Bihar Board Class 7 Social Science Civics Solutions Chapter 2 राज्य सरकार

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 2 Chapter 2 राज्य सरकार Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Social Science Civics Solutions Chapter 2 राज्य सरकार

Bihar Board Class 7 Social Science राज्य सरकार Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

प्रश्नों के उत्तर दें –

प्रश्न 1.
अपने आस-पास सरकार द्वारा किये जाने वाले कार्यों की एक सूची बनाएँ।
उत्तर-
हमारे आस-पास सरकार द्वारा अनेकों कार्य किए गए हैं जेसे-जगह-जगह चापाकल लगवाएँ गए जिससे लोगों को पानी के लिए इधर-उधर भटकना न पड़े। सड़क के किनारे पेड़ लगाए गए जिससे लोगों को छाँव के साथ ही शुद्ध वायु भी मिले। सड़कें बनवाई गयीं । सड़कें के किनारे बहने वालों नलियों पर ढक्कन लगवाएँ गए, जिससे वातावरण दूषित न हो।

प्रश्न 2.
शिक्षक की सहायता से अपने जिले के मानचित्र में अपने विधान सभा क्षेत्र को दर्शाएँ एवं ‘उम्मीदवार’ व ‘पार्टी’ का अर्थ समझाएँ।
उत्तर-
छात्र इसे स्वयं करें।

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प्रश्न 3.
चुनाव प्रचार क्यों किया जाता है? चर्चा करें।
उत्तर-
चुनाव प्रचार द्वारा उम्मीदवारों का प्रचार होता है। यह प्रचार हर । गाँव, कस्बा आदि में किया जाता है। इस प्रचार के जरिए सभी पार्टी अपने-अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाती है और अपने उम्मीदवारों के लिए वोट माँगती है। चुनाव प्रचार के दौरान सभी पार्टियों के द्वारा अपने-अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए ढेर सारे वादे किए जाते हैं।

प्रश्न 4.
अलग-अलग उम्मीदवार क्यों होते हैं ? इससे क्या फायदा होता है ?
उत्तर-
अलग-अलग उम्मीदवार इसलिए होते हैं, ताकि मतदाता के सामने अपने मतदान के लिए अनेक विकल्प मौजूद हों और एक ही उम्मीदवार को अपना मत देना उनकी मजबूरी नहीं होती। वे अपने पसंद के उम्मीदवार को मत दे सकते हैं। अलग-अलग उम्मीदवार के होने से जनता अपने पसंद के उम्मीदवार को अपना मत देगी और जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत प्राप्त होगा, वही जनता का प्रतिनिधि चुना जाएगा। इससे यह भी पता चलेगा कि जनता किस उम्मीदवार पर सबसे अधिक भरोमा करती है।

प्रश्न 5.
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के द्वारा मत कैसे दिया जाता है?
उत्तर-
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन एक आयताकार मशीन होती है। जिसमें एक तरफ सभी पार्टियों के चुनाव चिह्न अंकित रहते हैं। सभी चनाव चिह्नों के बगल में एक बटन लगा होता है। मतदाता को जिस पार्टी को वोट करना होता है वह उस पार्टी के चुनाव चिह्न के सामने वाली बटन को दबा देता है। उस बटन को दबाते ही पों की आवाज आती है और हमारा मतदान हो जाता है।

प्रश्न 6.
आप अपने क्षेत्र के वर्तमान एवं पर्व विधायक के नाम बताएँ।
उत्तर-
छात्र इसे स्वयं करें।

प्रश्न 7.
चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से समाहित तक पूरी प्रक्रिया को विद्यालय में टोली बनाकर नाटक के रूप में प्रस्तुत करें।
उत्तर-
छात्र इसे स्वयं करें।

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प्रश्न 8.
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 68 सदस्य है। किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत प्राप्त करने के लिए कितने सदस्यों की – आवश्यकता होगी?
उत्तर-
हिमाचल प्रदेश विधान सभा में 68 सदस्य हैं, तो यहाँ किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत प्राप्त करने 35 सदस्यों की आवश्यकता होगी क्योंकि बहुमत प्राप्त करने के लिए किसी पार्टी के पास विधान सभा सदस्यों की आधी संख्या से एक अधिक होनी चाहिए। यह संख्या अधिक की भी हो सकती है।

प्रश्न 9.
किस दल या गठबंधन की सरकार बनेगी यह तय करने के लिए – बहुमत के नियम से क्यों चलना चाहिए? चर्चा करें।
उत्तर-
किस दल या गठबंधन को सरकार बनेगी यह पता तय करने के लिए बहुमत के नियम से चलनी चहिए क्योंकि सरकार तो उसी दल की बननी चाहिए जिन्हें ज्यादा से ज्यादा लोग चाहते हों। किस पार्टी को लोग ज्यादा पसंद करते हैं, इसे तय करने के लिए पार्टी के हिसाब से सूची बनाई जाती है।

जिस दल के पास आधे से अधिक विधायक होते हैं, इससे पता चलता है कि उस दल को लोग ज्यादा चाहते हैं पर कई बार ऐसा होता है कि किसी दल के पास विधायक तो अधिक होते हैं, पर आधे से अधिक नहीं । यानी बाकी दलों की तुलना में उनके पास बहुमत नहीं होता और ऐसी स्थिति में गठबंधन वाली सरकार बनती है।

प्रश्न 10.
क्या कुछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ आपको लगता है कि बहुमत दो अनुसार निर्णय होना चाहिए? चर्चा करें।
उत्तर-
बहुमत के अनुसार निर्णय होना चाहिए-इसके लिए तो लोकतंत्र में उदाहरण भरे पड़े हैं । सर्वप्रथम तो विधायक का चुनाव ही ऐसा उदाहरण ‘है, जिसका निर्वाचन बहुमत से होता है । इसके बाद बहुमत के आधार पर मुख्यमंत्री का चुनाव होता है । विधान सभा में जितने कार्य होते हैं, वे सभी बहुमत से ही निर्णय होता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि हमें लगता है कि व्यवस्थापिका में सभी कार्य बहुमत के अनुसार ही होना चाहिए

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प्रश्न 11.
अपने शिक्षक की सहायता से बिहार विधान सभा चुनाव के वर्ष 2010 में विभिन्न राजनीतिक दल के परिणाम की जानकारी प्राप्त कर तालिका के रूप में दर्शाइए
उत्तर-
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प्रश्न 12.
अगर आप विधायक होते तो अपने क्षेत्र की कौन-सी समस्या उठाते और क्यों?
उत्तर-
अगर मैं विधायक होती तो अपने क्षेत्र की पेयजल संकट, बेरोजगारी, बिजली, सड़क आदि की समस्या को उठाती। इसी के साथ अपहरण भी एक प्रमुख समस्या है। पेयजल की संकट की वजह से लोगों को दूषित पानी पीने को मजबूर होना पड़ता है। जिसकी वजह से उन्हें कितनी बीमारियों का शिकार होना पड़ता है, जिसमें सबसे प्रमुख हैं पेट की बीमारियाँ ।

बेरोजगारी भी हमारे क्षेत्र की प्रमुख समस्या है, लोगों को रोजगार नहीं मिल पाता, जिससे उनके और उनके परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाती हैं। बेरोजगारी की वजह से कितने लोग आत्महत्या करने की कोशिश भी करते हैं। बिजली भी हमारे क्षेत्र की प्रमुख समस्या है।

बिजली की कमी की वजह से कितने कल-कारखाने अपने सही समय पर काम शुरू नहीं कर पाते हैं। इससे लोगों की दिनचर्या भी प्रभवित होती है। बिजली हमारे जीवन की आधारभूत संरचना है। सड़कों का सही होना भी आवश्यक होता है। सड़कें टूटी हुई हो तो अपने गन्तव्य स्थान पहुंचने में लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

जिसकी वजह से वह कभी-कभी अपने किसी आवश्यक काम के लिए भी देर से पहुंचते हैं और उनका बहुत नुकसान हो जाता है। हमारे बोझ में अपहरण भी एक मुख्य समस्या है। सबसे ज्यादा अपहरण स्कूली बच्चों का होता है। अपहरण के बाद उनके माता-पिता से

उनकी रिहाई के बदले मोटी रकम की मांग की जाती है और रकम न मिलने पर उन्हें मार दिया जाता है।

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प्रश्न 13.
आपकी नजर में एक विधायक और उस विधायक में, जो मंत्री भी हैं क्या अंतर हैं?
उत्तर-
एक विधायक जो सिर्फ विधायक है मंत्री नहीं वह सिर्फ जनता की परेशानियों को सरकार के आगे रख सकता है। संबंधित विषय पर प्रश्न पूछ सकता है और अपने सुझाव भी दे सकते हैं। किसी भी चीज की परेशानी के लिए या किसी खास विषय पर ध्यान न देने की वजह से अगर उसके क्षेत्र की जनता को परेशानियाँ हो रही हैं तो वह उस विभाग से संबंधित मंत्री से इसकी वजह पूछ सकती है और वह विधायक जो मंत्री भी है वह सदन में विधेयक पास करवा सकता है तथा अनुकूल कार्यवाही न होने पर कोई कड़ा रूख भी अपना सकता है।

प्रश्न 14.
विधान सभा में बहस करने की आवश्यकता क्यों हैं?
उत्तर-
विधान सभा में विधायक और मंत्री के बीच में बहस होती है। विधायक अपने क्षेत्र की जनता की परेशानियों को सरकार के सामने रखता है और संबंधित प्रश्न पूछता है और जिस विषय से संबंधित प्रश्न वह पूछता है उस विभाग के मंत्री उसका जवाब देते हैं। इससे हर क्षेत्र से जुड़ी परेशानियाँ सामने आती हैं। यहाँ मंत्री और विधायकों के बीच बहस होती है। विधायकों द्वारा प्रश्न पूछने पर मंत्री उन्हें बनाते हैं कि काम हो रहा और उन्हें और सदन को आश्वस्त करते हैं कि इस क्षेत्र में और भी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। इसी तरह बहस होती है और कई समस्याओं का हल निकलता है। ।

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपने शिक्षक को सहायता से पता लगाइये कि निम्नांकित सरकारी विभाग क्या काम करते हैं और उन्हें तालिका में दिये गये रिक्त स्थानों में भरिए।
उत्तर-
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प्रश्न 2.
निर्वाचन क्षेत्र व प्रतिनिधि शब्दों का प्रयोग करते हुए स्पष्ट कीजिए की विधायक कौन होता है और उनका चनाव किस प्रकार होता है?
उत्तर-
निर्वाचन क्षेत्र से कई अलग-अलग प्रतिनिधि चुनाव लड़ने के लिए खड़े होते हैं और जनता से अधिक से अधिक वोट की उम्मीद करते हैं और जनता जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक पसंद करती है उन्हें सबसे अधिक. वोट देते हैं और जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलता है वह विजयी घोषित किया है, फिर उसे जनता का प्रतिनिधि बनाकर संसद में भेजते हैं और जो प्रतिनिधि आपस में मिलकर सरकार बनाते हैं, उसे विधायक कहते हैं।

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प्रश्न 3.
विधान सभा सदस्य द्वारा विधायिका में किए गए कार्यों और शासकीय विभागों द्वारा किए गए कार्यों के बीच क्या अन्तर है?
उत्तर-
विधान सभा में बहस कुछ अर्थों में उपयोगी होती है क्योंकि अगर बहस नहीं होगी तो कोई पक्ष अपनी बात सामने कैसे रखेगा। जब कोई विधायक अपनी बात पूछता है तो उस विभाग के मंत्री उसका जवाब देते हैं। उन दोनों के बीच बहस होती है और उस समस्या का समाधान होता है । बहस से हर किसी को उसका हक मिलता है।

प्रश्न 4.
आपके विचार में क्या विधान सभा में बहस कछ अर्थों में उपयोगी रही? कैसे । चर्चा कीजिए।
उत्तर-
विधान सभा सदस्य द्वारा विधायिका में किए गए कार्यों और शासकीय विभागों द्वारा किए गए कार्यों के बीच अंतर विधान सभा सदस्य के द्वारा जो काम किए जाते हैं, वो जनता के हित में होते हैं उनमें जनता की भलाई होती है। जनता को जिस भी क्षेत्र में कोई परेशानी होती है, उस विभाग के मंत्री द्वारा उस परेशानी को दूर करने की कोशिश की जाती है और उस परेशानी के दुर होने पर उसकी वजह तलाशी जाती है और फिर उस पर कड़ी कार्यवाही की जाती है।

Bihar Board Class 7 Social Science राज्य सरकार Notes

पाठ का सार संक्षेप

पिछले कक्षा में हमने सरकार के तीन स्तरों स्थानीय, राज्य और केन्द्र के बारे में जाना । पिछली कक्षा में हमने स्थानीय स्तर के बारे में विस्तार से जाना था और इस कंक्षा में हमलोग राज्य स्तर के बारे में विस्तार से जानेगें। राज्य स्तर पर सरकार किस प्रकार से कार्य करती है, विधायक कौन होता है, विधान सभा के सदस्यां और मंत्रियों की क्या भूमिका होती है और सरकार के सामने जनता अपनी लात कैसे रखती है।

विधायक का चुनाव – भारत के सभी राज्यों में एक विधान सभा है। इसके सदस्यों को विधायक (एम. एल. ए.) कहते हैं। प्रत्येक राज्य भी कई विधान सभा क्षेत्रों में बंटा होता है। एक क्षेत्र से कई चुनाव लड़ते हैं और अपनी किस्मत आजमाते हैं। ये सभी लोग उम्मीदवार कहलाते हैं। ये उम्मीदवार लोग अलग-अलग पार्टियों से खड़े होते हैं, जैसे कोई कांग्रेस पार्टी से, कोई भा.ज.पा. से, कोई राजन्द० से तो कोई जन्दव्यू. या लोज-पा० से । कुछ लोग निर्दलीय भी होते हैं, जो किसी पार्टी से नहीं बल्कि अपने दम पर चुनाव लड़ते

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हैं। सभी उम्मीदवार पहले नामांकन पत्र भरते हैं। फिर अपने प्रचार के लिए विधान सभा क्षेत्र के अलग-अलग स्थानों पर अपनी-अपनी पार्टी के नेताओं का कार्यक्रम आयोजित करवाते हैं। इस तरह से अपनी-अपनी पार्टी के विचारों को जनता के बीच पहुँचाया जाता है और अपने उम्मीदवारों के लिए वोट मांगे जाते हैं।

फिर चुनाव का दिन आता है। लोग सुबह से मतदान के लिए लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े रहते हैं और अपनी बारी आने पर अपने पसंद के उम्मीदवार को जीताने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मशीन द्वारा अपना मत देते हैं। शाम 5 बजे तक मतदान का कार्य होता है। उसके बाद फिर वोटों की गिनती का दिन आता है और गिनती समाप्त होने पर सभी उम्मीदवारों में से जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत मिलता है, उन्हें जिला निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा विजयी घोषित किया जाता है और चनाव जीतने वाला उम्मीदवार विधायक बन जाता है। ये पाँच वर्षों के लिए निर्वाचित किए जाते हैं।

सरकार की कार्यप्रणाली सरकार में शामिल लोग जैसे मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री इत्यादि । इन सभी लोगों की समस्याओं पर कार्यवाई करनी होती है। इन मंत्रियों को विधान सभा में उठाए गए सवालों का जवाब देकर होता है और प्रश्नकर्ता को आश्वस्त करना होता है। इन विभागों द्वारा जो भी कार्य किया जाता है, उसका बजट सदन द्वारा स्वीकृत करवाया जाता है और उसके बाद उस योजना की । पूर्ति के लिए बजट में धन का प्रावधान कर अनुमोदन लिया जाता है।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण Questions and Answers

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

प्रश्न
विशेषण किसे कहते हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं।
उदाहरणतया – लाल कपडा, मोटा लडका, काली गाय, ऊँचा मकान, लंबा वह। इनमें लाल, मोटा, काली और ऊँचा शब्द क्रमश: कपड़ा, लड़का, गाय और मकान नामक संज्ञा-शब्दों की विशेषता बता रहे हैं। इसलिए ये विशेषण हैं। इसी प्रकार ‘लंबा’ शब्द ‘वह’ सर्वनाम की विशेषता बता रहा है। यह भी विशेषण है।

प्रश्न
विशेष्य किसे कहते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
विशेषण जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता प्रकट करता है उसे विशेष्य कहते हैं। उदाहरणतया—काली गाय, मोटा लड़का। इनमें ‘काली’ और ‘मोटा’ विशेषण क्रमशः ‘गाय’ और ‘लड़का’ की विशेषता प्रकट कर रहे हैं। अत: गाय और लड़का विशेष्य हुए।

प्रश्न
विशेषण के कितने भेद हैं ? सबका सोदाहरण परिचय दो।
उत्तर-
विशेषण के सामान्यतया चार भेद माने जाते हैं

  1. गुणवाचक विशेषण
  2. परिमाणवाचक विशेषण
  3. संख्यावाचक विशेषण
  4. सार्वनामिक विशेषण

1.गुणवाचक विशेषण
संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, रूप, रंग, आकार, प्रकार, स्थान, काल, दशा, स्थिति, शील, स्वभाव, स्वाद, गंध आदि का बोध कराने वाले शब्द गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं। उदाहरणतया-

सरल, भला, कुशल, उचित, पवित्र, साफ (गुण)।
कुटिल, जटिल, बुरास, लचर, अनुचित, गंदा (दोष)।
गोल, चौकोर, तिकोना, लंबा, चौड़ा, ठिगना (आकार)।
लाल, पीला, नीला, मैला, उजला, गोरा (रंग)।
बलवान, कमजोर, रोगी, पतला, गाढ़ा (अवस्था, दशा)।
भीतरी, बाहरी, पिछला, अगला, अग्रिम (स्थिति)।
पंजाबी, जापानी, देहलवी, भारतीय (स्थान)।
मीठा, नमकीन, तिक्त, कषाय (स्वाद)।
सुगंधित, तीखा, भीनी (गंध)।
मुलायम, चिकना, भारी, हल्का, गर्म, ठंडा, पालत जंगली (अन्य)

कुछ वाक्य-प्रयोग
(क) वह सुंदर कन्या है। (गुणवाचक)
(ख) इस घर का मालिक मोटा आदमी है।(आकारबोधक)
(ग) तुमने मेरी लाल कमीज पहनी है।(रंगबोधक)
(घ) मैं फटी पेंट नहीं पहना करता।(दशाबोधक)
(ङ) आधुनिक युग कंप्यूटर-युग है।(कालबोधक)

2. परिमाणवाचक विशेषण

जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम के माप, तोल, परिमाण को प्रकट करते हैं; परिमाणवाचक विशेषण कहलाते हैं। परिमाणवाचक विशेषण दो प्रकार के होते हैं-
(क) निश्चित परिमाणवाचक विशेषण किसी संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित परिमाण का बोध कराते हैं। जैसे–चार लिटर दूध, एक क्विंटल गेहूँ, दस मीटर कपड़ा, दस ग्राम सोना। कभी-कभी बाद में ‘भर’ लगाने से भी निश्चित परिमाण का बोध होता है। जैसे—सेर भर।

वाक्य प्रयोग- पहाड़ों पर 5 इंच वर्षा हुई।
इस साल एक हजार पेड़ उगे।

(ख) अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण- जिन विशेषणों से संज्ञा या सर्वनाम के निश्चित परिमाण का ज्ञान न होकर अनिश्चित माप-तोल का ज्ञान हो, उन्हें अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे—कुछ, बहुत, अधिक, थोड़ा, तनिक, इतना, उतना, जितना, कितना, ढेर, सारा आदि। कभी-कभी इनके साथ सा-से-सी का प्रयोग भी कर दिया जाता है। जैसे थोड़ा-सा।

वाक्य-प्रयोग-
चाय मेंथोड़ी चीनी डाल दीजिए।
जरा-सा दूध भी मिला दीजिए।
तनिक गर्म पानी भी डालो।
अबकुछ घूटे पीकर देखो।
आजसारा परिवार चाय पिएगा।

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3. संख्यावाचक विशेषण
जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की संख्या या गणना संबंधी विशेषता का बोध कराते हैं, संख्यावाचक विशेषण कहलाते हैं। इसके दो भेद होते हैं निश्चित संख्यावाचक तथा अनिश्चित संख्यावाचका।
निश्चित संख्यावाचक विशेषण- ये विशेषण संज्ञा या सर्वनाम की किसी निश्चित संख्या का बोध कराते हैं। जैसे—दो लड़के, चौथी मंजिल, दर्जन पैंसिलें, तिगुना, प्रत्येक आदि।संख्या के आधार पर इसके आगे भेद किए जा सकते हैं –

(क) पूर्ण संख्याबोधक विशेषण 1, 2, 3 आदि पूर्णांक संख्याएँ इसके अंतर्गत आती हैं। इन्हें गणनावाचक विशेषण भी कहते हैं।

(ख) अपूर्ण संख्याबोधक विशेषण- 1/4 (पाव), 1/2 (आधा), 3/4 (पौन), 1 1/4 (सवा), 1 1/2 (डेढ), 1 3/4 (पौन दो), 2 1/2 (ढाई), 3 1/2 (साढ़े तीन) आदि विशेषण विशेषतया माप-तोल में काम आते हैं।

(ग) क्रमवाचक विशेषण- क्रम का बोध कराने वाले विशेषण-जैसे-
पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, छठा, सातवाँ आदि क्रमवाचक विशेषण कहलाते हैं।

(घ) आवृत्तिवाचक विशेषण- विशेष्य की तहों या गुणन को बताने वाले विशेषण जैसे
दुहरा, तिहरा, दुगुना, तिगुना, चौगुना आदि आवृत्तिवाचक विशेषण कहलाते हैं।

(ङ) समुदायवाचक विशेषण- जहाँ संख्या के समुदाय को विशेषण के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, वहाँ समुदायवाचक विशेषण होता है। जैसे-
दोनों, तीनों, चारों या तीनों के तीनों, चारों के चारों आदि।

(च) समुच्चयवाचक विशेषण– विशेष्य के समुच्चय को प्रकट करने वाले विशेषण समुच्चयवाचक विशेषण कहलाते हैं। जैसे-
दर्जन (12), युग्म, जोड़ा, पच्चीसी, सैकड़ा, शतक, चालीसा, सतसई (700) आदि।।

(छ) प्रत्येकबोधक विशेषण- हर, प्रत्येक, प्रति आदि विशेषण प्रत्येकबोधक कहलाते हैं।
अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण- ये शब्द (विशेषण) संज्ञा या सर्वनाम की किसी निश्चित संख्या का बोध नहीं कराते, बल्कि उसका अस्पष्ट अनुमान प्रस्तुत करते हैं। जैसे
कुछ, कई, सब, सैकड़ों, दस-बीस, काफी, थोड़े, बहुत आदि।

वाक्य-प्रयोग-

कुछ बच्चे चंदा माँगने आए हैं।
तुम्हारी थैली मेंबहुत संतरे हैं, मेरी में थोड़े।
किताब लगभग पूरी पढ़ ली है, बसथोड़े पन्ने बाकी हैं।
वहाँकोई पाँच सौ खिलाड़ी होंगे।
रैली मेंहजारों लोग पहुंचे।
पचास एक संतरे बचे हुए थे।
दस-बीस रोटियाँ खाना मेरे बाएँ हाथ का खेल है।

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4. सार्वनामिक विशेषण
जो सर्वनाम अपने सार्वनाकि रूप में ही संज्ञा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। ये विशेषण चार प्रकार के होते हैं

(क) निश्चयवाचक/संकेतवाचक सार्वनामिक विशेषण- ये विशेषण संज्ञा की ओर निश्चयार्थी संकेत करते हैं। इसलिए इन्हें संकेतवाचक या निश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण कहा। जाता है। उदाहरणतया –

यह किताब वहाँ से मिली है।
उस कलम को उठा लाओ।

(ख) अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण- ये विशेषण संज्ञा की ओर अनिश्चयार्थी संकेत करते हैं। उदाहरणतया –
कोई सज्जन आए हुए हैं।
घर मेंकुछ भी खाने को नहीं है।

(ग) प्रश्नवाचक सार्वनामिक विशेषण ये सार्वनामिक विशेषण संज्ञा की प्रश्नात्मक विशेषता को प्रकट करते हैं। जैसे-
कौन आदमी आया है ?
तुम्हेंकौन-सी किताब चाहिए?
तम्हेंकिस लडके ने बचाया है?
तुम इनमें सेक्या चीज लोगे?

(घ) संबंधवाचक सार्वनामिक विशेषण – ये विशेषण एक संज्ञा या सर्वनाम का संबंध वाक्य में प्रयुक्त दूसरे संज्ञा या सर्वनाम के साथ जोड़ते हैं। उदाहरणतया-
जो आदमी कल आया था,वह बाहर खड़ा है।
वह बच्चा सामने जा रहा है,जिसने तुम्हारी किताब चुराई थी।
सार्वनामिक विशेषण और सर्वनाम में अंतर- कई जगह निश्चयवाचक सर्वनाम और सार्वनामिक विशेषण इतने समान रूप से प्रयुक्त होते हैं कि उन्हें पहचानने में भ्रम हो जाता है। ठीक पहचान के लिए ध्यान देना आवश्यक है कि यदि सर्वनाम का प्रयोग संज्ञा से पहले हुआ है, तो वह सार्वनामिक विशेषण होगा। यदि वह अकेले प्रयुक्त होगा, तो सर्वनाम कहलाएगा।

उदाहरणतया- यह पुस्तक अभी छपी है।
यह अभी छपी है।

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प्रथम वाक्य में ‘यह’ सार्वनामिक विशेषण है, क्योंकि ‘यह’ पुस्तक की विशेषता बतला रहा है। दूसरे वाक्य में ‘यह’ संज्ञा की जगह प्रयुक्त हुआ है, अतः निश्चयवाचक सर्वनाम है। कुछ अन्य उदाहरण देखिए-
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वह पुस्तक अच्छी है।  (वह-विशेषण)
वह अवश्य आएगा। (वह-सर्वनाम)
यह मेरे साथ खेलता है। (यह-सर्वनाम), (मेरे-विशेषण)
उस घर में मेरा मित्र रहता है। (उस-विशेषण), (मेरा-विशेषण)
उसने बालक को बचाया।  (उसने-सर्वनाम)
यह फल पका है और वह कच्चा । (यह-विशेषण), (वह-सर्वनाम)
इस घर में कौन रहता है। (इस-सार्व. विशेषण)

विशेषणों की रूप-रचना

विशेषणों की रूप-रचना संबंधी कुछ नियम इस प्रकार हैं-

(क) कुछ आकारांत विशेषणों में विशेष्य के लिंग-वचन बदलने के साथ-साथ बदलाव आता है। जैसे-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण - 2

इसी प्रकार- बड़ा नगर, बड़ी नगरी, बड़े नगरों में।
छोटा डंडा, छोटी डंडी, छोटे डंडे।

ध्यातव्य-  यह परिवर्तन केवल कुछ आकारांत पुल्लिंग विशेषणों में आता है। अन्य प्रकार के विशेषणों में कोई परिवर्तन नहीं होता। जैसे-
सुदर लड़का (एकवचन, पुल्लिंग)
सुंदर लड़के (बहुवचन, पुल्लिंग)
सुंदर लड़की (एकवचन, स्त्रीलिंग)
सुंदर लड़कियाँ (बहुवचन, पुल्लिंग)

(ख) यदि विशेष्य के पीछे कोई विभक्ति लगी हो, या संबोधन कारक हो तो आकारांत विशेषण के अंतिम ‘आ’ का ‘ए’ हो जाता है। जैसे-
बड़े लड़के ने मुझे बुलाया।
ए छोटे बच्चे, इधर आना।

अन्य विशेषण यथावत रहते हैं। जैसे-
चंचल लड़का, चंचल लड़की, चंचल लड़के, चंचल लड़कियाँ।
विशेषणों का संज्ञा-रूप में प्रयोग कई बार विशेषणों को संज्ञा-रूप में प्रयुक्त कर दिया जाता है।
उदाहरणतया-
उस मोटे को देखो!
वीरों की पूजा भी करते हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

गुणियों का सर्वत्र सम्मान होता है।
इन उदाहरणों में ‘मोटे’, ‘वीरों’ और ‘गुणियों’ शब्द संज्ञा-रूप में प्रयुक्त हुए हैं। अत: इनके लिंग, वचन, कारक भी संज्ञा-पदों के समान बदलेंगे।
अन्य उदाहरण-
इन गरीबों को देखिए।
बड़ों का कहना मानना चाहिए।
उस बेचारे ने कुछ नहीं किया।

विशेषणों की रचना

कुछ शब्द मूलतः विशेषण होते हैं तथा कुछ की रचना शब्दों में प्रत्यय, उपसर्ग आदि लगाने से होती है। जैसे –
पव्यय _चायवाला, सुखद, बलशाली, ईमानदार, नश्वर आदि।
उपसर्ग से दुबैल, लापता, बेहोशी, निडर आदि।
सोनों पयोग दुनाली; निकम्मा आदि।
विशेषण कई प्रकार के शब्दों से बनते हैं-
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आगे छात्रों की सुविधा के लिए अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषण दिए जा रहे हैं –
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Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण - 5

उद्देश्य-विशेषण और विधेय-विशेषण

प्रश्न
उद्देश्य विशेषण और विधेय-विशेषण किसे कहते हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
जो विशेषण विशेष्य शब्दों से पहले प्रयुक्त होते हैं, उन्हें उद्देश्य-विशेषण कहते हैं। जैसे-
गोरी लड़की नाच रही है।
काला घोड़ा दौड़ रहा है।
यहाँ ‘गोरी’ और ‘काला’ दोनों उद्देश्य विशेषण हैं।
कुछ स्थितियों में विशेषण विशेष्य के पश्चात् लगता है। इन्हें ‘विधेय विशेषण’ कहते हैं। जैसे
वह लड़की गोरी है।
घोड़ा काला है।
उसका पैन नीला है। आदि

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यहाँ गोरी, काला और नीला विशेषण विशेष्यों के पश्चात् लगे हैं। ये वाक्य के विधेय भाग के अंश हैं। इसीलिए इन्हें विधेय-विशेषण कहा जाता है। .
ध्यातव्य – विशेषण चाहे उद्देश्य-विशेषण हों, चाहे विधेय-विशेषण; उनके रूप का निर्धारण संज्ञा या सर्वनाम के अनुसार होता है। अर्थात् विशेषण का वही लिंग, वचन, परसर्ग होगा जो विशेष्य संज्ञा का होगा। उदाहरणतया-

उद्देश्य-विशेषणों के रूप-

मोटा लड़का कूद रहा है। (विशेषण-विशेष्य दोनों पुं. एकवचन)
मोटे लड़के को देखो। (विशेषण-विशेष्य दोनों पुं. बहुवचन)
मोटे लड़के कूद रहे हैं। (विशेषण-विशेष्य दोनों पुं. बहुवचन)
मोटे लड़कों को देखो। (विशेषण-विशेष्य दोनों पुं. बहुवचन)
मोटी लड़की को देखो। (विशेषण-विशेष्य दोनों स्त्री. एकवचन)
मोटी लड़कियों को देखें। (स्त्रीलिंग विशेषण अपरिवर्तित रहता है। एकवचन)

अब नीचे विधेय-विशेषण के रूप देखिए। ये भी बिल्कुल उद्देश्य-विशेषणों के समान रहेंगे। विधेय-विशेषणों के रूप-
वह लड़का मोटा है। (विशेषण-विशेष्य दोनों पुं. एकवचन)
वे लड़के मोटे हैं। (विशेषण-विशेष्य दोनों पुं. बहुवचन) ।
वह लड़की मोटी है। (विशेषण-विशेष्य दोनों स्त्री. एकवचन)
वे लड़कियाँ मोटी हैं। (स्त्रीलिंग विशेषण अपरिवर्तित है।)

विशेषणों का तुलना में प्रयोग

विशेषण मात्र संज्ञा-सर्वनाम की विशेषता ही नहीं बतलाते, अपितु विशेष्य शब्दों की विशेषता की तुलनात्मक अधिकता या न्यूनता को भी प्रकट करते हैं। यह विशेषणों की तुलना कहलाती है।)
तुलना-अवस्था तीन प्रकार की होती है—मूलावस्था, उत्तरावस्था तथा उत्तमावस्था।

1.मलावस्था इसमें किसी प्रकार की तुलना न होकर विशेष्य की सामान्य विशेषता प्रकट र की जाती है। जैसे
यह आम मीठा है।
मोहन पढ़ने में निपुण है।

2. उत्तरावस्था इसमें दो व्यक्तियों या वस्तुओं की तुलना द्वारा एक को दूसरे से अधिक . या न्यून दिखाया जाता है। जैसे-
मोहन श्याम से अधिक बलवान है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि उत्तरावस्था में दो विशेष्य होते हैं। उनमें तुलना प्रकट करने के लिए से, से बढ़कर, से घटकर, से कम, की अपेक्षा, की तुलना में, के मुकाबले, से अधिक आदि वाचक शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। उदाहरणतया-

मेरी मेज तुम्हारी मेज से काफीबड़ी है।
मोहन श्याम से बढ़करबलवान है।
मोहन श्याम की अपेक्षा अधिक बलवान है।
मोहन श्याम की तलना में अधिक बलवान है।
सोहन मोहन से बरालड़का है।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

3. उत्तमावस्था इसमें दो से अधिक व्यक्तियों, प्राणियों या वस्तुओं की तुलना की जाती है तथा उनमें से किसी एक को सबसे अधिक या सबसे कम बताया जाता है। जैसे-
राजीव सबसे बुरालड़का है।

ध्यान देने योग्य है कि उत्तमावस्था में सबसे अधिक, सर्वाधिक, सभी में, सभी से, सबसे आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। कुछ उदाहरण देखिए-

मोहन कक्षा के सभीबच्चों सेबलवान है।
मोहन कक्षा में सबसे अधिक बलवान है।
मोहन कक्षा के बच्चों में सर्वाधिकबलवान है।

तुलनाबोधक प्रत्यय

विशेषताओं की तुलना को व्यक्त करने के लिए विशेषणों के पीछे तुलनाबोधक प्रत्ययों का प्रयोग होता है। हिंदी भाषा में संस्कृत और फारसी से आए प्रत्यय ही प्रयुक्त होते हैं। संस्कृत में उत्तरावस्था के लिए ‘तर’ और उत्तमावस्था के लिए ‘तम’ प्रत्यय का प्रयोग होता है। कुछ उदाहरण देखिए-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण - 6
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण - 7
प्रविशेषण

प्रश्न
प्रविशेषण किसे कहते हैं? कुछ उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
ऐसे विशेषण, जो किसी विशेषण या क्रिया-विशेषण की भी विशेषता हैं, प्रविशेषण . कहलाते हैं। उदाहरणतया-
रमेशबहुत अच्छा लड़का है।
इस वाक्य में ‘अच्छा’, ‘लड़का’ (विशेष्य) का विशेषण है तथा ‘बहुत’, ‘अच्छा’ (विशेषण) की भी विशेषता प्रकट कर रहा है। अतः ‘बहुत’ प्रविशेषण है। प्रविशेषण प्रायः विशेषण या क्रिया-विशेषण से पूर्व लगते हैं। ये विशेषण की अधिकता या निश्चितता-अनिश्चितता को प्रकट करते हैं। हिंदी में प्रायः बहुत, बहुत अधिक, अत्यधिक, अत्यंत, बड़ा, खूब, बिल्कुल, ठीक, थोड़ा, कम, पूर्ण, लगभग आदि प्रविशेषणों का प्रयोग होता है। कुछ उदाहरण देखिए।

(i) रामअति , सुंदर है। (‘अति’ प्रविशेषण)
(ii) वहअत्यंत परिश्रमी बालक है। (‘अत्यंत प्रविशेषण)
(iii) तनिक धीरे-धीरे चलो। (‘तनिक’ प्रविशेषण)
(iv) वहबड़ा होनहार बालक है। (‘बड़ा’ प्रविशेषण)
(v) मैंपूर्णतः स्वस्थ हूँ। (‘पूर्णतः’ प्रविशेषण)
(vi) आपबड़े भोले हैं। (‘बड़े’ प्रविशेषण)
(vii) मोहनबहुत अधिक चतुर है। (‘बहुत अधिक प्रविशेषण)
(viii) सोहन अबविल्कुल स्वस्थ है। (‘बिल्कुल’ प्रविशेषण)
(ix) वह शाम कोठीक सात बजे आएगा। (‘ठीक’ प्रविशेषण)
(x) वहाँलगभग बीस आदमी थे। (‘लगभग’ प्रविशेषण)
(xi) मोहनबड़ा ईमानदार व्यक्ति है। (‘बड़ा’ प्रविशेषण)
(xii) चंद्रशेखर आजादमहान पराक्रमी क्रांतिकारी थे। (‘महान’ प्रविशेषण)

संबंधवाची विशेषण- कई बार संज्ञा और सर्वनाम के संबंधवाची रूपों को विशेषण के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। जैसे –
यहमोहन की किताब सोहन को दे देना।
मेरी किताब कल ले आना।
यहाँ ‘मोहन की’ तथा ‘मेरी’ दोनों संबंधवाची विशेषण हैं।
कृदंती रूप-कई बार विशेषण एक शब्द के रूप में न आकर क्रिया-पदबंध के रूप में आता है। में जाता है। जैसे –

थका हुआ आदमी छाया पाकर सो गया।
बहता हआ पानी अचानक कागया:

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

यहाँ ‘थका हुआ’ और ‘बहता हुआ’ कृदंती रूप विशेषण की भूमिका निभा रहे हैं।

सादृश्यवाची विशेषण-सा’, ‘जैसा’, ‘के समान’ आदि सादृश्यवाची शब्दों से युक्त विशेषण सादृश्यवाची कहलाते हैं। जैसे –
उसका रूप मोहन जैसाहै।
सीता-सारूप अचानक कुरूप हो उठा।
यहाँ ‘मोहन जैसा’ और ‘सीता-सा’ सादृश्यवाची विशेषण हैं।

II. क्रियाविशेषण

जो अविकारी शब्द क्रिया की विशेषता बतलाते हैं, उन्हें क्रियाविशेषण कहते हैं। जैसे
मोहन धीरे-धीरेचल रहा है।
यहाँ ‘धीरे-धीरे द्वारा ‘चलने’ की विशेषता प्रकट हो रही है। अतः यह क्रियाविशेषण है। कुछ अन्य उदाहरण-

मोहन बिल्कलथक गया है।
वह प्रतिदिनपढ़ता है।
मोहन मीठाबोलता है।

क्रियाविशेषण के भेद क्रियाविशेषण के निम्नलिखित चार भेद हैं-

  1. कालवचाचक क्रियाविशेषण
  2. स्थानवाचक क्रियाविशेषण
  3. रीतिवाचक क्रियाविशेषण
  4. परिमाणवाचक क्रियाविशेषण

1. कालवाचक क्रियाविशेषण-वे शब्द जिनसे क्रिया के होने या करने का समय सचित होता है, कालवाचक क्रियाविशेषण कहलाते हैं। जैसे
वह अभी-अभीगया है। यहाँ ‘अभी-अभी’ ‘गया’ क्रिया के समय को सूचित कर रहा है।

कुछ अन्य उदाहरण-संजय परसों जयपुर गया था।
शीला प्रतिदिन स्कूल जाती है।
आजकल महंगाई बढ़ती जा रही है।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

कालवाचक क्रिया-विशेषण के निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-

(क) कालबिंदवाचक आज, कल, अब, जब, अभी, कभी, सायं, प्रातः, परसों, कब, तब, . जब, पश्चात्।
(ख) अवधिवाचक सदैव, दिनभर, आजकल, नित्य, लगातार, निरंतर, सदा, आदि।
(ग) बारंबारतावाचक-प्रतिदिन, रोज, हर बार, बहुधा, प्रतिवर्ष आदि।

2. स्थानवाचक क्रियाविशेषण जो क्रियाविशेषण क्रिया के स्थान या दिशा का बोध कराते हैं, वे स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहलाते हैं। जैसे-
वह अंदर बैठा है। (स्थान)
वह ऊपर गया है। (दिशा)
यहाँ ‘अंदर’ और ‘ऊपर’ क्रमशः क्रिया के ‘स्थान’ और ‘दिशा’ का बोध करा रहे हैं।
अन्य उदाहरण-वह यहाँ रहता है।

माता जी बाहर गई हैं।
तुम इधर-उधर मत जाओ।

स्थान और दिशा के आधार पर इसके दो भेद हैं-
(क) स्थितिवाचक यहाँ, वहाँ, कहाँ, आगे, पीछे, मध्य, नीचे, ऊपर, तहाँ, जहाँ, अंदर, बाहर, आर-पार, चारों ओर, आस-पास, निकट आदि।
(ख) दिशावाचक- इधर, उधर, ऊपर, नीचे, दाहिने, बाएँ, की तरफ, की ओर, सामने, आमने-सामने, किधर आदि।

3. रीतिवाचक क्रियाविशेषण_जो क्रियाविशेषण क्रिया के होने की रीति या विधि का बोध कराते हैं, उन्हें रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं। जैसे-
मोहन तेजी से दौड़ा।
-इसमें ‘तेजी से’ क्रियाविशेषण ‘दौड़ने’ की रीति का बोध करा रहा है।
‘अन्य उदाहरण- आप कहते जाइए, मैं ध्यानपर्वक सुन रहा हूँ।
अब वह भलीभांति नाच लेता है।
राकेशमधर गाता है।

कछ प्रचलित रीतिवाचक क्रियाविशेषण- कैसे, ऐसे, वैसे, जैसे, सुखपूर्वक, ज्यों-त्यों, उचित, अनुचित, धीरे-धीरे, सहसा, ध्यानपूर्वक, सच, तेज, झूठ, यथार्थ, अस्तु, अवश्य, न, नहीं, मत, अतएव, वृथा, जल्दी, शीघ्र इत्यादि।

रीतिवाचक क्रिया-विशेषण कई प्रकार के होते हैं। इसके कुछ भेद इस प्रकार हैं –
(क) निश्चयात्मक-अवश्य, बेशक, सचमुच, वस्तुतः आदि।
(ख) अनिश्चयात्मक कदाचित्, बहुधा, प्रायः, अकसर, शायद आदि।
(ग) कारणात्मक क्योंकि, अतएव आदि।
(घ) आकस्मिकतात्मक सहसा, अचानक, एकाएक, अकस्मात् आदि।
(ङ) स्वीकारात्मक हाँ, सच, बिल्कुल, ठीक आदि।
(च) निषेधात्मकन, मत, नहीं, बिल्कुल, ठीक आदि।
(छ) आवयात्मक गटागट, धड़ाधड़, खुलमखुल्ला आदि।
(ज) अवधारक हो, तो, भर, तक आदि।

4. परिमाणवाचक क्रियाविशेषण परिमाणवाचक क्रियाविशेषण क्रिया की मात्रा या उसके परिमाण का बोध कराता है। यह बताता है कि क्रिया कितनी मात्रा में हुई। जैसे-
वह बिल्कुल/थोड़ा/बहुत थक गया है।
यहाँ ‘बिल्कुल’, थोड़ा’,’बहुत आदि क्रियाविशेषण ‘थकना’ क्रिया की मात्रा का बोध करा . रहे हैं। कुछ अन्य उदाहरण-
मैं घोडा जरा चला ही था कि रिक्शा आ गया।
बंगाल में चावल अधिक खाया जाता है।
तुमकम बोलो।
पहनना ही खाता है, जितना कि डॉक्टर बताता है।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण विशेषण और क्रिया विशेषण

अन्य प्रचलित परिमाणवाचक क्रियाविशेषण –
अति, अत्यंत, कई, एक, कम, थोड़ा-सा, अधिक, कुछ, तनिक, बस, इतन किंचित, सर्वथा, लगभग, निपट, पर्याप्त, खूब आदि।

Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान

Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान

Bihar Board Class 7 Science गंदे जल का निपटान Text Book Questions and Answers

अभ्यास

A. सही विकल्प चुनें –

प्रश्न 1.
अपशिष्ट जल है-
(i) पीने योग्य
(ii) स्नान योग्य
(iii) दुषित जल
(iv) भोजन बनाने योग्य
उत्तर:
(iii) दुषित जल

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प्रश्न 2.
विश्व जल दिवस मनाया जाता है –
(i) 22 जनवरी को
(ii) 22 फरवरी को
(iii) 22 मार्च को
(iv) 22 अप्रैल को
उत्तर:
(iii) 22 मार्च को

प्रश्न 3.
दूषित जल से होने वाली बिमारी नहीं है-
(i) पेचिस
(ii) पीलिया
(iii) खुजली
(iv) कैंसर
उत्तर:
(iv) कैंसर

प्रश्न 4.
पीलिया रोग का कारण है –
(i) दूषित जल का व्यवहार
(ii) गंदे कपड़ा पहनना
(iii) गरिष्ठ भोजन करना
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(i) दूषित जल का व्यवहार

Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान

प्रश्न 5.
चापाकल या कुएँ के पास जल जमाव से पेयजल होता है-
(i) स्वच्छ
(ii) दूषित
(iii) स्वच्छ एवं दृषित
(iv) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ii) दूषित

B. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें –

  1. हैजा एक ……………. जनित बीमारी है।
  2. बायोगैस का उपयोग ……………. के स्रोत के रूप में किया जाता है।
  3. वाहित मल घर, स्कूल, होटल, अस्पताल आदि से उपयोग के बाद बहने वाला ……………. जल होता है।
  4. वाहित मल एक जटिल मिश्रण है जिसमें निलोबत ठोस, मतजीवी और रोगवाहक जीवाणु कार्बनिक और ……………. अशुद्धियाँ पाई जाती हैं।
  5. पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण है …………. वीमारियाँ।

उत्तर:

  1. जल
  2. ऊर्जा
  3. अपशिष्ट
  4. अकार्बनिक,
  5. जल जनित।

C. सही वक्तव्य के सामने सही (✓) एवं गलत उत्तर के सामने गलत (✗) का चिह्न लगावें।

  1. संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2005-15 की अवधि को “जीवन के लिए जल” पर कार्य के लिए अंतर्राष्ट्रीय दशक के रूप में घोषित किया है। (✓)
  2. हैजा और. टायफाइड वायरस के कारण होने वाले गंग हैं। (✗)
  3. जल जनित रोगों के प्रमुख कारण दषित जल है। (✓)
  4. वायो गैस संयंत्र मानव मल निबटान को वैकल्पिक व्यवस्था है। (✓)
  5. कचरा प्रबंधन हेतु प्रत्येक व्यक्ति को एक जागरूक नागरिक की भूमिका निभानी चाहिए। (✓)

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D. निम्न प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दें –

प्रश्न 1.
अपशिष्ट जल से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वैसे जल जो प्रयोग करने के बाद जल जैसे झाग, तेल मिश्रित,अस्पतालों और उद्योगों से निकले काले, भरे रंग का जल जो नालियों में जाता है ‘अपशिष्ट’ जल कहते हैं।

प्रश्न 2.
वाहित पल क्या है ? उनमें कौन-कौन सी अशुद्धियाँ होती है ?
उत्तर:
वाहित मल घरों, स्कूलों, होटलों, अस्पतालों, उद्योगों और कार्यालय में उपयोग करने के बाद वाहित अपशिष्ट जल है। इसमें द्रवरूपी अवशिष्ट होता है जिसमें घुले हुए और निलंबित अपद्रव्य होते हैं।

प्रश्न 3.
जल जनित बीमारी क्या है ? इनसे होनेवाली किन्हीं तीन बीमारी के नाम एवं उनके लक्षण बताएँ।
उत्तर:
दूषित जल के सेवन से उत्पन्न रोग जनजनित बीमारी कहते हैं। पेचिश, पीलिया और हैजा जो दूषित जल के सेवन से होता है। पेचिश के लक्षण बार-बार दस्त होना, पेट में मरोड़ के साथ दस्त होना । पीलिया रोग में आँख, नाखुन एवं पेशाब का पीला हो जाना, भूख कम लगना । हैजा के लक्षण-अधिक और लगातार के दस्त हाना!

प्रश्न 4.
बायोगैस क्या है ? इसके क्या लाभ हैं?
उत्तर:
जानवरों, जीव-जन्तुओं के अवशिष्ट पदार्थ बायो संयंत्र में इकट्ठा होकर गैल बनाता है जिसे बायो गैस कहते हैं। बायो गैस ईंधन का काम करता है इससे खाना पका सकते हैं घरों और सड़कों पर लाइट जला सकते हैं और गैस उपयोग करने के बाद बचे अवशिष्ट पदार्थ खाद के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

प्रश्न 5.
एक जागरूक नागरिक के रूप में हम कचरा एवं गंदे जल के प्रबंधन में क्या योगदान दे सकते हैं।
उत्तर:
यदि किसी व्यक्ति के घर से वाहित जल या आसपास कडा-कर्कट फेंके तो इसके लिए कार्यालय में निवेदन करना चाहिए। उसे समझाना चाहिए। किसी सार्वजनिक स्थान का सफाई-सुथरा करने में सहयोग करना चाहिए। कचरा हमेशा कूड़ेदान में फेंकना चाहिए। इस प्रकार हम योगदान कर सकते हैं।

Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान

Bihar Board Class 7 Science गंदे जल का निपटान Notes

गंदै जल नालियों में बहता है, जिसमें झाग, तंल मिश्रित, काले, भरे रंग का जल जा शौचालय, दुकान, होटल और रमाईधर आदि स नालियों में जाता है जिसे “अपशिष्ट जल” कहते हैं। वाहित मल, घरों, स्कूलों, होटलों, अस्पतालों, उद्योगों आदि जगहों में उपयोग के बाद वाहित अपशिष्ट जल होता है। वाहित मल द्रवरूपी अपशिष्ट होता है । इसमें अधिकांश जल होता है और घुले हुए निलंबित अपद्रव्य होते हैं। ऐसे अपद्रव्य संदृषक कहलाते हैं। वाहित मल एक जटिल मिश्रण होता है जिसमें निलंबित ठोस कार्बनिक और अकार्बनिक अशुद्धियाँ, पापक तत्व, मृतजीवी और रोगवाहक जीवाणु तथा अन्य सूक्ष्म जीव होते हैं। कार्बनिक अशुद्धियाँ मानव मल, मूत्र, जैविक अशिष्ट, तेल, फल और सब्जी का कचरा आदि। अकार्बनिक अशद्धियाँ नाइट्रेट, फॉस्फेट धातुएँ आदि । हैजा और टायफॉयड़ आदि रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु । पेचिश रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव रहते हैं। सोख्ता गड्ढे का प्रयोग करना चाहिए। दूषित जल से कई तरह के रोग उत्पन्न होते हैं। उनका रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए। एक तालिका बनाते हैं।

Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान 1

Bihar Board Class 7 Science Solutions Chapter 9 गंदे जल का निपटान

मानव मल निपटान के लिए वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए। आज सैप्टिक टैंक, सूखा मोबाइल शौचालय का निर्माण किया जाता है। गंदे जल से निपटान के लिए भी शहरों में व्यवस्था की जाती है। शहरों में तीन प्रकार का नाला, पक्का नाला कच्चा नाला और भूगर्भ नाला । प्रदेश के सभी शहरी क्षेत्रों में भूगर्भ नालो. के साथ वाहित मल उपचार संयंत्र स्थापित करना चाहिए ताकि शहरी क्षेत्र गंदे जल से मुक्त हो सके और गंदे जल का निकास सीधा नदी में न हो। क्योंकि कई तरह की बीमारियाँ तथा जलीय जीव-जन्तुओं का नुकसान होता है। गाँवों में भी गंदे जल का निपटान के लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए। मानव मल से उन्नत खाद ‘बनाया जा सकता है। वायो संयंत्रों का उपयोग कर ऊर्जा की प्राप्ति की जाती है। नागरिकों को जागरूक होना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों को सफाई करनी चाहिए।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4 Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

प्रश्न 1.
(i) एक चर वाले (ii) दो चर वाले समीकरण के रूप में y = 3 का ज्यामितीय निरूपण कीजिए।
उतर:
(i) y = 3 को एक चर वाले समीकरण के रूप में लेते हुए संख्या रेखा पर इसका हल आकृति 4.11 में दर्शाया हैं।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

(ii) हम जानते हैं कि चर x और y वाले रैखिक समीकरण के रूप में हम y = 3 को 0 x + y = 3 के रूप में लिख सकते है। अब x के सभी मान मान्य झेते हैं, क्योंकि सदा ही शून्य होता है। फिर भी y का संबंध y = 3 को अवश्य संतुष्ट करना चाहिए।
अतः दिए गये समीकरण के दो हल x = 0, y = 3 और x = 2, y = 3 हैं।
अतः हमें निम्नलिखित सारणी प्राप्त होती है-
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4
सारणी में दिए गए बिन्दुओं को मिलाने पर हमें एक रेखा प्राप्त होगी जो x-अक्ष के समान्तर होगी तथा x -अस से 3 इकाई ऊपर होगी (देखें आकृति 4.12)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

प्रश्न 2.
(i) 1 एक चर वाले, (ii) दो चर वाले समीकरण के रूप में 2x + 9 = 0 का ज्यामितीय निरूपण कीजिए।
उत्तर:
(i) 2x + 9 = 0 ⇒ x = -9/2
x = -9/2 को एक चर वाले समीकरण के रूप में लेते हुए संख्या रेखा पर इसका हल आकृति 4.13 में दर्शाया गया है-
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

(ii) हम जानते हैं कि चर और । बाले रैखिक समीकरण के रूप में हम x = -9/2 को x + 0. y = -9/2 के रुप में लिख सकते हैं। अब y के सभी मान मान्य होते हैं, क्योंकि 0.y सदा ही शून्य होता है। फिर भी x को संबंध x = -9/2 अर्थात् 2x + 9 = 0 को संतुष्ट करना चाहिए।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

अतः दिए गए समीकरण के दो हल x = -9/2, y = 0 और x = -9/2 y= 2 है।
अत: हमें निम्नलिखित सारणी प्राप्त होती है-
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4
सारणी में दिए गए बिन्दुओं को मिलाने पर हमें एक रेखा प्राप्त होगी जो y – अक्ष के समानर होगी तथा y – अक्ष से वार्यों और 9/2 इकाई दूरी पर होगी (आकृति 4.14)।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.4

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Bihar Board Class 11 Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है।
(क) 1990
(ख) 1998
(ग) 1885
(घ) 1950
उत्तर:
(ख) 1998

प्रश्न 2.
नीचे लिखे गए चार जलवायु के समूहों में से कौन-सा समूह आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता है।
(क) A-B-C-D
(ख) A-C-D-E
(ग) B-C-D-E
(घ) A-C-D-F
उत्तर:
(ख) A-C-D-E

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में किस प्रकार के क्षेत्र में कोपेन की H जलवायु पायी जाती है?
(क) उच्च अक्षांश
(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र
(ग) उच्च तापमान
(घ) अधिक वर्षा
उत्तर:
(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र

प्रश्न 4.
कोपेन द्वारा जलवायु वर्गीकरण के क्या आधार हैं?
(क) तापमान एवं वृष्टि के मासिक मान
(ख) वृष्टि एवं वाष्पीकरण के मासिक मान
(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान
(घ) वाष्पोत्सर्जन के मासिक मान
उत्तर:
(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान

प्रश्न 5.
कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अहंक हैं?
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(ख) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिन्द से अधिक
(ग) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस से नीचे
उत्तर:
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

प्रश्न 6.
जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है ………………
(क) अनुप्रयुक्त
(ख) व्यवस्थित
(ग) जननिक
(घ) आनुभविक
उत्तर:
(ख) व्यवस्थित

प्रश्न 7.
भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा
(क) “Af”
(ख) “BSh”
(ग) “Cfb”
(घ) “Am”
उत्तर:
(घ) “Am”

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तलना करें।
उत्तर:
A उष्णकटिबंधीय जलवायु-उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु मकर रेखा और कक रेखा के बीच माई जाती है। पूरा वर्ष सूर्य के उर्ध्वस्थ तथा अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसर कटिबंध की उपस्थिति के कारण यहाँ की जलवायु उष्ण एवं आर्द्र रहती है। यहाँ वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। जलवायु के इस उष्णकटिबंधीय समूह को तीन प्रकारों में बाँटा जाता है, जिनके नाम हैं –

  • Af उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवाय जो कि विषवत रेखा के निकट पाई जाती है।
  • Am उष्णकटिबंधीय जलवायु जो कि भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण अमेरिका के पूर्वी भाग तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में पायी जाती है।
  • Aw उष्णकटिबंधीय आई तथा शुष्क शीत ऋतु वाली जलवायु जो कि Af प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है।

समूह B शुष्क जलवायु (Dry Climates : B) – यह जलवायु इस ग्रह के बहुत बड़े भाग को ढके हुए है जो विषुवत् रेखा से 15° से 60° उत्तर व दक्षिणी अक्षांशो के बीच विस्तृत है। 15 से 30 के निम्न अक्षांशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है, जहाँ तापमान की गिरावट और उत्क्रमण वर्षा नहीं होने देते। महाद्वीपों के पश्चिमी सीमांतों पर, ठंडी धाराओं के आसन्न, विशेषत: दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर, यह जलवायु विषुवत् रेखा की ओर अधिक विस्तृत है और तटीय भूमि पर पायी जाती है।

मध्य अक्षांशों में विषुवत् रेखा से 35° और 600 उत्तर व दक्षिण के बीच यह जलवायु महाद्वीपों के उन आंतरिक भागों तक परिरुद्ध होतो है जहाँ पर्वतों से घिरे होने के कारण प्रायः समुद्री आई पवनें नहीं पहुंच पातीं। शुष्कं जलवायु को स्टेपी अथवा अर्ध – शुष्क जलवायु (BS) और मरुस्थल जलवायु (Bw) में विभाजित किया जाता है। इसे आगे 15° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण कटिबंधीय (BSh) और उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल (BWh) में बाँटा जाता है। 35° और 60° अक्षांशों के बीच इसे मध्य अक्षांशीय स्टैपी (BSK) तथा मध्य अक्षांशीय मरुस्थल (BWk) में विभाजित किया जाता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

प्रश्न 2.
C एवं A प्रकार की जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएंगे?
उत्तर:
C प्रकार की जलवायु में सदाबहार कोणधारी वन जैसे-पाईन, फर व स्पूस आदि तटीय मरुस्थल में न्यून वनस्पति। A प्रकार की जलवायु में असंख्य वृक्षों के झुण्ड लंबे व घने वृक्ष, कम घने मध्य ऊंचाई के वृक्ष, न्यून वनस्पति, घास, पेड़ व लंबी झाड़ियों की अनुपस्थिति, शैवाल व अन्य जलीय व समुद्रीय पादप समुदाय, पर्णपाती से लेकर टुण्डा प्रकार की वनस्पति।

प्रश्न 3.
ग्रीन हाउस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाउस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर:
वे गैसें जो विकिरण की लंबी तरंगों का अवशोषण करती हैं, हरित गृह गैसें कहलाती हैं। हरित गृह गैसों की उपस्थिति के कारण वायुमंडल एक हरित गृह की भाँति व्यवहार करता है। वायुमंडल प्रवेशी सौर विकिरण परिवेषण भी करता है लेकिन पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर उत्सर्जित होने वाली अधिकतम लंबी तरंगों को अवशोषित कर लेता है।

वर्तमान में चिंता का कारण बनी मुख्य हरित गृह गैसें कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), क्लोरोफ्लोकार्बन्स (CFCs) तथ हैलंस, मिथेन (CH4) नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और ओजोन (O) हैं। कुछ अन्य गैसें जैसे नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) आसानी से हरित गृह गैसों से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमण्डल में उनके सांद्रण को प्रभावित करती हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक घरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
अंग्रेजी के बड़े अक्षर A, C, D, तथा E आर्द्र जलवायु को तथा B अक्षर शुष्क जलवायु को निरूपित करता है।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभाविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जननिक वर्गीकरण (genetic classification) जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास है जबकि आनुमाविक प्रणाली (empirical classification) प्रेक्षित किए गए विशेष रूप से तपमान एवं वर्षण से संबंधित आंकड़ों पर आधारित होता है।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवाकुओं में तापांतर बहुत कम होता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय आई जलायु में वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। इस प्रकार की जलवायु मकर रेखा और कर्क रेखा के बीच पाई जाती है।

प्रश्न 4.
सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रभावित होंगी?
उत्तर:
कुछ मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार सौर कलंकों (Sun Spots) की संख्या बढ़ने पर मौसम ठंडा और आर्द्र हो जाता है और उसमें प्रचण्डता बढ़ जाती है।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
भूमंडलीय जलवायु परिवर्तनों से संबंधित ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ से संबंधित जानकारियाँ एकत्रित कीजिए।
उत्तर:
वायुमण्डल में हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास किए गए हैं। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ है जिसकी उद्घोषणा सन् 1991 में की गई थी। सन् 2005 में प्रभावी हुई इस उद्घोषणा का 141 देशों में अनुमोदन किया है। क्योटो प्रोटोकॉल ने 35 औद्योगिक राष्ट्रों को बद्ध किया है कि वे सन् 1990 के उत्सर्जन स्तर में वर्ष 2012 तक 5% की कमी लायें। तापमान के उपलव्य आँकड़े पश्चिमी यूरोप के हैं, जो 19वीं शताब्दी के मध्य के हैं। इस अध्ययन की संदर्भित अवधि 1961-80 है।

इससे पहले व बाद की अवधियों की तापमान की असंगतियों का अनुमान 1961-90 की अवधि के औसत तापमान में लगाया गया है। पृथ्वी के घरातल के निकट वायु का औसत वार्षिक तापमान लगभग 14° सेल्सियस है। काल श्रेणी 196190 के ग्लोब सामान्य तापमान की तुलना में 1856-2000 के दौरान पृथ्वी के धरातल के निकट वार्षिक तापमान में असंगति को दर्शाती है।

तापमान के बढ़ने की प्रवृत्ति 20वीं शताब्दी में दिखाई दी। 20वीं शताब्दी में सबसे अधिक तापन दो अवधियों में हुआ। 1901-44 और 1977-991 इन दोनों में से प्रत्येक अवधि में भूमंडलीय तापन 0-4 सेल्सियस बढ़ा है। इन दोनों अवधियों के बीच थोड़ा शीतलन भी हुआ जो उत्तरी गोलार्द्ध में अधिक चिह्नित था।

20वीं शताब्दी के अंत में औसत वार्षिक तापमान का वैश्विक अध्ययन 19वीं शताब्दी में दर्ज किए गए तापमान में 0.6° सेल्सियस अधिक था। 1856-2000 के दौरान सबसे गर्म साल अतिम दशक में दर्ज किया गया था। सन् 1998 संभवतः न केवल 20वीं शताब्दी का बल्कि पूरी सहस्राब्दि का सबसे गर्म वर्ष था।

Bihar Board Class 11 Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘चीन तुल्य’ जलवायु किस क्षेत्र में पाई जाती है?
उत्तर:
इस प्रकार की जलवायु दक्षिणी-पूर्वी चीन, संयुक्त राज्य, अर्जेन्टीना, दक्षिणी-ब्राजील, जापान तथ आस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर पाई जाती है।

प्रश्न 2.
कोणधारी वन किस क्षेत्र में पाए जाते हैं?
उत्तर:
कोणधारी वन टैगा जलवायु क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसमें उत्तरी अमेरिका तथा युरेशिया। उत्तरी भाग शामिल है।

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प्रश्न 3.
टुण्डा जलवायु की क्या विशेषता है?
उत्तर:
इसमें कठोर ठंड वाली शीत ऋतु, ठंडी ग्रीष्म ऋतु, जिसका औसत तापमान 10°c से ऊपर नहीं होता, पाई जाती है।

प्रश्न 4.
कोपेन का वर्गीकरण कितने वर्गों में बंटा है?
उत्तर:
कोपेन का वर्गीकरण मुख्य रूप से 6 वर्गों में बंट है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के Capital Letters द्वारा लिखा जाता है।

  1. Tropical Rainy Climates (आई उष्णकटिबंधीय जलवायु)
  2. Dry Climates (शुष्क जलवायु)
  3. Warm Temperatures Climates (आई शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु)
  4. Cool Temperate Climates (शीतल हिम-वन जलवायु)
  5. Polar Climates (ध्रुवीय जलवायु)
  6. High Mountain Climates (उच्च पर्वतीय जलवायु)

प्रश्न 5.
जैतून (Olive) किस प्रदेश के प्रतिनिधि वृक्ष हैं?
उत्तर:
जैतून कैलीफोर्निया, मध्य चिल्ली तथा दक्षिणी अफ्रीका का प्रतिनिधि वृक्ष है। यह भूमध्य सागरीय जलवायु में पाया जाता है। इसकी जड़ें लम्बी और तने मोटे होते हैं।

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प्रश्न 6.
जलवायु विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
तापमान, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता-इन वायुमंडलीय अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले शास्त्र को जलवायु विज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 7.
उन तत्त्वों के नाम बताएं जिनके आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
जलवायु का वर्गीकरण निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया जाता है –

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वाष्पीकरण
  4. वाष्पोत्सर्जन
  5. जल संतुलन

प्रश्न 8.
दो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं के नाम बताएं जिनके नाम पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
थानवेट तथा कोपेन दो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हैं जिनके नाम पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया। प्रसिद्ध वर्गीकरण है –

  1. थार्नवेट वर्गीकरण
  2. कोपेन वर्गीकरण

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प्रश्न 9.
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में किस प्रकार के जलवायु आँकड़े प्रयोग किए जाते हैं।
उत्तर:

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वर्षा तथा तापमान का वनस्पति से सम्बन्ध कोपेन ने इन आंकड़ों के आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया।

प्रश्न 10.
मानसून जलवायु वाले क्षेत्र में किस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है?
उत्तर:
मानसून जलवायु वाले क्षेत्र में सदाबहार वन (महोगनी, देवदार) मिलते हैं। साल, सागवान मानसून धन में पाए जाते हैं, कम वर्षा वाले शुष्क वनों में झाड़ियाँ मिलती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्विवार्था के जलवायु वर्गीकरण के उद्देश्य स्पष्ट थे?
उत्तर:
उनका मानना था कि भूगोलवेत्ता, जीव वैज्ञानिक अथवा किसान, जैसे लोगों, को जिन्हें जलवायविक पर्यावरण को, अपने-अपने उद्देश्यों को समझने तथा उपयोग करने की आवश्यकता पड़ती है जलवायु के तथ्यों को सही जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ उन्होंने जलवायु के जननिक प्रकार के वर्गीकरण के गुणों को भी स्वीकार किया। उनके अनुसार-‘उत्पति’ न केवल रुचि बढ़ाती है, बल्कि वर्णन को समझने में विद्यार्थियों को अंत:दृष्टि का अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन की मात्रा बढ़ने से जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन गैस की वायुमण्डल में निरंतर वृद्धि से तापमान इस सीमा तक बढ़ जायगा कि इससे ग्रीनलैण्ड तथा अंटार्कटिका महाद्वीप में बर्फ पिघलनी आरम्भ हो जाएगी। फलतः समुद्र तक ऊपर उठगा जिससे तटीय भाग तथा द्वीप डूब जाएंगे। इससे वाष्पन एवं वर्षा के प्रतिरूपों में परिवर्तन आयेगा, पौधों की नई-नई बीमारियाँ तथा नाश आदि की समस्याएँ खड़ी होंगी और अंटार्कटिका के ऊपर स्थित ओजोन छिट बडा हो जायगा।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर कम से कम होता है?
उत्तर:
भूमध्यरेखीय खंड में वार्षिक तापान्तर सबसे कम होता है। यह प्रायः 5° सेमी से कम होता है। इस खंड में वर्ष भर समान रूप से वर्षा होती है तथा मेघ छाए रहते हैं। कम तापमान मिलते हैं तथा दिन-रात सदा समान होते हैं। परिणामस्वरूप वार्षिक तापान्तर होता है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डलीय प्रभाव किस प्रकार कार्य करता है?
उत्तर:
भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह प्रभाव कहते हैं, जिसे सामान्यतः वायुमंडलीय प्रभाव भी कहते हैं। वायुमण्डल का प्रभाव एक शीशे की भाँति काम करता है, जो आने वाली सौर ऊर्जा की, लघु तरंगों को अपने से होकर गुजरने देता है, लेकिन बाहर जाने वाली पार्थिव विकिरण की दीर्घ तरंगों को रोकता है। वायुमण्डलीय प्रभाव को समझने के लिए खिडकियाँ बंद करके अपनी कार को दो घंटों के लिए धूप में खड़ी कर दीजिए। अब कार के अंदर के तापमान का अनुभव कीजिए। यह बाहर के तापमान से अधिक होगा। शीत ऋतु में हरित गृह में काँच की छत की पारदर्शिता का उपयोग लघु तरंगों को ट्रैप करके टमाटर उगाने के लिए किया जा सकता है। चित्र में वायुमण्डलीय प्रभाव को दिखाया गया है।
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प्रश्न 5.
चीन तुल्य जलवायु वाले प्रदेशों के जलवायु लक्षण तथा वनस्पति का वर्णन करों।
उत्तर:
लक्षण-यह जलवायु चीन दक्षिणी-पूर्वी, संयुक्त राज्य, अर्जेन्टीना, दक्षिणी-ब्राजील, जापान तथा आस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर पाई जाती हैं। वार्षिक औसत तापमान 19°C तथा वर्षा 120 सेमी भी होती है। यहाँ हरिकेन तथा टाईफन भयानक रूप से चलते हैं। यहाँ ग्रीष्म और आई ऋतुएँ होती हैं। शीत ऋतु में हल्की ठंड पड़ती है। … प्राकृतिक वनस्पति-इस खंड में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन मिलते हैं। मैदानी भाग में ओक, कपूर, शहतूत, यूकेलिप्टस प्रमुख हैं, पर्वतीय भाग में पाईन तथा साइप्रस के कोणधारी वन मिलते हैं।

प्रश्न 6.
पश्चिमी यूरोपीय जलवायु उत्तरी दक्षिणी अमेरिका में केवल पतली समुद्र तटीय पट्टियों में ही क्यों पाई जाती है?
उत्तर:
उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में पश्चिमी यरोपीय खंड एक तंग पड़ी के रूप में चिली और कनाडा में मिलता है। निरंतर ऊँचे रॉकीज तथा एण्डीज पर्वतों की रोक के कारण इस खंड का विस्तार सीमित है। इस प्रकार की जलवायु 40° से 60° अक्षांशों के मध्य पाई जाती है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 10°C तथा वर्षा 140 सेमी के लगभग होती हैं। यहाँ समुद्र की निकटता, उष्ण सागरीय धाराओं तथा चक्रवातों के कारण सारा वर्ष परिवर्तनशील मौसम रहता है जो शारीरिक तथा मानसिक विकास के अनुकूल होता है। पश्चिमी पवनें वर्ष भर पर्याप्त वर्षा करती है।

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प्रश्न 7.
जलवायु विज्ञान की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर वायु का एक विस्तृत आवरण फैला हुआ है। तापमान, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता-इन वायुमंडलीय अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले शास्त्र को जलवाय विज्ञान कहते हैं। इनमें केवल वायुमण्डलीय क्रियाओं का ही नहीं अपितु जलवायु के विभिन्न तत्त्वों एवं नियंत्रकों का भी अध्ययन किया जाता है। जलवायु प्राकृतिक आवरण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह कृषि, सिंचाई भूमि उपयोग, परिवहन तथा मानवीय जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 8.
जलवायु का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?
उत्तर:
जलवायु में बहुत प्रकार की क्षेत्रीय विभिन्नताएं पाई जाती हैं। इसलिए जलवायु को कुछ मुख्य वर्गों में बांटा गया है। अनेक विधियों के आधार पर वर्गीकरण किया गया, परंतु कोई भी वर्गीकरण सर्वगुण संपन्न नहीं है। संसार की मुख्य जलवायु का वर्गीकरण निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया गया है –

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वाष्पीकरण
  4. वाष्पोत्सर्जन
  5. जल संतुलन

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रकार की जलवायु की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताइए

  1. सवाना जलवायु
  2. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु
  3. मानसूनी जलवायु
  4. भूमध्य रेखीय जलवायु
  5. भूमध्य-सागरीय जलवायु
  6. टैगा जलवायु
  7. टुण्डा जलवायु

उत्तर:

  1. सवाना जलवायु – वर्ष भर ऊँचा तापमान, आई ग्रीष्म ऋतु तथा शुष्क शीत ऋतु।
  2. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु – उच्चतम तापमान, 58° वर्षा कम, शुष्क ऋतु।
  3. मानसूनी जलवायु – गर्मियों में भारी वर्षा, शीत ऋतु, शुष्क।
  4. भूमध्य रेखीय जलवायु – अधिक वर्षा 35 से 90 सेमी, ग्रीष्म ऋतु में तापमान 25°C, शीत ऋतु में तापमान 10°C से भी कम।
  5. भूमध्य – सागरीय जलवायु-उष्ण और शुष्क ग्रीष्म ऋतु, मृदु शीत ऋतु, साधारण वर्षा शीत ऋतु में।
  6. टैगा जलवायु – छोटी ग्रीष्म ऋतु 10°C से 15°C तापमान, लंबी और कठोर शीत ऋतु, कम वर्षा गर्मी के महीनों में।
  7. टुण्ड्रा – कठोर ठंड वाली शीत ऋतु, ठंडी ग्रीष्म ऋतु, जिसका औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं होता।

प्रश्न 10.
मरुस्थलीय जलवायु तथ स्टेपी जलवायु में क्या अंतर है?
उत्तर:
मरुस्थलीय जलवायु तथा स्टेपी जलवाय में अंतर –
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प्रश्न 11.
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु 20° से 40° अक्षांशें के मध्य अनियमित पट्टी में क्यों पाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उष्णकटिबंधीय आई जलवायु 20 से 40 अक्षांशों के बीच एक अनियमित पट्टी के रूप में फैली हुई है। यहाँ का तापमान तथा वर्षा पूरे वर्ष भर अत्यधिक रहती है।

  • इस जलवायु क्षेत्र के आंतरिक भाग उपार्द्र होते हैं।
  • यह जलवायु विषुवत् रेखा के दोनों ओर लगभग 5 से 10 अक्षांशों के मध्य पाई जाती है।
  • महाद्वीपों के पूर्वी भाग में यह उपोष्ण जेट धारा तथा अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र के प्रभाव में रहती है।
  • महाद्वीपों के पूर्वी भागों में इनका विस्तार काफी अधिक है, क्योंकि व्यापारिक पवनें उत्तर:पूर्व से तटों की ओर आती हैं।

प्रश्न 12.
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अपेक्षा ट्विार्था के जलवायु वर्गीकरण के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोपेन का वर्गीकरण तापमान एवं वर्षण के मासिक तथा वार्षिक माध्यमों पर आधारित था। ट्रिवार्थी ने भी कोपेन के नियमों का अनुसरण किया।

दिवाओं के जलवायु वर्गीकरण के लाभ –

  • यह वर्गीकरण जननिक आधार पर किया गया है।
  • यह सरल तथा वर्णनात्मक है।
  • ट्रिवार्था ने केवल सीमित संख्या में, जो 15 से कम है, जलवायविक प्रकारों की पहचान की।
  • जलवायु के तथ्यों की सही जानकारी देती है।
  • जलवायु के विश्लेषण में वैज्ञानिक गुणवत्ता को बढ़ाती है।
  • वर्णन को समझने के लिए विद्यार्थियों को अंतर्दृष्टि का अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल में कार्बन वितरण का वर्णन कीजिए तथा कार्बन चक्र एवं ग्रीन हाऊस प्रभाव के मध्य सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
तीन प्रमुख हरित गृह गैसें-कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मिथेन (CH5), तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (CFC) में कार्बन होता है, जो पर्यावरण का सबसे सामान्य तत्त्व है, यह सभी जैविक पदार्थों में मौजूद है तथा साधारण गैस से लेकर पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन के अति विषम व्युत्पन्नों तका का एक घटक है, पर्यावरण में उपस्थित कार्बन गतिशील है। यह गतिशीलता एक’ प्राकृतिक जैव भू-रासायनिक चक्र द्वारा नियंत्रित की जाती है। सामान्यतः प्राकृतिक कार्बन चक्र स्वमेव नियमित होता है। तंत्र में कार्बन अनेक बड़े भंडारों से होकर गुजरता है।

वायुमण्डल में 750 अरब टन कार्बन रहता है, जबकि 2,000 अरब टन कार्बन स्थल तथा 4,000 अरब टन कार्बन महासागरों में संचित है, जैविक पदार्थ लगभग 450 से 600 अरब टन कार्बन अपने में रखता है, जो वायुमण्डल में संचित कार्बन से कुछ कम है। विश्व जीवश्मी इंधन भण्डार भी लगभग 5,000 अरब टन कार्बन का मुख्य भंडार है। इनके द्वारा रखे गए कार्बन लाखों वर्षों से कार्बन चक्र में शामिल नहीं है। जीवाश्मी ईधन को जलाने से प्रतिवर्ष वायुमण्डल में पाँच अरब टन कार्बन की मात्रा जोड़ दी जाती है।

मानव जनित कार्बन का प्राथमिक स्रोत जीवाश्मी ईंधन का उपयोग है। प्राकृतिक वनस्पति के विनाश से इसका संवर्धन होता है, क्योंकि प्राकृतिक वनस्पति प्रकाश संश्लेषण के दौरान पुनर्चक्रित कार्बन की मात्रा को घटाता है। ये प्रक्रियाएँ वर्तमान मानवजनित कार्बन निष्कासन के 5 से 20 प्रतिशत भाग के लिए उत्तरदायी हैं। 1850 और 1950 के बीच लगभग 120 अरब टन कार्बन, वनोन्मूलन तथा आग द्वारा अन्य वनस्पति के विनाश के फलस्वरूप वायुमण्डल में छोड़ा गया।

हरित गृह तथा कार्बन – चक्र में संबंध-वायुमण्डलीय गैसों के परमाणु एवं अणु हरित गृह गैसों, विशेषकर जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा मिथेन द्वारा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण तथा पश्च विकिरण करते हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड ज्वालामुखी क्रियाओं द्वारा लाया जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड की उतनी ही मात्रा वर्षण द्वारा हटा दी जाती है। मिथेन लकडी में बैक्टीरिया के उपापचय तथा घास चरने वाले पशुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है।

औद्योगिक तथा परिवहन क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसें पहुँचाई जाती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई मात्रा भूमण्डलीय तापमान को बढ़ाने का काम करती है। भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह प्रभाव कहते हैं। यह एक शीशे की भाँति काम करता है। यह भपृष्ठीय तापमान को उस तापमान से ऊँचा रखता है, जो इस प्रक्रिया के अभाव में होता है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण
  2. उपोष्ण जलवायु
  3. भूमण्डलीय जलवायु परिवर्तन।

उत्तर:
1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण – जर्मनी के प्रसिद्ध जलवायु वैज्ञानिक डॉ. कोपेन ने सन् 1936 में जलवायु वर्गीकरण की योजना बनाई। यह वर्गीकरण तापमान और वर्षा पर आधारित है। इसमें तापमान और वर्षा के संख्यात्मक मूल्यों का प्रयोग किया गया है। इन आंकड़ों को प्राकृतिक वनस्पति के विकास का आधार माना गया है। इसके अनुसार प्राकृतिक वनस्पति का विकास वर्षा की प्रभावशीलता पर निर्भर करता है। जलवायु प्रकारों की सीमाओं का निर्धारण करते समय अधिक गर्म तथा सबसे ठंडे महीनों के तापमान को आधार बनाया गया है। कोपेन का वर्गीकरण मुख्य रूप से 6 वर्गों में बँटा है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के Capital Letter द्वारा लिखा गया है
(A) आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु
(B) शुष्क जलवायु
(C) आई शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु
(D) शीतल हिम-वन
(E) ध्रुवीय जलवायु
(F) उच्च पर्वतीय जलवायु

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण:
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2. उपोष्ण जलवायु – यह जलवायु उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के बीच पाई जाती है। इस प्रकार की जलवायु में तापमान वर्ष के 8 महीने 18° से ऊपर रहता है। शीत ऋतु अल्पकालीन होती है। तटीय भागों में वर्ष भर वर्षा होती है। वर्षा वितरण के आधार पर उपोष्ण जलवायु दो प्रकार की है

(क) उपोष्ण आर्द्र (cfw) – यह महाद्वीपों के पूर्वी भागों में मिलती है। इस जलवायु में वर्ष भर वर्षा होती है।
उपोष्ण शुष्क ग्रीष्म – इस प्रकार में मध्यम वर्षा से कम वर्षा प्राप्त होती है। वर्षा सर्दियों में होती है, जबकि गर्मियाँ शुष्क होती हैं।

3. भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन – वायुमण्डल प्रकृतिवश गतिशील है। इसमें होने वाले परिवर्तन क्षेत्रीय होने के साथ-साथ समयानुसार भी होते हैं। ये परिवर्तन पृथ्वी के वायुमंडलीय प्रणाली में अंत: प्रेरित हो सकते हैं, अथवा पार्थिवेतर कारकों द्वारा बहिप्रेरित हो सकते हैं। भूमण्डलीय ऊष्मन एक ऐसा ही परिवर्तन है, जो मानव द्वारा लगातार और अधिकाधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ‘हरित गृह’ गैसों को वायुमण्डल में पहुंचाए जाने से उत्पन्न हुआ है।

वायुमण्डलीय गैसों के परमाणु एवं अणु हरित गृह गैसों द्वारा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण तथा पश्च विकिरण करते हैं। वायुमण्डल में CO2 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा लाई जाती है। CO2 की उतनी ही मात्रा वर्षण द्वारा हटा दी जाती है। मिथेन, जो CO2 से बीस गुना अधिक प्रभावशाली है, लकड़ी में बैक्टीरिया के उपापचय तथा घास चरने वाले पशुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है। मिथेन का शीघ्रता से कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकरण होता है।

मानवीय क्रियाओं, जैसे जीवाश्मी तेल को जलाने तथा विभिन्न कृषकीय क्रियाओं द्वारा मिथेन एवं कार्बन डाईऑक्साइड वायुमण्डल में जमा की जा रही है। वायुमण्डल में CO2 की मात्रा सम्पूर्ण विश्व की जलवायु बदलने में मुख्य भूमिका अदा करती है। इससे यह स्पष्ट है कि CO2 की मात्रा में परिवर्तन वायुमण्डल के निचले स्तर के तापमान में परिवर्तन लायेगा।

तीन औद्योगीकरण तथा कृषि और परिवहन क्षेत्रों में हुई तकनीकी क्रांति से भी वायुमण्डल में CO2 मिथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन की मात्रा बढ़ी है। इनमें से कुछ गैसें पेड़-पौधों द्वारा उपभोग कर ली जाती हैं तथा कुछ भाग महासागरों में घुल जाता है। फिर भी 50% वायुमण्डल में बच जाता है। चावल उत्पादन करने वाले किसान, कोयला खनिज, डेरी में लगे लोग तथा स्थानांतरी कृषक भी भूमण्डलीय ऊष्मन में अपना योगदान देते हैं। भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

प्रश्न 3.
जलवायु तथा मौसम में क्या अंतर है? उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
मौसम के मुख्य तत्त्व हैं-तापक्रम, दबाव, हवाएँ, नमी, मेघ और वर्षा। वायुमण्डल की इन दशाओं का अध्ययन ही जलवायु या मौसम है।

मौसम – मौसम का अर्थ किसी स्थान पर किसी विशेष या निश्चित समय में वायुमण्डल की। दशाओं, तापक्रम, दबाव, हवाओं, नमी, मेघ और वर्षा के कल जोड का अध्ययन करना है। इसलिए मौसम मानचित्रों पर दिन व समय अवश्य लिखे जाते हैं। मौसम प्रतिदिन, प्रति सप्ताह, प्रति मास बदलता रहता है।

एक ही स्थान पर कभी मौसम गर्म, कभी उमस वाला, कभी आई हो सकता है। इंगलैण्ड में दिन-प्रतिदिन के मौसम में इतनी विभिन्नता है कि कहा जाता है, “Britain has no climate, only weather” इस प्रकार वायुमण्डल की बदलती हुई अवस्थाओं को मौसम कहा जाता है। आकाशवाणी से मौसम की स्थितियों का प्रसारण भी होता है।

जलवायु – किसी स्थान की जलवायु उस स्थान पर एक लम्बे समय की वायुमंडल की दशाओं के कुल योग का अध्ययन होती है। यह एक लम्बे समय का औसत मौसम होती है। जलवाय तथा मौसम में भिन्नता समय पर निर्भर करती है। मौसम का सम्बन्ध थोडे समय से है जबकि जलवायु का सम्बन्ध एक लम्बे समय से है।

मिन का हर रोज एक जैसा मौसम न होने के कारण जलवायु तथा मौसम में कोई अंतर नहीं है। इसलिए कहा जाता है, “Egypt has no weather, only climate.” इस प्रकार किसी स्थान पर कम से कम पिछले 35 वर्षों के मौसम की औसत दशाओं को उस स्थान पर जलवायु कहते हैं। भारतीय जलवायु के अध्ययन के आँकड़ों का सम्बन्ध पिछले 100 वर्षों से है।

उदाहरण – दिल्ली में किसी विशेष दिन अधिक वर्षा हो तो हम कहते हैं कि आज मौसम आई है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि दिल्ली की जलवायु ‘आई’ है। दिल्ली में ग्रीष्मकाल में अधिक वर्षा होती है तथा जलवायु मानसूनी है।

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प्रश्न 4.
मनुष्य के लिए जलवायु विज्ञान का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
जलवायु सबसे व्यापक और शक्तिशाली तत्त्व है जो कि मानवीय जीवन पद्धति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती है। मानवीय क्रियाकलापों, स्वास्थ्य, भोजन वस्त्र, मकान, परिवहन तथा संस्कृति आदि पर जलवायु का व्यापक नियंत्रण रहता है।

1. जलवायु तथा भोजन – जलवायु मानव के जीवन को निर्धारित करती है। ठंडे प्रदेशों में शरीर की उष्णता बनाए रखने के लिए मांस, मदिरा तथा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। उष्ण प्रदेशों में कम मात्रा में भोजन का प्रयोग किया जाता है। मानसूनी जलवायु में चावल मुख्य भोजन है। शीत-कृष्ण जलवायु में डेयरी पदार्थों का अधिक प्रयोग किया जाता है। शुष्क प्रदेशों में बकरी, भेड़ तथा ऊँट के दूध का प्रयोग किया जाता है।

2. जलवायु तथा वस्व – जलवायु की विभिन्नता के अनुसार वस्त्रों के उपयोग में भी विभिन्नता पाई जाती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में वस्त्रों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। ठंडे प्रदेशों में ऊनी वस्त्र प्रयोग किए जाते हैं। टुण्डा प्रदेश में खाल या समूर के वस्त्र पहने जाते हैं।

3. जलवायु तथा मकान – मकानों की रचना पर जलवायु का प्रभाव पड़ता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बलानदार छतें बनाई जाती है। टुण्ड्रा प्रदेश में बर्फ से बने घर (इग्लू) बनाए जाते हैं। भूमध्य खण्ड में लोग झोपड़ियों में निवास करते हैं, जबकि मध्य एशिया के किरगीज लोग तम्बओं में रहते हैं।

4. जलवायु तथा कृषि – जलवायु कृषि को निर्धारित करती है। अधिक वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण मानसूनी प्रदेशों में चावल की कृषि होती है तथा वर्ष में तीन-तीन फसलें पैदा होती हैं। टुण्ड्रा प्रदेश में कम तापमान के कारण कृषि नहीं होती। शुष्क प्रदेशों में सिंचाई से फसलें उत्पन्न की जाती हैं। .

5. जलवायु तथा कार्य क्षमता – जलवायु मनुष्य के स्वास्थ्य, शारीरिक तथा मानसिक विकास पर प्रभाव डालती है। शीत जलवायु प्रदेश के लोग परिश्रमी व साहसी होते हैं तथा उनकी कार्यक्षमता अधिक होती है। उष्ण प्रदेशों के लोग आलसी तथा कम परिश्रमी होते हैं तथा इनका मानसिक विकास भी कम होता है । उष्ण-आर्द्र भूमध्यरेखीय जलवायु में कई बीमारियों तथा कीड़ों के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

6. जलवायु तथा मानवीय क्रियाकलाप – मानवीय क्रियाओं के निर्धारण में जलवायु एक महत्त्वपूर्ण कारक है। आई प्रदेशों में सूती वस्त्र उद्योग, शुष्क प्रदेशों में फिल्म उद्योग तथा सागरीय जलवायु में फलों पर आधारित उद्योग स्थापित हैं। जलवायु आर्थिक विकास तथा सभ्यता के विकास में एक सम्पन्न भौगोलिक तत्त्व है। शीत-उष्ण प्रदेशों में अनुकूल जलवायु के कारण ही जनसंख्या अधिक है। जलवायु का प्रभाव परिवहन साधनों तथा व्यापारिक मार्गों पर भी पड़ता है। इस प्रकार जलवायु मानवीय क्रियाकलापों, सभ्यता तथा जीवन पद्धति पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 5.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. जलवायु का जननिक एवं आनुभाविक वर्गीकरण
  2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु तथा उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु
  3. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु

उत्तर:
1. जलवायु का जननिक एवं आनुभाविक वर्गीकरण –
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2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु तथा उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु –
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3. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु –
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प्रश्न 6.
ट्विार्था द्वारा बनाए गए बड़े जलवायु समूहों का वर्णन कीजिए। इसके वर्गीकरण के क्या आधार हैं?
उत्तर:
ट्रिवार्था ने तापमान तथा वर्षा के आधार पर विश्व की जलवायु को 6 बड़े जलवायु समूहों में बाँटा है। इन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में चिह्नित किया गया है। इसमें से पाँच-‘ए’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘एफ’ तापमान पर आधारित हैं और छठा ‘बी’ शुष्क वर्ग में है, जो वर्षा पर आधारित है।

तापमान के आधार पर जलवायु समूह –
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (ए) – यह जलवायु विषुवत् रेखा के साथ 20° से 40° अक्षांशों के मध्य अनियमित पट्टी के रूप में फैली हुई है। तटीय क्षेत्रों में सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18° से. से ऊपर रहता है। ‘ए’ जलवायु क्षेत्र के आंतरिक भाग उपार्द्र होते हैं। इसे उष्णकटिबंधीय आई जलवायु कहते हैं।

महाद्वीपों के पूर्वी भागों में यह जलवायु अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र तथा उपोष्ण जेट धारा के प्रभाव में रहती है। इसे उष्णकटिबंधीय वर्षा वन भी कहते हैं। उष्णकटिबंधीय आई एवं शुष्क जलवायु में शीत ऋतु शुष्क होती है। इस जलवायु को सवाना जलवायु भी कहते हैं।

उपोष्ण जलवायु ‘सी’ – यह जलवायु उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के बीच पाई जाती है यहाँ तापमान वर्ष के 8 महीने 18° से. से ऊपर रहता है। तटीय भाग में वर्ष भर वर्षा होती है। ऋतुनिष्ठ वर्षा वितरण के आधार पर उपोष्ण जलवायु दो प्रकार की है-उपोष्ण आर्द्र तथा उपोष्ण शुष्क ग्रीष्म।

  • उपोष्ण आर्द्र – वर्ष भर वर्षा होती है।
  • उपोष्ण शुष्क – मध्य से कम वर्षा। वर्षा सर्दियों में होती है।

शीतोष्ण जलवायु ‘डी’ – यह मध्य अक्षांशों (40 से 65° उत्तर – दक्षिण) के विस्तृत भू-भागों में मिलती है। शीतोष्ण जलवायु के दो प्रकार हैं

  • शीतोष्ण जलवायु – शीत ऋतु मृदु तथा ग्रीष्म ऋतु कुछ गर्म होती है। वर्ष भर औसतन तापमान 0°C से ऊपर रहता है और वर्षा होती है।
  • शीतोष्ण महाद्वीपीय जलवायु – शीत ऋतु अत्यधिक सर्द तथा ग्रीष्म ऋतु शीतल होती हैं। वार्षिक वर्षा कम है। भूमि का शीतलन प्रतिचक्रवातों से जुड़ा है।

बोरियल जलवायु ‘ई’ – उच्चतर-मध्य अक्षांशों में यह जलवायु मिलती है। ग्रीष्म ऋतु छोटी और शीतल होती है। वार्षिक तापमान 0° से 10°C के मध्य रहता है। वर्षा बहुत कप और गर्मियों में होती है। विश्व के शंकुधारी वनों में यह जलवायु देखने को मिलती है।

ध्रुवीय जलवायु ‘एफ’ – ध्रुवीय जलवायु उच्च अक्षांशों तथा हिमालय के आल्प्स पर्वतों के ऊँचे भागों में मिलती है। औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं जाता । यहाँ गर्मियों का मौसम नहीं होता। तापमान के आधार पर ध्रुवीय जलवायु को दो प्रकारों में बाँटा गया है

  • टुण्डा जलवायु – यह केवल उत्तरी-गोलार्द्ध में पाई जाती है। यह चरम शीत प्रदेश है। यहाँ स्थाई रूप से पाला रहता है।
  • हिमटोप जलवायु – यह ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भागों में पाई जाती है। गर्मियों में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है। इस क्षेत्र में वर्षा थोड़ी मात्रा में होती है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.2

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BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 4 दो चरों वाले रैखिक समीकरण Ex 4.2

प्रश्न 1.
निम्नलिखित विकल्पों में कौन-सा विकल्प सत्य है और क्यों?
y = 3x + 5 का
(i) एक अद्वितीय हल है
(ii) केवल दो हल हैं
(iii) अपरिमित रूप से अनेक हल हैं।
उत्तर:
दिया गया समीकरण] = 3x +5, दो घरों वाला एक रैखिक समीकरण है।
अतः के विभिन्न मानों के लिए के विभिन्न मान प्राप्त करते।
जैसे- यदि x = 0 तो y = 3 × 0 + 5 = 5 होगा।
यदि x = 1 तो y = 3 × 1 + 5 = 8 होगा।
अत: दिये गये रैखिक समीकरण के अपिरिमित रूप से अनेक हल है। विकल्प (i) सही है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित समीकरणों में से प्रत्येक समीकरण के चार हल लिखिए।
(i) 2x + y = 7
(ii) πx + y = 9
(iii) x = 4y
उत्तर:
(i) 2x + y = 7
अतः y = 7 – 2x
यदि x = 0 है तो, y = 7 – 2 × 0 = 7
यदि x = 1 है तो. y = 7 – 2 × 1 = 5
यदि x = 2 है तो. y = 7 – 2 × 2 = 3
यदि x = 3 है तो, y = 7 – 2 × 3 = 1
∴दिए गए समीकरण के चार हल है. (0, 7), (1, 5), (2, 3) और (3, 1)

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(ii) πx + y = 9
अतः y = 9 – πx
यदि x = 0 है तो, y = 9 – π × 0 = 9
यदि x = 1 है तो. y = 9 – π × 1 = 9 – π
यदि x = 2 है तो. y = 9 – π × 2 = 9 – 2π
यदि x = 3 है तो, y = 9 – π × 3 = 9 – 3π
∴दिए गए समीकरण के चार हल है. (0, 9), (1, 9 – π), (2, 9 – 2π) और (3, 9 – 3π)

(iii) x = 4y
अतः y = x/4
यदि x = 0 है तो, y = 0/4 = 0
यदि x = 1 है तो. y = 1/4
यदि x = 2 है तो. y = 2/4 = 1/2
यदि x = 3 है तो, y = 3/4
∴ दिए गए समीकरण के चार हल है. (0, 0), (1, 1/4), (2, 1/2) और (3, 3/4)

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प्रश्न 3.
अताइए कि निम्नलिखित हालों में कौन-कौन समीकरण x – 2y = 4 के हल हैं और कौन-कौन हल नहीं है-
(i) (0, 2)
(ii) (2, 0)
(iii) (4, 0)
(iv) √2.4√2
(v) (1, 1)
उत्तर:
(i) (0, 2)
x = 0 तथा y = 2 समीकरण x – 2y = 4 के बाएँ पक्ष में रखाने पर,
बायाँ पक्ष = x – 2y
= 0 – 2 × 2 = -4 ≠ दायाँ पक्ष
अत: (0, 2) समीकरण x – 2y = 4 का हल नहीं है।

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(ii) (2, 0)
x = 2 तथा y = 0 समीकरण x – 2y = 4 के बाएँ पक्ष में रखने पर.
बायाँ पक्ष x = x – 2y
= 2 – 2 × 0
= 2 ≠ दायाँ पक्ष
अत: (2, 0) समीकरण x – 2y = 4 का हल नहीं है।

(iii) (4, 0)
x = 4 तथा y = 0 समीकरण x – 2y = 4 के बाएँ पक्ष में रखने पर.
बायाँ पक्ष = x – 2y
= 4 – 2 × 0 = 4 = दायाँ पक्ष
अतः (4, 0) समीकरण x – 2y = 4 का हल नहीं है।

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(iv) √2.4√2
x = √2 तथा y = 4√2 समीकरण x – 2y = 4 के बाएँ पक्ष में रखने पर.
बायाँ पक्ष = x – 2y
= √2 – 2 × 4√2
= √2 – 8√2 = -7√2 ≠ दायाँ पक्ष
अतः (√2.4√2) समीकरण x – 2y = 4 का हल नहीं है।

(v) (1, 1)
x = 1 तथा y = 1 समीकरण x – 2y = 4 के बाएँ पक्ष में रखने पर.
बायाँ पक्ष = x – 2y
= 1 – 2 × 1 = -1 ≠ दायाँ पक्ष
अतः (1, 1) समीकरण x – 2y = 4 का हल नहीं है।

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प्रश्न 4.
k का मान ज्ञात कीजिए जबकि x = 2, y = 1 समीकरण 2x + 3y = k का एक हल हो।
उत्तर:
यदि x = 2, y = 1 समीकरण 2x + 3y = k का एक हल है तो ये समीकरण को सन्तुष्ट करेंगे।
2 × 2 + 3 × 1 = k
k = 4 + 3
k = 7

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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल में जल Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव के लिए वायुमण्डल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है ……………….
(क) जलवाष्प
(ख) धूल कण
(ग) नाइट्रोजन
(घ) ऑक्सीजन
उत्तर:
(क) जलवाष्प

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन सी है जिसके द्वारा जल द्रव से गैस में बदल जाता है ……………….
(क) संघनन
(ख) वाष्पीकरण
(ग) वाष्पोत्सर्जन
(घ) अवक्षेपण
उत्तर:
(ख) वाष्पीकरण

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है?
(क) सापेक्ष आर्द्रता
(ख) निरपेक्ष आर्द्रता
(ग) विशिष्ट आर्द्रता
(घ) संतृप्त हवा
उत्तर:
(घ) संतृप्त हवा

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन-सा है?
(क) पक्षाभ
(ख) वर्षा मेघ
(ग) स्तरी
(घ) कपासी
उत्तर:
(घ) कपासी

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वषर्ण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:
उत्पत्ति के आधार पर वर्षा के तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवहनीय वर्षा
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. चक्रवाती वर्षा

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

  1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute humidity) – वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहा जाता है।
  2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative humidity) – दिये गये तापमान पर अपनी पूरी क्षमता की तुलना में मौजूद आर्द्रता के प्रतिशत को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
  3. संतृप्त आर्द्रता (Saturated humidity) – दिये गये तापमान पर जलवाष्प से पूरी तरह पूरित हवा को संतृप्त आर्द्रता कहते हैं।

प्रश्न 3.
(i) ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों बढ़ती है?
उत्तर:
वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण तथा संघनन के कारण क्रमश बढ़ती-घटती रहती है। वाष्पीकरण का मुख्य कारण ताप है। ऊष्मा का ह्रास ही संघनन का कारण होता है।

(ii) बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
बादल पानी की छोटी बूंदों या बर्फ के छोटे रवों की संहति होते हैं जो कि पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण बनते हैं। इनकी ऊंचाई, विस्तार, घनत्व तथा पारदर्शिता या अपारदर्शिता के आधार पर बादलों को चार प्रकार में वर्गीकृत किया गया है –

  • पक्षाभ मेघ (Citrus)
  • कपासी (Cumulus)
  • स्तरी (Stratus) और
  • वर्षा मेघ (Nimbus)

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वार्षिक वर्षन की कुल मात्रा के आधार पर विश्व की मुख्य वर्षण प्रवृति को निम्नलिखित रूपों में पहचाना जाता है विषुवतरेखीय पट्टी, शीतोष्ण प्रदेशों में पश्चिमी तटीय किनारों के पास के पर्वतों की वायु की ढाल पर तथा मानसून वाले क्षेत्रों के तटीय भागों में वर्षा बहुत अधिक होती है, जो प्रतिवर्ष 200 सेमी से ऊपर होती है। महाद्वीपों के आंतरिक भागों में प्रतिवर्ष 100 से 200 सेमी वर्षा होती है। महाद्वीपों के तटीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा 50 से 100 सेमी प्रतिवर्ष तक होती है। महाद्वीपों के भीतरी भाग के वृष्टि छाया क्षेत्रों में पड़ने वाले भाग तथा ऊँचे-अक्षांशों वाले क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। कुछ क्षेत्रों में जैसे विषुवतरेखीय पट्टी तथा ठंडे समशीतोष्ण प्रदेशों में वर्षा पूरे वर्ष होती रहती है।

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प्रश्न 2.
संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने के प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ओस, कुहरा, तुषार एवं बादल; स्थिति एवं तापमान के आधार पर संघनन के प्रकारों को वर्गीकृत किया जा सकता है। संघनन तब होता है जब ओसांक जमाव बिन्दु से नीचे होता है तथा तब भी संभव है जब ओसांक जमाव बिंदु से ऊपर होता है।

ओस (Dew) – जब आर्द्रता धरातल के ऊपर हवा में संघनन केन्द्रकों पर संघनित न होकर ठोस वस्तु जैसे-पत्थर, घास तथा पौधों की पत्तियों की ठंडी सतहों पर पानी की बूंदों के रूप में जमा होती है तब इसे ओस के नाम से जाना जाता है। इसके बनने के लिए सबसे उपयुक्त अवस्थाएँ साफ आकाश, शांत हवा, उच्च सापेक्ष आर्द्रता तथा ठंडी एवं लम्बी रातें हैं। ओस बनने के लिए यह आवश्यक है कि ओसांक जमाव बिंदु से ऊपर हो।

तुषार (Frost) – ठंडी सतहों पर बनता है जब संघनन तापमान के जमाव बिंदु से नीचे (0°से) चले जाने पर होता है अर्थात् ओसांक बिंदु पर या उसके नीचे होता है। अतिरिक्त नमी पानी की बूंदों की बजाए छोटे-छोटे बर्फ के रवों के रूप में जमा होती है। उजले तुषार के बनने की सबसे उपर्युक्त अवस्थायें, ओस के बनने की अवस्थाओं के समान है, केवल हवा का तापमान जमाव बिन्दु पर या उससे नीचे होना चाहिए ।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
जून से 31 दिसम्बर तक के समाचार-पत्रों से सूचनाएँ एकत्र कीजिए कि देश के किन भागों में अत्यधिक वर्षा हुई।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अध्यापक या माता-पिता की मदद से इन परियोजना को स्वयं करें।
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Bihar Board Class 11 वायुमंडल में जल Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ओसांक क्या है?
उत्तर:
जिस तापमान पर किसी वायु का जलवाष्प जल रूप में बदलना शुरू हो जाता है, उस तापमान को ओसांक कहते हैं।

प्रश्न 2.
वृष्टि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मुक्त वायु से वर्षा जल, हिम वर्षा तथा ओलों के रूप में जलवाष्प का धरातल पर गिरना वृष्टि कहलाता है। किसी क्षेत्र पर वायुमण्डल से गिरने वाली समस्त जलराशि को तृष्टि कहा जाता है।

प्रश्न 3.
संघनन प्रक्रिया कब होती है?
उत्तर:
जिस प्रक्रिया द्वारा वायु के जलवाष्प जल के रूप में बदल जाएँ, उसे संघनन कहते हैं। जलकणों के वाष्प का गैस से तरल अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन कहते हैं।

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प्रश्न 4.
आर्द्रता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वाय में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वाय में सदा जलवाष्प भरे होते हैं, जिससे वायु नमी प्राप्त करती है। जलवाष्प की मात्रा वायुमण्डल में आर्द्रता का बोध कराती है।

प्रश्न 5.
वाष्पीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस क्रिया द्वारा तरल तथा जल-गैसीय पदार्थ जलवाष्प में बदल जाते हैं, उसे वाष्पीकरण कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा परिमाण चार घटकों पर निर्भर करती हैं-शुष्कता, तापमान, वायु परिसंचरण तथा जलखंड।

प्रश्न 6.
सापेक्ष आर्द्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी तापमान पर वायु में कुल जितनी नमी समा सकती है उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

प्रश्न 7.
हल्के कोहरे को क्या कहते हैं?
उत्तर:
हल्के कोहरे को धुंध कहते हैं। औद्योगिक नगरों में धुंए के साथ उड़ी हुई राख पर जल-बिंदु टिकने से कोहरे छाया रहता है। ऐसे कोहरे को धुंध (Smog) कहते हैं।

प्रश्न 8.
‘हिमपात’ कैसे होता है?
उत्तर:
जब संघनन हिमांक (32°F) से कम तापमान पर होता है तो जल कण हिम में बदल जाते हैं और हिमपात होता है। दण्डा प्रदेश की समस्त वर्षा हिमपात के रूप में होती है।

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प्रश्न 9.
बादल (मेघ) कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
ऊंचाई के अनुसार मेघ तीन प्रकार के होते हैं

  1. उच्च स्तरीय मेघ – (6000 से 10000 मीटर तक ऊंचे) जैसे-पक्षाभ, स्तरी तथा कपास मेघ ।
  2. मध्यम स्तरीय मेघ – (3000 से 6000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-मध्य कपासी शिखर मेघ ।
  3. निम्न स्तरीय मेघ – (3000 मीटर तक ऊंचे मेघ) जिनमें स्तरी, कपासी मेघ, वर्षा स्तरी मेघ, कपासी वर्षा मेघ शामिल हैं।

प्रश्न 10.
बादल कैसे बनते हैं?
उत्तर:
वायु के ऊपर उठने तथा फैलने से उसका तापमान ओसांक से नीचे हो जाता है। इससे हवा में संघनन होता है। ये जलकण वायु में आर्द्रताग्राही कणों पर जमकर बादल बन ‘जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ओसांक क्या है? नमी की मात्रा से इसका क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
संतप्त वायु के ठंडे होने से जलवाष्प जल के रूप में बदल जाते हैं। जिस तापमान पर किसी वायु का जलवाष्प जल रूप में बदलना शुरू हो जाता है उस तापमान को ओसांक कहते हैं। जिस तापमान पर संघनन की क्रिया आरम्भ होती है उसे ओसाांक या संघनन तापमान कहा जाता है। ओसांक तथा नमी की मात्रा में प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है, जब सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है तो संघनन की क्रिया जल्दी होती है। थोड़ी मात्रा में शीतलन की क्रिया से वायु ओसांक पर पहुँच जाती है। परन्तु कम सापेक्ष आर्द्रता के कारण संघनन नहीं होता । संघनन के लिए तापमान का ओसांक के निकट या नीचे होना आवश्यक है।

प्रश्न 2.
आर्द्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायु में उपस्थित जलवाष्म की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वायु में सदा जलवाष्प होते हैं, जिससे वायु नमी प्राप्त करती है। वायुमण्डल में कुल भार का 2% भाग जलवाष्प के रूप में मौजूद है। यह जलवाष्प महासागरों, समुद्रों, झीलों, नदियों आदि के जल से वाष्पीकरण द्वारा प्राप्त होता है। आर्द्रता के दो माप हैं-सापेक्ष आर्द्रता तथा निरपेक्ष आर्द्रता । वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा से ही आर्द्रता का बोध होता है।

प्रश्न 3.
‘कोहरा’ कैसे बनता है?
उत्तर:
कोहरा एक प्रकार का बादल है जो धरातल के समीप वायु में धूल कणों पर लटके हुए जल-बिन्दुओं से बनता है। ठंडे धरातल या ठंडी वायु के सम्पर्क से नमी से भरी हुई वायु जल्दी ठंडी हो जाती है। वायु में उड़ते रहने वाले धूल कणों पर जलवाष्प का कुछ भाग जल बिन्दुओं के रूप में जमा हो जाता है। जिससे वातावरण धुंधला हो जाता है तथा 200 मीटर से अधिक दूरी की वस्तु दिखाई नहीं देती तब वायुयानों की उड़ाने स्थगित करनी पड़ती हैं। यह प्रायः साफ तथा शांत मौसम में, शीत ऋतु की लम्बी रातों के कारण बनता है जब धरातल पूरी तरह ठंडा हो जाता है। इसे कोहरा भी कहते हैं। नदियों, झीलों व समुद्रों के समीप के प्रदेशों में भी कोहरा मिलता है।

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प्रश्न 4.
संसार में वर्षा का वार्षिक वितरण बताएँ।
उत्तर:
संसार में वर्षा का वितरण समान नहीं है। भूपृष्ठ पर होने वाली कुल वर्षा का 19 प्रतिशत महाद्वीपों पर तथा 81 प्रतिशत महासागरों से प्राप्त होता है। संसार की औसत वार्षिक वर्षा 975 मिलीमीटर है।

  1. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र – इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का औसत 200 सेंटीमीटर है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र तथा मानसूनी प्रदेशों के तटीय भागों में अधिक वर्षा होती है।
  2. सामान्य वर्षा वाले क्षेत्र – इन क्षेत्रों में 100 से 200 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। यह क्षेत्र उष्ण कटिबन्ध में स्थित है तथा ये मध्यवर्ती पर्वतों पर मिलते हैं।
  3. कम वर्षा वाले क्षेत्र – महाद्वीपों के मध्यवर्ती भाग तथा शीतोष्ण कटिबन्ध के पूर्वी तटों पर 25 से 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है।
  4. वर्षा विहीन प्रदेश – गर्म मरुस्थल, ध्रुवीय प्रदेश तथा वृष्टि छाया प्रदेशों में 25 सेंटीमीटर से कम वर्षा होती है।

प्रश्न 5.
वृष्टि किसे कहते हैं? वृष्टि के कौन-कौन से रूप हैं?
उत्तर:
किसी क्षेत्र पर वायुमण्डल से गिरने वाली समस्त जलराशि को वृष्टि कहा जाता है। मुक्त वायु से वर्षा, जल, हिम वर्षा तथा ओलों के रूप में जलवाष्प का धरातल पर गिरना वृष्टि कहलाता है। वृष्टि मुख्य रूप से तरल तथा ठोस रूप में पाई जाती है। इसके तीन रूप हैं –

  • जलवर्षा
  • हिमवर्षा
  • ओला वृष्टि

वृष्टि ओसांक से कम तापमान पर संघनन से होने वाली ओला वृष्टि 0°C या 32°F से कम तापमान पर होती है।

प्रश्न 6.
संघनन कब और कैसे होता है?
उत्तर:
जिस क्रिया द्वारा वायु के जलवाष्प जल के रूप में बदल जाएँ, उसे संघनन कहते हैं। जल कणों के वाष्प का गैस से तरल अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन कहते हैं। वायु का तापमान कम होने से उस वायु की वाष्प धारण करने की शक्ति कम हो जाती है। कई बार तापमान इतना कम हो जाता है कि वायु जलवाष्प का सहारा नहीं ले सकती और जलवाष्प तरल रूप में वर्षा के रूप में गिरता है।

इस क्रिया के उत्पन्न होने के कई कारण हैं –

  • जब वायु लगातार ऊपर उठकर ठंडी हो जाए।
  • जब नमी से लदी वायु किसी पर्वत के सहारे ऊँचे उठकर ठंडी हो जाए।
  • जब गर्म तथा ठंडी वायुराशियाँ आपस में मिलती हैं। कोहरा, धुंध, मेघ, ओले, हिम, ओस, पाला आदि संघनन के विभिन्न रूप हैं।

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प्रश्न 7.
किसी स्थान की वर्षा किन तत्त्वों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
किसी स्थान की वर्षा निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती हैं –

  1. भूमध्य रेखा से दूरी – भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अधिक गर्मी के कारण वर्षा अधिक होता है।
  2. समुद्र से दूरी – तटवती प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में कम।
  3. समुद्र तल से ऊँचाई – पर्वतीय भागों में मैदानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।
  4. प्रचलित पवनें – सागर से आने वाली पवनें वर्षा करती हैं परन्तु स्थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।
  5. महासागरीय धाराएँ – ऊष्ण धाराओं के ऊपर गुजरने वाली पवनें अधिक वर्षा करती हैं, इसके विपरीत शीतल पवनों के ऊपर से गुजरने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

प्रश्न 8.
ओस तथा ओसांक में क्या अंतर है?
उत्तर:
ओस तथा ओसांक में अंतर –
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प्रश्न 9.
वर्षा तथा वृष्टि में क्या अंतर है?
उत्तर:
वर्षा तथा वृष्टि में अंतर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वर्षा किस प्रकार होती है? वर्षा के विभिन्न प्रकारों का उदाहरण सहित वर्णन करो।
उत्तर:
वायु की आर्द्रता ही वर्षा का आधार है। वर्षा होने का मुख्य कारण संतृप्त वायु का ठंडा होना है। वर्षा होने की क्रिया कई पदों में होती है –
1. संघनन होना – नम वायु के ऊपर उठने से उसका तापक्रम प्रति 1000 फूट (300 मीटर) पर 5.6°F घटता जाता है। तापमान के निरन्तर घटने से वायु की वाष्प शक्ति घट जाती है। वायु संतृप्त हो जाती है तथा संघनन क्रिया होती है।

2. मेघों का बनना – वायु में लाखों धूल कण तैरते-फिरते हैं। जलवाष्प इन कणों पर जमा हो जाते हैं। ये मेघों का रूप धारण कर लेते हैं।

3. जल कणों का बनना – छोटे-छोटे मेघ कणों के आपस में मिलने से जल की बँदें बनती हैं। जब इन जल कणों का आकार व भार बढ़ जाता है तो वायु इसे सम्भाल नहीं पाती । ये जल कण पृथ्वी पर वर्षा के रूप में गिरते हैं। इस प्रकार जल कणों का पृथ्वी पर गिरना ही वर्षा कहलाता है।

वर्षा के प्रकार – वायु तीन दशाओं में ठंडी होती है –

  • गर्म तथा नम वायु का संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठना।
  • किसी पर्वत से टकराकर नम वायु का ऊपर उठना।
  • ठंडी तथा नर्म वायु का आपस में मिलना।

इन दशाओं के आधार पर वर्षा तीन प्रकार की होती है –
1. संवहनीय वर्षा – स्थल पर अधिक गर्मी के कारण वायु गर्म होकर फैलती है तथा हल्की हो जाती है। यह वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और इस वायु का स्थान लेने के लिए पास वाले अधिक दबाव वाले खंड से ठंडी वायु आती है। यह वायु भी गर्म होकर ऊपर उठती है। इस प्रकार संवाहिक धाराएँ उत्पन्न हो जाती है तथा वर्षा होती है। यह वर्षा घनघोर, अधिक मात्रा में तथा तीव्र बौछारों के रूप में होती है।
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2. पर्वतीय वर्षा – किसी पर्वत के सहारे ऊपर उठती हुई नम पवनों द्वारा वर्षा को पर्वतीय वर्षा कहते हैं। यह वर्षा पर्वतों की पवन विमुख ढाल पर बहुत कम होती है।
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3. चक्रवातीय वर्षा – चक्रवात में गर्म व नम वायु ठंडी शुष्क वायु के मिलने से ठंडी वायु गर्म वायु को ऊपर उठा देती है। आई वायु ऊष्ण धारा के सहारे ठंडे वायु से ऊपर चढ़ जाती . है। ऊपर उठने पर गर्म वायु का जलवाष्प ठंडा होकर वर्षा के रूप में गिरता है। इसे चक्रवातीय वर्षा कहते हैं। यह वर्षा लगातार, बहुत थोड़ी देर तक, परन्तु थोड़ी मात्रा में होती है।
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प्रश्न 2.
निरपेक्ष आर्द्रता तथा सापेक्ष आर्द्रता क्या है? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।।
उत्तर:
किसी समय किसी तापमान पर वायु में जितनी नमी मौजूद हो, उसे वायु की निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। यह ग्राम प्रति घन सेमी द्वारा प्रकट की जाती है। इस प्रकार निरपेक्ष आर्द्रता को वायु के प्रति आयतन जलवाष्प के भार के रूप में परिभाषित किया जाता है। तापमान बढ़ने या घटने पर भी वायु की वास्तविक आर्द्रता वही रहेगी जब तक उसमें और अधिक जलवाष्प शामिल न हो या कुल जलवाष्प पृथक् न हो जाए वाष्पीकरण द्वारा निरपेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है तथा वर्षा द्वारा कम हो जाती है। वायु के ऊपर उठकर फैलने या नीचे उतरकर सिकुड़ने से भी यह मात्रा बढ़ या घट जाती है।

वितरण –

  • भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक निरपेक्ष आर्द्रता होती है तथा ध्रुवों की ओर घटती जाती है।
  • ग्रीष्म ऋतु में शीतकाल की अपेक्षा तथा दिन में रात की अपेक्षा वायु की निरपेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
  • निरपेक्ष आर्द्रता महासागरों पर स्थल खंडों की अपेक्षा अधिक होती है।
  • इससे वर्षा के सम्बन्ध में अनुमान लगाने में सहायता नहीं मिलती।

सापेक्ष आर्द्रता – किसी तापमान पर वायु में कुल जितनी नमी समा सकती है उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
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दूसरे शब्दों में यह वायु की निरपेक्ष नमी तथा उसकी वाष्प धारण करने की क्षमता में प्रतिशत अनुपात है।
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सापेक्ष आर्द्रता को प्रतिशत में प्रकट किया जाता है। इसे वायु संतृप्तता का प्रतिशत अंश भी कहा जाता है। वायु के फैलने व सिकुड़ने में सापेक्ष आर्द्रता बदल जाती है। तापमान के बढ़ने से वायु की वाष्प ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सापेक्ष आर्द्रता कम हो जाती है। तापमान घटने से वायु ठंडी हो जाती है तथा वाष्प ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है। इस प्रकार सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है।

वितरण –

  • भूमध्य रेखा पर सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
  • उष्ण मरुस्थलों में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है।
  • कम वायु दबाव क्षेत्रों में सापेक्ष आर्द्रता अधिक परन्तु अधिक दबाव क्षेत्रों में कम होती है।
  • महाद्वीपों के भीतरी क्षेत्रों में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है।
  • दिन में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है, परन्तु रात्रि में अधिक।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –

  1. संघनन
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. उच्च मेघ
  4. वृष्टि छाया

उत्तर:
1. संघनन – जलवाष्प के तरल अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं। यदि हवा अपने ओसांक से नीचे ठंडी होती है, तो इसके जलवाष्प की मात्रा जल में बदल जाती है। जब भी ओसांक तापमान, हिमांक से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प सीधे क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया द्वारा हिम में बदल जाता है।

संघनन दो कारकों पर निर्भर करता है। प्रथम वायु की आपेक्षित आर्द्रता तथा द्वितीय शीतलन की मात्रा। इसीलिए मरुस्थल क्षेत्रों में ओसांक तक पहुँचने के लिए अधिक मात्रा में शीतलन की जरूरत पड़ती है जबकि आई जलवायु में शीतलन की कम मात्रा भी संघनन प्रक्रिया को आरंभ कर देती है। कोई भी संघनन प्रक्रिया उस समय तक सम्पन्न नहीं हो सकती, जब तक ऐसा धरातल उपलब्ध न हो, जिस पर द्रव संघनित हो सके।

2. पर्वतीय वर्षा – पर्वतीय वर्षा उस समय होती है, जब आई वायु अपने मार्ग में आए किसी पर्वत अथवा किसी अन्य ऊँचे भूभाग से होकर गुजरती है, और ऊपर उठने के लिए विवश होती – है। कपर उठने से यह ठंडी होती है, और अपनी आर्द्रता को वर्षा के रूप में गिरा देती है। इस प्रकार अनेक पर्वतों के पवनाभिमुखी ढाल भारी वर्षा प्राप्त करते हैं, जबकि प्रतिपवन ढाल, जिन पर हवा ऊपर से नीचे उतरती है कम वर्षा पाते हैं। इस प्रकार की परिस्थिति विस्तृत रूप में भारत, उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों पर पाई जाती है।

वर्षण की मात्रा ‘ढाल’ पहाड़ी की ऊंचाई तथा वायुराशि के तापमान तथा इसमें मौजूद आर्द्रता की मात्रा पर निर्भर करती है। पर्वत के दूसरी ओर ऊपर से नीचे उतरती हवा जलविहीन होती है, और इसलिए किसी प्रकार की वर्षा नहीं होती। अतः क्षेत्र शुष्क रहता है, जिसे वृष्टि छाया कहते हैं।

3. उच्च मेष (5 से 14 किमी)-इसके निम्नलिखित प्रकार हैं –
(क) पक्षाभ मेघ – यह तंतुनमा, कोमल तथा सिल्क जैसी आकति के मेघ हैं। जब ये मेघ समूह से अलग होकर आकाश में अव्यवस्थित तरीके से तैरते नजर आते हैं, तो ये साफ मौसम लाते हैं। जब ये व्यवस्थित तरीके से, मध्य स्तरी मेघों से जुड़े हुए हैं, तो आई मौसम की पूर्व सूचना देते हैं।

(ख) पक्षाभ स्तरी मेघ – ये पतले श्वेत चादर की तरह होते हैं। ये समस्त आकाश को घेरकर दूध जैसी शक्ल प्रदान करते हैं। सामान्यतः ये आने वाले तूफान के लक्षण हैं।

(ग) पक्षाभ कपासी मेघ – ये मेघ छोटे-छोटे श्वेत पत्रकों अथवा छोटे गोलाकार रूप में दिखाई देते हैं, इनकी कोई छाया नहीं पड़ती। ये समूहों, रेखाओं अथवा उर्मिकाओं में व्यवस्थित होते हैं। ऐसी व्यवस्था को मैकरेल आकाश कहते हैं।

4. वृष्टि छाया – पश्चिमी घाट की सहयाद्रि पहाड़ियों द्वारा अरब सागर की आई हवा ऊपर उठने के लिए विवश करती है, जिससे ये फैलकर ठंडी हो जाती हैं और वर्षा करती हैं। वर्षण की मात्रा ढाल, पहाड़ी की ऊँचाई तथा वायुराशि के तापमान तथा इसमें मौजूद आर्द्रता पर निर्भर करती है। पर्वत के दूसरी ओर ऊपर से नीचे उतरती हवा जलविहीन होती है और इसीलिए किसी प्रकार की वर्षा नहीं होती।

अत: यह क्षेत्र शुष्क रहता है, जिसे वृष्टि छाया कहते हैं। वष्टि छाया वाले क्षेत्र महाद्वीपों के भीतरी भाग तथा उच्च अक्षांश निम्न वर्णन के क्षेत्र हैं, जहाँ वार्षिक वर्षण 50 सेमी से कम होता है। उष्णकटिबंध में स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी भाग तथा शुष्क मरुस्थल इसी श्रेणी में आते हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट कीजिए

  1. विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा
  2. निरपेक्ष आर्द्रता एवं आपेक्षिक आर्द्रता
  3. वाष्पन एवं वाष्पन वाष्पोत्सर्जन
  4. ओस एवं पाला
  5. मेघ एवं कहरा
  6. संवहनीय वर्षा एवं चक्रवातीय वर्षा

उत्तर:
1. विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा में अंतर –
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2. निरपेक्ष आर्द्रता एवं आपेक्षिक आर्द्रता में अंतर –
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3. वाष्पन एवं वाष्पन वाष्पोत्सर्जन –
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4. ओस एवं पाला –
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5. मेघ एवं कोहरा में अंतर –
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6. संवहनीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा में अंतर –
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प्रश्न 5.
विश्व में वर्षण के वितरण के प्रमुख लक्षणों तथा इन्हें नियंत्रित करने वा. कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वर्षण के मुख्य लक्षण भूमंडलीय दाब तथा पवन प्रणाली, स्थल एवं जल के वितर नथा उच्चावच लक्षणों के प्रकृति द्वारा समझाए जा सकते हैं –
1. उच्च अक्षांश सामान्यत: उच्च दाब रखते हैं, जिनका सम्बन्ध नीचे उतरती तथा अपसरिट होती हवाओं से है, और इसलिए यहाँ शुष्क दशा रहती है।

2. विषुवतीय निम्न दाब पट्टी, जहाँ हवाएँ अभिसरित होकर ऊपर उठती हैं, काफी वर्षा प्राप्त करती हैं। पवनों एवं दाब प्रणालियों के अतिरिक्त यहाँ की वायु की प्रकृति भी वर्षण की संभावना निर्धारित को में प्रमुख कारक है।

3. वर्षा के अक्षांशीय विभिन्नता के अतिरिक्त, स्थल एवं जल का वितरण भूमंडलीय वर्षा प्रतिरूप को जटिल बना देता है। मध्य अक्षांशों में स्थित स्थलीय भू-भाग कम वर्षा प्राप्त करते हैं।

4. पर्वतीय बाधाएँ भूमंडलीय पवन प्रणाली से अपेक्षित आदर्श वर्षा के प्रतिरूप को बदल देती हैं। पर्वतों के पवनाभिमुख ढाल खूब वर्षा

5. प्राप्त करते हैं, जबकि प्रतिपवन ढाल तथा इनके आस-पास के निम्न क्षेत्र वृष्टि छाया में आते हैं।

किसी स्थान की वर्षा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
1. तापमान – यदि संघनन O°C से ऊपर होता है तो होने वाला वर्षण, वर्षा के रूप में होता है।

2. जल की बूंदों के हवा से गुजरते समय वायुमंडल की दशा – यदि वर्षा की बूंदें नीचे गिरते समय ठंडी हवा परत से गुजरती हैं, तो ये जमकर बजरी का रूप ले लेती हैं। तड़ितझंझा की शक्तिशाली धाराओं में, जल बूंदें ऊपर की ओर हिमाशीतित तापमान पर ले जाई जाती हैं और ओले के रूप में गिरती हैं।

3. भूमध्य रेखा से दूरी – भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अधिक गर्मी के कारण वर्षा अधिक होती है।

4. समुद्र से दूरी – तटवर्ती प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में कम। समुद्र तल से ऊंचाई-पर्वतीय भागों में मैदानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।

5. प्रचलित पवनें – सागर से आनेवाली पवनें वर्ष करती हैं, परन्तु स्थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

6. महासागरीय धाराएँ – उष्ण धाराओं के ऊपर से गुजरने वाली पवनें अधिक वर्षा करती हैं। इसलिए विपरीत, शीतल पवनों के ऊपर से गुजरने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

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प्रश्न 6.
वायन तथा वाष्पोत्सर्जन की दर को नियंत्रित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिस प्रक्रिया के द्वारा तरल पदार्थ एवं जल-गैसीय पदार्थ जलवाष्प में बदल जाते हैं, उसे वाष्पीकरण अथवा वाष्पन कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा परिणाम चार घटकों पर निर्भर करते हैं –

  1. शुष्कता – शुष्क वायु में जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। आई वायु होने पर वाष्पीकरण की दर एवं मात्रा कम हो जाती है।
  2. तापमान – धरातल का तापक्रम बढ़ जाने से वाष्पीकरण बढ़ जाता है तथा ठंडे धरातल पर कम वाष्पीकरण होता है।
  3. वायु परिसंचरण – वायु संरचरण से वाष्पीकरण की मात्रा में वृद्धि होती है।
  4. जलखंड – विशाल जलखण्डों के ऊपर वाष्पीकरण स्थल की अपेक्षा अधिक होती है।

प्रश्न 7.
मेघ कैसे बनते हैं? औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार बताइए।
उत्तर:
मुक्त वायु में, ऊंचाई पर, धूल कणों पर लदे जलकणों या हिमकणों या हिमकणों के समूह को मेघ कहते हैं। वायु के तापमान के ओसांक से नीचे गिरने पर बादल बनते हैं। वायु के ऊपर उठने तथा फैलने से उसका तापमान ओसांक से नीचे हो जाता है। इससे हवा में संघनन होता है। ये जलकण वायु में आर्द्रताग्राही कणों पर जमकर बादल बन जाते हैं। अधिकांश मेघ गर्म एवं आई वायु के ऊपर उठने से बनते हैं।

ऊपर उठती हवा फैलती है और जब तक ओसांक तक न पहुँच जाए, ठंडी होती जाती है और कुछ जलवाष्य मेघों के रूप में संघनित होते हैं। दो विभिन्न तापमान रखने वाली वायुराशियों के मिश्रण से भी मेघों की रचना होती है। मेघ-आधार की औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों को तीन वर्गों में रखा गया है

  • उच्च स्तरीय मेघ – (6000 से 10000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-पक्षाभ, स्तरीय तथा कपासी मेघ।
  • मध्यम स्तरीय मेघ – (3000 से 6000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-मध्य कपासी शिखर मेघ ।
  • निम्न स्तरीय मेघ – (3000 मीटर तक ऊँचे) जिनमें स्तरी कपासी मेघ, वर्षा स्तरी मेघ, कपासी मेघ, कपासी वर्षा मेघ शामिल हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

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BSEB Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद Questions and Answers

प्रश्न-
क्रिया किसे कहते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
जिस शब्द या पद से किसी कार्य के करने या होने का बोध होता है, उसे क्रिया कहते हैं। उदाहरणतया निम्नलिखित वाक्यों में प्रयुक्त काले पद देखिए
चिड़िया आकाश में उड़ रही है।
मोहन पार्क में दौड़ता है।
विनोद दूध अवश्य पीता है।
तुमने शाम को किताब दी थी।
बर्फ पिघल रही है।
तुम्हारी किताब मेज पर है।
ये सभी पद किसी-न-किसी कार्य के करने (दौड़ना, पीना, देना, पिघलना) या होने (उड़ना, होना) के सूचक हैं। अत: ये क्रिया-पद हैं।

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धातु

प्रश्न
धातु की परिभाषा देते हुए उसे उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-क्रिया के मूल अंश को धातु कहते हैं।जैसे-पढ़, लिख, सो, रो, हँस, खेल, देख आदि।
स्पष्टीकरण – पढ़ धातु से अनेक क्रिया-रूप बनते हैं। जैसे-
पदूंगा, पढ़ता है, पढ़ा, पढ़ रहा होगा, पढ़े, पढ़ो, पढ़ना चाहिए, पढ़ा था, पढ़िए, पढ़ी थी आदि।
परंतु इन सब में सामान्य रूप है-‘पढ़’। यही मूल धातु है।
मूल धातु की पहचान मूल धातु की पहचान का एक तरीका है—मूल धातु का प्रयोग ‘तू’ के साथ आज्ञार्थक क्रिया के रूप में किया जाए। जैसे-
तू खा, तू पी, तू हँस, तू खेल आदि।
इनमें खा, पी, हँस, खेल आदि मूल धातु हैं।
क्रिया के सामान्य रूप धातु में ‘ना’ प्रत्यय लगाने से क्रिया के सामान्य रूप बन जाते हैं। जैसे-
पढ़ + ना = पढ़ना; सो + ना = सोना; हँस + ना = हँसना; खेल + ना = खेलना आदि।

क्रिया के भेद : अकर्मक-सकर्मक

प्रश्न-
क्रिया के कितने भेद होते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
मुख्य रूप से क्रिया दो प्रकार की होती है-
(क) अकर्मक और (ख) सकर्मक।
(क) अकर्मक क्रिया…वाक्य में प्रयोग करते समय जिस क्रिया में कर्म की आवश्यकता नहीं होती, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे
हँसना, रोना, उठना, गिरना, ठहरना, रुकना, बैठना, चलना, झुकना, जागना, ऊँघना, छींकना, जीना, मरना, टूटना, आना, जाना, दौड़ना आदि।
अकर्मक क्रिया का प्रभाव सीधे कर्ता पर पड़ता है। उदाहरणतया-
श्याम दौड़ता है।
यहाँ ‘दौड़ना’ क्रिया का फल सीधे कर्ता श्याम पर पड़ रहा है। दूसरे, इस वाक्य में कोई ‘कर्म’ नहीं है। न ही उसकी आवश्यकता है।
अन्य उदाहरण
पक्षी उड रहे हैं।
शीला रोएगी।
बच्चे हँस रहे हैं।
सुभाषचंद्र बोस देश के लिए उठ खड़े हुए।
कितने नेता लालच के कारण गिर जाते हैं।
गाड़ी ठहर गई है।
वह तुम्हारे लिए रुका हुआ है।
गाड़ी में सीधे बैठो।
आओ, दिल्ली चलें।
कुछ पाना है तो डाको।
अतिथि जाग गया है।
बच्चे बड़ी देर से ऊँध रहे हैं।
सर्दी के कारण सभी छींक रहे हैं।
वह घर आ चुका है।
मेहमान जा चुके हैं।
चोर-चोरी करते-करते मर गया।
नेहरू जी 14 नवंबर के दिन जन्मे।
गिलास मेरे हाथों से टूट गया।
सुशीला बहुत तेज दौड़ती है।

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(ख) सकर्मक क्रिया-जिस क्रिया के प्रयोग में ‘कर्म’ की आवश्यकता पड़ती है और उसका सीधा प्रभाव कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। उदाहरणतया-
अनुराग ने पुस्तक खरीदी।
‘खरीदी’ क्रिया के प्रयोग में ‘कर्म’ (पुस्तक) की आवश्यकता अनिवार्य रूप से बनी हुई है। अगर ‘पुस्तक’ का लोप कर दिया जाए तो अर्थ अस्पष्ट या अपूर्ण रह जाएगा। उदाहरणतया अनुरांग ने खरीदी। इस वाक्य में जिज्ञासा बनी ही हुई है कि क्या खरीदी ? दूसरे, ‘खरीदी’ क्रिया का फल पुस्तक पर पड़ रहा है। अतः यह सकर्मक क्रिया है।
कुछ महत्त्वपूर्ण सकर्मक क्रियाएँ इस प्रकार हैं-
देख, सुन, पढ़, लिख, कर, हो, कह, सूंघ, खा, पी, ले, दे, मार, छोड़, काट, पीट, तोड़, बेच आदि। इन्हीं से बनने वाली प्रेरक क्रियाएँ भी सकर्मक होती हैं। जैसे-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद - 01

सकर्मक क्रिया के कुछ वाक्य-प्रयोग
शीला ने संतरा खाया।
उसने बच्चे को संतरा खिलाया।
मोहन दुध पी रहा है।
माँ मोहन को दध पिला रही है।
लड़के फिल्म देखते हैं।
अध्यापक बच्चों को फिल्म दिखा रहे हैं।
मैंने कहानी सुनी।
मैंने बच्चों को कहानी सुनाई/सुनवाई।
मैंने उपन्यास पढ़ा।
मैंने लोगों को उपन्यास पढ़वाया/पढ़ाया।
उसने कविता लिखी।
उसने लड़कियों से कविता लिखवाई।
मैंने परिश्रम किया।
मने सबसे परिश्रम करवाया।
अध्यापक ने कठोर वचन कहे/कहलवाए।
मैंने फल संचा।

अकर्मक-सकर्मक के भेद

प्रश्न-
अकर्मक क्रिया के भेद स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
अकर्मक क्रिया तीन प्रकार की होती है-
(क) स्थित्यर्थक पर्ण अकर्मक क्रिया – यह क्रिया बिना कर्म के पूर्ण अर्थ देती है और कर्ता की स्थिर दशा का बोध कराती है। जैसे-
श्याम सो रहा है। (सोने की दशा)
मोहन हँसता है। (हँसने की दशा)
श्यामा रो रही है। (रोने की दशा)

खिलना, अनुभव करना आदि ऐसी ही क्रियाएं हैं। अस्तित्ववाची क्रियाएं भी इसी भेद के . अंतर्गत आती हैं। जैसे—’परमात्मा है। यहाँ ‘है’ क्रिया स्वयं में पूर्ण तथा स्थित्यर्थक है।

(ख) गत्यर्थक पर्ण अकर्मक क्रिया यह क्रिया भी बिना कर्म के पूर्ण होती है और कर्ता . की गतिमान दशा का बोध कराती है।

उदाहरणतया-
मोहन दिल्ली जा रहा है।
यहाँ ‘जा रहा है’ क्रिया कर्ता की गतिमान दशा की द्योतक है। यह बिना कर्म के भी पूर्ण अर्थ व्यक्त कर रही है। अतः यह गत्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया है। कुछ अन्य उदाहरण
चिड़िया आकाश में उड़ रही है।
सोहन कमरे से निकल रहा है।
सूरज पश्चिम में डूबेगा।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

(ग) अपूर्ण अकर्मक क्रिया- अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ वे होती हैं जिन्हें ‘कर्म’ की तो आवश्यकता नहीं होती किंतु कर्ता से संबंधित किसी-न-किसी ‘पूरक’ शब्द की अवश्य आवश्यकता होती है। पूरक शब्द के बिना वाक्य अधूरा बना रहता है। उदाहरणतया

‘मैं हूँ।’
यह वाक्य कर्ता और क्रिया की दृष्टि से पूरा है। परंतु इसमें ‘मैं’ से संबंधित किसी पूरक की कमी है। पूरक के लगते ही वाक्य पूर्ण हो जाएगा। जैसे-

मैं स्वस्थ हूँ।
‘स्वस्थ’ पूरक से वाक्य स्वयं में पूरा हो गया है। कुछ अन्य उदाहरण देखिए –
मोहन (होशियार) है।
श्याम (वकील) बनेगा
पड़ोसी (चालाक) निकला।

होना, बनना, निकलना आदि अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ हैं। इनमें कर्ता-पूरक की आवश्यकता होती है। इसलिए इन्हें ‘कर्तृपक’ या ‘उद्देश्यपूरक’ भी कहा जाता है।

प्रश्न
सकर्मक क्रिया के भेदों का परिचय कीजिए।
उत्तर-
सकर्मक क्रिया के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं. .
(क) पूर्ण एककर्मक क्रियाएँ- इन्हें सामान्यतः ‘सकर्मक क्रिया’ के नाम से जाना जाता है। इन क्रियाओं में एक कर्म की आवश्यकता होती है। उदाहरणत:

कुत्ते ने बकरी को काटा।

यहाँ ‘काटा’ क्रिया ‘कर्म’ (बकरी को) के बिना अधूरी है, तथा इस कर्म के समावेश से अर्थ भी पूरा हो गया है। अब और किसी कर्म की आवश्यकता नहीं रही है। इसलिए यह ‘पूर्ण एककर्मक क्रिया’ है। कुछ अन्य उदाहरण देखिए-
सीमा खाना खा रही है।
दर्जी कपड़े सिएगा।
अब्दुल पत्र लिखेगा।

(ख) पूर्ण हिकर्मक क्रियाएँ- पूर्ण द्विकर्मक क्रियाएँ वे होती हैं जिनमें दो कर्मों की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ-
संतोष ने बेटे को पता बताया था।
इस वाक्य में दो कर्म हैं-बेटे को’ तथा ‘पता’। यदि इनमें से एक कर्म हटा लिया जाए . . तो अर्थ अस्पष्ट रह जाएगा। अन्य उदाहरण देखिए-
मोहन ने सोहन को अपनी घड़ी दी।
शीला ने रमा को गाना सुनाया।
राम ने मोहन को किताब दी।
विनोद ने मनोज को कार बेची।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

प्रायः देना, लेना, बताना आदि प्रेरणार्थक क्रियाएं इसी कोटि के अंतर्गत आती हैं। ‘देना’ क्रिया
में दो कर्म नहीं होते। एक कर्म जैसे ‘मोहन को’ संप्रदान कारक के अंतर्गत आता है। परंतु मोटे . तौर पर उसे कर्म मान लिया जाता है।

(ग) अपूर्ण सकर्मक क्रियाएँ – ये वे क्रियाएँ हैं जिनमें कर्म रहते हुए भी कर्म के किसी पूरक शब्द की आवश्यकता बनी रहती है। वरना अर्थ अपूर्ण रहता है। चुनना, मानना, समझना, बनाना आदि ऐसी ही क्रियाएँ हैं। उदाहरणतया –
सोहन अमित को मूर्ख समझता है।.
इस वाक्य में अमित को’ कर्म है। परंतु यह कर्म अकेले अधूरा अर्थ देता है। ‘मूर्ख’ पूरक के आने पर अर्थ स्पष्ट होता है। ‘मूर्ख’ का संबंध ‘अमित’ (कर्म) से होने के कारण हम उसे ‘कर्मपूरक’ कहते हैं। कुछ अन्य उदाहरण देखिए-
छात्रों ने दीपक को अपना प्रतिनिधि चुना।
वह तुम्हें मित्र मानता है।
सभी लड़के इंद्रपाल को पागल बनाते हैं।

अकर्मक-सकर्मक में परिवर्तन (अंतरण)
क्रियाओं का अकर्मक होना या सकर्मक होना प्रयोग पर निर्भर करता है, न कि उनके धातु-रूप पर। यही कारण है कि कभी-कभी अकर्मक क्रियाएँ सकर्मक रूप में प्रयुक्त होती हैं
और कभी सकर्मक क्रियाएँ अकर्मक रूप में प्रयुक्त होती हैं। जैसे-

पढ़ना (सकर्मक)-श्याम किताब पढ़ रहा है।
पढ़ना (अकर्मक) श्याम आठवीं में पढ़ रहा है।
खेलना (सकर्मक)-बच्चे हॉकी खेलते हैं। .
खेलना (अकर्मक)-बच्चे रोज खेलते हैं।

“हँसना’, ‘लड़ना’ आदि कुछ अकर्मक क्रियाएँ सजातीय कर्म आने पर सकर्मक रूप में प्रयुक्त होती हैं। जैसे-
बाबर ने अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं।
वह मस्तानी चाल चल रहा था।
ऐंठना, खुजलाना आदि क्रियाओं के दोनों रूप मिलते हैं। जैसे-
पानी में रस्सी ऐंठती है। (अकर्मक)
नौकर रस्सी ऐठ रहा है। (सकर्मक)
उसका सिर खुजलाता है। (अकर्मक)
वह अपना सिर खुजलाता है। (सकर्मक)

संयुक्त क्रिया

प्रश्न
संयुक्त क्रिया किसे कहते हैं ? उसके भेद लिखिए।
उत्तर
दो या दो से अधिक धातुओं के योग से बनी हुई क्रियाएँ संयुक्त क्रिया कहलाती हैं। जैसे—मैं पढ़ लिया करता हूँ।
वह बढ़ता चला आ रहा है।
उसे आने दिया जा सकता है।
उपर्युक्त उदाहरणों में एकाधिक क्रिया-पदों के योग से क्रिया का कार्य संपन्न हुआ है। अतः ये संयुक्त क्रियाएँ हैं।

भेद- संयुक्त क्रियाएँ जिन-जिन क्रियाओं के मेल से बनती हैं, वे चार प्रकार की होती हैं मुख्य क्रिया, सहायक क्रिया, संयोजी क्रिया और रंजक क्रिया।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

मुख्य क्रिया- संयुक्त क्रियाओं में एक क्रिया मुख्य होती है। वह कर्ता या कर्म के मुख्य व्यापार को लक्षित करती है। उदाहरणतया उपर्युक्त उदाहरणों में पढ़, बढ़ता और आने मुख्य क्रियाएँ हैं।

सहायक क्रिया- मुख्य क्रिया के अतिरिक्त क्रिया के अन्य पक्षों-काल, वृत्ति, पक्ष, वाच्य आदि की सूचना देने वाले क्रिया-रूपों को सहायक क्रिया कहते हैं। इन्हें संयोजी क्रिया तथा रंजक क्रिया नाम के अन्य दो भेदों में भी बाँटा जा सकता है।

संयोजी क्रियाएँ संयोजी क्रियाएँ मुख्य क्रिया के पक्ष, वृत्ति और वाच्य की सूचना देती हैं।
(क) पक्ष का उद्घाटन करने वाले कुछ उदाहरण देखिए-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद - 1

(ख) संयोजी क्रियाएँ कर्ता की इच्छा, अनिच्छा, विवशता या समर्थता आदि वृत्तियों को भी प्रकट करती हैं। उदाहरणतया-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद - 2

(ग) संयोजी क्रियाएँ वाक्य के वाच्य का भी बोध कराती हैं। प्रायः ‘जा’ धातु से वाच्य का प्रकटीकरण होता है। उदाहरणतया-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद - 3

(घ) अनुमति देने में भी हिंदी में संयोजी क्रिया ‘दे’ का प्रयोग किया जाता है। जैसे-
Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद - 4

रंजक क्रियाएँ – रंजक क्रियाएँ मुख्य क्रिया के अर्थ को रजित करती हैं अर्थात् विशिष्ट अर्थ-छवि प्रदान करती हैं। सामान्यत: ये आठ हैं—आना, जाना, उठना, बैठना, लेना; देना, पड़ना, डालना आदि। उदाहरणतया-

1.आना रो आना, कर आमा, बन आना। (अनायासता का भाव)
वाक्य-प्रयोग- दुखिया का करुण-क्रंदन सुनकर मुझे रुलाई आ गई।
मैं पानी भरने गई थी, उल्टे बाल्टी दान कर आई।

2. जाना पी जाना, आ जाना, खाना (क्रियापूर्णता/शीघ्रता का भाव)
वाक्य प्रयोग गर्मी के मारे मैं तीन-चार कैंपा-कोला पी गया। .
मैं जा रहा हूँ, तुम जल्दी आ जाना।
तुम यहाँ आकर बैठ जाओ।

3. उठना रो उठना, गा उठना, चिल्ला उठना (आकस्मिकता का भाव)
वाक्य-प्रयोग- लक्ष्मण-मूर्छा का दृश्य देखकर मेरा हृदय रो उठा।
चोर के हाथ में चाकू देखकर मैं सहायता के लिए चिल्ला उठा।

4. बैठना मार बैठना, खो बैठना, चढ़ बैठना। (आकस्मिकता का भाव)
वाक्य-प्रयोग- गुस्से में आकर मैं बच्चे को मार बैठा।
लाभ के चक्कर में मैं अपना नुकसान कर बैठा।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

5. लेना-पी लेना, सो लेना, ले लेना। (क्रियापूर्णता/क्विशता का भाव)
वाक्य-प्रयोग- उसने दूध पी लिया है।(क्रियापूर्णता)
मजबूरी में उसने जहर का चूंट पी लिया। (विवशता)

6. देना-चल देना, रो देना, फेंक देना। (क्रियापूर्णता/विवशता का भाव)
वाक्य-प्रयोग– बालक बैग उठाकर स्कूल चल दिया।
स्कूल से आकरे बालक ने बैग एक और फेंक दिया।
उसे मोहन आता दिखाई दिया।

7. पडना रो पड़ना, हँस पड़ना, चौंक पड़ना। (स्वतः/शीघ्रता का भाव)
वाक्य-प्रयोग- बच्चा माँ की मृत्यु का समाचार सुनकर रो पडा। .
सामने से अचानक आए शेर को देखकर मैं चौंक पड़ा।
वह विद्यालय की ओर चल पडा।

8. डालना-मार डालना, तोड़ डालना, काट डालना। (बलात्भाव/क्रिया-पूर्णता का भाव)
वाक्य-प्रयोग- राम ने रावण को मार डाला।
गुस्से में आई भीड़ ने सरकारी ढाँचे को तहस-नहस कर डाला।

9.मरना-डूब मरना।
वाक्य-प्रयोग-माँ ने दुत्कारते हुए कहा- डूब मर! नकल करने से अच्छा तू डूब मरता।

10. मारना-लिख मारा।
वाक्य-प्रयोग–आजकल के अनाड़ी पत्रकार बिना आने-बूझे कुछ-का-कुछ लिख मारते हैं।

11.निकलना चल निकलना।
वाक्य-प्रयोग-यह नया समाचार-पत्र भी चल निकला है।

12. बसना-चल बसना।
वाक्य-प्रयोग पिछले वर्ष मोहन के पिताजी चल बसे थे।

13. लगना आरंभधोतका
वाक्य-प्रयोग मोहन विद्यालय जाने लगा।

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संयुक्त क्रियाओं के बारे में कछ महत्त्वपूर्ण बातें
1. कहीं-कहीं संयुक्त क्रिया के दोनों पदों का क्रम तथा रूप बदलने पर उनके अर्थ में – परिवर्तन आ जाता है। उदाहरणतया
(क) मोहन ने उसे मार दिया। (जान से मार दिया)
(ख) मोहन ने उसे दे मारा। (अचानक चोट कर दी)

2. निषेधात्मक वाक्यों में मुख्य क्रिया के साथ रंजक क्रिया का प्रयोग नहीं होता। यथा-
उसे भूख लग आई। – उसे भूख नहीं लगी।
मोहन चिल्ला उठा। – मोहन नहीं चिल्लाया।
सुरेश ने काम कर दिया। – सुरेश ने काम नहीं किया।

संयुक्त क्रिया में से मुख्य क्रिया की पहचान –
संयुक्त क्रिया में से मुख्य क्रिया की पहचान करना सावधानी का काम है। उदाहरणतया-
मैं पढ़ लेता हूँ।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद

यहाँ ‘पढ़’ और ‘लेता’ में से मुख्य क्रिया की पहचान करनी है। इसके लिए प्रश्न करें कि कर्ता (मैं) क्या करता है ? ‘पढ़ने का काम’ या लेने का काम’। उत्तर मिलेगा पढ़ने का काम। अतः यहाँ मुख्य क्रिया हुई ‘पढ़ना’। ‘लेता हूँ’ सहायक क्रिया हुई।
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Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण क्रिया-भेद - 6

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर की परिभाषा दें।
उत्तर:
वृद्धि (Growth):
वृद्धि समस्त उपापचयी प्रक्रियाओं (उपचय तथा अपचय) का अन्तिम परिणाम है। इसमें पौधे के आकार एवं आयतन में परिवर्तनीय या चिरस्थायी वर्धन होता है। इसके साथ प्रायः शुष्क भार एवं जीवद्रव्य की मात्रा में भी वर्धन होता है।

विभेदन (Differentiation):
तने या जड़ के शीर्ष पर स्थित अग्रस्थ विभज्योतक (apical meristem) या एधा (cambium) कोशिका से बनने वाले कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित या विशिष्टीकृत हो जाती है। इस क्रिया को विभेदन (differentiation) कहते हैं।

परिवर्धन (Development):
बीज के अंकुरण से लेकर मृत्यु तक होने वाले समस्त परिवर्धन जिसके फलस्वरूप पौधे के जटिल शरीर का गठन होता है, जिससे जड़, तना, पत्तियाँ, फूल और फल बनते हैं, परिवर्धन के अन्तर्गत आते हैं। इन क्रियाओं को दो प्रमुख समूह में बाँट लेते हैं –
(क) वृद्धि तथा
(ख) विभेदन।

निर्विभेदन : (Dedifferentiation):
जीवित विभेदित स्थायी कोशिकाएँ जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता नहीं होती, उनमें से कुछ कोशिकाओं में पुन: विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को निर्विभेदन (dedifferentiation) कहते हैं; जैसे-कॉर्क एधा, अन्तरापूलीय एधा।

पुनर्विभेदन (Redifferentiation):
निर्विभेदित कोशिकाओं या ऊतकों से बनी कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता पुन: खो देती है और विशिष्ट कार्य करने के लिए रूपान्तरित हो जाती है। इस प्रक्रिया को पुनर्विभेदन (redifferentiation) कहते है।

सीमित वृद्धि (Determinate Growth):
यह पौधों में वृद्धि का खुला स्वरूप होता है। यह पौधे के विभिन्न भागों में पाई जाती है। इसमें विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ पादप शरीर का गठन करती हैं, उसे सीमित वृद्धि कहते हैं।

मेरिस्टेम (Meristem):
जड़ तथा तने के शीर्ष पर स्थित कोशिकाओं का वह समूह जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता होती है, मेरिस्टेम (meristem) कहलाता है। इससे स्थायी ऊतक तथा अन्तर्विष्ट एवं पार्श्व मेरिस्टेम (intercalary & lateral meristem) का निर्माण होता है।

वृद्धि दर (Growth Rate):
समय की प्रति इकाई के दौखन बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर (growth rate) कहते हैं। वृद्धि दर को गणितीय ढंग से (mathematically) व्यक्त किया जा सकता है। एक जीव या उसके अंग विभिन्न तरीकों से कोशिकाओं का निर्माण कर सकते हैं।

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प्रश्न 2.
पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
वृद्धि के प्राचालिक (Parameter of Growth):
वृद्धि सभी जीवधारियों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। पौधों में वृद्धि कोशिका विभाजन, कोशिका विवर्धन या दीर्धीकरण तथा कोशिका विभेदन के फलस्वरूप होती है।

पौधे के मेरिस्टेम कोशिकाओं (meristematic cells) में कोशा विभाजन की क्षमता पाई जाती है। सामान्तया कोशिका विभाजन जड़ तथा तने के शीर्ष (apex) पर होता है। इसके फलस्वरूप जड़ तथा तने की लम्बाई में वृद्धि होती है। एधा (cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है।

इसे द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth) कहते हैं। कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वर्धन का परिणाम है। जीवद्रव्य की बढ़ोत्तरी या वर्धन का मापन कठिन है। वृद्धि पर मापन के कुछ मापदण्ड हैं – ताजे भार में वृद्धि, शुष्क भार में वृद्धि, लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिका संख्या में वृद्धि आदि।

मक्का की जड़ का अग्रस्थ मेरिस्टेम प्रति घण्टे लगभग 17,500 कोशिकाओं का निर्माण करता है। तरबूज की कोशिका के आकार में लगभग 3,50,000 गुना वृद्धि हो सकती है। पराग नलिका की लम्बाई में वृद्धि होने से यह वर्तिकाग्र, वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में स्थित बीजाण्ड में प्रवेश करती है।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णित करें –
(अ) अंकगणितीय वृद्धि
(ब) ज्यामितीय वृद्धि
(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र
(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।
उत्तर:
(अ) अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth):
समसूत्री विभाजन के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से एक कोशिका निरन्तर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है।

अंकगणितीय वृद्धि को हम निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति होती है। चित्र में वृद्धि (लम्बाई) समय के विरुद्ध आलेखित की गई है। इसके फलस्वरूप रेखीय वक्र (linear curve) प्राप्त होता है। इस वृद्धि को हम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं –
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चित्र – नियत रेखीय वृद्धि (लम्बाई) और समय के विरुद्ध आलेख।
L1 = L0 + rt
(L1 = समय ‘t’ पर लम्बाई,
L0 = समय ‘O’ पर लम्बाई
r = वृद्धि दर। दीर्धीकरण प्रति इकाई समय में)

(ब) ज्यामितीय वृद्धि (Geometrical Growth):
एक कोशिका की वृद्धि अथवा पौधे के एक अंग की वृद्धि अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं होती। प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag chase) में वृद्धि की दर पर्याप्त धीमी होती है। तत्पश्चात् यह दर तीव्र हो जाती है और उच्चतम बिन्दु (maximum point) तक पहुँच जाती है। इसे मध्य तीव्र वृद्धि काल (middle logarithmic phase) कहते हैं। इसके पश्चात् यह दर धीरे-धीरे कम होती जाती है और अन्त –
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चित्र – (A) अंकगणितीय और (B) ज्यामितिक वृद्धि, (C) भ्रूण विकास के समय अंकगणितीय और ज्यामितिक वृद्धि।

में स्थिर हो जाती है। इसे अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कहते हैं। इसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं। इनमें सूत्री विभाजन से बनी दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका विभाजन का अनुकरण करती हैं और इसी प्रकार विभाजित होने की क्षमता बनाए रखती हैं।

यद्यपि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘S’ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) को गणितीय रूप से निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –
W1 = \(W_{0}^{e n}\)
जहाँ (W1 = अन्तिम आकार – भार, ऊँचाई, संख्या आदि
W0 = प्रारम्भिक आकार, वृद्धि के प्रारम्भ में
r = वृद्धि दर (सापेक्ष वृद्धि दर)
t = समय में वृद्धि
e = स्वाभाविक लघुगणक का आधार (base of natural logarithms)
r = एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप सामग्री का निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, जिसे एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) के रूप में संदर्भित किया जाता है; अत: W1 का अन्तिम आकार W0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।

(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (Sigmoid Growth Curve):
ज्यामितिक वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त कर सकते हैं –

  • प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (Initial lag phase)
  • मध्य तीव्र वृद्धि काल (Middle lag phase)
  • अन्तिम धीमा वृद्धि काल (Last stationary phase)
  • यदि वृद्धि दर का समय के प्रति ग्राफ बनाएं तो ‘S’ की आकृति का वक्र प्राप्त होता है। इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र कहते है।

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(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर (Absolute and Relative Growth Rate):

  • मापन और प्रति यूनिट समय में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परम वृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं।
  • किसी दी गई प्रणाली की प्रति यूनिट समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है।

चित्र – सम्पूर्ण और सापेक्ष वृद्धि दर। पत्ती A तथा B को देखें। दोनों ने अपने क्षेत्रफल दिए गए समय में A से A’ और B से B’ तक 5 सेमी-2 बढ़ा लिए हैं। दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखिए। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक (Natural Plant Growth Regulators):
पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (Meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हार्मोन्स (Phytohormones) कहते हैं।

ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। अनेक कृत्रिम कार्बनिक यौगिक में पादप हार्मोन्स की तरह कार्य करते हैं। वेण्ट (Went 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती।

पादप हार्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं –

  1. ऑक्सिन (Auxins)
  2. जिबरेलिन (Gibberellins)
  3. सायटोकाइनिन (Cytokinins)
  4. ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)
  5. एथिलीन (Ethylene)

1. ऑक्सिन (Auxins):
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris canariensis) के नवोद्भिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एक तरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एक तरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन
चित्र – प्रांकुर चोल को पार्श्व दिशा से एकतरफा प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ता है।

बायसेन:
जेन्सन (Boysen-Jensen 1910-1913) ने कटे हुए प्राकुंर चोल को अगार (agar) के घनाकार टुकड़े पर रखा, कुछ समय पश्चात् अगार के घनाकार टुकड़े को कटे हुए प्रांकुर चोल के स्थान पर रखने के पश्चात् एकतरफा प्रकाश से प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। वेण्ट (Went, 1928) ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोद्भिद् पर किए।

उन्होंने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला की प्रांकुर चोल के शीर्ष पर बना रासायनिक पदार्थ अगार के टुकड़ों (block) में आ गया था। वेण्ट ने प्रांकुर चोल के कटे हुए शीर्ष को दो अगार के टुकड़ों पर रखा जिनके मध्य अभ्रक (माइका) की पतली प्लेट लगी थी, एकतरफा प्रकाश डालने पर रासायनिक पदार्थ के 65% भाग अप्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र हो जाता है और केवल 35% रासायनिक पदार्थ प्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र होता है।

वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रता तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की।
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन
चित्र – वेण्ट द्वारा जई के प्रांकुर चोल के शीर्ष पर किया गया प्रयोग।

ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग (Physiological effects & Uses of Auxins):

1. प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism):
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।

2. शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance):
सामान्तया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती है। चाय बागान में तथा चाहरदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।

3. विलगन (Abscission):
परिपक्व, पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलयन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होगा।

4. अनिषेकफलन (Parthenocarpy):
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल का विकास हो जाता है; जैसे-अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकान पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।

5. खरपतवार निवारण (Weed Destruction):
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।

6. कटे तनों पर जड़ निभेदन (Root differentiation on Stem cutting):
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़ें शीघ्र निकल आती है। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।

7. प्रसुप्तता नियन्त्रण (Control of Dormancy):
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिन का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।

8. जिबरेलिन (Gibberellins):
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग – foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबेरेल फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं।

कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ पौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन – A3 (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन – A3 है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।

जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व (Physiological Effects and Importance of Gibberellins in Agriculture & Horticulture):

I. लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of inrease the length):
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगूर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।

II. पुष्यन पर प्रभाव (Effect of Flowering):
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिंग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।

(i) अनिषेकफलन (Parthenocarphy):
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।

(ii) जीर्णता या जरावस्था (Senescence):
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।

(iii) बीजों का अंकुरण (Seeds Germination):
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।

(iv) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants):
GA का छिड़काव करने से अनावृत्तबीजी (gymnosperm) पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।

III. सायटोकाइनिन (Cytokinin):
सायटोकाइनिन (Cytokinin) – सायटोकायनिन ऑक्सिन की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं का समूह तभी बनता है, जब माध्यम में आक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन नामक बढ़ावा देने वाला तत्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिन रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही है।

सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Cytokinin):

  • ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
  • ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
  • कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अगों के निर्माण को नियन्त्रित करते हैं।

यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिनि और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक हैं।

IV. ऐब्सीलिक अम्ल (Abscisic Acid : ABA):
कार्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है।

वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया।

ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Abscisic Acid):

(i) विलगन (Abscission):
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।

(ii) कलिकाओं की वृद्धि एरं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds):
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।

(iii) जीर्णता (Senescence):
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।

(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration):
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली भूमि में खेती करने के लिए उपुयक्त है।

(v) कन्द निर्माण (Tuber Formation):
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।

(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation):
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।

V. एथिलीन (Ethylene):
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हार्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हार्मोन होता है।

एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Ethylene):

(i) पुष्पन (Flowering):
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।

(ii) विलगन (Abscission):
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।

(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification):
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।

(iv) फलों का पकना (Fruit Ripening):
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम, केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा वसन्तीकरण क्या है? इनके महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
दीप्तिकालिता (Photoperiodism):
पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।

(क) दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं –

  • अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
  • दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
  • तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)

अल्प प्रदीप्तकाली पौधो को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।

(ख) कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्री के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है।

वसन्तीकरण (Varnalization):
कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरण कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत्त होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी० डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था।

गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्तु ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह बसन्ती गेहूँ के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है।

कम ताप पर उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
ऐब्सीसिक एसिड को तनाव हॉर्मोन कहते हैं क्यों?
उत्तर:
ऐब्सीसिक अम्ल वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए बाह्य त्वचीय रन्ध्रों को बन्द करने के लिए प्रोत्साहित करत है। वह विपरीत परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के तनावों को सहन करने में सहायक होता है, इस कारण इसे तनाव हॉर्मोन
कहते हैं।

प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
पौधों में वृद्धि एवं विभेदन भी उन्मुक्त होता है। विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ/ऊतक परिपक्व होने पर भिन्न-भिन्न संरचनाएँ बनती हैं। कोशिका/ऊतक की परिपक्वता के समय अन्तिम संरचना कोशिका के आन्तरिक स्थान पर भी निर्भर करती है; जैसे – मूल के शीर्ष पर स्थित विभज्योतक से मूलगोप कोशिकाएँ, परिधि की ओर मूलीय त्वचा के रूप में विभेदित होती है।

इसी प्रकार कुछ कोशिकाएँ जाइलम, फ्लोएम, परिरम्भ, वल्कुट आदि के रूप में विभेदित होती है। इसी प्रकार प्ररोह शीर्ष पर स्थित विभज्योतक विभिन्न कोशिकाओं/ऊतकों और अंगों के रूप में विभेदित होती है। इस प्रकार विभज्योतक की क्रियात्मकता से पौधे के शरीर की विभिन्न कोशिकाओं, ऊतक और अंगों के निर्माण को वृद्धि का खुला स्वरूप कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तकाली पौधे और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे किसी एक स्थान पर साथ-साथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (short day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिस पर या इससे कम प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे अधिक प्रकाश अवधि में पौधा पुष्प उत्पन्न नहीं कर सकता।

दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों (long day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिससे अधिक प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे कम प्रकाश अवधि मे पुष्प उत्पन्न नहीं होते। अतः अल्प प्रदीप्तकाली पौधों और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में विभेदन उनमें निर्णायक दीप्तिकाल से कम अवधि पर पुष्पन होना अथवा अधिक अवधि पर पुष्प उत्पन्न होने के आधार पर किया जाता है।

दो जातियों के पौधे समान अवधि के प्रकाश में पुष्प उत्पन्न करते हैं; उनमें से एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधा तथा दूसरा दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा हो सकता है; जैसे – जैन्थियम (Xanthium) का निर्णायक दीप्तिकाल 15\(\frac{1}{2}\) घण्टे हैं और हाइओसायमस नाइजर (Hyoscyamus niger) का निर्णायक दीप्तिकाल 11 घण्टे है।

दोनों पौधे 14 घण्टे की प्रकाशीय अवधि में पुष्प उत्पन्न कर सकते हैं। इस आधा पर जैन्थियम अल्प प्रदीप्तकाली पौधा है क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से कम प्रकाशीय अवधि में पुष्पन करता है तथा हाइओसायमस नाइजर दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा है; क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल में अधिक प्रकाश अवधि में पुष्पन करता है।

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प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक नाम दीजिए –
(क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
(ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
(ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
(घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
(ङ) एक रोजेट पौधे में वोल्ट हेतु
(च) पत्तियों के रन्ध्र को तुरन्त बन्द करने हेतु।
उत्तर:
(क) ऑक्सिन (Auxins)
(ख) एथिलीन (Ethylene)
(ग) सायटोकाइनिन (Cytokinins)
(घ) सायटोकाइनिनि (Cytokinins)
(ङ) जिबरेलिन (Gibberellins)
(च) ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)।

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है? यदि हाँ या नहीं तो क्यों?
उत्तर:
पौधों में पुष्पन क्रिया प्रतिदिन उपलब्ध प्रकाश अवधि (Photoperiod) से प्रभावित होती है। पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया नहीं करता, क्योंकि पौधे की पत्तियाँ ही प्रकाश को ग्रहण करने की क्षमता रखती हैं। पत्तियों में एक प्रेरक हॉर्मोन फ्लोरिजन (florigen) उत्पन्न होता है। इसकी निश्चित मात्रा पुष्पन को प्रभावित करती है। प्लोरिजन के अभाव में पुष्पन नहीं होता।

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प्रश्न 11.
क्या हो सकता है, अगर –
(क) जी ए3 (GA3) को धान के नवोद्भिद् पर दिया जाए।
(ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बन्द कर दें।
(ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
(घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन्स डालना भूल जाएँ।
उत्तर:
(क) नवोद्भिद् पादप GA3 के प्रभाव में अधिक लम्बे हो जाते हैं। इनकी पत्तियाँ पीली और लम्बी हो जाती हैं। इस लक्षण को बैकेन (फूलिश सीडलिंग) रोग कहते हैं।
(ख) अविभेदित कोशिकाओं का समूह बन जाएगा।
(ग) सड़े फल से एथिलीन हॉर्मोन निकलता है, जिसके प्रभाव से कच्चे फल जल्दी पक जाएँगे।
(घ) सायटोकाइनिन्स मिलाने से अविभेदित कैलस में प्ररोह तथा जड़ का विकास हो जाता है।

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 8 गति

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Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 8 गति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 9 Science गति InText Questions and Answers

प्रश्न शृंखला # 01 (पृष्ठ संख्या 110)

प्रश्न 1.
एक वस्तु के द्वारा कुछ दूरी तय की गई। क्या इसका विस्थापन शून्य हो सकता है। अगर हाँ, तो अपने उत्तर को उदाहरण के द्वारा समझाइए।
उत्तर:
हाँ, एक वस्तु का विस्थापन शून्य हो सकता है यदि उसकी प्रारम्भिक व अन्तिम स्थिति समान हो या उनके बीच की दूरी शून्य हो। यदि वस्तु कुछ दूरी तय करके अपनी प्रारम्भिक स्थिति पर वापस आ जाती है तो उसका विस्थापन शून्य होगा।

प्रश्न 2.
एक किसान 10 m की भुजा वाले एक वर्गाकार खेत की सीमा पर 40 s में चक्कर लगाता है। 2 मिनट 20 s के बाद किसान के विस्थापन का परिमाण क्या होगा?
हल:
यदि खेत ABCD है तो किसान 40 s में 10 + 10 + 10 + 10 = 40 m चलता है।
अत: 2 min 20 s = 140 s में किसान 140 m चलेगा।
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2 min 20 s में किसान खेत के 3 चक्कर लगाने के बाद 20 m और चलेगा तथा किसान C पर होगा। अतः किसान की विस्थापन दूरी AC के बराबर होगी। पाइथागोरस प्रमेय से,
AC2 = AB2 + BC2
= 102 + 102
= 100+ 100

AC2 = 200
AC = \( \sqrt{200} \) = 10\( \sqrt{2} \)
= 10 x 1.414
=14.14 मीटर

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प्रश्न 3.
विस्थापन के लिए निम्न में कौन सही है ?
(a) यह शून्य नहीं हो सकता है।
(b) इसका परिमाण वस्तु के द्वारा तय की गई दूरी से अधिक है।
उत्तर:
दोनों
(a) व (b) गलत हैं।

प्रश्न शृंखला # 02 (पृष्ठ संख्या 112)

प्रश्न 1.
चाल एवं वेग में अन्तर बताइए।
उत्तर:
किसी वस्तु की गति की दर उसकी चाल कहलाती है व एक निश्चित दिशा में चाल को वेग कहते हैं। वेग वस्तु की चाल व दिशा दोनों को व्यक्त करता है।

प्रश्न 2.
किस अवस्था में किसी वस्तु के औसत वेग का परिमाण उसकी औसत चाल के बराबर होगा?
उत्तर:
जब एक वस्तुः सरल रेखा में बदलती हुई चाल के साथ गति कर रही है तो इसके गति की दर के परिमाण को औसत वेग के द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। इसका परिकलन औसत चाल के परिकलन के समान ही होता है।

प्रश्न 3.
एक गाड़ी का ओडोमीटर क्या मापता है ?
उत्तर:
ओडोमीटर गाड़ी में लगा वह यन्त्र है जो गाड़ी के द्वारा तय की गई दूरी को मापता है।

प्रश्न 4.
जब वस्तु एकसमान गति में होती है तब इसका मार्ग कैसा दिखाई पड़ता है ?
उत्तर:
जब वस्तु एकसमान गति में होती है तब इसका मार्ग सरल रेखा में दिखाई पड़ता है।

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प्रश्न 5.
एक प्रयोग के दौरान अन्तरिक्ष यान से एक सिग्नल को पृथ्वी पर पहुँचने में 5 मिनट का समय लगता है। पृथ्वी पर स्थित स्टेशन से उस अन्तरिक्ष यान की दूरी क्या है ? (सिग्नल की चाल = प्रकाश की चाल = 3 x 102 ms-1)
हल:
हम जानते हैं कि,
v = \(\frac { s }{ t }\)
v = 3 x 108 ms-1
t= 5 मिनट = 5 x 60 = 300s
s = v x t
=3 x 108 x 3 x 102
s = 9 x 1010 m
अतः पृथ्वी पर स्थित स्टेशन से अन्तरिक्ष यान की दूरी 9 x 1010 m है।

प्रश्न श्रृंखला # 03 (पृष्ठ संख्या 114)

प्रश्न 1.
आप किसी वस्तु के बारे में कब कहेंगे कि –
1. वह एकसमान त्वरण से गति में है ?
2. वह असमान त्वरण से गति में है ?
उत्तर:
1. यदि एक वस्तु सरल रेखा में चलती है और इसका वेग समान समयान्तराल में समान रूप से घटता या बढ़ता है तो वस्तु के त्वरण को एकसमान त्वरण कहा जाता है।
2. यदि एक वस्तु सरल रेखा में चलती है और इसका वेग असमान रूप से बदलता है तो उसके त्वरण को असमान त्वरण कहते हैं।

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प्रश्न 2.
एक बस की गति 5s में 80 km h-1 से घटकर 60 km h-1 हो जाती है। बस का त्वरण ज्ञात कीजिए।
हल:
प्रारम्भिक वेग ५ = 80 km h-1
अन्तिम वेग v = 60 km h-1
समय, t = 5s
समीकरण से
a = \(\frac { v – u }{ t }\)
a = \(\frac { 60 – 80 }{ 5s }\)km h-1
= (\(\frac {20}{5}\)x \(\frac {1000}{3600}\)) m/s2
= (\(\frac {10}{9}\)) = – 1.11 m/s2
बस का त्वरण -1.11 m/s2 है।

प्रश्न 3.
एक रेलगाड़ी स्टेशन से चलना प्रारम्भ करती है और एक समान त्वरण के साथ चलते हुए 10 मिनट में 40 kmh-1की चाल प्राप्त करती है। इसका त्वरण ज्ञात कीजिए।
हल:
प्रारम्भिक वेग, u = 0
अन्तिम वेग, v = 40 km h-1
= 40 x \(\frac {1000}{3600}\)
\(\frac {100}{9}\)m/s

समय,
t = 10 min
= 10 x 60 = 600s
हम जानते हैं,
a = \(\frac {v – u}{t}\)
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\(\frac {1}{54}\)m/s-2
= 0.0185 m/s2
रेलगाड़ी का त्वरण 0.0185 ms-2 है।

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प्रश्न शृंखला # 04 (पृष्ठ संख्या 118)

प्रश्न 1.
किसी वस्तु के एकसमान व असमान गति के लिए समय-दूरी ग्राफ की प्रकृति क्या होती है ?
उत्तर:
एकसमान गति के लिए समय-दूरी ग्राफ एक सरल रेखा होती है। असमान गति के लिए समय के साथ तय की गई दूरी का ग्राफ एक सरल रेखा नहीं होता है।

प्रश्न 2.
किसी वस्तु की गति के बारे में आप क्या कह सकते हैं जिसका दूरी-समय ग्राफ समय अक्ष के समान्तर एक सरल रेखा है।
उत्तर:
जिस वस्तु का दूरी-समय ग्राफ समय अक्ष के समान्तर एक सरल रेखा है उस वस्तु की गति एकसमान होगी।

प्रश्न 3.
किसी वस्तु की गति के विषय में आप क्या कह सकते हैं जिसका चाल-समय ग्राफ समय अक्ष के समान्तर एक सरल रेखा है ?
उत्तर:
जब चाल समय-ग्राफ समय अक्ष के समान्तर एक सरल रेखा है तो वस्तु एकसमान चाल से गतिमान होगी।

प्रश्न 4.
वेग-समय ग्राफ के नीचे के क्षेत्र से मापी गई राशि क्या होती है ?
उत्तर:
वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्र (क्षेत्रफल) दिए गए समयान्तराल में वस्तु द्वारा तय की गई दूरी (विस्थापन के परिमाण) को दर्शाता है।

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प्रश्न शृंखला # 05 (पृष्ठ संख्या 121)

प्रश्न 1.
कोई बस विरामावस्था से चलना प्रारम्भ करती है तथा 2 मिनट तक 0.1 ms-2 के एकसमान त्वरण से ‘चलती है। परिकलन कीजिए:
(a) प्राप्त की गई चाल, तथा
(b) तय की गई दूरी।
हल:
प्रारम्भिक वेग, u = 0
त्वरण, a = 0.1 ms-2
समय, t = 2 min = 120 s

(a) प्राप्त की गई चाल
हम जानते हैं,
v = u + at
v = 0 + 0.1 m/s2 x 120 s
v = 12 m/s
अतः बस द्वारा प्राप्त की गई चाल 12 m/s है।

(b) तय की गई दूरी हम जानते हैं,
s = ut + \(\frac {1}{2}\)at2
s = 0 x 12 s + \(\frac {1}{2}\) x 0.1 m/s2 x (120 s)2
= \(\frac {1}{2}\) x 1440 m = 720 m
अत: बस द्वारा तय की गई दूरी 720 m है।

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प्रश्न 2.
कोई रेलगाड़ी 90 km h-1 की चाल से चल रही है। ब्रेक लगाये जाने पर वह-0.5 ms-2 का एकसमान त्वरण उत्पन्न करती है। रेलगाड़ी विरामावस्था में आने के पहले कितनी दूरी तय करेगी?
हल:
यहाँ प्रारम्भिक वेग, u = 90 km/h
= \(\frac {90 x 100m}{60 x 60 s}\) = 25 m/s
अन्तिम वेग, v = 0
त्वरण, a = – 0.5 m/s2
तय की गई दूरी = ?
हम जानते हैं,
v2 = u2 + 2as
0 = (25 m/s)2 +2 x (-0.5) m/s2 x s
0 = 625 m2 s-2 – 1 m/s2 x s
1 m / s2 x s = 625 m s-2
s = 625 m s-2/1 m s-2 = 625 m
अतः रेलगाड़ी विरामावस्था में आने से पहले 625 m की दूरी तय करेगी।

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प्रश्न 3.
एक ट्रॉली एक आनत तल पर 2 m s-2 के त्वरण से नीचे जा रही है। गति प्रारम्भ करने के 3s के पश्चात् उसका वेग क्या होगा?
हल:
प्रारम्भिक वेग, u = 0
त्वरण, a = 2 m/s2
समय, t = 3 s
अन्तिम वेग, v = ?
हम जानते हैं, v = u + at
v = 0 + 2 m / s2 x 3 s
v = 6 m / s
अतः ट्रॉली का अन्तिम वेग 6 m/s होगा।

प्रश्न 4.
एक रेसिंग कार का एकसमान त्वरण 4 ms-2 है। गति प्रारम्भ करने के 10s पश्चात् वह कितनी दूरी तय करेगी?
हल:
त्वरण, a = 4 ms-2
प्रारम्भिक वेग, u = 0
समय, t = 10 s
तय की गई दूरी = ?
हम जानते हैं,
s = ut + 1/2 at2
s = 0 x 10 s + \(\frac {1}{2}\) x 4 m/s-2 x (10 s)-2
=\(\frac {1}{2}\) x 4 ms-2 x 100 s-2
= 2 x 100 m = 200 m
अतः रेसिंग कार गति प्रारम्भ करने के 10 s के पश्चात् 200 m की दूरी तय करेगी।

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 8 गति

प्रश्न 5.
किसी पत्थर को ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर 5 ms-1के वेग से फेंका जाता है। यदि गति के दौरान पत्थर का नीचे की ओर दिष्ट त्वरण 10 m s-2 है, तो पत्थर के द्वारा कितनी ऊँचाई प्राप्त की गई तथा उसे वहाँ पहुँचने में कितना समय लगा.?
हल:
प्रारम्भिक वेग, u = 5 m / s
अन्तिम वेग, v = 0
(क्योंकि जहाँ से पत्थर नीचे गिरने लगता है उसका वेग शून्य हो जाता है)
त्वरण, a = – 10 m /s-2
(त्वरण नीचे की दिशा में है, अतः पत्थर का वेग घट रहा है, अतः त्वरण – ve होगा)
ऊँचाई, i.e., दूरी, s = ?
हम जानते हैं,
v2 = u2+ 2as
0 = (5 m/s)2 + 2 x – 10 m/s2 x s
0 = 25 m2 – s2 – 20 m/s2 x s
20 m/s2 x s = 25 m2 s2
s = \(\frac{25 m^{2} s^{2}}{20 m / s^{2}}\)img
s = 1.25 m
हम जानते हैं,
v = u + at
0 = 5m s-1 + (- 10 m s-2) x t
10 m s-2 x t = 5 m s-1
t =  \(\frac{5 m s^{-1}}{10 m s^{-2}}\)
t = \(\frac {1}{2}\) s = 0.5 s
अत: पत्थर 1.25 m ऊँचाई तय करेगा व इस दूरी को तय करने में 0.5 s लगा।

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क्रियाकलाप 8.1 (पृष्ठ संख्या 108)

प्रश्न 1.
आपकी कक्षा की दीवार विरामावस्था में है या गति में, चर्चा करें।
उत्तर:
हमारी कक्षा की दीवार विरामावस्था में है क्योंकि वह अपनी जगह पर स्थिर है व गति नहीं करती।

क्रियाकलाप 8.2 (पृष्ठ संख्या 108)

प्रश्न 2.
क्या आपने कभी अनुभव किया है कि रेलगाड़ी, जिसमें आप बैठे हैं, गति करती हुई प्रतीत होती है जबकि वास्तव में वह विरामावस्था में है ? इस बिन्दु पर चर्चा करें और विचारों का आदान-प्रदान करें।
उत्तर:
रेलगाड़ी जिसमें हम बैठे हैं अगर वह विरामावस्था में है और हम उसके बाहर एक दूसरी गतिमान रेलगाड़ी को देखते हैं तो हमें अपनी रेलगाड़ी गति करती हुई प्रतीत होती है। परन्तु यह गति गतिमान रेलगाड़ी की विपरीत दिशा में प्रतीत होती है।

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क्रियाकलाप 8.3 (पृष्ठ संख्या 110)

प्रश्न 3.
एक मीटर स्केल और एक लम्बी रस्सी लीजिए। बास्केट बॉल कोर्ट के एक कोने से दूसरे कोने तक उसके किनारे से होते हुए जाएँ। अपने द्वारा तय की गई दूरी और विस्थापन के परिमाण को मापें। दोनों भौतिक राशियों के मापन में आप क्या अन्तर पाते हैं ?
उत्तर:
बास्केट बॉल कोर्ट के एक कोने से दूसरे कोने तक जाने में तय की गई दूरी 100 m है और पूरे बास्केट बॉल कोर्ट का चक्कर लगाने पर तय की गई दूरी = 100 + 100 + 100 + 100 = 400 m जबकि विस्थापन शून्य है क्योंकि प्रारम्भिक व अन्तिम स्थितियाँ समान हैं।

करियाकलाप 8.5 (पृष्ठ संख्या 110)

प्रश्न 4.
दो वस्तुओं A तथा B की गति से सम्बन्धित आँकड़ों को अग्रांकित सारणी में दिया गया है। ध्यान से देखें और बताएँ कि वस्तुओं की गति एक समान है या असमान।
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उत्तर:
वस्तु A की गति एकसमान है क्योंकि वह समान (15 मिनट) समयान्तराल में समान दूरी (10 m) तय करती है। वस्तु B की गति असमान है क्योंकि वह समान समयान्तराल में असमान दूरी तय करती है।

क्रियाकलाप 8.6 (पृष्ठ संख्या 112)

प्रश्न 5.
अपने घर से बस स्टॉप या स्कूल जाने में लगे समय को मापिए। यदि आप मान लें कि आपके पैदल चलने की औसत चाल 4 किमी/घण्टा है, तो अपने घर से बस स्टॉप या स्कूल की दूरी का आकलन कीजिए।
उत्तर:
मेरे घर से बस स्टॉप तक पहुँचने में मुझे 30 मिनट लगते हैं। मेरे पैदल चलने की औसत चाल 4 किमी/घण्टा है। अतः मेरे घर से बस स्टॉप 2 किमी की दूरी पर हुआ।

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क्रियाकलाप 8.7 (पृष्ठ संख्या 112)

प्रश्न 6.
जब आसमान में बादल छाए होते हैं, तो बिजली के चमकने और बादलों के गरजने की क्रिया बार-बार हो सकती है। पहले बिजली की चमक दिखाई देती है। उसके कुछ समय पश्चात् बादलों के गरजने की ध्वनि आप तक पहुँचती है। क्या आप बता सकेंगे कि ऐसा क्यों होता है ?
उत्तर:
बिजली के चमकने व बादलों के गरजने में समय अन्तराल होता है क्योंकि बिजली की चमक प्रकाश की चाल के बराबर होती है (3 x 108 मी/सेकण्ड) जो कि ध्वनि की चाल से काफी तेज होती है। वायु में ध्वनि की चाल 346 मी/से है। यही कारण है कि हमें बिजली की चमक पहले दिखाई देती है जबकि बादलों की गरजन बाद में सुनाई पड़ती है।

क्रियाकलाप 8.8 (पृष्ठ संख्या 114)

प्रश्न 7.
आप दैनिक जीवन में बहुत प्रकार की गतियों को देखते होंगे, जिनमें प्रमुख हैं
(a) गति की दिशा में त्वरण
(b) त्वरण गति की दिशा के विरुद्ध है
(c) एकसमान त्वरण है, तथा
(d) असमान त्वरण है।
क्या आप ऊपर दिए गए प्रत्येक प्रकार की गति के लिए एक-एक उदाहरण दे सकते हैं ?
उत्तर:
(a) गति की दिशा में त्वरण-कोई भी गिरती हुई वस्तु जैसे कि एक गेंद गति की दिशा में त्वरण करती है।
(b) त्वरण गति की दिशा के विरुद्ध है-ऊपर उछाली मई गेंद में गुरुत्वीय त्वरण गति की दिशा के विरुद्ध होता है।
(c) एकसमान त्वरणं है-कोई भी वस्तु जो मुक्त पतन करती है, एकसमान त्वरण प्रदर्शित करती है या वृत्तीय पथ पर भी एकसमान त्वरण होता है। चन्द्रमा व पृथ्वी की गति एक समान त्वरण के उदाहरण हैं।
(d) असमान त्वरण है-असमान वेग से चलती हुई कार असमान त्वरण का उदाहरण है।

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क्रियाकलाप 8.9 (पृष्ठ संख्या 117)

प्रश्न 8.
एक ट्रेन के तीन विभिन्न स्टेशनों A, B और C पर आगमन और प्रस्थान करने के समय एवं स्टेशन A से स्टेशन B व C की दूरी निम्न सारणी में दी गई है। सारणी : स्टेशन A व B तथा C की दूरी तथा ट्रेन के आगमन व प्रस्थान करने का समय
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मान लें कि किन्हीं दो स्टेशनों के बीच ट्रेन की गति एकसमान है तो इस आधार पर वेग-समय ग्राफ खींचें तथा इसकी व्याख्या करें।
हल:
दी गई सारणी के अनुसार, ट्रेन स्टेशन A से B तक 120 किमी चलती है। तीन घण्टे में (11.15 – 8.15 = 3 घण्टा) व स्टेशन B से C तक 60
किमी. (180 – 120 = 60 किमी) चलती है 1.5 घण्टा में (13.00 – 11.30)। इस आधार पर वेग-समय ग्राफ निम्न है –
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स्टेशन A से 8 तक तय की गई दूरी = 120 किमी
स्टेशन A से B तक लिया गया समय = 11.15 – 8.15 = 3 घण्टा
A से B तक वेग = \(\frac { 120 }{ 3 }\)
= 40 किमी/घण्टा

स्टेशन B से C तक तय की गई दूरी = 60 किमी
स्टेशन B से C तक लिया गया समय = 1.5 घण्टा
स्टेशन B से C तक लिया गया वेग = \(\frac { 60 }{ 1.5 }\) = 40 किमी/घण्टा
अतः ट्रेन A से C तक एकसमान वेग से चल रही है।

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क्रियाकलाप 8.10 (पृष्ठ संख्या 118)

प्रश्न 1.
फिरोज और उसकी बहन सानिया अपनी . साइकिलों से स्कूल जाते हैं। वे दोनों घर से एक ही समय पर प्रस्थान करते हैं एवं एक ही मार्ग से जाते हैं फिर भी अलग-अलग समय पर स्कूल पहुँचते हैं। अग्रांकित सारणी उन दोनों के द्वारा अलग-अलग समय में तय की गई दूरी को दर्शाती है। उन दोनों की गति के लिए एक ही पैमाने पर । दूरी-समय ग्राफ खीचें तथा व्याख्या करें। सारणी : फिरोज और सानिया द्वारा अपनी साइकिलों पर अलग-अलग समय में तय की गई दूरी
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उत्तर:
फिरोज की गति Pसे R तक एकसमान है व सानिया की गति 0 से B व B से D तक एकसमान है। अत: वे असमान गति से चल रहे हैं।
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OS = फिरोज द्वारा तय की गई दूरी, OE = सानिया द्वारा तय की गई दूरी।

क्रियाकलाप 8.11 (पृष्ठ संख्या 122)

प्रश्न 2.
एक धागे का टुकड़ा लें और उसके एक छोर पर एक छोटे से पत्थर को बाँध दें। धागे के दूसरे छोर को पकड़कर पत्थर को वृत्तीय पथ पर नियत चाल से घुमाएँ। अब पत्थर सहित धागे को छोड़ दें। क्या आप बता सकते हैं कि धागा छोड़ने के बाद पत्थर किस दिशा में जाएगा? इस क्रिया को बार-बार दोहराएँ और वृत्तीय पथ के अलग-अलग जगहों से पत्थर को छोड़ें और यह देखें कि पत्थर के गति करने की दिशा समान है या नहीं।
उत्तर:
पत्थर वृत्तीय पथ के स्पर्शी के अनुदिश सरल रेखीय पथ पर गति करता है। अलग-अलग जगहों से पत्थर को छोड़ने पर पत्थर की गति की दिशा समान नहीं रहती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब पत्थर को छोड़ा जाता है तो वह उसी दिशा में गति जारी रखता है जिस दिशा में उस क्षण वह गति कर रहा है। अतः जब पत्थर को वृत्तीय पथ पर घुमाया जाता है तो उसकी गति की दिशा प्रत्येक बिन्दु पर परिवर्तित होती है।

Bihar Board Class 9 Science गति Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एक एथलीट वृत्तीय पथ जिसका व्यास 200 m है, का एक चक्कर 40 s में लगाता है। 2 min 20 s के बाद वह कितनी दूरी तय करेगा और उसका विस्थापन क्या होगा ?
हल:
दिया गया है, व्यास = 200 m, अतः
त्रिज्या r = 100 m
एक चक्कर में लगने वाला समय = 40s
2 m 20 s समय = 2 x 60 s + 20 s = 140 s
140 s के बाद दूरी = ?
140 s के बाद विस्थापन = ?
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v = \(\frac {2πr}{40 s}\)
v = \(\frac {2 x 3.14 × 100 m}{40 s}\)
v = \(\frac {628}{40 }\) = \(\frac {m}{s}\)

(a) 140 s के बाद दूरी
दूरी = वेग x समय
दूरी = 15-7 m/s x 140 s = 2198 m

(b) 2 m 20s i.e., 140s के बाद विस्थापन
40s में लगने वाले चक्कर = 1
अतः 1s में लगने वाले चक्कर = \(\frac {1}{40 }\)
अतः 140 s में लगने वाले चक्कर = \(\frac {1}{40 }\) x 140 = 3.5
अतः, 3.5 चक्कर के बाद एथलीट वृत्तीय पथ पर दूसरी ओर आ जायेगा, यानि वृत्तीय पथ के व्यास के बराबर दूरी के जो 200 m है।
2 m 20 s के बाद विस्थापन = 200 m
अतः 2 m 20 s के बाद एथलीट द्वारा तय की गई दूरी 2198 m व उसका विस्थापन 200 m होगा।

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प्रश्न 2.
300 m सरल रेखीय पथ पर जोसेफ जॉगिंग करता हुआ 2 min 30 s में एक सिरे A से दूसरे सिरे B तक पहुँचता है और घूमकर 1 min में 100 m पीछे बिन्दु C पर पहुँचता है। जोसेफ की औसत चाल और औसत वेग क्या होंगे?
(a) सिरे A से सिरे B तक तथा
(b) सिरे B से सिरे C तक।
हल:
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A से B तक दूरी = 300 m
समय = 2 min 30 s = 2 x 60 + 30 = 150s
B से C तक दूरी = 100 m
समय = 1 min = 60s

(a) सिरे A से B तक औसत चाल व वेग –
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समय
= 300 m = 2 m/s
अतः, औसत चाल = 2 m/s पूरब की ओर

(b) हम जानते हैं,
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= \(\frac {100 m}{60 s}\) = 1.66 m /s
अतः औसत वेग = 1.66 m/s पश्चिम
अतः, औसत चाल = 1.66 m/s व औसत वेग = 1.66 m/s पश्चिम

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प्रश्न 3.
अब्दुल गाड़ी से स्कूल जाने के क्रम में औसत चाल को 20 km h-1 पाता है। उसी रास्ते से लौटने के समय वहाँ भीड़ कम है और औसत चाल 30 km h-1 है। अब्दुल की इस पूरी यात्रा में उसकी औसत चाल क्या है ?
हल:
हर एक यात्रा में लगने वाला समय पता करने के पश्चात् हम औसत चाल का परिकलन कर सकते हैं।
अगर स्कूल की दूरी = 5 km
स्कूल पहुँचने में लगने वाला समय = t1
स्कूल से लौटने में लगने वाला समय = t2
हम जानते हैं,
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स्कूल जाने में औसत चाल = \(\frac{S}{t_{1}}\)
20 km/hr = \(\frac{S}{t_{1}}\)
t1 = \(\frac{s}{20}\) hr = 26 hr
स्कूल से लौटने में औसत चाल = \(\frac{S}{t_{2}}\)
30 km/hr = \(\frac{S}{t_{2}}\)
t2 = \(\frac{s}{30}\) h
कुल समय = t1 + t2 = \(\frac{s}{20}\) + \(\frac{s}{30}\)
(t1 + t2) = \(\frac{3s + 2s}{60}\) h
= \(\frac{5s}{60}\)h = \(\frac{s}{12}\)h
अब दोनों तरफ की यात्रा की औसत चाल=
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\(\frac{2 s}{s / 12}\)
\(\frac{2 s \times 12}{s}\)
= 24 km/hr
अतः अब्दुल की औसत चाल = 24 km/hr

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प्रश्न 4.
कोई मोटरबोट झील में विरामावस्था से सरल रेखीय पथ पर 3.0 m s-2 के नियत त्वरण से 8.0 s तक चलती है। इस समय अन्तराल में मोटर बोट कितनी दूरी तय करती है ?
हल:
यहाँ, प्रारम्भिक वेग (u) = 0
त्वरण (a) = 3.0 m/s2
समय = 8s
अतः, दूरी (s) = ?
हम जानते हैं,
s = ut + \(\frac{1}{2}\) at2
s = 0 x 8 + \(\frac{1}{2}\) 3 m/s2 x (8s)2
s = \(\frac{1}{2}\) x 3 x 64 m
s = 3 x 32 m
s = 96 m
अतः मोटर बोट दिये गए समय में 96 m की दूरी तय करेगी।

प्रश्न 5.
किसी गाड़ी का चालक 52 km h-1 की गति से चल रही कार में ब्रेक लगाता है तथा कार विपरीत दिशा में एकसमान दर से त्वरित होती है। कार 5 s में रुक जाती है। दूसरा चालक 30 km h-1 की गति से चलती हुई दूसरी कार पर धीमे-धीमे ब्रेक लगाता है तथा 10 s में रुक जाता है। एक ही ग्राफ पेपर पर दोनों कारों के लिए चाल-समय ग्राफ आलेखित करें। ब्रेक लगाने के पश्चात् दोनों में से कौन-सी कार अधिक दूरी तक जाएगी?
हल:
पहले ड्राइवर के लिए दिया है, –
प्रारम्भिक वेग, u = 52 km h-1
= \(\frac{52 \times 1000 m}{60 \times 60 s}\) = 14.4 m s-1

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समय t = 5s
अन्तिम वेग, v = 0 (कार रुक जाती है)
अतः, दूरी s = ?
दूसरे ड्राइवर के लिए दिया है।
u = 3 km h-1
= \(\frac{52 \times 1000 m}{60 \times 60 s}\) = 9.4 ms-1
समय, t = 10 s
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AD = पहली कार का वेग, BC = दूसरी कार का वेग ग्राफ का क्षेत्रफल गाड़ी द्वारा तय की गई दूरी बताता है। अतः,पहली कार द्वारा तय की गई दूरी = ∆ OAD का क्षेत्रफल
दूरी s = \(\frac{1}{2}\) x OD x OA
s = \(\frac{1}{2}\) x 14.4 m/s x 5s
s = 7.2 m/s x 5 s = 36 m
अतः दूसरी कार द्वारा तय की गई दूरी = ∆OBC का क्षेत्रफल
दूरी s = \(\frac{1}{2}\) x OC x OB
= \(\frac{1}{2}\) x 9.4 m/s x 10s
= 4.7 m/s x 10 s = 47 m
अतः दूसरी कार अधिक दूरी तक जायेगी।

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प्रश्न 6.
चित्र 8.7 में तीन वस्तुओं A, B और C के दूरी-समय ग्राफ प्रदर्शित है। ग्राफ का अध्ययन करके निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए
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(a) तीनों में से कौन सबसे तीव्र गति से गतिमान है ?
(b) क्या ये तीनों किसी भी समय सड़क के एक ही बिन्दु पर होंगे?
(c) जिस समय B, A से गुजरती है उस समय तक C कितनी दूरी तय कर लेती है ?
(d) जिस समय B, C से गुजरती है उस समय तक यह कितनी दूरी तय कर लेती है ?
हल:
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(a) ग्राफ से यह स्पष्ट है कि B कम समय में ज्यादा दूरी तय करती है। अतः, B सबसे तीव्रगति से गतिमान है।
(b) ये तीनों किसी भी समय सड़क के एक ही बिन्दु पर कभी नहीं होंगे।
(c) ग्राफ से, हर वर्ग 0.57 km दूरी दर्शाता है। A, B से बिन्दु S पर गुजरती है जो बिन्दु P की रेखा में है (दूरी अक्ष पर) व 9.14 km प्रदर्शित करता है।
अतः, इस बिन्दु पर C की दूरी
= 9.14 – (0.57 x 3.75) km
= 9.14 km – 2.1375 km
= 7.00025 km
= 7 km

अतः जिस समय B, A से गुजरती है उस समय तक C7 km दूरी तय कर लेती है।

(d) B, C से दूरी अक्ष पर बिन्दु Q पर गुजरती है जो कि
4 km + 0.57 km x 2.25 = 5.28 km
अतः जिस समय B, C से गुजरती है उस समय तक यह 5.28 km दूरी तय कर लेती है।

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प्रश्न 7.
20 m की ऊँचाई से एक गेंद को गिराया जाता है। यदि उसका वेग 10 m s-2 के एकसमान त्वरण की दर से बढ़ता है तो यह किस वेग से धरातल से टकराएगी ? कितने समय पश्चात् वह धरातल से टकराएगी ?
हल:
यहाँ, प्रारम्भिक वेग, u = 0
दूरी (s) = 20 m
त्वरण (a) = 10 m/s2
अन्तिम वेग, v = ?
समय, t = ?

(a) अन्तिम वेग, v का परिकलन हम जानते हैं, –
v2 = u2 + 2as
v2 = 0 + 2 x 10 m/s2 x 20 m
v2 = 400 m2 s-2
v2 = \(\sqrt{400 m^{2} s^{-2}}\)
v = 20 m/s

(b) समय, t का परिकलन हम जानते हैं –
v-1 = u + at
v = 20 m/s-1 = 0 + 10 m s-2 x t
t = \(\frac{20 \mathrm{m} \mathrm{s}^{-1}}{10 \mathrm{m} \mathrm{s}^{-2}}\)
t = 20 m s-1
अत: गेंद धरातल पर 20 ms-1 के वेग से 2 5 के पश्चात् टकराएगी।

प्रश्न 8.
किसी कार का चाल-समय ग्राफ चित्र 8.9 में दर्शाया गया है।
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(a) पहले 4 5 में कार कितनी दूरी तय करती है ? इस अवधि में कार द्वारा तय की गई दूरी को ग्राफ में छायांकित क्षेत्र द्वारा दर्शाइए।
(b) ग्राफ का कौन-सा भाग कार की एकसमान गति को दर्शाता है?
हल:
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(a) पहले 4 s में कार द्वारा तय की गई दूरी दूरी-समय ग्राफ का क्षेत्रफल किसी वस्तु द्वारा तय की गई दूरी दर्शाता है। दिये गए ग्राफ में, 56 पूरे वर्ग व 12 आधे वर्ग 4 s ग्राफ के क्षेत्रफल में आते हैं।
कुल वर्ग = 56 + \(\frac{12}{2}\) = 62 वर्ग समय अक्ष पर,
5 वर्ग = 2s
1 वर्ग = \(\frac{2}{5}\) 5
चाल अक्ष पर 3 वर्ग = 2 m/s
1 वर्ग = 2 m/s
1 वर्ग का क्षेत्रफल = 3 s x 3m/s = ism
अतः 62 वर्ग का क्षेत्रफल = 62 x 2 = 248 = 16-53 m
अतः, पहले 4 s में कार 16.53 m दूरी तय करती है।

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(b) भाग AB एक सरल रेखा है जो समय अक्ष के समान्तर है, यह भाग एकसमान गति को दर्शाता है।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सी अवस्थाएँ सम्भव है तथा प्रत्येक के लिए एक उदाहरण दें –
(a) कोई वस्तु जिसका त्वरण नियत हो परन्तु वेग शून्य हो।
(b) कोई वस्तु किसी त्वरण से गति कर रही है लेकिन समान चाल से।
(c) कोई वस्तु किसी निश्चित दिशा में गति कर रही हो तथा त्वरण उसके लम्बवत् हो ?
उत्तर:
(a) यह अवस्था सम्भव है केवल स्वतन्त्रतापूर्वक गिरती वस्तु के. प्रारम्भिक बिन्दु पर अथवा ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेंकी गयी वस्तु के अन्तिम बिन्दु पर जहाँ वस्तु का वेग शून्य तथा त्वरण गुरुत्वीय है।
(b) यह अवस्था सम्भव है जब कोई वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर समान चाल से चल रही है जहाँ किसी भी बिन्दु पर त्वरण मार्ग के केन्द्र की ओर होगा।
(c) यह अवस्था केवल उस स्थिति में सम्भव है जब कोई वस्तु किसी दिशा में गति करना प्रारम्भ करती है तथा वृत्ताकार मार्ग पर चलती है उस समय उसका त्वरण उसकी गति की दिशा के लम्बवत् मार्ग के केन्द्र की ओर होगा।

प्रश्न 10.
एक कृत्रिम उपग्रह 42,250 km त्रिज्या की वृत्ताकार कक्षा में घूम रहा है। यदि वह 24 घंटे में पृथ्वी की परिक्रमा करता है तो उसकी चाल का परिकलन कीजिए।
हल:
यहाँ त्रिज्या, r = 42,250 km
समय,
t = 24 hr
वेग = ?
हम जानते हैं कि वृत्तीय पथ पर वेग = \(\frac{2πr}{समय}\)
v = \(\frac{2 \times \frac{22}{7} \times 42250 \mathrm{km}}{24 \mathrm{hr}}\)
v = \(\frac{2 \times 22 \times 42250}{7 \times 24}\) = 11065.47 km / hr
अतः कृत्रिम उपग्रह का वेग = 11065.47 km / hr

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि धरातल पर वायुदाब 1000 मिलीबार है तो घरातल से 1किमी की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(क) 700 मिलीबार
(ख) 900 मिलीबार
(ग) 1100 मिलीबार
(घ) 1300 मिलीबार
उत्तर:
(ख) 900 मिलीबार

प्रश्न 2.
अंतर ऊष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(क) भूमध्य रेखा के निकट
(ख) कर्क रेखा के निकट
(ग) मकर रेखा के निकट
(घ) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर:
(क) भूमध्य रेखा के निकट

प्रश्न 3.
उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(क) घड़ी की सुईयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(ग) समदाब रेखाओं के समकोण पर
(घ) समदाब रेखाओं के सामानंतर
उत्तर:
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 4.
वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(क) विषुवतीय वन
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग
(ग) हिमालय पर्वत
(घ) दक्कन पठार न पठार
उत्तर:
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन सा बल अथवा प्रभाव भूमंडलीय पवनों को विक्षेपित करता है? [B.M.2009A]
(क) दाब प्रवलता
(ख) अभिकेंद्रीय लक्षण
(ग) कोरियोलीसि
(घ) भू-घर्षण
उत्तर:
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

प्रश्न 6.
सामान्यतः कितनी ऊंचाई पर 1°C तापमान घट जाता है?
(क) 65 मी०
(ख) 165 मी०
(ग) 500 मी०
(घ) 1000 मी०
उत्तर:
(ख) 165 मी०

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर:
वायुदाब मापने की इकाई मिलीबार है। व्यापक रूप से प्रयोग की जानेवाली इकाई किलो पास्कल है जिसे (hpa) लिखा जाता है। दाब ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने के लिए और तुलनात्मक बनाने के लिए, वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्र तल के स्तर पर घटा लिया जाता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 2.
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोषण उच्च दाब से विषुवत् वृत की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी-पूर्वी क्यों होती हैं?
उत्तर:
पृथ्वी का अपने पक्ष पर घूर्णन पवनों को दिशा को प्रभावित करता हैं। इसे कोरिआलिस बल कहा जाता है। इसके प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्द्ध में अपने बाईं तरफ विक्षेपित (deflect) हो जाती हैं। कोरिआलिस प्रभाव दाब प्रणवता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणताबल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। जितनी दाब प्रवणता अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी।

प्रश्न 3.
भूविक्षेपी पवनें (Geotrophic winds) क्या हैं?
उत्तर:
पृथ्वी की सतह से 2-3 किमी की ऊँचाई पर ऊपरी वायुमण्डल में पवने धरातलीय घर्षण के प्रभाव से मुक्त होती है तथा दाब प्रवणता तथा कोरिआलिस प्रभाव से नियंत्रित होती हैं। जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, दाब प्रवणता बल कोरिआलिसि प्रभाव से संतुलित हो जाता है और फलस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानांतर बहती हैं। यह पवनें भूविक्षेपी (Geotrophic wind) पवनों के नाम से जानी जाती हैं।

प्रश्न 4.
समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर:
ऊष्मा के अवशेषण के स्थल व समुद्र में भिन्नता पाई जाती है। दिन के दौरान स्थल भाग शीघ्र गर्म हो जाते हैं और समुद्र की अपेक्षा अधिक ताप ग्रहण करते हैं। अतः स्थल पर हवाएँ ऊपर उठती हैं और न्यून दाब क्षेत्र बनता है, जबकि समुद्र अपेक्षाकृत ठण्डे रहते हैं और उन पर उच्च वायुदाब बना रहता है। इससे समुद्र से स्थल की ओर दाब प्रवणता उत्पन्न होती है और पवनें समुद्र से स्थल की तरफ समुद्र समीर के रूप में प्रवाहित होती हैं। रात्रि में इसके एकदम विपरीत प्रक्रिया होती है। स्थल समुद्र की अपेक्षा जल्दी ठण्डा होता है। दाब प्रवणता स्थल से समुद्र की तरफ होने पर स्थल समीर प्रवाहित होती है।

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प्रश्न 5.
पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं –

  1. दाब प्रवणता बल
  2. कोरिऑक्तिस प्रभाव
  3. अभिकेन्द्रीय त्वरण
  4. भू-घर्षण

1. दाब प्रवणता बल – क्षैतिज वायुदाब के अंतर के कारण वायु में गति आती है। दो स्थानों के बीच में दाब प्रणवता जितनी अधिक होगी वायु उतनी ही तीव्र गति से चलेगी। वायु उच्च भार वाले क्षेत्र से निम्न भार वाले क्षेत्र की ओर चलती है।

2. कोरीऑलेस प्रभाव – पृथ्वी के घूर्णनगति के कारण वायु अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है जिसे कोरिऑलिस बल कहा जाता है। इस बल के कारण उत्तरार्द्ध में पवन दाहिने और दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड जाती हैं जिसे फेटेल का नियम भी कहा जाता है। यह बल भूमध्य रेखा पर शुन्य है जबकि ध्रुवों पर अधिक हो जाता है। यह बल की दिशा में परिवर्तन करता है न कि वायु की दिशा को।

3. अभिकेन्द्रीय त्वरण – भ्रमणशील पृथ्वी के घूर्णन केंद्र की दिशा में वायु के अंदर होनें वाले त्वरण के कारण ही पवन हेतु स्थानीय उच्च या न्यून वायु दाब चारों ओर फैल जाता है।

4. भू-घर्षण – धरातलीय विषमताओं के कारण पवन के रास्ते में घर्षण तथा अवरोध पैदा होते हैं जो पवनों की गति एवं दिशा को प्रभावित करती हैं। पर्वत. पठार आदि धरातलीय आकतियाँ पवनों की दिशा एवं गति को बदल देती है। महासागरों के पवनें, महाद्वीपों की अपेक्षा अधिक गति से चलती है।

प्रश्न 6.
पवन के अपरदन कार्य से उत्पन्न स्थलाकतियों का वर्णन करें?
उत्तर:
पवन के अपरदन कार्य से निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।
1. प्लाया (Playa) – प्लाया एक आंतरिक प्रवाह का बेसिन होता है जिसमें एक झील होती है। प्लाया में जल थोड़ी देर हेतु ही रहती है क्योंकि शुष्क जलवायु के कारण वाष्पीकरण की दर अधिक है। प्रायः प्लाया में लवनों का निक्षेप होता है, जिसे प्लाया के क्षारीय निक्षेप कहते हैं?

2. मुरु कटटिम (Desert Pavement) – अपवहन महीन पदार्थों को हटा देता है, जिससे भू-पृष्ठ पर बड़ी-बड़ी गुटिकाएँ बच जाती है। इस प्रकार के अवशिष्ट गुटिकाओं वाले परत को मरुकुट्टिम कहते हैं।

3. वातगर्त (Deflation Hollows) – पवन अपरदन से उत्पन्न उथले गत्तों का अपवहन गर्त अथवा वातर्गत कहते हैं?

4. छत्रक या गारा (Mushroom) – पवन द्वारा अपरदित शैल के हल्के तथा बारीक कण अधिक ऊंचाई तक उठाये जाते हैं, जब बाल के कण गैस पृष्ठ के अनावहित भाग पर परे जोर से टकराते हैं। इससे मरुभूमियों में अधिक तथा ऊपरी मात्रा में कम होता है। इस प्रकार एक छतरीनुमा आकृति बन जाती है, जिसे छत्रक कहते हैं। अरबी भाषा में इसे ‘गारा’ (Gara) कहा जाता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पवना की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ।
उत्तर:
पवनें उच्च दाब से कम दाब की तरफ प्रवाहित होती हैं। भूतल पर धरातलीय विषमताओं के कारण घर्षण पैदा होता है, जो पवनों की गति को प्रभावित करता है। इसके साथ पृथ्वी का घूर्णन भी पवनों के वेग को प्रभावित करता है। अतः पृथ्वी के धरातल पर क्षैतिज पवनें तीन संयुक्त प्रभावों का परिणाम है –

  1. दाब प्रवणता प्रभाव
  2. घर्षण बल तथा
  3. कोरिआलिस प्रभाव।

इसके अतिरिक्त, गुरुत्वाकर्षण बल पवनों को नीचे प्रवाहित करता है।

1. दाब प्रवणता बल – वायुमण्डलीय दाब भिन्नता एक बल उत्पन्न करता है। दूरी के संदर्भ में दाब परिवर्तन की दर दाब प्रवणता है। जहाँ समदाब रेखाएँ पास-पास हों, वहाँ दाब प्रणवता अधिक व समदाब रेखाओं के दूर-दूर होने से दाब प्रवणता कम होती है।

2. घर्षण बल – यह पवनों की गति को प्रभावित करता है। धरातल पर घर्षण सर्वाधिक होता है और इसका प्रभाव धरातल से 1 से 3 किमी ऊँचाई तक होता है। समुद्र पर इसका प्रभाव न्यूनतम होता है।

3. कोरिऑलिस प्रभाव – पृथवी अपने अक्ष पर घूर्णन पवनों की दिशा को प्रभावित करती है। सन् 1844 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने इसका विवरण प्रस्तुत किया और इसी पर इसे कोरिआलिस बल कहा जाता है। इसके प्रभावों से पवनें उत्तरी गालार्द्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्द्ध में अपने मूल दिशा से बाईं तरफ विक्षेपित (deflect) हो जाती हैं। जब पवनों का वेग अधिक होता है तब विक्षेपण भी अधिक होता है। कोरिऑलिस प्रभाव अक्षांशों के समानुपात में बढ़ता है। यह ध्रुवों पर सर्वाधिक और भूमध्यरेखा पर अनुपस्थित होता है।

कोरिऑलिस प्रभाव दाब प्रवणता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणता बल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। जितनी दाब प्रवणता अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी। इन दो बलों को एक-दूसरे के समकोण पर होने के कारण न्यून दाब क्षेत्र में पवनें इसी के इर्द-गिर्द बहती हैं। भूमध्य रेखा पर कोरिऑलिस प्रभाव शून्य होता है और पवनें समदाब रेखाओं के समकोण बहती हैं। अतः न्यून दाब क्षेत्र और अधिक गहन होने की अपेक्षा भर जाता है। यही कारण है कि भूमध्य रेखा के निकट उष्णकटिबंधीय चक्रवात नहीं बनते।

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प्रश्न 2.
पथ्वी पर वायमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हए चित्र बनाएँ। 300 उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के सम्भव कारण बताएँ।
उत्तर:
उच्च तापमान व न्यूनदाब होने से अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती हैं। उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस न्यून दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। अभिसरित वायु संवहन कोष्ठों के साथ ऊपर उठती हैं। यह क्षोभमण्डल के ऊपर 14 कि. मी. की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है और फिर ध्रुवों की तरह प्रवाहित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप लगभग 30° उत्तर व दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्र वायु का कुछ भाग अवतलन करता है और उपोष्ण उच्चदाब बनता है।

अवतलन का एक कारण यह है कि जब वायु 30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों पर पहुँचती है तो यह ठंडी हो जाती है। धरातल के निकट वायु का अपसरण होता है और यह भूमध्यरेखा की ओर पूर्वी पवनों के रूप में बहती है। भूमध्यरेखा के दोनों तरफ से प्राहित होने वाली पूर्वी पवनें अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसंचरण क्षेत्र (ITCZ) पर मिलती हैं। पृथ्वी की सतह से ऊँचाई पर ऐसा परिसंचरण और इसके विपरीत परिसंचरण कोष्ठों (Cells) के रूप में होता है।

उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में ऐसे कोष्ठों को हेडले कोष्ठ (Hadley Cell) कहा जाता है। मध्य अक्षांशाय वायु परिसंचरण में ध्रुवों से प्रवाहित होती ठण्डी पवनों का अवतलन होता है और उपोष्ण उच्चदाब कटिबंधीय क्षेत्रों से आती गर्म हवा ऊपर उठती है। धरातल पर ये पवनें पछुआ पवनों के नाम से जानी जाती हैं और इसके कोष्ठ फैरल कोष्ठ के नाम से जाने जाते हैं। ध्रुवीय अक्षोंशों पर ठंडी सघन वायु का ध्रुवों पर अवतलन होता है और मध्य अक्षांशों की ओर ध्रुवीय पवनों के रूप में प्रवाहित होती हैं। इन कोष्ठों को ध्रुवीय कोष्ठ कहा जाता है। ये तीन कोष्ठ वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का प्रारूप निर्धारित करते हैं। तापीय ऊर्जा का निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों में स्थानांतर सामान्य परिसंचरण को बनाए रखता है।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात से किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं, क्यों?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में महासागरों पर होती हैं और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गति करते हैं। ये चक्रवात पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं। ये ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरिकेन’ के नाम से, पश्चिम प्रशान्त और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफून’ और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विली’ के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं –

  • वृहत समुद्री सतह जहाँ तापमान 27° सेल्सियम से अधिक हो
  • कोरिऑलिस प्रभाव का होना
  • उर्ध्वाधर पवनों की गति में कम अंतर होना
  • कमजोर न्यूनदाब क्षेत्र का होना या कम स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण
  • समुद्री स्तर पर ऊपरी अपसरण।

चक्रवातों को और अधिक विध्वंसक करने वाली ऊर्जा संघनन प्रक्रिया द्वारा ऊँचे कपासी स्तरी मेघों से प्राप्त होती है जो इस तूफान के केन्द्र को घेरे होती हैं। समुद्रों से लगातार आर्द्रता की आपूर्ति की जाती है। ये क्षीण होकर क्षय हो जाते हैं। वह स्थान जहाँ से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात गुजरते हैं, वह तट landfall of cyclone कहलाता है जो चक्रवात 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केन्द्र के चारों तरफ प्रबल सर्पिल (Spiral) पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँखें कहा जाता है। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 किलोमीटर तक होता है। इसका केंद्रीय क्षेत्र शांत होता है जहाँ पवनों का अवतलन होता है।

केन्द्र के चारों तरफ जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप में आरोहण होता है, यह आरोहण क्षोभमण्डल की ऊँचाई तक पहुँचता है। इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है जो 250 कि० मी० प्रति घंटा तक होता है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती हैं। इनका व्यास बंगाल की खाड़ी, अरब सागर व इंडियन महासागर पर 600 से 120 कि० मी० के बीच होता है। यह परिसंचरण प्रणाली धीमी गति से 300 से 500 किमी प्रतिदिन की दर से गति

करते हैं। ये तूफान तरंग उत्पन्न करते हैं और तटीय निम्न क्षेत्रों को जलप्लावित कर देते हैं। ये तूफान स्थल पर धीरे-धीरे क्षीण होकर खत्म हो जाते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
(i) मौसम पद्धति को समझने के लिए मीडिया, अखबार, दूरदर्शन तथा रेडियो से मौसम संबंधी सूचना को एकत्र कीजिए।
(ii) किसी अखबार का मौसम संबंधी भाग, विशेषकर वह जिसमें उपग्रह से भेजा गया मानचित्र दिखाया गया है, पढ़ें। मेघाच्छादित क्षेत्र को रेखांकित करें। मेघों के वितरण से वायुमण्डलीय परिसंचरण की व्याख्या करें। अखबार व दूरदर्शन पर दिखाए गए पूर्वानुमान से तुलना करें। यह भी बताएँ कि सप्ताह के कितने दिन का पूर्वानुमान ठीक था।
उत्तर:
परियोजना कार्य (i) एवं (ii) कि किसी अखबार, रेडियो या दूरदर्शन या सभी से मौसमी संबंधी विवरणों को इकट्ठा करके स्वयं करें।
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कोरियोलिस बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
‘कोरियोलिस’ बल को विक्षेपित बल भी कहा जाता है। सभी गतिशील वस्तुएँ विषुवत् रेखा की ओर संचलन के समय अपने पथ से विक्षेपित हो जाती हैं जिसे कोरियोलिस बल कहते हैं, क्योंकि कोरियोलिस नामक वैज्ञानिक ने इसकी खोज की थी।

प्रश्न 2.
किस क्षेत्र को ‘घोड़ों’ का अक्षांश कहा जाता है?
उत्तर:
उपोष्ण उच्च दाब पट्टी, जो कर्क एवं मकर रेखाओं के पास (25° उ०व०८०) से क्रमशः 35° उ०व०८० अक्षांशों के बीच दोनों गोलाद्धों में स्थित है, हवाओं के ऊपर व नीचे उतरने से यहाँ उच्च दाब बनता है। इस क्षेत्र में दुर्बल पवनों के फलस्वरूप शांत वायु की दशा उत्पन्न हो जाती है। इस क्षेत्र को घोड़ों का अक्षांश कहा जाता है।

प्रश्न 3.
वायुदाब किस प्रकार मापा जाता है?
उत्तर:
वायुदाब प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पड़ने वाले दाब के रूप में मापा जाता है। वायदाब के मापन के लिए जिस इकाई का प्रयोग करते हैं उसे मिलीबार (मि०बा०) कहते हैं।

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प्रश्न 4.
समदाब रेखा क्या है?
उत्तर:
समदाब रेखा एक काल्पनिक रेखा हे, जो समुद्र तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हुई खींची जाती है।

प्रश्न 5.
“मिस्ट्रल’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह हवा का स्थानीय नाम है। यह फ्रांस में आल्प्स में भूमध्य सागर की ओर चलती है। यह अत्यधिक ठंडी, शुष्क एवं तेज बहने वाली पवन है।

प्रश्न 6.
वायुदाब प्रणालियों के दो प्रकार कौन से हैं?
उत्तर:

  1. उच्च दाब
  2. निम्न दाब

प्रश्न 7.
60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों पर किस प्रकार का दाब पाया जाता है?
उत्तर:
निम्न दाब।

प्रश्न 8.
उच्च दाब कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
30° उत्तरी व 30° दक्षिणी अक्षांशों के साथ।

प्रश्न 9.
विषुवत् वृत्त के दोनों तरफ से प्रवाहित होने वाली पूर्वी पवने कहाँ मिलती हैं?
उत्तर:
अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर।

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प्रश्न 10.
कब दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है?
उत्तर:
जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, तो दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है।

प्रश्न 11.
पवनें क्या होती हैं?
उत्तर:
धरातल के समानांतर चलने वाली हवा को पवन कहते हैं। जितनी. दाब प्रवणता अधिक होगी, पवन का वेग उतना ही अधिक होगा।

प्रश्न 12.
‘डोलड्रम’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
विषुवत रेखा के दोनों ओर एक शांत क्षेत्र स्थित है। यहाँ पवनें दुर्बल हैं तथा इनका धरातलीय प्रवाह बहुत कम है। इन्हें ‘डोलड्रम’ कहते हैं।

प्रश्न 13.
‘गरजने वाला चालीसा, प्रचंड पचासा तथा चीखता साठ’ किसके नाम हैं?
उत्तर:
ये पछुआ पवनें हैं जिनका वेग प्रचंड है। कभी-कभी ये दोनों ऋतुओं में बड़ी तुफानी होती हैं। अतः पुराने समय में नाविकों ने इनका नाम गरजने वाला चालीसा, प्रचण्ड पचासा तथा चीखता साठ रखा था।

प्रश्न 14.
स्थल समीर किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये पवनें रात को स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, समुद्र पर वायुदाब कम हो जाता है, परन्तु स्थल पर वायुदाब अधिक होता है । इस प्रकार ये पवनें स्थल से समद्र की ओर चलती हैं।

प्रश्न 15.
‘चिनूक’ को ‘हिम भक्षी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि यह हवा सर्दियों के अधिकांश दिनों में घास के मैदानों को हिम से मुक्त रखती हैं। इस प्रकार की हवा रॉकीज पर्वतमाला के पूर्वी ढालों पर ऊपर से नीचे उतरती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उन उत्तर

प्रश्न 1.
वायुदाब प्रवणता की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
वायुदाब का वितरण समदाब रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाओं के अन्तर को वायुदाब प्रवणता कहते हैं। यह दो समदाब रेखाओं पर समकोण बनाती हुई होती हैं। यह दाब प्रवणता वायु दिशा अथवा आयु वेग को प्रदर्शित करती है। यदि समदाब रेखाएँ एक-दूसरे के निकट हों तो दाब प्रवणता तीव्र होती है तथा तेज पवनें चलती हैं। यदि समदाब रेखाएँ दूर-दूर हों तो वायु की गति मन्द होती है। उँचाई के साथ-साथ 34 मिलीबार प्रति 300 मीटर की दर से वायु दाब कम होता है । वायुमण्डल की ऊपरी परतें हल्की होती हैं। ऊपरी परतों के बोझ तथा दबाव के कारण नीचे की परतों पर सम्पीड़न क्रिया होती है। इसलिए धरातल के निकट की परतों में वायुदाब अधिक होता है।

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प्रश्न 2.
घोड़ों के अक्षांश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
22°से 35° मध्य के अक्षांशों को अश्व अक्षांश कहते हैं। कर्क रेखा तथा मकर रेखा के निकट का यह शांत मंडल कहलाता है। शांत भूखण्ड में धरातल पर वायु की क्षैतिज गति नहीं होती। पवनें ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर को चलती रहती हैं। ये पवनें न तो स्थाई हैं और न अधिक गति से चलती हैं। वायुमण्डल शांत तथा मौसम साफ रहता है। लगातार उतरती हुई वायु तथा दबाव के कारण यहाँ उच्च वायु दाब होता है। इन अक्षांशों से ध्रुवों की ओर पश्चिमी पवनें तथा भूमध्य रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं।

प्रश्न 3.
‘डोलडुम क्षेत्र’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
यह शांत खंड भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5°N तथा 5°s के बीच स्थित है। इसे भूमध्य रेखा का शांत खंड भी कहते हैं। धरातल पर चलने वाली वायु का अभाव होता है या बहुत ही शांत चलती है। यह शांत खंड भूमध्य रेखा के चारों ओर फैला हुआ है। इस खंड में वर्ष भर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं तथा तापमान ऊँचा रहता है। वायु गर्म तथा हल्की होकर लगातार संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठती हैं तथा धरातल पर वायुदाब कम हो जाता है।

प्रश्न 4.
फैरल का नियम क्या है? चित्र द्वारा स्पष्ट करो।
उत्तर:
धरातल पर पवनें कभी उत्तर से दक्षिण की ओर नहीं चलती। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं और मुड़ जाती हैं। इसें फैरल का नियम कहते हैं। हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण, पृथ्वी की दैनिक गति है जब हवाएँ कम चाल वाले भागों से अधिक चाल वाले भागों की ओर जाती हैं तो पीछे रह जाती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कोरोलिस बल भी कहा जाता है। .
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प्रश्न 5.
वायुमंडलीय दाब से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायुमंडलीय दाब पृथ्वी के धरातल पर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण टिका है। गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु में भार होता है। वायु में भी एक घनफुट में 1.2 औंस भार होता है। इस भार के कारण पृथ्वी के धरातल पर दबाव पड़ता है। वायुमंडलीय दाब का अर्थ है किसी भी स्थान पर वहाँ की हवा की उच्चतम सीमा के स्तम्भ का भार । समुद्र तल प्रति वर्ग इंच पर वायुमण्डल का दबाव 6.68 किलोग्राम या 1.3 किलोग्राम प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है। वायुमंडल का औसत या सामान्य दाब 45° अक्षांश पर समुद्र तल पर 29.92 इंच या 76.92 इंच या 76 सेंटीमीटर या 1013.2 मिलीबार होता है।।

प्रश्न 6.
एक मिलीबार से क्या अभिप्राय है? वायुदाब की माप इकाइयों में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
एक वर्ग सेमी पर एक ग्राम भार के बल को एक मिलीबार कहते हैं। दूसरे शब्दों में 1000 डाईन प्रति वर्ग सेमी के वायु भार को एक मिलीबार कहते हैं। 1000 मिलीबार के वायुभार को एक बार (Bar) कहते हैं।
विभिन्न माप इकाइयों में सम्बन्ध –
30 इंच वायुदाब =76 सेमी = 1013.2 मिलीबार
1 इंच वायुदाब = 34 मिलीबार
1 सेमी वायुदाब = 13.3 मिलीबार

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प्रश्न 7.
‘चिनूक’ तथा ‘फोएन’ पवनें क्या हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ये गर्म तथा शुष्क पवनें हैं। ये पवनें पर्वतों के सम्मख ढाल पर टकराकर ऊपर चढती है। इस क्रिया के कारण ये ठंडी होकर पवन के सामने वाले ढाल पर काफी वर्षा करती हैं। चिनक पवने-अमेरिका में रॉकीज पर्वतों को पार करके प्रेयरी के मैदान में चलने वाली ऐसी पवनों को चिनूक पवनें कहते हैं। चिनूक का अर्थ है-बर्फ खाऊ, क्योंकि ये पवनें अधिक तापक्रम के कारण बर्फ को पिघला देती हैं। कई बार 24 घंटे के समय में 50F(10°C) तापक्रम बढ़ जाता है।

फोएन पवनें – यूरोप में आल्प्स को पार करके स्विट्जरलैंड में उतरने वाली पवने को फोएन पवनें कहते हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी के सात दाब कटिबंधों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वी के सात दाब कटिबंध इस प्रकार हैं –

  1. विषुवतीय निम्न दाब पट्टी
  2. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  3. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  4. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  5. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  6. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  7. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)।

प्रश्न 9.
पवन और वायुधारा में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पवन और वायुधारा में अंतर –
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प्रश्न 10.
भूमंडलीय और सामयिक पवनों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भूमंडलीय और सामयिक पवनों में अंतर –
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प्रश्न 11.
वायुराशि क्या होती है? पवन से यह किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
वायुराशि वायुमण्डल का एक छोटा तथा विस्तृत भाग है जिसमें तापमान और आर्द्रता के लक्षण एक समान होते हैं। इस प्रकार वायुराशियों में एकरूपता का पाया जाना इसका मुख्य लक्षण है। एक वायुराशि में एक-दूसरे के ऊपर वाय की विभिन्न परतें होती हैं। इस प्रकार वायुमंडल में पर्याप्त ऊँचाई तक एक विशाल वायुराशि में एकरूपता पाई जाती है।

प्रश्न 12.
स्रोत प्रदेश किसे कहे हैं? धुवीय महाद्वीपीय स्रोत प्रदेशों का वर्णन करें।
उत्तर:
धरातल के ऐसे समान क्षेत्र जहाँ वायुराशियों की उत्पत्ति होती है, स्रोत प्रदेश कहलाते हैं। यह प्रदेश पृथ्वी के धरातल पर विस्तृत क्षेत्र है जहाँ एक सम लक्षण पाए जाते है। ऐसे प्रदेश में एक सम धरातल तथा प्रति चक्रवातीय वायु तथा प्रति चक्रवातीय वायु व्यवस्था पाई जाती है। इस अवस्था में अपसारी वायु संचरण होता है। प्रायः स्रोत प्रदेश ध्रुवीय तथा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में पाए जाते हैं। शीतकाल में उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया या ध्रुवीय प्रदेश बर्फ से ढके रहते हैं। यहाँ प्रति चक्रवात चलते हैं। वायु स्थिर तथा शुष्क होती है तापमान तथा आर्द्रता में एकरूपता पाई जाती है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 13.
पृथ्वी के धरातल पर कुछ वायुदाब कटिबंध तापीय कारणों से नहीं बल्कि गतिक कारणों से उत्पन्न हुए हैं। ये कटिबंध कौन-से हैं? इनकी उत्पत्ति की व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी भूमध्य रेखा तथा ध्रुवों के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब तथा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की उत्पत्ति होती है। इनकी उत्पत्ति गतिक कारणों से है। भूमध्य रेखा से ऊपर उठने वाली वायु ठंडी होकर तथा भारी होकर 30° अक्षांशों के निकट नीचे उतरने लगती है, इसके अतिरिक्त पृथ्वी के घूर्णन के कारण ध्रुवों से आने वाली वायु भी यहाँ नीचे उतरती है, इसलिए यहाँ उच्च वायुदाब उत्पन्न होता है।
60° अक्षांशों के निकट वायुदाब की उत्पत्ति गति कारणों से होती है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण इन अक्षांशों से वायु भूमध्य रेखा की ओर तथा ध्रुवों की ओर खिसक जाती है इसलिए यहाँ निम्न वायुदाब स्थापित हो जाता है।

प्रश्न 14.
मिस्ट्रल और फॉन में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मिस्ट्रल और फॉन में अंतर –
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प्रश्न 15.
स्थल और समुद्र समीर में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्थल और समुद्र समीर में अंतर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुदाब के क्षैतिज वितरण के विश्व प्रतिरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायुदाब का क्षैतिज वितरण सामान्य रूप से उच्च वायुदाब और निम्न वायुदाब को एकांतर कटिबंध के रूप में प्रस्तुत करता है। वायुदाब और तापमान में प्रतिलोमी संबंध है। 30° उत्तर एवं दक्षिणी अक्षांशों के पास दो उपोष्ण उच्चदाब के और 60° उत्तर तथा दक्षिण अक्षांशों के पास दो उपध्रुवीय निम्नदाब के मध्यवर्ती क्षेत्र हैं। जिस दिशा में वायुदाब सबसे तेजी से घट रहा हो, उस दिशा में प्रति इकाई दूरी पर वायुदाब में आई गिरावट को दाब प्रवणता कहते हैं। विषुवतीय निम्न वायुदाब कटिबंध की गर्म हवा ऊपर उठने के साथ धीरे-धीरे ठंडी होती जाती है। ऊपरी स्तर पर पहुँचने के बाद यह ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगती है और अधिक ठंडी होने पर यह 20° तथा 35° अक्षांशों के मध्य नीचे उतरने लगती है। इसके लिए दो कारक उत्तरदायी हैं।
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प्रथम-वायु के ठंडा होने से इसका घनत्व बढ़ जाता है, जिससे यह नीचे उतरने लगती है। दूसरा-पृथ्वी का घूर्णन पश्चिमी से पूर्व की ओर होने के कारण ध्रुवों की ओर जाने वाली हवाएँ पूर्व की ओर विक्षेपित हो जाती हैं। अपने पक्ष पर घूर्णन करती हुई पृथ्वी पर विषुवत रेखा के पास कोई भी बिन्दु सर्वाधिक तीव्र गति से संचलन करता है। जैसे-जैसे हम ध्रुवों की ओर जाते हैं, वेग कम होता जाता है और ध्रुवों पर लगभग शून्य हो जाता है। वेग में अन्तर के कारण सभी गतिशील वस्तुएँ, विषुवत रेखा की ओर अथवा विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर संचलन के समय पथ से विक्षेपित हो जाती हैं। विक्षेपण बल की खोज सर्वप्रथम फ्रांसीसी गणितज्ञ कोरियोलिस ने की थी। इसलिए इसे कोरियोलिस बल कहते हैं बाद में इसे फैरेल के नियम से जाना गया।
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इस नियम के अनुसार-सभी गतिशील वस्तुएँ अपने पथ से विक्षेपित हो जाती हैं, जैसे पवन और महासागरीय धाराएँ, जिसकी दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में बाएँ हैं। विषुवत रेखा से दूर जाने के साथ विक्षेपण दर में वृद्धि होती जाती है। इससे अवरोध उत्पन्न होने लगता है और हवा ऊपर की ओर संचित होने लगती है। इससे कर्क रेखा और 35° उत्तरी अक्षांश मकर रेखा और 35° दक्षिणी अक्षांश के मध्य हवाएँ ऊपर से नीचे उतरने लगती हैं जिससे यहाँ उच्च दाब कटिबंधों की उत्पत्ति होती है। उपोष्ण कटिबंध तथा ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली हवाएँ 45° उत्तर व दक्षिण आर्कटिक वृत एवं 40° दक्षिण व अंटार्कटिक वृत्त के मध्य स्थित क्षेत्रों में मिलती हैं। ये उपध्रुवीय निम्न दाब के क्षेत्र हैं।

इस प्रकार कुल सात कटिबन्ध हैं –

  • विषुवतीय निम्न दाब पट्टी
  • उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  • उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  • ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)

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प्रश्न 2.
पवनों के मुख्य प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायु परिसंचरण के तीन विभिन्न तंत्र हैं – प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक।
(i) प्राथमिक पवनें – इन पवनों का सम्बन्ध घूर्णन करती हुई पृथ्वी के धरातल पर वनों के सामान्य परिसंचरण प्रतिरूप से है। प्राथमिक पवनों में डोलड्रम, व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें तथा ध्रुवीय पवनें शामिल हैं।

डोलड़म – ये पवनें विषुवत रेखा के दोनों ओर एक शांत क्षेत्र में होती हैं। इनका धरातलीय प्रवाह बहुत कम है।

व्यापारिक पवनें – ये पवनें दोनों- गोलार्द्ध में 5°से 30° अक्षांशों के मध्य चलती हैं। उत्तर में इन्हें उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें तथा दक्षिण में दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनें कहते हैं। दोनों पवनों विषुवत रेखा पर अभिसरण करती हैं, जिसे अंतर उष्णकटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र कहते हैं।

पछुआ पवनें – ये मध्य अक्षांशों में 35° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के बीच चलती हैं। इनकी दिशा परिवर्तशनशील है और वेग भी प्रचण्ड है। पछुआ पवनें गर्मी एवं सर्दी दोनों ही ऋतुओं में बड़ी तूफानी होती हैं।

धृवीय पूर्वी पवनें – ये विषुवत रेखा की ओर बहती हैं. जो शीघ्रता से पर्व से पश्चिम की दिशा ले लेती हैं। इन्हें ध्रुवीय पवनें कहते हैं।

(ii) द्वितीयक पवनें – ये हवाएँ, जो ऋतु के अनुसार अपनी दिशा बदल लेती हैं, मानसून पवनें, वायुराशियाँ एवं साताग्र, चक्रवात एवं प्रति-चक्रवात, स्थल समीर, पर्वत एवं घाटी समीर ऐसी पवन प्रणालियाँ हैं।

मानसून पवनें – ये वे मौसमी पवनें हैं जिनकी दिशा मौसम के अनुसार बिल्कुल विपरीत होती हैं। ये पवनें गर्मी में 6 मास समुद्र से स्थल की ओर तथा शीतकाल के 6 मास स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। ये एक प्रकार से जल तथा स्थल पवनें हैं। इनकी उत्पत्ति का कारण जल तथा स्थल के ठंडा व गर्म होने में विभिन्नता है। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायुदाब में भी अन्तर हो जाता है जिससे हवाओं की दिशा पलट जाती हैं।

पर्वतीय तथा घाटीय पवनें – ये साधारण दैनिक पवनें हैं जो दैनिक तापान्तर के फलस्वरूप वाय दबाब की विभिन्नता के कारण चलती हैं पर्वतीय पवनें पर्वतीय प्रदेश में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर बहती हैं। यह तीव्र विकिरण तथा गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती हैं। इसे वायु प्रवाह भी कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ ठंडी वायु से भर जाती हैं जिससे घाटी के निचले भाग में पाला पड़ता है।
घाटीय पवनें-दिन के समय घाटी की गर्म वायु ढाल से होकर शिखर की ओर ऊपर चढ़ती हैं इन्हें घाटीय पवनें कहते हैं । ये पवनें घाटियों में गर्मी की तीव्रता को कम करती हैं। ऊपर चढ़ने के कारण ये पवनें ठंडी होकर घनघोर वर्षा करती हैं।
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(iii) तृतीयक अथवा स्थानीय पवनें-इन पवनों की उत्पत्ति भू-भाग के तत्काल प्रभाव द्वारा होती है। जब ये पवनें अत्यधिक गर्म एवं शुष्क होती हैं तो पशु एवं वनस्पति जगत पर शक्तिशाली प्रभाव डालती हैं। स्थानीय पवनों का एक अन्य वर्ग वायु अपवाह कहलाता है। बर्फीली हवाओं का स्थानीय नाम उत्तरी एडियाटिक तट में बोरा तथा दक्षिणी फ्रांस में मिस्टूल है। अन्य प्रकार की स्थानीय पवनें लू, फॉन तथा चिनूक हैं, ये गर्म एवं शुष्क पवनें हैं। ये द्वितीयक प्रकार की पवनों को जन्म देते हैं।

(iv) वायुराशियाँ एवं वातान-ये अभिगामी वायुमंडलीय विक्षोभ हैं, जो पूरे विश्व भर में द्वितीयक प्रकार की पवनों को जन्म देते हैं। वायुराशियाँ-यह हवा का एक विशाल समूह है, जिसमें तापमान तथा आर्द्रता की दशाएँ, एक समान होती हैं। वायुराशि अपनी विशेषताएँ अपने स्रोत से प्राप्त करती हैं। दो आधारभूत वायुराशियाँ हैं-ध्रुवीय (P) तथा उष्णकटिबंधीय (T). इनके तापमान में भारी अंतर रहता है। ध्रुवीय वायुराशियाँ-ये वायुराशियाँ उच्च अक्षांशों में जन्म लेती हैं। ये ठंडी तथा क्रम आर्द्र होती हैं। उष्णकटिबंधीय वायुराशियाँ-अधिक आर्द्र होती हैं।

(v) वाताग्र – विभिन्न गुणों वाली वायुराशियों के मध्य की संपर्क रेखा वाताग्र कहलाती हैं। शीत वाताग्र की उत्पत्ति वहाँ से होती हैं, जहाँ ठंडी हवा गर्म हवा के नीचे संचलन करती है। ठंडी वायु का पिछला सिरा जिसका अनुसरण गर्म वायु राशि करती है, उष्ण वाताग्न कहलाता है। प्रत्येक स्थिति में वर्षा होने की संभावना रहती है। जब दोनों वातान मिल जाते है तब इसे अधिधारित वाताग्र कहते हैं।

(vi) चक्रवात – जलवायु की दृष्टि से वायुमंडलीय विक्षोभों में चक्रवात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, जो मौसम को प्रभावित करते हैं। चक्रवातों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है-शीतोष्ण चक्रवात तथा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात।

शीतोष्ण चक्रवात – इनका क्षेत्र दोनों गोलाद्धों के मध्य अक्षांशों में 35° से 65° अक्षांशों के बीच संकेन्द्रित है। ये बड़े विस्तृत होते हैं। ये श्वेत मेघों की पृष्ठभूमि में काले मेघों का आगमन आने का सूचक हैं। जैसे ही चक्रवात किसी स्थान पर पहुंचता है, बूंदाबांदी, शुरू हो जाती है और फिर भारी वर्षा होती है। इससे शीत वाताग्र के आगमन की सूचना मिलती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात – ये अपने उग्रता तथा व्यापक विनाश के लिए जाने जाते हैं। इनकी जलवायविक विशेषता वर्षा करना है। ये महासागरों के ऊपर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विकसित होते हैं। इन हवाओं का वेग 120 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा तक होता है। ये कम क्षेत्रफल घेरते हैं। भारत में इनकी प्रचण्डता का अनुभव सर्वाधिक बंगाल की खाड़ी में पूर्वी तट पर होता है। चक्रवात वायुमण्डलीय गतिशीलता के सूचक हैं तथा मानव एवं मानव समाज कल्याण की दृष्टि से बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।