Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 21 गुरु की सीख

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 21 गुरु की सीख Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 21 गुरु की सीख

Bihar Board Class 7 Hindi गुरु की सीख Text Book Questions and Answers

गुरु की सीख Summary in Hindi

एक दिन गुरु जी अपने शिष्यों को जड़ी-बूटियों की जानकारी देने के लिए किसी जंगल में लेकर जा रहे थे। रास्ते में अवारा कुत्ते भौंकते हुए उनके पीछे आ गए । गुरु और उनका एक शिष्य उनकी ओर ध्यान न देकर चुपचाप अपनी राह पर चलते रहे। पर उनके अन्य शिष्य वहीं रूक गए। वे पत्थर मारकर उन आवारा कुत्तों को भगाने लगे।

उन्हें भगाकर जैसे ही वे आगे बढ़े, अचानक एक बंदर उनके रास्ते में आ गया। वे उसे भी पत्थर मारने लगे। बंदर तब भी वहाँ से भागा नहीं। वह उन शिष्या से चिढ़ गया था। बहुत देर तक वे उस बंदर से ही उलझे रह।

जब जंगल में पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जब वे अपने गुरु के पास आए, गुरु ने उनकी ओर देखा भी नहीं। उनकी अनदेखी करते हुए गुरु ने अपने साथ आए शिष्य से कहा-“वत्स, शाम होनेवाली है। जंगल में अब रूकना ठीक नहीं है, हमें यहाँ से अब शीघ्र जाना होगा।” यह सुनकर अन्य शिष्य हैरान रह गए । जड़ी-बूटियों के बारे में तो गुरु जी ने कुछ बताया ही नहीं था।

उन शिष्यों ने विनम्र भाव से गुरु से कहा-“गुरुजी, आप तो हमें जंगल में जड़ी-बूटियों की जानकारी देने के लिए लाए थे, पर आप तो बिना जानकारी दिए जाने की बात कह रहे हैं।”

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 21 गुरु की सीख

गुरु ने कठोरता से कहा “बच्चो, तुम सही कह रहे हो । पर गुम अभी इस योग्य नहीं हो।”

गुरु की बात को वे समझ नहीं सके। शिष्यों ने पुनः याचना भरे स्वर में कहा – “गुरुजी, आप हम से नाराज क्यों हैं ? हमारा दोष क्या है ?”

शिष्यों को समझाते हुए गुरु ने कहा-“बच्चो, यदि तुम समय पर जंगल में आ जाते, तो संभवत: मैं तुम्हें जड़ी-बूटियों की जानकारी अवश्य देता । पर तुमने लो अपना सारा समय रास्तं में व्यर्थ की बातों में उलझनों में ही गंवा दिया।”

शिष्यों को अपनी गलती का एहसास हो गया था। वे खाली हाथ-मुँह लटकाए कुटिया में वापस आकर अपनी गलती पर पश्चाताप करने लगे।

जबकि वह शिष्य, जो रास्ते में न रूककर गुरु के साथ ही रहा था, अपने साथ कई उपयोगी जड़ी-बूटियाँ जंगल से एकत्रित कर ले आया था।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 20 यशास्विनी

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 20 यशास्विनी Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 20 यशास्विनी

Bihar Board Class 7 Hindi यशास्विनी Text Book Questions and Answers

पाठ से –

प्रश्न 1.
इन पद्यांशों के अर्थ स्पष्ट कीजिए।

(क) पग-नुपूर कंगन हार नहीं,
तुम विद्या से श्रृंगार करो।
अर्थ – हे नारी ! पैर में पायल, हाथ में कंगन और गले में हार पहनना हों अपना शृंगार मत समझो। आज तुझे विद्या से अपने को शृंगार करने का समय है।

(ख) वह दान दया की वस्तु नहीं,
वह जीव नहीं वह नारी है।
अर्थ – हे पुरुषो ! नारी को मात्र दान-दया का जीव मत मानो। वह पुरुषों के साथ-साथ चलने वाली नारी है।

(ग) उसे टेरेसा बन जीने दो,
उसे इंदिरा बन जीने दो।
अर्थ-हे पुरुषो। इसी नारी में कोई महान समाज सेविका मदर टेरेसा अथवा कोई इंदिरा भी बन सकती है। अत: इन्हें भी टेरेसा, इंदिरा बनने दो।

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पाठ से आगे –

प्रश्न 1.
समाज में लिंग-भेद मिटाना क्यों जरूरी है ? इसको मिटाने के लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं ?
उत्तर:
समाज में अभी भी लिंग भेद व्याप्त है जिसे मिटाना जरूरी है क्योंकि बेटा-बेटी दोनों एक समान हैं। बेटियाँ भी अच्छी विद्या पाकर राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान दे रही हैं। इसके बाद भी स्त्री-पुरुष में विभेद किया जा रहा है जो स्त्री के साथ अन्याय हो रहा है।

इसको मिटाने के लिए हम सबसे पहले भ्रूण हत्या रोकने की कोशिश करेंगे। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देंगे। लड़कियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करेंगे। बेटा-बेटी को एक समान बताने का प्रयास कर लिंग-भेद मिटाया जा सकता है।

प्रश्न 2.
समाज में स्त्री एवं पुरुष में भेद-भाव किन-किन रूपों में दिखाई देता है। इन्हें समाप्त करने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है ?
उत्तर:
आज के युग में भी स्त्री-पुरुष में भेद-भाव विभिन्न रूपों में दिखाई देता है जिसे हम निम्न रूप में देखते हैं –

  1. विशेषतः स्त्रियों को पुरुष अपना सेविका मानती हैं।
  2. विशेषत: स्त्रियों को घर के कामों में सीमित रखा जाता है।
  3. स्त्रियों को शिक्षित करना अभिशाप मानते हैं।
  4. उनके रहन-सहन पढ़ाई-लिखाई और खान-पान भी पुरुषों की अपेक्षा कमजोर दिखाई पड़ते हैं।

अर्थात् पुरुषों की अपेक्षा नारियों का महत्व समाज में कम देते हैं। इसको दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –

  1. समाज में नारी के योगदान की चर्चा करना चाहिए।
  2. नारी सह पुरुष शिक्षा का समान शिक्षा प्रणाली बने ।
  3. नारी को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जाय ।
  4. नारी को आगे बढ़ने देने के लिए सहयोग करना चाहिए।

प्रश्न 3.
समाज में भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। लगातार महिलाओं की संख्या में कमी हो रही है। लोग लड़के की कामना करते हैं तथा लड़कियों को दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाता है। वर्तमान समय में कमोवेश नारी की यही स्थिति है। इस परिदृश्य को ध्यान में रखकर एक स्वरचित कविता का निर्माण कीजिए।
उत्तर:
बेटी
गर्भ में बेटो को कम मत समझो,
मात्र नारी नहीं तुम जननी समझो।
कौन कहता जो पुत्र तुम्हारें गर्भ में है,
वह कुकर्मी, शैतान चोर-डाकू नहीं है।
तुम्हारी बेटी क्यों नहीं हो सकती.ऐसा,
कल्पना, इंदिरा लता मंगेशकर के जैसा।
जन्म लेने दो उसे उसका यह अधिकार है।
नहीं तो तुम्हें नारी होने पर धिक्कार है।

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व्याकरण –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के विलोम लिखिए –
उत्तर:
तोड़ो = जोड़ो
संवारना = मिटाना
नफरत = प्रेम
सम्मान = असम्मान
स्वीकार = अस्वीकार
दया = कठोरता

प्रश्न 2.
दिये गये पुलिङ्ग शब्दों के स्त्रीलिंग शब्द लिखिए –
उत्तर:
अभिनेता = अभिनेत्री।
नेता = नेताइन।
लेखक = लेखिका।
छात्र = छात्रा।
अध्यापक = अध्यापिका।
नर = नारी।

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कुछ करने को –

प्रश्न 1.
बाल विवाह, दहेज-प्रथा, भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियाँ हमारे समाज में हैं। आपके विद्यालय में “मीना मंच” से संबंधित या कुछ अन्य पुस्तकें होगी। जिनमें बालिका शिक्षा तथा नारी गणनितकरण से सम्बन्धित कहानियाँ हैं। आप उनका अध्ययन कीजिए और नुक्कड़ नाटक के द्वारा समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने के लिए लोगों को प्रेरित कीजिए।
उत्तर:
बालिका शिक्षा और नारी सशक्तिकरण से सम्बन्धित अनेक पुस्तकें हैं उसका अध्ययन कर नुक्कड़ नाटक करें।

प्रश्न 2.
प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस दिन क्या-क्या होता है। अपने शिक्षक से चर्चा कीजिए।
उत्तर:
प्रतिवर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है जिसमें राष्ट्र के श्रेष्ठ महिलाओं को सम्मानित किया जाता है। मेघावी छात्राओं को सम्मानित किया जाता है।

प्रश्न 3.
भारतीय नारी विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम लहराया है, जैसे –
इन्दिरा गाँधी – राजनीति क्षेत्र में।
कल्पना चावला – अंतरिक्ष क्षेत्र में।
मदर टेरेसा – समाज सेवा क्षेत्र में।
लता मंगेशकर – संगीत के क्षेत्र में।
क्या आपके आस-पास कोई ऐसी नारी है, जिसने किसी क्षेत्र में अपना विशेष नाम किया हो । शिक्षक, अभिभावक की सहायता से पता कर उनसे मिलिए और बातचीत कीजिए।
उत्तर:
हमारे पास एक वयोवृद्ध महिला भगवती देवी जी हैं मैं उनसे मिलकर बातचीत किया और जाना।

प्रश्न 4.
क्या आप महिलाओं की शिक्षा के प्रति अधिक व्यस्त रही?
उत्तर:
हाँ मैंने जीवन में अधिकाधिक महिलाओं को शिक्षित करने का व्रत रख लिया है।

प्रश्न 5.
आपने महिलाओं की क्या दशा देखी?
उत्तर:
पहले महिलाओं को केवल बच्चा पैदा करने वाली और खाना बनाने वाली मानकर उसे पुरुष रखते थे। उनको शिक्षा से वंचित रखा जाता था । उनको घर से निकलने नहीं दिया जाता था।

प्रश्न 6.
आपके द्वारा कितनी महिलाएँ शिक्षित हुई ?
उत्तर:
गिनती करना तो मुश्किल है लेकिन हजारों की संख्या में लड़कियाँ एवं महिलाओं को मैंने शिक्षा देकर उन्हें शिक्षित किया है।

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प्रश्न 7.
महिला शिक्षा के लिए आपने क्या-क्या उपाय किये?
उत्तर:
सबसे पहले उन्हें चर्खा कतवाकर, गुड़िया बनवाकर अर्थोपार्जन के लिए आकृष्ट किया। फिर उनके बच्चे को पढ़ाने का काम भी करने लगे तथा अनपढ़ महिलाओं को भी साक्षर होने के लिए प्रोत्साहित किया। लड़कियों का स्कूल खोला।

प्रश्न 8.
आज आपके विद्यालय में कहाँ तक लड़कियाँ अध्ययन कर सकती हैं?
उत्तर:
वर्तमान समय में हमारे यहाँ वर्ग प्रथम से दशम वर्ग तक की छात्राएँ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।

प्रश्न 9.
आपके इस कार्य में सरकार का क्या सहयोग रहा?
उत्तर:
सरकार भी बालिका शिक्षा के प्रति जागरूक है। हमारे यहाँ वर्ग आठ तक की शिक्षा को सरकार अपने अधिकार में लेकर मान्यता दे दी है। लेकिन हाई स्कूल के शिक्षिकागण सरकारी सहायता से वंचित है। हाईस्कूल को भी वित्तरहित मान्यता देकर छोड़ दिया गया है।

प्रश्न 10.
क्या आए सरकार से संतुष्ट हैं ?
उत्तर:
वर्तमान सरकार नारी शिक्षा के प्रति अधिक जागरूक है जिससे हम संतुष्ट हैं।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 20 यशास्विनी

गतिविधि –

जूतों की दुकान में जाकर जूते-चप्पलों तथा सैंडलों की बनावट, रंग तथा उपयोग में लाई गई सामग्री पर जानकारी एकत्रित करके नीचे दिये गये प्रश्नों के जवाब दीजिए।

(क) क्या लड़के तथा लड़कियों के जूते-चप्पल तथा सैंडल में अन्तर है ? यदि हाँ तो ये अन्तर कान-कौन से हैं ?
उत्तर:
लड़कियों के जूते चप्पल तथा सैंडल प्रायः लड़के के जूते चप्पलों से ऊँची ऐडियों की होती हैं। लड़कियों के जूते-चप्पल विशेषतः रंग-बिरंगी रंगों में होती है।

(ख) लड़के तथा लड़कियों के लिए अलग-अलग जूते-च बनाने के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
लड़कियों के जूते-चप्पल को अलग-अलग बनाने का मुख्य कारण उन्हें आकर्षक बनाना है तथा लिंग-भेद कायम रखना है।

(ग) लड़के तथा लड़कियों के जूते चप्पलों तथा सैंडलों में अन्तर ‘लिंग-भेद को बनाये रखने का एक तरीका है। चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हाँ, लड़के तथा लड़कियों के जूते चप्पलों तथा सैंडड़ों में अन्तर कर लिंग-भेद में बढ़ावा देना है। जो नहीं होना चाहिए।’

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शारीरिक ताकत का भ्रम

स्त्रियाँ तेजी से दौड़ नहीं सकतों—यह धारणा ‘सुसंस्कृत’ गृहिणियों’ को देखकर पैदा होती है। लेकिन तथ्य गवाह है कि यदि स्त्री को समान अवसर मिले तो वह पुरुपों से ज्यादा पीछे नहीं रह सकतीं । ओलंपिक के रिकार्ड इसके गवाह हैं। ओपिक प्रतियोगिताओं में 100 मीटर की दौड़ में पुरुषों का रेकार्ड 1183 सेकेंड (1984 में) का है और स्त्रियों का रेकार्ड 10.76 सेकेंड (1984 में) का । यानि स्त्री की अधिकतम रफ्तार पुरुष की अधिकतम रफ्तार से सिर्फ 17.94 प्रतिशत कम है। लेकिन 10 हजार मीटर की दौड़ में यह फर्क लगभग आधा हो जाता है। 0 हजार मीटर की दौड़ में पुरुषों का अब तक का रेकार्ड है 27 मिनट 18,81 सेकेंड और स्त्रियों का 30 मिनट 13.74 सेकेंड। यानी स्त्री की अधिकतम रफ्तार पुरुष से सिर्फ 9.95 प्रतिशत कम. है। क्या 9.95 प्रतिशत की कमी स्त्री और पुरुष की दौड़ने की क्षमता में किसी बड़े, मूलभूत फर्क की ओर इशारा करती है? फिर यह सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय रेकॉर्ड का मामला है।

औसत के स्तर पर यह फर्क और भी कम हो सकता है। बल्कि कम हो जाता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि स्त्रियों की रफ्तार स्थिर नहीं है। यह पिछले पाँच दशकों में लगातार बढ़ती गयी है। उदाहरण के लिए 100 मीटर की दूरी स्त्री द्वारा तय करने का रेकार्ड 1928 में 12.2 सेकेंड था, जो 1984 में घटकर 10.97 सेकेंड रह गया। 800 मीटर की दूरी में यह फर्क इस प्रकार रहा : 1928 में 4 मिनट 16.8 सेकेंड और 1984 में 1 मिनट 57.60 सेकेंड । इससे क्या हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि आदिम युग में, जल विषमता नहीं थी या न्यूनतम थी तथा स्त्री को बलपूर्वक सुकुमार नहीं किया जाता था, तब यह भी पुरुष की तरह ही हष्ट-पुष्ट होती होगी-उतनी ही सक्षम, उतनी ही चुस्त और शायद उतनी ही हिंसक भी ?

(राजकिशोर स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार से साभार)

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यशास्विनी Summary in Hindi

सारांश – आज के युग में भी नारियों को स्थान पुरुषों की अपेक्षा पीछे माना जा रहा है जबकि नारियों ने सभी क्षेत्रों में अपना योगदान पुरुष से कम नहीं दे रही हैं। इसी पर आधारित इस कविता में नारियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया है।

अर्थ लेखन –
मत उसके नभ को छीनो तम,
मत तोड़ो उसके सपनों को।
वह दान दया की वस्तु नहीं,
वह जीव नहीं वह नारी है।

अर्थ – ई पुरुषो । नारी की स्वतंत्रता को तुम मत छीनो । उसके सपनों को साकार होने दो । नारी केवल दान, दया की वस्तु नहीं है। नारी सामान्य जीव नहीं बल्कि नर के साथ-साथ चलने वाली, सहायक रूप में काम आने वाली नारी है।

अगर कर सकते हो कुछ भी तम,
तो कुछ न करो-यह कार्य करो!
जो चला गया पर अब जो है
उसको संवारना आर्य करो।

अर्थ – हे आर्य । आपने नारियों का बहुत परित्याग किया है। भ्रूण हत्या आदि से उसको नाश किया है लेकिन जो बची है उसको संवारने का कार्य करो।

क्या दादी-नानी-चाची मां।
बस यह बनकर है रहने को?
निर्जीव नहीं, वह नारी है
उसे टेरेसा बन जीने दो,
उसे इंदिरा बन जीने दो।

अर्थ – क्या नारी को दादी-नानी-चाची और माँ बनाना ही औचित्य है। वह निर्जीव पत्थर नहीं कि जिस रूप में चाहो बना लो । वह तो पुरुषों को साथ देने वाली नारी है। उसे मदर टेरेसा या इंदिरा बनकर जीने दो।

हाँ तोड़ो उस बेड़ी को जरा
जिसमें नफरत की कड़ियाँ हैं।
फिर पंखों को खुल जाने दो,
उसे कल्पना बन जीने दो,
उसे लता बन जीने दो।

अर्थ – बेटी से नफरत की बेड़ी को काँट दो उसे भी स्वतंत्रता से जीने दो जिससे वे भी कल्पना चावला बनकर आकाश में विचरण करें या लता मंगेशकर की तरह संगीत की दुनिया में नाम कमा सकें।

पग-नुपूर कंगन-हार नहीं
तुम विद्या से श्रृंगार करो ।
तुम खुद अपना सम्मान करो
अपना नारीत्व स्वीकार करो।

अर्थ – हे नारी ! पैर में पायल पहनना, हाथ में कंगन पहनना और गले में हार पहनना ही तुम्हारा श्रृंगार नहीं। अब तुम विद्या से अपना श्रृंगार करो। तुम अपने आपको सम्मान करो। अपने नारीत्व गुण को स्वीकार करो । अर्थात् नारी होने का गौरव प्राप्त करो।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

Bihar Board Class 8 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 3 Chapter 8 खाद्य सुरक्षा Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

Bihar Board Class 8 Social Science खाद्य सुरक्षा Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या खेतों में काम करके रामू को नियमित आय होती होगी ? क्या इस आय से वह पर्याप्त भोजन की व्यवस्था कर पाता होगा? चर्चा करें।
उत्तर-
नहीं, रामू को खेतों में काम करके नियमित आय नहीं होती होगी। वह लगभग हजार रुपये प्रति वर्ष कमाता है । इस क्षुद्र आय से वह अपने परिवार के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था कभी नहीं कर पाता होगा ।

प्रश्न 2.
कमला की बीमारी और उसके छोटे से बच्चे के मृत्यु का क्या कारण
उत्तर-
कमला की बीमारी और उसके छोटे से बच्चे के मृत्यु का कारण कुपोषण है।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 3.
सोमू अपनी उम्र से छोटा क्यों दिखता है ?
उत्तर-
कुपोषण के कारण ।

प्रश्न 4.
रामू और उसके परिवार को लम्बे समय तक पर्याप्त भोजन क्यों नहीं मिल पाता है ? ऐसा क्यों है कि पीढ़ी दर पीढ़ी इस परिवार के लोग कमजोर पैदा होते हैं ?
उत्तर-
नियमित रोजगार न होने से पास में जरूरी पैसा के न होने के कारण रामू और उसके परिवार को लम्बे समय तक पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाया । अभाव से रामू का परिवार कुपोषण का शिकार है। इसी कुपोषण के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी इस परिवार के लोग कमजोर पैदा होते हैं।

प्रश्न 5.
सरला जता से ही कमजोर क्यों है ?
उत्तर-
सरला की माँ भी कुपोषण का शिकार थी। कुपोषित माँ की संतान होने से ही सरला जन्म से ही कमजोर थी।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 6.
किन चीजों की कमी के कारण कुपोषण होता है ?
उत्तर-
पौष्टिक भोजन जैसे दूध, घी, फल व उचित मात्रा में भोजन न मिल पाने के कारण कुपोषण होता है।

प्रश्न 7.
कुपोषण के क्या-क्या लक्षण होते हैं ?
उत्तर-
कुपोषण के लक्षण

  1. शरीर की वृद्धि का रुक जाना ।
  2. खून की कमी का होना ।
  3. मांसपेशियाँ ढीली होना या सिकुड़ जाना।
  4. शरीर का वजन कम होना ।
  5. हाथ-पर पतले और पेट बड़ा होना ।
  6. शरीर में सूजन होना।
  7. कमजोरी महसूस करना ।

प्रश्न 8.
पुरुषों के मुकाबले, महिलाएँ अधिकतर कुपोषण से क्यों ग्रसित होता
उत्तर-
महिलाएँ घर का ज्यादातर काम करती हैं और दिन-रात काम करती रहती हैं। उस अनुपात में उन्हें उचित पौष्टिक आहार न मिलने से वे अधिकतर कुपोषण ग्रसित हो जाती हैं।

प्रश्न 9.
कुपोषण जैसी समस्या से निपटने के लिए हमें क्या करना चाहिए? शिक्षिका के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर-
कुपोषण जैसी समस्या से निपटने के लिए सबसे जरूरी है कि हर व्यक्ति के पास उचित और सम्मानजनक काम हो । उस काम से उन्हें निश्चित और नियमित आय हो जिससे वे अपने परिवार को उचित और पौष्टिक भोजन दे पाएँ । यही कुपोषण जैसी समस्या से निपटने के लिए प्रथम शर्त है। द्वितीय, सरकार बिना काम या कम आय वाले लोगों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध करवाए । यह लोगों का मौलिक अधिकार भी है।

प्रश्न 10.
आप अपने पड़ोस के आंगनबाड़ी केन्द्र जाकर निम्न सूचना एकत्र कर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

  1. बच्चों एवं महिलाओं का वजन क्यों लिया जाता है?
  2. वहाँ लोग किस प्रकार का आहार लेते हैं ?
  3. आंगनबाड़ी केन्द्र का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उत्तर-
संकेत – यह परियोजना कार्य है। आपको स्वयं करना है।

प्रश्न 11.
अपनी शिक्षिका व अपने घर के बड़े-बूढ़ों से जानकारी इकट्ठा करके अपने आसपास की ऐसी योजनाओं के बारे में पता लगाइये जिससे लोगों को रोजगार व आय की प्राप्ति हो रही है।
उत्तर-
बेरोजगारी का कुपोषण से सीधा-सीधा संबंध है। बेरोजगारी यानी आय से यानी पैसों से वंचित होना । बिना पैसों के पौष्टिक क्या साधारण पेट भर भोजन भी नहीं जटता तो फिर कपोषण होगा ही होगा।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 13.
लोगों को रोजगार दिलाने का दायित्व सरकार का क्यों होना चाहिए? अपने संविधान में दिए गए अधिकारों/प्रावधानों को ध्यान में रखकर इसका उत्तर दें।
उत्तर-
खाद्य सुरक्षा पाना लोगों का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार उन्हें भारत का संविधान देता है । अतः खाद्य सुरक्षा के लिए लोगों को रोजगार दिलाने का दायित्व सरकार का है।

प्रश्न 14.
क्या आपके घरों में भी अनाज का भंडारण किया जाता है ? अगर हाँ, तो इसका क्या उद्देश्य है?
उत्तर-
हाँ, हमारे घरों में भी अनाज का भंडारण किया जाता है। इसका उद्देश्य होता है कि अनाज खरीदने के लिए बार-बार खुदरा बाजार न जाना पड़े और थोक में अनाज सस्ते में मिल जाता है।

प्रश्न 15.
सरकार बफर स्टॉक क्यों बनाती है ?
उत्तर-
थोक में सस्ते में अनाज खरीदने के लिए । जब फसल नहीं हो तो यही बफर स्टॉक देश की जनता के काम में आता है विशेषकर गरीब व कम आय प्राप्त करने वाली जनता को

प्रश्न 16.
उचित मूल्य की दुकानों तक अनाज कैसे पहुँचता है ? अपने शब्दों में लिखिये।
उत्तर-
सरकार उत्पादकों से अनाज खरीदकर बफर स्टॉक में जमा करती है। गोदामों में अनाज का भंडारण करती है और उन गोदामों से उचित मूल्य की दूकानों तक पहुँचाती है।

प्रश्न 17.
क्या आपने कभी इस तरह की परिस्थिति देखी है ?
उत्तर-
हाँ, राशन दुकानों में सामान न होने की परिस्थिति मैंने कई बार देखा है।

प्रश्न 18.
आपके विचार में क्या दुकानदार सच बोल रहा है?
उत्तर-
नहीं, राशन दुकानदार अधिकतर झूठ ही बोलते हैं।

प्रश्न 19.
क्या आपके परिवार के पास राशन कार्ड है ?
उत्तर-
हाँ।

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प्रश्न 20.
इस राशन कार्ड से आपके परिवार में हाल में कौन-कौन-सी चीज खरीदी है ?
उत्तर-
बस किरासन तेल ही मिलता है हमें।

प्रश्न 21.
क्या आपके परिवार को राशन की चीजें लेने में कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है ? उनसे पता लगाएँ।
उत्तर-
हाँ, राशन दुकानदार या तो समान नहीं है कहेगा या फिर कभी कुछ राशन देगा भी तो खराब क्वालिटी का।

प्रश्न 22.
आपकी समझ से राशन की दुकानें क्यों जरूरी हैं ?
उत्तर-
जनता को राशन उचित दर पर घर-घर पहुँचाने के लिए हर मुहल्ले में राशन की दूकानें जरूरी हैं।

प्रश्न 23.
अपने इलाके की राशन की दुकान पर जाएँ और ये जानकास्यिाँ
प्राप्त करें।

  1. राशन की दुकान कब खलती है?
  2. वहाँ पर कौन-कौन-सी चीजें बेची जाती हैं ?
  3.  वहाँ किस-किस तरह के कार्डधारी आते हैं?
  4. वहाँ राशन कहाँ से आता है ?
  5. क्या इन दुकानों से सभी कार्डधारियों के लिए एक समान मूल्य होता है ?
  6. क्या राशन की दूकान और खुले बाजार की सामग्रियों की गुणवत्ता एवं मूल्य में अंतर होता है ? पता लगाइए।
  7. लक्षित जन वितरण प्रणाली के अन्तर्गत ए. पी. एल., बी.पी.एल, अन्त्योदय,’वृद्ध लोगों के लिए अन्नपूर्णा योजना संचालित की जाती हैं। अपनी शिक्षिका से इस विषय पर जानकारी एकत्रित कीजिये। ।
  8. निर्धन और गैर निर्धन के लिए चीजों का अलग-अलग मूल्य रखने में, क्या कोई व्यावहारिक कठिनाई हो सकती है ? कारण सहित समझाइये।

उत्तर-

  1. राशन दुकान सुबह-शाम निश्चित समय पर खुलती है।
  2. किरासन तेल, चावल, गेहूँ, चीनी आदि ।
  3. ए.पी.एल., बी.पी.एल., अन्त्योदर कार्डधारी आते हैं।
  4. वहाँ राशन सरकारी गोदामों से आता है।
  5. नहीं, हर कार्डधारी के लिए अलग मूल्य होता है।
  6. हाँ, खुले बाजार की वस्तुओं की गुणवत्ता अच्छी होती है, राशन दुकान में अधिकतर खराब गुणवत्ता के सामान ही मिलते हैं।
  7. सामान्य लोगों के लिए ए.पी.एल. कार्ड होते हैं जबकि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए बी.पी.एल. कार्ड होते हैं।
  8. गह तय करना ही पहले तो संभव नहीं होता कि निर्धन कौन है और गैर निर्धन कौन । कई बार तो समर्थ लोग भी निर्धन का कार्ड हासिल कर लेते हैं। वैसे दोनों श्रेणी के लिए अलग-अलग चीजों का अलग-अलग मूल्य रखने में कोई व्यावहारिक कठिनाई नहीं आनी चाहिए । इच्छा शक्ति और धैर्य हो
    दुकानदारों में तो सब संभव हो सकता है।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 24.
क्या आपको लगता है कि सरकार का गरीबों का स्वास्थ्य सुरक्षित कराने का यह तरीका सही है? कारण सहित समझाइए।
उत्तर-
नहीं, राशन दुकानें सही ढंग से काम नहीं करतीं। उन पर निगरानी रखने वाले लोग भी भ्रष्ट ही होते हैं।

प्रश्न 25.
क्या ऐसा भी किया जा सकता है कि कम दामों पर खाद्य सुरक्षा सार्वजनिक रूप से सभी लोगों को उपलब्ध करायी जाए? इसके लाभ तथा नुकसान पर अपनी शिक्षिका के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर-
ऐसा किया जा सकता है। इसका लाभ होगा कि जिनके पास राशन कार्ड नहीं है उन्हें भी उचित दर पर राशन मिलेगा। नुकसान यह है कि समर्थ व्यापारी ज्यादा राशन सस्ते दाम पर खरीद कहीं कालाबाजारी का धंधा कर राशन और महँगा न कर दें।

प्रश्न 26.
क्या कुछ लोग गलत तरीकों से अपने-आपको इस रेखा के नीचे प्रमाणित करने की कोशिशें करते होंगे?
उत्तर-
ऐसा तो बहुत लोग करते हैं। हमारे गाँव में तो मुखिया के परिवार में सभी लोगों के पास गरीबों को मिलने वाला लाल कार्ड है।

अभ्यास-प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसे कौन से लोग हैं जो खाद्य सुरक्षा से सर्वाधिक ग्रस्त हो सकते
उत्तर-
जिनके पास रोजगार नहीं है और न ही कोई राशन कार्ड है। खेतिहर मजदूर और अनियमित मजदूरी पाने वाले श्रमिकों के साथ भी यही स्थिति है। वे भी खाद्य सुरक्षा से सर्वाधिक ग्रस्त हैं।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 2.
राशन की दुकान होना क्यों जरूरी है ? समझाइये।
उत्तर-
सरकार तो घर-घर स्वयं जाकर सबको राशन नहीं पहँचा सकती। उसे भी इस काम के लिए किसी एजेंसी की जरूरत पड़ेगी। राशन . की दूकान सरकारी एजेंसी के रूप में कार्य करती है। जन-जन तक राशन की पहुँच होने के लिए राशन की दूकानें होना जरूरी है।

प्रश्न 3.
लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा खाद्य उपलब्ध कराने के अतिरिक्त खाद्य सुरक्षा के लिए और क्या-क्या उपाय किये जा सकते हैं ? शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर-
खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकार तमाम लोगों को, विशेषकर बेरोजगारों को लक्षित कर, उन्हें उचित रोजगार दिलाकर उन्हें खाद्य सुरक्षा प्रदान कर सकती है। साथ ही, बाजार पर नियंत्रण कर खाद्य वस्तुएँ उचित दर पर आम लोगों को उपलब्ध कराने से भी यह काम हो सकता है।

प्रश्न 4.
खाद्य सुरक्षा से आप क्या समझते हैं ? यह सभी लोगों के लिए क्यों जरूरी है ?
उत्तर-
लोगों को अपना जीवन-यापन करने के लिए जरूरी राशन मिले। इतनी क्रय-शक्ति उनकी हा कि वे अपने परिवार के लिए राशन खरीद सकें – बाजार से या राशन दुकान से । इसी को खाद्य सुरक्षा कहते हैं। यह सभी लोगों के लिए बेहद जरूरी है। बिना खाद्य पदार्थ के वे जी कैसे पाएँगे और कम खाद्य पदार्थ मिलने से वे कुपोषण का शिकार हो जाएँगे।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 5.
कुपोषण क्या है ? कुपोषण से लोगों पर किस-किस तरह के असर पड़ते हैं ?
उत्तर-
शरीर को पूरी खुराक न मिल पाना ही कुपोषण है । कुपोषण से लोगों का स्वास्थ्य खराब हो जाता है । वे कई बीमारियों के शिकार हो असमय ही काल-कवलित हो जाते हैं । कुपोषित लोगों की पीढ़ी दर पीढ़ी कुपोषित हो जाती है।

प्रश्न 6.
आपके क्षेत्र में सरकार द्वारा लोगों को रोजगार देने के लिए कौन-कौन-सी योजनाएं चलाई जा रही हैं ? आपके विचार में इनमें से किस योजना का लाभ लोगों को सबसे अधिक हो रहा है और क्यों?
उत्तर-
महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत हमारे क्षेत्र में कई गरीब लोगों को रोजगार मिल रहा है।

प्रश्न 7.
भारत में अनाज की मात्रा पर्याप्त होने के बावजूद कई लोगों को भरपेट भोजन क्यों नहीं मिल पाता? अपने शब्दों में समझाइये।
उत्तर-
भारत में अनाज की मात्रा में तो कोई कमी नहीं है । पर, सरकारी गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ते रहते हैं। राशन दूकान वालों तक अच्छा अनाज पहुँचते भी हैं तो अच्छा अनाज वे बेच खाते हैं और लोगों को खराब अनाज खरीदकर देते हैं ।

इस खेल में उनकी जेब गर्म होती है । खुले बाजार में भी काफी राशन रहती है फिर भी बड़े व्यापारी कालाबाजारी करने के लिए काफी खाद्य सामग्री छुपाकर संग्रहित किये रहते हैं। इसी कारण, भारत में अनाज की मात्रा पर्याप्त होने के बावजूद कई लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता।

प्रश्न 8.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली क्या है ? एक उदाहरण देकर समझाइये।
उत्तर-
सरकार द्वारा राशन दुकानों के माध्यम से लोगों तक सस्ते दर पर अनाज उपलब्ध करवाना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली कहलाता है।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 8 खाद्य सुरक्षा

प्रश्न 9.
भारत में अपनाई जाने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किस प्रकार की समस्याएँ हैं ? आपके विचार में इन्हें हल करने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर-
भारत में अपनाई जाने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ बड़ी समस्याएँ हैं। सरकार द्वारा सरकारी गोदामों से राशन दुकान तक अनाज़ समय पर पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इस मामले में राज्य स्तर पर लोकपाल नियुक्त कर राशन दुकानों की निगरानी करवानी चाहिए कि वे सही अनाज सही लोगों को सही दर पर ही दें।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 19 आर्यभट

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 19 आर्यभट Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 19 आर्यभट

Bihar Board Class 7 Hindi आर्यभट Text Book Questions and Answers

पाठ से –

प्रश्न 1.
निम्नलिखित वाक्यों में सही के सामने सही (✓) का और गलत के सामने गलत (☓) का निशान लगाइए।
प्रश्नोत्तर –
(i) आर्यभट्ट एक प्रसिद्ध किसान थे। (☓)
(ii) वे पाटलीपुत्र के रहने वाले थे। (☓)
(iii) आर्यभट्ट भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था कि पृथ्वी अपनी धूरी पर चक्कर लगाती है। (✓)
(iv) चाँद के प्रकट होने तथा पूरा गायब होने के मध्य एक निश्चित अवधि होती है। (✓)

प्रश्न 2.
आर्यभट्ट ने कौन-कौन-सी खोज की?
उत्तर:
आर्यभट्ट एक महान खगोलविद्, महान गणितज्ञ एवं ज्योतिष सम्राट के रूप में जाने जाते हैं।
उन्होंने निम्नलिखित खोज की।
(i) पृथ्वी गोल है।
(ii) पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है।
(iii) सूर्य स्थिर है।
(iv) राशियाँ 12 हैं।
(v) पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ने से चन्द्रग्रहण होता है।
(vi) चन्द्रमा के लोप होने की अवधि होती है।
(vii) रवि मार्ग पर सभी नक्षत्र भ्रमण करते हैं।
(viii) वृत्त की परिधि जानने का तरीका इत्यादि !

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प्रश्न 3.
अन्धविश्वास से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
परम्परा को मानना, वैज्ञानिक सम्मत नहीं होना फिर भी उसे मानना अन्धविश्वास कहलाता है। जैसे—इस वैज्ञानिक युग में भी हम मरे हुए को भृत कहकर पुकारते हैं। वह मनुष्य को तंग करता है ऐसा जानते हैं। यह एक भयंकर अन्धविश्वास का उदाहरण है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में दीजिए।
(क) आर्यभट्ट का सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण के विषय में क्या मानना था?
उत्तर:
आर्यभट्ट का मानना था कि जब चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है तो सूर्यग्रहण और जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है तो चन्द्रग्रहण होता है।

(ख) “आर्य भट्टीयम्” किन विषयों पर लिखा ग्रन्थ है ?
उत्तर:
“आर्य भट्टीयम्” खगोली ज्ञान, गणित और ज्योतिषीय ज्ञान पर साधारित ग्रन्थ है।

(ग) रवि मार्ग किसे कहते हैं ?
उत्तर:
आकाशीय पिण्ड सूर्य की परिक्रमा करते हैं, जिस मार्ग से आकाशीय पिण्ड परिक्रमा करते हैं उसे “रवि मार्ग” कहते हैं।

(घ) आर्यभट्ट ने जब “आर्यभट्टीयम्” की रचना की उस समय उनकी उम्र क्या थी?
उत्तर:
मात्र तैइस वर्ष की उम्र में आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम् की रचना की।

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व्याकरण –

(क) विज्ञान + इक = वैज्ञानिक। इसी तरह “इक” प्रत्यय जोड़कर अन्य कुछ शब्दों का निर्माण कीजिए।
उत्तर:
दर्शन + इक = दार्शनिक।
साहित्य + इक = साहित्यिक ।
साहस + इक = साहसिक।
परम्परा + इक = पारम्परिक ।
भूगोल + इक = भौगोलिक।
शब्द + इक = शाब्दिक इत्यादि ।

(ख) निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाइए-
उत्तर:
उपग्रह–उपग्रह बड़े ग्रहों की परिक्रमा करते हैं।
उद्योग – उद्योग-धन्धे को बढ़ावा देना चाहिए।
भौगोलिक – भौगोलिक स्थिति का ज्ञान भूगोल में मिलता है।
नैतिक – हमारे नैतिक कर्म समय पर होना चाहिए।
पृथ्वी – पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है।

(ग) निम्नलिखित शब्दों को अ और आ के उच्चारण में अंतर पर ध्यान देते हुए बोलिए-
उत्तर:
Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 19 आर्यभट 1

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 19 आर्यभट
कुछ करने को

प्रश्न 1.
संध्या समय आकाश में सूर्य को देखते हुए सूर्यास्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संध्या समय सूर्य पश्चिम की ओर आकाश में दिखता है। अस्त से पूर्व सूर्य लाल रंग का दिखाई पड़ता है। आकाश के बादल भी लाल सिन्दुरिया रंग के दिखते हैं पेड़-पौधे पर सूर्य की लाल किरणें पड़ने से लालिमायुक्त दिखते हैं।

धीरे-धीरे सूर्यास्त हो जाता है।

प्रश्न 2.
कुछ धर्मग्रन्थों का मानना है कि पृथ्वी स्थिर एवं सूर्य सहित बाकी ग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं, जबकि वैज्ञानिकों का मानना है कि सूर्य स्थित है एवं पृथ्वी सहित बाकी ग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं । इन दोनों बातों में से आप किसे सही मानते हैं और क्यों?
उत्तर:
वैज्ञानिकों के मत से हम असहमत हैं क्योंकि सूर्य घूमता तो सभी आकाशीय पिण्ड (ग्रह) पर. पृथ्वी के समान ही शीत-गर्मी होता । सर्य से जितनी दूरी पर जो ग्रह या उपग्रह हैं वे उतने ही सूर्य की गर्मी से प्रभावित हैं।

प्रश्न 3.
आर्यभट्ट ने कई जटिल सवालों का हल खोजा। क्या आप बता सकते हैं कि पानी को उबालने पर वह नीचे नहीं गिरता। लेकिन दूध उफान लेकर नीचे गिर जाता है। क्यों? उत्तर:
दूध पानी की अपेक्षा गाढ़ा द्रव पदार्थ है जब दूध को उबाला जाता है तो उसके गाढ़ा तत्व गर्म होकर. ऊपर आकर परत बना लेता है। वह परत गर्म होकर ऊपर की ओर उठने लगता है और अंत में गिरने लगता है जो पानी में नहीं होता।

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आर्यभट Summary in Hindi

सारांश – भारत के प्रथम और महान खगोलविद् महान गणितज्ञ तथा महान ज्योतिषी के रूप में अपना स्थान बनाने वाले आर्यभट्ट का जन्म 476 ई. में गोदावरी और नर्मदा नदी के बीच अश्मक प्रदेश में हुआ था।

वे अपने नये विचारों का प्रचार कर लोगों में व्याप्त खगोल सम्बन्धित अन्धविश्वास को दूर करने एवं उत्तर भारत के ज्योतिषियों के विचारों का अध्ययन करने हेतु पटना आये थे। पटना से थोड़ी दूर पर उनकी वेधशाला थी जहाँ ताँबे, पीतल और लकड़ी के तरह-तरह के यंत्र रखे थे।

ज्योतिष सम्राट आर्यभट्ट स्वतंत्र विचार के थे। उन्होंने पुराने विचारों का खंडन कर अपना नये विचार की स्थापना करने के लिए “आर्य मट्टीयम्” नामक श्रेष्ठ ग्रन्थ मात्र 23 वर्ष की आयु में लिखा । पहले लोग जानते थे कि पृथ्वी स्थिर तथा सूर्य आदि ग्रह घूमते हैं। परन्तु आर्यभट्ट ने लिखा कि पृथ्वी घूमती है, सूर्य स्थिर रहता है। अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगा है। जिस मार्ग पर सभी नक्षत्र गमन करते हैं उसे “रविमार्ग” कहते हैं।

आर्यभट्ट का आर्यभट्टीयम् मात्र 242 पंक्तियों एवं इक्कीस श्लोक में सिमटा हुआ है। उन्होंने चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण की प्राचीन अन्धविश्वासों का भी खण्डन करते हुए कहा कि जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है तो चन्द्रग्रहण तथा जब चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है तो सूर्यग्रहण होता है।

“आर्यभट्टीयम्” पूर्णतः विज्ञान पर आधारित ग्रन्थ है। इसमें शून्य की उपयोगिता पर विशेष रूप से चर्चा की गई है जो आज कम्प्यूटर के लिए बहुत महत्वदायक है। आर्यभट्ट ने अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित और ज्यामिति क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा का अनुपम प्रदर्शन किया। सबसे पहले उन्होंने ही बताया कि वृत्त का व्यास यदि मालूम हो तो परिधि निकालना सरल है। उनके ज्ञान का प्रचार यूनानी गणितज्ञों ने यूरोप में भी किया। आज विद्यालय में रेखा गणित को यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की ज्यामिति पर आधारित माना जाता है लेकिन इसकी जड़ “आर्यभट्टीयम्” में देखा जा सकता है।

आर्यभट्ट में वैज्ञानिकों को खोज के लिए नया रास्ता दिया ।

वेद-पुराण उपनिपद् और स्मृतियों में स्थापित परम्परा का विरोध कर सही विचार देकर उन्होंने अपने साहस का परिचय दिया जिसके कारण उन्हें क्रांति पुरुष के नाम से भी जाना जाता है।

भारत को ज्ञान में अग्रणी स्थापित करने वाले उस महान विभूति को आसमान में स्थापित करने के लिए भारत ने अपना पहला कृत्रिम उपग्रह का नाम “आर्यभट्ट” रखा।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 7 सहकारिता

Bihar Board Class 8 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 3 Chapter 7 सहकारिता Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 7 सहकारिता

Bihar Board Class 8 Social Science सहकारिता Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 7 सहकारिता 1
ऊपर दिये गये स्थान में दो ऐसे कार्यों को दर्शाएँ जो आप (1) अकेले करते हैं (2) जिसे औरों के साथ मिलकर ज्यादा आसानी से किया जा सकता है।
उत्तर

(1) अकेले करते हैं

  • नौकरी करना
  • बच्चों को पढ़ाना
  • दर्जी का काम
  • नाई का काम
  • लेख लिखना
  • निशानेबाजी करना
  • तैरना
  • दौड़ना
  • व्यक्तिगत व्यापार
  • तानाशाही
  • कंचे खेलना

(2) औरों के साथ मिलकर

  • खेल खेलना
  • समारोह मनाना
  • दुग्ध उत्पादक सहयोग
  • समिति बनाना
  • कोई संस्था बनाना
  • बैंक चलाना
  • सरकार का गठन करना
  • सहकारी समिति बनाना
  • सामूहिक व्यापार
  • लोकतंत्र
  • क्रिकेट खेलना

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 7 सहकारिता

प्रश्न 2.
मधुरापुर में मधुरापुर महिला दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति बनने से पहले दूध बेचने व खरीदने की क्या व्यवस्था थी? ।
उत्तर-
तब, दुग्ध उत्पादक अपने दूध को पास के बाजार में या शहर में बेचने ले जाते थे जहां मख्य तौर पर शहर के निवासी या मिठाई दुकानदार दूध खरीदते थे।

प्रश्न 3.
सहकारी समिति को चलाने के लिए कार्यकारिणी क्यों बनाई जाती है?
उत्तर-
ऐसा, समिति के कार्यों का उचित रूप से संचालन करने और समिति के अंदर लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू रखने के उद्देश्य से किया जाता है।

प्रश्न 4.
दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति बनने के बाद दूध उत्पादक परिवारों की जिंदगियों में क्या परिवर्तन आया ?
उत्तर-
दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति बनने के बाद वहाँ के दुग्ध उत्पादक परिवारों और किसानों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में निरंतर सुधार होने लगा। उन्हें अपने दूध का निश्चित ग्राहक भी मिल गया और दूध की पूरी और सही कीमत भी मिलने लगी।

प्रश्न 5.
क्या आपके आस-पास इस प्रकार की कोई दुग्ध समिति है ? वर्णन करें।
उत्तर-
संकेत : यदि आपके आस-पास है कोई दुग्ध समिति तो आपका उत्तर हाँ में होगा, यदि नहीं है तो आपका उत्तन्ना में होगा।

प्रश्न 6.
पैक्स के सदस्य कौन होते हैं ?
उत्तर-
कृषक।

प्रश्न 7.
ऋण देने के लिए पैक्स के पास पैसा कहाँ से आता है ?
उत्तर-
सरकार द्वारा ।

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प्रश्न 8.
ऋण देने के अलावा पैक्स और कौन से कार्य करती है ?
उत्तर-

  1. किसानों की बचत का संचय कर बैंक का काम करना ।
  2. उचित दर पर खाद उपलब्ध कराना ।
  3. बीज भी उचित दर पर देना।
  4. यह सुनिश्चित करना कि किसानों की फसलों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाय ।

प्रश्न 9.
पैक्स के कारण किसानों को महाजनों के चंगुल से मुक्ति कैसे मिलती है?
उत्तर-
आवश्यकता होने पर पैक्स के सदस्य किसानों को सस्ते दर पर ऋण मिल जाता है। इससे किसानों को महाजनों के चंगुल में फंस जाने से मुक्ति मिलती है।

प्रश्न 10.
पैक्स द्वारा फसल खरीदने से किसानों को क्या फायदा होता है ?
उत्तर-
पैक्स द्वारा फसल खरीदने से किसानों को उचित दर पर वे फसल मिल जाती हैं।

प्रश्न 11.
पैक्स के सदस्य किस साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होते हैं ?
उत्तर-

  1. किसानों की कृषि सम्बन्धी जरूरतें पूरी होती हैं।
  2. सस्ते दर पर ऋण मिल जाता है।
  3. उचित दर पर खाद और बीज मिल जाते हैं।
  4. अच्चने मूल्य पर फसल बिक जाती है।

प्रश्न 12.
सरकार कमजोर वर्गों को पैक्स में हिस्सेदारी दिलाने के लिए क्या करती है ? अपनी शिक्षक/शिक्षिका के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर-
कोई भी किसान निर्धारित सदस्यता-शुल्क और एक शेयर की राशि देकर पैक्स का सदस्य बन सकता है।

प्रश्न 13.
उपभोक्ता सहकारी समिति जैसी समितियाँ क्यों बनाई जाती हैं ?
उत्तर-
उपभोक्ता सहकारी समिति की स्थापना का उद्देश्य थोक व्यापारी अथवा उत्पादकों से सीधे अधिक मात्रा में माल खरीदकर अपने सदस्यों को सस्ते दर पर उपलब्ध कराना है। ये समितियाँ वित्तीय आधार पर कमजोर लोगों को व्यापारियों व दलालों द्वारा किये जाने वाले शोषण से बचाती हैं।

लोगों की पारस्परिक समस्याओं का समाधान निकालने और उस क्षेत्र के लोगों की जीविका या रोजमर्रा के जीवन से सम्बन्धित समस्याओं या मुश्किलों को कम करने के उद्देश्य से ही उपभोक्ता सहकारी समिति जैसी समितियाँ बनाई जाती

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प्रश्न 14.
इसके सदस्य बनने के लिए क्या अनिवार्य है ?
उत्तर-
इसकी सदस्यता स्वैच्छिक होती है यानी कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से किसी सहकारी समिति का सदस्य बन सकता है।

प्रश्न 15.
थोक व्यापारी या उत्पादक से अधिक मात्रा में सामग्री खरीदने के लिए पूँजी कहाँ से आती है?
उत्तर-
समिति के सदस्यों द्वारा जमा राशि से जो पँजी इकटठा होती है. उससे अधिक मात्रा में थोक व्यापारी या उत्पादकों से सीधे सामग्री खरीदी जाती है। इस प्रकार खुदरा बाजार से काफी कम मूल्य पर सामग्री मिल जाती

प्रश्न 16.
चर्चा कर पता करें – थोक व्यापारी या उत्पादक से खरीदी गई वस्तु बाजार से सस्ते मूल्य पर क्यों उपलब्ध होती है ?
उत्तर-
थोक व्यापारी से या सीधे उत्पादकों से बड़ी मात्रा में वस्तुएँ खरीदने के कारण ही वस्तुएँ बाजार से सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होती हैं।

प्रश्न 17.
आपके इलाके में किस प्रकार की सहकारी समितियाँ हैं ? एक सूची बनाएँ। फिर टोली बनाकर नीचे दिए गए बिन्दुओं पर इनके बारे में जानकारी ढूंढ़िये और अपनी रिपोर्ट बनाकर कक्षा में पेश कीजिये।

  1. आपके इलाके की सहकारी समिति के सदस्य कौन हैं ?
  2. सदस्य मिलकर क्या करते हैं ?
  3. इससे क्या लाभ होता है ?
  4. समिति के सामने किस तरह की समस्याएँ आती हैं ?

उत्तर-
मेरे इलाके में जो सहकारी समिति है उसके सदस्य मेरे क्षेत्र में रहने वाले किसान भाई हैं।

सहकारी समिति के सदस्य मिलकर अपने सदस्यों के हितों व उनकी आर्थिक उन्नति के लिए कई प्रकार के प्रयास करती हैं। इन समितियों का काम निजी व्यवसाय से अलग है । इसमें व्यक्तिगत लाभ के स्थान पर सामूहिक हित . पर विशेष जोर दिया जाता है।

इन समितियों के बनने से किसानों को कई प्रकार के लाभ होते हैं। जरूरत पडने पर उन्हें सस्ते दर पर ऋण मिल जाता है। इससे वे महाजनों के चंगुल में फंसने से बच जाते हैं। सस्ते दर पर वस्तुएँ मिल जाती हैं। उनकी फसल का अच्छा दाम मिल जाता है। यानी उन्हें फायदा ही फायदा होता है । शोषण से मुक्ति मिल जाती है। इससे उनकी आर्थिक दशा सुधर जाती है।

ऐसी समिति की सदस्यता स्वैच्छिक और खुली होने से कुछ स्वार्थी तत्व इसमें आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। फिर वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने की तिकड़म भिड़ाने में लग जाते हैं। ज्यादा मुनाफा वे खुद हड़प करने की जुगत ‘भिडाते रहते हैं। जब दूसरे सदस्य इसका विरोध करते हैं तो समिति में आए दिन झगड़ा-कोहराम मचने लगता है।

इससे समिति का विकास होने के बदले उसके अस्तित्व पर ही संकट के बादल मँडराने लगते हैं। बिहार में मत्स्यजीवी सहयोग समिति और व्यापार मंडल की असफलता के पीछे भी यही कारण थे । पर, हमारे क्षेत्र की सहकारी समिति में ऐसी समस्या फिलहाल नहीं है । गलत व्यक्ति को सदस्य बनाया ही नहीं जाता । इससे अभी इस समिति में शांति और उन्नति ही है।

प्रश्न 18.
अपनी शिक्षिका व घर के सदस्यों से चर्चा करके बिहार मत्स्यजीवी सहयोग समिति और व्यापार मंडल की असफलता के कारण हूँढ़िए।
उत्तर-
गलत व स्वार्थी लोगों द्वारा इन समितियों की सदस्यता लेने व उनके द्वारा निजी लाभ उठाने और अन्य सदस्यों की हकमारी करने से ही ये समितियाँ असफलता का शिकार हो गईं।

प्रश्न 19.
संचित कोष की जरूरत क्यों है ?
उत्तर-
संचित कोष के माध्यम से समिति की बेहतरी के लिए नई मशीनें या सामग्री खरीदने तथा आकस्मिक खर्चों को पूरा करने की सुविधा मिल जाती

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प्रश्न 20.
आपके अनुसार दुग्ध उत्पादक समितियाँ किस प्रकार की योजनाओं पर खर्च करती हैं ?
उत्तर-

  1. नई मशीनें या नई सामग्री खरीदने के लिए।
  2. अन्य कल्याणकारी योजनाओं, जैसे अपने सदस्यों को सस्ते में जरूरत पड़ने पर ऋण दिलाना, व थोक में सामान खरीद सदस्यों को सस्ते दर पर उपलब्ध कराना, जैसे चारा, खल्ली आदि ।
  3. किसानों को लाभ में से बोनस देना।

प्रश्न 21.
दूधिया का काम और समिति के काम में क्या अंतर है?
उत्तर-
दुधिया सिर्फ अपने अकेले के निचली व्यापार की बात सोचता है। उसका काम उसी से शुरू होकर उसी पर खत्म हो जाता है। अपने काम के पूरे लाभ व पूरी हानि का भागीदार वह स्वयं होता है। जबकि समिति सामूहिक व्यापार व सामूहिक हितों व लाभ का समान वितरण के बारे में सोचती है।

समिति एक बैंक की तरह भी काम करती है और सरकार के एक अत्यन्त छोटी इकाई की तरह भी काम करती है। जिसका उद्देश्य अपने सभी सदस्यों की मुश्किलों को दूर करना व उनका संरक्षक बन संकट में उन्हें पिता की तरह बल देना है। समिति सामूहिक हित पर ध्यान देती है जबकि दूधिया निजी हित पर।

अभ्यास-प्रश्न

प्रश्न 1.
सहकारी समिति के सदस्य कौन होते हैं? वे मिलकर क्या करते हैं? इससे क्या लाभ होता है?
उत्तर-
सहकारी समिति का सदस्य कोई भी उत्पादक हो सकता है। जिन उत्पादकों के हितों के लिए समिति बनती है उन्हीं से जुड़े उत्पादक उस समिति के सदस्य बनते हैं। जैसे- दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति में केवल दुग्ध उत्पादक ही सदस्य बन सकते हैं। ये सदस्य मिलकर अपने हितों व अपनी आर्थिक उन्नति के लिए मिल-जुलकर प्रयास करते हैं। इससे लाभ यह होता है कि समिति के सदस्य शोषण, व्यर्थ की परेशानियों और अपने उत्पाद को बेचने के भागमभाग से बच जाते हैं। उनकी आर्थिक दशा सुधरने लगती है।

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प्रश्न 2.
सहकारिता से आप क्या समझते हैं ? एक उदाहरण देकर समझाइए। सहकारी समितियाँ बनने से पहले, इनसे सम्बन्धित लोगों को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था ? इनके बनने के बाद, ये कठिनाइयाँ कैसे दूर हो पाईं ?
उत्तर-
आपस में मिल-जुलकर समूह में, एक समिति गठित कर कार्य-व्यापार करने को सहकारिता कहते हैं। जैसे-पाठ में, मधुरापुर में महिला दुग्ध उत्पादक

सहयोग समिति’ नामक एक सहकारी समिति गठित की गई। यह समिति जिला स्तर पर वैशाली पाटलिपुत्र दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड, जिसे हम पटना डेयरी के नाम से भी जानते हैं, के साथ जुड़कर काम करती है।

सहकारी समितियाँ बनने से पहले, इनसे सम्बन्धित उत्पादकों को अपना उत्पाद बेचने के लिए दूर-दराज के इलाकों में जाकर अपने ग्राहक ढूँढ़ने पड़ते थे। उन्हें उचित दाम भी नहीं मिल पाता था।

इन समितियों के बनने के बाद उनसे जुड़े उत्पादकों को अपने उत्पाद एक जगह बेचने की सुविधा मिल गयी और वह भी उचित मूल्य पर । साथ ही, ‘जरूरत पड़ने पर उन्हें समिति से ऋण लेने की सुविधा भी मिल गयी, वह भी सस्ते दर पर । इससे वे महाजनों के चंगुल में फंसने से बच गये।

प्रश्न 3.
अध्याय में जिन तीन सहकारी समितियों की बात की गई है, उनमें से आप किस सहकारी समिति को सबसे अधिक उपयोगी मानते हैं और क्यों?
उत्तर-
अध्याय में वर्णित तीन सहकारी समितियों में से मुझे ‘दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति’ सर्वाधिक उपयोगी जान पड़ती है। कारण कि ऐसी समिति के गठन से अच्छी गुणवत्ता का दूध उचित मूल्य पर शहरों में, घर-घर तक उपलब्ध हो जाता है, जिसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता ।

गाँवों में तो दूध की उपलब्धता खटालों से हो भी जाती है पर शहरों में उतने खटाल होना संभव ही नहीं हैं जो पूरे शहर की दुग्ध आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाएँ। वह भी अच्छी क्वालिटी का और उचित दर पर और निर्धारित समय पर । दुग्ध

बूथों पर फौरन पैकेट का दूध ले लेने से खटाल में जाकर देर तक गाय दुहाने तक इंतजार करने का समय भी बच जाता है।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 7 सहकारिता

प्रश्न 4.
सहकारी समितियों के काम-काज में कौन-कौन-सी मुश्किलें आती हैं? आपके विचार में इन मुश्किलों को हल करने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है? मान लीजिए आप मधुरापुर महिला दुग्ध उत्पादन समिति के अध्यक्ष हैं। अपनी समिति को अच्छी तरह से चलाने और उसमें अधिक-से-अधिक लोगों को जोड़ने के लिए आप क्या-क्या कोशिशें करेंगे?
उत्तर-
सहकारी समितियों के काम-काज में मश्किलें तब आने लगती हैं जब उनमें स्वार्थी चरित्र के व्यक्ति प्रवेश कर जाते हैं। वे स्वार्थी व्यक्ति अपने हितों के लिए समिति के गठन का उद्देश्य भी प्रभावित करने लगते हैं। ऐसे सदस्य समिति के माध्यम से अपना व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने लगते हैं। इससे जो लाभ सबको मिलना चाहिए वह कुछ लोगों को ही प्राप्त हो पाता है,। जब दूसरे सदस्य इसका विरोध करते हैं तो आपसी झगड़े होना शरू हो जाते हैं। तब, समिति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।

इन मुश्किलों को हल करने के लिए नये सदस्यों की जाँच-पड़ताल करके ही उन्हें समिति का सदस्य बनाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के बारे में कोई शंकास्पद बात मालूम हो तो उसे समिति से निकाल दिया जाना चाहिए।

यदि मैं मधुरापुर महिला दुग्ध उत्पादन समिति का अध्यक्ष होता. तो समिति को अच्छी तरह से चलाने के लिए मैं उसमें गलत व्यक्ति को प्रवेश नहीं लेने देता । यदि बाद में पता चलता कि कोई व्यक्ति संगठन में गलत है तो उसे फौरन निकाल देता । अधिक से अधिक लोगों को अपनी समिति से जोड़ने के लिए मैं समिति का अच्छी तरह से प्रचार करता । समिति के कार्यों का प्रदर्शन कर उसे जनता से जोड़ता ताकि समिति का अधिक-से-अधिक प्रचार हो और अधिक-से-अधिक लोग मेरी समिति से जुड़ सकें।

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प्रश्न 1.
उत्पादन के चार कारक कौन-कौन से हैं और इनमें से प्रत्येक के पारिश्रमिक को क्या कहते हैं?
उत्तर:
उत्पादन के निम्नलिखित चार साधन होते हैं –

  1. भूमि
  2. श्रम
  3. पूंजी एवं
  4. उद्यम

उत्पादन साधनों को दिए जाने वाले भुगतान नीचे लिखे गए हैं –

  1. भूमि की सेवाओं के लिए भूमिपति को दिए गए भुगतान को लगान या किराया कहते हैं।
  2. श्रमिक को मानसिक अथवा शारीरिक श्रम के बदले उत्पादन इकाई भुगतान करती है जिसे मजदुरी या वेतन कहते हैं।
  3. पूंजी के प्रयोग के बदले उत्पादन पूंजीपति को भुगतान प्रदान करता है जिसे ब्याज कहते हैं।
  4. उत्पादन प्रक्रिया में अनिश्चितता एवं जोखिमों को वहन करने के बदले उद्यमी को अधिशेष आय प्राप्त होती है जिसे लाभ कहते हैं।

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प्रश्न 2.
किसी अर्थव्यवस्था में समस्त अंतिम व्यय समस्त कारक अदायगी के बराबर क्यों होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि अर्थव्यवस्था में कोई बाह्य स्राव नहीं होता है अथवा मुद्रा खर्च करने का कोई और विकल्प नहीं होता है तो परिवार क्षेत्र के पास आय को खर्च करने का एक ही विकल्प होता है कि सम्पूर्ण आय को अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं पर खर्च किया जाए। दूसरे शब्दों में उत्पादन साधनों को साधन आय के रूप में आय प्राप्त होती है वे इसका प्रयोग वस्तुओं एवं सेवाओं को क्रय करने के लिए करते हैं। इस प्रकार उत्पादक इकाइयों द्वारा साधन भुगतान के रूप में प्रदान की गई मुद्रा वस्तुओं व सेवाओं के विक्रय से प्राप्त आगम के रूप में वापिस मिल जाती है।

इस प्रकार फर्मों द्वारा किए गए साधन भुगतानों के योग तथा सामूहिक उपभोग पर किए गए व्यय में कोई अन्तर नहीं होता है। दूसरे चक्र में उत्पादक पुन: वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करेंगे और साधनों को उनकी सेवाओं के लिए साधन भुगतान करेंगे। साधनों के स्वामी साधनों से प्राप्त आय को वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद पर खर्च करेंगे। इस प्रकार वर्ष दर वर्ष आय को वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद पर खर्च किया जाता है। अतः परिवार क्षेत्र द्वारा किया गया सामूहिक व्यय फर्मों को प्राप्त हो जाता है।

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प्रश्न 3.
स्टॉक और प्रवाह में भेद स्पष्ट कीजिए। निवल निवेश और पूंजी में कौन स्टॉक है और कौन प्रवाह? हौज में पानी के प्रवाह से निवल निवेश और पूंजी की तुलना कीजिए।
उत्तर:
स्टॉक:
वह आर्थिक चर जिसे एक निश्चित समय बिन्दु पर मापा जात है स्टॉल कहलाता है।

प्रवाह:
आर्थिक चर जिसे एक निश्चित समयावधि में मापा जाता है, उसे प्रवाह कहते हैं।

शुद्ध निवेश:
सकल निवेश तथा स्थायी पूंजी के उपभोग के अन्तर को शुद्ध निवेश कहते हैं। सकल निवेश तथा स्थायी पूंजी के उपभोग को एक निश्चित समयावधि में मापा जाता है। सामान्यतः ये दोनों चर लेखा वर्ष की अवधि के लिए मापे जाते हैं। इस प्रकार शुद्ध निवेश प्रवाह आर्थिक चर का उदाहरण है।

पूंजी में वे सभी मानव निर्मित वस्तुएं शामिल की जाती हैं जो अन्य वस्तुओं अथवा सेवाओं के उत्पादन में काम आती है। पूंजी एक मशीन, कच्चे माल, उपकरण आदि के रूप में उत्पादन प्रक्रिया में पूंजी का प्रयोग किया जाता है। इनकी मात्रा का मापन एक निश्चित समय बिन्दु पर किया जाता है। इस प्रकार पूंजी एक आर्थिक स्टॉक है। शुद्ध निवेश एवं पूंजी की तुलना एक टैंक में बहने वाले पानी से की जा सकती है। टैंक मे बहने वाला पानी तथा शुद्ध निवेश दोनों आर्थिक प्रवाह हैं। इसी प्रकार किसी निश्चित समय बिन्दु पर टैंक में पानी की मात्रा तथा फर्म के पास पूंजी दोनों आर्थिक स्टॉक हैं।

प्रश्न 4.
नियोजित और अनियोजित माल-सूची संचय में क्या अंतर है? किसी फर्म की माल सूची और मूल्यवर्धित के बीच संबंध बताइए।
उत्तर:
बिना बिके माल, अर्द्धनिर्मित माल एवं कच्चे माल का स्टॉक जिसे कोई फर्म अगले वर्ष के लिए ले जाती है अथवा प्रयोग करने के लिए रखती है उसे माल तालिका निवेश कहते हैं। माल तालिका निवेश नियोजित एवं अनियोजित दोनों प्रकार का हो सकता है। माल तालिका निवेश में अनुमानित बढ़ोतरी के समान वृद्धि को नियोजित माल तालिका या भण्डार निवेश कहते हैं।

उदाहरण के लिए एक फर्म अपना भण्डार निवेश 100 कमीजों से बढ़ाकर 200 कमीज करना चाहती है। फर्म अनुमानित बिक्री 1000 कमीज के समान ही कमीजों की बिक्री करती है। फर्म का कमीज उत्पादन 1100 कमीज है तो फर्म का वास्तविक भण्डार निवेश निम्न प्रकार ज्ञात किया जा सकता है।

भण्डार निवेश में वृद्धि = आरंभिक स्टॉक + उत्पादन – बिक्री
= 100 + 1100 – 900 = 200 कमीज

इस उदाहरण में अनुमानित भण्डार निवेश में वृद्धि और वास्तविक भण्डार निवेश दोनों समान हैं। यदि किसी उत्पादक इकाई का वास्तविक भण्डार निवेश, अनुमानित भण्डार निवेश से अधिक या कम करता है तो इसे अनियोजित भण्डार निवेश कहते हैं। उदाहरण के लिए एक फर्म का आरंभिक स्टॉक 100 कमीज है वह अपना स्टॉक 200 कमीज बनाना चाहती है। फर्म 1100 कमीजों का उत्पादन करती है लेकिन फर्म केवल 900 कमीजों को ही बेच पाती है। इस उदाहरण में वास्तविक भण्डार निवेश में वृद्धि का आंकलन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

भण्डार निवेश में वृद्धि = आरंभिक स्टॉक + उत्पादन – बिक्री
= 100 + 1100 – 900
= 300 कमीज

इस तरह फर्म का वास्तविक भण्डार निवेश 300 कमीज नियोजित भण्डार निवेश 200 कमीज से अधिक हैं। इस प्रकार की भण्डार वृद्धि को अनियोजित निवेश कहते हैं। भण्डार निवेश में परिवर्तन तथा मूल्य वृद्धि में संबंध फर्म की सकल मूल्य वृद्धि = फर्म द्वारा विक्रय + भण्डार निवेश में परिवर्तन – मध्यवर्ती – उपभोग

इस समीकरण में मूल्य वृद्धि तथा भण्डार निवेश में परिवर्तन का संबंध स्पष्ट प्रतीत होता है। भण्डार निवेश में वृद्धि से मूल्य वृद्धि में बढ़ोतरी होती है। इसके विपरीत भण्डार निवेश में कमी आने पर मूल्य वृद्धि में कमी आती है।

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प्रश्न 5.
तीन विधियों से किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद की गणना करने की किन्हीं तीन निष्पत्तियों लिखिए। संक्षेप में यह भी बताइए कि प्रत्येक विधि से सकल घरेलू उत्पाद का एक-सा मूल्य क्या आना चाहिए?
उत्तर:
GDP (सकल घरेलू उतपाद) को ज्ञात करने की तीन विधियां निम्नलिखित हैं –
1. मूल्य वृद्धि विधि
या अन्तिम उत्पाद विधि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = सभी घरेलू उत्पादक इकाइयों की सकल मूल्य वृद्धि का योग
GVA1 + GVA2 + ………….. + GVAN
\(\sum_{i=1}^{N} G V A i\)

2. अन्तिम उपभोग विधि या व्यय विधि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = सभी घरेलू उत्पादक इकाइयों द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री से प्राप्त आगम = कुल अन्तिम उपभोग का योग + निवेश + सरकारी
उपभोग व्यय + निर्यात – आयात
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 1
जहाँ C, I, G, X व्यय के वे भाग हैं जो घरेलू उत्पादकों को प्राप्त होते हैं जबकि Cm, Im, Gm अन्तिम व्यय के वे भाग हैं जो विदेशी उत्पादकों को प्राप्त होते हैं।

3. आय विधि
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = उत्पादन साधनों को किए गए भुगतानों का योग
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 2
जहाँ Wi – परिवार क्षेत्र द्वारा प्राप्त मजदूरी एवं वेतन
Pi – परिवार क्षेत्र प्राप्त लाभ
li – परिवार क्षेत्र द्वारा प्राप्त ब्याज
Ri – परिवार क्षेत्र द्वारा प्राप्त किराया सरल रूप में इस समीकरण को निम्न प्रकार से भी लिखा जा सकता है
GDP = W + R + I + P

उपरोक्त तीनों विधियों का मिलान:
अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करने के लिए उत्पादक इकाइयां चार साधन आगतों भूमि, श्रमू, पूंजी एवं उद्यम की सहायता से मध्यवर्ती वस्तुओं का उपयोग करती है। फर्मों के द्वारा जो भी उत्पादन किया जाता है, उसे अर्थव्यवस्था में उपभोग एवं निवेश के उद्देश्य के लिए बेच दिया जाता है। फर्म उत्पादन साधनों को किराया, मजदूरी, ब्याज व लाभ का भुगतान करती हैं और उसे वस्तुओं व सेवाओं का विक्रय करके आगम के रूप में वापिस प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार उत्पादन स्तर जितना उत्पादन होता है या मूल्य वृद्धि होती है उसे साधनों में आय कगे रूप में बांट दिया जाता है, साधनों के स्वामी प्राप्त आय को अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं पर खर्च कर देती है।

इसलिए तीनों विधियों से GDP का समान प्राप्त होता है।
GDP = \(\sum_{i=1}^{N} G V A i\)
W + R + I + P
= C + I + G + X – M

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प्रश्न 6.
बजटीय घाटा और व्यापार घाटा को परिभाषित कीजिए। किसी विशेष वर्ष में किसी देश की कुल बचत के ऊपर निजी निवेश का आधिक्य 2000 करोड़ रु. था। बजटीय घाटे की राशि 1500 करोड़ रु. थी। उस देश के बजटीय घाटे का परिणाम क्या था?
उत्तर:
बजटीय घाटा:
एक वर्ष की अवधि में सरकार द्वारा किए गए व्यय तथा सरकार की प्राप्तियों के अन्तर को बजटीय घाटा कहते हैं।

बजट घाटा:
सरकार का व्यय-सरकार द्वारा अर्जित कर आगम व्यापार शेष-आयात पर व्यय का निर्यात आगम पर अधिशेष व्यापार शेष कहलाता है।

व्यापार शेष = आयात पर व्यय-निर्यात से प्राप्त
आगम निजी निवेश बचत = 2000 करोड़ रु.
I – S = 2000 करोड़ रु.
बजट घाटा = (-) 1500 करोड़ रु.
व्यापार शेष = (I – S) + (G – T)
= 2000 करोड़ रु. + – (1500) करोड़ रु.
= 500 करोड़ रु.

प्रश्न 7.
मान लिजिए कि किसी विशेष वर्ष में किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद बाजार कीमत पर 1100 करोड़ रु. था। विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय 100 करोड़ रु. था। अप्रत्यक्ष कर मूल्य-उत्पादन का मूल्य 150 करोड़ रु. और राष्ट्रीय आय 850 करोड़ रु. है, तो मूल्यहास के समस्त मूल्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद GDP at mp = 1100 करोड़ रु. विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय (NFIA) = 100 करोड़ रु.
शुद्ध अप्रत्यक्ष कर NIT = 150 करोड़ रु.
साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद NNP at fc = 850 करोड़ रु.
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-घिसावट-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर = राष्ट्रीय आय (NNP at fc)
1100 करोड़ रु. + 100 करोड़ रु.-घिसावट – 150 करोड़ रु.
= 850 करोड़ रु. 1050 करोड़ रु. – घिसावट = 850 करोड़ रु.
घिसावट = 850 करोड़ रु. -1050 करोड़ रु.
-घिसावट = (-)200 करोड़ रु.
घिसावट = 200 करोड़ रु.
उत्तर – घिसावट = 200 करोड़ रु.

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प्रश्न 8.
किसी देश विशेष में एक वर्ष लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद 1900 करोड़ रु. है। फर्मों/सरकार के द्वारा परिवार को अथवा परिवार के द्वारा सरकार/फर्मों को किसी भी प्रकार का ब्याज अदायगी नहीं की जाती है, परिवारों की वैयक्तिक प्रयोज्य आय 1200 करोड़ रु. है। उनके द्वारा अदा किया गया वैयक्तिक आयकर 600 करोड़ रु. है और फर्मों तथा सरकार द्वारा अर्जित आय का मूल्य 200 करोड़ रु. है। सरकार और फर्म द्वारा परिवार को की गई अंतरण अदायगी का मूल्य क्या है?
उत्तर:
साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at fc) = 1900 करोड़ रु.
परिवारों द्वारा ब्याज भुगतान = 0 रु
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 1200 करोड़ रु.
परिवारों द्वारा प्रत्यक्ष करों का भुगतान = 600 करोड़ रु.
फर्म व सरकार की प्रतिधारित आय = 200 करोड़ रु.
हस्तांतरण भुगतान से प्राप्ति = ?
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष करों का भुगतान – गैर कर भुगतान = [राष्ट्रीय आय-प्रतिधारित आय-परिवारों द्वारा शुद्ध ब्याज भुगतान – निगम कर + सरकार व फर्मों से परिवारों को हस्तांतरण भुगतान।] – प्रत्यक्ष करों का भुगतान-गैर कर भुगतान
1200 करोड़ रु. = 1900 करोड़ रु. – 200 करोड़ रु – 0 रु. – 0 रु. + सरकार व फर्मों से परिवारों को हस्तांतरण भुगतान – 0 रु.। – 600 करोड़ रु.
1200 करोड़ रु. = 1700 करोड़ रु. + सरकार व फर्मों से हस्तांतरण
भुगतान – 600 करोड़ रु. 1200 करोड़ रु. = 1100 करोड़ रु. + सरकार व फर्मों से हस्तांतरण भुगतान या 1100 करोड़ रु. + सरकार व फर्मों से परिवारों के हस्तांतरण भुगतान
= 1200 करोड़ रु. या सरकार व फर्मों से परिवार क्षेत्र को हस्तांतरण भुगतान
= 1200 करोड़ रु. – 1100 करोड़ रु.
= 100 करोड़ रु. उत्तर-सरकार व फर्मों से परिवार क्षेत्र को हस्तांतरण भुगतान = 100 करोड़ रु.

प्रश्न 9.
निम्नलिखित आँकड़ों से वैयक्तिक आय और वैयक्तिक प्रयोज्य आय की गणना कीजिए:Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 3
हल:
वैयक्तिक आय = साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय + हस्तांतरण आय-निगम कर-परिवारों द्वारा शुद्ध ब्याज प्राप्ति
= 800 + 200 + 300 – 500 – (1200 – 1500)
= 8500 – 500 – (- 300)
= 8500 – 500 + 300
= 8300 करोड़ रु.
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-वैयक्तिगत प्रत्यक्ष कर-गैर कर भुगतान
= 8300 – 500 – 0 करोड़ रु.
= 7800 करोड़ रु.
उत्तर:

  1. वैयक्तिक आय = 8300 करोड़ रु.
  2. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 7800 करोड़ रु.

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प्रश्न 10.
हजाम राजू एक दिन में बाल काटने के लिए 500 रु. का संग्रह करता है। इस दिन उसके उपकरण में 50 रु. का मूल्यह्रास होता है। इस 450 रु. में से राजू 30 रु. बिक्री कर अदा करता है। 200 रु. घर ले जाता है और 220 रु. उन्नति और नए उपकरणों का क्रय करने के लिए रखता है। वह अपनी आय में से 20 रु. आयकर के रूप में अदा करता है। इन पूरी सूचनाओं के आधार पर निम्नलिखित में राजू का योगदान ज्ञात कीजिए –
(a) सकल घरेलू उत्पाद।
(b) बाजार कीमत पर निबल राष्ट्रीय उत्पाद।
(c) कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद।
(d) वैयक्तिक आय।
(e) वैयक्तिक प्रयोज्य आय।
उत्तर:
ΣRi = 500 रु.
स्थायी पूंजी का उपभोग = 50 रु.
बिक्री कर = 30 रु.
प्रतिधारित आय = 220 रु.
घर ले जाई गई आय = 200 रु.
आयकर = 20 रु.

(a) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP at mp) में योगदान
= बाल काटने के लिए प्राप्त आगम
= 500रु.

(b) बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at mp) में योगदान
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद – स्थायी पूंजी का उपभोग
= 500 रु. – 50 रु.
= 450 रु.

(c) साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान
= बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
= 450 रु. -30 रु.
= 420 रु.

(d) वैयक्तिक आय = साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान – अवितरित लाभ
= 420 रु. -220 रु.
= 200 रु.

(e) वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष कर
= 200 रु. – 20 रु.
= 180 रु.
उत्तर:
(a) 500 रु.
(b) 450 रु.
(c) 420 रु.
(d) 200 रु.
(e) 180 रु.

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प्रश्न 11.
किसी वर्ष एक अर्थव्यवस्था में मौद्रिक सकल राष्ट्रीय उत्पाद का मूल्य 2500 करोड़ रु. था। उसी वर्ष, उस देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद का मूल्य किसी आधार वर्ष की कीमत पर 3000 करोड़ रु. था। प्रतिशत के रूप में वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद अवस्फीतिक के मूल्य की गणना कीजिए। क्या आधार वर्ष और उल्लेखनीय वर्ष के बीच कीमत स्तर में वृद्धि हुई।
हल:
विशिष्ट वर्ष में मौद्रिक GNP%3D 2500 करोड़ रु.
विशिष्ट वर्ष में स्थिर कीमतों पर/वास्तविक (GNP) = 3000 करोड़ रु.
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 4
= \(\frac{2500}{3000}\) × 100% = \(\frac{5}{6}\) × 100%
= \(\frac{500}{6}\) % = 83.33%
नहीं कीमत स्तर आधार वर्ष से विशिष्ट वर्ष के बीच कम हुआ है
= (100 – 83.33)%
= 16.67%
उत्तर:
कीमत स्तर में कमी = 16.67%

प्रश्न 12.
किसी देश में कल्याण के निर्देशांक के रूप में सकल घरेलू उत्पाद की कुछ सीमाओं को लिखो।
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद को कल्याण सूचकांक के रूप में प्रयोग करने की सीमाएं –

  1. सकल घरेलू उत्पाद के वितरण को अनदेखा किया जाता है।
  2. अमौद्रिक विनिमय इसमें शामिल नहीं किए जाते हैं।
  3. जनसंख्या वृद्धि की तरफ भी ध्यान नहीं दिया जाता है।
  4. उत्पादन तरीके की तरफ बाजिब ध्यान नहीं दिया जाता है।
  5. उत्पादन से होने वाले प्रदूषण का हिसाब इसमें नहीं होता है।
  6. उत्पादित वस्तुओं की प्रकृति इससे स्पष्ट नहीं होती है।
  7. नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा इससे प्रदर्शन नहीं होता है।
  8. GDP के माध्यम से कानून, सुरक्षा, न्याय आदि मूल्य प्रतिबिंबित नहीं होते हैं।
  9. प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग अथवा पर्यावरण असन्तुलन की ओर ध्यान GDP के माध्यम से नहीं दिया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics राष्ट्रीय आय का लेखांकन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आर्थिक सहायता क्या है?
उत्तर:
राज्य की ओर उत्पादकों की दिए जाने वाली आर्थिक अनुदान को आर्थिक सहायता कहते हैं। आर्थिक सहायता किसी वस्तु के उत्पादन को प्रोत्साहित करते एवं उत्पादन लागत को कम करने के उद्देश्य से दी जाती है।

प्रश्न 2.
मौद्रिक प्रवाह का अर्थ लिखें।
उत्तर:
इससे अभिप्राय कारक आय का उत्पादक क्षेत्र से परिवार की ओर तथा परिवार क्षेत्र से उत्पादक क्षेत्र की ओर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं पर होने वाले मौद्रिक व्यय से है।

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प्रश्न 3.
अर्थव्यवस्था की रचना के बारे में लिखें।
उत्तर:
चक्रीय प्रवाह की दृष्टि से एक अर्थव्यवस्था को निम्नलिखित क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है। जैसे –

  1. परिवार क्षेत्र
  2. उत्पादक क्षेत्र
  3. सरकारी क्षेत्र
  4. मुद्रा बाजार/वित्तीय प्रणाली
  5. शेष विश्व क्षेत्र या विदेशी क्षेत्र या अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र

प्रश्न 4.
फर्म से परिवारों की ओर प्रवाहों की सूची बनाएं।
उत्तर:
फर्म से परिवारों की ओर निम्नलिखित प्रवाह है –

  1. अन्तिम वस्तुओं का क्रय फर्म से परिवार करते हैं अर्थात् अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह फर्म से परिवार की ओर होता है।
  2. साधन आगतों का क्रय फर्म परिवारों से करते हैं। साधन आगतों के पुरस्कार के रूप में लगान, मजदूरी, ब्याज व लाभ फर्म से परिवारों की ओर प्रवाहित होता है।

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प्रश्न 5.
तीन क्षेत्रीय मॉडल के किन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
तीन क्षेत्रीय मॉडल में अर्थव्यवस्था में तीन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है –

  1. परिवार क्षेत्र।
  2. उत्पादक क्षेत्र।
  3. सरकारी क्षेत्र के बीच होने वाले आय के चक्रीय प्रवाह।

प्रश्न 6.
वास्तविक प्रवाह क्या होता है?
उत्तर:
परिवार क्षेत्र द्वारा कारक सेवाओं का प्रवाह उत्पादक क्षेत्र की ओर होता है और उत्पादित क्षेत्र द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का प्रवाह परिवार क्षेत्र की ओर होता है।

प्रश्न 7.
आय के प्रवाह को चक्रीय प्रवाह क्यों कहते हैं?
उत्तर:
आय के प्रवाह को चक्रीय प्रवाह इसलिए कहते हैं, क्योंकि –

  1. विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्तियों और भुगतानों का प्रवाह बराबर होता है और
  2. प्रत्येक वास्तविक प्रवाह जिस दिशा में होता है उसाक मौद्रिक प्रवाह उसकी विपरीत दिशा में होता है।

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प्रश्न 8.
चक्रीय प्रवाह मॉडल का महत्त्व बताएं।
उत्तर:
चक्रीय प्रवाह मॉडल का निम्नलिखित महत्त्व है –

  1. विभिन्न क्षेत्रों की परस्पर निर्भरता का ज्ञान।
  2. समावेश और वापसी का ज्ञान।
  3. राष्ट्रीय आय के अनुमान की सुविधा।
  4. महत्त्वपूर्ण समष्टि चरों का ज्ञान।
  5. अर्थव्यवस्था की रचना का ज्ञान।

प्रश्न 9.
प्रयोज्य आय से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैयक्तिक आय में से प्रत्यक्ष करो तथा सरकारी प्रशासनिक विभागों की विविध प्राप्तियों अर्थात् फीस, जुर्माने आदि को कम करके जो आय बचती है, उसे प्रयोज्य आय कहते हैं।

प्रश्न 10.
क्या लॉटरी से प्राप्त आय को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा?
उत्तर:
नहीं, राष्ट्रीय आय में लॉटरी से प्राप्त आय को शामिल नहीं किया जायेगा, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप वस्तुओं के प्रवाह में कोई वृद्धि नहीं होगी।

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प्रश्न 11.
क्या पुरानी कार के विक्रय मूल्य को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय में पुरानी कार के विक्रय मूल्य के शामिल नहीं किया जाता क्योंकि जब उस कार का उत्पादन हुआ था तब ही उसे GNP में शामिल कर लिया गया था।

प्रश्न 12.
क्या शेयर्स की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है?
उत्तर:
शेयर्स वित्तीय पुंजी के अंग हैं। इनके परिणामस्वरूप अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में प्रत्यक्ष रूप से कोई परिवर्तन नहीं होता, इसलिए शेयर्स की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है।

प्रश्न 13.
चार क्षेत्रीय मॉडल में किन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
चार क्षेत्रीय मॉडल में अर्थव्यवस्था के चार क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है –

  1. परिवार क्षेत्र।
  2. उत्पादक क्षेत्र।
  3. सरकारी क्षेत्र।
  4. शेष विश्व क्षेत्र के बीच होने वाले आय के चक्रीय प्रवाह।

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प्रश्न 14.
सकल घरेलू उत्पाद से क्या अभिप्राय है? या बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी राष्ट्र की घरेलू सीमाओं में एक वर्ष में निवासियों तथा गैर-निवासियों द्वारा उत्पादित अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के बाजार मूल्य के जोड़ को सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है।

प्रश्न 15.
कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद से क्या आशय है?
उत्तर:
कारक लागत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद से आशय बिना दोहरी गिनती के सभी कारकों को ब्याज, मजदूरी, लगान तथा लाभ क रूप में प्राप्त होने वाली कुल आय तथा निवल विदेशी कारक आय के जोड़ से है।

प्रश्न 16.
राष्ट्रीय आय लेखांकन के महत्त्व बताएँ।
उत्तर:

  1. इसके द्वारा राष्ट्रीय आय को मापने में सहायता प्राप्त होती है।
  2. यह अर्थव्यवस्था के ढाँचे को समझने में सहायक होता है।
  3. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के सापेक्षिक महत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. आय के कारकों में बँटवारे का ज्ञान प्राप्त होता है।
  5. अन्तक्षेत्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय तुलना में सहायक है।
  6. विभिन्न सयम अवधियों में आय की तुलना में सहायक।

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प्रश्न 17.
किन मदों को घरेलू उत्पाद/आय में शामिल नहीं किया जाता है?
उत्तर:
निम्नलिखित मदों को घरेलू उत्पाद/आय में शामिल नहीं किया जाता है –

  1. गृहणियों की सेवाएं
  2. पुरानी वस्तुओं का क्रय-विक्रय
  3. हस्तांतरण भुगतान
  4. वित्तीय लेन-देन
  5. गैर-कानूनी गतिविधियाँ
  6. खाली समय की गतिविधियाँ
  7. मध्यवर्ती वस्तुएँ

प्रश्न 18.
वास्तविक GNP क्या है?
उत्तर:
स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय तथा वास्तविक राष्ट्रीय आय किसी देश के सामान्य निवासियों द्वारा एक वर्ष में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं तथा सेवाओं के स्थिर मूल्यों का जोड़ है।

प्रश्न 19.
कारक अदागियां क्या होती हैं?
उत्तर:
उत्पादन के कारकों यानि भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यमवृत्ति को प्राप्त आय जैसे-लगान, ब्याज, मजदूरी एवं लाभ को कारक अंदायगियां कहा जाता है।

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प्रश्न 20.
क्या लॉटरियों से प्राप्त अप्रत्याशित लाभों को कारक आय में शामिल किया जायेगा?
उत्तर:
लॉटरियों से प्राप्त अप्रत्याशित लाभों को कारक आय में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि यह एक हस्तांतरण भुगतान है।

प्रश्न 21.
क्या पुराने टेलीविजन की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है?
उत्तर:
नहीं, पुराने टेलीविजन की बिक्री से प्राप्त राशि को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि राष्ट्रीय आय में केवल चालू वर्ष में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को ही शामिल कियो जाता है।

प्रश्न 22.
व्यक्ति अ, कमीशन एजेन्ट स की सहायता से ब का पुराना स्कूटर बेचता है। इसका राष्ट्रीय आय पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
पुराने स्कूटर की बिक्री राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करेंगे, लेकिने कमीशन एजेन्ट का कमीशन का कमीशन राष्ट्रीय आय में शामिल करेंगे, क्योंकि यह नई सेवा का पुरस्कार है।

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प्रश्न 23.
हस्तांतरण आय क्या होती है?
उत्तर:
ऐसी आय जो बिना किसी वस्तु या सेवा के प्राप्त होती है, उसे हस्तांतरण आय कहते हैं। हस्तांतरण आय कहते हैं। हस्तांतरण आय एक पक्षीय होती है। इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि नहीं होती है। जैसे-वृद्धावस्था पेन्शन, छात्रवृत्ति आदि। हस्तांतरण आय को राष्ट्रीय आय को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करते।

प्रश्न 24.
सरकारी अंतिम उपभोग व्यय का अनुमान किस प्रकार लगाया जाता है?
उत्तर:
सरकार, प्रतिरक्षा, चिकित्सा, कानून और व्यवस्था तथा सांस्कृतिक सेवाओं का उत्पादन करती है। सरकार का अन्तिम उपभोग व्यय निम्न प्रकार से ज्ञात किया जा सकता है सरकार द्वारा अन्तिम उपभोग व्यय = वस्तुओं एवं सेवाओं का शुद्ध क्रय (विदेशी क्रय सहित) + कर्मचारियों का पारिश्रमिक

प्रश्न 25.
बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद क्या है?
उत्तर:
बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद किसी अर्थव्यवस्था की घरेलू सीमा में एक लेखा वर्ष में सामान्य निवासियों द्वारा अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के बाजार मूल्य एवं मूल्य ह्रास के अन्तर तथा विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय का जोड़ है।

प्रश्न 26.
मूल्य वृद्धि की अवधारणा की परिभाषा करें।
उत्तर:
विक्रय मूल्य एवं स्टॉक में वृद्धि के योग में से अंतर्वर्ती चीजों की लागत (मध्यवर्ती उपभोग) घटाने पर मूल्य वृद्धि प्राप्त होती है।
मूल्य वृद्धि = उत्पादन वृद्धि
मध्यवर्ती उपभोग अथवा उत्पादन प्रक्रिया में फर्म साधन आगतों (भूमि, श्रम, पूँजी एवं अद्यम) की सेवाओं का प्रयोग करके गैर-साधन आगतों (मध्यवर्ती वस्तुओं) की उपयोगिता में जितनी वृद्धि होती है।

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प्रश्न 27.
मूल्य ह्रास क्या होता है?
उत्तर:
उत्पादन प्रक्रिया में पूंजीगत वस्तुओं जैसे-इमारत, मशीन, उपकरण आदि के मूल्य में घिसावट, सामान्य टूट-फूट, अप्रचलन (तकनीकी परिवर्तन) आदि के कारण कमी को मूल्य हास कहते हैं। इसे स्थायी पूंजी का उपभोग एवं अचर पूंजी का उपभोग अथवा घिसावट भी कहते हैं।

प्रश्न 28.
सकल व्यय के घटक क्या होते हैं?
उत्तर:
सकल व्यय में परिवार, फर्म एवं सरकार द्वारा किए गए व्ययों को शामिल करते हैं। इन क्षेत्रों के अंतिम व्यय को निम्न वर्गों में भी बाँटते हैं –

  1. निजी अन्तिम उपभोग व्यय।
  2. निवेश व्यय।
  3. सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय।
  4. शुद्ध निर्यात।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय लेखांकन के उपयोग क्या हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय लेखांकन के प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं –

  1. राष्ट्रीय आय का विभिन्न उत्पादन संसाधनों के बीच विभाजन समझाया जा सकता है अर्थात् राष्ट्रीय आय में किस संसाधन का कितना योगदान है-इसे जाना जा सकता है।
  2. अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान, इन क्षेत्रों की सापेक्ष एवं निरपेक्ष संवृद्धि की जानकारी राष्ट्रीय आय लेखांकन से प्राप्त होती है।
  3. अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन का बोध होता है।
  4. राष्ट्रीय आय लेखांकन में अर्थव्यवस्था के मजबूत पक्षों व कमजोर पक्षों की जानकारी प्राप्त होती है।
  5. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों जीवन स्तर में वृद्धि, राष्ट्रीय आय का वितरण आदि की जानकारी प्रदान करते हैं।
  6. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों से विभिन्न देशों के तुलनात्मक अध्ययन का आधार प्राप्त होता है।
  7. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों से उपभोग, बचत व पूंजी निर्माण की जानकारी मिलती है।
  8. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों देश की आर्थिक नीतियों की समीक्षा का आधार होते हैं।
  9. राष्ट्रीय आय के आंकड़ों के आधार पर भावी आर्थिक नीतियों, सामाजिक नीतियों की रचना की जाती है आदि।

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प्रश्न 2.
आय के चक्रीय प्रवाह में निर्गत/निवर्तन एवं आगत/परिवर्धन की अवधारणाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर:
निर्वतन-इसमें वे सभी मदें शामिल की जाती है जिनसे राष्ट्रीय आय में घटोतरी होती है। इसकी प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं –

  1. बचत
  2. कर एवं
  3. आयात

आगत/परिवर्धन:
इसमें वे सभी मदें शामिल की जाती हैं जिनसे राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी होती है। इसकी मुख्य मदें निम्नलिखित हैं –

  1. निवेश,
  2. सरकारी व्यय एवं
  3. निर्यात

यदि अर्थव्यवस्था में आगतों के सापेक्ष निर्गत कम होते हैं तो आय का स्तर बढ़ता है इसके विपरीत यदि निर्गत, आगतों से ज्यादा होते हैं आय का स्तर घटता है। संतुलन की अवस्था में निर्गतों का मान आगतों के मान के बराबर रहता है।

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प्रश्न 3.
दो क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह समझाइए।
उत्तर:
दो क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था सरल अर्थव्यवस्था होती है। इस अर्थव्यवस्था में केवल दो क्षेत्र-परिवार व फर्म विद्यमान होते हैं। परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ प्रदान करते हैं बदले में फर्म साधन सेवाओं का भुगतान परिवारों को करती है। इसी प्रकार फर्म परिवारों को वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करती है तथा परिवार वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का भुगतान फर्म को करते हैं।

इस अर्थव्यवस्था में पूंजी बाजार, सरकार तथा विदेशी व्यापार का कोई अस्तित्व नहीं होती है। परिवार उत्पादक क्षेत्र को भूमि, श्रम, पूंजी तथा उद्यम प्रदान करते हैं। फर्म परिवारों को मजदूरी, लगान, ब्याज व लाभ का भुगतान करती है। परिवार साधन आय की सहायता से फर्मों से वस्तु वे सेवाएं खरीदते हैं बदले में उनका मूल्य उत्पादक क्षेत्र को प्रवाहित होता है। इसे निम्न प्रकार भी दर्शाया जा सकता है –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 5

प्रश्न 4.
किसी चक्रीय प्रवाह प्रतिमान का प्रयोग कर दर्शाइए कि आय और उत्पादन के प्रवाह एक-समान होते हैं।
उत्तर:
चक्रीय प्रवाह के सभी प्रतिमानों में आय व उत्पादन के प्रवाह एक-समान होते हैं। उत्पादक क्षेत्र, परिवार क्षेत्र से साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम की सेवाएं क्रय करता है। इन साधन आगतों की सेवाओं की सहायता से उत्पादक क्षेत्र गैर साधन आगतों की उपयोगिता को बढ़ाता है। गैर साधन आगतों की उपयोगिता में वृद्धि को आय का सृजन कहते हैं। इस सृजित आय पर चार साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम का अधिकार होता है। अत: वितरण स्तर पर इस सृजित आय (उत्पादन) को चारों साधनों में आय के रूप में बांट दिया जाता है। उत्पादन के साधनों को उतनी ही आय प्राप्त होती है जितनी आय का सृजन उत्पादन क्षेत्र में होता है। अतः आय और उत्पादन के प्रवाह एक-समान होते हैं।

प्रश्न 5.
“समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का मार्ग राष्ट्रीय लेखांकन के गलियारों से होकर गुजरता है”। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय लेखांकन की सहायता से हम दो प्रमुख कार्य करते हैं। एक देश की विशिष्ट आर्थिक उपलब्धियों का पता चलता है। दो, आर्थिक नीतियों की समीक्षा के लिए तर्कसंगत आधार प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीय लेखांकन की सहायता से न केवल आर्थिक समुच्चयों की माप की जाती है बल्कि अर्थव्यवस्था की कार्यशैली का मूल्यांकन व विश्लेषण भी किया जाता है और उनकी व्याख्या की जाती है। अतः यह कहना उचित है कि समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का मार्ग राष्ट्रीय लेखांकन के गलियारों से होकर गुजरता है।

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प्रश्न 6.
कृष्यर्थ शास्त्री कौन थे? आर्थिक गतिविधियों के बारे में उनके विचार क्या थे?
उत्तर:
18 वीं शताब्दी के फ्रांसीसी प्रकृतिवादी अर्थशास्त्रियों को कृष्णर्थ अर्थशास्त्री कहते हैं। आर्थिक गतिविधियों के संचालन के बारे में वे मुक्त प्रवाह के पक्षधर थे। इसलिए वे अर्थशास्त्री आर्थिक क्रियाकलापों में सरकार के हस्तक्षेप के विरोधी थे। वे स्वतन्त्र व्यापार के पक्षधर थे। उनके विचार में समाज की प्रमुख गतिविधि कृषि थी। क्वीने ने अर्थतालिका के द्वारा धन के चक्रीय प्रवाह तथा समाज के विभिन्न वर्गों के बीच कृषि उत्पादन के वितरण का विधिपूर्ण चित्रांकन प्रस्तुत किया।

प्रश्न 7.
आय और उत्पादन के चक्रीय प्रवाह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रवाह की सहायता से एक निश्चित समय अवधि में आर्थिक चरों के मूल्य में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती है। आय तथा उत्पादन भी आर्थिक प्रवाह हैं। आर्थिक प्रवाह, आर्थिक स्टॉक से भिन्न होते हैं क्योंकि स्टॉक की माप एक निश्चित समय बिन्दु पर की जाती है। अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों जैसे परिवार, फर्म, सरकार एवं शेष विश्व की परस्पर निर्भरता के चित्रांकन को आय एवं उत्पादन का चक्रीय प्रवाह कहते हैं। दूसरे शब्दों में, एक क्षेत्र के आर्थिक निर्णय दूसरे क्षेत्रों के आर्थिक निर्णयों के प्रवाह के अनुरूप लिये, जाते हैं।

प्रश्न 8.
मौद्रिक प्रवाह की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यदि आर्थिक प्रवाह मुद्रा के रूप में होता है तो इसे मौद्रिक प्रवाह कहते हैं। मौद्रिक प्रवाह में एक क्षेत्र से अन्य क्षेत्र/क्षेत्रों को मुद्रा का प्रवाह होता है। इस प्रकार के प्रवाह में वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह शामिल नहीं किया जाता है। जैसे-परिवार क्षेत्र से फर्म, सरकार एवं शेष विश्व द्वारा क्रय की गई वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य का प्रवाह। फर्म, सरकार एवं शेष विश्व द्वारा परिवार क्षेत्र को साधन आय (लगान, मजदूरी, ब्याज एवं लाभ) का भुगतान आदि।

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प्रश्न 9.
आय और उत्पादन के चक्रीय प्रवाह का सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
वर्ष 1758 में क्वीने ने आय और उत्पादन की चक्रीय प्रवाह तालिका की रचना की थी। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री इस विषय में मौन रहे। 19वीं शताब्दी के मध्य में कार्ल मार्क्स ने आय और उत्पादन के चक्रीय प्रवाह के बारे में चर्चा की। आय व उत्पादन प्रवाह के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं –

  1. विनिमय चाहे वस्तु के माध्यम से हो अथवा मुद्रा के माध्यम से, प्रत्येक प्रक्रिया में उत्पादक/विक्रेता को उतनी ही राशि प्राप्त होती है जितनी उपभोक्ता/क्रेता खर्च करते हैं।
  2. वस्तुओं व सेवाओं का प्रवाह एक ही दिशा में होता है परन्तु उन्हें प्राप्त करने के लिए किए गए भुगतानों का प्रवाह विपरीत दिशा में होता है।

प्रश्न 10.
परिवारों की प्राप्तियों एवं भुगतानों को लिखिए।
उत्तर:
परिवार क्षेत्र की प्राप्तियां एवं भुगतान निम्न हैं –
प्राप्तियां:
परिवार क्षेत्र को साधन सेवाओं का पुरस्कार लगान, मजदूरी ब्याज व लाभ प्राप्त होता है। इस क्षेत्र को उत्पादक क्षेत्र से अन्तिम वस्तुएं एवं सेवाएं प्राप्त होती हैं। परिवार को सरकार से आर्थिक सहायता की प्राप्ति होती है। शेष विश्व से परिवार क्षेत्र को साधन भुगतान प्राप्त होता है, परिवार विदेशों से वस्तुओं एवं सेवाओं को भी प्रत्यक्ष रूप से खरीदते हैं। शेष विश्व से परिवार को चालू हस्तांतरण भी प्राप्त होते हैं।

भुगतान:
परिवार फर्म, सरकार व विदेशों से जो वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करते हैं उनके मौद्रिक मूल्यों का भुगतान करना पड़ता है। सरकार परिवारों पर प्रत्यक्ष कर लगाती है। परिवार करों का भुगतान सरकारी क्षेत्र को करते हैं।

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प्रश्न 11.
समष्टि स्तर पर लेखांकन का महत्त्व बताएं।
उत्तर:
लेखांकन सभी स्तरों पर महत्त्वपूर्ण होता है परन्तु समष्टि स्तर और भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। इसके कई कारण हैं-लेखांकन के आधार पर अर्थव्यवस्था में पूरे वित्तीय वर्ष की गतिविधियों की समीक्षा की जाती है। आर्थिक विश्लेषण के बाद सरकार जन कल्याण की भावना से उपयुक्त आर्थिक व सामाजिक नीतियाँ बनाती है। इसी के आधार पर अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय उत्पादन, राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय व्यय, घरेलू पूंजी निर्माण, प्रति व्यक्ति आय आदि समाहारों की जानकारी प्राप्त होती है। लेखांकन के आधार पर अर्थव्यवस्था की विभिन्न वर्षों की उपलब्धियों का तुलनात्मक अध्ययन संभव होता है।

प्रश्न 12.
वैयक्तिक आय की परिभाषा दीजिए। यह वैयक्तिक प्रयोज्य आय से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
वैयक्तिक आय-परिवारों को सभी स्रोतों से प्राप्त आय के योग को वैयक्ति आय कहते हैं।
वैयक्तिक आय = निजी आय – निगम कर – निगमित बचत।
वैयक्तिक प्रयोज्य आय-वैयक्तिक आय का वह भाग जिसे परिवार स्वेच्छा से उपभोग या बचत के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।
वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – प्रत्यक्ष कर – दण्ड, जुर्माना आदि।

प्रश्न 13.
वस्तु एवं सेवा में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 6

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प्रश्न 14.
मध्यवर्ती उपभोग क्या है? सरकार के मध्यवर्ती उपभोग के दो कारण दीजिए।
उत्तर:
मध्यवर्ती उपभोग-एक उत्पादक इकाई द्वारा दूसरी उत्पादन इकाई से खरीदी गई वे वस्तुएँ एवं सेवाएँ जिनको पुनः बेचा जाता है। मध्यवर्ती उपभोग कहलाती हैं। सरकार के मध्यवर्ती उपभोग के उदाहरण –

  1. सरकारी विभागों द्वारा खरीदी गई स्टेशनरी।
  2. सरकारी वाहनों के लिए खरीदा गया पेट्रोल।

प्रश्न 15.
हरित जीएनपी किसे कहते हैं?
उत्तर:
हरित जीएनपी की आवधारणा का विकास आर्थिक विकास के मापक के रूप में किया जा रहा है। जी.एन.पी. को मानवीय कुशलता को मापने के लायक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं इसी सन्दर्भ में हरित जी.एन.पी. का प्रतिपादन किया है। हरित जीएनपी, आर्थिक संवृद्धि की कसौटी-प्राकृतिक संसाधनों के विवेकशील विदोहन और विकास के हित लाभों के समान वितरण पर जोर देती है। अर्थात् जीएनपी का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, संरक्षण एवं समाज के विभिन्न वर्गों में उनके न्यायोचित बंटवारे से हैं।

प्रश्न 16.
परिभाषा करें-
(क) मौद्रिक जीएनपी
(ख) वास्तविक जीएनपी।
उत्तर:
(क) मौद्रिक जीएनपी-यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना लेखा वर्ष में बाजार में प्रचलित कीमतों के आधार पर की जाती है तो इसे मौद्रिक सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं। मौद्रिक जीएनपी में परिर्वतन तात्कालिक बाजार कीमतों में परिवर्तन, तात्कालिक लेखा वर्ष में उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन अथवा दोनों में परिवर्तन के कारण हो सकता है।

(ख) वास्तविक जीएनपी-यदि सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना किसी आधार वर्ष की कीमतों के आधार पर की जाती है तो इसे वास्तविक सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) कहते हैं। वास्तविक जीएनपी में बढ़ोतरी केवल वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि के कारण होती है।

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प्रश्न 17.
बाजार कीमत और स्थिर कीमत पर राष्ट्रीय आय में भेद करें।
उत्तर:
बाजार कीमत पर राष्ट्रीय आय:
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजार में प्रचलित कीमतों पर मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग को बाजार कीमत पर राष्ट्रीय आय कहते हैं।

स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय:
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा के उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के आधार वर्ष की कीमतों पर मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग को स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय कहते हैं। बाजार कीमतों पर राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी के कारण हैं-कीमतों में वृद्धि अथवा उत्पादन की मात्रा में वृद्धि अथवा कीमतों एवं उत्पादन की मात्रा दोनों में वृद्धि। स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी केवल उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी के कारण होती है।

प्रश्न 18.
कर्मचारियों के पारिश्रमिक की परिभाषा दीजिए। इसके विभिन्न संघटक क्या हैं? उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
परिभाषा:
उत्पादक इकाई द्वारा श्रमिकों को मानसिक एवं शारीरिक सेवाओं के बदले जो भुगतान दिया जाता है, उसे कर्मचारियों का पारिश्रमिक कहते हैं।
संघटक:

  1. नकद वेतन-उत्पादक इकाई द्वारा श्रमिकों को मानसिक एवं शारीरिक सेवाओं के बदले जो भुगतान नकद मुद्रा के रूप में दिया जाता है, उसे नकद वेतन कहते हैं। जैसे मूल वेतन, भत्ते, बोनस, कमीशन आदि।
  2. किस्म के रूप में वेतन-उत्पादक इकाई द्वारा श्रमिकों को मानसिक एवं शारीरिक सेवाओं के बदले जो भुगतान वस्तु या सेवाओं के रूप में दिया जाता है। उसे किस्म के रूप में वेतन कहते हैं। जैसे-मुफ्त आवास, सहायता युक्त भोजन आदि।
  3. सामाजिक सुरक्षा अंशदान-श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में मालिकों का अंशदान। जैसे सामूहिक बीमा प्रीमियम, प्रोविडेण्ड फण्ड आदि में मालिकों का भुगतान।

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प्रश्न 19.
सामान्य सरकार क्षेत्र में शुद्ध मूल्य वृद्धि कैसे ज्ञात की जाती है?
उत्तर:
सामान्य सरकार क्षेत्र में ब्याज, लगान व लाभ की अवधारणा, उत्पन्न नहीं होती है, सरकार को अप्रत्यक्ष करों का भुगतान नहीं करना पड़ता है सरकार घिसावट के आंकड़े एकत्र नहीं करती है। अतः इस क्षेत्र में
उत्पादन मूल्य = सामान्य सरकार का मध्यवर्ती उपभोग + कर्मचारियों का पारिश्रमिक। शुद्ध मूल्य वृद्धि = उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग = कर्मचारियों का पारिश्रमिक। इस क्षेत्र में शुद्ध मूल्य वृद्धि कर्मचारियों के पारिश्रमिक के बराबर होती है।

प्रश्न 20.
मध्यवर्ती उत्पाद (वस्तुएं) तथा अन्तिम उत्पाद में अन्तर बताइए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 7

प्रश्न 21.
अन्तिम वस्तु और अन्तर्वती वस्तु में क्या भेद होता है?
उत्तर:
अन्तिम वस्तु-वे वस्तुएँ जिनका प्रयोग उपभोग या निवेश के लिए किया जाता है, अन्तिम वस्तु कहलाती है। इन वस्तुओं को उत्पादन प्रक्रिया में पुनः कच्चे माल की तरह प्रयोग में नहीं लाया जाता है। ये पूरी तरह से तैयार हो जाती हैं इनका पुनः रूप, रंग, आकार नहीं बदला जाता है। इन वस्तुओं को घरेलू/राष्ट्रीय उत्पादन में शामिल किया जाता है। अन्तर्वर्ती वस्तु-वे वस्तुएँ जिनका प्रयोग उत्पादन प्रक्रिया में अन्य वस्तुओं के उत्पादन में कच्चे माल की तरह किया जाता है अन्तर्वर्ती वस्तु कहलाती है। ये वस्तुएं पूरी तरह से तैयार नहीं होती है उत्पादन प्रक्रिया में एक चरण से दूसरे चरण में इनके रूप, रंग, आकार आदि में परिवर्तन किया जाता है। उत्पादन प्रक्रिया में दूसरी वस्तुओं के निर्माण में इनका अपना अस्तित्व खो जाता है। इन वस्तुओं को घरेलू/राष्ट्रीय उत्पादन में शामिल नहीं किया जाता है।

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प्रश्न 22.
क्या GNP राष्ट्रीय कल्याण का मापन करता है?
उत्तर:
बहुत लम्बे समय से अर्थशास्त्री आर्थिक संवृद्धि एवं आर्थिक विकास के मापक रूप में GNP (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) का प्रयोग करते आ रहे हैं। GNP में बढ़ोतरी को अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा एवं GNP में कमी को खराब माना जाता रहा है। परन्तु GNP में वृद्धि से राष्ट्रीय आय का वितरण, संसाधनों के प्रयोग का स्वभाव एवं दर, जीवन की गुणवत्ता आदि के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। अत: GNP से राष्ट्रीय क्षेत्र स्तर का मापन नहीं होता है। आय की गणना का उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि अपने आपको गरीब बनाए बगैर वे क्या कुछ उपभोग सकते हैं। GNP में बढ़ोत्तरी विकास का इकलौता उद्देश्य नहीं है। इसके अलग राष्ट्रीय आय के समान वितरण, जन समुदाय के जीवन की गुणवत्ता में सुधार तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण आदि भी आर्थिक विकास के उद्देश्यों में शामिल किए जाने चाहिए। दूसरे शब्दों में, आर्थिक विकास का उद्देश्य उत्पादकता में वृद्धि। मानवीय कुशलता में बढ़ोतरी के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को सतत् विकास के लिए आवश्यक माना जाता है। अत: GNP में बढ़ोतरी राष्ट्रीय कल्याण का अधूरा माप है।

प्रश्न 23.
निजी अन्तिम उपभोग व्यय के संघटक समझाइए।
उत्तर:
परिवारों के अन्तिम उपभोग एवं परिवारों की सेवा मे निजी गैर-लाभकारी संस्थाओं का अन्तिम उपभोग का योग निजी अन्तिम उपभोग कहलाता है।
निजी अन्तिम उपभोग = परिवारों का अन्तिम उपभोग + परिवारों की सेवा में निजी गैर लाभकारी संस्थाओं का अन्तिम उपभोग।
परिवारों का अन्तिम उपभोग = टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं पर व्यय + गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं पर व्यय + विदेशों से प्रत्यक्ष खरीद पर व्यय + मकानों का आरोपित किराया + किस्म के रूप में वेतन + स्थिर परिसम्पत्तियों का स्व-लेखा उत्पादन – उपहार-पुराने एवं रद्दी सामान की बिक्री।
निजी गैर लाभकारी संस्थाओं का अन्तिम उपभोग = मध्यवर्ती उपभोग-विदेशों से चालू खाते पर प्रत्यक्ष खरीद + कर्मचारियों का पारिश्रमिक – जनता को बिक्री।

प्रश्न 24.
सकल घरेलू स्थाई पूंजी निर्माण और स्टॉक में परिवर्तन के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 8

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प्रश्न 25.
इन वाक्यांशों का अर्थ बताइए –

  1. स्थिर व्यावसायिक निवेश
  2. भण्डार निवेश
  3. गृह निर्माण निवेश
  4. सार्वजनिक निवेश

उत्तर:
1. स्थिर व्यावसायिक निवेश:
फर्मों द्वारा नए यंत्र-सयंत्रों पर किया गया व्यय स्थिर व्यावसायिक निवेश कहलाता है। स्थिर व्यावसायिक निवेश करते समय उत्पादक इकाईयाँ विचार-विमर्श करती हैं। सकल स्थिर व्यावसायिक निवेश में मूल्यह्रास शामिल रहता है परन्तु शुद्ध स्थिर व्यावसायिक निवेश की गणना करने के लिए स्थिर व्यवसायिक निवेश में से मूल्यह्रास घटाते हैं।

2. भण्डार निवेश:
भण्डार निवेश उत्पादन का वह भाग होता है जिसे बाजार में बेचा नहीं गया है। भण्डार निवेश में कच्चा माल, अर्द्धनिर्मित माल एवं तैयार माल को शामिल करते हैं। भण्डार निवेश में वृद्धि की गणना अन्तिम स्टॉक से आरम्भिक स्टॉक घटाकर की जाती है।

3. गृह निर्माण निवेश:
भवन निर्माण पर व्यय को गृह निर्माण निवेश कहते हैं। शुद्ध गृह निर्माण निवेश में से गृह निर्माण का मूल्यह्रास घटाते हैं।

4. सार्वजनिक निवेश:
सरकार द्वारा स्थिर परिसंपत्तियों (सड़कों, पुलों, विद्यालयों, अस्पतलों आदि) के निर्माण पर व्यय की गई राशि को सार्वजनिक निवेश कहते हैं। शुद्ध सार्वजनिक निवेश ज्ञात करने के लिए सकल सार्वजनिक निवेश में से मूल्यह्रास को घटाते हैं।

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प्रश्न 26.
निम्नलिखित को राष्ट्रीय आय में शामिल क्यों नहीं किया जाता है।

  1. एक घरेलू फर्म से पुरानी मशीन का क्रय।
  2. एक घरेलू फर्म के नए शेयरों का क्रय।
  3. सरकार द्वारा छात्रों को छात्रवृत्ति।
  4. संपत्ति कर।
  5. अप्रत्यक्ष कर।
  6. वृद्धावस्था पेंशन।

उत्तर:

  1. एक घरेलू फर्म से पुरानी मशीन का क्रय केवल स्वामित्व का हस्तातरंण है, इससे चालू वर्ष में उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हुई है।
  2. क्योंकि इससे वस्तुओं या सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि नहीं हुई है यह केवल कागजी परिसंपत्ति का विनिमय है।
  3. छात्रों को छात्रवृत्ति एक प्रकार का अंतरण भुगतान है यह पक्षीय भुगतान इससे वस्तुओं व सेवाओं का प्रवाह नहीं बढ़ता है।
  4. क्योंकि संपत्ति कर एक प्रकार का अनिवार्य अंतरण भुगतान है।
  5. क्योंकि अप्रत्यक्ष कर एक प्रकार का अनिवार्य अंतरण भुगतान है।
  6. क्योंकि वृद्धावस्था पेंशन अंतरण भुगतान है।

प्रश्न 27.
नीचे दिए गए सौदे घरेलू उत्पाद को किस प्रकार प्रभावित करेंगे –

  1. एक पुरानी कार के मालिक द्वारा कार बेचकर उस रुपये से नया स्कूटर खरीदना।
  2. एक नई कंपनी द्वारा दलालों की मार्फत अंश पत्रों की बिक्री जिनको कमीशन का भुगतान किया जाता है।
  3. किराये पर लिए गए मकान की खरीद।

उत्तर:

  1. पुरानी कार की बिक्री को राष्ट्रीय उत्पाद में शामिल नहीं किया जायेगा परन्तु नए स्कूटर की खरीद को राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  2. अंश पत्रों की बिक्री से केवल स्वामित्व का हस्तांतरण होता है अतः इनकी बिक्री राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करेंगे परन्तु इनकी बिक्री के लिए दलालों का कमीशन राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  3. किराये पर लिया गया मकान पुराना है। अतः पुराने मकान की खरीद को राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं करेंगे।

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प्रश्न 28.
सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अंकलन में किन कार्यों को शामिल नहीं किया जाता है?
उत्तर:
सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अंकलन में निम्नलिखित कार्यों को शामिल नहीं किया जाता है –
1. सरकार द्वारा हस्तांतरण भुगतान:
हस्तांतरण एक पक्षीय होते हैं। इन भुगतानों से वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में बढ़ोतरी नहीं होती है। जैसे वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति आदि।

2. कागजी परिसंपत्तियों का क्रय-विक्रय:
इन परिसंपत्तियों के क्रय-विक्रय में केवल स्वामित्व का हस्तांतरण होता है। इनसे वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में बढ़ोतरी नहीं होती है। जैसे बचत पत्र, अंश पत्र, ऋण पत्र आदि का क्रय-विक्रय आदि।

3. गैर कानूनी क्रियाएं:
इन क्रियाओं को अपराध माना जाता है इसलिए इन्हें राष्ट्रीय आय के आंकलन में नहीं जोड़ते हैं। जैसे चोरी, डकैती, जुआ आदि।

4. गैर-बाजार वस्तुएं एवं सेवाएं:
ये वस्तुएं बाजार परिधि से बाजार रहती है। इनके बारे में पर्यात जानकारी का अभाव रहता है। इनके मूल्य का अनुमान लगाना असंभव सा होता है।

5. निजी अंतरण भुगतान:
ये भुगतान भी एक पक्षीय होते हैं। इनसे वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह नहीं बढ़ता है।

प्रश्न 29.
GNP (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) के आंकलन में किन कार्यों को अपवर्जित माना गया है? इसके कारण भी बताइए।
उत्तर:
GNP के मापन में निम्नलिखित कार्यों को छोड़ दिया जाता है –
1. वित्तीय/कागजी परिसंपत्तियों का लेन-देन:
बचत पत्र, ऋण पत्र, बाँड, अंश पत्र आदि को वित्तीय परिसपंत्ति कहते हैं। इनके क्रय-विक्रय से मात्र स्वामित्व बदलता हैं, वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि नहीं होती है। इसलिए इस प्रकार के लेन-देन GNP के आंकलन में छोड़ दिए जाते हैं।

2. सरकार द्वारा हस्तांतरण भुगतान:
हस्तांतरण भुगतान वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रतिफल नहीं होते हैं ये एक पक्षीय होते हैं। इनमें वस्तुओं एवं सेवाओं का सृजन नहीं होता है। जैसे-छात्रवृत्ति, वृद्धावस्था पेन्शन आदि। इसलिए इन्हें भी GNP के आंकलन में शामिल नहीं करते हैं।

3. निजी अन्तरण भुगतान-ये भी एक पक्षीय होते हैं इनमें भी आय का सृजन नहीं होता है। इसलिए इन्हें GNP में शामिल नहीं करते हैं। जैसे जेब खर्च आदि।

4. गैर बाजार वस्तुएं एवं सेवाएं-स्व-उपभोग के लिए उत्पन्न की गई सेवाएं बाजार की परिधि से बाहर रहती हैं उनके मूल्य का अनुमन लगाना असंभव होता है इसलिए इन्हें GNP से बाहर रखते हैं।

5. पुराने सामान की बिक्री-पुराने सामान को बेचने से आय का सृजन नहीं होता है। पुराने सामान के उत्पादक मूल्य को उत्पादित लेखा वर्ष में आय सृजन के रूप में शामिल किया जा चुका है। पुराने उत्पाद की बिक्री से नव उत्पादन नहीं होता है अतः पुराने सामान का मूल्य (GNP) में शामिल नहीं किया जाता है।

6. गैर-कानूनी क्रियाएँ-गैर-कानूनी क्रियाओं का उचित रूप में पता नहीं चलता है, या उनक सही हिसाब-किताब का ब्यौरा नहीं मिलता है। इससे भी ज्यादा देश में इन क्रियाओं को अपराध माना जाता है इसलिए GNP के आंकलन में इन्हें छोड़ देते हैं।

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प्रश्न 30.
किन परिस्थितियों में ऐसा होता है –

  1. राष्ट्रीय आय, घरेलू साधन आय के बराबर।
  2. निजी आय, वैयक्तिक आय के बराबर।
  3. राष्ट्रीय आय, घरेलू आय से कम।
  4. क्या वैयक्तिक आय निजी आय से अधिक हो सकती है।
  5. वैयक्तिक आय, वैयक्तिक प्रयोज्य आय के बराबर।

उत्तर:

  1. जब विदेशों से शुद्ध साधन आय शून्य होती है तो राष्ट्रीय आय, घरेलू साधन आय के समान होती है।
  2. वैयक्तिक आय में लाभ कर तथा अवितरित लाभ जोड़ने पर निजी आय प्राप्त होती है। यदि लाभ कर तथा अवितरित लाभ शून्य होते हैं वैयक्तिक आय व निजी आय समान होती है।
  3. यदि विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय ऋणात्मक होती है तो राष्ट्रीय आय, घरेलू आय से कम होती है।
  4. निजी आय = वैयक्तिक आय + लाभ कर + अवितरित लाभ। यदि लाभ कर अथवा अवितरित लाभ अथवा दोनों शून्य से अधिक होते हैं निजी आय, वैयक्तिक आय से ज्यादा होती है।
  5. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष कर-दण्ड जुर्माना आदि।

प्रश्न 31.
क्या निम्नलिखित को राष्ट्रीय आय के आंकलन में शामिल किया जाता है? कारण भी लिखो –

  1. सड़क की रोशनी पर सरकारी व्यय।
  2. विदेशों में काम कर रहे श्रमिक द्वारा उसके परिवार को मिली रकम।
  3. व्यावसायिक बैंक से परिवार को ब्याज की प्राप्ति।
  4. जमीन की बिक्री से प्राप्त राशि।
  5. सुरक्षा पर सरकारी व्यय।
  6. लंदन में सरकारी बैंक की एक शाखा द्वारा अर्जित लाभ।
  7. पाकिस्तान दूतावास में काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों को मिली मजदूरी।

उत्तर:

  1. सड़क की रोशनी पर सरकारी व्यय, सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय का घटक है। अतः व्यय विधि से राष्ट्रीय आय की गणना करने में इसको शामिल किया जायेगा।
  2. विदेशों में काम कर रहे श्रमिक द्वारा परिवार को मिली रकम, विदेशों से अर्जित साधन आय है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल की जायेगी।
  3. व्यावसायिक बैंक से प्राप्त ब्याज साधन आय है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल की जायेगी।
  4. जमीन की बिक्री से प्राप्त आय राष्ट्रीय आय में शामिल नहीं होगी क्योंकि इस सौदे मे केवल स्वामित्व परिवर्तन होता है।
  5. सुरक्षा पर सरकारी व्यय अन्तिम उपभोग व्यय का एक संघटक है अतः इसे राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  6. विदेशों से अर्जित लाभ साधन आय का घटक है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल किया जायेगा।
  7. भारतीय कर्मचारी को पाकिस्तान दूतावास से मिली मजदूरी साधन आय है अतः राष्ट्रीय आय में शामिल की जायेगी।

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प्रश्न 32.
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय किसे कहते हैं? यह कैसे ज्ञात की जाती है?
उत्तर:
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय-बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद, एवं शेष विश्व से शुद्ध चालू हस्तांतरण भुगतान के योग को राष्ट्रीय प्रयोज्य आय कहते हैं। राष्ट्रीय प्रयोज्य आय का उपयोग राष्ट्र जैसे चाहे कर सकता है। राष्ट्रीय प्रयोज्य आय का उपयोग निम्न प्रकार किया जा सकता है।

  1. सरकारी अन्तिम उपभोग
  2. निजी अन्तिम उपभोग एवं
  3. राष्ट्रीय बचत

राष्ट्रीय प्रयोज्य आय का मान राष्ट्रीय आय में कम या ज्यादा हो सकता है। यदि शेष विश्व से चालू अंतरण धनात्मक होते है तो राष्ट्रीय प्रयोज्य आय, राष्ट्रीय आय से अधिक होती है इसके विपरीत यदि शेष विश्व से चालू अंतरण ऋणात्मक होते हैं तो राष्ट्रीय प्रयोज्य आय, राष्ट्रीय आय से कम होती है।

राष्ट्रीय प्रयोज्य आय = बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद + शेष विश्व से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान या
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय = साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर + विदेशों से शुद्ध साधन आय + शेष विश्व से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान

प्रश्न 33.
घरेलू उत्पाद (राष्ट्रीय आय) के आंकलन की मूल्य वृद्धि विधि की रूपरेखा दीजिए।
उत्तर:
इस विधि से राष्ट्रीय आय ज्ञान करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाये जाते हैं –

  1. अर्थव्यवस्था में उत्पादक इकाइयों की पहचान करना और उन्हें समान क्रियाओं के आधार पर विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों (प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक) में बांटना।
  2. प्रत्येक उत्पादन इकाई द्वारा मूल्य वृद्धि ज्ञात करना और उन्हें जोड़कर प्रत्येक क्षेत्र की साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि निकालना।
  3. देश की घरेलू सीमा में समस्त क्षेत्रों की साधन लागत पर मूल्य वृद्धि को जोड़कर घरेलू आय ज्ञात करना।
  4. शुद्ध विदेशी साधन आय ज्ञात करना और उसे घरेलू आय में जोड़कर राष्ट्रीय आय ज्ञात करना।

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प्रश्न 34.
स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय का महत्त्व बताइये।
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक संवृद्धि को ज्ञात करने के लिए एक वर्ष की राष्ट्रीय आय की तुलना आधार-वर्ष की राष्ट्रीय आय से की जाती है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि उत्पादन में वृद्धि के कारण भी हो सकती है और कीमतों में वृद्धि के कारण भी हो सकती है, जब कीमत में वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तो यह वृद्धि अर्थव्यवस्था की प्रगति का वास्तविक चित्र प्रस्तुत नहीं करती।

जब उत्पादन में वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तो इसे राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि कहते हैं। यह वृद्धि आर्थिक संवृद्धि की सूचक है। प्रचलित कीमतों पर राष्ट्रीय आय में कीमतों का प्रभाव शामिल होने के कारण इसकी तुलना आधार वर्ष की राष्ट्रीय आय से नहीं की जा सकती। अत: प्रचलित कीमतों पर राष्ट्रीय आय को, स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय में परिवर्तित करके हम राष्ट्रीय आय की तुलना आधार वर्ष की राष्ट्रीय आय से कर सकते हैं।

प्रश्न 35.
माल भण्डार का अर्थ बताइए।
उत्तर:
किसी वस्तु का उत्पादने करने के लिए कच्चे माल, अर्द्धनिर्मित माल और तैयार माल की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार वस्तु के निर्माण की प्रक्रिया में उत्पादक नल तंत्र के बीच जितनी भी वस्तुएं होती हैं उसे ही माल भण्डार में निवेश करते हैं। यदि ये निवेश न किया जाये तो उत्पादन की प्रक्रिया बन्द हो जाती है। माल भण्डार के निवेश में निम्नलिखित वस्तुएँ शामिल की जाती है –

  1. उत्पादक और विक्रेताओं के पास निर्मित वस्तुएं।
  2. उत्पादन पाइप लाइन में अर्द्धनिर्मित वस्तुएं।
  3. उत्पादकों के पास कच्चा माल।

माल भण्डार धनात्मक भी हो सकता है और ऋणात्मक भी, यदि उपभोग उत्पादित वस्तुओं की मात्रा से अधिक हो तो भण्डार निवेश ऋणात्मक होगा। यदि उत्पादित वस्तुएं उपभोग की मात्रा से अधिक हैं तो माल भण्डार धनात्मक होगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय आय के आंकलन की उत्पादन और आय विधियां समझाइए।
उत्तर:
राष्ट्रीय आय के आंकलन की उत्पादन विधि:
उत्पादन विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में निम्नलिखित चरणों का प्रयोग किया जाता है –
(I) आर्थिक इकाइयों का वर्गीकरण:
अर्थव्यवस्था की सभी उत्पादक इकाइयों को तीन क्षेत्रों-प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र में बांटते हैं। इन क्षेत्रों को विभिन्न उपक्षेत्रों में बांटा जाता है।

(II) बाजार कीमतो पर सकल उत्पादन मूल्य की गणना करना:
एक लेखा वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की बाजार कीमतों को सकल उत्पादन मूल्य कहते हैं। बाजार कीमतवे पर सकल उत्पादन मल्वा की गणला उत्तरदा-मूल्य लेहत वर्ष में बाजार कीमत पर उत्पादन मूल्य = उत्पादन की मात्रा × प्रति इकाई बाजार कीमत। सभी उत्पादक इकाइयों के उत्पादन मूल्य को जोड़कर पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य की गणना की जाती है।

(III) अन्तर्वती/मध्यवर्ती उपभोग:
उत्पादक इकाइयां अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रयोग करती हैं। इस प्रकार की वस्तुओं के प्रयोग को मध्यवर्ती उपभोग कहते हैं। सभी उत्पादक इकाइयों के मध्यवर्ती उपभोग को जोड़कर पूरी अर्थव्यवस्था का मध्यवर्ती उपभोग ज्ञात कर लिया जाता है।

(IV) बाजार कीमतों पर सकल मूल्य वृद्धि:
बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य के आंकड़ों में से मध्यवर्ती उपभोग घटाकर बाजार कीमतों पर सकल मुल्य वृद्धि की गणना की जाती है। यह अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य या बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद के समान होती है।

(V) साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि (NVA at fc) या साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद (NVA at fc) या घरेलू साधन आय घरेलू साधन आय ज्ञात करने के लिए बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद में से स्थायी पूंजी का उपभोग व शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाते हैं।
घरेलू साधन आय = बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद-स्थायी पूंजी का उपभोग,-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर, अथवा,
घरेलू साधन आय = बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग-स्थायी पूंजी का उपभोग-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर

(VI) राष्ट्रीय आय:
घरेलू साधन आय अथवा साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि में विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय जोड़कर राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है।
राष्ट्रीय आय = घरेलू साधन आय + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय अथवा,
राष्ट्रीय आय = साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय अथवा,
राष्ट्रीय आय = बाजार कीमतों पर सकल उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग-स्थायी पूंजी उपभोग-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय आय विधि से राष्ट्रीय आय-आय विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में निम्नलिखित चरणों का प्रयोग किया जाता है। सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की उत्पादन प्रक्रिया में सृजित आय के योग को राष्ट्रीय आय कहते हैं –

1. कर्मचारियों का पारिश्रमिक:
श्रमिक वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करने के लिए अपनी शारीरिक एवं मानसिक सेवाएं प्रदान करते हैं। श्रमिकों की सेवाओं के बदले उन्हें नकद, किस्म या सामाजिक सुरक्षा के रूप में भुगतान दिया जाता है। श्रमिकों को दिए गए सभी भुगतानों के योग को कर्मचारियों का पारिश्रमिक कहते हैं।

2. लगान:
भूमि की सेवाओं के बदले भूमिपतियों को दिए जाने वाले भुगतान को लगान या किराया कहते हैं।

3. ब्याज:
पूंजी के प्रयोग के बदले पूंजीपतियों को किए गए भुगतान को ब्याज कहते हैं। इसमें परिवारों को प्राप्त शुद्ध ब्याज को शामिल किया जाता है। शुद्ध ब्याज की गणना करने के लिए परिवारों द्वारा प्राप्त ब्याज में से उनके द्वारा किए गए ब्याज भुगतानों को घटाते हैं।

4. लाभ:
उत्पादन प्रक्रिया के जोखिमों व अनिश्चिताओं को वहन करने के प्रतिफल को लाभ कहते हैं।

5. घरेलू साधन आय:
घरेलू साधन आय की गणना करने के लिए कर्मचारियों के पारिश्रमिक, लगान, ब्याज एवं लाभ का योग करते हैं। घरेलू साधन आय = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + लगान + ब्याज + लाभ + मिश्रित आय (अनिगमित उद्यमों की आय जिसमें कर्मचारियों के पारिश्रमिक, लगान, ब्याज व लाभ को अलग बाँटना मुश्किल होता है)

6. राष्ट्रीय आय:
घरेलू साधन आय में विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय को जोड़कर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है। राष्ट्रीय आय = घरेलू साधन आय + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय

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प्रश्न 2.
परिभाषा करें –

  1. बाजार कीमतों पर जी.एन.पी. (बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद)।
  2. बाजार कीमतों पर एन.एन.पी. (बाजार कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद)।
  3. साधन लागत पर जी.एन.पी. (साधन लागत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद)।
  4. साधन लागत पर एन.एन.पी. (साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद)।

उत्तर:
1. बाजार कीमतों पर जी.एन.पी. (GNP at mp):
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के बाजार कीमतों पर मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग को बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।
बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद = बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय।

2. बाजार कीमतों पर एन.एन.पी. (NNP at mp):
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में से स्थायी पूंजी का उपभोग घटाने पर प्राप्त बाजार कीमतों को शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं।
अथवा बाजार कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमतों पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद-स्थायी पूंजी का उपभोग अथवा बाजार कीमतों पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद
= विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-स्थान पूंजी का उपभोग

3. साधन लागत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP at fc):
एक लेखा वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित सभी अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाने पर प्राप्त साधन लागत पर शुद्ध उत्पाद कहते हैं।
अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर

4. साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP at fc):
एक लेखा वर्ष में देश की घरेलू सीमा में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मौद्रिक मूल्य एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय के योग में से स्थायी पूंजी का उपभोग एवं शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाने पर साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन कहते हैं।
अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर-स्थायी पूंजी का उपभोग अथवा साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
= साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय

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प्रश्न 3.
साधन बाजार में विभिन्न क्षेत्रों के बीच आय और व्यय के चक्रीय प्रवाह को चित्रांकित कीजिए अथवा आय व्यय के चक्रीय प्रवाह को दर्शाइए।
उत्तर:
दो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में परिवार व फर्म दो क्षेत्र होते हैं। परिवार साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम के स्वामी होते हैं फर्म परिवार क्षेत्र से इन साधन सेवाओं को क्रय करती है। दूसरे शब्दों में फर्म साधन आगतों के प्रतिफलों, लगान, ब्याज, मजदूरी व लाभ का भुगतान परिवार क्षेत्र को करती है। अर्थात् फर्म साधन सेवाओं का भुगतान करने के लिए मुद्रा व्यय करती है। इस प्रकार फर्म से परिवार की ओर मुद्रा के रूप में परिवार क्षेत्र को प्राप्त होते हैं। परिवार इस प्राप्त आय को वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग करने के लिए व्यय करती है। इस प्रकार अर्थ व्यवस्था के दोनों क्षेत्र क्रेता एवं विक्रेता दोनों की भूमिका निभाते हैं इसलिए दोनों क्षेत्रों के बीच प्रवाह निरन्तर चलता है। इसे निम्नांकित चित्र से भी दर्शाया जा सकता है –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 9

प्रश्न 4.
द्विक्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के चक्रीय प्रवाह में वित्त क्षेत्र का समावेश होने पर आय और व्यय के चक्रीय प्रवाह को दर्शाइए।
उत्तर:
किसी अर्थव्यवस्था में विभिन्न वित्तीय संस्थाओं जैसे व्यापारिक बैंक, बीमा कंपनिया आदि को वित्तीय क्षेत्र या पूंजी बाजार कहते हैं। वित्तीय बाजार बचत करने वालों, निवेश करने वालों अथवा ऋण प्रदान करने वालों के बीच बिचौलिए का काम करता है। वास्तव में परिवार एवं उत्पादक दोनों क्षेत्र अपनी सम्पूर्ण आय को खर्च नहीं करते हैं। परिवार साधन आय में से कुछ बचत करते हैं। इसी प्रकार उत्पादक वस्तुओं एवं सेवाओं की बिक्री से प्राप्त आगम में से कुछ बचत करते हैं। कुछ फर्मों निवेश करने के लिए मुद्रा की मांग भी करती हैं।

अतः वित्तीय क्षेत्र को परिवार व उत्पादक के बीच मध्यवस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है। वित्तीय संस्थाएँ उन परिवारों एवं फर्मों को जिनके पास अधिशेष आय होती है, बचत करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं तथा उनकी बचतों को अपने यहाँ जमा करवाती हैं। दूसरी ओर वित्तीय संस्थाएँ परिवारों एवं उद्यमों को उधार लेने अथवा फर्मों को निवेश करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। इन क्षेत्रों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रवाह ठीक उसी प्रकार होता है जैसे बिना वित्त क्षेत्र के समावेश के। लेकिन वहाँ परिवार एवं उद्यमों की बचतों को सुन्न मान लिया जाता है।Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 10

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प्रश्न 5.
निम्न पर टिप्पणी कीजिए –

  1. निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय।
  2. निजी आय।
  3. वैयक्तिक आय।
  4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय।

उत्तर:
1. निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय:
घरेलू साधन आय में निजी व सरकारी दोनों क्षेत्रों की उपार्जित आय सम्मिलित होती है। सार्वजनिक क्षेत्र की उपार्जित आय में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रशासनिक विभागों की आय एवं गैर विभागीय उद्यमों की बचत को शामिल करते हैं। निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से अपार्जित आय ज्ञात करने के लिए घरेलू साधन आय में से सार्वजनिक क्षेत्र की उपार्जित आय घटाती जाती है। संक्षेप में निजी क्षेत्र की उपार्जित आय = घरेलू साधन आय प्रशासनिक विभागों की उद्यम वृत्ति एवं संपत्ति की आय-गैर विभागीय उद्यमों की बचतें

2. निजी आय:
निजी क्षेत्र को एक लेखा वर्ष में सभी स्रोतों से जितनी आय प्राप्त होती है, उसे निजी आय कहते हैं। निजी क्षेत्र में उपार्जित एवं गैर उपार्जित दोनों प्रकार की आय प्रवाहित होती है। निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय एवं विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय निजी आय के उपार्जित घटक हैं तथा सरकार से चालू अन्तरण, शेष विश्व से शुद्ध चालू अन्तरण एवं राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज गैर उपार्जित आय के रूप में निजी क्षेत्र को प्रवाहित होते हैं। संक्षेप में निजी आय = निजी क्षेत्र की घरेलू उत्पाद से उपार्जित आय -विदेशों से शुद्ध साधन आय + सरकार से चालू अन्तरण – राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज

3. वैयक्तिक आय:
निजी आय का वह भाग जो परिवार क्षेत्र की ओर प्रवाहित होता है उसे वैयक्तिक आय कहते हैं। निजी आय का सम्पूर्ण भाग परिवारों की ओर प्रवाहित नहीं होता है। निजी आय का कुछ भाग सरकार को निगम कर के रूप में प्रवाहित होता है तथा कुछ भाग निजी उत्पादक क्षेत्र के पास निगमित बचत के रूप में रह जाता है।
अत: वैयक्तिक आय = निजी आय-निगम कर-निगमित बचत

4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय:
निजी आय का वह भाग जिसे परिवार स्वेच्छापूर्वक उपभोग या बचत के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, वैयक्तिक प्रयोज्य आय कहलाता है। परिवार वैयक्तिक आय का सम्पूर्ण भाग स्वेच्छापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकते हैं। कुछ भाग उन्हें इच्छा के विरुद्ध प्रत्यक्ष करों, दण्ड, जुर्माना आदि के भुगतान पर खर्च करना पड़ता है। संक्षेप में वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय-प्रत्यक्ष कर-दण्ड/जुर्माना आदि

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प्रश्न 6.
दिखाइए कि मूल्य वृद्धि का योग साधन आयों के योग के समान किस प्रकार हो जाता है?
उत्तर:
मल्य वद्धि-फर्म गैर साधन आगतों की उपयोगिता बढाने के लिए साधन आगतों भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम की सेवाएं क्रय करती है। साधन आगतों की सेवाओं पर किया गया व्यय साधन भुगतान कहलाता है। साधन भुगतान को ही साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि कहते हैं। साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि की गणना करने के लिए उत्पादन मूल्य में से मध्यवर्ती उपभोग, स्थायी पूंजी का उपभोग एवं शुद्ध अप्रत्यक्ष कर घटाते हैं।
साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि = उत्पादन मूल्य-मध्यवर्ती उपभोग-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर-स्थायी पूंजी का उपभोग अथवा = साधन भुगतान

साधन आय:
उत्पादन साधन भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम अपनी सेवाएं उत्पादन प्रक्रिया में फर्म को बेचती है। उनकी सेवाओं के बदले साधनों के मालिकों को जितनी-जितनी आय प्राप्त होती है उनके योग को साधनों की आयों का योग कहते हैं।

उपयुक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि फर्म साधनों की सेवाओं के प्रयोग के बदले उनके भुगतान पर जितना व्यय करती है ठीक उतनी ही राशि साधनों के मालिकों को आय के रूप में प्राप्त होती है। इसलिए साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि साधन आयों के योग के बराबर होती है।

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प्रश्न 7.
विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय की परिभाषा दीजिए और इसके संघटक बताइए।
उत्तर:
शेष विश्व से निवासियों द्वारा प्राप्त साधन-आय में से गैर-निवासियों को दिए गए साधन-भुगतान को घटाने पर हमें विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय प्राप्त होती है। शेष विश्व से शुद्ध साधन आय = निवासियों द्वारा शेष विश्व से प्राप्त साधन आय-गैर-निवासियों को दी जाने वाली साधन आय।
शेष विश्व से शुद्ध साधन आय के संघटक निम्नलिखित हैं –

  1. कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक।
  2. शेष विश्व से शुद्ध सम्पत्ति व उद्यमवृत्ति से प्राप्त आय।
  3. विदेशों में निवासी कंपनियों द्वारा शुद्ध प्रतिधारित आय।

1. कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक:
इसके अन्तर्गत एक देश के निवासी कर्मचारियों द्वारा विदेशों में प्राप्त पारिश्रमिक में से गैर-निवासी कर्मचारियों को दिए गए पारिश्रमिक को घटाया जाता है।
कर्मचारियों का शुद्ध पारिश्रमिक = विदेशों में निवासी कर्मचारियों द्वारा प्राप्त पारिश्रमिक – गैर निवासी कर्मचारियों को दिया गया पारिश्रमिक

2. शेष विश्व से शुद्ध सम्पत्ति व उद्यमवृत्ति से प्राप्त आय:
यह एक देश के निवासियों द्वारा किराया, ब्याज, लाभांश और लाभ के रूप में प्राप्त आय तथा इस प्रकार के शेष विश्व को किए गए भुगतान का अन्तर है। इसमें सरकार द्वारा विदेशी-ऋण पर दिया गया ब्याज भी
शामिल है।

3. विदेशों में निवासी कंपनियों द्वारा शुद्ध प्रतिधारित आय:
प्रतिधारित आय से तात्पर्य कंपनियों के अवितरित लाभ से है। विदेशों में काम करने वाली घरेलू कम्पनियों की प्रतिधारित आय और देश में विदेशी कम्पनियों की प्रतिधारित आय का अन्तर विदेशों में निवासी कम्पनियों की शुद्ध प्रतिधारित आय कहलाती है। निवासी कंपनियों की शुद्ध प्रतिधारित आय = विदेशों में निवासी कम्पनियों द्वारा प्रतिधारित आय-गैर-निवासी कम्पनियों की प्रतिधारित आय।

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प्रश्न 8.
चार क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह समझाइए।
उत्तर:
आधुनिक अर्थव्यवस्था चार क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था हैं। चार क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में अधिक जटिलता पाई जाती है। इस प्रतिमान में परिवार, फर्म, सरकार व विदेशों को शामिल किया जाता है। परिवारों व फर्मों के बीच प्रवाह द्वि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था की ही तरह होता है। फर्म, परिवार व सरकार के मध्य प्रवाह त्रि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था के समान होता है। शेष विश्व के साथ प्रवाह का संबंध अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार व पूंजी प्रवाहों के रूप में होता है। एक देश के निर्यात व आयात की सहायता से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उस देश को होने वाले लाभ व हानि की जानकारी प्राप्त होती है।

यदि किसी अर्थव्यवस्था का व्यापार शेष अनुकूल होता है तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में लाभ मिलता है इसके विपरीत यदि व्यापार शेष प्रतिकूल होता है तो उस देश को विदेशों के साथ व्यापार में हानि होती है। परिवार विदेशों से प्रत्यक्ष रूप में वस्तुओं व सेवाओं को खरीदते हैं तथा उनके मौद्रिक मूल्यों का भुगतान करते हैं। विदेश में परिवार क्षेत्र से साधन सेवाएं खरीदी जाती है तथा साधन सेवाओं का मूल्य परिवार क्षेत्र को मिलता है। इसी प्रकार सरकार व उत्पादक क्षेत्र विदेशों से साधन आगतें क्रय करते हैं, उनकी सेवाओं का भुगतान विदेशों को प्रवाहित होता है। चक्रीय प्रवाह को निम्नांकित तरह से भी दर्शाया जा सकता है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 part - 1 img 11a

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प्रश्न 9.
तीन क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह समझाइए।
उत्तर:
तीन क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में परिवार क्षेत्र, उत्पादक क्षेत्र के अलावा सरकार का समावेश और हो जाता है। इस प्रकार के प्रतिमान में सरकार अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करती है तथा जन-कल्याण की भावना से वस्तुओं एवं सेवाओं के प्रवाह में वृद्धि करने में सहयोग करती है।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 part - 1 img 12a

भ्रम की स्थिति से बचने के लिए सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के क्रय-विक्रय प्रवाह को ही शामिल किया जाता है हस्तांतरण भुगतानों के प्रवाह को शामिल नहीं करते हैं। फर्मों की ही तरह सरकार परिवार क्षेत्र से साधन आगतें, भूमि, श्रम, एवं पूंजी क्रय करती है और उनकी सेवाओं का भुगतान परिवार क्षेत्र को दिया जाता है। सरकार फर्मों से जरूरी वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करती है और उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह सरकार से उत्पादक क्षेत्र की ओर होता है।

फर्म से परिवार वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदते हैं और बदले में उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह फर्म की ओर होता है। सरकार, फर्म एवं परिवार क्षेत्रों के बीच विभिन्न प्रकार के हस्तांतरण भुगतानों जैसे-कर, आर्थिक सहायता आदि का प्रवाह भी होता है। त्रि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह निम्नलिखित चित्र के द्वारा भी दर्शाया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
दोहरी गणना की समस्या को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। तथा बताइए कि दोहरी गणना की समस्या से किस प्रकार बच सकते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय आय की गणना के लिए जब किसी वस्तु या सेवा के मूल्य की गणना एक से अधिक बार होती है तो उसे दोहरी गणना कहते हैं। दोहरी गणना के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय बहुत अधिक हो जाती है। दोहरी गणना की समस्या को निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है मान लीजिए एक किसान 500 रु. के गेहूँ का उत्पादन करता है और उसे आटा मिल को बेच देता है। आटा मिल द्वारा गेहूँ की खरीद मध्यवर्ती उपभोग पर व्यय है। आटा-मिल गेहूँ से
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 part - 1 img 13a

भ्रम की स्थिति से बचने के लिए सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के क्रय-विक्रय प्रवाह को ही शामिल किया जाता है हस्तांतरण भुगतानों के प्रवाह को शामिल नहीं करते हैं। फर्मों की ही तरह सरकार परिवार क्षेत्र से साधन आगतें, भूमि, श्रम, एवं पूंजी क्रय करती है और उनकी सेवाओं का भुगतान परिवार क्षेत्र को दिया जाता है।

सरकार फर्मों से जरूरी वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करती है और उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह सरकार से उत्पादक क्षेत्र की ओर होता है। फर्म से परिवार वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदते हैं और बदले में उनके मौद्रिक मूल्य का प्रवाह फर्म की ओर होता है। सरकार, फर्म एवं परिवार क्षेत्रों के बीच विभिन्न प्रकार के हस्तांतरण भुगतानों जैसे-कर, आर्थिक सहायता आदि का प्रवाह भी होता है। त्रि-क्षेत्रकीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह निम्नलिखित चित्र के द्वारा भी दर्शाया जा सकता है।

आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न आंकड़ों के आधार पर फर्म (A) तथा फर्म (B) द्वारा की गई मूल्य वृद्धियों का आंकलन करें –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 14

उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 15

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 राष्ट्रीय आय का लेखांकन

प्रश्न 2.
निम्न आंकड़ों के आधार पर फर्म (X) तथा फर्म (Y) की मूल्य वृद्धि आकलित करें –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 16

उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 17

प्रश्न 3.
साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 18

उत्तर:
साधन लागत पर शुद्ध मूल्य वृद्धि = बिक्री + (अन्तिम स्टॉक – आरम्भिक स्टॉक) कच्चे माल की खरीद – (अप्रत्यक्ष कर आर्थिक सहायता) – घिसावट
= 750 + (10 – 15) – 300 – (75 – 0) – 125
= 750 – 5 – 300 – 75 – 125
= 750 – 380 – 125
= 245 रु.

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित आंकड़ों से प्रचालन – अधिशेष की गणना कीजिए –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 19

उत्तर:
प्रचालन अधिशेष = बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि – स्थायी पूंजी का उपभोग – अप्रत्यक्ष कर + आर्थिक सहायता – मजदूरी और वेतन
= 7000 – 400 – 700 + 100 – 3000
= 7100 – 4100
= 3000 करोड़ रु.

प्रश्न 5.
कर्मचारियों का पारिश्रमिक ज्ञात कीजिए –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 20

उत्तर:
कर्मचारियों का पारिश्रमिक = साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद – किराया ब्याज – लाभ – घिसावट –
= 250 – 20 – 35 – 15 – 60
= 250 – 130
= 120 करोड़ रु.

प्रश्न 6.
इन आंकड़ों का प्रयोग करें और (क) व्यय विधि तथा (ख) आय विधि से शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद का आंकलन करें –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 21

उत्तर:
(क) व्यय विधि –
शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (कारक लागत पर) = निजी अन्तिम उपभोग + सकल व्यावसायिक स्थिर निवेश + सकल गृह निर्माण निवेश-सकल सार्वजनिक निवेश + भण्डार निवेश + सरकार द्वारा वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद + निर्यात – आयात + विदेशों से शुद्ध साधन आय – मूल्यह्रास – सहायता – अप्रत्यक्ष कर
= 700 + 60 + 60 + 40 + 20 + 200 + 40 – 20 – 20 + (-10) – 10 + 20
= 700 + 440 – 20 – 10 – 10
= 1140 – 60
= 1080 लाख रुपये

(ख) आय विधि शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (कारक लागत पर) –
= मजदूरी व वेतन + सामाजिक सुरक्षा हेतु रोजगारदाताओं का अंशदान + लाभ + लगान/भाड़ा + ब्याज + मिश्रित आय + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 700 + 100 + 100 + 50 + 40 + 100 + (-10) = 1090 – 10
= 1080 लाख रुपये

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प्रश्न 7.
निम्न जानकारी का प्रयोग कर (क) व्यय विधि (ख) आय विधि से साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDPfc) का आंकलन करें –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 22

उत्तर:
(क) व्यय विधि
साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद –
(GDpfc) = वैयक्तिक उपभोग व्यय + सकल व्यावसायिक स्थिर निवेश + सकल गृह निर्माण निवेश + वस्तुओं व सेवाओं की सरकारी खरीदारी + सकल सरकारी निवेश + भण्डार निवेश + निर्यात – आयात – अप्रत्यक्ष कर + सहायय्य
= 700 + 60 + 60 + 200 + 40 + 20 + 40 – 20 – 20 + 10
= 1130 – 40
= 1090 लाख रुपये

(ख) आय विधि
साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद –
(GDPfc) = मजदूरी वेतन + रोजगारदाताओं का सामाजिक सुरक्षा में योगदान + लाभ + लगान + ब्याज + मिश्रित आय + मूल्य ह्रास
= 700 + 100 + 100 + 50 + 50 + 100 + 20
= 1120 लाख रुपये

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प्रश्न 8.
निम्न आंकड़ों से बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन करें –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 23
उत्तर:
बाजार कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद = प्राथमिक क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य द्वितीयक क्षेत्र का अन्तर्वर्ती उपभोग व प्राथमिक क्षेत्र का अन्तर्वर्ती उपभोग + सेवा क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य + द्वितीयक क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य – सेवा क्षेत्र का अन्तर्वर्ती उपभोग –
= 2000 – 800 – 1000 + 1400 + 1800 – 600
= (2000 + 1400 + 1800) – (800 – 1000 – 600)
= 5200 – 2400
= 2800 लाख रुपये

प्रश्न 9.
परिचालन अधिशेष ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 24
उत्तर:
परिचालन अधिशेष
= बाजार कीमत पर सकल मूल्य वृद्धि – वेतन एवं मजदूरी – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर – घिसावट –
= 15000 – 5000 – 750 – 250
= 15000 – 6000
= 9000 रु.

प्रश्न 10.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से (क) आय विधि द्वारा बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (ख) व्यय विधि द्वारा राष्ट्रीय आय ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 25
उत्तर:
(क) आय विधि द्वारा बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद –
= कर्मचारियों का पारिश्रमिक + लगान, ब्याज, लाभ + मिश्रित आय + स्थिर पूंजी का उपभोग + अप्रत्यक्ष कर – आर्थिक सहायता
= 240 + 100 + 280 + 40 + 90 – 90
= 740 करोड़ रु.
उत्तर:
बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद = 740 करोड़ रु.

(ख) व्यय विधि से राष्ट्रीय आय –
= निजी अन्तिम उपभोग + सरकारी अन्तिम उपभोग + सकल अचल पूंजी निर्माण + स्टॉक में परिवर्तन + निर्यात – आयात + विदेशों से शुद्ध साधन आय — अप्रत्यक्ष कर + आर्थिक सहायता – स्थिर पूंजी का उपभोग
= 510 + 75 + 130 + 35 + 50 – 60 – 5 – 90 + 10 – 40
= 615 करोड़
उत्तर:
राष्ट्रीय आय = 615 करोड़ रु.

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प्रश्न 11.
निम्न आंकड़ों से (क) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद (ख) राष्ट्रीय आय ज्ञात करो –Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 26
उत्तर:
(क) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद –
= निजी उपभोग व्यय + सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय + शुद्ध घरेलू अंचल पूंजी निर्माण + स्थिर पूंजी का उपभोग + अन्तिम स्टॉक – शुद्ध आयात
= 300 + 70 + 30 + 40 + 10 – 25 – 15
= 410 करोड़ रु.

(ख) राष्ट्रीय आय –
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद + अनुदान-अप्रत्यक्ष कर-स्थिर पूंजी का उपभोग + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 410 + 5 – 50 – 40 + (-20)
= 305 करोड़ रु.
उत्तर:
(क) 410 करोड़ रुपये
(ख) 305 करोड़ रुपये

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित आंकड़ों का प्रयोग करके राष्ट्रीय आय की गणना करो –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 27

उत्तर:
(क) बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद –
= सरकारी अन्तिम उपभोग व्यय + अन्तिम स्टॉक आरंभिक स्टॉक + सकल अचल पूंजी निर्माण + निजी अन्तिम उपभोग व्यय + निर्यात – आयात
= 150 + 100 – 80 + 130 + 600 + 60 – 70
= 890 करोड़ रु.

(ख) राष्ट्रीय आय –
= बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद – अचल पूंजी का उपभोग + विदेशों से शुद्ध साधन आय – अप्रत्यक्ष कर + अनुदान
= 890 – 20 + (-10) – 70 + 10
= 800 करोड़ रु.
उत्तर:
राष्ट्रीय आय = 800 करोड़ रुपये

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प्रश्न 13.
व्यय विधि तथा आय विधि से राष्ट्रीय आय ज्ञात करो –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 28
उत्तर:
व्यय विधि –
राष्ट्रीय आय = (ii) – (iii) + (iv) + (vii) + (viii) – (ix) + (x) + (xi) – (xii) + (xiii)
= 3800 – 3800 + 6300 + 1000 + 1700 – 1700 + 29000 + 300 – 2200 + 300
= 34700 करोड़ रु.

आय विधि –
राष्ट्रीय आय = कर्मचारियों का पारिश्रमिक + प्रचालन अधिशेष + मिश्रित आय + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 13300 + 5000 + 16000 + 300
= 34600 करोड़ रु.
उत्तर:
आय विधि से राष्ट्रीय आय = 34600 करोड़ रुपये व्यय विधि से राष्ट्रीय आय = 34700 करोड़ रुपये

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित आंकड़ों का प्रयोग करके ज्ञात करें –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 29

1. घरेलू आय
= लगान + मजदूरी + ब्याज + लाभकर + लाभांश + मिश्रित आय + अवितरित लाभ
= 5000 + 30000 + 8000 + 2000 + 12000 + 4000 + 3000
= 64000 करोड़ रु.

2. राष्ट्रीय आय = घरेलू आय + विदेशों से शुद्ध साधन आय
= 64000 + 7000
= 71000 करोड़ रु.

3. वैयक्तिक आय = राष्ट्रीय आय – अधिशेष (सरकारी) – लाभकर – अवितरित लाभ + अंतरण भुगतान + उपहार व प्रेषणाएं
= 64000 – 15000 – 2000 – 3000 + 1000 + 2500
= 47500 करोड़ रु.

4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – वैयक्तिक कर
= 47500 – 1500 = 46000 करोड़ रु.
उत्तर:

  1. घरेलू आय = 64000 करोड़ रु.
  2. राष्ट्रीय आय = 71000 करोड़ रु.
  3. वैयक्तिक आय = 47500 करोड़ रु.
  4. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 46000 करोड़ रु.

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प्रश्न 15.
निम्नलिखित आंकड़ों का प्रयोग करके ज्ञात करें –

  1. साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद
  2. वैयक्तिक आय
  3. वैयक्तिक प्रयोज्य आय

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 2 उपभोक्ता के व्यवहार का सिद्धांत part - 1 img 30
उत्तर:
1. राष्ट्रीय आय = बाजार कीमत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद + शेष विश्व से शुद्ध साधन आय-शुद्ध अप्रत्यक्ष कर
= 38000 + (-300) – 3000
= 34700 करोड़ रु.

2. वैयक्तिक आय = राष्ट्रीय आय-सरकारी प्रशासनिक विभागों की आय-कम्पनी लाभकर + राष्ट्रीय ऋण पर बयाज + शेष विश्व से चालू अंतरण + सरकार से वृद्धावस्था पेंशन
= 34700 – 600 – 600 + 200 + 100 + 600
= 34400 करोड़ रु.

3. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = वैयक्तिक आय – वैयक्तिक प्रत्यक्ष कर
= 34400 – 900
= 33500 करोड़ रु.
उत्तर:

  1. राष्ट्रीय आय = 34700 करोड़ रु.
  2. वैयक्तिक आय = 34400 करोड़ रु.
  3. वैयक्तिक प्रयोज्य आय = 33500 करोड़ रु.

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामूहिक आर्थिक क्रियाकलापों को मापने का आधार होता है –
(A) आय का चक्रीय प्रवाह
(B) स्टॉक में परिवर्तन
(C) शुद्ध निवेश
(D) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय
उत्तर:
(A) आय का चक्रीय प्रवाह

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प्रश्न 2.
विभिन्न उत्पादक इकाइयों की मूल्य वृद्धि ज्ञात करने के लिए शामिल करते हैं –
(A) केवल मध्यवर्त वस्तुओं का मूल्य
(B) अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य
(C) केवल अन्तिम वस्तुओं का मूल्य
(D) सभी वस्तु का मूल्य
उत्तर:
(B) अन्तिम वस्तुओं व सेवाओं का मूल्य

प्रश्न 3.
GNP अपसायक माप सकता है –
(A) विशिष्ट वस्तुओं व सेवाओं का औसत कीमत स्तर
(B) सभी वस्तुओं व सेवाओं का औसत कीमत स्तर
(C) कीमत वृद्धि
(D) कीमत में कमी
उत्तर:
(B) सभी वस्तुओं व सेवाओं का औसत कीमत स्तर

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प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आय तथा घरेलू साधन आय समान होती है जब –
(A) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय शून्य हो
(B) शुद्ध निर्यात शून्य हो
(C) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय ऋणात्मक हो
(D) शुद्ध निर्यात धनात्मक हो
उत्तर:
(A) विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय शून्य हो

प्रश्न 5.
वित्तीय परिसंपत्तियों की खरीद-फरोख्त को –
(A) GNP में शामिल किया जाता है
(B) GNP में शामिल नहीं किया जाता है
(C) A व B में से कोई नहीं
(D) A व B दोनों
उत्तर:
(B) GNP में शामिल नहीं किया जाता है

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प्रश्न 6.
सकल निवेश का भाग निम्न में से कौन-सा नहीं है –
(A) व्यापारिक निवेश
(B) सरकारी निवेश
(C) ग्रह निर्माण निवेश
(D) घरेलू सीमा में पुरानी वस्तुओं का क्रय-विक्रय
उत्तर:
(D) घरेलू सीमा में पुरानी वस्तुओं का क्रय-विक्रय

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय प्रयोज्य आय है –
(A) NNP at mp + विदेशों से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान
(B) GDP + NFIA
(C) NNP at fc + विदेशों से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान
उत्तर:
(A) NNP at mp + विदेशों से शुद्ध चालू अंतरण भुगतान

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प्रश्न 8.
राष्ट्रीय आय व इसके अवयवों पर पुस्तक लिखी थी –
(A) साइमन कुजनेटस
(B) रिचर्ड स्टोन
(C) जे. एम. कीन्स
(D) डेविड रिकार्डों
उत्तर:
(A) साइमन कुजनेटस

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय आय लेखांकन का मानक प्रारूप तैयार कियो था –
(A) रिचर्ड स्टोन ने
(B) साइमन कुजनेटस ने
(C) जे. एम. कीन्स ने
(D) एडम स्मिथ ने
उत्तर:
(A) रिचर्ड स्टोन ने

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प्रश्न 10.
ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय आय लिखी थी –
(A) बी. सी. महालनोविस
(B) डी. आर. गाडगिल
(C) वी. के. आर. वी. राव
(D) अम्बेडकर
उत्तर:
(C) वी. के. आर. वी. राव

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

Bihar Board Class 12 Economics समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
व्यष्टि अर्थशास्त्र और समष्टि अर्थशास्त्र में क्या अंतर है?
उत्तर:
शेष अर्थव्यवस्था को समान मानकर व्यक्तिगत क्षेत्र की कार्य पद्धति का अध्ययन व्यष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है। उदाहरण के लिए वस्तु विशेष की कीमत का निर्धारण, वस्तु विशेष की मांग अथवा पूर्ति आदि व्यष्टि अर्थशास्त्र के विषय हैं। समष्टि अर्थशास्त्र में सामूहिक आर्थिक चरों का अध्ययन किया जाता है। इस शाखा में विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के अन्तर्संबंधों का अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए आय एवं रोजगार का निर्धारण, पूंजी निर्माण, सार्वजनिक व्यय, आदि विषयों का विश्लेषण समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 2.
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं –

  1. इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में संसाधनों पर जनता का निजी स्वामित्व होता है।
  2. वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन बाजार में बिक्री के लिए किया जाता है।
  3. बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर श्रम संसाधन का क्रय-विक्रय किया जाता है।
  4. उत्पादक लाभ कमाने के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करते हैं।
  5. विभिन्न उत्पादक इकाइयों में परस्पर प्रतियोगिता पायी जाती हैं।

प्रश्न 3.
समष्टि अर्थशास्त्र की दृष्टि से अर्थव्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्रकों का वर्णन करें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

  1. परिवार क्षेत्र
  2. फर्म या उत्पादक क्षेत्र
  3. सामान्य सरकार
  4. विदेशी क्षेत्र

परिवार क्षेत्र से अभिप्राय अर्थव्यवस्था के उन सभी व्यक्तियों से जो उपभोग के लिए वस्तुएँ/सेवाएं खरीदते हैं। इसके परिवार क्षेत्र साधन आगतों जैसे भूमि, श्रम पूँजी एवं उद्यम की आपूर्ति करते हैं। उत्पादक क्षेत्र में उन सभी उत्पादक इकाइयों को शामिल किया जाता है जो साधनों को क्रय करती है, उनका संगठन करती है, उनकी सेवाओं का प्रयोग करके वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादक करती है और बाजार में उनका विक्रय करती है। फर्म का आकार छोटा अथवा बड़ा हो सकता है।

सरकार से अभिप्राय उस संगठन से है जो जनता को सुरक्षा, कानून, मनोरंजन, न्याय, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सेवाएं निःशुल्क या सामान्य कीमत पर प्रदान करता है। सामान्यतः सरकार जनहित के लिए आर्थिक क्रियाओं का संचालन करती है। सरकार लाभ कमाने के लिए आर्थिक क्रियाओं का संचालन नहीं करती है। शेष विश्व से अभिप्राय उन सभी आर्थिक इकाइयों से है जो देश की घरेलू सीमा से बाहर स्थित होती है। शेष विश्व में दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाओं, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार, विश्व बैंक, विश्व मुद्रा कोष आदि को शामिल किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 4.
1929 की महामंदी का वर्णन करें।
उत्तर:
वर्ष 1929 से 1933 की अवधि को महामंदी कहते हैं। इस अवधि में यूरोप व अमेरिका में उत्पादन, रोजगार में भारी कमी उत्पन्न हो गई थी। इस अवधि में वस्तुओं की मांग का स्तर कम था। उत्पादन साधन बेकार पड़े थे। श्रम शक्ति को भारी संख्या में कार्य क्षेत्र से बाहर कर दिया गया था। अमेरिका में बेरोजगारी का स्तर 3% से बढ़कर 25% हो गया था।

लगभग विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएँ अभावी मांग की समस्या एवं मुद्रा अवस्फीति की समस्याओं से ग्रस्त थीं। आर्थिक महामंदी के काल में अर्थशास्त्रियों को समूची अर्थव्यवस्था को एक इकाई मानकर अध्ययन करने के लिए विवश कर दिया। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि महामंदीकाल की समस्याओं के परिणामस्वरूप ही समष्टि अर्थशास्त्र का उदय हुआ।

Bihar Board Class 12 Economics समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र के दो विषय क्या हैं?
उत्तर:
अर्थशास्त्र अध्ययन के निम्नलिखित दो विषय हैं –

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र, तथा
  2. समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 2.
व्यष्टि अर्थशास्त्र में किन समस्याओं का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र में विशिष्ट अथवा व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 3.
समष्टि अर्थशास्त्र में किन आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है?
उत्तर:
सामूहिक या वृहत स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

प्रश्न 4.
पूर्ण रोजगार का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह स्थिति जिसमें सभी इच्छुक व्यक्तियों को उनकी रुचि एवं योग्यतानुसार प्रचलित मजदूरी दर पर कार्य करने का अवसर प्राप्त हो जाता है पूर्ण रोजगार की स्थिति कहलाती है।

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र की उस शाखा का नाम लिखो जो समष्टि आर्थिक चरों का अध्ययन करती है।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र सामूहिक चरों का अध्ययन करता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 6.
समष्टि अर्थशास्त्र का विरोधाभास क्या है?
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का विरोधाभास यह है कि जो बात एक व्यक्तिगत आर्थिक चर के बारे में सत्य होती है आवश्यक नहीं कि सामूहिक आर्थिक चरों के बारे में भी सत्य हो।

प्रश्न 7.
पूरी अर्थव्यवस्था के विश्लेषण का कार्य किससे होता है?
उत्तर:
विभिन्न आर्थिक इकाइयों अथवा क्षेत्रों में घनिष्ठ संबंध के कारण समूची अर्थव्यवस्था का विश्लेषण किया जाता है।

प्रश्न 8.
प्रतिनिधि वस्तु का अर्थ लिखो।
उत्तर:
एक अकेली वस्तु जो अर्थव्यवस्था में उत्पादित सभी वस्तुओं एवं सेवाओं का प्रतिनिधित्व करती है प्रतिनिधि वस्तु कहलाती है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 9.
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त का अर्थ लिखो।
उत्तर:
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रचलित मजदूरी दर पर सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति रहती है।

प्रश्न 10.
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु लिखो।
उत्तर:
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु –

  1. वस्तु की आपूर्ति अपनी मांग की स्वयं जननी होती है।
  2. एक अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति पाई जाती है।

प्रश्न 11.
समष्टि अर्थशास्त्र की एक सीमा बताओ।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में सामूहिक आर्थिक चरों को समरूप माना जाता है जबकि वे वास्तव में समान होते नहीं हैं।

प्रश्न 12.
चार परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के नाम लिखो।
उत्तर:
चार परंपरावादी अर्थशास्त्री –

  1. डेविड रिकार्डों
  2. जे. बी. से
  3. जे. एस. मिल तथा
  4. आल्फ्रेड मार्शल

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प्रश्न 13.
जे. एम. कीन्स द्वारा लिखित अर्थशास्त्र की पुस्तक का क्या नाम है?
उत्तर:
प्रो. जे. एम. कीन्स द्वारा लिखित पुस्तक का नाम है General Theory of Employment Interest and Money.

प्रश्न 14.
स्वतंत्र आर्थिक चरों का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वे आर्थिक चर जो दूसरी किसी आर्थिक चर/चरों को प्रभावित करता है स्वतंत्र आर्थिक चर कहलाते हैं। जैसे राष्ट्रीय आय आदि।

प्रश्न 15.
आश्रित आर्थिक चर का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वह आर्थिक चर दूसरे किसी आर्थिक चर से प्रभावित होता है आश्रित चर कहलाता है। जैसे उपभोग, बचत आदि।

प्रश्न 16.
समष्टि अर्थशास्त्र के चरों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
समष्टि चरों के उदाहरण –

  1. सामूहिक मांग
  2. सामूहिक पूर्ति
  3. रोजगार
  4. सामान्य कीमत स्तर आदि

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प्रश्न 17.
‘से’ का नियम क्या है?
उत्तर:
‘से’ का नियम बताता है कि किसी वस्तु की आपूर्ति उसकी मांग की स्वयं जननी होती है।

प्रश्न 18.
1929-1933 की अवधि में महामंदी के मुख्य बिन्दु लिखो।
उत्तर:
आर्थिक महामंदीकाल में बाजारों में वस्तुओं की आपूर्ति उपलब्ध थी लेकिन वहाँ मांग की कमी की समस्या थी और बेरोजगारी का स्तर भी बढ़ गया था।

प्रश्न 19.
उस आर्थिक चर का उदाहरण दीजिए जिसे समष्टि स्तर पर स्थिर माना जाता है।
उत्तर:
वस्तुओं के कीमत स्तर को समष्टि स्तर पर स्थिर माना जाता है।

प्रश्न 20.
सामूहिक मांग की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग के योग को कुल मांग/सामूहिक मांग कहते हैं।

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प्रश्न 21.
उपभोग फलन का अर्थ लिखो।
उत्तर:
उपभोग राष्ट्रीय आय का फलन है। दूसरे शब्दों में उपभोग फलन, उपभोग व राष्ट्रीय आय के बीच संबंध को व्यक्त करता है।

प्रश्न 22.
आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) से पूर्व समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन किस शाखा में किया जाता था?
उत्तर:
आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) से पूर्व अर्थशास्त्र का अध्ययन केवल व्यष्टि अर्थशास्त्र के रूप में किया जाता था।

प्रश्न 23.
समष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम लिखिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र को आय सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 24.
कीमत सिद्धान्त को और किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
वैकल्पिक तौर पर कीमत सिद्धान्त को व्यष्टि अर्थशास्त्र के नाम से जाना जाता था।

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प्रश्न 25.
दो आश्रित चरों के उदाहरण लिखो।
उत्तर:
आश्रित चरों के उदाहरण –

  1. उपभोग एवं
  2. बचत

प्रश्न 26.
अन्तः क्षेपण का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
वे आर्थिक क्रियाएं जिनसे राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी होती है अन्तः क्षेपण कहलाती हैं। जैसे निवेश, उपभोग आदि।

प्रश्न 27.
बाह्य स्राव का अर्थ लिखो।
उत्तर:
वे आर्थिक क्रियाएं जिनसे राष्ट्रीय आय में कमी आती है बाह्य स्राव कहलाती है।

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प्रश्न 28.
समष्टि अर्थशास्त्र का उदय किस कारण हुआ?
उत्तर:
केन्द्रीय क्रांति अथवा आर्थिक महामंदी के बाद समष्टि अर्थशास्त्र का उदय हुआ।

प्रश्न 29.
उस आर्थिक चर का नाम लिखो जिसे व्यष्टि स्तर पर स्थिर माना जाता है।
उत्तर:
आय एवं रोजगार स्तर को व्यष्टि पर स्थिर माना जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यष्टि व समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर लिखो।
उत्तर:
व्यष्टि व समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर –

  1. व्यष्टि अर्थशास्त्र व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन करता है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र सामूहिक स्तर पर आर्थिक चरों का अध्ययन करता है।
  2. व्यष्टि अर्थशास्त्र समझने में सरल है जबकि समष्टि अर्थशास्त्र सापेक्ष रूप से जटिल विषय है।
  3. संसाधनों का वितरण व्यष्टि अर्थशास्त्र का एक आवश्यक उपकरण है लेकिन समष्टि स्तर पर इसे स्थिर माना जाता है।
  4. व्यष्टि अर्थशास्त्र कीमत सिद्धान्त तथा संसाधनों के आबटन पर जोर देता है लेकिन आय व रोजगार समष्टि के मुख्य विषय हैं।

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प्रश्न 2.
समष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था को इकाई मानकर सामूहिक आर्थिक चरों का विश्लेषण करता है। समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र अधिक व्यापक है। निम्नलिखित आर्थिक चरों का इस शाखा में अध्ययन किया जाता है –

  1. सामूहिक मांग
  2. सामूहिक पूर्ति
  3. सकल घरेलू पूंजी निर्माण
  4. स्वायत्त एवं प्रेरित निवेश
  5. निवेश गुणांक
  6. औसत उपभोग एवं बचत प्रवृत्ति
  7. सीमान्त उपभोग एवं बचत प्रवृत्ति
  8. पुंजी की सीमान्त कार्य क्षमता

प्रश्न 3.
संक्षेप में पूर्ण रोजगार की अवधारणा को स्पष्ट करो।
उत्तर:
वह स्थिति जिसमे एक अर्थव्यवस्था में सभी इच्छुक लोगों को दी गई या प्रचलित मजदूरी दर पर योग्यतानुसार आसानी से कार्य मिल जाता है पूर्ण रोजगार कहलाती है। परंपरावादी अर्थशास्त्री जे. बी. से का पूर्ण रोजगार के बारे में अलग विचार था। परंपरावादी रोजगार सिद्धान्त के अनुसार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है क्योंकि प्रचलित मजदूरी पर काम करने के इच्छुक सभी व्यक्तियों को आसानी से काम मिल जाता है।

जे. एम. कीन्स के अनुसार आय के सन्तुलन स्तर पर रोजगार स्तर को साम्य रोजगार स्तर कहते हैं। आवश्यक रूप से साम्य रोजगार का स्तर पूर्ण रोजगार स्तर के समान नहीं होता है। साम्य रोजगार का स्तर यदि पूर्ण रोजगार स्तर से कम होता है तो अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की समस्या रहती है। परंपरावादी अर्थशास्त्री साम्य रोजगार को ही पूर्ण रोजगार कहते थे।

प्रश्न 4.
व्यष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध विशिष्ट या व्यक्गित आर्थिक चरों से है। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में विशिष्ट आर्थिक इकाइयों या व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र की व्यष्टि शाखा में उपभोक्ता सन्तुलन, उत्पादक सन्तुलन, साम्य कीमत निर्धारण, एक वस्तु की मांग, एक वस्तु की पूर्ति आदि विषयों का अध्ययन किया जाता है। आर्थिक महामंदी से पूर्व अर्थशास्त्र के रूप में केवल व्यष्टि अर्थशास्त्र का ही अध्ययन किया जाता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र को कीमत-सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है।

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प्रश्न 5.
समष्टि अर्थशास्त्र की अवधारणा संक्षेप में स्पष्ट करो।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का संबंध सामूहिक या समष्ट्रीय आर्थिक चरों से हैं। दूसरे शब्दों में अर्थशास्त्र की इस शाखा में सामूहिक या समष्टि आर्थिक चरों का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र की समष्टि शाखा में आय एवं रोजगार निर्धारण, पूँजी निर्माण, सार्वजनिक व्यय, सरकारी व्यय, सरकारी बजट, विदेशी व्यापार आदि विषयों का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र ही इस शाखा का उदय आर्थिक महामंदी के बाद हुआ है। इस शाखा को आय एवं रोजगार सिद्धान्त के रूप में भी जाना जाता है।

प्रश्न 6.
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर:
रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त का प्रतिपादन परंपरावादी अर्थशास्त्रियों ने किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति को प्रचलित मजदूरी पर उसकी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार आसानी से काम मिल जाता है। दूसरे शब्दों में प्रचलित मजदूरी दर पर अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। काम करने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए दी गई मजदूरी दर पर बेरोजगारी की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है। रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त को बनाने में डेविड रिकार्डो, पीगू, मार्शल आदि व्यष्टि अर्थशास्त्रियों ने योगदान दिया है। रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त में जे. बी. से का रोजगार सिद्धान्त बहुत प्रसिद्ध है।

प्रश्न 7.
संक्षेप में अनैच्छिक बेरोजगार को समझाइए।
उत्तर:
यदि दी गई मजदूरी दर या प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को आसानी से कार्य नहीं मिल पाता है तो इस समस्या को अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं। एक अर्थव्यवस्था में अनैच्छिक बेरोजगारी के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –

  1. अर्थव्यवस्था में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति हो सकती है।
  2. प्राकृतिक संसाधनों की कमी।
  3. पिछड़ी हुई उत्पादन तकनीक।
  4. आधारिक संरचना की कमी आदि।

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प्रश्न 8.
सामूहिक मांग का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
दी गई अवधि में एक अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग के योग को कुल मांग या सामूहिक मांग कहते हैं। अर्थव्यवथा में वस्तुओं की मांग उपभोग तथा निवेश के लिए की जाती है। इस प्रकार वस्तुओं की उपभोग के लिए मांग तथा निवेश के लिए मांग के योग को भी सामूहिक मांग कह सकते हैं। संक्षेप में सामूहिक मांग = उपभोग + निवेश। सामूहिक मांग के संघटको को निम्न प्रकार से भी लिखा जा सकता है –

  1. निजी अन्तिम उपभोग व्यय।
  2. सार्वजनिक अन्तिम उपभोग व्यय।
  3. सकल घरेलू पूंजी निर्माण।
  4. शुद्ध निर्यात।

प्रश्न 9.
वे कारक लिखिए जिन पर कीन्स का रोजगार सिद्धान्त निर्भर करता है।
उत्तर:
कीन्स का आय एवं रोजगर सिद्धान्त निम्नलिखित कारकों पर निर्भर है –

  1. अर्थव्यवस्था में आय एवं रोजगार का स्तर, सामूहिक मांग के स्तर पर निर्भर होता है। सामूहिक मांग का स्तर जितना ऊँचा होता है, आय एवं रोजगार का स्तर भी उतना ही अधिक होता है। इसके विपरीत सामूहिक मांग का स्तर नीचा होने पर आय एवं रोजगार का स्तर भी नीचा रहता है।
  2. अर्थव्यवस्था आय एवं रोजगार के स्तर को उपभोग का स्तर बढ़ाकर बढ़ाया जा सकता है।
  3. अर्थवव्यवस्था के उपभोग का स्तर आय के स्तर व उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर होता है।

प्रश्न 10.
कुछ व्यष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
व्यष्टि अर्थशास्त्र का संबंध व्यक्तिगत या विशिष्ट आर्थिक चरों से होता है। कुछ व्यष्टि आर्थिक चरों के उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  1. संसाधनों का आंबटन
  2. उपभोक्ता व्यवहार एवं उपभोक्ता सन्तुलन
  3. वस्तु की मांग
  4. वस्तु की मांग की लोच
  5. वस्तु की आपूर्ति
  6. उत्पादक व्यवहार एवं उत्पादक सन्तुलन
  7. वस्तु की पूर्ति लोच
  8. वस्तु की कीमत का निर्धारण।

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प्रश्न 11.
समष्टि अर्थशास्त्र में संरचना की भ्रान्ति को स्पष्ट करो।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों का अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन में समूह की इकाइयों में बहुत अधिक विषमता पायी जाती है। समूह की इकाइयों की विषमता को पूरी तरह से अनदेखा किया जाता है। इस विषमता के कारण कई भ्रान्तियाँ पैदा हो जाती हैं। जैसे पूंजी वस्तुओं की कीमत गिरने से सामान्य कीमत स्तर गिर जाता है। लेकिन दूसरी ओर खाद्यान्नों की बढ़ती हुई कीमतें उपभोक्ताओं की कमर तोड़ती रहती हैं। लेकिन सरकार आंकड़ों की मदद से सामान्य कीमत स्तर को घटाने का श्रेय बटोरती है।

प्रश्न 12.
समष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे –

  1. समष्टि शाखा से आर्थिक भ्रान्तियों को सुलझाने में मदद मिलती है।
  2. इस. शाखा के अध्ययन से आर्थिक उतार-चढ़ावों को समझना सरल हो जाता है।
  3. व्यष्टि अर्थशास्त्र के पूरक के रूप में इसके विकास को समष्टि अर्थशास्त्र सहायक है।
  4. समष्टि आर्थिक विश्लेषण से आर्थिक नियोजन से मदद मिलती है।
  5. आर्थिक नियोजन के क्रियान्वयन में मदद मिलती है।

प्रश्न 13.
परंपरावादी रोजगर सिद्धान्त की मान्यताएं लिखिए।
उत्तर:
आय एवं रोजगार का परंपरावादी सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

  1. वस्तु की आपूर्ति उसकी मांग की जननी होती है।
  2. मजदूरी दर पूर्णतया लोचदार होती है।
  3. ब्याज दर पूर्णतया लोचदार होती है।
  4. वस्तु की कीमत पूर्णतथा नम्य होती है।
  5. अर्थव्यवस्था में पूर्ण प्रतियोगिता पाई जाती है।
  6. आर्थिक क्रियाकलापों के संचालन में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है।

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प्रश्न 14.
समष्टि अर्थव्यवस्था के उपकरण बताइए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपकरणों का उपयोग किया जाता है –
1. आय एवं रोजगार नीति –

  • सामूहिक मांग
  • सामूहिक पूर्ति

2. राजकोषीय नीति –

  • सरकारी बजट
  • मजदूरी नीति
  • आयात व निर्यात नीति
  • उत्पादन नीति

3. मौद्रिक नीति –

  • बैंक दर
  • नकद जमा अनुपात
  • संवैधानिक तरलता अनुपात
  • खुले बाजार की क्रियाएँ
  • साख नीति

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प्रश्न 15.
समष्टि अर्थशास्त्र के लिए व्यष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
जिस प्रकार व्यक्ति-व्यक्ति को मिलाकर समाज का गठन होता है फर्म-फर्म के संयोजन से उद्योग की रचना होती है। उद्योगों को मिलाकर अर्थव्यवस्था अर्थात् समग्र बनता है। इसलिए व्यष्टि अर्थशास्त्र समष्टि अर्थशास्त्र के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। जैसे –

  1. अलग-अलग वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत के आधार पर ही सामान्य कीमत स्तर का आकलन करते हैं।
  2. व्यक्तिगत आर्थिक/उत्पादक इकाइयों के आय के योग के योग से राष्ट्रीय आय ज्ञात की जाती है।
  3. आर्थिक नियोजन के लिए फर्मों व उद्योगों के नियोजन का जानना अति आवश्यक है।

प्रश्न 16.
समष्टि अर्थशास्त्र में समूहों को मापने में आने वाली कठिनाइयों को लिखिए।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। वस्तुओं एवं सेवाओं का मापन अलग-अलग इकाइयों में किया जाता है। दूसरे शब्दों में सभी उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं का मापन करने के लिए कोई एक उपयुक्त इकाई नहीं है। अत: वस्तुओं एवं सेवाओं को मापने में केवल मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 17.
आय व उत्पादन के बारे में परंपरावादी विचार को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
आय एवं उत्पादन के परंपरावादी सिद्धान्त के अनुसार वस्तु की आपूर्ति, मांग की जननी होती है। अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता पायी जाती है। वस्तुओं की कीमत पूर्णतः नम्य होती है। इसका अभिप्राय यह है कि वस्तुओं की आपूर्ति एवं मांग में परिवर्तन के अनुसार कीमत में परिवर्तन हो जाता है। नम्य कीमत पर से वस्तु बाजार में मांग व पूर्ति में स्वतः सन्तुलन स्थापित हो जाता है।

इसलिए अधिशेष उत्पादन अथवा अधिमांग की कोई समस्या पैदा नहीं होती है। यदि अस्थायी तौर पर अधिशेष उत्पादन की समस्या उत्पन्न होती है तो वस्तु की कीमत गिर जाती है। कम कीमत पर वस्तु की मांग बढ़ जाती है और उत्पादक पूर्ति कम मात्रा में करने लगते हैं। मांग व पूर्ति में परिवर्तन का क्रम संतुलन स्थापित होने पर रुक जाता है। वस्तु बाजार की तरह श्रम बाजार में भी नम्य मजदूरी दर के द्वारा सन्तुलन स्थापित हो जाता है और अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति रहती है।

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प्रश्न 18.
व्यष्टिं अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र की परस्पर निर्भरता स्पष्ट करो।
उत्तर:
व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र की दो अलग-अलग शाखाएं हैं। ये दोनों शाखाएं परस्पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए एक वस्तु की कीमत निर्धारण व्यष्टि विश्लेषण के आधार पर किया जाता है और सामान्य कीमत का निर्धारण समष्टि विश्लेषण के द्वारा होता है। उद्योग में मजदूरी दर निर्धारण व्यष्टि अर्थशास्त्र का मुद्दा है। सामान्य मजदूरी दर का निर्धारण समष्टि अर्थशास्त्र का विषय है। इस प्रकार से कहा जा सकता है। कि व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र एक-दूसरे पर निर्भर शाखाएं हैं।

प्रश्न 19.
संक्षेप में समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र बताइए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्र की एक विस्तृत श्रृंखला है। इस शाखा के कुछ क्षेत्र नीचे लिखे गए हैं –

  1. रोजगर सिद्धान्त-रोजगार एवं बेरोजगार से संबंधित विभिन्न अवधारणाओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।
  2. राष्ट्रीय आय का सिद्धान्त-राष्ट्रीय आय से संबंधित समाहारों जैसे बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद, साधन लागत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद, बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद, राष्ट्रीय प्रयोज्य आयं आदि तथा उनके संघटकों का अध्ययन किया जाता है।
  3. मुद्रा सिद्धान्त-मुद्रा के कार्य, मुद्रा के प्रकार, बैंकिग प्रणाली आदि का विश्लेषण अर्थशास्त्र की इस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है।
  4. विश्व व्यापार का सिद्धान्त- व्यापार शेष, भुगतान शेष, विनिमय दर आदि के बारे में विश्लेषण समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है।

प्रश्न 20.
आर्थिक विरोधाभास को समझने के लिए समष्टि अर्थशास्त्र किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
कुछ आर्थिक तथ्य ऐसे होते हैं जो व्यक्तिगत स्तर पर उपयुक्त होते हैं परन्तु सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। ऐसी धारणाओं को आर्थिक विरोधाभास कहते है। जैसे महामंदीकाल में व्यक्तिगत बचत व्यक्तिगत स्तर पर लाभकारी रही परन्तु पूरी अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक सिद्ध हुई। इस विरोधाभास को प्रो. जे. एम. कीन्स ने समष्टि अर्थव्यवस्था की सहायता से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि बचत व्यक्तिगत स्तर पर वरदान होती है परन्तु सामूहिक स्तर पर अभिशाप होती है।

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प्रश्न 21.
क्या व्यष्टि अर्थशास्त्र को समझने के लिए समष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन जरूरी है?
उत्तर:
कई बार व्यक्तिगत निर्णय समष्टि निर्णयों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इसी प्रकार व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयां निर्णय लेने के लिए सामूहिक निर्णयों को ध्यान में रखना जरूरी होता है –

  1. एक फर्म के उत्पादन का स्तर का पैमाना कुल मांग अथवा लोगों की क्रय शक्ति को ध्यान में रखकर तय करती है।
  2. एक वस्तु की कीमत उस वस्तु की मांग व पूर्ति से ही तय नहीं होती है बल्कि दूसरी वस्तुओं की मांग व पूर्ति को भी ध्यान में रखकर तय की जाती है।
  3. एक फर्म साधन भुगतान के निर्धारण के लिए दूसरी फर्मों के साधन भुगतान संबंधी निर्णय ध्यान में रखती है। आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आय एवं रोजगार सिद्धान्त की कीन्स विचारधारा के मुख्य बिन्दु बताइए।
उत्तर:
आर्थिक महामंदीकाल (1929-1933) ने कई ऐसी आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया जिनको व्यष्टि अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर हल नहीं किया जा सका। इन समस्याओं के समाधान हेतु प्रो. जे. एम. कीन्स ने General Theory of Employment, Interest & Money लिखी। इस पुस्तक में कीन्स ने आय एवं रोजगार के बारे में निम्नलिखित मुख्य बातें बतायीं –

1. एक अर्थव्यवस्था में आय एवं रोजगार का स्तर संसाधनों की उपलब्धता एवं उपयोग पर निर्भर करता है। यदि किसी अर्थव्यवस्था में कुछ संसाधन बेकार पड़े होते हैं तो अर्थव्यवस्था उन्हें उपयोग में लाकर आय एवं रोजगार के स्तर को बढ़ा सकती है।

2. कीन्स ने परंपरावादियों के इस विचार को कि एक वस्तु की पूर्ति मांग की जनक होती है खारिज कर दिया। कीन्स ने बताया कि वस्तु की कीमत उपभोक्ता की आय और उपभोक्ता की उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर करती है।

3. परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार सन्तुलन की अवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। लेकिन कीन्स ने सन्तुलन स्तर के रोजगार स्तर को साम्य रोजगार स्तर का नाम दिया और स्पष्ट किया कि साम्य रोजगार स्तर आवश्यक रूप से पूर्ण रोजगार स्तर के समान नहीं होता है यदि साम्य रोजगार स्तर, पूर्ण रोजगार स्तर से कम है तो अर्थव्यवस्था उपभोग या सामूहिक मांग को बढ़ाकर आय एवं रोजगार स्तर में वृद्धि कर सकती है।

4. परंपरावादी विचार में सरकारी हस्तक्षेप को निषेध करार दिया गया था। लेकिन कीन्स ने सुझाव दिया कि विषम परिस्थितियों जैसे अभावी मांग अधिमांग आदि में हस्तक्षेप करके इन्हें ठीक करने के लिए उपाय अपनाने चाहिए।

5. परंपरावदी सिद्धांत में बचतों को वरदान बताया गया है जबकि समष्टि स्तर पर कीन्स ने बचतों को अभिशाप की संज्ञा दी है। व्यक्तिगत स्तर पर बचत वरदान हो सकती है।

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प्रश्न 2.
व्यष्टि एवं समष्टि अर्थशास्त्र में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
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प्रश्न 3.
आय एवं रोजगार के परंपरावादी सिद्धान्त को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
परंपरावादी अर्थशास्त्रियों जैसे पीग, डेविड रिकार्डों, आल्फ्रेड मार्शल, जे. एस. मिल, जे. बी. से आदि ने व्यष्टि अर्थशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। दूसरे शब्दों में परंपरावादी अर्थशास्त्रियों ने अपना ध्यान व्यष्टि अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों एवं नियमों का प्रतिपादन करने की ओर केन्द्रित किया। परंपरावादी अर्थशास्त्रियों की मान्यता थी कि साम्य स्तर पर एक अर्थव्यवस्था में सदैव पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है। आर्थिक परिवर्तन से अस्थायी अधिशेष उत्पादन अथवा बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो सकती है। परन्तु नम्य मजदूरी दर एवं नम्य कीमत के द्वारा ये समस्याएं स्वतः सरकारी हस्तक्षेप के बिना ठीक हो जाती है। इस सिद्धांत की मुख्य बातें निम्न प्रकार हैं –

  1. एक वस्तु की आपूर्ति, मांग की जनक होती है।
  2. साम्य की अवस्था में अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति होती है।
  3. अर्थव्यवस्था में अधिशेष उत्पादन कोई समस्या नहीं होती है। यदी कभी यह समस्या उत्पन्न होती है तो वस्तु की नम्य कीमत के द्वारा यह समस्या स्वयं हल हो जाती है।
  4. अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की समस्या भी उत्पन्न नहीं होती है। यदि अस्थायी रूप से यह समस्या उत्पन्न होती है तो नुम्य मजदूरी दर उसे ठीक कर देती है।
  5. अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति अथवा अवस्फीति की भी कोई समस्या नहीं होती है। नम्य ब्याज दर मुद्रा की मांग एवं आपूर्ति में सन्तुलन बना देती है।
  6. सरकार को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

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प्रश्न 4.
समष्टि आर्थिक दृष्टिकोण की आवश्यकता को स्पष्ट करो।
उत्तर:
परंपरावादी अर्थशास्त्रियों जैसे पीगू, डेविड रिकाडौँ, आल्फ्रेड मार्शल, जे. एस. मिल. जे. बी. से आदि ने व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्तों को प्रतिपादित करने में अहम भूमिका निभायी। इन अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक समस्याओं का हल ढूंढने का काम व्यष्टि स्तर तक सीमित रखा। 1929 तक व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्त एवं उनकी मान्यताओं से आर्थिक समस्याओं का स्वतः समाधान होता रहा। लेकिन (1929-1933) के महामंदीकाल ने व्यष्टि अर्थशास्त्रियों की मान्यताओं एवं सिद्धान्त को असफल कर दिया। वस्तुएं प्रचुर मात्रा में बाजार में उपलब्ध थीं परन्तु अपनी मांग नहीं उत्पन्न कर पा रही थी। वस्तु की कीमत नम्यता के आधार पर कीमत घटने पर भी वस्तुओं की मांग नहीं बढ़ी।

इसी प्रकार साधन बाजार नम्य मजदूरी पर बेरोजगारी की समस्या को ठीक नहीं कर पाई। नम्य ब्याज दर से अर्थव्यवस्थाओं में अवस्फीति की स्थिति ठीक नहीं हो पा रही है। महामंदी की लम्बी अवधि, इसके द्वारा उत्पन्न विकट समस्याओं जैसे अभावी मांग, मुद्रा अवस्फीति, बेरोजगारी आदि ने अर्थव्यवस्थाओं को बेहाल बना दिया। इन समस्याओं का समाधान करने में व्यष्टि आर्थिक सिद्धान्तों के हाथ खड़े हो गए। अर्थात् व्यष्टि सिद्धान्तों से इन समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा था।

इसी संदर्भ मे जे. एम. कीन्स ने General Theory of Income & Employment, Money and Interest लिखी। इस पुस्तक ने महामंदी की समस्याओं से छुटकारा पाने की नई राह दिखाई। इस नई राह को समष्टि अर्थशास्त्र कहते हैं। इस सिद्धान्त में सुझाए गये सिद्धान्तों के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं में बेकार पड़े, साधनों का सदोपयोग बढ़ा, जिससे उत्पादन, आय एवं रोजगार स्तर में सुधार संभव हो पाया। अतः समष्टि स्तर की समस्याओं जैसे आय का स्तर बढ़ाने, बेरोजगारी दूर करने, अवस्फीति या स्फीति आदि को ठीक करने के लिए समष्टि दृष्टिकोण आवश्यक है।

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प्रश्न 5.
समष्टि अर्थशास्त्र के क्षेत्रों का संक्षिप्त ब्योरा दीजिए।
उत्तर:
समष्टि अर्थशास्त्र में निम्नांकित विषयों का अध्ययन किया जाता है –

  1. राष्ट्रीय आय का सिद्धान्त-इस शाखा में राष्ट्रीय आय की विभिन्न अवधारणाओं, संघटकों माप की विधियों तथा सामाजिक लेखांकनों का अध्ययन किया जाता है।
  2. मुद्रा का सिद्धान्त-मुद्रा की मांग व पूर्ति रोजगार के स्तर को प्रभावित करती है। मुद्रा के कार्य, प्रकर तथा मुद्रा सिद्धान्तों का अध्ययन समष्टि स्तर पर किया जाता है।
  3. सामान्य कीमत सिद्धान्त-मुद्रा स्फीति, मुद्रा, अवस्फिति, इनके उत्पन्न होने के कारणों एवं इन्हें ठीक करने के उपायों का अध्ययन एवं विश्लेषण अर्थशास्त्र में किया जाता है।
  4. आर्थिक विकास का सिद्धान्त-आर्थिक विकास/प्रति व्यक्ति आय में होने वाले परिवर्तनों एवं इनकी समस्याओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र में किया जाता है। सरकार की राजस्व नीति, एवं मौद्रिक नीतियों का अध्ययन समष्टि शाखा में किया जाता है।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सिद्धान्त-विभिन्न देशों के बीच आयात-निर्यात की मात्रा, दिशा के साथ विभिन्न देशों के दूसरे आर्थिक लेन-देनों का विश्लेषण भी इस शाखा में किया जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पूर्ण रोजगार वह स्थिति होती है जिसमें सभी इच्छुक व्यक्तियों को आसानी से कार्य मिल जाता है –
(A) बाजार मजदूरी दर पर
(B) स्थिर मजदूरी दर पर
(C) बाजार से कम मजदूरी दर पर
(D) बाजार से अधिक मजदूरी दर पर
उत्तर:
(A) बाजार मजदूरी दर पर

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 2.
सन्तुलन रोजगारी स्थिति वह होती है जिसमें –
(A) सामूहिक मांग व सामूहिक पूर्ति समान होती है
(B) सामूहिक मांग, सामूहिक पूर्ति से ज्यादा होती है
(C) सामूहिक मांग, सामूहिक पूर्ति से कम होती है
(D) सामूहिक मांग शून्य होती है
उत्तर:
(A) सामूहिक मांग व सामूहिक पूर्ति समान होती है

प्रश्न 3.
उपभोग प्रवृत्ति जिस परिवर्तन के बारे में बताती है वह है –
(A) आय के कारण बचत में परिवर्तन
(B) आय के कारण निवेश में परिवर्तन
(C) आय के कारण ब्याज दर में परिवर्तन
(D) आय के कारण उपभोग में परिवर्तन
उत्तर:
(D) आय के कारण उपभोग में परिवर्तन

प्रश्न 4.
वर्ष 1929 से पूर्व अर्थशास्त्र जिस शाखा का अध्ययन किया जाता था वह है –
(A) समष्टि अर्थशास्त्र
(B) व्यष्टि अर्थशास्त्र
(C) A तथा B दोनों
(D) बीजगणित व समष्टि अर्थशास्त्र
उत्तर:
(B) व्यष्टि अर्थशास्त्र

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 5.
Teh General Theory of Income & Employment, Money and Interest लिखा था –
(A) आल्फ्रेड मार्शल
(B) जे. एस. मिल
(C) डेविड रिकार्डो
(D) जे. एम. कीन्स
उत्तर:
(D) जे. एम. कीन्स

प्रश्न 6.
Teh General Theory of Income & Employment,Money and Interest प्रकाश में आयी –
(A) वर्ष 1929
(B) वर्ष 1729
(C) वर्ष 1936
(D) वर्ष 1991
उत्तर:
(C) वर्ष 1936

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 7.
समष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम है –
(A) आय सिद्धान्त
(B) कीमत सिद्धान्त
(C) उपभोक्ता सिद्धान्त
(D) उत्पादक सिद्धान्त
उत्तर:
(A) आय सिद्धान्त

प्रश्न 8.
व्यष्टि अर्थशास्त्र का वैकल्पिक नाम है –
(A) आय सिद्धान्त
(B) कीमत सिद्धांत
(C) उपभोक्ता सिद्धान्त
(D) उत्पादक सिद्धान्त
उत्तर:
(B) कीमत सिद्धांत

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 1 समष्टि अर्थशास्त्र का परिचय

प्रश्न 9.
बचत प्रवृत्ति जिस परिवर्तन के बारे में बताती है वह है –
(A) आय के कारण बचत में परिवर्तन
(B) आय के कारण उपभोग में परिवर्तन
(C) आय के कारण निवेश में परिवर्तन
(D) आय के कारण ब्याज परिवर्तन
उत्तर:
(A) आय के कारण बचत में परिवर्तन

प्रश्न 10.
आर्थिक महामंदीकाल की अवधि थी –
(A) 1939-1942
(B) 1857-1860
(C) 1929-1932
(D) 1947-1950
उत्तर:
(C) 1929-1932

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

Bihar Board Class 8 Social Science Solutions Geography Hamari Duniya Bhag 3 Chapter 4 परिवहन Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

Bihar Board Class 8 Social Science परिवहन Text Book Questions and Answers

अभ्यास-प्रश्न

I. बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में कौन परिवहन साधन सबसे अधिक उपयोग में आता है ?
(क) वायु परिवहन
(ख) जल परिवहन
(ग) सड़क परिवहन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ग) सड़क परिवहन

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

प्रश्न 2.
स्वर्णिम चतुर्भुज योजना किसके अन्तर्गत आता है ?
(क) वायु परिवहन
(ख) सड़क परिवहन
(ग) जल परिवहन
(घ) उपर्युक्त सभी में
उत्तर-
(ख) सड़क परिवहन

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय राजमार्ग की देख-रेख कौन-सा विभाग करता है?
(क) लोक निर्माण विभाग
(ख) केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग
(ग) राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग

प्रश्न 4.
सीमा सड़क संगठन क्या है ?
(क) सीमावर्ती सड़कों की देख-रेख करने वाली संस्था
(ख) सीमा पर लोगों की देख-रेख करने वाली संस्था
(ग) सीमा के पार स्थित सड़कों की देखभाल करने वाली संस्था
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) सीमा पर लोगों की देख-रेख करने वाली संस्था

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

प्रश्न 5.
इंडियन एयरलाइंस को अब किस नाम से जाना जाता है ?
(क) भारतीय
(ख) इंडियन
(ग) आर्यावर्त
(घ) भारतीय एयरलाइंस
उत्तर-
(घ) भारतीय एयरलाइंस

II. खाली स्थानों को उपयुक्त शब्दों से भरें

  1. भारत में वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण …….. में किया गया ।
  2. मार्मगाओ पत्तन …………. राज्य में है।
  3. पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय ………. है।
  4. सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग सं० …………. है।
  5. चेन्नई एक …………. पत्तन है।
  6. सदिया से घुबरी जल परिवहन मार्ग ……. नदी में है।

उत्तर-

  1. 1953
  2. गोवा
  3. हाजीपुर
  4. 7 (2369 किमी लम्बा)
  5. प्राचीन कृत्रिम
  6. ब्रह्मपुत्र ।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें (अधिकतम 50 शब्दों में)

प्रश्न 1.
स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग क्या है?
उत्तर-
स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग सड़क है। दिल्ली-कोलकाता मुंबई-चेन्नई को आपस में 6 लेन वाली सड़कों से जोड़ने वाला यह मार्ग देश में द्रुतगति से सामान को ढोने और आने-जाने की सविधा प्रदान करता है।

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प्रश्न 2.
देश में वाय परिवहन की स्थिति का वर्णन करें। ।
उत्तर-
हवाई जहाज आसमान में उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक की दूरी तय करती है इसलिए इन्हें हवाई साधन कहते हैं। पहले वायु परिवहन विशिष्ट लोगों के ही हाथ में था लेकिन 1953 में सरकार ने वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण कर दिया। शुरुआत में एयर इंडिया की हवाई यात्राएँ देश से विदेशों तक जुड़ी थीं और इंडियन एयरलाइन्स (इंडियन) घरेलू एवं पड़ोसी देशों से जुड़ी हुई विमान सेवा थी। लेकिन आजकल हवाई सेवाएँ निजी कम्पनियों द्वारा भी चलाई जा रही हैं जो घरेलू और पड़ोसी देशों के लिए भी उपलब्ध है।

प्रश्न 3.
भारत में पहली रेलगाड़ी कब और कहाँ चली थी? नक्शे पर भी दर्शाइए।
उत्तर-
भारत में पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल, 1853 को मुम्बई से थाणे चली थी।

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन 1
प्रश्न 4.
पाइप लाइन परिवहन क्या है ? उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
पाइप लाइन परिवहन जमीन के अंदर बिछाई गई पाईप लाइनें हैं, जिनकी मदद से पेट्रोलियम पदार्थ, जल, गैस आदि एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाई जाती है। जैसे-बिहार के बरौनी, उत्तर प्रदेश के मथुरा, हरियाणा के पानीपत में स्थापित तेलशोधक कारखानों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति ऐसे ही पाइप लाइनों के जरिये होती है।

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

प्रश्न 5.
देश के तीन राष्ट्रीय आंतरिक जल परिवहन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
भारत सरकार ने पश्चिम बंगाल के हल्दिया से इलाहाबाद तक गंगा नदी में, सदिया से घुबरी ब्रह्मपुत्र नदी में, दक्षिण भारत में केरल के तटीय नहर कोट्टापुरम् से कोल्लम को राष्ट्रीय आंतरिक जलमार्ग घोषित किया गया है।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें । (अधिकतम 200 शब्दों में)

प्रश्न 1.
परिवहन एवं यातायात के साधन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। क्यों? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
“एक स्थान से दूसरे स्थान तक व्यक्तियों या वस्तुओं को. पहुँचाना-लाना परिवहन कहलाता है।” यह सड़क मार्ग, रेल मार्ग, हवाई मार्ग, जल मार्ग से होता है। यह विभिन्न प्रकार के वाहनों से संभव हो पाता है। रेल यात्रा समाप्त करके स्टेशन से बाहर निकलने पर हम पाते हैं कि गंतव्य तक पहुँचने के लिए रिक्शा, ऑटोरिक्शा, टमटम, कारें, जीप, बस इत्यादि मिलती हैं। ये सभी वाहन हमें या सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में मदद करती हैं। ये सभी भूमि पर चलते हैं इसलिए स्थलीय परिवहन के साधन हैं।

वहीं दूसरी ओर हवाई जहाज आसमान में उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक की दूरी तय करती हैं इसलिए इन्हें हवाई साधन कहते हैं। नावें, स्टीमर, जहाजें पानी में चलकर गंतव्य तक पहुँचती हैं। इसलिए उन्हें जल परिवहन के साधन कहते हैं। बिना इन साधनों के आवागमन संभव नहीं है। इसलिए परिवहन एवं यातायात के साधन राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं।

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

प्रश्न 2.
देश में परिवहन के कौन-कौन से साधन विकसित हैं ? प्रत्येक का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-
देश में परिवहन के चार साधन विकसित हैं

  1. सड़क परिवहन
  2. रेल परिवहन
  3. पाइप लाइन
  4. वायु परिवहन
  5. जल परिवहन

(i) सड़क परिवहन सड़कें परिवहन का एक मुख्य साधन है। हम स्कूल आने, प्रखंड जाने, जिला मुख्यालय जाने में सड़क का उपयोग करते हैं। अपने देश की सड़कों को उनकी उपयोगिता और क्षमता के आधार पर विभिन्न प्रकारों में बाँटा गया है। इसी आधार पर उनकी देखरेख की जाती है।

(ii) रेल परिवहन-रेल परिवहन यात्रियों एवं माल ढुलाई का प्रमुख साधन है। यह देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठान है जिसमें लगभग 16 लाख कर्मचारी काम करते हैं। देश में रेलवे को प्रशासनिक सुविधा के लिए 16 मंडलों में बाँटा गया है जिस पर रेलवे बोर्ड नियंत्रण रखता है। बिहार के हाजीपुर में पूर्व मध्य रेलवे का मंडल कार्यालय अवस्थित है। रेलवे समय-समय पर देश के अन्दर अनेक तीर्थ स्थानों को जोड़ने वाली ट्रेनें भी चलाती हैं।

(iii) पाइप लाइन हममें से कोई भी इस परिवहन का उपयोग नहीं करता । यह जमीन के अन्दर बिछाई गई पाईप लाइनें होती हैं, जिनकी मदद से पेट्रोलियम पदार्थ, जल, गैस आदि एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाई जाती है। इन पाइप लाइनों को बिछाने में प्रारंभिक खर्च तो बहत ज्यादा आता है लेकिन इसके रख-रखाव में कम दिक्कतें होती हैं। इस परिवहन में बाधाएँ भी कम आती हैं और समय भी कम लगता है, साथ ही परिवहन में सामग्री का नुकसान भी कम होता है। इसलिए धीरे-धीरे परिवहन का यह मार्ग सस्ता होता जाता है।

(iv) वायु परिवहन हेलीकॉप्टर, जेट ये सभी वायु परिवहन के अन्तर्गत आते हैं। परिवहन के साधनों में ये सबसे द्रुतगामी के साधन हैं। यद्यपि यह महँगा है, फिर भी दुर्गम क्षेत्रों में भी आसानी से और आरामदायक ढंग से पहँचा जा सकता है। पहले वाय परिवहन विशिष्ट लोगों के ही हाथ में था, लेकिन 1953 में सरकार ने वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण कर दिया ।

(v) जल परिवहन -आंतरिक जल-परिवहन देश के अन्दर नदियों के जल में जहाजों का परिचालन किया जाता है और यात्री व माल की ढुलाई की जाती है। देश के अन्दर लगभग 15 हजार किलोमीटर नौसंचालन जलमार्ग है।

Bihar Board Class 8 Social Science Geography Solutions Chapter 4 परिवहन

प्रश्न 3.
भारत में जल परिवहन की स्थिति का विवरण दीजिए।
उत्तर-
जल परिवहन दो प्रकार के होते हैं –

पहला आंतरिक जल परिवहन और दूसरा समुद्री जल परिवहन । आंतरिक जल-परिवहन देश के अन्दर नदियों के जल में जहाजों का परिचालन किया जाता है और यात्री व माल की ढुलाई की जाती है। देश के अन्दर लगभग 15 हजार किलोमीटर नौसंचालन जलमार्ग हैं। भारत सरकार ने पश्चिम बंगाल के हल्दिया से इलाहाबाद तक गंगा नदी में, सदिया से घुबरी ब्रह्मपुत्र नदी में, दक्षिण भारत में केरल के तटीय नहर कोट्टापरम से कोल्लम को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है। गोदावरी, कृष्णा, सुंदरवन आदि महत्त्वपूर्ण आंतरिक जलमार्ग हैं। मैंने पटना में भी गंगा नदी में मालवाहक जहाज देखा है । पूर्वी पटना में गंगा तट पर राजेन्द्र प्रसाद अन्तर्देशीय जलपरिवहन टर्मिनल है।

समुद्री जल परिवहन भारत की लगभग साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबी समुद्री तट बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के साथ लगी हुई है । इन समुद्र तटों पर 12 प्रमुख बड़े बंदरगाह और कई छोटे और मंझोले पत्तन हैं जिनसे अंतर्राष्ट्रीय परिवहन सुलभ होता है।

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Bihar Board 9th English Objective Questions and Answers

BSEB Bihar Board 10th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 1.
‘Scaling Great Height’ is an important essay based on the life of a mountainer.
(a) Bichendri Pal
(b) Santosh Yadav
(c) Santosh Singh
(d) None of these
Answer:
(b) Santosh Yadav

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 2.
Santosh Yadav was the daughter of a rich.
(a) doctor
(b) musician
(c) director
(d) parents
Answer:
(d) parents

Question 3.
Santosh Yadav decided to Fight against old
(a) Custom
(b) beleave
(c) scolt
(d) faith
Answer:
(a) Custom

Question 4.
At the age of sixteen, Santosh refused her father’s proposal to get early
(a) education
(b) be businessness
(c) marriage
(d) none of these
Answer:
(c) marriage

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 5.
Santosh Yadav, was interested to get higher
(a) reputation
(b) education
(c) money
(d) ranks
Answer:
(b) education

Question 6.
Santosh Yadav enrolled in a college at Uttar kashi’s Nehru institute of
(a) moutaineering
(b) engineering
(c) medical
(d) foot bowler
Answer:
(a) moutaineering

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 7.
Santosh Yadav got the honour of Padmashri by Indian
(a) Abmassi
(b) Army
(c) Association
(d) Government
Answer:
(d) Government

Question 8.
Santosh enrolled in a college at institute of mountaineering
(a) Uttar Kashi’s Nehru
(b) BHU
(c) JNU
(d) DU
Answer:
(a) Uttar Kashi’s Nehru

Question 9.
Santosh got the honour of………by the Indian Government.
(a) Padmabushan
(b) Padmashri
(c) Bharatratna
(d) none of these
Answer:
(b) Padmashri

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 10.
At the age of……….years Santosh scaled Mt. Everest.
(a) 16
(b) 18
(c) 20
(d) 22
Answer:
(c) 20

Question 11.
Santosh was in Maharaui college……….
(a) Delhi
(b) Patna
(c) Allahabad
(d) Jaipur
Answer:
(d) Jaipur

Question 12.
Kasturba Hostel faced the………Hill.
(a) Chapura
(b) Utti
(c) Arawali
(d) Dehradoon
Answer:
(c) Arawali

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 13.
Santosh used to watch …… going up the hill from hostel.
(a) Villagers
(b) Fields
(c) Players
(d) none of these
Answer:
(a) Villagers

Question 14.
Santosh left home and got herself enrolled in a school in……….
(a) Patna
(b) Delhi
(c) Nepal
(d) noneof these
Answer:
(b) Delhi

Question 15.
Santosh changes traditional……. of her family.
(a) culture
(b) religion
(c) custom
(d) none of these
Answer:
(c) custom

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 16.
Kasturba Hostel faced the.
(a) high mountain
(b) town view
(c) lake view
(d) Aravalli hills
Answer:
(d) Aravalli hills

Question 17.
Santosh lived in the
(a) Kasturba Hostel
(b) Jaipur hostel
(c) Girl hostel
(d) Town hostel
Answer:
(a) Kasturba Hostel

Question 18.
Santosh yadav joined
(a) Jaipur college
(b) Maharaja college
(c) Maharani college jaipur
(d) College of Jaipur
Answer:
(c) Maharani college jaipur

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 19.
Santosh yadav wanted to study a
(a) more and more
(b) bit more
(c) no more
(d) little
Answer:
(b) bit more

Question 20.
Santosh’s father was rich enough to send her in best school but he was sent in line with existing.
(a) custom
(b) old school
(c) town school
(d) nearby town school
Answer:
(a) custom

Question 21.
Santosh’s parents affluents.
(a) Farmers
(b) landlord
(c) land owners
(d) businessmen
Answer:
(c) land owners

Question 22.
Santosh went on an expedition
(a) every year
(b) every month
(c) every week
(d) none of these
Answer:
(a) every year

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 23.
Santosh developed a remarkable resistance to cold and the
(a) warm
(b) cool
(c) hot
(d) attitude
Answer:
(d) attitude

Question 24.
Santosh yadav joined the institute of
(a) music
(b) mountaineering
(c) navy
(d) nursing
Answer:
(b) mountaineering

Question 25.
Santosh yadav used to watch villagers from her room, going up the hill and suddenly
(a) falling
(b) coming back
(c) rolling
(d) vanishing
Answer:
(d) vanishing

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Choose the suitable word from options given.

Question 26.
The……….of Santosh, hard work and sincerity came in 1992.
(a) scaled
(b) culmination
(c) invited
(d) second
Answer:
(b) culmination

Question 27.
Santosh Yadav………..Mt. everest, the coming the youngest woman in the world to achieve the Goal.
(a) invited
(b) second
(c) scaled
(d) twice
Answer:
(c) scaled

Question 28.
Santosh found herself a member of an Indo-Nepalese women’s expedition that…………her to join.
(a) invited
(b) second
(c) twice
(d) culmination
Answer:
(a) invited

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 29.
Santosh then scaled everest a………..time
(a) twice
(b) invited
(c) second
(d) scaled
Ans—
(c) second

Question 30.
Santosh was the only woman to have scaled everest……
(a) culmination
(b) twice
(c) invited
(d) aloft
Answer:
(b) twice

Question 31.
Santosh was honoured with the……….
(a) Padambhushan
(b) Bharatratna
(c) Padarnshri
(d) none of these
Answer:
(c) Padarnshri

Question 32.
Santosh felt on the top of the world and she told that it
took some time for the………moment to sinkin.
(a) invited
(b) enormity
(c) second
(d) twice
Answer:
(b) enormity

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 33.
Santosh unfurled the Indian tricolour and held it……….
(a) aloft
(b) enormity
(c) high
(d) invited
Answer:
(a) aloft

Question 34.
Santosh’s feeling was…………
(a) enormity
(b) scaled
(c) indescribable
(d) second
Answer:
(c) indescribable

Question 35.
Santosh collected and brought down……..kilograms of garbage from Himalayas.
(a) 100
(b) 200
(e) 300
(d) 500
Answer:
(d) 500

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Choose the saine meaning from the options;

Question 36.
Innumberablc
(a) False belief
(b) Countless
(c) difference
(d) criticized
Answer:
(b) Countless

Question 37.
Castigated
(a) countless
(b) difference
(c) criticized
(d) deliverance
Answer:
(c) criticized

Question 38.
Salvation
(a) deliverance
(b) countless
(e) difference
(d) false belief
Answer:
(a) deliverance

Bihar Board 9th English Reader Objective Answers Chapter 2 Scaling Great Heights

Question 39.
Distinction
(a) deliverance
(b) difference
(c) false belief
(d) countless
Answer:
(b) difference

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान कौशलों का विकास Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
एक सेवार्थी-परामर्शदाता संबंधों के नैतिक मानदंड क्या है?
उत्तर:

  1. भौतिक/व्यावसायिक आचरण-संहिता, मानक तथा दिशा-निर्देशों का ज्ञान: संविधियों, नियमों एवं अधिनियमों की जानकारी के साथ मनोविज्ञान के लिए जरूरी कानूनों की जानकारी भी आवश्यक है।
  2. विभिन्न नैदानिक स्थितियों में नैतिक एवं विधिक मुद्दों को पहचानना और उनका विश्लेषण करना।
  3. नैदानिक स्थितियों में अपनी अभिवृत्तियों एवं व्यवहार को नैतिक विमाओं को पहचानना और समझना।
  4. जब भी नैतिक मुद्दों का सामना हो तब उपयुक्त सूचनाओं एवं।
  5. नैतिक मुद्दों से संबंधित उपयुक्त व्यावसायिक आग्रहिता।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

प्रश्न 2.
साक्षात्कार कौशल को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
एक साक्षात्कार दो या अधिक व्यक्तियों के बीच एक उद्देश्यपूर्ण वार्तालाप है जिसमें प्रश्न-उत्तर प्रारूप या फॉमेंट का अनुसरण किया जाता है। साक्षात्कार अन्य प्रकार के वार्तालाप की तुलना में अधिक औपचारिक होता है क्योंकि इसका एक पूर्वनिर्धारित उद्देश्य होता है तथा उसकी संरचना केंद्रित होती है। अनेक प्रकार के साक्षात्कार होते हैं। उनमें से एक रोजगार साक्षात्कार है जिसका अनुभव हममें से अधिकांश लोग करेंगे। अन्य प्रारूपों में सूचना संग्रह संबंधी साक्षात्कार, परामर्शी साक्षात्कार पूछताछ संबंधी साक्षात्कार, रेडियो-टेलीविजन के साक्षात्कार तथा शोध साक्षात्कार आते हैं।

प्रश्न 3.
संप्रेषण को परिभाषित कीजिए। संप्रेषण प्रक्रिया का कौन-सा घटक सबसे महत्त्वपूर्ण है? अपने उत्तर को प्रासंगिक उदाहरणों से पुष्ट कीजिए।
उत्तर:
संप्रेषण एक सचेतन या अचेतन, साभिप्राय या अनभिप्रेत प्रक्रिया है जिसमें भावनाओं तथा विचारों को, वाचिक या अवाचिक संदेश के रूप में भेजा, ग्रहण किया और समझा जाता है। श्रवण संप्रेषण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है। श्रवण एक महत्त्वपूर्ण कौशल है जिसका उपयोग हम प्रतिदिन करते हैं। शैक्षिक सफलता, नौकरी की उपलब्धि एवं व्यक्तिगत प्रसन्नता काफी हर तक हमारे प्रभावी ढंग से सुनने की योग्यता पर निर्भर करती है। प्रथमतया, श्रवण हमें एक निष्क्रिय व्यवहार लग सकता है क्योंकि इसमें चुप्पी होती है लेकिन निष्क्रियता की यह छवि सच्चाई से दूर है। श्रवण में एक प्रकार की ध्यान सक्रियता होती है। सुनने वाले धैर्यवान तथा अनिर्णायाताक होने के साथ विश्लेषण करते रहना पड़ता है ताकि सही अनुक्रिया दी जा सके।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 9 मनोविज्ञान कौशलों का विकास

प्रश्न 4.
श्रवण में संस्कृति की भूमिका को समझाइए।
उत्तर:
श्रवण में संस्कृति की भूमिका-मस्तिष्क की तरह और हम जिस संस्कृति में पलते बढ़ते हैं वह भी हमारी श्रवण एवं सीखने की योग्यताओं को प्रभावित करती है। एशियाई संस्कृति, जैसे कि भारत में जब बड़े या वरिष्ठ लोग संदेश देते हैं तब उसकी शांत संप्रेषक की तरह ग्रहण किया जाता है। कुछ संस्कृतियाँ में ध्यान को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाता है। उदाहरण के लिए, बौद्ध दर्शन में एक संप्रत्यय होता है जिसको ‘मनोयोग’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि आप जो भी करें, उस पर अपना संपूर्ण ध्यान केंद्रित रखें। बाल्यावस्था में ‘मनोयोग’ का प्रशिक्षण देने से ध्यान केंद्रित करने की योग्यता का विस्तार हो जाता है और इससे श्रवण की क्षमता बेहतर हो जाती है। व्यक्ति में इससे सहानुभूति श्रवण की योग्यता भी बढ़ती है। फिर भी अनेक संस्कृतियों में श्रवण कौशलों में बढ़ोत्तरी से जुड़े संप्रत्ययों को अभाव है।

प्रश्न 5.
परामर्शी साक्षात्कार का विशिष्ट प्रारूप क्या है?
उत्तर:
परामर्शी साक्षात्कार के विशिष्ट प्रारूप इसे प्रकार से होते हैं:

1. साक्षात्कार का प्रारंभ:
इसका उद्देश्य यह होता है कि साक्षात्कार देनेवाला आराम की स्थिति में आ जाए। सामान्यतः साक्षात्कारकर्ता बातचीत की शुरुआत करता है और प्रारंभिक समय में ज्यादा बात करता है।

2. साक्षात्कार का मुख्य भाग:
यह इस प्रक्रिया का केन्द्र है। इस अवस्था में साक्षात्कारकर्ता सूचना और प्रदत्त प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रश्न पूछने का प्रयास करता है जिसके लिए साक्षात्कार का आयोजन किया जाता है।

3. प्रश्नों का अनुक्रम:
साक्षात्कारकर्ता प्रश्नों की सूची तैयार करता है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों या श्रेणियों से जो वह जानना चाहता है, प्रश्न होते हैं।

4. साक्षात्कार का समापन:
साक्षात्कार का समापन करते समय साक्षात्करकर्ता ने जो संग्रह किया है उसे उसाक सारांश बताना चाहिए। साक्षात्कार का अंत आगे के लिए जानेवाले कदम पर चर्चा के साथ होना चाहिए। जब साक्षात्कार समाप्त हो रहा हो तब साक्षात्कारकर्ता को साक्षात्कार देनेवाले को भी प्रश्न पूछने का अवसर देना चाहिए या टिप्पणी करने का मौका देना चाहिए।

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प्रश्न 6.
परामर्श से आप क्या समझते हैं? एक प्रभावी परामर्शदाता की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साक्षात्कार की योजना, सेवार्थी एवं परामर्शदाता के व्यवहार का विश्लेषण तथा सेवार्थी के ऊपर पड़नेवाले विकासात्मक प्रभाव के निर्धारण के लिए परामर्श एक प्रणाली प्रस्तुत करता है। एक परामर्शदाता इस बात में अभिरुचि रखता है कि वह सेवार्थी की समस्याओं को उसके दृष्टिकोण और भावनाओं को ध्यान में रखकर समझ सके।

इसमें समस्या से जुड़े वास्तविक तथ्य या वस्तुनिष्ठ तथ्य कम महत्त्वपूर्ण होते हैं और यह अधिक महत्त्वपूर्ण होता है कि सेवार्थी द्वारा स्वीकार की गई भावनाएँ कैसी हैं, उनको लेकर काम किया जाए। इसमें व्यक्ति तथा वह समस्या को किस प्रकार परिभाषित करता है, इसको ध्यान में रखा जाता है। परामर्श में सहायतापरक संबंध होता है जिसमें सम्मिलित होता है वह जो मदद चाह रहा है, मदद से रहा है, देने का इच्छुक है, जो मदद देने में सक्षम हो या प्रशिक्षित हो और उस स्थिति में हो जहाँ मदद लेना और देना सहज हो।

एक प्रभावी परामर्शदाता की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

1. प्रामाणिकता:
हमारे अपने बारे में प्रत्यक्ष या अपनी छवी हमारे “मैं” को बनाती है। यह स्व प्रत्यक्षित ‘मैं’ हमारे विचारों, शब्दों क्रियाओं, पोशाक और जीवन शैली के माध्यम से अभिव्यक्ति होता है। यह सभी हमारे ‘मैं’ को दूसरों तक संप्रेषित करते हैं। जो हमारे निकट संपर्क में आते हैं वे अपने लिए हमारे बारे में अलग छवि या धारण बनाते हैं और वे कभी-कभी इस छवि को हम तक पहुँचाते भी हैं। उदाहरण के लिए मित्र हमें बताते हैं कि वे हमारे बारे में क्या पसंद या नापसंद करते हैं।

हमारे माता-पिता या अध्यापक हमारी प्रशंसा या आलोचना करते हैं। हम जिनका आप सम्मान करते हैं वे भी आपका मूल्यांकन करते हैं। ये सामूहिक निर्णय उन लोगों के द्वारा जिनका आप सम्मान करते हैं, इनको ‘दूसरे महत्त्वपूर्ण’ भी कहा जा सकता है, एक ‘हम’ का विकास करते हैं। इस ‘हम’ में वह प्रत्यक्षण सम्मिलित है जो दूसरे हमारे बारे में बताते हैं। यह प्रत्यक्षण हमारे स्व-प्रत्यक्षित-‘मैं’ जैसा भी हो सकता है या उससे भिन्न हो सकता है। जहाँ तक हम अपने स्वयं के बारे में अपने प्रत्यक्षण तथा दूसरों के अपने बारे में प्रत्यक्षण के प्रति जितने जानकार एवं सजग है, इससे हमारी आत्म-जागरुकता का पता चलता है। प्रामाणिकता का अर्थ है कि हमारे व्यवहार की अभिव्यक्ति आपको मूल्यों, भावनाओं एवं आंतरिक आत्मबिंब या आत्म-छवि (Self-image) के साथ संगत होती है।

2. दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर:
एक उपबोध्य (Counselee) परामर्शदाता संबंध में एक अचछा संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करता है। यह इस स्वीकृति को परावर्तित करता है कि दोनों की भावनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। जब हम नए संबंध बनाते हैं तब हम एक अनिश्चितता की भावना एवं दुश्चिता का अनुभव करते हैं। इन भावनाओं को कम किया जा सकता है अगर परामर्शदाता सेवार्थी जैसा महसूस कर रहा हो बारे में एक सकारात्मक आदर का भाव प्रदर्शित करता है। दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर का भाव दिखाने के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखना चाहिए।

  • जब कोई बोल रहा हो तब ‘मैं’ संदेश का उपयोग बनाए न कि ‘तुम’ संदेश की। इसका एक उदाहरण होगा, ‘मैं समझता हूँ’ न कि “आपको/तुमको नहीं चाहिए।”
  • दूसरे व्यक्ति को अनुक्रिया तभी देना चाहिए तब व्यक्ति उसकी कही हुई बात को समझ लें।
  • दूसरे व्यक्ति को यह स्वतंत्रता देनी चाहिए ताकि वह जैसा महसूस करता है वैसा बता सकें। उसको टोकना या बाधित नहीं करना चाहिए।
  • यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि दूसरा यह जानता है कि व्यक्ति क्या सोच रहा है। अपने को निर्देश आधार के अनुसार ही व्यक्त करना चाहिए अर्थात् उस संदर्भ के अनुसार जिसमें बातचीत चल रही है।
  • स्वयं या दूसरों के ऊपर कोई लेबल लगाना चाहिए (उदाहरणार्थ, “तुम एक अंतर्मुखी व्यक्ति हो” इत्यादि)

3. तदनुभूति:
यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कौशल है जो परामर्शदाता के पास होना चाहिए। तदनुभूति एक परामर्शदाता की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह सेवार्थी की भावनाओं को उसके ही परिप्रेक्ष्य से समझता है। यह दूसरे के जूते में पैर डालने जैसा है, जिसके द्वारा व्यक्ति दूसरों की तकलीफ एवं पीड़ा को महसूस करके समझ सकते हैं। सहानुभूति एवं तनुभूति में अंतर हाता लगता है कि उसकी दया की किसी को जरूरत है।

4. पुनर्वाक्यविन्यास:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी को कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों को उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।

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प्रश्न 7.
परामर्श के मिथकों का खंडन किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
परामर्श के मिथकों का खंडन –

  1. परामर्श का तात्पर्य केवल सूचना देना नहीं होता है।
  2. परमर्श केवल सलाह देना नहीं होता है।
  3. किसी नौकरी या पाठ्यक्रम में चयन या स्थान परामर्श देना नहीं होता है।
  4. परामर्श. और साक्षात्कार समान नहीं है यद्यपि परामर्श में साक्षात्कार प्रक्रिया का उपयोग किया जा सकता है।
  5. परामर्श के अंतर्गत अभिवृत्तियों, विश्वासों और व्यवहारों का अनुनय करके, भर्त्सना करके, धमकी देकर या विवश करके प्रभावित करना नहीं आता है।

प्रश्न 8.
प्रभावी संबंधों को किस प्रकार विकसित किया जा सकता है?
उत्तर:
प्रभावी संबंधों को विकसित करना-अधिकतर लोग जो परामर्शदाता से मदद लेते हैं, उनके प्रभावी या संतोषजनक संबंध बेहद कम होते हैं या उनका पूरी तरह अभाव होता है। चूँकि व्यवहार में परिवर्तन अक्सर सामाजिक अवलंब या समर्थन के एक नेटवर्क से आता है इसके लिए जरूरी है कि सेवार्थी दूसरे व्यक्तियों से अच्छा संबंध विकसित करने पर ध्यान दें। परामर्श संबंध वह माध्यम है जिससे इसका प्रारंभ किया जा सकता है।

हम सभी की तरह परामर्शदाता भी पूर्ण नहीं होते हैं, लेकिन दूसरों की तुलना में स्वस्थ एवं सहायक संबंधों का विकास करने की विशेषताओं में प्रशिक्षण प्राप्त होते हैं। संक्षेप में, परामर्श में सेवार्थी के लिए एक वे अधिक परिणामों की अपेक्षा होती है, जो साथ ही घटित होते हैं। सेवार्थी में होनेवाले प्रभावी व्यवहार परिवर्तन बहुपक्षीय होते हैं। इसको इस रूप से देखा जा सकता है कि सेवार्थी अधिक जिम्मेदारी ले, नई अंतदृष्टि विकसित करे, विभिन्न प्रकार के व्यवहार करे तथा अधिक प्रभावी संबंध विकसित करने का प्रयास करे।

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प्रश्न 9.
अपने एक मित्र के व्यक्तिगत जीवन के एक ऐसे पक्ष की पहचान कीजिए जिसे वह बदलना चाहता है। अपने मित्र की सहायता करने के लिए मनोविज्ञान के एक विद्यार्थी के रूप में विचार करके उसकी समस्या के समाधान या निराकरण के लिए एक कार्यक्रम को प्रस्तावित कीजिए।
उत्तर:
मेरा मित्र धूम्रपान करता है। उसकी यह आदत काफी दिनों से है और पिछले कुछ दिनों में उसकी आदत काफी बढ़ गई है। धूम्रपान के कारण उसके व्यक्तिगत जीवन में कठिनाइयाँ सामने आने लगी हैं। प्रतिदिन पारिवारिक कलह से परेशान है। कार्यालय में ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पाता है। गहरे अवसाद के दौर से गुजर रहा है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि उसने धूमपान छोड़ने की कोशिश न की हो। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। मनोविज्ञान के छात्र होने के नाते मैं उसके लिए कुछ करना चाहूँगा। सबसे पहले मैं उसके इस नकारात्मक सोच कि धूम्रपान को वह नहीं छोड़ पाएगा। इसे सकारात्मक सोच में बदलूँगा।

उसमें आत्मविश्वास जगाने के बाद उसे किसी ऐसे चिकित्सक या केन्द्र में ले जाऊँगा, जहाँ इस प्रकार की आदतों को छुड़वाने का काम किया जाता हो। मैं इस संबंध में उसके परिवार वालों से भी बात करूँगा उनको भी आश्वस्त करूँगा और परामर्श दूंगा कि सब काम स्नेह, प्रेम और प्यार से संभव हो सकता है। इसमें सभी व्यक्ति की बराबर की भागीदारी होनी चाहिए। सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी। जब सब्र एक साथ इस काम में लगेंगे तो मेरे मित्र में आत्म-विश्वास जगेगा और दुगुने जोश से धूम्रपान को छोड़ने की कोशिश करेगा और अंत में उसे इसमें सफलता मिलेगी।

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान कौशलों का विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मनोविज्ञान में सेवार्थी किसे कहते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान में सेवार्थी वह व्यक्ति/संगठन है जो स्वयं ही अपनी किसी समस्या के समाधान में मनोवैज्ञानिक से मदद, निर्देश या हस्तक्षेप प्राप्त करना चाहता है।

प्रश्न 2.
संज्ञानात्मक कौशल क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक कौशल समस्या समाधान की योग्यता, आलोचनात्मक चिंतन और व्यवस्थित तर्कना, बौद्धिक जिज्ञासा तथा नम्यता है।

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प्रश्न 3.
भावनात्मक कौशल क्या है?
उत्तर:
सांवेगिक नियंत्रण एवं संतुलन, अंतर्वैयक्तिक द्वंद्व के प्रति सहनशीलता, अनिश्चितताओं और अस्पष्टताओं के प्रति सहनशीलता भावनात्मक कौशल है।

प्रश्न 4.
कौशल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कौशल पद को प्रवीणता, दक्षता या निपुणता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका अर्जन या विकास प्रशिक्षण अनुभव के द्वारा किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
परावर्ती कौशल क्या है?
उत्तर:
स्वयं की अभिप्रेरणाओं, अभिवृत्तियों एवं व्यवहारों को समझने तथा परीक्षण करने की योग्यता, अपने और दूसरों के व्यवहारों के प्रति संवेदनशीलता परिवर्ती कौशल है।

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प्रश्न 6.
अभिवृत्ति क्या है?
उत्तर:
दूसरों के प्रति सहायता की इच्छा, नए विचारों के प्रति खुलापन, ईमानदारी/अंखडता/मूल्यपरक नैतिक व्यवहार, व्यक्तिगत साइंस आदि अभिवृत्ति हैं।

प्रश्न 7.
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागम कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागम हैं –

  1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण और
  2. सहभागी प्रेक्षण

प्रश्न 8.
प्रकृतिवादी प्रेक्षण क्या है?
उत्तर:
प्रकृतिवादी प्रेक्षण एक प्राथमिक तरीका है जिससे हम सीखते हैं कि लोग भिन्न स्थितियों में कैसे व्यवहार करते हैं।

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प्रश्न 9.
सहभागी प्रेक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर:
सहभागी प्रेक्षण में प्रेक्षण की प्रक्रिया में एक सक्रिय सदस्य के रूप में संलग्न होता है। इसके लिए वह उस स्थिति में स्वयं भी सम्मिलित हो सकता है जहाँ प्रेक्षण करना है।

प्रश्न 10.
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ ने कौशलों के किन तीन समुच्चयों की संस्तुति की है?
उत्तर:
अमेरिकी मनोविज्ञान संघ ने कौशलों के निम्नलिखित तीन समुच्चयों की संस्तुति की है –

  1. व्यक्तिगत भिन्नताओं का मूल्यांकन
  2. व्यवहार परिष्करण कौशल
  3. परामर्श एवं निर्देशन कौशल

प्रश्न 11.
एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण किस स्तर पर करता है?
उत्तर:
एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है।

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प्रश्न 12.
व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर किस तरह करते हैं?
उत्तर:
वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशाला या क्षेत्र में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वे अपने प्रश्नों को उत्तर गणितीय संभाव्यताओं के आधार पर करते हैं। उसके बाद ही वे किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सिद्धांत या नियम पर पहुँचते हैं।

प्रश्न 13.
आधारभूत कौशल को कितनी श्रेणियों में बाँटा गया है?
उत्तर:
आधारभूत कौशल को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है –

  1. सामान्य कौशल
  2. प्रेक्षण कौशल
  3. विशिष्ट कौशल

प्रश्न 14.
अंतर्वैयक्तिक कौशल क्या है?
उत्तर:
सुनने की योग्यता एवं तंदनुभूति की क्षमता, दूसरों की संस्कृति के प्रति सम्मान एवं अभिरुचि की भावना, अनुभवों के मूल्यों, दृष्टिकोणों, लक्ष्यों एवं इच्छाओं तथा भय को समझने का खुलापन तथा प्रतिप्राप्ति को ग्रहण करने की सकारात्मक भावना इत्यादि अंतर्वैयक्तिक कौशल है।

प्रश्न 15.
अंतरावैयक्तिक संप्रेषण किसे कहते हैं?
उत्तर:
अंतरावैयक्तिक संप्रेषण का संबंध व्यक्ति की स्वयं से संवाद करने की क्रिया को कहते हैं। विचार-प्रक्रम, वैयक्तिक निर्णयन तथा स्वयं पर केन्द्रित विचार शामिल होते हैं।

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प्रश्न 16.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेक्षण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण का तात्पर्य उस संप्रेषण से है जो दो या दो से अधिक व्यक्तियों से संबंधित होता है, जो एक संप्रेषणपरक संबंध स्थापित करते हैं।

प्रश्न 17.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण के अंतर्गत क्या-क्या आते हैं?
उत्तर:
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण के अंतर्गत अनेक प्रकारों में मुखोन्मुख या मध्यस्थ आधारित वार्तालाप, साक्षात्कार एवं लघु समूह परिचर्चा आते हैं।

प्रश्न 18.
सार्वजनिक संप्रेषण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सार्वजनिक संप्रेषण में वक्ता अपनी बातों या संदेशों को श्रोताओं तक पहुँचाता है। यह प्रत्यक्ष, जैसे-कोई वक्ता मुखोन्मुख जनसभा में भाषण देता है या अप्रत्यक्ष, जैसे-जहाँ वक्ता रेडियो या टेलीविजन के माध्यम से बात करता है।

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प्रश्न 19.
चयनात्मक संप्रेषण से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब हम संप्रेषण करते हैं तब हमारा संप्रेषण चयनात्मक होता है। इसका अर्थ है, हमारे पास उपलब्ध शब्दों एवं व्यवहारों के एक विशाल संग्रह में से हम उन शब्दों एवं क्रियाओं को चुनते हैं जिसके बारे में हमारा भरोसा रहता है कि वे हमारे विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त हैं।

प्रश्न 20.
कूट संकेतन क्या है?
उत्तर:
कूट संकेतन में विचार लेना, उनको अर्थ देना और उनको संदेश के रूप में बदल देना आदि कार्य होते हैं।

प्रश्न 21.
प्रेक्षण के एक लाभ को लिखिए।
उत्तर:
प्रेक्षण का प्रमुख लाभ यह है कि यह प्राकृतिक या स्वाभाविक स्थिति में व्यवहार को देखने और अध्ययन करने का अवसर देता है।

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प्रश्न 22.
प्रेक्षण की एक कमी को लिखिए।
उत्तर:
प्रेक्षण की एक कमी यह है कि प्रेक्षण करने में अभिनति या प्रर्वाग्रह की भावना आ जाती है क्योंकि प्रेक्षक या प्रेक्षित की भावनाएँ इसको प्रभावित कर देती हैं।

प्रश्न 23.
एक संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक को अन्य कौशलों की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
एक संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक को भी शोध कौशलों के अलावा मूल्यांकन, सुगमीकरण, परामर्शन एवं व्यवहारपरक कौशलों की आवश्यकता होती है जिससे वे व्यक्ति, समूहों, टीमों और संगठनों के विकास की प्रक्रिया को समझ सकें या समझने में मदद कर सकें।

प्रश्न 24.
संप्रेषण प्रक्रिया से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संप्रेक्षण एक सचेतन या अचेतन, साभिप्राय या अनभिप्रेत प्रक्रिया है जिसमें भावनाओं तथा विचारों को वाचिक या अवाचिक संदेश के रूप में भेजा, ग्रहण किया और समझा जाता है।

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प्रश्न 25.
मनोयोग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
मनोयोग का अर्थ है कि व्यक्ति जो भी करे उस पर अपना संपूर्ण ध्यान केन्द्रित रखे।

प्रश्न 26.
बाल्यावस्था में मनोयोग करने के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
बाल्यावस्था में मनोयोग का प्रशिक्षण देने से ध्यान केंद्रित करने की योग्यता का विस्तार हो जाता है और इससे श्रवण की क्षमता बेहतर हो जाती है।

प्रश्न 27.
क्रोध का शरीर भाषा में संप्रेषण का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अगर सीधी मुद्रा में सीने पर हाथ बँधे हो, शरीर की मांसपेशियाँ तनी हो, जबड़ों को मांसपेशियाँ में जकड़न और आँखों की मांसपेशियों में संकुचन हो तो यह संभवतः क्रोध का संप्रेषण करता है।

प्रश्न 28.
संगति किसे कहते हैं?
उत्तर:
संप्रेक्षण में वर्तमान व्यवहार और अतीत के व्यवहार के बीच एकरूपता तथा वार्षिक एवं अवाचित व्यवहार के बीच सुमेल को संगति कहते हैं।

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प्रश्न 29.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उपयोग कहाँ किया जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षण का उपयोग मुख्यतः सामान्य बुद्धि, व्यक्तित्व, विभेदक अभिक्षकताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, व्यावसायिक उपयुक्तता या अभिरुचियों, सामाजिक अभिवृत्तियों तथा विभिन्न अबौद्धिक विशेषताओं के विश्लेषण एवं निर्धारण में किया जाता है।

प्रश्न 30.
संप्रेषण अविराम क्यों है?
उत्तर:
संप्रेषण अविराम है क्योंकि यह कभी भी रुकता नहीं चाहे हम सोए या जागे हों-हम लगातार विचारों का प्रक्रमण करते रहते हैं। हमारा मस्तिष्क सदैव सक्रिय रहता है।

प्रश्न 31.
संप्रेषण प्रक्रिया के प्रभावी होने की मात्रा किस बात पर निर्भर करती है?
उत्तर:
संप्रेषण प्रक्रिया के प्रभावी होने की मात्रा इस बार पर निर्भर करती है कि संप्रेषण में प्रयुक्त होनेवाले संकेतों या कूटों, जिनका उपयोग संदेश को प्रेषित करने और उसको ग्रहण करने के लिए किया गया है, के प्रति संप्रेषण करनेवाले संप्रेषकों की आपसी समझ कितनी है।

प्रश्न 32.
संप्रेषण का बृहत्तर अर्थ क्या है?
उत्तर:
संप्रेषण का बृहत्तर अर्थ है-इसमें दो या उससे अधिक व्यक्तियों के बीच एक संबंध होता है जिसमें वे अर्थ निरूपण की हिस्सेदारी में शामिल होते हैं जिससे संदेश के भेजने एवं ग्रहण करने में एक समानता बनी रहती है।

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प्रश्न 33.
संभाषण क्या है?
उत्तर:
भाषा का उपयोग करके बोलना संभाषण है।

प्रश्न 34.
सुनना और श्रवण में क्या अंतर है?
उत्तर:
सुनना एक जैविक क्रिया है जिसमें संवेदी सरणियों के द्वारा संदेश का अभिग्रहण शामिल होता है। यह श्रवण का एक आंशिक पक्ष है। इसमें अभिग्रहण ध्यान, अर्थ का आरोपण तथा श्रवणकर्ता की संदेश के प्रति अनुक्रिया आदि शामिल होते हैं।

प्रश्न 35.
दृष्टि प्रणाली से श्रवण कैसे किया जाता है?
उत्तर:
श्रवण तंत्र के अलावा कुछ लोग अपनी दृष्टि प्रणाली से भी श्रवण करते हैं। वे किसी व्यक्ति की मुखीय अभिव्यक्ति, भंगिमा, गति एवं रूप-रंग का प्रेक्षण करते हैं, जिससे अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं और जिनको मात्र संदेश के वाचिक अंश के श्रवण से नहीं समझा जा सकता है।

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प्रश्न 36.
परामर्श क्या है?
उत्तर:
परामर्श में सहायतापरक संबंध होता है जिसमें सम्मिलित होता है वह जो मदद चाह रहा है, जो मदद दे रहा है या देने का इच्छुक है, जो मदद देने में सक्षम हो या प्रशिक्षित हो और स्थिति में हो जहाँ मदद लेना और देना सहज हो।

प्रश्न 37.
परामर्श की सफलता किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
परामर्श की सफलता परामर्शदाता की योग्यता, कौशल, अभिवृत्ति, व्यक्तिगत गुणों एवं व्यवहारों पर निर्भर करती है।

प्रश्न 38.
उच्च चार गुणों को लिखिए जो प्रभावली परामर्शदाता के साथ संबंधित होते हैं।
उत्तर:

  1. प्रमाणिकता
  2. दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर
  3. तदनुभूति की योग्यता
  4. पुनर्वाक्यविन्यास

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प्रश्न 39.
प्रामाणिकता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्रामाणिकता का अर्थ है कि व्यक्ति के व्यवहार की अभिव्यक्ति उसके मूल्यों, भावनाओं एवं आंतरिक आत्मबिंब या आत्म-छवि के साथ संगत होती है।

प्रश्न 40.
तदनुभूति से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कौशल है जो परामर्शदाता के पास होना चाहिए। ये। परामर्शदाता की वह योग्यता है जिसके द्वारा वे सेवार्थी की भावनाओं को उसके ही परिप्रेक्ष्य से समझाता है।

प्रश्न 41.
पुनर्वाक्यविन्यास क्या है?
उत्तर:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी की कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों को उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।

प्रश्न 42.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय कितना बातों के प्रति सजग रहना चाहिए?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय वस्तुनिष्ठ, वैज्ञानिक उन्मुखता तथा मानकीकृत व्याख्या के प्रति सजगता रखना आवश्यक होता है।

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प्रश्न 43.
साक्षात्कार क्या है?
उत्तर:
एक साक्षात्कार दो या अधिक व्यक्तियों के बीच एक उद्देश्यपूर्ण वार्तालाप है जिसमें प्रश्न-उत्तर प्रारूप या फार्मेट का अनुसरण किया जाता है।

प्रश्न 44.
प्रत्यक्ष प्रश्न किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रत्यक्ष प्रश्न स्पष्ट होते हैं और इनको विशिष्ट सूचनाओं की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, “अंतिम बार आपने कहाँ काम किया था?”

प्रश्न 45.
द्विध्रुवीय प्रश्न क्या होते हैं?
उत्तर:
इस प्रकार के प्रश्नों में हाँ/नहीं अनुक्रिया अपेक्षित होती है। उदाहरण के लिए, “क्या आप इस कंपनी के लिए काम करना चाहेंगे?”

प्रश्न 46.
दर्पण प्रश्न का क्या उद्देश्य होता है?
उत्तर:
दर्पण प्रश्न का उद्देश्य होता है कि व्यक्ति ने जो कहा है उस पर परिवर्तन करके विचार करे या उसको आगे बढ़ाए।

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प्रश्न 47.
संप्रेषण अंतःक्रियात्मक क्यों है?
उत्तर:
संप्रेषण अंत:क्रियात्मक है क्योंकि हम लगातार दूसरों के ओर स्वयं के संपर्क में रहते हैं। दूसरे हमारे भाषणों तथा व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं तथा हम स्वयं भी अपनी वाक्-क्रिया के प्रति अनुक्रिया देते हैं। इस प्रकार हमारे संप्रेषण के आधार पर क्रिया-प्रतिक्रिया चक्र का बने रहना है।

प्रश्न 48.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए कौन-कौन सी सक्षमताएँ आवश्यक होती है?
उत्तर:
प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए निम्नलिखित सक्षमताएँ आवश्यक है –

  1. सामान्य कौशल
  2. प्रेक्षण कौशल
  3. विशिष्ट कौशल

प्रश्न 49.
कौन-से सामान्य कौशल सभी मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक होते हैं?
उत्तर:
बौद्धिक और वैयक्तिक दोनों प्रकार के सामान्य कौशल सभी मनोवैज्ञानिक के लिए आवश्यक है। एक बार इन कौशलों का प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद ही किसी विशिष्ट क्षेत्र में विशिष्टि प्रशिक्षण देकर उन कौशलों का अग्रिम विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 50.
मनोवैज्ञानिक परीक्षण के कौशल विकसित करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
इसमें परामर्शदाता उस योग्यता का परिचय देता है कि कैसे सेवार्थी की कही हुई बातों को या भावनाओं को विभिन्न शब्दों का उपयोग करते हुए कहा जा सकता है।

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प्रश्न 51.
साक्षात्कार मुखोन्मुख क्या है? यह किस प्रकार आगे बढ़ती है?
उत्तर:
साक्षात्कार मुखोन्मुख आमने-सामने के वार्तालाप की प्रक्रिया है। यह तीन अवस्थाओं से आगे बढ़ती है, प्रारंभिक तैयारी, प्रश्न एवं उत्तर तथा समापन अवस्था।

प्रश्न 52.
प्रभावी संप्रेषण में होनेवाली विकृतियों को किस प्रकार कम किया जा सकता है?
उत्तर:
एक उचित संदेश की रचना करना, पर्यावरणीय शोर को नियंत्रित करना तथा प्रतिपादित देना कुछ तरीके हैं जिनके द्वारा प्रभावी संप्रेषण में होनेवाली विकृतियों को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 53.
प्रभावी मनोवैज्ञानिक होने के लिए किन बातों का होना आवश्यक है?
उत्तर:
प्रभावी मनोवैज्ञानिक के रूप में विकसित होने के लिए, मनोवैज्ञानिक में सक्षमता, अखंडता, व्यावसायिक एवं उत्तरदायित्व, लोगों के अधिकारों तथा मर्यादा के प्रति सम्मान की भावना आदि का होना आवश्यक है।

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प्रश्न 54.
श्रवण कौशलों को सुधारने का एक संकेत बतलाइए।
उत्तर:
संप्रेषित की जा रही सूचना प्राप्त करने की शुरुआत में कोई निर्णय लेने से बचना चाहिए। सभी विचारों के प्रति खुलापन रखना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामान्य कौशल क्या है? समझाइए।
उत्तर:
ये कौशल मूलतः सामान्य स्वरूप के हैं और इनकी आवश्यकता सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिक को होती है चाहे उनकी विशेषज्ञता को क्षेत्र कोई भी हो। ये कौशल सभी व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक के आवश्यक है, चाहे वे नैदानिक एवं स्वास्थ्य मनोविज्ञान के क्षेत्र के हों, औद्योगिक/संगठनात्मक, सामाजिक या पर्यावरणी मनोविज्ञान से संबंधित हों या सलाहकार के रूप में कार्यरत हों। इन कौशलों में वैयक्तिक तथा बौद्धिक कौशल दोनों शामिल होते हैं। यह अपेक्षा की जाती है कि किसी भी प्रकार का व्यावसायिक प्रशिक्षण (चाहे नैदानिक या संगठानात्मक हो) उन विद्यार्थियों को नहीं दिया जाना चाहिए जिनमें इन कौशलों का अभाव हो। एक बार इन कौशलों का शिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद ही किसी विशिष्ट प्रशिक्षण देकर उन कौशलों का अग्रिम विकास किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
बौद्धिक और वैयक्तिक कौशल को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
बौद्धिक और वैयक्तिक कौशल निम्न हैं –

  1. अंतर्वैयक्तिक कौशल-सुनने की योग्यता एवं तदनुभूति की क्षमता, दूसरों की संस्कृति के प्रति सम्मान तथा अभिरुचि की भावना, अनुभवों, दृष्टिकोणों, लक्ष्यों एवं इच्छाओं तथा भय को समझने का खुलापन तथा प्रतिप्राप्ति को ग्रहण करने की सकारात्मक भावना इत्यादि। इन कौशलों की वाचिक या अवाचिक रूप से व्यक्त किया जाता है।
  2. संज्ञानात्मक कौशल-समस्या समाधान की योग्यता, आलोचनात्मक चिंतन और व्यवस्थित तर्कना, बौद्धिक जिज्ञासा तथा नम्यता।
  3. भावात्मक कौशल-सांवेगिक नियंत्रण एवं संतुलन, अंतर्वैयक्तिक द्वंद्व के प्रति सहनशीलता, अनिश्चिताओं और अस्पष्टताओं के प्रति सहनशीलता।
  4. व्यक्तित्व/अभिवृत्ति-दूसरों के प्रति सहायता की इच्छा, नए विचारों के प्रति खुलापन, ईमानदारी/अखंडता/मूल्यपरक नैतिक व्यवहार, व्यक्तिगत साहस।
  5. अभिव्यक्तिपरक कौशल-अपने विचारों, भावनाओं, सूचनाओं को वाचिक, अवाचिक तथा लिखित, रूप में संप्रेषित करने की योग्यता।
  6. परावर्ती या मननात्मक कौशल-स्वयं की अभिप्रेरणाओं अभिवृत्तियों एवं व्यवहारों को समझने तथा परीक्षण करने की योग्यता अपने और दूसरे के व्यवहारों के प्रति संवेदनशीलता।
  7. वैयक्तिक कौशल-वैयक्तिक संगठन, स्वास्थ्य, समय प्रबंधन एवं उचित परिधान या वंश।

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प्रश्न 3.
एक मनोवैज्ञानिक किस प्रकार सभी पक्षों का रिकॉर्ड तैयार करता है जिससे प्रेक्षण की प्रक्रिया में कुछ महत्त्वपूर्ण एवं सार्थक पक्षों को समझा जा सके?
उत्तर:

  1. धैर्यपूर्वक प्रेक्षक करना।
  2. अपने भौतिक परिवेश को निकट से देखना जिससे क्या, कौन, कैसे, कहाँ और कब का समझा जा सके।
  3. लोगों की प्रतिक्रियाओं, संवेगों और अभिप्रेरणाओं के प्रति जागरूक रहना।
  4. उन प्रश्नों को पूछना जिनका उत्तर प्रेक्षण करते समय पाया जा सके।
  5. स्वयं को उपस्थित रखना अपने बारे में सूचना देना, यदि पूछा जाए।
  6. एक आशावादी कौतूहल या जिज्ञासा से प्रेक्षण करे।
  7. नैतिक आचरण करें-प्रेक्षण के दौरा लोगों की निजता के मानकों का पालन करें ; उनसे प्राप्त सूचनाओं को किसी को भी न बताएँ, इसका ध्यान रखें।

प्रश्न 4.
प्रेक्षण के क्या लाभ और हानि हैं?
उत्तर:
प्रेक्षण के लाभ और हानि निम्नलिखित हैं –

  1. इसका प्रमुख लाभ यह है कि यह प्राकृतिक या स्वाभाविक स्थिति में व्यवहार को देखने और अध्ययन करने का अवसर देता है।
  2. बाहर के लोगों को या उस स्थिति में रहनेवाले लोगों को प्रेक्षण के लिए प्रशिक्षण दिया सकता है।
  3. इसकी एक कमी यह है कि प्रेक्षण करने में अभिनति या पूर्वाग्रह की भावना आ जाती है क्योंकि प्रेक्षक या प्रेक्षित की भावनाएँ इसको प्रभावित कर देती हैं।
  4. किसी दी गई परिस्थिति में दैनंदिन क्रियाएँ नित्यकर्म (रूटीन) की तरह होती हैं जो अक्सर प्रेक्षक की दृष्टि से चूक जाती हैं।
  5. दूसरी संभाव्य कमी यह है कि वास्तविक व्यवहार और दूसरों की अनुक्रियाएँ प्रेक्षक की उपस्थिति से प्रभावित हो सकती हैं, इस प्रकार प्रेक्षण का उद्देश्य पराजित हो सकता है।

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प्रश्न 5.
संप्रेषण की विशेषताओं को समझाइए।
उत्तर:
संप्रेक्षण की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. संप्रेषण गतिशील है-क्योंकि इसकी प्रक्रिया निरंतर परिवर्तनशील रहती है। जैसे कि व्यक्ति की अपेक्षाओं, अभिवृत्तियों; भावनाओं तथा संवेगों में परिवर्तन होता रहता है, इस परिवर्तन को हम लगातार अभिव्यक्त करते हैं’ इसी से उनका संप्रेषण भी लगातार परिवर्तित होता रहता है।

2. संप्रेषण अविराम है-क्योंकि यह कभी भी रुकता नहीं है ‘चाहे हम सोए जगे हों-हम लगातार विचारों का प्रक्रम करते रहते हैं। हमारा मस्तिष्क सदैव सक्रिय रहता है।

3. संप्रेषण अनुत्क्रमणीय है-क्योंकि एक बार संदेश भेज देने के बाद हम उसे वापस नहीं कर सकते हैं। अगर एक बार जबान फिसल जाए, एक बार दृष्टिपात कर दें या संवेगात्मक उत्तेजना को प्रकट कर दें तो हम उसको मिटा नहीं सकते। हमारी क्षमायाचनाएँ या अस्वीकरण इसके प्रभाव को हल्का कर सकती है। लेकिन उसको पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती जो कहा जा चुका है।

4. संप्रेषण अंतःक्रियात्मक है-क्योंकि हम लगतार दूसरों के और स्वयं के संपर्क में रहते हैं। दूसरे हमारे भाषणों तथा व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं तथा हम स्वयं भी अपनी वाक्-क्रिया के प्रति अनुक्रिया देते हैं। इस प्रकार, हमारे संप्रेषण के आधार पर एक क्रिया-प्रतिक्रिया चक्र का बने रहता है।

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प्रश्न 6.
वाचन क्या है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
वाचन संप्रेषण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। भाषा को उपयोग करके बोलना वाचन कहलाता है। भाषा में प्रतीकों का उपयोग किया जाता है जिसमें अर्थ बँधे हुए होते हैं। प्रभावी होने के लिए यह आवश्यक है कि संप्रेषण भाषा का सही उपयोग करना जानता हो क्योंकि भाषा प्रतीकात्मक होती है, इसलिए जहाँ तक संभव हो शब्दों का उपयोग स्पष्ट एवं परिशुद्ध होना चाहिए। संप्रेषण किसी सदंर्भ के अंतर्गत घटित होता है। इसलिए दूसरे के संदर्भ आधार को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ है प्रेषक जिससे संदर्भ से संदेश प्रेषित कर रहा है, उसके प्रति जानकारी होनी चाहिए। साथ ही उस संदर्भ की व्याख्या की हिस्सेदारी आवश्यक है। अगर नहीं तो अपनी शब्दावली स्तर पर शब्दों के चयन को सुननेवाले के अनुरूप स्तर पर लाना पड़ता है। किसी संस्कृति-विशिष्ट या क्षेत्र अनुरूप अपभाषा तथा शब्दों की अभिव्यक्ति कभी-कभी संप्रेषण की प्रभावित में बाधा बन जाती है।

प्रश्न 7.
अभिग्रहण को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
श्रवण प्रक्रिया का प्रारंभिक चरण है उद्दीपन या संदेश का अभिग्रहण करना। ये संदेश श्रव्य हो सकते हैं। श्रवण प्रक्रिया कुछ जटिल शारीरिक अंत: क्रियाओं पर आधारित होती है जिसमें कान तथा मस्तिष्क की भूमिका होती है। श्रवण तंत्र के अलावा कुछ लोग अपनी दृष्टि प्रणाली में भी श्रवण करते हैं। वे किसी व्यक्ति का मुखीय अभिव्यक्ति, भगिमा (मुद्रा), गति एवं रंग-रूप का प्रेषण करते हैं, जिससे अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं और जिनको मात्र संदेश के वाचिक अंश के श्रवण से नहीं समझा जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि एक प्रभावी परामर्शदाता होने के लिए उसका व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित होना अनिवार्य है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
हाँ, एक प्रभावी परामर्शदाता होने के लिए उसका व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित होना अनिवार्य है। यह आवश्यक है कि वह परामर्श एवं निर्देशन के क्षेत्र में सक्षम हो। सक्षमताओं को विकसित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों की उचित शिक्षा और प्रशिक्षण कुशल पर्यवेक्षण में दिया जाना चाहिए। गलत व्यवसाय में जाने के भयंकर परिणाम हो सकते हैं। मान लीजिए, कोई व्यक्ति किसी ऐसे काम में चला जाता है जिसके लिए उसके पास अपेक्षित अभिक्षमता का अभाव है, तब उसके सामने समायोजन की या निषेधात्मक संवेगों की गंभीर समस्या विकसित हो सकती है, वह हीनता मनोग्रंथि से भी ग्रसित हो सकता है।

इन कठिनाइयों को वह दूसरे माध्यमों से प्रक्षेपित कर सकता है। इसके विपरीत, अगर कोई ऐसा व्यवसाय चुनता है जिसके लिए उसमें पर्याप्त अनुकलनशीलता है तब उसको अपने काम में संतुष्टि होगी। इससे उत्पन्न सकारात्मक भावनाएँ उसके समग्र जीवन समायोजन पर अच्छा प्रभाव डालेंगी। परामर्श भी एक ऐसा ही क्षेत्र है जहाँ एक व्यक्ति को प्रवेश करने लिए आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता पड़ती है जिसमें वह अपनी अनुकूलता और अपने आधारभूत कौशलों का मूल्यांकन करके देख सके कि वह इस व्यवसाय के लिए प्रभावी है या नहीं। किसी परामर्शदाता की प्रभाविता के लिए संदेशों के प्रति अभिज्ञता (जानकारी) और संवेदनशीलता अनिवार्य घटक है।

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प्रश्न 2.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक को एक कूट मनोवैज्ञानिक से कैसे अलग किया जा सकता है?
उत्तर:
अधिकतर लोग सोचते हैं कि वे किसी न किसी प्रकार के मनोवैज्ञानिक हैं। हम अक्सर बुद्धि, हीनता, मनोग्रंथि, अनन्यता संकट, मानसिक बाधाओं, अभिवृत्ति, दबाव, संप्रेषण बाधाओं के बारे में बात करते हैं। सामान्यतः इन पदों का परिचय लोगों के लोकप्रिय लेखन तथा जनसंचार के माध्यमों से होता है। मानव व्यवहार के बारे में कई प्रकर के सामान्य बुद्धि के पद लोग अपने जीवन से जुड़ी प्रक्रियाओं से सीख लेते हैं। मानव व्यवहार से जुड़ी कुछ नियमितताओं के अनुभव के आधार पर उनके बारे में सामान्यीकरण किया जाता है। इस प्रकार का दैनिक व्यवसायी (शौकिया) मनोविज्ञान अकसर उल्टा असर डालता है, कभी-कभी तो अत्यंत भयावह हो सकता है।

एक कूट मनोवैज्ञानिक को वास्तविक मनोविज्ञान से कैसे अलग करेंगे? इसका उत्तर कुछ इस प्रकार के प्रश्न पूछकर तैयार किया जा सकता है, जैसे-उसका व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक पृष्ठभूमि, संस्थागत संबंधन तथा उसका सेवा देने संबंधी अनुभव आदि। यहाँ पर यह महत्त्वपूर्ण है कि उस मनोवैज्ञानिक का प्रशिक्षण एक शोधकर्ता के रूप में कैसे हुआ है और उसमें व्यावसायिक मूल्यों का आंतरिकीकरण कितना हुआ है। अब इस बात को माना जा रहा है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त उपकरणों का ज्ञान, उनसे जुड़ी विधियों एवं सिद्धांत मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं।

उदाहरण के लिए एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है। वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशाला या क्षेत्र में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वे अपने प्रश्नों का उत्तर गणितीय प्रसंभाव्यताओं के आधार पर प्राप्त करते हैं। उसके बाद ही वह किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सिद्धांत या नियम पर पहुँचते हैं। यहाँ पर एक और अंतर स्थापित करना चाहिए। कुछ मनोवैज्ञानिक शोध के माध्यम से सैद्धांतिक निरूपणों की खोज करते हैं।

जबकि कुछ अन्य हमारे प्रतिदिन की क्रियाओं और व्यवहारों से संबंधित रहते हैं। हमें दोनों प्रकार के मनोवैज्ञानिकों की जरूरत है। हमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो सिद्धांतों का विकास करे जबकि कुछ दूसरे उनका उपयोग मानव समस्याओं के समाधान के लिए करें। यहाँ यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि शोध कौशलों के अलावा एक मनोवैज्ञानिक के लिए वे कौन-सी सक्षमताएँ हैं जो आवश्यक हैं। कुछ दशाएँ ऐसी हैं जो मनोवैज्ञानिक के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक मानी जा रही है।

इसके अंतर्गत ज्ञान के वे क्षेत्र आते हैं, जिसकी शिक्षा और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद व्यवसाय में आने से पूर्व किसी मनोवैज्ञानिक को जानना चाहिए। ये शिक्षकों, अभ्यास करनेवाले एवं शोध करनेवाले सभी के लिए जरूरी हैं जो छात्रों से, व्यापार से, उद्योगों से और बृहत्तर समुदायों के साथ परामर्शन की भूमिकाओं में होते हैं। यह माना जा रहा है कि मनोविज्ञान में सक्षमताओं को विकसित करना, उनको अमल में लाना और उनका मापन करना कठिन है, क्योंकि विशिष्ट पहचान और मूल्यांकन की कसौटियों पर आम सहमति नहीं बन पाई है।

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प्रश्न 3.
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागमों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रेक्षण के दो प्रमुख उपागम हैं –

  1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण तथा
  2. सहभागी प्रेक्षण

1. प्रकृतिवादी प्रेक्षण (Naturalisticobsevation):
एक प्राथमिक तरीका है जिससे हम सीखते हैं लोग भिन्न स्थितियों में कैसे व्यवहार करते हैं। मान लीजिए, कोई जानना चाहता हैं कि जब कोई कंपनी अपने उत्पाद में भारी छूट की घोषणा करती है तो प्रतिक्रियास्वरूप लोग शॉपिंग मॉल जाने पर कैसा व्यवहार करते हैं। इसके लिए वह शॉपिंग मॉल में जा सकता है जहाँ इन छूट वाली वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है, क्रमबद्ध ढंग से वह प्रेक्षण कर सकता है कि लोग खरीदारी से पहले या बाद में क्या कहते या करते हैं। उनके तुलनात्मक अध्ययन से, वहाँ क्या हो रहा है, इस बारे में रुचिकर सूझ बन सकती है।

2. सहभागी प्रेक्षण (Participant observation):
प्रकृतिवादी प्रेक्षण का ही एक प्रकार है। इसमें प्रेक्षक प्रेक्षक की प्रक्रिया में एक सक्रिय सदस्य के रूप में संलग्न होता है। इसके लिए वह उस स्थिति में स्वयं भी सम्मिलित हो सकता है जहाँ प्रेक्षण करना है। उदाहरण के लिए, ऊपर दी गई समस्या में, एक प्रेक्षणकर्ता उसी शॉपिंग मॉल की दुकान में अशंकालिक नौकरी लेकर अंदर का व्यक्ति बनकर ग्राहकों को व्यवहार में विभिन्नताओं का प्रेक्षण कर सकता है। इस तकनीक का मानवशास्त्री बहुतायत से उपयोग करते हैं जिनका उद्देश्य होता है कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रथमतया दृष्टि से एक परिप्रेक्ष्य विकसित कर सकें जो एक बाहरी व्यक्ति को सामान्यता उपलब्धता नहीं होता है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. ध्यान
  2. पूनर्वाक्यविन्यास
  3. अर्थ का आरोपण
  4. शरीर भाषा

उत्तर:
1. ध्यान-एक बार जब उद्दीपक, जैसे-एक शब्द या दृष्टि संकेत या दोनों, ग्रहण किए जाते हैं तो वे मानव प्रक्रमण तंत्र की ध्यान अवस्था पर पहुंचते हैं। इस अवस्था में अन्य उद्दीपन पश्चगमन की अवस्था में आ जाते हैं ताकि हम विशिष्ट शब्दों या दृश्य प्रतीकों पर पूरा ध्यान सकें। सामान्यता हमारा ध्यान हम जो सुन रहे हैं और समझ रहे हैं उनके बीच बँटा रहता है या हमारे आस-पास जो कुछ घटित हो रहा है उसमें उलझा रहता है।

मान लीजिए कि एक छात्र कोई सिनेमा देख रहा है। उसके सामने बैठा व्यक्ति अपने बगल में बैठे व्यक्ति के साथ लगातार कानाफूसी कर रहा है। सिनेमाघर का ध्वनि यंत्र भी खड़खड़ा रहा है। साथ ही, उसे आगे आनेवाली परीक्षा के बारे में भी चिंता है। इस तरह से उसका ध्यान अनेक दिशाओं में बँटा रहता है। विभक्त ध्यान किसी संदेश या संकेत को ग्रहण करना कठिन बना देता है।

2. पुनर्वाक्यविन्यास-यह कैसे पता चलेगा कि कोई श्रवण कर रहा है कि नहीं? उससे पूछकर कि उसने जो कहा वह उसको फिर से कहे। ऐसा करनेवाले व्यक्ति उसके शब्दों को एकदम से नहीं दोहरा सकता है। वह मूलतः अपनी समझ से आपकी बातों या विचारों को पुनर्कथित करता है-वही जो उसकी समझ में आया होता है। इसी को पुनर्वाक्यविन्यास (Paraphrasing) कहते हैं। इसके द्वारा व्यक्ति को यह समझ में आ जाता है कि उसने जो कहा वह कितना समझा या सुना गया है।

अगर कोई कही हुई बात को संक्षप में दुबारा दोहरा नहीं सकता तब यह इसका साक्ष्य है कि उसने पूरा संदेश ठीक से ग्रहण नहीं किया हैं अर्थात् या तो सुना नहीं है या समझा नहीं है। हम जब कक्षा में अध्यापक या किसी दूसरे व्यक्ति को सुन रहे हों तब भी इस बार ध्यान रखना चाहिए कि क्या हम उसकी बात दोहरा सकते हैं या नहीं? सुनी हुई बात को पुनर्वाक्यविन्यास करने का प्रयास करना चाहिए और यदि ऐसा नहीं कर पाते हैं तब संभव होने पर तत्काल स्पष्टीकरण करना चाहिए।

3. अर्थ का आरोपण-किसी भी उद्दीपन को ग्रहण करने के बाद उसको हम एक पूर्वानिर्धारित श्रेणी में रखते हैं, उसे श्रेणी को विकास भाषा के सीखने के साथ ही जुड़ा रहता है। हम उन मानसिक श्रेणियों को विकसित करते हैं। जिने द्वारा प्राप्त संदेश की व्याख्या की जाती है। उदाहरण के लिए, हमारी श्रेणीकरण प्रणाली ने ‘पनीर’ शब्द को दुग्ध उत्पादन के रूप में श्रेणीबद्ध कर रहा है, जिसका एक खास स्वाद है, रंग है, जिसके द्वारा हम ‘पनीर’ शब्द का उपयोग सही अर्थ में कर पाते हैं।

4. शरीर भाषा-जब हम दूसरों से संवाद करते हैं तब हमारे शब्द हमारे संदेश का पूर्ण अर्थ संप्रेषित नहीं कर पाते हैं। हम सभी जानते हैं कि संप्रेषण का एक बड़ा भाग वाचिक भाषा का उपयोग किए बिना भी हो सकता है। हमें पता है कि अवाचिक क्रियाएँ प्रतीकात्मक होती किसी भी बातचीत की क्रिया से गहराई से जुड़ी रहती हैं। इन्हीं अवाचिक क्रियाओं के अंश को शरीर भाषा (Body Language) कहते हैं। शरीर भाषा में वह सारे संदेश शामिल होते हैं जो शब्दों के अलावा लोग बातचीत के दौरान उपयोग करते हैं।

शरीर भाषा पढ़ते समय इस बात का अवश्य ध्यान चाहिए कि कोई भी एक अवाचित संकेत अपने आप में संपूर्ण अर्थ नहीं रखता है। इसमें हावभाव, भंगिमा, शरीर की बनावट, नेत्र संपर्क शरीर की गति, पोशाक शैली जैसे कारक शामिल होते हैं और इसको एक गुच्छ (Cluster) के रूप में समझना पड़ता है। साथ ही, वाचिक संप्रेषण में अवाचिक संकेतों के अनेक अर्थ हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सीने पर एक-दूसरे पर रखी गई बाहुओं या भुजाओं का अर्थ होता है कि व्यक्ति स्वयं को अलग रखता चाहता है, परंतु अगर सीधी मुद्रा में सीने पर हाथ बँधे हों, शरीर की मांसपेशियाँ तनी हों, जबड़ों की मांसपेशियों में जकड़न और आँखों की मांसपेशियों में सकुचन हो तो यह संभवतः क्रोध का संप्रेषण करता है।

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प्रश्न 5.
श्रवण कौशलों को सुधारने के कुछ संकेतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
श्रवण कौशलों को सुधारने के कुछ संकेत निम्नलिखित हैं –

  1. इस बात की पहचान करनी चाहिए कि प्रेषक एवं संग्राहक दोनों संप्रेषण को प्रभावी बनाने के लिए समान रूप से जिम्मेदार होते हैं।
  2. संप्रेषित की जा रही सूचना प्राप्त करने की शुरुआत में कोई निर्णय लेने से बचना चाहिए। सभी विचारों के प्रति खुलापन रखना चाहिए।
  3. धैर्यवान श्रवणकर्ता बनना चाहिए। अनुक्रिया देने में जल्दी नहीं करना चाहिए।
  4. अहं कथन से बचना चाहिए। केवल जो चाहते हैं उसकी के बारे में नहीं करना चाहिए। दूसरों को भी अवसर देना चाहिए और जो कहना है कहने देना चाहिए।
  5. सांवेगिक अनुक्रियाओं के प्रति सावधान रहना, विशेष रूप से वे शब्द जो भावपूर्ण हों।
  6. यह ध्यान रखना चाहिए कि शरीर भंगिमा श्रवण को प्रभावित करती है।
  7. विमनस्कता को नियंत्रित करना चाहिए।
  8. अगर कोई संदेह हो तो पुनर्कथन (पुनर्वाक्यविन्यास) करना चाहिए। प्रेषक से पूछना चाहिए कि वह आपके द्वारा ठीक समझा जा रहा है या नहीं।
  9. जो कहा जा रहा है उसका मानस-प्रत्यक्षीकरण करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि संदेश को मूर्त क्रिया के रूप में अनुदित करना चाहिए।

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प्रश्न 6.
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कौशलों के मूल तत्त्वों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कौशलों के मूल तत्त्व अग्रलिखित हैं –

  1. विविध प्रकार की विधियों एवं माध्यमों से मूल्यांकन करने की योग्यता, इसमें उन तरीकों का ध्यान रखना भी सम्मिलित है जिसमें विविध व्यक्तियों, युग्मों, परिवारों एवं समूहों के प्रति सम्मान एवं अनुक्रियाशीलता की भावना बनी रहे।
  2. निर्णय लेने के लिए प्रदत्त संग्रह करते समय एक प्रणालीबद्ध उपागम के उपयोग की योग्यता।
  3. मूल्यांकन विधियों के आधारों से जुड़े मनोमितिक मुद्दों का ज्ञान।
  4. विभिन्न स्रोतों से प्रा त प्रदत्तों को समाकलित करने से संबंधित मुद्दों की जानकारी रखना।
  5. नैदानिक उद्देश्यों के लिए विभिन्न स्रोतों से प्राप्त प्रदत्तों को समाकलित करने की योग्यता।
  6. निदान के उपयोग एवं निरूपण की योग्यता, जिसमें उपलब्ध नैदानिक उपागमों की सीमाओं और शक्तियों को समझा जा सके।
  7. कौशलों को बढ़ाने एवं अमल लाने के लिए पर्यवेक्षण के प्रभावी उपयोग की क्षमता कोई भी जो मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करता है उसका व्यावसायिक रूप से योग्य होना तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षण में प्रशिक्षित होना आवश्यक है।
  8. मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का संचालन परीक्षण पुस्तिका (मैन्युअल) में दी गई सूचना/अनुदेशों के अनुसार ही किया जाता है।

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प्रश्न 7.
साक्षात्कार प्रश्नों के विभिन्न प्रकारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साक्षात्कार प्रश्नो के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं –

  1. प्रत्यक्ष प्रश्न-ये स्पष्ट होते हैं और इनको विशिष्ट सूचनाओं की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, “अंतिम बार आपने कहाँ काम किया था?”
  2. मुक्तोत्तर प्रश्न-ये कम स्पष्ट होते हैं और केवल विषय को बताते हैं। उदाहरण के लिए “आप अपनी नौकरी से कुल मिलाकर कितने प्रसन्न थे?”
  3. अमुक्तोत्तर प्रश्न-ये अनुक्रिया के विकल्प भी प्रस्तुत करते हैं जिससे अनुक्रिया का प्रसरण संकीर्ण रहता है। उदाहरण के लिए, “क्या आपको लगता है कि उत्पाद संबंधी ज्ञान या संप्रेषण कौशल एक विक्रेता के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होता है?”
  4. द्वि-ध्रुवीय प्रश्न-यह अमुक्तोत्तर प्रश्न का ही एक प्रकार है। इसमें हाँ/नहीं अनुक्रिया अपेक्षित होती है। उदाहरण के लिए, “क्या आप इस कंपनी के लिए काम करना चाहेंगे?”
  5. संकेतन प्रश्न-ये किसी विशिष्ट उत्तर के पक्ष में अनुक्रिया को प्रोत्साहन देते हैं। उदाहरण के लिए, “क्या आप इस पक्ष में नहीं हैं कि इस कंपनी में अधिकारियों का एक संघ (यूनियन) बने?”

प्रश्न 8.
एक प्रभावी मनोवैज्ञानिक को एक कटु मनोवैज्ञानिकों से कैसे अलग किया जा सकता है?
उत्तर:
अधिकतर लोग सोचते हैं कि वे किसी न किसी प्रकार के मनोवैज्ञानिक हैं। हम अक्सर बुद्धिहीनता मनोग्रंथि, अनन्यता संकट, मानसिक बाधाओं, अभिवृत्ति दबाव, संप्रेषण बाधाओं के बारे में बात करते हैं। सामान्यतः इन पदों का परिचय लोगों के लोकप्रिय लेखन तथा जनसंचार के माध्यमों से होता है। मानव व्यवहार के बारे में कई प्रकार के सामान्य बुद्धि के पद लोग अपने जीवन से जुड़ी प्रक्रियाओं से सीख लेते हैं। मानव व्यवहार से जुड़ी कुछ नियमितताओं के अनुभव के आधार पर उनके बारे में सामान्यीकरण किया जाता है। इस प्रकार के दैनिक व्यवसायी मनोविज्ञान अक्सर उल्टा प्रभाव डालता है, कभी-कभी तो अत्यंत भयावह हो सकता है एक कूट मनोवैज्ञानिक को वास्तविक मनोविज्ञान से कैसे अलग करेंगे?

इसका उत्तर कुछ इस प्रकार के प्रश्न पूछकर तैयार किया जाता है, जैसे-उसका व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक पृष्ठभूमि, संस्थागत संबंधन तथा उसका सेवा देने संबंधी अनुभव आदि। यहाँ पर महत्त्वपूर्ण है कि उस मनोवैज्ञानिक का प्रशिक्षण एक शोधकर्ता के रूप में कैसे हुआ है उसमें व्यासायिक मूल्यों का आंतरिकीकरण कितना हुआ है? अब इस बात को माना जा रहा है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त उपकरणों का ज्ञान, उनसे जुड़ी विधियों एवं सिद्धांत मनोवैज्ञानिक विशेषता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए एक व्यावसायिक मनोवैज्ञानिक समस्या का निराकरण वैज्ञानिक स्तर पर करता है। वे अपनी समस्याओं को प्रयोगशाला या क्षेत्र में ले जाकर परीक्षण करके उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करते हैं वे अपने प्रश्नों का उत्तर गणितीय प्रसंभाव्यताओं के आधार पर प्राप्त करते हैं। उसके बाद ही वह किसी विश्वसनीय मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त या नियम पर पहुँचते हैं।

यहाँ पर एक और अंतर स्थापित करना चाहिए। कुछ मनोवैज्ञानिक शोध के माध्यम से सैद्धांतिक निरूपणों की खोज करते हैं जबकि कुछ अन्य हमारे प्रतिदिन की क्रियाओं और व्यवहारों से संबंधित रहते हैं। हमें दोनों प्रकार के मनोवैज्ञानिकों की जरूरत हैं। हमें कुछ ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो सिद्धान्तों का विकास करे जबकि कुछ दूसरे उनका उपयोग मानव समस्याओं के समाधान के लिए करें। यहाँ यह जानना महत्त्वपूर्ण है शोध कौशलों के अलावा एक मनोवैज्ञानिक के लिए वे कौन-सी क्षमताएँ हैं जो आवश्यक हैं। कुछ दशाएँ और सक्षमताएँ ऐसी हैं जो मनोवैज्ञानिकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक मानी जा रही हैं।

इसके अंतर्गत ज्ञान के वे क्षेत्र आते हैं जिसको शिक्षा और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद व्यवसाय में आने से पूर्व किसी मनोवैज्ञानिक को जानना चाहिए। ये शिक्षकों, अभ्यास करनेवाले एवं शोध करनेवाले सभी के लिए जरूरी हैं जो छात्रों से, व्यापार से, उद्योगों से और वृहत्तर समुदायों के साथ परामर्श की भूमिकाओं में होते हैं। यह माना जा रहा है कि मनोविज्ञान में सक्षमताओं को विसरित करना, उनको अमल में लाना और उनका.मापना करना कठिन है, क्योंकि विशिष्ट पहचान और मूल्यांकन की कसौटियों पर अम सहमति नहीं बना पायी है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संप्रेक्षण एक प्रक्रिया है –
(A) सचेतन
(B) अचेतन
(C) साभिप्राय
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 2.
व्यक्ति की स्वयं से संवाद करने की क्रिया को कहते हैं –
(A) अन्तरवैयक्तिक संप्रेषण
(B) अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण
(C) सार्वजनिक संप्रेषण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) अन्तरवैयक्तिक संप्रेषण

प्रश्न 3.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण संबंधित होता है –
(A) स्वयं से
(B) दो या दो से अधिक व्यक्तियों से
(C) जनसभा से
(D) भीड़ से
उत्तर:
(B) दो या दो से अधिक व्यक्तियों से

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प्रश्न 4.
अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण के प्रकार हैं –
(A) मध्यस्थ आधारित वार्तालाप
(B) साक्षात्कार
(C) लघु समूह परिचर्चा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
अपनी बातों को रेडियो या टेलीविजन के माध्यम से वक्ता द्वारा कहने को कहते हैं –
(A) सार्वजनिक संप्रेषण
(B) अंतर्वैयक्तिक संप्रेषण
(C) अंतरवैयक्तिक संप्रेषण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) सार्वजनिक संप्रेषण

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प्रश्न 6.
गरम स्टोव को छूने पर अंगुलियों का खींचना और हमारी आँखों में आँसू आना किसका उदाहरण है?
(A) वाचिक संप्रेषण
(B) अवाचिक संप्रेषण
(C) भाषायी संप्रेषण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(B) अवाचिक संप्रेषण

प्रश्न 7.
श्रवण में कौन-सी विशेषता नहीं होनी चाहिए –
(A) धैर्यवान
(B) अधैर्यवान
(C) अनिर्णयात्मक
(D) ध्यान सक्रियता
उत्तर:
(B) अधैर्यवान

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प्रश्न 8.
सुननेवाला द्वारा हमारी की गई बातों को अपनी समझ में बातों या विचारों को पुनर्कथित कहलाता है –
(A) पुनर्वाक्यविन्यास
(B) अभिग्रहण
(C) ध्यान
(D) आरोपण
उत्तर:
(A) पुनर्वाक्यविन्यास

प्रश्न 9.
श्रवण प्रक्रिया में किन अंगों की भूमिका नहीं होती है?
(A) कान
(B) मस्तिष्क
(C) नाक
(D) आँख
उत्तर:
(C) नाक

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प्रश्न 10.
शरीर भाषा में निम्न में कौन-से कारक शामिल हैं?
(A) हावभाव
(B) हाथ की गति
(C) भंगिमा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 11.
साक्षात्कार के किस आग में साक्षात्कारकर्ता सूचना और प्रदत्त प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रश्न पूछता है?
(A) प्रारंभ
(B) मुख्य भाग
(C) समापन
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) मुख्य भाग

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प्रश्न 12.
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग करते समय आवश्यक है –
(A) वस्तुनिष्ठता
(B) वैज्ञानिक उन्मुखता
(C) मानकीकृत व्याख्या
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
एक प्रभावी परामर्शदाता के गुण नहीं हैं –
(A) प्रामाणिकता
(B) दूसरों के प्रति सकारात्मक आदर
(C) दूसरों के प्रति सकारात्मक अनादर
(D) तद्नुभूति की योग्यता
उत्तर:
(C) दूसरों के प्रति सकारात्मक अनादर

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प्रश्न 14.
मनोवृत्ति का निर्माण निम्नांकित में किस कारक द्वारा प्रभावित नहीं होता है?
(A) सामाजिक सीखना
(B) विश्वसनीय सूचनाएँ
(C) आवश्यकता पूर्ति
(D) श्रोता की विशेषताएँ
उत्तर:
(D) श्रोता की विशेषताएँ

प्रश्न 15.
योग में सम्मिलित होता है –
(A) ध्यान
(B) मुद्रा
(C) नियम
(D) ज्ञान
उत्तर:
(A) ध्यान

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प्रश्न 16.
समय प्रबन्ध किस श्रेणी का कौशल है?
(A) वैयक्तिक
(B) सामूहिक
(C) राजनैतिक
(D) धार्मिक
उत्तर:
(A) वैयक्तिक

प्रश्न 17.
दो या अधिक व्यक्तियों के बीच वार्तालाप और अन्तःक्रिया है –
(A) परीक्षण
(B) साक्षात्कार
(C) परामर्श
(D) प्रयोग
उत्तर:
(B) साक्षात्कार

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प्रश्न 18.
किसी वस्तु को खोने का बोध या संताप क्या कहलाता है?
(A) निर्धनता
(B) वंचन
(C) सामाजिक असुविधा
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(B) वंचन

प्रश्न 19.
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक संघ के ने एक कार्यदल गठित किया जिसका उद्देश्य किनके लिए आवश्यक कौशलों की पहचान करना था?
(A) समाजशास्त्रियों
(B) अर्थशास्त्रियों
(C) व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों

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प्रश्न 20.
प्रभावी मनोवैज्ञानिक बनने के लिए आवश्यक आधारभूत कौशल है –
(A) सामान्य कौशल
(B) विशिष्ट कौशल
(C) प्रेक्षण कौशल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 21.
सामान्य कौशल किस प्रकार के व्यावसायिक मनोवैज्ञानिकों के लिए आवश्यक है?
(A) नैदानिक एवं स्वास्थ्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में मनोवैज्ञानिकों को
(B) औद्योगिक एवं संगठनात्मक क्षेत्र के मनोवैज्ञानिकों को
(C) सामाजिक या पर्यावरणी क्षेत्र के मनोवैज्ञानिकों को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 22.
सामान्य कौशल में शामिल होते हैं –
(A) वैयक्तिक कौशल
(B) बौद्धिक कौशल
(C) वैयक्तिक तथा बौद्धिक कौशल दोनों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) वैयक्तिक तथा बौद्धिक कौशल दोनों

प्रश्न 23.
मनोवैज्ञानिक अपने परिवेश के किन पक्षों के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रेक्षण करता है?
(A) घटनाएँ
(B) व्यक्ति
(C) घटनाएँ एवं व्यक्ति दोनों
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) घटनाएँ एवं व्यक्ति दोनों

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प्रश्न 24.
प्रेक्षण का वह तरीका जिससे हम सीखते हैं कि लोग भिन्न स्थितियों में कैसे व्यवहार करते हैं, कहलाता है –
(A) प्रकृतिवादी प्रेक्षण
(B) प्रेक्षण
(C) सहभागी प्रेक्षण
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) प्रकृतिवादी प्रेक्षण

प्रश्न 25.
एक प्रेक्षणकर्ता द्वारा शॉपिंग मॉल की दुकान में अंशकालिक नौकरी लेकर अंदर का व्यक्ति बनकर ग्राहकों के व्यवहार में भिन्नताओं का प्रेक्षण कहलाता है –
(A) प्रकृतिवादी प्रेक्षण
(B) सहभागी प्रेक्षण
(C) आत्म-प्रत्यक्षण
(D) मूल्यांकन प्रेक्षण
उत्तर:
(B) सहभागी प्रेक्षण

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान एवं जीवन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आप ‘पर्यावरण’ पद से क्या समझते हैं? मानव-पर्यावरण संबंध को समझने। के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण (Environment) शब्द, हमारे चारों ओर जो कुछ है उसे संदर्भित करता है, शाब्दिक रूप से हमारे चारों ओर भौतिक, सामाजिक कार्य तथा सांस्कृतिक पर्यावरण में जो कुछ है वह इसमें निहित है। व्यापक रूप से, व्यक्ति के बाहर जो शक्तियाँ हैं, जिनके प्रति व्यक्ति अनुक्रिया करता है, वे सब इसमें निहित हैं। मानव-पर्यावरण संबंध को समझने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्य निम्नलिखित हैं –

1. अल्पमतवादी परिप्रेक्ष्य (Minimalist perspective) का यह अभिग्रह है कि भौतिक पर्यावरण मानव व्यवहार, स्वास्थ्य तथा कुशल-क्षेम (कल्याण) पर न्यूनतम या नगण्य प्रभाव डालता है। भौतिक पर्यावरण तथा मनुष्य का अस्तित्व समांतर घटक के रूप में होता है।

2. नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य (Instrumental perspective) प्रस्तावित करता है कि भौतिक पर्यावरण का अस्तित्व ही प्रमुखतया मनुष्य के सुख एवं कल्याण के लिए है। पर्यावरण के ऊपर मनुष्य के अधिकांश प्रभाव इसी नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य को प्रतिबिंबित करते हैं।

3. आध्यात्मिक परिप्रक्ष्य (Spiritual perspective) पर्यावरण को एक सम्मान योग्य और मूल्यवान वस्तु के रूप में संदर्भित करता है न कि एक समुपयोग करने योग्य वस्तु के रूप में। इसमें मान्यता है कि मनुष्य अपने तथा पर्यावरण के मध्य परस्पर-निर्भर संबंध को पहचानते हैं, अर्थात् मनुष्य का भी तभी अस्तित्व रहेगा और वे प्रसन्न रहेंगे जब पर्यावरण को स्वस्थ तथा प्राकृतिक रखा जाएगा।

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प्रश्न 2.
भीड़ के प्रमुख लक्षण क्या हैं? भीड़ के प्रमुख मनोवैज्ञानिक परिणामों की व्याख्या करते हैं।
उत्तर:
भीड़, के संदर्भ उस असुस्थता की भावना से है जिसका कारण यह है कि हमारे आस – पास बहुत अधिक व्यक्ति या वस्तुएँ होती हैं जिससे हमें भौतिक बंधन की अनुभूति होती है तथा कभी-कभी वैयक्तिक स्वतंत्रता में न्यूनतम का अनुभव होता है। एक विशिष्ट क्षेत्र या दिक् में बड़ी संख्या में व्यक्तियों की उपस्थिति के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया ही भीड़ कहलाती है। जब यह संख्या एक निश्चित स्तर से अधिक हो जाती है तब इसके कारण वह व्यक्ति जो इस स्थिति में फंस गया है, दबाव का अनुभव करता है। दबाव का अनुभव करता है। इस अर्थ में भीड़ भी एक पर्यायवाची दाबवकारक का उदाहरण है।

भीड़ के अनुभव के निम्नलिखित लक्षण होते हैं –

  1. असुरक्षा की भावना
  2. वैयक्तिक स्वतंत्रता में न्यूनता या कमी
  3. व्यक्ति का अपने आस-पास के परिवेश के संबंध में निषेधात्मक दृष्टिकोण, तथा
  4. सामाजिक अंत:क्रिया पर नियंत्रण के अभाव की भावना।

भीड़ क प्रमुख मनोवैज्ञानिक परिणाम –

1. भीड़ तथा अधिक घनत्व के परिणामस्वरूप अपसामान्य व्यवहार तथा आक्रामकता उत्पन्न हो सकते हैं। अनेक वर्षों पूर्व चूहों पर किए गए शोध में यह परिलक्षित हुआ था। इन प्राणियों को एक बाड़े में रखा गया, प्रारंभ में यह कम संख्या में आक्रामक तथा विचित्र व्यवहार प्रकट होने लगे, जैसे-दूसरे चूहों की पूँछ काट लेना। यह आक्रामक व्यवहार इस सीमा तक बढ़ा कि अंततः ये प्राणी बड़ी संख्या में मर गए जिससे बाड़े में उनकी जनसंख्या फिर कम हो गई। मनुष्य में भी जनसंख्या वृद्धि के साथ कभी-कभी हिंसात्मक अपराधों में वृद्धि पाई गई है।

2. भीड़ के फलस्वरूप उन कठिन कार्यों का जिनमें संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ निहित होती निष्पादन निम्न स्तर का हो जाता है तथा स्मृति और संवेगात्मक दशा पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ये निषेधात्मक प्रभाव उन व्यक्तियों में अल्प मात्र में परिलक्षित होते हैं जो भीड़ वाले परिवेश के आदी होते हैं।

3. वे बच्चे जो अत्यधिक भीड़ वाले घरों में बड़े होते हैं, वे निचले स्तर के शैक्षिक निष्पादन प्रदर्शित करते हैं। यदि वे किसी कार्य पर असफल होते हैं तो उन बच्चों की तुलना वे जो कम भीड़ वाले घरों में बढ़ते हैं, उस कार्य पर निरंतर काम करते रहने की प्रवृत्ति भी उनमें दुर्बल होती है। अपने माता-पिता के साथ अधिक द्वंद्व के अनुभव करते हैं तथा उन्हें अपने परिवार से भी कम सहायता प्राप्त होती है।

4. सामाजिक अंत: क्रिया की प्रकृति भी यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति भीड़ के प्रति किसी सीमा तक प्रतिक्रिया करेगा। उदाहरण के लिए यदि अंत:क्रिया किसी आनंददायक सामाजिक अवसर पर होती है; जैसे – किसी प्रीतिभोज अथवा सार्वजनिक समारोह में; तब संभव है कि उसे भौतिक स्थान में बड़ी संख्या में अनेक लोगों की उपस्थिति कोई भी दबाव उत्पन्न करे। बल्कि, इसके फलस्वरूप सकारात्मक सांवेगिक प्रतिक्रियाएँ हो सकती है। इसके साथ ही, भीड़ भी सामाजिक अंत:क्रिया की प्रकृति को प्रभावित करती है।

5. व्यक्ति भीड़ के प्रति जो निषेधात्मक प्रभाव प्रदर्शित करते हैं; उसकी मात्रा में व्यक्तिगत भिन्नताएँ होती हैं तथा उनकी प्रतिक्रियाओं की प्रकृति में भी भेद होता है।

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प्रश्न 3.
शोर क्या है? मनुष्य के व्यवहार पर शोर के प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कोई भी ध्वनि जो खीझ या चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करे और अप्रिय हो, उसे शोर कहते हैं। मनुष्य के व्यवहार पर शोर के प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. शोर चाहे तीव्र हो या धीमा हो, वह समग्र निष्पादन को तब तक प्रभावित नहीं करता है जब तक कि संपादित किए जाने वाला कार्य सरल हो; जैसे-संख्याओं का योग। ऐसी स्थितियों में व्यक्ति अनुकूलन कर लेता है या शोर का ‘आदी’ हो जाता है।
  2. जिस कार्य का निष्पादन किया जा रहा है यदि वह अत्यंत रुचिकर होता है, तब भी शोर की उपस्थिति में निष्पादन प्रभावित नहीं होता है।
  3. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कार्य की प्रकृति व्यक्ति को पूरा ध्यान उसी में लगाने तथा शोर को अनसुना करने में सहायता करती है। यह भी एक प्रकार अनुकूलन हो सकता है।
  4. जब शोर कुछ अंतराल के बाद आता है तथा उसके संबंध में भविष्यकथन नहीं किया जा सकता, तब वह निरंतर होनेवाले शोर की अपेक्षा अधिक बाधाकारी प्रतीत होता है।
  5. जिस कार्य का निष्पादन किया जा रहा है, जब वह कठिन होता है यह उसपर पूर्ण एकाग्रता की आवश्यकता होती है, तब तीव्र, भविष्यकथन न करने योग्य तथा नियंत्रण न किया जा सकने वाला शोर निष्पादन स्तर को घटाता है।
  6. जब शोर को सहन करना या बंद कर देना व्यक्ति के नियंत्रण में होता है तब कार्य निष्पादन में त्रुटियों में कमी आती है।
  7. संवेगात्मक प्रभावों के संदर्भ में, शोर यदि एक विशेष स्तर से अधिक हो तो उसके कारण चिड़चिड़ापन आता है तथा इससे नींद में गड़बड़ी भी उत्पन्न हो सकती है।

प्रश्न 4.
“मानव पर्यावरण को प्रभावित करते हैं तथा उससे प्रभावित होते हैं।” इस कथन की व्याख्या उदाहरणों की सहायता से कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण पर मानव प्रभाव-मनुष्य भी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और अन्य उद्देश्यों से भी प्राकृतिक पर्यावरण के ऊपर अपना प्रभाव डालते हैं। निर्मित पर्यावरण के सारे उदाहरण पर्यावरण के ऊपर मानव प्रभाव को अभिव्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिये मानव ने जिसे हम ‘घर’ कहते हैं, उसका निर्माण प्राकृतिक पर्यावरण को परिवर्तित करके ही किया जिससे कि उन्हें एक आश्रय मिल सके। मनुष्यों के इस प्रकर के कुछ कार्य पर्यावरण को क्षति भी पहुंचा सकते हैं और अंततः स्वयं उन्हें भी अनेकानेक प्रकार से क्षति पहुंचा सकते हैं।

उदाहरण के लिए, मनुष्य उपकरणों का उपयोग करते हैं, जैसे-रेफ्रीरजेटर तथा वातानुकूलन यंत्र जो रासायनकि द्रव्य (जैसे-सी.एफ.सी. या क्लोरो-फ्लोरो कार्बन) उत्पादित करते हैं, जो वायु को प्रदूषित करते हैं तथा अंतत: ऐसे शारीरिक रोगों के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं, जैसे-कैंसर के कुछ प्रकार। धूम्रपान के द्वारा हमारे आस-पास की वायु प्रदूषित होती है तथा प्लास्टिक एवं धातु से बनी वस्तुओं को जलाने से पर्यावरण पर घोर विपदाकारी प्रदूषण फैलानेवाला प्रभाव होता है।

वृक्षों के कटान या निर्वनीकरण के द्वारा कार्बन चक्र एवं जल चक्र में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। इससे अंतत: उस क्षेत्र विशेष में वर्षा के स्वरूप पर प्रभाव पड़ सकता है और भू-क्षरण तथा मरुस्थलीकरण में वृद्धि हो सकती है। वे उद्योग जो निस्सारी का बहिर्वाह करते हैं तथा इस असंशोधित गंदे पानी को नदियों में प्रवाहित करते हैं, इस प्रदूषण के भयावह भौतिक (शारीरिक) तथा मनोवैज्ञानिक परिणामों से तनिक भी चिंतित प्रतीत नहीं होते हैं।

मानव व्यवहार पर पर्यावरणी प्रभाव –

1. प्रत्यक्ष पर पर्यावरणी प्रभाव-पर्यावरण के कुछ पक्ष मानव प्रत्यक्षण को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, अफ्रीका की एक जनजाति समाज गोल कुटियों (झोपड़ियों) में रहती है अर्थात् ऐसे घरों में जिनमें कोणीय दीवारें नहीं हैं। वे ज्यामितिक भ्रम (मूलर-लायर भ्रम) में कम त्रुटि प्रदर्शित करते हैं, उन व्यक्तियों की अपेक्षा जो नगरों में रहते हैं और जिनके मकानों में कोणीय दीवारें होती हैं।

2. संवेगों पर पर्यावरणीय प्रभाव-पर्यावरण का प्रभाव हमारी सांवेगिक प्रतिक्रियाओं पर भी पड़ता है। प्रकृति के प्रत्येक रूप का दर्शन चाहे वह शांत नदी का प्रवाह हो, एक मुस्कुराता हुआ फूल हो, या एक शांत पवर्त की चोटी हो, मन को एक ऐसी प्रसन्नता से भर देता है जिसकी तुलना किसी अन्य अनुभव से नहीं की जा सकती।

प्राकृतिक विपदाएँ; जैसे-बाढ़, सूखा, भू-स्खलन, भूकंप चाहे पृथ्वी के ऊपर हो या समुद्र के नीचे हो, वह व्यक्ति के संवेगों पर इस सीमा तक प्रभाव डाल सकते हैं कि वे गहन अवसाद और दुःख तथा पूर्ण असहायता की भावना और अपने जीवन पर नियंत्रण के अभाव का अनुभव करते हैं। मानव संवेगों पर ऐसा प्रभाव एक अभिघातज अनुभव है जो व्यक्तियों के जीवन को सदा के लिए परिवर्तित कर देता है तथा घटना के बीत जाने के बहुत समय बाद तक भी अभिघातज उत्तर दबाव विकार (Post-traumatic stress disorder, PTDS) के रूप में बना रहता है।

3. व्यवसाय, जीवन शैली तथा अभिवृतियों पर पारिस्थितिक का प्रभाव-किसी क्षेत्र का प्राकृतिक पर्यावरण या निर्धारित करता है कि उस क्षेत्र के उस क्षेत्र के निवासी कृषि पर (जैसे-मैदानों में) या अन्य व्यवसायों, जैसे-शिकार तथा संग्रहण पर (जैसे-वनों, पहाड़ों या रेगिस्तानी क्षेत्रों में) या उद्योगों पर (जैसे-उन क्षेत्रों में जो कृषि के लिए उपजाऊ नहीं है) निर्भर रहते हैं परन्तु किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र के निवासियों के व्यवसाय भी उनकी जीवन शैली और अभिवृत्तियों का निर्धारण करते हैं।

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प्रश्न 5.
मानस के लिए-व्यक्तिगत स्थान’ का संप्रत्यय क्यों महत्त्वपूर्ण है? अपने उत्तर को एक उदाहरण की सहायता से उचित सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
व्यक्गित स्थान (Personal space) या वह सुविधाजनक भौतिक स्थान जिसे व्यक्ति अपने आस – पास बनाए रखना चाहता है, अधिक घनत्व वाले पर्यावरण से प्रभावित होता है। भीड़ में व्यक्तिगत स्थान प्रतिबंधित है। व्यक्तिगत स्थान का संप्रत्यय निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है –

1. यह भीड़ के निषेधात्मक प्रभावों को एक पर्यावरणी दबाव कारक के रूप में समझता है।

2. यह हमें सामाजिक संबंधों के बारे में बताता है। उदाहरण के लिए, दो व्यक्ति यदि एक-दूसरे. से काफी निकट खड़े या बैठे हों तो उनका प्रत्यक्ष मित्र या संबंधी के रूप में होता है। जब एक छात्र विद्यालय पुस्तकालय में जाता है और यदि उसका मित्र जिस मेज पर बैठा है उसके निकट का स्थान खाली है तो वह उसके निकट के स्थान पर ही बैठता है। किन्तु यदि उस मेज पर कोई अपरिचित बैठा है और उसके निकट स्थान खाली है तो इस बात की संभावना कम है कि वह उस व्यक्ति के निकट के स्थान पर बैठेगा।

3. हमें कुछ सीमा तक यह ज्ञात होता है कि भौतिक स्थान को किस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है जिससे कि सामाजिक स्थितियों में दबाव अथवा असुविधा में कमी की जा सके अथवा सामाजिक अंत:क्रिया को अधिक आनंददायक तथा उपयोगी बनाया जा सके।

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प्रश्न 6.
‘विपदा’ पद से आप क्या समझते हैं? अभिघातज उत्तर दबाव विकार के लक्षणों को सूचीबद्ध कीजिए। उसका उपचार कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाएँ ऐसे दबावपूर्ण अनुभव हैं जो कि प्रकृति के प्रकोप के परिणाम हैं अर्थात् जो प्राकृतिक पर्यावरण में अस्त-व्यस्तता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। प्राकृतिक विपदाओं के भी उदाहरण भूकंप, सूनामी, बाढ़, तूफान तथा ज्वालामुखीय उद्गार हैं। अन्य विपदाओं के भी उदाहरण मिलते हैं, जैसे-युद्ध, औद्योगिक दुर्घटनाओं (जैसे-औद्योगिक कारखानों में विषैली गैस अथवा रेडियो सक्रिय तत्त्वों का रिसाव) अथवा महामारी (उदाहरण के लिये, प्लेग जिसने 1994 में हमारे देश के अनेक क्षेत्रों में तबाही मची थी)।

किन्तु, युद्ध तथा महा मानव द्वारा रचित घटनाएँ हैं, यद्यपि उनके प्रभाव भी उतने ही गंभीर हो सकते हैं जैसे कि प्राकृतिक विपदाओं के। इन घटनाओं को ‘विपदा’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्हें रोका नहीं जा सकता, प्रायः ये बिना किसी चेतावनी के आती हैं और मानव जीवन एवं संपत्ति को इनसे अत्यधिक क्षति पहुँचाती है।

अभिधातज उत्तर दबाव विकास (पी.टी.एस.डी) एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है जो अभिघातज घटनाओं, जैसे-प्राकृतिक विपदाओं के कारण उत्पन्न होती है। इस विकास के निम्नलिखित कारण हैं –

1. किसी विपदा के प्रति तात्कालिक प्रतिक्रिया सामान्यत: अनभिविन्यास (आत्म-विस्मृति) की होती है। सामान्य जन को यह समझने में कुछ समय लगता है कि इस विपदा का पूरा अर्थ क्या है तथा इसने उनके जीवन में क्या कर दिया है। कभी-कभी वे स्वयं अपने से यह स्वीकार। नहीं करते कि उनके साथ कोई भयंकर घटना घटी है। इन तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के पश्चात् शारीरिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं।

2. शारीरिक प्रतिक्रियाएँ-जैसे बिना कार्य किए भी शारीरिक परिश्रति, निद्रा में कठिनाई, भोजन के स्वरूप में परिवर्तन, हृदयगति और रक्तचाप में वृद्धि तथा एकाएक चौंक पड़ना पीड़ित व्यक्तियों में सरलता से दृष्टिगत होती हैं।

3. सामाजिक प्रतिक्रियाएँ, जैसे-शोक एवं भय, चिड़चिड़ापन क्रोध (“यह मेरे ही साथ क्यों घटित हुआ”) सहायता की भावना, निराशा (“इस घटना का निवारण करने के लिए मैं कुछ कर सका/सकी”) अवसाद, कभी-कभी पूर्ण संवेग-शून्यता अपराध भावना कि व्यक्ति स्वयं जीवित है जबकि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो गई, स्वयं अपने को दोष देना तथा जीवन के नेमी क्रियाकलापों (Routine activities) में भी अभिरुचि का अभाव।

4. संज्ञानात्मक प्रतिक्रियाएँ, जैसे-आकुलता, एकाग्रता में कठिनाई, अवधान विस्तृति में कमी, संभ्रम, स्मृतिलोप या ऐसी सुस्पष्ट स्मृतियाँ जो वांछित हैं (अथवा, घटना का दुःस्वप्न)।

5. सामाजिक प्रतिक्रियाएँ, जैसे-दूसरों से विननिवर्तन (Withdra), दूसरों के साथ द्वंद्व, प्रियजनों के साथ भी अक्सर विवाद और अस्वीकृति महसूस करना या अलग-अलग पड़ जाना।

6. यह आश्चर्यजनक है कि अक्सर कुछ उत्तरजीवी, दबाव के प्रति प्रबल सांवेगिक प्रतिक्रियाओं के मध्य में भी, वास्तव में स्वस्थ होने की प्रक्रिया में दूसरों के लिए सहायक होते हैं। इन अनुभवों को सामना करने के बाद भी जीवित बच जाने तथा अपना अस्तित्व बचाए रखने से व्यक्ति जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर लेते हैं तद्नुभूति के द्वारा इस अभिवृत्ति को दूसरे उत्तरजीवियों में विकसित कराने में समर्थ हो जाते हैं।

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प्रश्न 7.
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार क्या है? प्रदूषण के पर्यावरण का संरक्षण कैसे किया जा सकता है? कुछ सुझाव दीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार (Pro-environmental behaviour) के अनतर्गत वे दोनों प्रकार के व्यवहार आते हैं जिनका उद्देश्य पर्यावरण की समस्याओं से संरक्षण करना है तथा स्वस्थ पर्यावरण को उन्नत करना है। प्रदूषण से पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए कुछ प्रोत्साहन क्रियाएँ निम्नलिखित हैं:

1. वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है, वाहनों को अच्छी हालत में रखने से अथवा ईंधन रहित वाहन चलाने से और धूम्रपान की आदत छोड़ने से।

2. शोर के प्रदूषण में कमी लाई जा सकती है, यह सुनिश्चित करके कि शोर का प्रबलता स्तर मद्धिम हो। उदाहरण के लिए सड़क पर अनावश्यक हॉर्न बजाने का कम कर अथवा ऐसे नियमों का निर्माण कर जो शोर वाले संगीत को कुछ विशेष समय पर प्रतिबंधित कर सकें।

3. कूड़ा-करकट से निपटने का उपयुक्त प्रबंधन, उदाहरण के लिए जैविक रूप से नष्ट होने वाले तथा जैविक से नष्ट नहीं होने वाले अवशिष्ट कूड़े का पृथक कर या रसोईघर की अवशिष्ट सामग्री से खाद बनाकर। इस प्रकार के उपायों का उपयोग घर तथा सार्वजनिक स्थानों पर किया जाना चाहिए। औद्योगिक तथा अस्पताल की अवशिष्ट सामग्रियों के प्रबंधन के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

4. वृक्षारोपण करना तथा उनकी देखभाल की व्यवस्था, यह ध्यान में रखकर करने की आवश्यकता है कि ऐसे पौधे और वृक्ष नहीं लगाने चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों।

5. प्लास्टिक के उपयोग का किसी भी रूप में निषेध करना, इस प्रकार ऐसी विषैली अवशिष्ट सामग्रियों को कम करना जिनसे जल, वायु तथा मृदा का प्रदूषण होता है।

6. उपभोक्ता वस्तुओं का वेष्टन या पैकेज जैविक रूप से नष्ट होने वाले पदार्थों में कम बनाना। ऐसे निर्माण नियमों का बनाना (विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में) जो इष्टतम पर्यावरणी अभिकल्प का उल्लंघन न करने दें।

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प्रश्न 8.
“निर्धनता’ ‘भेदभाव से कैसे संबंधित है? निर्धनता तथा वंचन के मुख्य मनोवैज्ञानिक, प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्धनता की सर्वसामान्य परिभाषा है कि यह एक ऐसी दशा है जिसमें जीवन में आवश्यक वस्तुओं का अभाव होता है तथा इसका संदर्भ समाज में धन अथवा संपत्ति का असमान विवरण होता है। जाति तथा निर्धनता के कारण सामाजिक असुविधा द्वारा सामाजिक भेदभाव या विभेदन (Social discrimination) की समस्या उत्पन्न हुई है। भेदभाव प्रायः पूर्वाग्रह से संबंधित होते हैं। निर्धनता के संदर्भ में भेदभाव का अर्थ उन व्यवहारों से है जिनके द्वारा निर्धन तथा धनी के बीच विभेद किया जाता है जिससे धनी तथा सुविधासंपन्न व्यक्तियों का निर्धन का निर्धन तथा सुविधावचित व्यक्तियों में क्षमता होते हुए भी उन्हें उन अवसरों से दूर रखा जाता है जो समाज के बाकी लोगों को उपलब्ध होते हैं।

निर्धनों के बच्चों को अच्छे विद्यालयों में अध्ययन करने या अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग करने तथा रोजगार के अवसर नहीं मिलते हैं। सामाजिक असुविधा तथा भेदभाव के कारण निर्धन अपनी सामाजिक-आर्थिक दशा को अपने प्रयासों से उन्नत करने में बाधित हो जाते हैं और इस प्रकार निर्धन और भी निर्धन हो जाते हैं। संक्षेप में, निर्धनता तथा भेदभाव इस प्रकार के संबद्ध है कि भेदभाव निर्धनता का कारण तथा परिणाम दोनों ही हो जाता है। यह सुस्पष्ट है कि निर्धनता या जाति के आधार पर भेदभाव सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण है तथा उसे घटना ही होगा।

निर्धनता तथा वंचन की मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ तथा उनके प्रभाव-निर्धनता तथा वंचन हमारे समाज की सुस्पष्ट समस्याओं में से है। भारतीय समाज-विज्ञानियों ने जिनमें समाजशात्री, मनोवैज्ञानिक तथा अर्थशास्त्री सभी शामिल हैं, समाज के निर्धन एवं वंचित वर्गों के ऊपर सुव्यवस्थित शोधकार्य किए हैं। उनके निष्कर्ष तथा प्रेक्षण यह प्रदर्शित करते हैं कि निर्धनता तथा वंचन के प्रतिकूल प्रभाव अभिप्रेरणा, व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार, संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य पर परिलक्षित होते हैं।

1. अभिप्रेरणा के संबंध में पाया गया है कि निर्धन व्यक्तियों में निम्न आकांक्षा स्तर और दुर्बल उपलब्धि अभिप्रेरणा तथा निर्धनता की प्रबल आवश्यकता परिलक्षित होती हैं। वे अपने सफलताओं की व्याख्या भाग्य के आधार पर करते हैं न कि योग्यता कठिन पश्रिम के आधार पर। सामान्यतः उनका यह विश्वास होता है कि उनके बाहर जो घटक हैं वे उनके जीवन की घटनाओं की नियंत्रित करते हैं, उनके भीतर के घटक नहीं।

2. जहाँ तक व्यक्तित्व का संबंध हे निर्धन एवं वंचित व्यक्तियों में आत्म-सम्मान का निम्न स्तर और दुश्चिंता तथा अंतर्मुखता में खोए रहते हैं। वे बड़े किन्तु सुदूर पुरस्कारों की तुलना में छोटे किन्तु तात्कालिक पुरस्कारों को अधिक वरीयता देते हैं क्योंकि उनके प्रत्यक्षण के अनुसार भविष्य बहुत ही अनिश्चित है। वे निराशा, व्यक्तिहीनता और अनुभूत अन्याय के बोध के साथ जीते हैं तथा अपनी अपन्यता के खो जाने का अनुभव करते हैं।

3. सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में निर्धन तथा वंचित वर्ग समाज के शेष वर्गों के प्रति अमर्ष या विद्वेष की अभिवृत्ति रखते हैं।

4. संज्ञानात्मक प्रकार्यों पर दीर्घकालीन वंचन के प्रभाव के संबंध में यह पाया गया है कि निम्न की अपेक्षा उच्च वंचन स्तर के पीड़ित व्यक्तियों में ऐसे कृत्यों (जैसे-वर्गीकरण, शाब्दिक तर्क, काल प्रत्यक्ष तथा चित्र गहनात प्रत्यक्षण) पर बौद्धिक क्रियाएँ तथा निपष्पादन निम्न स्तर के होते हैं। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि वंचन का प्रभाव इसलिए होता है क्यों कि जिस परिवेश में बच्चे पलकर बड़े होते हैं चाहे वह साधन संपन्न हों या कंगाल, वह उनके संज्ञानात्मक विकास की प्रभावित करता है तथा या उनके संज्ञानात्मक कृत्य निष्पादन में परिलक्षित होता है।

5. जहाँ तक मानसिक स्वास्थ्य का संबंध है, मानसिक विकारों तथा निर्धनता या वंचन में ऐसा संबंध है जिस पर प्रश्नचिह्न भी नहीं लगाया जा सकता है। निर्धन व्यक्तयों में कुछ विशिष्ट मानसिक रोगों से पीड़ित होने की संभावना, धनी व्यक्तियों की अपेक्षा, संभवतः इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि वे मूल आवश्यकताओं के विषय में निरंतर चिंतित रहते हैं, असुरक्षा की भावना अथवा चिकित्सा-सुविधाओं, विशेष रूप से मानसिक रोगों के लिए, की अनुपलब्धता से ग्रस्त रहते हैं।

वस्तुत: यह सुझाव भी दिया गया है कि अवसाद प्रमुखतया निर्धन व्यक्तियों का ही मानसिक विकास है। इनके अतिरिक्त, निर्धन निराशा-भावना तथा अन्नयता के खो जाने का भी ऐसे अनुभव करते हैं जैसे कि वे समाज के अंग ही नहीं है। इसके परिणामस्वरूप वे संवेगात्मक तथा समायोजन संबंधी समस्याओं से भी पीड़ित होते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology Solutions Chapter 8 मनोविज्ञान एवं जीवन

प्रश्न 9.
‘नैमत्तिक आक्रमण’ तथा शत्रुतापूर्ण आक्रमण’ में अंतर कीजिए। आक्रात्मक तथा हिंसा को कम करने हेतु कुछ युक्तियों का सुझाव दीजिए।
उत्तर:
‘नैमित्तिक आक्रमण’ तथा ‘शत्रुतापूण आक्रमण’ में अंतरः
नैमित्तिक आक्रमण (Instrumental aggression) तथा शत्रुतापूर्ण आक्रमण (Hostile aggression) में भी भेद किया जाता है। जब किसी लक्ष्य या वस्तु को प्राप्त करने के लिए आक्रमण किया जाता है तो उसे नैमित्तिक आक्रमण कहते हैं। उदाहरण के लिए, एक दबंग छात्र विद्यालय में नए विद्यार्थी को इसलिए चपत लगाता है जिससे कि वह उसकी चॉकलेट ले सके।

शत्रुतापूर्ण आक्रमण वह कहलाता है जिसमें लक्ष्य (पीड़ित) के प्रति क्रोध की अभिव्यक्ति होती है या उसे हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है, जबकि हो सकता है कि आक्रमण का आशय पीड़ित व्यक्ति से कुछ भी प्राप्त करना न हो। उदाहरण के लिए, समुदाय के किसी व्यक्ति की एक अपराधी इसलिए पिटाई कर देता है क्योंकि उसने पुलिस के समक्ष अपराधी का नाम लिया।

आक्रामकता तथा हिंसा को कम करने की युक्तियाँ –

1. माता-पिता तथा शिक्षकों को विशेष रूप से सतर्क करने की आवश्यकता है कि वे आक्रामकता को किसी भी रूप में प्रोत्साहित या पुरस्कृत न करें, अनुशासित करने के लिए दंड के उपयोग को भी परिवर्तित करना होगा।

2. आक्रामक मॉडलों के व्यवहारों को प्रेक्षपण करने तथा उनका अनुकरण करने के लिए अवसरों को कम करने की आवश्यकता है। आक्रमण को वीरोचित व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करने को विशेष रूप में परिहार की आवश्यकता है क्योंकि इससे प्रेक्षण द्वारा अधिगम करने के लिए उपयुक्त परिस्थिति का निर्माण होता है।

3. निर्धनता तथा सामाजिक अन्याय आक्रमण के प्रमुख कारण हो सकते हैं क्योंकि वह समाज के कुछ वर्गों में कुंठा उत्पन्न कर सकते हैं। सामाजिक न्याय तथा समानता को समाज में परिपालन करने से कुंठा के स्तर को कम करने तथा उसके द्वारा आक्रामक प्रवृतित्तयों को नियंत्रित करने में कम-से-कम कुछ सीमा तक सफलता मिल सकती है।

4. इन उक्तियों के अतिरिक्त सामाजिक या सामुदायिक स्तर पर यह आवश्यक है कि शांति के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास किया जाए। हमें न केवल आक्रामकता को कम करने की आवश्यकता है बल्कि इसकी भी आवश्यकता है कि हम सक्रिय रूप से शांति विकसित करें एवं उसे बनाए रखें। हमारे अपने संस्कृति मूल्य सदा शांतिपूर्ण तथा सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को अधिक महत्त्व देते हैं। हमारे राष्ट्रीय महात्मा गाँधी ने विश्व की शांति कार एक नया दृष्टिकोण दिया जबकि आक्रमण का अभाव नहीं था, यह अहिंसा (Non-violence less) का विचार था, जिस पर उन्होंने स्वयं जीवन भर अभ्यास किया।

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प्रश्न 10.
मानव व्यहार पर टेलीविजन देखने के मनोवैज्ञानिक समाघात का विवेचन कीजिए। उसके प्रतिकूल परिणामों को कैसे कम किया जा सकता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मानव व्यवहार पर टेलीविजन देखने का मनोवैज्ञानिक समाघात-इसमें कोई संदेह नहीं है कि टेलीविजन प्रौद्योगिक प्रगति कार एक उपयोगी उत्पाद है, किन्तु उसके मानव पर मनोवैज्ञानिक समाघात के संबंध में दोनों सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव पाए गए हैं। अनेक शोध अध्ययनों में टेलीविजन देखने की संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक व्यवहारों पर प्रभाव का अध्ययन किया गया, है विशेष रूप से पाश्चात्य संस्कृतियों में उनके निष्कर्ष मिश्रित (मिले-जुले) प्रभाव दिखाते हैं। अधिकांश अध्ययन बच्चों पर किए गए हैं क्योंकि ऐसा समझा जाता है कि वे वयस्कों की अपेक्षा टेलीविजन के समाघात के प्रति अधिक संवेदनशील या असुरक्षित हैं।

1. टेलीविजन बड़ी मात्र में सूचनाएँ और मनोरंजन को आकर्षक रूप से प्रस्तुत करता है तथा यह दृश्य माध्यम है, अतः यह अनुदेश देने का एक प्रभावी माध्यम बन गया। इसके साथ ही क्योंकि कार्यक्रम आकर्षक होते हैं, इसलिए बच्चे उन्हें देखने में बहुत अधिक समय व्यतीत करते हैं। इसके कारण उनके पठन-लेखन (पढ़ने-लिखने) की आदत तथा घर के बाहर की गतिविधि यों जैसे-खेलने में कम आती है।

2. टेलीविजन देखने से बच्चों की एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की योग्यता, उनकी सर्जनात्मकता तथा समझने की क्षमता तथा उनकी सामाजिक अंतः क्रियाएँ भी प्रभावित हो सकता है। एक ओर, कुछ श्रेष्ठ कार्यक्रम सकारात्मक अंतर्वैयक्तिक अभिवृत्तियों पर बल देते हैं तथा उपयोगी तथ्यात्मक सूचनाएँ उपलब्ध कराते हैं जो बच्चों को कुछ वस्तुओं को अभिकल्पित तथा निर्मित करने में सहायता करते हैं। दूसरी ओर, ये कार्यक्रम कम उम्र के दर्शकों का विकर्षण या चित्त-अस्थिर कर एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने की उनकी योग्यता में व्यवधान उत्पन्न कर सकते हैं।

3. लगभग चालीस वर्ष पूर्व अमेरिका तथा कनाडा में एक गंभीर वाद-विवाद इस विषय पर उठा कि टेलीविजन देखने का दर्शकों, विशेषकर बच्चों की आक्रामकता तथा हिंसात्मक प्रवृत्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है। जैसा कि पहले आक्रामक व्यवहारों के संदर्भ में बताया जा चुका है, शोध के परिणामों ने यह प्रदर्शित किया कि टेलीविजन पर हिंसा को देखना वस्तुतः दर्शकों में अधिक आक्रामकता से संबद्ध था।

यदि दर्शक बच्चे थे तो जो कुछ वे देखते थे उसका अनुकरण करने की उनमें प्रवृत्ति थी किन्तु उनमें ऐसे व्यवहारों के परिणामों को समझने की परिपक्वता नहीं थी। तथापि, कुछ अन्य शोध-निष्कर्ष यह भी प्रदर्शित करते हैं कि हिंसा को देखने से दर्शकों में वस्तुतः सहज आक्रामक प्रवृत्तियों में कमी आ सकती है-जो कुछ भीतर रुका हुआ है उसे निकास या निर्गम का मार्ग मिल जाता है, इस प्रकार तंत्र साफ हो जाता है, जैसे कि एक बंद निकास-नल की सफाई हो रही है। यह प्रक्रिया केथार्सिस (Catharisis) कहलाती है।

4. वयस्कों तथा बच्चों के संबंध में यह कहा जात है कि एक उपभोक्तावादी अभिवृत्ति (प्रवृत्ति) विकसित हो रही है और यह टेलीविजन देखने के कारण है। बहुत से उत्पादों के विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं तथा किसी दर्शक के लिए उनके प्रभाव में आ जाना काफी स्वाभाविक प्रक्रिया है। इन परिणामों की चाहे कैसे भी व्याख्या की जाए इस बात के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं जो असीमित टेलीविजन देखने के प्रति चेतावनी देते हैं।

Bihar Board Class 12 Psychology मनोविज्ञान एवं जीवन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राकृतिक पर्यावरण क्या है?
उत्तर:
प्रकृति वह अंश जिसे मानव ने नहीं छुआ है, वह प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।

प्रश्न 2.
निर्मित पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक पर्यावरण में जो कुछ भी मानव द्वारा सर्जित है, वह निर्मित पर्यावरण है। उदाहरण-मकन, पुल, सड़कें बाँध आदि।

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प्रश्न 3.
किस मनोवैज्ञानिक ने मानव-पर्यावरण संबंधी का विवरण प्रस्तुत करने के लिए तीन उपागमों का वर्णन किया है?
उत्तर:
स्टोकोल्स ने मानव-पर्यावरण संबंधी का विवरण प्रस्तुत करने के लिए तीन उपागमों का वर्णनन किया है।

प्रश्न 4.
स्टोकोल्स नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा प्रस्तुत तीन उपागमों का नाम बताइए।
उत्तर:
स्टोकोल्स द्वारा मानव-पर्यावरण संबंधी का विवरण प्रस्तुत करने के वर्णित तीन उपागम –

  1. अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य
  2. नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
  3. आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

प्रश्न 5.
नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य का मानव-पर्यावरण संबंध के बारे में क्या मानना है?
उत्तर:
अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य का यह अभिग्रह है कि भौतिक पर्यावरण मानव व्यवहार, स्वास्थ्य तथा कुशल क्षेम पर न्यूनतम या नगण्य प्रभाव डालता है।

प्रश्न 6.
नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य क्या प्रस्तावित करता है?
उत्तर:
नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तावित करता है कि भौतिक पर्यावरण की अस्तित्व ही प्रमुखतया मनुष्य के सुख एवं कल्याण के लिए है। पर्यावरण के ऊपर मनुष्य के अधिकांश प्रभाव इसी नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य का प्रतिबिंबित करते हैं।

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प्रश्न 7.
आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य मानव-पर्यावरण संबंध का किस रूप में विवरण प्रस्तुत करता है।
उत्तर:
आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य पर्यावरण को एक सम्मान योग्य और मूल्यवान वस्तु के रूप में संदर्भित करता है अर्थात् इसका मानना है कि मनुष्य तभी स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे जब पर्यावरण का स्वस्थ तथा प्राकृतिक रखा जायेगा।

प्रश्न 8.
पर्यावरण के विषय में भारतीय दृष्टिकोण किस परिप्रेक्ष्य को मान्यता देता है?
उत्तर:
पर्यावरण के विषय में पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य को मान्यता देता है।

प्रश्न 9.
पर्यावरणी मनोविज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान की एक शाखा जो अनेक ऐसे मनोवैज्ञानिक मुद्दों का अध्ययन करता है जिनका संबंध व्यापक अर्थ में मानव-पर्यावरण अंतः क्रियाओं से होता है, पर्यावरणी मनोविज्ञान कहलाता है।

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प्रश्न 10.
आजकल किन पर्यावरणी समस्याओं के प्रति जागरुकता बढ़ रही है?
उत्तर:
आजकल पर्यावरणी समस्याएँ-शोर वायु, जल तथा प्रदूषण और कूड़े को निपटाने के असंतोषजनक उपायों का शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़नेवाले क्षतिकर प्रभाव के प्रति जागरुकता बढ़ रही है।

प्रश्न 11.
पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण शब्द हमारे चारों ओर जो कुछ है उसे संदर्भित है। व्यक्ति के बाहर जो शक्तियाँ है जिनके प्रति व्यक्ति अनुक्रिया करता है वे सब पर्यावरण में निहित हैं।

प्रश्न 12.
पारिस्थितिकी क्या है?
उत्तर:
पारिस्थितिकी जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन है।

प्रश्न 13.
दबाव क्या है?
उत्तर:
दबाव एक अप्रिय मनोवैज्ञानिक स्थिति है जो व्यक्ति में तनाव तथा दुश्चिंता उत्पन्न करती है।

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प्रश्न 14.
शोर क्या है?
उत्तर:
कोई भी ध्वनि जो खीझ या चिड़चिड़ाहट उत्पन्न करे और अप्रिय हो, उसे शोर कहते हैं।

प्रश्न 15.
कार्य निष्पादन पर शोर के प्रभाव को उसकी कौन-सी विशेषताएँ निर्धारित करती हैं?
उत्तर:
शोर की तीन विशेषताएँ शोर की तीव्रता, भविष्यकथनीयता तथा नियंत्रणीयता कार्य निष्पादन पर शोर के प्रभाव को निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 16.
शोर का क्या प्रभाव होता है?
उत्तर:
शोर हमारे चिंतन, स्मृति तथा अधिगम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। शोर से हमारी सुनने की क्षमता में कमी आ सकती है तथा मानसिक क्रियाओं पर निषेधात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे एकाग्रता कम हो जाती है।

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प्रश्न 17.
पर्यावरणी प्रदूषण कितने रूपों में हो सकता है?
उत्तर:
पर्यावरणी प्रदूषण वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के रूपों में हो सकता है।

प्रश्न 18.
प्रदूषण क्या होता है?
उत्तर:
प्रदूषण किसी प्राकृतिक संसाधन की गुणवत्ता में अनचाहा परिवर्तन है जो जीने वालों के लिए हानिकारक हो सकता है।

प्रश्न 19.
कुछ ऐसे अवशिष्ट पदार्थों के उदाहरण दें जो जैविक रूप से क्षरणशील नहीं होते।
उत्तर:
प्लास्टिक, टीन तथा धातु से बने पात्र ऐसे अवशिष्ट पदार्थ हैं जो जैविक रूप से झरणशील नहीं होते।

प्रश्न 20.
हमारे देश के संदर्भ में आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
हमारे देश में अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य के दो उदाहरण हैं-राजस्थान के विश्नोई समुदाय के रीति-रिवाज तथा उत्तराखण्ड क्षेत्र के चिपको आंदोलन।

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प्रश्न 21.
अभिघातज उत्तर दबाव विकास क्या है?
उत्तर:
अभिघाज उत्तर दबाव विकास एक मनोवैज्ञानिक समस्या है जो अभिघातज घटनाओं जैसे-प्राकृतिक विपदाओं के कारण उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 22.
रेफ्रीजरेटर तथा वातानुकूलन यंत्र किस रासायनिक द्रव्य को उत्पादित करते हैं?
उत्तर:
रेफ्रीजरेटर तथा वातानुकूल यंत्र सी.एफ.सी. या क्लोरो-फ्लोरो रासायनिक द्रव्य को उत्पादित करते हैं।

प्रश्न 23.
वृक्षों का कटान किस प्रकार का व्यवधान उत्पन्न करता है?
उत्तर:
वृक्षों का कटान कार्बन चक्र एवं जल चक्र में व्यवधान उत्पन्न करता है।

प्रश्न 24.
पर्यावरणी दबावकरकों के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
शोर, प्रदूषण, भीड़ तथा प्राकृतिक विपदाएँ ये सब पर्यावरणी दबाव कारकों को उदाहरण हैं।

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प्रश्न 25.
अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरी किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामाजिक स्थितियों में मनुष्य जिन व्यक्तियों के साथ अंत:क्रिया कर रहा होता है उनके साथ एक विशेष भौतिक (शारीरिक) दूरी बनाए रखना चाहता है। इसे अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरी कहते हैं।

प्रश्न 26.
प्राकृतिक विपदाएँ क्या हैं?
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाएँ ऐसे दबावपूर्ण अनुभव है जो कि प्रकृति प्रकोप के परिणाम हैं अर्थात् जो प्राकृतिक पर्यावरण में अस्तव्यस्तता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। उदाहरण-भूकंप, सुनानी, बाढ़, तूफान आदि।

प्रश्न 27.
प्राकृतिक घटनाओं को विपदा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
भूकंप, बाढ़, तूफान तथा ज्वालामुखीय उद्गार आदि प्राकृतिक घटनाओं को विपदा इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्हें रोका नहीं जा सकता, प्रायः ये बिना किसी चेतावनी के आती तथा मानव जीवन एवं संपत्ति को इनसे अत्यधिक क्षति पहुँचती है।

प्रश्न 28.
प्राकृतिक विपदाओं के एक प्रभाव को लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाओं के पश्चात् सामान्य जन निर्धनता की चपेट में आ जाते हैं बेघर तथा संसाधन रहित हो जाते हैं और उनका सब कुछ क्षतिग्रस्त और नष्ट हो जाता है।

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प्रश्न 29.
प्राकृतिक विपदाओं के विध्वंसक परिणामों को कम करने हेतु किस प्रकार की तैयार की जा सकती है?
उत्तर:
प्राकृतिक विपदाओं के विध्वंसक परिणामों को कम करने हेतु अग्र तैयारी की जा सकती है –

  1. चेतावनी
  2. सुरक्षा उपायों के द्वारा और
  3. मनोवैज्ञानिक विकारों के उपचार द्वारा

प्रश्न 30.
वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के स्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर:
अवशिष्ट पदार्थ या कूड़ा-करकट जो घरों या उद्योगों से निकलते हैं, वाहनों से निकलनेवाले विषैला धुआँ, चिमनियों से निकलनेवाले धुआँ, औद्योगिक धूल, तम्बाकू, पाल आदि वायु, जल तथा भूमि प्रदूषण के बड़े स्रोत हैं।

प्रश्न 31.
भीड़ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक विशिष्ट क्षेत्र या दिक् में बड़ी संख्या में व्यक्तियों की उपस्थिति के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया ही भीड़ कहलाती है।

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प्रश्न 32.
भीड़ के अनुभव के किन्हीं दो लक्षणों को बताइए।
उत्तर:
भीड़ के अनुभव के दो लक्षण निम्नलिखित है –

  1. असुस्थता की भावना
  2. वैयक्तिक स्वतंत्रता में न्यूनता या कमी

प्रश्न 33.
भीड़ सहिष्णुता क्या है?
उत्तर:
भीड़ सहिष्णुता, अधिक घनत्व या भीड़वाले पर्यावरण के साथ मानसिक रूप से संयोजन करने की योग्यता की संदर्भित करती है। जैसे-घर के भीतर भीड़।

प्रश्न 34.
प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता वह योग्यता है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति उस स्थिति को भी सह लेता है जिसमें उसे माल संसाधनों यहाँ तक कि भौतिक स्थान के लिए भी अनेक व्यक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती हैं।

प्रश्न 35.
भारतीय समाज में सामाजिक असुविधा का एक प्रमुख कारण बताइए।
उत्तर:
भारतीय समाज में सामाजिक असुविधा का एक प्रमुख कारण जाति व्यवस्था रही है।

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प्रश्न 36.
सामाजिक असुविधा किस स्थिति को कहते हैं?
उत्तर:
वह स्थिति जिसके कारण समाज के कुछ वर्गों को उन असुविधाओं का उपयोग नहीं करने दिया जाता है जो कि समाज के शेष वर्ग के व्यक्ति करते हैं।

प्रश्न 37.
भेदभाव का क्या अर्थ है?
उत्तर:
भेदभाव का अर्थ उन व्यवहारों से है जिनके द्वारा धनी तथा निर्धन के बीच विभेद किया जाता है जिससे धनी और सुविधासंपन्न व्यक्तियों का निर्धन तथा सुविधावंचित व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक पक्षपात किया जाता है।

प्रश्न 38.
निर्धनता तथा वंचन के प्रभव किन बातों पर परिलक्षित होते हैं?
उत्तर:
निर्धनता तथा वंचन के प्रतिकूल प्रभाव अभिप्रेरणा, व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार, संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य पर परिलक्षित होते हैं।

प्रश्न 39.
सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में निर्धन तथा वंचित वर्ग शेष वर्गों के प्रति किस प्रकार की अभिवृत्ति रखते हैं।
उत्तर:
सामाजिक व्यवहार के संदर्भ में निर्धन तथा वंचित वर्ग समाज के शेष वर्गों के प्रति उमर्ष या विद्वैष की अभिवृत्ति रखते हैं।

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प्रश्न 40.
मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार करने के लिए किस प्रमुख अभिवृत्ति को विकसित करने की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
मनोविज्ञानिक विकारों का उपचार करने के लिए एक प्रमुख अभिवृत्ति जिसे उत्तरजीवियों में विकसित करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 41.
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार के अंतर्गत वे दोनों प्रकार के व्यवहार होते हैं जिनका उद्देश्य पर्यावरण का समस्याओं से संरक्षण करना है तथा ईंधनरहित वाहन चलाने से।

प्रश्न 42.
वायु प्रदुषण को कम करने का कोई एक उपाय बताइए।
उत्तर:
वाहनों को अच्छी हालत में रखने अथवा ईंधनरहित वाहन चलाने से।

प्रश्न 43.
आर्थिक अर्थ में निर्धनता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
आर्थिक अर्थ में निर्धनता का मापन आय, पोषण तथा जीवन की मूल आवश्यकताओं, जैसे-भोजन, वस्तु तथा मकान पर कितनी धनराशि व्यय की जा रही हैं, के आधार पर ही करते हैं।

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प्रश्न 44.
वंचन किस दशा को संदर्भित करता है?
उत्तर:
वंचन उस दशा को संदर्भित करता है जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसने कोई मूल्यवान वस्तु खो दी है तथा उसे वह प्राप्त नहीं हो रही है जिसके लिए वह योग्य है।

प्रश्न 45.
सामाजिक असुविधा या विभेदन की समस्या के उत्पन्न होने के कारण बताइए।
उत्तर:
जाति और निर्धनता के कारण सामाजिक असुविधा द्वारा सामाजिक भेदभाव या विभेदन की समस्या उत्पन्न हुई है।

प्रश्न 46.
हिंसा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दूसरे व्यक्ति या वस्तु के प्रति बलपूर्वक ध्वंसात्मक या विनाशकारी व्यवहार को हिंसा कहते हैं।

प्रश्न 47.
किस प्रकार के आक्रमण को नैमित्तिक आक्रमण की संज्ञा दी जाती है?
उत्तर:
जब किसी लक्ष्य या वस्तु को प्राप्त करने के लिए आक्रमण किया जाता है तो इसे नैमित्तिक आक्रमण कहते हैं।

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प्रश्न 48.
शत्रुतापूर्ण आक्रमण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
शत्रुतापूर्ण आक्रमण वह कहलाता है जिसमें लक्ष्य के प्रति क्रोध की अभिव्यक्ति होती है या उसे हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है जबकि हो सकता है कि आक्रामक का आशय पीड़ित व्यक्ति से कुछ भी प्राप्त करना न हो।

प्रश्न 49.
आक्रमण के किन्हीं दो कारणों को लिखें।
उत्तर:
आक्रमण के दो कारण हैं –

  1. आक्रामकता की सहज प्रवृत्ति का होना और
  2. कुंठा

प्रश्न 50.
निर्धनता की संस्कृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक विश्वास व्यवस्था, जीवन शैली तथा वे मूल्य जिनके साथ निर्धन व्यक्ति पलकर बड़ा हुआ है तथा व्यक्ति को यह मनवा या स्वीकार करवा देती है कि वह तो निर्धन ही रहेगा या रहेगी, निर्धनता की संस्कृति कहलाती है।

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प्रश्न 51.
अन्त्योदय के कार्यक्रमों में किन बातों का प्रावधान किया गया है?
उत्तर:
अन्त्योदय के कार्यक्रम में स्वास्थ्य सुविधाओं, पोषण शिक्षा तथा रोजगार के लिए प्रशिक्षण उन सभी क्षेत्रों जिनमें निर्धन व्यक्तियों को सहायता की आवश्यकता होती है, का प्रावधान किया गया है।

प्रश्न 52.
उस अंतर्राष्ट्रीय समूह का नाम लिखें जो निर्धनों के हित के लिए समर्पित या प्रतिबद्ध है।
उत्तर:
एकॉन एड् ‘एक अंतर्राष्ट्रीय समूह है, जो निर्धनों के हित के लिए समर्पित या प्रतिबद्ध है।

प्रश्न 53.
एक्शन एड् का लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
एकॉन एड् का लक्ष्य निर्धनों को उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना, समानता तथा न्याय के प्रति जागरूक करना तथा उसके लिए पर्याप्त पोषण, स्वास्थ्य तथा शिक्षा एवं रोजगार की सुविधाओं को सुनिश्चित करना है।

प्रश्न 54.
आक्रमण पद का उपयोग मनोवैज्ञानिक किस प्रकार के व्यवहार के लिए करते हैं?
उत्तर:
आक्रमण पद का उपयोग मनोवैज्ञानिक ऐसे किसी भी व्यवहार को इंगित करने के लिए करते हैं जो किसी व्यक्तियों के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति/व्यक्तियों के हानि पहुँचाने के आशय से किया जाता है।

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प्रश्न 55.
कुछ संक्रामक या संचारी रोगों के नाम बताइए।
उत्तर:
एच. आई. वी./एड्स, तपेदिक, मलेरिया, श्वसन-संक्रामक या संचारी रोग हैं।

प्रश्न 56.
कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत क्या है?
उत्तर:
कुठां-आक्रामकता सिद्धांत के अनुसार, कुंठा के कारण आक्रामक व्यवहार उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 57.
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन डोलार्ड ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर किस सिद्धांत का परीक्षण करने के लिए शोध अध्ययन किया?
उत्तर:
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन डोलॉर्ड ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत का परीक्षण करने के लिए विशेष रूप से शोध अध्ययन किया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी को परिभाषित कीजिए। ‘अभिकल्प’ में होने वाले कुछ लक्षणों को लिखिए।
उत्तर:
पारिस्थितिकी जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच के संबंधी का अध्ययन है। मनोविज्ञान में पर्यावरण तथा मनुष्यों की परस्पर निर्भरता पर फोकस है क्योंकि पर्यावरण का अर्थ उन मनुष्यों के आधार पर ही निकलता है जो उसमें रहते हैं। निर्मित पर्यावरण के अंतर्गत साधारणतया पर्यावरणी अभिकल्प (Environmental design) का संप्रत्यय भी आता है। ‘अभिकल्प’ में कुछ मनोवैज्ञानिक लक्षण होते हैं; जैसे –

  1. मानव मस्तिष्क की सर्जनात्मकता, जैसा कि वास्तुविदों, नगर योजनाओं और सिविल अभियंताओं के कार्यों में अभिव्यक्त होता है।
  2. प्राकृतिक पर्यावरण पर नियंत्रण के अर्थ में, जैसा कि नदी के प्राकृतिक बहाव को बाँध कर बनाकर नियमित करने से प्रदर्शित होता है।
  3. निर्मित पर्यावरण में सामाजिक अंत:क्रिया के प्रकार पर प्रभाव। यह विशिष्टता उदाहरण के लिये, कॉलोनी में घरों की बीच कली दूरी, एक घर से कक्षों की अवस्थिति या किसी दफ्तर में औपचारिक तथा औपचारिक सभा के लिए कार्य करने की मेजों और कुर्सियों की व्यवस्था में प्रतिबिंबित होता है।

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प्रश्न 2.
स्थिति पर निर्भरता के आधार पर चार प्रकार की अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्थिति पर निर्भरता के आधार पर चार प्रकार की अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरियों को एडवर्ड हॉल (Edward Hall) नामक मानव विज्ञानी ने बताया है –

  1. अंतरंग दूरी (18 इंच तक)-यह वह दूरी है जो हम तब बनाकर रखते हैं जब हम किसी निजी बातचीत करते हैं या किसी घनिष्ट मित्र या संबंधी के साथ अंत:क्रिया करते हैं।
  2. व्यक्तिगत दूरी (18 इंच से 4 फुट)-यह वह दूरी है जो हम तब बनाकर रखते हैं जब किसी घनिष्ठ मित्र या संबंधी के साथ एकेक अंतः क्रिया करते या फिर कार्य स्थान अथवा दूसरे सामाजिक स्थिति में किसी ऐसे व्यक्ति से अकेले में बात करते हैं जो हमारा बहुत अंतरंग नहीं हैं।
  3. सामाजिक दूरी (8 इंच से 10 फुट)-यह वह दूरी है जो हम उन अंत:क्रियाओं में बनाते हैं जो औचापरिक होते हैं, अंतरंग नहीं।
  4. सार्वजनिक दूरी (10 फीट से अनंत तक)-यह वह दूरी है जो हम औपचारिक स्थिति में, जहाँ बड़ी संख्या में लोग उपस्थिति हों बनाकर रखते हैं। उदाहरण के लिए किसी सार्वजनिक वक्ता से श्रोताओं की या कक्षा में अध्यापक की दूरी होती है।

प्रश्न 3.
प्रतिक्रिया की तीव्रता किन तत्त्वों से प्रभावित होती हैं?
उत्तर:
सामान्यतः प्रतिक्रिया की तीव्रता निम्नलिखित तत्त्वों से प्रभावित होती है –

  1. विपदा की तीव्रता तथा उसके द्वारा की गई क्षति (संपत्ति एवं जीवन), दोनों के संबंध में।
  2. व्यक्ति की सामना करने की सामान्य योग्यता।
  3. विपदा के पूर्व अन्य दबावपूर्ण अनुभव। उदाहरण के लिए जिन व्यक्तियों ने पहले भी दबावपूर्ण स्थितियों का अनुभव किया है उन्हें फिर एक और कठिन और दबावपूर्ण स्थिति में निपटने में अधिक कठिनाई हो सकती है।

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प्रश्न 4.
भीड़ सहिष्णुता तथा प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता में क्या अंतर है?
उत्तर:
भीड़ सहिष्णुता, अधिक घनत्व या भीड़ वाले पर्यावरण के साथ मानसिक रूप से संयोजन करने की योग्यता को संदर्भित करती है; जैसे-घर के भीतर भीड़ (एक छोटे कमरे में बड़ी संख्या में लोग) जो लोग ऐसे पर्यावरण के आदी होते हैं जिसमें अनेक व्यक्ति उनके चारों ओर रहते ही हैं – उदाहरण के लिये वे व्यक्ति जो एक बड़े परिवार में पलकर बड़े होते हैं तथा परिवार एक छोटे मकान में रहता है), वे उन लोगों की अपेक्षा जिन्हें अपने आस-पास केवल कुछ ही व्यक्तियों के रहने की आदत होती, भीड़ सहिष्णुता अधिक विकसित कर लेते हैं। हमारे देश की जनसंख्या विशाल है तथा अनेक व्यक्ति बड़े परिवारों में परंतु छोटे मकानों में रहते हैं।

इसके कारण यह प्रत्याशा होती है कि सामान्यतः भारतीयों में भीड़ सहिष्णुता कम जनसंख्या वाले देशों के वासियों की अपेक्षा अधिक होगी। प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता, वह योग्यता है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति उस स्थिति को भी संह लेता है जिसमें उसे मूल संसाधनों यहाँ तक कि भौतिक स्थान के लिए भी अनेक व्यक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा (प्रतियोगिता) करनी पड़ती है। चूंकि भीड़ की स्थिति में संसाधनों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा की संभावना होती है इसलिए इस स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया भी संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा सहिष्णुता से प्रभावित होगी।

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प्रश्न 5.
वायु-प्रदूषण क्या है और इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?
उत्तर:
आधुनिकीकरण तथा औद्योगिकरण के कारण हमारे पर्यावरण की हवा की गुणवत्ता अत्यधिक प्रभावित हुई है। हवा हमारे तथा सभी जीव-जंतुओं के जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वाहनों तथा उद्योगों से निकलनेवाला धुआँ, धूम्रपान आदि से हवा में खतरनाक जहर घुल जाते हैं। इसे हम वायु-प्रदूषण के नाम से जानते हैं। हम इस समस्या के प्रति अपनी सजगता बढ़ाकर इस पर नियंत्रण कर सकते हैं – वाहनों को अच्छी हालत में रखने से या ईंधनरहित वाहन का उपयोग कर तथा धूम्रपान की आदत छोड़कर हम वायु-प्रदूषण को कम कर सकते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निर्धनता के मुख्य कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –
1. निर्धन स्वयं अपनी निर्धनता के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस मत के अनुसार, निर्धन व्यक्तियों में योग्यता तथा अभिप्रेरणा दोनों की कमी होती है जिसके कारण वे प्रयास करके उपलब्ध अवसरों का लाभ नहीं उठा पाते। सामान्यतः निर्धन व्यक्तियों के विषय में यह मत निषेधात्मक है तथा उनकी स्थिति को उत्तम बनाने में तनिक भी सहायता नहीं करता है।

2. निर्धनता का कारण कोई व्यक्ति नहीं अपितु एक विश्वास व्यवस्था, जीवन शैली तथा वे मूल्य हैं जिनके साथ वह पलकर बड़ा हुआ है। यह विश्वास व्यवस्था, जिसे निर्धनता की संस्कृति’ (Culture of poverty) कहा जाता है, व्यक्ति को यह मनवा या स्वीकार करवा देती है कि वह तो निर्धन ही रहेगा/रहेगी तथा यह विश्वास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता है।

3. आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक कारक मिलकर निर्धनता का कारण बनते हैं। भेदभाव के कारण समाज के कुछ वर्गों को जीविका की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करने के अवसर भी दिए जाते। आर्थिक व्यवस्था को सामाजिक तथा राजनीतिक शोषण के द्वारा वैषम्यपूर्ण (असंगत) तरह से विकसित किया जाता है जिससे कि निर्धन इस दौड़ से बाहर हो जाते हैं। ये सारे कारक सामाजिक असुविधा के संप्रत्यय में समाहित किए जा सकते हैं जिसका निर्धन सामाजिक अन्याय, वंचन, भेदभाव तथा अपवर्जन का अनुभव करते हैं।

4. वह भौगोलिक क्षेत्र, व्यक्ति जिसके निवासी हों, उसे निर्धनता का एक महत्त्वपूर्ण कारण माना जाता है। उदाहरण के लिए, वे व्यक्ति जो ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जिनमें प्राकृतिक संसाधनों का अभाव होता है। (जैसे-मरुस्थल) तथा जहाँ की जलवायु भीषण होती है (जैसे-अत्यधिक सर्दी या गर्मी) प्रायः निर्धनता के शिकार हो जाते हैं यह कास्क मानव द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। फिर भी इन क्षेत्रों के निवासियों की सहायता के लिए प्रयास अवश्य किए जा सकते हैं ताकि वे जीविका के वैकल्पिक उपाय खोज सकें तथा उन्हें उनकी शिक्षा एवं रोजगार हेतु विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।

5. निर्धनता चक्र (Poverty cycle) भी निर्धनता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण है जो यह व्याख्या करता है कि निर्धनता उन्हीं वर्गों में ही क्यों निरंतर बनी रहती है। निर्धनता की निर्धनता की जननी भी है। निम्न आय और संसाधनों के अभाव से प्रारंभ कर निर्धन व्यक्ति निम्न स्तर के पोषण तथा स्वास्थ्य, शिक्षा के अभाव तथा कौशलों के अभाव से पीड़ित होते हैं। इनके कारण उनके रोजगार पाने के अवसर भी कम हो जाते हैं जो पुनः उनकी निम्न आय स्थिति तथा निम्न स्तर के स्वास्थ्य एवं पोषण स्थिति को सतत् रूप से बनाए रखते हैं।

इनके परिणामस्वरूप निम्न अभिप्रेरणा स्तर स्थिति को और भी खराब कर देता है, यह चक्र पुनः प्रारंभ होता है और चलता रहता है। इस प्रकार निर्धनता चक्र में उपर्युक्त विभिन्न कारकों की अंतः क्रियाएँ सन्निहित होती हैं तथा इसके परिणामस्वरूप वैयक्तिक अभिप्ररेणा, अभिप्रेरणा, आशा तथा नियंत्रण-भावना में न्यूनता आती है।

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प्रश्न 2.
निर्धनता उपशमन के उपयोग की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निर्धनता उपशमन के उपाय निर्धनता एवं उसके निषेधात्मक परिणामों को उपशमित अथवा कम करने के लिए सरकार तथा अन्य समुहों द्वारा अनेक कार्य किए जा रहे हैं। यह कार्य निम्नलिखित है –
1. निर्धनता चक्र को तोड़ना तथा निर्धन व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सहायता करना-प्रारंभ में निर्धन व्यक्तियों को वित्तीय सहायता, चिकित्सापरक एवं अन्य सुविधाएँ उपलबध कराना आवश्यक हो सकता है। यह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि निर्धन व्यक्ति इस वित्तीय एवं अन्य प्रकार की सहायताओं और स्रोतों पर अपनी जीविका के लिए निर्भर न हो जाएँ।

2. ऐसे संदर्भो का निर्माण जो निर्धन व्यक्तियों को उनकी निर्धनता के लिए दोषी ठहराने की बजाय उन्हें उत्तरदायित्व सिखाए-इस उपाय के द्वारा उन्हें आशा, नियंत्रण एवं अनन्यता की भावनाओं को दोबारा अनुभव करने में सहायता मिलेगी।

3. सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए शैक्षिक एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना-इस उपाय के द्वारा निर्धन व्यक्तियों को अपनी योग्यताओं तथा कौशलों को पहचानने में सहायता मिलेगी जिससे वे समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष अपने में समर्थ हो सकें। यह कुंठा को कम करके अपराध एवं हिंसा को भी कम करने में सहायक होगा तथा निर्धन व्यक्तियों को अवैध साधनों के बजाय, वैध साधनों से जीविकोपार्जन करने हेतु प्रोत्साहित करेगा।

4. उन्नत मानसिक स्वास्थ्य हेतु उपाय-निर्धनता न्यूनीकरण के अनेक उपाय उनके – शारीरिक स्वास्थ्य को तो सुधारने में सहायता करते हैं किन्तु उनके मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का समाधान प्रभावी ढंग से करना फिर भी आवश्यक होता है। यह आशा की जा सकती है कि इस समस्या के प्रति जागरूकता के द्वारा निर्धनता के इस पक्ष पर अधिक ध्यान देना संभव हो सकेगा।

5. निर्धन व्यक्तियों को सशक्त करने के उपाय-उपर्युक्त उपायों के द्वारा निर्धन व्यक्तियों को अधिक सशक्त बनाना चाहिए जिससे वे स्वतंत्र रूप से गरिमा के साथ अपना जीवन-निर्वाह करने में समर्थ हो सकें तथा सरकार अथवा अन्य समूहों की सहायता पर निर्भर नहीं रहें।

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प्रश्न 3.
आक्रमण के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आक्रमण के निम्नलिखित कारण हैं –
1. सहज प्रवृत्ति-आक्रामकता मानव में (जैसा कि यह पशुओं में होता है) सहज (अंतर्जात) होती है। जैविक रूप से यह सहज प्रवृत्ति आत्मरक्ष हेतु हो सकती है।

2. शारीरिक क्रियात्मक तंत्र-शरीर क्रियात्मक तंत्र अप्रत्यक्ष रूप से आक्रामतकता जनिक कर सकते हैं, विशेष रूप से मस्तिष्क के कुछ ऐसे भागों को सक्रिय करके जिनकी संवेगात्मक अनुभव में भूमिका होती हैं शरीरक्रियात्मक भाव प्रबोधन की एक सामान्य स्थिति या सक्रियण की भावना प्रायः आक्रमण के रूप में अभिव्यक्ति हो सकती है। भाव प्रबोधन के कई कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, भीड़ के कारण भी आक्रमण हो सकता है, विशेष रूप से गर्म तथा आई मौसम में।

3. बाल-पोषण-किसी बच्चे का पालन किस तरह से किया जाता है वह प्रायः उसी आक्रामकता को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, वे बच्चे जिनके माता-पिता शारीरिक दंढ का उपयोग करते हैं, उन बच्चों की अपेक्षा जिनके माता-पिता अन्य अनुशासनिक, तकनीकों का उपयोग करते हैं, अधिक आक्रामक बन जाते हैं। ऐसा संभवतः इसलिए होता है कि माता-पिता ने आक्रामक व्यवहार का एक आदर्श उपस्थित किया है, जिसका बच्चा अनुकरण करता है। यह इसलिए भी हो सकता है कि शारीरिक दंड बच्चे को क्रोधित तथा अप्रसन्न बना दे और फिर बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है वह इस क्रोध को आक्रामक व्यवहार के द्वारा अभिव्यक्त करता है।

4. कुंठा-आक्रमण कुंठा की अभिव्यक्ति तथा परिणाम हो सकते हैं, अर्थात् वह संवेगात्मक स्थिति जो तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति को किसी लक्ष्य तक पहुँचने में बाधित किया जाता है अथवा किसी ऐसी वस्तु जिसे वह पाना चाहता है, उसको प्राप्त करने से उसे रोका जाता है। व्यक्ति किसी लक्ष्य के बहुत निकट होते हुए भी उसे प्राप्त करने से वंचित रह सकता है। यह पाया गया है कि कुठित स्थितियों में जो व्यक्ति होते हैं, वे आक्रामक व्यवहार उन लोगों की अपेक्षा अधिक प्रदर्शित करते हैं जो कुठित नहीं होते।

5. कुंठा के प्रभाव की जाँच करने के लिए किए गए एक प्रयोग में बच्चों को कुछ आकर्षक खिलौनों, जिन्हें वे पारदर्शी पर्दे (स्क्रीन) के पीछे से देख सकते थे, को लेने से रोका गया। इसके परिणामस्वरूप ये बच्चे, उन बच्चों की अपेक्षा, जिन्हें खिलौने उपलब्ध थे, खेल में अधिक विध्वंसक या विनाशकारी पाए गए।

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प्रश्न 4.
कुछ स्थितिपरक कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
कुछ स्थितिपरक कारक निम्नलिखित हैं –
1. अधिगम-मनुष्यों में आक्रमक प्रमुखतया अधिगम का परिणाम होता है, न कि केवल सहज प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति। आक्रामकता का अधिगम एक से अधिक तरीकों द्वारा घटित हो सकता है। कुछ व्यक्ति आक्रामकता इसलिए सीख सकते हैं क्योंकि उन्होंने पाया है कि ऐसा करना एक प्रकर का पुरस्कार है (उदाहरण के लिए, शत्रुतापूर्ण आक्रमण के द्वारा आक्रामक व्यक्ति को वह प्राप्त हो जाता है जो वह चाहता है)। यह प्रत्यक्ष प्रबलन द्वारा अधिगम का एक उदाहरण है। व्यक्ति दूसरों के आक्रामण व्यवहार का प्रेक्षण करते हुए भी आक्रामण करना सीखता है। यह मॉडलिंग या प्रतिरूपण (Modelling) के द्वारा अधिगम का एक उदाहरण है।

2. आक्रामक मॉडल का प्रेक्षण-एलबर्ट बंदूरा (Albert Bandura) एवं उनके सहयोगियों तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अनेक शोध अध्ययन आक्रामकता के अधि गम में मॉडल की भूमिका को प्रदर्शित करते हैं। यदि कोई बच्चा टेलीविजन पर आक्रमण तथा हिंसा देखता है तो वह उस व्यवहार का अनुकरण करना प्रारंभ कर सकता है।

इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि टेलीविजन तथा सिनेमा के माध्यम से दिखाई जानेवाली हिंसा एवं आक्रामकता का दर्शकों, विशेष रूप से बच्चों पर, प्रबल प्रभाव पड़ता है, किन्तु प्रश्न यह है कि क्या केवल टेलीविजन पर हिंसा देखने मात्र से व्यक्ति आक्रामक व्यवहार को प्रकट करने में सहायक होते हैं? या कुछ अन्य स्थितिपरक कारक हैं जो उसके आक्रामक व्यवहार को प्रकट करने में सहायक होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर स्थितिपरक कारकों के संबंध में प्राप्त करके दिया जा सकता है।

3. दूसरों द्वारा क्रोध-उत्तेजनक क्रियाएँ-यदि कोई व्यक्ति एक हिंसा प्रदर्शित करनेवाला सिनेमा देखता है तथा इसके पश्चात् उसे किसी अन्य व्यक्ति द्वारा क्रोध दिलाया जाता है (उदाहरण के लिए उसका अपमान कर या उसे धमकी देकर, शारीरिक आक्रमण द्वारा या बेईमानी द्वारा) तो उस व्यक्ति में आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करने की संभावना बढ़ जाते है, इसकी तुलना में कि यदि उसे क्रोधित नहीं किया गया हो। जिन अध्ययनों द्वारा कुंठा-आक्रामकता सिद्धांत का परीक्षण किया गया था उनमें व्यक्ति को उत्तेजित कर क्रोध दिला कुंठा उत्पन्न करने का तरीका था।

4. आक्रमण के शास्त्रों (हथियारों) की उपलब्धता- यह पाया है कि हिंसा को देखने के पश्चात् प्रेक्षक में आक्रामकता की संभावना उसी दशा में तब बढ़ती है जब वह आक्रमण के शस्त्र जैसे-डंडा, पिस्तौल या चाकू आसानी से उपलब्ध हों।

5. व्यक्तित्व-कारक-व्यक्तियों से अंतः क्रिया करते समय हम देखते हैं कि उनमें से कुछ स्वाभाविक रूप से ही अधिक ‘क्रोधी (गर्म-मिजाज)’ होते हैं तथा अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक आक्रामकता प्रदर्शित करते हैं। अतः, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आक्रमकता एक वैयक्तिक गुण है। यह पाया गया है कि वे व्यक्ति जिनमें निम्नस्तरीय आत्म-सम्मान होता है तथा जो असुरक्षित महसूस करते हैं, वे अपने अहं को प्रबल दिखाने के लिए आक्रामक व्यवहार कर सकते हैं। इसी प्रकार वे व्यक्ति जिन्हें अत्यंत उच्चस्तरीय आत्म-सम्मान होता है वे भी आक्रामकता इसलिए प्रदर्शित कर सकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे लोग उन्हें उस उच्च स्तर’ पर नहीं रखते जिस पर उन्होंने स्वयं को रखा हुआ है।

6. सांस्कृतिक कारक-जिस संस्कृति में व्यक्ति पल कर बड़ा होता है वह अपने सदस्यों को आक्रामक व्यवहार सिखा सकती है अथवा नहीं। ऐसा वह आक्रामक व्यवहारों की प्रशंसा द्वारा तथा उन्हें प्रोत्साहन कर सकती है अथवा ऐसे व्यवहारों को हतोत्साहित करके उनकी आलोचना कर सकती है। कुछ जनजातीय समुदाय रूप से शांतिप्रिय हैं जबकि कुछ अन्य आक्रामकता को अपनी उत्तरजीविता के लिए आवश्यक समझते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दबाव एक स्थिति हैं –
(A) मनोवैज्ञानिक
(B) सामाजिक
(C) आर्थिक
(D) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(A) मनोवैज्ञानिक

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प्रश्न 2.
सी.एफ.सी. या क्लोरो-फ्लोरो कार्बन किसे प्रदूषित करते हैं?
(A) मृदा
(B) जल
(C) वायु
(D) उपरोक्त कोई नहीं
उत्तर:
(C) वायु

प्रश्न 3.
कार्य निष्पादन पर शोर के प्रभाव को शोर की कौन-सी विशेषता निर्धारित करती है?
(A) शोर की तीव्रता
(B) भविष्यकथनीयता
(C) नियंत्रणीयता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 4.
भोपाल गैस त्रासदी कब हुई थी?
(A) दिसंबर 1984
(B) दिसंबर, 1986
(C) मई 1984
(D) जनवरी, 1984
उत्तर:
(A) दिसंबर 1984

प्रश्न 5.
अवशिष्ट पदार्थ जो जैविक रूप से क्षरणशील नहीं होते
(A) प्लास्टिक
(B) धातु से बने पात्र
(C) टीन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 6.
निम्न में किन कारणों से अभिघातज उत्तर दबाव विकार उत्पन्न होते हैं।
(A) शोर
(B) प्राकृतिक विपदाएँ
(C) प्रदूषण
(D) भीड़
उत्तर:
(B) प्राकृतिक विपदाएँ

प्रश्न 7.
अंतर्वैयक्तिक भौतिक दूरी में व्यक्ति किसी प्रकार की दूरी बनाए रखता है?
(A) भौतिक (शारीरिक)
(B) आर्थिक
(C) मानसिक
(D) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(A) भौतिक (शारीरिक)

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प्रश्न 8.
किस मनोवैज्ञानिक ने स्थिति पर निर्भरता के आधार पर चार प्रकार के अंतर्वैयक्तिक दूरी को बताया है –
(A) जॉन डोलार्ड
(B) स्टोकोल्स
(C) एडवर्ड हॉल
(D) एलबर्ट बंदूरा
उत्तर:
(C) एडवर्ड हॉल

प्रश्न 9.
अंतरंग दूरी में एक व्यक्ति कितनी दूर की दूरी बनाए रखता है?
(A) 18 इंच तक
(B) 4 इंच से 10 फुट तक
(C) 4 इंच से 8 फुट तक
(D) 18 इंच से 4 फुट तक
उत्तर:
(A) 18 इंच तक

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प्रश्न 10.
पर्यावरण-उन्मुख व्यवहार नहीं है –
(A) पर्यावरण की समस्याओं से संरक्षण करना
(B) पर्यावरण को नष्ट करना
(C) स्वस्थ पर्यावरण को उन्नत करना
(D) पर्यावरण-मित्र वस्तुओं का उपयोग करना
उत्तर:
(B) पर्यावरण को नष्ट करना

प्रश्न 11.
निम्न में किस पर निर्धनता तथा वचन का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है?
(A) अभिप्रेरणा
(B) संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं
(C) व्यक्तित्व
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 12.
निम्न में कौन पर्यावरण का संरक्षण करने के लिए प्रोत्साहन क्रियाएँ हैं?
(A) वाहनों को अच्छी हालत में रखना
(B) वृक्षारोपण करना एवं उनकी देखभाल करना
(C) कूड़ा-करकट से निपटने का उपर्युक्त प्रबंधन करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
पर्यावरणीय मनोवैज्ञानिक किन माध्यमों द्वारा पर्यावरण संरक्षण पर बल देते हैं?
(A) पर्यावरणीय शिक्षा
(B) पूर्व व्यवहार अनुबोधक
(C) पश्च व्यवहार पुनर्बलन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) पर्यावरणीय शिक्षा

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प्रश्न 14.
ग्रिफिट का योगदान निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में है?
(A) प्रकाश
(B) शोरगुल
(C) वायु-प्रदूषण
(D) तापमान
उत्तर:
(D) तापमान

प्रश्न 15.
विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है –
(A) 5 अप्रैल
(B) 5 मई
(C) 5 जून
(D) 5 जूलाई
उत्तर:
(C) 5 जून

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प्रश्न 16.
भूकंप एक संकट है –
(A) प्राकृतिक
(B) राजनैतिक
(C) सामाजिक
(D) धार्मिक
उत्तर:
(A) प्राकृतिक

प्रश्न 17.
शोर या ध्वनि को मानने के लिए किस पैमाने का प्रयोग किया जाता है?
(A) सिरदर्द रहना
(B) श्रवण-शक्ति का कम होना
(C) चक्कर आना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) श्रवण-शक्ति का कम होना

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प्रश्न 18.
आक्रमण के कारणों के संबंध में निम्नलिखित में कौन-सा मत नहीं है?
(A) शरीरक्रियात्मक तंत्र
(B) सहज प्रवृत्ति
(C) दादात्मीकरण
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) शरीरक्रियात्मक तंत्र

प्रश्न 19.
भारतीय परिपेक्ष्य में निर्धन किसे कहेंगे?
(A) आमदनी इतनी कम हो कि व्यक्ति अपर्याप्त जीवन व्यतीत करें
(B) आमदनी अधिक हो पर आवश्यकताएँ दोनों अधिक हो
(C) आमदनी और आवश्यकताएँ दोनों अधिक हो
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) आमदनी इतनी कम हो कि व्यक्ति अपर्याप्त जीवन व्यतीत करें

प्रश्न 20.
शुद्ध वायु कहलाती हैं –
(A) 78.98% N2, 20.44% O2, तथा 0.03% CO2
(B) 20.44% N2, 78.98% O2, तथा 0.03% CO2
(C) 60.30% N2, 39.20% O2, तथा 0.03% CO2
(D) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(A) 78.98% N2, 20.44% O2, तथा 0.03% CO2

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प्रश्न 21.
मानव-पर्यावरण संबं को समझने के लिए कितने संदर्भ विकसित किए गए हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(B) तीन

प्रश्न 22.
जिन प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति अपने वातावरण के सतत् आवाज के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेता है। उसे कहा जाता है –
(A) अभ्यसन
(B) सीखना
(C) आदत बनाना
(D) इनमें कुछ भी नहीं
उत्तर:
(A) अभ्यसन

प्रश्न 23.
प्लास्टिक थैलों का उपयोग पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या है, क्योंकि प्लास्टिक थैले –
(A) जैविक झरणशील होते हैं
(B) जैविक अक्षरशील होते हैं
(C) ज्वलनशील होते हैं
(D) उपर्युक्त सभी होते हैं
उत्तर:
(B) जैविक अक्षरशील होते हैं

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प्रश्न 24.
भूकंप, सुनामी, बाढ़, तूफान ये सब विपदाएँ हैं?
(A) प्राकृतिक
(B) राजनैतिक
(C) सामाजिक
(D) धार्मिक
उत्तर:
(A) प्राकृतिक

प्रश्न 25.
निम्न में कौन प्राकृति विपदा नहीं है –
(A) भूकंप
(B) सुनामी
(C) विषैली गैसें का कारखाने मे रिसाव
(D) बाढ़
उत्तर:
(C) विषैली गैसें का कारखाने मे रिसाव

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प्रश्न 26.
निम्नलिखित में कौन-से निर्मित पर्यावरण उदाहरण है?
(A) नगर
(B) बाँध
(C)पुल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 27.
मानव-निर्मित विपदा के उदाहरण नहीं हैं –
(A) युद्ध
(B) तूफान
(C) महामारी
(D) कारखानों में विषैली गैसों का रिसाव
उत्तर:
(B) तूफान

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प्रश्न 28.
मानव-पर्यावरण सम्बन्ध का विवरण प्रस्तुत करने के लिए निम्न में किस मनोवैज्ञानिक ने तीन उपागमों का वर्णन किया?
(A) स्टोकोल्स
(B) जॉन डोलार्ड
(C) एलबर्ट बंदूरा
(D) एडवडं हॉल
उत्तर:
(A) स्टोकोल्स

प्रश्न 29.
र्यावरण के विषय में पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण किस परिप्रेक्ष्य का मान्यता देता है?
(A) अल्पतमावादी परिप्रेक्ष्य
(B) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
(C) अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) अध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

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प्रश्न 30.
‘उत्तराखंड क्षेत्र’ के ‘पिचको आंदोलन’ मानव-पर्यावरण संबंधों में किस परिप्रक्ष्य का उदाहरण है?
(A) आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
(B) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
(C) अल्ल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(A) आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

प्रश्न 31.
निम्न में कौन पर्यावरणी दबाव कारकों के उदाहरण हैं?
(A) शोर
(B) भीड़
(C) प्राकृतिक विपदाएँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 32.
पर्यावरण को क्षतिग्रस्त करना’ मानव पर्यावरण संबंध के किस परिप्रेक्ष्य को दर्शाता है –
(A) अल्पतमवादी परिप्रेक्ष्य
(B) आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य
(C) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य
(D) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(C) नैमित्तिक परिप्रेक्ष्य