Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 15 खाद्य संसाधनों में सुधार

BSEB Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 15 खाद्य संसाधनों में सुधार

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 15 खाद्य संसाधनों में सुधार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 9 Science खाद्य संसाधनों में सुधार  InText Questions and Answers

प्रश्न श्रृंखला # 01 (पृष्ठ संख्या 229)

प्रश्न 1.
अनाज, दाल, फल तथा सब्जियों से हमें क्या प्राप्त होता है ?
उत्तर:
अनाज से हमें कार्बोहाइड्रेट, दाल से प्रोटीन तथा फल एवं सब्जियों से विभिन्न खनिज लवण व विटामिन्स प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न श्रृंखला # 02 (पृष्ठ संख्या 230)

प्रश्न 1.
जैविक तथा अजैविक कारक किस प्रकार फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं ?
उत्तर:
किसी फसल के उत्पादन पर अनेक जैविक तथा अजैविक कारक प्रभाव डालते हैं। जैविक कारकों के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव (जैसे-जीवाणु, कवक आदि), अनेक प्रकार के कीट-पतंगे तथा अन्य जीव-जन्तु आते हैं। इनमें से जीवाणु एवं कवक जहाँ एक तरफ हमारी फसलों में रोग उत्पन्न करके उत्पादन को काफी कम कर देते हैं वहीं कुछ जीवाणु ऐसे भी होते हैं (जैसे दालों की छड़ों में पाये जाने वाली जीवाणु)।

जो भूमि की उर्वरता को बढ़ाकर हमारे उत्पादन में बढ़ोत्तरी करते हैं। इसी प्रकार जहाँ कीट-पतंगे हमारी खड़ी फसलों एवं उनके उत्पाद को नुकसान पहुंचाते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ कीट जैसे केंचुए भूमि की उर्वरता को बढ़ाते हैं। अजैविक कारकों के अन्तर्गत सूखा, क्षारकता, जलाक्रान्ति, गरमी, ठण्ड, वर्षा तथा पाला आदि आते हैं। इन सभी कारकों के विपरीत प्रभाव के कारण फसल उत्पादन कम हो सकता है।

प्रश्न 2.
फसल सुधार के लिए ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण क्या है ?
उत्तर:
फसल सुधार के लिए ऐच्छिक सस्य विज्ञान गुण निम्न प्रकार हैं –
(1) किसी चारे वाली फसल के लिए लम्बी एवं सघन शाखाएँ ऐच्छिक गुण हैं ताकि इन फसलों से अधिक मात्रा में चारा प्राप्त हो सके।
(2) अनाज की फसलों के लिए बौने पौधे उपयुक्त गुण है ताकि इन फसलों को उगने हेतु कम पोषकों की आवश्यकता पड़े।

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प्रश्न शृंखला # 03 (पृष्ठ संख्या 231)

प्रश्न 1.
वृहत् पोषक क्या हैं ? और इन्हें वृहत् पोषक क्यों कहते हैं ?
उत्तर:
ऐसे पोषक जिनकी पौधों को अपनी वृद्धि एवं विकास हेतु अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है, वृहत् पोषक कहलाते हैं। चूँकि इनकी अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। इसी कारण इन्हें वृहत् पोषक कहा गया है। पौधों को मृदा से प्राप्त होने वाले 13 पोषकों में से 6 वृहत् पोषक होते हैं। ये हैं-पोटैशियम, नाइट्रोजन, सल्फर, कैल्सियम, फॉस्फोरस तथा मैग्नीशियम।

प्रश्न 2.
पौधे अपना पोषण कैसे प्राप्त करते हैं ?
उत्तर:
पौधे पोषक पदार्थ हवा, पानी तथा मिट्टी से प्राप्त करते हैं। पौधों को अपनी वृद्धि एवं विकास हेतु कुल 16 पोषक पदार्थों की आवश्यकता होती है जिनमें से तीन कार्बन, ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन वह वायु एवं जल से तथा शेष बचे 13 पोषक पदार्थ वह मिट्टी से ग्रहण करते हैं।

प्रश्न शृंखला # 04 (पृष्ठ संख्या 232)

प्रश्न 1.
मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए खाद तथा उर्वरक के उपयोग की तुलना कीजिए।
उत्तर:
मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए खाद तथा उर्वरक के उपयोग की तुलना निम्न प्रकार से कर सकते हैं –
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प्रश्न श्रृंखला # 05 (पृष्ठ संख्या 235)

प्रश्न 1.
अग्रलिखित में से कौन-सी परिस्थिति में सबसे अधिक लाभ होगा ? क्यों ?
(a) किसान उच्चकोटि के बीज का उपयोग करें, सिंचाई न करें अथवा उर्वरक का उपयोग न हों।
(b) किसान सामान्य बीजों का उपयोग करें, सिंचाई करें तथा उर्वरक का उपयोग करें।
(c) किसान अच्छी किस्म के बीज का प्रयोग करें, सिंचाई करें, उर्वरक का उपयोग करें, तथा फसल सुरक्षा की विधियाँ अपनायें।
उत्तर:
उपर्युक्त में से –
(c) परिस्थिति जिसमें किसान ने अच्छे बीजों का चयन किया, समय पर सिंचाई एवं उर्वरकों का उपयोग किया तथा फसल सुरक्षा की उचित विधियाँ अपनाईं में अधिक लाभ होगा। क्योंकि –
(1) अच्छे बीजों का चयन करने पर अधिकांश बीज अंकुरित हो जायेंगे तथा उनसे उगे पौधे स्वस्थ एवं उच्च लक्षणों युक्त होंगे।
(2) समय पर सिंचाई और उर्वरकों का उपयोग करने पर उनकी बढ़वार अच्छी होगी तथा पौधे स्वस्थ रहेंगे जिससे उन पर फूल एवं फलों का विकास अच्छा होगा।
(3) फसल सुरक्षा की विधियों के अन्तर्गत फसल की खरपतवारों कीटों तथा रोगों से रक्षा आती हैं। यदि किसान ने इनसे फसल को बचाने हेतु आवश्यक कदम उठाये तो निश्चित रूप से फसल का उत्पादन बहुत अच्छा होगा। परिणामस्वरूप किसान को अधिक लाभ पहुँचेगा।

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प्रश्न शृंखला # 06 (पृष्ठ संख्या 235)

प्रश्न 1.
फसल की सुरक्षा के लिए निरोधक विधियाँ तथा जैव नियन्त्रण क्यों अच्छा समझा जाता है ?
उत्तर:
फसल की सुरक्षा के लिए निरोधक विधियों (जैसेसमय पर फसल उगाना, अन्तराफसलीकरण, फसल चक्र, प्रतिरोधक क्षमता वाली फसलों को उगाना तथा ग्रीष्मकाल में गहरी जुताई) तथा जैव नियन्त्रण (जैसे-जैव कीटनाशी एवं जैवपीड़कों का उपयोग), अच्छा माना जाता है क्योंकि इनसे वातावरण में किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता।

जबकि रासायनिक विधियों, जिनमें विभिन्न शाकनाशी, कीटनाशी एवं कवकनाशी आते हैं, का छिड़काव फसलों पर किया जाता है। इससे वातावरण में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनती हैं। ये रसायन फसलों के लिए उपयोगी दूसरे अन्य जीवों को भी नष्ट कर देते हैं। अतः स्पष्ट है कि फसल की सुरक्षा के लिए निरोधक विधियाँ तथा जैव नियन्त्रण ही उत्तम है।

प्रश्न 2.
भंडारण की प्रक्रिया में कौन-से कारक अनाज की हानि के लिए उत्तरदायी हैं ?
उत्तर:
भंडारण की प्रक्रिया में अनेक जैविक तथा अजैविक कारक अनाज को हानि पहुँचाते हैं। जैविक कारकों के अन्तर्गत विभिन्न कीट, कृन्तक, कवक, चिंचड़ी तथा जीवाणु हैं जो अनाज को नष्ट कर देते हैं। वहीं अजैविक कारकों के अन्तर्गत भण्डारण के स्थान पर उपयुक्त नमी एवं ताप का अभाव है। ये सभी कारक अनाज की गुणवत्ता को खराब कर उसका वजन एवं अंकुरण की क्षमता को कम कर देते हैं।

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प्रश्न श्रृंखला # 07 (पृष्ठ संख्या 236)

प्रश्न 1.
पशुओं की नस्ल सुधार के लिए प्रायः कौन-सी विधि का उपयोग किया जाता है और क्यों ? .
उत्तर:
पशुओं की नस्ल सुधार के लिए प्रायः संकरण विधि का उपयोग किया जाता है। इनमें दो विभिन्न गुणों (नस्लों) वाले पशुओं के बीच संकरण कराकर ऐसी संकर सन्तान उत्पन्न की जाती है जिसमें दोनों नस्लों के गुण विद्यमान होते हैं। उदाहरण के लिए हमारे देश की गायों की रोगरोधक क्षमता बहुत अच्छी होती है लेकिन दुग्ध उत्पादन कम। लेकिन विदेशी नस्ल की गायों की प्रतिरोधक क्षमता तो कम होती है परन्तु इनका दुग्ध उत्पादन अधिक होता है। अब इन दोनों गायों में संकरण कराने से संकर नस्ल की गाय उत्पन्न की गई हैं जिनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता एवं प्रतिरोधक क्षमता दोनों ही अच्छी हैं।

प्रश्न श्रृंखला # 08 (पृष्ठ संख्या 237)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन की विवेचना कीजिए –
“यह रुचिकर है कि भारत में कुक्कुट, अल्प रेशे के खाद्य पदार्थों को उच्च पोषकता वाले पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तन करने के लिए सबसे अधिक सक्षम है। अल्प रेशे के खाद्य पदार्थ मनुष्यों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।”
उत्तर:
कुक्कुट या मुर्गीपालन अण्डे एवं माँस उत्पादन के. लिए किया जाता है। मुर्गियों को आहार में प्रमुख रूप से अल्प (सस्ते) रेशे के खाद्य पदार्थ दिये जाते हैं और वह इन रेशे युक्त पदार्थों को खाकर, हमें उच्च गुणवत्ता वाली प्रोटीन से युक्त अण्डे एवं माँस देती है। अतः यह ठीक ही कहा गया है कि भारत में कुक्कुट पालन, अल्प रेशे के खाद्य पदार्थों को उच्च पोषकता वाले पशु प्रोटीन आहार में परिवर्तन करने के लिए सबसे अधिक सक्षम है। अल्प रेशे के खाद्य पदार्थ मनुष्य के लिए उपयुक्त नहीं होते क्योंकि इनसे उसे ऊर्जा तो मिलती है लेकिन शरीर वृद्धि एवं विकास तथा टूट-फूट की मरम्मत हेतु प्रोटीन की पूर्ति इस आहार द्वारा सम्भव नहीं है।

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प्रश्न शृंखला # 10 (पृष्ठ 238 पर)

प्रश्न 1.
पशुपालन तथा कुक्कुट पालन के प्रबन्धन प्रणाली में क्या समानता है ?
उत्तर:
पशुपालन तथा कुक्कुट पालन के प्रबन्धन प्रणाली में प्रमुख समानताएँ इस प्रकार हैं –

  1. दोनों के आवास छायादार, उचित ताप, प्रकाश एवं वायु युक्त होने चाहिए।
  2. दोनों में ही स्वच्छता की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  3. दोनों में ही आहार की गुणवत्ता तथा पशुओं एवं कुक्कुटों के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 2.
ब्रौलर तथा अण्डे देने वाली लेयर में क्या अन्तर है ? इनके प्रबन्धन के अन्तर को स्पष्ट कीजिए। .
उत्तर:
ब्रौलर माँस के लिए पाली जाने वाली कुक्कुटों को कहा जाता है जबकि अण्डे देने वाली मुर्गी लेयर कहलाती हैं। अण्डे देने वाली (लेयर) मुर्गियों को आहार में सस्ता रेशेदार आहार दिया जाता है जबकि ब्रौलर चूजों को अच्छी वृद्धि दर तथा अच्छी आहार दक्षता के लिए विटामिन, प्रोटीन तथा वसा से प्रचुर आहार देते हैं। इनकी देखभाल में भी विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि इनकी मृत्युदर कम रहे तथा उनके पंख एवं माँस की गुणवत्ता बनी रहे।

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प्रश्न शृंखला # 11 (पृष्ठ संख्या 239)

प्रश्न 1.
मछलियाँ कैसे प्राप्त करते हैं ?
उत्तर:
मछलियाँ दो तरह से प्राप्त की जा सकती हैं –
1. प्राकृतिक स्रोतों से मछली पकड़कर, तथा
2. मछली पालन या मछली संवर्धन द्वारा।
प्राकृतिक स्रोतों के अन्तर्गत समुद्र तथा ताजा जल; जैसेनदियों, तालाबों आदि से मछलियों को पकड़ा जा सकता है।

प्रश्न 2.
मिश्रित मछली संवर्धन से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
मिश्रित मछली संवर्धन में एक तालाब में मछलियों की कई जातियों का संवर्धन एक साथ किया जाता है। इसके अन्तर्गत मछलियों के साथ-साथ प्रॉन एवं मोलस्क का संवर्धन भी कर सकते हैं। एकल संवर्धन की तुलना में मिश्रित संवर्धन अधिक लाभदायक होता है क्योंकि विभिन्न जाति की मछलियों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं जिससे उनमें आहार के लिए प्रतिस्पर्धा भी कम होती है।

कुछ मछलियाँ; जैसे-कटला जल की सतह.से अपना आहार लेती हैं, कुछ जैसे रोहू तालाब के मध्य क्षेत्र से तथा कुछ जैसे कॉमन कार्प तालाब की तली से। इस प्रकार तालाब के प्रत्येक भाग में उपलब्ध आहार का उपयोग हो जाता है। परिणामस्वरूप हमारी लागत कम आती है तथा मछलियों के उत्पादन में अपेक्षाकृत वृद्धि होती है जिससे अधिक लाभ कमाया जा सकता है।

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प्रश्न श्रृंखला # 12 (पृष्ठ संख्या 240)

प्रश्न 1.
मधु उत्पादन के लिए प्रयुक्त मधुमक्खी में कौन-से ऐच्छिक गुण होने चाहिए ?
उत्तर:
मधु उत्पादन के प्रयुक्त मधुमक्खी में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

  1. उसमें मधु एकत्र करने की क्षमता बहुत अधिक होनी चाहिए।
  2. वह गुस्सैल कम होनी चाहिए अर्थात् डंक कम मारती हो।
  3. वह निर्धारित छत्ते में अधिक समय तक रहती हो तथा प्रजनन भी तीव्रता से करती है।

प्रश्न 2.
चारागाह क्या है और ये मधु उत्पादन से कैसे सम्बन्धित है ?
उत्तर:
चारागाह वास्तव में वह स्थान है जहाँ से कोई जीव अपना प्राकृतिक भोजन लेता है। किसी पशु के लिए ये घास का मैदान तथा मधुमक्खी के लिए ये फूलों का बगीचा या ऐसा क्षेत्र जिसमें पर्याप्त फूल वाले पौधे हों, हो सकता है। अधिक तथा उत्तम गुणवत्ता वाले मधु का उत्पादन तभी सम्भव है जब मधुमक्खियों को पर्याप्त मात्रा में चारागाह अर्थात् फूल उपलब्ध हों, क्योंकि इन्हीं से ये पराग एवं मकरन्द एकत्र करती हैं। मधु का उत्पादन, उसकी गुणवत्ता एवं स्वाद सभी इन फूलों पर ही निर्भर करता है।

क्रियाकलाप

नोट:
इस अध्याय के सभी क्रियाकलाप अवलोकनार्थ हैं। अतः विद्यार्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शिक्षक महोदय के साथ खेत/कृषि फार्म हाउस/पशुशालाओं/ कुक्कुटशालाओं आदि का भ्रमण करें तथा उनके निर्देशानुसार विभिन्न सूची बनायें।

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Bihar Board Class 9 Science परमाणु एवं अणु Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
फसल उत्पादन की एक विधि का वर्णन करो जिससे अधिक पैदावार प्राप्त हो सके।
उत्तर:
हमारे अनुसार फसल चक्र अपनाकर अधिक पैदावार प्राप्त हो सकती है। फसल चक्र खेती की ऐसी विधि है जिसमें किसी निश्चित क्षेत्र पर एक निश्चित अवधि में फसलों को इस प्रकार हरे-भरे करके उगाया जाता है ताकि भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट न हो और किसान को अधिकतम लाभ प्राप्त हो सकें। प्रत्येक फसल की अपनी कुछ निश्चित आवश्यकताएँ होती हैं। लगातार किसी भू-भाग में एक ही फसल उगाने से इस क्षेत्र में किसी खास तत्व की कमी हो जाती है जिससे आगे आने वाली फसल का उत्पादन कम हो जाता है।

फसल चक्र अपनाने से इसी कमी को दूर किया जा सकता है। फसल चक्र अपनाते समय ध्यान में रखना है कि अनाज वाली फसलों के बाद दलहनी फसलों, उथली जड़ों वाली फसलों के बाद गहरी जड़ों वाली फसलें, अधिक खाद चाहने वाली फसलों के बाद कम खाद चाहने वाली फसलें तथा अधिक पानी चाहने वाली फसलों के बाद कम पानी चाहने वाली फसलों को उगाना है। इस प्रकार से हमें अपने संसाधनों का पूरा लाभ प्राप्त होगा तथा पैदावार निश्चित रूप से अधिक प्राप्त होगी।

प्रश्न 2.
खेतों में खाद तथा उर्वरकों का उपयोग क्यों करते हैं ?
उत्तर:
विभिन्न फसलें पोषक पदार्थ मृदा से ग्रहण करती हैं जिससे मृदा में कुछ खाद्य तत्वों की कमी होने लगती है। इस कमी को दूर करने तथा फसल के उचित विकास एवं अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु खेतों में खाद एवं उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। इससे मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा उसमें लाभदायक जीवाणुओं की संख्या एवं जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है जिसका सीधा प्रभाव हमारी फसलों पर पड़ता है और उत्पादन बढ़ जाता है।

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प्रश्न 3.
अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र के क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
अंतराफसलीकरण तथा फसल चक्र दोनों ही फसलों का उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंतराफसलीकरण द्वारा पीड़क एवं रोगों को एक प्रकार की फसल के सभी पौधों में फैलने से रोका जा सकता है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को भी बढ़ाया जा सकता है जबकि फसल चक्र से भूमि के क्षय को रोककर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। इन दोनों विधियों से फसलों की उर्वरकों पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। उन्हें रोगों एवं पीड़कों के प्रकोप से बचाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
आनुवंशिक फेरबदल क्या हैं ? कृषि प्रणालियों में से कैसे उपयोगी हैं ?
उत्तर:
ऐसी प्रक्रिया या विधि, जिसमें किसी पौधे या जन्तु में कुछ इच्छित गुणों को जीन में बदलाव करके प्रविष्ट करा दिया जाता है, आनुवंशिक फेरबदल कहलाती है। जब किसी इच्छित गुण के जीन्स को पौधे में प्रविष्ट कराते हैं तो ट्रांसजेनिक पौधों का विकास होता है। वे ट्रांसजेनिक पौधे नये प्रविष्ट जीन के कारण इच्छित गुणों को प्रदर्शित करते हैं। – कृषि प्रणालियों में इसके उपयोग से फसलों की गुणवत्ता, रोग एवं कीट से प्रतिरोधकता एवं उत्पादन क्षमता सभी में वृद्धि होती है।

उदाहरण के लिए किसी अनाज वाले पौधे की जंगली जाति जो रोगों एवं कीड़ों के प्रति अधिक प्रतिरोधी थी लेकिन उसकी अनाज की बाली छोटी आकृति की थी, में ऐसे जीन्स को प्रवष्टि कराया जो अनाज की बड़ी बाली के लिए जिम्मेदार था तो उत्पन्न ट्रांसजेनिक पौधे की बालियाँ भी बड़े आकार की प्राप्त हुईं। इससे हमें ऐसे पौधे प्राप्त हुए जो रोगों एवं कीटों से प्रतिरोधी भी थे। साथ-ही-साथ बड़ी बाली होने के कारण उनसे अनाज का उत्पादन भी अधिक प्राप्त हुआ।

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प्रश्न 5.
भण्डारगृहों (गोदामों) में अनाज की हानि कैसे होती है ?
उत्तर:
भण्डारगृहों में अनाज की हानि दो प्रकार के कारकों जैविक तथा अजैविक द्वारा हो सकती है। जैविक कारकों में विभिन्न प्रकार के कीट, कृन्तक, कवक एवं जीवाणु आदि होते हैं जबकि अजैविक कारकों में उपयुक्त नमी एवं तथा ताप आते हैं। इन कारणों के परिणामस्वरूप अनाज की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अनाज को वजन एवं अंकुरण करने की क्षमता कम या बिल्कुल नष्ट हो सकती है, इसका रंग खराब हो सकता है जिससे उसका बाजार मूल्य कम हो जाता है।

प्रश्न 6.
किसान के लिए पशुपालन प्रणालियाँ कैसे लाभदायक हैं ?
उत्तर:
किसान के लिए पशुपालन अत्यन्त लाभदायक है। इसके द्वारा एक ओर तो किसान की अतिरिक्त आमदनी बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर कृषि की उप-उत्पाद (भूसा आदि) पशुपालन में तथा पशुपालन के उप-उत्पाद (गोबर, खाद आदि) कृषि में उपयुक्त होने पर लागत कम हो जाती है जिससे धन की बचत होती है तथा किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो जाती है। किसान की आर्थिक स्थिति, उसे अच्छे बीज, उर्वरक एवं कृषि यन्त्र आदि खरीदने के लिए उत्साहित करती है। परिणामस्वरूप उसे कृषि में भी अच्छा लाभ होने लगता है।

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प्रश्न 7.
पशुपालन के क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
पशुपालन के प्रमुख लाभ हैं –

  1. किसान की स्वयं की तथा बाजार की आवश्यकता हेतु उत्तम दूध की आपूर्ति होती है।
  2. कृषि कार्य करने; जैसे-हल चलाना, सिंचाई एवं बोझा उठाना आदि हेतु पशु उपलब्ध हो जाते हैं।
  3. पशुओं द्वारा प्राप्त मलमूत्र से कार्बनिक खाद बनती है जो भूमि की उर्वरता बढ़ाने में सहायक है।
  4. कुक्कुटपालन द्वारा उत्तम किस्म के अण्डे एवं माँस प्राप्त होता है।
  5. पशुपालन से किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है।

प्रश्न 8.
उत्पादन बढ़ाने के लिए कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन में क्या समानताएँ हैं ?
उत्तर:
उत्पादन बढ़ाने के लिए कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन में प्रमुख समानता सही प्रबन्धन की विधियों का प्रयोग है जिसके अन्तर्गत फार्म की उचित एवं दैनिक सफाई अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सही तापमान, उचित समय पर भोजन की उपलब्धता, रोगों से सुरक्षा तथा प्राप्त उत्पादन का उचित एवं शीघ्र विपणन की व्यवस्था आदि तीनों के लिए ही लगभग समान है। इसके अतिरिक्त नये एवं संकर सदस्यों की संख्या में वृद्धि भी उत्पादन को बढ़ाती है।

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प्रश्न 9.
प्रग्रहण मत्स्यन, मेरीकल्चर तथा जल संवर्धन में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
प्रग्रहण मत्स्यन, प्राकृतिक स्रोतों से मछली पकड़ने की विधियाँ हैं, जबकि मेरीकल्चर के अन्तर्गत समुद्री मछलियों का व्यावसायिक उपयोग के लिए संवर्धन किया जाता है तथा जल संवर्धन में उच्च आर्थिक महत्व के जलीय जन्तुओं; जैसे-प्रॉन (झींगा), केकड़े तथा मछलियाँ आदि का उत्पादन किया जाता है।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण सर्वनाम

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण सर्वनाम Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण सर्वनाम

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण सर्वनाम Questions and Answers

‘प्रश्न 1.
सर्वनाम क्या है ? उदाहरण सहित लिखिये।
उत्तर-
संज्ञा के बदले जिन शब्दों का प्रयोग होता है, उन्हें सर्वनाम कहते हैं। जैसे-वह, उसे, उसने, मैं, मेरा, मेरे, वे, हमलोग, आदि।”
उदाहरण-
राम एक लड़का है।
वह पढ़ने में तेज है।
उसने कड़ी मेहनत की है।
उसे अवश्य सफलता मिलेगी।
मोटे अक्षरवाले शब्द सर्वनाम हैं, क्योंकि ये राम (संज्ञा) के बदलें आये हैं।

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प्रश्न 2.
सर्वनाम के भेदों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
सर्वनाम के भेद :
सर्वनाम के छः भेद हैं-
(i) पुरुष-वाचक सर्वनाम
(ii) निश्चय-वाचक सर्वनाम
(iii) अनिश्चय-वाचक सर्वनाम
(iv) सम्बन्ध-वाचक सर्वनाम
(v) प्रश्न-वाचक सर्वनाम
(vi) निंज-वाचक सर्वनाम

(i) परुष-वाचक सर्वनाम_जो ‘सर्वनाम’ पुरुषवाचक या स्त्रीवाचक संज्ञाओं के नाम के बदले में आता है, उसे पुरुषवाचक सर्वनाम’ कहा जाता है। जैसे-मैं, हम, तुम, वह आदि।
पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद हैं-
(क) प्रथम परुष_’प्रथम पुरुष’ को उत्तम परुष भी कहा जाता है। जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग कहने या बोलने वाला अपने लिए करता है, उसैप्रथम परुष कहा जाता है। जैसे-मैं, हम।
(ख) मध्यम परुष सुनने वाले के लिए जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग किया जाता है, उसे मध्यम पुरुष कहा जाता है। जैसे-तू, तुम, आप, तुम्हें, आपको आदि।
(ग) अन्य परुष जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग ऐसी ‘संज्ञा’ के लिए हो, जिसके विषय में बात की जा रही हौ, किन्तु जो वहाँ उपस्थित न हो, ऐसे ‘सर्वनाम’ को अन्य पुरुष कहा जाता है। जैसे—वह, वे, उसकी, उनकी, उसका आदि।
(ii) निश्चय-वाचक सर्वनाम जिससे ‘निश्चित व्यक्ति, वस्तु या भाव का बोध हो, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहा जाता है। जैसे—यह, वह, ये, वे, आप आदि।
(iii) अनिश्चय-वाचक सर्वनाम जिससे किसी ‘निश्चित’ व्यक्ति, वस्तु या भाव का बोध न हो, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-कोई, कुछ।
(iv)सम्बन्ध-वाचक सर्वनाम_जिस सर्वनाम से वाक्य में आये ‘संज्ञा’ के साथ ‘सम्बन्ध . ‘स्थापित किया जाय, उसे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहा जाता है जैसे-जो, सो, जौन, तौन। इस प्रकार के ‘सर्वनाम’ वाक्य. में एक-दूसरे के बाद आते हैं। जैसे—जो करेगा सो मरेगा।
(v) प्रश्न-वाचक सर्वनाम जिस ‘सर्वनाम’ का प्रयोग. प्रश्न’ करने के लिए किया जाता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहा जाता है। जैसे-कौन, क्या।
(vi)निज-वाचक सर्वनाम जिस ‘सर्वनाम’ से ‘स्वयं या निज’ का बोध हो. उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे आप, स्वयं| ‘निजवाचक सर्वनाम का प्रयोग ‘वक्ता’ अपने लिए करता है। जैसे-मैं स्वयं यह काम करूंगा।

Bihar Board Class 10 Hindi व्याकरण सर्वनाम

सर्वनाम रूपावली (वचन और कारक के साथ)

1.(क) पुरुषवाचक सर्वनाम उत्तमपुरुष ‘मैं’ शब्द
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सर्वनामों के पुनरुक्त रूप

कुछ सर्वनाम पुनरुक्ति के साथ प्रयोग में आते हैं और तब उनके अर्थ में कुछ विशिष्टता भी होती है। कुछ सर्वनाम संयुक्त रूप में भी आते हैं। जैसे-जो कोई।
जो-जो : जो-जो आए, उसे खिलाओ।
कोई-कोई : कोई-कोई तो बिना बात बहस करते हैं।
क्या-क्या : आपने वहाँ क्या-क्या देखा?
कौन-कौन : कौन-कौन आ रहा है। किंस-किस कमरे में छात्र बीमार हैं।
कुछ-कुछ : अब कुछ-कुछ याद आ रहा है।
कोई-न-कोई : जाओ, वहाँ कोई-न-कोई तो मिल ही जाएगा।
कुछ-न-कुछ : कुछ-न-कुछ करते ही रहना चाहिए।
जो कोई-जो कुछ : जो कोई आए, उसे रोक लो। जो कुछ मिले, रख लो।
अपना-अपना : अपना-अपना बस्ता उठाओ और घर जाओ।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 9 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 2 Chapter 9 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 9 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन

Bihar Board Class 7 Social Science मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्न प्रश्नों के उत्तर दें:

प्रश्न (i)
रवि को रेगिस्तानी देश ‘थार’ में जाने के लिए किन आवश्यक चीजों को ले जाना होगा ? सूची बनाइये और कारण भी लिखिये।
उत्तर-
‘थार’ में जाने के लिये निम्नलिखित वस्तुएँ साथ ले जाना चाहिए :

  1. रात में ओढ़ने के लिये कंबल । पहनने के लिये काफी कपड़े।
  2. खाने के तैयार समान, जैसे-बिस्कुट, पावरोटी, मक्खन ।
  3. एक बड़ा थर्मस तथा एक गिलास ।
  4. थार यह क्षेत्र का नक्शा ।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 9 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन

प्रश्न (ii)
थार प्रदेश में जनसंख्या कम क्यों है ?
उत्तर-
थार प्रदेश में जनसंख्या इसलिए कम है क्योंकि वहाँ का जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण है । जीवन-यापन के साधनों का अभाव है। सड़कों की कमी से यात्रा करना कठिन है । दिन में काफी गर्म तथा रात में भारी ठंड झेलना पड़ता है।

प्रश्न (iii)
आपके प्रदेश के जनजीवन और थार प्रदेश के जनजीवन में अंतरों की सूची बनाइए ।
उत्तर-
हमारे प्रदेश के जनजीवन और थार प्रदेश के जनजीवन में अंतरों की सूची निम्नलिखित है :

हमारे प्रदेश का जन-जीवन-

  1. केवल गर्मी के मौसम में ही गर्मी पड़ती है
  2. केवल जाड़े में रात में जाड़ा पड़ता है
  3. वर्षा ऋतु में सामान्य वर्षा होती है|
  4. हर प्रकार का वाहन मिलता है
  5. पानी की कोई किल्लत नहीं ह
  6. हर तरह के अन्न की प्रमुखता है

थार प्रदेश का जन-जीवन-

  1. सालों भर गर्मी पड़ती है
  2. सालों भर रात में जाड़ा पड़ता है
  3. वर्षा नहीं के बराबर होती है
  4. केवल ऊँट ही वाहन है.
  5. पानी की भारी किल्लत है
  6. केवल बजारे की प्रमुखता है

प्रश्न (iv)
नखलिस्तान का मॉडल या चित्र बनाइए।
उत्तर-
Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 9 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया थार प्रदेश में जन-जीवन 1

प्रश्न (v)
थार प्रदेश में जल की उपलब्धता कैसे बढ़ाई जा सकती है?
उत्तर-
पक्का टैंक बनाकर वर्षा के जल को एकत्र किया जा सकता है। वर्षा ऋतु में जो भी वर्षा हो, पूरे गाँव के वर्षा जल को इसमें एकत्र किया जाय । यह जल पीने से लेकर सिंचाई के काम में भी आ सकता है।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 9 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन

प्रश्न (vi)
थार प्रदेश में बहने वाली नदियों में पानी कैसे बढ़ सकता है ?
उत्तरे-
नदियाँ प्राकृतिक होती हैं । वह भी राजस्थान की नदियाँ शुष्क है। अतः नदियों में पानी बढ़ाना कठिन है ! हाँ, उसके स्थान पर इन्दिरा नहर से उप-नहरों की संख्या बढ़ाकर नदियों की कमी दूर की जा सकती है।

प्रश्न (vii)
यातायात, सुरक्षा, खानपान के लिए ऊँट जीवन रेखा है कैसे ? अपने प्रदेश के ऐसे किसी उपयोगी जानवर के बारे में बताएँ
उत्तर-
जैसा कि हम पूरे पाठ में पढ़ चुके हैं. ऊँट ही यहाँ की मुख्य सवारी है । यातायात के लिये यही एकमात्र साधन है । बालू पर दूसरी सवारी चल भी नहीं सकती । यह क्षेत्र पाकिस्तान सीमा पर अवस्थित है, अतः सुरक्षा की अति आवश्यकता है, कम-से-कम बार्डर सिक्युरिटी फोर्स के लिए, सो वे भी ऊँट का ही उपयोग करते हैं । ऊँटनी का दूध ही यहाँ मिलता है । उसी. के दूध से चाय बनती है । खोवा, पनीर सब ऊँटनी के दूध से ही बनते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यातायात, सुरक्षा, खानपान के लिए ऊँट ही जीवन रेखा है ।

हमारे प्रदेश बिहार में ऐसी बात नहीं है । यातायात के लिए घोडा समेत अनेक साधन मौजूद है । सुरक्षा के लिए उत्तर नेपाल की सीमा पर घोड़ा और जीप का उपयोग होता है । दूध के लिए बकरी, गाय और भैंस बहुतायत से उपलब्ध हैं।

प्रश्न 2.
सही विकल्प पर सही (✓) का चिह्न लगाएँ ।

प्रश्न (i)
थार का रेगिस्तान फैला है :
(क) गुजरात-महाराष्ट्र
(ख) गुजरात-राजस्थान
(ग) पंजाब-राजस्थान
उत्तर-
(ख) गुजरात-राजस्थान

प्रश्न (ii)
साफा कहते हैं:
(क) सफाई वाले कपड़े को
(ख) पूरी आस्तीन वाली कमीज को
(ग) सिर पर बाँधने वाली पगड़ी को
उत्तर-
(ग) सिर पर बाँधने वाली पगड़ी को

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प्रश्न (iii)
थार प्रदेश में पाये जाने वाले खनिज हैं
(क) संगमरमर-अभ्रक
(ख) बॉक्साइट-संगमरमर
(ग) संगमरमर-जिप्सम
उत्तर-
(ग) संगमरमर-जिप्सम

प्रश्न (iv)
नखलिस्तान का अर्थ है :
(क) एक बहुत छोटा प्रदेश
(ख) ठंड. लवायु का क्षेत्र
(ग) रेगिस्तान में हरियाली व जल वाला क्षेत्र
उत्तर-
(ख) ठंड. लवायु का क्षेत्र

Bihar Board Class 7 Social Science मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : थार प्रदेश में जन-जीवन Notes

पाठ का सार संक्षेप

राजस्थान और गुजरात राज्यों के पश्चिम में थार का मरुस्थल है। जहाँ तक नजर जाती है वहाँ तक बाल-बाल ही दिखाई पड़ता है। बीच-बीच में अरावली की पहाड़ियाँ और जहाँ-तहाँ बालू के टिब्बे मिलते हैं। पूरा क्षेत्र शुष्क और गर्म है । दिन में प्राय: बालू भरी आँधियाँ चलती हैं और रात में तापमान काफी नीचे चला जाता है । वर्षा नहीं होती और होती भी है तो नाममात्र की (वार्षिक 25 सेमी से भी कम) । दिन की गर्मी और रात में जाड़े से बचने के लिए काफी वस्त्र की आवश्यकता पड़ती है ।

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पेड़-पौधे नहीं मिलते । मिलते भी हैं तो कंटीली झाड़ियाँ, बबूल, नागफनी आदि के रूप में । खजूर भी उपजता है। जहाँ-तहाँ मरुद्यान हैं, जहाँ कुछ हरियाली दिखाई पड़ती है। यहाँ जहाँ-तहाँ बलई मिट्टी मिलती है, जिसमें बाजरा, जौ और जई जैसे अनाज उपजाए जाते. हैं । जहाँ सिंचाई की सुविधा है, वहाँ गेहूँ, मकई, दलहन और सब्जियों की खेती होती है। यहाँ के लोगों का मुख्य भोजन बाजरे की रोटी है। ऊँट इनकी मुख्य सवारी है । हालाँकि यहाँ के लोग भेड़ भी पालते हैं । ऊँट कंटीली झाड़ियाँ

और बबूल की टहनियाँ आराम से खा लेते हैं । ऊँटनी के दूध का उपयोग होता है। जहाँ-जहाँ बावड़ी या कुएँ मिलते हैं, उन्हीं के आसपास आबादी पाई जाती है। मरुद्यानों से पानी ढोकर लाया जाता है । जैसलमेर जैसे नगरों में टैंकर से पानी पहुँचाया जाता है । यहाँ के लोग पानी का उपयोग काफी सावध नी से करते हैं।

थार प्रदेश में जिप्सम, संगमरमर, छींटेदार इमारती पत्थर, लिग्नाइट कोयला, ताँबा, अभ्रख, नमक आदि मिलते हैं । संगमरमर और लाह की मूर्तियाँ. चूड़ियाँ, हाथी-दाँत की वस्तुओं पर नक्काशी, कपड़ों की रंगाई और छपाई इनका मुख्य व्यवसाय है।

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जीवन-यापन की कमी के कारण जनसंख्या अत्यन्त विरल है। मुख्य नगर बिकानेर, जैसलमेर, बाड़मेड़, जोधपुर आदि है । पानी की कमी को दूर करने के लिए सतलज नदी पर बाँध बना कर इन्दिरा गाँधी नहर बनाई गई है। इसे राजस्थान नहर भी कहा जाता है । इस नहर के बन जाने से पानी की कमी दूर हुई है और गहन कृषि होने से हरियाली भी दिखाई देती है । थार रेगिस्तान को देखने और ऊँट की सवारी करने के लिये देशी-विदेशी सैलानियों का तांता लगा रहता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?
(क) तरुणावस्था
(ख) प्रथम प्रौढ़ावस्था
(ग) अन्तिम प्रौढ़ावस्था
(घ) वृद्धावस्था
उत्तर:
(क) तरुणावस्था

प्रश्न 2.
एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैं; किस नाम से जानी जाती है?
(क) U – आकार की घाटी
(ख) अन्धी घाटी
(ग) गॉर्ज
(घ) कैनियन
उत्तर:
(घ) कैनियन

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प्रश्न 3.
निम्न में से किन प्रदेशों में रसायनिक अपक्षय प्रक्रिया यान्त्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है?
(क) आई प्रदेश
(ख) शुष्क प्रदेश
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश
(घ) हिमनद प्रदेश
उत्तर:
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा वक्तव्य लेपीज (Lapies) शब्द को परिभाषित करता है?
(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।
(ख) ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे से कीप के आकार के होते हैं।
(ग) ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं।
(घ) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों।
उत्तर:
(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।

प्रश्न 5.
गहरे, लम्बे व विस्तृत गर्त या बेसिन जिनके शीर्ष दीवार खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं, उन्हें क्या कहते हैं?
(क) सर्क
(ख) पाश्विक हिमोढ़
(ग) घाटी हिमनद
(घ) एस्कर
उत्तर:
(क) सर्क

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प्रश्न 6.
यू-आकार की घाटी बनती है ……………
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
चट्टानों में अध: कर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?
उत्तर:
नदी विकास की प्रारम्भिक अवस्था में प्रारम्भिक मन्द ढाल पर विसर्प लूप विकसित होते हैं और ये लूप चट्टानों में गहराई तक होते हैं, जो प्रायः नदी अपरदन या भूतल के धीमे व लगातार उत्थान के कारण बनते हैं। कालान्तर में ये गहरे तथा विस्तृत हो जाते हैं और कठोर चट्टानी भागों में गहरे गॉर्ज व कैनियन के रूप में पाए जाते हैं।

ये उन प्राचीन धरातलों के परिचायक है जिन पर नदियाँ विकसित हुई है। बाढ व डेल्टाई मैदानों पर लूप जैसे चैनल प्रारूप विकसित होते हैं-जिन्हें विसर्प कहा जाता है । नदी विसर्प के निर्मित होने का कारण तटों पर जलोढ़ का अनियमित व असंगठित जमाव है, जिससे जल के दबाव का नदी पाश्वों की तरफ बढ़ता है। प्रायः बड़ी नदियों के विसर्प में उत्तल किनारों पर सक्रिय निक्षेपण होते हैं और अवतल किनारों पर अधोमुखी (Undercutting) कटाव होते हैं।

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प्रश्न 2.
घाटी रंध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
सामान्यतः धरातलीय प्रवाहित जल घोल रंध्रों व विलयन रंगों में से गुजरता हुआ भूमि के अन्दर नदी के रूप में विलीन हो जाता है और फिर कुछ दूर के पश्चात् किसी कंदरा से भूमिगत नदी के रूप में फिर से निकल आता है। जब घोलरंध्र व डोजाइन इन कंदराओं की छत के गिरने से या पदों के स्खलन द्वारा आपस में मिल जाते हैं, तो लम्बी तंग तथा विस्तृत खाइयाँ बनती है जो कि घाटी का युवाला कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
चूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौमजल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि, जब चानें पारगम्य, कम सघन अत्यधिक जोड़ों/सन्धियों व दरारों वाली हो, तो घरातलीय जल का अन्त:स्रवण आसानी से होता है। लम्बवत् गहराई पर जाने के बाद धरातल के नीचे चट्टानों की संधियाँ, छिद्रों व संस्तरण तल से होकर क्षैतिज अवस्था में बहना प्रारंभ करता है।

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प्रश्न 4.
हिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति व नाम बताएं।
उत्तर:
हिमनद घाटियों में निम्नलिखित रैखिक निक्षेपण स्थलरूप पाए जाते हैं –

  1. हिमोढ़-हिमोद, हिमनद टिल (Till) – या गोलाश्मी मृहिका के जमाव की लम्बी कटकें।
  2. एस्कर (Eskers) – बड़े गोलाश्म, चट्टानी टुकड़े और छोटा चट्टानी मलबा हिमनद के नीचे बर्फ की घाटी में जमा हो जाते हैं, जो वक्राकार कटक के रूप में मिलते हैं।
  3. हिमानी धौत मैदान (Outwash plains) – हिमानी-जलोढ़ निक्षेपों से हिमानी धैत मैदान नर्मित होते हैं।
  4. ड्रमलिन का निर्माण हिमनद दरारों में भारी चट्टान मलबे के भरने व उसके बर्फ के चे रहने से होता है।

प्रश्न 5.
मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरनदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?
उत्तर:
उष्ण मरूस्थलों के दो प्रभावशाली अनाच्छादनकर्ता कारकों में से पवन एक महत्त्वपूर्ण अपरदन का कारक है। मरुस्थलीय धरातल शीघ्र गर्म और शीघ्र ठंडे हो जाते हैं। उष्ण धरातलों के ठीक ऊपर वायु गर्म हो जाती है, जिससे हल्की गर्म हवा प्रक्षुब्दता के साथ उर्ध्वाधर गति करती है। इसके मार्ग में कोई रुकावट आने पर भँवर, वातावृत बनते हैं तथा अनुवात एवं उत्वात प्रवाह उत्पन्न होता है।

पवन, अपवाहन, घर्षण आदि द्वारा अपरदन करती हैं। मरुस्थलों में अपक्षय जनित मलबा केवल पवन द्वारा ही नहीं, बल्कि वर्षा च सृष्टि धोवन से भी प्रवाहित होता है। पवन केवल महीन मलबे का ही अपवाहन कर सकती है। जबकि वृहत् अपरदन मख्यतः परत बाढ़ या वृष्टि धोवन से ही सम्पन्न होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आई व शुक्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
आई व शुष्क जलवायु प्रदेशों में, जहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, प्रवाहित जल सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक हैं जो धरातल के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल के दो तत्त्व हैं। एक, धरातल परत के रूप में फैला हुआ प्रवाह है। दूसरा रैखिक प्रवाह है जो घाटियों में नदियों सरिताओं के रूप में बहता है।

प्रवाहित जल द्वारा निर्मित अधिकतर अपरदित स्थलरूप ढाल प्रवणता के अनुरूप बहती हुई नदियों की आक्रामक युवावस्था से संबंधित है। कालांतर में तेज ढाल लगातार अपरदन के कारण मंद ढाल में परिवर्तित हो जाते हैं और परिणामस्वरूप नदियों का वक्र कम हो जाता है, जिससे निक्षेपण आरंभ होता है।

तेज ढाल से बहती हुई, सरिताएं भी कुछ निक्षेपित भू-आकृतियाँ बनाती हैं, लेकिन ये नदियों के माध्यम तथा धीमे ढाल पर बने आकारों की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। प्रवाहित जल का ढाल जितना मंद होगा, उतना ही अधिक निक्षेपण होगा। जब लगातार अपरदन के कारण नदी तल समतल हो जाए, तो अधोमुखी कटाव कम हो जाता है और तटों का पार्श्व अपरदन बढ़ जाता है और इसके फलस्वरूप पहाड़ियाँ और घाटियाँ समतल मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।

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प्रश्न 2.
चूना घट्टानें आई व शुष्क जलवायु में भिन व्यवहार करती हैं क्यों ? चूना प्रदेश में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन-सी हैं और इसके क्या परिणाम हैं।
उत्तर:
चूने का पत्थर पतली एवं मोटी दोनों प्रकार की परतों में पाया जाता है तथा इसके कण महीन भी हो सकते हैं, साथ ही साथ बड़े भी। चूँकि लाइमस्टोन की रचना घुलनशील तत्त्व कैल्शियम कार्बोनेट से होती है, अत: यह आर्द्र जलवायु में शीघ्रता से घुल जाता है। इस कारण इस चट्टान पर रासायनिक अपक्षय का प्रभाव सर्वाधिक होता है।

लेकिन शष्क जलवाय में या शुष्क जलवायु वाले भागों में यह अपक्षय के लिए अवरोधक होता है। इसका मुख्य कारण ह है कि लाइमस्टोन की रचना में समानता होती है तथा परिवर्तन के कारण चट्टान में फैलाव तथा संकुचन नहीं होता है, कारण चट्टान का बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन अधिक मात्रा में नहीं हो पाता है।

चूना पत्थर (Limestone) या डोलोमाइट चट्टनों के क्षेत्र में भौम जल द्वारा घुलन प्रक्रिया और उसकी निशेपण प्रक्रिया से बने ऐसे स्थलरूपों को कार्स्ट (Karst topography) स्थलाकृति का नाम दिया गया है। अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक (दोनों प्रकार के स्थललरूप कार्ट स्थलाकृतियों की विशेषताएँ हैं। अपरदित स्थलरूप-कुंड (Pools) घोलरंध्र (Sinkholes), लैपिज (Lapies), और चूना पत्थर चबूतरे (Limestone pavements) हैं।

निक्षेपित स्थलरूप कंदराओं के भीतर ही निर्मित होते हैं। चूनायुक्त चट्टानों के अधिकतर भाग गतों व खाइयों के हवाले हो जाते हैं और पूरे क्षेत्र में अत्यधिक अनियमित, पतले व नुकीले कटक आदि रह जाते हैं, जिन्हें लेपीस (Lapies) कहते हैं। इन कटकों या लेपोस का निर्माण चट्टानों की संधियों में भिन्न घुलन प्रक्रियाओं द्वारा होता है। कभी-कभी लेपीज के विस्तृत क्षेत्र समतल चूना युक्त चबूतरों में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं या किस प्रक्रिया से यह सम्पन्न होता है बताएँ?
उत्तर:
हिमनदों से प्रबल अपरदन होता है जिसका कारण इसके अपने भार से उत्पन्न घर्षण होता है। हिमनद द्वारा कर्षित चट्टानी पदार्थ (प्रायः बड़े गोलाश्म व शैलखंड) इसके तल में ही इसके साथ घसीटे जाते हैं या घाटी के किनारों पर अपघर्षण व घर्षण द्वारा अत्यधिक अपरदन करते हैं। हिमनद अपक्षय रहित चट्टानों का भी प्रभावशाली अपरदन करते हैं, जिससे ऊँचे पर्वत छोटी पहाड़ियों व मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।
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हिमनद के लगातार संचलित होने से हिमनद मलबा हटता जाता है विभाजक नीचे हो जाता है और कालान्तर में ढाल इतने निम्न हो जो हैं कि हिमनद ही संचलन शक्ति समाप्त हो जाती है तथा निम्न पहाड़ियों व अन्य निक्षेपित स्थलरूपों वाला एक, मिनी धौत (Outwash plain) रह जाता है। चित्र (a) तथा (b) हिमनद के अपरदन व निक्षेपण से निर्मित स्थलरूपों को दर्शात हैं। हिमानीकृत पर्वतीय भागों में हिमनद द्वारा उत्पन्न स्थलरंध्रों में सर्क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सर्क के शीर्ष पर अपरदन होने से हॉर्न निर्मित होते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र के आस-पास के स्थलरूप, उनके पदार्थ तथा वह जिन प्रक्रियाओं से निर्मित हैं, पहचानें।
उत्तर:
अध्यापकों या अपने अभिभावकों के साथ अपने आस-पास के क्षेत्रों में जाएँ और स्थलाकृतियों को पहचानने की कोशिश करें। पाठ्य-पुस्तक साथ में रखें (इस परियोजना का कार्य स्वयं करें)।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘U’-घाटी किस प्रकार बनती है?
उत्तर:
हिम का असमान संचलन हिम को खंडित कर देता है, जिससे इसमें दरारें पड़ जाती हैं। इन्हें हिमबिदर कहते हैं। ‘U’ आकार की हिम गह्वार तथा मेष शिलाएँ बनती हैं।

प्रश्न 2.
तरंगापवर्तन किसे कहते हैं?
उत्तर:
धीमी होने पर तरंगों की पंक्तियाँ विभिन्न खंडों में नहीं बल्कि तरंग शीष के साथ-साथ निरन्तर परिवर्तित होते हुए मुड़ती हैं। इस प्रक्रिया को तरंगापर्वतन कहते हैं।

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प्रश्न 3.
लैगून (Lagoon) कैसे निर्मित होते हैं?
उत्तर:
जब रोधिका तथा स्पिट किसी खाड़ी के मुख पर निर्मित होकर उसके मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं तब लैगून (Lagoon) निर्मित होते हैं।

प्रश्न 4.
पुलिन क्या है? ये कैसे बनते हैं?
उत्तर:
पुलिन अस्थाई स्थलाकृतियाँ हैं। ये अधिकतर थल से नदियों व सरिताओं द्वारा अथवा तरंगों के अपरदन द्वारा बहाकर लाए गए पदार्थ होते हैं।

प्रश्न 5.
स्कंध ढाल किसे कहते हैं?
उत्तर:
उत्तर किनारों का ढाल मंद होता है ओर ये स्कंध ढाल (Slip-off-bank) कहलाते हैं।

प्रश्न 6.
भू-आकृतिक विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-आकृतिक विज्ञान भू-आकृतियों की उत्पत्ति का विज्ञान है। परंपरागत रूप में यह अध्ययन भू-आकृतियों की उत्पत्ति एवं विकास तक ही सीमित था।

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प्रश्न 7.
एकरूपता का नियम क्या है?
उत्तर:
चार्ल्स लीयल के अनुसार प्रकृति सभी कालों में एक समान आचरण करती है। इसे एकरूपता का नियम कहते हैं। वास्तव में भौतिक एवं रसायनिक नियम ही एक समान रहते हैं और भू-वैज्ञानिक क्रियाओं को निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 8.
प्रथम कोटि की भू-आकृतियाँ किस प्रकार की है?
उत्तर:
प्रथम कोटि की भू-आकृतियों में महाद्वीप और महासागर द्रोणियाँ सम्मिलित है, जो पृथ्वी के उच्चावचकी सबसे बड़ी इकाइयों को अपने में समेटे हुए हैं।

प्रश्न 9.
तुषार-क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
मध्य एवं उच्च अक्षांशों की जलवायु तथा उच्च तुंगता के क्षेत्रों में पानी का बारी-बारी जमना एवं पिघलना-तुषार क्रिया कहलाता है।

प्रश्न 10.
कणिकी विघटन किसे कहते हैं?
उत्तर:
शैल सबसे पहले खंडों में टूटती है, जिसे खंड विघटन कहते हैं। इसके बाद यह कणों में बदलती है, जिसे किणका विघटन कहते हैं।

प्रश्न 11.
सॉलीफ्लक्शन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वृक्ष विहीन टुंडा प्रदेश में मृदा-प्रवाह को अंग्रेजी में सॉलीफ्लक्शन कहते हैं।

प्रश्न 12.
अवसर्पण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब कोई अकेला शैल खंड अपने क्षैतिज अक्ष पर पीछे की ओर सर्पिल होकर एक चक्र विभंग तल पर लढकता है. उसे अवसर्पण कहते हैं।

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प्रश्न 13.
हिमानी का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्राकृतिक रूप से भूमि पर संचित किसी भी विशाल हिमराशि को हिमानों कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘द्रोणी झील’ की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
भूमि पर संचित विशाल हिमराशि को हिमानी कहते हैं। हिमानियों द्वारा अपने तल का कर्षण करने से हिमनद-द्रोणी का निर्माण होता है। यदि हिमनद-द्रोणी जल से भर जाता है. तो द्रोणी झील की उत्पत्ति होता है, जो हिमनद द्रोणी समुद्र के पास बनती है, वह समुद्र जल से भर जाती है। प्रत्येक द्रोणी के शीर्ष पर अति तीव्र ढाल वाली एक अर्ध-वृताकार बेसिन की रचना होती है, जिसे गह्वर कहते हैं।

प्रश्न 2.
यान्त्रिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
यान्त्रिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 3.
भू-प्रवाह एवं पंक प्रवाह में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भू-प्रवाह एवं पंक प्रवाह में अन्तर –
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प्रश्न 4.
जलोढ़ पंख एवं डेल्टा में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
जलोढ़ पंख एवं डेल्टा में अन्तर –
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प्रश्न 5.
V आकार घाटी एवं U आकार घाटी में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
V आकार घाटी एवं U आकार घाटी में अन्तर –
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प्रश्न 6.
पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ कौन-सी है?
उत्तर:
पृथ्वी के निर्माण के पश्चात् महाद्वीपों तथा महासागरों का निर्माण हआ। ये प्रथम श्रेणी की भू-आकृतियाँ हैं। इसके पश्चात् विवर्तनिक भू-संचरणों के कारण पर्वत, पठार तथा मैदान बनें। इन्हें पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ कहते हैं। इन भू-आकृतियों का मानव के लिए अलग-अलग महत्त्व है। पर्वत तथा पठार सम्पदाओं के भण्डार हैं। ये भू-आकृतियाँ भूगोलवेत्ताओं के लिए विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि वह इन क्षेत्रों में मानव-क्रियाकलापों का अध्ययन करता है।

प्रश्न 7.
विवर्तनिक संचरण से उत्पन्न पर्वतों के प्रकार बताएँ एवं उदाहरण दें।
उत्तर:
पर्वत ऐसे उँचे प्रदेश को कहते हैं, जो अपने आस-पास के क्षेत्र में 900 मीटर से अधिक ऊँचा हो। 900 मीटर से कम ऊँचे प्रदेश को पहाडी कहते हैं। कई क्षेत्र सापेक्ष ऊँचाद्र कम होने पर भी पहाडी कहे जाते हैं। जैसे-पारसनाथ की पहाडी. लेकिन कई क्षेत्र कम ऊँचे होते हैं और उनकी ऊँचाई अधिक होती है, पर्वत कहलाते हैं। जैसे-इंग्लैण्ड में पेनाइन पर्वत। भूसंचरण से उत्पन्न पर्वतों को विवर्तनिक पर्वत कहते हैं। ये प्रायः दो प्रकार के हैं-वलित पर्वत तथा खण्ड पर्वत।

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प्रश्न 8.
भू-द्रोणी से आपका क्या अभिप्राय है? उदाहरण देकर बताएँ।
उत्तर:
पतले लम्बे तथा गहरे समुद्री अथवा झील बेसिन को भू-द्रोणी कहते हैं। इन भू-द्रोणियों में एकत्रित मलबे पर दबाव पड़ने तथा उठान से बलित पर्वत बनते हैं। टैथीज भू-द्रोणी में ही हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ है। भूपृष्ठीय ढाल, जो स्थल प्रवाह द्वारा जलमागों के जल के साथ मिलकर एक अपवाह द्रोणी की रचना करता है। इस द्रोणी की सीमा एक रेखा के रूप में पहाड़ियों की अविरत श्रृंखला का अनुसरण करती है।

प्रश्न 9.
युवा वलित तथा प्राचीन वलित पर्वत किसे कहते हैं?
उत्तर:
युवा वलित पर्वत-वे पर्वत जिमका निर्माण हए अधिक समय नहीं हुआ है। इन पर्वतों की निर्माण क्रिया अभी चल रही है। हिमालय पर्वत, रॉकी पर्वत, आल्पस पर्वत इसके प्रमुख उदाहरण हैं। प्राचीन वलित पर्वत-ये पर्वत है, जिनका निर्माण प्राचीन काल में हआ है। ये पर्वत अपरदन के कारण कम ऊँचे हैं। यूराल पर्वत, अप्लेशियन पर्वत तथा शॉन पर्वत इनके उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
मैदानों का मानव के लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर:
महत्त्व –

  • मैदानों में निवास की सुविधाएँ होती हैं।
  • मैदानों के समतल धरातल तथा गहरी उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि की सुविधा है।
  • मैदान अन्न के भण्डार है।
  • मैदानों की समतल भूमि पर यातायात के साधन सरलता से बनाए जाते हैं।
  • मैदानों में बड़े-बड़े उद्योग तथा नगर स्थित होते हैं।
  • मैदान प्राचीन सभ्यताओं के पालने हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

प्रश्न 11.
विभिन्न प्रकार की जलवायु में भू-आकृतियों पर भिन्न संरचनाओं वाली चट्टानों के प्रभावों का वर्णन करो।
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र में भू-आकृतियों के निर्माण में चट्टानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। निम्नलिखित गुण महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं –

  1. कठोरता
  2. संधियाँ
  3. पारगम्यता
  4. संरन्ध्रता।

विभिन्न प्रकार की जलवायु में विभिन्न भू-आकृतियाँ बनती है। उष्ण-आर्द्र जलवायु में चूने का पत्थर अपक्षयित हो जाता है। परन्तु शुष्क प्रदेशों में तीव्र ढाल वाली चट्टान के रूप में रहता है। शीत प्रदेशों में पाले के प्रहार से चट्टानें टूट जाती है। शुष्क प्रदेशों में ग्रेनाइट से गुम्बदनुमा भू-आकार बनते हैं, जिन्हें ‘टोर’ कहा जाता है।

प्रश्न 12.
भूस्खलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया से शैल अदृढ बन जाती है। जब गरुत्वाकर्षण बल उन्हें नीचे लाता है, तो इन्हें शैलपात कहते हैं। गिरते हुए शैल खंड छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाते हैं और एक ऐसी ढाल का निर्माण करते हैं, जिस पर अदृढ़ पदार्थ बिखरे पड़े होते हैं, इन्हें शैल मलबा कहते हैं। शैल खंड का अकेले धरातल पर नीचे लुढ़कना भूस्खलन (शैल स्खलन) कहलाता है।
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प्रश्न 13.
नदी निक्षेपण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
नदी का वेग कम होने लगता है, गाद के मोटे कण नीचे बैठने लगते हैं, जबकि बारीक मृत्तिका अनिश्चित रूप से परिवहन जारी रखती है। इसे नदी निक्षेपण कहते हैं। मृत्तिका समुद्र में पहुँचकर समुद्र के नमकीन जल के सम्पर्क में आती है और इसमें उपस्थित कण बड़े हो जाते हैं। इसे ऊर्णन कहते हैं। मध्यम तथा मोटे आकार वाले बालू के कण तथा बड़े टुकड़े नदी के तल पर तल भार के रूप में यात्रा करते हैं। नदी विसर्प, बाढ़ के मैदान, गुंफित मार्ग, गोखुर झील तथा डेल्टा आदि का निर्माण नदी निक्षेपण के कारण होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न प्रकार के वृहत क्षरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वृहत क्षरण के रूप प्रलयंकारी अवसर्पण से लेकर जलसंतृप्त मृदा के मन्द प्रवाह तक हो सकते हैं। मृदा लम्बे काल से पर्वत ढाल के सहारे अति मन्द गति से नीचे की ओर निरन्तर संचालित हो रही है। इसे मृदा सर्पण कहते हैं। आर्द जलवायु वाले पर्वतीय तथा पहाड़ी क्षेत्रों में जलसंतृप्त मिश्रित मृदा मृत्तिका खनिजों में धनी रेगोलिथ मृदा प्रवाह का रूप लेती है। जब खनिज पदार्थों के अनुपात में जल की मात्रा अधिक होती है, तो वह वृहत क्षरण पंक प्रवाह का रूप ले लेता है। यह नदी मागों में तेजी के साथ यात्रा करता है।

सीधे शैल-भृगु के किनारे भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया शैल को अदृढ़ बना देती है। गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें नीचे लाता है, तो उसे शैलपात का नाम दिया जाता है। शैलखंड टूट-टूटकर एक ऐसे ढाल का निर्माण करती है, जिन्हें शैल मलबा कहते हैं। शैलखंड का धरातल पर नीचे लुढ़कना शैल स्खलन कहलाता है । जब कोई अकेला शेलखंड सर्पिल होकर एक वक्र विभाग तल पर लुढ़कता है, तो उसे अवसर्पण कहते हैं।
अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण की प्रक्रियाएँ अनेक कारकों, जैसे-प्रवाहित जल, हिमनदी । या हिमानी, समुद्री तरंगों तथा पवनों द्वारा क्रियान्वित की जाती है।
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1. प्रवाहित जल – प्रवाहित जल अनाच्छादन का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है। अपक्षय एक वृहत् क्षरण के साथ मिलकर नदी क्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया, जिसे नदीय अनाच्छादन कहते हैं, के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल भू-आकृतिक कारक के रूप में दो आधारभूत विधि से कार्य करता है। पहला है स्थल प्रवाह। इसमें भूपृष्ठ के ऊपर जल प्रवाह ढाल के सहारे लगभग एक विस्तृत परत के रूप में गतिशील रहता है।

दूसरा है मार्ग प्रवाह अथवा नदी प्रवाह, जिसमें जल एक सुनिश्चित लम्बे संकीर्ण तथा गहरे मार्ग से होकर नीचे तल की ओर बहता है, जिसे नदी मार्ग कहते हैं। नदी मार्ग अनेक शाखाओं के रूप में जलमार्ग का एक जाल बनाती है। जब नदी का वेग कम होने लगता है, गोद के मोटे कण नीचे बैठने लगते हैं। यह नदी का निक्षेपण है। नदी विसर्प, बाढ़ के मैदान, गुफीत मार्ग, गोखुर झील तथा डेल्टा आदि का निर्माण नदी के निक्षेपण के कारण होता है।

2. हिमानी – प्राकृतिक रूप से संचित विशाल हिम राशि को हिमानी कहते हैं । हिम विनाश की औसत दर हिमपात से अपेक्षाकृत कम होती है। हिमानी के निचले भाग में अपक्षरण की दर विनाश की संचयन दर से बढ़ जाती है। हिम की शुद्ध हानि का यह क्षेत्र अपक्षरण क्षेत्र कहलाता है।

3. पवनें – पवनें पृथ्वी पर पवन अपरदन तथा निक्षेपण की अवस्थितियों को प्रभावित करती हैं। पवन अपरदन एक प्रकार की अपवाहन है। पवन अपरदन से उत्पन्न उथले गर्तो अपवाहन गर्त अथवा वातगर्त कहते हैं। वालूवात्या क्रिया पवन अपरदन का दूसरा रूप है। यह अपरदन तब होता है, जब बालू के कण शैल पृष्ठ के अनावरित भाग पर जोर से टकराते हैं। छत्रक शैल, खोंच, मधुछत्ता कुछ ऐसे लक्षण है, जो बालूवात्या पवन परिवहन से बनी भू-आकृति को लोएस कहते हैं। बालू टिब्बे मरुस्थलों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भू-आकृतियाँ हैं।
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4. तरंगें – समुद्री तरंगों द्वारा अपरदन विनाशकारी प्रक्रियाएँ है, जो पदार्थों को परिवहन तथा निक्षेपण के साथ क्रियाशील हैं। तरंग-क्रिया अपरदन का प्रमुख कारक है। पवन द्वारा उत्पन्न महासागरीय तरंगें दो प्रकार की होती है-प्रगामी तरंगें, जिसमें जल से होकर तरंगें तेजी से संचलन करती है, तथा दोलनी तरंग, जो केवल ऊपर-नीचे संचलन करती हैं। इससे तरंग-अपरदित आलों (खाँचों) तथा समुद्री गुफाओं की रचना होती है। समुद्र का अपरदन का कार्य मुख्य रूप से तरंग के आकार तथा शक्ति, समुद्र की ओर ढाल, उच्च एवं निम्न ज्वारभाटा के मध्य तट की ऊँचाई, शैल संघटन तथा जल की गहराई पर निर्भर करता है। अपरदन समुद्री तरंगों के घुलनशील तथा रासायनिक क्रियाओं द्वारा भी प्रभावित होता है।
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प्रश्न 2.
मैदान क्या होते हैं? मैदानों का वर्गीकरण करें। प्रत्येक के उदाहरण दें।
उत्तर:
प्रमुख भू-आकृतियों में मैदान सबसे अधिक स्पष्ट तथा सरल है। स्थल के अधिकांश भाग (40 प्रतिशत) पर इनका विस्तार है। मैदान भू-धरातल पर निचले तथा समतल प्रदेश होते हैं। मैदान स्थल के वे समतल भाग हैं, जो सागर तल से 150 मी. से कम ऊँचाई पर हों तथा उनकी ढाल धीमी तथा साधारण हो।

मैदान समुद्रतल से ऊँचे या नीचे हो सकते हैं। परन्तु अपने आस-पास के पठार या पर्वत से कभी भी ऊँचे नहीं हो सकते। सभी मैदान समुद्र तल से समान ऊँचाई पर नहीं होते । कई मैदान समुद्र तल से बहुत ऊँचे होते हैं, जैस संयुक्त राज्य अमेरिका के महान् मैदान 1500 मीटर ऊँचे हैं। परन्तु हॉलैंड का तट समुद्र तल से नीचा है।

मैदान तीन प्रकार से बनते हैं –

  • अपरदन से – बाहरी शक्तियों के अपरदन से ऊँचे-नीचे मैदान बनते हैं।
  • निक्षेपण से – नदी, हिमनदी तथा वायु द्वारा लाई गई सामग्री के निक्षेपण से मैदान बनते हैं।
  • पृथ्वी की हलचल – पृथ्वी की भीतरी शक्तियों की हिलडुल के कारण तटवर्ती मैदान बनते हैं।

वर्गीकरण – रचना के आधार पर मैदानों को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:

  1. जलोढ़ मैदान
  2. अपरदन के मैदान
  3. हिमानी मैदान
  4. सरोबरीय मैदान
  5. तटीय मैदान
  6. लोएस मैदान

1. जलोढ़ मैदान – नदियों द्वारा तलछट के जमाव से विशाल जलोढ़ मैदान बनते हैं। नदियों का उद्देश्य स्थल भाग को काटकर सागर तल तक ले जाना होता है। पर्वतों से निकलकर नदियाँ भाभर का मैदान बनाती है। निचली घाटी में बाढ़ के समय बारीक मिट्टी के जमाव से बाढ़ का मैदान बनता है। सागर में गिरने से पहले एक समतल त्रिकोण आकार का मैदान बनाती है, जिसे डेल्टा कहते हैं। नदियों द्वारा बने मैदान बड़े उपजाऊ होते हैं।

उदाहरण – भारत में गंगा-सतलुज का विशाल मैदान चीन में ह्वांग हो तथा यंगसीक्यांग नदी का मैदान, अमेरिका में मिसीसिपी का मैदान।

2. अपरदन के मैदान – लम्बे समय तक हिम, जल, वायु आदि के निरंतर कटाव के कारण पर्वत या पठार घिस कर नीचे हो जाते हैं तथा मैदानों का रूप धारण कर लेते हैं। ये मैदान पूर्ण रूप से समतल नहीं होते । इन मैदानों का ढाल अत्यन्त हल्का होता है। इनके बीच कठोर चट्टानों के रूप में ऊँचे टीले मिलते हैं। ऐसे मैदान में कठोर चट्टानों के टीले नष्ट नहीं होते । इन्हें मोनेडनाक कहते हैं। इन्हें उपान्त मैदान भी कहते हैं।

उदाहरण – फिनलैंड तथा साइबेरिया का मैदान, भारत में अरावली प्रदेश, अफ्रीका में सहारा मैदान, यूरोप का मैदान ।

3. हिमानी मैदान – ये मैदान हिम नदी या ग्लेशियर के निक्षेप से बनते हैं । हिम नदी कटाव द्वारा ऊँचे भागों को काट-छाँटकर सपाट मैदान का निर्माण करती हैं। इनमें झीलें, जल प्रपात तथा ऊँचे-नीचे दलदली प्रदेश मिले हैं। जब बर्फ पिघलती है, तो अपने साथ बहाकर लाई मिट्टी बजरी, कंकर आदि निचले स्थानों तथा गड्ढों में भर देती है। इससे धरातल समतल बन जाता है। इन मैदानों में हिमोढ़ के जमाव से बने मैदान को ड्रिफ्ट मैदान भी कहते हैं। हिम नदी के अपरदन से भी मैदान बनते हैं, जिनमें छोटे-छोटे टीले इधर-उधर बिखरे होते हैं।

उदाहरण – हिम युग में उत्तरी अमेरिका, कनाडा तथा यूरोप बर्फ से ढके हुए थे। बर्फ पिघलने से वहाँ हिमानी मैदान बन गए। जैसे-उत्तर-पूर्वी लद्दाख का मैदान।

4. सरोवरीय मैदान – झीलों के भरने या सूख जाने से उन स्थानों पर सरोवरीय मैदान बनते हैं। झीलों में गिरने वाली नदियाँ अपने साथ लाई हुई मिट्टी आदि झील में जमा करती हैं, जिससे झील की तली ऊँची हो जाती है, गहराई कम हो जाती है और धीरे-धीरे झील पूरी तरह भरकर एक सपाट मैदान बन जाती है, पृथ्वी की भीतरी हलचल के कारण झील की तली ऊपर उठ जाने से भी मैदान बनते हैं।

उदाहरण – उत्तरी अमेरिका का प्रेवरीज का हरा भरा मैदान, हंगरी का मैदान, भारत में कश्मीर घाटी, मणिपुर में इम्फाल बेसिन ।

5. तटीय मैदान – तटीय मैदान प्रायः समुद्र के किनारे स्थित होते हैं, जो तटीय भाग जल में डूब जाते हैं उन पर तलछट के जमाव के कारण तटीय मैदान बनते हैं। सागरों के पीछे हटने से भी स्थल भाग सूखकर मैदान बन जाते हैं। पृथ्वी की हलचल के कारण तट के समीप कम गहरा समुद्र ऊँचा उठ जाता है। प्रायः तटीय मैदान का ढाल समुद्र की ओर धीमा होता है। इनका महत्त्व बन्दरगाहों तथा समुद्री व्यापार से है।।

उदाहरण – अमेरिका की खाड़ी का तटीय मैदान तथा महान् मैदान, भारत का पूर्वी तटीय मैदान, रूस का मैदान ।

6. लोएस का मैदान – वायु द्वारा बने मैदान की रेगिस्तानी या लोएस का मैदान कहते हैं। वायु रेत को उड़ाकर दूर-दूर के स्थानों में जमा करती है। एक पर्त के ऊपर दूसरी पर्त के बिछ जाने से इन मैदानों की रचना होती है। ऐसे मैदानों में रेत के डिब्बे अधिक होते हैं।

उदाहरण – उत्तर पश्चिमी चीन में सैंसी तथा शांसी प्रदेशों में लोएस का मैदान मिलते हैं। । पंजाब तथा हरियाणा की सीमा पर लोएस का मैदान मिलते हैं, रूसी तुर्किस्तान का मैदान ।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 8 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : लहाख प्रदेश में जन-जीवन

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 2 Chapter 8 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : लहाख प्रदेश में जन-जीवन Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 8 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : लहाख प्रदेश में जन-जीवन

Bihar Board Class 7 Social Science मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : लहाख प्रदेश में जन-जीवन Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्न प्रश्नों के उत्तर दें :

प्रश्न (i)
हम प्रकृति के साथ अनुकूलित हैं । कैसे ?
उत्तर-
हम जिस पारितंत्र में रहते हैं वहीं के वातावरण के अनुकूल अपने को अनुकूलित कर लेते हैं । हम ही क्यों ? वहाँ के पशु-पक्षी, फसलें, वनस्पतियाँ जलवायु के अनुकूल ढालने में हमारा साथ देती हैं, हालांकि उन्हें भी अनुकूलित होने में समय लगा होगा।

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प्रश्न (ii)
जम्मू कश्मीर के नक्शे में सिंध नदी का बहाव, कराकोरम दर्रा और जोजिला दर्रा को चिह्नित करें ।
उत्तर-
Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 8 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया लहाख प्रदेश में जन-जीवन 1Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 8 मानव पर्यावरण अंतःक्रिया लहाख प्रदेश में जन-जीवन 1

प्रश्न (iii)
लद्दाख क्षेत्र की जलवायु कैसी है ?
उत्तर-
लद्दाख क्षेत्र की जलवायु शुष्क और ठंडा है । यह दुनिया की छत कहे जाने वाला तिब्बत के पठार का पश्चिमी भागा है । तात्पर्य कि इसे हम उच्च भूमि भी कह सकते हैं। यहाँ की सामान्य ऊँचाई 6700 मीटर है । अधि क ऊँचाई के कारण ही जलवायु ठंडी है । हिमालय पहाड़ की वृष्टि छाया में पड़ जाने से यहाँ वर्षा नहीं होती । इसी कारण यह क्षेत्र शुष्क हो गया है। जाड़ा सालों भर पड़ता है, कभी बहुत अधिक और कभी थोड़ा कम ।

प्रश्न (iv)
लद्दाख में विरल वनस्पति और विरल जनसंख्या क्यों है ?
उत्तर-
उच्च शुष्कता के कारण यह उजाड़ है और वनस्पतियाँ कम है। हरियाली जिसे कहते हैं वह कहीं नहीं दिखती । कृषि योग्य भूमि की भारी कमी है । जीवन-यापन की असुविधा के कारण जनसंख्या भी विरल ही है ।

प्रश्न (v)
याक की उपयोगिता हमारे यहाँ के किस पशु से मिलती है ?
उत्तर-
याक की उपयोगिता हमारे यहाँ के भैंस से है । मादा याक बच्चे पैदा करती है । इनसे दूध मिलता है, जिससे खोवा, पनीर और मक्खन बनता है। नर याक बोझ ढोने, गाड़ी और हल खींचने के काम आते हैं ।

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प्रश्न (vi)
लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में पर्यटन की क्या संभावनाएँ हैं ?
उत्तर-
जाड़े की अधिकता तथा कोई प्राचीन स्मारक के नहीं रहने के कारण यहाँ पर्यटन की कोई संभावना नहीं है । यातायात की भी कोई खास सस्ती व्यवस्था नहीं है।

प्रश्न (vii)
ठंडे रेगिस्तानी प्रदेशों में आपको जाना है । साथ ले जाने ‘वाले सामानों की सूची बनाइए ।
उत्तर-
ठंडे रेगिस्तानी प्रदेश में जाने के लिए हमें मोटे-मोटे कम्बल, गर्म कपड़े जिसमें ओभर कोट अवश्य हो, ऊनी मोजा, कांटेदार जूता । रात बिताने के लिए रावटी भी साथ में होना चाहिए। तैयार खाने का सामान भी साथ ले जाना पड़ेगा । स्टोव और किरासन तेल भी साथ रहे ।

प्रश्न (viii)
आप अपने और लद्दाख के निवासियों के जीवन शैली की तुलना करके पता करें कि कहाँ का जीवन अधिक कठिन है और क्यों?
उत्तर-
हम धान, गेहूँ और विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाते हैं। ये सुविधा लद्दाख के लोगों के पास बहुत कम है । हमारा वातावरण सुखमय है जबकि लद्दाखवासियों को मशक्कत का जीवन-जीना पडता है । हम तीनों मौसमों जाड़ा, गर्मी और बरसात का मजा लेते हैं तीनों में से किसी में अधि कता नहीं है । लद्दाख में तो केवल जाड़ा पड़ता है और वह भी भीषण ।

प्रश्न 2.
सही विकल्प पर सही (✓) का चिह्न लगाएँ :

प्रश्न (i)
लद्दाख की जलवायु शुष्क है, इसका कारण है लद्दाख का :
(क) ऊँचाई पर होना
(ख) वनस्पतियों का न होना
(ग) हिमालय की वृष्टि-छाया में होना
उत्तर-
(क) ऊँचाई पर होना

प्रश्न (ii)
लद्दाख में पाया जाने वाला महत्त्वपूर्ण जानवर है:
(क) पांडा
(ख) जंगली भैंसा
(ग) याक
उत्तर-
(ग) याक

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प्रश्न (iii)
कश्मीर से लद्दाख होते हुए तिब्बत को जोड़ता है:
(क) रोहतांग दर्रा
(ख) काराकोरम दर्रा
(ग) जोजीला दर्रा
उत्तर-
(ख) काराकोरम दर्रा

प्रश्न (iv)
लद्दाख में बहने वाली नदियाँ हैं :
(क) सिंधु-नर्मदा
(ख) सिंधु-वाका
(ग) सिंधु-गंगा
उत्तर-
(ख) सिंधु-वाका

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पाठ का सार संक्षेप

लद्दाख जम्मू-कश्मीर राज्य का एक भाग है । यह तिब्बत के पठार के पश्चिमी सीमा पर है । यहाँ ऐसे तो सालों भर बर्फ रहती है, लेकिन नवम्बर से जनवरी तक के महीनों में यह क्षेत्र पूर्णतः बर्फ में बदल जाता है । पेड़-पौधे कहीं-कहीं नाममात्र के ही हैं । यहाँ की सामान्य ऊँचाई 6700 मीटर है। यहाँ वर्षा नहीं होती बल्कि बर्फ गिरती है । कहीं वनस्पति नहीं दिखाई देती और दिखाई देती थी है तो बहुत कम । जब बर्फ नहीं रहती तब जौ, गेहूँ, जई और आलू आदि फसलें उपजाई जाती हैं। यहाँ अच्छे किस्म का जीरा उपजता है। सिंधु नदी लद्दाख से ही निकलती है। इसके अलावा शियांकबाका, छ् आदि नदियाँ भी बड़ी नदियों में शुमार होती हैं । झरनों की कमी नहीं है । यहाँ बिजली उत्पादन की अपार सम्भावनाएँ हैं । याक यहाँ का मुख्य पशु है ।

इसके दूध से पनीर और मक्खन बनाया जाता है । जंगली भेंड़ें, बकरियाँ भी मिलती हैं। इनके दूध और माँस का उपयोग होता है । याक, भेड़, बकरी के बालों से ऊनी वस्त्र बनाये जाते हैं । कम्बल, लोई व टोपी, जूते आदि कुटीर उद्योग के तहत बनाए जाते हैं। सड़के कम हैं। अधिकांश आवागमन पैदल होता है । लद्दाख के लिए हवाई जहाज उपलब्ध है । रोहतांग दर्रा होकर एक सुरंग बनाई गई है, जिससे होकर सालों पर शेष भारत से लद्दाख का सम्पर्क बना रहता है । सेना के लोग अधिकतर हवाई जहाज और हेलिकॉप्टर से आवाजाही करते हैं। पगडडियाँ भी आवागमन में मुख भूमिका निभाती हैं । यहाँ मंगोल प्रजाति के

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लोग हैं, जो बौद्ध धर्म मानते हैं अत: बौद्ध मठों की संख्या अधिक है । इन मठों को ‘गोम्पा’ कहा जाता है। हेमिस, थिकसे, लामायुस प्रसिद्ध बौद्ध मठ हैं। मठों को चारों ओर से रंगीन झंडे-पताकाओं से घेर दिया जाता है । उनका मानना है कि झर्ड-पताकाओं पर लिखे संदेश सीधे ईश्वर तक पहुँच जाता है। लद्दाख में ईरानी मूल के कुछ लोग हैं, जिन्हें ‘बाल्टी’ कहा जाता है । ये इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं । यहाँ रहने वाले मनुष्य और पशु यहाँ के वातावरण के योग्य अपने को अनुकूलित कर लिये हैं।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 2 Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण Text Book Questions and Answers, Notes.

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Bihar Board Class 7 Social Science मौसम सम्बन्धी उपकरण Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें :

प्रश्न 1.
दैनिक तापमान से क्या समझते हैं ?
उत्तर-
दिन-प्रतिदिन के अधिकतम और न्यूनतम तापमान को दैनिक तापमान कहते हैं।

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प्रश्न 2.
सोचकर बताइए कि किसी जगह पर दिन भर के तापमान में भिन्नता क्यों होती है ?
उत्तर-
किसी जगह पर दिन भर के तापमान में भिन्नता के कारण हैं सूर्य से मिलने वाला ताप । प्रात:काल में तापमान कम रहता है । जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाता है वैसे-वैसे तापमान बढ़ता जाता है । 2 बजे दिन में तापमान सर्वाधिक होता है । अब जैसे-जैसे सूर्य पश्चिम की ओर ढलते जाता है, वैसे-वैसे तापमान भी कमता जाता है। संध्या में वह सर्वाधिक कम हो जाता है । फिर जैसे-जैसे रात बीतती जाती है वैसे-वैसे तापमान कम होते जाता है। इस प्रकार सुबह चार बजे का तापमान न्यूनतम हो जाता है ।

प्रश्न 3.
अधिकतम और न्यूनतम तापमान क्या होता है ? किसी अखबार में देखकर आज का अधिकतम और न्यूनतम तापमान लिखिए।
उत्तर-
किसी दिन के 24 घंटे के तापमान में जो आंकड़ा अधिकतम बताता है और जो आंकड़ा न्यूनतम बताता है वही उस दिन का अधिकतम और न्यूनतम तापमान होता है ।

आज बिहार के विभिन्न शहरों का तापमान निम्नलिखित रहा :

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण 1

प्रश्न 4.
मौसम संबंधी उपकरणों के नाम लिखिए तथा बताइए कि वे किस-किस काम आते हैं ?
उत्तर-
मौसम संबंधी उपकरणों के नाम निम्नलिखित हैं:

  1. थर्मामीटर
  2. विंडबेन तथा
  3. रेनगंज ।

1. थर्मामीटर – से अधिकतम और न्यूनतम तापमान मापा जाता है।
2. विंडबेन – से हवा की दिशा ज्ञात की जाती है ।
3. रेनगेज – से वर्षा की मात्रा मापी जाती है ।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण

प्रश्न 5.
मौसम केन्द्र पर दैनिक तापमान कैसे मापते हैं ? लिखिए।
उत्तर-
मौसम केन्द्र पर दैनिक तापमान मापने के लिए तापमापी अर्थात् थर्मामीटर नामक एक उपकरण रहता है । इस उपकरण को काँच की नली से बनाया जाता है । इसका आकार अंग्रेजी के U अक्षर जैसा होता है । न्यूनतम ताप नली से लगी काँच की एक और धुंडी होती है, जिसमें पारा भरा रहता है। अधिकतम ताप वाली नली में अल्कोहल भरा होता है । जैसे-जैसे तापमान – बढ़ता है, वैसे-वैसे पारा फैलता है और अधिकतम तापवाली नली का अल्कोहल ऊपर चढ़ता है ।

स्केल को देख कर पता करते हैं कि अभी का अधिकतम तापमान क्या है । तब ताप के बाद चुम्बक से पारा को नीचे कर लिया जाता है । फिर पारा ऊपर चढने लगता हैं न्यूनतम तापमान पर रूक जाता है । दिन विशेष का अधिकतम और न्यूनतम तापमान नोट कर लिया जाता है और रेकॉर्ड बुक में चढ़ा लिया जाता है । यह क्रिया प्रतिदिन दी जाती है।

प्रश्न 6.
हवा की दिशा किस उपकरण से पता की जाती है । चित्र बनाकर नाम लिखिए।
उत्तर-
हवा की दिशा ‘विंडवेन’ नामक उपकरण से पता की जाती है।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण 2

प्रश्न 7.
वर्षा मापक यंत्र का चित्र बनाइए ।
उत्तर-
Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण 3

प्रश्न 8.
आपके यहाँ मौसम सम्बन्धी आँकड़े कहाँ एकत्र किये जाते हैं ? पता कर के लिखिए। .
उत्तर-
हमारे राज्य बिहार में पटना अवस्थित वेधशाला में मौसम सम्बन्धी । आँकड़े एकत्र किये जाते हैं ।

(ख) मिलान कीजिए:

  1. रेनगेज – तापमान
  2. विंडवेन – वर्षा की मात्रा
  3. थर्मामीटर – पवन की दिशा

उत्तर-

  1. रेनगेज – वर्षा की मात्रा
  2. विंडवेन – पवन की दिशा
  3. थर्मामीटर – तापमान

(ग) खाली जगहों को भरिए :

  1. दैनिक तापमान …………………. में मापते हैं ।
  2. शरीर का तापमान …………………. में मापते हैं।
  3. तापमान की मानक इकाई …………
  4. वायुदिशा दर्शक में तीर की पूँछ……………………. की दिशा में हो जाती है।
  5. वर्षा की मात्रा ………………………. से मापते हैं ।

उत्तर-

  1. सेल्सियस पैमाने
  2. फारेनहाइट पैमाने
  3. सेल्सियस
  4. वायु चलने
  5. रेनगेज ।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण

क्रियाशीलन 

पवन दिशा दर्शक बनाइए एवं उन तरीकों की सची बनाकर कक्षा में प्रकाशित कीजिए जिनसे हम हवा की दिशा का अनुमान लगा सकते
संकेत : छात्र स्वयं करें ।

Bihar Board Class 7 Social Science मौसम सम्बन्धी उपकरण Notes

पाठ का सार संक्षेप

स्थान-स्थान का तापमान अलग-अलग होता है । दिन में तापमान अधि क रहता है, जबकि रात में तापमान कम रहता है। . तापमान मापने वाले यंत्र को थर्मामीटर कहते हैं । यह दो तरह का होता है। एक फारेनहाइट पैमाने का और दूसरा सेल्सियस पैमाने का । फारेनहाइट पैमाने के थर्मामीटर को डॉक्टरी थर्मामीटर कहते हैं । इससे किसी व्यक्ति का बुखार मापा जाता है । सेल्सियस पैमाने के थर्मामीटर को प्रयोगशाला या वेध शाला थर्मामीटर कहते हैं । इससे दिन और रात का तापमान मापा जाता है। यह प्रायः प्रयोगशालाओं या वेधशालाओं में रहता है । यहीं से अख पर काले अधिकतम और न्यूनतम तापमान की जानकारी प्राप्त कर अखबारों में छापते हैं । डाक्टरी थर्मामीटर में केवल पारा भरा रहता है, जबकि प्रयोगशाला

थर्मामीटर में पारा के साथ अल्कोहल भी भरा होता है। दोनों ही थर्मामीटर U आकार का होता है । . वायु की दिशा क्या है इसे भी जानने का एक उपकरण है। यह एक । छड़ के सहारे छत के काफी ऊपर तक रखा जाता है । एक छड़ के एक ओर तीर तथा दूसरी ओर मछली की पूँछ के आकार का चपटा उपकरण लगा रहता है । जब हवा चलती है तो यह चपटा उपकरण घूम जाता है । तीर की दिशा देखकर पता कर लेते हैं कि किस दिशा में हवा बह रही है।

Bihar Board Class 7 Social Science Geography Solutions Chapter 13 मौसम सम्बन्धी उपकरण

वेधशाला में वर्षा मापने का भी यंत्र होता है । बोतल में एक कीप लगा होता है, जिससे होकर वर्षा जल बोतल में एकत्र होता है । बोतल में सेंटीमीटर का निशान बना होता है। उसी को देखकर पता कर लिया जाता है कि कितना सेंटीमीटर वर्षा हुआ है ।

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 5 बाजार संतुलन

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 5 बाजार संतुलन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 5 बाजार संतुलन

Bihar Board Class 12 Economics बाजार संतुलन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
बाजार सन्तुलन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वह स्थिति, जिसमें परिवर्तन की कोई प्रवृत्ति नहीं होती है उसे साम्य या सन्तुलन की स्थिति कहते हैं। साम्य की अवस्था में मांगी गई मात्रा तथा पूर्ति की गई मात्रा समान होती है। माँग व पूर्ति में परिवर्तन करने के लिए किसी के लिए कोई प्रेरणा नहीं होती है। बाजार सन्तुलन की अवस्था में सभी फर्मों द्वारा की गई आपूर्ति व सभी उपभोक्ताओं द्वारा की गई माँग के बराबर होती है। सन्तुलन की अवस्था में न तो फर्म न ही उपभोक्ता किसी परिवर्तन की इच्छा करते हैं। गणितीय रूप से बाजार सन्तुलन को दर्शाया जा सकता है –
जहाँ yd → बाजार माँग तथा
ys → बाजार पूर्ति

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प्रश्न 2.
हम कब कहते हैं कि बाजार में किसी वस्तु के लिए अधिमाँग है?
उत्तर:
यदि किसी दी गई कीमत पर बाजार माँग वस्तु की बाजार पूर्ति से अधिक होती है, तो इस स्थिति को अधिमाँग कहते हैं। गणितीय रूप में अधिमाँग को निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है –
yd > ys
जहाँ yd → बाजार माँग तथा
ys → बाजार पूर्ति

प्रश्न 3.
हम कब कहते हैं कि बाजार में किसी वस्तु के लिए अधिपूर्ति है?
उत्तर:
यदि किसी दी गई कीमत पर बाजार आपूर्ति वस्तु की बाजार माँग से अधिक होती है, तो इस स्थिति को अधिशेष आपूर्ति कहते हैं।
ys > ys
जहाँ ys → बाजार माँग तथा
yd बाजार पूर्ति

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प्रश्न 4.
क्या होगा यदि बाजार में प्रचलित मूल्य है?

  1. सन्तुलन कीमत से अधिक
  2. सन्तुलन कीमत से कम

उत्तर:
1. यदि बाजार में प्रचलित वस्तु की कीमत उसकी साम्य कीमत से अधिक है, तो फर्म उस वस्तु की आपूर्ति अधिक मात्रा में करेगी तथा उपभोक्ता उस वस्तु की माँग कम मात्रा में करेंगे। इससे बाजार में सन्तुलन की अवस्था बिगड़ जायेगी। अधिशेष आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न होगी। इस स्थिति को चित्र में दर्शाया गया है।
कीमत Op1 > Op
कीमत Op1 कीमत पर
माँगी गई मात्रा = Oyd
पूर्ति की गई मात्रा = Oy5
Oys > oyd
जिसका अभिप्राय अधिशेष आपूर्ति से है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 1

2. यदि बाजार में प्रचलित वस्तु की कीमत उसकी साम्य कीमत से कम होती है, तो बाजार में उस वस्तु के उत्पादक पूर्ति कम करेंगे तथा उस वस्तु के क्रेता माँग अधिक मात्रा में करेंगे। इस प्रकार बाजार का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। इस स्थिति को स्वल्पता या अधिमाँग कहते हैं। इसे चित्र द्वारा दर्शाया गया है।
कीमत Op1 < Op
कीमत Op1 कीमत पर –
माँग = Oyd
पूर्ति = Oy5
oyd < oy5
जिसका अर्थ है अधिमाँग या स्वल्पता।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 2

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प्रश्न 5.
फर्मों की एक स्थिर संख्या होने पर पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में कीमत का निर्धारण किस प्रकार होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जब पूर्ण प्रतियोगी बाजार में फर्मों की संख्या निश्चित होती है, तो साम्य की स्थिति का निर्धारण माँग व पूर्ति के एक साथ काम करने से होता है। पूर्ण प्रतियोगी बाजार में जहाँ फर्मों की संख्या निश्चित होती है क्रेता एवं विक्रेता दोनों ही कीमत स्वीकारक होते हैं। बाजार पूर्ति वक्र यह दर्शाता है कि विभिन्न कीमत स्तर पर सभी फर्म कितनी मात्रा बेचने के लिए तैयार है। इसी प्रकार बाजार माँग चक्र यह दर्शाता है कि विभिन्न कीमत स्तर पर विभिन्न क्रेता वस्तु की कितनी मात्रा खरीदने को तैयार है।

सन्तुलन वह अवस्था है जहाँ बाजार में माँगी गई मात्रा पूर्ति की गई मात्रा के बराबर होती है। ज्यामितीय रूप से साम्य अवस्था वह बिन्दु है, जहाँ बाजार माँग वक्र व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं। इस बिन्दु पर वस्तु की माँगी गई मात्रा उसकी पूर्ति की गई मात्रा के बराबर होती है इस बिन्दु के अलावा अन्य बिन्दुओं पर या तो अधिमाँग की स्थिति होती है या अधिशेष पूर्ति की। साम्य बिन्दु पर कीमत को साम्य कीमत तथा क्रय व विक्रय की गई मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं। साम्य कीमत निर्धारण को निम्नलिखित चित्र द्वारा दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 3
आपूर्ति वक्र SS व माँग DD एक-दूसरे को बिन्दु E पर काटते हैं। अतः बिन्दु E साम्य बिन्दु है। इस बिन्दु पर साम्य कीमत = Op, साम्य मात्रा = Oy

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प्रश्न 6.
मान लिजिए की अभ्यास 5 में सन्तुलन कीमत बाजार में फर्मों की न्यूनतम औसत लागत से अधिक है। अब यदि फर्मों के निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन की अनुमति दे दें, तो बाजार कीमत इसके साथ किस प्रकार समायोजन करेगी?
उत्तर:
एक फर्म उत्पाद की धनात्मक मात्रा का उत्पादन केवल उस स्थिति में करती है, जब वस्तु कीमत न्यूनतम परिवर्तनशील लागत समान या अधिक होती है। जब बाजार में फर्म का प्रवेश व गमन स्वतंत्र होता है, तो हमेशा फर्म उस कीमत पर आपूर्ति करती है, जहाँ किसी फर्म को न तो असामान्य लाभ प्राप्त होता है और न ही हानि होती है। अत: कीमत का निर्धारण उस बिन्दु पर होगा, जहाँ वस्तु की कीमत, न्यूनतम अवसर लागत के समान होगी। यदि साम्य कीमत, न्यूनतम औसत लागत से अधिक है, तो फर्म को असामान्य लाभ मिलता है।

कई अन्य फर्मे बाजार में प्रवेश करने लगती है। इससे अधिशेष आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न होगी। फर्मों में प्रतियोगिता बढ़ने से वे वस्तु की कीमत कम करेंगे। जब तक मौजूदा फर्मों को असामान्य लाभ प्राप्त होता रहेगा नई फमें बाजार में प्रवेश करती रहेगी, जब वस्तु की कीमत, औसत लागत के समान हो जायेगी, तो फर्मों का प्रवेश बाजार में बन्द हो जायेगा। इस कीमत पर सभी मौजूदा फर्मों को सामान्य लाभ मिलेगा। अतः मुक्त प्रवेश व गमन का अभिप्राय है कि बाजार कीमत, न्यूनतम औसत लागत के हमेशा बराबर होगी।
p = Min AC

इस कीमत पर फर्म पूर्तिको माँग के समान समायोजित करने का प्रयास करती है। रेखाचित्र द्वारा साम्य का निर्धारण माँग वक्र तथा p = न्यूनतम AC रेखा द्वारा होता है। साम्य का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है, जहाँ माँग वक्र, p = AC न्यूनतम रेखा को काटता है स्वतन्त्र प्रवेश व गमन की स्थिति नीचे रेखाचित्र द्वारा साम्य का निर्धारण दिखाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 4
जब बाजार में फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र रूप से होता है, तो कीमत का निर्धारण न्यूनतम औसत लागत के बराबर होता है। साम्य मात्रा का निर्धारण भी माँग वक्र व न्यूनतम औसत लागत के प्रतिच्छेदन बिन्दु पर होता है।

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प्रश्न 7.
एक बाजार में निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन की अनुमति है, तो फर्मे पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में कीमत के किस स्तर पर पूर्ति करती है? ऐसे बाजार में सन्तुलन मात्रा किस प्रकार निर्धारित होती है?
उत्तर:
बाजार में फर्मों के स्वतन्त्र प्रवेश व गमन का अभिप्राय है कि कोई भी फर्म असामान्य लाभ प्राप्त नहीं करेगी। इस स्थिति में फर्म को हानि भी नहीं होगी। साम्य कीमत का निर्धारण उस स्तर पर होगा, जहाँ कीमत, न्यूनतम औसत लागत के समान होगी। यदि बाजार कीमत का स्तर न्यूनतम औसत लागत से अधिक होगा, तो फर्मों को असामान्य लाभ मिलेगा। असामान्य लाभ से आकर्षित होकर कई नई फर्मे बाजार में प्रवेश करेंगी। नई फर्मों के प्रवेश के कारण बाजार पूर्ति में वृद्धि होगी और आपूर्ति आधिक्य की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। सम्पूर्ण उत्पाद को बेचने के लिए फर्मे कीमत घटाती है, ताकि वे अपने सम्पूर्ण उत्पाद को बेच सकें।

जब तक मौजूदा फर्मों को असामान्य लाभ मिलेगा नई फर्मों का बाजार में प्रवेश जारी रहता है, जब वस्तु की कीमत, औसत लागत के बराबर हो जाती है, तो फर्मों का प्रवेश रूक जाता है, क्योंकि इस कीमत पर सभी मौजूदा फर्मों को सामान्य लाभ प्राप्त होता है। मौजूदा फर्म साम्य की अवस्था में बाजार छोड़कर नहीं जाती है, क्योंकि उन्हें कोई हानि नहीं उठानी पड़ती है।

साम्य के निर्धारण के आकलन को उस स्थिति में भी स्पष्ट किया जा सकता है, जब वस्तु की बाजार कीमत औसत लागत से कम होती है। जब बाजार में फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र होता है, तो साम्य निर्धारण माँग वक्र तथा p = AC न्यूनतम रेखा के कटाव बिन्दु पर होता है। साम्य का निर्धारण, जब फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र होता है नीचे रेखाचित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 5
पूर्ण प्रतियोगी बाजार फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र होने के कारण साम्य का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है, जहाँ बाजार कीमत, न्यूनतम औसत लागत के समान होती है। इसी बिन्दु पर क्रय-विक्रय की गई मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं।
साम्य कीमत = Op0 = Min AC
साम्य मात्रा = Oy0

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प्रश्न 8.
एक बाजार में फर्मों की सन्तुलन संख्या किस प्रकार निर्धारित होती है, जब उन्हें निर्बाध प्रवेश व बहिर्गमन की अनुमति हो?
उत्तर:
बाजार में फर्मों का स्वतन्त्र प्रवेश व गमन इस बात का प्रतीक है कि बाजार पूर्ति उस कीमत पर होती है, जहाँ किसी भी फर्म को न तो असामान्य लाभा प्राप्त है और न ही हानि उठानी पड़ती है। बाजार कीमत उस स्तर पर तय होती है, जहाँ कीमत न्यूनतम AVC के समान होती है। यदि बाजार कीमत न्यूनतम AVC से अधिक होती है, तो फर्मों असामान्य लाभ मिलता है। इससे आकर्षित होकर नई फर्में बाजार में प्रवेश करती है। फर्मों के प्रवेश से बाजार पूर्ति बढ़ जाती है, जो अधिक आपूर्ति को जन्म देती है। अधिशेष आपूर्ति के कारण बाजार कीमत घटती है, जिससे सारा उत्पादन बेचा जा सके।

नई फर्मों का प्रवेश, जब तक जारी रहता है, तव तक फर्मों का असामान्य लाभ मिलता है। जब कीमत न्यूनतम AVC के समान हो जाती है, तो नई फर्मों का प्रवेश रुक जाता है। इस कीमत पर प्रत्येक मौजूदा फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त होगा, इस स्थिति में कोई नई फर्म बाजार में प्रवेश नहीं करेगी। इसके, क्योंकि फर्मों को सामान्य लाभ मिलता है और हानि उठानी नहीं पड़ती है, इसलिए मौजूदा फर्मे बाजार छोड़कर इस स्थिति में बाहर नहीं जाती है। इस अवस्था में फर्म साम्य की स्थिति में है फर्मों की संख्या की व्याख्या, इसके विपरीत स्थिति में भी की जा सकती है, जब फर्मों को हानि उठानी पड़ती है।

प्रश्न 9.
सन्तुलन कीमत तथा मात्रा किस प्रकार प्रभावित होती है, जब उपभोक्ताओं की आय में –
(I) वृद्धि होती है
(II) कमी होती है
उत्तर:
यदि बाजार में फर्मों की स्ख्या स्थिर है, तो उपभोक्ता की आय साम्य कीमत एवं साम्य मात्रा को प्रभावित करेगी। इसे नीचे समझाया गया है –

(I) उपभोक्ता की आय में वृद्धि:
1. आय बढ़ने पर उपभोक्ता घटिया वस्तु की खरीद पर कम व्यय करेगा। ऐसी वस्तुओं की माँग में कमी होने के कारण घटिया वस्तु का माँग वक्र नीचे/बायीं ओर खिसक जायेगा। माँग में कमी के कारण पूर्ति आधिक्य की स्थिति पैदा होगी, जिससे साम्य कीमत व साम्य मात्रा में कमी आयेगी।Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 6

2. आय बढ़ने पर उपभोक्ता सामान्य वस्तु की खरीद पर अधिक व्यय करेगा। अतः सामान्य वस्तु का माँग वक्र दायीं/ऊपर की ओर खिसक जायेगा। माँग में वृद्धि के कारण बाजार में माँग की अधिकता के कारण साम्य कीमत व साम्य मात्रा में बढ़ोतरी होगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 7

(II) उपभोक्ता आय में कमी:
1. आय कम होने पर उपभोक्ता घटिया वस्तु की अधिक खरीद करेगा। ऐसी वस्तुओं की माँग बढ़ने पर घटिया वस्तु का माँग वक्र ऊपर/दायीं ओर खिसक जायेगा माँग बढ़ने के कारण पूर्ति में कमी की स्थिति पैदा होगी, जिससे साम्य कीमत व साम्य मात्रा में बढ़ोतरी होगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 8

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प्रश्न 10.
पूर्ति तथा माँग वक्रों का उपयोग करते हुए दर्शाइए कि जूतों की कीमतों में वृद्धि, खरीदी व बेची जाने वाली मोजों की जोड़ी की कीमतों को तथा संख्या को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
जूते व जुराब एक-दूसरे की पूरक वस्तु है। जूतों की कीमत में वृद्धि का जुराब की माँग पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। अर्थात् जूतों की कीमत में वृद्धि होने पर जुराबों की माँग में कमी आ जायेगी। अतः जुराबों की मॉग बायीं/नाचे की ओर खिसक जायेगा। इस प्रभाव को निम्नलिखित चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 9

प्रश्न 11.
कॉफी की कीमत में परिवर्तन, चाय की सन्तुलन कीमत को किस प्रकार प्रभावित करेगा? एक आरेख द्वारा सन्तुलन मात्रा पर प्रभाव को भी समझाइए।
उत्तर:
कॉफी व चाय एक-दूसरे की प्रतियोगी वस्तु है। कॉफी की कीमत में परिवर्तन होने पर चाय की माँग में समान दिशा में परिवर्तन होगा। कॉफी की कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप चाय की साम्य कीमत एवं मात्रा पर प्रभाव नीचे चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 10Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 11

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प्रश्न 12.
जब उत्पादन में प्रयुक्त अगतों की कीमत परिवर्तन होता है, तो किसी वस्तु की सन्तुलन कीमत तथा मात्रा किस प्रकार परिवर्तित होती है?
उत्तर:
उत्पादन प्रक्रिया में प्रयुक्त साधनों की कीमत में परिवर्तन दो प्रकार से साम्य कीमत एवं मात्रा को प्रभावित करता है –

  1. साधन आगतों की कीमत बढ़ सकती है
  2. साधन आगतों की कीमत घट सकती है

1. साधनों की कीमत में वृद्धि:
साधन आगतों की कीमत में वृद्धि का वस्तु की पूर्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अर्थात् साधन आगतों की कीमत बढ़ने से वस्तु की पूर्ति में कमी आ जाती है। इससे पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है। साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव को निम्नलिखित चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 12

2. साधनों की कीमत में कमी:
साधन आगतों की कीमत में कमी का वस्तु की पूर्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। अर्थात् साधन आगतों की कीमत घटने पर वस्तु की पूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है। साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव नीचे चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 13
नई साम्य कीमत घटेगी तथा साम्य मात्रा बढ़ेगी।

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प्रश्न 13.
यदि वस्तु x की स्थानापन्न वस्तु (y) की कीमत में वृद्धि होती है, तो वस्तु x की सन्तुलन कीमत तथा मात्रा पर इसका क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
यदि वस्तु (x) की प्रतिस्थापन वस्तु (y) की कीमत बढ़ जायेगी, तो वस्तु (x) सापेक्ष रूप से सस्ती हो जायेगी। इससे वस्तु (x) की माँग में वृद्धि होगी। अर्थात् वस्तु (x) का माँग वक्र ऊपर दायीं ओर खिसक जायेगा। इस परिवर्तन का साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव को नीचे चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 14
नई साम्य कीमत तथा मात्रा दोनों में वृद्धि हो जायेगी।

प्रश्न 14.
बाजार फर्मों की संख्या स्थिर होने पर तथा निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन की स्थिति में, माँग वक्र के स्थानान्तरण का सन्तुलन पर प्रभाव की तुलना कीजिए।
उत्तर:
1. जब फर्मों की संख्या स्थिर हो, तो माँग वक्र में खिसकाव का साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव:
जब बाजार में फर्मों की संख्या स्थिर होती है, तो माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव से बाजार में अधिमाँग की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। अधिमाँग के कारण साम्य कीमत व मात्रा में वृद्धि हो जायेगी। इसके विपरीत माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव से बाजार में माँग कम हो जायेगी, इससे साम्य कीमत व मात्रा दोनों में कमी उत्पन्न हो जायेगी। माँग वक्र में खिसकाव. के कारण साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव को नीचे चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 15
इस स्थिति में साम्य कीमत व मात्रा दोनों कम हो जायेगी।

2. जब फर्मों का प्रवेश में निर्गम स्वतन्त्र हो, तो माँग वक्र में खिसकाव का साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव:
जब बाजार में फर्मों का प्रवेश व निर्गम स्वतन्त्र होता है, तो साम्य बिन्दु का निर्धारण हमेशा न्यूनतम औसत लागत पर तय होता है। पूर्ण प्रतियोगी बाजार में किसी भी फेर्म को असामान्य लाभ प्राप्त नहीं होता है। माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव होने पर बाजार में अधिमाँग की स्थिति पैदा हो जाती है, इससे बाजार कीमत स्तर में बढ़ोतरी होती है। बढ़ी कोभत पर मौजूदा फर्मों को असामान्य लाभ मिलेगा। इससे आकर्षित होकर कई नई फर्मे बाजार में प्रवेश करेंगी। नई फर्मों के प्रवेश से बाजार पूर्ति में बढ़ोतरी हो जायेगी। इससे साम्य कीमत अपने मूल स्तर पर पहुँच जायेगी।

माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव होने पर बाजार में न्यून माँग की स्थिति पैदा होती है इससे बाजार कीमत कम हो जाती है। मौजूदा फर्मों को हानि उठानी पड़ती है। जिन फर्मों को हानि होती है, वे बाजार छोड़कर बाहर चली जाती है । फर्मों के बाहर होने से बाजार आपूर्ति कम हो जायेगी, इससे साम्य कीमत पुनः अपने पूर्व स्तर पर पहुँच जाती है। इस प्रकार फर्मों के मुक्त प्रवेश व निर्गम का साम्य कीमत पर प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव से साम्य मात्रा बढ़ जायेगी। इसी प्रकार माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव से साम्य मात्रा कम हो जायेगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 16
जब बाजार से फर्मों का प्रवेश व निर्गम स्वतंत्र होता है, तो माँग वक्र में खिसकाव का साम्य कीमत पर प्रभाव नहीं पड़ता है लेकिन साम्य मात्रा प्रभावित होती है।

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प्रश्न 15.
माँग तथा पूर्ति वक्र दोनों में दायीं ओर शिफ्ट का सन्तुलन कीमत तथा मात्रा पर प्रभाव को एक आरेख द्वारा समझाइए।
उत्तर:
नीचे दर्शायी गई तीन स्थितियाँ हो सकती है –
(I) यदि माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र में दायीं वक्र में खिसकाव से ज्यादा हो –Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 17

(II) यदि माँग वक्र के दायीं ओर खिसकाव पूर्ति चक्र में खिसकाव से कम हो –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 18
नई साम्य कीमत कम हो जायेगी परन्तु साम्य मात्रा बढ़ जायेगी।

(III) यदि माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव के बराबर हो –Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 19

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प्रश्न 16.
सन्तुलन कीमत तथा मात्रा किस प्रकार प्रभावित होते हैं जब –
(I) माँग तथा पूर्ति दोनों समान दिशा में शिफ्ट होते हैं।
(II) माँग तथा पूर्ति वक्र विपरीत दिशा में शिफ्ट होते हैं।
उत्तर:
(I) माँग और पूर्ति वक्र दोनों समान दिशा में खिसकाव –

1. माँग व पूर्ति वक्र दोनों में बायीं ओर खिसकाव
(a) माँग वक्र में पूर्ति वक्र की तुलना में बायीं ओर ज्यादा खिकाव
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 20

(b) माँग वक्र में पूर्ति वक्र की तुलना में बायीं ओर कम खिसकाव
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 21

(c) माँग वक्र व पूर्ति वक्र में बायीं ओर समान खिसकाव
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 22

(II) दायीं ओर माँग वक्र व पूर्ति वक्र में खिसकाव –
(a) माँग वक्र में पूर्ति वक्र की तुलना में दायीं ओर कम खिसकाव –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 23

(b) माँग वक्र में दायीं ओर पूर्ति वक्र की तुलना में ज्यादा खिसकाव –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 24

(c) माँग वक्र व पूर्ति वक्र दोनों में दायीं ओर समान खिसकाव –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 25

(III) माँग व पूर्ति वक्र में विपरीत दिशा में खिसकाव –
(a) माँग वक्र में बायीं ओर तथा पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव –Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 26

(b) माँग वक्र में दायीं ओर तथा पूर्ति वक्र में बायीं ओर खिसकाव –Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 27

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प्रश्न 17.
वस्तु बाजार में तथा श्रम बाजार में माँग तथा पूर्ति वक्र किस प्रकार भिन्न होते हैं?
उत्तर:
वस्तु बाजार के माँग वक्र व पूर्ति वक्र तथा श्रम बाजार के माँग वक्र एवं पूर्ति वक्र में मूलभूत अन्तर होता है। वस्तु बाजार में वस्तु की माँग उपभोक्ता करते हैं और उत्पादक वस्तु की पूर्ति करते हैं। लेकिन श्रम बाजार में श्रम की माँग उत्पादक करते हैं व श्रम की पूर्ति परिवार करते हैं। वस्तुओं की माँग उपयोगिता पाने के लिए की जाती है, जबकि श्रम की माँग उत्पादकता के कारण की जाती है। वस्तुओं की पूर्ति उत्पादक लाभ कमाने के लिए की जाती है, जबकि श्रम की पूर्ति का उद्देश्य रोजगार व मजदूरी प्राप्त करना होता है। हालाँकि मजदूरी दर का निर्धारण श्रम की माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा उसी प्रकार होता है। जैसे-वस्तु की कीमत का निर्धरण माँग व पूर्ति की शक्तियाँ करती है।

प्रश्न 18.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में श्रम की इष्टतम मात्रा किस प्रकार निर्धारित होती है?
उत्तर:
प्रतियोगी होने के कारण प्रत्येक फर्म लाभ अधिकतम करने के प्रयास करती है। अतः उत्पादक इकाई उस स्तर तक श्रम का नियोजन करती है जहाँ श्रम की अन्तिम इकाई की लागत उस अतिरिक्त श्रम के नियोजन से फर्म की आय में बढ़ोतरी होती है। श्रम की अन्तिम इकाई की लागत मजदूरी दर के समान होती है। श्रम की अन्तिम इकाई के नियोजन से अतिरिक्त लाभ (आय) उस इकाई की सीमान्त उत्पादकता के समान होती है। अत: फर्म उस बिन्दु तक श्रम का नियोजन करती है जहाँ –
मजदूरी दर = सीमान्त आगम उत्पादकता
w = MRP1
जहाँ MRp2 = MR × MP2
अथवा MRp2 = p × Mp2 (MR =p प्रतियोगी फर्म के लिए)
अथवा MRp2 = VMp2
अथवा w = VMp2

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प्रश्न 19.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी श्रम बाजार में मजदूरी दर किस प्रकार निर्धारित होती है।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में श्रम की मजदूरी दर का निर्धारण माँग और पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है। श्रम की माँग उत्पादक करते हैं। फर्म लाभ कमाने के उद्देश्य से श्रम की माँग करती है। श्रम के नियोजन पर फर्म को लागत भी उठानी पड़ती है। श्रम को क्रय करने की अतिरिक्त लागत श्रम को दी गई मजदूरी होती है। श्रम के नियोजन से प्राप्त लाभ श्रम की सीमान्त उत्पादकता के समान होता है। एक फर्म श्रम की अधिकतम इकाइयों का नियोजन उस सीमा तक करती है जहाँ श्रम की मजदूरी दर श्रम की सीमान्त आगत उत्पादकता के समान होती है।

श्रम की सीमान्त आगम उत्पादकता ह्रासमान सीमान्त उत्पादकता के नियमानुसार प्राप्त होती है और फर्म हमेशा w = VMp2 = MRp2 के आधार पर उत्पादन करती है। इसका अभिप्राय है श्रम का माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है। इस प्रकार श्रम की माँग व पूर्ति श्रम को दी जाने वाली मजदूरी दर में विपरीत सम्बन्ध होता है। श्री की आपूर्ति परिवार करते हैं। परिवार श्रम से प्राप्त मजदूरी तथा आराम के बीच चयन के आधार पर श्रम की आपूर्ति करते हैं। सामान्यतः परिवार ऊँची मजदूरी दर पर श्रम की ज्यादा आपूर्ति करते हैं।

कोई व्यक्तिगत श्रमिक हो सकते हैं, जो ऊँची मजदूरी दर भी आराम पसन्द करते हैं लेकिन सामान्यत: ऊँची मजदूरी दर पर अधिक श्रम की आपूर्ति द्वारा अधिक कमाना ज्याद पसन्द करते हैं। अतः श्रम का आपूर्ति वक्र धनात्मक ढाल वाला होता है। जिस बिन्दु पर ऋणात्मक ढाल वाला श्रम माँग वक्र तथा धनात्मक ढाल वाला श्रम का पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं वहाँ साम्य का निर्धारण होता है। साम्य की अवस्था में श्रम की माँग व पूर्ति दोनों समान होते हैं। इसे निम्नलिखित चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 28
श्रम की साम्य मजदूरी दर Ow तथा साम्य माँग व पूर्ति OL है।

प्रश्न 20.
क्या आप किसी ऐसी वस्तु के विषय में सोच सकते हैं, जिस पर भारत में कीमत की उच्चतम निर्धारित कीमत लागू है। निर्धारित उच्चतम कीमत सीमा के क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर:
हाँ, गेहूँ एक ऐसी वस्तु है जिस पर भारत में कीमत नियंत्रण किया जाता है। इसके अतिरिक्त मिट्टी के तेल, चावल आदि पर भी कीमत नियंत्रण का प्रयोग किया जाता है।

कीमत नियन्त्रण के प्रभाव:
सामान्यतः कीमत नियन्त्रण के साथ ही राशन प्रणाली शुरू करनी पड़ती है। कीमत नियन्त्रण के निम्नलिखित तीन प्रभाव होते हैं –

1. प्रायः
उपभोक्ताओं को उपभोग के लिए घटिया वस्तु मिलती है, क्योंकि कीमत नियन्त्रण के कारण उत्पादकों को वस्तु की कीमत मिलती है। उत्पादन लागत को घटाने के लिए वे नीची गुणवत्ता वाली वस्तु उत्पन्न करते हैं।

2. प्रत्येक उत्पादक को उपभोग हेतु वस्तु की निश्चित मात्रा प्राप्त होती है। वस्तु की स्वल्पता के कारण उपभोक्ताओं को लम्बी-लम्बी कतारों में खड़ा होना पड़ता है।

3. ज्यादातर उपभोक्ताओं को आवश्यकता से कम मात्रा में ही उपभोग के लिए वस्तु मिल पाती है। उनमें से कुछ उपभोक्ता अतिरिक्त मात्रा प्राप्त करने के लिए ऊँची कीमत देने को तैयार हो जाते हैं। इससे रिश्वत, कालाबाजारी, जमाखोरी जैसी समस्याएँ पैदा हो जाती है।

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प्रश्न 21.
माँग वक्र में शिफ्ट का कीमत पर अधिक तथा मात्रा पर कम प्रभाव होता है, जबकि फर्मों की संख्या स्थिर रहती है। स्थितियों की तुलना करें, जब निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन की अनुमति हो। व्याख्या करें।
उत्तर:
माँग वक्र व पूर्ति वक्र में साथ-साथ परिवर्तन का प्रभाव, जब फर्मों की संख्या स्थिर होती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 29
माँग व पूर्ति में एक साथ परिवर्तन का प्रभाव, जब फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र हो –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 30

प्रश्न 22.
मान लीजिए, एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में वस्तु x की माँग तथा पूर्ति वक्र निम्न प्रकार दिए गए हैं –
qD = 700 – p
qS = 500 + 3p क्योंकि p ≥ 15
= 0 क्योंकि 0 ≤ p ≤ 15 मान लीजिए कि बाजार में समरूपी फर्मे हैं। 15 रुपये से कम, किसी भी कीमत पर वस्तु x की बाजार पूर्ति के शून्य होने के कारण की पहचान कीजिए। इस वस्तु के लिए सन्तुलन कीमत क्या होगी? सन्तुलन की स्थिति में x की कितनी मात्रा का उत्पादन होगा?
उत्तर:
qD
yD = 700 – p
qS = 500 + 3p p ≥ 15 के लिए
= 0 p ≤ 15 के लिए
15 रुपये से कम कीमत वस्तु पूर्ति मात्रा शून्य है। इसका कारण यह है कि पूर्ण प्रतियोगी बाजार में कोई भी फर्म न्यूनतम AVC से कम कीमत पर धनात्मक उत्पादन नहीं करती है।

साम्य अवस्था में –
yD = yS
700 – p = 500 + 3p (मूल्य स्थापित करने पर)
या – 3p – p = 500 – 700
या – 4p = – 200
200 या 4p = 200 या p = \(\frac{200}{4}\) या p = 50
p का मूल्य किसी भी समीकरण में प्रतिस्थापित करने पर –
yD = 700 – 50 = 650
yS = 500 + 3 × 50 = 500 + 150 = 650
साम्य कीमत = 50 रुपये
साम्य मात्रा = 650

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प्रश्न 23.
अभ्यास 22 में दिए गए समान माँग वक्र को लेते हुए, आइए, फर्मों को वस्तु x का उत्पादन करने के निर्बाध प्रवेश तथा बर्हिगमन की अनुमति देते हैं। यह भी मान लीजिए कि बाजार समानरूपी फर्मों से बना है, जो वस्तु x का उत्पादन करती है। एक अकेली फर्म का पूर्ति वक्र निम्न प्रकार है –
\(\boldsymbol{q}_{\boldsymbol{f}}^{\boldsymbol{s}}\) = 8 + 3p क्योंकि p ≥ 20
= 0 क्योंकि 0 ≤ p ≤ 20

  1. p = 20 का क्या महत्त्व है?
  2. बाजार में x के लिए किस कीमत पर सन्तुलन होगा? अपने उत्तर का कारण बताइए।
  3. सन्तुलन मात्रा तथा फर्मों की संख्या का परिकलन कीजिए।

उत्तर:
1. p = 20 न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत है।
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में कोई भी फर्म न्यूनतम AVC से कम कीमत पर धनात्मक उत्पादन स्तर उत्पन्न नहीं करती है। बाजार में फर्मों का प्रवेश व गमन मुक्त होने के कारण साम्य कीमत 20 रु. होगी।

2. साम्यावस्था के लिए साम्य कीमत 20 रुपये होगी।
बाजार में फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र होने के कारण 20 रुपये से कम कीमत पर कोई भी फर्म धनात्मक स्तर पर उत्पादन नहीं करेगी क्योंकि 20 रुपये से कम कीमत पर वस्तु बेचने से फर्म को हानि होगी। 20 रुपये से अधिक किसी भी कीमत पर फर्मों का असामान्य लाभ मिलेगा। असामान्य लाभ से आकर्षित होकर नई फर्म बाजार में प्रवेश करने लगती है। फर्मों का प्रवेश उस समय तक जारी रहता है, जब तक फर्मों का लाभ सामान्य नहीं हो जाता। एक बार कीमत न्यूनतम औसत लागत के समान होते ही साम्य स्थापित हो जाती है। इस अवस्था में फर्मों का प्रवेश व गमन रुक जाता है।

3. बाजार में फर्मों का प्रवेश व गमन स्वतन्त्र है। अतः साम्य कीमत 20 रुपये होगी।
yS = 8 + 3p
= 8 + 3 × 20 (p का मान रखने पर)
= 8 + 60 = 68 एक फर्म की आपूर्ति
साम्य स्तर पर बाजार माँग yD = 700 – p = 700 – 20 (p का मान रखने पर)
= 680
68 इकाइयों की पूर्ति करती है = 1 फर्म
1 इकाई की पूर्ति करती है = \(\frac{1}{68}\) फर्म
680 इाकइयों की पूर्ति करती है = \(\frac{1}{68}\) × 680 फर्म = 10 फर्म
बाजार में साम्य मात्रा = 680 इकाइयाँ
फर्मों की संख्या = 10

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प्रश्न 24.
मान लीजिए कि नमक की माँग तथा पूर्ति वक्र को इस प्रकार दिया गया है –
qD = 1000 – p; qS = 700 + 2p
1. सन्तुलन कीमत तथा मात्रा ज्ञात कीजिए।

2. अब मान लीजिए कि नमक के उत्पादन के लिए प्रयुक्त एक आगत की कीमत में वृद्धि हो जाती है और नया पूर्ति वक्र है –
qS = 400 + 2p
सन्तुलन कीमत तथा मात्रा किस प्रकार परिवर्तित होती है ? क्या परिवर्तन आपकी अपेक्षा के अनुकूल है?

3. मान लीजिए, सरकार नमक की बिक्री पर 3 रुपये प्रति इकाई कर लगा देती है। यह सन्तुलन कीमत तथा मात्रा को किस प्रकार करेगा?
उत्तर:
1. qD yd = 1000 – p
qSy = 700 + 2p
साम्य अवस्था में yd = ys
100 – p = 700 + 2p
या – 2p – p = 700 – 1000
या – 3p = -300
या 3p = 300 या p = \(\frac{300}{3}\) = 100
p का मान माँग व पूर्ति समीकरणों में प्रतिस्थापित करने पर
yd = 1000 – p = 1000 – 100 = 900
ys = 700 + 2p = 700 + 2 × 100 = 700 + 200 = 900
साम्य कीमत = 100 रुपये
साम्य मात्रा = 900 इकाइयाँ

2. नई आपूर्ति समीकरण ys = 400 + 2p
साम्यावस्था में, ys = ys
1000 – p = 400 – 1000
या – 2p – p = 400 – 1000 या – 3p = 600
या 3p = 600 या p = \(\frac{600}{3}\) p = 200 p का मान माँग व पूर्ति समीकरण में रखने पर yd = 1000 – p = 1000 – 200 = 800
ys = 400 + 2p = 400 + 2 × 200 = 400 + 400 = 800
साम्य कीमत = 200 रुपये
साम्य मात्रा = 800 इकाइयाँ
सन्साधनों की कीमत में वृद्धि से पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है, जिससे साम्य कीमत बढ़ जाती है लेकिन साम्य मात्रा घट जाती है। अतः परिणाम हमारी अपेक्षाओं को सत्यापित करता है।

3. yd = 1000 – p
ys = 700 + 2p
उत्पादन शुल्क 3 रुपये/इकाई लगाने पर आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जायेगा। खण्ड (i) में साम्य कीमत 100 रुपये था, 3 रु./इकाई उत्पाद शुल्क आरोपित होने पर फर्म को प्रति इकाई 3 रुपये कम प्राप्त होंगे। अत:
ys = 700 + 2(p – 3)
साम्यावस्था में yd = ys
1000 – p = 700 + 2(p – 3)
या 1000 – p = 700 + 2p – 6 या – 2p – p = 700 – 6 – 1000
या -3p = -306 या 3p = 306
या p = \(\frac{306}{3}\) = 102
p का मान माँग व पूर्ति समीकरण में रखने पर –
yd = 1000 – p = 1000 – 102 = 898
ys = 700 + 2(p – 3) = 700 + 2(102 – 3)
= 700 + 2 × 99 = 700 + 198 = 98
नई साम्य कीमत = 102 रुपये
नई साम्य मात्रा = 898 इकाइयाँ

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प्रश्न 25.
मान लीजिए कि एपार्टमेन्टों के लिए बाजार-निर्धारण किराया इतना अधिक है कि सामान्य लोगों द्वारा वहन नहीं किया जा सकता, यदि सरकार किराए पर एपार्टमेन्ट लेने वालों की मदद करने के लिए किराया नियन्त्रण लागू करती है, तो इसका एपार्टमेन्टों के बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि बाजार सामान्य जन की पहुँच से अधिक किराया अपार्टमेन्ट्स का तय करता है, तो सरकार किराए की उच्चतम सीमा तय कर सकती है, ताकि सामान्य आदमी के लिए आवास प्रयोज्य हो जाएँ। सरकार किराए की सीमा, बाजार किराए से काफी कम तय करेगी। कम किराए पर ज्यादा लोग आपार्टमेन्ट की माँग करेंगे, आपूर्ति पक्ष कम अपार्टमेन्ट किराये देने को तैयार होगा। इससे किराये के मकानों की अधिकता उत्पन्न हो जायेगी। इस स्थिति को नीचे रेखाचित्र में दर्शाया गया है। किराया
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 31
अधिक माँग पर काबू पाने के लिए सरकार अपार्टमेन्ट की राशनिंग कर सकती है, जिससे एक व्यक्ति एक से अधिक अपार्टमेन्ट न ले सके। इस व्यवस्था के निम्नलिखित परिणाम होंगे –

  1. कम किराए पर उत्पादक घटिया गुणवत्ता वाले अपार्टमेन्ट का निर्माण कर सकते हैं, ताकि इन्हें निर्मित करने की लागत कम हो जाए।
  2. अधिक माँग या स्वल्पता के कारण सामान्य लोगों को लम्बी कतार में खड़ा होना पड़ेगा।
  3. नियन्त्रित किराए पर सभी चाहने वाले लोगों को किराये पर अपार्टमेन्ट नहीं मिलेंगे। इससे कालाबाजारी, रिश्वतखोरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती है।

Bihar Board Class 12 Economics बाजार संतुलन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
साम्य कीमत का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह कीमत स्तर, जिस पर किसी वस्तु की माँगी गई मात्रा व पूर्ति की जाने वाली मात्रा दोनों बराबर होती है, साम्य कीमत कहलाती है।

प्रश्न 2.
एक पूर्ण प्रतियोगी ‘बाजार में सन्तुलन कब स्थापित होता है?
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में सन्तुलन तब स्थापित होता है, जब किसी दी गई कीमत पर वस्तु की माँग व पूर्ति दोनों बराबर हो जाती है।

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प्रश्न 3.
जब फर्मों की संख्या स्थिर रहती है, तब माँग व पूर्ति वक्रों के द्वारा कैसे निर्धारित होता है?
उत्तर:
जब फर्मों की संख्या स्थिर होती है, तब सन्तुलन माँग व पूर्ति का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है, जहाँ माँग वक्र व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं।

प्रश्न 4.
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में श्रम रोजगार का अधिकतम स्तर क्या होता है?
उत्तर:
प्रत्येक फर्म उस स्तर तक श्रम का नियोजन करती है, जहाँ सीमान्त आगम उत्पादकता श्रम की मजदूरी दर के समान होती है।

प्रश्न 5.
किसी उत्पाद के लिए अधिमाँग का अर्थ बताओ।
उत्तर:
यदि किसी दी गई कीमत पर एक वस्तु के लिए बाजार माँग उसकी बाजार पूर्ति से अधिक होती है, तो इसे अधिक माँग कहते हैं।

प्रश्न 6.
किसी वस्तु की अधिक पूर्ति का अर्थ लिखो।
उत्तर:
यदि किसी दी गई कीमत पर वस्तु की बाजार माँग की तुलना में उसकी बाजार पूर्ति अधिक होती है, तो इसे अधिक पूर्ति कहते हैं।

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प्रश्न 7.
बाजार सन्तुलन का अर्थ लिखो।
उत्तर:
बाजार की वह स्थिति, जिसमें दी गई कीमत पर किसी वस्तु की बाजार माँग उसकी बाजार पूर्ति के समान होती है, साम्य कीमत कहलाती है। सन्तुलन की अवस्था में न तो उपभोक्ता माँग में परिवर्तन करना चाहते हैं और न ही
उत्पादक पूर्ति में परिवर्तन करना चाहते हैं।

प्रश्न 8.
जब पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार हो और माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार हो और माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 9.
जब पूर्ति वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो और माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव हो जाए, तो साम्य कीमत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
जब पूर्ति वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो और माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है, तब साम्य कीमत में वृद्धि हो जायेगी।

प्रश्न 10.
माँग वक्र व पूर्ति वक्र में एक साथ परिवर्तन होने पर साम्य मात्रा पर प्रभाव किस प्रकार निर्धारित होता है?
उत्तर:
माँग वक्र व पूर्ति वक्र में एक साथ परिवर्तन होने पर दोनों वक्रों के ढाल तथा खिसकाव के स्तर के आधार पर साम्य मात्रा पर पड़ने वाले प्रभाव का निर्धारण होता है।

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प्रश्न 11.
माँग व पूर्ति में एक साथ परिवर्तन होने पर साम्य कीमत पर किससे निर्धारित होता है?
उत्तर:
माँग वक्र व पूर्ति वक्र के ढाल एवं दोनों में खिसकाव की माप के द्वारा साम्य कीमत पर पड़ने वाले प्रभाव का निर्धारण होता है।

प्रश्न 12.
पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव का साम्य मात्रा पर प्रभाव लिखो।
उत्तर:
पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 13.
यदि माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है, तो साम्य मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है, तो साम्य मात्रा में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 14.
साम्य मात्रा पर माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव का प्रभाव लिखो।
उत्तर:
जब माँग वक्र बायीं ओर खिसकता है, तो साम्य मात्रा कम हो जाती है।

प्रश्न 15.
जब माँग वक्र बायीं ओर खिसकता है, तो साम्य कीमत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब माँग वक्र बायीं ओर खिसकता है, तो साम्य कीमत कम हो जाती है।

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प्रश्न 16.
माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव का साम्य कीमत पर प्रभाव लिखो।
उत्तर:
माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य कीमत बढ़ जाती है।

प्रश्न 17.
पूर्ति वक्र में बायीं ओर खिसकाव का साम्य मात्रा पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पूर्ति वक्र में बायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य मात्रा कम हो जाती है।

प्रश्न 18.
पूर्ति वक्र में बायीं ओर खिसकाव का साम्य कीमत पर प्रभाव लिखो।
उत्तर:
पूर्ति वक्र में बायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य कीमत बढ़ जाती है।

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प्रश्न 19.
यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो व पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य कीमत पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो एवं पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य कीमत घट जाती है।

प्रश्न 20.
जब किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो ओर पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
जब किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो और पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है, तो साम्य मात्रा अपरिवर्तित रहती है।

प्रश्न 21.
जब किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो और पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य कीमत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
जब किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो और पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य कीमत बढ़ जायेगी।

प्रश्न 22.
एक वस्तु का पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार है और माँग वक्र बायीं ओर खिसक रहा है, क्या साम्य कीमत बदल जायेगी?
उत्तर:
जब वस्तु का पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार है और माँग वक्र बायीं ओर माँग वक्र बायीं ओर खिसकने पर साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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प्रश्न 23.
जब एक वस्तु का पूर्ति वक्र लोचदार है और माँग वक्र बायीं ओर खिसक रहा है। क्या साम्य मात्रा अपरिवर्तित रहेगी?
उत्तर:
जब किसी वस्तु का पूर्ति वक्र लोचदार होता है, तो माँग वक्र बायीं ओर खिसक रहा हो, तो साम्य मात्रा कम हो जायेगी।

प्रश्न 24.
जब माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है, तो साम्य मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
जब माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है, तो साम्य मात्रा बढ़ जायेगी।

प्रश्न 25.
जब माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य कीमत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
जब माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो और पूर्ति वक्र दायीं खिसक जाए, तो साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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प्रश्न 26.
अक्षम्य (non-viable) उद्योग में माँग वक्र व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को क्यों नहीं काटते हैं?
उत्तर:
इस प्रकार के उद्योग में उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होती है। अत: माँग वक्र व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते हैं।

प्रश्न 27.
अक्षम्य (non-viable) उद्योग का अर्थ बताओ।
उत्तर:
वह उद्योग, जिसके बाजार माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र एक-दूसरे को नहीं काटते हैं, उसे अक्षम्य उद्योग कहते हैं।

प्रश्न 28.
नियन्त्रित कीमत का अर्थ लिखो।
उत्तर:
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा किसी वस्तु के विक्रय मूल्य की अधिकतम सीमा तय करना कीमत नियन्त्रण कहलाता है। उच्चतम कीमत निर्धारण के बाद विक्रेता तय कीमत से ज्यादा कीमत पर अपने उत्पाद को नहीं बेच सकता है।

प्रश्न 29.
यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो एवं पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य मात्रा पर इसका प्रभाव पड़ेगा बताइए।
उत्तर:
यदि किसी वस्तु का माँग वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो एवं पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाए, तो साम्य मात्रा अपरिवर्तित रहेगी।

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प्रश्न 30.
क्या प्रतियोगी वस्तु की कीमत पूर्णप्रतियोगी बाजार में वस्तु की साम्य कीमत को प्रभावित करती है?
उत्तर:
प्रतियोगी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर वस्तु का माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है, जिससे साम्य कीमत बढ़ जाती है। इसके विपरीत प्रतिस्थापन वस्तु की कीमत में कमी से वस्तु का माँग वक्र बायीं ओर खिसक जाता है, जिससे
साम्य कीमत कम हो जाती है।

प्रश्न 31.
क्या अभिरुचि में अनुकूल परिवर्तन का वस्तु की साम्य कीमत पर प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
अभिरुचि में अनुकूल परिवर्तन होने पर माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है। अतः साम्य कीमत व मात्रा दोनों बढ़ जाती है।

प्रश्न 32.
समर्थन कीमत का अर्थ लिखो।
उत्तर:
छोटे उत्पादकों किसानों आदि के हितों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा किसी उत्पाद के घोषित मूल्य को समर्थन मूल्य कहते हैं। प्रायः समर्थन मूल्य सरकार बाजार मूल्य से ज्यादा तय करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नियन्त्रित कीमत एवं साम्य कीमत में सम्बन्ध लिखो।
उत्तर:
साम्य कीमत वह कीमत स्तर होता है, जिस पर किसी वस्तु की माँगी गई बाजार मात्रा उसकी बाजार पूर्ति के बराबर होती है। जबकि नियन्त्रित कीमत वह कीमत स्तर है, जो सरकार द्वारा उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए तय की जाती है। सरकार कीमत नियन्त्रण करने के लिए किसी वस्तु की अधिकतम कीमत तय कर देती है। कीमत नियन्त्रण होने पर उत्पादक बाजार में उससे ज्यादा कीमत पर नहीं बेच सकता है। सामान्यत नियन्त्रित कीमत साम्य कीमत से नीची तय की जाती है। कीमत नियन्त्रण बाजार में वस्तु की स्वल्पता उत्पन्न करती है।Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 32

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प्रश्न 2.
माँग में वृद्धि होने पर साम्य कीमत में वृद्धि हो जाती है परन्तु साम्य मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्या यह सम्भव है? यदि हाँ, तो समझाइए।
उत्तर:
माँग में वृद्धि होने पर साम्य कीमत में वृद्धि हो जाती है परन्तु साम्य मात्रा अपरिवर्तित रहती है, जब आपूर्ति वक्र पूर्णतया बेलोचदार होता है। इस प्रभाव को नीचे चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 33

प्रश्न 3.
क्या उत्पाद शुल्क की दर में वृद्धि साम्य कीमत एवं मात्रा को प्रभावित करती है? यदि हाँ, तो चित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
हाँ, उत्पाद शुल्क की दर में वृद्धि वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा दोनों को प्रभावित करती है। उत्पाद शुल्क की दर बढ़ने से सीमान्त लागत बढ़ जाती है। इससे आपूर्ति में कमी आ जाती है। वस्तु की आपूर्ति में कमी होने पर आपूर्ति वक्र ऊपर बायीं ओर खिसक जाता है। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, साम्य कीमत बढ़ जाती है परन्तु साम्य मात्रा घट जाती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 33

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प्रश्न 4.
लागत बचाने वाली तकनीक साम्य कीमत एवं मात्रा को किस प्रकार से प्रभावित करती है? समझाइए।
उत्तर:
लागत बचाने वाली तकनीक का प्रयोग करने से सीमान्त लागत घटने लगती है। परिणामस्वरूप पूर्ति में वृद्धि हो जाती है। पूर्ति में वृद्धि होने से पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है। साम्य कीमत का स्तर कम हो जाता है परन्तु साम्य मात्रा बढ़ जाती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 34

प्रश्न 5.
क्या अभिरुचियों में अनुकूल परिवर्तन होने पर बाजार कीमत तथा विनिमय की गई मात्रा पर प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
उपभोक्ता की अभिरुचियों में अनुकूल परिवर्तन होने पर माँग में वृद्धि हो जाती है । माँग में वृद्धि के कारण माँग वक्र ऊपर दायीं ओर खिसक जाता है। इससे साम्य कीमत व साम्य मात्रा दोनों में वृद्धि हो जाती है। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है।Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 35

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प्रश्न 6.
प्रतियोगी वस्तु की कीमत में वृद्धि साम्य कीमत को किस प्रकार प्रभावित करती है? चित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
प्रतियोगी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर वस्तु का उपभोग बढ़ जाता है। वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है, इससे माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है। इससे वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा में वृद्धि हो जायेगी। इसे नीचे चित्र में दिखाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 36

प्रश्न 7.
एक उद्योग अक्षम्यता से क्या अभिप्राय है। स्पष्ट करो।
उत्तर:
बाजार में कभी-कभी यह स्थिति भी हो सकती है कि किसी वस्तु की बाजार माँग शून्य हो जाती है। ऐसा तब हो सकता है, जब किसी वस्तु की उत्पादन लागत बहुत ऊँची हो। उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होने से उत्पादक कम कीमत पर वस्तु बेच नहीं सकता है और उपभोक्ता इतनी ऊँची कीमत देने को तैयार नहीं होते हैं। इस स्थिति में वस्तु का उत्पादन/आपूर्ति नहीं होती है। माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र विनिमय की किसी धनात्मक मात्रा पर नहीं काटते हैं।
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प्रश्न 8.
समर्थन कीमत से किस प्रकार अधिशेष उत्पादन/आपूर्ति किस प्रकार उत्पन्न होती है?
उत्तर:
समर्थन मूल्य या न्यूनतम कीमत सरकार द्वारा किसानों या छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए घोषित किया जाता है। समर्थन मूल्य घोषित करने का उद्देश्य किसी विशिष्ट वस्तु के उत्पादन को प्रोत्साहन देना होता है। सामान्यतः समर्थन मूल्य बाजार कीमत से अधिक घोषित किया जाता है। ऊँची कीमत पर उपभोक्ता वस्तु की कम मात्रा क्रय करते हैं तथा उत्पादक ज्यादा मात्रा उत्पन्न करने की इच्छा करते हैं। इसी कारण बाजार में अधिशेष आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
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प्रश्न 9.
भयंकर सूखे के कारण गेहूँ की आपूर्ति में बहुत कमी आ जाती है? इस घटना का गेहूँ की बाजार कीमत पर प्रभाव चित्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
भयंकर सूखे के कारण गेहूँ की आपूर्ते में बहुत कमी आने का अभिप्राय है गेहूँ का आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जायेगा। इस घटना में गेहूँ की कीमत में बहुत बढ़ोतरी होगी लेकिन मात्रा कम हो जायेगी। इस प्रभाव को नीचे चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 39

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प्रश्न 10.
माना जीन्स के उत्पादन में प्रयोग होने वाली रुई की कीमत में वृद्धि हो जाती है। इसका जीन्स की बाजार कीमत व साम्य मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
रुई जीन्स के उत्पादन में प्रयुक्त एक साधन है। रुई की कीमत बढ़ने पर जीन्स की उत्पादन की सीमान्त लागत में बढ़ोतरी हो जायेगी। जिससे जीन्स का आपूर्ति वक्र ऊपर बायीं ओर खिसक जायेगा। अर्थात् साम्य कीमत में वृद्धि हो जायेगी। परन्तु साम्य मात्रा कम हो जायेगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 40

प्रश्न 11.
आय में कमी से साम्य कीमत एवं मात्रा पर प्रभाव समझाइए।
उत्तर:
आय में कमी का साम्य कीमत एवं साम्य मात्रा पर प्रभाव वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करता है। जैसे –
1. सामान्य वस्तु:
आय में कमी होने पर सामान्य वस्तु की माँग घट जाती है। सामान्य वस्तु का माँग वक्र, उपभोक्ता की आय कम होने पर बायीं ओर खिसक जाता है। इससे साम्य कीमत तथा साम्य मात्रा दोनों घट जाते हैं। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है।Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 41

2. घटिया वस्तु:
आय में कमी होने पर घटिया वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है। घटिया वस्तु का माँग वक्र, उपभोक्ता की आय कम होने पर दायीं ओर खिसक जाता है। साम्य कीमत व साम्य मात्रा दोनों में वृद्धि हो जाती है। इस प्रभाव को नीचे चित्र में दर्शाया गया है।Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 42

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प्रश्न 12.
उपभोक्ताओं एवं विक्रेताओं के निर्णयों में बाजार में किस प्रकार तालमेल बैठता है?
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में बाजार निर्णय उपभोक्ताओं व क्रेताओं के आपसी संव्यवहारों के द्वारा लिए जाते हैं। बाजार में साम्य का निर्धारण माँग व पूर्ति की शक्तियों के आधार पर होता है। उपयोगिता के स्तर को अधिकतम करने के लिए एक उपभोक्ता वस्तु की सीमान्त उपयोगिता के समान अधिकतम कीमत प्रदान कर सकता है।

दूसरी ओर उत्पादक लाभ को अधिकतम करने के लिए वस्तु की सीमान्त लागत के समान न्यूनतम कीमत स्वीकार कर सकता है। कीमत की अधिकतम एवं न्यूनतम सीमाओं के बीच जहाँ कही माँग व पूर्ति बराबर हो जाती है साम्य कर निर्धारण हो जाता है। सन्तुलन बिन्दु पर कीमत को साम्य कीमत तथा खरीदी व बेची गई मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं। साम्य की अवस्था में उपभोक्ता व विक्रेता खरीदी व बेची गई मात्रा में परिवर्तन नहीं करना चाहते हैं।

प्रश्न 13.
माँग वक्र में खिसकाव का वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
माँग वक्र में खिसकाव की स्थिति में साम्य कीमत एवं मात्रा पर प्रभाव वस्तु के पूर्ति वक्र की प्रकृति पर निर्भर करता है । नीचे विभिन्न आपूर्ति वक्रों के साथ में माँग वक्र में खिसकाव का साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव दर्शाए गए हैं –

1. जब आपूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार:
जब वस्तु का पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार होता है, तो माँग वक्र में दायीं अथवा बायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। परन्तु माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य मात्रा बढ़ जाती है और माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य मात्रा घट जाती है ।
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2. जब पर्ति वक्र पूर्णतया बेलोचदार हो:
जब वस्तु का पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार होता है, तो माँग वक्र में दायीं अथवा बायीं ओर खिसकाव का साम्य मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। माँग में दायीं ओर खिसकाव से साम्य कीमत बढ़ जाती है व माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव को साम्य कीमत कम हो जाती है।
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3. जब पूर्ति वक्र लोचदार हो:
जब वस्तु की पूर्ति लोचदार होती है, तो. माँम – बक्र में खिसकाव का साम्य कीमत एवं मात्रा दोनों पर प्रभाव पड़ता है। माँग वक्र जब दायीं ओर खिसकता है, तो साम्य कीमत व मात्रा दोनों में बढ़ोतरी हो जाती है तथा माँग वक्र जब बायीं ओर खिसकता है, तो साम्य कीमत एवं मात्रा दोनों घट जाती है।
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प्रश्न 14.
चित्र की सहायता से समझाइए कि कीमत नियन्त्रण की स्थिति में राशनिंग घ्रणाली आवश्यक होती है।
उत्तर:
सामान्यतः सरकार नियन्त्रित कीमत का स्तर, साम्य कीमत से कम तय करती है परिणामस्वरूप वस्तु की आपूर्ति नियंत्रित कीमत पर माँग की तुलना में कम हो जाती है। अर्थात् बाजार में वस्तु की स्वल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। उपलब्ध कम मात्रा को अधिक उपभोक्ताओं में वितरित करने के लिए राशनिंग प्रणाली लागू करना आवश्यक हो जाता है। राशनिंग प्रणाली लागू होने पर निम्न आय वर्ग वाले उपभोक्ता भी कम कीमत वस्तु की निर्धारित मात्रा राशनिंग प्रणाली के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 46

प्रश्न 15.
उपभोक्ता की आय में वृद्धि किस प्रकार से वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा को प्रभावित करती है? समझाइए।
उत्तर:
उपभोक्ता की आय में वृद्धि का साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करता है। जैसे –

1. सामान्य वस्तु:
उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर सामान्य वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है। उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर सामान्य वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है। उपभोक्ता की आय में वृद्धि से सामान्य वस्तु का माँग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है। इससे साम्य कीमत व मात्रा दोनों में बढ़ोतरी हो जाती है। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 47

2. घटिया वस्तु:
उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर घटिया वस्तु की माँग कम होती है। आय बढ़ने पर घटिया वस्तु का माँग वक्र बायीं ओर खिसक जाता है। इससे घटिया वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा दोनों कम हो जाते हैं। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है।Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 48

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प्रश्न 16.
यदि सरकार बाजार मजदूरी दर से न्यूनतम मजदूरी ऊँची तय करती है, तो इसका बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी दर का निर्धारण बाजार मजदूरी दर से ऊपर तय करती है, तो इसका बाजार पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ेगा –

  1. यदि सरकार मजदूरी नीति को सख्ती से लागू करती है, तो श्रमिकों को बाजार से ऊँची मजदूरी दर प्राप्त होगी।
  2. ऊँची मजदूरी दर पर आपूर्ति की तुलना श्रम की माँग कम होगी। इससे श्रम बाजार में बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होगी।
  3. काम करने की विवशता के कारण कुछ बेरोजगार श्रमिक नीची मजदूरी दर पर काम करने को तैयार हो जाते हैं। श्रमिक वास्तव में ऊँची मजदूरी दर पर हस्ताक्षर करते हैं और वास्तव में पाते हैं कम मजदूरी। इससे श्रम बाजार में कालाबाजारी जन्म लेती है।

प्रश्न 17.
किसी वस्तु के पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखे।
उत्तर:
वस्तु की कीमत के अलावा वे सभी कारक, जो किसी वस्तु की पूर्ति में वृद्धि करते हैं, पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव पैदा करते हैं। उनमें से कुछ कारक निम्नलिखित है –

  1. उत्पादन तकनीक में प्रगति।
  2. फर्मों की संख्या में वृद्धि।
  3. उत्पादन शुल्क की दर में कमी।
  4. वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त साधनों की कीमत में कमी।
  5. प्राकृतिक कारकों में अनुकूल परिवर्तन।

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प्रश्न 18.
वस्तु के माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखो।
उत्तर:
वस्तु की कीमत के अलावा वे सभी कारक, जो वस्तु की माँग में कमी उत्पन्न करते हैं माँग वक्र में बायीं ओर खिसकाव पैदा करते हैं। उनमें से कुछ कारक नीचे दिए गए हैं –

  1. पूरक वस्तु की कीमत में वृद्धि।
  2. वस्तु की प्रतिस्थापन वस्तु की कीमत में कमी।
  3. उपभोक्ता की रुचि अभिरुचियों में प्रतिकूल परिवर्तन।
  4. जलवायु व मौसम में प्रतिकूल परिवर्तन।

प्रश्न 19.
समझाइए कि राशनिंग प्रणाली कालाबाजारी को जन्म देती है।
उत्तर:
जब सरकार नियन्त्रण करती है, तो बाजार में वस्तु की स्वल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सामान्यतः नियन्त्रित कीमत का स्तर साम्य कीमत से कम तय किया जाता है। साम्य कीमत से कम कीमत पर वस्तु की बाजार माँग वस्तु की पूर्ति से कम रहती है। राशनिंग प्रणाली लागू करके सरकार वस्तु की उपलब्ध कम मात्रा अधिक उपभोक्ताओं में वितरित करती है। यदि उच्च आय वर्ग के उपभोक्ताओं को आवश्यकता से वस्तु की कम मात्रा राशन में प्राप्त होती है, तो वे चोरीछिपे ऊँची कीमत देकर वस्तु की तय मात्रा से ज्यादा मात्रा खरीदने की पेशकश करते हैं। परिणामस्वरूप विक्रेता काला बाजार की गतिविधियों में लिप्त होने लगते हैं।

प्रश्न 20.
आपूर्ति वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखिए।
उत्तर:
आपूर्ति वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक –

  1. उत्पादन में प्रयुक्त साधनों की कीमत में परिवर्तन।
  2. उत्पादन तकनीक में परिवर्तन।
  3. फर्मों की संख्या में परिवर्तन।
  4. सम्बन्धित वस्तु की कीमत में परिवर्तन।
  5. उत्पादन शुल्क की दर में परिवर्तन।
  6. प्राकृतिक कारकों में परिवर्तन।

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प्रश्न 21.
माँग वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक लिखो।
उत्तर:
वस्तु की कीमत के अलावा अन्य वे सभी कारक, जो वस्तु की माँग को प्रभावित करते हैं माँग वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी होते हैं। जैसे –

  1. सम्बन्धित वस्तु की कीमत में परिवर्तन।
  2. उपभोक्ता की आय में परिवर्तन।
  3. उपभोक्ता की रुचि एवं अभिरुचियों में परिवर्तन।
  4. उपभोक्ताओं की संख्या में परिवर्तन।

प्रश्न 22.
वर्ष 2002-03 के लिए मुख्य बजट में चाय पर उत्पाद शुल्क 2 रु./किग्रा. से घटाकर 1रु./किग्रा. कर दिया गया। अन्य बातें समान रहती है। चाय की साम्य कीमत पर इस प्रभाव को दर्शाइए।
उत्तर:
चाय उत्पादन पर उत्पाद शुल्क की दर 2 रु./किग्रा. से 1 रु./किग्रा. कर देने से चाय उत्पादन की सीमान्त लागत प्रति किग्रा 1 रुपये कम हो जायेगी। सीमान्त लागत घटने से चाय की आपूर्ति में वृद्धि हो जायेगी। अर्थात् चाय का पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जायेगा। इससे चाय की साम्य कीमत घट जायेगी परन्तु साम्य मात्रा में वृद्धि हो जायेगी। इसे नीचे चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 49

प्रश्न 23.
यदि सरकार वस्तु की कीमत का नियन्त्रण बाजार कीमत से कम करती है, तो इसके बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेंगे?
उत्तर:
यदि सरकार नियन्त्रित कीमत का स्तर बाजार कीमत से कम तय करती है, तो इसके बाजार पर निम्नलिखित प्रभाव होंगे –

  1. बाजार कीमत से कम नियन्त्रित कीमत पर उपभोक्ता वस्तु की अधिक मात्रा में माँग करेंगे तथा उत्पादक कम मात्रा में पूर्ति करेंगे इससे बाजार में वस्तु की स्वल्पता की समस्या उत्पन्न हो जायेगी।
  2. स्वल्पता की समस्या से “पहले आओ पहले पाओ” या “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की समस्या पैदा हो सकती है।
  3. दूसरे क्रम पर स्थित समस्या से बचने के लिए सरकार राशनिंग प्रणाली लागू कर सकती है।
  4. राशनिंग प्रणाली लागू होने पर रिश्वतखोरी, जमा खोरी, काला बाजारी जैसी समस्या पनपने लगती है।

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प्रश्न 24.
समर्थन कीमत का बाजार पर प्रभाव लिखो।
उत्तर:
सामान्यतः सरकार, जो समर्थन मूल्य घोषित करती है, उसका स्तर बाजार कीमत से ऊपर होता है। इससे बाजार में निम्नलिखित प्रभाव उत्पन्न होते हैं –

  1. बाजार कीमत से ऊपर समर्थन कीमत पर बाजार में वस्तु की आपूर्ति उसकी माँग की तुलना में ज्यादा हो जाती है। इससे बाजार में अधिशेष उत्पादन की समस्या पैदा हो जाती है।
  2. अधिशेष उत्पादन की स्थिति में उत्पादक बाजार में सम्पूर्ण उत्पादन नहीं बेच पाते हैं, बल्कि सरकार को उस अधिशेष उत्पादन को क्रय करने की व्यवस्था करनी पड़ती है।
  3. अधिशेष उत्पादन को क्रय करके सरकार बफर स्टॉक बनाती है।
  4. उपभोक्ताओं को न्यायोचित कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार को आर्थिक सहायता की व्यवस्था करनी पड़ती है।

प्रश्न 25.
बाजार कीमत व सामान्य कीमत में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 50

प्रश्न 26.
एक उदाहरण की सहायता से फर्मों की संख्या में परिवर्तन से आपूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव को समझाइए तथा इसका साम्य कीमत व मात्रा पर प्रभाव लिखो।
उत्तर:
इस विषय में मोबाइल फोन का उदाहरण उपयुक्त रूप से पेश किया जा सकता है। 1990 के मध्य दशक में भारतवर्ष में एयर-टैल, एस्सार आदि गिनी-चुनी कम्पनियों मोबाइल फोन की सेवाएँ उपलब्ध कराती थी। फर्मों की कम संख्या के कारण ये फर्म काल भेजने-सुनने की ऊँची कीमत उपभोक्ताओं से वसूलती थी। वर्ष 2002 के अन्त तक कुछ नई कम्पनियाँ जैसे-डॉलफिन, हच, टाटा-बिरला आदि इस क्षेत्र में प्रवेश कर गई अर्थात् मोबाइल क्षेत्र में काम करने वाली फर्मों की संख्या में वृद्धि हो गई। इससे मोबाइल फोन सेवा की आपूर्ति बढ़ गई और परिणामस्वरूप मोबाइल सुनने की स्थानीय लागत बिल्कुल समाप्त हो गई। मोबाइल से स्थानीय, एस. टी. डी. आदि पर काल करना सस्ता हो गया है।

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प्रश्न 27.
माना चीनी पर से कीमत नियन्त्रण हटा लिया जाता है। इसका चीनी की साम्य मात्रा व कीमत पर पड़ने वाले प्रभाव को समझाइए।
उत्तर:
सामान्यत: नियन्त्रित कीमत का स्तर साम्य कीमत से नीचे तय किया जाता है। चीनी पर से कीमत नियन्त्रण हटाने पर बाजार में साम्य का निर्धारण उस कीमत पर होगा, जहाँ चीनी की बाजार माँग व पूर्ति दोनों समान हो जायेगी। उपभोक्ताओं की खुले बाजार में नियन्त्रित कीमत से ऊँची कीमत पर चीनी क्रय करनी पड़ेगी। अतः उपभोक्ता पक्ष नियन्त्रित कीमत पर चीनी की माँग की तुलना में कम मात्रा में चीनी की माँग करेंगे। दूसरी ओर उत्पादक चीनी की अधिक मात्रा में आपूर्ति करेंगे। साम्य का निर्धारण नियन्त्रित कीमत से ऊपर होगा। उपभोक्ताओं को ज्यादा मात्रा में उपभोग के लिए चीनी प्राप्त होगी। इस प्रभाव को निम्नलिखित चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 51

प्रश्न 28.
अभिरुचि में प्रतिकूल परिवर्तन के कारण माँग में कमी का कोई एक उदाहरण समझाइए।
उत्तर:
इस सम्बन्ध में वायु-यात्रा का उदाहरण पेश किया जा सकता है। 11.9.2001 को अमेरिका स्थित व्यावसायिक टॉवर पर आतंकवादी हमले के बाद से लोग हवाई यात्राओं से डरने लगे। हवाई यात्रा के भय से हवाई यात्रा का माँग वक्र बायीं ओर खिसक गया अर्थात् हवाई यात्रा करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आ गई। अमरिका में हवाई यात्रा किराए में गिरावट आ गई। कई हवाई यात्रा कम्पनियों को अपना उत्पादन पैमाना संकुचित करना पड़ा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
माँग व पूर्ति अनुसूचियों एवं वक्रों की सहायता से वस्तु की साम्य कीमत एवं साम्य निर्धारण की विधि समझाइए।
उत्तर:
वस्तु बाजार में सन्तुलन की अवस्था उस बिन्दु पर उत्पन्न होती है, जहाँ वस्तु की बाजार माँग तथा बाजार पूर्ति दोनों समान होते हैं। माँगी अनुसूची में विभिन्न कीमतों पर उपभोक्ताओं द्वारा माँगी गई विभिन्न मात्राओं को दर्शाया जाता है। पूर्ति अनुसूची में विभिन्न कीमतों पर उत्पादकों द्वारा बेची गई विभिन्न मात्राओं को दर्शाया जाता है। उपभोक्ता वस्तु की ऊँची कीमत पर कम इाकइयों की माँग करते हैं तथा इसके विपरीत नीची कीमत पर अधिक इकाइयों की माँग करते हैं। उत्पादक वस्तु की ऊँची कीमत पर अधिक इकाइयों की पूर्ति करते हैं और नीची कीमत पर कम इकाइयों की पूर्ति करते हैं।

लाभ को अधिकतम करने के लिए उत्पादक सीमान्त लागत से कम कीमत पर वस्तु नहीं बेच सकते हैं। इसी प्रकार उपभोक्ता अधिकतम सन्तुष्टि पाने के लिए वस्तु की सीमान्त उपयोगिता से अधिक कीमत नहीं दे सकते हैं। इस प्रकार उपभोक्ता पक्ष के लिए अधिकतम कीमत देने की सीमा वस्तु की सीमान्त उपयोगिता होती है और उत्पादक के लिए न्यूनतम कीमत स्वीकार करने की सीमा वस्तु की सीमान्त लागत होती है। इन दो न्यूनतम एवं अधिकतम कीमत सीमाओं के बीच में जहाँ कहीं वस्तु की माँग व पूर्ति बराबर हो जाती है वहाँ साम्य का निर्धारण होता है। साम्य बिन्दु पर कीमत स्तर को साम्य कीमत एवं मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं। साम्य की स्थिति को निम्नलिखित अनुसूची से भी समझाया जा सकता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 52
उपरोक्त अनुसूची में कीमत स्तर 3 पर वस्तु की माँगी गई मात्रा व पूर्ति की गई मात्रा दोनों बराबर है। इसके अलावा अन्य कीमत स्तरों पर या तो वस्तु माँग अधिक या पूर्ति। अतः तालिका में साम्य कीमत 3 तथा साम्य मात्रा 16 है। साम्य का निर्धारण रेखाचित्र की सहायता से समझाया जा सकता है। वस्तु का माँग वक्र DD ऋणात्मक ढाल वाला होता है तथा पूर्ति वक्र SS धनात्मक ढाल वाला होता है। माँग वक्र व पूर्ति वक्र दोनों बिन्दु E पर एक-दूसरे को काटते हैं। बिन्दु E साम्य बिन्दु है क्योंकि इस बिन्दु पर वस्तु की माँग व पूर्ति दोनों बराबर है। इसके अलावा अन्य बिन्दुओं पर या तो वस्तु की माँग पूर्ति से ज्यादा है अथवा पूर्ति माँग से ज्यादा है। साम्य बिन्दु से कीमत अक्ष पर खींचे गए लम्ब को p साम्य कीमत स्तर तथा साम्य बिन्दु से मात्रा अक्ष पर खींचे गए लम्ब का पद साम्य मात्रा को दर्शाता है।
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प्रश्न 2.
जब किसी वस्तु के बाजार माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र दोनों दायीं ओर खिसकते हैं, तो साम्य कीमत व मात्रा बदल भी सकते हैं नहीं भी। व्याख्या करो।
उत्तर:
माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र दोनों में दायीं ओर खिसकाव होने पर साम्य मात्रा व कीमत में परिवर्तन हो भी सकता है और नहीं भी इसे नीचे समझाया गया है –
1. माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव से अधिक है:
माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र की तुलना में ज्यादा होता है, तो साम्य कीमत व मात्रा दोनों बढ़ जाती है। इस स्थिति को नीचे चित्र द्वारा स्पष्ट किया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 54

2. जब माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र से कम हो:
जब माँग में वृद्धि वस्तु की पूर्ति में वृद्धि से कम होती है, तो साम्य कीमत कम हो जाती है परन्तु साम्य मात्रा बढ़ जाती . है। इसे नीचे रेखाचित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 55

3. जब माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव पूर्ति वक्र में खिसकाव के समान हो:
जब किसी वस्तु की माँग में वृद्धि उसकी पूर्ति में वृद्धि के बराबर होती है तो वस्तु की समय कीमत पर इस परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है परन्तु साम्य मात्रा बढ़ जाती है।
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प्रश्न 3.
साम्य कीमत एवं साम्य मात्रा पर क्या प्रभाव पड़ेगा जब –

  1. माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव हो।
  2. माँग वक्र पूर्णतया लोचदार हो, पूर्ति वक्र बाहर की ओर खिसक जाए।
  3. माँग व पूर्ति वक्र दोनों समानुपात में घटते हों।

उत्तर:
1. माँग वक्र में दायीं ओर खिसकाव का मतलब है माँग में वृद्धि । माँग में वृद्धि होने पर साम्य कीमत व मात्रा दोनों में वृद्धि हो जायेगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 57

2. यदि माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होता है और पूर्ति वक्र बाहर की ओर खिसक जाता है, तो वस्तु की साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा परन्तु साम्य मात्रा बढ़ जायेगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 58

3. माँग व पूर्ति में समानुपात में कमी होने पर वस्तु के माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र दोनों बायीं ओर खिसक जाते हैं। इस परिवर्तन के होने पर साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा परन्तु साम्य मात्रा घट जायेगी।
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प्रश्न 4.
इस सभी प्रश्नों के माँग और आपूर्ति वक्रों के खिसकाव या उन्हीं वक्रों पर स्थान परिवर्तन द्वारा हल करो।

  1. वर्ष 2001 से भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर रोक लगा दी। इसका सिगरेटों की औसत कीमत व बिक्री पर क्या प्रभाव होगा?
  2. खनिज तेल के नये भण्डारों की खोज से डीजल और पेट्रोल की कीमत कम हो जाती है इसका नई कारों के बाजार पर क्या प्रभाव होगा?
  3. नए पर्यावरण नियमों के अनुसार औषध-निर्माताओं की ऐसी उत्पादन विधियों का प्रयोग करने को बाध्य होना पड़ता है, जो महंगी तो रहती है पर जिससे पहले की अपेक्षा हानिकारक रसायनों का उत्सर्जन कम हो जाता है। इनका औषधियों की कीमतों पर क्या प्रभाव होगा?

उत्तर:
1. वर्ष 2001 में भारतवर्ष के सर्वोच्च न्यायालय में सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान वर्जित कर दिया इससे भारत में सिगरेट की माँग कम हो जायेगी। इस परिवर्तन से सिगरेट की साम्य कीमत कम हो जायेगी और साम्य मात्रा भी कम हो जायेगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 5 बाजार संतुलन part - 2 img 60

2. कारों के लिए पेट्रोल/डीजल पूरक वस्तु है। पूरक वस्तु की कीमत कम होने से वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि पेट्रोल/डीजल की कीमत घटने पर कारों की माँग में वृद्धि हो जायेगी। कार का माँग वक्र दायीं ओर खिसक जायेगा। कार की साम्य कीमत व मात्रा दोनों में वृद्धि हो जायेगी।
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3. पर्यावरण-मित्र उत्पादन तकनीक का प्रयोग करने पर औषधि उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी हो जायेगी। उत्पादन में प्रयुक्त साधनों की कीमत बढ़ने से औषधि का आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जायेगा। इसके परिणामस्वरूप साम्य कीमत व मात्रा दोनों कम हो जायेगी।
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इस परिवर्तन का दूसरा रूप भी है। पर्यावरण मित्र उत्पादन तकनीक के प्रयोग से विषैले पदार्थों का स्राव कम मात्रा में होगा। इससे पर्यावरण पहले की तुलना से अच्छा हो जायेगा। स्वस्थ पर्यावरण में लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। उत्तम स्वास्थ्य होने पर औषधियों की माँग में कमी आ जायेगी। साम्य कीमत व मात्रा पर औषधियों की माँग व पूर्ति में कमी के स्तर के आधार पर प्रभाव पड़ेगा।

यदि औषधियों की माँग में कमी, पूर्ति की तुलना में कम होगी, तो औषधियों की साम्य कीमत बढ़ जायेगी। यदि औषधियों की माँग में कमी, पूर्ति की तुलना में ज्यादा होगी, तो साम्य कीमत कम हो जायेगी। यदि औषधियों की माँग में कमी, पूर्ति में कमी के समान होगी, तो साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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प्रश्न 5.
जब किसी वस्तु की माँग व पूर्ति दोनों में कमी आती है, तो वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा बदल भी सकती है और नहीं भी। व्याख्या करो।
उत्तर:
जब किसी वस्तु की माँग व पूर्ति दोनों में कमी आती है, तो वस्तु की साम्य कीमत व मात्रा बदल भी सकती है और नहीं भी, नीचे समझाया गया है –

1. जब माँग वक्र में कमी पूर्ति वक्र में कमी से अधिक हो:
जब किसी वस्तु की माँग में कमी उसकी पूर्ति में कमी से अधिक हो, तो वस्तु की साम्य कीमत कम हो जायेगी तथा साम्य मात्रा भी कम हो जायेगी।
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2. जब वस्तु की माँग में कमी पूर्ति में कमी के बराबर होगी-जब वस्तु की माँग में कमी उसकी पूर्ति में कमी के बराबर होगी, तब उस वस्तु की साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा परन्तु साम्य मात्रा घट जायेगी।
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3. जब वस्तु की माँग में कमी उसकी पूर्ति में कमी से कम हो-जब वस्तु की मांग में कमी उसकी पूर्ति में कमी से कम होगी, तब वस्तु की साम्य कीमत बढ़ जायेगी तथा वस्तु की मात्रा घट जायेगी।
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प्रश्न 6.
चीन टेलीफोन यंत्रों का एक बहुत बड़ा उत्पादक है। यह हाल ही में विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना है। अब इसे भारत जैसे अन्य देशों में अपना माल बेचने की छुट हो गई है। कल्पना कीजिए-ये कोई टेलीफोनों की बड़ी भारी खेप का निर्यात कर देता है।

  1. भारत के बाजार में टेलीफोनों की कीमत और मात्रा पर क्या प्रभाव होगा?
  2. यदि भारत में टेलीफोनों की खरीदारी पर कुल व्यय पर क्या प्रभाव होगा?

उत्तर:
1. चीन द्वारा भारतवर्ष में भारी संख्या में टेलीफोन उपकरणों का निर्यात करने पर टेलीफोन उपकरणों की आपूर्ति में वृद्धि हो जायेगी। इससे टेलीफोन उपकरण का आपूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जायेगा। उपकरणों की साम्य कीमत घट जायेगी। इसे नीचे समझाया गया है –
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2. यदि भारत में टेलीफोन उपकरणों की माँग पूर्णतया लोचदार है, तो चीन द्वारा भारत बड़ी संख्या में टेलीफोन उपकरणों के निर्यात का साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। साम्य मात्रा बढ़ने से टेलीफोन उपकरणों पर भारत का व्यय बढ़ जायेगा।
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प्रश्न 7.
श्रम बाजार में मजदूरी दर का निर्धारण समझाइए।
उत्तर:
श्रम बाजार में मजदूरी दर का निर्धारण श्रम की माँग व पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है। परिवार क्षेत्र श्रम की आपूर्ति करता है तथा श्रम की माँग उत्पादक करते हैं। श्रम से अभिप्राय श्रमिकों की संख्या से न होकर श्रम के घंटों से होता है। जहाँ श्रम माँग व पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं मजदूरी दर का निर्धारण उसी बिन्दु पर होता है।

फर्म लाभ को अधिकतम करने का प्रयास करती है। अत: फर्म उस इकाई तक श्रम का नियोजन करती है, जिस पर श्रम की अतिरिक्त लागत तथा श्रम के नियोजन से प्राप्त अतिरिक्त लाभ दोनों समान हो जाते हैं। श्रम की इकाई को नियोजित करने की अतिरिक्त लागत श्रम की मजदूरी दर होती है तथा श्रम के नियोजन से प्राप्त अतिरिक्त लाभ श्रम की सीमान्त आगम उत्पादकता के समान होता है। अतः फर्म निम्नलिखित शर्त तक श्रम का नियोजन बढ़ाती है –
मजदूरी = श्रम की सीमान्त आगम उत्पादकता
w = MRp2
जहाँ MRp2 = MR × Mp2
जब तक MRp2 का मूल्य मजदूरी दर से ज्यादा होता है फर्म को श्रम का नियोजन बढ़ाना लाभकारी रहता है। जब MRp2 का मूल्य मजदूरी दर से कम होता है, तो श्रम का नियोजन करना फर्म के लिए हानिकारक रहता है। अतः फर्म को श्रम नियोजन उसी स्थिति में अधिकतम लाभकारी होता है, जब w = mRp2, होता है।
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आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में चाय के माँग वक्र व पूर्ति वक्र नीचे दिए गए हैं –
yd = 500 – p
ys = 300 + 3p क्योंकि p ≥ 40 के लिए
= 0 P < 40 के लिए
मानिए बाजार सभी फर्म एक समान है। चाय की साम्य कीमत की गणना करो। साम्य मात्रा का भी आंकलन करो।
उत्तर:
साम्य अवस्था में –
yd = ys
500 – p = 300 + 3p (yd व ys के मान रखने पर)
-3p – p = 300 – 500
-4p = -200
4p = 200
p = \(\frac{200}{4}\)
p = 50
p का मान रखने पर yd = 500 – 50 = 450
ys = 300 + 3 × 50 = 300+ 150 = 450
चाय की साम्य कीमत = 50 रुपये
चाय की साम्य मात्रा = 450

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प्रश्न 2.
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में जूतों के माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र निम्नलिखित है –
yd = 1200 – p
ys = 600 + 2p क्योंकि p ≥ 200 के लिए
क्योंकि p < 200 के लिए
मानिए बाजार सभी फर्म एक समान है। चाय की साम्य कीमत की गणना करो । साम्य मात्रा का भी आंकलन करो।
उत्तर:
सन्तुलन की अवस्था में –
yd = ys
1200 – p = 600 + 2p (yd व ys के मान रखने पर)
-2p – p = 600 – 1200
3p = 600
p = \(\frac{100}{3}\)
p = 200
p का मान प्रतिस्थापित करने पर yd = 1200 – 200 = 1000
ys = 600 + 2 × 200 = 600 + 400 = 1000
जूतों की साम्य कीमत = 200 रुपये
जूतों की साम्य मात्रा = 1000

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प्रश्न 3.
मानिए सी. पी. गाइड्स के माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र निम्नलिखित है –
yd = 10000 – p
ys = 7000 + 19p क्योंकि p ≥ 140 के लिए
क्योंकि p < 140 के लिए
मानिए बाजार सभी फर्म एक समान है। चाय की साम्य कीमत की गणना करो। साम्य मात्रा का भी आंकलन करो।
उत्तर:
सन्तुलन की अवस्था में –
yd = ys
10000 – p = 7000 + 19p (yd व ys के मान रखने पर)
– p – 19p = 7000 – 10000
-20p = -3000
20p = 3000
p = \(\frac{300}{20}\)
p = 150
p का मान करने पर yd = 10000 – 150 = 9850
साम्य कीमत = 150 रुपये
साम्य मात्रा = 9850

प्रश्न 4.
माना सरकार बी. पी. गाइड्स की बिक्री पर 10 रु./इकाई की दर से उत्पाद शुल्क आरोपित कर देती है प्रश्न 3 में दी गई समीकरण के आधार पर अनुमान लगाइए कि इससे आपूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? नई साम्य कीमत व साम्य मात्रा क्या होगी?
yd = 10000 – p
ys = 7000 + 19p क्योंकि p ≥ 140 के लिए
= 0 क्योंकि p < 140 के लिए
सी. पी. गाइड्स की साम्य कीमत व साम्य मात्रा का परिकलन करो।
उत्तर:
yd = 10000 – p
ys = 7000 + 19p क्योंकि p > 140 के लिए
= 0 क्योंकि p < 140 के लिए
गाइड की बिक्री पर कर आरोपित होने पर न्यूनतम औसत लागत बढ़ जायेगी। अतः
ys = 7000 + 19 (p-10) p ≥ 140 के लिए
= 0 p < 140 के लिए
साम्य की अवस्था में –
yd = ys
10000 – p = 7000 + 19p (p – 10) (yd व ys के मान रखने पर)
10000 – p = 7000 + 19p – 190
– p – 19p = 7000 – 10000
-20p = -3190
20p = 3190
p = \(\frac{3190}{20}\) = 1595
yd = 10000 – 159.5
= 9840.5
ys = 7000 + 19 (159.5 – 10)
= 7000 + 3030.5 – 190 = 7000 + 2840.5
= 9840.5
साम्य कीमत = 159.5 रुपये
साम्य मात्रा = 9840.5 इकाइयाँ

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प्रश्न 5.
गोल्डेन सीरिज स्टडी मैटीरियल के माँग वक्र व पूर्ति वक्र की समीकरण निम्नलिखित है –
yd = 368 – p
ys = 8 + 3p क्योंकि p ≥ 80 के लिए
= 0 क्योंकि p < 80 के लिए
किस कीमत पर गोल्डेन सीरिज स्टडी मैटीरियल की माँग व आपूर्ति दोनों बराबर हो जायेंगी?
उत्तर:
yd = 368 – p
ys = 8 + 3p
yd = ys
368 – p = 8 + 3p (yd व ys के मान रखने पर)
या – p – 3p = 8 – 368 – 4p = 360
या 4p = 360 या p = \(\frac{360}{4}\); p = 90
गोल्डेन सीरिज स्टडी मैटीरियल की साम्य कीमत = 90 रुपये

प्रश्न 6.
टी-शर्ट का माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र निम्नलिखित है –
yd = 368 -p
ys = 68 + 5p क्योंकि p ≥ 40 के लिए
= 0 क्योंकि p < 40 के लिए

  1. टी-शर्ट की साम्य कीमत व साम्य मात्रा की गणना करो।
  2. यदि सरकार टी-शर्ट की बिक्री से 12 रु./शर्ट की दर से उत्पाद शुल्क हटा लेती है, तो नई साम्य कीमत व साम्य मात्रा क्या होगी?

उत्तर:
1. yd = 368 – p
ys = 68 + 5p क्योंकि p ≥ 40 के लिए
= 0 क्योंकि p < 40 के लिए
साम्य की अवस्था में –
yd = ys
368 – p = 68 + 5p (yd व ys के मान रखने पर)
या – p – 5p = 68 – 368
6p = 300
p = \(\frac{360}{6}\)
p = 150

2. सरकार प्रति इकाई विक्रय पर से 12 रु. उत्पाद शुल्क हटा लेती है। उत्पादक को प्रति इकाई 12 रु. अधिक प्राप्त होंगे। अतः पूर्ति होगा।
ys = 68 + 5 (p + 12)
साम्य की अवस्था में –
ys = ys
368 – p = 68 + 5p (p + 12)
(yd व ys के मान रखने पर)
368 – p = 68 + 5p + 60
-p – 5p = 68 + 60 – 368
-6p = -240
6p = 240
p = \(\frac{240}{6}\)
p का मान रखने पर yd = 368 – 40
= 328
ys = 68 + 5 (40 + 12) = 68 + 260
= 7000 + 2840.5 = 328
नई साम्य कीमत = 40 रुपये प्रति इकाई
नई साम्य मात्रा = 328 इकाइयाँ

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प्रश्न 7.
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में पेन के माँग वक्र व पूर्ति वक्र इस प्रकार है –
yd = 700 – p
ys = 8 + 3p क्योंकि p ≥ 15 के लिए
= 0 क्योंकि p < 15 के लिए

  1. ys = 0, p < 15 के लिए का क्या महत्त्व है?
  2. पेन की साम्य कीमत ज्ञात करो।
  3. पेन की साम्य मात्रा ज्ञात करो।

उत्तर:
1. yd = 700 – p
ys = 8 + 3p क्योंकि p ≥ 15 के लिए
= 0 क्योंकि p < 15 के लिए
ys = 0, p < 15 के लिए का अभिप्राय है, न्यूनतम औसत लागत 15 रुपये है। अत: 15 रुपये प्रति इकाई कीमत से कम पर फर्म वस्तु की शून्य मात्रा की आपूर्ति करेगी।

2. साम्य की अवस्था में yd = ys
700 – p = 8 + 3p (yd व ys के मान रखने पर)
-p – 3p = 8 – 700
– 4p = -692
4p = 692
p = \(\frac{692}{4}\)
p = 173
साम्य कीमत = 173 रुपये

3. p का मान प्रतिस्थापित करने पर
yd = 700 – p
= 700 – 173
= 527
ys = 8 + 3p
= 8 + 3 × 173
= 38 + 519
= 3527
साम्य मात्रा = 527 इकाइयाँ

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प्रश्न 8.
यदि माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र नीचे दिए गए हैं –
yd = 400 – p
ys = 240 + 3p
साम्य की अवस्था में –
yd = ys
400 – p = 240 + 3p (yd व ys के मान रखने पर)
या – p – 3p = 24 – 400
-4p = – 160
4p = 160
p = \(\frac{160}{4}\) = 40
p का मान रखने पर –
yd = 400 – p = 400 – 40 = 360
ys = 240 + 3p = 3 × 240 + 3 × 40
240 + 3 × 40 = 240 + 120 = 360
साम्य कीमत = 40 रुपये/इकाई
साम्य मात्रा = 360 इकाइयाँ

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प्रश्न 9.
प्रश्न 8 में दिए गए उत्पादन वक्र की वस्तु के उत्पाद में प्रयुक्त साधनों की कीमत बढ़ने से 4रु./इकाई लागत बढ़ जाती है। उसी माँग वक्र का प्रयोग करते हुए नई साम्य कीमत ज्ञात करो तथा नई साम्य मात्रा की गणना करो।
उत्तर:
1. yd = 400-p
ys = 240 + 3(p – 4) (पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जायेगा क्योंकि उत्पादक को प्रति इकाई 4 रुपये कम प्राप्त होंगे)
साम्य क अवस्था में –
yd = ys
400 – p = 240 + 3(p – 4) (yd व ys के मान रखने पर)
400 – p = 240 + 3p – 12
– p – 3p = 240 – 12 – 400
4p = – 172
4p = 172
p = \(\frac{172}{4}\)
p = 43

2. p का मान रखने पर yd = 400 – p = 400 – 43 = 357
ys = 240 + 3(p – 4) = 240 + 3(43 – 4)
240 + 3 × 39 = 240 + 117 = 357
साम्य कीमत = 43 रुपये प्रति इकाई
साम्य मात्रा = 357 इकाइयाँ

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प्रश्न 10.
बाजार माँग वक्र एवं पूर्ति वक्र निम्नलिखित है –
yd = 10000 – p
ys = 4000 + 3p

  1. साम्य कीमत व साम्य मात्रा की गणना करो।
  2. माना एक फर्म का आपूर्ति वक्र ys = 0+p, फर्मों की संख्या ज्ञात करो, साम्य मात्रा की पूर्ति कर रही है।

उत्तर:
yd = 10000 – p
ys = 4000 + 2p

1. साम्य की अवस्था में –
yd = ys
10000 – p = 4000 + 2p (yd व ys के मान रखने पर)
– p – 2p = 4000 – 10000
– 3p = 3 – 6000
3p = 6000
p = \(\frac{6000}{3}\)
p = 2000
p का मान रखने पर
yd = 10000 – p = 10000 – 2000 = 8000
ys = 4000 + 2p
= 4000 + 2 × 2000 = 4000 + 4000 = 8000
साम्य कीमत = 2000 रुपये प्रति इकाई
साम्य मात्रा = 8000 इकाइयाँ

2. एक फर्म की आपूर्ति = 0 + 2000 इकाइयाँ (p का मान रखने पर)
= 2000 इकाइयाँ
फर्मों की संख्या = image 68 = \(\frac{8000}{2000}\) = 4 फर्म
फर्मों की संख्या = 4 फर्म

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वस्तु की कीमत निर्धारण के जितना समय अधिक होता है उतनी ही ज्यादा महत्ता होती है –
(A) पूर्ति पक्ष की
(B) माँग पक्ष की
(C) तकनीकी प्रगति की
(D) कर नीति की
उत्तर:
(A) पूर्ति पक्ष की

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प्रश्न 2.
वस्तु की कीमत निर्धारण में अल्पकाल में अधिक भूमिका होती है –
(A) पूर्ति पक्ष की
(B) माँग पक्ष की
(C) तकनीकी प्रगति की
(D) कर नीति की
उत्तर:
(B) माँग पक्ष की

प्रश्न 3.
वह बाजार, जिसमें फर्मों का प्रवेश व गमन पूर्ण स्वतन्त्र होता है, कहलाता है।
(A) एकाधिकारी
(B) पूर्ण प्रतियोगी
(C) एकाधिकारात्मक प्रतियोगी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) पूर्ण प्रतियोगी

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प्रश्न 4.
माँग व पूर्ति से ज्यादा वृद्धि होने पर साम्य कीमत –
(A) घटती है
(B) बढ़ती है
(C) घटती है या बढ़ती है
(D) न तो घटती है न ही बढ़ती है
उत्तर:
(B) बढ़ती है

प्रश्न 5.
एक वस्तु के माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र दोनों बायीं ओर समान रूप से खिसकते हैं, तो साम्य कीमत –
(A) घटेगी
(B) बढ़ेगी
(C) घटेगी या बढ़ेगी
(D) न तो घटेगी और न बढ़ेगी
उत्तर:
(D) न तो घटेगी और न बढ़ेगी

प्रश्न 6.
वस्तु की पूर्ति में वृद्धि या कमी से साम्य कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता है यदि वस्तु माँग –
(A) पूर्णतया लोचदार हो
(B) पूर्णतया बेलोचदार हो
(C) इकाई से कम लोचदार हो
(D) इकाई से अधिक लोचदार हो
उत्तर:
(A) पूर्णतया लोचदार हो

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प्रश्न 7.
किसी वस्तु की माँग में वृद्धि या कमी से साम्य कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जब वस्तु की पूर्ति –
(A) पूर्णतया लोचदार हो
(B) पूर्णतया बेलोचदार हो
(C) इकाई से कम लोचदार हो
(D) इकाई से अधिक लोचदार हो
उत्तर:
(A) पूर्णतया लोचदार हो

प्रश्न 8.
इकाई लोचदार पूर्ति वक्र है –
(A)
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(B)
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(C)
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(D)
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उत्तर:
(C)
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प्रश्न 9.
सामान्य सरकार उच्चतम कीमत का निर्धारण करती है –
(A) साम्य कीमत के बराबर
(B) साम्य कीमत से कम
(C) साम्य कीमत से अधिक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) साम्य कीमत से कम

प्रश्न 10.
सरकार समर्थन कीमत का निर्धारण करती है –
(A) साम्य कीमत के बराबर
(B) साम्य कीमत से कम
(C) साम्य कीमत से अधिक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) साम्य कीमत से अधिक

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

Bihar Board Class 12 Economics पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धा बाजार की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. बाजार में क्रेताओं व विक्रेताओं की अधिक संख्या होती है जो कीमत स्वीकारक होते हैं।
  2. सभी उत्पादक सामंगी वस्तु का विक्रय करते हैं।
  3. क्रेताओं एवं विक्रेताओं को एक निश्चित समय अवधि वस्तु उपलब्धता एवं कीमत के बारे में पूर्ण ज्ञान होता है।
  4. बाजार में फर्म का प्रवेश एवं बाह्य गमन स्वतंत्र होता है।

पूर्ण प्रतियोगी बाजार की विशेषताओं के प्रभाव:

1. क्रेताओं एवं विक्रेताओं की विशाल संख्या होने के कारण कोई भी विक्रेता वस्तु की पूर्ति को घटाकर या बढ़ाकर वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकता है। इसी प्रकार एक क्रेता वस्तु की माँग को घटाकर या बढ़ाकर वस्तु की पूर्ति को प्रभावित नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए होता है कि बाजार आपूर्ति में एक फर्म की आपूर्ति नगण्य होती है और बाजार माँग की तुलना में एक व्यक्ति की माँग नगण्य होती है। विक्रेताओं-क्रेताओं की विशाल संख्या, समांगी वस्तु एवं बाजार के बारे में पूर्ण जानकारी के कारण पूर्ण प्रतियोगी बाजार में कीमत एक समान होती है और व्यक्तिगत माँग वक्र पूर्णतया लोचदार होता है।

2. फर्म का स्वतंत्र प्रवेश एक बाह्य गमन यह दर्शाता है कि एक फर्म केवल लाभकारी उत्पाद स्तर तक ही उत्पादन करती है। ऐसा न होने पर फर्म बाजार से बाहर चली जायेगी और यदि वर्तमान असामान्य लाभ अर्जित करती है तो नई फर्म बाजार में प्रवेश कर सकती है।

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प्रश्न 2.
एक फर्म की संप्राप्ति, बाजार कीमत तथा उसके द्वारा बेची गई मात्रा में क्या संबंध है?
उत्तर:
उत्पादित मात्रा को विक्रय करके एक फर्म आगम प्राप्त करती है। उत्पाद की मात्रा एवं प्रति इकाई कीमत के गुणनफल को कुल आगम कहते हैं।
कुल आगम = उत्पाद की मात्रा × प्रति इकाई कीमत
TR = Y × P
जहाँ TR – कुल आगम
Y – उत्पादक की मात्रा एवं
P – प्रति इकाई वस्तु की कीमत
एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में एक फर्म कीमत स्वीकारक होती है वह वस्तु की कीमत को प्रभावित नहीं कर सकती है। अतः प्रतियोगी फार्म वस्तु की कीमत में परिवर्तन के द्वारा कुल आगम को प्रभावित नहीं कर सकती है वह केवल उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन के माध्यम से ही कुल आगम को प्रभावित कर सकती है।

प्रश्न 3.
कीमत रेखा क्या है?
उत्तर:
उत्पाद-कीमत तल में विभिन्न उत्पाद मात्राओं के लिए खींची गई रेखा को कीमत रेखा कहते हैं। पूर्ण प्रतियोगी बाजार में एक फर्म की कीमत रेखा एवं माँग वक्र समान रेखाएँ होती हैं।

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प्रश्न 4.
एक कीमत-स्वीकारक फर्म का कुल संप्राप्ति वक्र ऊपर की ओर प्रवणता वाली सीधी रेखा क्यों होती है? यह वक्र उद्गम से होकर क्यों गुजरती है?
उत्तर:
शून्य उत्पादन स्तर पर कुल आगम शून्य होता है। कुल आगम मूल बिन्दु से आरम्भ होता है। जैसे-जैसे उत्पाद में वृद्धि होती है कुल आगम में भी वृद्धि होती है। अतः आगम वक्र मूल बिन्दु से धनात्मक ढाल वाली सीधी रेखा होती है क्योंकि उत्पाद के सभी स्तरों पर वस्तु की कीमत एक समान रहती है।
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प्रश्न 5.
एक कीमत-स्वीकार फर्म का बाजार कीमत तथा औसत संप्राप्ति में क्या संबंध है?
उत्तर:
प्रति इकाई उत्पाद के कुल आगम को औसत आगम कहते हैं।
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AR = \(\frac{TR}{y}\) = \(\frac{py}{p}\) (∵TR = py)
अतः औसत आगम प्रति इकाई कीमत के बराबर है।

प्रश्न 6.
एक कीमत-स्वीकारक फर्म की बाजार कीमत तथा सीमांत संप्राप्ति में क्या संबंध है?
उत्तर:
उत्पाद की एक अतिरिक्त इकाई का विक्रय बढ़ाने पर कुल आगम में वृद्धि को सीमांत आगम कहते हैं।
सीमांत आगम = y1 इकाइयों से प्राप्त कुल आगम – (y1 – 1) इकाइयों से प्राप्त कुल आगम
MR = TRy1 – TRy1-1-1 अथवा MR = p × y1 – p(y1 – 1)
अथवा MR = py1 – Py1 + p
अथवा MR = p
इस प्रकार कीमत स्वीकारक फर्म का सीमान्त आगम प्रति इकाई कीमत के समान होता है।

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प्रश्न 7.
एक पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में लाभ अधिकतमीकरण फर्म की सकारात्मक उत्पादन करने की क्या शर्ते हैं?
उत्तर:
निश्चित विक्रय अवधि में कुल आगम तथा कुल लागत के अंतर को लाभ कहते हैं।
लाभ = कुल आगम – कुल लागत
यदि उत्पादन स्तर धनात्मक है तो उस उत्पादन स्तर पर अधिकतम लाभ की शर्त है –

  1. सीमांत आगम = सीमांत लागत।
  2. सीमांत लागत में वृद्धि हो।

प्रश्न 8.
क्या प्रतिस्पर्धा बाजार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म जिसकी बाजार कीमत सीमांत लागत के बराबर नहीं है, उसका निर्गत का स्तर सकारात्मक हो सकता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि उत्पादन के किसी धनात्मक स्तर पर सीमांत आगम जो एक फर्म प्रतियोगी लाभ कमाने वाली फर्म के लिए सीमांत लागत के बराबर नहीं होता तो या तो MR का मूल्य MC के मूल्य से ज्यादा होता है या कम।

1. यदि MR का मान MC के मान से ज्यादा है:
इसका अभिप्राय है कि उत्पाद की इकाई का उत्पादन करके इसकी बिक्री से फर्म इस इकाई की लागत से ज्यादा आगम अर्जित कर रही हैं इसे चित्र की सहायता से समझाया जा सकता है। उत्पादन स्तर y0 पर MR, MC से अधिक है। उत्पादन में थोड़ी अधिक मात्रा में वृद्धि करने पर MR, MC से ज्यादा रहता है।

अत: उत्पादन स्तर y0 से y, तक बढ़ाने पर लाभ में बढ़ोतरी होती है। अत: फर्म उत्पादन स्तर y2 से दायीं ओर जब तक उत्पादन बढ़ाती है जब तक MR, MC के समान नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, जब तक MR, MC से ज्यादा रहता है। फर्म उत्पादन स्तर बढ़ाकर लाभ में वृद्धि कर सकती है। अतः MR, MC से ज्यादा होने पर अधिकतम लाभ की स्थिति नहीं होती है।

2. यदि MR का मान MC के मान से कम है:
इसका अभिप्राय उत्पादन की इकाई का उत्पादन करके इसकी बिक्री से, लागत की तुलना में कम आगम प्राप्त करती है। इस स्थिति को चित्र द्वारा समझाया जा सकता है। उत्पादन स्तर y3 पर MR का मान MC से कम है। अर्थात् y3 उत्पादन स्तर पर फर्म को हानि उठानी पड़ रही है।

अत: 9. उत्पादन स्तर पर फर्म का लाभ अधिकतम नहीं है। फर्म उत्पादन स्तर y3 से बायीं ओर उत्पादन स्तर को तब तक घटाती है जब तक MR व MC दोनों समान नहीं हो जाते हैं। अतः लाभ अधिकतम करने वाली फर्म का धनात्मक उत्पादन स्तर अधिकतम लाभ का नहीं हो सकता है यदि कीमत सीमांत लागत के बराबर नहीं है।
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प्रश्न 9.
क्या एक प्रतिस्पर्धी बाजार में कोई लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक निर्गत स्तर पर उत्पादन कर सकती है, जब सीमांत लागत घट रही हो। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
एक फर्म उत्पादन के उस स्तर तक उत्पादन करती है जिस पर उसका लाभ अधिकतम होता है। यदि उत्पादन किसी धनात्मक स्तर पर अधिकतम लाभ हो रहा है तो निम्नलिखित शर्ते पूरी होनी चाहिए –

  1. सीमांत आगम (MR) = सीमांत लागत (MC)।
  2. सीमांत लागत में वृद्धि हो रही हो।

यदि उत्पादन के किसी स्तर पर MC वस्तु की सीमांत लागत के समान है और MC घट रही है:
इसे चित्र द्वारा समझाया जा सकता है। उत्पादन के y1, स्तर पर MC व वस्तु की कीमत समान है तथा MC घट रही है। उत्पादन का स्तर अधिकतम लाभ का स्तर नहीं हो सकता है। उत्पादन स्तर में बढ़ोतरी करने पर कीमत या MR, MC से ज्यादा हो जाती है। अर्थात् y1, स्तर से उत्पादन बढ़ाकर फर्म अपने लाभ को बढ़ा सकती है। इस प्रकार यदि उत्पादन के किसी स्तर पर MC वस्तु की कीमत के समान है और MC घट रही है तो यह अधिकतम लाभ की स्थिति नहीं है।
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प्रश्न 10.
क्या अल्पकाल में प्रतिस्पर्धी बाजार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन कर सकता है, यदि बाजार में कीमत न्यूनतम औसत परिवर्ती लागत से कम है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत AVC कम किसी भी कीमत स्तर पर उत्पादन का धनात्मक उत्पादन स्तर उत्पन्न नहीं कर सकती है। इसे निम्नलिखित चित्र द्वारा समझाया जा सकता है –
उत्पादन के Y1, स्तर पर –
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अतः हानि का मान TFC से ज्यादा है जबकि उत्पादन के शून्य स्तर पर हानि TFC के समान होती है। अतः उत्पादन नहीं करके फर्म अपनी हानि को घटा रही है। अतः न्यूनतम AVC से कम कीमत पर फर्म उत्पादन का कोई स्तर नहीं चुनना पसंद करती है।
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प्रश्न 11.
क्या दीर्घकाल में स्पर्धी बाजार में लाभ-अधिकतमीकरण फर्म सकारात्मक स्तर पर उत्पादन कर सकती है? यदि बाजार सीमांत न्यूनतम औसत लागत से कम है, व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अल्पकाल में फर्म उन सभी कीमत स्तरों जो TVC की भरपाई कर सकते हैं, उत्पादन का धनात्मक स्तर उत्पन्न करती है। इस बात को निम्नलिखित चित्र द्वारा समझाया जा सकता है। माना Y1, उत्पादन का ऐसा स्तर है जो दिए गए स्तर पर अधिकतम लाभ की शर्त को पूरा करता है। कीमत स्तर न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत से अधिक है। कीमत स्तर न्यूनतम औसत लागत से कम है। उत्पादन के Y1, स्तर पर –
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अत: उत्पादन स्तर Y1, पर शून्य उत्पादन स्तर से कम हानि है जब वस्तु की कीमत SAC से कम परंतु AVC से ज्यादा होती है। अर्थात् एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में यदि कीमत, न्यूनतम AVC से ज्यादा होता है तो फर्म उत्पादन का धनात्मक स्तर चयन करना पसंद करती है क्योंकि इससे हानि में कमी आती है।
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प्रश्न 12.
अल्पकाल में एक फर्म का पूर्ति वक्र क्या होता है?
उत्तर:
किसी दी गई कीमत पर अधिकतम लाभ कमाने वाली फर्म अल्पकाल में उत्पाद की जितनी मात्रा उत्पादन के लिए चयन करती उसे आपूर्ति वक्र कहते हैं। दूसरे शब्दों में, आपूर्ति विभिन्न कीमतों पर अधिकतम लाभ के विभिनन उत्पादन स्तरों को दर्शाती है। किसी भी कीमत जो न्यूनतम AVC के समान या अधिक हो फर्म कीमत को संगत उत्पादन की SMC के समान करेगी। ऐसी सभी कीमतों के लिए न्यूनतम AVC से व उससे ऊपर SMC वक्र संगत उत्पादन स्तरों के अधिकतम लाभ स्तरों के संयोजनों को प्रदान करते हैं। एक फर्म का न्यूनतम AVC से तथा उससे ऊपर SMC का ऊपर जाता हुआ भाग आपूर्ति वक्र होता है।
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गहरा रेखाखण्ड अल्पकालीन आपूर्ति वक्र को दर्शाता है।

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प्रश्न 13.
दीर्घकाल में एक फर्म का पूर्ति वक्र क्या होता है?
उत्तर:
दीर्घकाल में फर्म उत्पादन के सभी साधनों में आवश्यकतानुसार समायोजन कर सकती है। अतः दीर्घकाल में स्थिर लागत उत्पन्न नहीं होती है। उत्पादन के शून्य स्तर पर, फर्म की लागत भी शून्य होती है। अतः शून्य उत्पादन स्तर पर न लाभ न हानि की स्थिति होती है। अतः दीर्घकाल में फर्म उत्पादन के उन स्तरों का चयन करती जिससे उसकी कुल लागत को पूरा किया जा सके। दूसरे शब्दों में, फर्म उत्पादन के उन सभी स्तरों का चयन करती है जिनके लिए कीमतें न्यूनतम LRAC के समान या उससे अधिक होती है। न्यूनतम LRAC के समान या उससे अधिक सभी कीमतों पर LRMC का ऊपर उठता हुआ भाग दीर्घकालीन आपूर्ति वक्र को दर्शाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 10
चित्र में गहरा रेखाखण्ड (LRMC) दीर्घकालीन आपूर्ति वक्र को दर्शाता है।

प्रश्न 14.
प्रौद्योगिकीय प्रगति एक फर्म के पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
उत्पादन तकनीक में प्रगति के माध्यम से एक फर्म उत्पादन साधनों की समान मात्रा से अधिक उत्पादन कर सकती है। दूसरे शब्दों में, प्रोन्नत उत्पादन तकनीक से उत्पादन के समान स्तर को, साधनों की कम इकाइयों के प्रयोग से भी उत्पन्न किया जा सकता है। प्रोन्नत उत्पादन तकनीक से सीमान्त लागत घट जाती है। अत: SMC वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है जब कोई फर्म उन्नत उत्पादन तकनीक का प्रयोग करती है। आवश्यक रूप से, न्यूनतम AVC से व इससे ऊपर SMC का ऊपर उठता भाग आपूर्ति वक्र होता है। अतः फर्म का आपूर्ति वक्र भी नीचे दायीं ओर खिसक जाता है जब कोई फर्म प्रोन्नत उत्पादन तकनीक का प्रयोग करती है।

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प्रश्न 15.
इकाई कर लगाने में एक फर्म के पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
प्रति इकाई बिक्री पर सरकार द्वारा लगाए गए शुल्क को इकाई शुल्क कहते हैं। इकाई उत्पादन शुल्क आरोपित करने पर फर्म की सीमांत लागत बढ़ जाती है। इससे सीमांत लागत वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है। न्यूनतम AVC से व इससे ऊपर SMC का ऊपर उठता भाग आपूर्ति वक्र को दर्शाता है। अतः कर लगाने पर फर्म का आपूर्ति वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है।

प्रश्न 16.
किसी आगत की कीमत में वृद्धि एक फर्म के पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
उत्पादन आगतों की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हो जाती है। इससे सीमांत लागत बढ़ जाती है। सीमांत लागत वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है। न्यूनतम AVC से व इससे ऊपर SMC का ऊपर उठता हुआ भाग आपूर्ति वक्र होता है। अतः साधनों आगतों की कीमत/लागत बढ़ने से आपूर्ति वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है।

प्रश्न 17.
बाजार में फर्मों की संख्या में वृद्धि, बाजार पूर्ति वक्र को किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर:
फर्मों की संख्या में परिवर्तन होने पर बाजार आपूर्ति वक्र में खिसकाव होता है। फर्मों की संख्या बढ़ोतरी होने पर आपूर्ति में वृद्धि होती है अतः बाजार आपूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है। इसके विपरीत फर्मों की संख्या में कमी होने से बाजार आपूर्ति में कमी आ जाती है। इससे आपूर्ति वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है।

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प्रश्न 18.
पूर्ति की कीमत लोच का क्या अर्थ है? हम इसे कैसे मापते हैं?
उत्तर:
कीमत परिवर्तन के प्रति वस्तु की आपूर्ति में प्रतिक्रियात्मक परिवर्तन की माप को पूर्ति की लोच कहते हैं।
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प्रश्न 19.
निम्न तालिका में कुल संप्राप्ति, सीमान्त संप्राप्ति तथा औसत संप्राप्ति का परिकलन कीजिए । वस्तु की प्रति इकाई बाजार कीमत 10 रुपये है।
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उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 13
प्रति इकाई उत्पाद विक्रय के लिए कीमत 10 रुपये/इकाई है अतः सीमांत आगम MR व औसत आगम AR दोनों कीमत 10 रुपये प्रति इकाई के समान है। जैसे-जैसे फर्म बिक्री का स्तर बढ़ाती है कुल आगत TR एक समान दर से बढ़ती है।

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प्रश्न 20.
निम्न तालिका में एक प्रतिस्पर्धी फर्म की कुल संप्राप्ति तथा कुल लागत सारणियों को दर्शाता जाता है। प्रत्येक उत्पादन स्तर के लाभ की गणना कीजिए। वस्तु की बाजार कीमत भी निर्धारित कीजिए।
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उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 15
प्रत्येक विक्रय स्तर पर वस्तु की कीमत एक समान 5 रुपये प्रति इकाई है।

प्रश्न 21.
निम्न तालिका में एक प्रतिस्पर्धी फर्म की कुल लागत सारणी को दर्शाया गया है। वस्तु की कीमत 10 रुपये दी हुई है। प्रत्येक उत्पादन स्तर पर लाभ की गणना कीजिए। लाभ-अधिकतमीकरण निर्गत स्तर ज्ञात कीजिए।
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उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 17
अधिकतम लाभ का उत्पादन स्तर 7 इकाइयाँ हैं क्योंकि उत्पादन स्तर 8 पर लाभ का स्तर ऋणात्मक है। उत्पाद स्तर 7 पर कुल लागत वक्र नीचे से कुल आगम वक्र को काटेगा।

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प्रश्न 22.
दो फर्मों वाले एक बाजार को लीजिए। निम्न तालिका दोनों फर्मों के पूर्ति सारणियों को दर्शाती है: SS1 कालम में फर्म-1 की पूर्ति सारणी, कालम SS2, में फर्म-2 की पूर्ति साराणि है। बाजार पूर्ति सारणी का परिकलन कीजिए।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 18
उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 19

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प्रश्न 23.
एक दो फर्मों वाले बाजार को लीजिए। निम्न तालिका में कालम SS1 , तथा कालम SS2, क्रमशः फर्म-1 तथा फर्म-2 के पूर्ति सारणियों को दर्शाते हैं। बाजार पूर्ति सारणी का परिकलन कीजिए।
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उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 21

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प्रश्न 24.
एक बाजार में तीन समरूपी फर्म हैं। निम्न तालिका फर्म-1 की पूर्ति सारणी दर्शाती है। बाजार पूर्ति सारणी का परिकलन कीजिए।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 22
उत्तर:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 23

प्रश्न 25.
10 रुपये प्रति इकाई बाजार कीमत पर एक फर्म की संप्राप्ति 50 रुपये है। बाजार कीमत बढ़कर 15 रु. हो जाती है और फर्म को 150 रु. की संप्राप्ति होती है। पूर्ति वक्र की कीमत लोच क्या है?
उत्तर:
कीमत स्तर 10 रु./इकाई पर कुल आगम TR = 50 रु.
पूत का गई इकाइया (y) = \(\frac{TR}{p}\) = \(\frac{50}{10}\) = 5 इकाइयाँ
कीमत स्तर 15 रु./इकाई पर कुल आगम TR = 150 रु.
पूर्ति की/बेची गई इकाइयाँ (y1) = \(\frac{TR}{p}\) = \(\frac{150}{15}\) = 10 इकाइयाँ
कीमत में परिवर्तन ∆p1 = p1 – p0 = 15 – 10 = 5 रु.
मात्रा में परिवर्तन ∆y = y1 – y = 10 – 5 = 5 इकाइयों
es = \(\frac{∆y}{∆p}\) × \(\frac{p}{y}\) = \(\frac{5}{5}\) × \(\frac{10}{5}\) = 2
पूर्ति की लोच = 2

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प्रश्न 26.
एक वस्तु की बाजार कीमत 5 रु. से बदलकर 20 रु. हो जाती है। फलस्वरूप फर्म पूर्ति की मात्रा 15 इकाई बढ़ जाती है। फर्म के पूर्ति वक्र की कीमत लोच 0.5 है। फर्म का आरम्भिक तथा अंतिम निर्गत स्तर ज्ञात करें।
उत्तर:
p = 5 रु.; P1 = 20 रु.
∆p = P1 – p = 20 – 5 = 15 रु;
∆y = 15 इकाइयाँ (दी गई)
es = \(\frac{∆y}{∆p}\) × \(\frac{p}{y}\); 0.5 = \(\frac{15}{15}\) × \(\frac{5}{y}\) अथवा 0.5 × y = 5
y = \(\frac{5}{0.5}\) = \(\frac{50}{5}\) = 10
y1 = y + ∆y [P1 = 15 पर आपूर्ति होगी क्योंकि पूर्ति में उसी दिशा में परिवर्तन होगा जिस दिशा में कीमत बदलती है]
= 10 + 15
= 25
आरम्भिक उत्पादन स्तर = 10 इकाइयाँ, अंतिम उत्पादन स्तर = 25 इकाइयाँ।

प्रश्न 27.
10 रुपये बाजार कीमत पर एक फर्म निर्गत की 4 इकाइयों की पूर्ति करता है। बाजार कीमत बढ़कर 30 रुपये हो जाती है। फर्म की पूर्ति कीमत लोच 1.25 है। नई कीमत पर फर्म कितनी मात्रा की पूर्ति करेगी?
उत्तर:
p = 10; y = 4 इकाइयाँ, P1 = 30 रुपये, y1 = ?, es = 1.25
∆p = P1 – p = 30 – 10 = 20 रुपये,
∆y = y1 – y = y1 – 4 इकाइयाँ
es = \(\frac{∆y}{∆p}\) × \(\frac{p}{y}\); 1.25 = \(\frac { y_{ 1 }-4 }{ 8 } \) × \(\frac{10}{4}\)
अथवा 1.25 = \(\frac { y_{ 1 }-4 }{ 8 } \) अथवा y1 – 4 = 1.25 × 8
अथवा y1 – 4 = 10.00 अथवा y1 = 10 + 4 = 14 इकाइयाँ
नई कीमत पर फर्म 14 इकाइयों की पूर्ति करेगी।

Bihar Board Class 12 Economics पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्थिर लागत का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह उत्पादन लागत जो उत्पादन स्तर में परिवर्तन स्तर में परिवर्तन के साथ परिवर्तित नहीं होती है स्थिर लागत कहलाती है। जैसे इमारत का किराया, स्थायी कर्मचारियों का वेतन आदि।

प्रश्न 2.
परिवर्तनशील लागत का अर्थ उदाहरण सहित लिखो।
उत्तर:
वह लागत जो उत्पादन स्तर में परिवर्तन के साथ परिवर्तित होती रहती है परिवर्तनशील लागत कहलाती है। जैसे कच्चे माल का मूल्य, अस्थायी कर्मचारियों का वेतन आदि।

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प्रश्न 3.
परिवर्तनशील औसत लागत का अर्थ लिखो।
उत्तर:
प्रति इकाई उत्पाद की परिवर्तनशील लागत को औसत परिवर्तनशील लागत कहते हैं।

प्रश्न 4.
वास्तविक लागत का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
उत्पादन आगतों के स्वामी उन्हें पूर्ति करने में जो त्याग, दर्द, कष्ट आदि उठाते हैं, वास्तविक लागत कहते हैं।

प्रश्न 5.
लागत फलन को परिभाषित करो।
उत्तर:
उत्पादन की निश्चित मात्रा का उत्पादन करने पर जो लागत आती है उसे लागत फलन कहते हैं। अथवा उत्पादन मात्रा एवं लागत के संबंध को लागत फलन कहते हैं।

प्रश्न 6.
सीमान्त लागत की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
उत्पाद की एक अतिरिक्त इकाई का उत्पादन बढ़ाने पर कुल लागत या कुल परिवर्तनशील लागत में जो वृद्धि होती है उसे सीमांत लागत कहते हैं।

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प्रश्न 7.
सीमांत लागत वक्र की सामान्य आकृति बताओ।
उत्तर:
सीमांत लागत वक्र की सामान्य आकृति अंग्रेजी अक्षर U जैसी होती है।

प्रश्न 8.
औसत स्थिर लागत (AFC) वक्र की प्रकृति लिखो।
उत्तर:
औसत स्थिर लागत (AFC) हमेशा ऋणात्मक ढाल का वक्र होता है।

प्रश्न 9.
बाजार का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
बाजार शब्द से अभिप्राय उस सम्पूर्ण क्षेत्र से है जिसमें क्रेता एवं विक्रेता फैले होते हैं और वस्तु विनिमय का व्यापार करते हैं।

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प्रश्न 10.
पूर्ण प्रतियोगिता की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
बाजार की वह स्थिति जिसमें बहुत अधिक क्रेता एवं विक्रेता समांगी वस्तु का विनिमय करते हैं।

प्रश्न 11.
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में कीमत स्वीकारक कौन होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में फर्म/उत्पादक कीमत स्वीकारक होती है।

प्रश्न 12.
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में व्यक्तिगत फर्म का माँग वक्र किस प्रकृति का होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में एक व्यक्तिगत फर्म का माँग वक्र पूर्णतः लोचदार होता है। अथवा व्यक्तिगत फर्म का प्रतियोगी बाजार में क्षैतिज अक्ष के समांतर होता है।

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प्रश्न 13.
कुल आगम का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
कुल उत्पाद तथा इकाई कीमत के गुणनफल को कुल आगम कहते हैं।
कुल आगम = उत्पाद मात्रा × प्रति इकाई कीमत

प्रश्न 14.
लाभ की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
कुल आगम तथा कुल लागत के अंतर को लाभ कहते हैं। दूसरे शब्दों में, लागत के ऊपर अर्जित कुछ आगम को लाभ कहते हैं।

प्रश्न 15.
कीमत स्वीकारक फर्म के लिए औसत एवं कीमत में संबंध लिखो।
उत्तर:
कीमत स्वीकारक फर्म के लिए औसत आगम सदैव कीमत के बराबर होती है।

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प्रश्न 16.
कीमत स्वीकारक फर्म के लिए सीमान्त आगम एवं कीमत में संबंध लिखो।
उत्तर:
कीमत स्वीकारक फर्म के लिए सीमांत आगम एवं कीमत दोनों एक समान होते हैं।

प्रश्न 17.
आपूर्ति का अर्थ लिखो।
उत्तर:
निश्चित कीमत व निश्चित समय पर कोई फर्म किसी वस्तु की जितनी मात्रा में बिक्री करती है उसे आपूर्ति कहते हैं।

प्रश्न 18.
आपूर्ति एवं स्टॉक में अंतर लिखो।
उत्तर:
किसी निश्चित समय बिन्दु पर एक फर्म के पास उपलब्ध उत्पाद की मात्रा को स्टॉक कहते हैं। एक निश्चित समय में दी गई कीमत पर उत्पादक वस्तु की जितनी मात्रा बेचने को तैयार होता है उसे आपूर्ति कहते हैं।

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प्रश्न 19.
व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह अनुसूची जो विभिन्न कीमत स्तरों पर एक फर्म द्वारा बेची गई विभिन्न मात्राओं को दर्शाती है, व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची कहलाती है।

प्रश्न 20.
बाजार पूर्ति अनुसूची का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह अनुसूची जो विभिन्न कीमत स्तरों पर बाजार में उपस्थित सभी विक्रेताओं द्वारा बेची गई उत्पाद की मात्राओं के योग को दर्शाती है उसे बाजार पूर्ति अनुसूची कहते हैं।

प्रश्न 21.
पूर्ति में वृद्धि का अर्थ लिखो।
उत्तर:
जब किसी वस्तु की मात्रा में उसकी कीमत के अलावा अन्य कारकों के कारण वृद्धि होती है तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहते हैं।

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प्रश्न 22.
सीमान्त आगम की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
उत्पाद की एक अतिरिक्त इकाई का विक्रय बढ़ाने पर कुल आगम में जितनी वृद्धि होती है उसे सीमांत आगम कहते हैं।

प्रश्न 23.
समविच्छेद बिन्दु क्या होता है?
उत्तर:
वह बिन्दु जिस पर वस्तु की कीमत औसत लागत के समान होती है उसे समविच्छेद बिन्दु कहते हैं। समविच्छेद बिन्दु पर फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त होता है।

प्रश्न 24.
सरकार द्वारा किसी वस्तु की बिक्री पर इकाई उत्पादन शुल्क लगाने पर उसकी पूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
उत्पादन शुल्क लगाने पर फर्म का पूर्ति वक्र ऊपर बायीं ओर खिसक जायेगा।

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प्रश्न 25.
फर्मों की संख्या में परिवर्तन होने पर आपूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
यदि फर्मों की संख्या में वृद्धि होगी तो पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जायेगा। यदि फर्मों की संख्या में कमी होगी तो पूर्ति वक्र ऊपर बायीं ओर खिसक जायेगा।

प्रश्न 26.
साधन आगतों की कीमत कम होने पर आपूर्ति वक्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
साधन आगतों की कीमत घटने पर आपूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जायेगा।

प्रश्न 27.
यदि दो पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं तो इनमें से किस वक्र की पूर्ति लोच अधिक होगी?
उत्तर:
वह पूर्ति वक्र जो दूसरे वक्र की तुलना में ज्यादा चपटा होगा उसकी पूर्ति लोच ज्यादा होती है।

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प्रश्न 28.
पूर्ति में कमी की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
जब किसी वस्तु की मात्रा में उसकी कीमत में अलावा अन्य कारकों के कारण कमी आती है इसे पूर्ति में कमी कहते हैं।

प्रश्न 29.
पूर्ति में संकुचन का अर्थ लिखो।
उत्तर:
अन्य कारक समान रहने पर जब किसी वस्तु की कीमत में कमी होने पर उसकी पूर्ति की गई मात्रा घटती है तो इसे पूर्ति में संकुचन कहते हैं।

प्रश्न 30.
पूर्ति में विस्तार का अर्थ लिखो।
उत्तर:
अन्य कारक समान रहने पर जब किसी वस्तु की कीमत में बढ़ोतरी होने पर उसकी पूर्ति की गई मात्रा बढ़ती है तो इसे पूर्ति में विस्तार कहते हैं।

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प्रश्न 31.
एक फर्म के आपूर्ति वक्र पर तकनीकी प्रगति का प्रभाव लिखो।
उत्तर:
तकनीकी प्रगति से एक फर्म का आपूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
लाभ को ज्यामितीय विधि द्वारा समझाइए।
उत्तर:
कीमत स्तर P1 एवं उत्पादन स्तर y1 पर –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 24

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प्रश्न 2.
यदि MR का मान MC से अधिक हो तो क्या यह अधिकतम लाभ की स्थिति हो सकती है? समझाइए।
उत्तर:
यदि उत्पादन के किसी विशिष्ट स्तर पर फर्म की सीमांत आगम, सीमांत लागत से अधिक है तो इसका अभिप्राय यह होता है कि उस उत्पादन इकाई के उत्पादन से फर्म को उस इकाई की लागत से अधिक आगम प्राप्त हो रहा है। अर्थात् उस इकाई का उत्पादन लाभकारी है। उत्पादन में थोड़ी अधिक वृद्धि करने पर भी MR, MC से अधिक रहता है।

अर्थात् उत्पादन की कुछ और इकाइयों का उत्पादन बढ़ाकर फर्म लाभ को बढ़ा सकती है। अतः जब MR, MC से अधिक होता है तो फर्म उत्पादन स्तर को बढ़ाने का प्रयास करती है और जब तक MR व MC समान नहीं होते उसके लाभ में भी बढ़ोतरी होती रहती है। इसलिए MR, MC से ज्यादा होने पर अधिकतम लाभ की स्थिति उत्पन्न नहीं होती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 25
उत्पादन स्तर y0 पर MR > MC लाभ
उत्पादन स्तर y0 से y1 तक MR > MC लाभ में बढ़ोतरी
उत्पादन स्तर y1 पर MR = MC अधिकतम लाभ

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प्रश्न 3.
यदि MR का मान MC से कम हो तो क्या यह अधिकतम लाभ की स्थिति हो सकती है? समझाइए।
उत्तर:
यदि किसी विशिष्ट उत्पादन स्तर पर MR, MC से कम होता है, इसका मतलब यह होता है कि उस इकाई का उत्पादन करने पर फर्म को उसकी लागत से कम आगम प्राप्त होता है। अतः उस इकाई. का उत्पादन फर्म के लिए हानिप्रद है। उत्पादन स्तर में थोड़ी कमी से भी MR, MC से कम रहता है अर्थात् फर्म को हानि उठानी पड़ती है लेकिन हानि के स्तर में उत्पादन स्तर में वृद्धि करने पर कमी आती है।

फर्म उत्पादन स्तर को कम करती है, जब तक MR, MC से कम होती है और इस प्रकार उत्पादन स्तर कम करके कुल हानि में भी कमी आती है। उत्पादन स्तर घटाने का सिलसिला उस उत्पादन स्तर तक रहता है जब तक MR व MC समान नहीं होते हैं। अतः यदि MR का मान MC से कम होता है तो यह अधिकतम लाभ की स्थिति नहीं हो सकती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 26
चित्र में उत्पादन स्तर y0 पर MR < MC हानि
उत्पादन स्तर y0 से y1 तक MR < MC हानि
उत्पादन स्तर y1 पर MR = MC अधिकतम लाभ

प्रश्न 4.
दीर्घकालीन समता बिन्दु की अवधारणा समझाइए।
उत्तर:
दीर्घकाल में फर्म उत्पादन बढ़ाना उस स्तर तक जारी रखती है जब तक कीमत, न्यूनतम दीर्घकालीन औसत लागत (LARC) से अधिक रहती है। जब कीमत न्यूनतम LRAC के समान हो जाती है तो फर्म उत्पादन स्तर न बढ़ाने का निर्णय कर सकती है। यदि कीमत, न्यूनतम LRAC से कम रह जाती है तो फर्म उत्पाद को बेचकर प्राप्त आगम से कुल लागत को पूरा नहीं कर सकती है।

अत: फर्म उत्पादन के उस स्तर पर उत्पादन बढ़ाना बंद करती है जहाँ (Min.) LRAC कीमत के बराबर होती है। अतः आपूर्ति वक्र नीचे चला जाता है। अंतिम कीमत उत्पादन स्तर संयोजन वहाँ प्राप्त होता है जहाँ LRMC वक्र, LRAC वक्र को नीचे से काटता है। इस बिन्दु पर कीमत, न्यूनतम LRAC दोनों समान हो जाते हैं इस बिन्दु से उत्पादन स्तर घटाने पर कुल TR, कुल लागत से कम हो जाती है। आगे और फर्म को हानि उठानी पड़ती है। अत: फर्म को उस बिन्दु से आगे उत्पादन बढ़ाना पसंद नहीं जहाँ LRAC, कीमत के समान हो जाती है उससे आगे उत्पाद बढ़ाने पर फर्म को उठानी पड़ती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 27

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प्रश्न 5.
क्या होता है जब कीमत, न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत से अधिक परंतु न्यूनतम औसत लागत से कम होती है?
उत्तर:
माना उत्पादन स्तर y निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा करता है –

  1. कीमत, न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत से अधिक है तथा
  2. कीमत, अल्पकालीन न्यूनतम औसत लागत से कम है।

कीमत का मान न्यूनतम SAC से कम है अर्थात फर्म को हानि पड़ेगी। कीमत का मान न्यूनतम AVC से ज्यादा है इसका अभिप्राय है TR का मान TVC से अधिक होगा। इस स्थिति में फर्म उत्पाद को बेचकर सम्पूर्ण लागत की भरपाई नहीं कर सकती है। फर्म TVC एवं TFC का कुछ भाग उत्पाद को बेचकर पूरा कर रही है। यदि फर्म उत्पादन स्तर शून्य रखने का निर्णय करेगी तो फर्म की कुल हानि कुल स्थिर लागत के समान होगी। इस प्रकार हानि के स्तर को कम करने के लिए फर्म उत्पादन का धनात्मक स्तर उत्पन्न करने का निर्णय लेगी।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 28
जब P = Min AVC कुल हानि सम्पूर्ण छायांकित भाग
जब P > Min AVC and
P < Min SAC – हानि क्रोस छायांकित भाग

प्रश्न 6.
संक्षेप में फर्म का अल्पकालीन समता बिन्दु (Shutdown point) समझाइए।
उत्तर:
अल्पकाल में फर्म उस उत्पादन स्तर तक उत्पादन करने का निर्णय करती है जब तक कीमत, न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत (Min AVC) के समान या इससे अधिक होती है। यदि कीमत स्तर, न्यूनतम AVC से कम हो जाता है तो फर्म अपनी कुल परिवर्तनशील लागत की भरपाई उत्पाद को बेचकर प्राप्त आगम से नहीं कर सकती है। अतः यह बिन्दु जिस पर SMC नीचे से AVC वक्र को काटती है फर्म का अल्पकालीन समता बिन्दु होता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 29

प्रश्न 7.
उत्पादक संतुलन का अर्थ समझाइए।
उत्तर:
उत्पादक संतुलन उत्पादन की वह स्थिति होती है जब फर्म को अधिकतम लाभ प्राप्त होता है। उत्पादक की साम्य अवस्था में फर्म का कुल आगम, कुल लागत समान होता है। गणितीय रूप में उत्पादक संतुलन को नीचे लिखा गया है –
कुल आगम (TR) = कुल लागत (TC)
दूसरे शब्दों में उत्पादक उस स्थिति में साम्य की अवस्था में होता है जब फर्म उत्पाद के लिए मिलने वाला कीमत सीमांत लागत के बराबर होती है। साम्य की अवस्था में – कीमत (AR) = सीमांत लागत (MC) साम्य की अवस्था में फर्म को केवल सामान्य लाभ प्राप्त होता है।

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प्रश्न 8.
संक्षेप में समविच्छेद बिन्द की अवधारणा स्पष्ट करो।
उत्तर:
दीर्घकाल में यदि कोई फर्म सामान्य लाभ से कम अर्जित करती है तो वह उत्पादन कतई नहीं करती है। अल्पकाल में कोई फर्म सामान्य लाभ से कम स्तर पर भी उत्पादन कर सकती है। दूसरे शब्दों में फर्म हानि उठाकर भी उत्पादन जारी रख सकती है। लेकिन कोई भी फर्म अल्पकाल में भी उत्पादन नहीं करेगी। यदि उत्पाद की कीमत, न्यूनतम औसत परिवर्तनशील लागत से कम रहती है। आपूर्ति वक्र पर वह बिन्दु जिस पर फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त होता है समविच्छेद बिन्दु कहलाता है। अल्पकाल में जिस बिन्दु पर SMC वक्र नीचे से AVC वक्र को न्यूनतम बिन्दु पर काटता है। दीर्घकाल में समविच्छेद बिन्दु आपूर्ति वक्र RMC वक्र के उस बिन्दु पर होता है जहाँ LRMC वक्र, LRAC वक्र के न्यूनतम बिन्दु पर नीचे से काटता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 30
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 31

प्रश्न 9.
उदाहरण सहित सामान्य लाभ की परिभाषा समझाइए।
उत्तर:
उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादन करने के लिए फर्म विभिन्न साधन आगतों का प्रयोग करती है। अधिकांशतः साधनों का प्रयोग करने के लिए फर्म इनकी कीमत प्रत्यक्ष रूप से चुकाती है। फर्म उत्पादन में कुछ निजी साधनों का प्रयोग भी करती है। निजी साधनों के बाजार मूल्य को अस्पष्ट लागत कहते हैं। स्पष्ट लागतों एवं अस्पष्ट लागतों के योग को कुल लागत कहते हैं।

उत्पाद को बाजार में बेचकर फर्म जितना आगम प्राप्त करती है उसे कुल आगम कहते हैं। कुल लागत पर कुल आगम के अधिशेष को लाभ कहते हैं। लाभ का वह स्तर जिस पर फर्म केवल स्पष्ट एवं अस्पष्ट लागतों की भरपाई कर पाती है सामान्य लाभ कहलाता है। दूसरे शब्दों में सामान्य लाभ वह न्यूनतम लाभ होता है जो फर्म को व्यवस्था में बने रहने के लिए अवश्य प्राप्त होना चाहिए। सामान्य लाभ को शून्य लाभ भी कहते हैं क्योंकि इस स्तर पर फर्म की कुल आगम व कुल लागत दोनों एक समान होते हैं।

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प्रश्न 10.
अवसर लागत की अवधारणा को समझाइए।
उत्तर:
किसी गति विधि की अन्य सभी वैकल्पिक गतिविधियों के अधिकतम् मूल्य को अवसर लागत कहते हैं। माना पारिवारिक व्यापार में निवेश के अलावा वह उक्त धनराशि को शून्य प्रतिफल के लिए अपनी तिजोरी में रख सकता है अथवा 10 प्र.श. ब्याज पर बैंक में जमा करवा सकता है। अतः वैकल्पिक गतिविधियों में निवेश का अधिकतम प्रतिफल बैंक में धनराशि जमा करवाना है। बैंक जमा करवाना पारिवारिक व्यापार में निवेश की अवसर लागत है। एक बार घरेलू व्यापार में निवेश करने के बाद अवसर लागत की अवधारणा खत्म हो जाएगी। परंतु जब तक पारिवारिक व्यापार में निवेश नहीं किया जाता है तब तक बैंक जमा से ब्याज के रूप में प्रतिफल पारिवारिक व्यापार में निवेश की अवसर लागत है।

प्रश्न 11.

  1. इकाई लोचदार पूर्ति वक्र एवं
  2. शून्य लोचदार पूर्ति वक्र बनाइए

उत्तर:
1. धनात्मक ढाल वाला पूर्ति वक्र जो मूल बिन्दु से गुजरता है, इकाई लोचदार पूर्ति को दर्शाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 32

2. क्षैतिज अक्ष पर लम्बवत पूर्ति वक्र, शून्य लोचदार को दर्शाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 33

प्रश्न 12.
कोई तीन कारक लिखिए जो आपूर्ति वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसकाते हैं।
उत्तर:
पूर्ति को ऊपर/बायीं ओर खिसकाने वाले कारक:

  1. साधन आगतों की कीमत में वृद्धि
  2. उत्पाद शुल्क लगाना/उत्पाद शुल्क में वृद्धि
  3. फर्मों की संख्या में कमी
  4. प्रतिस्थापक वस्तुओं की कीमत में वृद्धि

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प्रश्न 13.
आपूर्ति के नियम का अर्थ लिखो। इसे आपूर्ति अनुसूची एवं वक्र द्वारा समझाइए।
उत्तर:
अन्य कारक समान रहने पर वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उत्पादक उसकी अधिक करता है तथा वस्तु की कीमत में कमी होने पर उत्पादक वस्तु की कम मात्रा में पूर्ति करता है। इसे पूर्ति का नियम कहते हैं। पूर्ति के नियम को पूर्ति अनुसूची व वक्र की सहायता से समझाया जा सकता है –

पूर्ति अनुसूची:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 34

पूर्ति अनुसूची विभिन्न कीमतों पर वस्तु की पूर्ति की गई मात्राओं को दर्शाती है। जैसे जैसे कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो पूर्ति की मात्रा भी बढ़ती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 35
पूर्ति वक्र का ढाल धनात्मक है जो इस बात को दर्शाता है कि पूर्ति की मात्रा वस्तु की कीमत बढ़ने पर बढ़ जाती है।

प्रश्न 14.
समांगी उत्पाद होने का क्या अर्थ है ? बाजार में इसका कीमत निर्धारण में प्रभाव समझाइए।
उत्तर:
समांगी उत्पाद का अभिप्राय है एक समान वस्तु। इसका मतलब होता है सभी उत्पादकों द्वारा उत्पादित वस्तुएँ रंग, आकार, शक्ल, स्वाद आदि में एकदम एक जैसी होती है। समांगी वस्तु का परिणाम यह होता है कि बाजार में सभी उत्पादक वस्तु की समान कीमत प्राप्त कर सकते हैं। यदि कोई भी उत्पादक बाजार कीमत से अधिक वसूलने की हिम्मत करता है तो समांगी वस्तु उपलब्ध होने के कारण वह वस्तु की मात्रा बाजार में नहीं बेच सकता है। अर्थात समांगी वस्तु उपलब्ध होने के कारण एक कीमत स्वीकारक के रूप में कार्य करती है वह स्वयं कीमत का निर्धारण नहीं कर सकती है।

प्रश्न 15.
वे कारक लिखो जो पूर्ति वक्र को नीचे/दायीं ओर खिसकाते हैं।
उत्तर:
पूर्ति वक्र को दायीं ओर खिसकाने के लिए उत्तरदायी कारक:

  1. साधन आगतों की कीमत में कमी
  2. उत्पाद शुल्क में कमी
  3. उत्पादन तकनीक में प्रगति
  4. फर्मों की संख्या में वृद्धि

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प्रश्न 16.
माँग वक्र पर संचरण तथा माँग वक्र में खिसकाव में अंतर लिखो।
उत्तर:
यदि अन्य कारकों के समान रहने पर वस्तु की कीमत बढ़ने से पूर्ति की मात्रा बढ़ जाती है अथवा वस्तु की कीमत कम होने पर पूर्ति की गई मात्रा कम हो जाती है तो इससे पूर्ति वक्र पर संचरण होता है। जबकि वस्तु की कीमत समान रहने पर अन्य कारकों में अनुकूल परिवर्तन से पूर्ति बढ़ जाती है अथवा अन्य कारकों में प्रतिकूल परिवर्तन से पूर्ति कम हो जाती है इससे पूर्ति वक्र में खिसकाव होता है।

पूर्ति वक्र पर संचरण पूर्ति में विस्तार या संकुचन की स्थिति में होता है जबकि पूर्ति वक्र में खिसकाव पूर्ति में वृद्धि या कमी होने पर होता है। पूर्ति में विस्तार की स्थिति में पूर्ति वक्र पर नीचे ऊपर तथा पूर्ति में संकुचन की स्थिति में ऊपर से नीचे संचरण होता है जबकि पूर्ति में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र में खिसकाव नीचे/दायीं ओर होता है व पूर्ति में कमी होने पर पूर्ति वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 36

प्रश्न 17.
पूर्ति की गई मात्रा में परिवर्तन तथा पूर्ति में परिवर्तन में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:
यदि अन्य कारकों के समान रहने पर कीमत में वृद्धि होने पर पूर्ति बढ़ जाती है अथवा वस्तु की कीमत कम होने पर पूर्ति घट जाती है तो इसे पूर्ति की गई मात्रा में परिवर्तन कहते हैं जबकि वस्तु की कीमत समान रहने पर अन्य कारकों में अनुकूल परिवर्तन से पूर्ति में वृद्धि तथा अन्य कारकों में वृद्धि तथा अन्य कारकों में प्रतिकूल परिवर्तन से वस्तु की पूर्ति कमी को पूर्ति में परिवर्तन कहते हैं। पूर्ति की गई मात्रा में परिवर्तन से पूर्ति अनुसूची में बदलाव नहीं होता है जबकि पूर्ति में परिवर्तन से पूर्ति अनुसूची बदला जाती है। पूर्ति की गई मात्रा में परिवर्तन होने पर पूर्ति वक्र पर संचरण होता है जबकि पूर्ति में परिवर्तन होने पर पूर्ति वक्र में खिसकाव होता है।

प्रश्न 18.
नीचे चित्र में विभिन्न आपूर्ति वक्र दर्शाए गए हैं। घटते क्रम में पूर्ति लोच की श्रेणियाँ लिखो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 37
उत्तर:
पूर्ति वक्र का ढ़ाल पूर्ति की लोच को निर्धारित करता है। वह सीधी रेखा जो मूल बिन्दु से गुजरती है इकाई लोचदार पूर्ति को दर्शाती है। इस वक्र की तुलना अधिक चपटे वक्र की पूर्ति लोच इकाई से अधिक तथा इससे अधिक ऊर्द्धवाधर ढाल वाले वक्र की पूर्ति लोच इकाई से कम होती है। इन तथ्यों के आधार पर चित्र में दर्शाए गए वक्रों की पूर्ति लोच इस प्रकार होगी –

  1. वक्र C अधिक चपटा है वक्र B की तुलना में अतः यह इकाई से अधिक लोचदार पूर्ति को दर्शाता है।
  2. वक्र B, बिन्दु से गुजर रहा है, इसकी पूर्ति लोच इकाई है।
  3. पूर्ति वक्र A अधिक उर्ध्वाधर है वक्र B की अपेक्षा अतः इसकी पूर्ति लोच इकाई से कम है।

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प्रश्न 19.
उत्पाद की अंतिम इकाई से प्राप्त आगम को सीमांत आगम कहते हैं। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर:
नहीं, उत्पाद की अंतिम इकाई से प्राप्त आगम सीमांत आगम नहीं होता है। उत्पाद की एक अतिरिक्त इकाई का विक्रय करने पर कुल आगम में होने वाली बढ़ोतरी को सीमान्त आगम कहते हैं।
MR = TRn – TRn – 1
अतः सीमांत आगम उत्पाद की अंतिम इकाई की बिक्री से प्राप्त आगम नहीं हो सकता है।

प्रश्न 20.
एक प्रतियोगी फर्म के लिए सीमांत आगम व कुल आगम में संबंध लिखो।
उत्तर:
सीमांत आगम तथा कुल आगम में संबंध –

  1. जब सीमांत आगम धनात्मक होता है और इसमें बढ़ने की प्रवृत्ति पायी जाती है तब कुल आगम अधिक दर से बढ़ता है।
  2. जब सीमांत आगम धनात्मक होता है लेकिन उसमें घटने की प्रवृत्ति पायी जाती है तब कुल घटती दर से बढ़ता है।
  3. जब सीमांत आगम शून्य होता है तब कुल आगम अधिकतम होता है।
  4. जब सीमांत आगम ऋणात्मक होता है तब कुल आगम घटने लगता है।

प्रश्न 21.
एक अप्रतियोगी फर्म के लिए औसत आगम तथा कुल आगम में संबंध लिखो।
उत्तर:
औसत आगम तथा कुल आगम में संबंध:

  1. जब औसत आगम में वृद्धि होती है, कुल आगम अधिक दर से बढ़ती है।
  2. जब औसत आगम में कमी होती है, कुल आगम में घटती हुई दर से बढ़ोतरी होती है।
  3. औसत आगम तथा कुल आगम किसी भी धनात्मक विक्रय स्तर पर शून्य एवं धनात्मक नहीं हो सकते हैं।

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प्रश्न 22.
पूर्ति में वृद्धि में कमी में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:
वस्तु की कीमत समान रहने पर जब अन्य कारकों में अनुकूल परिवर्तन होने पर पूर्ति बढ़ जाती है तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहते हैं। वस्तु की कीमत समान रहने पर जब अन्य कारकों में प्रतिकूल परिवर्तन होने पर पूर्ति घट जाती है तो इसे पूर्ति में कमी कहते हैं। पूर्ति में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है जबकि पूर्ति में कमी होने पर पूर्ति वक्र ऊपर की ओर खिसक जाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 38

प्रश्न 23.
पूर्ति में विस्तार तथा पूर्ति में वृद्धि में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:
यदि अन्य कारकों के समान रहने पर कीमत में वृद्धि होने से वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती . है तो इसे पूर्ति में विस्तार कहते हैं, जबकि वस्तु की कीमत समान रहने पर यदि अन्य कारकों में अनुकूल परिवर्तन होने से पूर्ति बढ़ जाती है इसे पूर्ति में वृद्धि कहते हैं। पूर्ति में विस्तार होने पर पूर्ति अनुसूची नहीं बदलती है जबकि पूर्ति में वृद्धि होने पर पूर्ति अनुसूची में बदल जाती है। पूर्ति में विस्तार की स्थिति में उसी पूर्ति वक्र पर नीचे से ऊपर संचरण होता है जबकि पूर्ति में वृद्धि की स्थिति में पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 39

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प्रश्न 24.
पूर्ति में संकचन तथा पूर्ति में कमी में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:
यदि अन्य कारकों के समान रहने पर कीमत में कमी होने से वस्तु की पूर्ति कम हो जाती है तो इसे पूर्ति में संकुचन कहते हैं जबकि वस्तु की कीमत समान रहने पर यदि अन्य कारकों में प्रति अनुकूल परिवर्तन होने से पूर्ति घट जाती है इसे पूर्ति में कमी कहते हैं। पूर्ति में संकुचन होने पर पूर्ति अनुसूची नहीं बदलती है। जबकि पूर्ति में कमी होने से पूर्ति अनुसूची बदल जाती है। पूर्ति में संकुचन की स्थिति में उसी पूर्ति वक्र पर ऊपर नीचे संचरण होता है जबकि पूर्ति में कमी की स्थिति में पूर्ति वक्र ऊपर बायीं ओर खिसक जाता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 40

प्रश्न 25.
पूर्ति की लोच की परिभाषा दीजिए। पूर्ति की लोच ज्ञात करने के लिए प्रतिशत विधि को समझाइए।
उत्तर:
पूर्ति की लोच पूर्ति की गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन की माप जो वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण होती है।
माना आरंभिक कीमत (p) पर वस्तु की पूर्ति = q1
कीमत स्तर (p) पर पूर्ति = q1
कीमत में परिवर्तन ∆p = P1 – p
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प्रश्न 26.
पूर्ति में विस्तार तथा पूर्ति में संकुचन में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर:
अन्य कारकों के समान रहने पर कीमत बढ़ने से वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है तो इसे पूर्ति में विस्तार कहते हैं। अन्य कारकों के समान रहने पर कीमत घटने से वस्तु की पूर्ति घट जाती है तो इसे पूर्ति में संकुचन कहते हैं। पूर्ति में विस्तार होने पर पूर्ति वक्र पर नीचे से ऊपर संचरण होता है पूर्ति में संकुचन होने पर पूर्ति वक्र पर ऊपर से नीचे संचरण होता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 42

प्रश्न 27.
वस्तु की पूर्ति एवं समय अवधि में संबंध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. अति अल्पकाल अथवा बाजारकाल इतनी छोटी अवधि होती है कि इसमें फर्म उत्पादन के सभी साधनों में परिवर्तन नहीं कर सकती है।
  2. अल्पकाल वह समय अवधि होती है जिसमें फर्म केवल परिवर्तनशील साधन को बदल सकती है जबकि अन्य साधन स्थिर रहते हैं। अत: फर्म उत्पादन के परिवर्तनशील साधन की इकाइयों को बढ़ाकर ही उत्पादन को बढ़ा सकती है।
  3. अर्थात फर्म एक सीमित सीमा तक ही वस्तु की पूर्ति को प्रभावित कर सकती है।
  4. दीर्घकाल में उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं। अतः इस अवधि फर्म साधनों के प्रयोग से वस्तु की पूर्ति को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस अवधि में पूर्ति लोचदार होती है।
    Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 43

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प्रश्न 28.
मूल बिन्दु से गुजरने वाले पूर्ति वक्र की लोच 1 इकाई क्यों होती है।
उत्तर:
आपूर्ति वक्र के किसी बिन्दु पर \(\frac{\mathrm{MY}_{0}}{\mathrm{OY}_{0}}\) का अनुपात पूर्ति लोच कहलाता है जहाँ MY0 मात्रा अक्ष का भाग है। M मात्रा अक्ष का वह बिन्दु जहाँ पूर्ति व क्रय विस्तारित पूर्ति वक्र क्षैतिज अक्ष को काटता है। Y0 वह बिन्दु है जहाँ पूर्ति वक्र से क्षैतिज रेखा पर डाला गया लम्ब क्षैतिज अक्ष को काटता है।

OP0 कीमत अक्ष का वह बिन्दु है जहाँ पूर्ति वक्र से खींचा गया लम्ब कीमत अक्ष को काटता है। मूल बिन्दु से गुजरने वाले वक्र के लिए बिन्दु M तथा O दोनों समान होते हैं। अत: MY0 तथा OY0 दोनों समान होते हैं। इसलिए मूल बिन्दु से गुजरने वाले वक्र के लिए MY0 व OY0 का अनुपात 1 होता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 44
es = \(\frac{\mathrm{MY}_{0}}{\mathrm{OY}_{0}}\) = \(\frac{\mathrm{OY}_{0}}{\mathrm{OY}_{0}}\) [∵MY0 = OY0]

प्रश्न 29.
पूर्ति लोच को ज्ञात करने की ज्यामीतिय विधि समझाइए।
उत्तर:
पूर्ति लोच की गणना आपूर्ति वक्र के उदगम के आधार पर की जाती है। पूर्ति वक्र पर स्थित किसी बिन्दु s पर MY0 तथा OY0 के अनुपात से पूर्ति लोच की गणना की जाती है। M मात्रा अक्ष का वह बिन्दु है जिस पर पूर्ति वक्र या विस्तारित पूर्ति वक्र, मात्रा अक्ष को काटता है, Y0 मात्रा अक्ष पर वह बिन्दु है जिस पर बिन्दु s से क्षैतिज अक्ष पर डाला गया लम्ब मिलता है।
es = \(\frac{\mathrm{MY}_{0}}{\mathrm{OY}_{0}}\)
यदि MY0 > OY0 तो पूर्ति की लोच इकाई से अधिक होगी
यदि MY0 = OY0 तो पूर्ति की लोच के समान होगी
यदि MY0 < OY0 तो पूर्ति की लोच इकाई से कम होगी
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 45
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 45a

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प्रश्न 30.
एक पूर्ण प्रतियोगी फर्म का माँग वक्र पूर्णतया लोचदार क्यों होता है?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी बाजार में एक समान कीमत होने का कारण यह है कि इस बाजार में अधिक क्रेता व विक्रेता समान वस्तु का आदान प्रदान करते हैं। क्रेता व विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है। क्रेता न्यूनतम कीमत पर वस्तु का क्रय करते हैं। यदि कोई विक्रेता अपने उत्पाद की ऊँची कीमत तय करता है तो कोई भी क्रेता उसकी वस्तु क्रय नहीं करता है, और उस फर्म को बाजार से बाहर जाना पड़ता है। प्रत्येक फर्म यह जानती है कि बाजार में इसके द्वारा की गई पूर्ति का क्या महत्व है अर्थात बाजार कीमत पर कितनी मात्रा में बिक्री की जायेगी। कोई भी फर्म बाजार कीमत से कम कीमत नहीं स्वीकार कर सकती है इसलिए एक फर्म का माँग वक्र पूर्तियोगिता में पूर्णतया लोचदार होता है।

प्रश्न 31.
पूर्ण प्रतियोगी फर्म का MR व AR का मान स्थिर क्यों होता है।
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी फर्म के MR व AR वक्र x अक्ष के समांतर होते हैं जो Y – 3 अक्ष को कीमत स्तर p पर काटते हैं। ये दोनों वक्र कीमत रेखा होते हैं। पूर्ण प्रतियोगी फर्म के AR एवं MR का मान समान व स्थिर होता है। पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत समान रहने के कारण AR व MR का मान स्थिर रहता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 46

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित को समझाइए।

  1. उत्पादन साधनों का न्यूनतम लागत संयोजन
  2. समविच्छेद बिन्दु

उत्तर:
1. उत्पादन साधनों का न्यूनतम लागत संयोजन:
प्रत्येक उत्पादन इकाई का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। इस लक्ष्य को पाने के लिए फर्म उत्पादन साधनों के ऐसे संयोजनों का चयन करती है जिससे उसकी उत्पादन लागत न्यूनतम हो जाए। उत्पादन साधनों का ऐसा संयोजन जिसकी लागत न्यूनतम होती है, न्यूनतम लागत संयोजन कहलाता है।

2. समविच्छेद बिन्दु:
वह बिन्दु जिस पर फर्म की कुल आगम उसकी कुल उत्पादन लागत के समान होती है समविच्छेद बिन्दु कहलाता है। दूसरे शब्दों में जिस बिन्दु पर कुल औसत लागत वस्तु की कीमत के बराबर होती है समविच्छेद बिन्दु कहलाता है। समविच्छेद बिन्दु पर फर्म को सामान्य लाभ प्राप्त होता है। इसका अभिप्राय यह है कि न तो फर्म को हानि होती है और न लाभ। परंतु इस बिन्दु पर फर्म का कुल लाभ अधिकतम होता है।
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Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत

प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत फर्म की संतुलन/साम्य अवस्था को समझाइए।
उत्तर:
एक पूर्ण प्रतियोगी फर्म संतुलन की अवस्था में उस बिन्दु पर पहुँचती है जहाँ सीमांत लागत बढ़ती हुई स्थिति में कीमत रेखा को काटती है। पूर्ण प्रतियोगी फर्म की साम्य अवस्था को नीचे चित्र की सहायता से समझाया जा सकता है। चित्र में बिन्दु E अधिकतम लाभ की दोनों शर्तों को पूरा करता है इस बिन्दु पर वस्तु की कीमत व सीमांत लागत समान है तथा सीमांत लागत का ऊपर उठाता हुआ भाग कीमत रेखा को काटता है। इस बिन्दु पर कुल लाभ ज्यादा होगा।
कुल आगम = कीमत रेखा के अंतर्गत क्षेत्रफल कुल आगम = क्षेत्रफल
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 48

उत्पादन (इकाइयाँ) उत्पादन स्तर OQ पर फर्म को अधिकतम लाभ मिलेगा। इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी उत्पादन स्तर पर कुल लाभ बिन्दु E पर लाभ की तुलना में कम होगा। अतः फर्म का संतुलन बिन्दु वहाँ स्थापित होता है जहाँ सीमांत लागत वक्र का ऊपर उठता हुआ भाग कीमत रेखा को काटता है।

प्रश्न 3.
वस्तु की पूर्ति लोच को प्रभावित करने वाले कारक समझाइए।
उत्तर:
पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले कारक:
1. प्रयोग में लाए जाने वाले साधनों की प्रकृति:
वस्तु की पूर्ति लोच साधनों की प्रकृति से प्रभावित होती है। यदि वस्तु के उत्पादन में विशिष्ट साधनों का प्रयोग किया जाता है तो वस्तु की पूर्ति बेलोचदार होती है। दूसरी ओर यदि वस्तु के उत्पादन में सामान्य रूप उपलब्ध साधनों का प्रयोग किया जाता है तो वस्तु की पूर्ति लोचदार होती है।

2. प्राकृतिक कारक:
प्राकृतिक कारक भी वस्तु की पूर्ति लोच को प्रभावित करते हैं यदि किसी वस्तु के उत्पादन में अधिक समय लगता है तो वस्तु की पूर्ति बेलोचदार होती है। उदाहरण के लिए जैसे टीक लकड़ी के उत्पादन में अधिक समय लगता है तो इसकी पूर्ति बेलोचदार होती है।

3. जोखिम:
वस्तु की पूर्ति लोच उत्पाद की जोखिम वहन करने की इच्छा पर भी निर्भर करती है। यदि उत्पादक की जोखिम उठाने की अधिक तत्परता/इच्छा होती है तो वस्तु की पूर्ति लोच अधिक होती है इसके विपरीत यदि उत्पादक जोखिम उठाने से बचता है तो पूर्ति लोच कम होगी।

4. वस्तु की प्रकृति:
शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं की पूर्ति बेलोचदार होती है तथा टिकाऊ वस्तुओं की पूर्ति लोच अधिक होती है।

5. उत्पादन लागत:
वस्तु की उत्पादन लागत भी पूर्ति लोच को प्रभावित करती है। यदि वस्तु की उत्पादन लागत बढ़ती है तो पूर्ति बेलोचदार होती है इसके विपरीत यदि उत्पादन लागत घटती है तो पूर्ति की लोच ज्यादा होती है।

6. समयावधि:
पूर्ति लोच समयावधि से बहुत ज्यादा प्रभावित होती है। उत्पादक के पास जितना अधिक समय होता है पूर्ति उतनी अधिक लोचदार होती है इसके विपरीत फर्म के जितनी कम समयावधि होती है पूर्ति उतनी ही कम लोचदार होती है। समयावधि के आधार पर पूर्ति लोच को निम्न प्रकार भी समझाया जा सकता है –

7. अति अल्पकाल:
यह समय अवधि इतनी कम होती है कि इसमें उत्पादक साधनों में परिवर्तन नहीं कर सकता है इसलिए पूर्ति लगभग पूर्णतः बेलोचदार होती है।

8. अल्पकाल:
इस समय अवधि में फर्म परिवर्तनशील साधनों की संख्या तो बढ़ा सकती है लेकिन सभी साधनों की संख्या नहीं बढ़ा सकती है अतः इस अवधि में पूर्ति बेलोचदार होती है।

9. दीर्घकाल:
इस अवधि फर्म में सभी साधनों में परिवर्तन कर सकती है अतः कीमत के अनुसार फर्म वस्तु की पूर्ति को बदल सकती है। इस अवधि में पूर्ति लोचदार होती है।

10. उत्पादन तकनीक:
यदि वस्तु के उत्पादन की तकनीक जटिल होती है तो इसे बदलने के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है अतः पूर्ति लोच कम होती है। इसके विपरीत सरल उत्पादन तकनीक से उत्पन्न वस्तु की पूर्ति लोच अधिक होती है।

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प्रश्न 4.
संक्षेप में समझाइए कि विभिन्न कारक वस्तु की पूर्ति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारक –
1. वस्तु की कीमत:
वस्तु की कीमत व उसकी पूर्ति में सीधा संबंध होता है। सामान्यतः ऊँची कीमत पर वस्तु की अधिक पूर्ति की जाती है और नीची कीमत पर वस्तु की पूर्ति की गई मात्रा कम होती है।

2. संबंधित वस्तुओं की कीमत:
प्रतियोगी वस्तु की कीमत और वस्तु की कीमत में विपरीत संबंध होता है। प्रतियोगी वस्तु की कीमत बढ़ने पर, वस्तु सापेक्ष रूप से सस्ती हो जाती है और उत्पादक के लिए उसे बेचना कम लाभप्रद हो जाता है इसलिए उत्पादक वस्तु की कम पूर्ति करता है।

3. फर्मों की संख्या:
फर्मों की संख्या तथा वस्तु की आपूर्ति में सीधा संबंध होता है। किसी वस्तु के उत्पादन में जितनी अधिक संख्या में फर्म संलग्न होती है उसकी पूर्ति उतनी ही अधिक होती है तथा फर्मों की संख्या जितनी कम होती है पूर्ति भी उतनी ही कम होती है।

4. फर्म का उद्देश्य:
यदि फर्म का उद्देश्य अधिक लाभ कमाना होता है तो फर्म ऊँची कीमत पर अधिक उत्पादन/पूर्ति करती है। इसके विपरीत यदि कोई फर्म नाम कमाना चाहती है, यह बिक्री अधिक करना चाहती है या रोजगार स्तर को ऊँचा करना चाहती है तो कम कीमत पर भी फर्म अधिक पूर्ति करने का प्रयास करती है।

5. उत्पादन साधनों की कीमत:
उत्पादन साधनों की कीमत तथा वस्तु की पूर्ति में विपरीत संबंध होता है। यदि उत्पादन आगतों की कीमत कम होती है तो उत्पादन लागत कम आती है इससे फर्म अधिक उत्पादन करती है। इसके विपरीत यदि उत्पादन आगतों की कीमत बढ़ती है तो लागत ऊँची होने के कारण पूर्ति घट जाती है।

6. उत्पादन तकनीक में परिवर्तन:
उत्पादन तकनीक एवं वस्तु की पूर्ति में सीधा संबंध होता है उन्नत उत्पादन तकनीक के प्रयोग से उत्पादन लागत घटती है जिसमें उत्पादक वस्तु की अधिक पूर्ति करता है।

7. भावी कीमत:
यदि उत्पाक को ऐसा लगता है कि निकट भविष्य में वस्तु की कीमत घटने वाली है तो वर्तमान में वस्तु की अधिक पूर्ति करेगा इसके विपरीत यदि निकट भविष्य में कीमत बढ़ने की संभावना होती है तो उत्पादक वस्तु की वर्तमान पूर्ति को कम करेगा।

8. सरकारी नीति:
सरकार की कर नीति एवं आर्थिक सहायता की नीति भी वस्तु की पूर्ति को प्रभावित करती है। कर की ऊँची दर वस्तु की पूर्ति को घटाती है और आर्थिक सहायता वस्तु की पूर्ति को प्रोत्साहित करती है।

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प्रश्न 5.
पूर्ति लोच की विभिन्न श्रेणियों के बारे में समझाइए।
उत्तर:
पूर्ति लोच की श्रेणियाँ –
1. पूर्णतया बेलोचदार पूर्ति (शून्य लोचदार पूर्ति):
यदि वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर वस्तु की पूर्ति अप्रभावित रहती है तो पूर्ति लोच शून्य या पूर्णतया बेलोचदार कहलाती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 49
चित्र में कीमत स्तर Op, Op1, Op2, पर पूर्ति की गई मात्रा एक समान OQ रहती है। अतः – पूर्ण बेलोचदार पूर्ति वक्र क्षैतिज अक्ष पर लम्बवत होता है।

2. अपूर्ण लोचदार या इकाई से कम लोचदार पूर्ति:
जब कीमत में परिवर्तन होने पर पूर्ति की गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से कम होता है तो पूर्ति लोच इकाई से कम होती है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 50
चित्र में pp1, में प्रतिशत परिवर्तन, पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन QQ1 से ज्यादा है।

3. इकाई लोचदार पूर्तिवक्र:
जब कीमत में परिवर्तन होने पर पूर्ति की गई मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के समान होता है तो पूर्ति लोच इकाई के बराबर होती है। इकाई लोचदार पूर्ति वक्र मूल बिन्दु से गुजरता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 51

4. लोचदार या इकाई से अधिक लोचदार पूर्ति:
जब कीमत परिवर्तन होने पर पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन, कीमत में प्रतिशत परिवर्तन से ज्यादा होता है तो पूर्ति लोच इकाई से अधिक होती है। इकाई से अधिक लोचदार पूर्ति वक्र बढ़ाने पर कीमत अक्ष को काटता है।

5. अनन्त लोचदार/पूर्णतया लोचदार पूर्ति:
जब कीमत में नगण्य परिवर्तन या बिना किसी परिवर्तन के कारण वस्तु की पूर्ति बदल जाती है तो पूर्ति लोच पूर्णतया लोचदार/अनन्त लोचदार कहलाती है। पूर्णतया लोचदार पूर्ति वक्र क्षैतिज अक्ष के समांतर होता है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 52

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प्रश्न 6.
बाजार पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारक समझाइए।
उत्तर:
बाजार पूर्ति को प्रभावित करने वाले कारक:
1. वस्तु की कीमत:
वस्तु की कीमत उसकी बाजार पूर्ति को प्रभावित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। ऊँची कीमत पर बाजार पूर्ति अधिक एवं नीची कीमत पर बाजार पूर्ति कम होती है।

2. उत्पादन तकनीक:
बाजार पूर्ति उत्पादन तकनीक से भी प्रभावित होती है। यदि नई एवं उन्नत उत्पादन तकनीक से उत्पादन लागत कम हो जाती है तो बाजार पूर्ति अधिक होती है। दूसरी पिछड़ी एवं लागत बढ़ाने वाली तकनीक का प्रयोग करने पर बाजार पूर्ति कम होती है।

3. उत्पादन साधनों की कीमत:
उत्पादन साधनों की कीमत से उत्पादन लागत का निर्धारण होता है। साधनों की कीमत बढ़ने पर उत्पादन लागत बढ़ जाती है इससे बाजार पूर्ति कम हो जाती है। इसके विपरीत उत्पादन साधनों की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ जाती है और बाजार पूर्ति कम हो जाती है।

4. कर नीति:
कर नीति भी बाजार पूर्ति को प्रभावित करती है यदि सरकार उत्पादन शुल्क की दर बढ़ा देती है या आर्थिक सहायता कम कर देती है उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हो जाती है। परिणामतः वस्तु की बाजार पूर्ति कम हो जाती है। इसके विपरीत यदि सरकार शुल्क की दर घटा देती है अथवा आर्थिक सहायता बढ़ा देती है तो उत्पादन लागत घट जाती है इससे बाजार पूर्ति में वृद्धि हो जाती है।

5. फर्मों की संख्या:
यदि किसी वस्तु की उत्पादन में अधिक संख्या में फर्म संलग्न होती है तो बाजार पूर्ति अधिक होती है इसके विपरीत वस्तु के उत्पादन में जितनी कम संख्या में फर्म संलग्न होती है वस्तु की बाजार शर्ते उतनी कम होती है।

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प्रश्न 7.
पूर्ति वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारकों को समझाइए।
उत्तर:
पूर्ति वक्र में खिसकाव के लिए उत्तरदायी कारक:
1. तकनीकी परिवर्तन:
उत्पादन की नई एवं प्रोनोत्त तकनीक जो उत्पादन लागत को घटाती है पूर्ति में वृद्धि पैदा करती है जिससे पूर्ति वक्र नीचे दायीं ओर खिसक जाता है। इसकी विपरीत पिछड़ी एवं घिसी हुई तकनीक से उत्पादन लागत बढ़ जाती है जो पूर्ति में कमी उत्पन्न करती है परिणामतः पूर्ति वक्र ऊपर/बायीं ओर खिसक जाता है।

2. साधन आगतों की कीमत में परिवर्तन:
साधनों आगतों की कीमतें जैसे मजदूरी दर, कच्चे माल का मूल्य, किराया आदि सीमांत लागत को प्रभावित करते हैं। सीमांत लागत के परिवर्तित होने से पूर्ति में परिवर्तन हो जाता है। साधन आगतों में वृद्धि (कमी) से सीमांत ज्यादा (कम) हो जाती है। इससे पूर्ति वक्र बायीं (दायीं) ओर खिसक जाता है।

3. करों में परिवर्तन:
उत्पादकों को बिक्री पर कर देना पड़ता है। करों की दर में, परिवर्तन से सीमांत लागत बढ़ जाती है। इस प्रकारा करों में वृद्धि (कमी) से सीमांत लागत में वृद्धि (कमी) उत्पन्न हो जाती है। अतः करों में वृद्धि (कमी) से पूर्ति वक्र में बायीं (दायी) ओर खिसकाव उत्पन्न होता है।

4. संबंधित वस्तुओं की कीमत में परिवर्तन:
दिए गए साधनों से एक से अधिक वस्तुओं का उत्पादन किया जा सकता है फर्म उस वस्तु के उत्पादन के उत्पादन में ज्यादा प्रयोग करती है जिसका उत्पादन ज्यादा लाभकारी होता है। अतः प्रतिस्थापन वस्तु की कीमत में कमी (वृद्धि) से वस्तु की पूर्ति ज्यादा (कम) हो जाती है परिणामतः पूर्ति वक्र दायों (बायीं) ओर खिसक जाता है।

5. फर्मों की संख्या में परिवर्तन:
फर्मों की संख्या में वृद्धि (कमी) होने से वस्तु की पूर्ति में वृद्धि (कमी) उत्पन्न हो जाती है। इससे पूर्ति वक्र में दायीं (बायीं) और खिसकाव उत्पन्न होता है।

आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तालिका के पूरा करो –
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 53
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 54

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प्रश्न 2.
एक फर्म की कुल आगम अनुसूची नीचे दी गई है इससे औसत आगम, सीमांत आगम तथा कीमत की गणना करो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 55
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 56

क्यों औसत आगम प्रत्येक उत्पादन स्तर पर स्थिर है और कीमत हमेशा औसत आगम के बराबर रहती है। इस प्रकार कीमत स्तर 7 रु. है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित तालिका को पूरा करो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 57
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 58

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित तालिका को पूरा करो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 59
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 60

प्रश्न 5.
पूर्ण प्रतियोगी बाजार वस्तु की बाजार कीमत 25 रु. है।

  1. 0 – 8 उत्पादन इकाई के लिए फर्म की कुल आगम अनुसूची बनाइए।
  2. माना बाजार कीमत बढ़कर 30 रु. हो जाती है। नया कुल अधिक ढ़ालू या चपटा होगा।

उत्तर:
1.
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 61

2. नई कीमत 30 रु. पर कुल आगम अनुसूची
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 62
नया कुल आगम वक्र अधिक ढ़ालू होगा।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित तालिका को पूरा करो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 63
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 64

प्रश्न 7.
निम्नलिखित तालिका को पूरा करो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 65
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 66

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प्रश्न 8.
एकाधिकारी फर्म की माँग अनुसूची नीचे दी गई है।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 67
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 68

प्रश्न 9.
निम्नलिखित तालिका से कुल आगम, औसत आगम तथा सीमांत आगत ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 69
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 70

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित तालिका से औसत आगम व सीमांत आगम का परिकलन करो।
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 71
हल:
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 72

प्रश्न 11.
जब बाल पैन की कीमत 4रु./इकाई है तो एक बाल पैन निर्माता प्रति दिन 8 पैन बेचता है। जब कीमत बढ़कर 5 रु./इकाई हो जाती है तो वह प्रतिदिन 10 पैन बेचने का निर्णय करता है। पैन की कीमत पूर्ति लोच की गणना करो।
हल:
p = Rs.4 q = 38 पैन
∆p = Rs. (5 – 4) = Rs.1 ∆q = 10 – 8 = 2 पैन
es = \(\frac{∆q}{∆p}\) × \(\frac{p}{q}\) es = \(\frac{2}{1}\) × \(\frac{4}{8}\) = 1 (चरों के मूल्य रखने)
पैन की पूर्ति कीमत लोच = 1

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प्रश्न 12.
जब आम की कीमत 24 रु./किग्रा. है तो एक आम विक्रेता 80 क्विंटल आम प्रतिदिन बेचना चाहता है। यदि आम की पूर्ति लोच 2 है तो आम विक्रेता 30 रु./इकाई आम की कितनी मात्रा बेचेगा?
हल:
p = Rs. 24 प्रति किलो q = 80 क्विंटल
∆p = Rs. (30 – 24) प्रति किलो
∆q = q1 – 80 क्विंटल = Rs.6 प्रति किलो
es = \(\frac{∆q}{∆p}\) × \(\frac{p}{q}\)
2 = \(\frac{q_{1}-80}{6}\) × \(\frac{24}{80}\) (मूल्य प्रतिस्थापित करने पर)
या, 2 = \(\frac{q_{1}-80}{6}\) × \(\frac{24}{80}\) या, 2 = \(\frac{q_{1}-80}{1}\) × \(\frac{4}{80}\)
या, 2 = \(\frac{q_{1}-80}{1}\) × \(\frac{1}{20}\) या, q1 – 80 = 20 × 2
q1 = 40 + 80 = 120
30 रु./इकाई कीमत 120 क्विंटल आम बेचेगा। .

प्रश्न 13.
एक वस्तु की पूर्ति लोच 25 है । 5 रु./इकाई पर एक विक्रेता 300 इकाइयों की पूर्ति करता है। 4रु./इकाई कीमत पर वह वस्तु की कितनी मात्रा की पूर्ति करेगा?
हल:
p = Rs. 5
∆p = 4 – 5 = Rs.(-1)
es = 2.5; es = \(\frac{∆q}{∆p}\) × \(\frac{p}{q}\)
2.5 = \(\frac{q_{1}-300}{-1}\) × \(\frac{5}{300}\), 2.5 = \(\frac{q_{1}-300}{-1}\) × \(\frac{1}{60}\)
या, q1 – 300 = 2.5 × (-1) × 60 = – 150 या, q1 = – 150 + 300 = 150
4 रु./इकाई कीमत पर वह 150 इकाइयाँ बेचेगा।

प्रश्न 14.
8 रु./इकाई कीमत एक वस्तु की आपूर्ति 200 रु./इकाइयाँ हैं । इसकी पूर्ति लोच 1.5 है। यदि वस्तु की कीमत बढ़कर 10 रु./इकाई हो जाए तो नई कीमत पर पूर्ति की गई मात्रा की गणना करो।
हल:
p = 3D 8 रु. प्रति इकाई
∆p = 10 – 8 = 2 रु. प्रति इकाई
q = 200 इकाइयाँ ∆q = q1 – 200
es = 1.5
1.5 = \(\frac{q_{1}-200}{2}\) × \(\frac{1}{25}\) या, q1 – 200 = 1.5 × 2 × 25
या, q1 – 200 = 75 या, q1 = 75 + 200 = 275
नई कीमत पर पूर्ति की गई इकाइयाँ 275

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प्रश्न 15.
वस्तु की कीमत में 10% वृद्धि होने के कारण वस्तु की पूर्ति की गई इकाइयाँ 400 से बढ़कर 450 हो जाती हैं। पूर्ति की लोच की गणना करो।
हल:
कीमत में प्रतिशत परिवर्तन = 10%
पूर्ति में परिवर्तन = 450 – 400 = 50 इकाइयाँ
पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन = \(\frac{50}{400}\) × 100 = \(\frac{50}{4}\) = 12.5%
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 73
= 1.25
पूर्ति में कीमत लोच = 1.25

प्रश्न 16.
8 रुपये प्रति इकाई कीमत पर एक वस्तु की गई मात्रा 400 इकाइयाँ है। इसकी पूर्ति लोच 2 है। वह कीमत ज्ञात करो जिस पर विक्रेता 600 इकाइयों की पूर्ति करेगा?
हल:
p = 8 रुपये प्रति इकाई
∆p = (P1 – 8) रुपये
q = 400 इकाइयाँ
∆q = 600 – 400 = 200 इकाइयाँ
Bihar Board Class 12 Economics Chapter 4 पूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति में फर्म का सिद्धांत part - 2 img 74
या, P1 = 2 + 8 = 10
10 रु./इकाई कीमत पर विक्रेता 600 इकाइयों की पूर्ति करेगा

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

निम्नलिखित कथनों के लिए सर्वोत्तम विकल्पों का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
आपूर्ति लोच हमें आपूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन का बोध कराती है –
(A) कीमत में 10 प्रतिशत परिवर्तन के कारण
(B) कीमत में 100 प्रतिशत परिवर्तन के कारण
(C) 50 प्रतिशत कीमत परिवर्तन के कारण
(D) 1 प्रतिशत कीमत परिवर्तन के कारण
उत्तर:
(D) 1 प्रतिशत कीमत परिवर्तन के कारण

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प्रश्न 2.
आपूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव का कारण हो सकता है –
(A) फर्मों की संख्या में कमी
(B) फर्मों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं
(C) फर्मों की संख्या में वृद्धि
(D) वस्तु की कीमत में परिवर्तन
उत्तर:
(C) फर्मों की संख्या में वृद्धि

प्रश्न 3.
यदि बाजार आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक रहा है तो कारण हो सकता है –
(A) फर्मों की संख्या में कमी
(B) फर्मों की अपरिवर्तित संख्या
(C) फर्मों की संख्या में वृद्धि
(D) वस्तु की कीमत में परिवर्तन
उत्तर:
(A) फर्मों की संख्या में कमी

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प्रश्न 4.
फर्मों के आपूर्ति वक्रों का क्षैतिज योग होता है –
(A) बाजार आपूर्ति वक्र
(B) व्यक्तिगत आपूर्ति वक्र
(C) बाजार माँग वक्र
(D) व्यक्तिगत माँग वक्र
उत्तर:
(A) बाजार आपूर्ति वक्र

प्रश्न 5.
उत्पाद शुल्क लगाने से –
(A) आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है
(B) आपूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है
(C) आपूर्ति वक्र पर ऊपर की ओर संचरण होता है
(D) आपूर्ति वक्र पर नीचे की ओर संचरण होता है
उत्तर:
(A) आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसक जाता है

प्रश्न 6.
यदि आपूर्ति वक्र बायीं ओर खिसकता है तो कारण हो सकता है –
(A) साधन आगतों की कीमत में कमी
(B) साधन आगतों की कीमत में वृद्धि
(C) साधन आगतों की साम्य कीमत
(D) साधन आगतों की शून्य कीमत
उत्तर:
(B) साधन आगतों की कीमत में वृद्धि

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प्रश्न 7.
यदि आपूर्ति वक्र दायीं ओर खिसकता है तो कारण हो सकता है –
(A) साधन आगतों की कीमत में वृद्धि
(B) साधन आगतों की कीमत में कमी
(C) साधन आगतों की समान कीमत
(D) साधन आगतों की शून्य कीमत
उत्तर:
(B) साधन आगतों की कीमत में कमी

प्रश्न 8.
आपूर्ति वक्र में दायीं ओर खिसकाव का कारण हो सकता है –
(A) तकनीकी प्रगति
(B) तकनीकी पिछड़ापन
(C) स्थिर तकनीकी
(D) या तो तकनीकी प्रगति या तकनीकी पिछड़ापन
उत्तर:
(A) तकनीकी प्रगति

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प्रश्न 9.
कीमत स्वीकारक फर्म सीमांत आगम होता है –
(A) कीमत से कम
(B) शुद्ध लागत के समान
(C) कीमत के समान
(D) लागत के समान
उत्तर:
(C) कीमत के समान

प्रश्न 10.
किसी फर्म का लाभ वह आगम है जो –
(A) शून्य लागत पर प्राप्त होता है
(B) शुद्ध लागत पर प्राप्त होता है
(C) सकल लागत पर प्राप्त होता है
(D) अतिरिक्त लागत पर होता है
उत्तर:
(B) शुद्ध लागत पर प्राप्त होता है

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?
(क) निक्षेपण
(ख) ज्वालामुखियता
(ग) पटल विरूपन
(घ) अपरदन
उत्तर:
(घ) अपरदन

प्रश्न 2.
जल योजना प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) क्ले
(घ) लवण
उत्तर:
(घ) लवण

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प्रश्न 3.
मलबा अवधाव की घाटी बनती है।
(क) भूस्खलन
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन
(ग) मंदी प्रवाही वृहत् संचलन
(घ) अवतलन/धसकन
उत्तर:
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन

प्रश्न 4.
भू-आकार की घाटी बनती है।
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रफ़्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे?
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने एवं मुदा निर्माण कार्य में सहायक होती हैं बल्कि वे अपदन्न एवं वृहत संचलन के लिए भी उत्तरदायी हैं । जैव मात्रा एवं जैव विविधता प्रमुखतः वन (वनस्पति) की उपज हैं तथा वन अपक्षयी प्रावार की गहराई अर्थात् न केवल आवरण प्रस्तर एवं मिट्टी अपितु वृहत् संचलन पर निर्भर करता है।

यदि चट्टानों का अपक्षय न हो तो अपरदन का बोई महत्त्व नहीं होता। चट्टान का अपक्षय एवं निक्षेपण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान है। यह कुछ खनिजों जैसे लोहा, मैंगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा अयस्कों के समृद्धिकरण (enrichment) एवं संकेन्द्रण (concentration) में सहायक होता है।

प्रश्न 2.
वृहत् संचलन जो वारविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य (Perceptible) हैं, वे क्या हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
वृहत् संचलन के अन्तर्गत वे सभी संचलन आते हैं, जिनमें चट्टानों के मलवा (debris) का गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढाल के सहारे बना गतिज ऊर्जा या किसी भू-आकृतिक कारक की सहारप्ता के स्थानान्तरण निहित होता है। वृहत संचलन के लिए अपक्षय अनिवार्य नहीं है, यद्यपि वृहत् संचलन को बढ़ावा देता है।

असम्बद्ध कमजोर पदार्थ, छिछले संस्तर वाली चट्टानें, अंश, तीव्रता से झूके हुए संस्तर, खड़े भृगु या तीव्र ढाल, पर्याप्त वर्षा, मूसलाधार वर्षा तथा वनस्पति का अभाव, झीलों, नदियों जलाशयों से भरी मात्रा में जल निष्कासन, विस्फोट आदि वृहत् संचलन को अनुकूलित करते हैं।

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प्रश्न 3.
विभिन्न गतिशिल एवं शक्तिशाली बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य सम्पन करते हैं।
उत्तर:
बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपनी उर्जा से अन्तर्जनित शक्तियों से नियन्त्रित विवर्तनिक (tectonic) कारकों से उत्पन्न प्रवणता द्वारा निर्धारित वायुमण्डल से प्राप्त करते हैं। ढाल या प्रवणता बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारकों से नियन्त्रित विवर्तनिक कारकों द्वारा निर्मित होती हैं। बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपक्षय, वृहत क्षरण संचलन, अपरदन परिवहन आदि सभी प्रधान कार्य सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 4.
क्या मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?
उत्तर:
हाँ, मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है क्योंकि अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों के समुच्चय पर निर्भर करता है। कालान्तर में ये समुदाय (combine) अपक्षयी प्रावार (Mantle) की मूल विशेषताओं को जन्म देते है और यह अपक्षयी प्रवार ही मृदा निर्माण का मल निवेश होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
“हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है,” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धरातल पृथ्वी मण्डल के अन्तर्गत उत्पन्न हुई बाह्य शक्तियों एवं पृथ्वी के अन्दर अद्भुत आन्तरिक शक्तियों से अनवरत प्रभावित होता है तथा यह सर्वदा परिवर्तनशील है। बाह्य शक्तियों को बहिर्जनिक (exogenic) तथा आन्तरिक शक्तियों को अन्तर्जनित (endogenic) शक्तियाँ कहते हैं।

बहिर्जनिक शक्तियों के क्रियाओं का परिणाम होता है उमड़ी हुई भू-आकृतियों का विघर्षण (wearing down) तथा बेसिन/निम्नक्षेत्रों/गों के भराव (अधिवृद्धि/तल्लोचन) धरातल पर अपरदन के माध्यम से उच्चावच के मध्य अन्तर के कम होने के तथ्य को कहते हैं, क्रमस्थापन radation) अन्तर्जनित शक्तियाँ निरन्तर धरातल के भागों के ऊपर उठाती हैं या उनका निर्माण करती है तथा इस प्रकार वे उच्चावच में मिलता को सम (बराबर) करने में असफल रहती है। अतएव भिन्नता तब तक बनी रहती है जब तक बर्हिजनिक एवं अन्तर्जनिक शक्तियों के विरोधात्मक प्रतिकूल कार्य चलते रहते हैं।

सामान्यतः अन्तर्जनित शक्तियाँ मूल रूप से आकति निर्मात्री शक्तियाँ हैं तथा बर्हिजनिक प्रक्रियायें मुख्य रूप से भूमि विघर्षण शक्तियाँ होती हैं। धरातल का निर्माण एवं विघटन क्रमशः अन्तर्जनित एवं बर्हिजनिक शक्तियों द्वारा भूपर्पटी के उद्भव एवं उसके वायुमण्डल द्वारा आवृत होने के समय से चला आ रहा है।

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प्रश्न 2.
‘बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यह कहना बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है कि बाहाजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य गर्मी से प्राप्त करती हैं। तापक्रम तथा वर्षा दो महत्त्वपूर्ण जलवायविक तत्व हैं जो विभिन्न प्रक्रियाओं को नियन्त्रित करते हैं। सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को एक सामान्य शब्दावली अनाच्छादन (denudation) के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अपक्षय,

वहत क्षरण संचलन, अपरदन, परिवहन आदि इसमें सम्मिलित होते हैं। अनाच्छाद प्रक्रियाओं तथा उनसे सम्बन्धित परिचालक/प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। वनस्पति का घनत्व, प्रकार एवं वितरण, जो मुख्यतः उर्जा एवं तापमान पर निर्भर करते हैं, बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्राक्रियाओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। इन सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की शक्ति का स्त्रोत ऊर्जा है। अत: हम कह सकते हैं कि बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियायें अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती है।

प्रश्न 3.
क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय – प्रक्रियाएँ कुछ अनुप्रयुक्त शक्तियों (forces) पर निर्भर करती हैं। ये अनुप्रयुक्त शक्तियाँ हो सकती हैं –
1. गुरुत्वाकर्षण शक्तियाँ, जैसे अधिक भार का दबाव, भार एवं अपरूपण प्रतिबल (sheadr stress)

2. तापक्रम में परिवर्तन क्रिस्टल वृद्धि पशुओं के कार्य के कारण उत्पन्न विस्तारण (expansion) शक्तियाँ, शुष्कण एवं आईन चक्रों से नियामित जल का दबाव। भौतिक अपक्षय प्रक्रियाओं में अधिकांश तापीय विस्तारण एवं दबाव के निर्मुक्त होने (release) के कारण होती है। ये प्राक्रियाएँ लघु एवं मन्द होती हैं।

लेकिन बार-बार संकुचन एवं विस्तारण के कारण चट्टान के सन्तति श्रांति (Fatigue) के फलस्वरूप ये चट्टानों को बड़ी हानि पहुंचा सकती हैं। रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाओं का एक वर्ग, जैसे जलयोजन, ऑक्सीजन न्यूनीकरण, कार्बोनेटीकरण, विलयन, चट्टानों पर उन्हें अपघटित/वियोजित, घुलित या सूक्ष्म खण्डन अवस्था में रसायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ऑक्सीजन, सतही और मृदा जल एवं अन्य अम्ल द्वारा न्यूनीकरण के लिए कार्यरत रहता है।

इसमें ऊष्मा के साथ जल एवं वायु को विद्यमानता सभी रासयनिक प्रतिक्रियाओं को तीव्र गति देने के लिए आवश्यक है। अतः भौतिक एवं रसायनिक अपक्षय की ये प्रक्रियाएँ अतसम्बन्धित हैं। ये साथ-साथ चलती रहती हैं तथा अपक्षय प्रक्रिया को त्वरित बना देती हैं।

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प्रश्न 4.
आप किस प्रकार मृदा निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा निर्माण कारकों के बीच अन्तर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा निर्माण में दो महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाएं सर्वधम अपक्षय पर निर्भर करती हैं तथा अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों समुच्चय पर निर्भर करता है। मृदा निर्माण पाँच मूल कारकों के द्वारा नियन्त्रित होता है। ये कारक हैं –

  • जलवायु
  • स्थलाकृति
  • उच्चावच मूल पदार्थ
  • चट्टान जैविक प्रक्रियाएँ
  • कालावधि वस्तुतः मृदा निर्माण कारक संयुक्त रूप से कार्यरत रहते हैं एवं एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करते हैं।

जलवायु (Climate) – जलवायु मृदा निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण सक्रिय कारक है। मृदा के विकास में संलग्न जलवायविक तत्त्वों में प्रमुख हैं –

प्रवणता, बारम्बारता एवं वर्षा-वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता के सन्दर्भ में नमी।
तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

  • वर्षा से मृदा को जल मिलता है। रासायनिक एवं जैविक क्रियाएँ इसके बिना सम्भव नहीं होती । कुछ रसायन पानी में घुल जाती हैं एवं
  • सकारात्मक तथा नकारात्मक रूप से आवेशित घटकों में अपने को अलग कर लेती हैं।
  • ये तत्त्वों के जटिल रासायनिक अन्तः परिवर्तन/विनिमय में सहायक होते हैं जो मिट्टी के विकास एवं पौधे की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं।

जैविक क्रियायें (Biological Activities) – वनस्पति आवरण एवं जीव जो मूल पदार्थों पर प्रारम्भ तथा बाद में विद्यमान रहते हैं मृदा में जैव पदार्थ, नमीधारण की क्षमता तथा नाइट्रोजन इत्यादि जोड़ने में सहायक होते हैं। मृत पौधे मृदा को सूक्ष्मता विभाजित जैव पदार्थ ह्यूमस प्रदान करते हैं। कुछ जैविक अम्ल जो ह्यूमस बनने की अवधि में निर्मित होते हैं मृदा के मूल पदार्थों के खनिजों के विनियोजन में सहायता करते हैं। बैक्टेरियल कार्य की प्रवणता ठण्डी एवं गर्म जलवायु की मिट्टियों/मृदाओं में अन्तर को दर्शाती हैं।

राइजोबियम (Rhizobium) एक प्रकार के बैक्टेरिया, जंतुवाले पौधे की जड़ ग्राथिका में रहता है तथा मेजबान पौधों के लिए लाभकारी नाइट्रोजन निर्धारित करता है। चींटी, दीमक, केचुए, कृतक (roderts) इत्यादि जानवरों का महत्त्व अभियान्त्रिकी (mechanical) सा होता है, लेकिन मृदा निर्माण में यह महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि वे मृदा को बार-बार ऊपर नीचे करते रहते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने चतुर्दिक विद्यमान भू-आकृतिक/उच्चावच एवं पदार्थों के आधार पर जलवायु, सम्भव अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्त्वों और विशेषताओं को परखिए एवं अंकित कीजिए।
उत्तर:
इस अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित जानकारियों एवं विशेषताओं को सूचीबद्ध करें परियोजना को स्वयं करें। इस अध्याय में जूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ दी गई हैं।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवसर्पण तथा शैल पतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
दाल जिस पर संचलन होता है, के संदर्भ में पश्च-आवर्तन (Rotation) के साथ शैल-मलबा की एक या कई इकाइयों के फिसलन (slipping) को अवसर्पण कहते हैं। किसी तीव्र ढाल के सहारे शैल खण्डों का ढाल से दूरी रखते हुए स्वतन्त्र रूप से गिरना शैल पतन (Fall) कहलाता है।

प्रश्न 2.
अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, अनिवार्य नहीं। इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपरदन द्वारा उच्चावचन का निम्नीकरण होता है। अर्थात् भू-दृश्य विधर्षित होते जाते हैं। इसका तात्पर्य ये है कि अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, लेकिन अपक्षय अपरदन के लिए अनिवार्य दशा नहीं है। अपक्षय, वृहत् क्षरण एवं अपरदन निम्नीकरण की प्रक्रियाएँ हैं।

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प्रश्न 3.
वृहत् संचलन और अपरदन में अन्तर बतायें।
उत्तर:
वृहत् संचलन में शैल मलबा चाहे वह शुष्क हो अथवा नम, गुरुत्वाकर्षण के कारण स्वयं आधार तल पर जाते हैं। लेकिन प्रवाहशील जल, हिमानी लहरें एवं धाराएँ तथा वायु निलाम्बित मलबे को नहीं ढोते हैं। वस्तुत: यह अपरदन ही है जो धरातल में होने वाले अनवरत परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। अपरदन एवं परिवहन गतिज ऊर्जा द्वारा नियन्त्रित होता है। धरातल के पदार्थों का अपरदन एवं परिवहन वायु, प्रवाहशील जल, हिमानी लहरों एवं धाराओं तथा भूमिगत जल द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
मृदा निर्माण में समय (कालवधि-time) की क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाओं के प्रचलन में लगने वाले काल (समय) की अवधि मृदा की · परिपक्वता एवं उसके पार्थिवका (profile) का विकास निर्धारण करती है। एक मृदा तभी परिपक्व होती है जब मृदा निर्माण की सभी प्रक्रियाएँ लम्बे काल तक पार्थिवका विकास करते हुए कार्यरत रहती है। कुछ समय पहले निक्षेपित जलोढ़ मिट्टी या हिमानी टिले से विकसित मृदायें तरुण या युवा (Young) मानी जाती हैं तथा उनमें संस्तर (Horizon) का अभाव होता है अथवा कम विकसित संस्तर मिलता है।

प्रश्न 5.
मृदा निर्माण में जलवायु किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
मृदा के विकास में संलग्न जलवायवी तत्त्वों में प्रमख हैं –

  1. प्रवणता वर्षा एवं बारम्बारता वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता बारम्बारता
  2. तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

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प्रश्न 6.
ऑक्सीकरण एवं न्यूनीकरण में अन्तर बताइए।
उत्तर:
खनिज एवं ऑक्सीजन का संयोग, ऑक्सीकरण कहलाता है। जहाँ वायुमण्डल एवं ऑक्सीजन युक्त जल मिलते हैं। इस प्रक्रिया में लौह, मैंगनीज, गंधक (Suphur) इत्यादि सर्वाधिक शामिल होते हैं। ऑक्सीकरण एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जो लौह धारक बायोटाइट, ओलीवाइन एवं पाइरोक्सीन जैसे खनिजों को प्रभावित करती है। ऑक्सीकरण होने पर लौह का लाल रंग भूरे या पीले रंग में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 7.
अपक्षय के महत्त्व पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ शैलों को छोटे-छोटे टुकड़ो में तोड़ने के लिए तथा न केवल आवरण प्रस्तर एवं मृदा निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करती है अपितु अपरदन एवं वृहत् संचालन के लिए भी उत्तरदायी होती है। यदि शैलों का अपक्षय न हो तो अपरदन का कोई महत्त्व नहीं होता । शैलों का अपक्षय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मूल्यवान कुछ खनिजों जैसे-लोहा, मैगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा के अयस्कों के समृद्धिकरण एवं संकेन्द्रण में सहायक होता है। अपक्षय मृदा निर्माण की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।

प्रश्न 8.
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 9.
अन्तर्जात बल तथा बर्हिजात बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के आन्तरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल अन्तर्जात बल कहे जाते हैं। इन बलों द्वारा भूतल पर असमानताओं का सूत्रपात होता है। पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होने वाले बल बर्हिजात बल कहे जाते हैं। इन्हें समतल स्थापक बल भी कहते हैं। ये बल पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा भूतल पर उत्पन्न विषमताओं को दूर करने में हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं।

प्रश्न 10.
संचलन के कौन-से तीन रूप होते हैं?
उत्तर:
संचलन के निम्न तीन रूप होते हैं –

  1. अनुप्रस्थ विस्थापन (तुषार वृद्धि या अन्य कारणों से मृदा का अनुप्रस्थ विस्थापन)
  2. प्रवाह एवं
  3. स्खलन

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प्रश्न 11.
वृहत् संचलन की संक्रियता के लिए जिम्मेवार किन्हीं तीन कारकों के बारे में बताइए।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक एवं कृत्रिम साधनों के माध्यम से टिकने के आधार का हटना
  2. ढालों की प्रवणता एवं ऊँचाई में वृद्धि
  3. पदार्थों के प्राकृतिक अथवा कृत्रिम भराव के कारण उत्पन्न अतिभार।

प्रश्न 12.
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 13.
मिट्टी और शैल में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:
मिट्टी और शैल में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ किसे कहते हैं? क्या भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं या दोनों एक ही हैं?
उत्तर:
धरातल के पदार्थों पर अन्तर्जनित एवं बर्हिजनित बलों द्वारा भौतिक दबाव तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। पटल विरूपण (Diastrophism) एवं ज्वालामुखीयता (Volcanism) अन्तर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। अपक्षय, वृहत् क्षरण (Mass wasting), अपरदन एवं निक्षेपण (Deposition) बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। प्रकृति के किसी भी बाह्यजनिक तत्त्व (जैसे जल, हिम, वायु इत्यादि) जो धरातल के पदार्थों का अधिग्रहण (Acquire) तथा परिवहन करने में सक्षम हैं, को भू-आकृतिक कारक कहा जा सकता है।

जब प्रकृति के तत्त्व ढाल प्रवणता के कारण गतिशील हो जाते है तो पदार्थों को हटाकर ढाल के सहारे ले जाते हैं और निचले भागों में निक्षेपित कर देते हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ तथा भू-आकृतिक कारक, विशेषकर बर्हिजनिक, को यदि स्पष्ट रूप से अलग-अलग न कहा जाए तो इन्हें एक ही समझना होगा क्योंकि ये दोनों एक ही होते है।

एक प्रक्रिया एक बल होता है जो धरातल के पदार्थों के साथ अनूप्रयूक्त होने पर प्रभावी हो जाता है। एक कारक (Agent) एक गतिशील माध्यम (जैसे प्रवाहित जल, हिमानी हवा लहरें एवं धाराएँ इत्यादि) हैं जो धरातल के पदार्थों को हटाता, ले जाता है तथा निक्षेपित करता है। इस प्रकार प्रवाहयुक्त जल, भूमिगत जल, हिमानी, हवा, लहरों, धाराओं इत्यादि को भू-आकृतिक कारक कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
गुरुत्वकर्षण बल और पटल विरूपण (Diastrophism) के विषय में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुरुत्वाकर्षण हाल के सहारे सभी गतिशील पदार्थों को सक्रिय बनाने वाला दिशात्मक (Directional) बल होने के साथ-साथ धरातल के पदार्थों पर दबाव (stress) डालता है। अप्रत्यक्ष गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल (stress) लहरों एवं ज्वार भाटा जनित धाराओं को क्रियाशील बनाता है। निःसन्देह गुरुत्वाकर्षण एवं ढाल प्रवणता के अभाव में गतिशीलता सम्भव नहीं है। अतः अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण भी नहीं होगा। गुरुत्वाकर्षण एक ऐसा बल है जो भूतल के सभी पदार्थों के संचलन को प्रारम्भ करते हैं। सभी संचलन, चाहे वे पृथ्वी के अन्दर हो या सतह पर, प्रवणता के कारण ही घटित होते हैं, जैसे ऊँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर, तथा उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु दाब क्षेत्र की ओर ।

पटल विरुपण (Diastrophism) – सभी प्रक्रियाएँ जो भू-पर्पटी को संचालित, उत्थापित तथा निर्मित करती हैं, पटल विरूपण के अन्तर्गत आती हैं। इनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  • तीक्ष्ण वलयन के माध्यम से पर्वत निर्माण तथा भू-पर्पटी की लम्बी एवं संकीर्ण पट्टियों को प्रभावित करने वाली पर्वतनी प्रक्रियाएँ
  • धरातल के बड़े भाग के उतापन या विकृति में संलग्न महाद्वीप रकम सम्बन्धी प्रक्रियाएँ
  • अपेक्षाकृत छोटे स्थानीय संचलन के कारण उत्पन्न भूकम्प
  • पपटी प्लेट के क्षैतिज संचलन करने में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका।

प्लेट विवर्तनिक/प्रवर्तनी की प्रक्रिया में भू-पर्पटी वलयन के रूप में तीक्ष्णता से विकृत हो जाती है। महाद्वीप रचना के कारण साधारण विकृति हो सकती है। प्रवर्तनी पर्वत निर्माण प्रक्रिया है, जबकि महाद्वीप रचना महाद्वीप निर्माण प्रक्रिया है। प्रवर्तनी, महाद्वीप रचना (Empeirogeny) भूकम्प एवं प्लेट विवर्तनिक की प्रक्रियाओं से भू-पर्पटी में घंश तथा विभंग हो सकता है। इन सभी प्रक्रियाओं के कारण दबाव, आयतन तथा तापक्रम में परिवर्तन होता है, जिसके फलस्वरूप शैलों का कायान्तरण प्रेरित होता है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.3

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BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.3

प्रश्न 1.
निम्नलिखित भिन्नों को दशमलव रूप में लिखिए और बताइए कि प्रत्येक का दशमलव प्रसार किस प्रकार का है-
(i) \(\frac{36}{100}\)
(ii) \(\frac{1}{11}\)
(iii) 4\(\frac{1}{8}\)
(iv) \(\frac{3}{13}\)
(v) \(\frac{2}{11}\)
(vi) \(\frac{329}{400}\)
उत्तर:
(i) \(\frac{36}{100}\) = 0.36
अतः \(\frac{36}{100}\) का दशमलव रूप 0.36 है तथा बड़ एक सांत दशमलब है।

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Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 1
अत: \(\frac{1}{11}\) का दशमलव रूप 0.0908… = 0.\(\bar { 09 }\) है तथा यह एक अनवसानी आवर्ती है।

(iii) 4\(\frac{1}{8}\)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 2
अत: 4\(\frac{1}{8}\) का दशमलव रूप 4.125 है तथा यह एक सांत दशमलव है।

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(iv) \(\frac{3}{13}\)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 3
अग \(\frac{3}{13}\) का दशमलव रूप 0.\(\overline { 230769 } \) है तथा यह एक अनवसानी आवर्ती है।

(v) \(\frac{2}{11}\)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 4
अतः \(\frac{2}{11}\) का दशमलव रूप 0.\(\overline { 18 }\) है तथा यह एक अनवसानी आवर्ती है।

(vi) \(\frac{329}{400}\)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 5
अतः \(\frac{329}{400}\) का दशमलव रूप 0.8225 है तथा यह एक सात दशमलव है।

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प्रश्न 2.
आप जानते हैं कि \(\frac{1}{7}\) = 0.\(\overline { 142857 }\) है। वास्तव में लम्बा भाग दिए बिना क्या आप यह बता सकते हैं कि \(\frac{2}{7}\), \(\frac{3}{7}\), \(\frac{4}{7}\), \(\frac{5}{7}\), \(\frac{6}{7}\) के दशमलव प्रसार क्या हैं? यदि हाँ, तो कैसे?
उत्तर:
मनहार, \(\frac{1}{7}\) = 0.\(\overline { 142857 }\) \(\frac{2}{7}\), \(\frac{3}{7}\), \(\frac{4}{7}\), \(\frac{5}{7}\), \(\frac{6}{7}\) के प्रसार सम्वा भाग दिए, विना निम प्रकार से ज्ञात कर सकते हैं-
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित को \(\frac{1}{7}\) के रूप में व्यक्त कीजिए, जहाँ p और q पूर्णाक है तथा q ≠ 0 है
(i) 0.\(\bar { 6 }\)
(ii) 0.4\(\bar { 7 }\)
(iii) 0.00\(\overline { 001 }\).
हल:
(i) मान x = 0.\(\bar { 6 }\) = 0.666…
यहाँ एक अंक की पुनरावृति है अतः 10 से गुणा करने पर,
10 x = 6.666…
इसलिए 10x = 6 + 0.666… = 6 + x
अतः 9x = 6
अर्थात् x = \(\frac{6}{9}\) = \(\frac{2}{3}\)

(ii) माना x = 0.47 = 0-4777 ……..(1).
समी. (1) को 10 से गुणा करने पर,
10x = 4.7777 ……..(2)
यहाँ एक अंक की पुनरावृति है अतः 10 से गुण करने पर,
100 = 47.777
इसलिए 100x = 43 + 4.777… = 43 + 10x (समी- (2) से)
अतः 90x = 43
अर्थात x = \(\frac{43}{90}\)

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.3

(iii) माना x = 0.\(\overline{001}\) = 0.001001001…
यहाँ तीन अंकों की पुनरावृत्ति है अत: 1000 से गुणा करने पर,
1000x = 001.001001…
इसलिए 1000x = 1 + 001001… = 1 + x
अतः 999x = 1
अर्थात् x = \(\frac{1}{999}\)

प्रश्न 4.
0-99999… को \(\frac{p}{q}\) के रूप में व्यक्त कीजिए। क्या आप अपने उत्तर से आश्चर्यचकित हैं? अपने अध्यापक और कक्षा के सहयोगियों के साथ उत्तर की सार्थकता पर चर्चा कीजिए।
हल:
माना
x = 0.99999
वहाँ एक अंक को पुनरावृत्ति है अत: 10 से गुणा करने पर,
10x = 99999
इसलिए 10 = 9 + 0-999…… 9 + x
अतः 9x = 9
अर्थात् x = \(\frac{9}{9}\) = 1
हाँ, हम अपने उत्तर से आश्चर्यचकित है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.3

प्रश्न 5.
\(\frac{1}{17}\) के दशमलव प्रसार में अंकों की पुनरावृति खण्ड में अंकों की अधिकतम संख्या क्या हो सकती है? अपने उत्तर की जाँच करने के लिए विभाजन-क्रिया कीजिए।
हल:
\(\frac{1}{17}\) के दशमलव प्रसार में अंकों की पुनरावृत्ति खण्ड में अंकों की अधिकतम संख्या = 17 – 1 = 16
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 7
16 अंकों का पुनरावृत्ति खण्ड है।

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प्रश्न 6.
\(\frac{p}{q}\) (q ≠ 0) के रूष की परिमेय संख्याओं के अनेक उदाहरण लीजिए, जहाँ और पूर्णाक है, जिनका 1 के अतिरिक्त अन्य कोई उभयनिष्ठगुणनखंड नहीं है और जिसका सांतदशमलय निरुपण (प्रसार) है। क्या आपका अनुमान लगा सकते हैं कि को कौन-सा गुण अवश्य संतुष्ट करना चाहिए?
उत्तर:
\(\frac{p}{q}\) के रूप में परिमेय संख्याओं के अनेक बाहरण, जहाँ p और q पूर्णक है तथा 1 के अतिरिक्त अन्य कोई डायनिष्ठ गुणनखण्ड नहीं है वह है, \(\frac{1}{5}\), \(\frac{7}{4}\), \(\frac{11}{8}\), \(\frac{27}{2}\), \(\frac{33}{5}\) आदि। उपर्युक्त दी गई सभी परिमेय ‘संख्याएँ सांत दशमलव हैं।
जैसे-
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 8
हैं, हम अनुमान लगा सकते हैं, यदि संख्या एक सांत दशमलब है तोके गुणनखण्डों में 2 की पारा या 5 की पात या दोनों का होना आवश्यक है।

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प्रश्न 7.
ऐसी तीन संख्याएं लिखिए जिनके दशमलव प्रसार अनवसानी अनावी हो।
उत्तर:
तीन संख्याएँ जिनके दशमलव प्रसार अन्यसानी अनावर्ती है
0.50500500050000…
0.71711711171111…
0.230230023000…

प्रश्न 8.
परिमेय संख्या \(\frac{5}{7}\) और \(\frac{9}{11}\) के बीच की तीन अलग-अलग अंपरिमेय संख्याएँ ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
अपरिमेय संख्या ज्ञात करने के लिए सर्वप्रथम \(\frac{5}{7}\) तथा \(\frac{9}{11}\) का दशमलव रूप ज्ञात करना पड़ेगा।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex Q 1.3 9
अपरिमेय संख्याएँ होगी।
0.7407404074000740000…
0.781078100781000…
0.803800380003800003…

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प्रश्न 9.
बताइए कि निम्नलिखित संख्याओं में कौन-कौन संख्याएँ परिमेय और कौन-कौन संख्याएँ अपरिमेय है-
(1) \(\sqrt{23}\)
(ii) \(\sqrt{225}\)
(iii) 0.3796
(iv) 7.478478
(v) 1101001000100001.
उत्तर:
(1) \(\sqrt{23}\) एक अपरिमेय संख्या है, क्योंकि यह एक पूर्ण वर्ग नहीं है।
(ii) \(\sqrt{225}\) = (ii) \(\sqrt{15×15}\) = 15. यह एक परिमेय संख्या है।
(iii) 0.3796, एक सांत परिमेय संख्या है।
(iv) 7.478478… = 7.\(\overline{478}\), एक असांत आवर्ती परिमेय संख्या है।
(v) 1.1010010001000001… एक अपरिमेय संख्या है क्योंकि यहाँ पुनरावृत्ति नहीं है।

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Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

BSEB Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 9 Science प्राकृतिक सम्पदा InText Questions and Answers

प्रश्न शृंखला # 01 (पृष्ठ संख्या 217)

प्रश्न 1.
शुक्र और मंगल ग्रहों के वायुमण्डल से हमारा वायुमण्डल कैसे भिन्न है ?
उत्तर:
हमारी पृथ्वी का वायुमण्डल बहुत-सी गैसों जैसे-नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (20%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.03%) तथा जलवाष्प का मिश्रण है। इन वायु घटकों के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव है। जबकि शुक्र तथा मंगल ग्रहों के वायुमण्डल का मुख्य घटक कार्बन डाइऑक्साइड (95 से 97%) है।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल एक कम्बल की तरह कैसे कार्य करता है ?
उत्तर:
वायु ऊष्मा की कुचालक है जिससे यह पृथ्वी के तापमान को दिन के समय अचानक बढ़ने से रोकता है तथा रात के समय ऊष्मा को बाहरी अन्तरिक्ष में जाने की दर को कम करती है। इस प्रकार वायुमण्डल एक कम्बल की तरह कार्य करके पूरे वर्ष तापमान को लगभग नियत रखता है।

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प्रश्न 3.
वायु प्रवाह (पवन) के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
वायु का प्रवाह पृथ्वी के वायुमण्डल के असमान विधियों से गर्म होने के कारण होता है। तटीय क्षेत्रों में स्थल के ऊपर की वायु तेजी से गर्म होकर ऊपर उठना शुरू करती है। जैसे ही यह ऊपर की ओर उठती है, वहाँ कम दाब का क्षेत्र बन जाता है तथा समुद्र के ऊपर की वायु कम दाब वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित हो जाती है। इस प्रकार एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में वाय का प्रवाह पवनों का निर्माण करता है। लेकिन इन हवाओं को बहुत से अन्य कारक; जैसे-पृथ्वी की घूर्णन गति तथा पवन के मार्ग में आने वाली पर्वत श्रृंखलाएँ भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 4.
बादलों का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर:
दिन के समय जब जलीय भाग गर्म होते हैं तथा बड़ी मात्रा में जलवाष्प बनकर वायु में प्रवाहित हो जाती है। जल वाष्प की कुछ मात्रा विभिन्न जैविक क्रियाओं के कारण भी वातावरण में आती है। जब वातावरण की वायु गर्म हो जाती है तो यह अपने तथा जलवाष्प को लेकर ऊपर की ओर उठ जाती है तथा ऊपर वायुमण्डल में फैलकर ठण्डा होने के कारण छोटी-छोटी जल बूँदों के रूप में संघनित होकर बादलों का निर्माण करती है।

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प्रश्न 5.
मनुष्य के तीन क्रियाकलापों का उल्लेख करें जो वायु प्रदूषण में सहायक हैं।
उत्तर:
वायु प्रदूषण में सहायक मनुष्य के प्रमुख तीन क्रिया-कलाप निम्नलिखित हैं –

  1. जीवाश्म ईंधन; जैसे-कोयला एवं पेट्रोलियम पदार्थों का दहन।
  2. जंगलों का विनाश।
  3. औद्योगीकरण की अन्धी दौड़ में नियमों को अनदेखा करना।

प्रश्न श्रृंखला # 02 (पृष्ठ संख्या 219)

प्रश्न 1.
जीवों को जल की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर:
जीवों के शरीर की सभी जैविक क्रियाएँ जलीय माध्यम में सम्पन्न होती हैं। ये सभी क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर जल में घुले पदार्थों के माध्यम से होती हैं तथा जीव के शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में पदार्थों का संवहन इसी घुली हुई अवस्था . में होता है। इसी कारण जीवों को जल की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 2.
जिस गाँव/शहर/नगर में आप रहते हैं वहाँ पर उपलब्ध शुद्ध जल का मुख्य स्त्रोत क्या है ?
उत्तर:
कुएँ एवं नदियाँ।

प्रश्न 3.
क्या आप किसी क्रियाकलाप के बारे में जानते हैं जो इस जल के स्रोत को प्रदूषित कर रहा है ?
उत्तर:
कुओं का खुला होना तथा हमारे नगरों के नाले का जल एवं उद्योगों से निकला कचरा सीधे ही नदियों में प्रवाहित हो रहा है। ये क्रियाएँ इन जलस्रोतों को प्रदूषित कर रही हैं।

प्रश्न शृंखला # 03 (पृष्ठ संख्या 222)

प्रश्न 1.
मृदा (मिट्टी) का निर्माण किस प्रकार होता है ?
उत्तर:
मृदा निर्माण एक लम्बी प्रक्रिया है जिसमें लाखों वर्ष का समय लगा है। इसका निर्माण चट्टानों से कुछ भौतिक, रासायनिक तथा जैविक प्रक्रमों द्वारा हुआ है। इस क्रिया में सर्वप्रथम तापमान में परिवर्तन से चट्टानों में असमान प्रसरण एवं संकुचन होता है। परिणामस्वरूप उनमें दरारें आ जाती हैं। धीरे-धीरे ये दरारें चौड़ी होकर चट्टानों को तोड़ देती हैं। अब जल के बहाव या तेज हवा या आपस में रगड़ने से ये छोटे-छोटे टुकड़ों तथा अन्त में महीन कणों में बदल जाती हैं तथा आगे निक्षेपित हो जाती हैं।

लाइकेन जैसे छोटे जीव भी मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। ये चट्टानों पर उगते हैं तथा उनकी सतह पर एक अम्ल जैसा पदार्थ छोड़ते हैं जो चट्टान की सतह को चूर्ण के समान कर मृदा की एक पतली परत बना देता है। इस पर दूसरे जीव जैसे मॉस उग जाते हैं तथा धीरे-धीरे इन जीवों के मृत अवशेष इस पतली परत को और मोटा कर अन्य पौधों की वृद्धि के अनुकूल बना देते हैं। इस प्रकार मृदा का निर्माण होता है।

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प्रश्न 2.
मृदा अपरदन क्या है ?
उत्तर:
मृदा की ऊपरी उपजाऊ सतह का किसी कारक जैसे वायु, जल या मनुष्य की क्रियाओं द्वारा एक स्थान से अन्यत्र स्थानान्तरित हो जाना जिससे मृदा की उर्वरता नष्ट हो जाये, मृदा अपरदन कहलाता है।

प्रश्न 3.
अपरदन को रोकने और कम करने के कौन-कौन से तरीके हैं ?
उत्तर:
अपरदन को रोकने और कम करने का प्रमुख तरीका वन विनाश को रोकना तथा अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना है। अपरदन रोकने के लिए यह आवश्यक है कि भूमि खाली न छोड़ी जाये। वर्षा शुरू होने से पहले खाली भूमि के चारों ओर मेड़बन्दी की जाय। असमतल भूमि पर कन्टूर खेती तथा ढालू भूमि पर सीढ़ीदार खेती की जाय। ऐसे क्षेत्र जहाँ वायु द्वारा अपरदन की अधिक सम्भावना है वहाँ भूमि पर लम्बे वृक्षों की वायुरोधी कतार लगाई जाये। \

प्रश्न श्रृंखला # 04 (पृष्ठ संख्या 226)

प्रश्न 1.
जल-चक्र के क्रम में जल की कौन-कौन सी अवस्थाएँ पाई जाती हैं ?
उत्तर:
जल चक्र के क्रम में जल तीन अवस्थाओं –

  1. ठोस अवस्था; जैसे-बर्फ
  2. द्रव अवस्था; जैसे- भूमिगत जल एवं नदी, तालाब, झरने आदि तथा
  3. गैसीय अवस्था; जैसेजलवाष्प में पाया जाता है।

प्रश्न 2.
जैविक रूप से महत्वपूर्ण दो यौगिकों के नाम दीजिए जिनमें ऑक्सीजन और नाइट्रोजन दोनों पाये जाते हैं ?
उत्तर:
प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल (DNA एवं RNA) जैविक रूप से महत्वपूर्ण ऐसे दो यौगिक हैं जिनमें ऑक्सीजन और नाइट्रोजन दोनों पाये जाते हैं।

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प्रश्न 3.
मनुष्य की किन्हीं तीन गतिविधियों को पहचानें जिससे वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है।
उत्तर:
मनुष्य की निम्न गतिविधियों से वायु में कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है –

  1. ईंधन के दहन द्वारा जिसका उपयोग खाना बनाने, उसे गर्म करने, यातायात तथा विभिन्न उपयोगों में किया जाता है।
  2. कूड़े-करकट में आग लगाने से।
  3. वन विनाश के कारण।

प्रश्न 4.
ग्रीन हाउस प्रभाव क्या है ?
उत्तर:
पृथ्वी का तापमान प्रमुख रूप से कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा पर निर्भर करता है। यह गैस एक निश्चित सीमा तक । उपस्थित होने पर सूर्य की किरणों को पृथ्वी पर आने देती है तथा पृथ्वी से इसकी ऊष्मा को पुनः वापस जाने भी देती है। लेकिन इस गैस का मोटा आवरण पृथ्वी से लौटने वाली इस ऊष्मा को रोककर पृथ्वी के उस क्षेत्र विशेष का तापमान बढ़ा देता है। यह क्रिया उस ग्रीन हाउस के समान है जिसका शीशा सूर्य के प्रकाश को तो अन्दर आने देता है लेकिन उसकी गर्मी को वापस बाहर जाने से रोकता है। ठीक उसी प्रकार CO) का आवरण भी ऊष्मा को बाहर जाने से रोक देता है। इसे ही ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं।

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प्रश्न 5.
वायुमण्डल में पाये जाने वाले ऑक्सीजन के दो रूप कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
वायुमण्डल में पाये जाने वाले ऑक्सीजन के दो रूप हैं –
1.  द्विपरमाण्विक ऑक्सीजन (O2) तथा
2. त्रिपरमाण्विक ऑक्सीजन-ओजोन (O3)।
सामान्य ऑक्सीजन अणु के विपरीत ओजोन विषैला होता है।

क्रियाकलाप 14.1 (पृष्ठ संख्या 214)

प्रश्न 1.
1. जल से भरा बीकर तथा
2. मृदा या बालू से भरा बीकर में से किसमें तापमान की माप अधिक है ?
उत्तर:
3. मृदा या बालू से भरे बीकर का।

प्रश्न 2.
प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर कौन सबसे पहले गर्म होगा-स्थल या समुद्र।
उत्तर:
स्थल।

प्रश्न 3.
क्या छाया में वायुका तापमान, बालू तथा जल के तापमान के समान होगा ? आप इसके कारण के बारे में क्या सोचते हैं ? और तापमान को छाया में क्यों मापा जाता है ?
उत्तर:
नहीं, छाया में वायु का तापमान, बालू तथा जल के तापमान से कम होगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि वायु, बालू अथवा जल की तुलना में जल्दी ठण्डी होती है। तापमान को छाया में इसलिए मापा जाता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि सीधे सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में वायु, बालू और जल कैसे ठण्डे होते हैं।

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प्रश्न 4.
क्या बन्द बोतल या शीशे के बर्तन में लिया गया हवा का तापमान और खुले में लिया गया हवा का तापमान समान है ? इसके कारण के बारे में आप क्या सोचते हैं ? क्या हम प्रायः इस तरह की घटनाओं से अवगत होते हैं ?
उत्तर:
नहीं, बन्द बोतल या शीशे के बर्तन में लिया गया हवा का तापमान, खुले में लिये गये हवा के तापमान से अधिक होता है क्योंकि शीशे का बर्तन सूर्य के प्रकाश को बर्तन के अन्दर तो आने देता है परन्तु उसकी गर्मी को बाहर जाने से रोकता है जिससे उसका तापमान बाहर की तुलना में अधिक हो जाता है।
हाँ, हम इस तरह की घटनाओं से अवगत हैं। ग्रीन हाउस में इसी प्रकार की घटना होती है।

क्रियाकलाप 14.2 (पृष्ठ संख्या 214)

प्रश्न 5.
जब अगरबत्ती को मुँह के किनारे पर ले जाया जाता है तब अवलोकन करें कि धुआँ किस ओर जाता
उत्तर:
इस स्थिति में अगरबत्ती का धुआँ मोमबत्ती की लौ की ओर नीचे की ओर जाता है क्योंकि ठण्डी हवा (अगरबत्ती का धुआँ मोमबत्ती के आस-पास की वायु की अपेक्षा ठण्डा होता है) मोमबत्ती की ऊपर उठती गर्म हवा से उत्पन्न रिक्त स्थान को भरने के लिए नीचे की ओर बहती है।

प्रश्न 6.
जब अगरबत्ती को मोमबत्ती के थोड़ा ऊपर रखा जाता है तब धुआँ किस ओर जाता है ?
उत्तर:
इस स्थिति में अगरबत्ती का धुआँ ऊपर उठने लगता है। इसका कारण यह है कि अब अगरबत्ती का धुआँ आसपास की वायु की अपेक्षा गर्म होने के कारण ऊपर की ओर उठता है।

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प्रश्न 7.
दूसरे भागों में जब अगरबत्ती को रखा जाता है तो धुआँ किस ओर जाता है ?
उत्तर”:
ऊपर की ओर।

क्रियाकलाप 14.3 (पृष्ठ संख्या 215)

प्रश्न 8.
आपने कब देखा कि बोतल के अन्दर स्थित हवा कुहरे की भाँति हो जाती है ?
उत्तर:
जब बोतल पर दाब बढ़ाया जाता है तो बोतल के अन्दर का धुआँ कुहरे की भाँति हो जाता है।

प्रश्न 9.
यह कुहासा कब समाप्त होता है ?
उत्तर”:
दाब समाप्त होने पर यह कुहासा भी समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 10.
बोतल के अन्दर दाब कब अधिक होता है ?
उत्तर:
बोतल को दबाने पर।

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा

प्रश्न 11.
कुहासा दिखाई देने की स्थिति में, बोतल के अन्दर का दाब कम है या अधिक है ?
उत्तर:
कुहासा दिखाई देने पर स्पष्ट है कि बोतल के अन्दर का दाब अधिक है।

प्रश्न 12.
इस प्रयोग के लिए बोतल के भीतर धुएँ की आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर:
क्योंकि धुएँ के कणों द्वारा जलवाष्प का संघनन हो जाता है। वास्तव में ऐसी स्थिति में धुएँ के कण जल की बूंदों के लिए केन्द्रक (nuclei) का काम करते हैं जिसके आस-पास जल की बूंदें एकत्रित हो जाती हैं।

प्रश्न 13.
क्या होगा जब आप इस प्रयोग को बिना अगरबत्ती के धुएँ के करेंगे? अब ऐसा प्रयत्न करें और देखें कि परिकल्पना सही थी या गलत।
उत्तर:
कुहासा दिखाई नहीं देता। यदि ऐसा करने पर देखा गया कि परिकल्पना सही थी।

क्रियाकलाप 14.9 (पृष्ठ संख्या 218)

प्रश्न 14.
क्या दोनों बार संख्याएँ समान थीं?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 15.
किस मौसम में आपने विभिन्न प्रकार के पौधों और जन्तुओं की अधिकता पाई ?
उत्तर:
बरसात के मौसम में।

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प्रश्न 16.
प्रत्येक प्रकार के जीवों की संख्या किस मौसम में अधिक थी?
उत्तर:
बरसात के मौसम में।

क्रियाकलाप 14.12 (पृष्ठ संख्या 225)

प्रश्न 17.
वैश्विक ऊष्माकरण के क्या परिणाम हो सकते
उत्तर:
वैश्विक ऊष्माकरण के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हो सकती है जिससे ध्रुवीय क्षेत्रों के विशाल हिमखण्ड पिघलकर समुद्री जल के स्तर को बढ़ा सकते हैं। परिणामस्वरूप समुद्र के किनारे बसे देश एवं नगर डूब सकते हैं। इसके अतिरिक्त पृथ्वी के ताप में वृद्धि से मौसम में भयंकर बदलाव हो सकता है जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ (तूफान, बाढ़ आदि) आयेंगी।

प्रश्न 18.
कुछ अन्य ग्रीन हाउस गैसों के नामों का भी पता लगाएँ। .
उत्तर:
प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें हैं-कार्बन डाइ-ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लूरोकार्बन। .. क्रियाकलाप 14.13 (पृष्ठ संख्या 226)

प्रश्न 19.
यह पता लगायें कि कौन-कौन से अणु हैं जो ओजोन परत को हानि पहुँचाते हैं ?
उत्तर:
क्लोरोफ्लूरोकार्बन (CFC) जैसे-फ्रीऑन के विघटन से वातावरण में क्लोरीन एवं फ्लोरीन के परमाणु विसरित होते हैं जो ओजोन परत को हानि पहुँचाते हैं।

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प्रश्न 20.
समाचार-पत्रों में प्रायः ओजोन परत में होने वाले छिद्र की चर्चा की जाती है ?
उत्तर:
हमारे वायुमण्डल में ओजोन का एक जीवनरक्षक स्तर पाया जाता है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर उन्हें पृथ्वी पर आने से रोकता है। परन्तु क्लोरोफ्लूरोकार्बन (CFC) वातावरण में पहुँचकर इस ओजोन परत को पतला करते जा रहे हैं तथा कहीं-कहीं यह स्तर अत्यन्त पतला हो गया है जिसे ओजोन छिद्र कहा जाता है। समाचार-पत्रों मैं प्रायः इसी की चर्चा की जाती है।

प्रश्न 21.
यह पता लगायें कि क्या छिद्र में कोई परिवर्तन हो रहा है। वैज्ञानिक क्या सोचते हैं कि यह किस प्रकार पृथ्वी पर जीवन को प्रभावित करेगा?
उत्तर:
हाँ, अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छिद्र बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ओजोन छिद्र के कारण सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक पहुँचने लगेंगी जिसके प्रभाव से तरह-तरह के उत्परिवर्तन के अलावा त्वचा का कैंसर एवं आँखों में मोतियाबिन्द जैसे विकार उत्पन्न होंगे।

Bihar Board Class 9 Science प्राकृतिक सम्पदा Text book Questions and Answers

प्रश्न 1.
जीवन के लिए वायुमण्डल क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
जीवन के लिए वायुमण्डल आवश्यक है। इसके प्रमुख कारण हैं –

  1. वायुमण्डल नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइ ऑक्साइड तथा जलवाष्प का मिश्रण है। इन वायु घटकों के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सम्भव है।
  2. वायुमण्डल पृथ्वी का एक नियत औसत तापक्रम बनाये रखता है।
  3. यह दिन के समय अचानक तापं वृद्धि से सुरक्षा प्रदान करता है।
  4. रात के समय यह ऊष्मा को बाहरी अन्तरिक्ष में जाने से रोकता है।

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 14 प्राकृतिक सम्पदा
प्रश्न 2.
जीवन के लिए जल क्यों अनिवार्य है ?
उत्तर:
जल जीवन के लिए अनिवार्य है, क्योंकि –
(1) जीवों की सभी जैविक क्रियाएँ जलीय माध्यम में सम्पन्न होती हैं।
(2) जीवों के शरीर में विभिन्न पदार्थों का संवहन जल द्वारा ही होता है।

प्रश्न 3.
जीवित प्राणी मृदा पर कैसे निर्भर हैं ? क्या जल में रहने वाले जीव सम्पदा के रूप में मृदा से पूरी तरह स्वतन्त्र हैं ?
उत्तर:
जीवन की विविधता को निर्धारित करने में मृदा महत्वपूर्ण घटक है। लगभग सभी जीवित प्राणी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मृदा पर निर्भर करते हैं। पौधों जो सम्पूर्ण पारितन्त्र को भोजन उपलब्ध कराते हैं, सीधे रूप से मृदा से खनिज लवणों का अवशोषण कर अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं तथा दूसरे जीव इन पौधों या फिर उन जीवों जो पौधों पर निर्भर है, से अपना भोजन लेते हैं।

जल में रहने वाले जीव, सम्पदा के रूप में मृदा से पूर्णरूप से स्वतन्त्र नहीं हैं। यद्यपि जलीय जीव सीधे रूप से मृदा से सम्बन्धित नहीं होते। जलीय उत्पाद पौधे जल से आवश्यक खनिजों को अवशोषित करके अपने भोजन बनाते हैं लेकिन जल में ये आवश्यक खनिज अप्रत्यक्ष रूप से मृदा द्वारा ही पहुँचते हैं जो विभिन्न जल स्रोतों में पानी के साथ घुलकर पहुँची है।

Bihar Board Class 9 Science Solutions Chapter 14 शहीद बकरी

प्रश्न 4.
आपने टेलीविजन पर और समाचार-पत्र में मौसम सम्बन्धी रिपोर्ट को देखा होगा। क्या आप सोचते हैं कि हम मौसम के पूर्वानुमान में सक्षम हैं ?
उत्तर:
मौसम विभाग मौसम से सम्बन्धित कुछ तत्वों; जैसे तापमान, आर्द्रता, वायु की गति एवं वर्षा आदि के आँकड़ों को एकत्र करके मौसम का पूर्वानुमान लगाता है। इन आँकड़ों को कुछ यंत्रों की सहायता से एकत्र किया जाता है; जैसे-तापमान ज्ञात करने के लिए थर्मामीटर, वायु की गति मापने के लिए एनिमोमीटर तथा वर्षा मापने के लिए गेज आदि।

प्रश्न 5.
हम जानते हैं कि बहुत सी मानवीय गतिविधियाँ वायु, जल एवं मृदा के प्रदूषण स्तर को बढ़ा रही हैं। क्या आप सोचते हैं कि इन गतिविधियों को कुछ विशेष क्षेत्रों में सीमित कर देने से प्रदूषण के स्तर को घटाने में सहायता मिलेगी ?
उत्तर:
हाँ, इन गतिविधियों को कुछ क्षेत्र विशेष में सीमित करने से प्रदूषण के स्तर को कम किया जा सकता है। जैसे यदि किसी नगर उद्योगों को एक निश्चित क्षेत्र में प्रतिस्थापित कर दें तो उनसे निकले अपद्रव्य सीधे जलाशयों (जलकायों) या कृषि भूमि में नहीं मिलेंगे तथा प्रदूषण का स्तर काफी हद तक कम हो जायेगा। इसके अतिरिक्त इन औद्योगिक क्षेत्रों में घना वृक्षारोपण भी प्रदूषण के स्तर को कम करेगा।

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प्रश्न 6.
जंगल वायु, मृदा तथा जलीय स्त्रोत की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करते हैं ?
उत्तर:
जंगल या वन वायु, मृदा तथा जलीय स्रोत की गुणवत्ता को अनेक प्रकार से प्रभावित करते हैं जिनमें से कुछ। प्रमुख इस प्रकार हैं –
1. ये प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के माध्यम से वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर ऑक्सीजन निकालते हैं जिससे वातावरण शुद्ध होता है तथा इन दोनों गैसों का स्तर ठीक बना रहता है।

2. वन मृदा अपरदन को रोकते हैं। इनकी जड़ें मृदा कणों को मजबूती से जकड़े रहती हैं। वृक्षों से गिरी पुरानी पत्तियाँ मृदा सतह को ढककर वर्षा के वेग को कम कर देती हैं, जिससे जल एवं वायु द्वारा भूमि कटाव नहीं हो पाता।

3. वन जल सम्पदा के पुनः चक्रण में भी सहायता करते हैं। ये वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायुमण्डल में जलवाष्प छोड़ते हैं जो संघनित होकर बादल बनाने में सहायक है। इन बादलों के वर्षा के रूप में बरसने पर जलीय स्रोतों की गुणवत्ता में सुधार होता है।