Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता

Bihar Board Class 11 Economics निर्धनता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निर्धनता की परिभाषा दें।
उत्तर:
निर्धनता को न्यूनतम उपभोग आवश्कताओं को पूरा करने में असर्मथता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, निर्धनता से अभिप्राय जीवन, स्वास्थ तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की प्राप्ति की असमर्थता है।

प्रश्न 2.
काम के बदले अनाज कार्यक्रम का क्या अर्थ है?
उत्तर:
काम के बदले अनाज कार्यक्रम का अर्थ उस कार्यक्रम से है जिसके अन्तर्गत श्रमिकों को काम के बदले नकदी न देने के स्थान पर एक निश्चित मात्रा में अनाज देना है।

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प्रश्न 3.
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार का एक-एक उदाहरण दें?
उत्तर:
ग्रामीण स्वरोजगार का एक उदाहरण-मुर्गीपालन । शहरी स्वरोजगार का एक उदाहरण-फोटोस्टेट की दुकान।

प्रश्न 4.
आय अर्जित करने वाली परिसम्पत्तियों के सृजन से निर्धनता की समस्या का सामाधान किस प्रकार हो सकता है?
उत्तर:
आय अर्जित करने वाली परिसम्पत्तियों के सृजन से रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। रोजगार मिलने से निर्धनता की समस्या का सामाधान किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
भारत सरकार द्वारा निर्धनता पर त्रि-आयामी प्रहार की संपेक्ष में व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत सरकार ने निर्धनता निवारण के लिए त्रि-आयामी नीति अपनाई। इस त्रि-आयामी निति का वर्णन आगे किया गया है –

1. संवृद्धि आधारित निति-यह नीति इस आशा पर आधारित है कि आर्थिक संवृद्धि के अर्थत् सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय की तीव्र वृद्धि के पूर्वार्द्ध प्रभाव समाज के सभी वर्गों तक पहुँच जायेंगे।

1950 से 1960 ई० के दशक के पूर्वार्द्ध में हमारी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य यही था। यह माना जा रहा था कि तीव्र गति दर औद्योगिक विकास और चुने हुए क्षेत्रों में हरित क्रांति के माध्यम से कृषि का पूर्ण कायकल्प निश्चित ही समाज के अधिक पिछड़े वर्गों को लाभान्वित करेगा परन्तु यह रणनीति निर्धनता उन्मूलन में सफल नहीं रही।

2. जनसंख्या की वृद्धि क परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय में बहुत ही कमी आई। कृषि तथा उद्योग क्षेत्रों में स्वांगीण वद्धि अधिक प्रभावशाली नहीं रही। धनी तथा निर्धन के बीच की खाई और भी बढ़ गई। आर्थिक संवृद्धि के लाभ निर्धनों तक नहीं पहुँच पाये।

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प्रश्न 6.
सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं के सहायतार्थं कौन से कार्यक्रम अपनाये हैं?
उत्तर:
सरकार बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं को निर्वाह के लिए पेंशन देती है।

प्रश्न 7.
क्या निर्धनता और बेरोजगारी के बीच कोई सम्बन्ध है? समझाए?
उत्तर:
निर्धनता से अभिप्राय है जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्रप्ति की आयोग्ता। निर्धनता के कारणों में बेरोजगारी को भी सम्मिलित करते है। बेरोजगारी वह स्थिति है जब श्रमिक प्रचलित मजदूरी पर काम करना चाहते हैं लेकिन काम नहीं मिलता है। जब देश की श्रम शक्ति बेरोजगारी के कारण बेकार रहती है, ते आय एवं क्रय शक्ति का स्तर गिर जाता है। जिससे निर्धनता बढ़िती है। इस विवरण से स्पष्ट है कि निर्धनता और बेरोजगारी में संबंध है।

प्रश्न 8.
सापेक्ष और निरपेक्ष निर्धनता में क्या अन्तर है?
उत्तर:
सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों तथा दूसरे देशों की तुलता में पाई जाने वाली निर्धनता है। जबकि निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता की माप से है।

प्रश्न 9.
मान लिजिए आप एक निर्धन परिवार से हैं और छोटी सी दुकान खोलने के लिए सरकारी सहायता प्राप्त करना चाहते हैं। आप किस योजना के अन्तर्गत आवेदन देंगे और क्यों?
उत्तर:
मैं निर्धन परिवार से हूँ और मैंने 10वीं कक्षा उत्तीर्ण कर रखी है। मैं छोटी से दुकान खोलने के लिए शिक्षित बेरोजगार ऋण के लिए आवेदन करँगा। क्योंकि शासन की ओर से इस पर 25% सब्सिडी (सहायिकी) प्राप्त होगी।

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प्रश्न 10.
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अन्तर स्पष्ट करें। क्या यह कहना सही होगा कि निर्धनता अनुपात प्रवृति का प्रयोग करें।
उत्तर:
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अन्तर (Difference between Rural unemployment and Urban unemployment):
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी एवं अल्प बेरोजगारी एक साथ विद्यमान होती हैं और उनके बीच स्पष्ट विभेद करना सम्भव नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि से भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ जाता है। भूमि पर जनसंख्या बढ़ने पर कृषकों की संख्या बढ़ जाती है। जिसके कारण प्रच्छन्न बेरोजगारी की मात्रा में वृद्धि होती है। यहाँ पर शहरी क्षेत्रों की तरह खुली बेरोजगारी नहीं पाई जाती। यहाँ पर मौसमी बेरोजगारी भी पाई जाती है।

इसके विपरीत शहरी क्षेत्र में खुली बेरोजगारी पाई जाती है। शहरों में अशिक्षितों की अपेक्षा शिक्षित बेरोजगारों की संख्या अधिक होती है। इसका कारण यह है कि जितनी संख्या में लोग शिक्षा प्राप्त करते है, उतनी मात्रा में सेवा क्षेत्र का विस्तार नहीं हो पाता। इसलिए मध्यम वर्ग में शिक्षित बेरोजगार की समस्या गम्भीर रूप धारण करती जा रही है। संपेक्ष में हम कह सकते हैं कि भारत में ग्रामीण क्षेत्र में प्रमुख रूप से अल्प रोजगार, मौसमी बेरोजगारी तथा प्रच्छन्न बेरोजगारी पायी जाती है जबकि शहरी क्षेत्र में खुली बेरोजगारी पाई जाती है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 4 निर्धनता img 1

निर्धनता का गाँवों से शहर में आना:
इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्रामीण क्षेत्रों की निर्धनता अब शहरों की ओर भी आ गई है। जनसंख्या में वृद्धि होने के कारण कृषकों की आर्थिक दशा प्रतिदिन बिगड़ती जाती हैं। जिसके कारण बड़ी जनसंख्या की यह गतिशीलता शहरी आकर्षण का परिणाम नहीं अपितु ग्राम में रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध न होने के कारण इन्हें गाँवों से शहर की ओर धकेल दिया। परिणाम स्वरूप निर्धनता गाँव शहर की ओर बढ़ी। इस बात की पृष्टि अग्रलिखित तालिका से की जा सकती है –

गरीबी अनुपात
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 4 निर्धनता img 2
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2004-2005 ई०।

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प्रश्न 11.
भारत के कुछ राज्यों में निर्धनता रेखा के नीचे की जनसंख्या का प्रयोग करके सापेक्ष निर्धनता की आवश्यकता स्पष्ट करें।
उत्तर:
नीचे चार्ट में निर्धनता की राज्य स्तरीय प्रवुतियाँ दिखाई गई हैं।
भारत में निर्धनता की प्रवृत्तियाँ 1973 – 2000
निर्धनों की संख्या (मिलियन)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 4 निर्धनता img 3
चित्र से स्पष्ट है कि भारत में 70% निर्धन केवल पाँच राज्यों में सीमित हैं। ये राज्य हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा। 1973-74 में तो इन राज्यों की आधी से अधिक जनसंख्या निर्धनता रेखा से निचे रह गये थे। यद्यपि इन राज्यों में भी निर्धनता का अनुपात कम हुआ है, परन्तु अन्य राज्यो के अपेक्षा उनकी सफलता न के बराबर है। यदि गुजरात को देखें तो वहाँ 1973-2000 के बीच निर्धनता रेखा से नीचे का अनुपात 48% से कम होकर 15% रह गया है। इस अवधि (1973-2000) में पश्चिमी बंगाल की सफलता भी महत्त्वपूर्ण रही सफलता मिली है।

प्रश्न 12.
मान लिजिए कि आप किसी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव से निर्धनता निवारण के कुछ प्रस्ताव दीजिए।
उत्तर:
गाँव से निर्धनता निवारण के प्रस्ताव-गाँव में निर्धनता के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं –

  1. भूमि का विकास किया जाय।
  2. खेती में श्रम-प्रधान विधियों का अधिक उपयोग किया जाए।
  3. पशु-धन का विस्तार किया जाए।
  4. कृषि का विविधीकरण किया जाए।
  5. शिक्षा, आवास, स्वास्थ सेवाएँ आदि का विकास किया जाए।
  6. कृषिजन्य उद्योगों का विकास किया जाए।

Bihar Board Class 11 Economics निर्धनता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निर्धनता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निर्धनता से अभिप्राय है जीवन, स्वास्थ तथा कार्य कुशलता के लिए न्यूनतम उपयोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता।

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प्रश्न 2.
न्यूनतम मानवीय आवयश्कताओं में किन-किन को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
न्यूनतम मानवीय आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम मानवीय आवश्यकतायें शामिल होती है।

प्रश्न 3.
न्यूनतम मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से मनुष्य पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
न्यूनतम मानवीय आवश्कताओं को पूरा न होने से मनुष्य को कष्ट होता है। उसके स्वास्थ तथा भविष्य में निर्धनता से छुटकारा पाना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 4.
निर्धनता शब्द का प्रयोग किन दो अर्थों में किया जाता है?
उत्तर:
निर्धनता शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है –

  1. सापेक्ष निर्धनता (Relative – povert) तथा
  2. निरपेक्ष निर्धनता (Absolute proverty)।

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प्रश्न 5.
सापेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों की तुलना में पाई जाने वाली निर्धनता है। सापेक्ष निर्धनता में हम आय के वितरण पर विचार करते हैं। जिस देश या वर्ग के लोगों का जीवन निर्वाह स्तर नीचा होता है उन्हें उच्च निर्वाह स्तर के लोगों की तुलना में सापेक्ष रूप से निर्धन माना जायेगी।

प्रश्न 6.
निरपेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता की माप से है। वह सामान्य जीवन की आवश्यकतायें जुटाने के लिये संसाधनों के अभाव को इंगित करता है।

प्रश्न 7.
अधिकांश देशों में किस आधार पर निर्धनता का अनुमान लगाने का प्रत्यन किया जाता है?
उत्तर:
अधिकांश देशों में प्रति व्यक्ति उपभोग की जाने वाली न्यूनतम कैलोरी की मात्रा या इनके उपभोग क लिये आवश्यक प्रति व्यय के आधार पर निर्धनता का अनुमान लगाने का प्रयत्न किया जाता है।

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प्रश्न 8.
भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए किस धारणा का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा की धारणा का प्रयोग किया जाता है। निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोग निर्धन कहलाते हैं।

प्रश्न 9.
निर्धनता रेखा किसे कहते हैं?
उत्तर:
निर्धनता रेखा से अभिप्राय उस रेखा से है जो प्रतिव्यक्ति औसत मासिक व्यय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की संतुष्टि कर सकें। इस रेखा के नीचे लोगों की निर्धन माना जाता है।

प्रश्न 10.
भारत में किस आधार पर निर्धनता रेखा को परिभाषित किया गया है?
उत्तर:
भारत में न्यूनतम दैनिक कैलोरी की मात्रा के आधार पर निर्धनता रेखा को परिभाषित किया गया है।

प्रश्न 11.
भारत के कितने लोग निर्धनता रेखा से नीचे रह रहे हैं?
उत्तर:
भारत में वर्तमान में लगभग 22 प्रतिशत लोग निर्धनता रेख से नीचे रह रहे हैं।

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प्रश्न 12.
भारत के किस राज्य में निर्धनता रेखा से नीचे जनसंख्या का प्रतिशत सबसे कम है?
उत्तर:
पंजाब राज्य में।

प्रश्न 13.
उन राज्यों के नाम बनायें, जहाँ लगभग रेखा से नीचे जनसंख्या का प्रतिशत सबसे कम है?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल तथा उड़ीसा में लगभग 70% लोग निर्धनता रेखा से नीचे रहते हैं।

प्रश्न 14.
1999-2000 में किन दो राज्यों के लोग निर्धनता रेखा के पास पाये गये?
उत्तर:
बिहार और उड़ीसा राज्य में।

प्रश्न 15.
1973 में गुजरात में कितने प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा के नीचे रहते थे?
उत्तर:
1973 में गुजरात में 48% लोग निर्धनता रेखा के नीचे रहते थे।

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प्रश्न 16.
1973-2000 में निर्धनता रेखा के नीचे रहने वाले लोगों में कितना प्रतिशत की कमी आई?
उत्तर:
15%

प्रश्न 17.
शहरी क्षेत्र में निर्धारित कैलोरी की मात्रा बतायें जिसके आधार पर निर्धन जनसंख्या का प्रतिशत किया जाता है।
उत्तर:
2100 कैलोरी।

प्रश्न 18.
ग्रामीण क्षेत्र में निर्धारित कैलोरी की मात्रा बताइये जिसके आधार पर निर्धन जनसंख्या का प्रतिशत निर्धारित किया जाता है।
उत्तर:
2400 कैलोरी।

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प्रश्न 19.
भारत में दो निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  1. जवाहर रोजगार योजना, तथा
  2. एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम

प्रश्न 20.
भारत में फैली भंयकर गरीबी के संकेत लिखें।
उत्तर:
भारत में फैली भंयकर गरीबी के संकेत हैं-शहरों में बढ़ती झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों का उमड़ता जमघट, पटरियों और नालों को अपना शयन कक्ष समझने वाला बढ़ता वर्ग, धूल, कीचड़ और गन्दी नालियों में खेलता बचपन।

प्रश्न 21.
किस व्यक्ति का निर्धन व्यक्ति कहते है?
उत्तर:
उस व्यक्ति को निर्धन व्यक्ति कहते हैं, जो जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्य के लिये न्यूनतम उपयोग आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता है।

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प्रश्न 22.
अप्रैल 1989 में किन दो कार्यक्रम ‘जवाहर रोजगार योजना’ आरम्भ किया गया?
उत्तर:
अप्रैल 1989 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP) और ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारन्टी कार्यक्रम (RLEGP) को मिलकर एक नया कार्यक्रम, “जवाहर रोजगार योजना” आरंभ किया गया।

प्रश्न 23.
निर्धनता उन्मूलन के निम्नलिखित उपक्रम कब आरंभ किये गये?
उत्तर:

  1. 15 अगस्त 1983
  2. अगस्त 1983 तथा
  3. अप्रैल 1989

प्रश्न 24.
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में 100 दिन का रोजगार कब कानूनी अधिकार बना?
उत्तर:
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र में 100 दिन का रोजगार 2 फरवरी 2006 ई. को कानूनी अधिकार बना।

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प्रश्न 25.
योजना आयोग ने किस आधार पर निर्धनता रेखा को परिभाषित किया है?
उत्तर:
भारत के योजना आयोग ने कैलारी-पान के अधार पर गरीबी रेखा को परिभाषित किया है।

प्रश्न 26.
शहरी क्षेत्र मे कौन निरन्तर (लगातार) निर्धनता बनाये हुए हैं?
उत्तर:
शहरी क्षेत्र में ठेला चलाने वाले, गली में एक तरफ बैठने वाले मोची, भिखारी, फूलों का हार बनाने वाली स्त्रियाँ, सिर पर टोकरी रखकर सामान बेचने वाले, कचरा आदि बुनने वाले शहरों क्षेत्रों में लगातार निर्धनता बनाये हुए हैं।

प्रश्न 27.
1999-2000 ई. में ग्रमीण क्षेत्र तथा शहरी क्षेत्र के लिये निर्धनता रेखा कैसे परिभाषित की गई थी?
उत्तर:
1999-2000 ई. में ग्रामीण क्षेत्र के लिये निर्धनता प्रति व्यक्ति 325 रुपये मासिक उपभोग तथा शहरी क्षेत्र के लिये प्रति व्यक्ति 454 रुपये मासिक उपभोग के रूप में परिभाषित की गई थी।

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प्रश्न 28.
शहरी क्षेत्र में पांच सदस्य वाले एक परिवार का मासिक उपभोग व्यय 2000 रुपये है। क्या यह परिवार निर्धनता रेखा के नीचे रह रहा है?
उत्तर:
हाँ; यह परिवार निर्धनता रेखा के नीचे रह रहा है क्योंकि यहाँ पर प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 400 रुपये है जो 454 रुपये से कम है।

प्रश्न 29.
निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम किस पंचवर्षीय योजना से आरम्भ किया गया था?
उत्तर:
निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम तृतीय पंचवर्षीय योजना से आरम्भ किया गया था।

प्रश्न 30.
प्रधानमंत्री रोजगार (PMRY) का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
प्रधानमंत्री रोजगार, योजना का उद्देश्य ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र के निम्न आय परिवार के शिक्षित बेरोजगारों को आर्थिक सहायता देना था ताकि वे अपना छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू कर सके।

प्रश्न 31.
स्वर्ण जयन्ती रोजगार योजना (SJSRY) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
स्वर्ण जयन्ती रोजगार योजना का मुख्य उद्देश्य है शहरी क्षेत्र में रहने वाले बेरोजगारों के लिये स्वरोजगार (Self employment) तथा मजदूरी के बदले रोजगार (Wage employment) देने की व्यवस्था करना।

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प्रश्न 32.
ग्रामीण रोजगार उत्पन्न कार्यक्रम (REGP) का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
आर० ई० पी० का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में स्वरोगार के लिये अवसर उत्पन्न करना है।

प्रश्न 33.
स्वरोजगार कार्यक्रम के तीन उदाहरण है?
उत्तर:

  1. स्वर्ण जयन्ती रोजगार (SISRY)
  2. प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY) तथा
  3. ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (REGP)

प्रश्न 34.
स्वरोजगार योजना के अन्तर्गत 1990 से पूर्व वित्तीय सहायता किनको प्रदान की जाती थी?
उत्तर:
स्वरोजगार योजना के अन्तर्गत 1990 से पूर्व वित्तीय सहायता व्यक्तियों या व्यक्तिगत परिवारों को दी जाती थी।

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प्रश्न 35.
भारत में निर्धनता की कोई दो विशेषतायें लिखें।
उत्तर:

  1.  शहरी क्षेत्र में निर्धनता मुख्यत: ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता का परिणाम है।
  2. भारत में निर्धनता की मात्रा भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न पाई जाती है।

प्रश्न 36.
कोई दो शहरी निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रधानमंत्री रोजगार योजना
  2. स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना

प्रश्न 37.
बेरोजगारी किस प्रकार निर्धनता से संबंधित है?
उत्तर:
निर्धनता के कारण काम करने वाले व्यक्ति पर आश्रितों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति उपभोग में कमी आ जाती है जो कि निर्धनता को इंगित करती है।

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प्रश्न 38.
वृद्धि लोगों तथा निर्धन महिलाओं की सहायता के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा कौन-सा कार्यक्रम आरंभ किया गया?
उत्तर:
वृद्ध लोगों तथा निर्धन महिलाओं की सहायता के लिये केन्द्रीय सरकार ने समाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme) आरम्भ किया।

प्रश्न 39.
देश में निर्धनता उन्मूलन के लिए सरकार ने अब तक कौन-कौन सी विधियाँ अपनाई?
उत्तर:
देश में निर्धनता उन्मूलन के लिये सरकार ने अब तक तीन विधियाँ अपनाई –

  1. आर्थिक विकास
  2. निर्धनता उन्मूलन कायक्रम तथा
  3. न्यूतम आवश्यकता कार्यक्रम

प्रश्न 40.
न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं (जैसे स्वास्थ्य सेवायें, पेयजल, विधुत, शिक्षा आदि) को उपलब्ध करवाना था। वह कार्यक्रम पांचवीं योजना के अन्तर्गत आरम्भ किया गया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आजकल किसान आत्महत्यायें क्यों कर रहे हैं?
उत्तर:
किसान अपने परिवार की आवश्यकताओं तथा भूमि जोतने के लिये महाजनों, साहूकारों तथा बैंको आदि (प्रायः किसान महाजनों से उधार लेते हैं क्योंकि बैंको की अपेक्षा उनसे ऋण लेना आसान होता है) से ऋण लेते हैं परन्तु वे ऋण वापस करने में असमर्थ होते हैं। साहूकरों से लिये गये ऋणों पर ब्याज की दर बहुत अधिक होती है। ऋण की राशि प्रतिदिन बढ़ती जाती है। किसान इन ऋणों को वापस देने में असमर्थ होते हैं। उनकी फसल बहुत कम होती है। वे फसलों की उचित कीमत भी नहीं प्राप्त कर पाते। प्राकृति विपदाओं से उनकी हालत और भी खराब हो जाती है। फलस्वरूप व अपने मानसिक संतुलन खो बैठता हैं और आत्महत्या कर लेते हैं।

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प्रश्न 2.
निर्धनता को दूर करने के लिए छः सुझाव दीजिए।
उत्तर:
निर्धनता को दूर करने के लिए कोई छः सुझाव (Six suggestions for the removel of proverty):

  1. निर्धनता को दूर करने के लिए सम्पति तथा आय के असमान वितरण को कम किया जाता चाहिए।
  2. लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास के लिये उपयुक्त सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  3. सरकार को सभी को न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये खाद्यान्न, मकान, शिक्षा स्वास्थ, यातायात आदि की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
  4. जिन परिवारों में कोई रोजगार प्राप्त व्यक्ति नहीं है, उनके लिए समाजिक सहायता कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए।
  5. स्वरोजगार संबंधी कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  6. निर्धनता को दूर करने के लिए जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारे निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम इच्छित परिणाम क्यों न प्राप्त कर सके? कारण लिखें।
उत्तर:
इच्छित परिणाम लाने में असफल के कारण (Causes of not achieving desirable results):

  1. दरस्थ क्षेत्रों की अवहेलना की गई।
  2. जिला अधिकारिक तथा बैंक प्रबंधकों में असहयोग की प्रवृति।
  3. अधिकांश सरकारी अधिकारियों का भ्रष्ट होना।
  4. निर्धनता के अ. की तुलना में इन कार्यक्रमों पर आवाटित संसाधनों की राशि अपर्याप्त थी।
  5. भूमि तथा अन्य सापतियों का असमान वितरण।
  6. कार्यक्रम से होने वाले लाभ निर्धनों को न मिलना।
  7. संसाधनों का अनुशलता से प्रयोग किया जाना।
  8. सरकारी अधिकारियों का पूर्णतः प्रशिक्षित न होना।
  9. स्थानीय लोगों का दवाव।

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प्रश्न 4.
मान लो शहरी क्षेत्र में निर्धनता रेखा प्रतिमास प्रति व्यक्ति 454 रूपये है। शहर में रहने वाले एक 10 सदस्यीय परिवार को सब साधनों से कुल मासिक आय 75,000 रुपये है। बतायें कि वह परिवार निर्धन रेखा के नीचे है या ऊपर?
उत्तर:
10 सदस्यों की मासिक आय – 75,000 रुपये
1 सदस्य की मासिक आय = 75,000/10 = 7,500
यह आय निर्धनता रेखा प्रतिमाह प्रति व्यक्ति आय से अधिक है। अत: यह दस सदस्यीय परिवार निर्धनता रेखा से ऊपर है।

प्रश्न 5.
निर्धनों के बच्चे दीर्घायु क्यों नहीं होते हैं?
उत्तर:
निर्धनों के बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिलता। उन्हें सुरक्षित पेय जल उपलब्ध नहीं होता। प्रायः एक समय का खाना उपलब्ध होता है। गर्भवती स्त्रियों की ठीक प्रकार से देखभाल नहीं हो पाती। अत: नवजात शिशु अस्वस्थ तथा कमजोर होता है। इलाज करवाने तथा दवाइयाँ खरीदने के लिये उसके पास पैसे नहीं होते। उन्हें घातक रोग लग जाते हैं जो उनकी जल्दी मृत्यु का कारण बनते हैं। अतः निर्धनों के बच्चे दीर्घायु नहीं होते।

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प्रश्न 6.
अधिसूचित जिलों के परिवार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अर्न्तगत किन अधिकारों का उपभोग कर सकते हैं?
उत्तर:
अधिसूचित जिलों के परिवार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं –

  1. रोजगार की मांग करने का अधिकार।
  2. अनुरोध करने के 15 दिन के भीतर रोजगारी भत्ता पाने का अधिकार।
  3. अगर 15 दिन के अन्दर रोजगार न मिले तो बेरोजगार भत्ता पाने का अधिकार।
  4. राज्य में लागू मजदूरी की वैधानिक दर से मजदूरी पाने का अधिकार।
  5. कार्यस्थल पर नीचे का पानी, बच्चों के लिये आश्रम, प्राथमिक चिकित्सा जैसी सुविधायें। प्राप्त करने का अधिकार।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की विशेषताएँ (Features of National Rural Employment Guarantee Act):

  1. यह अधिनियम केवल एक कार्यक्रम ही नहीं अपितु एक कानून है जिसके अन्तर्गत रोजगार हासिल करने की कानूनी गारंटी दी गई है।
  2. इसके नियोजन तथा क्रियान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूनिका होगी।
  3. इसमें संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, सामाजिक लेखा परिक्षा और लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जायेगी।
  4. शिकायत निवारण प्रणाली की भी व्यवस्था की जायेगी।
  5. इसका लाभ उठाने वालों में से एक-तिहाई महिलाएँ होगी।
  6. अधिसूचित क्षेत्रों में अकुशल मजदूरों का कार्य करने का इच्छुक कोई भी व्यक्ति रोजगार के लिए ग्रामसभा में पंजीकरण हेतु आवेदन कर सकता है। इसके बाद उसे जॉब कार्ड Jokatest card) दे दिया जायेगा।
  7. जॉब कार्ड एक कानूनी दस्तावेज है जिसमें पंजीकृत व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत रोजगार के लिये आवेदन करने का हकदार हो जाता है।
  8. पंजीकरण वर्ष भर खुला रहेगा।
  9. रोजगार आवेदक के घर से पाँच किलोमीटर के दायरे में दिया जायेगा। ऐसा संभव न होने पर अतिरिक्त मजदूरी दी जायेगी।

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प्रश्न 2.
भारत में निर्धनता के मुख्य कारण समझाइये।
उत्तर:
योजना आयोग्य ने भारत में बेरोजगारी, अल्प रोजगार और कमजोर साधन के आधार को गरीबी का प्रमुख कारण माना है –

  1. आर्थिक कारक (Economic Factors)
  2. सामाजिक कारक (social Factors)
  3. राजनैतिक कारक (Political Factors)

1. आर्थिक कारक (Economic Factors):

बेरोजगारी (Unemployment):
भारत में गरीबी का प्रमुख कारण देश में भीषण बेरोजगारी की समस्या है। इस समय देश में करीब 6. कारोड़ लोग बेरोजगार हैं।

जनसंख्या में तेजी से वृद्धि (Rapid) Growth in Population):
भारत में जनसंख्या का आकार न केवल बड़ा है, अपितु इसमें होने वाली वृद्धि होने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय एवं व्यक्ति आय एवं उपभोग स्तर में कोई खास वृद्धि नहीं हो रही है।

आय का असमान वितरण (Unequal Distribution of Income):
भारत में आय के असमान वितरण को गरीबी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

उत्पादन में कम वृद्धि (Lass increase in Production):
देश में योजना काल के दौरान कृषि व उद्योग क्षेत्रों में उत्पादन में जितनी वृद्धि होनी चाहिए थी, उतानी नहीं हुई। इसका प्रमुख कारण है भारत में पुरानी और घटियाँ उत्पादने विधियों का प्रयोग किया जाना।

कीमत स्तर पर वृद्धि (Rise in Price Levle):
भारत में कीमत स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही है। 1950-51 ई० से 1996-97 ई० तक की अवधि में सामान्य कीमत में 16 गुना वृद्धि हुई है। अतः क्रयशक्ति घट जाने से बहुत से लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये हैं।

कृषि का पिछड़ापन (liackwardness of Agriculture):
भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि प्रधान रही है लेकिन भारतीय कृषि की दशा अत्यन्न शोचनीय है। भारत में कृषि के पिछड़ेपन के कारण प्रति हेक्टेयर एवं प्रतिव्यक्ति उत्पादकता विश्व के विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम है। ऐसी स्थिति में किसानों का गरीब होना स्वाभाविक है।

2. सामाजिक कारक (Social Factors):
भारत में समाजिक ढांचा भी गरीब के लिए जिम्मेदार है। व्यापक निरक्षरता, अज्ञानता, भाग्यवाद, अन्धविश्वास आदि ने देश के आर्थिक विकास में बाधाएं उत्पन्न की है। लोग परिश्रम की बजाय भाग्य में अधिक विश्वास रखते हैं। समाजिक रीति-रिवाजों के कारण वे विवाह, मृत्युभोज आदि पर कई बार अपनी समार्थ्य से बाहर व्यय कर देते हैं।

3. राजनैतिक कारक (Political Factors):
भारत में लंबे समय तक अंग्रेजों का गुलाम रहा। अंग्रेजों ने अपने शासन काल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का खूब जमकर शोषण किया और इसके परम्परागत विश्व-विख्यात उद्योगों को पूर्णत: नष्ट कर दिया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भातीय अर्थव्यवस्था अत्यन्त निर्धन एवं पिछड़ी हुई दशा में थी जिससे अभी तक हम संभल नहीं पाए हैं।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता

प्रश्न 3.
जवाहर रोजगार योजना पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
28 अप्रैल, 1989 ई० को जवाहर रोजगार योजना आरंभ की गई है। इस योजना का लक्ष्य प्रत्येक निर्धन. ग्रामीण परिवार के कम से कम एक सदस्य को उसके घर के नजदीक कार्यस्थल पर प्रति वर्ष 50 से लेकर 100 दिनों तक रोजगार देना है। योजना की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. यह योजना केन्द्र प्रायोजित है जिसे राज्य सरकार द्वारा कार्यन्वित किया जाता है।
  2. जवाहर रोजगार योजना का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी तथा अल्प रोजगार वाले पुरूषों तथा महिलाओं के लिए अतिरिक्त लाभकारी रोजगार सृजन करना है।
  3. योजना पर होने वाल व्यय को केन्द्र तथा राज्यों द्वारा 80 व 20 के अनुपात में वहन किया जाता है।
  4. जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले लोग लक्षित समूह माने गए हैं।
  5. योजना के अन्तर्गत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मुक्त बन्धुआ मजदूरों को प्राथमिकता दी जाती है।
  6. रोजगार के 30 प्रतिशत अवसरों को महिलाओं के लिए आरक्षित रखा गया है।

प्रश्न 4.
गरीबी निवारण कार्यक्रमों को लागू करने की क्या आवश्यकता थी? इन्हे पहल क्यों नहीं आरम्भ किया?
उत्तर:
प्रारंभिक योजना काल में यह समझा गया था कि विकास के लाभ बेहतर मजदूरी, बेहतर रोजगार के अवसर, बेहतर उत्पादकता तथा अधिक उत्पादन के रूप में छनकर नीचे तक (percolate down) जाते हैं। ऐसा माना गया है कि 10% जनसंख्या (जो उत्पादक माध्यमों द्वारा अर्थव्यवस्था से सुसंबद्ध नहीं) के लिये विशेष प्रयासों की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए खाद्यान्नों जैसी आवश्यक वस्तुओं को आर्थिक सहायता दी गई।

विलासिता उपभोग मदों की वस्तुओं पर ऊँची दरों पर कर लगाये गए। दूसरे शब्दों में पुनः वितरण की दशा में काफी प्रयास किये गये। साठ के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया कि विकास तथा पुनः वितरण की दिशा में उठाने गये उपायों के परिणाम सीमित रहेंगे यदि कुछ व्यावसायिक स्तरों और सामाजिक वर्गों की सहायता करने के लिए कुछ विशेष संपूरक कार्यक्रम शुरू न किये गये। अतः गरीबी निवारण कार्यक्रमों को लागू किया गया।

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प्रश्न 5.
भारत में गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार ने कौन-कौन से कदम उठाए हैं? उनका संपेक्ष में वितरण दें।
उत्तर:
सरकार ने पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत निर्धनता को दूर करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं –
1. लघु तथा कुटीर उद्योग (Small and cottage Industries):
सरकार ने निर्धनता तथा बेरोजगारी को कम करने के लिए लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास के लिये विशेष प्रयत्न किये हैं। स्वयं रोजगार योजना (Self Employment Scheme) को प्रोत्साहन देने के लिए काफी धन व्यय किया जा रहा है।

2. जवाहर ग्राम समृद्धि (Jawahar-Gram Samridhi Yojana):
अप्रैल, 1999 से जवाहर रोजगार योजना के स्थान पर एक अन्य व्यापक योजना जवाहर ग्राम समृद्धि योजना आरंभ की गई है। इसके अन्तर्गत गाँवों में गरीबों को निरंतर रोजगार प्रदान करने के लिए स्थायी परिसम्पत्तियों तथा बुनियादी ढाचे का निमार्ण किया जायेगा। यह योजना ग्राम पंचायतों द्वारा लागू की जाती है।

3. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (Minimum Needs Programme):
पांचवी योजना में निर्धन लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम लागू किया गया है। वे हैं-प्रारंभिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, ग्रामीण स्वास्थ, ग्रामीण सड़कें आदि।

4. नेहरू रोजगार योजना (Nheru Employment Scheme):
श्री जवाहर लाल नेहरू का जन्म शताब्दी के अवसर पर सरकार ने शहरी क्षेत्र के निर्धन लोगों को रोजगार दिलाने के लिए नेहरू रोजगार योजना आरंभ की थी। इसके अन्तर्गत शहरी क्षेत्र के बेरोजगार व्यक्तियों को
रोजगार दिलाने की व्यवस्था की जाती है।

5. बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम (Twenty Point Programme):
आम जनता को खुशहाल बनाने तथा गरीबी के बंधन से मुक्त कराने के लिए नया बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम 1982 ई० से शुरू किया गया। इसकी प्रस्तावना में कहा गया, “निर्धनता के विरूद्ध सेघर्ष हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। 20 सूत्रीय कार्यक्रम योजना की वह तेज धार है जो निर्धनता को काट देगी।” संशोधित कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य गरीबी को दूर करना, उत्पादकता को बढ़ना, आय की असमानताओं में कमी और समाजिक एवं आर्थिक असमानताओं का निवारण कर जीवन स्तर – में वृद्धि लाना है।

6. प्रधानमंत्री रोजगार योजना (Prime Minister Rozgar yojana):
यह योजना शिक्षत बेरोजगारों युवाओं को रोजगार देने के लिए बनाई गई है। इस योजना के अन्तर्गत 1999 तक 9.7 लाख लोगों को रोजगार दिया गया।

7. रोजगार बीमा योजना (Employment Assurance Scheme):
यह योजना 1994 में आरंभ की गई। यह योजना सभी ग्रामीण खण्डों में लागू की जा रही है, जहाँ संशोधित सार्वजनिक वितरण प्रणाली प्रचलित है। इस योजना का लक्ष्य रोजगार को तलाश करने वाले ग्रामीण इलाकों में गरीब लोगों को विशेष रूप से कृषि संबंधी कार्य में मंदी वाले मौसम में रोजगार प्रदान करना है।

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प्रश्न 6.
स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना-पूर्व में चल रही छ: योजनाओं का विलय करके:

  1. समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRCP)
  2. स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण (ट्राइसेस)
  3. ग्रामीण महिला एवं बालोत्थान योजना
  4. दस लाख कूप निर्माण योजना (MWS)
  5. उन्नत टूल किट योजना (SITRA)
  6. गंगा कल्याण योजना 1 अप्रैल, 1999 से आरम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य सहायता प्राप्त गरीब परिवारों (स्वरोजगारी) को बैंक ऋण एवं सरकारी सब्सिडी के माध्यम से स्व-सहायता समूहों में संगठित करके गरीबी रेखा से ऊपर लाना है।

विशेषताएं (Features):
इस योजना की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित हैं –

  1. इस योजना (SGSY) का मुख्य उद्देश्य गाँवों के गरीब लोगों को स्वरोजगार के अवसर प्रदान कने के लिए लघु उद्योगों को बढ़ावा देना है।
  2. इस योजना के अंतर्गत गांवों में भारी संख्या में छोटे-छोटे लघु उद्योगों को बढ़ावा देना है।
  3. यह योजना छोटे उद्यमों का एक सम्पूर्ण कार्यक्रम है। इसके अन्तर्गत स्वरोजगार से संबंधित निम्नलिखित कार्यक्रम शामिल किये गये हैं –
    • ग्रामीण गरीबों को आत्मनिर्भर समूहों में संगठित करके उनकी क्षमता का निमार्ण करना।
    • इस कार्यक्रम के अन्तर्गत आने वाले लोगों को अपना उद्यम स्थापित करने के लिये बैंको से ऋण तथा सरकारी सहायता दी जायेगी।
    • इस योजना पर खर्च किया जाने वाला धन केन्द्रीय तथा राज्य सरकारें 75 : 25 के अनुपात में बाँटेंगी।
    • यहाँ योजना जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों द्वारा पंचायत समितियों के माध्यम से लागू क जायेगी।

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प्रश्न 7.
निर्धन परिवारों की कुछ विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
निर्धन परिवारों की विशेषताएँ (Characteristics ofpoor familles):
निर्धन परिवारों से अभिप्राय उन परिवारों से है जो जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्य कुशलता के लिये न्यूनतम आवश्यकताओं को प्राप्त करने में असमर्थ हो। इन न्यूनतम आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम मानवीय आवश्यकताएं शामिल होती हैं। इन मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ती न होने से मनुष्य को पीड़ा होती है। स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता में हानि होती है। निर्धन परिवारों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. मकान (House):
निर्धन परिवारों के मकान प्रायः कच्चे होते हैं। इन घरों की दीवारें पकी हुई मिट्टी की बनी होती हैं और छते घास-फूस की बनी होती हैं। कई निर्धन परिवरों को यह भी नसीब नहीं होता। वे सांझी जमीन पर रहते हैं। बहुत अधिक निर्धन परिवारों के पास जमीन भी नहीं होती है।

2. सम्पत्ति (Assets):
निर्धन परिवारों क पास बहुत ही कम सम्पत्ति होती है। कई बार निर्धन परिवारों के पास तो रहने के लिये भी जमीन नहीं होती। वे प्रायः भूमिहीन होते हैं। उनकी आय इतनी कम होती है कि वे उस आय से अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर सकते। सबसे अधिक निर्धन परिवार तो भूख से मरते हैं। निर्धन व्यक्तियों को स्थायी रूप से रोजगार नहीं मिलता। उन्हें गैर-कृषि क्षेत्र में भी काम नहीं मिलता।

3. स्वास्थ (Health):
निर्धन परिवार प्रायः रोगों से घिरे होते हैं। दवाइयां लेने के लिये उनके पास पैसे नही होते। पौष्टीक भोजन खरीद नहीं सकते। निर्धन परिवारों में गैर-पौष्टिकता बहुत ही अधिक होती है। बुरा स्वास्थ्य, अपंगता तथा भयंकर बीमारियां उन्हें शरीरिक रूप से कमजोर बनाती हैं। इससे उनमें कार्य करने की शक्ति कम हो जाती है।

4. ऋणग्रस्त (Indebtness):
अल्प आय के कारण वे अपनी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते। वे इलाज कराने और खाद्य पदार्थ खरीदने के लिये साहूकारों (Moneylenders) से ऋण लेते हैं। वे सिर से पैर तक कर्ज में डूबे रहते हैं। एक बार ऋण लेने पर वे साहूकार के जाल में फंस जाते हैं।

5. शिक्षा (Education):
निर्धन परिवार के सदस्य अशिक्षित होते हैं। उन्होंने स्कूल का मुँह तक नहीं देखा। निर्धन परिवार के सदस्य बचपन से ही धन-अर्जन के लिये छोटा-मोटा काम करना आरंभ कर देते हैं। उनमें साक्षरता तथा निपुणता का अभाव होता है। वे अन्धविश्वासी, अज्ञानी तथा भाग्य में विश्वास रखने वाले होते हैं।

6. बड़ा परिवार (Big Families):
निर्धन परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होती है। वे छोटे परिवार के महत्त्व को नहीं समझते। निर्धन परिवारों में आश्रित सदस्यों की संख्या अधिक होती है। इन आश्रित सदस्यों में छोटे बच्चे, बूढ़े तथा बीमार लोग होते हैं।

7. सुविधाओं का अभाव (Lock of facilities):
निर्धन परिवरों में विधुत नहीं होती। वे खाना बनाने के लिये लकड़ी तथा गोबर का प्रयोग करते है। उन्हें पीने के लिए सुरक्षित पानी उपलब्ध नही होता।

8. अधिकतम लिंग भिन्नता (Extreme Gender Inequality):
निर्धनों परिवारों में लड़कों तथा लडकीयों में बहुत अन्तर समझा जाता है। स्कूल भेजने मे लड़कियों की अपेक्षा लड़को को अधिक महत्त्व दिया जाता है। परिवार में निर्णय लेने में पुरुषों का अधिक हाथ होता है। लड़कियों तथा औरतों के स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता।

9. अन्य विशेषताएँ (Other features):
अधिकांश निर्धन परिवारों को मत देने का अधिकार नहीं होता। वे शक्ति हीन तथा मूक होते है। वे सेवाओं तथा संसाधनों को उपलब्ध कराने में सरकार को प्रभावित करने में समर्थ नहीं होते। सरकार तक उनकी पहुँच नगण्य होती है। निर्धन व्यक्तियों का उनके मालिकों द्वारा शोषण किया जाता है।

निर्धनता के संदर्भ में Shaheen Rafi the Damian Killen लिखते हैं – “निर्धनता भूख है, निर्धनता रोग की अवस्था में डॉक्टर के पास जाने की असमर्थता है।”

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प्रश्न 8.
निर्धनता रेखा को कैसे निर्धारित किया जाता है?
उत्तर:
निर्धनता रेखा का निर्धारण (Determinationof Poverty Line):
निर्धनता दो आधार पर मापा जा सकता है –
1. पूर्ण रूप से तथा

2. सापेक्षिक रूप से। निर्धनता पूर्ण रूप से मापने के लिए पहले निश्चित किया जाता है कि एक व्यक्ति को कम से कम आवश्यकता कितने पदार्थों की है। दूसरा अनुमान यह लगाया जाता है कि उतने पैसे कितने व्यक्तियों के पास नहीं हैं। ऐसे सभी व्यक्ति निर्धनता रेखा के अन्तर्गत आते हैं, जिनके पास उपभोग की आवश्यक वस्तुओं को जुटाने के लिये साधन नहीं है।

3. भारत में निर्धारित न्यूनतम कैलोरी की मात्रा के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि कोई व्यक्ति निर्धन है या नहीं। वह व्यक्ति जिसके पास इतनी राशि उपलब्ध नहीं है जिससे वह उतनी वस्तुएं खरीद सके जिसके उपभोग करने पर. उसकी निर्धारित न्यूनतम कैलोरी की मात्रा उपलब्ध हो निर्धन कहलाता है। अथवा निर्धनता रेखा के नीचे आता है।

4. योजना आयोग ने निर्धनता रेखा के लिए वर्तमान अधार के अनुसार प्रति व्यक्ति के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 2400 कैलोरी प्रतिदिन और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलारी प्रतिदिन की मात्रा निर्धारित की है। 1999-2000 ई० में ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रतिमाह 328 रुपया के उपभोग तथा शहरी क्षेत्र के लिए प्रतिमाह 454 रुपये के उपभोग को निर्धारित रेखा के रूप में परिभाषित किया गया है।

5. मान लिजिए कि राम का परिवार शहर में रहता है। उसके 5 सदस्यों के परिवार का मासिक उपभोग व्यय 2000 रुपये हैं। ऐसी अवस्था में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 400 रुपये हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि राम का परिवार निर्धनता रेखा के नीचे रहता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नीति/योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए गरीबी रेखा का निर्धारण होना चाहिए –
(a) बहुत ऊँचा
(b) बहुत नीचा
(c) न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा

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प्रश्न 2.
भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण करने के लिए प्रयोग किया जाता है –
(a) आय को
(b) उपभोग को
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) उपभोग को

प्रश्न 3.
भारत में ग्रामीण लोगों के लिए आवश्यक कैलोरी मान है –
(a) 2400
(b) 2100
(c) 2500
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 2400

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प्रश्न 4.
शहरी भारतीयों के लिए आवश्यक औसत कैलोरी मान है –
(a) 2400
(b) 2100
(c) 2500
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 2100

प्रश्न 5.
1999-00 में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत था –
(a) 27.1
(b) 27.6
(c) 26.1
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 27.1

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प्रश्न 6.
1999-00 में भारत में गरीबी का स्तर था –
(a) 27.1
(b) 27.6
(c) 26.1
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 26.1

प्रश्न 7.
भारत वर्ष में विकास प्रखण्डों की संख्या है –
(a) 4000
(b) 5000
(c) 6000
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 4000

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प्रश्न 8.
समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम शरू किया गया –
(a) 1983 में
(b) 1980 में
(c) 1989 में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 1980 में

प्रश्न 9.
मजदूरी रोजगार कार्यक्रम एवं मजदूरी रोजगार योजना एकीकरण किया गया –
(a) 1983 में
(b) 1980 में
(c) 1989 में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 1989 में

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प्रश्न 10.
मजदूरी रोजगार कार्यक्रम एवं मजदूरी रोजगार योजना एकीकरण करके नाम रखा गया –
(a) जवाहर रोजगार
(b) ग्रामीण समृद्धि योजना
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जवाहर रोजगार

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी पर जीवन Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं …………….
(क) केवल पौधे
(ख) केवल प्राणी
(ग) सभी जैव व अजैव जीव
(घ) सभी जीवित जीव
उत्तर:
(ग) सभी जैव व अजैव जीव

प्रश्न 2.
उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं …………….
(क) प्रेचरी
(ख) आयरन ऑक्साइड
(ग) सवाना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) सवाना

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प्रश्न 3.
चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है ……………..
(क) आयरन कार्बोनेट
(ख) आयरन ऑक्सइड
(ग) आयरन नाइट्राइट
(घ) आयरन सल्फेट
उत्तर:
(घ) आयरन सल्फेट

प्रश्न 4.
प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है ………………
(क) प्रोटीन
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) एमिनोएसिड
(घ) विटामिन्स
उत्तर:
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जीवधारियों के आपस में व उनका भौतिक पर्यावरण के अंतर्सम्बन्धों का वैज्ञानिक अध्ययन ही पारिस्थितिकी है। पारिस्थितिकी ही प्रमुख रूप से जीवधारियों के जन्म, विकास, वितरण, प्रवृत्ति व उनके लिए प्रतिकूल अवस्थाओं में भी जीवित रहने से सम्बन्धित है, तथा भूमि, जल और वायु में क्रियाशील ऊर्जा प्रवाह और पोषण श्रृंखला का भी अध्ययन पारिस्थितिकी है।

प्रश्न 2.
पारितंत्र (Ecological System) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएँ।
उत्तर:
किसी विशेष क्षेत्र में किसी विशेष समूह के जीवधारियों का भूमि, जल अथवा वायु (अजैविक तत्त्वों) में ऐसा अंतर्सम्बन्ध जिसमें ऊर्जा प्रवाह व पोषण श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से समायोजित हों, उसे पारितंत्र (Ecological System) कहा जाता है। प्रमुख पारितंत्र दो प्रकार के हैं-स्थलीय (Terrestrial) पारितंत्र व जलीय (aquatic) पारितंत्र। वन, घास, क्षेत्र, मरुस्थलीय और टुण्ड्रा (Tundra) संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र हैं।

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प्रश्न 3.
खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य श्रृंखला का एक उदाहरण देते हुए उसके अनेक स्तर बताएं?
उत्तर:
प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ताओं के भोजन बनते हैं। द्वितीयक उपभोक्ता फिर तृतीयक उपभोक्ताओं के द्वारा खाए जाते हैं। यह खाद्य क्रम और इस क्रम से एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा प्रवाह ही खाद्य शृंखला (food chain) कहलाती है। चराई खाद्य श्रृंखला पौधों (उत्पादक) से शुरू होकर मांसाहारी (तृतीयक उपभोक्ता) तक जाती है, जिसमें शाकाहारी मध्यम स्तर पर हैं। हर स्तर पर ऊर्जा का हास होता है जिसमें श्वसन, उत्सर्जन व विघटन प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। खाद्य श्रृंखला में तीन से पांच स्तर होते हैं और हर स्तर पर ऊर्जा कम होती है।

उदाहरण –

  • घास → हिरण → शेर।
  • घास → कीट → मेढ़क → पक्षी।

प्रश्न 4.
खाद्य जाल (food wed) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएँ।
उत्तर:
खाद्य श्रृंखलाएँ पृथक अनुक्रम पर होकर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने को खाद्य जाल (food web) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-एक चूहा जो अन्न पर निर्भर है, वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीयक मांसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक माँसाहारी जीव एक से अधिक प्रकार के शिकार पर निर्भर हैं।

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प्रश्न 5.
बायोम (Biome) क्या है?
उत्तर:
किसी भौगोलिक क्षेत्र में समस्त पारिस्थितिक तंत्र एक साथ मिलकर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण करते हैं जिसको बायोम (Biome) कहते हैं। उदाहरण के लिए मरुस्थली बायोम या वन बायोम में कोई तालाब,
झील, घास का मैदान या वन भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 1.
संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थिति तथा विस्तार – सदाबहार वर्षा वन बायोम पादप तथा प्राणियों के विकास तथा वृद्धि के लिए अनुकूलतम दशायें प्रदान करता है क्योंकि इसमें वर्ष भर उच्च वर्षा तथा तापमान रहता है। इसी कारण से इसे अनुकूलतम बायोम (Opotimum biome) कहते हैं। इस बायोम का सामान्यतः विस्तार 10° . तथा 10° द. अक्षाशों के मध्य स्थित है।

प्रश्न 2.
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeo-chemical cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है, वर्णन करें?
उत्तर:
सूर्य ऊर्जा का मूल स्रोत है जिस पर सम्पूर्ण जीवन निर्भर है। यही ऊर्जा जैवमंडल में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा जीवन प्रक्रिया आरम्भ करती है, जो हरे पौधे के लिए भोजन व ऊर्जा का मुख्य आधार है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन व कार्बनिक यौगिक में परिवर्तित हो जाती है। धरती पर पहुंचने वाले सूर्यातप का बहुत छोटा भाग (केवल 0.1 प्रतिशत) प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में काम आता है इसका आधे से अधिक भाग पौंधे की श्वसन-विसर्जन क्रिया में और शेष भाग अस्थाई रूप से पौधे के अन्य भागों में संचित हो जाता है।

विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 करोड़ वर्षों में वायुमंडल व जलमंडल की संरचना में रासायनिक घटकों का संतुलन लगभग एक जैसा अर्थात् बदलाव रहित रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह संतुलन पौधे व प्राणी ऊतकों से होने वाली चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। यह चक्र जीवों द्वारा रासायनिक तत्त्वों के अवशोषण से आरम्भ होता है और उनके वायु, जल व मिट्टी में विघटन से पुनः आरम्भ होता है। ये चक्र मुख्यत: सौर ताप से संचालित होते हैं।

जैवमंडल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच ये कहे जाते हैं। जैव भू-रासायनिक चक्र के दो प्रकार हैं-एक गैसीय (gaseous cycle) और दूसरा तलछटी चक्र (Sedimentary cycle)। गैसीय चक्र में पदार्थ का मुख्य भंडार/स्रोत वायुमंडल व महासागर हैं। तलछटी चक्र के प्रमुख भंडार पृथ्वी की भूपर्पटी पर पाई जाने वाली मिट्टी तलछट व अन्य चट्टानें हैं।

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प्रश्न 3.
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर:
किसी पारितंत्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक संतुलन है। यह तभी संभव है जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे  क्रमशः परिवर्तन भी हो, लेकिन ऐसा प्राकृतिक अनुक्रमण (natural succession) के द्वारा । ही होता है। इसे पारितंत्र मे हर प्रजाति की संख्या के एक स्थाई संतुलन के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है।

यह संतुलन निश्चित प्रजातियों में प्रतिस्पर्धा व आपसी सहयोग से होता है। कुछ प्रजातियों के जिंदा रहने के संघर्ष से भी पर्यावरण संतुलन प्राप्त किया जाता है। संतुलन इस बात पर भी निर्भर करता है कि कुछ प्रजातियाँ अपने भोजन व जीवित रहने के लिए दूसरी प्रजातियों पर निर्भर रहती हैं इसके उदाहरण विशाल घास के मैदानों में मिलते हैं जहाँ शाकाहारी जंतु अधिक संख्या में होते हैं। दूसरी तरफ मांसाहारी कम संख्या में होते हैं तथा शाकाहारियों के शिकार पर निर्भर होते हैं, अत: इनकी संख्या नियंत्रित रहती है।

पारिस्थितिक असंतुलन के कारण हैं-नई प्रजातियों का आगमन, प्राकृतिक विपदाएँ और मानव जनित कारक भी हैं। मनुष्य के हस्तक्षेप से पादप समुदाय का संतुलन प्रभावित होता है जो अन्तोगत्वा पूरे पारितंत्र के संतुलन को प्रभावित करता है। इस असंतुलन से कई अन्य द्वितीयक अनुक्रमण आते हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर जनसंख्या दबाव से भी पारिस्थितिक बहुत प्रभावित हुई है। इसने पर्यावरण के वास्तविक रूप को लगभग नष्ट कर दिया है और सामान्य पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव डाला है। पर्यावरण असंतुलन से ही प्राकृतिक आपदाएँ जैसे-बाढ़, भूकंप, बीमारियाँ और कई जलवायु सम्बन्धी परिवर्तन होते हैं।

विशेष आवास स्थानों में पौधों व प्राणी समुदायों में घने अंतर्सम्बन्ध पाए जाते हैं। निश्चित स्थानों पर जीवों में विविधता वहाँ के पर्यावरणीय कारकों का संकेतक है। इन कारकों का समुचित ज्ञान व समझ ही पारितंत्र व संरक्षण के बचाव के प्रमुख आधार हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
प्रत्येक बायोम की प्रमुख विशेषताओं को बताते हुए विश्व के मानचित्र पर विभिन्न बायोम के वितरण दर्शाइए।
उत्तर:
सवाना बायोम –
जलवायु – सवाना बायोम की जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ हैं-स्पष्ट शुष्क तथा आई ऋतुएँ, वर्ष भर ऊँचा तापमान तथा अधिक सूर्यातप। औसत वार्षिक वर्षा 500 से 2000 मिलीमीटर के बीच होती है तथा किसी भी महीने में तापमान 20° सेंटीग्रेड से नीचे नहीं जा पाता है। आईता तथा तापमान के आधार पर तीन ऋतुएँ होती हैं (मोटे तौर पर दो ही ऋतुएँ होती हैं परंतु तापमान के आधार पर शुष्क ऋतु को गर्म एवं शीत दो उपभागों में विभक्त कर लिया जाता है)। शीत शुष्क ऋतु-दिन का तापमान ऊँचा रहता है, 26°से 32° सेण्टीग्रेड। रात्रि में यह कम होकर 21°सेण्टीग्रेड हो जाता है।

उष्ण शुष्क ऋत-सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं. सूर्यातप अधिकाधिक प्राप्त होने के कारण तापमान 32° से 38° सेण्टीग्रेड के बीच रहता है तथा उष्णतर ऋतु-सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा का 80 से 90 प्रतिशत स्तर वर्षाकाल में ही प्राप्त होता है। ज्ञातव्य है कि भूमण्डल के विभिन्न सवाना प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में पर्याप्त अंतर होता है, जो धरातलीय बनावट तथा भूमध्यरेखा से दूरी के कारण होता है। यथा-ब्राजील के सवाना प्रदेश (इसे स्थानीय भाषा में Cerrado कहते हैं, इस प्रदेश का उच्चावच सागरतल से 1300 मीटर के बीच है) में औसत वार्षिक तापमान 20 से 26° सेण्टीग्रेड तथा औसत वार्षिक वर्षा 750 से 2000 मिलीमीटर (एण्डीज के पास) तक होती है जिसका 90 प्रतिशत भाग 7(उत्तरी भाग में) से 11 (दक्षिणी भाग में) महीनों वाली आई तथा शुष्क ऋतु में प्राप्त होता है।

औसत वार्षिक तापमान 22° सेण्टीग्रेड तथा अधिकतम तापमान 32° सेण्टीग्रेड होता है परंत मासिक अंतर 2 सेण्टीग्रेड से। कम होता है। इसके विपरीत भारतीय सवाना में अधिकतम तापमान (मई तथा जून में) 45° से 48° सेण्टीग्रेड एवं न्यूनतम तापमान (जनवरी में) 5° सेण्टीग्रेड या उससे भी कम हो जाता है, औसत वार्षिक वर्षा 1500 मिलीमीटर से भी कम होती है तथा इसका 80 से 90 प्रतिशत भाग 15 जून से 15 सितम्बर के मध्य प्राप्त हो जाता है।

बनस्पति समुदाय-सवाना बायोम में घासों का बाहुल्य होता है। घासें तथा अन्य शाकीय पौधे (herbaceous plants) वनस्पति समुदाय के लम्बवत् स्तरीकरण के सबसे नीचले स्तर (धरातलीय स्तर) का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरा (मध्यवर्ती) स्तर झाड़ियों का तीसरा (सबसे ऊपरी स्तर) वृक्षों का होता है। सवाना बायोम में घासें सर्वप्रधान होती है जिनकी बनावट स्थूल (coarse) तथा कड़ी होती हैं। इनकी पत्तियाँ चपटी होती हैं तथा इनकी (घासों की) ऊँचाई 80 सेण्टीमीटर तक या उससे अधिक होती है।

घासों में सर्वप्रथम तथा सर्वोच्च हाथी घास (elephant grass) होती है जिसकी ऊंचाई 5 मीटर तक होती है। इनका आकार गुच्छेदार होता है। ज्ञातव्य है कि समस्त धरातल घासों के सतत आवरण से ढका नहीं होता है, अपितु बीच-बीच में नग्न धरातल भी होता है। इन घासों की पत्तियों की बनावट (चपटी तथा बड़े आकार की) ऐसी होती है कि इनसे वाष्पोत्सर्जन (transpiration) शुष्क तथा तर सभी ऋतुओं में तीव्र गति से होता है, अतः शल्क मौसम में ये अपनी पत्तियाँ गिरा देती हैं तथा घास आवरण खुला तथा विरल हो जाता है, परंतु आई मौसम के आते ही इनमें पुनः हरी पत्तियाँ तेजी से निकल आती हैं तथा वे पुनः हरी-भरी हो जाती हैं। इन घासों की जड़ें बारीक शाखाओं एवं प्रतिशाखाओं के घने जाल वाली होती हैं। जो लगभग 2.5 मीटर की गहराई तक मिट्टियों में प्रविष्ट हो जाती है।

वृक्षों का स्वभाव जल की सुलभता पर निर्भर करता है कुछ ऐसी विशिष्ट प्रजातियाँ होती हैं जिनकी संरचना इस प्रकार की होती हैं कि शुष्क मौसम में पत्तियों द्वारा होने वाला सदाबहार स्वभाव को बनाये रहती हैं। कुछ वृक्षों की प्रजातियों में स्टोमैट को बंद करके शुष्क मौसम में जल संचित करने के गुण नहीं होते हैं। ऐसे वृक्षों की पत्तियाँ शुष्क मौसम में गिर जाती हैं तथा ये वृक्ष पर्णपाती वृक्षों की श्रेणी में आते हैं। वृक्षों की जड़ें सवाना प्रदेश के शुष्क एवं तर मौसमों के मुताबिक होती हैं, अर्थात् ये इतनी लम्बी होती हैं कि शुष्क मौसम में भौम जल स्तर (ground water table) से जल प्राप्त कर सकें। सामान्य रूप में इनकी जड़ें 5 से 20 मीटर की गहराई तक धरातल में प्रविष्ट होती हैं। H. Watter (1971) ने कुछ झाड़ियों को (tamrix SPP) 50 मीटर लम्बी जड़ों का उल्लेख किया है।

शुष्क मौसम में तथा अग्निकांड के बाद ये वृक्ष अपनी इन लम्बी जड़ों से नीचे से जल ऊपर खींचते हैं तथा अपना अस्तित्व बनाये रहते हैं। कुछ वृक्षों की जड़ें कन्द (turbes) वाली होती हैं। वृक्षों की सामान्य ऊँचाई 15 मीटर तक होती है। तनों से छोटी-छोटी शाखाएँ निकलती हैं तथा छाल एक सेण्टीमीटर तक मोटी है। ज्ञातव्य है कि वृक्षों की प्रजातियाँ बहुत कम होती हैं। कभी-कभी तो किसी क्षेत्र में केवल एक ही प्रजाति का प्रभुत्व होता है यथा तंजानिया से सेनेगल तक baobah प्रजाति तथा सूडान एवं आयबरी कोस्ट के सवाना में ताड़ का ही प्रभुत्व पाया जाता है।

क्षेत्र विशेष में घासों तथा वृक्षों के अनुपात के आधार पर सवाना बायोम को निम्न प्रकारों में विभक्त करते हैं –

1. वन सवाना (Woodland Savanna) – यहाँ वृक्षों तथा झाड़ियों का प्रभुत्व होता है जिनके द्वारा ऊपरी वितान (upper canopy) अत्यन्त सघन हो जाता है परंतु वांछित सूर्य प्रकाश धरातल तक पहुँच जाता है जिस कारण धरातल पर शाकीय पादपों (herbaceous plants) का निचला स्तर पूर्णतया विकसित हो जाता है। उपरिनिवासी पादपों (epiphytes) का प्रायः अभाव होता है।

2. वृक्ष सवाना (Tree Savanna) – उस समय विकसित होता है जब धरातल पर घासों का प्राधान्य होता है तथा वृक्ष दूर-दूर बिखरे होते हैं।

3. झाड़ी सवाना (ShrubSavanna) – इसमें धरातल पर घासों का बाहुल्य होता है, वृक्षों का सर्वथा अभाव होता है तथा छोटी-छोटी झाड़ियाँ होती हैं।

4. घास सवाना (Grass Savanna) – इसका विकास वहाँ होता है जहाँ वृक्ष तथा झाड़ियाँ अनुपस्थित होती हैं तथा घासों का घना किन्तु लगातार आवरण विस्तृत क्षेत्रों पर विकसित होता है।

सभी सवाना बायोम की एक उभय विशेषता यह है कि इन्हें समय-समय पर जलाया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जैविक पदार्थ नष्ट हो जाता हैं तथा जन्तुओं की जनसंख्या घटती जाती है। ज्ञातव्य है कि बार-बार आग लगाये जाने के कारण यहाँ के पादपों में कुछ ऐसी विशेषतायें विकसित हो गई है कि कछ अग्नि प्रतिरोधी (fire resistant) प्रजातियों का विकास हो गया है (यथा Imperata spp, एक प्रकार की घास)।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन
ज्ञातव्य है कि सवाना बायोम में विस्तृत घास क्षेत्र एवं वृक्षों की कम संख्या के कारण जन्तुओं में गतिशीलता अधिक होती है। इसी कारण से यहाँ पर वृहदाकार स्तनधारी जन्तु (हाथी, जिराफ, गैण्डा आदि) तथा पक्षी (Courses, bustards, game birds, ostriches, gazelles आदि) तथा बिना उड़ने वाले पक्षी (emu) आदि पाये जाते हैं।

सवाना बायोम में वनस्पति की संरचना तथा उसमें मौसमी परिवर्तन एवं बिना रीढ वाले प्राणियों में पूर्ण सह-सम्बन्ध पाया जाता है। रीढविहीन प्राणियों में कीटों (यथा-मक्खियाँ-flies (diptera), टिड्डी grasshoppers, दीमक – termitesisopteres, any Shymenoptera, springtails) तथा संधिपाद प्राणियों (जोड़ों से निर्मित पैर वाले arthropods यथा मकड़ा, बिच्छू आदि) की असंख्य जनसंख्या पायी जाती है।

उदाहरण के लिए ऊँची घास वाले पश्चिमी अफ्रीका के गायना सवाना प्रदेश में oligochaete worms, spiders तथा insects का घनत्व शुष्क मौसम में प्रति 300 वर्ग मीटर क्षेत्र में 50,000 से 60,000 तथा आई मौसम में 1,00,000 पाया जाता है। वर्षा काल में लघु प्राणियों (यथा springtails, ants earwigs, cockroaches, small crickets, carabid bettles आदि) तथा शुष्क मौसम में बड़े जीवों (रीढ़विहीन, यथा locusts, grasshoper, mantids तथा circkets) की प्रधानता रहती है।

उल्लेखनीय है कि सवाना बायोम में प्राणियों (रौढ़वाले तथा रीढविहीन, लघ्वाकार कीट से लेकर वृहदाकार हाथी तक) की अत्यधिक जनसंख्या के बावजूद उनमें आहार के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा नहीं होती है क्योंकि इस बायोम की वनस्पतियों के मुताबिक शाकाहारी प्राणियों के आहार ग्रहण की आदतों में विशिष्टतायें पायी जाती है। उदाहरणार्थ-जिराफ वृक्षों की पत्तियों पर निर्भर करता है, जेबरा ऊँची घासों के ऊपरी भाग एवं झाड़ियों को खाता है, wildbeest मध्यम ऊँचाई की घासों को चरता है तथा gazells (हिरण परिवार) सबसे छोटी घासों का सेवन करता है।

स्पष्ट है कि सवाना बायोम में चराई अनुक्रम (grazing siccession) का पूर्ण विकास हुआ है। खुरवाले जन्तुओं (ungulates) की मौसमी गतिशीलता में भी पर्याप्त अंतर होता है। इस विभिन्न मौसमी गतिशीलता के कारण भी आहार के लिए तगड़ा संघर्ष नहीं हो पाता है। मौसमी गतिशीलता के स्वभाव के आधार पर G.Morel (1968) ने खुरवाले जानवरों को निम्न 5 श्रेणियों में विभक्त किया है

  • मौसमी भ्रमण रहित जन्तु – giraffe, grant’s gazelle, hartebeest
  • शुष्क मौसम में आंशिक भ्रमण करने वाले जन्तु – impala.
  • वर्षा काल में आंशिक भ्रमण करने वाले जन्तु – watrhog. dikdik, water buck, rhino.
  • शुष्क मौसम में प्रवास करने वाले जन्तु – buffalo, zebra, wildbesst, cland, elephant.
  • मार्गीय प्रवासी (passage migrants) जन्तु – भैंसा, जेबरा तथा हाथी।

सवाना प्रदेश में आये दिन वनस्पतियों को जलाने से वहाँ के प्राणियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इस क्रिया (burming) के कारण प्राणियों के प्रकार तथा उनकी संख्या में निरंतर हास हो रहा है।

प्राणी समुदाय – उल्लेखनीय है कि विश्व के विभिन्न महाद्वीपों के सवाना बायोम के विभिन्न क्षेत्रों में प्राणियों में विषमता पायी जाती है क्योंकि इन भौगोलिक क्षेत्रों का अलग-अलग रूपों में विकास हुआ है तथा इनमें मानव प्रभाव का चरण तथा उसकी तीव्रता विभिन्न रही है। सवाना प्रदेश में आई एवं शुष्क ऋतुओं की पर्यावरण सम्बन्धी दशाओं में परिवर्तन के कारण वनस्पति आवरण में अंतरण होता है जिस कारण आहार की बहुलता (आई ऋतु में) तथा अल्पता (शुष्क ऋतु में) होती है।

इसके बावजूद कुछ प्रकार के जन्तुओं की संख्या अन्य बायोम प्रकारों से बहुत अधिक मिलती है। अफ्रीकी सवाना में चरने वाले बड़े जन्तओं की सबसे अधिक किस्में पायी जाती हैं। जेब्रा antelope, wildbeast, जिराफ, हिप्पोपोटामस तथा हाथियों के बड़े-बड़े झण्ड पाये जाते हैं। इसके विपरीत अमेरिकी तथा आस्ट्रेलियाई सवाना में पक्षियों को छोड़कर उक्त प्राणी कम संख्या में पाये जाते हैं। आस्ट्रेलिया में Marsupials (पेट के बाह्य भाग में बनी थैली में बच्चों को रखने वाले जन्तुओं का वंश यथा-कंगारू) का प्रभुत्व है। इनकी 50 प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

इनमें बड़े आकार वाले लाल कंगारू (Macropus rufus, 1.5 मीटर ऊँचे) से लेकर लघु आकार वाली wallaby (M. browni, 30 सेंटीमीटर ऊँचे) प्रजातियाँ होती हैं। दक्षिणी अमेरिकी सवाना में चरने वाले दीर्घ जन्तुओं में deer तथा guanaco प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ पर tucans, parrots, nightjars, kingfishers, doves finches, parakets तथा wood peckers (कठफोड़वा) भारी संख्या में मिलते हैं।

रूम-सागरीय बायोम – रूम-सागरीय बायोम का विस्तार दोनों गोलाद्धों में महाद्वीप के पश्चिमी भाग में 30 से 40° अक्षांशों के बीच पाया जाता है। इस बायोम के अन्तर्गत रूम सागर के किनारे फैले यूरोपीय भाग, उत्तरी अमेरिका में कैलिफोर्निया, उ.प. अफ्रीका का रूमसागरीय तटवर्ती भाग, द. अमेरिका में मध्य में चिली, द. अफ्रीका का सुदूर द.प. भाग तथा द.प. आस्ट्रेलिया के तटवर्ती भाग आते हैं। इस प्रदेश की जलवायु की प्रमुख विशेषता है-गर्म शुष्क ग्रीष्मकाल तथा शीत आई शरद् काल।

शरद् तथा बसंत कालीन वर्षा के जल द्वारा मिट्टियों की नमी बढ़ जाती है तथा बसंतकाल में वनस्पतियों में अधिकतम वृद्धि होती है। ग्रीष्मकाल में तापमान बढ़ने तथा वर्षा के अभाव में जल की न्यूनता के कारण वनस्पतियों की वृद्धि का स्थगन हो जाता है। यद्यपि रूमसागरीय प्रदेश विभिन्न महाद्वीपों में काफी बिखरे हैं तथापि इनकी वनस्पति तथा बायोम संरचना में पर्याप्त समानता होती है। इस बायोम की वनस्पतियों की संरचना इस तरह की होती है कि वे ग्रीष्मकालीन शुष्कता को सहन कर सकें। पत्तियाँ मोटी तथा कठोर होती हैं (sclerophyllous) तथा तनों की छाल मोटी होती है।

पादप समुदाय में वृक्ष तथा झाड़ियाँ प्रमुख होती हैं। अधिकांश पादप सदाबहार होते हैं। झाड़ियों के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय नाम हैं यथा-यूरोपीय भाग में maquis of machia कैलिफोर्निया में chaparral द. अफ्रीका में fynbos या fynbosch कई वृक्षों की पत्तियों में शुष्कानुकूलित संरचना (Xeromorphic structure) होती है यथा मोटी बाह्य त्वचा, ग्रन्थिल रोयें, बंद रंध्र आदि। कुछ वृक्षों (यथा mastic tree) शुष्क काल में अपने रंधों (stomata) को बंद करके वाष्पोत्सर्जन (transpiration) (artemisia) न्यूनतम कर देते हैं। कुछ पत्तियों का आकार छोटा होता है (यथा chamise) ताकि कम से कम वाष्पोत्सर्जन हो सके। कुछ वृक्षों की पत्तियाँ काँटे जैसी होती हैं।

कुछ पौधों के विस्तृत जड़ तंत्र होते हैं (यथा almond), कुछ पौधों की गहरी मूसली जड़ (trap root) होती है जो शैलों की संधियों में भी प्रविष्ट हो जाती हैं कुछ पौधों की जड़ें भूमि के ऊपर भी विस्तृत होती हैं तथा नीचे गहराई तक भी प्रविष्ट होती हैं (यथा chamise) कुछ पौधों में कन्द (bulb तथा tubers) होते हैं। ये पौधे रंग-बिरंगे फूल वाले होते हैं। वसंत काल में ये खिलते हैं तथा रंग-बिरंगे दृश्य प्रस्तुत करते हैं। ग्रीष्मकाल में ये प्रसुप्तावस्था में होते हैं परंतु कन्दों (bulns) से आई शीतकाल के प्रारम्भ होते ही नये कल्ले निकल आते हैं (यथा hyaxinthus, crocus, lilium, orchis आदि)।

यूरोपियन रूमसागरीय बायोम में वनस्पति समुदाय में तीन लम्बवत् स्तर पाये जाते हैं। ऊपरी स्तर का प्रमुख वृक्ष ओक है जिसके दो वर्ग हैं-सदाबहार ओक तथा पर्णपाती ओक। ओक की कई प्रजातियां पायी जाती हैं। ऊँचाई के साथ वृक्षों का क्रम बदलता जाता है, सबसे नीचे सदाबहार ओक, बढ़ती ऊँचाई के साथ क्रमशः पर्णपाती ओक, बीच, पाइन तथा फर का क्रम पाया जाता है। दूसरा स्तर झाड़ियों का होता है जिसमें सर्वप्रमुख mquis या macchia है। इसका आवरण इतना घना होता है कि यह अप्रवेश्य हो जाता है। इसकी ऊँचाई 2 मीटर या उससे अधिक होती है। प्रमुख प्रजातियाँ हैं- arbutus, pistacia, phamnus, ceratonio आदि । इनसे गोंद, रेजिन, टैनिन, रंग आदि प्राप्त किये जाते हैं।

लगातार पशुचारण, जलाने तथा कटाई द्वारा maquis का रूपांतरण garrigue (स्थानीय नाम) में हो गया है। Garrigue का भी मानव द्वारा विदोहन होने पर उसका रूप बदल गया है जिसे batha कहते हैं। सबसे निचले स्तर में शाकीय पौधों का आवरण होता है।

उत्तरी अमेरिका (कैलिफोर्निया) बायोम – में वनस्पति समुदाय में सर्वप्रमुख वृक्ष ओक (विभिन्न प्रजातियाँ) तथा चैपरेल झाड़ियाँ हैं। ओक की ऊँचाई 6 से 23 मीटर तक होती है, तना छोटा होता है तथा फैला हुआ मुकुट (crowns) होता है। निचला स्तर घासों का होता है। कम उर्वर तथा हल्की मिट्टी वाले भागों में चैपरेल की घनी झाड़ियों का विकास होता है। यह यूरोपिय maquis का समकक्षी होता है। इसी तरह बौनी झाड़ियों बाथा (यूरोपिय) की तरह यहाँ पर सेज झाडियाँ होती हैं। दक्षिणी अमेरिका के चिली में कैलिफोर्निया के समान ही वनस्पतियाँ पायी जाती हैं। चिली में कैलिफोर्निया के चैपरेल के समान झाड़ी को मैटोरेल कहते हैं।

उपर्युक्त रूमसागरीय क्षेत्रों के बायोम में शकाहारी स्तनधारी जन्तुओं में mule deer, browsers, (कैलिफोर्निया), guanacos (चिली) आदि प्रमुख हैं। रोडेण्ट्स के कई परिवार पाये जाते हैं। जिनमें खरगोश की कई प्रजातियाँ प्रमुख होती हैं। भक्षक जन्तुओं में coyote (खरगोश का प्रमुख भक्षक), liards, snakes प्रमुख हैं तथा raptorial birds में kites, falcons तथा hawks का प्रमुख स्थान है।

शीतोष्ण घास प्रदेश बायोम (TemperateGrassland Blome)-शीतोष्ण घास प्रदेश का विस्तार उत्तरी गोलार्द्ध में महाद्वीपों के आन्तरिक भागों (उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी तथा यूरेशिया का स्टेपी प्रदेश) में पाया जाता है, जहाँ महाद्वीपीय जलवायु (ग्रीष्मकाल तथा शीतकालीन दशाओं में अत्यधिक अंतर होता है) का विकास हुआ है तथा शुष्कता का साम्राज्य रहता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इसका विस्तार दक्षिण अमेरिका में अर्जेन्टाइना तथा युरूग्वे (पम्पाज), दक्षिण अफ्रीका के उच्च पर्वतीय भाग (वेल्ड), आस्ट्रेलिया के दक्षिण उत्तरी गोलार्ड के शीतोष्ण घास मैदानों में महाद्वीपीय जलवायु की प्रधानता होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में महाद्वीपीय का प्रभाव कम होता है। अधिकांश भागों में सर्वाधिक वर्षा ग्रीष्म काल में होती है। इन सभी क्षेत्रों में घासें सर्वप्रमुख वनस्पति समुदाय होती हैं जो चरम समुदाय (climax community) की द्योतक हैं। इनमें सर्वप्रमुख सदाबहार घासें होती हैं। शाकीय पौधे (herbaceous plants) वृक्ष तथा झाड़ियाँ गौण होती हैं।

ज्ञातव्य है कि अधिकांश घास मैदान मानव क्रिया-कलापों का प्रतिफल हैं। प्रत्येक क्षेत्र में वनस्पति प्रकार, मृदा तथा जलवायु में तथा पादप समुदाय एवं प्राणी समुदाय में पूर्ण सहसम्बन्ध पाया जाता है। घासों का ऊपरी वितान (canopy) उनकी पत्तियों का होता है। पुष्पी कल्ले लघु समय तक ही रहते हैं। पुष्पों में पंखुड़ियों नहीं होती हैं। उनका परागण (pollination) हवा द्वारा होता है। बीजों का हवा द्वारा शीघ्र विसरण (dispersal) हो जाता है। ज्ञातव्य है कि घास मैदान के सभी प्रदेशों के अधिकांश भागों में मौलिक घास आवरण को साफ कर दिया गया है तथा उनमें खाद्यान्नों की खेती की जाती है। ये प्रदेश विश्व के प्रमुख अन्न भण्डार तथा दुग्ध व्यवसाय के क्रोडस्थल हैं।

1. यूरोपीय भाग – में इस घास प्रदेश को स्टेपी बायोम कहते हैं जिसका सर्वाधिक विकास रूस में हुआ है। इसी रूसी स्टेपी का विस्तार पूर्वी यूरोप से प. साइबेरिया तक विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तर में शीतोष्ण कोणधारी वनों तथा द.पू. में शुष्क प्रदेशीय बायोम के मध्य स्टेपी बायोम स्थित है। उत्तरी शीतोष्ण कोणधारी वनों तथा दक्षिण से शुद्ध घास बहुल स्टेपी बायोम के मध्य वन स्टेपी की संक्रमण मेखला (transitionalzone) पायी जाती है। इस तरह बन स्टेपीज तथा घास स्टेपीज रूस के समस्त क्षेत्रफल के 12 प्रतिशत भाग पर फैले हैं।

वन स्टेपीज के यूरोपीय भाग में ओक, लाइम, एल्म तथा मैपिल वृक्षों की बहुलता है जबकि प. साइबेरिया में बर्च, आस्पेन तथा विलो वृक्षों का मिश्रण प्रधान है, इन वन स्टेपीज के मध्य छिटपुट रूप में fescues तथा feather grasses (sita Koeleria) के वंशों वाले क्षेत्र पाये जाते हैं जिन्हें मीडोस्टेपीज (meadowsteppes) कहते हैं। वन स्टेपीज में 500 से 600 मिलीमीटर तक वार्षिक वर्षा होती है जबकि घास स्टेपीज का विकास 400 से 500 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा वाले भागों में हुआ है। उत्तर से दक्षिण दिशा में जलवायु, वनस्पति तथा मृदा में क्रमिक परिवर्तन होता जाता है। सबसे उत्तर में चरनोज्म मिट्टियों के साथ घास स्टेपीज की स्थिति है।

दक्षिण की ओर जाने पर शुष्कता बढ़ती है अतः अर्द्धशुष्क स्टेपीज तथा चेस्टनट मृदा पायी जाती है और दक्षिण जाने पर अर्द्ध-शुष्क तथा शुष्क रेगिस्तान प्रारम्भ हो जाता है। उत्तर से दक्षिण वनस्पतियों का निम्नांकित अनुक्रम पाया जाता है –

  • वन स्टेपीज (इसका वर्णन ऊपर किया गया है)
  • मीडो स्टेपीज में टर्फ वाली घासों की प्रजातियाँ (Stipa तथा Fescue) तथा कई प्रकार के पुष्पी शाकीय पौधे (यथा trifolum तथा कई प्रकार के daisy) पाये जाते हैं
  • घास स्टेपीज में घास की प्रमुख किस्में Stipa की गुच्छे वाली प्रजातियाँ हैं तथा शुष्कानुकूलित झाड़ियों की Artemisa प्रजातियाँ प्रमुख हैं तथा
  • गहरे रंग की चेस्टनट मिट्टियों के साथ शुष्कानुकूलित झाड़ियाँ (artemisia प्रजाति) पायी जाती हैं।

2. उत्तरी अमेरिकी प्रेयरी का विकास संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के पश्चिम में रॉकीज पर्वत तथा पूर्व में शीतोष्ण पर्णपाती वनों के मध्य विस्तृत क्षेत्रों में हुआ है। वार्षिक वर्षा पूर्व (1050 मिलीमीटर) से पश्चिम (400 मीलोमीटर से कम) घटती जाती है। इस प्रेयरी प्रदेश में घासों की ऊँचाई में पूर्व से पश्चिम (क्रमशः उच्च घास, मध्यम घास तथा छोटी घास) श्रेणीकरण (ordering) पाया जाता है।

(i) उच्च घास प्रेयरी की मेखला सबसे पूर्व में पायी जाती है। प्रमुख घास प्रजाति bluestem होती है जिसकी ऊंचाई 1.5 से 2.4 मीटर होती है। इन घासों के मध्य में स्थान-स्थान पर ओक तथा हिकरी वृक्षों के झुरमुट पाये जाते हैं।

(ii) मिन प्रेयरी का सर्वाधिक विकास संयुक्त राज्य अमेरिका के वृहद मैदान में हुआ है। वास्तव में मिश्र प्रेयरी का विस्तार उच्च घास प्रेयरी की पश्चिम में उत्तर (कनाडा से प्रारम्भ होकर) दक्षिण (टक्साज तक) विस्तृत चौड़ी पट्टी में पाया जाता है जिसमें मध्यम तथा कम ऊँचाई की घासें पायी जाती हैं (ऊँचाई 0.6 से 1.2 मीटर तक)। प्रमुख प्रजातियाँ हैं Stippa commata (नुकीली घासें-डोरा जैसी), sand dropseed (sporobolus cryptandrus), westem wheat grass (agropyron smithii), jungegrass, blugrama तथा buffalo grass, तथा

(iii) लघु घास प्रेयरी का विस्तार Great Plains के पश्चिमी भाग पर पाया जाता है। घासों की ऊँचाई 60 सेण्टीमीटर से कम होती है।

3. दक्षिणी अमेरिकी पम्पाज – का सर्वाधिक विस्तार अर्जेन्चाइना (समस्त क्षेत्रफल के 12 प्रतिशत भाग पर) में हुआ है। अमेरिकी प्रेयरीज तथा यूरोपीय स्टेपीज की तुलना में पम्पाज अधिक आई हैं। पूर्व में वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर तथा पश्चिमी एवं द.पू. में 450 मिलीमीटर तक होती है। आर्द्र पम्पाज का विस्तार पूर्वी भाग में पाया जाता है जहाँ लम्बी एवं ऊँची घासें पायी जाती हैं।

पश्चिम की ओर जाने पर शुष्कता बढ़ती जाती है अतः घासें छोटी पायी जाती हैं। इस पश्चिमी भाग को अर्द्ध आर्द्र पम्पाज कहते हैं। पम्पाज में कई वंश (genera) तथा प्रजातियों (species) की घासें पायी जाती हैं यथा-Birza, Bromus, Panicum, Paspaluim Lolium आदि । इनमें कई स्तर (layers) पाये जाते हैं। मनुष्य ने इस क्षेत्र में दलहनी जाति के lucene पौधों का रोपण किया जाता है। अधिकांश पम्पाज को साफ करके गेहूं के खेतों में बदल दिया गया है।

4. अफ्रीकी वेल्ड (veld) – का विस्तार दक्षिणी अफ्रीका में 1500 से 2000 मीटर ऊंचाई वाले पठार के पूर्वी भाग में दक्षिण ट्रान्सवाल, Orange Free State तथा लिसोथी के कुछ भागों पर पाया जाता है। ज्ञातव्य है कि इस पठार के 1500 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले भागों पर वर्षा की अनिश्चितता, शुष्कता की अधिकता, रात्रि में पाला की प्रचंडता तथा शरद काल में दैनिक तापान्तर की अधिकता के कारण वृक्षों का उगना तथा विकसित होना सम्भव नहीं हो पाता है, अत: चरम घास समुदाय का विकास हुआ है। उल्लेखनीय है कि धरातलीय बनावट, मृदा ऊंचाई तथा जलवायु में भिन्नता के कारण घासों की संरचना में पर्याप्त अंतर पाया जाता है, अतः वेल्ड घास बायोम को कई उपभागों में विभक्त किया गया है –

(i) थेमाडा वेल्ड – 1500 से 1750 मीटर की ऊँचाई पर विकसित हुआ है जहाँ औसत वर्षा 650 से 750 मिलीमीटर तक होती है। Black turf soils पर विकसित होने वाले प्रमुख घास Redgrass (Themeda triandra) है। अन्य घास प्रकारों में ristida Eragrostis तथा Hyparrhenia प्रमुख हैं

(ii) अल्पाइन वेल्ड का विकास 2000 से 2500 मीटर ऊंचाई वाले भागों (Darkensberg पर्वत पर) पर हुआ है जिसमें Themeda के साथ Festuca तथा Bromus घासें पायी जाती हैं। यहाँ के प्राणी जीवन को मनुष्य ने बड़े पैमाने पर प्रभावित तथा परिमार्जित किया है। प्रारम्भ में game, antelopes, zebras (शाकाहारी) तथा शेर, लकड़बाग्घा, हायना, सियार (सभी मांसाहारी) के बड़े झुण्ड पाये जाते थे परंतु मानव द्वारा अनवरत हनन के कारण अब ये ,अदृश्य हो गये हैं। बिलकारी शाकाहारी प्राणियों में springhare, gerbil आदि अब भी भारी संख्या में पाये जाते हैं। मांसाहारी बिलकारी प्राणियों में mangooses या meerkats प्रमुख हैं।

5. आस्ट्रेलियाई शीतोष्ण घास प्रदेश का विस्तार आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी भाग तथा उत्तरी तस्मानिया में पाया जाता है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शरद काल उत्तरी गोलार्द्ध के शीतोष्ण घास क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म होता है तथा घासों तथा साथ-साथ युकेलिप्टस वृक्ष भी पाये जाते हैं। दक्षिणी सागर तटीय भाग से (1524 मिलीमीटर) उत्तर जाने पर (635 मिलीमीटर) औसत वार्षिक वर्षा घटती जाती है अत: यहाँ पर घास क्षेत्रों के तीन उपप्रदेश विकसित हुए हैं।

(i) शीतोष्ण लम्बी घास वाला क्षेत्र-इसका विस्तार न्यूसाउथवेल्स के पूर्वी तटीय भाग से विक्टोरिया तथा पूर्वी तस्मानिया तक है। घासों में Poa tussock तथा Themeda australis (इसे कंगारू घास कहते हैं क्योंकि यह कंगारू को सर्वाधिक प्रिय होती है) तथा Danthonia pallida अधिक व्यापक है।

(ii) शीतोष्ण लम्बी घास वाले क्षेत्र का विकास प्रथम के समानान्तर किन्तु आन्तरिक भागों में हुआ है। यहाँ Danthonia तथा Stipa वंश की छोटी प्रजातियों का विकास हुआ है।

(iii) शुष्कानुकूलित (xerophytic) घास वाला क्षेत्र और अधिक आन्तरिक भाग में विकसित हुआ है। प्रारम्भ में आस्ट्रेलियाई शीतोष्ण घासों का विकास यहाँ के देशज जन्तुओं (यथा कंगारू) के चरने के स्वभाव के आधार पर हुआ था परंतु भेड़ों के आगमन (मानव द्वारा) बाहर से लाकर लगाये जाने वाले पौधों (यथा clover) तथा घासों (यथा-bromus, hardeum तथा ryegrass) के कारण घासों की कई मौलिक प्रजातियाँ या तो समाप्त हो गई हैं या कमजोर पड़ गई हैं।

स्नतधारी जन्तुओं में कंगारू यहाँ का सबसे बड़ा देशज जन्तु है। बड़े कंगारूओं की यहाँ पर तीन किस्में पायी जाती हैं –

  • लाल कंगारू
  • भूरे कंगारू तथा
  • wallaroos

जब से यूरोपीय खरगोशों को यहाँ पर लाया गया (लगभग एक सौ वर्ष पूर्व) तब से इनकी संख्या इतनी बढ़ी है कि अब ये सर्वप्रमुख जन्तु हो गये हैं। बाद में इनकी संख्या की बाढ़ को रोकने के लिए परभक्षी लोमड़ी को लाया गया परंतु इसका कोई खास प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ है। उड़ानविहीन Emu पक्षी यहाँ के विशिष्ट प्राणी हैं।

6. न्यूजीलैण्ड शीतोष्ण घास क्षेत्र – का विकास मौलिक रूप में दक्षिणी द्वीप के पूर्वी भाग तथा उत्तरी द्वीप के मध्यवर्ती भाग में हुआ था। जिसमें गुच्छेदार घासों का सर्वाधिक विकास हुआ था परंतु विगत सौ वर्षों में मानव ने इन्हें पूर्णतया बदल दिया है। इस समय घासों की दो प्रमुख किस्में पायी जाती हैं –

(i) short tussock grasses (प्रमुख प्रजातियाँ-festuca तथा poa) 0.5 मीटर ऊँची होती हैं तथा पीले-भूरे रंग की होती हैं

(ii) tall tussock grasses-उच्च भागों पायी जाती हैं (प्रमुख प्रजाति-Chiomechloa)। इस बायोम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शाकाहारी स्तनधारी जन्तुओं का पूर्णतया अभाव है (क्योंकि यह द्वीप सदा से अन्य स्थलीय भागों से अलग रहा है)। प्रारम्भ में यहाँ पर दैत्याकार उड़ानरहित moss पक्षियों का निवास था परंतु नवागन्तुक मानव द्वारा इनका शिकार इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि अब ये विलुप्त हो गये हैं।

शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम-इसे टैगा वन बायोम भी कहते हैं। यह बायोम शीतोष्ण बायोमों का सबसे उत्तरी बायोम (दक्षिण गोलार्द्ध में नहीं पाया जाता है) जिसे टैगा बायोम भी कहते हैं। इसका विस्तार उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया में शीत महाद्वीपीय अथवा उपध्रुवीय जलवायु प्रदेशों में पाया जाता है। कोणधारी वृक्ष, वनस्पतियाँ में सबसे प्रभावशाली हैं। इनके चार प्रमुख वंश (genera) यथा-spruce (picea), pine (Pinus), fir (Abies) तथा larch (Larix) वनस्पति समुदाय की अधिकांश संरचना करते हैं। इन कोणधारी वृक्षों के साथ शीतोष्ण पर्णपाती कठोर लकड़ी वाले वृक्षों के वंश भी (alder-Almus, birch-Betula, popular-populus) आपस में समिश्र रूप में पाये जाते हैं।

ज्ञातव्य है कि इन शीतोष्ण पर्णपाती वृक्षों का विकास मौलिक कोंणधारी वृक्षों के अग्नि के कारण नष्ट होने तथा मानव द्वारा काटे जाने के कारण द्वितीयक अनुक्रम (secondary succession) के रूप में हुआ है। इस बायोम में सबसे अधिक मुलायम लकड़ी प्राप्त होती है जिसका सभी बायोमों के वृक्षों से सर्वाधिक आर्थिक महत्त्व होता है यहाँ की जलवायु की प्रमुख विशेषतायें हैं –

  • अति शीत लम्बी शीत ऋतु (कम से कम 6 महीनों का औसत तापमान शून्य अंश सेण्टीग्रेड से कम होता है)
  • शरद् काल में हिमपात
  • धरातलीय नमी के जम जाने के कारण परमाफ्रास्ट सतह का निर्माण
  • लघु अवधि वाला गर्म ग्रीष्मकाल
  • वनस्पति के वृद्धि काल का समय 50 (उत्तरी सीमा पर) से 100 दिन (दक्षिणी सीमा पर)
  • वार्षिक वर्षा में अत्यधिक क्षेत्रीय विषमता (500 से 2000 मिलीमीटर, तरल जल तथा ठोस हिम दोनों को मिलाकर) तथा
  • अत्याधिक वार्षिक तापीय विषमता (ग्रीष्मकाल में 25° सेण्टीग्रेड से शरदकाल में (-)40° सेण्टीग्रेड तक)

यहाँ की वनस्पतियों में आवृत्तिबीजी कोणधारी (gymnosperm conifers) वृक्ष सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। पत्तियाँ सुई के समान नुकीली होती हैं ताकि शरद काल में मिट्टियों के हिमीकरण के समय वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कम हो सके। अधिकांश वृक्ष सदाबहार होते हैं। बीज शंकु के आकार की खोल में बंद रहते हैं। दनों के निचले भाग में न्यूनतम वानस्पतिक आवरण होता है। जलवायु, उच्चावच तथा मिट्टियों में विभिन्नता के साथ वृक्षों के आकार, बनावट तथा शाखाओं के प्रारूप एवं वृक्षों की प्रजातियों में पर्याप्त क्षेत्रीय विषमताएँ होती हैं। अधिकांश वृक्षों की ऊँचाई 12 से 21 मीटर के बीच होती है परंतु पर्वतीय भागों पर इनकी ऊँचाई 100 मीटर तक हो जाती है। जहाँ पर मानव द्वारा वनों की कटाई अधिक हुई है वहाँ पर शीतोष्ण पर्णपाती वनों का द्वितीय अनुक्रम विकसित हुआ है।

(i) उत्तरी अमेरिकी कोणधारी वन बायोम – का विस्तार कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में पाया जाता है। निम्न स्थलीय कोणधारी वनों का क्षेत्र उत्तर में आर्कटिक वृक्ष रेखा (वह रेखा जिसके उत्तर क्षैतिज रूप में तथा ऊपर लम्बवत् रूप में, शरद् काल इतना लम्बा होता है कि वृक्ष का उगना तथा बढ़ना सम्भव नहीं हो पाता है) अर्थात् वृक्ष रहित टुण्ड बायोम की दक्षिणी सीमा से प्रारंभ होकर दक्षिण में शीतोष्ण पर्णपाती वनों की उत्तरी सीमा के मध्य विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता है। सबसे उत्तर में लार्च तथा स्यूस के झुरमुट पाये जाते हैं। इनके दक्षिण में खुले कोणधारी वनों का विकास हुआ है। इनमें black spurce तथा white spruce बिखरे रूपों में पाये जाते हैं।

वनावरण विरल होता है। धरातल पर झाड़ियों, माँस तथा लाइकेन (lichens) का घना आवरण विकसित हुआ है। इस मण्डल में विशुद्ध कोणधारी वनों का अति घना आवरण पाया जाता है जिसमें white spruce, black spruce तथा blasam fir का प्रभुत्व होता है। ज्ञातव्य है कि इस कोणधारी वन बायोम के उक्त तीनों मण्डलों में वृक्ष प्रकारों तथा मृदा प्रकारों में पूर्ण सह संबंध पाया जाता है यथा-उर्वर तथा उत्तम प्रवाह वाली मिट्टियों में white spruce तथा blsam fie, रेतीली मिट्टियों में Jack pines, निचले परंतु छिछले गतॊ में दलदलों का विकास हुआ है जिनके किनारों पर black spruce के समूह विकसित होते हैं।

(ii) यूरेशिया के शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम – का विस्तार पश्चिमी में उत्तरी स्कॉटलैण्ड से प्रारम्भ होकर स्कैडिनेविया तथा यूरोपीय रूस से होता हुआ पूर्व में साइबेरिया के पूर्वी भाग तक पाया जाता है। इसका सर्वाधिक विकास साइबेरिया में उत्तर से दक्षिण 1600 किमी. चौड़ी मेखला में (जो पश्चिम से पूर्व में फैली है) हुआ है। उत्तरी अमेरिका की भांति ही इसमें भी उत्तर से दक्षिण तीन मण्डलों (ऊपर इसका उल्लेख किया जा चुका है) का विकास हुआ है। यूरोपीय शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम में वनस्पतियों के प्रकार तथा वितरण हिमानी मिट्टियों (प्लीस्टोसीन हिमानीकरण के समय जनित) के असमान वितरण से पूर्णतया प्रभावित हुए हैं। रेतीली मिट्टियों में पाइन तथा चिकनी मिट्टी तथा दुमट मिट्टियों से स्यूस वृक्षों का विकास हुआ है।

इनके बीच में स्थित झीलों के किनारों पर एल्डर, बर्च तथा विलो का विस्तार पाया जाता है। स्कैण्डिनेविया के समस्त क्षेत्रफल के 50 प्रतिशत भाग पर शीतोष्ण कोंणधारी वन बायोम का विस्तार पाया जाता है। यहाँ पर प्रमुख प्रजातियाँ हैं-Scots pine, Norway spurce तथा birch एशियाई भाग (साइबेरिया) में प्रमुख प्रजातियाँ हैं-फर, स्यूस, पाइन, लार्च तथा मध्य साइबरिया में, जो सबसे सर्द भाग है, कोणधारी वृक्षों के स्थान पर शीतोष्ण पर्णपाती वनों (बर्च तथा लघु लार्च) का विकास हुआ है।

शीतोष्ण कोणधारी वनों में वनस्पतियों का आदर्श स्तरीकरण नहीं पाया जाता है। घने तथा बंद वनों में धरातलीय आवरण न्यूनतम होता है परंतु खुले वनों में कुछ शाकीय पादपों, बौनी झाड़ियों तथा मॉसेस का विरल आवरण, धरातल पर पाया जाता है । इस वन बायोम की पॉडजॉल विशिष्ट मृदा होती है। इसका निर्माण भूमि तल पर पत्तियों, वृक्षों के गिरे तनों के टूटे भाग, वृक्षों, फलों के शंकु तथा वृक्षों के छालों के वियोजक जीवों द्वारा वियोजन, ह्यूमस के निर्माण, जल द्वारा अपक्षालन (leaching या eluviation) आदि द्वारा होता है।

इसका रंग काला या गहरा भूरा होता है। ऊपरी आवरण, जो मृदा के A सतह (A horizon) के ऊपर होता है, में जैविक पदार्थों का बाहुल्य होता है। A मंडल में जल के साथ जैविक पदार्थों का अपक्षालन द्वारा नीचे गमन होता है। अत: यह मण्डल अपक्षालन मण्डल (leaching horizon) कहा जाता है। B मंडल विनिक्षेपण मण्डल (illuviation horizon) होता है जिसमें लोहा तथा एल्यूमिनियम के यौगिक, क्ले तथा घमस तत्वों का जमाव होता है। इसका रंग नारंगी भूरा होता है।C मंडल में आधारभूत शैल आंशिक रूप से अपक्षयित होती है। सबसे निचला D मंडल में आधारभूत शैल का बना होता है।

टैगा या शीतोष्ण कोणधारी बायोम के प्राथमिक उपभोक्ता प्राणियों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है –

  • वृक्षों के रस चूसने वाली प्रजातियाँ यथा (aphids) तथा
  • घास चरने तथा वृक्षों की कोपलों को खाने वाली प्रजातियाँ।

इन प्राणियों की आहार ग्रहण करने वाली प्रक्रियाओं से वनस्पतियों पर कुप्रभाव पड़ता है। वृक्षों से रस चूस लेने से वृक्षों में तरल पदार्थों के संचार में व्यवधान हो जाता है तथा विपत्रता (defoliation, पत्तियों का गिरना) द्वारा पत्तियों के कम हो जाने से प्रकाश संश्लेषण में कमी हो जाती है। नयी कोपलों के भक्षण के कारण भी नयी . शाखाओं तथा टहनियों एवं पत्तियों की वृद्धि कम हो जाती है। कुछ प्राणी पुष्पों तथा फलों को खा जाते हैं तथा भक्षण के समय अधिकांश को काटकर नीचे गिरा देते हैं जिस कारण पौधों की पुनर्जनन क्षमता घट जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ पौधे समाप्त हो जाते हैं तथा कुछ संख्या में कम हो जाते हैं, जिस कारण पादप समुदाय का संघटन ही बदल जाता है।

वन बायोम को प्रभावित करने की मात्रा के आधार पर इस बायोम के प्राणियों को तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है –

  • सर्वप्रभावी (dominant)
  • प्रभावी (influents) तथा
  •  गौण प्रभावी (minor influents)।

सर्वप्रभावी पौधों को प्रत्यक्ष रूप से इतना प्रभावित करते हैं कि पादप समुदाय का संघटन ही बदल जाता है। इस श्रेणी के प्रमुख प्राणी बड़े आकार वाले शाकाहारी जन्तु होते हैं यथा-moose I प्रभावी प्राणियों में रीढ़वाले बड़े मांसाहारी प्राणी आते हैं (मनुष्य भी इस श्रेणी में आता है)। गौण प्रभावी प्राणी ज्यादातर बिना रीढ़ वाले मांसाहारी प्राणी तथा परजीवी प्राणी होते हैं। शाकाहारी बड़े जन्तुओं में caribou तथा moose प्रमुख होते हैं। कीटों की कई प्रजातियाँ भी सर्वप्रभावी प्राणियों की श्रेणी में आती हैं क्योंकि ये वृक्षों का विपत्रण द्वारा उनकी छालों तथा जड़ों का भक्षण करके, तनों तथा शाखाओं में छेद करके नुकसान पहुँचाते हैं। इस तरह के कीटों में larch sawfly, pine sawfly, spruce budworms आदि प्रमुख हैं।

Black fly परिवार के कीट कई स्तनधारी प्राणियों तथा पक्षियों के शरीर से खून चूसते हैं। प्रभावी प्राणियों में बड़े आकार वाले परभक्षी (predators) मांसाहारी जन्तु होते हैं यथा timber wolf, lynx गलितमांसभक्षी (scavengers) जन्तुओं में bears तथा wolverines (Gulo gulo) प्रमुख है। गौणप्रभावी प्राणियों में स्तनधारी जन्तु तथा पक्षी आते हैं-यथा-spruce grouse (उत्तर अमेरिका में), caparcaillic (यूरेशिया में) शंक्वाकारा पत्तियों को खाते हैं: red squirrels (बीजों का भक्षण करते हैं), crosbil आदि । इस तरह के प्राणियों का भक्षण करने वाले (predators) जन्तुओं में गिलहरियों को खाने वाले pine marten छोटे पक्षियों का शिकार करने वाले cwls तथा hawks प्रमुख हैं।

शरद तथा ग्रीष्म काल में कई प्राणियों का मौसमी प्रवास होता है। यहाँ की जलवायु तथा प्राणियों की संरचना में सह-सम्बन्ध पाया जाता है अर्थात् प्राणियों के शरीरों की संरचना इस तरह की होती है कि वे शीतकाल की कठोरता को सहन कर सकें। अधिकांश प्राणी मोटी खाल, घने तथा लम्बे बाल वाले होते हैं। इन्हें समूरदार जानवर (fur animals) कहते हैं (यथा mink, marten तथा beaver)। जैसे-जैसे दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते जाते हैं जन्तुओं का आकार बढ़ेता जाता है ताकि वे अति शीत दशाओं को सहन कर सकें।

मौसमी परिवर्तन के साथ आहार की आपूर्ति की समस्या भी होती है। शीतकाल में जबकि धरातलीय मिट्टियाँ जम जाती हैं तथा धरातल पर हिमाच्छादन हो जाता है तो धरातलीय लघु पादपों का आवरण बर्फ के नीचे ढंक जाता है तथा प्राणियों के लिए आहार संकट हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ प्राणी शीतनिद्रा (hibermation) में चले जाते हैं अर्थात् भूमि के नीचे चुपचाप निष्क्रिय पड़े रहते हैं। कुछ छोटे rodents बर्फ की परत के नीचे हो जाते हैं परंतु बर्फ से ढंकी झाडियों तथा मॉसेस से अपना आहार ग्रहण करते रहते हैं। कुछ प्राणी (यथा beavers) जाड़े के लिए पहले से ही आहार का संग्रह कर लेते हैं।

टण्डा बायोम – टुण्ड्रा का शाब्दिक अर्थ होता है बंजर भूमि (barren ground)। इस बायोम में वर्ष भर सूर्यातप तथा सूर्य प्रकाश का अभाव रहता है जिस कारण वानस्पतिक विकास न्यूनतम होता है। वृक्षों का सर्वथा अभाव रहता है। कम से कम आठ महीनों तक
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन
(A = निम्न टुण्ड्रा, B = मध्य टुण्ड्रा, C = उच्च टुण्ड्रा तथा D = वृक्ष टुण्ड्रा)
धरातल पूर्णतया हिमाच्छादित रहता है। तापमान हिमांक से नीचे रहता है। तेज बर्फानी हवायें चलती हैं। वनस्पति विकास का समय 50 दिन से भी कम होता है। मृदा सदा हिमीकृत अवस्था में होती है। इस तरह के सदा हिमीकृत धरातल को परमाफ्रास्ट कहते हैं।

आर्कटिक टुण्ड्रा का विस्तार उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया के उत्तर में स्थायी ध्रुवीय हिमावरण तथा दक्षिण में शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम की उत्तरी सीमा के मध्य पाया जाता है जिसके अन्तर्गत अलास्का, कनाडा का सुदूर उत्तरी अंचल, यूरोपीय रूस तथा साइबेरिया के उत्तरी भाग आते हैं। इनके अलावा आर्कटिक द्वीपों पर भी इस बायोम का विस्तार हुआ है। आर्कटिक टुण्डा में वार्षिक वर्षा 400 मिलीमीटर से कम होती है। टुण्डा बायोम को दो प्रकारों में विभक्त किया जाता है-आर्कटिक टुण्डा बायोम तथा अल्पाइन टुण्ड्रा बायोम (यह उच्च पर्वतों पर पाया जाता है, इसकी स्थिति उष्ण कटिबंध से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय पर्वतों पर वृक्ष रेखा के ऊपर होती है)। यहाँ पर केवल आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम का ही उल्लेख किया जा रहा है।

वृक्ष रेखा के उत्तर जाने पर जलवायु की बढ़ती कठोरता के साथ वनस्पतियों में भी तेजी से परिवर्तन होता जाता है। अतः आर्कटिक टुण्ड्रा को दक्षिणी सीमा से उत्तरी सीमा तक तीन मण्डलों में विभक्त करते हैं (दक्षिण से उत्तर की ओर) निम्न आर्कटिक टुण्डा, मध्य आर्कटिक टुण्ड्रा तथा उच्च आर्कटिक टुण्डा (ज्ञातव्य है कि निम्न, मध्य तथा उच्च, अक्षांशों के मान के प्रतीक हैं)। चित्र 15.5 में कनाडा के आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम के विभिन्न मण्डलों को प्रदर्शित किया गया है।

निम्न टुण्डा आर्कटिक टुण्डा का सबसे दक्षिणी मण्डल होता है जिसके अन्तर्गत उत्तरी कनाडा का अधिक भाग, उत्तरी अलास्का, कनाडा के द्वीपों (बैंक्स द्वीप, विक्टोरिया द्वीप, बैफिन द्वीप) के दक्षिणी भाग, दक्षिण ग्रीनलैण्ड, साइबेरियन प्रायद्वीप आदि सम्मिलित किये जाते हैं। उच्च टुण्ड्रा के अन्तर्गत कनाडा के द्वीपमण्डल (archipelago) के उत्तर में स्थित द्वीपों (यथा क्वीन एलिजाबेथ समूह के द्वीप) को सम्मिलित किया जाता है। इसमें वनस्पति छिटपुट रूप में पायी जाती है जिसमें mosses, lichens तथा कठोर शाकीय झाड़ियाँ (यथा avens saxifirages आदि) पायी जाती हैं। वृक्षों का सर्वथा अभाव पाया जाता है। मध्य टुण्डा का विस्तार उक्त दो मण्डलों के मध्य पाया जाता है।

टुण्ड्रा बायोम में भी मृदा में नमी की स्थिति तथा वनस्पति के बीच पूर्ण सहसम्बन्ध पाया जाता है। लिथोसोल (पूर्ण प्रवाह युक्त मिट्टी जिसमें आधार शैल पतली होती है) में lichens तथा mosses का शुष्क समुदाय (xeric community) विकसित होता है; बॉग मृदा में sedges तथा mosses का विस्तार पाया जाता है।

आर्कटिक टुण्ड्रा में शीत की कठोरता तथा सूर्य प्रकाश के अभाव के कारण समस्त विश्व की कुल पादप प्रजातियों की मात्र 3 प्रतिशत पादप प्रजातियाँ ही विकसित हो पायी हैं। यहाँ की वनस्पतियाँ शीतानुकूलित (cryophytes) होती हैं अर्थात् इनमें अतिशीत दशाओं को सहन करने की सामर्थ्य होती है। N.Pollumin (1959) के अनुसार आर्कटिक टुण्ड्रा में शीतानुकूलित पदार्थों के 66 परिवार पाये जाते हैं। उत्तर की ओर जाने पर शौत की कठोरता बढ़ती जाती है तथा पादप प्रजातियों की संख्या भी कम होती जाती है। अधिकांश पादप अनुच्छेदार होते हैं तथा ऊँचाई 5 से 8 सेंटीमीटर तक होती है। ये जमीन से चिपके रहते हैं क्योंकि धरातल का तापमान ऊपर स्थित वायु के ताप से अपेक्षाकृत अधिक होता है।

झाड़ियाँ प्रायः उन भागों में विकसित होती हैं जहाँ पर हिम का ढेर उन्हें तेज चलने वाली बर्फानी हवाओं से बचा सके । इसमें आर्कटिक विलो प्रमुख हैं। इनके तने तथा पत्तियाँ मृदा स्तर के ऊपर कुछ सेण्टीमीटर तक होती हैं। इनकी वृद्धि दर अत्यंत मन्द होती है परंतु इनकी आयु बहुत अधिक होती है (150 से 300 वर्ष पुराने पादपों के उदाहरण मिले हैं)। सदाबहार पुष्पी पादपों का विकास धरातल के गद्दे के रूप में होता है। इनमें प्रमुख है-माँस कैम्पियन । टुण्ड्रा के छ पादप प्रजातियों में गूदेदार पत्तियाँ होती हैं। Saxifirage प्रजाति के कुछ पादपों का विकास गुच्छों के रूप में होता है जबकि कुछ चटाई की तरह भूमि पर क्षैतिज रूप में फैलते हैं (यथा-Dryas octopetala)

आर्कटिक टुण्ड्रा के पादपों का विकास काल लघु ग्रीष्मकाल (50 दिन तक) होता है। जिस समय इनके अवयवों का विकास, फूलों का खिलना, परागण, बीजों का बनना, उनका पकना तथा अन्ततः विसरण आदि सभी क्रियायें सम्पादित होती हैं।

आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम के प्राणियों को दो प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है –

  • स्थायी निवासी (residents) तथा
  • प्रवासी (migrants)

शीतकाल में अधिकांश प्राणी टुण्डा छोड़कर दक्षिणी भागों में प्रवास कर जाते हैं। स्पष्ट है कि प्राणियों में मात्र वे ही शरद् काल में यहाँ टिक पाते हैं जिनकी विशिष्ट शारीरिक संरचना कठोर शीत से बचाव करने में समर्थ होती है। इस तरह स्थायी प्राणियों के शरीर के बाह्य भाग में फर या पंखों का घना आवरण होता है जो इनके लिए लिहाफ (रजाई) का कार्य करते हैं। Musk ox (ovibus muschatus) स्थूल शरीर वाला शाकाहारी जन्तु होता है जिसको शरीर पर कोमल ऊन का बना आवरण होता है तथा मोटे बाल बाहर निकले रहते हैं।

ये बाल इतने लम्बे होते हैं कि इस जन्तु के खड़ा होने पर भूमि को छू जाते हैं। ऊन तथा बालों का यह घना आवरण सर्दी तथा नमी के लिए अप्रवेश्य होता है, अतः यह जन्तु कठोर शीत से अपना बचाव कर लेता है। ग्रीष्मकाल के आते ही यह आवरण गिर जाता है तथा जन्तु फटेहाल दिखाई पड़ता है। आर्कटिक लोमड़ के शरीर पर फर का दुहरा आवरण होता है जिस कारण वह -50° सेण्टीग्रेड तक तापमान को सहन कर लेता है एवं कठोर शीतकाल में लेमिंग तथा खरगोशों का शिकार करने में व्यस्त रहता है। स्थायी पक्षियों में घने पंख होते हैं (यथा-Ptarmigan पक्षी) । छोटे पक्षी अपने रोयेदार पंखों को फुलाकर तथा फड़फड़ाकर शीत से अपनी रक्षा करते हैं।

कुछ स्थायी प्राणी वर्ष के विभिन्न मौसमों में अपना रंग बदल देते हैं। Ptarmigan पक्षी अपने पंखों का रंग साल में तीन बार बदलता है। आर्कटिक लोमड़ तथा Stoat (mustela erminea) का रंग ग्रीष्मकाल में भूरा होता है तथा शरद् काल में श्वेत हो जाता है। कुछ स्तनधारी जन्तुओं (यथा-रीक्ष तथा कैरिबू) के पैर का निचला भाग (जिस पर रोयें नहीं होते हैं) इस तरह का बना होता है कि उससे होकर शरीर की ऊष्मा बाहर न निकल सके (insulated feet) छोटे आकार वाले rodents, lemmings, shrews तथा volces बर्फ में बिल बनाकर रहते हैं ताकि भक्षकों से बच सकें।

आर्कटिक टुण्ड्रा के अधिकांश जन्तु प्रवासी (migrants) होते हैं। जब शरद् काल प्रारम्भ होता है तो ये दक्षिण की ओर वन वाले भागों में भ्रमण कर जाते हैं तथा ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होते ही अपने मूल स्थान में वापस लौट आते हैं। सबसे पहले प्रवास करने तथा पुनः वापस आने वाले प्राणियों में पक्षी प्रमुख होते हैं। (water, fowl, ducks, swans तथा geese की कई प्रजातियाँ)। कुछ पक्षी वसंतकाल में आगमन के समय दक्षिणी भाग से अपने वास्य क्षेत्र में वापस आने से पहले ही जोड़े खा लेते हैं (लैंगिक सम्पर्क)। कुछ पक्षी अपने उसी घोंसले में वापस आ जाते हैं जिन्हें वे शीतकाल के समय छोड़ जाते हैं।

चूँकि ग्रीष्मकाल छोटा होता है और इसी लघु समय के अन्तर्गत घोंसला बनाना, सहवास (सम्भोग) करना, अण्डे देना, उनको जनना तथा नवजात शिशुओं को चारा चुगाना आदि सभी कार्य सम्पादित करना होता है अत: इनके जोड़ों (नर तथा मादा) का प्रेमालाप लघु समय तक ही सीमित रहता है। कुछ पक्षी प्रवास के समय अत्यधिक दूरी तक जाते हैं। इनमें सर्वप्रमुख हैं-आर्कटिक टर्न (Sterna paradisaea)।

ये ग्रीष्मकाल में अपने मूल आर्कटिक टुण्डा वास्य क्षेत्र में प्रवाप करती हैं तथा शीतकाल के प्रारम्भ होते ही अपना स्थान छोड़कर दक्षिणी गोलार्द्ध में अण्टार्कटिका तक पहुंच जाती हैं (इस समय दक्षिण गोलाई में ग्रीष्मकाल होता है)। स्पष्ट है कि आर्कटिक टर्न एक ही वर्ष में दो बार ग्रीष्मकाल तक लाभ उठोती है। कीटों में mosquitoes, midges, blackflies आदि प्रमुख हैं। ग्रीष्मकाल में छोटे-छोटे जलीय भण्डारों, दलदलों तथा नदियों में इनके लार्वा का अपार समूह विकसित हो जाता है जो पक्षियों का प्रमुख आहार है।

भ्रमणशील तथा प्रवासी बड़े जन्तुओं में रेण्डियर तथा कैरिबू सर्वप्रमुख हैं। ये शीतकाल में शीतोष्ण कोणधारी वनों में रहते हैं तथा इसी समय नर तथा मादा में सहवास होता है परंतु बच्चों का जनन ज्यादातर ग्रीष्मकाल में टुण्ड्रा प्रदेश में होता है । ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होते ही caribou भारी झुण्डों में उत्तर की ओर चल पड़ते हैं तथा सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करके टुण्डा आवास में पहुंचते हैं तथा मादा caribou यहाँ बच्चे जनती हैं।

शरद् काल के आगमन होते ही इनके झुण्ड पुनः दक्षिण की ओर चल पड़ते हैं। स्पष्ट है कि यह प्रवास आहार की प्राप्यता तथा अप्राप्यता के फलस्वरूप होता है। इनके सामूहिक भ्रमण के समय रीछों का इन पर आक्रमण होता है तथा लंगड़े, कमजोर तथा कुछ गर्भवती मादा कैरिबू को रौछ पकड़ लेते हैं तथा खा जाते हैं। ग्रीष्मकाल में टुण्ड्रा बायोम में कॅरिबू पर मच्छरों तथा खून चूसने वाले कीटों का भी भयानक आक्रमण होता रहता है। इनसे बचने के लिए ये बार-बार जल में शरण लेते हैं।

अति लघु वृद्धि काल (growing period), न्यूनतम सूर्यातप तथा सूर्य प्रकाश, मिट्टियों में पोषक तत्त्वों (यथा नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस) का अभाव, अविकसित मृदा, मृदा में नमी का अभाव, हिमीकृत धरातल परमाक्रास्ट) आदि के कारण इस आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम में न्यूनतम प्राथमिक उत्पादकता होती है। V.D. Alexandrova (1970) के आकलन के अनुसार उच्च आर्कटिक तथा निम्न आर्कटिक टुण्ड्रा में प्राथमिक उत्पादकता (Primary productivity केवल वनस्पतियों की) क्रमशः 142 ग्राम तथा 228 ग्राम (शुष्क भार) प्रति वर्ग मीटर प्रतिवर्ष है। स्पष्ट है कि इस कम उत्पादकता के कारण शाकाहारी जन्तुओं के भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाती है, अतः ये मौसमी प्रवास करते हैं।

सागरीय बायोम – सागरीय बायोम की कुछ ऐसी विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं (जो प्राय: स्थलीय बायोम में नहीं होती है) जो यहाँ के जीव समुदायों (पादप तथा प्राणी दोनों) को प्रभावित करती हैं। महासागरीय जल का तापमान 0° से 30° सेण्टीग्रेड के बीच रहता है। सागरीय जल ‘में घुले पोषक लवण तत्त्वों की अधिकता होती है। सागरीय बायोग में जीवन तथा आहार श्रृंखला एवं आहार जाल, सूर्य प्रकाश, जल, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन की सुलभता पर आधारित होता है। ये सभी कारक मुख्य रूप से सागर की ऊपरी सतह में ही आदर्श स्थिति में सुलभ होते हैं।

प्रकाश नीचे जाने पर कम होता जाता है तथा 200 मीटर से अधिक गहराई पर जाने पर पूर्णतया समाप्त हो जाता है। इसी ऊपरी सतह (प्रकाशित मण्डल-photiczone) में प्राथमिक उत्पादक पौधे (हरे पौधे, फाइटोप्लैंकटन प्रकाश संश्लेषण द्वारा आहार पैदा करते हैं) तथा प्राथमिक उपभोक्ता जूप्लैंक्टन भी इसी मण्डल में रहते हैं तथा फाइटोप्लैंकटन का सेवन करते हैं। अधिक गहराई में रहने वाले प्राणी अवसादों पर निर्भर करते हैं।

सागरीय बायोम प्रकार – सूर्व प्रकाश, पोषक तत्त्वों, कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन की सुलभता के आधार पर सागरीय भागों में विभिन्न प्रकार के आवासों (वास्य क्षेत्र) का निर्माण होता है जिनमें विभिन्न प्रकार के पादप तथा प्राणी समुदाय रहते हैं। मुख्य रूप से सागरीय बायोम को दो प्रमुख विभागों में अलग करते हैं –

  • पेलैजिक बायोम तथा
  • नितलीय बायोम (benthic biome)

गहराई तक पादप जीवन के आधार पर पलैजिक बायोम को दो उपभोगों में अलग किय जाता है –

  • तट तल बायोम (fertic biome), यह महाद्वीपीय मग्न तटों का भांग होता है जिसमें जल की गहराई 200 मीटर तक होती है) तथा
  • खुला सागर बायोम।

प्रकाश के दृष्टिकोण से सागरीय बायोम को दो प्रमुख भागों में विभक्त करते हैं –

  • प्रकाशित बायोम (euphotic या photic biome) तथा
  • अप्रकाशित बायोम (aphotic biome)।

महाद्वीपीय मग्न तट का समस्त लम्बवत् भाग प्रकाशित होता है। यदि सागरीय बायोम के दो विभागों (पेलैजिक तथा बेन्थिक) को ध्यान में रखा जाये तो सागरीय बायोम के निम्न उपविभाग हो सकते हैं।

A. पेलैजिक बायोम – सागर तल से सागर तली तक का समस्त जलीय भाग। इसके निम्न उपभोग होते हैं –

  • प्रकाशित बायोम या ऊपरी पेलैजिक बायोम-गहराई 200 मीटर तक। महाद्वीपीय मग्न तट भी इसी श्रेणी में आता है। इस समस्त मण्डल में सूर्य प्रकाश पहुँता है परंतु ऊपर से नीचे जाने पर उसकी मात्रा तथा तीव्रता घटती जाती है।
  • अप्रकाशित मण्डल या बायोम-इसकी गहराई 200 मीटर से नीचे की ओर सागरतली तक होती है जो विभिन्न महासागरों एवं सागरों में अलग-अलग होती है। इसमें निम्न गौण मण्डल होते हैं अधिक तथा पूर्ण अन्धेरा होता है। मात्र जीवप्रदीप्त प्रकाश (bioluminescence) ही होता है।
  • अति गहरे पेलैजिक मण्डल-गहराई 6000 मीटर तक होती है।

B. सागरतलीय बायोम (Benthic biome) – इसमें सागरतलीय भाग को सम्मिलित करते हैं। इसके तीन उप-विभाग होते हैं – बेलांचली मण्डल (Littoral zone) –

  • इसके अन्तर्गत सागर तट तथा किनारे का वह भाग आता है जो उच्च ज्वार तथा निम्न ज्वार तल के बीच होता है।
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    चित्र : सागरीय बायोम के प्रकार (जे. डब्लू. हेजपेथ, 1957 के अनुसार)
  • उपवेलांचली मण्डल (Sub-littoral zone) – इसके अन्तर्गत महाद्वीपीय मग्न तट में जल के नीचे स्थित स्थलीय (तलीय भाग) भाग आता है।
  • गहरे तलीय मण्डल (Deep sea benthic zone) – इसके तीन उपमण्डल होते हैं
    (i) Archinenthal zone – महाद्वीपीय मग्न तट से 1000 मीटर की गहराई पर स्थित तलीय भाग।
    (ii)Abyssal benthic zome – 100 मीटर से 6000 मीटर तक गहराई पर स्थित तलीय भाग।
    (iii) Hadal zone – 6000 से 7000 मीटर तक गहराई पर स्थित तलीय भाग। यह मुख्य रूप से महासागरीय गहरी खाइयों की तली को प्रदर्शित करता है।

C. सागरीय जीवों (पादपों तथा जन्तु दोनों) को उनके आवास के आधार पर तीनों कोटियों में विभक्त किया जाता है।

  • प्लैंकटन – ये प्रकाशित मण्डल में जल में उतारन वाले सूक्ष्मस्तरीय पादप तथा जन्तु होते हैं।
  • नेक्टन – इसके अन्तर्गत बड़े आकार वाले तथा शक्तिशाली तैरने वाले जन्तु आते हैं (मछलियाँ आदि) जो सागर के प्रत्येक मण्डल में घूमते रहते हैं।
  • बेन्चस – इसके अन्तर्गत उन पादपों तथा जन्तुओं को सम्मिलित करते हैं जो सागर तली पर रहते हैं।

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प्रश्न 2.
आपके स्कूल प्रांगण में पाए जाने वाले पेड़, झाड़ी व सदाबहार पौधों पर एक संक्षिप्त लेख लिखें और लगभग आधे दिन यह पर्यवेक्षण करें कि किस प्रकार के पक्षी इस वाटिका में आते हैं। क्या आप इन पक्षियों की विविधता का भी उल्लेख कर सकते हैं।
उत्तर:
इस परियोजना कार्य को अपने अध्यापकों की सहायता से स्वयं करें। मदद के लिए परियोजना कार्य (i) देखें।

Bihar Board Class 11 पृथ्वी पर जीवन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘कृषि पारिस्थितिकी’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कृषि फसलों तथा पर्यावरण के मध्य संबंध को कृषि पारिस्थितिकी कहते हैं। फसलों के प्रकार जलवायु, ऋतु तथा किसान के चुनाव पर निर्भर हैं।

प्रश्न 2.
अप्रकाशी क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
महासागरों में 2000 मीटर की गहराई तक स्थित जल क्षेत्र कम प्रकाश पाता है. जो प्रकाश संश्लेषण के लिए अपर्याप्त है। इस क्षेत्र को अप्रकाशी क्षेत्र कहते हैं।

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प्रश्न 3.
हरे पौधे को उत्पादक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
सभी जीव भोजन निर्वाह के लिए भोजन ऊर्जा तथा पदार्थ दोनों की ही आपूर्ति करता है। हरे भरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बोहाइड्रेट पैदा करते हैं तथा प्रोटीन और वसा का संश्लेषण करते हैं। इसलिए इन्हें उत्पादक कहा जाता है।

प्रश्न 4.
प्रथम उपभोक्ता किसे कहते हैं?
उत्तर:
शाकाहारी घटक मुख्य रूप से अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते हैं, प्रथम उपभोक्ता कहलाते हैं।

प्रश्न 5.
जैवमंडल के अजैविक घटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अजैविक घटक मुख्य रूप से जलवायु तथा मृदीय कारक हैं। जलवायु कारकों में तापमान, आर्द्रता, वर्षा तथा हिमपात को शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 6.
पारिस्थितिक की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पर्यावरण तथा जीवों के बीच पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्रकाश संश्लेषण की परिभाषा दें।
उत्तर:
पौधों द्वारा प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल को कार्बोहाइड्रेट में बदलने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं।

प्रश्न 8.
पारिस्थितिक तंत्र के घटकों के दो वर्ग बताएँ।
उत्तर:
प्रारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य वर्ग हैं –

  1. जैव (Organic)
  2. अजैव (Inorganic)

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प्रश्न 9.
कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानव द्वारा कृत तंत्र को पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं। मानव ने अन्य जीवों की तुलना में पर्यावरण को अत्यधिक बदला है। इस परिवर्तन के कारण ही इसे कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 10.
‘सुपोषी झील’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उथली झीलें, जो जैविक उत्पादों के संचय में समृद्ध हैं, सुपोषी झीलें कहलाती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
महासागरों का जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
महासागर जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालते हैं –

  1. महासागर धरातल, तापमान तथा आर्द्रता पर प्रभाव डालते हैं।
  2. महासागर सौर ऊर्जा का संचय करते हैं।
  3. मालसागरों में ऊर्जा के अवशोषण और निष्कर्षण की विशाल क्षमता है।
  4. समुद्र तट पर तापांतर बहुत कम होता है।
  5. महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान को कम करने में मदद करती हैं।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक पर्यावरण तथा मानवीय (कृत्रिम) पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण के दो प्रकार हैं –

  • प्राकृतिक पर्यावरण
  • कृत्रिम पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण से अभिप्राय प्राकृतिक तत्त्वों से है। जैसे-भूमि, वायु, वनस्पति, जल, मिट्टी आदि। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर वातावरण के ऐसे तत्त्व उत्पन्न होते हैं जो मानवीय जीवन पर प्रभाव डालते हैं। पर्यावरण वास्तव में एक ही है, परंतु जब मानव इस दृश्य में प्रवेश करता है तो वह इस पर्यावरण को अपनी इच्छा से प्रभावित करता है। पर्यावरण को मानवीय पर्यावरण कहा जाता है। इसमें जनसंख्या, परिवहन, बस्तियाँ आदि सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 3.
मरुस्थलीय बायोम पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मरुस्थलों की विशेषता अत्यधिक कम वर्षा का होना तथा उच्च वाष्पन है। कम वर्षा के कारण वर्षा से प्राप्त जल भी पौधों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचता। दिन अत्यधिक गर्म और रात ठंडी होती है। तापमान का मौसमी उतार-चढ़ाव काफी होता है। मरुस्थलों में पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तु कम होते हैं। विभिन्न प्रकार के एकॉशया, कैक्टस, यूफोर्बियाज तथा अन्य गूदेदार वनस्पति मरुस्थल में मिलते हैं। इस बायोम में पाए जाने वाले मुख्य जीव हैं-चीटियाँ, टिड्डियाँ, ततैये, बिच्छ, मकड़ी, छिपकली, रटल साँप तथा अनेक कीटभक्षी पक्षी जैसे-बतासी और अबाबील, बटेर, बत्तख, मरु चूहे, खरगोश, लोमड़ी, गीदड़ तथा विभिन्न प्रकार की बिल्लियाँ ।

प्रश्न 4.
जलीय पारिस्थितिक तंत्र, स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जलीय पारिस्थितिक तंत्र खुले महासागरों से लेकर छोटे-छोटे जलाशयों तक है तथा इनमें खारापन, गहराई तथा तापमान के उतार-चढ़ाव को दशाएँ पाई जाती हैं । समुद्री तथा अलवण जलीय पर्यावरण में भी अनेक पारिस्थितिक तंत्र हैं, जिनकी सीमाएँ अतिव्यापी हैं। जलीय पर्यावरण के साथ जीवों के अनुकूलन में अंशों तथा विविधता की दृष्टि से काफी अंतर होता है। कुछ प्राणी पूरी तरह जल में रहते हैं; जैसे-मछलियाँ कुछ प्राणी जल तथा स्थल दोनों पर रहते हैं। अजैविक कारकों की दृष्टि से जलीय पारिस्थितिक तंत्र तथा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र काफी भिन्न हैं। यहाँ रहने वाले समुदायों में भारी अंतर है।

प्रश्न 5.
महासागरीय द्रोणियों में किस प्रकार का पर्यावरण पाया जाता है?
उत्तर:
महासागरीय ट्रोणियों में प्रमुख तीन पर्यावरणों की पहचान की गई है –

  1. वेलांचली क्षेत्र – तट से महाद्वीपीय शेल्फ के किनारे तक की समुद्री सतह।
  2. नितलस्थ क्षेत्र – महाद्वीपीय ढाल तथा अप्रकाशी एवं वितलीय क्षेत्र तक विस्तृत समुद्री सतह।
  3. वेलापवर्ती क्षेत्र – इसमें महासागरीय द्रोणी का जल शामिल है।

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प्रश्न 6.
प्लवक क्या होते हैं?
उत्तर:
पल्वक वे तैरते हुए जीव हैं जिनके पास स्वयं गतिशील होने का कोई साधन नहीं होता। ये जलधाराओं के साथ गति करते हैं। ये सक्ष्म आकार के जीव होते हैं। ये दो प्रकार को होते हैं-पादप प्लवक तथा प्राणी प्लवक । ये नदी तथा सरिताओं में पाए जाते हैं। पादप प्लवक स्वपोषी जीव होते हैं। डायटम प्लवक वर्ग के पौधे हैं। ये सूक्ष्म होते हैं। ये उप-आर्कटिक तथा अंटार्कटिक क्षेत्र के ठंडे जल में तेजी से पनपते हैं।

प्रश्न 7.
प्राकतिक वातावरण तथा मानवीय वातावरण में क्या अंतर है?
उत्तर:
वातावरण के दो प्रकार हैं –

  • प्राकृतिक वातावरण
  • मानवीय वातावरण

प्राकृतिक वातावरण से तात्पर्य प्राकृतिक तत्त्वों से है। जैसे-भूमि, वायु, वनस्पति, जल, मिट्टी आदि । इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर वातावरण के ऐसे तत्त्व उत्पन्न होते हैं जो मानवीय जीवन पर प्रभाव डालते हैं। वातावरण यथार्थ में एक ही है, परंतु जब मानव इस दृश्य में प्रविष्ट होता है तो वह इस वातावरण को अपनी इच्छा से प्रभावित करता है। इस वातावरण को मानवीय वातावरण कहा जाता है। इसमें जनसंख्या, परिवहन, बस्तियाँ, धर्म आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 8.
पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रकृति के विभिन्न संघटक जीवन तथा विकास के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। स्थलाकृतियाँ, वनस्पति तथा जीव-जन्तु एक-दूसरे से मिलकर एक वातावरण का निर्माण करते हैं, जिसे पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं। यह वातावरण पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में ऊर्जा उत्पन्न करने में सहायक होता है जो जीवों के विकास में सहायता करता है। इस प्रकार स्थलाकृतियों, वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में एक चक्र पाया जाता है जिससे हमें पृथ्वी के जैविक पहलू को समझने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 9.
पारिस्थितिकी संतुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक संघटकों में एक जीवन चक्र होता है। पहले वे उत्पन्न होते हैं, विकसित होकर प्रौढ़ावस्था में पहुँचते हैं तथा फिर समाप्त हो जाते हैं। यह चक्र एक लम्बे समय में समाप्त होता है। जीव-जन्तु, वनस्पति, पौधे आदि विकसित होकर एक अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था में सभी जीवों की जल, भोजन, वायु आदि आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। जैव संख्या तथा वातावरण के बीच एक संतुलन स्थापित हो जाता है। इस अवस्था को पारिस्थितिकी संतुलन कहते हैं। इस अवस्था के पश्चात् इन संघटकों में कोई परिवर्तन नहीं होता।

प्रश्न 10.
पारिस्थितिक समर्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला में एक स्तर से दूसरे स्तर तक ऊर्जा के रूपान्तरण के प्रतिशत को पारिस्थितिक समर्था कहते हैं। खाद्य श्रृंखला में चार प्रकार के स्तर पाए जाते हैं। सर्वप्रथम स्तर में आधार स्तर पर प्राथमिक पौष्टिक होते हैं। द्वितीय स्तर पर शाकाहारी होते हैं। तृतीय स्तर पर मांसाहारी तथा चतुर्थ स्तर पर अन्य मांसाहारी होते हैं। इनमें 5% से 20% तक ऊर्जा का रूपांतरण होता है। इसका तात्पर्य यह है कि शाकाहारी निचले स्तर से केवल 10% ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 11.
प्रकृति का संतुलन कैसे बना रहता है?
उत्तर:
प्रकृति का संतुलन-प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए भोजन की उपलब्धता मुख्य कारक है। यह संतुलन गतिशील है और इसमें उतार-चढ़ाव कुछ सीमाओं के भीतर होता रहता है। कोई भी जीव पृथक् न रहकर अपने ही जीवों की संगत में रहता है। इसका पारिस्थितिक क्षेत्र जैविक पर्यावरण की अनुकूलता पर निर्भर करता है। जैविक पर्यावरण विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं की उपज है।

पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक संघटकों में एक जीवन चक्र होता है। पहले वे उत्पन्न होते हैं, विकसित होकर प्रौढ़ावस्था में पहुंचते हैं तथा फिर समाप्त हो जाते हैं। जीव-जन्तु, वनस्पति, पौधे आदि विकसित होकर एक अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था में सभी जीवों की जल, भोजन, वायु आदि आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। जीव तथा प्रकृति के बीच एक संतुलन हो जाता है। इस अवस्था को पारिस्थितिकी संतुलन या प्रकृति-संतुलन कहते हैं।

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प्रश्न 12.
जैव मंडल में ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है?
उत्तर:
जैवमंडल में ऊर्जा प्रवाह-प्रकृति में ऊर्जा प्रकाश संश्लेषित जीवों के माध्यम से प्रवेश करती है और एक जीव से दूसरे जीव को भोजन के रूप में दी जाती है। वे जीव जो सूर्य के प्रकाश का ट्रैप करते हैं, उत्पादक कहलाते हैं। ट्रेप की गई ऊर्जा का कुछ भाग प्राथमिक उपभोक्ताओं द्वारा लिया जाता है। पशु पेड़-पौधों से अधिक सक्रिय होने के कारण ऊर्जा के अधिकतर भाग को अन्य घटक द्वारा उपयोग किए जाने से पहले ही कर लेते हैं। ऊर्जा स्थानांतरण में खाद्य श्रृंखला से ऊर्जा का कुछ भाग लुप्त हो जाता है।

इस प्रकार ऊर्जा की मात्रा एक स्तर से अगले स्तर पर स्थानांतरित होने पर घटती जाती है। मृत जीवों का अपघटन रासायनिक ऊर्जा का विमोचन करता है। अन्त में समस्त और ऊर्जा, जो उत्पादकों के माध्यम से जैविक संसार में प्रवेश करती है अजैविक संसार को प्रकाश के रूप में नहीं बल्कि उष्मा के रूप में वापस कर दी जाती है।
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प्रश्न 13.
पारिस्थितिक तंत्रों की क्या-क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिक तंत्रों की सीमाएँ-पारिस्थितिक तंत्र में निवेश एवं उत्पादन का अध्ययन इसकी सीमाओं को आर-पार किया जा सकता है तथा सुविधा के लिए इसे पृथक् अस्तित्व में देखा जाता है। पारिस्थितिक तंत्र की सीमाएँ अस्पष्ट तथा अतिव्यापी हैं। ऊर्जा तथा पदार्थों का एक पारिस्थिक तंत्र से दूसरे पारिस्थितिक तंत्र में संचलन होता रहता है। यह संचलन नजदीक अथवा दूर के पारिस्थितिक तंत्र से हो सकता है। ऊर्जा एवं पदार्थों का संचलन, जैविक, जलावायविक अथवा भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

हिमालय क्षेत्र से भारी मात्रा में मृदा गंगा, यमुना तथा बह्मपुत्र जैसी नदियों द्वारा अपने डेल्टाओं में लाई जाती हैं। साइबेरिया से सारस भारत (भरतपुर) प्रवास करते हैं। गहरे महासागरीय अवसाद में उत्पन्न हुआ फास्फोरस शैवाल-क्रस्टेशियाई-जलकाक खाद्य श्रृंखला द्वारा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र की ओर परिवहित किया जा सकता है। पृथ्वी पर उपस्थित हजारों पारिस्थितिक तंत्र आपस में जुड़े हुए हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखें –

  • तुंगता के अनुसार बायोम
  • मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र
  • मितपोषणी झीलें
  • पारिस्थितिक तंत्रों की सीमाएँ

उत्तर:
1. तुंगता के अनुसार बायोम – टुण्ड्रा बायोम की शृंखला हिमालय (एशिया), एंडीज (अमेरिका) तथा रॉकीज (उत्तरी अमेरिका) जैसी पर्वत श्रेणियों के ढालों पर भी देखी जा सकती हैं। इस पर्वत श्रेणियों पर बायोम प्रकार में धीमा परिवर्तन अक्षांश के स्थान पर ऊँचाई का अनुसरण करता है। इन बायोमों के निर्धारण में तापमान तथा वर्षण की दर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारक हैं। उष्णकटिबंधीय पर्वतों में पेड़-पौधों के समुदाय तथा इनकी दशाएँ पर्वत के आधार से हिमरेखा तक इस प्रकार हैं-उष्णकटिबंधीय वन (भारत में तराई क्षेत्र); पर्णपाती वन; शंकुधारी वन तथा टुण्डा बनस्पति।

2. मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र – मानव ने पर्यावरण को इतना अधिक बदला है कि इसे मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है। पौधों एवं जीव-जन्तुओं सहित गाँव एवं शहर फलोद्यान एवं बागान, उद्यान एवं पार्क आदि मानवकृत स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र हैं। बड़े बाँध और जलाशय, झीलें, नहरें, छोटे मत्स्य तालाब और जल जीवशाला मानवकृत जलीय पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं। जैविक समुदाय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संशोधन आग का प्रयोग, पौधों के उगने तथा पशुओं के पालने से आया है। कृषि ही समस्त मानव सभ्यता की जड़ है और यही सभ्यता का पोषण भी करती है। मानव ने वनों तथा घास भूमियों के विशाल क्षेत्रों को चुने हुए पौधों, जैसे अनाज, दालें, तिलहन तथा चारा, पैदा करने के लिए शस्य भूमि में बदल दिया है।

मानवकृत सभी पारिस्थितिक तंत्र, जिसमें कृषि पारिस्थितिक तंत्र सम्मिलित हैं, काफी सरल एवं अत्यधिक सक्षम हैं। इनमें प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की विविधता का अभाव है। एक ही प्रकार की फसल जलाभाव, बाढ़, बीमारियों, नाशक जीवों अथवा भूमि पर रहने वाले कीटों द्वारा पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं।

3. मितपोषणी झीलें – झील एवं तालाब प्रत्येक बायोम में मिलते हैं। ये अलवणीय जलाशय हैं। अपेक्षाकृत उथली झीलें जैविक उत्पादों के संचय में समृद्ध हैं, इन्हें सपोषी झीलें कहते हैं। गहरी झीलें जिनके दोनों किनारों के ढाल तीव्र तथा पथरीले हों, परिसंचरित पोषण असे फॉस्फेट में निर्धन होते हैं। इन्हें मितपोषणी झीलें कहते हैं। इन झीलों के भौतिक कारक अवस्थिति, ऊँचाई और आस-पास के बायोम पर निर्भर करते हैं। कुछ झीलें खारे जल वाली होती हैं, जैसे राजस्थान की सांभर झील। अलवणीय तालाबों में स्वपोषी सूक्ष्म पादपप्लवक भी पाए जाते हैं।

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प्रश्न 2.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता एवं द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता
  2. जैविक तथा अजैविक कारक
  3. खाद्य शृंखला तथा खाद्य जाल।

उत्तर:
1. प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता एवं द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता में अंतर –
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2. जैविक तथा अजैविक कारक –
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3. खाद्य शृंखला तथा खाद्य जाल।
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प्रश्न 3.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. स्थलीय तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्र
  2. समुद्री तथा अलवणीय जल पर्यावरण
  3. टैगा तथा टुंड्रा।

उत्तर:
1. स्थलीय तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्र में अंतर –
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2. समुद्री तथा अलवणीय जल पर्यावरण –
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3. टैगा तथा टुंड्रा –
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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है ……………..
(क) ज्वार
(ख) तरंग
(ग) धाराएँ
(घ) ऊपर में से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) धाराएँ

प्रश्न 2.
वृहत् ज्वार आने का क्या कारण है?
(क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल
(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक-दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) तटरेखा का दंतुरित होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक-दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

प्रश्न 3.
पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अपसौर
(ख) उपसौर
(ग) उपभू
(घ) अपभू
उत्तर:
(ग) उपभू

प्रश्न 4.
पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अक्टूबर
(ख) जुलाई
(ग) सितम्बर
(घ) जनवरी
उत्तर:
(घ) जनवरी

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
तरंगें क्या हैं?
उत्तर:
तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं । तरंगों में जल का कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं।

प्रश्न 2.
महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?
उत्तर:
वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पायी जाती हैं। तरंगें जैसे ही आगे की ओर बढ़ती हैं बड़ी होती जाती हैं तथा वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं।

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प्रश्न 3.
ज्वारभाटा क्या है?
उत्तर:
चन्द्रमा एवं सूर्य के आकर्षण के कारण दिन में एक बार या दो बार समुद्र तल का नियतकालिक उठने या गिरने को ज्वारभाटा कहा जाता है।

प्रश्न 4.
ज्वारभाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
चन्द्रमा के गुरुवाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वार भाटाओं की उत्पति होती है। दूसरा कारक, अपकेंद्रीय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर दो महत्वपूर्ण ज्वारभाटाओं को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं। चन्द्रमा की तरफ वाले पृथ्वी के भाग पर, एक ज्वारभाटा उत्पन्न होता है जब विपरीत भाग पर चन्द्रमा का गुरुत्वीय आकर्षण उसकी दूरी के कारण कम होता है तब अपकेंद्रीय बल दूसरी तरफ ज्वार उत्पन्न करता है।

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प्रश्न 5.
ज्वारभाटा नौकासंचालन से कैसे संबंधित हैं?
उत्तर:
ज्वारभाटा नौकासंचालकों व मछुआरों को उनके कार्य संबंधी योजनाओं में मदद करती . है। नौकासंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्त्व है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलधाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं ? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
जलधाराएँ अधिक तापमान वाले क्षेत्रों से कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर तथा इसके विपरीत कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर बहती हैं। जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो ये उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उन्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती हैं।

उदाहरणार्थ, गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह जो उत्तर की ओर यूरोप के पश्चिमी तट की ओर बहती है। यह ब्रिटेन और नार्वे के तट पर शीत ऋतु में भी वैर्फ नहीं जमने देती। जलधाराओं का जलवायु पर प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है। जब आप समान अक्षांशों पर स्थित ब्रिटिश द्वीप समूह की शीत ऋतु की तुलना कनाडा के उत्तरी पूर्वी तट की शीत ऋतु से करते हैं। कनाडा का उत्तरी-पूर्वी तट लेब्राडोर की ठंडी धारा के प्रभाव में आ जाता है। इसलिए यह शीत ऋतु में बर्फ से ढका रहता है।

प्रश्न 2.
जलधाराएं कैसे उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
महासागरों में धाराओं की उत्पत्ति कई कारकों के सम्मिलित प्रयास के फलस्वरूप संभव होती है। इनमें से कुछ कारक महासागरीय जल की विभिन्न विशेषताओं से संबंधित हैं कुछ कारक पृथ्वी की परिभ्रमण क्रिया तथा उसके गुरुत्वाकर्षण बल से संबंधित हैं तथा कुछ बाह्य। कारक हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे कारक भी हैं जो धाराओं में परिवर्तन लाते हैं। इन्हें रूप परिवर्तन कारक (modifying factors) कहते हैं।

1. पृथ्वी के परिभ्रमण से संबंधित कारक – पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में अपनी अक्षरेखा के सहारे परिक्रमा करती है। इस गति के कारण जल स्थल का साथ नहीं दे पाता है, जिस कारण वह पीछे छूट जाता है, परिणामस्वरूप जल में पूर्व से पश्चिम दिशा में गति उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार विषुवत् रेखीय धाराओं की उत्पत्ति होती है कभी-कभी कुछ जल पृथ्वी की परिभ्रमण दिशा की ओर भी अग्रसर हो जाता है। जिस कारण प्रति विषुवत् रेखीय धारा की उत्पत्ति होती है।

2. सागर से संबंधित कारक – सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिस कारण धाराओं की उत्पत्ति होती है।

3. बाह्य सागरीय कारक – महासागरीय जल पर वायुमण्डलीय दशाओं का पर्याप्त प्रभाव होता है। इनमें वायुमण्डलीय दबाव तथा उनमें भिन्नता, वायु दिशा, वर्षा वाष्पीकरण आदि धाराओं की उत्पत्ति में सहायक होते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
एक ग्लोब या मानचित्र लें, जिसमें महासागरीय धाराएँ दर्शाई गई हैं, यह भी बताएँ कि क्यों कुछ जलधाराएँ गर्म हैं व अन्य ठंडी। इसके साथ ही यह भी बताएं कि निश्चित स्थानों पर यह क्यों विक्षेपित होती है। कारणों का विवेचन करें।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं को तापमान के आधार पर गर्म व ठंडी जलधाराओं में वर्गीकृत किया जाता है।
1. ठण्डी जलधाराएँ ठण्डे जल को गर्म जल क्षेत्रों में लाती हैं। ये महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर बहती हैं (ऐसी दोनों गोलाद्धों में निम्न व मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में होता है) और उत्तरी गोलार्द्ध के उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में यह जलधाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तट पर बहती हैं।

2. गर्म जलधाराएँ गर्म जल को ठण्डे जल क्षेत्रों में पहुँचाती हैं और प्रायः महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती हैं (दोनों गोलाद्धों के निम्न व मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में)। उत्तरी गोलार्द्ध में ये जलधाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर (उच्च अक्षांशीय) क्षेत्रों में बहती हैं।

पानी के घनत्व में अंतर महासागरीय जलधाराओं की ऊर्ध्वाधर गति को प्रभावित करता है। ठंडा जल गर्म जल की अपेक्षा अधिक सघन होता है। सघन जल नीचे बैठता है जबकि हल्के जल की प्रवृत्ति ऊपर उठने की होती है। ठंडे जल वाली महासागरीय धाराएँ तब उत्पन्न होती हैं जब ध्रुवों के पास वाले जल नीचे एवं धीरे-धीरे विषुवत् रेखा की ओर गति करते हैं। गर्म जलधाराएँ विषुवत् रेखा से सतह के साथ होते हुए ध्रुवों की ओर जाती है और ठंडे जल का स्थान लेती हैं।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ प्रचलित पवनों और कोरियोलिस प्रभाव से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। निम्न अक्षांशों से बहने वाली गर्म जलधाराएँ कोरिलोसिस प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में अपने बाईं तरफ और दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने दाईं तरफ मुड़ जाती है (देखें चित्र)।
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प्रश्न 2.
किसी तालाब के पास जाएँ तथा तरंगों की गति का अवलोकन करें एक पत्थर फेंकें एवं देखें की तरंगें कैसे उत्पन्न होती हैं। एक तरंग का चित्र बनाएँ एवं इसकी लम्बाई, दूरी तथा आयाम को मापें तथा अपनी कापी में इसे लिखें।
उत्तर:
इस परियोजना कार्य को स्वयं करें।

Bihar Board Class 11 महासागरीय जल संचलन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘उद्घावन’ क्या है?
उत्तर:
अत्यधिक विक्षुब्ध जल की परत के रूप में जब तरंग स्थल की ओर संचलित होती है, तब इसे उद्धावन कहते हैं।

प्रश्न 2.
जल में सूर्य का प्रकाश कितनी गहराई तक प्रवेश कर सकता है?
उत्तर:
जल में सूर्य का प्रकाश 900 मीटर की गहराई तक प्रवेश कर सकता है, पर केवल 100 मीटर की गहराई तक इतना प्रकाश रहता है, जिसका उपयोग पेड़-पौधे कर सकें।

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प्रश्न 3.
सागरीय जल के तापमान का वार्षिक अंतर किन घटकों पर निर्भर करता है?
उत्तर:

  1. विभिन्न गहराइयों में तापमान विभिन्नता
  2. ताप चालन का प्रभाष
  3. संवहनी धाराओं का प्रभाव
  4. जलराशियों का पार्श्व विस्थापन

प्रश्न 4.
महासागरीय जल के कौन-से गुण समुद्री जन्तुओं और वनस्पतियों को प्रभाटि करते हैं?
उत्तर:

  1. जल का तापमान
  2. जल का घनत्व
  3. जल की लवणत
  4. जल र संचरण

प्रश्न 5.
उन कारकों के नाम बताइए, जो महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति को निर्याः करते हैं।
उत्तर:
समुद्री धाराओं की उत्पत्ति को नियंत्रित करने वाली महत्त्वपूर्ण क्रियाविधि हैं –

  1. समुद्री धरातल पर पवनों का कर्षण तथा
  2. जल घनत्व में अंतर से उत्पन्न असा

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प्रश्न 6.
महासागरीय धाराएं किसे कहते हैं?
उत्तर:
जल की एक राशि का एक निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक सामान्य संच • महासागरीय धारा कहलाता है। ये चौड़ी प्रवाह प्रणाली से लेकर छोटी प्रवाह प्रणाली तक हं

प्रश्न 7.
थर्मोक्लाइन धाराएं किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जल के घनत्व में अंतर के कारण जो धाराएँ उत्पन्न होती हैं उन्हें थर्माक्लाइन धार कहते हैं।

प्रश्न 8.
गल्फ स्ट्रीम का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पलोरिडा अंतरीप से हटेरास अंतरीए की ओर बहने वाली धारा फ्लोरिडा ध कहलाती है। हटेरास अंतरीप के पश्चात् इसे गल्फ स्ट्रीम कहते हैं।

प्रश्न 9.
तरंग-आवर्त काल किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी निश्चित बिन्दु से गुजरने वाले दो क्रमिक तरंगों के बीच के समय को तरंग-आवर्त काल कहते हैं।

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प्रश्न 10.
‘भग्नोमि’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक क्रांतिक बिन्दु पर आकर तरंग रूप खंडित होकर विक्षुब्य जल समूह में बदल जता है, जिसे भग्नोर्मि कहते हैं।

प्रश्न 11.
तरंग का वेग कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
तरंग वेग निम्न विधि से निश्चित किया जा सकता है –
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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भग्ना॑मि तथा उद्घावन किस प्रकार बनती है?
उत्तर:
जब कोई तीव्र ढाल वाली तरंग तट की ओर बढ़ती है और इसे तट के उथले जल से गुजरना पड़ता है, तो इसके शृंग की ऊँचाई शीघ्रता से बढ़ती है और तरंग का अग्रढाल अत्यधिक तीव्र हो जाता है। एक क्रांतिक बिन्दु पर आकार तरंग रूप में खंडित होकर विक्षुब्ध जल समूह में बदल जाता है, जिसे भग्नोर्मि कहते हैं। भानोमि के पश्चात् तरंग अत्यधिक विक्षुब्ध जल की परत के रूप में वह स्थल की ओर संचलित होती है, जिसे उद्धावन कहते हैं।

प्रश्न 2.
स्वेल और सर्फ में क्या अंतर है?
उत्तर:
स्वेल –

  • खुले सागर में नियमित तरंगों को स्वेल कहा जाता है।
  • तट के समीप इन तरंगों की ऊँचाई बढ़ जाती है।

सर्फ –

  • तटीय क्षेत्रों में टूटती हुई तरंगों को सर्फ कहते हैं।
  • तट के समीप ये तरंगें शोर मचाती हुई तट पर प्रहार करती हैं।

प्रश्न 3.
ज्वारीय भित्ति किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब ज्वारीय तरंगें किसी खाड़ी अथवा नदी के मुहाने में प्रवेश करती हैं तो ज्वारीय भंग नदी के ऊपरी भाग की ओर तेजी से बढ़ती हुई एक खड़ी दीवार की भाँति दिखाई देती हैं, जिसे ज्वारीय भित्ति कहते हैं। जब ज्वार उठता है तो पानी की एक धारा नदी घाटी में प्रवेश करती है। यह लहर नदी के जल को विपरीत दिशा में बहाने का प्रयास करती है। ज्वारीय लहर की ऊँचाई बढ़ जाती है तथा पानी का बहाव उलट जाता है। हुगली नदी में ज्वारीय भित्ति के कारण छोटी नावों को बहुत हानि पहुँचती है। ज्वारीय भित्ति मानव की अनेक प्रकार से सहायता करती है।

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प्रश्न 4.
पवन निर्मित तरंगों के विभिन्न प्रकार बताएं।
उत्तर:
तरंगें पवन के संपर्क से सागरीय जल के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे की गति से उत्पन्न होती हैं। पवन द्वारा तरंगें तीन प्रकार की होती हैं –

  • सी (sea)
  • स्वेल (swell)
  • सर्फ (surf)

विभिन्न दिशाओं तथा गतियों से उत्पन्न तरंगों को ‘सी’ कहते हैं। जब ये तरंगें नियमित रूप से एक निश्चित गति तथा दिशा से आगे बढ़ती हैं तो इसे स्वेल कहते हैं। समुद्र तट पर शोर करती है, टूटती हुई तरंगों को सर्फ कहते हैं। जब ये तरंगें समुद्र तट पर वेग से दौड़ती हैं, तो इन्हें स्वाश (swash) कहते हैं । समुद्र की ओर वापस लौटती हुई. तरंगों को बैक वाश कहते हैं।

प्रश्न 5.
ज्वारभाटा किसे कहते हैं? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
ज्वारभाटा समुद्र की एक गति है। समुद्र जल नियमित रूप से प्रतिदिन दो बार उठता है तथा दो बार नीचे उतरता है। समुद्र जल के इस नियमित उतार तथा चढ़ाव को ज्वारभाटा कहते हैं। पानी के ऊपर उठने की क्रिया को ज्वार तथा पानी के नीचे उतरने की क्रिया को भाटा कहते हैं।

  • प्रत्येक स्थान पर ज्वार तथा भाटा की ऊँचाई भिन्न-भिन्न होती है।
  • प्रत्येक स्थान पर ज्वार या भाटा की अवधि भिन्न-भिन्न होती है।
  • समुद्र जल लगभग 6 घंटे और 13 मिनट तक ऊपर चढ़ता है और इतनी देर तक नीचे उतरता है।
  • ज्वारभाटा एक स्थान पर नित्य ही एक समय पर नहीं आता।

प्रश्न 6.
समुद्री जल की विसंगति तथा समविसंगतीय रेखा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
महासागर महान ऊष्मा भंडार का काम करते हैं। किसी स्थान के औसत तापमान तथा उस स्थान के अक्षांश के औसत तापमान के बीच के अंतर को ऊष्मीय-विसंगति कहते हैं। गर्मजल धाराओं के कारण धनात्मक तथा शीतल जलधाराओं के कारण ऋणात्मक विसंगति उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 7.
महासागरीय जलधाराओं की मुख्य विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
महासागरीय जलधाराओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. जलधाराएँ निरंतर एक निश्चित दिशा में प्रवाह करती हैं।
  2. निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराओं को गर्म जलधाराएँ कहते हैं।
  3. उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराओं को ठंडी जलधाराएँ कहते हैं।
  4. उत्तरी गोलार्द्ध की जलधाराएं अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध की जल-धाराएँ अपने बाई ओर मुड़ जाती हैं।
  5. निम्न अक्षांशों में पूर्वी तटों पर गर्म जलधाराएँ तथा पश्चिमी तटों पर ठंडी जल धाराएँ बहती हैं।
  6. उच्च अक्षांशों में पश्चिमी तटों पर गर्म जलधाराएँ और पूर्वी तटों पर ठंडी जल धाराएँ बहती हैं।

प्रश्न 8.
साउथैम्पटन (इंग्लैंड) के तट पर प्रतिदिन चार बार ज्वार क्यों आते हैं?
उत्तर:
सामान्यतः दिन में दो बार ज्वार आता है। परंतु साउथैम्पटन (इंग्लैंड के दक्षिणी तट) पर ज्वार प्रतिदिन चार बार आते हैं। यह प्रदेश इंगलिश चैनल द्वारा उत्तरी सागर तथा अन्ध महासागर को जोड़ता है। दो बार ज्वार अन्ध महासागर की ओर से आते हैं तथा दो बार उत्तरी सागर की ओर से आते हैं।

प्रश्न 9.
हुगली नदी में नौका संचालन के लिए ज्वार-भाटा का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
ऊँचे ज्वार आने पर नदियों के मुहाने पर जल अधिक गहरा हो जाता है। इस प्रकार बड़े-बड़े जलयान नदी में कई मील भीतर तक प्रवेश कर जाते हैं। कोलकाता हुगली नदी के किनारे समुद्र तट से 120 किमी दूर स्थित है, परंतु हुगली नदी में आने-जाने वाले ज्वार के कारण ही जलयान कोलकाता तक पहुँच पाते हैं। ज्वारीय तरंगें नदियों के जल स्तर को ऊपर उठा देती हैं, जिससे जलयान आंतरिक पतनों तक पहुंच जाते हैं।

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प्रश्न 10.
समुद्री तरंगों की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
तरंगें जल में दोलनी-गतियाँ हैं। समुद्री तरंगों की उत्पत्ति की क्रियाविधि पर यह विश्वास किया जाता है कि ये तरंगें जलीय घरातल पर पवनों के घर्षण के कारण बनती हैं। तरंगों की ऊँचाई तीन कारकों पर निर्भर करती हैं –

पवन वेग
किसी दिशा विशेष से पवन के बहने की अवधि तथा
जलीय घरातल का विस्तार क्षेत्र, जिस पर पवन चलती है।

जहाँ जल गहरा होता है, वहाँ पवन का वेग अधिक होता है तथा उसके बहने की अवधि भी लम्बी होती है। ऐसी परिस्थिति में उच्च तरंग का निर्माण होता है। पवन वेग 160 किमी प्रति घंटा हो और यह पवन 1,600 किमी विशाल समुद्री क्षेत्र में लगातार 50 घंटे तक चले तो 15 मीटर ऊंची तरंगों की उत्पत्ति हो सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ज्वार विलम्ब से क्यों आते हैं? किसी स्थान पर नित्य चारभाटा एक ही समय पर नहीं आता, क्यों?
उत्तर:
चन्द्रमा पृथ्वी के इर्द-गिर्द 29 दिन में पूरा चक्कर लगाता है। चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर का 29वाँ भाग हर रोज आगे बढ़ जाता है। इसलिए किसी स्थान को चन्द्रमा के सामने दोबारा आने में 24 घंटे से कुछ अधिक ही समय लगता है।
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दूसरे शब्दों में प्रत्येक 24 घंटों के पश्चात् चन्द्रमा अपनी पहली स्थिति से लगभग 13° आगे चला जाता है, इसलिए किसी स्थान को चन्द्रमा के ठीक सामने आने में 12.5×4-50 मिनट अधिक लग जाते हैं।
क्योंकि दिन में दो बार ज्वार आता है इसलिए प्रतिदिन ज्वार 25 मिनट देरी के अंतर से अनुभव किया जाता है। पूरे 12 घंटे के बाद पानी का चढ़ाव देखने में नहीं आता; परंतु ज्वार 12 घंटे 25 मिनट बाद आता है। 6 घंटे 13 मिनट तक जल चढ़ाव पर रहता है और पश्चात् 6 घंटे 13 मिनट तक जल उतरता रहता है। ज्वार के उतार-चढ़ाव का यह क्रम बराबर चलता रहता है।

प्रश्न 2.
प्रशांत महासागर की धाराओं का वर्णन करें। इस महासागर के आस-पास के प्रदेशों पर इन धाराओं के प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
प्रशांत महासागर की धाराएँ-प्रशांत महासागर में धाराओं का क्रम अंघमहासागर के. समान ही है। अधिक विस्तार तथा तट रेखा के कारण कुछ भिन्नता है। मुख्य धाराएँ निम्नलिखित हैं –
1. उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा – यह गर्म पानी की धारा है जो मध्य अमेरिका के तट से चीन सागर तक बहती है। यह धारा व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्वी-पश्चिमी दिशा में भूमध्य रेखा के समानान्तर बहती है।

2. क्यूरोसिवो धारा – चीन सागर में फिलीपाइन द्वीप समूह के निकट पानी एकत्र होने से इस गर्म धारा का जन्म होता है। क्यूरोसिवो धारा चीन के तट के सहारे जापान तक पहुँच जाती है। दक्षिणी द्वीप से टकराकर इसकी दो शाखाएँ हो जाती हैं। बाहरी शाखा पूर्वी तट पर खुले सागर में बहती है जिसे क्यूरोसिवो धारा कहते है। भीतरी शाखा पूर्वी तट पर खुले सागर में पश्चिमी तट पर बहती है जिसे सुशीमा धारा कहते हैं। इस धारा का रंग गहरा नीला होता है। जापानी लोग इसे काली धारा भी कहते हैं।

3. उत्तरी प्रशांत डिफ्ट – क्यूरोसिवो धारा जल 40° उत्तर अक्षांश को पार करके पूर्व की ओर मुड़ जाता है। इसे उत्तरी प्रशांत ड्रिफ्ट कहते हैं।

4. कैलोफोर्निया की धारा – यह एक ठंडी धारा है जो कैलीफोर्निया के तट के साथ-साथ भूमध्य रेखा की ओर बहती है। इसके प्रभाव से इस तट की जलवायु कठोर व शुष्क हो जाती है।

5. क्यूराइल की धारा – यह एक ठंडी जल धारा है जो बैरिंग जलडमरूमध्य से साइबेरिया के पूर्वी तट के सहारे जापान के पूर्वी तट तक पहुंच जाती है, इसे ओयाशियो धारा भी कहते हैं।

6. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा – यह एक शक्तिशाली गर्म धारा है, जो भूमध्य रेखा, के दक्षिण में बहती है। यह धारा व्यापारिक पवनों के प्रभाव से दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट से पश्चिम की ओर आस्ट्रेलिया के न्यूगिनी तक जाती है।

7. विपरीत भूमध्य रेखीय धारा – यह एक गर्म जलधारा है, जो भूमध्य रेखा के साथ-साथ शांत हवा की पेटी में पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती है। यह उत्तरी तथा दक्षिणी भूमध्य रेखीय धाराओं की विपरीत दिशा में बहती है।

8. पूर्वी आस्ट्रेलिया धारा – फिजी द्वीप के निकट से आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट तक बहने वाली इस गर्म धारा को न्यू साउथ वेल्थ धारा भी कहते हैं। यह धारा न्यूजीलैंड द्वीप को घेर लेती है।

9. अंटार्कटिक ड्रिफ्ट-यह अत्यंत ठंडे जल की धारा है जो अंटार्कटिक महाद्वीप के इर्द-गिर्द बहती है। दक्षिणी प्रशांत महासागर में पश्चिमी पवनों के प्रभाव से यह धारा पूर्वी । आस्ट्रेलिया से चिल्ली देश के तट तक बहती है।
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10. पेरू की धारा-यह ठंडी जलधारा को लेकर पेरू तक बहती है। यह धारा ऐटाकामा मरुस्थल की जलवायु को कठोर तथा शुष्क बना देती है।

प्रश्न 3.
दीर्घ ज्वार तथा लघु ज्वार में अंतर बताओ। ज्वार प्रतिदिन 50 मिनट विलम्ब से क्यों आते हैं?
उत्तर:
दीर्घ ज्वार – सबसे ऊँचे ज्वार को दीर्घ ज्वार कहते हैं। यह स्थिति अमावस तथा पूर्णमासी के दिन होती है।

कारण – इस स्थिति में सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी एक सीध में होते हैं। सूर्य तथा चन्द्रमा की संयुक्त आकर्षण शक्ति बढ़ जाने से ज्वार शक्ति बढ़ जाती है। सूर्य तथा चन्द्रमा के कारण ज्वार उत्पन्न हो जाते हैं। इन दिनों ज्वार अधिकतम ऊँचा तथा भाटा कम से कम नीचा होता है। दीर्घ ज्वार प्रायः साधारण ज्वार की अपेक्षा 20% अधिक ऊँचा होता है।
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लघु ज्वार – अमावस के सात दिन पश्चात् या पूर्णमासी के सात दिन पश्चात् ज्वार की ऊँचाई अन्य दिनों की अपेक्षा नीची रह जाती है। इसे लघु ज्वार कहते हैं। इस स्थिति को शुक्ल और कृष्ण पक्ष की अष्टमी कहते हैं जब आधा चाँद होता है।
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कारण – इस स्थिति में सूर्य तथा चन्द्रमा पृथी से समकोण स्थिति पर होते हैं। सूर्य तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति विपरीत दिशाओं में कार्य करती है। सूर्य व चन्द्रमा के ज्वार तथा भाटा एक-दूसरे को घटाते हैं। इन दिनों उच्च ज्वार कम ऊँचा तथा भाटा कम नीचा होता है। लघु ज्वार प्रायः साधारण ज्वार की अपेक्षा 20% कम ऊँचा होता है।

प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए –

  • हिन्द महासागर की धाराएँ
  • ज्वारभाटा की उत्पत्ति

उत्तर:
1. हिन्द महासागर की धाराएँ – इन धाराओं का परिसंचरण प्रशांत तथा अटलांटिक महासागर की धाराओं के परिसंचरण से भिन्न है। हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में धाराओं का परिसंचरण प्रतिरूप मानसून के ऋतुनिष्ठ परिवर्तन का अनुसरण करता हुआ अपनी दिशा बदल लेता है। यहाँ शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु में धाराओं का उत्क्रमण दिखाई देता है। हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में धाराओं का परिसंचरण प्रतिरूप अन्य दक्षिणी महासागरों के समान ही है, जो दिशा के दृष्टिकोण से घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल है।

महासागर के उत्तरी भाग में जल का परिसंचरण गर्मियों में घड़ी की सुइयों के अनुकूल होता है। दक्षिणी विषुवतीय धारा पश्चिम की ओर संचलन करती है। अफ्रीका के तट के पास यह दो भागों में बँट जाती है। इसका बड़ा भाग दक्षिण की ओर मोजांबिक तथा आगुलहास धाराओं के रूप में पूर्व की ओर मुड़कर पश्चिमी पवन अपवाह के रूप में बहता है। आस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ यह आस्ट्रेलियन धारा के रूप में दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है और फिर दक्षिणी विषुवत् धारा से मिल जाती है। सर्दियों में उत्तरी-पूर्वी मानसून धारा विषुवत् रेखा के दक्षिण विरुद्ध धारा के रूप में पूर्व की ओर बहती है।
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2. ज्वारभाटा की उत्पत्ति – ज्वारभाटा सागरों तथा महासागरों के जल स्तर में आवर्ती उतार-चढ़ाव है, जो सूर्य और चन्द्रमा के विभेदी आकर्षण के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। दिन में दो बार, लगभग प्रति 12 घंटे 26 मिनट के बाद समुद्र तल ऊपर उठता है तथा दो बार नीचे गिरता है। समुद्र तल के ऊपर उठने को ज्वार तथा नीचे गिरने को भाटा कहते हैं।

ज्वारभाटा की उत्पत्ति का मूल कारण चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति है। सर्वप्रथम न्यूटन ने यह बताया कि सूर्य, चन्द्रमा तथा ज्वारभाटा का आपस में कुछ संबंध है। चन्द्रमा अपने आकर्षण बल के कारण पृथ्वी के जल को आकर्षित करता है। स्थल भाग कठोर होता है, इस कारण खिंच नहीं पाता परंतु जल भाग तरल होने के कारण ऊपर उठ जाता है। यह जल चन्द्रमा की ओर उठता है। वहाँ पर आसपास का जल सिमटकर उठ जाता है जिसे उच्च ज्वार कहते हैं। जिस स्थान पर जलराशि कम रह जाती है वहाँ जल अपने तल से नीचे गिर जाता है, उसे लघु ज्वार कहते हैं।

पृथ्वी की दैनिक गति के कारण प्रत्येक स्थान पर दिन-रात में दो बार ज्वार आता है। एक ही समय में पृथ्वी तल पर दो बार ज्वार उत्पन्न होते हैं। जब ठीक चन्द्रमा के सामने तथा दूसरा उससे विपरीत वाले स्थान पर जल ऊपर उठता है, इसे सीधा ज्वार कहते हैं। विपरीत भाग में अपकेंद्रीय बल के कारण जल ऊपर उठता है तथा
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उच्च ज्वार उत्पन्न होता है इसे अप्रत्यक्ष ज्वार कहते हैं। इस प्रकार पृथ्वी के एक ओर ज्वार आकर्षण शक्ति की अधिकता के कारण और दूसरी ओर अपकेन्द्रीय शक्ति की अधिकता के कारण उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 5.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. ठण्डी एवं गर्म महासागरीय धाराएँ
  2. उच्च ज्वार एवं लघु ज्वार
  3. उद्घावन एवं पश्चधावन

उत्तर:
1. ठण्डी एवं गर्म महासागरीय धाराएँ में अंतर –
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2. उच्च ज्वार एवं लघु ज्वार
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3. उद्घावन एवं पश्चधावन
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प्रश्न 6.
महासागरीय धाराओं का वेग कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
तरंग का ऊपरी भाग शीर्ष तथा निम्न भाग गर्त कहलाता है। दो क्रमिक शृंगों अथवा गर्तों के मध्य की दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं। किसी निश्चित बिन्दु से गुजरने वाले दो क्रमिक तरंगों के बीच के समय को तरंग आवर्त काल कहते हैं। संचलन करती हुई तरंग का वेग निम्न विधि से निश्चित किया जा सकता है
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तरंग आवर्त काल 160 किमी प्रति घंटा हो तो यह पवन 1,600 किमी विशाल समुद्री क्षेत्र में लगातार 50 घंटे तक चले तो 15 मीटर ऊँची तरंगों की उत्पत्ति हो सकती है। शक्तिशाली तूफानों के समय तरंगों की ऊँचाई बढ़ जाती है। 12 से 15 मीटर तक ऊँची तरंगों का वेग 30 से 100 मीटर प्रति घंटा होता है तथा इनकी तरंगदैर्ध्य 60 से 120 मीटर के मध्य होती है।

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प्रश्न 7.
यदि महासागरीय धाराएं न होती, तो विश्व का क्या हुआ होता? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराएँ मानव जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं। धाराओं का यह प्रभाव कई प्रकार से होता है –

  1. जिन तटों पर गर्म या ठंडी धाराएं चलती हैं वहाँ की जलवायु क्रमशः गर्म या ठंडी हो जाती है।
  2. गर्म धारा के प्रभाव से तटीय प्रदेशों का तापक्रम ऊँचा हो जाता है तथा जलवायु सम हो जाती है। ठंडी धारा के कारण शीतकाल में
  3. तापक्रम बहुत नीचा हो जाता है और वायु विषम व कठोर हो जाती है।
  4. गर्म धाराओं के समीप के प्रदेशों में अधिक वर्षा होती है, परंतु ठंडी धाराओं के समीप के प्रदेशों में कम वर्षा होती है।
  5. गर्म व ठंडी धाराओं के मिलने पर धुंध व कोहरा उत्पन्न होता है।
  6. गर्म व ठंडी धाराओं के मिलने से गर्म वायु बड़े वेग से ऊपर उठती है तथा तीव्र तूफानी चक्रवात को जन्म देती है।
  7. गर्म धाराओं के प्रभाव से सर्दियों में बर्फ नहीं जमती तो बन्दरगाह व्यापार के लिए वर्ष भर खुले रहते हैं, परंतु ठंडी धारा के समीप का
  8. तट महीनों बर्फ से जमा रहता है। ठंडी धाराएँ व्यापार में बाधक हो जाती हैं।
  9. धाराएँ जल मार्गों का निर्धारण करती हैं। ठंडे सागरों के साथ बहकर आने वाली हिमशिलाएँ जहाजों को बहुत हानि पहुंचाती हैं। इनसे
  10. मार्ग बचाकर समुद्री मार्ग निर्धारित किए जाते हैं।
  11. प्राचीन काल में धाराओं का जहाजों की गति पर प्रभाव पड़ता था। धाराओं की अनुकूल दिशा में चलने से जहाज की गति बढ़ जाती थी
  12. परंतु विपरीत दिशा में चलने से उनकी गति मंद पड़ जाती थी।
  13. धाराओं के कारण समुद्र जल स्वच्छ, शुद्ध तथा गतिशील रहता है।
  14. धाराएँ समुद्री जीवन का प्राण है। ये अपने साथ बहुत-सी गली-सड़ी वस्तुएँ बहाकर, लाती हैं। ये पदार्थ मछलियों के भोजन का आधार हैं।

ऊपर लिखित बातों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि धाराएँ न होती तो प्रकृति ही अस्त-व्यस्त हो जाती । समुद्री प्राणियों का जीवन असंभव हो जाता है। जलवायु व्यापार, तापक्रम तथा मानव जीवन पर विपरीत प्रभाव होता और सारे विश्व का अस्तित्व ही बदल जाता। इसलिए धाराएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा

Bihar Board Class 11 Economics उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत में आर्थिक सुधार क्यों आरम्भ किए गए?
उत्तर:
निरन्तर बढ़ती हुई कीमतों, बढ़ते हुए बजटीय घाटे, घटती हुई विनिमय दर, बढ़ते हुए व्यापार घाटे और भुगतान संकट, देश का ऋण जाल में फंसना आदि कुछ ऐसे कारण थे जिनके कारण भारत में आर्थिक सुधार आरम्भ किए गए।

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प्रश्न 2.
विश्व व्यापार संगठन के कितने सदस्य देश हैं?
उत्तर:
वर्तमान समय में विश्व व्यापार संगठन के 133 सदस्य देश हैं।

प्रश्न 3.
नई आर्थिक नीति की घोषणा कब की गई?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति की घोषणा जुलाई 1991 में की गई।

प्रश्न 4.
रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों पर किस प्रकार नियंत्रण रखता है?
उत्तर:
रिजर्व बैंक विभिन्न नियमों तथा कसौटियो के माध्यम से व्यावसायिक बैंकों के कार्यों का नियमन करता है। रिजर्व बैंक ही तय करता है कि कोई बैंक अपने पास कितनी मुद्रा जमा रख सकता है। विभिन्न क्षेत्रकों को उधार देने की प्रकृति को यही तय करता है।

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प्रश्न 5.
रुपयों के अवमूल्यन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब किसी विशेष उद्देश्य से दूसरे देश की मुद्रा की तुलना में एक देश की मुद्रा की विनिमय दर घटाकर उसके मूल्य को कम कर दिया जाता है तो इस प्रक्रिया को अवमूल्यन कहते हैं। अवमूल्य में मुद्रा का बाह्य मूल्य कम होता है किन्तु अवमूल्यन के बाद मुद्रा का आन्तरिक मूल्य कम नहीं होता है।

प्रश्न 6.
इसमें भेद करें।

  1. युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय (Strategic and Minority sale)
  2. द्वितीयक और बहुपक्षीय व्यापार (Bilateral and Multilateral trade)
  3. प्रशुल्क एवं प्रशुल्क अवरोधक (Tariff and Non tariffs barriers)

उत्तर:
1. युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय में अंतर:
कोई कंपनी जब अपने सभी अंश। (शेयरों) का विक्रय किसी अन्य कंपनी को हस्तांतरित करती है तो यह युक्तियुक्त विक्रय है जबकि कंपनी अपने अंशों (शेयरों) को बाजार में जनता के लिए विक्रय करती है तो यह अल्पांश विक्रय कहलाता है।

2. द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार में अंतर:
दो पक्षों के बीच में होने वाले व्यापारों को द्विपक्षीय व्यापार कहते हैं। इसके विपरीत दो से अधिक देशों के बीच में होने वाले व्यापार को बहुपक्षीय व्यापार कहते हैं।

3. प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधकों में अंतर:
शुल्क के द्वारा आयात तथा निर्यात का अवरोध प्रशुल्क अवरोध कहलाता है जबकि कोटा तथा अन्य कारणों से आयात तथा निर्यात का अवरोध गैर-शुल्क अवरोध कहलाता है।

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प्रश्न 7.
प्रशुल्क (Tariffs) क्यों लगाये जाते हैं?
उत्तर:
घरेलू उद्योग को विदेशी उद्योगों से संरक्षण देने के लिये प्रशुल्क लगाये जाते हैं।

प्रश्न 8.
परिमाणात्मक प्रतिबंधों का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
पमिाणात्मक प्रतिबंधों से अभिप्राय निश्चित मात्रा से अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं का आयात न होना।

प्रश्न 9.
लाभ काम रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर देना चाहिए?
उत्तर:
लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों से होने वाले लाभों से वंचित हो जायेगी। इससे समाजवाद की भावना को आघात लगेगा। सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम में कार्यरत कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

प्रश्न 10.
क्या आपके विचार से बाह्य प्रापण भारत के लिए अच्छा है? विकसित देशों में इसका विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर:
हाँ, सेवाओं का बाह्य प्रापण से भारत को रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। दूसरे देशों का पैसा भारत में आ रहा है और भारतीय लोग कम दाम पर दूसरे देशों को दक्षतापूर्ण सेवायें प्रदान कर रहे हैं।

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प्रश्न 11.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण यह विश्व का बाह्य केन्द्र बन रहा है। अनुकूलन परिस्थितियाँ क्या हैं?
उत्तर:
गुण (Advantage):
भारतीय दूसरों को सेवा बाँटने में कुशल हैं। वे सही ढंग से तथा ये कम कीमत पर दूसरों को सेवाएं प्रदान कर सकते हैं। भारत में कुशल कर्मचारी काफी मात्रा में हैं।

प्रश्न 12.
क्या भारत सरकार की नवरल नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में सहायक रही हैं? कैसे?
उत्तर:
भारत सरकार की नवरत्न नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में काफी सहायक रही है। विद्वानों का कहना है कि नवरत्नों के प्रसार को बढ़ावा देकर इन्हें विश्वस्तरीय। निकाय बनाने के स्थान पर सरकार ने विनिवेश द्वारा आशिक रूप से इनका निजीकरण किया हे और उन्हें वित्तीय बाजार से स्वयं संसाधन जुटाने और विश्व बाजारों में अपना विस्तार करने के योग्य बनाया है।

प्रश्न 13.
सेवा क्षेत्रक के तीब्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सेवा क्षेत्रक उदारीकरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ एकदम नवीन क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत अनेक व्यवसायों को सम्मिलित कर लिया गया है जिन्हें सेवा क्षेत्र नाम दिया गया है। जैसे कोरियर सर्विस आदि। सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी कारणों में प्रमुख हैं संचार व यातायात की सुविधाएँ, बैंकिंग की आधुनिक सुविधाएँ व सरकार की उदारवादी नीति।

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प्रश्न 14.
सुधार प्रक्रिया तथा कृषि क्षेत्रक दुष्प्रभावित हुआ लागत है। क्यों?
उत्तर:
सुधार कार्यों से कृषि को कोई लाभ नहीं हो पाया है जिससे कृषि की संवृद्धि दर कम होती जा रही है। सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्रक काफी दुष्प्रभावित हुआ है। यह निम्नलिखित तत्त्वों तथा तथ्यों से स्पष्ट है –

1. सार्वजनिक व्यय में कमी:
सुधार अवधि में कृषि क्षेत्रक में सार्वजनिक व्यय विशेषकर आधारिक संरचना (सिंचाई, बिजली, सड़क निर्माण, बाजार सम्पर्क तथा शीघ्र प्रसार) पर व्यय में काफी कमी आई है। इससे कृषि क्षेत्रक काफी दुष्प्रभावित हुआ है।

2. उर्वरक सहायिकी की समाप्ति:
सुधार काल में उर्वरक सहायिकों को समाप्त कर दिया गया। इससे उत्पादन लागतों में वृद्धि हुई। इसका छोटे और सीमांत किसानों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा।

3. विदेशी स्पर्धा का सामना:
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के कारण कृषि उत्तम में आयात शुल्क की कटौती की गई। न्यूनतम समर्थन मूल्यों को समाप्त कर दिया गया: अतिरिक्त इन पदार्थों के आयात पर परिमाणात्मक प्रबंध हटाए गए । इन सबके कारण भारत के किसानों को विदेशी स्पर्धा का सामना करना पड़ा जिसका उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

4. खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि:
उत्पादन व्यवस्था निर्यातोन्मुखी हुई। आन्तरिक उपभोग की खाद्यान्न फसलों के स्थान पर निर्यात के लिए नकदी फसलों पर बल दिया गया। इससे देश में खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि हुई।

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प्रश्न 15.
सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के क्या कारण रहे हैं?
उत्तर:
सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के अग्रलिखित कारण रहे हैं –

1. वैश्वीकरण के कारण विकासशील देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित देशों की। वस्तुओं और पूँजी प्रवाहों को प्राप्त करने के लिए खोल देने के लिए बाध्य हैं और उन्होंने अपने उद्योगों का आयातित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा का खतरा मोल ले लिया। सस्ते आयातों ने घरेलू वस्तुओं की मांग को प्रतिस्थापित कर दिया है।

2. बिजली की कटौती के कारण बिजली सहित आधारित संरचनाओं की पूर्ति पर्याप्त ही बनी रही। इससे औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन में कमी आई।

3. भारत ने वस्त्र परिधान आदि के व्यापार से सभी कोटा आदि के प्रतिबंध हटा दिए थे, पर अभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत और चीन से सभी कोटा प्रतिबंध नहीं हटाये हैं। फलस्वरूप भारत को विद्यमान उच्च अप्रशुल्क अवरोधकों के कारण अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में प्रवेश के उपयुक्त अवसर भी नहीं मिल पा रहे।

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प्रश्न 16.
सामाजिक न्याय और जन कल्याण के परिप्रेक्ष्य में भारत के आर्थिक सुधारों पर चर्चा करें।
उत्तर:
भारत के आर्थिक सुधार भारत में आर्थिक सुधार के परिणामस्वरूप आर्थिक विकास की दर में वृद्धि हुई। औद्योगिक क्षेत्र की प्रतियोगिता में भी वृद्धि हुई। कीमत वृद्धि पर नियंत्रण हुआ। लघु उद्योगों का भी विकास हुआ। सुधारकाल की अवधि में कुल मिलाकर संवृद्धि दरों में कमी आई है, किन्तु सेवा क्षेत्रक की संवृद्धि दर में सुधार हुआ। इसी समय कृषि और उद्योगों की संवृद्धि दर में अच्छा सुधार हुआ है। दसवीं पंचवर्षीय योजना में सकल घरेलू उत्पाद दर के 8% लक्ष्य रखा गया है।

अर्थव्यवस्था के खुलने से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा विदेशी विनिमय रिजर्व में तेजी से वृद्धि हुई है। अब भारत वाहन कल-पुर्जे, इंजीनियरिंग उत्पादों, सूचना प्रौद्योगिकी उत्पादों और वस्त्रादि का एक सफल निर्यातक के रूप में विश्व बाजार में जम गया है। बढ़ती कीमतों पर भी नियंत्रण रखा गया है। यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद में संवृद्धि हुई है परंतु फिर भी भी रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन न हो सका। आर्थिक सुधारों से कृषि काफी प्रभावित हुई है। औद्योगिक क्षेत्र मैं संवृद्धि दर में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई है। सार्वजनिक उपक्रमों के बेचने से सरकार को बहुत घाटा उठाना पड़ा है। सुधारों से उच्च वर्ग की आमदनी में वृद्धि हुई है। आय तथा सम्पत्ति के। असमान वितरण में वृद्धि हुई है।

Bihar Board Class 11 Economics उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विनिवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विनिवेश से अभिप्राय है सरकारी उपक्रमों की पूंजी के एक भाग को निजी पूंजीपतियों को बेचना।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैश्वीकरण से अभिप्राय है घरेलू अर्थव्यवस्था का शेष संसार के साथ एकीकरण । अथवा समन्वय करना जिससे विभिन्न अर्थव्यवस्थाएँ एक दूसरे के साथ जुड़ जाएँ।

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प्रश्न 3.
आर्थिक सुधारों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आर्थिक सुधारों से अभिप्राय है वर्तमान आर्थिक नीतियों एवं व्यवस्था में सुधार लाना तथा उनमें आवश्यक अदल-बदल करना ताकि अर्थव्यवस्था के निर्धारित लक्ष्यों का सरलता से प्राप्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इसे विदेशी पूंजी निवेश भी कहते हैं। इसमें विदेशी कम्पनियों, फर्मों और व्यक्तियों से लिए गए ऋण आते हैं। इस निवेश का उद्देश्य लाभ कमान होता है। यह निवेश उन कार्यों में किया जाता है जिनमें अधिक से अधिक लाभ प्राप्त होने की सम्भावना हो। बहुराष्ट्रीय नियम अल्पविकसित देशों में अपनी शाखा और कार्यालय खोलते हैं। इसमें ऋण वापस करने जैसी समस्याएं नहीं होती।

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प्रश्न 5.
नई आर्थिक नीति की घोषणा कब की गई?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति की घोषणा जुलाई 1991 में की गई।

प्रश्न 6.
आर्थिक उदारीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आर्थिक उदारीकरण से अभिप्राय है कि सभी व्यक्तियों को अपने आवश्यकतानुसार निजी आर्थिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता।

प्रश्न 7.
निजीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निजीकरण से अभिप्राय है कि आर्थिक प्रणाली से निजी उपक्रम एवं पूंजी की भूमिका निरन्तर बढ़ती जाएगी और समान अनुपात में सरकार की भूमिका कम हो जायेगी।

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प्रश्न 8.
विराष्ट्रीयकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विराष्ट्रीयकरण से अभिप्राय है कि सरकारी उपक्रमों की पूंजी का स्वामित्व निजी पूँजीपतियों को सौंपना।

प्रश्न 9.
नई आर्थिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति से अभिप्राय है जुलाई 1999 के बाद में किये विभिन्न आर्थिक सुधारों से है जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में प्रतियोगी वातारण पैदा करके उत्पादकता और कुशलता में वृद्धि करना है।

प्रश्न 10.
नई आर्थिक नीति बनाने की क्यों आवश्यकता पड़ी?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति बनाने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से हुई –

  1. राजकोषीय घाटे में वृद्धि।
  2. प्रतिकूल भुगतान संतुलन मे वृद्धि।
  3. विदेशी भण्डारों में कमी।
  4. कीमातों में वृद्धि।
  5. सार्वजनिक क्षेत्रों में उद्यमों की असफलता।

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प्रश्न 11.
आर्थिक सुधार (नई आर्थिक नीति) के मुख्य तत्व लिखें।
उत्तर:
आर्थिक सुधार के मुख्य तत्व तीन हैं –

  1. उदारीकरण
  2. निजीकरण तथा
  3. विश्वव्यापीकरण

प्रश्न 12.
व्यापार निति सुधार 1991 के क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
व्यापर नीति सुधार 1991 के उद्देश्य थे –

  1. आयात तथा निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबन्धों को शीघ्र अति शीघ्र हटना
  2. प्रशुल्क दरों में कमी लाना तथा
  3. आयात के लिए लाईसेंस प्रक्रिया को समाप्त करना

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प्रश्न 13.
क्या श्रम को स्वतंत्र रूप से प्रवास होने की अनुमति दी जानी चाहिए?
उत्तर:
नहीं श्रम को स्वंतत्र रूप से प्रवास की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

प्रश्न 14.
प्रशुल्क (Traiff) एवं अप्रशुल्क अवरोधक में भेद करें?
उत्तर:
शुल्क के द्वारा आयात तथा निर्यात का अवरोध प्रशुल्क अवरोध कहलता है जबकि कोआ तथा अन्य कारणों से आयात तथा निर्यात को अवरोध गैर-शुल्क अवरोध कहलता है।

प्रश्न 15.
भारत ने आयत पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध क्यों लगा रखा था (नई आर्थिक नीति से पहले)?
उत्तर:
घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए भारत ने आयात पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध विकास से बहुत कम हुआ।

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प्रश्न 16.
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिये कई उपाय। अपनाये गये थे। उनमें से कोई तीन उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. लाइसेंस तथा पंजीकरण की समाप्ति।
  2. एकाधिकार कानून में छूट।
  3. पूंजीगत पदार्थों के आयत की छुट आदि।

प्रश्न 17.
आंशिक परिवर्तनशीलता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आशिक परिवर्तनशीलता से अभिप्राय है कुछ विदेशी सौदा के लिए बाजार द्वारा निर्धारित कीमत पर विदेशी मुद्रा जैसे डॉलर या पौण्ड को बाजार में खरीदना या बेचना।

प्रश्न 18.
स्वतन्त्र परिवर्तनशीलता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आंशिक परिवर्तनशीलता से अभिप्राय है कुछ विदेशी सौदों के लिये बाजार द्वारा निर्धारित कीमत पर विदेशी मुद्रा जैसे डॉलर या पौण्ड को बाजार से खरीदना या बेचना।

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प्रश्न 19.
विश्व व्यापक, संगठन की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विश्व व्यापक संगठन की स्थापना 1915 में हुई।

प्रश्न 20.
विश्व व्यापक संगठन का प्रधान कार्यालय कहाँ है?
उत्तर:
विश्व व्यापक संगठन का प्रधान कार्यालय जेनेवा में है।

प्रश्न 21.
भारत का केन्द्रीय बैंक कौन सा है?
उत्तर:
भारत का केन्द्रीय बैंक भारतीय रिर्जव बैंक (Reserve Bank of India) है।

प्रश्न 22.
ब्रिटेन के केन्द्रीय बैंक को किसे नाम से पुकारा जाता है?
उत्तर:
ब्रिटेन के केन्द्रीय बैंक को बैंक ऑफ इंग्लैण्ड के नाम से पुकारा जाता है।

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प्रश्न 23.
1999 से पूर्व की आर्थिक नीतियों के प्रमुख उद्देश्य लिखे?
उत्तर:
1999 से पूर्व की आर्थिक नीतियों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे –

  1. ऊँची संवृद्धि दर।
  2. राष्ट्रीय स्वावलंबन।
  3. पूर्ण रोजगार।
  4. आय की असमानताओं में कमी।

प्रश्न 24.
स्थिर विनिमय दर क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर से अभिप्रय उस विनिमय दर से है जो किसी देश के केन्द्र बैंक के द्वारा निश्चित की जाती है।

प्रश्न 25.
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक वर्ष की अवधि में किसी देश के द्वारा विदेशों को किये जाने वाले मौद्रिक भुगतानों और उनसे ली जाने वाली मौद्रिक प्राप्तियों के अंतर को भुगतान शेष कहते हैं। भुगतान शेष का रिकार्ड द्विअंकन प्रणाली के आधार पर रखा जाता है।

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प्रश्न 26.
विदेशी पूँजी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विदेशी पूँजी से अभिप्राय अन्य देशों के निवासियों द्वारा एक देश में वित्त के रूप में पूँजी लगाना है। अल्पविकसित देशों में विदेशी पूंजी निवेश आधुनिक प्रौद्योगिकी लाती है और निवेश की कमी को पूरा करती है।

प्रश्न 27.
स्थिर विदेशी विनिमय दर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब किसी देश की मुद्रा की अन्य देशों की मुद्राओं से विनिमय दरें उस देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा निश्चित की जाती है तो उसे स्थिर विदेशी विनिमय दर कहते हैं। 1991 तक भारत में विदेशी विनिमय दरें रिजर्व बैंक द्वारा निश्चित की जाती थीं। रिजर्व बैंक द्वारा निश्चित की गई विनिमय दरों को स्थिर विनिमय दर कहते हैं। रिजर्व बैंक ने कई बार स्थिर विनिमय दरों में परिवर्तन किया है।

प्रश्न 28.
वैश्वीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैश्वीकरण से अभिप्राय है विश्व के विभिन्न देशों में आपसी लेन-देन की मात्रा बढ़ाना जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के साथ जुड़ जायें, परस्पर आर्थिक निर्भरता तथा आर्थिक एकीकरण में फैलाव आए।

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प्रश्न 29.
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में सरकार का विनिवेश से क्या अभिप्राय है? सरकार इन उद्योगों का विनिवेश क्यों कर रही है?
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में सरकार के विनिवेश में अभिप्राय है कि सरकार उद्योगों को निजी क्षेत्र की बेच रही है। परिणामस्वरूप इन उद्यमों का स्वामित्व तथा प्रबंध सरकार के स्थान पर निजी क्षेत्र का हो जायेगा। इन उद्योगों में सरकार के विनिवेश का कारण है कि ये उद्योग घाटे में चल रहे हैं।

प्रश्न 30.
निजीकरण करने के लिए सरकार द्वारा अपनाये गये उपायों से कोई एक उपाय लिखें।
उत्तर:
आर्थिक सुधारों में निजीकरण के लिये किये गये उपायों में से एक उपाय सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन है। भारत के आर्थिक विकास में आरम्भ से ही सार्वजनिक क्षेत्र को प्रमुख स्थान दिया गया था। परंतु नये आर्थिक सुधारों में सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से कम करके 4 कर दी गई है।

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प्रश्न 31.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत किये गये राजकोषीय सुधारों के कोई तीन बिन्दु लिखें।
उत्तर:

  1. कर प्रणाली को अधिक वैज्ञानिक तथा युक्तिपूर्ण बना दिया गया है।
  2. आर्थिक सहायता को कम कर दिया गया है।
  3. विदेशी कंपनियों के लाभ को कम कर दिया गया है।

प्रश्न 32.
ई. बिजनेस का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ई. बिजनेस (E-Business) का अर्थ इंटरनेट पर व्यवसाय चलाना है। इसमें न केवल क्रय-विक्रय अपितु ग्राहकों को सेवायें प्रदान व व्यावसायिक साझेदार के साथ सहयोग करना भी शामिल है।

प्रश्न 33.
ई. कॉमर्स की मुख्य धारा के कितने क्षेत्र हैं? इसके नाम लिखें।
उत्तर:
ई कॉमर्स की मुख्यधारा के तीन क्षेत्र हैं –

  1. इलेक्ट्रॉनिक मार्केट (Electronic Market)
  2. इलेक्ट्रॉनिक डाटा इंटचेंज (Electronic Data Interchange)
  3. इंटरनेट कॉमर्स (Internet Commerce).

प्रश्न 34.
ई. कॉमर्स से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ई. कॉमर्स (E-Commerce) से अभिप्राय उन सभी व्यावसायिक लेन-देन से है जो इलेक्ट्रानिक प्रोसेसिंग (Electronic Processing) एवम् आँकड़ों के प्रेषण (Transmission) के माध्यम से पूरे किये जाते हैं।

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प्रश्न 35.
टाटा टी (Tata-tea) ने 2000 में किस कंपनी का अधिग्रहण किया और कितने में?
उत्तर:
भारत की टाटा स्टील ने 2000 में सिंगापुर की नाट स्टील कंपनी को 1245 करोड़ रुपये में खरीदा था।

प्रश्न 36.
टाटा मोटर्स कंपनी ने डेवूड की दक्षिणी कोरिया में स्थित भारी वाणिज्यिक वाहन इकाई कितने में खरीदी?
उत्तर:
टाटा कंपनी ने 2000 में 1870 करोड़ रुपये में अमेरिका की टेटली का अधिग्रहण किया था।

प्रश्न 37.
2004 में भारत की किस कंपनी ने सिंगापुर की नाट स्टील (Nat Steel) कंपनी को 1245 करोड़ में रुपये में खरीदा था।
उत्तर:
टाटा टी ने।

प्रश्न 38.
निजीकरण के क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निजीकरण से अभिप्राय निजी क्षेत्र द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का पूर्ण रूप से स्वामित्व प्राप्त करना तथा उनका प्रबंध करना।

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प्रश्न 39.
निजीकरण के पक्ष में कोई दो तर्क दें?
उत्तर:

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उद्यम घाटे में पड़े हैं।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उद्यम अकार्यकुशल (Incfficient) हैं।

प्रश्न 40.
व्यापार शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यापार शेष से अभिप्राय वस्तुओं के निर्यात तथा आयात के मूल्यों का अंतर है।

प्रश्न 41.
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भुगतान शेष एक ऐसा खाता अथवा विवरण है जिसमें सभी विदेशी प्राप्तियों एवम् भुगतानों को दर्शाया जाता है। इसमें अदृश्य सभी मदों को दर्शाया जाता है।

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प्रश्न 42.
भारत में दूसरे विश्व युद्ध से पूर्व भुगतान शेष कैसा था?
उत्तर:
भारत में दूसरे विश्व युद्ध से पूर्व भुगतान शेष संतुलित था।

प्रश्न 43.
1991 के अन्त में भारत में विदेशी मुद्रा के का भण्डार कितना था?
उत्तर:
1991 के अन्त में भारत में विदेशी मुद्रा के भण्डार केवल दो सप्ताह के आयात के लिये पर्याप्त था।

प्रश्न 44.
द्विपक्षीय (Bilateral) तथा बहुपक्षीय में क्या अन्तर है?
उत्तर:
दो देशों क बीच होने वाले व्यापार को द्विपक्षीय व्यापार कहते हैं जबकि दो से अधिक देशों के बीच में होने वाले व्यापार को बहुपक्षीय व्यापार कहते हैं।

प्रश्न 45.
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् और विशेष रूप से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से भारत का भुगतान शेष कैसा है?
उत्तर:
प्रतिकूल।

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प्रश्न 46.
विनिवेश के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
विनिवेश के उद्देश्य हैं –

  1. वित्तीय अनुशासन में सुधार लाना तथा
  2. आधुनिकीकरण की सुविधायें प्रदान करना

प्रश्न 47.
राजकोषीय नीति या आर्थिक सुधारों के विपक्ष में कोई दो बिन्दु दें।
उत्तर:
विनिवेश के उद्देश्य हैं –

  1. नई आर्थिक निति में कृषि को काम महत्व दिया गया है।
  2. इसमें उद्योगों के निजीकरण को बहुत ही अधिक महत्व दिया गया है।

प्रश्न 48.
उदारीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उदारीकरण से अभिप्राय है सरकार द्वारा लगाये गये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भौतिक नियंत्रणों (औद्योगिक लाइसेसिंग व्यवस्था, आयात लाइसेंस, विदेशी मुद्रा नियन्त्रण आदि) से उद्योगों को मुक्त करना। उदारीकरण में निजी उद्यमियों को उपने निर्णय स्वयं लेने की सवतंत्रता दी जाती है।

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प्रश्न 49.
विश्व व्यापार संगठन क्या है? इससे क्या अपेक्षा की जाती है?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन एक स्वैच्छिक संठन है। इस संगठन की सदस्यता आवश्यक नहीं है। कोई भी देश इस संगठन का सदस्य बन सकता है। इस संगठन से यह आशा की जाती है कि वह विभिन्न देशों के व्यापार में स्वतंत्र रूप से प्रोत्साहन दे।

प्रश्न 50.
नई आर्थिक निति का प्रमुख उद्देश्य क्या है? इसके तीन आधार स्तम्भ लिखें।
उत्तर:
नई आर्थिक. निति का प्रमुख उद्देश्य उत्पादन इकाईयों की उत्पादन क्षमता में सुधार लाना है। इसके तीन आधार स्तम्भ निम्नलिखित हैं –

  1. उदारीकरण
  2. निजीकरण
  3. विश्वव्यापीकरण (वैश्वीकरण)

प्रश्न 51.
स्वालम्बन की दिशा में किन बातों पर जोर दिया गया है? दो बातें लिखें।
उत्तर:
स्वालम्बन की दिशा में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया हैं –

  1. विज्ञान तथा तकनीक के प्रयोग में वृद्धि।
  2. देश के पिछड़े क्षेत्रों का विकाश।

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प्रश्न 52.
उदारीकरण का विदेशी निवेश अन्तःप्रवाह पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
उदारीकरण से विदेशी निवेश अन्तःप्रवाह में बहुत वृद्धि हुई।

प्रश्न 53.
संस्थागत निवेशकों में मुख्य कौन हैं?
उत्तर:

  1. मर्चेट बैंकर्स (Merchant Bankers) म्युचुअल फण्डस (Mutual Funds) तथा
  2. पेंशन फण्डस (Pension Funds) संस्थागत निवेशक हैं

प्रश्न 54.
दूसरे युद्ध के दौरान भारत का भुगतान शेष अनुकूल क्यों रहा?
उत्तर:
क्योंकि युद्ध के समय भारतीय वस्तुओं की मांग अधिक रही और आयात बहुत कम हो गये।

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प्रश्न 55.
कोरियर सेवाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कोरियर सेवाओं (Courier Services) से अभिप्राय उन सेवाओं से है जिनके अन्तर्गत पत्रों, प्रपत्रों एवम् छोटे पार्सलों की सुपुर्दगी एक स्थान से दूसरे स्थान तक की जाती है।

प्रश्न 56.
कोर क्षेत्र (Core Sector) किसे कहते हैं?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र कोर क्षेत्र कहलाता है जिसमें आधारभूत संरचना वाले उद्योग जैसे-पेट्रोलियम, मशीनरी, लोहा-इस्पात आदि सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 57.
विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) कब से लागू कर दिया गया है? इसने किस कानून का स्थान लिया था?
उत्तर:
विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) 1 जून 2000 से लागू कर दिया गया है। इसने विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम (FEMA) का स्थान लिया है।

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प्रश्न 58.
आयात प्रतिस्थापन तथा निर्यात संवर्द्धन में अंतर बतायें।
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं के स्थान पर उनका कोई निकट स्थापन (Close substitute) देश में ही उत्पादित किया जाता है। इसके विपरीत निर्यात संवर्द्धन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें निर्यात वृद्धि के लिये पुराने निर्यातकर्ताओं को तथा नवीन व्यक्तियों को निर्यात में वृद्धि करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है।

प्रश्न 59.
पूँजीगत खातों में दिखाई जाने वाली कोई तीन मदें लिखें।
उत्तर:

  1. निजी प्राप्तियाँ तथा निजी भुगतान
  2. सरकारी प्राप्तियाँ तथा भुगतान तथा
  3. विदेशी ऋणों के मूलधन व ब्याज का भुगतान लेना व देना

प्रश्न 60.
भुगतान संतुलन के चालू खाते में दिखाई जाने वाली कोई तीन मदें लिखें।
उत्तर:

  1. वस्तुओं का आयात तथा निर्यात
  2. अमौद्रिक स्वर्ण का लेन-देन तथा
  3. एकपक्षीय हस्तान्तरण जैसे-दान

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प्रश्न 61.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) किस प्रकार वाणिज्यिक बैंकों पर नियंत्रण रखता है।
उत्तर:
भारतीय रिजर्व बैंक गतिरोधक (Obstructive Authority) अधिकारी के तौर पर वाणिज्यि बैंकों पर नियंत्रण रखता है।

प्रश्न 62.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का सबसे प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर:
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का सबसे प्रमुख कार्य बैंकिंग क्षेत्र का अनुकूलतम नियमन (Facilitating Regulating) करना है।

प्रश्न 63.
बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को कैसे बढ़ावा दिया गया?
उत्तर:
निजी क्षेत्र में बैंकों की स्थापना करने की अनुमति के द्वारा बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया।

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प्रश्न 64.
भारत में निर्धन खाद्य उपभोक्ता कौन है?
उत्तर:
भारत में निर्धन खाद्य उपभोक्ता हैं-ग्रामीण क्षेत्र में भूमिहीन श्रमिक तथा छोटे किसान व शहरी क्षेत्र में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी।

प्रश्न 65.
कृषि उपज के समर्थित मूल्य से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि उपज के समर्थित मूल्य से अभिप्राय किसानों को उनकी उपज की न्यूनतम मूल्य की गारंटी देना।

प्रश्न 66.
देश में खाद्यान्नों की घरेलू कीमतों में वृद्धि का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
देश में घरेलू बाजार के समर्थित मूल्य से अभिप्राय किसानों के उपज में न्यूनतम मूल्य वृद्धि है।

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प्रश्न 67.
अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के लिए भारत सरकार के कई कदम उठाये थे। उनमें कोई दो उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. औद्योगिक लाइसेंसिंग तथा पंजीकरण की समाप्ति (Abolition Industrial Licensing and Registration) तथा
  2. एकाधिकारी कानून से छूट

प्रश्न 68.
निजीकरण के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र की सरकारी कंपनियों को निजी कंपनियों में कितने तरीकों से बदला जा सकता है?
उत्तर:
दो तरीकों से –

  1. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के स्वामित्व तथा प्रबंध से सरकार का हट जाना।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का पूर्ण विक्रय करना।

प्रश्न 69.
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे तीन उपक्रमों के नाम लिखें जिन्हें नवरल कहा जाता है।
उत्तर:

  1. एन. टी. पी. सी. (NTPC), सेल (SAIL) तथा
  2. गेल (GAIL)

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प्रश्न 70.
भारत में निजीकरण के लिये कौन से उपाय अपनाये गये? कोई तीन बताएँ।
उत्तर:

  1. सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सरकार का विनिवेश
  3. सार्वजनिक उद्यमों के अंशों की बिक्री

प्रश्न 71.
मर्चेट बैंकिंग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मर्चेट बैंकिंग (Merchant Banking) से अभिप्राय औद्योगिक तथा व्यापारिक संस्थाओं को विशिष्ट प्रकार की सेवायें उपलब्ध करना।

प्रश्न 72.
म्युचुअल फण्ड (Mutual Fund) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
म्युचुअल फण्ड ऐसी निधि है जो पारस्परिक सहयोग से बनाई जाती है।

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प्रश्न 73.
अवमूल्यन तथा मूल्य ह्रास में अंतर बतायें।
उत्तर:
जब सरकार देश में निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से जानबूझ कर स्वयं अपने देश की मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्रा में कम कर देती है तब उसे अवमूल्यन कहा जाता है। परंतु जब बाजार की माँग एवम् पूर्ति शक्तियों के प्रभाव से एक देश की मुद्रा का मूल्य बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के विदेशी मुद्रा में कम हो जाता है, तब उसे मूल्य ह्रास कहा जाता है।

प्रश्न 74.
नई आर्थिक नीति में निजीकरण को क्यों अधिक महत्व दिया गया है?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति में निजीकरण को अधिक महत्व देने का मुख्य कारण यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र अधिक कार्यकुशल है। उसकी कुशल उत्पादकता तथा लाभदायकता में हमारे लिए जरूरी है।

प्रश्न 75.
मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मौद्रिक नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो मुद्रापूर्ति, ब्याज तथा विनिमय दर से सम्बन्धित है।

प्रश्न 76.
1991 की आर्थिक नीति को U-Turn की संज्ञा क्यों दी जाती है?
उत्तर:
सन् 1991 की आर्थिक नीति को U-Turn इसलिये कहते हैं कि 1991 के बाद अपनाई गई आर्थिक नीति पहले से अपनाई गई नीतियों के बिल्कुल उल्टी है।

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प्रश्न 77.
अमेरिका के केन्द्रीय बैंक का क्या नाम है?
उत्तर:
अमेरिका के केन्द्रीय बैंक का नाम फेडरल रिजर्व सिस्टम (Federal Reserve System) है।

प्रश्न 78.
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण का काम कब आरम्भ हुआ?
उत्तर:
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण का कार्य 1991-92 में आरम्भ हुआ।

प्रश्न 79.
उद्योगों में सरकार विनिवेश कर रही है। इस कथन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस कथन का यह अभिप्राय है कि सरकार उद्योगों को निजी क्षेत्र को बेच रहा है।

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प्रश्न 80.
रुपये के अवमूल्यन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रुपये के अवमूल्सल के अभिप्राय है रुपये के विनिमय दर में कमी लाना । रुपया के अवमूल्यन में विदेशी मुद्रा महंगी हो जाती है अथवा एक रुपये के बदले में विदेशी मुद्रा की राशि कम हो जाती है।

प्रश्न 81.
राजकोषीय सुधारों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राजकोषीय सुधारों से अभिप्राय सरकार की आय में वृद्धि करना तथा व्यय को इस प्रकार करना है जिससे उत्पादन तथा आर्थिक कल्याण पर बुरा प्रभाव नहीं पड़े।

प्रश्न 82.
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क (Central Excise Duties) के स्थान पर अब कौन-सा कर लगाया गया है?
उत्तर:
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के स्थान पर अब केन्द्रीय मूल्य वृद्धि कर (CENVAT) लगाया गया है।

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प्रश्न 83.
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत निजीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत निजीकरण का अर्थ है सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों में से अधिक से अधिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिये खोलना। यह वह सामान्य प्रक्रिया है जिसके द्वारा निजी क्षेत्र किसी सरकारी उद्यम का मालिक बन जाता है या उसका प्रबंध करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चालू खाते तथा पूँजीगत खाते में अंतर बताएँ।
उत्तर:
चालू खाते तथा पूँजीगत खाते में अंतर (Difference between Current Accountant Capital Account):
चालू खाते में वस्तुओं के आयात् एवम् निर्यात, अमौद्रिक स्वर्ण का लेनदेन, परिवहन, बैंकिंग, बीमा, तकनीकी, सेवाएँ तथा पर्यटन आदि से प्राप्त एवम् देय राशि तथा एकपक्षीय हस्तान्तरण जैसे दान आदि मदों को दिखाया जाता है जबकि पूँजीगत खाते में सभी पूँजीगत लेनदेनों को दिखाया जाता है। जैसे –

  1. निजी प्राप्तियाँ एवं भुगतान
  2. सरकारी प्राप्तियाँ तथा सरकारी भुगतान
  3. विदेशी ऋणों के मूलधन व ब्याज का लेन-देन
  4. शुद्ध भूल त्रुटियाँ आदि मदें

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प्रश्न 2.
भुगतान संतुलन तथा व्यापार संतुलन में अंतर बताएँ।
उत्तर:
भुगतान संतुलन तथा व्यापार संतुलन में अंतर –
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Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा

प्रश्न 3.
आयात अभ्यांश (Import Quoto) किसे कहते हैं? आयात अभ्यांश के उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
आयात अभ्यांश (Import Quoto):
आयात अभ्यांश का अभिप्राय वस्तु की उस निश्चित मात्रा अथवा मूल्य से है जिनका समय की एक निश्चित अवधि में देश में आयात किया जा सकता है। इस प्रकार आयात अभ्याश में आयात की मात्रा का पहले से निर्धारण कर दिया जाता है और उसमें कुछ वृद्धि नहीं की जा सकती।

आयात अभ्यांश के उद्देश्य (Objective of Import Quota):

  1. घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करना।
  2. आयातों का प्रभावशाली नियमन।
  3. भुगतान शेष के असंतुलन को दूर करना।
  4. आयातों के अन्तः प्रभाव को सीमित करके घरेलू कीमतों में स्थिरता लाना।

प्रश्न 4.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत कौन से वित्तीय सुधार किये गये थे?
उत्तर:
वित्तीय सुधारों से अभिप्राय देश की मौद्रिक तथा बैंकिंग नीतियों में सुधार करने से है। नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत निम्नलिखित वित्तीय सुधार के किये गये –

  1. तरलता अनुपात में कमी कर दी गई।
  2. बैंकों को ब्याज की दरों का निर्धारण करने की स्वतंत्रता दी गई।
  3. बैंकिंग प्रणाली की पुनः रचना की गई। नये निजी बैंकों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया।
  4. अलग-अलग बैंकों के अधिकारियों की भर्ती के लिये स्वतंत्रता दी गई।

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प्रश्न 5.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत करों में कौन-कौन से सुधार किये गये?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत करों में सुधार (Tax Reforms under New Economic Policy):
नई आर्थिक नीति में करों में निम्नलिखित सुधार किये गये –

  1. आयकर की दरों में लगातार कमी की गई।
  2. 1990-91 से निगम कर की दर जो पहले बहुत ऊँची थी, को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।
  3. अप्रत्यक्ष करों में सुधार लाये गये।
  4. केन्द्रीय उत्पादक शुल्क के स्थान पर केन्द्रीय मूल संवृद्धि कर (Central value Added Tax-CNVAT) लगाया गया।
  5. राज्य स्तर पर भी वैट (VAT) को लागू कर दिया गया है।

प्रश्न 6.
सुधार नीति के अन्तर्गत औद्योगिक क्षेत्र में सुधार लिखें?
उत्तर:
नई सुधार नीति के अन्तर्गत औद्योगिक क्षेत्र में सुधार (Industrial Sector Reforms):
नई सुधार नीति के अन्तर्गत औद्योगिक क्षेत्र में निम्नलिखित सुधार किये गये –

  1. औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता वाले उद्योगों की संख्या 18 से घटा कर तीन कर दी गई।
  2. एकाधिकारात्मक एवम् प्रतिबंधात्मक व्यापार अधिनियम के अन्तर्गत लगाय गये सभी प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से कम करके 8 कर दी गई।
  4. निर्यात और व्यापारिक गृहों तथा बड़े व्यापारिक घरानों को बड़ी मात्रा में आयात की अनुमति दी गई। व्यापारिक गृहों को अब 51% विदेशी पूँजी लगाने की अनुमति दी गई।

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प्रश्न 7.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब की गई थी? इसका मुख्य कार्यालय कहाँ है? इसके उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) यह एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इसकी स्थापना 1995 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य देशों द्वारा आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिये की गई थी। यह अन्तर्राष्ट्रीय संगठन गेट का उत्तराधिकारी है। यह गेट की अस्थायी प्रकृति के विपरीत स्थायी संगठन है। इसका मुख्य कार्यलय जेनेवा में स्थित है।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य (Objectives of WTO):

  1. वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन एवम् व्यापार को बढ़ावा देना।
  2. विश्व संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करना।
  3. जीवन स्तर में वृद्धि करना।
  4. पर्यावरण का संरक्षण एवं सुरक्षा करना।

प्रश्न 8.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत व्यापार और निवेश नीति के सुधार लिखें।
उत्तर:
नई आर्थिक नीति के अंतर्गत व्यापार और निवेश से सम्बन्धित नीति में निम्नलिखित सुधार किये गये –

  1. संवेदनशील उद्योग को छोड़कर बाकी सभी उद्योगों पर आयात लाइसेसिंग समाप्त कर दिया गया।
  2. अप्रैल 2001 से निर्मित उपभोक्ता वस्तुओं तथा कृषि उत्पादों के आयात पर प्रतिबंधों को हटा दिया गया।
  3. भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर निर्यात कर समाप्त कर दिये गए।
  4. FEMA 1973 को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर विदेशी विनिमय प्रबंध अधिनियम (Foreign Exchange Management Act-FEMA)-लागू किया गया।

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प्रश्न 9.
अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिये नई नीतियाँ अपनाई गईं। उनको समूहों में बाँट सकते हैं? प्रत्येक का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था की कुशलता बढ़ाने के लिये अनेक नीतियाँ बनाई गई। इन नीतियों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. स्थिरता प्रयत्न, तथा
  2. संरचनात्मक सुधार प्रयत्न

1. स्थिरता प्रयत्न (Stabilization Measures):
ये अल्पकालीन प्रयत्न हैं। इनका उद्देश्य भुगतान शेष में जो कमियाँ आ गई थी उनको ठीक तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रण में लाना है।

2. संरचनात्मक सुधार प्रयत्न (Structural Reform Measures):
ये दीर्घकालीक प्रयत्न हैं। इनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था की कुशलता में सुधार लाना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न भागों में विद्यमान लोचहीनता को समाप्त करके उसकी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वृद्धि
करना है।

प्रश्न 10.
विनिवेश से क्या अभिप्राय है? इस कार्यक्रम में भारत कहाँ तक सफल रहा है?
उत्तर:
विनिवेश का अर्थ (Meaning of Disinvestment):
विनिवेश से अभिप्राय है सार्वजनिक उद्यमों की सम्पूर्ण अथवा कुछ परिसम्पत्तियों की बिक्री अर्थात् सरकारी उपक्रमों की पूँजी के एक भाग की बिक्री जिसे कि निजी पूँजीपति खरीद सकते हैं। विनिवेश निजीकरण का एक रूप है। विनिवेश के अन्तर्गत सार्वजनिक उद्यमों के कुछ अंशों को निजी कंपनियों को बेचना होता है। कितने प्रतिशत अंश बेचे जायेंगे, यह उपक्रमों की प्रकृति पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 11.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण करने के लिये सरकार द्वारा कौन-कौन से कदम उठाये गये हैं? संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण करने के लिये सरकार द्वारा अपनाये गये कदम (Steps taken by the Govt. to Control the riding Prices):

  1. बढ़ते सरकारी खर्चों पर अंकुश लगाया गया।
  2. मुद्रापूर्ति की वृद्धि पर रोक लगाई गई।
  3. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार किया गया।
  4. उत्पादन उद्यमों की आर्थिक सहायता और बाहरी समर्थन में कटौती करना।
  5. आधारभूत उद्योगों में प्रचलनात्मक कुशलता में सुधार लाना और क्षमता, विस्तार करना।
  6. औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश बाधाओं को कम करना।

प्रश्न 12.
एकाधिकारी एवं प्रतिबंधक व्यवहार अधिनियम के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
MRTP कानून मई 1969 में बनाया गया था और यह जून 1969 से लागू हुआ। इस अधिनियम के अन्तर्गत 1970 में एक MRTO आयोग की स्थापना की गई जिसका प्रमुख कार्य एकाधिकारी एवं प्रबंधक व्यवहारों को नियंत्रित करना था। इस अधिनियम द्वारा आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकना और एकाधिकार और प्रतिबंधक व्यापार व्यवहारों के लिए नियंत्रण लागू करना था। इस अधिनियम में इस बात की स्थापना की गई कि सार्वजनिक हित की दृष्टि से उत्पादन, वितरण और आर्थिक साधनों की आपूर्ति हो सके, कुशलता में वृद्धि की जा सके।

नये उद्यमों के विकास को प्रोत्साहन दिया जा सके और क्षेत्रीय विषमता को कम किया जा सके। भारत में MRTP अधिनियम के लागू होने पर भी आर्थिक शक्ति में निरंतर वृद्धि होती रही है। 1991 की नई औद्योगिक नीति में 100 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा को हटा दिया गया है, तथा अब कोई फर्म जितना भी निवेश करना चाहे, कर सकती है। नये प्रोजेक्ट की स्थापना, विस्तार और अन्य समूहों में मिलना या अन्य फर्म को खरीदने जैसे कार्यों के लिए अब MRTP कमीशन की आवश्यकता नहीं रह गई है।

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प्रश्न 13.
पूरे संसार में निजीकरण की लहर के फैसले के क्या कारण हैं?
उत्तर:
निम्नलिखित कारणों से संसार में निजीकरण की नहर फैल गई है –

  1. यह अनुभव किया गया है कि निजी क्षेत्र के उपक्रमों का तेजी से विकास करने के लिये सरकार के पास निवेश करने के लिये पर्याप्त साधन नहीं है।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्य क्षमता को बढ़ाने के लिये उनका निजीकरण करना चाहिये।

प्रश्न 14.
पारस्परिक कोष पर टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
पास्परिक कोष (Mutual Fund):
पारस्परिक कोष अथवा म्युचुअल फण्ड (Mutual Fund) एक विशेष प्रकार का मध्यस्थ (निवेश संस्था) है जिसे आम जनता की बचत को गतिशील करने के लिए एक ट्रस्ट (Trust) के रूप में स्थापित किया गया है। इसमें विभिन्न योजनाओं के द्वारा जनता के कोष स्थापित किये जाते हैं तथा इन कोषों का मुद्रा बाजार (Money Market) में विभिन्न प्रतिभूतियों (Securities) एवम् अन्य प्रपत्रों में निवेश किया जाता है। यह कोष एक निवेश माध्यम के रूप में कार्य करता है। यह अपेक्षाकृत छोटे निवेशकों को बचतों को एकत्रित करता है और उन्हें विविध प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करता है।

प्रश्न 15.
किन समस्याओं के कारण हमें 1991 में नई आर्थिक नीति अपनानी पड़ी?
उत्तर:
निम्नलिखित समस्याओं के कारण हमें 1991 में नई आर्थिक नीति अपनानी पड़ी –

  1. (i) प्रतिकूल भुगतान संतुलन में वृद्धि।
  2. सरकार के गैर-विकासात्मक खर्चा में वृद्धि होने के कारण राजकोषीय घाटे में वृद्धि।
  3. विदेशी विनिमय मुद्रा भण्डार में कमी।
  4. कीमतों में वृद्धि।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की असफलता।
  6. भारतीय अर्थव्यवस्था में अन्तर्राष्ट्रीय विश्वास का डगमगाना।
  7. नये ऋणों का न मिलना।
  8. अनिवासी भारतीयों के खातों से बड़ी-बड़ी राशियाँ निकाला जाना।

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प्रश्न 16.
सार्वजनिक क्षेत्र के नवरल उपक्रमों के नाम लिखें।
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के नवरल उपक्रम (Navratan enterprises of Public Sector):

  1. स्टील ऑथेरिटी ऑफ इंडिया (SAII)
  2. इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन लि. (IOCL)
  3. भारत संचार निगम लिमटेड (BSNL)
  4. हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि. (HPCL)
  5. भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड (BPCL)
  6. ऑयन एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC)
  7. भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लि. (BHEL)
  8. नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC)
  9. इण्डियन पैट्रो कैमिकल्ज कार्पो. (NTPC)
  10. गैस ऑथेरिटी ऑफ इंडिया लि. (GAIL)
  11. महानगर टेलीफोन निगम लि. (MTNL)

प्रश्न 17.
सार्वजनिक उपक्रमों में निजीकरण एवम् विनिवेश प्रक्रिया को किन बिन्दुओं के आधार पर औचित्यपूर्ण कहा जा सकता है?
उत्तर:
औचित्यपूर्ण बिन्दु (Points for Justification) सार्वजनिक उपक्रमों में निजीकरण एवम् विनिवेश प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर औचित्यपूर्ण कहा जा सकता है –

  1. निजी क्षेत्र की कुशलता, प्रबंध की क्षमता का सार्वजनिक उपक्रमों में प्रयोग सम्भव।
  2. विनिवेश से प्राप्त धनराशि का प्रयोग अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में कर पाना सम्भव है।
  3. घाटे में चल रही रुग्ण सार्वजनिक इकाइयों को बजट की सहायता में दी जाने वाली वित्तीय सहायता के बोझ से मुक्ति।
  4. सार्वजनिक उपक्रमों में बढ़ती लाल-फीताशाही एवम् सरकारी हस्तक्षेप को नियंत्रित करना सम्भव।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र की बीमार (रुग्ण) इकाइयों का पुनः उद्धार सम्भव।
  6. सार्वजनिक उपक्रमों की अल्पशोषित तथा अशोषित उत्पादन क्षमता का पूर्ण विदोहन सम्भव।
  7. निजी क्षेत्र की प्रबंधकीय क्षमता का प्रयोग करके लम्बी परिपक्वता अवधि को घटाना सम्भव।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाह्यस्रोत से क्या अभिप्राय है? सेवाओं के बाह्यकरण के विभिन्न प्रकार समझायें।
उत्तर:
बाह्यस्रोत का अभिप्राय (Meaning of outsourcing):
पिछले दशक से सेवा क्षेत्र में एक नई प्रकार की व्यावसायिक क्रिया का विश्व में प्रादुर्भाव हुआ है। इसे बी. पी. ओ. (Business Process Outsorcing) या बाह्यस्रोत या कॉल सेन्टर (Call Centre) कहते हैं। बाह्यस्रोत से अभिप्राय बाह्य अभिक्रेताओं से व्यवसाय का कार्य करवाना। उदाहरण के लिये एक कंपनी अपने पुराने रिकार्ड को रखने की जिम्मेदारी एक बाह्य एजेन्सी को दे। बाह्यस्रोत की मुख्य विशेषता यह है कि कंपनियाँ नियमित रूप से निष्पादन की जाने वाली क्रियाओं को ठेके पर ले लेती हैं।

सेवाओं के बााकरण के प्रकार (Types of outsourcing):
सेवाओं के बाह्यकरण के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं –

1. वित्तीय सेवाएँ (Financial Services):
वित्तीय सेवा के अन्तर्गत मध्यस्थ अभिकर्ता व्यावसायिक संगठन को वित्त प्राप्त करने के विशेषज्ञों की राय तथा कानून सम्बन्धी जानकारी इत्यादि प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिये जब कोई कंपनी अंश जारी करके या ऋणपत्र जारी करके पूँजी एकत्र करना चाहती है जो उसे कानूनी कार्यवाही करनी पड़ती है। कई बार इस प्रकार के कार्य में काफी समय लग जाता है और अंशपत्र/ऋणपत्र जारी करने के पीछे उद्देश्य भी खत्म हो जाते हैं। अतः अगर यह कार्य की विशेषज्ञों को दे दिया जो इसे कम समय में दक्षता के साथ करे।

2. विज्ञापन सेवाएँ (Advertising Services):
इस प्रकार के मध्यस्थ (Agencies) व्यावसायिक संगठन के द्वारा निर्मित वस्तु एवम् सेवा को उपभोक्ता में लोकप्रिय बनाने के लिये समस्त कार्य करते हैं। ये विज्ञापन प्रति तैयार करते हैं, विज्ञापन माध्यम का चयन करते हैं और वस्तु को उपभोक्ताओं में लोकप्रिय बनाने सम्बन्धी कार्य करते हैं।

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प्रश्न 2.
शुल्क का केसकेडिंग प्रभाव (Casecading effect of the Duties) समझायें। इस प्रभाव से बचने के लिये कौन-सा कर लगाया गया है?
उत्तर:
शुल्क का केसकेडिंग प्रभाव (Casecading effect of the Duties) केसकेडिंग का अर्थ है जल का प्रवाह या जल का बहना। जल शुल्क के केसकेडिंग का अर्थ है शुल्क का बह जाना। उसका व्यर्थ चला जाना । शुल्क केसकेडिंग से कीमतों में भारी वृद्धि होती है क्योंकि प्रत्येक स्तर पर विक्रय कर देना पड़ता है। उदाहरण के लिये पहले कच्चे माल (रुई) की कीमत पर कर लगाया जाता है। जब रुई को कपड़े बनाने वाले व्यक्ति (मध्यवर्ती उत्पादक) को बेचा जाता है। इसके बाद जब कपड़े का निर्माता दर्जी को कपड़ा बेचता है, कपड़े की कीमत पर कर लगाया जाता है। इसके बाद सिलेसिलाये कपड़े (निर्मित माल) पर कर लगाया जाता है।

प्रत्येक स्तर पर दिये गये कर निर्मित माल की कीमत का अंश बन जाते हैं। प्रत्येक स्तर पर पहले दिये गये करों की कोई कटौती नहीं मिलती इसलिये इसे केसकेडिंग प्रभाव (Cascading Effect) कहते हैं। केसकेडिंग प्रभाव के कारण अंतिम उपभोक्ता वस्तुओं में काफी वृद्धि होती है। इस बात को एक उदाहरण देकर समझाया जा सकता है। मान लो एक किसान ने 100 रुपये की रुई कपड़ा बनाने वाले को बेची। विक्रय कर 4 प्रतिशत है। अतः कपड़ा बनाने वाला इसे 104 रुपये में खरीदता है।

अब कपड़ा निर्माता रुई से कपड़ा बनाकर उसे 140 रुपये में दर्जी को बेचता है। माना कपड़े पर विक्रय कर 5 प्रतिशत है। अतः दर्जी उस कपड़े को 147 रुपये में (140 + 7) खरीदता है। अब दर्जी उस कपड़े की कमीज 200 रुपये में बेचता है। कमीज का विक्रय कर 4% है। अतः ग्राहक उस कमीज को 208 रुपये में खरीदेगा। इस तरह विभिन्न चरणों पर दिये गये करों के कारण कमीज की कीमत बहुत अधिक हो जाती है। करों के केसकेडिंग प्रभाव से बचने के लिये अब मूल्यवृद्धि कर-वेट (VAT) की व्यवस्था की गई है।

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प्रश्न 3.
नीचे तालिका में 1993-94 कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर दी गई है। तालिका में दिये गये आँकड़ों को काल श्रेणी आरेख द्वारा दिखायें।
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उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद संवृद्धि प्रतिशत में (GDP gross the on Percentage)
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प्रश्न 4.
1991 की नई आर्थिक नीति में क्या परिवर्तन किये गये?
उत्तर:
सरकार ने आर्थिक संकट को दूर करने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आर्थिक नीति में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों को तीन क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है –

  1. औद्योगिक नीति में परिवर्तन
  2. विदेशी व्यापार नीति में परिवर्तन
  3. राजकोषीय नीति में परिवर्तन

1. औद्योगिक नीति में परिवर्तन (Change in the Industrial Policy):

(a) लाइसेंस प्रणाली की समाप्ति (Abolishing of Licencing System):
ऐसे उद्योग जिनका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है उनको छोड़कर शेष सभी उद्योगों को लाइंसस प्रणाली से मुक्त कर दिया गया है। इससे अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता बढ़ गई है। ऐसी आशा की जाती है कि इससे उद्योगों का विस्तार होगा और उनकी कुशलता बढ़ेगी।

(b) विदेशी निवेश की स्वतंत्रता (Freedom of Foreign Investment):
विदेशी निवेशकों को भारतीय उद्योगों में पैसा लगाने की छूट दे दी गई है। ये अब कुल पूँजी का 51 प्रतिशत पैसा लगा सकते हैं। इससे न केवल विदेशों से वित्त प्राप्त होगा बल्कि नई प्रौद्योगिकी प्रबंधन विधियाँ भी देश में आयेंगी।

(c) सुरक्षित उद्योग निजी क्षेत्र में (Reserve Industries in theprivate hand):
ऐसे उद्योग जिनके विकास का उत्तरदायित्व केवल सरकार पर था, अब उन्हें निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। केवल रक्षा सामग्री या अति आवश्यक उद्योग ही सरकार ने अपने हाथ में रखे हैं।

(d) utaifant et Bra att varaat (Freedom of inporting foreign technique):
इसके अन्तर्गत भारतीय उद्योगों को विदेशों से प्रौद्योगिकी का आयात और इसमें निरंतर सुधार की छूट दी गई है।

(e) बड़े उद्योगों पर से प्रतिबंध समाप्त (Abolition of restriction of heavy Industries):
एकाधिकार प्रवृत्ति को बढ़ते से रोकने के लिए लगाये गये प्रतिबंध हटा लिये गये। बड़े औद्योगिक घरानों को अपना कार्य क्षेत्र विभिन्न दिशाओं में फैलाने की अनुमति दे दी गई।

2. विदेशी. व्यापार और विदेशी विनिमय नीति में परिवर्तन (Change in the foreign trade and foreign exchange policy):

(a) आयात शुल्क में कमी (Reduction in the import duty):
आयात शुल्कों को कम किया गया, जिससे देश के उत्पादों की विदेशी उत्पादों से प्रतियोगिता बढ़ गई क्योंकि अब विदेशी वस्तुएँ पहले की अपेक्षा सस्ती हो गई।

(b) विदेशी विनिमय दर से नियंत्रण हटाना (Removing restriction of foreign exchange rate):
विदेशी विनिमय दर पर नियंत्रण को समाप्त कर दिया गया है। अब विदेशी मुद्रा खुले बाजार की दर पर मिलती है। सरकारी और बाजार दरों में अंतर नहीं रहा। अब आयातक आयात की वास्तविक लागत को ध्यान में रखेंगे। अब विदेशी मुद्रा की कीमत में उतार-चढ़ाव होंगे। ये उतार-चढ़ाव विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति में संतुलन लाएंगे।

3. राजकोषीय नीति में परिवर्तन (Change in the fiscal policy):
राजकोषीय नीति से अभिप्राय सरकार की आय और व्यय नीति से है। इसमें भी काफी परिवर्तन किए गए हैं।

(a) उत्पाद शुल्क में कमी (Decrease in excise duty):
बहुत सी वस्तुओं पर सरकार ने उत्पाद शुल्क को कम कर दिया है। इससे भारतीय उत्पादकों की विदेशी वस्तुओं से प्रतियोगिताओं की स्थिति में सुधार आया है। आयात शुलक में कमी से भारतीय उत्पादकों को विदेशी उत्पादकों से कड़ी प्रतियोगिता करना पड़ रही है।

(b) सरकारी व्यय में कमी (Reduction in public expenditure):
सरकार अपने अनुत्पादक व्यय को कम रही है और निवेश के लिए अधिक राशि जुटा रही है।

(c) प्रत्यक्ष करों की दर में कमी (Reduction in Direct taxes rates):
प्रत्यक्ष करों की दर में धीरे-धीरे कमी की गई ताकि लोग स्वेच्छा से कर दें। आशा की जाती है कि लोग धीरे-धीरे करों की चोरी करना बंद कर देंगे और सरकार की प्राप्ति पहले से अधिक होगी।

(d) सरकारी पूँजी का विक्रय (Disinevest of government capital):
सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि वह अपने कुछ उद्योगों में लगी पूँजी का एक भाग बाजार में बेचेगी। आवश्यकताओं को पूरा करने क लिए साधन जुटाने के लिए ऐसा किया गया है।

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प्रश्न 5.
प्रतीत होता है कि सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्र को कोई लाभ नहीं हुआ है। समझायें।
उत्तर:
सुधार प्रक्रिया से कृषि को लाभ नहीं हुआ है। उल्टे सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्र पर बुरा प्रभाव पड़ा है। कृषि क्षेत्र में संवृद्धि दर में कमी आ रही है। भारत में खाद्यान्न के बड़े-बड़े भण्डारण (Stock) के बावजूद 250 मिलियन से अधिक लोग निर्धनता रेखा से नीचे रह रहे हैं। प्रति व्यक्ति खाद्यान्न स्टॉक के लगातार बढ़ने पर भी खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता कम हो रही है तथा पौष्टिक गुणवत्ता में कमी आ रही हैं। खाद्यान्नों की कीमतें बड़ी तेजी से बढ़ रही है। खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि के दो मुख्य कारण हैं –

1. खाद्यान्नों को दी गई आर्थिक सहायता में कमी तथा

2. उन कीमतों में वृद्धि जिन पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्नों की आपूर्ति की जाती थी। खाद्यान्नों के उत्पादकों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कमी आने से उन्होंने खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि कर दी क्योंकि उन्होंने कटौती के भार को उपभोक्ताओं के पास भेज दिया। सरकार खाद्यान्नों के समर्थित मूल्य को इतना ऊँचा रखती है कि सामान्य जनता इन मूल्यों पर खाद्यान्न खरीदने में समर्थ नहीं होती क्योंकि उनकी क्रय-शक्ति काफी नहीं होती।

ऊँची कीमतों से खाद्यान्नों की माँग कम हो जाती है तथा निर्धन उपभोक्ता बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इन निर्धन उपभोक्ताओं में शामिल हैं-ग्रामीण क्षेत्र के भूमिहीन, श्रमिक तथा छोटे किसान और शहरी क्षेत्र के असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी। उधर अधिक समर्थित मूल्य के कारण अधिक उत्पादन के लिये प्रेरित है।

मांग के कम और पूर्ति के अधिक होने पर भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India) को समर्थित मूल्य पर अधिक खाद्यान्न खरीदना पड़ता है और इस प्रकार खाद्यान्न का स्टॉक बढ़ता है। अतिरिक्त स्टॉक को रखने के लिये सरकार को और अधिक व्यय करना पड़ता है। इस खर्चे को पूरा करने के लिये सरकार को अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। परिणामस्वरूप कृषि में निवेश कम हो जाता है। सिंचाई की सुविधाओं पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कृषि में अनुसंधान तथा विकास का कार्य भी पिछड़ रहा है।

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प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष करों तथा अप्रत्यक्ष करों में भेद करें।
उत्तर:
प्रत्यक्ष करों तथा अप्रत्यक्ष करों में अंतर (Differentite between Direct Taxes and Indirect Taxes) :
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प्रश्न 7.
विकास योजना की प्रारंभिक अवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र में क्यों अधिक महत्व दिया गया था? कारण लिखें। अथवा, विकास योजना की प्रारम्भिक अवस्थाओं में एक बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र बनाना क्यों आवश्यक था? कारण लिखें।
उत्तर:
विकास योजना की प्रारम्भिक अवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्व देने के कारण (Causes of giving more importance to public sector in the intitial stages of development planning):
विकास योजना की प्रारम्भिक अवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र को बहुत अधिक महत्व देने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे –

1. विशाल निवेश (Huge Investment):
पूँजीगत उद्योगों की स्थापना करने के लिये विशाल निवेश की आवश्यकता होती है। जिन उद्योगों में विशाल निवेश की आवश्यकता होती है, निजी व्यक्ति विशाल निवेश करने में असमर्थ होते हैं। उन क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना की जाती है।

2. विलम्ब के लाभ (Delay in Profit):
भारी उद्योगों की स्थापना के लिये न केवल विशाल निवेश की आवश्यकता होती है, अपितु उनमें लाभ भी बड़े समय के बाद प्राप्त होते हैं। निजी व्यक्ति उद्योग से जल्दी से जल्दी लाभ प्राप्त करने की आशा करते हैं।

3. राष्ट्रीय हित (National Interest):
राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से युद्ध सामग्री बनाने के उद्योग निजी क्षेत्र में नहीं लगाये जा सकते।

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प्रश्न 8.
व्यावसायिक संचार के विभिन्न साधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक संचार के विभिन्न साधन (Various means of business communcation):
व्यावसायिक संचार के विभिन्न साधन निम्नलिखित हैं –

1. टेलीकॉम (Telecom):
सरकार डाक सेवाओं के द्वारा सूचना तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने की व्यवस्था करती है। परंतु इसमें अत्यधिक समय लगता है। अतः टेलीकॉम की सुविधा ने संचार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह शीघ्र संदेश भेजने के लिए सबसे सरल, सस्ता और आधुनिक साधन है। इसके द्वारा दोनों पक्ष ऐसे बातचीत कर लेते हैं जैसे आमने-सामने बैठे हों।

टेलीफोन का प्रयोग मामूली सा व्यावहारिक आदमी भी कर सकता है। ग्राहक विदेशी डायलिंग (ISD) की सुविधा का लाभ भी ले सकता है। कुछ समय तक यह सारा व्यवसाय सरकार के हाथ में था परंतु अब सरकार ने काफी हद तक टेलीकम्यूनिकेशन व्यवसाय का निजीकरण कर दिया है जिससे इसकी योग्यता और अधिक बढ़ गई है।

2. फैक्स (Fax):
यह मशीन नक्शे तथा रेखाचित्रों को प्रसारित करने के लिए प्रयोग की जाती है। संदेश देने वाला व्यक्ति सबसे पहले नक्शे को एक कागज पर अंकित कर लेता है। इसके बाद यह कागज मशीन में लगे एक सिलेण्डर के चारों ओर लपेट दिया जाता है। फिर संदेश देने वाला व्यक्ति संदेश प्रसारण का बटन दबा देता है और कुछ ही सेकेण्ड में नक्शे की नकल दूसरे व्यक्ति तक पहुँच जाती है। यह माध्यम बहुत ही कम खर्च व समय में नक्शे, रेखाचित्र, सूचना व सभी आवश्यक चीजों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचा देता है। ये न केवल स्थानीय क्षेत्र में उपयोगी है बल्कि अंतराष्ट्रीय क्षेत्र में भी इसका उपयोग है।

3. इंटरनेट (Internet):
कम्प्यूटर के विकास ने संचार के सभी माध्यमों को पीछे छोड़ दिया है। इसके द्वारा संसार के किसी भी कोने में जाकर सभी प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। इसका आरंभ अमेरिका द्वारा 5 वर्ष पूर्व किया गया था। इसके निर्माण के पीछे उद्देश्य था कि सभी प्रकार की सूचना एक स्थान पर एकत्रित की जा सके और विभिन्न स्थानों पर एक साथ पहुंचाई जा सके। आज कम्प्यूटर क्रांति ने सारे संसार की दूरियों को समेट कर रख दिया है और दूर-दराज के देश ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे बिल्कुल नजदीक हों।

4. ई-मेल (E-Mail):
पुराने समय में सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने में अत्यधिक समय लगता था, परंतु इलेक्ट्रॉनिक मेल (E-Mail) के द्वारा सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान तक तुरंत पहुँचाई जा सकती है। इसमें सूचनाओं का स्वरूप भी नहीं बिगड़ता है। लागत भी कम आती है और दोनों पक्षों की सक्षमता बढ़ती है। इसके द्वारा संसार के किसी भी कोने में कुछ ही. सेकण्ड में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ पहुँचाई जा सकती हैं और उनकी गोपनीयता भी बनी रहती है।

5. एक्स्ट्रानेट (Extranet):
उत्पादकों, वितरकों तथा उपभोक्ताओं के बीच सम्पर्क रखने के लिए नई पद्धति का विकास किया गया है, जिसे एक्स्ट्रानेट कहते हैं। इसके अंतर्गत उपभोक्ताओं को आने वाली वस्तुओं के विषय में समस्त जानकारी प्राप्त हो जाती है। उत्पादकों को उत्पादन स्तर का पता चलता है और किसी भी स्तर पर होने वाली कठिनाई या कमी को वहीं पर दूर किया जा सकता है।

6. वर्ल्डवाइड वेब (World wide Web):
www पद्धति का विकास अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन को सुविधा प्रदान करने के लिए किया गया है।

7. वायस मेल (Voice Mail):
यह बहुत ही आकर्षक पद्धति है। इसके अंतर्गत कम्प्यूटर द्वारा मशीन को टेलीफोन के साथ जोड़ दिया जाता है जिसे उस टेलीफोन का या संस्था का मालिक वहाँ पर उपस्थित हो या न हो, कोई भी सूचना मिले बिना नहीं रहती चाहे वह महत्त्वपूर्ण हो अथवा नहीं। इस पद्धति में श्रम व लागतों में कमी आती है।

इसके अन्तर्गत संस्था में कार्य करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की आने वाली व जाने वाली कॉल पर नजर रखी जा सकती है। इस पद्धति में सूचना को टेलीफोन द्वारा कम्प्यूटर तक पहुँचा दिया जाता है जो इसको अपने अंदर इकट्ठा करके रख लेता है। फिर जिस व्यक्ति के लिए सूचना इकट्ठी की गई है वह इस मशीन में से सूचनाओं को रिट्रिव कर कॉल्स (Calls) का यथानुसार तथा परिस्थितिनुसार जवाब दे सकती है।

8. यूनिफाइड मेसेजिंग सर्विस (Unifited Meassaging Serivce):
इस आकर्षक एवं बहुपयोगी पद्धति के अंतर्गत संचार के विभिन्न साधनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को एक-दूसरे में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे-फैक्स मैसेज (Fax Message) को वायसमेल मेसेज (Voicemail Messaging) में उन लोगों के लिए बदला जा सकता है जिनके पास टेलीफोन है पर फैक्स मशीन नहीं है।

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प्रश्न 9.
प्रशुल्क और अभ्यांश में अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रशुल्क और अभ्यांश में अंतर (Difference between Traiff and Quota):
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प्रश्न 10.
मूल्य वर्धित कर या मूल्य वृद्धि कर (Value added Tax-VAT) क्या है? समझायें। यह विक्रयकर से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
मूल्य वर्धित कर (Value added Tax):
मूल्य वर्धित कर वस्तु विक्रय कर का एक विकल्प है। यह ऐसी कर प्रणाली है जिसके अन्तर्गत कर केवल उत्पादन प्रक्रिया में की गई मूल्य वृद्धि पर ही लगाया जाता है। मूल्य की यह वृद्धि उत्पादक या विक्रेता द्वारा की जाती है। श्री एल. के. झा समिति के अनुसार, “मूल्यवर्धित कर व्यापक रूप से समस्त वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया गया एक कर है जिसमें निर्मित वस्तुओं एवम् शासकीय सेवाओं को पृथक कर दिया जाता है। यह कर प्रत्येक स्तर पर होने वाली व्यवसाय की मूल्य वृद्धि पर जोड़ा जाता है। अत: इसे मूल्य वर्धित कर कहते हैं।”

समीकरण के रूप में:
वर्धित मूल्य = वस्तु का कुल मूल्य – क्रय की गई कच्ची सामग्री एवम् अन्य सामग्री का मूल्य।

अंतर:
विक्रय कर वस्तु के कुल मूल्य पर लगाया जाता है जबकि वेट (VAT) प्रत्येक अवस्था में केवल बढ़े हुए मूल्य पर लगाया जाता है। वस्तु की कुल कीमत पर नहीं अपितु वस्तु में होने वाली वृद्धि पर लगाया जायेगा। इससे ग्राहकों को कुछ आराम (Relief) मिलेगा क्योंकि अब कमीज की कीमत इतनी अधिक होगी जितनी पहले थी। इसे निम्न उदाहरण की सहायता से समझाया गया है –
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नोट –

  1. 100/= पर विक्रय कर 4% = 4 रुपये
  2. 36 रुपये पर विक्रय कर 1.44 रुपये तथा
  3. 58.56 रु. पर विक्रय कर 2.35 रुपये)

ऊपर की तालिका से यह स्पष्ट होता है कि अतिम उपभोक्ता को एक कमीज 203.35 में मिलेगी जो पहली कीमत 200 रुपये से अधिक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतवर्ष में 1991 तक की आर्थिक नीतियाँ थीं –
(a) प्रतिबंधात्मक
(b) उदारवादी
(c) स्वतंत्र
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रतिबंधात्मक

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प्रश्न 2.
1991 के आर्थिक सुधारों को कहते हैं –
(a) पहली पीढ़ी के आर्थिक सुधार
(b) दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार

प्रश्न 3.
1991 के आर्थिक सुधारों के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकारी क्षेत्र के हिस्से की शेयर-पूँजी कुल-स्टॉक की होनी चाहिए –
(a) 51 प्रतिशत
(b) 49 प्रतिशत
(c) 50 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 51 प्रतिशत

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प्रश्न 4.
भारत में नए आर्थिक सुधारों ने सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में कुल स्टॉक में निजी क्षेत्र की शेयर पूँजी की इजाजत दी –
(a) 51 प्रतिशत
(b) 49 प्रतिशत
(c) 50 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 49 प्रतिशत

प्रश्न 5.
WTO का विस्तार रूप है –
(a) विश्व व्यापार संगठन
(b) विश्व यातायात संगठन
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) विश्व व्यापार संगठन

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प्रश्न 6.
विश्व व्यापार संगठन पूरे विश्व के लिए सिफारिश करता है –
(a) मुक्त व्यापार की
(b) प्रतिबंधात्मक व्यापार की
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) मुक्त व्यापार की

प्रश्न 7.
अस्सी के दशक में वार्षिक वृद्धि दर थी –
(a) 3.5 प्रतिशत
(b) 5.5 प्रतिशत
(c) 4.5 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 5.5 प्रतिशत

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प्रश्न 8.
वर्ष 1981-82 में राजस्व घाटा सकल घरेलू उत्पाद का था –
(a) 14
(b) 6
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 14

प्रश्न 9.
राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति, विनिमय दर नीति व मजदूरी आय नीति में परिवर्तन को कहते हैं –
(a) व्याष्टि आर्थिक उपाय
(b) समष्टि आर्थिक उपाय
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) समष्टि आर्थिक उपाय

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

Bihar Board Class 11 Geography महासागरीय जल Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उस तत्त्व की पहचान करें जो जलीय चक्र का भाग नहीं है ……………..
(क) वाष्पीकरण
(ख) वर्षन
(ग) जलयोजन
(घ) संघनन
उत्तर:
(ग) जलयोजन

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय ढाल की औसत गहराई निम्नलिखित के बीच होती है ……………….
(क) 2-20 मीटर
(ख) 20-200 मीटर
(ग) 200-2,000 मीटर
(घ) 2,000-20,000 मीटर
उत्तर:
(ग) 200-2,000 मीटर

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन की लघु उच्चावच आकृति महासागरों में नहीं पाई जाती है?
(क) समुद्री टीला
(ख) महासागरीय गंभीर
(ग) प्रवाल द्वीप
(घ) निमग्न द्वीप
उत्तर:
(ग) प्रवाल द्वीप

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
(क) हिंद महासागर
(ख) अटलांटिक महासागर
(ग) आर्कटिक महासागर
(घ) प्रशांत महासागर
उत्तर:
(ग) आर्कटिक महासागर

प्रश्न 5.
लवणता को प्रति समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम) की मात्रा से व्यक्त किया जाता है ………………..
(क) 10 ग्राम
(ख) 100 ग्राम
(ग) 1,000 ग्राम
(घ) 10,000 ग्राम
उत्तर:
(ग) 1,000 ग्राम

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
हम पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?
उत्तर:
जल हमारे सौरमंडल का दुर्लभ पदार्थ है। पृथ्वी को छोड़कर और किसी भी ग्रह – पर जल उपलब्ध नहीं है। पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध है। इसलिए पृथ्वी को ‘नीला ग्रह’ (Blue Planet) कहा जाता है।

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय सीमांत क्या होता है?
उत्तर:
महाद्वीपीय सीमा प्रत्येक महादेश का विस्तृत किनारा होता है जो कि अपेक्षाकृत छिछले समुद्रों तथा खाड़ियों का भाग होता है। यह महासागर का सबसे छिछला भाग होता है, जिसकी औसत प्रवणता 1 डिग्री या उससे भी कम होती है। इस सीमा का किनारा बहुत ही खड़े ढाल वाला होता है।

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प्रश्न 3.
विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्तों की सूची बनाइए।
उत्तर:
ये महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं। अभी तक लगभग 57 गतों को खोजा गया है, जिसमें से 32 प्रशांत महासागर में, 19 अंध महासागर में एवं 6 हिंद महासागर में हैं।

प्रश्न 4.
ताप प्रवणता क्या है?
उत्तर:
महासागर के सतहीय एवं गहरी परतों वाले जल के बीच विभाजक रेखा होती है। विभाजक रेखा के इस क्षेत्र से जहाँ तापमान में तीव्र कमी आती है, उसे ताप प्रवणता कहा जाता है।

प्रश्न 5.
समुद्र में नीचे जाने पर आप ताप की किन परतों का सामना करेंगे? गहराई के साथ तापमान में भिन्नता क्यों आती है?
उत्तर:
महासागरीय जल की सबसे ऊपरी परत का तापमान 20 डिग्री से. से 25 डिग्री से. के बीच होता है। गहराई के बढ़ने के साथ इसके तापमान में तीव्र गिरावट आती है। क्योंकि समुद्रीय जल के कुछ आयतन का लगभग 90% भाग गहरे महासागर में ताप प्रवणता (थर्मोक्लाईन) के नीचे पाया जाता है।
बढ़ता हुआ तापमान = बढ़ती हुई गहराई

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प्रश्न 6.
समुद्री जल की लवणता क्या है?
उत्तर:
लवणता या खारापन वह शब्द है जिसका व्यवहार समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा को परिभाषित करने में किया जाता है। 1,000 ग्राम (1 किलोग्राम), समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम में) की मात्रा के द्वारा इसकी गणना की जाती है। यह प्रायः प्रति PPT के रूप में व्यक्त की जाती है। खारापन समुद्री जल का महत्त्वपूर्ण गुण है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलीय चक्र के विभिन्न तत्त्व किस प्रकार अंतर-संबंधित हैं?
उत्तर:
जल एक चक्रीय संसाधन है। इसका प्रयोग बार-बार किया जा सकता है। जल एक चक्र के रूप में महासागर से धरातल पर और धरातल से महासागर तक पहुंचता है। जलीय चक्र पृथ्वी की सतह के ऊपर, सतह पर एवं सतह के भीतर जल की गति की व्याख्या करता है। पृथ्वी पर जल का वितरण असमान है। जलीय चक्र जल का वह चक्र है जो पृथ्वी के जलमण्डल से गैस, तरल व ठोस-विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। यह जल के लगातार आदान-प्रदान से भी संबंधित है। यह आदान-प्रदान महासागर, धरातल, वायुमण्डल, अधःस्तल व जीवों के बीच लगातार होता रहता है।

पृथ्वी पर पाए जाने वाले जल का लगभग 71% भाग महासमुद्रों में पाया जाता है। शेष जल हिमानियों, हिमछत्रों, भूमिगत जल, झीलों, आई मृदा, वायुमण्डल सरिताओं और जीवन में ताजा/मीठे जल के रूप में संग्रहित है। चूंकि धरातल पर गिरने वाले जल का लगभग 59 प्रतिशत भाग वाष्पीकरण के द्वारा वायुमण्डल में चला जाता है। शेष भाग धरातल पर बह निकलता है; कुछ भूमि में रिस जाता है और कुछ भाग हिमानी का रूप ले लेता है।

प्रश्न 2.
महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का निरीक्षण कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय जल के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक है –
(क) अक्षांश (Latitude) – महासागरों के ऊपरी जल का तापमान विषुवत् रेखा से ध्रुवों की तरफ विकिरण की मात्रा में कमी के कारण घटता जाता है।

(ख) स्थल एवं जल का असमान वितरण (Unequal Distribution of Land and Water) – उत्तरी गोलार्द्ध के महासागर दक्षिणी गोलार्ड के महासागरों की अपेक्षा स्थल के बहुत बड़े भाग से जुड़े होने के कारण अधिक मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते हैं।

(ग) प्रचलित हवाएँ (Prevailing Winds) – स्थलों से महासागरों की तरफ बहने वाली. हवाएँ समुद्र की तरफ से गर्म जल को तट के दूर धकेल देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप नीचे का ठंडा जल ऊपर की ओर आ जाता है। परिणामस्वरूप तापमान में देशांतरीय अंतर आता है। इसके विपरीत, समुद्र से तट की ओर बहने वाली हवाएँ गर्म जल को तट पर जमा कर देती हैं एवं इसके कारण तापमान बढ़ जाता है।

(घ) समुद्री जलधाराएँ (Ocean Currents) – गर्म महासागरीय जलधाराएँ ठंडे क्षेत्रों में तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ गर्म समद्री क्षेत्रों के तापमान को घटा देती है। गल्फ स्ट्रीम (गर्म धारा) उत्तरी अमरीका के पूर्वी किनारे तथा यूरोप के पश्चिमी तट के तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि लेब्रोडोर जलधारा (ठंडी धारा) उत्तरी अमेरिका के उत्तर:पूर्वी किनारे के नजदीक के तापमान को कम कर देती है। .

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
विश्व की एटलस की सहायता से महासागरीय नितन के उच्चावच्चों को विश्व के मानचित्र पर दर्शाइए।
उत्तर:
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A. स्थलजात् निक्षेप
B. टैरोपोड सिंधुपक
C. ग्लोबीजेराइना सिंधुप
D. डायटम सिंधुपंक
E. रेडियोलेरियन सिंधुपंक
F. लाल मृत्तिका R= लाल पंक
G. G= हरी पंक
H. C = प्रवाल बालू एवं पंक

नोट – नीली पंक स्थलजात् निक्षेपों में विस्तृत रूप से तट के साथ-साथ महाद्वीपीय शेल्फ तथा महाद्वीपीय ढाल पर लगभग सभी स्थानों पर मिलती है। अत: मानचित्र पर इसको दर्शाया नहीं गया है।

प्रश्न 2.
एटलस की सहायता से हिन्द महासागर में महासागरीय कटकों के क्षेत्रों को पहचानिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल
A – सोकोत्रा चैगोस कटक
B – चैगोस कटक
C – सेचलीस कटक
D – चैगोस सेण्ट पाल कटक,
E – अमस्टरडम सेण्ट पाल कटक
F – भारत अण्टार्कटिका कटक
G – करगलेन गासबर्ग कटव
H – मैडागास्कर कटक
I – अटलांटिक-अण्टार्कटिका कटक

Bihar Board Class 11 महासागरीय जल Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वाष्यन-वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं?
उत्तर:
कुछ जल का वाष्पन एवं अवशोषण पौधों की जड़ों द्वारा किया जाता है, परंतु इसका वाष्पोत्सर्जन पौधों की पत्तियों द्वारा कर दिया जान वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी पर शुद्ध जल की प्राति कहाँ से होती है?
उत्तर:
पृथ्वी पर शुद्ध जल की प्राप्ति का मंडल, नदी तथा झरनों के ताजा जल, समुद्री जल (लवण घुला जल) तथा लवणीय झीलों से संघनित हुई सूक्ष्म बूंदों से होती है।

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प्रश्न 3.
‘थर्मोक्लाइन’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
महासागरीय जल की तापमान संरचना का द्वितीय स्तर थर्मोक्लाइन या ताप प्रवणता कहलाता है। इसकी विशेषता गहराई बढ़ने के साथ तीव्र गति से तापमान का घटना है।

प्रश्न 4.
महासागरीय जल के तापमान को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
तापमान को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-अक्षांश, स्थल एवं जल का असमान वितरण, प्रचलित पवनें, महासागरीय धाराएँ तथा अन्य गौण कारक, जैसे अंत: समुद्री कटक, स्थानीय मौसमी दशाएँ तथा समुद्र
की आकृति एवं आकार।

प्रश्न 5.
रेजिडेंस या आवास काल किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह औसत समय जिसमें एक तत्त्व महासागरीय जल में वहाँ से बाहर निकलने से पहले घुला रहता है, उसे रेजिडेंस अथवा आवास काल कहते हैं।

प्रश्न 6.
कैनियन का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर:
जब जल का प्रवाह महासागरीय शेल्फ को काट देता है तब इससे अंतः समुद्री कैनियन का निर्माण होता है।

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प्रश्न 7.
तट की परिभाषा बताइए।
उत्तर:
तट चौरस सतह वाला ऊँचा क्षेत्र है, जो अपेक्षाकृत कम गहराई होने के कारण मछली पकड़ने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
महासागरीय कटक से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अंतः समुद्री पर्वत श्रृंखला जिसकी लंबाई लगभग 64000 किमी. है। महासागरीय कटक कहलाती है। इसकी खोज 20वीं शताब्दी में की गई।

प्रश्न 9.
महासागरीय खाई क्या होती है?
उत्तर:
महासागर के वे भाग, जो 6000 मी. से अधिक गहरे हैं, महासागरीय खाई कहलाते हैं। ये महासागरों में यत्र-तत्र पाए जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जलमंडल किसे कहते हैं? हिन्द महासागर को आधा महासागर क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी के तल के जल से डूबे हुए भाग को जलमंडल कहते हैं। यह घरातल पर लगभग 361,059,000 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं। जो पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्र का 71% भाग है। उत्तरी गोलार्द्ध का 61% भाग तथा दक्षिणी गोलार्द्ध का 81% भाग महासागरों से घिरा हुआ है। उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का विस्तार अधिक है, इसलिए इसे वाटर हेमिस्फेयर (Water Hemisphere) कहते हैं।

अन्ध महासागर तथा प्रशांत महासागर उत्तर:दक्षिण में दोनों ओर खुले हैं। ये भूमध्य रेखा के दोनों ओर समान रूप से फैले हुए हैं, परंतु हिन्द महासागर उत्तर की ओर बंद है। एशिया महाद्वीप इसके विस्तार को रोकता है। एक प्रकार से इसका विस्तार अधिकतर दक्षिण की ओर है। इसलिए इसे आधा महासागर कहते हैं।

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प्रश्न 2.
गम्भीर समुद्री उद्रेरव (Submarine Ridges) किसे कहते हैं तथा गम्भीर समुद्री पहाड़ियों (कटकों) का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर:
महासागरीय तल पर ऊँचे उठे हुए भाग को गम्भीर उद्रेरव कहते हैं। यह प्रायः 60 हजार किलोमीटर लम्बे और 100 किमी चौड़े हो सकते हैं। इनकी विश्वव्यापी स्थिति किसी भूमंडलीय हलचल का संकेत देती है। प्रायः यह महासागरों के मध्य में या धरती पर पाई जाती है। इनकी रचना के कई कारण हैं –

  • दरारों के साथ बेसाल्ट का फैलना।
  • संवाहिक धाराओं द्वारा भूपटल का ऊँचा उठना तथा नीचे फँसना ।

कटकों का निर्माण – गम्भीर समुद्री तल पर कई पहाड़ियों, टीले तथा निमग्न द्वीप पाए जाते हैं। ये प्रायः 300 मीटर तक ऊँचे हैं। इनकी रचना ज्वालामुखी क्रिया तथा भूपटल में विरूपण से होती है। समुद्री टीले और द्वीप प्रशांत महासागर में काफी पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
महासागरीय नितलों पर पाए जाने वाली सबसे अधिक सामान्य आकृतियों के नाम लिखो।
उत्तर:
महासागरीय तली पर महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, महासागरीय मैदान तथा गर्त के अतिरिक्त निम्नलिखित लक्षण पाए जाते हैं –

  1. उद्रेरव (Ridges)
  2. पहाड़ियाँ (Hills)
  3. टीले (Sea mounts)
  4. निमग्न द्वीप (Guyots)
  5. खाइयाँ (Trenches)
  6. 4641 (Canyons)
  7. ware fuferet (Coral reefs)
  8. 1747 (Canyons)

प्रश्न 4.
महासागरीय खाइयों तथा गों को विवर्तनिक उत्पत्ति वाला क्यों समझा जाता है?
उत्तर:
महासागरों में लम्बे, गहरे तथा संकरे खड्डों को महासागरीय गर्त कहा जाता है। इनकी उत्पत्ति भूतल एवं दरारें पड़ने तथा मोड़ पड़ने की हलचल के कारण हुई है। ये अधिकतर उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ भूकंप आते हैं तथा ज्वालामुखी स्थित हों। ये अधिकतर बलित पर्वतों तथा द्वितीय चापों के समानान्तर स्थित होते हैं। इसलिए इनका सम्बन्ध भूगर्मिक हलचलों से है। महासागरीय खाई का भाग 6000 मी. से अधिक गहरा होता है। अधिकांश खाइयाँ प्रशांत महासागर की सीमाओं के समीप स्थित हैं।

प्रश्न 5.
महाद्वीपीय शेल्फ किसे कहते हैं तथा विभिन्न प्रकारों के नाम बताएँ?
उत्तर:
महाद्वीपों के किनारे का विस्तृत क्षेत्र, जिसकी चौड़ाई कुछ किलोमीटर से 300 किमी. तक है, महासागरीय शेल्फ कहलाता है। यह महाद्वीपों के चारों ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है। वास्तव में यह महाद्वीपीय खंड का ही जलमग्न किनारा हैं जो 150 से 200 मीटर तक गहरा होता है। प्रमुख नदियाँ समुद्र में पहुंचने के पश्चात् समुद्री जल से मिलते हुए अपने प्रवाह को महाद्वीपीय शेल्फ पर जारी रखती है। महाद्वीपीय शेल्फ निम्न प्रकार के हैं –

  1. हिमानीकृत शेल्फ
  2. बड़ी नदियों के मुहानों पर शेल्फ
  3. प्रवाल भित्ति शेल्फ
  4. द्रुमाकृतिक घाटियों से युक्त शेल्फ
  5. नवीन वलित पर्वत के पार्श्व शेल्फ

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प्रश्न 6.
महासागरीय नितल की गहराई कैसे मापी जाती है तथा संसार में सबसे गहरा स्थान कौन-सा है?
उत्तर:
महासागरीय नितल की गहराई गम्भीरता मापी यंत्र से मापी जाती है। इस यंत्र से ध्वनि तरंगें महासागरीय नितल को प्रतिध्वनि के रूप में वापस आती हैं। इनकी गति व समय से गहराई ज्ञात की जाती है। संसार में सबसे गहरा स्थान प्रशांत महासागर में गुआम द्वीपमाला के समीप मेरिआना गर्त है। इसकी गहराई 11022 मीटर है। यदि ऐवरेस्ट पर्वत को इस गर्त में डुबो दिया जाए तो इसकी चोटी समुद्री जल से 2 किलोमीटर नीचे रहेगी।

प्रश्न 7.
समुद्री खाई तथा समुद्री कैनियन में अंतर बताओ –
उत्तर:
समुद्री खाई तथा समुद्री कैनियन में अंतर –
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प्रश्न 8.
महासागरों का आर्थिक महत्त्व क्या है? वर्णन करें।
उत्तर:

  1. समुद्री पर्यावरण पौधों तथा पशु जीवन के बहुत समृद्ध स्रोत हैं।
  2. तटीय क्षेत्रों के निवासी मुख्य रूप से अपने निर्वाह तथा व्यापार के लिए समुद्रों पर ही निर्भर करते हैं।
  3. महाद्वीपीय सीमांतों का दोहन खनिज उत्पादन के लिए भी किया जा रहा है।
  4. उथले महाद्वीपीय शेल्फ तथा आंतरिक समुद्र प्लैटिनम, सोने तथा टिन के प्लेसर निक्षेप के लिए जाने जाते हैं।
  5. पेट्रोलियम संसाधनों के लिए भी महाद्वीपीय शेल्फ का दोहन किया जा रहा है।
  6. समुद्री सतह पर मैंगनीज की ग्रंथिकाएँ पाई गई हैं। ये ग्रंथिकाएँ, निकिल, ताँबा तथा कोबाल्ट के स्रोत भी हो सकते हैं।

प्रश्न 9.
प्रति ध्रुवीय स्थिति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धरती पर जल और स्थल का वितरण प्रति ध्रुवीय है। महाद्वीपों और महासागर एक-दूसरे के विपरीत स्थित हैं। यह संयोजन इस प्रकार है कि जल और स्थल एक-दूसरे से एक व्यास के विपरीत कोनों पर (Diametrically opposite) स्थित हैं, जैसे आर्कटिक महासागर अण्टार्कटिक महाद्वीप के विपरीत स्थित है। यूरोप तथा अफ्रीका प्रशांत महासागर के विपरीत स्थित हैं। उत्तरी अमेरिका हिन्द महासागर के विपरीत स्थित है।

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प्रश्न 10.
समुद्री कैनियन की विशेषताओं एवं निर्माण को स्पष्ट करें।
उत्तर:
महासागरीय निमग्न तट तथा ढाल पर तंग, गहरी तथा ‘V’ आकार की घाटियों को कैनियन कहा जाता है। ये घाटियाँ विश्व के सभी तटों पर नदियों के मुहानों पर पाई जाती हैं। जैसे-हडसन, सिन्धु, गंगा, कांगो नदी। यह कैनियन नदी द्वारा अपरदन तथा सागरीय अपरदन से बनी हैं।

कैनियनों के प्रकार (Types of Conyons) – ये घाटियाँ मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं –

  1. वे कैनियन, जो छोटे, गार्ज के रूप में महाद्वीपीय शेल्फ से शुरू होकर ढाल पर काफी गहराई तक विस्तृत होते हैं। जैसे न्यू इंग्लैण्ड तट पर ओशनोग्राफर कैनियन ।
  2. वे कैनियन, जो नदियों के मुहानों से शुरू होकर कंवल शेल्फ तक ही पाए जाते हैं जैसे-मिसीसिपी तथा सिन्धु नदी के कैनियन, हडसन कैनियन ।
  3. वे कैनियन, जो तट व ढाल पर काफी कटे-फटे होते हैं, जैसे दक्षिणी कैलिफोर्निया के तट पर, बेरिंग कैनियन तथा जेम चुंग कैनियन ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणियों लिखिए –

  1. महाद्वीपीय उत्थान
  2. मध्य महासागरीय कटक
  3. महासागरीय द्रोण
  4. अंतः समुद्री कैनियन

उत्तर:
1. महाद्वीपीय उत्थान – महाद्वीपीय शेल्फ के बाद महाद्वीपीय ढाल स्थित होता है, जो अचानक महाद्वीपीय उत्थान में प्रतिस्थापित हो जाता है, जिसका ढाल पर्याप्त मंद होता है। सामान्यतः महाद्वीपीय उत्थान मध्यम से निम्न उच्चावच का होता है। महासागरीय उत्थान सैकड़ों किलोमीटर चौड़ाई का क्षेत्र है, जिसका धरातल समीप के वितलीय मैदान से सैकड़ों मीटर ऊपर उठा होता है। महासागरीय उत्थान का उच्चावच अल्प से अत्यधिक असम हो सकता है। बरमूडा महासागरीय उत्थान का एक अच्छा उदाहरण है।

2. मध्य महासागरीय कटक – महासागरीय कटक एक अंत:समुद्री पर्वत श्रृंखला है। इसकी लम्बाई लगभग 64,000 किमी. है तथा इसकी खोज बीसवीं शताब्दी में महासागरीय खोजों के दौरान हुई । यह कटक उत्तरी एवं दक्षिणी अटलांटिक महासागरीय द्रोणियों के मध्य से गुजरता हुआ हिंद महासागरीय द्रोण और फिर आस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका के बीच से दक्षिणी प्रशांत द्रोणी में प्रवेश करता है। यह कटक एक पट्टी की भाँति फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई 2000 से 2400 किमी है। वितलीय मैदान से यह सीढ़ियों के क्रम में ऊपर उठता है।

3. महासागरीय द्रोणी – महासागरीय द्रोणी महासागरीय सतह का एक विशाल क्षेत्र है जो सामान्यत: 2500 से 6000 मीटर की गहराई तक स्थित होता है। यह महासागरीय क्षेत्रफल के लगभग 76.2 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है। महासागरीय द्रोणी सतह पर तीन प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं –

  • वितलीय मैदान एवं पहाड़ियाँ
  • महासागरीय उत्थान
  • समुद्री टीला

वितलीय मैदान गहरे महासागरीय सतह का एक भाग है, जिनकी तली सपाट और ढाल पर्याप्त मंद होता है । यह महाद्वीपीय उत्थान के आधार तल पर स्थित होता है और सभी महासागर द्रोणियों में पाया जाता है। इनकी रचना लम्बे समय तक जमने वाले अवसाद के कारण हुई है। वितलीय पहाड़ियाँ महासागरीय द्रोणी सतह से ऊपर उठी हुई छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं, जिनकी ऊँचाई कुछ मीटर से लेकर सैकड़ों मीटर तक होती है। समुद्री टीला एक शिखर है, जो समुद्र सतह से 1000 मीटर अथवा इससे अधिक ऊँचे होते हैं।

अनेक समुद्री टीलों का ऊपरी भाग आश्चर्यजनक रूप से सपाट तथा अत्यधिक तीव्र ढाल वाला होता है। महासागरीय उत्थान सैकड़ों किलोमीटर चौड़ाई का क्षेत्र है, जिसका धरातल समीप के वितलीय मैदान से सैकड़ों मीटर ऊपर उठा होता है। महासागरीय उत्थान का उच्चावच अल्प से अत्यधिक असम हो सकता है।

4. अंतः समुद्री कैनियन – जल का प्रवाह महाद्वीपीय शेल्फ को काट देता है, जिससे अंतः समुद्री कैनियन का निर्माण होता है। इनकी तुलना स्थलीय धरातल पर बनी गहरी अवनलिकाओं से की जा सकती है। अंतः समुद्री कैनियन महाद्वीपीय शेल्फ एवं ढाल के प्रमुख लक्षण हैं। ये
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खड़ी ढाल वाली गहरी घाटियाँ हैं जो लम्बी अवतल परिच्छेदिका बनाती हैं। कुछ कैनियन देखने में द्रुमाकृतिक होते हैं। महाद्वीपीय सीमाओं की विशेषता कुछ छोटे-छोटे समुद्री लवण, जैसे तट, शेल्फ तथा भित्ति हैं। तट एक चौरस सतह वाला ऊँचा क्षेत्र है, जो अपेक्षाकृत कम गहराई होने के कारण मत्स्य पालन के लिए उपयोग किया जाता है। भित्ति एक जैविक निक्षेप है, जो मृत अथवा जीवित प्रवाल द्वारा बनाया जात है।

प्रश्न 2.
अंटलांटिक महासागरीय सतह का मानचित्र बनाइए और उसमें महासागरीय द्रोणियाँ तथा मध्य अटलांटिक कटक दिखाइए।
उत्तर:
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प्रश्न 3.
हिन्द महासागरीय सतह के उच्चावच का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्द महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। हिंद महासागर के महाद्वीपीय शेल्फ में बड़ा भिन्नता है। यह प्रशांत एवं अटलांटिक महासागर से छोटा है। अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी के सीमांतों पर यह बड़ी विस्तार वाली है। अफ्रीका के पूर्वी तट तथा मैडागास्कर में यह लगभग 640 किमी. चौड़ी है, लेकिन जावा एवं समात्रा के तट के साथ यह संकीर्ण हैं। अंटार्कटिका के उत्तरी तट के पास भी यह संकीर्ण है। हिन्द महासागर में सीमांत सागरों की संख्या कम है। यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण सीमांत सागर, जैसे-मोजाविक चैनल, लाल सागर, ईरान की खाडी, अंडमान सागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी आदि मौजूद हैं।

मध्य हिन्द महासागरीय कटक उत्तर में भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे से दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला है। यह कटक उच्च भूमियों के एक अविच्छिन्न श्रृंखला का निर्माण। करता है। हिन्द महासागर के प्रमुख कटक हैं-सोकोत्राचागोस, मालदीव, चागोस-सेंटपॉल, इंडियन-अंटार्कटिक, मैडागास्कर, अटलांटिक तथा अंटार्कटिका कटक।

मध्य हिन्द महासागरीय कटक तथा अन्य कटक हिन्द महासागर को नेक महासागरीय द्रोणियों में विभक्त करती हैं। इनके नाम हैं-ओमान द्रोणी, अरेबियन द्रोणी, सोमाली द्रोणी, अगुल्हास-नटाल द्रोणी, अटलांटिक-हिन्द-अंटार्कटिक द्रोणी, पूर्वी हिन्द-अंटार्कटिक द्रोणी तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया द्रोणी।

हिन्द महासागर में बहुत कम महासागरीय खाइयाँ हैं। जावा तथ सुंडा खाई (7450 मी.) सबसे गहरी है। हिन्द महासागर के प्रमुख गहरे वितलीय मैदान हैं-सोमाली. श्रीलंका तथा हिन्द वितलीय मैदान । हिन्द महासागर में मैदानों की ऊंचाई 3600 मी से 5400 मी है।

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प्रश्न 4.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. महाद्वीपीय शेल्फ एवं महाद्वीपीय ढाल
  2. तट एवं भित्ति
  3. महासागरीय जल के प्रथम एवं तृतीय स्तर
  4. थर्मोक्लाइन एवं हैलोक्लाइन

उत्तर:
1. महाद्वीपीय शेल्फ एवं महाद्वीपीय ढाल में अंतर –
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2. तट एवं भित्ति में अंतर –
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3. महासागरीय जल के प्रथम एवं तृतीय स्तर में अंतर –
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4. थर्मोक्लाइन एवं हैलोक्लाइन में अंतर –
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प्रश्न 5.
अन्ध महासागर की स्थल रूपरेखा के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करो।
उत्तर:
अन्ध महासागर –

विस्तार तथा आकार – यह महासागर पृथ्वी के 1/6 भाग को घेरे हुए है। इसका आकार ‘S’ अक्षर की तरह है। यह महासागर भूमध्य रेखा पर लगभग 2560 किमी चौड़ा है, परंतु दक्षिण में इसकी चौड़ाई 4800 किलोमीटर है।

समुद्रतली – इस महासागर के तटों पर चौड़ा महाद्वीपीय निमग्न तट पाया जाता है। यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के तटों पर इसकी चौड़ाई 400 किलोमीटर है। यहाँ प्रसिद्ध मछली क्षेत्र पाये जाते

उद्रेरव (Ridges) –

  • मध्य एटलांटिक उद्रेरव उत्तर से दक्षिण तक ‘S’ आकार में फैला हुआ है। यह उद्रेरव 14 हजार किलोमीटर लम्बा है, जिसकी
  • ऊंचाई लगभग 4 हजार मीटर है।
  • डालफिन उद्रेरव तथा वेलविस उद्रेरव उत्तरी भाग में।
  • दक्षिण भाग में चेलेंजर उद्रेव।
  • उत्तरी भाग में टेलीग्राफ पठार।

सागरीय बेसिन – अन्ध महासागर में कई छोटे-छोटे बेसिन पाए जाते हैं, जैसे –

  • लेब्रेडोर बेसिन
  • स्पेनिश बेसिन
  • उत्तरी अमेरिकन बेसिन
  • कोपवर्ड बेसिन
  • गिन्नी बेसिन
  • ब्राजील बेसिन

सागरीय गर्न – मोटे तौर पर अन्ध महासागर में गर्त कम हैं। मुख्य गर्त निम्नलिखित हैं –

  • प्यूटोरिको गर्त-जो इस सागर का सबसे गहरा स्थान है तथा 4812 फैदम गहरा है।
  • रोमाशे गर्त-4030 फैदम गहरा है।
  • दक्षिणी सेण्डविच गर्त-जो फाकलैंड द्वीप के निकट 4575 फैदम गहरा है।

तटीय सागर – उत्तरी भाग में कई छोटे सागर पाये जाते हैं, जैसे-बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, हडसन खाड़ी, बेफिन खाड़ी, मेक्सिको तथा कैरेबियन सागर।

द्वीप – इस महासागर में ग्रेट ब्रिटेन तथा न्यू फाउंडलैंड जैसे महाद्वीपीय द्वीप हैं। निमग्न तट पर पश्चिमी द्वीप समूह आइसलैंड आदि द्वीप पाए जाते हैं। मध्य उद्रेव पर ए|स द्वीप, सेन्टहेलना, बरमूदा द्वीप स्थित हैं। अफ्रीका तट पर कई ज्वालामुखी द्वीप केपवर्ड द्वीप तथा कमेरी द्वीप स्थित हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

प्रश्न 6.
महासागरों की तली के उच्चावच के सामान्य लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
महासागरों की गहराई तथा उच्चावच में काफी विभिन्नता है जिसे उच्चतादर्शी वक्र से दिखाया जाता है। बनावट तथा गहराई के अनुसार सागरीय तल को चार भागों में बाँटा जाता है
1. महाद्वीपीय मग्न तट (Continental Shelf) – महाद्वीपों के चारों ओर सागरीय तट का वह भाग जो 150 से 200 मीटर तक गहरा होता है, महाद्वीपीय चबूतरा कहलाता है। वास्तव में यह महाद्वीप का जलमग्न भाग होता है। महाद्वीपीय निमग्न तट का सबसे अधिक विस्तार अन्ध महासागर है। इसकी औसत चौड़ाई 70 किमी तथा गहराई 72 फैदम होती है। आर्कटिक सागर के तट पर इसकर विस्तार 1000 किमी से भी अधिक है। पर्वत श्रेणियों वाले तटों पर संकरे महाद्वीपीय मग्न तट पाए जाते हैं। समुद्र तल के ऊपर उठने से या स्थल भाग के नीचे घुस जाने से निमग्न तट की रचना होती है। ये शेल्फ मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

2. महाद्वीपीय ढाल – महाद्वीपीय निमग्न तट के बाहर का ढाल जो महासागर की ओर तीव्र गति से नीचे उतरता है, महाद्वीपीय ढाल कहलाता है। इसकी गहराई 3600 मीटर तक है। इसका सबसे अधिक विस्तार अंध महासागर में 12.4% क्षेत्र पर है। यह ढाल वास्तव में गहरे समुद्रों तथा महाद्वीपों के स्तर को पृथक् करती है। जहाँ महाद्वीपीय ढाल का अंत होता है वहाँ मन्द ढाल को महाद्वीपीय उत्थान कहते हैं।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

3. महासागरीय मैदान – महाद्वीपीय ढाल के पश्चात् समुद्र में चौड़े तथा समतल क्षेत्र को महासागरीय मैदान कहते हैं। इसकी औसत गहराई 3000 से 6000 मीटर तक है। इसे नितल मैदान भी कहते हैं । इन मैदानों पर कई भू-आकृतियाँ पाई जाती है; जैसे-समुद्री उद्रेरव द्वीप, समुद्री टीले, निमग्न द्वीप आदि। इन मैदानों पर स्थलज तथा उथले जल से उत्पन्न तलछट पाए जाते हैं। नितल मैदान पर जलमग्न कटक पाए जाते हैं, जो महासागरों के मध्य क्षेत्र में हैं। इन कटकों की लम्बाई 75000 किमी. है। ये मन्द ढाल वाले चौड़े पठार के समान हैं।

4. महासागरीय गर्त – ये समुद्र तल पर गहरे खड्डे होते हैं। इनका विस्तार बहुत कम होता है जबकि लम्बे, गहरे तथा संकरे खड्ड को खाई कहते हैं। इनकी औसत गहराई 5500 मीटर है। संसार में सबसे अधिक गहरा गर्त प्रशांत महासागर में है जिसकी गहराई 11022 मीटर है। यह गर्त द्वीपीय चापों के सहारे मिलता है। ये भूकम्पीय तथा ज्वालामुखी क्षेत्रों से संबंधित हैं।

5. अन्य विशेष आकृतियाँ – महासागरों में उच्चावच में विविधता के कारण कई भू-आकृतियाँ जैसे द्वीप, उद्रेव, अटोल, समुद्री कैनियन भी पाई जाती है।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)

Bihar Board Class 11 Economics भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
योजना की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
योजना से अभिप्राय किसी निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयत्नों से है। नियोजन के अन्तर्गत देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए लक्ष्य रखे जाते हैं जिसकी प्राप्ति के लिए देश में और देश के बाहर सभी साधन जुटाए जाते हैं। उद्देश्यों की प्राप्ति तथा साधनों का जुटाने के लिए सम्बन्धित देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को देखते हुए विकास की व्यूह रचना निर्धारित की जाती है।

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प्रश्न 2.
भारत ने योजना को क्यों चुना?
उत्तर:
देश की आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने के लिए भारत ने योजना को चुना। आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने का आर्थिक नियोजन के अतिरिक्त दूसरा विकल्प स्वतंत्र बाजार व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत उत्पादक सभी क्रियाओं को लाभ की दृष्टि से करता है परंतु यह व्यवस्था भारत के लिए निम्नलिखित कारणों से अनुपयुक्त थी –

  1. भारत में आय में भारी असमानता पाई जाती है। उत्पादन धनी व्यक्तियों के लिए किया जायेगा क्योंकि उनके पास वस्तुएँ खरीदने की शक्ति है।
  2. अधिकांश व्यक्ति निर्धन होने के कारण साख, पैसा एवं उपयोगी वस्तुओं पर खर्च कर देंगे और बचत नहीं होगी।
  3. निर्धन व्यक्तियों के लिए आवास, शिक्षा, चिकित्सा आदि की ओर ध्यान नहीं दिया जायेगा क्योंकि वे आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं हैं।
  4. इस बात की संभावना है कि दीर्घकालिक आर्थिक बातों पर ध्यान न दिया जाए जैसे आधारभूत और भारी उद्योग आदि।

प्रश्न 3.
योजना का लक्ष्य क्या होना चाहिए।
उत्तर:
योजना के निम्नलिखित लक्ष्य होने चाहिए –

  1. संवृद्धि
  2. आधुनिकीकरण
  3. आत्मनिर्भरता
  4. समानता

परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक योजना में इन लक्ष्यों को एक समान महत्त्व दिया जाए। सीमित संसाधनों के कारण प्रत्येक योजना में ऐसे लक्ष्यों का चयन करना पड़ता है, जिनको प्राथमिकता दी जानी है। हाँ, योजनाओं में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जहाँ तक संभव हो, इनके उद्देश्य में अन्त:विरोध न हो।

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प्रश्न 4.
चमत्कारी बीज क्या होते हैं?
उत्तर:
उच्च पैदावार वाली किस्मों की बीजों को चमत्कारी बीज कहा जाता है। इन बीजों के प्रयोग से अनाज के उत्पादन में वृद्धि होती है, विशेषकर गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में। इन बीजों के प्रयोग में पर्याप्त मात्रा में उवर्रकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल-आपूर्ति की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 5.
विक्रय अधिशेष क्या है?
उत्तर:
विक्रय अधिशेष किसानों द्वारा उत्पादन का वह अंश है जो उनके द्वारा बाजार में बेचा जाता है।

प्रश्न 6.
कृषि क्षेत्रक में लागू किए गए भूमि सुधारों की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कृषि क्षेत्रक में लागू किए गए भूमि सुधारों की आवश्यकता (Necessity of land reforms):
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में कृषि पिछड़ी हुई अवस्था में थी। कृषि में उत्पादकता कम थी। कृषि में निम्न उत्पादकता के कई कारण थे। उनमें से कुछ कारण थे-कृषि जोतों का असमान वितरण, भू-जोतों का छोटा आकार, भूमि का उपविभाजन तथा अपखण्डन, विभिन्न भू-धारण पद्धतियाँ। कृषि क्षेत्र की निम्न उत्पादकता के कारण भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका (यू.एस.ए.) से अनाज का आयात करना पड़ा।

कृषि उत्पादन में वृद्धि लाने के लिए तथा देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाने के लिए भूमि सुधारों की आवश्यकता पड़ी। भूमि-सुधार से अभिप्राय कृषि से सम्बन्धित संस्थागत परिवर्तनों से है। जैसे जोत के आकार में परिवर्तन, भू-धारण प्रणाली में परिवर्तन या उनका उन्मूलन।

भूमि-सुधार के प्रकार (Types of land-reforms):
भूमि सुधार के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं –

1. मध्यस्थों की समाप्ति (Abolition of intermediates):
विभाजन से पूर्व लगभग 43% भाग में जमींदारी प्रथा प्रचलित थी। यह प्रथा राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से बहुत ही दोषपूर्ण थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न राज्यों में इस प्रथा का उन्मूलन करने के लिए कानून बनाये गए। बिचौलियों का उन्मूलन करने का मुख्य उद्देश्य किसानों को भूमि का स्वामी बनाना था।

बिचौलियों के उन्मूलन का नतीजा यह था कि लगभग 200 लाख काश्तकारों का सरकार से सीधा सम्पर्क हो गया तथा वे जमींदारों के द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्त हो गए। भू-स्वामित्व से उन्हें उत्पादन में वृद्धि के लिए प्रोत्साहन मिला। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई किन्तु बिचौलियों के उन्मूलन से सरकार समानता के लक्ष्य को प्राप्त न कर सकी।

2. जोतों की उच्चतम सीमा का निर्धारण करना:
जोतों की उच्चतम सीमा के निर्धारण का अर्थ है कि किसी व्यक्ति की कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा निर्धारण करना। इस नीति का उद्देश्य कुछ लोगों में भू-स्वामित्व के संकेन्द्रण को कम करना है। इस निर्धारित सीमा से किसान के पास जो भूमि होती है, वह अतिरिक्त भूमि के रूप में सरकार के पास चली जाती है और सरकार इसे भूमिहीन किसानों में वितरित कर, देती है।

देश के अधिकांश राज्यों में जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित की जा चुकी है। अधिकतम भूमि-सीमा निर्धारण कानून में भी कई बाधाएँ आई। बड़े जमींदारों ने इस कानून को न्यायालयों में चुनौती दी जिसके कारण इसे लागू में देर हुई। इस अवधि में वे अपनी भूमि निकट सम्बन्धियों आदि के नाम करवाकर कानून से बच गये।

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प्रश्न 7.
हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इसे किसानों को कैसे लाभ पहुँच? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
हरित क्रांति (Green Revolution):
हरित क्रांति से अभिप्राय उत्पादन की तकनीक को सुधारने तथा कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि करने से है। हरित क्रांति की दो मुख्य विशेषताएँ हैं –

  1. उत्पादन की तकनीकी को सुधारना तथा
  2. उत्पादन में वृद्धि करना इस संदर्भ में स्व. श्रीमति इंदिरा गाँधी ने लिखा था, “हरित क्रांति का आशय यह है कि खेती में मेड़बंदी करवाकर, फावड़े, तगारी, गेंती, हल इत्यादि उपयोगी कृषि के साधन प्राप्त करके कृषि की जाएं, अपितु इन साधनों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि की जाए।

हरित क्रांति लागू करने के कारण (Caused of Green Revolution):
हरित क्रांति लागू करने का उद्देश्य कृषि क्षेत्रक में उत्पादकता में वृद्धि करना है तथा औपनिवेशिक काल के कृषि गतिरोध को स्थायी रूप से समाप्त करना।

किसानों को लाभ (Advantages of the farmers):
हरित क्रांति से किसानों को निम्नलिखित लाभ हुआ –

  1. हरित क्रांति में किसान अधिक गेहूँ तथा चावल उत्पन्न करने में समर्थ हुए। किसान के पास अब बाजार में बेचने के लिए काफी अनाज है।
  2. किसानों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है।

प्रश्न 8.
योजना उद्देश्य के रूप में समानता के साथ संवृद्धि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समानता के साथ संवृद्धि (Growth with equality):
केवल संवृद्धि के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन में सुधार नहीं आ सकता। किसी देश में संवृद्धि दर बढ़ने पर भी अधिकांश लोग गरीब हो सकते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि समृद्धि (आर्थिक) के साथ देश के निर्धन वर्ग को भी वे सब साधन सुलभ हो, केवल धनी लोगों तक सीमित न हो। अतः संवृद्धि के साथ-साथ समानता भी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ होना चाहिए और धन-सम्पत्ति के वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
क्या रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारतीय योजना के कई उद्देश्य हैं। इनमें एक उद्देश्य आधुनिकीकरण है। आधुनिकीकरण से अभिप्राय वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए नई तकनीकी को अपनाना है। उदाहरण के लिए किसान पुराने बीजों के स्थान पर नई किस्म के बीजों का प्रयोग करके खेती में पैदावार बढ़ा सकता है। आधुनिकीकरण केवल नई तकनीकी के प्रयोग तक सीमित नहीं है अपीत इसका उद्देश्य सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना है। जैसे यह स्वीकार करना कि महिलाओं का अधिकार भी पुरुषों के समान होना चाहिए। कई लोगों का विचार है कि रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है। उनका यह मत. गलत है। आधुनिकीकरण से रोजगार के अवसरों में विस्तार होगा।

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प्रश्न 10.
भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना क्यों आवश्यक था?
उत्तर:
भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना आवश्यक है। आत्मनिर्भरता इसलिए आवश्यक है ताकि विकसित देश उन वस्तुओं के आयात करने से बच जाएँ जिनका उत्पादन देश में ही संभव है। इस नीति का विशेषकर खाद्यान्न के लिए अन्य देशों पर निर्भरता कम करने के लिए पालन आवश्यक समझा गया है। ऐसी आशंका भी थी कि आयतिक खाद्यान्न विदेशी तकनीकी और पूँजी पर निर्भरता, किसी न किसी रूप में हमारी देश की नीतियों में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ाकर हमारी संप्रभुता (Soveregnity) में बाधा डाल सकती थी।

प्रश्न 11.
किसी अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन क्यों होता है ? क्या यह आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था के जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्रक.को सबसे अधिक योगदान करना चाहिए? टिप्पणी करें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन (SectoralShedule of an economy):
कार्यशील जनसंख्या के विभिन्न क्षेत्र में वितरण को अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन कहते हैं। अर्थव्यवस्था की संरचना के तीन क्षेत्रक होते हैं –

1. प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि)

2. द्वितीयक क्षेत्रक (विनिर्माण) तथा तृतीयक क्षेत्रक (सेवा)। प्राथमिक क्षेत्र में मुख्य रूप से उन सब आर्थिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनमें प्राकृतिक साधनों का शोषण किया जाता है। जैसे-खेती करना, मछली, पकड़ना, वन काटना आदि। द्वितीयक क्षेत्रक में वे व्यवसाय आते हैं जो प्रकृति से प्राप्त कच्चे माल का रूप बदल कर पक्का माल तैयार करते हैं। जैसे-रुई से कपड़ा बनाना, चमड़े से जूते बनाना, गन्ने से चीनी बनाना आदि। तृतीयक क्षेत्रक में सेवाओं का उत्पादन करने वाले शामिल होते हैं जैसे-बैंकिंग, परिवहन आदि।

देश का सकल घरेलू उत्पाद देश की अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों से प्राप्त होता है। इन क्षेत्रकों के योगदान से अर्थव्यवस्था का ढाँचा तैयार होता है। कुछ देशों में सकल घरेलू उत्पाद में संवृद्धि में कृषि का योगदान अधिक होता है तो कुछ में सेवा क्षेत्र की वृद्धि इसमें अधिक योगदान करती है। देश के विकास के साथ-साथ इसमें संरचनात्मक परिवर्तन आता है। भारत में तो यह परिवर्तन बहुत विचित्र रहा।

सामान्यतः विकास के साथ-साथ सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का अंश कम होता है और उद्योगों का अंश प्रधान होता है। विकास के उच्चतर स्तर पर पहुँच कर जी.डी.पी. में सेवाओं का अंशदान अन्य दो क्षेत्रकों से अधिक हो जाता है। 1990 से पूर्व भारत में जी.डी.पी. में कृषि का अंश 50 प्रतिशत अधिक था, परंतु 1990 में सेवा क्षेत्रक का अंश बढ़कर 40.59% हो गया। यह अंश कृषि तथा उद्योगों दोनों से ही अधिक था। ऐसी स्थिति तो प्रायः विकसित देशों में पाई जाती है। 1991 के बाद तो सेवा क्षेत्रक के अंश की संवृद्धि की यह प्रवृत्ति और बढ़ गई। इस प्रकार हम देखते हैं कि जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्रक का सबसे अधिक योगदान वांछनीय है।

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प्रश्न 12.
योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को ही। अग्रणी भूमिका क्यों सौंपी गई थी?
उत्तर:
सावर्जनिक उपक्रम (Public Enterprises):
सार्वजनिक उपक्रम से अभिप्राय ऐसी व्यावसायिक या औद्योगिक संस्थाओं से है जिनका स्वामित्व, प्रबंध एवं संचालन सरकार (केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय संस्था) के अधीन होता है। स्वतंत्रता के बाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र को निम्नलिखित कारणों से महत्त्व दिया गया है –

1. विशाल विनियोग की आवश्यकता (Need for huge investment):
कई ऐसे आधारभूत तथा देश के लिये आवश्यक उद्योग होते हैं जिनमें इतने निवेश की आवश्यकता होती है कि निजी क्षेत्र के उद्योग रुचि नहीं लेते।

2. क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए (For removing regional disparities):
भारत जब स्वतंत्र हुआ था तो उस समय क्षेत्रीय असमानताएँ बहुत थीं। इन क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रमों की स्थापना आवश्यक थी। सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों की स्थापना उन क्षेत्रों में की जाती है जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं।

3. आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकने के लिए (Tocheck concentration of economic power):
जब भारत स्वतत्रं हुआ था तो उस समय आय तथा सम्पत्ति का असमान वितरण था। देश के कुछ लोगों के पास का धन केन्द्रित था। अमीर लोग बहुत अमीर थे और गरीब लोग बहुत ही गरीब थे। आय की विषमताओं को कम करने के लिये स्वतंत्रता के पश्चात् सार्वजनिक क्षेत्र को महत्त्व दिया गया।

4. आधारभूत संरचनाओं का विकास करने के लिये (To develop the infrastructure):
स्वतंत्रता के समय भारत में आधारभूत संरचनायें अविकसित तथा असंतोषजनक थीं। बिना आधारभूत संरचनाओं में सुधार लाये देश का विकास नहीं हो सकता। आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने के लिए निजी क्षेत्र आगे आने को तैयार नहीं थे, क्योंकि आधारभूत संरचनाओं में काफी निवेश होता है और काफी समय के पश्चात् उनसे आय प्राप्त होती है। अतः इन संरचनाओं को विकसित करने के लिये सरकार को आगे आना पड़ा।

5. सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण (Important for defence purposes):
जब देश स्वतंत्र हुआ तो उस समय भारत की सुरक्षा खतरे में थी। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध सामग्री (बम, गोले, अस्त्र शस्त्र) के निर्माण की आवश्यकता थी। युद्ध सामग्री के निर्माण के लिये हम निजी क्षेत्र पर भरोसा नहीं कर सकते। अतः इन सबका निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र में किया गया।

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प्रश्न 13.
इस कथन की व्याख्या करें “हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्न के प्रति प्रापण द्वारा विशाल सुरक्षित भण्डार बनाने के योग्य बनाया गया ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सकें।
उत्तर:
प्रश्न में दिए गए कथन से अभिप्राय यह है कि हरित क्रांति के फलस्वरूप अनाज में विशेषकर गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में बहुत ही अधिक वृद्धि हुई। इसके फलस्वरूप भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त हो गई। अब हम अपने राष्ट्र की खाद्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अमेरिका या किसी देश की कृषि पर निर्भर नहीं रहे। अनाज के अधिक उत्पादन से किसान के पास इतना अनाज हो गया कि वह उसका अंश बाजार में बेचने के लिए लाता है सरकार उनसे समर्थित मूल्य (न्यूनतम मूल्य) पर अनाज खरीदती है और खाद्यान्न का सुरक्षित स्टॉक बनाती है ताकि खाद्यान्न की कमी के समय इस स्टॉक का प्रयोग किया जा सके।

प्रश्न 14.
भारत में कृषि-अनुदान के पक्ष क्या विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
भारत में कृषि अनुदान (Agricultural Subsidies in India):
कृषि अनुदान से अभिप्राय सरकार द्वारा कृषकों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता से है जिससे वे अपने उत्पाद को उत्पादन लागत में भी कम कीमत पर बेच सकें। अब कृषि अनुदान के पक्ष तथा विपक्ष में काफी वाद-विवाद हो रहा है। कुछ विद्वानों के अनुसार कृषि अनुदान को समाप्त कर दिया जाना चाहिये जबकि कुछ विद्वान इसे जारी रखने के पक्ष में हैं।

विपक्ष के तर्क (Arguments against agricultural subsidies):
यह आम सहमति है कि किसानों को नई HYV तकनीकी अपनाने हेतु प्रेरित करने के लिये उन्हें कृषि अनुदान देना आवश्यक था। नई तकनीकी अपनाना जोखिम भरा काम है। अत: नई तकनीकी का परीक्षण करने के लिये प्रोत्साहन देने के लिये कृषि अनुदान आवश्यक है। अब परीक्षण करने पर नई तकनीकों को लाभप्रद पाया गया है तथा इसे व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है। अतः अब कृषि अनुदान देना समाप्त किया जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त कृषि अनुदान का उद्देश्य किसानों को लाभ पहुँचाना है जबकि इसका लाभ रसायन उद्योग (Fertilizer Industry) तथा समृद्ध इलाकों के किसानों को हो रहा है। अत: यह दलील दी जाती है कि इसे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह सरकार के वित्त पर बहुत बड़ा बोझ है।

पक्ष के तर्क (Arguments in favour of agricultural subsidies):
कुछ विद्वानों का विचार है कि कृषि अनुदान को जारी रखा जाना चाहिये क्योंकि भारत में कृषि एक जोखिम व्यवसाय है और जोखिम व्यवसाय रहेगा। अधिकांश किसान बहुत निर्धन हैं और बिना अनुदान के वांछित आदानों को खरीदने में समर्थ नहीं होंगे। अनुदान के उन्मुलन से निर्धन तथा धनी किसानों में असमानता बढ़ जायेगी और न्याय का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा। इसके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का विचार है कि यदि अनुदानों से रसायन उद्योग तथा बड़े किसानों को लाभ हो रहा है तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि सरकार अनुदान देना बंद कर दे। इसके विपरीत सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिये जिससे निर्धन किसानों को लाभ पहुँचे।

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प्रश्न 15.
हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्रक में ही क्यों लगी रही?
उत्तर:
अर्थशास्त्रियों के अनुसार जैसे-जैसे देश सम्पन्न होता है कृषि के योगदान में और उस पर निर्भर जनसंख्या में पर्याप्त कमी आती है। भारत में 1950-1990 की अवधि में यद्यपि जी.डी.पी. में कृषि के अंशदान में तो भारी कमी आई है, पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में कमी न के बराबर आई। दूसरे शब्दों में 1990 तक की देश की 65% जनसंख्या कृषि में लगी हुई थी। इसका कारण यह है कि उद्योग क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक, कृषि क्षेत्रक में काम करने वाले लोगों को नहीं खपा पाए। अनेक अर्थशास्त्री इसे 1950-1990 के दौरान अपनाई गई नीतियों की विफलता मानते हैं।

प्रश्न 16.
यद्यपि उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र बहुत आवश्यक रहा है, पर सार्वजनिक क्षेत्रक के अनेक ऐसे उपक्रम हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्रक के अर्थव्यवस्था के संसाधनों के बरबादी के साधन बने हुए हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा किए गए योगदान के बावजूद कुछ अर्थशास्त्रियों ने सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उद्यमों के निष्पादन को आलोचना की है। अनेक क्षेत्रक की फर्मों ने भारी हानि उठाई, लेकिन उन्होंने काम जारी रखा क्योंकि किसी सरकारी उपक्रम को बंद किया जाना अत्यन्त कठिन और लगभग असंभव होता है। भले ही इसके कारण राष्ट्र के सीमित संसाधनों का विकास होता रहे। इसका अर्थ यह नहीं है कि निजी फर्मों को सदा लाभ ही होता हो।

इसके अतिरिक्त सार्वजनिक क्षेत्रक का प्रयोजन लाभ कमाना नहीं है, अपितु राष्ट्र के कल्याण को बढ़ावा देना है। इस दृष्टि से सार्वजनिक क्षेत्रक की फर्मों का मूल्यांकन जनता के कल्याण के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका मूल्यांकन उनके द्वारा कमाए गए लाभों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। सार्वजनिक उपक्रमों की उपयोगिता निम्न तथ्यों के आधार पर स्पष्ट होती है –

  1. सार्वजनिक उपक्रम क्षेत्रीय असमानता को दूर करते हैं।
  2. ये आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकते हैं।
  3. ये आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने में बहुत ही अधिक सहायक होते हैं।
  4. ये देश की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  5. ये श्रमिकों के कल्याण की ओर अधिक ध्यान देते हैं।

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प्रश्न 17.
आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है?
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन-आयात प्रतिस्थापन से अभिप्राय है कि आयात की जाने वाली वस्तुओं का घरेलू (देशी) उत्पादन द्वारा प्रतिस्थापन करना। उदाहरण के लिए विदेशों में निर्मित वाहनों का आयात करने के स्थान पर उन्हें भारत में ही निर्मित करने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाय। इस नीति के अनुसार सरकार ने विदेशी प्रतिस्पर्धा से उद्योगों की रक्षा की। आयात संरक्षण के दो प्रकार थे: प्रशुल्क और कोटा –

1. प्रशुल्क (Tariff):
प्रशुल्क आयातिक वस्तुओं पर लगाया गया कर है। प्रशुल्क लगाने पर आयातिक वस्तुएँ अधिक महंगी हो जाती हैं जो वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करती हैं।

2. कोटा (Quota):
कोटे में वस्तुओं की मात्रा निर्दिष्ट रहती है, जिन्हें आयात किया जा सकता है।

प्रश्न 18.
औद्योगिकी नीति प्रस्ताव 1956 में निजी क्षेत्रक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था?
उत्तर:
औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956-निजी क्षेत्र के भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के राज्य के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 को अंगीकार किया गया। इस प्रस्ताव को द्वितीय पंचवर्षीय योजना का आधार बनाया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार उद्योगों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। प्रथम वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जिन पर राज्य का अनन्य स्वामित्व था। दूसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जिनके लिए निजी क्षेत्रक सरकारी क्षेत्रक के साथ मिलकर प्रयास कर सकते थे, परंतु जिनमें नई इकाइयों को शुरू करने की एकमात्र जिम्मेदारी। राज्य की होती है। तीसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जो निजी क्षेत्रक के अन्तर्गत आते थे।

इस प्रस्ताव के अन्तर्गत निजी क्षेत्रक को लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया है। नये उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जाती थी, जब तक सरकार से लाइसेंस नहीं प्राप्त कर लिया जाता था। इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। यदि उद्योग आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में लगाए गए तो लाइसेंस प्राप्त करना आसान था। इसके अतिरिक्त उन इकाइयों को कुछ रियासतें भी दी गईं, जैसे-कर लगाना तथा कम प्रशुल्क पर बिजली देना।

इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय समानान्तर को बढ़ावा देना था। वर्तमान उद्योग को भी उत्पादन बढ़ाने या विविध प्रकार के उत्पादन (वस्तुओं की नई किस्मों का उत्पादन) करने के लिए लाइसेंस प्राप्त करना होता था। इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना था कि उत्पादित वस्तुओं की मात्रा अर्थव्यवस्था द्वारा अपेक्षित मात्रा से अधिक न हो, उत्पादन बढ़ाने का लाइसेंस केवल तभी दिया जाता था जब सरकार इस बात से आश्वस्त होती थी कि अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में वस्तुओं की आवश्यकता है।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)

प्रश्न 19.
निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 1
उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Economics भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था मुख्यतः कितने प्रकार की हैं-उनके नाम लिखें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था मुख्यतः तीन प्रकार की हैं –

  1. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था
  2. समाजवादी अर्थव्यवस्था तथा
  3. मिश्रित अर्थव्यवस्था

प्रश्न 2.
उस अर्थव्यवस्था का नाम लिखो जो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था दोनों की विशेषताएँ लिए हुए है?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था।

प्रश्न 3.
बाजार अर्थव्यवस्था का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर:
बाजार अर्थव्यवस्था का दूसरा नाम पूँजीवादी अर्थव्यवस्था है।

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प्रश्न 4.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में किन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है?
उत्तर:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिनका विक्रय लाभप्रदाता के साथ अपने देश में या दूसरे देशों में सरलता से किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
समाजवादी अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
समाजवादी अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें सरकार समाज की आवश्यकतानुसार वस्तुओं के उत्पादन का निर्णय करती है।

प्रश्न 6.
मिश्रित अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें सरकार तथा बाजार (मांग तथा पूर्ति शक्तियाँ) दोनों मिलकर यह निर्णय लेते हैं कि क्या उत्पादन किया जाये, कैसे उत्पादन किया जाये तथा उत्पादित वस्तुओं का वितरण कैसे किया जाये।

प्रश्न 7.
योजना आयोग की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
योजना आयोग की स्थापना 1950 में की गई।

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प्रश्न 8.
आर्थिक नियोजन क्या है?
उत्तर:
आर्थिक नियोजन एक ऐसी रणनीति है जिसके अन्तर्गत किसी देश के साधनों को ध्यान में रखकर एक निश्चित समय में आर्थिक विकास के निश्चित लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।

प्रश्न 9.
भारतीय योजना की अवधि क्या है?
उत्तर:
भारतीय योजना की अवधि पाँच वर्ष है।

प्रश्न 10.
उत्पादन की श्रम-प्रधान तकनीक में क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उत्पादन की श्रम-प्रधान तकनीक से अभिप्राय उत्पादन की उस विधि से है जिसमें पूँजी की अपेक्षा श्रम का अधिक प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
उत्पादन की उस तकनीक को क्या कहते हैं जिसमें श्रम की अपेक्षा पूँजी का अधिक प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
उत्पादन की पूँजी प्रधान तकनीक।

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प्रश्न 12.
भूमि सुधार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि सुधार से अभिप्राय भूमि जोतों के स्वामित्व में परिवर्तन करना है। इसका उद्देश्य कृषि से समता (न्याय) लाना है।

प्रश्न 13.
भूमि सीमा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि सीमा का उद्देश्य भूमि के कुछ हाथों में स्वामित्व के केन्द्रीकरण को कम करना है।

प्रश्न 14.
भूमि सीमा का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
भूमि सीमा का उद्देश्य भूमि के कुछ हाथों में स्वामित्व के केन्द्रीकरण को कम करना है।

प्रश्न 15.
भारत में किस उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिश्रित अर्थव्यवस्था के मार्ग को अपनाया गया?
उत्तर:
भारत में सामाजिक समता के साथ आर्थिक विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिश्रित अर्थव्यवस्था में मार्ग को अपनाया गया।

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प्रश्न 16.
हमारी पंचवर्षीय योजना को बनाने में कई विख्यात विचारकों को योगदान रहा है। उनमें से एक विचारक का नाम लिखें।
उत्तर:
प्रो. पी. सी. महालनोबिस (Prof. Prasanta Chandra Mahalanobis)।

प्रश्न 17.
योजना आयोग ने देश के आर्थिक विकास के लिये पहली पंचवर्षीय योजना कब आरम्भ की?
उत्तर:
योजना आयोग ने देश के आर्थिक विकास के लिये पहली पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल, 1951 से आरम्भ की।

प्रश्न 18.
पहली पंचवर्षीय योजना में किस क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया?
उत्तर:
पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया था।

प्रश्न 19.
पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को क्यों अधिक महत्त्व दिया गया है? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं में निम्नलिखित कारणों से औद्योगिक विकास को अधिक महत्त्व दिया गया है –

  1. औद्योगिक विकास से देश में रोजगार के अवसरों की अधिक वृद्धि होती है अपेक्षाकृत कृषि के।
  2. इससे आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिलता है।

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प्रश्न 20.
चकबंदी (Consolidation of Holdings) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
चकबंदी से अभिप्राय ऐसी प्रक्रिया से है जिसके द्वारा एक भू-स्वामी के इधर-उधर बिखरे हुए खेतों के बदले में उसी किस्म के उतने ही आकार के एक या दो खेत इकट्ठ दे दिये जाते हैं।

प्रश्न 21.
चकबंदी से क्या लाभ है?
उत्तर:
चकबंदी से कृषकों को उन्नत किस्म के आदानों का प्रयोग करने में सहायता मिलता है तथा कम से कम से प्रयत्नों में अधिकतम उत्पादन में सफलता मिलती है। इससे उत्पादन लागत में भी कमी आती है।

प्रश्न 22.
भूमि सुधार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि सुधार से अभिप्राय भूमि (जोतों) के स्वामित्व में परिवर्तन लाना। दूसरे शब्दों में भूमि सुधार में भूमि के स्वामित्व के पुनः वितरण को शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 23.
भूमि सुधार क्यों अपनाया गया?
उत्तर:
कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा सामाजिक न्याय की स्थापना करने के लिये भूमि सुधार अपनाया गया।

प्रश्न 24.
पंचवर्षीय योजनाओं के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्य हैं –

  1. वृद्धि
  2. आधुनिकीकरण
  3. आत्म-निर्भरता तथा
  4. न्याय (equity)

प्रश्न 25.
जी.डी.पी. का पूरा नाम लिखो?
उत्तर:
डी.डी.पी. का पूरा नाम सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) है।

प्रश्न 26.
पं. जवाहरलाल नेहरू तथा अन्य नेताओं और विचारकों ने किस प्रकार की अर्थव्यवस्था को भारत के अनुकूल समझा?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था को।

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प्रश्न 27.
पं. जवाहरलाल नेहरू पूर्व सोवियत संघ में प्रचलित समाजवाद के पक्ष में क्यों नहीं थे?
उत्तर:
क्योंकि पूर्व सोवियत संघ में उत्पादन के सब साधनों पर सरकार का स्वामित्व था। वहाँ कोई निजी सम्पत्ति नहीं थी। भारत जैसे प्रजातंत्र देश में यह सम्भव नहीं था।

प्रश्न 28.
सकल घरेलू उत्पादन क्या है?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद एक वर्ष में उत्पादित कुल वस्तुओं तथा सेवाओं का बाजार मूल्य है।

प्रश्न 29.
आधुनिकीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
नई तकनीकी को अपनाना और सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन को आधुनिकीकरण कहते हैं।

प्रश्न 30.
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में किस उद्देश्य को महत्व दिया गया?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता को।

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प्रश्न 31.
आत्मनिर्भरता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता से अभिप्राय उन वस्तुओं का आयात न करना जिन वस्तुओं का उत्पादन – देश में किया जा सकता है।

प्रश्न 32.
औद्योगिक नीति को कौन-सी नीति कार्य रूप प्रदान करती है?
उत्तर:
औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति औद्योगिक नीति को कार्य रूप प्रदान करती है।

प्रश्न 33.
हरित क्रांति से खाद्यान्नों की कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ा।
उत्तर:
हरित क्रांति के फलस्वरूप खाद्यान्नों की कीमतों में उपभोग की दूसरी मदों की अपेक्षा कमी आई।

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प्रश्न 34.
हरित क्रांति से सरकार को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
हरित क्रांति से स्टॉक बनाने के लिये काफी मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध हो गया।

प्रश्न 35.
हरित क्रांति के विषय में दो भ्रांतियाँ क्या थीं?
उत्तर:

  1. हरित क्रांति से छोटे तथा बड़े किसानों में विषमता बढ़ जायेगी, तथा
  2. उन्नत बीज से उत्पन्न पौधों पर कीट आक्रमण करेंगे।

प्रश्न 36.
एक अर्थव्यवस्था की कौन-सी प्रमुख समस्याएँ हैं?
उत्तर:

  1. क्या उत्पादन किया जाये
  2. कितनी मात्रा में, कैसे उत्पादन किया जाय और
  3. किसके लिये उत्पादन किया जाये।

प्रश्न 37.
योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष कौन होता है?
उत्तर:
योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है।

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प्रश्न 38.
वास्तविक रूप में (In Real Sense) भारत में योजना काल कब आरम्भ हुआ?
उत्तर:
दूसरी पंचवर्षीय योजना से।

प्रश्न 39.
ब्रिटिश शासन काल में कृषि किस अवस्था में थी?
उत्तर:
कृषि गतिहीन थी। कृषि में वृद्धि नगण्य थी। कृषि में असमानता थी।

प्रश्न 40.
कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए क्या प्रयत्न किये गये?
उत्तर:
समानता को दूर करने के लिए भूमि सुधार किया गया तथा उत्पादन में वृद्धि लाने के लिये उन्नत बीजों का प्रयोग किया गया। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया गया। कृषि में आधुनिक मशीनों तथा उपकरणों को प्रयोग में लाया गया।

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प्रश्न 41.
जमींदारी उन्मूलन से होने वाले दो लाभ लिखें।
उत्तर:

  1. कृषकों को शोषण होना बंद हो गया।
  2. कृषि-उत्पादन में वृद्धि हुई।

प्रश्न 42.
जमींदारी उन्मूलन से क्या न्याय का उद्देश्य (Goal of Equity) पूर्णतः प्राप्त हो गया?
उत्तर:
नहीं, जमींदारी उन्मूलन से न्याय का उद्देश्य पूरी तरह से नहीं प्राप्त किया जा सका।

प्रश्न 43.
दूसरी योजना के आरम्भ में विकास पद्धति अपनाई गई थी। इस विकास पद्धति को तैयार करने का श्रेय किसको दिया जा सकता है?
उत्तर:
विकास पद्धति को तैयार करने का श्रेय प्रो. पी. सी. महालनोबिस को दिया जा सकता है।

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प्रश्न 44.
योजना की विकास पद्धति में औद्योगीकरण पर बल क्यों दिया गया? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  1. औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादकता का स्तर कृषि क्षेत्र में उत्पादकता के स्तर की तुलना में अधिक होता है।
  2. बेरोजगारी की समस्या का समाधान औद्योगीकरण में सम्भव होता है।

प्रश्न 45.
योजना काल में ग्रामीण क्षेत्र में आय की विषमताओं के बढ़ने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्र में आय की विषमता के बढ़ने का प्रमुख कारण है – योजना के दौरान कृषि विकास के लिये उठाये गये विभिन्न कदमों का लाभ प्रमुख रूप से बड़े-बड़े किसानों को दो पहुँचा है। छोटे किसान इन लाभों से वंचित रहे।

प्रश्न 46.
किस अर्थव्यवस्था में लोगों की आवयश्कतानुसार उत्पादित वस्तुओं का वितरण किया जाता है?
उत्तर:
समाजवादी अर्थव्यवस्था में।

प्रश्न 47.
औद्योगिक विकास के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने क्या कहा था?
उत्तर:
औद्योगिक विकास के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “सभी राष्ट्र जिस देवता की पूजा करते हैं, वह देवता है औद्योगिकरण, वह देवता है, मशीनीकरण, वह देवता है, उच्च उत्पादन तथा प्राकृतिक साधनों एवम् साधनों का अधिक से अधिक लाभप्रद प्रयोग की औद्योगिक विकास है।”

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प्रश्न 48.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता लाना था।

प्रश्न 49.
औद्योगिक लाईसेंसिंग नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औद्योगिक लाईसेंसिंग नीति से अभिप्राय उस नीति से है जिसके अन्तर्गत औद्योगिक उपक्रमों की स्थापना अथवा विस्तार के लिये सरकार से आज्ञपत्र लेना अनिवार्य होता है।

प्रश्न 50.
भारत के विदेशी व्यापार की संरचना तथा प्रतिबंध मात्रा को ब्रिटिश सरकार ने किस प्रकार कुप्रभावित किया?
उत्तर:
भारत के विदेशी व्यापार की संरचना तथा प्रतिबंध मात्रा को ब्रिटिश सरकार ने वस्तु उत्पादन, व्यापार तथा टैरिफ (Tariff) की प्रतिबंधात्मक नीतियों द्वारा कुप्रभावित किया।

प्रश्न 51.
ब्रिटिश सरकार की वस्तु उत्पादन, व्यापार तथा टैरिफ की प्रतिबंधात्मक नीतियों के फलस्वरूप भारत किन-किन वस्तुओं का निर्यातक बन गया?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार की वस्तु उत्पादन, व्यापार प्रतिबंध तथा टैरिफ की प्रतिबंधात्मक नीतियों के फलस्वरूप भारत कच्चा रेशम, सूत, ऊन, चीनी, पटसन आदि प्राथमिक वस्तुओं का उत्पादक बन गया।

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प्रश्न 52.
उपनिवेश शासन में कृषि में गतिहीनता हमेशा के लिये किस क्रांति के द्वारा तोड़ी गई?
उत्तर:
उपनिवेश शासन में कृषि में गतिहीनता हमेशा के लिये हरित क्रांति के द्वारा तोड़ी गई।

प्रश्न 53.
हरित-क्रांति के प्रथम चरण की समयावधि लिखें। इस चरण में HYV बीजों का प्रयोग किन-किन राज्यों में किया गया?
उत्तर:
हरित क्रांति के प्रथम चरण की समयावधि मध्य 1960 से 1970 तक की है। पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश (पश्चिमी) राज्यों में किया गया।

प्रश्न 54.
कोटा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कोटा से अभिप्राय आयात की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा का निर्धारण करने से है।

प्रश्न 55.
1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का कितना योगदान था और 1950-51 में कितना था?
उत्तर:
1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 24.6% था जबकि 1950-51 में यह 11.80% था।

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प्रश्न 56.
उन्नत किस्म के बीज (High Yielding Variety Seeds) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उन्नत किस्म के बीजों से अभिप्राय ऐसे बीजों से है जिन्हें बोकर कम क्षेत्र में अधिक मात्रा में फसल प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 57.
जीतों की अधिकतम सीमा (Ceiling of Holdings) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जोतों की अधिकतम सीमा से अभिप्राय जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना और अतिरिक्त (Surplus) भूमि को भूमिहीनों में बाँटकर सामाजिक न्याय की स्थापना करना व अधिक से अधिक लोगों को रोजगार की सुविधाएँ देना था।

प्रश्न 58.
बाजार में कीमतों का निर्धारण किसके द्वारा होता है?
उत्तर:
बाजार में कीमतों का निर्धारण माँग तथा पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है।

प्रश्न 59.
कीमतें किस बात की संकेतक हैं?
उत्तर:
कीमतें बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता की संकेतक हैं।

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प्रश्न 60.
वस्तुओं की उपलब्धता में कमी कीमतों में क्या परिवर्तन लाती हैं?
उत्तर:
कीमतों में वृद्धि होती है।

प्रश्न 61.
वस्तुओं की उपलब्धता में कमी आने के फलस्वरूप कीमतों में होने वाली वृद्धि वस्तुओं के उपभोग पर क्या प्रभाव डालती है?
उत्तर:
वस्तुओं का उपभोग बुद्धिमत्ता तथा कुशलता से किया जाता है।

प्रश्न 62.
लोग वस्तुओं का कुशलता से प्रयोग करने को कब प्रेरित होते हैं?
उत्तर:
जब वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है।

प्रश्न 63.
यदि विद्युत निःशुल्क कर दी जाय तो उसका प्रयोग किस प्रकार से किया जायेगा?
उत्तर:
अकुशलता तथा लापरवाही से विद्युत का प्रयोग किया जाएगा।

प्रश्न 64.
मान लो किसानों को जल की आपूर्ति निःशुल्क की जाती है। ऐसी अवस्था में किसान जल का प्रयोग किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
ऐसी अवस्था में पानी की कमी की ओर बिना ध्यान दिये उसका अनावश्यक प्रयोग करंगे और वे ऐसी फसलें बोयेंगे जिनके लिए अधिक मात्र में पानी की आवश्यकता होगी।

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प्रश्न 65.
ब्रिटिश शासन में भारत किन-किन वस्तुओं का आयात करता था?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन में भारत सूती, रेशमी और ऊनी कपड़ों (निर्मित उपभोग वस्तुएँ) तथा ब्रिटेन की फैक्ट्रियों में निर्मित वस्तुओं का आयात करता था।

प्रश्न 66.
HYV बीजों का प्रयोग किन-किन राज्यों में किया गया।
उत्तर:
HYV बीजों का प्रयोग पंजाब, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में किया गया।

प्रश्न 67.
हरित क्रांति के दूसरे चरण का कार्यकाल लिखें।
उत्तर:
हरित क्रांति के दूसरे चरण का कार्यकाल 1970 से 1980 ई. है।

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प्रश्न 68.
विपणित अधिशेष (Marketed Surplus) किसे कहते हैं?
उत्तर:
कृषि उत्पाद का वह भाग जो कृषकों के द्वारा बाजार में बेचा जाता है, उसे विपणित अधिशेष कहते हैं।

प्रश्न 69.
उद्योग के दो लाभ लिखें।
उत्तर:
लाभ (Advantages):

  1. उद्योग रोजगार प्रदान करता है।
  2. यह आधुनिकीकरण को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 70.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 (Industrial Policy of Resolution of 1956) के उद्योगों को कितनी श्रेणियों में वर्गीकृत किया है? पहले वर्ग में किन उद्योगों को रखा गया है?
उत्तर:
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 ने उद्योगों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। पहली श्रेणी में उन उद्योगों को रखा गया है जो पूर्णतः राज्य के स्वामित्व में होंगे।

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प्रश्न 71.
औद्योगिक नीति 1956 में द्वितीय श्रेणी में कौन-कौन से उद्योग रखे गये हैं?
उत्तर:
औद्योगिक नीति 1956 में 12 महत्त्वपूर्ण उद्योगों को द्वितीय श्रेणी में रखा गया जैसे लोहे की धातुएँ एवम् एल्युमीनियम, औजार, मशीन, दवाइयाँ आदि। इन उद्योगों के विकास के लिये सरकार अधिक भाग देगी।

प्रश्न 72.
आयात प्रतिस्थापन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन से अभिप्राय उन वस्तुओं के आयात से बचना है, जिनका उत्पादन अपने देश में किया जा सकता है।

प्रश्न 73.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें वस्तुओं का उत्पादन तथा वितरण लोगों की आवश्यकता के आधार पर नहीं अपितु लोगों की क्रय शक्ति तथा क्रय इच्छा के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 74.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 में तृतीय श्रेणी में कौन-कौन से. उद्योग रखे. गये हैं?
उत्तर:
तृतीय श्रेणी (वर्ग) में उन सभी उद्योगों को रखा गया है जो निजी क्षेत्र के लिये सुरक्षित रहेंगे। इनका विकास सामान्यतः निजी क्षेत्र की प्रेरणा से होगा। किन्तु इस श्रेणी में भी राज्य नये उद्योगों की स्थापना कर सकता है।

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प्रश्न 75.
1990 में देश की जनसंख्या का कितना प्रतिशत भाग कृषि में कार्यरत था?
उत्तर:
1990 में देश की जनसंख्या का 65% भाग कृषि में कार्यरत था।

प्रश्न 76.
1990 में सकल घरेलू उत्पादन में कृषि के योगदान का अनुपात घटा है परंतु कृषि पर निर्भर करने वाली जनसंख्या में कमी नहीं आई है। कारण बताएँ।
उत्तर:
इसका कारण यह है कि कृषि में कार्यरत जनसंख्या को औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्र खपा नहीं सकते।

प्रश्न 77.
निर्धन राष्ट्र कैसे उन्नति कर सकते हैं?
उत्तर:
निर्धन राष्ट्र उन्नति कर सकते हैं यदि वे उद्योगों को बढ़ावा दें।

प्रश्न 78.
पंचवर्षीय योजनाओं में (पहली पंचवर्षीय योजना को छोड़कर) औद्योगिक विकास को क्यों अधिक महत्त्व दिया गया है?
उत्तर:
हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को इसलिए महत्त्व दिया गया है क्योंकि उद्योग कृषि की अपेक्षा अधिक स्थायी रोजगार देते हैं। वह आधुनिकीकरण को बढ़ावा देते हैं और देश में समृद्धि लाते हैं।

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प्रश्न 79.
भारत में किस वर्ष से पंचवर्षीय योजनाओं की एक निरंतर प्रक्रिया चल रही है?
उत्तर:
भारत में सन् 1951 से पंचवर्षीय योजनाओं की एक निरंतर प्रक्रिया चल रही है।

प्रश्न 80.
आर्थिक विकास के उच्चतर स्तर पर किस क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक होता है?
उत्तर:
आर्थिक विकास के उच्चतर स्तर पर सेवा क्षेत्र (तृतीयक क्षेत्र) का योगदान सबसे अधिक होता है।

प्रश्न 81.
1990 में सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान कितना था?
उत्तर:
1990 में सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 40.59 (कृषि तथा विनिर्माण क्षेत्र से अधिक) था।

प्रश्न 82.
किस तकनीकी ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया?
उत्तर:
हरित क्रांति तकनीकी ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया।

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प्रश्न 83.
वस्तु की कीमत में वृद्धि होने से उस वस्तु के उपयोग पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कीमत में वृद्धि होने से उस वस्तु का प्रयोग बड़ी बुद्धिमत्ता तथा कुशलता से किया जाता है।

प्रश्न 84.
व्यावसायिक संरचना तथा आर्थिक विकास में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
आर्थिक संरचना तथा आर्थिक विकास में अटूट सम्बन्ध है। ज्यों-ज्यों आर्थिक विकास होता है त्यों-त्यों कृषि क्षेत्र पर निर्भर जनसंख्या का प्रतिशत कम होता जाता है तथा द्वितीयक क्षेत्र तृतीयक क्षेत्र पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ता जाता है।

प्रश्न 85.
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का क्रम क्यों आरम्भ किया गया?
उत्तर:
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में अल्पविकसितता को दूर करने के लिए और देश में उपलब्ध साधनों का उचित उपयोग करने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं के क्रम को शुरू किया गया।

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प्रश्न 86.
औद्योगिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औद्योगिक नीति से अभिप्राय उस नीति से है जिसमें मौलिक और औद्योगिक मुद्दों को स्पष्ट किया जाता है। जैसे उद्योगों का निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में विभाजन, पैमाने के आधार पर उद्योगों के स्वरूप का निर्धारण, पूँजीगत अथवा उपभोक्ता वस्तुओं के उद्यमों की स्थापना।

प्रश्न 87.
आर्थिक संवृद्धि को परिभाषित करें।
उत्तर:
आर्थिक संवृद्धि-को एक अर्थव्यवस्था में लम्बे समय तक प्रति व्यक्ति सकल घरेलू . उत्पाद में निरंतर वृद्धि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

प्रश्न 88.
आर्थिक संवृद्धि को किन दो तरीकों से परिभाषित किया जा सकता है?
उत्तर:

  1. सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि
  2. प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि।

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प्रश्न 89.
एक देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान देने वाले क्षेत्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
एक देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान देने वाले तीन क्षेत्र हैं –

  1. प्राथमिक क्षेत्र
  2. द्वितीयक क्षेत्र तथा
  3. तृतीयक क्षेत्र

प्रश्न 90.
प्राथमिक क्षेत्र में किन आर्थिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है?
उत्तर:
प्राथमिक क्षेत्र को कृषि क्षेत्र भी कहते हैं। इस क्षेत्र में उन सब आर्थिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनमें प्राकृतिक साधनों का शोषण किया जाता है। जैसे-खेती – करना, मछली पकड़ना, वन काटना आदि।

प्रश्न 91.
द्वितीयक क्षेत्र में कौन-कौन से व्यवसाय आते हैं?
उत्तर:
द्वितीय क्षेत्र को विनिर्माण क्षेत्र भी कहते हैं। इस क्षेत्र में वे व्यवसाय आते है। जो प्रकृति से प्राप्त कच्चे माल का रूप बदलकर पक्का माल तैयार करते हैं अथवा एक प्रकार की वस्तु को दूसरी प्रकार की वस्तु में बदलते हैं, जैसे-रुई से कपड़ा बनाना, चमड़े से जूता बनाना, गन्ने से चीनी बनाना आदि।

प्रश्न 92.
तृतीयक क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
तृतीयक क्षेत्र उस क्षेत्र को कहते हैं जिसमें बैंकिंग, परिवहन, संचार आदि सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। इसे सेवा क्षेत्र भी कहते हैं।

प्रश्न 93.
अर्थशास्त्र की भाषा में आर्थिक संवृद्धि का अच्छा संकेतक कौन है?
उत्तर:
अर्थशास्त्र की भाषा में आर्थिक संवृद्धि का अच्छा संकेतक सकल घरेलू उत्पाद में निरंतर वृद्धि है।

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प्रश्न 94.
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की गणना कैसे की जाती है?
उत्तर:
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद निकालने के लिये सकल घरेलू उत्पाद को जनसंख्या से विभाजित किया जाता है।

प्रश्न 95.
आर्थिक विकास से सकल घरेलू उत्पाद में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान में क्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में जैसे-जैसे विकास होता है, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान कम होता जाता है और विनिर्माण क्षेत्र तथा सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ता जाता है।

प्रश्न 96.
संरचनात्मक परिवर्तन से क्या अभिप्राय है? यह कब होता है?
उत्तर:
संरचनात्मक परिवर्तन से अभिप्राय सकल घरेलू उत्पाद में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान में परिवर्तन होना है। यह परिवर्तन देश के आर्थिक विकास के कारण होता है।

प्रश्न 97.
स्वतंत्रता के समय प्राथमिक, द्वितीयक एवम् तृतीयक क्षेत्र की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत के संरचनात्मक ढाँचे में कृषि का महत्त्व सबसे अधिक था। इसके विपरीत उद्योगों का बहुत कम महत्त्व था। सेवा क्षेत्र का भी योगदान कम था।

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प्रश्न 98.
भूमि सुधार की दिशा में कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण उठाये गये हैं? कोई तीन कदम लिखें।
उत्तर:

  1. मध्यस्थों एवम् जमींदारी का उन्मूलन
  2. जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण करना तथा
  3. चकबंदी

प्रश्न 99.
किन-किन राज्यों में भूमि सुधारों ने सफलता प्राप्त की और क्यों?
उत्तर:
केरल तथा पश्चिमी बंगाल में भूमि सुधार आंदोलन ने सफलता प्राप्त की क्योंकि वहाँ की सरकार काश्तकारों को भूमि देने पर दृढ़संकल्प थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और समाजवादी अर्थव्यवस्था में कोई दो अंतर बतायें।
उत्तर:
पूँजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था में अंतर –
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प्रश्न 2.
पूँजीवाद किन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है? वह किस उत्पादन विधि को अपनाता है और किस आधार पर वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण करता है?
उत्तर:
पूँजीवाद उन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनको देश या विदेश में लाभ पर बेचा जा सकता है। वह उत्पादन की उस विधि को अपनाता है जो तुलनात्मक रूप से कम खर्चीली हो। वह लोगों की क्रयशक्ति और क्रय-इच्छा को आधार पर वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण करता है।

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प्रश्न 3.
समाजवादी अर्थव्यवस्था में किन वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन किया जाता हैं? इस अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण किस आधार पर किया जाता है? यह अर्थव्यवस्था किस देश में अपनाई गई थी?
उत्तर:
समाजवादी अर्थव्यवस्था में समाज तथा सेवाओं का वितरण भी लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार ही किया जाता है। यह अर्थव्यवस्था पूर्व सोवियत संघ में अपनाई गई थी।

प्रश्न 4.
प्रत्येक समाज को किन तीन प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है?
उत्तर:
प्रत्येक समाज को निम्न तीन प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है –

  1. देश में किन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाये?
  2. वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन कैसे किया जाये? वस्तुओं के उत्पादन के लिये उत्पादकों द्वारा अधिक मानवीय श्रम का प्रयोग किया जाना चाहिये या अधिक पूँजी का?
  3. लोगों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का वितरण कैसे किया जाना चाहिये?

प्रश्न 5.
लघु उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
लघु उद्योग को निवेश की मात्रा के आधार पर परिभापित किया जाता है। समय-समय पर निवेश की मात्रा में परिवर्तन किया जाता है। 1950 में उस उद्योग को लघु उद्योग कहा जाता था जिसमें अधिकतम निवेश 5,00,000 रुपये है। वर्तमान समय में इस सीमा को बढ़ा कर एक करोड़ कर दिया गया है।

प्रश्न 6.
लघु उद्योगों को विकसित करने के लिये भारत सरकार द्वारा कई कदम उठाये गये हैं। कोई चार उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. सरकार ने लघु उद्योगों को कुछ वस्तुओं को कर से मुक्त रखा है।
  2. इन्हें बैंकों से कम ब्याज दर पर ऋण दिया जाता है।
  3. लघु उद्योगों के विकास के लिये देश में बड़ी संख्या में औद्योगिक वस्तियों की स्थापना की गई है।
  4. इस बात की संभावना है कि दीर्घकालिक आर्थिक बातों पर ध्यान न दिया जाए जैसे आधारभूत और भारी उद्योग आदि।

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प्रश्न 7.
घरेलू उद्योगों के विदेशी प्रतियोगिता से किन दो रूपों में संरक्षण दिया गया? उन रूपों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता सं किन दो रूपों में संरक्षण दिया गया-प्रशुल्क (Tarifls) तथा कोटा (Quotas)। प्रशुल्क से अभिप्राय आयतित वस्तुओं पर कर से है। प्रशुल्क में आयात की जाने वाली वस्तु महंगी हो जाती है। परिणामस्वरूप आयात की जाने वाली वस्तुओं का आयात किया जा सकता है। प्रशुल्क और कोटे का उद्देश्य आयात पर प्रतिबंध लगाना और घरेलू फर्मों को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देना है। विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण मिलने पर हमारे देश में घरेलू इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) तथा आटोमोबाइल (Automobile) उद्योग विकसित हो सके।

प्रश्न 8.
हरित क्रांति के विषय में कौन-कौन सी आशंकाएँ थीं? क्या वे आशंकाएँ सच निकलीं।
उत्तर:
हरित क्रांति के विषय में दो भ्रान्तियाँ थीं –
1. हरित क्रांति से अमीरों तथा गरीबों में विषमत्ता बढ़ जायेगी क्योंकि बड़े जमींदार ही इच्छित अनुदानों का क्रय कर सकेंगे और उन्हें ही हरित क्रांति का लाभ मिलेगा और वे और अधिक धनी हो जायेंगे। निर्धनों को हरित क्रांति से कुछ लाभ नहीं होगा।

2. उन्नत बीज वाली फसलों पर जंतु एवं कीड़े आक्रमण करेंगे। ये दोनों भ्रान्तियाँ सच नहीं हुई क्योंकि सरकार ने छोटे किसानों को निम्न ब्याज दर पर ऋणों की व्यवस्था की और रासायनिक खादों पर आर्थिक सहायता दी ताकि वे उन्नत बीज तथा रासायनिक खाद सरलता से खरीद सकें और उनका उपयोग कर सकें। जीव-जन्तुओं के आक्रमणों को भी सरकार द्वारा स्थापित अनुसंधान संस्थाओं (Reserch Institutes) की सेवाओं द्वारा कम कर दिया गया।

प्रश्न 9.
सार्वजनिक उपक्रम से क्या अभिप्राय है? इसकी विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रम से अभिप्राय ऐसी व्यावसायिक अथवा औद्योगिक संस्था से है जिसका स्वामित्व, प्रबंध एवम् संचालन सरकार (केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन या किसी सार्वजनिक संस्था) के अधीन होता है। राव, चौधरी एवम् चक्रवर्ती के अनुसार, “व्यवसाय में राजकीय उपक्रम से आशय एक ऐसे प्रतिष्ठान से है जो सरकार के द्वारा एकल स्वामी या बहुमत अंशधारी के रूप में भी नियंत्रित या संचालित किया जाता है।”
विशेषताएँ (Features):

  1. ये सरकारी संस्थाएँ होती हैं।
  2. इनका स्वामित्व, प्रबंध एवम् संचालन सरकार के हाथों में होता है।
  3. सरकार जैसे केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार अथवा स्थानीय प्रशासन अथवा कोई सार्वजनिक संस्था इनका स्वामित्व हो सकता है।
  4. इन उपक्रमों पर या तो सरकार का पूर्ण स्वामित्व होता है या इनकी अधिकांश पूँजी पर सरकार का नियंत्रण होता है।
  5. इन संस्थाओं द्वारा निजी संस्थाओं की भाँति ही वस्तुओं एवं सेवाओं का विक्रय किया जाता है।

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प्रश्न 10.
संरक्षण की नीति किस अवधारणा पर आधारित है?
उत्तर:
संरक्षण की नीति इस अवधारणा पर आधारित है कि विकासशील देश के उद्योग. अधिक विकसित देशों में निर्मित वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसी मान्यता है कि यदि घरेलू उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तो वे कुछ समय के पश्चात् विकसित देशों में निर्मित वस्तुओं का मुकाबला कर सकेंगे।

प्रश्न 11.
विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण की आलोचना किस आधार पर की जाती है?
उत्तर:
ऐसा माना जाता है कि अधिक समय तक संरक्षण देने से उद्योग अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता नहीं बढ़ायेगी क्योंकि उन्हें पता है कि वह ऊँची कीमत पर अपनी निकृष्ट वस्तुओं को अपने देश में बेच सकते हैं।

प्रश्न 12.
सार्वजनिक उपक्रमों के औचित्य में कई तर्क दिये जाते हैं। कोई चार तर्क लिखें।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रमों के औचित्य में तर्क (Rational of Public Sector):

  1. सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना लाभ के उद्देश्य से नहीं अपितु जनकल्याण हेतु की जाती है।
  2. इन उपक्रमों में कर्मचारियों की हितों की रक्षा की जाती है।
  3. ये उपक्रम कर्मचारियों को आवास तथा यातायात की सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं।
  4. ये उपक्रम क्षेत्रीय असमानता को दूर करने का प्रयत्न करते हैं।

प्रश्न 13.
सार्वजनिक संस्थाओं के महत्त्व को दर्शाने वाले किन्हीं दो बिन्दुओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रमों का महत्त्व (Importance of public sector undertakings):
निम्नलिखित बिन्दु सार्वजनिक उपक्रमों के महत्त्व को दर्शाते हैं –

1. सामाजिक न्याय (Social Justice):
सार्वजनिक उपक्रमों में सामाजिक न्याय की प्राप्ति में सहायता मिलती है। इन संस्थाओं के द्वारा अधिकतम संभव मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने का प्रयास किया जाता है। आय की असमानताओं को न्यूनतम किया जाता है तथा राष्ट्रीय आय का वितरण समानता एवं न्याय के आधार पर किया जाता है।

2. क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना (Removing Regional Disparities):
सार्वजमिक उद्योगों के द्वारा क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। इन उद्योगों की स्थापना उन क्षेत्रों में की जाती है जिन क्षेत्रों की निजी उद्योगपतियों द्वारा अवहेलना की जाती है। इसमें उद्योगों की स्थापना इस प्रकार की जाती है कि उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो।

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प्रश्न 14.
एक देश में केवल तीन वस्तुओं का उत्पादन होता है –

  1. दूध
  2. लकड़ी और
  3. कपड़ा। 2005 में इन तीन वस्तुओं का उत्पादन क्रमशः 10,000 लीटर, 20,000 क्विंटल तथा 30,000 मीटर हुआ। इन वस्तुओं की कीमत क्रमशः 8 रुपये प्रति लीटर, 5 रुपये क्विंटल तथा 10 रुपये प्रति मीटर है। इस देश की सकल घरेलू उत्पाद की गणना करें।

उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 4a
अतः देश का. सकल घरेलू उत्पाद 3,80,000 रुपये है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि विकास का संक्षेप में वर्णन करें?
उत्तर:
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि क्षेत्र में होने वाली प्रगति (Progress in Agricultures during First Seven Fiveyear Plans):
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं की समयावधि 1951 से 1990 है। इस समयावधि में कृषि के विकास को उच्च प्राथमिकता दी गई। कृषि विकास में योजनाओं का योगदान दो प्रकार का है-भूमि सुधार तथा तकनीकी सुधार।

1. भूमि सुधार (Land Reforms):
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में अधिकतर कृषकों की स्थिति शोचनीय थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत पश्चात् भारत सरकार ने भूमि सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। भूमि सुधार से अभिप्राय जोतों के स्वामित्व में परिवर्तन से है। अब तक भूमि सुधार में काफी प्रगति की जा चुकी है। भूमि सुधारों में मुख्यतः निम्न को शामिल किया गया –

  • जमींदारों एवम् मध्यस्थों का उन्मूलन
  • जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण
  • चकबंदी
  • काश्तकारी व्यवस्था में सुधार

जमींदारों एवम् मध्यस्थों का उन्मूलन (Abolition of Zamindari System):
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में तीन प्रकार की काश्तकारी प्रथा प्रचलन में थी –

  • जमींदारी प्रथा
  • रैयतवाड़ी प्रथा तथा
  • महालवाड़ी प्रथा।

ये तीनों प्रथाएँ उत्पादन एवम् उत्पादकता के विकास में बाधक थीं तथा सामाजिक व आर्थिक न्याय के दृष्टिकोण से अनुचित थीं। अतः सरकार ने सर्वप्रथम इन्हें समाप्त करने का निर्णय किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् काश्तकारों को भूमि का स्वामी बनाने के लिये तथा मध्यस्थों को समाप्त करने के लिए कदम उठाये गये। बिचौलियों के उन्मूलन से लगभग 200 लाख काश्तकारों का सरकार से सीधा सम्बन्ध हो गया है। अब वे जमींदारों के शोषण से मुक्त हैं। भूमि के स्वामित्व ने उनको अधिक उत्पादन करने की प्रेरणा दी है। परंतु जमींदारी उन्मूलन से सामाजिक न्याय का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं किया जा सका। कानून में कुछ कमियाँ होने के कारण पूर्व जमींदार बड़ी-बड़ी जमीनों के स्वामी बने हुए हैं।

2. जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण (Ceiling of Holdings):
भारत में भूमिहीन श्रमिक काफी संख्या में हैं। हमारे देश में जहाँ एक ओर अधिकांश लोगों के पास खेती के लिये एक बीघा भी भूमि नहीं है, वहाँ दूसरी ओर कुछ गिने-चुने लोग इतनी अधिक भूमि के स्वामी हैं कि उसकी ठीक प्रकार से देखभाल भी नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था में यह आवश्यक हो जाता है कि जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित की जाए ताकि अतिरिक्त भूमि को भूमिहीनों में बाँट कर सामाजिक न्याय की स्थापना की जा सके और अधिक से अधिक लोगों को रोजगार की सुविधायें उपलब्ध कराई जा सकें।

लगभग सभी राज्य सरकारों ने जोतों की अधिकतम सीमा के सम्बन्ध में आवश्यक अधिनियम पारित किये हैं। जोतों की उच्चतम सीमा से अभिप्राय जोत की उस अधिकतम सीमा से है जो कि एक कृषक या एक गृहस्थ अपने अधिकार में रख सकता हैं। इस सीमा से जितनी अधिक भूमि एक व्यक्ति के पास होती है वह सरकारी कब्जे में आ जाती है और सरकार इसका पुनः वितरण भूमिहीन किसानों के बीच कर देती है। अधिकतमत जोत सीमा सम्बन्धी कानूनों के फलस्वरूप 1991-92 के आरम्भ में अनुमानित घोषित अतिरिक्त भूमि का क्षेत्रफल लगभग 8.8 मिलियन हेक्टेयर था।

सरकार के द्वारा प्राप्त किया गया क्षेत्र 3.0 मिलियन हेक्टेयर था तथा वास्तव में वितरित क्षेत्र केवल 1.8 मिलियन हेक्टेयर था। वितरित किया गया क्षेत्र कुल उपलब्ध अतिरिक्त क्षेत्र का दो-तिहाई भाग है। इससे स्पष्ट है कि हमारे देश में भूमि सीमा कानूनों की प्रगति बहुत धीमी है। उच्चतम सीमा के नियमों को लागू करने में कई कठिनाई सामने आईं।

बड़े जमींदारों ने उच्चतम सीमा अधिनियमों को न्यायालयों में चुनौती दी और इस प्रकार इन अधिनियमों को लागू करने में विलम्ब हुआ। इस विलम्ब में बड़े-बड़े जमींदारों ने अपनी भूमियों को अपने निकट सम्बन्धियों के नाम पंजीकृत करा ली और इन अधिनियमों से बच गये। भूमि सुधार ने केरल तथा पश्चिम बंगाल में सफलता प्राप्त की क्योंकि वहाँ की राज्य सरकारें भूमि में सुधार लाने हेतु वचनबद्ध थीं। दुर्भाग्यवश दूसरे राज्यों की सरकारें भूमिहीनों को भूमि देने में रुचि नहीं रखती थीं और आज उन राज्यों में भूमि जोतों में काफी असमानता है।

3. तकनीकी सुधार और हरित क्रांति (Technical Reforms and Green Revolution):
तकनीकी सुधार से अभिप्राय कृषि उत्पादन की विधियों में सुधार करना तथा उन्नत बीजों का प्रयोग करना। कृषि क्षेत्र में उत्पादकता काफी सीमा तक कृषि आदानों (बीज, खाद तथा उर्वरक, सिंचाई सुविधा) एवं उत्पादन की तकनीक पर निर्भर करती है। यदि उन्नत किस्म के कृषि आदानों एवम तकनीक का प्रयोग किया जाये तो कृषि के क्षेत्र में प्रगति की जा सकती है। कृषि आदानों से अभिप्राय उन साधनों से है जिनकी सहायता से कृषि उत्पादन किया जा सकता है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित को शामिल किया जा सकता है-सिंचाई की सुविधाएँ, खाद एवम् उर्वरक, कृषि मशीनी आदि।

स्वतंत्रता के समय देश 75% लोग कृषि पर निर्भर करते थे और कृषि पिछड़ी हुई अवस्था में थी। कृषि के पिछड़ेपन के मुख्य कारण कृषि उत्पादन के पुराने तरीकों को अपनाना, सिंचाई सुविधाओं का अभाव। भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर थी और यदि मानसून की वर्षा अपर्याप्त होती थी तो किसानों पर संकट के बादल मंडरा जाते थे, क्योंकि सिंचाई सुविधाओं का अभाव था। औपनिवेशकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन (slagnat) थी। इस गतिहीनता को स्थायी रूप से हरित क्रांति (Green Revolution) द्वारा तोड़ा गया। हरित क्रांति से अभिप्राय उत्पादन की तकनीक को सुधारने एवम् कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि करने से है।

हरित क्रांति की दो मुख्य विशेषतायें थीं –
1. उत्पादन की तकनीक को सुधारना तथा

2. उत्पादन में वृद्धि करना। इस संदर्भ में स्व. श्रीमती इंदिरा गाँधी ने लिखा था, “हरित क्रांति का आशय यह नहीं है कि खेतों में मेड़बंदी करवा कर फावड़े, तगारी, गेंती, हल, बक्खर इत्यादि उपयोगी कृषि के साधन प्राप्त करके कृषि की जाये अपितु इन साधनों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि करना है।”

इस क्रांति का मुख्य आधार नवीन व उच्च उत्पादन वाली वस्तुओं का प्रयोग है जिससे कृषक तीन से चार गुने अधिक तक उत्पादन कर सकता है। हल के स्थान पर ट्रैक्टर से जुताई करने, मानसून पर निर्भर न रह कर ट्यूबवेलों से सिंचाई की व्यवस्था करने तथा उपज को जानवरों के पैरों से अलग न करा कर थ्रेशर मशीन का प्रयोग करने, उन्नत बीजों तथा अच्छी रासायनिक खादों का प्रयोग कर तथा उचित समय पर पानी देने से कृषि उत्पाद में वृद्धि हुई। इसे ही हरित क्रांति कहते हैं।

हरित क्रांति का देश के कृषि क्षेत्र पर अच्छा प्रभाव पड़ा। इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन बढ़ कर तीन गुने से भी अधिक हो गया। हरित क्रांति से पूर्व देश को भारी मात्रा में खाद्यान्नों का आयात करना पड़ता था परंतु अब भारत इस क्षेत्र में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। हरित क्रांति से कृषि आय में वृद्धि हुई परंतु इस क्रांति की कुछ कमियाँ भी थीं जो मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं –

  1. हरित क्रांति मुख्य रूप से गेहूँ, ज्वार, बाजार तक ही सीमित है। फसलों जैसे पटसन और कपास आदि के उत्पादन में केवल सीमित वृद्धि हुई है।
  2. खाद्यान्नों में वृद्धि पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश तथा तमिलनाडु में ही हुई।

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प्रश्न 2.
पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य (Goals of Five Year Plans):
पंचवर्षीय योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

1. संवृद्धि (Growth):
संवृद्धि से अभिप्राय एक देश में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में देश की क्षमता में वृद्धि है। दूसरे शब्दों में देश में यातायात, बैंकिंग आदि सेवाओं का विस्तार करना। उत्पादक पूँजी की कार्यकुशलता में वृद्धि करना, उत्पादन पूँजी के स्टॉक में वृद्धि करना। आर्थिक विकास का अच्छा संकेतक सकल घरेलू उत्पादन में निरंतर वृद्धि है।

सकल घरेलू उत्पाद से अभिप्राय एक देश में उत्पादित वस्तुओं तथा सवाओं के बाजार मूल्य से है। वस्तुओं तथा सेवाएँ के उत्पाद में वृद्धि होने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी और देशवासियों को अधिक मात्रा में सेवाएँ और वस्तुएँ उपलब्ध होंगी। संवृद्धि में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। यदि हम यह चाहते हैं कि देशवासियों का जीवन स्तर ऊँचा हो, उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त हों तो हमें देश में अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करना पड़ेगा।

2. आधुनिकीकरण (Modernisation):
देश में वस्तुओं और सेवाओं का अधिक उत्पादन करने के लिए हमें उत्पादन की नई तकनीकी अपनानी होगी। उदाहरण के लिये एक किसान खेती में अधिक उत्पादन कर सकेगा यदि वह पुराने बीजों के साथ उन्नत किस्म के बीज का प्रयोग करे। इसी प्रकार नई किस्म के मशीन के प्रयोग से एक फैक्टरी अधिक उत्पादन कर सकन्नी है।

नई तकनीक के अपनाने को ही आधुनिकीकरण कहते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आधुनिकीकरण से अभिप्राय न केवल नई तकनीकों को अपनाना है अपितु सामाजिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन लाना है। सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन में अभिप्राय स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देना, उन्हें घर की चारदीवारी में न बांधना। उन्हें भी कार्यस्थल पर (बैंकों, कारखानों, स्कूलों आदि में) अपनी योग्यता का सुअवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

3. आत्मनिर्भरता (Self-reliance):
पंचवर्षीय योजनाओं का एक लक्ष्य भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। आत्मनिर्भरता से अभिप्राय उन वस्तुओं का आयात न करना जिन वस्तुओं का अपने देश में उत्पादन किया जा सकता है। आत्मनिर्भरता की नीति को पंचवर्षीय योजनाओं में इसलिये महत्त्व दिया जाये ताकि विदेशों पर निर्भरता को कम किया जा सके।

4. न्याय (Equity):
एक देश के निवासियों के जीवन स्तर में सुधार केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता से नहीं आ सकता। यह सम्भव है कि एक देश में संवृद्धि अधिक ऊँची हैं, देश में उच्च तकनीक है और फिर भी अधिकांश लोग निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहे हों। आर्थिक समृद्धि का लाभ केवल धनी वर्ग को ही नहीं मिलना चाहिये अपितु निर्धन वर्ग को भी उससे लाभ होना चाहिये। अतः संवृद्धि, आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता के साथ-साथ समानता (न्याय) भी आवश्यक है। प्रत्येक भारतवासी को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये समर्थ होना चाहिये।

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प्रश्न 3.
एक अर्थव्यवस्था की कौन-सी समस्या है? विस्तारपूर्वक समझाएँ?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्याएँ (Main problems of an economy):
एक अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

1. किन वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में (Which commodities are to be produced and in what quantity):
प्रत्येक अर्थव्यवस्था की सबसे पहली समस्या यह है कि कौन-सी वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन किया जाए जिससे लोगों की अधिकतम आवश्यकताओं को संतुष्टि किया जा सके। इस समस्या के उत्पन्न होने का मुख्य कारण आवश्यकताओं की तुलना में साधन सीमित होना है। प्रत्येक अर्थव्यवस्था को यह चुनाव करना पड़ता है कि किन आवश्यकताओं को संतुष्ट किया जाए तथा किनका त्याग किया जाए।

इस विषय में दो बातें तय करनी पड़ती हैं –

  • यह तो यह निर्णय लेना पड़ता है कि कौन-सी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाए। अर्थात् क्या उपभोक्ता वस्तुएँ, पूँजीगत वस्तुएँ, युद्धकालीन वस्तुएँ या शांतिकालीन वस्तुओं का उत्पादन किया जाए।
  • जब एक अर्थव्यवस्था यह तय कर लेती है कि कौन-सी वस्तु का उत्पादन करना है तो उसे यह भी निर्णय लेना पड़ता है कि उपभोक्ता वस्तुओं का कितना उत्पादन किया जाए पूँजीगत वस्तुओं का कितना उत्पादन किया जाए। उत्पादक उन्हीं वस्तुओं का तथा उतनी ही मात्रा में उत्पादन करते हैं जिनसे उन्हें अधिकतम लाभ प्राप्त होता है।

2. वस्तुओं का उत्पादन किस प्रकार किया जाए (How to Produce):
एक अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या है वस्तुओं का उत्पादन कैसे किया जाए। इस समस्या का संबंध उत्पादन की तकनीक का चुनाव करने से है। इसमें उत्पादन की कई तकनीकों को अपनाया जा सकता है। जैसे –

श्रम प्रधान तकनीक (Labour intensive technique):
इस तकनीक में श्रम का उपयोग पूँजी की तुलना में अधिक किया जाता है।

श्रम प्रधान तकनीक (Labour intensive technique):
इस तकनीक में श्रम का उपयोग पूँजी की तुलना में अधिक किया जाता है। एक अर्थव्यवस्था को यह तय करना पड़ता है कि वह कौन-सी तकनीक का प्रयोग किस उद्योग में करे जिससे उत्पादन अधिक कुशलतापूर्वक किया जा सके। किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन की कौन-सी तकनीक अपनाई जाए, यह साधनों की उपलब्धता तथा उनके सापेक्षिक मूल्यों पर निर्भर करेगा।

3. उत्पादन किसके लिए किया जाए (For whom to Produce):
एक अर्थव्यवस्था को यह भी निर्धारित करना पड़ता है कि उत्पादन किसके लिये किया जाए। उत्पादन एवं उपभोग या बाजार में विनिमय के लिए किया जाता है। इसके मुख्य दो पहलू हैं –

  • प्रथम पहलू का संबंध व्यक्तिगत वितरण से है। इसका अभिप्राय यह है कि उत्पादन का समाज के विभिन्न व्यक्तियों तथा परिवारों में किस प्रकार वितरण किया जाए।
  • वितरण की समस्या का एक दूसरा पहलू कार्यात्मक वितरण है। इसका संबंध यह ज्ञात करने से है उत्पादन के विभिन्न साधनों अर्थात् भूमि, श्रम, पूँजी तथा उद्यम में उत्पादन का बँटवारा कैसे हो।

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प्रश्न 4.
क्या सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का सामाजिक दायित्व लाभ-उपार्जन से अधिक आवश्यक है?
उत्तर:
भारत में औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 तथा औद्योगिक अधिनियम 1951 को क्रियान्वित करने के फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र का प्रादुर्भाव हुआ। औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 तथा औद्योगिक अधिनियम 1951 में सार्वजनिक एवम् निजी क्षेत्र के कार्यों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। क्षेत्रों के स्पष्ट विभाजन के बाद से ही सार्वजनिक क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ।

आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामाजिक क्षेत्र, सामाजिक मूल्यों तथा व्यापक हित के विचार को महत्त्व देता है। बड़ी-बड़ी सार्वजनिक कल्याण संस्थाओं की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र में ही संभव है क्योंकि निजी क्षेत्र इतना बड़ा निवेश करने का साहस नहीं करता। सार्वजनिक क्षेत्र का दायित्व सामाजिक है। यह लाभ कमाने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। सामाजिक दायित्व में निम्नलिखित दायित्व सम्मिलित हैं –

  1. समाज को रोजगार देना।
  2. बीमार (रुग्न) उद्योगों को स्वस्थ बनाना।
  3. एकाधिकार प्रवृत्ति को रोकना।
  4. आय की असमानता को कम करना।
  5. धन तथा सम्पत्ति का उचित वितरण करना।
  6. व्यापारिक शोषण समाप्त करना तथा।
  7. वस्तुओं की कमी को दूर करना।

यदि इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये सार्वजनिक उपक्रमों को हानि भी हो तो भी उन्हें सामाजिक दायित्वों को निभाना चाहिये।

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प्रश्न 5.
पंचवर्षीय योजना के उद्देश्य के रूप में समानता या न्याय से क्या अभिप्राय है? क्या हम पंचवर्षीय योजना के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए हैं? कारण सहित उत्तर दें।
उत्तर:
न्याय या समानता (Equity):
नियोजन का एक प्रमुख लक्ष्य न्याय की प्राप्ति है। राज्य के नीति निर्देशक तत्व संविधान के आवश्यक तत्त्व हैं। उनमें यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि सरकार एक ऐसी व्यवस्था उत्पन्न करने का प्रयत्न करेगी जिसमें आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक न्याय सभी को उपलब्ध होगा। दूसरे भारत में यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि यहाँ समाजवादी ढंग से समाज की रचना करनी है। इन मौलिक बातों को ध्यान में रखकर सभी योजनाओं का यह प्रमुख लक्ष्य रहा है कि –

1. आय की विषमता को कम किया जाये।

2. बेकारी और निर्धनता को दूर किया जाये।

3. आर्थिक सत्ता के केन्द्रीयकरण को कम किया जाये जिससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले तथा।

4. लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाये रखा जाये। केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता से लोगों का जीवनस्तर सुधार नहीं सकता जब तक आर्थिक समृद्धि का फल निर्धन व्यक्तियों को नहीं प्राप्त होता। ऐसी अवस्था में तो अमीर और अधिक अमीर होते जायेंगे तथा गरीब और अधिक निर्धन हो जायेंगे। इस तरह अमीरों तथा गरीबों के बीच में अंतर बढ़ता जायेगा।

अतः आर्थिक समृद्धि के साथ आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता के साथ-साथ न्याय (सामाजिक तथा आर्थिक) का भी महत्व है। प्रत्येक भारतीय नागरिक को इस योग्य बनाना है कि वह भोजन, आवास, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। इसके अतिरिक्त सम्पत्ति के असमान वितरण को भी घटाया जाना चाहिये।

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उस समय नगरों तथा ग्रामों में आर्थिक, असमानता थी। भारत में जमींदारी प्रथा थी। जमींदार बड़ी-बड़ी भू-जोतों के स्वामी थे। वे काश्त करने के लिए काश्तकारों को जमीन देते थे और मनमाना भूमि का किराया लेते थे। काश्तकार उनकी दया पर निर्भर करते थे। जमींदार जब भी चाहें उनको बेदखल कर देते थे। किसान लोग अति निर्धन थे, ऋणगस्त थे।

कहा जाता था कि किसान ऋण में पैदा होता है, ऋण में रहता है और ऋण में मरता है। इसके विपरीत जमींदार ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें हर प्रकार सुविधाएँ प्राप्त थीं। इस तरह गाँवों में आर्थिक तथा सामाजिक विषमता व्याप्त थीं। ग्राम में आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए योजना काल में कई भूमि सुधार किए गये। कृषि उत्पादन में वृद्धि और सामाजिक न्याय के लिये कृषि में किये गये संस्थागत परिवर्तनों को भूमि सुधार कहते हैं। ये कृषि जोतों को पुनर्गठित कर तथा भूमि के स्वामित्त्व करके किये जाते हैं।

भूमि सुधारों के दो मुख्य उद्देश्य हैं –

  1. कृषि विकास अर्थात् कृषि में वृद्धि तथा
  2. सामाजिक न्याय अर्थात् मध्यस्थों द्वारा काश्तकारों की समाप्ति और भूमि के जोतने वालों को भूमि का स्वामी बनाना

भारत में भूमि-सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। जैसे जमींदारों (मध्यस्थों): का उन्मूलन, काश्तकारी व्यवस्था में सुधार, जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना, चकबंदी, सहकारी खेती आदि। भारत के भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की गति काफी धीमी रही इस कारण इनके परिणाम संतोषजनक नहीं रहे हैं। प्रो. दान्तवाला ने कहा है कि, “अब तक भारत में जो भूमि सुधार हुए हैं या निकट भविष्य में होने वाले हैं, वे सभी सही दिशा में हैं लेकिन लियान्वयन के अभाव में इनके परिणाम संतोषजनक नहीं रहे हैं।”

शहरों में भी आय तथा सम्पत्ति का असमान वितरण है। भारत जैसे पिछड़े देशों में आय को असमानता गरीबी की संख्या को बढ़ाने में हवन में आहुति की तरह काम करती है। पंचवर्षीय योजनाओं में आय की अंसमानता को दूर करने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाये गये हैं।

  1. सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार किया गया है।
  2. औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति अपनाया गया है।
  3. लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किये गये हैं।
  4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अपनाय गया है।
  5. बीस सूत्री कार्यक्रम अपनाया गया है।
  6. कई राज्यों में बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था की गई है।
  7. स्वरोजगार को प्रोत्साहन दिया गया है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि योजनाओं में अपनाई गई नीतियों के परिणामस्वरूप आय की विषमताएँ कम होने के बजाय बढ़ी हैं। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में जितनी आय अर्जित हुई उसका एक बड़ा भाग कुछ औद्योगिक घरानों के पास ही केन्द्रित रह गया तथा सामान्य जनता तक उसका लाभ बहुत मात्रा में नहीं पहुँचा। अन्य शब्दों में विभिन्न योजनाओं में अपनाये गये विभिन्न विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में आय की मात्रा में वृद्धि। तो हुई है किन्तु इसका समान बंटवारा नहीं हुआ है।

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प्रश्न 6.
आर्थिक नियोजन के कई लक्ष्य हैं। उनमें एक लक्ष्य आत्मनिर्भरता है। आत्मनिर्भरता के लिये भारत में क्या प्रयल किये गये हैं और उसमें हम कहाँ तक सफल हुए हैं?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता-पंचवर्षीय नियोजनों का एक लक्ष्य (Self Reliance-Goal of Five year Plans):
पंचवर्षीय योजनाओं के कई लक्ष्य हैं। उनमें से एक लक्ष्य आत्मनिर्भरता है। आत्मनिर्भरता से अभिप्राय उन वस्तुओं के आयात से बचना है जिनका उत्पादन स्वयं देश में किया जा सकता है। लगभग 200 वर्षों की परतंत्रता के पश्चात् भारत 15 अगस्त, 1947: को स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के समय हम अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिये विदेशों पर। निर्भर थे। उस समय खाद्यान्न की कमी थी और इस कमी को पूरा करने के लिये हमें काफी मात्रा में खाद्यान्नों का आयात करना पड़ा।

देश में भारी और आधारभूत उद्योग लगभग नहीं के बराबर थे और इस कारण पूँजीगत वस्तुओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अतः भारत को दूसरे देशों की निर्भरता (विशेषकर खाद्यान्नों के लिये) कम करने के लिए आत्मनिर्भरता की नीति को आवश्यक समझा गया। हमें यह डर था कि कहीं आयात खाद्यान्न, विदेशी तकनीकी तथा विदेशी पूँजी पर हमारी निर्भरता से हमारी नीतियों पर विदेशी हस्तक्षेप करना न आरम्भ कर दें। अतः हमने आत्मनिर्भरता की नीति को अपनाया।

योजनाओं के आरम्भ में ही आत्मनिर्भरता की बात कही गई परंतु तीसरी योजना में इस पर विशेष बल दिया गया। पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में तो विदेशी सहायता पर निर्भरता को न्यूनतम करने की बात कही गई। भारत में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य प्राप्त करने के कई प्रत्यन किये गये। कृषि में उत्पादकता को बढ़ाने के कई भूमि सुधार किये गये। जमींदारी प्रथा उन्मूलन के लिये कानून बनाये गये। काश्तकारों को भूमि का स्वामी बनाया गया।

भमि की उच्चतम सीमा निर्धारित की गई। हरित क्रांति द्वारा कृषि उत्पादों में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप 1960 में भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया। भारत में खाद्यान्नों का एक विपुल भण्डार भी बनाया जा चुका है। अब हमें (कुछ अपवादों को छोड़कर) खाद्यान्नों के आयात की आवश्यकता नहीं है, परंतु खादों तथा रासायनिक पदार्थों का अब भी हमें भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है। देश में उद्योगों को विकसित करने के लिए भी कई प्रयत्न किये गये हैं। दूसरी पंचवर्षीय योजना में उद्यमों को मुख्य रूप से प्रधानता दी गई ताकि औद्योगिक प्रगति की नींव रखी जा सके। सातवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि में औद्योगिक विकास की दिशा में अनेक आधारभूत परिवर्तन हुए हैं जिससे देश में आर्थिक विकास को बल मिला।

पूँजीगत वस्तुओं एवं उपभोक्ता वस्तुओं दोनों के उत्पादन में विकास की समान महत्त्व दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ। उपभोग उद्योगों के सम्बन्ध में देश लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। उद्योगों का विविधीकरण तथा आधुनिकीकरण किया गया। औद्योगिक उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। लघु उद्योगों के विकास के लिये प्रयत्न किये गये।

उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देने के लिए संरक्षण तथा कोटा की नीति अपनाई गई। पहली पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक क्षेत्र में उपलब्धियाँ वास्तव में प्रभावशाली रहीं। इस काल में औद्योगिक क्षेत्र में 6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि प्रशंसनीय है। दूसरे योजनाकाल के आरम्भ में आयात प्रतिस्थापन के लिये सब प्रकार के उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया। इतना होने पर भी हम अभी तक औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं।

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प्रश्न 7.
औद्योगिक नीति 1956 ने भारत के उद्योगों को कितनी श्रेणियों में बाँटा? इन वर्गों में किन उद्योगों को रखा गया?
उत्तर:
उद्योगों का वर्गीकरण (Classification of Industries):
औद्योगिक नीति 1956 के अनुसार भारतीय उद्योगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया –

  1. प्रथम वर्ग
  2. द्वितीय वर्ग तथा
  3. तृतीय वर्ग

1. प्रथम श्रेणी (First Category):
प्रथम श्रेणी में युद्ध सामग्री का निर्माण, परमाणु शक्ति के उत्पादन एवम् नियंत्रण, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, रेल यातायात तथा डाकघर को रखा गया। इनके स्वामित्व और प्रबंध तथा स्थापना एवं विकास का दायित्व पूर्ण रूप से केन्द्रीय सरकार को सौंपा गया।

2. द्वितीय श्रेणी (Second Category):
इस श्रेणी में वे उद्योग रखे गये जिनके विकास में सरकार अधिक भाग लेगी। 12 उद्योगों को इस श्रेणी में रखा गया जैसे-औजार, मशीन, दवाइयाँ, रासायनिक खाद, रबड़, जल यातायात, सड़क यातायात आदि। भाविष्य में इस श्रेणी उद्योगों की स्थापना सरकारी क्षेत्र में ही की जायेगी।

3. तृतीय श्रेणी (Third Category):
इस श्रेणी में उन सभी उद्योगों को रखा गया जो निजी क्षेत्र के लिये सुरक्षित रहेंगे। इनका विकास निजी क्षेत्र की प्रेरणा से हागा किन्तु इस श्रेणी में भी राज्य नये उद्योगों की स्थापना कर सकता है।

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प्रश्न 8.
भारत में औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के क्या प्रमुख उद्देश्य रहे हैं?
उत्तर:
भारत में औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के प्रमुख उद्देश्य (Main Objectives of Industrial Licensing):
भारत में औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. विभिन्न योजनाओं के लक्ष्यों के अनुसार औद्योगिक निवेश तथा उत्पादन को विकसित एवं नियंत्रित करना।
  2. छोटे और लघु उद्यमों को प्रोत्साहन देना तथा उन्हें संरक्षण प्रदान करना।
  3. औद्योगिक स्वामित्व के रूप में आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकना।
  4. आर्थिक विकास के क्षेत्र में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना तथा समुचित संतुलित औरद्योगिक विकास के लिये प्रेरित करना।

प्रश्न 9.
व्यापार नीतियों के औद्योगिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
व्यापार नीतियों का औद्योगिक विकास, पर प्रभाव (Effect of tradepolicies on industrial development):
प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत भारत के औद्योगिक क्षेत्र की उपलब्धियाँ बहुत ही प्रभावशाली रहीं। 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 11.8 प्रतिशत था जो कि 1990-91 में बढ़कर 24.6 प्रतिशत हो गया। सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी में वृद्धि विकास का संकेतक है। भारत का उद्योग क्षेत्र अब केवल सूती उद्योग और पटसन तक ही सीमित नहीं रह गया था। 1990 तक इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के कारण विविधता आ गई।

सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ औद्योगिक इकाइयाँ थीं-चितरंजन डीजल लोकोमोटिव वर्क्स, इन्टेगरल कोच फैक्टरी, हिन्दुस्तान शिपयार्ड, इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन आदि। प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में सार्वजनिक प्रतिष्ठानों ने आश्चर्यजनक प्रगति की है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के आरम्भ होने के समय अर्थात 1950 में भारत में केन्द्रीय सरकार के अधीन केवल 5 प्रतिष्ठान थे जिनमें 29 करोड़ रुपये की पूँजी का निवेश किया गया था इसके मुकाबले इनकी संख्या बढ़कर 7 वीं योजना के अन्त में 244 हो गई थी जिसमें 1,06,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश हो चुका था। लघु उद्योगों के विकास ने उन व्यवसायियों को व्यवसाय चलाये जाने का सुअवसर प्रदान किया जिनके पास बड़े-बड़े उद्योग चलाने की पूँजी नहीं थी। विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण ने घरेलू उद्योगों को विकसित होने का सुअवसर प्रदान किया।

भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के योगदान होने पर भी कुछ अर्थशास्त्री सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की उपलब्धियों की आलोचना करते हैं। उनका विचार है कि आरम्भ में सार्वजनिक उपक्रमों की बहुत ही आवश्यकता थी और इन उपक्रमों ने सकल घरेलू उत्पाद में काफी योगदान दिया है। परंतु अब अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, अकुशलता, भ्रष्टाचार, मितव्ययता, लालफीताशाही आदि व्याप्त हैं, जिनके फलस्वरूप वे उपक्रम घाटे में चल रहे हैं। कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अपने उत्पादों का मनमाना मूल्य निर्धारित करते हैं और उपभोक्ता का शोषण करते हैं जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का उद्देश्य जन कल्याण है न कि जनता का शोषण।

इनमें उत्पाद की गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। परंतु इन कारणों से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को समाप्त नहीं किया जाना चाहिये। इनमें कुशलता लाई जानी चाहिये। भ्रष्टाचार, अकुशल तथा कामचोर कर्मचारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही की जानी चाहिये। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवम् सेवाओं का मूल्य निर्धारित करने के लिये मूल्य बोर्ड का गठन किया जाना चाहिये । इतना होने पर भी यदि कोई सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम घाटे में चल रहा है तो उसे बंद नहीं करना चाहिये क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना नहीं है, अपितु जनकल्याण है। इसके अतिरिक्त इस बात की क्या गारंटी है कि उस उपक्रम में लाभ होगा यदि वह उपक्रम निजी क्षेत्र में चलाया जाये निजी क्षेत्र के उपक्रम भी तो घाटे में चलते हैं।

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प्रश्न 10.
भारत में व्यापार नीति पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारत की व्यापार नीति (Trade Policy of India):
व्यापार नीति को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –
1. बाह्य उन्मुख नीति (Outward looking Policy) तथा

2. अन्तर्मुख नीति (Inward looking Policy)। बाह्य उन्मुख नीति निर्यात संवर्धन पर जोर देती है जबकि अन्तर्मुख नीति आयात प्रतिस्थापन पर। हमारे देश की प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में हमारी व्यापार नीति अन्तर्मुखी (Inward looking) रही है। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि व्यापार की अन्तर्मुखी नीति आयात प्रतिस्थापन पर जोर देती है। हमारी प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में आयात प्रतिस्थापन पर अधिक बल दिया गया है। आयात प्रतिस्थापन का अर्थ है कि आयात की जाने वाले वस्तुओं का घरेलू (देशी) उत्पादन द्वारा प्रतिस्थापन करना।

उदाहरण के लिये परिवहन के साधनों को दूसरे देशों से आयात करने के स्थान पर अपने देश में उनका निर्माण करना। जिन देशों में आयात प्रतिस्थापन की नीति को अपनाया जाता है वहाँ घरेलू उद्योगों को अत्यधिक संरक्षण प्रदान किया जाता है। आयातों व विदेशी निवेश पर कड़े नियंत्रण रखे जाते हैं। आयात से संरक्षण दो तरीकों से किया जा सकता है –

2. टैरिफ (Tariffs) एवं कोटा (Quotas)। आयात की जाने वाली वस्तुएँ महंगी हो जाती हैं और इससे उनके उपयोग को हतोत्साहित किया जाता है। कोटे से यह निर्धारित किया जाता है कि कोई विशेष वस्तु कितनी मात्रा में दूसरे देशों से मंगवाई जा सकती है। टैरिफ और कोटे से आयात पर प्रतिबंध लग जाता है और विदेशी प्रतियोगिता से घरेलू फर्मों को संरक्षण प्राप्त होता है। संरक्षण की नीति इस अवधारणा पर आधारित होती है कि विकसित देश के उद्योग अधिक विकसित देशों में उत्पादित वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसी मान्यता है कि यदि घरेलू उद्योगों को संरक्षण किया जाता है तो कुछ समय के पश्चात् वे विदेशी उद्योगों से मुकाबला करने में समर्थ जो जाते हैं।

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प्रश्न 11.
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विभिन्न उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विभिन्न उद्देश्य (Various Objective of Public Sector in India):
भारत में सार्वजनिक उपक्रमों को विभिन्न उद्देश्यों के लिये स्थापित किया गया है। भिन्न-भिन्न उपक्रमों के भिन्न-भिन्न उद्देश्य हैं। इन सभी उद्देश्यों को चार शीर्षकों में विभाजित किया गया है –
1. राष्ट्रीय उद्देश्य (National Objectives):
बहुत से सार्वजनिक उपक्रम राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रख कर स्थापित किये गये हैं। जैसे-राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु शक्ति आदि।

2. सामाजिक उद्देश्य (Economic objectives):
भारत में सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना के कुछ मुख्य उद्देश्य सामाजिक भी हैं जो इस प्रकार हैं –

  • समाज को रोजगार देना
  • बीमार उद्योगों को स्वस्थ बनाना
  • एकाधिकार प्रवृत्ति को रोकना
  • आय की असमानता को कम करना
  • उचित वितरण
  • व्यापारिक शोषण समाप्त करना
  • वस्तुओं की कमी को दूर करना

3. आर्थिक उद्देश्य (Economic Objectives):
कुछ सार्वजनिक उपक्रम आर्थिक उद्देश्य से प्रेरित होकर भी स्थापित किये गये हैं। जैसे –

  • योजनाबद्ध विकास करना
  • संतुलित क्षेत्रीय विकास करना
  • भावी विकास हेतु वित्तीय साधन जुटाना
  • विकास दर में वृद्धि करना
  • निर्यात में वृद्धि करना
  • आधारभूत उद्योगों का विकास करना

4. अन्य उद्देश्य (Other Objectives):

  • निजी उपक्रमों की स्थापना करना
  • तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना
  • लघु तथा कुटीर उद्योगों की सहायता करना

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प्रश्न 12.
महालनोबिस के जीवन तथा उपलब्धियों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
महालनोबिस की उपलब्धियाँ (Achievements of Mahalanobis):
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में पहली पंचवर्षीय योजना का सूत्रपात 1951 में हुआ था। इस योजना में कृषि को बहुत महत्त्व दिया गया था। परंतु वास्तव में भारत में योजना का वास्तविक रूप में आरम्भ द्वितीय पंचवर्षीय योजना से हुआ था। द्वितीय पंचवर्षीय योजना में ही भारतीय योजना के उद्देश्य के विषय में वास्तविक विचारों का उल्लेख किया गया था और वह दूसरी पंचवर्षीय योजना महालनोबिस के विचारों पर आधारित थी। इस दृष्टिकोण से उन्हें भारतीय योजना का निर्माता कहा जा सकता है।

महालनोबिस का जन्म 1893 में कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई, प्रेसीडेंसी कॉलेज (Presidency College) तथा इंगलैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (Cambridge University) में की। उन्होंने सांख्यिकी (Statistics) के विषय में इतना अधिक योगदान दिया कि उनकी विश्व में प्रसिद्ध हो गई और उन्हें 1946 में Britian’s Royal Society का सदस्य बना लिया गया। उन्होंने कोलकाता में भारतीय सांख्यिकीय ‘संस्था’ (Indian Statistical Institute) की स्थापना की और सांख्य (Snakhya) नाम की एक पत्रिका (Journal) शुरू की।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 6
दूसरी पंचवर्षीय योजना में उन्होंने भारत तथा विश्व के विख्यात अर्थशास्त्रियों को आमंत्रित किया ताकि वे उन्हें भारत के आर्थिक विकास के बारे में परामर्श दे सके। वे भारत को आर्थिक विकास के पथ पर डालने के लिये सर्वदा स्मरणीय रहेंगे।

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प्रश्न 13.
भू-धारण प्रणाली से क्या अभिप्राय है? स्वतंत्रता के समय भारत में कितने प्रकार की भू-स्वामित्व प्रणालियाँ अस्तित्व में थीं? प्रत्येक प्रणाली का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भू-धारण प्रणाली (Land Tenure System):
सरकार के प्रति काश्तकारों के कर्त्तव्यों तथा अधिकारों के निर्धारण और वर्णन को भू-धारण प्रणाली कहते हैं। स्वतंत्रता के समय भारत में तीन भू-धारण प्रणालियाँ प्रचलित थीं –

  1. जमींदारी प्रथा
  2. महालवाड़ी प्रथा, तथा
  3. रैयतवाड़ी प्रथा

1. जमींदारी प्रथा (ZamindariSystem):
इस प्रणाली का आरम्भ लार्ड कार्नवालिस ने 1971 में बंगाल में स्थायी बंदोस्त चलाकर किया था। इसके अनुसार कुछ किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया गया जो वास्तव में पहले मालगुजारी एकत्रित करने वाले सरकारी कर्मचारी थे। इन नये भू-स्वामियों ने अधिकांश भूमि पट्टे पर काश्तकारों को दी और वे उसका मनमाना लगान प्राप्त करते थे। ये जमींदार अब काश्तकारों तथा सरकार के बीच में मध्यस्थ (बिचौलिये) बन गये। वे स्वयं काश्तकारी नहीं करते थे। उनका मुख्य कार्य काश्तकारों से मनचाहा लगान वसूलना होता था।

वे सरकार को एक निश्चित मालगुजारी देते थे। वे देश के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नाम से जाने जाते थे। ये जमींदार भूमि के विकास की ओर कोई ध्यान देते थे। काश्तकार भी भूमि में कोई सुधार नहीं लाते थे क्योंकि उन्हें भूमि से कभी भी बेदखल किया जा सकता था। जमींदार काश्तकारों से न केवल लगान वसूल करते थे अपितु अन्य गैर-कानूनी कर भी लगाते थे, जिसके परिणामस्वरूप यह प्रणाली कृषि तथा देश की उन्नति में निश्चित रूप से बाधक सिद्ध हुई। इस प्रथा के फलस्वरूप आर्थिक दृष्टि से किसान कंगाल तथा ऋणगस्त हो गये। सामाजिक दृष्टि से वे दास की अवस्था में आ गये।

स्वतंत्रता के पश्चात् इस प्रथा का उन्मूलन करने के लिये सरकार द्वारा कई कानून पास किये गये। इस सम्बन्ध में सबसे पहले अधिनियम 1943 में मद्रास (चेन्नई) में पारित किया गया। 1955 तक लगभग सभी राज्यों में ऐसे अधिनियम पारित किये जा चुके थे। कई राज्यों में मध्यस्थों की और से इन कानूनों को चुनौती दी गई जिन्हें 1951 के संविधान में संशोधन के द्वारा दूर करना पड़ा। भू-धारण की इस प्रणाली के उन्मूलन से लगभग दो करोड़ काश्तकारों का सरकार से प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो गया है।

2. महालवाड़ी प्रथा (Mahalwari System):
भू-धारण की इस प्रणाली (प्रथा) के अन्तर्गत सारी भूमि ग्राम समुदाय की होती है ग्राम समुदाय के सदस्य व्यक्तिगत और सामूहिक रूपों में लगान के भुगतान के लिये उत्तरदायी होते हैं। भू-धारण की यह प्रणाली 1863 में शुरू हुई थी और देश के कुछ क्षेत्रों में जैसे आगरा, अवध और पंजाब के कुछ भागों में प्रचलित थी। यद्यपि आरम्भ में भूमि का स्वामित्व सामूहिक था परंतु समय के साथ-साथ काश्तकार अपनी भूमि के लगान. के लिये व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी समझा जाने लगा।

3. रैयतवाड़ी प्रथा (RayatwariSystem):
यह प्रथा हमारे देश में सबसे अधिक जानी जाती है। इस प्रथा के अन्तर्गत भूमि पर काश्तकारों का अलग-अलग वैयक्तिक स्वामित्व होता है। ये सभी भू-स्वामी (काश्तकार) व्यक्तिगत रूप से राज्य को लगान देने के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस प्रथा के अन्तर्गत काश्तकारों और राज्य के बीच किसी भी प्रकार का कोई मध्यस्थता नहीं है। यह प्रथा आरम्भ में मद्रास में लागू की गई और बाद में ब्रिटिश भारत के अधिकतर प्रदेशों बम्बई, बिहार और मद्रास में की गई।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन योजना आयोग का अध्यक्ष है?
(a) वितमंत्री
(b) योजना मंत्री
(c) प्रधानमंत्री
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) प्रधानमंत्री

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प्रश्न 2.
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में किस आर्थिक प्रणाली को अपनाया गया?
(a) पूंजीवादी
(b) मिश्रित
(c) समाजवादी
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) मिश्रित

प्रश्न 3.
किस आर्थिक प्रणाली में उत्पादन के सभी साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है?
(a) समाजवादी
(b) मिश्रित
(c) पूँजीवादी
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) पूँजीवादी

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प्रश्न 4.
ब्रिटीशकाल मुख्यतः कितनी भू-धारण प्रणालीयाँ थीं?
(a) दो
(b) तीन
(c) एक
(d) चार
उत्तर:
(b) तीन

प्रश्न 5.
जमींदार प्रथा के उन्मूलन से कितने काश्तकारों का सरकार से प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो गया?
(a) 300 लाख
(b) 200 लाख
(c) 250 लाख
(d) 350 लाख
उत्तर:
(b) 200 लाख

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प्रश्न 6.
1990 में देश का लगभग कितना प्रतिशत भाग कृषि कार्य में कार्यरत था?
(a) 80 %
(b) 65 %
(c) 70 %
(d) 40 %
उत्तर:
(b) 65 %

प्रश्न 7.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 ने भारत के उद्योगों को कितनी श्रेणयों में वर्गीकृत किया?
(a) चार
(b) दो
(c) तीन
(d) पाँच
उत्तर:
(c) तीन

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प्रश्न 8.
1990-91 में औद्योगिक क्षेत्र का सकल घेरलू उत्पाद में योगदान कितना था?
(a) 26 %
(b) 23 %
(c) 28 %
(d) 24.6 %
उत्तर:
(d) 24.6 %

प्रश्न 9.
भारत में आर्थिक नियोजन का काल कब आरम्भ हुआ?
(a) 1 अप्रैल 1961
(b) 1 अप्रैल 1980
(c) 1 अप्रैल 1951
(d) 14 अप्रैल 1974
उत्तर:
(c) 1 अप्रैल 1951

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प्रश्न 10.
1-4-1979 से 31-2-1980 का वर्ष किस योजना के अन्तर्गत आता है?
(a) प्रथम पंचवर्षीय योजना
(b) योजना का अवकाश काल
(c) द्वितीय पंचवर्षीय योजना
(d) पांचवीं पंचवर्षीय योजना
उत्तर:
(b) योजना का अवकाश काल

प्रश्न 11.
योजना काला में निम्नखित किस कारण से अभी निर्मित वस्तुओं का उत्पादन निध लक्ष्यों से कम रहा?
(a) बिजली की कमी
(b) कच्चे माल की कमी
(c) औद्योगिक अशान्ति
(d) उपयुक्त सभी कारण
उत्तर:
(d) उपयुक्त सभी कारण

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प्रश्न 12.
भारत मे आर्थिक आयोजन का एक प्रमुख उद्देश्य था –
(a) सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास
(b) हिन्दी को प्रोत्साहन देना
(c) सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर
(d) आर्थिक विषमता का बढ़ाना
उत्तर:
(d) आर्थिक विषमता का बढ़ाना

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

Bihar Board Class 11 Economics स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत में औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों का केन्द्र बिन्दु क्या था? उन नीतियों के क्या प्रभाव हुए?
उत्तर:
औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों के केन्द्र बिन्दु निम्नलिखित थे –

  1. भारत का इंगलैंड को कच्चे माल की पूर्ति करने वाला बनाना।
  2. भारत को इंगलैंड में बने तैयार माल की पूर्ति करने वाला बनाना।

नीतियों का प्रभाव (Effects of Policies):
इससे भारत का स्वरूप मूल रूप से बदल गया। भारत कच्चे माल का निर्यातक और निर्मित माल का आयातक बन गया। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत में राष्ट्रीय आय की वार्षिक संवृद्धि दर 20% से कम हो गई तथा प्रति व्यक्ति उत्पादन वृद्धि दर तो मात्र आधा प्रतिशत रह गई।

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प्रश्न 2.
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री दादाभाई नौरोजी, विलियम, डिगबी, किडल शिराज, डा० वी० के० आर० वी० राव० आर० सी० देसाई आदि थे।

प्रश्न 3.
औपनिवेशिक शासन काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर:
कृषि क्षेत्र की गतिहीनता का मुख्य कारण औपनिवेशिक शासन द्वारा लागू की गई भू-व्यवस्था प्रणालियाँ थीं। साथ ही राजस्व और कृषि का व्यवसायीकरण भी प्रमुख कारण थे।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता के समय देश में कार्य कर रहे कुछ आधुनिक उद्योगों के नाम बताइए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता के समय देश में कार्य कर रहे आधुनिक उद्योग निम्नलिखित थे:

  1. सूती उद्योग
  2. पटसन उद्योग
  3. लोहा इस्पात उद्योग
  4. चीनी
  5. सीमेंट तथा
  6. कागज उद्योग

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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत में व्यवस्थित वि-उद्योगीकरण के दोहरे ध्येय क्या थे?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत में अर्थव्यवस्था वि-उद्योगीकरण के दोहरे ध्येय निम्नलिखित थे –

  1. भारत को इंगलैंड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बनाना।
  2. इंगलैंड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के उत्पादन के लिए भारत को ही एक विशाल बाजार बनाना।

प्रश्न 6.
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परम्परागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कारण बताएँ।
उत्तर:
हम इस विचार से पूर्ण सहमत हैं कि अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परंपरागत हस्तकला उद्यागों का विनाश हुआ। ब्रिटिश काल में भारत की विश्व प्रसिद्ध शिल्पकलाओं का पतन हुआ। शिल्पकला के पतन के प्रमुख कारण देशी राजाओं एवं नवाबों का अन्त, मशीनों द्वारा निर्मित विदेशी वस्तुओं की प्रतियोगिता, परिवहन के साधनों का विकास, ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश संसद की नीति आदि थे।

प्रश्न 7.
भारत में आधारिक संरचना विकास की नीतियों से अंग्रेज अपने क्या उद्देश्य पूरा करना चाहते थे?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन काल में रेलों, बंदरगाहों, जल परिवहन आदि आधारिक संरचना का विकास प्रारंभ हुआ। इसका मकसद आम जनता को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि देश के भीतर प्रशासन एवं पुलिस को चुस्त-दुरुस्त रखने एवं देश के कोने-कोने से कच्चा माल एकत्र करके अपने देश में भेजने एवं वहाँ तैयार किए गए माल को भारत के सुदूर क्षेत्रों में पहुंचाने के लिए आधारिक संरचना का विकास किया गया।

प्रश्न 8.
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीतियों की कमियों की आलोचनात्मक विवेचना करें।
उत्तर:
प्राचीन समय से ही भारत एक महत्त्वपूर्ण देश रहा है किन्तु ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई नीतियों का भारत के विदेशी व्यपार की संरचना, स्वरूप और आकार पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप भारत कच्चे उत्पाद जैसे रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील, पटसन आदि का निर्यातक होकर रह गया।

साथ ही वह सूती, रेशमी ऊनी वस्त्रों जैसे अन्तिम उपभोक्ता वस्तुओं और इंगलैंण्ड के कारखानों में बनी हल्की मशीनों आदि का आयातक हो गया। व्यावहारिक रूप से इंग्लैण्ड ने भारत के आयात-निर्यात व्यापार पर अपना एकाधिकार जमाए रखा। भारत का आधे से अधिक व्यापार तो केवल इंगलैंड तक सीमित रहा और कुछ व्यापार चीन, श्रीलंका और ईरान से भी होने दिया। स्वेज नहर का व्यापार मार्ग खुलने से तो भारत के व्यापार पर अंग्रेजी नियन्त्रण और भी सख्त हो गया।

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प्रश्न 9.
औपनिवेशिक काल में भारतीय सम्पत्ति के निष्कासन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत के विदेशी व्यापार पर ब्रिटिश शासन का एकाधिकार सा उत्पन्न हो गया था। भारत के विदेशी व्यापार में निर्यात अधिशेष होने के बावजूद भी इसका लाभ भारत को नहीं मिला। निर्यात अधिशेष के निष्कासन को अंग्रेजी सरकार ने बड़ी चालाकी से कानून, प्रशासन एवं युद्ध पर खर्च करके अपने हित में कर लिया। हमारे देश को निर्यात अधिशेष का कोई फायदा नहीं मिला बल्कि हमारी कई आवश्यक वस्तुओं का अभाव पैदा हो गया। संक्षेप में, अंग्रेज प्रशासन ने आयात व्यय, युद्ध व्यय, पुलिस-प्रशासन व्यय आदि के निमित्त भारतीय संमत्ति का निष्कासन किया।

प्रश्न 10.
जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष कौन-सा माना जाता है।
उत्तर:
1921 वर्ष जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष माना जाता है।

प्रश्न 11.
औपनिवेशिक काल में भारत की जनांकिकीय स्थिति का एक संख्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत की जनांकिकीय स्थितियों का एक संख्यात्मक चित्रण –

  1. 1921 वर्ष: भारत के जनसंख्या का अधिक विशाल न होना तथा उसकी संवृद्धि दर का बहुत अधिक न होना।
  2. साक्षरता दर: 16 प्रतिशत से कम (महिला साक्षरता दर केवल 7 प्रतिशत)।
  3. सकल मृत्यु दर: बहुत ऊँची विशेषकर शिशु मृत्युदर (लगभग 218 प्रति हजार)।
  4. जीवन प्रत्याशा स्तर: केवल 32 वर्ष (जो अब 63 वर्ष है)।

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प्रश्न 12.
स्वतंत्रता पूर्व भारत की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ समझाइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता पूर्व भारतीय जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ:
स्वतंत्रता पूर्व भारत में कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था जिसमें 70-75 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी। विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र में क्रमश: 10 प्रतिशत तथा 10-25 प्रतिशत जनता लगी थी।
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प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित करें।
उत्तर:
प्रमुख आर्थिक चुनौतियाँ (Main Economic Challenges):

1. स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष व्यवसायीकरण था। भूमि पर जनसंख्या का अधिक भार था। जोतों की उपविभाजन तथा विखण्डन की समस्या थी। अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई भू-राजस्व प्रणालियों के कारण सरकार तथा किसानों के बीच कई बिचौलिये (मध्यस्थ) हो गये। ये मध्यस्थ किसानों से बहुत अधिक लगान वसूल करने लगे। परिणामस्वरूप कृषि की उत्पादकता पर बुरा प्रभाव पड़ा। किसानों की ऋणग्रस्ता में वृद्धि हुई।

2. औद्योगिक क्षेत्रक (Industrial Sector):
औद्योगिक क्षेत्रक आधुनीकीकरण वैविध्य। (Diversity) क्षमता संवर्धन और सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की माँग कर रहा था।

3. विदेशी व्यापार (Foreign Trade):
स्वतंत्रता के समय भारत का विदेशी व्यापार अधिकांश इंग्लैंड से होता था। यह व्यपार तो केवल इंग्लैंड की औद्योगिक क्रान्ति को पोषित कर रहा था। विदेशी शासन के दौरान भारत के विदेशी व्यापार का स्वरूप पूर्णरूप से औपनिवेशिक हो गया जिसके अनुसार मुख्य रूप से खाद्यान्न और कच्चे माल को निर्यात किया जाता था और उद्योगों में नियमित उपभोक्ता वस्तुओं को आयात किया जाता था।

4. आधारिक संरचनाएँ (Infrastractures):
आधारित संरचनाएँ पिछड़ी हुई थीं। उपनिवेशिक शासन के अन्तर्गत देश में रेलों, पत्तनों जल परिवहन व डाक-तार आदि का विकास हुआ किन्तु इनका विकास संतोषजनक नहीं हुआ। उस समय के आन्तरिक जलमार्ग अलाभकारी सिद्ध हुए। डाक सेवाएँ अवश्यक जन सामान्य को सुविधाएँ प्रदान कर रही थीं किन्तु वे बहुत ही अपर्याप्त थी। स्वतंत्रता के समय प्रसिद्ध रेलवे नेटवर्क सहित सभी आधारिक संरचनाओं में उन्नयन प्रसार तथा जनोन्मुखी विकास की आवश्यकता थी।

5. गरीबी तथा बेरोजगारी (Poverty and Unemployment):
स्वतंत्रता के समय भारत में बेरोजगारी व्यापक रूप से प्रचलित थी। बेरोजगारी के साथ-साथ भारत के सामने गरीबी की चुनौती थी। व्यापक गरीबी और बेरोजगारी सार्वजनिक आर्थिक नीतियों को कल्याणोन्मुखी बनाने पर आग्रह कर रही थी।

6. निष्कर्ष (Conclusion):
संक्षेप में हम वह सकते हैं कि स्वतंत्रता के समय देश में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बहुत अधिक थीं।

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प्रश्न 14.
भारत में प्रथम सरकारी जनगणना किस वर्ष में हुई थी?
उत्तर:
भारत में प्रथम सरकारी जनगणना, 1881 में हुई थे।

प्रश्न 15.
स्वतन्त्रता के समय भारत के विदेशी व्यापार के परिणाम और दिशा की जानकारी दें।
उत्तर:
विदेशी व्यापार की संरचना (Composition of Foreign Trade):
विदेशी व्यापार की संरचना से अभिप्राय आयात और निर्यात की जाने वाली मों से है। दूसरे शब्दों में विदेशी व्यापार की संरचना से हम इस बात का अध्ययन करते हैं कि एक देश किन-किन वस्तुओं का आयात तथा निर्यात करता है।

प्राचीन काल से ही भारत एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक देश रहा है, किन्तु औपनिवेशिक सरकार द्वारा अपनाई गई वस्तु उत्पादन, व्यापार और सीमा शुल्क और प्रतिबन्ध नीतियों का भारत के विदेशी व्यापार की संरचना पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप भारत कच्चे उत्पादन जैसे रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील और पटसन आदि का निर्यातक रह गया है और वह सूती रेशमी ऊनी वस्तुओं जैसी अन्तिम उपभोक्ता वस्तुओं और हल्की मशीने का आयात करने लगा।

विदेशी व्यापार की दिशा (Direction of Foreign Trade):
विदेशी व्यापार की दिशा का अर्थ है कि एक देश किन-किन देशों से वस्तुओं का आयात करता है और किन-किन देशों को वस्तुओं का निर्यात करता है। स्वतंत्रता के समय भारत का व्यापार केवल इंगलैंड तक सीमित रहा। शेष कुछ व्यापार चीन, श्रीलंका और ईरान से भी होने दिया जाता था। स्वेज नहर का व्यापार मार्ग खुलने से तो व्यापार पर अंग्रेजी नियंत्रण और भी सख्त हो गया।

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प्रश्न 16.
क्या अंग्रेजों ने भारत में कुछ सकारात्मक योगदान भी दिया था? विवेचना करें।
उत्तर:
अंग्रेजी साम्राज्य का सकारात्मक योगदान (Constructive Contribution of the British Rule):
भारत में ब्रिटेश अपनी विनाशक भूमिका के लिये याद किए जाते हैं। स्वार्थों ने अंग्रेजों को अन्धा बना दिया था और वे भारत के हितों को सदा ही ताक पर रखकर बैठे रहे किन्तु, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजों का भारत में राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक उत्थान में बहुत योगदान है। प्रसिद्ध विचारात्मक और चिन्तक कार्ल मार्क्स भारत में ब्रिटिश शासन के इतिहास को अचेतक साधन मानते हैं। ब्रिटिश शासन ने भारत को निम्न प्रकार से योगदान दिया है –

  1. देश की राजनीतिक और आर्थिक एकता ब्रिटिश शासन की देन है।
  2. विदेशी पूँजी के प्रयोग से देश में औद्योगिक विकास हुआ। रेलवे की स्थापना से आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य की नींव पड़ी।
  3. विदेशी पूँजी से भारत में औद्योगिक पूँजीवाद का जन्म हुआ जो अनेक रूपों में भारत के लिए वरदान सिद्ध हुआ है।
  4. विदेशी पूँजी से भारत में आधुनिक बैंकिंग बीमा तथा वित्तीय एवं व्यापारिक प्रणाली का सूत्रपात हुआ।
  5. विदेशी पूँजी के कदमों का अनुकरण करते हुए भारतीय पूँजीपति भी निवेश क्रियाओं में रुचि लेने लगे जो कि भावी विकास का प्रमुख उपकरण सिद्ध हुआ।
  6. नये उद्योगों और नई तरह की आर्थिक क्रियाओं को बढ़ावा देने से ब्रिटिश पूँजी तथा प्रबन्ध अभिकर्ता ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  7. ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप भारत में जाति का बन्धन टूटने लगा।
  8. डाक व्यवस्था में पर्याप्त सुधार से सारे देश में एक निश्चित दर पर पत्र-व्यवहार करना सम्भव हो गया।
  9. डाक-तार के विकास के जरिए व्यापारी तथा लोगों के आपसी सम्बन्धों को बढ़ावा मिला।
  10. शिक्षा के प्रसार से भारतवासियों में विकास और स्वतंत्रता की चेतना जागी।

Bihar Board Class 11th Economics स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पूँजीगत वस्तु उद्योगों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पूँजीगत वस्तु उद्योगों से अभिप्राय उन उद्योगों से है जो वर्तमान उपभोग में वस्तुओं के निर्माण के लिये मशीनों तथा औजारों का उत्पादन करते हैं।

प्रश्न 2.
कृषि के व्यवसायीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि के व्यवसायीकरण से अभिप्राय बाजार में बिक्री के लिए फसलों का उत्पादन करना है।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में कितने प्रकार की भू-राजस्व प्रणालियाँ प्रचलित थीं? उनके नाम लिखें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत में तीन प्रकार की भू-राजस्व प्रणालियाँ प्रचलित थीं –

  1. जमींदारी प्रथा
  2. महालवाड़ी प्रथा तथा
  3. रैयतवाड़ी प्रथा

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के समय भारत के विदेशी व्यापार की मात्रा तथा दिशा लिखें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत का कुल विदेशी व्यापार 782 करोड़ रुपये का था। भारत का अधिकतर व्यापार इंगलैंड और राष्ट्रमंडल देशों से होता था।

प्रश्न 5.
देश के विभाजन से भारत के पटसन वस्तु उद्योग पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
देश के विभाजन से कच्चे माल की कमी के कारण भारत के पीटसन वस्तु उद्योग पर बुरा बहुत प्रभाव पड़ा। इसका मुख्य कारण पटसन उत्पन्न करने वाला क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) का बन गया था।

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प्रश्न 6.
औपनिवेशिक अवधि के दौरान भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषता क्या थी।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल के दौरान भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषता निर्यात आधिक्य का अर्जन करना था।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक संरचना (ढाँचे) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यावसायिक से अभिप्राय किसी देश की श्रम शक्ति शक्ति का विभिन्न उद्योगों तथा। क्षेत्रों में वितरण करना है। क्षेत्रों को हम मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित करते हैं –

  1. कृषि
  2. उद्योग
  3. सेवाएँ

प्रश्न 8.
ब्रिटिश भारत की व्यावसायिक संरचना की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. कार्यशील जनसंख्या का 70%-75% भाग कृषि में काम करता था।
  2. विनिर्माण क्षेत्र में कर्मचारियों का अनुपात केवल 10% था।

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प्रश्न 9.
भारत में रेलवे का आरंभ कब हुआ?
उत्तर:
भारत में रेलवे का आरम्भ 1850 ई० में हुआ। प्रथम रेलगाड़ी 1853 ई० में चली।

प्रश्न 10.
1921 से पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की कौन-सी अवस्था में था?
उत्तर:
1921 से पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की पहली अवस्था में था।

प्रश्न 11.
ब्रिटिश का में भारत की जनांकिकीय संक्रमण की मुख्य विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
1921 से पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की पहली अवस्था में था। जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनों ही ऊँची थी। जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या में संतुलन बना हुआ था परंतु 1921 के पश्चात् भारत ने जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में प्रवश किया।

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प्रश्न 12.
1921 के पश्चात् भारत के जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में क्यों प्रवेश किया।
उत्तर:
क्योंकि 1921 के पश्चात् देश में आधारभूत सुविधाओं के प्राप्त होने तथा नये विचारों के विकसित होने से देश में मृत्यु दर में कमी आने लगी, परंतु जन्म दर में कोई कमी नहीं आई। ऐसी अवस्था में जनंसख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी।

प्रश्न 13.
ब्रिटिश काल में कृषि में निम्न उत्पादकता के क्या कारण थे?
उत्तर:
ब्रिटिश काल में कृषि में निम्न उत्पादन के मुख्य कारण पिछड़ी तकनीकी का प्रयोग, पर्याप्त वित्त का आवाज,दोषपूर्ण काश्तकारी प्रथा, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, खाद नगण्य प्रयोग आदि थे।

प्रश्न 14.
विभाजन का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
विभाजन के फलस्वरूप अधिक सिंचित तथा उपजाऊ भूमि का बहुत बड़ा भाग पाकिस्तान में चला गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत के कृषि उत्पादन को बहुत बड़ा धक्का लगा।

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प्रश्न 15.
आधारिक संरचना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आधारिक संरचना से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा सेवाओं से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं। आधारिक संरचनाओं द्वारा स्वयं वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन नहीं किया जाता, अपितु उनके द्वारा वस्तुओं के उत्पादन के प्रवाह को बनाया जाता है।

प्रश्न 16.
भारत को स्वतंत्रता कब प्राप्त हुई?
उत्तर:
भारत को स्वतंत्रता 15 अगस्त, 1947 ई० को प्राप्त हुई।

प्रश्न 17.
प्राचीन भारत में अधिकांश लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था?
उत्तर:
प्राचीन भारत में अधिकांश लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।

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प्रश्न 18.
प्राचीन भारत में सरकार की आय का मुख्य स्रोत क्या था?
उत्तर:
प्राचीन भारत में सरकार की आय का मुख्य स्रोत कृषि था।

प्रश्न 19.
औपनिवेशिक काल की आय की गणना करने वाले कुछ विद्वानों के नाम लिखें।
उत्तर:
दादाभाई नौरोजी, विलियिम डिगबोई, वी० के० आर० वी० राव०, आर० सी० देसाई आदि।

प्रश्न 20.
ब्रिटिश राज्य में भारत की कितने प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई थी?
उत्तर:
ब्रिटिश काल में भारत की लगभग 85% जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई थी।

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प्रश्न 21.
ब्रिटिश काल में भारत में कृषिक्षेत्र गतिहीन क्यों था? कोई तीन कारण लिखें।
उत्तर:

  1. दोषपूर्ण भू-प्रणालियाँ (इसमें एक जमींदारी प्रणाली थी)
  2. तकनीकी का निम्न स्तर
  3. सिंचाई सुविधाओं का अभाव

प्रश्न 22.
18 वीं शताब्दी के मध्य में भारतीय कृषि की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  1. भारत की कुल जनसंख्या का 85% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ था।
  2. कृषि के उत्पादन में पुरान ढंग अपनाये जाते थे।

प्रश्न 23.
18 वीं शताब्दी के मध्य में भारत के तीन प्रमुख उद्योग कोन से थे?
उत्तर:

  1. वस्त्र उद्योग
  2. चीनी उद्योग
  3. लोहा इस्पात उद्योग

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प्रश्न 24.
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में हस्तशिल्प उद्योगों के पतन के कोई दो दुष्परिणाम लिखें।
उत्तर:

  1. बड़े पैमाने पर बेरोजगारी में वृद्धि हुई।
  2. भारतीय उपभोक्ता बाजार में ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओ की माँग में वृद्धि हुई।

प्रश्न 25.
भारत की प्रथम लोहा और इस्पात कंपनी का क्या नाम था? इसकी स्थापना कब की गई?
उत्तर:
भारत की प्रथम लोहा और इस्पात कंपनी का नाम टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी (TISCO) था। इसकी स्थापना अगस्त 1907 में की गई।

प्रश्न 26.
टैरिफ किन कारणों से लगाया जा सकता है।
उत्तर:
निम्न कारणों से टैरिफ लगाया जा सकता है –

  1. सरकारी आय में वृद्धि लाने के लिये।
  2. भुगतान शेष के घाटे को कम करने के लिये।
  3. घरेलू रोजगार को बढ़ाने के लिये या कम लागत वाली आयात वस्तुओं से घरेलू उद्योग को बचाने के लिये।

प्रश्न 27.
अदृश्य मदों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अदृश्य मदों से अभिप्राय वे मदें, जो दिखाई नहीं देती। इन्हें चालू खाते में दिखाया जाता है। परिवहन, बैकिंग, बीमा तकनीकी, सेवाएँ आदि।

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प्रश्न 28.
उपभोक्ता वस्तुओं तथा पूंजीगत वस्तुओं में किन-किन वस्तुओं को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
उपभोक्ता वस्तुओं में मुख्यतया खाद्य पदार्थों को शामिल किया जाता है जबकि पूँजीगत वस्तुओं में भारी मशीनों आधारभूत वस्तुओं तथा सुरक्षा उपकरणों को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 29.
टैरिफ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आयात वस्तुओं पर लगाये जाने वाले कर शुल्क को टैरिफ कहते हैं। यह कर भौतिक . इकाइयों (प्रतिटन) या कीमत के आधार पर लगाया जाता है।

प्रश्न 30.
भौतिक इकाई के आधार पर कर लगाने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भौतिक इकाई के आधार पर कर लगाने से अभिप्राय वस्तु के वजन के हिसाब से कर लगाना है। भारी वस्तु पर अधिक कर लगेगा और हल्की वस्तु पर कम। मान लें आयात की गई वस्तु पर कर की दर 100 रुपये क्विंटल है। यदि आयात की गई वस्तु का वजन दो क्विंटल है तो उस पर 200 रु. टैरिफ लगेगा और 4 क्विंटल पर 400 रुपये वस्तु के मूल्य से इसका कोई संबंध नहीं है।

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प्रश्न 31.
वस्तु की कीमत के आधार पर कर लगाने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वस्तु की कीमत के आधार पर कर लगाने कर लगाने के लिये आयात की गई वस्तु की कीमत को आधार बनाया जायेगा। मान लो कर 3 रुपये प्रति हजार है आयात की गई वस्तु की कीमत 30,000 रुपये है ऐसी अवस्था में वस्तु 90 रुपये टैरिफ लगेगा।

प्रश्न 32.
जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था की विशेषताएं लिखें।
उत्तर:
जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था में जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनो ही ऊँची होती हैं। अत: जनसंख्या वृद्धि की दर कम होती है।

प्रश्न 33.
स्वतंत्रता के समय हमारी अर्थव्यवस्था में कौन-कौन से उद्योग थे?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित उद्योग थे –

  1. सूती कपड़ा उद्योग
  2. पटसन उद्योग
  3. लोहा तथा इस्पात उद्योग
  4. कागज उद्योग

प्रश्न 34.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यस्था की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था तथा-विक्षत अर्थव्यवस्था थी।

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प्रश्न 35.
1921 ई० से पूर्व भारत में मृत्यु दर ऊँची क्यों थी?
उत्तर:
1921 ई० से पूर्व भारत में मृत्यु दर ऊँची होने के कई कारण थे। जैसे-बीमारियों की रोकथाम करने तथा उनके इलाज का ज्ञान होना खाने-पीने की कमी, सफाई व्यवस्था का उत्तम न होना। प्रभावशाली स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव आदि।

प्रश्न 36.
कुछ खाद्य फसलों के नाम लिखें।
उत्तर:
गेहूँ, ज्वार, बाजरा, चुना आदि।

प्रश्न 37.
कुछ नकदी फसलों के नाम लिखें।
उत्तर:
चाय, काफी आदि।

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प्रश्न 38.
ब्रिटिश भारत में जीवन प्रत्याशा कितनी थी और अब कितनी हैं?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत में जीवन प्रयाश 32 वर्ष थी जबकि अब यह 63 वर्ष है।

प्रश्न 39.
ब्रिटिश भारत में शिशु मृत्यु दर कितनी थी और अब कितनी है?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत में शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हजार थी। अब यह 63 प्रति हजार है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निर्यात के आधिक्य पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
निर्यात का आधिक्य (Large export surplus):
ब्रिटिश काल में भारतीय विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषता निर्यात का आधिक्य था। निर्यात आधिक्य से अभिप्राय भारत का आयातित निर्यात आयात से अधिक होना। परन्तु इस आधिक्य का भारतीय अर्थव्यवस्था का बुरा प्रभाव पड़ा। इससे घरेलू बाजार में कई आवश्यक वस्तुओं की बहुत कमी हो गई। इसके अतिरिक्त इस आधिक्य के परिणामस्वरूप भारत में सोने या चाँदी का कोई प्रभाव नहीं हुआ। निर्यात आधिक्य का प्रयोग निम्नलिखित खर्चों पर किया गया।

  1. अंग्रेजों द्वारा भारत, अफ्रीका आदि स्थानों पर भेजी गई सेना पर खर्च।
  2. भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा विभिन्न युद्धों में किये गये खर्चे।
  3. भारत द्वारा विदेशों से लिये गये ऋणों पर ब्याज, पेंशन अवकाश भत्ता, सामान की खरीद पर किये गये खर्चे।
  4. इंग्लैण्ड में स्थित भारतीय कार्यालय का व्यय।
  5. विदेशी जहाजरानी, विदेशी विनिमय बैंक और विदेशी कंपनियों को किया जाने वाला भुगतान।

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प्रश्न 2.
जमींदारी प्रथा पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
जमींदारी प्रथा (ZamindariSystem):
भारत में भू-राजस्व की इस प्रणाली का आरंभ लार्ड कार्नवालिस ने बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (Permanent settlement) के अंतर्गत किया, इसके अनुसार कुछ किसानों को भूमि का स्वामित्व दे दिया गया जो वास्तव में पहले मालजुगारी एकत्रित करने वाले सरकारी कर्मचारी थे। इन नये भू-स्वामियों ने अधिकांश भूमि पट्टे पर दे दी जिससे वे मनचाहा लगान प्राप्त करते थे।

ये जमींदार सरकार तथा काश्तकारों के बीच मध्यस्त थे। जमींदार सरकार को स्थायी रूप से निर्धारित लगान की निश्चित राशि देते थे। जमींदार के रुचि काश्तकरों से अधिक से अधिक लगान ऐठने तक ही सीमित थी। वे भूमि के विकास में रुचि नहीं लेते थे। इधर काश्तकार भूमि से किसी भी समय बेदखल किये जाने के डर से भूमि सुधार में कम रुचि लेते थे। फलस्वरूप कृषि की उत्पादकता कम होती गई।

प्रश्न 3.
ब्रिटिश प्रशासन के खर्चों पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
ब्रिटिश प्रशासन के खर्चे (Cost of British Administration):
ब्रिटिश प्रशासन के खर्चों से अभिप्राय उन खर्गों से है जिनका वहन भारत को करना पड़ा। इन खर्चों की पूर्ति भारत में ही आय जुटाकर की जाती थी। ये खर्चे निम्नलिखित थे –

  1. भारत द्वारा विदेशों से लिये गये ऋणों पर ब्याज, पेंशन सामान पर किये गये व्यय।
  2. ब्रिटिश शासन अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए युद्ध करता था। इन खर्चों का वहन भी भारत को करना पड़ा। मैसूर युद्ध, मराठा युद्ध, अफगान और बर्मा की लड़ाइयाँ आदि युद्धों और लड़ाई में किये गये खर्च का बोझ भारत पर ही थोपा गया।
  3. इंगलैण्ड से भारत के बीच जो टेलीग्राम लाइनें बिछाई गईं, उन सबका खर्चा भारत के नाम लिख दिया गया।
  4. अदृश्य वस्तुओं के भुगतान का खर्च आदि।

प्रश्न 4.
कृषि के वाणिज्यीकरण पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialisation of Agriculture):
कृषि के वाणिज्यीकरण से अभिप्राय यह है कि व्यापारिक फसलों का अधिक बोया जाना। व्यापारिक फसलों के अंतर्गत कपास, जूट, गन्ना, रोपण फसलें, तिहलन आदि फसलें आती हैं। ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। इस परिवर्तन के कारण खाद्यान्नों और स्वयं उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन के स्थान पर व्यापारिक फसलों का उत्पादन अधिक हो गया।

इसका मुख्य कारण ब्रिटेन के उद्योगों के लिये कच्चे माल की पूर्ति को बढ़ाना था। साथ ही बढ़ती हुई लगान की राशि के लिये किसान पहले की अपेक्षा अधिक व्यापारिक फसलों का उत्पादन करने लगे क्योंकि इन फसलों का मूल्य खाद्यान्नों की अपेक्षा ऊँचा होता था। वाणिज्यीकरण के कारण खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी आई। अकाल की भयंकरता बढ़ गई।

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प्रश्न 5.
अंग्रेजों के मन में भारत के रेल विकास के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
भारत में रेल विकास के प्रमुख उद्देश्य (Main objectives for developing Railways):
भारत की पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल, 1853 में चली। इसने कुल 34 किलोमीटर की दूरी तय की थी। अंग्रेजों ने भारत में रेल का विकास निम्नलिखित उद्देश्यों से किया –

1. प्रशासनिक उद्देश्य (Administrative objectives):
अंग्रेजों ने विशाल भारतीय क्षेत्र पर कड़ा नियंत्रण रखने के लिए प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से रेलवे के विस्तृत जाल का निर्माण किया।

2. व्यापारिक उद्देश्य:
रेलवे के विकास का पहला उद्देश्य इंगलैंड के कारखानों के लिये आवश्यक कच्चे माल को देश के भीतरी भागों से लेकर बंदरगाहों तक पहुँचाना था। दूसरा यापारिक उद्देश्य इंग्लैण्ड के कारखानों में उत्पादित तैयार माल को देश के विभिन्न भागों में हुँचाना था।

3. लाभकारी निवेश संबंधी उद्देश्य (Objective of Profitable investment):
रेलवे के विकास का उद्देश्य अंग्रेजों के धन का लाभकारी निवेश था। रेल विकास में इंग्लैण्ड के पूंजीपतियों ने भारी राशि का निवेश किया और लाभ कमाये।

प्रश्न 6.
ब्रिटिश सरकार ने भारत में 1850 में रेल यातायात आरंभ किया था। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
रेलवे का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (Impact of Railway on Indian Economy):
रेलवे से भारतीय अर्थव्यवस्था कई तरह से प्रभावित हुई। इनका वर्णन नीचे किया जा रहा है –

  1. रेलवे के शुरू होने से भारतीय लोग लंबी दूरी तक यात्रा करने के योग्य बन गये।
  2. इससे भौगोलिक तथा सांस्कृतिक बाधाएँ समाप्त हो गई।
  3. रेलवे ने कृषि का व्यवसायीकरण किया।
  4. इसने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता को समाप्त किया।
  5. भारत में विदेशी व्यापार का बहुत ही अधिक विस्तार हुआ।

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प्रश्न 7.
भारत के आर्थिक निष्कासन से क्या अभिप्राय है? उन सभी साधनों की समीक्षा कीजिए, जिनसे भारत का आर्थिक निष्कासन संभव हो पाया?
उत्तर:
आर्थिक निष्कासन का अर्थ (Meaning of drain of Indian wealth):
भारतीय आर्थिक निष्कासन से अभिप्राय भारतीय अर्थव्यवस्था का नियमित ढंग से शोषण करना (exploitation) और उपहारस्वरूप भारी मात्रा में भारत की सम्पत्ति को अपने देश में भेजना। दूसरे शब्दों में ब्याज, रायल्टी विदेश व्यापार का अधिकांश लाभ आदि के रूप में भारत के वित्तीय साधनों के निष्कासन से है। भारतीय आर्थिक निष्कासन की विधियाँ (Methods of drains of Indian wealth) भारतीय आर्थिक निष्कासन निम्नलिखित विधियों में से किया गया –

  1. अंग्रेज कर्मचारियों की आवश्यकता पूर्ति के लिये विदेशों से खरीदी गई वस्तुओं के भुगतान के रूप में प्रेषण।
  2. इंगलैण्ड में रखे गये भारत के सार्वजनिक साख के ब्याज के रूप में आने वाले व्यय का प्रेषण।
  3. ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों द्वारा भारत में की गई बचतों का इंगलैण्ड में निवेश के लिए प्रेषण क्योंकि ये कर्मचारी अपनी पूँजी अपने ही देश में प्रयोग करना अधिक बेहतर समझते थे।
  4. यूरोपीय कर्मचारियों द्वारा इंगलैण्ड स्थित अपने परिवारों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मुद्रा का प्रेषण।
  5. अंग्रेजों द्वारा भारत अफ्रीका आदि स्थानों पर भेजी गई सेना का खर्च को करना पड़ा।

प्रश्न 8.
कृषि के वाणिज्यीकरण के प्रभाव लिखें।
उत्तर:
वाणिज्यीकरण के प्रभाव (Effect of Commercialisation):
कृषि के वाणिज्यीकरण के फलस्वरूप खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी आई जिसके फलस्वरूप प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की उपलब्धता में कमी हो गई।

  1. ब्रिटिश उद्योगों को कच्चा माल मिलने लगा।
  2. अकाल की भयंकरता बढ़ गई।
  3. अकाल के समय विदेशों पर खाद्यान्नों की निर्भरता बढ़ गई।
  4. भारत के घरेलू उद्योगों पर द्यातक प्रभाव पड़ा।

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प्रश्न 9.
स्वतंत्रता पूर्व भारत के विदेशी व्यापार की क्या दशा थी?
उत्तर:
1. विदेशी व्यापार की दशा (Direction of foreign trade):
स्वतंत्रता पूर्व भारत का अधिकतर व्यापार इंगलैण्ड तथा राष्ट्रमण्डल के देशों के साथ होता था। कुल निर्यात का 34% तथा कुल आयात का 31% व्यापार इंगलैण्ड के साथ होता था। इसके अतिरिक्त दूसरे ब्रिटिश उपनिवेशों जैसे बर्मा (म्यांमार) कनाडा श्रीलंका आदि से निर्यात व्यापार 21% और आयात 10% था।

2. विदेशी व्यापार की संरचना (Composition of Foreign trade):
स्वतंत्रता पूर्व भारत के विदेशी व्यापार में बहुत कम वस्तुएँ सम्मिलित थीं। भारत से कच्चे माल और कृषि वस्तुओं का निर्यात किया जाता था। भारत के निर्यातों में मुख्य स्थान सूती वस्त्र और कपास अनाज, जूट की वस्तुएं चाय और तिलहन का था।

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प्रश्न 10.
भारत के विभाजन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
भारत के विभाजन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (Efects of partition of Indian Economy):
भारत के विभाजन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा –

1. खाद्यान्न में कमी (Food shortage):
विभाजन के फलस्वरूप भारत में खाद्यान्न की। गंभीर कमी अनुभव की जाने लगी।

2. कच्चे माल की कमी (Shortage of raw materials):
विभाजन का दूसरा गंभीर प्रभाव कच्चे माल की पूर्ति पर पड़ा। विभाजन के बाद पाकिस्तान में वे क्षेत्र खोले गये जो कृषिजन्य पदार्थों की पूर्ति करते थे और इन पदार्थों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करने वाली अधिकांश मिलें भारत में स्थित थीं। अत: भारत को कच्चे माल की कमी अनुभव हुई। इस तरह से प्रभावित उद्योगों में पंटसन और सूती उद्योग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

3. संकुचित बाजार (Loss of Market):
विभाजन के परिणामस्वरूप भारत के कई उद्योगों के बाजार का अकार बहुत ही सीमित हो गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता के समय अथवा कुछ समय बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की क्या स्थिति थी? संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति (Condition of the Indian Economy at the time of Independence):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था निम्न प्रकार की थी –

1. गतिहीन अर्थव्यवस्था (Stagnant Economy):
अंग्रेजों ने भारतीय अर्थव्यवस्था का गतिहीन अर्थव्यवस्था बना दिया था। गतिहीन अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें वृद्धि दर न के बराबर होती है। स्वतंत्रता से पूर्व 100 वर्ष की अवधि में प्रति व्यक्ति आय की औसत दर 0.5 प्रतिशत के लगभग थी। अर्थव्यवस्था की गतिहीनता के कारण भारत एक पिछड़ा हुआ निर्धन देश बनकर रह गया जबकि संसार के अधिकतर देशों ने बड़ी तीव्रता से प्रगति
की थी।

2. पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था (Backward Economy):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई थी। भारतीय अर्थव्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएँ इसके पिछड़ेपन को प्रकट करती हैं –

(क) स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी। कृषि का सकल घरेलू में योगदान लगभग चालू कीमतों पर 54% थी।
(ख) स्वतंत्रता के समय मशीनरी तथा अन्य आवश्यक यंत्रों का आयात करता था।
(ग) स्वतंत्रता के समय भारत में उद्योगों का बहुत ही कम विकास हुआ था।
(घ) स्वतंत्रता के समय भारत में सीमेंट, चीनी, लोहा, इस्पात आदि कुछ ही गिने-चुने उद्योग थे।
(ङ) भारत में उस समय न के बराबर पूँजीगत वस्तु उद्योग थे।
(च) राष्ट्रीय आय में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान ही कम था।

3. औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था (Colonial Economy):
विभाजन के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्णरूप से औपनिवेशिक थी। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होती है –

(क) 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में भारत के निर्यात व्यापार में कपास जूट और चाय का हिस्सा 60% से अधिक था।
(ख) औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यूरोप के देशों में ओद्योगिक क्षमता का निर्माण हो चुका था और वे अपने बने माल को भारत तथा अन्य अपनिवेशों को भेजते थे।
(ग) विदेशी पूंजी का उपयोग कृषि और बागान (Plantation) उद्योगों में किया जाता था जिसका मुख्य कारण औद्योगिक देशों की कच्चे माल की मांग को पूरा करना था।

4. क्षीण अर्थव्यवस्था (Deplected Economy):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था क्षीण तथा खोखली थी। इंगलैंड और इसके भिन्न देशों की युद्ध संबंधी आवश्यकताओं पूर्ति के लिये भारतीय उद्योगों को निरंतर रूप से 24 घंटे कार्य करना पड़ा। सारे उत्पादन का निर्यात किया जाता और भारतीयों को प्रायः सामान्य जीवन की वस्तुओं से वंचित रहना पड़ता है।

5. विच्छेदित अर्थव्यवस्था (Amputed Economy):
स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था विच्छेदित हो गई थी। देश का विभाजन अनेक रूपों से काफी समय तक आर्थिक दृष्टि से देश के लिये घातक सिद्ध हुआ। विभाजन के घातक प्रभाव निम्नलिखित थे –

(क) भारत में स्थापित जूट (पटसन) मिलों को कच्चा माल (Raw Material) मिलान बंद हो गया क्योंकि विभाजन के फलस्वरूप पटसन के लिये कच्चा माल पैदा करने वाले इलाके पाकिस्तान में चले गये।
(ख) बम्बई तथा अहमदाबाद के कपड़ों की मिलों को कपास मिलना बंद हो गया।
(ग) देश खाद्यन्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं रहा।
(घ) सभी वस्तुओं के लिए बाजार सीमित हो गया।
(ङ) लाखों की संख्या में जनसंख्या के हस्तानान्तरण में अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई।

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प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यस्था की मुख्य विशेषताएँ (Main features of Indian Economy at the eve of independence)

1. कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था (Agriculatural Economy):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान था। देश की जनसंख्या का लगभग 85% भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से. अपनी आजीविका कृषि से ही कमाता था।

देश की लगभग 72% श्रमशक्ति कृषि में लगी हुई थी। इतना होने पर भी भारत की कृषि पिछड़ेपन के कई कारण थे, जैसे जमींदारी प्रथा, वर्षा पर अधिक निर्भरता या सिंचाई सुविधाओं का अभाव, भूमि पर जनसंख्या का अधिक दबाव, कृषि करने के पुराने ढंग, खाद का नगण्य प्रयोग आदि। भारत के विभाजन ने कृषि व्यवसाय को एक और झटका दिया। अविभाज्य देश का सिंचित तथा उपजाऊ भाग पाकिस्तान में चला गया।

2. औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Sector):
कृषि की ही तरह स्वतंत्रता के समय औद्योगिक क्षेत्र भी पिछड़ा हुआ था। ब्रिटिश भारत में के विश्व-प्रसिद्ध हस्तकला उद्योगों का पतन हुआ। अंग्रेजी सरकार ने ऐसी नीति अपनाई जिससे भारत में उद्योगों का विकास न हो सका। उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन में उद्योगों को विकसित करने के लिये भारत को केवल कच्ची वस्तुओं का निर्यातक बनाया तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं का उपभोक्ता बनाना था। भारत में देशी हस्तशिल्प उद्योगों के पतन से बेरोजगारी को बढ़ावा मिला।

19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में आधुनिक उद्योग शुरू हुए परन्तु वे बहुत ही धीमी गति से विकसित हुए। प्रारम्भ में सूती और पटसन मिलें स्थापित की गई। सूती कारखानों पर अधिकतर भारतीयों का स्वामित्व था और ये कारखाने भारत के पश्चिमी भागों (महाराष्ट्र तथा गुजरात) में स्थित थे। जूट के कारखानों पर अंग्रेजों का स्वामित्व था और वे बंगाल में केन्द्रित थे। 20 वीं शताब्दी के आरंम्भ में लोहा तथा इस्पात उद्योग शुरू हुआ।

प्रथम लोहा तथा इस्पात कंपनी (टाटा आयरन तथा स्टील कंपनी) अर्थात TISCO) की स्थापना जमशेदुर में हुई। इस कंपनी ने 1912 में उत्पादन करना शुरू कर दिया था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत का और अधिक औद्योगीकरण करने के लिये यहाँ पर पूंजीगत वस्तु उद्योग न बराबर थे। देश के अधिकतर उद्योग अपने पूँजीगत पदार्थों अर्थात् मशीनों के लिये इंग्लैण्ड पर निर्भर करते थे। औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर तथा इसका सकल घरेलू उत्पादन में योगदान बहुत ही कम था। अधिकांश उद्योग निजी स्वामित्व में थे। रेलवे, संचार तथा बंदरगाहों पर स्वामित्व सरकार का था।

3. विदेशी व्यापर (Foreign Trade):
स्वतंत्रता के समय भारत के कच्चे माल और कृषि पदार्थों का निर्यात करता था। भारत के निर्यातों में मुख्य स्थान कपास, चीनी, नील, पटसन आदि का था। भारत, इंग्लैंड तथा अन्य देशे से अधिकतर उपभोग की तैयार वस्तुएँ, मशीन आदि मंगवाता था। भारत का अधिकतर इंगलैंड तथा राष्ट्रमण्डल देशों से होता था।

4. आर्थिक संरचना का अल्प विकास (Less development of economic infrastructure):
स्वतंत्रता के समय भारत में आर्थिक संरचना जैसे यातायात, बिजली, संचार, बैंकिंग आदि का कम विकास हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने 1850 ई० में रेलवे की शुरुआत की थी। रेलवे ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कई प्रकार से प्रभावित किया। रेलवे के अतिरिक्त ब्रिटिश शासन ने सड़क परिवहन का भी विकास किया। सड़क और रेलवे परिवहन के विकास के साथ-साथ आंतरिक जल यातायात तटीय जल यातयात तथा सामुद्रिक यातायात को विकसित करने का प्रयत्न किया गया। परन्तु इनका विकास संतोषजनक नहीं था।

5. जनांकिकीय दशा (Demographic condition):
जनांकिकीय संक्रमण की तीन अवस्थाएँ होती हैं-प्रथम अवस्था, द्वितीय अवस्था तथा तृतीय अवस्था। 1921 के पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था में था। इस अवस्था में अंधविश्वास तथा चिकित्सा की सुविधाएँ न होने के कारण मृत्यु दर ऊँची होती है। मृत्यु दर के ऊँचा होने के साथ-साथ जन्म दर भी ऊँची होती है। अतः जनसंख्या में वृद्धि दर बहुत ही कम होती है। 1921 के पश्चात् भारत ने जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में प्रवेश किया। ऊँची जन्म दर तथा कम मृत्यु दर के कारण भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। स्वतंत्रता के समय भारत की जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी।

6. व्यावसायिक संरचना (Occupational structure):
व्यावसायिक संरचना का अभिप्राय है अर्थव्यवस्था में कार्यशील जनसंख्या का विभिन्न व्यवसायों में वितरण। साधारणतया इसका अध्ययन किसी अर्थव्यवस्था के विभिन्न व्यवसायों अथवा विभिन्न क्षेत्रों में कार्यशील कुल श्रम-शक्ति के प्रतिशत के रूप में किया जाता है –

  1. प्राथमिक क्षेत्र के व्यवसाय
  2. द्वितीयक क्षेत्र के व्यवसाय, तथा
  3. तृतीयक क्षेत्र के व्यवसाय। औपनिवेशिक काल में भारत की व्यावसायिक संरचना में नगण्य परिवर्तन हुए। स्वतंत्रता के समय 70-75% कार्यशल जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्र में लगी हुई थी। 10% तथा 15-20% कार्यशील जनसंख्या क्रमशः द्वितीयक क्षेत्र तथा तृतीयक क्षेत्र में लगी हुई थी।

अतिरिक्त गतिविधियाँ (Suggested Additional Activities)

प्रश्न 1.
अपने शिक्षक के सहयोग से इस विषय पर परिचर्चा करें-क्या भारत में जमींदारी प्रथा का सचमुच उन्मूलन हो गया है? यदि आपका सामान्य मत नकारात्मक है, तो आपके विचार से इसे समाप्त करने के लिए क्या कदम उठाया जाना चाहिए और क्यों?
उत्तर:
छात्र कक्षा मे जमींदारी प्रथा के आरम्भ एवं दुष्परिणाम आदि पर वहस करेंगे तथा तथ्यों आँकड़ों से यह सिद्ध करेंगे कि जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिये सरकार द्वारा किये गये प्रयत्न पूर्ण रूप से सफल नहीं हुए हैं। अब भी भारत के अधिकांश भागों में जमींदारी प्रथा प्रचलन में है। इसके बाद छात्र सुझाव देंगे कि किस प्रकार जमींदारी प्रथा का पूर्ण रूप से उन्मूलन किया जा सकता है – जैसे कानून ऐसे बनाये जायें जिनकी अवमानना संभव न हो। कानूनों को सख्ती से लागू किया जाये। वह कार्य अनुभवी योग्य, ईमानदार तथा निष्ठावान सरकारी अधिकारियों को सौंपा जाना चाहिए। राजनैतिक नेताओं का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

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प्रश्न 2.
स्वतंत्रता के समय हमारे देश की जनता अपनी आजीविका के लिए क्या-क्या कार्य करती थी? आज जनता के मुख्य व्यवसाय क्या हैं? देश में चल रहे आर्थिक सुधारों को ध्यान में रखकर आज से पंद्रह वर्ष 2020 में आप किस प्रकार के व्यावसायिक परिदृश्य की कल्पना करेंगे।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय हमारी अर्थव्यवस्था के लोगों का मुख्य व्यवसाय (Majar occupation followed by the people of our economy at the time of independence):

स्वतंत्रता के समय हमारे देश के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेतीवाड़ी (कृषि) था। राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक था। कृषि के उतार-चढ़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावित करते थे। भारत की जनसंख्या का लगभग 85% भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से अपनी आजीविका का अर्जन करते थे। वर्तमान समय में यद्यपि भारतीय लोगों का व्यावसाय कृषि है, परन्तु समय के साथ लोग कृषि कार्य को छोड़कर शहरों में नौकरी करने लगे हैं। आज से 15 वर्ष के बाद सन् 2020 तक परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा। भारत एक कृषि प्रधान देश नहीं रहेगा। वह अमेरिका की तरह एक विकसित राष्ट्र होगा और उसकी अर्थव्यवस्था वर्तमान अमेरिका के समान होगी। व्यावसायिक परिदृश्य में कम्प्यूटर तकनीक अपने चरम पर होगी तथा सुपर कम्प्यूटरों का युग प्रारम्भ हो गया होगा।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में लोगों की उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं की सूची बनाइए। उस सूची की आज के उपभोग स्वरूप से तुलना करें। इस प्रकार जन-सामान्य के जीवन स्तर में आए परिवर्तनों का आकलन करें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय ग्रामीण क्षेत्र में उपलब्ध होने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की सूची (List of goods and services available in rural sector at the time of Independence):
स्वतंत्रता के समय ग्रामीण क्षेत्र में निम्नलिखित वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपलब्ध थीं –

  1. कुओं से जल की आपूर्ति।
  2. खेतों से ताजी सब्जियाँ तथा फल।
  3. खाद्यान्न पदार्थ।
  4. पहनने के लिए मोटा कपड़ा।
  5. बैलगाड़ियाँ, घोड़े खच्चर द्वारा प्रदान की गई सेवाएँ।
  6. गाय, भैसों तथा बकरियों से दूध की प्राप्ति।
  7. चूसने के लिए गन्ना और खाने के लिए गुड़ की प्राप्ति।
  8. मनोरंजन के लिए कुश्ती या दंगल आदि।
  9. लोहार, बढ़ई, नाई आदि की सेवाएँ।
  10. दाइयों, हकीमों को सेवाएँ।
  11. रहने के लिए कच्चे मकान तथा झोपड़ियाँ।

स्वतंत्रता के समय शहरी क्षेत्र में उपलब्ध होने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की सूची (List of goods and services available inurban sector in urban sector at the time of independence):

स्वतंत्रता के समय शहरी क्षेत्र में निम्नलिखित वस्तुएँ तथा सेवाएँ उपलब्ध थीं –

  1. रहने के लिए पक्के मकान।
  2. इलाज कराने के लिए अस्पताल तथा डॉक्टर।
  3. बड़े शहरों में विद्युत की सुविधाएँ।
  4. यातायात के साधन-टांगा, बसें रेलवे।
  5. जल-आपूर्ति (कुओं, नलकों से)।
  6. जल निकासी की सुविधाएँ।
  7. कई शहरों में पक्की सड़कें।
  8. वस्तुएँ खरीदने के लिये बाजार।
  9. शिक्षा प्राप्त करने के लिये स्कूल तथा कॉलेज।
  10. मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल।

जीवन स्तरों में तुलना (Comparison of Standard of living):
गाँवों की अपेक्षा शहरों में जीवन स्तर अच्छा था। गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिकतर लोग पिछड़े हुए अन्धविश्वासी शिक्षित आदि थे। वे अपने स्वास्थ्य के प्रति भी सचेत नहीं थे। गाँव वालों का मुख्य व्यवसाय कृषि था जो कि पिछड़ी हुई थी। भूमिहीन किसानों की हालत तो बहुत ही खराब थी। उन्हें दो समय का खाना भी नसीब नहीं होता था। साहूकार उनका शोषण करते थे। वे ऋणग्रस्त थे। कहा जाता है कि वे कर्जे में पैदा होते थे, कर्ज में रहते थे और कर्ज में ही मर जाते थे।

उनकी आय बहुत ही कम थी। गाँवों में प्रच्छन (छिपी हुई) बेरोजगारी थी। इसके विपरीत शहरों में लोग कारखानों कार्यालयों तथा दुकानों में काम करते थे। उनकी निश्चित आय/वेतन था। उनको समय का भोजन सरलता से मिल जाता था। वे शिक्षित भी थे। कुछ ऐसे लोग भी जो बहुत ही गरीब थे। वे मजदूरी करते थे रिक्शा चलाते थे, घरों में काम करते थे फेरी लगाते थे। स्टेशनों तथा बस अड्डों पर कली का काम करते थे। इनमें से अधिकांश वे लोग थे जो गाँवों से शहर में रोजगार की तलाश में आते थे। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शहर में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर गाँव में रहने वाले लोगों की अपेक्षा ऊँचा था।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रश्न 4.
अपने आस-पास के गाँवों और शहरों के स्वतंत्रता पूर्व के चित्र संग्रहित करें। उन्हें आज के परिदृश्यों से मिला कर देखें। आप उसमें क्या परिवर्तन देखते हैं? क्या इनमें आए परिवर्तन सुखद हैं या दुखद? चर्चा करें।
उत्तर:
हमने अपने निकट के शहर की स्वतंत्रता से पूर्व तथा स्वतंत्रता के बाद की तस्वीरें तथा फोटोग्राफ एकत्रित किये। इन चित्रों से प्राप्त होने वाले परिदृश्य की वर्तमान परिदृश्य से तुलना करने पर हमें निम्नलिखित अन्तर दिखाई देते हैं –

  1. पहले शहर में पक्की सड़कें बहुत कम थीं पर अब सड़कों का जाल बिछा हुआ है।
  2. पहले उस शहर में केवल एक ही सरकारी विद्यालय था, जिसमें केवल दसवीं तक शिक्षा दी जाती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये विद्यार्थियों को दूसरे शहर में जाना पड़ता था। परन्तु इस शहर में कई सरकारी, मान्यताप्राप्त तथा पलिब्क स्कूल हैं जिसमें 12 वीं तक शिक्षा दी जाती है। इसके अतिरिक्त इस शहर में एक डिग्री कॉलेज भी हैं।
  3. पहले शहर में यातयात का साधन मुख्यतः साइकिल तथा बसें थीं। कार या स्कूटर मोटर साइकिल बहुत ही कम लोगों के पास थे। परन्तु अब स्कूटरों मोटरसाइकिलों तथा कारों की भरमार है।
  4. पहले शहर में केवल एक ही सरकारी अस्पताल था परन्तु अब कई सरकारी तथा गैरसरकारी अस्पताल हैं। डॉक्टरों तथा दवाइयों की दुकानों की भरमार है जबकि पहले उस शहर में इक्का-दुक्का डॉक्टर और दवाई की दुकान होती थी।
  5. पहले शहर में केवल एक ही मंदिर गुरुद्वारा तथा मस्जिद थे पर अब तो इनकी भरमार हो गई है।
  6. इस शहर में पहले होटल, चाय की दुकानें रेस्टोरेंट ढाबे कम मात्रा में पाये जाते थे, परन्तु अब इनकी भरमार है। अब तो इस शहर में एक पाँच सितार होटल भी है।
  7. पहले एक सिनेमाघर था, परन्तु अब सिनेमाघर हैं।
  8. पहल केवल एक बैंक था (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) परन्तु अब अनेकों बैंक हैं जहाँ हमेशा भीड़ लगी रहती हैं।
  9. पहले बच्चे पैदल या रिक्शा पर पढ़ने के लिये जाते थे परन्तु अब में प्रायः स्कूल की बसों में जाते हैं।
  10. पहले मकान एकमंजिला थे और आबादी कम थी परन्तु अब लगभग सभी मकान दो मंजिले हो गये हैं, अब आबादी भी बढ़ गई है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
TISCO का मतलब है –
(a) टाटा आयरन एण्ड स्टील कंम्पनी
(b) टाइटन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी
उत्तर:
(a) टाटा आयरन एण्ड स्टील कंम्पनी

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प्रश्न 2.
आर्थिक विकास के लिए कौन-सा कम महत्वपूर्ण है –
(a) उद्योग
(b) कृषि
उत्तर:
(b) कृषि

प्रश्न 3.
लोहा, इस्पात, चीनी और सीमेण्ट, कागज और वस्त्र उद्योग किस शताब्दी में शुरू होने लगे –
(a) अठारहवीं शताब्दी
(b) उन्नीसवीं शताब्दी
(c) बीसवीं शताब्दी
उत्तर:
(c) बीसवीं शताब्दी

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प्रश्न 4.
ब्रिटिश शासन काल में कितनी प्र. श. जनसंख्या भारत के गाँवों में रहती थी –
(a) 60 प्र. श.
(b) 70 प्र. श.
(c) 85 प्र. श.
उत्तर:
(c) 85 प्र. श.

प्रश्न 5.
भारत में प्रथम जनगणना किस वर्ष में हुई –
(a) 1881
(b) 1882
उत्तर:
(a) 1881

प्रश्न 6.
TARIFF का मतलब है –
(a) आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर
(b) निर्यातित वस्तुओं पर लगाया गया कर
उत्तर:
(a) आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर

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प्रश्न 7.
20 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कुल वास्तविक उत्पाद बढ़ोतरी दर थी –
(a) 2 प्र. श.
(b) 2 प्र. श. से कम
उत्तर:
(b) 2 प्र. श. से कम

प्रश्न 8.
20 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर थी –
(a) आधा प्र. श.
(b) एक प्र. श.
उत्तर:
(a) आधा प्र. श.

प्रश्न 9.
अंग्रेजी शासन में जीवन प्रत्याशा थी –
(a) 32 वर्ष
(b) 30 वर्ष
उत्तर:
(a) 32 वर्ष

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प्रश्न 10.
वर्तमान जीवन प्रत्याशा है –
(a) 65 वर्ष
(b) 60 वर्ष
उत्तर:
(a) 65 वर्ष

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Bihar Board Class 11 Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है।
(क) 1990
(ख) 1998
(ग) 1885
(घ) 1950
उत्तर:
(ख) 1998

प्रश्न 2.
नीचे लिखे गए चार जलवायु के समूहों में से कौन-सा समूह आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता है।
(क) A-B-C-D
(ख) A-C-D-E
(ग) B-C-D-E
(घ) A-C-D-F
उत्तर:
(ख) A-C-D-E

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में किस प्रकार के क्षेत्र में कोपेन की H जलवायु पायी जाती है?
(क) उच्च अक्षांश
(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र
(ग) उच्च तापमान
(घ) अधिक वर्षा
उत्तर:
(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र

प्रश्न 4.
कोपेन द्वारा जलवायु वर्गीकरण के क्या आधार हैं?
(क) तापमान एवं वृष्टि के मासिक मान
(ख) वृष्टि एवं वाष्पीकरण के मासिक मान
(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान
(घ) वाष्पोत्सर्जन के मासिक मान
उत्तर:
(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान

प्रश्न 5.
कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अहंक हैं?
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(ख) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिन्द से अधिक
(ग) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस से नीचे
उत्तर:
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा

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प्रश्न 6.
जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है ………………
(क) अनुप्रयुक्त
(ख) व्यवस्थित
(ग) जननिक
(घ) आनुभविक
उत्तर:
(ख) व्यवस्थित

प्रश्न 7.
भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा
(क) “Af”
(ख) “BSh”
(ग) “Cfb”
(घ) “Am”
उत्तर:
(घ) “Am”

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तलना करें।
उत्तर:
A उष्णकटिबंधीय जलवायु-उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु मकर रेखा और कक रेखा के बीच माई जाती है। पूरा वर्ष सूर्य के उर्ध्वस्थ तथा अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसर कटिबंध की उपस्थिति के कारण यहाँ की जलवायु उष्ण एवं आर्द्र रहती है। यहाँ वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। जलवायु के इस उष्णकटिबंधीय समूह को तीन प्रकारों में बाँटा जाता है, जिनके नाम हैं –

  • Af उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवाय जो कि विषवत रेखा के निकट पाई जाती है।
  • Am उष्णकटिबंधीय जलवायु जो कि भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण अमेरिका के पूर्वी भाग तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में पायी जाती है।
  • Aw उष्णकटिबंधीय आई तथा शुष्क शीत ऋतु वाली जलवायु जो कि Af प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है।

समूह B शुष्क जलवायु (Dry Climates : B) – यह जलवायु इस ग्रह के बहुत बड़े भाग को ढके हुए है जो विषुवत् रेखा से 15° से 60° उत्तर व दक्षिणी अक्षांशो के बीच विस्तृत है। 15 से 30 के निम्न अक्षांशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है, जहाँ तापमान की गिरावट और उत्क्रमण वर्षा नहीं होने देते। महाद्वीपों के पश्चिमी सीमांतों पर, ठंडी धाराओं के आसन्न, विशेषत: दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर, यह जलवायु विषुवत् रेखा की ओर अधिक विस्तृत है और तटीय भूमि पर पायी जाती है।

मध्य अक्षांशों में विषुवत् रेखा से 35° और 600 उत्तर व दक्षिण के बीच यह जलवायु महाद्वीपों के उन आंतरिक भागों तक परिरुद्ध होतो है जहाँ पर्वतों से घिरे होने के कारण प्रायः समुद्री आई पवनें नहीं पहुंच पातीं। शुष्कं जलवायु को स्टेपी अथवा अर्ध – शुष्क जलवायु (BS) और मरुस्थल जलवायु (Bw) में विभाजित किया जाता है। इसे आगे 15° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण कटिबंधीय (BSh) और उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल (BWh) में बाँटा जाता है। 35° और 60° अक्षांशों के बीच इसे मध्य अक्षांशीय स्टैपी (BSK) तथा मध्य अक्षांशीय मरुस्थल (BWk) में विभाजित किया जाता है।

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प्रश्न 2.
C एवं A प्रकार की जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएंगे?
उत्तर:
C प्रकार की जलवायु में सदाबहार कोणधारी वन जैसे-पाईन, फर व स्पूस आदि तटीय मरुस्थल में न्यून वनस्पति। A प्रकार की जलवायु में असंख्य वृक्षों के झुण्ड लंबे व घने वृक्ष, कम घने मध्य ऊंचाई के वृक्ष, न्यून वनस्पति, घास, पेड़ व लंबी झाड़ियों की अनुपस्थिति, शैवाल व अन्य जलीय व समुद्रीय पादप समुदाय, पर्णपाती से लेकर टुण्डा प्रकार की वनस्पति।

प्रश्न 3.
ग्रीन हाउस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाउस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर:
वे गैसें जो विकिरण की लंबी तरंगों का अवशोषण करती हैं, हरित गृह गैसें कहलाती हैं। हरित गृह गैसों की उपस्थिति के कारण वायुमंडल एक हरित गृह की भाँति व्यवहार करता है। वायुमंडल प्रवेशी सौर विकिरण परिवेषण भी करता है लेकिन पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर उत्सर्जित होने वाली अधिकतम लंबी तरंगों को अवशोषित कर लेता है।

वर्तमान में चिंता का कारण बनी मुख्य हरित गृह गैसें कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), क्लोरोफ्लोकार्बन्स (CFCs) तथ हैलंस, मिथेन (CH4) नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और ओजोन (O) हैं। कुछ अन्य गैसें जैसे नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) आसानी से हरित गृह गैसों से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमण्डल में उनके सांद्रण को प्रभावित करती हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक घरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
अंग्रेजी के बड़े अक्षर A, C, D, तथा E आर्द्र जलवायु को तथा B अक्षर शुष्क जलवायु को निरूपित करता है।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभाविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जननिक वर्गीकरण (genetic classification) जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास है जबकि आनुमाविक प्रणाली (empirical classification) प्रेक्षित किए गए विशेष रूप से तपमान एवं वर्षण से संबंधित आंकड़ों पर आधारित होता है।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवाकुओं में तापांतर बहुत कम होता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय आई जलायु में वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। इस प्रकार की जलवायु मकर रेखा और कर्क रेखा के बीच पाई जाती है।

प्रश्न 4.
सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रभावित होंगी?
उत्तर:
कुछ मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार सौर कलंकों (Sun Spots) की संख्या बढ़ने पर मौसम ठंडा और आर्द्र हो जाता है और उसमें प्रचण्डता बढ़ जाती है।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
भूमंडलीय जलवायु परिवर्तनों से संबंधित ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ से संबंधित जानकारियाँ एकत्रित कीजिए।
उत्तर:
वायुमण्डल में हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास किए गए हैं। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ है जिसकी उद्घोषणा सन् 1991 में की गई थी। सन् 2005 में प्रभावी हुई इस उद्घोषणा का 141 देशों में अनुमोदन किया है। क्योटो प्रोटोकॉल ने 35 औद्योगिक राष्ट्रों को बद्ध किया है कि वे सन् 1990 के उत्सर्जन स्तर में वर्ष 2012 तक 5% की कमी लायें। तापमान के उपलव्य आँकड़े पश्चिमी यूरोप के हैं, जो 19वीं शताब्दी के मध्य के हैं। इस अध्ययन की संदर्भित अवधि 1961-80 है।

इससे पहले व बाद की अवधियों की तापमान की असंगतियों का अनुमान 1961-90 की अवधि के औसत तापमान में लगाया गया है। पृथ्वी के घरातल के निकट वायु का औसत वार्षिक तापमान लगभग 14° सेल्सियस है। काल श्रेणी 196190 के ग्लोब सामान्य तापमान की तुलना में 1856-2000 के दौरान पृथ्वी के धरातल के निकट वार्षिक तापमान में असंगति को दर्शाती है।

तापमान के बढ़ने की प्रवृत्ति 20वीं शताब्दी में दिखाई दी। 20वीं शताब्दी में सबसे अधिक तापन दो अवधियों में हुआ। 1901-44 और 1977-991 इन दोनों में से प्रत्येक अवधि में भूमंडलीय तापन 0-4 सेल्सियस बढ़ा है। इन दोनों अवधियों के बीच थोड़ा शीतलन भी हुआ जो उत्तरी गोलार्द्ध में अधिक चिह्नित था।

20वीं शताब्दी के अंत में औसत वार्षिक तापमान का वैश्विक अध्ययन 19वीं शताब्दी में दर्ज किए गए तापमान में 0.6° सेल्सियस अधिक था। 1856-2000 के दौरान सबसे गर्म साल अतिम दशक में दर्ज किया गया था। सन् 1998 संभवतः न केवल 20वीं शताब्दी का बल्कि पूरी सहस्राब्दि का सबसे गर्म वर्ष था।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘चीन तुल्य’ जलवायु किस क्षेत्र में पाई जाती है?
उत्तर:
इस प्रकार की जलवायु दक्षिणी-पूर्वी चीन, संयुक्त राज्य, अर्जेन्टीना, दक्षिणी-ब्राजील, जापान तथ आस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर पाई जाती है।

प्रश्न 2.
कोणधारी वन किस क्षेत्र में पाए जाते हैं?
उत्तर:
कोणधारी वन टैगा जलवायु क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसमें उत्तरी अमेरिका तथा युरेशिया। उत्तरी भाग शामिल है।

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प्रश्न 3.
टुण्डा जलवायु की क्या विशेषता है?
उत्तर:
इसमें कठोर ठंड वाली शीत ऋतु, ठंडी ग्रीष्म ऋतु, जिसका औसत तापमान 10°c से ऊपर नहीं होता, पाई जाती है।

प्रश्न 4.
कोपेन का वर्गीकरण कितने वर्गों में बंटा है?
उत्तर:
कोपेन का वर्गीकरण मुख्य रूप से 6 वर्गों में बंट है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के Capital Letters द्वारा लिखा जाता है।

  1. Tropical Rainy Climates (आई उष्णकटिबंधीय जलवायु)
  2. Dry Climates (शुष्क जलवायु)
  3. Warm Temperatures Climates (आई शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु)
  4. Cool Temperate Climates (शीतल हिम-वन जलवायु)
  5. Polar Climates (ध्रुवीय जलवायु)
  6. High Mountain Climates (उच्च पर्वतीय जलवायु)

प्रश्न 5.
जैतून (Olive) किस प्रदेश के प्रतिनिधि वृक्ष हैं?
उत्तर:
जैतून कैलीफोर्निया, मध्य चिल्ली तथा दक्षिणी अफ्रीका का प्रतिनिधि वृक्ष है। यह भूमध्य सागरीय जलवायु में पाया जाता है। इसकी जड़ें लम्बी और तने मोटे होते हैं।

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प्रश्न 6.
जलवायु विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
तापमान, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता-इन वायुमंडलीय अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले शास्त्र को जलवायु विज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 7.
उन तत्त्वों के नाम बताएं जिनके आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
जलवायु का वर्गीकरण निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया जाता है –

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वाष्पीकरण
  4. वाष्पोत्सर्जन
  5. जल संतुलन

प्रश्न 8.
दो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं के नाम बताएं जिनके नाम पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
थानवेट तथा कोपेन दो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हैं जिनके नाम पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया। प्रसिद्ध वर्गीकरण है –

  1. थार्नवेट वर्गीकरण
  2. कोपेन वर्गीकरण

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प्रश्न 9.
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में किस प्रकार के जलवायु आँकड़े प्रयोग किए जाते हैं।
उत्तर:

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वर्षा तथा तापमान का वनस्पति से सम्बन्ध कोपेन ने इन आंकड़ों के आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया।

प्रश्न 10.
मानसून जलवायु वाले क्षेत्र में किस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है?
उत्तर:
मानसून जलवायु वाले क्षेत्र में सदाबहार वन (महोगनी, देवदार) मिलते हैं। साल, सागवान मानसून धन में पाए जाते हैं, कम वर्षा वाले शुष्क वनों में झाड़ियाँ मिलती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्विवार्था के जलवायु वर्गीकरण के उद्देश्य स्पष्ट थे?
उत्तर:
उनका मानना था कि भूगोलवेत्ता, जीव वैज्ञानिक अथवा किसान, जैसे लोगों, को जिन्हें जलवायविक पर्यावरण को, अपने-अपने उद्देश्यों को समझने तथा उपयोग करने की आवश्यकता पड़ती है जलवायु के तथ्यों को सही जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ उन्होंने जलवायु के जननिक प्रकार के वर्गीकरण के गुणों को भी स्वीकार किया। उनके अनुसार-‘उत्पति’ न केवल रुचि बढ़ाती है, बल्कि वर्णन को समझने में विद्यार्थियों को अंत:दृष्टि का अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन की मात्रा बढ़ने से जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन गैस की वायुमण्डल में निरंतर वृद्धि से तापमान इस सीमा तक बढ़ जायगा कि इससे ग्रीनलैण्ड तथा अंटार्कटिका महाद्वीप में बर्फ पिघलनी आरम्भ हो जाएगी। फलतः समुद्र तक ऊपर उठगा जिससे तटीय भाग तथा द्वीप डूब जाएंगे। इससे वाष्पन एवं वर्षा के प्रतिरूपों में परिवर्तन आयेगा, पौधों की नई-नई बीमारियाँ तथा नाश आदि की समस्याएँ खड़ी होंगी और अंटार्कटिका के ऊपर स्थित ओजोन छिट बडा हो जायगा।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर कम से कम होता है?
उत्तर:
भूमध्यरेखीय खंड में वार्षिक तापान्तर सबसे कम होता है। यह प्रायः 5° सेमी से कम होता है। इस खंड में वर्ष भर समान रूप से वर्षा होती है तथा मेघ छाए रहते हैं। कम तापमान मिलते हैं तथा दिन-रात सदा समान होते हैं। परिणामस्वरूप वार्षिक तापान्तर होता है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डलीय प्रभाव किस प्रकार कार्य करता है?
उत्तर:
भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह प्रभाव कहते हैं, जिसे सामान्यतः वायुमंडलीय प्रभाव भी कहते हैं। वायुमण्डल का प्रभाव एक शीशे की भाँति काम करता है, जो आने वाली सौर ऊर्जा की, लघु तरंगों को अपने से होकर गुजरने देता है, लेकिन बाहर जाने वाली पार्थिव विकिरण की दीर्घ तरंगों को रोकता है। वायुमण्डलीय प्रभाव को समझने के लिए खिडकियाँ बंद करके अपनी कार को दो घंटों के लिए धूप में खड़ी कर दीजिए। अब कार के अंदर के तापमान का अनुभव कीजिए। यह बाहर के तापमान से अधिक होगा। शीत ऋतु में हरित गृह में काँच की छत की पारदर्शिता का उपयोग लघु तरंगों को ट्रैप करके टमाटर उगाने के लिए किया जा सकता है। चित्र में वायुमण्डलीय प्रभाव को दिखाया गया है।
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प्रश्न 5.
चीन तुल्य जलवायु वाले प्रदेशों के जलवायु लक्षण तथा वनस्पति का वर्णन करों।
उत्तर:
लक्षण-यह जलवायु चीन दक्षिणी-पूर्वी, संयुक्त राज्य, अर्जेन्टीना, दक्षिणी-ब्राजील, जापान तथा आस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर पाई जाती हैं। वार्षिक औसत तापमान 19°C तथा वर्षा 120 सेमी भी होती है। यहाँ हरिकेन तथा टाईफन भयानक रूप से चलते हैं। यहाँ ग्रीष्म और आई ऋतुएँ होती हैं। शीत ऋतु में हल्की ठंड पड़ती है। … प्राकृतिक वनस्पति-इस खंड में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन मिलते हैं। मैदानी भाग में ओक, कपूर, शहतूत, यूकेलिप्टस प्रमुख हैं, पर्वतीय भाग में पाईन तथा साइप्रस के कोणधारी वन मिलते हैं।

प्रश्न 6.
पश्चिमी यूरोपीय जलवायु उत्तरी दक्षिणी अमेरिका में केवल पतली समुद्र तटीय पट्टियों में ही क्यों पाई जाती है?
उत्तर:
उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में पश्चिमी यरोपीय खंड एक तंग पड़ी के रूप में चिली और कनाडा में मिलता है। निरंतर ऊँचे रॉकीज तथा एण्डीज पर्वतों की रोक के कारण इस खंड का विस्तार सीमित है। इस प्रकार की जलवायु 40° से 60° अक्षांशों के मध्य पाई जाती है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 10°C तथा वर्षा 140 सेमी के लगभग होती हैं। यहाँ समुद्र की निकटता, उष्ण सागरीय धाराओं तथा चक्रवातों के कारण सारा वर्ष परिवर्तनशील मौसम रहता है जो शारीरिक तथा मानसिक विकास के अनुकूल होता है। पश्चिमी पवनें वर्ष भर पर्याप्त वर्षा करती है।

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प्रश्न 7.
जलवायु विज्ञान की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर वायु का एक विस्तृत आवरण फैला हुआ है। तापमान, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता-इन वायुमंडलीय अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले शास्त्र को जलवाय विज्ञान कहते हैं। इनमें केवल वायुमण्डलीय क्रियाओं का ही नहीं अपितु जलवायु के विभिन्न तत्त्वों एवं नियंत्रकों का भी अध्ययन किया जाता है। जलवायु प्राकृतिक आवरण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह कृषि, सिंचाई भूमि उपयोग, परिवहन तथा मानवीय जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 8.
जलवायु का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?
उत्तर:
जलवायु में बहुत प्रकार की क्षेत्रीय विभिन्नताएं पाई जाती हैं। इसलिए जलवायु को कुछ मुख्य वर्गों में बांटा गया है। अनेक विधियों के आधार पर वर्गीकरण किया गया, परंतु कोई भी वर्गीकरण सर्वगुण संपन्न नहीं है। संसार की मुख्य जलवायु का वर्गीकरण निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया गया है –

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वाष्पीकरण
  4. वाष्पोत्सर्जन
  5. जल संतुलन

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रकार की जलवायु की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताइए

  1. सवाना जलवायु
  2. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु
  3. मानसूनी जलवायु
  4. भूमध्य रेखीय जलवायु
  5. भूमध्य-सागरीय जलवायु
  6. टैगा जलवायु
  7. टुण्डा जलवायु

उत्तर:

  1. सवाना जलवायु – वर्ष भर ऊँचा तापमान, आई ग्रीष्म ऋतु तथा शुष्क शीत ऋतु।
  2. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु – उच्चतम तापमान, 58° वर्षा कम, शुष्क ऋतु।
  3. मानसूनी जलवायु – गर्मियों में भारी वर्षा, शीत ऋतु, शुष्क।
  4. भूमध्य रेखीय जलवायु – अधिक वर्षा 35 से 90 सेमी, ग्रीष्म ऋतु में तापमान 25°C, शीत ऋतु में तापमान 10°C से भी कम।
  5. भूमध्य – सागरीय जलवायु-उष्ण और शुष्क ग्रीष्म ऋतु, मृदु शीत ऋतु, साधारण वर्षा शीत ऋतु में।
  6. टैगा जलवायु – छोटी ग्रीष्म ऋतु 10°C से 15°C तापमान, लंबी और कठोर शीत ऋतु, कम वर्षा गर्मी के महीनों में।
  7. टुण्ड्रा – कठोर ठंड वाली शीत ऋतु, ठंडी ग्रीष्म ऋतु, जिसका औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं होता।

प्रश्न 10.
मरुस्थलीय जलवायु तथ स्टेपी जलवायु में क्या अंतर है?
उत्तर:
मरुस्थलीय जलवायु तथा स्टेपी जलवाय में अंतर –
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प्रश्न 11.
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु 20° से 40° अक्षांशें के मध्य अनियमित पट्टी में क्यों पाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उष्णकटिबंधीय आई जलवायु 20 से 40 अक्षांशों के बीच एक अनियमित पट्टी के रूप में फैली हुई है। यहाँ का तापमान तथा वर्षा पूरे वर्ष भर अत्यधिक रहती है।

  • इस जलवायु क्षेत्र के आंतरिक भाग उपार्द्र होते हैं।
  • यह जलवायु विषुवत् रेखा के दोनों ओर लगभग 5 से 10 अक्षांशों के मध्य पाई जाती है।
  • महाद्वीपों के पूर्वी भाग में यह उपोष्ण जेट धारा तथा अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र के प्रभाव में रहती है।
  • महाद्वीपों के पूर्वी भागों में इनका विस्तार काफी अधिक है, क्योंकि व्यापारिक पवनें उत्तर:पूर्व से तटों की ओर आती हैं।

प्रश्न 12.
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अपेक्षा ट्विार्था के जलवायु वर्गीकरण के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोपेन का वर्गीकरण तापमान एवं वर्षण के मासिक तथा वार्षिक माध्यमों पर आधारित था। ट्रिवार्थी ने भी कोपेन के नियमों का अनुसरण किया।

दिवाओं के जलवायु वर्गीकरण के लाभ –

  • यह वर्गीकरण जननिक आधार पर किया गया है।
  • यह सरल तथा वर्णनात्मक है।
  • ट्रिवार्था ने केवल सीमित संख्या में, जो 15 से कम है, जलवायविक प्रकारों की पहचान की।
  • जलवायु के तथ्यों की सही जानकारी देती है।
  • जलवायु के विश्लेषण में वैज्ञानिक गुणवत्ता को बढ़ाती है।
  • वर्णन को समझने के लिए विद्यार्थियों को अंतर्दृष्टि का अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल में कार्बन वितरण का वर्णन कीजिए तथा कार्बन चक्र एवं ग्रीन हाऊस प्रभाव के मध्य सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
तीन प्रमुख हरित गृह गैसें-कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मिथेन (CH5), तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (CFC) में कार्बन होता है, जो पर्यावरण का सबसे सामान्य तत्त्व है, यह सभी जैविक पदार्थों में मौजूद है तथा साधारण गैस से लेकर पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन के अति विषम व्युत्पन्नों तका का एक घटक है, पर्यावरण में उपस्थित कार्बन गतिशील है। यह गतिशीलता एक’ प्राकृतिक जैव भू-रासायनिक चक्र द्वारा नियंत्रित की जाती है। सामान्यतः प्राकृतिक कार्बन चक्र स्वमेव नियमित होता है। तंत्र में कार्बन अनेक बड़े भंडारों से होकर गुजरता है।

वायुमण्डल में 750 अरब टन कार्बन रहता है, जबकि 2,000 अरब टन कार्बन स्थल तथा 4,000 अरब टन कार्बन महासागरों में संचित है, जैविक पदार्थ लगभग 450 से 600 अरब टन कार्बन अपने में रखता है, जो वायुमण्डल में संचित कार्बन से कुछ कम है। विश्व जीवश्मी इंधन भण्डार भी लगभग 5,000 अरब टन कार्बन का मुख्य भंडार है। इनके द्वारा रखे गए कार्बन लाखों वर्षों से कार्बन चक्र में शामिल नहीं है। जीवाश्मी ईधन को जलाने से प्रतिवर्ष वायुमण्डल में पाँच अरब टन कार्बन की मात्रा जोड़ दी जाती है।

मानव जनित कार्बन का प्राथमिक स्रोत जीवाश्मी ईंधन का उपयोग है। प्राकृतिक वनस्पति के विनाश से इसका संवर्धन होता है, क्योंकि प्राकृतिक वनस्पति प्रकाश संश्लेषण के दौरान पुनर्चक्रित कार्बन की मात्रा को घटाता है। ये प्रक्रियाएँ वर्तमान मानवजनित कार्बन निष्कासन के 5 से 20 प्रतिशत भाग के लिए उत्तरदायी हैं। 1850 और 1950 के बीच लगभग 120 अरब टन कार्बन, वनोन्मूलन तथा आग द्वारा अन्य वनस्पति के विनाश के फलस्वरूप वायुमण्डल में छोड़ा गया।

हरित गृह तथा कार्बन – चक्र में संबंध-वायुमण्डलीय गैसों के परमाणु एवं अणु हरित गृह गैसों, विशेषकर जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा मिथेन द्वारा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण तथा पश्च विकिरण करते हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड ज्वालामुखी क्रियाओं द्वारा लाया जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड की उतनी ही मात्रा वर्षण द्वारा हटा दी जाती है। मिथेन लकडी में बैक्टीरिया के उपापचय तथा घास चरने वाले पशुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है।

औद्योगिक तथा परिवहन क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसें पहुँचाई जाती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई मात्रा भूमण्डलीय तापमान को बढ़ाने का काम करती है। भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह प्रभाव कहते हैं। यह एक शीशे की भाँति काम करता है। यह भपृष्ठीय तापमान को उस तापमान से ऊँचा रखता है, जो इस प्रक्रिया के अभाव में होता है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण
  2. उपोष्ण जलवायु
  3. भूमण्डलीय जलवायु परिवर्तन।

उत्तर:
1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण – जर्मनी के प्रसिद्ध जलवायु वैज्ञानिक डॉ. कोपेन ने सन् 1936 में जलवायु वर्गीकरण की योजना बनाई। यह वर्गीकरण तापमान और वर्षा पर आधारित है। इसमें तापमान और वर्षा के संख्यात्मक मूल्यों का प्रयोग किया गया है। इन आंकड़ों को प्राकृतिक वनस्पति के विकास का आधार माना गया है। इसके अनुसार प्राकृतिक वनस्पति का विकास वर्षा की प्रभावशीलता पर निर्भर करता है। जलवायु प्रकारों की सीमाओं का निर्धारण करते समय अधिक गर्म तथा सबसे ठंडे महीनों के तापमान को आधार बनाया गया है। कोपेन का वर्गीकरण मुख्य रूप से 6 वर्गों में बँटा है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के Capital Letter द्वारा लिखा गया है
(A) आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु
(B) शुष्क जलवायु
(C) आई शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु
(D) शीतल हिम-वन
(E) ध्रुवीय जलवायु
(F) उच्च पर्वतीय जलवायु

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण:
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2. उपोष्ण जलवायु – यह जलवायु उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के बीच पाई जाती है। इस प्रकार की जलवायु में तापमान वर्ष के 8 महीने 18° से ऊपर रहता है। शीत ऋतु अल्पकालीन होती है। तटीय भागों में वर्ष भर वर्षा होती है। वर्षा वितरण के आधार पर उपोष्ण जलवायु दो प्रकार की है

(क) उपोष्ण आर्द्र (cfw) – यह महाद्वीपों के पूर्वी भागों में मिलती है। इस जलवायु में वर्ष भर वर्षा होती है।
उपोष्ण शुष्क ग्रीष्म – इस प्रकार में मध्यम वर्षा से कम वर्षा प्राप्त होती है। वर्षा सर्दियों में होती है, जबकि गर्मियाँ शुष्क होती हैं।

3. भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन – वायुमण्डल प्रकृतिवश गतिशील है। इसमें होने वाले परिवर्तन क्षेत्रीय होने के साथ-साथ समयानुसार भी होते हैं। ये परिवर्तन पृथ्वी के वायुमंडलीय प्रणाली में अंत: प्रेरित हो सकते हैं, अथवा पार्थिवेतर कारकों द्वारा बहिप्रेरित हो सकते हैं। भूमण्डलीय ऊष्मन एक ऐसा ही परिवर्तन है, जो मानव द्वारा लगातार और अधिकाधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ‘हरित गृह’ गैसों को वायुमण्डल में पहुंचाए जाने से उत्पन्न हुआ है।

वायुमण्डलीय गैसों के परमाणु एवं अणु हरित गृह गैसों द्वारा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण तथा पश्च विकिरण करते हैं। वायुमण्डल में CO2 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा लाई जाती है। CO2 की उतनी ही मात्रा वर्षण द्वारा हटा दी जाती है। मिथेन, जो CO2 से बीस गुना अधिक प्रभावशाली है, लकड़ी में बैक्टीरिया के उपापचय तथा घास चरने वाले पशुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है। मिथेन का शीघ्रता से कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकरण होता है।

मानवीय क्रियाओं, जैसे जीवाश्मी तेल को जलाने तथा विभिन्न कृषकीय क्रियाओं द्वारा मिथेन एवं कार्बन डाईऑक्साइड वायुमण्डल में जमा की जा रही है। वायुमण्डल में CO2 की मात्रा सम्पूर्ण विश्व की जलवायु बदलने में मुख्य भूमिका अदा करती है। इससे यह स्पष्ट है कि CO2 की मात्रा में परिवर्तन वायुमण्डल के निचले स्तर के तापमान में परिवर्तन लायेगा।

तीन औद्योगीकरण तथा कृषि और परिवहन क्षेत्रों में हुई तकनीकी क्रांति से भी वायुमण्डल में CO2 मिथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन की मात्रा बढ़ी है। इनमें से कुछ गैसें पेड़-पौधों द्वारा उपभोग कर ली जाती हैं तथा कुछ भाग महासागरों में घुल जाता है। फिर भी 50% वायुमण्डल में बच जाता है। चावल उत्पादन करने वाले किसान, कोयला खनिज, डेरी में लगे लोग तथा स्थानांतरी कृषक भी भूमण्डलीय ऊष्मन में अपना योगदान देते हैं। भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह कहते हैं।

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प्रश्न 3.
जलवायु तथा मौसम में क्या अंतर है? उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
मौसम के मुख्य तत्त्व हैं-तापक्रम, दबाव, हवाएँ, नमी, मेघ और वर्षा। वायुमण्डल की इन दशाओं का अध्ययन ही जलवायु या मौसम है।

मौसम – मौसम का अर्थ किसी स्थान पर किसी विशेष या निश्चित समय में वायुमण्डल की। दशाओं, तापक्रम, दबाव, हवाओं, नमी, मेघ और वर्षा के कल जोड का अध्ययन करना है। इसलिए मौसम मानचित्रों पर दिन व समय अवश्य लिखे जाते हैं। मौसम प्रतिदिन, प्रति सप्ताह, प्रति मास बदलता रहता है।

एक ही स्थान पर कभी मौसम गर्म, कभी उमस वाला, कभी आई हो सकता है। इंगलैण्ड में दिन-प्रतिदिन के मौसम में इतनी विभिन्नता है कि कहा जाता है, “Britain has no climate, only weather” इस प्रकार वायुमण्डल की बदलती हुई अवस्थाओं को मौसम कहा जाता है। आकाशवाणी से मौसम की स्थितियों का प्रसारण भी होता है।

जलवायु – किसी स्थान की जलवायु उस स्थान पर एक लम्बे समय की वायुमंडल की दशाओं के कुल योग का अध्ययन होती है। यह एक लम्बे समय का औसत मौसम होती है। जलवाय तथा मौसम में भिन्नता समय पर निर्भर करती है। मौसम का सम्बन्ध थोडे समय से है जबकि जलवायु का सम्बन्ध एक लम्बे समय से है।

मिन का हर रोज एक जैसा मौसम न होने के कारण जलवायु तथा मौसम में कोई अंतर नहीं है। इसलिए कहा जाता है, “Egypt has no weather, only climate.” इस प्रकार किसी स्थान पर कम से कम पिछले 35 वर्षों के मौसम की औसत दशाओं को उस स्थान पर जलवायु कहते हैं। भारतीय जलवायु के अध्ययन के आँकड़ों का सम्बन्ध पिछले 100 वर्षों से है।

उदाहरण – दिल्ली में किसी विशेष दिन अधिक वर्षा हो तो हम कहते हैं कि आज मौसम आई है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि दिल्ली की जलवायु ‘आई’ है। दिल्ली में ग्रीष्मकाल में अधिक वर्षा होती है तथा जलवायु मानसूनी है।

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प्रश्न 4.
मनुष्य के लिए जलवायु विज्ञान का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
जलवायु सबसे व्यापक और शक्तिशाली तत्त्व है जो कि मानवीय जीवन पद्धति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती है। मानवीय क्रियाकलापों, स्वास्थ्य, भोजन वस्त्र, मकान, परिवहन तथा संस्कृति आदि पर जलवायु का व्यापक नियंत्रण रहता है।

1. जलवायु तथा भोजन – जलवायु मानव के जीवन को निर्धारित करती है। ठंडे प्रदेशों में शरीर की उष्णता बनाए रखने के लिए मांस, मदिरा तथा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। उष्ण प्रदेशों में कम मात्रा में भोजन का प्रयोग किया जाता है। मानसूनी जलवायु में चावल मुख्य भोजन है। शीत-कृष्ण जलवायु में डेयरी पदार्थों का अधिक प्रयोग किया जाता है। शुष्क प्रदेशों में बकरी, भेड़ तथा ऊँट के दूध का प्रयोग किया जाता है।

2. जलवायु तथा वस्व – जलवायु की विभिन्नता के अनुसार वस्त्रों के उपयोग में भी विभिन्नता पाई जाती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में वस्त्रों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। ठंडे प्रदेशों में ऊनी वस्त्र प्रयोग किए जाते हैं। टुण्डा प्रदेश में खाल या समूर के वस्त्र पहने जाते हैं।

3. जलवायु तथा मकान – मकानों की रचना पर जलवायु का प्रभाव पड़ता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बलानदार छतें बनाई जाती है। टुण्ड्रा प्रदेश में बर्फ से बने घर (इग्लू) बनाए जाते हैं। भूमध्य खण्ड में लोग झोपड़ियों में निवास करते हैं, जबकि मध्य एशिया के किरगीज लोग तम्बओं में रहते हैं।

4. जलवायु तथा कृषि – जलवायु कृषि को निर्धारित करती है। अधिक वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण मानसूनी प्रदेशों में चावल की कृषि होती है तथा वर्ष में तीन-तीन फसलें पैदा होती हैं। टुण्ड्रा प्रदेश में कम तापमान के कारण कृषि नहीं होती। शुष्क प्रदेशों में सिंचाई से फसलें उत्पन्न की जाती हैं। .

5. जलवायु तथा कार्य क्षमता – जलवायु मनुष्य के स्वास्थ्य, शारीरिक तथा मानसिक विकास पर प्रभाव डालती है। शीत जलवायु प्रदेश के लोग परिश्रमी व साहसी होते हैं तथा उनकी कार्यक्षमता अधिक होती है। उष्ण प्रदेशों के लोग आलसी तथा कम परिश्रमी होते हैं तथा इनका मानसिक विकास भी कम होता है । उष्ण-आर्द्र भूमध्यरेखीय जलवायु में कई बीमारियों तथा कीड़ों के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

6. जलवायु तथा मानवीय क्रियाकलाप – मानवीय क्रियाओं के निर्धारण में जलवायु एक महत्त्वपूर्ण कारक है। आई प्रदेशों में सूती वस्त्र उद्योग, शुष्क प्रदेशों में फिल्म उद्योग तथा सागरीय जलवायु में फलों पर आधारित उद्योग स्थापित हैं। जलवायु आर्थिक विकास तथा सभ्यता के विकास में एक सम्पन्न भौगोलिक तत्त्व है। शीत-उष्ण प्रदेशों में अनुकूल जलवायु के कारण ही जनसंख्या अधिक है। जलवायु का प्रभाव परिवहन साधनों तथा व्यापारिक मार्गों पर भी पड़ता है। इस प्रकार जलवायु मानवीय क्रियाकलापों, सभ्यता तथा जीवन पद्धति पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 5.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. जलवायु का जननिक एवं आनुभाविक वर्गीकरण
  2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु तथा उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु
  3. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु

उत्तर:
1. जलवायु का जननिक एवं आनुभाविक वर्गीकरण –
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2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु तथा उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु –
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3. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु –
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प्रश्न 6.
ट्विार्था द्वारा बनाए गए बड़े जलवायु समूहों का वर्णन कीजिए। इसके वर्गीकरण के क्या आधार हैं?
उत्तर:
ट्रिवार्था ने तापमान तथा वर्षा के आधार पर विश्व की जलवायु को 6 बड़े जलवायु समूहों में बाँटा है। इन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में चिह्नित किया गया है। इसमें से पाँच-‘ए’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘एफ’ तापमान पर आधारित हैं और छठा ‘बी’ शुष्क वर्ग में है, जो वर्षा पर आधारित है।

तापमान के आधार पर जलवायु समूह –
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (ए) – यह जलवायु विषुवत् रेखा के साथ 20° से 40° अक्षांशों के मध्य अनियमित पट्टी के रूप में फैली हुई है। तटीय क्षेत्रों में सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18° से. से ऊपर रहता है। ‘ए’ जलवायु क्षेत्र के आंतरिक भाग उपार्द्र होते हैं। इसे उष्णकटिबंधीय आई जलवायु कहते हैं।

महाद्वीपों के पूर्वी भागों में यह जलवायु अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र तथा उपोष्ण जेट धारा के प्रभाव में रहती है। इसे उष्णकटिबंधीय वर्षा वन भी कहते हैं। उष्णकटिबंधीय आई एवं शुष्क जलवायु में शीत ऋतु शुष्क होती है। इस जलवायु को सवाना जलवायु भी कहते हैं।

उपोष्ण जलवायु ‘सी’ – यह जलवायु उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के बीच पाई जाती है यहाँ तापमान वर्ष के 8 महीने 18° से. से ऊपर रहता है। तटीय भाग में वर्ष भर वर्षा होती है। ऋतुनिष्ठ वर्षा वितरण के आधार पर उपोष्ण जलवायु दो प्रकार की है-उपोष्ण आर्द्र तथा उपोष्ण शुष्क ग्रीष्म।

  • उपोष्ण आर्द्र – वर्ष भर वर्षा होती है।
  • उपोष्ण शुष्क – मध्य से कम वर्षा। वर्षा सर्दियों में होती है।

शीतोष्ण जलवायु ‘डी’ – यह मध्य अक्षांशों (40 से 65° उत्तर – दक्षिण) के विस्तृत भू-भागों में मिलती है। शीतोष्ण जलवायु के दो प्रकार हैं

  • शीतोष्ण जलवायु – शीत ऋतु मृदु तथा ग्रीष्म ऋतु कुछ गर्म होती है। वर्ष भर औसतन तापमान 0°C से ऊपर रहता है और वर्षा होती है।
  • शीतोष्ण महाद्वीपीय जलवायु – शीत ऋतु अत्यधिक सर्द तथा ग्रीष्म ऋतु शीतल होती हैं। वार्षिक वर्षा कम है। भूमि का शीतलन प्रतिचक्रवातों से जुड़ा है।

बोरियल जलवायु ‘ई’ – उच्चतर-मध्य अक्षांशों में यह जलवायु मिलती है। ग्रीष्म ऋतु छोटी और शीतल होती है। वार्षिक तापमान 0° से 10°C के मध्य रहता है। वर्षा बहुत कप और गर्मियों में होती है। विश्व के शंकुधारी वनों में यह जलवायु देखने को मिलती है।

ध्रुवीय जलवायु ‘एफ’ – ध्रुवीय जलवायु उच्च अक्षांशों तथा हिमालय के आल्प्स पर्वतों के ऊँचे भागों में मिलती है। औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं जाता । यहाँ गर्मियों का मौसम नहीं होता। तापमान के आधार पर ध्रुवीय जलवायु को दो प्रकारों में बाँटा गया है

  • टुण्डा जलवायु – यह केवल उत्तरी-गोलार्द्ध में पाई जाती है। यह चरम शीत प्रदेश है। यहाँ स्थाई रूप से पाला रहता है।
  • हिमटोप जलवायु – यह ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भागों में पाई जाती है। गर्मियों में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है। इस क्षेत्र में वर्षा थोड़ी मात्रा में होती है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल में जल Text Book Questions and Answers

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(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव के लिए वायुमण्डल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है ……………….
(क) जलवाष्प
(ख) धूल कण
(ग) नाइट्रोजन
(घ) ऑक्सीजन
उत्तर:
(क) जलवाष्प

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन सी है जिसके द्वारा जल द्रव से गैस में बदल जाता है ……………….
(क) संघनन
(ख) वाष्पीकरण
(ग) वाष्पोत्सर्जन
(घ) अवक्षेपण
उत्तर:
(ख) वाष्पीकरण

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है?
(क) सापेक्ष आर्द्रता
(ख) निरपेक्ष आर्द्रता
(ग) विशिष्ट आर्द्रता
(घ) संतृप्त हवा
उत्तर:
(घ) संतृप्त हवा

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन-सा है?
(क) पक्षाभ
(ख) वर्षा मेघ
(ग) स्तरी
(घ) कपासी
उत्तर:
(घ) कपासी

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वषर्ण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:
उत्पत्ति के आधार पर वर्षा के तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवहनीय वर्षा
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. चक्रवाती वर्षा

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

  1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute humidity) – वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहा जाता है।
  2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative humidity) – दिये गये तापमान पर अपनी पूरी क्षमता की तुलना में मौजूद आर्द्रता के प्रतिशत को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
  3. संतृप्त आर्द्रता (Saturated humidity) – दिये गये तापमान पर जलवाष्प से पूरी तरह पूरित हवा को संतृप्त आर्द्रता कहते हैं।

प्रश्न 3.
(i) ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों बढ़ती है?
उत्तर:
वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण तथा संघनन के कारण क्रमश बढ़ती-घटती रहती है। वाष्पीकरण का मुख्य कारण ताप है। ऊष्मा का ह्रास ही संघनन का कारण होता है।

(ii) बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
बादल पानी की छोटी बूंदों या बर्फ के छोटे रवों की संहति होते हैं जो कि पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण बनते हैं। इनकी ऊंचाई, विस्तार, घनत्व तथा पारदर्शिता या अपारदर्शिता के आधार पर बादलों को चार प्रकार में वर्गीकृत किया गया है –

  • पक्षाभ मेघ (Citrus)
  • कपासी (Cumulus)
  • स्तरी (Stratus) और
  • वर्षा मेघ (Nimbus)

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वार्षिक वर्षन की कुल मात्रा के आधार पर विश्व की मुख्य वर्षण प्रवृति को निम्नलिखित रूपों में पहचाना जाता है विषुवतरेखीय पट्टी, शीतोष्ण प्रदेशों में पश्चिमी तटीय किनारों के पास के पर्वतों की वायु की ढाल पर तथा मानसून वाले क्षेत्रों के तटीय भागों में वर्षा बहुत अधिक होती है, जो प्रतिवर्ष 200 सेमी से ऊपर होती है। महाद्वीपों के आंतरिक भागों में प्रतिवर्ष 100 से 200 सेमी वर्षा होती है। महाद्वीपों के तटीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा 50 से 100 सेमी प्रतिवर्ष तक होती है। महाद्वीपों के भीतरी भाग के वृष्टि छाया क्षेत्रों में पड़ने वाले भाग तथा ऊँचे-अक्षांशों वाले क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। कुछ क्षेत्रों में जैसे विषुवतरेखीय पट्टी तथा ठंडे समशीतोष्ण प्रदेशों में वर्षा पूरे वर्ष होती रहती है।

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प्रश्न 2.
संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने के प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ओस, कुहरा, तुषार एवं बादल; स्थिति एवं तापमान के आधार पर संघनन के प्रकारों को वर्गीकृत किया जा सकता है। संघनन तब होता है जब ओसांक जमाव बिन्दु से नीचे होता है तथा तब भी संभव है जब ओसांक जमाव बिंदु से ऊपर होता है।

ओस (Dew) – जब आर्द्रता धरातल के ऊपर हवा में संघनन केन्द्रकों पर संघनित न होकर ठोस वस्तु जैसे-पत्थर, घास तथा पौधों की पत्तियों की ठंडी सतहों पर पानी की बूंदों के रूप में जमा होती है तब इसे ओस के नाम से जाना जाता है। इसके बनने के लिए सबसे उपयुक्त अवस्थाएँ साफ आकाश, शांत हवा, उच्च सापेक्ष आर्द्रता तथा ठंडी एवं लम्बी रातें हैं। ओस बनने के लिए यह आवश्यक है कि ओसांक जमाव बिंदु से ऊपर हो।

तुषार (Frost) – ठंडी सतहों पर बनता है जब संघनन तापमान के जमाव बिंदु से नीचे (0°से) चले जाने पर होता है अर्थात् ओसांक बिंदु पर या उसके नीचे होता है। अतिरिक्त नमी पानी की बूंदों की बजाए छोटे-छोटे बर्फ के रवों के रूप में जमा होती है। उजले तुषार के बनने की सबसे उपर्युक्त अवस्थायें, ओस के बनने की अवस्थाओं के समान है, केवल हवा का तापमान जमाव बिन्दु पर या उससे नीचे होना चाहिए ।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
जून से 31 दिसम्बर तक के समाचार-पत्रों से सूचनाएँ एकत्र कीजिए कि देश के किन भागों में अत्यधिक वर्षा हुई।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अध्यापक या माता-पिता की मदद से इन परियोजना को स्वयं करें।
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ओसांक क्या है?
उत्तर:
जिस तापमान पर किसी वायु का जलवाष्प जल रूप में बदलना शुरू हो जाता है, उस तापमान को ओसांक कहते हैं।

प्रश्न 2.
वृष्टि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मुक्त वायु से वर्षा जल, हिम वर्षा तथा ओलों के रूप में जलवाष्प का धरातल पर गिरना वृष्टि कहलाता है। किसी क्षेत्र पर वायुमण्डल से गिरने वाली समस्त जलराशि को तृष्टि कहा जाता है।

प्रश्न 3.
संघनन प्रक्रिया कब होती है?
उत्तर:
जिस प्रक्रिया द्वारा वायु के जलवाष्प जल के रूप में बदल जाएँ, उसे संघनन कहते हैं। जलकणों के वाष्प का गैस से तरल अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन कहते हैं।

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प्रश्न 4.
आर्द्रता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वाय में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वाय में सदा जलवाष्प भरे होते हैं, जिससे वायु नमी प्राप्त करती है। जलवाष्प की मात्रा वायुमण्डल में आर्द्रता का बोध कराती है।

प्रश्न 5.
वाष्पीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस क्रिया द्वारा तरल तथा जल-गैसीय पदार्थ जलवाष्प में बदल जाते हैं, उसे वाष्पीकरण कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा परिमाण चार घटकों पर निर्भर करती हैं-शुष्कता, तापमान, वायु परिसंचरण तथा जलखंड।

प्रश्न 6.
सापेक्ष आर्द्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी तापमान पर वायु में कुल जितनी नमी समा सकती है उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

प्रश्न 7.
हल्के कोहरे को क्या कहते हैं?
उत्तर:
हल्के कोहरे को धुंध कहते हैं। औद्योगिक नगरों में धुंए के साथ उड़ी हुई राख पर जल-बिंदु टिकने से कोहरे छाया रहता है। ऐसे कोहरे को धुंध (Smog) कहते हैं।

प्रश्न 8.
‘हिमपात’ कैसे होता है?
उत्तर:
जब संघनन हिमांक (32°F) से कम तापमान पर होता है तो जल कण हिम में बदल जाते हैं और हिमपात होता है। दण्डा प्रदेश की समस्त वर्षा हिमपात के रूप में होती है।

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प्रश्न 9.
बादल (मेघ) कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
ऊंचाई के अनुसार मेघ तीन प्रकार के होते हैं

  1. उच्च स्तरीय मेघ – (6000 से 10000 मीटर तक ऊंचे) जैसे-पक्षाभ, स्तरी तथा कपास मेघ ।
  2. मध्यम स्तरीय मेघ – (3000 से 6000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-मध्य कपासी शिखर मेघ ।
  3. निम्न स्तरीय मेघ – (3000 मीटर तक ऊंचे मेघ) जिनमें स्तरी, कपासी मेघ, वर्षा स्तरी मेघ, कपासी वर्षा मेघ शामिल हैं।

प्रश्न 10.
बादल कैसे बनते हैं?
उत्तर:
वायु के ऊपर उठने तथा फैलने से उसका तापमान ओसांक से नीचे हो जाता है। इससे हवा में संघनन होता है। ये जलकण वायु में आर्द्रताग्राही कणों पर जमकर बादल बन ‘जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ओसांक क्या है? नमी की मात्रा से इसका क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
संतप्त वायु के ठंडे होने से जलवाष्प जल के रूप में बदल जाते हैं। जिस तापमान पर किसी वायु का जलवाष्प जल रूप में बदलना शुरू हो जाता है उस तापमान को ओसांक कहते हैं। जिस तापमान पर संघनन की क्रिया आरम्भ होती है उसे ओसाांक या संघनन तापमान कहा जाता है। ओसांक तथा नमी की मात्रा में प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है, जब सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है तो संघनन की क्रिया जल्दी होती है। थोड़ी मात्रा में शीतलन की क्रिया से वायु ओसांक पर पहुँच जाती है। परन्तु कम सापेक्ष आर्द्रता के कारण संघनन नहीं होता । संघनन के लिए तापमान का ओसांक के निकट या नीचे होना आवश्यक है।

प्रश्न 2.
आर्द्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायु में उपस्थित जलवाष्म की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वायु में सदा जलवाष्प होते हैं, जिससे वायु नमी प्राप्त करती है। वायुमण्डल में कुल भार का 2% भाग जलवाष्प के रूप में मौजूद है। यह जलवाष्प महासागरों, समुद्रों, झीलों, नदियों आदि के जल से वाष्पीकरण द्वारा प्राप्त होता है। आर्द्रता के दो माप हैं-सापेक्ष आर्द्रता तथा निरपेक्ष आर्द्रता । वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा से ही आर्द्रता का बोध होता है।

प्रश्न 3.
‘कोहरा’ कैसे बनता है?
उत्तर:
कोहरा एक प्रकार का बादल है जो धरातल के समीप वायु में धूल कणों पर लटके हुए जल-बिन्दुओं से बनता है। ठंडे धरातल या ठंडी वायु के सम्पर्क से नमी से भरी हुई वायु जल्दी ठंडी हो जाती है। वायु में उड़ते रहने वाले धूल कणों पर जलवाष्प का कुछ भाग जल बिन्दुओं के रूप में जमा हो जाता है। जिससे वातावरण धुंधला हो जाता है तथा 200 मीटर से अधिक दूरी की वस्तु दिखाई नहीं देती तब वायुयानों की उड़ाने स्थगित करनी पड़ती हैं। यह प्रायः साफ तथा शांत मौसम में, शीत ऋतु की लम्बी रातों के कारण बनता है जब धरातल पूरी तरह ठंडा हो जाता है। इसे कोहरा भी कहते हैं। नदियों, झीलों व समुद्रों के समीप के प्रदेशों में भी कोहरा मिलता है।

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प्रश्न 4.
संसार में वर्षा का वार्षिक वितरण बताएँ।
उत्तर:
संसार में वर्षा का वितरण समान नहीं है। भूपृष्ठ पर होने वाली कुल वर्षा का 19 प्रतिशत महाद्वीपों पर तथा 81 प्रतिशत महासागरों से प्राप्त होता है। संसार की औसत वार्षिक वर्षा 975 मिलीमीटर है।

  1. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र – इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का औसत 200 सेंटीमीटर है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र तथा मानसूनी प्रदेशों के तटीय भागों में अधिक वर्षा होती है।
  2. सामान्य वर्षा वाले क्षेत्र – इन क्षेत्रों में 100 से 200 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। यह क्षेत्र उष्ण कटिबन्ध में स्थित है तथा ये मध्यवर्ती पर्वतों पर मिलते हैं।
  3. कम वर्षा वाले क्षेत्र – महाद्वीपों के मध्यवर्ती भाग तथा शीतोष्ण कटिबन्ध के पूर्वी तटों पर 25 से 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है।
  4. वर्षा विहीन प्रदेश – गर्म मरुस्थल, ध्रुवीय प्रदेश तथा वृष्टि छाया प्रदेशों में 25 सेंटीमीटर से कम वर्षा होती है।

प्रश्न 5.
वृष्टि किसे कहते हैं? वृष्टि के कौन-कौन से रूप हैं?
उत्तर:
किसी क्षेत्र पर वायुमण्डल से गिरने वाली समस्त जलराशि को वृष्टि कहा जाता है। मुक्त वायु से वर्षा, जल, हिम वर्षा तथा ओलों के रूप में जलवाष्प का धरातल पर गिरना वृष्टि कहलाता है। वृष्टि मुख्य रूप से तरल तथा ठोस रूप में पाई जाती है। इसके तीन रूप हैं –

  • जलवर्षा
  • हिमवर्षा
  • ओला वृष्टि

वृष्टि ओसांक से कम तापमान पर संघनन से होने वाली ओला वृष्टि 0°C या 32°F से कम तापमान पर होती है।

प्रश्न 6.
संघनन कब और कैसे होता है?
उत्तर:
जिस क्रिया द्वारा वायु के जलवाष्प जल के रूप में बदल जाएँ, उसे संघनन कहते हैं। जल कणों के वाष्प का गैस से तरल अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन कहते हैं। वायु का तापमान कम होने से उस वायु की वाष्प धारण करने की शक्ति कम हो जाती है। कई बार तापमान इतना कम हो जाता है कि वायु जलवाष्प का सहारा नहीं ले सकती और जलवाष्प तरल रूप में वर्षा के रूप में गिरता है।

इस क्रिया के उत्पन्न होने के कई कारण हैं –

  • जब वायु लगातार ऊपर उठकर ठंडी हो जाए।
  • जब नमी से लदी वायु किसी पर्वत के सहारे ऊँचे उठकर ठंडी हो जाए।
  • जब गर्म तथा ठंडी वायुराशियाँ आपस में मिलती हैं। कोहरा, धुंध, मेघ, ओले, हिम, ओस, पाला आदि संघनन के विभिन्न रूप हैं।

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प्रश्न 7.
किसी स्थान की वर्षा किन तत्त्वों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
किसी स्थान की वर्षा निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती हैं –

  1. भूमध्य रेखा से दूरी – भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अधिक गर्मी के कारण वर्षा अधिक होता है।
  2. समुद्र से दूरी – तटवती प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में कम।
  3. समुद्र तल से ऊँचाई – पर्वतीय भागों में मैदानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।
  4. प्रचलित पवनें – सागर से आने वाली पवनें वर्षा करती हैं परन्तु स्थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।
  5. महासागरीय धाराएँ – ऊष्ण धाराओं के ऊपर गुजरने वाली पवनें अधिक वर्षा करती हैं, इसके विपरीत शीतल पवनों के ऊपर से गुजरने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

प्रश्न 8.
ओस तथा ओसांक में क्या अंतर है?
उत्तर:
ओस तथा ओसांक में अंतर –
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प्रश्न 9.
वर्षा तथा वृष्टि में क्या अंतर है?
उत्तर:
वर्षा तथा वृष्टि में अंतर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वर्षा किस प्रकार होती है? वर्षा के विभिन्न प्रकारों का उदाहरण सहित वर्णन करो।
उत्तर:
वायु की आर्द्रता ही वर्षा का आधार है। वर्षा होने का मुख्य कारण संतृप्त वायु का ठंडा होना है। वर्षा होने की क्रिया कई पदों में होती है –
1. संघनन होना – नम वायु के ऊपर उठने से उसका तापक्रम प्रति 1000 फूट (300 मीटर) पर 5.6°F घटता जाता है। तापमान के निरन्तर घटने से वायु की वाष्प शक्ति घट जाती है। वायु संतृप्त हो जाती है तथा संघनन क्रिया होती है।

2. मेघों का बनना – वायु में लाखों धूल कण तैरते-फिरते हैं। जलवाष्प इन कणों पर जमा हो जाते हैं। ये मेघों का रूप धारण कर लेते हैं।

3. जल कणों का बनना – छोटे-छोटे मेघ कणों के आपस में मिलने से जल की बँदें बनती हैं। जब इन जल कणों का आकार व भार बढ़ जाता है तो वायु इसे सम्भाल नहीं पाती । ये जल कण पृथ्वी पर वर्षा के रूप में गिरते हैं। इस प्रकार जल कणों का पृथ्वी पर गिरना ही वर्षा कहलाता है।

वर्षा के प्रकार – वायु तीन दशाओं में ठंडी होती है –

  • गर्म तथा नम वायु का संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठना।
  • किसी पर्वत से टकराकर नम वायु का ऊपर उठना।
  • ठंडी तथा नर्म वायु का आपस में मिलना।

इन दशाओं के आधार पर वर्षा तीन प्रकार की होती है –
1. संवहनीय वर्षा – स्थल पर अधिक गर्मी के कारण वायु गर्म होकर फैलती है तथा हल्की हो जाती है। यह वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और इस वायु का स्थान लेने के लिए पास वाले अधिक दबाव वाले खंड से ठंडी वायु आती है। यह वायु भी गर्म होकर ऊपर उठती है। इस प्रकार संवाहिक धाराएँ उत्पन्न हो जाती है तथा वर्षा होती है। यह वर्षा घनघोर, अधिक मात्रा में तथा तीव्र बौछारों के रूप में होती है।
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2. पर्वतीय वर्षा – किसी पर्वत के सहारे ऊपर उठती हुई नम पवनों द्वारा वर्षा को पर्वतीय वर्षा कहते हैं। यह वर्षा पर्वतों की पवन विमुख ढाल पर बहुत कम होती है।
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3. चक्रवातीय वर्षा – चक्रवात में गर्म व नम वायु ठंडी शुष्क वायु के मिलने से ठंडी वायु गर्म वायु को ऊपर उठा देती है। आई वायु ऊष्ण धारा के सहारे ठंडे वायु से ऊपर चढ़ जाती . है। ऊपर उठने पर गर्म वायु का जलवाष्प ठंडा होकर वर्षा के रूप में गिरता है। इसे चक्रवातीय वर्षा कहते हैं। यह वर्षा लगातार, बहुत थोड़ी देर तक, परन्तु थोड़ी मात्रा में होती है।
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प्रश्न 2.
निरपेक्ष आर्द्रता तथा सापेक्ष आर्द्रता क्या है? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।।
उत्तर:
किसी समय किसी तापमान पर वायु में जितनी नमी मौजूद हो, उसे वायु की निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। यह ग्राम प्रति घन सेमी द्वारा प्रकट की जाती है। इस प्रकार निरपेक्ष आर्द्रता को वायु के प्रति आयतन जलवाष्प के भार के रूप में परिभाषित किया जाता है। तापमान बढ़ने या घटने पर भी वायु की वास्तविक आर्द्रता वही रहेगी जब तक उसमें और अधिक जलवाष्प शामिल न हो या कुल जलवाष्प पृथक् न हो जाए वाष्पीकरण द्वारा निरपेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है तथा वर्षा द्वारा कम हो जाती है। वायु के ऊपर उठकर फैलने या नीचे उतरकर सिकुड़ने से भी यह मात्रा बढ़ या घट जाती है।

वितरण –

  • भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक निरपेक्ष आर्द्रता होती है तथा ध्रुवों की ओर घटती जाती है।
  • ग्रीष्म ऋतु में शीतकाल की अपेक्षा तथा दिन में रात की अपेक्षा वायु की निरपेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
  • निरपेक्ष आर्द्रता महासागरों पर स्थल खंडों की अपेक्षा अधिक होती है।
  • इससे वर्षा के सम्बन्ध में अनुमान लगाने में सहायता नहीं मिलती।

सापेक्ष आर्द्रता – किसी तापमान पर वायु में कुल जितनी नमी समा सकती है उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
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दूसरे शब्दों में यह वायु की निरपेक्ष नमी तथा उसकी वाष्प धारण करने की क्षमता में प्रतिशत अनुपात है।
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सापेक्ष आर्द्रता को प्रतिशत में प्रकट किया जाता है। इसे वायु संतृप्तता का प्रतिशत अंश भी कहा जाता है। वायु के फैलने व सिकुड़ने में सापेक्ष आर्द्रता बदल जाती है। तापमान के बढ़ने से वायु की वाष्प ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सापेक्ष आर्द्रता कम हो जाती है। तापमान घटने से वायु ठंडी हो जाती है तथा वाष्प ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है। इस प्रकार सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है।

वितरण –

  • भूमध्य रेखा पर सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
  • उष्ण मरुस्थलों में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है।
  • कम वायु दबाव क्षेत्रों में सापेक्ष आर्द्रता अधिक परन्तु अधिक दबाव क्षेत्रों में कम होती है।
  • महाद्वीपों के भीतरी क्षेत्रों में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है।
  • दिन में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है, परन्तु रात्रि में अधिक।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –

  1. संघनन
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. उच्च मेघ
  4. वृष्टि छाया

उत्तर:
1. संघनन – जलवाष्प के तरल अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं। यदि हवा अपने ओसांक से नीचे ठंडी होती है, तो इसके जलवाष्प की मात्रा जल में बदल जाती है। जब भी ओसांक तापमान, हिमांक से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प सीधे क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया द्वारा हिम में बदल जाता है।

संघनन दो कारकों पर निर्भर करता है। प्रथम वायु की आपेक्षित आर्द्रता तथा द्वितीय शीतलन की मात्रा। इसीलिए मरुस्थल क्षेत्रों में ओसांक तक पहुँचने के लिए अधिक मात्रा में शीतलन की जरूरत पड़ती है जबकि आई जलवायु में शीतलन की कम मात्रा भी संघनन प्रक्रिया को आरंभ कर देती है। कोई भी संघनन प्रक्रिया उस समय तक सम्पन्न नहीं हो सकती, जब तक ऐसा धरातल उपलब्ध न हो, जिस पर द्रव संघनित हो सके।

2. पर्वतीय वर्षा – पर्वतीय वर्षा उस समय होती है, जब आई वायु अपने मार्ग में आए किसी पर्वत अथवा किसी अन्य ऊँचे भूभाग से होकर गुजरती है, और ऊपर उठने के लिए विवश होती – है। कपर उठने से यह ठंडी होती है, और अपनी आर्द्रता को वर्षा के रूप में गिरा देती है। इस प्रकार अनेक पर्वतों के पवनाभिमुखी ढाल भारी वर्षा प्राप्त करते हैं, जबकि प्रतिपवन ढाल, जिन पर हवा ऊपर से नीचे उतरती है कम वर्षा पाते हैं। इस प्रकार की परिस्थिति विस्तृत रूप में भारत, उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों पर पाई जाती है।

वर्षण की मात्रा ‘ढाल’ पहाड़ी की ऊंचाई तथा वायुराशि के तापमान तथा इसमें मौजूद आर्द्रता की मात्रा पर निर्भर करती है। पर्वत के दूसरी ओर ऊपर से नीचे उतरती हवा जलविहीन होती है, और इसलिए किसी प्रकार की वर्षा नहीं होती। अतः क्षेत्र शुष्क रहता है, जिसे वृष्टि छाया कहते हैं।

3. उच्च मेष (5 से 14 किमी)-इसके निम्नलिखित प्रकार हैं –
(क) पक्षाभ मेघ – यह तंतुनमा, कोमल तथा सिल्क जैसी आकति के मेघ हैं। जब ये मेघ समूह से अलग होकर आकाश में अव्यवस्थित तरीके से तैरते नजर आते हैं, तो ये साफ मौसम लाते हैं। जब ये व्यवस्थित तरीके से, मध्य स्तरी मेघों से जुड़े हुए हैं, तो आई मौसम की पूर्व सूचना देते हैं।

(ख) पक्षाभ स्तरी मेघ – ये पतले श्वेत चादर की तरह होते हैं। ये समस्त आकाश को घेरकर दूध जैसी शक्ल प्रदान करते हैं। सामान्यतः ये आने वाले तूफान के लक्षण हैं।

(ग) पक्षाभ कपासी मेघ – ये मेघ छोटे-छोटे श्वेत पत्रकों अथवा छोटे गोलाकार रूप में दिखाई देते हैं, इनकी कोई छाया नहीं पड़ती। ये समूहों, रेखाओं अथवा उर्मिकाओं में व्यवस्थित होते हैं। ऐसी व्यवस्था को मैकरेल आकाश कहते हैं।

4. वृष्टि छाया – पश्चिमी घाट की सहयाद्रि पहाड़ियों द्वारा अरब सागर की आई हवा ऊपर उठने के लिए विवश करती है, जिससे ये फैलकर ठंडी हो जाती हैं और वर्षा करती हैं। वर्षण की मात्रा ढाल, पहाड़ी की ऊँचाई तथा वायुराशि के तापमान तथा इसमें मौजूद आर्द्रता पर निर्भर करती है। पर्वत के दूसरी ओर ऊपर से नीचे उतरती हवा जलविहीन होती है और इसीलिए किसी प्रकार की वर्षा नहीं होती।

अत: यह क्षेत्र शुष्क रहता है, जिसे वृष्टि छाया कहते हैं। वष्टि छाया वाले क्षेत्र महाद्वीपों के भीतरी भाग तथा उच्च अक्षांश निम्न वर्णन के क्षेत्र हैं, जहाँ वार्षिक वर्षण 50 सेमी से कम होता है। उष्णकटिबंध में स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी भाग तथा शुष्क मरुस्थल इसी श्रेणी में आते हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट कीजिए

  1. विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा
  2. निरपेक्ष आर्द्रता एवं आपेक्षिक आर्द्रता
  3. वाष्पन एवं वाष्पन वाष्पोत्सर्जन
  4. ओस एवं पाला
  5. मेघ एवं कहरा
  6. संवहनीय वर्षा एवं चक्रवातीय वर्षा

उत्तर:
1. विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा में अंतर –
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2. निरपेक्ष आर्द्रता एवं आपेक्षिक आर्द्रता में अंतर –
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3. वाष्पन एवं वाष्पन वाष्पोत्सर्जन –
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4. ओस एवं पाला –
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5. मेघ एवं कोहरा में अंतर –
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6. संवहनीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा में अंतर –
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प्रश्न 5.
विश्व में वर्षण के वितरण के प्रमुख लक्षणों तथा इन्हें नियंत्रित करने वा. कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वर्षण के मुख्य लक्षण भूमंडलीय दाब तथा पवन प्रणाली, स्थल एवं जल के वितर नथा उच्चावच लक्षणों के प्रकृति द्वारा समझाए जा सकते हैं –
1. उच्च अक्षांश सामान्यत: उच्च दाब रखते हैं, जिनका सम्बन्ध नीचे उतरती तथा अपसरिट होती हवाओं से है, और इसलिए यहाँ शुष्क दशा रहती है।

2. विषुवतीय निम्न दाब पट्टी, जहाँ हवाएँ अभिसरित होकर ऊपर उठती हैं, काफी वर्षा प्राप्त करती हैं। पवनों एवं दाब प्रणालियों के अतिरिक्त यहाँ की वायु की प्रकृति भी वर्षण की संभावना निर्धारित को में प्रमुख कारक है।

3. वर्षा के अक्षांशीय विभिन्नता के अतिरिक्त, स्थल एवं जल का वितरण भूमंडलीय वर्षा प्रतिरूप को जटिल बना देता है। मध्य अक्षांशों में स्थित स्थलीय भू-भाग कम वर्षा प्राप्त करते हैं।

4. पर्वतीय बाधाएँ भूमंडलीय पवन प्रणाली से अपेक्षित आदर्श वर्षा के प्रतिरूप को बदल देती हैं। पर्वतों के पवनाभिमुख ढाल खूब वर्षा

5. प्राप्त करते हैं, जबकि प्रतिपवन ढाल तथा इनके आस-पास के निम्न क्षेत्र वृष्टि छाया में आते हैं।

किसी स्थान की वर्षा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
1. तापमान – यदि संघनन O°C से ऊपर होता है तो होने वाला वर्षण, वर्षा के रूप में होता है।

2. जल की बूंदों के हवा से गुजरते समय वायुमंडल की दशा – यदि वर्षा की बूंदें नीचे गिरते समय ठंडी हवा परत से गुजरती हैं, तो ये जमकर बजरी का रूप ले लेती हैं। तड़ितझंझा की शक्तिशाली धाराओं में, जल बूंदें ऊपर की ओर हिमाशीतित तापमान पर ले जाई जाती हैं और ओले के रूप में गिरती हैं।

3. भूमध्य रेखा से दूरी – भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अधिक गर्मी के कारण वर्षा अधिक होती है।

4. समुद्र से दूरी – तटवर्ती प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में कम। समुद्र तल से ऊंचाई-पर्वतीय भागों में मैदानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।

5. प्रचलित पवनें – सागर से आनेवाली पवनें वर्ष करती हैं, परन्तु स्थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

6. महासागरीय धाराएँ – उष्ण धाराओं के ऊपर से गुजरने वाली पवनें अधिक वर्षा करती हैं। इसलिए विपरीत, शीतल पवनों के ऊपर से गुजरने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

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प्रश्न 6.
वायन तथा वाष्पोत्सर्जन की दर को नियंत्रित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिस प्रक्रिया के द्वारा तरल पदार्थ एवं जल-गैसीय पदार्थ जलवाष्प में बदल जाते हैं, उसे वाष्पीकरण अथवा वाष्पन कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा परिणाम चार घटकों पर निर्भर करते हैं –

  1. शुष्कता – शुष्क वायु में जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। आई वायु होने पर वाष्पीकरण की दर एवं मात्रा कम हो जाती है।
  2. तापमान – धरातल का तापक्रम बढ़ जाने से वाष्पीकरण बढ़ जाता है तथा ठंडे धरातल पर कम वाष्पीकरण होता है।
  3. वायु परिसंचरण – वायु संरचरण से वाष्पीकरण की मात्रा में वृद्धि होती है।
  4. जलखंड – विशाल जलखण्डों के ऊपर वाष्पीकरण स्थल की अपेक्षा अधिक होती है।

प्रश्न 7.
मेघ कैसे बनते हैं? औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार बताइए।
उत्तर:
मुक्त वायु में, ऊंचाई पर, धूल कणों पर लदे जलकणों या हिमकणों या हिमकणों के समूह को मेघ कहते हैं। वायु के तापमान के ओसांक से नीचे गिरने पर बादल बनते हैं। वायु के ऊपर उठने तथा फैलने से उसका तापमान ओसांक से नीचे हो जाता है। इससे हवा में संघनन होता है। ये जलकण वायु में आर्द्रताग्राही कणों पर जमकर बादल बन जाते हैं। अधिकांश मेघ गर्म एवं आई वायु के ऊपर उठने से बनते हैं।

ऊपर उठती हवा फैलती है और जब तक ओसांक तक न पहुँच जाए, ठंडी होती जाती है और कुछ जलवाष्य मेघों के रूप में संघनित होते हैं। दो विभिन्न तापमान रखने वाली वायुराशियों के मिश्रण से भी मेघों की रचना होती है। मेघ-आधार की औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों को तीन वर्गों में रखा गया है

  • उच्च स्तरीय मेघ – (6000 से 10000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-पक्षाभ, स्तरीय तथा कपासी मेघ।
  • मध्यम स्तरीय मेघ – (3000 से 6000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-मध्य कपासी शिखर मेघ ।
  • निम्न स्तरीय मेघ – (3000 मीटर तक ऊँचे) जिनमें स्तरी कपासी मेघ, वर्षा स्तरी मेघ, कपासी मेघ, कपासी वर्षा मेघ शामिल हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर की परिभाषा दें।
उत्तर:
वृद्धि (Growth):
वृद्धि समस्त उपापचयी प्रक्रियाओं (उपचय तथा अपचय) का अन्तिम परिणाम है। इसमें पौधे के आकार एवं आयतन में परिवर्तनीय या चिरस्थायी वर्धन होता है। इसके साथ प्रायः शुष्क भार एवं जीवद्रव्य की मात्रा में भी वर्धन होता है।

विभेदन (Differentiation):
तने या जड़ के शीर्ष पर स्थित अग्रस्थ विभज्योतक (apical meristem) या एधा (cambium) कोशिका से बनने वाले कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित या विशिष्टीकृत हो जाती है। इस क्रिया को विभेदन (differentiation) कहते हैं।

परिवर्धन (Development):
बीज के अंकुरण से लेकर मृत्यु तक होने वाले समस्त परिवर्धन जिसके फलस्वरूप पौधे के जटिल शरीर का गठन होता है, जिससे जड़, तना, पत्तियाँ, फूल और फल बनते हैं, परिवर्धन के अन्तर्गत आते हैं। इन क्रियाओं को दो प्रमुख समूह में बाँट लेते हैं –
(क) वृद्धि तथा
(ख) विभेदन।

निर्विभेदन : (Dedifferentiation):
जीवित विभेदित स्थायी कोशिकाएँ जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता नहीं होती, उनमें से कुछ कोशिकाओं में पुन: विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को निर्विभेदन (dedifferentiation) कहते हैं; जैसे-कॉर्क एधा, अन्तरापूलीय एधा।

पुनर्विभेदन (Redifferentiation):
निर्विभेदित कोशिकाओं या ऊतकों से बनी कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता पुन: खो देती है और विशिष्ट कार्य करने के लिए रूपान्तरित हो जाती है। इस प्रक्रिया को पुनर्विभेदन (redifferentiation) कहते है।

सीमित वृद्धि (Determinate Growth):
यह पौधों में वृद्धि का खुला स्वरूप होता है। यह पौधे के विभिन्न भागों में पाई जाती है। इसमें विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ पादप शरीर का गठन करती हैं, उसे सीमित वृद्धि कहते हैं।

मेरिस्टेम (Meristem):
जड़ तथा तने के शीर्ष पर स्थित कोशिकाओं का वह समूह जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता होती है, मेरिस्टेम (meristem) कहलाता है। इससे स्थायी ऊतक तथा अन्तर्विष्ट एवं पार्श्व मेरिस्टेम (intercalary & lateral meristem) का निर्माण होता है।

वृद्धि दर (Growth Rate):
समय की प्रति इकाई के दौखन बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर (growth rate) कहते हैं। वृद्धि दर को गणितीय ढंग से (mathematically) व्यक्त किया जा सकता है। एक जीव या उसके अंग विभिन्न तरीकों से कोशिकाओं का निर्माण कर सकते हैं।

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प्रश्न 2.
पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
वृद्धि के प्राचालिक (Parameter of Growth):
वृद्धि सभी जीवधारियों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। पौधों में वृद्धि कोशिका विभाजन, कोशिका विवर्धन या दीर्धीकरण तथा कोशिका विभेदन के फलस्वरूप होती है।

पौधे के मेरिस्टेम कोशिकाओं (meristematic cells) में कोशा विभाजन की क्षमता पाई जाती है। सामान्तया कोशिका विभाजन जड़ तथा तने के शीर्ष (apex) पर होता है। इसके फलस्वरूप जड़ तथा तने की लम्बाई में वृद्धि होती है। एधा (cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है।

इसे द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth) कहते हैं। कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वर्धन का परिणाम है। जीवद्रव्य की बढ़ोत्तरी या वर्धन का मापन कठिन है। वृद्धि पर मापन के कुछ मापदण्ड हैं – ताजे भार में वृद्धि, शुष्क भार में वृद्धि, लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिका संख्या में वृद्धि आदि।

मक्का की जड़ का अग्रस्थ मेरिस्टेम प्रति घण्टे लगभग 17,500 कोशिकाओं का निर्माण करता है। तरबूज की कोशिका के आकार में लगभग 3,50,000 गुना वृद्धि हो सकती है। पराग नलिका की लम्बाई में वृद्धि होने से यह वर्तिकाग्र, वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में स्थित बीजाण्ड में प्रवेश करती है।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णित करें –
(अ) अंकगणितीय वृद्धि
(ब) ज्यामितीय वृद्धि
(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र
(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।
उत्तर:
(अ) अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth):
समसूत्री विभाजन के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से एक कोशिका निरन्तर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है।

अंकगणितीय वृद्धि को हम निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति होती है। चित्र में वृद्धि (लम्बाई) समय के विरुद्ध आलेखित की गई है। इसके फलस्वरूप रेखीय वक्र (linear curve) प्राप्त होता है। इस वृद्धि को हम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं –
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चित्र – नियत रेखीय वृद्धि (लम्बाई) और समय के विरुद्ध आलेख।
L1 = L0 + rt
(L1 = समय ‘t’ पर लम्बाई,
L0 = समय ‘O’ पर लम्बाई
r = वृद्धि दर। दीर्धीकरण प्रति इकाई समय में)

(ब) ज्यामितीय वृद्धि (Geometrical Growth):
एक कोशिका की वृद्धि अथवा पौधे के एक अंग की वृद्धि अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं होती। प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag chase) में वृद्धि की दर पर्याप्त धीमी होती है। तत्पश्चात् यह दर तीव्र हो जाती है और उच्चतम बिन्दु (maximum point) तक पहुँच जाती है। इसे मध्य तीव्र वृद्धि काल (middle logarithmic phase) कहते हैं। इसके पश्चात् यह दर धीरे-धीरे कम होती जाती है और अन्त –
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चित्र – (A) अंकगणितीय और (B) ज्यामितिक वृद्धि, (C) भ्रूण विकास के समय अंकगणितीय और ज्यामितिक वृद्धि।

में स्थिर हो जाती है। इसे अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कहते हैं। इसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं। इनमें सूत्री विभाजन से बनी दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका विभाजन का अनुकरण करती हैं और इसी प्रकार विभाजित होने की क्षमता बनाए रखती हैं।

यद्यपि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘S’ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) को गणितीय रूप से निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –
W1 = \(W_{0}^{e n}\)
जहाँ (W1 = अन्तिम आकार – भार, ऊँचाई, संख्या आदि
W0 = प्रारम्भिक आकार, वृद्धि के प्रारम्भ में
r = वृद्धि दर (सापेक्ष वृद्धि दर)
t = समय में वृद्धि
e = स्वाभाविक लघुगणक का आधार (base of natural logarithms)
r = एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप सामग्री का निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, जिसे एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) के रूप में संदर्भित किया जाता है; अत: W1 का अन्तिम आकार W0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।

(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (Sigmoid Growth Curve):
ज्यामितिक वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त कर सकते हैं –

  • प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (Initial lag phase)
  • मध्य तीव्र वृद्धि काल (Middle lag phase)
  • अन्तिम धीमा वृद्धि काल (Last stationary phase)
  • यदि वृद्धि दर का समय के प्रति ग्राफ बनाएं तो ‘S’ की आकृति का वक्र प्राप्त होता है। इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र कहते है।

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(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर (Absolute and Relative Growth Rate):

  • मापन और प्रति यूनिट समय में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परम वृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं।
  • किसी दी गई प्रणाली की प्रति यूनिट समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है।

चित्र – सम्पूर्ण और सापेक्ष वृद्धि दर। पत्ती A तथा B को देखें। दोनों ने अपने क्षेत्रफल दिए गए समय में A से A’ और B से B’ तक 5 सेमी-2 बढ़ा लिए हैं। दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखिए। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक (Natural Plant Growth Regulators):
पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (Meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हार्मोन्स (Phytohormones) कहते हैं।

ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। अनेक कृत्रिम कार्बनिक यौगिक में पादप हार्मोन्स की तरह कार्य करते हैं। वेण्ट (Went 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती।

पादप हार्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं –

  1. ऑक्सिन (Auxins)
  2. जिबरेलिन (Gibberellins)
  3. सायटोकाइनिन (Cytokinins)
  4. ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)
  5. एथिलीन (Ethylene)

1. ऑक्सिन (Auxins):
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris canariensis) के नवोद्भिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एक तरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एक तरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।
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चित्र – प्रांकुर चोल को पार्श्व दिशा से एकतरफा प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ता है।

बायसेन:
जेन्सन (Boysen-Jensen 1910-1913) ने कटे हुए प्राकुंर चोल को अगार (agar) के घनाकार टुकड़े पर रखा, कुछ समय पश्चात् अगार के घनाकार टुकड़े को कटे हुए प्रांकुर चोल के स्थान पर रखने के पश्चात् एकतरफा प्रकाश से प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। वेण्ट (Went, 1928) ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोद्भिद् पर किए।

उन्होंने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला की प्रांकुर चोल के शीर्ष पर बना रासायनिक पदार्थ अगार के टुकड़ों (block) में आ गया था। वेण्ट ने प्रांकुर चोल के कटे हुए शीर्ष को दो अगार के टुकड़ों पर रखा जिनके मध्य अभ्रक (माइका) की पतली प्लेट लगी थी, एकतरफा प्रकाश डालने पर रासायनिक पदार्थ के 65% भाग अप्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र हो जाता है और केवल 35% रासायनिक पदार्थ प्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र होता है।

वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रता तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की।
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चित्र – वेण्ट द्वारा जई के प्रांकुर चोल के शीर्ष पर किया गया प्रयोग।

ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग (Physiological effects & Uses of Auxins):

1. प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism):
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।

2. शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance):
सामान्तया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती है। चाय बागान में तथा चाहरदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।

3. विलगन (Abscission):
परिपक्व, पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलयन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होगा।

4. अनिषेकफलन (Parthenocarpy):
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल का विकास हो जाता है; जैसे-अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकान पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।

5. खरपतवार निवारण (Weed Destruction):
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।

6. कटे तनों पर जड़ निभेदन (Root differentiation on Stem cutting):
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़ें शीघ्र निकल आती है। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।

7. प्रसुप्तता नियन्त्रण (Control of Dormancy):
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिन का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।

8. जिबरेलिन (Gibberellins):
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग – foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबेरेल फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं।

कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ पौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन – A3 (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन – A3 है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।

जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व (Physiological Effects and Importance of Gibberellins in Agriculture & Horticulture):

I. लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of inrease the length):
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगूर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।

II. पुष्यन पर प्रभाव (Effect of Flowering):
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिंग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।

(i) अनिषेकफलन (Parthenocarphy):
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।

(ii) जीर्णता या जरावस्था (Senescence):
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।

(iii) बीजों का अंकुरण (Seeds Germination):
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।

(iv) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants):
GA का छिड़काव करने से अनावृत्तबीजी (gymnosperm) पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।

III. सायटोकाइनिन (Cytokinin):
सायटोकाइनिन (Cytokinin) – सायटोकायनिन ऑक्सिन की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं का समूह तभी बनता है, जब माध्यम में आक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन नामक बढ़ावा देने वाला तत्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिन रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही है।

सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Cytokinin):

  • ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
  • ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
  • कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अगों के निर्माण को नियन्त्रित करते हैं।

यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिनि और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक हैं।

IV. ऐब्सीलिक अम्ल (Abscisic Acid : ABA):
कार्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है।

वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया।

ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Abscisic Acid):

(i) विलगन (Abscission):
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।

(ii) कलिकाओं की वृद्धि एरं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds):
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।

(iii) जीर्णता (Senescence):
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।

(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration):
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली भूमि में खेती करने के लिए उपुयक्त है।

(v) कन्द निर्माण (Tuber Formation):
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।

(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation):
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।

V. एथिलीन (Ethylene):
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हार्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हार्मोन होता है।

एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Ethylene):

(i) पुष्पन (Flowering):
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।

(ii) विलगन (Abscission):
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।

(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification):
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।

(iv) फलों का पकना (Fruit Ripening):
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम, केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।

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प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा वसन्तीकरण क्या है? इनके महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
दीप्तिकालिता (Photoperiodism):
पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।

(क) दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं –

  • अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
  • दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
  • तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)

अल्प प्रदीप्तकाली पौधो को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।

(ख) कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्री के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है।

वसन्तीकरण (Varnalization):
कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरण कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत्त होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी० डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था।

गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्तु ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह बसन्ती गेहूँ के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है।

कम ताप पर उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
ऐब्सीसिक एसिड को तनाव हॉर्मोन कहते हैं क्यों?
उत्तर:
ऐब्सीसिक अम्ल वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए बाह्य त्वचीय रन्ध्रों को बन्द करने के लिए प्रोत्साहित करत है। वह विपरीत परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के तनावों को सहन करने में सहायक होता है, इस कारण इसे तनाव हॉर्मोन
कहते हैं।

प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
पौधों में वृद्धि एवं विभेदन भी उन्मुक्त होता है। विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ/ऊतक परिपक्व होने पर भिन्न-भिन्न संरचनाएँ बनती हैं। कोशिका/ऊतक की परिपक्वता के समय अन्तिम संरचना कोशिका के आन्तरिक स्थान पर भी निर्भर करती है; जैसे – मूल के शीर्ष पर स्थित विभज्योतक से मूलगोप कोशिकाएँ, परिधि की ओर मूलीय त्वचा के रूप में विभेदित होती है।

इसी प्रकार कुछ कोशिकाएँ जाइलम, फ्लोएम, परिरम्भ, वल्कुट आदि के रूप में विभेदित होती है। इसी प्रकार प्ररोह शीर्ष पर स्थित विभज्योतक विभिन्न कोशिकाओं/ऊतकों और अंगों के रूप में विभेदित होती है। इस प्रकार विभज्योतक की क्रियात्मकता से पौधे के शरीर की विभिन्न कोशिकाओं, ऊतक और अंगों के निर्माण को वृद्धि का खुला स्वरूप कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तकाली पौधे और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे किसी एक स्थान पर साथ-साथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (short day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिस पर या इससे कम प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे अधिक प्रकाश अवधि में पौधा पुष्प उत्पन्न नहीं कर सकता।

दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों (long day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिससे अधिक प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे कम प्रकाश अवधि मे पुष्प उत्पन्न नहीं होते। अतः अल्प प्रदीप्तकाली पौधों और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में विभेदन उनमें निर्णायक दीप्तिकाल से कम अवधि पर पुष्पन होना अथवा अधिक अवधि पर पुष्प उत्पन्न होने के आधार पर किया जाता है।

दो जातियों के पौधे समान अवधि के प्रकाश में पुष्प उत्पन्न करते हैं; उनमें से एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधा तथा दूसरा दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा हो सकता है; जैसे – जैन्थियम (Xanthium) का निर्णायक दीप्तिकाल 15\(\frac{1}{2}\) घण्टे हैं और हाइओसायमस नाइजर (Hyoscyamus niger) का निर्णायक दीप्तिकाल 11 घण्टे है।

दोनों पौधे 14 घण्टे की प्रकाशीय अवधि में पुष्प उत्पन्न कर सकते हैं। इस आधा पर जैन्थियम अल्प प्रदीप्तकाली पौधा है क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से कम प्रकाशीय अवधि में पुष्पन करता है तथा हाइओसायमस नाइजर दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा है; क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल में अधिक प्रकाश अवधि में पुष्पन करता है।

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प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक नाम दीजिए –
(क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
(ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
(ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
(घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
(ङ) एक रोजेट पौधे में वोल्ट हेतु
(च) पत्तियों के रन्ध्र को तुरन्त बन्द करने हेतु।
उत्तर:
(क) ऑक्सिन (Auxins)
(ख) एथिलीन (Ethylene)
(ग) सायटोकाइनिन (Cytokinins)
(घ) सायटोकाइनिनि (Cytokinins)
(ङ) जिबरेलिन (Gibberellins)
(च) ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)।

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है? यदि हाँ या नहीं तो क्यों?
उत्तर:
पौधों में पुष्पन क्रिया प्रतिदिन उपलब्ध प्रकाश अवधि (Photoperiod) से प्रभावित होती है। पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया नहीं करता, क्योंकि पौधे की पत्तियाँ ही प्रकाश को ग्रहण करने की क्षमता रखती हैं। पत्तियों में एक प्रेरक हॉर्मोन फ्लोरिजन (florigen) उत्पन्न होता है। इसकी निश्चित मात्रा पुष्पन को प्रभावित करती है। प्लोरिजन के अभाव में पुष्पन नहीं होता।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

प्रश्न 11.
क्या हो सकता है, अगर –
(क) जी ए3 (GA3) को धान के नवोद्भिद् पर दिया जाए।
(ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बन्द कर दें।
(ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
(घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन्स डालना भूल जाएँ।
उत्तर:
(क) नवोद्भिद् पादप GA3 के प्रभाव में अधिक लम्बे हो जाते हैं। इनकी पत्तियाँ पीली और लम्बी हो जाती हैं। इस लक्षण को बैकेन (फूलिश सीडलिंग) रोग कहते हैं।
(ख) अविभेदित कोशिकाओं का समूह बन जाएगा।
(ग) सड़े फल से एथिलीन हॉर्मोन निकलता है, जिसके प्रभाव से कच्चे फल जल्दी पक जाएँगे।
(घ) सायटोकाइनिन्स मिलाने से अविभेदित कैलस में प्ररोह तथा जड़ का विकास हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि धरातल पर वायुदाब 1000 मिलीबार है तो घरातल से 1किमी की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(क) 700 मिलीबार
(ख) 900 मिलीबार
(ग) 1100 मिलीबार
(घ) 1300 मिलीबार
उत्तर:
(ख) 900 मिलीबार

प्रश्न 2.
अंतर ऊष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(क) भूमध्य रेखा के निकट
(ख) कर्क रेखा के निकट
(ग) मकर रेखा के निकट
(घ) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर:
(क) भूमध्य रेखा के निकट

प्रश्न 3.
उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(क) घड़ी की सुईयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(ग) समदाब रेखाओं के समकोण पर
(घ) समदाब रेखाओं के सामानंतर
उत्तर:
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

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प्रश्न 4.
वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(क) विषुवतीय वन
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग
(ग) हिमालय पर्वत
(घ) दक्कन पठार न पठार
उत्तर:
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन सा बल अथवा प्रभाव भूमंडलीय पवनों को विक्षेपित करता है? [B.M.2009A]
(क) दाब प्रवलता
(ख) अभिकेंद्रीय लक्षण
(ग) कोरियोलीसि
(घ) भू-घर्षण
उत्तर:
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

प्रश्न 6.
सामान्यतः कितनी ऊंचाई पर 1°C तापमान घट जाता है?
(क) 65 मी०
(ख) 165 मी०
(ग) 500 मी०
(घ) 1000 मी०
उत्तर:
(ख) 165 मी०

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर:
वायुदाब मापने की इकाई मिलीबार है। व्यापक रूप से प्रयोग की जानेवाली इकाई किलो पास्कल है जिसे (hpa) लिखा जाता है। दाब ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने के लिए और तुलनात्मक बनाने के लिए, वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्र तल के स्तर पर घटा लिया जाता है।

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प्रश्न 2.
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोषण उच्च दाब से विषुवत् वृत की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी-पूर्वी क्यों होती हैं?
उत्तर:
पृथ्वी का अपने पक्ष पर घूर्णन पवनों को दिशा को प्रभावित करता हैं। इसे कोरिआलिस बल कहा जाता है। इसके प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्द्ध में अपने बाईं तरफ विक्षेपित (deflect) हो जाती हैं। कोरिआलिस प्रभाव दाब प्रणवता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणताबल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। जितनी दाब प्रवणता अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी।

प्रश्न 3.
भूविक्षेपी पवनें (Geotrophic winds) क्या हैं?
उत्तर:
पृथ्वी की सतह से 2-3 किमी की ऊँचाई पर ऊपरी वायुमण्डल में पवने धरातलीय घर्षण के प्रभाव से मुक्त होती है तथा दाब प्रवणता तथा कोरिआलिस प्रभाव से नियंत्रित होती हैं। जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, दाब प्रवणता बल कोरिआलिसि प्रभाव से संतुलित हो जाता है और फलस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानांतर बहती हैं। यह पवनें भूविक्षेपी (Geotrophic wind) पवनों के नाम से जानी जाती हैं।

प्रश्न 4.
समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर:
ऊष्मा के अवशेषण के स्थल व समुद्र में भिन्नता पाई जाती है। दिन के दौरान स्थल भाग शीघ्र गर्म हो जाते हैं और समुद्र की अपेक्षा अधिक ताप ग्रहण करते हैं। अतः स्थल पर हवाएँ ऊपर उठती हैं और न्यून दाब क्षेत्र बनता है, जबकि समुद्र अपेक्षाकृत ठण्डे रहते हैं और उन पर उच्च वायुदाब बना रहता है। इससे समुद्र से स्थल की ओर दाब प्रवणता उत्पन्न होती है और पवनें समुद्र से स्थल की तरफ समुद्र समीर के रूप में प्रवाहित होती हैं। रात्रि में इसके एकदम विपरीत प्रक्रिया होती है। स्थल समुद्र की अपेक्षा जल्दी ठण्डा होता है। दाब प्रवणता स्थल से समुद्र की तरफ होने पर स्थल समीर प्रवाहित होती है।

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प्रश्न 5.
पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं –

  1. दाब प्रवणता बल
  2. कोरिऑक्तिस प्रभाव
  3. अभिकेन्द्रीय त्वरण
  4. भू-घर्षण

1. दाब प्रवणता बल – क्षैतिज वायुदाब के अंतर के कारण वायु में गति आती है। दो स्थानों के बीच में दाब प्रणवता जितनी अधिक होगी वायु उतनी ही तीव्र गति से चलेगी। वायु उच्च भार वाले क्षेत्र से निम्न भार वाले क्षेत्र की ओर चलती है।

2. कोरीऑलेस प्रभाव – पृथ्वी के घूर्णनगति के कारण वायु अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है जिसे कोरिऑलिस बल कहा जाता है। इस बल के कारण उत्तरार्द्ध में पवन दाहिने और दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड जाती हैं जिसे फेटेल का नियम भी कहा जाता है। यह बल भूमध्य रेखा पर शुन्य है जबकि ध्रुवों पर अधिक हो जाता है। यह बल की दिशा में परिवर्तन करता है न कि वायु की दिशा को।

3. अभिकेन्द्रीय त्वरण – भ्रमणशील पृथ्वी के घूर्णन केंद्र की दिशा में वायु के अंदर होनें वाले त्वरण के कारण ही पवन हेतु स्थानीय उच्च या न्यून वायु दाब चारों ओर फैल जाता है।

4. भू-घर्षण – धरातलीय विषमताओं के कारण पवन के रास्ते में घर्षण तथा अवरोध पैदा होते हैं जो पवनों की गति एवं दिशा को प्रभावित करती हैं। पर्वत. पठार आदि धरातलीय आकतियाँ पवनों की दिशा एवं गति को बदल देती है। महासागरों के पवनें, महाद्वीपों की अपेक्षा अधिक गति से चलती है।

प्रश्न 6.
पवन के अपरदन कार्य से उत्पन्न स्थलाकतियों का वर्णन करें?
उत्तर:
पवन के अपरदन कार्य से निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।
1. प्लाया (Playa) – प्लाया एक आंतरिक प्रवाह का बेसिन होता है जिसमें एक झील होती है। प्लाया में जल थोड़ी देर हेतु ही रहती है क्योंकि शुष्क जलवायु के कारण वाष्पीकरण की दर अधिक है। प्रायः प्लाया में लवनों का निक्षेप होता है, जिसे प्लाया के क्षारीय निक्षेप कहते हैं?

2. मुरु कटटिम (Desert Pavement) – अपवहन महीन पदार्थों को हटा देता है, जिससे भू-पृष्ठ पर बड़ी-बड़ी गुटिकाएँ बच जाती है। इस प्रकार के अवशिष्ट गुटिकाओं वाले परत को मरुकुट्टिम कहते हैं।

3. वातगर्त (Deflation Hollows) – पवन अपरदन से उत्पन्न उथले गत्तों का अपवहन गर्त अथवा वातर्गत कहते हैं?

4. छत्रक या गारा (Mushroom) – पवन द्वारा अपरदित शैल के हल्के तथा बारीक कण अधिक ऊंचाई तक उठाये जाते हैं, जब बाल के कण गैस पृष्ठ के अनावहित भाग पर परे जोर से टकराते हैं। इससे मरुभूमियों में अधिक तथा ऊपरी मात्रा में कम होता है। इस प्रकार एक छतरीनुमा आकृति बन जाती है, जिसे छत्रक कहते हैं। अरबी भाषा में इसे ‘गारा’ (Gara) कहा जाता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पवना की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ।
उत्तर:
पवनें उच्च दाब से कम दाब की तरफ प्रवाहित होती हैं। भूतल पर धरातलीय विषमताओं के कारण घर्षण पैदा होता है, जो पवनों की गति को प्रभावित करता है। इसके साथ पृथ्वी का घूर्णन भी पवनों के वेग को प्रभावित करता है। अतः पृथ्वी के धरातल पर क्षैतिज पवनें तीन संयुक्त प्रभावों का परिणाम है –

  1. दाब प्रवणता प्रभाव
  2. घर्षण बल तथा
  3. कोरिआलिस प्रभाव।

इसके अतिरिक्त, गुरुत्वाकर्षण बल पवनों को नीचे प्रवाहित करता है।

1. दाब प्रवणता बल – वायुमण्डलीय दाब भिन्नता एक बल उत्पन्न करता है। दूरी के संदर्भ में दाब परिवर्तन की दर दाब प्रवणता है। जहाँ समदाब रेखाएँ पास-पास हों, वहाँ दाब प्रणवता अधिक व समदाब रेखाओं के दूर-दूर होने से दाब प्रवणता कम होती है।

2. घर्षण बल – यह पवनों की गति को प्रभावित करता है। धरातल पर घर्षण सर्वाधिक होता है और इसका प्रभाव धरातल से 1 से 3 किमी ऊँचाई तक होता है। समुद्र पर इसका प्रभाव न्यूनतम होता है।

3. कोरिऑलिस प्रभाव – पृथवी अपने अक्ष पर घूर्णन पवनों की दिशा को प्रभावित करती है। सन् 1844 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने इसका विवरण प्रस्तुत किया और इसी पर इसे कोरिआलिस बल कहा जाता है। इसके प्रभावों से पवनें उत्तरी गालार्द्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्द्ध में अपने मूल दिशा से बाईं तरफ विक्षेपित (deflect) हो जाती हैं। जब पवनों का वेग अधिक होता है तब विक्षेपण भी अधिक होता है। कोरिऑलिस प्रभाव अक्षांशों के समानुपात में बढ़ता है। यह ध्रुवों पर सर्वाधिक और भूमध्यरेखा पर अनुपस्थित होता है।

कोरिऑलिस प्रभाव दाब प्रवणता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणता बल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। जितनी दाब प्रवणता अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी। इन दो बलों को एक-दूसरे के समकोण पर होने के कारण न्यून दाब क्षेत्र में पवनें इसी के इर्द-गिर्द बहती हैं। भूमध्य रेखा पर कोरिऑलिस प्रभाव शून्य होता है और पवनें समदाब रेखाओं के समकोण बहती हैं। अतः न्यून दाब क्षेत्र और अधिक गहन होने की अपेक्षा भर जाता है। यही कारण है कि भूमध्य रेखा के निकट उष्णकटिबंधीय चक्रवात नहीं बनते।

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प्रश्न 2.
पथ्वी पर वायमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हए चित्र बनाएँ। 300 उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के सम्भव कारण बताएँ।
उत्तर:
उच्च तापमान व न्यूनदाब होने से अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती हैं। उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस न्यून दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। अभिसरित वायु संवहन कोष्ठों के साथ ऊपर उठती हैं। यह क्षोभमण्डल के ऊपर 14 कि. मी. की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है और फिर ध्रुवों की तरह प्रवाहित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप लगभग 30° उत्तर व दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्र वायु का कुछ भाग अवतलन करता है और उपोष्ण उच्चदाब बनता है।

अवतलन का एक कारण यह है कि जब वायु 30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों पर पहुँचती है तो यह ठंडी हो जाती है। धरातल के निकट वायु का अपसरण होता है और यह भूमध्यरेखा की ओर पूर्वी पवनों के रूप में बहती है। भूमध्यरेखा के दोनों तरफ से प्राहित होने वाली पूर्वी पवनें अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसंचरण क्षेत्र (ITCZ) पर मिलती हैं। पृथ्वी की सतह से ऊँचाई पर ऐसा परिसंचरण और इसके विपरीत परिसंचरण कोष्ठों (Cells) के रूप में होता है।

उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में ऐसे कोष्ठों को हेडले कोष्ठ (Hadley Cell) कहा जाता है। मध्य अक्षांशाय वायु परिसंचरण में ध्रुवों से प्रवाहित होती ठण्डी पवनों का अवतलन होता है और उपोष्ण उच्चदाब कटिबंधीय क्षेत्रों से आती गर्म हवा ऊपर उठती है। धरातल पर ये पवनें पछुआ पवनों के नाम से जानी जाती हैं और इसके कोष्ठ फैरल कोष्ठ के नाम से जाने जाते हैं। ध्रुवीय अक्षोंशों पर ठंडी सघन वायु का ध्रुवों पर अवतलन होता है और मध्य अक्षांशों की ओर ध्रुवीय पवनों के रूप में प्रवाहित होती हैं। इन कोष्ठों को ध्रुवीय कोष्ठ कहा जाता है। ये तीन कोष्ठ वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का प्रारूप निर्धारित करते हैं। तापीय ऊर्जा का निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों में स्थानांतर सामान्य परिसंचरण को बनाए रखता है।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात से किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं, क्यों?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में महासागरों पर होती हैं और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गति करते हैं। ये चक्रवात पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं। ये ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरिकेन’ के नाम से, पश्चिम प्रशान्त और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफून’ और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विली’ के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं –

  • वृहत समुद्री सतह जहाँ तापमान 27° सेल्सियम से अधिक हो
  • कोरिऑलिस प्रभाव का होना
  • उर्ध्वाधर पवनों की गति में कम अंतर होना
  • कमजोर न्यूनदाब क्षेत्र का होना या कम स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण
  • समुद्री स्तर पर ऊपरी अपसरण।

चक्रवातों को और अधिक विध्वंसक करने वाली ऊर्जा संघनन प्रक्रिया द्वारा ऊँचे कपासी स्तरी मेघों से प्राप्त होती है जो इस तूफान के केन्द्र को घेरे होती हैं। समुद्रों से लगातार आर्द्रता की आपूर्ति की जाती है। ये क्षीण होकर क्षय हो जाते हैं। वह स्थान जहाँ से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात गुजरते हैं, वह तट landfall of cyclone कहलाता है जो चक्रवात 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केन्द्र के चारों तरफ प्रबल सर्पिल (Spiral) पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँखें कहा जाता है। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 किलोमीटर तक होता है। इसका केंद्रीय क्षेत्र शांत होता है जहाँ पवनों का अवतलन होता है।

केन्द्र के चारों तरफ जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप में आरोहण होता है, यह आरोहण क्षोभमण्डल की ऊँचाई तक पहुँचता है। इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है जो 250 कि० मी० प्रति घंटा तक होता है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती हैं। इनका व्यास बंगाल की खाड़ी, अरब सागर व इंडियन महासागर पर 600 से 120 कि० मी० के बीच होता है। यह परिसंचरण प्रणाली धीमी गति से 300 से 500 किमी प्रतिदिन की दर से गति

करते हैं। ये तूफान तरंग उत्पन्न करते हैं और तटीय निम्न क्षेत्रों को जलप्लावित कर देते हैं। ये तूफान स्थल पर धीरे-धीरे क्षीण होकर खत्म हो जाते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
(i) मौसम पद्धति को समझने के लिए मीडिया, अखबार, दूरदर्शन तथा रेडियो से मौसम संबंधी सूचना को एकत्र कीजिए।
(ii) किसी अखबार का मौसम संबंधी भाग, विशेषकर वह जिसमें उपग्रह से भेजा गया मानचित्र दिखाया गया है, पढ़ें। मेघाच्छादित क्षेत्र को रेखांकित करें। मेघों के वितरण से वायुमण्डलीय परिसंचरण की व्याख्या करें। अखबार व दूरदर्शन पर दिखाए गए पूर्वानुमान से तुलना करें। यह भी बताएँ कि सप्ताह के कितने दिन का पूर्वानुमान ठीक था।
उत्तर:
परियोजना कार्य (i) एवं (ii) कि किसी अखबार, रेडियो या दूरदर्शन या सभी से मौसमी संबंधी विवरणों को इकट्ठा करके स्वयं करें।
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कोरियोलिस बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
‘कोरियोलिस’ बल को विक्षेपित बल भी कहा जाता है। सभी गतिशील वस्तुएँ विषुवत् रेखा की ओर संचलन के समय अपने पथ से विक्षेपित हो जाती हैं जिसे कोरियोलिस बल कहते हैं, क्योंकि कोरियोलिस नामक वैज्ञानिक ने इसकी खोज की थी।

प्रश्न 2.
किस क्षेत्र को ‘घोड़ों’ का अक्षांश कहा जाता है?
उत्तर:
उपोष्ण उच्च दाब पट्टी, जो कर्क एवं मकर रेखाओं के पास (25° उ०व०८०) से क्रमशः 35° उ०व०८० अक्षांशों के बीच दोनों गोलाद्धों में स्थित है, हवाओं के ऊपर व नीचे उतरने से यहाँ उच्च दाब बनता है। इस क्षेत्र में दुर्बल पवनों के फलस्वरूप शांत वायु की दशा उत्पन्न हो जाती है। इस क्षेत्र को घोड़ों का अक्षांश कहा जाता है।

प्रश्न 3.
वायुदाब किस प्रकार मापा जाता है?
उत्तर:
वायुदाब प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पड़ने वाले दाब के रूप में मापा जाता है। वायदाब के मापन के लिए जिस इकाई का प्रयोग करते हैं उसे मिलीबार (मि०बा०) कहते हैं।

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प्रश्न 4.
समदाब रेखा क्या है?
उत्तर:
समदाब रेखा एक काल्पनिक रेखा हे, जो समुद्र तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हुई खींची जाती है।

प्रश्न 5.
“मिस्ट्रल’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह हवा का स्थानीय नाम है। यह फ्रांस में आल्प्स में भूमध्य सागर की ओर चलती है। यह अत्यधिक ठंडी, शुष्क एवं तेज बहने वाली पवन है।

प्रश्न 6.
वायुदाब प्रणालियों के दो प्रकार कौन से हैं?
उत्तर:

  1. उच्च दाब
  2. निम्न दाब

प्रश्न 7.
60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों पर किस प्रकार का दाब पाया जाता है?
उत्तर:
निम्न दाब।

प्रश्न 8.
उच्च दाब कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
30° उत्तरी व 30° दक्षिणी अक्षांशों के साथ।

प्रश्न 9.
विषुवत् वृत्त के दोनों तरफ से प्रवाहित होने वाली पूर्वी पवने कहाँ मिलती हैं?
उत्तर:
अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर।

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प्रश्न 10.
कब दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है?
उत्तर:
जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, तो दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है।

प्रश्न 11.
पवनें क्या होती हैं?
उत्तर:
धरातल के समानांतर चलने वाली हवा को पवन कहते हैं। जितनी. दाब प्रवणता अधिक होगी, पवन का वेग उतना ही अधिक होगा।

प्रश्न 12.
‘डोलड्रम’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
विषुवत रेखा के दोनों ओर एक शांत क्षेत्र स्थित है। यहाँ पवनें दुर्बल हैं तथा इनका धरातलीय प्रवाह बहुत कम है। इन्हें ‘डोलड्रम’ कहते हैं।

प्रश्न 13.
‘गरजने वाला चालीसा, प्रचंड पचासा तथा चीखता साठ’ किसके नाम हैं?
उत्तर:
ये पछुआ पवनें हैं जिनका वेग प्रचंड है। कभी-कभी ये दोनों ऋतुओं में बड़ी तुफानी होती हैं। अतः पुराने समय में नाविकों ने इनका नाम गरजने वाला चालीसा, प्रचण्ड पचासा तथा चीखता साठ रखा था।

प्रश्न 14.
स्थल समीर किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये पवनें रात को स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, समुद्र पर वायुदाब कम हो जाता है, परन्तु स्थल पर वायुदाब अधिक होता है । इस प्रकार ये पवनें स्थल से समद्र की ओर चलती हैं।

प्रश्न 15.
‘चिनूक’ को ‘हिम भक्षी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि यह हवा सर्दियों के अधिकांश दिनों में घास के मैदानों को हिम से मुक्त रखती हैं। इस प्रकार की हवा रॉकीज पर्वतमाला के पूर्वी ढालों पर ऊपर से नीचे उतरती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उन उत्तर

प्रश्न 1.
वायुदाब प्रवणता की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
वायुदाब का वितरण समदाब रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाओं के अन्तर को वायुदाब प्रवणता कहते हैं। यह दो समदाब रेखाओं पर समकोण बनाती हुई होती हैं। यह दाब प्रवणता वायु दिशा अथवा आयु वेग को प्रदर्शित करती है। यदि समदाब रेखाएँ एक-दूसरे के निकट हों तो दाब प्रवणता तीव्र होती है तथा तेज पवनें चलती हैं। यदि समदाब रेखाएँ दूर-दूर हों तो वायु की गति मन्द होती है। उँचाई के साथ-साथ 34 मिलीबार प्रति 300 मीटर की दर से वायु दाब कम होता है । वायुमण्डल की ऊपरी परतें हल्की होती हैं। ऊपरी परतों के बोझ तथा दबाव के कारण नीचे की परतों पर सम्पीड़न क्रिया होती है। इसलिए धरातल के निकट की परतों में वायुदाब अधिक होता है।

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प्रश्न 2.
घोड़ों के अक्षांश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
22°से 35° मध्य के अक्षांशों को अश्व अक्षांश कहते हैं। कर्क रेखा तथा मकर रेखा के निकट का यह शांत मंडल कहलाता है। शांत भूखण्ड में धरातल पर वायु की क्षैतिज गति नहीं होती। पवनें ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर को चलती रहती हैं। ये पवनें न तो स्थाई हैं और न अधिक गति से चलती हैं। वायुमण्डल शांत तथा मौसम साफ रहता है। लगातार उतरती हुई वायु तथा दबाव के कारण यहाँ उच्च वायु दाब होता है। इन अक्षांशों से ध्रुवों की ओर पश्चिमी पवनें तथा भूमध्य रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं।

प्रश्न 3.
‘डोलडुम क्षेत्र’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
यह शांत खंड भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5°N तथा 5°s के बीच स्थित है। इसे भूमध्य रेखा का शांत खंड भी कहते हैं। धरातल पर चलने वाली वायु का अभाव होता है या बहुत ही शांत चलती है। यह शांत खंड भूमध्य रेखा के चारों ओर फैला हुआ है। इस खंड में वर्ष भर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं तथा तापमान ऊँचा रहता है। वायु गर्म तथा हल्की होकर लगातार संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठती हैं तथा धरातल पर वायुदाब कम हो जाता है।

प्रश्न 4.
फैरल का नियम क्या है? चित्र द्वारा स्पष्ट करो।
उत्तर:
धरातल पर पवनें कभी उत्तर से दक्षिण की ओर नहीं चलती। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं और मुड़ जाती हैं। इसें फैरल का नियम कहते हैं। हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण, पृथ्वी की दैनिक गति है जब हवाएँ कम चाल वाले भागों से अधिक चाल वाले भागों की ओर जाती हैं तो पीछे रह जाती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कोरोलिस बल भी कहा जाता है। .
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प्रश्न 5.
वायुमंडलीय दाब से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायुमंडलीय दाब पृथ्वी के धरातल पर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण टिका है। गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु में भार होता है। वायु में भी एक घनफुट में 1.2 औंस भार होता है। इस भार के कारण पृथ्वी के धरातल पर दबाव पड़ता है। वायुमंडलीय दाब का अर्थ है किसी भी स्थान पर वहाँ की हवा की उच्चतम सीमा के स्तम्भ का भार । समुद्र तल प्रति वर्ग इंच पर वायुमण्डल का दबाव 6.68 किलोग्राम या 1.3 किलोग्राम प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है। वायुमंडल का औसत या सामान्य दाब 45° अक्षांश पर समुद्र तल पर 29.92 इंच या 76.92 इंच या 76 सेंटीमीटर या 1013.2 मिलीबार होता है।।

प्रश्न 6.
एक मिलीबार से क्या अभिप्राय है? वायुदाब की माप इकाइयों में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
एक वर्ग सेमी पर एक ग्राम भार के बल को एक मिलीबार कहते हैं। दूसरे शब्दों में 1000 डाईन प्रति वर्ग सेमी के वायु भार को एक मिलीबार कहते हैं। 1000 मिलीबार के वायुभार को एक बार (Bar) कहते हैं।
विभिन्न माप इकाइयों में सम्बन्ध –
30 इंच वायुदाब =76 सेमी = 1013.2 मिलीबार
1 इंच वायुदाब = 34 मिलीबार
1 सेमी वायुदाब = 13.3 मिलीबार

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प्रश्न 7.
‘चिनूक’ तथा ‘फोएन’ पवनें क्या हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ये गर्म तथा शुष्क पवनें हैं। ये पवनें पर्वतों के सम्मख ढाल पर टकराकर ऊपर चढती है। इस क्रिया के कारण ये ठंडी होकर पवन के सामने वाले ढाल पर काफी वर्षा करती हैं। चिनक पवने-अमेरिका में रॉकीज पर्वतों को पार करके प्रेयरी के मैदान में चलने वाली ऐसी पवनों को चिनूक पवनें कहते हैं। चिनूक का अर्थ है-बर्फ खाऊ, क्योंकि ये पवनें अधिक तापक्रम के कारण बर्फ को पिघला देती हैं। कई बार 24 घंटे के समय में 50F(10°C) तापक्रम बढ़ जाता है।

फोएन पवनें – यूरोप में आल्प्स को पार करके स्विट्जरलैंड में उतरने वाली पवने को फोएन पवनें कहते हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी के सात दाब कटिबंधों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वी के सात दाब कटिबंध इस प्रकार हैं –

  1. विषुवतीय निम्न दाब पट्टी
  2. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  3. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  4. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  5. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  6. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  7. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)।

प्रश्न 9.
पवन और वायुधारा में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पवन और वायुधारा में अंतर –
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प्रश्न 10.
भूमंडलीय और सामयिक पवनों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भूमंडलीय और सामयिक पवनों में अंतर –
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प्रश्न 11.
वायुराशि क्या होती है? पवन से यह किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
वायुराशि वायुमण्डल का एक छोटा तथा विस्तृत भाग है जिसमें तापमान और आर्द्रता के लक्षण एक समान होते हैं। इस प्रकार वायुराशियों में एकरूपता का पाया जाना इसका मुख्य लक्षण है। एक वायुराशि में एक-दूसरे के ऊपर वाय की विभिन्न परतें होती हैं। इस प्रकार वायुमंडल में पर्याप्त ऊँचाई तक एक विशाल वायुराशि में एकरूपता पाई जाती है।

प्रश्न 12.
स्रोत प्रदेश किसे कहे हैं? धुवीय महाद्वीपीय स्रोत प्रदेशों का वर्णन करें।
उत्तर:
धरातल के ऐसे समान क्षेत्र जहाँ वायुराशियों की उत्पत्ति होती है, स्रोत प्रदेश कहलाते हैं। यह प्रदेश पृथ्वी के धरातल पर विस्तृत क्षेत्र है जहाँ एक सम लक्षण पाए जाते है। ऐसे प्रदेश में एक सम धरातल तथा प्रति चक्रवातीय वायु तथा प्रति चक्रवातीय वायु व्यवस्था पाई जाती है। इस अवस्था में अपसारी वायु संचरण होता है। प्रायः स्रोत प्रदेश ध्रुवीय तथा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में पाए जाते हैं। शीतकाल में उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया या ध्रुवीय प्रदेश बर्फ से ढके रहते हैं। यहाँ प्रति चक्रवात चलते हैं। वायु स्थिर तथा शुष्क होती है तापमान तथा आर्द्रता में एकरूपता पाई जाती है।

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प्रश्न 13.
पृथ्वी के धरातल पर कुछ वायुदाब कटिबंध तापीय कारणों से नहीं बल्कि गतिक कारणों से उत्पन्न हुए हैं। ये कटिबंध कौन-से हैं? इनकी उत्पत्ति की व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी भूमध्य रेखा तथा ध्रुवों के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब तथा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की उत्पत्ति होती है। इनकी उत्पत्ति गतिक कारणों से है। भूमध्य रेखा से ऊपर उठने वाली वायु ठंडी होकर तथा भारी होकर 30° अक्षांशों के निकट नीचे उतरने लगती है, इसके अतिरिक्त पृथ्वी के घूर्णन के कारण ध्रुवों से आने वाली वायु भी यहाँ नीचे उतरती है, इसलिए यहाँ उच्च वायुदाब उत्पन्न होता है।
60° अक्षांशों के निकट वायुदाब की उत्पत्ति गति कारणों से होती है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण इन अक्षांशों से वायु भूमध्य रेखा की ओर तथा ध्रुवों की ओर खिसक जाती है इसलिए यहाँ निम्न वायुदाब स्थापित हो जाता है।

प्रश्न 14.
मिस्ट्रल और फॉन में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मिस्ट्रल और फॉन में अंतर –
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प्रश्न 15.
स्थल और समुद्र समीर में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्थल और समुद्र समीर में अंतर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुदाब के क्षैतिज वितरण के विश्व प्रतिरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायुदाब का क्षैतिज वितरण सामान्य रूप से उच्च वायुदाब और निम्न वायुदाब को एकांतर कटिबंध के रूप में प्रस्तुत करता है। वायुदाब और तापमान में प्रतिलोमी संबंध है। 30° उत्तर एवं दक्षिणी अक्षांशों के पास दो उपोष्ण उच्चदाब के और 60° उत्तर तथा दक्षिण अक्षांशों के पास दो उपध्रुवीय निम्नदाब के मध्यवर्ती क्षेत्र हैं। जिस दिशा में वायुदाब सबसे तेजी से घट रहा हो, उस दिशा में प्रति इकाई दूरी पर वायुदाब में आई गिरावट को दाब प्रवणता कहते हैं। विषुवतीय निम्न वायुदाब कटिबंध की गर्म हवा ऊपर उठने के साथ धीरे-धीरे ठंडी होती जाती है। ऊपरी स्तर पर पहुँचने के बाद यह ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगती है और अधिक ठंडी होने पर यह 20° तथा 35° अक्षांशों के मध्य नीचे उतरने लगती है। इसके लिए दो कारक उत्तरदायी हैं।
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प्रथम-वायु के ठंडा होने से इसका घनत्व बढ़ जाता है, जिससे यह नीचे उतरने लगती है। दूसरा-पृथ्वी का घूर्णन पश्चिमी से पूर्व की ओर होने के कारण ध्रुवों की ओर जाने वाली हवाएँ पूर्व की ओर विक्षेपित हो जाती हैं। अपने पक्ष पर घूर्णन करती हुई पृथ्वी पर विषुवत रेखा के पास कोई भी बिन्दु सर्वाधिक तीव्र गति से संचलन करता है। जैसे-जैसे हम ध्रुवों की ओर जाते हैं, वेग कम होता जाता है और ध्रुवों पर लगभग शून्य हो जाता है। वेग में अन्तर के कारण सभी गतिशील वस्तुएँ, विषुवत रेखा की ओर अथवा विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर संचलन के समय पथ से विक्षेपित हो जाती हैं। विक्षेपण बल की खोज सर्वप्रथम फ्रांसीसी गणितज्ञ कोरियोलिस ने की थी। इसलिए इसे कोरियोलिस बल कहते हैं बाद में इसे फैरेल के नियम से जाना गया।
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इस नियम के अनुसार-सभी गतिशील वस्तुएँ अपने पथ से विक्षेपित हो जाती हैं, जैसे पवन और महासागरीय धाराएँ, जिसकी दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में बाएँ हैं। विषुवत रेखा से दूर जाने के साथ विक्षेपण दर में वृद्धि होती जाती है। इससे अवरोध उत्पन्न होने लगता है और हवा ऊपर की ओर संचित होने लगती है। इससे कर्क रेखा और 35° उत्तरी अक्षांश मकर रेखा और 35° दक्षिणी अक्षांश के मध्य हवाएँ ऊपर से नीचे उतरने लगती हैं जिससे यहाँ उच्च दाब कटिबंधों की उत्पत्ति होती है। उपोष्ण कटिबंध तथा ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली हवाएँ 45° उत्तर व दक्षिण आर्कटिक वृत एवं 40° दक्षिण व अंटार्कटिक वृत्त के मध्य स्थित क्षेत्रों में मिलती हैं। ये उपध्रुवीय निम्न दाब के क्षेत्र हैं।

इस प्रकार कुल सात कटिबन्ध हैं –

  • विषुवतीय निम्न दाब पट्टी
  • उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  • उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  • ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)

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प्रश्न 2.
पवनों के मुख्य प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायु परिसंचरण के तीन विभिन्न तंत्र हैं – प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक।
(i) प्राथमिक पवनें – इन पवनों का सम्बन्ध घूर्णन करती हुई पृथ्वी के धरातल पर वनों के सामान्य परिसंचरण प्रतिरूप से है। प्राथमिक पवनों में डोलड्रम, व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें तथा ध्रुवीय पवनें शामिल हैं।

डोलड़म – ये पवनें विषुवत रेखा के दोनों ओर एक शांत क्षेत्र में होती हैं। इनका धरातलीय प्रवाह बहुत कम है।

व्यापारिक पवनें – ये पवनें दोनों- गोलार्द्ध में 5°से 30° अक्षांशों के मध्य चलती हैं। उत्तर में इन्हें उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें तथा दक्षिण में दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनें कहते हैं। दोनों पवनों विषुवत रेखा पर अभिसरण करती हैं, जिसे अंतर उष्णकटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र कहते हैं।

पछुआ पवनें – ये मध्य अक्षांशों में 35° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के बीच चलती हैं। इनकी दिशा परिवर्तशनशील है और वेग भी प्रचण्ड है। पछुआ पवनें गर्मी एवं सर्दी दोनों ही ऋतुओं में बड़ी तूफानी होती हैं।

धृवीय पूर्वी पवनें – ये विषुवत रेखा की ओर बहती हैं. जो शीघ्रता से पर्व से पश्चिम की दिशा ले लेती हैं। इन्हें ध्रुवीय पवनें कहते हैं।

(ii) द्वितीयक पवनें – ये हवाएँ, जो ऋतु के अनुसार अपनी दिशा बदल लेती हैं, मानसून पवनें, वायुराशियाँ एवं साताग्र, चक्रवात एवं प्रति-चक्रवात, स्थल समीर, पर्वत एवं घाटी समीर ऐसी पवन प्रणालियाँ हैं।

मानसून पवनें – ये वे मौसमी पवनें हैं जिनकी दिशा मौसम के अनुसार बिल्कुल विपरीत होती हैं। ये पवनें गर्मी में 6 मास समुद्र से स्थल की ओर तथा शीतकाल के 6 मास स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। ये एक प्रकार से जल तथा स्थल पवनें हैं। इनकी उत्पत्ति का कारण जल तथा स्थल के ठंडा व गर्म होने में विभिन्नता है। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायुदाब में भी अन्तर हो जाता है जिससे हवाओं की दिशा पलट जाती हैं।

पर्वतीय तथा घाटीय पवनें – ये साधारण दैनिक पवनें हैं जो दैनिक तापान्तर के फलस्वरूप वाय दबाब की विभिन्नता के कारण चलती हैं पर्वतीय पवनें पर्वतीय प्रदेश में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर बहती हैं। यह तीव्र विकिरण तथा गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती हैं। इसे वायु प्रवाह भी कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ ठंडी वायु से भर जाती हैं जिससे घाटी के निचले भाग में पाला पड़ता है।
घाटीय पवनें-दिन के समय घाटी की गर्म वायु ढाल से होकर शिखर की ओर ऊपर चढ़ती हैं इन्हें घाटीय पवनें कहते हैं । ये पवनें घाटियों में गर्मी की तीव्रता को कम करती हैं। ऊपर चढ़ने के कारण ये पवनें ठंडी होकर घनघोर वर्षा करती हैं।
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(iii) तृतीयक अथवा स्थानीय पवनें-इन पवनों की उत्पत्ति भू-भाग के तत्काल प्रभाव द्वारा होती है। जब ये पवनें अत्यधिक गर्म एवं शुष्क होती हैं तो पशु एवं वनस्पति जगत पर शक्तिशाली प्रभाव डालती हैं। स्थानीय पवनों का एक अन्य वर्ग वायु अपवाह कहलाता है। बर्फीली हवाओं का स्थानीय नाम उत्तरी एडियाटिक तट में बोरा तथा दक्षिणी फ्रांस में मिस्टूल है। अन्य प्रकार की स्थानीय पवनें लू, फॉन तथा चिनूक हैं, ये गर्म एवं शुष्क पवनें हैं। ये द्वितीयक प्रकार की पवनों को जन्म देते हैं।

(iv) वायुराशियाँ एवं वातान-ये अभिगामी वायुमंडलीय विक्षोभ हैं, जो पूरे विश्व भर में द्वितीयक प्रकार की पवनों को जन्म देते हैं। वायुराशियाँ-यह हवा का एक विशाल समूह है, जिसमें तापमान तथा आर्द्रता की दशाएँ, एक समान होती हैं। वायुराशि अपनी विशेषताएँ अपने स्रोत से प्राप्त करती हैं। दो आधारभूत वायुराशियाँ हैं-ध्रुवीय (P) तथा उष्णकटिबंधीय (T). इनके तापमान में भारी अंतर रहता है। ध्रुवीय वायुराशियाँ-ये वायुराशियाँ उच्च अक्षांशों में जन्म लेती हैं। ये ठंडी तथा क्रम आर्द्र होती हैं। उष्णकटिबंधीय वायुराशियाँ-अधिक आर्द्र होती हैं।

(v) वाताग्र – विभिन्न गुणों वाली वायुराशियों के मध्य की संपर्क रेखा वाताग्र कहलाती हैं। शीत वाताग्र की उत्पत्ति वहाँ से होती हैं, जहाँ ठंडी हवा गर्म हवा के नीचे संचलन करती है। ठंडी वायु का पिछला सिरा जिसका अनुसरण गर्म वायु राशि करती है, उष्ण वाताग्न कहलाता है। प्रत्येक स्थिति में वर्षा होने की संभावना रहती है। जब दोनों वातान मिल जाते है तब इसे अधिधारित वाताग्र कहते हैं।

(vi) चक्रवात – जलवायु की दृष्टि से वायुमंडलीय विक्षोभों में चक्रवात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, जो मौसम को प्रभावित करते हैं। चक्रवातों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है-शीतोष्ण चक्रवात तथा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात।

शीतोष्ण चक्रवात – इनका क्षेत्र दोनों गोलाद्धों के मध्य अक्षांशों में 35° से 65° अक्षांशों के बीच संकेन्द्रित है। ये बड़े विस्तृत होते हैं। ये श्वेत मेघों की पृष्ठभूमि में काले मेघों का आगमन आने का सूचक हैं। जैसे ही चक्रवात किसी स्थान पर पहुंचता है, बूंदाबांदी, शुरू हो जाती है और फिर भारी वर्षा होती है। इससे शीत वाताग्र के आगमन की सूचना मिलती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात – ये अपने उग्रता तथा व्यापक विनाश के लिए जाने जाते हैं। इनकी जलवायविक विशेषता वर्षा करना है। ये महासागरों के ऊपर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विकसित होते हैं। इन हवाओं का वेग 120 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा तक होता है। ये कम क्षेत्रफल घेरते हैं। भारत में इनकी प्रचण्डता का अनुभव सर्वाधिक बंगाल की खाड़ी में पूर्वी तट पर होता है। चक्रवात वायुमण्डलीय गतिशीलता के सूचक हैं तथा मानव एवं मानव समाज कल्याण की दृष्टि से बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।