिति तीनों का सूत्रवत चित्रण किया है। गालिब जी ने जो लिखा है वह जीवन का कटु सत्य है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 9 गालिब (त्रिलोचन)

गालिब के जीवन में निजी कहलाने वाला कुछ नहीं था। जीवन में धन आया भी तो ठहरा नहीं। कोई चल-अचल संपत्ति उनके पास नहीं थी। एक विचित्र बात थी कि जब-जब उनका मुँह खुलता, वे मुंह को खोलते, मुँह से सिर्फ सत्य ही बाहर आता। सत्य तो कटु था। बेधक था, मारक था। सत्य से व्यष्टि से लेकर समाष्टि दूर भागते थे। सत्य का मार्ग अपनाकर हम स्वयं और सृष्टि का कल्याण करने में सक्षम हैं।

सचमुच सत्यवादी वही है जो संबंधों से असंबद्ध हो। कवि ने गालिब के व्यक्तित्व की वह झलक दिखलाई है जो कम शब्दों में अपनी बात बेजोड़ ढंग से रखते हैं।

प्रश्न 9.
हमको उनसे है वफा की उम्मीद। जो नहीं जानते वफा क्या है। गालिब अपने फन के समुच गालिब थे। व्यारघ्या करें। [B.M.2009(A)]]
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवाद काव्यधारा के प्रमुख कवि त्रिलोचन द्वारा विरचित गालिब शीर्षक सॉनेट से ली गई हैं।

कवि त्रिलोचन ने जो फारसी के अजीम शायर मिर्जा असद उल्लाह खाँ, ‘गालिब’ का शब्द चित्र अपने सॉनेट में प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार मिलन सार हमदर्द, हरदिल अजीज इंसान थे। उन्होंने हमारी बोली को तराशा, हमारी जुदा-जुबानों को एक जगह लाने का गंगा-यमुना के पानी को एक करने जैसा कार्य किया। जिसका परिणाम है कि आज हिन्दी में उर्दू, फारसी, अरबी के शब्द के धुल-मिल गए हैं।

गालिब स्पष्ट करते हैं कि हमने उन लोगों से बफाई और मुहब्बत की उम्मीद की है जो वफा से परिचित ही नहीं है। शायर के मनोभाव को परखने वाले जौहरी का अभाव है। दुनियाँ वालों से उनकी जो उम्मीदें थीं वे साकार नहीं हो पाईं। एक तरह से उनका दर्द ही इन पंक्तियों में उभरकर सामने आया है।

गालिब भाषा की बात

प्रश्न 1.
प्रस्तुत सॉनेट में त्रिलोचन ने कई मुहावरों का प्रयोग किया है। जैसे-अपनों से अपना, अंटी में दाम न होना आदि। पाठ के आधार पर ऐसे मुहावरों की सूची बनाएँ और उनका वाक्य में प्रयोग करें।
उत्तर-
कवि त्रिलोचन रचित ‘गालिब’ शीर्षक सॉनेट में निम्नलिखित मुहावरे आये हैं अपनों से अपने-तुमसे क्या छिपाना, तुम तो अपनों से अपने हो। गाँठ जटिल-भागने में नहीं बहादुरी जीवन की जटिल गाँठ खोलने में है। दाम नहीं अंटी में-रिलायंस कम्पनी तुम खरीदगे? अंटी में दाम भी है या नहीं?

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साँस-साँस पर तोलना-किस शब्द का क्या प्रभाव होगा बोलने से पहले साँस-साँस पर तौल लेना चाहिए।

अपना कहने को क्या-अपना कहने को क्या, तुम मेरी छोड़ो अपनी जरूरत कहो। मुँह खोलना- कीमत मुँह खोलने की भी होती है। गालिब होकर रहे-जीवन से हार कर नहीं, जीवन को गालिब होकर आनंद उठाओ।

प्रश्न 2.
महिमा, गरिमा शब्दों की तरह ‘इमा’ प्रत्यय लगाकर आठ अन्य शब्द बनाएं।
उत्तर-
पूर्णिमा, अरुणिमा, कालिमा, लालिमा, रक्तिमा, गरिमा, लघिया, महिमा।

प्रश्न 3.
‘धन-धान’ में कौन-सा समास है?
उत्तर-
धन-धान में द्वन्द्व समास है।

प्रश्न 4.
‘सत्य बोलता था जब-जब मुंह खोल रहे थे’-इस वाक्य में कर्ता कौन है।
उत्तर-
इस वाक्य में कर्ता ‘सत्य’ है जो बोलने का कार्य कर रहा है।

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प्रश्न 5.
‘बेशक’ में ‘बे’ उपसर्ग है। ‘बे’ उपसर्ग लगाकर सात शब्द बनाएँ।
उत्तर-
बेकार, बेलगाम, बेमरौवत, बेमजा, बेसहारा, बेलौस और बेसुरा।

प्रश्न 6.
‘अक्षर’ शब्द के प्रयोग में श्लेष अलंकार है, कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
एक ही शब्द के विभिन्न सन्दर्भो में जब अलग-अलग अर्थ (भले ही निरर्थक हो) मिलते हैं तब श्लेष अलंकार होता है। यहाँ अक्षर का पहला अर्थ वर्ण, दूसरा अर्थ भाषा (वाणी) और तीसरा अर्थ सर्वशक्तिमान कालपुरुष, जन्म-जरामरण से रहित ईश्वर, ब्रह्म परमेश्वर और अल्लाह है।

प्रश्न 7.
त्रिलोचन की काव्य भाषा में एक सादगी और सरलता दिखलाई पड़ती है चौड़ी गहरी नदी जैसी बताई जाती है। इस सॉनेट की सादगी और सरलता को आधार बनाकर उनकी काव्य भाषा पर एक टिप्पणी कीजिए।
उत्तर-
त्रिलोचन प्रगतिवादी आन्दोलन के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। प्रगतिवाद की विशेषताओं में एक यह भी है कि सरल बोधगम्य शब्दों, बिम्बों के माध्यम से कवि अपनी बात रखता है किन्तु उसकी मारक क्षमता कहीं अधिक बढ़ी होती है। त्रिलोचन को प्रेमचंद, निराला और नागार्जुन जैसे वास्तविक संघर्षपूर्ण संसार मिला, जिसे देखने, जीने भोगने और उसमें कलात्मक सुधार करने का अवसर मिला।

संघर्षों से दो-दो हाथ करते रहने वालों की काव्य भाषा में सादगी और सरलता ही आयेगी। ‘गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-“छुद्र नदि भरि चलि तोराई” अर्थात् जिन नदियें का पेटी उथला होता है, वे ही अधिक उफनती है। सौभाग्य से त्रिलोचन का वस्तु संसार जितना विस्तृत है उतना ही अनुभव सम्पृक्त भी है।

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वे सॉनेट भले लिखते हों किन्तु सॉनेट रूपी गागर में वे सागर भर देते हैं। वह भी अपने आस-पास के प्रचलित शब्दों से लोकोक्तियों और मुहावरों के भरोसे। क्योंकि उन्हें यह सत्य पता है कि मुहावरे और लोकोक्तियों के पीछे कितने कड़े कटु अनुभव, मानस वृत्तियों का कितना लम्बा इतिवृत्त संबली के रूप में खड़ा है।

गालिब शीर्षक सॉनेट में भी यही सादगी और सरलता दृष्टिगोचर होती है। बोली गाँठ, ठिठोली-बहलाया, दाम, अंटी, साँस-तोल धान जैसे शब्दों के बदले त्रिलोचन शब्द कोश में अर्थ ढूँढने पर बाध्य कर देने वाले शब्दों का भी प्रयोग कर सकते थे किन्तु तब, गालिब का व्यक्तित्व इतना सहज नहीं होता। वे भी केशव की तरह कठिन काव्य के “प्रेत” की तरह दीखते। कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने भी लिखा है-

“जैसा मैं कहता हूँ, वैसा तू लिख फिर भी मुझसे बड़ा तू दीख”

कवि का बड़प्पन इसी में है कि यह बारीक-से-बारीक बात जेहन में उतार दे बिना किसी ताम-झाम के। अलंकार यदि स्वाभाविक रूप से आ जाएँ तो ठोक वरना अतिरिक्त श्रम न करे। तुम मिल जाए तो ठीक। किन्तु तुक के लिए बेतुक अर्थहीन वर्ष.-विन्यास से बचे। हम समझते है कि आधुनिक होकर भी, उच्च शिक्षा प्राप्त करके भी त्रिलोचन आपादमस्तक सादगी की पूतिमूर्ति हैं और इसी के प्रक्षेप इनके सॉनेट हैं।

प्रश्न 8.
‘महिमा’ संज्ञा है या विशेषण? वाक्य में प्रयोग कर स्पष्ट करें।
उत्तर-
महिमा भाववाचक संज्ञा पद है, जिसका अर्थ है-बड़ाई, महातम, महात्म्य, गौरव आदि। उदाहरण-भगवान श्रीकृष्ण की महिमा अपरम्पार है। भगवान श्रीराम की महिमा जगजाहिर है।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

गालिब दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सॉनेट के विषय में जानकारी दें।
उत्तर-
सॉनेट अंग्रेजी साहित्य का काव्यरूप है। हिन्दी में इसके लिए चतुर्दश पदी शब्द का प्रयोग होता है। इस काव्य रूप के विषय में निम्न बातें ध्यातव्य हैं।

  1. इसमें चौदह पंक्तियाँ होती है, कम या अधिक नहीं।
  2. दो-दो पंक्तियों का युग्म या जोड़ा होता हैं जिसे कप्लेट (Couplet) कहते हैं। ऐसे सात कप्लेट से एक सॉनेट बनता है।
  3. अंतिम कप्लेट में सॉनेट की विषयवस्तु से सम्बन्धित कोई महत्त्वपूर्ण तथ्य संदेश के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

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प्रश्न 2.
शेर और गजल किसे कहते हैं?
उत्तर-
शेर और गजल दोनों उर्दू शायरी से सम्बन्धित काव्य रूप हैं। शेर में दो पंक्तियाँ होती हैं। इसका शाब्दिक अर्थ होता है एक लड़ी में पिरोना। गद्य को जब पद्य का रूप दिया जाता है तो वह बोध हो जाता है। इसमें दो चरण या पंक्तियाँ या मिसरे होते हैं।

गजल-इसका अर्थ होता है प्रेमिका से बातचीत। यह ऐसा काव्य रूप है जिसमें पाँच से ग्यारह शेर अर्थात् दस से बाईस पंक्तियाँ होती हैं। कुछ लोग इसमें सात से चौदह मिसरे या पंक्तियाँ मानते हैं। इसमें हर शेर दूसरे से स्वतंत्र होता है। उसका मजमून या विषय अलग-अलग होता है। दोनों पंक्तियों का एक प्रकार का तुक होता है। इसमें प्रेमिका के रूप, रंग, अदा तथा खूबियों का अधिकतर बढ़ा चढ़ा और प्रभावशाली वर्णन होता है। वास्तव में गजल में हुश्न और इश्क का वर्णन गजल गोई के दिलों की आवाज को प्रकट करता है।

गालिब उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गालिब का व्यक्तित्व कैसा था?
उत्तर-
त्रिलोचन के अनुसार गालिब का व्यक्तित्व दबंग था। वें वक्ता थे। वे दु:खों और कठिनाइयों से संघर्ष करते रहे। उन्हें दुनिया से कोई काम नहीं था, लेकिन वे दुनिया को अपनी अनुभवी आँखों से सदा तौलते रहे। वे मनमौजी स्वभाव के मस्त व्यक्ति थे। उनकी आँखों में सदैव नये सपने पलते थे जिन्हें वे अपनी रचनाओं में व्यक्त करते थे।

प्रश्न 2.
गालिब का कवि-कर्म का संक्षेप में विवेचन करें।
उत्तर-
शायरी के क्षेत्र में गालिब सदा कुछ नया और दूसरे शायरों से कुछ अलग कहने के अग्रणी थे। उनकी रचनाओं में जीवन की जटिल गाँठे खोलने का प्रयत्न है। इसी कारण उनकी अभिव्यक्ति में हल्कापन नहीं है उनकी भाषा भी सहज और सम्प्रेषणीय है, इसलिए वह प्रभाव उत्पन्न करती है। वे जीवन के अनुभवों के कवि हैं। अत: उनकी रचनाओं में सत्य मुखर और बेलौस होकर बोलता है। दूसरे शब्दों में, वे सत्यम् के कवि हैं।

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गालिब अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गालिब का जीवन कैसा था?
उत्तर-
कवि त्रिलोचन के अनुसार गालिब गरीब थे। उनके पास घर नहीं था। उनकी जेब में पैसे नहीं थे। परिवार के नाम पर अपना कहने के लिए भी कोई नहीं था। उन्होंने सुख की आँखों से दुख को देखा था।

प्रश्न 2.
गालिब गैर क्यों नहीं लगते हैं?।
उत्तर-
गालिब दो कारणों से गैर नहीं लगते हैं। प्रथम उनकी भाषा हमारी आज की भाषा की तरह आधुनिक है। द्वितीय, उनके सपने वे ही हैं जो आज की नयी पीढ़ी के नये सपने हैं।

प्रश्न 3.
गालिब द्वारा ‘दुनिया जोतने’ से कवि का क्या तात्पर्य है?।
उत्तर-
दुनिया जोतने से कवि का तात्पर्य यह है कि गालिब की रचनाओं में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के यथार्थ अनुभवों का भंडार है।

प्रश्न 4.
‘गालिब ने जब भी मुँह खोला सत्य कहा’ का तात्पर्य क्या है?
उत्तर-
गालिब ने अपनी रचनाओं में जो भी लिखा है वे सभी बिना किसी लाग लपेट के सत्य की तल्ख अभिव्यक्ति हैं।

प्रश्न 5.
नवीन आँखों के नवीन सपने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
कवि का तात्पर्य है कि गालिब ने जो कुछ लिखा है वह आज की नयी पीढ़ी की भावनाओं से पूर्णत: मेल खाता है।

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प्रश्न 6.
सुख की आँखों से दुःख देखा और ठिठोली की-इसका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
गालिब गरीबी के बीच रहकर भी मस्त जीवन जीते रहे। दु:खों की कभी परवाह नहीं की। यही कारण है कि गजल के दृष्टिकोण से गालिब का अद्वितीय स्थान है।

प्रश्न 7.
गालिब शीर्षक कविता में कवि के द्वारा किस शायर का परिचय दिया गया है?
उत्तर-
गालिब शीर्षक कविता में कवि त्रिलोचन ने मिर्जा गालिब का परिचय दिया है।

प्रश्न 8.
गालिब कैसी प्रकृति के व्यक्ति थे?
उत्तर-
शायर गालिब आजाद प्रकृति के व्यक्ति थे।

प्रश्न 9.
असदुल्लाह खाँ किनका नाम था?
उत्तर-
असदुल्लाह खाँ प्रसिद्ध शायर और गजलगो मिर्चा गालिब नाम था।

गालिब वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएं

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प्रश्न 1.
गालिब कविता के कवि हैं?
(क) मैथिलीशरण गुप्त
(ख) दिनकर
(ग) त्रिलोचन
(घ) मीरा
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 2.
गालिब का जन्म कब हुआ था?
(क) 1971 ई०
(ख) 1885 ई०
(घ) 1910 ई०
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
गालिब का जन्म स्थान था
(क) मध्य प्रदेश
(ख) दिल्ली
(ग) उत्तर प्रदेश
(घ) हिमाचल प्रदेश
उत्तर-
(ग)

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प्रश्न 4.
कवि का मूल नाम था
(क) जगदेव सिंह
(ख) वासुदेव सिंह
(घ) नटवर सिंह
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
गालिब की कृतियाँ हैं
(क) दिगंत
(ख) शब्द
(ग) फूल नाम एक है
(घ) अमोला
उत्तर-
(क)

प्रश्न 6.
गालिब की गद्य रचनाएँ हैं
(क) देशकाल
(ख) रोजनामचा
(ग) काव्य और अर्थबोध
(घ) मुक्ति बोध की कविताएँ
उत्तर-
(ग)

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प्रश्न 7.
त्रिलोचन की रचना है
(क) काव्य
(ख) सौनेट
(ग) गद्य लेखन
(घ) कहानी-संग्रह
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 8.
त्रिलोचन हैं
(क) लेखक
(ख) काहनीकार
(ग) कवि
(घ) फकीर
उत्तर-
(ग)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
त्रिलोचन …………….. काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं।
उत्तर-
प्रगतिवाद या प्रगतिशील।

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प्रश्न 2.
त्रिलोचन हिन्दी कविता में …………… के तो पर्याय ही माने जाते हैं।
उत्तर-
सॉनेट।

प्रश्न 3.
त्रिलोचन ने मुख्य रूप से ……………. अपनी कविता का विषय बनाया है।
उत्तर-
ग्रामीण जीवन और किसानों-श्रमिकों की संस्कृति को।

प्रश्न 4.
त्रिलोचन ने संस्कृत, हिन्दी, उर्दू आदि भषाओं का …………….. किया है।
उत्तर-
अनुशीलन तथा आत्मसात।

प्रश्न 5.
अपने बाद की कविता पर त्रिलोचन का ……………. उनके विशेष महत्व का प्रमाण है।
उत्तर-
रचनात्मक प्रभाव।

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प्रश्न 6.
प्रस्तुत सॉनेट उनके प्रसिद्ध संकलन ……………… में संकलित है।
उत्तर-
दिगंत।

गालिब कवि परिचय – त्रिलोचन (1917)

प्रश्न-
कवि त्रिलोचन का जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं का विवेचन कीजिए।
उत्तर-
कवि त्रिलोचन का प्रगतिशील कविताओं के कवियों में प्रभावपूर्ण स्थान है। इनका मूल नाम वासुदेव सिंह था। इनका जन्म सन् 1917 में चिरानी पट्टी जिला सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इन्होंने अनेक काव्य-रचनाएँ लिखीं। काव्य के साथ-साथ गद्य के क्षेत्र में भी इनकी लेखनी की प्रवीणता कुछ कम नहीं रही। साहित्य के अनुपम रचनाओं के लिए इन्हें साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इन्हें गाँधी पुरस्कार से नवाजा गया। श्लाका सम्मान भी इनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

काव्य-रचनाएँ-धरती, शब्द, अरधान, चैती, मेरा घर, तुम्हें सौंपता हूँ, गुलाब और बुलबुल, ताप के मथ हुए दिन, उस जनपद का कवि हूँ, दिगंत अमाला आदि।

गद्य रचनाएँ-रोजनामचा, देशकाल, काव्य और अर्थ बोध, मुक्ति बोध की कविताएँ। हिन्दी के अनेक कोशों के निर्माण में त्रिलोचन जी ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

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काव्यगत विशेषताएँ-त्रिलोचन जी बहुभाषी विज्ञ शास्त्री भी माने जाते हैं। इनके द्वारा रचित साहित्य में इनका अनेक भाषाओं का ज्ञान स्पष्ट झलकता है। इस ज्ञान से इनकी रचनाओं में

पर हावी नहीं होता। इनकी रचनाओं की भाषा छायावादी कल्पनाशीलता से दूर ग्राम्य जीवन की माटी से जुड़ी यथार्थ की भाषा है। हिन्दी में सॉनेट (अंग्रेजी छंद) को स्थापित करने का श्रेय भी त्रिलोचन जी को जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा को यह कवि पाठक के सम्मुख इस प्रकार से नए स्वरूप में प्रस्तुत करता है कि वह उसे अपने ही आस-पास के वातावरण की जान पड़ती है। इनकी भाषा हृदय को छू लेने वाली है। भाषा सरल और बोधगम्य है। वस्तुतः आधुनिक प्रगतिशील हिन्दी कवियों में त्रिलोचनजी का प्रभावपूर्ण स्थान है।

गालिब कविता का सारांश

प्रश्न-
कवि त्रिलोचन द्वारा लिखित सॉनेट ‘गालिब’ का सारांश लिखें।
उत्तर-
प्रस्तुत सॉनेट प्रसिद्ध कवि त्रिलोचन द्वारा रचित ‘गालिब’ एक प्रसिद्ध सॉनेट है। यहाँ का अंकन ऐसी सरलता और सादगी से किया गया है कि उनकी शबीह में नैसर्गिक अपनाने के साथ पूरी परम्परा का अक्सर दृश्य दिखाई पड़ता है।

एक कवि दूसरे कवि पर लिखे और वह भी सहृदयता के साथ पूरी तरह नतमस्तक होकर तो जरूर कोई बात होगी। और जब बात गालिब की हो तो वकौल गालिब-

“कुछ तो पठिए कि लोग कहते हैं।”
आज गालिब “गजल सरा” न हुआ।”

उसी गालिब पर चुष्पदी छंद विद्या के धुरंधर कवि त्रिलोचन ने सॉनेट रचा। इस सॉनेट के अनुसार गालिब, गैर नहीं है, विजातीय नहीं, बेगाने नहीं। वे किसी रक्त संबंधी की तरह ही स्वजन प्रिय है, प्रेमास्पद हैं क्योंकि उनकी सोच संकीर्ण नहीं है। गालिब ने फारसी के बाद उर्दू और उर्दू के साथ हिन्दी को मजबूती प्रदान की, अर्थवत्ता प्रदान की। आज जो हर किसी की आँखों मे चमकीले सपने तैरते हैं, वे गालिब के देखे गये तरक्की पसंद सपनों के ही हिस्से हैं। गालिब ने जीव-जगत के संबंध के रहस्य को, गांठ को खोलने का काम किया। वह भी नपी-तुली भाषा-शैली में कही भी उनकी भाषा में भटकाव, हल्कापन नहीं है। बचपन सुख से बीता पर व्यक्तिगत कारणों से (शराब और जुए की लत) वे बाकी जिन्दगी दुःख में काटी। खोखली ढिढोलियों के द्वारा ही मन बहलाया।

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“मुफ्त की ‘मय’ पीते है कि जाहिद
रंग लाएगी फाका मस्ती भी मेरी एक दिन”

पैसे का अभाव रहा फिर भी दुनिया से कोई ऐसा वास्ता नहीं रखा कि शर्मसार होना पड़े। हाँ गालिब मन मसोस कर दुनिया की दोरंगी नीति, चाल-ढाल को बड़े गौर से देखते रहे। उनके पास उनका अपना कहलाने वाला भी कोई नहीं था, कुछ भी नहीं था। फिर भी उनके पास अजीब-सी थाती थी। जब कभी कुछ बोलते, कहने के लिए मुँह खुलता तो लगता जैसे सत्य बोल रहे हैं। गालिब अपनी शर्तों पर जीते रहे और अपनी तरीके से कूच किया। किन्तु जो कर गये, जो छोड़कर गये, जो हमें दे गये, वह अमूल्य है, अतुल्य है। गालिब ने अलग-अलग भाषाओं के बीच भावात्मक रिश्ता कायम किया। अलग-अलग धर्म सम्प्रदायों के बीच “परमब्रह्म अनल हक” की एकरूपता का प्रतिपादन किया।

कवि त्रिलोचन ने भी अत्यन्त नपे-तुले ढंग से गालिब की जीवन रेखाओं को उभारा है। उनके व्यक्तित्व और अवदान दोनों को रेखांकित किया है। कविता में यमक, वीप्सा, अनुप्रास जैसे अलंकारों के साथ मुहावरों और लोकोक्तियों में भी अपनी जगह बनायी है।

गालिब कठिन शब्दों का अर्थ

गालिब-शक्तिशाली, जबर्दस्त, विजेता। गैर-पराया। ठिठोली-मजाक, दिल्लगी। अंटी-बटुवा, जेब। अक्षर-जिसका क्षरण न हो, जो नष्ट न हो। बेशक-निस्संदेह।

गालिब काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. गालिब गैर नहीं ……………….. गालिब के सपने हैं।
व्याख्या-
‘गालिब’ शीर्षक सॉनेट की प्रस्तुत पंक्तियों में कवि त्रिलोचन कहना चाहते हैं कि मात्र भाषा और धर्म की भिन्नता के कारण गालिब को भिन्न नहीं माना जा सकता। वे हमारे समानधर्मा हैं। वे जिस प्रकार की भाषा में अपने भावों का व्यक्त करते हैं वही हमारी भी भाषा है। उनकी रचनाओं में जो व्यक्त हुआ है वही हमारी आज की नयी पीढ़ी के सपने हैं। यहाँ बोली. का साधारण अर्थ नहीं है। यहाँ बोली से तात्पर्य कहने के ढंग और भाषा से है। सारांशत: कवि कहना चाहता है कि आधुनिक भाव-विचार का जो स्वरूप है वही गालिब में भी प्राप्त है। अत: वे हमारे समान धर्मा हैं, हमारे अपने हैं, अपने धर्म के लोगों और अपनी भाषा अर्थात् हिन्दी में लिखने वाले लोगों की तुलना में वे हमें ज्यादा अपने अनुभव होते हैं।

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2. गालिब ने खोली गाँठ ………………. नाम नहीं था।
व्याख्या-
‘गालिब’ शीर्षक कविता की प्रस्तुत पंक्तियों में त्रिलोचन जी ने गालिब की कविताओं की विशेषता बतलाई है। उनके अनुसार गालिब की कविताओं में जीवन की जटिलता को अंकित करने और उसका रहस्य समझाने की चेष्टा है। उसमें कही गयी बात अर्थात् तथ्य और बोली अर्थात् कहने का ढंग और कहने के लिए अपनायी गई शैली दोनों तुली हुई है अर्थात् सटीक है। अर्थात् कथ्य को इस तरह तोलकर कहा गया है कि सीधे प्रभाव उत्पन्न करती है। उसमें ऊपरी तौर पर सरलता लगती है, लेकिन कथ्य और भाषा दोनों प्रभावशाली होने के कारण हलकापन नहीं है। अभिप्राय यह है कि गालिब की कविता में बात वजनदार ढंग से कही गयी है।

3. सुख की आँखों ने दुःख देखा …………….. धन-धान नहीं था।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में गालिब के विषय में त्रिलोचन बताना चाहते हैं कि उन्होंने पहले सुख के दिन देखे। फिर दुर्दिन ने घेरा तो उन्हीं सुख देखने वाली आँखों से दुःख देखना पड़ा। तब लापरवाही और मस्ती के सहारे उन्होंने दुख के साथ ठिठोली की। इस तरह दु:ख के साथ ठिठोली कर यानी उसे हल्केपन से लेकर हँसी-मजाक में उसके प्रभाव को नकार कर गालिब ने अपना जी बहलाया।

उनके पास पैसे नहीं थे। दुनिया से कोई मतलब नहीं था लेकिन सतत् हर साँस वे संसार के लोगों, व्यवहारों को तौल रहे थे। उनके पास धन-धान तो नहीं ही था अपना कहने के लिए भी कोई नहीं था। इसलिए वे बेखौफ होकर सत्य को अपनी शायरी में अभिव्यक्त करते रहे। जब मुँह खोला अर्थात् जब कविता लिखी तो जीवन के सत्य को ही वाणी दी, न समझौता किया, न चापलूसी की। कवि के कहने का आशय यह है कि समय के प्रभाव और दुःखों की मार से गालिब विचलित नहीं हुए तथा सदा सच को वाणी दी।

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4. गालिब हो कर रहे ………………. महिमा जोड़ी।
व्याख्या-
त्रिलोचन रचित ‘गालिब’ कविता से प्रस्तुत पंक्तियाँ ली गयी है। यह उस सॉनेट की अंतिम पंक्तियाँ हैं जिनसे गालिब की कविता के प्रभाव को सूझ–रूप में उपस्थित किया गया है। प्रथम पंक्ति में कवि ने यह बताया है कि गालिब ने परिस्थितियों से जूझकर अपनी साहित्यिक पहचान बनायी और सारी दुनिया को जीतकर रख दिया। अर्थात् जीवन के विविध क्षेत्रों के जटिल और गंभीर समस्या की व्याख्या अपने काव्य माध्यम से की। अत: उनकी कविता जीवन के सच की व्याख्या है।

दूसरी पंक्ति में यह कहा गया है कि वे कवि थे। कवि जो मनीषी होता है, द्रष्टा और स्रष्टा होता है। अक्षर जोड़ना अर्थात् कविता लिखना उनका कार्य था। उन्होंने इस अक्षर-कर्म के स्रष्टा होता है। अक्षर जोड़ना अर्थात् कविता लिखना उनका कार्य था। उन्होंने इस अक्षर-कर्म के सहारे अक्षरत्व अर्थात् अमरत्व प्राप्त किया। कवि की दृष्टि में वे एक अनश्वर कवि हैं, उनकी कृतियाँ समय के साथ और चमकदार और प्रासंगिक होती गयी। अत: अक्षर-साधन से उनको वह महिमा मिली है जो उन्हें अक्षर अर्थात् अनश्वर, अक्षर बनाती है।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 6 झंकार

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 6 झंकार (मैथिलीशरण गुप्त)

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झंकार पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कवि ने शरीर की सकल शिराओं को किस तंत्री के तार के रूप में देखना चाहा है?
उत्तर-
मैथिली शरणगुप्त जैसे राष्ट्रभक्त कवि ने अपने शरीर की सकल शिराओं को मातृभूमि की सर्वतोमुखी विकास रूपी तंत्री के तार रूप में देखना चाहा है। कवि सम्पूर्ण संचित ऊर्जा क्षमता को मातृभूमि के कायाकल्प प्रक्रिया में लगा देना चाहा है।

प्रश्न 2.
कवि को आघातों की चिन्ता क्यों नहीं है?
उत्तर-
कवि राष्ट्र-प्रेम की भावना लोकचित में जागृत करना चाहता है। स्वाधीनता की व्याकुलता में वह स्वाधीनता आन्दोलन को सम्पूर्ण राष्ट्र में अंतर्व्याप्त करना चाहता है। गुलामी से बढ़कर कोई दूसरी पीड़ा नहीं है। स्वाधीनता की उत्कट आकांक्षा कुछ विलक्षण ही होती है। स्वाधीनता की आकांक्षा ने कवि को आघातों की चिन्ता से विमुक्त कर दिया है।

प्रश्न 3.
कवि ने समूचे देश में किस गुंजार के गमक उठने की बात कही है?
उत्तर-
आधुनिक भारत के प्रथम राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त में गुलामी की जंजीर में जकड़ी भारत माता को स्वाधीन करने की गहरी व्याकुलता है। कवि गुलाम भारत में आजादी प्राप्ति हेतु शौर्य, पौरुष तथा पराक्रम का संचार करना चाहता है, जिसके बल पर सम्पूर्ण भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष का स्वर गुंजारित हो सके। कवि स्वाधीनता आंदोलन में देशवासियों की सक्रिया सहभागिता चाहता है। वह स्वतंत्रता प्राप्ति के गुंजार का गमक सम्पूर्ण देश में गुंजारित करना चाहता है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 6 झंकार (मैथिलीशरण गुप्त)

प्रश्न 4.
“कर प्रहार, हाँ कर प्रहार तू,
भार नहीं, यह तो है प्यार।
यहाँ किससे प्रहार करने के लिए कहा गया है। यहाँ भार को प्यार कहा गया है। इसका क्या अर्थ है?
उत्तर-
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त रचित झंकार शीर्षक कविता से ली गयी हैं।

सांगीतिक वातावरण में जब संगत करते कलाकार विभिन्न प्रकार के रागों स्वरो, लयों का, अपनी कलाकारिता का इस भाव से प्रदर्शन करे कि सामने वाला कलाकार निरुतर हो जाए। किन्तु समर्थ कलाकार उसकी तोड़ प्रस्तुत करता चलता है जिससे स्वस्थ प्रतियोगी वातावरण बनता है तब परमआनंद की अनुभूति होती है। यहाँ प्रहार का यही अर्थ है, यहाँ एक कलाकार कलावत अपने समकक्ष कलाकर को, ताल, राग के माध्यम से प्रहार करने और स्वयं को उसका प्रतिकार करने के लिए प्रस्तुत होने की बात करता है।

“विपरीत और विरोधी के बीच ही विकास है” के सूत्र को पकड़े हुए कवि इस प्रहार को प्यार की संज्ञा देता है। जब तक चुनौती नहीं हो निखार नहीं आता। जब तक धधकती आग नहीं गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट हो सोने में कांति नहीं आती है। कवि चुनौतियों, जबावदेहियों, दायित्वों को भार स्वरूप नहीं प्यार स्वरूप स्वीकार करता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियां की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
(क) “मेरे तार तार से तेरी
तान-तान का हो विस्तार
अपनी अंगुली के धक्के से
खोल अखिल श्रुतियों के द्वार।”
सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगर्भित पंक्तियाँ हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त रचित ‘झंकार’ शीर्षक कविता से उद्धत हैं। वीणा से राग स्वर तभी निःसृत होता है तब उसके ऊपर तार अपनी जीवनाहूति देते हैं, अपने को तनवाने (तन्य) के लिए प्रस्तुत होते। स्वर संधान के पूर्व तारों को साधित किया जाता है।

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कवि स्वर संधान की पूर्व पीठिका बनने को प्रस्तुत है। अपनी शरीर की शिराओं को तार बनाने का सन्नद्ध है और वाँछा करता है, स्वर लहरी दूर-दूर तक गूंजे। प्रवीण अंगुलियों का तारों पर आघात इतना पुरजोर हो कि अखिल सृष्टि में यह कल निनाद सुना जा सके। कवि ठोस आधार पर मसृण कलाकृति का आकाक्षी है।

कवि शारीरिक भूख के ऊपर उठकर मानसिक हार्दिक क्षुधा की तृप्ति हेतु आहन करता है।

स्पष्ट है गुप्त जी का झुकाव छायावादी विचारधारा की ओर हो चुका है। तार-तार और तान-तान में वीप्सा अलंकार तथा अपनी अंगुली ……………….. अखिल में ‘अ’ वर्ण की आवृति से अनुप्रास अलंकार उपस्थित है।

(ख) ताल-ताल पर भाल झुकाकर
माकहत हों सब बारम्बार
लघ बँध जाए और क्रम-क्रम से
सभ में समा जाए संसार।
सप्रसंग व्याख्या-
प्रस्तुत सारगर्भित पंक्तियाँ हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित मैथिलीशरण गुप्त रचित ‘झंकार शीर्षक कविता से उद्धृत हैं। इन पंक्तियों में कवि ने संगीत की चरम स्थिति की प्राप्ति और उसके प्रभाव की चर्चा की है। संगीत वह भाषा है जिसे अनपढ़ भी समझ लेते हैं। संगीत का जब समां बन्ध जाता है तो हर ताल पर, हर थाप पर प्रत्येक आरोह-अवरोह के साथ श्रोता अपने निजत्व को त्याग कर संगीत के सम्मोहन में बन्धे सिर झुकाते रहते हैं। आनन्द के सागर में डूबे रहते हैं। उन्हें मधुमती भूमिका प्राप्त होती है।

परिपक्व संगीत ‘ब्रह्मानन्द सहोदर’ आनंद की प्राप्ति करता है। संगीत गायन वादन के क्रम में वह चरम क्षण भी आता है जिस सम कहा जाता है जहाँ एक अलौकिक शांतिमय संसार का सृजन हो जाता है।

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कविक अभीष्ट है कि हम कला को इस ऊँचाई तक ले जाएँ कि आलोचना का अवकाश न रहे बल्कि हमारी कला विश्व समुदाय को मोहित, आकर्षित करने, उन्हें मधुमती भूमिका में पहुँचाने, ब्रह्मानंद का क्षणिक ही सही साक्षात्कार कराने में सफल हो।

कवि भारत के सांस्कृतिक उत्थान का आकांक्षी है। लालित्य वर्द्धन का आकांक्षी है।

प्रस्तुत पंक्तियां में वीप्स और अनुप्रास अलंकार का वर्णन हुआ है।

प्रश्न 6.
कविता का केन्द्रीय भाव क्या है? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
आधुनिक काल के द्वितीय उत्थान-द्विवेदी युग के प्रमुख कवि हैं मैथिलीशरण गुप्त। वे आधुनिक भारत के प्रथम राष्ट्रकवि तथा नए भारत में हिन्दी जनता के प्रतिनिधि कवि के रूप में सम्मानित हैं।

प्रस्तुत कविता में कवि कहता है कि स्वतंत्रता का स्वर इतना ऊचाँ हो कि सम्पूर्ण राष्ट्र एकीभूत होकर देश की आजादी का स्वर गुंजारित करे। प्रकृति आनन्दमय हो जाए, मनुष्य का भाग्य इठलाये। मुक्तिकामना की गमक देश और काल की सीमा का उल्लंघन कर जन-जन के मानस पटल पर गुजारित हो जाए। मुक्तिकामना की तान से स्वतंत्रता की ऐसी उत्कट कामना भारतवासियों में पैदा हो कि वे सदियों से गुलामी की दासता में छटपटा रही भारतमाता गुलामी के बन्धन से मुक्त हो जाए। सम्पूर्ण हिन्दीवासी अपनी अस्मिता की खोज की व्याकुलता राष्ट्रप्रेम का या राष्ट्र-मुक्ति के संग्राम में समाहित होकर गुलामी की बेड़ियां से आजाद हो जाए।

‘झंकार’ कविता में स्वाधीनता आन्दोलन की अंतर्व्याप्त राष्ट्र के कोने-कोने में हो चुकी है और स्वाधीनता तथा मुक्ति की प्यास एवं सम्पूर्ण राष्ट्र को हिन्दोलित होने की सच्चाई सहज ही दृष्टिगोचर होती है। कविता में सम्पूर्ण राष्ट्र की एकीभूत मुक्तिकामना की उत्कट और अपूर्व अभित्यक्ति हुई है। राष्ट्र के प्रति प्रणों से बढ़कर राष्ट्र प्रेम तथा कृतज्ञता की आत्मिक अनुभूति इस गीति-गमक रचना में स्वरित होती है। कवि की राष्ट्रीयता, देशप्रेम, यथार्थबोध, आजादी की कामना का उद्देश्य एवं चेतना कविता का मूल स्वर है।

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प्रश्न 7.
कविता में सुरों की चर्चा करें। इनके सजीव-साकार होने का क्या अर्थ है?
उत्तर-
भारत राष्ट्र के गौरव गायक मैथिलीशरण गुप्त की झंकार शीर्षक कविता संगीत की पृष्ठभूमि में रचित है। संगीत के घटक सुर स्वर हैं। स्वरों का आरोह-अवरोह जब पक्के गायक के गले से नि:सृत होता है तो एक जीवन्त अवलोक का सृजन होता है। ऐसा लगता है कि स्वर केवल कान के माध्यम से ही नहीं सुन रहे बल्कि आँखों के सामने साकार रूप में उपस्थित हैं। स्वरों की सर्वोत्तम प्रेषणीयता ही सजीव-साकार का अर्थ ग्रहण करती है।

प्रश्न 8.
इस कविता का स्वाधीनता आन्दोलन से कोई सांकेतिक सम्बन्ध दिखायी पड़ता है। यदि हाँ! तो कैसा?
उत्तर-
राष्ट्रकवि मैथिलीशरधा गुप्त की प्रस्तुत कविता ‘झंकार’ में भारतीय स्वतंत्रता-संघर्ष का स्वर नि-संदेह गुंजारित है। इस कविता में कवि की देशभक्ति स्वतंत्रता प्राप्ति की उत्कृष्ट आकांक्षा तथा भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की उत्प्रेरणा का स्वर अनुगुजित है। दिव्यभूमि की आजादी के लिए व्याकुल कवि का हृदय मुक्ति की युक्ति निकालने को तैयार है तथा सम्पूर्ण हिन्द को इस स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़ने का आह्वान करता है जो उसके उत्कृष्ट देशभक्ति रेखांकित एवं विश्लेषित करता है।

कविता में गुलामी की बेड़ियों को काटकर भारतमाता को स्वाधीन बनाने की संवेदना-कल्पना का संस्पर्श का एकांत साक्ष्य पेश होता है। कविता में स्वाधीनता आन्दोलन की अंतर्व्याप्ति तथा मुक्ति की प्यास निःसंदेह निर्णायक स्थान प्राप्त कर चुका है। सम्पूर्ण राष्ट्र स्वाधीनता के लिए आन्दोलित होकर सदियों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए कृतसंकल्पित है। इस कविता में सम्पूर्ण राष्ट्र की एकीभूत मुक्तिकामना की गीति-गमक गुंजारित और झंकृत है।

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प्रश्न 9.
वर्णनात्मक कविता लिखने के लिए “द्विवेदी युग” के कवि प्रसिद्ध थे। किन्तु इस कविता में छायावादी कवियों जैसी शब्द-योजना, भावाभिव्यक्ति एवं चेतना दिखलायी पड़ती है। कैसे? इस पर विचार करें।
उत्तर-
आदर्शवाद की प्रधानता के कारण “द्विवेदी युग’ के कवियों ने वर्णन प्रधान इतिवृत्तात्मक शैली को ग्रहण किया। यह शैली नैतिकता के प्रचार और आदर्शों की प्रतिष्ठा के लिए अत्यन्त उपयुक्त थी। विभिन्न पौराणिक एवं ऐतिहासिक आख्यानों को काव्यबद्ध करने के लिए इस युग में वर्णनात्मक काव्य को प्रधानता मिली। वर्णन-प्रधान शैली होने के कारण इस काव्य में नीरसता और शुष्कता आ गई तथा अनुभूति की गहराई का समावेश हो सका ! वर्णनात्मक काव्य में कोमलकांत पदावली और रसात्मकता का अभाव है।

‘द्विवेदी युग’ के कवि का ध्यान प्रकृति के यथातथ्य वर्णन तथा मानव प्रकृति का चित्रण इस समय की कविता का प्रधान विषय बन गई। इस काल के कवियों ने जहाँ प्रकृति के बड़े संवेदनात्मक एवं चित्रात्मक चित्र प्रस्तुत किये हैं, वहाँ प्रकृति वर्णन के द्वारा नैतिक उपदेश देने की चेष्टा भी की है।

द्विवेदी युग में खड़ी बोली परिमार्जित और परिष्कृत होकर भाषा में स्वच्छता और सजीवता का समावेश करने में समर्थ हुई। भाषा का अधिक सरस, माधुर्यपूर्ण तथा प्रौढ़ स्वरूप इस युग में परिलक्षित होता है। ‘द्विवेदी युग’ के काव्य विविधमुखी है। काव्य में विविध छन्दों को अपनाने की प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रस्तुत कविता ‘झंकार’ में छायावादी कवियों जैसी शब्द योजना, भावभिव्यक्ति एवं चेतना दिखलाई पड़ती है। गुप्त जी की कविता में न संस्कृत के तत्सम शब्दों की भरमार तथा अरबी-फारसी के शब्दों का बाहुल्य और देशज शब्दों की प्रचुरता है। उन्होंने खड़ी बोली की प्रकृति और संरचना की रक्षा करते हुए, उसे काव्य भाषा के रूप में विकसित करने का सफल प्रयास किया है।

राष्ट्रकवि गुप्तजी ने खड़ी बोली हिन्दी के स्वरूप निर्धारण और विकास के साथ-साथ उसे काव्योपयुक्त रूप प्रदान करने वाले अन्यतम कवियों में अग्रणी भूमिका निभाई। निश्चय ही आज की काव्य भाषा के निर्माण में उनकी आधारभूत भूमिका परिलक्षित होती है। प्राचीन के प्रति पूज्यभावना और नवीन के प्रति उत्साहपूर्ण भाव की विशेषता, कालानुसरण की अद्भुत क्षमता एवं उत्तरोत्तर बदलती भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण कर चलने की शक्ति, काव्य में परम्परा और आधुनिकता का द्वंद्व तनाव और समन्वय का यथार्थ समायोजन करने की अद्भुत क्षमता की गीति-गमक ने उन्हें छायावादी कवियों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है।

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झंकार भाषा की बात

प्रश्न 1.
गुप्तजी की कविता में तुकों का सफल विधान है। इस कविता में प्रयुक्त तुकों को छाँट कर लिखें।
उत्तर-
मैथिलीशरण गुप्तजी तुकान्त कविता रचने के लिए जितने विख्यात हैं उतने ही आलोचना के पात्र भी हैं। किन्तु यह भी सत्य है कि तुक के कारण ही कविता दीर्घजीवी हो पाती है। झंकार में निम्नलिखित तुकान्त शब्द आये हैं- तार-झंकार; साकार-गुजार; प्यार-तैयार; विस्तार-द्वार और बारंबर-संसार।

प्रश्न 2.
पूरी कविता में अनुप्रास अलंकार है। अनुप्रास अलंकार क्या है? कविता से इसके उदहरणों को चुनकर लिखें।
उत्तर-
अनु (बार-बार) + प्रास (रख्ना) = अनुप्रास अर्थात् जहाँ अक्षरों में समानता होती है, भी ही उनके स्वर मिले या न मिले वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। इसके चार भेद हैं-छेकनुप्रास (एक या अधिक वर्षों का केवल दो बार प्रयोग); वृत्यनुप्रास (एक या अधिक वर्णों का दो से अधिक बार प्रयोग); श्रुत्यानुप्रास (मुख के किसी एक ही उच्चारण स्थल से उच्चारित होने वाले वर्गों की आवृत्ति) और अन्त्यानुप्रास (चरण या पद के अन्त में एक से स्वर-व्यंजन के आगम से)।

प्रस्तुत झंकार कविता में निम्न पंक्तियों में अनुप्रास है-

  • प्रथम पंक्ति-स, श, र, क, की आवृत्ति
  • द्वितीय पंक्ति-‘त’ की तीन आवृत्ति
  • तृतीय पंक्ति-‘क’ की एक आवृत्ति
  • चतुर्थ पंक्ति-उ, ऊ की आवृत्ति
  • पंचम पंक्ति-न, स की आवृत्ति
  • षष्ठ पंक्ति-स, र की आवृत्ति
  • सप्तम पंक्ति-द, स, क, ल, म की आवृत्ति
  • अष्टम पंक्ति -क, र, प, ह की आवृत्ति
  • नवम पंक्ति -र, ट की आवृत्ति
  • दशम पंक्ति-त, ह की आवृत्ति
  • एकादश पंक्ति-त, ह की आवृत्ति
  • द्वादश पंक्ति-त, र आवृत्ति।
  • त्रयोदश पंक्ति-त, न की आवृत्ति
  • चतुर्दश पंक्ति-अ की आवृत्ति
  • पंचदश पंक्ति-ल की आवृत्ति
  • षोडस पंक्ति-त, ल, क, र की आवृत्ति
  • सप्तदश पंक्ति- ह, ब, र की आवृत्ति
  • अष्टादश पंक्ति-क, र, म की आवृत्ति
  • उनविंश पंक्ति-स, म की आवृत्ति

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग निर्णय करें। शरीर, शिरा, झंकार, प्रकृति, नियति, गमक, तान, अंगुली, भाल, संसार।
उत्तर-
शरीर (पुं.) – राम का शरीर गंदा है।
शिरा (स्त्री.) – आपकी शिरा में झंकार है।
झंकार (स्त्री.) – पायल की झंकार मन मोहक होता है।
प्रकृति (स्त्री.) – प्रकृति बहुरंगी है।
नियति (स्त्री.) – आपकी नियति पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
गमक (पुं.) – जर्दा का गमक अच्छा है।
तान (स्त्री.) – मुरली की तान मधुर होती है।
अंगुली (स्त्री.) – मेरी अंगुली कट गई।
भाल ([.) – तुम्हारा भाल चमक रहा है।
संसार (पुं.) – यह संसार सनातन है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों से विशेषण बनाएँ शरीर, प्रकृति, संसार, नियति, काल,
उत्तर-

  • शरीर – शारीरिक
  • प्रकृति – प्राकृतिक
  • संसार – सांसारिक
  • नियति – नैतिक
  • काल – कालिक

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

झंकार लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘झंकार’ कविता का अभिप्राय क्या है?
उत्तर-
‘झंकार’ कविता ईश्वर और मानव के बीच संबंध को सूचित करती है। इसमें कवि बताना चाहता है कि ईश्वर कर्ता है और मनुष्य निमित्त। मनुष्य ईश्वर का वाद्य यन्त्र है। इसके द्वारा वह अपने सत्ता को झंकृत करना चाहता है। यह झंकार विश्वव्यापी लय के रूप में संसार के कण-कण में समायी हुई है। मानव अपने कर्म के द्वारा ईश्वर की सत्ता को व्यक्तर करे यही इस गीत का भाव है।

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प्रश्न 2.
‘झंकार’ कविता का केन्द्रीय भाव बतायें।
उत्तर-
‘झंकार’ कविता आत्म-परमात्मा के बीच निहित सम्बन्ध की व्याख्या करती है। इसमें कवि यह कहना चाहता है कि उसे ईश्वर अपना वाद्य यन्त्र बनने का गौरव दें। वह सभी प्रकार के आघात सहकर भी ईश्वर के संगीत को विश्व संगीत के रूप में व्यक्त करने का माध्यम बनना चाहता है। उसकी इच्छा है कि उसके माध्यम से व्यक्त होने वाली ईश्वरीय सत्ता की झंकार गहरी और व्यापक हो तथा सारा संसार ईश्वरीय संगीत की लय पर सम्मोहित होकर उससे तदाकर या एकरूप हो जाय।

झंकार अति लघु उत्तरीय प्रश्न।

प्रश्न 1.
‘झंकार’ कविता में कवि ने अपने को किस रूप में प्रस्तुत किया है?
उत्तर-
‘झंकार’ कविता में कवि ने अपने को वाद्य यन्त्र के रूप में प्रस्तुत किया है और कहा है कि मेरे शरीर के स्नायु तंत्र की सभी नसें ही इस शरीर रूपी वाद्य यन्त्र या तंत्री के तार

प्रश्न 2.
कवि कैसी गुंजार की इच्छा व्यक्त करता है?
उत्तर-
कवि चाहता है कि वह गुंजर ऐसी हो कि सभी स्थानों तथा सभी समयों में उसकी सत्ता बनी रहे।

प्रश्न 3.
श्रुतियों के द्वार खोलने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
‘श्रुति’ शब्द के दो अर्थ हैं। पहला कान और दूसरा सुनकर प्राप्त होने वाला ज्ञान। जब ‘श्रुति’ शब्द का दूसरे अर्थ में लाक्षणिक प्रयोग होता है तो वह वेद-ज्ञान का अर्थ देता है। अतः श्रुतियों के द्वार खोलने का अर्थ है परमात्मा की कृपा से समस्त ज्ञान-विज्ञान का बोध प्राप्त हो जाने की क्षमता प्राप्त होना।

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प्रश्न 4.
परमात्मा के संगीत की झंकार से उत्पन्न प्रभाव का कवि ने किस रूप में वर्णन किया है?
उत्तर-
कवि के अनुसार परमात्मा के संगीत की झंकृत का प्रभाव गहरा हो। वह सकल श्रुतियों के द्वार खोल दें। उसके ताल-ताल पर संसार मोहित होकर तथा सिर नवाकर उसके प्रभाव का व्यक्त करें तथा सारा संसार उस संगीत के लय से तदाकार हो जाय।

प्रश्न 5.
झंकार शीर्षक कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तर-
झंकार शीर्षक कविता का केन्द्रीय भाव देशवासियों को उनकी अस्मिता का बोध कराना है।

प्रश्न 6.
कवि मैथिलीशरण गुप्त के दृष्टिकोण में स्वाधीनता आन्दोलन में देश का उद्धार कैसे हुआ था?
उत्तर-
कवि मैथिलीशरण गुप्त के दृष्टिकाण से स्वाधीनता आन्दोलन में देश का उद्धार सुरों के तालमेल से हुआ था।

प्रश्न 7.
वीण की तान से कवि मैथिलीशरण गुप्त क्या कहना चाहते हैं?
उत्तर-
वीणा की तान से कवि मैथिलीशरणगुप्त तान का विस्तार करना चाहते हैं तथा जागरण का संदेश देना चाहते है।

झंकार वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
‘झंकार’ कविता के कवि हैं
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) मैथिलीशरण गुप्त
(ग) दिनकर
(घ) त्रिलोचन
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 2.
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म हुआ था?
(क) 1886
(ख) 1876
(ग) 1883
(घ) 1884
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सथान था
(ख) मध्य प्रदेश
(ग) हिमाचल प्रदेश
(घ) उत्तराखंड

प्रश्न 4.
मैथिलीशरण गुप्त प्रमुख हुई थी
(क) पंडित द्वारा
(ख) माता द्वारा
(ग) पिता द्वारा
(घ) स्वाध्याय द्वारा
उत्तर-
(घ)

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प्रश्न 5.
मैथिलीशरण गुप्त प्रमुख कवि हैं?
(क) द्विवेदी युग
(ख) छायावादी युग
(ग) आदि युग
(घ) इनमें से सभी
उत्तर-
(क)

प्रश्न 6.
मैथिलीशरण गुप्त रचनाएँ है?
(क) साकेत
(ख) यशोधरा
(ग) पंचवटी
(घ) झंकार
उत्तर-
(सभी)

प्रश्न 7.
मैथिलीशरण गुप्त ने अनुवाद किया था?
(क) पलासी युद्ध का
(ख) मेघनाद वध
(ग) वृत्रसंसार
(घ) सभी
उत्तर-
(घ)

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
आधुनिक काल के द्विवेदी युग में प्रमुख …………… है।
उत्तर-
मैथिलीशरण गुप्त।

प्रश्न 2.
झंकार शीर्षक कविता …………. द्वारा लिखित है।
उत्तर-
मैथिलीशरण गुप्त।

प्रश्न 3.
गुलामी की जंजीर में जकड़ी भारतमाता को गुलामी की दासता से मुक्त कराने का भार . …………….. पर है।
उत्तर-
देशवासियों।

प्रश्न 4.
आदर्शवाद की प्रधानता के कारण द्विवेदी युग के कवियों ने वर्णन प्रधान ….. शैली को ग्रहण किया।
उत्तर-
इति वृत्तात्मक।

प्रश्न 5.
भारत-भारती कृति द्वारा जो भावना भर दी थी तभी से वे ………………. के रूप में प्रसिद्ध
उत्तर-
राष्ट्रकवि।

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प्रश्न 6.
राष्ट्रीय आंदोलन में मैथिलीशरण गुप्त के काव्य का …………….. रहा है।
उत्तर-
गहरा संबंध।

प्रश्न 7.
गुप्त जी ने प्रबंध काव्य की लुप्त होती परंपरा को ……………… दिया
उत्तर-
समर्थ संरक्षण।

प्रश्न 8.
वेश वैष्णव ………………. थे।
उत्तर-
रामभक्त।

प्रश्न 9.
साकेत जिसका अर्थ आयोध्या है उनका है।
उत्तर-
उत्कृष्ट महाकाव्य।

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झंकार कवि परिचय – मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964)

मैथिलीशरण गुन्त द्विवेदी युग के एक प्रमुख कवि थे। इनका जन्म 3 अगस्त, 1886 को मध्यप्रदेश के (झाँसी उत्तर प्रदेश) चिरगाँव में हुआ था। ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इनकी कविता परवान चढ़ी। फिर ‘भारत-भारती ‘ का स्वर तो ऐसा गूंजा कि स्वाधीनता-सेनानियों के ओठों पर इस काव्य की पंक्तियाँ सदा ‘सर्वदा विराजमान रहने लगीं। बासी पूरियों का नाश्ता पसन्द करने वाले गुप्तजी की जीवन-लीला 1964 ई. में समाप्त हुई। कविवर ‘सदा जीवन उच्च विचार’ के मूर्तिमन्त प्रतीक थे।

इनकी श्रेष्ठ काव्य-साधना में अनेक पुरस्कृत-अभिनंदित हुई तथा राष्ट्रभाषा-सालाहकार परिषद के अध्यक्ष भी बने। जब ये दिल्ली में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य थे, तब इनके निवास पर गुणियों तथा ज्ञानियों की शानदार महफिलें सजा करती थीं। लेकिन इस अमर यशस्वी महाकवि को एक पर एक तीन-तीन शादियों के बावजूद बारम्बार संतानमृत्यु का दंश झेलना पड़ा कोई दर्जन पर सन्तानों में अन्ततः एक ही का सुख इन्हें नसीब हो सका। गुप्तजी संस्कारी रामभक्त परिवार के परम रामभक्त कवि थे। वे अपनी काव्य कुशलता को भी श्रीराम का ही प्रसाद मानते रहे

“राम ! तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,
कोई कवि बन जाय-सहज संभाव्य है।”

‘साकेत’ राष्ट्रकवि का श्रेष्ठतम महाकाव्य है। जीवन का अनन्त विविधता एवं बहुगिता उनकी कृतियों में मिलती है। इनके कुछ प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित प्रमुख हैं-साकेत, भारत-भारती, यशोधरा, रंग में भंग, किसान, जयद्रथ-वथ, पत्रावली, प्रदक्षिणा, कुणाल-गीत, सिद्धराज, पंचवटी, द्वापर, विष्णुप्रिय, त्रिपथगा, सैरिन्ध्री, जय भारत, चन्द्रहास, गुरुकुल, हिन्द आदि।

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गुप्तजी आदर्शवादी और राष्ट्रवादी थे। उनकी उदार धार्मिकता, स्वदेशभक्ति तथा सांस्कृतिक गौरव-गान के साथ शक्ति-पूजा, जयघोष तथा ग्रामीण सरलता की संगति खूब बैठी है। मानना होगा कि गुप्तजी खड़ी बोली काव्य-चटसार के सीधे-सादे प्राइमरी गुरु हैं। हिन्दी के अनगिनत आधुनिक कवियों ने निस्संदेह कविताई का ककहरा उन्हीं से सीखा। हिन्दी के संभवतः सरल कवि के रूप में भी शान से पढ़ा जा सकता है।

भारत की साधारण जनता की लालसाएँ, आदर्श, साधना, रुचियाँ तथा आवश्यकताएँ, कर्म एवं भावना गद्य में प्रेमचन्द ढाल रहे थे और पद्य में गुप्तजी। राष्ट्रीय जीवन में व्याप्त रुदन के स्वरों को हास्य की फुलझड़ियों में बदलने का पूरा-पूरा श्रेय गुप्त जी को ही है। कोई भी साहित्यिक धारा इनकी छुअन से नहीं बच पायी। एक ओर वे सांस्कृतिक उत्थान के पुरोधा हैं तो दूसरे ओर समन्वय के प्रहरी।

वास्तव में प्राचीन के प्रति पूज्यभावना औ: नवीन के प्रति उत्साहपूर्ण स्वागत भाव गुप्त जी की विशेषता है। उनमें कालानुसरण की अदुभुत क्षमता थी। उत्तरोत्तर बदलती भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति ने उनके सुदीध रचना समय में बराबर उनका महत्त्व बनाए रखा।

झंकार पाठ का सारांश

स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानंद, महात्मा गाँधी और महर्षि अरविन्द के चिन्तन से प्रभावित स्वतंत्र भारम के प्रथम अघोषित राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त रचित झंकार शीर्षक गीत राष्ट्रीय भावना का प्रक्षेपक है। . एक राष्ट्र का समस्त विकास तभी संभव है जब जन-जन में उसके लिए उत्सर्ग का भाव हो। प्रत्येक नागरकि चाहे वह जिस व्यवास से जुड़ा हो यदि वह राष्ट्र उन्नयन के भाव को अपने हृदय में धारण करते हुए कार्यरत है तो देश का कल्याण अवश्मम्भावी है।

कवि एक सत्यनिष्ठ, देशभक्त के रूप में घोषणा करता है मातृभूमि रूपी वीणा के तार बनने की अगर आवश्यकता है। तनाव सहन करने जरूरत है तो मै अपने शरीर की सम्पूर्ण शिराओं को तंत्री का तार बनाने के लिए दधीचि की तरह प्रस्तुत हूँ। मुझे आघातों, वारों, चोटों की चिन्ता किंचित भी नहीं है। मेरा एकमात्र लक्ष्य है कि विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़े ! उसकी झंकार विश्व के कोने-कोने तक सुनाई पड़े। मेरी महती कामना है कि मातृभूमि के उत्कर्ष में नियति नियामक न बनकर घटक बने, प्रकृति सहयोगिनी बने ताकि उन्नति, विकास के जितने भी सुर स्वर है वे साकार हो उठे। यह सुर-संधान देशकाल की सीमा के परे जा पहुंचे। ऐसी गुंजार, का मै आकांक्षी हूँ।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 6 झंकार (मैथिलीशरण गुप्त)

मै सहर्ष हर प्रकार के प्रहार हेतु प्रस्तुत हूँ। मेरे शत्रुओं, तुम्हें जिस तरह से प्रहार करना हो, मुझे मार्ग से हटाने की इच्छा हो वह करों, मै इसे प्यार समझकर स्वीकार करूँगा। और क्या कहूँ। मै प्राणपण हूँ। तन-मन-धन से तुम्हारे प्रहार सहने के लिए प्रस्तुत हूँ।

कवि पुनः मातृभूमि को सम्बोधित करते हुए कहता है-मेरी शिराओं से बने हर तार से राष्ट्र का विकास रूपी तान विस्तारित हो। जो अब तक बेखबर हैं, जिनके कान उन्नति, कला संस्कृति की गमक धमक गुंजार से वचित हैं, या बन्द हैं। उन कानों के द्वारा खुल जाएँ। वे भी राष्ट्र यज्ञ में आहुति देने हेतु स्वयं को प्रस्तुत कर सकें। देश का स्वरूप इस तरह से बने कि सम्पूर्ण विश्व उस पर मोहित हो जाए। जैसे मधुर मोहक ताल सुनने का बार-बार मन करता है। मन, हृदय सभी मुक्त होते हैं। अवगुंठन के लिए अवकाश नहीं हो, स्थान नहीं हो। ऐसी समत्व भावभूमि तैयार हो कि वसुधैव कुटुम्बकम् की आर्ष कल्पना साकार हो उठे।

वस्तुत: प्रस्तुत गीत में गुप्तजी ने राष्ट्र प्रेमी का चोला बिना उतारे छायावादी रचना संसार में प्रवेश किया है। एक राष्ट्रभक्त विश्व मानव के रूप में कायान्तरित कैसे हो सकता है। एक उत्सर्ग प्रेमी, कला, संस्कृति के विकास के लिए स्वयं को बदली परिस्थिति में कैसे ढाल सकता. है। इन सब तथ्यों पर भी ध्यान जाता है। शत्रु के लिए प्यारे सम्बोधन हृदय की विस्तृत स्थिति का द्योतक कराता है। श्रुतियों के द्वार, साधारण जन के अचेतावस्था के साथ वैदिक ज्ञान के प्रति पुनः लगाव झुकाव को भी दर्शाता है। विकास, विस्तार केवल मेरा ही हो, कवि का यह अभीष्ट नहीं है, बल्कि वह औरों का भी विस्तार देखना चाहता है।

प्रस्तुत कविता ” तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित, चाहता हूँ देश की ध – रती तुझे कुछ और भी हूँ।” के सम्मिलन की भूमि में रची गयी गुप्तजी की एक उत्कृष्ट रचना है। अनुप्रास वीप्सा आदि अलंकारों की छटा विकीर्ण है।

झंकार कठिन शब्दों का अर्थ

शिरा-नस नाड़ी, धमनी। झंकार-संगीतमय ध्वनि। तंगी-वीणा, तार से बने हुए वाद्य ! आघात-चोट। नियति-भाग्य ! गमक-संगीत का पारिभाषिक शब्द जो कंपनपूर्ण रमणीक ध्वनि गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट के अर्थ के हैं। गुंजार-गूंज। तार-तार-रेशा-रेशा। अखिल-संपूर्ण। श्रुतियों-ध्वनियों। भाल-माथा। सम-संगीत का शान्तिमय परम क्षण। सकल-सम्पूर्ण।

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झंकार काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. इस शरीर की सकल …………… ऊँची झंकार।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि मैथिलशरण गुप्त रचित ‘झंकार’ कविता से ली गयी हैं। झंकार में कवि का स्वर आध्यात्मिक है, यहाँ छायावादी रहस्य-चेतना मुखर है। इन पंक्तियों में कवि कहता है कि जिस तरह वीणा के तारों पर आघात करने से संगीत की सृष्टि होती है उसी तरह का मानव शरीर भी वीणा की तरह तारों वाल वाद्य यन्त्र है। इस शरीर में निहित शिराएँ अर्थात् नर्से ही तार है।

हे परमात्मा ! इस शरीर की सभी शिराएँ तुम्हारी तंत्री अर्थात् वाद्य यन्त्र के तार बनें। हमें आधात की चिन्ता नहीं है कि कितनी चोट लगती है या कितनी झंकार उठती है। बस केवल इसमें से झंकार निकलनी चाहिए। अर्थात् इस शरीर से कोई ऐसा महत्वपूर्ण काम संभव हो जो जगत के लिए सुखद और मेरे लिए यशवर्द्धक हो। यहाँ कवि ने अपने को परमात्मा का तंत्र भी कहा है। वही इसे बजाता है अर्थात् जैसा लक्ष्य निर्धारित करता है वैसा हम कार्य करते है।

2. नाचे नियति, प्रकृति सुर साधे ……………. गहरी गुंजार।
व्याख्या-
‘झंकार’ की गीत की इन पंक्तियों में इनके रचयिता कवि प्रस्तुत श्रेष्ठ मैथिलीशरण गुप्त परमात्मा से यह कहना चाहते हैं कि तुम इस तन रूपी तंत्री के सभी सुरों को सजीव-साकार करों। वे सुर इतने प्रभावशाली हों, प्रेरक हो कि नियति अर्थात् भाग्य जो सब को नचाता है वह स्वयं नाचने लगे और प्रकृति जो लय के माध्यम से साकार होती है वह स्यवयं सुर साधने लगे।

उस झंकार का प्रभाव देश देश में अर्थात् सभी स्थानों में व्याप्त हो जाय और वह इतनी स्थायी हो कि भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों में व्याप्त रहकर कालातीत झंकार बन जाय। उस झंकार की गमक ऐसी हो कि उसका गहरा प्रभाव पड़े। यहाँ कवि ने तन के भीतर उठने वाली आत्मा की झंकार के विश्वव्यापी स्वरूप और गहरे प्रभाव की ओर संकेत किया है।

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3. कर प्रहार, हों, कर प्रहार …………….. मैं, हूँ तैयार
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त जी की छायावादी-रहस्यवादी काव्यकृति ‘झंकार’ . से गृहीत हैं। इन पंक्तियों में कवि अपने नियन्ता परमात्मा से अनुरोध करना चाहता है तुम मुझको बजाने की कृपा अवश्य करो, यह मेरा सौभाग्य होगा कि तुमने मुझे उपयोग के लायक समझा। बजाने में चाहे जितने जोर से तुम आघात करो मुझे आपत्ति नहीं क्योंकि मै जानता हूँ कि वह प्रहार नहीं तुम्हारा प्यार होगा। हे प्यारों, मै तुमसे अधिक क्या कहूँ, मै हर तरफ से तुम्हारे द्वारा बजाये जाने के लिए तैयार हूँ। ये पंक्तियाँ प्रसन्नतापूर्वक दु:ख उठाने वाली मध्ययुगीन भक्ति-भावना तथा सम्पूर्ण समर्पण की प्रवृत्ति को सूचित करती हैं।

4. मेरे तार तार से ………………. श्रुतियों के द्वार।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त रचित ‘झंकार’ कविता से ली गयी हैं। इसमें कवि यह भाव व्यक्त करता है कि परमात्मा के द्वारा यदि वह उसके संगीत का माध्यम बनाया जाता है तो यह उसका सौभाग्य होगा। अतः वह चाहता है कि उसके शरीर की सभी शिराओं से परमात्मा के संगीत का प्रकाशन हो, वह उनके विश्वव्यापी संगीत के प्रसार का निमित्त ‘बने। उसकी हार्दिक इच्छा है कि परमात्मा के अस्तित्व-बोध का भौतिक माध्यम बनकर जगत को उसकी सत्ता की सांगीतिक अनुभूति करा सकेगा।

5. ताल-ताल पर भाल ………………… समा जाय संसार :
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त रचित ‘झंकार’ कविता से ली गयी हैं। हम जानते है कि संगीत में ताल का महत्त्व होता है। हर गीत अलग-अलग ताल में निबद्ध होता है। कवि चाहता है कि उसके माध्यम से परमात्मा का जो संगीत व्यक्त हो उसके प्रत्येक ताल पर संसार बार-बार मोहित होकर अपना सिर झुकाकर परमात्मा की महत्ता को नमन करे। भीतर से निकली झंकार में ऐसी अन्विति हो, ऐसी क्रम-व्यवस्था हो कि लय बँध जाय और उस लय के व्यापक प्रभाव में क्रम-क्रम से सम अर्थात् उद्वेग और तनाव से रहित ऐसी स्निग्ध और आन्नदपूर्ण शान्ति का विधान हो कि सारा संसार उसी में समाहित हो जाय। अर्थात् परमात्मा की सत्ता से तन्मय-तदाकार होकर अखंड आनन्द की प्राप्ति करे। इन पंक्तियों में ताल, लय तथा सम ये तीनों शब्द संगीतशास्त्र के पारिभाषिक शब्द हैं।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

भारत-दुर्दशा पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कवि सभी भारतीयों को किसलिए आमंत्रित करता है और क्यों?
उत्तर-
राष्ट्र-प्रेम का शंखनाद करने वाले, हिन्दी साहित्य में नवजागरण के अग्रयूत. भातेन्दु हरिश्चन्द्र का परतंत्र भारत की दारुण-दशा से व्यथित है। भारत पौराणिक काल से ही सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र रहा है जहाँ शाक्य, हरिश्चन्द्र, नहुष, येयाति, राम, युधिष्ठिर, वासुदेव और सारी जैसे युग-पुरुष मनीषि पैदा हुए थे, उसी भारत के निवासी अज्ञानता और अन्तर्कलह का शिकार होकर पतन के गर्त में समा गए हैं। भारत की ऐसी दारुण-दशा से कवि का हृदय हाहाकार मचा रहा है। गुलामी की उत्कट वेदना में भारतवासियों पर व्यंग-वाण चलाते हुए कहता है कि आओ सभी साथ मिलकर भारत की दुर्दशा पर रोते हैं।

प्रश्न 2.
कवि के अनुसार भारत कई क्षेत्रों में आगे था पर आज पिछड़ चुका है। पिछड़ने के किन कारणों पर कविता के संकेत किया गया है?
उत्तर-
भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के अनुसार भारत जो अनेक क्षेत्रों का अधिपति था, अब पिछलग्गू बन गया है। कवि ने अपनी भाषा और साहित्य के द्वारा पौराणिक भारतीय सभ्यता और संस्कृति का गहरा आत्मबोध कराया है। मूढ़ता, अन्तर्कलह और वैमनस्य, आलस्य और कुमति ने भारतीयों को पतन के गर्त में धकेल दिया है। कवि ने इस दुर्दशा से मुक्ति के लिए समाज में गहरे आत्ममंथन और बदलाव की आधारशिला रखकर पराधीनता के खिालाफ शंखनाद करने की उद्देश्य-चेतना के लिए प्रेरित किया है।

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प्रश्न 3.
अब जहँ देखहु तह दुःखहिं दुःख दिखाई। [Board Model 2009(A)]
हा हा ! भारत-दुर्दशा न देखि जाई॥
-इन पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक हिन्दी साहित्य के सृजनकर्ता, युग प्रवर्तक महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ से उद्धत है। बहुमुखी प्रतिभा के कालजयी साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने उत्कृष्ट अंतर्दृष्टि एवं सहज बोध के के द्वारा देश के निवासियों में राष्ट्रीयता का भाव जगाया है।

कवि के अनुसार जगतगुरु भारत, परतंत्रता की बेडियों में जकड़कर मूढता, कहल और अज्ञानता की काली रजनी के गोद में समा गया है। अपनी ऐतिहासिक गरिमा को विस्मृत कर भारतीय, सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों के अंधकूप में डूबकर राष्ट्रीयता और देशोन्नति के आत्मगौरव से विमुख हो गए हैं। भारतीय समाज को चारों आरे से दुर्दिन के काले बादल ने घेर लिया है।

ऐतिहासिक आत्मबोध को आत्मसात नहीं करने के कारण भारतवासी चहुँ ओर से दुःखों के दलदल में फंस गये हैं। भारत की इस अन्तर्व्यथा के लिए जिम्मेवार भारतीयों से इसकी दुर्दशा पर रोने के लिए कवि कहता है।

प्रश्न 4.
भारतीय स्वयं अपनी इस दुर्दशा के कारण हैं। कविता के आधार पर उत्तर दीजिए। [Board Model 2009(A)]
उत्तर-
युगांतकारी व्यक्तित्व लेकर साहित्याकाश में उदित ध्रुवतारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की दुर्दशा के लिए भारतीयों को ही जिम्मेदार माना है। भारतीय अपने ऐतिहासिक यथार्थ को विस्मृत कर अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता, कुरीति, कलह और वैमनस्य के गर्त में समा गए हैं। अपने स्वर्णिम अतीत का आत्मगौरव विस्मृत कर पराधीनता के बेड़ी में जकड़ गए हैं जिसके कारण भारतीय अतीव दारूण-दशा से व्यथित हैं।

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प्रश्न 5.
‘लरि वैदिक जैन डूबाई पुस्तक सारी।
करि कलह बुलाई जवनसैन पुनि भारी॥
उत्तर-
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ हिन्दी साहित्य के युगप्रवर्तक साहित्यकार भारन्तेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ शीर्षक कविता से उद्धत है। धर्म-सम्प्रदाय-भाषा-जाति की संवाद रहित विविधताओं में डूबा तथा सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों में जकड़ा हुआ अशिक्षित भारतीय समाज ऐतिहासिक आत्मबोध को विस्मृत कर आपसी अन्तर्कलह का शिकार हो गया है।

स्वाधीनता के संकल्पकर्ता कविवर भारतेन्दु ने अपने अन्तर्दृष्टि और सहज बोधात्मक दृष्टि से भारतीयों को आपसी अनर्तद्वन्द्व और अन्तर्कलह को परख लिया है। कवि ने ‘अहिंसा परमों धर्मः की गोद में बैठे जैन धर्मावलम्बियों पर तीखा शब्द-वाण चलाया है। भारतेन्दु ने क्रान्तिकारी शाब्दिक हथौड़े से जैन और वैदिक धर्मावलम्बियों पर तल्ख प्रहार किया है। जैन और वैदिक धर्मावलम्बियों के आपसी अन्तर्कलह ने भारत को पराधीन बनाने के लिए यवनों की सेना को भारत पर कब्जा करने का मार्ग प्रशस्त किया। अन्तर्कलह में जकड़ा हुआ अशिक्षित भारतीय समाज भला स्वाधीनता के लिए कैसे संघर्ष कर सकता है। अन्तर्कलह का शिकार भारतीय गुलामी के दंश को झेलने के लिए अभिशप्त है जो इनके दुर्दशा का केन्द्र-बिन्दु है।

प्रश्न 6.
‘सबके ऊपर टिक्कस की आफत’-जो कवि ने क्या कहना चाहा है?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्ति राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा, धरती और नभ के धूमकेतू कविवर भारतेन्दु रचित ‘भारत-दुर्दशा’ से उद्धत है। कवि ने गुलाम भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था का अतीव दारुण और व्यथित चित्र अंकित किया है। अंग्रेजी आक्रान्ताओं के शासन में भारत का धन विदेश चला जाता है, यह कवि के लिए असह्य और कष्टकारी है। महँगाई रूपी रोग काल के गाल समान निगलने को तैयार खड़ा है जो गरीब और बेसहारा लोगों पर हथौड़ा-सा प्रहार कर रहा है। गुलामी के दंश से आहत भारतीय दरिद्रता और दैयनीयता के शिकार हैं। ऊपर से उनपर ‘टिक्कस का आफत आर्थिक ‘कर’ का बोझ ने उसके मस्तक को दीनता के भार से दबा दिया है। भारतीय कष्ट और दुखों से दब-से गये हैं।

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प्रश्न 7.
अंग्रेजी शासन सारी सुविधाओं से युक्त है, फिर भी यह कष्टकर है, क्यों?
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ कालजयी साहित्यकार, आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवचेतना के अग्रदूत और हिन्दी साहित्य के दुर्लभ पुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ से ली गई है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पराधीन भारत के दारुण-दशा को अपनी अंतर्दृष्टि एवम् सहज बोध से गहराई तक समझा। भारतीय ऐतिहासिक मूल्यों को आत्मसात कर उन्होंने स्वाधीनता संकल्प के लिए भारतवासियों को यथार्थबोध, परिवर्तन-कामना के साथ ही उद्देश्य चेतना जगाकर नवजीवन के संचार का प्रयास किया है।

कविवर भारतेन्दु अंग्रेजों के दमन और लूट-खसोट की नीति पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि अंग्रेजों के राज्य में सुख और साज तो बढ़ गये हैं परन्तु भारत का धन विदेश चला जाता है, यह उनके लिए ही नहीं सारे भारतवासियों को कष्ट प्रदान करने वाला कृत्य है। कवि ने भारतीयों के अतमन में झंझावत पैदा करने के लिए क्रान्तिकारी हथौड़े से काम नहीं लिया उन्होंने मृदु संशोधक, निपुण वैद्य की भाँति रोगी की नाजुक स्थिति की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त कर उसकी रूचि के अनुसार पथ्य की व्यवस्था की, जिसका वर्णन मुर्तिमान प्राणधारा का उच्छल वेग के समान ‘भारत-दुर्दशा’ में वर्णित इन पंक्तियों में परिलक्षित होता है।

प्रश्न 8.
कविता का सरलार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
देखें कविता का सारांश।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित उद्धरणों की सप्रसंग व्याख्या करें
(क) रोबहु सब मिलि के आबहु भारत भाई।
हा हा ! भारत दुर्दशा न देखी जाई।

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(ख) अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन विदेश चलि जात इहै अति खारी॥
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता और हिन्दी साहित्य के नवोत्थान के प्रतीक कवि शिरोमणि हरिश्चन्द्र द्वारा विरचित बहुचर्चित और सुविख्यात कविता ‘भारत-दुर्दशा से उद्धत है। इस कविता में कवि की राष्ट्रीयता, देशोन्नति व जातीय उत्थान के लिए अन्तर्व्यथा ऐतिहासिक यथार्थ के बिडंबनापूर्ण बोध के भीतर से जन्म लेती दिखाई पड़ती है।

कवि के अनुसार भारतीय अपनी स्वर्णिम अतीत का आत्मगौरव को विस्मृत कर दिया है। अशिक्षा, अज्ञनता, अंधविश्वास, कुरीति, कलह और वैभवनस्य में डूबे भारतीयों पर उन्होनें तीखा व्यंग-वाण चलाया है। उनकी अकर्मण्यता और आलस्य से भारत पतन के गर्त में डूब गया है। भारत की इस दारुण-दशा को देखकर कवि के हृदय में हाहाकार मचा हुआ है। भारत में इस दुर्दशा से आहत कवि सभी भारतीयों को जिम्मेवार मानते हुए एक साथ मिलकर रोने के लिए आमंत्रित करता है। कवि ने भारतीयों को अतीत और वर्तमान, स्वाधीनता और पराधीनता के वैषम्य की एक दशमय अनुभूति जगाने का सार्थक और यर्थाथ प्रयास किया है।

(ख) प्रस्तुत पंक्तियाँ कालजयी साहित्यकार, आधुनिक हिन्दी साहित्य में नवचेतना के अग्रदूत और हिन्दी साहित्य रूपी वाटिका के दुर्लभ पुष्प भारतेन्दु हरिशचन्द्र द्वारा विरचित ‘भारत-दुर्दशा’ से ली गई है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पराधीन भारत के दारुण-दशा को अपनी अंतर्दृष्टि एवम् सहजबोध से गहराई तक समझा। भारतीय ऐतिहासिक मूल्यों को आत्मसात कर उन्होंने स्वाधीनता संकल्प के लिए भारतवासियों को यथार्थबोध, परिवर्तन-कामना के साथ ही उद्देश्य चेतना जगाकर नवजीवन के संचार का प्रयास किया है।

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कविवर भारतेन्दु का हृदय अंग्रेजों के दमन और लूट-खसोट की नीति पर गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि अंग्रेजों के राज्य में सुख और साज तो बढ़ गये हैं परन्तु भारत का धन विदेश चला जाता है, यह उनके लिए नहीं सारे भारतवासियों को कष्ट प्रदान करने वाला कृत्य है। कवि ने भारतीयों के अर्न्तमन में झंझावत पैदा करने के लिए क्रान्तिकारी हथौड़े से काम नहीं लिया बल्कि उन्होंने मृदु संशोधक, निपुण वैद्य कि भाँति रोगी की नाजुक स्थिति की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त कर उसकी रुचि के अनुसार पथ्य की व्यवस्था की जिसका वर्णन मूर्तिमान प्राणधारा का उच्छल वेग के समान ‘भारत-दुर्दशा’ में वर्णित इन पंक्तियों से परिलक्षित होता है।

प्रश्न 10.
स्वाधीनता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में इस कविता की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर-
आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रवर्तक महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पराधीन भारत के दारुण-दशा को मूर्तिमान करने का एक बानगी है-भारत-दुर्दशा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पराधीन भारत का अकल्पनीय दारुण-दशा को गहराई से देखा।

पराधीन भारतवासियों में स्वतंत्रता संकल्प के लिए ‘भारत-दुर्दशा कविता के माध्यम से उनके भीतर जातीय अस्मिता, यथार्थबोध, परिवर्तन-कामना के साथ ही उद्देश्य-चेतना का संचार कर दिया। ‘भारत-दुर्दशा’ की यथार्थता और व्यंगता ने अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता, कुरीति, कलह और वैमनस्य में डूबे भारतीय समाज को गहराई से समझने की अंतर्दृष्टि दी। इस कविता का सजीव और यथार्थ चित्रण ने धर्म-सम्प्रदाय, भाषा-जाति की संवाद रहित विविधताओं में डूबा तथा सामाजिक कुप्रथाओं और कुरीतियों में जकड़ा हुआ अशिक्षित समाज को ऐतिहासिक आत्मबोध को जगाकर स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया है।

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अतीत और वर्तमान, स्वाधीनता और पराधीनता के वैषम्य एक दंशमय अनुभूति जागृत करने वाली इस कविता ने भारतीय समाज को आन्दोलित कर स्वतंत्रता को पुण्य-पथ पर निरंतर अग्रसित हाने की प्रेरणा दी है। भारतेन्दु की कविता ‘भारत-दुर्दशा’ में कवि ने भारतीयों के स्वर्णिम ऐतिहासिक अतीत का आत्मगौरव से परिचय कराते हुए लिखा है

“जहँ भए शाक्य हरिचंदरू ययाती।
जहँ राम युधिष्ठर वासुदेव संती।।
जहँ भीम करण अर्जुन की छटा दिखाती।
तहँ रही मूढता कलह अविद्या राती।।

भारतेन्दु ने पराधीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था पर व्यंग्य-बाण चलाकर भारत के निवासियों में स्वतंत्रता संकल्प का ऐतिहासिक आत्मबोध जागृत कराया। इस कविता के ऐतिहासिक आत्मबोध कटाक्ष-व्यंग्य ताजगी तथा मौलिकता के गुणों ने अपनी सार्थकता का परिचय देते हुए स्वतंत्रता का बिगुल फूंकने के भारतीय समाज को उत्साहित तथा जागृत किया है। सदियों तक पराधीन भारतीय समाज ने स्वतंत्रता-संघर्ष के लिए अपने उत्तरदायित्वहीनता के प्रमाद से मुक्त होकर स्वतंत्रता के लिए जागृत हो गए। स्वतंत्रता संग्रान के लिए प्रेरित करनेवाली इस कविता और इसके युगपुरुष और कालजयी साहित्यकार का यशोगान भारतीय समाज जबतक प्रकृति का अस्तित्व कायम है, गाता रहेगा।

भारत-दुर्दशा भाषा की बात।

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखें ईश्वर, रोग, दिन, राज, कलह, अविधा, कुमति, छटा
उत्तर-

  • ईश्वर – भगवान
  • रोग – व्याधि
  • दिन – दिवस
  • दीन – गरीब
  • राज – साम्राज्य
  • कलह – झगड़ा
  • अविद्या – कुविद्या
  • कुमति – दुर्गति
  • छटा – शोभा।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य प्रयोग द्वारा निर्णय करें दुर्दशा, विद्या, दुःख, पुस्तक,धन सुख, बल, मूढ़ता, विद्याफल, महँगी, आलस।
उत्तर-
दुर्दशा (स्त्री.) – तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की है? हमें अच्छी विद्या सीखनी चाहिए।
दुःख (पु.) – तुम्हारी दशा देखकर मुझे दुख होता है।
पुस्तक (स्त्री) – यह मेरी पुस्तक है।
धन (पुं.) – आपका धन परोपकारर्थ ही तो है।
सुख (पुं.) – यहाँ तो सुख-ही-सुख है।
बल ((.) – उसका बल अतुलनीय है।
मूढ़ता (स्त्री.) – मेरी मूढ़ता ही तो है जो तुम पर विश्वास किया।
विद्याफय (पुं.) – विद्याफल मीठा होता है।
महँगी (स्त्री.) – चाँदी महँगी है।
आलस (पु.) – आलस करना बुरा है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखें दुर्दशा, रूप, विद्या, कलह, कुमति, विदेश।
उत्तर-

  • दुर्दशा – सुदशा
  • रूप – कुरूप
  • विद्या – अविद्या
  • कलह – मेल
  • कुमति – सुमति।
  • विदेश – स्वदेश।

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प्रश्न 4.
संज्ञा के विविध भेदों के उदाहरण कविता से चुनें।
उत्तर-
किसी भी वस्तु, स्थान व्यक्ति अथवा भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं। इसके निम्नलिखित भेद हैं-
(क) व्यक्तिवाचक,
(ख) जातिवाचक,
(ग) समूहवाचक,
(घ) द्रव्यवाचक तथा
(ङ) भाववाचक।।

भारत दुर्दशा कविता में आगत संज्ञाएँ और उनकी कोटि निम्नोद्धन हैं-
व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्द-भारत, ईश्वर, विधाता, शाक्य, हरिश्चन्द्र, नहुष, ययाति, राम, युधिष्ठिर, वासुदेव, सर्याति, भीम, करन, अर्जुन, वैदिक, जैन, जवनसैन।
जातिवाचक संज्ञा शब्द-भाई सब जेहि, रोग।
समूहवाचक सज्ञा शब्द-सैन, सब, जिन।
द्रव्यवाचक संज्ञा शब्द-धन, टिक्कस।
भाववाचक संज्ञा शब्द-बल, सभ्य, रूप, रंग, रस, विद्याफल, छटा, मूढ़ता, कलह, अविद्या, राती, आफत, सुख, भारी, ख्वारी, महंगी, रोग, दुर्दशा, कुमति, अन्ध, पंगु, बुद्धि।

प्रश्न 5.
इन शब्दों को सन्धि विच्छेद करें युधिष्ठिर, हरिश्चन्द्र, यद्यपि, युगोद्देश्य, प्रोत्साहन।
उत्तर-

  • युधिष्ठिर = युधिः + ठिर
  • हरिश्चन्द्र = हरिः + चन्द्र
  • यद्यपि = यदि + अपि
  • युगोद्देश्य = युग + उद्देश्य
  • प्रोत्साहन = प्र + उत्साहन

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 5 भारत-दुर्दशा (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

भारत-दुर्दशा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतेन्दु के अनुसार भारत का अतीत कैसा था? स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार हमारा अतीत गौरवशाली था। ईश्वर की कृपा से हम सबसे पहले सभ्यं हुए। सबसे पहले कला-कौशल का विकास किया। सबसे पहले ज्ञान-विज्ञान की गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट अनेक अपलब्धियाँ प्राप्त की। अतीत में हमारे यहाँ रामकृष्ण, हरिश्चन्द्र, बुद्ध, भीम, अर्जुन आदि महान पुरुष पैदा हुए जिनको याद कर हम गौरवान्वित होते हैं।

प्रश्न 2.
भारतेन्दु के अनुसार भारत की वर्तमान स्थिति कैसी है? बतायें।
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार वर्तमान काल से हमारी स्थिति बहुत बुरी थी। उनके समय देश पराधीन था, अंग्रेजों का शासन था। हमारा समाज अशिक्षित मूर्ख और कलहप्रिय था। आपसी कलह के कारण हमने यवनों को बुलाया था उन्होंने हमें पराजित कर हमें लूटा, हमारे ग्रंथ नष्ट कर दिये और हमे पंगु तथा आलसी बना दिया।

प्रश्न 3.
अंग्रेजी राज के प्रति भारतेन्दु के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
अंग्रेजी राज के विषय में भारतेन्दु का दृष्टिकोण विरोधी है। वे देशभक्त थे। अत: गुलामी के विरोधी थे। वे मानते थे कि अंग्रेजी देश में सुख के जो सामान रेल-तार-डाक आदि ले आये है वे अपने लाभ के लिए यो उसका लाभ हमें भी मिल रहा है। इसके विपरीत वे हमारे देश के श्रम और कच्चे माल का उपयोग कर जो सामान बनाते हैं वह हमी को बेचकर उसके मुनाफे से अपने को सम्पन्न बना रहे हैं। हम निरन्तर गरीब होते जा रहे हैं। ऊपर से वे रोज नये टैक्स लगा रहे हैं। रोज महँगाई बढ़ रही है, अकाल पड़ा है। यदि हम स्वाधीन रहते तो हमारा धन यहीं रहता और हम इस तरह निरन्तर दीन-हीन नहीं होते।

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प्रश्न 4.
भारतेन्द्र के अनुसार भारत दुर्दशा के कारणों को संक्षेप में बतायें।
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार भारत की दुर्दशा का प्रधान कारण है-गुलामी। यह गुलामी चाहे यवनों की हो या अंग्रेजी की हमारे लिए अहितकारी रही। इन लोगों ने हमें विद्या, बल तथा धन तीनों से वंचित रखा ताकि हम दुर्बल बने रहें।

दूसरा कारण उनकी दृष्टि में स्वयं भारतीय लोगों का आचरण है। उनके आचरण में स्वार्थ तथा कलहप्रियता की प्रधानता है। इसके अतिरिक्त ये आलसी स्वभाव के हैं। थोड़े में संतुष्ट होकर प्रयत्न नहीं करते, अपनी बुरी दशा से विद्रोह नहीं करते तथा बेहतर जीवन के लिए संघर्ष नहीं करते। इन्हीं कारणों से ये बार-बार पदाक्रान्त हुए, पराजित हुए और गुलाम बने।

भारत-दुर्दशा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतेन्दु किस कोटि के कवि हैं?
उत्तर-
भारतन्दु प्राचीन और नवीन की संधि-भूमि पर स्थित देशभक्त कवि हैं।

प्रश्न 2.
अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी का क्या अर्थ है?
उत्तर-
अंग्रेजों के शासन काल में भारत विज्ञान से प्राप्त सुविधाओं का वंचित हुआ।

प्रश्न 3.
विश्व में सबसे पहले सभरता का विकास कहाँ हुआ?
उत्तर-
भारतेन्दु के अनुसार विश्व में सबसे पहले सभयता का विकास भारत में हुआ।

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प्रश्न 4.
भारत के समय भारत में किन चीजों के कारण अंधेरा छाया था?
उत्तर-
भारतेन्दु के समय आलस्य, कुमति और कलह का अंधेरा छाया था।

प्रश्न 5.
भारत भाई से भारतेन्दु का तात्पर्य क्या है?
उत्तर-
भारत भाई से तात्पर्य भारत के लोगों से है। भारतेनदु ने उन्हें भाई कहकर संबोधित किया है।

प्रश्न 6.
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता भारतेंदु हरिश्चन्द्र के किस नाटक के अंतर्गत है?
उत्तर-
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता भारतेंदु हरिश्चंद्र के भारत-दुर्दशा नामक नाटक के अन्तर्गत है।

प्रश्न 7.
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता में किस भावना की अभिव्यक्ति हुयी है?
उत्तर-
भारत-दुर्दशा शीर्षक कविता में देश-प्रेम की भावना की अभिव्यक्ति हुयी है।

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प्रश्न 8.
भारत-दुर्दशा नामक कविता में किस बात की व्यंजना हुयी है?
उत्तर-
भारत-दुर्दशा नामक कविता में अतीत गौरव और देश प्रेम की व्यंजना हुयी है।

भारत-दुर्दशा वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल के प्रवर्तक साहित्यकार के रूप में किस माना जाता है?
(क) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(घ) रामचन्द्र शुक्ल
उत्तर-
(क)

प्रश्न 2.
‘भारत दुर्दशा’ साहित्य की किस विधा में है?
(क) एकांकी
(ख) नाटक
(ग) गद्य-काव्य
(घ) पद्य-काव्य
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 3.
हिन्दी भाषा और साहित्य में नवजागरण के अग्रदूत किसे माना जाता है?
(क) प्रेमचन्द्र
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) भारतेन्दु हरिशचन्द्र
(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
भारत की धार्मिक मर्यादा को किसने नष्ट किया है?
(क) जैन धर्मावलम्वी ने
(ख) वैदिक धर्मावलम्बी ने
(ग) बौद्ध धर्मावलम्बी ने
(घ) वैदिक एवं जैन धर्मावलम्बियों ने
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 5.
भारतेन्दु हरिशचन्द्र के पद किस भावे जुड़े पद हैं?
(क) राष्ट्रीय भाव
(ख) प्रेम भाव
(ग) करुण भाव
(घ) भक्ति भाव
उत्तर-
(क)

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न:
1. हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग के संस्थापक
2. ‘भारत-दुर्दशा’ पाठ के रचयिता ………………. हैं।
3. रोबड सब मिलिकै आवहु ……………… भाई।।
4. सबके ऊपर ………………. की आफत आई।
उत्तर-
1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
3. भारत
4. टिक्कस।

भारत-दुर्दशा कवि परिचय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850-1885)

आधुनिकता नवोत्थान के प्रतीक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 18-19वीं सदी के जगत-सेठों के एक प्रसिद्ध परिवार के वंशज थे। उनके पूर्वज सेठ अमीचन्द का उत्कर्ष भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के समय हुआ था। नवाब सिराजुद्दौला के दरबार में उनका बड़ा मान था। निष्ठावान अमीचन्द के साथ अंग्रेजी ने अत्यन्त नीचतापूर्ण व्यवहार किया था। उन्हीं के प्रपौत्र गोलापचन्द्र, उपनाम गिरिधरदास के ज्येष्ठ पुत्र थे भारतेन्दु। भारतेन्दु का जन्म 1850 में उनके ननिहाल में हुआ था 5 वर्ष की अवस्था में ही माता पार्वती देवी का तथा 10 वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो गया।

विमाता मोहिनी देवी का उनके प्रति कोई खास स्नेह-भाव नहीं था। फलतः उनके लालन-पालन का भार काली कदमा दाई तथा तिलकधारी नौकर पर रहा। पिता की असामयिक मृत्यु से शिक्षा-दीक्षा की समूचित व्यवस्था नहीं हो पायी। बचपन से ही चपल स्वभाव के भारतेन्दु की बुद्धि कुशाग्र तथा स्मरणशक्ति तीव्र थी। उस जमाने के रइसों में राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिन्द’ का नाम बड़ा ऊँचा था। भारतेन्दु शिक्षा हेतु उन्हीं के पास जाया करते थे। स्वाध्याय के बल पर उन्होंने अनके भाषाएँ सीखीं तथा स्वाभाविक संस्कारवश काव्य-सृजन करने लगे।

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तेरह वर्ष की आयु में ही इनका विवाह हो गया। इनकी जीवन-संगिनी बनी काशी के रईस लाला गुलाब राय की सुपुत्री मन्ना देवी। घर की स्त्रियों के आग्रह पर पन्द्रह वर्ष की अवस्था में उन्हें कुटुम्बसहित जगन्नाथ-यात्रा करनी पड़ी। देशाटन का उन्हें खूब लाभ मिला। वे हर जगह मातृभूमि तथा मातृभाषा एवं राष्ट्र की स्वाधीनता पर भाषण देते। 1884 की उनकी बलिया-यात्रा उनकी अंतिम यात्रा प्रमाणित हुई। उनके जर्जर शरीर ने उनकी तेजस्वी आत्मा को बाँधे रखने में असमर्थता जतायी और मात्र 34 वर्ष 6 माह की अल्पवय में वे 6 जनवरी, 1885 को इस संसार से चल बसे।

किन्तु इस छोटे जीवन-काल में भी उन्होंने हिन्दी, समाज तथा भारत राष्ट्र की जो अविस्मरणीय सेवा की उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय, कम होगी। उनकी संताने थीं-एक पुत्री, दो पुत्र। पुत्र असमय ही चल बसे। पुत्री विद्यापति सुविख्यात विदुषी बनी। धर्मपरायण मन्ना देवी ने 42 वर्षों तक वैधव्य भोगने के बाद 1926 ई. में प्राण विसर्जित किये। वे परम गुणवन्ती थी तथा आजीवन जन-जन की प्रशंसा पाती रही।

निस्देह भारतेन्दु के आविर्भाव के पूर्व हम राष्ट्रीयता को ठीक-ठीक समझने में असमर्थ थे। भारतेन्दु ने राष्ट्रभक्ति का ज्वार उमड़ाकर अंग्रेजों की दमनात्मक नीतियों तथा भारत की दुर्दशा के कारणों का पर्दाफाश किया। वे युगान्तकारी कलाकार थे। परिवर्तन का काल था वह जब भारतेन्दु को ब्रजभाषा की गद्य-क्षमता तथा खड़ी बोली की पद्य-क्षमता पर अविश्वास रहा।

लेकिन उन्होंने अपने समकालीन को एक सूत्र में पिरोकर जिस तरह काव्य-साधना तथा साहित्य-सेवा में लगाया, वह अतुलनीय बन गया। उनकी उपलब्धियाँ तथा ख्याति अद्वितीय रही। काव्य के क्षेत्र में उन्होंने ब्रजभाषा का कंटकहीन पथ अपनाया। उनकी काव्याभिव्यक्ति की शैली कृष्ण-काव्य परंपरा वाली है। ब्रजभाषा के वे अंतिम गीतकार थे। . वस्तुतः भारतेन्दु ने अपनी साहित्यिक रचनाओं द्वारा स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

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भारत-दुर्दशा कविता का सारांश

आधुनिक हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक महान साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘भारत-दुर्दशा’ शीर्षक कविता के माध्यम से देश के निवासियों में राष्ट्रीयता का भाव जगाया है। अशिक्षा, अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता, कुरीति, कलह और वैमनस्य की जंजीरों में जकड़े भारतीय समाज को अतीत और वर्तमान, स्वाधीनता और पराधीनता तथा वैषम्य की दंशमय गहराई को समझने की अन्तर्दृष्टि दी है।

भारत की दुर्दशा देखकर कवि की आत्मा चीत्कार उठी है। भारत की दुर्दशा से व्यथित कवि भारत के निवासियों को इसकी दुर्दशा पर मिलकर रोने के लिए आमंत्रित करता है।

भारत की राजनीति, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था पर अपना व्यंग्य-वाण चलाते हुए भारतेन्दु कहते है कि जिस भारत देश को ईश्वर ने सबसे पहले धन और बल देकर सभ्य बनाया। सबसे पहले विद्वता के भूषण से विभूषित कर रूप, रंग और रस के सागर में गोता लगवाया, वही भारत वर्ष अब सभी देशों से पीछे पड़ रहा है। कवि को भारत की दुर्दशा देखकर हृदय में हाहाकार मच रहा है।

भारत में त्याग, और बलिदान के प्रतीक शाक्य, हरिश्चन्द्र, नऊष और ययाति ने जन्म लिया। यहीं राम, युष्ठिर, वासुदेव और सर्याति जैसे सत्यनिष्ठ और धर्मनिष्ठ अवतरित हुए थे। भारत में ‘ ही भीम, करण और अर्जुन जैसे वीर, दानवीर तथा धनुर्धर पैदा हुए परन्त आज उसी भारत के निवासी अशिक्षा, अज्ञानता, कलह और वैमनस्य के जंजीरों में जकड़कर दुख के सागर में डूब चुके हैं। भारत की ऐसी दारूण-दशा के लिए कवि का हृदय आन्दोलित है।

राष्ट्र चिंतन से दूर ‘अहिंसा परमो धर्मः, के आलम्बन के केन्द्र में बैठा जैन धर्मावलम्बियों ने वैदिक धर्म का विरोध कर यवनों (इस्लाम आदि) की सेना की भारत पर कब्जा करने का मार्ग प्रशस्त किया। मूढ़ता के कारण आपसी कलह ने बुद्धि, बल, विद्या और धन को नाशकर आलस्य, कुमति और कलह की काली छटा से भारतीय जन-जीवन घिर गया। भारतीय अन्धे, लँगड़े और दीन-हीन होकर जीने के लिए अभिशप्त हो गये हैं, भारत की दुर्दशा अवर्णनीय हो गई है।

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अंग्रेजो के राज्य अर्थात पराधीन भारत में वैभव और सुख बढ़ गये हैं परन्तु भारतीय धन विदेश चला जाता है। यह स्थिति अतीव कष्टकारी है। उसपर महँगाई सुरसा की भाँति मुँह फैलाये जा रही है। दिनों-दिन दुखों की तीव्रता बढ़ रही है और ऊपर से ‘कर’ का बोझ तो ‘कोढ़ में खाज’ सा कष्टकारक है। भारत की ऐसी दुर्दशा कवि के लिए असह्य हो गया। उसके हृदय में हाहाकार मचा हुआ है।

भारत-दुर्दशा कठिन शब्दों का अर्थ

आवहु-आओ। मीनो-सिक्त, भीगा हुआ। लखाई-दिखाई। मूढ़ता-मूर्खता। अविद्या-अज्ञान। राती-अंधकार। जवनसैन-यवनों की सेवा। पुनि-फिर। नासी-नष्ट। विखलाई-बिलखना, विलाप करना। ख्यारी-कष्टकारी। टिक्कस-टैक्स, कर। पंगु-लंगड़ा। आफत-आपदा, विपदा।

भारत-दुर्दशा काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. रोबहु सब ……………………. भारत दुर्दशां न देखी जाई।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ भारतेन्दु रचित ‘भारत-दुर्दशा’ कविता से ली गयी हैं। यहाँ भारतेन्दु ने देश की दुर्दशा का कारुणिक चित्रण करते हुए लोगों के मन में सुप्त देश-प्रेम को जागने का प्रयास किया है। कवि कहता है कि हे भारत के भाइयों ! आओ, सब मिलकर रोओ ! अब अपने प्यारे देश की दुर्दशा नहीं देखी जाती।

इस देश को ईश्वर ने दुनिया के सभी देशों से पहले बलवान-धनवान बनाया और सबसे पहले सभ्यता का वरदान दिया। यही देश सबसे पहले रूप-रस-रंग में भींगा अर्थात् कला-सम्पन्न विधाओं को प्राप्त कर अपने को ज्ञान-सम्पन्न बनाया लेकिन दुख है कि वही देश आज इतना पिछड़ गया कि पिछलग्गू बनकर भी चलने लायक नहीं है।

सब मिलाकर भारतेन्दु, प्रस्तुत पंक्तियों में कहना चाहते है कि जो देश सभ्यता, कला-कौशल तथा वैभव में अग्रणी और सम्पन्न रहा वही आज गुलामी के कारण पिछड़कर दीन-हीन बन गया है। आज इसकी दुर्दशा नहीं देखी जाती। देखते ही मन पीड़ा और ग्लानि से भर जाता है।

2. जहँ राम युधिष्ठिर ……………. भारत-दुर्दशा न देखी जाई।।
व्याख्या-
‘भारत दुर्दशा’ कविता से ली गयी प्रस्तुत पंक्तियों में भारतेन्दु देश के लोगों को गौरवशाली अतीत की याद दिलाकर प्रेरणा भरना चाहते हैं। वे कहते है कि इस इस देश में राम, युधिष्ठिर, वासुदेवं कृष्ण, सर्याति, शाक्य, बुद्ध, दानी हरिश्चन्द्र, नहुष तथा ययाति जैसे प्रसिद्ध सम्राट हुए। यहाँ, भीम, कर्ण, अर्जुन जैसे पराक्रमी योद्ध हुए। इन लोगों के कारण देश में सुशासन, सुख और वैभव का प्रकाश फैला रहा। उसी देश में (पराधीनता के कारण) आज सर्वत्र दुःख ही दुःख छाया है। . उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से भारतेन्दु यह बताना चाहते है कि अतीत में हम सुख और समृद्धि के शिखर पर विराजमान थे, जबकि आज हम दुःख और पतन के गर्त में गिरकर निस्तेज हो गये है। इस पतन का कारण गुलामी ही समझना चाहिए।

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3. लरि बैदिक जैन डुबाई ……………. भारत दुर्दशा न देखी जाई।
व्याख्या-
भारत दुर्दशा की इन पंक्तियों में भारतेन्दु जी ने यह बनाना चाहा है कि प्राचीन काल में भारत के लोगों ने धर्म के नाम पर लड़ाई की और द्वेषवश विदेशियों को आमंत्रण देकर बुलाया उसी के परिणामस्वरूप हम अन्ततः गुलाम हा गये।

कवि का मत है कि वैदिक मत को माननेवालों और जैनमत को मानने वालों ने आपस में लड़कर सारे ग्रंथों को नष्ट किया। फिर आपसी कलह के कारण यवनों की सेना को बुला लिया। उन यवनों ने इस देश को सब तरह से तहस नहस कर दिया। मारकाट और ग्रंथों को जलाने के कारण सारी विद्या नष्ट हो गयी तथा धन लूट लिया। इस तरह आपसी कलह के कारण यवनों द्वारा पदाक्रान्त होने से बुद्धि, विद्या, धन, बल आदि सब नष्ट हो गये। आज उसी का कुपरिणाम हम आलस्य, कुमति और कलह के अंधेरे के रूप में पा रहे हैं। कवि इस दशा से विचलित होकर कहता है-हा ! हा ! भारत दुर्दशा, न देखी जाई।”

4. अंगरेजराज सुख साज ………………. दुर्दशा न देखी जाई।
व्याख्या-
भारत दुर्दशा की प्रस्तुत पंक्तियों में भारतेन्दु जी ने अंग्रेजी राज की प्रशसा करने वालों को मुँहतोड़ उत्तर दिया है। उनके समय में देश गुलाम था और अनेक लोग गोजी पढ़-लिखकर तथा अंग्रेजियत को अपनाकर अपने देश को हेय दृष्टि से देख रहे थे। भय अथवा गुलाम स्वभाव अथवा “निज से द्रोह अपर से नाता” की मनोवृत्ति के कारण लोग अंग्रेजों के खुशामदी हो गये थे। अंग्रेजों ने देश का शासन की पकड़ मजबूत रखने और अपने तथा शासन-व्यापार की सुविधा के लिए रेल, डाक आदि की व्यवस्था की।

दोयम दरजे के नागरिक के रूप में इन सुविधाओं का लाभ भारतीयों को ही मिल रहा था। अत: वे अंगेजी राज के प्रशंसक थे। भारतेन्दु सच्चाई उजागर करते हुए कहते है कि यह सच है कि अंग्रेजी राज में सुख-सामानों में भारी वृद्धि हुई है। लेकिन इससे क्या, अंग्रेज हमारा शोषण कर धन एकत्र करते हैं और अपने घर इंगलैंड भेज देते हैं। इस तरह वे मुनाफा से अपना घर भर रहे हैं और हम शोषित हैं। ऊपर से महँगाई रोज बढ़ रही है। नित नए टैक्स लगाये जा रहे हैं जिसके फलस्वरूप हमारा दुख दिन-प्रतिदिन दूना होता जा रहा है। अतः यह शासन के नाम पर हमारा शोषण कर रहा है और हमारी स्थिति खराब होती जा रही है।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 4 सहजोबाई के पद

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 4 सहजोबाई के पद

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 4 सहजोबाई के पद

सहजोबाई के पद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर।

कविता के साथ

प्रश्न 1.
सहजोबाई के मन में उनके आराध्य की कैसी छवि बसी हुई है।
उत्तर-
हिन्दी के ज्ञानश्रयी की शाखा की संत कवियित्री सहजोबाई के प्रस्तुत काव्य में श्रीकृष्ण उनके आराध्य प्रतीत होते हैं। सहजोबाई के मन में कृष्ण की शैशवावस्था का अलौकिक सौन्दर्य प्रतिबिम्बित है। लीलाधारी श्रीकृष्ण के माथे पर मुकुट, कान में मोतियों के कुण्डल, बिखड़े हुए बाल, होठ का मटकाना, भौंह चलाते हुए ठुमक ठुमुक कर धरती पर चलते हुए उनका सौन्दर्य अनुपम और अद्वितीय है।

श्रीकृष्ण के घुघरूं की कर्णप्रिय ध्वनि मन के तारों को सहज ही झंकृत करती है। सहजोबाई ने अपने आराध्य नटवर नागर, लीलाधर कृष्ण का सगुण स्वरूप की छवि अपने मन में बसायी हुई है जो दिव्यातिदिव्य और अनुपमेय है। उनकी इस सुन्दरता की बराबर करोड़ो कामदेव की सम्मिलित शोभा भी नहीं कर सकती।

प्रश्न 2.
सहजोबाई ने किससे सदा सहायक बने रहने की प्रार्थना की है?
उत्तर-
ज्ञानाश्रयी संत कवयित्री सहजोबाई ने बाल श्रीकृष्ण से सदा सहायक बने रहने की प्रार्थना की है।

प्रश्न 3.
“झुनक-झुनक नूपूर झनकारत, तता थेई रीझ रिझाई।
चरणदास हिजो हिय अन्तर, भवन कारी जित रहौ सदाई।
इन पंक्तियों को सौन्दर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
निर्गुण ब्रह्म उपासिका कवयित्री सहजोबाई की सगुण भक्ति शिरमौर श्रीकृष्ण के प्रति भाव-विहलता, भाव-प्रवणता इन पंक्तियों में उपस्थित है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 4 सहजोबाई के पद

बालक कृष्ण अपने पैरों को बलात् इस तरह पटक रहे हैं कि उनके पैरों में बंधी पायल के र (घुघरू) एक लय विशेष में झंकृत हो रहे हैं और यह लय है तो ता थैया जिसके इंगित १: कृष्ण न सिर्फ रीझ गये हैं बल्कि अपने चतुर्दिक उपस्थित लोगों को भी मंत्रमुग्ध किये हुए है। कृष्ण की यह विश्वमोहिनी छवि के स्वामी को सहजोबाई अपने हृदय में भवन बनाकर सदा के लिए रखना चाहती हैं। कबीरात्मा भी अपने राम को कुछ इसी तरह अपनी आँखों में बसाना

“नैनन की करि कोठरी पुतरी पलंग बिछाय,
पलकनि कै चिक डारि कै पिय को लिया रिझाय।”

सम्ममा भक्त अपने भगवान से शाश्वत सायुज्यता का आकांक्षी होता है। उसे वह अपने व्यक्तित्व के कोमलतम, पवित्रतम स्थान में रखना चाहता है। भक्त भगवान पर एकाधिकार चाहता है। यही सौन्दर्य यहाँ जित है।

प्रश्न 4.
सहजोबाई ने हरि से उच्च स्थान गुरु को दिया है। इसके लिए वे क्या-क्या तर्क देती हैं?
उत्तर-
कवयित्री सहजोबाई ने अपने गुरु चरणदास के प्रति सहज और पावन भक्तिभावना का परिचय दिया है। कवियित्री ने सच्ची गुरु भक्ति के रूप में अपने गुरु की महिमा की अद्वितीयता का विवेचन एवं विश्लेषण किया है। गुरु के प्रति पूर्णरूप से समर्पित कवयित्री के निश्छल हृदय के पवित्र उद्गार मिलते हैं। सहजोबाई ने गुरु के दिव्यातिव्य मार्गदर्शन के प्रति समर्पिता का भाव सहज ही दृष्टिगोचार होता है। गुरु ने अपने दिव्य ज्ञान से अज्ञानता के तिमिर को हटाकर ज्ञान से प्रकाशित किया, जिससे सांसरिक आवागमन (जन्म-मृत्यु) के बन्धन से मुक्त कराया।

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ईश्वर ने पाँच चोर मद, लोभ, मोह, काम और क्रोध को शरीर रूपी मन्दिर में बिठाया, गुरु ने उससे छुटकारा पाने की युक्ति सिखाई। ईश्वर ने सांसारिक राग-रंग, अपना-पराया का भ्रम में उलझाया, गुरु ने ज्ञान रूपी दीपक के प्रकाश से अलोकित कर तमाम बन्धनों से मुक्ति दिलाने के लिए आत्म ज्ञान से साक्षात्कार कराया है। गुरु ने सांसारिक भवसागर से निकलने का मार्ग प्रशस्त कराया। सहजोबाई की गुरुभक्ति उत्कट और अपूर्व है। गुरु के प्रति परमात्मा से भी बढ़कर प्रेम भक्ति तथा कृतज्ञता का उत्कट और अपूर्व भाव प्रदर्शित कवयित्री ने किया है। गुरु ही ज्ञान का सागर तथा सच्चा पथ-प्रदर्शक है। गुरु का स्थान हरि से भी ऊँचा है।

प्रश्न 5.
“हरि ने पाँच चोर दिये साथा,
गुरु ने लई छुटाय अनाथा।”
यहाँ किन पाँच चोरों की ओर संकेत है? गुरु उससे कैसे बचाते हैं।
उत्तर-
संत साहित्य में अवगुणों को चोर से संज्ञायित किया गया है। पाँच चोर निम्नलिखित हैं-काम, क्रोध, मोह, मद और लोभ। शरीर तक सीमित होना, इन्द्रित सुख की पूर्ति की इच्छा काम है। अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ होते देख गुस्सा होना क्रोध है। अनाधिकृत वस्तु के प्रति आसक्ति मोह अथवा लोभ है।

किसी भी प्रकार की प्रभुता प्राप्त कर लेने का भाव मद से प्रदर्शित होता है। दूसरे को किसी भी रूप में सम्पन्न देखकर ईर्ष्या का भाव डाह का भाव मत्सर है।

सद्गुरु संसार की नश्वरता, असारता, क्षणभंगुरता का निदर्शन करारकर अपने शिष्य को प्रबोध देता है। ध्यान, समाधि जीवमात्र की निष्काम सेवा आदि के द्वारा गुरु इन पाँच चोरों से शिष्य को बचाते हैं।

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प्रश्न 6.
“हरि ने कर्म भर्म भरमायौ। गुरु ने आतम रूप लखायौ ॥
हरि ने मोरूँ आप छिपायौ। गुरु दीपक दै ताहि दिखायो॥”
इन पंक्तियों की व्याख्या करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पद्यांश ज्ञानाश्रयी कवयित्री सहजोबाई द्वारा विरचित है। कवियित्री ने गुरु महिमा और गरिमा की श्रेष्ठता का बेबाक चित्रण किया है। वह कहती है कि हरि ने उन्हें सांसारिक . कर्म के भर्म में उलझा कर रख दिया है और गुरु ने आत्मज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर उसके ‘स्व’ के अस्तित्व का ज्ञान कराया है : गुरु ने ‘स्वयं’ से साक्षात्कार कराकर सांसारिक अज्ञानता से छुट्टी दिलाई है, गुरु अपने ज्ञान के दीपक से प्रकाशित करते हैं।

प्रश्न 7.
पठित पद में सहजोबाई ने गुरु पर स्वयं को न्योछावर किया है। वह पंक्ति लिखें।
उत्तर-
प्रस्तुत पद में सहजोबाई गुरु की महानता और महिमा के आगे सर्वोत्तम समर्पण किया है जो उसकी उत्कृष्ठ गुरु भक्ति की पराकाष्ट है। वह कहती है

“चरणदास पर तन मन वारूँ। गुरु न तनँ हरि  तजि डारूँ।।”

प्रश्न 8.
पठित पद के आधार पर सहजोबाई की गुरुभक्ति का मूल्यांकन करें।
उत्तर-
संत कवयित्री सहजोबाई का पाठ्यपुस्तक में संकलित पद ‘गुरु भक्ति’ का उत्कृष्ट और दुर्लभ उदारिण है। सहजो द्वारा गुरु भक्ति की उत्कट और अपूर्व अभिव्यक्ति हुई है। गुरु के प्रति परमात्मा से भी बढ़कर प्रेम-भक्ति तथा कृतज्ञता की आत्मिक अनुभूति इस पद में विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता है।

सहजोबाई ने अपना सम्पूर्ण जीवन गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया। ज्ञान आधारित गुरु भक्ति सहजो में अविचल संकल्प और समर्पण की स्पृहणीय शक्ति बनकर प्रकट होती है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 4 सहजोबाई के पद

वह हरि को त्याज्य समझती है परन्तु गुरु को त्यागने की वह कल्पना भी नहीं करना चाहती है

“राम तर्जे पर गुरु न बिसारूँ।
गुरु के सम हरि न निहारूँ॥

सहजोबाई ने गुरु की महिमा और ज्ञान के अस्तित्व को स्वीकारते हुए उसे उच्छल आनंदानुभूति होती है। वह गुरु को ही सांसरिक आवागमन, मर्म तथा आत्म ज्ञानसे साक्षात्कार कराने के लिए अपनी सारी सत्ता को हृदय, प्राण, बुद्धि कल्पना, संकल्प इत्यादि सारी वृत्तियों को समाहित और घनीभूत करके बड़े वेग के साथ स्वयं को गुरुभक्ति में समाहित कर दिया है। अपनी केवल व्यक्तिगत सत्ता की भावना को पूर्ण विसर्जन कर केवल गुरु को ही ध्येय स्वरूप आत्मसात करती है। गुरु के प्रति परमात्मा से भी बढ़कर प्रेम-भक्ति तथा कृतज्ञता को प्रकट करते हुए कहती है

“चरणदास पर तन मन वारूँ।
गुरु न तनूं हरिः जि डारूँ॥

कवयित्री सहजोबाई एक सच्ची गुरुभक्त के रूप में गुरू की प्रार्थना करती हैं ताकि उसे मोह-माया के बन्धन से मुक्त होकर अपने आराध्य की पूर्ण चरणगति और शरणगति प्राप्ति हो। गुरु के वरदहस्त की छाया में दिव्य ज्ञान प्राप्त कर सकल संताप को दूर करने की क्षमता सम्पन्न होती है।

सहजोबाई के पद भाषा की बात

प्रश्न 1.
पठित पदों में अनुप्रास अलंकार है। ऐस उदाहरण को छांट कर लिखें।
उत्तर-
सहजोबाई रचित पदों की निम्नांकित पंक्तियां में अनुप्रास अलंकार हैं-
“मुकुट लटक अटकी मन माहीं ‘म’ वर्ण की आवृति
नृत तन नटवर मदन मनोहर ‘न’ और ‘म’ वर्ण की आवृति
ठुमक ठुमुक पग धरत धरनि पर ‘प’ और ‘ध’ वर्ण की आवृति
झुनुक झुनक नुपुर झनकारत
तथा थेई थेई रीझा रिझाई में ‘झ’ त, थ और ‘र’ वर्ण आवृति
हरि ने जन्म दियो जग माहीं ‘ज’ वर्ण की आवृति
हरि ने कर्म भर्म भरमायौ में ‘भ’ वर्ण की आवृति।

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प्रश्न 2.
“भौंह चलाना” का क्या अर्थ है?
उत्तर-
आँखों के ऊपर की रोमावली भौंह कहलाती है। व्यक्ति जब कुछ देने से कतराना चाहता है, उसके भीतर चुहल करने की इच्छा होती है, तब भौंहों को ऊपर नीचे करता है। आनन्ददायी आश्र्चचकित करने वाली घटना से साक्षात्कार करने के समय तथ्यों गोपन में भौंह चलाया जाता है। बिहारी ने तो कृष्ण की मुरली चोरी प्रसंग में गोपियों को “भौहनि हँसौ” की स्थिति में प्रस्तुत किया

“बतरस लालच ताल की मुरली धरि लुकाय”
सौं करै भौहनि हंसे दैन कहै नटि जाय।
भौंक चलना का अर्थ सौहार्द्रपूर्ण कुटिलता का अवाक् ज्ञापन करना है।

प्रश्न 3.
चतुराई, रिझाइ जैसे शब्दों में ‘आई’ प्रत्यय लगा है। पठित पदों से अलग ‘आई’ प्रत्यय से पाँच शब्द बनाएँ।।
उत्तर-
लखाई, बिलगाई, मचिलाई, बिलखाई और मुस्काई।

प्रश्न 4.
कर्म-भर्म रोग-भोग मं कौन-सा सम्बन्ध है?
उत्तर-
कर्म-धर्म तथा रोग-भाग दोनों ही द्वन्द्व समास है।

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प्रश्न 5.
इनका शुद्ध रूप लिखें नृत, गुर, हरिपू, बेरी, मर्म, आतम
उत्तर-

  • अशुद्ध – शुद्ध
  • नृत्य – नृत
  • गुरु – गुरु
  • हरिकूं – हरि को
  • बेरी – बेड़ी
  • भ्रम – भर्म
  • आतम – आत्म, आत्मा

प्रश्न 6.
पठित पदों से क्रिया पद चुनएि।
उत्तर-
सहजोबाई रचित पदां में निम्नलिखत क्रियापद आये हैं
अटकी, बिथुराई, हलत, मटक, चलाई, धरत, करत, झनकारत रहौ, बिसारू, तनँ बिसारू, निहारूँ दियो छुटाहीं, दिये, छटाय, गेरी, काटी, उरझायी, भरमायौ, लखायौ, छिपायो, लाये, मिटायै, वारूँ और डारूँ।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

सहजोबाई के पद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सहजोबाई द्वारा वर्णित सगुण रूप या कृष्ण के रूप पर प्रकाश डालें
उत्तर-
सहजोबाई ने ‘नटवर’ शब्द का प्रयोग किया है जिससे स्पष्ट होता है कि सगुण ईश्वर से उनका तात्पर्य कृष्ण से है। द्वितीय, ठुमक ठुमुक चलने और पैरों में झुमुक झुमुक कर नृपुर बजने से स्पष्ट है कि कृष्ण के बाल रूप का वर्णन है। कवयित्री ने सुन्दर मुकुट, नृत्यशील शरीर, कान के कुंडल तथा बिखर केश का वर्णन किया है। क्रिया सौन्दर्य के अन्तर्गत ठुमुक ठुमुक चलने नूपूर झनकारने, होठ फड़काने, भौहे चलाने, नाचने और भुजाएँ उठाकर भाव-मुद्रा प्रदर्शित करने का वर्णन है।

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प्रश्न 2.
सहजोबाई की गुरु-भक्ति भावना का वर्णन संक्षेप में करें।
उत्तर-
सहजोबाई की गुरु-भक्ति अनन्य है। वह गुरु को सदैव हृदय में बसाये रखना चाहती हैं। उसके गुरु संत चरणदास जी आत्मज्ञानी है, उनके पास ज्ञान का दीपक है। ईश्वर ने मानव-तन देकर अपनी प्राप्ति में जितनी बाधाएँ खड़ी की हैं उन सबका निदान गुरु ने किया है, इसलिए सहजोबाई अपने गुरु को गोविन्द से श्रेष्ठ मानती है। उसका दृढ़ विश्वास है कि गुरु की कृपा से ईश्वर मिल सकता है मगर ईश्वर की कृपा से गुरु नहीं। अत: वह अपने गुरु के प्रति समर्पण पूर्ण भक्ति-भावना व्यक्त करती है।

सहजोबाई के पद अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सहजोबाई गुरु को हरि से श्रेष्ठ क्यों मानती हैं?
उत्तर-
उनकी दृष्टि से ईश्वर ने अपने को छिपाने के लिए प्रपंचों का सृजन किया है जबकि गुरु उन प्रपंचों को ज्ञान के प्रकाश से काटकर भक्त को ईश्वर से मिला देता है, अत: गुरु ईश्वर से श्रेष्ठ है।

प्रश्न 2.
ईश्वर ने जीव को अपने से अलग रखने और छिपाने के लिए क्या-क्या किया है?
उत्तर-
ईश्वर ने पंचेन्द्रिय रूपी पाँच चोर साथ लगा दिया है रोग और भोग में उलझाया है, कुटुम्ब्यिों के रूप में ममता का जाल देकर उलझाया है तथा कर्म-फल का भ्रम पैदा किया है।

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प्रश्न 3.
गुरु ने क्या किया है?
उत्तर-
गुरु ने जन्म-मरण के आवागमन से मुक्ति दिलाई है। ममता का बन्धन काटा है। योग और आत्मज्ञान दिया है तथा ज्ञान-रूपी दीपक के प्रकाश में ईश्वर के दर्शन कराये हैं।

प्रश्न 4.
पाँच चोर से कवयित्री का क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
पाँच चोर से तात्पर्य पंच ज्ञानेन्द्रियों-आँख, कान, नाक, मुँह और मन से है जो व्यक्ति को संसार के प्रति आसक्त बनाते हैं। इन इन्द्रियों के कारण मनुष्य संसार के प्रति लगाव रखता है।

प्रश्न 5.
सहजोबाई किस प्रकार की कवयित्री है?
उत्तर-
सहजोबाई निर्गुण और सन्त विचार की दोनों विचारधारा की कवयित्री है।

प्रश्न 6.
सहजोबाई के प्रथम पद में किसकी व्यंजना की गयी है?
उत्तर-
सहजोबाई ने अपने प्रथम पद में कृष्ण की सगुण लीलानुभूति की व्यंजना की है।

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प्रश्न 7.
सहजोबाई ने द्वितीय पद में किस पर प्रकाश डाला है?
उत्तर-
सहजोबाई ने अपने द्वितीय पद में गुरु की महत्ता और उसके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है।

सहजोबाई के पद वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग, या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
सहजोबाई का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) मध्यप्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) पंजाब
(घ) हरियाणा
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 2.
सहजोबाई के गुरु कौन थे।
(क) चरनदास
(ख) हरिप्रसाद भार्गव
(ग) तुकाराम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

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प्रश्न 3.
सहजोबाई ने अपना सम्पूर्ण जीवन किसको समर्मित किया है?
(क) गुरु चरणदास को
(ख) ईश्वर को
(ग) गुरु और उनके माध्यम से ईश्वर को
(घ) किसी को नहीं
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
सहजोबाई किसको नहीं छोड़ सकती है।
(क) भगवान को
(ख) गुरु चरनदास को
(ग) अपने पिता को
(घ) अपनी माता को।
उत्तर-
(ख)

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न:
1. सहजोबाई निर्गुण …………….. भक्ति के अन्तर्गत आती है।
2. राम तर्जे पै …………. न बिसारूँ।
3. गुरु ने काटा …………….. बेरी।
4. मुकुट लटक ……………. मन माहीं।
उत्तर-
1. ज्ञानाश्रयी
2. गुरु
3. माया
4. अटकी।

सहजोबाई पद कवि परिचय – (1725)

कवि परिचय-साहित्य में कोई भी प्रवृत्ति किसी भी काल में किसी न किसी अंश में जीवित रहती है। जैसे रीति काल के घोर विकास-वैभवपूर्ण वातावरण में भी भूषण वीरस के पुनः प्रस्तोता कवि हुए उसी तरह सहजोबाई भी निर्गुण संतमत की अलग जगाती दीखती हैं।

“हरिप्रसाद की सुता नाम है सहजोबाई।
दूसर कुल में सदा गुरु चरन सहाई।”

की एक मात्र स्वीकारोक्ति के अनसार इनके पिता का नाम हरिप्रसाद भार्गव था। प्रसिद्ध संत कवि चरणदास की ये शिष्या बन आजीवन ब्रह्मचारिणी बन इन्हीं की सेवा में रहीं।

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इनके चिन्तन में कुछ चीजें ऐसी हैं जो अन्य संत कवियों से इन्हें अलग करती हैं। निर्गुण ज्ञानाश्रयी भक्तिधारा की होकर भी कृष्ण के प्रति जो इनका रागानुरक्ति है वह इन्हें मीरा की तरह प्रस्तुत करती है और गुरु के प्रति जो इनका उद्गार है वह इन्हें कबीर की कोटि में पहुंचा देता प्रस्तुत करती है और ना होकर भी कृष्ण के प्रति जात कवियों से इन्हें अलग सहजों के व्यक्तित्व और काव्य में अटूट गुरुभक्ति सहज ध्यानाकृष्ट करती है। वे ईश्वर से कहीं अधिक महत्त्व अपने गुरु को देती हुई कहती हैं-

राम तजूं पै गुरु न बिसारूं। गुरु के सम हर कूँ न निहारूँ।।
चरणदास पर तन मन वारूं। गुरु न तजूं हरिः तजि डारूँ।।

सहजोबाई ने अपना सम्पूर्ण जीवन गुरुचरण दास और उनसे प्राप्त ईश्वरी अनुराग को समर्पित कर दिया। जैसा कि आचार्य शुक्ल का कथन है- ब्रह्म के स्वरूप में भावुक भक्त ध्यान या भाव-मग्नता के समय अपनी सारी सत्ता को हृदय प्राण, बुद्धि, कल्पना, संकल्प इत्यादि सारी वुत्तियों को समाहित और घनीभूत करके बड़े वेग के साथ लीन कर देता है। भावुक भक्त की एकांत अनुभूति प्रत्यक्ष दर्शन के ही तुल्य होती है। सहजोबाई ने कृष्ण के स्वरूप को निर्गुण ज्ञानमार्गी का चोल उतार कर जिस सहज और प्रकृत रूप में प्रस्तुत किया है, उसे विस्मृत करना कठिन है

“मुकुट लटक अटकी मन माहीं।
नृत तन नटवर मदन मनोहर कुडल झलक अलक बिथुराई।”

सहजोबाई की रचनाओं में इनकी प्रगाढ़ गृरुभक्ति, संसार की ओर से पूर्ण विरक्ति तथा साधु, मानव-जीवन, प्रेम, निर्गुण सगुण भेद, नाम स्मरण जैसे परंपरित विषय ही हैं। विषय पुराने हैं उद्भावनाएं ये बहुत मार्मिक नहीं हैं कहीं-कहीं, भाव विह्वलता के निदर्शन अवश्य हो जाते हैं

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“बबा काया नगर बसावौ।
ज्ञान दृष्टि से सैं घट में देखौं, सूरति निरति लौ लौवौ।
पाँच मारि मन बस करि अपने तीनों ताप नसावौ।
सत संतोष गहौ दृढ़ सेती दुर्जन मारि भजावौ।
सील, छिमा धीरज धारौ, अनहद बंब बजावौ।
पाप बनिया रहन न दीजै, धरम बजार लगावौ।।
सुबस बास होवै तब नगरी, बैरी रहै न कोई।
चम्न दास गह अमल बतायो, सहजो संभान्न सोई।।

सहजोबाई ने अपनी रचनाओं में सांसारिकता से विराग, नामजप तथा निर्गुण-सगुण ब्रह्म अभेद भाव की अभिव्यंजना की है। सहजोबाई में जो भक्ति है वह ज्ञान आधारित है लेकिन उसका प्रकटीकरण अविचल संकल्प और समर्पण की स्पृहणीय शक्ति के रूप में हुआ है।

मीरा के बाद सहजोबाई ही हमारे सामने आती हैं जो नारी होकर भी अपने अस्तित्व और सतीत्व दोनों बिन्दुओं पर मुखर हैं। उस जमाने में कुँवारी और ब्रह्मचारिणी बनकर गुरु की सेवा में समर्पित हो जाना एक कठोर कार्य था!

इन्होंने दोहे, चौपाई और कुंडलियाँ छंद में अपनी रचनाएँ की हैं। इनकी एकमात्र उपलब्ध रचना “सहज प्रकाश” है।

पदों का भावार्थ।

सहजोबाई के प्रथम पद

रीतिकाल के घोर शृंगारिक वातावरण में निर्गुण ज्ञानमार्गी भक्ति की अलख जगानेवाली सहजोबाई, कृष्ण के स्वरूप पर इस तरह से मुग्ध हुई कि निर्गुण का पद-पाठ भूल कर कृष्ण सौन्दर्य का वर्णन कर बैठी। इनके अनुसार शिशु कृष्ण के माथे पर जो मुकुट है उसमें झालर हैं, फुदने के उनके हिलने-डुलने से गजब का सौन्दर्य वर्द्धन होता है। सहजो का मन चित्त उसी लटकन में अटक कर रह गया है। छोटे कृष्ण अपने छोटे पैरों के बल नाचने में व्यस्त हैं और इस क्रम में उनके कानों के कुण्डल श्यामल धुंघराले बालों को तितर-बितर करते हुए बार-बार झलक मारते हैं और श्रीकृष्ण के सौन्दर्य को और वर्धित करते हैं।

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उनकी नाक में मुक्ता जड़ित बुलाक है जो होठों के हिलने पर हिलता है। कृष्ण की भौंहे भी कमान सी हैं जिनके गतिशील होने से इनका स्वरूप और प्रभविष्णु हो उठता है। धरती पर तो थाह-थाह कर ठुमक-ठुमक कर चलते हैं किन्तु अपनी बांहें उठाकर पलक झपकते कोई-न-कोई बाल सुलभ चपलता कर बैठते हैं। इनकी चतुराई भी बड़ी मोहक है। जब इन्हें ताता-थैया की लय पर नाचने के लिए कहा जाता है तो इनके पैरों में बंधी पायल के नुपूर झंकृत हो उठते हैं। पहले ये दुलार, मनुहार पर रीझते हैं और फिर आनन्द में डूबकर हम सबको रिझाते हैं।

सहजोबाई अपने गुरु चरणदास की कृपा से यह लीला देखने में सफल हुई है। कृष्ण का यह स्वरूप हृदय को भवन बनाकर सदा सर्वदा के लिए बसाने योग्य है। वह कृष्ण से प्रार्थना करती है कि इसी विश्व मोहन स्वरूप में वे उसके हृदयरूपी भवन में सदा के लिए बस जाएँ।

प्रस्तुत घद में वात्सल्य रस का वर्णन हुआ है। अनुप्रास, वीप्सा, उपमा आदि अलंकारों का सुन्दर विनियोग प्राप्त होता है।

इस पद के वर्णन से सहजोबाई के भीतर सगुण-निर्गुण भक्ति का जो अन्तर्विरोध है उसका एक तरह से निरसन हुआ है। यह उनकी निर्गुण भक्ति की उच्छल आनन्दानुभूति का ही प्रकट रूप है।

सहजोबाई के द्वितीय पद

ज्ञानी, संत, निर्गुणपंथी सहजोबाई अपने गुरु (श्रीचरणदास) और परमब्रह्म राम के बीच प्राथमिकता के प्रश्न पर गुरु के साथ हैं। उनके मत से ब्रह्म राम की उपलब्धि हो जाने के बाद भी गुरु का महत्त्व अक्षुण्ण है। यदि कोई अब उनसे गुरु को छोड़ने, विस्मृत करने को कहेगा तो मै उपलब्ध राम (ब्रह्म) को ही तजना, त्यागना श्रेयष्कर समझूगी। गुरु यदि मेरे सामने हैं तो उनके रहते मैं राम को देखन भी नहीं चाहूँगी।

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यह सही है कि हरि की कृपा से मेरा संसार में जन्म हुआ है। लेकिन ईश्वर तो चौरासी। लाख योनियों में असंख्या जीवों को प्रतिदिन जन्म देते हैं और मृत्यु के द्वारा उसे अपने पास बुला लेते हैं। लेकिन यह कृपा गुरु की ही है जिससे आवागमन से, जेन्म-मरण के चक्र से मुझे (जीव को) मुक्ति मिल गयी है। ईश्वर ने न सिर्फ हमें पैदा किया बल्कि चलते समय पाँचा चोर भी मेरे साथ लगा दिये। ये हैं-काम, क्रोध, मोह, मद और मत्सर।

जो कुछ भी कमायी होती, पुण्यार्जन होता, ये चोर चुरा लेते थे। मै इनके रहते अनाथ थी। गुरु ने इन चोरों (दुर्गुणों) से मुक्त कराया। हरि ने पैदा होने के लिए एक परिवार रूपी कारा में भेज दिया। जहाँ माया-ममता की बहुस्तरीय बेड़ियों ने मुझे जकड़ लिया। गुरु ने इन बेड़ियों को काटकर मुझे मुक्त किया। यही नहीं, ईश्वर ने जन्म देकर रोग और भोग में, सुख और दुःख में उलझा दिया। सांसारिक आकर्षण भोग के लिए प्रवृत्त करते और भोगोपरान्त अनेक रोग झेलने पड़ते थे। योगी गुरु ने योग के द्वारा रोग और भोग दोनों से मुक्त कराया। ईश्वर ने अनेक तरह के कर्म के मकड़जाल में उलझा दिया।

मै वास्तव में क्या हूँ, इसका स्मरण ही भूल गया। गुरु ने मुझे आत्म रूप का दर्शन कराया। ईश्वर ने मेरे साथ धोखा किया। मेरा निजत्व उसने मुझसे ही छिपा लिया, जिसे गुरु ने अपने ज्ञान के दीपक की लौ में मुझे दिख दिया। ईश्वर ने मुझे फिर भरमाने की चेष्टा की कि बंधन में ही, पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन में ही जीव की मुक्ति है। किन्तु मेरे गुरु ने ईश्वर के इस तिलस्म को भी मिटा डाला। अत: जिन गुरु चरणदास ने मेरा कायाकल्प किया उन पर मै स्वयं को तन-मन से न्योछावर करती हूँ। गुरु को किसी भी परिस्स्थिति में नहीं तज सकती भले ही हरि को तजना पड़ जाए तो उसे छोड़ने के लिए मै सर्वदा तैयार हूँ। मेरी गति राम में ही, गुरु में लीन होने में ही है।

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प्रस्तुत पद में सहजोबाई ने परमपिता जगत् नियामक के अवगुणों का वर्णन किया है। ऐसा दुः साहस आज तक शायद ही किसी कवि ने किया हो। ईश्वर ने जन्म देकर भटकने के लिए बाध्य कर दिया, अपने इंगित पर नाचने के लिए बाध्य कर दिया किन्तु गुरु ने ईश्वर के विधान को ही मेरे लिए उलट-पुलट कर रख दिया।

स्वाभाविक रूप से अनुप्रास अलंकार यत्र-तत्र उपलब्ध है। शांत रस का यह पद अपूर्व प्रभाव क्षमता से सम्पन्न है।

सहजोबाई के पद कठिन शब्दों का अर्थ

नृत-नृत्य। भवनकारी-हृदय की भवन बनाकर रहने वाले। नटवर-लीलाधारी कृष्ण। सदाई-सदा ही, सर्वदा, हमेशा। अलक-केश, लट। बिसाऊँ-भूलूँ। बिथुराई-बिखरा हुआ। माही-में। बुलाक-नाक का आभूषण जाल में डोरी-जाल में डालना। हलत-हिलना। बेरी-बेड़ी, जंजीर। मुक्ताहल-मोती। लखादौ-दिखाया। नूपूर-धुंघरू। आप छिपायौ-आत्मरूप। छिया-दिया। रीझ-मोहित। तजि डारूँ-छोड़ दूं। धनरि (धरणी)-धरती। मोरूँ-मुझसे। हिय-हृदय।

सहजोबाई के पद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. मुकुट लटक अटकी …………..बिथुराई।
व्याख्या-
सहजोबाई ने प्रस्तुत पंक्तियों में सगुण रूप ईश्वर श्री कृष्ण के सौंदर्य का वर्णन किया है। उनके अनुसार कृष्ण के माथे का शोभाशाली मुकुट और उसमें लगे लटकन मेरे मन में अटक गये हैं। अर्थात् मेरा मन कृष्ण के सौंदर्य पर रीझ गया है। उनका शरीर नृत्य कर रहा है। चंचल स्वभाव के कारण हर समय गतिशील लगता है जो अपनी लयात्मकता के कारण नृत्य करता हुआ प्रतीत होता है। ऐसे नटवर श्री कृष्ण का मर्दन अर्थात् कामदेव के समान मनोहर रूप मन को मुग्ध कर लेता है। उनके कानों में पड़ा कुंडल डोलने पर कौधता है और छितरायी, हुई केश-राशि की शोभा मन को मुग्ध कर देती है।

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2. नाक बुलाक हलत ………… करत चतुराई।।
व्याख्या-
सहजोबाई ने प्रस्तुत पंक्तियों में नटवर श्री कृष्ण की आंगिक शोभा का वर्णन किया है। इसमें नाक में धारण किये गये बुलाक का वर्णन है जिसमें मुक्ताहल अर्थात् मोती जड़े हुए हैं। उनके मनोरम ओठ विशिष्ट सुन्दर ढंग से मटकते हैं और भौंहो की भौगमा सौन्दर्य की छवि बिखेरती है। वे ठुमुक-ठुमक कर धरती पर पैर रखते है अर्थात् चलते हैं और हाथों को उठा-उठाकर विभिन्न मुद्राओं के द्वारा भाव-चातुर्य व्यक्त करते हैं। अर्थात् उनके हस्त-परिचालन के माध्यम से विविध भावों की भी अभिव्यक्ति होती है वह कोरा हस्तपरिचालन नहीं होता है। यहाँ कवयित्री ने कृष्ण के आभूषण तथा उनके औठ, भौंह, पग, हाथ आदि की गति मुद्रा का सजीव चित्र खींचा है।

3. झुनुक झुनुक नूपूर झनकारत ……………. रहौ सदाई।
व्याख्या-
श्री कृष्ण चलते हैं तो पैरों के नूपुर बजते हैं। इससे उनके बाल-मन को आनन्द आता है, अतः वे जान-बूझकर नूपूर को झनकारते चलते हैं। इससे वातावरण में लयबद्ध झनकार उत्पन्न होती है। यह सुनने वालों का मन मोह लेता है। इतना ही नहीं कृष्ण ताता थेई की मुद्रा में नाचते भी हैं और उनका नृत्य मन को मोह लेता है। इतना ही नहीं कृष्ण ताता थेई की मुद्रा में नाचते भी है और उनका नृत्य मन को मोह लेता है। सहजोबाई कहती हैं कि मै तुम्हारे चरणों की दासी हूँ, तुम मेरे हृदय में निवास करो और सदा मुझ पर कृपा रखो। इन पंक्तियों में ‘चरणदास’ शब्द का दो अर्थो में प्रयोग हुआ है। प्रथम चरणों का दास और द्वितीय सहजोबाई के गुरु चरणदास। अतः यहाँ श्लेष अलंकार है।

4. राम तनँ पै गुरु न बिसारूँ ……………… आवागमन छुटाहीं।
व्याख्या-
सहजोबाई ने प्रस्तुत पंक्तियों में अपनी यह प्रतिज्ञा व्यक्त की है कि वह राम को छोड़ सकती हैं मगर गुरु को नहीं। इसका कारण बतलाती हुई कहती है कि हरि ने जन्म देकर संसार में भेज दिया। मै यहाँ जीवन-धारण करने की सारी व्यथा, सारा प्रपंच और सारा विकार झेल रही हूँ। मगर गुरु ने ज्ञान देकर इस आवागमन अर्थात् जन्म लेने और मरने के क्रम से छुटकारा दिला दिया है। इसीलिए मैं गुरु के समान हरि को नहीं मानती हूँ। अर्थात् गुरु हरि से श्रेष्ठ हैं। हाँ ‘राम’ शब्द का प्रयोग ईश्वर के लिए हुआ है दशरथसुत के अर्थ में नहीं।

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5. हरि ने पाँच चोर दिये साथा …………….. काटी ममता बेरी।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में सहजोबाई कहती है कि हरि ने हमारे साथ कोई उपकारा नहीं किया है। उलटे कई समस्याएँ साथ लगा दी हैं। इन पंक्तियों के अनुसार गुरु ने पाँच चोरो से मुक्ति दिलाने का कार्य किया है। अर्थात् उनके उपेदश में इन्द्रियों के प्रति आसक्ति घटाने में सहायता मिली है। इसी तरह हरि ने ‘सूत-वि:-नारी भवन परिवारा’ के कुटुम्ब-जाल में फंसा दिया है, उलझा दिया है ताकि ईश्वर की ओर उन्मुख होने का अवसर ही न मिले। यहाँ गुरु ने ममता की डोर काटकर इस कुटुम्ब जाल से मुक्त होने में मदद की है। अत: ईश्वर सांसारिकता और आसवित में फैलाकर अपने से दूर करता है जबकि गुरु मोहपाश काटकर ईश्वर के समीप पहुँचाता है। अतः गुरु ईश्वर से श्रेष्ठ है।

6. ‘हरि ने रोग भोग उरझायौ ……………. आंतम रूप लखायौ।’
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में सहजोबाई हरि और गुरु का अन्तर स्पष्ट करती हुई कहती है कि हरि ने जीवन तो दिया लेकिन रोग और भोग में उलझा दिया। इससे जीवन कठिन और जटिल हो गया। इसके विपरीत गुरु ने योग की शिक्षा देकर मुक्ति दिलाई। योग के विषय में कहा गया है कि कर्म-कौशल और चित्तवृत्ति के निरोध के उपाय नाम योग है। इन दोनों अर्थात् कौशल और चित्त निरोध से जीवन संयमशील बनता है और तब स्वभावतः रोगमुक्त हो जाता है। इसी तरह हरि ने कर्म मार्ग पर डालकर कर्मफल की अनिवार्यता बतलाई जिससे कर्म का दुनिया में भटक गया। गुरु ने आत्मरूप का ज्ञान देकर बताया है कि अपने भीतर देखने पर आत्मज्ञान पाने से ही कर्म फल और कर्म-बन्धन से मुक्ति मिलती है। इस गुरु योग और आत्मज्ञान देता है जबकि ईश्वर कर्म भोग और रोग। अत: गुरु ही श्रेष्ठ हैं।

7. हरि ने मोसं आप छिपायौ …………….. हरि . तजि डारूँ।
व्याख्या-
चौपाई छन्द में रचित प्रस्तुत पंक्तियों में सहजोबाई कहती हैं कि पंच ज्ञानेन्द्रिया, भोग, रोग, कर्म परिवार, धन आदि सांसारिक आकर्षण के अनेक प्रपंचो के द्वारा ईश्वर ने एक परदा जैसा हमारे और अपने बीच डाल दिया और अपने को छिपया, ताकि हम उसे प्राप्त नहीं कर सकें। सहजो की दृष्टि में उपयुक्त तत्त्व अंधकार के परदे की तरह थे जिसके कारण हम ईश्वर को देखने में असमर्थ रहे। तब गुरु ने ज्ञान का दीपक जलाकर इस अन्धकार को दुर कर दिया और ईश्वर के दर्शन करा दिया फिर हरि से जोड़कर हमारे लिए मुक्ति रूपी गति ले आये।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 4 सहजोबाई के पद

इस प्रकार गुरु ने ईश्वर द्वारा फैलाए सारे प्रपचों को मिटा दिया जिससे हमारा अज्ञानजनित भ्रम दूर हो गया। मै अपने गुरु. चरणदास पर तन-मन न्योछावर करती हूँ। मै ऐसा ज्ञान देने वाले गुरु को नहीं तनँगी, अकर ईश्वर और गुरु में से किसी एक को छोड़ना होगा तो ईश्वर को ही छोडूंगी। सहजोबाई के इस कथन का अभिप्राय यह है कि गुरु की कृपा से ईश्वर मिल जाता है लेकिन ईश्वर की कृपा से गुरु नहीं। यदि ईश्वर को छोड़ भी दूंगी तो उनकी कृपा से पुनः प्राप्त कर लूँगी, कवयित्री ने चरण की दासी और गुरु चरणदास-इन दो अर्थो में ‘चरणदास’ शब्द का प्रयोग किया है अतः इसमें श्लेष अलंकार है।

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 3 मीराबाई के पद

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 3 मीराबाई के पद

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 3 मीराबाई के पद

मीराबाई के पद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मीरा अपने सच्चे प्रीतम के साथ किस तरह रहने को तैयार हैं?
उत्तर-
मीरा अपने सच्चे प्रीतम के साथ हर परिस्थिति में रहने के लिए तैयार हैं। उसके प्रीतम कृष्ण उसे जो पहनने के लिए देंगे वही पहनने के लिए तैयार है। जो खाने के लिए उसके प्रीतम के द्वारा दिया जाएगा उसी से मीरा अपनी क्षुधा की तृप्ति करेगी, जो स्थान रहने के लिए कृष्ण देंगे वह वहीं निवास करेगी और यदि वे बेच भी दें तब भी वह कृष्ण प्रदत्त नयी स्थिति में रह लेगी।

प्रश्न 2.
“मेरी उण की प्रीत पुराणी, उण बिन पल न रहाऊँ।”-का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पद सगुण भक्ति धारा की कृष्णोपासक कवयित्री मीराबाई द्वारा रचित है। कृष्ण के प्रति मीरा का एकनिष्ठ अटूट सर्मपण उत्तरोत्तर अतीव वेग से उमड़ते भावों से परिपूर्ण है। मधुर भाव की उत्कट प्रेमानुभूति से वशीभूत मीरा श्रीकृष्ण मीरा श्रीकृष्ण के प्रति सर्वात्म समर्पण करती है। वह श्रीकृष्ण पर लुट चुकी, मिट चुकी है। श्रीकृष्ण के रंग में रंग में रंगी मीरा उनसे पुरानी प्रीति को स्वीकार करते हुए एक पल भी अकेले नहीं रहना चाहती है। मीरा का अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रति सर्वात्म समर्पित प्रेम व्यजित है। मीरा के प्रेम में उमड़ते हुए ऐसे प्रेम-वेग सहज ही दृष्टिगोचर होता है।

प्रश्न 3.
कृष्ण के प्रति तोड़ने पर भी मीरा प्रीत तोड़ने को तैयार नहीं है। क्यों?
उत्तर-
मीराबाई रूढ़ियों से ग्रसित मध्यकालीन समाज की सामाजिक बंधनों को तोड़कर नटवर नागर (श्रीकृष्ण) की प्रेम दीवानी बनकर उन्हें सच्चा प्रियतम के रूप में अपनाया है। वह तो श्रीकृष्ण के जादुई पाश में इस तरह बँधी है कि उसका अपना अस्तित्व ही उनमें विलीन हो गया है। विधवा मीरा तत्कालीन सामाजिक नियमों के अनुसार सती न होकर श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति की उन्मत घोषणा करती है। उन्होंने श्रीकृष्ण को ही अपना वास्तविक पति और प्रियतम स्वीकार करती है।

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पति को वह कैसे छोड़ सकती है जिसके प्रेम में वह अस्तित्वविहीन हो गई है। कृष्ण के द्वारा प्रीत तोड़ देने पर भी वह उनसे प्रीत जोड़ने को मजबूर है। वह श्रीकृष्ण के संग तरुवर और पक्षी, सरवर और मछली, गिरिवर और चारा, चंदा और चकोरा, मोती और धागा तथा सोना और सुहागा के समान रहना चाहती है। वस्तुतः मीरा का किसी भी परिस्थिति में प्रीत नहीं तोड़ने की जादुई पाश में बंध चुकी है।

प्रश्न 4.
मीरा ने कृष्ण के लिए कौन-कौन-सी उपमाएँ दी हैं? वे कृष्ण की तुलना में स्वयं को किस रूप में प्रस्तुत करती हैं?
उत्तर-
मीरा ने कृष्ण के लिए निम्नलिखित उपमानों का प्रयोग किया है-तरुवर (पेड़), सरवर (सरोवर), गिरिवर (हिमालय पर्वत), चन्दा (चन्द्रमा), मोती और सोना।

मीरा ने कृष्ण की तुलना में स्वयं को क्रमशः पंखिया (पारवी, पक्षी), मछिया (मछली), चारा (घास), चकोरा (चकोर, चक्रवाक पक्षी), धागा और सोहागा के रूप में प्रस्तुत किया है।

प्रश्न 5.
“तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी” में ठाकुर का क्या अर्थ है?
उत्तर-
उपर्युक्त पक्ति में आगत ठाकुर शब्द का अर्थ स्वामी, मालिक, सर्वस्व, सर्वेश, भर्तार आदि है।

प्रश्न 6.
पठित पद के आधार पर मीरा की भक्ति-भावना का परिचय अपने शब्दों में
उत्तर-
कृष्ण भक्त कवियों में मीराबाई का नाम स्वर्णाक्षरों में भक्ति-शिखर पर अकित है। मीरा की भक्ति माधुर्य भाव की कृष्ण भक्ति है। इस भक्ति में विनय भावना, समर्पण भावना, वैष्णवी प्रीत, अवधा भक्ति के सभी रंग शामिल हैं। कृष्ण प्रेम में अस्तित्व-विहीन मीरा तरुवर पर पक्षी, सरोवर में मछली, गिरिवर पर चारा, चंदा के साथ चकोर, मोती के साथ धागा और सोना के लिए सोहागा के रूप में रहना चाहती है। तमाम तरह की लोक-मर्यादा को छोड़कर श्रीकृष्ण को पति मानकर कहती है-“तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी”

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मीरा ने आँसुओं के जल से जो प्रेम-बेल बोई थी, अब वह फैल गई है और उसमें आनन्द-फल लग गए हैं। वह सौन्दर्य और प्रेम के जादुई पाश में पूर्णतः बंध चुकी है। वह हर . पल अब श्रीकृष्ण को येन-केन प्रकारेण रिझाना चाहती है। वह कहती है

रेणु दिन वा के संग खेलूँ
ज्यूँ-त्यूँ ताही रिझाऊँ।

मीरा के पदों की कड़ियाँ समर्पण भाव से ओत-प्रोत है। इस समर्पण में प्रेमोन्माद के रूप में वह प्रकट होती है। उनका उन्माद और तल्लीनता, आत्मसमर्पण की स्थिति में पहुँच गया है

‘मीरा के प्रभु गिरधर नागर
बार-बार बलि जाऊँ।’.

मीरा की भक्ति में उद्दामता है, पर अंधता नहीं। उनकी भक्ति के पद आंतरिक गूढ़ भावों के स्पष्ट चित्र हैं। मीरा के पदों में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग दोनों पक्ष पाए जाते हैं, पर उनमें विप्रलंभ शृंगार की प्रधानता है। उन्होंने ‘शांत रस’ के पद भी रचे हैं।

मीरा की भक्ति के सरस-सागर की कोई थाह नहीं है, जहाँ जब चाहो, गोते लगाओ। इसमें रहस्य साधना भी समाई हुई है। संतों के सहज योग को मीरा ने अपनी भक्ति का सहयोगी बना लिया था।

प्रश्न 7.
“गिरिधर म्हारो साँचो प्रीतम” यहाँ साँचो विशेषण का प्रयोग मीरा ने क्यों किया है?
उत्तर-
कृष्ण भक्त कवयित्री मीराबाई उनकी उपासना प्रियतम (पति) के रूप में करती है। यह रूप अत्यन्त मनोहारी है। उन्होंने श्रीकृष्ण को ही अपना वास्तविक पति और सच्चा प्रियतम बताया-‘गिरिधर म्हारो साँचो प्रीतम’। युवावस्था में विधवा मीरा ने वैधव्यता को, जो उनकी नजर में सांसारिक और झूठा था, को धता बताकर स्वयं को अजर-अमर स्वामी श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। अर्थात् ‘साँचो’ विशेषण मीरा की कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ अटूट समर्पण की पराकाष्ठा है।

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प्रश्न 8.
मीरा की भक्ति लौकिक प्रेम का ही विकसित रूप प्रतीत होती है। कैसे? यह दोनों पदों के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रेम के दो स्वरूप हैं-
(i) जगतिक या सांसारिक प्रेम और (2) ईश्वरीय या आध्यात्मिक प्रेम। किसी शायर ने कहा है-“हकीकी इश्क से पहले मिजाजी इश्क होता है।” अर्थात् ईश्वर से प्रेम करने या होने के पूर्व सांसारिक प्रेम होता है। जो अपने रक्त सम्बन्धियों से, अपने परिवेश से प्रेम नहीं कर पाएगा वह ईश्वर से क्या खाक प्रेम करेगा।

मीरा कृष्ण को ‘पिया’ संबोधन देती है। पिया अर्थात् पति। भारतीय समाज में पति-पत्नी ‘के सम्बन्ध को अत्यन्त आदरणीय, सम्मानित स्थान प्राप्त है। विशेषकर हिन्दू समाज में जहाँ हर विषम परिस्थिति में यह दाम्पत्य बंधन अटूट बना रहता है। पति-पत्नी एक-दूसरे के व्यक्तित्व के परिपूरक होते हैं। एक-दूसरे पर आश्रित होते हैं। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम निवेदन एक पत्नी के प्रणय निवेदन की तरह ही है। अन्तर सिर्फ इतना भर है कि कृष्ण यहाँ अलौकिक, परमपुरुष ब्रह्म स्वरूप हैं। जैसे एक पतिव्रता हर परिस्थिति में, सुख-दुख में पति के प्रति एकनिष्ठ बनी रहती हैं संतुष्ट होती हैं। मीरा भी कृष्ण के प्रति ऐसी ही भावना व्यक्त करती हैं। अत: यह – कहना ठीक ही है कि मीरा की भक्ति लौकिक प्रेम का विकसित रूप है।

मीराबाई के पद भाषा की बात।

प्रश्न 1.
मैं, म्हारो, उण आदि सर्वनाम हैं। दिये गये पदों से सर्वनामों को चुनकर लिखें।
उत्तर-
मीराबाई राजस्थान की थी। उनकी रचनाओं में राजस्थानी बोली के शब्द आये हैं। सर्वनाम भी राजस्थानी बोली के ही प्रयोग में लाये गये हैं।

  • म्हारो – मेरा
  • उण – वह, उसका, उसके
  • तोसों – तुमसे तितही – वहीं
  • वा – उसके
  • ताही – उसको
  • सोई – वहीं।

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प्रश्न 2.
प्रथम पद में मीरा ने कृष्ण और अपने लिए कुछ उपमान या अप्रस्तुत दिये हैं। उन्हें अलग-अलग लिखें।
उत्तर-
कृष्ण के लिए प्रयुक्त उपमान मीरा के लिए प्रयुक्त उपमान

  • तरुवर – पंखिया
  • सरवर – मछिया
  • गिरिवर – चारा
  • चंदा – चकोरा
  • सोना – सोहागा
  • ठाकर – दासी

प्रश्न 3.
मीरा के इन पदों में भक्ति रस है। भक्ति रस का स्थायी भाव ईश्वर विषयक रति है। अन्य रसों की सूची उनके स्थायी भावों के साथ बनाएँ।
उत्तर-
रसो वै सः अर्थात् रस ब्रह्म ही है। रसो की संख्या भिन्न आचार्यों ने आत नौ और ग्यारह निर्धारित की है। स्थायी भावों से साथ इन रसों की सूची निम्नवत है–

प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखें रात, दिन, प्रभु, तरु, तालाब, चन्द्रमा, सोना।
उत्तर-

  • रात – निशा, रजनी, रात्रि।
  • दिन – दिवा, दिवस।
  • प्रभु – स्वामी, ठाकुर
  • तरु – वृक्ष, पेड़, तड़ाग
  • तालाब – सर, सरोवर, तडाग।
  • चन्द्रमा – चन्द्र निशापति, रजनीपति, निशाकर, चाँद।
  • सोन – कनक, स्वर्ण, सुवर्ण, हेम, हिरण्य।।

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प्रश्न 5.
मीरा की भाषा ब्रज मिश्रित राजस्थानी है। ये दोनों हिन्दी क्षेत्र की उपभाषाएँ हैं। बिहार प्रदेश में कितनी उपभाषाएँ बोली जाती हैं? उनकी सूची क्षेत्रवार बनाएँ।
उत्तर-
बिहार प्रांत में निम्नलिखित उपभाषाएँ बोली जाती हैं जिनके नाम के आगे उनका क्षेत्र उल्लिखित हैं

  • भोजपुरी-छपरा, सीवान, गोपालगंज, पश्चिमी चम्पारण, आरा, भोजपुर, रोहतास, कैमूर।
  • मैथिली-पूर्वी चम्पारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, मधुबनी, पूर्णिया, अररिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा सुपौल।
  • मगही-पटना, गया, चतरा, औरंगाबाद।
  • अंगिका-भागलपुर, पूर्णिया का कुछ भाग नौगछिया।
  • वञ्जिका-वैशाली और पूर्वी चम्पारण का कुछ भाग।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

मीराबाई के पद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मीरा के कृष्ण के प्रति समर्पण भाव का विवेचन करें।
उत्तर-
मारा कृष्ण के प्रति अनन्य भाव से समर्पित है। वह दिन-रात कृष्ण के चरणों में पड़ी रहकर उनकी रूप माधुरी निहारना चाहती है। यह हर तरह से कृष्ण को रिझाना चाहती है। वह ऐसी समर्पिता है कि कृष्ण जो पहचानें, जो खिलावें अर्थात् जैसे रखना चाहें उन्हीं की दासी बनकर रहना चाहती है। यह समर्पण-भाव अपने उत्कर्ष पर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ वह कृष्ण द्वारा बेचे जाने पर बिक जाने के लिए तैयार हो जाती है। सारांशत: वह एक पूर्ण समर्पिता और दासी भाव की प्रेमिका है।

प्रश्न 2.
मीरा की दृष्टि में कृष्ण का क्या स्थान है?
उत्तर-
मीरा ने कृष्ण के लिए कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग अपने प्रसंग में किये हैं। इन शब्दों से कृष्ण के विषय में मीरा की दृष्टि ज्ञात होती है। प्रथमतः मीरा की दृष्टि से गिरिधर रूप है वह जिसमें उन्होंने पर्वत धारण कर जन-समूह की घोर वृष्टि से रक्षा की। अतः मीरा की दृष्टि में कृष्ण सबके रक्षक हैं। तृतीय, मीरा के कृष्ण नागर हैं। सागर वह व्यक्ति होता है .. जो सभ्य, शिष्ट, संस्कारवान और मृदु वचन एवं आचरण का धनी होता है। अंतः मीरा के कृष्ण श्रेष्ठ पुरुष हैं।

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प्रश्न 3.
कृष्ण के प्रति मीरा किस भाव से समर्पिता है?
उत्तर-
मीरा ने कृष्ण को अपना प्रेमी और पति माना है। स्वभावत: उसने अपने को प्रेमिका के रूप में रखा है। लेकिन उसके प्रेमिका रूप में पत्नी जैसा समर्पण और दासी जैसा सेवा-भाव मिला हुआ है। एक वाक्य में वह पूर्णतः समर्पिता और सेविका प्रेमिका है जो कृष्ण को खुले शब्दों में पति मानती है।

मीराबाई के पद अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मीरा कृष्ण से प्रीति क्यों तोड़ना नहीं चाहती है?
उत्तर-
मीरा की दृष्टि में कृष्ण के समान सर्व रूप-गुण सम्पन्न कोई दूसरा पुरुष है ही नहीं लिससे वह प्रीति कर सके। इसलिए कृष्ण उसके लिए विकल्पहीन पुरुष हैं।

प्रश्न 2.
मीरा ने किन उपमानों के सहारे अपने और कृष्ण के सम्बन्ध को व्यक्त किया है?
उत्तर-
मीरा ने सरोवर और मछली, पेड़ और पक्षी, पर्वत और घास, चन्द्रमा और चकोर, मोती और धागा तथा सोना और सुहागा जैसे उपमानों द्वारा अपने और कृष्ण के सम्बन्ध को व्यक्त किया है?

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प्रश्न 3.
मीरा के कृष्ण कैसे व्यक्ति हैं?
उत्तर-
मीरा के कृष्ण नागर हैं, रक्षक हैं और सच्चे प्रियतम हैं। यही कारण है कि मारा की भक्ति कृष्ण में लीन है।

प्रश्न 4.
मीराबाई किस प्रकार की कवयित्री हैं?
उत्तर-
मीराबाई कृष्णभक्ति वाली कवयित्री है।

प्रश्न 5.
मीराबाई के प्रथम पद में किसकी व्यंजना हुई है?
उत्तर-
मीराबाई के प्रथम पद में एकांतिक प्रेम और समपर्ण भाव दोनों की व्यंजना हुई है।

प्रश्न 6.
श्रीकृष्ण के प्रति मीरा की समर्पण-भावना उनके किस पद में दिखाई देती है?
उत्तर-
श्रीकृष्ण के प्रति मीराबाई की समर्पण-भावना द्वितीय पद में दिखाई देती है।

मीराबाई के पद वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

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प्रश्न 1.
मीरावाई किस काल के कवयित्री हैं?
(क) रीतिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) वीरगाथाकाल
(घ) आधुनिक काल
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 2.
मीरवाई के उपास्य थे
(क) कृष्ण
(ख) राम
(ग) शिव
(घ) ब्रह्मा
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
मीरा के पद का संकलन किस ग्रंथ में है?
(क) प्रेमाश्रु
(ख) प्रेमवाणी
(ग) प्रेम सुधा
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 4.
मीरा के प्रथम पद मे किसका वर्णन है?
(क) एकान्तिक प्रेम का
(ख) आत्म समर्पण का
(ग) अनन्य भक्ति का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

प्रश्न 5.
दूसरे पद में मीरा के किस रूप की व्यंजन हुई है?
(क) एकान्तिक प्रेम की
(ख) कृष्ण के प्रति समर्पण की
(ग) एकांगिक प्रेम की
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
मीरा…………..भक्तिधारा की प्रतिनिधि कवयित्री के रूप में जानी जाती है।
उत्तर-
सगुण

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प्रश्न 2.
मीरा की तुलना भारतीय साहित्य में तमिल की वैष्णव भक्त कवयित्री………………से की जाती
उत्तर-
गोदा (अंडाल)

प्रश्न 3.
पहले पद में मीरा का प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रति वेपरवाह…………व्यंजित हैं।
उत्तर-
ऐकान्तिक प्रेम

प्रश्न 4.
तुम भये…………मैं तेरी मछिया।
उत्तर-
सरवर

प्रश्न 5.
तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी…………..।
उत्तर-
दासी।

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मीराबाई पद कवि परिचय (1504-1563)

हिन्दी साहित्य की भक्ति रस शाखा में सबसे महत्त्वपूर्ण के रूप में प्रेम दीवानी “दरद दिवाणी” मीराबाई का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनके जीवन-वृत्त में अनेक किम्वदतियाँ समाहित हैं, जिससे इनकी जीवनी अलौकिक घटनाओं से युक्त हो जाती है। कुछ घटनाएँ सत्य भी है जिनका वर्णन मीरा की कई रचनाओं में हुआ है। अनेक रचनाओं का उल्लेख होते हुए भी मीराबाई की पदावली ही सबसे प्रमाणिक मानी गयी है। तत्कालीन वातावरण की दृष्टि से संतों की ये शिष्या दिखती हैं किन्तु धार्मिक दृष्टि से सगुण भक्ति के समीप पड़ती है।

यही कारण है कि मीरा के भाव संतों के भाव जैसे ही अनुभूतिमय है और उनकी शैली में अधिक कोमल, तरल और प्रांजलं है। मीरा का आलंबन अलौकिक है और भक्तिभाव की दृष्टि से मीरा का प्रेम व्यापार रहस्यवाद के अन्तर्गत आता है। मीरा के आराध्य सगुण कृष्ण हैं जबकि रहस्यवाद निर्गुण ब्रह्म और जीव के मधुर रागात्मक सम्बन्ध पर आधारित है। यही कारण है कि मीरा न तो पूर्णतः संतों की श्रेणी में आती है और न भक्तों की श्रेणी में। मीरा की भक्ति माधुर्य भाव की है। सगुण ईश्वर के साथ भक्त कवि अपना भावपूर्ण व्यापार चलाते हैं। मीरा अपने आराध्य देव को प्रेमी ही नहीं पति भी मानती हैं–

“मेरो तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।”
“मैं तो गिरिधर के घर जाऊँ
गिरिधर म्हारों सांचों प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ।”

कृष्ण के बिना मीरा का जीवन कठिन हो गया है-

“पिया बिन रहयो न जाई।”
“पिया बिन मेरी सेज अलूनी, जागत रैन बहावे।”

फागुन आया हुआ है और कृष्ण पास नहीं हैं-
“होरी पिया बिन खारी”

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मीरा के समक्ष को लेकर कोई औपचारिक बंधन नहीं है। उनका स्पष्ट कथन है-
“मेरी उनकी प्रीत पुराणी उण बिन पल न रहाऊँ
पूरब जनम की प्रीत पुराणी, सो कस छोड़ी जाय।”

मीरा के काव्य में रूपासक्तिजन्य माधुर्य भाव का वर्णन हुआ है जो कृष्ण के सौन्दर्याकर्षण पर आधारित है-
“मोहन के मैं रूप लुभाणी
सुन्दर वदन कमल दल लोचन
बाँकी चितवन मद मुस्कानी”
आली रे मेरे नैना वान पड़ी

चित चढ़ी मोरे माधुरी मूरत, उरबीच आन पड़ी।”

मीरा तो कृष्ण के हाथों पहले ही दर्शन में बिक गयी और उनके साथ हो गयी-

“मैं ठाढ़ी गृह आपणो री, मोहन निकसे आई
वदन चन्द्र प्रकाशत हिली मंद-मंद मुस्काई
लोग कुटुम्बी गरजे ही बरजे ही, बतिया कहत बनायी
चंचन निपट अकट नहीं मानत, परहित गये बिकाई।”

मीरा की माधुर्य भक्ति में प्रगाढ़ता के साथ अनुभूति की गंभीरता भी है-
“रमईया बिन नींद न आवे
नींद न आवै विरह सतावै प्रेम की आँच डुवाब
होरी पिया बिन लागै खारी
सूनो गाँव देस सब सूना सूनी सेज अटारी।”

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कला पक्ष की दृष्टि से भी मीराबाई का काव्य अत्यन्त समृद्ध है। इनके काव्य में संयोग और वियोग श्रृंगार के साथ शांत रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। संयोग शृंगार का वर्णन देखें
“आवत मोरी गलियन में गिरधारी
मैं तो छुनि गई लाज की मारी।”

वियोग शृंगार का एक उदाहरण
‘हे री ! मैं तो दरद दीवाणी म्हारा दरद न जाणै कोई
प्रीतम बिन तम जाइ न सजनी दीपक भवन न भावै हो
फूलन सेल सूल हुई लागी जागत रैनि बिहावै हों।”

शांत रस का वर्णन देखें-
“स्याम बिन दुःख पावा सजनी
कुण महाँ धीर वंधावा
राम नाम बिनु मुकति न पावा फिर चौरासी जावां
साध संगत मा भूलणां जावा मूरख जनम गमावां
मीरा के प्रभु थारी सरणे जोत धरत पद पावां।”

मीरा ने काव्य में प्रकृति चित्रण अपने प्रकृत रूप में उपस्थित है-
“मतवारे बादल आये रे, हरि को सनेसो कबहु न लाये
गाजै पवन मधुरिमा मेहा अति झड़ लाये रे
कारो नाग विरह अति जारी मीरा मन हरि भायो रे।”

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मीरा की भाषा में गुजरती, राजस्थानी और ब्रजभाष में तीनों की त्रिधारा दीखती है। वस्तुतः इन तीनों भाषा-क्षेत्रों से इनका सम्बन्ध रहा है।

मीरा की शैली पद है जिसके साथ ‘सरसी’, विष्णुपद, दोहा, सवैया, शोभन, तांटक और .. कुण्डल छन्दों का भी प्रयोग किया है।

मीरा के काव्य में सादृश्यमूलक अलंकार जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अत्युक्ति, उदाहरण, . विभावना, समासोक्ति अर्थान्तर न्यास, श्लेष, वीप्सा और अनुप्रास की प्रधानता है। कहा जा सकता है कि मीरा के काव्य का भाव और कला दोनों पक्ष समृद्ध हैं। किन्तु सबके बावजूद मीरा में कवि कर्म प्रधान नहीं है। कृष्ण के लिए उनकी दिवानगी ही प्रधान और प्रसिद्ध है।

मीराबाई के पद कविता का भावार्थ

मीराबाई के प्रथम पद
प्रस्तुत पद में कृष्ण को समर्पित भक्त कवयित्री मीराबाई कृष्ण को ही सम्बोधित करते हुए कहती है हमारे बीच एक रागात्मक सम्बन्ध बना है। यदि इस सम्बन्ध को तुम अपनी तरफ से तोड़ भी देते तो तब भी मेरा एकनिष्ठ प्रेम जारी रहेगा। मैं यह सम्बन्ध कभी नहीं तोडूंगी। इसका एक कारण है कि तुम्हारे जैसा गुण सम्पन्न इस संसार में और कोई नहीं जिससे तुमसे बिछुड़ने के बाद सम्बन्ध बना सकूँ, जोड़ सकूँ।

वैसे हमारा सम्बन्ध अस्तित्व-सा अन्योन्याश्रित हैं। प्रभु मेरे यदि तुम तरुवर हो तो मैं उस पर निवास करने वाली पक्षी हूँ, चिड़िया हूँ। तुम्ही इस “पाखी” के सहायक हो। यदि तुम सरोवर हो तो उसमें जीवन धारण करने वाली मैं मछली हूँ। जल ही जिसका जीवन है। यदि तुम पर्वत राज हो तो मैं उसकी गोद में वाली हरियाली हूँ। यदि तुम चन्द्रमा हो तो मैं तुमको एक टक निहारने वाला चकोर हूँ। यदि तुम मोती हो तो मैं क्षुद्र धागा हूँ जिसमें गूंथ कर माला तैयार होती है। यदि तुम स्वर्ण, कंचन हो तो मैं सोहागा (एक रासायनिक पदार्थ) हूँ। यदि तुम ब्रज के स्वामी ठाकुर हो तो मैं तेरी सेविका हूँ, चरणों की दासी हूँ।

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मीरा रचित इस पद में केवल यही नहीं कथित है कि जीव हर रूप और स्थिति में ईश्वर पर निर्भर है बल्कि यह भी व्यजित तथ्य है कि जीव से ही ईश्वर को सार्थक्य प्राप्त होता है। जिस पेड़ पर पक्षी निवास नहीं करते वह मनहूस माना जाता है। वह सरोवर ही क्या जहाँ जीवन का अस्तित्व ही नहीं हो। मोती कीमती और चमकदार होकर भी किसी की ग्रीवा तक पहुंचने के लिए तुच्छ धागे पर ही निर्भर है। सोने को अपनी स्वाभाविक आभा पाने के लिए सोहागा की संगती चाहिए ही। वह स्वामी क्या जिसके सेवक अनुचर नहीं हो।

मीरा प्रकारान्तर से यह तथ्य कृष्ण को समझा देना चाहती है कि तुम चाहकर भी सम्बन्ध-विच्छेद कर सकते। जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध, भक्त और भगवान का सम्बन्ध शाश्वत होता है, काल निरपेक्ष होता है।

प्रस्तुत पद में मीरा ने कृष्ण के लिए पिया, प्रभु, ठाकुर जैसी सम्बोधन संज्ञाओं का और अपने लिए ठाकुर की दासी का प्रयोग कर रागात्मक सम्बन्ध को एक महनीयता प्रदान की है। . रूपक, उदाहरण जैसे अलंकार से सज्जित यह पद, अद्वितीय मारक क्षमता से भी युक्त है।

मीराबाई के द्वतीय पद

कृष्ण की कर्षण शक्ति से प्रभावित मध्यकालीन भक्तिधारा की मधुराभक्ति की साधिका राधिका के समतुल्य दीवानी मीरा रचित इस पद में उनका हृदयोद्गार व्यक्त है। मीरा श्रीकृष्ण के सौन्दर्य और प्रेम के जादुई पाश में इस तरह बंधी हुई है कि उनके निजत्व का निरसन हो चुका है। उनका कहना है कि मेरा गन्तव्य कृष्ण हैं। मैं उसी के घर जाऊंगी। वे ही मेरे सच्चे प्रियतम हैं। जिसके रूप से देखकर लुब्ध हो चुकी हूँ। मैं कृष्ण के साथ अभिसार करने हेतु सन्नद्ध हूँ। जैसे ही रात हागी मैं कृष्ण के पास जाऊँगी और रात पर रास में सहभागी बन सुबह होने के साथ ही इस पर घर को वापस आ जाऊंगी।

कृष्ण भी मुझ पर रीझ जाएँ, मोहित हो जाएँ, इसके लिए सत-दिन उनके रंग संग तरह-तरह के खेलती रहूँगी। अब यह सब इच्छा पर होगा कि मुझे खाने-पीने और पहनने के लिए क्या देते हैं। मेरी ऐसी जातर्तिक कोई इच्छा शेष नहीं है। मेरा और कृष्ण का प्रेम बहुत पुराना और गहरा है। उनके बिना अब एक पल का जीना भी असंभव है। वे अपने आश्रय में जहाँ स्थान देंगे वही मेरा निवास होगा और यदि वे मुझे दूसरे के हाथों बेचना भी चाहें तो मुझे कोई मलाल नहीं होगा। क्योंकि मेरा “मैं’ अब बाकी बचा ही नहीं है। मीरा कहती है कि मेरे स्वामी तो गिरधर नगर है। जिन पर मैं बार-बार बलि जाती हूँ कृष्ण पर अपने को न्योछावर करती हूँ।”

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 3 मीराबाई के पद

प्रस्तुत पद में सम्पर्ण के भावना की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति हुई है। जैसे कबीर ने सवयं को राम का कुत्ता घोषित किया। शांत रस की इस रचना में अनुप्रास की छटा देखते बनती है। एकनिष्ठ प्रेम और आत्मोत्सर्ग की यह सर्वोत्तम प्रस्तुति है।

मीराबाई के पद कठिन शब्दों का अर्थ

गिरधर-गोवर्धन गिरि को धारण करने वाले, कृष्ण। तोसों-तुमसे। तरुवर-श्रेष्ठ वृक्ष। पॅखिया-पक्षी। सरवर-तालाब। मछिया-मछली। गिरिवर-पर्वतराज। सोहागा-सोना का शुद्ध करने के लिए प्रयुक्त क्षार। ठाकुर-स्वामी। म्हारो-मेरा। साँचो-सच्चा। रैण-रातः। दिना-दिन। रिझाऊँ-प्रसन्न करूँ। तितही-वहीं। नागर-विदग्ध, चतुर, रसिक। बलि जाऊ-छिवर हो जाऊँ। वा-उसको। ताही-उसको। सोई-वही।

मीराबाई के पद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. जो तुम तोड़ो, पिया……………कौन संग जोड़ें।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ राजस्थान कोकिला मीरा द्वारा रचित हैं। इन पंक्तियों में मीरा कहती हैं कि हे कृष्ण, तुम मेरे प्रियतम हो, मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। तुम पर मेरा अधिकार नहीं है अत: तुम चाहो तो मुझसे अपनी प्रीति तोड़ ले सकते हो। लेकिन मैं तुमसे प्रीत नहीं तोडूंगी। अगर तुमसे प्रीत तोड़ लूँ तो जोडूंगी किससे? अर्थात् तुम्हारे सिवा मेरा कोई नहीं है। अतः तुम करो या न करो मगर मैं तो तुमसे ही प्रीति करूँगी, क्योंकि तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जिससे मैं प्रेम कर सकूँ। मीरा ने अलग भी कहा है-मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई। अतः ये पंक्तियाँ कृष्ण के प्रति मीरा के अनन्य प्रेम को व्यक्त करती हैं।।

2. तुम भये तरुवर………..हम भये सोहागा।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में मीरा कृष्ण से अपनी अनन्य प्रीति का निवेदन करती कहती हैं कि कृष्ण तुम तरुवर हो और मैं उस पर आश्रय पाने वाली चिड़िया। तुम सरोवर हो तो मैं उसमें रहने वाली मछली जो तुमसे अलग होते ही तड़प-तड़प कर मर जायेगी। तुम पर्वत हो तो मैं उस पर उगने वाली घास। तुम चन्द्रमा हो तो मैं चकोर। तुम मोती तो मैं धागा। तुम सोना हो तो मैं सोहागा।

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अभिप्राय यह है कि उक्त अनेक उदाहरणों के सहारे मीरा ने कृष्ण के साथ अपनी उस भक्ति का परिचय दिया है जो निर्भरा भक्ति कहलाती है। इसमें भक्त भगवान को अपना आधार मानता है जिसके बिना उसका अस्तित्व ही नहीं होता।

3. मीरा कहे प्रभु……………मेरी दासी:
व्याख्या-
इन पंक्तियों में मीरा कहती है कि हे व्रज में निवास करने वाले मेरै प्रभु ! तुम मेरे . ठाकुर हो और मैं तुम्हारी दासी अर्थात् मुझमें-तुममें स्वामी-सेविका वाला प्रेम है। इन पंक्तियों
मे मीरा का अभिप्राय सामान्य दासी कहने से नहीं है वह बताना चाहती है कि वह कृष्ण की ऐसी प्रिय पत्नी है जो दासी की तरह पूर्ण समर्पण भाव से अपने स्वामी की सेवा करती है और उसी. में सुख मानती है।

4. मैं गिरिधर के घर जाऊँ………….लुभाऊँ।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ मीरा द्वारा रचित पद से ली गयी हैं। यहाँ मीरा द्वारा अपने प्रियतम कृष्ण के पास जाने का उल्लेख किया गया है। मीरा कहती हैं कि कृष्ण मेरे सच्चे प्रियतम हैं। वे अत्यन्त सुन्दर हैं। उनकी रूप माधुरी मोहक है। अत: मैं देखते ही उन पर लुब्ध हो जाती हूँ। जिस तरह भ्रमर फूल पर सतत् मँडराता रहता है। उसी तरह मैं उनकी रूप माधुरी के सम्मोहन में सतत् उन्हीं के समीप रहना और उनकी रूप माधुरी निहारते रहना चाहती हूँ।

5. रैण पडै तब ही उठ जाऊँ…………….ताही रिझाऊँ।
व्याख्या-
मीरा द्वारा रचित “मैं गिरिधर के घर जाऊँ” पद से गृहीत इन पंक्तियों में यह बताने की चेष्टा की गई है कि वह कृष्ण के सौन्दर्य और प्रेम की दीवानी है। अतः एक पल भी अलग रहना उसे स्वीकार नहीं। यही कारण है कि जैसे ही रात होती है उनकी सेवा में चली जाती और भोर होने पर ही उनसे अलग होती है। दिन में भी उनके साथ खेलती रहती हूँ। इस तरह चाहे दिन हो या रात मैं आठों पहर उन्हीं के साथ खेलती या सेवा में रहती हूँ। वे जैसे रीझते है उसी तरह उन्हें रिझाती हूँ। उन्हें जो पसंद है वही आचरण करती हूँ और इस तरह एक आज्ञाकारिणी प्रेमिका या पत्नी के रूप में मैं सेविका धर्म का तन्मयता से पालन करते हुए उनकी प्रसन्नता पाने के लिए प्रयल करती रहती हूँ।

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6. जो पहिरावै सोई पहिरूँ…………….पल न रहाऊँ।
व्याख्या-
मीरा ने अपने पद की प्रस्तुत पंक्तियों में अपने पूर्ण समर्पण भाव को व्यक्त किया है। वह पूरी तरह अनुगता और सेवापरायण दासी है। वह पति रूप श्री कृष्ण से कोई अपेक्षा नहीं करती। उसमें पाने की नहीं देने की लालसा है। अत: आदर्श सेविका की तरह वह कहती है कि वे जो पहनाते हैं वही पहनती हूँ जो देते हैं वही खाती हूँ। मेरी उनसे प्रीत पुरानी है। मैं उनसे अलग एक पल भी नहीं रह सकती हूँ। मीरा के इस कथन से यह बात स्पष्ट है कि मीरा ने भक्त होने के बाद अपने समस्त राजकीय संस्कारों का त्याग कर दिया था। खाने-पहनने की रुचि भूल कर जो मिलता था वही प्रभु प्रसाद समझकर खा लेती थी और जो भी वस्त्र मिल जाता था उससे तन ढंक लेती थी।

7. जहाँ बैठावें तितही बैढूँ………………बार-बार बलि जाऊँ।
व्याख्या-
अपने पद की प्रस्तुत पंक्तियों में मीरा ने कृष्ण के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त किया है। वह कृष्ण के प्रेम में दीवानी है। अत: जीवन के सारे क्रियाकलाप, सुख-दुःख को कृष्ण इच्छा का प्रसाद मानकर सादर स्वीकार करती है। वह कृष्ण को अपना नियामक और प्रेरक मानती है और कहती है कि वे जहाँ बैठाते हैं वहीं बैठी रहती हूँ। यदि वे मुझे बेच दें तो उनकी खुशी के लिए मैं सहर्ष बिक जाऊंगी। मेरे प्रभु गिरिधर हैं अर्थात् पर्वत भी उठाकर संकट से रक्षा करने में समर्थ हैं। वे नागर हैं अर्थात् शिष्ट, सभ्य, संस्कारवान और चतुर हैं। अतः मैं बार-बार उन पर अपने को न्योछावर करती हूँ।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

कबीर के पद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कबीर ने संसार को बौराया क्यों कहा है?
उत्तर-
कबीर ने संसार को ‘बौराया हुआ’ इसलिए कहा है क्योंकि संसार के लोग सच सहन नहीं कर पाते और न उसपर विश्वास करते हैं। उन्हें झूठ पर विश्वास हो जाता है। कबीर संसार के लोगों को ईश्वर और धर्म के बारे में सत्य बातें बताता है, ये सब बातें परम्परागत ढंग से भिन्न है, अत: लोगों को अच्छी नहीं लगती। इसलिए कबीर ने ऐसा कहा है कि यह संसार बौरा गया है, अर्थात पागल-सा हो गया है।

प्रश्न 2.
“साँच कहाँ तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना” कबीर ने यहाँ किस सच और झूठ की बात कही है?
उत्तर-
कबीर ने बाह्याडंबरों से दूर रहकर स्वयं को पहचानने की सलाह दी है। आत्मा का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। कबीर संसार के लोगों को ईश्वर और धर्म के बारे में सत्य बातें बताता है, ये सब परंपरागत ढंग से भिन्न है, अत: लोगों को यह पसंद नहीं है। संसार के लोग सच को सहन न करके झूठ पर विश्वास करते हैं। इस प्रकार कबीर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों के बाह्यडंबरों पर तीखा कटाक्ष किया है।

प्रश्न 3.
कबीर के अनुसार कैसे गुरु-शिष्य अन्तकाल में पछताते हैं? ऐसा क्यों होता है?
उत्तर-
कबीर के अनुसार इस संसार में दो तरह के गुरु और शिष्य मिलते हैं। एक कोटि है सदगुरु और सद् शिष्य की जिन्हें तत्त्व ज्ञान होता है, जो विवेकी होते हैं, जिन्हें जीव-ब्रह्म के सम्बन्ध का ज्ञान होता है, ऐसे सदगुरु और शिष्यों में सद् आचार भरते हैं। इनका अन्तर-बाह्य एक समान होता है। ये अहंकार शून्य होते हैं। गुरु-शिष्य की दूसरी कोटि है असद गुरु-और असद शिष्य की। इस सम्बन्ध में कबीर ने एक साखी में कहा है-

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जाके गुरु अंधरा, चेला खरा निरंध,
अंधा-अधे ठेलिय, दोनों कूप पड़प।

असद् अविवेकी बनावटी गुरु सद्ग्रन्थों का केवल उच्चारण करते हैं, वाचन करते-कराते हैं, ग्रन्थों में विहित, निहित तथ्यों को अपने आचरण में उतारते और उतरवाते नहीं हैं। अपरिपक्व ज्ञान और उससे उत्पन्न अभिमान को अपनी आजीविका बना लेते हैं। समय रहते ये चेत नहीं पाते और अन्त में जब आत्मोद्धार के लिए समय नहीं बच पाता, तब ये बेचैन हो जाते हैं। किन्तु अब इनके पास पछतावे के अलावा कुछ बचता ही नहीं है।

प्रश्न 4.
“हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुर्क कहै रहिमाना
आपस में दोउ लरि-लरि मुए, मर्म न काहू जाना।
इन पंक्तियों का भावार्थ लिखें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ अपने समय के और अपनी तरह के अनूठे समाज-सुधारक चिंतक कबीर रचित पद से उद्धृत है। इन पंक्तियों में परम सत्ता के एक रूप का कथन हुआ है। यही मर्म है, यही अन्तिम सत्य है कि परम ब्रह्म, अल्लाह, गॉड सभी एक ही हैं। किन्तु अज्ञानतावश अलग-अलग धर्म सम्प्रदायों में बता मानव समाज अपने-अपने भगवान से प्यार करता है, दूसरे के भगवान को हेय समझता है। अपने भगवान के लिए अन्ध-भक्ति दर्शाता है। उनकी यह कट्टरता, बद्धमूलता, इतनी प्यारी होती है कि जरा-जरा सी बात पर धार्मिक भावनाएं आहत होने लगती हैं।

दो सम्प्रदायों के बीच का सौहार्द्र वैमनस्य में बदल जाता है। हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं और लड़कर कट मर जाते हैं। यदि उन्हें परम तत्त्व का, परम सत्य का, मूल-मर्म का ज्ञान होता तो पूरब-पश्चिम, मंदिर-मस्जिद, पूजा-रोजा, राम-रहीम में भेद नहीं करते। एक-दूसरे के लिए प्राणोत्सर्ग करते न कि एक-दूसरे के खून के प्यासे होते।

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प्रश्न 5.
‘बहुत दिनन के बिछुरै माधौ, मन नहिं बांधै धीर’ यहाँ माधौ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर-
कबीर निर्गुण-भक्ति के अनन्य उपासक थे। उन्होंने परमात्मा को कण-कण में देखा है, ज्योति रूप में स्वीकारा है तथा उसकी व्याप्ति चराचर संसार में दिखाई है। इसी व्याप्ति को अद्वैत सत्ता में देखते हुए उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति दी है। कबीर ने ईश्वर को “माधौ” कहकर पुकारा है।

प्रश्न 6.
कबीर ने शरीर में प्राण रहते ही मिलने की बात क्यों कही है?
उत्तर-
प्रेम में यों तो सम्पूर्ण शरीर मन, प्राण सभी सहभागी होते हैं किन्तु आँखों की भूमिका अधिक होती है। विरह की दशा में आँखें लगातार प्रेमास्पद की राह देखती रहती हैं। विरही प्रेमी की आंकुलता-व्याकुलता का अतृप्ति का ज्ञापन आँखों से ही होता है फिर इसका क्या भरोसा कि मृत्यु के बाद यही शरीर पुनः प्राप्त हो। प्रेम यदि इसी जन्म और मनुष्य योनि में हुआ है, विरह की ज्वाला में यदि यही शरीर, मन, प्राण दग्ध हो रहे हैं तो फिर प्रेम को सार्थक्य भी तभी प्राप्त होगा जब शरीर में प्राण रहते इसी जन्म में प्रभु से मिलन हो जाए। विरह मिलन में बदल जाए। यही कारण है कि कबीर ने शरीर में प्राण रहते ही मिलते ही बात कही है।

प्रश्न 7.
कबीर ईश्वर की मिलने के लिए बहुत आतुर हैं। क्यों?
उत्तर-
हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग भक्तिकाल के निर्गुण भक्ति की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि कबीरदास ने ‘काचै भांडै नीर’ स्वयं को तथा ‘धीरज’ अर्थात् धैर्य की प्रतिमूर्ति ईश्वर को कहा है। अपनी व्याकुलता तथा प्रियतम से मिलकर एकाकार होने की उनकी उत्कंट लालसा उन्हें आतुर बना देती है। तादात्म्य की उस दशा में कवि अपने जीवन को कच्ची मिट्टी का घड़ा में भरा पानी माना है। यह शरीर नश्वर है। मृत्यु शाश्वत सत्य है कवि इन लौकिक दुखों (जीवन-मृत्यु) से छुटकारा पाकर ईश्वर की असीम सत्ता में विलीन होना चाहता है। अतः कबीर की ईश्वर से मिलने की आतुरता अतीव तीव्र हो गई है।

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प्रश्न 8.
दूसरे पद के आधार पर कबीर की भक्ति-भावना का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर-
हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-1 में संकलित कबीर रचित द्वितीय पद कबीर की भक्ति भावना का प्रक्षेपक है। वस्तुत: कबीर की भक्ति- भावना को एक विशिष्ट नाम दिया है-“रहस्यवाद”। यह रहस्यवाद साहित्य की एक स्पष्ट भाव धारा है, जिसका किसी रहस्य से कोई लेना-देना नहीं है। आत्मा-परमात्मा को प्रणय-व्यापार, मिलन-विरह आदि रहस्यवाद का उपजीव्य है।

इस रहस्यवाद में कवि स्वयं को स्त्री या पुरुष मानकर ईश्वर, आराध्य या परम ब्रह्म के साथ अपने विभिन्न क्रिया व्यापारों, क्षणों और उपलब्धियों का अत्यंत प्रांजल, भाव प्रवण वर्णन करती है।

सूफी संत की जहाँ आत्मा पुरुष और परमात्मा को नारी रूप में चित्रित करते हैं, वहाँ कबीर आदि संत कवियों ने स्वयं को नारी, प्रिया, प्रेयसी आदि के रूप में प्रस्तुत करते हुए परमब्रह्म, ईश्वर, . साईं, सद्गुरु, कर्त्तार आदि के साथ अपने रभस प्रसंग का स्नेहिल, क्षणों का निष्कलुष और प्रांजल वर्णन किया है।

कबीर की भक्ति भाव रहस्यवाद, प्रगल्भ इन्द्रिक बिम्बों प्रतीकों से पूर्ण है किन्तु शृंगारिक रचनाओं की तरह कामोद्दीपक नहीं है, जुगुप्सक नहीं है। “मेरी चुनरी में लग गये दाग” लिखकर भी कबीर का रहस्यवाद पुरइन के पत्र पर पानी की बून्द की तरह निर्लिप्त है, शीलगुण सम्पन्न है।

प्रश्न 9.
बलिया का प्रयोग सम्बोधन में हुआ है। इसका अर्थ क्या है?
उत्तर-
कबीर रचित पद में बलिया सम्बोधन शब्द आया है जिसका कोशगत अर्थ ‘बलवान’ है। किन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि कबीर भाषा के डिक्टेटर हैं। “बाल्हा” शब्द ‘बलिया’ का विकृत रूप है जिसका प्रयोग कबीर ने एक अन्य पद में किया है बाल्हा आओ हमारे गेह रे। कबीर के मत से बलिया का अर्थ सर्वशक्ति सम्पन्न परमपुरुष, भर्तार और पति ही है।

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प्रश्न 10.
प्रथम पद में कबीर ने बाह्याचार के किन रूपों का जिक्र किया है? उन्हें अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
परम्परा-भंजक; रूढ़ि-भंजक, समाज-सुधारक कबीर रचित प्रथम पद में हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदायों में व्याप्त आडम्बर पूर्ण बाह्याचारों का उल्लेख हुआ है।

तथाकथित नेमी द्वारा (नियमों का कठोरता से अनुपालन करने वाले) प्रात:काल प्रत्येक ऋतु और अवस्था में स्नान करना, पाहन (पत्थर) की पूजा करना, आसन मारकर बैठना और समाधि लगाना पितरों (पितृ) की पूजा, तीर्थाटन करना, विशेष प्रकार की टोपी, पगड़ी को धारण करना, तरह-तरह के पदार्थों की माला (तुलसी, चन्दन, रुद्राक्ष और पत्थरों की मालाएँ) माथे पर विभिन्न रंगों और रूपों में, गले में कानों के आस-पास बाहुओं पर तिलक-छापा लगाना ये सभी बाह्याडम्बर है। इनका विरोध मुखर स्वर में कबीर ने किया है।

प्रश्न 11.
कबीर धर्म उपासना के आडंबर का विरोध करते हुए किसके ध्यान पर जोर देते हैं?
उत्तर-
संत कबीर ने हिन्दू और मुसलमानों के ढोंग-आडंबरों पर करारी चोट की है। उन्होंने धर्म के बाहरी विधि विधानों, कर्मकांडों-जप, माला, मूर्तिपूजा, रोजा, नमाज आदि का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि हिन्दू और मुसलमान आत्म-तत्त्व और ईश्वर के वास्तविक रहस्य से अपरिचित हैं, क्योंकि मानवता के विरुद्ध धार्मिक कट्टर और आडम्बरपूर्ण कोई भी व्यक्ति अथवा : .. धर्म ईश्वर की परमसत्ता का अनुभव नहीं कर सकता।

कबीर ने स्वयं (आत्मा) को पहचानने पर बल देते हुए कहा है कि यही ईश्वर का स्वरूप है। आत्मा का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।

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प्रश्न 12.
आपस में लड़ते-मरते हिन्दू और तर्क को किस मर्म पर ध्यान देने की सलाह कवि देता है?
उत्तर-
मुगल बादशाह बाबर के जमाने से हिन्दू-मुसलमान अपने पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के कारण लड़ते-मरते चले आ रहे हैं। साम्प्रदायिक सौहार्द्र की जगह साम्प्रदायिकता का जहर पूरे समाज में घुला हुआ है। दोनों ही सम्प्रदायों का तथाकथित पढ़ा-लिखा और अनपढ़ तबका ‘ईश्वर’ की सत्ता, अवस्थिति की वस्तु स्थिति से अनवगत है। मूल चेतना, मर्म का ज्ञान किसी को नहीं है।

वेद-पुराण, कुरान, हदीश लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों पर ईश्वर के स्वरूप, उसके प्रभाव और सर्वव्यापी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान होने की बात कही गयी है। जीव और ब्रह्म में द्वैत नहीं अद्वैत का सम्बन्ध है यह भी कथित है। किन्तु द्विधा और द्वैत भाव की प्रबलता के कारण हम हिन्दू-मुसलमान लड़ते आ रहे हैं। कबीर ने स्पष्ट कहा “एकै चाम एकै मल मूदा-काको कहिए ब्राह्मण शूद्रा।”

हमें इस मर्म पर ध्यान देना है कि हम सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं। हमारी उत्पत्ति समान रूप से हुई है। पालन समान हवा, पानी, अन्नादि से होता है और मृत्यु की प्रक्रिया भी परम सत्ता द्वारा नियत और नियंत्रित है। परोपकार करके हम ईश्वर के सन्निकट होते हैं। पाप करके बाह्योपचार के पचड़े में पड़कर हम ईश्वर से दूर होकर अपना इहलोक के साथ परलोक भी कष्टमय कर लेते हैं। सदाचरण निष्काम सेवा ही ईश्वरोपासना का मूल मर्म है। मानवता की निष्काम सेवा से बढ़कर इस अनित्य संसार में कुछ भी नहीं है।

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प्रश्न 13.
“सहजै सहज समाना” में सहज शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है। इस प्रयोग की सार्थकता स्पष्ट करें।
उत्तर-
मध्यकालीन भारत में भक्ति की क्रांतिकारी भाव धारा को जन-जन तक पहुँचाने वाले भक्त कबीर ने ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को ‘सहजै सहज समाना’ शब्द का दो बार प्रयोग किया है। प्रस्तुत शब्द में कबीर द्वारा बाह्याडंबरों की अपेक्षा स्वयं (आत्मा) को पहचानने की बात कही गई है। अपने शब्दों में कबीर ने ये बाह्याडंबर बताए हैं-पत्थर पूजा, कुरान पढ़ाना, शिष्य बनाना, तीर्थ-व्रत, टोपी-माला पहनना, छापा-तिल, लगाना, पीर औलिया की बातें मानना आदि।

कबीर कहते हैं ईश्वर का निवास न तो मंदिर में है, न मस्जिद में, न किसी क्रिया-कर्म में है और न योग-साधना में। उन्होंने कहा है कि बाह्याडंबरों से दूर रहकर स्वयं (आत्मा) को पहचानना चाहिए। यही ईश्वर है। आत्म-तत्व के ज्ञानी व्यक्ति ईश्वर को सहज से भी सहज रूप में प्राप्त कर सकता है। कबीर का तात्पर्य है कि ईश्वर हर साँस में समाया हुआ है। उन्हें पल भर की तालाश में ही पाया जा सकता है।

प्रश्न 14.
कबीर ने भर्म किसे कहा है?
उत्तर-
कबीर के अनुसार अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्य अज्ञानता के अंधकार में डूब जाते हैं। इनके गुरु भी अज्ञानी होते हैं; वे घर-घर जाकर मंत्र देते फिरते हैं। मिथ्याभिमान के परिणामस्वरूप लोग विषय-वासनाओं की आग से झुलस रहे हैं। कवि का कहना है कि धार्मिक आडम्बरों में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही ईश्वर की परम सत्ता से अपरिचित हैं। इनमें कोई भी प्रभु के प्रेम का सच्चा दीवाना नहीं है।

कबीर ने इन बाह्याडम्बरों के ‘भर्म’ को भुलाकर स्वयं (आत्मा) को पहचानने की सलाह देते हुए कहा है कि आत्मा का ज्ञान की सच्चा ज्ञान है। ईश्वर हर साँस में समाया हुआ है अर्थात् सच्ची अनुभूति और आत्म-साक्षात्कार के बल पर ईश्वर को पल भर की तलाश में ही पाया जा सकता है।

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कबीर के पद भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का रूप लिखें
आतम, परवान, तीरथ, पियारा, सिख्य, असनान, डिंभ, पाथर, मंतर, नर्म, अहनिस, तुमकूँ।
उत्तर-

  • आतम-आत्मा
  • परवान-पत्थर
  • तीरथ-तीर्थ
  • पियारा-प्यारा
  • सिख्य-शिष्य
  • असनान-स्नान
  • डिभ-दंभ
  • पाथर-पत्थर
  • मंतर-मंत्र
  • मर्म-भ्रम
  • अहनिश-अहर्निश
  • तुमकूँ-तुमको

प्रश्न 2.
दोनों पदों में जो विदेशज शब्द आये हैं उनकी सूची बनाएँ एवं उनका अर्थ लिखें।
उत्तर-
कबीर रचित पद द्वय में निम्नलिखित विदेशज (विदेशी) शब्द आये हैं, जिनका अर्थ अग्रोद्धत है

पीर-धर्मगुरु; औलिया-संत; कितेब-किताब, पुस्तक; कुरान-इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रंथ; मुरीद-शिष्य, चेला, अनुयायी; तदबीर-उपाय, उद्योग, कर्मवीरता; खवरि-सूचना, ज्ञान; तुर्क-इस्लाम धर्म के अनुयायी, तुर्की देश के निवासी; रहिमाना-रहमान-रहम दया करने वाला अल्ला।

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प्रश्न 3.
पठित पदों से उन शब्दों को चुनें निम्नलिखित शब्दों के लिए आये हैं
उत्तर-
आँख-नैन; पागल-वौराना (बौराया); धार्मिक-धरमी; बर्तन-भांडे, वियोग-विरह, आग-अगिनि, रात-निस।

प्रश्न 4.
नीचे प्रथम पद से एक पंक्ति दी जा रही है, आप अपनी कल्पना से तुक मिलते हुए अन्य पंक्तियाँ जोड़ें- “साँच कहो तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना।”
उत्तर-
साँच कहो तो मारन धावै झूठे जग पतियाना,
मर्म समझ कर चेत ले जल्दी घूटे आना-जाना,
जीवन क्या इतना भर ही है रोना हँसना खाना,
हिय को साफ तू कर ले पहले, बसे वहीं रहिमान।
छोड़ सके तो गर्व छोड़ दे राम बड़ा सुलिताना,
भाया मोह की नगरी से जाने कब पड़ जाय जाना”
चेत चेत से मूरख प्राणी पाछे क्या पछि ताना।

प्रश्न 5.
कबीर की भाषा को पंचमेल भाषा कहा गया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें वाणी का डिक्टेटर कहा है। कबीर की भाषा पर अपने शिक्षक से चर्चा करें अथवा कबीर की भाषा-शैली पर एक सार्थक टिप्पणी दें।
उत्तर-
“लिखा-लिखि की है नहीं देखा देखी बात’ “की उद्घोषणा करने वाले भाषा के डिक्टेटर और वाणी के नटराज कबीर की भाषा-शैली कबीर की ही प्रतिमूर्ति है। कबीर बहु-श्रुत और परिव्राजक संत कवि थे। हिमालय से हिन्द महासागर और गुजरात से मेघालय तक फैले उनके अनुयायियों द्वारा किये गये कबीर की रचनाओं के संग्रह में प्रक्षिप्त क्षेत्रियता का निदर्शन इस बात का सबल प्रमाण है कि कबीर “जैसा देश वैसी वाणी, शैली’ के प्रयोक्ता थे।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट कहा है “मेरी बोली पूरबी” लेकिन भोजपुरी राजस्थानी, पंजाबी, अवधी, ब्रजभाषा आदिनेक तत्कालीन प्रचलित बोलियों और भाषाओं के शब्द ही नहीं नवागत इस्लाम की भाषा अरबी, उर्दू, फारसी के शब्दों की शैलियों का उपयोग किया है। रहस्यवादी संध्याभाषा उलटबाँसी, योग की पारिभाषिक शब्दावली के साथ ही सरल वोधगम्य शब्दों के कुशल प्रयोक्ता हैं।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 कबीर के पद

“जल में रहत कुमुदनी चन्दा बसै आकास, जो जाहि को भावता सो ताहि के पास” कहने वाले कबीर “आँषि डिया झाँई पड्या जीभड्या छाल्या पाड्या” भी कहते हैं। ये आँखियाँ अलसानि पिया हो सेज चलो “कहने वाले कबीर” कुत्ते को ले गयी बिलाई ठाढ़ा सिंह चरावै गाई”। भी कहते हैं। कबीर के सामने भाषा सचमुच निरीह हो जाती है।

प्रश्न 6.
प्रथम पद में अनुप्रास अलंकार के पाँच उदाहरण चुनें।
उत्तर-
नेमि देखा धरमी देखा-पंक्त में ‘मि’ वर्ण और देखा शब्द की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार। जै पखानहि पूजै में प वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार पीर पढ़े कितेब कुराना में क्रमशः प और क वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार। उनमें उहै में उ वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार। पीतर पाथर पूजन में प वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार उपस्थित है।

प्रश्न 7.
दूसरे पद में ‘विरह अगिनि’ में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार के चार अन्य उदाहरण दें।
उत्तर-
रूपक अलंकार के चार अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं ताराघाट, रघुवर-बाल-पतंग, चन्द्रमुखी, चन्द्रबदनी, मृगलोचनी।

प्रश्न 8.
कारक रूप स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
झठे-झूठ को-द्वितीय तत्पुरुष, पखानहि-पत्थर को द्वितीया तत्पुरुष; सब्दहि-शब्द को-द्वितीय-तत्पुरुष, खबरि-सूचना ही में-सम्प्रदान तत्पुरुष; कारनि-कारण से-अपादान, तत्पुरुष, भांडै-भांड में-अधिकरण तत्पुरुष।

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प्रश्न 9.
पाठ्य-पुस्तक में संकलित कबीर रचित पद “संतौ देखो जग बौराना’ का भावार्थ लिखें।
उत्तर-
प्रथम पद का भावार्थ देखें। प्रश्न 10. पाठ्य-पुस्तक में संकलित कबीर रचित द्वितीय पद का भावार्थ प्रस्तुत करें। उत्तर-द्वितीय पद का भावार्थ देखें।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।

कबीर के पद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर की विरह-भावना पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
कबीर परमात्मा से प्रेम करने वाले भक्त हैं। उनकी प्रीति पति-पत्नी भाव की है। परमात्मा रूपी पति से मिलन नहीं होने के कारण वे विरहिणी स्त्री की भाँति विरहाकुल रहते हैं। ये प्रियतम के दर्शन हेतु दिन-रात आतुर रहते हैं। उनके नेत्र उन्हें देखने के लिए सदैव आकुल रहते हैं। वे विरह की आग में सदैव जलते रहते हैं। एक वाक्य में उनकी दशा यही है कि “तलफै बिनु बालम मोर जिया। दिन नहिं चैन, रात नहिं, निंदिया तरप तरप कर भोर किया।”

कबीर के पद अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कबीर विरह की दशा में क्या अनुभव करते हैं?
उत्तर-
कबीर को विरह की अग्नि जलाती है, आतुरता और उद्वेग पैदा करती है तथा मन धैर्य से रहित हो जाता है।

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प्रश्न 2.
कबीर परमात्मा से क्या चाहते हैं?
उत्तर-
कबीर परमात्मा का दर्शन चाहते हैं, विरह-दशा की समाप्ति और मिलन का सुख चाहते हैं।

प्रश्न 3.
कबीर के अनुसार हिन्दू-मुस्लिम किस मुद्दे पर लड़ते हैं? उत्तर-हिन्दू-मुसलमान नाम की भिन्नता और उपासना की भिन्नता को लेकर लड़ते हैं। प्रश्न 4. कबीर की दृष्टि में नकली उपासक क्या करते हैं?
उत्तर-
नकली उपासक नियम-धरम का विधिवत पालन करते हैं, माला-टोपी धारण करते हैं, आसन लगाकर उपासना करते हैं, पीपल-पत्थर पूजते हैं, तीर्थव्रत करते हैं तथा भजन-कीर्तन गाते हैं।

प्रश्न 5.
कबीर की दृष्टि में नकली गुरु लोग क्या करते हैं?
उत्तर-
नकली गुरु लोग किताबों में पढ़ें मन्त्र देकर लोगों को शिष्य बनाते हैं और ठगते हैं।

इन्हें अपने ज्ञान, महिमा तथा गुरुत्व का अभिमान रहता है लेकिन वास्तव में ये आत्मज्ञान से रहित मूर्ख, ठग और अभिमानी होते हैं।

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प्रश्न 6.
कबीर के अनुसार ईश्वर-प्राप्ति का असली मार्ग क्या है?
उत्तर-
ईश्वर-प्राप्ति का असली मार्ग है आत्मज्ञान अर्थात् अपने को पहचानता और अपनी सत्ता को ईश्वर से अभिन्न मानना तथा ईश्वर से सच्चा प्रेम करना।

प्रश्न 7.
कबीरदास ने प्रथम पद में किसकी व्यर्थता सिद्ध की है?
उत्तर-
कबीरदास ने अपने प्रथम पद में पत्थर पूजा, तीर्थाटन और छाप तिलक को व्यर्थ बताया है।

प्रश्न 8.
कबीर ने दूसरे पद में बलिध का प्रयोग किसके लिए किया है?
उत्तर-
कबीरदास ने अपने दूसरे पद में बलिध का प्रयोग परमात्मा और सर्वशक्तिमान के लिए किया है।

प्रश्न 9.
कबीर के दृष्टिकोण में सारणी या सबद गाने वाले को किसकी खबर नहीं है?
उत्तर-
कबीरदास ने दृष्टिकोण में सारणी या सबद गाने वाले को स्वयं अपनी खबर नहीं है।

कबीर के पद वस्तनिष्ठ प्रश्नोत्तर

सही उत्तर सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

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प्रश्न 1.
कबीरदास किस काल के कवि हैं?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) वीरगाथा काल
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 2.
कबीर किसके उपासक थे?
(क) निर्गुण ब्रह्म के
(ख) सगुण ब्रह्म के
(ग) निराकार ब्रह्म के
(घ) साकार ब्रह्म के
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 3.
कबीर ने इस संसार को क्या कहा है?
(क) बौराया हुआ
(ख) साश्वत
(ग) क्षणभंगुर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क)

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प्रश्न 4.
लोग किस पर विश्वास करते हैं?
(क) सत्य पर
(ख) झूठ पर
(ग) बाह्याडम्बर पर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
कबीर ने मर्म किसे कहा है?
(क) घाव को
(ख) वेदना को
(ग) रहस्य को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
कबीर ने ‘साखी’, संबंद और……………की रचना की।
उत्तर-
रमैनी

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प्रश्न 2.
कबीर, कागद की लेखी’ की जगह………..को तरजीह देते थे।
उत्तर-
आँखन-देखी

प्रश्न 3.
साँच कहाँ तो मारन धावै,………….जग पतियाना।
उत्तर-
झूठे

प्रश्न 4.
साखी सब्दहि गावत भूले…………खबरि, नहि जाना।
उत्तर-
आतम।

कबीर के पद कवि परिचय – (1399-1518)

कबीर का जन्मकाल भी निश्चित प्रमाण के अभाव में विवादास्पद रहा है। फिर भी, बहुत से विद्वानों द्वारा सन् 1399 ई० को उनका जन्म और सन् 1518 ई० को उनका शरीर त्याग मा लिया गया है। इस तरह कुल एक सौ बीस वर्षों की लम्बी आयु तक जीवित रहने का सौभाग्य संत कवि कबीर को मिला था। जीवन रूपी लम्बी चादर को इन्होंने इतने लम्बे काल तक ओढा, जीया और अंत में गर्व के साथ कहा भी कि “सो चादर सुन नर मुनि ओढ़ी-ओढ़ी के मैली कीन्हीं चदरिया।

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दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धरि दीनि चदरिया।” हिन्दी साहित्य के स्वर्णयुग भक्तिकाल के पहले भक्त कवि कबीरदास थे। भक्ति को जन-जन तक काव्य रूप में पहुँचा कर उससे सामाजिक चेतना को जोड़ने का काम भक्तिकालीन भक्त कवियों ने किया। ऐसा भक्त कवियों में पहला ही नहीं सबसे महत्वपूर्ण नाम भी कबीर का ही माना जाता है।

कहा जाता है कि एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से जन्म लेने के बाद लोक-लाज के भय से माता द्वारा परित्यक्त नवजात शिशु कबीर बनारस के लहरतारा तालाब के किनारे नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पति द्वारा पाये और पुत्रवत पाले गये।

कबीर रामानन्दाचार्य के ही शिष्य माने जाते हैं पर गुरु मंत्र के रूप में प्राप्त राम नाम को उन्होंने सर्वथा निर्गुण रूप में स्वीकार और अंगीकार किया। अनजाने सिद्ध और नाथ-साहित्य से भी गहरे तक प्रभावित रहे। विशेष पंथ या मठ-मंदिर के आजन्म विरोधी रहे। कहा जाता है कि उनको कमाल नामक पुत्र और कमाली नामक एक पुत्री भी थी।

सिकंदर लोदी जैसे कट्टर मुसलमान शासक के काल में भी ऐसी धर्म निरपेक्ष ही नहीं कट्टरता-विरोधी उक्तियाँ कबीर से ही संभव थीं। शायद उसके अत्याचार का वे शिकार हुए भी थे। मृत्युकाल में उन्होंने मगहर की यात्रा की थी।

कबीर के पद कविता का भावार्थ

प्रथम पद महान् निर्गुण संत, परम्परा, भंजक, एकेश्वरवादी चिंतक कवि, कबीर संतों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे संतो ! देखो यह संसार बौरा गया है, पागल हो गया है। इसकी विवेक . बुद्धि नष्ट हो गयी है। जब भी मैं इन सांसारिक जीवों को सत्य के बारे में बताना चाहता हूँ।

ये मुझे उल्टा-सीधा कहते हैं, मुझे मारने दौड़ते हैं और जो कुछ इनके इर्द-गिर्द माया प्रपंच है उसे ये सत्य मान बैठे हैं।

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मुझे ऐसे अनेक नियम-धर्म के कठोर पालक दिखे जो हर मौसम में शरीर को कष्ट देकर स्नान करते हैं, आत्म ज्ञान से शून्य होकर पत्थर के देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। अनेक पीर (धर्म गुरु) और औलिया (संत) मिले जो कुरान जैसे ग्रंथ की गलत तथ्यहीन व्याख्या अपने शिष्यों को समझा कर उनको भटका चुके हैं। उन्हें अपने पीर औलिया होने का घमंड हो गया है।

पितृ (मरे हुए पूर्वज) की सेवा पत्थरों की मूर्ति पूजा और तीर्थटन करने वाले धार्मिक अहंकारी हो चले हैं। स्वयं को संत, महात्मा धार्मिक दर्शन के लिए टोपी, माला, तिलक-छाप धारण किये हुए हैं और अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल चुके हैं। सचमुच के महान् वीतरागी संतों द्वारा रचित साखी सबद आदि गाते घुमते चलते हैं। इस संसार के प्राणी अपने को हिन्दू-मुस्लिम में बाँट चुके हैं।

एक को राम प्यारा है तो दूसरे को रहमान प्यारे हैं। छोटी-छोटी बातों पर ये एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हो लड़-मर पड़ते हैं? लेकिन अभिमान अहंकार के वशीभूत हो ये घर-घर बाह्याचरण का आडम्बर युक्त पूजा, कर्मकाण्ड का मंत्र देते चलते हैं। मुझे तो लगता है कि ये तथाकथित गुरु अपने शिष्यों सहित माया के सागर में डूब चुके हैं। अन्त में इन्हें पछताना ही पड़ेगा।

ये हिन्दू-मुसलमान, पीर औलिया सभी ईश्वर-धर्म के मूल तत्त्व और मर्म को भूल चुके हैं। कई बार इनकी मैंने समझाकर कहा कि ईश्वर को कर्मकाण्ड बाह्यचार से नहीं बल्कि सहज जीवन-यापन की पद्धति से ही प्राप्त किया जा सकता है। क्योंकि परमब्रह्म ईश्वर अल्ला अत्यंत सहज और सरल हैं।

प्रस्तुत पद में कबीर ने अपने समय के साम्प्रदायिक तनावग्रस्त माहौल का भी वर्णन किया है। पद में अनायास रूप से अनुप्रास, वीप्सा. आदि अलंकार आये हैं। पद शांत रस का अनूठा उदाहरण है।

द्वितीय पद साधना के क्षेत्र के सहज सिद्ध हठयोगी, भावना के क्षेत्र में आकर कितना कोमल प्राण, भावुक, भाव विह्वल, विदग्ध हृदय हो सकता है, यह विरोधाभास कबीर में उपलब्ध हो सकता है।

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चिर विरहिणी कबीर आत्मा विरह विदग्ध अवस्था की चरम स्थिति में चीत्कार करती हुई कहती है कि हे बलिया (बाल्हा) प्रियतम तुझे कब देवूगी तेरा प्रेम मेरे भीतर इस तरह से व्याप्त हो गया है कि दिन-रात तुम्हारे दर्शन की आतूरता आकुलता बनी रहती है। मेरी आँखें केवल तुमको देखना चाहती हैं, ये लगातार खुली रहती हैं कि तुम्हारे दीदार से वंचित न हो जाएँ।

हे मेरे भर्तार (स्वामी) तुम भी इतना सोच विचार लो कि तुम्हारे बिना शरीर में जो विरहाग्नि उत्पन्न हुई है वह शरीर को कैसे जलाती होगी। मेरी गुहार सुनो, बहरा मत बन जाओ मैं जानती हूँ कि तुम धीरता की प्रतिमूर्ति हो, शाश्वत हो लेकिन मेरी शरीर कच्चा कुम्भ है और उसने प्राण रूपी नीर है। घड़ा कभी भी फूट सकता है, मृत्यु कभी भी हो सकती है। तुमसे बिछड़े हुए भी बहुत दिन हो गये, अब मन को किसी भी प्रकार से धीरता प्राप्त नहीं हो पाती।

जब तक यह शरीर है, मेरे दु:ख का नाश करने वाले तुम एक बार मुझे अपना “दरस-परस” करा दो। मैं अतृप्ति को साथ लिये मरना नहीं चाहती। तुमसे मैंने प्रेम किया है, विरह भी भोंग रही हूँ किन्तु यदि हमारा मिलन नहीं हुआ, प्रेम का सुखान्त नहीं हुआ तो यह तुम्हारे जैसे सर्वशक्तिमान आर्तिनाशक के विरुद्ध के विरुद्ध बात होगी।

प्रस्तुत पद में कबीर ने भारतीय रहस्यवाद का सुन्दर वर्णन किया है। जहाँ जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध प्रेमी और प्रेमास्पद के रूप में चित्रित है।

रूपक और अनुप्रास अलंकार के उदाहरण यत्र-तत्र उपलब्ध है। सम्पूर्ण पद में शांत रस का पूर्ण परिपाक हुआ है।

कबीर के पद कठिन शब्दों का अर्थ

पतियाना-विश्वास करना। धावै-दौड़ना। व्यापै-अनुभव। रती-तनिक (रत्ती, रती)। नेमी-नियम का पालन करने वाला। बधीर-बहरा, जो कम सुने या न सुने। आतम-आत्मा। अगिनी-अग्नि। पखानहि-पत्थर को। दादि-विनती, स्तुति। पीर-धर्म गुरु। गुसांई-गोस्वामी, मालिक। औलिया-सन्त। जिन-मत, नहीं (निषेध सूचक)। कितेब-किताब, पुस्तक। भांडै-बर्तन। मुरीद-शिष्य, चेला, अनुयायी। छता-अक्षत, रहते हुए। तदवीर-उपाय। आरतिवंत-दुःखी। डिंभ-दंभ। रहिमाना-दयालु। पीतर-पीतल, पितर, पुरखा। महिमा-महत्त्व। मूए-मरे। बलिया-प्रियतम। अहनिस-दिन-रात।

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कबीर के पद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. संतो देखत जग बौराना…………नमें कछु नहिं ज्ञाना।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास जी ने धार्मिक क्षेत्र में उलटी रीति और संसार के लोगों के बावलेपन का उल्लेख किया है। वे संतों अर्थात् सज्जन तथा ज्ञान-सम्पन्न लोगों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि संतो! देखो, यह संसार बावला या पागल हो गया है? इसने उल्टी राह पकड़ ली है। जो सच्ची बात कहता है उसे लोग मारने दौड़ते हैं। इसके विपरीत जो लोग गलत और झूठी बातें बताते हैं उन पर वे विश्वास करते हैं। मैंने धार्मिक नियमों और विधि-विधानों का पालन करने वाले अनेक लोगों को देखा है। वे प्रातः उठकर स्नान करते हैं, तथा मंदिरों में जाकर पत्थर की मूर्ति को पूजते हैं। मगर उनके पास तनिक भी ज्ञान नहीं है। वे अपनी आत्मा को नहीं जानते हैं और उसकी आवाज को मारते हैं, अर्थात् अनसुनी करते हैं, अर्थात् अनसुनी करते हैं, सारांशतः कबीर कहना चाहते हैं कि ऐसे लोग केवल बाहरी धर्म-कर्म और नियम-आचार जानते हैं जबकि अन्त: ज्ञान से पूर्णतः शून्य हैं।

2. बहुतक देखा पीर औलिया…………..उनमें उहै जो ज्ञाना।
व्याख्या-
कबीरदास जी ने अपने पद की प्रस्तुत पंक्तियों में मुसलमानों के तथाकथित पीर और औलिया के आचरणों का परिहास किया है। वे कहते हैं कि मैंने अनेक पीर-औलिये को देखा है जो नित्य कुरान पढ़ते रहते हैं। उनके पास न तो सही ज्ञान होता है और न कोई सिद्धि होती है फिर भी वे लोगों को अपना मुरीद यानी अनुगामी या शिष्य बनाते और उन्हें उनकी समस्याओं के निदान के उपाय बताते चलते हैं। यही उनके ज्ञान की सीमा है। निष्कर्षतः कबीर कहना चाहते हैं कि ये पीर-औलिया स्वतः अयोग्य होते हैं लेकिन दूसरों को ज्ञान सिखाते फिरते हैं। इस तरह ये लोग ठगी करते हैं।

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3. आसन मारि डिंभ धरि…………….आतम खबरि न जाना।
व्याख्या-
कबीरदास जी का स्पष्ट मत है कि जिस तरह मुसलमानों के पीर औलिया ठग हैं उसी तरह हिन्दुओं के पंडित ज्ञान-शूल। वे कहते हैं कि ये नकली साधक मन में बहुत अभिमान रखते हैं और कहते हैं कि मैं ज्ञानी हूँ लेकिन होते हैं ज्ञान-शूल। ये पीपल पूजा के रूप में वृक्ष पूजते हैं, मूर्ति पूजा के रूप में पत्थर पूजते हैं। तीर्थ कर आते हैं तो गर्व से भरकर अपनी वास्तविकता भूल जाते हैं। ये अपनी अलग पहचान बताने के लिए माला, टोपी, तिलक, पहचान चिह्न आदि धारण करते हैं और कीर्तन-भजन के रूप में साखी, पद आदि गाते-गाते भावावेश में बेसुध हो जाते हैं। इन आडम्बरों से लोग इन्हें महाज्ञानी और भक्त समझते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि इन्हें अपनी आत्मा की कोई खबर नहीं होती है। कबीर के अनुसार वस्तुतः ये ज्ञानशून्य और ढोंगी महात्मा हैं।

4. हिन्दु कहै मोहि राम पियारा………….मरम न काहू जाना।
व्याख्या-
कबीर कहते हैं कि हिन्दू कहते हैं कि हमें राम प्यारा है। मुसलमान कहते हैं कि हमें रहमान प्यारा है। दोनों इन दोनों को अलग-अलग अपना ईश्वर मानते हैं और आपस में लड़ते तथा मार काट करते हैं। मगर, कबीर के अनुसार दोनों गलत हैं। राम और रहमान दोनों एक सत्ता के दो नाम हैं। इस तात्त्विक एकता को भूलकर नाम-भेद के कारण दोनों को भिन्न मानकर आपस में लड़ना मूर्खता है। अत: दोनों ही मूर्ख हैं जो राम-रहीम की एकता से अनभिज्ञ हैं।

5. घर घर मंत्र देत…………….सहजै सहज समाना।
व्याख्या-
कबीरदास जी इन पंक्तियों में कहते हैं कि कुछ लोग गुरु बन जाते हैं मगर मूलतः वे अज्ञानी होते हैं। गुरु बनकर वे अपने को महिमावान समझने लगते हैं। महिमा के इस अभिमान से युक्त होकर वे घर-घर घूम-घूम कर लोगों को गुरुमंत्र देकर शिष्य बनाते चलते हैं। कबीर के मतानुसार ऐसे सारे शिष्य गुरु बूड़ जाते हैं; अर्थात् पतन को प्राप्त करते हैं और अन्त समय में पछताते हैं। इसलिए कबीर संतों को सम्बोधित करने के बहाने लोगों को समझाते हैं कि ये सभी लोग भ्रमित हैं, गलत रास्ते अपनाये हुए हैं।

मैंने कितनी बार लोगों को कहा है कि आत्मज्ञान ही सही ज्ञान है लेकिन ये लोग नहीं मानते हैं। ये अपने आप में समाये हुए हैं, अर्थात् स्वयं को सही तथा दूसरों को गलत माननेवाले मूर्ख हैं। यदि आप ही आप समाज का अर्थ यह करें कि कबीर ने लोगों को कहा कि अपने आप में प्रवेश करना ही सही ज्ञान है। तब यहाँ ‘आपहि आप समान’ का अर्थ होगा-‘आत्मज्ञान प्राप्त करना’ जो कबीर का प्रतिपाद्य है।

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6. हो बलिया कब देखेंगी…………..न मानें हारि।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास जी ने ईश्वर के दर्शन पाने की अकुलाहट भरी इच्छा व्यक्त की है। वे कहते हैं कि प्रभु मैं तुम्हें कब देखूगा? अर्थात् तुम्हें देखने की मेरी इच्छा कब पूरी होगी, तुम कब दर्शन दोगे? मैं दिन-रात तुम्हारे दर्शन के लिए आतुर रहता हूँ। यह इच्छा मुझे इस तरह व्याप्त किये हुई है कि एक पल के लिए भी इस इच्छा से मुक्त नहीं हो पाता हूँ।

मेरे नेत्र तुम्हें चाहते हैं और दिन-रात प्रतीक्षा में ताकते रहते हैं। नेत्रों की चाह इतनी प्रबल है कि ये न थकते हैं और न हार मानते हैं। अर्थात् ये नेत्र जिद्दी हैं और तुम्हारे दर्शन किये बिना हार मानकर बैठने वाले नहीं हैं। अभिप्राय यह कि जब ये नेत्र इतने जिद्दी हैं, और मन दिन-रात आतुर होते हैं तो तुम द्रवित होकर दर्शन दो और इनकी जिद पूरी कर दो।

7. “बिरह अगिनि तन……………..जिन करहू बधीर।”
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीरदास जी अपनी दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे स्वामी ! तुम्हारे वियोग की अग्नि में यह शरीर जल रहा है, तुम्हें पाने की लालसा आग की तरह मुझे दग्ध कर रही है। ऐसा मानकर तुम विचार कर लो कि मैं दर्शन पाने का पात्र हूँ या उपेक्षा का?

कबीरदास जी अपनी विरह-दशा को बतला कर चुप नहीं रह जाते हैं? वे एक वादी अर्थात् फरियादी करने वाले व्यक्ति के रूप में अपना वाद या पक्ष या पीड़ा निवेदित करते हैं और प्रार्थना. करते हैं कि तुम मेरी पुकार सुनो, बहरे की तरह अनसुनी मत करो। पंक्तियों की कथन-भगिमा की गहराई में जाने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि कबीर याचक की तरह दयनीय मुद्रा में विरह-निवेदन नहीं कर रहे हैं। उनके स्वर में विश्वास का बल है और प्रेम की वह शक्ति है जो प्रेमी पर अधिकार-बोध व्यक्त करती है।

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8. तुम्हे धीरज मैं आतुर…………….आरतिवंत कबीर।
व्याख्या-
अपने आध्यात्मिक विरह-सम्बन्धी पद की प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर अपनी तुलना आतुरता और ईश्वर की तुलना धैर्य से करते हुए कहते हैं कि हे स्वामी ! तुम धैर्य हो और मैं आतुर। मेरी स्थिति कच्चे घड़े की तरह है। कच्चे घड़े में रखा जल शीघ्र घड़े को गला कर बाहर निकलने लगता है। उसी तरह मेरे भीतर का धैर्य शीघ्र समाप्त हो रहा है अर्थात् मेरा मन अधीर हो रहा है। आप से बहुत दिनों से बिछुड़ चुका हूँ।

मन अधीर हो रहा है तथा शरीर क्षीण हो रहा है। अपने भक्त कबीर पर कृपाकर अपने दर्शन दीजिए। आपके दर्शन से ही मेरा जीवन सफल हो सकता है। कबीरदास का मन ईश्वर से मिलने के लिए व्याकुल है। उनकी अन्तरात्मा ईश्वर के लिए आतुर है। वास्तव में, ईश्वर के दर्शन से ही कबीर का जीवन सफल हो सकता है।

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 12 गाँव के बच्चों की शिक्षा

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Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 12 गाँव के बच्चों की शिक्षा (कृष्ण कुमार)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 12 गाँव के बच्चों की शिक्षा (कृष्ण कुमार)

गाँव के बच्चों की शिक्षा पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“कमारा ल्ये” का देश किस देश का उपनिवेश था? अपनी आत्मकथा के अन्तिम अध्याय में उन्होंने किस प्रसंग का चित्रण किया है? संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
कमारा ल्ये’ का देश (पश्चिमी अफ्रीका) फ्रांस का उपनिवेश था। कमारा ल्ये ने अपनी आत्मकथा के अन्तिम अध्याय में उस घटना का विवरण प्रस्तुत किया है। उच्चतर माध्यमिक शिक्षा समाप्त करने के पश्चात एक प्रतियोगिता के लिए उनका चयन हुआ। सौभाग्यवश मेधावी छात्र ‘कमारा’ उक्त प्रतियोगिता में सफल हुए। उत्तीण होने पर उन्हें उच्च-शिक्षा के लिए फ्रांस भेजने का प्रस्ताव हुआ। उन्हें तत्कालीन सरकार द्वारा फ्रांस भेजने एवं अध्ययन (शिक्षण) की व्यवस्था की गई। उस समय एक गुलाम देश में, विदेश जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करना एक विशिष्ट उपलब्धि तथा आश्चर्यजनक बात थी।

कमारा को अपने माता-पिता, रिश्तेदारों तथा घर के तमाम लोगों से मिलकर विदा लेने के लिए अपने गाँव आना पड़ा। गाँव के सभी लोग अत्यन्त गद्गद् थे। कमारा को उसके चाचा-चाचियों, मामा-मामियों तथा अन्य सम्बन्धियों ने सहर्ष विदाई दी। किन्तु खटकने वाली एक बात यह थी कि उसकी माँ वहाँ पर दिखायी नहीं दी। चिन्तित कमारा माँ से आर्शीवाद लेने की आशा पाले, अपनी झोपड़ी में गए। माँ वहाँ पर सिसकियाँ भर रही थीं। माँ को रोते देख कमारा उद्विग्न हो गए। उन्होंने माँ से इसका कारण पूछा।

अनेक प्रयासों के पश्चात माँ ने कहा कि जिस दिन कमारा का प्राथमिक पाठशाला में नामांकन हुआ था, उसी दिन उसकी माँ ने समझ लिया था कि वह (कमारा) उस गाँव में नहीं टिक पाएगा। मैंने पिता एवं चाचा को कमारा की पढ़ाई कराने के लिए मना किया था, किन्तु वे लोग नहीं माने। उनलोगों ने उसको (उसकी माँ को) धोखा दिया। अब पढ़ने के लिए विदेश जाने के बाद कमारा देश में भी नहीं रहेगा। उसकी माँ ने यह भी कहा कि वह कमारा तो उससे बहुत पहले ही, शिक्षा प्राप्त करने के साथ विदाई ले चुका है। केवल उसी से नहीं वरन् पूरे गाँव से उसे छीन लिया गया है। इन पंक्तियों में एक माँ की अन्तर्वेदना स्पष्ट परिलक्षित होती है।

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 12 गाँव के बच्चों की शिक्षा (कृष्ण कुमार)

प्रश्न 2.
‘कमारा ल्ये’ की आत्मकथा किसे समर्पित है?
उत्तर-
‘कमारा ल्ये’ ने अपनी आत्मकथा अपने देश की इन असंख्य अशिक्षित माताओं को समर्पित किया है, जो अफ्रीका के खेतों में काम करती हैं। विदेश में विद्याध्ययन के लिए जाते समय अपनी माँ से विदाई लेते समय उसके द्वारा प्रकट किए गए उद्गार से कमारा अत्यन्त प्रभावित हुआ। माँ के अन्तः वेदना तथा नैराश्य की भावना ने इसकी संवेदना को झकझोर कर रख दिया, जिसकी परिणति उसकी आत्मकथा के समर्पण में स्पष्ट प्रतिबिम्बित होती है।

प्रश्न 3.
“कमारा ल्ये” की माँ उन्हें क्यों नहीं पढ़ाना चाहती थीं? .
उत्तर-
“कमारा ल्ये’ की माँ को आशंका थी कि यदि वह शिक्षा ग्रहण करने विद्यालय जाएगा तो कालांतर में गाँव छोड़कर अन्यत्र चला जाएगा। गाँव छोड़ना उसकी परिस्थितिजन्य विवशता होगी। जब वह अपना देश छोड़कर उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु फ्रांस जाने लगा तो उसकी माँ को पूर्ण विश्वास हो गया कि अब वह अपने देश अफ्रीका में नहीं रह पाएगा, विदेश चला जाएगा। माँ की ममता उसे ऐसा सोचने पर विवश कर रही थी।

प्रश्न 4.
“शिक्षा अपने आप में कोई गुणकारी दवाई नहीं है जिसके सेवन से समाज एकदम रोगमुक्त हो जाएगा या वह कोई एक उपहार हो जो सरकार हमें देने वाली हो या पिछले पचास साल से देती चली आ रही हो।” आखिरकार शिक्षा क्या है? लेखक के इस कथन का अभिप्राय क्या है? स्पष्ट करें।
उत्तर-
लेखक कृष्ण कुमार के मतानुसार हम लोग शिक्षा और साक्षरता के विषय में गलत एवं त्रुटिपूर्ण धारणा से ग्रसित हैं। हम समझते हैं कि शिक्षा का कोई सामाजिक चरित्र नहीं है। हमलोगों की यह मानसिकता है कि शिक्षा स्वयं ऐसी गुणकारी दवाई है जिसके सेवन से समाज एकदम, रोगमुक्त हो जाएगा। हम यह भी मान बैठे हैं कि यह एक उपहार है जो सरकार द्वारा प्रदान किया गया है अथवा पिछले पचास साल से सरकार द्वारा हमें प्राप्त होता रहा है।

कृष्ण कुमार ने व्यंग्यात्मक शैली में इसे रेखांकित किया है। लेखक हमारी इस भावना से सहमत नहीं है। उसके अनुसार पिछले पचास सालों से सरकार ऐसे आश्वासन देती आ रही है। इसके बावजूद अभी तक शिक्षा प्रत्येक बच्चे तक नहीं पहुँची है। लेखक के अनुसार वर्तमान समय में शिक्षा का नितान्त प्रतिकूल सामाजिक चरित्र उभरकर सामने आया है। शिक्षा बच्चों को समाज के सबसे व्यापक सरकारों से काटनेवाला एक प्रमुख अस्त्र बनकर उभरी है। प्राथमिक पाठशाला में प्रवेश करने वाले दिने से ही इस प्रक्रिया का सूत्रपात हो जाता है।

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अतः लेखक कृष्ण कुमार का विचार है कि प्राथमिक शिक्षा के दायरा का विस्तार लड़कियों तथा समाज के उत्पीडित तबकों तक किया जाए। साथ ही बच्चों को शिक्षा के माध्यम से रखना है, उन्हें इस दिशा में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। शिक्षा सार्थक होना चाहिए। इस दिशा में एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने के आवश्यकता है।

प्रश्न 5.
लेखक के अनुसार शिक्षा बच्चों को समाज के सबसे व्यापक सरोकारों से काटने वाला एक प्रमुख अस्त्र बन गई है? लेखक ने ऐसा क्यों कहा है? क्या आप इससे सहमत हैं? आप अपना विचार दें।
उत्तर-
लेखक कृष्ण कुमार की धारणा है कि बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा का वर्तमान स्वरूप बच्चों को समाज के सबसे व्यापक सरोकारों से काटने वाला एक प्रमुख अस्त्र बनकर उभरा है कि विद्वान लेखक ऐसा अनुभव करते हैं कि बच्चे समझते हैं कि शिक्षा का कोई सामाजिक महत्त्व नहीं है। बल्कि वास्तविकता यह भी है कि बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा परोसी जा रही है जिसके द्वारा शिक्षा का सामाजिक चरित्र अछूता रह जाता है, उपेक्षित रहता है। अपने सामाजिक दायित्व का बोध बच्चों को नहीं हो पाता है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति को देखकर लेखक की ऐसी प्रतिक्रिया है। लेखक इस स्थिति से क्षुब्ध दिख पड़ते हैं। वह यह देखते आ रहे हैं कि पिछले पचास वर्षों से शिक्षा की ऐसी ही दयनीय स्थिति चली आ रही है।

निश्चित रूप से लेखक महोदय के विचार पूर्णरूपेण तथ्य पर आधारित हैं। निःसंदेह वर्तमान शिक्षा-पद्धति इसी प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण दौर से गुजर रही है। बच्चे अपने सामाजिक दायित्वों को नहीं समझते। वे शिक्षा के सामाजिक-चरित्र की उपेक्षा करते हैं। इसकी दृष्टि से शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकों के ज्ञान तक ही सीमित है।

अतः लेखक का कथन सर्वथा उपयुक्त एवं सार्थक है।

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प्रश्न 6.
आर्थिक उदारीकरण से आप क्या समझते हैं? इसके क्या दुष्परिणाम हुए हैं?
उत्तर-
आर्थिक उदारीकरण को आमतौर पर आर्थिक सुधार के रूप में जाना जाता है। इसे राष्ट्र की आर्थिक स्थिति के उन्नयन हेतु एक सुदृढ़ औजार के तौर पर समझा जाने लगा है। इसके परिणामस्वरूप पूँजीवाद देश के कोने-कोने में पहुंच रहा है। राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की अवधारणा का भ्रामक विचार सरकार के मानस-पटल पर पल्लवित हो रहा है।

किन्तु वास्तविकता यह है कि यह उदारीकरण राष्ट्र को जर्जर बना रहा है। इस प्रक्रिया द्वारा जमीन, जंगल, पानी, खनिजों तथा अन्य मानव-संसाधनों का दोहन हो रहा है। आम आदमी से छीनकर इन्हें कुछ पूँजीपति घरानों तथा विदेशी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। देश के कोने-कोने से आम आदमी अपनी जीवन से विस्थापित हो रहे हैं, अपने बच्चों से दूर जाकर अन्यत्र रोजी-रोटी कमाने के लिए विवश हैं। अभागे लोग इस तथ्य से भली-भांति परिचित हैं कि आर्थिक उदारीकरण देश को किस ओर ले जा रहे हैं। इस स्थिति द्वारा इससे (उदारीकरण से) उपजे दुष्परिणाम का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

प्रश्न 7.
लेखक ने प्रस्तुत पाठ में देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पर आक्षेप किये हैं। उनके विचार से देश की राजनीतिक व्यवस्था में कौन-सी समस्याएँ प्रवेश कर चुकी हैं?
उत्तर-
लेखक कृष्ण कुमार देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से क्षुब्ध है। सर्वत्र हिंसा एवं अपराध का बोलबाला हो गया। यूँ कहा जाए कि अपराध का राजनीतिकरण तथा राजनीति का अपराधीकरण हो गया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वर्तमान में अपराध राजनीति का हिस्सा बन चुका है। हम इसकी गहराई में जितना जाएँगे हमें क्रमशः इसके विस्तार की जानकारी प्राप्त होगी। हिंसा एवं अपराध राजनीति का धार्मिक अंग हो गया है जो राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में अबाध गति से प्रवाहित हो रहा है। राजनीति में ही नहीं, सामाजिक संबंधों तक भी इसने अपने पाँव पसार लिये हैं।

इस हिंसा का शिकार महिलाएं, कामगार, आदिवासी, छोटे किसान तथा मजदूर यह सभी समान रूप से हो रहे हैं। हिंसा एवं अपराध का यह भयंकर तांडव पूँजी के शासन तथा एकदम भ्रष्ट एवं प्रांसगिक हो गई राजनीति के साथ-साथ राजनीति की मुख्य धारा में भी प्रविष्ट हो गया है। लेखक ने इन दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों से असंतुष्ट, अपनी वेदना प्रकट की है।

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प्रश्न 8.
“पंचायती राज में एक तरफ चिंगारी और रोशनी झाँकती है, वहीं ढेरों आशंकाओं का अँधेरा भी दिखाई देता है।” यहाँ किन रोशनी और आशंकाओं की ओर संकेत है?
उत्तर-
‘गाँव के बच्चों की शिक्षा’ शीर्षक कहानी के लेखक कृष्ण कुमार के अनुसार देश के सर्वांगीण विकास के लिए पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना एक सार्थक कदम है। लेखक पंचायती राज व्यवस्था को राष्ट्र के उत्थान का एक सशक्त माध्यम मानता है। उसे इस व्यवस्था में आशा की एक किरण दिख पड़ती है, राष्ट्र एवं समाज में परिवर्तन की एक छोटी, किन्तु ऊर्जावान चिंगारी दृष्टिगोचर हो रही है। किन्तु वह पूर्ण आश्वस्त नहीं है। वह यह देखकर निराश है कि पंचायती राज व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, वरन् केवल औपचारिकता मात्र है।

उन्हें समुचित प्रशासनिक अधिकारों से वंचित रखा गया है। अनेक प्रदेशों में पंचायतों के चुनाव नहीं हुए हैं। ग्राम सभाएँ केवल नाममात्र की उपस्थिति दर्शाती हैं। वे किसी भी मुद्दे पर चर्चा भर कर सकती हैं, फैसले नहीं ले सकतीं, पंचायतों के महत्त्वपूर्ण अधिकारों से वंचित रहने के कारण पीड़ित, शोषित एवं बुनियादी सुविधाओं से रहित जनता की स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है। महिलाओं की स्थिति भी वैसी ही दयनीय है।

लेखक पंचायती राज व्यवस्था को राष्ट्र एवं समाज के सर्वांगपूर्ण विकास की सशक्त कड़ी मानता है, साथ ही लेखक को यह देखकर निराशा होती है कि पंचायतों का चुनाव एवं गठन होने के बावजूद व्यावहारिक रूप से उसे नाममात्र के अधिकार दिए गए हैं। स्थानीय स्तर पर मची खलबली एवं अराजकता को नियंत्रित करने की स्थिति में हमारी पंचायतें नहीं हैं। यह कैसी विडम्बना है। लेखक यह देखकर हतप्रभ है।

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प्रश्न 9.
प्राथमिक शिक्षा को अधिक कारगर बनाने के लिए लेखक ने कौन-से दो क्षेत्र सुझाए हैं?
उत्तर-
वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति संतोषप्रद नहीं है। इसके अनेक कारण हैं। एक प्रमुख कारण यह है कि प्राथमिक पाठशाला का शिक्षक उपेक्षित एवं प्रताड़ित है। एक ओर बालकों तथा बालिकाओं का पाठशाला में नामंकन के पश्चात ऐसी परिस्थितियाँ सृजित की जाती हैं कि वे बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। बच्चों को उपेक्षा तथा अपमान का चूंट पीना पड़ता है। प्रारम्भिक कक्षाओं में उन्हें प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। एक और बड़ी कठिनाई यह भी है कि शिक्षकों को समुचित प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। शिक्षा का तीव्र गति से अवमूल्यन हो रहा है।

लेखक कृष्ण कुमार के कथनानुसार कुछ प्रदेशों में शिक्षकों को 500 रुपए वेतन पर नियुक्त किया जा रहा है। अल्प वेतन भोगी शिक्षक कभी भी सही ढंग से अध्यापन कार्य नहीं कर सकते।

प्राथमिक शिक्षा को कारगर बनाने के लिए शिक्षकों के प्रति उपेक्षा-भाव का परित्याग करना होगा। उन्हें समुचित वेतनमान दिया जाना चाहिए। साथ ही उनके प्रशिक्षण की यथेष्ट योजना कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। पाठशालाओं में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा ताकि बच्चे स्कूल जोन के लिए प्रोत्साहित हो। उनके लिए कुछ आकर्षक कार्यक्रम तैयार करना श्रेयस्कर है। विद्यालयों को पर्याप्त वित्तीय सहायता भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण है।

शिक्षा में सुधार एवं उन्नयन के लिए बड़ी-बड़ी गोष्ठियाँ, सेमिनार आदि आयोजित करना, शिक्षाविदों की कमिटी गठित कर कंसलटेंसी फीस का भारी-भरकम भुगतान इस दिशा में एक अनुपयुक्त प्रयास है। इससे प्राथमिक शिक्षा पर खर्च की जाने वाली राशि का अधिक हिस्सा उन्हीं अनावश्यक मदों में व्यय हो जाता है। प्राथमिकशालाओं के विकास तथा शिक्षकों के बेहतर वेतनमान में उस कोष का निवेश होना चाहिए।

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इस प्रकार लेखक ने प्राथमिक शिक्षा के प्रसार के लिए उपर्युक्त कई उपाय बताये हैं।

प्रश्न 10.
नौकरशाही ने प्राथमिक शिक्षा को किस प्रकार नुकसान पहुँचाया है?
उत्तर-
शिक्षा पर नौकरशाही के प्रभुत्व के प्राथमिक शिक्षा को पर्याप्त नुकसान पहुँचाया है। नौकरशाही इसके विकास के सामने एक दीवार बनकर खड़ी है। वह प्रायः हर अच्छे कार्यक्रम का विरोध करती है। इस दिशा में गहराई तक जाने पर यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है। पंचायतें इसकी मूक गवाह हैं। बड़ी-बड़ी कमिटियों और कमीशनों द्वारा सुझाए गए शैक्षिक सुधार नौकरशाही द्वारा ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं, अच्छे से अच्छे सुझाव और संभावनाएँ कुचल दी जाती हैं। इसके मूल में अफसरों की मानसिकता अपने प्रभुत्व को बनाए रखने की होती है। वह अपनी ताकत कम होते देखना नहीं चाहता। विडम्बना यह है कि शिक्षा की विफलताओं का सारा दोष प्राथमिकशाला के निरीह शिक्षकों पर थोप दिया जाता है, जबकि वे हमारे साथी हैं, शत्रु नहीं।

इससे यह निर्विवाद स्पष्ट हो जाता है कि नौकरशाही प्राथमिक शिक्षा को अत्यधिक नुकसान पहुँचाया है।

प्रश्न 11.
प्राथमिक शिक्षा की असफलता का दोष किन्हें दिया जाता है?
उत्तर-
प्राथमिक शिक्षा की असफलता का दोषारोपण प्राथमिकशाला के शिक्षकों पर किया जाता है। पिछलो कई पीढ़ियों से इस प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। परंतु अभी तक इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।

प्रश्न 12.
प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी धन के आगमन की अन्तिम परिणति महिलाओं पर हिंसा के रूप में होनी है? कैसे?
उत्तर-
देश में आज प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी धन के आगमन से अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, जिसकी अन्तिम परिणति महिलाओं पर हिंसा के रूप में प्रकट हुई है। आर्थिक उदारीकरण की विवशताओं के फलस्वरूप प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में विदेशी धन आ रहा है। विधायक, मंत्री और अफसर दिन-रात इसके बंदरबाँट में लगे हैं तथा इसकी सत्तर प्रतिशत से अधिक की राशि उनके पेट में चली जाती है। स्पष्ट है कि यह पैसा बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को जन्म दे रहा है। यह निर्विवाद तथ्य है कि भ्रष्टाचार हिंसा की जननी है, हिंसा का प्रणेता है और जहाँ हिंसा होगी उसकी शिकार विशेषकर महिलाएँ होगी।

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अत: यह पूर्णतया सत्य है कि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी धन की अन्तिम परिणति नारी-उत्पीड़न है जो हिंसा का रूप भी अक्सर धारण कर लेता है।

प्रश्न 13.
लेखक के प्राथमिकशाला के शिक्षकों से संबंधित विचार संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
प्राथमिक शिक्षा को अधिक बनाने की दिशा में लेखक कृष्ण कुमार ने सारगर्भित सुझाव व्यक्त किए हैं। लेखक के मतानुसार प्राथमिक-शिक्षा कोई अजूबा या दूर की कौड़ी नहीं है, बल्कि उसी संदर्भ में जन्म लेती है जो हमारे ईद-गिर्द रचा जा रहा है। प्राथमिकशाला के शिक्षकों के साथ चलकर शिक्षा की समस्याओं तथा उसकी लाचारी को समझा जा सकता है। शिक्षकों की व्यक्तिगत विवशताओं का समाधान आवश्यक है। अल्प वेतन भोगी प्राथमिक शिक्षक निष्ठापूर्वक अध्यापन कार्य नहीं कर सकते। उनकी लाचारी, मजबूरी एवं विपन्नता का समाधान आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उनको स्वाभिमान एवं स्वतंत्र रूप में निर्णय लेने का अधिकार देना होगा।

इस प्रकार लेखक ने वर्तमान में प्राथमिकशालाओं के अध्यापकों की दुरावस्था एवं निराकरण का सुझाव प्रस्तुत किया है।

प्रश्न 14.
साधना बहन के हरित-क्रांति के सम्बन्ध में क्या विचार हैं?
उत्तर-
साधना बहन ने हरित क्रांति के नाम पर तथाकथित खेती में क्रांतिकारी परिवर्तन के प्रति अपनी निराशा तथा असंतोष प्रकट किया है। उसके द्वारा सोयाबीन की खेती से होने वाले दुष्प्रभाव तथा खेती पर होने वाली विपरीत स्थितियों का अत्यन्त सजीव चित्रण किया गया है। उनके अनुसार साठ के दशक में प्रारम्भ की गई हरित क्रांति गरीबी तथा विषमता में वृद्धि का कारण बनी है। इधर गाँवों में विषमता एवं गरीबी में उत्तरोत्तर वृद्धि एवं दूसरी ओर धनी लोग पहले से अधिक अमीर तथा समृद्ध हुए हैं। इस तथाकथित हरित क्रांति का दुष्परिगाम यह हुआ है कि हमारे गाँवों की कृषि योग्य भूमि नष्ट हुई है।

नई-नई फसलों, जिनका हमारी जलवायु से कोई संबंध नहीं है, यहाँ की परिस्थितियों में अनुपयुक्त हैं, नकदी फसलों का प्रलोभन देकर, खेती करने को प्रोत्साहित किया गया। रासायानिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंप प्रयोग से पानी और मिट्टी के विषाक्त होने का खतरा उपस्थित हो गया है। गाँवों की कृषि को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है सोयाबीन की खेती ने, जिसके परिणामस्वरूप देश की मिट्टी अनेक स्थानों पर अनुर्वर होने के कगार पर पहुंच गई है। इससे हमारी खेती की व्यापक क्षति हुई है।

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पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण और समाज में समता के मूल्यों को स्थापित करके ही हम राष्ट्र के विकास की आशा कर सकते हैं। अन्यथा विनाश की ओर तेजी से बड़ते कदम हमारी कृषि के लिए अत्यन्त अहितकर होगा।

अतः हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है अन्यथा वर्तमान शिक्षा इस दिशा में अधिक विध्वंसकारी परिणाम लाएगी।

साधना बहन ने उपर्युक्त तथ्यों को रेखांकित करते हुए अपना आन्तरिक क्षोभ प्रकट किया है। साथ ही उन्होनें हमें उक्त प्रयासों से बचने का परामर्श दिया है।

प्रश्न 15.
“यदि हम पर्यावरण, प्रकृति-सरंक्षण और समाज में समता के मूल्यों को स्थापित करने की बात नहीं करेंगे तो शिक्षा इस विनाश को और भी तेजी से फैलाएगी।” लेखक के इस कथन का अभिप्राय स्पष्ट करें। आखिरकार शिक्षा इस विनाश को कैसे तेजी से फैलाएगी?
उत्तर-
‘गाँव के बच्चों की शिक्षा’ के लेखक कृष्ण कुमार का यह कटु अनुभव है कि हम केवल बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाते हैं, उपलब्धियों की चर्चा करते हैं, किन्तु राष्ट्र के विकास के प्रमुख कारक (कार्य), यथा पर्यावरण की सुरक्षा, प्रकृति-संरक्षण तथा समाज में समता के मूल्यों की स्थापना के प्रति सचेष्ट नहीं हैं। हम इनकी नितान्त उपेक्षा कर रहे हैं। वर्तमान शिक्षा इसमें सार्थक योगदान नहीं कर रही है। इसकी परिणति व्यापक विनाश को आमंत्रित करेगी।

वास्तविकता यह है कि उच्च स्तर पर मंत्रियों की चाटुकारिता तथा विभागीय अफसरों द्वारा खुशामद में तलवे चाटने की प्रवृत्ति इन बुराइयों का मूल कारण है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप शिक्षा दर्शन ही समाप्त हो जाता है। समुचित मार्गदर्शन के अभाव में हम लक्ष्य से भटक गए हैं।

शिक्षक वर्तमान दयनीय स्थिति तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली से अत्यन्त क्षुब्ध तथा हतोत्साहित है। इसकी आन्तरित इच्छा है कि वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन लाये बिना हम समाज में समता एवं विकास के लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते।

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प्रश्न 16.
गाँधीजी की बुनियादी शिक्षा की रूपरेखा क्या थी?
उत्तर-
गाँधीजी की बुनियादी शिक्षा की रूपरेखा शिक्षा को ग्रामीण जीवन तथा गाँव के पारम्परिक उद्योगों से जोड़ना था। गाँधीजी आज की शिक्षा विशेष तौर से प्राथमिक शिक्षा में नवजीवन का संचार करना चाहते थे। वस्तुत: वे ऐसा करने में पूर्ण सक्षम थे। बुनियादी तालीम की गांधीजी की कल्पना, उनके ग्राम-स्वराज्य के सपनों की आधारशिला थी। इसके माध्यम से ग्रामों की स्वायत्तता तथा ग्रामीणों को सम्मानपूर्वक जीने का हौसला देना, उनका लक्ष्य था। इस प्रक्रिया में बुनियादी तालीस की उनकी रूपरेखा आज भी प्रेरणादायक है तथा इस संदर्भ में कार्य करने को दिशा दे सकने में समर्थ है। शिक्षा के सामाजिक चरित्र पर सीधे प्रहार बिना शिक्षा और विनाशकारी विकास के बंधन को हम तोड़ नहीं सकते।

गांधी की बुनियादी शिक्षा की रूपरेखा उपर्युक्त तथ्यों को रेखांकित करती है। इसके द्वारा हम आसानी से समझ सकते हैं। आज की शिक्षा ग्रामीण समाज की पुनर्रचना करने में पूर्णतया अक्षम है। हमें बुनियादी शिक्षा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा को एक ऐसे मुकाम पर पहुंचाना होगा जहाँ गाँवों को स्वायत्तता, ग्रामीणों को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार तथा गांवों के पारंपरिक उद्योगों को संरक्षण प्राप्त हो सके।

गाँव के बच्चों की शिक्षा भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखें प्रतिकूल, सहज, प्राथमिक, सुलझाना, ग्रामीण, प्रश्न, जमीन, स्वायत्तता, विदेशी
उत्तर-

  • शब्छ – विपरीतार्थक शब्द
  • प्रतिकूल – अनुकूल
  • सहज – दुर्लभ
  • प्राथमिक – अतिम
  • सुलझाना – उलझाना
  • ग्रामीण – शहरी, नगरीय
  • प्रश्न – उत्तर
  • जमीन – आसमान
  • स्वायत्तता – पराधीनता,
  • परनिर्भरता – स्वदेशी

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों के वचन परिवर्तित करें-
माँ, सिसकी, रिश्तेदार, लड़का, लड़की, किसान, मजदूर, विधायक, मंत्री, अफसर, विवशता, पस्तक, प्रक्रिया
उत्तर-

  • शब्द – परिवर्तित वचन
  • माँ – माएँ, माताएँ
  • सिसकी – सिसकियाँ
  • रिश्तेदार – रिश्तेदारों
  • लड़का – लड़के
  • लड़की – लड़कियाँ
  • किसान – किसानों
  • मजदूर – मजदूरों
  • विधायक – विधायकगण
  • अफसर – अफसरों
  • विवशता – विवशताएँ
  • पुस्तक – पुस्तकं
  • प्रक्रिया – प्रक्रियाएँ

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के समानार्थी लिखें
प्राथमिकशाला, अनपढ़, बुनियादी, गुंजाइश, महिला शिक्षक, गिरवी, इस्तेमाल, ताकतवर, आजादी, हैसियत, लचर, दाखिला, अरमान
उत्तर-

  • शब्द – समानार्थी शब्द
  • प्राथमिक शाला – प्रारंभिक शाला
  • अनपढ़ – मूर्ख
  • बुनियादी – बेसिक
  • गुंजाइश – जोगाड़
  • महिला शिक्षक – अध्यापिका
  • गिरवी – बंधक
  • इस्तेमाल – व्यवहार
  • ताकतवर – शक्तिशाली
  • आजादी – स्वतंत्रता
  • हैसियत – औकात, सामर्थ्य
  • लचर – पंगु, कमजोर
  • दाखिल – भर्ती
  • अरमान – अभिलाषा।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग निर्णय करें
गाँव, सुविधा, भाषा, पढ़ाई, सुधार, जाल, नीति, परिदृश्य
उत्तर-

  • गाँव (पुलिंग)-यह मेरा गाँव है।
  • सुविधा (स्त्रीलिंग)-आप अपनी सुविधा के अनुकूल कार्य करें।
  • भाषा (स्त्रीलिंग)-मेरी भाषा अच्छी नहीं है।
  • पढ़ाई (स्त्रीलिंग)-आपकी पढ़ाई कैसी है?
  • सुधार (पुलिंग)-गाँवों का सुधार होना अपेक्षित है।
  • जाल (पुलिंग)-आपका जाल फैलना उचित नहीं।
  • नीति (स्त्रीलिंग)-सरकार की वर्तमान नीति जनहित में है।
  • परिदृश्य (पुलिंग)-यह परिदृश्य उपेक्षित नहीं है।

प्रश्न 5.
अर्थ की दृष्टि से नीचे दिए गए वाक्यों की प्रकृति बताएँ
उत्तर-
(क) प्राथमिक शिक्षा के लिए विदेशी धन क्यों आया है? प्रश्नवाचक वाक्य
(3) आज शिक्षा का बहुत ही प्रतिकूल सामाजिक चरित्र उभर आया है। – विधिवाचक वाक्य
(ग) मुझे मालूम था कि तुम इस देश में नहीं रूक पाआगे और हमारे लिए कुछ नहीं कर पाओगे। – नकारात्मक वाक्य
(घ) तुम्हें जहाँ जाना है जाओ।
(ङ) संभव है इस सभा में कहीं टिमरनी से आई साधना बहन बैठी हैं। – संदेहवाचक वाक्य
(च) क्या वजह है कि आज हमारे कई गाँवों में पानी उपलब्ध नहीं है, लेकिन शराब उपलब्ध -विस्मयादिबोधक वाक्य

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अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

गाँव के बच्चों की शिक्षा लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हरित क्रांति के प्रभाव को लिखें। ,
उत्तर-
भारत एक कृषि प्रधान देश है। स्वतंत्रता के समय भारतीय कृषि पिछड़ी हुयी थी। इसीलिए कृषि की पिछड़ेपन को दूर करने और उसे उन्नतशील बनाने के लिए खेती में एक नयी क्रांति को लागू किया गया, जिसे हरित क्रांति कहा गया। हरित क्रांति के माध्यम से भारतीय कृषि को हरी-भरी बनाने का लक्ष्य रखा गया। इस क्रांति से देश में कृषि की उत्पादकता में वृद्धि हुयी और हमारा देश खाद्यान्न फसलों के दृष्टिकोण से आत्म-निर्भर बन चुका है। प्रस्तुत निबंध में भी साधना बहन ने हरित क्रांति का भारतीय कृषि पर अनुकूल प्रभाव पड़ा है।

प्रश्न 2.
बुनियादी शिक्षा के महत्व को बतलाएँ।
उत्तर-
भारत में बुनियादी शिक्षा का महत्व बहुत अधिक है। इसीलिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भी बुनियादी शिक्षा का समर्थन किया था। उन्होंने यह कहा था कि बुनियादी शिक्षा की रूपरेखा शिक्षा को ग्रामीण जीवन तथा गाँव के पारम्परिक उद्योगों से जोड़ना था। वे प्राथमिक शिक्षा को देश के अनुकूल बनाना चाहते थे। जिससे कि ग्रामीण स्वराज्य के सपनों को साकार किया जा सके। वे कृषि के साथ-साथ कुटीर उद्योगों का समर्थन करते थे। इसीलिए उन्होंने चरखा उद्योग का समर्थन किया।

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गाँव के बच्चों की शिक्षा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक निबंध के लेखक कौन हैं?
उत्तर-
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक निबंध के लेखक कृष्ण कुमार हैं।

प्रश्न 2.
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक पाठ किस प्रकार की रचना है?
उत्तर-
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक पाठ एक विचारोत्रेजक रचना है।

प्रश्न 3.
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक पाठ में लेखक की चर्चा हुयी है?
उत्तर-
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक पाठ में कमारा ल्ये नामक लेखक की चर्चा हुयी है।

प्रश्न 4.
गाँव के बच्चों की शिक्षा में किनकी बुनियादी शिक्षा की अवधारणा पर वि किया गया है?
उत्तर-
गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक पाठ में गाँधीजी की बुनियादी शिक्षा की अवधारणा पर विचार किया गया है।

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प्रश्न 5.
प्राथमिक शिक्षा भारत में असफल रहा है?
उत्तर-
भारत में प्राथमिक शिक्षा धन के लूट-खसोट के कारण असफल रहा है। इसमें भ्रष्टाचार अधिक है। इसलिए अपेक्षा के अनुसार यह अधिक सफल नहीं हो सका है।

गाँव के बच्चों की शिक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही उत्तर का सांकेतिक चिह्न (क, ख, ग या घ) लिखें।

प्रश्न 1.
‘गांव के बच्चों की शिक्षा’ व्याख्यान कहाँ से लिया गया है?
(क) शिक्षा और ज्ञान
(ख) त्रिकाल दर्शन
(ग) आज नहीं पढ़ेगा
(घ) स्कूल की हिन्दी
उत्तर-
(क)

प्रश्न 2.
‘नीली आंखों वाले बगुले’ किसकी रचना है?
(क) मोहन राकेश
(ख) कृष्ण कुमार
(ग) मेहरुन्निसा परवेज
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख)

 Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 12 गाँव के बच्चों की शिक्षा (कृष्ण कुमार)

प्रश्न 3.
शिक्षाशास्त्रियों में किस विषय पर प्राय: वाद-विवाद होते रहते हैं?
(क) शिक्षा का माध्यम
(ख) वयस्क शिक्षा
(ग) गाँव नगरों का शिक्षा
(घ) साहित्यिक विधाएँ
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
कुमारल्ये का देश किस देश का उपनिवेश था?
(क) इंगलैंड
(ख) फ्रांस
(ग) अमेरिका
(म) जर्मनी
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
कुमारल्ये की आत्मकथा किसे समर्पित है?
(क) अपनी माँ को
(ख) अपनी पुत्र को
(ग) अफ्रीका के असंख्य अशिक्षित माताओं को
(घ) अफ्रीकी बुद्धिजीवियों को
उत्तर-
(ग)

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।

प्रश्न 1.
आज शिक्षा का बहुत ही…….सामाजिक चरित्र उभर आया है।
उत्तर-
प्रतिकूल

प्रश्न 2.
पंचायती राज का पुनरुदय एक…………..प्रक्रिया है।
उत्तर-
ऐतिहासिक

प्रश्न 3.
देश में आज प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र में काफी……..आया हुआ है।
उत्तर-
विदेशी

प्रश्न 4.
हरित क्रांति की वजह से हमारे गाँव की जमीनें……………………हुई हैं।
उत्तर-
बर्बाद।

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गाँव के बच्चों की शिक्षा लेखक परिचय – कृष्ण कुमार (1951)

आधुनिक हिन्दी गद्य-साहित्य में कृष्ण कुमार मूलतः प्रखर विचारक के रूप में प्रख्यात हैं। एक विचारक के रूप में अपने लेखन के माध्यम से नारी-मुक्ति व नारी की आजादी आदि कई मानवीय चिन्ताओं के प्रति अपनी सजगता का परिचय देते हुए विचार जगत में उद्वेलन पैदा करने की दिशा में उनके प्रयास, उनकी चेतना और संवेदना को एक नया आयाम प्रदान करते हैं।

कृष्ण कुमार का जन्म सन् 1951 ई० में हुआ था। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वे अध्यापन-कार्य से जुड़ गये। सम्प्रति दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा शास्त्र विभाग (सी.आई.ई.) में प्रोफेसर एवं पूर्व संकायाध्यक्ष हैं।

शिक्षा शास्त्री के रूप में सत्तर के दशक में प्रकाशित शैक्षिक प्रश्नों पर केन्द्रित ‘राज, समाज और शिक्षा’ प्रो. कुमार की एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह कृति आज पूर्व के परिवर्तनों के आलोक में शिक्षा की दशा और दिशा के संदर्भ में अपेक्षित जानकारी देने में सहायक है।

आधुनिक हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत कृष्ण कुमार को लेखक और विचारक के रूप में विशिष्ट पहचान प्राप्त है। भारतीय शिक्षा और उसके अनुपयुक्त रूपों में अवस्थाओं के गहन पर्यालोचन में उनका चिंतन अपने वैशिष्ट्रय के साथ प्रकट हुआ है। राष्ट्रीय नवजागरण से लेकर समसामयिक मुद्दों, यथा-भूमंडलीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद, दलित एवं नारी विमर्श आदि विभिन्न वैचारिक संदर्भो में समसामयिक भारतीय शिक्षा पर उनकी सोच पूर्णतया उजागर हुई है।

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उनका जन्म सन् 1951 में मध्य प्रदेश राज्य के टीकमगढ़ में हुआ था। ऊँची शिक्षा उन्हें मध्यप्रदेश के सागर विश्वविद्यालय और टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा से प्राप्त हुई। सम्प्रति वे एन.सी.ई.आर.टी., नई दिल्ली के निदेशक है।

हिन्दी साहित्य उनकी कहानियों, यात्रा वृत्तांत और निबंधों से जहाँ समृद्धि हुआ है वहीं उनका शिक्षा दर्शन भी उनके शिक्षा सम्बंधी आलेखों में पूरी तरह से उजागर हुआ है।

उनकी कृतियों में नीली आँखों वाले बगुले, त्रिकालदर्शन, अब्दुल मजीद का छुरा, विचार का.. डर, स्कूल की हिन्दी, राज, समाज और शिक्षा आदि प्रमुख हैं।

भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों, प्रतिमानों, रूपों आदि के संदर्भ में उनके शिक्षा-चिंतन विशेष महत्त्व रखते हैं। अपने शिक्षा चिंतन के अन्तर्गत उन्होंने शिक्षा के स्वरूप, प्रक्रिया और प्रविधि में स्थानीय जरूरतों और संसाधनों की अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व दिया है।

उनके अब तक के चिंतन में भारतीय लोकतांत्रिक शिक्षा का एक आधुनिक रूप उभरता दिखलायी पड़ता है।

गाँव के बच्चों की शिक्षा पाठ का सारांश।

प्रस्तुत पाठ “गाँव के बच्चों की शिक्षा” कृष्ण कुमार द्वारा लिखित एक सशक्त हिंदी निबंध है।

कृष्ण कुमार लिखित “गाँव के बच्चों की शिक्षा” एक ही देश और समाज में सामान्य शिक्षा के चल रहे अनेक रूपों को प्रस्तुत करते हुए गाँव के बच्चों की शिक्षा की व्यापक समीक्षा एवं तदनुरूप उसकी विसंगतियों के निराकरण की दिशा में विद्वान लेखक ‘कृष्ण कुमार’ का एक सार्थक प्रयास है। शिक्षा के स्वरूप, प्रक्रिया और प्रविधि में स्थानीय जरूरतों, संसाधनों आदि पर प्रस्तुत निबंध में विशेष जोर दिया गया है। गाँधीजी की बुनियादी शिक्षा की अवधारणा तथा शिक्षा के अपेक्षतया सर्वांगीण रूप के युक्तियुक्त विवेचन की सफल प्रस्तुति इस लेख में की गई है।

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विद्वान लेखक अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु पाठकों को फ्रांस द्वारा शासित पश्चिमी अफ्रीका के एक छोटे-से प्रदेश में ले जाते हैं। वहाँ कमारा-ल्ये नामक एक लेखक हुए हैं। लेखक ने कमारा-ल्ये की आत्मकथा के कुछ अंशों के माध्यम से उनके जीवन के संघर्षों का सजीव चित्रण किया है, ग्रामीण परिवेश में प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक का क्रमिक उल्लेख उनकी आत्मकथा में वर्णित है। औपनिवेशिक वातावरण में उनका शिक्षण वस्तुतः प्रशंसनीय था। ग्रामवासी उनकी अप्रत्याशित सफलता से प्रसन्न एवं गौरवान्वित थे, किन्तु उनकी माँ पुत्र के उनसे दूर चले जाने की संभावना से दुःखी थीं।

लेखक ने कमारा ल्ये का दृष्टान्त अपने यहाँ व्याप्त शैक्षणिक वातावरण के संदर्भ में दिया है। लेखक को ऐसा लगता है कि वर्तमान शिक्षा का मानो कोई सामाजिक चरित्र नहीं है। एक प्रतिकूल सामाजिक चरित्र उभर कर सामने आया है। – लेखक की दृष्टि में पंचायती राज का पुनरुदय एक ऐतिहासिक घटना है। उसे इस बात का दु:ख भी है कि पूँजीवाद का प्रसार देश के कोने-कोने में हो रहा है। जमीन, जंगल, पानी, खनिज एवं अन्य मानव संसाधनों पर पूँजीपतियों एवं विदेशी कंपनियों का कब्जा हो गया है।

राजनीति पर हिंसा तथा अपराध हावी है, जिसका शिकार महिलाएँ, मजदूर, कामगार, आदिवासी और छोटे किसान हो रहे हैं। पंचायती राज इस शोषण के निराकरण की दिशा में सार्थक भूमिका निभा सकते हैं।

प्राथमिक शिक्षा को अधिक कारगर बनाकर ही पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य की प्राप्ति एवं राष्ट्र का विकास संभव है। भ्रष्ट नौकरशाही, राजनीतिक नेताओं एवं मंत्रियों के काले कारनामों से देश आक्रांत है। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर देश में आर्थिक विषमता तथा विपन्नता विकराल रूप धारण कर रही है।

प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन, कार्यरत शिक्षकों के स्तर में सुधार, उन्हें समुचित अधिकार और सम्मान देकर ही किया जा सकता है। अल्प वेतनभोगी शिक्षकों से सार्थक अध्यापन की आशा करना व्यर्थ है। पाठ्यक्रम में ताकतवर वर्गों की विचारधारा का प्रचार अनुपयुक्त है। ग्रामीण समाज की छवि प्रस्तुत न कर समाज में शासक वर्गों के जीवन की प्रस्तुति निन्दनीय है। प्रस्तुत पाठ के अनुसार इन विसंगतियों का मूल कारण, पिछले कई दशक से चली आ रही यह प्रक्रिया एवं तथाकथित मनोवृत्ति है।।

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लेखक ने महिला पंचों के एक सम्मेलन में अप्रैल, 1997 में इस व्याख्यान द्वारा उक्त विचार प्रकट किए जिन्हें “शिक्षा और ज्ञान” निबंधमाला में संग्रहीत किया गया है। उन्होंने महिलाओं से शिक्षा, कृषि और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर चर्चा की। कृषि में कीटनाशकों एवं रासायनिक खाद, पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण, समाज में समानता, प्राथमिक शिक्षा तथा महात्मा गाँधी की बुनियादी शिक्षा मुख्य विचार बिन्दु थे।

यह पाठ रचनात्मक समझ जगाने के साथ-साथ एक विचारोत्तेजक बहस की प्रस्तावना भी करता है।

गाँव के बच्चों की शिक्षा कठिन शब्दों का अर्थ

होशियार-चतुर, मेधावी। कुव्वत-क्षमता। प्रतिकूल-विपरीत। सरोकार-लगाव, संबंध। बेमानी-व्यर्थ, बेकार। दायरा-क्षेत्र। उत्पीड़ित-शोषित जिसका उत्पीड़न हुआ हो। तबका-वर्ग। पुनरुदय-पुन:उदय। गुंजाइश-संभावना। अभ्युदय-उत्थान। खलबली-बेचैनी। कामगार-काम करनेवाले। अप्रासंगिक-अनुपयुक्त। आलंकारिक रूप से-सजावटी तौर पर। कारगर-सफल, उपयोगी। नौकरशाही-अफसरशाही। तालीम-शिक्षा। मुखातिब-आमने-सामने। शिकंजा-घेरा। विवशता-मजबूती, कुछ न कर पाने की स्थिति। शरीक-शामिल। तादाद-संख्या। कंसलटेंसी फीस-सलाह देने के लिए लिया गया शुल्क। तिरस्कार-अपमान, उपेक्षा। परिधि-घेरा, वृत्त। अंतर्विरोध-भीतरी विषमता। सब्सिडी-छूट। प्रवंचना-ठगी। परनाला-नाला। स्वायत्त-आत्मनिर्भर। समग्र-सम्पूर्ण। दोयम दर्जा-दूसरा स्तर।

गाँव के बच्चों की शिक्षा महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या

1. गाँधीजी के ग्राम स्वराज के सपने का अर्थ है गाँवों को स्वायत्तता देना तथा ग्रामीणों को सम्मानपूर्वक जीने का हौसला देना। इस प्रक्रिया में बुनियादी तालीम की उनकी रूपरेखा आज भी हमें प्रेरणा और काम करने की एक परिधि दे सकती है।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ कृष्ण कुमार द्वारा लिखित गाँव के बच्चों की शिक्षा नामक पाठ से ली गयी है। इन पंक्तियों में लेखक का यह कहना है कि गाँव को स्वायत्तता देना और ग्रामीणों को सम्मानपूर्वक जीने का वातावरण उत्पन्न करके उन्हें हौसला देना गाँधीजी के ग्रामीण स्वराज का सपना साकार हो सकता है। देश में ग्रामीण स्वराज हासिल करने के लिए बुनियादी शिक्षा के साथ-साथ गाँव में लोगों को कुटीर उद्योग का विकास करना चाहिए। बुनियादी शिक्षा ग्रामीण स्वराज के अनुकूल होना चाहिए तभी भारत का समुचित विकास हो सकता है। इस सिलसिले में आजकल पंचायती राज महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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2. देश में आज प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काफी विदेशी धन आया हुआ है। इस विदेशी धन को खर्च करने में, हमारे विधायक मंत्री और अफसर दिन-रात व्यस्त हैं।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ कृष्ण कुमार द्वारा लिखित गाँव के बच्चों के शिक्षा नामक पाठ से ली गयी है। इन पंक्तियों का अध्ययन करने से इस बात का पता चलता है कि आज हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए बहुत विदेशी धन आया है। इस विदेशी धन की बहुत लूट-खसोट हो रही है। इसमें भ्रष्टाचार बहुत है। इस भ्रष्टाचार में मंत्री, विधायक के साथ-साथ अधिकारी भी शामिल हैं। इस विदेशी धन का बंदरबाँट हो रहा है जिससे प्राथमिक शिक्षा का देश में समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा बहुत सफल नहीं है। हालाँकि सर्व-शिक्षा कार्यक्रम चल रहा है जिसका अनुकूल प्रभाव देश की शिक्षा पर पड़ रहा है। फिर भी प्राथमिक शिक्षा को सफल बनाने के लिए भ्रष्टाचार और धन के लूट-खसोट पर नियंत्रण लगाना चाहिए।