Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 3 संख्याज्ञानम् Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit संख्याज्ञानम् Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिक-

प्रश्न 1.
उच्चारण करें –

प्रश्न (क)

  1. एक: – एका – एकम्
  2. दो: – दू  – दोऊ
  3. त्रयः – तितः – त्रीणि
  4. चत्वारः – चतस्रः – चत्वारि
  5. पञ्च
  6. षट्
  7. सप्त
  8. अप्ट
  9. नव
  10. दश
  11. एकादश
  12. द्वादश
  13. त्रयोदश
  14.  चतुर्दश
  15. पञ्चदश
  16. पोडश
  17. सप्तदश
  18. अष्टदश
  19. नवदश (एकोनविंशतिः ऊनविंशतिः)
  20. विंशतिः।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

प्रश्न (ख)
प्रथमा विभक्ति में-

शब्द – लिङ्ग-एकवचन-द्विवचन-बहुवचन
बालक – पुल-बालकः-बालकौ-बालकाः
उत्तर-

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम् 1

लिखिति

प्रश्न 2.
चित्र को देखकर संख्या लिखें
उत्तर-

  1. चत्वारि कन्दुकानि ।
  2. द्वे पुष्पे।
  3. द्वौ बालको।
  4. एका बालिका।
  5. पञ्च कदली-फलानि ।

प्रश्न 3.
नीचे लिखी संख्याओं के संस्कृतपद लिखें-
यथा-

  1. ग्यारह – एकादश
  2. सात – सप्त
  3. पाँच – पञ्च
  4. तेरह – त्रयोदश
  5. उन्नीस – एकोनविंशति
  6. आठ – अष्ट
  7. अठारह – अष्टादश

प्रश्न 4.
निम्नांकित संख्याओं को बढ़ते क्रम में पुनः लिखें –
(पञ्च, अष्टादश, द्वादश, नव, त्रयोदश, सप्त, एकादश, अष्ट।)
उत्तर-
पञ्च, सप्त, अष्ट, नव, एकादश, द्वादश, त्रयोदश, अष्टादश ।

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प्रश्न 5.
वर्गों को जोड़कर शब्द :- यथा-क् + ऋ + प् + ण् + अः
उत्तर-
कृष्णः

(क) ब् + आ + ल् + अ + क् + अ:
उत्तर-
वालकः।

(ख) प् + अ + त् + अ + न् + त् + इ
उत्तर-
पतन्ति ।

(ग) न् + ऋ + त् + य् + अ + म्
उत्तर-
नृत्यम्।

(घ) व् + अ + र् + ष् + आ
उत्तर-
वर्षा ।

प्रश्न 6.
उचित संख्यावाचक शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति करें-

  1. मम …………. कर्णो स्तः ।
  2. गजस्य …………… पादाः भवन्ति ।
  3. मम …………… नासिका अस्ति ।
  4. द्विचक्रिकायां ………….. चक्रे भवतः।
  5. दशरथस्य …………… पुत्राः आसन् ।

उत्तर-

  1. दौ
  2. चत्वारः
  3. एका
  4. द्वे
  5. चत्वारः

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प्रश्न 7.
रेखा खींचकर मिलान करें

  1. पट – (क) देवाः
  2. पञ्च – (ख) हस्ती
  3. द्वौ – (ग) मुखम्
  4. एकम् – (घ) वेदाः
  5. त्रयः – (ङ) ऋतवः
  6. चाजारः – (च) पाण्डवाः

उत्तर-

  1. पट् – (ङ) ऋतवः
  2. पञ्च – (च) पाण्डवाः
  3.  द्वौ – (ख) हस्तौ
  4. एकम् – (ग) मुखम्
  5. त्रयः – (क) देवाः
  6. चत्वारः – (घ) वेदाः

Bihar Board Class 6 Sanskrit संख्याज्ञानम् Summary

एक: बालकः पठति (पु.)
अर्थ –
एक लड़का पढ़ता है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

एका बाला पठति (स्त्री)
अर्थ –
एक लड़की पढ़ती है।

एक पुष्पं विकसति (नपु०)
अर्थ –
एक फूल खिलता है।

द्वौ अश्वौ धावतः (पु.)
अर्थ –
दो घोडे. दौड़ते हैं।

द्वे महिले गायतः (स्त्री०)
अर्थ –
दो महिलाएँ गाती हैं।

द्वे चक्रे भ्रमतः (नपु०)
अर्थ –
दो चक्के घूमते हैं।

त्रयः खगाः कूजन्ति (पु.)
अर्थ –
तीन पक्षियाँ बोलते हैं।

तिम्रः बालिकाः क्रीडन्ति (स्त्री)
अर्थ –
तीन लड़कियाँ खेलती हैं।

त्रीणि पत्राणि पतन्ति (नपु.)
अर्थ –
तीन पत्ते गिरते हैं।

खट्वायाः चत्वारः पादाः सन्ति (पु.)
अर्थ –
खटिया के चार पैर हैं।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

चतस्रः महिलाः भ्रमन्ति (स्त्री०)
अर्थ –
चार महिलाएं घूमती हैं।

अत्र चत्वारि पुष्पाणि सन्ति (नपु०)।
अर्थ –
यहाँ चार फूल हैं।

पाञ्च पाण्डवाः गच्छन्ति(पु.)
अर्थ –
पाँच पाण्डव जाते हैं।

‘भ्रमरस्य पट् पादाः सन्ति ।
अर्थ –
भौरा के छः पैर हैं।

सप्त तारकाः गगने भान्ति।
अर्थ –
सात तारे आकाश में चमकते हैं।

अत्र अप्टो फलानि सन्ति
अर्थ –
यहाँ आठ फल हैं।

नव पतंगा:
अर्थ-
नौ पतंगें।

दश मोटरयानानि सन्ति।
अर्थ-
दस मोटरगाड़ियाँ हैं।

एकादशा फलानि गुच्छे सन्ति।
अर्थ –
ग्यारह फल गुच्छा में हैं।

अत्र द्वादश कन्दुकानि सन्ति।
अर्थ-
यहाँ बारह गेन्दें हैं।

तत्र त्र्यांदश पुस्तकानि तिष्ठन्ति।
अर्थ –
वहाँ तेरह पुस्तकें रखी हैं।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

चतुर्दश छात्रः नृत्यन्ति।
अर्थ –
चौदह छात्र नाच रहे हैं।

जले पञ्चदश मीनाः तरन्ति।
अर्थ –
जल में पन्द्रह मछलियाँ तैरती हैं।

पुरा भारते षोडश जनपदाः आसन्
अर्थ –
प्रचीनकाल में भारत में सोलह जनपद थे।

इमानि सप्तदश चक्राणि चलन्ति।
अर्थ –
ये सतरह चक्के चलते हैं।

पुराणानि अष्टादश सन्ति।
अर्थ –
पुराणे अठारह हैं।

ऊनविंशति भ्रमराः भ्रमन्ति।
अर्थ –
उन्नीस भौरें घूमते हैं।

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विंशति चटकाः बिहरन्ति।
अर्थ –
बीस चिड़ियाँ बिहार करती हैं।

शब्दार्था:-एकः (पु०) -एका बालकः -लड़का/बालक। पठति -पढ़ता है/पढ़ती है। एका (स्त्री०)-एका बाला – लड़की/बालिका। एकम् (नंपु०) – एका द्वौ (पुं०) – दो। अश्वौ – दो घोड़े। धावत: – दौड़ते हैं। द्वे (स्त्री0) दो, महिले – दो स्त्रियाँ/महिलाएँ। चक्रे – (दो) पहिये। द्वे (नंपु०) – दो। भ्रमतः (द्विवचन)- घूमते हैं। त्रयः(पुं०) – तीन। खगाः – चिड़ियाँ/पक्षियाँ। तिम्रः (स्त्री०) – तीन। क्रीडन्ति – खेलती हैं।खेलती हैं। त्रीणि (नंपु०) – तीन। पत्राणि – पत्ते। पतन्ति – गिरते हैं। चत्वारः (पुं०) – चार। पादाः – पैर। सन्ति – हैं। चतम्रः (स्त्री०) – चार। भ्रमन्ति – घूमती/घूमते हैं। वृक्ष – पेड़ में। चत्वारि (नंपु०)– चार। पुष्पाणि – फूल। पञ्च – पाँच। पाण्डवाःपाण्डव। भ्रमरस्य – भ्रमर का/भौर का। घट् – छः। सप्त- सात। तारकाः – तारे।

गगने – आकाश में। भान्ति -चमकते हैं। अष्टौ – आठ। नव – नौ। पतंगा: – पतंग/फतिंगे। दश – दस। मोटरयानानि – मोटरगाड़ियाँ। एकादश – ग्यारह। गुच्छे – गुच्छा में। द्वादश – बारह। अत्र – यहाँ। कन्दुकानि – गेंदें। तत्र – वहाँ। त्रयोदश – तेरह। पुस्तकानि – पुस्तकें। तिष्ठन्ति – रखी हैं। चतुर्दश- चौदह। नृत्यन्ति – नाचते हैं/नाचती हैं। जले- जल में । पञ्चदश – पन्द्रह। मीनाः – मछलियाँ। तरन्ति – तैरते हैं । तैरती हैं। पुरा – पहले/प्राचीन काल में। षोडश – सोलह। जनपदाः – जनपदें। आसन् – थे। इमानि (नंपु०) – ये। सप्तदश – सतरह। चक्राणि – चक्के। चलन्ति – चलते हैं। चलती हैं। एतानि (नप०) – ये। अष्टादश – अठारह। पुराणानि – पुराणे। ऊनविंशतिः – उन्नीस। विंशतिः – बीस। चटकाः -पक्षियाँ/चिड़ियाँ। विहरन्ति – बिहार करती हैं। विहार करते हैं।

व्याकरणम् 

लिङ्ग-संस्कृत शब्द तीन लिंगों में विभक्त हैं –

पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग । लिङ्ग सभी सुबन्त शब्दों में अनिवार्य रूप से रहता है। कुछ शब्द केवल पुल्लिङ्ग हैं। जैसे-गज, मीन,. साधु, मुनि, राम, बालक, नर इत्यादि। कुछ शब्द केवल स्त्रीलिङ्ग हैं। जैसे-बालिका, लता, रमा, शाला (घर), विद्या, शिक्षिका, देवी, धेनु (गाय), भूमि इत्यादि । कुछ शब्द केवल नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे-फल, धन, पात्र, अंग, गृह, उपवन, वारि, दधि इत्यादि । कोश ग्रन्थों में संस्कृत शब्दों के लिङ्ग बताये जाते हैं। विशेषण शब्दों का लिङ्ग उनके विशेष्य के अनुसार होता है।

जैसे –

पुँल्लिङ्ग –

1. अयम् बालकः चतुरः अस्ति।
(बालक पल्लिंग है अतः उसके साथ जुड़े अयम् और चतरः दोनों .. पुंल्लिंग हैं।)

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2 अयम् गजः विशालः अस्ति ।
(गज के पुंल्लिग होने से अयम् और विशालः पुंल्लिंग हैं।)

स्त्रीलिङ्ग –

1. इयम् महिला कुशला अस्ति ।
(महिला स्त्रीलिंग है अतः उसकी विशेषता बतानेवाला कुशला शब्द तथा निर्देशक इयम् शब्द स्त्रीलिंग में हैं।)

2 इमाः बालिकाः सुरूपाः सन्ति।
(बालिकाः के अनुसार इमाः और सुरूपाः स्त्रीलिंग बहुवचन में)

नपुंसकलिङ्ग –

1. इदम् पुष्पम् सुन्दरम् अस्ति।
(पुष्प नपुंसकलिंग में है अतः इदम् और सुन्दरम् भी उसी लिंग)

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2. इमॉनि फलानि पक्वानि सन्ति ।
(फलानि के अनुसार इमानि, पक्वानि हैं।)
वचन – संस्कृत भाषा में शब्दों के तीन वचनों में प्रयोग होते हैं
एकवचन, द्विवचन और बहुवचन । सभी लिङ्गों में ये वचन होते हैं।

जैसे-

  • पुल्लिङ्ग – बालकः – बालको – बालकाः।
  • स्त्रीलिंग – बालिका – बालिके – बालिकाः ।
  • नपुंसकलिङ्ग – फलम् – फले – फलानि।

इनके निर्देशक सर्वनाम शब्द इस प्रकार हैं-

  • पुल्लिङ्ग – अयम् – इमो – इमे।
  • स्त्रीलिङ्ग – इयम् – इमे – इमाः ।
  • नपुंसकलिङ्ग – इदम् – इमे – इमानि ।

क्रियापदों में भी वचन इन शब्दों के कारण ही आते हैं। कुछ

उदाहरण देखें-

पुल्लिङ्ग –

  • अयम् बालक : पठति (एकवचन)।
  • इमौ बालको धावत: (द्विवचन)।
  • इमे गजाः चलन्ति (बहुवचन)।

स्त्रीलिङ्ग –

  • इयम् लता पतति (एकवचन)।
  • इमे बालिके धावतः (द्विवचन)।
  • इमाः महिलाः गायन्ति (बहुवचन)।

नपुंसकलिङ्ग –

  • इदम् पुष्पम् शोभनम् अस्ति (एकवचन)।
  • इमे पत्रे पततः (द्विवचन)।
  • इमानि फलानि पक्वानि सन्ति (बहुवचन) ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 3 संख्याज्ञानम्

नोट- हिन्दी में संख्यावाचक शब्दों के लिङ्ग में समानता है।
संस्कृत में एक से चार तक की संख्याएँ तीनों लिङ्गों में पृथक्-पृथक् होती हैं।

  • जैसे- पुलिङ्ग – स्त्री० – नपु०
  • एक- एकः – एका – एकम्
  • दो – द्वौ – द्वे – द्वे
  • तीन – त्रयः – दिसः – त्रीणि
  • चार – चत्वारः – चतस्रः – चत्वारि

नोट- पाँच से आगे को संख्याएँ तीनों लिंगों में एक समान होती हैं।

  • जैसे – पुलिङ्ग – स्त्री० – नपुः
  • पाँच – पञ्च – पञ्च – पञ्च
  • छ: – पटं – पट् – षद्

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

Bihar Board Class 10 Disaster Management जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बाढ़ के समय निम्नलिखित में से किस स्थान पर जाना चाहिए ?
(क) ऊँची भूमि वाले स्थान पर
(ख) गाँव के बाहर
(ग) जहाँ हैं उसी स्थान पर
(घ) खेतों में
उत्तरं-
(क) ऊँची भूमि वाले स्थान पर

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

प्रश्न 2.
मलवे के नीचे दबे हुए लोगों को पता लगाने के लिए किस यंत्र की मदद ली जाती
(क) दूरबीन
(ख) इंफ्रारेड
(ग) हेलीकॉप्टर
(घ) टेलीस्कोप
उत्तर-
(ख) इंफ्रारेड

प्रश्न 3.
आग से जलने की स्थिति में जले हुए स्थान पर क्या प्राथमिक उपचार करना चाहिए?
(क) ठंडा पानी डालना चाहिए
(ख) गर्म पानी डालना
(ग) अस्पताल पहुंचाना
(ग) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) ठंडा पानी डालना चाहिए

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

प्रश्न 4.
बस्ती/मकान में आग लगने की स्थिति में क्या करना चाहिए?
(क) अग्निशामक यंत्र को बुलाना
(ख) दरवाजे खिड़कियाँ लगाना
(ग) आग बुझाने तक इंतजार करना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) अग्निशामक यंत्र को बुलाना

प्रश्न 5.
सुनामी किस स्थान पर आता है ?
(क) स्थल
(ख) समुद्र
(ग) आसमान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) समुद्र

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
आपदा की घड़ी में जीवन रक्षक प्रबंधन अत्यधिक उपयोगी और अत्यावश्यक है। आकस्मिक प्रबंधन ही किसी प्रशासन की सफलता की कसौटी होती है। इसके अंतर्गत आपदा मेंआते ही प्रभावित लोगों को आपदा से निजात दिलाना ही प्रमुख उद्देश्य होता है। अलग-अलग प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं के आकस्मिक प्रबंधन में अलग-अलग प्रकार की प्राथमिकताएँ होती हैं।

प्रश्न 2.
बाढ़ की स्थिति में अपनाये जानेवाले आकस्मिक प्रबंधन का संक्षेप में वर्णन कीजिए!
उत्तर-
बाढ़ की स्थिति में पहली प्राथमिकता बाढ़ रोकना नहीं बल्कि बाढ़ से लोगों को .. बचाना है। लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना भी आकस्मिक प्रबंधन का ही अंग है। सुरक्षित स्थान पर ले जाने के बाद भोजन और पेयजल की व्यवस्था आवश्यक है। बच्चों के लिए दूध की व्यवस्था, महामारी से बचने के लिए गर्म जल, गर्म भोजन तथा छोटे से जगह में मिलजुलकर रहने के लिए वातावरण बनाना आकस्मिक प्रबंधन का ही हिस्सा है। पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी अति आवश्यक है। खाद्य पदार्थ, पशुचारा, महामारी आने से संबंधित जीवन रक्षक दवाई, छिड़काव की सामग्री इत्यादि का पूर्व प्रबंधन आकस्मिक प्रबंधन की पहली शर्त है।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

प्रश्न 3.
भूकंप एवं सुनामी की स्थिति में आकस्मिक प्रबंन की मर्चा संक्षेप में करें।
उत्तर-
भूकंप की स्थिति में आकस्मिक प्रबंधन का तीन प्रमुख कार्य होता है

  • बचे हुए विस्थापित लोगों को राहत कैंप में ले जाना या उसे सभी प्रकार की आवश्यक सुवि’ – उपलब्ध कराना।
  • वैसे लोगों को मलवे से निकालना जो अभी भी दबे हुए हैं।
  • अकाल मृत्युप्राय आम लोगों को और जानवरों को सही स्थान पर दफनाकर या धार्मिक रीतियों के अनुरूप अंतिम संस्कार करना। ऐसा नहीं करने से महामारी फैलने की संभावना रहती है।

सुनामी की स्थिति में पहली प्राथमिकता है कि घायल का प्राथमिक उपचार कर अस्पताल पहुँचाया जाय तथा लापता पता लगाने के लिए हेलिकॉप्टर, रडार जैसे यंत्रों की मदद ली जाय। शक्तिचालित नौकाएँ भी इस कार्य में सहायता ली जा सकती हैं।

प्रश्न 4.
आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-
आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके लिए आवश्यक है कि वे राहत शिविर का निर्माण करें। वहाँ सभी उपकरणं और प्राथमिक उपचार की सामग्रियाँ उपलब्ध कराएँ तथा एम्बुलेंस, डॉक्टर, अग्निशामक इत्यादि की व्यवस्था में तत्परता दिखाएँ। कागजी दाव-पेंच न पड़कर राहत राशि और राहत सामग्री को पहुंचाकर आपदा प्रबंधन को सरल तथा सहज बनाएँ।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

प्रश्न 5.
आग लगने की स्थिति में क्या प्रबंधन करना चाहिए ? उल्लेख करें।
उत्तर-
आग लगने की स्थिति में आकस्मिक प्रबंधन की तीन बड़ी जिम्मेवारी होती है-

(क) आग में फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना।
(ख) घायलों को तत्काल प्राथमिक उपचार देकर अस्पताल पहुंचाना और उससे पहले ठंडा पानी डालना, बर्फ से सहलाना और बरनोल जैसी प्राथमिक औषधि का उपयोग करना।
(ग) आग के फैलाव को रोकना, जिसके लिए नजदीक में उपलब्ध बालू, मिट्टी, अगर तालाब हो तो उसके जल का उपयोग करना, अग्निशामक यंत्र को बुलाना, बगल के झुग्गी-झोपड़ी को उखाड़ फेंकना, विद्युत लाइन को विच्छेदित करना अतिआवश्यक है।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
आपदा की घड़ी में जीवन रक्षक प्रबंधन अत्यधिक उपयोगी और अत्यावश्यक है। आकस्मिक प्रबंधन ही किसी प्रशासन की सफलता की कसौटी होती है। इसके अंतर्गत आपदा मेंआते ही प्रभावित लोगों को आपदा से निजात दिलाना ही प्रमुख उद्देश्य होता है। अलग-अलग प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं के आकस्मिक प्रबंधन में अलग-अलग प्रकार की प्राथमिकताएँ होती हैं।

प्रश्न 2.
आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका का विस्तार से उल्लेख करें। .
उत्तर-
मुख्यतः आकस्मिक प्रबंधन के तीन घटक हैं –

  1. स्थानीय प्रशासन
  2. स्वयंसेवी संगठन
  3. गाँव अथवा मुहल्ले के लोगा ।

(1) स्थानीय प्रशासन-आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन की अहम भूमिका होती है। राहत शिविर का निर्माण, प्राथमिक उपचार की सामग्री की व्यवस्था, एम्बुलेंस, डॉक्टर, अग्निशामक इत्यादि की तत्काल व्यवस्था करना इसका प्रमुख कार्य है।

(2) स्वयंसेवी संगठन–आकस्मिक प्रबंधन में स्वयंसेवी संस्था महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अगर गाँव के युवकों तथा पंचायत प्रबंधन के बीच समन्वय हो। ऐसे प्रबंधन में जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव का परित्याग करना पड़ता है। स्वयंसेवी संस्था आकस्मिक प्रबंधन में काफी योगदान दे सकती है।

(3) गाँव अथवा मुहल्ले के लोग—आकस्मिक प्रबंधन में गाँव और मुहल्ले के लोग काफी योगदान दे सकते हैं। जैसे-युवकों को मानसिक रूप से सुदृढ़ और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करनाऔर उनमें साहस का संचार कर सकते हैं।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 4 जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन

Bihar Board Class 10 Disaster Management जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन Notes

  • बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में प्रायः कच्चे मकान ओर झोपड़ियों की बहुलता होती है। धान के कारण यहाँ, पुआलं का ढेढ़ रहना स्वाभाविक है। अतः आग लगने पर इसके तेजी से फैलने का अंदेसा बना रहता है।
  • बाढ़ में घिरे लोगों को बाहर निकालना सबसे पहला कार्य है।
  • बाढ़, सूखा, भूकम्प, सुनामी, चक्रवात, भूस्खलन, ओलावृष्टि, वज्रपात, हिमपात इत्यादि प्रमुख आपदाएँ हैं।
  • ज्वालामुखी के प्रकोप से भारत. प्रायः बचा हुआ है।
  • पंजाब, हरियाणा जैसे पश्चिमोत्तर राज्यों में हिमालय की बर्फ पिघलने से बाढ़ आती है।
  • सुनामी से बंगाल की खाड़ी प्रभावित है। क्योंकि इसके पूर्वी भाग में इण्डोनेशिया का तट बहुत अधिक संवेदनशील है।
  • प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ संकटों और आपदाओं को आमंत्रित करती है।
  • भारत में चक्रवात प्रायः मई जून तथा अक्टूबर-नवम्बर में अधिक आते हैं।
  • कारगर वैकल्पिक संचार-व्यवस्था राहत-कार्य में सहायक होती है।
  • भारत में बिहार ही एक ऐसा राज्य है, जो किसी संकट और आपदा से अछूता नहीं है, सिवाय सुनामी और भूकम्प के।।
  • आपदा प्रबंधन दो चरणों में लागू करने की आवश्यकता है आकस्मिक तथा दीर्घकालीन प्रबंधन।
  • आपदा के दौरान खोये हुए व्यक्तियों का पता लगाने में न सिर्फ शक्ति चालित नावों की मदद, रडार एवं हेलीकॉप्टरों की मदद ली जा सकती है बल्कि कृत्रिम उपग्रह भी सहायक होते हैं।
  • राहतकर्मियों के उपकरणों को दो भागों में बाँट सकते हैं-
    (क) बचाव कर्मियों के निजी उपकरण।
    (ख) बचाव दल के लिए उपकरण।
  • आकस्मिक प्रबंधन के तीन प्रमुख घटक हैं-
    (i) स्थानीय प्रशासन (ii) स्वयंसेवी संगठन तथा (iii) ग्राम एवं मुहल्ले के लोग।
  • आपदा प्रबंधन हेतु स्कूल में छात्र-छात्राओं को भी प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • आपदा प्रबंधन को दिनचर्या का एक अंग समझना आवश्यक है।
  • आपदा प्रबंधन के लिए युवकों को प्रेरित एवं प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • भारत में 56 प्रतिशत भू-क्षेत्र भूकंप प्रभावित हैं।
  • भारत के 16 राज्यों का 16 प्रतिशत भाग सूखे के चपेट में रहता है।
  • अगस्त 2008 में नेपाल के कुसाहा के पास कोसी बाँध टूट जाने के कारण उत्तरी बिहार के कोसी क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आयी।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 6 स्थानीय सरकार

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 1 Chapter 6 स्थानीय सरकार Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 6 स्थानीय सरकार

Bihar Board Class 6 Social Science स्थानीय सरकार Text Book Questions and Answers

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संजना की बहन जिसकी उम्र 22 वर्ष है। शादी के बाद पास के गाँव में रहती है। क्या उसका नाम मतदातासूची में लिखा जाएगा?
उत्तर-
नहीं, संजना की बहन का नाम मतदान सूची में नहीं लिखा जाएगा। क्योंकि वह पास के गाँव में रहती है। उसका नाम उस गाँव के वार्ड सदस्य के पास लिखा जाएगा।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 6 स्थानीय सरकार

प्रश्न 2.
मतदाता सूची की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर-
ग्राम पंचायत के चुनाव होनेवाले हैं। इसलिए इस पंचायत के वोट डालने वाले लोगों के नामों को लिखने के लिए इन नामों की सूची को मतदान सूची की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
आरक्षण व्यवस्था क्यों आवश्यक है? कक्षा में शिक्षक के साथ चर्चा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 4.
पंचायत के क्षेत्र को वार्डों में क्यों बाँटा जाता है?,
उत्तर-
प्रत्येक ग्राम पंचायतों को क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है। “अगर सभी वार्ड सदस्य एक ही टोले/मोहल्ले के हो जाएँ, तो दूसरे मोहल्ले/टोले के बारे में कौन ध्यान देगा?” इसलिए पंचायत के क्षेत्र को वार्डों में बाँट दिया जाता है।

प्रश्न 5.
मुखिया का चुनाव कैसे होता है?
उत्तर-
ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया होता है। बिहार पंचायती राज अधिनियम के अनुसार मुखिया का चुनाव वयस्क मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से होता है । मुखिया का कार्यकाल भी 5 वर्ष का होता है। वार्ड सदस्य अपने ही सदस्यों में से एक को ही उपमुखिया चुनते हैं। मुखिया के परामर्श के अनुसार उपमुखिया सभी कार्य कर सकता है।

प्रश्न 6.
शहर कैसे बनते हैं ? आसपास के उदाहरण के साथ चर्चा करें।
उत्तर-
शहर में जनसंख्या के आधार पर प्रशासन का निर्माण किया जाता है। शहर बनने की जनसंख्या चालीस हजार से दो लाख के बीच होती है। उसी प्रकार छोटे शहर जो गाँव से शहर का रूप लेने लगते हैं वहाँ अधिकांश लोग अपनी जीविका कृषि से नहीं बल्कि व्यापार, नौकरी, उद्योग आदि करते

बिहार में पटना नगर निगम की स्थापना 1952 में की गई थी। बिहार के अन्य शहरों मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा, गया, आरा और बिहार शरीफ में भी नगर निगम की स्थापना की गई है।

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प्रश्न 7.
नगर पंचायत और नगर निगम में क्या अंतर है ? पता करें।
उत्तर-
नगर पंचायत-छोटे शहर जो गाँव से शहर का रूप लेने लगते हैं वहाँ नगर पंचायत बनाई जाती है। यह नगर पंचायत इन शहरों के कार्य करते नगर निगम-नगर निगम आबादी के अनुसार कई भागों में बाँटा गया है जिसे वार्ड कहते हैं। यह नगर निगम अधिकांश कार्यों को करती है।

प्रश्न 8.
पार्षद को चुनाव द्वारा क्यों चुना जाता है ?
उत्तर-
नगर को आबादी के अनुसार कई भागों में बाँटा गया है जिसे . वार्ड कहा जाता है। पटना नगर 72 क्षेत्रों में बाँटा गया है। सभी वाडों से एक-एक व्यक्ति चुनकर आते हैं, वे वार्ड काउंसलर या पार्षद कहलाते हैं। सभी पार्षदों का चुनाव पाँच वर्षों के लिए होता है।

प्रश्न 9.
नगर निगम के पार्षद और कर्मचारी के काम में क्या अंतर
उत्तर-
नगर निगम के पार्षद के प्रशासन के लिए एक नगर आयुक्त होता है, जो आमतौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा स्तर का पदाधिकारी होता है। नगर आयुक्त, नगर निगम का मुख्य प्रशासक है। नगर निगम परिषद एवं समितियों द्वारा लिए गए निर्णयों के तहत कार्य संपादन करना आयुक्त एवं कर्मचारियों का काम है। उदाहरण के लिए जल व्यवस्था, विकास संबंधी कार्य, सार्वजनिक सुविधा के कार्य इत्यादि ।

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प्रश्न 10.
अलग-अलग समितियाँ बनाने की जरूरत क्यों है?
उत्तर-
अलग-अलग समितियों के द्वारा ही हम अपने कार्यों को सुव्यवस्थित तरीके से कर सकते हैं और वह कार्य आसानी स किया जा सकता है। निगम ‘परिषद एवं समितियों द्वारा ही कार्य को संपादन किया जाता है।

प्रश्न 11.
क्या इन परिषदों से स्थानीय समस्याओं का हल हो सकता है? अपने इलाके के उदाहरण से समझाएँ।
उत्तर-
हाँ, इन परिपदों से स्थानीय समस्याओं का हल हो सकता है। उदाहरण-हमारे नगर में पानी की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी तो वहाँ नगर निगम परिपद ने अपने तरीके से जल मुहैया कराया जिससे अब जल की व्यवस्था सही रहती है।

प्रश्न 12.
ग्राम एवं नगर दोनों जगह वार्ड बनाये गये हैं। ऐसे क्यों ? चर्चा करें।
उत्तर-
ग्राम एवं नगर दोनों जगह वार्ड बनाये जाते हैं। ताकि ग्राम की समस्या और उसका निदान गाँव के वार्ड आपसी सहयोग और प्रशासनिक उणयों के द्वारा कर सकें।

प्रश्न 13.
आपके आसपास के शहरों में सफाई की सुविधा कैसी है ? आपस में चर्चा करें।
उत्तर-
हमारे आसपास के शहरों में सफाई की सुविधा बहुत अच्छी नहीं है। नगर-निगम समय-समय पर सभी सविधाओं का ध्यान रखती है जिससे किसी तरह की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता है । लेकिन कई जगहों पर सड़कों एवं नालियों की सफाई करना जरूरी है। वहाँ से गंदगी नहीं निकलने से बीमारियां का भी सामना करना पड़ता है। जल, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी भी सुविधाओं को ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 14.
कर की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर-
नगर निगम को अपने कार्य करने के लिए देश को आगे बढ़ाकर उन्नित करने के लिए इतने सार काम करने के लिए बहुत सारा पैसा चाहिए। निगम यह राशि अलग-अलग तरीकों से इकट्ठा करता है। इस राशि का बड़ा भाग सरकार द्वारा अनुदान से आता है। जो लोग कर देते हैं उसी से सरकार इस राशि को उपलब्ध कराती है।

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प्रश्न 15.
पता करें कि नगर निगम/नगर परिषद/नगर पंचायत को लोगों द्वारा.कर के रूप में आय उपलब्ध हो पाता है या नहीं?
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

अभ्यास

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र या अपने पास के ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत द्वारा किये गये किसी एक कार्य का उदाहरण दीजिए और उसके बारे में निम्न बातें पता कीजिए।

प्रश्न (i)
यह काम क्यों किया गया?
उत्तर-
गाँव की सफाई करना यह काम गाँव की सुरक्षा के लिए किया गया।

प्रश्न (ii)
पैसा कहाँ से आया?
उत्तर-
पैसा ग्राम पंचायत में दिये गये अनुदान से आया।

प्रश्न (iii)
काम पूरा हुआ या नहीं?
उत्तर-
काम पूरा हो गया, क्योंकि पूरे ग्राम पंचायत के लोगों में एकता थी।

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प्रश 2.
पंचायत सचिव कौन होता है? पंचायत सचिव और ग्राम-पंचायत के प्रमुख के कार्यों में क्या अन्तर है?
उत्तर-
ग्राम पंचायत का एक सचिव होता है, जो ग्राम सभा का भी सचिव होता है। उसे पंचायत सचिव कहा जाता है। सचिव का चुनाव नहीं होता है यह सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

पंचायत सचिव का कार्य ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत की बैठक बुलाना एवं चर्चा में उठे बिन्दुओं को एक रजिस्टर पर अंकित करना तथा उनका रिकार्ड रखना होता है । वह ग्राम पंचायत के रोकड़, पास बुक, अभिलेख एवं पंजियों का संधारण करता है। वह ग्राम पंचायत के सभी कार्यों का कार्यन्वयन करने में मुखिया को सहयोग करता है।

ग्राम पंचायत कृषि, पशुपालन, सिंचाई, मछली पालन आदि को बढ़ावा देना । ग्रामीण आवास, बिजली की व्यवस्था का प्रबंध करना। सहकारिता, कृषि भंडारण तथा बिक्री की व्यवस्था करना।

प्रश्न 3.
गाँव में भूमि विवाद है लेकिन आपस में झगड़ा नहीं हो। इसके लिए इस विवाद को कैसे सुलझायेंगें ? इसमें हल्का कर्मचारी की क्या भूमिका होगी?
उत्तर-
गाँव के जमीन को नापना और उसका अभिलेख रखना हल्का कर्मचारी का काम होता है । यह जमीन का लेखा-जोखा रखने वाले कर्मचारी को हल्का कर्मचारी कहते हैं। अगर गाँव में भूमि विवाद है तो इसे आपस में बिना झगड़े के हल्का कर्मचारी शांतिपूर्वक बिना मुकर्मो के सुलझा सकता है। कर्मचारी नक्शे के आधार पर जमीन को नापकर देखता है जिससे पता चलता है कि किसके तरफ जमीन अधिक है किसके तरफ कम है। ।

इस प्रकार गाँव के भूमि विवाद को हल्का कर्मचारी अपनी भूमिका के द्वारा भृमि विवाद मामलों को सुलझा जा सकता है।

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प्रश्न 4.
‘एक बिटिया की चाह’ कविता में किस मुद्दे को उठाने की कोशिश की गई है? क्या आपको यह मुद्दा महत्वपूर्ण लगता है ? क्यों?
उत्तर-
एक बिटिया की चाह’ कविता में यह मुद्दे के बारे में बताया जा रहा है कि बेटी की भी चाह है कि उसे भी अपना एक घर है। भले ही इसके बदले उसे कोई दहेज में मिलनेवाली चीजें लेने का अरमान नहीं है। पर उसे एक अपना घर मिलना चाहिए । वह अपने पिता से एक घर अपना जो केवल उसी का हो ।

इसमें दहेज प्रथा की कुरीतियों के बारे में कहा जा रहा है । दहेज प्रथा के विरुद्ध आवाज लगायी जा रही है। जिससे सभी बेटियों को समान अधिकार मिलने का अवसर प्राप्त हो । यह मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसी पर सभी बेटियों का भविष्य निर्धारित है। उसे भी समान अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

प्रश्न 5.
नगर परिषद् एवं नगर पंचायत में क्या अन्तर हैं?
उत्तर-
नगर परिषद-जिस शहर की जनसंख्या 5 लाख से अधिक हो उसकी नगरीय स्वशासन इकाई को नगर परिषद् कहते हैं। निगम परिषद् के काम करने के लिए अलग-अलग समितियाँ बनाई जाती हैं। जैसे–शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, लोक निर्माण, उद्यान आदि ।

नगर पंचायत-छोटे, कस्बाई शहरों के लिए वहाँ नगर पंचायत बनाई – जाती है। नगर पंचायत के भी कई कार्य होते हैं। वह उन कार्यों को करते हैं। वे अपनी जीविका व्यापार, नौकरी उद्योग आदि से चलाते हैं। यह नगरपंचायत इन शहरों के काम करते हैं। जैसे – शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा आदि ।

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प्रश्न 6.
नगर निगम के आयुक्त की नियुक्ति कौन करता है और उसके कार्य क्या हैं?
उत्तर-
निगम परिषद् के काम करने के लिए अलग-अलग समितियाँ बनाई जाती है। नगर निगम के प्रशासन के लिए एक नगर आयुक्त की नियुक्ति की जाती है। जो आमतौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा स्तर का पदाधिकारी होता है। नगर आयुक्त, नगर-निगम का मुख्य प्रशासक है। निगम परिषद् एवं समितियों द्वारा लिए गये निर्णयों के तहत कार्य संपादन करना आयुक्त एवं कर्मचारियों का काम है

  1. जल, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी कार्य ।
  2. सार्वजनिक सुविधा के कार्य । जैसे – सडक साफ करना, कचरा उठाने की व्यवस्था करना एवं नालियों की सफाई, सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था आदि ।
  3. विकास संबंधी कार्य जैसे-सड़क बनाना, नालियाँ खुदवाना, सड़कों पर प्रकाश व्यवस्था करना।
  4. शिक्षा संबंधी कार्य।
  5. प्रशासनिक कार्य । जैसे-जन्म-मृत्य पंजीयन आदि।
  6. अपातकालीन कार्य । जैसे – आग लगने पर बुझाना ।
  7. पर्यावरण सुरक्षा । जैसे-वृक्षारोपण एवं देखभाल करना।

प्रश्न 7.
एक ग्रामीण क्षेत्र है, दूसरा नगरीय क्षेत्र है, इनको आप। किन-किन रूपों में अन्तर करते हैं ! शिक्षक के साथ चर्चा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 8.
ग्राम पंचायत और नगर प्रशासन का मुख्य कार्य क्या-क्या हैं ? अपने अनुभव के आधार पर दो-दो उदाहरण देकर समझायें।
उत्तर-
ग्राम पंचायत के मुख्य कार्य ग्रामीण आवास, परिवार कल्याण, स्वास्थ्य सेवा, अनुसूचित और पिछड़ी जनजातियों के कल्याण के लिए, कार्य करना । कृषि भूमि-सुधार, सिंचाई, ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग आदि। नगर प्रशासन का मुख्य कार्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी कार्य, सार्वजनिक सुविधा का कार्य, पशु चिकित्सा का कार्य, विकास संबंधी कार्य, शिक्षा सम्बंधी कार्य, जन कल्याण, प्रशासनिक कार्य, अपातकालीन कार्य आदि ये सभी कार्य नगर प्रशासन अपनी देख-रेख में करते हैं।

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प्रश्न 9.
ग्राम पंचायत और नगर निगम के आय के कौन-कौन से साधन हैं, सूची बनायें।
उत्तर-
ग्राम पंचायत के आय के साधन निम्न हैं

  1. ग्राम पंचायत निधि।
  2. सरकार द्वारा लगाए गए कर ।
  3. केन्द्र एवं राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान ।

नगर निगम के आय के साधन निम्न हैं

  1. कर।
  2. सरकार से प्राप्त अनुदान ।।
  3. आवश्यकता पड़ने पर नगर प्रशासन कर्ज भी ले सकता है।
  4. अन्य विभिन्न तरीकों से लिए जाने वाले शुल्क । जैसे-होर्डिंग, मोबाईल टॉवर आदि।

Bihar Board Class 6 Social Science स्थानीय सरकार Notes

पाठ का सारांश

गाँव की समस्या का समाधान स्थानीय सरकार के द्वारा किया जाता है। इसकी सर्वोच्च संस्था पंचायत होती है। पंचायत का अर्थ होता है । पाँच पंचों की समिति । पंचायत का मुख्य उद्देश्य गाँवों की समस्याओं को दूर कर उन्हें उन्नत एवं आत्मनिर्भर बनाना । सार्वजनिक चीजों की देख-रेख कौन करेगा? ये जब खराब हो जाएँगे तो कौन ठीक करवायेगा ? इनकी सुरक्षा कौन करेगा? कोई व्यक्ति जबरदस्ती करे तो समस्या को कौन सुलझाएगा? इसलिए इस प्रकार की समराओं के निदान के लिए ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत की स्थापना की जाती है।

बिहार राज्य में पंचायत की स्थापना जनसंख्या के घनत्व के अधार पर की जाती है। वहाँ की जनसंख्या कम से कम 7.000 या उससे अधिक हो। पंचों का चुनाव का काम राज्य निर्वाचन आयोग करता है । गाँव में एक मतदाता सूची होती है जिनमें उन्हीं लोगों के नाम होते हैं जो कम-से-कम 18 साल के हों तथा कम-से-कम 180 दिन तक उस क्षेत्र में रह रहे हों ।

मतदान ही वार्ड सदस्य, मुखिया पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद् सदस्य, पंच या सरपंच का चुनाव करते हैं। ग्राम पंचायत की बैठक हर तीन माह पर एक आम सभा की तरह होती है जो मुखिया के द्वारा बुलाई जाती है। यह बैठक पंचायत भवन में बुलाई जाती हैं। ग्राम पंचायत द्वारा स्थानीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के कार्य किये जाते हैं। उनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं

  • ग्रामीण विकास योजनाओं का ग्राम सभा द्वारा चर्चा के बाद क्रियान्वयन करना।
  • कृषि, पशुपालन, सिंचाई, मछली पालन, आदि को बढ़ावा देना।
  • ग्रामीण आवास पेयजल, सड़क, घाट, बिजली की व्यवस्था, बाजार एवं मेला इत्यादि का समुचित प्रबंध करना ।
  • स्वास्थ्य सेवा, परिवार कल्याण, विकलांग कल्याण की योजनाओं में मदद करना।
  • कुआँ, तालाबों, पोखरों आदि का निर्माण।
  • सहकारिता, कृषि भंडारण तथा बिक्री की व्यवस्था करना।

ग्राम पंचायत के आय के साधन – ग्राम पंचायत के आय के दो प्रमख स्रोत हैं। एक कर के रूप में जो वह खद लगाती है और दूसरा अनुदान के रूप में, जो सरकार द्वारा उसे मिलता है। उदाहरण के लिए पंचायत अपनी क्षेत्र की दुकानदारों से कर वसूल करती है। इसका खुद का स्रोत हैं और पंचायत के किसी भी जरूरी काम पर इसे खर्च किया जा सकता है। ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए या आवास योजना के लिए पंचायत को सरकार द्वारा पैसे प्राप्त होते हैं।

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हमारे देश में 6 लाख से भी अधिक गाँव हैं। उनकी समस्याओं को सुलझाना आसान काम नहीं है। गाँव में भी बेहतर व्यवस्था के लिए एक प्रशासन होता है। प्रत्येक पुलिस थाना का एक क्षेत्र होता है जिसमें चोरी, दुर्घटना, मारपीट, झगड़े आदि का केश (रपट) दर्ज करके थाना प्रशासनिक कार्रवाई करता है। गाँव के जमीन को नापना और उसका अभिलेख रखना हल्का कर्मचारी की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। हल्का कर्मचारी किसानों की भूमि कर कर जमा करवाता है तथा सरकार को अपने क्षेत्र में उगने वाले फसलों के बारे में जानकारी देता है। इसका काम अवलोकन कई लोग करते

बिहार राज्य कई जिलों में बँटा हुआ है। जमीन का लेखा-जोखा रखने हेतु जिलों को भी प्रखण्ड और अनुमण्डल में बाँटा गया है। जिला में सबसे ऊपर जिलाधिकारी उसके बाद उपसमाहर्ता (भूमि सुधार) अंचलाधिकारी, अंचल निरीक्षक और अंत में हल्का कर्मचारी होता है।

नगर प्रशासन -गाँव की अपेक्षा शहरों की आबादी अधिक होती है इसलिए उनकी समस्याएँ भी अधिक होती हैं। शहरों में जनसंख्या के आधार पर स्थानीय प्रशासन का निर्माण किया जाता है। महानगरों के लिए महानगर. निगम, बड़े शहरों के लिए नगर निगम एवं छोटे शहरों के लिए नगरपालिकाएँ तथा कस्बाई शहरों के लिए पंचायत की स्थापना की गई है । हमारे बिहार राज्य । में कंवल नगर निगम, नगरपालिकाएँ तथा नगर-पंचायतें ही हैं।

बिहार में पटना नगर निगम की स्थापना 1952 में की गई थी। भागलपुर, दरभंगा, आरा तथा बिहार शरीफ में नगर-निगम की स्थापना 2006 में की गई थी। नगर की आबादी के अनुसार कई भागों में बाँटा गया है, जिसे वार्ड कहते हैं।

पटना नगर को 72 वार्डों में बाँटा गया है। सभी वार्डों में एक व्यक्ति चुनकर आते हैं जो वार्ड काउंसलर कहलाते हैं। इनका चुनाव 5 वर्षों के लिए होता है। इसकी बैठक प्रत्येक माह होती है। निगम परिपद अपने सदस्यों में से एक महापौर एवं एक उपमहापौर चुनता है। इनका कार्यकाल 5 वर्षों तक का होता है ।

महापौर की अनुपस्थिति में उपमहापौर ही सारे कार्य को संभालता है। दूसरा अंग स्थायी समिति है जिसमें 7 सदस्य होते हैं। यह समिति अधिकांश कार्यों का करती है। तीसरा अंग परामर्शदाता समितियाँ हैं जो सभी विषयों पर सलाह देती हैं। चौथा अंग नगर आयुक्त होता है जो नगर निगम के कर्मचारियों की देखभाल तथा नियुक्ति करता है।

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पटना नगर-निगम के मुख्य कार्य

  • जल, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा संबंधी कार्य जैसे -पानी की व्यवस्था ।
  • सार्वजनिक सुविधा के कार्य । जैसे – सड़क साफ करना, कचरा उठाने की व्यवस्था करना, सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था आदि ।
  • विकास संबंधी कार्य । जैसे – सड़क बनाना, नालियाँ खुदवाना, सडकों पर प्रकाश व्यवस्था एवं वाहन ठहराव की व्यवस्था करना।
  • शिक्षा संबंधी कार्य।
  • प्रशासनिक कार्य। जैसे-जन्म-मृत्य पंजीयन आदि के कार्य ।
  • अपातकालीन कार्य । जैसे – आग लगने पर बुझाना. बाद आने पर रोकने के प्रयास करना.।
  • पर्यावरण सुरक्षा।
  • विविध कार्य । जैसे-जमीन एवं मकान का सर्वेक्षण एवं नक्शा बनाना, जनगणना की व्यवस्था आदि । इसी प्रकार अन्य शहरों में भी नगर परिषद् या नगर पंचायत परिषद् बनाकर काम किया जाता है।

इतने सारे कामों को करने के बहुत सारा पैसा चाहिए। निगम यह राशि अलग-अलग तरीकों से इकट्ठा करता है। इस राशि का बड़ा भाग सरकार द्वारा अनुदान से आता है। लोग जो कर (Tax) देते हैं। वह सरकार इस राशि को उपलब्ध कराती है।

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अतः नगर-निगम के आय के साधन इस प्रकार हैं

  • मकान एवं दुकान तथा अन्य आदि से प्राप्त कर ।
  • सरकार द्वारा प्राप्त होने वाले अनुदान ।
  • अन्य विभिन्न तरीकों से लिए जानेवाले शुल्क जैसे-होर्डिंग, मोबाइल टॉवर आदि।
  • नगर-निगम कर्ज भी ले सकती है।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

Bihar Board Class 10 Disaster Management प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
महासागर के तली पर होनेवाले कंपन को किस नाम से जाना जाता है?
(क) भूकंप
(ख) चक्रवात
(ग) सुनामी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) सुनामी

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प्रश्न 2.
2 दिसम्बर, 2004 को विश्व के किस हिस्से में भयंकर सनामी आया था?
(क) पश्चिम एशिया
(ख) प्रशांत महासागर
(ग) अटलांटिक महासागर
(घ) बंगाल की खाड़ी
उत्तर-
(घ) बंगाल की खाड़ी

प्रश्न 3.
भूकंप से पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली सबसे पहली तरंग को किस नाम से जाना जाता है?
(क) पी-तरंग
(ख) एस-तरंग
(ग) एल-तरंग
(ग) टी-तरंग
उत्तर-
(क) पी-तरंग

प्रश्न 4.
भूकंप केन्द्र के उर्ध्वाधर पृथ्वी पर स्थित केन्द्र को क्या कहा जाता है?
(क) भूकंप केन्द्र
(ख)- अधिकेन्द्र
(ग) अनुकेन्द्र
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) अनुकेन्द्र

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प्रश्न 5.
भूकंप अथवा सुनामी से बचाव का इनमें से कौन-सा तरीका सही नहीं है?
(क) भूकंप के पूर्वानुमान को गंभीरता से लेना ।
(ख) भूकंप विरोधी भवनों का निर्माण करना .
(ग) गैर-सरकारी संगठनों द्वारा राहत कार्य हेतु तैयार रहना
(घ) भगवान भरोसे बैठे रहना।
उत्तर-
(घ) भगवान भरोसे बैठे रहना।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भूकम्प के केन्द्र एवं अधिकेन्द्र के बीच अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
भूपटल के नीचे का वह स्थल भूकंपीय कंपन प्रारंभ होता है, भूकंप केन्द्र कहलाता ‘ है। भूपटल पर वे केन्द्र जहाँ भूकम्प के तरंग का सर्वप्रथम अनुभव होता है अधिकेन्द्र कहलाते हैं।

प्रश्न 2.
भूकंपीय तरंगों से आप क्या समझते है? प्रमुख भूकंपीय तरंगों के नाम लिखिए।
उत्तर-
भूकंप के समय उठनेवाले कंपन को मुख्यतः प्राथमिक (P), द्वितीयक (S) तथा दीर्घ (L) तरंगों में बाँटा जाता है।
P-तरंग सबसे पहले पृथ्वी पर पहुंचा है।
S-तरंग अनुप्रस्थ तरंग है और इसकी गति प्राथमिक तरंग से कम होती है।
तरंग भूपटलीय सतह पर उत्पन्न होती है, इसकी गहनता सबसे कम होती है। धीमी गति के साथ क्षैतिज रूप से चलने के कारण यह किसी स्थान पर सबसे बाद में पहुंचती है लेकिन यह सर्वाधिक विनाशकारी तरंग होती है।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

प्रश्न 3.
भूकंप और सुनामी के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
भूकंप-

  • भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है।
  • भूकंप की गहनता और बारंबारता में भारी अंतर होता है। इसे पाँच भागों में विभक्त किया गया है-जोन-1, जोन-2, जोन-3, जोन-4, जोन-5

सुनामी –

  • सुनामी भी प्राकृतिक आपदा है।
  • महासागर की तली पर जब कंपन होता है तो इसे सुनामी कहा जाता है।
  • समुद्र जल में कंपन उत्पन्न होता है और इस कंपन से क्षैतिज गति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 4.
सुनामी से बचाव के लिए कोई तीन.उपाय बताइए।’
उत्तर-

  • सुनामी से बचने के लिए समुद्र के बीच में स्टेशन/प्लेटफार्म बनाने की जरूरत है, जो समुद्री जल के सतह के नीचे की क्षैतिज हलचलों का अध्ययन कर तट पर संकेत दे सकता है जिससे वहाँ से लोगों को हटाया जा सके। सही पूर्वानुमान से लोगों को सुनामी से बचाया। जा सकता है।
  • सुनामी से बचने के लिए कंक्रीट तटबंध की जरूरत है।
  • सुनामी से बचने के लिए सरकार तथा गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा तटीय प्रदेश में रहनेवाले लोगों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भूकंप क्या है ? भारत को प्रमुख भूकंप क्षेत्रों में वभाजित करते हुए सभी क्षेत्रों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर-
भूपटल के नीचे का वह केन्द्र जहाँ भूकंपीय कंपन प्रारंभ होता है भूकंप कहलाता है। भारत को 5 भूकंपीय पेटी (Zone) में बांटा गया है जो निम्नलिखित हैं .

  • जोन-1: इस जोन में दक्षिणी पठारी क्षेत्र आते हैं, जहाँ भूकंप का खतरा नहीं के बराबर है।
  • जोन-2 : इसके अन्तर्गत प्रायद्वीपीय भारत के तटीय मैदानी क्षेत्र आते हैं जहाँ भूकंप की संभावना होती लेकिन तीव्रता कम होने के कारण अतिसीमित खतरे होते हैं।
  • जोन-3 :इसके अंतर्गत गंगा-सिन्धु का मैदान, राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात के क्षेत्र आते हैं। यहाँ भूकंप का प्रभाव तो देखने को मिलता है लेकिन वह कभी-कभी विनाशकारी होते हैं।
  • जोन-4 : इसमें अधिक खतरे होते हैं। इसके अंतर्गत शिवालिक हिमालय का क्षेत्र, पश्चिम बंगाल का उत्तरी क्षेत्र, असम घाटी तथा पूर्वोत्तर भारत का क्षेत्र तथा अंडमान निकोबार क्षेत्र भी आते हैं।
  • जोन-5:यह सर्वाधिक खतरे का क्षेत्र होता है। इसके अंतर्गत गुजरात का कच्छ प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरखंड का कुमाऊँ पर्वतीय क्षेत्र, सिक्किम तथा दार्जिलिंग का पहाड़ी क्षेत्र आता है।

प्रश्न 2.
सुनामी से आप क्या समझते हैं ? सुनामी से बचाव के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
सुनामी ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ हैं जो महासागर की तली पर कंपन से होता है इस कंपन से जल में क्षैतिज गति उत्पन्न होती है।

सुनामी से बचाव के लिए पूर्वानुमान आवश्यक है। समुद्र के बीच में इसके लिए स्टेशन/ प्लेटफार्म बनाने की जरूरत है, जो समुद्री जल के सतह के नीचे की क्षैतिज हलचलों का अध्ययन कर तट पर संकेत दे सकता है, जिससे कि लोगों को वहाँ से हटाया जा सके।

सुनामी से बचाव के लिए कंक्रीट तटबंध बनाने की जरूरत है। इस तट से टकराने वाले सुनामी तरंगों का तटीय मैदान पर सीमित प्रभाव होगा। तटबंध के किनारे में गाँव जैसी वनस्पति को सघन रूप से लगाना चाहिए।

तटीय प्रदेश में रहनेवालों को सुनामी से बचाने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके अंतर्गत सूचना मिलते ही समुद्र की तरफ या स्थल खंड की तरफ तुरंत भागने के लिए तैयार करना, सुनामी जल के स्थिर होने के बाद सामूहिक रूप से बचाव कार्य में लग जाना, घायलों की चिकित्सा सुविधाओं के अंतर्गत प्रभावित लोगों को स्वच्छ पेयजल और भोजन की व्यवस्था करना, असामाजिक तत्वों द्वारा लूट-मार न हो इसके लिए आम लोगों का सहयोग लेने जैसे कार्यों को करना आवश्यक है जिसमें सुनामी जल न्यूनतम प्रभाव डाल सके।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

प्रश्न 3.
भूकंप एवं सुनामी के विनाशकारी प्रभाव से बचने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जिससे बचाव के लिए. बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं इन प्रयासों को निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत रखा जा सकता है
(i) भूकंप का पूर्वानुमान, (ii) भवन निर्माण, (iii) जानमाल की सुरक्षा, (iv) प्रशासनिक कार्य, (v) गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग।

पूर्व, तरंग और अनुकंपन तरंगों को यदि भूकंपलेखी यंत्र पर ठीक से मापन किया जाय तो तरंगों की प्रवृत्ति के आधार पर संभावित बड़े भूकंप का पूर्वानुमान किया जा सकता है।

भूकंपनिरोधी मकान बनाने चाहिए। जनमाल की सुरक्षा हेतु विशेष सुरक्षा बलों की आवश्यकता है।
भूकंप से बर्बादी को रोकने में प्रशासनिक सतर्कता अतिआवश्यक है। इसके लिए मीडिया, पुलिस और जिला प्रशासन को अधिक सक्रिय होने की जरूरत है।

भूकंप की तबाही को रोकने में गैर-सरकारी संगठनों की अहम भूमिका होती है। ये संस्थाएँ न सिर्फ तत्काल राहत पहुँचाने में मदद कर सकते हैं वरन् भूकंपनिरीधी भवन निर्माण तथा भूकंप से तत्काल बचाव के लिए प्रशिक्षित भी कर सकते हैं। दबे हुए मलवे से आमलोगों को निकालने हेतु सामान्य तरीकों के अलावा सरकारी तंत्र की मदद से नवीन तकनीक का उपयोग करते हुए
साँस लेते हुए मानव को बचाने का कार्य कर सकते हैं।

विद्यालय में बच्चों को भूकंप से बचाव की जानकारी दी जानी चाहिए। भूकंप की तरह ही सुनामी भी प्राकृतिक आपदा है जिसमें समुद्र के बीच स्टेशन/प्लेटफार्म बनाने चाहिए जिससे पूर्व सूचना मिलने पर वहाँ से लोगों को हटाया जा सके।
सुनामी से बचाव के लिए कंक्रीट तटबंध बनाने की जरूरत है। इस कारण तट से टकराने-वाले सुनामी तरंगों का तटीय मैदान पर सीमित प्रभाव होगा। तटबंध के किनारे मैंग्रोव जैसी वनस्पति को लगाना चाहिए।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

राज्य सरकार तथा गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा तटीय प्रदेश में रहनेवाले, लोगों को सुनामी से बचाव का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। सुनामी से प्रभावित लोगों को तत्काल चिकित्सा सुविधा, शुद्ध पेयजल और भोजन की व्यवस्था, असामाजिक तत्वों द्वारा लूट-पाट न हो इसके लिए आमलोगों का सहयोग लेना अतिआवश्यक है।

प्रश्न 4.
भूकम्प और सुनामी के विनाशकारी प्रभावों का वर्णन करें और इनसे बचाव के उपाय बताएँ।
उत्तर-
भूकम्प और सुनामी एक प्राकृतिक आपदा है। इससे मानवीय जगत पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे धन-जन की अपार क्षति होती है। बड़ी-बड़ी इमारतें एक मल्बे का रूप ले लेती हैं। जिससे आर्थिक हानि होती है। सुनामी आने से समुद्र के किनारे के गरीब मछुआरों का जीवन संकट में.पड़ जाता है। अभी हाल में जापान में भूकम्प के झटकों ने जापानवासियों को दहशत में ला दिया है। वहाँ के लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया है। भूकम्प और सुनामी आने से न केवल धन-जन हानि होती है, बल्कि इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इन दोनों विनाशकारी आपदाओं से देश की स्थिति डॉवाडील हो जाती है। लोग अपने-आपको सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं और दहशत में रहते हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण जापान है, जहाँ भूकम्प के झटकों ने जापान में अपना विनाशकारी लीला दिखाया है। अत: इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भूकम्प और सुनामी के बहुत अधिक विनाशकारी प्रभाव होते हैं।

भूकंप से बचाव के उपाय

  • भूकंप का पूर्वानुमान- भूकंपलेखी यंत्र के द्वारा भूकंपीय तरंगों का पूर्वानुमान किया जा सकता है।
  • भवन-निर्माण- भवनों का निर्माण भूकंपरोधी तरीकों के आधार पर किया जाना चाहिए। खासकर उन क्षेत्रों में जो भूकंप प्रभावित हैं।
  • प्रशासनिक कार्य- भूकंप के बाद राहत-कार्य के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा विरोध दस्ते का गठन किया जाना चाहिए।
  • गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग- भूकंपीय आपदा से निपटने के लिए गैर-सरकारी संगठनों का भी योगदान हो सकता है। ये संस्थाएं न सिर्फ राहत-कार्य में मदद कर सकते हैं, बल्कि भूकम्प के पूर्व लोगों को भूकम्प विरोधी भवन-निर्माण तथा भूकम्प के समय तत्काल बचाव हेतु लोगों को प्रशिक्षित भी कर सकते हैं।

सुनामी से बचाव के उपाय-

  • तटबंधों तथा मैंग्रोव झाड़ी का विकास- सुनामी के विनाशकारी प्रभाव से बचने के लिए कंक्रीट के तटबंधों का निर्माण तथा तटबंधों पर मैंग्रोव की झाड़ियों का विकास कर सुनामी के झटके को कम किया जा सकता है।
  • तटीय प्रदेश के लोगों को प्रशिक्षण तटीय प्रदेशों में रहने वाले लोगों को प्रशिक्षण देकर सुनामी के बाद राहत-कार्यों में सामूहिक रूप से इनसे मदद लिया जा सकता है।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

Bihar Board Class 10 Disaster Management प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़ Notes

  • पृथ्वी के अन्दर प्लेटों की हलचल या अन्य भूगर्भीय क्रियाओं के कारण पृथ्वी की सतह पर जब कंपन होता है, तो उसे भूकंप कहते हैं।
  •  हिमालय की तराई को पूरा भाग और पश्चिमी भाग भूकंप के सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र हैं।
  • भूकंप की तीव्रता मापने की इकाई ‘रिक्टर पैमाना’ है।
  • 7 या इससे अधिक रियक्टर के भूकंप अत्यधिक विनाशकारी होते हैं।
  • पृथ्वी के अन्दर के तरंगों को ‘रैले तरंगें’ और सतह के पास की तरंगों को ‘लव तरंगें’ कहते हैं। ये नाम वैज्ञानिकों के नाम के आधार पर रखे गए हैं।
  • सुनामी जापानी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘भयंकर समुद्री दैत्य’।
  • समुद्र की पेंदी के पास भूकंप होने से सुनामी लहरें उत्पन्न होती हैं। किनारे आने पर ये विकराल रूप धारण कर लेती है।
  • भारत का दक्षिण-पूर्वी तट और द्वीप समूह सुनामी से अधिक प्रभावित होते हैं।
  • भूकंप संवेदनशीलता के आधार पर क्षेत्रों का वर्गीकरण-
  • जापान में भूकंप आना प्रायः सामान्य बात है।

भारत की राष्ट्रीय भूभौतिकी प्रयोगशाला, भूगर्भीय सर्वेक्षण, भारतीय मौसम विभाग और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के विगत लगभग 1,200 भूकंपों का गहन विश्लेषण कर इसे निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया है-

  • अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र कच्छ, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल के तराई क्षेत्र, संपूर्ण पूर्वोत्तर राज्या
  • अतिसंवेदनशील पूर्वोत्तर गुजरात, जम्मू-कश्मीर का तराई का भाग, हिमालय प्रदेश, . पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी महाराष्ट्र और उड़ीसा का पूर्वोत्तर कोना।
  • मध्यम संवेदनशील क्षेत्र देश का पश्चिमी क्षेत्र, सतपुरा, विंध्याचल के साथ लगी मध्य पेटी, मैदानी भाग का मध्य भाग एवं कुछ पूर्वी तटीय क्षेत्र।
  • निम्न संवेदनशील क्षेत्र मध्यम संवेदनशील क्षेत्रों से सटी हुई भीतरी पट्टी।
  • न्यनतम संवेदनशील क्षेत्र कर्नाटक, पूर्वी महाराष्ट्र, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के . पश्चिमी भाग, राजस्थान का पूर्वी भाग। राजस्थान का पूर्वी भाग।

भूकंप के विभिन्न प्रभाव
(क) भूतल पर दरारें पड़ना, भूस्खलन; जमीन के भीतर से पानी निकल जाना; भू-दबाव एवं अन्य संभावित श्रृंखला प्रतिक्रियाएँ।
(ख) मानव निर्मित कृतियों पर दरारें पड़ना, उलट जाना, आकुंचन, निपात, धन, जन , और निर्माणों की हानि एवं अन्य संभावित शृंखला प्रतिक्रियाएँ।
(ग) जल पर लहरें उत्पन्न होना, समुद्रों में सुनामी जैसी आपदा उत्पन्न होना एवं अन्य। संभावित श्रृंखला प्रतिक्रियाएँ।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 3 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : भूकंप एवं सुनामी

भूकम्प की वैज्ञानिक व्याख्या-पृथ्वी के भीतर विभिन्न क्रियाओं के कारण भूकंप हो सकता है, जैसे-

  • ज्वालामुखी सक्रियता-भयानक ज्वालामुखी विस्फोटों से निकटवर्ती क्षेत्रों में भूकंप का अनुभव हो सकता है।
  • पृथ्वी का संकुचन-पृथ्वी के संकुचन से भीतरी भागों में दबाव बढ़ जाता है। जिससे चट्टानों में टूट-फूट की क्रिया होती है और इसका फल तल के ऊपर भूकंप के रूप में मिलता है।
  • पहाड़ों या ऊंचे स्थानों से जब कुछ भाग कटकर नीचे की ओर जमा होने लगता है तो इसके फलस्वरूप कहीं चट्टानें नीचे खिसकती हैं कहीं ऊपर। इस हलचल से भी भूकंप हो सकता है।
  • भ्रंशनकिसी कारण से चट्टानें जब टूटती है तो इधर-उधर खिसकने लगती हैं। इन भ्रंशित क्षेत्रों में इन चट्टानों का क्रम कभी भी बदल सकता है और ये क्षेत्र भूकंप के लिए संवेदनशील हो जाते हैं, जैसे भारत में कृष्णा नदी के तट के साथ लातूर की भ्रंशित रेखा।
  • प्रत्यास्थ्य प्रतिक्षेप-चट्टानों में लचीलापन होता है। दबाव बढ़ने पर ये कुछ सिकुड़ जाता हैं और कम होने पर पुनः फैल जाती हैं। परंतु इसकी भी एक सीमा होती है। इस प्रत्यास्थता सीमा से अधिक दबाव पड़ने पर ये टूट जाती हैं। इस क्रिया से भी भूकंप हो सकता है।
  • जल-रिसाव-गहरे समुद्र में यदि निचले तल में दरार हो तो उससे पानी रिसकर नीचे जाता है, जहाँ तापमान की अधिकता के कारण यह वाष्प बन जाता है, इससे 1200 गुने से भी . अधिक दबाव उत्पन्न होता है और इससे पृथ्वी की सतह में कंपन उत्पन्न होता है। …..
  • पृथ्वी की प्लेटों के बीच पारस्परिक क्रिया-पृथ्वी के प्लेटें खिसकते समय दूसरी अन्य प्लेटों को धक्का देती है या उनके बीच घर्षण होता है अथवा वे एक-दूसरे से दूर हटती हैं। इन परिस्थितियों में में भी कंपन से भूकंप होता है।
  • अन्य कारण-भूस्खलन, समुद्री तटों पर मिट्टी टूटकर नीचे गिरना, चूना प्रदेशों की कंदराओं की छतों का बह जाना, बर्फीला अवधान या हिमपिंडों के खिसकने से स्थानीय भूकंप हो सकते हैं।

 

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़ Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़

Bihar Board Class 10 Disaster Management प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
नदियों में बाढ़ आने के प्रमुख कारण कौन हैं?
(क) जल की अधिकता
(ख) नदी के तल में अवसाद का जमाव
(ग) वर्षा की अधिकता होना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) जल की अधिकता

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प्रश्न 2.
बिहार का कौन-सा क्षेत्र बाढ़ग्रस्त क्षेत्र हैं ?
(क) पूर्वी बिहार
(ख) दक्षिणी बिहार
(ग) पश्चिमी बिहार
(घ) उत्तरी-दक्षिणी बिहार
उत्तर-
(घ) उत्तरी-दक्षिणी बिहार

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में किस नदी को ‘बिहार का शोक’ कहा गया है?
(क) गंगा
(ख) गंडक
(ग) कोशी
(घ) पुनपुन
उत्तर-
(ग) कोशी

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प्रश्न 4.
बाढ़ क्या है ?
(क) प्राकृतिक आपदा
(ख) मानव-जनित आपदा
(ग) सामान्य आपदा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) प्राकृतिक आपदा

प्रश्न 5.
सूखा किस प्रकार की आपदा है ?
(क) प्राकृतिक आपदा
(ख) मानवीय आपदा
(ग) सामान्य आपदा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) प्राकृतिक आपदा

प्रश्न 6.
सूखे की स्थिति किस प्रकार आती है ?
(क) अचानक
(ख) पूर्व सूचना के अनुसार
(ग) धीरे-धीरे ।
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) अचानक

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प्रश्न 7.
सूखे के लिए जिम्मवार कारक हैं :
(क) वर्षा की कमी
(ख) भूकंप
(ग) बाढ़
(ग) ज्वालामुखी क्रिया
उत्तर-
(क) वर्षा की कमी

प्रश्न 8.
सूखे से बचाव का मु
(क) नदियों को आपस में जोड़ देना
(ख) वर्षा-जल का संग्रह करना
(ग) बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) वर्षा-जल का संग्रह करना

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लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बाढ़ कैसे आती है ? स्पष्ट करें।.
उत्तर-
मॉनसन की अनिश्चितता के कारण बाढ़ आती है। भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार जल के देवता इन्द्र को माना जाता हैं जिनकः क्रोधित होने से अनावृष्टि होती है और बाढ़ आती है किन्तु वर्तमान में मानवीय कारण माना जाने लगा है। जैसे—बाढ़ को रोकने के लिए बाँध और तटबंध बनाये गये हैं। जब जल का स्तर बढ़ जाता है तो बाँध और तटबंध टूट जाते हैं जिससे बाढ़ आती है।

प्रश्न 2.
बाढ़ से होनेवाली हानियों की चर्चा करें।
उत्तर-
बाढ़ आने से अनेक हानियां होती हैं जिससे इसमें अधिक जनसंख्या प्रभावित होती है। महामारी फैलना, मकानों का गिरना, फसलों की बर्बादी होती है।

प्रश्न 3.
बाढ़ से सुरक्षा हेतु अपनाई जानेवाली सावधानियों को लिखें।
उत्तर-
बाढ़ की विनाशलीला को रोकने के लिए बांध और तटबंध का निर्माण किया जा रहा है। लेकिन इसमें कुछ खामियों के चलते इस प्रबंध पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। इसके लिए वर्तमान समय में विश्व के कई देशों ने नदियों पर बाँध न बनाकर कृत्रिम जलाशय का निर्माण किया है तथा जल की निकासी इस प्रक्रिया से होने की प्रबंधन होता है जिससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न न हो। बाढ़ से सुरक्षा हेतु सावधानियाँ निम्न प्रकार हैं

  • ऐसे इमारतों/भवनों का निर्माण रसायन मिश्रित कच्चे मालों का प्रयोग हो जिससे बाढ़ के बावजूद मकान बर्बाद नहीं हो सके।
  • आमलोगों को सलाह देना कि मकानों का निर्माण पूर्णतः नदी के किनारे तथा नदी के संकरी ढालों पर नहीं करना चाहिए। नदी से मकान से दूरी कम-से-कम 250 मी. होनी चाहिए।
  • इसके लिए तात्कालिक व्यवस्था होनी चाहिए। इस कार्य में पंचायत द्वारा बाढ़ के पूर्व पर्याप्त पंपसेट की व्यवस्था चाहिए।
  • स्तंभ (Pillar) आधारित मकान होनी चाहिए और स्तंभ की गहराई काफी होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
बाढ़ नियंत्रण के लिए उपाय बताएँ।
उत्तर-
बाढ़ नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से दो तरह के उपाय बताये गये हैं जिनमें एक है। वैकल्पिक प्रबंधन और दूसरा पूर्व सूचना प्रबंधन।

1. वैकल्पिक प्रबंधन-वैकल्पिक प्रबंधन में पारिस्थितिकी के अनुरूप टिकाऊ प्रबंधन को प्राथमिकता दी गई है। इसमें भवनों का निर्माण, मकान का निर्माण नदी से दूर, मकान की दीवार, सीमेंट, कंक्रीट से और स्तंभ का निर्माण काफी गहराई का बताया गया है।

2. पूर्व सूचना प्रबंधन इसमें सुदूर संवेदन सूचनाएँ निश्चित रूप से एकत्रित की जानी चाहिए। पूर्व सूचना पर विद्यालय बंद कर देना चाहिए और स्थानीय अस्पताल में डॉक्टर और दवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के लोगों को तैराकी का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, गाँव विद्यालय और पंचायतों में स्वीमिंग जैकेट की व्यवस्था होनी चाहिए। डी. टी. टी. का छिड़काव, ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव और मृत जानवरों को शीघ्र हटने की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे बीमारी से बचा जा सकता है।

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में स्वयंसेवी संस्था आपसी भेदभाव-भुलाकर गांव के ऊंचे भवनों में एकत्रित होना चाहिए और महामारी फैलने पर जल, नमक, चीनी का घोल तथा भोजन और कपड़े की व्यवस्था होनी चाहिए।

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प्रश्न 5.
सूखे की स्थिति को परिभाषित करें। .
उत्तर-
वर्षा की अत्यधिक कमी के कारण जो समस्या उत्पन्न होती है उसे सुखाड़ की संज्ञा दी जाती है। इससे आम लोगों के सामने तीन बड़ी समस्या होती है-

  • फसल न लगने से खाद्यान्न की कमी
  • पेयजल की कमी
  • मवेशियों के लिए चारे की कमी।

प्रश्न 6.
सुखाड़ के लिए जिम्मेवार कारकों का वर्णन करें।
उत्तर-
वर्षा का न होना मुख्य रूप से सुखाड़ का कारण माना जाता है।

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प्रश्न 7.
सुखाड़ से बचाव के तरीकों का वर्णन करें।
उत्तर-
सुखाड़ जैसी आपदा के प्रबंधन हेतु दो प्रकार की योजनाएं आवश्यक हैं। ये हैं-दीर्घकालीन और लघुकालीन। दीर्घकालीन योजना के अंतर्गत नहर, तालाब, कुआँ; पइन, आहर के विकास की जरूरत है। नहर के माध्यम से जलाशयों में जल लाया जा सकता है। कोसी कमांड क्षेत्र, गंडक कमांड क्षेत्र तथा चंदन-किउल-बरूआ कमांड क्षेत्र, सुखाड़ के समय नहर प्रबंधन के द्वारा प्राकृतिक आपदा को कम करने का प्रयास है। तालाब बनाने का मूल उद्देश्य जलसंग्रहण है। कुएँ से भूमिगत जल का उपयोग होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार में बाढ़ की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर-
संपूर्ण भारत या विश्व में बिहार की बाढ़ का भयानक रूप अपना अलग स्थान रखता है। बिहार में कोशी नदी को बिहार का शोक कहा जाता है। इसकी विभीषिका तो इतनी भयावह होती है कि 2008 ई. में आई बाढ़ ने विश्व स्तर पर मदद देनी पड़ी। इसमें बर्वादी का आंकड़ा भी लगाना मुश्किल है। 2008 ई. में भारत-नेपाल सीमा पर कुसहा के पास तटबंध टूटने से आई बाढ़ ने भी कोशी की धारा ही बदल दी। कारण स्पष्ट है कि बिहार के उत्तर में नेपाल है जो नदियों का मास स्थल है। नेपाल द्वारा छोड़े गए जल सबसे पहले बिहार में ही प्रवेश करता है जो कोशी, कमला बलान, गंडक इत्यादि नदियों द्वारा अपना भयावह रूप लेती है और संकट उत्पन्न हो जाता है।

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प्रश्न 2.
बाढ़ के कारणों एवं इसकी सरक्षा-संबंधी उपायों का विस्तृत वर्णन करें। .
उत्तर-
बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जिसके कारण अधिक संख्या में जान-माल का नुकसान होता है।
बाढ़ के निम्न कारण हैं।

  • नदियों में अधिक मात्रा में वर्षा जल के पहुंचने से बाढ़ आती है।
  • वर्षा जल के साथ नदी की घाटी में मिट्टी के जमा होने से भी बाढ़ आती है।
  • वनस्पतियों की कटाई के कारण बाढ़ होती है।
  • कमजोर तटबंध के टूटने से बाढ़ आती है।

बाढ़ से सुरक्षा संबंधी निम्न उपायों को किया जा सकता है

  • बाढ़ की सूचना प्राप्त होते ही उस क्षेत्र के लोगों को हटा देना चाहिए।
  • बाढ़ पूर्व की दवा, खाद्य एवं पेयजल की सुविधा उपलब्ध कर लेनी चाहिए।
  • नदियों के तटबंधों का नियमित मरम्मत कार्य होते रहना चाहिए।
  • सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों द्वारा राहत कार्य किया जाना चाहिए।
  • मानव समाज को इस दिशा में जागरूक करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 3.
सुखाड़ के कारणों एवं इनके बचाव के तरीकों का वर्णन करें।
उत्तर-
Yख्य रूप से वर्षा की अत्यधिक कमी को सुखाड़ कहा जाता है। इससे बचाव के लिए निम्नलिखित कारण बताए गए हैं- . .
सुखाड़ के बचाव के लिए दो प्रकार की योजनाएं आवश्यक हैं-दीर्घकालीन एवं लघुकालीन। दीर्घकालीन योजना के अंतर्गत नहर, तालाब, कुंआ, पइन, आहिर के विकास की जरूरत है। लघुकालीन योजना में भूमिगत जल का संग्रहण, वर्षा जल का संग्रहण आवश्यक है। ऊपर वर्णित दीर्घकालीन योजना द्वारा जल का संग्रह कर सुखाड़ से बचा जा सकता है। लघुकालीन योजना में बोरिंग के माध्यम से जल निकाला जाता है। ड्रिप सिंचाई एवं छिड़काव सिंचाई (Sprinklen Irrigation) के द्वारा भी भूमिगत जल का उपयोग पारिस्थितिकी के अनुरूप किया जाता है। वर्षा का संग्रहण पाइन द्वारा एक बड़े टंकी में किया जाता है। भारत के कई राज्यों में इसका संग्रह कुंड या तालाब बनाकर किया जाता है। वर्षा जल संग्रहण तकनीक सुखाड़ के दिनों में वरदान साबित हो सकता है।

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परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र में बाढ़ से होनेवाली हानि का आंकड़ा इकट्ठा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता लें।

प्रश्न 2.
अपने राज्य में सूखाग्रस्त जिलों की पहचान करें।
उत्तर-
छात्र अपने शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 2 प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़

Bihar Board Class 10 Disaster Management प्राकृतिक आपदा एवं प्रबंधन : बाढ़ सुखाड़ Notes

  • केन्द्र और राज्य सरकारों के आपदा राहत और पुनर्वास विभाग तथा आपदा-प्रबंधन निर्माण तो है ही, साथ में, प्रखंड और पंचायत स्तर पर भी समितियाँ हैं। स्वयंसेवी संस्थाएँ बहुत उपयोगी होती हैं।
  • भारत की सभी बड़ी नदियों में बरसात में बाढ़ आ जाती है, परंतु दक्षिण भारत में प्रायः नदियों के अंतिम छोर पर ही इसका प्रभाव दिखाई पड़ता है जबकि हिमालय की नदियाँ अधिक बाढ़ग्रस्त रहती हैं।
  • हिमालय के बर्फ से पिघलने से भी कुछ नदियों में बाढ़ आ जाती है भले ही वर्षा न हुई हो।
  • कोसी की बाढ़ में बालू की परत जम जाती है, वहीं बगल में कमला नदी उपजाऊ पंक की परत बिछा देती है।
  • अधिक वर्षा से पूर्वोत्तर भाग में शिलांग सूखाग्रस्त और अल्पवर्षा का क्षेत्र है, क्योंकि यह वृष्टिछाया में स्थित है।
  • देश का पश्चिमी भाग और दक्षिण का मध्य प्रायः सूखाग्रस्त रहता है।
  • बाढ़ और सूखे से जानमाल की हानि का कारण आपदा प्रबंधन की कमी है।

बाढ के दुष्परिणाम-

  1. जन-धन की हानि होती है।
  2. पालतू पशु भी मर जाते हैं।
  3. फसलें बरबाद हो जाते हैं।
  4. मकान और ढाँचों के गिरने या क्षतिग्रस्त होने से आर्थिक हानि के साथ आवास की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
  5. परिवहन के साधन; जैसे- सड़कें, रेलमार्ग, पुल आदि टूट जाते हैं।
  6. बाढ़ के तुरंत बाद प्रभावित क्षेत्रों में कई प्रकार की बीमारियां फैलती हैं; जैसे-हैजा, आंत्रशोथ, हेपेटाइटिस और अन्य जल-जनित बीमारियाँ।

बाढ़ से लाभ

  1. नदियों के किनारे मजबूत तटबंध
  2. बाँध का निर्माण
  3. वनीकरण (वृक्षारोपण) जलग्रहण क्षेत्रों में जनसंख्या-जमाव पर नियंत्रण
  4. नदियों के मार्ग में स्थान-स्थान पर जल एकत्र करने की सुविधा जिससे अचानक बाढ़ आने से रोका जा सके तथा संचित जल का सिंचाई में या अन्य उपयोग हो सके।
  5. सूचना-तंत्र को सुदृढ़ करना।

सूखे का जन-जीवन पर निम्नांकित कई प्रकार से दुष्परिणाम पड़ता है-

  • फसलों के सूखने से उत्पादन कम होता है और खाद्य समस्या उत्पन्न हो जाती है। अधिकांश ग्रामीण की जीविका फसलों पर हो निर्भर करती है। फसलों के सूखने से उन्हें सबसे अधिक कष्ट होता है और भूखे मरने की स्थिति आ जाती है। फसलों के सूखने से राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक हानि होती है। इसे अकाल कहते हैं।
  • फसलों के सूखने पर मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध नहीं हो पाता है। इसे तृण-अकाल कहते हैं।
  • वर्षा कम होने या अनावृष्टि होने, अर्थात सूखा पड़ने से जल की उपलब्धता एक समस्या बन जाए, यहाँ तक कि पेयजल की भी आपूर्ति नहीं हो, जो इसे जल-अकाल कहते हैं।
  • यदि उपर्युक्त तीनों परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएं तो त्रि-अकाल या महाअकाल उत्पन्न होता है, जो विध्वंसक होता है।
  • सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में मानव-प्रसास, पशुपालयन और मवेशियों की मौत एक सामान्य – घटना है।
  • जल कमी से उपलब्ध जल भी प्रायः दूषित होता है। सफाई की.कमी से और दूषित जल से पीने से प्रायः आंत्रशोथ, हैजा, पीलिया रोग (जौण्डिस), हेपेटाइटिस और इसी तरह की कई बीमारियां फैल जाती हैं और महामारी का रूप ले लेती है।

सूखे से बचाव के उपाय-
कुछ आवश्यक कदम उठाने से सूखे के प्रभाव को कम किया जा सकता है। जैसे-

1. तात्कालिक या अल्पकालिक योजनाएँ राष्ट्रीय या राज्य स्तर की योजनाएं बनाते समय सूखाग्रस्त क्षेत्रों की समस्याओं को ध्यान में रखना चाहिए। आवश्यक होने पर निम्न उपाय करना चाहिए-

(क) पेयजल का सरक्षित भंडारण एवं वितरण की समुचित व्यवस्था रहनी चाहिए।
(ख) जल-संबंधी बीमारियों के लिए आवश्यक दवाओं और अन्य चिकित्सीय सहायता का ‘प्रबंध होना चाहिए।
(ग) पशुओं के चारे का भंडार होना चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर आसानी से वितरित किया जा सके।
(घ) अधिक कठिन परिस्थिति में मवेशियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का प्रबंध होना चाहिए, जहाँ सचित जल उपलब्ध हो सके।
(ङ) आपदा प्रबंधन के अधीन अनाज का एक विशेष कोष रहना चाहिए, जिससे खाद्य-समस्या से लोगों को मुक्ति मिल सके।

दीर्घकालीन योजनाएँ-राष्ट्रीय स्तर पर कुछ योजना र दीर्घकालीन समस्या की दृष्टि में रखकर बनानी चाहिए; जैसे-

(क) भूमिगत जल के भंडार का पता लगाया जाना चाहिए। इस जल को नलकूपों द्वारा खींचकर सिंचाई या पीने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
(ख) जल-प्रचुर क्षेत्रों से जल अभाव वाले क्षेत्रों में पहुंचाने के लिए नहर या पाईप लाइन का प्रबंध रहना चाहिए।
(ग) उपग्रहों की सहायता से भूमिगत जल की संभावना का पता लगाना चाहिए।
(घ) सड़कों के किनारों पर और खाली जमीन पर पर्याप्त वनरोपण को प्रोत्साहित करना जिससे हरियाली में वृद्धि हो और वर्षा की संभावना बढ़ सके।
(ङ) नदियों को परस्पर जोड़ना जिससे अधिक जल को ऐसे क्षेत्र में भेजा जा सके जहाँ इसकी आवश्यकता है। इससे बाढ़ और सुखाड़ दोनों को कम किया जा सकता है। भारत में चूंकि उतर भारत में बाढ़ आती है तो दक्षिण में जल का अभाव रहता है और दक्षिण में जब जाड़े में वर्षा होती है तो उत्तरी भाग में वर्षा नहीं होती। अतः नदियों को जोड़ने से पूरे देश की समस्या दूर की जा सकती है। हिमालय की सदानीरा नदियों का जल मध्य, पश्चिमी और दक्षिण क्षेत्र में सिंचाई के लिए सालोंभर उपलब्ध हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

Bihar Board Class 11 Sociology भारतीय समाजशास्त्री Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

प्रश्न 1.
गोत्र बहिर्विवाह से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
गोत्र का ब्राह्मणों तथा बाद में गैर-ब्राह्मणों द्वारा पूर्णतया बहिर्विवाह इकाई समझा गया। मूल धारणा यह है कि गोत्र के सभी सदस्य एक-दूसरे से संबंधित होते हैं। उनमें रक्त संबंध होता है अर्थात कोई ऋषि या संत उनका सामान्य पूर्वज होता है। इसी कारण, एक ही गोत्र के सदस्यों के बीच विवाह को अनुचित समझा जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में ब्रिटिश शासन से कौन-से तीन प्रकार के परिवर्तन हुए?
उत्तर:
भारत में ब्रिटिश शासन से निम्नलिखित तीन प्रकार के परिवर्तन हुए –

  • कानूनी तथा संस्थागत परिवर्तन, जिनसे सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता के अधिकार प्रदान किए गए।
  • प्रौद्योगिकीय परिवर्तन
  • व्यावसायिक परिवर्तन

प्रश्न 3.
कुछ मानवशास्त्रियों तथा ब्रिटिश प्रशासकों ने जनजातियों को अलग कर देने की नीति की वकालत क्यों की?
उत्तर:
कुछ मानवशास्त्रियों तथा ब्रिटिश प्रशासकों द्वारा जनजातियों को अलग कर देने की नीति की वकालत निम्नलिखित कारणों से की गई –

  • जनजातियों के लोग गैर-जनजातियों व हिंदुओं से भिन्न हैं।
  • जनजातियों के लोग हिंदुओं के विपरित जीवनवादी हैं।
  • जनजाति के लोग हिंदुओं के विपरीत जीवनवाद हैं।
  • जनजातीय लोगों के हिन्दुओं से संपर्क होने के कारण उनकी संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था को हानि हुई। गैर-जनजातियों के लोगों ने चालाकी तथा शोषण से उनकी (जनजाति के लोगों की) भूमि तथा अन्य स्रोतों पर कब्जा कर लिया।

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प्रश्न 4.
घुर्ये का भारतीय जनजातियों के हिंदूकरण की प्रक्रिया का विवरण दीजिए।
उत्तर:
घुर्ये ने भारत के जनजातियों के हिंदूकरण में निम्नलिखित तथ्यों का विवरण दिया है –

  • कुछ जनजातियों का हिंदू समाज में एकीकरण हो चुका है।
  • कुछ जनजातियाँ एकीकरण की दिशा में अग्रसर हो रही हैं।

प्रश्न 5.
घुर्ये ने जनजातियों के किस भाग को ‘हिंदू समाज का अपूर्ण एकीकृत वर्ग’ कहा है?
उत्तर:
भारत की कुछ जनजातियाँ जो पहाड़ों अथवा घने जंगलों में रह रही है, अभी तक हिंदू समाज के संपर्क में नहीं आयी हैं। जी.एस.घुर्ये ने इन जनजातियों हिन्दू समाज को ‘अपूर्ण एकीकृत वर्ग’ कहा है।

प्रश्न 6.
जनजातियों के द्वारा हिंदू सामजिक व्यवस्था को क्यों अपनाया गया?
उत्तर:
जनजातियों ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था को आर्थिक उद्देश्यों के कारण अपनाया हिंदू धर्म को अपनाने के पश्चात् जनजाति के लोग अल्पविकसित हस्तशिल्प की संकीर्ण सीमाओं से बाहर आ सके। इसके पश्चात् उन्होंने विशेषीकृत व्यवसायों को अपनाया। इन व्यवसायों की समाज में अत्यधिक मांग थी। जनजातियों ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था अपनाने का दूसरा कारण जनजातीय निवासों तथा रीतियों के हेतु जाति व्यवस्था की उदारता था।

प्रश्न 7.
इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी की नींव किसने और कब डाली?
उत्तर:
गोविंद सदाशिव घुयें ने 1952 में इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी की नींव डाली।

प्रश्न 8.
घुर्ये ने जाति तथा नातेदारी के तुलनात्मक अध्ययन में किन दो बिंदुओं को महत्त्वपूर्ण बताया है?
उत्तर:
भारत में पायी जाने वाली नातेदारी व जातीय संजाल की व्यवस्था अन्य समाजों में भी पायी जाती है। जाति तथा नातेदारी ने भूतकाल में एकीकरण का कार्य किया है। भारतीय समाज का उद्विकास विभिन्न प्रजातीय तथा नृजातीय समूहों के एकीकरण पर आधारित था।

प्रश्न 9.
घुर्ये ने जाति व्यवस्था में पाए जाने वाले किन छः संरचनात्मक लक्षणों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
जी.एन.घुर्ये ने जाति व्यवस्था में पाए जाने वाले निम्नलिखित छः संरचनात्मक लक्षणों का उल्लेख किया है –

  • खंडात्मक विभाजन
  • अनुक्रम या संस्तरण अथवा पदानुक्रम
  • शुद्धता तथा अशुद्धता के सिद्धांत
  • नागरिक तथा धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विभिन्न विभागों के विशेषाधिकार
  • व्यवसाय चुनने संबंधी प्रतिबंध
  • वैवाहिक प्रतिबंध

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प्रश्न 10.
अंनतकृष्ण अययर एवं शरतचंद्र रॉय ने सामजिक मानवविज्ञान के अध्ययन का अभ्यास कैसे किया?
उत्तर:
अंनतकृष्ण अययर प्रारंभ में केवल एक लिपिक थे। बाद में आप अध्यापक हो गए। सन् 1902 में कोचीन राज्य में एक नृजातीय सर्वे कर कार्य अपकों सौंपा गया और आप मानवशास्त्री हो गए। इसी प्रकार ही शरत्चंद्र रॉय कानूनविद् थे। अपने ‘उरावं’ जनजाति पर कुछ शोध किया और आप मानवशास्त्री हो गए।

प्रश्न 11.
जाति-व्यवस्था में विवाह बंधन पर चार पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर:

  • जाति व्यवस्था में अंतजार्तीय विवाहों पर प्रतिबंध था।
  • जातियों में अंतः विवाह का प्रचलन था।
  • प्रत्येक जाति छोटे-छोटे उपसमूहों अथवा उपजातियों में विभाजित थी।
  • घूर्ये अंतः विवाह को जाति प्रथा में प्रमुख कारक मानते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों के बारे में घुर्ये के विचार लिखिए?
उत्तर:
ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों के बारे में घुर्य के विचार का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) घुर्ये ने नगरों तथा महानगरों के विकास के बारे में निराशवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया है। नगरों से पुरुषों तथा स्त्रियों की चारित्रिक विशेषताओं को समाप्त नहीं किया है।

(ii) घूर्य के अनुसार विशाल नगर उच्च शिक्षा, शोध, न्यायपालिका, स्वास्थ सेवाएँ तथा प्रिंट मीडिया व मनोरंजन आदि अंततोगत्वा सांस्कृतक वृद्धि करते हैं। नगर का प्रमुख कार्य सांस्कृतिक एकरात्मकता की भूमिका का निर्वाह करना है।

(iii) घूर्ये नगरीकरण के पक्के समर्थक थे। घुर्य के अनुसार नगर नियोजन को निम्नलिखित समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान देना चाहिए –

  • पीने की पानी की समस्या
  • मानवीय भीड़-भाड़
  • वाहनों की भीड़-भाड़
  • सार्वजनिक वाहनों के नियम
  • मुम्बई जैसे महानगरों में रेल परिवहन की कमी
  • मृदा का अपरदन
  • ध्वनि प्रदूषण
  • अंधाधुंध पेड़ों की कटाई तथा
  • पैदल यात्रियों की दुर्दशा

(iv) घूर्ये जीवनपर्यत ग्रामीण – नगरीयता के विचारों का समथन करते रहे। उनका मत था कि नगरीय जीवन के लाभों के साथ-साथ प्राकृति की हरीतिमा का भी लाभ उठाना चाहिए। भारत में नगरीकरण केवल औद्योगीकरण के कारण नहीं है। नगर तथा महानगर अपने नजदीकी स्थानों के लिए सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में भी कार्य करते हैं।

(v) घूर्य के अनुसार ब्रिटीश शासन के दौरान ग्रामों तथा नगरीय केन्द्रों के बीच पाए जाने वाले संबंधों की उपेक्षा की गई।

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प्रश्न 2.
जाति तथा नातेदारी के विषय में गोविंद सदाशिव धूर्ये के विचार लिखिए?
उत्तर:
जाति तथा नातेदारी के बारे में जी.एस.घूर्य के विचारों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) घुर्ये ने अपनी पुस्तक Caste and Race in India 1932 में ऐतिहासिक मानवशास्त्रीय तथा समाजशास्त्रीय उपागमों को कुशलतापूर्वक संयुक्त किया है घूर्य जाति की ऐतिहासिक उत्पति तथा उसके भौगोलिक प्रसार से संबंधित थे। उन्होंने जाति के तत्कालीन लक्षणों पर ब्रिटिश शासन के प्रभावों को प्रभावों को भी समझने का प्रयास किया है।

(ii) घूर्ये ने अपनी पुस्तक में बाद के संस्करण में भारत की आजादी के बाद जाति व्यवस्था में आने वाले परिवर्तनों का उल्लेख किया है। .

(iii) एक तार्किक विचारक के रूप में वे जाति व्यवस्था का घोर विरोध करते थे। उनका ‘अनुमान था कि नगरीय पर्यावरण तथा आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों से जाति बंधन कमजोर हो जाएँगे। लेकिन उन्होंने पाया कि जातिनिष्ठा तथा जातिय चेतना का रूपांतरण नृजातिय समूहों मं हो रहा है।

(iv) घूर्ये का मत है कि जाति अंत: विवाह तथा बहिर्विवाह के माध्यम से नातेदारी से संबंधित है।

प्रश्न 3.
घूर्य के अनुसार धर्म के महत्व को समझाइए?
उत्तर:
जी.एस.घूर्ये न धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों के अध्ययन में मौलिक योगदान प्रदान किया है। समाज में धर्म की भूमिका का विशद् वर्णन उन्होंने निम्नलिखित पुस्तकों में किया है –

  • Indian Sadhus (1953)
  • Gods and Men (1962)
  • Religious Consciousnes (1965)
  • Indian Accultrtion (1977)
  • Vedic India (1979)
  • The legacy of Ramayana (1979)

घुर्ये ने संस्कृति के पाँच आधार बताए हैं –

  • धार्मिक चेतना
  • अंत: करण
  • न्याय
  • ज्ञान प्राप्ति हेतु निर्बाध अनुसरण
  • सहनशीलता।

घूर्ये ने अपनी पुस्तक Indian sadhus में महान वेंदातिंक दार्शनिक शंकराचार्य तथा दूसरे धार्मिक आचार्य द्वारा चलाए गए अनेक धार्मिक पंथों तथा केंद्रों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है। घूर्ये ने भारत में त्याग की विरोधाभासी प्रकृति को प्रस्तुत किया है। शंकराचार्य के समय से ही हिंदू समाज का कम या अधिक रूप में साधुओं द्वारा मार्गदर्शन किया गया है। ये साधु-एकांतवासी नहीं हैं। उनमें से ज्यादातर साधुमठासी होते हैं। भारत में। मठों का संगठन हिन्दूवाद तथा बोद्धवाद के कारण है।

भारत में साधुओं द्वारा धार्मिक विवादों में मध्यस्थता भी की जाती है। उनके द्वारा धार्मिक ग्रंथों तथा पवित्र ज्ञान को संरक्षण दिय गया है। इसके अतिरिक्त, साधुओं द्वारा विदेशी आक्रमणों के समय धर्म की रक्षा की गई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जाति व राजनीति पर घूर्य के विचार लिखिए?
उत्तर:
जाति तथा राजनीति के संबंध में जी.एस.घूर्य के विचारों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) प्रसिद्ध समाजशास्त्री जी.एस.घूर्ये ने जातिनिष्ठा अथवा जातीय लगाव के प्रति सावधानी बरतने की बात कही है। जातिनिष्ठा तथा जातीय लगाव दोनों ही भारत की एकता के लिए संभावित खतरे हैं।

(ii) यद्यपि ब्रिटिश शासन के दौरान किए गए परिवर्तनों से जाति-व्यस्था के कार्य कुछ सीमा तक प्रभावित तो हुए तथापि उनका पूर्णरूपेण उन्मूलन नहीं हो सक। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान निम्नलिखित तीन प्रकार के परिवर्तन आए –

  • कानूनी तथा संस्थागत परिवर्तन
  • प्रौद्योगिकी परिवर्तन तथा
  • व्यावसायिक परिवर्तन

(iii) घूर्ये का यह स्पष्ट मत है कि भारत में ब्रिटिश शासक जाति व्यवस्था के समाजिक तथा आर्थिक आधारों को समाप्त करने में कभी भी गम्भीर नहीं रहे। उनके द्वारा छुआछूत को समाप्त करने का भी प्रयत्न नहीं किया गया।

(iv) परतंत्र भारत में निम्नलिखित समीकरण पाए गए हैं –

  • जातिय समितियों को अधिकता
  • जातिय पत्रिकाओं की संख्या में वृद्धि
  • जाति पर आधारित न्यासों में वृद्धि
  • नातेदारी ने जातिय चेतना के विचारों को प्रोत्साहित किया।

उपरोक्त वर्णित चारों कारक वास्तविक सामुदायिक तथा राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधा उतपन्न करते हैं।

(vi) जी.एस.घूर्ये को इस बात की चिंता थी कि राजनैतिक नेता प्राप्त करने तथा उस काम रखने के लिए जातीय संवेदना का शोषण करेंगे। इस संदर्भ में धूर्य की चिंता निरर्थक नहीं थी। घूर्य ने राजनीति क्षेत्र तथा नौकरियो में वंचित वर्ग के आरक्षण के आंदोलन की भावना की प्रशंसा की। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अछूत जातियों को विशेष शैक्षिक सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। उनका मत था कि शिक्षा ही उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकती है।

प्रश्न 2.
जनजातियों पर घूर्ये के विचार दीजिए।
उत्तर:
जनजातियों के विषय में घूर्य के विचार का निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत अध्ययन, किया जा सकता है। भारत की जनसंख्या में जनजातियाँ एक महत्त्वपूर्ण भाग है। घूर्ये ने इस बात पर चिंता प्रकट की थी कि कुछ मानवशास्त्री तथा ब्रिटिश प्रशासक जनजातियों को पृथक् कर देने की नीति के हिमायती थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि हर कीमत पर जनजातियों की विशष्टि पहचान बनायी रखी जानी चाहिए। उन्होंने इस संबंध मे निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए

  • जनजातिय गैर-जनजाति या हिंदुओं से पृथक् है।
  • जनजातिय लोग देश के मूल निवासी हैं।
  • जनजातिय लोग हिंदुओं के विपरीत जीववादी हैं।
  • जनजातियं लोग भाषा के आधार पर भी हिंदुओं से अलग हैं।
  • गैर-जनजातिय लोगों के संपर्क में आने से जनजातीय लोगों की संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ है।
  • गैर-जनजातियों लोगों की चालाकी तथा शोषण के कारण जनजातिय लोगो की जमीन तथा अन्य संसाधन समाप्त हो गए।

जी.एस.घूर्य ने उपरोक्त बिंदुओं का ऐतिहासिक आंकड़ों तथा उदाहरणों द्वारा तत्कालीन स्थिति के संदर्भ में विरोधी किया है। जी.एस.घूर्य ने भरतीय जनजातियों के हिंदूकरण की प्रक्रिया का उल्लेख किया है। उनका मत है कि कुछ जनजातियों का हिंदू समाज में एकीकरण हो चुका है तथा कुछ जनजातियाँ एकीकरण की दशा में अग्रसर हो रही है। घूर्ये का मत है कि कुछ जनजातियाँ पहाड़ों तथा जंगलों में रह रही हैं। ये जनजातियाँ हिंदू समाज से अभी तक अप्रभावित हैं। ऐसी जनजातियों को हिंदू समजा का अपूर्ण एकीकृत वर्ग कहा जाता है।

जी.एस.पूर्वे के अनुसार जनजातियों द्वारा हिंदू सामाजिक व्यवस्था को निम्नलिखित दो करणों से अपनाया गया है प्रथम आर्थिक उद्देश्य था। जनजातियों द्वारा हिंदू धर्म की अपनया गया था अंत: उन्हें अपने अल्पविकसित जनजातिय हस्तशिल्प की सीमाओं से बाहर आने का मार्ग मिल गया। इसके पश्चात् जनजातिय लोगों ने बिशिष्ट प्रकार के उन व्यवसायों को अपनाया जिनकी समाज में मांग थी। द्वितीय कारण जनजातिय विश्वासों तथा रीतियों के संदर्भ में जाति व्यवस्था की उदारता थी।

जी.एस.घूर्ये ने इस बात को स्वीकार किया कि भोले जनजातिय लोग गैर-जनजातियों, हिंदू महाजानों तथा भू-माफियाओं द्वारा शोषित किए गए। घूर्ये का मत है कि इसका मूल कारण ब्रिटीश शाशन को दोषपूर्ण राज्स्व तथा न्याय व नीतियाँ थी। ब्रिटिश सरकार की वन संबंधी नीतियों से जनजातिय लोगों के जीवन को और अधिक कठोर बना दिया। इन दोषपूर्ण नीतियों के कारण न केवल जनजातिय लोगों को कष्ट हुआ वरन् गैर-जनजातिय लोगों को भी अनेक कठिनाइयों का समाना कारना पड़ा। वस्तुतः समाज में प्रखलत व्यवस्था ने जनजातिय लोगों तथा गैर-जनजातिय लोगों को समान रूप से कष्ट पहुँचाया।

प्रश्न 3.
घूर्ये के अनुसार जाति के संरचनात्मक लक्षणों का वर्णन कीजिए?
उत्तर:
घूर्य ने जाति के निम्नलिखित छः संरचनात्मक लक्षणों का उल्लेख किया है –
(i) खंडात्मक विभाजन-जी.एस.घूर्य ने जाति को सामजिक समूहों अथवा खंडो के रूप में समझा है। इनकी सदस्यता का निर्धारण जन्म से होता है। सामाज के खंड विभाजन का अभिप्राय जाति के अनेक खंड में विभाजन है। प्रत्येक खंड का अपना जीवन होता है। प्रत्येक जाति के नियम, विनियम, नैतिकता तथा न्याय के मानदंड होते हैं।

(ii) अनुक्रम अथवा संस्मरण अथवा पदानुक्रम-जाति अथवा इसके खंडों में संस्तरण पाया जाता है। संस्तरण की व्यवस्था में जातियाँ एक-दूसरे के संदर्भ में उच्च अथवा निम्न स्थिति में होती है। सभी जगह संस्तरण की व्यवस्था में ब्राह्मणों की स्थिति उच्च तथा अछूतों की निम्न होती है।

(iii) शुद्धता एवं अशुद्धता के सिद्धांत-जातियों तथा खंडों के बीच पृथकता, शुद्धि तथा अशुद्धि के सिद्धांत पर आधारित है। शुद्ध तथा अशुद्ध के सिद्धांत के अंतर्गत दूसरी जीतियों के . संदर्भ में खान-पान संबंधी नियमों का पालन किया जाता है। आमतौर पर ज्यादातर जातियों को ब्राह्मणों द्वारा पकाए गए कच्चे भोजन को ग्रहण करने पर कोई आपत्ति नहीं होती है। दूसरी और, ऊँची जातियों द्वारा निम्न जातियों द्वारा पकाया गया पक्का खाना, जैसे कचौड़ी आदि ग्रहण किया जाता है।

(iv) नागरिक तथा धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विभिन्न भागों में विशेषाधिकार-समाज में संस्तरण के विभाजन के कारण विभिन्न समूहों को प्रदान किए गए विशेषाधिकारों तथा दायित्वों में असमानता पायी जाती है। व्यवसायों का निर्धारण जाति की प्रकृति के अनुसार होता है। ब्राह्मणों की उच्च स्थिति इन्हीं आधारों पर होती है। निम्न जाति के लोग उच्च जाति के लोगों के रीति-रिवाजों तथा वस्त्र धारण करने आदि की नकल नहीं कर सकते थे। उनके द्वारा ऐसा किया जाना समाज के नियमों के विरुद्ध कार्य समझा जाता था।

(v) व्यवसायों के संबंध में प्रतिबंध-प्रत्येक जाति अथवा जाति समूहों किसी न किसी वंशानुगत व्यवसाय से संबंध होते थे। व्यवसायों का वर्गकरण भी शुद्धता तथा अशुद्धता के सिद्धांत के आधार पर किया जाता था। वर्तमान समय में इस स्थिति में परिवर्तन आया है। लेकिन पुरोहित के कार्य पर अभी भी ब्राह्मणों का अधिकार कायम है।

(vi) वैवाहिक प्रतिबंध-जाति व्यवस्था में अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध था। जातियों में अंतः विवाह का प्रचलन था। घूर्ये अंतः विवाह को जाति प्रथा का प्रमुख कारक मानते हैं।

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प्रश्न 4.
‘जनजातिय समुदायों को कैसे जोड़ा जाय’ इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
उत्तर:
जानजातिय समुदायों से कैसे संबंध स्थापित हो? यह एक गंभीर प्रश्न है। जी.एस. घूर्य ने अपनी पुस्तक ‘द शिड्यूल्ड टाइब्स’ में लिखा है। “अनुसूचित जनजातियों को न तो अदिम कहा जाता है और न आदिवासी न ही उन्हें अपने आप में एक कोटि माना जाता है” यानि पहचान की समस्या गंभीर हैं। जनजातिय समुदायों के साथ संबंध स्थापित करने में निम्न तथ्व भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं

  • भूमि हस्तांतरण तथा शोषण के बिंदुओं को रोका जाए।
  • आर्थिक विकास के अवरोधों को दूर किया जाए।
  • उनके सांस्कृतिक स्वरूप और मूल संस्कृत में कोई परिवर्तन न किया जाए।
  • अशिक्षा की समस्या से दूर किया जाए।
  • ऋणग्रस्तता को समाप्त करने का प्रयास किया जाए।
  • जनजातियों के समग्र विकास के लिए कदम उठाए जाएँ।

इन सभी कार्यों को पूर्ण करने पर निश्चित हो जनजातियों समुदायों से समर्क की समस्या समाम्त हो जाएगी।

प्रश्न 5.
घूर्ये ने भारतीय सामाज की व्याख्या कैसे की?
उत्तर:
घूर्ये ने भारतीय समाज की व्याख्या निम्नलिखित रूप में किये जाते हैं –

  • जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक विशिष्टता है। उन्होंने भारतीय समाज में जातियों के उपजातियों के रूप में विभाजन को स्वीकार किया है।
  • घूर्ये ने भारतीय जनसंख्या को उनकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर प्रायः छः प्रकार के वर्गों में विभाजित किया है- इंडी आर्यन, पूर्वी द्रविड़, पश्चिमी मुण्डा और मंगोलियन।
  • इनके अनुसार हिंदू, जैन, बौद्ध धर्म के कालात्मक स्मारकों में कई समान तत्वों का समावेश है।
  • उनका मत था कि मुस्लिम भवनों में हिंदू कला का केवल अलंकरण के रूप में प्रयोग हुआ है।
  • घूर्य का विचार था कि बहुलवादी प्रकृतियों ने राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में बाधा डाली है और यह भारतीय समाज को टुकड़ों में बाँटे जाने को प्रोत्साहन देती है।

प्रश्न 6.
भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हर्बर्ट रिजले तथा जी.एस.घूर्ये की स्थिति की रूपरेखा दें?
उत्तर:
वास्तव में जाति व्यवस्था भारतीय समाज की अपने एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, उसे उसी बना रहना पड़ता है। जाति की सदस्यता जन्म से होती है। जाति-‘कास्ट’ एक अंग्रेजी शब्द है जिसकी उत्पति पुर्तगाली भाषा के –

  • जाति की सदस्यता उन व्यक्तियों तक ही सीमित होती है जो उस जाति के सदस्यों से उत्पन्न हुए हों और इस प्रकार उत्पन्न होने वाले
  • सभी व्यक्ति जाति में आते हैं।
    जिसके सदस्य एक अविच्छिन्न सामाजिक नियम के द्वारा समूह के बाहर विवाह करने से रोक दिए जाते हैं।

प्रो.एच.रिजले के अनुसार, “जाति परिवारों के समूह का एक संकलन है जिसका एक सामान्य नाम है, जो काल्पनिक पुरुष अथवा देवताओं से उत्पन्न होने का दावा करती है। एक वंशानुकूल व्यवसाय करने का दावा करती है और उन लोगों की दृष्टि से सजातीय समुदाय बनाती है जो अपना मत देने योग्य हैं।” प्रो.जी.एस.घूर्ये-प्रो.घूर्य ने जाति की परिभाषा देते हुए कहा है, ‘जाति एक जटिल अवधारणा है।’ इस प्रकार रिजले और घूर्ये दोनों जाति के संबंध में अलग-अलग विचार रखते हैं। प्रजाति से आशय यहाँ नस्ल से है : भारत में आर्य ही इस तथ्य पर एक मत हैं कि प्रजातिय विभिन्नता होते हुए भी भारत में जातिय एकता बनी हुई है।

ध्रुजटी प्रसाद मुखर्जी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
डी.पी. की ‘पुरुष’ की अवधारणा बताइए?
उत्तर:
डी.पी. मुखर्जी ने अपनी ‘परुष’ की अवधारणा में उसे (पुरुष को) समाज तथा व्यक्ति से पृथक् नहीं किया है और न ही वह पुरुष समूह मस्तिष्क के नियंत्रण में है। मुखर्जी के अनुसार ‘पुरुष’ सक्रिय कर्ता के रूप दूसरे व्यक्त्यिों के साथ संबंध स्थापित करता है तथा अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना है। मुखर्जी का मत है कि पुरुष का विकास दूसरे व्यक्तियों के साथ संपर्क से होता है। इस प्रकार, उसका मानव समूहों में अपेक्षाकृत अच्छा स्थान होता है।

प्रश्न 2.
कर्ता की स्थिति स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार कर्ता की स्थिति के अंतर्गत व्यक्ति एक कर्ता के रूप में कार्य करता है। एक स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में जो कि व्यक्ति के अपने लक्ष्यों तथा हितों को प्राप्त करने की मौलिक विशेषताएँ रखता है।

प्रश्न 3.
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार परंपरा के अर्थ को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार परंपरा का मूल ‘वाहक’ है जिसका तात्पर्य संप्रेषण करना है। संस्कृत भाषा में इसका समानार्थक परंपरा है, जिसका तात्पर्य है उत्तराधिकारी अथवा ऐतिहासिक जिसका आधार अथवा जुड़े इतिहास में हैं। मुखर्जी के अनुसार परंपराओं का कोई न कोई स्रोत अवश्य होता है। धार्मिक ग्रंथ अथवा महर्षियों के कथन अथवा ज्ञात या अज्ञात पौराणिक नायक परंपराओं के स्रोत हो सकते हैं।

पंरपराओं के स्रोत कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन इनकी एतिहासिकता को समाज के सभी सदस्यों द्वारा मान्यता प्रदान की जाति है। परंपराओं को उद्धत किया जाता है। उन्हें पुन: याद किया जाता है तथा उनका सम्मान किया जाता है। वस्तुतः परंपराओं की दीर्घकालीन संप्रेषणता से सामजिक संबद्धता तथा सामाजिक एकता कायम रखती है।

प्रश्न 4.
भारत में अंग्रजों द्वारा प्रारंभ की गई नगरीय, आद्योगिक व्यवस्था का प्रभाव बताइए।
उत्तर:
भारत में अंग्रजों द्वारा प्रारंभ की गई नगरीय औद्यौगिक व्यवस्था ने प्राचीन संस्थाओं के ताने-बाने को समाप्त कर दिया। इसके द्वारा अनेक परंपरागत जाजियों एवं वर्गों का विघटन हो गया। इन परिवर्तनों के काण एक नयी प्रकार का सामजिक अनुकूलन तथा समायोजन हुआ। इन नए परिवर्तनों के द्वारा भारत नगरीय केंद्रों में शिक्षित मध्यवर्ग समाज का मुख्य बिंदु बनकर सामने आया।

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प्रश्न 5.
डी.पी.मुकर्जी के अनुसार भारत आधुनिकता के मार्ग पर किस प्रकार अग्रसर हो सकता है?
उत्तर:
डी.पी.मुकर्जी के अनुसार भारत अपनी परंपराओं से अनुकूलन तभी कर सकता है जब मध्यवर्गीय व्यक्ति अपना संपर्क आम जनता के पुनः स्थापित करें । मुखर्जी कहते हैं कि इस प्रक्रिया में उन्हें न तो अनावश्यक रूप से क्षमायाचना करनी चाहिए और न ही अपनी परंपराओं के विषय में बढ़-चढ़कर अथवा आत्मश्लाघा करनी चाहिए। उन्हें परंपराओं की जीवंतता को कायम रखना चहिए जिसमें आधुनिकता द्वारा आवश्यक परिवर्तनों के साथ समायोजन हो सके। इस प्रकार व्यक्तिवाद एवं समाजिकता के बीच संतुलन कायम रह सकेगा। इस नए अनुभव से भारत तथा विश्व दोनों ही लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

प्रश्न 6.
सामजशास्त्र के क्षेत्र में डी.पी.मुकर्जी का महानतम योगदान बताइए?
उत्तर:
प्रसिद्ध भारतीय सामजशास्त्री डी.पी.मुकर्जी के विचार वर्तमान सामाजिक पररिस्थितियों में पूर्णत: उचित है। मुकर्जी का समाजशास्त्र के क्षेत्र में महानतम योगदान परंपराओं की भूमिकाओं का सैद्धांतिक निरूपण है। डी.पी.मुकर्जी का स्पष्ट मत था कि भारतीय सामाजिक यर्थाथता की समुचित समीक्षा इसकी संस्कृति तथा सामाजिक क्रियाओं, विशिष्ट परंपराओं, विशिष्ट प्रतीकों, विशिष्ट मानकों के संदर्भ में की जा सकती है।

प्रश्न 7.
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताइए?
उत्तर:
जाति जन्म पर आधारित ऐसा समूह है जो अपने सदस्यों को खान-पान, विवाह, व्यवसाय और सामजिक संपर्क के संबंध में कुछ प्रतिबंध मानने को निर्देशित करता है।

प्रश्न 8.
‘जीवंत परंपरा’ से डी.पी.मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाज शास्त्रीयों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
उत्तर:
प्रो.ए.आर. देसाई ने समाजशास्त्र में भारतीय समाज को लेकर अनेक अध्ययन किये। उन्होंने पाया कि स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से रूपांतर की स्थिति उत्पन्न हुई है। भारत की जनता क रहन-सहन के परंपरागत स्तर में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया।

आधुनिकता के नाम पर कुछ लोगों ने परंपराओं को त्यागने का साहस तो किया पर वे भी कहीं न कहीं उसमें लिप्त रहे। भारतीय समाजशात्रियों के विषय में भी श्री देसाई के विचार यही हैं कि वे अपने अध्ययनों में भारतीय परंपराओं के प्रति जकड़े हुए हैं इससे ऊपर उठकर विचार श्रृंखला मीमांसा नही बन पाती है।

प्रश्न 9.
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार भारतीय समाजशास्त्रियों के मूलभूत उद्देश्य क्या होने चाहिए?
उत्तर:
डी.पी.मुखजी के अनुसार सामाजिक सामजशास्त्रियों को केवल सामजशास्त्री की सीमा तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। भारतीय सामजशास्त्रियों को लोकाचारों, जनरीतियों, रीति-रिवाजों तथा परंपराओं में भागदारी करने के साथ-साथ समाजिक व्यवस्था के अर्थ का समझन का भी प्रयास करना चाहिए।

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प्रश्न 10.
डी.पी. मुखर्जी के अनुसार भारतीय समाजशास्त्रियों को किन दो उपागमों के संश्लेषण का प्रयास करना होगा?
उत्तर:
डी.पी. मुखर्जी के अनुसार भारतीय समाजशास्त्रियों को निम्नलिखित दो उपागमों के संश्लेषण का प्रयास करना होगा
(i) समाजशास्त्री के द्वारा तुलनात्मक उपागम को अपनाना होगा। एक यही तुलनात्मक उपागम उन विशेषताओं को प्रकाश में लाएगा जिनकी भरतीय समाज अन्य समाजों के साथ भागीदारी करता है। इस उद्देश्य को प्राप्ति हेतु समाजशास्त्री परंपरा का अर्थ समझने का लक्ष्य रखेगे। वे इसके मूल्यों तथ्य प्रतीकों का सावधानीपूवर्क परीक्षण भी करेंगे।

(ii) भारतीय समाजशास्त्री संघर्ष तथा परस्पर विरोधी शक्तियों के संश्लेषण को समझने के लिए द्वंद्वात्मक उपागम का अवलंबन करेंगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय समाजशास्त्रियों का समजशास्त्री होना ही पूर्ण नहीं है, उन्हें पहले भारतीय होना चाहिए।” डी.पी. के इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
डी.पी.मुकर्जी ने भारतीय समाज के अपने सामजशास्त्रीय विश्लेषण में यह तथ्य पूर्णरूपेण स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय समाजशास्त्र के व्यापक अध्ययन हेतु विभिन्न उपागमों की आवश्यकता है। डी.पी. का स्पष्ट मत है कि भारतीय सामजिक व्यवस्था के अध्ययन हेतु एक पृथक उपागम की आवश्यकता है। यही कारण है कि डी.पी. मुकर्जी का मत है कि भारतीय समाजशास्त्रियों को केवल सामाजशास्त्री होना ही काफी नहीं है, उन्हें भारतीय भी होना चाहिए।

डी.पी. का मत है कि भारतीय समाजशास्त्रियों को भारतीय समाजशास्त्रियों को केवल सामाजशास्त्री होना ही काफी नहीं है, उन्हें भारतीय भी होना चाहिए। भारतीय समाजशास्त्रियों को निम्नलिखित दो उपगामों के संश्लेषण का प्रयास करना चहिए। प्रथम भारतीय समाजशास्त्री तुलनात्मक उमगम को अपनाएँगे। वास्तविक तुलनात्मक उपागम उन सभी विशेषताओं को स्पष्ट करेगी जो भारतीय समाज अन्य समाजों के साथ बाँटेगा। इसके साथ-साथ इसकी परंपराओं की विशेषताओं को भी बाँटेगी।

इसी दृष्टिकोण से, समाजशास्त्री परंपरा का अर्थ समझने का प्रयास करेंगे। उनके द्वारा प्रतीकों तथा मूल्यों का सावधानी पूवर्क परीक्षण किया जाएगा। द्वितीय भारतीय समाजशास्त्रीय विरोधी शक्तियों के संघर्ष तथा संश्लेषण के संरक्षण तथा परिवर्तन का समझने के लिए द्वंद्वात्मक उपागम का अवलंबन करेंगे।

प्रश्न 2.
पश्चिमी सामाजिक विज्ञान के संबंध में डी.पी.मुकर्जी के क्या विचार थे?
उत्तर:
पश्चिमी सामाजिक विज्ञान क विषय में डी.पी.मुकर्जी के विचारों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) डी.पी.मुकर्ज पश्चिमी सामाजिक विज्ञानों के प्रत्यक्षवाद के पक्ष में नहीं थे। मुखर्जी का मत है कि पश्चिमी सामजिक विज्ञान ने व्यक्तियों का जैविकीय या मनोवैज्ञानिक इकाइयों तक सीमित कर दिया है. पश्चिमी देशों की औद्योगिकी संस्कृति ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर्ता बना दिया है।

(ii) डी.पी.का मत है कि व्यक्तिवाद अथवा व्यक्तियों की भूमिकाओं तथा अधिकारों को मान्यता प्रदान करके प्रत्यक्षवाद के मनुष्य को उसके सामाजिक आधार से पृथक् कर दिया है।

(iii) डी.पी. का मत है कि ‘हमारी मनुष्य की अवधारणा ‘पुरुष’ की है व्यक्ति की नहीं।’ मुखर्जी के अनुसार व्यक्ति शब्द हमारे धार्मिक ग्रंथो अथवा महर्षियों के कथनों में बहुत कम पाया जाता है। ‘पुरुष’ का विकास उसके अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग से तथा अपने समूह के सदस्यों के मूल्यों तथा भागीदरी से होता है।

(iv) डी.पी. क अनुसार भारत की समाजिक व्यवस्था मूलरूप स समूह, संप्रदा अथवा जाति कार्य का मानक अनुस्थापना है। यही कारण है कि आम भारतीय द्वारा नैराश्य का अनुभव नहीं किया जाता है। इस संदर्भ में डी.पी. हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों तथा बौद्धों में कोई विभेद नहीं है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

प्रश्न 3.
परंपराओं की गतिशीलता किसे कहते हैं?
उत्तर:
डी.पी.मुकर्जी के अनुसार परंपरा का तात्पर्य संप्रेषण से है प्रत्येक सामजिक परंपरा का कोई न कोई उद्गम अवश्य होता है। समाज के सभी सदस्यों द्वारा परंपराओं की ऐतिहासिकता को मान्यता प्रदान की जाती है। परंपरा के द्वारा प्रायः यथास्थिति को कायम रखा जाता है। परंपरा का रूढ़िवादी होना आवश्यक नहीं है। डी.पी. का मत है कि परंपरओं में परिवर्तन होता रहता है।

भारतीय परंपराओं में तीन सिद्धांतो को मान्यता प्रदान की गई है –

  • श्रुती
  • समृति तथा
  • अनुभव

विभिन्न संप्रदायों या पंथो संत-संस्थापकों के व्यक्तिगत अनुभवों से सामूहिक अनुभव की उत्पत्ति होती है, जिससे प्रचलित सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था में परिवर्तन होता है। प्रेम या प्यार तथा सहजता का अनुभव या स्वतः स्फूर्त जो इन संतों तथा अनेक अनुयायिकों में पायी जाती है वह सूफी संतों में भी देखने को मिलती है। परंपरागत व्यवस्था द्वारा विरोधी आवाजों को भी सामायोजित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप, सुविधाहीन विभिन्न समूहों की वर्ग चेतना ने जातिय व्यवस्था को जबर्दस्त चुनौती दी है।

प्रश्न 4.
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार सामाजिक वास्तविकता का अर्थ है?
उत्तर:
सामाजिक वास्तविकता के संबंध में डी.पी.मुकर्जी के विचारों का अध्ययन निम्नखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) सामाजिक वास्तविकता के अनेक तथा विभिन्न पहलू हैं तथा इसकी अपनी परंपरा तथा भविष्य है।

(ii) सामाजिक वास्तविकता को समझने के लिए विभिन्न पहलू की अंत:क्रियाओंक की प्रकृति को व्यापक तथा संक्षिप्त रूप में देखना होगा। इसके साथ-साथ परंपराओं तथा शक्तियों के अंत: संबंधों को भी भली भाँति समझना होगा। किसी विषय विशेष में संकुचित विशेषीकरण इस तथ्य का समझने में सहायक नहीं है।

(iii) डी.पी.मुखर्जी के अनुसार इस दिशा में सामजशास्त्र अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। उनका स्पष्ट मत है कि किसी अन्य सामाजिक विज्ञान की भाँति समाजशास्त्र का अपना फर्श तथा छत है। मुखर्जी का मत है कि समाजशास्त्र का फर्श अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति धरातल में संबद्ध है तथा इसकी छत ऊपर से खुली हुई है।

(iv) डी.पी. मुखर्जी का. मत है कि समाजशास्त्र हमारी जीवन तथा सामाजिक वास्तविकता : का एकीकृतं दृष्टिकोण रखने में सहायता करता है। यही कारण है कि डी.पी.मुखर्जी ने सामाजिक जीवन के विस्तृत चित्र का संक्षिप्त दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि डी.पी. ने सामाजिक विज्ञनों के संश्लेषण पर निरंतर जोर दिया है। समाजशास्त्र एक समाजिक विज्ञान के रूप में विभिन्न विषयों के संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण प्रयास कर सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये बदलाव के ढाँचे की कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
भारतीय संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में विषमताओं के होते हुए भी मौलिक एकता की भावना इसे संसार की अन्य संस्कृतियों से अलग रखती है। अर्थात् समुद्र के उत्तर में हिमालय के दक्षिण में जो देश है वह भारत नाम का खंड है। वहाँ के लोग भारत की संतान कहलाते हैं। भारत एक विशाल देश है। उत्तर में हिमालय पर्वत दक्षिण में तीन ओर समुंद्र हैं। इसकी भौगालिक विशेषता इसे संसार के अन्य देशों से अलग रखती है।

भारत की भौगोलिक एकता को खण्डित करने का सहास आज तक कोई शक्ति नहीं कर सकी। सांस्कृतिक एकता-भारत के विभिन्न वर्गों ने मिलकर एक ऐसी विशिष्ट और अनोखी संस्कृति को जन्म दिया है जो शेष संसार में सर्वथा भिन्न है। भारतीय संस्कृति संसार में उच्च। स्थान रखती है। भारतीय संस्कृति में एकता का आधार राजनीतिक या भौगोलिक न होकर सांस्कृतिक रहा है।

भाषागत एकता-भारत में प्रचीन काल से ही द्रविड़, आर्य, कोल, ईरानी, यूनानी हुण, शक, अरब, पठान, मंगोल, डच, फेंच, अंग्रेज आदि जातियाँ आती रही है। इन लोगों ने यहाँ की भाषा और संस्कृति को एक सीमा तक अपनाया। अधिकांश भरतीय भाषाओं पर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। भारत में मुसलमानों के आगमन के पश्चात् उर्दू भाषा का जन्म हुआ। बंगला, तमिल, तेलगु भाषा पर भी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता पड़ता है। भारत में प्राचीन काल से ही अनेक भाषाओं का जन्म हआ किंत उनमें किसी प्रकार का भी टकराव देखने का नही मिला।

धार्मिक एकता-भारत में विभिन्न धर्मों के मानने वाले निवास करते हैं। प्रत्येक धर्म के अपने विश्वास, रीति-रिवाज, उपासाना और पूजन विधियाँ हैं। हिंदू धर्म में ही आर्य समाजी, सनातन धर्मी, शैव, वैष्णव, नानक पंथी, कबीर पंथी आदि विभिन्न सम्प्रदान हैं, पंरतु विभिन्न मत-मतान्तरों के होते हुए भी भारत में धार्मिक एकता बनी हुई है। संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया। सभी धर्मों क पवित्र ग्रंथो का आदर किया जाता हैं।

राजनीतिक एकता-भारत में समय-समय पर अनेक शासन प्रणालियों का प्रचलन रहा है। कि स्वतंत्रता के पश्चात् प्रजातंत्रिक शासन प्रणाली अस्तित्व में आई। अनेक राजनीतिक दल और विचारधाराओं का उदय हुआ किंतु सभी दल भारत की राजनीतिक एकता को सर्वोपरि समझते हैं। सामाजिक-आर्थिक एकता-भारत में विभिन्न धर्मों और विश्वासों को मानने वाले लोग रहते हैं। उनकी परम्पराओं और रीति-रिवाजों में अंतर है परंतु उनके परस्पर संबंधों में उदारता और भाईचारे की भावना वद्यमान है। मानव कल्याण और लोकहित की भावाना से प्ररेणा लेकर संस्कृति की एकता को सुरक्षित बनाए रखा गया है। आर्थिक विषमता के होते हुए भी आत्मसंतोष की भावना विद्यमान है।

उपयुक्त सभी विशेषताएँ भारतीय संस्कृति तथा समाज की है जबकि किसी भी समाज में परिवर्तन होता है तो उसके कुछ निर्धारित प्रारूप होते हैं यथा-समाज में हिंदी में हिंदी भाषा के स्थान पर अंग्रेजी का वर्चस्व यह प्रतिरूप समाज की भाषायी एकता को प्रभावित करता है। इसी प्रकार अन्य तत्व भी परिवर्तन के प्रारूप को प्रभावित करते हैं।

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प्रश्न 2.
परंपरा तथा आधुनिकता के विषय में डी.पी.मुखर्जी के क्या विचार थे?
उत्तर:
परंपरा तथा आधुनिकता के विषय में डी.पी.मुखर्जी के विचार –
(i) परंपरा का अर्थ-प्रसिद्ध भारतीय समाजशास्त्रीय डी.पी.मुखर्जी के अनुसार परंपरा का तात्पर्य संप्रेषण से है। प्रत्येक परंपरा का कोई न कोई उदगम स्रोत धार्मिक ग्रंथ तथा महर्षियों के कथन हो सकते हैं। परंपराओं के स्रोत कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन इनकी ऐतिहासिकता को प्राय: सभी व्यक्तियों द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है। परंपराओं को उद्धत, पुनःस्मरण किय जाता है तथा उनका सम्मान किया जाता है।

(ii) भारतीय परंपराओं की शक्ति-डी.पी.मुखर्जी के अनुसार भारतीय परंपराओं की वास्तविक शक्ति उसके मूल्यों का पारदर्शिता में पाई जाती है। इसकी उत्पति स्त्रियों तथा पुरुषों की अतीत की घटनाओं से संबद्ध जीवन पद्धतियों तथा भावनाओं से होती है, इनमें से कुछ मूल्य अच्छे तथा कुछ बुरे हैं। सोचने वाली बात यह है कि. तकनीक, प्रजातंत्र, नगरीकरण तथा नौकरशाही के नियम आदि विदेशी तत्वों मे उपयोगिता को भारतीय परंपरा में स्वीकार किया गया।

(iii) आधुनिक भारतीय संस्कृति एक आश्चर्यजनक सम्मिश्रण-डी.पी. का यह स्पष्ट मत है कि पश्चिमी संस्कृति तथा भारतीय परंपराओं में समायोजन निश्चित रूप से होगा। डी. पी.आगे कहते हैं कि भारतीय संस्कृति किसी भी दशा में समाप्त नहीं होगी। भारतीय संस्कृति की ननीयता, समायोजन तथा अनूकूलन इसके अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे। भारतीय संस्कृति ने जनजातिय संस्कृति को आत्मसात किया है, इसके साथ-साथ इसने अनेक आंतरिक विरोधों को भी अपने साथ मिलाया है। यही कारण है कि आधुनिक भारतीय संस्कृति एक आश्चर्य मिश्रण कहलाती है।

(iv) परंपरा व आधुनिकता मे द्वंद्व की स्थिति-डी.पी.का पूर्ण व्यक्ति या संतुलित व्यक्तित्व का अर्थ है –

  • नैतिक उत्साह, सौंदर्यात्मक तथा बौद्धिक समझदारी का मिश्रण है।
  • इतिहास एवं तार्किकता का ज्ञान। उपरोक्त कारणों से ही पंरपरा तथा आधुनिक में द्वंद्व की स्थिति बन जाती है।

(v) भारतीय परंपरा का पश्चात्य संस्कृति से सामना-डी.पी.का मत है कि भारतीय संस्कृति का पाश्चात्य संस्कृति से सामाना होने पर सांस्कृतिक अंत:विरोधों की शक्तियों को मुक्त किया जा सकता है। इस नए मध्य वर्ग को जन्म दिया है। डी.पी. के अनुसार संघर्ष तथा संशलेषण की प्रक्रिया को भारतीय समाज की वर्ग-संरचना को सुरक्षित रखने वाली शक्त्यिों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

प्रश्न 3.
डी.पी.मुखर्जी ने नए मध्यम वर्ग की अवधारणा की व्याख्या किस प्रकार की है?
उत्तर:
डी.पी.मुखर्जी ने नए मध्यम वर्ग को व्याख्या के संबंध में निम्नलिखित बिंदुओं पर बल दिया है –
(i) नगरीय-औद्योगिक व्यवस्था-डी.पी. मुखर्जी के अनुसार अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रारंभ की गई नगरीय-औद्योगिक व्यवस्था न पुराने ताने-बाने को लगभग समाप्त कर दिया । नगरीय-सामज में नया सामाजिक अनुकूलन तथा समायोजन प्रारंभ हुआ। इस नए सामाजिक ताने-बाने में नगरों में शिक्षित मध्यम वर्ग समाज का मख्य बिंद बन गया।

(ii) शिक्षित मध्यम वर्ग आधुनिक सामाजिक शक्ति के ज्ञान को नियंत्रित करता है-शिक्षित मध्यम वर्ग द्वारा सामाजिक शक्ति के ज्ञान को नियंत्रित किया जाता है। इसका तात्पर्य है कि पश्चिमी देशों द्वारा प्रदत विज्ञान, तकनीक, प्रजातंत्र तथा ऐतिहासिक विकास की भावना भारत में नगरीय समाज में विज्ञान तथा तकनीकी से संबंधित समस्त विशेषताओं तथा मध्ययम वर्ग की सेवाओं के उपयोग की बात कही गई है। डी.पी. का मत है कि मुख्य समास्या इस मध्यम वर्ग के पश्चिमी विचारों तथा जीवनशैली का पूर्णरूपेण अनुकरण करना है।

यही कारण है कि इस तथ्य को प्रसन्नता अथवा तिरस्कार कहा जाए कि हमारे समाज का माध्यम वर्ग भारतीय . वास्तविकताओं तथा संस्कृति से पूर्णतया अनभिज्ञ बना रहता है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते है कि भारतीय मध्य वर्ग पश्चिमी सभयता से अधिक निकट है जबकि भारती संस्कृति तथा विचारों से उसका अलगाव जारी है।

यद्यपि मध्यम वर्ग भारतीय परंपराओं से संबंद्ध नहीं है तथापि परंपराओं मे प्रतिरोध तथा . सीखने की अत्यधिक शक्ति पायी जाती है। यह परंपराएँ मानव के भौगोलिक तथा जनकीय प्रतिमानों के आधार पर भौतिक समायोजन तथा जैविकीय आवेगा के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। इस संबंध में भारत के संदर्भ में कहा जा सकता है कि यहाँ नगर-नियोजन तथा परिवार नियोजन के कार्यक्रमों परंपराओं से इतना अधिक संबंधित हैं कि नगर-नियोजन तथा समाज सुधारक इनकी अनदेखी नहीं कर सकते है।

यदि वे ऐसा करते हैं तो समस्त नियोजन तथा सुधार कार्य खतरे में पड़ जाएंगे। इस विश्लेषण के संदर्भ में कहा जा सकता है कि नगर-नियोजन भारत का मध्यम वर्ग आधुनिक भारत के निर्माण में आम जनता के नेतृत्व की स्थिति में नहीं है। मध्य वर्ग का विचार क्षेत्र परिश्मी सभयता से संबंधित रहने के कारण यह स्वदेशी परंपराओं से पृथक् हो गया है। यही कारण है कि मध्यम वर्ग का जनता से संपर्क टूट गया है।

(iii) भारत पंरपराओं से अनुकूलन करके आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है-डी.पी.मुखर्जी का मत है कि यदि मध्यम वर्ग आम-जनता से अपना संमक पुनः स्थापित करता है तो भारत परंपराओं से अनुकूलन करके आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। भारतीयों को अपनी परंपराओं के संदर्भ में न तो क्षमा याचना करने की आवश्यकता है और न ही आत्मश्यलाघा की आवश्यकता है।

उन्हें परंपराओं की जीवतंता को नियंत्रित करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए जिसे आधुनिकता द्वारा आवश्यक परिवर्तनों के साथ समायोजन कर सके। इस प्रकार व्यक्तिवाद तथा सामाजिकता में संतुलन कायम होगा। इस नूतन अनुभवों से भारत तथा विश्व लाभान्वित हो सकेंगे।

अक्षय रमनलाल देसाई – (1915-1994)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रो. देसाई के अनुसार ‘भूमि सुधारों’ में असफलता के कारण थे?
उत्तर:
प्रो. देसाई के अनुसार भूमि सुधार में असफलता के निम्न कारण थे –

  • राजनीतिक संकल्प शक्ति का अभाव।
  • प्रशासनिक संगठन : नीति निर्वाह के अपर्याप्त कारण।
  • कानूनी बाधाएँ।
  • सही एवं अद्यतन अभिलेखों का अभाव।
  • भूमि सुधार को अब तक आर्थिक विकास की मुख्य धारा से अलग करके देखना।

प्रश्न 2.
प्रो. देसाई की दो प्रमुख कृतियों का उल्लेख किजिए?
उत्तर:
श्री देसाई की दो प्रमुख कृतियाँ हैं –

  • Social Background of Indian Nationalism
  • State and Society in Indian

प्रश्न 3.
कल्याणकारी राज्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रो.ए.आर. देसाई के अनुसार स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई। कल्याणकारी राज्य में लोकतांत्रिक समाजवाद के चिंतन को प्रस्तुत किया गया। प्रो. देसाई के असार भारत में कल्याणकारी राज्य पूँजीवादी संरचना का मुखौटा है। कल्याणकारी राज्य में बुर्जआ वर्ग के हितों की रक्षा की जा रही है। इस प्रकार प्रो. देसाई ने कल्याणकारी राज्य को जन सामान्य के संघर्ष के क्षेत्र में एक सुनियाजित अवरोध के रूप में सामने रखा है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ए. आर. देसाई ने भारतीय समाजशास्त्रियों की आलोचना किस प्रकार की?
उत्तर:
प्रोफेसर ए. आर. देसाई ने संयुक्त राज्य अमेरिका तथा इंगलैंड से उधार ली गई अवधारणाओं तथा पद्धतियों के आधार पर भारतीय समाजशास्त्रियों के द्वारा सामाजिक-आर्थिक प्रघटनाओं के विशलेषण करने की प्रवृति की कड़ी आलोचना की थी। श्री देसाई के अनुसार भारत में सामाजशास्त्र मुख्यतया उधार ली हुई अवधारणाओं और पद्धतियों का अनुशासन है।

और यह उधार पश्चिमी देशों विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैंड के परम प्रतिष्ठत केंद्रों से लिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि परम प्रतिष्ठित मॉडलों का पीछा करते हुए छद्म बुद्धि व्यापार के दलदल में आत्मलाप है। प्रो.ए.आर. देसाई ने बौद्धिक चेतना एवं विश्लेषण के एक नवीन क्षितिज का सृजन किया। समाजशास्त्रीय विचारों की श्रृंखला को एक नई उष्मा प्रदान की। स्पष्ट है कि जनसाधारण के संघर्ष से समाजशास्त्र के विकास में प्रो. देसाई का योगदान अतुलनीय है।

प्रश्न 2.
देसाई की सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा क्या है?
उत्तर:
प्रो.ए.आर. देसाई ने सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा को स्पष्ट किया है। वास्तव में अनेक देशों में पूँजीवादी संरचना क विकल्प के रूप में सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा रही है। जब सरकारी तथा अर्द्धसरकारी स्तर पर उत्पादन के विभिन्न साधनों एवं संगठनों पर नियंत्रण किया जाता है, उसका राष्ट्रीयकरण किया जाता है तो उसमें सार्वजनिक क्षेत्रों का एक स्वरूप निर्मित हा जाता है। जैसे भारत में 1970 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

प्रिवीपर्स को समाप्त कर दिया गया। इस प्रकार देश में सार्वजनिक क्षेत्र को महत्त्व देने का प्रयास किया गया। प्रो.ए.आर. देसाई ने अपनी पुस्तक Indian’s path of Development Amarxist Apporach में सार्वजनिक क्षेत्रों का मूल्यांकन किया है। श्री देसाई के अनुसार भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का संतुलित विकास नहीं हुआ है। इस कारण पूंजीपतियों को निरंतर प्रश्रय प्राप्त होता रहता है।

प्रश्न 3.
ए. आर देसाई के समाजशास्त्रीय योगदानों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
डॉ. योगेन्द्र सिंह ने तुलनात्मक विश्लेषणों के आधार पर प्रो.ए.आर देसाई के समाजशास्त्रीय योगदान का मूल्यांकन किया है। योगेन्द्र सिंह ने निम्न बिंदुओं के आधार पर प्रो. देसाई के महत्त्व को स्पष्ट किया है।

(i) प्रो. योगेन्द्र सिंह के अनुसार सामाजिक अध्ययनों के मार्क्सवादी प्रतिमानों का विकास विशेषकर युवा समाजशास्त्रियों में देखा जाता है। 1950 के दशक में यह दृष्टिकोण अस्तित्व में था लेकिन वह इतना नहीं था उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डी.पी.मुखर्जी ने सामाजिक विश्लेषणों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण के स्थान पर शास्त्रीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी थी इस दृष्टिकोण में भारतीय आदर्शों और परंपराओं के साथ द्वंद्वात्मक को तर्क संलग्न किया गया था।

(ii) अपने आरंभिक अध्ययनों में समाजशास्त्रीय रामकृष्ण मुखर्जी ने मार्क्सवादी परंपराओं की बहुत-सी श्रेणीयों और संचालनों का उपयोग किया। लेकिन कालान्तर में, समाजशास्त्र में मार्क्सवादी पद्धतियों को 1950 के दशक की पीढ़ी के समाजशास्त्रियों के मध्य अकेले ए.आर. देसाई ने ही सामजशास्त्र में समान रूप से प्रचारित और प्रयुक्त किया था।

(iii) भारतीय समाजशास्त्र के जिज्ञासात्मक विषय की जड़े व्यापक दृष्टिकोण से मुख्यतः संरचनात्मक, प्रकार्यात्मक अथवा कुछ अर्थों में संरचनात्मकता और ऐतिहासिक संरचनात्मक प्रतिमानों में पाई जाती थीं। यह भारतीय समाजशास्त्र पर ब्रिटिश और अमेरिकी समाजशास्त्री परंपराओं के प्रभाव को स्पष्ट करता है। 1970 और 1980 के दशक के मध्य ये परंपराएँ पाई जाती थीं। इस प्रकार प्रो, योगेन्द्र सिंह न ए.आर. देसाई की सामजशास्त्रीय दृष्टि का तुलनात्मक विश्लेषण किया है।

प्रश्न 4.
ए.आर. देसाई का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
भारतीय सामाजशास्त्रीय अक्षय रमनलाल देसाई का जन्म सन् 1915 में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा, बड़ौदा, सूरत तत्पश्चात् मुम्बई में संपन्न हुई। आप ऐसे पहले भारतीय समाजशास्त्री थे जो सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल के औपचारिक सदस्य थे। आप जीवन । भर मार्क्सवादी रहे। आप मार्क्सवादी राजनीति में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।

श्री देसाई के पिता मध्यवर्गी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाल व्यक्ति थे और बड़ौदा राज्य के लोक सेवक थे। वे एक अच्छे उपन्यासकार भी थे। वे समाजवाद, भारतीय राष्ट्रवाद और गाँधी जी की विभिन्न गतिविधियों में रुचि रखते थे। श्री देसाई की माता का देहांत जल्दी हो गया था। श्री देसाई ने अपने पिता के साथ प्रवसन का जीवन अधिक व्यतीत किया, क्योंकि उनके पिता का स्थानांतरण निरंतर होता रहता था।

श्री देसाई का 1948 में पी. एच. डी. की उपाधि मिली। आपकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।

  • Social Background of Indian Nationalism
  • Peasant Struggles in India
  • Agraian Struggles in India
  • State and Society In India

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रो. ए. आर देसाई के समाजशास्त्रीय विचारों को संक्षेप मे लिखिए?
उत्तर:
प्रो. ए. आर देसाई अपने आप में एक विशिष्ट भारतीय समाजशास्त्री हैं जो सीधे तौर पर एक राजनैतिक पार्टी से जुड़े थे और उसके लिए कार्य करते थे। भारतीय समाजशास्त्र में प्रो. देसाई का अवदान अविस्मरणीय है। प्रो. देसाई ने जन-संघर्ष तथा विक्षोभ के वैचारिक आयाम को भारतीय समाजशास्त्र की चिंतन परिधि में एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया एक चेतना संपन्न विचारक के रूप में उन्होंने विश्व की प्रमुख घटनाओं तथा मुद्दों का गंभीर अध्ययन किया।

उन्होंने भारतीय सामजिक संरचना मं पाए जाने वाले शोषण तथा सामाजिक मतांतरों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। सामाजिक-आर्थिक ऐसी राजनीतिक प्रघटनाओं के विश्लेषण में प्रोफेसर ए.आर. देसाई ने उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों एवं स्रोतों को प्रयुक्त किया। पूँजीवाद आर्थिक संरचना तथा श्वेत वसन राजनीतिक व्यवस्था के नकाब को उतारकर रख दिया। भारतीय समाजशास्त्र के विस्तृत आयाम पर प्रोफेसर देसाई ने अध्ययन एवं अनुसंधान को एक सर्वथा नवीन दिशा एवं दृष्टि प्रदान की। परिवार, नातेदारी, जाति, विवाह, धर्म तथा संघर्ष के समाजशास्त्र को मार्क्सवादी दृष्टिकोण के आधार पर एक नवीन ऊर्जा तथा एक नवीन उष्मा प्रदान की। प्रोफेसर ए. आर. देसाई ने लिखा है।

“सामाजिक विज्ञान के अभ्यासियों को गंभीर बौद्धिक तथा नैतिक धर्म संकट का सामना करना पड़ेगा या तो वे देश के शासक के तरीकों को सही सिद्ध करते हए अपने लिए सुरक्षा और सम्मान का इंतजाम करें, या हिम्मत बाँधकर और नतीजों का सामना करने के लिए तैयार होकर ऐसा नजरिया अपनाएँ जो विकास के पूंजीवाद रास्ते को अपनानी वाली सरकार के नेतृत्व में काम करती शक्तियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए दुख भोगते लोगों के लिए उपयोगी ज्ञान को प्रजनित करें तथा उसका प्रचार-प्रसार करें। उनका संघर्ष पूंजीवादी रास्ते के परिणामों के असर को दूर करने के लिए और उनके विपरित विकास के गैर-पूँजीवादी रास्ते के लिए स्थितियाँ तैयार करने के लिए होगा।

इससे भारत में काम काजी लोगों की विशाल संख्या की उत्पादत क्षमता मुक्त हो जाएगी और सम्मान वितरण संभव होगा।” प्रोफेसर ए.आर. देसाई ने पूँजीवादी आर्थिक संरचना, साम्राज्यवाद एवं दमनकारी शक्तियों के विरुद्ध सामजशास्त्रीय चिंतन परिधि के आधार पर विचार प्रकट किए। उन्होनें साभजशास्त्रीय अध्ययन तथा अनुसंधान को जनसंघर्ष के साथ जोड़ा तथा जन-विक्षोभ के विविध आयामों को वैज्ञानिक दृष्टि दी। उन्होनें स्वतंत्र भारत में परिवर्तन तथा विकास की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की।

साथ ही पंचवर्षीय योजनाओं, कृषि समस्याओं, विकास कार्यक्रमों, ग्रामीण संरचनाओं एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का गहन एवं गंभीर विश्लेषण किया उनके अनुसार स्वतंत्र भारत में रज्य की प्रकृति तथा समाज के प्रकार के विश्लेषण में बौद्धिक जगत से जुड़े लोग असफल रहे हैं तथा विद्वानों द्वारा निरंतर जन-संघर्ष के केन्द्रीय बिंदु की उपेक्षा की गई। उन्होंने जन-अहसमति, कल्याणकारी राज्य, भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व, भरतीय राष्ट्रवाद, संक्रमण स्थिति में भारतीय ग्रामीण समुदाय तथा महात्मा गाँधी के सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों का आलोचनात्मक परीक्षण किया। उन्होंने अपने विचार तथा चिंतनों के आधार पर सत्ता एवं व्यवस्था का पोषण नहीं किया।

काल्याणकारी राजय के नाम पर पूंजीवादी आर्थिक संरचना के संपोषण की प्रवृति का उन्होंने खलासा किया। एक विद्रोही समाजशास्त्री के रूप में. एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी चिंतक के रूप में तथा जन-असहमति एवं जन संघर्ष के मुद्दों से जुड़े एक प्रखर समाजशास्त्री के रूप में प्रोफेसर ए.आर. देसाई का नाम विचारों की दुनिया में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने भारत में राजनीति तथा विकास के विविध आयामों के लिए सामजशास्त्रियों को उत्प्रेरित किया। उन्होंने कल्याणकारी राज्य, संसदीय लोकतंत्र, राजनीति तथा विकास के अध्ययन हेतु ऐतिहासिक भौतिकवाद के आधार पर भारत में राज्य तथा समाज का विश्लेषण किया। साथ ही, समाजशास्त्रीय नजरिये की एक नई उत्तेजना प्रदान की। सामजशास्त्रीय अध्ययन को बहस का विषय बनाया।

क्या मौजूदा समाजशास्त्रीय अध्ययन पिछड़ापन, गरीबी तथा असमानता के समाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है, क्या भरतीय समाज में तेजी से हो रहे रूपांतरणों की केन्द्रीय प्रवृति को रेखांकित करने में मौजूदा समाजशास्त्रीय अन्वेषण सक्षम है? क्या गरीबों के हक में हस्तक्षेप करने की ताकत सामज शास्त्र में पैदा की जा सकी है? प्रोफेसर देसाई ने स्पष्ट किया कि भारतीय परिदृश्य में समाजशास्त्रीय विश्लेषणों तथा उपागमों पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

प्रश्न 2.
कल्याणकारी राज्य क्या है? ए. आर देसाई इसके द्वारा किए गए दावों की आलोचना क्यों करते हैं?
उत्तर:
प्रो. देसाई अपनी कृति State and Society in India के कल्याणकारी राज्य की अवधारणा प्रस्तुत की है लोक-कल्याणकारी राज्य किसी अहस्तक्षेपी राज्य से भिन्न है। राज्य का अस्तक्षेपी रूप तो केवल एसे कार्य सम्पादित करता है जो पुलिस कार्य कहलाते हैं, जैस-सुरक्षा कानून व्यवस्था? सम्पत्ति का संरक्षण तथा अनुबंधों का प्रयर्तन । इसके अतिरिक्त अस्तक्षेपी राज्य व्यक्ति के अन्य कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता जबकि लोक-कल्याणकारी राज्य उपरोक्त कार्यों के साथ-साथ जन स्वास्थ का भी ध्यान रखता है। वे ऐसी बुनियादी सुविधाएँ भी सुलभ कराता है, जिससे लोगों में राज्य के मामलों का प्रभावी भागीदारी निभाने के लिए आवश्यक न्युनतम शिक्षा का लाभ अवश्य पहुँचे।

इसके अतिरिक्त लोक-कल्याणकारी राज्य तो अनिवार्यात: नागरिकों को काम का अधिकार, निश्चित निर्वाह आय का अधिकार तथा आश्रय पाने का अधिकार सुलभ कराना होता है। बेरोजगारों के निर्वाह भत्ता देना भी ऐसा ही राज्य का दायित्व है। सभी को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए लोक कल्याणकारी राज्य मानव अधिकारों में आस्था रखता है। वह आवश्यक रूप से मानव जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता लेकिन आर्थिकता, निर्धनता, बीमारी तथा अन्य सामाजिक बुराईयों को दूर करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार अहस्तक्षेपी राज्य एक नकारात्मक राज्य हैं जो सुरक्षात्मक (पुलिस कार्य) करता है, जबकि लोक कल्याणकारी सकारात्मक राज्य हैं जो विकास कार्य करता है।

मैसूर नरसिहाचार श्रीनिवास – (1916 – 1999)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
श्री.एम.एन. श्री निवास के समाजशास्त्रीय योगदान को दर्शाने वाले दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:
समाजशास्त्री पी.सी. जोशी ने लिखा है कि एम.एन.श्री निवास ने मनुवाद का विरोध किय तथा बड़ौदा विश्वविद्यालय क प्रमुख शिक्षाविद् प्रो.के.टी.शाह के इस प्रास्तव को ठुकरा दिया कि समाजशास्त्र मनु के धर्मशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है। एम.एन.श्री निवास ने 1996 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘इंडियन सोसाइटी’ श्रू पर्सनल राइटिंग्स में यह स्पष्ट किया कि समाजशास्त्र के अंतर्गत सामाजिक प्रघटनाओं के विश्लेषण हेतु वैज्ञानिक पद्धति आवश्यक है।

एम.एन. श्रीनिवास ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय विद्याशास्त्र तथा समाजशास्त्र को पर्यायवाची शब्द के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। भारतीय विद्याशास्त्र तथा समाजशास्त्र में बहुत अंतर है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि समाजशास्त्रीय परिदृश्य में भारतीय विद्याशास्त्र को समाजशास्त्र के रूप में गहण करने की दोषपूर्ण प्रवृति रही है। एम.एन. श्री निवास ने यह भी स्पष्ट किया है कि सामजशास्त्रीय अध्ययन एवं अनुसंधान हेतु समाजशास्त्रियों को आम जनता के बीच जाना ही होगा। इस प्रकार उन्होंने क्षेत्रीय शोध कार्य के महत्व को रखांकित किया। पुस्तकों, अभिलेखों, पुरात्वों तथा अन्य संबंधित सामग्रियों का उपयोग द्वितीयक स्रोत के रूप में किया जा सकता है।

सामाजिक वास्तविक्ता एवं सामाजिक प्रघटनाओं के अध्ययन के लिए सुदूर नगरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अध्ययन के आधार पर ही प्रामाणीक तथ्यों का विश्लेषण वैज्ञानिक औचित्य एवं वस्तुनिष्ठ पद्धतियों के आधार पर संभव है । इस प्रकार उन्होंने पुस्तकीय परिपेक्ष्य को विशेष महत्त्व प्रदान नहीं किया।

प्रश्न 2.
एम. एन. श्रीनिवास की प्रमुख कृतियाँ कौन सी हैं?
उत्तर:

  • ‘रिलीजन एंड सोसाइटी अमंग दि कुर्गस ऑफ साउथ इंडिया’ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1952 ।
  • ‘मेथड इन सोशल एंथ्रोपॉलोजी’ यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो प्रेस, शिकागो, संपादित, 19581 ।
  • सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ लॉस एंजिलल्स कैलीफोर्निया, 1996 ।
  • ‘कास्ट इन मॉडर्न इंडिया एंड अदर एशज’ मुम्बई एलाइड पब्लिशर्स, 1962 ।
  • ‘द रिमेम्बर्ड विलेज’, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1976 ।
  • ‘द डोमिनेण्ट कास्ट एंड अदर एशेज’ आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1987 ।
  • द कोहेसिव रोड ऑफ.संस्कृताइजेशन’ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1989 ।
  • ऑन लिविंग इन ए रिवोल्यूशन एंड अदर एशेज’, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1992 1
  • इंडयन सोसाइटी श्रू पर्सलन राइटिंग्स’, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 19961 ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पाश्चात्यीकरण की अवधारणा की व्याख्या कीजिए?
उत्तर:
सामजशास्त्री डॉ. श्री निवास के पश्चिमीकरण की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया है। पश्चिमीकरण के संदर्भ में उनका विचार है कि “पश्चिमीकरण शब्द अग्रेजों के शासन काल के 150 वर्षों से अधिक के परिणामस्वरूप भारतीय समाज व संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों को व्यक्त करता है और इस शब्द में प्रौद्योगिकी संस्थाओं, विचारधारा, मूल्यों आदि के विभिन्न स्तरों में घटित होने वाले परिवर्तनों का समावेश रहता है।”

पश्चिमीकरण का तात्पर्य देश में उस भौतिक सामाजिक जीवन का विकास होता है जिसके अंकुर पश्चिमी धरती पर प्रकट हुए और पश्चिमी व यूरोपीय शक्तियों के विस्तार के साथ-साथ विश्व के विभिन्न कोनों में अविराम गति से बढ़ता गया। पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण भी कहते हैं लेकिन अनेक समस्याएँ होते हुए भी पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण के निए पश्चात्य सभ्यता और संस्कृति से संपर्क होना आवश्यक है। पश्चिमीकरण एक तटस्थ प्रक्रिया है।

इसमें किसी संस्कृति के अच्छे या बुरे होने का अभास नहीं होता। भारत में पश्चिमीकरण के फलस्वरूप जाति प्रथा में पाये जाने वाले ऊँच-निच के भेद समाप्त हो रहे हैं। नगरीकरण ने जाति प्रथा पर सिधा प्रहार किया हैं। यातायात के साधनों के विकसित होने से, अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से सभी जातियों का रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज आदि एक जैसे हो गये है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार आ रहा है। भारतीय महिलाओ पर पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा है। विवाह की संस्था में अब लचीलापन देखने को मिलता है । विवाह पद्धति में परिवर्तन आ रहे हैं बाल विवाह का बहिष्कार बढ़ रहा है। अन्तर्जातीय विवाह नगरों में बढ़ रहे है। संयुक्त परिवार प्रथा का पालन भी देखने को मिल रहा है। रीति-रिवाजों और खान-पान भी पश्चिमीकरण से प्रभावित हुआ है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्रीय शोध के लिए गांव को एक विषय के रूप में लेने पर एम.एन. श्री निवास तथा लुई ड्यूमों ने इसके पक्ष में क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर:
लई ड्यूमों और एम.एन. श्री निवास दोनों ही भारतीय समाजशास्त्री हैं। दोनों ने ही अनेक विषयों पर समाजशास्त्रीय अन्वेषण किया है। दोनों ने ही ‘ग्राम’ पर भी अपने विचार प्रकट किए है। ‘ग्राम’ को समाजशास्त्रीय अन्वेषण का विषय बनाने के संदर्भ में दोनों ने निम्न तर्क प्रस्तुत किए है: ग्रामीण जीवन कृषि पर आधारति है कृषि एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें सारा ग्राम कृषि समुदाय एक-दूसरे पर निर्भर करता है। सभी लोग फसलों की बुआई, कटाई आदि में एक-दूसरे।

का सहयोग करते हैं। ग्रामीण जीवन में सरलता और मितव्ययता एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ग्रामों में अपराध और पथभ्रष्ट व्यवहार जैसे चोरी, हत्या, दुराचार आदि बहुत कम होते हैं क्योंकि ग्रामीण में बहुत सहयोग होता है। वे भगवान से भय खाते हैं और परम्परावादी होते हैं ग्रामीण लोग नगरों की चकाचौंध और माह से कम प्रभावित होते हैं और साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। उनके व्यवहार और कार्यकलाप गाँव की प्रथा, रूढ़ि, जनरीतियों आदि से संचालित होते हैं। उनकी इसी सहजता के कारण वे समाजशास्त्री अन्वेषण में बहुत सहयोग देते हैं।

प्रश्न 3.
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
समाजशास्त्री एम.एन. श्री निवास के अनुसार, “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज, धर्मकांड, विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता संस्कृतिकरण में नए विचारों और मूल्यों को ग्रहण किया जाता है। निम्न जातियाँ अपनी स्थिति को ऊपर उठाने के लिए ब्राह्माणों के तौर तरीकों को अपनाती हैं और अपवित्र समझे जाने वाले मांस मंदिरा के सेवन को त्याग देती हैं। इन कार्यों से ये निम्न जातियाँ स्थानीय अनुक्रम में ऊँचे स्थान की अधिकारी हो गई है। इस प्रकार संस्कृतिकरण नये और उत्तम विचार, आदर्श मूलय, आदत तथा कर्मकांडों को अपनी जीवन स्थित को ऊँचा और परिमार्जित बनाने की क्रिया. है।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में स्थिति में अपरिवर्तित होता है। इसमें संरचनात्मक परिवर्तन नहीं होता है। इसमें संरचनात्मक परिवर्तन नही होता। जाति व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती। सस्कृतिकरण की प्रक्रिया जातियों में ही नहीं बल्कि जनजातियों और अन्य समूहों में भी पाई जाती है। भरतीय ग्रामीण समुदायों में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में प्रभुजाति की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वे संस्कृतिकरण करने वाली जातियों के लिए संदर्भ भूमिका का कार्य करती है।

यदि किसी क्षेत्र में ब्रह्मणों प्रभु जाति है तो वह ब्राह्मणवादी विशेषताओं को फैला देगा। जब निचली जातियाँ ऊँची जातियों के विशिष्ट चरित्र को अपनाने लगती हैं तो उनका कड़ा विरोध होता है। कभी-कभी ग्रामों में इसके लिए झगड़े भी हो जाते हैं। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया बहुत पहले से चली आ रही है। इसके लिए ब्राह्मणों का वैधीकरण आवश्यक था।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाज के स्तरीकरण में जाति का आधार स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
जाति एक ऐसे पदसोपानीकृत संबंध को बताती है जिसमें व्यक्ति जन्म लेते है तथा जिसमें व्यक्ति का स्थान, अधिकार का स्थान, अधिकार तथा कर्तव्य का निर्धारण होता है। व्यक्तिगत उपलब्धियाँ तथा गुण व्यक्ति की जाति में परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। जाति व्यवस्था वस्तुतः हिंदू सामजिक संगठन का आधार हैं।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी समाजशास्त्री लुई ड्यूमों ने अपनी पुस्तक होमा हाइरारकीकस में जाति व्यवस्था का प्रमुख आधार शुद्धता तथा अशुद्धता की अवधारणा होता है । ड्यूमों ने पदसोपानक्रम को जाति व्यवस्था की विशेषता माना है।

प्रारंभ मे हिंदू समाज चार वर्गों में विभाजित था :

  • ब्राह्मण
  • क्षत्रिय
  • वैश्य तथा
  • शूद्र

शुद्धता तथा अशुद्धता के मापदंड पर ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च तथ शुद्र का निम्न होता है। वर्ण व्यवस्था मे पदानुक्रम क्षत्रियों का द्वितीय तथा वैश्य का तृतीय स्थान होता है। एम.एन.श्री निवास के अनुसार जिस प्रकार जाति व्यवस्था की इकाई कार्य करती है, उस संदर्भ में वह जाति है, वर्ण नहीं है हालांकि, जाति-व्यवस्था के लक्षणों को वर्ण व्यवस्था से ही लिया गया है लेकिन वर्तमान संदर्भ में जाति प्रारूप अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। एम.एन. श्रीनिवास ने जाति की परिभाषा करते हुए कहा है कि:

  • जाति वंशानुगत होती है।
  • जाति अंतः विवाही होती है।
  • जाति आमतौर पर स्थानीय समूह होती है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत

BSEB Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 10 Science विद्युत InText Questions and Answers

अनुच्छेद 12.1 पर आधारित

प्रश्न 1.
विद्युत परिपथ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी विद्युत धारा के सतत तथा बंद पथ को विद्युत परिपथ कहते हैं।

प्रश्न 2.
विद्युत धारा के मात्रक की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
विद्युत धारा का S.I. मात्रक ऐम्पियर है। 1 ऐम्पियर को निम्नवत् परिभाषित किया जा सकता है-“यदि किसी चालक में1 सेकण्ड में1 कूलॉम आवेश प्रवाहित होता है तो उत्पन्न विद्युत धारा का मान1 ऐम्पियर होगा।”

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प्रश्न 3.
एक कूलॉम आवेश की रचना करने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या परिकलित कीजिए।
हल:
हम जानते हैं कि एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश होता है = 1.6 x 10-19C
माना 1 कूलॉम आवेश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = n
∴ ne = 1C ⇒  n x 1.6 x 10-19 C = 1C
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उत्तर:
n = 6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉन

अनुच्छेद 12.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
उस युक्ति का नाम लिखिए जो किसी चालक के सिरों पर विभवांतर बनाए रखने में सहायता करती है।
उत्तर:
उस युक्ति का नाम विद्युत सेल है जो किसी चालक के सिरों पर विभवांतर बनाए रखने में सहायता करती है।

प्रश्न 2.
यह कहने का क्या तात्पर्य है कि दो बिंदुओं के बीच विभवांतर 1 v है?
उत्तर:
दो बिंदुओं के बीच विभवांतर 17 है कथन का तात्पर्य है कि “प्रति कूलॉम आवेश के प्रवाहित होने पर कार्य करने की दर 1 जूल है।”

प्रश्न 3.
6 Vबैटरी से गुजरने वाले हर एक कूलॉम आवेश को कितनी ऊर्जा दी जाती है?
हल:
हम जानते हैं –
W = V x Q
W = 6 x 1
W = 6 जूल

अनुच्छेद 12.3से 12.5 पर आधारित

प्रश्न 1.
किसी चालक का प्रतिरोध किन कारकों पर निर्भर करता है?
उत्तर:
किसी चालक का प्रतिरोध अग्रलिखित कारकों पर निर्भर करता है –

  1. पदार्थ की प्रकृति पर
  2. तार की लंबाई पर (R ∝ l)
  3. तार के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल पर
    R = \(\frac {l}{ A}\) (A = πr2 or l x b)

प्रश्न 2.
समान पदार्थ के दो तारों में यदि एक पतला तथा दूसरा मोटा हो तो इनमें से किसमें विद्युत धारा आसानी से प्रवाहित होगी जबकि उन्हें समान विद्युत स्रोत से संयोजित किया जाता है? क्यों?
उत्तर:
विद्युत धारा मोटे तार में से आसानी से प्रवाहित होगी, क्योंकि इसका प्रतिरोध पतले तार से कम होगा।

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प्रश्न 3.
मान लीजिए किसी वैद्युत अवयव के दो सिरों के बीच विभवांतर को उसके पर्व के विभवांतर की तुलना में घटाकर आधा कर देने पर भी उसका प्रतिरोध नियत रहता है। तब उस अवयव से प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर:
नियत ताप तथा प्रतिरोध पर
V ∝ I
अर्थात् विभवान्तर आधा हो जाने पर धारा भी आधी हो जाएगी।

प्रश्न 4.
विद्युत टोस्टरों तथा विद्युत इस्तरियों के तापन अवयव शुद्ध धातु के न बनाकर किसी मिश्रातु के क्यों बनाए जाते हैं?
उत्तर:
विद्युत टोस्टरों तथा विद्युत इस्तरियों के तापन अवयव शुद्ध धातु के न बनाकर किसी मिश्रातु के बनाये जाते हैं; क्योंकि मिश्रातु का प्रतिरोध शुद्ध धातु से अधिक होता है इसलिए वे सरलता से गर्म होकर ताप प्रदान करते हैं।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर तालिका 12.2 में दिए गए आँकड़ों के आधार पर दीजिए –
(a) आयरन (Fe) तथा मरकरी (Hg) में कौन अच्छा विद्युत चालक है?
(b) कौन-सा पदार्थ सर्वश्रेष्ठ चालक है?
उत्तर:
(a) लोहा (आयरन); क्योंकि आयरन की प्रतिरोधकता मरकरी से कम है
(b) चाँदी: क्योंकि सारणी के आधार पर सिल्वर की प्रतिरोधकता सबसे कम है।

अनुच्छेद 12.6 और 12.6.1 पर आधारित

प्रश्न 1.
किसी विद्युत परिपथ का व्यवस्था आरेख खींचिए जिसमें 2v के तीन सेलों की बैटरी, एक 50 प्रतिरोधक, एक 80 प्रतिरोधक, एक 120 प्रतिरोधक तथा एक प्लग कुंजी सभी श्रेणीक्रम में संयोजित हों।
उत्तर:
विद्युत परिपथ का व्यवस्था आरेख चित्र में प्रदर्शित है –
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प्रश्न 2.
प्रश्न 1 का परिपथ दुबारा खींचिए तथा इसमें प्रतिरोधकों से प्रवाहित विद्युत धारा को मापने के लिए ऐमीटर तथा 12Ω के प्रतिरोधक के सिरों के बीच विभवांतर मापने के लिए वोल्टमीटर लगाइए। ऐमीटर तथा वोल्टमीटर के क्या पाठ्यांक होंगे?
हल:
माना, R1 = 50Ω, R2 = 8Ω तथा R3 = 12Ω
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∴ ये तीनों प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं
∴  तुल्य प्रतिरोध = 5 + 8 + 12 = 25Ω
विभवान्तर V = 2 + 2 + 2 = 6V
हम जानते हैं,
I = \(\frac {v}{R}\)
I = \(\frac {6}{25}\)
I = 0.24 A
122 प्रतिरोधक के सिरों के बीच विभवांतर = IR
= 0.24 x 12 = 2.88 v
अतः ऐमीटर का पाठ्यांक 0.24A तथा वोल्टमीटर का पाठ्यांक 2.88V होगा।

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अनुच्छेद 12.6.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
जब (a) 1Ω तथा 106 Ω (b) 1Ω, 103 Ω तथा 106 Ω के प्रतिरोध पार्श्वक्रम में संयोजित किए जाते हैं तो इनके तुल्य प्रतिरोध के संबंध में आप क्या निर्णय करेंगे?
हल:
(a) दिया है,
R1 = 1Ω
R2 = 106 Ω
∴ समान्तर संयोजन के सूत्र से,
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}\)
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(b) दिया है, R1 = 1Ω, R2 = 103 Ω , R3 = 106 Ω
समान्तर संयोजन के सूत्र से,
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उपर्युक्त परिणामों से स्पष्ट होता है कि समान्तर संयोजन का तुल्य प्रतिरोध, संयोजन में जुड़े अल्पतम प्रतिरोध से भी कम होता है।

प्रश्न 2.
100Ω  का एक विद्युत लैम्प, 50Ω का एक विद्युत टोस्टर तथा 500Ω का एक जल फिल्टर 220v के विद्युत स्रोत से पार्यक्रम में संयोजित हैं। उस विद्युत इस्तरी का प्रतिरोध क्या है जिसे यदि समान स्रोत के साथ संयोजित कर दें तो वह उतनी ही विद्युत धारा लेती है जितनी तीनों युक्तियाँ लेती हैं। यह भी ज्ञात कीजिए कि इस विद्युत इस्तरी से कितनी विद्युत धारा प्रवाहित होती है?
हल:
विद्युत इस्तरी 100Ω, 50Ω तथा 500Ω को श्रेणीक्रम में जोड़े जाने पर प्राप्त तुल्य प्रतिरोध लेगी।
माना यह तुल्य प्रतिरोध R Ω है।
समान्तर संयोजन के सूत्र से,
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प्रश्न 3.
श्रेणीक्रम में संयोजित करने के स्थान पर वैद्युत युक्तियों को पार्श्वक्रम में संयोजित करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
श्रेणीक्रम में संयोजित करने के स्थान पर वैद्युत युक्तियों को पार्यक्रम में संयोजित किया जाता है, क्योंकि यदि श्रेणीक्रम में संयोजित कोई वैद्युत युक्ति खराब हो जाती है तो पूरा परिपथ टूट जाता है अर्थात् सभी वैद्युत युक्तियाँ कार्य करना बंद कर देती हैं जबकि पार्श्वक्रम में ऐसा नहीं होता। पार्श्वक्रम में यदि एक वैद्युत युक्ति खराब भी हो जाती है तो शेष वैद्युत युक्तियाँ सुचारु रूप से कार्य करती रहती हैं।

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इसके साथ-साथ वैद्युत युक्तियों को श्रेणीक्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध का मान बढ़ जाएगा जिससे बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न होगी और आग लग जाएगी, इसके विपरीत पार्यक्रम में तुल्य प्रतिरोध का मान बहुत कम होता है, जिसके कारण आग लगने का कोई खतरा नहीं रहता है।

प्रश्न 4.
2 Ω, 3 Ω तथा 6Ω के तीन प्रतिरोधकों को किस प्रकार संयोजित करेंगे कि संयोजन का कुल प्रतिरोध –
(a) 4Ω
(b) 1Ω हो? (2011)
हल:
(a) 4Ω प्रतिरोध के लिए
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3Ω तथा 6Ω वाले प्रतिरोध पार्श्वक्रम में संयोजित किए गए हैं, जबकि 2Ω वाला प्रतिरोध श्रेणीक्रम में संयोजित किया गया है।
3Ω व 6Ω के पार्श्व संयोजन का प्रतिरोध माना R’ है तो
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac {1}{3}\)+ \(\frac {1}{6}\) = \(\frac {2+1}{6}\) =\(\frac {3}{6}\)
R = \(\frac {6}{3}\) = 2Ω
R’ =2Ωका प्रतिरोध R1 =2Ω के साथ श्रेणीक्रम में जुड़ा है।
∴ तुल्य प्रतिरोध R =R1 + R’ = 2Ω + 2Ω = 4Ω

(b) 10 प्रतिरोध के लिए
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सभी तीनों प्रतिरोधों को 12 का तुल्य प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए पार्श्वक्रम में संयोजित किया गया है।
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}+\frac{1}{R_{3}}\) = \(\frac {1}{2}\) + \(\frac {1}{3}\) + \(\frac {1}{6}\) = \(\frac {3+2+1}{6}\) = \(\frac {6}{6}\) = 1

प्रश्न 5.
4Ω, 8Ω, 1Ω तथा 24Ω प्रतिरोध की चार कुंडलियों को किस प्रकारसंयोजित करें कि संयोजन से –
(a) अधिकतम
(b) निम्नतम प्रतिरोध प्राप्त हो सके? (2016)
हल:
(a) अधिकतम प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में संयोजित करना होगा
R = R1 + R2+ R3 + R4
R = 4+8+ 12 +24
R = 48Ω

(b ) निम्नतम प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए प्रतिरोधों को पार्यक्रम में संयोजित करना होगा –
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}+\frac{1}{R_{3}}+\frac{1}{R_{4}}\)
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac {1}{4}\) + \(\frac {1}{8}\) + \(\frac {1}{12}\) + \(\frac {1}{24}\) ; \(\frac {6 +3+2+1}{24}\) = \(\frac {12}{24}\)
R = \(\frac {12}{24}\) = R = 2Ω

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विद्युत 247 अनुच्छेद 12.7 पर आधारित

प्रश्न 1.
किसी विद्युत हीटर की डोरी क्यों उत्तप्त नहीं होती जबकि उसका तापन अवयव उत्तप्त हो जाता है? उत्तर-हम जानते हैं,
H = I2 Rt
H ∝ R
चूँकि विद्युत हीटर के तापन अवयव का प्रतिरोध बहुत अधिक होता है इसलिए अधिकतम विद्युत धारा ऊष्मा में परिवर्तित हो जाती है और तापन अवयव उत्तप्त होने लगता है। इसके विपरीत विद्युत हीटर की डोरी का प्रतिरोध बहुत कम होता है इसलिए यह उत्तप्त नहीं होता है।

प्रश्न 2.
एक घंटे में 50v विभवांतर से 96000 कूलॉम आवेश को स्थानांतरित करने में उत्पन्न ऊष्मा परिकलित कीजिए।
हल:
हम जानते हैं,
W = QV
H = QV
H = 96000 x 50J
H = 4800000 J
H = 4.8 x 106 J
उत्तर:
H = 4.8 x 103 kJ

प्रश्न 3.
20 Ω प्रतिरोध की कोई विद्युत इस्तरी 5 A विद्युत धारा लेती है। 30 s में उत्पन्न ऊष्मा परिकलित कीजिए।
हल:
दिया है,
R = 20Ω, I = 5A, t = 30s
हम जानते हैं,
H = I2 Rt
मान रखने पर, H = 52x 20 x 30
H = 25 x 20 x 30
H = 15000 J
उत्तर:
H= 15 kJ

अनुच्छेद 12.7.1 और 12.8 पर आधारित

प्रश्न 1.
विद्युत धारा द्वारा प्रदत्त ऊर्जा की दर का निर्धारण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
विद्युत धारा द्वारा प्रदत्त ऊर्जा की दर का निर्धारण विद्युत शक्ति द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 2.
कोई विद्युत मोटर 220v के विद्युत स्रोत से 5.0 A विद्युत धारा लेता है। मोटर की शक्ति निर्धारित कीजिए तथा 2 घंटे में मोटर द्वारा उपभुक्त ऊर्जा परिकलित कीजिए।
हल-दिया है,
V = 220V, I = 5A तथा t = 2h
विद्युत शक्ति P = VI
P = 220 x 5 = 1100 वाट
ऊर्जा = विद्युत शक्ति x समय
= 1100 x 2 घण्टे
=\(\frac {11100}{100}\) KW x 2h
उत्तर:
= 2.2 kWh

Bihar Board Class 10 Science विद्युत Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
प्रतिरोध R के किसी तार के टुकड़े को पाँच बराबर भागों में काटा जाता है। इन
टुकड़ों को फिर पार्यक्रम में संयोजित कर देते हैं। यदि संयोजन का तुल्य प्रतिरोध R’ है तो R/ R’ अनुपात का मान क्या है?
(a) 1/25
(b) 1/5
(c) 5
(d) 25
हल –
(d) 25
प्रत्येक कटे भाग का प्रतिरोध R/5 होगा।
अतः R1= R2 = R3 = R4 =R5 = R/5
\(\frac{1}{R^{\prime}}=\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}+\frac{1}{R_{3}}+\frac{1}{R_{4}}+\frac{1}{R_{5}}\)
= \(\frac {5}{R}\) + \(\frac {5}{R}\) + \(\frac {5}{R}\) + \(\frac {5}{R}\) + \(\frac {5}{R}\) = \(\frac {25}{R}\)
\(\frac{R}{R^{\prime}}\) = 25

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा पद विद्युत परिपथ में विद्युत शक्ति को निरूपित नहीं करता?
(a) I2R
(b) IR2
(c) VI
(d) V2/R
उत्तर:
(b) IR2

प्रश्न 3.
किसी विद्युत बल्ब का अनुमतांक 220 V; 100 w है। जब इसे 110 V पर प्रचालित करते हैं तब इसके द्वारा उपभुक्त शक्ति कितनी होती है?
(a) 100 W
(b) 75 W
(c) 50 W
(d) 25 W
उत्तर:
(d) 25 W
सूत्र P =\(\frac{V^{2}}{R}\) से,
बल्ब का प्रतिरोध R = \(\frac{V^{2}}{P}\) = \(\frac {220 × 220}{100}\) =484 Ω
∴ दसरी दशा में शक्ति खर्च p1 = \(\frac{V_{1}^{2}}{R}\) = \(\frac {110 × 110 }{484}\) =25W

प्रश्न 4.
दो चालक तार जिनके पदार्थ, लंबाई तथा व्यास समान हैं, किसी विद्युत परिपथ में पहले श्रेणीक्रम में और फिर पार्श्वक्रम में संयोजित किए जाते हैं। श्रेणीक्रम तथा पार्श्वक्रम संयोजन में उत्पन्न ऊष्माओं का अनुपात क्या होगा?
(a) 1 : 2
(b) 2 : 1
(c) 1 : 4
(d) 4 : 1
उत्तर:
(c) 1 : 4
यदि एक तार का प्रतिरोध R है तो श्रेणी संयोजन का प्रतिरोध R1 = 2R व पार्श्व संयोजन का प्रतिरोध R2=\(\frac {R}{2}\) होगा।
यदि विभवान्तर V है तो ऊष्माओं का अनुपात =\(\frac{H_{1}}{H_{2}}\) = \(\frac{V^{2} / R_{1}}{V^{2} / R_{2}}\)
\(\frac{R_{2}}{R_{1}}=\frac{R / 2}{2 R}\) = \(\frac {1}{4}\) = 1 : 4

प्रश्न 5.
किसी विद्युत परिपथ में दो बिंदुओं के बीच विभवांतर मापने के लिए वोल्टमीटर को किस प्रकार संयोजित किया जाता है?
उत्तर:
किसी विद्युत परिपथ में दो बिंदुओं के बीच विभवांतर मापने के लिए वोल्टमीटर को पार्यक्रम में संयोजित किया जाता है।

प्रश्न 6.
किसी ताँबे के तार का व्यास 0.5 mm तथा प्रतिरोधकता 1.6 x 10-8 Ω – mहै।10Ω प्रतिरोध का प्रतिरोधक बनाने के लिए कितने लंबे तार की आवश्यकता होगी? यदि इससे दोगुने व्यास का तार लें तो प्रतिरोध में क्या अंतर आएगा?
हल:
दिया है,
प्रतिरोधकता p = 1.6 x 10-8-m, प्रतिरोध R = 10 Ω,
व्यास 2 r = 0.5 m m = 5 x 10-4m
∴ त्रिज्या r =25 x 10-4m
∴ तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A = πr2 = 3.14 x (25 x 10-4 )2m2 = 19.625 x 10-8m2
सूत्र R =P\(\frac {l}{A}\) से,
तार की लम्बाई, l = \(\frac {R × A}{P}\) = \(\frac{10 \Omega \times 19.625 \times 10^{-8} \mathrm{m}^{2}}{1.6 \times 10^{-8} \Omega \mathrm{m}}\)
= 12.26 x 103 m =122.6 m
व्यास दोगुना करने पर त्रिज्या r दोगुनी तथा अनुप्रस्थ क्षेत्रफल (A = πr2) चार गुना हो जाएगा।
∴  R ∝ \(\frac {1}{A}\)
∴ क्षेत्रफल चार गुना होने पर प्रतिरोध एक-चौथाई रह जाएगा।
अर्थात् नया प्रतिरोध R1= \(\frac {1}{4}\) R = \(\frac {1}{4}\) x 10 = 2.5 Ω

प्रश्न 7.
किसी प्रतिरोधक के सिरों के बीच विभवांतर v के विभिन्न मानों के लिए उससे प्रवाहित विद्युत धाराओं I के संगत मान नीचे दिए गए हैं –
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 9
v तथा I के बीच ग्राफ खींचकर इस प्रतिरोधक का प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।
हल:
हम ग्राफ खींचने के लिए V को y – अक्ष पर तथा I को x – अक्ष पर लेते हैं।
ग्राफ से प्राप्त प्रतिरोध –
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 10
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Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 11

प्रश्न 8.
किसी अज्ञात प्रतिरोध के प्रतिरोधक के सिरों से 12 v की बैटरी को संयोजित करने पर परिपथ में 2.5 mA विद्युत धारा प्रवाहित होती है। प्रतिरोधक का प्रतिरोध परिकलित कीजिए।
हल:
हम जानते हैं, R = \(\frac {V}{I}\) (ओम के नियमानुसार)
दिया है,
V = 12 वोल्ट, I = 2.5 mA = 2.5 x 10-3 A
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 13

प्रश्न 9.
9 v की किसी बैटरी को 0.2 Ω, 0.3 Ω, 0.4 Ω, 0.5 Ω तथा 12Ω के प्रतिरोधकों के साथ श्रेणीक्रम में संयोजित किया गया है। 12Ω के प्रतिरोधक से कितनी विद्युत धारा प्रवाहित होगी?
हल:
श्रेणीक्रम संयोजन में प्रत्येक प्रतिरोध में से समान विद्युत धारा प्रवाहित होती है अर्थात्
Req = R1 + R2 + R3 + R4 + R5
= 0.2Ω + 0.3 Ω + 0.4 Ω + 0.5 Ω+ 12 Ω = 13.4Ω
∴ कुल धारा I = \(\frac {V}{R}\) = \(\frac {9}{13.4}\) = 0.67 A
∴ 12 Ω प्रतिरोध से बहने वाली विद्युत धारा का मान 0.67 A होगा।

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प्रश्न 10.
176 Ω प्रतिरोध के कितने प्रतिरोधकों को पार्यक्रम में संयोजित करें कि 220V के विद्युत स्रोत से संयोजन से 5 A विद्युत धारा प्रवाहित हो?
हल:
दिया है, V = 220V, I = 5A
तुल्य प्रतिरोध
R = \(\frac {V}{I}\) = \(\frac {220V}{5A}\) = 44Ω
माना कि प्रतिरोधों की संख्या = n
तब R1 = R2 =………. = Rn = 176Ω
पार्श्व (समान्तर) क्रम में,
\(\frac {I}{R}\) = \(\frac{1}{R_{1}}\) + \(\frac{1}{R_{2}}\) + ……..+ n
\(\frac {I}{R}\) = \(\frac{1}{176}\) + \(\frac{1}{176}\) + ………+ n
\(\frac{1}{44}\) = \(\frac{n}{176}\)
n = \(\frac{176}{44}\) = 4
अतः प्रतिरोधों की संख्या = 4

प्रश्न 11.
यह दर्शाइए कि आप 60 प्रतिरोध के तीन प्रतिरोधकों को किस प्रकार संयोजित करेंगे कि प्राप्त संयोजन का प्रतिरोध –
1.  9Ω, 2. 4Ω हो।
हल:
1. 90 के लिए प्रतिरोधों का संयोजन निम्नवत् है –
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 14
अर्थात् 9 Ω का प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए दो प्रतिरोधों को पार्यक्रम में तथा एक प्रतिरोध को इन दोनों प्रतिरोधों के श्रेणीक्रम में संयोजित करते हैं। पार्श्व संयोजन का प्रतिरोध
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac {1}{6}\) + \(\frac {1}{6}\) = \(\frac {2}{6}\)
R’ = \(\frac {6}{2}\) = 32
यह 3Ω का प्रतिरोध, 6Ω के तीसरे प्रतिरोध के साथ श्रेणीक्रम में जुड़कर 3 + 6 = 9Ω का प्रतिरोध होगा।

2. 4Ω के लिए प्रतिरोधों का संयोजन निम्नवत् है –
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 15
अर्थात् 4Ω का प्रतिरोध प्राप्त करने के लिए दो प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में संयोजित करते हैं तथा इस संयोजन को पुनः तीसरे प्रतिरोध के साथ पार्श्वक्रम में संयोजित करते हैं। 6Ω – 6Ω के दो प्रतिरोधों के श्रेणी संयोजन का प्रतिरोध 6 + 6 = 12Ω होगा। यह 12Ω का प्रतिरोध 6Ω के साथ पार्श्वक्रम में 4Ω का प्रतिरोध देगा।
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac {1}{6}\) + \(\frac {2+1}{12}\) = \(\frac {3}{12}\)
R = \(\frac {12}{3}\) = 4Ω

प्रश्न 12.
220 V की विद्युत लाइन पर उपयोग किए जाने वाले बहुत-से बल्बों का अनुमतांक 10 w है। यदि 220V लाइन से अनुमत अधिकतम विद्युत धारा 5 A है तो इस लाइन के दो तारों के बीच कितने बल्ब पार्श्वक्रम में संयोजित किए जा सकते हैं?
हल:
प्रत्येक बल्ब का प्रतिरोध = R
R = \(\frac{V^{2}}{P}\) = \(\frac{220 \times 220}{10}\)
R = 4840
माना अधिकतम 5 A धारा प्राप्त करने के लिए 220V पर पार्श्वक्रम में संयोजित होने वाले बल्बों की संख्या n है।
∴ \(\frac{1}{R_{e q}}\) = \(\frac{1}{4840}+\frac{1}{4840}+\ldots r\)
\(\frac{1}{R_{e q}}\) = \(\frac{4840}{n}\)
अब, R = \(\frac{V}{I}\) (ओम के नियमानुसार)
∴ I = \(\frac{V}{R}\)
5A≤\(\frac{V}{R}\)
= 5≤ \(\frac{\frac{220}{4840}}{n}\) = n≤\(\frac{4840 \times 5}{220}\) = n≤110
∴ विद्युत बल्बों की संख्या = 110

प्रश्न 13.
किसी विद्युत भट्ठी की तप्त प्लेट दो प्रतिरोधक कुंडलियों A तथा B की बनी हैं जिनमें प्रत्येक का प्रतिरोध 24 62 है तथा इन्हें पृथक्-पृथक्, श्रेणीक्रम में अथवा पार्श्वक्रम में संयोजित करके उपयोग किया जा सकता है। यदि यह भट्ठी 220V विद्युत स्रोत से संयोजित की जाती है तो तीनों प्रकरणों में प्रवाहित विद्युत धाराएँ क्या हैं?
हल:
दिया है, V = 220V, प्रतिरोध R1 = R2 = 24Ω
प्रथम स्थिति जब प्लेटें श्रेणीक्रम में संयोजित की जाती हैं।
R = 24 + 24 = 48 Ω
I = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{220}{48}\)A
= 4.6 A (लगभग)

द्वितीय स्थिति जब प्लेटें पार्श्वक्रम में संयोजित की जाती हैं।
\(\frac{1}{R}\) = \(\frac{1}{24}\) + \(\frac{1}{24}\)
\(\frac{1}{R}\) = \(\frac{1 + 1}{24}\)
\(\frac{1}{R}\) = \(\frac{2}{24}\)
R = \(\frac{24}{2}\)
R = 12 Ω
I = \(\frac{I}{R}\) = \(\frac{220}{12}\)A = 18.3A(लगभग)
तृतीय स्थिति जब केवल एक ही प्लेट जुड़ी है।
I = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{220}{24}\) A = 9.2 A (लगभग)

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 13 विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभावBihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत

प्रश्न 14.
निम्नलिखित परिपथों में प्रत्येक में 2Ω प्रतिरोधक द्वारा उपभुक्त शक्तियों की तुलना कीजिए:
1. 6 vकी बैटरी से संयोजित 1Ω तथा 2Ω श्रेणीक्रम संयोजन
2. 4 V बैटरी से संयोजित 12Ω तथा 2Ω का पावक्रम संयोजन।
हल:
1. दिया है, V = 6V, R = 1 + 2 = 3Ω
धारा, I = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{6}{3}\) A = 2A
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 16
∴ 2Ω के प्रतिरोधक द्वारा उपयोग शक्ति
P1 = I2R = (2)2 x 2 =4 x 2 = 8 w

2. दिया है, V = 4V
(पार्श्वक्रम में दोनों प्रतिरोधों के लिए V का मान समान होगा)।
R =22
धारा, I = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{4}{2}\) A = 2A
धारा, P2 = VI = 4 x 2 = 8w
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 17

प्रश्न 15.
दो विद्युत लैम्प जिनमें से एक का अनुमतांक 100 w; 220 V तथा दूसरे का 60 W; 220 है, विद्युत मेंस के साथ पार्यक्रम में संयोजित हैं। यदि विद्युत आपूर्ति की वोल्टता 220 V है तो विद्युत में से कितनी धारा ली जाती है?
हल:
प्रथम विद्युत लैम्प का प्रतिरोध = R1
द्वितीय विद्युत लैम्प का प्रतिरोध = R2
हम जानते हैं,
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 18
जब R1 व R2 पार्श्वक्रम में संयोजित हैं –
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 19
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 20

प्रश्न 16.
किसमें अधिक विद्यत ऊर्जा उपभक्त होती है : 250wका टी०वी० सेट जो एक घंटे तक चलाया जाता है अथवा 120 W का विद्युत हीटर जो 10 मिनट के लिए चलाया जाता है?
हल:
हम जानते हैं, ऊर्जा = शक्ति x समय
टी०वी० सेट के लिए
E1 = 250 Js-1 x 1 x 3600 s (250 W = 250 Js-1)
= 900000 J
= 9 x 105J

विद्युत हीटर के लिए
E2 = 1200 Js-1 x 10 x 60s (120 W = 1200 Js-1)
=720000J
=7.2 x 105J
∴  E1 > E2
इसलिए टी०वी० सेट में अधिक विद्युत ऊर्जा उपभुक्त होगी।

प्रश्न 17.
8Ω प्रतिरोध का कोई विद्युत हीटर विद्युत मेंस से 2 घंटे तक 15 A विद्युत धारा लेता है। हीटर में उत्पन्न ऊष्मा की दर परिकलित कीजिए।
हल:
ऊष्मा की दर = शक्ति
∴ P = \(\frac{E}{t}\) = \(\frac{I^{2} R t}{t}\)_12 Rt
∴  P = I5R
∴  P = 152 x 8 = 225 x 8
∴  P = 1800 वाट
अतः हीटर में 1800 J/s की दर से ऊष्मा उत्पन्न होगी।

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प्रश्न 18.
निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए
(a) विद्युत लैम्पों के तंतुओं के निर्माण में प्रायः एकमात्र टंगस्टन का ही उपयोग क्यों किया जाता है?
(b) विद्यत तापन युक्तियों जैसे ब्रेड-टोस्टर तथा विद्युत इस्तरी के चालक शुद्ध धातुओं के स्थान पर मिश्रातुओं के क्यों बनाए जाते हैं?
(c) घरेलू विद्युत परिपथों में श्रेणीक्रम संयोजन का उपयोग क्यों नहीं किया जाता है?
(d) किसी तार का प्रतिरोध उसकी अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल में परिवर्तन के साथ किस प्रकार परिवर्तित होता है?
(e) विद्युत संचारण के लिए प्रायः कॉपर तथा ऐलुमिनियम के तारों का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
(a) विद्युत लैम्पों के तंतुओं के निर्माण में प्रायः एकमात्र टंगस्टन का ही उपयोग किया जाता है; क्योंकि इसका गलनांक तथा प्रतिरोध बहुत उच्च होता है। उच्च प्रतिरोध होने के कारण यह बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है जिसके कारण यह चमकता है और प्रकाश देता है तथा उच्च गलनांक होने के कारण यह उच्च ताप पर भी पिघलता नहीं है।
(b) पृष्ठ 243 पर प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखें।
(c) पृष्ठ 245 पर प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।
(d) हम जानते हैं, R ∝ p \(\frac{l}{A}\)
जहाँ R = तार का प्रतिरोध; p = तार की प्रतिरोधकता; 1 = तार की लम्बाई तथा A = अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल
R ∝ \(\frac{l}{A}\) = R ∝ \(\frac{l}{\pi r^{2}}\) a
R ∝  \(\frac{l}{r^{2}}\)
इसलिए यदि किसी तार के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल घटता है तो उसका प्रतिरोध बढ़ता है जबकि यदि अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल बढ़ता है तो उसका प्रतिरोध घटता है।
(e) हम जानते हैं कि चाँदी, ताँबा तथा ऐलुमिनियम विद्युत के सबसे अच्छे सुचालक हैं। चूँकि चाँदी धातु बहुत महँगी है इसलिए विद्युत संचारण करने के लिए ताँबा तथा ऐलुमिनियम धातु के तारों का प्रयोग किया जाता है।

Bihar Board Class 10 Science विद्युत Additional Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्युत आवेश का मात्रक है – (2014)
(a) जूल
(b) कूलॉम
(c) वोल्ट
(d) ऐम्पियर
उत्तर:
(b) कूलॉम

प्रश्न 2.
ऐम्पियर-सेकण्ड मात्रक है – (2013, 14)
(a) विद्युत ऊर्जा का
(b) वि० वा० बल का
(c) आवेश का
(d) धारा का
उत्तर:
(c) आवेश का

प्रश्न 3.
एक प्रोटॉन पर विद्युत आवेश की मात्रा होती है – (2013, 18)
(a) 1.0 x 10-19 कूलॉम
(b) 6.25 x 1019 कूलॉम
(c) 1.6 x 1019 कूलॉम
(d) 1.6 x 10-19 कूलॉम
उत्तर:
(d) 1.6 x 10-19 कूलॉम

प्रश्न 4.
विद्युत धारा का SI मात्रक है – (2015)
(a) कूलॉम
(b) ऐम्पियर
(c) जूल
(d) ओम
उत्तर:
(b) ऐम्पियर

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प्रश्न 5.
किसी चालक तार में विद्युत धारा का प्रवाह होता है – (2015)
(a) मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा
(b) प्रोटॉनों द्वारा
(c) आयनों द्वारा
(d) न्यूट्रॉनों द्वारा
उत्तर:
(a) मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा

प्रश्न 6.
निम्न परिपथ में A एवं B के बीच विभवान्तर होगा – (2017)
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 21
(a) 3 वोल्ट
(b) 2 वोल्ट
(c) 1 वोल्ट
(d) -1 वोल्ट
उत्तर:
(c) 1 वोल्ट

प्रश्न 7.
प्रतिरोध का मात्रक होता है – (2013, 17)
(a) ओम
(b) ओम/मीटर
(c) ओम-मीटर
(d) मीटर/ओम
उत्तर:
(a) ओम

प्रश्न 8.
एक माइक्रो ओम का मान होता है – (2016)
(a) 10-9 ओम
(b) 10-6 ओम
(c) 10-3 ओम
(d) 1 ओम
उत्तर:
(b) 10-6 ओम

प्रश्न 9.
ओम के नियम का सूत्र है – (2015, 16)
(a) I = V x R
(b) R = V x I
(c) V = I x R
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर;
(c) V = I x R

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प्रश्न 10.
किसी तार की लम्बाई उसकी प्रारम्भिक लम्बाई की तीन गुना करने पर उसका प्रतिरोध हो जायेगा – (2017)
(a) 9 गुना
(b) 3 गुना
(c)  1/9 गुना
(d) 1/3 गुना
उत्तर:
(b) 3 गुना

प्रश्न 11.
ताप बढ़ाने पर किसी चालक का वैद्युत प्रतिरोध – (2018)
(a) अपरिवर्तित रहता है
(b) बढ़ता है
(c) घटता है
(d) कभी बढ़ता है और कभी घटता है
उत्तर:
(b) बढ़ता है

प्रश्न 12.
4 ओम प्रतिरोध वाले n चालक तार समान्तर-क्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध होगा – (2012, 13, 14)
(a) 4n
(b) 4/n
(c) n/4
(d) 4n2
उत्तर:
(b) 4/n

प्रश्न 13.
R1 व R2 प्रतिरोधों के दो तार समान्तर-क्रम में जोड़े गये हैं, इसका तुल्य प्रतिरोध होगा – (2014)
(a) R1 + R2
(b) R1 x R2
(c) \(\frac{R_{1} R_{2}}{R_{1}+R_{2}}\)
(d) \(\frac{R_{1}+R_{2}}{R_{1} R_{2}}\)
उत्तर:
(c) \(\frac{R_{1} R_{2}}{R_{1}+R_{2}}\)

प्रश्न 14.
यदि R प्रतिरोध के दो प्रतिरोधों को समान्तर क्रम में जोड़ा जाये तथा एक R प्रतिरोध को इनके श्रेणीक्रम में जोड़ा जाये तो परिणामी प्रतिरोध होगा। (2016)
(a) 3R
(b) 2R
(c) \(\frac {3R}{2}\)
(d) \(\frac {R}{2}\)
उत्तर:
(c) \(\frac {3R}{2}\)

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प्रश्न 15.
संलग्न परिपथ में धारा का मान है – (2014)
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 22
(a) 1 ऐम्पियर
(b) 0.5 ऐम्पियर
(c) 4 ऐम्पियर
(d) 2 ऐम्पियर
उत्तर:
(d) 2 ऐम्पियर

प्रश्न 16.
किलोवाट – घण्टा मात्रक है – (2018)
(a) विद्युत शक्ति का
(b) विद्युत धारा का
(c) विद्युत ऊर्जा का
(d) विद्युत आवेश का
उत्तर:
(c) विद्युत ऊर्जा का

प्रश्न 17.
एक पावर स्टेशन की सामर्थ्य 200 मेगावाट है। इसके द्वारा प्रतिदिन उत्पन्न विद्यत ऊर्जा होगी – (2009, 14)
(a) 200 मेगावाट-घण्टा
(b) 4800 मेगावाट-घण्टा
(c) 4800 मेगावाट
(d) 4800 जूल
उत्तर:
(b) 4800 मेगावाट-घण्टा

प्रश्न 18.
यदि एक विद्युत बल्ब पर 12 वोल्ट एवं 30 वाट लिखा है, तो इसमें प्रवाहित होने वाली धारा होगी – (2017)
(a) 0.4 ऐम्पियर
(b) 2.5 ऐम्पियर
(c) 12 ऐम्पियर
(d) 360 ऐम्पियर
उत्तर:
(b) 2.5 ऐम्पियर

प्रश्न 19.
एक बल्ब पर 220V-100 W अंकित है। उसके तन्तु का प्रतिरोध होगा – (2013, 15, 16)
(a) 2200 ओम
(b) 968 ओम
(c) 484 ओम
(d) 15 ओम
उत्तर:
(c) 484 ओम

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प्रश्न 20.
विद्युत ऊर्जा की इकाई (मात्रक) होती है – (2013, 15)
या बिजली के घरेलू उपयोग के लिए मूल्य ₹ 2.30 प्रति यूनिट है। यह यूनिट है : (2016)
(a) वाट
(b) किलोवाट
(c) किलोवाट/घण्टा
(d) किलोवाट-घण्टा
उत्तर:
(d) किलोवाट-घण्टा

प्रश्न 21.
एक किलोवाट-घण्टा में जूल की संख्या होगी – (2014)
(a) 3.6 x 103
(b) 3.6 x 104
(c) 3.6 x 105
(d) 3.6 x 106
उत्तर:
(d) 3.6 x 106

प्रश्न 22.
एक अश्व शक्ति बराबर है – (2015, 16, 18)
(a) 726 वाट
(b) 736 वाट
(c) 746 वाट
(d) 756 वाट
उत्तर:
(c) 746 वाट

प्रश्न 23.
एक चालक में 2 ऐम्पियर की धारा 10 वोल्ट पर 1 मिनट तक प्रवाहित की गयी। तार में व्यय हुई विद्युत ऊर्जा का मान होगा (2012, 13)
(a) 5 जूल
(b) 10 जूल
(c) 20 जूल
(d) 1200 जूल
उत्तर:
(d) 1200 जूल।

प्रश्न 24.
एक विद्युत हीटर की सामर्थ्य 0.5 किलोवाट है। इसे 20 मिनट तक उपयोग में लाया गया। उत्पन्न ऊष्मा का मान होगा – (2011, 13, 15)
(a) 6 x 105 जूल
(b) 10 जूल
(c) 4 जूल
(d) 2.5 x 10-2 जूल
उत्तर:
(a) 6 x 10 जूल

प्रश्न 25.
बिजली के बल्ब में फिलामेन्ट होता है – (2016, 17)
(a) टंगस्टन का
(b) लोहे का
(c) ताँबे का
(d) पीतल का
उत्तर:
(a) टंगस्टन का

प्रश्न 26.
हीटर का तार बना होता है – (2016)
(a) ताँबे का
(b) पीतल का
(c) नाइक्रोम का
(d) लोहे का
उत्तर:
(c) नाइक्रोम का

प्रश्न 27.
विद्युत सामर्थ्य (P) का सूत्र है – (2015)
(a) P = y
(b) P =
(c)P = VI
(d) P = Y
उत्तर:
(c) P = VI

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्युत चालक एवं अचालक पदार्थों के दो-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
विद्युत चालक लोहा, चाँदी। विद्युत अचालक रबड़, प्लास्टिक।

प्रश्न 2.
एक ऐम्पियर की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
यदि किसी परिपथ में 1 सेकण्ड में 1 कूलॉम आवेश प्रवाहित होता है, तो परिपथ में प्रवाहित धारा का मान 1 ऐम्पियर होता है।

प्रश्न 3.
कूलॉम की परिभाषा लिखिए।
उत्तर:
यह S.I. पद्धति में विद्युत आवेश की इकाई है। एक कूलॉम आवेश, आवेश की वह मात्रा है जो किसी चालक में एक ऐम्पियर की धारा बहने पर एक सेकण्ड में प्रवाहित होती है।

प्रश्न 4.
आवेश (q), धारा (i) तथा समय (t) में सम्बन्ध लिखिए। (2013)
उत्तर:
आवेश (q) = धारा (i) x समय (t)

उत्तर 5.
एक इलेक्ट्रॉन पर कितना तथा कैसा आवेश होता है ? (2011, 14)
उत्तर:
1.6 x 10-19 कूलॉम ऋणावेश।

प्रश्न 6.
1 कूलॉम आवेश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या कितनी होती है ? (2011)
उत्तर:
6.25 x 1018 इलेक्ट्रॉन।

प्रश्न 7.
विद्युत धारा की दिशा तथा आवेश की गति की दिशा में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
विद्युत धारा की दिशा धनावेश की गति की दिशा में होती है।

प्रश्न 8.
आवेश, विभवान्तर Vतथा कार्य w में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर:
V = \(\frac {W}{q}\)

प्रश्न 9.
किसी चालक का कुल आवेश 8.0 x 10-19 कूलॉम है जो कि ऋणात्मक है। इस पर कितने इलेक्ट्रॉनों की अधिकता है? (2014)
हल:
माना n इलेक्ट्रॉन अधिक हैं। तब
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5 इलेक्ट्रॉन अधिक हैं।

प्रश्न 10.
एक चालक से होकर एक मिनट में 150 कूलॉम आवेश गुजरता है। चालक में बहने वाली विद्युत धारा कितनी होगी? आवेश 150 कूलॉम
हल:
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प्रश्न 11.
यदि किसी चालक में प्रवाहित धारा 4.0 ऐम्पियर हो तो 1.5 मिनट में प्रवाहित आवेश की मात्रा ज्ञात कीजिए। (2011, 12, 13, 16, 17)
हल:
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∴ आवेश = धारा x समय
ज्ञात है : धारा = 4.0 ऐम्पियर, समय =1.5 मिनट = 90 सेकण्ड
∴ आवेश = 4.0 x 90 कूलॉम = 360 कूलॉम

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प्रश्न 12.
एक चालक में 1.6 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। प्रति सेकण्ड चालक से गुजरने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या क्या होगी? (2009, 11, 12, 17)
हल:
माना इलेक्ट्रॉनों की संख्या n है।
∴ विद्युत धारा = प्रति सेकण्ड प्रवाहित होने वाले आवेश की मात्रा
∴ 1.6 = n x 1.6 x 10-19
(इलेक्ट्रॉन का आवेश = 1.6 x 10-19 कूलॉम)
n = \(\frac{1.6}{1.6 \times 10^{-19}}\)
= 1019 इलेक्ट्रॉन

प्रश्न 13.
ताँबे के एक तार से होकर 50 x 1018 मुक्त इलेक्ट्रॉन प्रति सेकण्ड प्रवाहित हो रहे हैं। चालक में धारा का मान ज्ञात कीजिए। (e = 1.6 x 10-19 कूलॉम) (2009, 17, 18)
हल:
विद्युत धारा = प्रति सेकण्ड प्रवाहित होने वाले आवेश की मात्रा
= 50 x 1018 x 1.6 x 10-19 ऐम्पियर = 80 x 10-1 ऐम्पियर
= 8.0 ऐम्पियर

प्रश्न 14.
बिन्दु A से B की ओर 108 इलेक्ट्रॉन 10-4 सेकण्ड में प्रवाहित होते हैं। कितनी विद्युत धारा किस दिशा में प्रवाहित होगी? इलेक्ट्रॉन पर आवेश = 1.6 x 1019कूलॉम है। (2015, 16)
हल:
प्रवाहित धारा = प्रति सेकण्ड प्रवाहित आवेश –
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= 1.6 x 10-7ऐम्पियर (दिशा B से A की ओर)

प्रश्न 15.
1 ओम प्रतिरोध से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
यदि चालक के सिरों के बीच 1 वोल्ट का विभवान्तर होने पर उसमें 1 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो, तो चालक का प्रतिरोध 1 ओम होगा।

प्रश्न 16.
किसी चालक के विशिष्ट प्रतिरोध से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
किसी पदार्थ के एक मीटर लम्बे तार, जिसकी अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 1 वर्गमीटर है, के प्रतिरोध को उस पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं।

प्रश्न 17.
किसी धात्विक चालक के प्रतिरोध पर ताप-परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ता है? (2011)
उत्तर:
धात्विक चालक का ताप बढ़ने पर उसका प्रतिरोध बढ़ जाता है।

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प्रश्न 18.
ओम, ऐम्पियर तथा वोल्ट में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर:
वोल्ट = ऐम्पियर x ओम।

प्रश्न 19.
किसी चालक में 0.5 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित होती है जब उसके सिरों के बीच विभवान्तर 2 वोल्ट है। चालक का प्रतिरोध बताइए।
हल:
ओम के नियम से R = \(\frac {V}{ i}\)
ज्ञात है V = 2 वोल्ट, i = 0.5 ऐम्पियर
R = \(\frac {2}{0.5}\) ओम = 4 ओम

प्रश्न 20.
24 ओम प्रतिरोध के एक चालक में 0.2 ऐम्पियर की धारा बह रही है। इस चालक के सिरों के बीच क्या विभवान्तर है ?
हल:
ओम के नियम से
R = \(\frac {V}{ i}\)
V = i x R
ज्ञात है i = 0.2 ऐम्पियर,
R = 24 ओम
V = 0.2 x 24 = 4.8 वोल्ट

प्रश्न 21.
दो तार जिनके प्रतिरोध 4 ओम और 2 ओम हैं, श्रेणीक्रम में एक बैट्री से जुड़े हैं। पहले तार में 2 ऐम्पियर की धारा बह रही है। दूसरे तार में धारा का मान कितना होगा? (2014)
हल:
चूँकि प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। अत: दोनों तारों में समान धारा 2 ऐम्पियर ही प्रवाहित होगी।

प्रश्न 22.
तीन चालक तार जिनके प्रतिरोध क्रमशः 5, 7 तथा 13 ओम हैं, श्रेणीक्रम में जोड़े गये हैं। इनके संयोजन का तुल्य प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।
हल:
तुल्य प्रतिरोध R = R1 + R2 + R3 = 5 + 7 + 13 = 25 ओम

प्रश्न 23.
5 ओम तथा 10 ओम के प्रतिरोधों को समान्तर-क्रम में जोड़ा गया है। इस संयोजन का तुल्य प्रतिरोध ज्ञात कीजिए।
हल:
माना संयोजन का तुल्य प्रतिरोध R है, तब
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}\)
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac {1}{5}\) + \(\frac {1}{10}\) = \(\frac {3}{10}\)
या R = \(\frac {10}{3}\) = 3.33 ओम

प्रश्न 24.
दिये गये विद्युत परिपथ में धारा का मान बताइए।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 27
हल:
22 व 80 के प्रतिरोध समान्तर में संयोजित माना है। माना उभयनिष्ठ विभव V है, तब
V = 2 x i = 8 x 1
i = 8 = 4 ऐम्पियर

प्रश्न 25.
A एवं B के मध्य दिए गए परिपथ का तुल्य प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2015)
हल:
परिपथ में 2 Ω व 2 Ωके प्रतिरोध समान्तर क्रम में लगे हैं। यदि इनका तुल्य प्रतिरोध R1 है
तब \(\frac{1}{R_{1}}\) = \(\frac {1}{2}\)+ \(\frac {1}{2}\) = 1
या R1 = 1 ओम
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 12 विद्युत - 28
पुन: R, व 2Ω के प्रतिरोध श्रेणीक्रम में हैं। अत: इनका तुल्य प्रतिरोध
R = R1 + 2 = 1 + 2 = 3Ω
अत: A व B के मध्य तुल्य प्रतिरोध 3Ω है।

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प्रश्न 26.
विद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव से आप क्या समझते हैं? (2013)
उत्तर:
जब किसी चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो यह गर्म हो जाता है अर्थात् विद्युत धारा के प्रभाव से तार के पदार्थ में ऊष्मा उत्पन्न होती है। यह प्रभाव विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहलाता है।

प्रश्न 27.
विद्युत ऊर्जा से आप क्या समझते हैं? (2013)
उत्तर:
किसी चालक में विद्युत आवेश प्रवाहित करने में जो ऊर्जा व्यय होती है उसे विद्युत ऊर्जा कहते हैं।

प्रश्न 28.
यदि R प्रतिरोध वाले चालक में t सेकण्ड के लिए। ऐम्पियर धारा प्रवाहित की जाये तो उसमें उत्पन्न हुई ऊष्मा का मानi,R तथाt के पदों में लिखिए।
उत्तर:
H = \(\frac{i^{2} R t}{4.18}\) कैलोरी।

प्रश्न 29.
जूल, वोल्ट तथा कूलॉम में क्या सम्बन्ध है? (2009, 14)
उत्तर:
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प्रश्न 30.
विद्युत हीटर बनाने के लिए किस पदार्थ के तार को प्रयुक्त करना चाहिए तथा क्यों? या नाइक्रोम के तार के तन्तु का उपयोग विद्युत ऊष्मक में क्यों किया जाता है? (2015)
उत्तर:
नाइक्रोम के तार को; क्योंकि इसका गलनांक काफी अधिक होता है तथा उच्च ताप तक गर्म होने पर यह ऑक्सीकृत नहीं होता है।

प्रश्न 31.
धारा के ऊष्मीय प्रभाव पर आधारित चार विद्युत संयन्त्रों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. विद्युत बल्ब
  2. विद्युत ऊष्मक
  3. विद्युत इस्तरी
  4. गीजर।

प्रश्न 32.
विद्यत परिपथ के सामान्य तार तथा फ्यूज के तार में क्या अन्तर होता है? (2017, 18)
उत्तर:
फ्यूज के तार का गलनांक विद्युत परिपथ के सामान्य तार से कम होता है।

प्रश्न 33.
विद्युत फ्यूज किस धातु का बनाया जाता है तथा क्यों? (2011)
उत्तर:
विद्युत फ्यूज सीसा, टिन व ताँबे की मिश्रधातु का बना होता है; क्योंकि इसका गलनांक कम होता है।

प्रश्न 34.
400 W एवं 100 W के बल्बों में प्रयुक्त फिलामेन्ट के तारों में कौन पतला होगा और क्यों? (2012)
उत्तर:
100 W वाले बल्बों का फिलामेंट पतला होगा, क्योंकि पतले तार की अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल कम होगा जिससे उसका प्रतिरोध अधिक होगा
∴ R ∝  \(\frac {1}{A}\)

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प्रश्न 35.
विद्युत सामर्थ्य की परिभाषा लिखिए। या विद्युत शक्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा के व्यय होने की समय दर को विद्युत सामर्थ्य कहते हैं।
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प्रश्न 36.
एक हीटर पर 1 kW – 220V अंकित है। इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
इसका अर्थ है कि हीटर को 220V पर जलाने पर 1 घण्टे में 1 किलोवाट ऊर्जा व्यय होगी।

प्रश्न 37.
एक विद्युत हीटर में 120 वोल्ट विभवान्तर पर 12 कूलॉम का आवेश प्रवाहित होता है। हीटर में कितनी ऊर्जा व्यय होगी?
हल:
विभवान्तर V = 120 वोल्ट
प्रवाहित आवेश Q = i x t = 12 कूलॉम
∴ हीटर में व्यय ऊर्जा W = Vit = 120 x 12 = 1440 जूल

प्रश्न 38.
10 वोल्ट तथा 0.5 ऐम्पियर के बल्ब से प्रति सेकण्ड कितने जूल ऊष्मा उत्पन्न होती है?
हल:
प्रश्नानुसार, विभवान्तर V = 10 वोल्ट,
धारा i = 0.5 ऐम्पियर, समय t = 1 सेकण्ड
व्यय ऊर्जा W = Vit = 10 x 0.5 x 1 = 5 जूल

प्रश्न 39.
किसी चालक तार के सिरों का विभवान्तर 30 वोल्ट है तथा धारा का मान 3 ऐम्पियर है। तार में ऊष्मा प्रवाह की दर की गणना कीजिए। (2017)
हल:
प्रश्नानुसार, विभवान्तर V = 30 वोल्ट, धारा i = 3 ऐम्पियर, t = 1 सेकण्ड
∴ ऊष्मा प्रवाह की दर H = \(\frac {Vi}{4.2}\) कैलोरी
= \(\frac {30 × 3}{4.2}\) = 21.43 कैलोरी/सेकण्ड

प्रश्न 40.
250 वोल्ट, 5 ऐम्पियर फ्यूज वाले परिपथ में 25 वाट के कितने बल्ब जल सकते (2009, 11, 13, 14, 15, 17)
हल:
माना n बल्ब जल सकते हैं।
प्रश्नानुसार, V = 250 वोल्ट, i = 5 ऐम्पियर, P =n x 25 वाट
∴ P = Vi
n x 25 = 250 x 5
∴ n = \(\frac {250 × 5}{25}\) = 50
50 बल्ब जल सकते हैं।

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प्रश्न 41.
एक विद्युत हीटर में 250 वोल्ट विभवान्तर पर 4.5 ऐम्पियर धारा प्रवाहित होती है। हीटर की सामर्थ्य की गणना कीजिए। (2013)
हल:
विभवान्तर V = 250 वोल्ट, i = 4.5 ऐम्पियर
सामर्थ्य P = V x i = 250 x 4.5 = 1125 वाट

प्रश्न 42.
किसी परिपथ में 10 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित की जाती है। परिपथ में लगे 2 ओम प्रतिरोध वाले चालक में प्रति सेकण्ड उत्पन्न ऊष्मा की गणना कीजिए। (2012)
हल:
प्रश्नानुसार, 1 = 10 ऐम्पियर, R = 2 ओम, t = 1 सेकण्ड, H = ?
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सामर्थ्य P = V x i = 250 x 4.5 = 1125 वाट

प्रश्न 43.
किसी चालक के दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर 10 वोल्ट है। चालक में धारा का= मान ज्ञात कीजिए। यदि उसमें उत्पन्न ऊष्मा 15 जूल प्रति सेकण्ड हो। (2014, 16)
हल:
चालक में प्रति सेकण्ड उत्पन्न ऊष्मा (जूल में)
= विभवान्तर x धारा
15 =10 x i
चालक में धारा i = \(\frac {15}{10}\) = 1.5 ऐम्पियर

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विद्युत धारा से क्या तात्पर्य है ? इसका मात्रक बताइए। (2014)
उत्तर:
विद्युत धारा किसी चालक में विद्युत आवेश के प्रवाह की समय-दर को विद्युत धारा अथवा विद्युत धारा की तीव्रता कहते हैं।
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इसका मात्रक ऐम्पियर अथवा कूलॉम/सेकण्ड है। यह अदिश राशि है।

प्रश्न 2.
विद्युत विभव की परिभाषा दीजिए तथा चालक के विभवान्तर एवं धारा में सम्बन्ध लिखिए। (2012)
उत्तर:
विद्युत विभव अनन्त से एकांक आवेश को विद्युत क्षेत्र के किसी निश्चित बिन्दु तक लाने में किया गया कार्य उस बिन्दु पर विद्युत विभव कहलाता है। इसका मात्रक वोल्ट है। चालक के विभवान्तर एवं उसमें बहने वाली धारा का अनुपात सदैव नियत रहता है। अर्थात् यदि चालक का विभवान्तर V तथा इसमें धारा i है तो \(\frac {V}{i}\) = नियतांक।

प्रश्न 3.
किसी विद्युत परिपथ में अमीटर और वोल्टमीटर क्यों लगाये जाते हैं ? इन्हें परिपथ में किन क्रमों में जोड़ा जाता है? (2015)
या अमीटर का क्या कार्य है? इसे परिपथ में किस प्रकार जोड़ते हैं? (2016)
उत्तर:
अमीटर परिपथ में धारा मापने तथा वोल्टमीटर परिपथ के सिरों के बीच विभवान्तर मापने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। विद्युत परिपथ में अमीटर को श्रेणीक्रम में तथा वोल्टमीटर को समान्तर क्रम में लगाया जाता है।

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प्रश्न 4.
विद्युत प्रतिरोध का क्या अर्थ है ? एक धातु के तार का प्रतिरोध किन-किन बातों पर निर्भर करता है?
या प्रतिरोध से क्या तात्पर्य है ? यह किन-किन बातों पर निर्भर करता है? (2011)
या विद्युत प्रतिरोध क्या है ? इसका मात्रक लिखिए। (2012, 15)
उत्तर:
विद्युत प्रतिरोध किसी चालक का वह गुण जिसके कारण वह विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है, चालक का प्रतिरोध अथवा विद्युत प्रतिरोध कहलाता है। चालक के प्रतिरोध को R से व्यक्त करते हैं। इसका मान चालक के सिरों के बीच आरोपित विभवान्तर (V) व चालक में बहने वाली धारा (I) के अनुपात के बराबर होता है,
अर्थात्
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चालक के प्रतिरोध की निर्भरता किसी चालक का प्रतिरोध निम्नलिखित दो बातों पर निर्भर करता है –
1. एक ही पदार्थ तथा समान अनुप्रस्थ काट के विभिन्न लम्बाइयों के तारों का प्रतिरोध (R), लम्बाई (l) के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात्
R ∝ l
2. एक ही पदार्थ के समान लम्बाई परन्तु विभिन्न अनुप्रस्थ काट के तारों का प्रतिरोध (R), अनुप्रस्थ काट (A) के व्युत्क्रमानुपाती होता है, अर्थात्
R ∝  \(\frac {1}{A}\)

प्रश्न 5.
एक चालक का प्रतिरोध 3.0 ओम है। इसमें 0.5 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित करने से कितना विभवान्तर उत्पन्न होगा? यदि इस तार के सिरों पर उत्पन्न विभवान्तर 2.4 वोल्ट हो, तो इसमें कितनी धारा प्रवाहित होगी?
हल:
प्रश्नानुसार, प्रतिरोध R = 3.0 ओम, धारा i =0.5 ऐम्पियर
उत्पन्न विभवान्तर V = iR = 0.5 x 3.0 = 1.5 वोल्ट
पुन: यदि उत्पन्न विभवान्तर V = 2.4 वोल्ट, R = 3.0 ओम
प्रवाहित धारा i = \(\frac {V}{R}\) = \(\frac {2.4}{3.0}\) = 0.8 ऐम्पियर

प्रश्न 6.
दिए गए परिपथ में 1.5 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है। निम्न को ज्ञात कीजिए (2013, 17)
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(i) प्रतिरोध R का मान
(ii) A व B के बीच विभवान्तर
हल:
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(ii) A व B के बीच तुल्य प्रतिरोध R’ = 32 + 22 + 42 = 92 (प्रतिरोध श्रेणीक्रम में हैं।)
∴ A व B के बीच विभवान्तर = प्रतिरोध x धारा = 9 x 1.5 = 13.5 वोल्ट

प्रश्न 7.
दो प्रतिरोधों के मान क्रमशः 6 ओम एवं 3 ओम हैं। इनके संयोजन से बनने वाले अधिकतम व न्यूनतम प्रतिरोध की गणना कीजिए। (2014)
उत्तर:
अधिकतम प्रतिरोध R1तब होगा यदि संयोजन श्रेणीक्रम में हो।
∴ इस स्थिति में अधिकतम तुल्य प्रतिरोध
R1 = 6 +3 = 9 ओम
न्यूनतम प्रतिरोध R2 तब होगा यदि संयोजन समान्तर क्रम में हो।
इस स्थिति में,
\(\frac{1}{R_{2}}\) = \(\frac {1}{6}\) + \(\frac {1}{3}\)
\(\frac{1}{R_{2}}\) = \(\frac {1 + 2}{6}\) = \(\frac {1}{2}\)
अतः R2 = 2 ओम

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प्रश्न 8.
दो प्रतिरोध 4 ओम तथा 12 ओम के हैं। इन्हें 10 वोल्ट के सेल से जोड़ने पर परिपथ में कल कितनी धारा बहेगी, यदि प्रतिरोधों को –
(i) श्रेणीक्रम में
(ii) समान्तर क्रम में जोड़ा जाये? (2016)
हल:
श्रेणीक्रम में श्रेणीक्रम में जोड़ने पर,
परिपथ का तुल्य प्रतिरोध R1 = 4 + 12 = 16 ओम
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समान्तर क्रम में समान्तर क्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध
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प्रश्न 9.
निम्न विद्युत परिपथ में सेल का आन्तरिक प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2011, 16, 17)
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हल:
परिपथ में 6 Ω व 6 Ω के दो प्रतिरोध समान्तर क्रम में जुड़े हैं।
इनका तल्य प्रतिरोध \(\frac{1}{R_{1}}\) = \(\frac{1}{6}\) + \(\frac{1}{6}\) या \(\frac{1}{R_{1}}\) = \(\frac{2}{6}\) या R1 = 3Ω
अब R1 व r प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं।
∴ इनका तुल्य प्रतिरोध
R2 =(3 + r) ओम
अब परिपथ में E = V = 2 वोल्ट, i = 0.5 ऐम्पियर, R2 =(3 + r) ओम
V = iR से 2 = 0.5 (3 + r) या 3 + r = 4 या r = 4 – 3 = 1Ω

प्रश्न 10.
निम्न परिपथ में प्रवाहित विद्युत धारा का मान ज्ञात कीजिए। (2015, 17)
हल:
परिपथ में 4 Ω के दो प्रतिरोध समान्तर क्रम में लगे हैं।

इनका तुल्य प्रतिरोध –
\(\frac{1}{R_{1}}\) = \(\frac{1}{4}\) + \(\frac{1}{4}\)
R1 = \(\frac{4}{2}\) = 2Ω
पुनः परिपथ में R1 व 2 2 के प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं।
∴ इनका तुल्य प्रतिरोध R = (R1 + 2)Ω = (2 + 2) Ω = 4Ω
परिपथ में धारा i = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{10}{4}\) = 2.5 ऐम्पियर

प्रश्न 11.
नीचे दिये गये चित्र में दिये गये विद्युत परिपथ में A तथा B बिन्दुओं के बीच परिणामी प्रतिरोध का मान ज्ञात कीजिए। (2014, 15, 17, 18)
हल:
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2Ω, 3Ω, 4Ω श्रेणीक्रम में हैं। अतः तुल्य प्रतिरोध
R1 = 2Ω + 3Ω + 4Ω = 9Ω
अब 9Ω के दो प्रतिरोध समान्तर क्रम में हैं। अत: A व B बिन्दुओं के बीच परिणामी प्रतिरोध,
\(\frac{1}{R}\) = \(\frac{1}{9}\) + \(\frac{1}{9}\) = \(\frac{1}{R}\) = \(\frac{2}{9}\) R = \(\frac{9}{2}\) = 4.5Ω

प्रश्न 12.
संलग्न विद्युत परिपथ में बहने वाली विद्युत धारा की गणना कीजिए। 12 वोल्ट
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हल:
परिपथ में 1Ω,4Ω व 1Ω के प्रतिरोध श्रेणी क्रम में हैं।
∴ इनका तुल्य प्रतिरोध R = 1 + 4 + 1 = 60
प्रतिरोध R1,62 के प्रतिरोध के समान्तर क्रम में है
यदि इनका तुल्य प्रतिरोध R2 है, तब
\(\frac{1}{R_{2}}\) = \(\frac{1}{R_{1}}\) + \(\frac{1}{6}\)
= \(\frac{1}{6}\) + \(\frac{1}{6}\) = \(\frac{2}{6}\) = \(\frac{1}{3}\)
∴ R2 = 3Ω
अब 1Ω,2Ω व R2 प्रतिरोध श्रेणी क्रम में हैं।
∴ इनका तुल्य प्रतिरोध अर्थात् परिपथ का कुल प्रतिरोध
R = 1Ω + 2Ω + 3Ω = 6Ω
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प्रश्न 13.
ऊष्मा उत्पादन सम्बन्धी जूल का नियम लिखिए। या किसी चालक तार में धारा प्रवाहित करने पर उसमें उत्पन्न ऊष्मा किन-किन कारकों पर निर्भर करती है? स्पष्ट कीजिए। (2016)
उत्तर:
यदि विद्युत चालक में प्रवाहित होने वाली धारा i हो, तो t सेकण्ड में चालक में उत्पन्न ऊष्मा
Q = i2 – Rt जूल = \(\frac{i^{2} R t}{4.2}\) कैलोरी
इस सूत्र को जूल का ऊष्मीय प्रभाव का नियम कहते हैं।
स्पष्टत: चालक में प्रवाहित धारा के कारण उत्पन्न ऊष्मा
1. चालक के प्रतिरोध के अनुक्रमानुपाती होती है, अर्थात् Q ∝ R
2. चालक में प्रवाहित धारा के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है, अर्थात् p ∝ l2
3. चालक में धारा प्रवाह के समय के अनुक्रमानुपाती होती है, अर्थात् Q ∝ t

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प्रश्न 14.
तार में कुछ देर तक धारा प्रवाहित करने से तार का ताप 3°C बढ़ जाता है। यदि धारा को दोगुना कर दें तो उतनी ही देर में तार का ताप कितना बढ़ जायेगा? (2012)
हल:
∴ उत्पन्न ऊष्मा H = i2 Rt
उत्पन्न ऊष्मा ∝  प्रवाहित धारा का वर्ग (i2)
धारा दोगुनी होने पर उत्पन्न ऊष्मा चार गुनी होगी।
पुनः चूँकि ताप वृद्धि ∝ ऊष्मा ताप वृद्धि चार गुनी अर्थात् 3 x 4 = 12°C होगी।

प्रश्न 15.
R1 तथा R2 प्रतिरोधों के दो चालक एक सेल से समान्तर-क्रम में संयोजित हैं। किसी निश्चित समय में चालकों में व्यय हुई विद्युत ऊर्जाओं का अनुपात कितना होगा?
उत्तर:
दोनों चालक R1 ओम तथा R2 ओम सेल से समान्तर-क्रम में जुड़े हैं। अतः चालकों के सिरों पर समान विभवान्तर V वोल्ट होगा। उनमें से प्रत्येक में t सेकण्ड में व्यय विद्युत ऊर्जा निम्न प्रकार होगी
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भाग देने पर,
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अतः समान्तर-क्रम में जुड़े प्रतिरोधों में व्यय विद्युत ऊर्जा का अनुपात उनके प्रतिरोधों के अनुपात का प्रतिलोम होगा। स्पष्ट है जिस चालक का प्रतिरोध कम होगा, उसमें अधिक ऊर्जा व्यय होगी।

प्रश्न 16.
स्विच किसे कहते हैं? इसे परिपथ में किस क्रम में लगाते हैं?
उत्तर:
स्विच वह युक्ति है जिसके द्वारा किसी विद्युत उपकरण में विद्युत धारा के प्रवाह को नियन्त्रित किया जाता है। स्विच यदि ऑन रहता है तो उपकरण में धारा प्रवाह होता है और यदि स्विच ऑफ होता है तो उपकरण में धारा प्रवाह रुक जाता है। इसे परिपथ में उपकरण के साथ सदैव श्रेणीक्रम में लगाते हैं।

प्रश्न 17.
घरों की वायरिंग के परिपथ में फ्यूज का क्या महत्त्व है ? आवश्यक परिपथ बनाकर स्पष्ट कीजिए (2011, 12, 13, 14, 16, 17, 18)
उत्तर:
विद्युत परिपथ में फ्यूज एक सुरक्षा युक्ति के रूप में कार्य करता है। जब कभी घरों में बिजली की डोरी के दोनों तार विद्युतरोधी आवरण हट जाने के कारण एक-दूसरे से छू जाते हैं अथवा बिजली के बहुत सारे उपकरण एक साथ प्रयोग में लाये जाते हैं; तब परिपथ का विद्युत प्रतिरोध एकदम गिर जाता है तथा परिपथ में बहुत 1 N अधिक धारा बहती है।

इससे इतनी अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है कि परिपथ के तारों में आग लग सकती है। कभी-कभी किसी उपकरण की खराबी के कारण भी उसमें बहुत अधिक धारा आ जाती है जिससे उपकरण जल सकता है। इस फ्यूज के खतरों से बचने के लिए विभिन्न परिपथों की वायरिंग में वितरण बॉक्स फ्यूज-तार लगाये जाते हैं।
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प्रत्येक फ्यूज-तार में अधिकतम धारा वहन करने की एक क्षमता होती है। जब धारा इस निश्चित परिमाण से अधिक होती है तो फ्यूज -तार गल जाता है और विद्युत परिपथ टूट जाता है। जिससे क्षति होने से बच जाती है।

प्रश्न 18.
विद्युत बल्ब में कौन-सी गैस भरी जाती है और क्यों?
उत्तर:
उच्च सामर्थ्य के बल्बों में कोई निष्क्रिय गैस नाइट्रोजन अथवा ऑर्गन भरी जाती है। इससे बल्ब के तन्तु का वाष्पीकरण नहीं होता तथा बल्ब की दक्षता बढ़ जाती है।

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प्रश्न 19.
वाट की परिभाषा दीजिए। किलोवाट-घण्टा तथा जूल में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2011, 12, 14)
या किलोवाट-घण्टा (यूनिट) क्या है? इसकी परिभाषा दीजिए। या किलोवाट-घण्टा से क्या अर्थ है ?
या किलोवाट-घण्टा तथा जूल में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (2013) किलोवाट को परिभाषित कीजिए। (2011, 12, 17)
या किलोवाट-घण्टा को जूल में बदलिए। (2018)
उत्तर:
वाट की परिभाषा यह सामर्थ्य का मात्रक है। “यदि किसी कर्ता के कार्य करने की दर 1 जूल प्रति सेकण्ड है, तो उसकी सामर्थ्य 1 वाट कहलाती है। इसी प्रकार यदि किसी विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा व्यय की दर 1 जूल / सेकण्ड हो, तो उस परिपथ में लगे विद्युत स्रोत की सामर्थ्य 1 वाट होती है।”
वाट = ऐम्पियर-वोल्ट भी होता है। क्योंकि
वाट = जूल/सेकण्ड = कूलॉम x वोल्ट / सेकण्ड
= ऐम्पियर x सेकण्ड – वोल्ट / सेकण्ड = ऐम्पियर x वोल्ट

किलोवाट-घण्टा यह विद्युत ऊर्जा का मात्रक है। इसको साधारण भाषा में यूनिट भी कहते हैं। 1 किलोवाट-घण्टा किसी विद्युत परिपथ में 1 घण्टे में व्यय होने वाली विद्युत ऊर्जा की मात्रा है; जबकि उस परिपथ में 1 किलोवाट विद्युत शक्ति का स्रोत लगा हो।
किलोवाट-घण्टा तथा जूल में सम्बन्ध –
1 किलोवाट-घण्टा =1 किलोवाट x 1 घण्टा
=103 वाट x 60 x 60 सेकण्ड
= 103 जूल/सेकण्ड x 60 x 60 सेकण्ड
= 3.6 x 106 जूल

प्रश्न 20.
दो विद्युत बल्बों में समान धातु एवं समान लम्बाई के तन्तु लगे हैं, परन्तु एक बल्ब का तन्तु दूसरे की अपेक्षा अधिक मोटा है। किस बल्ब की सामर्थ्य अधिक होगी तथा क्यों? (बल्बों की वोल्टता समान है) (2014,18)
उत्तर:
किसी बल्ब की सामर्थ्य (Power) P, उस पर लगे विभवान्तर V तथा प्रवाहित धारा । पर निर्भर करती है।
P= Vi
ओम के नियम से,
V = iR
या i = V / R
अतः P = \(\frac{V^{2} }{R}\) …(i)
चूँकि समान धातु एवं समान लम्बाई वाले तन्तु का प्रतिरोध उसकी त्रिज्या के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
अत: जिस बल्ब का तन्तु मोटा है; उसका प्रतिरोध कम तथा जिस बल्ब का तन्तु पतला है; उसका प्रतिरोध अधिक होगा।
अत: समीकरण (i) से मोटे तार के लिए प्रतिरोध कम होने से उसकी सामर्थ्य अधिक होगी तथा पतले तार का प्रतिरोध अधिक होने से उसकी सामर्थ्य कम होगी।

प्रश्न 21.
एक नामांकित विद्युत परिपथ बनाइए जिसमें रेगुलेटर, स्विच, पंखा तथा वैद्युत बल्ब घर में मेन्स से जुड़े दिखाये गये हैं। (2011, 17)
उत्तर:
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प्रश्न 22.
5 ओम प्रतिरोध तथा 10 ओम प्रतिरोध के तारों में समान विद्युत धारा समान समय तक प्रवाहित करने पर तारों में उत्पन्न हुई ऊष्माओं में क्या अनुपात होगा?
हल:
तार में उत्पन्न ऊष्मा H =\(\frac{i^{2} R t}{4.2}\) कैलोरी
समान i व t के लिए H R
अत: 5 ओम व 10 ओम के तारों में उत्पन्न ऊष्माओं का अनुपात
\(\frac{R_{1}}{R_{2}}\) = \(\frac{5}{2}\) = 1:2

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प्रश्न 23.
किसी परिपथ में 10 ऐम्पियर की धारा 4 सेकण्ड तक प्रवाहित की जाती है। यदि परिपथ का प्रतिरोध 10 ओम है, तो ज्ञात कीजिए –
(i) परिपथ में प्रवाहित कुल इलेक्ट्रॉन की संख्या
(ii) उत्पन्न ऊष्मा (2015)
हल:
(i) परिपथ में प्रवाहित कुल आवेश (q) = धारा (i) x समय (t)
=10 x 4 = 40 कूलॉम
परिपथ में प्रवाहित इलेक्ट्रॉन की संख्या
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(ii) ऊष्मा, Q = i2. R x t = 10 x 10 x 10 x 4
= 4000 जूल = \(\frac{4000}{4.2}\) कैलोरी = 9.52.38 कैलोरी

प्रश्न 24.
किसी विद्यत मोटर की सामर्थ्य 7.5 किलोवाट है। इसने 8 घण्टा प्रतिदिन की दर से 15 दिन कार्य किया। कितने यूनिट (किलोवाट-घण्टा) विद्युत ऊर्जा व्यय हुई? इसका मान जूल में भी ज्ञात कीजिए। (2011, 13, 14, 18)
हल:
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= 900 x 3.6 x 106 जूल
= 3.24 x 109 जूल

प्रश्न 25.
1.5 किलोवाट सामर्थ्य के हीटर का उपयोग 30 मिनट तक करने में कितनी ऊष्मा प्राप्त होगी? (2009, 11)
हल:
सामर्थ्य P = 1.5 किलोवाट = 1500 वाट, समय 1 = 30 मिनट = 30 x 60 सेकण्ड
प्राप्त ऊष्मीय ऊर्जा = सामर्थ्य x समय = 1500 x 30 x 60 = 2700000 जूल = 2.7 x 109 जूल
= \(\frac{2.7 \times 10^{6}}{4.2}\) कैलोरी = 6.43 x 105कैलोरी

प्रश्न 26.
दो बल्बों जिनमें एक पर 100 वाट-220 वोल्ट तथा दूसरे पर 60 वाट-220 वोल्ट लिखा है को 220 वोल्ट की सप्लाई लाइन से समान्तर क्रम में जोड़ा गया है। सप्लाई लाइन से निर्गत धारा की गणना कीजिए। (2009, 14)
हल:
प्रश्नानुसार, V = 220 वोल्ट, P = 100 + 60 = 160 वाट, i = ?
P = Vi
i = \(\frac{P}{V}\) = \(\frac{160}{220}\) = 0.73 ऐम्पियर

प्रश्न 27.
एक विद्युत बल्ब पर 250 V-200w लिखा है। इसे 250 वोल्ट के मेन्स से जोड़ने पर बल्ब में कितनी अधिकतम धारा प्रवाहित होगी? बल्ब के प्रतिरोध की भी गणना कीजिए। (2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18)
हल:
प्रश्नानुसार, V = 250 वोल्ट, P= 200 वाट
∴ बल्ब का प्रतिरोध R = \(\frac{V^{2}}{P}\) = \(\frac{250 x 250}{200}\) = 312.5 ओम
250 वोल्ट के मेन्स से जोड़ने पर,
बल्ब में अधिकतम धारा i = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{250}{312.5}\) = 0.8 ऐम्पियर

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प्रश्न 28.
25 वाट तथा 100 वाट के दो बल्बों के प्रतिरोधों की तुलना कीजिए, यदि इनकी वोल्टता समान हो। (2014)
हल:
माना दोनों बल्बों की वोल्टता V वोल्ट है तथा 25 वाट और 100 वाट के बल्बों का प्रतिरोध क्रमश: R1 तथा R2 ओम हैं।
हम जानते हैं कि बल्ब की सामर्थ्य P = \(\frac{V^{2}}{R}\)
25 वाट के बल्ब के लिए 25 = \(\frac{V^{2}}{R_{1}}\)
100 वाट. के बल्ब के लिए 100 = \(\frac{V^{2}}{R_{2}}\)
भाग देने पर,
\(\frac{100}{25}=\frac{R_{1}}{R_{2}}\)
या \(\frac{R_{1}}{R_{2}}=\frac{4}{1}\) या R1 : R2 = 4:1
अर्थात् 25 तथा 100 वाट के बल्बों के पतिशों क अनुगात 4 : 1 है।

प्रश्न 29.
एक बल्ब पर 60 W-220 V लिखा है। इसको 220 वोल्ट के विद्युत मेन्स में लगाने पर कितनी धारा प्रवाहित होगी? बल्ब द्वारा 5 मिनट में उत्पन्न ऊष्मा की गणना कीजिए। (2011, 18)
हल:
विभवान्तर V = 220 वोल्ट, सामर्थ्य P = 60 वाट,
समय t = 5 मिनट = 5 x 60 सेकण्ड
धारा i = \(\frac{P}{V}\) = \(\frac{60}{220}\) = \(\frac{3}{11}\) ऐपियर
5 मिनट अर्थात् 5 x 60 सेकण्ड में व्यय ऊर्जा W = Vit
= 220 x \(\frac{3}{11}\) x 5 x 60 = 18000 जूल
अतः उत्पन्न ऊष्मा = \(\frac{18000}{4.2}\) = 4285.7 कैलोरी

प्रश्न 30.
एक घर में 220 V-100 w के 5 बल्ब प्रतिदिन 8 घण्टे जलते हैं तो 2 रुपये प्रति यूनिट की दर से एक माह (30 दिन) का खर्च ज्ञात कीजिए। (2014)
हल:
व्यय ऊर्जा (यूनिट)
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खर्च = व्यय यूनिट x 1 यूनिट का मूल्य
=120 x 2 = ₹ 240

प्रश्न 31.
एक विद्युत बल्ब का प्रतिरोध 1000 ओम है। इसको 200 वोल्ट के मेन्स से जोड़कर 10 घण्टे तक जलाने में कितने यूनिट विद्युत ऊर्जा व्यय होगी?
हल:
बल्ब में प्रवाहित धारा i = \(\frac{V}{R}\) = \(\frac{200}{1000}\) = 0.2 ऐम्पियर
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प्रश्न 32.
200 ओम प्रतिरोध के तार में 1.5 ऐम्पियर की धारा प्रवाहित करने से ऊर्जा व्यय की दर ज्ञात कीजिए। यदि उपर्युक्त तार में ऊर्जा व्यय की दर 1250 वाट लें, तो तार के सिरों का विभवान्तर कितना होगा? (2014, 18)
हल:
प्रतिरोध R = 200 ओम, धारा i = 1.5 ऐम्पियर
ऊर्जा व्यय की दर P = i2 R
= (1.5)2 x 200
= 2.25 x 200 = 450 वाट
प्रतिरोध R= 200 ओम, P = 1250 वाट, V= ?
सूत्र P = \(\frac{V^{2}}{R}\) से, V2 = P x R
= 1250 x 200 = 250000
∴ तार के सिरों के बीच विभवान्तर V = \(\sqrt{250000}\) = 500 वोल्ट

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प्रश्न 33.
आपके घर में विद्युत कटौती के दौरान आवश्यक विद्यत आपूर्ति के लिए 12 वोल्ट/150 ऐम्पियर-घण्टा की एक बैटरी लगायी गयी है। यदि विद्युत कटौती के दौरान आप इस पूर्णतया आवेशित बैटरी से एक 60 वाट का पंखा एवं एक 40 वाट का बल्ब प्रयोग में लाते हैं, तो यह कब तक कार्य करेंगे? किसी भी अन्य ऊर्जा को हानि को नगण्य मानें। (2017)
हल:
उपकरणों की कुल सामर्थ्य P = 60 + 40 = 100 वाट
माना उपकरण t घण्टे कार्य करेंगे, तब
उपकरणों द्वारा t घण्टे में प्रयुक्त ऊर्जा = बैटरी की कुल ऊर्जा
100 वाट x t घण्टा = 12 x 150 वाट-घण्टा
t = \(\frac{12 × 150}{100}\) = 18
∴ उपकरण 18 घण्टे तक कार्य करेंगे।

प्रश्न 34.
दो प्रतिरोध 3 ओम तथा 5 ओम के हैं। इन्हें किसी सेल से जोड़ने पर कौन-सा प्रतिरोध अधिक गर्म होगा, यदि इन्हें परस्पर
(i) श्रेणीक्रम में
(ii) समान्तर क्रम में जोड़ा जाये? (2017)
हल:
(i) श्रेणीक्रम में दोनों प्रतिरोधों में समान धारा बहेगी।
∴ उत्पन्न ऊष्माओं का अनुपात \(\frac{H_{1}}{H_{2}}=\frac{i^{2} R_{1} t}{i^{2} R_{2} t}=\frac{R_{1}}{R_{2}}=\frac{3}{5}\)
= 3:5
∴ 5 ओम का प्रतिरोध अधिक गर्म होगा।
(ii) समान्तर क्रम में दोनों प्रतिरोधों के सिरों पर विभवान्तर समान होगा। .
∴ उत्पन्न ऊष्माओं का अनुपात
\(\frac{H_{1}}{H_{2}}=\frac{V^{2} t / R_{1}}{V^{2} t / R_{2}}=\frac{R_{2}}{R_{1}}=\frac{5}{3}\) = 5 : 3
अत: 3 ओम का प्रतिरोध अधिक गर्म होगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ओम का नियम क्या है ? इसके सत्यापन के लिए आवश्यक प्रयोग का वर्णन परिपथ आरेख खींचकर कीजिए। (2011, 12, 13, 14, 15)
या ओम के नियम की व्याख्या कीजिए। प्रतिरोध का मात्रक भी बताइए।
उत्तर:
ओम का नियम ओम के नियम के अनुसार जब भौतिक अवस्थाएँ (जैसे ताप आदि) समान रहें तो किसी चालक में प्रवाहित होने वाली धारा, उसके सिरों के बीच विभवान्तर के समानुपाती होती है। यदि किसी चालक के सिरों पर लगा विभवान्तर V तथा उसमें बहने वाली धारा I हो, तो
विभवान्तर ∝ धारा  या  V ∝ I
V = स्थिरांक x I
इस स्थिरांक को चालक का प्रतिरोध कहते हैं। यदि प्रतिरोध हो, तो
V = R x I था R = \(\frac {V}{I}\)
अतः यह नियम यह भी बताता है कि किसी परिपथ में प्रतिरोध, उसके सिरों के बीच विभवान्तर (वोल्टता) तथा प्रवाहित धारा का अनुपात होता है।
यदि हम विभवान्तर तथा धारा में ग्राफ खींचें तो वह एक सरल रेखा आती है। इससे भी यह प्रदर्शित होता है कि विभवान्तर, धारा के समानुपाती है।

प्रतिरोध का मात्रक प्रतिरोध का मात्रक
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इसे Ω (ओम) से प्रदर्शित करते हैं।
ओम के नियम का सत्यापन इस प्रयोग के लिए एक बैटरी, अमीटर, कुंजी, धारा नियन्त्रक, प्रतिरोध तथा वोल्टमीटर चित्र (a) के अनुसार लगाते हैं। प्रतिरोध में प्रवाहित धारा (I) अमीटर से तथा प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवान्तर (V) वोल्टमीटर द्वारा मापते हैं।
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प्रयोग करने के लिए कुंजी K को लगाकर धारा नियन्त्रक की एक स्थिति के लिए प्रतिरोध में प्रवाहित धारा तथा उसके सिरों के बीच विभवान्तर वोल्टमीटर द्वारा मापते हैं। इसी प्रकार धारा नियन्त्रक द्वारा परिपथ में बहने वाली धारा बदलकर अमीटर तथा वोल्टमीटर के पाठ पढ़ लेते हैं। अब विभवान्तर को X – अक्ष पर तथा धारा को Y – अक्ष पर लेकर एक ग्राफ खींचते हैं यदि यह सरल रेखा आता है देखें चित्र (b)], तो चालक के सिरों के बीच विभवान्तर तथा उनमें प्रवाहित धारा का सरल रेखीय ग्राफ ओम के नियम का पालन करता है, अर्थात् चालक ओम के नियम का पालन करता है।

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प्रश्न 2.
यदि तीन प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में जोड़ दिया जाये तो इस संयोग के लिए उनके तुल्य प्रतिरोध का सूत्र स्थापित कीजिए। (2012)
श्रेणीक्रम में प्रतिरोधों को किस प्रकार जोड़ा जाता है? प्रतिरोधों के इस समायोजन के लिए सूत्र प्राप्त कीजिए। (2015, 17)
उत्तर:
श्रेणीक्रम में संयोजन (Series combination) प्रतिरोधों का श्रेणीक्रम में संयोजन इस प्रकार होता है कि प्रतिरोधों को क्रमश: जोड़ा जाए अर्थात् किसी एक प्रतिरोध का सिरा, दूसरे प्रतिरोध के एक सिरे से तथा इस प्रतिरोध का दूसरा सिरा अगले प्रतिरोध के पहले सिरे से जुड़ा रहे। यह संयोजन चित्र में दिखाया गया है। इसमें R1, R2, R3प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में जोड़कर एक सेल, जिसका कुल विभवान्तर V वोल्ट है, से जोड़ा गया है। श्रेणीक्रम में जुड़े इन प्रतिरोधों के तुल्य प्रतिरोध का मान निम्नलिखित प्रकार से ज्ञात किया जाता है –
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माना प्रतिरोधों के सिरों पर विभवान्तर क्रमश: V1,V2,V3, हैं, तब ओम के नियम से
V1 =iR1; V2 =iR2; Vs =iR3
तब V1 + V2 + V3 = iR1 + iR2 + iR3
= i(R1 + R2 + R3) ……(i)
चूँकि कुल विभवान्तर V है, तब V =V1 + V2 +V3 …….(ii)
अब माना कोई एक ऐसा प्रतिरोध है, जो विभवान्तर V होने पर परिपथ में। धारा प्रवाहित करने में सहायक होता है। यह प्रतिरोध समतुल्य प्रतिरोध R कहलाता है।
अतः V = iR ……(iii)
समीकरण (i), (ii) व (iii) से,
iR = i(R1 + R2 + R3)
या R = R1 + R3 + R3 ……(iv)
अत: श्रेणीक्रम में समतुल्य प्रतिरोध, प्रतिरोधों के कुल योग के बराबर होता है।

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प्रश्न 3.
समान्तर क्रम में जुड़े तीन प्रतिरोधों के तुल्य प्रतिरोध के लिए सूत्र का निगमन। कीजिए। (2011, 16, 17)
उत्तर:
समान्तर क्रम में संयोजन समान्तर क्रम में जुड़े प्रतिरोधों का संयोजन चित्र में दिखाया गया है। इस प्रकार के संयोजन में प्रत्येक प्रतिरोध (R1 , R2, R3) दो निश्चित बिन्दुओं (A, B) के बीच जुड़ा हुआ होता है तथा उन दोनों निश्चित बिन्दुओं के बीच में सेल जोड़ दिया जाता है। अतः प्रत्येक प्रतिरोध के सिरों के विभवान्तर का मान V (माना) होगा।
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माना प्रतिरोधों R1, R2, व R3, में क्रमश: i1, i2 व i3 धाराएँ प्रवाहित होती हैं, तब ओम के नियम से,
i1 = \(\frac{V}{R_{1}}\) i2 = \(\frac{V}{R_{2}}\) i3 = \(\frac{V}{R_{3}}\)
कुल धारा i = i1 + i2 + i3
i = \(\frac{V}{R_{1}}+\frac{V}{R_{2}}+\frac{V}{R_{3}}\)
i = V(\(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}+\frac{1}{R_{3}}\)) ……..(i)

माना इन प्रतिरोधों के समतुल्य प्रतिरोध R है जिसके सिरों पर विभवान्तर V होने पर इसमें धारा i प्रवाहित होती है।
अतः R = \(\frac {V}{i}\) अथवा i = \(\frac {V}{R}\) …(ii)
समी० (i) व (ii) से,
\(\frac {V}{R}\) = V(\(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}+\frac{1}{R_{3}}\))
अथवा
\(\frac {1}{R}\) = \(\frac{1}{R_{1}}+\frac{1}{R_{2}}+\frac{1}{R_{3}}\) ……..(iii)
यह समीकरण समान्तर क्रम में जुड़े तीन प्रतिरोधों के समतुल्य प्रतिरोध का मान दर्शाती है।
अत: “समान्तर क्रम में जोड़ने पर समतुल्य प्रतिरोध का मान कम हो जाता है।”

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प्रश्न 4.
एक परिपथ में 10 ओम, 6 ओम तथा 4 ओम के तीन प्रतिरोध श्रेणीक्रम में संयोजित हैं। पूरे संयोजन के सिरों का विभवान्तर 10.0 वोल्ट है। प्रत्येक प्रतिरोध में धारा एवं विभवान्तर ज्ञात कीजिए। (2011)
हल:
प्रश्न के अनुसार परिपथ संलग्न है: परिपथ का कुल प्रतिरोध R = R1 + R2 + R3
या R = 10 + 6 + 4 = 20
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ओम के नियम से, i = \(\frac {V}{R}\) = \(\frac {10}{20}\) = 0.5 ऐम्पियर
प्रत्येक प्रतिरोध में धारा 0.5 ऐम्पियर बहेगी।
सूत्र V = iR से,
100 के प्रतिरोध का विभवान्तर = 0.5 x 10 = 5 वोल्ट
62 के प्रतिरोध का विभवान्तर = 0.5 x 6 = 3 वोल्ट
40 के प्रतिरोध का विभवान्तर = 0.5 x 4 = 2 वोल्ट

प्रश्न 5.
दो विद्यत प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में जोड़ने पर उनका तुल्य प्रतिरोध 25 ओम आता है। इनको समान्तर क्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध 4 ओम आता है। प्रत्येक विद्युत प्रतिरोध का प्रतिरोध ज्ञात कीजिए। (2011, 12, 18)
हल:
माना विद्युत प्रतिरोध क्रमश: P व Q हैं, तब प्रश्नानुसार श्रेणीक्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध
P + Q = 25 Ω …….(i)
तथा समान्तर क्रम में जोड़ने पर तुल्य प्रतिरोध
\(\frac {1}{P}\) + \(\frac {1}{Q}\) = \(\frac {1}{4}\) Ω  ……..(ii)
या \(\frac {P + Q}{PQ}\) = \(\frac {1}{4}\) या 4(P + Q) = PQ
समी० (i) से, 4 x 25 = PQ या PQ = 100 ……….(iii)
∴ (P-Q)2 = (P +Q)2 .. 4PQ = (25)2 – 4 x 100 = 625 – 400 = 225
∴ P – Q = 15 ……..(iv)
समी० (iii) व (iv) को हल करने पर,
P = 20 ओम तथा Q = 5 ओम

प्रश्न 6.
नीचे दिये गये चित्र में ज्ञात कीजिए (2012, 13, 14, 16)
1. तुल्य प्रतिरोध
2. परिपथ की धारा
3. 3Ω प्रतिरोध वाले चालक के सिरों का विभवान्तर 108
हल:
1. 2 Ω व 2 Ω के प्रतिरोध समान्तर क्रम में लगे हैं –
इनका तुल्य प्रतिरोध \(\frac {1}{R}\) = \(\frac {1}{2}\) + \(\frac {1}{2}\)= R1 = 1Ω
अब परिपथ में 1 Ω,1 Ω व 3 Ω के प्रतिरोध श्रेणी क्रम में लगे हैं।
∴ परिपथ का तुल्य प्रतिरोध R = 1Ω +1Ω + 3Ω = 5Ω
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2. परिपथ में विभवान्तर V = 1Ω वोल्ट, प्रतिरोध R = 5Ω
∴ परिपथ की धारा i = \(\frac {V}{R}\) = \(\frac {10}{5}\) = 2 ऐम्पियर

3. 3Ω के प्रतिरोध में धारा i = 2 ऐम्पियर
3 Ω के प्रतिरोध के सिरों के बीच विभवान्तर = धारा x प्रतिरोध – 2 x 3 = 6 वोल्ट

प्रश्न 7.
दिये गये परिपथ में ज्ञात कीजिए (2018)
1. A तथा B के मध्य प्रतिरोध
2. परिपथ में प्रवाहित धारा i (2015)
3. A तथा B के मध्य विभवान्तर
4. 3Ω के प्रतिरोध के सिरों का विभवान्तर (2013, 14, 15, 17)
हल:
1. AB के बीच (4 + 2) = 6 Ω व (2 + 1) = 3Ω के प्रतिरोध समान्तर क्रम में लगे हैं।
यदि A व B के बीच तुल्य प्रतिरोध R1 है तब,
\(\frac{1}{R_{1}}\) = \(\frac {1}{6}\) + \(\frac {1}{3}\) = \(\frac {3}{6}\) + \(\frac {1}{2}\)
⇒ R1 = 2Ω
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2. परिपथ में R, व 3Ω के प्रतिरोध श्रेणीक्रम में लगे है अत: परिपथ का तुल्य प्रतिरोध R = R1 + 3Ω = 2Ω + 3Ω = 5Ω
तथा विभवान्तर V = 10 वोल्ट
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3. A व B के मध्य विभवान्तर = A व B के बीच प्रतिरोध x धारा
= 2 x 2 = 4 वोल्ट

4. 3Ω के प्रतिरोध के सिरों का विभवान्तर = प्रतिरोध x धारा
= 3 x 2 = 6 वोल्ट

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प्रश्न 8.
विद्युत बल्ब का सिद्धान्त, रचना एवं कार्य-विधि समझाइए। इसका नामांकित चित्र बनाइए। विद्युत बल्ब में वायु के स्थान पर नाइट्रोजन अथवा ऑर्गन क्यो भरी जाती है ? (2011, 13) विद्युत बल्ब से प्रकाश प्राप्त होने के सिद्धान्त को समझाइए। (2012)
उत्तर:
विद्युत बल्ब
सिद्धान्त विद्युत बल्ब विद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव पर आधारित है। किसी तार मे विद्युत धारा प्रवाहित करने पर उसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है जिससे तार का ताप बढ़ जाता है तथा अधिक ताप बढ़ने पर वह श्वेत-तप्त काँच की छड़ रचना इसमें एक काँच का बल्ब होता है; जिसमें टंगस्टन धातु का तन्तु (फिलामेण्ट) होता है। बल्ब में निर्वात रखते हैं या कोई तार अक्रिय गैस जैसे ऑर्गन या नाइट्रोजन भर देते हैं। इसके ऊपर एक धातु (पीतल) की टोपी होती है, जिसके दोनों ओर दो पिन होते हैं; जो बल्ब को होल्डर में लगाने में सहायक होते हैं। इसके फिलामेण्ट तन्तु अन्दर काँच की छड़ होती है; जिसके अन्दर ताँबे के दो मोटे तार होते हैं।
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इन तारों के ऊपरी सिरे राँग से झले होते हैं तथा नीचे के सिरों के बीच टंगस्टन का बारीक फिलामेण्ट होता है (चित्र)। बल्ब को ऊपर से लाख या चपड़े से बन्द कर दिया जाता है; जिससे बाहर की वायु इसमें प्रवेश न कर सके। कार्य-विधि जब विद्युत धारा बल्ब में से प्रवाहित की जाती है, तो टंगस्टन का फिलामेण्ट गर्म होकर चमकने लगता है एवं प्रकाश देने लगता है। इससे विद्युत ऊर्जा का रूपान्तरण प्रकाश और ऊष्मा में होता है। घरों में प्रयोग किए जाने वाले बल्ब विभिन्न सामर्थ्य के होते हैं। उन पर उनकी सामर्थ्य तथा विभवान्तर लिखे होते है। ये सामान्यत: 220 वोल्ट विभवान्तर पर कार्य करते हैं।

ये 15 वाट से 500 वाट सामर्थ्य तक के होते हैं। यदि किसी बल्ब पर 40 वाट 220 वोल्ट लिखा हो, तो इसका ५ अर्थ यह होगा कि 220 वोल्ट मेन्स में लगाने पर इसमें प्रति घण्टा 40 वाट-घण्टा ऊर्जा व्यय होगी। बल्ब में निष्क्रिय गैसों का भरना. साधारण कोटि के तथा कम सामर्थ्य के बल्बों के भीतर निर्वात होता है, परन्तु ऊँची सामर्थ्य के बल्बों में निष्क्रिय गैसें (जैसे नाइट्रोजन एवं ऑर्गन) भर देने से तन्तु का ऑक्सीकरण नहीं हो पाता। इससे तन्तु का वाष्पीकरण नहीं होता तथा बल्ब की दक्षता व आयु बढ़ जाती है।

प्रश्न 9.
विद्यत परिपथ में व्यय सामर्थ्य से क्या अभिप्राय है? इसका मात्रक लिखिए। यदि परिपथ में v वोल्ट विभवान्तर पर। ऐम्पियर धारा प्रवाहित हो रही हो तो सामर्थ्य के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
या सिद्ध कीजिए कि किसी विद्युत बल्ब की सामर्थ्य उसके प्रतिरोध के व्युत्क्रमानुपाती होती है। (2011, 12, 13, 16)
उत्तर:
विद्युत सामर्थ्य किसी विद्युत परिपथ में विद्युत ऊर्जा के व्यय होने की दर को विद्युत सामर्थ्य कहते हैं। (2016)
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यदि किसी परिपथ में t सेकण्ड में W जूल ऊर्जा व्यय हो तो परिपथ की विद्युत सामर्थ्य
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सामर्थ्य के मात्रक जूल/सेकण्ड को वाट भी कहते हैं।
∴ P = \(\frac {W}{t}\) वाट

यदि परिपथ में V वोल्ट के विभवान्तर पर । ऐम्पियर धारा, t सेकण्ड तक प्रवाहित हो, तब व्यय ऊर्जा W = Vit जूल
∴ परिपथ की सामर्थ्य P = \(\frac {W}{t}\) = \(\frac {Vit}{t}\) = Vi वाट
यदि परिपथ का विद्युत प्रतिरोध R ओम है, तब V = iR से
सामर्थ्य P = i2 R वाट
पुन: चूंकि i = \(\frac {V}{R}\)
∴ सामर्थ्य P = \(\frac{V^{2}}{R}\) वाट
∴ P = \(\frac{V^{2}}{R}\)
P ∝ \(\frac {1}{R}\) (यदि v स्थिर रहे)
अतः स्पष्ट है कि निश्चित विभवान्तर लगाने पर बल्ब की विद्युत सामर्थ्य बल्ब के प्रतिरोध की व्युत्क्रमानुपाती होती है।

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प्रश्न 10.
एक बर्तन में 100 ग्राम जल 10°C पर रखा है, इसमें 42 ओम प्रतिरोध का एक तार जल में डालकर 2.0 ऐम्पियर की धारा 5 मिनट तक प्रवाहित की जाती है। यदि बर्तन की ऊष्माधारिता 50 कैलोरी /°C हो, तो जल में ताप-वृद्धि का मान बनाइए। (2014)
हल:
उत्पन्न ऊष्मा H = i2Rt जूल = \(\frac{i^{2} R t}{4.2}\) कैलोरी
यहाँ i = 2.0 ऐम्पियर, R = 42 ओम,
t = 5 मिनट = 5 x 60 सेकण्ड = 300 सेकण्ड
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माना इस ऊष्मा द्वारा बर्तन तथा जल के ताप में Δr°C की वृद्धि होती है।
बर्तन द्वारा ली गयी ऊष्मा = ऊष्माधारिता x ताप-वृद्धि
= 50 x Ar = 50 Δt कैलोरी
जल द्वारा ली गयी ऊष्मा = ms Ar
= 100 x 1 x Δt = 100 Δt कैलोरी
कुल ली गयी ऊष्मा = 50 At + 100 Δt = 150 Δt
150 Δt = 12,000
Δt = \(\frac{12,000}{150}\) = 80°C

प्रश्न 11.
एक घर में 50 W की 2 ट्यूबलाइट, 50 W के 2 पंखे, 200 w का एक फ्रिज तथा 1 kw का एक हीटर समय-समय पर प्रयुक्त होता है। यदि घर को विद्युत आपूर्ति 250 V पर की जा रही हो तो मीटर से ली जाने वाली अधिकतम धारा की गणना कीजिए जिससे उपयुक्त रेटिंग का फ्यूज परिपथ में लगाया जा सके। आवश्यक परिपथ बनाकर इनके संयोजन को भी दिखाइए। ‘2012, 18)
हल:
प्रश्नानुसार, P =(2 x 50 + 2 x 50 + 1 x 200 + 1000) W =1400 वाट
V = 250 वोल्ट, i = ?
परिपथ में अधिकतम धारा बहेगी यदि सभी उपकरण एक साथ चलेंगे।
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P = Vi से
i = \(\frac{P}{V}\) = \(\frac{1400}{250}\) = 5.6 ऐम्पियर

प्रश्न 12.
एक घर में 220 वोल्ट, 40 वाट के 5 बल्ब लगे हैं। बल्ब 30 दिन तक 5 घण्टे प्रतिदिन की दर से जलते हैं। यदि वैद्युत ऊर्जा का मूल्य ₹ 4 प्रति यूनिट हो तो ज्ञात कीजिए –
(i) बल्बों के संयोग का तुल्य प्रतिरोध
(ii) व्यय वैद्युत यूनिटों की संख्या
(iii) व्यय वैद्युत ऊर्जा का मूल्य (2017)
हल:
(i) दिया है V = 220 वोल्ट, एक बल्ब की सामर्थ्य P = 40 वाट
बल्ब का प्रतिरोध R = \(\frac{V^{2}}{P}\) = \(\frac{220 \times 220}{40}\) = 1210 ओम
∴ बल्ब समान्तर क्रम में लगे हैं, अत: 1210 ओम प्रतिरोध में 5 बल्ब समान्तर क्रम में लगे हैं। यदि इनका तुल्य प्रतिरोध R’ है, तो होता
\(\frac{1}{P}\) = \(\frac{1}{R}\) + \(\frac{1}{R}\) + \(\frac{1}{R}\) + \(\frac{1}{R}\) + \(\frac{1}{R}\) = \(\frac{5}{R}\)
∴ R’ = \(\frac{R}{5}\) = \(\frac{1210}{5}\) = 242 ओम
(ii) व्यय वैद्युत यूनिटो की संख्या =
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(iii) वैद्युत ऊर्जा का मूल्य = 30 x 4 = ₹ 120

प्रश्न 13.
आपके घर में 10 वाट के पाँच एलईडी बल्ब, 100 वाट का एक तन्तु बल्ब, 50 वाट के चार पंखे एवं 1.5 किलोवाट का एक एयर-कण्डीशनर लगा है। यदि बल्ब प्रतिदिन 5 घण्टे तथा पंखे एवं एयर-कण्डीशनर 20 घण्टे प्रयोग किये जा रहे हैं तो एक महीने (30 दिन) में ₹ 5 प्रति यूनिट की दर से विद्युत ऊर्जा का व्यय ज्ञात कीजिए। (2013, 15, 17)
हल:
व्यय विद्युत ऊर्जा (किलोवाट-घण्टा में)
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1000 कुल व्यय = 5 x 1042.5 = ₹ 5212.50

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प्रश्न 14.
1000 वाट सामर्थ्य वाले एक विद्युत हीटर को 250 वोल्ट के विद्युत मेन्स से जोड़ा जाता है। गणना कीजिए –
(i) हीटर से प्रवाहित धारा
(ii) हीटर के तार का प्रतिरोध
(iii) हीटर से प्रति मिनट उत्पन्न ऊष्मीय ऊर्जा
(iv) हीटर को 2 घण्टे उपयोग में लाने से किलो-वाट घण्टा में ऊर्जा व्यय (2016)
हल:
प्रश्नानुसार हीटर की सामर्थ्य P = 1000 वाट
विभवान्तर V = 250 वोल्ट
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(iii) हीटर से प्रति मिनट उत्पन्न ऊष्मा = i2Rt जूल
= (4)2 x 62.5 x 1 x 60
= 6.0 x 104 जूल
\(\frac{6.0 \times 10^{4}}{4.2}\) कैलोरी
= 1.43 x 104

(iv) व्यय विद्युत ऊर्जा (किलोवाट-घण्टे में)
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= 2 किलोवाट-घण्टे

प्रश्न 15.
220 वोल्ट व 10 ऐम्पियर धारा वाले विद्युत मोटर द्वारा आधे घण्टे में 40 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक पानी की टंकी में कितना पानी चढ़ाया जा सकता है? मोटर की कार्य दक्षता 80% है। पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण g = 10 मी/से है। (2014, 15, 17)
हल:
प्रश्नानुसार, V = 220 वोल्ट i= 10 ऐम्पियर,
t = 30 मिनट = 30 x 60 = 1800 सेकण्ड
∴ मोटर द्वारा 30 मिनट में ली गयी ऊष्मा = Vit
= 220 x 10 x 1800
= 3.96 x 106 जूल
∴ मोटर द्वारा दी गयी ऊर्जा = 3.96 x 106 x \(\frac{80}{100}\).
= 3. 17 x 106 = m x 10 x 40
∴ m = \(\frac{3.17 \times 10^{6}}{10 \times 40}\) (∴ g = 10 मी / से)
=7.925 x 103 किग्रा
अत: 7.925 x 103 किग्रा पानी ऊपर चढ़ाया जा सकता है।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : संसाधन एवं उपयोग Chapter 6 मानचित्र अध्ययन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 10 Geography मानचित्र अध्ययन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उच्चावच प्रदर्शन के लिए हैश्यूर विधि का विकास किसने किया था ?
(क) गुटेनबर्ग
(ख) लेहमान
(ग) गिगर
(घ) रिटर
उत्तर-
(ख) लेहमान ।

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प्रश्न 2.
पर्वतीय छायाकरण विधि में भू-आकृतियों पर किस दिशा से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है?
(क) उत्तर-पूर्व
(ख) पूर्व-दक्षिण
(ग) उत्तर-पश्चिम
(घ) दक्षिण-पश्चिम
उत्तर-
(ग) उत्तर-पश्चिम

प्रश्न 3.
छोटी, महीन एवं खंडित रेखाओं को ढाल की दिशा में खींचकर उच्चावच प्रदर्शन की विधि को क्या कहा जाता है ?
(क) स्तर रंजन
(ख) पर्वतीय छायाकरण
(ग) हैश्यूर
(घ) तल चिह्न
उत्तर-
(ग) हैश्यूर

प्रश्न 4.
तल चिह्न की सहायता से किसी स्थान विशेष की मापी गई ऊँचाई को क्या कहा जाता
(क) स्थानिक ऊँचाई.
(ख) विशेष ऊँचाई
(ग) समोच्च रेखा
(घ) त्रिकोणमितीय स्टेशन
उत्तर-
(क) स्थानिक ऊँचाई.

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प्रश्न 5.
स्तर रंजन विधि के अंतर्गत मानचित्रों में नीले रंग से किस भाग को दिखाया जाता है ?
(क) पर्वत
(ख) पठार
(ग) मैदान
(घ) जल
उत्तर-
(घ) जल

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हैश्यूर विधि तथा पर्वतीय छायाकरण में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
हैश्यूर विधि इस विधि के अन्तर्गत मानचित्र में छोटी, महीन एवं खंडित रेखाओं की सहायता से उच्चावच को निरूपित करते हैं। ये रेखाएँ ढाल की दिशा अथवा जल बहने की दिशा में खींची जाती हैं।

पर्वतीय छायाकरण विधि- इस विधि के अन्तर्गत उच्चावच प्रदर्शन के लिए भू-आकृतियों पर उत्तर पश्चिम कोने पर ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है। इसके कारण अंधेरे में पड़ने वाले हिस्से को या ढाल को गहरी आभा से भर देते हैं जबकि प्रकाश वाले हिस्से या कम ढाल को हल्की आभा से भर देते हैं या खाली छोड़ देते हैं।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
तल चिह्न और स्थानिक ऊँचाई क्या है ?
उत्तर-
तलचिह्न-वास्तविक सर्वेक्षणों के द्वारा भवनों, पुष्पों, खंभों, पत्थरों जैसे स्थायी वस्तुओं पर समुद्र तल से मापी गयी ऊँचाई को प्रदर्शित करने वाले चिह्न को तल चिह्न कहते हैं। मानचित्र पर ऐसे ऊँचाई को प्रदर्शित करने के लिए ऊँचाई को फीट अथवा मीटर किसी एक इकाई में लिखा जाता है।

स्थानिक ऊँचाई तल चिह्न की सहायता से किसी स्थान विशेष की मापी गई ऊंचाई को स्थानिक ऊँचाई कहा जाता है। इस विधि के द्वारा मानचित्र में विभिन्न स्थानों की ऊंचाई संख्या में लिख दी जाती है।

प्रश्न 3.
समोच्च रेखा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
वे कल्पित रेखाएं जो मानचित्र पर स्थित उन सभी स्थानों को मिलाती हैं जिनकी ऊँचाई समुद्र तल से समान हो, समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं।
मानचित्र पर इन समोच्च रेखाओं को बादामी रंग से दिखाया जाता है। इसका प्रतिपादन एक डच अभियंता एन. क्रुकुइस ने 1730 में किया था।

प्रश्न 4.
स्तर रंजन क्या है?
उत्तर-
भू-आकृतियों का प्रदर्शन मानचित्र पर विभिन्न रंगों की अलग-अलग आभाओं द्वारा करना स्तर रंजन कहलाता है। जैसे -समुद्र या जलीय भाग को नीले रंग द्वारा, मैदान को हरे रंग द्वारा, पर्वतों को बादामी रंग द्वारा, ऊँची जमीन को भूरे रंग द्वारा इत्यादि।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 5.
समोच्च रेखाओं द्वारा शंक्वाकार पहाड़ी का प्रदर्शन किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर-
जिस प्रदेश की ऊँचाई 1000 मी. से कम हो वह शंक्वाकार पहाड़ी कहलाता है और इससे अधिक ऊँचाई वाले भाग को पर्वत कहते हैं। इसके प्रदर्शन के लिए समोच्च रेखाएँ गोलाकार होती हैं जिनका मान भीतर की ओर बढ़ता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उच्चावच प्रदर्शन की प्रमुख विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
(i) हैश्यूर विधि-इस विधि के अन्तर्गत मानचित्र में छोटी, महीन एवं खंडित रेखाओं की सहायता से उच्चावच को निरूपित करते हैं। ये रेखाएँ ढाल की दिशा अथवा जल बहने की दिशा में खींची जाती हैं।

पर्वतीय छायाकरण विधि-इस विधि के अन्तर्गत उच्चावच प्रदर्शन के लिए भू-आकृतियों कर पर उत्तर-पश्चिम कोने पर ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है। इसके कारण अंधेरे में पड़ने वाले हिस्से को या ढाल को गहरी आभा से भर देते हैं जबकि प्रकाश वाले हिस्से या कम ढाल को हल्की आभा से भर देते हैं या खाली छोड़ देते हैं।

(ii) तल चिह्न वास्तविक सर्वेक्षणों के द्वारा भवनों, पुष्पों, खंभों, पत्थरों जैसे स्थायी वस्तुओं पर समुद्र तल से मापी गयी ऊँचाई को प्रदर्शित करने वाले चिह्न को तल चिह्न कहते हैं। मानचित्र पर ऐसे ऊँचाई को प्रदर्शित करने के लिए ऊंचाई को फीट अथवा मीटर किसी एक इकाई में लिखा जाता है।

स्थानिक ऊँचाई तल चिह्न की सहायता से किसी स्थान विशेष की मापी गई ऊंचाई को स्थानिक ऊँचाई कहा जाता है। इस विधि के द्वारा मानचित्र में विभिन्न स्थानों की ऊँचाई संख्या में लिख दी जाती है।

(iii) वे कल्पित रेखाएँ जो मानचित्र पर स्थित उन सभी स्थानों को मिलाती हैं जिनकी ऊंचाई समुद्र तल से समान हो, समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं। .. मानचित्र पर इन समोच्च रेखाओं को बादामी रंग से दिखाया जाता है। इसका प्रतिपादन एक डच अभियंता एन. क्रुकुइस ने 1730 में किया था।

(iv) भू-आकृतियों का प्रदर्शन मानचित्र पर विभिन्न रंगों की अलग-अलग आभाओं द्वारा करना स्तर रंजन कहलाता है। जैसे-समुद्र या जलीय भाग को नीले रंग द्वारा, मैदान को हरे रंग द्वारा, पर्वतों को बादामी रंग द्वारा, ऊँची जमीन को भूरे रंग द्वारा इत्यादि।

(v) त्रिकोणमितीय स्टेशन–इसका संबंध उन बिन्दुओं से है जिनका उपयोग त्रिभुजन विधि (एक प्रकार का सर्वेक्षण) द्वारा करते समय स्टेशन के रूप में उभरा हुआ था। मानचित्र पर त्रिभुज बनाकर उसके बगल में धरातल की समुद्रतल से ऊंचाई लिख दी जाती है।

(vi) आकृतिक विधि-स्थलाकृतिक लक्षणों से मिलते-जुलते प्रतीकों के द्वारा मानचित्र में दृश्य भूमि के प्रदर्शन को आकृतिक विधि कहते हैं।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
समोच्च रेखा क्या है ? इसके द्वारा विभिन्न प्रकार के ढालों का प्रदर्शन किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर-
समोच्च रेखा-वे कल्पित रेखाएँ जो मानचित्र पर स्थित उन सभी स्थानों को मिलाते हुए खींची जाती हैं जिनकी ऊंचाई समुद्र तल से समान हो, समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं।

विभिन्न पठार के उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिए समोच्च रेखाओं के खींचने या बनाने का प्रारूप अलग-अलग होता है। समोच्च रेखाओं द्वारा ढाल का प्रदर्शन सरलतापूर्वक किया जाता है जिसका विवरण निम्न है

  • एक समान ढाल को दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं को समान दूरी पर खींचा जाता है।
  • खड़ी ढाल को दिखाने के लिए समोच्च रेखाएँ पास-पास बनाई जाती हैं, जबकि मंद ढाल के लिए इन रेखाओं को दूर-दूर बनाया जाता है।
  • जब किसी मानचित्र में अधिक ऊँचाई की समोच्च रेखाएँ पास पास तथा कम ऊँचाई की समोच्च रेखाएं दूर-दूर बनी होती हैं तो समझना चाहिए कि इन समोच्च रेखाओं का समूह अवतल ढाल का प्रदर्शन कर रहा है। इसके विपरीत स्थिति उतल ढाल का प्रतिनिधित्व करती है।
  • सीढ़ीनुमा ढाल के लिए समोच्च रेखाएं अंतराल पर परंतु दो या तीन रेखाएँ एक साथ जोड़ में बनाई जाती हैं।

Bihar Board Class 10 Geography मानचित्र अध्ययन Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यदि समोच्च रेखाएं एक-दूसरे से बहुत अधिक दूरी पर खींची गयी हों, तो इनसे किस प्रकार की भूआकृति का प्रदर्शन होता है ?
(क) धीमी ढाल
(ख) खड़ी ढाल
(ग) सागर तल
(घ) सीढ़ीनुमा ढाल
उत्तर-
(क) धीमी ढाल

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
यदि भूमि की ढाल को छोटी-छोटी और सटी हुयी रेखाओं से प्रदर्शित किया गया हो, तो इसे क्या कहा जाता है ?
(क) छायालेखन
(ख) हैश्यूर
(ग) समोच्च रेखाएँ
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ख) हैश्यूर

प्रश्न 3.
यदि समोच्च रेखाओं द्वारा किसी नदी को प्रदर्शित करने में दो से अधिक रेखाएँ.एक ही बिंदु पर मिलती दिखायी गयी हों तो उस स्थान पर किस प्रकार की भूआकृति का अनुमान लगाया जाता है ?
(क) झील
(ख) पहाड़
(ग) जलप्रपात
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ग) जलप्रपात

प्रश्न 4.
जब समोच्च रेखाएँ संकेंद्रीय वृत्ताकार हों जिनके बीच की वृत्तीय रेखा अधिक ऊँचाई प्रदर्शित करती हो तो इससे किस प्रकार की भूआकृति का अनुमान लगाया जाता है ?
(क) पहाड़
(ख) पठार
(ग) नदीघाटी
(घ) जलप्रपात
उत्तर-
(क) पहाड़

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 5.
उच्चावच प्रदर्शन की हैश्यूर विधि का विकास किसने किया था ?
(क) गुटेनबर्ग
(ख) लेहमान
(ग) शिगर
(घ) रिटर
उत्तर-
(ख) लेहमान

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
समोच्च रखाएँ क्या हैं ?
उत्तर-
वे कल्पित रेखाएँ जो मानचित्र पर स्थित उन सभी स्थानों को मिलाती हैं जिनकी ऊँचाई समुद्र तल से समान हो, समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं। मानचित्र पर इन समोच्च रेखाओं को बादामी रंग से दिखाया जाता है। इसका प्रतिपादन एक डच अभियंता एन. कुकुइस ने 1730 ई. में किया था।

प्रश्न 2.
किसी देश के मानचित्र में हरे रंग का प्रयोग किस प्रकार के उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिये किया जाता है?
उत्तर-
किसी देश के मानचित्र में हरे रंग का प्रयोग मैदानों के उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हैश्यर से आप क्या समझते हैं ? इसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाता है?
उत्तर-
मानचित्र बनाने में भूमि की ढाल दिखाने के लिए छोटी-छोटी और सटी रेखाओं से काम लिया जाता है, जिन्हें हैश्यूर कहते हैं। खड़ी ढाल प्रदर्शित करने के लिए अधिक छोटी और सटी रेखाएँ तथा धीमी ढाल प्रदर्शित करने के लिए अपेक्षाकृत बड़े और दूर-दूर रेखा चिन्ह खींचे जाते हैं। समतल भाग के लिए रेखा चिह्न नहीं खींचे जाते, ये भाग खाली छोड़ दिए जाते हैं।
इस विधि से स्थलाकृति का साधारण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ऊँचाई का सही ज्ञान नहीं हो पाता है। इस विधि में रेखाचिह्नों को खींचने में अधिक समय लगता है। समोच्च रेखा वाले मानचित्र में छोटी आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए यह विधि अपनायी जाती है। इस विधि का विकास आस्ट्रेलिया के एक सैन्य अधिकारी लेहमान ने किया था।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
समोच्च रेखाएँ (Contoursor Contour line) क्या हैं ?
उत्तर-
समुद्र की सतह के समानांतर समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा समोच्च रेखा कहलाती है। विभिन्न ऊंचाई के लिए विभिन्न समोच्च रेखाएँ खींची जाती हैं जो एक दूसरे से कभी नहीं कटती हैं। जिस भू-भाग में खड़ी ढाल रहती है, वहाँ यह रेखाएँ सटी और घनी नजर आती हैं। इसके विपरीत कम ढाल आने पर ये दूर हो जाती हैं। प्रत्येक समोच्च रेखा पर ऊँचाई के अंक अंकित किए जाते हैं।

ऊँचाई-गहराई दिखाने की यह सर्वोत्तम विधि है। इस विधि से पहाड़, पठार, नदी घाटी, जल प्रपात या विभिन्न प्रकार की ढाल को भली-भाँति दिखाया जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उच्चावच प्रदर्शन में पर्वतीय छाया विधि का वर्णन करें।
उत्तर-
पर्वतीय छायाकरण विधि- इस विधि के अन्तर्गत उच्चावच प्रदर्शन के लिए भू-आकृतियों पर उत्तर-पश्चिम कोने पर ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है। इसके कारण अंधेरे में पड़ने वाले हिस्से को या ढाल को गहरी आभा से भर देते हैं जबकि प्रकाश वाले हिस्से या कम ढाल को हल्की आभा से भर देते हैं या खाली छोड़ देते हैं।

इस विधि से स्थलाकृति का साधारण ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है, पर सही-सही ऊँचाई या निचाई का पता नहीं लगाया जा सकता है और न ढाल की यथेष्ट जानकारी ही मिल सकती है। लघु मापक मानचित्रों में यह विधि काम में लायी जा सकती है।

प्रश्न 2.
रंग विधि से उच्चावच प्रदर्शन किस प्रकार किया जाता है ? समझाकर लिखें।
उत्तर-
रंग विधि या स्तर-रंजन में स्थल के विभिन्न भागों को विभिन्न रंगों से भी दिखाया जाता है। साधारणत: मैदान को हरे रंग से और पहाड़ को या पठार को भूरे रंग से दिखाया जाता है। भूरे रंग के साथ हल्के गुलाबी रंग का भी प्रयोग किया जा सकता है। बर्फीला भाग सफेद रंग से एवं जलीय भाग या समुद्र नीले रंग से प्रदर्शित किया जाता है। मरुभूमि पीले रंग से दिखायी जाती है। रंगों के अभाव में काली स्याही के विभिन्न स्तरों से ही काम लिया जाता है। – यह विधि भी दोष से युक्त नहीं है। इसमें भी ऊँचाई-निचाई का ठीक-ठीक पता नहीं चलता । है। उदाहरण के लिए, 0 m से 100 m तक ऊँची भूमि के लिए जब एक ही रंग का प्रयोग किया । जाता है तो भूमि की वास्तविक ढाल नहीं जानी जा सकती है।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 10 Geography मानचित्र अध्ययन Notes

  • पूरे भू-पटल या इसके एक भाग की समतल सतह पर समानुपाती प्रदर्शन मानचित्र कहलाता
  • जब धरातल की विभिन्न आकृतियों का प्रदर्शन मानचित्र पर किया जाता है तो उसे उच्चावच मानचित्र कहा जाता है।
  • मानचित्र पर जमीन या मैदान को हरे तथा पीले रंग से, ऊँची जमीन को भूरे रंग से तथा अधिक ऊँची जमीन को अधिक भूरे रंग से दिखाया जाता है।
    Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 6 मानचित्र अध्ययन - 1

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : संसाधन एवं उपयोग Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

Bihar Board Class 10 Geography बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
2001 में बिहार की कल जनसंख्या थी-
(क) 8 करोड़ से कम
(ख)-9 करोड़ से अधिक
(ग) 8 करोड़ से अधिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) 8 करोड़ से अधिक

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

प्रश्न 2.
1991-2001 के दौरान बिहार की जनसंख्या वृद्धि दर है
(क) 30 प्रतिशत
(ख) 28 प्रतिशत
(ग) 28.63 प्रतिशत
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) 28.63 प्रतिशत

प्रश्न 3.
बिहार में ग्रामीण आबादी है
(क) 89.5 प्रतिशत
(ख) 79.5 प्रतिशत
(ग) 99.5 प्रतिशत
(घ) शून्य प्रतिशत
उत्तर-
(क) 89.5 प्रतिशत

प्रश्न 4.
2001 की जनगणना के अनुसार बिहार में प्रतिवर्ग किलोमीटर कितने व्यक्ति रहते हैं ?
(क) 772 व्यक्ति
(ख) 881 व्यक्ति
(ग) 981 व्यक्ति
(घ) 781 व्यक्ति
उत्तर-
(ख) 881 व्यक्ति

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

प्रश्न 5.
सबसे अधिक आबादी वाला कौन जिला है ?
(क) भागलपुर
(ख) पटना
(ग) नालन्दा
(घ) मुंगेर
उत्तर-
(ख) पटना

प्रश्न 6.
सासाराम नगर का विकास हुआ था
(क) मध्ययुग में
(ख) प्राचीन युग में
(ग) वर्तमान युग में
(घ) आधुनिक समय में
उत्तर-
(क) मध्ययुग में

प्रश्न 7.
अविभाजित बिहार में एक मात्र नियोजित नगर था
(क) पटना
(ख) मुंगेर
(ग) टाटानगर
(घ) गया
उत्तर-
(ग) टाटानगर

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

प्रश्न 8.
2001 की जनगणना के अनुसार बिहार की नगरीय आबादी है-
(क) 20.5 प्रतिशत
(ख) 15.5 प्रतिशत
(ग) 10.5 प्रतिशत
(घ) 25.5 प्रतिशत
उत्तर-
(ग) 10.5 प्रतिशत

प्रश्न 9.
बिहार का सबसे बड़ा नगर कौन है ?
(क) पटना
(ख) गया
(ग) भागलपुर
(घ) दरभंगा
उत्तर-
(क) पटना

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार के अत्यधिक घनत्व वाले जिलों का नाम लिखें।
उत्तर-
पटना, दरभंगा, वैशाली, बेगूसराय, सीतामढ़ी, सारण एवं सीवान।

प्रश्न 2.
बिहार में अत्यन्त कम घनत्व वाले जिले कौन-कौन हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी चम्पारण, बांका, जमुई और कैमूर।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

प्रश्न 3.
बिहार की जनसंख्या आकार को बताइए।
उत्तर-
2001 की जनगणना के अनुसार यहाँ की कुल जनसंख्या 829,98,509 है। इनमें 432,43,795 पुरुष एवं 3,97,54,714 महिलाएं हैं। यहाँ भारत की कुल जनसंख्या का 8.07% है। बिहार में लिंग अनुपात 919 महिलाएँ प्रति हजार पुरुष हैं।

प्रश्न 4.
बिहार की जनसंख्या सभी जगह एक समान नहीं है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
यहाँ जनसंख्या के असमान वितरण का मुख्य कारण है आर्थिक-सामाजिक परिवेश और भौतिक विविधता।
जहाँ भी धरातल समतल जलोढ़ एवं मैदानी है वहाँ घनी आबादी है। जहाँ कृषि कार्य, प्रति व्यक्ति आय ज्यादा है वहाँ जनसंख्या अधिक है।

प्रश्न 5.
मध्ययुग में बिहार में नगरों का विकास किस प्रकार हुआ?
उत्तर-
मध्यकाल में नगरों का विकास सड़कों के विकास एवं प्रशासनिक कारणों से हुआ था। ऐसे नगरों में सासाराम, दरभंगा, पूर्णिया, छपरा, सिवान आदि हैं।

प्रश्न 6.
दो प्राचीन एवं दो आधुनिक नगरों का नाम लिखिए।
उत्तर-
प्राचीन नगर पाटलीपुत्र, नालन्दा आधुनिक नगर डालमियानगर, मुंगेर।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बिहार की जनसंख्या घनत्व पर विस्तार से चर्चा कीजिए।
उत्तर-
2001 की जनगणना के अनुसार बिहार में प्रतिवर्ग किमी. घनत्व 881 व्यक्ति है। सबसे अधिक घनत्व पटना जिला में है जहाँ प्रति वर्ग किमी. 1,471 व्यक्ति निवास करते हैं। इसके बाद दरभंगा और वैशाली का स्थान आता है। जहाँ क्रमशः 1,342 और 1,332 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. रहते हैं। चौथे स्थान पर बेगुसराय जिला है, यहाँ घनत्व 1,222 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. है।

यहाँ के विभिन्न जिलों की जनसंख्या घनत्व बहुत ही असमान है। इसके आधार पर बिहार को पाँच वर्गों में बाँटा गया है।

(i)अत्यधिक घनत्व वाले जिले जिन जिलों का घनत्व 1200 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. है। इसे इस वर्ग में रखा गया है। पटना, दरभंगा, वैशाली, बेगुसराय, सीतामढ़ी, सारण, सीवान इसके अन्तर्गत हैं। इन जिलों में राज्य की 17.50% भूमिपर 28.17% आबादी रहती है।

(ii) उच्च घनत्व के जिलेइसके अन्तर्गत वे जिले हैं, जहाँ औसत घनत्व 1000-1200 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. के बीच है। मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, गोपालगंज, मधुबनी तथा नालन्दा इस वर्ग में आते हैं। इस समूह में नालन्दा जिला को छोड़कर सभी जिले उत्तरी बिहार में स्थित है।

(iii) मध्यम घनत्व के जिले-इसके अन्तर्गत 1000-800 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. में रहते हैं। पूर्वी चम्पारण, भागलपुर, जहानाबाद, अरवल, भोजपुर, सहरसा, खगड़िया, मधेपुरा, बक्सर और मुंगेर जिले इस वर्ग में सम्मिलित हैं। इन जिलों में राज्य की 24% से अधिक भूमि और राज्य की कुल जनसंख्या की 18% अबादी वास करती है।

(iv) कम घनत्व जिले—इस वर्ग के अन्तर्गत पूर्णिया, कटिहार, अररिया, नवादा, शेखपुरा, सुपौल, गया, किशनगंज, लक्खीसराय, रोहतास और औरंगाबाद जिले आते हैं। इसमें औसत 600-800 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. निवास करते हैं। इन जिलों की लगभग 30% भूमि पर 26% अबादी वास करती है।

(v) अत्यंत कम घनत्व वाले जिले- इस वर्ग में वो आते हैं जिनकी अबादी 600 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. से कम है। इस वर्ग के अन्तर्गत पश्चिमी चम्पारण, बाँका, जमुई और कैमूर जिला आते हैं। जिनका घनत्व 38.2 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी. है। इन जिलों में राज्य की भूमि का 14.58 एवं कुल जनसंख्या का 9% आबादी निवास करती है।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

प्रश्न 2.
बिहार में नगर विकास पर एक विश्लेषण प्रस्तुत करें।
उत्तर-
बिहार में नगरों के विकास का इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ के अधिकतर प्रमुख नगर किसी न किसी नदी के तट पर विकसित है। यहाँ के प्राचीन नगरों का इनमें पाटलिपुत्र, नालन्दा, राजगीर, गया, वैशाली, बोधगया उदवेतपुरी, सीतामढ़ी आदि प्राचीन नगरों के उदाहरण हैं। मध्यकाल में भी यहाँ नगरों का विकास सड़कों के विकास एवं प्रशासनिक कारणो से हुआ था। ऐसे नगरों में, सासाराम, दरभंगा, पूर्णिया, छपरा, सिवान आदि आते हैं। अंग्रेजों के समय में बिहार में कुछ बदलाव आया रेल और सड़क मार्गों का विकास हुआ जिसके किनारे नगर विकसित होने लगे। आजादी के बाद यहाँ नगरों के विकास में तेजी आयी, राज्यों में औद्योगिक विकास स्वास्थ्य शिक्षा एवं जीवन की मौलिक सुविधाओं के कारण कई नए नगर भी विकसित हुए। इनमें बरौनी, हाजीपुर, दानापुर, डालमिया नगर, मुंगेर, जमालपुर कटिहार आदि हैं। किन्तु आज के बिहार में नगरों का विकास भारत के बड़े राज्यों की तुलना में बहुत ही कम हुआ है। यह सबसे कम शहरीकृत सध्य है। – वर्तमान में बिहार में 1 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों की संख्या मात्र एक है। 10 लाख से ऊपर आबादी वाले महानगर में केवल पटना नगर है। 2001 की जनगणना के अनुसार कुल नगरीय बस्तिया की संख्या 131 है।

बिहार के नगरों का कार्यात्मक स्वरूप इनकी उत्पत्ति से सम्बंधित है। यहाँ के पुराने नगर प्रशासन तथा व्यापार से जुड़े हो परन्तु आधुनिक नगर उद्योग, यातायात, व्यापार एवं शिक्षा से सम्बन्धित है। यहाँ के लगभग सभी जिला मुख्यालय शुरू से ही प्रशासनिक कार्य के साथ-साथ थोक व्यवसाय, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे नगरियो कार्यों से विकसित है। बिहार में कुछ चुने हुए नगरों में ही औद्यौगिक इकाइयाँ स्थापित हैं। इनमें मुंगेर, बरौनी, जमालपुर, कटिहार प्रमुख हैं।

बिहार विभाजन से पूर्व टाटानगर इस राज्य का मात्र नियोजित नगर था, जमशेदजी टाटा ने केवल बिहार को बल्कि भारत को आधुनिक नगर नियोजन से सर्वप्रथम परिचय कराया। किन्तु विभाजन के उपरांत बिहार में एक भी नियोजित नगर विकसित नहीं है। बिहार की राजधानी पटना भी आंशिक रूप से विकसित है। बिहार के अधिकतर नगर अव्यवस्थित हैं।

Bihar Board Class 10 Geography Solutions Chapter 5C बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण

Bihar Board Class 10 Geography बिहार : जनसंख्या एवं नगरीकरण Notes

  • यहाँ 3000 वर्ष पूर्व से ही मानव बसाव के प्रमाण मिलते हैं।
  • मगध साम्राज्य में 80 हजार से भी अधिक गाँव आबाद थे।
  • वर्तमान समय में उ. प्र. और महाराष्ट्र के बाद जनसंख्या की दृष्टि से बिहार तीसरा बड़ा राज्य है।
  • 2001 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या-8,2998,509 है। इनमें 4,32,43,795
  • पुरुष एवं 397,54,714 महिलाएँ हैं।
    • बिहार में लिंग अनुपात 919 महिलाएँ प्रति हजार पुरुष हैं।
    • बिहार में प्रतिवर्ग किमी. घनत्व 881 व्यक्ति है।
    • सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला जिला पटना एवं सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला जिला कैमूर है।
    • यहाँ के प्राचीन नगर-पटलीपुत्र, नालन्दा, राजगीर, गया, वैशाली, बोधगया, उदंतपुरी, सीतामढ़ी आदि हैं। ।
    • मध्यकालीन नगर-सासाराम, दरभंगा, पूर्णिया, छपरा, सिवान आदि हैं।
    • डालमियानगर, मुंगेर, बरौनी, जमालपुर, कटिहार इत्यादि आधुनिक नगर हैं।

Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Economics अर्थशास्त्र : हमारी अर्थव्यवस्था भाग 2 Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

Bihar Board Class 10 Economics उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. सही विकल्प चुनें।

प्रश्न 1.
भारत उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की घोषणा कब हुई ?
(क) 1986
(ख) 1980
(ग) 1987
(घ) 1988
उत्तर-
(क) 1986

Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

प्रश्न 2.
उपभोक्ता अधिकार दिवस कब मनाया जाता है ?
(क) 17 मार्च
(ख) 15 मार्च
(ग) 19 अप्रैल
(घ) 22 अप्रैल
उत्तर-
(ख) 15 मार्च

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन नं क्या है ?
(क) 100
(ख) 1000-100
(ग) 1800-11-4000
(घ) 2000-114000
उत्तर-
(ग) 1800-11-4000

प्रश्न 4.
स्वर्णाभूषणों की परिशुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए किस मान्यता प्राप्त चिह्न का होना आवश्यक है ?
(क) ISI मार्क
(ख) हॉल मार्क
(ग) एगमार्क
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) हॉल मार्क

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प्रश्न 5.
यदि किसी वस्तु या सेवा का मूल्य 20 लाख से अधिक तथा 1 करोड़ से कम है जो उपभोक्ता शिकायत करेगा
(क) जिला फोरम
(ख) राज्य आयोग
(ग) राष्ट्रीय आयोग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) राज्य आयोग

प्रश्न 6.
उपभोक्ता द्वारा शिकायत करने के लिए आवेदन शुल्क कितना लगता है.?
(क) 50 रु.
(ख) 70 रु.
(ग) 10 रु. .
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(घ) इनमें से कोई नहीं

II. सही कथन में सही का (V) तथा गलत में (x) का निशान लगाएँ।

प्रश्न 1.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 को संक्षिप्त रूप में कोपरा (COPRA) कहते हैं।
उत्तर-
सही

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन टेलीफोन नं. 15,000 है।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 3.
भारत में ‘सूचना पाने का अधिकार 2005’ कानून बनाया गया।
उत्तर-
सही

प्रश्न 4.
उपभोक्ता को खराब वस्तु या सेवा मिलने पर उत्पादक से मुआवजा पाने का अधिकार है, जो क्षति की मात्रा पर निर्भर करती है।
उत्तर-
सही

प्रश्न 5.
‘हॉलमार्क’ आभूषणों की गुणवत्ता को प्रमाणित करने वाला चिह्न है।
उत्तर-
सही

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आप किसी खाद्य पदार्थ संबंधी वस्तुओं को खरीदते समय कौन-कौन सी मुख्य बातों का ध्यान रखेंगे, बिन्दुवार उल्लेख करें।
उत्तर-
खाद्य पदार्थ संबंधी वस्तुओं को खरीदते समय निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है

  • अवयवों की सूची
  • वजन का परिमाण
  • निर्माता का नाम व पता
  • निर्माण की तिथि।
  • इस्तेमाल की समाप्ति, निर्दिष्ट से पहले इस्तेमाल की तिथि
  • निरामिष सामिष चिह्न
  • डाले गये रंग और खुशबू की घोषणा।
  • पोषाहार का दावा-सम्मिलित पौष्टिक तत्वों की मात्राएँ।
  • स्वास्थ्य के प्रति हानिकारक चेतावनी।
  • वैधानिक चेतावनी तम्बाकू। शिशु के लिए हल्का विकल्प।

प्रश्न 2.
उपभोक्ता जागरण हेतु विभिन्न नारों को लिखें।
उत्तर-
उपभोक्ता जागरण हेतु विभिन्न नारे इस प्रकार हैं

  • सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है।
  • ग्राहक सावधान।
  • अपने अधिकार को पहचानो।
  • जागो ग्राहक जागो।
  • उपभोक्ता के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करें

प्रश्न 3.
कुछ ऐसे कारकों की चर्चा करें जिससे उपभोक्ताओं का शोषण होता है।
उत्तर-
उपभोक्ता के शोषण होने के निम्नलिखित प्रमुख कारक इस प्रकार हैं

  • मिलावट की समस्या-महँगी वस्तुओं में मिलावट करके उपभोक्ता का शोषण होता है
  • कम तौलने द्वारा वस्तुओं की माप में हेरा-फेरी करके भी उपभोक्ता का शोषण होता है
  • कम गुणवत्तावाली वस्तु-उपभोक्ता को धोखे से अच्छी वस्तु के स्थान पर का गुणवत्ता वाली वस्तु देकर शोषण करना।
  • ऊँची कीमत द्वारा-ऊंची कीमतें वसूल करके भी उपभोक्ता का शोषण किया जाता है
  • डुप्लीकेट वस्तुएँ सही कम्पनी की डुप्लीकेट वस्तुएँ प्रदान करके उपभोक्ता का शोषा होता है।

प्रश्न 4.
उपभोक्ता के रूप में बाजार में उनके कुछ कर्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
उपभोक्ता जब कोई वस्तु खरीदता है, तो यह आवश्यक है कि वह उस वस्तु की रसी अवश्य ले ले एवं वस्तु की गुणवत्ता, ब्रांड, मात्रा, शुद्धता, मानक, माप-तौल, उत्पाद/निर्माण के तिथि, उपभोग की अंतिम तिथि, गारंटी/वारंटी पेपर, गुणवत्ता का निशान जैसे आई. एस. आई. एगमार्क, हॉलमार्क (आभूषण) और मूल्य की दृष्टि से किसी प्रकार के दोष, अपूर्णता पाते है तो सेवाएँ लेते समय अतिरिक्त सतर्कता एवं जागरुकता रखें। इस प्रकार उपभोक्ता अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर वस्तुओं एवं सेवाओं की गुणवत्ता को बढ़ा सकता है।

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प्रश्न 5.
उपभोक्ता कौन हैं ? संक्षेप में बतायें।
उत्तर-
उपभोक्ता बाजार व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। व्यक्ति जब वस्तुएँ एवं सेवाएँ अप प्रयोग के लिए खरीदता है तब वह उपभोक्ता कहलाता है। खरीददारी की अनुमति से ऐसी वस्तुऊ और सेवाओं का प्रयोग करने वाला व्यक्ति भी उपभोक्ता है। महात्मा गाँधी के शब्दों में, “उपभोक्ता हमारी दुकान” में आने वाला सबसे महत्वपूर्ण व्यकि है। वह हम पर निर्भर नहीं, हम उनपर निर्भर हैं।”

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उपभोक्ता के कौन-कौन अधिकार हैं ? प्रत्येक अधिकार को सोदाहरण लिखें।
उत्तर-
उपभोक्ता के निम्नलिखित प्रमुख अधिकार इस प्रकार हैं (i) सुरक्षा का अधिकार- उपभोक्ता का प्रथम अधिकार, सुरक्षा का अधिकार है। इर अधिकार का सीधा संबंध बाजार से खरीदी जानेवाली वस्तुओं और सेवाओं से जुड़ा हुआ है उपभोक्ता को ऐसी वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है जिससे उसके शरी या सम्पत्ति को हानि हो सकती है। जैसे—बिजली का आयरन विद्युत आपूर्ति की खराबी के कारण करंट मार देता है या एक डॉक्टर ऑपरेशन करते समय लापरवाही बरतता है जिसके कारण मरील को खतरा या हानि होती है।

(ii) सूचना पाने का अधिकार– उपभोक्ता को वे सभी आवश्यक सूचनाएं भी प्राप्त कर का अधिकार है जिसके आधार पर वह वस्तु या सेवाएँ खरीदने का निर्णय कर सकते हैं। जैसे पैकेट बंद सामान खरीदने पर उसका मूल्य, इस्तेमाल करने की अवधि, गुणवत्ता इत्यादि की सूचना प्राप्त करें।

(iii) चुनाव या पसंद करने का अधिकार-उपभोक्ता अपने अधिकार के अन्तर्गत विभिन्न निर्माताओं द्वारा निर्मित विभिन्न ब्राण्ड, किस्म, गुणा, रूप, रंग, आकार तथा मूल्य की वस्तुओं में किसी भी वस्तु का चुनाव करने को स्वतंत्र है।

(iv) सुनवाई का अधिकार-उपभोक्ता को अपने हितों को प्रभावित करनेवाली सभी बातों को उपयुक्त मंचों के समक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है। उपभोक्ता को अपने मंचों के साथ जुड़कर अपने बातों को रखनी चाहिए।

(v) शिकायत निवारण या क्षतिपूर्ति का अधिकार-यह अधिकार लोगों को आश्वासन प्रदान करता है कि क्रय की गयी वस्तु या सेवा उचित ढंग की नहीं निकले तो उन्हें मुआवजा दिया जायेगा।

(vi) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार-उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार के अन्तर्गत किसी .. वस्तु के मूल्य, उसकी उपयोगिता, कोटि तथा सेवा की जानकारी तथा अधिकारों से ज्ञान प्राप्ति की सुविधा जैसी बातें आती हैं जिसके माध्यम से शिक्षित उपभोक्ता धोखाधड़ी या दगाबाजी से बचने के लिए स्वयं सबल संरक्षित एवं शिक्षित हो सकते हैं एवं उचित न्याय के लिए खड़े हो सकते हैं। इसलिए एक सजग उपभोक्ता बने रहने के लिए निरंतर शिक्षा पाने का अधिकार दिया गया है।

Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

प्रश्न 2.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की मुख्य विशेषताओं को लिखें।
उत्तर-
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  • यह सभी वस्तुओं एवं सेवाओं पर लागू होता है जब तक कि केन्द्रीय सरकार ने विशेष छूट नहीं दी हो।
  • यह सभी क्षेत्रों पर लागू होता है चाहे वह निजी क्षेत्र हो, सार्वजनिक क्षेत्र हो अथवा .सहकारिता का क्षेत्र हो।
  • इस अधिनियम के प्रावधान प्रकृति से क्षतिपूरक हैं। दूसरे शब्दों में, यह अधिनियम उपभोक्ताओं को अन्य कानूनों में उपलब्ध निवारण के अतिरिक्त निवारण प्रदान करता है तथा उनमें से चुनाव उसकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है। .
  • सुरक्षा, सूचना, चयन, प्रतिनिधित्व, शिकायत निवारण एवं उपभोक्ता शिक्षा से संबंधित अधिकारों को उच्च स्थान प्रदान करता है।
  • उपभोक्ता को कुछ अनुचित एवं पतिबंधात्मक व्यापार, कार्यवाहियों, सेवाओं में कमियों. अथवा बुराइयों एवं सेवाओं को रोक लेने पर रोक लगाने तथा बाजार से खतरनाक वस्तुओं को हटाने की मांग का अधिकार है।

प्रश्न 3.
उपभोक्ता संरक्षण हेतु सरकार द्वारा गठित न्यायिक प्रणाली (त्रिस्तरीय प्रणाली)को विस्तार से समझायें।
उत्तर-
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत उपभोक्ताओं को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था की गयी है जिसे तीन स्तरों पर स्थापित किया गया है

  • राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग
  • राज्य स्तर पर राज्य स्तरीय आयोग।
  • जिला स्तर पर जिला मंच (फोरम)।

उपभोक्ताओं की शिकायतों के समाधान अथवा उपभोक्ता-विवादों के निपटारे हेतु सरकार द्वारा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में त्रिस्तरीय अर्द्ध-न्यायिक व्यवस्था है जिसमें जिला * मंचों, राज्य आयोग एवं राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गयी है।

यह न्यायिक व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी एवं व्यावहारिक है। इस व्यवस्था से उपभोक्ताओं को त्वरित (जल्दी) एवं सस्ता न्याय प्राप्त होता है और समय एवं धन की बचत होती है। जिस तरह आदालतों में मुकदमे दायर होते हैं उसी तरह उनकी सुनवाई की होती है। पहले शिकायत जिला फोरम में की जाती है। शिकायतकर्ता अगर संतुष्ट नहीं है, तो मामला को राज्य फोरम फिर राष्ट्रीय फोरम में ले जा सकता है। पुनः अगर उपभोक्ता राष्ट्रीय फोरम से संतुष्ट नहीं होता तो वह आदेश के 30 दिनों के अंदर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में अपील कर सकता है।
अतः सरकार त्रिस्तरीय प्रणाली द्वारा उपभोक्ता शिकायतों का निवारण करती है और उसे हर संभव न्याय देती है।

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प्रश्न 4.
दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरुकता की जरूरतों का वर्णन करें।
उत्तर-
(i) व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना है किन्तु कुछ व्यापारी अधिक लाभ कमाने की इच्छा से उपभोक्ताओं का शोषण करने लगे जिसके कारण एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता महसूस हुई जिससे उपभोक्ता के हितों की रक्षा की जा सके। । (ii) कभी-कभी उपभोक्ता व्यापारियों के द्वारा अपने आपको ठगा हुआ महसूस करता है। – उसे चुकाये गये मूल्य के बराबर वस्तु अथवा सेवा प्राप्त नहीं होती। यहाँ तक कि कभी-कभी उसे मिलावट की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं जिससे उसे अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उसे उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 5.
मानवाधिकार अधिकार आयोग के महत्व को लिखें।।
उत्तर-
हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक उच्चतम संस्था है जो मानवीय अधिकारों की रक्षा और उनके अधिकार से संबंधित हितों के लिए सुरक्षा प्रदान करती है। इस संस्था को राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था कहते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का महत्व इस बात से बढ़ जाता है कि इसके अध्यक्ष भारत के उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त प्रधान न्यायाधीश होते हैं। इसी तरह देश के प्रत्येक राज्य में एक राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है जो देश के नागरिकों के अधिकारऔर सुरक्षा संबंधी बातों को देखती है। विगत दिनों इस आयोग के कार्यों को देखने से पता लगता है कि यह अति संवेदनशील है। अतः कहा जा सकता है कि मानवाधिकार आयोग का बहुत अधिक महत्व है। इसके अन्तर्गत मानवीय अधिकारों का संरक्षण होता है।

परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
आपका विद्यालय उपभोक्ता जागरूकता हेतु आपके वर्ग में एक पोस्टर प्रतियोगिता आयोजन करता है जिसमें सभी उपभोक्ता अधिकार बिन्दुवार शामिल करते हुए एक पोस्टर तैयार करें।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
आकर्षक नारा संबंधी विज्ञापन तैयार करें।
उत्तर-

  1. जागो ग्राहक जागो।
  2. अपने अधिकारों को पहचानो।

प्रश्न 3.
सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 3.
अपने आस-पास के चार-पाँच लोगों का प्रश्नावली के आधार पर साक्षात्कार लें जिसमें यह पता चले कि वे शोषण के शिकार कहाँ और कैसे हुए हैं ? उनके शोषण के अनुभवों को कहानीबद्ध करें।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 4.
उपभोक्ता अधिकार से संबंधित प्रश्नावली को वितरित कर अपने क्षेत्र का सर्वेक्षण करें और जानें कि वे उपभोक्ता के रूप में कितने जागरुक है ?
Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण - 1
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टिप्पणी-
(क) यदि प्रश्न 5,12,13,15 और 16 के लिए आपका उत्तर ‘ग’ और शेष के लिए ‘क’ है, तो आप उपभोक्ता के रूप में पूरी तरह जागरुक हैं।
(ख) अगर प्रश्न 5,12,13,15 और 16 के लिए आपका उत्तर ‘क’ और शेष के लिए ‘ग’ है. तो आपको उपभोक्ता के रूप में जागरुक होने की जरूरत है।
(ग) यदि सभी प्रश्नों के लिए आपका उत्तर ‘ख’ है, तो आप आशिक रूप से जागरुक हैं।

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Bihar Board Class 10 Economics उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपभोक्ताओं के शोषण के मुख्य प्रकार है
(क) माप-तौल में कमी
(ख) मिलावट
(ग) भ्रामक प्रचार
(घ) इनमें तीनों ही
उत्तर-
(घ) इनमें तीनों ही

प्रश्न 2.
‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ पारित हुआ
(क) 1982 में
(ख) 1984 में
(ग) 1986 में
(घ) 1991 में
उत्तर-
(ग) 1986 में

प्रश्न 3.
‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ के अन्तर्गत उपभोक्ताओं की अपील सुनने का अधिकार है
(क) राज्य आयोग को
(ख) राष्ट्रीय आयोग को
(ग) दोनों को
(घ) इनमें कोई नहीं
उत्तर-
(ग) दोनों को

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प्रश्न 4.
विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस कब मनाया जाता है।
(क) 15 जनवरी को
(ख) 15 मार्च को
(ग) 15 अप्रैल को
(घ) 15 दिसंबर को
उत्तर-
(ख) 15 मार्च को

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन भोज्य पदार्थों की शद्धता की गारंटी देता है ?
(क) हॉलमार्क
(ख) एगमार्क
(ग) आई.एस.आई.
(घ) बुलमार्क
उत्तर-
(ख) एगमार्क

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उपभोक्ता शोषण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
उत्पादकों तथा विक्रेताओं के द्वारा जब किसी वस्तु को उपभोक्ताओं के बीच बेचा जाता है तथा उपभोक्ताओं द्वारा उसकी गुणवत्ता की जाँच करने पर गलत पाया जाता है तो इसे ही हम उपभोक्ता शोषण कहते हैं।

प्रश्न 2.
बाजार में अनुचित व्यापार कब अधिक होता है ?
उत्तर-
खाद्यान्न की कमी अत्यधिक होने के कारण या किसी भी वस्तु की बाजार में अत्यधिक माँग होने पर उस वस्तु की कमी होना, बाजार में अनुचित व्यापार को बढ़ावा देता है। कालाबाजारी जमाखोरी इत्यादि अनुचित व्यापार-आरंभ हो जाते हैं।

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प्रश्न 3.
बाजार में नियमों और विनिमयों की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?
उत्तर-
बाजार में उपभोक्ताओं के शोषण को रोकने तथा उनके अधिकारों की रक्षा के लिए नियमों और विनियमों की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 4.
‘उपभोक्ता जागरूकता आंदोलन’ का प्रारंभ सर्वप्रथम किस देश में हुआ?
उत्तर-
उपभोक्ता जागरूकता आंदोलन का प्रारंभ सर्वप्रथम इंगलैंड में हुआ।

प्रश्न 5.
उपभोक्ता अधिकारों की घोषणा सर्वप्रथम कब और कहाँ हुई थी?
उत्तर-
उपभोक्ता अधिकारों की घोषणा 1962 में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई।

प्रश्न 6.
“विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस’ कब मनाया जाता है?
उत्तर-
15 मार्च को प्रत्येक वर्ष विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रश्न 7.
‘कोपरा’ क्या है?
उत्तर-
सरकार द्वारा 1986 में पारित उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को ही संक्षेप में ‘कोपरा’ कहते हैं।

प्रश्न 8.
क्या “कोपरा’ केवल वस्तुओं के विक्रय पर लागू होता है ?
उत्तर-
कोपरा’ वस्तुओं के विक्रय के साथ-साथ उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा तथा दंड देने के स्थान पर क्षतिपूर्ति की व्यवस्था करती है।

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प्रश्न 9.
जब आप कोई सौंदर्य प्रसाधन या दवा खरीदते हैं तो उसके पैकेट पर किस प्रकार की जानकारी रहती है ?
उत्तर-
सौंदर्य प्रसाधन या दवा खरीदते समय उसके पैकेट पर उस वस्तु के उत्पादक कम्पनी का नाम मूल्य, निर्माण की तिथि, अंतिम तिथि आदि की जानकारी दी हुई रहती है।

प्रश्न 10.
उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए किस प्रकार के कानून बनाए गए हैं.
उत्तर-
उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 बनाए गए हैं। जो एक कानूनी उपाय है।

प्रश्न 11.
उपभोक्ताओं की क्षति होने पर उन्हें किस प्रकार का अधिकार प्रदान किया गया है?
उत्तर-
उपभोक्ताओं की क्षति होने पर उन्हें क्षतिपूर्ति अधिकार की व्यवस्था की गयी है। इसके लिए सरकार में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की व्यवस्था की जिसके अंतर्गत दंड देने के स्थान पर क्षतिपूर्ति की व्यवस्था. है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
बाजार में उपभोक्ताओं का किस प्रकार से शोषण किया जाता है ?
उत्तर-
बाजार में उपभोक्ताओं को निम्न प्रकार से शोषण किया जाता है

  • विक्रेता प्रायः वस्तुओं का उचित ढंग से माप-तौल नहीं करता तथा माप-तौल में कमी करते हैं।
  • कई अवसरों पर विक्रेता ग्राहकों से वस्तुओं के निर्धारित खुदरा मूल्य से अधिक राशि वसूलते हैं।
  • बाजारों में प्रायः घी, खाद्य पदार्थ, मसालों आदि में मिलावट होती है।
  • कई बार विक्रेता या उत्पादक उपभोक्ताओं को गलत था अधूरी जानकारी देकर धोखे में डाल देते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में किन कारणों से उपभोक्ता जागरूकता आंदोलन का प्रारंभ हुआ? संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
भारत में एक सामाजिक शक्ति के रूप में उपभोक्ता आंदोलन का उदय व्यापारियों के अनुचित व्यवसाय व्यवहार के कारण हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात खाद्यान्न की अत्यधिक कमी होने के कारण जमाखोरी और कालाबाजारी बहुत बढ़ गयी थी। अत्यधिक लाभ कमाने के लालच में उत्पादक और विक्रेता खाद्य पदार्थों में मिलावट करने लगे थे। इसके विरोध में देश में उपभोक्ता आंदोलन संगठित रूप में प्रारंभ हुआ। 1970 के इराक में कई उपभोक्ता संगठन जन-प्रदर्शन तथा पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित करने लगे थे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी विक्रेता उपभोक्ताओं को निर्धारित मात्रा में तथा उचित समय पर वस्तुओं की आपूर्ति नहीं करते थे तथा कई प्रकार से मनमानी करते थे। विगत वर्षों के अंतर्गत देश में उपभोक्ता संगठनों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है जिन्होंने उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने का प्रयास किया हैं उपभोक्ता आंदोलनों ने व्यापारिक संस्थानों तथा सरकार दोनों को अनुचित व्यवसाय व्यवहार में सुधार लाने के लिए बाध्य किया है। सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को पारित किया।

Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

प्रश्न 3.
दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता आंदोलन की आवश्यकता का वर्णन करें।
उत्तर-
उपभोक्ता जागरण की आवश्यकता अनेक अवसरों पर महसूस की जाती है जैसे शिक्षण संस्थाएँ अपने लुभावने प्रचारों के माध्यम से छात्रों को आकर्षित करते हैं, लेकिन वास्तव में वहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती। डॉक्टरों के द्वारा मरीज देखते समय फीस के बारे में जानकारी नहीं दी जाती है जिससे मरीजों का खूब शोषण होता हैं कई बार डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की जान भी चली जाती है।
अतः इन सभी मामले ने उपभोक्ता जागरूकता आंदोलन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 4.
भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित करने की आवश्यकता क्यों हुई?
उत्तर-
भारत में काफी समय पूर्व से ही उपभोक्ताओं को कई प्रकार से शोषण किया जाता रहा है। कभी माल या सेवा की घटिया किस्म के कारण तो कभी माप-तौल के कारण, कभी नकली वस्तु उपलब्ध होने के कारण, कभी वस्तु की कालाबाजारी, या जमाखोरी के कारण तो कभी स्तरहीन विज्ञापनों के कारण उपभोक्ताओं को अनदेखी की जा रही थी। सरकार ने उपभोक्ताओं की हितों की रक्षा के लिए समय-समय पर कदम उठाते हुए अनेक उपभोक्ता कानून बनाए हैं और वर्तमान में सरकार द्वारा विभिन्न माध्यमों से उपभोक्ता को जागरूक बनाने का सतत् प्रयास किया जा रहा है। ताकि लोग अपने अधिकारों को समझ सकें और अपनी शिकायत का निवारण कर सकें। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार के सामने उपभोक्ता संरक्षण
अधिनियम (1986) पारित करने की आवश्यकता महसूस हुई।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में उपभोक्ताओं का किस प्रकार शोषण किया जाता है ? उपभोक्ताओं के क्या अधिकार है तथा उनके संरक्षण के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं ?
उत्तर-
भारतीय अर्थव्यवस्था में उपभोक्ताओं की स्थिति सोचनीय है। वे सदैव व्यवसायियों द्वारा अनुचित लाभ कमाने के उद्देश्य से ठगे जाते हैं, साथ ही उनमें शिक्षा की कमी गरीबी का प्रभाव और जागरूकता अभाव के कारण भी उपभोक्ता शोषण के शिकार होते हैं। वर्तमान समय में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहाँ उपभोक्ताओं का शोषण नहीं हो रहा हो वह चाहे शिक्षा का क्षेत्र दो या बैकिंग, दूरसंचार, डाक, खाद्य सामग्री या फिर भवन निर्माण। सभी क्षेत्र में त्रुटि लापरवाही और कालाबाजारी उपभोक्ता के लिए घातक सिद्ध हो रही है। उपभोक्ता का कई प्रकार से शोषण किया जाता है यानि कभी माल या सेवा की घटिया किस्म के कारण तो कभी कम माप-तौल के कारण, कभी नकली वस्तु उपलब्ध होने के कारण, कभी वस्तु की कालाबाजारी या जमाखोरी के कारण तो कभी स्तरहीन विज्ञापनों के कारण।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 6 के अंतर्गत उपयोगताओं को कछ अधिकार प्रदान किए गए हैं जो निम्नलिखित हैं-

  • जान-माल के लिए खतरनाक वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री के विरुद्ध संरक्षण का अधिकार।
  • वस्तुओं की सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, मानक और मूल्य संबंधी सूचना का अधिकार।
  • विभिन्न वस्तुओं को देख परखकर चुनाव करने तथा प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर उन्हें प्राप्त करने का अधिकार।
  • उपभोक्ताओं को उचित स्थान पर अपनी शिकायत दर्ज कराने का अधिकार।
  • अनुचित व्यापार तरीकों एवं शोषण के विरुद्ध न्याय पाने का अधिकार।
  • उपभोक्ता प्रशिक्षण का अधिकार।

उपभोक्ताओं के अधिकार की रक्षा एवं हितों का संरक्षण करने के लिए सरकारी स्तर पर ‘केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद्’ एवं राज्य स्तर पर ‘राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद’ की स्थापना की गयी है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986′ के तहत उपभोक्ताओं को उनकी
शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था दी गई है जिसे तीन स्तरों पर स्थापित किया गया है
(i) राष्ट्रीय स्तर पर ‘राष्ट्रीय स्तरीय आयोगा
(ii) राज्य तर पर ‘राज्य स्तरीय आयोगा
(iii) जिला स्तर पर जिला मंच’ (फोरम)।
न्यायिक व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए बहुत ही उपयोगी एवं व्यवहारिक है।

Bihar Board Class 10 Economics Solutions Chapter 7 उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण

Bihar Board Class 10 Economics उपभोक्ता जागरण एवं संरक्षण Notes

  • समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक उपभोक्ता है तथा इसमें बच्चे, बूढ़े आदि सभी शामिल है।
  • उपभोक्ता जागरूकता आंदोलनसर्वप्रथम इंग्लैंड में प्रारंभ हुआ।
  • उपभोक्ता अधिकारों की घोषणा सर्वप्रथम 1962 में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई।
  • 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस’ के रूप में मनाते हैं।
  • शेल्फ नादर उपभोक्ता आंदोलन के प्रवर्तक माने जाते हैं।
  • भारत में उपभोक्ता आंदोलन का उदय व्यापारियों के अनुचित व्यवसाय व्यवहार के कारण हुआ।
  • उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए भारत सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया है।
  • सरकार ने जागो ग्राहक, जागो’ के नारे से उपभोक्ता जागरण के लिए एक व्यापक प्रचार प्रसार अभियान आरंभ किया है।.
  • सूचना का अभाव उपभोक्ता शोषण का एक प्रमुख कारण है।
  • सुरक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार तथा चयन का अधिकार उपभोक्ताओं के कुछ प्रमुख अधिकार है।
  • उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सरकार ने तीन प्रकार के उपाय कानूनी प्रशासनिक एवं तकनीकी अपनाए हैं।
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 उपभोक्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने का एक कानूनी
  • उपाय है तथा इसके अंतर्गत दंड देने के स्थान पर उपभोक्ताओं की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई है।
  • अधिनियम में राष्ट्र, राज्य एवं जिला स्तर पर एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र स्थापित करने का प्रावधान है।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थापना उपभोक्ता संरक्षण के लिए अपनाया गया एक प्रशासनिक उपाय है।
  • उपभोक्ताओं की हितों की रक्षा के लिए उत्पादों का मानकीकरण एक तकनीकी उपाय है।
  • भारतीय मानक ब्यूरों हमारे देश की प्रमुख मानकीकरण संस्था है।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना 1993 में हुई।
  • 24 दिसंबर भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • भी भारत में करीब 700 गैर-सरकारी उपभोक्ता संगठन है।
  • ग्राहकों के पास रसीद नहीं होने से उपभोक्ता के लिए प्रमाण एकत्र करना कठिन हो जाता है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत

BSEB Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 10 Science उर्जा के स्रोत InText Questions and Answers

अनुच्छेद 14.1 पर आधारित

प्रश्न 1.
ऊर्जा का उत्तम स्रोत किसे कहते हैं?
उत्तर:
ऊर्जा का उत्तम स्रोत, वह स्रोत है जो।

  1. प्रति इकाई द्रव्यमान या आयतन में अधिक कार्य करता हो।
  2. आसानी से प्राप्त हो सके।
  3. आसानी से भंडारित एवं परिवहित हो सके।
  4. सस्ता और सुरक्षित हो।

प्रश्न 2.
उत्तम ईंधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
उत्तम ईंधन वह ईंधन है –

  1. जिसका कैलोरी मान अधिक हो।
  2. जिसका मध्यम ज्वलन ताप हो।
  3. जिसके दहन के पश्चात् हानिकारक गैसें उत्पन्न न होती हों।
  4. जो दहन के पश्चात् ठोस अवशेष न छोड़ता हो।
  5. जो सस्ता हो एवं जिसका रख-रखाव आसान हो।

प्रश्न 3.
यदि आप अपने भोजन को गरम करने के लिए किसी भी ऊर्जा-स्रोत का उपयोग कर सकते हैं तो आप किसका उपयोग करेंगे और क्यों?
उत्तर:
हम ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत का उपयोग करेंगे जो प्रदूषण उत्पन्न न करता हो; क्योंकि उपर्युक्त विशेषता का ईंधन प्रकृति में असंतुलन उत्पन्न नहीं करेगा और पुनः स्थापित हो जाएगा जिससे बार-बार उपयोग हो सके।

अनुच्छेद 14.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
जीवाश्मी ईंधन की क्या हानियाँ हैं?
उत्तर:
जीवाश्मी ईंधन उपयोग करने की निम्नलिखित हानियाँ हैं –

  1. जीवाश्मी ईंधन बनने में लाखों वर्ष लगते हैं और इनके भंडार सीमित हैं।
  2. जीवाश्मी ईधन अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत हैं।
  3. जीवाश्मी ईंधन जलने से वायु-प्रदूषण होता है।

कार्बन, सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का जलीय विलयन अम्लीय होता है। अत: जीवाश्मी ईंधनों के धुएँ अम्लीय वर्षा
के कारक हैं जो मनुष्य में श्वसन सम्बन्धी तथा शरीर के खुले अंगों में जलन पैदा करते हैं।

प्रश्न 2.
हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर क्यों ध्यान दे रहे हैं?
उत्तर:
तकनीकी विकास के साथ-साथ ऊर्जा की खपत भी बढ़ रही है। हमारी बदलती जीवन शैली, अपने आराम के लिए अधिक-से-अधिक मशीनों के उपयोग के कारण भी ऊर्जा की माँग अधिक हो रही है। यह ऊर्जा की माँग की आपूर्ति परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से पूरी नहीं हो पा रही है। अतः हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत

प्रश्न 3.
हमारी सुविधा के लिए पवनों तथा जल ऊर्जा के पारंपरिक उपयोग में किस प्रकार के सुधार किए गए हैं?
उत्तर:
जल और पवनें ऊर्जा के परंपरागत स्रोत हैं। शुरू में इनकी ऊर्जा का उपयोग बहुत सीमित था, परन्तु तकनीकी विकास के कारण ये एक मुख्य ऊर्जा स्रोत की तरह विकसित हो रहे हैं। इस क्रम में निम्नलिखित सुधार किए गए हैं –
1. पवन ऊर्जा एक प्रदूषण-मुक्त ऊर्जा स्रोत है। पवन-चक्की द्वारा पवन की गतिज ऊर्जा का उपयोग यांत्रिक कार्य जैसे कुएँ से जल निकालना और विद्युत जनित्र चलाकर इसे विद्युत ऊर्जा में बदलकर विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा रहा है।

2. बहते जल का उपयोग सामान्यत: यातायात के लिए किया जाता था परन्तु अब बाँध बनाकर इस ऊर्जा को जल विद्युत ऊर्जा में बदलकर विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा रहा है। उपर्युक्त सम्बन्ध में नई तकनीक के प्रयोग द्वारा उच्च दक्षता की मशीनें बनाकर अधिक मात्रा में ऊर्जा का दोहन सुलभ हो गया है।

अनुच्छेद 14.3 पर आधारित

प्रश्न 1.
सौर कुकर के लिए कौन-सा दर्पण-अवतल, उत्तल अथवा समतल सर्वाधिक उपयुक्त होता है? क्यों?
उत्तर:
सौर कुकर के लिए अवतल दर्पण सर्वाधिक उपयुक्त होता है क्योंकि यह सूर्य से आने वाले विकिरण को ठीक से एक बिन्दु पर फोकस कर सकता है जिससे उच्च ऊष्मा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 2.
महासागरों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जाओं की क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर:
यद्यपि महासागर ऊर्जा के बडे स्रोत हैं, परन्तु औद्योगिक स्तर पर इनका दोहन कठिन है।

प्रश्न 3.
भूतापीय ऊर्जा क्या होती है?
उत्तर:
भूमि के नीचे स्थित गर्न स्थानों से प्राप्त ऊष्मा अथवा ऊष्मीय ऊर्जा भूतापीय ऊर्जा कहलाती

प्रश्न 4.
नाभिकीय ऊर्जा का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
नाभिकीय ऊर्जा एक गैर परंपरागत ऊर्जा है। आजकल विखंडन से प्राप्त ऊर्जा का सफलतापूर्वक उपयोग हो रहा है। संलयन अभिक्रिया से प्राप्त ऊर्जा के दोहन की संभावना व्यक्त की जा रही है।

अनुच्छेद 14.4 पर आधारित

प्रश्न 1.
क्या कोई ऊर्जा स्रोत प्रदूषण मुक्त हो सकता है? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर:
किसी भी प्रकार के ऊर्जा स्रोत के समाप्त होने से वातावरण असंतुलित होता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि कोई भी ऊर्जा स्रोत प्रदूषण मुक्त नहीं हो सकता है। उदाहरणार्थ, यदि हम लकड़ी को ऊर्जा स्रोत की तरह उपयोग करते हैं तब पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न होता है। वायु में CO2 और O2 का भी संतुलन प्रभावित होता है। लकड़ी जलने से उत्पन्न CO2 SO2 और NO2 वायु-प्रदूषण करते हैं। यहाँ तक कि सौर ऊर्जा के अधिक उपयोग से भूमंडलीय ऊष्मीय प्रभाव उत्पन्न होगा।

प्रश्न 2.
रॉकेट ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता रहा है? क्या आप इसे CNG की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन मानते हैं? क्यों अथवा क्यों नहीं?
उत्तर:
निम्नलिखित कारणों से हाइड्रोजन CNG की अपेक्षा एक स्वच्छ ईंधन माना जाता है –

  1. हाइड्रोजन का कैलोरी मान CNG की अपेक्षा अधिक है।
  2. CNG एक परंपरागत ऊर्जा स्रोत है जबकि H2 नहीं है।
  3. CNG एक ग्रीन हाउस गैस है जबकि H2 नहीं है। H2 प्रदूषण नहीं फैलाती है।
  4. CNG के दहन से CO तथा CO2 मुक्त होती हैं जबकि H2 के दहन से ऐसी हानिकारक गैसें उत्पन्न नहीं होती हैं।

अनुच्छेद 14.5 पर आधारित

प्रश्न 1.
ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप नवीकरणीय मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर:
दो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत निम्नवत् हैं –
(a) जल ऊर्जा बहते जल में उपस्थित ऊर्जा को जल ऊर्जा कहते हैं। यहाँ ऊँचाई से नीचे बहते जल की ऊर्जा का उपयोग कर लिया जाता है तथा उपयोग के बाद बहता हुआ जल समुद्र में चला जाता है। जल चक्र के कारण जल पुन: ऊँचाई पर पहुँच जाता है। इसलिए जल ऊर्जा को नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहते हैं।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत

(b) पवन ऊर्जा हम पवन ऊर्जा का विभिन्न कार्यों के लिए उपयोग करते हैं। प्रकृति में पवनें चक्रीय प्रक्रमों के कारण उत्पन्न होती हैं। इसलिए यह भी ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।

प्रश्न 2.
ऐसे दो ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखिए जिन्हें आप समाप्य मानते हैं। अपने चयन के लिए तर्क दीजिए।
उत्तर:
कोयला और पेट्रोलियम ऊर्जा के समापन योग्य स्रोत हैं क्योंकि यदि वे पुनर्स्थापित भी हों तो इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लग जाएँगे।

Bihar Board Class 10 Science उर्जा के स्रोत Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
गर्म जल प्राप्त करने के लिए हम सौर जल तापक का उपयोग किस दिन नहीं कर सकते?
(a) धूप वाले दिन
(b) बादलों वाले दिन
(c) गरम दिन
(d) पवनों (वायु) वाले दिन
उत्तर:
(b) बादलों वाले दिन

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन जैवमात्रा ऊर्जा स्रोत का उदाहरण नहीं है?
(a) लकड़ी
(b) गोबर गैस
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) कोयला
उत्तर:
(c) नाभिकीय ऊर्जा

प्रश्न 3.
जितने ऊर्जा स्रोत हम उपयोग में लाते हैं उनमें से अधिकांश सौर ऊर्जा को निरूपित करते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा ऊर्जा स्रोत अंततः सौर ऊर्जा से व्युत्पन्न नहीं है?
(a) भूतापीय ऊर्जा
(b) पवन ऊर्जा
(c) नाभिकीय ऊर्जा
(d) जैवमात्रा
उत्तर:
(c) नाभिकीय ऊर्जा

प्रश्न 4.
ऊर्जा स्रोत के रूप में जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर:
जीवाश्मी ईंधनों तथा सूर्य की तुलना –
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प्रश्न 5.
जैव मात्रा तथा ऊर्जा स्रोत के रूप में जल विद्युत की तुलना कीजिए और उनमें अंतर लिखिए।
उत्तर:
जैव मात्रा तथा जल विद्युत की तुलना –
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प्रश्न 6.
निम्नलिखित से ऊर्जा निष्कर्षित करने की सीमाएँ लिखिए
(a) पवनें
(b) तरंगें
(c) ज्वार-भाटा
उत्तर:
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प्रश्न 7.
ऊर्जा स्रोतों का वर्गीकरण निम्नलिखित वर्गों में किस आधार पर करेंगे?
(a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय
(b) समाप्य तथा अक्षय
क्या
(a) तथा
(b) के विकल्प समान हैं?
उत्तर:
(a) नवीकरणीय तथा अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत जल ऊर्जा, पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि ऊर्जा के वे स्रोत जो बार-बार उपयोग किए जा सकते हैं, उन्हें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहते हैं। परन्तु वे ऊर्जा स्रोत जिनके भंडार सीमित हैं और जिनके पुनर्स्थापन में लाखों वर्ष लगते हैं उन्हें अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कहते हैं; जैसे-कोयला और पेट्रोलियम।

(b) समाप्य तथा अक्षय ऊर्जा स्रोत अनवीकरणीय स्रोत की पुनर्स्थापना में लाखों वर्ष लगते हैं। अतः इसे समाप्य ऊर्जा स्रोत कहा जा सकता है। ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत; जैसे-पवन, जल और सौर ऊर्जा का उपयोग बार-बार और लम्बे समय तक किया जा सकता है। अत: ये अक्षय ऊर्जा स्रोत हैं।

उपर्युक्त तथ्य के आधार पर हम कह सकते हैं कि –
(a) और
(b) के विकल्प समान हैं।

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प्रश्न 8.
ऊर्जा के आदर्श स्रोत में क्या गुण होते हैं?
उत्तर:
ऊर्जा के आदर्श स्रोत में निम्नलिखित गुण होते हैं।

  1. इकाई द्रव्यमान ऊर्जा स्रोत से अधिक मात्रा में कार्य होना चाहिए।
  2. यह आसानी से प्राप्त होने वाला होना चाहिए।
  3. इसका भंडारण और परिवहन भी आसान होना चाहिए।
  4. यह सस्ता होना चाहिए।

प्रश्न 9.
सौर कुकर का उपयोग करने के क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? क्या ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर कुकरों की सीमित उपयोगिता है?
उत्तर:
लाभ सौर कुकर उपयोग करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. यह बिना प्रदूषण किए भोजन पकाने में सहायक है।
  2. सौर कुकर का उपयोग सस्ता है; क्योंकि सौर ऊर्जा के उपयोग का मूल्य नहीं चुकाना पड़ता है।
  3. सौर कुकर का रख-रखाव आसान होता है। इसमें किसी प्रकार के खतरे की संभावना नहीं होती है।

हानियाँ सौर कुकर उपयोग करने की निम्नलिखित हानियाँ हैं –

  1. रात में और बादल वाले दिनों में सौर कुकर का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
  2. यह भोजन पकाने में अधिक समय लेता है।
  3. सौर कुकर के परावर्तक की दिशा लगातार बदलते रहना पड़ता है जिससे सूर्य की रोशनी सौर कुकर में प्रवेश कर सके।
  4. सभी स्थानों पर हर समय सूर्य की रोशनी उपलब्ध नहीं होती है।

सौर कुकर के सीमित उपयोगिता वाले क्षेत्र हाँ, कछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ सौर ककर की सीमित उपयोगिता है। ध्रुवों पर जहाँ सूर्य आधे वर्ष तक नहीं दिखाई देता है वहाँ सौर कुकर का उपयोग सीमित है। पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ सूर्य की किरणें कुछ समय के लिए और काफी तिरछी पड़ती हैं वहाँ सौर कुकर का उपयोग बहुत कठिन है।।

प्रश्न 10.
ऊर्जा की बढ़ती माँग के पर्यावरणीय परिणाम क्या हैं? ऊर्जा की खपत को कम करने के उपाय लिखिए।
उत्तर:
आधुनिकीकरण तथा बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने में जुटे उद्योगों में ऊर्जा की अधिक आवश्यकता है। ऊर्जा की बढ़ती माँग के निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं –
1. ऊर्जा की बढ़ती माँग ऊर्जा स्रोत को समाप्त कर सकती है जो पर्यावरणीय असन्तुलन उत्पन्न कर सकती है।
2. ऊर्जा की बढ़ती माँग से परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का अधिक दोहन होगा। इनके प्राकृतिक भंडार सीमित हैं। अतः भविष्य में ऊर्जा ह्रास की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

ऊर्जा के उपयोग को सीमित करने के लिए निम्नलिखित सुझाव हैं –
1. ऊर्जा के दुरुपयोग को रोककर एवं न्यायसंगत उपयोग से ऊर्जा का उपयोग घटाया जा
सकता है।
2. ऊर्जा के अनवीकरणीय स्त्रोतों पर भार को कम करने के लिए गैर-परंपरागत और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों; जैसे—पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा, महासागरीय ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।

Bihar Board Class 10 Science उर्जा के स्रोत Additional Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव गैस एक उत्तम ईंधन है, इसमें कितने प्रतिशत ईंधन गैस होती है?
(a) 65%
(b) 75%
(c) 85%
(d) 70%
उत्तर:
(b) 75%

प्रश्न 2.
भारत का पवन ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन करने वाले देशों में कौन-सा स्थान है?
(a) पहला
(b) दूसरा
(c) चौथा
(d) पाँचवाँ
उत्तर:
(d) पाँचवाँ

प्रश्न 3.
तमिलनाडु में कन्याकुमारी के समीप भारत का विशालतम पवन ऊर्जा फॉर्म कितनी विद्युत उत्पन्न करता है?
(a) 380 MW
(b) 480 MW
(c) 280 MW
(d) 400 MW
उत्तर:
(a) 380 MW

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत

प्रश्न 4.
हमारा देश प्रतिवर्ष लगभग कितनी सौर ऊर्जा प्राप्त करता है?
(a) 450,000,000 करोड़ किलोवाट-घण्टा
(b) 400,000,000 करोड़ किलोवाट-घण्टा
(c) 500,000,000 करोड़ किलोवाट-घण्टा
(d) 550,000,000 करोड़ किलोवाट-घण्टा
उत्तर:
(c) 500,000,000 करोड़ किलोवाट-घण्टा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश संश्लेषण क्या है?
उत्तर:
प्रकाश संश्लेषण वह क्रिया है, जिसमें हरे पेड़-पौधे अपना भोजन प्राप्त करने के लिए सौर-ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में बदलते हैं।

प्रश्न 2.
नदियों पर बाँध बनाकर जल-विद्युत उत्पादन के दो लाभ तथा दो हानियाँ लिखिए।
उत्तर:
लाभ नदियों पर बाँध बनाकर जल-विद्युत उत्पादन करने से सिंचाई के लिए जल उपलब्ध होता है तथा बाढ़-नियन्त्रण में सहायता मिलती है। हानियाँ बाँध बनाने से बहुत-सी भूमि जलमग्न हो जाती है तथा बाँध के इब क्षेत्र में आने वाले गाँवों से लोगों को पलायन करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त नदी के जल-प्रवाह क्षेत्र का पर्यावरण भी प्रभावित होता है।

प्रश्न 3.
भारत में जल विद्युत-शक्ति की क्षमता कितनी है?
उत्तर:
भारत में जल विद्युत-शक्ति की क्षमता लगभग 4 x 1011 किलोवाट-घण्टा है।

प्रश्न 4.
जल विद्युत-गृह, तापीय विद्यत-गृह की अपेक्षा क्यों उपयोगी है?
उत्तर:
तापीय विद्युत-गृह के समीपवर्ती क्षेत्रों में कोयले के धुएँ के कारण वायु प्रदूषित हो जाती है, जबकि जल विद्युत-गृह से प्रदूषण उत्पन्न नहीं होता।

प्रश्न 5.
पवन चक्की से उपयोगी ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पवन का न्यूनतम वेग कितना होना चाहिए?
उत्तर:
पवन चक्की से उपयोगी ऊर्जा प्राप्त करने के लिए पवन का न्यूनतम वेग 15 किमी/ घण्टा होना चाहिए।

प्रश्न 6.
सौर-ऊर्जा को अप्रत्यक्ष रूप में उपयोग करने की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं?
उत्तर:
1. पवन-ऊर्जा का उपयोग
2. समुद्री लहरों की ऊर्जा का उपयोग
3. सागर की विभिन्न गहराइयों पर जल के तापान्तर का उपयोग आदि।

प्रश्न 7.
सौर कुकर कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
सौर-कुकर दो प्रकार के होते हैं –
(1) बॉक्सनुमा सौर-कुकर तथा
(2) गोलीय परावर्तक-युक्त सौर-कुकर।

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प्रश्न 8.
उन चार क्षेत्रों के नाम लिखिए जहाँ सौर-सेलों को ऊर्जा-स्त्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।
उत्तर:
कृत्रिम उपग्रहों में, सुदूर स्थानों पर स्थित अनुसन्धान केन्द्रों में, दूरदर्शन रिले स्टेशनों में तथा ट्रैफिक लाइटों में सौर-सेलों का उपयोग ऊर्जा-स्रोत के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 9.
आधुनिक सेलेनियम सौर-सेलों तथा अर्द्धचालकों से निर्मित सौर-सेलों की दक्षता कितनी होती है?
उत्तर:
आधुनिक सेलेनियम सौर-सेलों की दक्षता 25% तथा अर्द्धचालकों से निर्मित सौर-सेलों की दक्षता 10% से 18% तक होती है।

प्रश्न 10.
अर्द्धचालक क्या हैं?
उत्तर:
अर्द्धचालक वे पदार्थ, जिनकी विद्युत चालकता बहुत कम होती है, अर्द्धचालक कहलाते हैं। ये न तो विद्युत के सुचालक होते हैं और न ही पूर्णतया विद्युतरोधी होते हैं।

प्रश्न 11.
ऊर्जा के उन तीन रूपों के नाम बताइए, जो महासागर में उपलब्ध हैं।
उत्तर:
महासागर से दोहन (harness) किए जा सकने वाले ऊर्जा के तीन रूप –
1. सागरीय तापीय ऊर्जा
2. सागरीय लहरों की ऊर्जा तथा
3. ज्वारीय-ऊर्जा हैं।

प्रश्न 12.
भारत में ज्वारीय लहरों की ऊर्जा के दोहन हेतु कौन-कौन-से स्थान चुने गए हैं?
उत्तर:
भारत में ज्वारीय लहरों की ऊर्जा के दोहन हेतु तीन स्थान-गुजरात में कच्छ की खाड़ी, कैम्बे और पश्चिम बंगाल के पूर्वी समुद्री तट पर सुन्दरवन-चुने गए हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवाश्म ईंधन क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जीवाश्म ईंधन आज से करोड़ों वर्ष पूर्व पृथ्वी पर उपस्थित विशालकाय पेड़ पृथ्वी की भूपर्पटी के नीचे दब गए थे। ये वनस्पति अवशेष, समय बीतने के साथ, उच्च ताप तथा उच्च दाब की अवस्था में, ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ईंधन के रूप में बदलते चले गए। वनस्पति अवशेषों से बने इस प्रकार के ईंधन को जीवाश्म ईंधन कहते हैं। कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन के उदाहरण हैं।

प्रश्न 2.
पेट्रोलियम गैस कैसे प्राप्त की जाती है? उस गैस का नाम लिखिए जो पेट्रोलियम गैस का मुख्य घटक है।
उत्तर:
पेट्रोलियम गैस, तेल शोधक संयन्त्रों में पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन के दौरान उपोत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त पेट्रोलियम गैस, पेट्रोल के भंजन से भी प्राप्त की जाती है। पेट्रोलियम गैस का मुख्य घटक ब्यूटेन नामक गैस है।

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प्रश्न 3.
जल-विद्युत उत्पन्न करने का मूल सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:
जल-विद्युत उत्पन्न करने का मूल सिद्धान्त इसके लिए नदियों के बहते हुए जल को एक ऊँचा बाँध बनाकर एकत्र कर लिया जाता है। बाँध की तली के समीप जल टरबाइन लगा देते हैं। बाँध के ऊपरी भाग से इस जल को लगातार नीचे की ओर गिराते हैं। जब तेजी से गिरता हुआ जल, ‘जल टरबाइन’ के ब्लेडों पर गिरता है, तो उसकी ऊर्जा से जल टरबाइन तेजी से घूमने लगता है। जल टरबाइन की शाफ्ट विद्युत जनित्र के आमेचर से जुड़ी होने के कारण, इसका आमेचर भी जल टरबाइन के घूमने के कारण तेजी से घूमने लगता है। इस प्रकार, विद्युत का उत्पादन होने लगता है; अत: गतिज ऊर्जा विद्युत-ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है।

प्रश्न 4.
भारत में जल विद्युत-शक्ति की कुल क्षमता कितनी है? इस क्षमता का कितना भाग प्रयुक्त होता है?
उत्तर:
भारत में जल विद्युत-शक्ति की कुल क्षमता 4 x 1011 किलोवाट-घण्टा है। आज तक इस क्षमता का 11% से कुछ अधिक भाग ही उपयोग किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, यह भी अनुमान लगाया गया है कि लगभग 2.5 x 1010 किलोवाट-घण्टा विद्युत-ऊर्जा लघु तथा सूक्ष्म जल-विद्युत परियोजनाओं द्वारा भी उत्पन्न की जा सकती है। आजकल हमारे देश में उत्पादित कुल विद्युत-शक्ति का 23% से कुछ अधिक भाग जल-विद्युत से आता है।

प्रश्न 5.
व्यावसायिक स्तर पर पवन ऊर्जा का दोहन करने हेतु पहला चरण क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
व्यावसायिक स्तर पर पवन ऊर्जा का दोहन व्यावसायिक स्तर पर पवन ऊर्जा का दोहन करने हेतु पहला चरण ‘पवन ऊर्जा मानचित्र’ बनाना है। इस मानचित्र को बनाने के लिए यह आवश्यक है कि किसी दिए गए स्थान पर पूरे वर्ष पवन की चाल मापी जाए।
1. पवन ऊर्जा के मानचित्र विभिन्न स्थानों पर पवन की वार्षिक औसत चाल दर्शाते हैं। ये जनवरी तथा जुलाई माह में पवन की औसत चाल भी दर्शाते हैं (क्योंकि पवन की चाल जनवरी में अत्यधिक मन्द तथा जुलाई में अत्यधिक तीव्र होती है)।

2. पवन ऊर्जा के मानचित्र भूमि तल से लगभग 10 मीटर की ऊँचाई पर प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में उपलब्ध पवन-ऊर्जा के बारे में प्रमुख सूचनाएँ किलोवाट-घण्टे में देते हैं।

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प्रश्न 6.
भारत में पवन ऊर्जा के उपयोग हेतु बनाई गई योजनाएँ क्या हैं? या भारत में पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन किस प्रदेश में होता है? इनकी उत्पादन क्षमता क्या है?
उत्तर:
पवन ऊर्जा के उपयोग हेतु बनाई गई योजनाएँ भारत में उपलब्ध पवन ऊर्जा की क्षमता का लाभ उठाने हेतु विस्तृत योजनाएँ बनाई गई हैं। इनमें से कुछ योजनाओं को तो विद्युत उत्पादन हेतु लागू भी किया जा चुका है। भारत में पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन संयन्त्र गुजरात प्रदेश के ‘ओखा’ नामक स्थान पर स्थित है। इसकी उत्पादन क्षमता 1 मेगावाट (1 MW) है। दूसरा पवन ऊर्जा संयन्त्र गुजरात के पोरबन्दर में स्थित ‘लांबा’ नामक स्थान पर है। यह 200 एकड़ से भी अधिक भूमि पर फैला हुआ है। इसमें 50 पवन ऊर्जाचालित टरबाइन लगी हैं, जिनकी क्षमता 200 करोड़ यूनिट विद्युत उत्पन्न करने की है।

प्रश्न 7.
पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत क्या है? ऊर्जा के इस स्रोत को व्यापारिक स्तर पर उपयोग करने की क्यों आवश्यकता हुई?
उत्तर:
पृथ्वी पर ऊर्जा का सबसे विशाल स्रोत सूर्य है। सूर्य द्वारा दी गई ऊर्जा को सौर-ऊर्जा कहते हैं। पृथ्वी पर प्रतिदिन पड़ने वाले सूर्य के प्रकाश द्वारा दी गई ऊर्जा संसार के सभी देशों द्वारा एक वर्ष में उपयोग की गई कुल ऊर्जा का 50,000 गुना है। व्यापारिक स्तर पर ऊर्जा के इस स्रोत को उपयोग करने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि जीवाश्म ईंधनों के ज्ञात भण्डार बहुत कम रह गए हैं जो कुछ ही दशकों में समाप्त हो जाएंगे। इस ऊर्जा के संकट को दूर करने के लिए मानव ने ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों की खोज की। इनमें से एक नवीकरणीय स्रोत सौर-ऊर्जा भी है।

प्रश्न 8.
बॉक्सनुमा सौर-कुकर तथा संकेन्द्रक सौर-ऊष्मक में अन्तर बताइए। या बॉक्सनुमा सौर-कुकर तथा गोलीय परावर्तक-युक्त सौर-कुकर में अन्तर बताइए।
उत्तर:
बॉक्सनुमा सौर कुकर तथा संकेन्द्रक सौर-ऊष्मक में अन्तर –
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प्रश्न 9.
OTEC शक्ति संयन्त्र क्या है? ये किस प्रकार कार्य करते हैं?
उत्तर:
OTEC शक्ति संयन्त्र महासागरों की तापीय ऊर्जा को विद्युत-ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले संयन्त्रों को OTEC शक्ति संयन्त्र कहा जाता है। कार्य-सिद्धान्त ये संयन्त्र समुद्र की ऊपरी परत की ऊष्मा का प्रयोग कुछ तीव्र वाष्पशील पदार्थों को वाष्पित करने के लिए करते हैं। तत्पश्चात् इन वाष्पों की ऊष्मीय ऊर्जा का प्रयोग टरबाइन को चलाने के लिए किया जाता है। सबसे अन्त में टरबाइन की गतिज ऊर्जा द्वारा विद्युत जनित्र को चलाकर विद्युत-ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।

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प्रश्न 10.
नाभिकीय रिऐक्टरों के प्रमुख उद्देश्यों की सूची बनाइए। इनमें से कौन-से उद्देश्य लोगों की व्यापक भलाई के लिए महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
नाभिकीय रिऐक्टरों के उद्देश्य नाभिकीय रिऐक्टर विभिन्न उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए बनाए जाते हैं जो कि निम्नलिखित हैं।
1. विद्युत-ऊर्जा का उत्पादन नाभिकीय रिऐक्टरों का यह सर्वप्रमुख उद्देश्य है।

2. नए विखण्डनीय पदार्थों का उत्पादन कुछ नाभिकीय रिऐक्टरों का उद्देश्य विद्युत-ऊर्जा उत्पादन के अतिरिक्त नए विखण्डनीय पदार्थों का उत्पादन करना भी होता है। ऐसे रिऐक्टरों को ब्रीडर रिऐक्टर कहते हैं।

3. तीव्रगामी न्यूट्रॉनों का उत्सर्जन रिऐक्टर में U235 के विखण्डन से तीव्रगामी न्यूट्रॉन उत्सर्जित होते हैं, जिनके द्वारा अन्य तत्वों के कृत्रिम नाभिकीय विघटनों का अध्ययन किया जाता है।

4. कृत्रिम रेडियो आइसोटोपों का उत्पादन रिऐक्टर में अनेक तत्वों के कृत्रिम रेडियोऐक्टिव आइसोटोप बनाए जाते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सा, जीवविज्ञान, उद्योगों तथा कृषि आदि में होता है। उपर्युक्त सभी उद्देश्यों में से विद्युत-ऊर्जा का उत्पादन तथा कृत्रिम रेडियो आइसोटोपों का उत्पादन ऐसे। उद्देश्य हैं जो लोगों की व्यापक भलाई के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 11.
यूरेनियम के विखण्डन को समीकरण से समझाइए।
उत्तर:
यूरेनियम का विखण्डन यूरेनियम के दो आइसोटोप 92U238 तथा 92U235 हैं। 92U238 का विखण्डन केवल तीव्रगामी न्यूट्रॉनों द्वारा ही सम्भव है जबकि 92U235 का विखण्डन मन्दगामी न्यूट्रॉनों द्वारा होता है। जब मन्दगामी न्यूट्रॉन92U235 से टकराता है तो वह उसमें अवशोषित कर लिया जाता है तथा92U236 बन जाता है। चूंकि 92U236 अत्यन्त अस्थायी है; अतः यह दो खण्डों बेरियम तथा क्रिप्टन में टूट जाता है तथा न्यूट्रॉनों व ऊर्जा का उत्सर्जन करता है।
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प्रश्न 12.
यूरेनियम के विखण्डन उत्पाद क्या हैं?
उत्तर:
यूरेनियम के विखण्डन उत्पाद जब यूरेनियम आइसोटोप (U235) के नाभिक पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है तो यह दो अपेक्षाकृत हल्के नाभिकों में टूट जाता है और इसके साथ ही बहुत अधिक ऊर्जा मुक्त होती है। U235 के विखण्डन से अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न नाभिक प्राप्त होते हैं। इस प्रकार किसी विशिष्ट U235 नाभिक के विखण्डन से कौन-कौन से दो नाभिक उत्पन्न होंगे पहले से यह बता पाना सम्भव नहीं है। U235 नाभिक के विखण्डन से मुख्यत: नाभिकों के दो सह उत्पन्न होते हैं –
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  1. नाभिकों का भारी समूह इनकी द्रव्यमान संख्या 130 से 149 के बीच पाई जाती है।
  2. नाभिकों का हल्का समूह इनकी द्रव्यमान संख्या 84 से 104 के बीच पाई जाती है।

नाभिकों के भारी समूह के दो प्रमुख उदाहरण बेरियम-139 तथा लैन्थेनम-139 हैं, जबकि नाभिकों के हल्के समूह के दो उदाहरण – क्रिप्टन-94 तथा मॉलिब्डेनम-95 हैं। इस प्रकार U 235 के विखण्डन उत्पाद 56Ba139तथा 36Kr94 अथवा 57La139 तथा 42Mo95 हो सकते हैं।
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प्रश्न 13.
तापीय न्यूट्रॉन किसे कहते हैं? तापीय न्यूट्रॉन द्वारा प्रारम्भिक U235 नाभिक के विखण्डन को एक चित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
तापीय न्यूट्रॉन कम ऊर्जा (1ev ऊर्जा से कम) वाले वे न्यूट्रॉन जिनका उपयोग U235 नाभिक का विखण्डन करने के लिए किया जाता है, तापीय न्यूट्रॉन कहलाते हैं।
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प्रश्न 14.
रेडियोऐक्टिव विघटन तथा नाभिकीय विखण्डन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
रेडियोऐक्टिव विघटन तथा नाभिकीय विखण्डन में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैव-गैस प्राप्त करने के विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए। स्पष्ट कीजिए कि अवायुजीवी (अनॉक्सी) अपघटन से क्या तात्पर्य है? या जैव अपशिष्ट से जैव-गैस प्राप्त करने की विधि का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जैव-गैस का निर्माण जैव-गैस; कई ईंधन गैसों का मिश्रण है। इसे ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैव पदार्थों के अपघटन से प्राप्त किया जाता है। जैव-गैस का मुख्य घटक मेथेन (CH4) गैस है जो कि एक आदर्श ईंधन है। जैव-गैस उत्पन्न करने के लिए गोबर, वाहित मल, फल-सब्जियों तथा कृषि आधारित उद्योगों के अपशिष्ट आदि का प्रयोग किया जाता है। जैव-गैस बनाने के लिए दो प्रकार के संयन्त्रों का प्रयोग किया जाता है –
1. स्थायी गुम्बद प्रकार तथा
2. प्लावी (तैरती) टंकी प्रकार।

गोबर से जैव-गैस प्राप्त करने के लिए प्रायः ‘प्लावी टंकी प्रकार’ के संयन्त्र का प्रयोग करते हैं जबकि मानव मल तथा अन्य अपशिष्टों से जैव-गैस प्राप्त करने के लिए ‘स्थिर गुम्बद प्रकार’ के संयन्त्र का प्रयोग किया जाता है।

जैव-गैस प्राप्त करने के विभिन्न चरण –
प्रथम चरण: स्लरी का निर्माण सर्वप्रथम गाय-भैंस आदि घरेलू पशुओं के गोबर को पानी के साथ मिलाकर मिश्रण-टंकी में एक गाढ़ा घोल (स्लरी) तैयार कर लेते हैं। तत्पश्चात् स्लरी को डाइजेस्टर में डालकर छोड़ देते हैं। डाइजेस्टर, ईंटों का बना हुआ एक भूमिगत टैंक होता है जो चारों ओर से बन्द रहता है।
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द्वितीय चरण: स्लरी का अपघटन डाइजेस्टर में उपस्थित अवायुजीवी या अनॉक्सी सूक्ष्मजीव, पानी की उपस्थिति में, स्लरी में उपस्थित जैव-मात्रा का अपघटन कर उसे सरल यौगिकों में बदलने लगते हैं। इस क्रिया को पूरा होने में कुछ दिन लग जाते हैं तथा। निर्गम टंकी क्रिया पूर्ण होने पर डाइजेस्टर में मेथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन तथा सल्फर डाइऑक्साइड गैसों का मिश्रण प्राप्त होता है। यह मिश्रण ही जैव-गैस है।

यह गैसीय मिश्रण डाइजेस्टर में ऊपर उठकर प्लावी डाइजेस्टर टंकी या स्थिर गुम्बद में एकत्र हो जाता है। प्लाती टंकी या स्थिर गुम्बद के ऊपरी भाग में लगी नलिका द्वारा इस गैस को उपभोक्ता की रसोई तक ले जाया जाता है और गैस चूल्हों में जलाया जाता है।
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जैव-गैस के लाभ जैव-गैस एक उत्तम ईंधन है जो बिना धुआँ दिए जलती है। इसको जलाने से राख जैसा कोई ठोस अपशिष्ट भी नहीं बचता है। इस प्रकार, जैव-गैस एक पर्यावरण-हितैषी ईंधन है। डाइजेस्टर में, जैव गैस प्राप्त करने के पश्चात् शेष स्लरी में नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस के यौगिक प्रचुर मात्रा में होते हैं; अतः यह एक उत्तम खाद का कार्य करती है।

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इस प्रकार, जैव-गैस प्राप्त करने की क्रिया में न केवल हमें एक उत्तम ईंधन प्राप्त होता है, साथ-ही खेतों के लिए खाद भी प्राप्त होता है तथा पर्यावरण भी प्रदूषित होने से बच जाता है। अवायुजीवी (अनॉक्सी) अपघटन डाइजेस्टर में उपस्थित अवायुजीवी सूक्ष्मजीवों को ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है; अतः ये ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ही स्लरी का अपघटन करते हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होने वाला इस प्रकार का अपघटन अवायुजीवी अथवा अनॉक्सी अपघटन कहलाता है।

प्रश्न 2.
पवन चक्की का कार्य-सिद्धान्त क्या है? पवन चक्की का विवरण चित्र सहित समझाइए।
उत्तर:
पवन चक्की पवन चक्की एक ऐसी युक्ति है, जिसमें वायु की गतिज ऊर्जा ब्लेडों को घुमाने में प्रयुक्त की जाती है। यह बच्चों के खिलौने ‘फिरकी’ जैसी होती है। पवन चक्की के ब्लेडों की बनावट विद्युत पंखे के ब्लेडों के समान होती है। इनमें केवल इतना अन्तर है कि विद्युत पंखे में जब पंखे के ब्लेड घूमते हैं तो पवन अर्थात् वायु चलती है। इसके विपरीत, पवन चक्की में जब पवन चलती है, तो पवन चक्की के ब्लेड घूमते हैं।

घूमते हुए ब्लेडों की घूर्णन गति के कारण पवन चक्की से गेहूँ पीसने की चक्की को चलाना, जल-पम्प चलाना, मिट्टी के बर्तन के चाक को घुमाना आदि कार्य किए जा सकते हैं। पवन चक्की ऐसे स्थानों पर लगाई जाती है, जहाँ वायु लगभग पूरे वर्ष तीव्र वेग से चलती रहती है। यह पवन ऊर्जा को उपयोगी यान्त्रिक-ऊर्जा के रूप में बदलने का कार्य करती है। रचना पवन चक्की की रचना को चित्र में प्रदर्शित किया गया है। इसमें ऐलुमिनियम के पतले-चपटे आयताकार खण्डों के रूप में, बहुत-सी पंखुड़ियाँ लोहे के पहिये पर लगी रहती हैं।

यह पहिया एक ऊर्ध्वाधर स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर लगा रहता है तथा अपने केन्द्र से गुजरने वाली लौह शाफ्ट (अक्ष) के परितः घूम सकता है। पहिये का तल स्वत: वायु की गति की दिशा के लम्बवत् समायोजित हो जाता है, जिससे वायु सदैव पंखुड़ियों पर सामने से टकराती है। पहिये की अक्ष एक लोहे की फ्रैंक से जुड़ी रहती है। फ्रैंक का दूसरा सिरा उस मशीन अथवा डायनमो से जुड़ा रहता है, जिसे पवन-ऊर्जा द्वारा गति प्रदान करनी होती है।

कार्य-विधि:
चित्र में पवन चक्की द्वारा पानी खींचने की क्रिया का प्रदर्शन किया गया है। पवन चक्की की बैक एक जल-पम्प की पिस्टन छड़ से जुड़ी है। जब वायु, पवन चक्की की पंखुड़ियों से टकराती है तो चक्की का पहिया घूमने लगता है और पहिये से जुड़ी अक्ष घूमने लगती है। अक्ष की घूर्णन गति के कारण बॅक ऊपर-नीचे होने लगती है और जल-पम्प की पिस्टन छड़ भी ऊपर-नीचे गति करने लगती है तथा जल-पम्प से जल बाहर निकलने लगता है।
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कार्य-सिद्धान्त तेजी से बहती हई पवन जब पवन चक्की के ब्लेडों से टकराती है तो वह उन पर एक बल लगाती है जो एक प्रकार का घूर्णी प्रभाव उत्पन्न करता है और इसके कारण पवन चक्की के ब्लेड घूमने लगते हैं। पवन चक्की का घूर्णन उसके ब्लेडों की विशिष्ट बनावट के कारण होता है जो विद्युत के पंखे के ब्लेडों के समान होती है। पवन चक्की को विद्युत के पंखे के समान माना जा सकता है जो कि विपरीत दिशा में कार्य कर रहा हो, क्योंकि जब पंखे के ब्लेड घूमते हैं तो पवन चलती है।

इसके विपरीत, जब पवन चलती है तो पवन चक्की के ब्लेड घूमते हैं। पवन चक्की के लगातार घूमते हुए ब्लेडों की घूर्णन गति से जल-पम्प तथा गेहूँ पीसने की चक्की चलाई जा सकती है। पवन चक्की की भाँति ‘फिरकी’ भी पवन ऊर्जा से ही घूमती है।

प्रश्न 3.
चित्र की सहायता से बॉक्सनुमा सौर-कुकर की संरचना व कार्य-विधि का वर्णन कीजिए।
या सौर-ऊर्जा क्या है? सोलर-कुकर का सिद्धान्त एवं कार्य-विधि समझाइए। सोलर कुकर के लाभ भी लिखिए।
या सोलर कुकर के उपयोग, लाभ एवं सीमाएँ लिखिए।
उत्तर:
सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा को सौर-ऊर्जा कहते हैं। बॉक्सनुमा सोलर-कुकर यह एक ऐसी युक्ति है, जिसमें सौर-ऊर्जा का उपयोग करके भोजन को पकाया जाता है, इसलिए इसे सौर-चूल्हा भी कहते हैं। चित्र में बॉक्सनुमा सौर-कुकर को प्रदर्शित किया गया है। संरचना सामान्यतः यह एक लकड़ी का बक्सा A होता है जिसे बाहरी बक्सा भी कहते हैं। इस लकड़ी के बक्से के अन्दर लोहे अथवा ऐलुमिनियम की चादर का बना एक और बक्सा होता है, इसे भीतरी बक्सा कहते हैं। भीतरी बक्से के अन्दर की दीवारें तथा नीचे की सतह काली कर दी जाती है।

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भीतरी बक्से के अन्दर काला रंग इसलिए किया जाता है, जिससे कि सौर-ऊर्जा का अधिक-से-अधिक अवशोषण हो तथा परावर्तन द्वारा ऊष्मा की कम-से-कम हानि हो। भीतरी बक्से तथा बाहरी बक्से के बीच के खाली स्थान में थर्मोकोल अथवा काँच की रुई अथवा कोई भी ऊष्मारोधी पदार्थ भर देते हैं, इससे सौर-कुकर की ऊष्मा बाहर नहीं जा पाती। सौर कुकर के बक्से के ऊपर एक लकड़ी के फ्रेम में मोटे काँच का एक ढक्कन G लगा होता है, जिसे आवश्यकतानुसार खोला तथा बन्द किया जा सकता है। सौर-कुकर के बक्से में एक समतल दर्पण M भी लगा होता है जो कि परावर्तक तल का कार्य करता है।
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कार्य-विधि:
सर्वप्रथम पकाए जाने वाले भोजन को स्टील अथवा ऐलमिनियम के एक बर्तन C में डालकर जिसकी बाहरी सतह काली पुती हो, सौर-कुकर के अन्दर रख देते हैं तथा ऊपर से शीशे के ढक्कन को बन्द कर देते हैं। परावर्तक तल M अर्थात् समतल दर्पण को चित्रानुसार खड़ा करके सौर-कुकर को भोजन पकाने के लिए धूप में रख देते हैं। जब सूर्य के प्रकाश की किरणें परावर्तक तल M पर गिरती हैं तो परावर्तक तल उन्हें तीव्र प्रकाश-किरण पुंज के रूप में सौर-कुकर के ऊपर डालता है। सूर्य की ये किरणें काँच के ढक्कन में से गुजरकर सौर-कुकर के बक्से में प्रवेश कर जाती हैं तथा कुकर के अन्दर की काली सतह द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। चूँकि सूर्य की किरणों का

लगभग एक-तिहाई भाग ऊष्मीय प्रभाव वाली अवरक्त किरणों का होता है, इसलिए जब ये किरणें कुकर के बक्से में प्रवेश कर जाती हैं तो काँच का ढक्कन G इन्हें वापस बाहर नहीं आने देता। इस प्रकार सूर्य की और अधिक अवरक्त किरणें धीरे-धीरे कुकर के बक्से में प्रवेश करती जाती हैं, जिनके कारण सौर-कुकर के अन्दर का ताप बढ़ता जाता है। लगभग दो अथवा तीन घण्टे में सौर-कुकर के अन्दर का ताप 100°C तथा 140°C के बीच हो जाता है।

यही ऊष्मा सौर-कुकर के अन्दर बर्तन में रखे भोजन को पका देती है। उपयोग बॉक्सनुमा सौर-कुकर को उन खाद्य पदार्थों को पकाने के लिए प्रयुक्त करते हैं, जिन्हें पकाने के लिए धीमी आँच की आवश्यकता होती है। इस कुकर को रोटियाँ सेंकने में प्रयुक्त नहीं करते।

सोलर-कुकर के लाभ इसके निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. सोलर-कुकर से किसी प्रकार का धुआँ अथवा गन्ध नहीं निकलती है; अत: इसके प्रयोग से प्रदूषण नहीं होता।
  2. सोलर-कुकर में मिट्टी का तेल, कोयला, विद्युत आदि जैसे किसी ईंधन की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार इसके प्रयोग से ईंधन तथा विद्युत दोनों की बचत होती है।
  3. सोलर-कुकर से बहुत धीमी गति से खाना पकता है; अत: इसके द्वारा पके भोजन से पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते।
  4. सोलर-कुकर से खाना पकाते समय निरन्तर देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है।

सोलर-कुकर की परिसीमाएँ इसकी निम्नलिखित परिसीमाएँ हैं –

  1. सोलर-कुकर रात्रि में, बरसात में तथा बादल वाले दिनों में काम नहीं करते।
  2. सोलर-कुकर को रोटी बनाने में प्रयुक्त नहीं कर सकते।
  3. सोलर-कुकर को खाने वाली वस्तुओं को तलने में प्रयुक्त नहीं कर सकते।

प्रश्न 4.
सौर-सेल क्या है? सौर-सेलों के विकास तथा उपयोगों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सौर-सेल यह एक ऐसी युक्ति है, जो सूर्य से पृथ्वी तक पहुँचने वाली ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदल देती है। सौर-सेल का विकास आज से लगभग 100 वर्ष पहले यह खोज हो चुकी थी कि सेलीनियम की किसी पतली पर्त को सौर प्रकाश में रखने पर विद्युत उत्पन्न होती है। यह भी ज्ञात था कि सेलेनियम के किसी टुकड़े पर आपतित सौर-ऊर्जा का केवल 0.6% भाग ही विद्युत-ऊर्जा में परिवर्तित हो पाता है।

चूँकि इस प्रकार के सौर-सेल की दक्षता बहुत कम थी, इसलिए विद्युत उत्पादन के लिए इस परिघटना का उपयोग करने के कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए। प्रथम व्यावहारिक सौर-सेल सन् 1954 में बनाया गया था। यह सौर-सेल लगभग 1.0% सौर-ऊर्जा को विद्युत-ऊर्जा में परिवर्तित कर सकता था। इस सौर-सेल की दक्षता भी बहुत कम थी। अन्तरिक्ष कार्यक्रमों द्वारा उत्पन्न बढ़ती हुई माँग के कारण अधिक-से-अधिक दक्षता वाले सौर-सेलों को विकसित करने की दर तेजी से बढ़ी है। सौर सेलों के निर्माण के लिए अर्द्धचालकों के उपयोग से सौर-सेलों की दक्षता बहुत अधिक बढ़ गई है।

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सिलिकन, गैलियम तथा जर्मेनियम जैसे अर्द्धचालकों से बने हुए सौर-सेलों की दक्षता 10 से 18% तक होती है अर्थात् ये 10 से 18% सौर-ऊर्जा को विद्युत-ऊर्जा में परिवर्तित कर सकते हैं। सेलेनियम से बने आधुनिक सौर-सेलों की दक्षता 25% तक होती है। सौर-सेलों के उपयोग सौर-सेलों का उपयोग दुर्गम तथा दूरस्थ स्थानों में विद्युत-ऊर्जा उपलब्ध कराने में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध हुआ है। सौर-सेलों के महत्त्वपूर्ण उपयोग अनलिखित हैं –

1. सौर-सेलों का उपयोग कृत्रिम उपग्रहों तथा अन्तरिक्ष यानों में विद्युत उपलब्ध करने के लिए किया जाता है। वास्तव में, सभी कृत्रिम उपग्रह तथा अन्तरिक्ष यान मुख्यत: सौर-पैनलों के द्वाराउत्पादित विद्युत-ऊर्जा पर ही निर्भर करते हैं।

2. भारत में सौर-सेलों का उपयोग सड़कों पर प्रकाश व्यवस्था करने में, सिंचाई के लिए जलपम्पों को चलाने तथा रेडियो व टेलीविजन सैटों को चलाने में किया जाता है।

3. सौर सेलों का उपयोग समुद्र में स्थित द्वीप स्तम्भों में तथा तट से दूर निर्मित खनिज तेल के कुएँ खोदने वाले संयन्त्रों को विद्युत-शक्ति प्रदान करने में किया जाता है।

4. आजकल सौर-सेलों का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों तथा कैलकुलेटरों को चलाने में भी किया जाता है।

प्रश्न 5.
महासागर में ऊर्जा का दोहन कितने रूपों में और किस प्रकार किया जा सकता है? या महासागर में किन-किन रूपों में ऊर्जा भण्डारित है? ऊर्जा के उन तीन रूपों के नाम बताइए जिनका महासागर से दोहन किया जा सकता है।
उत्तर:
महासागरों में ऊर्जा का भण्डारण अथवा दोहन महासागरों में ऊर्जा भण्डारण अथवा दोहन के निम्नलिखित स्वरूप हैं –
1. सागरीय तापीय-ऊर्जा महासागर की सतह के जल तथा गहराई के जल के ताप में सदैव कुछ अन्तर होता है। इस तापान्तर के कारण उपलब्ध ऊर्जा को सागरीय तापीय-ऊर्जा कहते हैं। कहीं-कहीं पर यह तापान्तर 20°C तक भी होता है। इस सागरीय तापीय-ऊर्जा को विद्युत के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए सागरीय तापीय ऊर्जा रूपान्तरण विद्युत संयंत्र का प्रयोग किया जाता है।

2. सागरीय लहरों की ऊर्जा वायु का प्रवाह अधिक होने के कारण समुद्र की सतह पर जल की लहरें बहुत तेजी से चलती हैं, जिसके कारण उनमें गतिज ऊर्जा होती है। इस प्रकार, उत्पन्न ऊर्जा को सागरीय लहरों की ऊर्जा कहते हैं। इन गतिशील समुद्री लहरों की ऊर्जा का उपयोग विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

3. ज्वारीय-ऊर्जा चन्द्रमा के आकर्षण के कारण समुद्र के जल के ऊपर उठने को ज्वार तथा जल के नीचे उतरने को भाटा कहते हैं। ज्वार-भाटा की लहरें दिन में दो बार चढ़ती हैं तथा दो बार उतरती हैं। समुद्रतटीय क्षेत्रों में ज्वार तथा भाटा के बीच जल की विशाल मात्रा की गतिशीलता, ऊर्जा का एक बहुत बड़ा स्रोत उत्पन्न करती है।

ज्वारीय लहरों की ऊर्जा ज्वारीय बाँध बनाकर काम में लाई जाती है। ज्वार के समय उठे जल को बाँध द्वारा रोककर, जल को ऊँचाई से धीरे-धीरे जल टरबाइन के ब्लेडों पर गिराकर जल टरबाइन को घुमाते हैं और विद्युत उत्पादित करते हैं। भारत में ज्वारीय लहरों की ऊर्जा का दोहन करने के लिए तीन स्थान चुने गए हैं-कच्छ की खाड़ी, कैम्बे (गुजरात) तथा सुन्दरवन (पश्चिम बंगाल)।

4. समुद्रों में लवणीय प्रवणता से ऊर्जा चूँकि भिन्न-भिन्न समुद्रों के जल में लवणों की सान्द्रता भिन्न-भिन्न होती है; अतः दो समुद्रों के जल के लवणों की सान्द्रता के अन्तर को ‘लवणीय प्रवणता’ कहते हैं। दो भिन्न-भिन्न समुद्रों का जल जिस स्थान पर आपस में मिलता है, उस स्थान पर लवणों की सान्द्रता के अन्तर का उपयोग ऊर्जा प्राप्त करने हेतु किया जाता है।

5. समुद्री वनस्पतियों अथवा जैव-द्रव्यमान से ऊर्जा समुद्री वनस्पतियाँ अर्थात् पेड़-पौधे अथवा जैव-द्रव्यमान सागरीय ऊर्जा प्राप्त करने का एक स्रोत हैं। भविष्य में सागर में उपस्थित समुद्री शैवाल की विशाल मात्रा मेथेन नामक ईंधन प्रदान कर सकती है।

6. सागरीय ड्यूटीरियम के नाभिकीय संलयन से ऊर्जा सागर का जल, हाइड्रोजन के भारी परमाणु अर्थात् ड्यूटीरियम का एक असीमित स्रोत है। यह सागर में भारी जल के रूप में उपस्थित रहता है। डयूटीरियम, हाइड्रोजन का समस्थानिक है, जिसके नाभिक में एक प्रोटॉन तथा एक न्यूट्रॉन होता है। ड्यूटीरियम का नाभिकीय संलयन करके ऊर्जा प्राप्त करने के प्रयास चल रहे हैं। इन प्रयासों में सफलता मिल जाने पर सागर, ऊर्जा का एक विशाल स्रोत बन जाएगा, जो करोड़ों वर्षों तक हमें ऊर्जा प्रदान करता रहेगा।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 14 उर्जा के स्रोत

प्रश्न 6.
किसी नाभिकीय रिऐक्टर के प्रमुख घटकों के नाम लिखिए तथा उनके प्रकार्यों का वर्णन कीजिए।
या नाभिकीय रिऐक्टर के प्रमुख भागों का उल्लेख करते हुए इसकी प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।
या समझाइए कि नाभिकीय रिऐक्टर में विमन्दकों तथा नियन्त्रकों की सहायता से श्रृंखला अभिक्रिया को किस प्रकार नियन्त्रित किया जाता है?
उत्तर:
नाभिकीय रिऐक्टर के प्रमुख घटक: नाभिकीय रिऐक्टर एक ऐसा उपकरण है, जिसके भीतर नाभिकीय विखण्डन की नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया द्वारा ऊर्जा उत्पन्न की जाती है। इसके निम्नलिखित मुख्य भाग हैं –
1. ईंधन: (Fuel) विखण्डित किए जाने वाले पदार्थ (U235 अथवा Pu 239 ) को रिऐक्टर का ईंधन कहते हैं।

2. मन्दक: (Moderator) विखण्डन में उत्पन्न न्यूट्रॉनों की गति (ऊर्जा) को कम करने के लिए मन्दक प्रयोग किए जाते हैं। इसके लिए भारी जल, ग्रेफाइट अथवा बेरिलियम ऑक्साइड (BeO) प्रयोग किए जाते हैं। भारी जल सबसे अच्छा मन्दक है।

3. परिरक्षक (Shield) नाभिकीय विखण्डन के समय कई प्रकार की तीव्र किरणें (जैसे–किरणे) निकलती हैं, जिनसे रिऐक्टर के पास काम करने वाले व्यक्ति प्रभावित हो सकते हैं। इन किरणों से उनकी रक्षा करने के लिए रिऐक्टर के चारों ओर कंक्रीट की मोटी-मोटी (सात फुट मोटी) दीवारें बना दी जाती हैं।

4. नियन्त्रक: (Controller) रिऐक्टर में विखण्डन की गति पर नियन्त्रण करने के लिए कैडमियम की छड़ें प्रयुक्त की जाती हैं। रिऐक्टर की दीवार में इन छड़ों को आवश्यकतानुसार
अन्दर-बाहर करके विखण्डन की गति को नियन्त्रित किया जा सकता है।

5. शीतलक: (Coolant) विखण्डन के समय उत्पन्न होने वाली ऊष्मा को शीतलक पदार्थ द्वारा हटाया जाता है। इसके लिए वायु, जल अथवा कार्बन डाइऑक्साइड को रिऐक्टर में प्रवाहित करते हैं। ऊष्मा प्राप्त कर जल अतितप्त हो जाता है और जलवाष्प में परिवर्तित हो जाता है, जिससे टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादित की जाती है।

रचना नाभिकीय रिऐक्टर का सरल रूप चित्र में दिखाया गया है। इसमें ग्रेफाइट की ईंटों से बना एक ब्लॉक है, जिसमें निश्चित स्थानों पर साधारण यूरेनियम की छड़ें लगी रहती हैं। इन छड़ों पर ऐलुमिनियम के खोल चढ़ा दिए जाते हैं जिससे इनका ऑक्सीकरण न हो। ब्लॉक के बीच-बीच में कैडमियम की छड़ें लगी होती हैं, जिन्हें ‘नियन्त्रक-छड़ें’ कहते हैं। इन्हें इच्छानुसार अन्दर अथवा बाहर खिसका सकते हैं।

ग्रेफाइट मन्दक का कार्य करता है तथा कैडमियम न्यूट्रॉनों का अच्छा अवशोषक होने के कारण नाभिकीय विखण्डन को रोक सकता है। कैडमियम छड़ों के अतिरिक्त इसमें कुछ सुरक्षा छड़ें भी लगी रहती हैं जो दुर्घटना होने पर स्वत: रिऐक्टर में प्रवेश कर जाती हैं और अभिक्रिया को रोक देती हैं। रिऐक्टर के चारों ओर सात फुट मोटी कंक्रीट की दीवार बना दी जाती है, जिससे कर्मचारियों को हानिकारक विकिरणों से बचाया जा सके।
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कार्य-विधि:
रिऐक्टर को चलाने के लिए किसी बाह्य स्रोत की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि इसमें सदैव कुछ न्यूट्रॉन उपस्थित रहते हैं; अत: जब रिऐक्टर को चलाना होता है तो कैडमियम की छड़ों को बाहर खींच लेते हैं, तब रिऐक्टर में मौजूद न्यूट्रॉन यूरेनियम नाभिकों का विखण्डन प्रारम्भ कर देते हैं। जब रिऐक्टर में उपस्थित न्यूट्रॉनों द्वारा U235 का विखण्डन होता है तो इससे उत्पन्न तीव्रगामी न्यूट्रॉनों का ग्रेफाइट के साथ बार-बार टकराने से मन्दन हो जाता है, जिससे ये अगले U235के नाभिक का विखण्डन करने लगते हैं।

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इस प्रकार, विखण्डन की श्रृंखला-अभिक्रिया शुरू हो जाती है। जब कभी अभिक्रिया अनियन्त्रित होने लगती है, तब कैडमियम की छड़ों को अन्दर खिसका देते हैं। कैडमियम की छड़ें कुछ न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे विखण्डन दर कम हो जाती है और इस प्रकार, उत्पन्न ऊर्जा पर नियन्त्रण हो जाता है और विस्फोट नहीं हो पाता। रिऐक्टर में श्रृंखला-अभिक्रिया चलाने के लिए यूरेनियम की छड़ों का आकार, क्रान्तिक आकार से बड़ा रखते हैं।

प्रश्न 7.
श्रृंखला अभिक्रिया किसे कहते हैं तथा यह कैसे सम्पन्न की जाती है?
उत्तर:
नाभिकीय विखण्डन में श्रृंखला अभिक्रिया:
Ban जब यूरेनियम (92U235) पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है तो यूरेनियम नाभिक दो लगभग बराबर खण्डों में टूट जाता है। विखण्डन की इस अभिक्रिया में 2 या 3 नए न्यूट्रॉन निकलते हैं तथा अपार ऊर्जा उत्सर्जित मन्द गति होती है। अनुकूल परिस्थितियों में ये नए न्यूट्रॉन अन्य न्यूट्रॉन यूरेनियम नाभिकों को विखण्डित कर देते हैं और प्रत्येक नाभिक के विखण्डन से 2 या 3 नए न्यूट्रॉन उत्पन्न होते हैं, जो अन्य नाभिकों का विखण्डन करते हैं। इस प्रकार नाभिकों के विखण्डन की श्रृंखला बन जाती है जो एक बार प्रारम्भ होने के पश्चात् स्वत: नाभिकीय विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया। चालू रहती है और तब तक चलती रहती है, जब तक कि समस्त यूरेनियम समाप्त नहीं हो जाता।

इस प्रकार की अभिक्रिया को नाभिकीय विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं। चूँकि यूरेनियम के एक नाभिक के विखण्डित होने से लगभग 200 Mev ऊर्जा उत्पन्न होती है; अतः शृंखला अभिक्रिया में विखण्डित होने वाले नाभिकों की संख्या तेजी से बढ़ने के कारण उत्पन्न ऊर्जा बहुत शीघ्र ही अपार रूप धारण कर लेती है।
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शृंखला अभिक्रिया निम्नलिखित दो प्रकार की होती है –

1. अनियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया: (Uncontrolled chain reaction) इस अभिक्रिया में प्रत्येक विखण्डन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों में से औसतन एक से अधिक न्यूट्रॉन आगे विखण्डन करते हैं, जिसके कारण विखण्डनों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है; अत: यह अभिक्रिया अति तीव्र गति से होती है और कुछ क्षणों में सम्पूर्ण पदार्थ का विखण्डन हो जाता है। इससे ऊर्जा की बहुत अधिक मात्रा मुक्त होती है, जो भयानक विस्फोट का रूप ले लेती है। परमाणु बम में यही क्रिया होती है।

2. नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया: (Controlled chain reaction) इस अभिक्रिया में कृत्रिम उपायों द्वारा (मन्दक एवं नियन्त्रक पदार्थों से) इस प्रकार का नियन्त्रण किया जाता है कि प्रत्येक विखण्डन से प्राप्त न्यूट्रॉनों में से केवल एक ही न्यूट्रॉन आगे विखण्डन कर सके। इस प्रकार, इसमें विखण्डनों की दर नियत रहती है; अत: यह अभिक्रिया धीरे-धीरे होती है तथा उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग रचनात्मक कार्यों में किया जा सकता है। नाभिकीय रिऐक्टर अथवा परमाणु-भट्टी में यही क्रिया होती है।

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श्रृंखला अभिक्रिया में कठिनाइयाँ तथा उनका निवारण शृंखला अभिक्रिया के प्रचलन में निम्नलिखित दो कठिनाइयाँ आती हैं –

1. प्रथम कठिनाई यह है कि साधारण यूरेनियम में U238 तथा U235 दो आइसोटोप होते हैं। इनमें U235 केवल 0.7% होता है, जबकि U23899.3% होता है। जहाँ U238 केवल तीव्रगामी (ऊर्जा 1 MeV से अधिक) न्यूट्रॉनों द्वारा ही विखण्डित होता है, वहीं U238 मन्द न्यूट्रॉनों (ऊर्जा 0.025 ev) द्वारा ही विखण्डित हो जाता है, जबकि U238 आइसोटोप मन्द गति न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेता है।

प्राकृतिक यूरेनियम में U238 की मात्रा अधिक होने के कारण, विखण्डन क्रिया में उत्पन्न हुए न्यूट्रॉनों के U238 नाभिकों द्वारा अवशोषित कर लिए जाने की सम्भावना अधिक होती है। इससे विखण्डन की क्रिया शीघ्र ही रुक जाती है। इसलिए श्रृंखला अभिक्रिया को सम्पन्न करने के लिए प्राकृतिक यूरेनियम में विसरण विधि द्वारा U235 का अनुपात बढ़ाया जाता है। इस क्रिया को यूरेनियम संवर्द्धन कहते हैं तथा इस प्रकार प्राप्त यूरेनियम को संवर्द्धित यूरेनियम कहते हैं।

2. श्रृंखला अभिक्रिया को चलाने में द्वितीय कठिनाई यह है कि U235 नाभिक के विखण्डन से प्राप्त न्यूट्रॉन की गति इतनी तीव्र होती है कि वे सीधे ही अन्य U235 नाभिकों का विखण्डन नहीं कर पाते। इसलिए विखण्डन में भाग लेने से पूर्व इन न्यूट्रॉनों को मन्दित करना होता है। इसके लिए विखण्डनीय पदार्थ को कुछ विशेष प्रकार के पदार्थों से घेरकर रखा जाता है।

इन पदार्थों को मन्दक पदार्थ कहते हैं। जब विखण्डन में उत्पन्न न्यूट्रॉन बार-बार मन्दक पदार्थ के अणुओं से टकराते हैं तो उनकी ऊर्जा कम होती जाती है। जब न्यूट्रॉनों की ऊर्जा 0.025 ev तक कम हो जाती है तो वे U235 नाभिकों का विखण्डन करने लगते हैं। इस प्रकार श्रृंखला अभिक्रिया जारी रहती है।