Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 7 शश-सिंह कथा Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

Bihar Board Class 6 Sanskrit शश-सिंह कथा Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिक –

प्रश्न 1.
निम्न शब्दों के अर्थ बताएँ –

(भयंकरः, भोजनाय, पशवः, भीताः, तदा, विलम्बेन, आगतः, सर्वान्, अरक्षत्, बलम्)
उत्तर-

  1. भयंकरः – भयानका
  2. भोजनाय – भोजन के लिए।
  3. पशवः – सभी पशु
  4. भीताः – डरा हुआ।
  5. तदा – उस समय।
  6. विलम्बेन – विलम्ब से।
  7. आगतः – आया।
  8. सर्वान् – सबों को।
  9. अरक्षत् – रक्षा किया।
  10. बलम् – बल।

प्रश्न 2.
इच्छानुसारेण’ के समान इन शब्दों को जोड़कर बताएँ –

  1. नियम + अनुसारेण
  2. कर्म + अनुसारेण
  3. विद्या + आलयः
  4. समय + अनुसारेण
  5. धर्म + अनुसारेण।

उत्तर-

  1. नियमानुसारेण
  2. कर्मानुसारेण
  3. विद्यालयः
  4. समयानुसारेण
  5. ध नुसारेण ।

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प्रश्न 3.
इन शब्दों का पंचमी एकवचन में रूप बताएँ –

  1. सिंह
  2. शश
  3. शरीर
  4. कूप
  5. बल

उत्तर-

  1. सिंहात्श
  2. शात्श
  3. रीरात
  4. कूपात
  5. बलात्

प्रश्न 4.
‘तत्र’ शब्द से युक्त पाँच वाक्य बोलें ।
उत्तर-

  1. तत्र विद्यालयः अस्ति
  2. तत्र मम् गहं अस्ति
  3. तत्र रमेशः अपि पठति
  4. तत्र गणेशपूजनं अस्ति
  5. तत्र पुष्पाणि सन्ति।

लिखितः

प्रश्न 5.
इन वाक्यों में रिक्त स्थानों को सही शब्दों से भरें

  1. एकस्मिन् ………… एक: भयंकरः सिंहः वसति स्म ।
  2. सर्वे पशवः …………… अभवन् ।
  3. तदा सिंहः ……………. इति अवदत् ।
  4. सः विलम्बेन सिंहसमोपम् ………….. ।
  5. …………. बलं तस्य ।

उत्तर-

  1. एकस्मिन् वने एक: भयंकरः सिंहः वसति स्म ।।
  2. सर्वे पशवः भीताः अभवन् ।
  3. तदा सिंहः आम इति अवदत् ।
  4. सः विलम्बेन सिंहसमीपम् अगच्छत् ।
  5. बुद्धिर्यस्य बलं तस्य ।

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प्रश्न 6.
संस्कृत में अनुवाद करें

  1. जंगल में एक सिंह था। (आसीत्)
  2. वह इच्छानुसार भोजन करता है। (भोजनं करोति)
  3. गुस्सा मत करो। (कुरू)
  4. वह गुफा में रहता है। (तिष्ठति)
  5. जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है।

उत्तर-

  1. वने एकः सिंहः आसीत्।
  2. सः इच्छानुसारेण भोजनं करोति।
  3. क्रोधं मा कुरू।
  4. सः गुहायाम् तिष्ठति ।
  5. यस्य बुद्धिः तस्य बलम् ।

प्रश्न 7.
इन शब्दों से वाक्य बनाएँ –

  1. भयंकरः
  2. सिंहः
  3. तदा
  4. वने
  5. बुद्धिमान
  6. कुत्र।

उत्तर-

  1. भयंकर – भयंकरः सिंहः वने वसति।
  2. सिंह – सिंहः भयंकरः आसीत् ।
  3. तदा – तदा सः वनं अगच्छत् ।
  4. वने – वने पशवः वसन्ति ।
  5. बुद्धिमान् – बुद्धिमानः विजयी भवति ।
  6. कुत्र – कुत्र त्वम् गच्छसि?

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न 8.
इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है ? पाँच वाक्यों में लिखें।
उत्तर-
खरगोश और सिंह की कहानी से शिक्षा मिलती है कि

  1. जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है।
  2. जहाँ बल से काम नहीं हो वहाँ बुद्धि का प्रयोम करना चाहिए।
  3. छोटे शरीर वाले भी यदि बुद्धिमान हों तो बलशाली पर विजय प्राप्त कर सकता है।
  4. बल का घमण्ड नहीं करना चाहिए।
  5. गुस्सा करने से बुद्धि मारी जाती है।

प्रश्न 9.
इस कहानी के आधार पर कोई कहानी लिखें।
उत्तर-
किसी पेड़ पर कौवा-कौवी की जोड़ी रहता था। उसी पेड़ के खोखड़ में एक भयंकर काला सौंप भी रहता था। वह साँप कौवा-कौवी के अण्डे को खा जाता था। .. एक रोज कौवी ने कौवा से बोली- नाथ! हमदोनों इस पेड़ को छोड़कर अन्यत्र चलें। क्योंकि यहाँ हमदोनों के बच्चे का जीवन सुरक्षित नहीं है। काला साँप हमारे बच्चे को खा जाता है। कौवा बोला – डरो मत। मैंने उसके अपराध को बहुत सह लिया है। अब नहीं सहूँगा। कौवी बाली – उतने बलवान के साथ कैसे झगड़ा करोगे ।

कौवा बोला- चिन्ता मत करो, यहाँ के तालाब में राजकुमार स्नान करते समय अपना वस्त्र और सोने का सिकरी पत्थर पर रख देता है। जब वह पानी में स्नान के लिए प्रवेश करेगा. तब उसके सोने की सिकरी को चोंच से उठाकर खोखड़ में डाल दूँगा। सिपाही मेरे पीछे दौड़ते हुए खोखड़ के पास आयेंगे । वहाँ साँप को मारकर मिकरी ले जायेंगे । दूसरे दिन कौवा ने वैसा ही किया। साँप मारा गया। कौवी-कौवा निर्भय होकर पेड़ पर रहने लगे। अत: सही कहा गया है – बुद्धि से जो काम होता है वह बल से नहीं हो सकता है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न 10.
निम्नलिखित शब्दों का वर्ण-विच्छेद करें –
जैसे- वने – व + अ + न + अ + ए ।

प्रश्न (क)
वसति …….. ।
उत्तर-
व् + अ + स + अ + त+इ।

प्रश्न (ख)
गच्छतु …….. ।
उत्तर-
ग् + अ + च् + छ + अ + त् + उ ।

प्रश्न (ग)
क्रमश: ……… ।
उत्तर-
क् + र् + अ + म् + अ +श् +अ ।

प्रश्न (घ)
एकस्मिन् …….. ।
उत्तर-
ए + क् + अ + स् + म् ।

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प्रश्न (ङ)
राजन् ……….. ।
उत्तर-
र् + आ + ज् + अ + न् ।

प्रश्न 11.
इनका सुमेल करें –

  1. सिंहः – (क) भीताः
  2. शशः – (ख) गर्जति
  3. पशवः – (ग) लघुः पशुः
  4. पशूनां संख्या – (घ) बलम्
  5. बुद्धिः – (ङ) क्षीणा

उत्तर

  1. सिंहः – (ख) गर्जति
  2. शशः – (ग) लघुः पशुः
  3. पशवः – (क) भीताः
  4. पशूनां संख्या – (ङ) क्षीणा
  5. बुद्धिः – (घ) बलम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit शश-सिंह कथा Summary

(खरगोश और शेर की कहानी)

पाठ – एकस्मिन् वने एक: भयंकरः सिंहः वसति स्म । स वने इच्छानुसारेण पशून भोजनाय मारयति स्म। अतः सर्वे पशवः
भीताः अभवन् । ते मिलित्वा विचारम् अकुर्वन् –

अर्थ – एक वन में एक भयंकर सिंह रहता था। वह जंगल में इच्छा अनुकूल पशुओं को भोजन के लिए मारता था। अत: सभी पशु भयभीत हो गये । उन सबों ने मिलकर विचार किया

पाठ – प्रतिदिनम् एकैकः पशुः सिंहस्य भोजनाय स्वयं गच्छतु । स्वविचारं ते सिंहस्य समीपं अस्थापयत् । तदा सिंहः “आम्” इति अवदत् ।

अर्थ – प्रतिदिन एक-एक पशु सिंह के भोजन के लिए स्वयं जाय। अपना विचार वे सभी सिंह के समीप रखा। तब सिंह ने “हाँ” कह दिया।

पाठ – एवम् एकैकः पशुः सिंहस्य भोजनकाले प्रतिदिनम् अगच्छत्।वने पशव: निश्चिन्ताः अभवन् । किन्तु एव पशूनी संख्या क्रमशः क्षीणा अभवत् ।

अर्थ – इस प्रकार एक-एक पशु सिंह के भोजन के समय प्रतिदिन जाते थे। वन में सभी पशु निश्चिन्त हो गये। किन्तु इससे पशुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती गई।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

पाठ – एकस्मिन् दिवसे एकस्य शशस्य वारः आसीत्। सः विलम्बेन सिंहसमीपम् अगच्छत् । तस्य अल्पशरीरेण, विलम्बेन आगमने च सिंहः कुपितः अभवत् । सः अवदत्रे दुष्ट ! कथं त्वम् एकाकी विलम्बेन च आगतः ? बुद्धिमान् शशः अवदत्- राजन् ! कोपं न कुरू । एक: अन्यः सिंहः मार्गे मिलितः। स गुहायां तिष्ठति ।

अर्थ – एक दिन एक खरगोश की बारी थी। वह विलम्ब से सिंह के समीप गया। उसके छोटे शरीर देखकर और देर से आने के कारण सिंह गुस्सा में आ गया। वह बोला -रे दुष्ट! क्यों तुम अकेले और विलम्ब से आया है? बुद्धिमान खरगोश कहा- हे राजन! गुस्सा नहीं करें। एक अन्य शेर रास्ते में मिला। वह गुफा में रहता है।

पाठ – सिंहः अवदत्-कुत्र सः ? नय मां तत्र । हनिष्यामि तं – दुष्टम् । शशः सिंह कूपसमीपम् अनयत् । तत्र कूपे स्वच्छायाम् सिंह अपश्यत् । अन्यं सिंह मत्वा कोपेन सः कूपे अकूर्दत् । तत्र स कालेन मृतः एवं शशस्य बुद्धिः सर्वान् पशून् अरक्षत् । अतः कथयन्ति-बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।

अर्थ – शेर बोला- कहाँ है वह ? मझे वहाँ ले चलो। मैं उस दृष्ट को मार दूंगा। खरगोश सिंह को कुआँ के समीप ले गया। वहाँ कुआँ में अपनी छाया सिंह ने देखा। दूसरा शेर मानकर गुस्सा से वह कुआँ में कूद गया। उसी समय वह मर गया। इस प्रकार खरगोश की बुद्धि ने सभी पशुओं की रक्षा की । इसलिए कहा गया है- जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है।

शब्दार्थाः– एकस्मिन् – एक (वस्तु) में। वसति स्म – निवास करता था। पशुन् – पशुओं को। भीता अभवन – डर गये थे। मिलित्वा – मिलकर। भोजनाय – भोजन के लिए। गच्छतु – जाय। क्षीणा – कम(नष्ट)। वारः – बारी, पारी। एकाकी – अकेला। विलम्बेन – विलम्ब से। कुपितः – क्रोध से भरा हुआ। अभवत् – हो गया (हुआ)। अवदत् – बोला। कथम् क्यों/कैसे। कुरु – करो। मार्गे – रास्ते में। हनिष्यामि – मार दूंगा । तं दुष्टम् – उस दृष्ट को। कूप-समीपम् – कुएँ के पास । अनयत् – ले गया। स्वच्छायाम् – अपनी परिछाई को । अपश्यत् – देखा । मत्वा – समझकर, कोपेन – गुस्सा से, अकूर्दत् -कूद गया । सर्वान् – सभी को। कथयन्ति – कहते/कहती हैं। बुद्धिर्यस्य (बुद्धिः + यस्य)- जिसके पास बुद्धि है। बलंतस्य – उसी के पास बल

व्याकरणम्

एकस्मिन् – एक (सप्तमी एकवचन (पुं./नपुं.) ।
इच्छानुसारेण – इच्छा + अनुसोरण(तृतीय एकवचन)

  1. एकैक: – एक + एक:।
  2. निश्चिन्ताः – निः + चिन्ताः ।
  3. बुद्धिर्यस्य – बुद्धिः + यस्य ।
  4. आसीत् – अस् + लड्. लकार ।
  5. हनिष्यामि – हन् + लृट् लकार ।
  6. अकूर्दत् – कुर्द + लड् लकार ।
  7. अगच्छत् गम् + लड् लकार ।
  8. अपश्यत् – दृश + लड्लकार।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 6 जनसंख्या Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

Bihar Board Class 9 Geography जनसंख्या Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
भारत में सर्वाधिक साक्षरता दर किस राज्य की है ?
(क) पश्चिम बंगाल
(ख) महाराष्ट्र
(ग) बिहार
(घ) केरल
उत्तर-
(घ) केरल

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 2.
भारत की औसत आयु संरचना क्या है ?
(क) 64.6 वर्ष
(ख) 64.9 वर्ष
(ग) 81.6 वर्ष
(घ) 70.2 वर्ष
उत्तर-
(क) 64.6 वर्ष

प्रश्न 3.
2001 ई० की जनगणना में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं के अनुपात की क्या स्थिति है ?
(क) 927 महिलाएँ
(ख) 990 महिलाएँ
(ग) 933 महिलाएँ
(घ) 1010 महिलाएँ
उत्तर-
(ख) 990 महिलाएँ

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 4.
भारत औसत जनसंख्या घनत्व प्रतिवर्ग कि० मी० क्या है ?
(क) 318 व्यक्ति
(ख) 325 व्यक्ति
(ग) 302 व्यक्ति
(घ) 288 व्यक्ति
उत्तर-
(ग) 302 व्यक्ति

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1951 ई0 में भारत की जनसंख्या कितनी थी ?
उत्तर-
1951 ई० में भारत की जनसंख्या 3.610 लाख थी।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 2.
भारत में 2001 ई० में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत था ?
उत्तर-
भारत में 2001 ई० में नगरीय जनसंख्या 27.78% हो गई।

प्रश्न 3.
केरल में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या क्या है ?
उत्तर-
केरल में प्रति 1000 पुरुष पर महिलाओं की संख्या 1058 है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 4.
भारत की साक्षरता दर का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत की साक्षरता के स्तर में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है । 2001 ई० की जनगणना के अनुसार देश की साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत पुरुषों का 73 प्रतिशत एवं महिलाओं की 53.67 प्रतिशत है।

प्रश्न 5.
भारत में लिंग अनुपात की विशेषताओं को बताएँ।
उत्तर-
प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को लिंग अनुपात कहा जाता है। भारत में लिंग अनुपात महिलाओं के पक्ष में नहीं हैं । सन् 1951 से 2001 के बीच लिंग अनुपात की सारणी इस प्रकार है-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या - 1

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 6.
जनगणना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
एक निश्चित समयांतराल को आधिकारिक गणना को जनगणना कहते हैं। भारत में सबसे पहले 1872 ई० में जनगणना की गई थी। सन् 1881 ई० में पहली बार सम्पूर्ण जनगणना की गयी थी। उसी समय से प्रत्येक 10 वर्ष पर जनगणना होती है।
भारतीय जनगणना जनसंख्यिकी, समसामयिक तथ्यों तथा आर्थिक आँकड़ों का सबसे बृहद स्रोत है।।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की जनसंख्या वृद्धि की विशेषताओं को बताएँ।
उत्तर-
जनसंख्या में वृद्धि की विशेषताएँ मुख्यतः चार हैं-(i) जन्मदर (ii) मृत्युदर (iii) प्रवास तथा (iv) व्यावसायिक संरचना।
(i) जन्मदर-एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों में जितने बच्चों का जन्म होता है, उसे ‘जन्मदर’ कहते हैं। यह वृद्धि का एक प्रमुख घटक है क्योंकि भारत में हमेशा जन्मदर मृत्युदर से अधिक रहा है। भारत की

आबादी 1951 में 3.60 लाख से बढ़कर 2001 में 10.280 लाख हो गई। वार्षिक वृद्धि 1.93% के हिसाब से बढ़ी।

(ii) मृत्युदर-एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों के मरने की संख्या को मृत्युदर कहा जाता है । मृत्युदर में तेजी से गिरावट भारत की जनसंख्या में वृद्धि की दर का प्रमुख कारण है। 1980 तक उच्च जन्मदर में धीमी गति से एवं मृत्युदर में तीव्र गति से गिरावट के कारण जन्मदर और मृत्युदर में काफी बड़ा अन्तर आ गया है । इसके कारण जनसंख्या में विस्फोट हो गया।

(iii) प्रवास-लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाने को प्रवास कहते हैं। प्रवास केवल जनसंख्या के आकार को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उम्र एवं लिंग के वृद्धि में ग्रामीण-नगरीय प्रवास के कारण शहरों तथा नगरों की जनसंख्या में नियमित वृद्धि हुई है। 1951 में कुल जनसंख्या की 17.29% नगरीय जनसंख्या थी, जो 2001 में बढ़ कर 27.78% हो गई । एक दशक (1991 से 2001) के भीतर 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों की संख्या 23 से 35 हो गयी है।

(iv) व्यावसायिक संरचना-आर्थिक रूप से क्रियाशील जनसंख्या का प्रतिशत विकास का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के अनुसार किए गए जनसंख्या के आर्थिक वितरण को व्यावसायिक संरचना कहते हैं । भारत एक कृषि प्रधान देश है अत: 64% जनसंख्या गाँवों में कृषि कार्य पर आधारित है । शहरों में जीविका-निर्वाह के साधनों के बढ़ने से सुरक्षा के ख्याल से भी नगरों की संख्या बढ़ रही

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 2.
भारत के विषम जनसंख्या घनत्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
जनसंख्या घनत्व का तात्पर्य भूमि के प्रति इकाई पर अधि वासित होनेवाली जनसंख्या है। भारतीय जनगणना विभाग द्वारा स्तरीय मापक के रूप में प्रतिवर्ग कि०मी० को एक इकाई माना गया है । इस दृष्टि से, भारत की जनगणना 2001 के अनुसार, भारत का औसत जनसंख्या घनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है लेकिन इसमें भारत में विषमता है।

मैदानी राज्यों में सर्वाधिक घनत्व है, तरायी राज्यों में भी काफी घनत्व है लेकिन पर्वतीय राज्यों में, अधिवासी आर्थिक संरचनात्मक सुविधा की कमी के कारण घनत्व पाये जाते हैं। पठारी राज्यों में सामान्य घनत्व की स्थिति है। भारतीय राज्यों में सर्वाधिक घनत्व पश्चिम बंगाल का है। यहाँ
औसतन प्रतिवर्ग कि०मी० 904 व्यक्ति रहते हैं। इसके बाद क्रमशः बिहार (881), केरल (819) का स्थान है। सबसे कम घनत्व अरुणाचल प्रदेश अर्थात् पर्वतीय राज्य का है जहाँ औसत घनत्व मात्र 13 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी० है।

केन्द्र शासित प्रदेशों को शामिल कर देखा जाय तो सर्वाधिक घनत्व दिल्ली का है । यह 9340 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी० है । अंडमान निकोवार द्वीप समूह का घनत्व मात्र 34 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी० है ।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

जनसंख्या वृद्धि दर तीव्र होने के कारण भारत के औसत घनत्व में भी तेजी से वृद्धि हुई है। यह 1901 ई० में मात्र 37 व्यक्ति वर्ग कि०मी० था जो 2001 में बढ़कर 325 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि०मी० हो चुका है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

Bihar Board Class 9 Disaster Management सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
सामान्य आपदाओं को कितने वर्गों में रखा जाता है ?
(क) 1
(ख) 2
(ग) 3
(घ) 4
उत्तर-
(ख) 2

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 2.
तीव्र ज्वर का क्या कारण है ?
(क) जीवाणु
(ख) विषाणु
(ग) फंगस
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) जीवाणु

प्रश्न 3.
नगरों में सड़क कहाँ से पार करनी चाहिए?
(क) जहाँ जेब्रा का चिह्न नहीं बना हो
(ख) जहाँ जेब्रा का चिह्न बना हो
(ग) अपनी स्वेच्छा के अनुसार
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) जहाँ जेब्रा का चिह्न बना हो

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 4.
पैदल चलते समय सड़क पर चलना आदर्श है ?
(क) दायीं तरफ
(ख) बीच से
(ग) बायीं तरफ
(घ) स्वेच्छा से
उत्तर-
(ग) बायीं तरफ

प्रश्न 5.
रेल यात्रा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
(क) रेलफाटकों को पार करते समय दायीं-बायीं नहीं देखना चाहिए।
(ख) रेल यात्रा के दौरान ज्वलनशील पदार्थ नहीं ले जाना चाहिए।
(ग) बच्चों को रेलवे लाइन पार करने के नियमों की जानकारी नहीं होनी चहिए।
(घ) इनमें से कोई नहीं।।
उत्तर-
(ख) रेल यात्रा के दौरान ज्वलनशील पदार्थ नहीं ले जाना चाहिए।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हवाई यात्रा करते समय सुरक्षा के कौन से नियम ध्यान में रखने चाहिए?
उत्तर-
हवाई यात्रा करते समय सुरक्षा के निम्नलिखित नियम ध्यान में रखने चाहिए

  • यात्री. सुरक्षा संबंधी नियमों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और उसका पालन करें।
  • जब सीट पर बैठे तो बेल्ट बाँधे रखें और संकेतों का पालन करें।
  • आपातकालीन द्वार के बारे में पहले से जानकारी प्राप्त कर लें।
  • यात्रियों की शिनाख्त कड़ाई के साथ की जानी चाहिए।
  • विमान में चढ़ने के पूर्व यात्रियों के सामानों की अत्याधुनिक . इलेक्ट्रनिक यंत्रों से जाँच करनी चाहिए।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 2.
रेलवे फाटक पार करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
रेलवे फाटक पार करते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  • जब भी ऐसा कोई समपार आये तब उसे पार करने के पहले चालक वहाँ रुककर स्वयं या अपने संवाहक को उस चिह्न के पास से लाइन के पास भेजेगा। रेलवे लाइन के दोनों तरफ देखेगा कि कोई इंजन, ट्रेन अथवा ट्राली तो नहीं आ रही है अगर नहीं आ रही है तो सावधानी पूर्वक समपार को पार करेगा।
  • रक्षित समपार फाटकों पर गेट लैम्प लगे रहते हैं। रात्रि में आगर लाल बत्ती दिखाई दे तो समझें समपार फाटक बंद है । अगर सफेद , बती दिखाई दे समझें गेट खुला है। दिन के समय तो खुद ही पता चल जाता है।
  • गेट बंद रहने पर उसे पार किया जाय तो उसे तीन साल की सजा भी हो सकती है।
  • गाँवों तथा शहरों में बहुत सारे विद्यालय रेलवे लाइन के पास होते हैं। अतः शिक्षकों को चाहिए कि बच्चों को रेलवे लाइन पार करने के नियमों की पूर्ण जानकारी दें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 3.
सड़क यात्रा के दौरान किन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए?
उत्तर-
सड़क यात्रा के दौरान निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

  • शहरों में भीड़-भाड़ में कई जगह उपसतही पैदल मार्ग या भूमिगत पैदल मार्ग बने होते हैं। उन्हीं मार्गों को अपनाना चाहिए।
  • कहीं-कहीं भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में पैदल जाने के लिए पुल बने होते हैं उसी के ऊपर चलना चाहिए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क यात्रा के दौरान सड़क के बायें तरफ से चलना चाहिए।
  • सड़क पार करते समय जेब्रा क्रांसिंग से ही पार करना चाहिए ।
  • किसी चौक को पार करते समय रंगीन बत्तियों या चौराहे पर खड़े पुलिस के हाथ के इशारे को समझें तब आगे बढ़े।।
  • अगर किसी वाहन से सड़क यात्रा कर रहे हों तो वाहन एकं । निर्धारित गतिसीमा में चलाएँ।
  • शराब-पीकर वाहन न चलाएँ।
  • वाहन चलाते समय मोवाइल से बात-चीत न करें।
  • अगर दुपहिया वाहन चला रहे हों तो हेल्मेट का प्रयोग अवश्य करें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 4.
आग से उत्पन्न आपदा क्या है ?
उत्तर-
आग से उत्पन्न आपदा मानवजन्य आपदाओं में प्रमुख है। मानवीय भूल से आग लगने पर जान-माल की भारी क्षति होती है । ऐसा भी देखने में आता है कि चक्रवात, भूकम्प और बाढ़ जैसी आपदाओं में प्रतिवर्ष जितने लोग मरते हैं उससे कहीं ज्यादा लोगों की मृत्यु आग से उत्पन्न आयदा से होती है। इधर हाल ही में जयपुर के इंडियन आयल के पेट्रोल पम्प पर आग लगी जिसमें करीब 12 लोगों की मृत्यु हो गई और 300 करोड़ रुपए का पेट्रोल जल गया।

प्रश्न 5.
साम्प्रदायिक दंगों से बचाव के किन्हीं तीन उपायों का वर्णन करें।
उत्तर-
साम्प्रदायिक दंगों से बचाब के तीन उपाय निम्नलिखित हैं

  • साम्प्रदायिक दंगों से बचाव के लिए आवश्यक है कि हम न तो अफवाह फैलावें और न ही उसमें विश्वास करें।
  • अफवाह की सूचना निकटतम पुलिस स्टेशन को दें।
  • साम्प्रदायिक दंगों में लगे हुए लोगों को पनाह नहीं दें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 6.
आतंकवादी आपदा से बचाव के किन्हीं तीन उपायों का वर्णन करें।
उत्तर-
आतंकवादी आपदा से बचाव के तीन उपाय प्रमुख हैं.

  • यदि किसी क्षेत्र में सूटकेस, संदूक या थैला रखा हुआ दिखाई दे तो इसकी सूचना पुलिस को तुरंत ही देनी चाहिए।
  • यदि आपको किसी व्यक्ति की गतिविधियों पर शक हो तो उसकी सूचना तुरंत पुलिस को दें। यदि आप पुलिस तक नहीं जा सकते तो अपने शिक्षक या अभिभावक को दें।
  • अपने मकान में किरायेदार रखने के वक्त उसकी सही शिनाख्त करें और फोटोग्राफ सहित उसकी जानकारी पुलिस को दें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आग से उत्पन्न आपदा के अंतर्गत आग लगने के कारणों तथा रोकथाम के उपायों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
आग से उत्पन्न आपदा भी भयानक होती हैं- आग लगने के निम्नलिखित कारण हैं.

(i) खाना पकाते समय-खाना पकाते समय किसी व्यक्ति के मौजूद न होने अथवा स्टोव या खाना पकाने वाली किसी अन्य उपकरण में खराबी के कारण आग लगने से दुर्घटनाएँ होती हैं । कभी-कभी गैस रिसाव होने से भी गैस में आग लग जाती है जिससे दुर्घटनायें हो जाती

(ii) पानी या भोज्य सामग्री गर्म करने वाले उपकरणों से आग लगने की संभावना रहती है। बिजली के हीटर पर खाना बनाते समय भी दुघटनाएँ होती हैं।

(ii) घरों में बिजली की वायरिंग में विद्युत भार से अधिक आपूर्ति किये जाने पर वायरिंग में आग लग जाती हैं जिससे विद्युत उपकरण खराब हो जाते हैं।

(iv) किसी कारखाने में जमा की गई पैकिंग सामग्री, तरल पदार्थ, गैस जैसी ज्वलनशील वस्तु में आग लग जाती है जो विकराल रूप धारण कर लेती है।

(v) बीड़ी और सिगरेट को पीने के पश्चात अथवा ज्वलनशील पदार्थों को जंगलों में फेंकने से भी आग लग जाती है। अफ्रीका के जंगलों में जन जातियों के सामने यह आपदा प्रतिवर्ष आती है।

आग की रोकथाम के उपाय

  • घर के भीतर अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ न रखें।
  • घर से बाहर जाते समय बिजली के सभी उपकरणों को बन्द कर दें।
  • खाना बनाने के बाद गैस को बन्द कर दें।
  • एक ही सॉकेट में बहुत सारे उपकरण न लगावें ।
  • जिस घर में धुआँ हो वहाँ हाथ, पैर या पेट के बल चलने का अभ्यास करें।
  • बिजली के कारण आग लगने पर पानी का प्रयोग कभी भी न करें।
  • बच्चों के हाथ में माचिस कभी न दें।
  • कारखानों में अग्निशामन यंत्र अवश्य रखें ।
  • यथासंभव जल का प्रबंध भी करें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 2.
आतंकवाद क्या है ? आतंकवादी आपदा से बचाव के उपायों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
आतंकवाद मानवजनित वह आपदा है जो हिंसात्मक मार्ग से राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति चाहता है । वह राजनीति से प्रेरित हिंसा होती है इसका एकमात्र उद्देश्य वर्तमान शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। 11 सितम्बर, 2001 को वायुयान की मदद से अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर किया गया आतंकवादी हमला उनकी क्रूरता और कठोरता का चरम स्वरूप है। सैकड़ों लोग अपने जीवन गंवा बैठे। .

26 नवम्बर, 2008 को मुम्बई के कई स्थलों पर फिदायीन आतंकवादियों द्वारा एक साथ कई जगहों पर हमले हुए जिसमें पाँच सितारा होटल में आग लगा दी गयी । कुल मिलाकर 200 व्यक्तियों की जाने गयी । यह भी क्रूरता का एक ज्वलंत उदाहरण है।

आतंकवादी आपदा से वचाव के उपाय-इससे बचाव के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ आवश्यक हैं

  • यदि अचानक कोई गठरी मिल जाय तो उसे छूना नहीं चाहिए बल्कि पुलिस को तत्काल सूचित करना चाहिए।
  • प्रत्येक गाँव और शहरी मुहल्ले में आतंकवाद के विरुद्ध सामाजिक वातावरण बनाने के लिए समिति का गठन करना चाहिए ।
  • सरकार द्वारा आतंकवाद से उत्पन्न समस्याओं में फंसे लड़कों को यह आश्वासन देना चाहिए कि यदि वे हिंसा का मार्ग त्याग दें कर आम लोगों के साथ जीना प्रारंभ करते हैं तो उनके ऊपर दंडात्मक कार्यवाही नहीं होगी बल्कि क्षमादान के साथ-साथ रोजगार के लिए आर्थिक सहायता भी दी जायेगी।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 3.
विद्यालय स्तरीय आपदा प्रबंधन की जानकारी का वर्णन करें।
उत्तर-
विद्यार्थी सड़क मार्ग से बस द्वारा या पैदल प्रतिदिन विद्यालय आते और जाते हैं। अतः विद्यालय स्तर पर आवश्यक है कि बच्चों को परिवहन से संबंधित दुर्घटना के कारणों और उससे बचाव की जानकारी देनी चाहिए। बच्चों को शिक्षक द्वारा निम्नलिखित जानकारी दी जानी चाहिए

  • सड़क मार्ग पर सदैव बायें चलें।
  • यदि सड़क पार करनी हो तो हरी बत्ती जलने या उपस्थित पुलिस के संकेत पर पार करनी चाहिए।
  • विद्यालय में परिवहन मार्ग और दुर्घटना से जुड़े हुए मॉडल का प्रदर्शन करना चाहिए तथा विद्यार्थियों को इस प्रकार के माडल बनाने का निर्देश देना चाहिए।
  • विद्यालय बस का चालक पूर्ण प्रशिक्षित होना चाहिए और बच्चे को स्पष्ट हिदायत देते रहना चाहिए कि गाड़ी रुकने पर वे उतरें तथा उसमें चढ़ें।
  • गाड़ी में बैठने के बाद बच्चे शरीर का कोई भी अंग खिड़की के बाहर न निकालें।
  • विद्यालय में प्राथमिक उपचार की सुविधा होनी चाहए।
  • विद्यालय में बच्चों को यह बताना चाहिए कि जलने की स्थिति में तुरंत उस पर ठंढा जल डाला जाय । यदि उपलब्ध हो तो वर्फ के टुकड़ों को भी जले हुए अंग पर रखना चाहिए। ये सब जानकारियाँ बच्चों को होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
लघु स्तरीय आपदाओं के कारणों एवं उनसे बचाव के तरीकों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
लघु स्तरीय आपदाओं में कुपाचन जैसे-दस्त, हैजा, प्लेग, कालाजार, मलेरिया तथा तीव्र ज्वर जैसी संक्रामक अथवा महामारी होने वाली बीमारियाँ हो सकती हैं। इन बीमारियों के होने के निम्नलिखित कारण हैं

  • लघु स्तरीय आपदायें मुख्यतः खान-पान और जीवन शैली को स्वस्थ रूप से संचालित न करने से उत्पन्न होते हैं।
  • गरीब परिवारों में भोजन की समस्या होती है। कभी-कभी वे ऐसे पदार्थ खाने के लिए विवश होते हैं जो या तो अपाच्य होता है या अखाद्य । इससे पेट की बीमारियाँ हो जाती हैं।
  • एक कारण यह भी है कि जो भी भोजन उपलब्ध होता है उसे जानकारी अथवा समय के अभाव में ठीक ढंग से प्राप्त नहीं करते हैं । जैसे गर्म भोजन करने से और गर्म जल को ठंढा कर पीने से इस प्रकार की बीमारियों की संभावना नहीं के बराबर रहती है।
  • दूषित जल एवं हवा की गंदगी से हैजा, प्लेग, मलेरिया आदि रोग फैलते हैं।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

लघु स्तरीय आपदाओं से बचाव के तरीके

  • प्रारंभिक प्रबंधन की व्यवस्था पारिवारिक स्तर पर ही होनी चाहिए। जैसे-नमक और चीनी का घोल देना, नींबू चूसना, लौंग को दाँतों तले दबाकर रखना चाहिए। ऐसा करने से आरम्भ में बीमारी पर नियंत्रण हो सकता है।
  • गाँवों में स्वास्थ केन्द्र नहीं के बराबर होते हैं। अतः गाँव में जिसके पास सवारी है.उसे बीमार लोगों की मदद करनी चाहिए। जिसके पास मोबाइल फोन हो उसे तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र को सूचित कर देना चाहिए।
  • इलेक्ट्रॉल पाउडर को घर में रखना चाहिए अगर नहीं है तो नमक चीनी का घोल बनाकर मरीजों को देते रहना चाहिए।
  • स्वयं सेवी संस्थाएँ या ग्राम पंचायतें नुक्कड़ नाटकों या परिचर्चाओं द्वारा लोगों को इस संबंध में सावधानी रखने के लिए जागरूक कर सकती
  • हैजा, प्लेग आदि बीमारियाँ शीघ्र ही महामारी का रूप धारण कर लेते हैं अतः निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र को सूचित कर देना चाहिए ।
  • कुछ बीमारियों के लक्षण जानना आवश्यक है जिससे उनकी पहचान शीघ्र हो सके जैसे-मलेरिया, कालाजार आदि, ये गंदे जल तथा गंदी हवा से फैलते हैं अत: उनसे बचना चाहिए और इलाज की सुविधा के लिए बड़े अस्पतालों में जाना चाहिए।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 8 जलमेव जीवनम् Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit जलमेव जीवनम् Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिकः –

प्रश्न 1.
निम्न शब्दों का अर्थ बतावें –
अस्माकम्, धारयति, शुष्यन्ति, क्वचिद्, क्षारम्, कूपान्, यन्त्रेण, क्षेत्राणाम्, जीवम्, सर्वेषाम् ।
उत्तर-
अस्माकम् – हमारा/हमारे/हमारी, धारयति -धारण करता है। शुष्यन्ति – सूख जाते हैं। क्वचिद् -कहीं। क्षारम् – खारा/नमकीन। कूपान् – कुओं को। यन्त्रेण – मशीन से। क्षेत्राणाम – खेतों को। जीवम -प्राणी।। सर्वेषाम् -सबों का।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाएँ –

सूर्यः, पवनः, जलमेव, मधुरम्, अस्ति
उत्तर-

  1. सूर्यः – सूर्यः प्रकाशं ददाति।
  2. पवनः -पवनः मन्द-मन्दं चलति।
  3. जलमेव – जलमेव जीवनम्।
  4. मधुरम् – मधुरम् जलम् पेयम् भवति।
  5. अस्ति – अत्र विद्यालयः अस्ति।

लिखितः

प्रश्न 3.
इन वाक्यों में रिक्त स्थानों को सही शब्दों से भरें-

  1. ……………. जीवनम्।
  2. सर्वेषु जलस्य …………… वर्त्तते।
  3. भूमिः अपि ……….. ।
  4. नद्यां …………….. च जलं मधुरं भवति।
  5. वनस्पतयः वर्षाजलेन ………..।

उत्तर –

  1. जलमेव जीवनम्।
  2. सर्वेषु जलस्य प्रधानता वर्तते।।
  3. भूमिः अपि शुष्यति ।
  4. नंद्यां सरोवरे च जलं मधुरं भवति।
  5. वनस्पतयः वर्षाजलेन जीवन्ति ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 4.
पाठ के आधार पर जल की महत्ता पर पाँच वाक्य लिखें।
उत्तर-
जल ही जीवन है। जल के बिना मनुष्य जीव-जन्तु,पेड़-पौधे कुछ भी जीवित नहीं रह सकते हैं। जल के कारण ही मेघ बरसता है। जल से सिंचाई का काम होता है। जल से ही अन्न की उपज होती है।

प्रश्न 5.
संस्कृत में अनुवाद करें –

  1. जल मीठा है। (अस्ति)
  2. समुद्र का जल खारा होता है। (क्षारम्)
  3. नदी और तालाब का जल मीठा होता है। (मधुरं)
  4. मैं छठे वर्ग में पढ़ता हूँ। (पठामि)
  5. खेतों में अन्न होता है। (क्षेत्रेषु)

उत्तर-

  1. जलं मधुरं अस्ति ।
  2. सागरस्य जलं क्षारं भवति ।
  3. नद्याः तडागस्य जलं मधुरं भवति ।
  4. अहं षष्ठ वर्गे पठामि।।
  5. क्षेत्रेषु अन्नं भवति।

प्रश्न 6.
सन्धि-विच्छेद करेंसागरश्च, जलमपि, कोऽपि, जलमेव, तथापि।
उत्तर-
सागरश्च – सागरः च । जलमपि – जलम् अपि । कोऽपि – कः + अपि। जलमेव जलम् + एव। तथापि – तथा + अपि।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 7.
सही विकल्प चुनिए

  1. खाना – भोजनम्, फलम, मिष्टानम्।
  2. जल – जलम्, जले, जलेन ।
  3. खेत में – क्षेत्राणि, क्षेत्रेषु, क्षेत्रम्।
  4. सूर्य – सूर्यः, सूर्यम्, सूर्याय । ।
  5. सूखता है – शुष्यन्ति, शुष्यति, शुष्यतः ।

उत्तर-

  1. खाना – भोजनम्।
  2. जल – जलम्।
  3. खेतों में – क्षेत्रेषु।
  4. सूर्य – सूर्यः ।
  5. सूखता है – शुष्यति ।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित शब्दों का वर्ण विच्छेद करें –
जैसे – जले – ज् + अ + ल् + ए ।

  1. मेघः – …………………………
  2. पवनः – …………………………
  3. जनाः – ……………………….
  4. जीवनम्

उत्तर-

  1. मेघः – मे + घ।।
  2. पवन: – प + व + नः।
  3. जनाः – ज + नाः।
  4. जीवनम् – जी + व + नम् ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वर्गों को मिलाएँ –

जैसे -क् + र = क्रर् + क = क

  1. र् + प = पं
  2. प् + र प्र
  3. ल् + प = ल्प
  4. प् + ल = प्ल
  5. ज् + य = ज्य

उत्तर-

  1. पं
  2. प्र
  3. ल्प
  4. प्ल
  5. ज्य।

Bihar Board Class 6 Sanskrit जलमेव जीवनम् Summary

पाठ – अस्माकं जीवनस्य सुखाय प्रकृतिः नाना पदार्थान् धारयति। तेषु धनस्पतयः पशु-पक्षिणः मेघः,सूर्यः, भूमिः, पर्वतः, पवनः, जलम् इत्येते सन्ति। सर्वेषु च जलस्य प्रधानता वर्तते। जलं विना मानवो .. नजीवति, वनस्पतयः शुष्यन्ति, मेघाः न भवन्ति, अन्नं न जायतेाभूमिः अपि शुष्यति। अती जलं सर्वस्य जीवनम् अस्ति।

अर्थ -हम्मे जीवन के सुख के लिए प्रकृति अनेक पदार्थो को धारण करती है उनमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों, मेघ, सूर्य, भूमि, पर्वत, हवा, पानी आदि : है और सबों में जल की प्रधानता है। जल के बिना मनुष्य नहीं जीवित .. रह सकता है, पेड़-पौधे सूख जाते हैं, मेघ नहीं होते हैं, अन्न नहीं उपजता है, धरती भी सूख जाती है। अतः जल सब का जीवन है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

पाठ – भूमौ जलस्य नाना स्थानानि सन्ति। क्वचित् नदी, क्वचित् । सरोवरः, विशालः सागरश्च अस्ति। सागरे तु जलं क्षारम् । अस्ति। मेघः क्षारं जलं पीत्वा मधुरं जलं ददाति। नद्यां सरोवरे च जलं मधुरं भवति। जनाः कूपान् खनित्वा जलं निष्कासन्ति। क्वचित् कूपे मधुरं पेयं जलं भवति, क्वचित् क्षारम् अपेयं जलं भवति।

अर्थ – भूमि पर जल के अनेक स्थान हैं। कहीं नदी, कहीं तालाब और विशाल समुद्र हैं। समुद में पानी खारा (नमकीन) है। मेघ खारा पानी पीकर मीठा पानी देता है। लोग कुओं को खोदकर पानी निकालते हैं। कहीं कुओं में मीठा पानी पीने योग्य होता है, कहीं खारा नहीं पीने योग्य जल होता है।

पाठ – अधुना भूमिगतं जलमपि यन्वेण निष्कासन्ति क्षेत्राणां सेचने सर्वस्य जलस्य प्रयोगः भवति। सेचनात् क्षेत्रेषु अन्नं भवति। वनस्पतयः वर्षा जलेन जीवन्ति। अतः सर्वेषां जीवानां वनस्पतीनां भूमेश्च जीवनं जलमेव अस्ति।

अर्थ – आजकल भूमि के अन्दर के जल को भी मशीन के द्वार निकाले जाते हैं। खेतों को सींचने में सब प्रकार के जल का प्रयोग होता है। सिंचाई से खेतों में अन्न होता है। पेड़-पौधों
वर्ष के जल से जीवित रहते हैं। अतः सभी जीवों का, पेड़-पौधे का और भूमि का जीवन जल ही है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

शब्दार्था : – अस्माकम् – हमारा/हमारी/हमारे । जीवनस्य – जीवन के, का, की । सुखाय – सुख के लिए। नाना – अनेक प्रकार के । पदार्थान् – वस्तुओं को । धारयति – धारण करती हैं। तेषु – उन सबों में । वनस्पतयः – पेड़-पौधे । इत्येते(इति एते) – ये सब। सर्वेषु – सबों में । शुष्यन्ति – सूख जाते/जाती हैं । जायते – होता/होती है/उत्पन्न होता है। अपि – भी। भूमौ – धरती पर । क्वचित् – कहीं। क्षारम् – खारा(नमकीन)। पीत्वा — पीकर। नद्यां – नदी में। कूपान् – कुओं को। खनित्वा – खोदकर। निष्कासन्ति – निकालते/निकालती हैं। पेयाम् – पीने योग्य। अपेयम् – नहीं पीने योग्य। अधुना – आजकल। भूमिगत – जमीन के अन्दर का। यन्त्रेण – मशीन के द्वारा। क्षेत्राणाम् – खेतों की/का/के। सेचने – सिंचाई में। सेचनात् – सिंचाई से। क्षेत्रेषु – खेतों में । जीवानाम् – जीवों का ।

व्याकरणम्

सन्धि-विच्छे दः

  • जलमेव – जलम् + एव
  • इत्येते – इति +एते
  • सागरश्च – सागरः + च भूमेश्च – भूमेः + च
  • जलमपि – जलम् + अपि।

वर्ण-विशेषाः

क्ष त्र ज्ञ – देवनागरी लिपि में ये तीनों संयुक्ताक्षर हैं
क् + ष = क्ष। त् + र = त्र। ज् + अ = ज्ञ।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 10 मानवीय गलतियों के कारण घटित

Bihar Board Class 9 Disaster Management मानवीय गलतियों के कारण घटित Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
इनमें से कौन परमाणु ऊर्जा केन्द्र है ?
(क) केगा
(ख) वाराणसी
(ग) दिल्ली
(घ) मेरठ
उत्तर-
(क) केगा

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 2.
हिरोशिमा किस देश में है ?
(क) भारत
(ख) जापान
(ग) चीन
(घ) ताईवान
उत्तर-
(ख) जापान

प्रश्न 3.
परमाणु विस्फोट से बचने के लिए सर्वप्रथम प्रतीक चिह्न का ‘विकास किसने किया है ?
(क) टोकियो विश्वविद्यालय
(ख) केम्ब्रिज विश्वविद्यालय
(ग) केलिफोर्निया विश्वविद्यालय
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ग) केलिफोर्निया विश्वविद्यालय

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
परमाणु ऊर्जा क्या है ?
उत्तर-
यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों को परिष्कृत कर रिएक्टर के माध्यम से नाभिकीय विखंडन कराया जाता है जिससे ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इसी को परमाणु उर्जा कहते हैं।

प्रश्न 2.
विश्व में सर्वप्रथम परमाणु बम किस देश पर गिराया गया था?
उत्तर-
जापान पर।

प्रश्न 3.
भारत के किस राज्य में परमाणु परीक्षण किया गया?
उत्तर-
राजस्थान के पोखरन में ।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रेडियेशन से क्या-क्या हानि होती है ? मनुष्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी दें।
उत्तर-
रेडियेशन से मनुष्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव निम्नलिखित

  • रेडियेशन के प्रभाव से जीवों में अनुवांशिक पदार्थ (Genetic Materials) में उत्परिवर्तन की दर में वृद्धि होती है जिससे हड्डी का टी० वी०, कैंसर, शारीरिक विकृतियाँ तथा अंगों के समुचित विकास में असमानताएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।
  • पराबैगनी किरणों के प्रभाव से त्वचा संबंधी रोग भी हो सकते हैं।
  • नाभिकीय विस्फोटों से ओजोन की सुरक्षा-परत का क्षय होता है।
  • रेडियोधर्मी पदार्थों के रेडियेशन से रक्त कैंसर, बंध्यता, दृष्टि-दोष आदि रोग हो सकते हैं!

प्रश्न 2.
परमाणु ऊर्जा से क्या लाभ है ? वर्णन करें।
उत्तर-
परमाणु ऊर्जा का विकास विज्ञान की विशिष्ट उपलब्धियों में से एक है। इसके अंतर्गत यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों को परिष्कृत कर रियेक्टर के माध्यम से नाभिकीय विखंडन कराया जाता है जिसमे ऊर्जा की प्राप्ति होती है । यह ऊर्जा आर्थिक-सामाजिक विकास को नः ति दे सकता है । यथा-बिजली का उत्पादन, गाड़ियाँ चलाई जा सकती ‘ आदि कार्य किये जा सकते हैं।

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11.2 रासायनिक आपदा

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
भोपाल में रासायनिक गैस रिसाव कब हुआ था ?
(क) 1984
(ख) 1990
(ग) 1930
(घ) 2004
उत्तर-
(क) 1984

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 2.
तूतीकोरिन में 1997 ई0 में गैस रिसाव से कौन-सी बीमारी उत्पन्न हुई थी?
(क) उल्टी होना
(ख) सर्दी एवं खांसी
(ग) उल्टी होना एवं छाती में जलन
(घ) मस्तिष्क ज्वर
उत्तर-
(ग) उल्टी होना एवं छाती में जलन

प्रश्न 3.
अम्लीय वर्षा का सर्वाधिक प्रभाव कहाँ पड़ा है ?
(क) पटनां महानगर
(ख) दामोदर घाटी क्षेत्र
(ग) उत्तरी बिहार
(घ) असम घाटी क्षेत्र
उत्तर-
(ख) दामोदर घाटी क्षेत्र

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किस देश द्वारा गैस के प्रयोग से यहूदियों को मारा गया था ?
उत्तर-
जर्मनी के द्वारा गैस के प्रयोग से यहूदियों को मारा गया।

प्रश्न 2.
कीटनाशक में किस रासायनिक पदार्थ का प्रयोग होता है ?
उत्तर-
कीटनाशक में मिथाइल आइसोसायनेट तथा हाइड्रोजन साइनाइड रसायन का प्रयोग होता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गैस रिसाव होने पर किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिए?
उत्तर-
गैस रिसाव की स्थिति में वहाँ मौजूद लोगों को स्पष्ट दिशा निर्देश देने की जरूरत है कि वे वायु की उल्टी दिशा में जायें।
गैस रिसाव पर लोगों को यथाशीघ्र मास्क लगा लेना चाहिए।
सभी कर्मचारियों की एक निश्चित अंतराल पर चिकित्सों द्वारा जाँच होनी चाहिए। कारखानों में सायरन की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि तत्काल सभी को सूचित किया जा सके ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रासायनिक आपदा के अन्तर्गत आनेवाली समस्याओं का वर्णन
उत्तर-
औद्योगिक विकास के साथ-साथ रासायनिक पदार्थों के उत्पादन से जुड़ी तीन समस्याएँ आती हैं
(i) विषैले रासायनिक उत्पाद से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँ ।
(ii) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँ ।
(iii) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदाएँ।

(i) विषैले रासायनिक उत्पाद से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँइसका सर्वाधिक प्रभाव कृषि उत्पाद पर देखने को मिलता है । रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से न सिर्फ मृदा के सूक्षम जीवों का विनाश होता है बल्कि उत्पाद विषैली हो जाता है । इसके अलावा कई प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है जो जान लेवा सावित होती है। इससे अम्लीय वर्षा का डर बना रहता है विशेषकर महानगरों में।

(ii) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँरासायनिक आयुध के अंतर्गत विविध जहरीले गैसों के प्रयोग के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थों में भी ऐसे गैस सन्निहित होते हैं जिनके प्रभाव से त्वचा में जलन और गलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है । मृत्यु भी हो जाती है।

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(iii) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदा-गैस रिसाव बड़ी आपदा का रूप लेता है। भोपाल गैस रिसाव (1984) इसका प्रमाण है । पुनः 1999 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन गैस रिसाव के उदाहरण हैं।

11.3 जैविक आपदा

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
डेंगू बीमारी का क्या कारण है ?
(क) आग लगने से
(ख) एक बर्तन में अधिक समय तक पानी रहने से
(ग) बाढ़ आने से
(घ) गंदे भोजन से।
उत्तर-
(ग) बाढ़ आने से

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प्रश्न 2.
एंथेक्स क्या है ?
(क) अति सूक्ष्म जीव
(ख) युद्धपोत
(ग) जंगली जानवर
(घ) युद्ध का एक अस्त्र
उत्तर-
(ख) युद्धपोत

प्रश्न 3.
भारत में एड्स से लगभग कितने लोग प्रभावित हैं ?
(क) 25 लाख
(ख) 30 लाख
(ग) एक करोड़
(घ) 50 लाख
उत्तर-
(ख) 30 लाख

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्लेग और हैजे का क्या कारण है ?
उत्तर-
प्लेग-वायरल नामक विषाणु से होता है।
हैजा-विब्रियो कॉमा नामक जीवाणु से होता है।

प्रश्न 2.
एड्स की बीमारी के कारणों को बताएँ।
उत्तर-
एड्स की बीमारी जैविक वायरस का फैलाव वंशानुगत तथा दूषित रक्त को चढ़ाने तथा माता के द्वारा बच्चों को होता है । यह बड़ों में गलत एवं असंयमित यौन-संबंध से होता है।

प्रश्न 3.
हिपेटाइटिस बीमारी के कारणों को बताएँ।
उत्तर-
हिपेटाइटिस बीमारी सूक्ष्म जीवाणु और वायरस के शरीर में संक्रमण से होती है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैविक आपदा कितने प्रकार के हैं ? उनका संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर-
जैविक आपदा चार प्रकार के हैं।
(i) प्रथम वर्ग में उन बीमारियों को रखा गया है जिसका कारण सूक्ष्म जीवाणु तथा वायरस होते हैं। जिनसे चिकेन पॉक्स, हिपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं । इनसे तात्कालिक बचाव के लिए ग्लब्स, मास्क आदि का सतत् प्रयोग करना चाहिए।

(ii) इस जैविक आपदा में वैसी बीमारियों को रखा गया है जिसकी . उत्पत्ति का कारण सूक्ष्म जीवाणु तथा वायरस हैं । इस वर्ग में हिपेटाइटिस . A, B और C इन्फ्लूएंजा, लाइम डिजिज मिजिल्स, चिकेन-पॉक्स और एड्स जैसी बीमारियाँ संभव हैं।

(iii) जैविक आपदा के तीसरे वर्ग में वैसे सूक्ष्म जीवाणु और वायरस को रखा गया है जो मानव समूह के लिए विनाशकारी आपदा ला सकती है। इसके अंतर्गत एंथ्रेक्स, पश्चिमी नील वायरस, वेनेजुएलियन एन्सेफ्लाइटिस, स्मॉल पाक्स, ट्यूवरोक्लोसिस वायरस, रिफ्टबैली बुखार, येलो बुखार तथा मलेरिया, हैजा, डायरिया प्रमुख हैं। यह साधारणतः गरीब देशों की बीमारियाँ हैं ।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

(iv) चौथे स्तर की जैविक आपदा के अंतर्गत अति विनाशकारी वायरस को रखा जाता है। इसके अंतर्गत वायरस वोलिवियन तथा अर्जेंटियन बुखार तथा बर्ड फ्लू, एडस (HIV), डेंगू बुखार, माखर्ग बुखार, एबोला इत्यादि प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
जैविक अस्त्र क्या है ? इससे उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर-
नवीन युद्ध तकनीकी के अंतर्गत जैविक अस्त्रों को सम्मिलित किया गया है। इसे भारी विनाश का अस्त्र (Weapon of Mass . Destruction) कहा गया है। इसका विकास जापानियों ने किया लेकिन जैविक अस्त्रों का वास्तविक प्रयोग 2001 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकी हमले के बाद आरम्भ हुआ। एंथ्रेक्स डाक सेवा के द्वारा अथवा अज्ञात व्यक्तियों के द्वारा पहुँचाया जाने लगा । वास्तव में जैविक आपदा का कारण एक सूक्ष्म जीवाणु हैं।

जैविक अस्त्रों के अंतर्गत उपयोग में लाये जाने वाले और अन्य जीवाणु भी हैं जो रुग्णता लाने वाले जीवाणु है।

इससे उत्पन्न समस्याएँ-(i) जैविक अस्त्र के प्रयोग से इसके सूक्षम जीवाणु श्वसन क्रिया के द्वारा शरीर के अंदर जहर उत्पन्न करता है और वह सूक्ष्म त्रासदी को जन्म देते हैं। इसे गंदा बम (Dirty Bomb) कहा . गया है। (ii) दूसरी समस्या है इससे रुग्णता आती है। शरीर धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 3.
जैविक आपदा से बचाव के उपाय बताएँ।
उत्तर-
जैविक आपदा से बचाव के लिए आपदा जोखिम प्रबंधन की जरूरत है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें हैं –

  • गर्म जल पीना एवं स्वच्छ भोजन ग्रहण करना चाहिए ।
  • आवश्यक कीटनाशक दबावों का छिड़काव तथा प्रशासनिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।
  • अनजान व्यक्ति द्वारा दिये गये किसी भी प्रकार के डिब्बे को हाथ लगाने या छूने की जरूरत नहीं क्योंकि इसमें एंथ्रेक्स की संभावना हो सकती है।
  • किसी अनजान वस्तु को छूने के लिए ग्लब्स का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • डॉग एक्वाइड (कुत्ते के दल) की मदद से जैविक अस्त्रों की जगह की पहचान की जा सकती है।
  • जैविक अस्त्रों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध . लगाना चाहिए।

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Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 9 Geography क्षेत्रीय अध्ययन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
क्षेत्र में जाकर इकट्ठे किये गये आँकड़ों को क्या कहा जाता है ?
(क) द्वितीयक आँकड़ा
(ख) प्राथमिक आँकड़ा
(ग) तृतीयक आँकड़ा
(घ) चतुर्थक आँकड़ा
उत्तर-
(ख) प्राथमिक आँकड़ा

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प्रश्न 2.
ल में क्षेत्रीय अध्ययन है
(क) एक उपागम
(ख) एक विधितंत्र
(ग) एक सिद्धांत
(घ) एक मॉडल
उत्तर-
(क) एक उपागम

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय अध्ययन के महत्त्व को स्पष्ट करें।
उत्तर-
क्षेत्रीय एक महत्त्वपूर्ण अंग है, भूगोल का । इसका महत्त्व इस बात पर निर्भर है कि यह एक उपागम है जिसके द्वारा क्षेत्र विशेष के मानव और इसके परिवेश के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 2.
भूमि का कृषि के लिए उपयोग किस क्षेत्र में अधिक होता है ?
उत्तर-
जो क्षेत्र समतल, उपजाऊ एवं सिंचित हो, उसी में कृषि कार्य होता है।

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प्रश्न 3.
वायु प्रदूषण से किस प्रकार की हानि होती है ?
उत्तर-
वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभाव स्वास पर पड़ता है । साँस लेने के लिए ऑक्सीजन का प्रयोग करते हैं, पर वायु प्रदूषित होने की वजह से ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। और यही प्रदूषित वायु हम साँस लेते हैं जिससे साँस संबंधी बीमारियाँ होती हैं। वायु के प्रदूषित होने से उसमें सी० एफ० सी० गैसों की मात्रा की अहम भूमिका होती है; इस गैस के बढ़ने से ओजोन परत का क्षय होने लगता है जिससे पाराबैगनी गैस की वायुमण्डल में वृद्धि होने लगती है जिससे जीव जन्तु में चर्म कैंसर की संभावना बढ़ जाती है और SO2 की सान्द्रता बढ़ने से अम्ल की वर्षा होती है। प्रदूषण से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है।

प्रश्न 4.
जल-प्रदूषण से होनेवाली हानि की चर्चा करें।
उत्तर-
जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है। लेकिन जल प्रदूषण होने से इसके कुप्रभाव हैं

  • पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है। जलीय वनस्पति, मछलियाँ तथा उस जल को पीने वाले अन्य जीव मर जाते हैं।
  • खेतों में सिंचाई के रूप में प्रदूषित जल प्रयोग करने से उत्पादन मात्रा घट जाती है।
  • प्रदूषित जल में उपस्थित विषैले पदार्थ प्राकृतिक खाद्य-शृंखला (Food Chain) में प्रवेश कर जाते हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से अन्य जीवों तथा मनुष्यों को भी प्रभावित करते हैं।
  • प्रदूषित जल, जल से फैलने वाली बीमारियों को फैलाते हैं-हैजा, तपेदिक, पीलिया, पेचिस, डायरिया आदि रोग महामारी के रूप में फैलते हैं।

प्रश्न 5.
वर्षा जल का संग्रहण किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर-
वर्षा जल का संग्रहण विभिन्न विधियों से किया जाता है।

  • पहला यह है कि जल को विभिन्न प्रकार के भवनों की छतों से ही इकट्ठा कर लेना चाहिए।
  • सीधे जमीन पर पड़ने वाले जल को तालाबों आदि में इकट्ठा कर लेना चाहिए । नाद में इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न मदों में किया जाना चाहिए।
  • वर्षा के मौसम में जब नदियों में बाढ़ आई हुई हो तो उस जल को गढ्ढे में जमा कर लेना चाहिए ।

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प्रश्न 6.
एक आरेख की सहायता से वर्षा जल संग्रहण को दिखाएँ ।
उत्तर-
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पक्के पकानों की छतों से प्राप्त वर्षा जल को पाइप से कुएँ या जलाशयों में जमा किया जाता है।

प्रश्न 7.
क्षेत्रीय अध्ययन से क्या समझते हैं ? .
उत्तर-
क्षेत्रीय अध्ययन एक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत किसी विशिष्ट क्षेत्र में निवास करनेवाले लोगों के जीवन पर स्थलाकृति, जलवायु, अपवाह, कृषि उत्पादकता, औद्योगिक विकास, नगरीकरण इत्यादि का स्पष्टत प्रभाव पड़ता है। इन बातों को समझने के लिए क्षेत्रीय अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 8.
क्षेत्रीय अध्ययन के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
क्षेत्रीय अध्ययन से निम्नलिखित लाभ है

  • इससे क्षेत्र विशेष के मानव और इसके परिवेश की जानकारी मिलती है।
  • मानवीय गतिविधियों एवं क्रियाकलापों की जानकारी मिलती है।
  • क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले लोगों के जीवन पर स्थलाकृति, जलवायु, अपवाह, कृषि उत्पादकता, औद्योगिक विकास, नगरीकरण आदि की जानकारी मिलती है।

प्रश्न 9.
क्षेत्र का चयन करते समय किन बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर-
क्षेत्र चयन हेतु इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उस क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दों को उसमें शामिल किया जाय । जैसे-किसी क्षेत्र के जलस्तर में गिरावट, भूमि उपयोग, प्रदूषण के विभिन्न प्रकार जैसे-वाय प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीचे दी गई सारणी का अध्ययन कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों
का उत्तर दें-
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(क) उस भू-उपयोग वर्ग का नाम लिखें जिसका क्षेत्रफल लगातार घट रहा है?
(ख) फसल क्षेत्र के लगातार बढ़ने का मुख्य कारण स्पष्ट करें।
(ग) किस भू-उपयोग वर्ग के अंतर्गत सबसे कम भू-क्षेत्र का उपयोग हुआ है ?
उत्तर-
(क) वन-
(ख) देश की जनसंख्या लगातार बढ़ने के कारण खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो रही हैं और खाद्यान्न की समस्या को दूर करने के लिए फसलों का अधिक उत्पादन किया जा रहा है जिसके फलस्वरूप फसल क्षेत्र लगातार बढ़ रहे हैं।
(ग) तृषा भूमि।

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प्रश्न 2.
क्षेत्र अध्ययन के लिए प्रश्नावली के विभिन्न विधियों की चर्चा करें।
उत्तर-
क्षेत्र अध्ययन विधि में लोगों से प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रश्नों को
आवश्यकता के अनुसार पहले ही शिक्षक की सहायता से तैयार कर लिया जाता है। सर्वेक्षण के लिए अनेक प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं। प्रश्नों की प्रकृति, वांछित आँकड़ों की प्रकृति तथा वहाँ के लोगों की पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है।

कुछ प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में होगा । बहुविकल्प वाले प्रश्नों के उत्तर में कुछ विकल्प दिए जाते हैं उनमें से केवल एक ही सही होता है। प्रश्नावली के द्वारा जानकारी इकट्ठा इकट्ठी की और प्राप्त आँकड़ों का अध्ययन कर प्रतिवेदन तैयार किया जाता है । जैसे-बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का अध्ययन किसी गाँव या नगर की भूमि के उपयोग में क्या परिवर्तन आया है?

नगर में वाहनों की संख्या में वृद्धि से प्रदूषण के स्तर में कितनी वृद्धि हुईं। इस तरह की प्रश्नावली तैयार की जाती है।

प्रश्न 3.
वायु प्रदूषण के चार स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर-
वायु प्रदूषण के चार स्रोत
(i) उद्योगों से निकलने वाली गैस तथा अन्य उपशिष्ट
(ii) वाहनों द्वारा उत्सर्जित गैसीय एवं कणिकीय पदार्थ
(iii) शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उत्सर्जित गैस तथा
(iv) नाभिकीय परीक्षण ।

(a) वायुमंडल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2) गैस की सामान्य मात्रा है 0.03% पर इसकी मात्रा तेजी से बढ़ रही है। उसका कारण है लकड़ी, कोयला तथा अन्य जैविक पदार्थों का दहन, उद्योग, वाहन आदि इस गैस के मुख्य स्रोत हैं।
(b) कार्बन मोनोऑक्साइड-यह अत्यन्त ही हानिकारक वायु प्रदूषक गैस है। यह पेट्रोल तथा डीजल चालित वाहनों से उत्सर्जित होती है। कई बड़े उद्योगों में यह मुख्य प्रदूषक के रूप में वायुमंडल में उत्सर्जित होती है। महानगरों एवं नगरों में इसकी संभावना अधिक रहती है।।
(c) सल्फर डाइ ऑक्साईड (SO2)-गंधक युक्त गैस भी वायुमंडल के मुख्य प्रदूषकों में से एक है। यह तेल शोधक कारखानों तथा वाहनों से निकलती हैं।
(d) क्लोरोफ्लूरो कार्बन गैस (CFCgas)-कार्बन तत्वों से इस गैस का निर्माण होता है। इसका सीधा असर वायुमंडल के ओजोन परत के क्षारण में यह सक्रिय भूमिका निभाती है।

क्षेत्रीय अध्ययन : प्रश्नावली मॉडल

प्रश्न 1.
क्षेत्र का नाम
उत्तर-
आरा ।

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प्रश्न 2.
उत्तरदाता का नाम एवं पता।
उत्तर-
उदय सिंह ग्राम + पो०-आरा, जिला-आरा, बिहार ।

प्रश्न 3.
क्या कृषि क्षेत्र में वृद्धि हुई है ?
उत्तर-
हाँ।

प्रश्न 4.
क्या आपके गाँव में नलकूप है ?
उत्तर-
हाँ।

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प्रश्न 5.
कुएँ का जलस्तर पिछले पाँच वर्षों में बढ़ा है या घटा है ?
उत्तर-
घटा है।

प्रश्न 6.
सिंचाई के कौन-कौन से साधन इस क्षेत्र में उपलब्ध हैं ?
उत्तर-
नलकूप और सोन नदी।

प्रश्न 7.
एक वर्ष में कौन-कौन-सी बीमारियाँ बड़े स्तर पर उस क्षेत्र में हुई हैं?
उत्तर-
हैजा एवं पीलिया ।

प्रश्न 8.
अध्ययन क्षेत्र में किस प्रकार का प्रदूषण है ?
उत्तर-
जल प्रदूपण।

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प्रश्न 9.
जल-स्तर के घटने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
नलकूपों की अधिकता।

प्रश्न 10.
क्या आप वर्षा जल का संग्रह करते हैं ?
उत्तर-
नहीं।

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प्रश्न 11.
आप वर्ष में कौन-कौन सी फसलें उत्पन्न करते हैं ?
उत्तर-
धान, गेहूँ, दलहन, तेलहन, चना तथा मटर ।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 10 Disaster Management आपदा और सह अस्तित्व Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन प्राकृतिक आपदा है ?
(क) आग लगना
(ख) बम विस्फोट
(ग) भूकम्प
(घ) रासायनिक दुर्घटनाएँ
उत्तर-
(ग) भूकम्प

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प्रश्न 2.
भूकंप संभावित क्षेत्रों में भवनों की आकृति कैसी होनी चाहिए?
(क) अंडाकार
(ख) त्रिभुजाकार
(ग) चौकोर
(घ) आयाताकार
उत्तर-
(घ) आयाताकार

प्रश्न 3.
भूस्खलन वाले क्षेत्र में ढलान पर मकानों का निर्माण क्या है ?
(क) उचित
(ख) अनुचित
(ग) लाभकारी
(घ) उपयोगी ।
उत्तर-
(ख) अनुचित

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प्रश्न 4.
सुनामी प्रभावित क्षेत्र में मकानों का निर्माण कहाँ करना चाहिए?
(क) समुद्र तट के निकट
(ख) समुद्र तट से दूर
(ग) समुद्र तट से ऊंचाई पर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) समुद्र तट से दूर

प्रश्न 5.
बाढ़ से सबसे अधिक हानि होती है
(क) फसल की
(ख) पशुओं की
(ग) भवनों की
(घ) उपरोक्त सभी की
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी की

प्रश्न 6.
कृषि सुखाड़ होता है
(क) जल के अभाव में
(ख) मिट्टी की नमी के अभाव में
(ग) मिट्टी के क्षय के कारण
(घ) मिट्टी की लवणता के कारण
उत्तर-
(क) जल के अभाव में

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लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भूकंप के प्रभावों को कम करने के चार उपायों को लिखिए।
उत्तर-
भूकंप के प्रभावों को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं

  • भवनों का आयताकार होना चाहिए।
  • भवनों के निर्माण ईंट-कंक्रीट से होना चाहिए। .
  • नींव को मजबूत एवं भूकंप अवरोधी होना चाहिए।
  • गलियों एवं सड़कों को चौड़ा होना चाहिए तथा दो भवनों के बीच पर्याप्त दूरी होनी । चाहिए।

प्रश्न 2.
सुनामो संभावित क्षेत्रों में गृह निर्माण पर अपना विचार प्रकट कीजिए। उत्तर-सुनामी प्रभावित क्षेत्रों में गृह निर्माण के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

  • जहाँ सुनामी की लहरें आती हैं वहाँ लोगों को तटीय भाग की अपेक्षा तट से दूर बसना चाहिए।
  • समुद्र तटीय भाग में सघन वृक्षारोपण करना चाहिए।
  • नगरों एवं भवनों को बचाव के लिए कंक्रीट अवरोधक का निर्माण करना चाहिए।
  • प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे मकान का निर्माण करना चाहिए जो सुनामी लहरों के प्रभाव को न्यून कर सके।
  • पोताश्रयों को ऊंची बाँधों द्वारा सुरक्षित किया जा सकता है।
  • प्रभावित क्षेत्रों में मकान ऊंचे स्थानों पर और तट से करीब सौ मीटर की दूरी पर बनाना चाहिए।
  • सुनामी रेकॉर्डिग सेन्टर की स्थापना होना चाहिए।
  • उपग्रह प्रौद्योगिकी द्वारा सुनामी की चेतावनी प्राप्त करना चाहिए और संचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा तुरन्त आम लोगों तक पहुँचाना चाहिए।

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प्रश्न 3.
सुखाड़ में मिट्टी की नमी को बनाए रखने के लिए आप क्या करेंगे?
उत्तर-
सूखे जैसे प्राकृतिक आपदा को विभिन्न विधियों को अपनाकर इसकी विभीषिका को . कम किया जा सकता है। जैसे-जल संसाधन का वैज्ञानिक विकास और प्रबंधन द्वारा जल की समस्या का समाधान किया जा सकता है। क्योंकि सुखाड़ के समय जल के अभाव से न केवल मिट्टी की नमी समाप्त हो जाती है, बल्कि सभी प्राणियों को जान तक बचाना मुश्किल हो जाता
है। जल विभाजक के विकास की याजना ऐसी स्थिति में बहुत सहायक होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भूस्खलन अथवा बाढ़ जैसी प्राकृतिक विभीषिकाओं का सामना आप किस प्रकार कर सकते हैं ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर-
भूस्खलन के पाँच रूप होते हैं-

  • बारिश के पानी के साथ मिट्टी और कचड़े का नीचे आना,
  • कंकड़-पत्थरों का खिसकना
  • कंकड़-पत्थर का गिरना
  • चट्टानों का खिसकना
  • चट्टानों का गिरना आदि से जानमाल की बर्बादी होती है।

इससे बचाव के लिए निम्न उपाय किए जाने चाहिए-

  • मिट्टी की प्रकृति के अनुरूप उपयुक्त नींव बनाना।
  • ढलवां स्थान पर मकान का निर्माण न करना।
  • सामान्य एवं वैकल्पिक संचार प्रणालियों को समुचित व्यवस्था करना।
  • वनस्पति विहीन ऊपरी ढालों पर उपयुक्त वृक्ष प्रजातियों का सघन रोपण कार्य करना।
  • प्राकृतिक जल की निकासी का अवरुद्ध न होना।
  • पुख्ता दीवारों का निर्माण किया जाना। ..
  • बारिश की पानी और झरनों के प्रवेश सहित भूस्खलनों के संचलन पर काबू पाने के लिए समतल जल निकासी केन्द्र बनाना।
  • भूमि के नीचे बिछाए जाने वाले पाईप लाइन, केबुल आदि लचीले होने चाहिए ताकि भूस्खलन से उत्पन्न दबाव का सामना कर सकें।

बाढ़ एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। इससे निजात पाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं

  • बाढ़ की प्रवणता को कम करने के लिए वनों का विकास से निजात मिल सकती है।
  • नदियों के दोनों तटबंधों पर बाँध बनाना। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा प्रदान किया जा सकता है।
  • मृदा क्षय को भी निर्यात किया जा सकता है।
  • जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  • पर्वतीय भागों में नदियों के ऊपर बाँध और पृष्ठ भाग जलाशय का निर्माण कर जल को नियंत्रित किया जा सकता है
  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नहरों का जाल बिछाकर इसकी विभीषिका से बचा जा सकता है साथ ही सिंचाई का काम भी किया जा सकता है।
  • बाढ़ से बचाव के लिए रिंग बांध भी सहायक होता है। नदियों की धाराओं में सुधार तथा नदियों के लिए वैकल्पिक मार्ग का निर्माण द्वारा इस समस्या का समाधान संभव है।
  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्थान-स्थान पर खाद्यान्न बैंक का भी विकास होना चाहिए।

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प्रश्न 2.
सुनामी के दौरान उठाये जानेवाले कदम (Preparedness measures during Tsunami Scenario) के बारे में लिखें।
उत्तर-
सुनामी तूफान आने के पहले कुछ उठाये गए कदम निम्नांकित हैं

  • अपने स्कूल/मकान आदिसमुद्र तट से कितनी दूरी पर है इसकी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
  • यह जान लेना आवश्यक है कि आपका स्कूल/घर समुद्र तल से कितनी ऊंचाई पर है।
  • ऐसे स्थान पर चले जायें जो ऊँचाई पर स्थित हो और हर प्रकार से सुरक्षित हो।
  • सुनामी की लहर पहले हल्की और कम ऊंचाई की हो सकती है, परन्तु बाद में भयंकर रूप धारण कर सकती है। इसलिए हल्की लहर को देखते ही समुद्र तट को छोड़ देना चाहिए।
  • कई लोग सुनामी लहरों को देखने के लिए नजदीक चले जाते हैं, परन्तु ऐसा करना बड़ा खतरनाक सिद्ध हो सकता है। .
  • प्रशान्त सुनामी केन्द्र द्वारा दी गई चेतावनी की ओर ध्यान दें। उसे हल्के में ही मत टाल दें। मई 1960 में 61 व्यक्ति की मौत हो गई क्योंकि उनलोगों ने तटीय केन्द्र द्वारा चेतावनी को हवाई टापू पर अनसुनी कर दिया था।
  • रेडियो टेलीविजन द्वारा प्रसारित की गई जानकारी का लाभ उठाएँ और उनके द्वारा दी गई सतह पर अमल करें।

प्रश्न 3.
आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका का विस्तार से उल्लेख करें।
उत्तर-
मुख्यत: आकस्कि प्रबंधन के तीन घटक हैं-

  1. स्थानीय प्रशासन
  2. स्वयंसेवी संगठन
  3. गाँव अथवा मुहल्ले के लोग।

1. स्थानीय प्रशासन- आकस्मिक प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन की अहम भूमिका होती है। राहत शिविर का निर्माण, प्राथमिक उपचार की सामग्री की व्यवस्था, एम्बुलेंस, डॉक्टर, अग्निशामक इत्यादि की तत्काल व्यवस्था करना इसका प्रमुख कार्य है।

2. स्वयंसेवी संगठन- आकस्मिक प्रबंधन में स्वयंसेवी संस्था महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, अगर गाँव के युवकों तथा पंचायत प्रबंधन के बीच समन्वय हो। ऐसे प्रबंधन में जाति, धर्म, लिंग के भेदभाव का परित्याग करना पड़ता है। स्वयंसेवी संस्था आकस्मिक प्रबंधन में काफी योगदान दे सकती है।

3. गाँव अथवा महल्ले के लोग- आकस्मिक प्रबंधन में गाँव और मुहल्ले के लोग काफी योगदान दे सकते हैं। जैसे—युवकों को मानसिक रूप से सुदृढ़ और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करना और उनमें साहस का संचार कर सकते हैं।

Bihar Board Class 10 Disaster Management Solutions Chapter 6 आपदा और सह अस्तित्व

क्रियाकलाप

आप अपने गाँव मुहल्ले में शिक्षक के साथ एक आमसभा आयोजित कीजिए और आमलोगों को बताइए कि प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए मिलजुल कर उसका सामना करना चाहिए। इससे विपत्ति और बर्बादी कम होगी।
उत्तर-
छात्र अपने शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 10 Disaster Management आपदा और सह अस्तित्व Notes

  • यद्यपि आपदाएँ और संकट प्राकृतिक क्रियाओं के प्रतिफल हैं, परंतु अविवेकपूर्ण मानवीय क्रियाएँ भी आपदाओं को आमंत्रित करती हैं।
  • आपदा के संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन के लिए हमेशा तैयारी रखनी चाहिए, क्योंकि आपदाएं अप्रत्याशित रूप से घटित होती हैं।
  • बाढ़ और सूखे के संकट का आकलन कर उनसे निपटने की तैयारी सम्यक रूप से करनी ।
    चाहिए।
  • आपदा प्रबंधन में स्थानीय लोगों का सहयोग ही सबसे अधिक कारगर होता है।
  • संचार साधनों का उपयोग आपदा से निपटने में बहुत प्रभावशाली होता है।
  • अभी तक आपदाओं में लाखों-करोड़ों लोगों की मृत्यु तब हुई हैं जब उन क्षेत्रों में एकाधिपत्य शासन रहा है। किसी लोकप्रिय प्रजातांत्रिक देश में बड़ी संख्या में लोगों की ‘ मौत नहीं हुई, क्योंकि वहाँ आपदा से निपटने के लिए उचित प्रयास करना संभव हो सका आपदा प्रबंधन के महत्व को इंगित करने के लिए यह उदाहरण सटीक है।
  • प्रकृति में होनेवाले कुछ परिवर्तन संकट और आपदाओं के कारण होते हैं।
  • अनेक संकटों और आपदाओं का कारण मनुष्य के क्रियाकलाप भी होते हैं।
  • प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ संकटों और आपदाओं को आमंत्रित करती है।
  • संकट धीरे-धीरे उत्पन्न होते हैं और आपदाएँ अकस्मात विकास रूप ले लेती हैं।
  • भारत का उत्तरी तराई भाग भूकंप के लिए अत्यधिक संवेदनशील है।
  • ज्वालामुखी के प्रकोप से भारत प्रायः बचा हुआ है।
  • सुनामी से बंगाल की खाड़ी प्रभावित है, क्योंकि इससे पूर्वी भाग में इंडोनेशिया का तट बहुत अधिक संवेदनशील है।
  • भारत में चक्रवात प्रायः मई-जून तथा अक्टूबर-नवम्बर में अधिक आते हैं।
  • पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ प्रायः प्रतिवर्ष आती है और यही व्यापक हानि होती है।
  • पंजाब, हरियाणा जैसे पश्चिमोत्तर से राज्यों में हिमालय की बर्फ पिघलने से बाढ़ आती है।
  • देश के पश्चिमी और दक्षिणी भाग में प्रायः सूखे की स्थिति रहती है; परंतु सभी भाग इसकी चपेट में आ सकते हैं।
  • बाढ़ का दुष्प्रभाव क्षणिक होता है जबकि सूखे से लोगों को लंबे समय तक कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
  • देश में बिहार एक ऐसा राज्य है जो किसी संकट और आपदा से अछूता नहीं है, सिवाय सुनामी के।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जीन प्याजे के अनुसार सभी बच्चे ‘स्कीमा’ से प्रभावित होते है। [B.M. 2009A]
(क) बड़े होने पर
(ख) जन्म से ही
(ग) किशोर होने पर
(घ) दुबले होने पर
उत्तर:
(ख) जन्म से ही

प्रश्न 2.
मानव शरीर में कितने प्रकार के अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) 40
(ख) 36
(ग) 22
(घ) 15
उत्तर:
(ग) 22

प्रश्न 3.
‘जीरोपथेल्मिया’ किस विटामिन की कमी के कारण होता है। [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘K’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) विटामिन ‘A’
उत्तर:
(घ) विटामिन ‘A’

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प्रश्न 4.
वसा में घुलनशील विटामिन होता है । [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘डी’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘बी,’
(घ) विटामिन ‘बी,,’
उत्तर:
(क) विटामिन ‘डी’

प्रश्न 5.
ग्राम कार्बाहाइड्रेड के विघटन से कितनी ऊर्जा प्राप्त होती है। [B.M.2009A]
(क) 2 कैलोरी ऊर्जा
(ख) 6 कैलोरी ऊर्जा
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा
(घ) 10 कैलोरी ऊर्जा
उत्तर:
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा

प्रश्न 6.
दुबली-पतली शरीर रचना वाले व्यक्ति कहलाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) मीसोमोरफिक
(ख) एकटोमोरफिक
(ग) इण्डोमोरफिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) एकटोमोरफिक

प्रश्न 7.
एक साधारण कार्य करने वाले व्यस्क पुरुष को प्रतिदिन कितना ग्राम अनाज ग्रहण करना चाहिए। [B.M.2009A]
(क) 175 ग्रा.
(ख) 270 ग्रा
(ग) 380 ग्रा.
(घ) 520 ग्रा.
उत्तर:
(घ) 520 ग्रा.

प्रश्न 8.
खाद्य वर्गों को मिला-जलाकर खाने से – [B.M.2009A]
(क) विभिन्न स्वाद मिलता है
(ख) पकाने में समय की बचत होती है
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है
(घ) पोषक मान अधिक होता है
उत्तर:
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है

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प्रश्न 9.
खाद्य पदार्थों को कितने वर्ग में बाँटा जा सकता है ? [B.M.2009A]
(क) तीन
(ख) आठ
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर:
(ग) पाँच

प्रश्न 10.
पशु जन्य प्रोटीन में किस तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ? [B.M.2009A]
(क) अनिवार्य अमीनो अम्ल
(ख) ऊर्जा
(ग) पेप्टोन
(घ) एंजाइम
उत्तर:
(घ) एंजाइम

प्रश्न 11.
कैल्सियम का उत्तम स्रोत है –
(क) रागी
(ख) मकई
(ग) दाल
(घ) चावल
उत्तर:
(क) रागी

प्रश्न 12.
अंडे से प्राप्त होनेवाले प्रोटीन को प्रोटीन माना जाता है –
(क) A ग्रेड.
(ख) B ग्रेड
(ग) C ग्रेड
(घ) D ग्रेड
उत्तर:
(क) A ग्रेड.

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प्रश्न 13.
वसा वयस्क स्त्री एवं पुरुष को ग्राम में चाहिए –
(क) 20 ग्रा.
(ख) 30 ग्रा.
(ग) 45 ग्रा.
(घ) 50 ग्रा.
उत्तर:
(क) 20 ग्रा.

प्रश्न 14.
इडली डोसा खाया जाता है –
(क) आंध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर:
(घ) तमिलनाडु

प्रश्न 15.
खाद्य वर्ग मुख्यतः [B.M. 2009A]
(क) दो है,
(ख) चार है
(ग) पाँच है
(घ) आठ है
उत्तर:
(ग) पाँच है

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प्रश्न 16.
खाद्य पदार्थों के सही संग्रह की आवश्यकता क्यों है ? [B.M.2009A]
(क) उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए
(ख) आर्थिक लाभ के लिए
(ग) गुणवत्ता बढ़ाने के लिए
(घ) सुविधा के लिए
उत्तर:
(घ) सुविधा के लिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन का रासायनिक संगठन (Composition of Protein) क्या है ?
उत्तर:
प्रोटीन मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। प्रोटीन के कुछ समूहों में सल्फर, फॉस्फोरस तथा ताँबा, लोहा आदि लवण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 2.
प्रोटीन का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का वर्गीकरण (Classification of Proteins) निम्नलिखित के अनुरूप होता है –
(a) भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ।
(b) अमीनो अम्ल की मात्रा।

(a) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं –

  • साधारण प्रोटीन (Simple)
  • युग्म प्रोटीन (Conjuguated)।
  • प्राप्त प्रोटीन (Derived)।

(b) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं:

  • पूर्ण प्रोटीन (Complete Proteins)।
  • siera: yuf sitzta (Partially Complete)
  • 37 of stata (Incomplete proteins)

प्रश्न 3.
प्रोटीन के कोई तीन कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रोटीन के कार्य (Functions of Proteins):

  • प्रोटीन नए तंतुओं के उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
  • यह टूटे-फूटे व पुराने तंतुओं की मरम्मत के लिए भी उत्तरदायी है।
  • ग्लोबिन प्रोटीन रक्त के हीमोग्लोबिन तंतुओं का एक आवश्यक हिस्सा है।

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट कई रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना यौगिक है। यह पदार्थ कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के रासायनिक संयोग से मिलकर बनता है।

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प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट का किस आधार पर वर्गीकरण कर सकती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट को परमाणुओं की संख्या के आधार पर निम्न तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)।
  • डाइ-सैक्राइड (DiSaccharide)।
  • पोली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)।

प्रश्न 6.
वसा (Fats) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना होता है। वसा में नाइट्रोजन का अभाव होता है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन की मात्रा अधिक होती है लगभग दुगुनी और इसलिए यह कार्बोज से दुगुनी ऊर्जा उत्पादित कर पाते हैं। वसा का सुरक्षित कोष चर्बी के रूप में शारीरिक वजन का लगभग 13.8% होता है।

प्रश्न 7.
संतृप्त वसीय अम्ल (Saturated Fatty Acid) और असंतृप्त वसीय अम्ल (Unsaturated Fatty Acid) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संतृप्त वसीय अम्ल-जिन वसीय अम्ल में कार्बन अणुओं की बराबर संख्या में हाइड्रोजन अणु उपस्थित रहते हैं, उनको संतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, अर्थात् इनके कार्बन हाइड्रोजन ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। असंतृप्त वसीय अम्ल-वह अम्ल जिनमें हाइड्रोजन तथा कार्बन अणुओं की संख्या असमान हो अर्थात् हाइड्रोजन अणुओं की संख्या कार्बन अणुओं से कम हो, उसे असंतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, जैसे ओलेइक ऐसिड (Oleic Acid)।

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प्रश्न 8.
वसा और तेल में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वसायुक्त भोज्य पदार्थों को दो समूहों में बाँटा गया है। 1. वसा, 2. तेल। यह विभाजन तापक्रम से होने वाली क्रियाओं के अनुसार किया गया है। वसायुक्त पदार्थ यदि 20°C पर ठोस हो तो वह वसा कहलाता है। यदि इसी तापक्रम पर पदार्थ तरल हो तो वह तेल कहलाता है।

प्रश्न 9.
विटामिन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सन्तुलित भोजन में विटामिन आवश्यक पदार्थ हैं । इनके द्वारा शरीर की कोशिकाओं तथा तन्तुओं से अनेक कार्य होते रहते हैं। प्रत्येक विटामिन एक अलग रासायनिक तत्त्व है, इसके अपने निजी गुण होते हैं। ओसर नामक वैज्ञानिक ने विटामिनों की परिभाषा इस प्रकार की है, “यह एक ऐसा सशक्त मिश्रण है जो प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है किन्तु शरीर के लिए अनिवार्य है।”

प्रश्न 10.
विटामिन ‘ए’ पर नोट लिखें।
उत्तर:
विटामिन-‘ए’ पीलापन लिये हुए वह पदार्थ है, जो कि पानी में अघुलनशील, वसा में घुलनशील और आग के प्रति स्थिर (Stable) है । साधारण तापक्रम पर यह नष्ट नहीं होता लेकिन Oxidation की क्रिया से यह नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य की किरणों के सम्पर्क से भी यह नष्ट हो जाता है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में विटामिन एक साधारण तापक्रम पर भी नष्ट होता रहता है। लेकिन O2 की अनुपस्थिति में विटामिन-‘ए’ युक्त भोज्य पदार्थों को 120°C तक गर्म करने पर इसकी मात्रा और गुण यूँ ही बना रहता है। ”

प्रश्न 11.
विटामिन ‘डी’ के गुण क्या हैं ?
उत्तर:
गुण (Property): शुद्ध विटामिन-डी सफेद रवेदार, गन्ध रहित तथा वसा घुलित पदार्थों में घुलनशील है। आग के प्रति स्थिर, अम्ल तथा क्षार से यह नष्ट नहीं होता । CH तथा C2 के संयोग से यह बनता है। भोजन बनाने की साधारण विधियों में भी विटामिन-डी नष्ट नहीं होता। दूध को उबालने से, पाश्चुरीकरण से तथा पाउडर के रूप से सुखाए जाने पर भी इस विटामिन की मात्रा बनी रहती है।

प्रश्न 12.
जल में घुलनशील विटामिन बताइए।
उत्तर;
इन विटामिनों को हम दो श्रेणी में विभक्त करते हैं :
1. विटामिन बी श्रेणी-थायमिन, राइबोफ्लेविन, नायसिन, पारिडेक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालमिन, पैटोथीन अम्ल, बायोटिन, कोलीन।
2. विटामिन सी श्रेणी-ये जल में घुलने वाले विटामिन हैं। इनका मुख्य कार्य शरीर में ऊर्जा प्राप्ति में सहायक होना है।

ये विटामिन शरीर में उत्पादित नहीं हो सकते, अतः इन्हें प्रतिदिन आहार के द्वारा ही प्राप्त करना आवश्यक है। यदि शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच भी जाते हैं तो जल में घुलनशील होने के कारण जल-निष्कासन द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

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प्रश्न 13.
विटामिन B1 (Thiamine) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह विटामिन पूर्ण रूप से चावलों के परिस्तर (Pericarp) से सन् 1926 ई० में निकाला गया और 1937.ई० में व्यावसायिक रूप में तैयार किया गया । चूँकि इसमें एमाइन-नाइट्रोजनीय तत्त्व होने के साथ-साथ कुछ थोड़ा-सा अंश गन्धक का भी है, अतः इसे थायमीन कहा गया क्योंकि यह तन्त्रिकाओं (Nerves) पर कार्बोज से उत्पन्न पाइरुविक एसिड के प्रभाव को मिटाता है। इसे एन्युरिन (Aneurin) भी कहा जाता है।

प्रश्न 14.
विटामिन B1 (Riboflavin) के भौतिक गुण क्या हैं ?
उत्तर:
विटामिन के अणु के दो भाग हैं, राइबो (Ribo) शर्करा खण्ड व फ्लेविन (Flavin)। यह कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन (C1, H1, N2) और दो मेथिल समूह से मिलकर बनता है। सन् 1935 ई० से यह प्रयोगशालाओं में बनाया जाने लगा । अम्ल, ताप तथा वायु का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘सी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर:
विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल ताजे खट्टे रसदार फलों में ही उपस्थित होता है और रखे जाने पर या फलों के बासी हो जाने पर 50% तक नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 17.
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन कौन-सा है ?
उत्तर:
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन आँवला है जिसमें सन्तरे से 20 गुना विटामिन सी अधिक पाया जाता है।

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प्रश्न 18.
कैल्शियम के भौतिक गुणों का आधार क्या है ?
उत्तर:
कैल्शियम (Calcium): कैल्शियम एक अकार्बनिक पदार्थ है जिससे लवण तैयार किए जा सकते हैं। हमारे शरीर में मुख्यतः हाइड्रोक्सि-ऐपेटाइड Ca10 (Pou)6 (OH)2 के रूप में काम आता है। कार्बोनेट, साइट्रेट, फॉस्फेट और बाईकार्बोनेट काम में आने वाले अन्य लवण हैं। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लगभग दो किलो और फॉस्फोरस डेढ़ किलो तक पाया जाता है। कैल्शियम का लगभग 99 प्रतिशत भाग हड्डियों और दांतों को सुदृढ़ बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 19.
एनीमिया रोग किसकी कमी से होता है ?
उत्तर:
एनीमिया या रक्त में हीमोग्लोबिन का कम होना प्रमुखतः लोहे की कमी से होता है। इसके अतिरिक्त यह फोलिक अम्ल व सायनोकोबालामीन’ की कमी से भी होता है।

प्रश्न 20.
कैल्शियम के अवशोषण में कौन-सा विटामिन सहायक है ? बच्चों में इसकी कमी से होने वाले दो प्रमुख लक्षण लिखें।।
उत्तर:
कैल्शियम के अवशोषण हेतु शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता पड़ती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स नामक रोग हो जाता है। इसके दो प्रमुख लक्षण निम्न हैं :

  • टांगों की हड्डियाँ नर्म पड़ जाती हैं। शरीर का भार सहन न कर सकने के कारण मुड़कर धनुष के आकार की हो जाती हैं।
  • छाती की हड्डियाँ आगे की ओर बढ़ जाती हैं जिसके कारण वक्ष भाग कबूतरनुमा दिखने लगता है।

प्रश्न 21.
खनिज लवण कैल्शियम पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
कैल्शियम श्वेत खड़िया (Chalk) के पाउडर जैसा होता है। कैल्शियम की मात्रा शारीरिक वजन की 1.5 से 2.0% तक होती है, जिसमें 99% हड्डियों व दाँतों में और शेष 1% अन्य ऊतकों व द्रवों में होता है।

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प्रश्न 22.
कैल्शियम की शरीर में प्रतिदिन की मात्रा बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की प्रतिदिन की मात्रा (Daily intake of Calcium) –
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प्रश्न 23.
रक्त का रंग लाल क्यों होता है ?
उत्तर:
लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन की उपस्थिति ही रक्त को लाल रंग प्रदान करती है।

प्रश्न 24.
लोहे की प्रतिदिन कितनी मात्रा आवश्यक है ?
उत्तर:
शरीर में लोहे की आवश्यकता (Requirement of iron in the body): लोहा प्रतिदिन आहार से प्राप्त करना आवश्यक है। विभिन्न आयु व स्थिति के अनुसार लोहे की प्रतिदिन की मात्रा (mg)
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आकस्मिक दुर्घटना के घटित होने अथवा डॉक्टरी ऑपरेशन के पश्चात् रक्त के ह्रास को प्राकृतिक अवस्था में लाने के लिए कुछ मास तक व्यक्ति के भोजन में लोहे की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 25.
‘लोहे’ के भौतिक गुण (Physical properties) लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे की उपयोगिता के विषय में विस्तत ज्ञान प्राप्त करने के लिए 19वीं शताब्दी में अनेक प्रयोग व अनुसंधान हुए जिससे शरीर में लोहे के महत्त्वपूर्ण कार्यों का पता लग सका। खनिज लवणों में लोहे का विशेष महत्त्व है। यद्यपि लोहा बहुत कम मात्रा में शरीर में पाया जाता है परन्तु शरीर में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। शरीर के कुल वजन का 90.04% भाग आयरन का होता है। इसका 70% भाग रक्त के लाल कण में, 4% मांस-पशियों में, 25% यकृत अस्थिमज्जा, प्लीहा व गुर्दे में संचित भण्डार के रूप में और बाकी 1% रक्त प्लाज्मा व कोशिकाओं के इन्जाइम में रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन के मुख्य साधन (Main sources) कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • प्रोटीन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के प्रोटिअस शब्द से हुई है जिसका अर्थ खाद्य पदार्थों में से सर्वोत्तम पदार्थ है।
  • प्रोटीन मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन में पायी जाती है। सबसे अधिक प्रोटीन मांस, मछली, दूध व पनीर में पाया जाता है। इसके
  • अतिरिक्त सोयाबीन, सभी दालों में, गेहूँ, मटर, चावल, अरारोट, बादाम, मूंगफली आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रोटीन के अभाव में शरीर में कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन के अभाव में निम्नलिखित लक्षण उत्पन्न होते हैं –

  • उम्र के अनुपात में शारीरिक गठन, वृद्धि व विकास में कमी।
  • मांस-पेशियों की शिथिलता।
  • त्वचा का सूखापन-झुर्रियाँ पड़ना।
  • रक्तहीनता।
  • मानसिक विकास में कमी।
  • चिड़चिड़ापन, क्रोध, भावुकता आदि।
  • बालों का सूखापन और कंघी करने पर अधिक टूटना।
  • नाखून का सूखापन और उन पर सफेद दाग।
  • एन्जाइम्स की कमी के कारण पाचन शक्ति में कमी।
  • जल जमाव-शोफ (Nutritional Oedema)।

प्रश्न 3.
आवश्यक व अनावश्यक अमीनो अम्ल (Essential and Non-essential amino-acid) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आवश्यक अमीनो अम्ल से तात्पर्य है कि यह अमीनो अम्ल हमें खाद्य पदार्थों द्वारा अनिवार्य रूप से मिलने ही चाहिए क्योंकि इनका हमारे शरीर में संकलन (Synthesis) नहीं हो पाता। इन अमीनो अम्ल की भोजन में कमी होने से बच्चों का विकास रुक जाता है तथा प्रौढ़ों में तोड-फोड की मरम्मत नहीं हो पाती। बच्चों के लिए 10 अमीनो अम्ल आवश्यक होते हैं तथा प्रौढ़ों के लिए 8, क्योंकि हिस्टीडिन (Histidine) व आर्जिनिन (Arginine) को शिशुओं के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल माना जाता है।

सिस्टिन (Cystine) व टाइरोसिन (Tyrosin) को अर्द्ध-आवश्यक अमीनो अम्ल माना गया है। अनावश्यक अम्ल शरीर में होने वाली तोड़-फोड़ की मरम्मत कर सकते हैं। शरीर का निर्माण इनके द्वारा नहीं हो सकता । कुछ अनावश्यक अम्ल शरीर में कुछ आवश्यक अमीनो अम्ल की उपस्थिति में उत्पादित होते हैं।

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प्रश्न 4.
कार्बोज (Carbohydrates) का शरीर में क्या कार्य है ?
उत्तर:

  • कार्बोज ऊर्जा उत्पत्ति में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। शरीर की सारी ऐच्छिक व अनैच्छिक क्रियाओं के लिए गति व शक्ति प्रदान करते हैं।
  • यह वसा के पाचन में सहायक होते हैं।
  • ग्लूकोज अनावश्क अमीनो अम्ल के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • कार्बोज भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  • यह वसा के साथ मिलकर सन्तुष्टि की अनुभूति भी कराते हैं।
  • इसलिए अधिकांश मिष्ठान्न भोजन के अन्तिम दौर में परोसा जाता है।

प्रश्न 5.
कार्बोज की दैनिक मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
कार्बोज की मात्रा कोई निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की गई है, फिर भी 70% कैलोरीज कार्बोज से प्राप्त कर लेना चाहिए । उदाहरणार्थ एक साधारण काम-काज करने वाले व्यक्ति को कुल 2400 कैलोरी की आवश्यकता होती है तो इसका 70% 1680 कैलोरी हुई और चूँकि 10 ग्राम कार्बोज से 4 कैलोरी प्राप्त होती हैं, अतः उसे 1680 + 4 = 420 ग्राम कैलोरी की आवश्यकता होगी। वैसे भी 400 से 450 ग्राम तक की कार्बोज की मात्रा उपयुक्त समझी जाती है।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से शरीर का भार कम हो जाता है ? उनकी स्फूर्ति जाती रहती है और व्यक्ति आलस्य का शिकार हो जाते हैं और शारीरिक विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। शारीरिक कार्यों के लिए ऊर्जा न मिलने पर हर समय थकान महसूस होती है। कार्बोज की कमी होने पर प्रोटीन ऊर्जा के लिए उपयोग होता है और अपने शरीर निर्माण के विशिष्ट कार्य को सम्पन्न नहीं कर पाता है। इसके अतिरिक्त सेल्यूलोज की कमी होने पर मनुष्य कब्ज का शिकार हो जाता है। शरीर में संचित वसा गर्मी व शक्ति उत्पन्न करने हेतु व्यय हो जाता है। परिणामस्वरूप शरीर दुबला हो जाता है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, गालों की चमक जाती रहती है तथा व्यक्ति में दुर्बलता के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्बोहाइड्रेट्स के प्राप्ति स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
सभी भोज्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट्स के अतिरिक्त एक या एक से अधिक पोषक तत्त्व होते हैं। रोटी जो कि कार्बोहाइड्रेट्स की प्राप्ति का मुख्य साधन है उसमें अन्य पोषक तत्त्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। कुछ विशेष भोज्य पदार्थों को ज्वलन या ऊर्जा भोजन के नाम से पुकारते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें ऊर्जा उत्पादन तत्त्व अधिक होने से उनका मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है।

ऐसे पदार्थों में रोटी, आटा, छिलकेदार अनाज, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, चने आदि हैं। इसके अतिरिक्त सोयाबीन, सूखे मटर की फलियाँ आदि हैं। सूखे फलों में अंजीर, मुनक्का, खजूर, किशमिश, अंगूर, सूखी खुमानी आदि हैं। अन्य पदार्थों में शकरकन्द, अखरोट, शहद, गुड़, पहाड़ी आलू, जड़दार सब्जियाँ, पत्तीदार सब्जियाँ आदि हैं।

प्रश्न 8.
आहार में वसा की दैनिक आवश्यकता क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने अनुसंधानों के आधार पर यह अनुशंसा की है कि दैनिक आहार में 30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होनी चाहिए। प्रयुक्त की जाने वाली कुल वसा का 50% भाग वनस्पति तेलों से प्राप्त होना चाहिए ताकि आवश्यक वसीय अम्ल प्राप्त हो सके। विभिन्न आयु के व्यक्तियों के आहार में वसा का निम्नलिखित प्रतिशत होना चाहिए –
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प्रश्न 9.
वसा के मूल स्रोत (Sources) क्या हैं ?
उत्तर:
ऐसे भोज्य पदार्थ बहुत कम हैं जो पूर्णतः वसा तत्त्व से ही निर्मित हुए हैं। सामान्यतः विभिन्न चिकने भोज्य पदार्थों में प्रोटीन, वसा में घुलनशील विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और खजिन लवण आदि का संयोग रहता है परन्तु जिन पदार्थों में वसा की पर्याप्त मात्रा रहती है, उन्हें वसा का स्रोत माना जाता है।
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1. पशुजन्य स्रोत के अन्तर्गत माँस, मछली, मुर्गी के अण्डे, अण्डे की जर्दी, दूध और दूध से बने व्यंजन आते हैं।
2. वानस्पतिक स्रोत में वसा बीजों, सूखे मेवों (Nut), अनाजों और फलों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 10.
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर निम्न प्रकार हैं  –

वसा विलेय (Fat Soluble)।

  • वसा या वसा को घोलने वाले द्रवों में घुलनशील है।
  • आवश्यकता से अधिक खाये जाने पर शरीर में अधिकांश यकृत में संचित हो जाते हैं।
  • अभाव के दुष्परिणाम या लक्षण काफी विलम्ब से प्रकट होते हैं।
  • इनमें केवल ‘C, H, O अणु होते हैं।
  • अधिकता का शरीर पर कुप्रभाव पड़ता है।
  • यह विटामिन पूर्वगामी (Precursor) रूपों में भी पाए जाते हैं।

वारि विलेय (Water Soluble):

  • केवल वारि जल में घुलनशील है।
  • अधिकांश संचित नहीं होते। मूत्र में निष्कासित हो जाते हैं।
  • अभाव लक्षण तुरत ही प्रकट हो जाते हैं।
  • इनमें C, H, व O के अतिरिक्त N भी होता है, और कुछ में Sulphur व Cobalt भी।
  • अधिकता का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • यह पूर्वगामी रूपों में नहीं पाए जाते हैं।

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प्रश्न 11.
विटामिन ‘D’ के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions):
शरीर की उचित वृद्धि के लिए विटामिन डी की आवश्यकता है। इसकी अनुपस्थिति में विकास की गति रुक जाती है। चूहों के प्रयोग से पता चला है कि जिन चूहों को भोजन द्वारा विटामिन डी उपलब्ध कराई गई उनकी वृद्धि द्वितीय समूह के चूहों जिनके आहार में विटामिन डी अनुपस्थित थी, से बहुत अच्छी हुई।

  • कैल्शियम और फास्फोरस खनिज पदार्थों के अवशोषण में सहायक होते हैं जिससे हड्डियों व दाँतों को खनिज पदार्थ वांछित मात्रा में प्राप्त हो सकें।
  • इन्हीं तत्त्वां विशेषकर फास्फोरस गुर्दे (Kidney) के निकास को नियमित करता है। कैल्शियम उचित अनुपात में बना रहता है, जिससे हड्डियों की मजबूती बनी रहती है।
  • रक्त में भी कैल्शियम की मात्रा को. नियमित बनाए रखता है।
  • रक्त के अल्कंन फॉस्फेट इन्जाइम को नियमित बनाये रखता है जिसमें यह कैल्शियम व फॉस्फोरस को हड्डियों व दाँतों में संचित किए रखता है।

प्रश्न 12.
विटामिन ‘डी’ की दैनिक आवश्यकता क्या है ?
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता (Daily Requirement):

  • इस विटामिन की आवश्यकता जब शरीर में विकास हो रहा होता है, होती है।
  • गर्भवती स्त्री को भी इसकी आवश्यकता होती है।
  • एक स्वस्थ सामान्य वयस्क व्यक्ति.को इसकी थोड़ी आवश्यकता होती है। पोषण विज्ञान परिपद ने 18 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयु वर्गों के लिए
  • 200 आई. यू. (I.U) निश्चित किये हैं परन्तु प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए कुछ नहीं बताया।

प्रश्न 13.
विटामिन ‘बी’ (थायमिन) की भोजन में क्या उपयोगिता है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. इस विटामिन का विशेष कार्य कार्बोज के उपापचयन में सहायता करना है। इसके अभाव में शरीर में कार्बोज का पूर्ण अवशोपण नहीं हो पाता।
  2. यह विटामिन तान्त्रिका तंत्र के स्वास्थ्य तन्त्रिका तन्तु में संवेदन संचार तथा आँतों की स्वाभाविक क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है।
  3. थायमिन को मौरेल (Morale) विटामिन भी कहा जाता है। इसकी कमी से चिड़चिड़ापन, झगड़ालू प्रवृत्ति, अरुचि आदि लक्षण मनुष्यों में पाए जाते हैं। विलियम ने मनुष्यों पर प्रयोग करके बतलाया कि थायमिन पागलपन को ठीक नहीं करता लेकिन जब पागलों को इसकी कमी का आहार दिया जाता है तो उनके पागलपन की तीव्रता बढ़ जाती है।
  4. इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है। यह विटामिन शरीर की वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
  5. इसकी कमी से भूख नहीं लगती।
    B, के अभाव से राइबोफ्लेविन (Riboflavin) के संग्रह में कमी हो जाती है।
  6. रक्त में श्वेताणुओं की रोगाणु-भक्षण क्षमता की वृद्धि हेतु भी यह आवश्यक है।
  7. शरीर के आन्तरिक अवयवों की आवश्यक क्रियाशीलता हेतु शक्ति पहुँचाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 14.
“विटामिन ‘बी1‘ (थायमिन) की दैनिक आवश्यकता (Daily requirement) निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता-इस विटामिन की मात्रा, कैलारीज की मात्रा के अनुपात में निर्धारित की जाती है, अधिक शारीरिक श्रम करने वाले, अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट की खुराक खाने वाले और अधिक शराव सेवन करने वाले व्यक्ति को सामान्य से कुछ अधिक ही मात्रा की आवश्यकता होती है।
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प्रश्न 15.
विटामिन ‘बी2‘ (Riboflavin) के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions)”:

  • राइबोफ्लेविन प्रोटीनों व वसा के उपापचयन में सहायक है।
  • यह नायसिन के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • यह शारीरिक वृद्धि में सहायक है।
  • राइबोफ्लेविन की कमी से त्वचा स्वस्थ नहीं रह सकती।
  • यह अन्य शारीरिक इन्जाइमों से मिलकर शरीर की विभिन्न क्रियाओं में भाग लेता है।
  • यह ऑक्सीकरण प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है तथा कोशिकाओं के श्वसन के लिए अति आवश्यक है।

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प्रश्न 16.
राइबोफ्लेविन की दैनिक शारीरिक आवश्यकताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
शारीरिक आवश्यकता-(Requirement in the body): राइबोफ्लेविन की आवश्यकता मनुष्य के कार्य तथा आयु पर निर्भर करती है।
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प्रश्न 17.
विटामिन C के भौतिक गुणों (Physical Properties) का वर्णन करें।
उत्तर:
विटामिन सी को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे एस्कार्बिक अम्ल (Ascorbic Acid), सिविटामिस एसिड (Cevitamic Acid) या हेक्जुरोनिक एसिड (Hexuronic Acid) आदि। चूँकि यह स्कर्वी (Scurvy) नामक बीमारी का निराकरण करता है, अतः इसे एण्टी स्कोरब्यूटिक विटामिन (Anti Scorbutic Vitamin) भी कहते हैं। सन् 1932 ई० में इसका नींबू के रस से पृथक्करण किया गया और उसी वर्ष इसे रासायनिक रूप में भी तैयार किया गया।

विटामिन सी का रसायनिक नाम एस्कॉर्बिक अम्ल है। शुद्ध विटामिन सी सफेद स्वेदार, गन्ध रहित, पानी में घुलनशील, आग के प्रति अस्थिर, धूप एवं रोशनी में यह नष्ट हो जाता है। ताप, वायु, धातु में यह स्थिर है लेकिन तरल अवस्था में जबकि पानी के साथ इसका घोल बनाया जाता है, तो यह नष्ट हो जाता है। क्षार के माध्यम में यह अस्थिर है। अम्ल के माध्यम में यह नष्ट नहीं होता। जल में घुलनशील है।

प्रश्न 18.
विटामिन सी की दैनिक मात्रा मानव शरीर में कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
दैनिक मात्रा (Daily Requirement): बालकों के लिए शरीर विकास के साथ इस विटामिन की आवश्यकता बढ़ती रहती है।
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प्रश्न 19.
विटामिन C के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): यह समस्त रसीले फलों में विशेषकर नींबू, सन्तरा, आँवला, कमरख, अमरूद, चकोतरा, टमाटर में पाया जाता है, केले में भी यह पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहता है। हरी शाक-सब्जियों व ताजे फलों में जैसे पालक, सलाद आदि में यह पर्याप्त मात्रा में रहता है। अंकुरित अनाजों से यह अत्यधिक अंशों में प्राप्त किया जा सकता है। सूखे फलों में यह बिल्कुल नहीं रहता।

विभिन्न भोज्य पदार्थों में विटामिन (Vitamins in Different Food Stuffs)
अति उत्तम स्त्रोत – आँवला, अमरूद।
उत्तम स्रोत – नींबू का रस, पका पपीता, सन्तरा, काजू, अनानास, पका टमाटर, पका आम, मूली के पत्ते पालक, हरी पत्ती वाली शाक भाजी। .
सामान्य स्त्रोत – केला, सेब।

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प्रश्न 20.
लोहे के खाद्य स्रोत लिखें।
उत्तर:
खाद्य स्रोत:

  1. प्राणिज पदार्थों में यकृत (Liver) उत्तम स्रोत है। मांस, अण्डे की जर्दी, मछली आदि अन्य स्रोत हैं।
  2. फलों में सेब, आडु, खुबानी, अंगूर आदि से कुछ लोहा मिल जाता है।
  3. पालक व हरी पत्तीदार सब्जी लोहे के स्रोत हैं। पत्ते जितने अधिक हरे होंगे, उतना ही अधिक लोहा उनमें होगा।
  4. साबुत अनाजों व गुड़ में भी लोहा पाया जाता है।
  5. दालों में थोड़ी मात्रा में लोहा पाया जाता है।
  6. दूध, पनीर आदि में लोहा बहुत कम होता है।

प्रश्न 21.
खाद्य सम्मिश्रण क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट करें । [B.M. 2009 A]
उत्तर:
पर्याप्त पोषण के लिए यदि हम भोज्य पदार्थों को मिलाकर प्रयोग करें तो जो एक दूसरे. के पोषक तत्त्व की कमी को पूरा करते है उसे ही खाद्य सम्मिश्रण कहते हैं। इस विधि से पौष्टिक मान बढ़ाने से सबसे अधिक प्रभाव प्रोटीन की पौष्टिकता पर पड़ता है। अर्थात् प्रोटीन के द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी के स्रोतों को मिलाकर प्रथम श्रेणी का प्रोटीन प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर अनाज और दाल को मिलाकर दाल-रोटी दाल-चावल, खिचड़ी, डोसा इडली बड़ा बनाया जा सकता है इसी प्रकार से सब्जी और दूध के बने पदार्थ जैसे-गाजर का हलवा, टोमैटो क्रीम सूप। फल और अनाज से फ्रूट केक फलों का जैम ब्रेड इत्यादि बनाय जा सकता है। इस विधि से भोजन पकाने में पौष्टिकता तो बढ़ती ही साथ ही पकाने एवं खाने दोनों का ही समय कम लगता है और भोजन स्वादिष्ट, आकर्षक एवं रुचिकर भी हो जाता है।

प्रश्न 22.
लोहे की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
अथवा,
एक गर्भवती महिला अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाती। उसको कौन-सा रोग तत्त्वों की कमी से हो सकता है ? उसके दो लक्षण लिखें तथा एक खाद्य पदार्थ सुझाएँ।
उत्तर:
शरीर में कमी का प्रभाव (Effect of deficiency in the body):शरीर में लोहे ‘का अभाव कई कारणों से हो सकता है –

  • भोजन में लोहे की कमी।
  • लोहे का शरीर में पूर्णतः अवशोषण न होना।
  • शरीर में लोहे की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता हो।

लोहे की कमी से रक्तक्षीणता (Anaemia) रोग हो जाता है। इस रोग में लाल रक्त कण संख्या में बहुत कम हो जाते हैं, त्वचा पीली दिखाई देने लगती है, हीमोग्लोबिन का पर्याप्त रूप से निर्माण नहीं हो पाता। रक्त ऑक्सीजन वहन में असमर्थ हो जाता है। ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से शारीरिक क्रियाएँ क्षीण होने लगती हैं।

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ऊर्जा उत्पत्ति की कमी, शारीरिक कमजोरी, थकावट, भूख की कमी, साँस फूलने और हृदय धड़कने की शिकायत, आँखों की पलकों में लाली की कमी, चेहरा पीला, नाखून सफेद से और हाथों-पाँवों पर जल जमाव के कारण सूजन हो जाया करती है। व्यक्ति उत्साहहीन, सुस्त और बेचैन-सा रहने लगता है, वे लक्षण लोहे की कमी के ही लक्षण हैं।

प्रश्न 24.
लोहे की आवश्यकता शरीर में क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:

  • गर्भकाल में तथा जन्म पश्चात् शिशु और स्वयं के लिए भी माता को आवश्यक मात्रा में लोहा प्रदान करने के लिए।
  • बढ़ते बालकों के विकास के साथ-साथ लोहे की बढ़ती आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए।
  • विभिन्न व्यक्तियों की विशेष परिस्थितियों में लोहे की हानि को पूरा करने के लिए।
  • शरीर में लोहे की पर्याप्त मात्रा संचित करके भविष्य के संभाव्य अभावों के लिए पूर्ण व्यवस्था करने के लिए।

प्रश्न 25.
आयोडीन की शरीर में क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
शरीर में आवश्यकता (Requirement in the body)-समुद्रतटीय निवासियों को आयोडीन की अधिक आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके भोजन में आयोडीन की अधिक मात्रा उपस्थित रहती है। एक वयस्क व्यक्ति को 0.15 से 0.2 मिली ग्राम, छोटे बच्चे और अन्य बालकों को 0.05 से 0.10 मिलीग्राम एक अच्छे संतुलित आहार द्वारा प्राप्त होती है।

प्रश्न 26.
आप अपने लिए संतुलित भोजन का आयोजन करना चाहते हो। आपको ICMR खाद्य पदार्थ किस प्रकार मदद करेगी?
उत्तर:

  • प्रत्येक आहार में प्रत्येक खाद्य ग्रुप को सम्मिलित करने में।
  • भोजन में विभिन्नता लाने में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में प्रोटीन के क्या कार्य (Function) हैं ?
उत्तर:
1. मानव शरीर का लगभग 18% भाग प्रोटीन से बना होता है जो शरीर के विभिन्न भागों के कार्यों के अनुसार कई रूपों में पाया जाता है। शरीर में कोशिकाओं और ऊतकों का निर्माण करना प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसीलिए स्त्री को गर्भावस्था व स्तनपान काल में तथा बालक को बाल्यावस्था में शरीर के निर्माण और विकास के लिए प्रोटीन की विशेष रूप से अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. मनुष्य की बाह्य क्रियाशीलता तथा शरीर के अन्दर निरन्तर होती रहने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप ऊतकों में जो कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती रहती हैं उनकी पूर्ति तथा मरम्मत प्रोटीन द्वारा होती है। अस्थियाँ, दाँत, त्वचा, नाखून, रक्तकण, मांसपेशियां और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि की रचना में प्रोटीन का मुख्य भाग होता है। मूत्र और पित्त को छोड़कर शरीर के सभी तरल पदार्थों में अधिक या कम मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।

3. शरीर की क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में सहायता करना भी प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में प्रोटीन निम्न प्रकार से सहायता करता है –

(क) हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) इस प्रकार का प्रोटीन है जो रक्त के लाल कणों का एक मुख्य भाग है। इसमें लोहा भी सम्मिलित होता है। इसका कार्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है। रक् द्वारा यह ऑक्सीजन को विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है जिससे मिलकर कार्बोहाइड्रेट्स और वसा का ज्वलन होता है और परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है।
(ख) रक्त में जो प्रोटीन पाए जाते हैं वे रक्त की सामान्य क्षारीय प्रतिक्रिया (alkaline reaction) की स्थिति बनाए रखने में सहायता करते हैं।
(ग) एन्जाइम (enzyme) भी जो पाचन तथा उपापचयन (Matabolism) क्रियाओं में विशेष रूप से सहायक होती है, प्रोटीन से ही बने होते हैं।
(घ) विभिन्न हारमोन (Hormones) भी प्रोटीन से ही निर्मित होते हैं। वे नाइट्रोजन युक्त रासायनिक यौगिक हैं। शरीर की आन्तरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखने में इनका बहुत महत्त्व है।
(ङ) प्रोटीन आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव व हारमोन्स की बनावट में भाग लेते हैं। इन्सुलिन (Insulin), एनिलिन (Adrenaline), थायरॉक्सिन (Thyroxine) व अन्य हारमोन्स में विद्यमान रहते हैं।

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4. शरीर में रोगों से बचाव के लिए कुछ प्रतिरोधी (anti bodies) भी पाए जाते हैं। ये पदार्थ प्रोटीन से ही बनते हैं।

5. आवश्यकता पड़ने पर शरीर को काम करने के लिए प्रोटीन शक्ति भी प्रदान कर सकता है, परन्तु सामान्य दशा में प्रोटीन से ऊर्जा उत्पादक पदार्थों का काम लेना लाभकारी नहीं होता। यदि प्रोटीन ऊर्जा की उत्पत्ति के लिए प्रयुक्त कर लिए जाते हैं तो शरीर निर्माण के लिए प्रोटीन नहीं बचते हैं।
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प्रश्न 2.
प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर:
प्रोटीन की आवश्यकता कई बातों पर निर्भर करती है –

  • वृद्धि एवं विकास के समय अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • प्रोटीन की प्रतिदिन की आवश्यकता आहार में उपयोग की गई प्रोटीन के गुण पर भी निर्भर करती है। प्रतिदिन के आहार में उपयोग की गई प्रोटीन का आधा भाग प्राणी जगत के साधन से आना चाहिए।
  • प्रोटीन की आवश्यकता आहार में उपस्थित अन्य पौष्टिक तत्त्व जैसे कैलोरीज की मात्रा पर भी निर्भर करती है। आहार में कैलोरीज की कमी से प्रोटीन ऊष्मा प्रदान करने का कार्य करेगी।
  • संक्रामक बीमारियों में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की दैनिक मात्रा-1 ग्राम प्रतिकिलो वजन के अनुपात से लेना चाहिए। 1 ग्राम प्रोटीन = 4 KCal प्राप्त करता है।
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प्रश्न 3.
कार्बोहाइड्रेट को किस आधार पर वर्गीकृत (Classify) कर सकते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
कार्बोज को परमाणुओं की संख्या के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)
  • डाइ-सैक्राइड (Di-Saccharide)
  • पौली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)

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I. मोनो सैक्राइड (Mono-Saccharide): मोनो सैक्राइड कार्बोज है जिसके अणु में एक शर्करा इकाई है। इन्हें सरल शर्करा भी कहते हैं। इनका अभिपचन इन्हें खाने के पश्चात् तुरन्त ही हो जाता है। यह स्वाद में मीठा और जल में घुलनशील है।

(अ) ग्लूकोज (Glucose): यह मीठे फलों जैसे अंगूर में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। अतः इसको शक्कर (Grape) भी कहते हैं। यह मक्का, चुकन्दर, गन्ना आदि में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। ग्लूकोज श्वेतसार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। सभी श्वेतसार पाचन तथा पोषण के पश्चात् ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं।

रक्त में ग्लूकोज की एक निश्चित मात्रा होती है। यह मात्रा घटने तथा बढ़ने से शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में होने से यह मूत्र द्वारा वाहर निकलने लगता है। ये लक्षण डायबिटीज रोग के हैं। ग्लूकोज की आवश्यकता से अधिक मात्रा आहार में लेने से यह शरीर में ग्लाइकोजन (Glycogen) के रूप में एकत्रित हो जाता है।

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ग्लाइकोजन अधिकतर यकृत तथा मांसपेशियों में जमा रहता है । उपवास या बीमारियों में यही ग्लाइकोजन ग्लूकोज में बदल जाता है तथा ऑक्सीजन के पश्चात् ऊर्जा प्रदान करता है। ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा लेने से पाचन के पश्चात् वह वसा में परिवर्तित हो जाता है तथा वसा शरीर में जमा होकर अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न करती है। अत्यन्त दुर्बल रोगियों या मूर्छा आदि की दशा में ग्लूकोज को देने के लिए बाजार से बनी बनाई ग्लूकोज उपलब्ध हो जाती है। यह तुरंत रक्त में पहुँचकर रोगी को शक्ति प्रदान करता है क्योंकि इसे पचाने की आवश्यकता नहीं होती।

(ब) ग्लैक्टोज (Glactose): यह शक्कर ग्लूकोज व फ्रक्टोज की तरह प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। यह दूध में पाई जानेवाली शक्कर लैक्टोज के पाचन से प्राप्त होता है। इसको औद्योगिक विधि से भी तैयार किया जाता है।

(स) फ्रक्टोज (Fructose): यह फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। अत: फलों को शक्कर भी कहते हैं। यह इस समूह की सबसे मीठी शक्कर है। यह शहद, गुड़ आदि में पाया जाता है। फ्रक्टोज भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिनकी ग्लूकोज करता है। दोनों परस्पर परिवर्तनशील हैं।

II. डाइसैकराइड्स (Disaccharides) (C12 H2 O11 ): इन कार्बोहाइड्रेटों के अणुओं में शर्करा की दो इकाइयाँ होती हैं। इसलिए इन्हें दोहरी शर्करा या द्विशर्करा भी कहते हैं। ये सरल शर्करा से कुछ अधिक मीठी होती हैं तथा पानी मेंघुलनशीलस्फटिक (Crystals) बनने योग्य तथापाचन योग्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत ये सरल शर्कराओं में परिवर्तित हो जाती हैं।

(अ) लैक्टोज (Lactose): यह अन्य दूसरी शर्कराओं की अपेक्षा कम घुलनशील एवं कम मीठी होती है। साधारणतः यह रक्त या शरीर के ऊतकों में नहीं पायी जाती है। इसे दूध शक्कर भीकहते हैं। दूध में लैक्टोज 2 से 8% तक उपस्थित होती है। लैक्टोज का पाचन हो जाने के पश्चात् इसमें ग्लूकोज तथा ग्लैक्टोज बराबर अनुपात में मिलती है। लैक्टोज = ग्लूकोज + ग्लैक्टोज

(ब) सुक्रोज (Sucrose): यह अधिकतर गन्ने की शक्कर और चुकन्दर की शक्कर में पायी जाती है। यह साधारण चीनी का वैज्ञानिक नाम है। अभिपाचन के उपरान्त यह ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रक्त द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। इसकी अतिरिक्त मात्रा यकृत में ग्लाइकोजन बनकर संचित हो जाती है। सुक्रोज ग्लूकोज और फ्रक्टोस के संयोग से बनता है। सुक्रोज = ग्लूकोज + फ्रक्टोज

(स) माल्टोज (Maltose): इसे माल्ट या जवा शक्कर भी कहा जाता है। अंकुरित अनाजों में उपस्थित शक्कर है। अंकुरित होने की क्रिया के अन्तर्गत अनाजों के स्टार्च, माल्टोज शर्करा में परिवर्तित होते हैं जो अधिक सुपाच्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत अनाज का स्टार्च पहले माल्टोज में और फिर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है। माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज

III. पौली सैकराइड्स (Polysaccharides (C6H10O6): यह एक जटिल पदार्थ है। इस श्वेतसार में दो से ज्यादा शक्कर की इकाई रहती है। इनमें मिठास कम होती है तथा इसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

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(अ) स्टार्च (Starch): जड़, वीज, कन्द अनाजों आदि में ये काफी मात्रा में उपस्थित रहते हैं। स्टार्च पानी में अघुलनशील हैं। गर्म पानी के साथ घोलने पर स्टार्च पेस्ट के रूप में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च पकाने के पश्चात् उसके चारों ओर उपस्थित सेल्यूलोज की दीवार टूट जाती है तथा स्टार्च कण पानी शोषित करके फूल जाते हैं। स्टार्च को अधिक पकाने से वह चिपचिपे पदार्थ में बदल जाता है।

पका हुआ स्टार्च खाने में स्वादिष्ट होता है तथा इसका पाचन शीघ्र ही हो जाता है। कच्चे स्टार्च का पाचन नहीं होता क्योंकि लार में उपस्थित एन्जाइम टायलिन केवल पके स्टार्च पर ही कार्य करता है। स्टार्च के कणों का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। इसके कुछ कण गोल, कुछ अण्डाकार तथा कुछ बेढंगी शक्ल के होते हैं।

(ब) डेक्सट्रीन (Dextrin): डेक्सट्रीन प्रकृति में प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलता है। जब स्टार्च युक्त पदार्थों को पकाया या भूना जाता है तो स्टार्च डेक्सट्रिन में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च का उद्विच्छेदन होने से स्टार्च पहले माल्टोज में, फिर डेक्सट्रिन में तथा अन्त में ग्लूकोज के रूप में प्राप्त होता है। इस प्रकार डेक्सट्रिन की प्राप्ति स्टार्च के उविच्छेदन से भी होती है। डबलरोटी या चपाती की बाहरी पपड़ी भीतरी भाग की अपेक्षा अधिक पाचनशील होती है।

(स) सेल्यूलोज (Cellulose): यह स्टार्च कोशिकाओं की बाहरी पर्त पर कड़े आवरण के रूप में उपस्थित रहता है। यह एक अत्यन्त जटिल पदार्थ है। इस कारण इसका शरीर में पाचन नहीं होता। सेल्यूलोज का भोज्य-मूल्य नहीं होता लेकिन भोजन में इसका होना अति आवश्यक है। सेल्यूलोज के रेशे आहार में भूसी की मात्रा बढ़ाते हैं जिससे आंत की मांसपेशियों में कुंचन गति (Penstalistic Movement) तेजी से होती है और मल आँत से आसानी से बाहर निकल जाता है। भूसी आँत में पानी शोषित करके फूल जाती है तथा बड़ी आँत को बली प्रदान करती है जिससे बड़ी आँत में मल आसानी से निकल जाता है। साबुत अनाजों, दालों, ताजे फलों एवं सब्जियाँ, सूखे मेवे आदि में सेल्यूलोज अधिक पाया जाता है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन आहार में 4 से 7 मि. रेशा लेना चाहिए।

प्रश्न 4.
आहार द्वारा क्वाशिरक्योर का इलाज तथा मरस्मस रोग के लक्षण बताएँ।
उत्तर:
क्वाशिक्योर के रोगी को आहार देते समय निम्न दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए
1. आहार पाचनशील हो। शुरू के कुछ हफ्ते में सिर्फ तरल आहार देना चाहिए। तरल आहार में प्रोटीन, कैलोरीज तथा विटामिन अधिक मात्रा में हों।
2. जीवाणुनाशक तथा परजीवीनाशक दवाई देनी चाहिए।

आहार (Diet): बच्चे को शुरू में वसा रहित पाउडर दूध देना चाहिए। अच्छी तरह पकाए हुए अनाज, खिचड़ी, दाल का सूप आदि देना चाहिए । वसा युक्त भोज्य पदार्थ दूसरे या तीसरे हफ्ते से शुरू करना चाहिए। बच्चे को हरी पत्ते वाली पीली सब्जियाँ भी देनी चाहिए। इससे बच्चे को लौह, लवण, कैल्शिम, विटामिन ए आदि प्राप्त होंगे।

कैलोरीज (Calories): बच्चे को उसके भार के अनुसार कैलोरीज देनी चाहिए। प्रति किलो भार पर 140-150 कैलोरीज प्रतिदिन आहार में देनी चाहिए। अधिक कैलोरीज देने से बच्चा जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

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प्रोटीन (Protein): प्रोटीन उस स्रोत से दी जाए जिसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल उचित मात्रा में उपस्थित हों। प्रोटीन मुख्य रूप से प्राणी जगत् से दिया जाना चाहिए। प्रतिदिन प्रोटीन 3-5 ग्राम/कि.ग्राम के वजन में दिया जाना चाहिए।

विटामिन (Vitamin): विटामिन ए की कमी क्वाशिक्योर में अधिकांश रूप में देखी गई है। विटामिन ए की कमी की पूर्ति के लिए दवाई के रूप में विटामिन ए जैसे कॉड लिवर तेल (Cod liver oil) देना चाहिए। 50,000 IU विटामिन ए प्रतिदिन देना चाहिए।

अन्य खनिज लवण (Other minerals): मैग्नीशियम तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। प्रतिदिन बच्चे को 3-4 ग्राम पोटैशियम क्लोराइड तथा 5 से 10 ग्राम मैग्नीशियम क्लोराइड देना चाहिए। ये खनिज लवण तब तक देने चाहिए जब तक कि बच्चा पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाए।

मरास्मस (Marasmus): मरास्मस का मुख्य कारण आहार में प्रोटीन व कैलोरीज दोनों की कमी या अभाव है। एक वर्ष के बच्चे अधिकांशतः इस बीमारी से पीड़ित होते हैं। छ: महीने के पश्चात् बच्चे को पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता अधिक होती है परन्तु उनको उस समय उचित आहार नहीं मिल पाता। इनके आहार में मुख्य रूप से चावल का समावेश रहता है जिससे न तो पूर्ण प्रोटीन मिलता है और न ऊष्मा की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। इस आयु में बच्चों को अनेक संक्रामक बीमारियाँ भी होती हैं जिसमें डायरिया मुख्य है। डायरिया रोग में भोजन का पोषण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बच्चा कमजोर होता जाता है।

बच्चा दो प्रकार के अभाव से पीड़ित होता है –
1. आहार की कमी।
2. आहार का पोषण उचित न होना। रोग के लक्षण (Symptoms of the disease)

1. माँसपेशियों का कमजोर होना-बच्चे की माँसपेशियाँ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं तथा शरीर पर केवल अस्थि कंकाल ही रह जाता है। आहार में प्रोटीन की कमी के कारण माँसपेशियों में उपस्थित ग्लाइकोजिन (Glycogen) का निरन्तर उपयोग होता रहता है।

त्वचा में उपस्थित वसा जलकर शरीर को ऊष्मा प्रदान करती है। इस प्रकार शरीर में कार्बोज तथा वसा की कमी होती रहती है जिससे माँसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।

2. वृद्धि रुक जाती है-बच्चे के शरीर का भार तथा लम्बाई अत्यन्त कम हो जाती है। इस दशा को बौनापन भी कहते हैं।

3. अन्य लक्षण-बच्चे का यकृत बढ़ जाता है जिसके कारण उसका पेट बाहर निकल आता है। शरीर में केवल आगे निकला हुआ पेट ही दिखाई पड़ता है। बच्चे की शक्ल बन्दर की तरह भयानक हो जाती है। त्वचा खुरदरी हो जाती है।

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उस पर घाव हो जाते हैं। पानी की कमी से त्वचा सूख जाती है और उस पर दरारें पड़ जाती हैं। त्वचा ढीली पड़ कर लटक जाती है। हाथ-पैर एकदम कमजोर हो जाते हैं। विटामिन ए के अभाव के कारण आँखों में खुरदरापन आ जाता है। बच्चों में रक्तहीनता भी हो जाती है क्योंकि नए रक्त कणों का निर्माण उस समय ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

4. रक्त में परिवर्तन-सीरम एल्ब्यूमिन की मात्रा की रक्त में कमी हो जाती है। आहार द्वारा इलाज (Treatment through diet): इसमें वही आहार तथा पौष्टिक तत्त्व देनी चाहिए. जो क्वाशिक्योर में दिए जाते हैं।
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प्रश्न 5.
विस्तार से प्रोटीन कैलोरी कुपोषण के लक्षण लिखें। उत्तर-प्रोटीन व कैलोरी कुपोषण से निम्न दो बीमारियों के लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. क्वाशिक्योर (Kwashikior) – यह मुख्य रूप से आहार में प्रोटीन की कमी के कारण होता है।
2. मरास्मस (Marasmus) – मरास्मस आहार में प्रोटीन तथा कैलोरी दोनों की कमी के कारण होता है।

1. क्वाशिक्योर (Kwashikior): डॉ. सिसले विलियम (Dr. Cicely William) ने क्वाशिक्योर रोग की खोज की और उन्होंने देखा कि यह रोग अधिकतर 1 से 3 वर्ष की अवस्था के बच्चों को होता है। उन्होंने बताया कि माता का दूध छुड़ाने के पश्चात् जब बच्चों को ऊपरी दूध नहीं मिलता तब उन्हें माँड (Starch) वाले भोजन देने शुरू किए जाते हैं, जिससे उनमें इस रोग के होने की सम्भावना रहती है।

इसके अतिरिक्त जिन बच्चों को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार दूध नहीं मिलता और उन्हें जौ का पानी, साबूदाने का पानी या खिचड़ी दी जाती है जिसरं उनकी भूख शान्त नहीं हो पाती। उन्हें भी क्वाशिक्योर रोग हो जाता है। यह रोग अधिकतर गरीब तथा मध्यम वर्ग के बच्चों को जिन्हें शारीरिक आवश्यकतानुसार प्रोटीन नहीं मिल पाता, हो जाता है।

रोग के लक्षण (Symptoms of the disease): इस रोग से पीड़ित बच्चों के शरीर में निम्नलिखित लक्षण देखने में आते हैं –

  1. वृद्धि न्यूनता (Growth Failure): यह रोग का मुख्य लक्षण है। प्रोटीन की कमी के कारण शरीर की लम्बाई तथा भार कम हो जाता है।
  2. सूजन (Oedema): प्रथम पंजों तथा पैरों में सूजन आती है। तत्पश्चात् शरीर के अन्य भाग जैसे जाँघ, हाथ तथा मुख भी सूज जाते हैं । सूजन का मुख्य कारण रक्त में सीरम एल्ब्यूमिन की कमी है।
  3. चन्द्रमा के समान मुख (Moon Face): मुख चन्द्रमा के समान गोल हो जाता है । इसका मुख्य कारण मुख पर सूजन की उपस्थिति है।
  4. मानसिक परिवर्तन (Mental changes): मानसिक परिवर्तन के कारण रोगी में उदासीनता तथा चिड़चिड़ापन आ जाता है। रोग तीव्र होने के कारण रोगी आलसी व उदासीन हो जाता है। अपने आस-पास के वातावरण में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता।
  5. त्वचा तथा बालों में परिवर्तन (Skin and Hair changes): त्वचा रूखी, एवं खुरदरी हो जाती है।
  6. माँसपेशियों का क्षय होना (Muscle Wasting): शरीर की माँस-पेशियों का क्षय होने लगता है। इसका प्रभाव मुख्यतः हाथों पर पड़ता है।
  7. यकृत में परिवर्तन (Liver Changes): यकृत का आकार बढ़ जाता है जो कि Fatty Liver कहलाता है। वसा का पाचन ठीक नहीं हो पाता ।
  8. आमाशयिक आंत्रिक अंग पर प्रभाव (Gastro-Intestinal Tract): भूख कम हो जाती है। वमन तथा अतिसार खास लक्षण हैं। बच्चा. भोजन पचाने में असमर्थ होता है।
  9. रक्तहीनता (Anaemia): रक्तहीनता का मुख्य कारण लौह लवण तथा फेरिक अम्ल की कमी है।
  10. विटामिन की कमी (Vitamin Deficiency): विटामिन ए की कमी के लक्षण सामने आते हैं। राइबोफ्लेविन की कमी से होने वाले लक्षण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 6.
शरीर में वसा के प्रमुख कार्य कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
वसा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –
1. शरीर को ऊर्जा प्रदान करना (Give energy to the body): वसा का प्रमुख कार्य व्यक्ति को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना है। वसा कार्बोज और प्रोटीन से दुगुनी मात्रा में शक्ति व गर्मी प्रदान करती है। एक ग्राम वसा में 9 कैलोरी मिलती है।

2. अधिक मात्रा होने पर यह शरीर में जमा हो जाती है (Deposit as fat in the body): जब वसा शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच जाती है तो यह एकत्र होती रहती है। यह एडीपस (Adepose) तन्तुओं के रूप में शरीर में एकत्रित होती रहती है। जब कभी उपवास अथवा रुग्णावस्था में शरीर में वसा की कमी हो जाती है तो उस समय संचित की गई वसा ऑक्सीकरण (Oxidation) क्रिया द्वारा शरीर को गर्मी व शक्ति प्रदान करती है।

3. वसा तह का काम करती है (Fat actsas a layer): हमारा शरीर माँस से ढका रहता है, जिसे चर्म कहते हैं। इस चर्म के नीचे वसा एक तह के रूप में एकत्रित होती रहती है। जो ताप कुचालक होने के कारण शरीर की गर्मी का तापक्रम 88.4 FH बनाये रखता है।

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4. कोमल अंगों की रक्षा करना (Protection of delicate organs): शरीर के अन्दर अनेक कोमल अंग पाए जाते हैं, जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे । इनके ऊपर वसा की दोहरी पर्त चढ़ी
रहती है। यह पर्त कोमल अंगों को झटकों से बचाती है ताकि चोट व आघातों से कोमल अंग सुरक्षित रहें।

5. वसा अनिवार्य अम्ल प्रदान करता है (Provide essential fatty acids): वसा अनिवार्य अम्ल जो स्वास्थ्य एवं शरीर निर्माण के लिए बहुत आवश्यक है, भोजन में उपस्थित वसा द्वारा प्राप्त होता है। यह शारीरिक वृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

6. वसा में घुलनशील विटामिन प्रदान करना (Provide fat soluble vitamin): वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, ई और के अवशोषण में सहायक होते हैं। भोजन में वसा की कमी की स्थिति में यह वसा विलेय विटामिन अवशोषण नहीं हो पाते हैं।

7. शरीर अंगों को स्निग्धता प्रदान करना (Provide lubrication to different organs): वसा हमारे विभिन्न अंगों जैसे पाचन संस्थान के अंगों को स्निग्धता प्रदान करते हैं।

8. भोजन को स्वादिष्ट बनाना (Makes food tasty): वसा का प्रयोग करके जब हम खाद्य पदार्थ पकाते हैं तो स्वादिष्ट होता है।

9. भूख से सन्तुष्टि प्रदान करना (Gives food a satisfy value): वसा का पाचन धीरे-धीरे विलम्ब से होता है जिसके कारण वसायुक्त भोजन अधिक समय तक आमाशय में स्हता है और भूख देर से लगती है।

10. कोशिकाओं की रचना में भाग लेते हैं (Take part in the formation of cell): कोशिका झिल्ली का भाग बनाते हैं। उसे पारगम्यता (Permebility) प्रदान करते हैं, जिससे पोषक तत्त्व उसमें होकर आसानी से अन्दर व बाहर आ-जा सकें।

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ के कार्य लिखिए।
उत्तर:
कार्य (Functions):
1. विटामिन ए की अनुपस्थिति में कई प्रकार के आँख से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं। इन रोगों में से रात्रि-अन्धापन (night blindness) और जेरोफ्थालमिया Zerophthalmia) मुख्य हैं।

2. शारीरिक वृद्धि में सहायक होता है। इस विटामिन की विद्यमानता में शरीर की हड्डियाँ ठीक से पनपती हैं और उनकी लम्बाई यथोचित हो पाती है, जिससे व्यक्ति की शारीरिक वृद्धि सामान्य हो पाती है। हड्डियों के साथ-साथ यह अन्य अवयवों और अंग-प्रत्यंगों को भी विकसित करने में सहायक होता है। गर्भ में बच्चे के अंग-प्रत्यंगों को बनाने में मददगार होता है। इसीलिए इसे वृद्धिवर्धक कारक (Growth Promoting Factor) भी कहा गया है।

3. पृष्ठाच्छादक तन्तुओं या उपकला (epithelial tissues) के स्वास्थ्य के लिए-उपकला कोशिकाओं को मजबूत बनाने में और उनके पुनर्निर्माण में सहायक होता है। हमारी त्वचा की ऊपरी परत उपकला और शरीर के सभी खोखले अवयवों की भीतरी झिल्लियाँ तन्तुओं की बनी होती हैं।

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बाहरी उपकला धूप, गर्मी, सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं, भीतरी तन्तु श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में से निकलने वाले रसों की क्रियाओं में सहायक हैं। विटामिन ए की कमी से उपकला तन्तुओं की दशा अप्राकृतिक (abnormal) हो जाती है, त्वचा में रुखापन आ जाता है। समस्त त्वचा पर सींग के से उभार (Horny Structure) बन जाते हैं।

4. प्रोटीन को विभक्त करने वाले एन्जाइम्स की उत्पत्ति में सहायक होता है।

5. हार्मोन विशेषकर कोर्टीकोस्टीरान (Corticosteron) हार्मोन बनाने में सहायक होता है।

6. शरीर के अंगों पर कीटाणुओं के संक्रमण से बचाता है।

7. श्वास संस्थान की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में विटामिन ए की कमी से परिवर्तन के फलस्वरूप मनुष्यों को तथा जानवरों को ब्रकोन्यूमोनिया तथा अन्य संक्रमण जनित रोग होने की बार-बार सम्भावना रहती है।

8. दाँत और मसूढ़े (Teeth & gums) दाँतों के ऊपर एनामेल (enamel) की पर्त चढ़ी रहती है जो दाँतों में चमकीलापन लाती है। यदि यह ठीक प्रकार से नहीं बनता तो दाँत पीले हो जाते हैं। एनामेल के निर्माण के लिए विटामिन ए का भोजन में पाया जाना आवश्यक है। इसके प्रभाव में मसूढ़े अस्वस्थ रहते हैं।

9. मूत्र नलियों (Urinary Tubes) में पथरी बनने की सम्भावना-प्रयोग द्वारा सिद्ध हो चुका है कि भोजन में विटामिन ए की मात्रा ठीक न लेने पर पेशावनलियों में पथरी (Stone) बन जाती है जिससे पेशाब रुक-रुक कर आता है। बाद में इसके परिणाम बड़े घातक सिद्ध होते हैं।

10. स्नायु संस्थान (Nervous System) विटामिन ए की कमी से स्पाइनल कॉर्ड (Spinal Cord) में टॉक्सिन (Toxin) पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं, जिनका प्रभाव सम्पूर्ण संस्थान पर पड़ता है। लैथरिज्म की बीमारी भी इस विटामिन की कमी से बताई जाती है। इस रोग में दोनों पैरों में Paralysis हो जाता है।

11. पाचन संस्थान (Digestive System) विटामिन ए के अभाव में मनुष्य की आमाशय में अम्ल का अभाव पाया जाता है, जिससे भोजन के पाचन में व्यवधान होता है।

12. यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचयन में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘ए’ के अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms) के बारे में विस्तार से लिखिए।
अथवा
यदि एक बच्चा लाल-पीले रंग की फल-सब्जियाँ और हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाता है तो उसे कौन-से तत्त्व की कमी हो जाती है ? उसके लक्षण लिखें।
उत्तर:
1. रात्रि अन्धापन या रतौंधी (Night Blindness): आँख का भीतरी भाग जिसे रेटिना (Retina) कहते हैं वह दो प्रकार के कोषों छड़ (Rods) और सूचियों (Lons) से मिलकर बना है। इसमें रंग देने वाले कण पाए जाते हैं। वह रंग देने वाले कण (Colour pigments) जो छड़ में हैं, उन्हें रोडप्सिन (Rhodopsin) कहते हैं।

सूचियों में पाए जाने वाले रंग कणों को इडाप्सिन (Idopsin) कहते हैं। यह दोनों प्रकार के रंग कण विटामिन ए और प्रोटीन से बनते हैं। छड़ मध्यम रोशनी को ग्रहण करते हैं और सूची तेज रोशनी तथा रंग ग्रहण करते हैं। अन्धेरे से उजाले में देखते हैं, तो प्रोटीन से रोडोप्सिन (Rhodopsin) संयुक्त (Combined) हो जाते हैं। विटामिन ए की थोड़ी-सी मात्रा नष्ट हो जाती है, पुन: रोडोप्सिन की भरपाई के लिए विटामिन ए की आवश्यकता पड़ती है।

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यदि भोजन में विटामिन ए की मात्रा की प्राप्ति उचित प्रकार से शरीर में नहीं हो पाती तो रात्रि अन्धापन का रोग होने की सम्भावना रहती है। तीव्र या मध्यम प्रकाश में देखने के पश्चात् धुंधले प्रकाश में हमें कुछ समय तक चीजें दिखाई नहीं देतीं। यदि इस विटमिन की कमी अधिक हो तो यह समय काफी अधिक हो जाता है और कमी बढ़ने के साथ-साथ धीमी रोशनी में दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाता है।

2. जेरोफ्थालमिया (Zerophthalmia): इन रोग में अश्रु ग्रन्थियाँ ठीक प्रकार से काम नहीं करतीं। आँखों में शुष्कता (dryness) आ जाती है, जिससे खुजली का अनुभव होता है। आँखों में छोटी-छोटी फुन्सियाँ होकर पस पड़ने की सम्भावना रहती है। आँख का कॉर्निया (Cornea) वाला भाग शुष्क होकर पारदर्शी (Transparent) हो जाता है। आँख की गति में बाधा पहुँचती है।

ऐसी अवस्था में यदि विटामिन A की मात्रा की कमी अधिक बढ़ जाए तो अन्धापन आ जाता है। रोगाणु तीव्र गति से वृद्धि करने लगते हैं, क्योंकि अश्रु ही रोगाणुओं को आँख में प्रवेश नहीं करने देते हैं। संक्रमण के कारण कॉर्निया (काला भाग) में जख्म हो जाता है। आँख के सफेद भाग को ढकने वाली झिल्ली कनजक्टिवा (Conjuctiva) सूख जाती है तथा चमकहीन हो जाती है।

3.बीटोट्स बिन्द (Bitots Spot): कई बार जेरोफ्थाल्मिया के साथ-साथ बीटोट्स बिन्दु भी हो जाते हैं। विटामिन ए की कमी के कारण आँखों के भीतरी भाग की झिल्ली की पर्त पर भूरे अथवा सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इनका आकार तिकोना होता है और ये कनजक्टिवा (Conjuctiva) से चिपक जाते हैं। कॉर्निया पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ निकल आती हैं। उनमें रस पैदा होने लगता है इसलिए पलकें चिपक जाती हैं। बीटोट्स नामक व्यक्ति ने इसके बारे में 1863 ई० में प्रथम बार बताया था।

4 .किराटामलेसिया (Keratamalacia): यह रोग की अन्तिम स्थिति है, कॉर्निया अपारदर्शक हो जाता है, रक्तवाहिनियाँ सम्पूर्ण कॉर्निया को घेर लेती हैं। कॉर्निया लाल होकर सूज जाती है और घाव हो जाता है। संक्रमण (infection) आसानी से हो सकता है। कॉर्निया नष्ट हो जाती है तथा आँखों की रोशनी समाप्त हो जाती है। अश्रु ग्रन्थि ठीक प्रकार से काम नहीं करती, आँखें शुष्क हो जाती हैं और खुजली का अनुभव होता है।

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5. टोड त्वचा (Toad skin): विटामिन ए की कमी होने पर त्वचा में बहुत से परिवर्तन आते हैं जैसे त्वचा शुष्क, खुरदरी और चितकबरी हो जाती है। विशेषकर कन्धों, पेट, पीठ, गर्दन आदि पर बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं और यह मेंढक (Toad) की त्वचा के समान लगने लगती है।

6. अन्य परिवर्तन-नाक, गले, ट्रेकिया (Trachea), ब्रांकिस (Bronchis) की श्लेष्मिक झिल्ली सूख जाती है और उनमें रोगाणु के संक्रमण की आशंका बनी रहती है। पाचक रस कम मात्रा में स्रावित होते हैं तथा सभी पौष्टिक तत्त्वों के अवशोषण में रुकावट होती है।

प्रश्न 9.
विटामिन ‘ए’ के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): विटामिन ए हल्के-पीले रंग का और कैरोटीन लाल-पीले रंग का होता है। कैरोटीन पशु जगत और वनस्पतियाँ दोनों में पाया जाता है। कैरोटीन हरी पत्तेदार सब्जियों में भी पाया जाता है परन्तु इनके हरे रंग में पीला रंग घुल जाता है। डालडा (घी) जो हाइड्रोजनीकरण क्रिया द्वारा तेल से बनता है, ऊपर से विटामिन ए मिलाया जाता है। पशुजन्य पदार्थों में मछली के यकृत के तेल में सर्वाधिक पाया जाता है। दूध, मक्खन, पनीर, दही, यकृत आदि में भी पाया जाता है।

विटामिन
दुध, मक्खन, पनीर, दही, डालडा घी, अण्डे की जर्दी, यकृत, कॉड मछली का तेल।

कैरोटीन
सूखी खुमानी, आडू, शकरकन्द, आम, गाजर, पालक, टमाटर, पोदीना, धनिया की पत्ती, चकन्दर की पत्ती, हरी मटर आदि।

यह उन सब्जियों व फलों में पाया जाता है जो पीले रंग के हों जैसे गाजर, टमाटर, कद्, शकरकन्द, आम, खुमानी, आडू और हरी पत्तेदार सब्जियाँ। फलों व तरकारियों को जितनी अधिक धूप मिलेगी, उतना ही अधिक कैरोटीन उनमें पाया जाएगा।

अति उत्तम साधन (Rich Source): मछली का तेल।
उत्तम साधन (Good Source): मक्खन, घी, अण्डा, दूध का पाउडर।
अच्छे साधन (Fair Source): गाय या भैंस का दूध।

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शरीर में अवशोषण (Utilization in the body): विटामिन ए के शोषण में लगभग 5 घण्टे लगते हैं। भोजन में विटामिन और कैरोटीन प्राप्त होते हैं। छोटी आंत की दीवारों में ही कैरोटीन विटामिन ए में परिवर्तित होता है। विटामिन ए वसा के माध्यम से शरीर में पहुँचता है। इसलिए इसके अवशोषण के साथ-साथ वसा का अवशोषण अनिवार्य है। आवश्यकता से अधिक विटामिन का 99% भाग यकृत में जमा हो जाता है। विटामिन ए का विसर्जन आँखों में व्यर्थ पदार्थ के साथ हो जाता है।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘डी’ के अभाव से होने वाली बीमारियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms):
1. रिकेट्स (Rickets): यह रोग प्रायः पाँच वर्ष तक की आयु के बालकों को होता है। यह रोग भोजन में विटामिन डी, कैल्शियम या फॉस्फोरस लवण की कमी या सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण होता है।

कारण:
1. कम या दोषपूर्ण भोजन, शैशवावस्था में डिब्बे के दूध का प्रयोग, ताजे दूध और वसायुक्त भोजन की कमी और माङयुक्त भोजन की अधिकता।
2. घर में अस्वस्थ वातावरण, ताजी शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश की कमी।
3. यदि गुर्दो के कार्य में व्यवधान पहुंचता है तो गुर्दे से सम्बन्धित रोगों के कारण पेशाब के साथ फॉस्फोरस का विसर्जन बढ़ जाता है जिससे खून के फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शरीर की वृद्धि रुक जाती है और अस्थियों (Bones) में विकृति देखने में आती है।

इसमें आँतों में वसा के शोषण की शक्ति नहीं रहती जिससे शरीर में कैल्शियम (Ca) तथा विटामिन डी के शोषण में बाधा होने के कारण अस्थियों का निर्माण नहीं हो पाता।

लक्षण (Symptoms): विटामिन डी की कमी से बालक की अस्थियों में कैल्शियम के एकत्र होने में व्याघात होता है। साधारणत: अस्थि में होने वाले परिवर्तन निम्नलिखित हैं –

1.चौकोर सिर-सिर की अस्थि-विकृत होकर चपटी और चौकोर हो जाती है और ललाट की अस्थि आवश्यकता से अधिक उभर जाती है।

2. कबूतरी वक्ष (Pigeon Chest): संधि-स्थल (Joints) से अस्थियाँ मोटी हो जाती हैं। पसली की अस्थियाँ (Ribs) छाती के दोनों ओर माला की तरह ढाँचा (Beaded Ribs) बना लेती हैं। फलस्वरूप कबूतर-सा सीना दिखाई देने लगता है।

3. झुका मेरुदण्ड (Spinal cord bends): मेरुदण्ड की अस्थि नर्म होकर लचक जाती है और कूबड़ (Kyphosis) निकल आता है, या मेरुदण्ड एक तरफ मुड़ जाता है।

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4. कोमल अस्थियाँ: अस्थियाँ कोमल होकर दबाव के कारण उनके टेढ़े और विकृत हो जाने का भय रहता है। जब बालक चलना आरम्भ करता है तो भार के कारण अस्थियाँ टेढ़ी हो जाती है। चपटे पैर, मोटे घुटने आदि विकृतियाँ इनके परिणाम हैं।

अन्य लक्षण (Other Symptoms):

  • बालक चिड़चिड़ा, थका व अप्रसन्न दिखाई देता है। मस्तिष्क पर पसीना आने लगता है। विशेषकर जब बच्चा सोता रहता है।
  • सामान्य अशक्तता और पीलापन-पेशियों का पूर्ण विकास नहीं होता और वे अशक्त रोगी हो जाते हैं। अस्थि बन्धन भी कमजोर पड़ जाते हैं, दूध के दाँतों के निकलने में देर होती है, और जब वे निकलते हैं तो आसानी से दूषित हो जाते हैं।
  • उभरा हुआ पेट-पाचनतन्त्र में भी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है और पीले बदबूदार दस्त आने लगते हैं। कोमल तथा अशक्त पेशियों के परिणामस्वरूप पेट बाहर को निकल आता है।
  • रोग से बचने की शक्ति का कम हो जाना-जुकाम, खाँसी, शीघ्र ही हो जाते हैं और तरह-तरह के रोग सरलता से शरीर को जकड़ लेते हैं। विशेषकर फुफ्फुसों के रोग जैसे ब्रोन्काइटिस और निमोनिया आदि।

प्रश्न 11.
विटामिन डी के खाद्य स्रोत कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
विटामिन डी के स्रोत (Food Sources): विटामिन डी दो प्रकार से प्राप्त होता है –
1. विटामिन युक्त भोजन के खाने से।
2. चर्म द्वारा सूर्य की सीधी किरणें ग्रहण करने से।

1. यह केवल पशुजन्य भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। यह किसी तरकारी में पर्याप्त मात्रा में नहीं पाया जाता। इसकी प्राप्ति मक्खन, मछली के जिगर के तेल, कुछ मछलियों, माँस तथा अण्डे की जर्दी से होता है। दूध में यह बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है।
कुछ खाद्यों में विटामिन डी:
मछली का यकृत तेल।
कॉड यकृत तेल।
शार्क यकृत तेल।
अन्य भोज्य पदार्थ।
मछली, अण्डा, अण्डे का पीला भाग, मक्खन, घी, दूध।

2. यह विटामिन सबसे अधिक सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें में पाया जाता है। यह किरणें निकलते हुए सूर्य की किरणों में सबसे अधिक होती हैं। प्रातःकाल अपने शरीर पर किरणों को ग्रहण करने से शरीर में विटामिन डी पहुंचता है। चर्म की भीतरी तह में स्थित वसा में एक पदार्थ होता है, जिसे आर्गस्ट्रॉल (Ergasterol) कहते हैं। जब चर्म पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वे वस्त्र की तह में प्रवेश कर जाती हैं और आर्गस्ट्रॉल को विटामिन डी में परिवर्तित कर देती हैं।

सूर्य के प्रकाश ग्रहण करने पर इस विटामिन की कमी को कुछ सीमा तक पूरा किया जा सकता है। यही कारण है कि घनीबस्ती वाले शहरों की अपेक्षा पहाड़ी स्थानों, समुद्र तट और गाँवों में रहने वाले व्यक्तियों के शरीर में विटामिन डी का निर्माण अधिक मात्रा में होता है। मुसलमान स्त्रियाँ बन्द अंधेरे कमरों में दिन व्यतीत करती हैं और बुरका पहनकर बाहर जाती हैं परिणामतः वे विटामिन डी के इस स्रोत के लाभ से वंचित रह जाती हैं।

अवशोषण (Absorption): यह चिकनाई में घुलनशील है, यह छोटी आंत से बहुधा वसा के साथ-साथ यकृत में पहुँचकर वहीं संगृहीत हो जाता है। इसका अधिकांश यकृत में और कम भाग अस्थियों, मस्तिष्क और त्वचा में जमा होता है। आवश्यकता होने पर इन भण्डारों से यह विटामिन रक्त में मिलकर सम्पूर्ण शरीर की कमी की पूर्ति करता है। दीर्घकाल तक इस संचित हुईं विटामिन पर निर्भर करना सम्भव नहीं। – पित्त रस (Bile) की उपस्थिति में स्निग्ध Lipid शोषण शीघ्र हो जाता है।

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प्रश्न 12.
विटामिन ‘बी-1’ (थायमिन) की कमी से होने वाले रोग के बारे में बताइए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms): थायमिन की कमी से बेरी-बेरी (Beri-Beri) रोग हो जाता है। प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों का मुख्य भोजन चावल है, वे अधिकांश इस रोग से ग्रस्त रहते हैं। इसका कारण है जो चावल खाते हैं, वह मशीन से साफ किया हुआ होता है जिसके कारण यह चावल थायमिन रहित हो जाता है। इसके अतिरिक्त खाद्य तत्त्वों की कमी के कारण, गरीबी, अत्यधिक शारीरिक परिश्रम, संक्रमण जनित रोग, ज्वर, पाचन-सम्बन्धी विकार, गलत आदतें आदि कारणों से इस विटामिन का अभाव हो सकता है व रोग के लक्षण सामने आते हैं।

थायमिन की बहुत कमी होने पर बेरी-बेरी नामक रोग हो जाता है। यह रोग तीन प्रकार का होता है –
1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri)।
2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri)।
(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri)।
(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri)।
3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri)

1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri): फिलीपाइन द्वीप समूह तथा जापान में सर्वप्रथम बच्चों में यह रोग देखा गया । रोग के लक्षण तीसरे व चौथे सप्ताह में प्रकट होते थे। भूख की कमी, वमन, पेशाब कम मात्रा में होना, अतिसार और कब्ज भी हो सकता है। परिणामतः बच्चा निर्बल और बेचैन हो जाता है और पीला पड़ जाता है, शरीर पर मुख्यतः चेहरे, हाथों और पैरों पर सूजन आ जाती है, हृदय दुर्बल हो जाता है। शिशु रोता हुआ प्रतीत होता है परन्तु रोने की आवाज नहीं आती है, सांस लेने में कठिनाई होती है। माँसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं और शीघ्र ही ऐंठन से पीड़ित होकर मृत्यु हो सकती है।

2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri): इसके साधारणतः निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • पोलीन्यूराइटिसिस (Polyneuritisis)।
  • ओडीमा (Oedema)।
  • दिल की धड़कन बढ़ जाना (Disturbances of the heart)।

(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri): माँसपेशियों में सूजन आ जाती है। हाथों और पैरों में सनसनाहट, जलन तथा चैतन्य शून्यता आ जाती है, त्वचा में संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है, रोग के तीव्र रूप धारण कर लेने पर रोगी उठ-बैठ भी नहीं सकता और चल भी नहीं सकता। शुष्क बेरी-बेरी में ओडीमा की सम्भावना अधिक होती है।

(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri): सर्वप्रथम पैरों में सूजन आ जाती है। फिर समस्त शरीर में धीरे-धीरे सूजन आने लगती है। सूजन का कारण कोशिकाओं में जल-जमाव है। सूजा हुआ स्थान दबाने पर वहाँ गड्ढा-सा पड़ जाता है तथा थोड़ी देर पश्चात् वह फिर पहले की तरह हो जाता है । श्वास उथली व धड़कन की गति बढ़ जाती है, शरीर की वृद्धि रुक जाती है तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। बेचैनी, वमन या पेचिस भी हो सकती है। सहसा हृदय की गति बन्द हो जाने के कारण मृत्यु भी हो सकती है।

3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri): शराब का अधिक सेवन करने से भूख कम लगती है। विटामिन बी की हीनता हो जाती है जिससे बेरी-बेरी रोग हो जाता है। इस रोग के लक्षण प्रकट होने में साधारणत: दो से तीन महीने लग जाते हैं। प्रारम्भ में पाचन संस्थान संबंधी लक्षण प्रकट होते हैं-भूख न लगना, जी मिचलाना, वमन, पेट में अफारा, मलावरोध तथा दस्त आदि। बाद में रक्ताल्पता भी हो जाती है।

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प्रश्न 13.
विटामिन-‘बी1 (राइबोफ्लेविन) से होने वाले रोगों के बारे में बताइए।
उत्तर:
रोग के लक्षण (Effect of disease): प्रयोगों द्वारा ज्ञात हो गया है कि राइबोफ्लेविन के अभाव में व्यक्ति दुर्बल तथा वृद्ध जैसा दिखाई देने लगता है। यौवन का विकास अवरुद्ध हो जाता है। भोजन करने की इच्छा नष्ट हो जाती है तथा पाचन-शक्ति क्षीण हो जाती है, व्यक्ति अनेक चर्म और नेत्र रोगों का शिकार हो जाता है।

आँखों (Eyes) में-इसके अभाव में कॉर्निया (Cornea) के चारों ओर ललाई पैदा हो जाती है, आँखों में से पानी बहने लगता है, रोशनी अच्छी नहीं लगती। धीरे-धीरे ललाई बढ़ने लगती है और कॉर्निया पर छोटी-छोटी रक्त कोशिकाओं (Capillaries) का फैलाव होने लगता है। हमारे शरीर में कॉर्निया व आँख के लेंस ही ऐसे ऊतक हैं, जिन्हें अपने पोषण के लिए रक्त की आवश्यकता नहीं होती। अतः इनको पोषक तत्त्व अश्रु ग्रन्थि के स्राव ही से प्राप्त होते हैं।

अश्रुस्राव से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शरीर की बचाव शक्ति कम हो जाती है। स्वाभाविक तौर पर कॉर्निया को समुचित पोषण प्राप्त कराने के लिए उसके चारों ओर अतिरिक्त रक्त कोशिकाओं का जाल बिछने लगता है और इसी कारण आँख में ललाई, रेतीले कणों के गिरने का सा आभास आदि होने लगता है। पलकें खुरदरी रहती हैं और दृष्टि भी अस्पष्ट होने लगती है।

मुँह (Mouth)पर: होठों के मिलन स्थान पर कटाव होने लगता है। होठों पर सफेद दाग पड़ने लगते हैं, जैसे-कीलोसिस (Cheilosis)। जिह्वा की सतह पर दरारें पड़ जाती हैं और उसमें जलन व दर्द होता रहता है। जुबान का रंग बैंगनी लाल-सा हो जाता है। भोजन खाने पर जीभ में पीड़ा तथा जलन होती है। अन्त में जुबान से श्लैष्मिक झिल्ली हट जाती है। इस अवस्था को ज्योग्रेफिकल रंग कहते हैं।

त्वचा (Skin)पर: त्वचा स्वस्थ नहीं रहती। खुजली, काले दाग व एक प्रकार का त्वकशोध (Dermatitis) होता है जिसमें से पानी निकलता रहता है। ऐसे त्वकशोध ललाट, नाक के दोनों ओर तथा बगल आदि पर होते हैं जिनमें खुजली होने लगती है।

प्राप्ति साधन (Food Sources): कुछ राइबोफ्लेविन आँतों में भी निर्मित होता है। यह विटामिन बहुत से प्राणिज और वानस्पतिक भोज्य पदार्थों में पाया जाता है।

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विभिन्न भोज्य पदार्थों में उपस्थितिः अति उत्तम स्रोत: यकृत (Liver), अण्डे का पाउडर (Egg powder), शुष्क खमीर (Yeast), दूध का पाउडर। उत्तम स्त्रोत: दूध, मछली, अण्डा, साबुत अन्न, मांस, फलियाँ, हरी पत्तेदार सब्जी। सामान्य स्रोत: मिल का अन्न, मूलकन्द, अन्य शाकसब्बी। दूध इस विटामिन का अच्छा साधन है परन्तु मक्खन व घी में यह विटामिन नहीं होता यह पानी में घुलनशील है और छाछ में रह जाता है।

शरीर में अवशोषण (Absorption in the body): इसके अवशोषण के लिए अमाशय में पाया जाने वाला आमाशयिक अम्ल विद्यमान होना अनिवार्य है। इसका शोषण आँतों में होता है, विटामिन का अधिकांश हृदय यकृत में संगृहीत होता है, शेष भाग का संग्रह रक्त तथा तन्तु कोषों में होता है। राइबोफ्लेविन के संग्रह की प्रतिक्रिया भोजन में पैटोथोनिक अम्ल तथा विटामिन बी, की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इसकी संगृहीत मात्रा एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं हो सकती है। मूत्र के माध्यम से यह शरीर से निष्कासित हो जाती है।

प्रश्न 14.
विटामिन सी के कार्य लिखें।
उत्तर:
कार्य (Functions):

  1. कोलेगन (Collagen) का निर्माण-कोलेगन (Collagen) का निर्माण एवं उसे उचित अवस्था में रखने का कार्य विटामिन सी का ही है। कोलेगन शरीर में बनाने वाले कोषों को पारस्परिक सम्बद्ध करने का साधन है। यह लम्बी हड्डियों के सिरे तथा दाँत के भीतर सीमेंट वाला भाग बनाता है। साधारण कोषों के बन्धक तन्तुओं को कोलेगन की आवश्यकता है। यह जख्म को भरने का भी कार्य करता है। विटामिन सी के अभाव में जख्म देर से भरता है।
  2. अमीनो अम्ल (Amino Acid) जैसे फिनाइल एलानिन व टाइरोसीन (Alanine & Tyrosin) का ऑक्सीकरण करने में सहायक होता है।
  3. लोहे (Iron) व कैल्शियम के अवशोषण कराने में सहायक होता है।
  4. एड्रिनल व थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) का स्राव बढ़ाने और अन्य ग्रन्थियों के हारमोन्स (Hormones) पैदा कराने में सहायक होता है। .
  5. रक्त धमनियों की भीतरी भित्तियों पर कोलेस्टेरॉल के जमाव को रोकता है।
  6. त्वचा प्रतिरोपण (Skin Grafting) की सफलता में अत्यधिक सहायक होता है।
  7. नाक, गले व सांस नलिकाओं की कोशिकाओं को दृढ़ता प्रदान करता है जिससे बार-बार नजला, जुकाम, खाँसी आदि न हों।
  8. यह विटामिन अस्थियों के स्वरूप, विकास और निर्माण के लिए अत्यन्त आवश्यक है। स्कर्वी रोग में अस्थियों के अन्तिम सिरे प्रभावित होते हैं।
  9. इसके अभाव में पुराने भरे हुए घावों के पुनः खुल जाने की सम्भावना रहती है।
  10. दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। यह दाँतों के निर्माण एवं विकास में भी सहायता करता है।
  11. यह विटामिन मनुष्य को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
जल में घुलनशील विटामिनों की प्राप्ति, आवश्यकता एवं प्रभाव के परिणाम लिखें।
उत्तर:
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प्रश्न 16.
कैल्शियम के कार्य विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
कैल्शियम के कार्य (Functions of Calcium)
1. फॉस्फोरस के साथ हड्डियाँ बनाने, बढ़ाने और ठोस व दृढ़ करने में काम आता है।

2. दाँतों की रचना में भी यह ऐसी ही भूमिका निभाता है।

3. शरीर वृद्धि कराता है। हड्डियों में जब वृद्धि होती है तो स्वाभाविक है कि शरीर वृद्धि भी हो।

4. सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के साथ माँसपेशियों में संकुचन (Contraction) पैदा करता है, जिससे हमारे हाथ, पाँव, गर्दन, कमर व अन्य सभी अंग कार्य कर सकते हैं।

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5. आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव-निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है और एन्जाइम्स निर्माण में भी सहायक का कार्य करता है।

6. कोशिका झिल्ली की पारगम्यता पैदा करने में सहायक होता है।

7. रक्त का थक्के के रूप में जमना-रक्त में पायी जाने वाली सीरम में 100 मिली लीटर रक्त में 10 ग्राम कैल्शियम पाया जाता है। रक्त थक्के के रूप में परिवर्तित होने के लिए फाइब्रिन को फाइब्रीनोजन में बदलना पड़ता है।

इस परिवर्तन के लिए थ्रॉम्बिन एन्जाइम की आवश्यकता पडती है। यह थ्रॉम्बिन एन्जाइम प्रोथ्राम्बिन (Prothrombin) के रूप में निष्क्रिय दशा (Inactive Form) में रक्त में पाया जाता है। प्रोथ्राम्बिन को थ्रॉम्बिन में बदलने की क्रिया के लिए कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है।

8. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त हो तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स कहते हैं।

9. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है। इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाती हैं। इस दशा को आस्टोमलेश्यिा (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है।

10. दाँत सुडौलता रहित और कमजोर हो जाते हैं।

11. रक्त जमने में अधिक समय लगता है।

12. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

13. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 17.
कैल्शियम प्राप्ति के कौन-कौन-से साधन हैं ?
उत्तर:
कैल्शियम के साधन (Sources of Calcium): कैल्शियम की प्राप्ति निम्न वस्तुओं से होती है :

  • दूध और दूध से बनी चीजों में कैल्शियम पाया जाता है, क्योंकि दूध में कैल्शियम अकार्बनिक लवण के रूप में मिलता है।
  • यह अण्डे विशेषकर अण्डे की जर्दी वाले भाग में उपस्थित रहता है।
  • हरी पत्तीदार तरकारियों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। पालक में आक्जेलिक अम्ल की मात्रा . अधिक होने से शरीर में कैल्शियम का शोषण नहीं हो पाता है।
  • कुछ मछलियों में भी कैल्शियम पाया जाता है। .. 5. सूखे फलों, मेवों जैसे बादाम गिरी में भी यह लवण उपस्थित रहता है।
  • दालों में थोड़ी मात्रा में पाया जाता है लेकिन तेल निकालने वाले बीजों में यह काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • कुछ मात्रा में अनाजों द्वारा भी प्राप्त होता है। इनमें से रागी उत्तम साधन है।
  • अम्ल और क्षार की मात्रा को शरीर में एक-सा बनाए रखने का कार्य कैल्शियम करता है। शरीर में क्षार की मात्रा में वृद्धि हो जाने से अपच हो जाती है।

प्रश्न 18.
कैल्शियम की कमी से हानियाँ बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की कमी से हानि (Effect of Calcium deficiency):

1. कैल्शियम की कमी से शरीर छोटा रह जाता है।

2. हड्डियों का कैल्सीकरण अपूर्ण रहता है, जिसके फलस्वरूप वे निर्बल व लचकदार रहती हैं।

3. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त होत तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स (Rickets) कहते हैं।

4. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में कैल्शियम की माँग बढ़ जाती है। जब इसकी आवश्यकता की पूर्ति भोज्य पदार्थों द्वारा नहीं हो पाती तो इनकी पूर्ति के लिए गर्भवती तथा दूध पिलाती माँ की अस्थियों में से कैल्शियम का प्रत्याहरण होने लगता है। बच्चा अपने शरीर की वृद्धि के लिए कैल्शियम की आवश्यकता की पूर्ति माँ के शरीर में से कर लेता है।

इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाता । इसी दशा को आस्टोमलेशिया (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होती है।

5. दाँत सुडौलतारहित और कमजोर हो जाते हैं।

6. रक्त ‘जमने में अधिक समय लगता है।

7. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

8. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में से निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

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प्रश्न 19.
शरीर में लोहे के कार्य लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे के कार्य (Functions of iron in the body) :

  • यह रक्त में पाए जाने वाले तत्त्व हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। जब रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन समुचित मात्रा में होता है तब वह वांछित मात्रा में ऑक्सीजन अवशोषित कर कोशिकाओं में पहुँचाता है और कार्बनडाइऑक्साइड को शरीर के बार निकालता है
  • यह मांसपेशियों (Muscles) में पाए जाने वाले तत्त्व मायोग्लोबिन (Myoglobin) का आवश्यक तत्त्व है। मायोग्लोबिन में 3% लोहा रहता है।
  • लोहा प्रत्येक कोष में उपस्थित क्रोमेटीन पदार्थ का एक आवश्यक तत्त्व है।
  • शरीर में पाए जाने वाले कुछ एन्जाइम का लोहा एक आवश्यक भाग है।
  • लोहा तन्तुओं के ऑक्सीकरण (Oxidation) तथा कटौती (Reduction) की क्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में भाग लेता है।

प्रश्न 20.
आयोडीन (Iodine) के शरीर में क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
आयोडीन के कार्य (Functions of Iodine):

  • मनुष्यों के उचित शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए थाइरॉक्सिन (Thyroxin) अनिवार्य है। शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland) में ये हारमोन न निकलने पर शारीरिक और मानसिक विकास की गति में बाधा पहुँचती है।
  • शरीर के कोषों में होने वाली ऑक्सीकरण की क्रिया की दर को थाइरॉक्सिन प्रभावित करता है। थाइरॉक्सिन आवश्यकता से अधिक निकलने पर शक्ति की दर की गति बढ़ जाती है जिससे शरीर दुबला हो जाता है। इसके विपरीत जब थाइरॉक्सिन शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइराइड ग्रन्थि में से नहीं निकलता तो शक्ति उपापचयन की दर की गति कम हो जाती है। अतः शरीर मोटा हो जाता है।
  • मनुष्यों और जानवरों की सन्तानोत्पादन शक्ति के लिए आयोडीन आवश्यक है।
  • आयोडीन की कमी से बालों की वृद्धि नहीं हो पाती अथवा बाल उगते ही नहीं।
  • आयोडीन के अभाव से प्रौढ़ व्यक्ति भी प्रभावित हो जाते हैं। वे सुस्त हो जाते हैं। उनके हाथ-पाँव सूज जाते हैं।

प्रश्न 21.
आयोडीन की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
उत्तर:
रोग (Diseases):
1. गलगण्ड (Goiter): आयोडीन की आवश्यकता शरीर में स्थित थायराइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए होती है। इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन नामक हारमोन्स स्रावित होता है। शरीर में आयोडीन की कमी से यह हारमोन स्रावित होना बन्द हो जाता है और गले में घेघा निकल आता है, जिसे घेघा रोग कहते हैं। यह स्थिति अधिकतर किशोरावस्था या वयस्क महिलाओं में ही होती है। थायराइड ग्रन्थि का औसत वजन 25 ग्राम होता है, वह रोग की अवस्था में बढ़कर 200 से 500 ग्राम भी हो सकता है। घेघा बढ़ने पर यह दूर से ही दिख जाता है।

2. क्रोटिन (Cretinism): आयोडीन की कमी से बच्चों को क्रोटीन अथवा बौनापन (Cretinism) का रोग हो जाता है। बच्चों की वृद्धि, शारीरिक एवं मानसिक विकास रुक जाता है। त्वचा. मोटी और खुरदरी हो जाती है। चेहरे और समस्त शरीर में सूजन आ जाती है, त्वचा कार्य म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) गृह विज्ञान, वर्ग-119135 में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, चेहरे का भाव बिगड़ जाता है, जबान बड़ी हो जाती है, होंठ मोटे हो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी अवस्था में होठों का बन्द करना भी कठिन होता है।

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बच्चों की तरह बड़ों को मिक्सोडीमा (Myxoedema) का रोग हो जाता है। चेहरा भावहीन हो जाता है, हाथ-पाँव तथा चेहरे में सूजन आ जाती है। रोगी आलसी तथा सुस्त हो जाता है। आयोडीन की कमी से शरीर व दिमाग में और भी कई खराबियाँ पैदा हो सकती हैं जिनमें कुछ मामूली होती हैं तो कुछ खतरनाक जैसे, मानसिक विकृति, बहरा, गूंगापन, ठीक से खड़े न होना आदि।

प्रश्न 22.
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोग कौन से हैं?
उत्तर:
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोगपोषक तत्त्व | प्राप्ति स्रोत कमी से होने वाले रोग
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प्रश्न 23.
विभिन्न खाद्य वर्ग कौन-कौन से हैं वर्णन करें? [B.M. 2009 A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्ग में बाँटा गया है। जो निम्न प्रकार हैं-

  1. वर्ग-खाद्यान्न, अनाज-गेहूँ चावल, ज्वार बाजरा मक्का रागी एवं
  2. वर्ग-दाल एवं मेवा फलियाँ-सभी प्रकार की साबुत एवं घुली जाने तथा फलिया सूखी मेवा, मूंगफली, तिल बादाम इत्यादि।
  3. वर्ग-दूध और माँस-दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, खोया, दही। मांस, मछली, अंडा।
  4.  वर्ग-फल और सब्जियाँ-फल विभिन्न प्रकार के विटामिन ‘ए’ एवं विटामिन ‘सी’ भरपूर होते हैं। सब्जियों को तीन भाग में बाँटा जा सकता है।
    (a) हरी पत्तेदार सब्जियाँ,
    (b) गहरी पीली एवं लाल सब्जियाँ,
    (c) जड़ वाली सब्जियाँ
  5.  वर्ग-चीनी और वसा-चीनी, शक्कर, गुड़, वसा, घी, तेल, मक्खन।

वर्ग 1 – कार्बोज शक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन है।
वर्ग 2 – प्रोटीन प्राप्ति का वानस्पतिक साधन है। दालों में 40 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। मेवे से प्राप्त प्रोटीन उत्तम कोटि का होता है।
वर्ग 3 – पशु से पाये जाने वाले प्रोटीन के आधार पर, बनाया गया है। इस वर्ग से प्राप्त प्रोटीन उत्तम श्रेणी का है । अंडा से प्राप्त प्रोटीन को ‘ए’ ग्रेड का प्रोटीन माना गया है।।
वर्ग 4 – फल इनसे विटामिन खनिज लवण पाया जाता है। सब्जियाँ इनसे विटामिन ‘ए’ बी तथा सी से प्राप्त किया जा सकता है । जड़ वाली सब्जियाँ में कार्बन अधिक पाया जाता है। इनमें विटामिन एवं खनिज लवण कम होता है।
वर्ग 5 – इस वर्ग के खाद्य समूह से ऊर्जा प्राप्त होती है। गुड़ से लौह तत्त्व प्राप्त होता है।

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प्रश्न 24.
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting selection of food)-उत्तम पोषण का महत्त्वपूर्ण आधार विभिन्न भोज्य पदार्थों का चुनाव होता है। अतः आहार में ऐसे भोज्य पदार्थों का समावेश आवश्यक है जो परिवार की पौष्टिक आवश्यकताओं के साथ-साथ पूर्ण सन्तुष्टि भी प्रदान कर सकें। किन्हीं दो परिवारों का आहार समान नहीं होता। भिन्न प्रान्तों, देश-विदेश में यह अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है। विभिन्न परिवारों की आहार-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिन्न खाद्य पदार्थों का चयन इसका एक प्रमुख कारण है।

यह चयन कई कारकों पर आधारित है, जो निम्न हैं –
1. परिवार के आहार सम्बन्धी मूल्य (Family Food Values): किसी खाद्य पदार्थ को अपने आहार में सम्मिलित करना न करना परिवार के आहार-सम्बन्धी मूल्यों पर आधारित होता है। आहार-सम्बन्धी मूल्य भौगोलिक स्थिति या जलवायु, धार्मिक विश्वास, परम्परा, दूसरों की नकल आदि के कारण बनते हैं। उदाहरणार्थ किसी प्रान्त में अनाज यदि जलवायु उत्तम होने से काफी मात्रा में पैदा होता है तो वहाँ रहने वाले लोगों को शाकाहारी भोजन (अनाज) से लगाव हो जाता है।

इसमें भी यदि गेहूँ अधिक होता है तो रोटी खाने की आदत पड़ जाती है, जैसे पंजाबियों में । आदिवासी तथा बंगाली इलाकों में मांस, मछली, शराब आदि की ओर लोगों का अधिक झुकाव रहता है। दक्षिण में चावल अधिक खाया जाता है। प्रत्येक परिवार की जीवन-शैली (Life-style) भी भिन्न होती है जो आहार-सम्बन्धी मूल्यों को प्रभावित करती है। जैसे एक दिन में खाए जाने वाले आहारों की संख्या व समय । किसी परिवार में तीन समय भोजन पकता है तो किसी में दो समय । यह मूल्य किसी भी परिवार के शाकाहारी या मांसाहारी होने को भी प्रभावित करते हैं।

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2. खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Food Stuffs): बहुत से खाद्य पदार्थों, विशेषकर फल और सब्जियों की उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है। मौसमी चीजें सस्ती होती हैं और पौष्टिक भी। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी, साग, शलगम आदि अधिक मात्रा में मिलते हैं तो गर्मियों में घीया, तोरी, पेठा, अरबी, टिंडा, शिमला मिर्च, करेले आदि। मौसम के अतिरिक्त स्थानीय उपज का प्रभाव भी खाद्य पदार्थों के चयन पर पड़ता है।

यह पदार्थ सस्ते, स्वादयुक्त और जलवायु के अनुकूल होते हैं। उदाहरणार्थ तटवर्ती क्षेत्रों में मछली तथा अन्य समुद्री पदार्थ आसानी से और सस्ते मिल जाते हैं। इसलिए यह इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के आहार का मुख्य अंग बन जाते हैं। आज यातायात के साधनों में वृद्धि, उचित संरक्षण और संग्रह के तरीकों के कारण खाद्य पदार्थों की उपलब्धि हर जगह काफी बढ़ गई है।

3. क्रय शक्ति (Purchasing Power): भोज्य पदार्थों का चुनाव उन्हें खरीदने की सामर्थ्य पर काफी हद तक निर्भर करता है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति खाद्य पदार्थों चाहे वह मौसम के हों या बिना मौसम के, स्थानीय हों या अन्य प्रान्तों के, में से अपनी पसन्द के खाद्य पदार्थों का चयन कर सकता है, परन्तु निम्न आय वर्ग वाले व्यक्ति अपने भोजन में अधिक महँगे खाद्य पदार्थ सम्मिलित नहीं कर सकते, जैसे-दूध, मांस, फल आदि। इसलिए उन्हें ऐसे उपाय अपनाना आवश्यक है जिनसे कम कीमत में पौष्टिक आहार की प्राप्ति हो सके, जैसे-चीनी के स्थान पर गुड़, बादाम के स्थान पर मूंगफली का प्रयोग करना।

4. मिथ्या धारणाएँ: भोजन सम्बन्धी अन्ध-विश्वास कुछ ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जो गलत होती हैं । खाद्य पदार्थों का पोषक तत्त्वों के बारे में अज्ञानता के कारण विकास होता है। परम्परा से चले आए विश्वासों के कारण बातें अभी भी मान्य हैं। उदाहरणार्थ मछली खाने के बाद दूध पीने से चर्म रोग हो जाता है, चावल खाने से मोटापा बढ़ता है, सर्दी को भोजन से और बुखार को भूख से ठीक किया जा सकता है आदि। इस तरह की मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके कारण हम भोजन का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।

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5. संस्कृति (Culture): खाद्य पदार्थों का चयन धर्म, जाति व संस्कृति से प्रभावित होता है। जैसे पंजाबी के भोजन में मक्की की रोटी और साग, बंगाली के भोजन में चावल, मछली, दक्षिण भारतीय भोजन में सांभर, इडली आदि का अपना एक विशिष्ट स्थान है। – भोज्य पदार्थों की स्वीकृति में धर्म भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जैसे कुछ सम्प्रदायों में मांसाहारी खाद्य पदार्थ खाने की सख्त पाबंदी है। कुछ में लहसुन, प्याज खाना मना है। इस्लाम धर्म में लोग सूअर का मांस नहीं खाते, हिन्दू धर्म में गौ का मांस नहीं खाते । धार्मिक त्योहारों पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। शुभ अवसरों पर कुछ मीठा बनाया जाता है आदि।

6. समवयस्कों या मित्रों का प्रभाव (Peer Group): भोजन के विषय में मित्रों और जान-पहचान वाले लोगों की स्वीकृति बहुत महत्त्व रखती है, विशेष रूप से किशोरों के लिए। कई खाद्य पदार्थ व्यक्ति केवल इसलिए खाता है क्योंकि उसके साथी खाते हैं। जैसे आजकल किशारों में अनुपयोगी व्यंजन (Junk goods), जल्द तैयार किये जाने वाले व्यंजन (Fast Foods), जैसे-पिज्जा, नूडल्ज आदि खाये जाते हैं।

मित्रगणों के प्रभाव से व्यक्ति दूसरे प्रान्तों, दूसरे देशों के लोगों द्वारा खाये जाने वाले खाद्य पदार्थ भी अपने आहार में शामिल कर लेते हैं। उत्तर भारत में इडली, डोसा, सांभर का अधिक प्रचलन तथा मांसाहारी व्यक्ति का शाकाहारी और शाकाहारी व्यक्ति का मांसाहारी हो जाना इसके उदाहरण हैं।

6. संचार माध्यम (Media): टी.वी., रेडियो, फिल्म, समाचार-पत्र, गोष्ठियों आदि के माध्यम से पोषण-सम्बन्धी जानकारी आम जनता तक पहुँचाई जाती है। लोग, विशेष रूप से गृहिणियाँ इन्हें पढ़ती, सुनती या देखती हैं। उनके ऊपर इनका काफी प्रभाव देखने को मिलता है। वह अपने परिवार के पोषण स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करती हैं और उत्तम पोषक पदार्थों को अपने आहार में शामिल करती हैं।

इन संचार माध्यमों का कई बार विपरीत प्रभाव भी देखने को मिलता है। आकर्षित विज्ञापनों से प्रभावित होकर कई बार बच्चे, किशोर आदि अपने आहार में उन वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, जिनसे लाभ न होकर केवल धन का अपव्यय ही होता है। जैसे ठण्डे पेय पदार्थ (Soft Drinks), नूडल्स (Noodles), टॉफी और चॉकलेट आदि।

प्रश्न 25.
संतुलित आहार किसे कहते हैं ? भिन्न-भिन्न खाद्य वर्गों का भोजन में क्या योगदान है ?
उत्तर:
संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व-कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन और जल उचित मात्रा में प्राप्त हों । आहार मनुष्य की केवल भूख ही नहीं मिटता बल्कि उसे पूर्णतः स्वस्थ, नीरोग एवं पुष्ट बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त कुछ अधिक पोषक तत्त्व भी शरीर को मिलते हैं जो आपातकाल में प्रयोग किए जाते हैं। परिभाषा के अनुसार, संतुलित भोजन अधिक पोषक तत्त्व एकत्र कर देता है ताकि कभी-कभी असंतुलित भोजन का प्रभाव न पड़े।

खाद्य वर्ग (Food Groups): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने खाद्य पदार्थों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है :
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वर्ग 1. खाद्यान्न, अनाज और इसके उत्पाद (Cereals, grains and its products): अनाज कई प्रकार का होता है तथा गुणवत्ता और पसंद के अनुसार चुना जा सकता है। भारत में आमतौर से प्रयोगों में आने वाले अनाज गेहूँ, चावल, रागी, ज्वार और बाजरा हैं। खाद्यान्न में तीन हिस्से हैं, जैसे भूसा, बीज और भ्रूणपोष। अधिकतर भोजमों में खाद्यान्न की मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार यह भोजन में कैलोरी देने वाला मुख्य साधन है। – खाद्यान्नों में अलग-अलग प्रोटीन की मात्रा होती है।

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आमतौर पर प्रयोग में लिये जाने वाले खाद्यान्नों की प्रोटीन निम्नलिखित हैं –
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खाद्यान्नों के प्रोटीन शारीरिक क्रिया के लिए उत्तम नहीं हैं क्योंकि उनमें लाइसिन, मिथियोनिन, ट्रिप्टोफन और थ्रीओनिन जैसे अमीनो अम्ल बहुत कम होते हैं। खाद्यान्न की प्रोटीन मात्रा सुधर जाती है जब इनको प्रोटीनयुक्त खाद्यों के साथ मिलाया जाए, जैसे चावल और दाल, चावल और मांस या रोटी और दाल इत्यादि। खाद्यान्नों से काफी मात्रा में खनिज लवण मिल जाते हैं। हड्डियों और दांतों को स्वस्थ रखने के लिए ये कैल्शियम और फॉस्फोरस देते हैं। रागी तो कैल्शियम का भरपूर स्रोत है। हर 100 ग्राम वाले खाने के हिस्से में 344 मि० ग्राम कैल्शियम होता है।

बाजरा में लोहा होता है तथा अक्सर भोजन में लेने से लाभदायक सिद्ध हो सकता है। खाद्यान्न में विटामिन A और C की कमी होती है। पीली मक्की में कैरोटीन होती है। खाद्यान्नों को अंकुरित करने से उनमें विटामिन सी की मात्रा बढ़ जाती है। भूसी और बीज में बी-समूह के विटामिन काफी मात्रा में होते हैं। खाद्यान्नों को दलने, पालिश करने से बी-समूह के विटामिन नष्ट हो जाते हैं। सेला करते समय विटामिन अंदर के हिस्से में चला जाता है तथा दलने के समय अधिक विटामिन नष्ट नहीं होता। भूसी रूक्षांश देता है जो शरीर के उपापचय क्रिया में सहायक होता है।

कुछ कंदमूल हैं-आलू, शकरकंद, टपायका, जिमीकंद और कचालू। ये सभी स्टार्चयुक्त खाद्य आसानी से पच जाते हैं। ताप उसकी रासायनिक संरचना बदल देता है। स्वाद व आकार भी बदल जाता है। कंद और मूल कुछ समय के लिए खाद्यान्न का स्थान ले सकते हैं। भगवान राम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान कंद-मूल-फल खाकर ही जिये थे। यहां पर कन्द का अर्थ है टपायका, यह केरल में अधिक मात्रा में उगता है तथा इसमें स्टार्च और कैलोरी की मात्रा भरपूर होती है। आलू सबसे सामान्य कंद-मूल है तथा विश्व भर में लोग इसे पसन्द करते हैं। भोजन की अधिकांश कैलोरी इसी वर्ग में पायी जाती है।

वर्ग – 2. दालें और फलियाँ (Pulses and Legumes): दालों के प्रोटीन स्तर में तथा मात्रा में खाद्यान्न की प्रोटीन से बेहतर होती है। दालों में मिथिओनीन अमीनो अम्ल की कमी होती है। अरहर में तो ट्रिपटोफन भी कम होती है। जब दालों को खाद्यान्नों के साथ खाया जाता है तो इनका पौष्टिक स्तर बढ़ जाता है। लगभग 40 प्रतिशत दालों में थायमिन और फोलिक अम्ल जैसे विटामिन काफी मात्रा में पाए जाते हैं। चीनी लोग सोयाबीन की कई प्रकार की चटनी तथा पेस्ट प्रयोग करते हैं।

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सोयाबीन की थोड़ी मात्रा भी शारीरिक क्रिया के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो सकती है। दालों में विटामिन C की कमी होती है। अंकुरित करने से दालों में विटामिन C की मात्रा बढ़ जाती है तथा उनका आकार बदल जाता है, पाचन क्षमता सहज हो जाती है तथा लोहा और बी-समूह के विटामिन’ भी बढ़ जाते हैं। गिरियां और तेल के बीज वसा और प्रोटीन की मात्रा से भरपूर होते हैं । गिरियों में से वसा निकल जाने के बाद प्रोटीन अधिक हो जाते हैं। यह वर्ग मरम्मत के लिए प्रोटीन देते हैं। यह प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैं।

वर्ग – 3. दूध और मांस के उत्पाद (Milk and Meat Products): स्तनधारियों के दूध लैक्टोज, लैक्टलबूमिन और लैक्टोग्लोबिन की मात्रा से भरपूर होते हैं । दूध में सारे आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं। इसीलिए इसे पूर्ण आहार कहा जाता है। दूध में विटामिन सी और लोहा कम होता है । लैक्टोज कम मीठा तो होता है, किन्तु लैक्टिक अम्ल जीवाणु की वृद्धि में भी सहायक है। इस प्रकार रोगग्रस्त जीवाणु की वृद्धि को यह रोकता है। दूध से बी-समूह के विटामिन अच्छी मात्रा में मिल जाते हैं विशेषकर थायमिन, राइबोफ्लेविन और पायरीडोक्सिन। बी-समूह के विटामिन रोशनी में नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए यह अच्छी आदत है कि दूध को साफ, ठंडे, ढके हुए और अंधेरी जगह में रखा जाए। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्पूर्ण क्रीमयुक्त, मानक और टोन्ड दूध ले सकते हैं। उपभोग के लिए पाश्चुराइज्ड या मानकीकृत दूध लेना सुरक्षित है। दही-दूध को ‘जमने’ के लिए थोड़ी दही डालकर कमरे के ताप पर 4-12 घंटे तक रखने से दही बन जाता है। दही किसी भी प्रकार के दूध से बनाया जा सकता है। पाउडर से दूध बनाकर उसकी दही बना सकते हैं। दही को मथने से मक्खन बनाया जा सकता है। मक्खन दूध की अपेक्षा आसानी से पच जाता है। पनीर-दूध को दही, नींबू जूस, सिरका या सिट्रिक अम्ल से क्रिया करके पनीर प्राप्त होता है।

पनीर अवक्षेपित प्रोटीन है तथा इसमें वसा और लैक्टोज लगभग बिल्कुल नहीं होता। पनीर को पचाने की आवश्यकता नहीं होती तथा वह आसानी से पच जाता है। पनीर निकलने के बाद बचे हुए तरल को दही का पानी या छाछ (Whey) कहते हैं। छाछ में खनिज लवणों व दूध की वसा की भरपूर मात्रा होती है। इससे करी या ग्रेवी बनाना अच्छा तरीका है। प्रोसेस्ड पनीर वह पनीर है जो सन्तुलित अवस्था में बनाया जाता है। प्रोसेस्ड पनीर में पनीर से अधिक मात्रा में वसा होती है। इसलिए मोटे व्यक्तियों को इससे परहेज करना चाहिए। दूध और दूध के उत्पाद भोजन में कैल्शियम और विटामिन A का योगदान देते हैं।

मांस. उत्पाद (Meat Products): अंडे, मांस और मछली में उत्तम प्रकार के प्रोटीन होते हैं। हर प्रकार के मांस में रेशेदार जुड़ने वाले तन्तु होते हैं जो कोलेगन से भरपूर होते हैं। मीट को पकाने पर कोलेगन जैलेटिन में बदल जाता है। माँस में लोहा और फॉस्फोरस भी काफी मात्रा में होते हैं। अंगों के माँस (यकृत, हृदय, गुर्दे) विटामिन A की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। अंडों का प्रोटीन आसानी से शरीर में एकत्र हो जाता है।

सफेद माँस यानि कि मछली और मुर्गा को लाल माँस से बेहतर समझता जाता है और रोगियों तथा हृदय रोगियों के लिए उचित होता है। सामान्य माँस पदार्थ, हैम (ham), सौसेजिस (Sausages), सलामी (salami) और मछली होते हैं। इस वर्ग से उत्तम प्रोटीन मिलता है जो कि शारीरिक विकास और तन्तुओं की मरम्मत की योग्यता रखती है। अंडे व अंगों का मीट लोहे का भरपूर स्रोत है, इसलिए यह रक्त का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यह ऑक्सीकरण क्रियाओं के लिए उत्तरदायी है।

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वर्ग 4. फल और सब्जियाँ (Fruits and Vegetables): फलों का भोजन में एक विशेष स्थान है। भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वाद व सुगन्धों वाले फल उपलब्ध हैं। पके आम, पपीता और अंजीर विशेषकर कैरोटीन से भरपूर फल हैं। संतरे तथा नीबू प्रजाति के फलों में विटामिन C की मात्रा भरूपर होती है। ताजे फलों का रस स्वस्थ मसूड़ों, दांतों के लिए है। इसके अतिरिक्त घाव को शीघ्रता से भरना तथा साफ चेहरे के लिए भी फलों का रस आवश्यक है।

केला कार्बोज का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अफ्रीका में बच्चे अधिक केले खाते हैं और इसलिए क्वाशियोरकर रोग से ग्रस्त होते हैं। सेबों व आलू बुखारों में पैक्टिन की भरपूर मात्रा होती है जो जैम और जैली बनाने के लिए आवश्यक है। फलों से फल-शर्करा औरे लैवरोलोज मिलता है। वह कुछ रूक्षांश भी देते हैं जो शारीरिक क्रिया संतुलित करता है। फलों की तरह सब्जियों में भी कई किस्में होती हैं।

सब्जियाँ आकार में, स्वाद में, सुगंध में और पोषक तत्त्वों की मात्रा में भिन्न-भिन्न होती हैं। वह मौसम के कारण भी भिन्न होती हैं। पौधों के विभिन्न हिस्से सब्जियों की तरह खाए जाते हैं। पत्ते-पालक, चौलाई, पुदीना, धनिया, मेथी और सलाद इत्यादि । कंद और मूल-प्याज, शलजम, मूली और आलू। फल-बैंगन, भिंडी, खीरा, चिचिण्डा और अन्य कदू वर्गीय पदार्थ। फूल-फूल गोभी, कचनार और केले के फूल । हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम और लोहे के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

इनकी पर्याप्त मात्रा इन सब्जियों से प्राप्त हो जाती है। अधिकतर पत्तेदार सब्जियों में राइबोफ्लेविन भरपूर मात्रा में होती है। इनके सेवन से मुखपाक अर्थात् होठों के फटने (Cracking of lipsat-the cover of mouth) की चिन्ता नहीं रहती। अधिक रेशों की मात्रा होने के कारण हरी पत्तेदार सब्जियां सारक का काम करती हैं। इनमें ऑक्जीलेट की मात्रा बहुत अधिक होती है जो कि लोहा, कैल्शियम, तांबा व मैग्नीशियम के अवशोषण में बाधा डालते हैं। जड़ वाली सब्जियों में कार्बोज व कैरोटीन की भरपूर मात्रा होती है। सब्जियों में विटामिन C भी भरपूर होता है। विटामिन A और C दालों में कम होता है। दालों व अनाज के साथ सब्जियों का खाना भोजन की पौष्टिकता बढ़ा देता है। सब्जियां भिन्नता देती हैं तथा भोजन को आकर्षक बनाती हैं।

वर्ग 5. वसा और शर्करा (Fats and Sugars): वसा, मक्खन और घी की तरह भोजन को स्वादिष्ट तो बनाती ही है, वसा में घुलनशीन विटामिन भी हैं तथा यह कैलोरी भी देती है। कुछ लोग पशुजन्य वसा को भी पकाने का माध्यम बनाते हैं। तेल व वसा महंगे होते हैं। इसी कारण गरीब लोग 20 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा इनसे नहीं लेते। भोजन में वसा अमीर लोग अधिक खाते हैं जिससे अक्सर मोटापा तथा हृदय रोग पनपते हैं। अधिकतर तेलों में विटामिन नहीं होते।

लाल खजूर का तेल अलग है तथा उसमें विटामिन A (कैरोटीन) होता है। आर्थिक कारणों से तेल का भोजन में अधिक प्रयोग होता जा रहा है। तेलों में रक्त के कालेस्ट्रॉल स्तर को कम करने की क्षमता भी होती है। शर्करा-सुक्रोज साफ, सफेद पदार्थ है जिसमें न कोई अशुद्धता है और न ही कोई पोषक तत्त्व। अधिक शर्करा के प्रयोग से दाँतों के रोग में वृद्धि होती है। गुड़ में प्राकृतिक सुगंध होती है तथा कुछ मात्रा में खनिज लवण और विटामिन भी होते हैं तथा अधिक कैलोरी देती है। मिठाइयाँ अपने स्वाद के लिए मशहूर हैं, इसीलिए भोजन के बाद मीठा खाने की महत्ता है।
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यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रतिदिन भोजन में इन सभी खाद्य वर्गों से पदार्थ मिलाए । ऐसे भोजन में सभी पोषक तत्त्व अपना संतुलन बनाए रखते हैं। ऐसे भोजन को संतुलित आहार कहते हैं।

प्रश्न 26.
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting nutritional requirement) :
1. आयु (Age): बच्चों को उनके शरीर-भार को देखते हुए प्रौढ़ों की अपेक्षा अधिक मात्रा में भोज्य तत्त्वों की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका शरीर वृद्धि की अवस्था में होता है। वृद्धावस्था में आहार की मात्रा और पोषक तत्वों की आवश्यकता कम हो जाती है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ शिथिल पड़ जाती हैं।

2. लिंग (Sex): सामान्यतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा कम आहार की आवश्यकता होती है क्योंकि वह पुरुषों की अपेक्षा लम्बाई व भार में कम होती हैं तथा शारीरिक श्रम भी कम करती हैं।

3.  शरीर का आकार और बनावट (Size and Composition of the Body): लम्बे व भारी मनुष्य के शरीर में मांसपेशियाँ और ऊतक अधिक होते हैं, अतः उनकी भोजन की आवश्यकता ठिगने व दुबले-पतले मनुष्य की अपेक्षा अधिक होती है।

4. जलवायु (Climate): ठण्डे प्रदेशों में आहार की आवश्यकता गर्म प्रदेशों की अपेक्षा अधिक होती है क्योंकि शरीर के ताप को बनाए रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है। यही कारण है कि हम सर्दियों में अधिक खाते हैं।

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5. व्यवसाय (Occupation): अधिक शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों को कम श्रम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत मानसिक श्रम अधिक रखने वाले व्यक्तियों को अधिक प्रोटीन और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

6. विशेष शारीरिक अवस्थाएँ (Specific Body Conditions): कुछ विशेष शारीरिक अवस्थाएँ पोषक तत्त्वों की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में पोषक तत्त्वों की माँग काफी बढ़ जाती है।

ऑपरेशन के बाद की अवस्था व जल जाने की अवस्था में शरीर-निर्माणक तत्त्वें विशेष रूप से प्रोटीन की आवश्यकता अधिक रहती है। सन्तुलित आहार सर्वोत्तम आहार है परन्तु इसका तात्पर्य महँगा आहार नहीं है क्योंकि खाद्य पदार्थों की कीमत उनके उपलब्ध होने पर और मौसम पर निर्भर करती है न कि पौष्टिकता पर। अतः कम धन से भी सन्तुलित आहार की प्राप्ति की जा सकती है।

इसके लिए आवश्यकता है समान पोषक मूल्यों के सस्ते साधनों को जानने की। जैसे बादाम की जगह मूंगफली का प्रयोग करना। दूध की जगह दालों से प्रोटीन प्राप्त करना। महँगे भोजन भी असन्तुलित हो सकते हैं, जैसे बेमौसमी खाद्य पदार्थ। सन्तुलित आहार ग्रहण करने पर शरीर द्वारा उसका उपयोग हो सके इसके लिए यह ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है कि आहार पाचनशील, स्वादयुक्त, ताजा और दूषण रहित हो।

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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 11 भोजन के कार्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science भोजन के कार्य Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग कैलोरी उत्पन्न करता है –
(क) 4 कैलोरी
(ख) 2 कैलोरी
(ग) 6 कैलोरी।
(घ) 8 कैलोरी
उत्तर:
(क) 4 कैलोरी

प्रश्न 2.
विटामिन ‘C’ का सबसे बढ़िया स्रोत है –
(क) आँवला
(ख) संतरा
(ग) नींबू
(घ) दूध
उत्तर:
(क) आँवला

प्रश्न 3.
मानव शरीर में अमीनो अम्ल होते हैं –
(क) 22
(ख) 23
(ग) 25
(घ) 26
उत्तर:
(क) 22

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प्रश्न 4.
अंडे की सफेदी में मिलता है –
(क) अल्बुमिन
(ख) ग्लोबिन
(ग) फाइबरिन
(घ) जेलिटिन
उत्तर:
(क) अल्बुमिन

प्रश्न 5.
चांवल में उपस्थित प्रोटीन –
(क) ओराजेनिन है
(ख) होरडेनिन है
(ग) ग्लूटेनिन
(घ) ग्लायडिन
उत्तर:
(क) ओराजेनिन है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शरीर वर्धक तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन, खनिज लवण व जल शरीर की वृद्धि एवं मरम्मत हेतु आवश्यक हैं इसलिए इन्हें शरीरवर्धक तत्त्व भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
हमारे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर:
बाहरी व आन्तरिक क्रियाओं को सम्पादित करने हेतु शरीर को ऊर्जा चाहिए।

प्रश्न 3.
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में कितनी ऊर्जा देती हैं ?
उत्तर:
1 ग्राम कार्बोज, वसा व प्रोटीन हमारे शरीर में क्रमशः 4 कैलोरी, 9 कैलोरी व 4 . कैलोरी ऊर्जा देते हैं।

प्रश्न 4.
भोजन के स्वरूप का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
1. शारीरिक कार्य।
2. मनोवैज्ञानिक कार्य।
3. सामाजिक व सांस्कृतिक कार्य।

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प्रश्न 5.
शरीर में ऊर्जा की आवश्यकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यक्ति की जीवन क्रियाएँ, जैसे सांस लेना, परिसंचरण, पाचन और चूसना, सोखना के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
शारीरिक कार्यों के आधार पर चार विभिन्न तरह के भोजन कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • ऊर्जा प्रदान करने के लिए भोजन
  • शरीर के निर्माण के लिए भोजन
  • संरक्षात्मक भोजन
  •  नियंत्रित भोजन।

प्रश्न 7.
मनोवैज्ञानिक कार्य का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
भोजन व्यक्ति की भावात्मक आवश्यकता को पूरा करता है। जब कोई प्रसन्न होता है या मित्रों की संगति में होता है तो वह अधिक खाना खाता है।

प्रश्न 8.
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण में किन तत्त्वों का विशेष महत्त्व है ?
उत्तर:
शरीर की सुरक्षा तथा नियंत्रण हेतु विटामिन, खनिज लवण, जल और प्रोटीन का विशेष महत्त्व है। इसके अतिरिक्त शरीर के नियंत्रण हेतु फोक का अपना विशेष स्थान है।

प्रश्न 9.
हमें अपने आहार में अधिकांश वसायुक्त पदार्थों को क्यों नहीं सम्मिलित करना चाहिए?
उत्तर:
वसायुक्त पदार्थ सबसे अधिक ऊर्जा देते हैं। 1 ग्राम वसा 9 कैलोरी यानि कार्बोज से सवा दो गुणा अधिक कैलोरी देता है। यदि हम कैलोरी प्राप्ति हेतु शरीर की आवश्यकता वसा द्वारा पूरी कर लें तो अन्य तत्त्वों का अभाव रह जाएगा और हम रोगग्रस्त हो जाएंगे।

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प्रश्न 10.
भोजन में दीर्घजीवी और नैतिकता का परस्पर संबंध लिखें।
उत्तर:
अच्छा भोजन ज्यादा जीवन जीने के अवसर बढ़ा देता है। गन्दा भोजन बीमारियाँ फैलाता है। अस्वस्थ जीवन मृत्यु का कारण बन सकता है।

प्रश्न 11.
भोजन को पौष्टिक तत्त्वों के कार्यों के आधार पर किस प्रकार विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर:
पौष्टिक तत्त्व – कार्य
1. प्रोटीन – शारीरिक वृद्धि
2. कार्बोज, वसा – ऊर्जा देना
3. विटामिन – रोगों से बचाव
4. खनिज लवण – शारीरिक कार्यों पर नियंत्रण

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन व हमारी भावनाओं (Food & Emotions) में आपसी क्या सम्बन्ध है ?
अथवा
भोजन हमें मानसिक संतोष (Mental Satisfaction) कैसे प्रदान करता है ?
उत्तर:
भोजन न केवल शारीरिक व सामाजिक कार्य ही अदा करता है परन्तु यह मनोवैज्ञानिक कार्य करने में भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि हमारे लिए कोई भी व्यक्ति मनपसन्द वस्तु बना कर परोसता है तो हमें प्रसन्नता होती है। भोजन के माध्यम से वह अपने प्रेमभाव और मैत्री को व्यक्त करता है। अतः भोजन हमें मानसिक संतोष भी प्रदान करता है। जैसे एक बच्चा माँ की गोद में दूध पीकर सुरक्षित महसूस करता है।

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प्रश्न 2.
भोजन व त्यौहार (Food & festivals) का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
प्रत्येक त्यौहार में भोजन का अपना विशिष्ट महत्त्व है क्योंकि भोजन उत्सवों और त्यौहारों का अभिन्न अंग है। प्रत्येक त्यौहार में विशेष पकवान बना कर ही त्यौहार मनाने की प्रथा है। इन पकवानों का आदान-प्रदान कर सभी परिवार अपनी मैत्री की भावनाएँ व्यक्त करते हैं। रीति-रिवाजों को इतना नहीं याद करते जितना उन त्यौहारों पर बने पकवानों को। होली के त्यौहार पर गुझिया, संक्रान्ति व लोहड़ी पर तिल व गुड़ के व्यञ्जन, बैसाखी पर पीले केसरिया चावल, ईद पर सेवइयों की खीर आदि बनाने का प्रचलन है।

प्रश्न 3.
भोजन व कोशिकाओं का पुनर्निर्माण (Food and cell formation) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शरीर की वृद्धि व टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत हेतु भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन में उपस्थित प्रोटीन, खनिज लवण व जल यही कार्य करते हैं। व्यक्ति शैशवकाल से प्रौढ़ावस्था तक वृद्धि और विकास की दिशा में अग्रसर होता है। शरीर का भार व ऊँचाई में वृद्धि इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रश्न 4.
भोजन व कार्यक्षमता (Food & work efficiency) का परस्पर क्या . सम्बन्ध है ?
उत्तर:
भोजन व कार्यक्षमता-अच्छा भोजन अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और अच्छे स्वास्थ्य का एक प्रमुख लक्षण है, शरीर की उत्तम क्रियाशीलता या शरीर की कार्यक्षमता। अत: भोजन पर शरीर की कार्यक्षमता निर्भर करती है। सुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता कुपोषित व्यक्ति की कार्यक्षमता से निश्चित ही अधिक होती है। अमेरिका में एक अध्ययन में यह देखा गया कि कारखाने के कर्मचारी जो उत्तम नाश्ता करके आते थे, अधिक काम कर पाते थे। उन्हें थकावट भी कम और देर से होती थी।

प्रश्न 5.
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
कार्यों के आधार पर भोजन का वर्गीकरण –
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प्रश्न 6.
पोषण और मृत्यु-दर से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
पोषण और मृत्यु दर (Nutrition and mortality): कुपोषण के कारण आवश्यक पोषक तत्त्व आवश्यक मात्रा व अनुपात में प्राप्त नहीं होता है। शरीर क्षीण पड़ जाता है और अंततः मृत्यु हो जाती है। दिशाभारती 2 नवम्बर, 1975 के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग दस लाख बच्चों की पोषक आहार के अभाव में मृत्यु हो जाती है।

पौष्टिक आहार संबंधी हैदराबाद के राष्ट्रीय संस्थान द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार निम्न आय वर्ग वाले भारतीयों के 65 प्रतिशत बच्चे साधारणतः और 18 प्रतिशत बच्चे गम्भीर रूप से पौष्टिक आहार के अभाव में पीड़ित रहते हैं और कालान्तर में सूख-सूख कर मर जाते हैं। हरियाणा जैसे खुशहाल प्रदेश में भारतीय चिकित्सा शोध परिषद और राज्य सरकार द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 50 प्रतिशत बच्चों को प्रोटीन और पर्याप्त पौष्टिक आहार उपलब्ध नहीं होते।

डॉक्टर हिंगोरानी के अनुसार, कुपोषित शरीर रोगाणुओं से जूझने के लिए निर्बल प्रतिपिण्ड बनाता है जिसके कारण शरीर रोगी हो जाता है तथा अंततः मृत्यु हो जाती है । मृत्यु दर विकसित देशों में कम होने का प्रमुख कारण उनका उच्च पोषक स्तर है। भारत जैसे विकासशील देश में भी अब कुपोषण के कारण होने वाली मृत्यु-दर में भारी कमी हुई है।

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प्रश्न 7.
पोषण और मानसिक स्तर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पोषण और मानसिक स्तर (Nutrition and Psychological status)
मानसिक स्थिरचित्तता (Static Mental Tension)-उन सैनिकों में जिनको प्रयोग के लिए 6 माह तक कम खाना दिया गया था, मानसिक दृष्टि से भी बहुत परिवर्तन पाया गया। वे अधीर, चिड़चिड़े, उदास व हठी थे तथा संकल्प-शक्ति को खो बैठते थे। जब प्रतिबंध हटा तो उनका व्यवहार सामान्य हो गया।

मानसिक संलग्नता (Mental Imbalance): कुपोषण के कारण पाया गया कि बालक अपनी पढ़ाई में पूर्णरूपेण ध्यान नहीं दे रहे थे। मानसिक संलग्नता की कमी के कारण वे पाठ की गहराई तक पहुँचकर उसके गूढ अर्थ को नहीं समझ पा रहे थे। अधिक समय तक एकाग्रचित्तता भी उनके लिए संभव नहीं थी क्योंकि वे मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते थे। अतः संक्षेप में संतुलित भोजन के अभाव में मानसिक स्तर पर असाधारण प्रभाव पाया गया जिससे कि कार्यक्षमता और कुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 8.
पोषण और शारीरिक स्तर का क्या संबंध है?
उत्तर:
पोषण और शारीरिक स्तर (Nutrition and Physical Status): डील-डौल-जापानी प्रायः छोटे कद के होते हैं। यह निश्चित रूप से जानने के लिए कि क्या उनका छोटा डील-डौल उनके भोजन का प्रभाव है, कैलिफोर्निया शहर में 6 से 9 वर्ष के उन जापानी बालकों का जो अमेरीका में जन्मे और वहीं पले, अध्ययन किया गया और परिणामों की तुलना उसी आयु के जापान में जन्मे तथा वहीं रहने वाले बालकों से की गयी तो कैलीफोर्निया के बालकों का कद और शारीरिक भार अपेक्षाकृत अधिक पाया गया। यह अंतर दोनों वर्गों के भोजन की पौष्टिकता में अन्तर के कारण सिद्ध हुआ।

हड्डियाँ (Bones): जर्मन के एक स्कूल में विशेष आहार दिया गया। अतः आहार को विटामिन डी युक्त बनाया गया जिससे इन बालकों का विकास तीव्र हुआ ।
त्वचा (Skin): चर्बी की तह जो बाह्य त्वचा के नीचे होती है, उसकी मोटाई से शारीरिक स्तर का ज्ञान भली-भाँति हो सकता है।
माँसपेशियाँ (Muscles): मांसपेशियों का विकास एवं उनके ठोसपन की स्थिति से भी यह पता लगता है कि पोषण स्तर कैसा है।

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प्रश्न 9.
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
शरीर निर्माण के मुख्य खाद्य पदार्थ निम्नलिखित हैं :
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन के कार्य विस्तारपूर्वक समझाइए।
भोजन के कार्य (Functions of Food): शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कार्यों को सम्पन्न करने हेतु भोजन हमारे दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग है।
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I. शारीरिक कार्य (Physical functions): भोजन के शारीरिक कार्यों को मुख्य चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –
(क) ऊर्जा प्रदान करना
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना
(ग) रोगों से बचाना
(घ) शारीरिक कार्यों का सुसंचालन करना।
भोजन में उपस्थित छः पोषक तत्त्व कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण तथा जल इन कार्यों को सम्पन्न करते हैं। उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए मनुष्य के आहार में इन पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है।

(क) ऊर्जा प्रदान करना (Providing energy): जीवित प्राणियों के आन्तरिक व बाह्य शारीरिक कार्यों के संचालन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो उन्हें भोजन द्वारा प्राप्त होती है। अतः भोजन का एक मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा देना है। विभिन्न बाह्य कार्यों जैसे खाना पकाने, खेलने, पढ़ने तथा अन्य दैनिक कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा भोजन से ही प्राप्त होती है।

विभिन्न आन्तरिक कार्यों, जैसे-श्वसन, भोजन का पाचन, रक्त का परिसंचरण आदि के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। शरीर के ये आन्तरिक कार्य निरन्तर चलते रहते हैं तथा हमारी इच्छा व अनिच्छा का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः जब हम सो रहे होते हैं या आराम कर रहे होते हैं तब भी हमें इन अनैच्छिक रूप से कार्यरत अंगों, जैसे हृदय, फेफड़े आंत, गुर्दे आदि के आंतरिक कार्यों के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

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1. कार्बोज (Carbohydrates): जैसे अनाज (गेहूँ, चावल, बाजरा, आदि), शक्कर, ग्लूकोज, शहद, गुड़, आलू आदि। एक ग्राम कार्बोज शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

2. प्रोटीन (Proteins): जैसे दालें, दूध और दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली आदि। प्रोटीन निम्न स्थितियों में शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है

  • जब आहार में कार्बोज की कमी हो।
  • जब आहार में प्रोटीन शारीरिक आवश्यकताओं से अधिक हो।।
  • जब भोजन की प्रोटीन घटिया किस्म की हो और शारीरिक प्रोटीन बनाने में असमर्थ हो। एक ग्राम प्रोटीन शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 4 कैलोरी उत्पन्न करता है।

3. वसा (Fats): जैसे घी, तेल, मक्खन, क्रीम आदि। यह कार्बोज से सवा दो (214) गुना अधिक ऊर्जा देता है तथा एक ग्राम वसा शरीर में रासायनिक रूप से जलने पर लगभग 9 कैलोरी उत्पन्न करता है।
(ख) तन्तुओं का निर्माण करना (Building tissues): मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन काल अर्थात् जन्म से लेकर मृत्यु तक तन्तुओं का निर्माण होता रहता है। इन नए तन्तुओं का निर्माण निम्नलिखित कार्यों के लिए होता है –

  • शारीरिक वृद्धि।
  • टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत।

एक छोटा-सा शिशु आयु बढ़ने पर पूर्ण प्रौढ़ बन जाता है तथा उसके शारीरिक नाप व भार में परिवर्तन नए तन्तुओं के निर्माण के कारण होता है। मनुष्य के शारीरिक अंग हर समय कार्य करते रहते हैं जिसके कारण शरीर के तन्तु टूटते-फूटते रहते हैं। इन पुराने टूटे-फूटे तन्तुओं के पुनः निर्माण अथवा मरम्मत का कार्य भी भोजन करता है।

हमारे शरीर में तन्तुओं के निर्माण का कार्य भोजन में उपस्थित निम्न पोषक तत्त्व करते हैं:
1. प्रोटीन (Proteins): जैसे दूध, दूध से बने पदार्थ, अण्डा, मांस, मछली, दालें, सोयाबीन आदि का प्रोटीन शरीर के निर्माण में सर्वोच्च स्थान पर आता है।
2. खनिज लवण (Minerals): नए तन्तुओं के निर्माण कार्य में कुछ खनिज लवणों का विशेष स्थान है। यह प्रमुख खनिज लवण हैं कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा आदि, जो दांतों, अस्थियों तथा रक्त के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। ये खनिज लवण हमें दूध से बने पदार्थ मांस, मछली, कलेजी, अण्डा, दालें, अनाज आदि से प्राप्त होते हैं।

(ग) रोगों से बचाव (Protection against diseases): भोजन के विभिन्न कार्यों में एक कार्य शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करना है। हम जानते हैं कि एक कमजोर व्यक्ति को एक स्वस्थ व्यक्ति की अपेक्षा बीमारियाँ जल्दी घेरती हैं। हमारे शरीर को रोगों से बचाव क्षमता निम्न पोषक तत्त्वों द्वारा प्राप्त होती है।

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1. विटामिन (Vitamins): इनकी आवश्यकता हमें बहुत ही न्यून मात्राओं में होती है। यह कई प्रकार के होते हैं तथा प्रायः सभी भोज्य पदार्थों द्वारा प्राप्त होते हैं, परन्तु प्रत्येक भोज्य पदार्थों में कोई एक विटामिन अधिक मात्रा में होता है तो कोई दूसरा विटामिन कम मात्रा में होता है। जैसे विटामिन-ए दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियों, गहरी पीली सब्जियों, अण्डा, मांस आदि में अधिक होता है परन्तु दालों में यह कम मात्रा में पाया जाता है। इसी प्रकार विटामिन-सी आंवला, सन्तरा, नींबू आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है और अनाज, दालों, दूध आदि में इसकी मात्रा कम होती है।

2. खनिज लवण (Minerals): विटामिनों की भाँति खनिज लवणों की आवश्यकता भी कम मात्रा में होती है परन्तु रोगों से बचाव क्षमता के लिए यह शरीर हेतु अति आवश्यक हैं। खजिन लवण कई प्रकार के होते हैं तथा यह भी प्रायः सभी भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं। दूध, फल तथा सब्जियों में सभी प्रकार के खनिज लवण अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

विभिन्न अंगों के सुसंचालन के लिए खनिज लवणों तथा विटामिनों की आवश्यकता होती है क्योंकि शरीर की विभिन्न रासायनिक प्रतिक्रियाएँ इनके द्वारा नियन्त्रित होती हैं। इसी कारण इन पोषक तत्त्वों के नियमित प्रयोग से शरीर स्वस्थ बनता है तथा बीमारियों से मुक्त रखता है। यही कारण है कि विटामिन और खनिज लवण संरक्षक पोषक तत्त्वों के नाम से जाने जाते हैं।

(घ) शरीर को सुचारू रूप से चलाना (Monitoring the body): जिस प्रकार शरीर को विभिन्न पोषक तत्त्वों जैसे कार्बोज, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज लवणों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए जल और फोक की भी आवश्यकता होती है। शारीरिक क्रियाओं के नियमन के लिए जल अति आवश्यक है तथा मल निर्माण एवं निष्कासन के लिए आहार में फोक का होना आवश्यक है। फोक हमें हरी पत्तेदारसब्जियों, दालों तथा अनाजों के छिलकों से प्राप्त होता है।

II. मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological functions): शारीरिक कार्यों को पूर्ण करने के साथ-साथ भोजन हमें मानसिक सन्तोष और सुरक्षा भी प्रदान करता है। बच्चा सदैव अपनी मां की गोद में दूध पीकर ही अधिक सुरक्षित और प्रसद अनुभव करता है। बाजार में नाना प्रकार के पकवान खाकर भी मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती जो घर के सात्विक व सादे भोजन के खाने से प्राप्त हो जाती है। भूख की सन्तुष्टि करके भोजन मनुष्य को मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो पौष्टिक तत्त्वों की गोलियां खाने से कदापि प्राप्त नहीं हो सकती । मनुष्य का खान-पान उसकी संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं भोजन संबंधी आदतों पर निर्भर करता है।

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जो मनुष्य चावल खाना अधिक पसन्द करता है उसे यदि रोटी दी जाए तो उसे मानसिक सन्तुष्टि नहीं मिलती है और वह चावल प्राप्त करने की कोशिश करता है जिसे वह वर्षों से खाता आया है। मनुष्य को वही भोजन अधिक मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करता है जो वह प्रतिदिन खाता है और यही कारण है कि मनुष्य किसी भी प्रकार के परिवर्तन या नए भोजन को अपनाने में संकोच महसूस करता है।

III. सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य (Socio-cultural functions): भोजन के सामाजिक कार्य का महत्त्व शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कार्यों से किसी भी प्रकार कम नहीं है। भोजन व्यक्तियों में आपसी संबंध बढ़ाकर उनकी मैत्री सुदृढ़ करने में सहायक होता है। प्राचीन युग से ही खाना बांटकर खाना मित्रता का प्रतीक माना गया है जो आज के आधुनिक युग में भी यथावत है।

हम सभी घर पर आए अतिथि का सत्कार भोजन से करते हैं और अतिथि के लिए अच्छे-से-अच्छा भोजन ही परोसा जाता है। बच्चे के जन्म दिन, शादी आदि के उत्सव पर भी भोजन परोसा जाता है जिससे सामाजिक सम्बन्ध बढ़ते हैं। प्रायः किसी नए परिचित व्यक्ति से मैत्री बढ़ाने के लिए उसे घर पर भोजन के लिए ही आमंत्रित किया जाता है।

बड़े-बड़े भोजों पर व्यक्तियों को आमंत्रित करना सामाजिक प्रतिष्ठा का सूचक है। इसके अतिरिक्त अनेक त्यौहारों जैसे दीवाली, होली, रक्षाबन्धन आदि पर मिठाईयों का आदान-प्रदान मैत्री का सूचक माना जाता है। सामाजिक उत्सवों के लिए भी भोजन का आयोजन करना अनिवार्य-सा हो गया है। हमारे देश के भिन्न-भिन्न प्रान्त में भिन्न-भिन्न जातियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन खाते हैं।

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के प्रकार (Dimensions of Health) कौन-से हैं ?
उत्तर:
आज के युग में पूर्ण स्वस्थता (Complete well being) की स्थिति के लिए आध्यात्मिक पहलू के महत्त्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
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1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health): स्वास्थ्य के शारीरिक पक्ष से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। जब हम यह कहते हैं कि वह व्यक्ति स्वस्थ है तो हम साधारणतया स्वास्थ्य के इसी पक्ष की बात करते हैं। कोई भी व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ माना जाता है यदि वह सक्रिय, चुस्त व फुर्तीला है।
वह किसी शारीरिक रोग से ग्रस्त नहीं है तथा उसमें निम्न शारीरिक लक्षण पाए जाते हैं –

  • आयु के अनुपात में वजन और लम्बाई।
  • मांसपेशियाँ सुदृढ़ और विकसित।
  • हड्डियाँ मजबूत और वृद्धि सामान्य।
  • त्वचा स्वस्थ, सुन्दर व चिकनी।
  • आँखें स्वस्थ और दोषरहित।
  • बाल चमकीले और चिकने।
  • दाँत साफ, सामान्य एवं दोषरहित।
  • चाल-ढाल सीधी तनी हुई, पेट अन्दर।
  • गहरी नींद।
  • भूख सामान्य।
  • रोग निरोधक क्षमता उत्तम ।
  • उत्साही, सक्रिय एवं शक्ति से भरपूर ।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health): कोई भी व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ माना जाता है, यदि उसमें निम्न लक्षण पाए जाते हैं –

  • तनाव तथा चिन्ता से. गुक्त।
  • मानसिक रूप से सके और क्रियाशील।
  • दिमागी रोगों से मुक्त।
  • दूसरों के प्रति भातुक।
  • आन्तरिक अन्त से मुक्त।
  • विभिन्न लोगों और विभिन्न परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम।
  • अच्छी मानसिक योग्यता।
  • संवेगात्मक स्थिरता।

मानसिक स्वास्थ्य का अनुमान लगाना शारीरिक स्वास्थ्य की तुलना में कठिन है। यह कहा जाता है कि “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क रहता है।” (Healthy mind lives in a healthy body) इस परिभाषा से स्पष्ट है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आपस में सीधा सम्बन्ध है। मानसिक अस्वस्थता के कारण शारीरिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है।

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उदाहरणार्थ, अधिक चिन्ता और तनाव से शरीर में उच्च रक्तचाप अथवा हृदय रोग हो जाता है। इसके विपरीत स्थिति में शारीरिक अस्वस्थता से मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्थ एक पोलियो से ग्रस्त बच्चा खुद को सामान्य बच्चों से हीन अनुभव करता है और यही भावना उसे डर या आत्म-दयनीयता (Self-pity) की स्थिति में पहुँचा देती है । यह स्थिति मानसिक अस्वस्थता की स्थिति है।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health): सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति में निम्न लक्षण पाए जाते हैं।

  • वह समाज के दूसरे लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी अनुभव करता है।
  • वह सबके साथ सहयोग और सहनशीलता से रहता है।
  • उसका व्यवहार आनन्ददायक होता है।
  • वह आस-पास के लोगों से प्रेम से मिलता है।

मानसिक स्वास्थ्य के बिना सामाजिक स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त करना असम्भव है। उदाहरणार्थ, यदि व्यक्ति अपनी परेशानियों से चिन्ताग्रस्त और तनावयुक्त है, तो वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम नहीं हो सकता। इसी प्रकार प्रायः शारीरिक अस्वस्थता भी सामाजिक स्वस्थता में बाधक होती है। उदाहरणार्थ शारीरिक रोग व्यक्ति को चिड़चिड़ा, मायूस और दूसरों के साथ सामान्य व्यवहार के अयोग्य बना देता है। अपराधी व्यक्ति जैसे चोर, डाकू आदि सामाजिक अस्वस्थता के उदाहरण हैं। उनका व्यवहार समाज द्वारा मान्य नहीं होता इसीलिए उन्हें असामाजिक तत्त्व कहा जाता है।

4. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health): आध्यात्मिक स्वास्थ्य को परिभाषित कर पाना सबसे कठिन है। आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति अधिकतर नैतिक सिद्धांतों का पालन करता है, जैसे-सच बोलना, भलाई करना, अपने कर्तव्यों का दृढ़ता से पालन करना, दूसरों को दुख न देना आदि। धैर्य और आत्मिक शांति आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं। उन्हें प्रार्थना, चिन्तन और कर्तव्यपरायणता से प्राप्त किया जा सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति परिवार, समाज व देश के लिए सम्पत्ति होता है जबकि अस्वस्थ व्यक्ति एक बोझ।

प्रश्न 3.
उत्तम स्वास्थ्य के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लक्षण (Signs of good health): उत्तम स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि व्यक्ति शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हो। एक उत्तम पोषित व्यक्ति का ही उत्तम स्वास्थ्य हो सकता है। मानव कल्याण के लिए वैज्ञानिक पोषण विज्ञान से सम्बन्धित क्षेत्रों में निरन्तर अनुसंधान, अध्ययन व अन्वेषण कर रहे हैं। इसी के फलस्वरूप व्यक्ति के शरीर की बनावट, सबलता, आयु अवधि तथा मानसिक व व्यावहारिक लक्षणों में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, जिनका उल्लेख आगे किया गया है –

1. शारीरिक विकास एवं वृद्धि (Body growth and development) : एन.सी.एच.एस. के अनुसार बच्चों व किशोरों की अपेक्षित ऊँचाई व भार (Expected Height & Weight of Children & Adolescents according to N.C.H.S)
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(क) शारीरिक भार व ऊँचाई (Body weight & height): किसी भी व्यक्ति के शारीरिक भार व ऊँचाई को प्रभावित करने वाले अनेक कारकों में से उत्तम पोषण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता है तो उसका शरीर भार एवं ऊँचाई सामान्य स्तर से कम रह जाता है।

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इसी प्रकार अत्यधिक पोषण भी व्यक्ति के लिए अत्यन्त हानिकारक है क्योंकि इससे शारीरिक भार सामान्य स्तर से अधिक होने के कारण मोटापा आ जाता है। तालिका में विभिन्न आयु वर्गों के लिए सामान्य शरीर भार एवं ऊँचाई का उल्लेख किया गया है। आप इस तालिका की सहायता से अपने शरीर का भार व ऊँचाई की तुलना सामान्य स्तर से करके अपने स्वास्थ्य की दशा ज्ञात कर सकते हैं तथा प्रयत्न करके अपने शरीर के भार को सामान्य स्तर में रख सकते हैं।

(ख) अस्थियों का ढाँचा (Skeletal system): एक स्वस्थ व्यक्ति की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। भोजन में उपस्थित कैल्शियम, फास्फोरस व विटामिन डी हड्डियों का कैल्सीकरण करके उन्हें .मजबूत बनाते हैं। अतः एक सुपोषित स्वस्थ व्यक्ति का डील-डौल प्रभावित होता है। उसका सिर तना हुआ, छाती चौड़ी व उठी हुई, कन्धे सपाट व पेट अन्दर होता है।

(ग) त्वचा (Skin): स्वस्थ व्यक्ति की.त्वचा मुलायम व चमकीली होती है। बाहरी त्वचा के नीचे की तह की मोटाई से पोषण की स्थिति ज्ञात हो जाती है। इस निचली तह की मोटाई वसा के कारण होती है। जब व्यक्ति को उपयुक्त मात्रा में भोजन नहीं मिलता तब यह वसा जल कर उसे ऊर्जा प्रदान करती है और यह निचली तह पतली होती जाती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण करता है तो वसा त्वचा की निचली तह में चर्बी के रूप में जम जाती है।

(घ) मांसपेशियां (Muscles): एक स्वस्थ व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित व सुगठित होती हैं। उत्तम पोषण के अभाव में व्यक्ति की मांसपेशियां पूर्ण रूप से विकसित नहीं होती तथा ढीली पड़ जाती हैं।

(ङ) रक्त (Blood): भोजन में उपस्थित पोषक तत्त्व पाचन के पश्चात् रक्त में अवशोषित होते हैं तथा रक्त ही इन पोषक तत्त्वों को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाकर उनका पोषण करता है। अतः रक्त में उपस्थित पोषक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर किसी भी व्यक्ति के पोषण स्तर तथा स्वास्थ्य स्तर का पता लगाया जा सकता है। शरीर पोषण के अतिरिक्त व्यक्ति के फेफड़ों से ऑक्सीजन लेने तथा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने का कार्य रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

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एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति में सामान्यतः लगभग 1214 ग्राम हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) प्रति 100 मिली रक्त में होता है। उससे कम हीमोग्लोबिन की मात्रा अस्वस्थता का प्रतीक है जिससे व्यक्ति को जल्दी थकावट आती है और उसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है। सारांश में एक स्वस्थ व्यक्ति (जिसका पोषण स्तर बाल्यावस्था से ही उचित रहा हो) का पूर्ण विकसित अस्थि कंकाल, टांगें व बाँहें सुडौल, दाँत सुन्दर व सुदृढ, त्वचा चिकनी तथा मांसपेशियां ठोस व सबल होती हैं।

2. शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता (Physical efficiency and capability): अनुसंधानों एवं प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पोषण का प्रत्यक्ष प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता पर पड़ता है। अमेरिका में कुछ सैनिकों को सीमित आहार देने पर ज्ञात हुआ कि उनकी कार्यक्षमता बहुत कम हो गयी है। इसी प्रकार एक कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के प्रात:कालीन नाश्ते का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि सन्तुलित प्रात:कालीन नाश्ता खाने वाले मजदूरों की शारीरिक कार्यक्षमता व कार्यकुशलता अन्य मजदूरों की अपेक्षा अधिक है।

3. मानसिक स्थिरचित्तता (Constant mental tension): उत्तम स्वास्थ्य का मनुष्य के व्यवहार से सीधा सम्बन्ध है। एक अस्वस्थ व्यक्ति प्रायः उदांस, अधीर, चिड़िचिड़ा, खिन्न व हठी होता है तथा वह किसी भी कार्य में रुचि नहीं लेता है और उसकी संकल्प-शक्ति भी कम हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों के भोजन में सुधार लाने पर. उनका व्यवहार धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है। बच्चों में अस्थिर चित्त, अधीरता व उदण्डता का कारण भी अस्वस्थता है। एक स्वस्थ बच्चा अधिक सतर्क, क्रियाशील तथा उत्साही होता है। अनुसंधानों द्वारा व्यक्ति के मानसिंक . सन्तुलन में विटामिनों की भूमिका का अत्यधिक महत्त्व सिद्ध हुआ है।

4. मानसिक संलग्नता (Mental concentration): किसी भी बच्चे की मानसिक क्षमता अथवा बुद्धि उसकी अनुवांशिकता पर निर्भर करती है परन्तु उसका मानसिक विकास पूर्ण रूप से हो यह उसके पोषण पर निर्भर करता है। जिन बच्चों को उचित आहार नहीं मिलता वह अपनी पढ़ाई पर पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते हैं, वे अधिक समय तक एकाग्रचित नहीं रह सकते हैं और मानसिक दृष्टि से शीघ्र ही थक जाते हैं। अध्ययनों द्वारा यह पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुका है कि उचित पोषण का प्रभाव बच्चों की पढ़ाई पर सर्वाधिक पड़ता है। एक स्वस्थ बच्चा एकाग्रचित होकर पढ़ाई में पूर्ण रुचि लेता है।

5. मृत्यु आंकड़े व दीर्घ आयु (Death rate & Longivity): यदि सम्पन्न देशों के मृत्यु आंकड़ों एवं आयु की तुलना विकासशील देशों से की जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उत्तम स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध दीर्घ आयु व मृत्यु-दर में कमी से है। भारत में भी माता व शिशु को पौष्टिक आहार मिलने से मातृ व शिशु मृत्यु-दर में कमी आई है तथा आयु अवधि में बढ़ोतरी हुई है। प्रौढ़ व्यक्तियों के जीवन का अकाल अन्त बहुधा हृदय सम्बन्धी रोगों के कारण होता है जिसका सीधा सम्बन्ध आहार से है क्योंकि अधिक कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन करने से धमनियों में धीरे-धीरे विकार आने लगते हैं जिसके कारण हृदय की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 4.
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के अतिरिक्त स्वास्थ्य पर और किन बातों का प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
उत्तम स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक भोजन के महत्त्व के बारे में तुम्हें पूर्ण जानकारी हो गई है परन्तु पौष्टिक भोजन के साथ-साथ निम्नलिखित बातें भी हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती हैं –
1. शुद्ध वायु (Fresh Air): अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुद्ध वायु में श्वास लेना अति आवश्यक है। वायु में कार्बनिक पदार्थ व विषैली गैसों जैसे कार्बनडाइ ऑक्साइड (Carbon dioxide), कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon Mono-oxide), मीथेन (Methane), हाइड्रोजन सल्फाइड (Hydrogen Sulphide) आदि की मात्रा कम से कम तथा ऑक्सीन (Oxygen) की मात्रा लगभग 20.96 प्रतिशत तक होनी चाहिए। यदि वायु में कार्बनिक पदार्थों व विपैली गैसों की मात्रा अधिक होती है तो व्यक्ति को सिरदर्द, बदनदर्द, आलस्य व थकावट की शिकायत होती है। अशुद्ध वायु जिसमें मिट्टी के कणों व रोग के जीवाणुओं की अधिकता.होती है, में सांस लेने से व्यक्ति कई रोगों से ग्रस्त हो सकता है।

2. शुद्ध जल (Fresh Water): हमारे देश में पीने के लिए जल विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त किया जाता है, जैसे-तालाब, कुएँ, नदियाँ, नलकूप, नल आदि । जल में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ तथा रोगाणु पाए जाते हैं जिनके द्वारा व्यक्ति को अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। अतः हमें इस वात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जल चाहे किसी भी स्रोत द्वारा लिया जाए स्वच्छ तथा. रोगाणुरहित हो।

3. व्यक्तिगत एवं वातावरण की स्वच्छता (Personal & Environmental sanitation): प्रकृति में रोग उत्पन्न करने वाले अनेक जातियों के सूक्ष्म रोगाणु होते हैं जो अंधेरी जगह, नमी तथा गन्दगी में शीघ्रता से बढ़ते हैं और विभिन्न माध्यमों द्वारा संक्रमण फैलाते हैं। अतः गन्दगी के कारण मनुष्य अनेक रोगों का शिकार हो सकता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ-साथ वातावरण की स्वच्छता का भी पूर्ण ध्यान रखना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercise): अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन अपनी आयु, कार्य व निजी आवश्यकतानुसार शुद्ध वायु में नियमित रूप से व्यायाम करना आवश्यक है क्योंकि व्यायाम द्वारा फेफड़ों में शुद्ध वायु पहुँचती है, रक्त परिसंचरण की गति तेज होती है, जिससे विभिन्न अंगों में पोषक तत्त्व तीव्रता से पहुंचते हैं और व्यर्थ पदार्थों का निष्कासन भी तीव्रता से होता है।

5. नियमित विश्राम व निद्रा (Regular Rest & Sleep): दैनिक कार्यों से होने वाली थकावट को दूर करने तथा दोबारा कार्य करने के लिए ऊर्जा अर्जित करने के लिए उचित मात्रा में विश्राम व निद्रा आवश्यक है क्योंकि इन अवस्थाओं में शरीर में होने वाले मरम्मत के कार्य सुचारु रूप से होते हैं। यही कारण है कि बच्चों, बूढों व कमजोर व्यक्तियों को अधिक विश्राम व निद्रा की आवश्यकता होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 6 घण्टे से 8 घण्टे तक की नियमित निद्रा आवश्यक है। इसके विपरीत आवश्यकता से अधिक विश्राम व निद्रा भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

6. रोगों से रक्षा (Protection against diseases): प्राय: देखा गया है कि हम चाहे अपने स्वास्थ्य का कितना भी ध्यान रखें फिर भी कोई न कोई रोग हमें घेर लेता है। अतः रोगों जैसे तपेदिक, हैजा, टाइफाइड, पोलियो आदि से बचने के लिए बच्चों को नियमित रूप से टीके लगवाकर रोगों से रक्षा प्रदान करनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
विकासवादी परिप्रेक्ष्य व्यवहार के जैविक आधार का किस प्रकार व्याख्या करता है।
उत्तर:
संसार में जीवों की करोड़ों विभिन्न प्रजातियाँ हैं जो अपने पूर्ववर्ती प्रारूपों से आज के रूप में विकसित हुई हैं। जैविकीय परिवर्तन किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है। जीवों में व्यवहारात्मक परिवर्तन इतना मंद होते हैं कि सैकड़ों पीढ़ियों के बाद ही दिखाई पड़ता है।

आधुनिक मानवों के तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण उन्हें अपने पूर्वजों से अलग करते हैं –

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क जिसमें संज्ञानात्मक व्यवहार (प्रत्यक्षण, स्मृति, तर्कन) तथा भाषा के उपयोग करने की क्षमता का पाया जाना।
  2. काम करने योग्य विपरी अंगूठे के साथ मुक्त हाथ रखने वाला प्राणी बन जाना। मानव का व्यवहार बहुत जटिल और विकसित होता है। मस्तिष्क का वजन हमारे शरीर के सम्पूर्ण वजन का 2.35 प्रतिशत होता है जो सर्वाधिक होता है। मनुष्य का प्रमस्तिष्क के अन्य भागों से अधिक विकसित होता है।

हमारे व्यवहार को प्रभावित करने शारीरिक संरचना के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति अनुकूलन और आनुवंशिकता का सामूहिक योगदान रहता है। आहार जुटाने की योग्यता, पूरे परिवार की सुरक्षा, परभक्षों को अपने से अलग रखने की प्रवृत्ति जैसे अनेक प्रक्रियाएँ एवं विधियाँ हैं जो जीवों के व्यवहार को बदलने का कारण बने हुए हैं। जीवों के व्यवहार में अन्तर लाने का कार्य मुख्यत: पर्यावरण और जीन की योग्यता से करते रहता है। जीन के माध्यम से व्यवहार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवर्तन होता रहता है।

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प्रश्न 2.
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को किस प्रकार संचारित करती हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तंत्रिका कोशिकाएँ सूचना को विद्युत संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य निपुणता के साथ पूरा करती है। ये संबंधित अंगों के माध्यम से सूचना प्राप्त करके केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है जो प्राप्त सूचना को पेशीय अंगों तक ले जाती है।

तंत्रिका तंत्र के प्रमुख घटक पार्श्व तंतु विद्युत रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं और प्राप्त संकेतों को दूसरे घटक काय कोशिका में भेज देते हैं। अक्ष तंतु के अंतिम सिरे पर स्थित अंतस्थ वहन प्राप्त संकेतों को अन्य ग्रन्थियों और मांसपेशियों को दे देते हैं। पेशीय तंत्रिका स्नायविक आदेशों का संवहन करती है।
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चित्र: तंत्रिका कोशिका की संरचना
अर्थांत तंत्रिका तंत्र में सूचनाएं तंत्रिका आवेगा के रूप में प्रवाहित होती है जो उपिहक ऊर्ज के रूप में ग्राहकों तक पहुंचती है

प्रश्न 3.
प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के चार पालियों के नाम बताइये। ये क्या कार्य करते हैं?
उत्तर:
मस्तिष्क के चार प्रमुख भागों में से एक प्रमस्तिष्क कहलाने वाले भाग को प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के नाम से भी समझा जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट सभी उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों (अवधान, प्रत्यक्षण, अधिगम, स्मृति, भाषा-व्यवहार, तर्कना, समस्या समाधान) को नियमित करने का कार्य करता है।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की संरचना को चार मुख्य पालियों में बाँटा जा सकता है –

  1. ललाट या अग्र पालि
  2. पाश्विक या मध्य पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्वकपाल पालि

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की चार पालियों के कार्य भिन्न माने जाते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

1. ललाट अथवा अग्र पालि-ललाट पालि मुख्यतः
संज्ञानात्मक कार्यों (चिंतन, स्मृति, तर्कना, अधिगम, अवधान आदि) में सहायता करता है। किन्तु स्वायत्त और संवेगात्मक अनुक्रियाओं पर अवरोधात्मक प्रभाव डालता है।

2. पार्श्विक पालि या मध्य पालि:
पार्श्विक पालि त्वचीय संवेदनाओं और उनका चाक्षुष और श्रवण संवेदनाओं के साथ समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है। अर्थात् गर्मी, ठंढक, ददे आदि की अनुभूति इसी पालि पर आधारित होता है।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार
चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

3. शंख पालि:
शंख पालि का सीधा संबंध श्रवणात्मक सूचनाओं से होता है। प्रतीकात्मक शब्दों तथा भिन्न-भिन्न ध्वनियों का सही अर्थ समझने का कार्य शंख पालि का ही है। यह लिखित भाषा और वाणी का अर्थ समझने में निपुण होता है। अर्थात् शंख पालि के द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

4. पश्च कपाल पालि या पृष्ठ पालि:
पश्च कपाल पालि मुख्यतः चाक्षुष सूचनाओं से संबद्ध रहता है। इसी पालि के द्वारा चाक्षुष आवेगों की व्याख्या, चाक्षुष उद्दीपकों की स्मृत्ति और रंग चाक्षुष उन्मुखता आदि सम्पन्न की जा सकती है। इसके नष्ट होने से अंधापन का भय उत्पन्न हो जाता है। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट के प्रमुख पालियों के कार्य को कार चलाने के उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। कार चलाते समय बालक पश्च कपाल की सहायता से सड़क और अन्य गाड़ियों को देखता है, शंख पालि की मदद से हार्न या सचेतक की ध्वनि को सुन लेता है।

पार्श्विक पालि की सहायता से चालक गाड़ी को नियंत्रित रखने के लिए पेशीय क्रियाकलाप करता है। गाड़ी को रोकना या ओवरटेक करना आदि जैसे निर्णय के लिए ललाट पालि की मदद लेता है। इस तरह माना जा सकता है कि मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित होते हैं। प्रत्येक पालि की अपनी विशिष्ट कार्य-क्षमता होती है।

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प्रश्न 4.
विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रंथियों और उनसे निकलने वाले अन्तःस्त्रावों के नाम बताएँ। अंतःस्त्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?
उत्तर:
विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (नलिकाविहीन ग्रन्थियों) के नाम तथा उनसे निकलने वाले अन्तःस्रावों के नाम क्रमानुसार अंकित किए गए हैं –
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अन्तःस्रावी तंत्र हमारे व्यवहार को प्रत्यक्षतः प्रभावित करते हैं – पीयूष ग्रंथि मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को प्रभावित करके हमें व्यवहार में अन्तर लाने को बाध्य कर देते हैं। अवटु ग्रंथि से निकलने वाला थाइरॉक्सिन नामक हॉर्मोन शरीर में चयापचय की दर को प्रभावित करता है जिसके कारण ऊर्जा का उत्पादन होता है। इसकी सक्रियता बढ़ जाती है। इसके विपरीत थाइरॉक्सिन की कमी से शारीरिक और मानसिक सुस्ती आ जाती है। अधिवृक्क ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोनों के कारण तंत्रिका तंत्र के प्रकार्यों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह अधश्चेतक को उद्दीप्त करते हैं जिससे व्यक्ति का संवेग घटता बढ़ता –
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चित्र: मुख्य अंतःस्त्रावी ग्रंथियाँ
अग्नाशय से निकलनेवाले इन्सुलिन में यह क्षमता होती है कि वह भूख और दर्द से निश्चित रखकर खुश रहने की प्रवृत्ति जगाता है। इसके विपरीत मधुमेह से ग्रसित व्यक्ति इन्सुलिन के उपयोग में गड़बड़ी को मुख्य कारण मानता है। जनन ग्रंथियों से निकलने वाले हार्मोन के कारण हमारा व्यवहार उत्तेजित तथा आक्रामक हो जाता है। हमारे व्यवहार में सुन्दर, समर्थ एवं विकसित व्यक्ति कहलाने के लिए कृत्रिम प्रदर्शन के द्वारा आकर्षन उत्पन्न करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

सभी अन्तःस्रावों का सामान्य प्रकार्य हमारे व्यवहारपरक कल्याण के लिए निर्णायक होता है। शरीर का आंतरिक संतुलन बनाये रखने के लिए हमारे व्यवहार को दवाब मुक्त, भय मुक्त, विकसित रखने में हमारी सहायता करता है। सारांशतः अंतःस्रावी ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन के चलते हम अपने व्यवहार पर मानसिक असंतुलन उत्तेजना, भूख, रक्तचाप, उदासीनता, संवेग, सक्रियता, मोटापन, बेचैनी, चिन्ता आदि प्रभावकारी कारकों का कुप्रभाव नहीं पड़ने देते हैं और इस सर्वप्रिय व्यवहार के प्रदर्शन के योग्य बने रहते हैं।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र किस प्रकार आपातकालीन स्थितियों में कार्य-व्यवहार में हमारी सहायता करता है?
उत्तर:
आपातकाल की स्थिति में हम भय, अनहोनी, अशांति, दुर्घटना आदि के प्रभाव के कारण अव्यवस्थित हो जाते हैं। हमारी शारीरिक क्रिया स्वाभाविक कार्य नहीं कर पाती है और हम कई रोग अथवा विषमताओं के चक्कर में पड़ जाते हैं। ज्ञात है कि स्वायत्त तंत्र, जो तंत्रिका तंत्र का एक प्रमुख घटक होता है, उन क्रियाओं का संचालन करता है जिनपर हमारे प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होते हैं। जैसे, सॉस लेना, रक्त संचार, लार स्राव, उदर संकुचन और प्रायोगिक प्रतिक्रियाओं का नियंत्रण हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है। आपातकाल में तेजी से हृदय का धड़कना, कई वीभत्स घटनाओं को देखना, रक्तचाप का बढ़ जाना, मुँह सूखना, भूख न लगना, बार-बार प्यास लगना, चिड़चिड़ापन का बढ़ जाना जैसी अस्वाभाविक स्थितियाँ आ जाती हैं।

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐसी स्थिति में अपनी स्वाभाविक वृत्ति को छोड़कर हमारी सहायता करते हैं। अधिक ऊर्जा का संचार करके, अनुकंपी तंत्र की सक्रियता को कम करके, पाचन-क्रिया की गड़बड़ी को सुधार कर प्रभावित व्यक्ति को शांत कर उसे सामान्य स्थिति में लाता है। स्वायत्त तंत्रिका के दोनों प्रमुख खण्ड-अनुकम्पी और परानुकम्पी खण्ड अपने विपरीत प्रभाव की प्रवृत्ति को छोड़कर मानवीय व्यवहार में संतुलन बनाये रखने के लिए मिल-जुलकर कार्य करने लगते हैं। स्वायत्त तंत्र के दोनों खण्डों के सामूहिक प्रयास से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सभी शारीरिक क्रियाएँ (हृदय गति, श्वास गति, रक्तचाप, रक्त की संरचना) आदि सामान्य स्तर में आ जाती है। अर्थात् स्वायत्त् तंत्र की सक्रियता से प्रबल और त्वरित कार्यवाही के माध्यम से प्रभावित व्यक्ति परिस्थिति से जूझने की क्षमता बढ़ा पाता है।

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प्रश्न 6.
संस्कृति का क्या अर्थ है? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति का सामान्य अर्थ एक विशिष्ट अवधारणा मानी जाती है जहाँ अच्छे व्यवहार या आचरण करने वाले को सुसंस्कृत कहा जाता है। संस्कृति का सही अर्थ जानने के लिए भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने-अपने तरह से संस्कृति को परिभाषित किया है जिनमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नवत हैं –

1. वूम और सेल्जनिक:
समाज में संस्कृति का अर्थ मनुष्य की सामाजिक विरासत से लिया जाता है जिसमें सभी प्रकार के ज्ञान, विश्वास, प्रथाएँ एवं प्रथा आती हैं जिसे व्यक्ति समाज के एक सदस्य के रूप में ग्रहण करता है। आज संस्कृति लोगों की जीवन-शैली के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसे परम्परा की धरोहर के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित किए जाते रहे हैं।

2. टॉयलर (Taylor):
“संस्कृति वह जटिल समग्रता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, कला, आचार, कानून, प्रथा तथा ऐसी ही अन्य क्षमताओं और आदतों का समावेश रहता है जिसे मनुष्य समाज के सदस्य के रूप में प्राप्त करता है।” टॉयलर की इस परिभाषा में भौतिक तत्वों को संस्कृति में शामिल नहीं किया गया है। आज के मानवशास्त्रियों ने संस्कृति में भौतिक तत्वों को भी शामिल किया है।

3. पिडिंग्टन (R. Piddington):
“मानव संस्कृति उन भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों का संपूर्ण योग है जिसके द्वारा मानव अपनी जैविकीय और सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और साथ ही अपने को पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।” पिडिंग्टन की इस परिभाषा में –

  • भौतिक और बौद्धिक साधनों और उपकरणों को संस्कृति का अंग माना गया है।
  • मनुष्य संस्कृति के माध्यम से अपने को पर्यावरण (Environment) के अनुकूल बनाता है।
  • संस्कृति के तत्वों को मनुष्यमात्र की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन माना गया है।

4. डॉ. श्यामचरण दूबे:
प्रसिद्ध भारतीय विद्वान डॉ. दूबे के शब्दों में, “सीखे हुए व्यवहार-प्रकारों की उस समग्रता को जो किसी समूह को विशिष्टता प्रदान करती है, संस्कृति की संज्ञा दी जा सकती है। दूसरे शब्दों में, किसी समूह के ऐतिहासिक विकास में जीवन-यापन के जो विशिष्ट स्वरूप विकसित होते हैं, वे ही उस समूह की संस्कृति हैं।” पिडिंग्टन तथा दूबे के अनुसार मानव द्वारा निर्मित सभी भौतिक एवं अभौतिक वस्तुएँ संस्कृति में आती हैं।

5. रॉबर्ट बीयस्टेंड (Robert Bierstedt):
“संस्कृति एक जटिल समग्रता (the com plex whole) है जिसमें उन सभी चीजों का समावेश हैं जिनपर हम सोचते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते उन्हें अपने पास रखते हैं।”

6. हस्कोविट्स (Herskovits):
“संस्कृति पर्यावरण का मानव-निर्मित व्यवहार है।”

7. मेकाइवर तथा पेज (Maclver and Page):
मेकाइवर तथा पेज ने संस्कृति को सभ्यता से अलग माना है। उनका कहना है कि “हमारी संस्कृति वही है जो हम हैं और हम प्रयोग करते हैं, वही हमारी सभ्यता है” (Our culture is what we are, our civilization is what we use)। उन्होंने कलम, घड़ी, टाइपराइटर मशीन आदि को सभ्यता माना है जबकि ज्ञान, नैतिक आचार शास्त्र, कला, धर्म आदि को संस्कृति का तत्व स्वीकार किया है।

संस्कृति की विशेषताएँ:
संस्कृति के सम्बन्ध में प्राप्त अवधारणों तथा अनेक परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के सम्बन्ध में कुछ विशिष्ट विशेषताओं की संभावना मिलती है जो इस प्रकार व्यक्त किये जा सकते हैं –

  1. संस्कृति उन लोगों के व्यवहारात्मक उत्पादों को सम्मिलित करती है जो हमसे पहले आ चुके हैं। अर्थात् जैसे ही हम जीवन प्रारम्भ करते हैं, संस्कृति वहाँ पहले से ही उपस्थित होती है।
  2. संस्कृति एक जीवन-पद्धति है जो किसी निश्चित परिवेश में रहने वाले लोगों द्वारा अपनाई जाती है।
  3. संस्कृति को कुछ प्रतीकों में अभिव्यक्त अर्थों के रूप में समझा जाता है जो कि ऐतिहासिक रूप से लोगों में संचालित होते हैं।
  4. संस्कृति समय, स्थान, पर्यावरण और परिस्थिति के कारण भिन्नता बनाए रह सकती है।
  5. संस्कृति एक समाज से दूसरे समाज के मनुष्यों के व्यवहारों का निरूपण करती है।

इन विशेषताओं को स्पष्टतः व्यक्त करने के उपरान्त निम्न विशेषताओं को भी व्यक्त किए जा सकते हैं –

1. संस्कृति सीखे हुए आचरणों का नाम है:
जैसे-अभिवादन, गायन, वस्त्र पहनना, नृत्य करना आदि सीखे हुए आचरण कहलायेंगे; क्योंकि हम इन्हें समाज से सीखते हैं। गैर सीखे हुए आचरण वे कहलायेंगे जो कि स्वाभाविक प्रवृत्ति से सम्बन्धित होते हैं। जैसे-रोना, क्रोध करना आदि। समस्त सीखे हुए आचरण एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। वे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं; जैसे कि गुरु-शिष्य का आचरण, मालिक-मजदूर का आचरण आदि और इन्हीं के आध पर पर हम आचरणों के प्रतिमान निर्धारित करते हैं, जैसे-बच्चों का आचरण, स्त्रियों का आचरण, शिष्यों का आचरण इत्यादि।

2. संस्कृति के छिपे हुए आचरण संगठित प्रतिमानों के रूप होते हैं:
किसी भी व्यक्ति के आचरण का स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता है वरन् इनका महत्त्व अन्य लोगों के सम्बन्धों में’ ही होता है। एक आचरण अन्य आचरणों से भी सम्बन्धित होता है। हर व्यक्ति के आंचरण निर्धारित हो जाने पर समाज तथा उनकी संस्कृति उससे यह आशा करती है कि वह उसी के अनुसार आचरण करें। इसी के आधार पर उनके आचरणों का नामांकन होता है। जैसे कि बच्चों की तरह आचरण करने वाले युवक के कार्यों को बचकाना आचरण कहा जायगा। कुछ विशेष आचरण तथा संस्कृति द्वारा स्त्री तथा पुरुषों के लिए निर्धारित किये गये हैं। यदि कोई पुरुष स्त्रियो के अनुसार आचरण करते हैं तो उसे जनाना आचरण कहते हैं।

3. संस्कृति प्रतिमान आदर्शात्मक होते हैं:
भला-बुरा, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, विचार की शिक्षा छोटे को बड़े से मिलती है। उचित-अनुचित की धारणा परिणाम पर निर्भर करता है। किसी व्यक्ति के कार्य का परिणाम यदि अच्छा होता है तो मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार जनरीति, प्रथा, परम्परा, संस्था का रूप लेकर वह विचार संस्कृति का अंग बन जाता है।

4. संस्कृति के प्रतिमान भौतिक एवं अभौतिक दोनों ही होते हैं:
वस्तुवादी चीजें भौतिकवादी प्रतिमान में आयेंगी और विचारवादी सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली अभौतिक प्रतिमान में आयेंगी। इस प्रकार से रेडियो, टेलीविजन के आचरण, विचार, प्रथा, परम्परा आदि वस्तुएँ अभौतिक संस्कृति के अन्तर्गत आयेंगी, क्योंकि ये निराकार होती हैं।

5. सार्वभौमिक स्वीकृति:
कोई भी आचरण संस्कृति का अंग तभी कहलाता है जबकि पर्याप्त लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं।

6. व्यवहार के प्रतिमान हस्तांतरति होते हैं:
एक पीढ़ी अपने आचरण दूसरी पीढ़ी को सिखाती है और युग-युग से यह हस्तांतरण चल रहा है। माता-पिता, वयोवृद्धों तथा शिक्षकों के माध्यम से अभौतिक, भौतिक संस्कृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती हैं।

7. संस्कृति का स्वरूप हमेशा परिवर्तनशील होता है:
संस्कृति समाज तथा व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति की विधियों का नाम है। इसलिये यह हमेशा परिवर्तनशील होती है।

8. संस्कृति सामाजिक है:
संस्कृति सामाजिक है; क्योंकि व्यक्ति समूह के बाहर किसी भी प्रकार की सृष्टि नहीं कर सकता। यह समूह का आदर्शात्मक गुण होता है, व्यक्ति उसे अपनाने का प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 7.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि “जैविक कारक हमें समर्थ बनाने की भूमिका निभाती है जबकि व्यवहार के विशिष्ट पहलू सांस्कृतिक कारकों से जुड़े हैं।” अपने उत्तर के समर्थन के लिए कारण दीजिए।
उत्तर:
दिये गये कथन में सच्चाई है, क्योंकि जैवकीय उत्तराधिकारी जीन के माध्यम से घटित होते हैं जबकि सांस्कृतिक उत्तराधिकार पर्यावरण की भिन्न-भिन्न घटनाओं के कारण उत्पन्न होता है। जैविक कारक प्रकृति प्रदत्त होते हैं जबकि व्यवहार को परिवेश के आधार पर कृत्रिम दशा में उपलब्ध किया जाता है। जैविक कारक मनुष्य को ही नहीं बल्कि सभी जीवों को भी जीवन-संबंधी क्रियाकलाप (सांस लेना, भोजन खोजना, स्वयं को सुरक्षित रखना, स्वतंत्र एवं न्यायपूर्ण जीवन जीना) के प्रति समर्थ बनाता है।

सभी जीवों में माता-पिता से मिले जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक बनने का अवसर मिलता है तथा वह विभिन्न प्रतिक्रियाओं के प्रति स्वयं को समर्थ बना पाता है। जीन के रूप में प्राप्त होने वाले गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व के रूप में सहयोग करता है। गुणसूत्र के माध्यम से जीनोटाइप और फीनोटाइप जैसे लक्षण प्रकट होते हैं तथा जैविक कारक में सुरक्षा सम्बन्धी गुण उत्पन्न हो जाते हैं। इस तरह माना जा सकता है कि जैविक कारकों को उपलब्ध सामर्थ्य आनुवंशिक कारणों से संभव होते हैं।

सांस्कृतिक कारकों के प्रभाव में जीवन अनुकूलन के लिए अपने व्यवहार में परिस्थिति के अनुसार अन्तर उत्पन्न कर लेता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखकर काम व्यवहार सम्बन्धी नियमों, मूल्यों तथा कानूनों की रचना कर परिवेश में अनुकूल परिवर्तन लाने का प्रयास करते रहते हैं। पर्यावरण के विभिन्न घटकों से प्रभावित होकर जीवन अपनी जीव-पद्धति को बदलकर जीने का प्रयास करता है।

मानव का स्वभाव प्राकृतिक दशा के अधीन होती है जबकि शारीरिक क्षमता उसे बचपन से ही उपलब्ध रहती है। माँ-बाप की क्षमता, पालन-पोषण के लिए प्रयुक्त विधि और साधन जीवों को समर्थ बनाता है जो स्वाभाविक वृत्ति मानी जाती है। व्यवहार एक कृत्रिम प्रक्रिया होती है जो परिस्थितिवश उदंड, नम्र, सर्वप्रिय, कटु, किसी श्रेणी में रूपान्तरित हो सकता है।

प्रश्न 8.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज के हित में किये जाने वाले कार्य – विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारक कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

1. माता-पिता:
बालक के विकास पर सबसे अधिक प्रत्यक्ष और महत्त्वपूर्ण प्रभाव माता-पिता का पड़ता है। वे विभिन्न स्थितियों में माता-पिता के प्रति भिन्न प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं। माता-पिता उनके कुछ व्यवहारों को, शाब्दिक रूप से पुरस्कृत करके जैसे-प्रशंसा करना या अन्य मूर्त तरह से पुरस्कृत करके जैसे-चॉकलेट, खिलौने या बच्चे की पसंद की वस्तु खरीदना प्रोत्साहित करते हैं। वे कुछ अन्य व्यवहारों का अनुमोदन करके, निरुत्साहित करते हैं। वे बच्चों को भिन्न प्रकार की स्थितियों में रखके उन्हें विध्यात्मक अनुभव, सीखने के अवसर और चुनौतियाँ प्रदान करते हैं।

बच्चों से अन्योन्यक्रिया करते समय माता-पिता विभिन्न युक्तियाँ अपनाते हैं जिन्हें पैतृक शैली कहा जाता है। माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति व्यवहारों में स्वीकृति और नियंत्रण की हद के विषय में बहुत भिन्नताएँ होती हैं। माता-पिता अपने बच्चों को समाजीकृत करने के लिए जो शैली अपनाते हैं वे उनकी आर्थिक दशा, स्वास्थ्य, कार्य-दबाव, परिवार का स्वरूप आदि से प्रभावित होते हैं। दादा-दादी एवं नाना-नानी के समीपता तथा सामाजिक संबंधों का ढाँचा, बच्चे के समाजीकरण में प्रत्यक्षतः या माता-पिता के माध्यम से बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।

2. विद्यालय:
बच्चे विद्यालय में लंबा समय व्यतीत करते हैं, जो उन्हें अपने शिक्षकों और समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया करने का एक सुसंगठित ढाँचा प्रदान करता है। विद्यालय में बच्चे न केवल संज्ञानात्मक कौशल जैसे-पढ़ना, लिखना, गणित को करना ही नहीं सीखते हैं बल्कि बहुत से सामाजिक कौशल जैसे-बड़ों तथा समवयस्कों के साथ व्यवहार करने के ढंग, भूमिकाएँ स्वीकारणा, उत्तरदायित्व निभाना भी सीखते हैं।

वे समाज के नियमों और मानकों को भी सीखते हैं और उनका आंतरीकरण भी करते हैं। स्वयं पहल करना, आत्म-नियंत्रण, उत्तरदायित्व लेना और सर्जनात्मकता आदि गुण भी बच्चे विद्यालय में सीखते हैं। ये गुण बच्चे को अधिक आत्मनिर्भर बनाते हैं। वास्तव में, एक अच्छा विद्यालय बच्चे के व्यक्तित्व के पूर्णतया ही रूपांतरण कर सकता है।

3. समसमूह:
समसमूह बच्चे के समाजीकरण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक है। यह बच्चों को न केवल दूसरों के साथ होने का अवसर प्रदान करता है बल्कि अपनी उम्र के साथियों के साथ सामूहिक रूप से विभिन्न क्रियाकलापों जैसे-खेल को आयोजित करने का भी अवसर प्रदान करती है। ऐसे गुण; जैसे-सहभाजन, विश्वास, आपसी समझ, भूमिका स्वीकृति एवं निर्वहन भी समकक्षियों के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान विकसित होते हैं। बच्चे, अपने दृष्टिकोण को दृढ़तापूर्वक रखना और दूसरों के दृष्टिकोण को स्वीकार करना और उनसे अनुकूलन करना भी सीखते हैं। समसमूह के कारण आत्म-तादाम्य का विकास बहुत सुगम हो जाता है।

4. जनसंचार का प्रभाव:
दूरदर्शन, समाचारपत्रों, पुस्तकों और चलचित्रों के माध्यम से बच्चे बहुत सारी बातें सीखते हैं। किशोर और युवा प्रौढ़ अक्सर इन्हीं में से अपना आदर्श प्राप्त करते हैं, विशेषकर दूरदर्शन और चलचित्रों से। दूरदर्शन और चलचित्रों में दिखाई जानेवाली हिंसा बच्चों में आक्रामक व्यवहार को बढ़ाता है। अतः समाजीकरण के इस कारक को अधिक तरह से उपयोग करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों में अवांछित व्यवहारों के विकास को रोका जा सके।

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प्रश्न 9.
संस्कृतिकरण और समाजीकरण में हम किस प्रकार विभेद कर सकते हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संस्कृतिकरण का संदर्भ उन समस्त अधिगमों से है जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सोद्देश्य शिक्षण के होता है जबकि समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति ज्ञान, कौशल और शील गुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज एवं समूहों में प्रभावशाली सदस्यों की तरह भाग लेने में सक्षम बनाती है।

  1. संस्कृतिकरण के मुख्य तत्व प्रेक्षण द्वारा सीखना है जबकि सबसे महत्त्वपूर्ण समाजीकरण कारक माता-पिता, विद्यालय समसमूह, जन-संचार आदि होते हैं।
  2. संस्कृतिकरण के प्रभाव काफी स्पष्ट दिखाई देते है तथापि लोग सामान्यतः इन प्रभावों के प्रति सजग नहीं हो पाते हैं। समाजीकरण के प्रभाव के रूप में माता-पिता का व्यवहार, विद्यालय का कार्यक्रम, सामाजिक जालक्रम का विस्तार, अवांछित व्यवहारों का विकास आदि से जुड़े होते हैं।
  3. संस्कृतिकरण का प्रत्यक्ष विरोधाभास को जन्म देता है जबकि समाजीकरण किसी व्यक्ति में सुरक्षा, देखभाल, पालन-पोषण, योग्यता का विकास आदि को समझने तथा अपनाने का अवसर जुटाता है।
  4. पूर्ववर्ती पीढ़ियों के माध्यम से चीजों का सांस्कृतिक निरूपण किया जाता है जबकि समाजीकरण सदस्यों के व्यवहार, विकास, अनुप्रयोग आदि पर ध्यान देता है।
  5. संस्कृतिकरण पूरी जीवन विस्तृति तक निरन्तर चलती रहती है जबकि समाजीकरण आवश्यकता एवं दशा पर आश्रित होता है।
  6. संस्कृतिकरण एक प्रकार का सजग एवं उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है जबकि समाजीकरण समाजीकृत करने की शक्ति रखता है जो भाषिक व्यवहार के रूप में जाना जाता है।
  7. अर्थात् संस्कृतिकरण और समाजीकरण में विभेद बतलाने के लिए उनकी प्रकृति एवं विशेषताओं (लक्षण एवं प्रभाव) को इंगित करना होता है।

प्रश्न 10.
परसंस्कृति ग्रहण से क्या तात्पर्य है? क्या परसंस्कृति ग्रहण एक निर्बाध प्रक्रिया है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
दो भिन्न संस्कृतियों में से कोई एक जब दूसरी के सम्पर्क में आता है तो सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आना परसंस्कृति ग्रहण के सामान्य धारणा है। अभीष्ट सम्पर्क प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कुछ भी हो सकता है। परसंस्कृति ग्रहण की रूप में नयी संस्कृति में स्थानांतरण अथवा जन-संचार के माध्यमों से होनेवाले में प्रयुक्त माध्यमों में हो सकता है। उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना, प्रशिक्षण, नौकरी या व्यापार के लिए स्थान बदलना ऐच्छिक ग्रहण माना जाता है। औपनिवेशिक अनुभव, आक्रमण या राजनीतिक शरण के द्वारा अनैच्छिक ग्रहण कहलाता है।

परसंस्कृति ग्रहण को स्पष्टतः समझने के लिए कुछ नया सीखने की आवश्यकता हो जाती है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण की स्थिति में कोई व्यक्ति समस्यारहित माना जाता है। इसमें यदा-कदा द्वन्द्व की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

व्यवहार संबंधी ज्ञान की पुनरावृत्ति को जारी रखने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है। इसे परिवर्तन मुक्त भी रखा जा सकता है। अर्थात् परसंस्कृति ग्रहण का तात्पर्य दूसरी संस्कृतियों के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए हुए सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों से है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष; ऐच्छिक अथवा अनैच्छिक किसी भी श्रेणी में रहकर कुछ नया सीखने के लिए बाध्य कर देता है।

दूसरी संस्कृति के लोगों से मिलने पर उसकी संस्कृति को समझना तथा उसके साथ जीवन व्यतीत करने की सही स्थिति का पता लगाना परसंस्कृति ग्रहण की प्रमुख विशेषता है। ब्रिटिश शासनकाल में लोग इसी कारण इसके लक्षणों एवं आदर्शों को ग्रहण करना सरल, सत्य एवं अभीष्ट माना गया। इस प्रकार ब्रिटिश संस्कृति के साथ रह जाने से उसकी जीवन-शैली संबंधी प्रेक्षण किया जाता है।

परसंस्कृति ग्रहण की व्याख्या पर्यावरण को रूपान्तरित करना होता है। यह निर्बाध प्रतिक्रिया को नकारते हुए किसी के जीवन में किसी भी समय घटित हो सकती है। यह जब कभी भी घटित होता है तब इसमें मानकों, मूल्यों, गुणों और व्यवहार के प्रारूपों को पुनः सीखना होता है। इसकी सफल-व्याख्या करने के लिए समाजीकरण की मदद ली जाती है। परिवर्तन की दिशा एवं प्रभाव के बदलने से परसंस्कृति ग्रहण के प्रति समझ भी बदल जाती है।

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प्रश्न 11.
परसंस्कृतिग्रहण के दौरान लोग किस प्रकार की परसंस्कृतिग्राही युक्तियाँ अपनाते हैं? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
परसंस्कृतिकरण के अवसर पर अक्सर कुछ द्वन्द्व उत्पन्न हो जाते हैं जिससे मुक्ति पाना आवश्यक हो जाता है। अध्ययन से ज्ञात है कि लोगों के पास परसंस्कृतिग्राही परिवर्तन का मार्ग बदल जा सकता है। लोगों के पास परसंस्कृति ग्रहण से संबंधित कई विकल्प होते हैं। परसंस्कृति ग्रहण एक विशिष्ट नैतिक घटना है जिसका अध्ययन आत्मनिष्ठ तथा वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। भाषा, वेशभूषा, जीवन-शैली, जीवन-यापन के साधन, घर का प्रबंध, घर के साधन (आभूषण, फर्नीचर, रेडियो, टी.वी.), यात्रा के अनुभव, चलचित्रों का प्रदर्शन इत्यादि जीवन-यापन में अपनाये जाने वाले परिवर्तनों की सूचना देते हैं।

परिवर्तनों का परीक्षण या अभिवृतियाँ द्वन्द्व की समस्या से छुटकारा दिलाने में समर्थ हैं। इन्हें एक प्रमुख युक्ति माना जाता है। जीवन पद्धति से जुड़े परिवर्तनों के प्रति सजग रहना परसंस्कृति ग्रहण का मार्ग खोल देता है। साथ ही साथ समाकलन, आत्मसात्करण, पृथक्करण तथा सीमांतकरण नामक चार युक्तियों का उपयोग करके परसंस्कृति ग्रहण की संभावना को और अधिक पुष्ट बनाया जा सकता है। समाकलन नामक युक्ति में दो भिन्न संस्कृतियों को समान मूल्य दिया जाता है। आत्म सात्करण नामक युक्ति के द्वारा अपनी सांस्कृतिक अनन्यता को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।

पृथक्करण:
लोगों को दूसरे सांस्कृतिक समूहों के अन्यान्य क्रिया से बचना चाहिए।

सीमांतकरण:
अनिश्चय की स्थिति में रहने वाले लोग दो तरह के प्रश्नों के उत्तर जानने को उत्सुक रहते हैं।

(क) उन्हें क्या करना चाहिए?
(ख) वे क्यों दयनीय स्थिति में कैसे बने रहते हैं?

Bihar Board Class 11 Psychology मानव व्यवहार के आधार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तंत्रिका-कोष सन्धि का परिचय दें।
उत्तर:
किसी सूचना के प्रसारण की स्थिति में तंत्रिका आवेग को संचारित करना होता है। इस प्रक्रिया में एक तंत्रिका कोशिका निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका को संदेश दे देती है। पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अक्ष तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध या तंत्रिका कोष-संधि बनाते हैं।

प्रश्न 2.
तंत्रिका तंतु का क्रमबद्ध प्रतिरूपण एक आरेख के रूप में किस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है।
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र है जिसके प्रमुख अंश अलग-अलग तरह से व्यवस्थित रहकर विभिन्न प्रकार्यों से संलग्न रहते हैं। जैसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कठोर हड्डी के खोल (कपाल) के अन्दर पाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका तंत्र का कार्य ऐच्छिक नियंत्रण से बाहर होता है।

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प्रश्न 3.
परिधीय तंत्रिका तंत्र में क्या पाए जाते हैं?
उत्तर:
परिधीय तंत्रिका तंत्र में वे समस्त तंत्रिका कोशिकाएँ तथा तंत्रिका तंतु पाए जाते हैं जो केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को पूरे शरीर से जोड़ते हैं। कायिक तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र इसके प्रमुख भाग होते हैं।

प्रश्न 4.
कायिक तंत्रिका तंत्र के तीन प्रमुख हिस्से क्या हैं?
उत्तर:
कायिक अथवा कपालीय तंत्रिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं –

  1. संबेदी: जो संवेदी सूचनाओं का संग्रह करती है।
  2. पेशीय: जो पेशीय आवेगों को सिर के क्षेत्र में पहुँचाती है।
  3. मिश्रित: जो मेरुरज्जू के 31 समुच्चयों के रूप में संवेदी तथा संवहन दो तरह के कार्यों को पूरा करती है।

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प्रश्न 5.
स्वायत्त तंत्रिका के दो खण्ड क्या हैं? उनका तुलनात्मक अध्ययन किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के दो प्रमुख खण्ड हैं –

  1. अनुकम्पी खण्ड तथा
  2. परानुकंपी खण्ड विपरीत प्रभाव डालने वाले दोनों खण्डों का संतुलन बनाये रखने के लिए मिलकर कार्य करने होते हैं। परानुकंपी खण्ड मुख्यतः ऊर्जा के संरक्षण से सम्बद्ध होते हैं। अनुकंपी खण्ड आपातकालीन स्थितियों को नियंत्रित रखता है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र किनकी सहायता से तथा किस प्रकार के कार्य करते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क और मेरुरज्जु की सहायता से समस्त संवेदी सूचनाओं को संगठित करके मांसपेशियों तथा ग्रंथियों को प्रेरक आदेश देने का काम करता है।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात क्या है?
उत्तर:
एक वयस्क मस्तिष्क का भार 1.36 किग्रा होता है तथा इसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। उसकी मानव व्यवहार और विचार को दिशा प्रदान करने की योग्यता आश्चर्यजनक मानी जाती है।

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प्रश्न 8.
तंत्रिक तंत्र को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र को तीन भागों में विभाजित किया गया है-केंद्रीय तंत्रिकातंत्र, स्वचालित तंत्रिकातंत्र एवं परिधीय तंत्रिकातंत्र।

प्रश्न 9.
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन भाग होते हैं?
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को दो भागों में विभाजित किया गया है-सुषुम्ना नाड़ी एवं मस्तिष्क।

प्रश्न 10.
संवेदी तंत्रिकाएँ कहाँ अवस्थित होती हैं तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
संवेदी तंत्रिका शरीर के सभी भागों में स्थित होती है। इसका मुख्य कार्य ज्ञानेन्द्रियों रे स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके मस्तिष्क तक पहुँचाना है।

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प्रश्न 11.
गति तंत्रिका कहाँ अवस्थित होती है तथा इसके क्या कार्य हैं?
उत्तर:
गति तंत्रिका पूरे शरीर में पायी जाती है। यह मस्तिष्क से उत्पन्न हुए तंत्रिका आवेगों को मस्तिष्क या सुषुम्ना से ग्रहण करके माँसपेशियों, ग्रंथियों तथा शरीर के विभिन्न केन्द्रों तक ले जाने का कार्य करता है।

प्रश्न 12.
मस्तिष्क को किन तीन प्रमुख हिस्सों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क
  2. मध्य मस्तिष्क तथा
  3. अग्र मस्तिष्क उनके उपभागों के नाम मेडुला, ऑबलांगाटा, सेतु अनुमस्तिष्क आदि होते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी आकस्मिक उद्दीपनों के प्रति संवेदी अंगों के द्वारा अनैच्छिक क्रिया के रूप में प्रकट की जाने वाली प्रतिक्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं। जैसे-आँख झपकने की क्रिया।

प्रश्न 14.
साहचर्य तंत्रिका का क्या कार्य है?
उत्तर:
साहचर्य तंत्रिका का स्थान मस्तिष्क में तथा कुछ सुषुम्ना नाड़ी में होता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तंत्रिका से स्नायु-प्रवाहों को ग्रहण करके दूसरे साहचर्य तंत्रिका या गति तंत्रिका तक पहुँचाना होता है।

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प्रश्न 15.
अंतःस्रावी ग्रन्थि (Endocrine gland) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनुष्य के शरीर में वैसी ग्रन्थियाँ जिनसे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। ऐसी ग्रन्थियों को अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहा जाता है।

प्रश्न 16.
आनुवंशिकता की विशेषताएं बतायें।
उत्तर:
हम अपने माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में पाते हैं। अपने पूर्वजों से प्राप्त उत्तराधिकार में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ मिली रहती हैं। आनुवांशिक तत्व के प्रमुख तत्व गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में उपस्थित रहते हैं। जीन में उत्परिवर्तन की क्षमता होती है।

प्रश्न 17.
हमारे व्यवहार किससे प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
हमारे कई व्यवहार अंत:स्रावों से प्रभावित होते हैं तो कई व्यवहार प्रतिवर्ती अनुक्रियाओं के कारण होते हैं। हालाँकि हार्मोन तथा प्रतिवर्ती हमारे व्यवहार में आनेवाले अन्तरों की स्पष्ट व्याख्या नहीं कर पाती हैं। हमारे व्यवहार पर सांस्कृतिक शक्तियों का प्रभाव भी स्वाभाविक है। मानव काम-व्यवहार अनेक नियमों, मान, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित रहते हैं।

प्रश्न 18.
समाजीकरण के प्रमुख कारकों की चर्चा करें।
उत्तर:

  1. माता-पिता तथा घर के अन्य सदस्य
  2. विद्यालय
  3. समसमूह
  4. जन-संचार आदि समाजीकरण के प्रमुख कारक माने जाते हैं

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प्रश्न 19.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियों को किन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
परसंस्कृति ग्रहण के मार्ग में लोगों द्वारा जो परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ अपनाई जाती हैं वे हैं –

  1. समाकलन
  2. आत्मसात्करण
  3. पृथक्करण तथा
  4. सीमांतकरण

प्रश्न 20.
अंतःस्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखें।
उत्तर:
अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. थाइरायड ग्रन्थि
  2. पाराथायरायड ग्रंथि
  3. पिट्यूटरी ग्रन्थि
  4. एड्रीनल ग्रन्थि
  5. गोनाड्स (यौन ग्रन्थि)

प्रश्न 21.
लोग शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। क्यों?
उत्तर:
लोगों की विशिष्टताएँ, उनकी आनुवांशिक और पर्यावरण की माँगों के बीच अंतःक्रिया का परिणाम होती है। अर्थात् किसी प्रजाति के पूर्ववर्ती प्रारूपों में पर्यावरण की परिवर्तित होती हुई अनुकूलन की आवश्यकताओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जैविकीय परिवर्तन तथा विकास होता रहता है।

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प्रश्न 22.
आधुनिक मानव के किन तीन महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों के कारण वे अपने पूर्वजों से अलग प्रतीत होते हैं?
उत्तर:

  1. बड़ा और विकसित मस्तिष्क
  2. दो पैरों पर सीधा खड़ा होकर चलने की क्षमता तथा
  3. काम करने योग्य विपरीत अँगूठे के साथ मुक्त हाथ

प्रश्न 23.
हमारे व्यवहार का महत्त्वपूर्ण निर्धारक किसे माना जा सकता है?
उत्तर:
हमारी जैविकीय संरचना, जो हमें हमारे पूर्वजों से एक विकसित शरीर और मस्तिष्क के रूप में प्राप्त हुई है, हमारे व्यवहार का निर्धारक बनकर हमारी सहायता करती है। हम अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर पर्यावरण से समझौता करते हुए जीवन की विकास पथ अग्रसरित करते है।

प्रश्न 24.
तंत्रिका कोशिकाएँ क्या हैं?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई है। ये उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है तथा प्राप्त सूचना को विद्युत रासायनिक संकेतों में बदलकर अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करती है।

प्रश्न 25.
मानव तंत्रिका तंत्र में कितनी कोशिकाएँ हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका तंत्र में आकार, संरचना एवं कार्य करने की प्रवृत्ति और क्षमता की दृष्टि से भिन्न मानी जानेवाली लगभग बारह अरब तंत्रिका कोशिकाएँ हैं।

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प्रश्न 26.
वे तीन मूलभूत घटक क्या हैं जो तंत्रिका कोशिकाओं में भिन्नता पाई जाने पर भी समान रूप से पाए जाते हैं?
उत्तर:
सभी तंत्रिका कोशिकाओं में समान रूप से पाए जाने वाली तीन घटक हैं –

  1. काय (soma)
  2. पार्श्व तंतु (dendrites) तथा
  3. असतंतु (axon) ये कार्य की दृष्टि से अलग-अलग महत्त्व रखते हैं।

प्रश्न 27.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
तंत्रिका तंत्र में प्रवाहित होने वाली सूचनाओं के परिवर्तित रूप को तंत्रिका आवेग कहते हैं जो उद्दीपक ऊर्जा के सशक्त होने पर ही उत्पन्न होती है। इसकी शक्ति तंत्रिका तंतु के साथ-साथ स्थिर रहती है।

प्रश्न 28.
सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम (All or non law) क्या है?
उत्तर:
जब कोई स्नायु-प्रवाह चलता है अर्थात एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन में जाता है तो अपनी पूरी शक्ति के साथ जाता है, अन्यथा रुक जाता है। इसे ही सम्पूर्ण या बिल्कुल नहीं का नियम कहते हैं।

प्रश्न 29.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
नयूरॉन का वह हिस्सा जो तांत्रिक आवेग को दूसरे न्यूरॉन में छोड़ता है, उसे एक्सॉन कहा जाता है।

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प्रश्न 30.
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक किसमें होती है?
उत्तर:
न्यूरॉन की संख्या सबसे अधिक मस्तिष्क में होती है।

प्रश्न 31.
संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संस्कृति उन प्रतीकात्मक एवं सीखे हुए पक्षों को बिंबित करती है जिसमें भाषा, प्रथा, परम्पराओं आदि का समावेश किया जाता है।

प्रश्न 32.
संस्कृति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है – एक समाज विशेष के सदस्यों के सम्पूर्ण व्यवहार प्रतिमानों और समग्र जीवन विधि को ही संस्कृति कहा जाता है जो सामाजिक विरासत के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है।

प्रश्न 33.
भौतिक संस्कृति क्या है?
उत्तर:
भौतिक संस्कृति का संबंध उन बुनियादी दशाओं से है जिसमें भौतिक वस्तुएँ होती. हैं, जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है तथा जिन्हें देखा जा सकता है।

प्रश्न 34.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम में नियम, अपेक्षाएँ और मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।

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प्रश्न 35.
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम क्या हैं?
उत्तर:
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम का अभिप्राय मिथकों, अंधविश्वासों, वैज्ञानिक तथ्यकलाओं एवं धर्म से जुड़े हुए विचार हैं।

प्रश्न 36.
समाजीकरण का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक नवजात शिशु जो जन्म के समय न सामाजिक होता है और न असामाजिक, किसी विशिष्ट समाज का क्रियाशील सदस्य बन जाता है जो जन्म के बाद प्रारंभ होता है।

प्रश्न 37.
संस्कृति और मानवीय व्यवहार का क्या संबंध है?
उत्तर:
संस्कृति मनुष्य को विरासत में प्राप्त होती है इसलिये जिस संस्कृति में मनुष्य जीवन-यापन करता है उसी के अनुसार उसका सम्पूर्ण सामाजिक व्यवहार भी हो जाता है। इस पर मनोवैज्ञानिक व्यवहार का प्रभाव अवश्य पड़ता है।

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प्रश्न 38.
संस्कृतिकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संस्कृतिकरण सामाजिक परिवर्तन का एक स्वाभाविक आयाम है। अपनी संस्कृति के सभ्य लोगों के अनुरूप अपनी जीवन-शैली में परिवर्तन लाने और उनकी संस्कृति के मानदण्डों के अनुरूप व्यवहार करने को संस्कृतिकरण कहा जाता है।

प्रश्न 39.
आधुनिकीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आधुनिकीकरण मानवीय सामाजिक व्यवहार की एक ऐसी क्रिया है जिसमें मनुष्य आधुनिक विचारों और तकनीक के आधार पर सामाजिक व्यवहार करता है। मनुष्य आधुनिक विचारों से प्रभावित हो जाता है।

प्रश्न 40.
मस्तिष्क को कितने मुख्य भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
मस्तिष्क को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है-पश्च मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क तथा अग्र मस्तिष्क।

प्रश्न 41.
पश्च मस्तिष्क में मस्तिष्क के कौन-कौन से भाग आते हैं?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क के अन्तर्गत मेडुला, सेतु एवं लघु मस्तिष्क आते हैं।

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प्रश्न 42.
मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा कौन होता है?
उत्तर:
मस्तिष्क का सबसे नीचे तथा पीछे सुषुम्ना शीर्ष (Medulla) अवस्थित होते हैं !

प्रश्न 43.
लघु मस्तिष्क का क्या कार्य है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क का सबसे प्रमुख कार्य शारीरिक संतुलन को बनाए रखना होता है।

प्रश्न 44.
लघु मस्तिष्क कितने खण्डों में बँटा होता है तथा इसे मिलाने का कार्य कौन करता है?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क दो खण्डों में विभाजित रहता है जिसे मिलाने का काम सेतु करता है।

प्रश्न 45.
मध्य मस्तिष्क को कितने भागों में विभाजित किया जाता है?
उत्तर:
मध्य मस्तिष्क को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। इसके ऊपरी भाग को रूफ या टेक्टम कोने हैं तथा नीचे का भाग फ्लोर कहलाता है।

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प्रश्न 46.
पश्च मस्तिष्क (Hind brain) तथा मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर क्या कहा जाता है?
उत्तर:
पश्च मस्तिष्क और मध्य मस्तिष्क को एक साथ मिलाकर मस्तिष्क स्तम्भ कहा जाता है।

प्रश्न 47.
किसके द्वारा लघु मस्तिष्क (Cerebelum) तथा प्रमस्तिष्क (Cerebrum) आपस में मिलते हैं?
उत्तर:
लघु मस्तिष्क तथा प्रमस्तिष्क हाइपोथैलेमस द्वारा आपस में मिलते हैं।

प्रश्न 48.
प्रमस्तिष्क (Cerebrum) में कितने गोलार्द्ध (Hemisphere) होते हैं?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं।

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प्रश्न 49.
संधि-स्थल (Synapse) क्या है?
उत्तर:
जहाँ दो या दो से अधिक तंत्रिकाएं आपस में मिलती हैं उस स्थान को संधि-स्थल कहते हैं।

प्रश्न 50.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई किसे कहा जाता है?
उत्तर:
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन कहा जाता है।

प्रश्न 51.
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से कितनी होती है?
उत्तर:
मनुष्य में तंत्रिका आवेग की गति सामान्य रूप से 100 मीटर प्रति सेकेण्ड होती है।

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प्रश्न 52.
थैलेमस का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
थैलेमस का मुख्य कार्य शरीर के विभिन्न भागों से आए हुए स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क में निश्चित स्थान पर भेजना है। इसका संबंध संवेगों से भी होता है।

प्रश्न 53.
न्यूरॉन में शाखिकाएं (Dendrites) कहाँ होती हैं?
उत्तर:
शाखिकाएँ कोश शरीर के चारों तरफ शाखा की तरह फैल जाती हैं। इसका आकार बहुत छोटा होता है तथा इसकी भी कई उप-शाखाएँ होती हैं।

प्रश्न 54.
ऐक्सॉन (Axon) क्या है?
उत्तर:
यह न्यूरॉन का एक पतला लम्ब भाग है। इसका एक छोर कोश शरीर से जुड़ा होता है तथा दूसरे छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिसे एण्डल ब्रम कहते हैं।

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प्रश्न 55.
समाजीकरण की प्रक्रिया जन्मजात होती है या अर्जित?
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया अर्जित होती है, क्योंकि मनुष्य समाज में होनेवाले परिवर्तन के अनुसार अपने-आपको समायोजित करने का प्रयत्न करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रत्येक की स्थिति बतावें –
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ
(ख) पार्श्व तंतु
(ग) अवटु ग्रंथि
(घ) मेडुला
उत्तर:
(क) साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ:
मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के द्रव्य के ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं।

(ख) पावं तंतु:
मानव तंत्रिका तंत्र के तीन मूलभूत घटकों में से एक पार्श्व तंतु का नाम लिया जाता है। तंत्रिका कोशिका का अधिकांश कोशिका द्रव्य काय (soma) कोशिका में होती है। पार्श्व तन्तु (Dendrites) शाखाओं की तरह की विशिष्ट संरचना के साथ काय कोशिका से निकलते हैं। पाव तंतु में विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो किसी विद्युत-रासायनिक या जैव रासायनिक संकेत के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अवटु ग्रंथि:
अवटु ग्रन्थि गले में स्थित होती है। यह भाइरॉक्सिन नामक अंतःस्राव उत्पन्न करती है जो शरीर में चपापचय की दर को प्रभावित करता है।

(घ) मेडुला आबलांगाटा:
पश्च मस्तिष्क का एक प्रमुख हिस्सा बनकर मेडुला आबलांगाटा मूलभूत जीवन सहायक गतिविधियों को नियमित करने में सहायक होते हैं। मेडुला मस्तिष्क का सबसे निचला हिस्सा है। इसे मस्तिष्क का जीवनधार केन्द्र माना जाता है।

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प्रश्न 2.
आनुवंशिकता के प्रति जीवन एवं गुणसूत्र के व्यवहार का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
एक बच्चा अपने जन्म के समय.अपने माता-पिता से प्राप्त जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। उसे माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार में जीन के रूप में मिलता है। यह उत्तराधिकार व्यक्ति के विकास को जैविक नक्शा और समय सारणी प्रदान करता है। आनुवंशिकी की रूप में बच्चा को कुछ शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ उपलब्ध हो जाती हैं। निषेचित युग्मनज के गुणसूत्र प्रत्येक कोशिका के केन्द्र में होता है। गुणसूत्र को शरीर का आनुवंशिक तत्व माना जाता है। गुणसूत्र की संरचना धागे जैसी होती है। युग्मक-कोशिकाओं। में 23 गुणसूत्र पाए जाते हैं।

जीन अथवा DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। गुणसूत्र के एक विशेष जोड़े के प्रत्येक गुणसूत्र पर एक जीन स्थित होता है। लिंग गुणसूत्रों का जोड़ा आनेवाले बच्चे का लिंग निर्धारण करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवांशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। कुछ विशिष्ट जीन नियंत्रक जैसा कार्य करता है। जीनोटाइप और फीनोटाइप के माध्यम से वह कायिक संरचना तथा व्यवहार की कुशलता का निर्धारण करता है। उत्परिवर्तन कहलाने वाली क्रिया के माध्यम से जीन में रूपान्तरण संभव होता है। फलतः नयी जातियों की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार आनुवंशिक नामक प्रवृत्ति के विकास में जीन और गुणसूत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी व्यक्ति का कद, स्मृति, चेहरा, क्रोध जैसे गुण जीन अथवा गुणसूत्रों की देन होती है।

प्रश्न 3.
समाज जीव विज्ञान का क्षेत्र बतलावें।
उत्तर:
जीव विज्ञान और समाज की अन्योन्य क्रिया से संबंधित आधुनिक विद्याशाखा को समाज मनोविज्ञान कहकर संबोधित करते हैं। समावेशी उपयुक्तता के आधार पर यह विद्याशाखा मनुष्य के सामाजिक व्यवहार की व्याख्या करता हैं। समाज के प्रति सर्वप्रिय व्यवहार की कला को प्रभावित करने वाले जैविक कारकों का समुचित अध्ययन करके ही संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। इसी कारण हम संस्कृति के संदर्भ में उपलब्ध कुछ विचारों तथा मूल्यों को सामाजिक परिवेश में सीखना-समझना चाहते हैं।

माता-पिता, विद्यालय, समसमूह, जनसंचार के अतिरिक्त पर्यावरण की विविधता हमें समाज जीवन विज्ञान के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है। सफल जीवन के लिए हमें संस्कृतिकरण और समाजीकरण की विधियों, नियमों, मूल्यों की दृष्टि से स्पष्टतः समझना होगा। अध्ययन की प्रगाढ़ता के क्रम में हमें पता लगेगा कि प्रत्येक जीवन से अच्छे व्यवहार की प्रत्याशा की जाती है जिससे प्रजनन और पालन-पोषण से सम्बन्धित सभी प्रकार की जानकारियाँ मिल सकें।

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प्रश्न 4.
“हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं।” कैसे?
उत्तर:
हमारे पास बड़ा और अधिक विकसित मस्तिष्क है। हमारे मस्तिष्क का वर्जन हमारे शरीर के कुल भार का 2.35 प्रतिशत है जो अन्य प्रजातियों की तुलना में सर्वाधिक है। मनुष्य के प्रमस्तिष्क को अन्य भागों की तुलना में अधिक विकसित और उपयोगी माना जाता है। मानव अपने व्यवहार से पर्यावरण के साथ संतुलन बनाते हुए जीवन-क्रिया को आगे बढ़ा लेता है।

हम अपने सार्थक एवं विकसित व्यवहार के कारण आहार की व्यवस्था करने में, परभक्षी से स्वयं को सुरक्षित रखने में, बच्चों को शिक्षा एवं सुरक्षा प्रदान करने में अन्य प्रजातियों की तुलना में स्थिति के अनुसार विधियों एवं साधनों को बदल लेने की क्षमता अधिक विकसित रूप में रखते हैं।

आनुवांशिकता, जीन, गुणसूत्र आदि के महत्व को समझाते हुए सांस्कृतिक दशा के अनुकूल बनाने में हम सक्षम हैं। अनुभव प्राप्त करने अथवा कुछ सीखने-समझने की प्रवृत्ति हममें अपेक्षाकृत अधिक होती है। हमारे पास न केवल समान जैविकीय तंत्र, बल्कि निश्चित सांस्कृतिक तंत्र भी होते हैं। उत्तरजीविता से सम्बन्धित उद्देश्यों को पूरा करने में हमारी सतर्कता एकाधिकार रखती है।

प्रश्न 5.
अंतस्थ बटन (Terminal buttons) किसे कहते हैं? कार्य के आधार पर परिचय दें।
उत्तर:
मेरुरज्जु के अंतिम सिरे पर अक्ष तंतु छोटी-छोटी कई शाखाओं में बँट जाती है जिन्हें अंतस्थ बटन कहा जाता है। अंतस्थ बटन में अन्य तंत्रिका कोशिकाओं, ग्रन्थियों और मांसपेशियों में सूचना भेजने की क्षमता होती है। अक्षतन्तु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है जो मेरुरज्जु में कई फीट तक और मस्तिष्क में एक मिली मीटर से कम हो सकते हैं। इस असमर्थता की स्थिति में अंतस्थ बटन सूचना संवहन में निर्णायक कार्य करता है।

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प्रश्न 6.
तंत्रिका तंत्र का कौन-सा भाग ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है?
उत्तर:
सभी प्राणियों में मानव तंत्रिका तंत्र सर्वाधिक जटिल एवं विकसित तंत्र होता है। यद्यपि तंत्रिका तंत्र समग्र रूप से कार्य करता है फिर भी इसके अलग-अलग विभागों में अलग-अलग तरह के कार्य करने की प्रवृत्ति होती है। केन्द्रीय तंत्रिका के साथ परिधीय तंत्रिका तंत्र के अस्तित्व को पहचानने के बाद कायिक तंत्रिका तंत्र तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध होता है।

कायिक तंत्रिका तंत्र में कपालीय तथा मेरु तंत्रिका संलग्न होते हैं। संवेदी, पेशीय और मिश्रित तंत्रिकाओं के द्वारा देखने, सुनने के क्रम में नियंत्रण की आवश्यकता पूरी की जाती है। कपालीय तंत्रिकाओं के 12 समुच्चय होते हैं जबकि मेरु तंत्रिकाओं के 31 समुच्चय मिलते हैं। ये दोनों मिलकर संवाद का संवहन तथा संचरण करते हैं। अर्थात् कायिक तंत्रिका तंत्र संवेदी और पेशीय होने के साथ-साथ ऐच्छिक प्रकार्यों से सम्बद्ध माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
मस्तिष्क की प्राचीनतम तथा नवीनतम संरचनाओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
मस्तिष्क की प्राचीनतम संरचनाएँ उपवल्कुटीय यंत्र, मस्तिष्क स्तम्भ तथा अनुमस्तिष्क को प्राचीनतम संरचनाएँ मानी जाती हैं। लगातार चलनेवाली विकासात्मक प्रक्रियाओं के कारण प्रमस्तिष्कीय वल्कुट नामक परिवर्धन का पता चला है जो मस्तिष्क की नवीनतम परिवर्धन माना जाता है। विकास क्रम में यह भी पता चला है कि एक वयस्क मस्तिष्क का भार लगभग 1.36 किग्रा. है जिसमें 100 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ सक्रिय रहती हैं। मस्तिष्कीय क्रम वीक्षण से पता चलता है कि कुछ मानसिक प्रकार्य मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में वितरित हैं। प्रमस्तिष्कीय वल्कुट को चार पालियों में विभक्त किया गया है –

  1. ललाट पालि
  2. पार्विक पालि
  3. शंख पालि और
  4. पश्च कपाल पालि

अवधान, चिंतन, स्मृति, तर्कना, देखना, सुनना, सूचनाओं का संवहन, चाक्षुष आवेगों की व्याख्या करना प्रमस्तिष्कीय वल्कुट की विभिन्न पालियों के माध्यम से सरलता से पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 8.
संधिस्थल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक न्यूरोन के एक्सॉन तथा दूसरे न्यूरोन की शाखिकाओं के मिलन-स्थल को संधिस्थल कहा जाता है। संधिस्थल की विशेषता यह होती है कि एक्सॉन तथा शाखिकाएँ एक-दूसरे से सटी हुई नहीं होती फिर भी तंत्रिका आवेग का संचरण एक्सॉन से शाखिकाओं में हो जाता है। ऐसा संभव इसलिए हो पाता है, क्योंकि एक्सॉन की छोटी-छोटी पुस्तिकाओं से एक विशेष रासायनिक तरल पदार्थ जिसे न्यूरोट्रांसमीटर (neurotransmitter) कहा जाता है, निकलता है जिसके कारण यह स्थान गीला हो जाता है तथा दोनों में संबंध स्थापित हो जाता है। फलस्वरूप, आसानी से तंत्रिका आवेग आगे बढ़ जाता है। इस तरह, संधिस्थल तंत्रिका आवेग को पहले रोकता है तथा फिर उसका मार्ग प्रशस्त कर आगे बढ़ने देता है।

प्रश्न 9.
पूर्ण या शून्य नियम क्या है?
उत्तर:
पूर्ण या शून्य नियम तंत्रिका आवेग (nerve impulse) के संचरण (conduction) का एक नियम है जो यह बताता है कि जब कोई न्यूरोन किसी उपयुक्त उद्दीपन से उत्तेजित होता है तब वह या तो अपनी पूरी शक्ति के साथ उत्तेजित होता है या फिर बिल्कुल ही उत्तजित नहीं होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि उद्दीपन की शक्ति काफी कमजोर होती है जो न्यूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न ही नहीं कर पाती है। परंतु, यदि उससे नयूरोन में तंत्रिका आवेग उत्पन्न हो गया तो वह अपनी पूर्ण शक्ति के साथ उत्पन्न होगा न कि उद्दीपन की शक्ति के समान क्षीण मात्रा में।

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प्रश्न 10.
प्रतिवर्त क्रिया किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया वह स्वचालित (automatic) या अनैच्छिक (invol untary) अनुक्रिया है जो किसी उद्दीपन (stimulus) द्वारा उत्पन्न होती है। जैसे, आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक का अपने-आप बंद हो जाना, गर्म वायु से अंगुली का स्पर्श होने पर हाथ को झट पीछे खींच लेना आदि प्रतिवर्त क्रिया के उदाहरण हैं। प्रतिवर्त क्रिया की मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित हैं –

  1. प्रतिवर्त क्रिया अर्जित (acquired) न होकर जन्मजात होती है।
  2. यह स्वचालित या अनैच्छिक होती है।
  3. इस क्रिया की उत्पत्ति के लिए उद्दीपन (stimulus) का होना अनिवार्य है।
  4. प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन मस्तिष्क से न होकर सुषुम्ना से ही होता है।

प्रश्न 11.
प्रतिवर्त अनुक्रिया तथा प्रतिवर्त धनु में अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रतिवर्त अनुक्रिया या सहज अनुक्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति किया गया एक स्वचालित (automatic) जन्मजात अनुक्रिया है। जैसे आँख पर तीव्र रोशनी पड़ते ही आँख के पटल का अपने आप बंद हो जाना, हाथ में पिन चुभने या किसी के द्वारा चुभाये जाने पर हाथ का झट से पीछे खींच लेना एक प्रतिवर्त अनुक्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) जिन प्रक्रियाओं एवं अंगों से होकर गुजरता है उसे ही प्रतिवर्ष धनु (reflex arc) कहा जाता है। इसमें ज्ञानेन्द्रिय, संवेदी न्यूरॉन, सुषुम्ना तथा विशेष भाग, साहचर्य न्यूरॉन, कर्मेन्द्रिय आदि अंग सम्मिलित रहते हैं।

प्रश्न 12.
अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर की विभिन्न अंतःस्त्रावी ग्रन्थियों का नाम बतायें।
उत्तर:
शरीर के विभिन्न भागों में उपस्थित नलिकाविहीन ग्रन्थिं जो हार्मोन को अन्तःस्रावित करता है, अन्तःस्रावी ग्रन्थि कहलाता है। शरीर में निम्नलिखित अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि
  2. थायराइड ग्रंथि
  3. पाराथायरायड ग्रन्थि
  4. अधिवृक्क ग्रन्थि

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प्रश्न 13.
बहिःस्त्रावी ग्रंथि तथा अंतःस्रावी ग्रंथि में अंतर करें।
उत्तर:
बहिःस्रावी ग्रंथि वैसी ग्रंथि को कहा जाता है जिसके स्राव को निकलने के लिए विशेष मार्ग या नली बनी होती है। यही कारण है कि इसे नलिका विहीन ग्रंथि भी कहा जाता है। अंतःस्रावी ग्रंथि से तात्पर्य वैसी ग्रंथि से होता है जिसका स्त्राव निकलने के लिए किसी तरह की नली या मार्ग नहीं होता है। फलस्वरूप इसका स्राव सीधे खून में मिल जाता है तथा महत्त्वपूर्ण शारीरिक एवं मानसिक प्रभाव उत्पन्न करता है। शारीरिक एवं मानसिक विकास के दृष्टिकोण से अंतःस्रावी ग्रंथियाँ बहिःस्रावी ग्रंथियों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 14.
तंत्रिका तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी जब कोई अनुक्रिया करता है तब इसमें तीन तरह के अंगों का समन्वय होता है-ग्राहक (receptor) या ज्ञानेन्द्रिय, प्रभावक (effectors) अर्थात् मांसपेशियाँ एवं ग्रंथि तथा समायोजक (adjustor)। समायोजक का काम ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रभावक के बीच संबंध स्थापित करना होता है। समायोजक का दूसरा नाम तंत्रिका (nerve) है। अनेक तंत्रिकाएँ आपस में मिलकर ग्राहक तथा प्रभावक में विशेष संबंध स्थापित करती हैं और व्यक्ति सही-सही अनुक्रिया कर पाता है। इन तंत्रिकाओं के समूह या गुच्छा को तंत्रिका तंत्र या स्नायुमंडल (nervous system) कहा जाता है।

प्रश्न 15.
तंत्रिका आवेग क्या है?
उत्तर:
प्रत्येक न्यूरोन एक छोटी पतली आवरण से ढंका होता है। जब कोई उपयुक्त उद्दीपन उस आवरण को उत्तेजित करता है तब उससे न्यूरोन भी उत्तेजित हो जाता है। इससे एक तरह का वैद्यत रासायनिक आवेग (electro chemical impulse) पैदा होता है जिसे तंत्रिका आवेग (nerve impulse) कहा जाता है। तंत्रिका आवेग की गति सामान्यतः 100 मीटर प्रति सेकंड होती है।

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प्रश्न 16.
सुषुम्ना की संरचना का वर्णन करें।
उत्तर:
सुषुम्ना (spinal cord) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का एक प्रमुख भाग है। रीढ़ की हड्डी जो गर्दन से कमर तक फैली हुई है, में एक विशेष तरल पदार्थ भरा हुआ होता है और उसमें एक मोटा तंतु (Fibres) होता है। इसे सुषुम्ना कहा जाता है। रीढ़ की हड्डी में 31 जोड़ (Joints) होते हैं और प्रत्येक जोड़ के बाएँ तथा दाएँ भाग से एक-एक तंतु सुषुम्ना तंत्रिका के भी 31 जोड़ होते हैं। प्रत्येक जोड़ा में एक संवेदी तंत्रिका (sensory nerve) तथा दूसरा गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) होती है।

संवेदी तंत्रिका का संबंध ज्ञानेन्द्रियों से तथा गतिवाही तंत्रिका का संबंध कर्मेन्द्रिय (motor organs) से होता है। सुषुम्ना को कहीं से भी काटकर देखा जाए तो इसकी भीतरी संरचना (internal structure) एक ही समान दीख पड़ती है।सुषुम्ना के इस कटे हुए बीच के भाग का आकार तितली (butter fly) के समान होता है और इस भाग का रंग भूसर (gray) होता है। इसके बीच के भाग के चारों तरफ तरल पदार्थ होते हैं जिसे अनेक तंत्रिका तंत्र ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखलाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सुषुम्ना को तथा नीचे से ऊपर जाने वाले तंत्रिका तंतु द्वारा सुषुम्ना से मस्तिष्क को सूचनाएँ मिलती हैं।

प्रश्न 17.
शाखिका तथा एक्सॉन में अंतर बतलाएँ।
उत्तर:
न्यूरॉन के दो महत्त्वपूर्ण भाग (dendrite) तथा एक्सॉन (axon) हैं। शाखिका के आकार पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होते हैं जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं। इसके द्वारा न्यूरॉन दूसरे न्यूरॉन से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है। न्यूरॉन के उस भाग को एक्सॉन कहा जाता है जो कोश शरीर (cell body) से निकलकर आगे की ओर लम्बत: बढ़ा हुआ होता है। यह एक ऐसे परत या आवरण से ढंका होता है जो प्रत्येक दो मिलीमीटर पर कुछ दबा हुआ-सा होता है। एक्सॉन द्वारा तंत्रिका आवेग न्यूरॉन से निकलकर दूसरे न्यूरॉन की शाखिका में जाते हैं। अत: एक्सॉन न्यूरॉन का एक सुपुर्दगी केन्द्र (delivery centre) होता है।

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प्रश्न 18.
तंत्रिका कोशिका क्या कार्य करती है?
उत्तर:
तंत्रिका कोशिका हमारे तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाई मानी जाती है। तंत्रिका कोशिकाएँ विशिष्ट कोशिकाओं के रूप में विभिन्न प्रकार के उद्दीपकों को विद्युतीय आवेग में बदलती है। ये सूचना को विद्युत-रासायनिक संकेतों के रूप में ग्रहण करने, संवहन करने तथा अन्य कोशिकाओं तक भेजने में भी निपुण होते हैं। ये ज्ञानेन्द्रियों से सूचना प्राप्त करती है तथा उसे केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक ले जाती है।

प्रश्न 19.
मानव तंत्रिका तंत्र के कौन-कौन से तीन मूलभूत घटक पाये जाते हैं?
उत्तर:
मानव तंत्रिका में 12 अरब तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं जिनकी आकृति, आकार, रासायनिक संरचना और प्रकार्य में काफी भिन्नता होती है। इन भिन्नताओं के मिलने पर भी तीन मूलभूत घटक समान रूप से पाए जाते हैं –

(क) काय (Soma):
निकटवर्ती तंत्रिका कोशिका से आनेवाले तंत्रिका आवेग को ग्रहण करते हैं। ये पार्श्व तन्तु शाखाओं की तरह विशिष्ट संरचना वाले होते हैं।

(ख) पार्श्व तन्तु (Dendrites):
इसमें विशिष्ट ग्राहक होते हैं जो जैव रासायनिक संकेत (विद्युत रासायनिक) के मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं।

(ग) अक्ष तन्तु (Axon):
अक्ष तंतु अपनी लम्बाई के साथ-साथ सूचना का संवहन करता है। इसके अंतिम सिरे पर अंतस्थ बटन के रूप में छोटी-छोटी शाखाओं के पुंज होते हैं।

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प्रश्न 20.
तंत्रिका कोष सन्धि का निर्माण किस प्रकार से होता है?
उत्तर:
पूर्ववर्ती तंत्रिका कोशिका के अग्र तंतु के संकेत दूसरी तंत्रिका के पार्श्व तंतु से प्रकार्यात्मक संबंध बनाते हैं जिसे तंत्रिका कोष सन्धि भी कहते हैं। सन्धि स्थलीय संचरण की प्रकृति रासायनिक होती है जो रासायनिक पदार्थ तंत्रिका-संचारक कहलाते हैं। तंत्रिका कोष सन्धि के मध्य भाग में पाये जाने वाले खाली स्थान को सन्धि स्थलीय खण्ड कहा जाता है।

प्रश्न 21.
परिधीय तंत्रिका तंत्र का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका को पूरे शरीर से जोड़ने वाले समस्त तंत्रिका कोशिकाओं तथा तंत्रिका तन्तु को परिधीय तंत्रिका तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 22.
मस्तिष्क की संरचना उसके तीन प्रमुख हिस्सों में स्थित भिन्न-भिन्न उपभागों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
मस्तिष्क के तीन प्रमुख हिस्से होते हैं –

  1. पश्च मस्तिष्क-इसके उपभाग मेडुला ऑबलांगाटा सेतु तथा अनुमस्तिष्क होते हैं। इनके कारण श्वास प्रक्रिया, स्वमित क्रिया, श्रवण क्रिया, शारीरिक मुद्रा आदि वांछनीय विधि से उपयुक्त कार्य करते हैं।
  2. मध्य मस्तिष्क-इसमें रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम (R.A.S.) भाव प्रबंधन में सहयोग देता है। पर्यावरण से मिलने वाली सूचनाओं के चयन में भी यह सहायक होता है।
  3. अन मस्तिष्क-मस्तिष्क के इस भाग के चार उपविभाग होते हैं –

(क) अधश्चेतक-सांवेगिक तथा अभिप्रेरणात्मक व्यवहारों को नियमित रखने में मदद करता है।
(ख) चेतक-यह सूचना प्रसारण केन्द्र की तरह कार्य करता है।
(ग) उपवल्कुटीय तंत्र-यह तापमान, रक्तचाप और रक्तशर्करा के स्तर को समस्थिति में रखकर शारीरिक क्रिया को संतुलित रखता है। इसमें हिप्पोकेम्पस और गल तुडिका भी समाविष्ट हैं जो दीर्घकालिक स्मृति और संवेगात्मक व्यवहार को नियंत्रित रखता है।

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प्रश्न 23.
कारपस कैलोजम किसे कहा जाता है?
उत्तर:
प्रमस्तिष्क में दो गोलार्द्ध होते हैं:
बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere)। ये दोनों गोलार्द्ध एक-दूसरे से तंत्रिका के एक विशेष गुच्छा से जुड़े होते हैं। इसी विशेष गुच्छा (bundle) का नाम कारपस कैलोजम है।

प्रश्न 24.
प्रमस्तिष्क का विभिन्न पालियों के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क के दोनो गोलार्द्ध केंद्रीय सुलकस तथा लेट्रल दरार की मदद से चार पालियों में बँटे हैं जिनके कार्यों का वर्णन निम्नांकित हैं –

  1. अग्रपालि (Frontal lobe): यह केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर का भाग होता है तथा इसके द्वारा उच्च मानसिक प्रक्रियाओं (higher mental processes) का ज्ञान होता है।
  2. मध्यपालि (Parietal lobe): यह पालि केन्द्रीय सुलकस के आगे तथा लेट्रल दरार के ऊपर होता है । इसके द्वारा मूलतः त्वक संवेदन (touch sensation) अर्थात् ठंड, गर्म, दर्द आदि का ज्ञान होता है।
  3. शंखपालि (Temporal lobe): यह पालि लेट्रल दरार के नीचे जिसे हम कन्पट्टी कहते हैं, में होती है तथा इसके द्वारा श्रवण संवेदनाओं का ज्ञान होता है।

प्रश्न 25.
न्यूरॉन किसे कहते हैं?
उत्तर:
तंत्रिकातंत्र (nervous system) की सबसे छोटी इकाई को न्यूरॉन (neuron) या तंत्रिका कोश कहा जाता है। इसके द्वारा तंत्रिका आवेग प्राणी में एक जगह से दूसरे जगह संचारित होते हैं। अध्ययनों के अनुसार पूरे मानव में न्यूरॉन की संख्या 12.5 अरब (Billion) है जिसमें से करीब 10 अरब सिर्फ मस्तिष्क में ही है। शाखिका (dendrite), जीवकोश (cell body) तथा एक्सॉन (axon) न्यूरॉन के तीन प्रमुख संरचना होते हैं। शाखिका तंत्रिका आवेग को ग्रहण करता है और शरीर (cell body) के ओर भेज देता है। कोश शरीर उसे एक्सॉन (axon) की ओर भेज देता है जो तंत्रिका आवेग को बाहर निकालकर दूसरे न्यूरॉन के शाखिका को सुपुर्द कर देता है।

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प्रश्न 26.
न्यूरॉन के कितने प्रकार होते हैं? संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
(क) संवेदी न्यूरॉन (Sensory of afferent neuron):
इसे ज्ञानवाही न्यूरॉन भी कहा जाता है। संवेदी या ज्ञानवाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेश (nerve impulse) को ज्ञानेंद्रीय (sense organ) से सुषुम्ना एवं मस्तिष्क तक पहुँचता है।

(ख) साहचर्य न्यूरॉन (Association neuron):
इस तरह का न्यूरॉन सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। साहचर्य न्यूरॉन संवेदी न्यूरॉन तथा गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (motor impulse) से साहचर्य स्थापित करता है। संवेदी न्यूरॉन से तंत्रिका आवेश को ग्रस्त करके साहचर्य न्यूरॉन उसे गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन में छोड़ता है।

(ग) गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन (Motor neuron):
गतिवाही या क्रियावाही न्यूरॉन वैसे न्यूरॉन को कहा जाता है जो तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना या मस्तिष्क से केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुँचता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई वांछित अनुक्रिया कर पाता है।

प्रश्न 27.
न्यूरॉन तथा तंत्रिका में अंतर करें।
उत्तर:
न्यूरॉन स्नायुमंडल (nervous neuron) की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) है जिसमें शाखिका (dendrite), कोश शरीर (cell body), तथा एक्सॉन (axon) होता है। न्यूरॉन संवदी (sensory), पेशीय (motor) या साहचर्य (association) किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। तंत्रिका (nerve) की संरचना इससे भिन्न होती है। सैकड़ों या हजारों न्यूरॉन के एक्सॉन (axon) आपस में मिलकर एक गुच्छा.(bundle) तैयार करते हैं जिसे तंत्रिका (nerve) कहा जाता है। एक ही तंत्रिका में संवेदी तथा पेशीय दोनों तरह के न्यूरोन के एक्सॉन सम्मिलित हो सकते हैं।

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प्रश्न 28.
आनुवंशिकता के लिए जीन एवं गुणसूत्र की क्या भूमिका होती है?
उत्तर:
माता-पिता से विशेषताएँ उत्तराधिकार के रूप में जीन के माध्यम से मिलता है। बच्चा जीन के विशिष्ट संयोजन का धारक होता है। युग्मनज के मध्य भाग में केन्द्रक होता है जिसमें गुणसूत्र होते हैं। गुणसूत्र शरीर के आनुवंशिक तत्व माने जाते हैं जो मुख्यत: DNA नामक पदार्थ से बने होते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों जीन होते हैं।

एक शुक्राणु कोशिका और एक अंडाणु कोशिका के मिलने से एक नयी पीढ़ी का जन्म होता है। गर्भ धारण के समय जीवन 3 गुणसूत्र माता से और 23 गुणसूत्र पिता से प्राप्त करता है। प्रत्येक गुणसूत्र में हजारों आनुवंशिक निर्देश जीन के रूप में होते हैं। जीव के विकास में जीन से संयुक्त प्रोटीन महत्त्वपूर्ण काम करते हैं। जीन कई भिन्न रूपों में जीवित रह सकते हैं। जीन के रूपान्तरण को उत्परिवर्तन कहा जाता है। उत्परिवर्तन जीन में पुनः संयोजन के अवसर जुटाती है।

प्रश्न 29.
व्यवहार का जैवकीय आधार तथा सांस्कृतिक आधार को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनुष्य को जीवन-रक्षा एवं समान रक्षा के लिए कई प्रकार के व्यवहार का कर्त्ता बनना होता है। आहार ढूँढने की योग्यता, परभक्षी से दूर रहने की प्रवृत्ति, छोटे बच्चों का संरक्षण एवं पालन-पोषण पर आधारित जैवकीय व्यवहार में अपनी रुचि एवं क्रियाशीलता का प्रदर्शन करना होता है। अतिथियों को पसन्द का भोजन ऐच्छिक परिवेश में कराना हमारे लिए सांस्कृतिक व्यवहार माना जाता है। निर्धारित साधन के अभाव में उचित विकास को खोजकर प्रबंधक की मदद करना हमारा नैतिक व्यवहार है। वर्ग में बैठने की कला, प्रश्न पूछने का तरीका, खेल को खेल की भावना से खेलना, दुखी व्यक्ति को सांत्वना दे देना आदि सांस्कृतिक व्यवहार के अन्तर्गत माने जा सकते हैं।

प्रश्न 30.
संस्कृतिकरण या परसंस्कृतिकरण में क्या अंतर है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण-उन सभी प्रकार के अधिगम को कहते हैं जो बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के होता है। परसंस्कृतिकरण-परसंस्कृतिकरण का अर्थ है किसी अन्य संस्कृति की धारणा, विचार तथा व्यवहार को स्वीकारना तथा उसे अपनाना। जब व्यक्ति दूसरी संस्कृति की भाषा, विश्वास को अपनाता है तो इसे परसंस्कृतिग्रहण कहते है।

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प्रश्न 31.
संस्कृतिकरण का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
संस्कृतिकरण उन सभी प्रकार के अधिगमों को कहते हैं जो व्यक्ति के जीवन में बिना किसी प्रत्यक्ष और सुविचारित शिक्षण के इसलिए घटित होता है कि वे हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भो में हमें प्राप्त होते हैं। संस्कृतिकरण के दो मुख्य आधार हैं –

  1. प्रेक्षण और
  2. सीखना परिवारों, पूर्वजों अथवा पड़ोसियों के उत्तम व्यवहारों को पता लगाकर उसे ग्रहण करना संस्कृतिकरण माना जाता है। हम कुछ विचार, संप्रत्यय और मूल्यों को सीखते हैं।

प्रश्न 32.
प्रमस्तिष्क पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
प्रमस्तिष्क को प्रमस्तकीय वल्कुट भी कहा जाता है। यह अवधान, अधिगम, स्मृति एवं भाषा व्यवहार जैसे उच्चस्तरीय संज्ञानात्मक प्रकार्यों को नियमित करता है। इसमें तंत्रिका कोशिकाएँ, अक्ष तंतुओं के समूह और तंत्रिका जाल होते हैं। प्रमस्तिष्क दो अर्ध भागों में विभक्त है। बायाँ गोलार्ध भाषा संबंधी व्यवहारों को तथा दायाँ गोलार्द्ध प्रारूप प्रत्यभिज्ञान को संभालते हैं।

प्रमस्तिष्कीय वल्कुट चार पालियों में बँटा रहता है –

  1. ललाट पालि
  2. पाश्विक पालि
  3. शंख पालि तथा
  4. पश्च कपाल पालि जो चिंतन, स्मृति, दृष्टि, श्रवण, सूचनाओं के प्रक्रमण, उद्दीपकों का नियंत्रण जैसे कार्यों में संलग्न रहते हैं।

मस्तिष्क की कोई भी गतिविधि वल्कुट के केवल एक हिस्से के द्वारा ही संपादित नहीं होती। किन्तु एक विशेष कार्य के लिए वल्कुट का कोई एक विशेष भाग, दूसरे भागों की अपेक्षा अधिक निपुणता से कार्य पूरा कर लेता है।

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प्रश्न 33.
मेरुरज्जु की संरचना और कार्य बतावें।
उत्तर:
मेरुरज्जु की संरचना एक लम्बी रस्सी की तरह का होती है जो मेरुदंड के अन्दर पूरी लम्बाई में फैला रहता है। मेरुरज्जु का एक सिरा मेडुला से जुड़ा होता है जबकि दूसरा सिरा मुक्त रहता है। मेरुरज्जु के मध्य में उपस्थित तितली के आकार के धूसर रंग के प्रत्येक ढेर में साहचर्य तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं। मेरुरज्जु के दो प्रमुख को हैं –

  1. शरीर के निचले भागों से आनेवाले संवेदी आवेगों को मस्तिष्क तक पहुँचाना और
  2. मस्तिष्क में उत्पन्न होनेवाले पेशीय आवेगों को सारे शरीर तक पहुँचाना।

प्रश्न 34.
परिवर्ती क्रिया को समझने के लिए एक स्पष्ट उदाहरण दें।
उत्तर:
परिवर्ती क्रिया उद्दीपन के प्रतिक्रिया स्वरूप घटित होनेवाली अनैच्छिक क्रिया है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारे तंत्रिका तंत्र में विकासवादी प्रक्रिया के माध्यम से वंशानुगत होती है।

उदाहरण:
तेज प्रकाश के आने के कारण आँखों की पलकों का झपकना अथवा बहुत गर्म या ठंढा पिण्ड पर हाथ पड़ते ही हाथ को झटके के साथ हटाना परिवर्ती क्रिया कहलाती है। इसी प्रकार सांस लेना, अंगों को फैलाना, घुटनों में झटका लगना आदि परिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु के द्वारा सम्पादित होती है जिनमें मस्तिष्क भाग नहीं लेता है। प्रतिवर्ती क्रियाएँ जीव को किसी भी संभावित खतरे से बचाकर जीवन की रक्षा करता है।

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प्रश्न 35.
अन्तःस्रावी तंत्र में सन्निहित विभिन्न ग्रन्थियों के नाम एवं कार्य बतावें।
उत्तर:
मानव शरीर की मुख्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि-संवृद्धि, अंत:स्राव के माध्यम से मूल और गौण लैंगिक परिवर्तन को नियंत्रित किया जाता है।
  2. अवटु ग्रन्थि-थाइरॉक्सिन नामक अन्तःस्राव उत्पन्न करके शरीर कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पन्न करता है।
  3. अधिवृक्क ग्रन्थियाँ-इसके दो प्रमुख भाग अधिवृक्क वल्कुट और अधिवृक्क मध्यांश कहे जाते हैं जो क्रमशः ACTH और कार्टिकोयड के माध्यम से तंत्रिका तंत्र में उद्दीपन उत्पन्न करता है।
  4. अग्नाशय-यह इन्सुलिन के माध्यम से यकृत में ग्लुकोज का विखंडन करता है। इसकी अनियमित आचरण के कारण मधुमेह नामक रोग से मनुष्य ग्रसित हो जाता है।
  5. जनन ग्रन्थियाँ-शुक्र ग्रन्थि और डिंब ग्रन्थि के संयोजन से प्रजनन सम्बन्धी क्रिया सम्पादित होती है। इसके लिए एस्ट्रोजन, पोजेस्ट्रान, एण्ड्रोजन और टेस्टोस्ट्रोन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 36.
परसंस्कृतिकरण से क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी अन्य संस्कृति के संपर्क में आकर जो भी सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों के प्रभाव में पड़ते हैं उन्हें परसंस्कृतिकरण कहते हैं। परसंस्कृतिकरण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अथवा स्थायी या अस्थायी रूप में, ऐच्छिक या अनैच्छिक रूप में घटित होता रहता है। ये लाभ और हानि दोनों के कारण होते हैं। परसंस्कृतिकरण के माध्यम से नई विधियों या नये संस्कार से मुलाकात होती है। यह कभी-कभी कष्ट और कठिनाइयाँ उत्पन्न करती हैं। यदि इसे हानिकारक परिणाम वाला समझकर छोड़ने की इच्छा होती है तो कई विकल्प मिल जाते हैं।

प्रश्न 37.
परसंस्कृति ग्राही युक्तियाँ क्या-क्या हैं?
उत्तर:
निम्नलिखित चार युक्तियों के द्वारा परसंस्कृतिकरण सरलता से संभव हो जाता है –

  1. समाकलन-नई-पुरानी दोनों संस्कृति के प्रति रुचि रखना।
  2. आत्मसात्करण-अपनी संस्कृति का त्याग कर नई संस्कृति को अपनाना।
  3. पृथक्करण-दोनों संस्कृतियों को मिश्रित प्रभाव।
  4. सीमांतकरण-अनिश्चित स्थिति में।

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प्रश्न 38.
संस्कृति और समाज में क्या अंतर है?
उत्तर:
संस्कृति समाज में जीने एवं सामूहिक व्यवहार करने का ढंग है यह मानव-निर्मित होता है जिसके अंतर्गत धार्मिक विश्वास, रीति-रिवाज, रहन-सहन, मूल्य, रूढियाँ एवं परंपरा आती हैं। समाज-समाज लोगों का एक समूह है जिसकी एक विशेष सीमा होती है। वे एक सामान्य भाषा होती है जो उनके पड़ोसी लोग नहीं समझ पाते हैं एक समाज एकल राष्ट्र हो सकता है या नहीं हो सकता है।

प्रश्न 39.
समाजीकरण किसे कहते हैं? समाजीकरण के प्रमुख कारक क्या-क्या हैं?
उत्तर:
समाजीकरण-समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोग ज्ञान, कौशल और शीलगुण अर्जित करते हैं जो उन्हें समाज और समूहों के प्रभावी सदस्यों के रूप में भाग लेने के योग्य बनाते हैं। समाजीकरण नामक प्रक्रिया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सामाजिक-सांस्कृतिक संचरण का आधार तैयार करता है। जैसे कई भाषाओं की जानकारी रखनेवाले को किसी निश्चित क्षेत्र में जाकर उसी क्षेत्र की भाषा का व्यवहार करना होता है। समाजीकरण के प्रमुख कारक-समाज के हित में किये जाने वाले कार्य-विधि को जो हमें सीखने की विधि या अवसर प्रदान करता है उन्हें समाजीकरण के कारण कहते हैं। समाजीकरण के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. माता-पिता
  2. विद्यालय
  3. समसमूह और
  4. जनसंचार का प्रभाव

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘मानव व्यवहार जानवरों के व्यवहार से अधिक जटिल होते हैं। इस कथन को सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:
मानव व्यवहार की एक महत्त्वपूर्ण निर्धारिका हमारी जैवकीय संरचना है जो पूर्वजों से उत्तराधिकार के रूप में विकसित शरीर और मस्तिष्क के साथ मिलती है। हमारे व्यवहार दूसरी प्रजातियों की तुलना में बहुत जटिल और विकसित हैं क्योंकि हमारे पास एक बड़ा और विकसित मस्तिष्क है । हमें पर्यावरण को समझने तथा उसके प्रभाव के प्रति अनुकूलित होने की क्षमता है। एक मनुष्य होने के कारण हमारे पास न केवल जैवकीय तंत्र है बल्कि निश्चित सांस्कृतिक क्षेत्र भी होते हैं।

हम जानवरों की तुलना में अधिक सरलता से सीखे सकते हैं, अवसर को पहचान कर व्यवहार निश्चित कर सकते हैं। विविध माँगें, अनुभव और अवसर हमारे व्यवहार को अत्यन्त प्रभावित करते हैं। मानवीय व्यवहार के लिए जैविकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी होते हैं। अर्थात् मानव के व्यवहार की जटिलता का एक प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए एक संस्कृति है जो जानवरों में नहीं है।

उदाहरणार्थ, भूख से उत्पन्न वेदना के प्रति किये जाने वाले व्यवहार को समझा जा सकता है। मानव भूख की शांति के लिए विवेकपूर्ण विधि अपनाता है। शाकाहारी और मांसाहारी मानव अपनी भूख को अलग-अलग तरीके शान्त करके सन्तुष्ट होते हैं। खाद्य सामग्रियों के संग्रह और संरक्षण करना केवल मनुष्य के वश की बात है। मानव अपनी भूख की शान्ति के लिए सभ्य तरीका अपनाता है जबकि जानवर भूखा होने पर हिंसक और भयानक बन जाता है। मानव काम-व्यवहार कई नियमों, मानकों, मूल्यों और कानूनों से नियंत्रित होता है जबकि जानवर भोजन पाने के क्रम में किसी नियम और मूल्यों को नहीं अपनाता है।

मानव अपने काम-व्यवहार के लिए भरोसेमन्द साथी का चयन कर लेता है लेकिन जानवर मिल-जुल कर कोई व्यवस्था नहीं कर पाता है। अत: जैविकीय और सांस्कृतिक शक्तियों की परस्पर-क्रिया के द्वारा मानव प्रकृति विकसित होती है जिसके कारण मानव अपना स्वभाव निश्चित करके उचित व्यवहार करता है। मानव अपने व्यवहार को प्रयोगात्मक बनाने के लिए भौतिक वस्तुओं (औजार मूत्तियाँ), विचार (श्रेणियाँ, मानक, परोपकार, दया, धर्म) तथा सामाजिक संस्थान (परिवार, विद्यालय, सहाकारिता विभाग, पंचायत भवन) का उपयोग करने की क्षमता रहता है जो जानवरों को नसीब नहीं होता है।

भवन निर्माण हो या उपस्कर का निर्माण हो हम परिणामी उत्पाद के प्रति सुरक्षा और उपयोग की दृष्टि से सदा सतर्क व्यवहार करते हैं। हम किसी व्यवहार के लिए पूर्व निर्धारित साधनों या विधियों का इन्तजार नहीं करते हैं। वाशिंग मशीन के अभाव में हम बाल्टी-पानी के द्वारा ही सफाई का काम निबटाना जानते हैं। कुर्सी के अभाव में हम शिक्षण कार्य या यात्रा की योजना को बन्द नहीं कर देते हैं।

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प्रश्न 2.
जैवकीय तथा सांस्कृतिक मूल का सामान्य अर्थ एवं उद्देश्य बतावें।
उत्तर:
कोई बच्चा अपने पूर्वजों से एक विकसित शरीर और उन्नत मस्तिष्क पाकर अच्छे व्यवहार के प्रदर्शन के योग बनता है। अर्थात् हमारे व्यवहार का महत्वपूर्ण निर्धारक हमारी जैवकीय संरचना होती है। व्यवहार सम्बन्धी कला एवं आदतें हमें आनुवंशिक रूप में उपलब्ध होती हैं। जैसे माता-पिता के अशक्त रहने के कारण मंद बुद्धि वाले बच्चे जन्म लेते हैं तथा असामान्य लक्षण प्रकट करते हैं। किसी कारण मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त हो जाने पर जैवकीय आधारों का महत्त्व जानने का अवसर मिलता है।

किसी व्यक्ति का व्यवहार जैवकीय यंत्र के अलावे सांस्कृतिक तंत्र से भी प्रभावित होता है। पूर्वज से मिला संस्कृति से समझौता करते हुए हम अपने व्यावहारिक आचरण का निर्धारण करते हैं। विकट स्थितियों का मुकाबला करना, आकस्मिक घटना के बाद भी धैर्य बनाए रखना, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहने की युक्ति सोचना आदि ऐसी परिस्थिति है जहाँ जैविकीय ज्ञान के साथ-साथ सांस्कृतिक सहायता की आवश्यकता महसूस होने लगती है।

माँगें, अभाव, अनुभव, अवसर, लोगों की प्रतिक्रिया, मिलने वाला पुरस्कार आदि हमारे व्यवहार को प्रभावित किए बिना रहते हैं। ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा होने लगता है, इसकी समय विकसित होने लगती है और वह उक्त प्रभावों के स्पष्ट लक्षण और क्षमता को समझने लगता है। कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं जब सांस्कृतिक ज्ञान से ही हम समस्या को सरलता से सुलक्षा लेते हैं। मनोवैज्ञानिक की मानें तो जैवकीय आधार के अलावा सांस्कृतिक आधार भी व्यवहार के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। दोनों का साक्षा प्रयास हमारे व्यवहार को उन्नत दर्जा दिलाने में हमारी सहायता करते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 3 मानव व्यवहार के आधार

प्रश्न 3.
स्वतः संचालित स्नायु संस्थान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
स्वतंत्र स्नायु संस्थान मस्तिष्क का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह केन्द्रीय स्नायु संस्थान स्वतंत्र रहकर क्रिया करता है। शरीर में संवेगावस्था में होनेवाले अनेक परिवर्तनों को स्वतंत्र स्नायु संस्थान ही संचालित करता है। इस संचालन में केन्दीय स्नायु संस्थान का कोई हाथ नहीं रहता है।

परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि स्वतंत्र स्नायु संस्थान का केन्द्रीय स्नायु संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है। केन्द्रीय स्नायु संस्थान के भाग सुषुम्ना का स्वतंत्र स्नायु संस्थान में महत्वपूर्ण स्थान है। अतएव इस स्नायु संस्थान को स्वतंत्र केवल इसलिए समझा जाता है, क्योंकि जिन क्रियाओं के संचालन एवं नियंत्रण में मस्तिष्क काम नहीं करते वे स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा संचालित एवं नियंत्रित होती हैं।

इस संस्थान के कार्य को रोका नहीं जा सकता। यह संस्थान स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करता है। यह मानव शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं में समायोजन करता है। इसकी बहुत-सी नाड़ियाँ मस्तिष्क और सुषुम्ना से चलकर आमाशय और रक्तवाहिनी नाड़ियों से आकर मिलती हैं। इन नाड़ियों द्वारा आन्तरिक एवं बाह्य मांसपेशियों की क्रियाओं का संचालन होता है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान द्वारा स्राव ग्रन्थियों तथा आमाशंय और रक्त कोषों आदि की क्रिया का संचालन होता है। इसी से फेफड़े, दिल, यकृत, तित्ली, आमाशय, बड़ी आँत, प्रस्वेद ग्रन्थियाँ आदि की क्रिया चलती हैं। वस्तुतः यह संस्थान क्रियावाहक स्नायु संस्थान के बाहर स्थित है और उनकी क्रिया में केन्द्रीय स्नायु संस्थान कोई हाथ नहीं बँटांता। स्वतंत्र स्नायु संस्थान के बायें भाग को तीन भागों में बाँटा गया हैं –

  1. कापालिक
  2. माध्यमिक स्नायु तंत्र या थौरेको लम्बर और
  3. अनुब्रिका

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चित्र चित्र में सबसे ऊपर कापालिक है।

इससे जुड़े स्नायु कापालिक स्नायु कहलाते हैं। इसके नीचे सुषुम्ना है। इससे सम्बन्धित स्नायु सुषुम्ना स्नायु कहलाते हैं। सुषुम्ना शीर्ष से लेकर अनुत्रिका का भाग थौरेका लम्बर अथवा माध्यमिक स्नायु तंत्र कहलाता है। इसे थौरेका लम्बर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस भाग में स्नायु सुषुम्ना चलकर थोरेक्स तक पहुँचता है। सुषुम्ना का अंतिम भाग अनुत्रिका कहलाता है। स्वतंत्र स्नायु कोष गुच्छिका तथा शरीर के विभिन्न अंग सुषुम्ना से जुड़े होते हैं।

स्वतंत्र स्नायु का फैलाव नेत्र, रालवाही ग्रन्थियाँ, मुख, त्वचा और रक्त कोष, हृदय, श्वासनली, यकृत, आमाशय, क्लोम, आँत, अभिवृक्क, गुर्दे, थैली, कोलोन और गुर्दा तथा जननेन्द्रियों तक है। ये पसीने की ग्रन्थियों तथा त्वचा कोशों में भी फैले हुए हैं। ये पुच्छिंका लड़ी तथा सुषुम्ना को स्नायु सूत्र में जोड़ते हैं। जिन सूत्रों से ये इन्हें जोड़ते हैं वे सूत्र सुषुम्ना से निकलकर पुच्छिकाओं तक जाते हैं। पुच्छिकाओं की लड़ी में 22 अनुकम्पिक पुच्छिकायें होती हैं। मेंगेलियन लड़ी सुषुम्ना के समानान्तर में उसकी लम्बाई में होती है। अनुकम्पिक पुच्छिका लड़ी में माइलीन नामक श्वेत पदार्थ ऊपर से लिपटे रहते हैं। पुच्छिका लड़ी से निकलकर लागूल सूत्र वापस सुषुम्ना के स्नायु में जाकर मिलते है।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान के दो भाग हैं –

  1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान तथा
  2. परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान। ये दोनों भाग एक-दूसरे के विपरीत क्रियायें करते हैं।

अनुकम्पिक स्नायु संस्थान शरीर को कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है और खतरे का सामना करने के लिए तैयार करता है। यह संस्थान शरीर की खतरे से रक्षा भी करता है। संवेग की दशा में संस्थान अधिक क्रियाशील रहता है। इसकी क्रियाशीलता से ही खतरे के समय आँखों की पुतलियाँ फैल जाती हैं और आमाशय की रक्तवाहिनी नाड़ियाँ क्रियाशील हो जाती है। ये नाड़ियाँ आमाशय को रक्त न पहुँचाकर माँसपेशियों और मस्तिष्क को अधिक रक्त पहुँचाती हैं। परिणामस्वरूप आमाशय में भोजन पचना बन्द हो जाता है, भूख नहीं लगती है।

मांसपेशियों एवं मस्तिष्क की क्रियाशीलता बढ़ जाती है। आँत निष्क्रिय हो जाती है। आमाशय को रस प्रदान करने वाली ग्रन्थियाँ रस देना बन्द कर देती हैं। हृदय अधिक तेजी से रक्त फेंकने लगता है जिससे उसकी गति में तीव्रता आ जाती है। अभिवृक्क ग्रन्थियाँ अभिवृक्की रस का अधिकांश खून में पहुँचाने लगती हैं। परिणामस्वरूप रक्त शर्करा बढ़ जाती है। मनुष्य की शक्ति में वृद्धि हो जाती है।

आवेश के कारण कोश अधिक नष्ट होते हैं। साँस की गति तीव्र हो जाती है, हाँफने की क्रिया होने लगती है और कभी-कभी तो मल-मूत्र भी निकलने लगता है। लार ग्रन्थियों से रस निकलना बंद हो जाता है। गला और मुख सूख जाता है। ये क्रियायें कलह की अवस्था में, क्रोध एवं भय की अवस्था में देखी जाती है। संवेग की अवस्था में त्वचा की विद्युत-प्रतिशोधन शक्ति में भी कमी आ जाती है जिसे हम गाल्वनिक त्वचा अनुक्रिया के नाम से जानते हैं।

स्वतंत्र स्नायु संस्थान का दूसरा भाग परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान है। इसका सम्बन्ध कापालिक तथा अनुत्रिक से है। यह संस्थान एनाबोलिज्म की क्रिया करता है। यह संस्थान शरीर की शक्ति का संचय कर शरीर के विभिन्न भागों के पदार्थ को पुष्ट करता है। इस संस्थान की क्रिया में हृदय की धड़कन कम होती है और रक्त-चाए कम हो जाता है।

परिणामस्वरूप शरीर में भोजन की मात्रा कम खर्च होती है, लार ग्रन्थियों की क्रिया बढ़ जाती है, जिससे भोजन पचने की क्रिया में सहायता मिलती है। फलतः शरीर का वजन बढ़ जाता है, आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं। फलतः आँख में कम प्रकाश प्रवेश कर पाता है और आँखों को लाभ होता है। यह संस्थान अनुत्रिका विभाग के कार्य का संचालन करता है। यह ब्लेडर और कोलन तथा बड़ी आँतों को स्वस्थ रखता है। इसकी सहायता से शरीर से मल-मूत्र तथा विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं। अनुकम्पिक और परिअनुकम्पिक संस्थान में अन्तर है जो निम्न हैं –

1. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान में स्नायु कोश गुच्छिका सुषुम्ना के अन्दर होती है अथवा शरीर के उन आन्तरिक अंगों के पास होती है जिनको वे उत्तेजित करती है। परिअनुकम्पिक स्नायु संस्थान के कोश गुच्छिकायें सुषुम्ना के अन्दर न होकर अंगों के पास ही होती हैं।

2. अनुकम्पिक स्नायु संस्थान की क्रिया में सम्पूर्ण संस्थान काम करता है। परिअनुकम्पिक संस्थान की क्रिया में उस स्थान के विभिन्न भाग स्वतंत्र होते हैं। परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि ये दोनों संस्थान एक-दूसरे के विरुद्ध ही हैं, इनमें कोई पारस्परिक सम्बन्ध नहीं है। वास्तव में ये एक-दूसरे के सहयोगी होते हैं। मॉगर्न के अनुसार ये दोनों संस्थान कभी भी एक-दूसरे से स्वतंत्र कार्य नहीं करते बल्कि परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न मात्रा में सहयोग करते हैं। पर्यावरण में संघर्ष के समय जीव में अनुकम्पिक संस्थान की क्रिया अधिक और परिअनुकम्पिक संस्थान की कमी हो जाती है। इस सहयोग से शरीर में कार्य और विश्राम दोनों अवस्थाओं में संतुलन रहता है।

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प्रश्न 4.
मानव मस्तिष्क की संरचना या बनावट तथा कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग मस्तिष्क है जिसके माध्यम से व्यक्ति सभी तरह की क्रियाओं का संचालन करता है। शरीर में मस्तिष्क का स्थान सुषुम्ना के ऊपर तथा खोपड़ी (skull) के भीतर होता है। मस्तिष्क की बनावट तथा उसके कार्यों का अध्ययन निम्नांकित सात प्रमुख भाग में बाँटकर कर सकते हैं –

  1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata)
  2. सेतु (pons)
  3. लघुमस्तिष्क (cerebellum)
  4. थैलेमस (thalamus)
  5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus)
  6. मध्यमस्तिष्क (midbrain)
  7. प्रमस्तिष्क या प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebrum or cerebral cortex)

इन सबों का वर्णन निम्नांकित है –

1. मेडुला शीर्श (medulla oblongata):
मेडुला सुषुम्ना के ठीक ऊपर होता है। इसकी लम्बाई लगभग एक इंच होती है। यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को जोड़ता है। इसके द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। जैसे, यह सुषुम्ना का मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों से सम्पर्क स्थापित करता है, क्योंकि सुषुम्ना से मस्तिष्क की ओर जानेवाले सभी तंत्रिका आवेग मेडुला होकर ही गुजरते हैं। यह शरीर की रक्षा-संबंधी सभी क्रियाओं का जैसे रक्त-संचालन, साँस की गति, निगलने, हृदय की धड़कन आदि का संचालन एवं नियंत्रण करता है। यह शरीर में कुछ हद तक संतुलन भी बनाए रखने में मदद करता है तथा अपने क्षेत्र की प्रतिवर्त क्रियाओं को भी कुछ हद तक नियंत्रित करता है।

2. सेतु (pons):
यह मेडुला शीर्ष के ठीक ऊपर से होता है। इसमें कई तरह के तंतु पाए जाते हैं जिनके माध्यम से यह लघुमस्तिष्क (cerebellum) तथा प्रमस्तिष्क (cerebrum) के भागों को आपस में मिलाता है। इस तरह, यह वास्तविक अर्थ में सेतु या पुल का कार्य करता है। यह श्रवण कार्यों (auditory functions) के लिए एक तरह का प्रसारण स्टेशन (relay station) का कार्य करता है। इसमें कुछ ऐसे केन्द्रक (nuclei) भी होते हैं जिनमें प्रमुख श्वसन गति तथा आनन अभिव्यक्तियों (facial expressions) की क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
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चित्र: मानव मस्तिष्क के भागों का चित्र

3. लघुमस्तिष्क (cerebellum):
लघुमस्तिष्क या अनुमस्तिष्क प्रमस्तिष्क (cerebrum) या वृहत मस्तिष्क के नीचे और पीछे की ओर होता है। कुछ स्नायुतंतुओं द्वारा लघुमस्तिष्क का संबंध एक आरे प्रमस्तिष्क से तथा दूसरी ओर सुषुम्ना (spinal cord) से होता है। इसकी ऊपरी सतह पर धूसर पदार्थ (grey matter) होता है तथा उजला पदार्थ उसकी भीतर तह पर होता है। लघु मस्तिष्क का मुख्य कार्य शारीरिक संतुलन (bodily balance) बनाए रखना होता है। शराब के नशे में हो जाने पर लघुमस्तिष्क प्रभावित हो जाता है। फलस्वरूप, व्यक्ति की चाल-ढाल में लड़खड़ाहट आ जाती है।

4. थैलेमस (thalamus):
थैलेमस प्रमस्तिष्क (cerebrum) के नीचे और हाइपोथैलेमस के बगल में होता है। थैलेमस दोनों प्रमस्तिष्कीय गोलार्डों (cerebral hemispheres) के बीच एक अंडाकार संरचना है जिसे ऊपर से देखा नहीं जाता है। इसका कार्य बिजली के स्विचबोर्ड के समान है। जैसे स्विचबोर्ड का स्विच दबातें हैं, बिजली की धारा उपयुक्त जगह पर पहुंचकर बल्ब को प्रकाशमय कर देती है या पंखे को चला देती है, ठीक उसी प्रकार थैलेमस में जो तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं, वह उन्हें मस्तिष्क के उचित स्थान पर पहुँचा देता है।

अतः थैलेमस का मुख्य कार्य भिन्न-भिन्न संवेदी प्रक्रियाओं (sensory processes) से संबंधित आवेग को ग्रहण करके प्रमस्तिष्क (cerebrum) के उपर्युक्त केन्द्रों में प्रसारण (relay) करना होता है। इतना ही नहीं, यह लघुमस्तिष्क से भी आवेगों को ग्रहण करके उन्हें प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचाता है।

5. हाइपोथैलेमस (hypothalamus):
थैलेमस के नीचे एक छोटा परंतु अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण तंतु है जिसे हाइपोथैलेमस (hypothalamus) कहा जाता है। यह थैलेमस तथा मध्यमस्तिष्क (midbrain) को एक तरह एक जोड़ता है। हाइपोथैलेमस द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं। इसके द्वारा जैविक अभिप्रेरकों जैसे भूख, प्यास, काम आदि को समजित (regulate) किया जाता है। शरीर के भीतर सामान्य संतुलन बनाए रखने में भी यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाइपोथैलेमस संवेग की उत्पत्ति एवं नियंत्रण का मुख्य केन्द्र माना गया है। इसके द्वारा अंतःस्रावी ग्रन्थियों (endocrine glands) को भी समंजित किया जाता है।

6. मध्यमस्तिष्क (midbrain):
मध्यमस्तिष्क का स्थान मस्तिष्क के बीच में होता है। इसमें दो सतहें होती हैं-निचली सतह (floor) तथा ऊपरी सतह (roof or tectum)। निचली सतह संवेदी तंत्रिका आवेगों (sensory nerve impulses) को मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों में आने-जाने का काम करता है। जहाँ तक ऊपरी सतह या टेक्टम (tectum) का प्रश्न है, इसके द्वारा दृष्टि तथा श्रवण क्रियाओं के संचालन में मदद मिलती है।

जब मस्तिष्क का दृष्टिक्षेत्र या श्रवणक्षेत्र क्षतिग्रस्त हो जाता है तो इन क्रियाओं का संचालन यहीं से होता है। मध्यमस्तिष्क का एक विशिष्ट भाग जो घना एवं मोटा जाल-सा दिखता है, उसे रेटिकुलर फॉरमेशन (reticular formation) कहा जाता है जो व्यक्ति में सतर्कता की अवस्था को बनाए रखने में सक्षम होता है। इसमें नींद आदि के संचालन में भी मदद मिलती है।

7. प्रमस्तिष्क (cerebrum):
मानव मस्तिष्क का सबसे बड़ा तथा सबसे प्रमुख भाग प्रमस्तिष्क या वृहत मस्तिष्क है। इसे प्रमस्तिष्कीय वल्कुट (cerebral cortex) भी कहा जाता है। एक विशेष दरार (fissure), जिसे अनुदैर्ध्य दरार (longitudinal fissure) कहा जाता है, द्वारा प्रमस्तिष्क दो गोलार्डों (hemispheres) में बँटा होता है – बायाँ गोलार्द्ध (left hemisphere) तथा दायाँ गोलार्द्ध (right hemisphere), इन दोनों गोलार्डों के ऊपर न्यूरोन का एक पतला आवरण होता है जिसकी मोटाई लगभग 3 मिलीमीटर होती है।

इस आवरण का रंग धूसर (grey) होता है। बायाँ गोलार्द्ध तथा दायाँ गोलार्द्ध तंत्रिका तंतु (nerve fibre) के एक विशेष गुच्छा या बंडल (bundle) से जुड़े होते हैं जिसे कारपस कैलोजम (corpus callosum) कहा जाता है। यह उजले पदार्थ (white matter) का बना होता है। प्रत्येक गोलार्द्ध दो गहरी दरारों (fissure) अर्थात् रोलैण्डो की दरार (fissure of Rolando) या केन्द्रीय सुलकस (central sulcus) तथा सिलभियस की दरार (fissure of Sylvius) या लेट्रल दरार (lateral fissure) की मदद से निम्नांकित चार पालियों (lobes) में बँटा होता है –

  1. अग्रपालि (frontal lobe)
  2. मध्यपालि (parietal lobe)
  3. शंखपालि (temporal lobe)
  4. पृष्ठपालि (occipital lobe)

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चित्र : प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

इन खंडों के कार्य अलग-अलग हैं। इन्हें इन कार्यों के विभाजन के दृष्टिकोण से निम्नांकित तीन क्षेत्रों में बाँटा गया है –

  1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र (sensory area)
  2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र (motor area)
  3. साहचर्य क्षेत्र (association area)

1. संवेदी या ज्ञानवाही क्षेत्र के कार्य (Functions of sensory area):
इस क्षेत्र द्वारा संवेदी क्रियाएँ होती हैं जिसके फलस्वरूप हमें तरह-तरह के उद्दीपकों का ज्ञान होता है। इसके क्षेत्र द्वारा निम्नांकित तीन तरह के ज्ञान या संवेदनाएँ होती हैं –

(a) दृष्टि संवेदन (Visual sensation):
दृष्टि संवेदन का ज्ञान हमें पृष्ठपालि (occipital lobe) द्वारा होता है। इसलिए पृष्ठपालि की दृष्टि ज्ञानपालि कहा जाता है। आँख में जो तंत्रिका आवेग उत्पन्न होते हैं वे दृष्टि तंत्रिका (optic nerve) द्वारा पृष्ठपालि में पहुँचते हैं जिससे व्यक्ति में दृष्टि संवेदन का ज्ञान होता है। यदि किसी कारण से पृष्ठपालि नष्ट हो जाए तो व्यक्ति को दृष्टि संवेदन नहीं होगा।

(b) श्रवण संवेदन (Auditory sensation):
सुनने की क्रिया का नियंत्रण शंखपालि (temporal lobe) से होता है। अतः, शंखपालि को श्रवण ज्ञानकेन्द्र भी कहा जाता है। जब ध्वनि या आवाज कान में श्रवण तंत्रिका आवेग उत्पन्न करता है, तब वह शंखपालि में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को श्रवण संवेदन होता है। यदि यह शंखपालि पूर्णत: नष्ट हो जाए तब व्यक्ति को इससे श्रवण-संबंधी संवेदन या ज्ञान नहीं हो सकता है।

(c) त्वक संवेदन (Cutaneous sensation):
व्यक्ति को स्पर्श का ज्ञान या त्वक संबेदन का ज्ञान मध्यपालि (parietal lobe) से होता है। जब हमारे त्वक को कोई चीज उत्तेजित करता है, तब इससे तंत्रिका आवेग उत्पन्न होकर मध्यपालि (parietal lobe) में पहुँचता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को स्पर्श ज्ञान होता है।

2. क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र के कार्य (Functions of motor area):
व्यक्ति जो भी शारीरिक क्रिया या व्यवहार स्वेच्छा से करता है, उसका आदेश प्रमस्तिष्क के जिस भाग से मिलता है, उसे क्रियावाही या पेशीय क्षेत्र कहा जाता है। क्रियावाही क्षेत्र रोलैण्डो की दरार के बगल में एक लंबा-सा हिस्सा में अवस्थित है।

इस क्षेत्र में पिरामिड के आकार के बड़े-बड़े कोश (cells) पाए जाते हैं जिनके सहारे शारीरिक क्रियाओं एवं व्यवहारों का नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि पेशीय क्षेत्र के सबसे ऊपर का भाग शरीर के सबसे निचले हिस्से जैसे पैर की अंगुलियों तथा पैर की मांसपेशियों आदि का नियंत्रण एवं संचालन करता है और सबसे नीचे का भाग शरीर के ऊपर के हिस्से जैसे मुँह, गर्दन, चेहरा आदि की क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण करता है।

3. साहचर्य क्षेत्र के कार्य (Functions of association area):
अग्रपालि में एक बड़ा-सा साहचर्य क्षेत्र है जिसके द्वारा उत्त्व मानसिक क्रियाओं (higher mental processes) जैसे सोचना, तर्क करना, चिंतन करना, कल्पना करना, स्मरण करना आदि का संचालन एवं नियंत्रण होता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह क्षेत्र किसी कारण से क्षतिग्रस्त हो जाने से प्राणी वर्तमान संबद्ध सभी बातों, घटनाओं एवं अर्थों को भूल जाता है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि मानव मस्तिष्क की संरचना काफी जटिल है तथा इसके द्वारा प्राणी की सभी तरह की शारीरिक क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

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प्रश्न 5.
स्नायुकोश या तंत्रिका कोश या न्यूरोन की संरचना तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव शरीर में बहुत तरह के जीवित कोश (living cells) हैं जिनके अलग-अलग कार्य हैं। इनमें एक विशेष तरह के जीवित कोश का कार्य स्नायु आवेग (nerve impulse) को ढोना है। इस तरह के जीवित कोश को स्नायुकोश या तंत्रिका कोश (neuron) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, तंत्रिका कोश या जिसे न्यूरोन (neuron) कहा जाता है, एक ऐसा कोश होता है जिसके माध्यम से तंत्रिका आवेग के रूप में सूचनाएँ शरीर के एक अंग से दूसरे अंग में जाती हैं। न्यूरोन तंत्रिका तंत्र की सबसे छोटी इकाई (smallest unit) होती है।

संरचना या बनावट के दृष्टिकोण से तंत्रिका कोश को निम्नांकित तीन भागों में बाँटा गया है –

  1. शाखिकाएँ (dendrites)
  2. कोश शरीर (cell body)
  3. एक्सॉन (axon)

1. शाखिकाएँ (dendrites):
शाखिका की संरचना पेड़ की टहनियों तथा शाखाओं के समान होती है जिसमें कई छोटी-छोटी उपशाखाएँ होती हैं (जैसा कि चित्र में दिखाया गया है)। शाखिका दो तरह के कार्य करती है। पहला, यह तंत्रिका आवेगों (nerve impulse) को ग्रहण करती है तथा दूसरी उसे जीवकोश (cell body) की ओर भेज देती है। इस तरह, शाखिका कि मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को ग्रहण करना और उसे कोशशरीर की ओर भेजना होता है।

2. कोश शरीर (cell body):
कोशशरीर न्यूरोन का दूसरा प्रमुख भाग है। इसे सोमा (soma) भी कहा जाता है। कोशशरीर चारों तरफ से एक झिल्ली से ढंका होता है जिसे कोश की झिल्ली (membrane) कहा जाता है। इस झिल्ली के भीतर एक तरल पदार्थ होता है जिसे साइटोप्लाज्म (cytoplasm) कहा जाता है। कोशशरीर के बीच में केंद्रक (nucleus) होता है जो कोशशरीर का सबसे प्रधान भाग है। कोशशरीर के मुख्य दो कार्य होते हैं। पहला, शाखिका द्वारा लाए गए तंत्रिका आवेग को ग्रहण कर उसे आगे की ओर अर्थात एक्सॉन की ओर बढ़ाना तथा दूसरा कार्य न्यूरोन को स्वस्थ तथा जीवित रखना है।
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3. एक्सॉन (axon):
एक्सॉन तंत्रिका कोश या न्यूरोन के उस भाग को कहा जाता है जो कोशशरीर (cell body) से निकलकर आगे की कला हुआ दिखाई पडता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, इसका आकार छोटा भी होता है तथा बड़ा भी। एक्सॉन एक विशेष तरह की उजली परत या आवरण से ढंका होता है। यह परत सतत (continuous) नहीं होती है। बल्कि कुछ-कुछ दूर पर लगभग समाप्त हो जाती है या पतली हो जाती है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। एक्सॉन के अंतिम छोर पर अनेक छोटे-छोटे तंतु होते हैं जिन्हें एण्डब्रश (endbrush) या एण्डप्लेट (endplate) कहा जाता है।

एक्सॉन का मुख्य कार्य तंत्रिका आवेग को शरीर से निकालकर न्यूरोन के अंतिम छोर अर्थात् एण्डब्रश तक पहुँचा देना होता है। इस तरह, तंत्रिका आवेग एक्सॉन द्वारा बाहर निकल जाता है। इस तरह एक न्यूरोन इस क्रम में कार्य करता है-तंत्रिका आवेग (nerve impulse) को पहले शाखिका (dendrite) द्वारा ग्रहण किया जाता है और उसे कोशशरीर (cell body) की ओर भेज दिया जाता है। कोशशरीर उसे ग्रहण कर लेता है तथा एक्सॉन कोशशरीर से आ रहे तंत्रिका आवेग को एण्डब्रश होते हुए बाहर निकाल देता है अर्थात् दूसरे न्यूरोन में भेज देता है। स्पष्ट हुआ कि शाखिका तंत्रिका आवेग का एक ग्रहण केन्द्र (receiving centre) है जबकि एक्सॉन (axon) एक सुप्दगी केन्द्र (delivery centre) है।

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प्रश्न 6.
मस्तिष्क के कार्यों के अध्ययन के लिए किन-किन विधियों का उपयोग होता है। उनकी विवेचना करें।
उत्तर:
स्नायुमंडल या तंत्रिका तंत्र या मस्तिष्क की रचना एवं इसके कार्य के अध्ययन के लिए कई प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ प्रमुख विधियों का वर्णन यहाँ किया जा रहा है –

1. वर्णनात्मक विधि या अभिरंजन विधि (Staining method):
यह विधि तंत्रिका तंत्र की रचना के अध्ययन की सबसे प्राचीन विधि है। इस विधि का व्यवहार गोल्गी (Golgi) ने स्नायु-मंडल के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा उनके कार्य के अध्ययन में किया। इस विधि में स्नायु-कोश को रजित करने (रंगने) का प्रयास किया जाता है। चूँकि स्नायु-कोश पर किसी रंग का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता है, इसलिए स्नायु के माइलीन आवरण को रंगने का प्रयास किया जाता है। रंगों का व्यवहार दो प्रकार से किया जाता है। एक तो यह कि केवल तन्तुओं (Fibres) को रंगा जाता है और दूसरे प्रकार के रंग से केवल कोशिका-शरीर (Cell body) को रजित किया जाता है।

पहले प्रकार की कार्य-विधि को वेगर्ट विधि कहते हैं और दूसरे प्रकार की कार्य-विधि को नीसिल विधि (Nissil method) कहते हैं। रेजित तंतु या कोशिका-शरीर को माइक्रोस्कोप की मदद से देखा जाता है। रंगे हुए तन्तु या कोशिका-शरीर को देखने में आसानी होती है और इस आधार पर उनकी रचना को समझने का प्रयास किया जाता है। इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसके द्वारा तंतुओं तथा कोशिका-शरीर का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से संभव होता है। लेकिन इस विधि का दोष यह है कि इसके द्वारा सभी तन्तुओं का अध्ययन नहीं किया जा, सकता है। कारण यह है कि कुछ ऐसे तंतु हैं जिन पर माइलिन आवरण नहीं होता है। अत: इस प्रकार के तन्तुओं पर रंगों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

2. मस्तिष्क परिवर्तन-विधि (Brain changes method):
मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों की रचना तथा इनके कार्यों के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार किया जाता है। यहाँ यह देखने का प्रयास किया जाता है कि मनोवैज्ञानिक परिचालन (Manipulation) के कारण प्राणी के मस्तिष्क में कोई परिवर्तन होता है या नहीं और यदि परिवर्तन होता है तो मस्तिष्क के किस भाग में होता है। प्राणी को संवेदी वचन या संवेदी समृद्धि (Sensory Enrichment) से प्रभावित किया जाता है और यह देखने का प्रयास किया जाता है कि प्राणी के मस्तिष्क में कोई रचनात्मक या रसायन परिवर्तन होता है या नहीं।

लेकिन, इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसका उण्योग मनुष्य पर नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के मस्तिष्क में वातावरण के कारण होनेवाले रसायन-परिवर्तन तथा संरचनात्मक परिवर्तन का अध्ययन कठिन है। इसीलिए इस विधि का उपयोग केवल चूहे आदि छोटे-छोटे पशुओं पर किया जाता है। लेकिन पशुओं पर प्राप्त निष्कर्ष को मनुष्यों पर उसी रूप में लागू करना पूरी तरह सही नहीं हो पाता है।

3. विद्युत अभिलेखन-विधि (Electrical recording method):
स्नायुमंडल और खासकर मस्तिष्क के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार बड़े पैमाने पर होता है। इस विधि में स्नायुकोष या मस्तिष्क के किसी भाग में होने वाले विद्युत-प्रवाह को रेकार्ड (Record) कर लिया जाता है। प्राणी को किसी उत्तेजना से प्रभावित किया जाता है और मस्तिष्क के किसी भाग में उत्पन्न विद्युत-परिवर्तन को एलेक्ट्रोड (Electrode) द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है। इस प्रकार के विद्युत परिवर्तन को उत्पन्न अन्तःशक्ति (Evoke Potential) कहते हैं।

यह विधि स्नायु मंडल या मस्तिष्क के अध्ययन के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हुई है। टोवे ने इस विधि का उपयोग बिल्ली पर किया और ज्ञानवाही कॉर्टेक्स के कार्य को देखने का प्रयास किया। उन्होंने बिल्ली के ज्ञानवाही कॉर्टेक्स में एक बड़े आकार का एलेक्ट्रोड लगा दिया, फिर उसके ज्ञानवाही मार्ग (Sensory Path) को उत्तेजित करके अन्तःशक्ति जमा हो गयी। इससे पता चला कि ज्ञानवाही कार्य वास्तव में ज्ञानवाही कॉर्टेक्स द्वारा नियंत्रित होता है। लेकिन, यह विधि खतरनाक है। इसलिए मनुष्य पर इसका व्यवहार करना कठिन है। दूसरी बात यह है कि इस विधि के उपयोग के लिए बड़े प्रशिक्षित तथा योग्य स्नायु-विशेषज्ञ (Neurologist) की आवश्यकता होती है। इसके अभाव में अध्ययन के गलत हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।

4. उत्तेजना-विधि (Stimulation method):
स्नायुमंडल और विशेष रूप से मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए उत्तेजना करके यह देखने का प्रयास किया जाता है कि इससे प्राणी के व्यवहार में कोई परिवर्तन होता है या नहीं। उत्तेजन को स्वतंत्र चर (Independent Variable) और इससे उत्पन्न प्रतिक्रिया को आश्रित चर माना जाता है। साधारण अर्थ में उत्तेजन को कारण तथा प्रतिक्रिया को प्रभाव माना जाता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स के भिन्न-भिन्न भागों के कार्यों को जानने का प्रयास किया जाता है और देखा जाता है कि इससे प्राणी में कौन-सी नई प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।

विश्वास कर लिया जाता है कि उस प्रतिक्रिया का नियंत्रण कॉर्टेक्स के उसी भाग द्वारा होता है। जैसे-किसी चूहे के पृष्ठ-खण्ड (Occipital Lobe) को बिजली द्वारा उत्तेजित करने से यदि चूहे में देखने संबंधी क्रिया का आधार कॉर्टेक्स का पृष्ठ-खण्ड है। लेकिन इस विधि के साथ सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि इसको व्यवहार में लाने के लिए कुशल तथा प्रशिक्षित शारीरिक मनोवैज्ञानिक की आवश्यकता होती है।

5. क्षति-विधि (Lesion method):
स्नायु-मंडल या मस्तिष्क की रचना तथा कार्य के अध्ययन के लिए इस विधि का व्यवहार व्यापक रूप से होता रहा है। फ्लोरेंस तथा रोलैन्डो को इस विधि का पथप्रदर्शक समझा जाता है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को नष्ट कर दिया जाता है और देखा जाता है कि इसके कारण प्राणी की कौन-सी क्रिया क्षतिग्रस्त होती है। जैसे-कॉर्टेक्स के पृष्ठ-खण्ड को काट देने पर यदि प्राणी में देखने की क्षमता समाप्त हो जाती है तो समझा जाता है कि दृष्टि-संवेदना का नियंत्रण पृष्ठ-खण्ड द्वारा होता है। इसी तरह मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न भागों द्वारा होने वाले कार्यों को निर्धारित कर लिया जाता है।

6. क्यूरेर-विधि (Curare method):
मस्तिष्क के अध्ययन के लिए हार्लो एवं स्टेगनर (Halow and Stegner) ने 1933 में एक विधि निकाली जिसको क्यूरेर-विधि कहते हैं। क्यूरेर एक प्रकार की औषधि है जो मध्य अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका में अधिक व्यवहार किया जाता है। इसके उपयोग से दैहिक मांसपेशियाँ निष्क्रिय (Inactive) हो जाती हैं। इसका प्रभाव उप-कॉर्टेक्स पर नहीं पड़ता है। इसलिए जब उप-कॉर्टेक्स से संबंधित कार्य का अध्ययन करना होता है तो कॉर्टेक्स को क्यूरेर के प्रभाव से निष्क्रिय बना दिया जाता है। इससे कॉर्टेक्स से होनेवाली क्रियाएँ रुक जाती हैं। फिर प्राणी को कोई क्रिया सिखाई जाती है।

प्राणी जब उस क्रिया को सीखने में सफल होता है तो इससे साबित हो जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उप-कॉर्टेक्स द्वारा होता है। क्यूरेर के प्रभाव के समाप्त हो जाने के बाद भी यदि वह क्रिया जारी रहती है तो समझा जाता है कि उस क्रियापर कॉर्टेक्स का कोई बाधक प्रभाव नहीं है तो समझा जाता है कि उस पर उप-कॉर्टेक्स के साथ-साथ कॉर्टेक्स का भी नियंत्रण रहता है। इसी आधार पर कॉर्टेक्स तथा उप-कॉर्टेक्स द्वारा होनेवाले कार्यों का अध्ययन किया जाता है।

इस विधि का एक लाभ यह है कि इससे पशु को कोई हानि नहीं होती है। कारण यह है कि क्यूरेर का प्रभाव जब समाप्त हो जाता है तो मस्तिष्क का वह भाग पहले की तरह काम करने लगता है। यह गुण ‘उन्मूलन या क्षति-विधि’ में नहीं है, क्योंकि उस विधि में स्नायु को एक बार जब काट दिया जाता है तो फिर वह काम के लायक नहीं हो पाता है। इस प्रकार, क्यूरेर विधि में पशुओं की क्षति नहीं होती है, जबकि उन्मूलन विधि में पशुओं की क्षति होती है। लेकिन, इतना होने पर भी क्यूरेर-विधि की उपयोगिता बहुत सीमित है।

7. अपकर्षण विधि (Degeneration method):
स्नायु-मंडल के अध्ययन के लिए अपकर्षण-विधि या अप-विकार विधि का भी व्यवहार किया जाता है। अपकर्षण का अर्थ यह है कि जब स्नायु-मंडल के किसी क्षेत्र को नष्ट किया जाता है या काटा जाता है तो उस क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्र भी विघटित या अपकर्षित हो जाता है। उस क्षेत्र के बर्बाद होने से या विघटित होने से यदि कोई क्रिया रुक जाती है तो समझा जाता है कि उस क्रिया का नियंत्रण उसी क्षेत्र द्वारा होता है। इस प्रकार, स्नायुओं के अपकर्षण के आधार पर स्नायु-कोशों के संबंधों का पता लगाया जाता है और उनके द्वारा संचालित होनेवाली क्रियाओं का निरूपण किया जाता है।

8. रासायनिक विधि (Chemical method):
स्नयु-मंडल अथवा मस्तिष्क के अध्ययन के लिए रसायन-विधि का व्यवहार भी किया जाता है। वास्तव में यह विधि विद्युत-उत्तेजन विधि का ही एक रूप है। इस विधि में मस्तिष्क के किसी खास भाग को बिजली से उत्तेजित न करके किसी रासायनिक पदार्थ से उत्तेजित किया जाता है। जैसे-कुचालक एक काफी प्रभावशाली रासायनिक पदार्थ है जिसके द्वारा मस्तिष्क के किसी भाग को उत्तेजित किया जाता है और इससे जो परिवर्तन होता है उसे एलेक्ट्रोड द्वारा रेकार्ड कर लिया जाता है।

कभी-कभी एलेक्ट्रोड के बदले छोटे पिपेट से होकर रासायनिक पदार्थ को थोड़ी मात्रा में मस्तिष्क के किसी विशेष भाग पर डालकर उसे उत्तेजित करता है तथा उससे संचालित होनेवाली क्रिया का अध्ययन करता है। इस विधि का उपयोग भिन्न-भिन्न प्रेरक संरचना (Mechanism) से संबंधित प्रयोग में किया गया है।

ग्रौसमैन (Grossman 1960) ने इस विधि का व्यवहार प्यास तथा भूख प्रेरकों को संचालित करनेवाले मस्तिष्क के भागों को निर्धारित करने के लिए किया और देखा कि इस तरह के अध्ययन के लिए यह विधि काफी उपयोगी है। इस प्रकार, मस्तिष्क या स्नायु मंडल के अध्ययन के लिए कई विधियों का व्यवहार किया जाता है। प्रत्येक विधि के अपने गुण-दोष हैं। अत: आवश्यकता के अनुसार अधिक-से-अधिक विधियों का व्यवहार करके विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
प्रतिवर्त धनु से आप क्या समझते हैं? इस धनु में सम्मिलित शारीरिक अंगों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रतिवर्त क्रिया या सहज क्रिया (reflex action) किसी उद्दीपन के प्रति एक एक स्वचालित (automatic) एवं जन्मजात अनुक्रिया है। आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने से पलक का बंद हो जाना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रिया के शारीरिक आधार (bodily base) को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, प्रतिवर्त क्रिया के संचालन में स्नायु प्रवाह स्नायुओं और अंगों से होकर गुजरता है, उन सभी को प्रतिवर्त धनु के अंदर समझा जाता है।

वास्तव में सहज क्रिया एक सरलतम मानसिक क्रिया है। इसके होने के लिए सर्वप्रथम उद्दीपन ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) को उत्तेजित करता है जिससे ज्ञानेन्द्रिय में तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (sensory nerve) से होता हुआ सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका (association nerve) होते हैं। वे तंत्रिका आवेग को गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देते हैं।

तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रिया न्यूरोन द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों या कर्मेन्द्रियों में पहुँचाए जाते हैं। इसके फलस्वरूप व्यक्ति सहज क्रिया कर पाता है। इस प्रक्रिया में ज्ञानेन्द्रिय (sense organ) से सुषुम्ना तथा सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों तक के सभी रास्तों को प्रतिवर्त धनु (reflex arc) कहा जाता है। प्रतिवर्त धनु के उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके संचालन में शरीर के निम्नांकित छह अंगों की भूमिका प्रधान होती है –

1. ज्ञानेन्द्रिय (Sense organ):
मानव शरीर में कुछ खास-खास अंग हैं जो विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाओं को ग्रहण करते हैं। इन अंगों को ज्ञानेन्द्रिय या ग्राहक (receptor) कहा जाता है। व्यक्ति की प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय द्वारा एक विशेष प्रकार की उत्तेजना ग्रहण की जाती है जिसके कारण ही संबंधित उद्दीपण (stimulus) का ज्ञान होता है। जैसे, आँख द्वारा प्रकाश या रोशनी को, कान द्वारा आवाज को, नाक द्वारा गंध को, जीभ द्वारा स्वाद को तथा त्वचा द्वारा स्पर्श को ग्रहण किया जाता है।

2. संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका (Sensory nerve):
ज्ञानेन्द्रिय से सुषुम्ना तथा मस्तिष्क तक आने वाली तंत्रिका को संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका कहा जाता हैं। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय का संबंध ऐसी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना से होता है। जब उपयुक्त उद्दीपन (appropriate stimulus) किसी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करता है, तब उसमें तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है जो संबद्ध संवेदी तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। जैसे, वस्तु से हमारी त्वचा जब छू जाती है तब त्वचा में उत्पन्न तंत्रिका आवेग वेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुबुन्ना में पहुँचता है।

3. साहचर्य तंत्रिका (Association nerve):
साहचर्य तंत्रिका सुषुम्ना तथा मस्तिष्क में पाया जाता है। इसका मुख्य कार्य संवेदी तथा गति तंत्रिकाओं से संबंध स्थापित करना है, क्योंकि कार्यात्मक रूप से इनका एक छोर संवेदी तंत्रिका से तथा दूसरा छोर गति तंत्रिका से मिला होता है। सुषुम्ना इन्हीं के द्वारा प्रतिवर्त क्रियाओं का संचालन करता है। तब तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है तब साहचर्य तंत्रिका उसे सुषुम्ना गतिवाही तंत्रिका (motor nerve) में छोड़ देता है।

4. गतिवाही तंत्रिका (Motor nerve):
गतिवाही तंत्रिका मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों (motor organs) से जोड़ता है। जब सुषुम्ना में साहचर्य तंत्रिका द्वारा तत्रिका आवेग गतिवाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है, तब गतिवाही तंत्रिका उसे तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना से कर्मेन्द्रियों (मांसपेशियों) तक ले जाता है। फलस्वरूप, सुषुम्ना का आदेश कर्मेन्द्रिय को प्राप्त होता है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति कोई अनुक्रिया करता है।

5. कर्मेन्द्रिय (Motor organ):
कर्मेन्द्रियों द्वारा व्यक्ति अनुक्रियाएँ करता है। कर्मेन्द्रियों में सामान्यत: पेशियों एवं ग्रन्थियों को रखा जाता है। इन्हें प्रभावक (effectors) भी कहा जाता है। प्रतिवर्त क्रिया में सुषुम्ना का आदेश इन कर्मेन्द्रियों तक पहुँचता है और व्यक्ति अनुक्रिया कर बैठता है। प्रतिवर्त धनु में इस तरह से शरीर के छह अंगों की क्रियाशीलता होती है जिसे एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि रात्रि में हम कहीं जा रहे हैं।

अचानक कोई व्यक्ति आँख पर टॉर्च से तीव्र रोशनी डालता है। ऐसी परिस्थिति में आँख का पलक स्वतः बंद हो जाएगा जो एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। इस उदाहरण में सर्वप्रथम टॉर्च की रोशनी आँखों पर पड़ती है जिससे आँखें उत्तेजित हो जाती हैं और तंत्रिका आवेग (nerve impulse) उत्पन्न हो जाता है।

यह तंत्रिका आवेग संवेदी या ज्ञानवाही तंत्रिका द्वारा सुषुम्ना में पहुँचता है। सुषुम्ना में स्थित साहचर्य तंत्रिका के द्वारा यह तंत्रिका आवेग गतिवाही या क्रियावाही तंत्रिका में छोड़ दिया जाता है जो इसे आँख एवं पलक की मांसपेशियों (muscles) तक पहुँचा देता है और उसके फलस्वरूप पलक बंद हो जाता है। टॉर्च की रोशनी आँख पर पड़ने के बाद पलक बंद होने की अनुक्रिया इतनी तेजी से होती है कि यह पता नहीं चलता कि इसका संचालन तथा नियंत्रण कहीं से (अर्थात सुषुम्ना से) हो रहा है।

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प्रश्न 8.
सुषुम्ना या मेरुरज्जु की संरचना या बनावट तथा कार्य का वर्णन करें।
उत्तर:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) को दो भागों में बाँटा गया है सुषुम्ना (spinal cord) तथा मस्तिष्क (brain):
सुषुम्ना की संरचना-सुषुम्ना रीढ़ की हड्डी, जो कमर से गर्दन तक फैली है, के भीतर उपस्थित होती है। इस हड्डी के भीतर एक तरल पदार्थ भरा होता है जिसमें लगभग 18 इंच लंबा एक मोटा तंतु है। इसे ही सुषुम्ना कहा जाता है। इसका रंग ऊपर से उजला तथा भीतर से धूसर (grey) होता है। ऊपर से नीचे तक सुषुम्ना में कुल 3 भाग (divisions) होते हैं। प्रत्येक भाग से मेरुदण्डीय तंत्रिका (spinal nerves) का एक जोड़ा (pair) निकलता है। इस जोड़े में एक तंत्रिका भाग शरीर के बाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं तथा दूसरी तंत्रिका द्वारा शरीर के दाएँ भाग से स्नायुप्रवाह आते हैं।
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चित्र: सुषुम्ना का कटा हुआ भाग का चित्र

सुषुम्ना को यदि कहीं से काटा जाए, तब इसकी भीतरी संरचना या बनावट एक ही समान दीख पड़ती है। चित्र में सुषुम्ना के एक ऐसे कटे हुए भाग को दिखाया गया है। इस चित्र में गौर करने से यह स्पष्ट हो जाता है। सुषुम्ना के बीच का भाग, जिसका रंग धूसर (grey) होता है, एक तितली के समान होता है। सुषुम्ना के बीच के भाग के चारों तरफ उजला पदार्थ (white matter) होता है जिससे होकर अनेक तंत्रिका तंतु ऊपर से नीचे की ओर और नीचे से ऊपर की ओर आते-जाते दिखाई पड़ते हैं। ऊपर से नीचे आनेवाले तंत्रिका तंतु द्वारा मस्तिष्क से सूचनाएँ सुषुम्ना में आती हैं तथा नीचे से ऊपर जानेवाली तंत्रिका तंतु से सूचनाएँ सुषुम्ना से मस्तिष्क में जाती हैं।

सुषुम्ना द्वारा कई तरह के कार्य किए जाते हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. तंत्रिका आवेग का संरचण (Transmission of nerve impulse):
सुषुम्ना का प्रधान काम तंत्रिका आवेग का संचरण करना है। ऐसे संचरण के माध्यम से वह मस्तिष्क का संबंध शरीर के अन्य भागों से जोड़ पाता है। संचरण का अर्थ होता है शरीर से आनेवाले तंत्रिका आवेगों को मांसपेशियों तथा ग्रथियों से भेजना। शरीर के भिन्न-भिन्न भागों (सिर एवं गर्दन को छोड़कर) से आनेवाले तंत्रिका आवेग को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उसे मस्तिष्क में पहुँचाता है।

फिर मस्तिष्क द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों को भेजी जानेवाली सूचनाओं को सुषुम्ना ग्रहण करता है तथा उपयुक्त अंगों में ले जाने के लिए उन्हें पेशीय या गति न्यूरोन (motor neuron) में छोड़ देता है। इस तरह, सुषुम्ना द्वारा तंत्रिक आवेग के संचरण का कार्य संपन्न होता है।

2. प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संरचण (Conduct and control of reflex action):
प्रतिवर्त क्रिया का नियंत्रण एवं संचालन भी सुषुम्ना द्वारा किया जाता है। प्रतिवर्त क्रिया से तात्पर्य एक ऐसी जन्मजात, सरल एवं अनैच्छिक (involuntary) क्रिया से होती है जो किसी उद्दीपन के प्रति की जाती है।

जैसे किसी गर्म वस्तु से अंगुली स्पर्श हो जाने से अंगुली. को खींच लेना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। उसी तरह आँख पर तीव्र रोशनी पड़ने पर पलक बंद होना एक प्रतिवर्त क्रिया का उदाहरण है। प्रतिवर्त क्रियाएँ इतनी जल्दी हो जाती हैं कि लगता है मानो वे अपने-आप हो गईं। परंतु, सच्चाई यह है कि इसका नियंत्रण एवं संचालन इसी सुषुम्ना द्वारा होता है।

चूँकि सुषुम्ना ऐसी क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण अपने स्तर से मस्तिष्क से मिलनेवाली सूचना के बिना इंतजार किए ही करता है, अतः यह स्वचालित (automatic) होता प्रतीत होता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सुषुम्ना की संरचना तथा बनावट में थोड़ी जटिलता है तथा इसके द्वारा तंत्रिका आवेगों का संचरण तथा प्रतिवर्त क्रियाओं का नियंत्रण एवं संचालन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं।

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प्रश्न 9.
वृहत मस्तिष्क की बनावट और क्रियाओं का वर्णन करें।
Or, मानव वृहत मस्तिष्क की ज्ञानवाही एवं गतिवाही क्रियाओं की व्याख्या कीजिए।
Or, प्रमस्तिष्क की बनावट या कार्यवाही की व्याख्या करें।
उत्तर:
वृहत मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) मनुष्य मस्तिष्क का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख भाग मस्तिष्क है जिसे मस्तिष्क बल्क (Cerebral Cortex) भी कहते हैं। हमारी सभी चेतन क्रियाओं का संचालन और विभिन्न मानसिक अनुभवों का नियंत्रण प्रमस्तिष्क के ही द्वारा होता है। उदाहरणार्थ, प्रत्यक्षण, सोचना, विचारना, तर्क करना, कल्पना करना आदि हमारी सभी मानसिक क्रियाओं का संचालन प्रमस्तिष्क का उद्गम स्थान है। ऊपर की सतह को देखने से मस्तिष्क का यह भाग कहीं दबा हुआ तो कहीं उभरा हुआ मालूम होता है।

दबे हुए भाग को दरार या फिसर या सलकस (Fissure or Sulcus) कहते हैं। इस तरह के दो दबे हुए भागों के बीच के भाग को ‘गाइरस’ (Gyrus) की संज्ञा दी जाती है। उभरे हुए भागों को रीजेज (Ridges) कहते हैं। कोर्टेक्स की दरारें या फिसर दो भागों में बँटती हैं। दो भागों में बाँटने वाली लम्बी दरार का नाम रोलैण्डो या मध्य दरार (Rolando or central) है। एक दूसरी दरार या फिसर भी है, जिसे सिलभीयस (Fissure or Sylvius) की दरार कहते हैं। इन दरारों द्वारा कोर्टेक्स चार भागों में बँटा है –

  1. पृष्ठ पालि (Occipital lobe)
  2. मध्यपालि (Pariental lobe)
  3. अग्र-पालि (Frontal lobe) तथा
  4. शंख पालि (Temporal lobe)

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चित्र: प्रमस्तिष्क के चार पालियों का चित्र

वृहत मस्तिष्क के विभिन्न भागों के कार्यों को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवेदी कार्य (Sensory functions)
  2. पेशीय कार्य (Motor functions) तथा
  3. साहचर्यात्मक कार्य (Associative functions)

इन तीनों प्रकार के कार्यों का संचालन एवं नियंत्रण प्रमस्तिष्क के कुछ खास केन्द्रों के द्वारा होता है।

(I) मस्तिष्क द्वारा संचालित ज्ञानात्मक क्रियाएँ (Sensory functions of the cortex):
किसी भी उद्दीपन का ज्ञान होने के पीछे कुछ खास क्रियाएँ होती हैं। सबसे पहले उद्दीपन किसी ज्ञानेन्द्रिय के सहारे ग्रहण किया जाता है। फलतः ज्ञानेन्द्रिय तंत्रिका आवेग उत्पन्न होता है। यह तंत्रिका आवेग जब किसी खास तरह की तंत्रियों के सहारे वृहत मस्तिष्क या प्रमस्तिष्क के किसी भाग में पहुँचता है तो प्रमस्तिष्क के सहारे उस उद्दीपन का संवदेन और ज्ञान होता है। इस प्रकार किसी भी उद्दीपन का ज्ञान प्रमस्तिष्क के द्वारा ही होता है।

प्राणी के वर्तमान सम्पूर्ण ज्ञानात्मक अनुभवों को तीन वर्गों में रखा गया है –

(क) शारीरिक परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न अनुभव जिसके अन्तर्गत ताप, स्पर्श एवं शारीरिक गति का अनुभव रखा गया है।
(ख) दृष्टि-सम्बन्धी अनुभव, जैसे-रंग को देखना या रंगों को ठीक से नहीं पहचानना आदि।
(ग) श्रवण-सम्बन्धी अनुभव (Auditory Sensitivity), जैसे-ठीक से सुनना या सुनने में कमजोरी आदि।

इन तीन वर्गों का ज्ञानात्मक अनुभव या आधार-स्थान भी मस्तिष्क में अलग-अलग पाया गया है। उदाहरणार्थ, शारीरिक परिवर्तन में उत्पन्न अनुभव का आधार मस्तिष्क का वह भाग है जो रोलैण्डों के फीसर के ठीक पीछे पैरीटल कौर्टेक्स में स्थित है। शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा में स्थित ग्राहक कोशों से चलकर जो स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क के इस भाग में पहुँचते हैं वे हममें ताप एवं स्पर्श के अनुभव को उत्पन्न करते हैं। साथ ही साथ, शारीरिक अंगों के संचालन से उत्पन्न अनुभव की भी आधारशिला पैरीटल कौर्टेक्स का वही भाग है जो रोलैंडो के ठीक पीछे है। पैरीटल कौर्टेक्स के इस भाग को हम सोमेस्थेटिक (Somesthetic) भाग कहते हैं।

सोमेस्थेटिक भाग के कार्य –

1.  सोमेस्थेटिक भाग ताप एवं स्पर्श की संवेदनाओं का नियंत्रण एवं संचालन करता है। पीड़ा के अनुभव के लिए कौर्टेक्स का नहीं, बल्कि थैलेमस की आवश्यकता होती है।

2. दाहिने सोमेस्थेटिक भाग के द्वारा शरीर के बायें भाग में उत्पन्न ताप एवं गति के अनुभव नित्रित एवं संचालित होते हैं। बायें सोमेस्थेटिक भाग का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से रहता है।

3. त्वचा सम्बन्धी उत्तेजनाओं की शक्ति के लिए कौर्टेक्स की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि थैलेमस की है, कारण कि थैलेमस में इतनी सामर्थ्य है कि वह त्वचा सम्बन्धी संवेदनाओं को उत्पन्न, नियंत्रण एवं संचालित कर सकता है। इसलिए असाधारण स्थिति में कौर्टेक्स का सहयोग त्वचा संबंधी संवेदना की उत्पत्ति एवं नियंत्रण में रहते हुए भी इसके अभाव से उनकी उत्पत्ति एवं नियंत्रण में किसी प्रकार की बाधा नहीं होती है।

4. दृष्टि सम्बन्धी संवेदना प्रमस्तिष्क की पृष्ठ-पालि के द्वारा होती है। यही कारण है कि पृष्ठ-पालि को दृष्टि-संवेदन क्षेत्र कहा गया है। आँख में आनेवाले तंत्रिका आवेग प्रमस्तिष्क के इसी खण्ड से आते हैं जिनके फलस्वरूप हमें दृष्टि संबंधी प्रेरणा होती है। पृष्ठ-पालि के दो भाग हैं-बायाँ भाग और दाहिना भाग। दोनों आँखों में बायीं ओर आने वाला तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के बायें भाग में जाता है और दोनों आँखों की दाहिनी ओर से उत्पन्न तंत्रिका आवेग पृष्ठ-पालि के दाहिने भाग में जाता है।

अतः पृष्ठ-पालि का यदि कोई एक भाग क्षतिग्रस्त हो जाय तो दोनों आँखों की आधी रोशनी समाप्त हो जायेगी। पेनफील्ड एवं इरीक्शन महोदय ने अपने प्रयोग द्वारा मस्तिष्क के दृष्टि भाग और दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों के बीच स्पष्ट सम्बन्ध दिखलाया है। एक औरत जिसका दृष्टि भाग कौर्टेक्स को चीर-फाड़ के लिए खोला गया था, उसके उस दृष्टि भाग के विभिन्न हिस्सों पर बिजली से उत्तेजनाएँ हो गयीं। इस प्रकार उन हिस्सों को बिजली द्वारा उत्तेजित किये जाने पर औरत ने लाल, नीले आदि रंगों के अनुभव को प्राप्त किया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कोर्टेक्स की दृष्टि भाग का सम्बन्ध दृष्टि सम्बन्धी अनुभवों से है।

5. श्रवण:
सम्बन्धी अनुभवों का आधार मस्तिष्क की शंख-पालि (Temporal lobe) है। यही कारण है कि इसे मस्तिष्क का श्रवण-संवेदी क्षेत्र भी कहते हैं। यह शंख-पालि दो भागों में बँटी रहती है, किन्तु प्रत्येक भाग में दोनों कानों से तंत्रिका आवेग पहुँचते हैं। इसलिए शंख पालि के किसी एक भाग के क्षतिग्रस्त होने से श्रवण सम्बन्धी संवेदना में कुछ कमी आ जाती है। किन्तु, इससे व्यक्ति पूर्णतः बहरा नहीं हो जाता है। जबकि शंख पालि के दोनों भागों के क्षतिग्रस्त हो जाने पर व्यक्ति पूर्णतः बहरा हो जाता है।

(II) कौटॅक्स द्वारा नियंत्रित एवं संचालित गतिवाही क्रियाएँ (Motor functions of the cortex):
मनुष्यों के गतिवाही क्रियाओं का संचालन एवं नियंत्रण रौलेंडो दरार (Fissure of Rolando) के अग्र भाग से लगे पतले से लम्बे भाग द्वारा होता है। इन कोशों से लगे हुए मुख्य तंतु (Axon) होते हैं। पिरामिड की शक्ल के इन कोशों को अगर नष्ट कर दिया जाता है तो वे मुख्य तंतु जो बिल्कुल इनसे सटे रहते हैं, मरने लगते हैं। ऐसे मरे हुए स्नायु तंतु सुषुम्ना एवं सुषुम्नाशीर्ष में भी पाये जाते हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि पिरामिड की शक्ल के जीव कोशों का सम्बन्ध सुषुम्ना एवं सुषुम्ना शीर्ष में पाये जानेवाले स्नायु-तंतुओं से भी है।

मस्तिष्क के दायें अर्द्धखण्ड में स्थित गतिवाही क्षेत्र (Motor area) के नष्ट होने से शरीर के बायें अंग में होने वाली ऐच्छिक क्रियाओं में ह्रास देखा जाता है। इसी प्रकार दायें अंगों में होनेवाली ऐच्छिक क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार क्रियाओं का संचालन सहज धनु ही करता है। जिसके लिए वर्तमान सभी शारीरिक अवयव, जैसे-ग्राहक इन्द्रिय ज्ञानवाही स्नायु कोश, सुषुम्ना, गतिवाही स्नायु कोष, मांसपेशियाँ एवं पिंड अपने कार्यों के बिना किसी रुकावट के करतें ‘घाये जाते हैं। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को नष्ट कर देने पर कुछ क्रियाओं का सम्पन्न होना बिल्कुल असम्भव-सा हो गया है। किन्तु व्यक्ति में यह अवस्था बहुत दिनों तक नहीं रहती है। धीरे-धीरे ऐसा होता है कि विनष्ट भाग के निकट जीव-कोष नष्ट हुये जीव कोशों के कार्य-भार को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, जिससे वे असम्पन्न हुई क्रियाएँ भी सम्पन्न होने लगती हैं।

मस्तिष्क के गतिवाही क्षेत्रों को जब बिजली द्वारा उत्तेजित किया गया तो इससे निम्नलिखित परिणाम निकले –

(क) जब मस्तिष्क के ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों को उत्तेजित किया जाता है तो शरीर के निचले अंगों में क्रियाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दाहिने अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के बायें हिस्से के निचले अंगों की क्रियाओं का संचालन होता है तथा बायें अर्द्ध-मस्तिष्क के ऊपरी भाग की सहायता से शरीर के दाहिने भाग के अंगों का संचालन एवं नियंत्रण होता है।

(ख) मस्तिष्क के निचले भाग का गतिवाही क्षेत्र चेहरे से सम्बन्धित रहता है। अतः इसके उत्तेजित किये जाने पर चेहरा का फड़कना, मुँह का खुलना और बन्द हो जाना आदि क्रियाएँ शुरू हो जाती हैं। ऊपर के वर्णन से यह स्पष्ट है कि दाहिने गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के बायें भाग से और बायें गतिवाही क्षेत्र का सम्बन्ध शरीर के दाहिने भाग से रहता है। साथ ही साथ ऊपरी गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के निचले अंगों से और निचले गतिवाही क्षेत्रों का सम्बन्ध शरीर के ऊपरी भागों से रहता है।

(III) कौटॅक्स द्वारा सम्पादित एवं नियंत्रित साहचर्य क्रियाएँ (Associative functions of the cortex):
प्रामाणिक अग्रपालि (Frontal lobe) में जो बड़ा-सा क्षेत्र पाया जाता है उसका कार्य हमारे उच्च मानसिक प्रक्रमों के सम्पादन में सहायता करता है। कौर्टेक्स के विभिन्न भाग जटिल मानसिक-क्रियाओं का सम्पादन करते हैं। पढ़ने के बाद समझने की क्रिया का सम्पादन दृष्टि साहचर्य भाग (Visual associative area) करता है, सार्थक रूप से बोलने और लिखने की क्रिया का सम्पादन गतिवाही साहचर्य (frontal association) करता है।

इस सभी भागों में किसी एक भाग को ही अगर नष्ट कर दिया जाय तो उसपर आश्रित क्रियाएँ सम्पादित नहीं हो सकेंगी। अन्य प्रकार की क्रियाओं का सम्पादन बड़ी आसानी से हो जाता है। अत: गतिवाही साहचर्य क्षेत्र के नष्ट करने पर व्यक्ति आवाज पैदा कर सकता है, हाथों में कलम देने पर इधर-उधर चला जा सकता है, परन्तु वह सार्थक शब्द-समूह को नहीं उत्पन्न कर सकता है और न ही कलम से दो-चार-दस शब्द लिख ही सकता है, जिसका कोई अर्थ हो। इस प्रकार साहचर्य भाग के विनाश के साथ-साथ जटिल मानसिक क्रियाओं की सार्थकता भी जाती रहती है।

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प्रश्न 10.
परिधीय स्नायु-मंडल क्या है? इसके कौन-कौन प्रकार हैं?
उत्तर:
स्नायु-मंडल का यह भाग शरीर के परिधीय भागों में रहता है। इसलिए इसे हम परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। यह मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर सीमान्त प्रदेशों या शरीर की परिधि में फैले हुए हैं। इसी कारण शरीर की परिधि में पाये जाने वाले स्नायु कोशों के संगठन को परिधीय स्नायु-मण्डल कहा जाता है। इस स्नायु-मण्डल का सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों का सम्बन्ध केन्द्रीय स्नायु-मण्डल से ज्ञानवाही एवं क्रियावाही स्नायु-कोशों द्वारा स्थापित करता हैं। इस प्रकार परिधीय स्नायु-मण्डल के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं –

(क) ग्राहकेन्द्रियाँ
(ख) ज्ञानवाही स्नायु-कोश
(ग) कर्मेन्द्रियाँ-माँसपेशियाँ और ग्रन्थियाँ तथा
(घ) गतिवाही स्नायु-कोश

परिधीय स्नायु-मण्डल को उसके कार्यों के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है –

  1. ज्ञानवाही परिधीय.स्नायु-मण्डल
  2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल

1. ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल-परिधीय स्नायु-मण्डल के इस भाग का सम्बन्ध शरीर के विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों से रहता है। यह ज्ञानेन्द्रियों का संबंध केन्द्रिय स्नायु-मण्डल से स्थापित करता है। इस बात के स्पष्टीकरण के लिए एक उदाहरण लें। किसी मंदिर में घंटी बजती है। हम उस घंटी की आवाज को कान से सुनते हैं। कान ही आवाज को ग्रहण करते हैं। अतः कान आवाज के ग्राहक हैं। परन्तु इस आवाज का ज्ञान हमें मस्तिष्क से प्राप्त होता है।

कान और मस्तिष्क के बीच ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कार्य करता है। जब कान आवाज को ग्रहण करते हैं तब कान के ग्राहक कोष उत्तेजित हो जाते हैं। फलतः ज्ञानवाही स्नायु-प्रवाह उत्पन्न होते हैं। इस स्नायु-प्रवाह को मस्तिष्क में पहुँचाने का काम ज्ञानवाही स्नायु करता है। इन क्रियाओं के बाद ही हमें मंदिर की घंटी की आवाज का ज्ञान होता है। ज्ञानवाही स्नायु-कोष स्नायु प्रवाहों को ज्ञानेन्द्रियों से मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं इसलिए इसे ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल अन्य ज्ञानेन्द्रियों का भी सम्बन्ध सुषुम्ना और मस्तिष्क के साथ स्थापित करता है।

2. गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल:
परिधीय स्नायु-मण्डल का जो भाग मस्तिष्क एवं सुषुम्ना को कर्मेन्द्रियों तथा मांसपेशियों और ग्रन्थियों से सम्बन्धित करता है उसे हम गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल कहते हैं। इस स्नायु-मण्डल का कार्य मस्तिष्क या सुषुम्ना के आदेश को कर्मेन्द्रियों तक पहुँचाना है। इसके ऐसा करने पर ही व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है। इसे एक उदाहरण की सहायता से हम स्पष्ट कर सकते हैं। मान लीजिए आप पढ़ रहे हैं। कोई व्यक्ति दरवाजा खटखटाता है।

दरवाजा खटखटाने की आवाज को आपके कान ग्रहण करते हैं। ज्ञानवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है। मस्तिष्क दरवाजा खोलने का आदेश देता है। यह आदेश गतिवाही स्नायु-प्रवाह के रूप में गतिवाही स्नायु-कोश द्वारा मांसपेशियों तथा ग्रन्थियों तक पहुँचता है। तदुपरान्त आप दरवाजा खोलने की क्रिया करते हैं। इस प्रकार गतिवाही परिधीय स्नायु-मण्डल द्वारा मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के क्रियात्मक आवेग गतिवाही अवयवों, मांसपेशियों और ग्रन्थियों तक पहुँचाये जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

परिधीय स्नायु-मण्डल के कुछ ज्ञानवाही और गतिवाही स्नायुओं का कार्य मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित कराना है और कुछ को सुषुम्ना के साथ। मस्तिष्क के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को मस्तिष्क-स्नायु तथा सुषुम्ना के साथ सम्बन्ध स्थापित करानेवाले परिधीय स्नायु को सुषुम्ना-स्नायु कहते हैं। चूँकि स्नायु कोश पूर्णत: स्वतंत्र होकर कार्य करते हैं अतः परिधीय स्नायुमण्डल को दो भागों में बाँटा गया है –

  1. परिधीय दैहिम स्नायुमंडल तथा
  2. परिधीय स्वतः संचालित स्नायुमण्डल।

परिधीय दैहिक स्नायुमण्डल के स्नायु-कोशों की क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों द्वारा संचालित होती हैं। परन्तु ये स्नायु कोश मस्तिष्क एवं सुषुम्ना से बाहर शरीर के परिधीय भागों में स्थित हैं। व्यक्ति को इन स्नायुओं द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाओं का ज्ञान होता है। व्यक्ति इन क्रियाओं पर अपना नियंत्रण भी रखता है। ये स्नायु बाहरी वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। प्रत्येक स्नायु कोश स्वतंत्र एवं व्यक्तिगत रूप से कार्य करता है। इसमें ज्ञानवाही तथा गतिवाही दोनों प्रकार के स्नायु रहते हैं।

परिधीय स्वतः
संचालित स्नायु-मण्डल का निर्माण ऐसे स्नायु कोशों से हुआ है जिनकी क्रियाएँ मस्तिष्क के उच्च केन्द्रों के अधीन नहीं रहती हैं। अत: व्यक्ति को इन स्नायुकोशों द्वारा होनेवाली क्रियाओं का ज्ञान नहीं होता। व्यक्ति का इन पर नियंत्रण भी नहीं रहता है। ये मस्तिष्क और सुषुम्ना के बाहर ही रहते हैं। ये शरीर के आंतरिक वातावरण से सम्बन्धित रहते हैं। इनके स्नायु-कोश सामूहिक रूप से कार्य करते हैं। इसमें केवल गतिवाही स्नायुकोश ही रहते हैं।

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प्रश्न 11.
अन्तःस्रावी ग्रंथि से आप क्या समझते हैं? इसके प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यक्ति के शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं, जिससे स्राव निकलकर सीधे खून में मिल जाते हैं और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करते हैं। इस तरह की ग्रंथियों को अंतःस्रावी ग्रंथि तथा इससे निकलने वाले स्राव को हॉरमोन्स कहते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली ग्रंथियों में निम्नलिखित प्रमुख हैं –

1. थाइरॉयड ग्रंथि:
जब ग्रंथि का स्थान कण्ठ के निकट होता है। इससे थाइरॉक्सिन का स्राव होता है। थायरॉयड ग्रंथि से जब स्राव बहुत कम मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति में मानसिक मन्दता तथा उदासीनता छा जाती है। जब इससे स्राव अधिक मात्रा में निकलता है तो व्यक्ति अधिक क्रियाशील रहता है। उसका रक्तचाप बढ़ा रहता है, भूख अधिक लगती है, ऐसा व्यक्ति चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है।

2. पाराथायरॉयड ग्रंथि:
पारा थायरॉयड ग्रन्थि का स्थान भी कण्ठ के समीप ही रहता है जिसमें चार छोटी-छोटी ग्रंथियों होती हैं। पाराथायरॉयड का स्राव शरीर में कैलसियम की मात्रा को निर्धारित करता है। इस ग्रंथि से अधिक मात्रा में स्राव होता है, जिससे व्यक्ति में शिथिलता बढ़ जाती है तथा कम मात्रा में स्राव होने से तनाव होती है। व्यक्ति में घबराहट होती है तथा चिड़चिड़ा हो जाता है।

3. पिट्यूटरी ग्रंथि:
पिट्यूटरी ग्रंथि का स्थान मस्तिष्क में होता है। यह ग्रंथि शरीर के सभी ग्रंथियों को नियंत्रित करती है, इसीलिए इसे Master gland भी कहा जाता है। यदि किसी बच्चे के पिट्यूटरी ग्रंथि का स्राव कम मात्रा में होता है तो उसका शारीरिक विकास रुक जाता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः बौना रह जाता है। उसमें आलसी के लक्षण विकसित हो जाते हैं तथा यौन अंगों का विकास अवरुद्ध हो जाता है और यदि अधिक मात्रा में स्राव होता है, तो व्यक्ति का कद काफी लम्बा हो जाता है और उसमें क्रियाशीलता अधिक हो जाती है।

4. एड्रिनल ग्रंथि:
एड्रिनल ग्रंथि किडनी के ठीक ऊपर होता है। यह एक महत्त्वपूर्ण ग्र!ि है। इसे Emergency gland भी कहा जाता है। एड्रिनल ग्रंथि से दो प्रकार के स्राव निकल है जिसको कार्टिन तथा एड्रीनलिन कहा जाता है । एड्रीनलिन हमारे शरीर के लिए काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इससे रक्तचाप, हृदय गति, शरीर में रक्त की आपूर्ति अधिक होती है। इसमें संवेग की अवस्था में समायोजन में सहायता मिलती है।

5. गोनाड्स ग्रंथि:
गोनाड्स को यौन-ग्रंथि भी कहा जाता है। यह स्त्रियों और पुरुषों में अलग-अलग होता है। पुरुषों के यौन-ग्रंथि को Testes तथा स्त्रियों के यौन-ग्रंथि को Ovary कहा जाता है। पुरुषों में पुरुषों के गुण तथा स्त्री में स्त्रियों के गुणों का विकास होना इन्हीं ग्रंथियों पर निर्भर करता है। पुरुषों में मूंछों का निकलना, आवाज का मोटा होना तथा स्त्रियों में स्तनों का विकास, जाँघों की गोलाई इसी के स्राव पर निर्भर करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवहारवाद की नींव किसने डाली –
(a) वुण्ट
(b) कोहल
(c) वाटसन
(d) मैस्लो
उत्तर:
(c) वाटसन

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प्रश्न 2.
गुणसूत्र किस पदार्थ से बने होते हैं –
(a) जीन
(b) डी एन ए
(c) खत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) डी एन ए

प्रश्न 3.
हमारी आँखों कितनी परतों से बनी होती है –
(a) 1
(b) 2
(c) 3
(d) 4
उत्तर:
(c) 3

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प्रश्न 4.
स्नायुमंडल की सबसे छोटी इकाई है –
(a) न्यूरोन
(b) कपाल
(c) टेक्टम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) कपाल

प्रश्न 5.
मानव शरीर में कोशों की संख्या है –
(a) लगभग 1 करोड़
(b) लगभग 10 करोड़
(c) लगभग 10 अरब
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) लगभग 10 अरब

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प्रश्न 6.
मानव मस्तिष्क में संधि की संख्या कितनी होती है?
(a) 1 लाख
(b) 1 करोड़
(c) 10 करोड
(d) 1 अरब
उत्तर:
(c) 10 करोड

प्रश्न 7.
कान के नली की लंबाई होती है –
(a) 20 मी०मी०
(b) 25 मी०मी०
(c) 30 मी०मी०
(d) 32 मी०मी०
उत्तर:
(b) 25 मी०मी०

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प्रश्न 8.
आँख में पटलों की संख्या कितनी होती है?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 9.
जो प्रयोग करता है उसे कहा जाता है –
(a) प्रयोगकर्ता
(b) प्रयोग
(c) चर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रयोगकर्ता

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 2 मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य क्या होते हैं?
उत्तर:
अनुभवों, व्यवहारों तथा मानसिक प्रक्रियाओं के माध्यम से अर्जित ज्ञान को मानव-हित में अधिक-से-अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान करना ही वैज्ञानिक जाँच का सार्थक लक्ष्य होना चाहिए। वैज्ञानिक जाँच के लक्ष्य करने के क्रम में प्राप्त सिद्धांतों एवं नियमों के माध्यम से मानव को सुखमय जीवन प्रदान किया जा सकता है।
वैज्ञानिक जाँच के माध्यम से वांछनीय के पाने के लिए निम्नांकित चरणों में सम्पूर्ण प्रक्रिया को समाप्त किया जाता है –

  1. वर्णन
  2. पूर्वकथन
  3. व्याख्या
  4. नियंत्रण और
  5. अनुप्रयोग

1. वर्णन:
किसी निर्धारित विषय से सम्बन्धित समस्याओं से जुड़ी सभी सूचनाओं का सही रूप से संग्रह किया जाता है। चूँकि व्यक्ति के बदलने से व्यवहार बदल जाता है। अर्थात् व्यवहार और अनुभवं अनगिनत होते हैं। शोधकर्ता प्राप्त सूचनाओं के आधार पर व्यवहार और अनुभव का वर्णन उपस्थित करता है।

उदाहरणार्थ विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास चाहने वाले को पता लगाना होता है कि उपस्थिति, वर्ग-कार्य, गृह-कार्य समय और योजना का कार्यान्वयन आदि विद्यार्थी के लिए कितना उचित या अनुचित होता है। विद्यार्थियों से जुड़ी आदतों, नियमों, व्यवहारों, विचारों को प्रतिशत रूप में प्रस्तुत करके उनका अध्ययन किया जाता है। प्रस्तुत विवरण में व्यवहार विशेष का उल्लेख आवश्यक होता है, जो उसको समझने में सहायता करता है।

2. पूर्वकथन:
वैज्ञानिक जाँच के प्रथम चरण (वर्णन) से प्राप्त जानकारियों के आधार पर से जुड़े अन्य व्यवहारों, घटनाओं अथवा गोचरों से सम्बन्ध के सूक्ष्म अध्ययन से पता किया जा सकता है कि परिणाम अच्छा होगा या बुरा, दोषरहित व्यवहार के लिए क्या परिवर्तन करना। चाहिए। समय, आदत, योजना, स्थिति में से किस दशा में अंतर लाने की गुंजाइश तथा आवश्यकता है।

उदाहरणार्थ, समय और कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए यदि कोई छात्र अध्ययन के लिए अच्छी व्यवस्था के अधीन जिज्ञासु बनकर पढ़ता है तो विश्वास से कहा जा सकता है कि वह परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करेगा। अधिक-से-अधिक लोगों का प्रेक्षण किए जाने पर पूर्वकथन के सत्य प्रमाणित होने की आशा बढ़ जाती है।

3. व्याख्या:
प्रदत्त सूचनाओं के आधार पर प्रस्तुत किये गये पूर्वकथन के कारणों तथा सत्य होने की आशा पर आवश्यक ध्यान दिया जाता है। किसी भी व्यवहार के कारणों तथा प्रेरक कारकों के लक्ष्यों का अध्ययन करके पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि पूर्वकथन कितना प्रतिशत सही होगा। उदाहरणार्थ, भय या दंड से प्रभाव छात्र परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करेगा ही, इसमें संदेह है। पूर्वकथनों की व्याख्या करने अथवा पहचान करने में कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करना होता है। जैसे, उचित नियंत्रण तथा साधन, समय, प्रवृत्ति, आदत में उत्पन्न दोष के कारण कोई छात्र बार-बार असफल होता रहता है।

4. नियंत्रण:
प्राप्त सूचनाओं के आधार पर प्राप्त पूर्वकथन की व्याख्या से पता लग जाता है कि प्रकार्य के किस अंश में परिवर्तित की आवश्यकता है। किसी कार्य के प्रति उत्पन्न व्यवहार को मनोनुकूल स्थिति में लाकर को नियंत्रित किया जा सकता है। व्यवहार के नियंत्रण के लिए –
(क) उसे पूर्ववत दशा में रख जाता है या
(ख) उसे वर्तमान दाशा में बढ़ाया जाता है अथवा
(ग) उसकी तीव्रता में कमी लाया जाता है
उदाहरणार्थ, किसी छात्र के अध्ययन का समय बढ़ाकर उसे सफलता का हकदार बनाया जा सकता है। औषधि एवं सेवा में अंतर लाकर किसी रोगी का अच्छा उपचार किया जा सकता है।

5. अनुप्रयोग:
वैज्ञानिक जाँच का अंतिम लक्ष्य लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। वैज्ञानिक जाँच नए सिद्धांतों अथवा विसंगतियों का पता लगाकर उनमें सुधार या विकास करके मानव-हित में प्रयुक्त करता है। जैसे, यह पता लग चुका है कि योग अथवा ध्यान से मनुष्य को रोगमुक्त या चिंतामुक्त बनाया जा सकता है। कार्यस्थल तथा साधनों के विकास के द्वारा कार्यकर्ता की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
वैज्ञानिक जाँच करने में अंतर्निहित विभिन्न चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैज्ञानिक विधि में किसी घटना विशेष अथवा गोचर की जाँच के लिए उसे तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है –

(क) वस्तुनिष्ठ:
वैसी घटना, जिसकी माप प्रेक्षणकर्ता के बदलने पर भी अंतर रहे। जैसे किसी बाँस की लम्बाई यदि 2 मीटर है तो कोई भी नापकर 2 मीटर लम्बा ही बतायेगा।

(अ) व्यवस्थित:
किसी घटना विशेष या गोचर की जाँच निर्धारित चरणों में निश्चित क्रम को बनाये रखते हुए पूरा करते हैं।

(ग) परीक्षण:
वैज्ञानिक जाँच की सफलता उसके बार-बार प्रयोग करने पर समान परिणाम के मिलने पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक जाँच करने में क्रमबद्ध यानी निश्चित चरणों में जाँच पूरा करना, सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। वैज्ञानिक जाँच के लिए चार वांछनीय चरण निम्नवत हैं –
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(क) समस्या का संप्रत्ययन:
वैज्ञानिक जाँच के लिए सर्वप्रथम अध्ययन के लिए एक निश्चित कथ्य या विषय का निर्धारण करता है। अभीष्ट विषय के सम्बन्ध में अधिक-से-अधिक गुण-अवगुण, लक्षण, विशेषता, अनुक्रिया आदि का पता लगाता है जिससे निर्धारित समस्या का वैसा प्रश्न सामने आता है जिसके द्वारा, जिसके लिए जाँच प्रारम्भ किया जाता है जिसमें अर्जित ज्ञान, पूर्व में किए गए जाँच परिणाम, समीक्षा, अनुभव आदि का भरपूर उपयोग किया जाता है।

समस्या के निर्धारण और पहचान के बाद शोधकर्ता अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर समस्या के समाधान का एक सुलभ विधि की कल्पना करता है। शोधकर्ता की परिकल्पना एक ठोस निर्णय की स्थिति की खोज में जुट जाता है।

उदाहरणार्थ, शोधकर्ता दूरदर्शन को विषय मानकर यह सोच लेता है कि आज जो भी अप्रिय घटनाएँ (लूट, बैंक कांड, हत्या, अपहरण, बलात्कार) होती हैं वे दूरदर्शन के कार्यक्रमों का दुष्परिणाम है। टेलीविजन पर हिंसा के दृश्यों को देखकर बच्चों में आक्रामकता आती है। शोधकर्ता की इस प्रकार की समझ को परिकल्पना कह सकते हैं जिसे गलत या सही प्रमाणित करने के लिए शोध कार्य को आगे बढ़ाया जाता है।

(ख) प्रदत्त-संग्रह:
निर्धारित विषय के सम्बन्ध में प्रस्तुत की गई परिकल्पना की परख के लिए चार पहलुओं पर विचार करके उचित निर्णय लिया जाता है।

1. अध्ययन के प्रतिभागी:
सूचना उपलब्ध कराने वाले प्रतिभागी (छात्र, अध्यापक, कर्मचारी, संगठन) की पहचान उम्र, कार्य, पेशा, स्थिति आदि दृष्टिकोण से की जाती है। पता लगाया जाता है कि दी गई सूचना लोभ, द्वेष, प्रेम या पक्षपात पर आधारित तो नहीं है। भावना में बहकर दी गई सूचना प्रायः गलत होती है।

2. प्रदत्त संग्रह से सम्बन्धित विधियाँ:
समस्या के समाधन के लिए उचित विधि का उपयोग किया जाता है जिसके अन्तर्गत प्रेक्षण विधि, प्रायोगिक विधि, सहसंबंधात्मक विधि, व्यक्ति अध्ययन आदि प्रमुख हैं।

3. उपकरण:
उचित विधियों से परिणाम पाने के लिए तरह-तरह के साधनों (मानचित्र, शब्दचित्र, आँकड़ा, प्रश्नावली, साक्षात्कार, प्रेक्षण अनुसूची आदि) की मदद लेनी होती है।

4. प्रदत्त संग्रह की प्रक्रिया:
समस्या के लक्षणों के अनुरूप विभिन्न विधियों और साधनों के प्रयोग से अधिकतम जानकारी प्राप्त की जाती है। इस क्रम में शोधकर्ता निर्णय लेता है कि विधियों और उपकरणों का किस प्रकार वैयक्तिक या सामूहिक उपयोग में लाया जाना हितकर होगा।

(ग) निष्कर्ष निकालना:
सही सूचनाओं के संग्रह एवं परिकल्पना की सहायता से सांख्यिकी से जुड़े चित्रालेख या वृत्तखंड या दंड आरेख, तोरण तैयार किया जाता है। सांख्यिकी विधियों के उपयोग से प्रदत्त-संग्रह का अध्ययन एवं दृष्टि में पूरा करके उचित निष्कर्ष निकाला जाता है। सांख्यिकीय विधियों से सूचनाओं का विश्लेषण का उद्देश्य परिकल्पना की जाँच करके तदनुसार निष्कर्ष निकालना है।

(घ) शोध निष्कर्षों का पुनरीक्षण:
निर्धारित विषय से सम्बन्धित परिकल्पना, प्रदत्त संग्रह और ज्ञात निष्कर्ष का उपयोग भिन्न-भिन्न स्थानों एवं दशाओं में दुहराकर निष्कर्ष की सत्यता को परखा जाता है। नकारात्मक परिणाम मिलने पर पुनः वैकल्पिक परिकल्पना तथा सिद्धांत को स्थापित करके सही निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है। उदाहरणार्थ, यदि टेलीविजन देखने वाले बच्चों में कुछ आक्रामक नहीं बनते हैं तो परिकल्पना असत्य मान लिया जाता है। अनुसंधान और परीक्षण की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है चाहे शोधकर्ता बदल भी जाये। नया शोधकर्ता प्रमाणित निष्कर्षों को आगे की जाँच का आधार बना लेता है।

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प्रश्न 3.
मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों के स्वरूप की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानवीय व्यवहार, अनुभव और मानसिक प्रक्रियाओं का उपयोगी अध्ययन पर आधारित मनोवैज्ञानिक दार्शनिक अध्ययन के क्रम में मानव चेतना, स्व, मन-शरीर के सम्बन्ध, संज्ञान, प्रत्यक्षण, श्रम, अवधान, तर्कना आदि की समुचित परख में करने में सक्षम है। मनोविज्ञान की सफलता एवं विकास मानवीय खोजों पर आधारित होती हैं। मनोवैज्ञानिक विविध स्रोतों से भिन्न-भिन्न विधियों द्वारा अपनी समस्या से सम्बन्धित सूचनाओं अथवा प्रदत्तों का संग्रह करता है।

मनोवैज्ञानिक प्रदत्त (सामान्यतया सूचना) व्यक्तियों अव्यक्त अथवा व्यक्त व्यवहारों, आत्मपरक अनुभवों एवं मानसिक प्रक्रियाओं से जुड़ी होती हैं। ज्ञात है कि प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते हैं बल्कि वे एक संदर्भ में प्राप्त किए जाते हैं जो निश्चित नियम या सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हैं। कोई व्यक्ति दशा परिवर्तन के साथ-साथ अपनी शारीरिक प्रदर्शन में भी अंतर ला देता है। जैसे शादी के लिए दिखलाई जानेवाली एक लड़की नम्र स्वभाव वाली, संकोची कन्या की तरह साड़ी में लिपटी हुई देखी जाती है जबकि वह सामान्य जिन्दगी में पैंट-शर्ट पहनकर डिस्को करती है।

मानव-हित में हम मनोविज्ञान से सम्बन्धित तरह-तरह की सूचनाओं (प्रदत्तों) का संग्रह कर उसका सामूहिक अध्ययन करके उचित निष्कर्ष निकालते हैं। मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों (सूचनाओं) के अलग-अलग स्वरूप होते हैं जो निम्न वर्णित हैं –

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक
  4. मनोवैज्ञानिक

1. जनांकिकीय सूचनाएँ:
व्यक्तिगत सूचनाओं (नाम, आयु, लिंग, जन्मक्रम, सहोदरों की संख्या, शिक्षा, व्यवसाय, वैवाहिक स्थिति, बच्चों की संख्या, आवास की भौगोलिक स्थिति, जाति, धर्म, माता-पिता की शिक्षा और व्यवसाय, परिवार की आय आदि) को जनांकिकीय सूचना माना जाता है।

2. भौतिक सूचनाएँ:
भौतिक सूचनाओं का सम्बन्ध पारिस्थितिक सम्बन्धी जानकारियों से है। इसके अन्तर्गत क्षेत्र (पहाड़ी, रेगिस्तानी, जंगली, तराई आदि) आर्थिक दशा, आवास की दशा, शैक्षणिक एवं सामाजिक स्थितियों (विद्यालय, पड़ोस से सम्बन्ध) यातायात के साधन आदि से सम्बन्धित सूचनाएँ ली जाती हैं।

3. दैहिक सूचनाएँ (प्रदत्त):
किसी व्यक्ति के शरीर की रचना (रक्त, तापमान, त्वचा, मस्तिष्क की संरचना) के सम्बन्ध में सभी जानकारियाँ ली जाती हैं। कोई व्यक्ति कितना उछल सकता है? कितना दौड़ सकता है? उसके रक्त में कितना हिमोग्लोबिन है? वह कितना सोता है? वह कैसा स्वप्न देखता है? उसे कितना क्रोध, धैर्य, प्रतिरोध क्षमता, सहन शक्ति है? क्या वह लार की मात्रा से परेशान रहता है? इस प्रकार के दैहिक स्थिति को बतलाने वाली सूचनाओं को दैहिक प्रदत्त माना जाता है।

4. मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ:
बुद्धि, परत्युत्पन्नमति, रुचि, सर्जनशीलता, अभिप्रेरणा, वैचारिक, विकार, भ्रम, चिन्ता, अवसाद बोधन, प्रत्यक्षिक निर्णय, चिंतन प्रतिक्रियाएँ, चेतना, व्यक्तिपरक अनुपात आदि की जानकारी मनोवैज्ञानिक सूचना के अधीन माने जाते हैं।

मापन की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक प्रदत्त को श्रेणियों (उच्च/निम्न, हाँ/नहीं) के रूप में कोटियों (प्रथम, द्वितीय) के रूप में लब्धांकों (15, 20, 30, 40,60) के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रदत्त से वाचिक आख्याएँ, प्रक्षेपण अभिलेख, व्यक्तिगत दैनिकी क्षेत्र टिप्पणियाँ, पुरालेखीय प्रदत्त आदि भी उपलब्ध हो सकते हैं।

मनोवैज्ञानिक प्रदत्त के स्वरूप इस तरह के होते हैं कि उनके उपयोग में गुणात्मक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों का पृथक रूप से विश्लेषण करना संभव होता है। इन सभी स्वरूपों की सहायता से किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में लगभग पूरी जानकारी मिल जाती है।

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प्रश्न 4.
प्रायोगिक तथा नियंत्रित समूह एक-दूसरे से कैसे भिन्न होते हैं? एक उदाहरण की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायोगिक समूह में समूह सदस्यों को अनाश्रित परिवर्त्य प्रहस्तन के लिए प्रस्तुत किया जाता है जबकि नियंत्रित समूह प्रायोगिक समूह के सफल संचालन हेतु वांछनीय कारक जुटाने का कार्य करते हुए मात्र एक तुलना समूह बनकर जो प्रहस्तित परिवर्त्य से स्वयं को स्वतंत्र, रखता है। उदाहरणार्थ घटनास्थ अपने आपको अकेला पाकर स्वयं के निर्णय के आधार पर कार्य करना. नियंत्रित समूह के अन्तर्गत माना जाता है जबकि किसी अन्य की उपस्थिति में स्वयं के कुछ करने से रोक लेने की स्थिति प्रायोगिक समूह माना जाता है।

नियंत्रित समूह के निस्पादन की तुलना प्रायोगिक समूह से की जाती है। नियंत्रित समूह से प्राप्त परिणामों की गणना करने पर वह प्रायोगिक समूह से अधिक प्रभावकारी पाया जाता है। किसी प्रयोग से संबद्ध परिवों को नियंत्रित रखकर ही वांछनीय फल प्राप्त किया जाता है जिसके लिए आश्रित परिवर्त्य ही प्रभाव में रखा जाता है। जैसे किसी एक ही कक्षा के छात्रों पर शिक्षण कार्य का प्रभाव अलग-अलग पाया जाना बतलाता है कि जिन छात्रों पर विशिष्ट कारकों (शोर-गुल, गर्मी, नटखट साथी, मन का भटकना, ललक की कमी) का प्रभाव पड़ रहा हो, उसे शिक्षण कार्य से कम लाभ मिलता है।

प्रायः बहुत नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में प्रयोग किये जाते हैं तथा दो घटनाओं या परिवों के मध्य कार्य-करण संबंध स्थापित करके किसी एक कारक में परिवर्तन लाकर अन्य अचर कारकों पर प्रभाव का अध्ययन करते हैं। अनुसंधानकर्ता दो परिवर्त्य के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवयों को कारण माना जाता है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव के अधीन माना जाता है। प्रायोगिक अध्ययनों में सभी संबद्ध सार्थक परिवर्त्य को नियंत्रण में रखना होता है ताकि अच्छा परिणाम प्राप्त हो।

उदाहरणार्थ:
तापमान के नियंत्रण के लिए पंखा, कूलर, ए.सी. का उपयोग किया जाता है। वाद्य साधनों पर रोक लगाकर ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित रखा जा सकता है। सड़कों पर ठोकरों की ऊँचाई एवं संख्या बढ़ाकर वेतहासा भागती गाड़ी की चाल को नियंत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार माना जा सकता है कि लाभकारी परिणाम देने के लिए प्रायोगिक समूह-उत्तरदायी होता है जबकि परिणाम को यथाशीघ्र सुधरे स्वरूप में प्रदान करने की स्थिति नियंत्रित समूह उत्पन्न करता है।

उदाहरणार्थ एक सभा संचालन की स्थिति ली जाए तो वक्ता अपने कथन से श्रोता को तभी लाभ पहुँचा सकता है जब भीड़ नियंत्रित हो, वे अनुशासित रहें, विद्युत व्यवस्था सही हो, शान्ति बनाकर रखी जाए। नियंत्रण समूह में परिवयों का निरसन, प्राणिगत परित्वों के साथ प्रयोग-स्थल तथा प्रयोगकर्ता के विचार आदि को प्रमुख स्थान मिला है। सारांशतः माना जाता है कि प्रायोगिक विधि कार्य-कारण सम्बन्ध की स्थापना करती है। प्रायोगिक एवं नियंत्रण समूह का उपयोग करके अनाश्रित परिवों की उपस्थिति का प्रभाव आश्रित परिवर्त्य पर देखा जाता है।

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प्रश्न 5.
एक अनुसंधानकर्ता साइकिल चलाने की गति एवं लोगों की उपस्थिति के मध्य संबंध का अध्ययन कर रहा है। एक उपयुक्त परिकल्पना का निर्माण कीजिए तथा अनाश्रित एवं आश्रित परिवों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अध्ययन के क्रम में कोई अनुसंधानकर्ता कम-से-कम परिवयों के मध्य संबंध स्थापित करके सह संबंधात्मक अनुसंधान के परिणाम के रूप में उपयुक्त परिकल्पना का निर्माण करता है। दी गई स्थिति में साइकिल चलाने की गति पर लोगों की उपस्थिति के मध्य सम्बन्ध जोड़ने की बात कही गई है।

अनेक बार के प्रेक्षण के आधार पर एक परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है जिसके अनुसार, “लोगों की उपस्थिति के दर बढ़ते जाने पर साइकिल चलाने की गति घटती जाती है, क्योंकि भीड़ के बढ़ने के फलस्वरूप पथ अवरोधी स्थिति में आ जाता है।” अनुसंधन की इस दशा को ऋणात्मक सहसम्बन्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है जिसमें एक परिवर्त्य (x) का मान बढ़ने से दूसरे अपवर्त्य () का मान कम हो जाता है।

साइकिल की गति और जुटने वाली भीड़ को क्रमशः आश्रित और अनाश्रित परिवर्त्य माना जा सकता है। प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवर्त्य कारण होता है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव को माना जाता है। यह भी माना जाता है कि आश्रित परिवर्त्य से उस गोचर का बोध होता है जिसकी अनुसंधानकर्ता व्याख्या करना चाहता है जो मात्र अनाश्रित परिवर्त्य में परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मात्र है। इस आधार पर साइकिल की गति आश्रित परिवर्त्य तथा परिवर्तन के कारण का कारक लोगों की उपस्थिति अनाश्रित परिवर्त्य माना जा सकता है।

प्रश्न 6.
जाँच की विधि के रूप में प्रायोगिक विधि के गुणों एवं अवगुणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जाँच की विधि के रूप में प्रायोगिक विधि सतर्कतापूर्वक संचालित प्रक्रिया पर आधारित भिन्न-भिन्न प्रयोग के कारण सुपरिणामी माने जाते हैं। नियंत्रित दशा में दो घटनाओं या परित्वों के मध्य कार्य-कारण संबंध स्थापित करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। प्रयोग में एक कारक में ऐच्छिक परिवर्तन लाकर दूसरे कारक पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है जबकि अन्य संबंधित कारक स्थिर रखे जाते हैं।
प्रायोगिक विधि अपने साथ कुछ गुणों तथा कुछ अवगुणों को साथ लेकर चलती है।

प्रायोगिक विधि के गुण:

  1. वैज्ञानिक विधि – सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन करने में प्रायोगिक विधि क्रमबद्धता पर अधिक ध्यान देता है।
  2. नियंत्रक – यह प्रयोग की तीव्रता को प्रदूषण मुक्त रखता है तथा उसे अव्यावहारिक होने से बचाता है।
  3. वस्तुनिष्ठता – प्रायोगिक विधि द्वारा प्राप्त सभी प्रदत्त वस्तुनिष्ठ तथा पूर्वधारणा मक्त होते हैं।
  4. सहजता – प्रायोगिक विधि से प्राप्त परिणामों को सांख्यिकीय निरूपण के माध्यम से तुलनात्मक अध्ययन के लिए सहज माना जाता है।
  5. अनुसंधानकर्ता के लिए रुचिकर – अनुसंधानकर्ता किसी संदर्भ में आश्रित एवं अनाश्रित परित्वयों का चयन अपनी रुचि के अनुसार करता है।
  6. स्पष्ट व्याख्या – अनुसंधानकर्ता आश्रित एवं अनाश्रित परित्वयों के मध्य कार्य-करण सम्बन्ध की स्पष्ट व्याख्या करने में सक्षम होता है।
  7. बहुआयामी क्षेत्र – प्रायोगिक विधि के माध्यम से मानव-जीवन से जुड़े भिन्न-भिन्न क्षेत्रों (व्यवहार, संवेदना, दक्षता) का सरल अध्ययन करता है।

प्रायोगिक विधि के अवगुण:

  1. अक्षमता – किसी विशिष्ट समस्या का अध्ययन प्रायोगिक विधि से सदैव संभव नहीं होता है। जैसे-बुद्धि स्तर पर पौष्टिक आहार के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किसी को भूखा रखना संभव नहीं है।
  2. जानकारी का अभाव – समस्त प्रासंगिक परिवयों को पूर्णत: जानना और उनका नियंत्रण करना कठिन होता है।
  3. प्रतिकूल दशा – प्रयोग प्रायः बहुत नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किए जाते हैं जो वास्तविक व्यवहार में सुलभ नहीं हो पाते हैं। जैसे, तापमान, आँधी, प्रकाश, ध्वनि आदि प्रतिकूल दशा भी उत्पन्न कर सकते हैं।
  4. क्षेत्र प्रयोग के कारण उत्पन्न कठिनाई – शोधकर्ताओं को अव्यवस्थित किए बिना क्षेत्र प्रयोग संभव नहीं होता।
  5. प्रयोग कल्प विधि की बाध्यता – भूकंप, बाढ़, अकाल, अपहरण जैसी विपदाओं से जूझते बच्चों को प्रयोगशला के माध्यम से मदद नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
डॉ. कृष्णन व्यवहार को बिना प्रभावित अथवा नियंत्रित किए एक नर्सरी विद्यालय में बच्चों के खेल-कूद वाले व्यवहार का प्रेक्षण करने एवं अभिलेख तैयार करने जा रहे हैं। इसमें अनुसंधान की कौन-कौन सी विधि प्रयुक्त हुई है? इसकी प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए तथा उसके गुणों और अवगुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बच्चों के खेलकूद बदले व्यवहार का प्रेक्षण करने एवं व्यवहार को बिना प्रभावित अथवा नियत्रित किए अभिलेख तैयार करने हेतु प्रकृतिवादी तथा असहभागी प्रेक्षण-प्रक्रिया को अपनाना सहज, स्वाभाविक एवं वस्तुनिष्ठ होता है। चूंकि प्रेक्षण मनोवैज्ञानिक जाँच का एक सशक्त उपकरण है जिसे व्यवहार के वर्णनं की प्रभावकारी विधि मानी गयी है। अतः बच्चों के व्यवहार की परख के लिए हमें सदा सतर्क एवं जागरूक रहना होता है। प्रकृतिवादी प्रेक्षण के क्रम में प्रेक्षणकर्ता परिस्थिति का न तो प्रहस्तन करता है और न ही उसको नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

असहभागी प्रेक्षण की प्रक्रिया में किसधी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर से किया जाता है जिसमें वीडियो कैमरा तथा अभिलेख संरचना अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। अनुसंधानकर्ता अभिलेख तैयार करते समय व्यवहार की व्याख्या करने में अपनी रुचि एवं जागरूकता को नष्ट होने से बचाये रहता है। निरीक्षण विधि द्वारा बालकों के व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थिति में होता है। इनमें बच्चों की प्रतिक्रियाओं का क्रमबद्ध और योजनाबद्ध रूप में अध्ययन करके वांछनीय व्यवहार का पता लगाना सरल होता है, क्योंकि निरीक्षण विधि का स्वरूप वस्तुनिष्ठ होता है। प्रेक्षण के पश्चात् तैयार अभिलेखों का विश्लेषण करके सही अर्थ पाने का प्रयास किया जाता है।

खेलकूद वाले व्यवहार के अन्तर्गत रुचि, स्वभाव, जिज्ञासा, जीत की ललक, कला, प्रयास आदि तत्वों का सामूहिक प्रेक्षण किया जाता है। इसमें प्रतिभागियों की स्वैच्छिक सहभागिता, उनकी सूचित सहमति तथा परिणामों के विषय में प्रतिभागियों से भागीदारी करने जैसी नैतिक सिद्धांतों को अनुसंधान मूलतः परखने का प्रयास किया जाता है। सांख्यिकीय प्रक्रियाओं का उपयोग करके उचित निष्कर्ष को प्राप्त कर लिया जाता है।

प्रेक्षण विधि के युग:

  1. समय की बचत – बच्चों के व्यवहार का सामूहिक अध्ययन करने से दक्षतापूर्ण सूचनाओं के आधार पर सर्वेक्षण शीघ्रता से पूरा कर लिए जा सकते हैं।
  2. वस्तुनिष्ठता – मनोवैज्ञानिक परीक्षण से प्राप्त परिणाम में वस्तुनिष्ठता एवं प्रमाणीकरण बना रहता है।
  3. आयु वर्ग का विस्तार – परीक्षण किसी आयु वर्ग विशेष के लिए।
  4. सहसंबंधात्मक अनुसंधान की प्रवृत्ति का विकास – कार्यरत प्रवत्यों द्वारा प्राप्त सहसंबंध गुणांक के द्वारा यथासंभव व्यावहारिक एवं उपयोगी निष्कर्ष की प्राप्ति होती है।
  5. अर्थद्वन्द्व से मुक्ति – विशेषता की खोज में किया जाने वाला अनुसंधान स्पष्ट रूप से बिना किसी अर्थद्वन्द्व के परिभाषित किया जा सकता है।
  6. गणना अथवा मापन में सहजता – अभिलेखों तथा आँकड़ों या पठनों के आधार पर प्रतिक्रियादाताओं की गणना की विधि सरल बनायी जा सकती है।
  7. गति एवं शक्ति का महत्त्व – प्रतिभागियों की गति एवं शक्ति की पहचान करने में परीक्षण विधि अनुकूल माना जाता है।
  8. पूर्वाग्रह से मुक्ति – व्यवहार की परख करने वाले अनुसंधान में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं किया जा सकता है।
  9. निष्पक्षता – व्यवहार सम्बन्धी सही सूचना पाने में निष्पक्षता से गणना की जाती है।
  10. स्वाभाविक परिणाम – अनुसंधानकर्ता की सतर्कता के फलस्वरूप व्यवहार का स्वाभाविक स्वरूप जानने का अहसास मिलता है।
  11. विश्वसनीयता एवं पुनरावृत्ति की सुविधा-अनुसंधान क्रम में किये गये अध्ययन को दुहराया जा सकता है और परिणाम की विश्वसनीयता कायम रखी जा सकती है।

अनुसंधान प्रक्रिया के अवगुण:

  • प्रदत्तों का अभाव – निरीक्षण क्रम में सभी वांछनीय सूचनाएँ तथा साधन सरलता से सभी स्थितियों में उपलब्ध नहीं होते हैं।
  • समय का अभाव – परीक्षण के लिए निर्धारित प्रक्रिया कब प्रारम्भ होगी और कब समाप्त हो जाएगी यह अनुसंधानकर्ता नहीं जान पाता है। समय के अभाव में सम्पूर्ण अभिलेख प्राप्त नहीं होते हैं।
  • अपूर्ण निष्कर्ष – साधनों की कमी, समय की अनिश्चितता, परिकल्पना की स्थिति से तालमेल का नहीं होना आदि ऐसे कारण हैं जिससे निष्कर्ष अपूर्ण रह जाता है जिससे अनुसंधान की प्रक्रिया सत्य और विश्वसनीय नहीं रह पाती।
  • मानसिक प्रक्रियाओं के सामूहिक अध्ययन की बाध्यता – एक प्रकार के व्यवहार में जुड़े प्रतिभागियों की सामूहिक मानसिक क्रियाओं का आकलन संभव नहीं होता है। शारीरिक, वैचारिक एवं मानसिक दशाओं में भिन्नता के कारण प्रतिभागियों (बच्चों) के संवेगों की जानकारी सही-सही नहीं मिल पाती है।
  • श्रमसाध्यता – प्रेक्षण करके सही अभिलेख तथा निष्कर्ष प्राप्त करना बहुत ही बुद्धि और श्रम चाहता है। प्रेक्षण विधि श्रमसाध्य होता है जो अधिक समय लेती है तथा प्रेक्षक के पूर्वाग्रह के कारण गलत सूचना संग्रह करने का कारण बन जाता है।
  • पूर्वाग्रह – हम चीजों को उसी ढंग से देखते हैं जैसा कि हम स्वयं होते हैं न कि जैसी चीजें होती हैं। अर्थात् पूर्वाग्रह के कारण हम किसी घटना या प्रक्रिया की व्याख्या करने में गलती कर बैठते हैं। वास्तविक व्यवहार पर आधारित सूचना संग्रह में हमसे भूल हो जाती है।
  • समय और नियंत्रण या परियोजना की असुविधा – समय और साधन से संतुलन बनाने वाली क्रिया का हमेशा मिल जाना लगभग असंभव होता है।
  • निरसन की समस्या – प्रेक्षण के क्रिया-स्थल को उचित वातावरण बनाये रखने के लिए तापमान और ध्वनि जैसे परिवों का निरसन कठिन कार्य है।
  • प्रतिसंतुलनकारी तकनीक और यादृक्षिक वितरण – सम्बन्धी दोष समूहों के बीच विभवपरक अंतर लाकर वांछनीय परिणामों को प्रभावित करते हैं, क्योंकि कार्यों को निश्चित क्रम में सजाकर अध्ययन करना तथा प्रायोगिक और नियंत्रित समूहों में प्रतिभागियों का वितरण दोनों अच्छे परिणाम के लिए आवश्यक होते हैं।
  • क्षेत्र प्रयोग एवं प्रयोग कल्प – प्रेक्षण के लिए उपलब्ध क्षेत्र या विधि अनुसंधान के मनोनुकूल नहीं हो सकता है तथा भूकंप, बाढ़ जैसी विपदाओं से त्रस्त प्रतिभागियों के लक्षण अस्वाभाविक बन जाते हैं। प्रतिभागियों की दशा को उत्साहित, भयमुक्त अथवा चिन्तारहित बनाये रखना कठिन कार्य है।
  • नैतिक मुद्दे – मनोवैज्ञानिक अनुसंधान के क्रम में अनुसंधानकर्ता तथा प्रतिभागियों में से प्रत्येक नैतिक सिद्धांत (निजता, रुचि, उपकार, सुरक्षा) का पालन करेगा ही, यह मानना कठिन है।

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प्रश्न 8.
उन दो स्थितियों का उदाहरण दीजिए जहाँ सर्वेक्षण विधि का उपयोग किया जा सकता है? इस विधि की सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिष्कृत तकनीकों का उपयोग करके लोगों की अभिवृत्ति का पता लगाना तथा विभिन्न प्रकार के कारण-कार्य सम्बन्धों को पूर्वानुमान प्रस्तुत करना सर्वेक्षण विधि का प्रधान उद्देश्य होता है। उदाहरणार्थ –

  1. चुनाव के समय यह जानने के लिए सर्वेक्षण किया जाता है कि मतदाता किस राजनीतिक दल विशेष को वोट देंगे अथवा वे किस प्रत्याशी के पक्ष में अपना विश्वास प्रकट करते हैं।
  2. सर्वेक्षण अनुसंधान लोगों के मत, अभिवृत्ति और सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करने के लिए निम्न. प्रश्नों का मौलिक उत्तर जानना चाहता है –
    • भारत के लोगों को किन चीजों से प्रसन्नता मिलती है।
    • लोग परिवार नियोजन, पंचायती राज, स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था, शिक्षा सम्बन्धी कार्यक्रम आदि के. सम्बन्ध में किस स्तर की जानकारी रखते हैं।

सर्वेक्षण विधि की सीमाएँ –
विविध प्रकार के कारण-कार्य सम्बन्धों से जुड़े पूर्वानुमान को उपयोगी स्तर प्रदान करने के लिए प्रयोग तथा अनुसंधानकर्ता से सम्बन्धित कुछ सीमाएँ निर्धारित हैं –

1. अनुसंधानकर्ता:
अनुसंधनकर्ता को विषय तथा तकनीकों का ज्ञान होना चाहिए। उन्हें निःस्वार्थ, निर्भय एवं जिज्ञासु होना चाहिए। पूर्वानमान व्यक्त करने में उन्हें कुशल होना चाहिए।

2. मनोवैज्ञानिक प्रदत्त:
निर्धारित विषयों से सम्बन्धित सूचनाओं का ही संग्रह करना चाहिए। संग्रह की गई सूचना सत्य, मानक एवं उपयोगी होनी चाहिए।

3. विधियाँ और उपकरण:
सर्वेक्षण अनुसंधान के लिए सरल विधियाँ एवं वांछनीय उपकरणों का उपयोग किया जाना चाहिए।

4. स्वाभाविक प्रक्रियाएँ:
सर्वेक्षण अनुसंधान की सफलता के लिए आधुनिक तकनीकों पर आधारित प्रक्रियाओं को अपनाना चाहिए।

5. वैयक्तिक साक्षात्कार:
साक्षात्कार के लिए पूर्व निर्धारित प्रश्नों को ही प्रयोग में लाना चाहिए। साक्षात्कारकर्ता को प्रश्नों की शब्दावली में अथवा उसके पूछे जाने के क्रम में कोई भी परिवर्तन करने की स्वतंत्रता नहीं होती है। प्रतिक्रियादाता जो संवेदनशील तथा सहज दशा में रहकर इष्टतम उत्तर देने के लिए स्वतंत्र रहता है, समय-सीमा की छूट रहती है। साक्षात्कार के समय सभी परिस्थितियों को लचीला एवं अनुकूलित होना आवश्यक होता है।

6. प्रश्नावली सर्वेक्षण:
मुक्त तथा अमुक्त प्रश्नों के उत्तर लिखित या मौखिक रूप में देने की भी छूट होती है। इस विधि में पढ़ने योग्य प्रतिक्रियादाता ही भाग ले सकते हैं। प्रश्नावली का उपयोग पृष्ठभूमि सम्बन्धी एवं जनांकिकीय सूचनाओं, भूतकाल के व्यवहारों, अभिवृत्तियों एवं अधिमतों, किसी विषय विशेष के ज्ञान तथा व्यक्तियों की प्रत्याशाओं एवं आकांक्षाओं की जानकारी पर आधारित प्रश्नों के माध्यम से सर्वेक्षण किया जा सकता है। इसमें आमने-सामने बैठकर या डाक द्वारा लोगों की प्रतिक्रियाएँ जानने की छूट होती हैं।

7. दूरभाष सर्वेक्षण:
गलत सूचनाओं तथा अवांछनीय प्रतिक्रिया से बचे रहने की आवश्यकता होती है। विधि का चयन करने में सावधानी रखनी होती है।

8. मनोवैज्ञानिक परीक्षण:
जिस विशेषता के लिए परीक्षण की व्यवस्था की जाती है उसके स्पष्ट रूप से बिना किसी अर्रद्वन्द्व को परिभाषित किया जाना चाहिए तेथा सभी प्रयुक्त प्रश्नों को विषय से सम्बन्धित होना चाहिए। आयु वर्ग तथा समय-सीमा की छूट रहती है। विभिन्न पाठकों के लिए समान अर्थ देने वाले शब्दों का उपयोग किया जाना जरूरी है। अनुसंधानकर्ता को परिणाम की विश्वसनीयता, वैधता तथा मानकों पर सही आकलन करके शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।

9. विविध:
विषय एवं विधि के चयन में सावधनी रखते हुए निष्पादन सम्बन्धी सही सूचना प्राप्त करनी चाहिए। सही योजना, अनेक विधियों से प्राप्त प्रामाणिकता आदि का ध्यान महत्वपूर्ण होता है।

10. वास्तविक शून्य बिन्द का अभाव:
मनोवैज्ञानिक अध्ययन में जो कुछ लब्धांक मिलते हैं वे अपने आप में निरपेक्ष नहीं होती बल्कि उनका सापेक्ष मूल्य होता है।

11. मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप:
किसी विषय से सम्बन्धित गुणात्मक अध्ययन के लिए दो या अधिक शोधकर्ताओं को अवसर दिया जाना चाहिए। प्रत्येक से प्राप्त प्रेक्षणों पर सामुदायिक तर्क-वितर्क करके अतिम स्वरूप प्रदान करना चाहिए।

12. नैतिक मुद्दे:
प्रतिभागियों तथा अनुसंधानकर्ता के लिए रुचि, सहयोग, परोपकार, सुरक्षा, प्रोत्साहन तथा भागीदारी से सम्बन्धित सभी सुविधाएं जुटाने का नैतिक कर्तव्य बनता है। फलतः स्वैच्छिक सहभागिता, सूचित सहमति स्पष्टीकरण, अध्ययन के परिणाम की भागीदारी और प्रदत्त स्रोतों की गोपनीयता प्रमुख विचार के योग्य माने जाते हैं।

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प्रश्न 9.
साक्षात्कार एवं प्रश्नावली में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सर्वेक्षण अनुसंधन सूचना –
संग्रह हेतु विभिन्न तकनीकों की सहायता लेते हैं। प्रयुक्त तकनीकों में से साक्षात्कार और प्रश्नावली दो प्रचलित विधियाँ हैं। इन दोनों के स्वरूप, प्रभेद एवं निर्णय क्षमताओं में कुछ सूक्ष्म अंतर होते हैं जो निम्न वर्णित हैं –
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प्रश्न 10.
एक मानकीकृत परीक्षण की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एक मानकीकृत (संरचित) परीक्षण एक विशिष्ट प्रकार का मनोवैज्ञानिक परीक्षण होता है जिसका उपयोग मानसिक अथवा व्यावहारपरक विशेषताओं के संबंध में किसी व्यक्ति की स्थिति के मूल्यांकन में करते हैं। परीक्षण की रचना एक व्यवस्थित प्रक्रिया है तथा इसके कुछ निश्चित चरण होते हैं। इसके अन्तर्गत एकांशों के विस्तृत विश्लेषण तथा समग्र परीक्षण की विश्वसनीयता, वैधता एवं मानकों के आकलन आते हैं।

विश्वसनीयता की परख परीक्षण पुनः परीक्षण के आधार पर संभव होता है। परीक्षण के उपयोग योग्य होने के लिए उसकी वैधता भी आवश्यकता होता है। इससे पता चलता है कि क्या परीक्षण गणितीय उपलब्धि का मापन कर रहा है अथवा भाषा दक्षता का इसके बाद कोई परीक्षण प्रामाणिक तब माना जाता है जब परीक्षण के लिए मानक विकसित कर लिए जाते हैं। इससे किसी परीक्षण पर व्यक्तियों के प्राप्त लब्धांक की भी व्याख्या करने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 11.
मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमा निम्न वर्णित है:

  1. मनोवैज्ञानिक जाँच के क्रम में संग्रह किए जानेवाले व्यवहार अथवा किसी घटना का यथासंभव सही-सही वर्णन प्राप्त किया जाता है।
  2. प्राप्त सूचनाओं के विवरण से सम्बन्धित पूर्वकथन की रचना की जाती है।
  3. व्यवहार के कारणों की जानकारी प्राप्त करनी होती है।
  4. वैज्ञानिक जाँच के क्रम में सूचनाओं का विश्लेषण तथा अनुप्रयोग आवश्यक होते हैं।
  5. भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदत्तों को निश्चित क्रम में सजाना होता है।
  6. जाँच की विधियों का चयन और अनुप्रयोग में सतर्कता रखनी होती है।
  7. प्रेक्षण और अभिलेख की व्याख्या सहज होनी चाहिए।
  8. कार्य-करण सम्बन्धों की जानकारी एवं अनुप्रयोग आवश्यक होता है।
  9. प्रेक्षण सम्बन्धी गलत सूचनाओं एवं प्रतिक्रियाओं से बचा रहना चाहिए।
  10. समय सीमा पर ध्यान देना वांछनीय होता है।
  11. अनुसंधानकर्ता को अधिक विधियों का उपयोग करना चाहिए।
  12. लब्धांकों की तुलना करके सहसंबंध गुणांक का अनुमान लगाया जाता है।
  13. मनोवैज्ञानिक मापन सम्बन्धी समस्याओं (शून्य विधि का अभाव, मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप, गुणात्मक प्रदत्तों की आत्मपरक व्याख्या) के समाधान के बाद ही निष्कर्ष तय करना होता है। इन समस्याओं को मनोवैज्ञानिक जाँच की सीमा माना जाता है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक जाँच करते समय एक मनोवैज्ञानिक को किन नैतिक मार्गदर्शी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जाँच करते समय एक मनोवैज्ञानिक को निम्न वर्णित मार्गदर्शी सिद्धांतों का पालन करना चाहिए –

नैतिक सिद्धांत:
अध्ययन में भाग लेने के लिए व्यक्ति की निजता एवं रुचि का सम्मान, अध्ययन के प्रतिनिधियों को उपकार अथवा किसी खतरे से उसकी सुरक्षा तथा अनुसंधान के लाभ में सभी प्रतिभागियों की भागीदारी वांछनीय है। इसके पक्ष में निम्न बिन्दुओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है –

1. स्वैच्छिक सहभागिता:
अध्ययन में जुटे प्रतिभागियों को अध्ययन के लिए विषय को चयन करने में तथा समय निर्धारण में बिल्कुल स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए। प्रतिभागियों के निर्णय पर प्रलोभन, दंड, त्याग का प्रभाव नहीं डालना चाहिए।

2. सूचित सहमति:
प्रतिभागियों की दक्षता का उपयोग, प्रदत्त संगणक का प्रयोग, विचार को बदलने के लिए बाध्य करना आदि नैतिक सिद्धांत के विरुद्ध किया है। अच्छा तो यह होगा कि प्रतिभागियों को संभावित घटनाओं अथवा त्रुटियों की सूचना देकर उनकी सहमति ले लेनी चाहिए। प्रतिभागियों को अनायास शारीरिक या मानसिक उलझन में नहीं डालना चाहिए।

3. स्पष्टीकरण:
अध्ययन के विषय एवं विधियों का स्पष ज्ञान प्रतिभागियों को अवश्य दे देना चाहिए। झूठा भरोसा देना प्रतिभागियों से धोखा करना माना जाएगा।

4. अध्ययन के परिणाम की भागीदारी:
प्रदत्त संग्रह, प्रेक्षणों का अध्ययन, निष्कर्ष निकालना तथा अध्ययन के परिणाम की सही-सही सूचना प्रतिभागियों को मिल जानी चाहिए। अध्ययन के परिणाम के कारण कौन चिंतित है, कौन खुश है, कौन उससे फायदा उठाना चाहता है आदि अंधकार में रखने वाली स्थिति नहीं है। प्रतिभागियों की प्रत्याशा पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।

5. प्राप्त स्रोत की गोपनीयता:
प्रतिभागियों से संबंधित सभी सूचनाओं को अत्यन्त गोपनीय रखा जाना चाहिए। प्राप्त स्रोत की गोपनीयता के अभाव में बाहरी व्यक्तियों के द्वारा सुरक्षा खतरे में पड़ सकता है। उसके लिए संकेत संख्या, शब्द संकेत
की रचना की जानी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
परिकल्पना किसे कहते हैं?
उत्तर:
समस्या की पहचान के बाद शोधकर्ता समस्या समाधान के लिए संभावित हल खोजते है, काल्पनिक समाधान हेतु प्रस्तुत कथन को परिकल्पना कहा जाता है। जैसे, टेलीविजन पर हिंसा का दृश्य देखने से बच्चों में आक्रामकता आती है अथवा प्रतियोगिता या परीक्षा में असफल हो जाने से उत्साह मंद पड़ जाता है आदि।

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प्रश्न 2.
प्रदत्त संग्रह से सम्बन्धित किन चार पहलुओं के बारे में उचित निर्णय लेना होता है?
उत्तर:
(क) अध्ययन के प्रतिभागी (बच्चे, किशोर, कर्मचारी)
(ख) प्रदत्त संग्रह की विधि (प्रेक्षण, विधि, प्रायोगिक विधि)
(ग) अनुसंधान में प्रयुक्त उपकरण (साक्षात्कार, प्रश्नावली) तथा
(घ) प्रदत्त संग्रह की प्रक्रिया (वैयक्तिक, सामूहिक)।

प्रश्न 3.
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान किस लिए किए जाते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विवरण, पूर्वकथन, व्याख्या, व्यवहार नियंत्रण तथा वस्तुनिष्ठ तरीके से उत्पादित ज्ञान के अनुप्रयोग के लिए किए जाते हैं।

प्रश्न 4.
मनोवैज्ञानिक जांच के विभिन्न लक्ष्यों में से किसे सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक जांच का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य अनुप्रयोग को माना जाता है जो लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाकर उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिए सुगम मार्ग बनाते हैं।

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प्रश्न 5.
अनुसंधान के वैकल्पिक प्रतिमान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मानव व्यवहार का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है जिसका प्रेक्षण, मापन तथा नियंत्रण किया जा सकता है। आधुनिक व्याख्यात्मक परम्परा के अनुसार समझ को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फलतः प्राकृतिक आपदाओं और असाध्य रोगों की पहचान और उससे राहत पाने की युक्ति खोजी जाती है।

प्रश्न 6.
मनोवैज्ञानिक पूछताछ की विभिन्न विधियों का नाम लिखें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक पूछताछ अथवा मनोविज्ञान की विभिन्न विधियाँ हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. निरीक्षण विधि
  2. साक्षात्कार विधि
  3. प्रयोगात्मक विधि
  4. व्यक्ति इतिहास विधि
  5. प्रश्नावली विधि इत्यादि

प्रश्न 7.
निरीक्षण विधि क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण विधि एक ऐसी विधि है जिसमें पूर्व योजना के अनुसार क्रमबद्ध, पूर्वाग्रह मुक्त नियंत्रित एवं वस्तुनिष्ठ अध्ययन होता है। बाल मनोविज्ञान की समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन में निरीक्षण विधि एक महत्वपूर्ण विधि है।

प्रश्न 8.
निरीक्षण विधि के जन्मदाता कौन थे?
उत्तर:
निरीक्षण विधि के जन्मदाता जे. बी. वाटसन थे।

प्रश्न 9.
निरीक्षण विधि का स्वरूप कैसा है?
उत्तर:
निरीक्षण विधि का स्वरूप वस्तुनिष्ठ है।

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प्रश्न 10.
निरीक्षण विधि का मूल उद्देश्य बतायें।
उत्तर:
निरीक्षण विधि द्वारा बालकों के व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थिति में होता है। इसमें बच्चों की प्रतिक्रियाओं का क्रमबद्ध और योजनाबद्ध रूप में अध्ययन होता है।

प्रश्न 11.
साक्षात्कार विधि क्या है?
उत्तर:
साक्षात्कार विधि वैसी विधि है जिसमें साक्षात्कार करनेवाले विशेषज्ञों का एक समूह होता है जिसे साक्षात्कार बोर्ड कहते हैं। साक्षात्कार आमने-सामने होता है। इस विधि में सूचनाओं एवं तथ्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्न-उत्तर पद्धति को अपनाया जाता है।

प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक प्रदत्त किसे कहते हैं?
उत्तर:
व्यक्तियों के व्यक्त या अव्यक्त व्यवहारों, आत्मपरक अनुभवों एवं मानसिक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित जानकारियों के संग्रह को वैज्ञानिक प्रदत्त (सूचनाएँ) कहा जाता है। प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते बल्कि वे एक संदर्भ में प्राप्त होते हैं तथा उस सिद्धांत एवं विधि से आबद्ध होते हैं।

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प्रश्न 13.
मनोविज्ञान के प्रदत्तों को किन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक
  4. मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ

प्रश्न 14.
मनोविज्ञान की महत्वपूर्ण विधियों की ओर संकेत करें।
उत्तर:

  1. प्रेक्षण
  2. प्रायोगिक
  3. सहसंबंधात्मक
  4. सर्वेक्षण
  5. मनोवैज्ञानिक प्रेक्षण तथा
  6. व्यक्ति अध्ययन

प्रश्न 15.
प्रकृतिवादी परीक्षण की एक प्रमुख विशेषता बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणकर्ता परिस्थिति का न तो प्रहस्तन करता है और न ही उसको नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

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प्रश्न 16.
असहभागी प्रेक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस प्रेक्षण में किसी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर से करते हैं। गतिविधियों में बिना भाग लिए किये गये प्रेक्षण को असहभागी प्रेक्षण कहते हैं।

प्रश्न 17.
प्रेक्षण विधि से होनेवाले लाभ का उल्लेख करें।
उत्तर:
प्रेक्षण विधि में अनुसंधानकर्ता लोगों एवं उनके व्यवहारों का प्राकृतिक स्थिति जैसे वह घटित होती है, में अध्ययन कर सकता है।

प्रश्न 18.
प्रेक्षण की प्रायोगिक विधि से किस सम्बन्ध की व्याख्या संभव है?
उत्तर:
प्रायोगिक विधि एक नियंत्रित दशा में दो घटनाओं या परिवों के मध्य कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करने के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 19.
सहसंबंधात्मक अनुसंधान किन-किन स्थितियों में पाया जाता है?
उत्तर:

  1. धनात्मक (गुणांक + 1.00 के निकट)
  2. ऋणात्मक (गुणांक 0 और – 1.0 के बीच) तथा
  3. शून्य सहसंबंध (गुणांक – 0.02 अथवा + 0.03)।

प्रश्न 20.
सर्वेक्षण अनुसंधानकर्ता सूचना एकत्रित करने के लिए किन प्रमुख तकनीकों का उपयोग करता है?
उत्तर:

  1. साक्षात्कार
  2. प्रश्नावली
  3. दूरभाष तथा
  4. नियंत्रित प्रेक्षण

प्रश्न 21.
साक्षात्कार के दो रूपों के नाम बतावें।
उत्तर:

  1. संरचित या मानकीकृत तथा
  2. असंरचित या अमानकीकृत

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प्रश्न 22.
सर्वेक्षण की सीमा क्या होती है?
उत्तर:

  1. गलत सूचनाओं के द्वारा वास्तविक विचार को छिपाने की प्रवृत्ति
  2. लोग कभी-कभी वैसी प्रतिक्रियाएँ देते हैं जैसा शोधकर्ता जानना चाहता है।

प्रश्न 23.
शब्दावली के प्रयोग में क्या सावधानी रखनी होती है?
उत्तर:
किसी भी परीक्षण के एकांशों की शब्दावली ऐसी होनी चाहिए कि वह विभिन्न पाठकों को समान अर्थ का बोध कराए।

प्रश्न 24.
परीक्षण की सफलता के क्रम में किन तीन तत्वों पर ध्यान रखा जाता है?
उत्तर:

  1. परीक्षण की विश्वसनीयता
  2. परीक्षण की वैधता तथा
  3. परीक्षण के लिए प्रामाणिक मानक।

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प्रश्न 25.
प्रमाणिक साक्षात्कार क्या है?
उत्तर:
प्रमाणिक साक्षात्कार में प्रश्नों की सूची पहले से तैयार कर ली जाती है। इन प्रश्नों को साक्षात्कार देने वाले के क्रमानुसार पूछा जाता है। सभी लोगों के लिये एक ही तरह के प्रश्न होते हैं।

प्रश्न 26.
परिवर्त्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
अधीक्षण या घटना के भिन्न मान होते हैं जिसके मापन को परिवर्त्य कहा जाता है।

प्रश्न 27.
परिवर्त्य के दो प्रमुख वर्गों के नाम और लक्षण बतायें।
उत्तर:

  1. अनाश्रित परिवर्त्य – जिसका प्रहस्तन संभव होता है –
  2. आश्रित परिवर्त्य – जिसकी व्याख्या. वांछनीय होती है। प्रायोगिक दशा में, अनाश्रित परिवर्त्य कारण है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव।

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प्रश्न 28.
प्रायोगिक एवं नियंत्रित समूहों में प्रतिभागियों का वितरण किस रूप में किया जाता है?
उत्तर:
समान लक्षण वाले (सार्थक, जैविक, पर्यावरणीय, अनुक्रमिक) परिवयों का वितरण यादृक्षिक (random) रूप में किया जाता है।

प्रश्न 29.
एक ऐसी समस्या का उल्लेख करें जिसका अध्ययन प्रायोगिक रूप में नहीं किया जा सकता है?
उत्तर:
बच्चों के बुद्धि स्तर पर पौष्टिकता की कमी के प्रभाव का अध्ययन बच्चों को बार-बार भूखा रखकर करना अनैतिक एवं अव्यावहारिक कार्य कहलाता है।

प्रश्न 30.
क्षेत्र-प्रयोग से क्या समझते हैं?
उत्तर:
कुछ विशिष्ट स्थितियों (फसल चक्र) का अध्ययन प्रयोगशाला में संभव नहीं होता है तथा जिसके लिए अनुसंधानकर्ता को सम्बन्धित क्षेत्र में जाना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 31.
प्रयोग-कल्प किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूकंप, बाढ़, अतिवृष्टि जैसे प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित बच्चों की दशा का अध्ययन करने के लिए अनुसंधानकर्ता प्रयोग-कल्प की विधि अपनाता है जिसमें अनाश्रित परिवर्त्य का चयन करके उसे प्रहस्तित करने का प्रयास किया जाता है।

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प्रश्न 32.
स्वतंत्र साक्षात्कार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्वतंत्र साक्षात्कार में साक्षात्कार लेनेवाले स्वतंत्र रूप से विषय से संबंधित प्रश्नों को पूछते हैं।

प्रश्न 33.
साक्षात्कार विधि में किन सूचनाओं को एकत्र किया जाता है?
उत्तर:
साक्षात्कार विधि में आमने-सामने की परिस्थिति में बच्चों की व्यवहार सम्बन्धी सूचनाओं को एकत्र किया जाता है। इस विधि में प्रश्न और उत्तर के आधार पर सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।

प्रश्न 34.
प्रयोगात्मक विधि क्या है?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि एक ऐसी विधि है जिसमें निरीक्षण कार्य प्रयोग पर आधारित होता है। इस विधि का प्रयोग बच्चों के अध्ययन के लिये नियंत्रित वातावरण से होता है।

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प्रश्न 35.
प्रयोगात्मक विधि में किन उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि में मनोवैज्ञानिक उपकरणों एवं यंत्रों की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 36.
प्रयोगात्मक निरीक्षण के लिए किन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
बाल मनोविज्ञान के अध्ययन में प्रयोगात्मक निरीक्षण के लिये विभिन्न तकनीक का प्रयोग किया जाता है जो इस प्रकार हैं –

  1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक
  2. वन वे स्क्रीन तकनीक
  3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक
  4. प्रयोगात्मक कैबिनेट

प्रश्न 37.
प्रश्नावली विधि का निर्माण किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
प्रश्नावली विधि का निर्माण सबसे पहले स्टेनले हॉल ने किया।

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प्रश्न 38.
परीक्षणों का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का वर्गीकरण भाषा, उसके देने की रीति तथा जटिलता-स्तर के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 39.
भाषा के आधार पर तीन प्रकार के परीक्षण की गुंजाइश रहती है। नाम लिखें।
उत्तर:

  1. वाचक
  2. अवाचित तथा
  3. निष्पादन

प्रश्न 40.
देने की रीति के आधार पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों को किस प्रकार विभाजित किया जाता है?
उत्तर:

  1. वैयक्तिक तथा
  2. सामूहिक परीक्षण

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प्रश्न 41.
समय सीमा से बंधे परीक्षण के मूल आधार क्या हैं?
उत्तर:

  1. गति परीक्षण और
  2. शक्ति परीक्षण

प्रश्न 42.
अनुसंधानकर्ता को परीक्षण की किसी एक विधि पर निर्भर नहीं रहने की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर:
प्रत्येक विधि की अपनी विशेषताएँ एवं सीमाएँ होती हैं। दो या अधिक विधियों से समान परिणाम मिलते हैं तो परिणाम को प्रामाणिकता एवं उपयोगी करार दिया जाता है।

प्रश्न 43.
प्रदत्त विश्लेषण के दो प्रकार के विधिपरक उपागमों का उपयोग किया जाता है। उनके नाम बतावें
उत्तर:

  1. परिणामात्मक विधि और
  2. गुणात्मक विधि

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प्रश्न 44.
मनोवैज्ञानिक मापन की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. वास्तविक शून्य बिन्दु का अभाव
  2. मनोवैज्ञानिक उपकरणों का सापेक्षिक स्वरूप तथा
  3. गुणात्मक प्रदत्तों की आत्मपरक व्याख्या

प्रश्न 45.
नैतिक सिद्धांत में किन बातों पर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है?
उत्तर:
अध्ययन में भाग लेनेवाले व्यक्ति को जिज्ञासु, उत्साही तथा संशयमुक्त रखने के लिए उसकी सुरक्षा, गोपनीयता, निजता, रुचि पर ध्यान रखना होता है। स्वैच्छिक सहभागिता, सूचित सहमति तथा स्पष्टीकरण, भागीदारी जैसे बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है।

प्रश्न 46.
असंरचित प्रश्न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
असंरचित प्रश्नावली का निर्माण पहले से नहीं होता है बल्कि अध्ययन के समय व्यवहार-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। बच्चे स्वतंत्र होकर उत्तर देते हैं।

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प्रश्न 47.
प्रतिबंधित प्रश्नावली का अर्थ बतायें।
उत्तर:
प्रतिबंधित प्रश्नावली वैसी प्रश्नावली है जिसमें बच्चे लिखित उत्तरों में किसी एक के बारे में हाँ-ना, सहमत-असहमत इत्यादि कहकर उत्तर देते हैं।

प्रश्न 48.
प्रश्नावली विधि क्या है?
उत्तर:
प्रश्नावली विधि एक ऐसी विधि है जिसमें बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं की जानकारी के लिये प्रश्न बनाये जाते हैं। प्रश्नों द्वारा बच्चों के व्यवहार-सम्बन्धी उत्तर अंकित किये जाते हैं।

प्रश्न 49.
संरचित प्रश्न से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संरचित प्रश्न वैसे प्रश्न हैं जिसमें बच्चों के व्यवहार-सम्बन्धी बातों की जानकारी से संबंधित प्रश्न होते हैं जो पहले से ही तैयार कर लिये जाते हैं। बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है और उत्तर अंकित किये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान प्रदत्त के स्वरूप में किन विशेषताओं का होना आवश्यक माना जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रदत्त कोई स्वतंत्र सत्व नहीं होते हैं। वह स्वयं सत्यता के विषय में कुछ नहीं कहता बल्कि शोधकर्ता उसकी मदद से सही अनुमान पाने की स्थिति में पहुंचता है। शोधकर्ता प्रदत्त.को एक संदर्भ विशेष में रखकर अर्थवान बनाता है। प्रदत्तों को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. जनांकिकीय
  2. भौतिक
  3. दैहिक तथा
  4. मनोवैज्ञानिक सूचना मापन की दृष्टि से मनोवैज्ञानिक सूचनाएँ (प्रदत्त) अनपढ़ हो सकती है जिनका विश्लेषण मुणात्मक विधि का उपयोग करके पूरा किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
किन विशेषता के कारण वैज्ञानिक दिन-प्रतिदिन के प्रेक्षणों से भिन्न माने जाते हैं?
उत्तर:
(क) चयन:
वैज्ञानिक प्रेक्षण किसी एक निर्धारित विषय का (चयनित व्यवहार) का प्रेक्षण करता है तथा यथासंभव सभी प्रकार से संबद्ध प्रश्नों का संतोषप्रद हल खोज लेता है।

(ख) अभिलेखन:
अनुसंधानकर्ता चयनित विषय (व्यवहारों) का विभिन्न साधनों (पूर्व अर्जित ज्ञान एवं अनुभव का प्रयोग करते हुए प्राप्त परिणाम के आधार पर एक संतुलित अभिलेख तैयार करता है।

(ग) प्रदत्त विश्लेषण:
प्रेक्षण किसका, कब, कहां और कैसे किया जाता है, अनुसंधानकर्ता सभी पहलुओं पर ध्यान देते हुए अभिलेखों का विश्लेषण करता है जिसके माध्यम से वह अभिलेख से सही अर्थ प्राप्त करने का प्रयास करता है। दिन-प्रतिदिन के प्रेक्षणों में इनमें से किसी भी विधि का उपयोग करना संभव नहीं होता है जिसके कारण इसे वैज्ञानिक प्रेक्षण से भिन्न माना जाता है।

प्रश्न 3.
प्रेक्षण कितने प्रकार के होते हैं ? किसी एक प्रकार के प्रेक्षण को स्पष्टता समझायें।
उत्तर:
प्रेक्षण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रकृतिवादी बनाम नियंत्रित प्रेक्षण
(ख) असहभागी बनाम सहभागी प्रेक्षण

असहभागी बनाम सहभागी प्रेक्षण-किसी व्यक्ति या घटना का प्रेक्षण दूर रहकर किया जा सकता है। कभी-कभी प्रेक्षण स्वयं प्रेक्षण करनेवाले समूह का एक सदस्य बनकर प्रेक्षण करता है। ज किसी प्रक्रिया में भाग किये बिना अथवा बिना कोई अवरोध उत्पन्न किए प्रेक्षण करना असहभागी प्रेक्षण कहलाता है। जैसे विडियोग्राफी करके या स्वयं किसी वर्ग में चुपके से कोने में बैठकर सम्पूर्ण प्रक्रिया का अध्ययन करना असहभागी प्रेक्षण कहलाता है।

सहभागी प्रेक्षण करने के लिए प्रेक्षक को समूह के साथ मिलकर अध्ययन करना होता है। जैसे प्रेक्षक अध्यापक या छात्र के रूप में वर्ग कार्य में सम्मिलित होकर सम्पूर्ण शैक्षणिक कार्यों का अध्ययन करता है। असहभागी प्रेक्षण श्रमसाध्य होता है तथा अधिक समय लेता है। इसमें प्रेक्षण के पूर्वाग्रह के कारण गलती होने पर डर बना रहता है। इससे बचने के लिए अभिलेख तैयार करके प्रेक्षण के बाद उसके अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

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प्रश्न 4.
परिवर्त्य की सार्थकता को स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रायोगिक विधि में अनुसंधानकर्ता मापन किये जाने योग्य घटना या उद्दीपक (परिवर्त्य) के मध्य संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। परिवर्त्य भिन्न-भिन्न मान वाले उद्दीपक घटना को कहते हैं जो स्वयं में अंतर लाने की क्षमता रखता है।

उदाहरणार्थ, हम जिस एक कलम का उपयोग करते हैं वह एक अपवर्त्य नहीं है लेकिन भिन्न-भिन्न आकारों एवं रंगों वाली कलमें सामूहिक रूप में अपवर्त्य मानी जाती हैं। विभिन्न कदवाले व्यक्ति अपवर्त्य हैं। इसी प्रकार बाल का रंग, बुद्धि, वर्ग में छात्रों की उपस्थिति सभी अपवर्त्य हैं। अतः अपवर्त्य कहलाने वाली वस्तुओं अथवा घटनाओं की मात्रा अथवा गुणवत्ता में परिवर्तन होना वांछनीय तत्व हैं।

परिवर्त्य को दो श्रेणियाँ होती हैं –

1. अनाश्रित परित्वर्य:
जिसका हस्तान्तरण संभव है।

2. आश्रित परिवर्त्य:
जिस व्यवहार पर अनाश्रित परिवर्त्य के प्रभाव का प्रेक्षण किया जा सकता है। आश्रित परिवर्त्य उस गोचर को बतलाता है जिसकी व्याख्या करना अनुसंधानकर्ता का उद्देश्य है। यह मात्र अनाश्रित परिवर्त्य के परिवर्तन के परिणामस्वरूप व्यवहार में आनेवाला अंतर मात्र है।

प्रायोगिक दशा में अनाश्रित परिवर्त्य कारण है तथा आश्रित परिवर्त्य प्रभाव। दोनों प्रकार के परिवर्त्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अनुसंधानकर्ता अपनी रुचि एवं बुद्धि के अनुसार परिवयों का चयन करके कार्य-कारण सम्बन्ध की व्याख्या करने में सफल होना चाहता है।

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प्रश्न 5.
सर्वेक्षण विधि का एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
अनुसंधानकर्ता कई प्रकार के प्रश्नों को पूछकर प्राप्त उत्तरों के आधर पर मानव के स्वाभाविक व्यवहार का अध्ययन करता है। उदाहरणार्थ, कुछ प्रमुख प्रश्न निम्नवत हैं –

  1. भारत के लोगों को किन चीजों से प्रसन्नता मिलती है?
  2. क्या आप प्रसन्न हैं?
  3. लोगों को अत्यधिक प्रसन्नता किससे मिलती है?
  4. लोग अप्रसन्न अथवा दुखी होने पर क्या करते हैं? उपर्युक्त प्रश्नों में विभिन्न प्रकार के उत्तर प्राप्त हुए; जैसे कुछ ने अपने आपको प्रसन्न माना। कुछ ने संतुलित जीवन की सूचना दिया। कुछ ने स्वयं को दुखी माना। कुछ ने प्रसन्नता का कारण पैसों की उपलब्धि माना।

कुछ ने प्रसन्न रहने के लिए मन की शांति को कारक माना । कुछ लोगों ने सफलता को प्रसन्नता से तथा असफलता को अप्रसन्नता से जोड़कर बताया। दुखी मानव में कोई संगीत सुनता है, कोई मित्रों से मिलकर दुख को भूलना चाहता है, कम लोग थे जो अपनी अप्रसन्नता को सिनेमा देखकर भुलाना चाहता है।

इस तरह स्पष्ट होता है कि मनुष्यों में व्यवहार अथवा प्रतिक्रिया व्क्त करने की अलग-अलग विधियाँ होती हैं। प्रश्नोत्तर के प्रतिशत मान के आधार पर परिणामी निर्णय लिये जाते हैं। चोर-चोर का हल्ला सुनकर कोई छिप बैठता है तो कोई बाहर निकलकर चोर को पकड़ना चाहता है। कोई घरवाले को सांत्वना देने लगते हैं तो कुछ ने ईर्ष्यावश घटना को अपनी आकांक्षा के अनुकूल बताया।

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प्रश्न 6.
अंतर्निरीक्षण विधि से क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान की वह पहली विधि है। इस विधि का क्या व्यवहार सर्वप्रथम उण्ट ने किया। जिन्होंने 1879 ई. में लिपजिग में मनोविज्ञान की पहली प्रयोगशाला की स्थापना की और चेतन अनुभूति का अध्ययन अन्तर्निरीक्षण-विधि द्वारा किया। उन्होंने चेतन अनुभूति को मनोविज्ञान का अध्ययन विषय-वस्तु और अन्तर्निरीक्षण विधि को विधि माना।

अन्तर्निरीक्षण – विधि का अर्थ अपने भीतर देखना (To look within) है। अंतनिरीक्षण विधि वह विधि है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी चेतना अनुभूतियों का निरीक्षण स्वयं करता है और उन्हें अपने शब्दों में व्यक्त करता है। चेपलिन ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि अंतनिरीक्षण चेतन घटक के तत्वों तथा गुणों के वस्तुनिष्ठ विवरण को कहते हैं। इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि अंतर्निरीक्षण के लिए दो बातें आवश्क हैं –

1. इस विधि में व्यक्ति अपने चेतन अनुभव का वर्णन उसी रूप में करता है जिस रूप में अनुभव होता रहता है और वर्णन की प्रक्रिया उसी समय तक चलती है जब तक अनुभव की क्रिया चलती रहती है। इस विधि के निरीक्षण की चेतन अनुभूति के रचनात्मक तत्वों का वर्णन करना होता है। उण्ट के अनुसार चेतन अनुभूति के तीन रचनात्मक तत्व हैं जिन्हें संवेदना, भाव तथा प्रतिबिम्ब कहते हैं।

प्रश्न 7.
किसी विषय अथवा घटना से सम्बन्धित प्रस्तुत किये जाने वाले पूर्व कथनों पर किन बातों का प्रभाव देखा जाता है?
उत्तर:
निर्धारित विषय के सम्बन्ध में ज्ञान और स्वयं के अनुभव की प्रवृत्ति के द्वारा व्यवहार सम्बन्धी घटनाओं का सफल अध्ययन किया जा सकता है। थोड़ी-सी सतर्कता रखने पर व्यवहार विशेष के अन्य व्यवहारों, घटनाओं अथवा गोचरों के संबंध को सरलतापूर्वक जाना जा सकता है। व्यवहार के सही मूल्यांकन के आधार पर लगभग सही पूर्वकथन प्रस्तुत किया जा सकता है। विषयों के अध्ययन, समय की मात्रा एवं उपलब्धियों के बीच धनात्मक संबंध की स्थापना की जा सकती है। पूर्वकथन, प्रेक्षण किए गए व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होने पर अधिक सही होता है। जितने अधिक लोगों का प्रेक्षण किया जाएगा, पूर्वकथन के सही होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

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प्रश्न 8.
खोज की व्यवस्थित प्रक्रिया किन कारकों पर आधारित होती है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान विवरण, पूर्वकथन, व्याख्या, व्यवहार-नियंत्रण तथा वस्तुनिष्ठ तरीके से उत्पादित ज्ञान के अनुप्रयोग के लिए किए जाते हैं। इसके मुख्यतः चार चरण होते हैं –

  1. समस्या का संप्रत्ययन
  2. प्रदत्त संग्रह
  3. प्रदत्त विश्लेषण तथा
  4. अनुसंधान निष्कर्ष। निकालना और उसका पुनरीक्षण करना।

मनोविज्ञान में व्यवहार एवं अनुभव से संबंधित समस्याओं का समाधान करना होता है जिसके लिए उचित कार्य अथवा विषय का चयन किया जाता है। अच्छे परिणाम की प्राप्ति के लिए –

(क) अपने व्यवहार को समझने
(ख) दूसरे के व्यवहार को समझने
(ग) समूह से प्रभावित वैयक्तिक व्यवहार
(घ) समूह व्यवहार तथा
(ङ) संगठनात्मक स्तर पर तुलनात्मक अध्ययन करना होता है। जिज्ञासा की तरह विविध पक्षों का समुचित अध्ययन करने के परिणामस्वरूप एक काल्पनिक समाधान (परिकल्पना) की खोज की जाती है। साक्ष्य एवं प्रेक्षण के आधार पर परिकल्पना को सत्य स्थिति में लाने का प्रयास किया जाता है।

परिकल्पना स्थापना के बाद वास्तविक प्रदत्त संग्रह किया जाता है। सांख्यिकी सिद्धांत के द्वारा परिकल्पना एवं प्रदत्त संग्रह की जाँच और निष्कर्ष प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। प्राप्त किये गये निष्कर्षों को परखने के लिए उसे दोषमुक्त बनाने का प्रयास किया जाता है। निष्कर्षों का सफल पुनरीक्षण करके उसका अनुप्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 9.
सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण में मौलिक अंतर बतायें।
उत्तर:
सहभागी प्रेक्षण तथा असहभागी प्रेक्षण मुख्य दो प्रकार के प्रेक्षण हैं। सहभागी प्रेक्षण वैसे प्रेक्षण को कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता प्रयोज्यों द्वारा किए जा रहे व्यवहारों या क्रियाओं को करने में हाथ बंटाते हुए उनका प्रेक्षण करता है। परंतु, असहभागी प्रेक्षण इससे भिन्न होता है, क्योंकि इसमें अध्ययनकर्ता प्रयोज्यों द्वारा किए जा रहे व्यवहारों में बिना हाथ बटाएँ ही उनका निरीक्षण करता है।

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान के प्रयोगों में कारण-परिणाम संबंध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर में उस विशेष संबंध को कारण-परिणाम संबंध कहा जाता है जिसमें स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ (कारण) से आश्रित चर में कुछ स्पष्ट परिवर्तन (परिणाम) होता है। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों का उद्देश्य इस तरह के संबंध की सत्यता की जाँच करना होता है।

प्रश्न 11.
प्रकृतिवादी प्रेक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रकृतिवादी प्रेक्षण वैसे प्रेक्षण को कहा जाता है जिसमें अध्ययनकर्ता प्राणियों जैसे पशुओं, पक्षियों तथा अन्य इसी तरह के विशेष प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन उनके स्वाभाविक स्थानों (Natural settings) जिनमें वे रहते हैं, पर जाकर करता है।

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प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण के उद्देश्य की पूर्ति किन दशाओं में संभव होता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न मानवीय विशेषताओं (बुद्धि, अतिक्षमता, व्यक्तिगत रुचि, अभिवृत्ति, मूल्य शैक्षिक उपलब्धि आदि) के सही मूल्यांकन हेतु विभिन्न परीक्षणों का निर्माण करता है जिसका उपयोग वांछित उद्देश्यों (कार्मिक चयन, प्रशिक्षण, निर्देशन, निदान, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य) को पूरा करने में लगाने का प्रयास करता है।

परोक्षण को अर्थद्वन्द्व से बचाना, समय सीमा के बंधन को तोड़ना, मानवीकृत एवं वस्तुनिष्ठ उपकरणों का प्रयोग करना आदि परीक्षण की सफलता के मूल तत्व हैं। परीक्षण के उद्देश्यों के अनुकूल शब्दावली, पर्यावरणीय दशाओं का होना आवश्यक होता है। प्रतिक्रियादाताओं की प्रतिक्रियाओं की गणना की विधि का भी उल्लेख किया जाना वांछनीय होता है। अनुसंधान के सभी एकांशों की विशेषताओं का सही उपयोग परीक्षण की कामयाबी के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 13.
प्रयोगात्मक विधि से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि एक ऐसी विधि होती है जिसमें स्वतंत्र चर (Independent variable) तथा आश्रित चर (Dependent variable) के बीच कारण-परिणाम संबंध (Cause effect relationship) का एक नियंत्रित परिस्थिति (Controlled situation) में अध्ययन किया जाता है। स्वतंत्र चर से तात्पर्य वैसे चर से होता है जिसमें जोड़-तोड़ (Manipulation) किए जाने का दूसरे चर पर पड़नेवाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। आश्रित चर वैसे चर को कहा जाता है जिस पर स्वतंत्र चर का प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 14.
वैयक्तिक साक्षात्कार से क्या समझते हैं इसके प्रकार का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
वैयक्तिक साक्षात्कार उसे कहते हैं जिसमें 2 व्यक्ति आमने-सामने बैठे होते हैं। इनमें एक साक्षात्कारकर्ता होता है तथा दूसरा साक्षात्कारी होते हैं इसमें 2 प्रकार होते हैं –

  1. संरचित साक्षात्कार – इसमें प्रश्नों को स्पष्ट रूप से अनुसूची में एक क्रम लिखा जाता है।
  2. असरंचित साक्षात्कार – इसमें साक्षात्कारकर्ता को प्रश्नों के पूछे जाने के क्रम में परिवर्तन की स्वतंत्र रहती है।

प्रश्न 15.
मनोवैज्ञानिक अनुसंधान में नैतिकता के सिद्धांत को स्पष्ट करें।
उत्तर:
नैतिकता के सिद्धांत निम्न है –

  1. स्वैच्छिक सहभागिता – मनोवैज्ञानिक अध्ययन में जिस व्यक्ति का अध्ययन किया उनकी स्वैच्छिक सहभागिता होनी चाहिए।
  2. प्रदत्त की गोपनीयता – प्रतिभागियों से प्राप्त सूचना की गोपनीयता बनाए रखना चाहिए।
  3. अध्ययन – परिणाम में भागीदारी अध्ययन से प्राप्त परिणाम की सूचना प्रयोज्य को देना चाहिए।
  4. तटस्थता एवं ईमानदारी – अध्ययनकर्ता को अध्ययन से प्राप्त परिणाम के प्रति तटस्थ एवं ईमानदार होना चाहिए।
  5. स्पष्टीकरण – अध्ययन समाप्त हो जाने के बाद प्रतिभागियों को वे सब सूचना देनी चाहिए, जिससे वे अनुसंधान को ठीक से समझ सकें।

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प्रश्न 16.
स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर के अंतर को एक उदाहरण से समझायें।
उत्तर:
स्वतंत्र चर वैसे चर को कहा जाता है जिसमें प्रयोगकर्ता जोड़-तोड़ (Manipulation) करके उसके पड़नेवाले प्रभाव का अन्य चर पर अध्ययन करता है। आश्रित चर वैसे चर को कहा जाता है जिस पर स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ का प्रभाव पड़ता है तथा साथ-ही-साथ जिसके बारे में प्रयोगकर्ता प्रयोग करके भविष्यवाणी करना चाहता है।

जैसे-मान लिया जाए कि प्रयोगकर्ता पुरस्कार का सीखने पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोज्य को कुछ विशेष सामग्री विशेष इनाम की घोषणा के साथ यदि करने के लिए देता है और फिर वही सामग्री दूसरे प्रयोज्य को बिना किसी के इनाम की घोषणा के बाद करने के लिए देता है। यदि पहला प्रयोज्य दूसरे प्रयोज्य की तुलना में जल्द सामग्री को सीख लेता है तो यहाँ स्पष्टतः कहा जाएगा कि पुरस्कार से सीखने पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इस उदाहरण में सीखना आश्रित चर तथा पुरस्कार स्वतंत्र चर का उदाहरण है।

प्रश्न 17.
प्रयोगात्मक विधि तथा प्रेक्षण विधि में अचर बतलायें।
उत्तर”
समाज मनोविज्ञन में प्रयोगात्मक विधि तथा प्रेक्षण विधि दोनों का उपयोग होता है। फिर भी, इन दोनों में कुछ अंतर हैं जो निम्नांकित है –

  1. प्रयोगात्मक विधि में परिस्थिति हमेशा कृत्रिम (artificial) होती है जबकि प्रेक्षण विधि में परिस्थिति कृत्रिम न होकर स्वाभाविक (natural) होती है।
  2. प्रयोगात्मक विधि में स्वतंत्र चर को जोड़-तोड़ (manipulation) किया जाता है जबकि प्रेक्षण विधि में स्वतंत्र चर में वैसा प्रत्यक्ष जोड़-तोड़ नहीं किया जाता है।
  3. प्रयोगात्मक विधि में कारण-परिणाम संबंध (Cause-effect relation) स्थापित करना संभव है, परंतु प्रेक्षण विधि में इस तरह का संबंध सामान्यतः स्थापित नहीं हो पाता है।
  4. प्रयोगात्मक विधि की विश्वसनीयता तथा वैधता (validity) प्रेक्षण विधि की विश्वसनीयता तथा वैधता से अधिक होती है।

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प्रश्न 18.
नियंत्रित चर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों में यह विशेष रूप से प्रेक्षण किया जाता है कि स्वतंत्र चर में किए गए जोड़-तोड़ से आश्रित चर किस तरह से प्रभावित होता है। इसके अलावा प्रयोगकर्ता कुछ ऐसे चरों, जो स्वतंत्र चर के समान होते हैं तथा जिनसे आश्रित चर प्रभावित हो सकते हैं, के प्रभाव को नियंत्रित करके रखता है। ऐसे चरों को नियंत्रित चर कहा जाता है।

प्रश्न 19.
निरीक्षण विधि के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
निरीक्षण विधि के निम्नलिखित गुण हैं –
(क) यह विधि बच्चों की क्रियाओं का वस्तुनिष्ठ एवं अवैयक्तिक अध्ययन करती है। अध्ययन पूर्वाग्रहमुक्त एवं निष्पक्ष होता है।
(ख) इस विधि द्वारा स्वाभाविक अध्ययन होता है। सामूहिक व्यवहार का अध्ययन संभव है।
(ग) इस विधि द्वारा एक साथ अनेकानेक बच्चों का अध्ययन संभव होता है। बहरे, गूंगे, पागल, पशु-पक्षी सबके व्यवहार का अध्ययन संभव है।
(घ) इस विधि में उपकरणों एवं यंत्रों की सहायता ली जाती है।
(ङ) इस विधि में अध्ययन को दुहराया जाता है और उसकी विश्वसनीयता की जांच की जाती है।
(च) इस विधि द्वारा प्राप्त सामग्री का निरूपण संभव है। चूँकि सामग्रियाँ परिमाण में मिलती हैं, अत: उनकी सांख्यिकीय व्याख्या संभव है। निष्कर्ष की वैधता एवं विश्वसनीयता की जाँच हो सकती है।

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प्रश्न 20.
साक्षात्कार विधि के गुणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
साक्षात्कार विधि के गुण निम्नांकित हैं –
(क) इस विधि का पहला गुण यह है कि इस विधि द्वारा बच्चों की मनोवृत्तियों एवं जीवन-मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
(ख) यह सामान्य, असामान्य, असमंजित (maladjusted) बच्चों के अध्ययन में उपयोगी है।
(ग) इस विधि का तीसरा गुण यह है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों (data) की सत्यता एवं प्रतिपन्नता अधिक है।
(घ) स्वतंत्र साक्षात्कार में बच्चे खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ करते हैं। इसका नैदानिक महत्व (clinical value) ज्यादा है।
(ङ) जिन बच्चों में भाषा-विकास हुआ रहता है वे प्रश्नों के उत्तर लिखकर अथवा बोलकर सफल ढंग से दे पाते हैं। यह भी इस विधि की विशेषता है।
(च) समालापक (interviewer) साक्षात्कार के समय अपना निष्पक्ष अध्ययन करता है और पूर्वधारणा का असर नहीं होने देता, अतः सूचनाएँ पूर्वधारणा मुक्त होती हैं।
(छ) इस विधि का यह भी गुण है कि समालापक प्रशिक्षित होते हैं, अतः बच्चों की प्रतिक्रियाएँ अच्छी तरह अंकित कर लेते हैं।
(ज) इस विधि की यह विशेषता है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकी निरूपण (statistical treatment) संभव है।

प्रश्न 21.
साक्षात्कार विधि के दोषों का विवेचन करें।
उत्तर:
साक्षात्कार विधि के निम्नलिखित दोष हैं –
(क) इस विधि का पहला दोष यह है कि यह विधि एक खास उम्र के बच्चों के अध्ययन तक ही सीमित है, क्योंकि साक्षात्कार के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी है।
(ख) साक्षात्कार विधि में प्रतिक्रियाओं का अवरोधन (resistance) हानिकारक है। यह इस विधि का अवगुण है।
(ग) इस विधि में यह भी दोष है कि प्रशिक्षित समालापक भी कभी-कभी अपने अध्ययन में अपनी पूर्वधारणा की छाप छोड़ देते हैं जिससे अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है।
(घ) इसका चौथा दोष यह है कि गूंगे (dumb) और बहरे (deaf) बच्चों की मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है।
(ङ) यह विधि पूर्वपाठशालीय बालक के अध्ययन में भी असफल है।

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प्रश्न 22.
प्रश्नावली विधि के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रश्नावली विधि के गुण इस प्रकार हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण है कि यह विधि वस्तुनिष्ठ है। इससे प्राप्त प्रदत्त वस्तुनिष्ठ होते हैं।
  2. इसका दूसरा गुण यह है कि वैसे बच्चे जिनकी भाषा विकसित होती है वे खुलकर स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बातों को अध्ययनकर्ता के सामने रख देते हैं।
  3. इस विधि की तीसरी विशेषता यह है कि इससे असामान्य, असमंजित एवं समस्याजन्य सभी प्रकार के बच्चों का अध्ययन संभव है।
  4. इसकी चौथी विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से बच्चों का अध्ययन संभव है जिससे समय और पैसे की बचत होती है।
  5. इसकी पाँचवीं विशेषता यह है कि इससे प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय विश्लेषण संभव है।

प्रश्न 23.
प्रश्नावली विधि के दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि में निम्नांकित दोष हैं –

  1. यह मात्र उन्हीं बच्चों पर लागू हो सकती है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय का ज्ञान हो। अतः यह विधि सीमित है।
  2. इसका दूसरा दोष यह है कि इस विधि द्वारा गूंगे एवं बहरे बच्चे का अध्ययन संभव नहीं है।
  3. इस विधि में तीसरा दोष यह है कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर देने में अवरोध (resistance) दिखाते हैं।
  4. पाँचवाँ दोष यह है कि अध्ययनकर्ता अपनी पूर्वधारणा की छाप अध्ययन पर छोड़ देते हैं जिससे निष्कर्ष सही नहीं आता।

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प्रश्न 24.
विकासात्मक मनोविज्ञान की अध्ययन विधि के रूप में निरीक्षण विधि के दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि के निम्नांकित दोष हैं –
(क) वस्तुगत अध्ययन के बावजूद अध्ययन से प्राप्त सामग्रियों में निरीक्षणकर्ता की पूर्वधारणा तथा उसके वैयक्तिक दृष्टिकोण का समावेश हो जाता है। अतः निष्कर्ष की सत्यता एवं विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। यह एक महत्वपूर्ण आरोप इस विधि के खिलाफ है।

(ख) इस विधि का यह दोष भी है कि एक प्रकार के व्यवहासर के आधार पर संबंधित ‘मानसिक क्रियाओं का आकलन संभव नहीं है। जैसे बच्चों के संवेग में होनेवाली शारीरिक क्रियाओं के आधार पर हम निश्चित रूप से संवेग की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। बच्चों के कन्दन की क्रिया में कौन-सा संवेग है, यह पता लगाना कठिन है।

प्रश्न 25.
प्रयोगात्मक विधि के गुणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
प्रयोगात्मक विधि की समीक्षा करने पर हम देखते हैं कि इस विधि में यद्यपि काफी बियाँ हैं, तथापि यह दोषमुक्त नहीं कही जा सकती। इस विधि की निम्नांकित खूबियाँ हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण यह है कि यह विधि सामाजिक व्यवहारों का अध्ययन क्रमबद्ध एवं नियंत्रित वातावरण में करता है। यह वैज्ञानिक विधि है।
  2. इस विधि द्वारा प्राप्त प्रदत्त (data) वस्तुनिष्ठ एवं पूर्वधारणामुक्त होता है।
  3. समस्या से संबंधित प्रयोग को निष्कर्ष की जाँच के लिए दुहराया जा सकता है। एक या अनेक शोधकर्ता प्रयोग को दुहरा सकते हैं।
  4. इसकी यह भी खूबी है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय निरूपण संभव है। प्रदत्तों की विश्वसनीयता एवं प्रतिपन्नता की जाँच हो सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रयोगविधि की परिभाषा दें एवं इनके गुण दोषों को लिखें।
उत्तर:
प्रयोग का अर्थ ऐसे प्रेक्षण से है जो नियंत्रित परिस्थिति में किया जाता है। किसी परिकल्पना की सत्यता को प्रमाणित करने के उद्देश्य से जो प्रेक्षण नियंत्रित परिस्थिति में किया जाता है उसे प्रयोग कहते हैं। यह मनोविज्ञान की आधुनिक विधि है। चैपलिन के शब्दों में-“प्रयोग प्रेक्षणों” की एक श्रृंखला है जो एक परिकल्पना की जाँच के उद्देश्यों से नियंत्रित परिस्थितियों में किया जाता है।” चैपलिन ने प्रयोगात्मक विधि की परिभाषा इस प्रकार दी है –
“प्रयोगात्मक विधि वह प्रविधि है जिसके द्वारा प्रयोग के आधार पर सूचनाओं की खोज की जाती है।” प्रयोगात्मक विधि में प्रयुक्त आवश्यक अंग –

  1. प्रयोगकर्ता
  2. प्रयोज्य
  3. नियंत्रित प्रयोगशाला
  4. यंत्र – उपकरण विज्ञान प्रयोगों पर आधारित होता है। मनोविज्ञान का आधार भी प्रयोग है।
  5. मनोविज्ञान की प्रयोग विधि दूसरी सभी विधियों से अधिक वैज्ञानिक है। सच तो यह है कि उसी विधि के बल पर मनोविज्ञान विज्ञान होने का दावा करता है। अतः हम यहाँ देखना चाहेंगे कि मनोविज्ञान की प्रयोग-विधि में कौन-कौन से वैज्ञानिक गुण है।

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प्रश्न 2.
सहसंबंधात्मक अनुसंधान के क्रम में सहसंबंध गुणांक का निर्धारण क्यों किया जाता है?
उत्तर:
सहसंबंधात्मक अनुसंधान प्रयोगात्मक विधि से भिन्न होता है, क्योंकि इसमें अध्ययन के समय तथा उपलब्धियों पर किसी भी तरह का प्रभाव डालने की छूट नहीं होती है। पूर्वकथन। की स्पष्टता के लिए दो परिवयों के बीच सम्बन्ध का निर्धारण करना प्रमुख उद्देश्य होता है। चयनित दोनों परिवों में सम्बन्ध की शक्ति एवं दिशा एक गणितीय लब्धांक (सहसम्बन्ध गुणांक) द्वारा प्रस्तुत करने की प्रथा बन चुकी है। सहसंबंध गुणांक का विस्तार + 1.00, 0.2 से – 1.0 तक होता है।

धनात्मक सहसंबंध में जब एक परिवर्त्य का मान बढ़ता है तो दूसरे परिवर्त्य का मान भी बढ़ता है। जैसे, पढ़ने का समय बढ़ाने से छात्र का लब्धांक भी बढ़ जाता है। इस स्थिति में दोनों परित्वों के बीच जितना अधिक साहचर्य होगा वह गुणांक (+1.00) से उतना ही निकट होगा। सामान्य छात्रों के लिए अध्ययन में लागत समय और लब्धांक के लिए सहसंबंध गुणांक सामान्यतया +0.85 मिलता है। ऋणात्मक सहसंबंध में जब एक परिवर्त्य (x) का मान बढ़ता है तो दूसरे परिवर्त्य का मान घटता है। जैसे अध्ययन के लिए समय में होनेवाली वृद्धि से खेलने के समय के मान में कमी आ जाती है।

इस स्थिति में गुणांक विस्तार 0 और – 1.0 के मध्य मिलता है। चयनित दो परिवों के बीच जब कोई सहसंबंध नहीं होता है तो उसे शून्य सहसंबंध कहा जाता है। जैसे-अध्ययन के समय बदलने के प्रभाव के कारण छात्र के पैंट की लम्बाई में कोई अंतर नहीं आता है। इस स्थिति में गुणों का विस्तार – 0.2 अथवा + 0.3 के मध्य मिलता है जबकि नियमत: उसे शून्य होना चाहिए। अतः परिवों के लक्षण, व्यवहार, प्रभाव तथा अनुप्रयोग की दृष्टि से सहसंबंध गुणांक अ अति उपयोगी विधि बनती जा रही है।

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प्रश्न 3.
साक्षात्कार क्या है? इसके कौन-कौन गुण तथा दोष हैं? विवेचना करें।
उत्तर:
इस विधि में साक्षात्कार करनेवाले विशेषज्ञों का एक समूह होता है जिसे साक्षात्कार बोर्ड के नाम से जाना जाता है। जो लोग साक्षात्कार के लिए सामने आते हैं उन्हें समालाप्य (interviewee) कहते हैं। साक्षात्कार आमने-सामने बैठकर होता है। यह विधि सूचनाओं एवं तथ्यों की जानकारी के लिए ‘प्रश्न-उत्तर’ पद्धति को अपनाती है।

इसमें समालाप्य तथा समालापक (interviewer) के बीच आत्मिक संबंध (rapport) करना, सधमालापक का प्रशिक्षित (trained) होना, पूर्वधारणामुक्त होना, पूछे गए प्रश्नों की बनावट एवं भाषा पर ध्यान रखना, समालाप्य को भाषा का ज्ञान होना, उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ होना इत्यादि बातों पर ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। साक्षात्कार के मुख्य दो रूप सामने आते हैं –

1. प्रामाणिक साक्षात्कार (Standardized interview):
इसमें प्रश्नों की सूची पहले से तैयार कर ली जाती है। इन प्रश्नों को समालाप्य से क्रमानुसार पूछा जाता है। सभी लोगों के लिए एक ही तरह के प्रश्न होते हैं।

2. स्वतंत्र साक्षात्कार (Free interview):
इसमें समलापक स्वतंत्र रूप से विषय से संबंधित प्रश्नों को पूछते हैं।

गुण (Meritis):
साक्षात्कार विधि के गुण निम्नांकित हैं –
(क) इस विधि का पहला गुण यह है कि इस विधि द्वारा बच्चों की मनोवृत्तियों एवं जीवन-मूल्यों को समझने में सहायता मिलती है।
(ख) यह सामान्य, असामान्य, असमंजित (maladjusted) बच्चों के अध्ययन में उपयोगी है।
(ग) इस विधि का तीसरा गुण यह है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों (data) की सत्यता एवं: प्रतिपन्नता अधिक है।
(घ) स्वतंत्र साक्षात्कार में बच्चे खुलकर अपनी प्रतिक्रियाएँ करते हैं। इसका नैदानिक महत्व (clinical value) ज्यादा है।
(ङ) जिन बच्चों में भाषा विकास हुआ रहता है वे प्रश्नों के उत्तर लिखकर अथवा बोलकर सफल ढंग से दे पाते हैं। यह भी इस विधि की विशेषता है।
(च) समालापक साक्षात्कार के समय अपना निष्पक्ष अध्ययन करता है और पूर्वधारणा का असर नहीं होने देता, अत: सूचनाएँ पूर्वधारणामुक्त होती हैं।
(छ) इस विधि का यह भी गुण है कि समालापके प्रशिक्षित होते हैं, अत: बच्चों की प्रतिक्रियाएँ अच्छी तरह अंकित कर लेते हैं।
(ज) इस विधि की यह विशेषता भी है कि इसके द्वारा प्राप्त प्रदत्तों का सांख्यिकीय निरूपण (statistical treatment) संभव है।

दोष (Demerits):
(क) इस विधि का पहला दोष यह है कि यह विधि एक खास उम्र के बच्चों के अध्ययन तक ही सीमित है, क्योंकि साक्षात्कार के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी है।
(ख) साक्षात्कार विधि में प्रतिक्रियाओं का अवरोधन (resistance) हानिकारक है। यह भी इस विधि का अवगुण है।
(ग) इस विधि में यह भी दोष है कि प्रशिक्षित समालापक भी कभी-कभी अपने अध्ययन में अपनी पूर्वधारणा की छाप छोड़ देते हैं जिससे अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है।
(घ) इसका चौथा दोष यह है कि यह गूंगे (dumb) और बहरे (deaf) बच्चों की मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है।
(ङ) यह विधि पूर्वपाठशीय बालकों के अध्ययन में भी असफल है।

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प्रश्न 4.
प्रयोगात्मक विधि या प्रयोगात्मक निरीक्षण विधि से आप क्या समझते हैं? इसके गुण एवं दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
प्रयोगात्मक या प्रयोगात्मक निरीक्षण विधि बाह्य निरीक्षण विधि का ही एक प्रमुख रूप है। यह प्रयोग विधि भी एक प्रकार का निरीक्षण है। इस विधि का प्रयोग बच्चों के अध्ययन के लिए नियंत्रित वातावरण (controlled condition) में होता है। अध्ययन पूर्वयोजनानुसार क्रमबद्ध होता है। यह निरीक्षण प्रयोग पर आधारित है। इस विधि द्वारा अध्ययन के क्रम में मनोवैज्ञानिक उपकरणों एवं यंत्रों की सहायता ली जाती है। इस विधि में प्रयोगात्मक परिस्थिति का निर्माण किया जाता है जो नियंत्रित होती है। बच्चों के व्यवहार-संबंधी समस्या पर प्रयोग किए जाते हैं।

जैसे-बाल-मनोविज्ञान के अंतर्गत यह समस्या है कि विटामिन A बच्चों की आँखों की रोशनी को प्रभावित करता है या नहीं, तो ऐसी स्थिति में हम समान उम्र के बच्चों को दो समूहों में बाँटकर एक समूह को विटामिन A देते हैं और दूसरे को नियंत्रित रखते हैं। यहाँ प्रयोगात्मक समूह के बच्चों की आँख की रोशनी की नियंत्रित समूह के बच्चों की आँख की रोशनी से तुलना करते हैं। यदि अंतर आता है तो हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि विटामिन A से आँख की रोशनी बढ़ती है। Gesell के अनुसार नियंत्रित निरीक्षण ही प्रयोग विधि है।

बाल –
मनोविज्ञान के अध्ययन में प्रयोगात्मक निरीक्षण के अंतर्गत कई प्रविधियों (tech niques) का इस्तेमाल किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक (photographic dome technique)
  2. वन-वे स्क्रीन विधि (one-way screen technique)
  3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक (cinematographic technique)
  4. प्रयोगात्मक भवन (experimental cabinet)

1. फोटोग्राफिक डोम तकनीक:
इस प्रविधि द्वारा बच्चों के व्यवहारों का चित्र लिया जाता है। Gesell ने इस विधि द्वारा बच्चों की प्रतिक्षेप की क्रियाओं (reflex actions) का अध्ययन किया है।

2. वन-वे स्क्रीन विधि:
इस प्रविधि द्वारा पर्दे की ओट से बच्चों के व्यवहारों का निरीक्षण किया जाता है। यहाँ भी स्वाभाविक निरीक्षण संभव हो पाता है। इस प्रविधि को निरीक्षण के लिए Gesell ने भी अपनाया था।

3. सिनेमाटोग्राफिक तकनीक:
बच्चों की स्वाभाविक क्रियाओं का अध्ययन चलचित्रों के माध्यम से किया जाता है। खासकर, संवेग एवं सामाजिक प्रतिक्रियाओं में यह कारगर प्रविधि है।

4. प्रयोगात्मक भवन:
इसके द्वारा बच्चों को कमरे में रखकर लगातार बच्चों के व्यवहारों का निरीक्षण काफी समय तक किया जाता है। Ohio State University में इस प्रविधि का इस्तेमाल शुरू हुआ। उपर्युक्त प्रविधियाँ स्वतंत्र रूप से कारगर हैं और सम्मिलित रूप से भी। अतः ये एक-दूसरे के पूरक हैं।

गुण (Merits):
इसके गुण या विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
(क) इस विधि का यह गुण है कि इस विधि से प्रदत्त (data) पूर्वधारणामुक्त, निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ (objective) होता है।
(ख) इस विधि द्वारा अध्ययन की जाँच के लिए प्रयोग को दुहराया जा सकता है और प्रदत्तों की सत्यता की जाँच की जा सकती है।
(ग) इस विधि द्वारा प्रदत्तों की सांख्यिकीय निरूपण (statistical analysis) संभव है। इसके द्वारा परिणाम की सत्यता एवं प्रतिपन्नता (reliability and validity) जाँची जा सकती है।
(घ) इस विधि द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन योजनानुसार क्रमबद्ध ढंग से नियंत्रित वातावरण में किया जाता है। वस्तुगत अध्ययन के कारण प्रदत्त में एकत्र होते हैं।

दोष (Demerits):
इस विधि में निम्नलिखित कमियाँ हैं –
(क) यह विधि बच्चों की सभी मानसिक क्रियाओं के अध्ययन में असफल है। जैसे-अचेतन की क्रियाएँ।
(ख) यह विधि नियंत्रित वातावरण में सभी प्रकार की मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को उत्पन्न नहीं कर सकती। जैसे-भीड़-व्यवहार, सामाजिक तनाव, क्रांति इत्यादि।
(ग) यह विधि इसलिए भी दोषपूर्ण है कि नियंत्रित वातावरण में स्वाभाविक प्रतिक्रिया संभव नहीं है।
(घ) यह विधि सीमित भी है, क्योंकि सभी तरह के प्रयोग सभी प्रकार के प्राणियों पर प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में संभव नहीं है।

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प्रश्न 5.
वस्तुनिष्ठ निरीक्षण विधि क्या है? इसके गुण एवं दोषों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेक्षण या निरीक्षण विधि (Observation method) –
मनोविज्ञान की एक प्रमुख विधि है। जब वाटसन (Watson) ने पहली बार यह कहा कि मनोविज्ञान चेतन अनुभूति का विज्ञान नहीं है बल्कि व्यवहार के अध्ययन का विज्ञान है, तब उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मनोविज्ञान की विषय-वस्तु अर्थात् व्यवहार के अध्ययन करने की सबसे उत्तम विधि वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण (Objective observation) है। वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण वह विधि है जिसमें प्राणियों के व्यवहारों का अध्ययन किसी विशेष परिस्थिति में किया जाता है।

व्यवहार से तात्पर्य प्राणी की उन सभी क्रियाओं से होता है जो उद्दीपन (Stimulus) के प्रभावों के फलस्वरूप वह करता है। व्यवहार बाह्य (Extermal) तथा आंतरिक दोनों तरह के हो सकते हैं। रोना, दौड़ना आदि बाह्य व्यवहार के तथा साँस की गति में परिवर्तन, रक्तचाप में परिवर्तन आदि आंतरिक व्यवहार के उदाहरण हैं। जब कोई निरीक्षक या प्रेक्षक प्राणी के व्यवहारों का निरीक्षण किसी भी परिस्थिति में करके एकसमान निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तब ऐसे निरीक्षण को वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण या निरीक्षण (Objective observation) कहा जाता है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण को निम्नांकित तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है –

(a) सहभागी प्रेक्षण (Participant observation):
इस प्रेक्षण में प्रेक्षक घटना या व्यवहार को करने में स्वयं हाथ भी बँटाता है तथा उसका प्रेक्षण द्वारा अध्ययन भी करता है।

(b) असहभागी प्रेक्षण (Non-participant observation):
इस तरह के प्रेक्षण में प्रेक्षक घटना या व्यवहार का मात्र निरीक्षण करता है, उसके करने में हाथ नहीं बँटाता है।

(c) प्रकृतिवादी प्रेक्षण (Naturalistic observation):
इस विधि में प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन उनकी स्वाभाविक परिस्थिति जैसे बंदरों, चिड़ियों, मधुमक्खियों के व्यवहारों का उनके स्वाभाविक रहने के स्थानों में प्रेक्षण किया जाता है।

गुण (Merits):
(a) वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण विधि में वस्तुनिष्ठता (Objectivity) अधिक होती है। फलतः इससे प्राप्त निष्कर्ष अधिक विश्वसनीय होते हैं। जैसे-किसी व्यक्ति को जोर-जोर से बोलते, आँख लाल किए तथा उसके नथुने फड़कते देखते हैं, तो इस प्रेक्षण के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि व्यक्ति क्रोधित है।

(b) इस विधि का प्रयोग बच्चे, प्रौढ़, पशु-पक्षी, असामान्य व्यक्तियों आदि सभी पर किया जा सकता है। अतः इस विधि ने अंतर्निरीक्षण विधि की तुलना में निश्चित रूप से मनोविज्ञान के कार्यक्षेत्र (Scope) को विस्तृत कर दिया है।

(c) इस विधि द्वारा एक समय में एक से अधिक व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण आसानी से किया जा सकता है। समूह, भीड़ व्यवहार आदि का अध्ययन जो अंतर्निरीक्षण विधि से संभव नहीं है, इस विधि द्वारा आसानी से किया जा सकता है।

(d) इस विधि द्वारा किसी व्यवहार से प्राप्त तथ्यों की सांख्यिकीय व्याख्या किया जाना संभव है। सांख्यिकीय व्याख्या करने से मनोविज्ञान का स्वरूप अधिक वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक हो जाता है।

दोष:
(a) इस विधि में प्राणी के व्यवहारों का प्रेक्षण करके उसकी मानसिक स्थिति का पता लगाया जाता है। मानसिक स्थिति के बारे में इस तरह का अनुमान लगाना हमेशा सही नहीं हो पाता है। जैसे-खुशी और दुख दोनों ही अवस्थाओं में व्यक्ति की आँख में आँसू निकल आते हैं। इस प्रकार, व्यक्ति की आँसू को देखकर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि व्यक्ति में हर्ष की मानसिक स्थिति है या विवाद की।

(b) इस विधि का अन्य दोष यह है कि प्रेक्षक तथा उसकी व्याख्या करते समय पूर्वधारणा या पूर्वाग्रह तथा अपने अन्य निजी अनुभवों द्वारा काफी प्रभावित हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है प्राप्त निष्कर्ष गलत एवं अविश्वसनीय हो जाते हैं।

(c) सामान्यतः प्रेक्षक (Observer) परिस्थिति में स्वयं उपस्थित होकर ही व्यवहारों का प्रेक्षण तथा व्याख्या करता है। ऐसा देखा गया है कि परिस्थिति में प्रेक्षक की उपस्थिति से व्यक्तियों के वास्तविक व्यवहार में कुछ कृत्रिमता या विकृति आ जाती है जिससे किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं हो पाता है। इस दोष को दूर करने के लिए प्रेक्षक प्रायः अपनी पहचान छिपा लेते हैं या एक-तरफा पर्दा (One-way screen) का उपयोग करते हैं।

(d) कभी-कभी देखा गया है कि प्रेक्षक इस विधि द्वारा पागलों, पशुओं, बच्चों आदि के व्यवहारों का प्रेक्षण अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण से करते हैं जिसके कारण इनके संबंध में प्राप्त परिणाम विश्वसनीय एवं वैध (Valid) नहीं हो पाते हैं। जैसे-यदि प्रेक्षक बच्चों के व्यवहारों का प्रेक्षण को दोषपूर्ण होना ही है और प्राप्त निष्कर्ष को अयथार्थ होना ही है। वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण विधि के गुण-दोषों पर विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह विधि मनोविज्ञान के लिए काफी उपयोगी है।

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प्रश्न 6.
प्रश्नावली विधि के गुण तथा दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
G. Stanlet Hall ने सर्वप्रथम इस विधि का निर्माण विकासात्मक मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए किया। इस विधि में बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक क्रियाओं की जानकारी के लिए प्रश्न बनाए जाते हैं। प्रश्नों द्वारा बच्चों के व्यवहार-संबंधी उत्तर अंकित किए जाते हैं। इस विधि का प्रयोग कम उम्र के बच्चों के अध्ययन में नहीं हो पाता है, क्योंकि प्रश्नों के उत्तर के लिए भाषा विकसित होना चाहिए।

प्रतिमाओं के अध्ययन में Galton ने इस विधि को अपनाया। वैसे, बच्चों की मनोवृत्ति एवं जीवन-मूल्यों के अध्ययन में यह विधि सफल रही है। ऊपर के विवेचन से यह स्पष्ट है कि इस विधि में प्रश्नों की भूमिका महत्वपूर्ण है। यहाँ हमें इस बात पर विचार करना होगा कि प्रश्नों की सूची कैसी होती है, प्रश्न किस स्वरूप के होते हैं। प्रश्नों के बारे में विचार करने पर पाया गया है कि प्रश्न मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

1. संरचित प्रश्न-इस प्रकार की प्रश्नावली में बच्चों के व्यवहार:
संबंधी बातों की जानकारी से संबंधित प्रश्न होते हैं, जो पहले से ही तैयार कर लिए जाते हैं। बच्चों से प्रश्न पूछा जाता है और उत्तर अंकित किए जाते हैं। इस प्रश्नावली को उन्हीं बच्चों से पूछा जाता है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय की समझ होती है।

2. असंरचित प्रश्न:
इस प्रश्नावली का निर्माण पहले से नहीं होता है, बल्कि अध्ययन के समय व्यवहार-संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं। बच्चे स्वतंत्र होकर उत्तर देते हैं। इस संबंध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि अध्ययन के क्रम में प्रश्नों के उत्तर को सीमित रखा जाए अथवा असीमित। अर्थात्, बच्चे कुछ उत्तरों में से एक उत्तर चुनें अथवा स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार उत्तर दें। इस संदर्भ में भी दो प्रकार के उत्तर-उन्मुखं प्रश्नावली का व्यवहार होता है –

  • प्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें बच्चे लिखित उत्तरों में किसी एक के बारे में हाँ, ना, सहमत, असहमत इत्यादि कहकर उत्तर देते हैं।
  • अप्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें बच्चे स्वतंत्र होकर प्रश्नों के उत्तर देते हैं। बच्चे अपनी मनोवृत्ति, शिक्षा, मनोभावों, मनोवेगों एवं विचारों को खुलकर उत्तर के रूप में व्यक्त कर पाते हैं।

गुण (Merits):
प्रश्नावली विधि के गुण इस प्रकार हैं –

  1. इस विधि का पहला गुण यह है कि यह विधि वस्तुनिष्ठ है। इससे प्राप्त प्रदत्त वस्तुनिष्ठ होते हैं।
  2. इसका दूसरा गुण यह है कि वैसे बच्चे जिनकी भाषा विकसित होती है वे खुलकर स्वतंत्रतापूर्वक अपनी बातों को अध्ययनकर्ता के सामने रख देते हैं।
  3. इस विधि की तीसरी विशेषता यह है कि इससे असामान्य, असमंजित एवं समस्याजन्य सभी प्रकार के बच्चों का अध्ययन संभव है।
  4. इसकी चौथी विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से बच्चों का अध्ययन संभव है जिससे समय और अर्थ की बचत होती है।
  5. इसकी पाँचवी विशेषता यह है कि इससे प्राप्त प्रदत्तों (data) का सांख्यिकीय विश्लेषण (statistical analysis) संभव है।

दोष (Demerits):
इस विधि में निम्नांकित दोष हैं –

  1. यह मात्र उन्हीं बच्चों पर लागू हो सकती है जिन्हें भाषा एवं प्रत्यय का ज्ञान हो। अतः यह विधि सीमित है।
  2. इसका दूसरा दोष यह है कि इस विधि द्वारा गूंगे एवं बहरे बच्चे का अध्ययन संभव नहीं है।
  3. इस विधि में तीसरा दोष यह है कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर देने में अवरोध (resistance) दिखाते हैं।
  4. चौथा दोष यह है कि कभी-कभी प्रश्नों का चुनाव सही नहीं हो पाता है। प्रश्न अस्पष्ट एवं कठिन होते हैं। अतः बच्चे सही-सही उत्तर नहीं दे पाते।
  5. पाँचवाँ दोष यह है कि अध्ययनकर्ता अपनी पूर्वधारण की छाप-अध्ययन पर छोड़ देते हैं जिससे निष्कर्ष सही नहीं आता।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समस्या पहचान के बाद शोधकर्ता समस्या का एक काल्पनिक उत्तर ढूँढता है उसे कहा जाता है:
(a) कल्पना
(b) परिकल्पना
(c) चर
(d) प्रयोग
उत्तर:
(b) परिकल्पना

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प्रश्न 2.
मनोविश्लेषण की नींव किसने डाली
(a) फ्रायड
(b) उण्ट
(c) टिचनर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) टिचनर

प्रश्न 3.
संरचनावादी सिद्धांत की स्थापना हुई?
(a) 1880 ई. में
(b) 1890 ई. में
(c) 1896 ई. में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 1896 ई. में