Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

Bihar Board Class 11 Home Science उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जीन प्याजे के अनुसार सभी बच्चे ‘स्कीमा’ से प्रभावित होते है। [B.M. 2009A]
(क) बड़े होने पर
(ख) जन्म से ही
(ग) किशोर होने पर
(घ) दुबले होने पर
उत्तर:
(ख) जन्म से ही

प्रश्न 2.
मानव शरीर में कितने प्रकार के अमीनो अम्ल पाए जाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) 40
(ख) 36
(ग) 22
(घ) 15
उत्तर:
(ग) 22

प्रश्न 3.
‘जीरोपथेल्मिया’ किस विटामिन की कमी के कारण होता है। [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘K’
(ख) विटामिन ‘B’
(ग) विटामिन ‘C’
(घ) विटामिन ‘A’
उत्तर:
(घ) विटामिन ‘A’

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 4.
वसा में घुलनशील विटामिन होता है । [B.M.2009A]
(क) विटामिन ‘डी’
(ख) विटामिन ‘बी’
(ग) विटामिन ‘बी,’
(घ) विटामिन ‘बी,,’
उत्तर:
(क) विटामिन ‘डी’

प्रश्न 5.
ग्राम कार्बाहाइड्रेड के विघटन से कितनी ऊर्जा प्राप्त होती है। [B.M.2009A]
(क) 2 कैलोरी ऊर्जा
(ख) 6 कैलोरी ऊर्जा
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा
(घ) 10 कैलोरी ऊर्जा
उत्तर:
(ग) 4 कैलोरी ऊर्जा

प्रश्न 6.
दुबली-पतली शरीर रचना वाले व्यक्ति कहलाते हैं। [B.M. 2009A]
(क) मीसोमोरफिक
(ख) एकटोमोरफिक
(ग) इण्डोमोरफिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) एकटोमोरफिक

प्रश्न 7.
एक साधारण कार्य करने वाले व्यस्क पुरुष को प्रतिदिन कितना ग्राम अनाज ग्रहण करना चाहिए। [B.M.2009A]
(क) 175 ग्रा.
(ख) 270 ग्रा
(ग) 380 ग्रा.
(घ) 520 ग्रा.
उत्तर:
(घ) 520 ग्रा.

प्रश्न 8.
खाद्य वर्गों को मिला-जलाकर खाने से – [B.M.2009A]
(क) विभिन्न स्वाद मिलता है
(ख) पकाने में समय की बचत होती है
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है
(घ) पोषक मान अधिक होता है
उत्तर:
(ग) शरीर की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति होता है

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 9.
खाद्य पदार्थों को कितने वर्ग में बाँटा जा सकता है ? [B.M.2009A]
(क) तीन
(ख) आठ
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर:
(ग) पाँच

प्रश्न 10.
पशु जन्य प्रोटीन में किस तत्त्व की मात्रा अधिक होती है ? [B.M.2009A]
(क) अनिवार्य अमीनो अम्ल
(ख) ऊर्जा
(ग) पेप्टोन
(घ) एंजाइम
उत्तर:
(घ) एंजाइम

प्रश्न 11.
कैल्सियम का उत्तम स्रोत है –
(क) रागी
(ख) मकई
(ग) दाल
(घ) चावल
उत्तर:
(क) रागी

प्रश्न 12.
अंडे से प्राप्त होनेवाले प्रोटीन को प्रोटीन माना जाता है –
(क) A ग्रेड.
(ख) B ग्रेड
(ग) C ग्रेड
(घ) D ग्रेड
उत्तर:
(क) A ग्रेड.

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 13.
वसा वयस्क स्त्री एवं पुरुष को ग्राम में चाहिए –
(क) 20 ग्रा.
(ख) 30 ग्रा.
(ग) 45 ग्रा.
(घ) 50 ग्रा.
उत्तर:
(क) 20 ग्रा.

प्रश्न 14.
इडली डोसा खाया जाता है –
(क) आंध्र प्रदेश
(ख) कर्नाटक
(ग) केरल
(घ) तमिलनाडु
उत्तर:
(घ) तमिलनाडु

प्रश्न 15.
खाद्य वर्ग मुख्यतः [B.M. 2009A]
(क) दो है,
(ख) चार है
(ग) पाँच है
(घ) आठ है
उत्तर:
(ग) पाँच है

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 16.
खाद्य पदार्थों के सही संग्रह की आवश्यकता क्यों है ? [B.M.2009A]
(क) उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए
(ख) आर्थिक लाभ के लिए
(ग) गुणवत्ता बढ़ाने के लिए
(घ) सुविधा के लिए
उत्तर:
(घ) सुविधा के लिए

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन का रासायनिक संगठन (Composition of Protein) क्या है ?
उत्तर:
प्रोटीन मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। प्रोटीन के कुछ समूहों में सल्फर, फॉस्फोरस तथा ताँबा, लोहा आदि लवण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 2.
प्रोटीन का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
प्रोटीन का वर्गीकरण (Classification of Proteins) निम्नलिखित के अनुरूप होता है –
(a) भौतिक और रासायनिक विशेषताएँ।
(b) अमीनो अम्ल की मात्रा।

(a) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं –

  • साधारण प्रोटीन (Simple)
  • युग्म प्रोटीन (Conjuguated)।
  • प्राप्त प्रोटीन (Derived)।

(b) प्रोटीन को वर्गीकृत कर सकती हैं:

  • पूर्ण प्रोटीन (Complete Proteins)।
  • siera: yuf sitzta (Partially Complete)
  • 37 of stata (Incomplete proteins)

प्रश्न 3.
प्रोटीन के कोई तीन कार्य लिखिए।
उत्तर:
प्रोटीन के कार्य (Functions of Proteins):

  • प्रोटीन नए तंतुओं के उत्पादन के लिए अनिवार्य है।
  • यह टूटे-फूटे व पुराने तंतुओं की मरम्मत के लिए भी उत्तरदायी है।
  • ग्लोबिन प्रोटीन रक्त के हीमोग्लोबिन तंतुओं का एक आवश्यक हिस्सा है।

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट कई रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना यौगिक है। यह पदार्थ कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के रासायनिक संयोग से मिलकर बनता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट का किस आधार पर वर्गीकरण कर सकती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट को परमाणुओं की संख्या के आधार पर निम्न तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)।
  • डाइ-सैक्राइड (DiSaccharide)।
  • पोली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)।

प्रश्न 6.
वसा (Fats) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना होता है। वसा में नाइट्रोजन का अभाव होता है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन की मात्रा अधिक होती है लगभग दुगुनी और इसलिए यह कार्बोज से दुगुनी ऊर्जा उत्पादित कर पाते हैं। वसा का सुरक्षित कोष चर्बी के रूप में शारीरिक वजन का लगभग 13.8% होता है।

प्रश्न 7.
संतृप्त वसीय अम्ल (Saturated Fatty Acid) और असंतृप्त वसीय अम्ल (Unsaturated Fatty Acid) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संतृप्त वसीय अम्ल-जिन वसीय अम्ल में कार्बन अणुओं की बराबर संख्या में हाइड्रोजन अणु उपस्थित रहते हैं, उनको संतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, अर्थात् इनके कार्बन हाइड्रोजन ग्रहण करने में समर्थ नहीं हैं। असंतृप्त वसीय अम्ल-वह अम्ल जिनमें हाइड्रोजन तथा कार्बन अणुओं की संख्या असमान हो अर्थात् हाइड्रोजन अणुओं की संख्या कार्बन अणुओं से कम हो, उसे असंतृप्त वसीय अम्ल कहते हैं, जैसे ओलेइक ऐसिड (Oleic Acid)।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 8.
वसा और तेल में क्या अन्तर है?
उत्तर:
वसायुक्त भोज्य पदार्थों को दो समूहों में बाँटा गया है। 1. वसा, 2. तेल। यह विभाजन तापक्रम से होने वाली क्रियाओं के अनुसार किया गया है। वसायुक्त पदार्थ यदि 20°C पर ठोस हो तो वह वसा कहलाता है। यदि इसी तापक्रम पर पदार्थ तरल हो तो वह तेल कहलाता है।

प्रश्न 9.
विटामिन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सन्तुलित भोजन में विटामिन आवश्यक पदार्थ हैं । इनके द्वारा शरीर की कोशिकाओं तथा तन्तुओं से अनेक कार्य होते रहते हैं। प्रत्येक विटामिन एक अलग रासायनिक तत्त्व है, इसके अपने निजी गुण होते हैं। ओसर नामक वैज्ञानिक ने विटामिनों की परिभाषा इस प्रकार की है, “यह एक ऐसा सशक्त मिश्रण है जो प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है किन्तु शरीर के लिए अनिवार्य है।”

प्रश्न 10.
विटामिन ‘ए’ पर नोट लिखें।
उत्तर:
विटामिन-‘ए’ पीलापन लिये हुए वह पदार्थ है, जो कि पानी में अघुलनशील, वसा में घुलनशील और आग के प्रति स्थिर (Stable) है । साधारण तापक्रम पर यह नष्ट नहीं होता लेकिन Oxidation की क्रिया से यह नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त सूर्य की किरणों के सम्पर्क से भी यह नष्ट हो जाता है। ऑक्सीजन की उपस्थिति में विटामिन एक साधारण तापक्रम पर भी नष्ट होता रहता है। लेकिन O2 की अनुपस्थिति में विटामिन-‘ए’ युक्त भोज्य पदार्थों को 120°C तक गर्म करने पर इसकी मात्रा और गुण यूँ ही बना रहता है। ”

प्रश्न 11.
विटामिन ‘डी’ के गुण क्या हैं ?
उत्तर:
गुण (Property): शुद्ध विटामिन-डी सफेद रवेदार, गन्ध रहित तथा वसा घुलित पदार्थों में घुलनशील है। आग के प्रति स्थिर, अम्ल तथा क्षार से यह नष्ट नहीं होता । CH तथा C2 के संयोग से यह बनता है। भोजन बनाने की साधारण विधियों में भी विटामिन-डी नष्ट नहीं होता। दूध को उबालने से, पाश्चुरीकरण से तथा पाउडर के रूप से सुखाए जाने पर भी इस विटामिन की मात्रा बनी रहती है।

प्रश्न 12.
जल में घुलनशील विटामिन बताइए।
उत्तर;
इन विटामिनों को हम दो श्रेणी में विभक्त करते हैं :
1. विटामिन बी श्रेणी-थायमिन, राइबोफ्लेविन, नायसिन, पारिडेक्सिन, फोलिक अम्ल, कोबालमिन, पैटोथीन अम्ल, बायोटिन, कोलीन।
2. विटामिन सी श्रेणी-ये जल में घुलने वाले विटामिन हैं। इनका मुख्य कार्य शरीर में ऊर्जा प्राप्ति में सहायक होना है।

ये विटामिन शरीर में उत्पादित नहीं हो सकते, अतः इन्हें प्रतिदिन आहार के द्वारा ही प्राप्त करना आवश्यक है। यदि शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच भी जाते हैं तो जल में घुलनशील होने के कारण जल-निष्कासन द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 13.
विटामिन B1 (Thiamine) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यह विटामिन पूर्ण रूप से चावलों के परिस्तर (Pericarp) से सन् 1926 ई० में निकाला गया और 1937.ई० में व्यावसायिक रूप में तैयार किया गया । चूँकि इसमें एमाइन-नाइट्रोजनीय तत्त्व होने के साथ-साथ कुछ थोड़ा-सा अंश गन्धक का भी है, अतः इसे थायमीन कहा गया क्योंकि यह तन्त्रिकाओं (Nerves) पर कार्बोज से उत्पन्न पाइरुविक एसिड के प्रभाव को मिटाता है। इसे एन्युरिन (Aneurin) भी कहा जाता है।

प्रश्न 14.
विटामिन B1 (Riboflavin) के भौतिक गुण क्या हैं ?
उत्तर:
विटामिन के अणु के दो भाग हैं, राइबो (Ribo) शर्करा खण्ड व फ्लेविन (Flavin)। यह कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन (C1, H1, N2) और दो मेथिल समूह से मिलकर बनता है। सन् 1935 ई० से यह प्रयोगशालाओं में बनाया जाने लगा । अम्ल, ताप तथा वायु का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘सी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर:
विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े कमजोर हो जाते हैं।

प्रश्न 16.
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
विटामिन सी को फ्रेशफूड विटामिन इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केवल ताजे खट्टे रसदार फलों में ही उपस्थित होता है और रखे जाने पर या फलों के बासी हो जाने पर 50% तक नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 17.
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन कौन-सा है ?
उत्तर:
विटामिन सी का सबसे सस्ता साधन आँवला है जिसमें सन्तरे से 20 गुना विटामिन सी अधिक पाया जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 18.
कैल्शियम के भौतिक गुणों का आधार क्या है ?
उत्तर:
कैल्शियम (Calcium): कैल्शियम एक अकार्बनिक पदार्थ है जिससे लवण तैयार किए जा सकते हैं। हमारे शरीर में मुख्यतः हाइड्रोक्सि-ऐपेटाइड Ca10 (Pou)6 (OH)2 के रूप में काम आता है। कार्बोनेट, साइट्रेट, फॉस्फेट और बाईकार्बोनेट काम में आने वाले अन्य लवण हैं। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम लगभग दो किलो और फॉस्फोरस डेढ़ किलो तक पाया जाता है। कैल्शियम का लगभग 99 प्रतिशत भाग हड्डियों और दांतों को सुदृढ़ बनाने में प्रयुक्त होता है।

प्रश्न 19.
एनीमिया रोग किसकी कमी से होता है ?
उत्तर:
एनीमिया या रक्त में हीमोग्लोबिन का कम होना प्रमुखतः लोहे की कमी से होता है। इसके अतिरिक्त यह फोलिक अम्ल व सायनोकोबालामीन’ की कमी से भी होता है।

प्रश्न 20.
कैल्शियम के अवशोषण में कौन-सा विटामिन सहायक है ? बच्चों में इसकी कमी से होने वाले दो प्रमुख लक्षण लिखें।।
उत्तर:
कैल्शियम के अवशोषण हेतु शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता पड़ती है। इसकी कमी से बच्चों में रिकेट्स नामक रोग हो जाता है। इसके दो प्रमुख लक्षण निम्न हैं :

  • टांगों की हड्डियाँ नर्म पड़ जाती हैं। शरीर का भार सहन न कर सकने के कारण मुड़कर धनुष के आकार की हो जाती हैं।
  • छाती की हड्डियाँ आगे की ओर बढ़ जाती हैं जिसके कारण वक्ष भाग कबूतरनुमा दिखने लगता है।

प्रश्न 21.
खनिज लवण कैल्शियम पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
कैल्शियम श्वेत खड़िया (Chalk) के पाउडर जैसा होता है। कैल्शियम की मात्रा शारीरिक वजन की 1.5 से 2.0% तक होती है, जिसमें 99% हड्डियों व दाँतों में और शेष 1% अन्य ऊतकों व द्रवों में होता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 22.
कैल्शियम की शरीर में प्रतिदिन की मात्रा बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की प्रतिदिन की मात्रा (Daily intake of Calcium) –
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 1

प्रश्न 23.
रक्त का रंग लाल क्यों होता है ?
उत्तर:
लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन की उपस्थिति ही रक्त को लाल रंग प्रदान करती है।

प्रश्न 24.
लोहे की प्रतिदिन कितनी मात्रा आवश्यक है ?
उत्तर:
शरीर में लोहे की आवश्यकता (Requirement of iron in the body): लोहा प्रतिदिन आहार से प्राप्त करना आवश्यक है। विभिन्न आयु व स्थिति के अनुसार लोहे की प्रतिदिन की मात्रा (mg)
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन- 2
आकस्मिक दुर्घटना के घटित होने अथवा डॉक्टरी ऑपरेशन के पश्चात् रक्त के ह्रास को प्राकृतिक अवस्था में लाने के लिए कुछ मास तक व्यक्ति के भोजन में लोहे की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 25.
‘लोहे’ के भौतिक गुण (Physical properties) लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे की उपयोगिता के विषय में विस्तत ज्ञान प्राप्त करने के लिए 19वीं शताब्दी में अनेक प्रयोग व अनुसंधान हुए जिससे शरीर में लोहे के महत्त्वपूर्ण कार्यों का पता लग सका। खनिज लवणों में लोहे का विशेष महत्त्व है। यद्यपि लोहा बहुत कम मात्रा में शरीर में पाया जाता है परन्तु शरीर में इसकी उपस्थिति अनिवार्य है। शरीर के कुल वजन का 90.04% भाग आयरन का होता है। इसका 70% भाग रक्त के लाल कण में, 4% मांस-पशियों में, 25% यकृत अस्थिमज्जा, प्लीहा व गुर्दे में संचित भण्डार के रूप में और बाकी 1% रक्त प्लाज्मा व कोशिकाओं के इन्जाइम में रहता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन के मुख्य साधन (Main sources) कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • प्रोटीन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के प्रोटिअस शब्द से हुई है जिसका अर्थ खाद्य पदार्थों में से सर्वोत्तम पदार्थ है।
  • प्रोटीन मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार के भोजन में पायी जाती है। सबसे अधिक प्रोटीन मांस, मछली, दूध व पनीर में पाया जाता है। इसके
  • अतिरिक्त सोयाबीन, सभी दालों में, गेहूँ, मटर, चावल, अरारोट, बादाम, मूंगफली आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्रोटीन के अभाव में शरीर में कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन के अभाव में निम्नलिखित लक्षण उत्पन्न होते हैं –

  • उम्र के अनुपात में शारीरिक गठन, वृद्धि व विकास में कमी।
  • मांस-पेशियों की शिथिलता।
  • त्वचा का सूखापन-झुर्रियाँ पड़ना।
  • रक्तहीनता।
  • मानसिक विकास में कमी।
  • चिड़चिड़ापन, क्रोध, भावुकता आदि।
  • बालों का सूखापन और कंघी करने पर अधिक टूटना।
  • नाखून का सूखापन और उन पर सफेद दाग।
  • एन्जाइम्स की कमी के कारण पाचन शक्ति में कमी।
  • जल जमाव-शोफ (Nutritional Oedema)।

प्रश्न 3.
आवश्यक व अनावश्यक अमीनो अम्ल (Essential and Non-essential amino-acid) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आवश्यक अमीनो अम्ल से तात्पर्य है कि यह अमीनो अम्ल हमें खाद्य पदार्थों द्वारा अनिवार्य रूप से मिलने ही चाहिए क्योंकि इनका हमारे शरीर में संकलन (Synthesis) नहीं हो पाता। इन अमीनो अम्ल की भोजन में कमी होने से बच्चों का विकास रुक जाता है तथा प्रौढ़ों में तोड-फोड की मरम्मत नहीं हो पाती। बच्चों के लिए 10 अमीनो अम्ल आवश्यक होते हैं तथा प्रौढ़ों के लिए 8, क्योंकि हिस्टीडिन (Histidine) व आर्जिनिन (Arginine) को शिशुओं के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल माना जाता है।

सिस्टिन (Cystine) व टाइरोसिन (Tyrosin) को अर्द्ध-आवश्यक अमीनो अम्ल माना गया है। अनावश्यक अम्ल शरीर में होने वाली तोड़-फोड़ की मरम्मत कर सकते हैं। शरीर का निर्माण इनके द्वारा नहीं हो सकता । कुछ अनावश्यक अम्ल शरीर में कुछ आवश्यक अमीनो अम्ल की उपस्थिति में उत्पादित होते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 4.
कार्बोज (Carbohydrates) का शरीर में क्या कार्य है ?
उत्तर:

  • कार्बोज ऊर्जा उत्पत्ति में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। शरीर की सारी ऐच्छिक व अनैच्छिक क्रियाओं के लिए गति व शक्ति प्रदान करते हैं।
  • यह वसा के पाचन में सहायक होते हैं।
  • ग्लूकोज अनावश्क अमीनो अम्ल के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • कार्बोज भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  • यह वसा के साथ मिलकर सन्तुष्टि की अनुभूति भी कराते हैं।
  • इसलिए अधिकांश मिष्ठान्न भोजन के अन्तिम दौर में परोसा जाता है।

प्रश्न 5.
कार्बोज की दैनिक मात्रा कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
कार्बोज की मात्रा कोई निश्चित रूप से निर्धारित नहीं की गई है, फिर भी 70% कैलोरीज कार्बोज से प्राप्त कर लेना चाहिए । उदाहरणार्थ एक साधारण काम-काज करने वाले व्यक्ति को कुल 2400 कैलोरी की आवश्यकता होती है तो इसका 70% 1680 कैलोरी हुई और चूँकि 10 ग्राम कार्बोज से 4 कैलोरी प्राप्त होती हैं, अतः उसे 1680 + 4 = 420 ग्राम कैलोरी की आवश्यकता होगी। वैसे भी 400 से 450 ग्राम तक की कार्बोज की मात्रा उपयुक्त समझी जाती है।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेटों की कमी से शरीर का भार कम हो जाता है ? उनकी स्फूर्ति जाती रहती है और व्यक्ति आलस्य का शिकार हो जाते हैं और शारीरिक विकास पर भी प्रभाव पड़ता है। शारीरिक कार्यों के लिए ऊर्जा न मिलने पर हर समय थकान महसूस होती है। कार्बोज की कमी होने पर प्रोटीन ऊर्जा के लिए उपयोग होता है और अपने शरीर निर्माण के विशिष्ट कार्य को सम्पन्न नहीं कर पाता है। इसके अतिरिक्त सेल्यूलोज की कमी होने पर मनुष्य कब्ज का शिकार हो जाता है। शरीर में संचित वसा गर्मी व शक्ति उत्पन्न करने हेतु व्यय हो जाता है। परिणामस्वरूप शरीर दुबला हो जाता है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, गालों की चमक जाती रहती है तथा व्यक्ति में दुर्बलता के चिह्न दृष्टिगोचर होने लगते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 7.
कार्बोहाइड्रेट्स के प्राप्ति स्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
सभी भोज्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट्स के अतिरिक्त एक या एक से अधिक पोषक तत्त्व होते हैं। रोटी जो कि कार्बोहाइड्रेट्स की प्राप्ति का मुख्य साधन है उसमें अन्य पोषक तत्त्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं। कुछ विशेष भोज्य पदार्थों को ज्वलन या ऊर्जा भोजन के नाम से पुकारते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें ऊर्जा उत्पादन तत्त्व अधिक होने से उनका मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है।

ऐसे पदार्थों में रोटी, आटा, छिलकेदार अनाज, गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, चने आदि हैं। इसके अतिरिक्त सोयाबीन, सूखे मटर की फलियाँ आदि हैं। सूखे फलों में अंजीर, मुनक्का, खजूर, किशमिश, अंगूर, सूखी खुमानी आदि हैं। अन्य पदार्थों में शकरकन्द, अखरोट, शहद, गुड़, पहाड़ी आलू, जड़दार सब्जियाँ, पत्तीदार सब्जियाँ आदि हैं।

प्रश्न 8.
आहार में वसा की दैनिक आवश्यकता क्या होनी चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने अनुसंधानों के आधार पर यह अनुशंसा की है कि दैनिक आहार में 30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होनी चाहिए। प्रयुक्त की जाने वाली कुल वसा का 50% भाग वनस्पति तेलों से प्राप्त होना चाहिए ताकि आवश्यक वसीय अम्ल प्राप्त हो सके। विभिन्न आयु के व्यक्तियों के आहार में वसा का निम्नलिखित प्रतिशत होना चाहिए –
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 3

प्रश्न 9.
वसा के मूल स्रोत (Sources) क्या हैं ?
उत्तर:
ऐसे भोज्य पदार्थ बहुत कम हैं जो पूर्णतः वसा तत्त्व से ही निर्मित हुए हैं। सामान्यतः विभिन्न चिकने भोज्य पदार्थों में प्रोटीन, वसा में घुलनशील विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और खजिन लवण आदि का संयोग रहता है परन्तु जिन पदार्थों में वसा की पर्याप्त मात्रा रहती है, उन्हें वसा का स्रोत माना जाता है।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 4
1. पशुजन्य स्रोत के अन्तर्गत माँस, मछली, मुर्गी के अण्डे, अण्डे की जर्दी, दूध और दूध से बने व्यंजन आते हैं।
2. वानस्पतिक स्रोत में वसा बीजों, सूखे मेवों (Nut), अनाजों और फलों से प्राप्त होती है।

प्रश्न 10.
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वसा विलेय और वारि विलेय विटामिन्स में अन्तर निम्न प्रकार हैं  –

वसा विलेय (Fat Soluble)।

  • वसा या वसा को घोलने वाले द्रवों में घुलनशील है।
  • आवश्यकता से अधिक खाये जाने पर शरीर में अधिकांश यकृत में संचित हो जाते हैं।
  • अभाव के दुष्परिणाम या लक्षण काफी विलम्ब से प्रकट होते हैं।
  • इनमें केवल ‘C, H, O अणु होते हैं।
  • अधिकता का शरीर पर कुप्रभाव पड़ता है।
  • यह विटामिन पूर्वगामी (Precursor) रूपों में भी पाए जाते हैं।

वारि विलेय (Water Soluble):

  • केवल वारि जल में घुलनशील है।
  • अधिकांश संचित नहीं होते। मूत्र में निष्कासित हो जाते हैं।
  • अभाव लक्षण तुरत ही प्रकट हो जाते हैं।
  • इनमें C, H, व O के अतिरिक्त N भी होता है, और कुछ में Sulphur व Cobalt भी।
  • अधिकता का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • यह पूर्वगामी रूपों में नहीं पाए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 11.
विटामिन ‘D’ के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions):
शरीर की उचित वृद्धि के लिए विटामिन डी की आवश्यकता है। इसकी अनुपस्थिति में विकास की गति रुक जाती है। चूहों के प्रयोग से पता चला है कि जिन चूहों को भोजन द्वारा विटामिन डी उपलब्ध कराई गई उनकी वृद्धि द्वितीय समूह के चूहों जिनके आहार में विटामिन डी अनुपस्थित थी, से बहुत अच्छी हुई।

  • कैल्शियम और फास्फोरस खनिज पदार्थों के अवशोषण में सहायक होते हैं जिससे हड्डियों व दाँतों को खनिज पदार्थ वांछित मात्रा में प्राप्त हो सकें।
  • इन्हीं तत्त्वां विशेषकर फास्फोरस गुर्दे (Kidney) के निकास को नियमित करता है। कैल्शियम उचित अनुपात में बना रहता है, जिससे हड्डियों की मजबूती बनी रहती है।
  • रक्त में भी कैल्शियम की मात्रा को. नियमित बनाए रखता है।
  • रक्त के अल्कंन फॉस्फेट इन्जाइम को नियमित बनाये रखता है जिसमें यह कैल्शियम व फॉस्फोरस को हड्डियों व दाँतों में संचित किए रखता है।

प्रश्न 12.
विटामिन ‘डी’ की दैनिक आवश्यकता क्या है ?
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता (Daily Requirement):

  • इस विटामिन की आवश्यकता जब शरीर में विकास हो रहा होता है, होती है।
  • गर्भवती स्त्री को भी इसकी आवश्यकता होती है।
  • एक स्वस्थ सामान्य वयस्क व्यक्ति.को इसकी थोड़ी आवश्यकता होती है। पोषण विज्ञान परिपद ने 18 वर्ष की आयु तक विभिन्न आयु वर्गों के लिए
  • 200 आई. यू. (I.U) निश्चित किये हैं परन्तु प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए कुछ नहीं बताया।

प्रश्न 13.
विटामिन ‘बी’ (थायमिन) की भोजन में क्या उपयोगिता है ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. इस विटामिन का विशेष कार्य कार्बोज के उपापचयन में सहायता करना है। इसके अभाव में शरीर में कार्बोज का पूर्ण अवशोपण नहीं हो पाता।
  2. यह विटामिन तान्त्रिका तंत्र के स्वास्थ्य तन्त्रिका तन्तु में संवेदन संचार तथा आँतों की स्वाभाविक क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है।
  3. थायमिन को मौरेल (Morale) विटामिन भी कहा जाता है। इसकी कमी से चिड़चिड़ापन, झगड़ालू प्रवृत्ति, अरुचि आदि लक्षण मनुष्यों में पाए जाते हैं। विलियम ने मनुष्यों पर प्रयोग करके बतलाया कि थायमिन पागलपन को ठीक नहीं करता लेकिन जब पागलों को इसकी कमी का आहार दिया जाता है तो उनके पागलपन की तीव्रता बढ़ जाती है।
  4. इसकी कमी से वृद्धि रुक जाती है। यह विटामिन शरीर की वृद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
  5. इसकी कमी से भूख नहीं लगती।
    B, के अभाव से राइबोफ्लेविन (Riboflavin) के संग्रह में कमी हो जाती है।
  6. रक्त में श्वेताणुओं की रोगाणु-भक्षण क्षमता की वृद्धि हेतु भी यह आवश्यक है।
  7. शरीर के आन्तरिक अवयवों की आवश्यक क्रियाशीलता हेतु शक्ति पहुँचाने के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 14.
“विटामिन ‘बी1‘ (थायमिन) की दैनिक आवश्यकता (Daily requirement) निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
दैनिक आवश्यकता-इस विटामिन की मात्रा, कैलारीज की मात्रा के अनुपात में निर्धारित की जाती है, अधिक शारीरिक श्रम करने वाले, अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट की खुराक खाने वाले और अधिक शराव सेवन करने वाले व्यक्ति को सामान्य से कुछ अधिक ही मात्रा की आवश्यकता होती है।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 5

प्रश्न 15.
विटामिन ‘बी2‘ (Riboflavin) के क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
कार्य (Functions)”:

  • राइबोफ्लेविन प्रोटीनों व वसा के उपापचयन में सहायक है।
  • यह नायसिन के निर्माण में भी सहायक होता है।
  • यह शारीरिक वृद्धि में सहायक है।
  • राइबोफ्लेविन की कमी से त्वचा स्वस्थ नहीं रह सकती।
  • यह अन्य शारीरिक इन्जाइमों से मिलकर शरीर की विभिन्न क्रियाओं में भाग लेता है।
  • यह ऑक्सीकरण प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है तथा कोशिकाओं के श्वसन के लिए अति आवश्यक है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 16.
राइबोफ्लेविन की दैनिक शारीरिक आवश्यकताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
शारीरिक आवश्यकता-(Requirement in the body): राइबोफ्लेविन की आवश्यकता मनुष्य के कार्य तथा आयु पर निर्भर करती है।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 6

प्रश्न 17.
विटामिन C के भौतिक गुणों (Physical Properties) का वर्णन करें।
उत्तर:
विटामिन सी को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे एस्कार्बिक अम्ल (Ascorbic Acid), सिविटामिस एसिड (Cevitamic Acid) या हेक्जुरोनिक एसिड (Hexuronic Acid) आदि। चूँकि यह स्कर्वी (Scurvy) नामक बीमारी का निराकरण करता है, अतः इसे एण्टी स्कोरब्यूटिक विटामिन (Anti Scorbutic Vitamin) भी कहते हैं। सन् 1932 ई० में इसका नींबू के रस से पृथक्करण किया गया और उसी वर्ष इसे रासायनिक रूप में भी तैयार किया गया।

विटामिन सी का रसायनिक नाम एस्कॉर्बिक अम्ल है। शुद्ध विटामिन सी सफेद स्वेदार, गन्ध रहित, पानी में घुलनशील, आग के प्रति अस्थिर, धूप एवं रोशनी में यह नष्ट हो जाता है। ताप, वायु, धातु में यह स्थिर है लेकिन तरल अवस्था में जबकि पानी के साथ इसका घोल बनाया जाता है, तो यह नष्ट हो जाता है। क्षार के माध्यम में यह अस्थिर है। अम्ल के माध्यम में यह नष्ट नहीं होता। जल में घुलनशील है।

प्रश्न 18.
विटामिन सी की दैनिक मात्रा मानव शरीर में कितनी होनी चाहिए?
उत्तर:
दैनिक मात्रा (Daily Requirement): बालकों के लिए शरीर विकास के साथ इस विटामिन की आवश्यकता बढ़ती रहती है।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 8

प्रश्न 19.
विटामिन C के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): यह समस्त रसीले फलों में विशेषकर नींबू, सन्तरा, आँवला, कमरख, अमरूद, चकोतरा, टमाटर में पाया जाता है, केले में भी यह पर्याप्त मात्रा में उपस्थित रहता है। हरी शाक-सब्जियों व ताजे फलों में जैसे पालक, सलाद आदि में यह पर्याप्त मात्रा में रहता है। अंकुरित अनाजों से यह अत्यधिक अंशों में प्राप्त किया जा सकता है। सूखे फलों में यह बिल्कुल नहीं रहता।

विभिन्न भोज्य पदार्थों में विटामिन (Vitamins in Different Food Stuffs)
अति उत्तम स्त्रोत – आँवला, अमरूद।
उत्तम स्रोत – नींबू का रस, पका पपीता, सन्तरा, काजू, अनानास, पका टमाटर, पका आम, मूली के पत्ते पालक, हरी पत्ती वाली शाक भाजी। .
सामान्य स्त्रोत – केला, सेब।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 20.
लोहे के खाद्य स्रोत लिखें।
उत्तर:
खाद्य स्रोत:

  1. प्राणिज पदार्थों में यकृत (Liver) उत्तम स्रोत है। मांस, अण्डे की जर्दी, मछली आदि अन्य स्रोत हैं।
  2. फलों में सेब, आडु, खुबानी, अंगूर आदि से कुछ लोहा मिल जाता है।
  3. पालक व हरी पत्तीदार सब्जी लोहे के स्रोत हैं। पत्ते जितने अधिक हरे होंगे, उतना ही अधिक लोहा उनमें होगा।
  4. साबुत अनाजों व गुड़ में भी लोहा पाया जाता है।
  5. दालों में थोड़ी मात्रा में लोहा पाया जाता है।
  6. दूध, पनीर आदि में लोहा बहुत कम होता है।

प्रश्न 21.
खाद्य सम्मिश्रण क्या है ? उदाहरण देकर स्पष्ट करें । [B.M. 2009 A]
उत्तर:
पर्याप्त पोषण के लिए यदि हम भोज्य पदार्थों को मिलाकर प्रयोग करें तो जो एक दूसरे. के पोषक तत्त्व की कमी को पूरा करते है उसे ही खाद्य सम्मिश्रण कहते हैं। इस विधि से पौष्टिक मान बढ़ाने से सबसे अधिक प्रभाव प्रोटीन की पौष्टिकता पर पड़ता है। अर्थात् प्रोटीन के द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी के स्रोतों को मिलाकर प्रथम श्रेणी का प्रोटीन प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर अनाज और दाल को मिलाकर दाल-रोटी दाल-चावल, खिचड़ी, डोसा इडली बड़ा बनाया जा सकता है इसी प्रकार से सब्जी और दूध के बने पदार्थ जैसे-गाजर का हलवा, टोमैटो क्रीम सूप। फल और अनाज से फ्रूट केक फलों का जैम ब्रेड इत्यादि बनाय जा सकता है। इस विधि से भोजन पकाने में पौष्टिकता तो बढ़ती ही साथ ही पकाने एवं खाने दोनों का ही समय कम लगता है और भोजन स्वादिष्ट, आकर्षक एवं रुचिकर भी हो जाता है।

प्रश्न 22.
लोहे की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
अथवा,
एक गर्भवती महिला अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाती। उसको कौन-सा रोग तत्त्वों की कमी से हो सकता है ? उसके दो लक्षण लिखें तथा एक खाद्य पदार्थ सुझाएँ।
उत्तर:
शरीर में कमी का प्रभाव (Effect of deficiency in the body):शरीर में लोहे ‘का अभाव कई कारणों से हो सकता है –

  • भोजन में लोहे की कमी।
  • लोहे का शरीर में पूर्णतः अवशोषण न होना।
  • शरीर में लोहे की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता हो।

लोहे की कमी से रक्तक्षीणता (Anaemia) रोग हो जाता है। इस रोग में लाल रक्त कण संख्या में बहुत कम हो जाते हैं, त्वचा पीली दिखाई देने लगती है, हीमोग्लोबिन का पर्याप्त रूप से निर्माण नहीं हो पाता। रक्त ऑक्सीजन वहन में असमर्थ हो जाता है। ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता से शारीरिक क्रियाएँ क्षीण होने लगती हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

ऊर्जा उत्पत्ति की कमी, शारीरिक कमजोरी, थकावट, भूख की कमी, साँस फूलने और हृदय धड़कने की शिकायत, आँखों की पलकों में लाली की कमी, चेहरा पीला, नाखून सफेद से और हाथों-पाँवों पर जल जमाव के कारण सूजन हो जाया करती है। व्यक्ति उत्साहहीन, सुस्त और बेचैन-सा रहने लगता है, वे लक्षण लोहे की कमी के ही लक्षण हैं।

प्रश्न 24.
लोहे की आवश्यकता शरीर में क्यों बढ़ जाती है ?
उत्तर:

  • गर्भकाल में तथा जन्म पश्चात् शिशु और स्वयं के लिए भी माता को आवश्यक मात्रा में लोहा प्रदान करने के लिए।
  • बढ़ते बालकों के विकास के साथ-साथ लोहे की बढ़ती आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए।
  • विभिन्न व्यक्तियों की विशेष परिस्थितियों में लोहे की हानि को पूरा करने के लिए।
  • शरीर में लोहे की पर्याप्त मात्रा संचित करके भविष्य के संभाव्य अभावों के लिए पूर्ण व्यवस्था करने के लिए।

प्रश्न 25.
आयोडीन की शरीर में क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
शरीर में आवश्यकता (Requirement in the body)-समुद्रतटीय निवासियों को आयोडीन की अधिक आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उनके भोजन में आयोडीन की अधिक मात्रा उपस्थित रहती है। एक वयस्क व्यक्ति को 0.15 से 0.2 मिली ग्राम, छोटे बच्चे और अन्य बालकों को 0.05 से 0.10 मिलीग्राम एक अच्छे संतुलित आहार द्वारा प्राप्त होती है।

प्रश्न 26.
आप अपने लिए संतुलित भोजन का आयोजन करना चाहते हो। आपको ICMR खाद्य पदार्थ किस प्रकार मदद करेगी?
उत्तर:

  • प्रत्येक आहार में प्रत्येक खाद्य ग्रुप को सम्मिलित करने में।
  • भोजन में विभिन्नता लाने में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव शरीर में प्रोटीन के क्या कार्य (Function) हैं ?
उत्तर:
1. मानव शरीर का लगभग 18% भाग प्रोटीन से बना होता है जो शरीर के विभिन्न भागों के कार्यों के अनुसार कई रूपों में पाया जाता है। शरीर में कोशिकाओं और ऊतकों का निर्माण करना प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसीलिए स्त्री को गर्भावस्था व स्तनपान काल में तथा बालक को बाल्यावस्था में शरीर के निर्माण और विकास के लिए प्रोटीन की विशेष रूप से अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. मनुष्य की बाह्य क्रियाशीलता तथा शरीर के अन्दर निरन्तर होती रहने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप ऊतकों में जो कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती रहती हैं उनकी पूर्ति तथा मरम्मत प्रोटीन द्वारा होती है। अस्थियाँ, दाँत, त्वचा, नाखून, रक्तकण, मांसपेशियां और अन्तःस्रावी ग्रन्थियों आदि की रचना में प्रोटीन का मुख्य भाग होता है। मूत्र और पित्त को छोड़कर शरीर के सभी तरल पदार्थों में अधिक या कम मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।

3. शरीर की क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में सहायता करना भी प्रोटीन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इन क्रियाओं को नियमित रूप से चलाने में प्रोटीन निम्न प्रकार से सहायता करता है –

(क) हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) इस प्रकार का प्रोटीन है जो रक्त के लाल कणों का एक मुख्य भाग है। इसमें लोहा भी सम्मिलित होता है। इसका कार्य बड़ा महत्त्वपूर्ण है। रक् द्वारा यह ऑक्सीजन को विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है जिससे मिलकर कार्बोहाइड्रेट्स और वसा का ज्वलन होता है और परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होती है।
(ख) रक्त में जो प्रोटीन पाए जाते हैं वे रक्त की सामान्य क्षारीय प्रतिक्रिया (alkaline reaction) की स्थिति बनाए रखने में सहायता करते हैं।
(ग) एन्जाइम (enzyme) भी जो पाचन तथा उपापचयन (Matabolism) क्रियाओं में विशेष रूप से सहायक होती है, प्रोटीन से ही बने होते हैं।
(घ) विभिन्न हारमोन (Hormones) भी प्रोटीन से ही निर्मित होते हैं। वे नाइट्रोजन युक्त रासायनिक यौगिक हैं। शरीर की आन्तरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखने में इनका बहुत महत्त्व है।
(ङ) प्रोटीन आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव व हारमोन्स की बनावट में भाग लेते हैं। इन्सुलिन (Insulin), एनिलिन (Adrenaline), थायरॉक्सिन (Thyroxine) व अन्य हारमोन्स में विद्यमान रहते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

4. शरीर में रोगों से बचाव के लिए कुछ प्रतिरोधी (anti bodies) भी पाए जाते हैं। ये पदार्थ प्रोटीन से ही बनते हैं।

5. आवश्यकता पड़ने पर शरीर को काम करने के लिए प्रोटीन शक्ति भी प्रदान कर सकता है, परन्तु सामान्य दशा में प्रोटीन से ऊर्जा उत्पादक पदार्थों का काम लेना लाभकारी नहीं होता। यदि प्रोटीन ऊर्जा की उत्पत्ति के लिए प्रयुक्त कर लिए जाते हैं तो शरीर निर्माण के लिए प्रोटीन नहीं बचते हैं।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 9

प्रश्न 2.
प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर:
प्रोटीन की आवश्यकता कई बातों पर निर्भर करती है –

  • वृद्धि एवं विकास के समय अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
  • प्रोटीन की प्रतिदिन की आवश्यकता आहार में उपयोग की गई प्रोटीन के गुण पर भी निर्भर करती है। प्रतिदिन के आहार में उपयोग की गई प्रोटीन का आधा भाग प्राणी जगत के साधन से आना चाहिए।
  • प्रोटीन की आवश्यकता आहार में उपस्थित अन्य पौष्टिक तत्त्व जैसे कैलोरीज की मात्रा पर भी निर्भर करती है। आहार में कैलोरीज की कमी से प्रोटीन ऊष्मा प्रदान करने का कार्य करेगी।
  • संक्रामक बीमारियों में अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

प्रोटीन की दैनिक मात्रा-1 ग्राम प्रतिकिलो वजन के अनुपात से लेना चाहिए। 1 ग्राम प्रोटीन = 4 KCal प्राप्त करता है।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 10

प्रश्न 3.
कार्बोहाइड्रेट को किस आधार पर वर्गीकृत (Classify) कर सकते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
कार्बोज को परमाणुओं की संख्या के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • मोनो-सैक्राइड (Mono-Saccharide)
  • डाइ-सैक्राइड (Di-Saccharide)
  • पौली-सैक्राइड (Poly-Saccharide)

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 11
I. मोनो सैक्राइड (Mono-Saccharide): मोनो सैक्राइड कार्बोज है जिसके अणु में एक शर्करा इकाई है। इन्हें सरल शर्करा भी कहते हैं। इनका अभिपचन इन्हें खाने के पश्चात् तुरन्त ही हो जाता है। यह स्वाद में मीठा और जल में घुलनशील है।

(अ) ग्लूकोज (Glucose): यह मीठे फलों जैसे अंगूर में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। अतः इसको शक्कर (Grape) भी कहते हैं। यह मक्का, चुकन्दर, गन्ना आदि में अधिक मात्रा में उपस्थित रहता है। ग्लूकोज श्वेतसार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदार्थ है। सभी श्वेतसार पाचन तथा पोषण के पश्चात् ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं।

रक्त में ग्लूकोज की एक निश्चित मात्रा होती है। यह मात्रा घटने तथा बढ़ने से शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में होने से यह मूत्र द्वारा वाहर निकलने लगता है। ये लक्षण डायबिटीज रोग के हैं। ग्लूकोज की आवश्यकता से अधिक मात्रा आहार में लेने से यह शरीर में ग्लाइकोजन (Glycogen) के रूप में एकत्रित हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

ग्लाइकोजन अधिकतर यकृत तथा मांसपेशियों में जमा रहता है । उपवास या बीमारियों में यही ग्लाइकोजन ग्लूकोज में बदल जाता है तथा ऑक्सीजन के पश्चात् ऊर्जा प्रदान करता है। ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा लेने से पाचन के पश्चात् वह वसा में परिवर्तित हो जाता है तथा वसा शरीर में जमा होकर अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न करती है। अत्यन्त दुर्बल रोगियों या मूर्छा आदि की दशा में ग्लूकोज को देने के लिए बाजार से बनी बनाई ग्लूकोज उपलब्ध हो जाती है। यह तुरंत रक्त में पहुँचकर रोगी को शक्ति प्रदान करता है क्योंकि इसे पचाने की आवश्यकता नहीं होती।

(ब) ग्लैक्टोज (Glactose): यह शक्कर ग्लूकोज व फ्रक्टोज की तरह प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जाता। यह दूध में पाई जानेवाली शक्कर लैक्टोज के पाचन से प्राप्त होता है। इसको औद्योगिक विधि से भी तैयार किया जाता है।

(स) फ्रक्टोज (Fructose): यह फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है। अत: फलों को शक्कर भी कहते हैं। यह इस समूह की सबसे मीठी शक्कर है। यह शहद, गुड़ आदि में पाया जाता है। फ्रक्टोज भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिनकी ग्लूकोज करता है। दोनों परस्पर परिवर्तनशील हैं।

II. डाइसैकराइड्स (Disaccharides) (C12 H2 O11 ): इन कार्बोहाइड्रेटों के अणुओं में शर्करा की दो इकाइयाँ होती हैं। इसलिए इन्हें दोहरी शर्करा या द्विशर्करा भी कहते हैं। ये सरल शर्करा से कुछ अधिक मीठी होती हैं तथा पानी मेंघुलनशीलस्फटिक (Crystals) बनने योग्य तथापाचन योग्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत ये सरल शर्कराओं में परिवर्तित हो जाती हैं।

(अ) लैक्टोज (Lactose): यह अन्य दूसरी शर्कराओं की अपेक्षा कम घुलनशील एवं कम मीठी होती है। साधारणतः यह रक्त या शरीर के ऊतकों में नहीं पायी जाती है। इसे दूध शक्कर भीकहते हैं। दूध में लैक्टोज 2 से 8% तक उपस्थित होती है। लैक्टोज का पाचन हो जाने के पश्चात् इसमें ग्लूकोज तथा ग्लैक्टोज बराबर अनुपात में मिलती है। लैक्टोज = ग्लूकोज + ग्लैक्टोज

(ब) सुक्रोज (Sucrose): यह अधिकतर गन्ने की शक्कर और चुकन्दर की शक्कर में पायी जाती है। यह साधारण चीनी का वैज्ञानिक नाम है। अभिपाचन के उपरान्त यह ग्लूकोज में परिवर्तित होकर रक्त द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। इसकी अतिरिक्त मात्रा यकृत में ग्लाइकोजन बनकर संचित हो जाती है। सुक्रोज ग्लूकोज और फ्रक्टोस के संयोग से बनता है। सुक्रोज = ग्लूकोज + फ्रक्टोज

(स) माल्टोज (Maltose): इसे माल्ट या जवा शक्कर भी कहा जाता है। अंकुरित अनाजों में उपस्थित शक्कर है। अंकुरित होने की क्रिया के अन्तर्गत अनाजों के स्टार्च, माल्टोज शर्करा में परिवर्तित होते हैं जो अधिक सुपाच्य हैं। पाचन क्रिया के अन्तर्गत अनाज का स्टार्च पहले माल्टोज में और फिर ग्लूकोज में परिवर्तित होता है। माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज

III. पौली सैकराइड्स (Polysaccharides (C6H10O6): यह एक जटिल पदार्थ है। इस श्वेतसार में दो से ज्यादा शक्कर की इकाई रहती है। इनमें मिठास कम होती है तथा इसका कोई निश्चित आकार नहीं होता।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

(अ) स्टार्च (Starch): जड़, वीज, कन्द अनाजों आदि में ये काफी मात्रा में उपस्थित रहते हैं। स्टार्च पानी में अघुलनशील हैं। गर्म पानी के साथ घोलने पर स्टार्च पेस्ट के रूप में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च पकाने के पश्चात् उसके चारों ओर उपस्थित सेल्यूलोज की दीवार टूट जाती है तथा स्टार्च कण पानी शोषित करके फूल जाते हैं। स्टार्च को अधिक पकाने से वह चिपचिपे पदार्थ में बदल जाता है।

पका हुआ स्टार्च खाने में स्वादिष्ट होता है तथा इसका पाचन शीघ्र ही हो जाता है। कच्चे स्टार्च का पाचन नहीं होता क्योंकि लार में उपस्थित एन्जाइम टायलिन केवल पके स्टार्च पर ही कार्य करता है। स्टार्च के कणों का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। इसके कुछ कण गोल, कुछ अण्डाकार तथा कुछ बेढंगी शक्ल के होते हैं।

(ब) डेक्सट्रीन (Dextrin): डेक्सट्रीन प्रकृति में प्रत्यक्ष रूप में नहीं मिलता है। जब स्टार्च युक्त पदार्थों को पकाया या भूना जाता है तो स्टार्च डेक्सट्रिन में परिवर्तित हो जाता है। स्टार्च का उद्विच्छेदन होने से स्टार्च पहले माल्टोज में, फिर डेक्सट्रिन में तथा अन्त में ग्लूकोज के रूप में प्राप्त होता है। इस प्रकार डेक्सट्रिन की प्राप्ति स्टार्च के उविच्छेदन से भी होती है। डबलरोटी या चपाती की बाहरी पपड़ी भीतरी भाग की अपेक्षा अधिक पाचनशील होती है।

(स) सेल्यूलोज (Cellulose): यह स्टार्च कोशिकाओं की बाहरी पर्त पर कड़े आवरण के रूप में उपस्थित रहता है। यह एक अत्यन्त जटिल पदार्थ है। इस कारण इसका शरीर में पाचन नहीं होता। सेल्यूलोज का भोज्य-मूल्य नहीं होता लेकिन भोजन में इसका होना अति आवश्यक है। सेल्यूलोज के रेशे आहार में भूसी की मात्रा बढ़ाते हैं जिससे आंत की मांसपेशियों में कुंचन गति (Penstalistic Movement) तेजी से होती है और मल आँत से आसानी से बाहर निकल जाता है। भूसी आँत में पानी शोषित करके फूल जाती है तथा बड़ी आँत को बली प्रदान करती है जिससे बड़ी आँत में मल आसानी से निकल जाता है। साबुत अनाजों, दालों, ताजे फलों एवं सब्जियाँ, सूखे मेवे आदि में सेल्यूलोज अधिक पाया जाता है। एक व्यक्ति को प्रतिदिन आहार में 4 से 7 मि. रेशा लेना चाहिए।

प्रश्न 4.
आहार द्वारा क्वाशिरक्योर का इलाज तथा मरस्मस रोग के लक्षण बताएँ।
उत्तर:
क्वाशिक्योर के रोगी को आहार देते समय निम्न दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए
1. आहार पाचनशील हो। शुरू के कुछ हफ्ते में सिर्फ तरल आहार देना चाहिए। तरल आहार में प्रोटीन, कैलोरीज तथा विटामिन अधिक मात्रा में हों।
2. जीवाणुनाशक तथा परजीवीनाशक दवाई देनी चाहिए।

आहार (Diet): बच्चे को शुरू में वसा रहित पाउडर दूध देना चाहिए। अच्छी तरह पकाए हुए अनाज, खिचड़ी, दाल का सूप आदि देना चाहिए । वसा युक्त भोज्य पदार्थ दूसरे या तीसरे हफ्ते से शुरू करना चाहिए। बच्चे को हरी पत्ते वाली पीली सब्जियाँ भी देनी चाहिए। इससे बच्चे को लौह, लवण, कैल्शिम, विटामिन ए आदि प्राप्त होंगे।

कैलोरीज (Calories): बच्चे को उसके भार के अनुसार कैलोरीज देनी चाहिए। प्रति किलो भार पर 140-150 कैलोरीज प्रतिदिन आहार में देनी चाहिए। अधिक कैलोरीज देने से बच्चा जल्दी स्वस्थ हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रोटीन (Protein): प्रोटीन उस स्रोत से दी जाए जिसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल उचित मात्रा में उपस्थित हों। प्रोटीन मुख्य रूप से प्राणी जगत् से दिया जाना चाहिए। प्रतिदिन प्रोटीन 3-5 ग्राम/कि.ग्राम के वजन में दिया जाना चाहिए।

विटामिन (Vitamin): विटामिन ए की कमी क्वाशिक्योर में अधिकांश रूप में देखी गई है। विटामिन ए की कमी की पूर्ति के लिए दवाई के रूप में विटामिन ए जैसे कॉड लिवर तेल (Cod liver oil) देना चाहिए। 50,000 IU विटामिन ए प्रतिदिन देना चाहिए।

अन्य खनिज लवण (Other minerals): मैग्नीशियम तथा पोटैशियम की कमी हो जाती है। प्रतिदिन बच्चे को 3-4 ग्राम पोटैशियम क्लोराइड तथा 5 से 10 ग्राम मैग्नीशियम क्लोराइड देना चाहिए। ये खनिज लवण तब तक देने चाहिए जब तक कि बच्चा पूर्ण रूप से स्वस्थ न हो जाए।

मरास्मस (Marasmus): मरास्मस का मुख्य कारण आहार में प्रोटीन व कैलोरीज दोनों की कमी या अभाव है। एक वर्ष के बच्चे अधिकांशतः इस बीमारी से पीड़ित होते हैं। छ: महीने के पश्चात् बच्चे को पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता अधिक होती है परन्तु उनको उस समय उचित आहार नहीं मिल पाता। इनके आहार में मुख्य रूप से चावल का समावेश रहता है जिससे न तो पूर्ण प्रोटीन मिलता है और न ऊष्मा की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। इस आयु में बच्चों को अनेक संक्रामक बीमारियाँ भी होती हैं जिसमें डायरिया मुख्य है। डायरिया रोग में भोजन का पोषण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता तथा बच्चा कमजोर होता जाता है।

बच्चा दो प्रकार के अभाव से पीड़ित होता है –
1. आहार की कमी।
2. आहार का पोषण उचित न होना। रोग के लक्षण (Symptoms of the disease)

1. माँसपेशियों का कमजोर होना-बच्चे की माँसपेशियाँ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं तथा शरीर पर केवल अस्थि कंकाल ही रह जाता है। आहार में प्रोटीन की कमी के कारण माँसपेशियों में उपस्थित ग्लाइकोजिन (Glycogen) का निरन्तर उपयोग होता रहता है।

त्वचा में उपस्थित वसा जलकर शरीर को ऊष्मा प्रदान करती है। इस प्रकार शरीर में कार्बोज तथा वसा की कमी होती रहती है जिससे माँसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।

2. वृद्धि रुक जाती है-बच्चे के शरीर का भार तथा लम्बाई अत्यन्त कम हो जाती है। इस दशा को बौनापन भी कहते हैं।

3. अन्य लक्षण-बच्चे का यकृत बढ़ जाता है जिसके कारण उसका पेट बाहर निकल आता है। शरीर में केवल आगे निकला हुआ पेट ही दिखाई पड़ता है। बच्चे की शक्ल बन्दर की तरह भयानक हो जाती है। त्वचा खुरदरी हो जाती है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

उस पर घाव हो जाते हैं। पानी की कमी से त्वचा सूख जाती है और उस पर दरारें पड़ जाती हैं। त्वचा ढीली पड़ कर लटक जाती है। हाथ-पैर एकदम कमजोर हो जाते हैं। विटामिन ए के अभाव के कारण आँखों में खुरदरापन आ जाता है। बच्चों में रक्तहीनता भी हो जाती है क्योंकि नए रक्त कणों का निर्माण उस समय ठीक प्रकार से नहीं हो पाता।

4. रक्त में परिवर्तन-सीरम एल्ब्यूमिन की मात्रा की रक्त में कमी हो जाती है। आहार द्वारा इलाज (Treatment through diet): इसमें वही आहार तथा पौष्टिक तत्त्व देनी चाहिए. जो क्वाशिक्योर में दिए जाते हैं।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 5.
विस्तार से प्रोटीन कैलोरी कुपोषण के लक्षण लिखें। उत्तर-प्रोटीन व कैलोरी कुपोषण से निम्न दो बीमारियों के लक्षण दिखाई पड़ते हैं
1. क्वाशिक्योर (Kwashikior) – यह मुख्य रूप से आहार में प्रोटीन की कमी के कारण होता है।
2. मरास्मस (Marasmus) – मरास्मस आहार में प्रोटीन तथा कैलोरी दोनों की कमी के कारण होता है।

1. क्वाशिक्योर (Kwashikior): डॉ. सिसले विलियम (Dr. Cicely William) ने क्वाशिक्योर रोग की खोज की और उन्होंने देखा कि यह रोग अधिकतर 1 से 3 वर्ष की अवस्था के बच्चों को होता है। उन्होंने बताया कि माता का दूध छुड़ाने के पश्चात् जब बच्चों को ऊपरी दूध नहीं मिलता तब उन्हें माँड (Starch) वाले भोजन देने शुरू किए जाते हैं, जिससे उनमें इस रोग के होने की सम्भावना रहती है।

इसके अतिरिक्त जिन बच्चों को शारीरिक आवश्यकता के अनुसार दूध नहीं मिलता और उन्हें जौ का पानी, साबूदाने का पानी या खिचड़ी दी जाती है जिसरं उनकी भूख शान्त नहीं हो पाती। उन्हें भी क्वाशिक्योर रोग हो जाता है। यह रोग अधिकतर गरीब तथा मध्यम वर्ग के बच्चों को जिन्हें शारीरिक आवश्यकतानुसार प्रोटीन नहीं मिल पाता, हो जाता है।

रोग के लक्षण (Symptoms of the disease): इस रोग से पीड़ित बच्चों के शरीर में निम्नलिखित लक्षण देखने में आते हैं –

  1. वृद्धि न्यूनता (Growth Failure): यह रोग का मुख्य लक्षण है। प्रोटीन की कमी के कारण शरीर की लम्बाई तथा भार कम हो जाता है।
  2. सूजन (Oedema): प्रथम पंजों तथा पैरों में सूजन आती है। तत्पश्चात् शरीर के अन्य भाग जैसे जाँघ, हाथ तथा मुख भी सूज जाते हैं । सूजन का मुख्य कारण रक्त में सीरम एल्ब्यूमिन की कमी है।
  3. चन्द्रमा के समान मुख (Moon Face): मुख चन्द्रमा के समान गोल हो जाता है । इसका मुख्य कारण मुख पर सूजन की उपस्थिति है।
  4. मानसिक परिवर्तन (Mental changes): मानसिक परिवर्तन के कारण रोगी में उदासीनता तथा चिड़चिड़ापन आ जाता है। रोग तीव्र होने के कारण रोगी आलसी व उदासीन हो जाता है। अपने आस-पास के वातावरण में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता।
  5. त्वचा तथा बालों में परिवर्तन (Skin and Hair changes): त्वचा रूखी, एवं खुरदरी हो जाती है।
  6. माँसपेशियों का क्षय होना (Muscle Wasting): शरीर की माँस-पेशियों का क्षय होने लगता है। इसका प्रभाव मुख्यतः हाथों पर पड़ता है।
  7. यकृत में परिवर्तन (Liver Changes): यकृत का आकार बढ़ जाता है जो कि Fatty Liver कहलाता है। वसा का पाचन ठीक नहीं हो पाता ।
  8. आमाशयिक आंत्रिक अंग पर प्रभाव (Gastro-Intestinal Tract): भूख कम हो जाती है। वमन तथा अतिसार खास लक्षण हैं। बच्चा. भोजन पचाने में असमर्थ होता है।
  9. रक्तहीनता (Anaemia): रक्तहीनता का मुख्य कारण लौह लवण तथा फेरिक अम्ल की कमी है।
  10. विटामिन की कमी (Vitamin Deficiency): विटामिन ए की कमी के लक्षण सामने आते हैं। राइबोफ्लेविन की कमी से होने वाले लक्षण भी उपस्थित रहते हैं।

प्रश्न 6.
शरीर में वसा के प्रमुख कार्य कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
वसा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –
1. शरीर को ऊर्जा प्रदान करना (Give energy to the body): वसा का प्रमुख कार्य व्यक्ति को शक्ति तथा ऊर्जा प्रदान करना है। वसा कार्बोज और प्रोटीन से दुगुनी मात्रा में शक्ति व गर्मी प्रदान करती है। एक ग्राम वसा में 9 कैलोरी मिलती है।

2. अधिक मात्रा होने पर यह शरीर में जमा हो जाती है (Deposit as fat in the body): जब वसा शरीर में आवश्यकता से अधिक पहुँच जाती है तो यह एकत्र होती रहती है। यह एडीपस (Adepose) तन्तुओं के रूप में शरीर में एकत्रित होती रहती है। जब कभी उपवास अथवा रुग्णावस्था में शरीर में वसा की कमी हो जाती है तो उस समय संचित की गई वसा ऑक्सीकरण (Oxidation) क्रिया द्वारा शरीर को गर्मी व शक्ति प्रदान करती है।

3. वसा तह का काम करती है (Fat actsas a layer): हमारा शरीर माँस से ढका रहता है, जिसे चर्म कहते हैं। इस चर्म के नीचे वसा एक तह के रूप में एकत्रित होती रहती है। जो ताप कुचालक होने के कारण शरीर की गर्मी का तापक्रम 88.4 FH बनाये रखता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

4. कोमल अंगों की रक्षा करना (Protection of delicate organs): शरीर के अन्दर अनेक कोमल अंग पाए जाते हैं, जैसे हृदय, फेफड़े, गुर्दे । इनके ऊपर वसा की दोहरी पर्त चढ़ी
रहती है। यह पर्त कोमल अंगों को झटकों से बचाती है ताकि चोट व आघातों से कोमल अंग सुरक्षित रहें।

5. वसा अनिवार्य अम्ल प्रदान करता है (Provide essential fatty acids): वसा अनिवार्य अम्ल जो स्वास्थ्य एवं शरीर निर्माण के लिए बहुत आवश्यक है, भोजन में उपस्थित वसा द्वारा प्राप्त होता है। यह शारीरिक वृद्धि व उत्तम स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।

6. वसा में घुलनशील विटामिन प्रदान करना (Provide fat soluble vitamin): वसा में घुलनशील विटामिन ए, डी, ई और के अवशोषण में सहायक होते हैं। भोजन में वसा की कमी की स्थिति में यह वसा विलेय विटामिन अवशोषण नहीं हो पाते हैं।

7. शरीर अंगों को स्निग्धता प्रदान करना (Provide lubrication to different organs): वसा हमारे विभिन्न अंगों जैसे पाचन संस्थान के अंगों को स्निग्धता प्रदान करते हैं।

8. भोजन को स्वादिष्ट बनाना (Makes food tasty): वसा का प्रयोग करके जब हम खाद्य पदार्थ पकाते हैं तो स्वादिष्ट होता है।

9. भूख से सन्तुष्टि प्रदान करना (Gives food a satisfy value): वसा का पाचन धीरे-धीरे विलम्ब से होता है जिसके कारण वसायुक्त भोजन अधिक समय तक आमाशय में स्हता है और भूख देर से लगती है।

10. कोशिकाओं की रचना में भाग लेते हैं (Take part in the formation of cell): कोशिका झिल्ली का भाग बनाते हैं। उसे पारगम्यता (Permebility) प्रदान करते हैं, जिससे पोषक तत्त्व उसमें होकर आसानी से अन्दर व बाहर आ-जा सकें।

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ए’ के कार्य लिखिए।
उत्तर:
कार्य (Functions):
1. विटामिन ए की अनुपस्थिति में कई प्रकार के आँख से सम्बन्धित रोग हो जाते हैं। इन रोगों में से रात्रि-अन्धापन (night blindness) और जेरोफ्थालमिया Zerophthalmia) मुख्य हैं।

2. शारीरिक वृद्धि में सहायक होता है। इस विटामिन की विद्यमानता में शरीर की हड्डियाँ ठीक से पनपती हैं और उनकी लम्बाई यथोचित हो पाती है, जिससे व्यक्ति की शारीरिक वृद्धि सामान्य हो पाती है। हड्डियों के साथ-साथ यह अन्य अवयवों और अंग-प्रत्यंगों को भी विकसित करने में सहायक होता है। गर्भ में बच्चे के अंग-प्रत्यंगों को बनाने में मददगार होता है। इसीलिए इसे वृद्धिवर्धक कारक (Growth Promoting Factor) भी कहा गया है।

3. पृष्ठाच्छादक तन्तुओं या उपकला (epithelial tissues) के स्वास्थ्य के लिए-उपकला कोशिकाओं को मजबूत बनाने में और उनके पुनर्निर्माण में सहायक होता है। हमारी त्वचा की ऊपरी परत उपकला और शरीर के सभी खोखले अवयवों की भीतरी झिल्लियाँ तन्तुओं की बनी होती हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

बाहरी उपकला धूप, गर्मी, सर्दी से शरीर की रक्षा करती हैं, भीतरी तन्तु श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में से निकलने वाले रसों की क्रियाओं में सहायक हैं। विटामिन ए की कमी से उपकला तन्तुओं की दशा अप्राकृतिक (abnormal) हो जाती है, त्वचा में रुखापन आ जाता है। समस्त त्वचा पर सींग के से उभार (Horny Structure) बन जाते हैं।

4. प्रोटीन को विभक्त करने वाले एन्जाइम्स की उत्पत्ति में सहायक होता है।

5. हार्मोन विशेषकर कोर्टीकोस्टीरान (Corticosteron) हार्मोन बनाने में सहायक होता है।

6. शरीर के अंगों पर कीटाणुओं के संक्रमण से बचाता है।

7. श्वास संस्थान की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrance) में विटामिन ए की कमी से परिवर्तन के फलस्वरूप मनुष्यों को तथा जानवरों को ब्रकोन्यूमोनिया तथा अन्य संक्रमण जनित रोग होने की बार-बार सम्भावना रहती है।

8. दाँत और मसूढ़े (Teeth & gums) दाँतों के ऊपर एनामेल (enamel) की पर्त चढ़ी रहती है जो दाँतों में चमकीलापन लाती है। यदि यह ठीक प्रकार से नहीं बनता तो दाँत पीले हो जाते हैं। एनामेल के निर्माण के लिए विटामिन ए का भोजन में पाया जाना आवश्यक है। इसके प्रभाव में मसूढ़े अस्वस्थ रहते हैं।

9. मूत्र नलियों (Urinary Tubes) में पथरी बनने की सम्भावना-प्रयोग द्वारा सिद्ध हो चुका है कि भोजन में विटामिन ए की मात्रा ठीक न लेने पर पेशावनलियों में पथरी (Stone) बन जाती है जिससे पेशाब रुक-रुक कर आता है। बाद में इसके परिणाम बड़े घातक सिद्ध होते हैं।

10. स्नायु संस्थान (Nervous System) विटामिन ए की कमी से स्पाइनल कॉर्ड (Spinal Cord) में टॉक्सिन (Toxin) पदार्थ उत्पन्न हो जाते हैं, जिनका प्रभाव सम्पूर्ण संस्थान पर पड़ता है। लैथरिज्म की बीमारी भी इस विटामिन की कमी से बताई जाती है। इस रोग में दोनों पैरों में Paralysis हो जाता है।

11. पाचन संस्थान (Digestive System) विटामिन ए के अभाव में मनुष्य की आमाशय में अम्ल का अभाव पाया जाता है, जिससे भोजन के पाचन में व्यवधान होता है।

12. यह कार्बोहाइड्रेट के उपापचयन में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘ए’ के अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms) के बारे में विस्तार से लिखिए।
अथवा
यदि एक बच्चा लाल-पीले रंग की फल-सब्जियाँ और हरी पत्तेदार सब्जियाँ नहीं खाता है तो उसे कौन-से तत्त्व की कमी हो जाती है ? उसके लक्षण लिखें।
उत्तर:
1. रात्रि अन्धापन या रतौंधी (Night Blindness): आँख का भीतरी भाग जिसे रेटिना (Retina) कहते हैं वह दो प्रकार के कोषों छड़ (Rods) और सूचियों (Lons) से मिलकर बना है। इसमें रंग देने वाले कण पाए जाते हैं। वह रंग देने वाले कण (Colour pigments) जो छड़ में हैं, उन्हें रोडप्सिन (Rhodopsin) कहते हैं।

सूचियों में पाए जाने वाले रंग कणों को इडाप्सिन (Idopsin) कहते हैं। यह दोनों प्रकार के रंग कण विटामिन ए और प्रोटीन से बनते हैं। छड़ मध्यम रोशनी को ग्रहण करते हैं और सूची तेज रोशनी तथा रंग ग्रहण करते हैं। अन्धेरे से उजाले में देखते हैं, तो प्रोटीन से रोडोप्सिन (Rhodopsin) संयुक्त (Combined) हो जाते हैं। विटामिन ए की थोड़ी-सी मात्रा नष्ट हो जाती है, पुन: रोडोप्सिन की भरपाई के लिए विटामिन ए की आवश्यकता पड़ती है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

यदि भोजन में विटामिन ए की मात्रा की प्राप्ति उचित प्रकार से शरीर में नहीं हो पाती तो रात्रि अन्धापन का रोग होने की सम्भावना रहती है। तीव्र या मध्यम प्रकाश में देखने के पश्चात् धुंधले प्रकाश में हमें कुछ समय तक चीजें दिखाई नहीं देतीं। यदि इस विटमिन की कमी अधिक हो तो यह समय काफी अधिक हो जाता है और कमी बढ़ने के साथ-साथ धीमी रोशनी में दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाता है।

2. जेरोफ्थालमिया (Zerophthalmia): इन रोग में अश्रु ग्रन्थियाँ ठीक प्रकार से काम नहीं करतीं। आँखों में शुष्कता (dryness) आ जाती है, जिससे खुजली का अनुभव होता है। आँखों में छोटी-छोटी फुन्सियाँ होकर पस पड़ने की सम्भावना रहती है। आँख का कॉर्निया (Cornea) वाला भाग शुष्क होकर पारदर्शी (Transparent) हो जाता है। आँख की गति में बाधा पहुँचती है।

ऐसी अवस्था में यदि विटामिन A की मात्रा की कमी अधिक बढ़ जाए तो अन्धापन आ जाता है। रोगाणु तीव्र गति से वृद्धि करने लगते हैं, क्योंकि अश्रु ही रोगाणुओं को आँख में प्रवेश नहीं करने देते हैं। संक्रमण के कारण कॉर्निया (काला भाग) में जख्म हो जाता है। आँख के सफेद भाग को ढकने वाली झिल्ली कनजक्टिवा (Conjuctiva) सूख जाती है तथा चमकहीन हो जाती है।

3.बीटोट्स बिन्द (Bitots Spot): कई बार जेरोफ्थाल्मिया के साथ-साथ बीटोट्स बिन्दु भी हो जाते हैं। विटामिन ए की कमी के कारण आँखों के भीतरी भाग की झिल्ली की पर्त पर भूरे अथवा सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। इनका आकार तिकोना होता है और ये कनजक्टिवा (Conjuctiva) से चिपक जाते हैं। कॉर्निया पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ निकल आती हैं। उनमें रस पैदा होने लगता है इसलिए पलकें चिपक जाती हैं। बीटोट्स नामक व्यक्ति ने इसके बारे में 1863 ई० में प्रथम बार बताया था।

4 .किराटामलेसिया (Keratamalacia): यह रोग की अन्तिम स्थिति है, कॉर्निया अपारदर्शक हो जाता है, रक्तवाहिनियाँ सम्पूर्ण कॉर्निया को घेर लेती हैं। कॉर्निया लाल होकर सूज जाती है और घाव हो जाता है। संक्रमण (infection) आसानी से हो सकता है। कॉर्निया नष्ट हो जाती है तथा आँखों की रोशनी समाप्त हो जाती है। अश्रु ग्रन्थि ठीक प्रकार से काम नहीं करती, आँखें शुष्क हो जाती हैं और खुजली का अनुभव होता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

5. टोड त्वचा (Toad skin): विटामिन ए की कमी होने पर त्वचा में बहुत से परिवर्तन आते हैं जैसे त्वचा शुष्क, खुरदरी और चितकबरी हो जाती है। विशेषकर कन्धों, पेट, पीठ, गर्दन आदि पर बड़े-बड़े चकते बन जाते हैं और यह मेंढक (Toad) की त्वचा के समान लगने लगती है।

6. अन्य परिवर्तन-नाक, गले, ट्रेकिया (Trachea), ब्रांकिस (Bronchis) की श्लेष्मिक झिल्ली सूख जाती है और उनमें रोगाणु के संक्रमण की आशंका बनी रहती है। पाचक रस कम मात्रा में स्रावित होते हैं तथा सभी पौष्टिक तत्त्वों के अवशोषण में रुकावट होती है।

प्रश्न 9.
विटामिन ‘ए’ के प्राप्ति साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
प्राप्ति साधन (Food Sources): विटामिन ए हल्के-पीले रंग का और कैरोटीन लाल-पीले रंग का होता है। कैरोटीन पशु जगत और वनस्पतियाँ दोनों में पाया जाता है। कैरोटीन हरी पत्तेदार सब्जियों में भी पाया जाता है परन्तु इनके हरे रंग में पीला रंग घुल जाता है। डालडा (घी) जो हाइड्रोजनीकरण क्रिया द्वारा तेल से बनता है, ऊपर से विटामिन ए मिलाया जाता है। पशुजन्य पदार्थों में मछली के यकृत के तेल में सर्वाधिक पाया जाता है। दूध, मक्खन, पनीर, दही, यकृत आदि में भी पाया जाता है।

विटामिन
दुध, मक्खन, पनीर, दही, डालडा घी, अण्डे की जर्दी, यकृत, कॉड मछली का तेल।

कैरोटीन
सूखी खुमानी, आडू, शकरकन्द, आम, गाजर, पालक, टमाटर, पोदीना, धनिया की पत्ती, चकन्दर की पत्ती, हरी मटर आदि।

यह उन सब्जियों व फलों में पाया जाता है जो पीले रंग के हों जैसे गाजर, टमाटर, कद्, शकरकन्द, आम, खुमानी, आडू और हरी पत्तेदार सब्जियाँ। फलों व तरकारियों को जितनी अधिक धूप मिलेगी, उतना ही अधिक कैरोटीन उनमें पाया जाएगा।

अति उत्तम साधन (Rich Source): मछली का तेल।
उत्तम साधन (Good Source): मक्खन, घी, अण्डा, दूध का पाउडर।
अच्छे साधन (Fair Source): गाय या भैंस का दूध।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

शरीर में अवशोषण (Utilization in the body): विटामिन ए के शोषण में लगभग 5 घण्टे लगते हैं। भोजन में विटामिन और कैरोटीन प्राप्त होते हैं। छोटी आंत की दीवारों में ही कैरोटीन विटामिन ए में परिवर्तित होता है। विटामिन ए वसा के माध्यम से शरीर में पहुँचता है। इसलिए इसके अवशोषण के साथ-साथ वसा का अवशोषण अनिवार्य है। आवश्यकता से अधिक विटामिन का 99% भाग यकृत में जमा हो जाता है। विटामिन ए का विसर्जन आँखों में व्यर्थ पदार्थ के साथ हो जाता है।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘डी’ के अभाव से होने वाली बीमारियों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms):
1. रिकेट्स (Rickets): यह रोग प्रायः पाँच वर्ष तक की आयु के बालकों को होता है। यह रोग भोजन में विटामिन डी, कैल्शियम या फॉस्फोरस लवण की कमी या सूर्य के प्रकाश की कमी के कारण होता है।

कारण:
1. कम या दोषपूर्ण भोजन, शैशवावस्था में डिब्बे के दूध का प्रयोग, ताजे दूध और वसायुक्त भोजन की कमी और माङयुक्त भोजन की अधिकता।
2. घर में अस्वस्थ वातावरण, ताजी शुद्ध वायु तथा सूर्य के प्रकाश की कमी।
3. यदि गुर्दो के कार्य में व्यवधान पहुंचता है तो गुर्दे से सम्बन्धित रोगों के कारण पेशाब के साथ फॉस्फोरस का विसर्जन बढ़ जाता है जिससे खून के फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है। इससे शरीर की वृद्धि रुक जाती है और अस्थियों (Bones) में विकृति देखने में आती है।

इसमें आँतों में वसा के शोषण की शक्ति नहीं रहती जिससे शरीर में कैल्शियम (Ca) तथा विटामिन डी के शोषण में बाधा होने के कारण अस्थियों का निर्माण नहीं हो पाता।

लक्षण (Symptoms): विटामिन डी की कमी से बालक की अस्थियों में कैल्शियम के एकत्र होने में व्याघात होता है। साधारणत: अस्थि में होने वाले परिवर्तन निम्नलिखित हैं –

1.चौकोर सिर-सिर की अस्थि-विकृत होकर चपटी और चौकोर हो जाती है और ललाट की अस्थि आवश्यकता से अधिक उभर जाती है।

2. कबूतरी वक्ष (Pigeon Chest): संधि-स्थल (Joints) से अस्थियाँ मोटी हो जाती हैं। पसली की अस्थियाँ (Ribs) छाती के दोनों ओर माला की तरह ढाँचा (Beaded Ribs) बना लेती हैं। फलस्वरूप कबूतर-सा सीना दिखाई देने लगता है।

3. झुका मेरुदण्ड (Spinal cord bends): मेरुदण्ड की अस्थि नर्म होकर लचक जाती है और कूबड़ (Kyphosis) निकल आता है, या मेरुदण्ड एक तरफ मुड़ जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

4. कोमल अस्थियाँ: अस्थियाँ कोमल होकर दबाव के कारण उनके टेढ़े और विकृत हो जाने का भय रहता है। जब बालक चलना आरम्भ करता है तो भार के कारण अस्थियाँ टेढ़ी हो जाती है। चपटे पैर, मोटे घुटने आदि विकृतियाँ इनके परिणाम हैं।

अन्य लक्षण (Other Symptoms):

  • बालक चिड़चिड़ा, थका व अप्रसन्न दिखाई देता है। मस्तिष्क पर पसीना आने लगता है। विशेषकर जब बच्चा सोता रहता है।
  • सामान्य अशक्तता और पीलापन-पेशियों का पूर्ण विकास नहीं होता और वे अशक्त रोगी हो जाते हैं। अस्थि बन्धन भी कमजोर पड़ जाते हैं, दूध के दाँतों के निकलने में देर होती है, और जब वे निकलते हैं तो आसानी से दूषित हो जाते हैं।
  • उभरा हुआ पेट-पाचनतन्त्र में भी गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है और पीले बदबूदार दस्त आने लगते हैं। कोमल तथा अशक्त पेशियों के परिणामस्वरूप पेट बाहर को निकल आता है।
  • रोग से बचने की शक्ति का कम हो जाना-जुकाम, खाँसी, शीघ्र ही हो जाते हैं और तरह-तरह के रोग सरलता से शरीर को जकड़ लेते हैं। विशेषकर फुफ्फुसों के रोग जैसे ब्रोन्काइटिस और निमोनिया आदि।

प्रश्न 11.
विटामिन डी के खाद्य स्रोत कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
विटामिन डी के स्रोत (Food Sources): विटामिन डी दो प्रकार से प्राप्त होता है –
1. विटामिन युक्त भोजन के खाने से।
2. चर्म द्वारा सूर्य की सीधी किरणें ग्रहण करने से।

1. यह केवल पशुजन्य भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। यह किसी तरकारी में पर्याप्त मात्रा में नहीं पाया जाता। इसकी प्राप्ति मक्खन, मछली के जिगर के तेल, कुछ मछलियों, माँस तथा अण्डे की जर्दी से होता है। दूध में यह बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है।
कुछ खाद्यों में विटामिन डी:
मछली का यकृत तेल।
कॉड यकृत तेल।
शार्क यकृत तेल।
अन्य भोज्य पदार्थ।
मछली, अण्डा, अण्डे का पीला भाग, मक्खन, घी, दूध।

2. यह विटामिन सबसे अधिक सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें में पाया जाता है। यह किरणें निकलते हुए सूर्य की किरणों में सबसे अधिक होती हैं। प्रातःकाल अपने शरीर पर किरणों को ग्रहण करने से शरीर में विटामिन डी पहुंचता है। चर्म की भीतरी तह में स्थित वसा में एक पदार्थ होता है, जिसे आर्गस्ट्रॉल (Ergasterol) कहते हैं। जब चर्म पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, तो वे वस्त्र की तह में प्रवेश कर जाती हैं और आर्गस्ट्रॉल को विटामिन डी में परिवर्तित कर देती हैं।

सूर्य के प्रकाश ग्रहण करने पर इस विटामिन की कमी को कुछ सीमा तक पूरा किया जा सकता है। यही कारण है कि घनीबस्ती वाले शहरों की अपेक्षा पहाड़ी स्थानों, समुद्र तट और गाँवों में रहने वाले व्यक्तियों के शरीर में विटामिन डी का निर्माण अधिक मात्रा में होता है। मुसलमान स्त्रियाँ बन्द अंधेरे कमरों में दिन व्यतीत करती हैं और बुरका पहनकर बाहर जाती हैं परिणामतः वे विटामिन डी के इस स्रोत के लाभ से वंचित रह जाती हैं।

अवशोषण (Absorption): यह चिकनाई में घुलनशील है, यह छोटी आंत से बहुधा वसा के साथ-साथ यकृत में पहुँचकर वहीं संगृहीत हो जाता है। इसका अधिकांश यकृत में और कम भाग अस्थियों, मस्तिष्क और त्वचा में जमा होता है। आवश्यकता होने पर इन भण्डारों से यह विटामिन रक्त में मिलकर सम्पूर्ण शरीर की कमी की पूर्ति करता है। दीर्घकाल तक इस संचित हुईं विटामिन पर निर्भर करना सम्भव नहीं। – पित्त रस (Bile) की उपस्थिति में स्निग्ध Lipid शोषण शीघ्र हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 12.
विटामिन ‘बी-1’ (थायमिन) की कमी से होने वाले रोग के बारे में बताइए।
उत्तर:
अभाव लक्षण (Deficiency Symptoms): थायमिन की कमी से बेरी-बेरी (Beri-Beri) रोग हो जाता है। प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों का मुख्य भोजन चावल है, वे अधिकांश इस रोग से ग्रस्त रहते हैं। इसका कारण है जो चावल खाते हैं, वह मशीन से साफ किया हुआ होता है जिसके कारण यह चावल थायमिन रहित हो जाता है। इसके अतिरिक्त खाद्य तत्त्वों की कमी के कारण, गरीबी, अत्यधिक शारीरिक परिश्रम, संक्रमण जनित रोग, ज्वर, पाचन-सम्बन्धी विकार, गलत आदतें आदि कारणों से इस विटामिन का अभाव हो सकता है व रोग के लक्षण सामने आते हैं।

थायमिन की बहुत कमी होने पर बेरी-बेरी नामक रोग हो जाता है। यह रोग तीन प्रकार का होता है –
1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri)।
2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri)।
(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri)।
(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri)।
3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri)

1. शैशव बेरी-बेरी (Infantile Beri-Beri): फिलीपाइन द्वीप समूह तथा जापान में सर्वप्रथम बच्चों में यह रोग देखा गया । रोग के लक्षण तीसरे व चौथे सप्ताह में प्रकट होते थे। भूख की कमी, वमन, पेशाब कम मात्रा में होना, अतिसार और कब्ज भी हो सकता है। परिणामतः बच्चा निर्बल और बेचैन हो जाता है और पीला पड़ जाता है, शरीर पर मुख्यतः चेहरे, हाथों और पैरों पर सूजन आ जाती है, हृदय दुर्बल हो जाता है। शिशु रोता हुआ प्रतीत होता है परन्तु रोने की आवाज नहीं आती है, सांस लेने में कठिनाई होती है। माँसपेशियाँ सख्त हो जाती हैं और शीघ्र ही ऐंठन से पीड़ित होकर मृत्यु हो सकती है।

2. वयस्क बेरी-बेरी (Adult Beri-Beri): इसके साधारणतः निम्नलिखित लक्षण हैं –

  • पोलीन्यूराइटिसिस (Polyneuritisis)।
  • ओडीमा (Oedema)।
  • दिल की धड़कन बढ़ जाना (Disturbances of the heart)।

(अ) सूखी बेरी-बेरी (Dry Beri-Beri): माँसपेशियों में सूजन आ जाती है। हाथों और पैरों में सनसनाहट, जलन तथा चैतन्य शून्यता आ जाती है, त्वचा में संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है, रोग के तीव्र रूप धारण कर लेने पर रोगी उठ-बैठ भी नहीं सकता और चल भी नहीं सकता। शुष्क बेरी-बेरी में ओडीमा की सम्भावना अधिक होती है।

(ब) गीली बेरी-बेरी (Wet Beri-Beri): सर्वप्रथम पैरों में सूजन आ जाती है। फिर समस्त शरीर में धीरे-धीरे सूजन आने लगती है। सूजन का कारण कोशिकाओं में जल-जमाव है। सूजा हुआ स्थान दबाने पर वहाँ गड्ढा-सा पड़ जाता है तथा थोड़ी देर पश्चात् वह फिर पहले की तरह हो जाता है । श्वास उथली व धड़कन की गति बढ़ जाती है, शरीर की वृद्धि रुक जाती है तथा शक्ति क्षीण होती जाती है। बेचैनी, वमन या पेचिस भी हो सकती है। सहसा हृदय की गति बन्द हो जाने के कारण मृत्यु भी हो सकती है।

3. एल्कोहलिक बेरी-बेरी (Alcoholic Beri-Beri): शराब का अधिक सेवन करने से भूख कम लगती है। विटामिन बी की हीनता हो जाती है जिससे बेरी-बेरी रोग हो जाता है। इस रोग के लक्षण प्रकट होने में साधारणत: दो से तीन महीने लग जाते हैं। प्रारम्भ में पाचन संस्थान संबंधी लक्षण प्रकट होते हैं-भूख न लगना, जी मिचलाना, वमन, पेट में अफारा, मलावरोध तथा दस्त आदि। बाद में रक्ताल्पता भी हो जाती है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 13.
विटामिन-‘बी1 (राइबोफ्लेविन) से होने वाले रोगों के बारे में बताइए।
उत्तर:
रोग के लक्षण (Effect of disease): प्रयोगों द्वारा ज्ञात हो गया है कि राइबोफ्लेविन के अभाव में व्यक्ति दुर्बल तथा वृद्ध जैसा दिखाई देने लगता है। यौवन का विकास अवरुद्ध हो जाता है। भोजन करने की इच्छा नष्ट हो जाती है तथा पाचन-शक्ति क्षीण हो जाती है, व्यक्ति अनेक चर्म और नेत्र रोगों का शिकार हो जाता है।

आँखों (Eyes) में-इसके अभाव में कॉर्निया (Cornea) के चारों ओर ललाई पैदा हो जाती है, आँखों में से पानी बहने लगता है, रोशनी अच्छी नहीं लगती। धीरे-धीरे ललाई बढ़ने लगती है और कॉर्निया पर छोटी-छोटी रक्त कोशिकाओं (Capillaries) का फैलाव होने लगता है। हमारे शरीर में कॉर्निया व आँख के लेंस ही ऐसे ऊतक हैं, जिन्हें अपने पोषण के लिए रक्त की आवश्यकता नहीं होती। अतः इनको पोषक तत्त्व अश्रु ग्रन्थि के स्राव ही से प्राप्त होते हैं।

अश्रुस्राव से पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शरीर की बचाव शक्ति कम हो जाती है। स्वाभाविक तौर पर कॉर्निया को समुचित पोषण प्राप्त कराने के लिए उसके चारों ओर अतिरिक्त रक्त कोशिकाओं का जाल बिछने लगता है और इसी कारण आँख में ललाई, रेतीले कणों के गिरने का सा आभास आदि होने लगता है। पलकें खुरदरी रहती हैं और दृष्टि भी अस्पष्ट होने लगती है।

मुँह (Mouth)पर: होठों के मिलन स्थान पर कटाव होने लगता है। होठों पर सफेद दाग पड़ने लगते हैं, जैसे-कीलोसिस (Cheilosis)। जिह्वा की सतह पर दरारें पड़ जाती हैं और उसमें जलन व दर्द होता रहता है। जुबान का रंग बैंगनी लाल-सा हो जाता है। भोजन खाने पर जीभ में पीड़ा तथा जलन होती है। अन्त में जुबान से श्लैष्मिक झिल्ली हट जाती है। इस अवस्था को ज्योग्रेफिकल रंग कहते हैं।

त्वचा (Skin)पर: त्वचा स्वस्थ नहीं रहती। खुजली, काले दाग व एक प्रकार का त्वकशोध (Dermatitis) होता है जिसमें से पानी निकलता रहता है। ऐसे त्वकशोध ललाट, नाक के दोनों ओर तथा बगल आदि पर होते हैं जिनमें खुजली होने लगती है।

प्राप्ति साधन (Food Sources): कुछ राइबोफ्लेविन आँतों में भी निर्मित होता है। यह विटामिन बहुत से प्राणिज और वानस्पतिक भोज्य पदार्थों में पाया जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

विभिन्न भोज्य पदार्थों में उपस्थितिः अति उत्तम स्रोत: यकृत (Liver), अण्डे का पाउडर (Egg powder), शुष्क खमीर (Yeast), दूध का पाउडर। उत्तम स्त्रोत: दूध, मछली, अण्डा, साबुत अन्न, मांस, फलियाँ, हरी पत्तेदार सब्जी। सामान्य स्रोत: मिल का अन्न, मूलकन्द, अन्य शाकसब्बी। दूध इस विटामिन का अच्छा साधन है परन्तु मक्खन व घी में यह विटामिन नहीं होता यह पानी में घुलनशील है और छाछ में रह जाता है।

शरीर में अवशोषण (Absorption in the body): इसके अवशोषण के लिए अमाशय में पाया जाने वाला आमाशयिक अम्ल विद्यमान होना अनिवार्य है। इसका शोषण आँतों में होता है, विटामिन का अधिकांश हृदय यकृत में संगृहीत होता है, शेष भाग का संग्रह रक्त तथा तन्तु कोषों में होता है। राइबोफ्लेविन के संग्रह की प्रतिक्रिया भोजन में पैटोथोनिक अम्ल तथा विटामिन बी, की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इसकी संगृहीत मात्रा एक निश्चित मात्रा से अधिक नहीं हो सकती है। मूत्र के माध्यम से यह शरीर से निष्कासित हो जाती है।

प्रश्न 14.
विटामिन सी के कार्य लिखें।
उत्तर:
कार्य (Functions):

  1. कोलेगन (Collagen) का निर्माण-कोलेगन (Collagen) का निर्माण एवं उसे उचित अवस्था में रखने का कार्य विटामिन सी का ही है। कोलेगन शरीर में बनाने वाले कोषों को पारस्परिक सम्बद्ध करने का साधन है। यह लम्बी हड्डियों के सिरे तथा दाँत के भीतर सीमेंट वाला भाग बनाता है। साधारण कोषों के बन्धक तन्तुओं को कोलेगन की आवश्यकता है। यह जख्म को भरने का भी कार्य करता है। विटामिन सी के अभाव में जख्म देर से भरता है।
  2. अमीनो अम्ल (Amino Acid) जैसे फिनाइल एलानिन व टाइरोसीन (Alanine & Tyrosin) का ऑक्सीकरण करने में सहायक होता है।
  3. लोहे (Iron) व कैल्शियम के अवशोषण कराने में सहायक होता है।
  4. एड्रिनल व थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) का स्राव बढ़ाने और अन्य ग्रन्थियों के हारमोन्स (Hormones) पैदा कराने में सहायक होता है। .
  5. रक्त धमनियों की भीतरी भित्तियों पर कोलेस्टेरॉल के जमाव को रोकता है।
  6. त्वचा प्रतिरोपण (Skin Grafting) की सफलता में अत्यधिक सहायक होता है।
  7. नाक, गले व सांस नलिकाओं की कोशिकाओं को दृढ़ता प्रदान करता है जिससे बार-बार नजला, जुकाम, खाँसी आदि न हों।
  8. यह विटामिन अस्थियों के स्वरूप, विकास और निर्माण के लिए अत्यन्त आवश्यक है। स्कर्वी रोग में अस्थियों के अन्तिम सिरे प्रभावित होते हैं।
  9. इसके अभाव में पुराने भरे हुए घावों के पुनः खुल जाने की सम्भावना रहती है।
  10. दाँतों को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है। यह दाँतों के निर्माण एवं विकास में भी सहायता करता है।
  11. यह विटामिन मनुष्य को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

प्रश्न 15.
जल में घुलनशील विटामिनों की प्राप्ति, आवश्यकता एवं प्रभाव के परिणाम लिखें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 14

प्रश्न 16.
कैल्शियम के कार्य विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
कैल्शियम के कार्य (Functions of Calcium)
1. फॉस्फोरस के साथ हड्डियाँ बनाने, बढ़ाने और ठोस व दृढ़ करने में काम आता है।

2. दाँतों की रचना में भी यह ऐसी ही भूमिका निभाता है।

3. शरीर वृद्धि कराता है। हड्डियों में जब वृद्धि होती है तो स्वाभाविक है कि शरीर वृद्धि भी हो।

4. सोडियम, पोटैशियम व मैग्नीशियम के साथ माँसपेशियों में संकुचन (Contraction) पैदा करता है, जिससे हमारे हाथ, पाँव, गर्दन, कमर व अन्य सभी अंग कार्य कर सकते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

5. आन्तरिक ग्रन्थियों के स्राव-निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है और एन्जाइम्स निर्माण में भी सहायक का कार्य करता है।

6. कोशिका झिल्ली की पारगम्यता पैदा करने में सहायक होता है।

7. रक्त का थक्के के रूप में जमना-रक्त में पायी जाने वाली सीरम में 100 मिली लीटर रक्त में 10 ग्राम कैल्शियम पाया जाता है। रक्त थक्के के रूप में परिवर्तित होने के लिए फाइब्रिन को फाइब्रीनोजन में बदलना पड़ता है।

इस परिवर्तन के लिए थ्रॉम्बिन एन्जाइम की आवश्यकता पडती है। यह थ्रॉम्बिन एन्जाइम प्रोथ्राम्बिन (Prothrombin) के रूप में निष्क्रिय दशा (Inactive Form) में रक्त में पाया जाता है। प्रोथ्राम्बिन को थ्रॉम्बिन में बदलने की क्रिया के लिए कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है।

8. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त हो तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स कहते हैं।

9. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है। इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाती हैं। इस दशा को आस्टोमलेश्यिा (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होता है।

10. दाँत सुडौलता रहित और कमजोर हो जाते हैं।

11. रक्त जमने में अधिक समय लगता है।

12. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

13. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 17.
कैल्शियम प्राप्ति के कौन-कौन-से साधन हैं ?
उत्तर:
कैल्शियम के साधन (Sources of Calcium): कैल्शियम की प्राप्ति निम्न वस्तुओं से होती है :

  • दूध और दूध से बनी चीजों में कैल्शियम पाया जाता है, क्योंकि दूध में कैल्शियम अकार्बनिक लवण के रूप में मिलता है।
  • यह अण्डे विशेषकर अण्डे की जर्दी वाले भाग में उपस्थित रहता है।
  • हरी पत्तीदार तरकारियों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। पालक में आक्जेलिक अम्ल की मात्रा . अधिक होने से शरीर में कैल्शियम का शोषण नहीं हो पाता है।
  • कुछ मछलियों में भी कैल्शियम पाया जाता है। .. 5. सूखे फलों, मेवों जैसे बादाम गिरी में भी यह लवण उपस्थित रहता है।
  • दालों में थोड़ी मात्रा में पाया जाता है लेकिन तेल निकालने वाले बीजों में यह काफी मात्रा में पाया जाता है।
  • कुछ मात्रा में अनाजों द्वारा भी प्राप्त होता है। इनमें से रागी उत्तम साधन है।
  • अम्ल और क्षार की मात्रा को शरीर में एक-सा बनाए रखने का कार्य कैल्शियम करता है। शरीर में क्षार की मात्रा में वृद्धि हो जाने से अपच हो जाती है।

प्रश्न 18.
कैल्शियम की कमी से हानियाँ बताइए।
उत्तर:
कैल्शियम की कमी से हानि (Effect of Calcium deficiency):

1. कैल्शियम की कमी से शरीर छोटा रह जाता है।

2. हड्डियों का कैल्सीकरण अपूर्ण रहता है, जिसके फलस्वरूप वे निर्बल व लचकदार रहती हैं।

3. बचपन में यदि कैल्शियम उचित मात्रा में नहीं प्राप्त होत तो प्रायः टाँगें कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस स्थिति को रिकेट्स (Rickets) कहते हैं।

4. गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में कैल्शियम की माँग बढ़ जाती है। जब इसकी आवश्यकता की पूर्ति भोज्य पदार्थों द्वारा नहीं हो पाती तो इनकी पूर्ति के लिए गर्भवती तथा दूध पिलाती माँ की अस्थियों में से कैल्शियम का प्रत्याहरण होने लगता है। बच्चा अपने शरीर की वृद्धि के लिए कैल्शियम की आवश्यकता की पूर्ति माँ के शरीर में से कर लेता है।

इससे माँ की अस्थियाँ कमजोर व कोमल पड़ जाती हैं और जरा-सा धक्का लगने से अस्थियों के टूटने की सम्भावना रहती है। ये टूटी हुई अस्थियाँ आसानी से जुड़ नहीं पाता । इसी दशा को आस्टोमलेशिया (Osteomalacia) कहते हैं। यह रोग प्रायः गर्भावस्था तथा दुग्धपान की अवस्था में होती है।

5. दाँत सुडौलतारहित और कमजोर हो जाते हैं।

6. रक्त ‘जमने में अधिक समय लगता है।

7. स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

8. जब व्यक्ति अधिक आयु का हो जाता है तथा उसके आहार में वर्षों से कैल्शियम की कमी हो तो उसकी अस्थियों में से निरन्तर कैल्शियम खिंचने के कारण अस्थियों में छिद्र हो जाते हैं। इस रोग को आस्टिओपोरोसिस (Osteoporosis) कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 19.
शरीर में लोहे के कार्य लिखें।
उत्तर:
शरीर में लोहे के कार्य (Functions of iron in the body) :

  • यह रक्त में पाए जाने वाले तत्त्व हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है। जब रक्त की लाल रक्त कणिकाओं में हीमोग्लोबिन समुचित मात्रा में होता है तब वह वांछित मात्रा में ऑक्सीजन अवशोषित कर कोशिकाओं में पहुँचाता है और कार्बनडाइऑक्साइड को शरीर के बार निकालता है
  • यह मांसपेशियों (Muscles) में पाए जाने वाले तत्त्व मायोग्लोबिन (Myoglobin) का आवश्यक तत्त्व है। मायोग्लोबिन में 3% लोहा रहता है।
  • लोहा प्रत्येक कोष में उपस्थित क्रोमेटीन पदार्थ का एक आवश्यक तत्त्व है।
  • शरीर में पाए जाने वाले कुछ एन्जाइम का लोहा एक आवश्यक भाग है।
  • लोहा तन्तुओं के ऑक्सीकरण (Oxidation) तथा कटौती (Reduction) की क्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में भाग लेता है।

प्रश्न 20.
आयोडीन (Iodine) के शरीर में क्या कार्य हैं ?
उत्तर:
आयोडीन के कार्य (Functions of Iodine):

  • मनुष्यों के उचित शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए थाइरॉक्सिन (Thyroxin) अनिवार्य है। शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland) में ये हारमोन न निकलने पर शारीरिक और मानसिक विकास की गति में बाधा पहुँचती है।
  • शरीर के कोषों में होने वाली ऑक्सीकरण की क्रिया की दर को थाइरॉक्सिन प्रभावित करता है। थाइरॉक्सिन आवश्यकता से अधिक निकलने पर शक्ति की दर की गति बढ़ जाती है जिससे शरीर दुबला हो जाता है। इसके विपरीत जब थाइरॉक्सिन शारीरिक आवश्यकतानुसार थाइराइड ग्रन्थि में से नहीं निकलता तो शक्ति उपापचयन की दर की गति कम हो जाती है। अतः शरीर मोटा हो जाता है।
  • मनुष्यों और जानवरों की सन्तानोत्पादन शक्ति के लिए आयोडीन आवश्यक है।
  • आयोडीन की कमी से बालों की वृद्धि नहीं हो पाती अथवा बाल उगते ही नहीं।
  • आयोडीन के अभाव से प्रौढ़ व्यक्ति भी प्रभावित हो जाते हैं। वे सुस्त हो जाते हैं। उनके हाथ-पाँव सूज जाते हैं।

प्रश्न 21.
आयोडीन की कमी से होने वाले रोग के बारे में लिखें।
उत्तर:
रोग (Diseases):
1. गलगण्ड (Goiter): आयोडीन की आवश्यकता शरीर में स्थित थायराइड ग्रन्थि (Thyroid Gland) की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए होती है। इस ग्रन्थि से थायरॉक्सिन नामक हारमोन्स स्रावित होता है। शरीर में आयोडीन की कमी से यह हारमोन स्रावित होना बन्द हो जाता है और गले में घेघा निकल आता है, जिसे घेघा रोग कहते हैं। यह स्थिति अधिकतर किशोरावस्था या वयस्क महिलाओं में ही होती है। थायराइड ग्रन्थि का औसत वजन 25 ग्राम होता है, वह रोग की अवस्था में बढ़कर 200 से 500 ग्राम भी हो सकता है। घेघा बढ़ने पर यह दूर से ही दिख जाता है।

2. क्रोटिन (Cretinism): आयोडीन की कमी से बच्चों को क्रोटीन अथवा बौनापन (Cretinism) का रोग हो जाता है। बच्चों की वृद्धि, शारीरिक एवं मानसिक विकास रुक जाता है। त्वचा. मोटी और खुरदरी हो जाती है। चेहरे और समस्त शरीर में सूजन आ जाती है, त्वचा कार्य म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) गृह विज्ञान, वर्ग-119135 में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, चेहरे का भाव बिगड़ जाता है, जबान बड़ी हो जाती है, होंठ मोटे हो जाते हैं, यहाँ तक कि ऐसी अवस्था में होठों का बन्द करना भी कठिन होता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

बच्चों की तरह बड़ों को मिक्सोडीमा (Myxoedema) का रोग हो जाता है। चेहरा भावहीन हो जाता है, हाथ-पाँव तथा चेहरे में सूजन आ जाती है। रोगी आलसी तथा सुस्त हो जाता है। आयोडीन की कमी से शरीर व दिमाग में और भी कई खराबियाँ पैदा हो सकती हैं जिनमें कुछ मामूली होती हैं तो कुछ खतरनाक जैसे, मानसिक विकृति, बहरा, गूंगापन, ठीक से खड़े न होना आदि।

प्रश्न 22.
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोग कौन से हैं?
उत्तर:
विभिन्न पोषक तत्त्वों की प्राप्ति के स्रोत, कार्य तथा कमी से होने वाले रोगपोषक तत्त्व | प्राप्ति स्रोत कमी से होने वाले रोग
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 23.
विभिन्न खाद्य वर्ग कौन-कौन से हैं वर्णन करें? [B.M. 2009 A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा के आधार पर उन्हें विभिन्न वर्ग में बाँटा गया है। जो निम्न प्रकार हैं-

  1. वर्ग-खाद्यान्न, अनाज-गेहूँ चावल, ज्वार बाजरा मक्का रागी एवं
  2. वर्ग-दाल एवं मेवा फलियाँ-सभी प्रकार की साबुत एवं घुली जाने तथा फलिया सूखी मेवा, मूंगफली, तिल बादाम इत्यादि।
  3. वर्ग-दूध और माँस-दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे पनीर, खोया, दही। मांस, मछली, अंडा।
  4.  वर्ग-फल और सब्जियाँ-फल विभिन्न प्रकार के विटामिन ‘ए’ एवं विटामिन ‘सी’ भरपूर होते हैं। सब्जियों को तीन भाग में बाँटा जा सकता है।
    (a) हरी पत्तेदार सब्जियाँ,
    (b) गहरी पीली एवं लाल सब्जियाँ,
    (c) जड़ वाली सब्जियाँ
  5.  वर्ग-चीनी और वसा-चीनी, शक्कर, गुड़, वसा, घी, तेल, मक्खन।

वर्ग 1 – कार्बोज शक्ति प्राप्त करने का सबसे उत्तम साधन है।
वर्ग 2 – प्रोटीन प्राप्ति का वानस्पतिक साधन है। दालों में 40 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। मेवे से प्राप्त प्रोटीन उत्तम कोटि का होता है।
वर्ग 3 – पशु से पाये जाने वाले प्रोटीन के आधार पर, बनाया गया है। इस वर्ग से प्राप्त प्रोटीन उत्तम श्रेणी का है । अंडा से प्राप्त प्रोटीन को ‘ए’ ग्रेड का प्रोटीन माना गया है।।
वर्ग 4 – फल इनसे विटामिन खनिज लवण पाया जाता है। सब्जियाँ इनसे विटामिन ‘ए’ बी तथा सी से प्राप्त किया जा सकता है । जड़ वाली सब्जियाँ में कार्बन अधिक पाया जाता है। इनमें विटामिन एवं खनिज लवण कम होता है।
वर्ग 5 – इस वर्ग के खाद्य समूह से ऊर्जा प्राप्त होती है। गुड़ से लौह तत्त्व प्राप्त होता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

प्रश्न 24.
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
भोज्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting selection of food)-उत्तम पोषण का महत्त्वपूर्ण आधार विभिन्न भोज्य पदार्थों का चुनाव होता है। अतः आहार में ऐसे भोज्य पदार्थों का समावेश आवश्यक है जो परिवार की पौष्टिक आवश्यकताओं के साथ-साथ पूर्ण सन्तुष्टि भी प्रदान कर सकें। किन्हीं दो परिवारों का आहार समान नहीं होता। भिन्न प्रान्तों, देश-विदेश में यह अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है। विभिन्न परिवारों की आहार-सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भिन्न खाद्य पदार्थों का चयन इसका एक प्रमुख कारण है।

यह चयन कई कारकों पर आधारित है, जो निम्न हैं –
1. परिवार के आहार सम्बन्धी मूल्य (Family Food Values): किसी खाद्य पदार्थ को अपने आहार में सम्मिलित करना न करना परिवार के आहार-सम्बन्धी मूल्यों पर आधारित होता है। आहार-सम्बन्धी मूल्य भौगोलिक स्थिति या जलवायु, धार्मिक विश्वास, परम्परा, दूसरों की नकल आदि के कारण बनते हैं। उदाहरणार्थ किसी प्रान्त में अनाज यदि जलवायु उत्तम होने से काफी मात्रा में पैदा होता है तो वहाँ रहने वाले लोगों को शाकाहारी भोजन (अनाज) से लगाव हो जाता है।

इसमें भी यदि गेहूँ अधिक होता है तो रोटी खाने की आदत पड़ जाती है, जैसे पंजाबियों में । आदिवासी तथा बंगाली इलाकों में मांस, मछली, शराब आदि की ओर लोगों का अधिक झुकाव रहता है। दक्षिण में चावल अधिक खाया जाता है। प्रत्येक परिवार की जीवन-शैली (Life-style) भी भिन्न होती है जो आहार-सम्बन्धी मूल्यों को प्रभावित करती है। जैसे एक दिन में खाए जाने वाले आहारों की संख्या व समय । किसी परिवार में तीन समय भोजन पकता है तो किसी में दो समय । यह मूल्य किसी भी परिवार के शाकाहारी या मांसाहारी होने को भी प्रभावित करते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

2. खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Food Stuffs): बहुत से खाद्य पदार्थों, विशेषकर फल और सब्जियों की उपलब्धता मौसम पर निर्भर करती है। मौसमी चीजें सस्ती होती हैं और पौष्टिक भी। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी, साग, शलगम आदि अधिक मात्रा में मिलते हैं तो गर्मियों में घीया, तोरी, पेठा, अरबी, टिंडा, शिमला मिर्च, करेले आदि। मौसम के अतिरिक्त स्थानीय उपज का प्रभाव भी खाद्य पदार्थों के चयन पर पड़ता है।

यह पदार्थ सस्ते, स्वादयुक्त और जलवायु के अनुकूल होते हैं। उदाहरणार्थ तटवर्ती क्षेत्रों में मछली तथा अन्य समुद्री पदार्थ आसानी से और सस्ते मिल जाते हैं। इसलिए यह इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के आहार का मुख्य अंग बन जाते हैं। आज यातायात के साधनों में वृद्धि, उचित संरक्षण और संग्रह के तरीकों के कारण खाद्य पदार्थों की उपलब्धि हर जगह काफी बढ़ गई है।

3. क्रय शक्ति (Purchasing Power): भोज्य पदार्थों का चुनाव उन्हें खरीदने की सामर्थ्य पर काफी हद तक निर्भर करता है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति खाद्य पदार्थों चाहे वह मौसम के हों या बिना मौसम के, स्थानीय हों या अन्य प्रान्तों के, में से अपनी पसन्द के खाद्य पदार्थों का चयन कर सकता है, परन्तु निम्न आय वर्ग वाले व्यक्ति अपने भोजन में अधिक महँगे खाद्य पदार्थ सम्मिलित नहीं कर सकते, जैसे-दूध, मांस, फल आदि। इसलिए उन्हें ऐसे उपाय अपनाना आवश्यक है जिनसे कम कीमत में पौष्टिक आहार की प्राप्ति हो सके, जैसे-चीनी के स्थान पर गुड़, बादाम के स्थान पर मूंगफली का प्रयोग करना।

4. मिथ्या धारणाएँ: भोजन सम्बन्धी अन्ध-विश्वास कुछ ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जो गलत होती हैं । खाद्य पदार्थों का पोषक तत्त्वों के बारे में अज्ञानता के कारण विकास होता है। परम्परा से चले आए विश्वासों के कारण बातें अभी भी मान्य हैं। उदाहरणार्थ मछली खाने के बाद दूध पीने से चर्म रोग हो जाता है, चावल खाने से मोटापा बढ़ता है, सर्दी को भोजन से और बुखार को भूख से ठीक किया जा सकता है आदि। इस तरह की मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसके कारण हम भोजन का पूरा लाभ नहीं उठा पाते।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

5. संस्कृति (Culture): खाद्य पदार्थों का चयन धर्म, जाति व संस्कृति से प्रभावित होता है। जैसे पंजाबी के भोजन में मक्की की रोटी और साग, बंगाली के भोजन में चावल, मछली, दक्षिण भारतीय भोजन में सांभर, इडली आदि का अपना एक विशिष्ट स्थान है। – भोज्य पदार्थों की स्वीकृति में धर्म भी अपनी विशेष भूमिका निभाता है। जैसे कुछ सम्प्रदायों में मांसाहारी खाद्य पदार्थ खाने की सख्त पाबंदी है। कुछ में लहसुन, प्याज खाना मना है। इस्लाम धर्म में लोग सूअर का मांस नहीं खाते, हिन्दू धर्म में गौ का मांस नहीं खाते । धार्मिक त्योहारों पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। शुभ अवसरों पर कुछ मीठा बनाया जाता है आदि।

6. समवयस्कों या मित्रों का प्रभाव (Peer Group): भोजन के विषय में मित्रों और जान-पहचान वाले लोगों की स्वीकृति बहुत महत्त्व रखती है, विशेष रूप से किशोरों के लिए। कई खाद्य पदार्थ व्यक्ति केवल इसलिए खाता है क्योंकि उसके साथी खाते हैं। जैसे आजकल किशारों में अनुपयोगी व्यंजन (Junk goods), जल्द तैयार किये जाने वाले व्यंजन (Fast Foods), जैसे-पिज्जा, नूडल्ज आदि खाये जाते हैं।

मित्रगणों के प्रभाव से व्यक्ति दूसरे प्रान्तों, दूसरे देशों के लोगों द्वारा खाये जाने वाले खाद्य पदार्थ भी अपने आहार में शामिल कर लेते हैं। उत्तर भारत में इडली, डोसा, सांभर का अधिक प्रचलन तथा मांसाहारी व्यक्ति का शाकाहारी और शाकाहारी व्यक्ति का मांसाहारी हो जाना इसके उदाहरण हैं।

6. संचार माध्यम (Media): टी.वी., रेडियो, फिल्म, समाचार-पत्र, गोष्ठियों आदि के माध्यम से पोषण-सम्बन्धी जानकारी आम जनता तक पहुँचाई जाती है। लोग, विशेष रूप से गृहिणियाँ इन्हें पढ़ती, सुनती या देखती हैं। उनके ऊपर इनका काफी प्रभाव देखने को मिलता है। वह अपने परिवार के पोषण स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास करती हैं और उत्तम पोषक पदार्थों को अपने आहार में शामिल करती हैं।

इन संचार माध्यमों का कई बार विपरीत प्रभाव भी देखने को मिलता है। आकर्षित विज्ञापनों से प्रभावित होकर कई बार बच्चे, किशोर आदि अपने आहार में उन वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, जिनसे लाभ न होकर केवल धन का अपव्यय ही होता है। जैसे ठण्डे पेय पदार्थ (Soft Drinks), नूडल्स (Noodles), टॉफी और चॉकलेट आदि।

प्रश्न 25.
संतुलित आहार किसे कहते हैं ? भिन्न-भिन्न खाद्य वर्गों का भोजन में क्या योगदान है ?
उत्तर:
संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्त्व-कार्बोज, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन और जल उचित मात्रा में प्राप्त हों । आहार मनुष्य की केवल भूख ही नहीं मिटता बल्कि उसे पूर्णतः स्वस्थ, नीरोग एवं पुष्ट बनाए रखता है। इसके अतिरिक्त कुछ अधिक पोषक तत्त्व भी शरीर को मिलते हैं जो आपातकाल में प्रयोग किए जाते हैं। परिभाषा के अनुसार, संतुलित भोजन अधिक पोषक तत्त्व एकत्र कर देता है ताकि कभी-कभी असंतुलित भोजन का प्रभाव न पड़े।

खाद्य वर्ग (Food Groups): भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने खाद्य पदार्थों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा है :
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन
वर्ग 1. खाद्यान्न, अनाज और इसके उत्पाद (Cereals, grains and its products): अनाज कई प्रकार का होता है तथा गुणवत्ता और पसंद के अनुसार चुना जा सकता है। भारत में आमतौर से प्रयोगों में आने वाले अनाज गेहूँ, चावल, रागी, ज्वार और बाजरा हैं। खाद्यान्न में तीन हिस्से हैं, जैसे भूसा, बीज और भ्रूणपोष। अधिकतर भोजमों में खाद्यान्न की मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार यह भोजन में कैलोरी देने वाला मुख्य साधन है। – खाद्यान्नों में अलग-अलग प्रोटीन की मात्रा होती है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

आमतौर पर प्रयोग में लिये जाने वाले खाद्यान्नों की प्रोटीन निम्नलिखित हैं –
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 20
खाद्यान्नों के प्रोटीन शारीरिक क्रिया के लिए उत्तम नहीं हैं क्योंकि उनमें लाइसिन, मिथियोनिन, ट्रिप्टोफन और थ्रीओनिन जैसे अमीनो अम्ल बहुत कम होते हैं। खाद्यान्न की प्रोटीन मात्रा सुधर जाती है जब इनको प्रोटीनयुक्त खाद्यों के साथ मिलाया जाए, जैसे चावल और दाल, चावल और मांस या रोटी और दाल इत्यादि। खाद्यान्नों से काफी मात्रा में खनिज लवण मिल जाते हैं। हड्डियों और दांतों को स्वस्थ रखने के लिए ये कैल्शियम और फॉस्फोरस देते हैं। रागी तो कैल्शियम का भरपूर स्रोत है। हर 100 ग्राम वाले खाने के हिस्से में 344 मि० ग्राम कैल्शियम होता है।

बाजरा में लोहा होता है तथा अक्सर भोजन में लेने से लाभदायक सिद्ध हो सकता है। खाद्यान्न में विटामिन A और C की कमी होती है। पीली मक्की में कैरोटीन होती है। खाद्यान्नों को अंकुरित करने से उनमें विटामिन सी की मात्रा बढ़ जाती है। भूसी और बीज में बी-समूह के विटामिन काफी मात्रा में होते हैं। खाद्यान्नों को दलने, पालिश करने से बी-समूह के विटामिन नष्ट हो जाते हैं। सेला करते समय विटामिन अंदर के हिस्से में चला जाता है तथा दलने के समय अधिक विटामिन नष्ट नहीं होता। भूसी रूक्षांश देता है जो शरीर के उपापचय क्रिया में सहायक होता है।

कुछ कंदमूल हैं-आलू, शकरकंद, टपायका, जिमीकंद और कचालू। ये सभी स्टार्चयुक्त खाद्य आसानी से पच जाते हैं। ताप उसकी रासायनिक संरचना बदल देता है। स्वाद व आकार भी बदल जाता है। कंद और मूल कुछ समय के लिए खाद्यान्न का स्थान ले सकते हैं। भगवान राम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान कंद-मूल-फल खाकर ही जिये थे। यहां पर कन्द का अर्थ है टपायका, यह केरल में अधिक मात्रा में उगता है तथा इसमें स्टार्च और कैलोरी की मात्रा भरपूर होती है। आलू सबसे सामान्य कंद-मूल है तथा विश्व भर में लोग इसे पसन्द करते हैं। भोजन की अधिकांश कैलोरी इसी वर्ग में पायी जाती है।

वर्ग – 2. दालें और फलियाँ (Pulses and Legumes): दालों के प्रोटीन स्तर में तथा मात्रा में खाद्यान्न की प्रोटीन से बेहतर होती है। दालों में मिथिओनीन अमीनो अम्ल की कमी होती है। अरहर में तो ट्रिपटोफन भी कम होती है। जब दालों को खाद्यान्नों के साथ खाया जाता है तो इनका पौष्टिक स्तर बढ़ जाता है। लगभग 40 प्रतिशत दालों में थायमिन और फोलिक अम्ल जैसे विटामिन काफी मात्रा में पाए जाते हैं। चीनी लोग सोयाबीन की कई प्रकार की चटनी तथा पेस्ट प्रयोग करते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

सोयाबीन की थोड़ी मात्रा भी शारीरिक क्रिया के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो सकती है। दालों में विटामिन C की कमी होती है। अंकुरित करने से दालों में विटामिन C की मात्रा बढ़ जाती है तथा उनका आकार बदल जाता है, पाचन क्षमता सहज हो जाती है तथा लोहा और बी-समूह के विटामिन’ भी बढ़ जाते हैं। गिरियां और तेल के बीज वसा और प्रोटीन की मात्रा से भरपूर होते हैं । गिरियों में से वसा निकल जाने के बाद प्रोटीन अधिक हो जाते हैं। यह वर्ग मरम्मत के लिए प्रोटीन देते हैं। यह प्रोटीन के सस्ते स्रोत हैं।

वर्ग – 3. दूध और मांस के उत्पाद (Milk and Meat Products): स्तनधारियों के दूध लैक्टोज, लैक्टलबूमिन और लैक्टोग्लोबिन की मात्रा से भरपूर होते हैं । दूध में सारे आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं। इसीलिए इसे पूर्ण आहार कहा जाता है। दूध में विटामिन सी और लोहा कम होता है । लैक्टोज कम मीठा तो होता है, किन्तु लैक्टिक अम्ल जीवाणु की वृद्धि में भी सहायक है। इस प्रकार रोगग्रस्त जीवाणु की वृद्धि को यह रोकता है। दूध से बी-समूह के विटामिन अच्छी मात्रा में मिल जाते हैं विशेषकर थायमिन, राइबोफ्लेविन और पायरीडोक्सिन। बी-समूह के विटामिन रोशनी में नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए यह अच्छी आदत है कि दूध को साफ, ठंडे, ढके हुए और अंधेरी जगह में रखा जाए। आप अपनी आवश्यकता के अनुसार सम्पूर्ण क्रीमयुक्त, मानक और टोन्ड दूध ले सकते हैं। उपभोग के लिए पाश्चुराइज्ड या मानकीकृत दूध लेना सुरक्षित है। दही-दूध को ‘जमने’ के लिए थोड़ी दही डालकर कमरे के ताप पर 4-12 घंटे तक रखने से दही बन जाता है। दही किसी भी प्रकार के दूध से बनाया जा सकता है। पाउडर से दूध बनाकर उसकी दही बना सकते हैं। दही को मथने से मक्खन बनाया जा सकता है। मक्खन दूध की अपेक्षा आसानी से पच जाता है। पनीर-दूध को दही, नींबू जूस, सिरका या सिट्रिक अम्ल से क्रिया करके पनीर प्राप्त होता है।

पनीर अवक्षेपित प्रोटीन है तथा इसमें वसा और लैक्टोज लगभग बिल्कुल नहीं होता। पनीर को पचाने की आवश्यकता नहीं होती तथा वह आसानी से पच जाता है। पनीर निकलने के बाद बचे हुए तरल को दही का पानी या छाछ (Whey) कहते हैं। छाछ में खनिज लवणों व दूध की वसा की भरपूर मात्रा होती है। इससे करी या ग्रेवी बनाना अच्छा तरीका है। प्रोसेस्ड पनीर वह पनीर है जो सन्तुलित अवस्था में बनाया जाता है। प्रोसेस्ड पनीर में पनीर से अधिक मात्रा में वसा होती है। इसलिए मोटे व्यक्तियों को इससे परहेज करना चाहिए। दूध और दूध के उत्पाद भोजन में कैल्शियम और विटामिन A का योगदान देते हैं।

मांस. उत्पाद (Meat Products): अंडे, मांस और मछली में उत्तम प्रकार के प्रोटीन होते हैं। हर प्रकार के मांस में रेशेदार जुड़ने वाले तन्तु होते हैं जो कोलेगन से भरपूर होते हैं। मीट को पकाने पर कोलेगन जैलेटिन में बदल जाता है। माँस में लोहा और फॉस्फोरस भी काफी मात्रा में होते हैं। अंगों के माँस (यकृत, हृदय, गुर्दे) विटामिन A की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। अंडों का प्रोटीन आसानी से शरीर में एकत्र हो जाता है।

सफेद माँस यानि कि मछली और मुर्गा को लाल माँस से बेहतर समझता जाता है और रोगियों तथा हृदय रोगियों के लिए उचित होता है। सामान्य माँस पदार्थ, हैम (ham), सौसेजिस (Sausages), सलामी (salami) और मछली होते हैं। इस वर्ग से उत्तम प्रोटीन मिलता है जो कि शारीरिक विकास और तन्तुओं की मरम्मत की योग्यता रखती है। अंडे व अंगों का मीट लोहे का भरपूर स्रोत है, इसलिए यह रक्त का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। यह ऑक्सीकरण क्रियाओं के लिए उत्तरदायी है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

वर्ग 4. फल और सब्जियाँ (Fruits and Vegetables): फलों का भोजन में एक विशेष स्थान है। भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वाद व सुगन्धों वाले फल उपलब्ध हैं। पके आम, पपीता और अंजीर विशेषकर कैरोटीन से भरपूर फल हैं। संतरे तथा नीबू प्रजाति के फलों में विटामिन C की मात्रा भरूपर होती है। ताजे फलों का रस स्वस्थ मसूड़ों, दांतों के लिए है। इसके अतिरिक्त घाव को शीघ्रता से भरना तथा साफ चेहरे के लिए भी फलों का रस आवश्यक है।

केला कार्बोज का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। अफ्रीका में बच्चे अधिक केले खाते हैं और इसलिए क्वाशियोरकर रोग से ग्रस्त होते हैं। सेबों व आलू बुखारों में पैक्टिन की भरपूर मात्रा होती है जो जैम और जैली बनाने के लिए आवश्यक है। फलों से फल-शर्करा औरे लैवरोलोज मिलता है। वह कुछ रूक्षांश भी देते हैं जो शारीरिक क्रिया संतुलित करता है। फलों की तरह सब्जियों में भी कई किस्में होती हैं।

सब्जियाँ आकार में, स्वाद में, सुगंध में और पोषक तत्त्वों की मात्रा में भिन्न-भिन्न होती हैं। वह मौसम के कारण भी भिन्न होती हैं। पौधों के विभिन्न हिस्से सब्जियों की तरह खाए जाते हैं। पत्ते-पालक, चौलाई, पुदीना, धनिया, मेथी और सलाद इत्यादि । कंद और मूल-प्याज, शलजम, मूली और आलू। फल-बैंगन, भिंडी, खीरा, चिचिण्डा और अन्य कदू वर्गीय पदार्थ। फूल-फूल गोभी, कचनार और केले के फूल । हरी पत्तेदार सब्जियां कैल्शियम और लोहे के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

इनकी पर्याप्त मात्रा इन सब्जियों से प्राप्त हो जाती है। अधिकतर पत्तेदार सब्जियों में राइबोफ्लेविन भरपूर मात्रा में होती है। इनके सेवन से मुखपाक अर्थात् होठों के फटने (Cracking of lipsat-the cover of mouth) की चिन्ता नहीं रहती। अधिक रेशों की मात्रा होने के कारण हरी पत्तेदार सब्जियां सारक का काम करती हैं। इनमें ऑक्जीलेट की मात्रा बहुत अधिक होती है जो कि लोहा, कैल्शियम, तांबा व मैग्नीशियम के अवशोषण में बाधा डालते हैं। जड़ वाली सब्जियों में कार्बोज व कैरोटीन की भरपूर मात्रा होती है। सब्जियों में विटामिन C भी भरपूर होता है। विटामिन A और C दालों में कम होता है। दालों व अनाज के साथ सब्जियों का खाना भोजन की पौष्टिकता बढ़ा देता है। सब्जियां भिन्नता देती हैं तथा भोजन को आकर्षक बनाती हैं।

वर्ग 5. वसा और शर्करा (Fats and Sugars): वसा, मक्खन और घी की तरह भोजन को स्वादिष्ट तो बनाती ही है, वसा में घुलनशीन विटामिन भी हैं तथा यह कैलोरी भी देती है। कुछ लोग पशुजन्य वसा को भी पकाने का माध्यम बनाते हैं। तेल व वसा महंगे होते हैं। इसी कारण गरीब लोग 20 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा इनसे नहीं लेते। भोजन में वसा अमीर लोग अधिक खाते हैं जिससे अक्सर मोटापा तथा हृदय रोग पनपते हैं। अधिकतर तेलों में विटामिन नहीं होते।

लाल खजूर का तेल अलग है तथा उसमें विटामिन A (कैरोटीन) होता है। आर्थिक कारणों से तेल का भोजन में अधिक प्रयोग होता जा रहा है। तेलों में रक्त के कालेस्ट्रॉल स्तर को कम करने की क्षमता भी होती है। शर्करा-सुक्रोज साफ, सफेद पदार्थ है जिसमें न कोई अशुद्धता है और न ही कोई पोषक तत्त्व। अधिक शर्करा के प्रयोग से दाँतों के रोग में वृद्धि होती है। गुड़ में प्राकृतिक सुगंध होती है तथा कुछ मात्रा में खनिज लवण और विटामिन भी होते हैं तथा अधिक कैलोरी देती है। मिठाइयाँ अपने स्वाद के लिए मशहूर हैं, इसीलिए भोजन के बाद मीठा खाने की महत्ता है।
Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन - 21
यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रतिदिन भोजन में इन सभी खाद्य वर्गों से पदार्थ मिलाए । ऐसे भोजन में सभी पोषक तत्त्व अपना संतुलन बनाए रखते हैं। ऐसे भोजन को संतुलित आहार कहते हैं।

प्रश्न 26.
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
पोषक आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting nutritional requirement) :
1. आयु (Age): बच्चों को उनके शरीर-भार को देखते हुए प्रौढ़ों की अपेक्षा अधिक मात्रा में भोज्य तत्त्वों की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका शरीर वृद्धि की अवस्था में होता है। वृद्धावस्था में आहार की मात्रा और पोषक तत्वों की आवश्यकता कम हो जाती है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ शिथिल पड़ जाती हैं।

2. लिंग (Sex): सामान्यतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा कम आहार की आवश्यकता होती है क्योंकि वह पुरुषों की अपेक्षा लम्बाई व भार में कम होती हैं तथा शारीरिक श्रम भी कम करती हैं।

3.  शरीर का आकार और बनावट (Size and Composition of the Body): लम्बे व भारी मनुष्य के शरीर में मांसपेशियाँ और ऊतक अधिक होते हैं, अतः उनकी भोजन की आवश्यकता ठिगने व दुबले-पतले मनुष्य की अपेक्षा अधिक होती है।

4. जलवायु (Climate): ठण्डे प्रदेशों में आहार की आवश्यकता गर्म प्रदेशों की अपेक्षा अधिक होती है क्योंकि शरीर के ताप को बनाए रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होती है। यही कारण है कि हम सर्दियों में अधिक खाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 12 उचित पोषण एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए खाद्य पदार्थों का चयन

5. व्यवसाय (Occupation): अधिक शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों को कम श्रम करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत मानसिक श्रम अधिक रखने वाले व्यक्तियों को अधिक प्रोटीन और कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

6. विशेष शारीरिक अवस्थाएँ (Specific Body Conditions): कुछ विशेष शारीरिक अवस्थाएँ पोषक तत्त्वों की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्भावस्था तथा स्तनपान की अवस्था में पोषक तत्त्वों की माँग काफी बढ़ जाती है।

ऑपरेशन के बाद की अवस्था व जल जाने की अवस्था में शरीर-निर्माणक तत्त्वें विशेष रूप से प्रोटीन की आवश्यकता अधिक रहती है। सन्तुलित आहार सर्वोत्तम आहार है परन्तु इसका तात्पर्य महँगा आहार नहीं है क्योंकि खाद्य पदार्थों की कीमत उनके उपलब्ध होने पर और मौसम पर निर्भर करती है न कि पौष्टिकता पर। अतः कम धन से भी सन्तुलित आहार की प्राप्ति की जा सकती है।

इसके लिए आवश्यकता है समान पोषक मूल्यों के सस्ते साधनों को जानने की। जैसे बादाम की जगह मूंगफली का प्रयोग करना। दूध की जगह दालों से प्रोटीन प्राप्त करना। महँगे भोजन भी असन्तुलित हो सकते हैं, जैसे बेमौसमी खाद्य पदार्थ। सन्तुलित आहार ग्रहण करने पर शरीर द्वारा उसका उपयोग हो सके इसके लिए यह ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है कि आहार पाचनशील, स्वादयुक्त, ताजा और दूषण रहित हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *