Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 5 भारतमाता

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड Chapter 5 भारतमाता Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 5 भारतमाता

Bihar Board Class 10 Hindi भारतमाता Text Book Questions and Answers

कविता के साथ

भारत माता कविता का सारांश Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 1.
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि भारतमाता का कैसा चित्र प्रस्तुत करता है?
उत्तर-
प्रथम अनुच्छेद में कवि ने भारतमाता के रूपों का सजीवात्मक रूप प्रदर्शित किया है।
गाँवों में बसनेवाली भारतमाता आज धूल-धूसरित, शस्य-श्यामला न रहकर उदासीन बन गई है।
उसका आँचल मैला हो गया है। गंगा-यमुना के निर्माण जल प्रदूषित हो गये हैं। इसकी मिट्टी में पहले जैसी प्रतिमा और यश नहीं है। आज यह उदास हो गई है।

भारत माता कविता का सारांश लिखिए Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 2.
भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है ?
उत्तर-
भारत को अंग्रेजों ने गुलामी की जंजीर में जकड़ रखा था। इस देश पर अंग्रेजी हुकूमत कायम थी। यहाँ की जनता का कोई अधिकार नहीं था। अपने घर में रहकर पराये आदेश को मानना विवशता थी। परतंत्रता की बेड़ी में जकड़ी, काल के कुचक्र में फंसी विवश, भारत-माता चुपचाप अपने पुत्रों पर किये गये अत्याचार को देख रही थी। यहाँ की धरती दूसरे के अधीन थी। भारत माँ के पुत्र स्वतंत्र विचरण नहीं कर सकते थे। इसलिए कवि ने परतंत्रता को दर्शाते हुए मुखरित किया है कि भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी बनी है।

भारत माता कविता की व्याख्या Pdf Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 3.
कविता में कवि भारतवासियों का कैसा चित्र खींचता है ?
उत्तर-
प्रस्तुत कविता में कवि ने दर्शाया है कि परतंत्र भारत की स्थिति दयनीय हो गई थी। अंग्रेजों ने सुसंपन्न, सुसंस्कृत, सभ्य, शिखित और सोने की चिडिया स्वरूप भारत को निर्धनता, दीनता की हालत में ला दिया था। परतंत्र भारतवासियों को नंगे बदन, भूखे रहना पड़ता था। यहाँ की तीस करोड़ जनता, शोषित पीड़ित, मूढ, असभ्य अशिक्षित, निर्धन एवं वृक्षों के नीचे निवास करने वाली थी। कवि ने भारतवासियों के दीन हालत की यथार्थता को दर्शाया है। अर्थात् तात्कालीन भारतीय मूढ़, असभ्य, निर्धन, अशिक्षित, क्षुधित का पर्याय बन गये थे।

भारत माता’ कविता का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 4.
भारतमाता का ह्रास भी राहुग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है ?
उत्तर-
विदेशियों के द्वारा बार-बार लूटने रौंदने से भारतमाता चित्र विकीर्ण हो गया है। मुगलों .. के बाद अंग्रेजों ने लूटना शुरू कर दिया है। आज यह दूसरों के द्वारा रौंदी जा रही है। जिस तरह धरती सब बोल सहन करती है उसी तरह यह भारतमाता भी सबका धौंस उपद्रव आदि सहज भाव से सहन करती है। चंद्रमा अनायास राहु द्वारा ग्रसित हो जाता है उसी तरह यह धरती भी विदेशी आक्रमणकारी जैसे राहु से ग्रसित हो जाया करती है।

भारत माता’ कविता की विशेषताएं Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 5.
कवि भारतमाता को गीता प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञान मूठ क्यों कहता है ?
उत्तर-
भारत सत्य-अहिंसा, मानवता, सहिष्णुता, आदि का पाठ सारे विश्व को पढ़ाता था। किन्तु आज इस क्षितिज पर अज्ञानता की पराकाष्ठा चारों तरफ फैल गई है। लूटखसोट, अलगाववाद बेरोजगारी आदि जैसी समस्या उसको नि:शेष करते जा रहे हैं। मुखमण्डल सदा सुशोभित रहनेवाली भारतमाता के चित्र धूमिल हो गये हैं। धरती, आकाश आदि सभी इसके प्रभाव से ग्रसित हो गये हैं। आज सर्वत्र अंधविश्वास, अज्ञानता का साम्राज्य उपस्थित हो गया है। इसी कारण कवि ने इसे ज्ञानमूढ कहा है।

जय जन भारत कविता के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 6.
कवि की दृष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है ?
उत्तर-
विदेशियों द्वारा बार-बार पद-दलित करने के उपरान्त भी भारतमाता के सहृदयता के भाव को नहीं रौंदा गया है। इसकी सहनशीलता, आज भी बरकरार है। आज भी यह अहिंसा का पाठ पढ़ाती है। लोगों के भय को दूर करती है। सबकुछ खो देने के बाद भी यह अपने संतान. में वसुधैव कुटुम्बकम की ही शिक्षा देती है। यह भारतमाता के तप का ही परिणाम है कि उसकी संतान सहिष्णु बने हुए हैं।

भारत माता कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 7.
व्याख्या करें
(क) स्वर्ण शस्य पर पद-तल-लुंठित, धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित
(ख) चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नम वाष्पाच्छादित।
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य के सुमित्रानंदन पंत रचित ‘भारत माता’ पाठ से उद्धृत है। इसमें कवि ने परतंत्र भारत का साकार चित्रण किया है। भारतीय ग्राम के खेतों में उगे हुए फसल को भारत माता का श्यामला शरीर मानते हुए कवि ने कहा है कि भारत की धरती पर सुनहरा फसल सुशोभित है और वह दूसरे के पैरों तले रौंद दिया गया है।

प्रस्तुत व्याख्येय में कवि ने कहा है कि भारत पर अंग्रेजी हुकूमत कायम हो गयी है। यहाँ के लोग अपने ही घर में अधिकार विहीन हो गये हैं। पराधीनता के चलते यहाँ की प्राकृतिक शोभा भी उदासीन प्रतीत हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ कवि की स्वर्णिम फसल पैरों तले रौंद दी गयी है और भारत माता का मन सहनशील बनकर कुंठित हो रही है। इसमें कवि ने पराधीन भारत की कल्पना को मूर्त रूप दिया है।

(ख) प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य के ‘भारत माता’ पाठ से उद्धत है जो सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भारत का मानवीकरण करते हुए पराधीनता से प्रभावित भारत माता के उदासीन, दुःखी एवं चिंतित रूप को दर्शाया है।

प्रस्तुत व्याख्येय में कवि ने चित्रित किया है कि गुलामी में जकड़ी भारत माता चिंतित है, उनकी भृकुटि से चिंता प्रकट हो रही है, क्षितिज पर गुलामी रूपी अंधकार की छाया पड़ रही है, माता की आँखें अश्रुपूर्ण हैं और आँसू वाष्प बनकर आकाश को आच्छादित कर लिया है। इसके माध्यम से परतंत्रता की दुःखद स्थिति का दर्शन कराया गया है। पराधीन भारत माता उदासीन है इसका बोध कराने का पूर्ण प्रयास किया है।

भारत माता सुमित्रानंदन पंत Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 8.
कवि भारतमाता को गीता प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है?
उत्तर-
यह सर्वविदित है कि प्राचीन काल से ही भारत जगत गुरु कहा है। वेद वेदांग दर्शन, ज्ञान-विज्ञान की शोध स्थली भारत विश्व को ज्ञान देते रहा है। ‘गीता’ जो मानव को कर्मण्यता का पाठ पढ़ाता है जिसमें मानवीय जीवन के गूढ रहस्य छिपे हैं, यही सृजित किया गया है। लेकिन परतंत्र भारत की ऐसी दुर्दशा हुई कि यहाँ के लोग खुद दिशा विहीन हो गये, दासता में बँधकर अपने अस्मिता को खो दिये। आत्मनिर्भरता समाप्त हो या परावलम्बी। जीवन निकृष्ट, नीरस, ‘अज्ञानी, निर्धन एवं असभ्य हो गया। इसलिए कवि कहता है कि भारतमाता गीता प्रकाशिनी है
फिर भी आज ज्ञान मूढ़ बनी हुई है।

प्रश्न 9.
भारतमाता कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
भारत कभी धन-धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी था। किन्तु आज कितना बदला-बदला-सा है यह देश। इसी भारत की यथार्थवादी तस्वीर उतारती पंत की ‘ग्राम्या’ से संकलित यह कविता हिन्दी के श्रेष्ठ प्रगीतों में है। यहाँ कवि ने भारत का मानवीकरण करते हुए उसका चित्रण किया है। . भारत माता गांववासिनी है। दूर-दूर तक फैले हुए इसके श्याम खेत-खेत नहीं, धूल भरे आँचल हैं। गंगा और यमुना के जल, मिट्टी की इस उदास प्रतिमा में आँखों से बरसते हुए जल हैं।

दीनता से दुखी भारतमाता अपनी आँखें नीचे किए हुए हैं, होठों पर निःशब्द रोदन है और युगों से यहाँ छाए अंधकार से त्रस्त, यह अपने घर में ही बेगानी है। सब कुछ इसी का है, किंतु । नियमित का चक्र है कि आज इसका कुछ नहीं है, दूसरे ने अधिकार जमा लिया है।
इसके तीस करोड़ पुत्रों (कविता लिखे जाने तक भारत की आबादी इतनी ही थी) की दशा यह है कि वे प्रायः नंगे हैं, अधपेटे हैं, इनका शोषण हो रहा है ये अशिक्षित, भारत माता मस्तक झुकाए वृक्ष के नीचे खड़ी हैं।

भारत के खेतों पर सोना उगता है, पर इस देश को दूसरे अपने पैरों से रौंद रहे हैं, कुठित मन है हृदय हार रहा है, होंट थरथरा रहे हैं पर मुँह से बोली नहीं निकल रही। लगता है इस शरत चन्द्रमा को राहू ने ग्रस लिया है।

भारत माता के माथे पर चिंता की रेखाएँ हैं, आँखों में आँसू भरे हैं। मुख-मण्डल की तुलना चन्द्रमा से है किन्तु ‘गीता’ के सन्देश देनेवाली यह जननी मूढ़ बनी है। . किन्तु लगता है, आज इसकी अबतक की तपस्या सफल हो रही है, इसका तप-संयम रंग ला रहा है। अहिंसा का सुधा-पान कराकर यह लोगों का भय, भ्रम और तय दूर करनेवाली जगत जननी नये जीवन का विकास कर रही है।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
कविता के अनुच्छेद में विशेषण का संज्ञा की तरह प्रयोग हुआ है। आप उनका चयन करें एवं वाक्य बनाएँ।
ग्रामवासिनी, श्यामल, मैला, दैन्य, नत, नीरख। ।
विषण्ण, क्षुधित, चिर, मौन, चिंतित।
उत्तर-
ग्रामवासिनी – ग्रामवासिनी, अंग्रेजों की अत्याचार से त्रस्त थे।
श्यामल – उसका श्यामल वर्ण फीका हो गया है।
मैला – उसका आँचल मैला हो गया।
दैन्य – उसका दैन्य देखने में बनता है।
नत – उसका मस्तक नत है।
नीरव – नंदी नीरव गति से बह रही है।
विषण्ण – उसका हृदय विषण्ण है।
क्षुधित – क्षुधित मनुष्य कौन-सा पाप नहीं करता है।
चिर – चीर चिर है।
मौन – उसने मौन वर्त रखा है।
चिंतित – उसकी चिंतित मुद्राएँ अनायास आकर्षित करती है।

प्रश्न 2.
निम्नांकित के विग्रह करते हुए समास स्पष्ट करें
ग्रामवासिनी, गंगा-यमुना, शरदेन्दु, दैत्यजड़ित, तिमिरांकित, वाष्पाच्छादित, ज्ञानमूढ़, तपसंयम, जन-मन भय, भव-तम-भ्रम।
उत्तर-
ग्रामवासिनी – ग्राम में वास करने वाली – तत्पुरुष समास
गंगा-यमुना – गंगा और यमुना – द्वन्द
शरदेन्दु – शरद ऋतु की चाँद – तत्पुरुष
दैत्यजड़ित – दैत्य से जड़ित – तत्पुरुष
तिमिराकित – मिमिर से अंकित – तत्पुरुष
वाष्पाच्छादित – वाष्प से आच्छादित – तत्पुरुष
ज्ञानमूढ़ – ज्ञान में मूढ़ – तत्पुरुष
तपसंयम – तप में संयम – तत्पुरुष
जन-मन-भय – जन, मन और भय – द्वन्द
भव-तम भ्रम – अंत में भ्रमित संसार- तत्पुरुष

प्रश्न 3.
कविता से तद्भव शब्दों का चयन करें।
उत्तर-
भारतमाता, ग्रामवासिनी, खेतों, मैला, आँसू, मिट्टी, उदासिनी रोदन, थार, तीस, मूढ़, निवासिनी, चिंतित।

प्रश्न 4.
कविता से क्रियापद चुनें और उनका स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें।
उत्तर-
नत – उसका मस्तक नत है।
फैला – प्रकाश फैल गया।
क्रंदन – उसका क्रंदन सुनकर हृदय द्रवित हो गया।
पिला – उसने उसे अमृत पिला दिया।
धरती – धरती सबका संताप हरती है।

काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

1. भारतमाता ग्रामवासिनी
खेतों में फैला है श्यामल
धूल-भरा मैला-सा आँचल
गंगा-यमुना में आँस-जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी !
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग-युग के तप से विषण्ण मन
वह अपने घर में
प्रवासिनी!

प्रश्न
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) पद्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता- भारतमाता।
कवि- सुमित्रानंदन पंत

(ख) प्रस्तुत पद्यांश में हिन्दी काव्य धारा के प्रख्यात सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने भारतमाता का यथार्थ चित्र खींचा है। गुलामी के जंजीर में जकड़ी हुई भारत माता अंत:करण से कितनी व्यथित है इसी का चित्रण कवि यथार्थवादी धरातल पर कर रहे हैं। यहाँ कवि भारतमाता
को ग्रामवासिनी के रूप में चित्रण किया है क्योंकि भारत की अधिकांशतः जनता गाँवों में ही . निवास करती है। साथ ही प्रकृति का अनुपम सौंदर्य ग्रामीण क्षेत्रों में ही देखने को मिलते हैं।

(ग) कवि मुख्यतः मानवतावादी हैं और प्रकृति के पुजारी हैं। इसलिए यहाँ भी ग्रामीण क्षेत्र के प्रकृति का मानवीकरण करते हुए कहते हैं कि हमारी भारतमाता गाँवों में निवास करती हैं। भारत की भोली-भाली जनता गाँवों में रहती है जहाँ प्रकृति भी अनुपम सौंदर्य के साथ निवास करती है। ग्रामीण क्षेत्रों के विस्तृत भू-भाग में जो फसल लहलहाते हैं वे भारत माता के श्यामले शरीर के समान सुशोभित हो रहे हैं। भारत माता का धरती रूपी विशाल आँचल धूल-धूसरित और मटमैला दिखाई पड़ रहा है। गुलामी की जंजीर में जकड़ी हुई भारत माता कराह रही है। अर्थात् भारतीय जनता के क्रन्दन के साथ ऐसा लगता है कि भारत की प्रकृति भी परतंत्रता के कारण काफी व्यथित है। मिट्टी की प्रतिमा के समान निर्जीव और चेतना रहित होकर चुपचाप शांत अवस्था में भारत माता बैठी हुई है और अंत:करण से कराहती हुई गंगा और यमुना के धारा के रूप में आँसू बहा रही है।

यह भारत माता दीनता से जकड़ी हुई है। भारत की परतंत्रता पर अपने आपको आश्रयहीन महसूस कर रही है और जैसे लगता है कि बिना पलक गिराये हुए अपनी दृष्टि को झुकाये हुए कुछ गंभीर चिंता में पड़ी हुई है। हमारी भारत माता अपने ओठों पर बहुत दिनों से क्रंदन की उदासीन भाव रखी हुई है। जैसे लगता है कि बहुत युगों से अंधकार और विषादमय वातावरण में अपने आपको जकड़ी हुई महसूस कर रही है और यह भी प्रतीत हो रहा है कि अपने ही घर में प्रवासिनी बनी हुई है। इसका अभिप्राय यह है कि अंग्रेज शासक खुद भारत में रहकर भारतवासियों को शासन में कर लिया है।

(घ) प्रस्तुत अवतरण में भारतीय परतंत्रतावाद का सजीव चित्रण किया गया है। भारत के प्राकृतिक वातावरण का मानवीकरण किया गया है जिसमें भारत माता को रोती हुई मिट्टी की प्रतिमा बनाकर दर्शाया गया है। मिट्टी की प्रतिमा खेतों में लहलहाते फसल और धूल-धूसरित आँचल के माध्यम से कवि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति असीस आस्था और विश्वास व्यक्त किया है। साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा में ग्रामीण क्षेत्रों के प्राकृतिक वातावरण की प्राथमिकता देना चाहता है।

(ङ)

  • प्रस्तुत अंश में प्रकृति सौंदर्य का यथार्थवादी और अनूठा चित्र खींचा गया है।
  • प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की सुकुमारता यहाँ पूर्ण लाव-लश्कर के साथ दिखाई पड़ती है।
  • भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग अति प्रशंसनीय है।
  • अलंकार योजना की दृष्टि से मानवीकरण अलंकार का जबर्दस्त प्रभाव है। इसके साथ अनुप्रास, रूपक और उपमा की छटा कविता में जान डाल दी है।
  • कविता में खड़ी बोली का पूर्ण वातावरण दिखाई पड़ता है।
  • शब्द योजना की दृष्टि से तत्सम एवं तद्भव शब्द अपने पूर्ण परिपक्वता में उपस्थित हुए हैं। कविता संगीतमयी हो गयी है।

2. तीस कोटि सन्तान नग्न तन,
तीस कोटि सन्तान नग्न
अर्ध क्षधित, शोषित, निरस्त्रजन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरू-तल निवासिनी !
स्वर्ण शस्य पर-पद-तल लुंठित,
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित
क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी !

प्रश्न
(क) कविता एवं कवि का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) पद्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता.भारतमाता
कवि- सुमित्रानंदन पंत।

(ख) प्रस्तुत अवतरण में हिन्दी छायावादी विचारधारा के महानतम कवि सुमित्रानंदन पंत भारतवासियों का चित्र खींचा है। यहाँ दलित, अशिक्षित निर्धन, कुंठित, भारतवासी अतीत की गरिमा को भुलाकर वर्तमान की वैभवहीनता प्रणाली में जीवनयापन कर रहे हैं। परतंत्रता की जंजीर भारतवासियों को ऐसां जकड़ लिया है कि उनका जीवन अंधकारमय वातावरण में बिलबिलाता हुआ भटक रहा है।

(ग) कवि प्रस्तुत अंश में भारतवासियों के बारे में कहता है कि भारत के तीस करोड़ जनता अंग्रेजों के द्वारा शोषित होने के कारण वस्त्रहीन हो गये हैं। अर्थात् जिस समय भारत गुलाम था उस समय भारत की जनसंख्या तीस करोड़ थी। गरीबी की मार ऐसी थी कि उनके शरीर पर साबुन कपड़े भी नहीं थे। आधा पेट खाकर शोषित होकर, निहत्थे होकर, अज्ञानी और असभ्य होकर जीवनयापन कर रहे थे। दासता का बंधन समस्त भारतीयों को अशिक्षित और निर्धन बना दिया था। जैसे लगता था कि हमारी भारत माता ग्रामीण वृक्षों के नीचे सिर झुकाये हुए कोई गंभीर
सोच में पड़ी बैठी हुई है।

खेतों में चमकीले सोने के समान लहलहाते हुए फसल किसी दूसरे के पैरों के नीचे रौंदा जा रहा है और हमारी भारत माता धरती के समान सहनशील होकर हृदय में घुटन और क्रंदन . का वातावरण लेकर जीवन जी रही है। मन ही मन रोने के कारण भारतमाता के अधर काँप रहे
हैं। उसके मौन मुस्कुराहट भी समाप्त हो गयी है। साथ ही शरद काल में चाँदनी के समान हँसती हुई भारत माता अचानक राहु के द्वारा ग्रसित हो गई है।

(घ) प्रस्तुत अंश में गुलामी से जकड़ा भारतवासियों का बहुत ही दर्दनाक चित्र खींचा गया है। यह चित्र आज भी पूर्ण प्रासंगिक है। इसके माध्यम से कवि समस्त भारतवासियों को अतीत की गहराई में ले जाना चाहते हैं। साथ ही राहुरूपी अंग्रेजों की कट्टरता और संवेदनहीनता का दर्शन करवाते हैं।

(ङ)

  •  प्रस्तुत कविता हिंदी की यथार्थवादी कविता के एक नये उन्मेष की तरह है।
  • यह प्राकृतिक सौंदर्य की छवि को दर्शाती है जिससे यह मनोरम कही जा सकती है।
  • अलंकार योजना की दृष्टि से मानवीकरण अलंकार से अलंकृत है।
  • अनुप्रास, रूपक और उपमा की छटा कविता में जान डाल दी है।
  • कविता संगीतमयी है।

3.  चिंतित भृकटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!
सफल आज उसका तप संयम,
पिता अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भय, भव-तम-भ्रम,
जग-जननी
जीवन-विकासिनी!

प्रश्न
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) पद्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता- भारतमाता।
कवि सुमित्रानंदन पंत।

(ख) प्रस्तुत अवतरण में हिन्दी छायावादी के महान प्रवर्तक सुमित्रानंदन पंत परतंत्रतावाद , में भारतवासियों की स्थिति कितनी कठोरतम थी एवं कितना जटिल जीवन था, इसी का वर्णन यथार्थ के धरातल पर करते हैं।

(ग) कवि भारत माता का नाम लेकर सम्पूर्ण भारतीय भाषावाद, जातिवाद, संप्रदायवाद एवं राजनीतिवाद को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते हैं। तब तो भारत की तीस करोड़ जनता के मनोभिलाषा को दर्शाते हैं। हमारी भारतमाता की भृकुटी चिंता से ग्रसित है। सम्पूर्ण धरातल, परतंत्रारूपी अंधकार से घिरा हुआ है। सभी भारतवासियों के नेत्र झुके हुए हैं। भारतवासियों का हृदय-रूपी आकाश आँसूरूपी वाष्प से ढंक गया है।

चंद्रमा के समान सुन्दर और प्रसन्न मुख उदासीन होकर कोई घोर चिंता के सागर में डूब गया है जो भारतमाता अज्ञानता को समाप्त करनेवाली गीता उत्पन्न की है वही आज अज्ञानता ‘के वातावरण में भटक रही है।

इतने कठोरतम जीवन के बाद भी हमारी भारतमाता का तप और संयम में कमी नहीं आयी है। अपने समस्त भारतवासियों को अहिंसा का दूध पिलाकर उनके मन के भय अज्ञानता, प्रेमहीनता एवं भ्रमशीलता को दूर करती हुई सम्पूर्ण जगत की जननी होकर जीवन को विकास करनेवाली है।

(घ) प्रस्तुत पद्यांश में पराधीन भारत की दीन हालत की वास्तविक झलक मिलती है। इसमें पराधीनता से चिंतित भारतमाता की उदासीन चेहरा को जीवंत रूप में चिंत्रित किया गया है। नम आँखें, अश्रुरूपी वाष्प, गुलामी की अंधकाररूपी छाया के माध्यम से भारत माता दुखी भाव को जीवंत रूप में दर्शाया गया है। पद्यांश में भारतमाता विशाल छवि की कल्पना करते हुए जग जननी की संज्ञा देकर इसकी महत्ता को उजागर किया है। इस काव्यांश के माध्यम से ज्ञान, अहिंसा, तप, संयम को धारण करनेवाली भारत माता जीवन विकासिनी है ऐसी चेतना विश्व में जगाने का
प्रयास किया गया है।

(ङ)

  • यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य का प्रकटीकरण है।
  • भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग अति प्रशंसनीय है।
  • शब्द योजना की दृष्टि से तत्सम एवं तद्भव शब्द अपने पूर्ण परिपक्वता में उपस्थित हए हैं।
  • अलंकार योजना की दृष्टि से मानवीकरण अलंकार है।
  • इसमें अनुप्रास, रूपक और उपमा की छटा निहित है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें-

प्रश्न 1.
‘भारत माता’ किस कवि की रचना है ? या ‘भारत माता’ के रचयिता कौन हैं?
(क) रामधारी सिंह दिनकर
(ख) प्रेमधन
(ग) सुमित्रानन्दन पंत
(घ) कुंवर नारायण
उत्तर-
(ग) सुमित्रानन्दन पंत

प्रश्न 2.
सुमित्रानन्दन पंत कैसे कवि हैं ?
(क) हालावादी
(ख) छायावादी
(ग) रीतिवादी
(घ) क्षणवादी
उत्तर-
(क) हालावादी

प्रश्न 3.
पंतजी की भारत माता कहाँ की निवासिनी है ?
(क) ग्रामवासिनी
(ख) नगरवासिनी
(ग) शहरवासिनी
(घ) पर्वतवासिनी
उत्तर-
(क) ग्रामवासिनी

प्रश्न 4.
भारत माता का आँचल कैसा है ?
(क) नीला
(ख) लाल
(ग) गीला
(घ) धूल भरा
उत्तर-
(घ) धूल भरा

प्रश्न 5.
भारत माता’ कविता कवि के किस काव्य-ग्रंथ से संकलित है?…
(क) वीणा
(ख) ग्रंथि
(ग) ग्राम्या
(घ) उच्छवास
उत्तर-
(ग) ग्राम्या

प्रश्न 6.
पंतज़ी का मूल नाम क्या था?
(क) गोसाईं दत्त
(ख) सुमित्रानंदन
(ग) नित्यानंद पंत
(घ) परमेश्वर दत्त पंत
उत्तर-
(घ) परमेश्वर दत्त पंत

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
पंतजी को उनकी साहित्य-सेवा के लिए भारत सरकार ने ………….. से अलंकृत किया।
उत्तर-
पद्मभूषण

प्रश्न 2.
………. पर पंतजी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।
उत्तर-
चिदंबरा

प्रश्न 3.
पंतजी मूलत: ……….. और सौंदर्य के कवि हैं।
उत्तर-
प्रकृति

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार गंगा-यमुना के जल …….. के आँसू हैं।
उत्तर-
भारतमाता

प्रश्न 5.
पंतजी का जन्म अल्मोड़ा जिला के ……… में हुआ था।
उत्तर-
कौसानी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंतजी ने अपनी कविताओं में प्रकृति के किस पक्ष का उद्घाटन किया है ?
उत्तर-
पंतजी ने अपनी कविताओं में प्रकृति के सुकोमल पक्ष का उद्घाटन किया है।

प्रश्न 2.
‘भारत माता’ कविता पर किस विचारधारा का प्रभाव है ?
उत्तर-
भारत माता’ कविता पर प्रगतिवाद का प्रभाव है।

प्रश्न 3.
कवि पंत के ‘भारत माता’ कविता में किस काल के भारत का चित्रण है ?
उत्तर-
कवि पंत के ‘भारत माता’ कविता में भारत के पराधीन काल का चित्रण है।

प्रश्न 4.
‘भारत माता’ कविता में भारत के किस रूप का उल्लेख है ?
उत्तर-
‘भारत माता’ कविता में भारत के दीन-हीन का उल्लेख है।

प्रश्न 5.
‘भारत माता’ कविता में कैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है ?
उत्तर-
‘भारत माता’ कविता में तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

व्याख्या खण्ड

प्रश्न 1.
“भारत माता ग्रामवासनी
खेतों में फैला है श्यामल,
धूल-भरा मैला-सा आँचल
गंगा-यमुना में आँसू जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी !”
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘भारत माता’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इस कविता के रचनाकार महाकवि पंतजी है। कवि का कहना है कि भारत माता गाँवों में बसती है। उसके रूप की छटा हरियाली के रूप में खेतों में पसरी है। माँ का आँचल धूल से भरा हुआ
मटमैला दिखाई पड़ता है। गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों की तरह आँखों में जल है। भारत माता मिट्टी की सही प्रतिमा है। भारत माता का व्यक्तित्व हर दृष्टि से संपन्न है फिर भी मुखमंडल उदास क्यों हैं ? यह कवि स्वयं से और लोक-जन से प्रश्न पूछता है। इन पंक्तियों में कवि के कहने का भाव यह है कि भारत साधन-संपन्न देश होकर भी अभाव, बेकारी, वैमनस्य के बीच क्यों जी रहा है। इन्हीं कारणों से उसने भारत-भू को लोकदेवी, भारतमाता, भारतदेवी के रूप में , चित्रित कर यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया है। इसमें भारतीय जन-जीवन, उसकी वर्तमान स्थिति का स्पष्ट रेखांकन है, सत्य चित्रण है।

प्रश्न 2.
“दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग-युग के तम से विषण्ण मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी!
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता शीर्षक कविता से ली गयी हैं।
इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता की दैन्य स्थिति का सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है।

कवि भारत माँ की पीड़ा, आकुलता, अभावग्रस्तता को देखकर व्यथित हो उठा है। वह कहता है कि भारत माता दीनता से पीड़ित हैं। आँखें अपलक रूप में नीचे की ओर झुकी हुई हैं। होठों पर बहुत दिनों से मौन दिखायी पड़ता है। युग-युग के अंधकार सदृश्य टूटे मन के साथ निज घर में वास करते हुए भी प्रवासिनी के रूप में यानी अजनबी के रूप में रह रही हैं।

इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारत माता का मानवीकरण किया है और सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। भारतीय जन की पीड़ा, दीनता, रूदन, नैराश्य जीवन, टूट मन, पुराने कष्टप्रद घावों को देखकर कवि का संवेदनशील हृदय पीड़ित हो उठता है और भारत माता को भारतीय जन की पीड़ाओं, चिन्ताओं, कष्टों के रूप में चित्रित कर दिखाना चाहता है। कविता की इन पंक्तियों में भारतीय जन की पीड़ा, चिंता, भारत माता की चिंता है, पीड़ा है, अभावग्रस्तता है।

प्रश्न 3.
तीस कोटि सन्तान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्रजन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक,
तरु-तल निवासिनी!
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि कल्पना करता है कि तीस करोड़ पुत्रों की स्थिति आज असहनीय है। ये सारी संतानें नंगे तन लेकर रास्ते में भटक रही हैं। भूख भी आधी पूरी हुई है, अर्थात् आधा पेट भोजन ही उपलब्ध है। शोषित रूप में बिना किसी हथियार के यानी निहत्थे रूप में जी रहे हैं। भारतीय जनता कैसी है ? …मूढ़ है, असभ्य है, अशिक्षित है, निर्धन है, उसके मस्तक झुके हुए हैं अर्थात् उसमें प्रतिरोध का साहस नहीं रह गया है। पेड़ों के तल के नीचे निवास करनेवाली भारतीय जनता यानी भारत माता की आज की दुर्दशा और विवशता देखी नहीं जाती।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि के कहने का भाव यह है कि भारत के लोग घोर गरीबी, फटेहाली, बेकारी और अभाव में आज भी जी रहे हैं. और कल भी जीने के लिए विवश हैं।
इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता का चित्रण करते हुए भारतीय जनता को पुत्र रूप में चित्रित किया है और उनकी विशेषताओं, अभावों, कष्टों, दुःखों का सटीक वर्णन किया है। .

प्रश्न 4.
“स्वर्ण शस्य पद-तल लुंठित,
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रंदन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु-ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी!”
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता काव्य-पाठ से संकलित हैं। इन पक्तियों में कवि ने भारत माता के रूप-स्वरूप की विशेषताओं को चित्रित किया है। कवि कहता है कि स्वर्ण भंडार से युक्त, भारत की धरती है लेकिन पैरों तले रौंदकर घायल कर दिया गया है ऐसा क्यों ? धरती की तरह सहन शक्ति से युक्त मन है, फिर भी कुंठित क्यों है ? करुण क्रंदन से होंठ काँप रहे हैं। होंठों यानी अधरों पर जहाँ मौन हँसी रहनी चाहिए उसे राहु ने ऐसा ग्रस लिया है जैसे चन्द्रग्रहण लगता है।

शरत के चन्द्रमा की हँसी की तरह यानी चांदनी रात की छटा से युक्त भारत माता का व्यक्तित्व होना चाहिए। वहाँ आज उदासी है, रुदन है, कुंठा है, पीड़ा है, कंपन है, रौंदा हुआ मन है। . इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारतीय जन के अंतर के संत्रास को भारतमाता की पीड़ा, संत्रास, कुंठा के रूप में चित्रित किया है। भारत माता की विवशता, दीनता, दलित, टूटे मन के भाव को दिखाया गया है।

प्रश्न 5.
चिंतित भृकुटी क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाण्याच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारत माता के मुखमंडल का कष्टप्रद चित्रण प्रस्तुत किया है।

कवि कहता है कि भारत माता की भौंहें ऐसी लगती हैं मानो अंधकार से घिरा हुआ क्षितिज हो। आँखें झुकी हुई हैं जैसे वाष्प से ढंका हुआ नभ दिखता है। चंद्रमा से उपमा दिये जानेवाले मुख की शोभा आज विलुप्त है। पूरे विश्व के मूर्ख जनों को गीता का ज्ञान देनेवाली भारत माता आज स्वयं अंधकार में यानी घोर ज्ञानाभाव, अर्थाभाव के बीच दैन्य जीवन जी रही है। माँ का मुख-मंडल ज्ञान-ज्योति से, प्रभावान रहना चाहिए वह मलिन है पूरा व्यक्तित्व ही दयनीय दशा का बोध करा रहा है। इन पक्तियों के द्वारा कवि भारत की वर्तमान काल की विवशताओं, अभावों, अंधकार में जीने की विवशताओं, कुंठाओं से ग्रसित मन का चित्रण कर हमें भारत माता के मानवीकरण रूप द्वारा भारतीय समाज का सच्चा प्रतिबिंब उपस्थित कर यथार्थ-बोध करा रहा है।

प्रश्न 6.
सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्नन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भय, भव-तप-भ्रम,
जग-जननी
जीवन विकासिनी !
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक भारत माता काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि भारतीय सांस्कृतिक गौरव गाथा का चित्रण प्रस्तुत करते हुए भारत माता के विराट उज्ज्वल व्यक्तित्व की व्याख्या कर रहा है।

कवि कहता है कि आज हम सबका जीवन सफल है क्योंकि भारत माता तप, संयम, सत्य और अहिंसा रूपी अपने स्तन के सुधा का पान कराकर जनमन के भय का हरण कर रही है। भय और अंधकार से मुक्ति दिला रही है।

इन पंक्तियों में गांधी और बुद्ध के जीवन-दर्शन और करुणा के उपदेश छिपे हैं। भारत माता के इन सपूतों ने पूरे विश्व को अंधकार से आलोक की ओर चलने का मार्ग दर्शन किया। कवि अपनी काव्य पंक्तियों द्वारा भारतीय सांस्कृतिक गरिमा का गुणगान करता है और विश्व को याद दिलाता है कि भारत माता के आँचल से, भारत माँ की गोद से ही प्रभा-पुंज का उद्भव हुआ जिससे सारा विश्व आलोकित हुआ। सारा विश्व विश्वबंधुत्व, समता, शांति, अहिंसा, सत्य की ओर अग्रसर हुआ।
भारत माता जगत्-माता हैं। जीवन को विकास मार्ग पर ले जानेवाली माता है। वह सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाकर सुयोग्य पुत्र बनानेवाली माता हैं।

भारतमाता कवि परिचय

सुमित्रानंदन पंत का जन्म सन् 1900 में अलमोड़ा जिले के रमणीय स्थल कौसानी (उत्तरांचल) में हुआ था । जन्म के छह घंटे बाद ही माता सरस्वती देवी का देहान्त हो गया । पिता गंगादत्त पंत कौसानी टी स्टेट में एकाउंटेंट थे । पंतजी की प्राथमिक शिक्षा गाँव में हुई और फिर बनारस से उन्होंने हाईस्कूल की शिक्षा पायी । वे कुछ दिनों तक कालाकांकर राज्य में भी रहे । उसके बाद आजीवन वे इलाहाबाद में रहे 1 29 दिसंबर 1977 ई० में उनका निधन हो गया।

पंतजी का आरंभिक काव्य प्रकृति प्रेम और शिशु सुलभ जिज्ञासा को लेकर प्रकट हुआ । उनकी आरंभिक रचनाएँ प्रकृति और सौंदर्य के प्रेमी कवि की संवेदनशील अभिव्यक्तियों से परिपूर्ण हैं।

पंतजी प्रवृत्ति से छायावादी हैं, परंतु उनके विचार उदार मानवतावादी हैं । उन्होंने प्रसाद और निराला के समान छंदों और शब्द योजना में नवीन प्रयोग किए । पंतजी की प्रतिभा कलात्मक सूझ से सम्पन्न है, अतः उनकी रचनाओं में एक विलक्षण मृदुता और सौष्ठव मिलता है । युगबोध के अनुसार अपनी काव्यभूमि का विस्तार करते रहना पंत की काव्य-चेतना की विशेषता है । वे प्रारंभ में प्रकृति सौंदर्य से अभिभूत हुए, फिर मानव सौंदर्य से । मानव सौंदर्य ने उन्हें समाजवाद की ओर आकृष्ट किया । समाजवाद से वे अरविन्द दर्शन की ओर प्रवृत्त हुए। वे मानवतावादी कवि थे, जो मानव इतिहास के नित्य विकास में विश्वास करते थे । वे अतिवादिता एवं संकीर्णता के घोर विरोधी रहे । उनका अंतिम काव्य ‘लोकायतन’ है जो उनके परिपक्व चिंतन को समेट देता है। उनकी प्रमुख काव्यकृतियाँ हैं – ‘उच्छ्वास’, ‘पल्लव’, ‘वीणा’, ‘ग्रंथि’, ‘गुंजन’, ‘युगांत’, ‘युगवाणी’, ‘ग्राम्या’, ‘स्वर्णधूलि’, ‘स्वर्णकिरण’, ‘युगपथ’, ‘चिदंबरा’ आदि । पंतजी ने नाटक, आलोचना, कहानी, उपन्यास आदि भी लिखा । ‘चिदंबरा’ पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ’ भी मिला।

प्रकृति सौंदर्य की कविता के लिए विख्यात कवि की रचनाओं में यह कविता हिंदी की यथार्थवादी कविता के एक नये उन्मेष. की तरह है। प्रख्यात छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की यह प्रसिद्ध कविता उनकी कविताओं के संग्रह ‘ग्राम्या’ से संकलित है । यह कविता आधुनिक हिंदी के उत्कृष्ट प्रगीतों में शामिल की जाती है । अतीत के गरिमा-गान द्वारा अब तक भारत का ऐसा चित्र खींचा गया था जो ऐतिहासिक चाहे जितना रहा हो, वर्तमान को देखते हुए वास्तविक प्रतीत नहीं होता था । धन-वैभव, शिक्षा-संस्कृति, जीवनशैली आदि तमाम दृष्टियों से पिछड़ा हुआ, धुंधला और मटमैला दिखाई पड़ता यह देश हमारा वही भारत है जो अतीत में कभी सभ्य, सुसंस्कृत, ज्ञानी और वैभवशाली रहा था। कवि यहाँ इसी भारत का यथातथ्य चित्र प्रस्तुत करता है।

भारतमाता Summary in Hindi

पाठ का अर्थ

छायावाद के चार स्तम्भों में एक सुमित्रानंदन पंत द्वारा चित्र भारतमाता शीर्षक कविता एक चर्चित कविता है। कवि प्रवृत्ति से छायावादी है, परन्तु उनके विचार उदार मानवतावादी है। इनकी प्रतिमा कलात्मक सूझ से सम्पन्न है। युगबोध के अनुसार अपनी काव्य भूमिका विस्तार करते रहना पंत की काव्य-चेतना की विशेषता है।

प्रस्तुत कविता कवि की प्रसिद्ध कविता उनकी कविताओं के संग्रह ‘ग्राम्या’ से संकलित है। यह कविता आधुनिक हिन्दी के उत्कृष्ट प्रगीतों में शामिल की जाती है। इसमें अतीत के गरिमा, गान द्वारा अबतक भारत का ऐसा चित्र खींचा गया था जो वास्तविक प्रतीत नहीं होता है। धन-वैभव शिक्षा-संस्कृति, जीवनशैली आदि तमाम दृष्टियों से पिछड़ा हुआ धुंधला और मटमैला दिखाई पड़ता है। परन्तु कवि भारत का यथातथ्य चित्र प्रस्तुत किया है। भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। ऐसी धारणा रखने वाली भारतमाता क्षुब्ध और उदासीन है।

शस्य श्यामला धरती आज धूल-धूसरित हो गई है। करोड़ों लोग-नग्न, अर्द्धनग्न हैं। अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी सुरसा की तरह फैलते जा रहे हैं। चारो तरफ अज्ञानता, अशिक्षा फैली हुई है। गीता की उपदेशिका आज किंकर्तव्य विमूढ़ बनी हुई है। जीवन की सारी भंगिमाएँ धूमिल हो गई है। वस्तुतः कवि यथातथ्यों के माध्यम सम्पूर्ण भारतवासियों को अवगत करना चाहता है।

शब्दार्थ

श्यामल : साँवला
दैन्य : दीनता, अभाव, गरीबी
जड़ित : स्थिर, चेतनाहीन
नत : झुका हुआ
चितवन : दृष्टि
चिर : पुराना, स्थायी
नीरव : नि:शब्द, ध्वनिहीन
तम : अधकार
विषण्ण : (विषाद से निर्मित विशेषण) विषादमय
प्रवासिनी : विदेशिनी, बेगानी
क्षुधित : भूखा
निरस्त्रजन : निहत्थे लोग
शस्य : फसल
तरु-तल : वृक्ष के नीचे
पर-पद-तल : दूसरों के पाँवों के नीचे
लुठित : रौंदा जाता हुआ
सहिष्णु : सहनशील
कुठित : रुका हुआ, रुद्ध, गतिहीन
क्रंदन : रुदन, रोना
अधरं : होठ
स्मित : मुस्कान
शरदेन्दु : शरद ऋतु का चन्द्रमा
भृकुटि : भौंह
तिमिरांकित : अंधकार से घिरा हुआ
नमित : झुका हुआ
वाष्पाच्छादित : भाप से ढंका हुआ
आनन-श्री : मुख की शोभा
शशि-उपमित : चंद्रमा से उपमा दी जानेवाली
स्तन्य : स्तन का दूध

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Bihar Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएं प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:

  • 14-15 वीं शताब्दी में यूनानी और रोम सभ्यता की प्राचीनता को पुनर्जीवित किया गया।
  • प्राचीन लेखकों की रचनाओं का अध्ययन किया गया।
  • उन्होंने मानवतावाद के अध्ययन पर जोर दिया।
  • कला और चित्रकला को पुनर्जीवित किया गया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएं Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
इस काल की इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला की विशिष्टाओं की तुलना कीजिए?
उत्तर:

  • इस काल में इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला दोनों का प्रयत्न नगरों को सजाने में किया गया।
  • इटली में रोम के अवशेषों के आधार पर एक नवीन वास्तुकला की शैली अपनाई गई जिसको ‘क्लासिकी शैली’ कहा गया। इस्लामी कला में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं किया।
  • इटली में भवनों के चित्र बनाये गये, मूर्तियों का निर्माण किया और विभिन्न प्रकार की आकतियां उकेरी गई। इस्लामी वास्तुकला में इतनी सजावट पर जोर नहीं दिया गया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपरा के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर:
रोम तथा यूनानी विद्वानों ने कई क्लासिक ग्रंथ लिखे थे। परंतु शिक्षा के प्रसार के अभाव में इन गूढ ग्रंथों को पढ़ना संभव नहीं था। परंतु तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में इटली में शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ इन ग्रंथों का अनुवाद भी हुआ। इन्हीं ग्रंथों तथा इन पर लिखी गई टिप्पणियों ने इटली के लोगों को मानवतावादी विचारों से परिचित करवाया।

इटली में ही सर्वप्रथम विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में मानवतावादी विषय भी पढ़ाए जाने लगे। इन विषयों में प्राकतिक विज्ञान, मानव शरीर रचना विज्ञान, खगोल शास्त्र औषधि विज्ञान, गणित आदि विषय शामिल थे। इन विषयों ने लोगों की सोंच को मानव और उसकी भौतिक सुख-सुविधाओं पर केंद्रित किया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपरा पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए?
उत्तर:

  • वेनिस के धर्माधिकारी और सामन्त वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे परन्तु फ्रांस में ये शक्तिशाली थे।
  • वेनिस में नगर के धनी व्यापारी और महाजन लोग नगर के शासन में सक्रियता से भाग लेते थे। फ्रांस में ऐसा नहीं था।

Badalti Hui Sanskritik Parampara Question Answer प्रश्न 5.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादी विचारधारा की विशिष्टायें –

  • मानतावादी विचारधारा के अंतर्गत मानव के विभिन्न कल्याणकारी कार्यों पर ध्यान दिया जाता था।
  • इसमें मानव के सभी पक्षों की ओर आकर्षित किया जाता है इसलिए सभी विषयों-व्याकरण, भूगोल, इतिहास, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्र, कविता और नीति दर्शन के अध्ययन पर जोर दिया जाता है।
  • मानव के कल्याण के लिए सभी को आपस में वाद-विवाद और विचार-विमर्श करना चाहिए । डेला मिरेनडोला के अनुसार ऐसा करना दिमाग को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है।
  • मानवतावादी विचारों को कला के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। इसमें मानव रुचियों का विशेष ध्यान रखा गया । इसी के फलस्वरूप विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्री और कलाकार हुए।
  • मानव के रूप को यथार्थ रूप देने का प्रयास किया गया वैज्ञानिकों से भी इस कार्य में सहयोग दिया।
  • मानवतावाद के अंतर्गत मानव को विशेष महत्व दिया जाने लगा और उसकी प्रशंसा में अनेक कव्य लिखे गये।
  • 15 वीं शताब्दी में अनेक पुस्तकें मुद्रित हुई जिनका मूल विषय मानव ही था।
  • मानवतावाद के महिलाओं की विकृत स्थिति को सुधारने का प्रयास किया गया।

Badalti Hui Sanskritik Parampara Ke Question Answer प्रश्न 6.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा? उसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए।
उत्तर:
17वीं शताब्दी में विश्व आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका था। अतः इसने एक नया रूप धारण कर लिया था जो पूर्ववर्ती विश्व से निम्नलिखित बातों में भिन्न था –

  • यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या बढ़ रही थी।
  • अब एक विशेष प्रकार की ‘नगरीय-संस्कृति’ विकसित हो रही थी। नगर के लोग यह सोचने लगे थे कि वे गाँव के लोगों से अधिक ‘सभ्य’ हैं।
  • फ्लोरेंस, वेनिस और रोम जैसे नगर कला और विद्या के केंद्र बन गए थे। नगरों को राजाओं और चर्च से थोड़ी बहुत स्वायत्तता (autonomy) मिली थी।
  • धनी और अभिजात वर्ग के लोग कलाकारों तथा लेखकों के आश्रयदाता थे।
  • मुद्रण के आविष्कार से अनेक लोगों को छपी हुई पुस्तकों उपलब्ध होने लगीं।
  • यूरोप में इतिहास की समझ विकसित होने लगी थी। लोग अपने ‘आधुनिक विश्व’ की तुलना यूनान तथा रोम की प्राचीन दुनिया से करने लगे थे।
  • अब यह माना जाने लगा था कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार अपना धर्म चुन सकता है।
  • चर्च के, पृथ्वी के केंद्र संबंधी विश्वासों को वैज्ञानिकों ने गलत सिद्ध कर दिया था । वे अब सौर-मंडल को समझने लगे थे। उन्होंने सौर-मंडल के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
  • नवीन भौगोलिक ज्ञान ने इस विचार को उलट दिया कि भूमध्यसागर विश्व का केंद्र है। इस विचार के पीछे यह मान्यता रही थी कि यूरोप विश्व का केंद्र है।

Bihar Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Notes Bihar Board प्रश्न 1.
‘मानववाद’ से आप क्या समझते हैं? पुनर्जागरण काल की कला और साहित्य में मानववाद के उदाहरण दें।
उत्तर:
मानववाद से अभिप्राय उस दृष्टिकोण से है जिसमें वर्तमान समस्याओं को महत्त्व दिया जाता है। पुनरिण काल के साहित्यकारों तथा कलाकारों ने मानव के वर्तमान में विशेष रुचि ली। इसीलिए उस साहित्य को ‘मानविकी’ कहा जाता है।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Ke Question Answer प्रश्न 2.
पुनर्जागरण को आधुनिक युग का प्रारंभ क्यों समझा जाता है? दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • आधुनिक युग का आरंभ पुनर्जागरण से हुआ। इस युग में पुरानी और मध्यकालीन रूढ़िवादी मान्यताएं समाप्त होने लगी। मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन हुए।
  • अनेक नवीन वैज्ञानिक आविष्कार हुए। कला तथा साहित्य के क्षेत्र में नवीन विचाराधाराओं का उदय हुआ।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Question Answer प्रश्न 3.
आधुनिक युग कब आरंभ हुआ? इस युग को लाने में किन बातों ने सहायता की?
उत्तर:
सामंती व्यवस्था के विघटन के साथ ही आधुनिक युग का आरंभ हुआ। चार बातों ने आधुनिक युग लाने में सहायता दी-व्यापार का विकास, नगरों का जन्म, समाज में मध्यम वर्ग का उदय तथा रिनसा (पुनर्जागरण) । भौगोलिक खोजों ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्परा Class 11 Bihar Board प्रश्न 4.
रिनसां अथवा पुनर्जाकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पंद्रहवीं शताब्दी में इटली में पुनर्जागरण आया, जिसे रिनैसा कहते हैं। यूरोप में अज्ञान के लंबे अंधकार युग के बाद ज्ञान का एक नया आंदोलन आरंभ हुआ। यूरोप के लोगों के मन में यूरोप की प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के प्रति फिर से रुचि उत्पन्न हुई।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्परा Pdf Bihar Board प्रश्न 5.
यूरोप में हुए पुनर्जागरण के कोई दो प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
पुनर्जागरण के कारण लोगों के जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन हुए –

  • नवीन विचारों भावनाओं तथा मान्यताओं के उदय से अंधविश्वासों का अंत हुआ।
  • लोगों में मानवतावाद का प्रसार हुआ। फलस्वरूप मनुष्य साहित्यिक रचनाओं और कला-कृतियों का मुख्य विषय बन गया।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Project In Hindi प्रश्न 6.
छापेखाने का आविष्कारक किनको समझा जाता है? यूरोप में पहली छपी हुई पुस्तक कौन-सी थी?
उत्तर:
छापेखाने का आविष्कारक गुटेनबर्ग तथा कैस्टर नामक दो व्यक्तियों को माना जाता है। उन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में छापेखाने का आविष्कार किया। इस आविष्कार से साहित्य तथा ज्ञान के प्रसार में बड़ी सहायता मिली। यूरोप में छापने वाली सबसे पहली पुस्तक पंभवतः गुटेनबर्ग की बाइबिल थी।

प्रश्न 7.
धर्म-सुधार आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन से हमारा अभिप्राय उस आंदोलन से है जिसे मार्टिन लूथर ने रोमन चर्च में प्रचलित अनुचित रीति-रिवाजों के विरोध में चलाया। इस आंदोलन के समर्थकों ने प्रष्ट परंपराओं को समाप्त करके सुधरी हुई परंपरा स्थापित करने का प्रयत्न किया।

प्रश्न 8.
धर्म सुधार लहर अथवा प्रोटेस्टेंट लहर के कोई दो परिणाम लिखो।
उत्तर:

  • ईसाई धर्म दो भागों में बँट गया और लोगों का धर्म संबंधी दृष्टिकोण बदल गया।
  • स्वयं पोप को भी अपनी बेटियों का पता चला और उसने काऊटर रिफॉर्मेशन द्वारा अपनी स्थिति बचा ली।

प्रश्न 9.
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत यूरोप तथा अमेरिका के अभिलेखागारों तथा संग्रहालयों आदि में दस्तावेज, मुद्रित पुस्तकें, मूर्तियाँ, वस्र आदि हैं। कई भवन भी हमें इस समय के इतिहास की जानकारी देते हैं।

प्रश्न 10.
बहार्ट ने 14वीं से 17वीं शताब्दी तक इटली में पनप रही ‘मानवतावादी’ संस्कृति के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
बहार्ट ने लिखा है कि इटली में पनप रही ‘मानवतावादी संस्कृति’ इस नए विश्वास पर आधारित थी कि व्यक्ति अपने बारे में स्वयं निर्णय लेने और अपनी दक्षता को आगे बढ़ाने में समर्थ है। ऐसा व्यक्ति ‘आधुनिक’ था जबकि ‘मध्यकालीन मानव’ पर चर्च का नियंत्रण था ।

प्रश्न 11.
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् इटली की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दशा कैसी थी?
उत्तर:
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् इटली के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों का विनाश हो गया था। वहाँ कोई एकीकृत सरकार नहीं थी। रोम का पोप केवल अपने ही राज्य में सार्वभौम था। समस्त यूरोप की राजनीति में वह इतना मजबूत नहीं था।

प्रश्न 12.
इटली के वेनिस तथा जिनेवा नगर यूरोप के अन्य क्षेत्रों से किस प्रकार भिन्न थे? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:
इटली के वेनिस तथा जिनेवा नगर यूरोप के अन्य क्षेत्रों से निम्नलिखित बातों में भिन्न थे –

  • यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामंत वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे
  • धनी व्यापारी तथा महाजन नगर के शासन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना पनपने लगी।

प्रश्न 13.
पादुआ और बोलोनिया विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन के केंद्र थे। क्यों?
उत्तर:
पादुआ और बालोनिया के नगरों के मुख्य क्रियाक ” व्यापार और वाणिज्य संबंधी थे। इसलिए यहाँ वकीलों और नोटरी की बहुत अधिक आवश्यकता होती थी। इसी कारण यहाँ के विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन का केंद्र बन गए।

प्रश्न 14.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:
14वीं और 15वीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के धार्मिक, साहित्यिक – तथा कलात्मक तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया।

प्रश्न 15.
15वीं शताब्दी के आरंभ में किन लोगों को ‘मानवतावदा’ कहा जाता है?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के आरंभ में उन अध्यापकों को ‘मानवतावादी’ कहा जाता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास तथा नीतिदर्शन आदि विषय पढ़ाते थे।

प्रश्न 16.
प्राचीन रोमन तथा यूनानी लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन पर क्यों बल दिया गया?
उत्तर:
प्राचीन रोमन एवं यूनानी सभ्यता को एक विशिष्ट सभ्यता माना गया। इन्हें बारीकी से समझने के लिए प्राचीन रोमन तथा यूनानी लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन पर बल दिया गया। पेट्रार्क जैसे दार्शनिकों का मत था कि केवल धार्मिक शिक्षा से कुछ विशेष नहीं सीखा जा सकता।

प्रश्न 17.
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को ‘नये युग’ अथवा आधुनिक युग का नाम क्यों दिया?
उत्तर:
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को मध्यकाल से अलग करने के लिए ‘नये युग’ का नाम दिया। उनका यह तर्क था कि ‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोच को बुरी तरह जकड़ रखा था इसलिए यूनान और रोमवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। परंतु 15वीं शताब्दी के आरंभ में यह ज्ञान फिर से जीवित हो उठा।

प्रश्न 18.
टॉलेमी की रचना ‘अलमजेस्ट’ की विषय-वस्तु की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
टॉलेमी रचित ‘अलमजेस्ट’ नामक ग्रंथ खगोल विज्ञान से संबंधित था जो यूनानी भाषा में लिखा गया था। बाद में इसका अनुवाद अरबी भाषा में भी हुआ। इस ग्रंथ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख है जो यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है।

प्रश्न 19.
स्पेन के दार्शनिक इन रूश्द का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
स्पेन का दार्शनिक इन रूश्द एक अरबी दार्शनिक था। उसने दार्शनिक ज्ञान (फैलसुफ) तथा धार्मिक विश्वासों के बीच चल रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। उसकी पद्धति को ईसाई चिंतकों ने अपनाया ।

प्रश्न 20.
लोगों तक मानवतावादी विचारों को पहुंचाने में किन बातों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
उत्तर:

  • स्कूलों तथा विश्वविद्यालायों में मानवतावादी विषय पढ़ाए जाने लगे।
  • कला, वास्तु कला तथा साहित्य ने भी मानतावादी विचारों के प्रसार में प्रभावी भूमिका निभाई।

प्रश्न 21.
आडीयस वेसेलियस (Andreas Vesalius) कौन थे?
उत्तर:
आंड्रीयस वेसेलियस (1514-64 ई.) पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान के प्राध्यापक थे। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ (dissection) की। इससे आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान (Physiology) का प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 22.
‘यथार्थवाद’ क्या था?
उत्तर:
शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी तथा सौंदर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को नया रूप प्रदान किया। इसी को बाद में ‘यथार्थवाद’ (realism) का नाम दिया गया। यथार्थवाद की यह परंपरा उन्नसीवीं शताब्दी तक चलती रही।

प्रश्न 23.
माईकील एंजिलो बुआनारोती (Michael Angelo Buonarotti) कौन था? इटली की कला के क्षेत्र में उसका क्या योगदान था?
उत्तर:
माईकल एंजिलो बुआनारोती (1475-1564 ई.) एक कुशल चित्रकार, मूर्तिकार तथा वास्तुकार था। उसने पोप के सिस्टीन चैपल की भीतरी छत पर चित्रकारी की और ‘दि पाइटा’ नाम से मूर्ति बनाई। उसने सेंट पीटर गिरजाघर के गुबंद का डिजाइन भी तैयार किया। ये सभी कलाकृतियाँ रोम में ही हैं।

प्रश्न 24.
समुद्री खोजों के पीछे वास्तविक प्रेरक तत्त्व क्या थे?
उत्तर:

  • नए स्थानों की खोज करके लोगों को दास बनाना और दास व्यापार से भारी मुनाफा कमाना।
  • व्यापार वृद्धि तथा धन कमाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न होना।
  • मसाले और सोना प्राप्त करके यश कमाना।

प्रश्न 25.
नए देशों की खोजों से कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले?
उत्तर:

  • नए मार्गों का पता लगने के बाद यूरोपीय लोगों ने अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में व्यापार करना आरंभ कर दिया।
    दासों का क्रय-विक्रय होने लगा।
  • पादरियों ने इन उपनिवेशों में ईसाई धर्म का प्रचार शुरू किया जिसके फलस्वरूप यह धर्म विश्व का सबसे महान् धर्म बन गया।

प्रश्न 26.
यूरोपीय लोगों के जीवन पर धर्म-युद्धों के दो अच्छे प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • इन युद्धों से भौगोलिक खोजों के ज्ञान का विस्तार हुआ।
  • यूरोपवासी इस्लामी जगत् के संपर्क में आए। उन्होंने इस्लामिक जगत् की कला एवं विज्ञान संबंधी ज्ञान को अपनाया।

प्रश्न 27.
‘कॉस्टैनटाइन के अनुदान’ नामक दस्तावेज के प्रति मानवतावादियों की क्या प्रतिक्रिया थी? इससे उन राजाओं को क्यों खुशी हुई, जो चर्च के हस्तक्षेप से दुःखी थे?
उत्तर:
मानवतावादियों ने लोगों को बताया कि चर्च को उसकी न्यायिक और वित्तीय शक्तियाँ ‘कांस्टैनटाइन के अनुदान’ नामक दस्तावेज के अनुसार मिली थी। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज जालसाजी से तैयार करवाया गया। इस बात ने चर्च के अधिकारों के औचित्य को चुनौती दी जिससे राजाओं को खशी हुई।

प्रश्न 28.
पाप स्वीकारोक्ति (indulgences) नामक दस्तावेज क्या था?
उत्तर:
पाप स्वीकारोक्ति दस्तावेज चर्च द्वारा जारी एक दस्तावेज था। चर्च कहता था कि यह दस्तावेज व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति दिला सकता है। चर्च इस दस्तावेज को बेचकर खूब धन बटोर रहा था।

प्रश्न 29.
मानवतावादी युग में व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति कैसी थी?
उत्तर:
इस युग में व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति कुछ अच्छी थी। वे दुकान चलाने में अपने पति की सहायता करती थीं । जब उनके पति लंबे समय के लिए व्यापार के लिए कहीं दूर जाते थे, तो वे उनका कारोबार संभालती थीं। किसी व्यापारी की कम आयु में मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी परिवार का बोझ संभालती थी।

प्रश्न 30.
माचिसा ईसाबेला दि इस्ते (Isabellad’ Este) कौन थी?
उत्तर:
मार्चिसा ईसाबेला दि इस्ते (1474-1539 ई.) मंदुआ राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थी। उसने अपने पति की अनुपस्थिति में अपने राज्य पर शासन किया था।

प्रश्न 31.
दो मानवतावादी लेखकों के नाम बताएँ। यह भी बताएं कि उन्होंने क्या विचार व्यक्त किए? एक-एक बिंदु लिखिए।
उत्तर:
दो मानवतावादी लेखक थे-फ्रेनसेस्को बरबारी (Francesco Barbaro) तथा लोरेंजो वल्ला (Lorenzo’ Valla) –

  • फ्रेनसेस्को बरबारो (1390-1454 ई.) ने अपनी एक पुस्तक में संपत्ति अधिग्रहण करने को एक विशेष गुण कहकर उसका समर्थन किया।
  • लोरेंजो वल्ला (1406-1457 ई.) ने अपनी पुस्तक ऑनप्लेजर में ईसाई धर्म द्वारा भोग-विलास पर लगाई गई पाबंदी की आलोचना की।

प्रश्न 32.
मानवतावादी संस्कृति का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:

  • मानवतावादी संस्कृति से मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर हो गया।
  • इटली के निवासी भौतिक संपत्ति, शक्ति तथा गौरव की ओर आकृष्ट हुए।

प्रश्न 33.
15वीं शताब्दी में यूरोप में विचारों का प्रसार व्यापक रूप से तेजी से क्यों होने लगा?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में यूरोप में बड़ी संख्या में पुस्तके छपने लगीं। इनका क्रय-विक्रय भी होने लगा। अतः अब विद्यार्थियों को केवल अध्यापकों के व्याख्यानों के नोट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। वे बाजार से पुस्तकें खरीद कर पढ़ सकते थे। इससे विचारों के व्यापक और तीव्र प्रसार में सहायता मिली।

प्रश्न 34.
वाणिज्य और व्यापार की वृद्धि के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:

  • वाणिज्य और व्यापार वृद्धि के कारण यूरोप के लोग समृद्ध बने।
  • यूरोप के देशों ने खोजे गए प्रदेशों में उपनिवेश बसाए जिनको उन्होंने मंडियों के रूप। में प्रयुक्त किया।

प्रश्न 35.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
वंनिस इटली का नगर था। यह गणराज्य था। यह चर्च तथा सामंतो के प्रभाव से लगभग मुक्त था। नगर के धनी व्यापारी तथा महाजन सरकार में सक्रिय भूमिका निभाते थे। नगर में नागरिकता के विचारों का तेजी से प्रसार हो रहा था। इसके विपरीत फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र स्थापित था, जहाँ जनसाधारण नागरिक अधिकारों से वंचित थे।

प्रश्न 36.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादा विचारों के मुख्य अभिलक्षण निम्नलिखित थे –

  1. मानव जीवन की धर्म के नियंत्रण से मुक्ति।
  2. मानव का भौतिक सुख-सुविधाओं पर बल।
  3. मानव द्वारा संपत्ति तथा शक्ति का अधिग्रहण।
  4. मानव की गरिमा का बढ़ावा।
  5. मानव का आदर्श जीवन।

प्रश्न 37.
इस काल (पुनर्जागरण काल) की इटली की वास्तुकला और इस्लाम वास्तुकला की विशिष्टताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
इटली तथा इस्लामी वास्तुकला दोनों में ही भव्य भवनों का निर्माण हुआ। इस्लामी वास्तुकला में विशाल मस्जिदें बनी, तो इटली में भव्य कुथीडूल तथा मठ बनाए गए। इन भवनों की सजावट की ओर विशेष ध्यान दिया गया। मेहराब तथा स्तंभ इन भवनों की मुख्य विशेषताएँ थीं।

प्रश्न 38.
16वीं शताब्दी में यूरोप में होने वाली मुद्रण प्रौद्योगिकी के विकास के लिए यूरोपवासी किसके ऋीण थे और क्यों?
उत्तर:
सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में क्रांतिकारी मुद्रण प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। इसके लिए यूरोपीय लोग चीनियों तथा मंगोल शासकों के ऋणी थे। इसका कारण यह था कि यूरोप के व्यापारी और राजनयिक मंगोल शासकों के राज-दरबार में अपनी यात्राओं के दौरान इस तकनीक से परिचित हुए थे।

प्रश्न 39.
वाद-विवाद को प्लेटो और अरस्तु ने किस प्रकार महत्त्व दिया?
उत्तर:
उनका कहना था कि जहाँ तक हो सके हमें विचारगोष्ठियों में जाना चाहिए और वाद-विवाद करना चाहिए। जिस प्रकार शरीर को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम जरूरी है उसी प्रकार दिमाग की ताकत को बढ़ाने के लिए शब्दों के दंगल में उतरना जरूरी है इससे दिमागी ताकत बढ़ने के साथ-साथ बुद्धि और अधिक ओजस्वी होती है।

प्रश्न 40.
फ़्लोरेंस की प्रसिद्धि में किन दो व्यक्तियों का सबसे अधिक योगदान था?
उत्तर:
फ्लोरेंस की प्रसिद्धि में दाँते अलिगहियरी (Dante Alighieri) तथा कलाकार जोटो (Giotto) का सबसे अधिक योगदान था। अलिगहियरी ने धार्मिक विषयों पर लिखा। जोटो ने जीते-जागते रूपचित्र बनाए जिसने फ्लोरेंस को कलात्मक कृतियों के सृजन का केंद्र बना दिया।

प्रश्न 41.
‘रेनेसा व्यक्ति’ से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
‘रेनेसा व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग प्राय: उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और जो अनेक कलाओं में कुशल हों। पुनर्जागरण काल में ऐसे अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्र और कलाकार हो सकता था।

प्रश्न 42.
पुनर्जागरण की तीन मुख्य विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
पुनर्जागरण के मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  1. इटली के नगर पुनर्जागरण के प्रथम केंद्र थे।
  2. नवीन कला शैली का जन्म हुआ।
  3. वास्तुकला एवं साहित्य का विकास हुआ।

प्रश्न 43.
पुनर्जागरण यूरोप के किस देश में सबसे पहले आरंभ हुआ और क्यों?
उत्तर:
पुनर्जागरण का आरंभ सबसे पहल इटली में हुआ। इसके निम्नलिखित कारण थे –

  1. इटली के अनेक नगर (रोम, मिलान, फ्लारस) वाणिज्य तथा व्यापारिक केंद्र होने के कारण समृद्धशाली थे।
  2. इटली के नगर सामंती नियंत्रण से मुक्त थे। इसलिए इन नगरों के स्वतंत्र वातावरण से पुनर्जागरण को प्रोत्साहन मिला।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
पुनर्जागरण को इतिहास में पुनर्जन्म, पुनर्जागृति, बौद्धिक चेतना तथा सांस्कृतिक विकास आदि नामों से पुकारा जाता है। 13वीं शताब्दी के पश्चात् ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई जिनके कारण मनुष्य चेतनायुक्त बना। इसी चेतना को पुनर्जागरण का नाम दिया गया है। पुनर्जागरण को अंग्रजी भाषा में ‘रिनेसा’ कहते हैं जो मूलतः फ्रांसीसी भाषा का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है-फिर से जागना। यूरोपीय इतिहास के विश्लेषण के संदर्भ में पुनर्जागरण का अपना अलग काल है।

यह काल साधारणत: 14वीं शताब्दी (1350 से 1550 ई०) के बीच माना जाता है। वास्तव में आधुनिक यूरोप का आरंभ पुनर्जागरण से ही स्वीकार किया जाता है। यूरोप प्राचीनकाल में सभ्यता के उत्कर्ष पर पहुँचा हुआ था। यह उत्कर्ष यूनान तथा रोम में देखा गया। मध्यकाल में यूनानी तथा रोमन सभ्यता लगभग लुप्त हो गई। पुनर्जागरण काल में यह एक बार फिर संजीव हो उठी। एक बार फिर लौकिक जगत् के प्रति आस्था दिखाई गई। मानवता का महत्त्व बढ़ा। रुढ़िवादिता का स्थान तर्क ने ले लिया। प्राकृतिक सौंदर्य की फिर से पूजा होने लगी। इन सब बातों का मध्यकाल में कोई स्थान नहीं रहा था। परंतु पुनर्जागरण काल में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई जिन्होंने प्राचीन मूल्यों को फिर से स्थापित किया।

प्रश्न 2.
‘पुनर्जागरण’ से एक नए युग का आरंभ हुआ, ऐसा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
‘पुनर्जागरण’ से निःसंदेह एक नए युग का आरंभ हुआ। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे –

  1. पुनर्जागरण के कारण प्राचीन और मध्यकालीन समाज की रूढ़िवादी मान्यताएं समाप्त होने लगीं। अब लोग अपनी समस्याओं पर विचार करने लगे।
  2. इसके कारण सामंतवादी व्यवस्था के बंधन टूटने लगे और राष्ट्र-राज्यों की स्थापना हुई।
  3. पुनर्जागरण से पूर्व लोगों का चर्च के सिद्धांतों में अंधविश्वास था। परंतु अब लोग उन सिद्धांतों की सच्चाई में संदेह करने लगे और प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसने लगे। फलस्वरूप वैज्ञानिक चिंतन का युग आरंभ हुआ।
  4. पुनर्जागरण के कारण कला और साहित्य के क्षेत्र में अनेक नवीन विचारधाराओं का उदय हुआ। अनेक साहित्यकारों के व्यंग्यात्मक लेख और चित्रकारों ने अपने चित्रों में दूषित समाज और राजनीति पर प्रहार किया। ये सभी बातें आधुनिक युग की ही सूचक थीं।

प्रश्न 3.
यूरोप में पुनर्जागरण के उदय के क्या कारण थे?
उत्तर:
यूरोप में पुनर्जागरण के उदय ने निम्नलिखित तत्त्वों ने सहायता पहुँचाई –
1. धर्म युद्ध – नवीन ज्ञान का मार्ग दिखाने में मध्यकाल में लड़े गए धर्म युद्धों ने विशेष भूमिका निभाई। ये धर्म युद्ध (Crusades) तुर्कों से यरुशलम को स्वतंत्र कराने के लिए ईसाइयों ने लई । ये वीं शताब्दी के अंत से 13वीं शताब्दी तक जारी रहे। धर्म युद्धों के कारण यूरोप के सामाजिक, आर्थिक तथा बौद्धिक पक्षों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

2. धर्म सुधार आंदोलन – धर्म सुधार आंदोलन की लहर में अनेक विद्वानों ने चर्च के अधिकारों को चुनौती दी। जनसाधारण पहली बार यह सोचने लगा कि चर्च के नियम अंतिम नहीं हैं। इस नवीन दृष्टिकोण से मनुष्य के विचारों में जागृति आई।

3. भौगोलिक खोजें – भौगोलिक खोजों के कारण भी मनुष्य के विचारों में क्रांति आई। मार्को पोलो के दिशा-सूचक (Compass) के अविष्कार के कारण समुद्री यात्रा करने में सुविधा मिली । इटली के वैज्ञानिक गैलीलियों ने दूरबीन का आविष्कार किया। न्यूटन के ब्रांड के विषय ने वैज्ञानिक अनुमानों को सूत्रबद्ध किया। कोपरनिक्स ने अपनी खोजों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है बल्कि यह सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। इन नवीन खोजों के कारण नवीन विचारों का जन्म हुआ।

प्रश्न 4.
विज्ञान और दर्शन में अरबों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पूरे मध्यकाल में ईसाइ गिरजाघरों और मठों के विद्वान यूनान और रोम के विद्वानों की रचनाओं से परिचित थे। परंतु उन्होंने इन रचनाओं का प्रचार-प्रसार नहीं किया। चौदहवीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तु के ग्रंथों के अनुवाद पढ़े। ये अनुवाद अरब के अनुवादकों की देन थे जिन्होंने अतीत की पांडुलिपियों को सावधानीपूर्वक संरक्षण और अनुवाद किया था।

जिस समय यूरोप के विद्वान यूनानी ग्रंथों के अरबी अनुवादों का अध्ययन कर रहे थे, उस समय यूनानी विद्वान अरबी तथा फारसी विद्वानों की कृतियों का अनुवाद कर रहे थे, ताकि उनका यूरोप के लोगों के बीच प्रसार किया जा सके। ये ग्रंथ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान (astronomy) औषधि विज्ञान तथा रसायन विज्ञान से संबंधित थे। टालेमी ने अपनी रचना ‘अलमजेस्ट’ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख किया है जो यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है।

मुसलमान लेखकों में अरब के हकीम तथा बुखारा (मध्य एशिया) के दार्शनिक इन-सिना (Ibn-Sina) और आयुर्विज्ञान विश्वकोष के लेखक अल-राजी (रेजेस) शामिल थे। इन्हें इतालवी जगत में ज्ञानी माना जाता था। स्पेन के एक अरब दार्शनिक इब्न-रूश्दी ने दार्शनिक ज्ञान (फैलसुफ) तथा धार्मिक विश्वासों के बीच रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। इस पद्धति को ईसाई चिंतकों ने अपनाया।

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण काल में व्यापार में वृद्धि तथा नगरों के उदय का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में व्यापार के विकास तथा नगरों के उदय के कारण कई प्राचीन प्रथाएँ भंग हुई और नवीन बातें आरंभ हुई। वास्वत में यूरोप को अंधकार युग से निकाल कर आधुनिक युग में लाने का पूरा श्रेय व्यापारियों तथा नगरों को ही है। यह बात हम इस प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं –

(क) व्यापार में वृद्धि का प्रभाव-व्यापार में विकास का निम्नलिखित प्रभाव हुआ:
1. मध्य श्रेणी का उदय-व्यापार में वृद्धि के कारण समाज में एक नवीन श्रेणी का जन्म हुआ। यह श्रेणी थी मध्य श्रेणी जो सामंतों या कृषकों से बिल्कुल अलग थी। इस श्रेणी के पास धन था और धन की सहायता से यह कुछ भी कर सकती थी।

2. राजा का सबल बनाना-व्यापार को उन्नति से पूर्व राजा सामंतों के हा कठपुतली मात्र था। उसे सामंतों से धन मिलता था और वह उनकी सभी बातें स्वीकार करता था। वे यदि अपनी जनता पर अत्याचार भी करते थे तो राजा चुपचाप सहन करता था। परंतु व्यापार का वृद्धि से व्यापारी वर्ग का विकास हुआ जो राजा का सहयोगी था। इस वर्ग से धन प्राप्त करके राजा अपनी सैनिक शक्ति में वृद्धि कर सकता था। सेना के सबल होते ही सामंतवाद का अंत हुआ और राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ।

3. चर्च और सामंतों की शक्ति का हास – तृतीय श्रेणी को सुरक्षा चाहिए थी। यह सुरक्षा उन्हें केवल एक क्षेत्र में नहीं बल्कि सारे राज्य में चाहिए थी। उनका व्यापार दूर-दूर के क्षेत्रों में होता था। इसलिए इस वर्ग ने जी-जान से राजा की सहायता की। राजा सबल हो गया । सबल राजा ने चर्च और सामंतों की स्वेच्छाचारिता पर प्रहार किया और वह उनके बंधन से मुक्त हो गया। यदि ऐसा नहीं होता तो आधुनिक युग के आने में भी सैकड़ों वर्ष लग जाते ।

(ख) नगरों के उदय का महत्त्व-नगरों के उदय का महत्त्व इस प्रकार जाना जा सकता है –
1. सामंतों की दासता से मुक्ति – नगरों के उदय से सामंतों द्वारा लगाये गये बंधन ढीले पड़ गये। नगरों में धनी व्यापारी वर्ग रहता था। उन्होंने धन देकर नगरों को स्वतंत्र कराया। इन नगरों पर अब सामंतों या राजाओं का कोई प्रभाव न रहा।

2. स्वतंत्र वातावरण-इन नगरों में नागरिकों को पूरी स्वतंत्रता मिली। वे स्वतंत्रतापूर्वक सोच सकते थे और अपनी इच्छा अनुसार कोई भी कार्य कर सकते थे। इन स्वतंत्र विचारों ने अंधकार युग को समाप्त किया और आधुनिक युग लाने में सहयोग दिया।

प्रश्न 6.
धर्म-सुधारकों ने पद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में रोमन कैथोलिक चर्च और पादरियों की किन रीतियों और प्रथाओं के विरुद्ध आपत्ति की।
अथवा
यूरोपीय धर्म-सुधार आंदोलन (प्रोटेस्टेंट लहर) के उत्थान के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रोटेस्टेंट ‘धर्म सुधार’ से अभिप्राय ईसाई धर्म की उस शाखा से है, जो रोमन कैथोलिक चर्च के रीति-रिवाजों के विरोध में आरंभ हुई। इसका जन्मदाता मार्टिन लूथर था। इस धर्म-सुधार आंदोलन के उत्थान के निम्नलिखित कारण थे –

1. चर्च ने बहुत अधिक धन – संपत्ति इक्ट्ठी कर ली थी। पोप और उच्च पदों पर नियुक्त पादरी लोग भोग-विलास का जीवन व्यतीत करने लगे थे। इस कारण बहुत-से व्यक्ति इनसे घृणा करने लगे थे। यही बात धर्म-सुधार आंदोलन के उत्थान का एक प्रमुख कारण बनी।

2. चर्च में पादरियों के पदों को बेचा जाने लगा था। इसके परिणामस्वरूप लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

3. पोप तथा पादरी माफीनामे (दंडोमुक्तियाँ) बेंचते थे। लोगों को यह बात पसंद न थी। अतः उन्होंने चर्च के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई।

4. पोप जनता से अनेक प्रकार के कर तथा शुल्क वसूल करता था और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। इससे लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

प्रश्न 7.
लियोनार्दो-द-विंची की प्रतिभा पर नोट लिखिए।
उत्तर:
इटली का लियोनार्दो-द-विंची पुनर्जागरण काल की एक महानतम विभूति था। उसका जन्म 1452 ई० में हुआ। वह एक चित्रकार, मूर्तिकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि एवं गायक सभी कुछ था। यद्यपि उसके चित्र थोड़े हैं, किंतु सभी अनुपम हैं। इन चित्रों में से ‘दि वर्जिन ऑफ दि रॉक्स’ तथा ‘मोनालिसा’ अद्वितीय कृतियाँ हैं। मिलान के गिा घर में चित्रित ‘दि लास्ट सपर’ विश्व के कलात्मक आश्चर्यों में गिना जाता है। उसने एक उड़न मशीन का चित्र बनाया जिसके आधार पर वह ऐसी मशीनें बनाना चाहता था। जिसके द्वारा आकाश में उड़ना संभव हो। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति संभवतः अभी तक पैदा नहीं हुआ।

प्रश्न 8.
मानवतावाद से तुम क्या समझते हो? पुनर्जागरण काल की कला और साहित्य में मानवतावाद के उदाहरण दो।
उत्तर:
पुनर्जागरण से पूर्व दार्शनिक मृत्यु के बाद के परिणामों पर सोच-विचार किया करते थे और वर्तमान जीवन को परलोक की तैयारी समझते थे। पुनर्जागरण से यह दृष्टिकोण बदल गया। अब विचारक मानव की वर्तमान समस्याओं पर विचार करने लगे। मानव के इस दृष्टिकोण को ‘मानवतावाद’ कहा जाता है। इतिहासकार पेट्रार्क को मानवतावाद का पिता स्वीकार किया आता है। मानवतावाद के लेखकों ने मानव को केंद्र-बिंदु माना और उसे ही दर्शाने का प्रयत्न किया।

मानवतावाद तथा पुनर्जागरण काल की कला-मानवतावाद का पुनर्जागरण की कला-कृतियों पर विशेष प्रभाव पड़ा । रेफल तथा माइकेल एंजिलो ने जो चित्र बनाए, वे भले ही धन से संबंधित थे, परंतु उनका आधार मानव था। उन्होंने अपनी मूर्तियों में जीसस को मानव शिशु के रूप में दिखाया। उन्होंने उनकी माता को वात्सल्यमयी मां के रूप में दर्शाया । इस काल की अन्य मानवतावादी रचनाओं में मोनालिसा, मेडोना आदि विश्व-विख्यात रचनाएँ सम्मिलित हैं।

मानवतावाद तथा पुनर्जागरण काल का साहित्य-मानवतावाद ने पुनर्जागरण काल के साहित्य को भी खूब प्रभावित किया । सेक्सपीयर, दाँते आदि साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का विषय ईश्वर को नहीं बल्कि मानव को बनाया । उन्होंने मानव की भावानाओं, शक्तियों तथा त्रुटियों की पूर्ण विवेचना की। इस काल की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं में यूटोपिया, हैमलेट, डिवाइन कॉमेडी के नाम लिए जा सकते हैं।

प्रश्न 9.
मानवतावादियों ने मध्ययुग तथा आधुनिक युग के बीच किस प्रकार अंतर किया?
उत्तर:
मानवतावादी समझते थे कि वे अंधकार की कई शताब्दियों के बाद सभ्यता को नया जीवन दे रहे हैं। उनका मानना था कि रोमन साम्राज्य के टूटने के बाद ‘अंधकार युग’ शुरू हो गया था। मानवतावादियों की भाँति बाद के विद्वानों ने भी बिना कोई प्रश्न उठाए यह मान लिया कि यूरोप में चौदहवीं शताब्दी के बाद ‘नये युग’ का उदय हुआ। ‘मध्यकाल’ का प्रयोग रोम साम्राज्य के पतन के बाद एक हजार वर्ष की समयावधि के लिए किया गया। उनका यह तर्क था कि ‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोंच को बुरी तरह जकड़ रखा था। इसलिए यूनान और रोमनवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। मानवतावादियों ने ‘आधुनिक’ शब्द का प्रयोग पंद्रहवीं शताब्दी से आरंभ होने वाले के लिए किया।

मानवतावादियों और बाद के विद्वानों द्वारा प्रयुक्त काल क्रम (Periodisation) इस प्रकार था –
Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 10.
रिनेसा अथवा पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
पुनर्जागरण ‘रिनेसा’ का हिंदी रूपांतर है। इसका अर्थ अथवा पुनर्जागृति है। पुनर्जागरण वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी राष्ट्र मध्य युग के अंधकार से निकल कर आधुनिक युग के प्रकाश में साँस लेने लगे। वे आधुनिक युग के विचारों और शैलियों से प्रभावित हुए । मानव ने स्वतंत्र रूप से विचार करना आरंभ किया जिससे साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित हो गए।

विशेषताएँ-पुनर्जागरण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  • इटली के नगर-राज्य पुनर्जागरण के प्रथम केंद्र बन गये।
  • नवीन कला शैली का जन्म हुआ।
  • वास्तुकला एवं साहित्य का विकास हुआ।
  • प्राचीन विधियों तथा ज्ञान को नया जीवन मिला।
  • अनेक नवीन नगरों का उदय हुआ।
  • मानव में स्वतंत्र चिंतन और मानवता का विकास हुआ।

प्रश्न 11.
पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण तथा तीन परिणाम लिखिए।
उत्तर:
कारण-पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

  • मध्यकाल के अंत में नगरों का विकास हुआ। यहाँ का वातावरण स्वतंत्र था तथा लोग संपन्न थे। अतः इस वातावरण ने पुनर्जागरण के विचारों को प्रोत्साहित किया।
  • कुस्तुनतुनिया पर तुकों का अधिकार हो गया। अत: विद्वान इटली आ गए। इधर छापेखाने का आविष्कार हुआ। इससे पुनर्जागरण को बल मिला।

परिणाम –

  • पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप कला तथा साहित्य की कृतियों में मानवतावाद को प्राथमिकता दी गई।
  • विज्ञान के क्षेत्र में दिशासूचक यंत्र, सूक्ष्मदर्शी यंत्र, दूरबीन तथा अन्य खोजें हुई।
  • भूगोल के क्षेत्र में नवीन खोजें हुई। अमेरिका, भारत तथा कई अन्य देशों की खोज की गई।

प्रश्न 12.
कोपरनिकस तथा उसके ब्रह्मांड संबंधी विचारों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
ईसाइयों की यह धारणा थी कि मनुष्य पापी है। इस बात पर वैज्ञानिकों ने एक अलग दृष्टिकोण द्वारा आपत्ति की। यूरोपीय विज्ञान के क्षेत्र में एक युगांतकारी परिवर्तन कोपरनिकस (1473-1543 ई.) के विचारों से आया। ईसाइयों को यह विश्वास था कि पृथ्वी पापों से भरी हुई है और इस कारण वह स्थिर है। यह ब्रह्मांड (Universe) का केंद्र है जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह (Celestial Planets) घूम रहे हैं। परंतु कोपरनिकस ने यह घोषणा की कि पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।

कोपरनिकस एक निष्ठावान ईसाई था। वह इस बात से भयभीत था कि उसकी इस नयी खोज के प्रति परम्परावादी ईसाई धर्माधिकारियों की घोर प्रतिक्रिया हो सकती है। यही कारण था कि वह अपनी पांडुलिपि ‘डि रिवल्यूशनिबस’ (De revolutionibus-परिभ्रमण) को प्रकाशित नहीं कराना चाहता था। जब वह अपनी मृत्यु-शैय्या पर पड़ा था तब उसने यह पांडुलिपि अपने अनुयायी जोशिम रिटिकस (Joachim Rheticus) को सौंप दी। परंतु उसके विचारों को ग्रहण करने में लोगों को थोड़ा समय लगा।।

प्रश्न 13.
कोपरनिकस के सौरमंडलीय विचारा को आगे बढ़ाने में किन-किन वैज्ञानिकों का योगदान रहा ओर क्या?
उत्तर:
कोपरनिकस के सौरमंडलीय विचारों को आगे बढ़ाने में कई वैज्ञानिकों का योगदान रहा –
1. खगोलशास्त्री जोहानेस कैप्लर (Johannes Kepler, 1571-1630 ई.) ने अपने ग्रंथ कॉस्मोग्राफिकल मिस्ट्री (Cosmographical Mystery-खगोलीय रहस्य) में सौरमंडल के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। इससे यह सिद्ध हुआ कि सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार पथ पर नहीं बल्कि दीर्घ वृत्ताकार (ellipses) पथ पर परिक्रमा करते हैं।

2. गैलिलियो गैलिली (1564-1642 ई.) ने अपने ग्रंथ ‘दि मोशन (The Motion, गति) में गतिशील विश्व के सिद्धांतों की पुष्टि की।

3. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से विज्ञान को एक नई दिशा मिली।

प्रश्न 14.
‘वैज्ञानिक क्रांति’ क्या थी? इसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
विचारकों (वैज्ञानिकों) ने हमें बताया कि ज्ञान का आधार विश्वास न होकर अन्वेषण एवं प्रयोग है। जैसे-जैसे इन वैज्ञानिकों ने ज्ञान की खोज का मार्ग दिखाया वैसे-वैसे भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रयोग अन्वेषण कार्य होने लगे। इतिहासकारों ने मनुष्य और प्रकृति के ज्ञान के इस नए दृष्टिकोण को वैज्ञानिक क्रांति का नाम दिया। परिणामस्वरूप संदेहवादियों और आस्तिकों के मन में सृष्टि की रचना के स्रोत के रूप में ईश्वर का स्थान प्रकृति लेने लगी। यहाँ तक कि जिन्होंने ईश्वर में अपना विश्वास बनाए रखा वे भी एक दूरस्थ ईश्वर की बात करने लगे।

उनमें यह विश्वास पनपने लगा कि ईश्वर भौतिक संसार में जीवन को प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित नहीं करता है। इस प्रकार के विचारों को वैज्ञानिक संस्थाओं ने लोकप्रिय बनाया। फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र में एक नयी वैज्ञानिक संस्कृति की स्थापना हुई। 1670ई० में बनी पेरिस अकादमी तथा 1662 ई. में लंदन में गठित रॉयल सोसाइटी ने वैज्ञानिक संस्कृति के प्रसार में महत्त्वपूर्ण निभाई।

प्रश्न 15.
विगली पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विगली का जन्म 1484 ई० में स्विट्जरलैंड में हुआ था। उसने धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। लूथर की तरह वह भी क्षमा पत्रों का विरोधी था। उसने ज्यूरिख को अपना केंद्र बनाया और धर्म को नए ढंग से परिभाषित करना आरंभ किया। 1525 ई. में उसने रोम से संबंध तोड़कर एक रिफाई चर्च (Reformed Church) की स्थापना की। उसने बाइबिल को धर्म का एक मात्र स्रोत बताया और पादरियों द्वारा विवाह न करने का डटकर विरोध किया।

अनेक लोग कट्टर कैथोलिक बने रहे। विगली ने इन लोगों को बलात् प्रोटेस्टेंट बनाने का प्रयास किया जिसके कारण स्विट्जरलैंड में गृह युद्ध छिड़ गया। अंत में एक समझौता हुआ जिसके अनुसार धर्म के संबंध में अंतिम अधिकार स्थानीय सरकारों को मिल गया । इस प्रकार आज भी जर्मनी की भांति स्विट्जरलैंड में भी कैथोलिक एवं प्रोटेस्टैंट दोनों ही हैं।

प्रश्न 16.
मानवतावादी संस्कृति ने मनुष्य की एक संकल्पना प्रस्तुत की। वह क्या थी?
उत्तर:
मानवतावादी संस्कति से मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर हआ। इटली के निवासी अब भौतिक संपत्ति, शक्ति और गौरव से बहुत अधिक आकृष्ट हुए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वे अधार्मिक बन गए। वेनिस के मानवतावादी फ्रेनचेस्को बरबारो (Francesco Barbaro) ने अपनी एक पुस्तिका में संपत्ति अधिग्रहण करने को एक विशेष गुण कहकर उसका समर्थन किया। लोरेंजो वल्ला (I renzo Valla) जिसका वह विश्वाः था कि इतिहास का अध्ययन मनुष्य को पराकाष्ठा का जीवन व्यतोत करने के लिए प्रेरित करता है, ने अपनी पुस्तक ‘आनप्लेजर’ में ईसाई धर्म की भोग-विलास पर लगाई गई रोक की आलोचना की।

इस समय लोग शिष्टाचार का भी पूरा ध्यान रखते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को विनम्रता से बोलना चाहिए, ठीक ढंग से कपड़े पहनने चाहिए और सभ्य व्यवहार करना चाहिए। मानवतावादी के अनुसार व्यक्ति कई माध्यमों से अपने जीवन को आदर्श बना सकता है। इसके लिए शक्ति और संपत्ति का होना आवश्यक नहीं है।

प्रश्न 17.
मानवतावाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
पुनर्जागरण की एक मूल विशेषता मानवतावाद थी। मानवतावाद का अर्थ है-मनुष्यों में रुचि लेना तथा उसका आदर करना । मानवतावाद मनुष्य की समस्याओं का अध्ययन करता है, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा उसके जीवन को सुधारने एवं समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। पुनर्जागरण काल में परलोक की अपेक्षा इहलोक को महत्व दिया गया जिसमें हम रहते हैं, और यही मानवतावाद है। मानवतावाद के समर्थक मानवतावादी कहलाए।

पैट्रार्क अग्रणी मानवतावादी था। उसने अंधविश्वासों तथा धर्माधिकारियों की जीवन प्रणाली की आलोचना की। उसने परलोक चिंतन की अपेक्षा लौकिक जीवन को आनंदपूर्वक व्यतीत करने पर बल दिया। इटली के नागरिकों ने मानवतावाद का समर्थन इसलिए किया क्योंकि वे धार्मिक बंधनों के परिणामस्वरूप अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को विकसित करने में असमर्थ थे। वास्तव में धर्म-निरपेक्षता की भावना मानवतावाद की मुख्य विचारधारा थी।

प्रश्न 18.
पश्चिमी रोम साम्राज्य के पतन के पश्चात् किन परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता पहुंचाई?
उत्तर:
पश्चिमी रोम साम्राज्य के पतन के बाद इटली के राजनैतिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों का विनाश हो गया। इस समय कोई भी एकीकृत सरकार नहीं थी। रोम का पोप अपने राज्य में अवश्यक सार्वभौम था, परंतु पूरे यूरोप की राजनीति में वह इतना मजबूत नहीं था। काफी समय से पश्चिमी यूरोप के क्षेत्र सामंती संबंधों के कारण नया रूप ले रहे थे और लातीनी चर्च के नेतृत्व में उनका एकीकरण हो रहा था।

पूर्वी यूरोप में बाइजेंटाइन साम्राज्य के शासन के अधीन बदलाव आ रहे थे। उधर कुछ और पश्चिम में इस्लाम एक साझी सभ्यता का निर्माण कर रहा था। इटली कमजोर देश था। यह अनेक टुकड़ों में बँटा हुआ था। इन्हीं परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता पहुँचाई।

प्रश्न 19.
इटली के नगरों को नया जीवन किस प्रकार मिला?
उत्तर:
बाइजेंटाइन साम्राज्य और इस्लामी देशों के बीच व्यापार की वृद्धि से इटली के तटवर्ती बंदरगाह फिर से जीवित हो उठे । बारहवीं शताब्दी में जब मंगोलों ने चीन के साथ ‘रेशम मार्ग’ द्वारा व्यापार आरंभ किया तो पश्चिमी यूरोप के देशों के व्यापार को बढ़ावा मिला । इसमें इटली के नगरों ने मुख्य भूमिका निभाई। ये नगर स्वयं को स्वतंत्र नगर राज्यों का एक समूह मानते थे। वेनिस और जनेवा इटली के दो सबसे महत्त्वपूर्ण नगर थे।

वे यूरोप के अन्य क्षेत्रों से इस दृष्टि में अलग थे कि यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामंत वर्ग राजनीति में शक्तिशाली नहीं थे। धनी व्यापारी तथा महाजन नगर के शासन में सक्रिय भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना पनपने लगी। यहाँ तक कि जब नइ नगरों का शासन सैनिक तानाशाहों के हाथ में था, तब भी इन नगरों के निवासी अपने आ को यहाँ का नागरिक कहने में गर्व अनुभव करते थे।

प्रश्न 20.
पुनर्जागरण काल में चित्रकला के विकास पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में जिस कला का सर्वाधिक विकास हुआ वह थी चित्रकला यह धार्मिक प्रभावों से मुक्त हुई और चित्रकारों ने विषयों का चुनाव सीधे जीवन से किया। इस चित्रकला का सर्वाधिक विकास इटली में हुआ। पलास्टर और लकड़ी के स्थान पर कैनवास का प्रयोग होने लगा। इस समय के महान चित्रकारों में:-गियोयो में से कियो, माइकल एन्जेलो एवं लियोनार्डो द विंची प्रमुख था। माईकल ऐन्जेलो ने ‘दि पाइटा’ नामक चित्र में मां की वात्सल्यता को उभारा तो विंची ने मोनालिसा एवं ‘लास्ट सपर’ जैसे चित्रों की जीवंत चित्रकारी के लिये रेखा ज्ञान, नरकंकालों एवं शरीर क्रिया विज्ञान का अध्ययन किया।

प्रश्न 21.
कॉपरनिकस की खोज का महत्व बतावें।
उत्तर:
कॉपरनिकस (1473-1543) ने घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह एक क्रांतिकारी विचारधारा थी जो पूर्व की मान्यताओं के विपरीत थी। ईसाईयों का यह विश्वास था कि पृथ्वी स्थिर है, जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह घूमते हैं। कॉपरनिकस के सिद्धान्त के पश्चात् केपलर (1571-1630 ई०) और गैलिलियो ने भी इस सिद्धान्त के तथ्यों को सिद्ध किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानवतावाद के उदय तथा विकास में विश्वविद्यालयों के योगदान की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यूरोप में विश्वविद्यालय सर्वप्रथम इटली के शहरों में स्थापित हुए। ग्याहरवीं शताब्दी में पादुआ और बोलोना (Bologna) विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र थे। इसका कारण यह था कि इन नगरों के मुख्य क्रियाकलाप व्यापार वाणिज्य संबंधी थे। इसलिए वकीलों और नोटरी की बहुत अधिक आवश्यकता होती थी। ये लोग नियमों को लिखते थे, व्याख्या करते थे और समझौते तैयार करते थे। इनके बिना बड़े पैमाने पर व्यापार करना संभव नहीं था।

परिणामस्वरूप कानून को रोमन संस्कृति के संदर्भ में पड़ा जाने लगा। फाचेस्को पेट्रार्क (3041348 ई.) इस परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। पेट्रार्क के लिए पुराकाल एक विशिष्ट सभ्यता थी जिसे प्राचीन यूनानियों और रोमानों के वास्तविक शब्दों के माध्यम से ही अच्छी तरह समझा जा सकता था। अतः उसने इस बात पर बल दिया कि इन प्राचीन लेखकों की रचनाओं का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए।

नया शिक्षा कार्यक्रम इस बात पर आधारित था कि अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। यह सब हम केवल धार्मिक शिक्षा से नहीं सीख सकते । इस नयी संस्कृति को उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने ‘मानवतावाद’ का नाम दिया । पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ में मानवतावादी शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकार शास्त्र, कविता, इतिहास, नीति दर्शन आदि विषय पढ़ाते थे। मानवतावाद को अंग्रेजी में ‘यूमेनिटिज्म’ कहते हैं ‘ह्यूमेनिटिज’ शब्द लातीनी शब्द ‘ह्यूमैनिटास’ से बना है। कई शताब्दियों पहले रोम के वकील एवं निबंधकार सिसरो (Cicero, 106-43 ई० पू०) ने इसे ‘संस्कृति’ के अर्थ में लिया था। इस प्रकार मानवता पद को ‘मानवतावादी संस्कृति’ कहा गया।

इन क्रांतिकारी विचारों ने अनेक विश्वविद्यालयों का ध्यान आकर्षित किया। इनमें एक नव स्थापित विश्वविद्यालय फ्लोरेंस भी था जो पेट्रार्क का स्थायी नगर-निवास था। इस नगर ने तेरहवीं शताब्दी के अंत तक व्यापार या शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष उन्नति नहीं की थी। परंतु पंद्रहवीं शताब्दी में सब कुछ बदल गया।

किसी भी नगर की पहचान उसके महान् नागरिकों तथा उसकी संपन्नता से बनती है। फ्लोरेंस की प्रसिद्धि में दो लोगों का बड़ा हाथ था। ये व्यक्ति थे-दाँते अलिगहियरी (Dante Alighieri) तथा कालकार जोटो (Giotto)। दाँते ने धार्मिक विषयों पर। लिखा और जोटो ने जीते-जागते रूपचित्र (Portrait) बनाए। उनके द्वारा बनाए रूपचित्र काफी सजीव थे। इसके बाद फ्लोरेंस कलात्मक कृतियों का सृजन केंद्र बन गया और यह इटली के सबसे बौद्धिक नगर के रूप में जाना जाने लगा।

‘रिसा व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग, प्रायः उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और वह अनेक कलाओं में कुशल हो। पुनर्जागरण काल में अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। उदाहरण के लिए एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्रज्ञ और कलाकार हो सकता था।

प्रश्न 2.
पुनर्जागरण से क्या तात्पर्य है? इसकी मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण ‘रिनेसा’ का हिंदी रूपांतर है। इसका अर्थ पुनर्जन्म है। पुनर्जागरण वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी राष्ट्र मध्य युग के अंधकार से निकलकर आधुनिक युग के प्रकाश में सांस लेने लगे। वे आधुनिक युग के विचारों और शैलियों से प्रभावित हुए। मानव ने स्वतंत्र रूप से विचार करना आरंभ किया जिससे साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित हुए।

पुनर्जागरण की विशेषताएँ –
1. तर्क की प्रधानता – पुनर्जागरण ने मध्यकालीन धर्म तथा परमपराओं में बंधे समाज को मुक्त किया और तर्क को बढ़ावा दिया। इस दिशा में अरस्तु के तर्कशास्त्र ने मार्गदर्शन किया। पेरिस, बोलोने, ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज आदि विश्वविद्यालयों ने तर्क की विचारधारा का महत्त्व बढ़ाया। अब उसी बात को सही स्वीकार किया जाने लगा जो तर्क की कसौटी पर सही प्रमाणित हो।

2. प्रयोग का महत्त्व – रोजर बेकर (1214-1294 ई.) के अनुसार हम ज्ञान को दो प्रकार से प्राप्त करते हैं-वाद-विवादों द्वारा तथा प्रयोग द्वारा। परंतु वाद-विवाद से प्रश्न का अंत हो जाता है और हम भी इस पर विचार करना बंद कर देते हैं। इससे न तो संदेह समाप्त होता है और न ही मस्तिष्क को संतुष्टि प्राप्त होती है। यह बात तब-तक नहीं होती जब-तक कि अनुभव एवं प्रयोग द्वारा सत्य की प्राप्ति नहीं हो पाती । रोजर बेकर के इन विचारों ने प्रयोग एवं प्रेक्षण को बढ़ावा दिया।

3. मानववाद – पुनर्जागरण की एक मूल विशेषता मानववाद थी। मानववाद का अर्थ है-मनुष्य में रुचि लेना तथा इसका आदर करना। मानववाद मनुष्य की समस्याओं का अध्ययन करता है, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा उसके जीवन को सुधारने एवं समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। पुनर्जागरण काल में परलोक की अपेक्षा इहलोक को महत्त्व दिया गया जिसमें हम रहते हैं और यही मानववाद है।

4. सौंदर्य की उपासना – पुनर्जागरण की एक अन्य विशेषता थी-सौंदर्य की उपासना। कलाकारों ने अपनी कतियों में मनष्य की मोहिनी 7.1 प्रस्तुत करने का प्रयास किया। मालसा की मुग्ध करने वाली मुस्कान इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण है।

प्रश्न 3.
पुनर्जागरण का जन्म सर्वप्रथम इटली में ही क्यों हुआ?
उत्तर:
पुनर्जागरण का उदय एवं प्रसार 1350 ई० से 1550 ई० के बीच इटली में हुआ। यहाँ से इसका प्रसार जर्मनी, इंग्लैंड, फ्राँस तथा यूरोपीय राष्ट्रों में हुआ। इटली में पुनर्जागरण के उदय के मुख्य कारण इस प्रकार थे –

(क) इटली एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था। इटली के इस बढ़ते व्यापार तथा इसकी समृद्धि ने पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों को बल प्रदान किया।
1. देश में मिलान, नेपल्स, फ्लोरेंस, वेनिस आदि नगरों की स्थापना हुई। इन नगरों के व्यापारी बाल्कन प्रायद्वीप, पश्चिमी एशिया, बिजेंटाइन तथा मिस्र की यात्रा करते थे। यहाँ उनकी भेंट ईरानी व्यापारियों से होती रहती थी। इस संपर्क और विचार-विनिमय से एक-दूसरे के विचारों को अपनाने की क्षमता :त्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त अधिकांश संग्रहालय, सार्वजनिक पुस्तकालय और नाट्यशालाएँ नगरों में ही स्थापित की गईं, गाँवों में नहीं। इससे इटली के सांस्कृतिक जीवन को नवीन दिशा मिली।

2. इटली की समृद्धि ने धनी व्यापारिक मध्यम वर्ग को जन्म दिया। इस वर्ग ने सामंतों तथा पोप की परवाह करना बंद कर दिया और इसने मध्यकालीन मान्यताओं का उल्लंघन किया । इससे इटली में पुनर्जागरण की भावना को बल मिला।

3. अनेक व्यापारियों ने सम्राटों, साहित्याकारों तथा कलाकारों को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप साहित्यकारों तथा कलाकारों को स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। अकेले फ्लोरेंस नगर ने ही असंख्य कलाकारों और साहित्यकारों को आश्रय दिया। दाँते, पेट्रार्क, बुकासियों, एंजेली, लियोनादी, जिबर्टी, मैक्यावली आदि लेखक एवं कलाकार सभी इसी नगर में उभरे थे। अतः स्पष्ट है कि धन की वृद्धि ने कला तथा कलाकारों की शिक्षा को पुनर्जागरण की ओर प्रवाहित कर दिया।

(ख) इटली में पुनर्जाकरण के पनपने का एक अन्य कारण यह था कि यह प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान रहा था। इटली के नगरों में विद्यमान प्राचीन रोमन सभ्यता के अनेक स्मारक आज भी लोगों को पुनर्जागरण की याद मिलाते हैं। वे इटली को प्राचीन रोम की भांति महान् देखना चाहते थे। इस तरह प्राचीन रोमन संस्कृति पुनर्जागरण के लिए प्रेरणा का स्रोत सिद्ध

(ग) रोम सारे पश्चिमी यूरोपीय ईसाई जगत् का केंद्र था। पोप यहीं निवास करता था। कुछ पोप पुना॥रण की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों को रोम लाए और उनसे यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद करवाया। पोप निकोलस पंचम ने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की। उसने सेंट पीटर्स का गिरजाघर भी बनवाया। इन कार्यों का प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ना स्वाभाविक था।

(घ) रानीतिक दृष्टि से इटली पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त था। पवित्र रोम साम्राज्य के पतन के साथ-साथ उत्तरी इटली में अनेक स्वतंत्र नगर-राज्यों का उदय हो रहा था। इसके अतिरिक्त इटली में सामंती प्रथा अधिक दृढ़ नहीं थी। परिणामस्वरूप इन नगर-राज्यों के स्वतंत्र एवं स्वछंद वातावरण ने वहाँ क नागरिकों में नवीन विचारों को विकसित किया।

(ङ) मध्यकालीन यूरोप में शिक्षा पर धर्म का प्रभाव था, परंतु इटली में व्यापार के विकास के कारण शिक्षा धर्म के बन्धनों में मुक्त थी। यहाँ पाठ्यक्रम में व्यावसायिक ज्ञान, भौगोलिक ज्ञान आदि को उपयुक्त स्थान प्राप्त था। परिणामस्वरूप विज्ञान तथा तर्क को बल मिला।

(च) 1453 ई० में तुर्को ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। वहाँ के अधिकांश यूनानी विद्वान, कलाकार और व्यापारी भाग कर सबसे पहले इटली के नगरों में आए और यहीं पर बस गए। ये विद्वान अपने साथ प्राचीन साहित्य को अनेक अनमोल पांडुलिपियाँ भी लाये । कुछ विद्वानों ‘ने इटली के विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य करके नवीन चेतना जागृत की।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण की अग्रणी विभूतियाँ कौन थीं? कला, साहित्य तथा विज्ञान के क्षेत्रों में पुनर्जागकरण को विभिन्न उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जाकरण के काल में अनेक महान् विभूतियों का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी प्रतिभा तथा आविष्कारों से, साहित्य तथा विज्ञान को नये आयाम प्रदान किए। इनमें से प्रमुख विभूतियों तथा उनकी सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है –

1. पेटॉर्क – पेट्रॉर्क इटली का एक महान् लेखक तथा कवित था। उसे रोम के सम्राट ने 1341 ई० में राजकवि की उपाधि से विभूषित किया। उसे मानववाद का प्रतीक स्वीकार किया जाता है। उसने तत्कालीन समाज की आलोचना की और प्रचलित शिक्षा-प्रणाली पर तीखे प्रहार किए।

2. माइकल एंजिलो – यह पुनर्जागरण काल का एक महान् कलाकार था। यह चित्रकार तथा उच्च कोटि का मूर्तिकार था। उसकी चित्रकला की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ रोम के गिरजाघर सिस्तीन की छत में दिखाई देती हैं। उसका एक चित्र ‘दि फॉल ऑफ मैन’ विश्वविख्यात है। उसे मानवतावाद का दूत स्वीकार किया जाता है।

3. रफेल – इटली का यह महान् चित्रकार, माइकेल एंजिली तथा लियोनार्दो-द-विंची का समकालीन था। उसकी सर्वप्रथम कृति ईसा की माता मेंडोना का चित्र है जो आज भी रोम की शोभा है। उसने ईसाई धर्म से संबंधित विषयों पर अनेक चित्र बनाए और गिरजाघरों तथा महलों की दीवारों को उपदेशात्मक विषयों से सुसज्जित किया।

4. टॉमस मोर – टॉमस मोर का जन्म लंदन में हआ था। वह इंग्लैंड का चांसलर भी रहा। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत किया। टॉमस मोर पर इंग्लैंड की सरकार ने मुकदमा चलाया था और 1535 ई० में उसे फाँसी दे दी गई थी।

5. मेकियावली – इटली के नगर फ्लोरेंस के इन निवासी को आधुनिक राजनीति दर्शन का पिता माना जाता है। उसने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक ‘दि प्रिंस (The Prince) में राज्य की नई कल्पना का चित्र प्रस्तुत किया है। इसमें उसने शासन करने की कला का वर्णन भी किया है। उसके अनुसार धर्म और राजनीति का कोई संबंध नहीं है। उसके विचारों का आधुनिक शासन-प्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ा।

6. लियोनार्दो-द-विंची – इटली का यह महापुरुष बहुमुखी प्रतिभा का स्वामी था। वह चित्रकार, मूर्तिकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि और भी सभी कुछ था। उसने हवाई जहाज बनाने का भी प्रयत्न किया। उसके चित्रों में ‘दि लास्ट सपर’ चित्र बहुत प्रसिद्ध है।

7. गुटेनबर्ग – वह जर्मनी के मेंज नगर का निवासी था। प्रारंभ में वह हीरे और दर्पणों पर पॉलिश किया करता था। उसने मुद्रण के लिए आवश्यक वस्तुओं तथा कल पुर्जा का आविष्कार किया। वह प्रथम व्यक्ति था जिसने 1450 ई० के लगभग छापाखाना तैयार किया।

8. मार्टिन लूथर – मार्टिन लूथर जर्मनी का निवासी था। 1517 ई० में उसने रोम की धार्मिक यात्रा की। यहाँ उसने पोप और चर्च की बुराइयाँ देखीं। वापस आकर उसने इन बुराइयों के विरुद्ध सुधार आंदोलन आरंभ किया। इसे आंदोलन के परिणामस्वरूप ईसाई धर्म की प्रोटेस्टेंट शाखा का प्रचलन हुआ। उसने जर्मन भाषा में बाईबिल का अनुवाद किया। चर्च के विरुद्ध लिखे गए ग्रंथ में उसकी पुस्तक
‘टेबल टॉक’ अति प्रसिद्ध है। उसने मुक्ति पत्रों का घोर विरोध किया।

9. जॉन वाइक्लिफ – वह इंग्लैड का रहने वाला था। ‘सुधार आंदोलन’ का ‘प्रभात का सितारा’ कहा जाता है, क्योंकि उराने लूथर से पूर्व ईसाई धर्म में सुधार के प्रयत्न किए। उसने अपने विद्यार्थियों की सहायता से इ. बेल का अनुवाद अपनी मातृभाषा में किया। चर्च ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित किया और उसकी कई रचनाएँ जला दी गई।

10. गैलीलियों – गैलीलियो का जन्म इटली के नगर पीसा में हुआ। वह एक उच्च कोटि का गणितज्ञ था। 1609 ई० में उसने दूरबीन का आविष्कार किया जिसके परिणामस्वरूप सामुद्रिक यात्राएँ सरल बन
गई। वह उन पहले व्यक्तियों में से था जिन्होंने घोषणा की कि पृथ्वी एक ग्रह है जो सूर्य के चारों ओर घूमती है।

11. कोपरनिकस – यह पोलैंड का निवासी था। वह नक्षत्र विद्या का ज्ञाता था। उसका मुख्य योगदान आकाश के विभिन्न ग्रहों की गतियों की जानकारी देना था। उसने यह बताया कि पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं।

12. दाँते – यह इटली का महानतम् कवि था। उसे इतिहास में ‘दस नीरव शताब्दियों की वाणी’ कहा जाता है। उसने सेना में भी कार्य किया था। वह न्यायाधीश भी रहा। उसने जीवन में बहुत कष्ट झेला। उन्हीं यातनाओं ने उसे श्रेष्ठ कवि बना दिया। ‘डिवाइन कॉमेडी’ उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। इसमें दाँते ने स्वर्ग और नरक की काल्पनिक यात्रा का वर्णन किया है।

13. जॉन हस – वह प्राग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। उसने चर्च की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। परिणामस्वरूप उसे पोप के आदेशानुसार जीवित जला दिया गया।

14. फ्रांसिस बेकिन – फ्रांसिस बेकिन अंग्रेजी राजनीतिज्ञ तथा साहित्यकार था। वह अपने ‘श्रेष्ठ निबंधों के लिए विश्वविख्यात है।

15. हार्वे – हार्वे इंग्लैंड का इंग्लैंड का रहने वाला था। उसने 1610 ई० में इस बात का वर्णन किया कि रक्त किस प्रकार दिल से शरीर के सब भागों में जाता है और फिर लौलकर दिल में आता है।

16. वेसिलियस – यह बेज्लियम का रहने वाला था। उसने पहली बार मानवीय शरीर का पूर्ण अपनी पुस्तक में किया । पुस्तक का नाम था-De Humani Corporis Fabrica.

17. सर्वेतम – सर्वेतस स्पेन का रहने वाला था। वह एक महान् योद्धा और सफल लेखक था। उसकी रचित Don Quixote विश्व की महानतम् रचनाओं में गिनी जाती है और इसका लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पुस्तक में मध्यकालीन सामंतों की वीर गाथाओं का वर्णन है।

प्रश्न 5.
16वीं तथा 17वीं शताब्दी के दौरान हुए धर्म-सुधार (प्रोटेस्टेंट) आंदोलन के कारणों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
धर्म – सुधार आंदोलन से हमारा अभिप्राय उस आंदोलन से है जिसे जर्मनी के मार्टिन लूथर ने रोमन चर्च में प्रचलित अनुचित रीति-रिवाजों के विरोध में चलाया। इस आंदोलन के समर्थकों ने प्रष्ट परंपराओं को समाप्त करके सुधरी हुई परंपरा स्थापित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने रोमन चर्च से पृथक होकर एक नए प्रोटेस्टेंट चर्च की स्थापना की। इस प्रकार ईसाई धर्म के अनुयायी दो गुटों में विभाजित हो गए-कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट। धर्म सुधार आंदोलन पर्पनी से यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गया । इसे स्विट्जरलैंड में विगली तथा फ्रांस में काल्विन ने आ गे बढ़ाया।

कारण – धर्म सुधार आंदोलन के निम्नलिखित कारण थे –
1. मध्यकाल में रोमन कैथोलिक चर्च पश्चिमी यूरोप में अपना प्रभुत्व जमाए हुए था। इसमें सर्वोच्च स्थान पोप का था। वह यूरोप की समस्त ईसाई जनता का नेतृत्व करता था। चर्च की आपर शक्ति के कारण इसमें कई दोष आ गए थे। पुनर्जागरण के फलस्वयप सामान्य ज्ञान और विवेक के आधार पर जनता का चर्च में विश्वास कम होने लगा। लोग पूजा-पाठ का चर्च के संगठन की आलोचना करने लगे।

2. पोप की शक्ति असीम थी। वह विभिन्न देशों में पादरियों की नियुक्ति करता था। चर्च की अपनी अलग अदालत थी। चर्च के पदाधिकारी राज्य के नियमों से मुक्त थे। पोप राज-कार्यों में हस्तक्षेप किया करता था। इसलिए राजा पोप से मुक्त होने के लिए किसी अवसर की खोज में थे।

3. राष्ट्रीय राज्यों के उदय के साथ राजाओं की शक्ति बढ़ी। वे पोप के अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों पर अंकुश चाहते थे। इसलिए राजाओं ने धर्म सुधार आंदोलन को गति दी।

4. व्यापारी वर्ग भी चर्च के विरुद्ध था। वे चर्च की विपुल संपत्ति का लाभ उठाना चाहते थे। अतः उन्होंने चर्च के विरुद्ध राजाओं का समर्थन किया।

5. पादरी नैतिक रूप से पतन की ओर अग्रसर थे। अत: चर्च में जनता की आस्था कम होने लगी थी। चर्च जन-साधारण से अनेक प्रकार के कर और शुल्क वसूल करता था। यह धन देश के बाहर जाता था। सबसे अधिक भूमि का स्वामी चर्च ही था। चर्च को कर देना पाप समझा जाता था। पश्चिम यूरोप में चर्च की जागीरों में उनके कर्मचारी आतंक मचाते थे। अतः जनता भी कॅथोलिक चर्च के विरुद्ध आवाज उठाने लगी।

6. धर्म सुधार आंदोलन का मूल कारण जनता में पुनर्जागरण का प्रसार ही था। इस युग में प्रचलित मान्याताओं तथा विश्वासों का तर्क की कसौटी पर परीक्षण किया गया। तर्क की कसौटी पर पोष तथा पादरियों के अधिकार तथा व्यवहार खरे नहीं उतरे। अतः धार्मिक दोषों का विरोध होना स्वाभाविक ही था।

प्रश्न 6.
धर्म सुधार आंदोलन के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
धर्म सुधार आंदोलन के निम्नलिखित परिणाम निकले –
1. सामाजिक परिणाम – इस आंदोलन के कारण अंधविश्वासों और आडंबरों का अंत हुआ। साधारण नागरिक को बाइबिल का अध्ययन करने की सुविधा प्राप्त हो गई। वैज्ञानिकों को भी अपने मध्यकाल में स्वतंत्रता मिली। चर्च की संपत्ति का किसानों तथा मध्य वर्ग में वितरण होने लगा और लोग चर्च के कर-भार से मुक्त हो गए।

2. कैथोलिक धर्म में सुधार आंदोलन – कैथोलिक धर्म में अनेक सुधार हुए। कैथोलिक चर्च में सुधार के लिए ट्रेंट में एक परिषद् बुलाई गई। इसकी बैठकें अठारह साल तक चली। पोप की प्रधानता और उसके चर्च तथा धर्म ग्रथों की व्याख्या के अधिकार स्वीकार किए गए। इबिल का लेटिन में अनुवाद भी प्रामाणिक माना गया। चर्च ने क्षमा-पत्र बेचना बंद कर दिया। चर्च के अधिकारियों के प्रशिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाया गया।

3. गजनीतिक परिणाम – राजनीतिक जीवन में चर्च का प्रभाव कम हुआ। ग तरह राजाआ का शक्ति बढ़ी। पोप का बाहय हस्तक्षेप समाप्त हो गया। इस प्रकार राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण में बड़ा योगदान मिला।

4. वाणिज्य तथा व्यापार को प्रोत्साहन – पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप सामंतवादी व्यवस्था का अंत हो गया तथा व्यापार की प्रगति हुई। व्यापार की प्रगति के कारण एक समृद्ध मध्यम वर्ग का उदय हुआ।

5. राष्ट्रीय भाषा तथा साहित्य का प्रसार – धर्म सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप लोक भाषाओं तथा साहित्य का विकास हुआ। मार्टिन लूथर ने बाइबिल का अनुवाद जर्मन भाषा में किया। धर्म संबंधी लेख उसने जर्मन भाषा में प्रकाशित कराए। अन्य देशों में भी धर्म का प्रचार वहाँ की लोकभाषा में ही किया गया। जो प्रतिष्ठा कभी लैटिन भाषा को प्राप्त थी, वह अब लोक भाषाओं को मिलने लगी।

प्रश्न 7.
प्रति सुधार आंदोलन से क्या तात्पर्य है? वह कैथोलिक चर्च में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में कहाँ तक सफल रहा?
उत्तर:
चर्च तथा पोप की असीमित शक्ति और पोप तथा पादरियों के आडंबरपूर्ण कार्यों के विरुद्ध धर्म सुधार आंदोलन चला था। फलस्वरूप एक नए सुधारवादी धर्म (प्रोटेस्टेंट) का उदय हुआ। आरंभ में पोप तथा चर्च सुधारवादी आंदोलन के प्रति उदासीन रहे। परंतु जब इस आंदोलन ने जोर पकड़ा तो पोप को अपनी बेटियों का अनुभव हुआ। उसने अपने चर्च में सुधार लाने के लिए अपनी ओर से एक आंदोलन चलाया । इस आंदोलन को प्रति सुधार आंदोलन अथवा काउंटर रिफॉर्मेशन कहा जाता है। कैथोलिक चर्च की बुराइयों को दूर करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए

1. प्रति सुधार आंदोलन ने कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए तीन तरफा प्रयास किया। 1545 ई० में पोप पाल तृतीय ने ट्रेंट की परिषद् (Council of Trent) बुलाई। प्रोटेस्टेंटवाद से निपटने के तरीकों पर विचार किया गया। इस उद्देश्य से प्रोटेस्टेंटवादियों तथा कैथोलिक के बीच सैद्धांतिक झगड़ों को समाप्त करने के निर्णय लिया गया। इस परिषद् ने चर्द की प्रशासनिक बुराइयों को समाप्त करने तथा अनैतिक कार्यों पर रोक लगाने का निर्णय भी लिया। इसके अतिरिक्त इस परिषद् ने कुछ पुस्तकों की एक सूची तैयार करवाई। कैथोलिकों को इन पुस्तकों को पढ़ाने के लिए मना कर दिया गया।

2. धर्म प्रचारकों की एक संस्था स्थापित की गई। ये धर्म प्रचारक जेसुइट कहलाए। इस संगठन का नेता लोयोला (Loyola) नामक एक स्पेनिश था।

3. कैथोलिक चर्च ने अपनी इंकविजिशन (चर्च की अदालत) नामक संस्था की पुनः स्थापना की। इन प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भले ही समस्त यूरोप को पोप की सत्ता के अधीन नहीं लाया जा सका, तो भी ये प्रयास प्रोटेस्टेंटवाद के और अधिक प्रसार को रोकने में सफल रहे।

प्रश्न 8.
मानवतावादी विचारों का प्रचार किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
मानवतावादी अपनी बात लोगों तक तरह-तरह से पहँचाते थे। यद्यपि विश्वविद्यालय में मुख्य रूप से कानून, आयुर्विज्ञान और धर्मशास्त्र ही पढ़ाए जाते थे फिर भी धीरे-धीरे मानवतावादी विषय भी स्कूलों में पढ़ाये जाने लगे। ऐसा केवल इटली में ही नहीं, बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी हुआ। पुनर्जागरण काल में मानवतावादी विचारों के प्रसार में केवल औपचारिक शिक्षा ने ही योगदान नहीं दिया। इसमें कला, वास्तुकला और साहित्य ने भी प्रभावी भूमि निभाई।

नए कलाकारों को पहले के कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्रों से प्रेरणा मिली। रोमन संस्कृति के भौतिक अवशेषों की उतनी ही उत्कंठा के साथ खोज की गई जितनी कि प्राचीन ग्रंथों की। रोम साम्राज्य के पतन के एक हजार वर्षों बाद भी प्राचीन राम और उसके वीरान नगरों के खंडहरों से कलात्मक वस्तुएँ प्राप्त हुई। शताब्दियों पहले बनी पुरुषों एवं नियों की संतुलित मूर्तियों ने इतालवी वास्तुविदों को उस परंपरा को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। 1416 ई. में दोनातल्लो (Donatello, 1386-1466) ने सजीव मूर्तियाँ बनाकर एक नयी परंपरा स्थापित की।

प्रश्न 9.
चित्रकारों ने इतालवी कला को यथार्थवादी रूप कैसे प्रदान किया?
उत्तर:
कालकारों को मूल आकृति जैसी सटीक मूर्तियाँ बनाने की चाह को वैज्ञानिकों के कार्यों ने और अधिक प्रेरित किया। नर-कंकालों का अध्ययन करने के लिए कलाकार आयुर्विज्ञान कालेजों की प्रयोगशाला में गए। बेल्जियम मूल के आंडीयस बेसेलियम (1514-64 ई.) पादुआ

प्रश्न 10.
ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद कैसे उत्पन्न हुआ? अथवा, धर्म-सुधार आंदोलन की भूमिका कैसे तैयार हुई?
उत्तर:
यात्रा, व्यापार, सैनिक विजय तथा कूटनीतिक संपर्कों के कारण इटली के नगरों तथा राजदरबारों का दूर-दूर के देशों से संपर्क स्थापित हुआ। यहाँ के शिक्षित एवं समृद्ध लोगों ने ‘ इटली की नयी संस्कृति को प्रसन्नतापूर्वक अपना लिया। परंतु नए विचार आम आदमी तक न पहुंच सके, क्योंकि वे साक्षर नहीं थे। नये विचारों का प्रसार-पंद्रहवीं और आरंभिक सोलहवीं शताब्दी में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के अनेक विद्वान मानवतावादी विचारों की ओर आकर्षित हुए।

इटली के विद्वानों की भांति उन्होंने भी यूनान तथा रोम के क्लासिकी ग्रंथों और ईसाई धर्मग्रंथों के अध्ययन पर अधिक ध्यान दिया। परंतु इटली के विपरीत यूरोप में मानवतावाद ने ईसाई चर्च के अनेक सदस्यों को अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने ईसाइयों को अपने प्राचीन धर्मग्रंथों में बताए गए तरीकों से धर्म का पालन करने को कहा। उन्होंने अनावश्यक कर्मकांडों को त्यागने की बात भी की और कहा कि उन्हें धर्म में बाद में जोड़ा गया है। मानव के बारे में उनका दृष्टिकोण बिल्कुल नया था। वे उसे एक मुक्त एवं विवेकपूर्ण कर्ता समझते थे। बाद के दार्शनिक बार-बार इसी बात को दोहराते रहे । वे एक दूरवर्ती ईश्वर में विश्वास रखते थे और मानते थे कि मनुष्य को उसी ने बनाया है।

वे यह भी मानते थे कि मनुष्य को अपनी खुशी इसी विश्व में वर्तमान में ही ढूँढ़नी चाहिए। चर्च पर प्रहार-इंग्लैंड के टॉकस मोर (Thomas More 1478-1535 ई.) और हालैंड के इरेस्मस (Erasmus 1466-1536 ई.) का यह मानन था कि चर्च एक लालची संस्था बन गई है जो मनचाहे ढंग से साधारण लोगों से पैसा बटोर रही है। पादरियों द्वारा लोगों से धन ठगने का सबसे सरल तरीका ‘पाप-स्वीकारोक्ति’ (indulgences) नामक दस्तावेज का विक्रय था जो व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए सभी पापों से छुटकारा दिला सकता था। ईसाइयों को बाईबिल के स्थानीय भाषाओं में छपे अनुवाद से यह पता चल गया कि उनका धर्म ऐसी प्रथाओं की आज्ञा नहीं देता।

किसान तथा राजाओं में चर्च के प्रति असंतोष-यूरोप के लगभग प्रत्येक भाग में किसानों ने चर्च द्वारा लगाए गए विभिन्न करों का विरोध किया। इसके साथ-साथ राजा भी राज-काज में चर्च के हस्तक्षेप से दु:खी थे। परंतु मानवतावादियों ने उन्हें यह बताया कि चर्च की न्यायिक और वित्तीय शक्तियों का आधार कॉस्टैनआइन का अनुदान नामक एक दस्तावेज है। यह दस्तावेज असली नहीं था बल्कि जालसाजी से तैयार किया गया था। यह जानकारी पाकर राजाओं में खुशी की लहर दौड़ गई। इसी घटनाक्रम ने ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद को जन्म दिया और धर्म-सुधार आंदोलन की भूमिका तैयार की।

प्रश्न 11.
यूरोप के (इटली के) साहित्य पर पुनर्जागरण के क्या प्रभाव पड़े।
उत्ता:
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप मानव रोवन के प्रत्येक पक्ष में नवीनता आई। साहित्य में भी इस नवीनता के दर्शन हुए। पुनर्जागरण काल में लातीनी तथा यूनानी भाषाओं की अपेक्षा देशी अर्थात् मातृभाषाओं में साहित्य का सृजन किया जाने लगा। इस तरह इस काल में इतालवो, फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली, जर्मन, अंग्रेजी, डच, स्वीडिश आदि बोलचाल की भाषाएँ विकसित हुई। पॉडत नेहरू भी लिखते हैं कि ‘इस प्रकार यूरोप की भाषाओं ने प्रगति की और वे इतनी संपन्न एवं शक्तिशाली हो गई कि उन्होंने आज की सुंदर भाषाओं का रूप धारण कर लिया।

इन्हीं सुंदर भाषाओं में साहित्य की रचना हुई। और तो और बाइबिल का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। पुनर्जागरण काल में केवल भाषाई परिवर्तन ही नहीं हुआ, बल्कि विषय-वस्तु संबंधी परिवर्तन भी हुए। मध्यकालीन साहित्य का मुख्य विषय धर्म था। परंतु इस युग के साहित्य में धार्मिक विषयों के स्थान पर मनुष्य जीवन और समस्याओं को महत्व दिया गया। अब साहित्य आलोचना प्रधान, मानववादी और व्यक्तिवादी हो गया।

इतालवी साहित्य-पुनर्जागरण काल में इटली के साहित्याकारों ने अपनी रचनाओं द्वारा यूरोप के विद्वानों के लिए नवीन दिशाएँ प्रस्तुत की। इन साहित्याकारों में दाँते (1265-1321 ई.), फ्रांचेस्को पैट्रार्क (1304-1374 ई.), ज्योवानी बुकासियो (1313-1375) प्रमुख थे। इन तीनों ने क्रमशः अपनी कविताओं, जीवनियों और कथाओं से इटली के साहित्य को समृद्ध बनाने का प्रयत्न किया।

1. दाँते (Dante) – दाँते एक महान् कवि था। प्रायः उसकी तुलना विद्वान होमर के साथ की जाती है। उसकी रचना ‘डिवाइन कॉमेडी’ (Divine Comedy) विश्वविख्यात है। यह एक काल्पनिक कथा है। इसमें एक यात्रा का चित्र प्रस्तुत किया गया है। दाँते इस काल्पनिक यात्रा में नरक तथा स्वर्ग की यात्रा करता है। हम सबसे पहले नरक की यातनाओं और पीड़ाओं का दृश्य देखते हैं। इसके पश्चात् हम पापमोचन स्थल देखते हैं जहाँ संयम और कठोर जीवन से आत्मशुद्धि होती है और अंत आत्मिक सुख से होता है।

दाँते ने इसीलिए इसे ‘कॉमेडी’ (सुखांत) कहा है। इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य को नैतिक तथा संयमी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देना है। उसने लोगों को मानव प्रेम, देश-प्रेम तथा प्रकृति प्रेम की शिक्षा दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विषय-वस्तु मध्यकालीन और आध्यात्मिक है, फिर भी इसमें साहित्यिक श्रेष्ठता से युका आध्यात्मिक विषय का एक सरस चित्रण है। ‘दाँते को इतालवी कविता का पिता’ कहा जाता है।

2. पेदा (Patrare) – पेट्रार्क को ‘मानववाद का पिता’ कहा जाता है। मानवतावाद के प्रतिनिधि के रूप में उसे पुनर्जागरण का भी प्रथम व्यक्ति स्वीकार किया जाता है। अनेक इतिहासकार उसे दाँते से उच्च स्थान प्रदान करते हैं। उनका कहना है कि दति की ‘डिवाइन कॉमेडी’ में मध्यकाल की झलक है, जबकि पेट्रार्क की कविता नवीनता लिए हुए है। पेट्राक ने लोगों का ध्यान शिक्षा और साहित्य के स्थान पर यूनानी तथा रोमन साहित्य की विशिष्टता की ओर आकर्षित किया। उसकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के हर्ष तथा विषाद का मार्मिक वर्णन मिलता है। उसने यूनानी और लातीनी भाषा के पुराने हस्तलिखित ग्रंथों को खोजने और उनका संग्रह करने में बड़ा उत्साह दिखाया।

उसने अनेक पस्तकालय खोले और लोगों में पस्तकों के लिए रुचि पैदा की। कविता के अतिरिक्त उसने होमर, सिसरो, लिवी आदि प्राचीन लेखकों की रचनाओं में गहन रुचि दिखाई । उसने इनके साथ काल्पनिक पत्राचार किया। ये पत्र उसकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुए। इन पत्रों से पता चलता है कि उसका प्राचीन सभ्यात के प्रति बडा लगाव था। उसका सबसे बड़ा योगदान है कि उसने देशवासियों में प्राचीन यूनानी एवं रोमन साहित्य में अभिरुचि पैदा की।

3. बुकासियों (Bocacio) – बुकासियो पेट्रार्क का शिष्य था। उसने पुनर्जागरण का पूर्ण प्रतिनिधित्व किया। कहानीकार के रूप में उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति ‘डैकेमैरोन’ (Deccacmeron) है। इस हास्य प्रधान रचना में कुल एक सौ कहानियाँ हैं जिनमें एक नवीन शैली का विकास किया गया है। इनमें इटली के तत्कालीन संपन्न समाज में फैले नैतिक भ्रष्टाचार का वर्णन है। दाँते, पेट्रार्क तथा बुकासियो के अतिरिक्त एरिआस्ट्रो, दासो, सैल्यूतानी आदि ने अपने-अपने ढंग से इतालवी साहित्य को समृद्ध बनाया।

प्रश्न 12.
पुनर्जागरण काल से विज्ञान के क्षेत्र में क्या प्रगति हुई?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण उन्नति हुई। इसके प्रमुख कारण थे –

  • धर्म-सुधार आंदोलर ने लोगों को चर्च के नियंत्रण से मुक्ति दिलाई। अब उन्हें स्वतंत्र रूप से विचार करने का अवसर प्राप्त हुआ।
    मानववाद के विकास से बौद्धिक विकास को बढ़ावा मिला।
  • दार्शनिकों की विचार-प्रणाली में अंतर आया। अब वे भविष्य के विषय में भी सोचने लगे। उनका यह दूरदर्शी दृष्टिकोण नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों का आधार बना।
  • राष्ट्रीय राज्यों के उदय तथा नवीन सामाजिक व्यवस्था के विकास से भी वैज्ञानिक विचारधारा को प्रोत्साहन मिला।
  • नए देशों की खोज से लागों की जिज्ञासा बढ़ी। परिणामस्वरूप उनके दृष्टिकोण में भी परिवर्तन हुआ।
  • पुनर्जागरण काल के विद्वान परंपरागत विचारों को अंधाधुंध स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

वे प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसना चाहते थे। अंग्रेज विद्वान फ्रांसिस बेकन ने लोगों के सम्मुख ये विचार प्रस्तुत किए-“ज्ञान की प्राप्ति केवल प्रेक्षण और प्रयोग करने से ही हो सकती है। जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे पहले अपने चारों ओर घटित होने वाली घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए। फिर उसे स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि इन घटनाओं के पीछे क्या कारण हैं। जब वह किसी घटना के संभावित कारण के विषय में कोई धारणा बना ले, तो उसकी प्रयोगात्मक ढंगे से जाँच करे।” इस तार्किक दृष्टिकोण ने वैज्ञानिक प्रगति को संभव बनाया। इस काल में हुई वैज्ञानिक प्रगति का वर्णन इस प्रकार है

1. दूसरी शताब्दी में यूनानी खगोल शास्त्री टॉलमी ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था कि पृथ्वी विश्व के केंद्र में स्थित है। परंतु 16वीं शताब्दी में पोलैंड के वैज्ञानिक कोपरनिकस (1473-1543 ई.) ने इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध कर दिखाया। उसने बताया कि पृथ्वी एक ग्रह है और यह सूर्य के चारों ओर घूमती है। उसने यह निष्कर्ष गणना एवं प्रेक्षण के पश्चात् ही निकाला था। परंतु उसके द्वारा प्रतिपादित इस नवीन सिद्धांत का घोर विरोध हुआ, क्योंकि यह बाइबिल के प्रतिकूल था।

अत: पोप के आदेश पर उसे अपने नए विचारों का प्रसार बंद करना पड़ा। तत्पश्चात् इटली के वैज्ञानिक जाइडिनी ब्रूनो (1548-1600 ई.) ने कोपरनिकस के सिद्धांत का समर्थन किया और इसे फिर से प्रचलित करने का प्रयास किया। परंतु रोम के धर्माधिकारियों के आदेश से उसे जीवित जला दिया गया।

फिर भी तर्क पर आधारित सिद्धांत को काटा नहीं जा सका । जर्मन खगोलशास्त्री जॉन केपलर (1571-1630 ई.) ने भी प्रमाणों द्वारा इस सिद्धांत की पुष्टि की। उसने यह भी बताया कि पृथ्वी की भांति अन्य ग्रह भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। उनका मार्ग वृत्तीय नहीं, अपितु दीर्घवृत्ताकार (अंडाकार) है। इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो (1564-1642 ई.) ने स्वयं एक दूरबीन बनाई और उसकी सहायता से सूर्य, तारों तथा ग्रहों को देखा। उसने भी घोषणा की कि कोपरनिकम के विचार सत्य हैं। परंतु चर्च ने फिर से अपनी टांगे अड़ाई और उसे यह बात स्वीकार करने र विवश कर दिया कि उसने जो कहा है, वह असत्य है।

2. गैलीलियो ने अरस्तु की इस बात को भी प्रयोग द्वारा गलत सिद्ध किया कि गिरते हुए पिंडों की गति उनके भार पर निर्भर करती है। उसने बताया कि यह भार पर नहीं, अपितु दूरी पर निर्भर करती है।

3. उसी युग में इंग्लैंड के महान् वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ आइजक न्यूटन (1642-17271) ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिससे खगोल विज्ञान को एक नई दिशा मिली। उसने सिद्ध किया की पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु को ऊपर से नीचे खींचती है। न्यूटन के इस अन्वेषण का व्यापक प्रभाव पड़ा । लोग यह सोचने पर विवश हो गये कि विश्व कोई दैव योग (दैवी शक्ति) नहीं चला रहा । यह प्रकृति के सुव्यवस्थित नियमों के अनुसार चल रहा है।

4. पुनर्जागरण काल में खगोल विज्ञान के अतिरिक्त चिकित्सा, रसायन, भौतिक एवं गणितशास्त्र के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उन्नति हुई। नीदरलैंड के वेसेलियस (1514-64 ई.) ने औषधि तथा शल्य प्रणाली का गहन अध्ययन करने के पश्चात् ‘मानव शरीर की संरचना (The Structure of Human Body) नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने मानव शरीर के विभिन्न अंगों का समुचित विवरण प्रस्तुत किया। इंग्लैंडवासी विलियम हार्वे (15781657 ई.) ने पशुओं पर विभिन्न प्रयोग करके रक्त प्रवाह के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इन सिद्धांतों से स्वास्थ्य तथा रोग की समस्याओं का अध्ययन नये ढंग से आरंभ हुआ।

प्रश्न 13.
पुनर्जागरण का लोगों के साधारण जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
पुनर्जागरण के प्रभाव का वर्णन इस प्रकार है –
1. सामाजिक जीवन पर प्रभाव-पुनर्जागरण का यूरोप के समाज पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इससे पूर्व राजा, सामंत और पादरी के अतिरिक्त किसी को समाज में सम्मान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण के साथ-साथ नागरिक जीवन का महत्त्व बढ़ने लगा। नगरों में रहने वाले मध्य वर्ग के लोगों को सम्मान पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। मध्यकाल तक सामाजिक जीवन अपेक्षाकृत सरल ही था। समाज में मुख्यत: सामंत और चर्च ही प्रधान समझे जाते थे।

साधारण लोग भाग्यवादी थे और अंधविश्वासों की बेड़ियों में जकडे हए थे। वे इहलोक से ज्यादा परलोक करते थे। यही कारण था कि पादरी राज्य के अधिकारियों से भी अधिक सशक्त थे। पुनर्जागरण के कारण समाज में व्यवसाय और उद्योगों की भी उन्नति हुई। गाँवों और खेती का महत्त्व घटने लगा। धन के उत्पादन से साधनों में वृद्धि हुई। व्यवसायी, बैंकर, उद्योगपति, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक समाज
में सम्मान प्राप्त करने लगे। सच तो यह है कि पनर्जागरण के साथ सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा और समाज में तनाव बढ़ने लगा।

2. धार्मिक जीवन पर प्रभाव-पुनर्जागरण का धार्मिक स्वरूप, धर्म सुधार आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ। मध्य युग में धर्म समाज की धुरी था। पश्चिमी यूरोप की जनता कैथोलिक चर्च और पूर्वी यूरोप के लोग ग्रीक आर्थोडाक्स चर्च की छत्रछाया में जीवन व्यतीत करते थे। चर्च धर्म के स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करना चाहता था।

चर्च की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। उसकी शक्ति का प्रमाण इस बात से मिलता है कि जब ग्यारहवीं शताब्दी में पवित्र रोमन सम्राट हेनरी ने पोप ग्रेगोरी के हस्तक्षेप को मानने से इन्कार किया तो उन में उसे सर्दी के दिनों में नंगे पाँव आल्पस पर्वत पार करके पोप से क्षमा माँगने जाना पड़ा था। जब इंग्लैंड में वपाइक्लिफ और हंगरी के हंस ने चर्च में कछ सुधार करने की कोशिश की तो उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी।

चर्च के लिए पोपों का सेवाभाव समाप्त हो चुका था। विभिन्न संतों के अनुयायी होते हुए भी वे स्वयं को कैथोलिक चर्च के अधीन मानते थे। मध्ययुग में प्राचीन धर्म में कोई परिवर्तन न किया गया। परिणामस्वरूप चर्च में अंधविश्वासों और भ्रष्टाचार का बोलबाला होने लगा। राजा और सामंत तो इसके हिस्सेदार बन जाते थे इसका सारा दबाव समाज पर पड़ता था। पुनर्जागरण के कारण जब व्यक्तिवाद की स्थापना हुई तो सबसे पहले धार्मिक स्थिति की आलोचना आरम्भ हुई।

दाँते, एरासमस, टॉमस मोर से वाल्तेयर के समय तक चर्च में परिवर्तन की मांग बढ़ गई। अपने भ्रष्ट स्वरूप और आर्थिक शोषण के कारण चर्च को भी परिवर्तन अनिवार्य लगने लगा। सोलहवीं शताब्दी में चर्च का विरोध करने वालों ने प्रोटेस्टेंट चर्चा की परंपरा आरंभ की। अतः चर्च का एकाधिकार समाप्त होने लगा। मानव किसी भी सिद्धांत को अपनाने से पूर्व उसे विवेक और कसौटी पर परखने लगा।

3. आर्थिक जीवन पर प्रभाव-मध्ययुग में आर्थिक जीवन अपेक्षाकृत सरल और व्यवस्थित था। आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि पर आधारित था। आर्थिक संबंधों की नियोजक संस्थाएँ कम थौं। श्रमिकों और कारीगरों को निर्देशित करने वाली मुख्य संस्था ‘गिल्ड’ थी। इनके संचालक अनुयायियों के हितों की अपेक्षा निजी हितों को अधिक महत्त्व देते थे। परिणामस्वरूप विभिन्न गिल्डों में प्रतिस्पर्धा होती थी। यहाँ तक कि एक ही गिल्ड के सदस्यों में भी परस्पर शत्रुता उत्पन्न होने लगी। ये संस्थाएँ बोझ बन गई और आर्थिक प्रगति में बाधा बनने लगीं। धीरे-धीरे भौगोलिक यात्राएँ आरंभ हुई।

लोगों के व्यवसाय बढ़े और आर्थिक जीवन जटिल होने लगा। 15वीं शताब्दी आते-आते उत्पादन के साधनों में परिवर्तन आने लगा और व्यापार का क्षेत्र बढ़ा । मंडियों की खोज आरंभ हुई। बाजारों की खपत के लिए उत्पादन में वृद्धि हई। लोग गाँव छोड़ नगरों में आ कर बसने लगे। धन संचय हुआ। बैंकों तथा स्टॉक कंपनियों का श्रीगणेश हुआ। पूंजीवाद का जन्म हुआ। अब सब कुछ सरल नहीं था। व्यवस्था के लिए कानून की आवश्यकता पड़ी।

अतः सरकारी हस्तक्षेप आरंभ हुआ। पूंजीपति और सरकार निकट आई। श्रमिक लघु उत्पादन को बेचने के लिए उपनिवेशों का महत्त्व बढ़ा। इससे उपनिवेशवाद को तथा साम्राज्यवाद को बढ़ावा मिला। सच तो यह है कि आर्थिक जीवन जटिल हो गया । धन की वृद्धि अवश्य हुई परंतु आर्थिक विषमता बढी जिससे असंतोष फैला।

4. राजनैतिक जीवन-पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप राजनीतिक जीवन भी अछूता नहीं रहा। पुनर्जागरण से पूर्व यूरोपीय समाज में सामंतों का बोलबाला था। परंतु अब मध्य वर्ग के पास धन था। उन्होंने राजाओं की धन से सहायता की। इससे राजाओं की शक्ति बढ़ी। शीघ्र ही राष्ट्रीय राजतंत्रों का विकास आरंभ हुआ। फ्रांस में फ्रांसिस प्रथम तथा हेनरी चतुर्थ के शासन काल में राष्ट्रीयता के आधार पर केंद्रीय सत्ता दुढ़ और सारे राष्ट्र की शक्ति को राजा में केंद्रित माना जाने लगा।

राष्ट्रीय राजतंत्र के विकास से पोप की सत्ता में कमी आई। राष्ट्रीय भाषाओं अर्थात् अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश के विकास से राष्ट्रों के आंतरिक संगठन मजबूत हुए और उनकी शक्ति बढ़ी। राजाओं की शक्ति के बढ़ने के साथ-साथ शासन में मध्य वर्ग में साझेदारी की वृद्धि हुई। सामंत अकेले पड़ गये। राजा और मध्य वर्ग पहले साथ-साथ चले और फिर मध्य वर्ग ने राजा की सत्ता को भी चुनौती दे दी। फ्रांसीसी क्रांति इस संघर्ष का उज्जवल उदाहरण है।

पुनर्जागरण ने केवल यूरोप की ही नहीं बल्कि विश्व के राजनीतिक जीवन में नवीन परिभाषाएँ जुटाई। राज्य को नवीन परिभाषाएँ दी गई। व्यक्ति तथा राज्य के सम्बन्ध को नये सिरे से प्रस्तुत किया गया। आधुनिक राज्य की नींव डाली गई। सच तो यह है कि जितने नये आधार खोजे गये वे उन मूल्यों से ओत-प्रोत थे जिनका पोषण पुनर्जागरण ने किया।

प्रश्न 14.
मार्टिन लूथर के जीवन तथा सफलताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जर्मनी में प्रोटेस्टेंट लहर (धर्म-सुधार आंदोलन) का प्रवर्तक मार्टिन लूथर था। उसका जन्म 1483.ई० में जर्मनी के एक किसान परिवार में हुआ था। अत: उसमें किसानों जैसी सादगी भी थी और शक्ति भी। उसके पिता चाहते थे कि वह बड़ा होकर वकील बने और घर की प्रतिष्ठा को बढ़ाये। इसी उद्देश्य से विद्यालय भेजा गया। परंतु उसने कानून के साथ-साथ धर्मशास्त्र का अध्ययन भी आरंभ कर दिया। कानून और धर्म-शास्त्र में डिग्री प्राप्त करने के बाद वह ब्रिटेनवर्ग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुआ। वहाँ उसे धर्मशास्त्र के गहन अध्ययन का अवसर मिला। 1505 ई० में वह अगस्टीनियम भिक्षुओं में शामिल हो गया।

धर्म के संबंध में उसके मन में अनेक प्रश्न एवं शंकाए थीं और वह इनके समाधान की जिज्ञासा रखता था। फिर भी उसकी आस्था अडिग थी। उसका इस बात में पूरा विश्वास था कि केवल आस्था और विश्वास से ही मुक्ति मिल सकती है। 1511 ई० में लूथर ने अपनी शंकाओं के समाधान के लिए रोम की यात्रा की । अभी तक इस पवित्र नगर के प्रति उसकी पूरी श्रद्धा थी। इसलिए रोम पहुँचते ही वह भावुक हो उठा और उसने ये शब्द कहे : “पवित्र रोम तुम्हें शहीदों के खून ने पवित्र बनाया है। मेरा शत-शत प्रणाम स्वीकार करो।” शीघ्र ही रोम में फैले भ्रष्टाचार को देखकर उसका मोहभंग हो गया।

इसी बीच एक ऐतिहासिक घटना घटी जिसने लूथर को पोप एवं कैथोलिक चर्च का विरोधी बना दिया। पोप को सेंट पीटर गिरजाघर के लिए धन की आवश्यकता थी। यह धन उसने क्षमा-पत्रों की बिक्री द्वारा एकत्रित करने का निर्णय किया। 1517 ई० में उसका एक प्रतिनिधि क्षमापत्रों की बिक्री करता हुआ ब्रिटेनवर्ग पहुँचा। वह लोगों से यह शब्द कह रहा था, “जैसे ही क्षमा-पत्रों के लिए दिए गए सिक्कों की खनक गूंजती है, उस आदमी की आत्मा, जिसके लिए धन दिया गया है सीधी स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है।

यह भोली-भाली जनता के साथ एक बहुत बड़ा मजाक था। लोगों को धर्म के नाम पर मूर्ख बनाया जा रहा था और उनका शोषण किया जा रहा था। लथर ने जनता के साथ हो रहे इस मजाक और शोषण का विरोध किया। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्षमा-पत्रों की बिक्री धर्म के मूल्य सिद्धांत की अवहेलना है। इतना ही नहीं, उसने 95 सिद्धांतों (थीसिस) की एक सूची तैयार की जिन पर वह पोप का विरोधी था। यह सूची उसने एक गिरजाघर के द्वार पर चिपका दी। लोगों में तहलका मच गया। लूथर के इस कार्य ने तो उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। “जो प्रायश्चित कर लेता है उसे तो ईश्वर पहले ही क्षमा कर देता है।

उसे क्षमा-पत्र की क्या आवश्यकता है।” यह तर्क इतना ठोस था कि बहुत बड़ी संख्या में लोग लूथर के समर्थ बन गए । लूथर ने पहले अपने सिद्धांत लैटिन भाषा में लिखे थे। परंतु शीघ्र ही उनका अनुवाद जर्मन भाषा में किया गया । परिणामस्वरूप इन सिद्धांतों पर समस्त जर्मनी में तर्क-वितर्क होने लगा।

लूथर मन से तो पोप तथा कैथोलिक चर्च का विरोधी बन चुका था, परंतु उसने अभी तक चर्च के अधिकार को खुली चुनौती नहीं दी थी। पोप ने भी उसके विरोध को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने इसे ‘भिक्षुओं के बीच तू-तू मैं-मैं’ (Squable among monks) कह कर टाल दिया । परंतु 1519 ई० में स्थिति स्पष्ट हो गई। लथर ने जॉन नामक एक धर्मशास्त्र से साफ-साफ कह दिया कि वह इस बात को नहीं मानता कि पोप या चर्च कोई गलती नहीं कर सकता। यह बात चर्च की निरंकुश सत्ता पर सीधा प्रहार थी। इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते थे।

इसी बीच लूथर ने तीन लघु पुस्तिकाएँ (पैंफलेट) प्रकाशित की। इन पुस्तिकाओं में उसने उन मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जो आगे चलकर प्रोटेस्टेंटवाद के नाम से विख्यात हुए। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चर्च में पवित्रता नाम की कोई चीज नहीं है ‘ईश्वर के चर्च की कैद’ (On the Babilonian Captivity of the Church of God) नामक पुस्तिका में उसने पोप एवं उसकी व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया। अपनी दूसरी पुस्तिका ‘जर्मन सामंत वर्ग को संबोधन’ (An Address to the Nobility to German Nation) में उसने चर्च की अपार संपत्ति का वर्णन करते हुए जर्मन शासकों को विदेशी प्रभाव से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया। तीसरी पुस्तिका ‘मनुष्य की मुक्ति’ (On the Freedom of Clinstian Man) में उसने अपनी मुक्ति के सिद्धांतों का उल्लेख किया। इनके अनुसार मुक्ति के लिए मनुष्य का ईश्वर में अटूट विश्वास होना चाहिए।

लूथर की गतिविधियों से क्षुब्ध होकर पोप ने उसे धर्म से निष्कासित करने का आदेश दे दिया। परंतु लूथर ने पोप के आदेश को एक सार्वजनिक सभा में जला कर विद्रोह का झंडा फहरा दिया। 1521 ई० में उसे जर्मन राज्यों की सभा में सम्राट् के सामने प्रस्तुत होने के लिए कहा गया। उसके मित्रों ने उसे समझाया कि वह न जाये, क्योंकि उसे प्राणदंड भी दिया जा सकता है। परंतु उसने बड़े साहसपूर्ण ढंग से उत्तर दिया-“मैं अवश्य जाऊँगा, भले ही वहाँ मेरे इतने शत्रु क्यों न हों जितनी कि सामने के घर में खपरैलें।” आखिर वह गया। उसे कहा गया कि वह अपनी बातें वापस लें। परंतु उसने उत्तर दिया कि वह ऐसा तभी कर सकता है जब उसकी बातें तर्क द्वारा गलत सिद्ध कर दी जाएँ।

अंत में उसने ये शब्द कहे-“मुझे यही कहना था। मैं इसके विपरीत नहीं जा सकता। ईश्वर मेरी रक्षा करें।” (Here I stand; I can’t do otherwise : God help me.”) लूथर के इन शब्दों से समस्त जर्मनी में कौतूहल फैल गया। उसके मित्र घबरा गये। उन्होंने उसे एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जहाँ वह कई वर्षों तक अध्ययन करता रहा। इसी बीच उसने बाइबिल का अनुवाद जर्मन भाषा में किया। उसका यह अनुवाद इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि इसे आज भी जर्मन भाषा एवं साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।

मार्टिन लूथर के विचार एवं उनका प्रसार (The Ideas of Martin Luther and their spread) –

मार्टिन लूथर के मुख्य विचार निम्नलिखित थे –

  • उसने ईसा तथा बाइबिल की सत्ता को स्वीकार किया, परंतु चर्च की सार्वभौमिकता एवं निरंकुशता को नकार दिया।
  • उसने इस बात का प्रचार किया कि चर्च द्वारा निर्धारित कर्मों से मुक्ति नहीं मिल सकती।
  • इसके लिए ईश्वर में अटूट आस्था रखना आवश्यक है।
  • उसने पूर्व प्रचलित सात संस्कारों में से केवल तीन को ही मान्यता दी। ये थेनामकरण, प्रायश्चित तथा प्रसाद।
  • किसी भी व्यक्ति को न्याय से ऊपर न समझा जाए।
    चर्च के चमत्कार व्यर्थ हैं।
  • चर्च में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए पादरियों को विवाह करके सभ्य नागरिकों की तरह रहने की अनुमति दी जाए।
  • उसने घोषणा की कि उसका धर्म-ग्रंथ सबके लिए है और सभी उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

आगामी कुछ वर्षों में नवीन जागृति आई और वे अधिक-से-अधिक संख्या में लूथर द्वारा चलाए गए चर्च विरोधी आंदोलन में भाग लेने लगे। उन्होंने न तो पोप की कोई परवाह की और न ही सम्राट् की। उन्होंने चर्च की संपत्ति छीन ली तथा कैथोलिक पूजा-उपासना का परित्याग कर दिया। कैथोलिक मठ नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए। पोप की राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक सत्ता को अमान्य घोषित कर दिया गया। 1524 ई० तक समस्त जर्मनी में लूथरवादी शिक्षाएँ अनिवार्य लगने लगा।

सोलहवीं शताब्दी में चर्च का विरोध करने वालों ने प्रोटेस्टेंट चर्चा की परंपरा आरंभ की। अतः चर्च का एकाधिकार समाप्त होने लगा। मानव किसी भी सिद्धांत को अपनाने से पूर्व उसे विवेक और कसौटी पर परखने लगा। प्रचलित हो गईं। परंतु इसी समय कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिनके परिणामस्वरूप लूथरवादी आंदोलन काफी सीमित हो गया। केवल उत्तरी जर्मन राज्यों में ही उसका प्रभाव बना रहा।

प्रोटेस्टेंट चर्च का जन्म (Establishment of Protestant Church) – 1526 ई० में स्पीयर में पवित्र रोमन साम्राज्य की स्थापना की सभा हुई जिसका उद्देश्य धर्म सुधार आंदोलन की समस्या को हल करना था। परंतु इस समय तक क्योंकि जर्मनी के शासकगण लूथरवाद व कैथोलिक दलों में विभक्त हो चुके थे, अतः यह सभा धर्म-सुधार आंदोलन का कोई स्थायी समाधान न कर सकी। इस सभा ने धार्मिक समस्या के समाधान या धर्म संबंधी निश्चय का उत्तरदायित्व स्थानीय शासकों पर छोड़ दिया। यह निश्चित किया गया कि प्रत्येक राजा धर्म के विषय में ऐसा मार्ग अपनायेगा कि वह अपने आचरण के लिए ईश्वर और सम्राट के पति उत्तरदायी होगा।

1529 ई० में स्पीयर में ही एक अन्य सभा हुई। परंतु इस सभा ने भी सुधार आंदोलन को मान्यता प्रदान न की तथा नये सुधार आंदोलन के विरुद्ध कई कठोर निर्देश पारित कर दिये। सभा के एक पक्षीय निर्णय का लूथरवादी शासकों तथा समर्थकों ने तीव्र विरोध किया । इसी विरोध या प्रतिवाद (प्रोटेस्ट) के कारण इस सुधार आंदोलन का नाम ‘प्रोटेस्टेंट’ पड़ा । औपचारिक रूप से विरोध 19 अप्रैल, 1529 ई० को हुआ। अत: ऐतिहासिक दृष्टि से ‘प्रोटेस्टेंट’ शब्द का उदय इसी तिथि से माना जाता है। 1530 ई० में प्रोटेस्टेट धर्म का सैद्धांतिक रूप निरूपित किया गया जिसमें मार्टिन लूथर के सिद्धांतों को मान्यता मिली। इस प्रकार जर्मनी में चर्च दो भागों में बँट गया-प्रॉटेस्टेट तथा कैथोलिक चर्च।

आंग्सबर्ग की संधि (Augs Burg Treaty) – जर्मन सम्राट् चार्ल्स पंचम लूथरवाद को दबाना चाहता था। परंतु अन्य समस्याओं में उलझा होने के कारण वह ऐसा न कर सका । इसके लिए उसे 1530 ई. के बाद ही समय मिल सका। उसने आग्सबर्ग में एक सभा बुलाव और वहाँ प्रोटेस्टेंट लोगों को आदेश दिया कि वे अपने सिद्धांत सभा के सामने प्रस्तुत करें। अत: प्रोटेस्टेंटों ने एक दस्तावेज के रूप में अपने सिद्धांत सभा में रखे। इस दस्तावेज को ‘आग्सबर्ग की स्वीकृति’ कहते है परंतु चार्ल्स पंचम ने ‘आग्सबर्ग की स्वीकृति’ को अमान्य घोषित कर दिया।

फिर भी लूथरवादियों के प्रभाव तथा तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उसने 1532 ई० में विराम संधि की जो 1546 ई० तक चली। तत्पश्चात् वह पुन: प्रोटेस्टेंटो का समूल नाश करने पर उतर आया। परिणामस्वरूप जर्मनी में 1546 ई० से 1555 ई० तक गृह युद्ध चलता रहा। जर्मनी के लिए इस गृह युद्ध के भयंकर परिणाम निकले। अत: विवश होकर सम्राट् फडीनेंड ने जर्मनी के प्रोस्टेंटों के साथ 15555 में आग्सबर्ग की संधि कर ली।

इस धि के अनुसार –

  • प्रत्येक शासक को (जनता को नहीं) अपना और प्रजा का धर्म चुनने की स्वतंत्रता दे दी गई।
  • 1552 ई० से पहले प्रोटेस्टेंट लोगों ने चर्च की जो संपत्ति अपने अधिकार में ले ली थी; वह उनकी मान ली गई।
    लूथर के अतिरिक्त अन्य किसी को मान्यता नहीं दी गई।
  • यह कहा गया कि कैथोलिक क्षेत्रों में बसने वाले लूथरवादियों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
  • धार्मिक आरक्षण के सिद्धांत के अनुसार यदि कोई कैथोलिक धर्म परिवर्तन करता है तो उसे अपने पद से संबंधित सभी अधिकारों का परित्याग करना होगा।

आग्सबर्ग संधि में धार्मिक संघर्ष की समस्या कुछ सीमा तक सुलझ तो गई, परंतु बहुत त्रुटिपूर्ण ढंग से । संधि में व्यक्ति को नहीं शासक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई थी जो बहुत दिनों तक मान्य नहीं हो सकती थी। इस संधि द्वारा केवल लूथरवाद को ही वैध मान्यता दी गई। अन्य प्रोटेस्टेंट संप्रादायों (जैसे विग्लीवाद, काल्विनवाद) को कोई मान्यता नहीं मिली। यह संधि धार्मिक कलह का स्थायी निवारण न कर सकी और इस समस्या का समाधान लगभग एक सौ वर्षों के पश्चात् वैस्टफेलिया की संधि द्वारा ही किया जा सका।

प्रश्न 15.
काल्विनवाद की संक्षिप्त जानकारी दीजिए?
उत्तर:
यह सत्य है कि धर्म सुधार आंदोलन का प्रवर्तक लूथर को माना जाता है। परंतु धर्म-सुधार के क्षेत्र में काल्विन को लूथर से भी अधिक सफलता मिली । वह पहला सुधारक था जिसने एक ऐसे पवित्र संप्रदाय की स्थापना करने का प्रयास किया जिसका प्रभाव किसी एक देश में ही सीमित न रह कर पूरे विश्व में हो।

काल्विन का जन्म 1509 में फ्रांस में हुआ था। उसके माता-पिता उसे पादरी बनाना चाहते थे। उसने चर्च की छात्रवृत्ति पर पेरिस में धर्म एवं साहित्य का गहन अध्ययन किया। परंतु बाद में स्थिति को देखते हुए उसके पिता ने उसे वकील बनने का परामर्श दिया। परिणामस्वरूप वह कानून के अध्ययन में जूट गया। एक दिन उसमे एक नई प्रवृत्ति जागृत हुई। उसे अनुभव हुआ कि वह कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए नहीं, अपितु उससे हटकर एक नवीन एवं पवित्र संप्रदाय की स्थापना के लिए पृथ्वी पर आया है।

उसके लिए उसे कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए उसे कैथोलिक चर्च का सफल विरोध करना था। उसका दृढ़ विश्वास था कि वह अपने अकाट्य तों से ही अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। उसने कैथोलिक चर्च से अपना संबंध तोड़ लिया और में अपने विचारों का प्रचार करने लगा। फलस्वरूप उसके प्रशंसकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए फ्रांस के शासक फ्रांसिस ने उस पर प्रतिबंध लगाना चाहा। अतः वह फ्राँस छोड़ कर स्विटजरलैंड चला गया।

स्विट्जरलैंड में काल्विन ज्विग्ली के संपर्क में आया । वहाँ उसने ईसाई धर्म के आधारभूत सिद्धांत (Institute of Christian Religion) नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने प्रोटेस्टेंट चर्च के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। यह पुस्तक सम्राट् फ्राँसिस को समर्पित थी। काल्चिन चाहता था कि वह फ्राँस वापस जाकर सम्राट् को अपनी पुस्तक भेंट करे और उसे अपने तर्कों से प्रभावित करे। यदि वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाता, तो पूरा फ्रांस उसका अनुयायी बन जाता। परंतु ऐसा न हो सका। संभवतः फ्राँसिस ने उसको पुस्तक को पढ़ा ही नहीं।

फिर भी एक बात निर्विवाद कही जा सकती है कि यह पुस्तक उस समय तक लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक थी। उसमें काल्विन, विगली तथा लूथर के विचार अवश्य लिये गए थे। परंतु उनकी व्याख्या उसमें सर्वथा अपने ढंग से की थी। पुस्तक में कैथोलिक तथा सुधारवादी चचों की तुलना बड़ी ही प्रभावशाली ढंग से की गई थी। इस पुस्तक ने लोगों पर जादू सा प्रभाव किया और २७ ही नर्च के विरोधी संगठित होने लगे।

1536 ई० में काल्विन जेनेवा गया। वहाँ राजनीतिक तथा धार्मिक आंदोलन पहले से ही चल रहा था। उसने अपनी अद्भुत संगठन शक्ति के बल पर जेनेवावासियों को संगठित किया और उन्हें राजनीतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता दिलाई। शीघ्र ही जेनवा एक धर्म-प्रधान नगर राज्य बन गया जिसका सर्वोच्च नेता काल्विन बना। उसने नगर में एक विशुद्ध नैतिकवादी व्यवस्था का सूत्रपात किया। यदि कोई व्यक्ति अनैतिकता का प्रदर्शन करता, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था।

काल्विन स्वयं भी सादा जीवन व्यतीत करता था और नैतिक नियमों का कठोरता से पालन करता था। शीघ्र ही उसकी ख्याति समस्त यूरोप में फैलने लगी और दूर-दूर से आकर लोग उसके विष्य बनने लगे। उसने बाईबिल का अनुवाद फ्रांसीसी भाषा में करवाया, कई स्कूल खुलवायें तथा जेनेवा विश्वविद्यालय को शिक्षा का महान् केंद्र बनाया। परिणामस्वरूप लोगों में उसकी धाक् उसी प्रकार बैठ गई जैसी कि पोप की थी। अतः अब उसे ‘प्रोटेस्टेट पोप’ कहा जाने लगा।

काल्विन को इतनी अधिक सफलता उसके तर्कपूर्ण सिद्धांतों के कारण मिली जो इस प्रकार थे –

मनुष्य की मुक्ति न तो कर्म से हो सकती है और न ही आस्था से। मुक्ति केवल ईश्वर की असीम कृपा से ही मिल सकती है।
मुक्ति का एकमात्र साधन बाइबिल है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति और ईश्वर के अतिरिक्त कोई माध्यम नहीं।
मनुष्य को जीवन में पवित्र आचरण का पालन करना चाहिए।

काल्विन द्वारा प्रतिपादित विचारधारा ‘काल्विनवाद’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसे मध्यम वर्ग में विशेष लोकप्रियता मिली। धीरे-धीरे फ्रांस में भी इस विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा। वहाँ काल्विन के अनुयायी ‘यूनानो’ कहलाये। जर्मनी में जहाँ केवल लूथरवाद को ही मान्यता मिली थी, अब ‘काल्विनवाद’ को भी मान्यता दे दी गई। इस प्रकार यह विचारधारा धीरे-धीरे यूरोप के सभी देशों में फैल गई।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कोलम्बस अमेरिका पहुँचा ………………….
(क) 1492
(ख) 1497
(ग) 1495
(घ) 1473
उत्तर:
(क) 1492

प्रश्न 2.
1861-65 ई० तक दास प्रथा को लेकर गृहयुद्ध किस देश में हुआ?
(क) कनाडा
(ख) आस्ट्रेलिया
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) इंगलैंड
उत्तर:
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रश्न 3.
ऑन दि ओरिजिन ऑफ स्पीशीज पुस्तक किसने लिखी?
(क) चार्ल्स डार्विन
(ख) ग्रेगरी मेंडल
(ग) हरगोविन्द खुराना
(घ) न्यूटन
उत्तर:
(क) चार्ल्स डार्विन

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सी सामंतों की एक श्रेणी नहीं थी?
(क) बैरन
(ख) नाइट
(ग) डयूक
(घ) सर्प
उत्तर:
(क) बैरन

प्रश्न 5.
चर्च को प्रतिवर्ष कृषकों से उसकी उपज का कान-सा भाग लेने का अधिकार था?
(क) उपज का एक तिहाई भाग
(ख) उपज का दसवाँ भाग
(ग) उपज का एक चौथाई भाग
(घ) उपज का छठा भाग
उत्तर:
(ख) उपज का दसवाँ भाग

प्रश्न 6.
अभिजात्य सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश के लिये प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन कहाँ होता था?
(क) जापान
(ख) वर्मा
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर:
(घ) चीन

प्रश्न 7.
सोने और चाँदी के देश के विषय में किसने सुना था?
(क) कैनालल
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) पिजारो
(घ) कोलम्बस
उत्तर:
(ग) पिजारो

प्रश्न 8.
हेलनीज किस देश के निवासियों को कहा जाता था?
(क) रोम
(ख) यूनान
(ग) मिस्र
(घ) चीन
उत्तर:
(ख) यूनान

प्रश्न 9.
ओलंपिक खेल किस प्राचीन सभ्यता की देन है?
(क) रोम
(ख) मिश्र
(ग) यूनान
(घ) चीन
उत्तर:
(ग) यूनान

प्रश्न 10.
यूरोप में सर्वप्रथम विश्वविद्यालय कहाँ स्थापित हुए?
(क) इटली
(ख) जापान
(ग) रूस
(घ) मिस्र
उत्तर:
(क) इटली

प्रश्न 11.
एक चर्चित कलाकार ………………..
(क) कोपरनिकस
(ख) लियानार्डो द विंची
(ग) लूथर
(घ) मार्टिन
उत्तर:
(ख) लियानार्डो द विंची

प्रश्न 12.
लास्ट सपर चित्र का निर्माण वर्ष …………………
(क) 1495
(ख) 1946
(ग) 1947
(ग) 1467
उत्तर:
(क) 1495

प्रश्न 13.
ग्रेगोरिन कलैंडर का आरंभ …………………..
(क) 1582
(ख) 1587
(ग) 1560
(घ) 1547
उत्तर:
(क) 1582

प्रश्न 14.
नाईन्टी फाईव थिसेस की रचना …………………
(क) 1517
(ख) 1518
(ग) 1516
(घ) 1520
उत्तर:
(क) 1517

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Economics अर्थशास्त्र : हमारी अर्थव्यवस्था भाग 1 Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Economics Solutions Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी

Bihar Board Class 9 Economics बिहार के एक गाँव की कहानी Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

निर्देश : नीचे दिये गये प्रश्न में चार संकेत चिह्न हैं जिनमें एक सही या सबसे उपयुक्त हैं । प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रश्न संख्या के सामने वह संकेत चिह्न (क, ख, ग, घ) लिखें जो सही अथवा सबसे उपयुक्त हों।

Bihar Board Class 9 Economics Solution प्रश्न 1.
उत्पादन के प्रमुख साधन कितने हैं ?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर-
(ग) पाँच

Bihar Board Class 9th Economics Solution प्रश्न 2.
उत्पादन का अर्थ
(क) नयी वस्तु का सृजन
(ख) उपयोगिता का सृजन
(ग) उपयोगिता का नाश
(घ) लाभदायक होना
उत्तर-
(ख) उपयोगिता का सृजन

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 3.
उत्पादन का निष्क्रिय साधन है ?
(क) श्रम
(ख) संगठन
(ग) साहसी
(घ) भूमि
उत्तर-
(घ) भूमि

Bihar Board Solution Class 9 Economics प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से भूमि की विशेषता कौन-सी है ? .
(क) वह नाशवान है
(ख) वह मनुष्य निर्मित है
(ग) उसमें गतिशीलता का अभाव है।
(घ)उसमें समान उर्वरता है
उत्तर-
(क) वह नाशवान है

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र में भूमि का तात्पर्य क्या है ?
(क) प्रकृति प्रदत्त सभी नि:शुल्क वस्तुएँ
(ख) जमीन की ऊपरी सतह
(ग) जमीन की निचली सतह
(घ) केवल खनिज सम्पत्ति
उत्तर-
(क) प्रकृति प्रदत्त सभी नि:शुल्क वस्तुएँ

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन उत्पादक है ?
(क) बढ़ई
(ख) भिखारी
(ग) ठग
(घ) शराबी
उत्तर-
(क) बढ़ई

Bihar Board Class 9 Economics Notes प्रश्न 7.
उत्पादन का साधन है
(क) वितरण
(ख) श्रम
(ग) विनिमय
(घ) उपभोग
उत्तर-
(ख) श्रम

अर्थशास्त्र कक्षा 9 Chapter 1 Solution प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन उत्पादन का साधन नहीं है ?
(क) संगठन
(ख) उद्यम
(ग) पूँजी
(घ) उपभोग
उत्तर-
(घ) उपभोग

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन पूँजी है ?
(क) फटा हुआ वस्त्र ।
(ख) बिना व्यवहार में लायी जाने वाली मशीन ।
(ग) किसान का हल ।
(घ) घर के बाहर पड़ा पत्थर ।
उत्तर-
(ग) किसान का हल ।

Bihar Board Class 9 Civics Solution प्रश्न 10.
जो व्यक्ति व्यवसाय में जोखिम का वहन करता है, उसे कहते हैं ?
(क) व्यवस्थापक
(ख) पूँजीपति
(ग) साहसी
(घ) संचालक मंडल
उत्तर-
(ग) साहसी

Bihar Board Class 9 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन श्रम के अन्तर्गत आता है ?
(क) सिनेमा देखना
(ख) छात्र द्वारा मनोरंजन के लिए क्रिकेट खेलना
(ग) शिक्षक द्वारा अध्यापन
(घ) संगीत का अभ्यास आनन्द के लिए करना
उत्तर-
(ग) शिक्षक द्वारा अध्यापन

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. श्रम को उत्पादन का ………………….. साधन कहा जाता है।
2. शिक्षक के कार्य को ………………….. श्रम कहा जाता है ।
3. ……. अर्थव्यवस्था के भौतिक अथवा पूँजीगत साधन है ।
4. सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य की …………. बहुत बढ़ गई है।
5. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन विभिन्न साधनों के ………………… से होता है।
6. उत्पादन की नयी तकनीक की वजह से उत्पादन क्षमता में अपेक्षाकृत……….होती है।
उत्तर-
1. सक्रिय
2. मानसिक
3. मशीन एवं यंत्र
4. आवश्यकताएँ
5. सहयोग
6. वृद्धि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Class 9th Social Science Solution प्रश्न 1.
उत्पादन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन करना है।

Bihar Board Class 9 History Chapter 1 प्रश्न 2.
उत्पादन तथा उपभोग में अन्तर कीजिए।
उत्तर-
उत्पादन में उपयोगिता का सृजन होता है लेकिन उपभोग में उत्पादित वस्तुओं का प्रत्यक्ष रूप से मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए उपयोग होता है।

अर्थशास्त्र कक्षा 9 Chapter 1 Question Answer प्रश्न 3.
उत्पादन के विभिन्न साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर-
उत्पादन के विभिन्न साधन हैं-भूमि, पूँजी, श्रम, संगठन और उद्यम या साहस ।

Bihar Board 9th Class Social Science Book प्रश्न 4.
फतेहपुर गाँव के लोगों का मुख्य पेशा क्या है ?
उत्तर-
मुख्य पेशा कृषि है।

Economics Class 9 Chapter 1 Question Answer In Hindi प्रश्न 5.
भूमि तथा पूँजी में अन्तर करें।
उत्तर-
प्रकृति प्रदत्त यथा पहाड़, नदी, जंगल, सागर सभी भूमि हैं पर प्रकृति प्रदत वस्तुओं को छोड़कर जिससे आय प्राप्त होती है वह पूँजी है।

प्रश्न 6.
क्या सिंचित क्षेत्र को बढ़ाना महत्वपूर्ण है क्यों ?
उत्तर-
सिंचित क्षेत्र को बढ़ाना महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की कृषि मानसून पर आश्रित है जो एक जुआ का खेल है।

प्रश्न 7.
उत्पादन में पूँजी का क्या महत्व है ?
उत्तर-
बिना पूँजी के किसी भी वस्तु या सेवाओं का उत्पादन कर पाना संभव नहीं है । जैसे-बीज के बिना फ़सल का उत्पादन संभव नहीं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादन की परिभाषा दीजिए । उत्पादन के कौन-कौन से साधन हैं ? व्याख्या करें।
उत्तर-
अर्थशास्त्र में उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन करना है। जैसे-जब एक बढ़ई लकड़ी को काट-छाँट कर उससे टेबुल चा कुर्सी बनाता है, तब लकड़ी की उपयोगिता बढ़ जाती है, यही उत्पादन है। .
उत्पादन के साधन-

  • भूमि-प्रकृति प्रदत्त सारे मुफ्त उपहार जैसे-नदी, सागर, हवा, धूप खनिज़ आदि सभी भूमि हैं।
  • श्रम-श्रम का मतलब मनुष्य के आर्थिक कार्य से है चाहे वह हाथ से किया जाय या मस्तिष्क से । यह एक सक्रिय साधन है।
  • पूँजी-प्रकृति की निःशुल्क देन को छोड़कर वह सब सम्पत्ति जिससे आय प्राप्त होती है, पूँजी कहलाती है। जैसे-किसान के लिए बीज, कारखानों में कच्चा माल, मशीन आदि।
  • संगठन-उत्पादन का सक्रिय साधन है । विभिन्न साधनों को एकत्रित कर उन्हें उत्पादन में लगाने की क्रिया व्यवस्था या संगठन है।
  • साहस-उत्पादन में जोखिम उठाने के कार्य को साहस कहते हैं और जो व्यक्ति इसे करता है उसे साहंसी कहते हैं जैसे-कारखाने का मालिक ।

प्रश्न 2.
उत्पादन के साधनों में संगठन एवं-साहस की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-
उत्पादन के साधनों में संगठन एवं साहसी की अहम भूमिका है। क्योंकि भूमि, श्रम तथा पूँजी के होते हुए भी समुचित संगठन और साहसी के बिना उत्पादन संभव नहीं है। पहले संगठन पर विचार करें-भूमि, श्रम तथा पूँजी को एकत्रित कर संगठनकर्ता उसे व्यवस्थित ढंग से उपयोग करता है और उत्पादन का कार्य होता है । इसीलिए संगठन को उत्पादन प्रक्रिया का एक सक्रिय साधन माना गया है।

उत्पादन का कार्य जोखिम भरा हुआ होता है । उत्पादन में लाभ होगा या हानि एक साहसी ऐसा नहीं सोचता है यदि उत्पादन में लगातार घाटा ही होता रहे तो साहसी उत्पादन करने का साहस नहीं छोड़ेगा। साहसी सोच समझकर उत्पादन में पूँजी लगाता है।

प्रश्न 3.
फतेहपुर गाँव में कृषि कार्यों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
फतेहपुर गाँव में खेती ही मुख्य क्रिया है। अन्य कार्यों में पशुपालन, मुर्गी पालन, डेयरी, दुकानदारी. आदि क्रियाएँ हैं । गाँव में अधि कांश लोग भू-स्वामी हैं। इनमें से कुछ बड़े परिवार के हैं जो कृषि कार्य मजदूर किसानों से बातें करवाते हैं । गाँवों में नलकूप भी हैं। नलकूपों से सिंचाई का कार्य होता है। चूँकि फतेहपुर गाँव पटना शहर से बिलकुल , नजदीक है इसलिए कृषि संत आधुनिक यंत्रों का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन करता है। पर्याप्त पत्रा या यों कहें कि अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्नों का उ दन करते हैं तभी तो वे बैल गाड़ियों और ट्रैक्टरों में अनाजों को भरकर विक्रय हेतु बाजार में ले जाते हैं । जो पाठ्यपुस्तक में अंकित चित्र से पता चलता है।

प्रश्न 4.
मंझोले एवं बड़े किसान कृषि से कैसे पूँजी प्राप्त करते हैं ? वे छोटे किसानों से कैसे भिन्न हैं ?
उत्तर-
मंझोले एवं बड़े किसानों के पास अधिक भूमि होती है अर्थात् उनकी जोतों का आकार काफी बड़ा होता है जिससे वे उत्पादन अधिक करते हैं। उत्पादन अधिक होने से वे इसे बाजार में बेच कर काफी पूँजी जमा करते हैं जिसका प्रयोग वे उत्पादन की आधुनिक विधियों में करते हैं । इनकी पूँजी छोटे किसानों से भिन्न होती हैं क्योंकि छोटे किसानों के पास भूमि कम होने के कारण उत्पादन उनके भरण-पोषण के लिए भी कम पड़ता हैं । उन्हें भूमि में अधिकार प्राप्त नहीं होने के कारण बचत नहीं होती इसलिए खेती के लिए उन्हें पूँजी बड़े किसानों या साहकारों से उधार लेना होता है जिस पर उन्हें व्याज भी चुकाना पड़ता है।

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 अधिनायक

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 अधिनायक

 

अधिनायक वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

Adhinayak Kavita Ka Saransh Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
रघुवीर सहाय किस काल के कवि हैं?
(क) आधुनिक काल
(ख) आदिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) छायावाद
उत्तर-
(क)

Adhinayak Kavita Ka Bhavarth Likhe Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
‘अधिनायक’ शीर्षक कविता के कवि कौन है?
(क) नागार्जुन
(ख) शमशेर
(ग) रघुवीर सहाय
(घ) त्रिलोचन
उत्तर-
(ग)

रघुवीर सहाय का जन्म कब हुआ था?
(क) 9 दिसम्बर, 1929 ई.
(ख) 10 दिसम्बर, 1930 ई.
(ग) 15 दिसम्बर, 1935 ई.
(घ) 20 सितम्बर, 1936 ई.
उत्तर-
(क)

Adhinayak Kavita Ka Bhavarth Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 4.
इनमें से रघुवीर सहाय की कौन–सी रचना है?
(क) पद
(ख) हार–जीत
(ग) अधिनायक
(घ) छप्पय
उत्तर-
(क)

अधिनायक कविता का अर्थ Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 5.
पाठ्यपुस्तक में रघुवीर सहाय की संकलित ‘अधिनायक’ कविता कैसी कविता है?
(क) व्यंग्य प्रधान
(ख) हास्य प्रधान
(ग) वीररस प्रधान
(घ) रोमांस प्रधान
उत्तर-
(क)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

अधिनायक कविता का सारांश Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन………. गाता है।
उत्तर-
हरचरन

Adhinayak Kavita Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत………. विधाता है।
उत्तर-
भाग्य

अधिनायक कविता का भावार्थ Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 3.
मखमल, टमटम बल्लम तुरही………… छत्र चँवर के साथ ताव छुड़ाकर ढोल बजाकर जय–जय कौन करात है।
उत्तर-
पगड़ी

अधिनायक शीर्षक कविता का सारांश Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 4.
पूरब–पश्चिम से आते हैं नंगे–बूचे नरकंकाल सिंहासन पर बैठा, उनके………. लगाता है।
उत्तर-
तमगे कौन

अधिनायक कविता का विश्लेषण Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 5.
कौन–कौन है वह जन–गन–मन–अधिनायक वह………….. डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज बजाता है।
उत्तर-
महाबली

प्रश्न 6.
राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत राष्ट्रात म भला कान वह भारत………….. विधाता है।
उत्तर-
भाग्य

अधिनायक अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रघुवीर सहाय की कविता है।
उत्तर-
अधिनायक।।

प्रश्न 2.
अधिनायक कैसी कविता है?
उत्तर-
समकालीन राजनीति पर व्यंग्य कविता।

प्रश्न 3.
अधिनायक कौन है?
उत्तर-
सत्ताधारी वर्ग।

प्रश्न 4.
हरचरना कौन है?
उत्तर-
एक आम आदमी।

अधिनायक पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
हरचरना कौन है? उसकी क्या पहचान है?
उत्तर-
हरचरना ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता में एक आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। वह एक स्कूल जानेवाला बदहाल गरीब लड़का है। राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में राष्ट्रगान दुहराता है।।

हरचरना की पहचान ‘फटा सुथन्ना’ पहने एक गरीब छात्र के रूप में है।’

प्रश्न 2.
हरचरना ‘हरिचरण’ का तद्भव रूप है। कवि ने कविता में ‘हरचरना’ को रखा है, हरिचरण को नहीं, क्यों?
उत्तर-
‘हरचरना’ हरिचरण का तद्भव रूप है। कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘अधिनायक’ में ‘हरचरना’ शब्द का प्रयोग किया है, ‘हरिचरण नहीं। यहाँ कवि ने लोक संस्कृति की पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए ठेठ तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है। इससे कविता की लोकप्रियता बढ़ती है। कविता में लोच एवं उसे सरल बनाने हेतु ठेठ तद्भव शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 3.
अधिनायक कौन है? उसकी क्या पहचान है?।
उत्तर-
कवि के अनुसार ‘अधिनायक’ आज बदले हुए तानाशाह हैं। वे राजसी ठाट–बाट में रहते हैं। उनका रोब–दाब एवं तामझाम भड़कीला है। वे ही अपना गुणगान आम जनता से करवाते हैं। आज उनकी पहचान जनप्रतिनिधि की जगह अधिनायक अर्थात् तानाशाह बन गये हैं। यह उनकी पहचान बन गई है।

प्रश्न 4.
‘जय–जय कराना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कवि के अनुसार सत्ता पक्ष के जन प्रतिनिधियों आज अधिनायक का रूप ले लिए हैं। वे ही आज राष्ट्रीय गान के समय आम आदमी को जुटाकर अपनी जय–जयकार मनवाते हैं। माली पहनते हैं और जन–जन के प्रतिनिधि होने अपने को जनता का भाग्य विधाता मानते हैं।

प्रश्न 5.
‘डरा हुआ मन बेमन जिसका/बाजा रोज बजाता है, यहाँ ‘बेमन’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कविता की इस पंक्ति में ‘बेमन’ का अर्थ बिना रूचि से है। आज राष्ट्रीय गान गाने में आम जनता में कोई रूचि नहीं है। वे बिना मन के एक चली आती हुई परम्परा का निर्वहन करते हैं।

प्रश्न 6.
हरचरना अधिनायक के गुण क्यों गाता है? उसके डर के क्या कारण हैं?
उत्तर-
‘अधिनायक’ शीर्षक कविता में ‘हरचरना’ एक गरीब विद्यार्थी है। राष्ट्रीय गान वह गाता है, लेकिन उसे यह पता नहीं कि वह राष्ट्रीय गान क्यों गा रहा है। इस गान को वह एक सामान्य प्रक्रिया मानकर गाता है। एक गरीब व्यक्ति के लिए राष्ट्रीय गान का क्या महत्व। देशभक्ति, आजादी आदि का अर्थ वह नहीं समझ पाता। उसकी आजादी और देशभक्ति का दुश्मन तो वे व्यक्ति हैं जो गरीबों की कमाई पर आज शासक बने हुए हैं। वे तानाशाह बन गये हैं। आम जनता उनसे डरती है। कोई उनके खिलाफ मुँह नहीं खोलता। हरचरना के डरने का कारण यही सभी विषय है। मुँह खोलेगा तो उसे दंड भोगना होगा।

प्रश्न 7.
‘बाजा–बजाना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कविता ‘अधिनायक’ में कवि रघुवीर सहाय ने ‘बाजा–बजाना’ शब्द का प्रयोग गुण–गान करने के अर्थ में किया है। आम जनता जो गरीब एवं लाचार है, बाहुबली राजनेताओं के भय से उनके गुणगान में बेमन के लगी रहती है। यहाँ पर कवि ने आधुनिक राजनेताओं पर कठोर व्यंग्य किया है।

प्रश्न 8.
“कौन–कौन है वह जन–गण–मन अधिनायक वह महाबली” कवि यहाँ किसकी पहचान कराना चाहता है?
उत्तर-
कवि रघुवीर सहाय अपनी कविता ‘अधिनायक’ में प्रस्तुत पंक्ति की रचना कर उन सत्ताधारी वर्ग के जन प्रतिनिधियों की पहचान चाहता है जो राजसी ठाट–बाट में जी रहे हैं। गरीबों पर, आम आदमी पर उनका रोब–दाब है। वह ही अपने को जनता का अधिनायक मानते हैं। वे बाहुबली हैं। लोग उनसे डरे–सहमे रहते हैं। कवि उन्हीं की पहचान उक्त पंक्तियों में कराना चाहता है।

प्रश्न 9.
“कौन–कौन” में पुनरुक्ति है। कवि ने यह प्रयोग किसलिए किया है?
उत्तर-
कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘अधिनायक’ के अन्तिम पद में कौन–कौन का प्रयोग किया है। यह ‘कौन’ पुनरुक्ति है। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि आज देश में अधिनायकों एवं तानाशाहों की संख्या अनेक है। अनेक बाहुबली आज जनता के भाग्यविधाता बने हुए हैं। इसीलिए कविता के अन्तिम भाग में कौन–कौन’ पुनरुक्ति अलंकार का प्रयोग किया गया।

प्रश्न 10.
भारत के राष्ट्रगीत ‘जन–गण–मन अधियानक जय हे’ से इस कविता का क्या संबंध है? वर्णन करें।
उत्तर-
विद्वान कवि रघुवीर सहाय द्वारा रचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता एक व्यंग्यात्मक कविता है। इस कविता में कवि ने सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों को आधुनिक भारत के अधिनायक अर्थात् तानाशाह के रूप में चित्रित किया है। आज राष्ट्रीय गान के समय इन्हीं सत्ताधारियों का गुणगान किया जाता है। जब भी राष्ट्रीय त्योहारों पर “जन–गण–मन–अधिनायक जय हे” का राष्ट्रीय गान गाया जाता है तो आम आदमी जो गरीब और लाचार, जो फटेहाल जीवन बिता रहा है इस राष्ट्रगीत का अर्थ नहीं समझता। वह उसी राजनेता को अधिनायक मानकर इस राष्ट्रगीत को गाता है। वह समझता है कि वह उन्हीं राजनेताओं का गुणगान कर रहा है।

कवि का यह तर्क सही भी है। वास्तव में आज राष्ट्रगीत का महत्व राष्ट्रीयता से नहीं आंका जाता। कौन नेता कितना बड़ा बाहुबली है, कितना प्रभावशाली है उसी आधार पर उस राष्ट्रगीत के महत्व को आंका जाता है। कवि की यह सोच युक्तिसंगत और समसामयिक है। आज राष्ट्रगान की केवल खानापूर्ति होती है। देशभक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है।

प्रश्न 11.
कविता का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
कविता का सारांश देखें।

प्रश्न 12.
व्याख्या करें
पूरब पश्चिम से आते हैं
नंगे–बूचे नर–कंकाल,
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे लौन लगाता है।
उत्तर-
व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्यपुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने सत्तावर्ग के द्वारा जनता के शोषण का जिक्र किया है। यह एक व्यंग्य कविता है।

अधिनायक भाषा की बात

प्रश्न 1.
अधिनायक में ‘अधि’ उपसर्ग में पांच अन्य शब्द बनाएँ।
उत्तर-
‘अधि’–अधिकरण, अधिकार, अधिपति, अधिराज, अधिभार।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों का विग्रह करें और समास बताएं–राष्ट्रगीत, बेमन, पूरब–पश्चिम, महाबली, नरकंकाल।
उत्तर-
Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 अधिनायक 1

प्रश्न 3.
कवि ने ‘गुन’ और ‘पच्छिम’ जैसे प्रयोग क्यों किये हैं, जबकि इनका शुद्ध रूप क्रमशः ‘गुण’ और ‘पश्चिम’ हैं।
उत्तर-
‘गुन’ और ‘पच्छिम’ शब्द क्रमशः ‘गुण’ एवं ‘पश्चिम’ का तद्भव रूप है। लोक संस्कृति का. प्रयोग कर कवि अपनी कविता को लोकप्रिय एवं सुगम बनाने का प्रयास किया है। इसलिए कवि ने अपनी कविता में तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 4.
तमगे, रोज, बेमन के समानार्थी शब्द क्या होंगे?
उत्तर-

  • शब्द – समानार्थी शब्द
  • तमगे – तगमा, मेडल, पदक
  • रोज – प्रतिदिन, दैनन्दिन
  • बेमन – अनिच्छा, अमन से

प्रश्न 5.
‘कौन–कौन है वह जन–गण–मन’–अर्थ की दृष्टि से यह किस प्रकार का वाक्य है?
उत्तर-
प्रश्नबोधक वाक्य।

प्रश्न 6.
कवि की काव्य–भाषा पर अपनी टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
कवि रघुवीर सहाय की अपनी काव्य–शैली है। इनकी भाषा सरल, साफ–सुथरी एवं सधी हुई है। ये ‘नई कविता’ के समर्थ कवियों में से एक है जो रोजमर्रा के प्रसंगों को उठाकर उसे अपनी कविता में विशिष्ट शैली में प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त हैं। ज्यादातर बातचीत की सहज शैली में उन्होंने लिखा और खूब लिखा। उनकी कविता की व्यंग्यात्मक शैली उनके साहित्य की विशेषता है। वे आधुनिक काव्य भाषा के मुहावरे को पकड़ने में भी अधिक कुशल है।

अधिनायक कवि परिचय रघुवीर सहाय (1929–1990)

जीवन–परिचय–
नई कविता के प्रमुख कवि रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर, 1929 को लखनऊ, उत्तरप्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री हरदेव सहाय था, जो पेशे से शिक्षक थे। रघुवीर सहाय की सम्पूर्ण शिक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। संगीत सुनने और फिल्में देखने में उनकी विशेष अभिरुचि थी। उन्होंने ‘कौमुदी’ कविता केन्द्र की स्थापना की और उसका संचालन किया।

रघुवीर सहाय पेशे से पत्रकार थे। उन्होंने पत्रकारिता का आरंभ ‘नवजीवन’ लखनऊ से किया। इसके बाद ‘समाचार विभाग’ आकाशवाणी, नई दिल्ली और फिर नवभारत टाइम्स (नई दिल्ली) में विशेष संवाददाता के रूप में काम किया। उन्होंने 1979 से 1982 तक ‘दिनमान’ के प्रधान संपादक के रूप में भी काम किया। उनका निधन 30 दिसम्बर, 1990 को हुआ।

रचनाएँ–रघुवीर सहाय अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के माध्यम से कवि रूप में लोगों के सामने आए। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं

कविताएँ–सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो–हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं, कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ।

काव्यगत विशेषताएँ–रघुवीर सहाय नई कविता के कवि हैं। नई कविता के माध्यम से कविता की अग्रगति तथा विकास के लिए नई रचना भूमि, नई–नई भाषा, मुहावरा और रचनातंत्र की उद्भावना की शुरुआत हुई। श्री सहाय दूसरा सप्तक के सात कवियों में शामिल थे। उनकी कविताएँ संवेदना, सरोकार विषयवस्तु, अनुभव, भाषा, शिल्प आदि अनेक तलों पर अपने संकल्प और व्यवहार में नई थी। उनकी विशिष्ट मनोरचना और व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति कहानियों तथा पत्रकारिता में भी हुई। उनकी पत्रकारिता उनकी कविता को प्रासंगिक एवं प्रभावी बना देती है। उनकी कविताओं में व्याप्त तथ्यात्मकता मात्र तथ्य न रहकर ‘सत्य’ बन जाता है।

रघुवीर सहाय की कविताओं में परिवेश की सच्चाई की साहसपूर्ण प्रतिक्रिया मिलती है। यह प्रतिक्रिया तीखी, दाहक और निर्मम हो उठती है। वे अपनी कविता में व्यंग्य–कटाक्ष, घृणा और क्रोध का सार्थक प्रयोग करते हैं जिसका उद्देश्य परपीड़न का सुख नहीं, सच्ची रचनात्मकता या अर्थपूर्ण नई सामाजिकता होती है।

अधिनायक कविता का सारांश

‘अधिनायक’ शीर्षक कविता रघुवीर सहाय द्वारा लिखित एक व्यंग्य कविता है। इसमें आजादी के बाद के सत्ताधारी वर्ग के प्रति रोषपूर्ण कटाक्ष है। राष्ट्रीय गीत में निहित ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है। आजादी मिलने के इतने वर्षों के बाद भी आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं आया। कविता में ‘हरचरना’ इसी आम आदमी का प्रतिनिधि है।

हरचरना स्कूल जाने वाला एक बदहाल गरीब लड़का है। कवि प्रश्न करता है कि राष्ट्रगीत में वह कौन भारत भाग्य विधाता है जिसका गुणगान पुराने ढंग की ढीली–ढाली हाफ पैंट पहने हुए गरीब हरचरना गाता है। कवि का कहना है कि राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में वह ‘फटा–सुथन्ना’ पहने वही राष्ट्रगान दुहराता है जिसमें इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी न जाने किस ‘अधिनायक’ का गुणगान किया गया है।

कवि प्रश्न करता है कि वह कौन है जो मखमल टमटम वल्लभ तुरही के साथ माथे पर पगड़ी एवं चँवर के साथ तोपों की सलामी लेकर ढोल बजाकर अपना जय–जयकार करवाता है। अर्थात्, सत्ताधारी वर्ग बदले हुए जनतांत्रिक संविधान से चलती इस व्यवस्था में भी राजसी ठाठ–बोट वाले भड़कीले रोब–दाब के साथ इस जलसे में शिरकत कर अपना गुणगान अधिनायक के रूप में करवाये जा रहा है।

कवि प्रश्न करता है कि कौन वह सिंहासन (मंच) पर बैठा जिसे दूर–दूर से नंगे पैर एवं नरकंकाल की भाँति दुबले–पतले लोग आकर उसे (अधिनायक) तमगा एवं माला पहनते हैं। कौन है वह जन–गण–मन अधिनायक महावली से डरे हुए लोग से मन के रोज जिसका गुणगान बाजा बजाकर करते हैं।

इस प्रकार इस कविता में रघुवीर सहाय ने वर्तमान जनप्रतिनिधियों पर व्यंग्य किया है। कविता का निहितार्थ यह है मानो इस सत्ताधारी वर्ग की प्रच्छन्न लालसा ही सचमुच अधिनायक अर्थात् तानाशाह बनने की है।

कविता का भावार्थ 1.
राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत–भाग्य–विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित “अधिनायक” शीर्षक कविता से उद्धृत है। इन पंक्तियों में कवि ने उन जनप्रतिनिधियों पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष किया है जो इतने दिनों की आजादी के बाद भी आम आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं ला पाये हैं।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि जानना चाहता है कि वह कौन भाग्य विधाता है जिसका गान हरचरना नाम का एक गरीब विद्यार्थी कर रहा है। वह गरीब विद्यार्थी है। अपनी लाचारी का प्रमाण लिए हुए वह राष्ट्रीय गीत गाता है। कवि का यह कटु व्यंग्य बड़ा ही उचित एवं सामयिक है। सचमुच, आज लाखों गरीब छात्र अपने विद्यालयों में बिना मन के राष्ट्रीय गीत का गान करते हैं। उन्हें नहीं पता कि वे किसका गान कर रहे हैं।

इस प्रकार प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने आज के सत्ताधारी नेताओं पर कटाक्ष किया है। ये सत्ताधारी नेता आज तानाशाह बने हुए हैं।

2. मखमल टमटम बल्लभ तुरही
पगड़ी छत्र–चवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय जय कौन कराता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे पाठ्यपुस्तक दिगंत, भाग–2 के रघुवीर सहाय रचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता से ली गई है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बदली हुई जनतांत्रिक व्यवस्था में भी सत्ताधारी वर्ग के राजसी ठाट–बाट एवं रोब–दाब का वर्णन किया है। कवि प्रश्न पूछता है कि वह कौन व्यक्ति है जो मखमल, टमटम, बल्लभ, तुरही, पगड़ी छतरी एवं चैवर लगाकर तोप के गोले दागकर, ढोल नगाड़ा बजाकर जय–जयकार करवाता है। इसका अर्थ है कि अभी जनप्रतिनिधि अधिनायकवादी की भूमिका निभा रहे हैं। वे जनता का सेवक नहीं, राजसी। ठाट–बाट में लिप्त तानाशाह है। यह आजाद देश के लिए एक चिन्ता का विषय है। कवि व्यंग्य करते हुए एक कटु सत्य का वर्णन करता है कि क्या वे सच्चे जनप्रतिनिधि हैं। अर्थात् नहीं हैं।

3. पूरब–पश्चिम से आते हैं
नंगे–बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्यपुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने सत्तावर्ग के द्वारा जनता के शोषण का जिक्र किया है। यह एक व्यंग्य कविता है।

कवि के अनुसार राष्ट्रीय त्योहारों के अवसर पर सभी दिशाओं से जो जनता आती है वह नंगे पांव है। वह इतनी गरीब है कि केवल नरकंकाल का रूप हो गयी है। उसकी गाढ़ी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा सिंहासन पर बैठा जनप्रतिनिधि हड़प लेता है। गरीब जनता के पैसे से ही वह मेडल पहनता है। मंच पर फूलों की माला पहनता है। वह राज–सत्ता का भोग करता है। शेष जनता गरीबी को मार से परेशान है।

कवि रघुवीर सहाय ने उक्त पंक्तियों में सत्ता–वर्ग के तानाशाहों का व्यंग्यात्मक चित्रण बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। स्वतंत्र देश की यह दुर्दशा राजनेताओं की ही देन है। वे स्वयं राज–योग में लिप्त हैं और जनता गरीबी और लाचारी की मार झेल रही है।

4. कौन–कौन वह जन–गण–मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित “अधिनायक” शीर्षक कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने राष्ट्रीय गान में निहित ‘अधिनायक’ शब्द पर कटाक्ष किया है।

कवि ने कविता के अन्तिम पद में कौन–कौन दो बार प्रयोग कर यह बताने का प्रयास किया है कि जन–गण–मन अधिनायक एक नहीं अनेक हैं। आज देश में तानाशाहों की संख्या बढ़ गई है। वे अब महाबली का रूप धारण कर लिया है। अर्थात् देश की सम्पूर्ण शक्ति इन कुछ गिने–चुने अधिनायकों के हाथों में सीमित हो गई है। बाकी जनता डरी हुई है। सहमी हुई है और बिना इच्छा के राष्ट्रीय गान रूपी बाजा बजाती रहती है।

अतः अब इस राष्ट्रीय गान में आम आदमी की कोई रुचि नहीं रह गई है। राष्ट्रीय त्योहार पर वे केवल खानापूर्ति करते हैं। बेमन से वे राष्ट्रीय गान गाते हैं। उन्हें वास्तविक आजादी नहीं मिली है। आजादी का सुख उन्हें नहीं मिला। यह सुख मुट्ठी भर लोगों में सिमट कर रह गया है। देश के लिए यह अच्छा संदेश नहीं।

Bihar Board Class 9 History Solutions Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions History इतिहास : इतिहास की दुनिया भाग 1 Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science History Solutions Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम

Bihar Board Class 9 History अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
अमेरिका की राजधानी कहाँ है ?
(क) न्यूयार्क
(ख) कैलिफोर्निया
(ग) वाशिंगटन
(घ) कोई नहीं
उत्तर-
(ग) वाशिंगटन

अमेरिका की क्रांति के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
‘कामनसेंस’ की रचना किसने की थी?
(क) जैफर्सन
(ख) टॉमस पेन
(ग) वाशिंगटन
(घ) लफायते
उत्तर-
(ख) टॉमस पेन

Bihar Board Class 9 History Chapter 2 प्रश्न 3.
स्टांप एक्ट किस वर्ष पारित हुआ था ?
(क) 1765
(ख) 1764
(ग) 1766
(घ) 1767 ।
उत्तर-
(क) 1765

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का सेनापति कौन था?
(क) वाशिंगटन
(ख) वेलेजली
(ग) कार्नवालिस
(घ) कर्जन
उत्तर-
(ग) कार्नवालिस

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 5.
अमेरिकी संविधान कब लागू हुआ?
(क) 1787
(ख) 1789
(ग) 1791
(घ) 1793
उत्तर-
(ख) 1789

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 6.
विश्व में प्रथम लिखित संविधान किस देश में लागू हुआ?
(क) इंग्लैण्ड
(ख) फ्रांस
(ग) अमेरिका
(घ) स्पेन
उत्तर-
(ग) अमेरिका

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Bihar Board प्रश्न 7.
किस संधि के द्वारा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम को मान्यता मिली?
(क) पेरिस की संधि
(ख) विलाफ्रका की संधि
(ग) न्यूली की संधि
(घ) सेब्रे की संधि
उत्तर-
(क) पेरिस की संधि

Bihar Board Solution Class 9 History प्रश्न 8.
अमेरिकी स्वतंत्रता में अमेरिका का सेनापति कौन था?
(क) ग्रेनविले
(ख) जैफर्सन
(ग) लफाएते
(घ) वाशिंगटन
उत्तर-
(घ) वाशिंगटन

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 9.
अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे?
(क) जार्ज वाशिंगटन
(ख) अब्राहम लिंकन
(ग) रूजवेल्ट
(घ) अलगोर
उत्तर-
(क) जार्ज वाशिंगटन

Bihar Board Class 9 History Solution प्रश्न 10.
सप्तवर्षीय युद्ध किन दो देशों के बीच हुआ था?
(क) ब्रिटेन-अमेरिका
(ख) फ्रांस-कनाडा
(ग) ब्रिटेन-फ्रांस
(घ) अमेरिका-कनाडा
उत्तर-
(ग) ब्रिटेन-फ्रांस

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. लैसेज फेयर का सिद्धांत ……………. ने दिया थान
2. शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत …………… ने दिया था।
3. सेनापति लफाएते …………… का रहने वाला था।
4. जार्ज तृतीय इंग्लैण्ड का …………… था।
5. धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना, सर्वप्रथम …………… में हुई।
6. नई दुनिया (अमेरिका) का पता …………… ने लगाया था।
7. अमेरिका में अंग्रेजों के …………… उपनिवेश थे।
8. सर्वप्रथम आधुनिक गणतंत्रात्मक शासन की स्थापना ………. में हुई ।
9. अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण …………… था ।
10. ‘राइट्स ऑफ मैन’ की रचना …………… ने की थी।
उत्तर-
1. एडमस्मिथ,
2. माँटेस्क्यू,
3. फ्रांस,
4. शासक,
5. अमेरिका,
6. कोलम्बस,
7. 13,
8. अमेरिका,
9. बोस्टन की टी पार्टी,
10. टामॅस जेफर्सन ।

सही और गलत :

प्रश्न 1.
जार्ज वाशिंगटन अमेरिका के प्रथम प्रधानमंत्री थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
अमेरिका यूरोप महादेश में स्थित है।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वाधीनता के पुत्र एवं पुत्री नामक संगठन का निर्माण हुआ था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 4.
अमेरिका की खोज कोलम्बस ने नहीं किया था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 5.
अमेरिका स्वतंत्रता संग्राम में फ्रांस ने इंग्लैण्ड का साथ दिया था ।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
अमेरिका स्वतंत्रता का घोषणा पत्र जैफर्सन ने तैयार किया था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 7.
स्टांप एक्ट ग्रेनविले के समय पारित हुआ था।
उत्तर-
सही

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
(i) गणतंत्र (ii) मौलिक अधिकार (iii) मताधिकार (iv) उपनिवेश (v) राजतंत्र
उत्तर-
(i) गणतंत्र-जनता का शासन जनता के लिए जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ।
(ii) मौलिक अधिकार-संविधान द्वारा देश के नागरिकों को दिया गया अधिकार ।
(iii) मताधिकार-प्रत्येक वयस्क को शासन के प्रतिनिधि चुनने का मताधिकार प्राप्त है।
(iv) उपनिवेश-शक्ति सम्पन्न देशों द्वारा कमजोर देशों के भू-भाग पर बस जाना।
(v) राजतंत्र-राजा द्वारा शासित राज्य को राजतंत्र कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिका,या नई दुनिया की खोज क्यों हुई?
उत्तर-
अमेरिका या नई दुनिया की खोज स्पेन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इससे यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री यात्रा को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 2.
नई दुनिया को खोज इंग्लैण्ड के लिए वरदान साबित हुआ कैसे ?
उत्तर-
नई दुनिया की खोज के कारण इंग्लैण्ड ने अपने 13 उपनिवेश स्थापित कर लिए । इनका प्रशासन इंग्लैण्ड में प्रचलित प्रशासनिक-व्यवस्था के अनुरूप होता था। इसने अमेरिका का भरपूर दोहन किया जिससे उनकी आर्थिक स्थिति समृद्ध होती गई।

प्रश्न 3.
मुक्त व्यापार के सिद्धांत ने उपनिवेशवासियों को क्रांति के लिए प्रेरित किया कैसे?
उत्तर-
उपनिवेशवाद का बुनियादी सिद्धान्त उपनिवेशियों के आर्थिक शोषण एवं उनके संसाधनों का दोहन करना था। इसी के विरोध में मुक्त व्यापार की धारणा विकसित हो रही थी जिसमें राज्य द्वारा व्यापार को नियंत्रित करने का विरोध किया गया था। इस सिद्धान्त के अनुसार उपनिवेशवासी अपने व्यापार एवं अन्य क्रिया-कलापों में इंग्लैण्ड के हस्तक्षेप को नापसंद करते थे। इसी ने उपनिवेशवासियों को क्रान्ति के लिए प्रेरित किया।

प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने फ्रांस पर भी प्रभाव डाला है- कैसे ?
उत्तर-
अमेरिकी स्वतंत्रा संग्राम ने फ्रांस पर भी प्रभाव डाला है । इस संग्राम में लफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सैनिकों ने भी भाग लिया था। युद्ध के बाद जब वे अपने देश लौटे तब उन्होंने वहाँ की जनता को निरंकुश राजतंत्र के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया और दूसरी ओर फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई।

प्रश्न 5.
क्या अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों ने औपनिवेशिक विश्व को प्रभावित किया?
उत्तर-
हाँ, प्रभावित किया । अब सभी उपनिवेश अपनी-अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति तथा अपनी आजादी के लिए व्यग्र हो उठे । यह एक ऐसा विद्रोह था जिसने उपनिवेशवासियों में नव चेतना का संचार किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के तीन प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसके निम्नलिखित कारण थे

(i) उपनिवेशों में राजनीतिक स्वायत्तता का अभाव-अमेरिकी उपनिवेशों में अधिकतर अंगरेज लोग थे जिन्होंने इंग्लैण्ड की संसदीय व्यवस्था एवं विधि-विधान को देखा था। अतः वे अपने उपनिवेश में भी उसी तरह की प्रजातांत्रिक व्यवस्था एवं विधि-विधान चाहते थे । उपनिवेशों के गवर्नर इंग्लैण्ड के राजा के द्वारा मनोनित किए जाते थे, जो उदार नहीं होते थे। अतः संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। उपनिवेशवासियों को शासन के योग्य नहीं माना जाता था इसलिए इनमें भारी असंतोष था।

(ii) सप्तवर्षीय युद्ध का प्रभाव-सप्तवर्षीय युद्ध इंग्लैण्ड एवं फ्रांस में 1756 ई० से 1763 ई० के बीच हुआ था। इस युद्ध से पूर्व तक उपनिवेशवासी इंग्लैण्ड से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे क्योंकि वे कनाडा में फ्रांसीसियों के विरूद्ध अकेले अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे। लेकिन इस युद्ध में फ्रांस की पराजय के साथ ही यह भय समाप्त हो गया । अब उपनिवेशवासियों का एक मात्र लक्ष्य इंग्लैण्ड को बेदखल करना था। प्रो० पोलार्ड ने कहा था-“फ्रांस की पराजय ने अमेरिकावासियों की स्वतंत्रता की इच्छा को भड़काया”।

(iii) बोस्टन की चाय पार्टी-1773 ई० में चाय कानून द्वारा कंपनी के चाय से लदे जहाज अमेरिका के बोस्टन बन्दरगाह पर पहुँचे । उपनिवेशवासी सरकार द्वारा चाय पर कर लगाए जाने से क्रुद्ध थे। अतः वहाँ के नागरिकों ने रेड इंडियन के वेश में चाय की पेटियाँ समुद्र में फेंक दी। यह घटना बोस्टन की चाय पार्टी के नाम से विख्यात है। ब्रिटिश सरकार ने बन्दरगाह पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिया । इस तरह अमेरिकी उपनिवेश को विद्रोह की आग में धकेल दिया।

प्रश्न 2.
लोकतांत्रिक स्तर पर अमेरिकी संग्राम ने विश्व को कैसे प्रभावित . किया है ?
उत्तर-
अमेरिकी संग्राम का प्रभाव न केवल 13 उपनिवेशों पर पड़ा, बल्कि विश्व स्तर पर प्रभाव डाला।

लोकतांत्रिक स्तर पर इसका प्रभाव :

(i) एक नये राष्ट्र का उदय-13 उपनिवेशों ने आपस में मिलकर सेयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना की । विश्व के मानचित्र पर नए राष्ट्र का उदय हुआ । नए राष्ट्र के लिए 1787 में नया संविधान बना इसे 1789. ई० में लागू किया गया। इसने गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई ।
अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई।

(ii) प्रथम जनतंत्र की स्थापना-संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का पहला राष्ट्र बना जिसने प्रचलित राजतंत्रात्मक-व्यवस्था के स्थान पर जनतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था को अपनाया। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी जार्ज वाशिंगटन को अमेरिका का प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति बनाया गया।
इस प्रकार लोकतांत्रिक स्तर पर विश्व भर में यह प्रभाव पड़ा, अन्य उपनिवेश भी अपनी स्वतंत्रता की कल्पना करने लगे ।

प्रश्न 3.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों की आलोचनात्मक परीक्षण करें।
उत्तर-
अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है । पहली बार 13 उपनिवेशों ने ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ राष्ट्र का निर्माण किया। अमेरिका पहला राष्ट्र बना जहाँ गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई गई । अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया। धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई । अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर अनेक राष्ट्रों में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठीं।

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से समाज पर भी प्रभाव पड़ा । स्वतंत्रता संग्राम ने अमेरिकी समाज पर प्रभाव डाला । नई परिस्थिति में ब्रिटेन के राज भक्तों को अमेरिका छोड़कर पड़ोसी राष्ट्र कनाडा जाने को विवश होना पड़ा । केवल गणतंत्रात्मक विचार धारा से प्रभावित लोग ही अमेरिका में रह गए । युद्ध में प्रमुखता से भाग लेने के कारण स्त्रियों का समाज  में सम्मान बढ़ा इसलिए उनके नागरिक और आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के पराजय के क्या कारण थे ?
उत्तर-
अंग्रेजों के पराज्य के निम्नलिखित कारण थे :

  • इंग्लैण्ड की दूरी-अमेरिकी उपनिवेश अटलांटिक महासागर के पार 3000 मील की दूरी पर था। इससे युद्ध के सामान और रसद पहुँचाने में कठिनाई होती थी। दूसरी ओर अमेरिका की भौगोलिक स्थिति से भी अंग्रेज सैनिक अपरिचित थे ।
  • अमेरिका की शक्ति को नजरअंदाज किया गया एवं अधिकांश __ अंग्रेज इसे गृहयुद्ध ही समझते रहे ।
  • उपनिवेशवासियों में उत्साह था । वे स्वतंत्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार थे।
  • ब्रिटिश सेनापतियों ने कुछ सामरिक भूले की।
  • ब्रिटिश राजनेताओं के बीच गंभीर मतभेद था। जार्ज तृतीय की हठधर्मिता की नीति के कारण योग्य एवं अनुभवी नेता सरकार से अलग रहे।
  • इंग्लैण्ड का अकेले युद्ध लड़ना-यह इंग्लैण्ड की पराजय का मुख्य कारण था। उसे अन्य देशों का सहयोग नहीं मिल सका। जबकि अमरिकी उपनिवेशों को विदेशी सहायता प्राप्त हुई विशेषकर फ्रांस से । इसने धन और सेवा से काफी मदद पहुँचाई।
  • जार्ज वाशिंगटन जैसा सुयोग्य सेना नायक मिल गया जिसने बड़े धैर्य, साहस एवं कुशलता के साथ अंग्रेजी सेना को पराजित किया।

Bihar Board Class 8 English Book Solutions Chapter 1 I Wonder

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BSEB Bihar Board Class 8 English Book Solutions Chapter 1 I Wonder

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Bihar Board Class 8 English I Wonder Text Book Questions and Answers

A. Warmer

I Wonder Poem Questions And Answers Bihar Board Question 1.
There are many things that we wonder at. Tell your class some such things that you have often wondered at.
Answer:
I often wonder how this world was made. How did our planet come into its existence. How so many creatures were formed. Who made ail of us. How is He ?

B. Let’s Comprehend

B. 1. Think and Tell

B. 1. 1. Answer these questions orally

I Wonder Poem Class 8 Bihar Board Question 1.
What things in the first stanza tell you that the poet is curious ?
Answer:
’The colour of the grass, not seen wind, the making of birds nest and the trees in rest. These are the things in the first stanza that tell us that the poet is curious to know why they are so.

Class 8 English Chapter 1 Bihar Board Question 2.
Why do you think the speaker calls the cloud fluffy ?
Answer:
The cloud moves in the sky swiftly. So, the speaker calls the cloud Huffy.

I Wonder Why Poem Questions And Answers Question 3.
Does the wind have any colour ?
Answer:
No, wind has no colour.

Bihar Board Class 8 English Chapter 1 Question 4.
Do you often ask your father about the things that you wonder at Does he answer your questions ? If he doesn’t, what do you do to satisfy your curiosity ?
Answer:
I also ask my father about the things I wonder at. My father answers my questions. If he doesn’t know some question’s answer he tells me to ask it from others. To satisfy my curiosity I ask such questions from my teachers and other elderly persons.

B. 1. 2. Based on your reading of the poem say whether the following statements are ‘true’ or ‘false’

Bihar Board Class 8 English Book Solution Question 1.

  1. The shape of moon is fixed
  2. The birds make their own nests.
  3. The rainbow is not always colorful.
  4. The stars do not give light.

Answer:

  1. False
  2. True
  3. False
  4. False

B. 2. Think and Write

B. 2. 1. Think of Things and Ideas That you Associate With Rain.

I Wonder Poem Question Answer Bihar Board Question 1.
Then create a web chart around the word ‘rain’.

I Wonder Poem Class 2 Questions And Answers Bihar Board

Answer:

Bihar Board Class 8 English Book Solutions Chapter 1 I Wonder 2

B. 2. 2 Answer the following questions in not more than SO words.

I Wonder Class 8 Bihar Board Question 1.
Make a list of things that the poet is curious to know about.
Answer:
The poet is curious to know about why the grass is green, why the wind is never seen. The poet wants to know, who taught the birds to build a nest. Why the trees take rest. Where goes the missing bit of moon. He also wants to know about the lights of stars, about lightning’s origin. How comes rainbow and the fluffy clouds, up in the sky

I Wonder Poem Meaning In Hindi Bihar Board Question 2.
Who do you think is the T in the poem a child or an adult ? Give reasons for your answer.
Answer:
I think that, T in the poem is a child. He is not an adult. The questions that rises in his mind are the questions of a child’s curiosity. Adults don’t ever think of such questions. So, I agree to the point that the speaker, T of the poem is a child.

Bihar Board Solution Class 8 English Question 3.
What opinion do you form about the speaker ?
Answer:
In my opinion, the speaker is a child of high mental level. He is intelligent. His mind is full of queries and questions.

I Wonder Questions And Answers Bihar Board Question 4.
What does the question in the end suggest about the spaker’s attitude towards his dad ?
Answer:
The question, coming in the end of the poem sug-gests that the boy is undecisive. He is not sure that his Dad knows the answers of his questions. And even if he knew it, it was doubleful that he would answer to all of his queries.

C. Word Study

I Wonder Why The Grass Is Green Meaning In Hindi Question 1.
What does the phrasal verb ‘blow out’ mean in the poem ? Look up a dictionary and list the meaning. Note down other meanings of the phrasal verb and use it in your own sentences conveying other meanings.
Answer:
‘blow out’ in the poem means ‘to extinguish’ of to ‘ ‘put out fire’. Blow out: The fire was blown out by the strong wind. Some other meanings of the phrasal verb conveyed in sentences.

Blow out (to lose force)The fire blew itself out. Blow out (to defeat someone easily): One can’t blow out my courage. Blow out (flame put off by wind): The’candle blew out as he . opened the window.

I Wonder Poem In Hindi Bihar Board Question 2.
Look up a dictionary and list other phrasal verb that begin with ‘blow’, and use them in your own sentences.
Answer:
Blow out (to come out with force): With the explosion, the high flames blew out from the gas go down/building.

To blow upon (to speak ill of): It is bad to blow upon your friends.
To blow one’s own trumpet (to praise oneself): He is master in blowing his own trumpet.

C. 1. 3. Fill in the blanks in the sentences given below with the suitable phrasal verbs given in the box.

  1. put out : to extinguish
  2. call out : to sumon
  3. set out : to begin a journey
  4. wipe out : to remove
  5. give up : to leave

a. The government is ready to …………. Polio.
b. He ……………. for Kolkata with his father.
c. …………… a doctor to examine the patient.
d. He had to smoking because he had breathing problem………..
e. …………. the lantern.
Answer:
a. The government is ready to wipe out Polio.
b. He set out for Kolkata with his father.
c. Call out a doctor to examine the patient.
d. He had to give up smoking be cause he had breathing problems.
e. Put out the Panted.

D. Rhyme Time

Look at the following pairs of words:

green-seen
nest – rest

These pairs of words, you will notice, end with similar sounds. Such pairs of words that end with a similar sound are called rhyming pairs or words.

Question 1.
Pick out the rhyming pairs from the poem and add one more to each pair. One has been done for you.
green – seen – been
Answer:
Rhyming pairs from the poem – Added rhyming words

  1. nest – rest – chest – crest
  2. round – found – sound – mound
  3. out – about – shout – scout
  4. sky – high – cry – fry
  5. suppose – knows – prose – chose

E. Let’s Talk

Question 1.
Discuss the following in-groups or pairs and imagine : If the moon did not appear in sky, what would happen ?
Answer:
Ravi : Without the moon in the sky, the nights will become absolute dark.
Kavita : Its so frightening to think of the nights,-with- out the moon. Then, children can’t be able to play in the night.
Mini : Yes, its great delight to play in the moonlit night.
Anu : People in villages, will badly suffer. They walk far off distances in villages only with the help of moon’s light in the nights.

F. Translation

Question 1.
Translate into your mother tongue any one of the stanzas of the poem that you have just read.
Answer:
See’Hindi Translation of the poem.
Wonder (v)[वन्डर) = आश्चर्य करना । Wind (n) [विन्ड] = हवा। Build (v)[बिल्ड] = बनाना । Quite (adv) [क्वाइट] = पूरा । Round (adj) [राउन्ड] = गोल । Missing (adj)[मिसिंग = गायब । Bit (n) [बिट] – टुकड़ा । Lightning (n) |लाइटनिंग= बिजली । Flash (v)[फ्लैश] = चमकना । Fluffy (adj) [फ्लफी) = फुज्जीदार, हल्के-फुल्के । Supposé (v) [सपोज] = मानना ।

G. Activity

Question 1.
Find in the grid the words related to weather. Words can appear horizontally, vertically or diagonally. One has been done for you.

Bihar Board Class 8 English Solution
Answer:

I Wonder Poem Class 3 Questions And Answers Bihar Board

Temperature, Cloud, Rainbow, Cloud, Weather, Hail, Light-ning, Forecast, Snow, Wind, Sunny, Umbrella, Rain.

I Wonder Summary in English

‘I WONDER’ is a wonderful poem. The following poem is based on the queriful mind of a child. The speaker of this poem is a child. He looks around him. And his mind is full of queries. His queries are many. Why the grass is green ? Why the wind is never seen ? There are many such questions in his mind. At last, the child assures himself that if his Dad had the answers of his question, he will surely let him know about them.

I Wonder Summary in Hindi

‘आई वन्डर’ एक आश्चर्यजनक, अनुभूत कविता है । प्रस्तुत कविता एक ‘बालक के कौतूहलपूर्ण मस्तिष्क से सम्बन्धित है। कविता का वक्ता एक बालक है। वह अपने चारों ओर देखता है और उसके मस्तिष्क में कई प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। उसके पास कई प्रश्न हैं। घास हरे रंग की क्यों है ? क्यों हवा दिखती नहीं ? ऐसे ही कई प्रश्न हैं उसके दिमाग में । अंत में, वह बच्चा स्वयं को आश्वस्त भी करता है, यकीन भी दिलाता है कि यदि उसके पिता के पास इन प्रश्नों के उत्तर होंगे, तो वे उसे जरूरी बताएँगे।

I Wonder Hindi Translation of The Chapter

Wonder (v)[वन्डर) = आश्चर्य करना । Wind (n) [विन्ड] = हवा। Build (v)[बिल्ड] = बनाना । Quite (adv) [क्वाइट] = पूरा । Round (adj) [राउन्ड] = गोल । Missing (adj)[मिसिंग = गायब । Bit (n) [बिट] – टुकड़ा । Lightning (n) |लाइटनिंग= बिजली । Flash (v)[फ्लैश] = चमकना । Fluffy (adj) [फ्लफी) = फुज्जीदार, हल्के-फुल्के । Supposé (v) [सपोज] = मानना ।

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Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 4 दानी पेड़

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 4 दानी पेड़ Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 4 दानी पेड़

Bihar Board Class 7 Hindi दानी पेड़ Text Book Questions and Answers

पाठ से –

दानी पेड़ का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 1.
पेड़ से सब कुछ लेने के बाद भी आदमी खुश क्यों नहीं था?
उत्तर:
वह आदमी बूढ़ा हो गया था। उसके शरीर में दम नहीं था। दाँत गिर गये । वह थक गया था। पेड़ से पत्ते, टहनी, तने लेकर वह पेड़ को ढूंठ बना चुका था। उसे आराम की आवश्यकता थी। आराम करने की जगह उसके नजर में नहीं आ रही थी। इसलिए पेड़ से सब कुछ लेने के बाद भी वह आदमी खुश नहीं था।

Dani Per Class 7 Bihar Board प्रश्न 2.
अपना सब कुछ दे देने पर भी पेड़ खुश क्यों था?
उत्तर:
पेड़ परोपकारी था । वह अपने प्रिय दोस्त को खुश देखना चाहता था। इसलिए उसने अपना सब कुछ प्यारा लड़का के प्रति उत्सर्ग कर दिया। दान-शील स्वभाव वाले दान देकर आनन्द का अनुभव करते हैं। इसलिए दानी पेड़ अपना सब कुछ दे देने पर भी खुश था।

Dani Ped Ka Question Answer Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 3.
पेड़ ने आदमी के बचपन से बढ़ापे तक की किन-किन जरूरतों को पूरा किया ?
उत्तर:
पेड़ ने आदमी को बचपन से बुढ़ापे तक की अनेक जरूरतों को पूरा किया जो निम्नलिखित हैं –

(क) खेलने के लिए अपनी शाखाएँ।
(ख) थकान दूर करने के लिए अपनी छाया ।
(ग) मन बहलाने के लिए-फूल।
(घ) भूख मिटाने के लिए-फल ।
(ङ) पैसे के लिए सभी फल ।
(च) घर बनाने के लिए-टहनी (डाली)।
(छ) नाव बनाने के लिए अपनी तना ।
(ज) बुढ़ापे में सुस्ताने के लिए अपनी दूंठ (जड़)।

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solution प्रश्न 4.
पेड़ को दानी क्यों कहा गया है ?
उत्तर:
पेड़ परोपकार के लिए होता है। उसके प्रत्येक अंग परोपकार में लगता है। वह अपनी छाया देकर सबको आनन्द प्रदान करता है। उसके फल-फूल, पत्ते शाखाएँ तना, छाल, जड़ सब कुछ परोपकार में लग जाते हैं। इतना ही नहीं, वह प्राणवायु ऑक्सीजन दान कर सबों की रक्षा भी करता है। इसलिए पेड़ को दानी कहा जाता है।

Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 5.
बड़ा होने पर लड़का दुःखी क्यों रहने लगा?
उत्तर:
बड़ा होने पर लड़का दुःखी रहने लगा क्योंकि वह पेड़ से सब कुछ पा चुका था लेकिन जब वह बुढ़ापे को प्राप्त कर गया उसको रोग होने लगा, उसकी शक्ति क्षीण हो गई । अब पेड़ उसकी मदद किसी प्रकार से नहीं कर सकता था। अपने किये करनी पर उसे पश्चाताप हो रहा था जिसके कारण वह दु:खी था। अतः जो दूसरों का अपकार करता है या वृक्ष की रक्षा नहीं करता उसे दु:खी होना ही पड़ता है।

Hindi Class 7 Bihar Board Solution प्रश्न 6.
खाली जगहों को भरिए –

(क) पेड़ छोटे लड़के का …………… था।
उत्तर:
पेड़ छोटे लड़के का प्यारा था।

(ख) वह पेड़ के साथ ……….. खेलता।
उत्तर:
तह पेड़ के साथ लुका-छिपी खेलता।

(ग) मुझे पैसों की ………….. है।
उत्तर:
मुझे पैसों की जरूरत है।

(घ) मैं …………. खरीदना चाहता हूँ।
उत्तर:
मैं बहुत-सी चीजें खरीदना चाहता हूँ।

पाठ से आगे –

Bihar Board Solution Class 7 Hindi प्रश्न 1.
दुनिया में पेड़ों की संख्या को लगातार कम किया जा रहा है। अगर पेड़ों की संख्या इसी प्रकार कम होती जाय तो बीस वर्ष के बाद का समाज कैसा होगा?
उत्तर:
दिन-प्रतिदिन पेड़ों की संख्या में कमी आ रही है। यदि यही स्थिति बनी रही तो बीस वर्षों के बाद का समाज रोग से ग्रस्त हो जायेगा। समाज का प्रत्येक व्यक्ति असमय ही बूढ़ा होकर मरने लगेगा। वह वृक्ष के हनन से दु:खी रहेगा। कृत्रिम ऑक्सीजन का सहारा लेगा। फल-फूल देखने * को भी नहीं मिलेगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि बीस वर्षों के बाद का समाज रोग-शोक दुःखादि से आक्रान्त होकर रोता-बिलखता नजर आयेगा।

किसलय हिंदी बुक बिहार क्लास 7 Bihar Board प्रश्न 2.
पेड़ों को सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या किया जा सकता
उत्तर:
पेड़ों को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं –
(क) पेड़ों की कटाई पर रोक के लिए कानून बने ।
(ख) पेड़ों को लगाने की अनिवार्यता का कानून बने ।
(ग) पेड़ों की सुरक्षा के लिए विशेष पुलिस-बल का गठन हो।
(घ) पेड़-पौधों को रोग से बचाव के लिए वनस्पति विशेषज्ञों एवं डॉक्टरों की बहाली हो।
(ङ) पेड़-पौधों की सिंचाई के लिए व्यवस्था हो।

Bihar Board Class 7 Hindi Solution In Hindi प्रश्न 3.
दिये गये शब्दों का प्रयोग कर एक छोटी-सी कहानी लिखिए –
मेढ़क, तालाब, बगुला, बच्चे, मछली, साँप।
उत्तर:
बगुला की शैतानी-एक तालाब में मेढ़क, मछली और साँप परस्पर मित्र भाव से रहते थे। वहीं पर एक शैतान बगुला भी आता था। बगुला को इन तीनों की दोस्ती अच्छी नहीं लगी। उसने तीनों की दोस्ती को तोड़ने की बात सोच ली । वह साँप के पास जाकर कहता है-अरे, भाई साँप, मेढ़क तो तुमसे छल करता है। वह प्रतिदिन मछलियों को मारकर खा रहा है। एक दिन ऐसा होगा कि तुम्हारा कोई मित्र नहीं बचेगा। साँप शैतान बगुला के बहकावे में आकर मेढ़क को मारना ही उचित सजा मानकर अपने प्रिय दोस्त को निगल गया। अब बगुले ने साँप को मारने का विचार किया।

तालाब के किनारे कुछ बच्चे खेलने आया करते थे। बगुला ने कहा-अरे बच्चे, यहाँ मत खेलो, यहाँ पर रहने वाला साँप तुझे काट लेगा, तुमलोग वेमौत मारे जाओगे। तुम सब प्यारे-प्यारे, भोले-भाले बच्चे के मारे जाने के दुःख को मैं कैसे सहन करूँगा। लड़कों ने बगुला को आश्वासन दिया कि तुम चिन्ता मत करो, कल साँप मारा जायेगा । बच्चे कल होकर दंडे लेकर आये और साँप को खोजकर मार डाले। अब बगुला आसानी से मछली मार कर खाने लगा।

व्याकरण –

Bihar Board Class 7 Hindi Book प्रश्न 1.
नीचे दिये गये शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कर उनके लिङ्ग बताइए
उत्तर:
उदाहरण-शाखा (स्त्रीलिंग) लड़का पेड़ की शाखा पर झूलता था।
आम – (पुल्लिंग) आम मीठा होता है।
खिचड़ी (स्त्रीलिंग) खिचड़ी पक गई।
रंग – (पुल्लिंग) रंग पक्का है।
बन्धु – (पुल्लिंग) मेरा बन्धु आज आयेगा।

Class 7 Hindi Bihar Board प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्य वर्तमान काल में है। इन्हें क्रमशः भूतकाल और भविष्यत् काल में लिखिए –
(क) मुझे पैसों की जरूरत है (वर्तमान काल)
उत्तर:
मुझे पैसों की जरूरत थी (भूत काल)
मुझे पैसों की जरूरत होगी। (भविष्यत् काल)

(ख) मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ। (वर्तमान काल)
उत्तर:
मैं तुम्हें कुछ देना चाहता था। (भूतकाल)
मैं तुम्हें कुछ देना चाहूँगा। (भविष्यत् काल)

(ग) क्या तुम मुझे नाव दे सकते हो? (वर्तमान काल)
उत्तर:
क्या तुम मुझे नाव दे सकते थे? (भूत काल)
क्या तुम मुझे नाव दे सकोगे? (भविष्यत् काल).

Bihar Board 7th Class Hindi Book प्रश्न 3. 
कोष्ठक में दिये गये शब्दों में से सही शब्द चुनकर वाक्य पूरा कीजिए –
(क) युवक सभी ………… को काटकर ले गया। (शाखा, शाखाओं)
उत्तर:
युवक सभी शाखाओं को काटकर ले गया।

(ख) आदमी ने तना से नाव …………। (बनाई, बनाया)
उत्तर:
आदमी ने तना से नाव बनाई।

(ग) कई साल बीत ………..। (गए, गया) ।
उत्तर:
कई साल बीत गए।

(घ) वह ………… की माला बनाता था। (फूल, फूलों)
उत्तर:
वह फूलों की माला बनाता था।

(ङ) मुझे ………… की जरूरत है। (पैसों, पैसा)
उत्तर:
मुझे पैसों की जरूरत है।

गतिविधि – आप अपने आस-पास के पेड़ों की सूची बनाइए तथा बड़े समूह में साथियों से चर्चा कीजिए कि ये पेड़ हमारे जीवन में किस प्रकार उपयोगी हैं –
उत्तर:
हमारे आस-पास में मुख्यतः दो प्रकार के पेड़ हैं फलदार, छायादार।
(क) फलदार-आम, लीची, बेल, जामुन इत्यादि ।
(ख) छायादार–पीपल, बरगद, पाकर इत्यादि ।

उपयोगिता की चर्चा –

(क) फलदार वृक्ष से हमें छाया के साथ-साथ फल-फूल प्राप्त होते हैं। पेड़ों के पत्ते डाली, जड़ इत्यादि भी औषधि बनाने के काम में आते हैं। ये पेड़ हमारे लिए दिन में ऑक्सीजन छोड़ते हैं तथा रात में कार्बन गैस का उत्सर्जन करते हैं। जबकि दिन में वे कार्बन डाईऑक्साइड नामक दुषित वायु को ग्रहण कर ऑक्सीजन बनाने का काम करते हैं। इनके लकड़ियों से उपस्कर बनता है।

(ख) छायादार पेड़ – फलदार पेड़ से कहीं अधिक लाभकारी है क्योंकि कुछ छापादार पेड़ केवल हमारे लिए प्राणरक्षक के रूप में काम करते हैं जैसे -.पीपल अपनी छाया से लोगों को आराम देता ही है। साथ-साथ यह भी जान लें कि पीपल दिन-रात (24 घंटे) दुषित वायु कार्बन को ग्रहण करता है तथा ऑक्सीजन छोड़ता है जो प्राण वायु कहा जाता है। इसलिए पीपल की पूजा भी लोग करते हैं। उसी प्रकार बरगद भी हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी है। वह अपनी छाया से जीव-जन्तुओं को राहत देता है तथा मेघ को आकर्षित करने में बरगद का बहुत बड़ा योगदान होता है। जहाँ अधिक बरगद का पेड़ होगा वहाँ अधिक वर्षा होगी। इसलिए बरगद भी हमारे समाज में पूजित होता

इस प्रकार हरेक पेड़-पौधे हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं। अत: उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए।

दानी पेड़ Summary in Hindi

कहानी का सारांश – एक पेड़ को एक छोटे लड़के से बहुत प्यार था। वह लड़का प्रतिदिन पेड़ के पास आता था । वह फूलों की माला बनाकर पेड़ की तने पर चढ़ाता था, उसकी शाखा पर झूलता था। उसका फल खाता और वह पेड़ के साथ लुका-छिपी खेलता था। जब वह थक जाता तो पेड़ की छाँव में सो जाता था। लड़का भी पेड़ से बहुत प्यार करता था, इसलिए पेड़ बहुत खुश था।

समय बीतता गया लड़का जवान हो गया। अब वह पेड़ के साथ खेलने नहीं आता। पड़ अकेले दुःखी रहने लगा। एक दिन लड़का आया, पेड़ बहुत खुश हुआ। लड़का ने पेड़ से कहा—मुझे पैसे की जरूरत है जिससे मैं बहुत-सी चीज खरीदना चाहता हूँ। क्या तुम हमें पैसे दोगे । वृक्ष ने कहामेरे पास पैसे नहीं हैं, मेरे पास फल हैं, तुम फल तोड़कर बाजार में बेच लो, पैसे हो जाएँगे। लड़के ने सारे फल तोड़ लिये इसके बाद भी वृक्ष खुश था ।

कई साल के बाद वह युवक फिर पेड़ के पास आया और कहा-“मेरी शादी होने वाली है, मुझे घर चाहिए। क्या तुम मुझे एक घर दे सकते हो? पेड़ ने कहा हमारे पास घर नहीं है । तुम मेरी शाखाएँ काटकर ले जाओ और घर बना लो । युवक पेड़ की सारी शाखाएँ काट ली। इसके बाद भी पेड़ खुश था।

बहुत दिनों के बाद अब वह बच्चा अधेर व्यक्ति हो गया। एक दिन पेड़ के पास आकर कहा-हमें मछली मारने के लिए नाव चाहिए, क्या तुम नाव दे सकते हो? पेड़ ने कहा हमारे पास नाव नहीं है तुम मेरा बचा हुआ तना ले जाओ उससे नाव बन जाएँगे। वह पेड़ की तना को भी काट कर ले गया। अब उसका केवल जड़ बचा। इसके बाद भी पेड़ खुश था।

इस तरह कई वर्षों के बाद एक बूढ़ा आदमी पेड़ के पास आया। पेड़ पहचान गया। वही छोटा लड़का था। पेड़ ने खुशी मन से कहा-बेटा ! मैं तुझे कुछ देना चाहता था परन्तु हमारे पास कुछ नहीं है बताओ क्या तुझे ढूँ। बूढ़े ने कहा तुम देख रहे हो मेरी हालत, मेरे दाँत गिर गये इसलिए फल नहीं खा सकता। मेरी उम्र शाखाओं पर झुलने की नहीं रही। तने पर चढ़ने का दम ही नहीं है। मैं बहुत थक गया हूँ। मुझे बस आराम से बैठने और सुस्ताने के लिए एक जगह चाहिए।

पेड़ ने कहा, तो आओ मेरे दूंठ (जड़) पर बैठ जा । वह बैठकर सुस्ताने लगा। अब भी पेड़ खुश था।

शिक्षा – अतः जो व्यक्ति दानी होते हैं वे सर्वस्व निछावर करके भी खुश रहते हैं।

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 एक लेख और एक पत्र

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 6 एक लेख और एक पत्र

 

एक लेख और एक पत्र अति लघु उत्तरीय प्रश्न

एक लेख और एक पत्र Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
‘एक लेख और एक पत्र के लेखक हैं’ :
उत्तर–
भगत सिंह।

एक लेख और एक पत्र प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
भगत सिंह ने कैसी मृत्यु को सुन्दर कहा है?
उत्तर–
देश सेवा के बदले दी गई फाँसी को।

Ek Lekh Aur Ek Patra Question Answer Bihar Board Class 12th प्रश्न 3.
भगत सिंह के अनुसार आत्महत्या क्या है?
उत्तर–
कायरता।

एक लेख और एक पत्र Objective Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 4.
भगत सिंह सरकार के किस राय पर खपा थे?
उत्तर–
छात्र को राजनीति से दूर रखने की राय पर।

एक लेख और एक पत्र का सारांश Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 5.
विद्यार्थी को राजनीति में क्यों भाग लेना चाहिए?
उत्तर–
विद्यार्थी देश के भावी कर्णधार होते हैं।

Ek Lekhak Aur Ek Patra Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 6.
भगत सिंह के आदर्श पुरुष कौन थे? उत्तर–करतार सिंह सराबा।

Ek Patra Aur Ek Lekh Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 7.
सन् 1926 में भगत सिंह ने किस दल का गठन किया?
उत्तर–
नौजवान भारत सभा।

एक लेख और एक पत्र वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

Ek Lekh Aur Ek Patra Bhagat Singh Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
भगत सिंह का जन्म कब हुआ था?
(क) 28 सितम्बर, 1907 ई.
(ख) 10 सितम्बर, 1910 ई.
(ग) 15 जून, 1901 ई.
(घ) 17 फरवरी, 1908 ई.
उत्तर–
(क)

Hindi Class 12th Bihar Board प्रश्न 2.
1941 ई. में भगत सिंह किस पार्टी की ओर आकर्षित हुए?
(क) गदर पार्टी
(ख) नेशनल पार्टी
(ग) स्वतंत्र पार्टी
(घ) राष्ट्रवादी पार्टी
उत्तर–
(क)

Class 12 Hindi Bihar Board प्रश्न 3.
भगत सिंह सदैव किसका चित्र पॉकेट में रखते थे?
(क) गुरु गोविन्द सिंह
(ख) गुरुनानक
(ग) महात्मा बुद्ध
(घ) करतार सिंह सराया
उत्तर–
(घ)

Bihar Board Class 12 Hindi प्रश्न 4.
भगत सिंह किस उम्र से क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हुए?
(क) 12 वर्ष
(ख) 18 वर्ष
(ग) 10 वर्ष
(घ) 15 वर्ष
उत्तर–
(क)

प्रश्न 5.
भगत सिंह कब चौरीचौरा कांड में शरीक हुए?
(क) 1922 ई.
(ख) 1925 ई.
(ग) 1928 ई.
(घ) 1930 ई. .
उत्तर–
(क)

प्रश्न 6.
भगत सिंह ने नौजवान–सभा की शाखाएँ कहाँ–कहाँ स्थापित की?
(क) पटना–दिल्ली
(ख) कानुपुर–कलकत्ता
(ग) अजमेर–गाजीपुर
(घ) विभिन्न शहरों में
उत्तर–
(घ)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
भगत सिंह को ………. षड्यंत्र केस में फांसी की सजा हुई थी।
उत्तर–
लाहौर

प्रश्न 2.
भगत सिंह के पिता सरदार ………… थे।
उत्तर–
किशन सिंह

प्रश्न 3.
भगत सिंह ………. परिवार स्वाधीनता सेनानी थे।
उत्तर–
संपूर्ण

प्रश्न 4.
भगत सिंह का ……… खडकड़कलाँ, पंजाब में है।
उत्तर–
पैतृक गाँव

प्रश्न 5.
बाद में भगत सिंह ने ………….. कॉलेज, लाहौर से एफ. ए. किया।
उत्तर–
नेशनल

प्रश्न 6.
भगत सिंह का जन्म ………. हुआ था।
उत्तर–
28 सितम्बर, 1907 ई.

प्रश्न 7.
भगत सिंह ने बी. ए. के बाद पढ़ाई छोड़ दी और ……… दल में शामिल हो गए।
उत्तर–
क्रांतिकारी

एक लेख और एक पत्र पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विद्यार्थियों को राजनीति में भाग क्यों लेना चाहिए?
उत्तर–
विद्यार्थियों को राजनीति में भाग इसलिए लेना चाहिए क्योंकि उन्हें ही कल देश की बागडोर अपने हाथ में लेनी है। अगर वे आज से ही राजनीति में भाग नहीं लेंगे तो आने वाले समय में देश की भली–भाँति नहीं सँभाल पाएँगे, जिससे देश का विकास न हो सकेगा।

प्रश्न 2.
भगत सिंह की विद्यार्थियों से क्या अपेक्षाएँ हैं?
उत्तर–
भगत सिंह की विद्यार्थियों से बहुत–सी अपेक्षाएँ हैं। वे चाहते हैं कि विद्यार्थी राजनीति तथा देश की परिस्थितियों का ज्ञान प्राप्त करें और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करें। वे देश की सेवा में तन–मन–धन से जुट जाएँ और अपने प्राण न्योछावर करने से भी पीछे न हटें।

प्रश्न 3.
भगत सिंह के अनुसार केवल कष्ट सहकर ही देश की सेवा की जा सकती है? उनके जीवन के आधार पर इसे प्रमाणित करें।
उत्तर–
भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में हमारे सामने आते हैं जिनमें देश की आजादी के साथ समाज की उन्नति की प्रबल इच्छा भी दिखती है। इसकी शुरुआत 12 वर्ष की उम्र में जालियाँवाला बाग की मिट्टी लेकर संकल्प के साथ होती है, उसके बाद 1923 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ से। भगत सिंह यह जानते थे कि समाज में क्रांति लाने के लिए जनता में सबसे पहले राष्ट्रीयता का प्रसार करना होगा। उन्हें एक ऐसे विचारधारा से अवगत कराना होगा जिसकी बुनियाद समभाव समाजवाद पर टिकी हो। जहाँ शोषण की कोई बात न हो। इसलिए उन्होंने लिखा कि समाज में क्रांति विचारों की धार से होगी। वे समाज में गैर–बराबरी, भेदभाव, अशिक्षा, अंधविश्वास, गरीबी, अन्याय आदि दुर्गुण एवं अभाव के विरोधी के रूप में खड़े होते हैं, मानवीय व्यवस्था के लिए कष्ट, संघर्ष सहते हैं। भगत सिंह समझते हैं कि बिना कष्ट सहकर देश की सेवा नहीं की जा सकती है। इसीलिए उन्होंने जो नौजवान सभा बनायी थी उसका ध्येय सेवा द्वारा कष्टों को सहन करना एवं बलिदान करना था।।

क्रांतिकारी भगत सिंह कहते हैं कि मानव किसी भी कार्य को उचित मानकर ही करता है। जैसे हमने लेजिस्लेटिव असेम्बली में बम फेंकने का कार्य किया था। इस पर दिल्ली के सेसन जज ने असेम्बली बम केस में भगत सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। कष्ट के संदर्भ में रूसी साहित्य का हवाला देते हुए कहते हैं, विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती है। हमारे साहित्य में दुःख की स्थिति न के बराबर आती है परन्तु रूसी साहित्य के कष्टों और दु:खमयी स्थितियों के कारण ही हम उन्हें पसंद करते हैं।

खेद की बात यह है कि कष्ट सहन की उस भावना को अपने भीतर अनुभव नहीं करते। हमारे जैसे व्यक्तियों को जो प्रत्येक दृष्टि से क्रांतिकारी होने का गर्व करते हैं सदैव हर प्रकार से उन विपत्तियों ‘चिन्ताओं’ दुखों और कष्टों को सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए जिनको हम स्वयं आरंभ किए संघर्ष के द्वारा आमंत्रित करते हैं और जिनके कारण हम अपने आप को क्रांतिकारी कहते हैं। इसी आत्मविश्वास के बल पर भगत सिंह फाँसी के फंदे पर झूल गये। वे जानते थे मेरे इन कष्टों, दु:खों का जनता पर बेहद प्रभाव पड़ेगा और जनता आन्दोलन कर बैठेगी। अतः भगत सिंह का कहना सत्य है कि कष्ट सहकर ही देश की सेवा की जा सकती है।

प्रश्न 4.
भगत सिंह ने कैसी मृत्यु को सुन्दर कहा है? वे आत्महत्या को कायरता कहते हैं, इस संबंध में उनके विचारों को स्पष्ट करें।
उत्तर–
क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह देश सेवा के बदले दी गई फाँसी (मृत्युदण्ड) को सुन्दर मृत्यु कहा है। भगत सिंह इस सन्दर्भ में कहते हैं कि जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देनी चाहिए। इसी दृढ़ इच्छा के साथ हमारी मुक्ति का प्रस्ताव सम्मिलित रूप में और विश्वव्यापी हो और उसके साथ ही जब यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तो हमें फाँसी दे दी जाय। यह मृत्यु भगत सिंह के लिए सुन्दर होगी जिसमें हमारे देश का कल्याण होगा। शोषक यहाँ से चले जायेंगे और हम अपना कार्य स्वयं करेंगे। इसी के साथ व्यापक समाजवाद की कल्पना भी करते हैं जिसमें हमारी मृत्यु बेकार न जाय। अर्थात् संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है।

भगत सिंह आत्महत्या को कायरता कहते हैं। क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो आत्महत्या करेगा वह थोड़ा दुख, कष्ट सहने के चलते करेगा। वह अपना समस्त मूल्य एक ही क्षण में खो देगा। इस संदर्भ में उनका विचार है कि मेरे जैसे विश्वास और विचारों वाला व्यक्ति व्यर्थ में मरना कदापि सहन नहीं कर सकता। हम तो अपने जीवन का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहते हैं। हम मानवता की अधिक–से–अधिक सेवा करना चाहते हैं। संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है। प्रयत्नशील होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं कही जा सकती। भगत सिंह आत्महत्या को कायरता इसलिए कहते हैं कि केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने जीवन को समाप्त कर देते हैं। इस संदर्भ में वे एक विचार भी देते हैं कि विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती है।

प्रश्न 5.
भगत सिंह रूसी साहित्य को इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं? वे एक क्रान्तिकारी से क्या अपेक्षाएँ रखते हैं?
उत्तर–
सरदार भगत सिंह रूसी साहित्य को महत्वपूर्ण इसलिए मानते हैं कि रूसी साहित्य के प्रत्येक स्थान पर जो वास्तविकता मिलती है वह हमारे साहित्य में कदापि दिखाई नहीं देती है। उनकी कहानियों में कष्टों और दुखमयी स्थितियाँ हैं जिनके कारण दूख कष्ट सहने का प्रेरणा मिलती है। इस दुख, कष्ट से सहृदयता, दर्द की गहरी टीस और उनके चरित्र और साहित्य की ऊँचाई से हम बरबस प्रभावित होते हैं। ये कहानियाँ हमें जीव संघर्ष की प्रेरणा देती हैं। नये समाज निर्माण की प्रक्रिया में मदद करती हैं। इसलिए ये कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं।

सरदार भगत सिंह क्रांतिकारियों से अपेक्षा करते हैं कि हम उनकी कहानियाँ पढ़कर कष्ट सहन की उस भावना को अनुभव करें। उनके कारणों पर सोचे–विचारें। हम जैसे क्रान्तिकारियों का सदैव हर प्रकार से उन विपत्तियों, चिन्ताओं, दुखों और कष्टों को सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। भगत सिंह कहते हैं कि मेरा नजरिया यह रहा है कि सभी राजनीतिक कार्यकर्ता को ऐसी स्थितियाँ में उपेक्षा दिखानी चाहिए और उनको जो कठोरतम सजा दी जाय उसे हँसते–हँसते बर्दाश्त करना चाहिए। भगत सिंह क्रांतिकारियों से कहते हैं कि किसी आंदोलन के बारे में यह कह देना कि दूसरा कोई इस काम को कर लेगा या इस कार्य को करने के लिए बहुत लोग हैं यह किसी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार जो लोग क्रांतिकारी क्षेत्र के कार्यों का भार दूसरे लोगों पर छोड़ने को अप्रतिष्ठापूर्ण एवं घृणित समझते हैं उन्हें पूरी लगन के साथ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर देना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे उन विधि यों का उल्लंघन करें, परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 6.
‘उन्हें चाहिए कि वे उन विधियों का उल्लंघन करें परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक एवं अनुचित प्रयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता।’ भगत सिंह के इस कथन का आशय बताएँ। इससे उनके चिन्तन का कौन–सा पक्ष उभरता है? वर्णन करें।
उत्तर–
सरदार भगत सिंह क्रांतिकारियों से कहते हैं कि क्रांतिकारी शासक यदि शोषक हो, कानून व्यवस्था यदि गरीब–विरोधी, मानवता विरोधी हो तो उन्हें चाहिए कि वे उसका पुरजोर विरोध करें, परन्तु इस बात का भी ख्याल करें कि आम जनता पर इसका कोई असर न हो, वह संघर्ष आवश्यक हो अनुचित नहीं। संघर्ष आवश्यकता के लिए हो तो उसे न्यायपूर्ण माना जाता है परन्तु सिर्फ बदले की भावना हो तो अन्यायपूर्ण। इस संदर्भ में रूस की जारशाही का हवाला देते हुए कहते हैं कि रूस में बंदियों को बंदीगृहों में विपत्तियाँ सहन करना ही जारशाही का तख्ता उलटने के पश्चात् उनके द्वारा जेलों के प्रबंध में क्रान्ति लाए जाने का सबसे बड़ा कारण था। विरोध करो परन्तु तरीका उचित होना चाहिए, न्यायपूर्ण होना चाहिए। इस दृष्टि से देखा जाय तो भगत सिंह का चिन्तन मानवतावादी है जिसमें समस्त मानव जाति का कल्याण निहित है। यदि मानवता पर तनिक भी प्रहार हो, उन्हें पूरी लगन के साथ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर देना चाहिए।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कथनों का अभिप्राय स्पष्ट करें
(क) मैं आपको बताना चाहता हूँ कि विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती हैं।
(ख) हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपम है।
(ग) मनुष्य को अपने विश्वासों पर दृढ़तापूर्वक अडिग रहने का प्रयत्न करना चाहिए।
उत्तर–
(क) भगत सिंह का मानना है कि विपत्तियाँ मनुष्य को पूर्ण बनाती हैं। अर्थात् मनुष्य सुख की स्थिति में तो बड़े ही आराम से रहता है। लेकिन जब उस पर कोई दुख आता है तो वह उसे दूर करने के प्रयास करता है जिससे उसका ज्ञान तथा कार्यक्षमता बढ़ती है और वह पूर्णतः पाता है।

(ख) भगत सिंह के अनुसार यदि मनुष्य यह सोचने लगे कि अगर मैं कोई कार्य नहीं करूंगा तो वह कार्य नहीं होगा तो यह पूर्णतः गलत है। वास्तव में मनुष्य विचार को जन्म देनेवाला नहीं होता, अपितु परिस्थितियाँ विशेष विचारों वाले व्यक्तियों को पैदा करती हैं। अर्थात् हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपज है।

(ग) भगत सिंह कहते हैं कि हमें एक बार किसी लक्ष्य या उद्देश्य का निर्धारण करने के बाद उस पर अडिग रहना चाहिए। हमें विश्वास रखना चाहिए कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे।

प्रश्न 8.
‘जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए।’ आज जब देश आजाद है भगत सिंह के इस विचार का आप किस तरह मूल्यांकन करेंगे। अपना पक्ष प्रस्तुत करें।
उत्तर–
भगत सिंह का यह विचार है कि जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतः भुला देना चाहिए, बहुत ही उत्तम तथा श्रेष्ठ है। आज जब देश आजाद है तब भी भगत सिंह को यह विचार पूर्णतः प्रासंगिक है, क्योंकि किसी भी काल या परिस्थिति में देश या समाज मनुष्य से ऊपर ही रहता है। यदि देश का विकास होगा तो ही वहाँ रहनेवाले लोगों का विकास होगा। वहीं यदि देश पर किसी प्रकार की विपदा आती है तो वहाँ के निवासियों को भी कष्टों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए हमें सदैव अपने से पहले देश की श्रेष्ठता, विकास तथा मान–सम्मान के विषय में सोचना चाहिए। साथ ही इसके लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 9.
भगत सिंह ने अपनी फाँसी के लिए किस समय की इच्छा व्यक्त की है? वे ऐसा समय क्यों चुनते हैं?
उत्तर–
भगत सिंह ने अपनी फाँसी के लिए इच्छा व्यक्त करते हुए कहा है कि जब यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तो हमें फाँसी दे दी जाए। वे ऐसा समय इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि यदि कोई सम्मानपूर्ण या उचित समझौता होना हो तो उन जैसे व्यक्तियों का मामला उसमें कोई रूकावट उत्पन्न करे।

प्रश्न 10.
भगत सिंह के इस पत्र से उनकी गहन वैचारिकता, यथार्थवादी दृष्टि का परिचय मिलता है। पत्र के आधार पर इसकी पुष्टि करें।
उत्तर–
महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने इस पत्र में तीन–चार सवालों पर विचार किया है जिनमें आत्महत्या, जेल जाना, कष्ट सहना, मृत्युदण्ड और रूसी साहित्य है।

भगत सिंह का आत्महत्या के संबंध में विचार है कि केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने जीवन को समाप्त कर लेना मनुष्य की कायरता है। यह कायर व्यक्ति का काम है। एक क्षण में समस्त पुराने अर्जित मूल्य खो देना मूर्खता है अत: व्यक्ति को संघर्ष करना चाहिए। दूसरा जेल जाना भगत सिंह व्यर्थ नहीं मानते क्योंकि रूस की जारशाही का तख्ता पलट बंदियों का बंदीगृह में कष्ट सहने का कारण बना। अतः यदि आन्दोलन को तीव्र करना है तो कष्ट सहन से नहीं डरना चाहिए।

देश सेवा के क्रम में क्रांतिकारी को ढेरों कष्ट सहने पड़ते हैं–जेल जाना, उपवास करना इत्यादि अनेकों दण्ड। अतः भगत सिंह कहते हैं कि हमें कष्ट सहने से नहीं डरना चाहिए क्योंकि विपत्तियाँ ही व्यक्ति को पूर्ण बनाती हैं।

मृत्युदण्ड के बारे में भगत सिंह के विचार हैं कि वैसी मृत्यु सुन्दर होगी जो देश सेवा के संघर्ष के लिए हो। संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है। श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट आदर्श के लिए दी गई फाँसी एक आदर्श, सुन्दर मृत्यु है। अतः क्रांतिकारी को हँसते–हँसते फाँसी का फंदा डाल लेना चाहिए। रूसी साहित्य में वर्णित कष्ट दुख, सहनशक्ति पर फिदा है भगत सिंह। रूसी साहित्य में कष्ट सहन की जो भावना है उसे हम अनुभव नहीं करते। हम उनके उन्माद और चरित्र की असाधारण ऊँचाइयों के प्रशंसक है परन्तु इसके कारणों पर सोच विचार करने की चिन्ता कभी नहीं करते। अतः भगत सिंह का विचार है कि केवल विपत्तियाँ सहन करने के लिए साहित्य के उल्लेख ने ही सहृदयता, गहरी टीस और उनके चरित्र और साहित्य में ऊँचाई उत्पन्न की है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि भगत सिंह की वैचारिकता सीधे यथार्थ के धरातल पर टिकी हुई . आजीवन संघर्ष का संदेश देती है।

एक लेख और एक पत्र भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के प्रत्यय निर्दिष्ट करें कायरता, घृणित, पूर्णतया, दयनीय, स्पृहणीय, वास्तविकता, पारितोषिक।
उत्तर–
कायरता–ता, घृणित–इत, पूर्णतया–तया, दयनीय–इय, स्पृहणीय–इय, वास्तविकता–ता, पारितोषिक–इक।

प्रश्न 2.
‘हास्यास्पद’ शब्द में ‘आस्पद’ प्रत्यय हैं इस प्रत्यय से पाँच अन्य शब्द बनाएँ।
उत्तर–
‘आस्पद’ प्रत्यय से बने पाँच शब्द–विवादास्पद, घृणास्पद, संदेहास्पद, करुणास्पद, प्रेरणास्पद।

प्रश्न 3.
हमारे विद्यालय के प्राचार्य आ रहे हैं। इस वाक्य में ‘हमारे विद्यालय के प्राचार्य’ संज्ञा पदबंध है। वह पद समूह जो वाक्य में संज्ञा का काम करे, संज्ञा पदबन्ध कहलाता है। इस तरह नीचे दिए गए वाक्यों से संज्ञा पदबंध. चुनें
(क) बंदी होने के समय हमारी संस्था के राजनीतिक बंदियों की दशा अत्यन्त दयनीय थी।
(ख) कुछ मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं के आधार पर संगठित हमारी पार्टी अपने लक्ष्यों और आदर्शों की तुलना में क्या कर सकती थी?
(ग) मैं तो यह भी कहूँगा कि साम्यवाद का जन्मदाता मार्क्स, वास्तव में इस विचार को जन्म देनवाला नहीं था।
उत्तर–
(क) राजनीतिक बंदियों
(ख) कुछ मुट्ठी भर कार्यकर्ता
(ग) साम्यवाद का जन्मदाता मार्क्स।

प्रश्न 4.
पर्यायवाची शब्द लिखें वफादारी, विद्यार्थी, फायदेमंद, खुशामद, दुनियादारी, अत्याचार, प्रतीक्षा, किंचित्।
उत्तर–
वफादारी–विश्वसनीयता, विद्यार्थी–छात्र, फायदेमंद–लाभदायक, खुशामद–मिन्नत दुनियादारी–सांसारिकता, अत्याचार–अन्याय, प्रतीक्षा–इन्तजार, किंचित्–कुछ।

प्रश्न 5.
विपरीतार्थक शब्द लिखें
सयाना, उत्तर, निर्बलता, व्यवहार, स्वाध्याय, वास्तविक, अकारण
उत्तर–

  • सयाना – मूर्ख
  • उत्तर – प्रश्न
  • निर्बलता – सबलता
  • व्यवहार – सिद्धान्त
  • स्वाध्याय – अध्यापन
  • वास्तविक – अवास्तविक
  • अकारण – कारण

एक लेख और एक पत्र भगत सिंह लेखक परिचय।

जीवन–परिचय–
भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले अमर शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर, सन् 1907 के दिन वर्तमान लायलपुर (पाकिस्तान) में हुआ। इनका पैतृक गाँव खटकड़कलाँ, पंजाब था। इनकी माता का नाम विद्यावती एवं पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। इनका सम्पूर्ण परिवार स्वाधीनता संग्राम में शामिल था। इनके पिता और चाचा अजीत सिंह लाला लाजपत राय के सहयोगी थे। अजीत सिंह को देश से निकाला दिया गया था इसलिए वे विदेश जाकर मुक्तिसंग्राम का संचालन करने लगे। भगत सिंह के छोटे चाचा सरदार स्वर्ण सिंह भी जेल गए और जेल की यातनाओं के कारण सन 1910 में उनका निधन हो गया। भगत सिंह के फाँसी चढ़ने के बाद उनके भाई कुलबीर सिंह और कुलतार सिंह को जेल में रखा गया, जहाँ वे सन् 1946 तक रहे। इनके पिता भी अनेक बार जेल गए।

भगत सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव बंगा में हुई। इसके बाद लाहौर के डी.ए.वी. स्कूल से आगे की पढ़ाई की। बाद में नेशनल कॉलेज, लाहौर से एम.ए. किया। बी.ए. के दौरान इन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और क्रान्तिकारी दल में शामिल हो गए। भगत सिंह का बचपन से ही क्रांतिकारी करतार सिंह सराबा और गदर पार्टी से विशेष लगाव था। करतार सिंह सराबा की कुर्बानी को उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा जबकि उस समय उनकी आयु महज आठ वर्ष थी। जब वे बारह वर्ष के थे तो जलियाँवाला बाग का हत्याकांड हुआ। इस हत्याकांड का उनके हृदय पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे वहाँ की मिट्टी लेकर क्रान्तिकारी गतिविधियों में कूद पड़े। सन् 1922 में चौराचौरी कांड के बाद इनका कांग्रेस और महात्मा गाँधी से मोहभंग हो गया।

सन् 1923 में ये घर छोड़कर कानपुर चले गए और गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ से जुड़ गए। सन् 1926 में अपने नेतृत्व में पंजाब में ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन किया, जिसकी शाखाएँ विभिन्न शहरों में थी। सन् 1928 से 1931 तक चन्द्रशेखर आजाद के साथ मिलकर “हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ’ का गठन किया और क्रांतिकारी आन्दोलन को बड़े स्तर पर प्रारम्भ किया। इन्होंने 8 अप्रैल, सन् 1929 के दिन बटुकेश्वर दत्त और राजगुरू को साथ लेकर केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंका तथा गिरफ्तार हो गए। स्वाधीनता सेनानियों के घर में जन्म लेने के कारण बचपन से ही इनके मन में देश की स्वतंत्रता के लिए मर मिटने का जज्बा था।

इनके भीतर संकल्प, त्याग, कर्म आदि की अमोघ शक्ति थी। महज तेईस वर्षों में ही वे राष्ट्रीयता, देशभक्ति, क्रान्ति और युवाशक्ति के प्रतीक बन गए। भारत माँ के इस महान सपूत को अनेक कष्टों के बाद 23 मार्च सन् 1931 के दिन शाम 7 बजकर 33 मिनट पर ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ में फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

भगत सिंह कोई साहित्यकार न थे लेकिन इन्होंने काफी लिखा है। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं–

पंजाब की भाषा तथा लिपि की समस्या (हिन्दी में 1924), विश्वप्रेम (मतवाला में 1924 में प्रकाशित लेख), युवक (मतवाला में 1924 में प्रकाशित हिन्दी लेख), मैं नास्तिक क्यों हूँ (1939–31), अछूत समस्या, विद्यार्थी और राजनीति, सत्याग्रह और हड़तालें, बम का दर्शन, भारतीय क्रान्ति का आदर्श आदि लेख।

टिप्पणियाँ एवं पत्र जो विभिन्न प्रकाशकों द्वारा भगत सिंह के दस्तावेज के रूप में प्रकाशित हैं। शचीन्द्रनाथ सान्याल की पुस्तक ‘बंदी जीवन’ और ‘डॉन ब्रीन की आत्मकथा’ का अनुवाद इत्यादि भी सम्मिलित है।

एक लेख और एक पत्र पाठ के सारांश

भगत सिंह महान क्रान्तिकारी और स्वतंत्रता सेनानी और विचारक थे। भगत सिंह विद्यार्थी और राजनीति के माध्यम से बताते हैं कि विद्यार्थी को पढ़ने के साथ ही राजनीति में भी दिलचस्पी लेनी चाहिए। यदि कोई इसे मना कर रहा है तो समझना चाहिए कि यह राजनीति के पीछे घोर षड्यंत्र है। क्योंकि विद्यार्थी युवा होते हैं। उन्हीं के हाथ में देश की बागडोर है। भगत सिंह व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण देते हुए नौजवानों को यह समझाते हैं कि महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वगात करना और भाषण सुनना यह व्यावहारिक राजनीति नहीं तो और क्या है। इसी बहाने वे हिन्दुस्तानी राजनीति पर तीक्ष्ण नजर भी डालते हैं। भगत सिंह मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश सेवकों की जरूरत है जो तन–मन–धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी या उसके विकास में न्योछावर कर दे। क्योंकि विद्यार्थी देश–दुनिया के हर समस्याओं से परिचित होते हैं। उनके पास अपना विवेक होता है। वे इन समस्याओं के समाधान में योगदान दे सकते हैं। अतः विद्यार्थी को पॉलिटिक्स में भाग लेनी चाहिए।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 1 अरमान

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 1 अरमान Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 1 अरमान

Bihar Board Class 6 Hindi अरमान Text Book Questions and Answers

प्रश्न अभ्यास

पाठ से –

अरमान कविता का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 6 Hindi प्रश्न 1.
प्रस्तुत कविता में गरीबों को गले लगाने एवं सुखी बनाने की बात क्यों की गई है?
उत्तर:
समाज में जो लोग गरीब हैं, भिखारी हैं या समाज में जो लोग सहायता से वंचित हैं ऐसे लोगों को गले लगाने एवं सुखी बनाने से हमारे समाज में समता आयेगी। लोग सुखी होंगे। अतः सुखमयी, समतापूर्ण समाज की स्थापना के लिए कविता में गरीबों को गले लगाने एवं सुखी बनाने की बात की गई है।

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solution प्रश्न 2.
इस कविता में हारे हुए व्यक्ति के लिए क्या कहा गया है ?
उत्तर:
इस कविता में हारे हुए व्यक्ति के लिए कहा गया है कि-हारकर बैठना या अपने उम्मीदों को मारकर बैठना कायरता एवं अज्ञानता है। ऐसे हतोत्साहित लोगों के दिमाग में फिर से उत्साह जगाने की आवश्यकता है।

Armaan Kavita Ka Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
इन पंक्तियों के भाव स्पष्ट कीजिए-
रोको मत, आगे बढ़ने दो,
आजादी के दीवाने हैं।
हम मातृभूमि की सेवा में,
अपना सर्वस्व लगाएंगे।
उत्तर:
आजादी हमारी अभीष्ट (प्रिय) वस्तु है। हमें आजादी पाने के लिए आगे बढ़ने दो, इस पुनीत कार्य से हमें मत रोको । हम अपनी जन्मभूमि (मातृभूमि) की सेवा में अपना तन-मन-धन सब कुछ लगा देंगे।

Armaan Poem In Hindi Question Answer Bihar Board Class 6 प्रश्न 4.
बूढ़े और पूर्वजों का मान बढ़ाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर:
बूढे और पूर्वजों का मान बढ़ाने के लिए हमें कर्तव्यपरायण, लगन के पक्के और सत्यनिष्ठ बनना चाहिए। क्योंकि हमारे पूर्वज वीर, धुन के पक्के आर सच्च थ। उनका अनुकरण करने से उनके मान-सम्मान की वृद्धि होगी।

पाठ से आगे –

Bihar Board Class 6 Hindi Solution In Hindi  प्रश्न 1.
इस कविता का कौन-सा अंश आपको ज्यादा झकझोरता है ? विवेचन कीजिए।
उत्तर:
इस कविता का वह अंश हमको ज्यादा झकझोरता है जिसमें कवि ने कहा है कि –

जो लोग गरीब भिखारी हैं,
जिन पर न किसी की छाया है।
हम उनको गले लगाएंगे,
हम उनको सुखी बनाएँगे।

क्योंकि आज भी हमारा समाज विषमतापूर्ण है। समाज के बहुत लोग गरीब हैं। भिक्षाटन करके जीते हैं। समाज में कुछ लोग सहायता से वंचित हैं। ऐसे लोगों की सहायता कर के ही समतापूर्ण सुखी समाज की स्थापना सम्भव है।

अरमान कविता का सारांश Bihar Board Class 6 Hindi प्रश्न 2.
आपके भी कुछ शौक या अरमान होंगे, उनको पूरा करने के लिए, आप क्या करना चाहेंगे? ।
उत्तर:
हमारा भी शौक या अरमान है। वह है-समतापूर्ण सुखी समाज की स्थापना करना । जो लोग समाज में गरीब हैं जिनको कोई मदद नहीं करता है। ऐसे लोगों की मदद कर उन्हें सुखी बनाना ही हम अपना कर्तव्य बनाना चाहेंगे।

Bihar Board Solution Class 6 Hindi प्रश्न 3.
जन्मभूमि या मातृभूमि के प्रति कैसा लगाव होना चाहिए ?
उत्तर:
जन्मभूमि या मातृभूमि के प्रति हमारा सेवा का लगाव होना चाहिए क्योंकि जन्मभूमि से बढ़कर कुछ नहीं है। अत: जन्मभूमि की सेवा में या उसके उत्थान में हमें तन-मन-धन सब कुछ लगा देना चाहिए। श्रीराम ने भी कहा थी-हे लक्ष्मण ! माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक सुखकारी है। “जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि”।

Bihar Board Class 6 Hindi Solution प्रश्न 4.
यदि आप चाहते हैं कि देश आप पर अभिमान करे तो इसके लिए आपको क्या काम करना होगा?
उत्तर:
हम चाहते हैं कि देश हम पर अभिमान करें। इसके लिए हमको अपने-आप में देवत्व गुण लाना होगा। दीन-दुखियों की सेवा तथा हतोत्साहित लोगों का उत्साह बढ़ाना होगा । मातृभूमि की सेवा करना होगा तथा अपने इरादे के पक्के होना होगा। कर्त्तव्यनिष्ठ और सत्यप्रिय होना होगा।

व्याकरण

Bihar Board Class 6 Hindi प्रश्न 1.
रोको, मत जाने दो।
रोको मत, जाने दो।
उपर्युक्त वाक्यों में अल्प विराम चिह्न का प्रयोग अलग-अलग स्थानों पर हुआ है। जिससे उस वाक्य का अर्थ बदल गया है। इस प्रकार के कुछ और वाक्य बनाइए।
उत्तर:
सोचो मत, काम करो।
सोचो, मत काम करो।

वह देश कौन-सा है कविता का प्रश्न उत्तर Class 6 Bihar Board प्रश्न 2.
अर + मान = अरमान । इस उदाहरण के आधार पर ‘मान’ लगाकर नए शब्द बनाइए।
उत्तर:
अप + मान = अपमान । अभि + मान = ‘अभिमान । सम् + मान = सम्मान । बुद्धि + मान = बुद्धिमान । गति + मान = गतिमान ।

कुछ करने को –

Class 6 Hindi Bihar Board प्रश्न 1.
पता कीजिए कि देश के लिए किन-किन लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
उत्तर:
महात्मा गाँधी, सुभाषचन्द्र बोस, जयप्रकाश नारायण, विनोबा – भावे, चन्द्रशेखर आजाद, जवाहरलाल नेहरू इत्यादि ।

किसलय हिंदी बुक बिहार क्लास 6 Solution Bihar Board प्रश्न 2.
हर व्यक्ति का अपना कोई न कोई अरमान होता है। आप अपने अरमान के बारे में दस पंक्तियों में लिखिए और अपने शिक्षक को सुनाइए।
उत्तर:
मुझे अपना अरमान है कि मैं महान देशभक्त कहलाऊँ। क्योंकि देशभक्ति ही सच्ची भक्ति है । देशभक्ति के लिए हम अपना सर्वस्व लुटा देंगे। सच्ची देश भक्ति बेसहारा को सहारा देकर होती है। समाज में कुछ लोग हतोत्साहित लोग हैं उनके बीच उत्साह जगाकर उनको कर्तव्य पथ पर लाने का अरमान भी हमारे दिल में है। इससे समाज के बेकार लोग कामयाबी पाएँगे जिससे देश की उन्नति होगी। लाचार, गरीब, दु:खी लोगों की मदद करना हम पुनीत कर्म मानते हैं।

अरमान Summary in Hindi

कविता का सार-संक्षेप

प्रत्येक ठाक्ति का कुछ अरमान होता है। कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी जी अपने अरमानों के माध्यम से मानव को संदेश देते हैं कि मनुष्य को देवत्व गुणों का आधान करना चाहिए। ऐसा तभी सम्भव है जब हम समाज के गरीब बेसहारा लोगों को सहारा देंगे। समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो निराशा की मार से हतोत्साहित हैं, हमें उनके बीच उत्साहं को फिर से जगाकर कर्तव्यपरायण बनाना चाहिए। ___तन, मन, धन से मातृभूमि (जन्मभूमि) की सेवा करना भी प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है।

हमें अपने पूर्वजों के मान-सम्मान को बढाने के लिए अपने धुन का पक्का होना चाहिए तथा सत्य का अनुसरण करना चाहिए क्योंकि हमारे पूर्वज वीर, कर्तव्यनिष्ठ और सत्यप्रिय थे।

अर्थ-लेखन

है शौक यही अरमान यही,
हम कुछ कर के दिखलाएंगे।
मरने वाली दुनिया में हम,
अमरों में नाम लिखाएंगे।
अर्थ – हमारा शौक या अरमान यही है कि हमें कुछ कर दिखलाएँ । यह संसार नश्वर है जहाँ लोग मर जाते हैं। लेकिन जिनकी कृति इस संसार में रहती है वे अमर हो जाते हैं मेरा भी अरमान है कि हम भी अपनी कृति कायम कर अमरों में नाम लिखावें।

जो लोग गरीब भिखारी हैं,
जिन पर न किसी की छाया है।
हम उनको गले लगाएंगे,
हम उनको सुखी बनाएँगे।
अर्थ – समाज में जो लोग गरीब हैं, भिखारी हैं या जो समाज में सहायता से वंचित हैं, ऐसे लोगों को गले लगाकर उनकी मदद करेंगे, उनको सुखी बनाएँगे।

जो लोग हारकर बैठे हैं,
उम्मीद मारकर बैठे हैं।
हम उनके बुझे दिमागों में,
फिर से उत्साह जगाएँगे।

अर्थ – समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो जीवन से निराश होकर हतोत्साहित हो गये हैं। हम उनके अज्ञानता को दूर कर फिर से उत्साहित करेंगे।

रोको मत, आगे बढ़ने दो,
आजादी के दीवाने हैं।
हम मातृभूमि की सेवा में,
अपना सर्वस्व लगाएँगे।

अर्थ – हमें पुनीत कर्म की ओर बढ़ने दो, देश-धर्म से हमें मत रोको, क्योंकि हम आजादी के दीवाने हैं। आजादी हमारा प्रिय है। हम अपनी मातृभूमि की सेवा में अपना सब कुछ लगा देंगे।

हम उन वीरों के बच्चे हैं,
जो धुन के पक्के सच्चे थे।
हम उनका मान बढ़ाएंगे,
हम जग में नाम कमाएँगे।

अर्थ – हमारे पूर्वज वीर, धुन के पक्के और सच्चे थे। हम भी अपने पूर्वजों का अनुकरण कर उनका पान-सम्मान बढ़ाएँगे। हम संसार में नाम कमाएँगे।

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions गद्य Chapter 6 बहादुर

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड Chapter 6 बहादुर Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions गद्य Chapter 6 बहादुर

Bihar Board Class 10 Hindi बहादुर Text Book Questions and Answers

बोध और अभ्यास

पाठ के साथ

बहादुर कहानी का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 10 प्रश्न 1.
लेखक को क्यों लगता है कि जैसे उस पर एक भारी दायित्व आ गया हो?
उत्तर-
लेखक महोदय की पत्नी दिन-रात ‘नौकर-चाकर’ की माला जपती थी। उनका साला नौकर को लाकर सामने खड़ा कर दिया था। अब लेखक महोदय के ऊपर एक भारी दायित्व आ गया था कि नौकर के साथ घर में अच्छा बवि हो। नौकर घर के अनुकुल ढल जाया और यहाँ टिक जाय।

बहादुर पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 10 प्रश्न 2.
अपने शब्दों में पहली बार दिखे बहादुर का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
नौकर यानी बहादुर का शरीर चौड़ा और कद छोटा था। गोरा रंग और मुँह चपटा था। वह उजला हाफ पैंट और सफेद कमीज, भूरे रंग का जूता और गले में रूमाल बंधा था।

Bahadur Class 10 Hindi Question Answer प्रश्न 3.
लेखक को क्यों लगता है कि नौकर रखना बहुत जरूरी हो गया था?
उत्तर-
लेखक महोदय के सभी भाई और रिश्तेदार ऊंचे पद पर थे। इसलिए उनलोगों के पास नौकर-चाकर था। जब उनकी बहन के विवाह में सभी रिश्तेदारों का मिलन हुआ तो लेखक महोदय की पत्नी नौकर को देखकर ईर्ष्यालु हो गई। इसके बाद से घर में नौकर रखने के लिए परेशान करने लगी। अब लेखक महोदय को नौकर रखना बहुत जरूरी हो गया।

Bahadur Chapter Ka Question Answer प्रश्न 4.
साले साहब से लेखक का कौन-सा किस्सा असाधारण विस्तार से सुनना पड़ा?
उत्तर-
लेखक को साले साहब से एक दुखी लड़का का किस्सा असाधारण विस्तार से सुनना पड़ा। किस्सा था कि वह एक नेपाली था, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था। उसका बाघ युद्ध में मारा गया था और उसकी माँ सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी। माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी। माँ चाहती थी कि लड़का घर के काम-धाम में हाथ बँटाये, जबकि वह पहाड़ या जंगलों में निकल जाता और पेड़ों पर चढ़कर, चिड़ियों के घोंसलों में हाथ डालकर उनके बच्चे पकड़ता या फल तोड़-तोड़कर खाता। एक बार उसने भैंस की पिटाई की जिसके चलते माँ ने भी उसे खूब पीटा। अत्यधिक पिटाई के चलते लड़के का मन माँ से फट गया। रातभर जंगल में छिपा रहा, सुबह होने पर घर से राह खर्च के लिए चोरी से ‘कुछ रुपया लेकर भाग गया।

Bahadur Chapter In Hindi Bihar Board Class 10 प्रश्न 5.
बहादुर अपने घर से क्यों भाग गया था?
उत्तर-
बहादुर कभी-कभी पशुओं को चराने के लिए ले जाता था। एक बार उसने अपनी माँ की प्यारी भैंस को बहुत मारा। मार खाने के उपरान्त भैंस उसकी मां के पास पहुंच जाती है। माँ को आभास होता है कि लड़के ने इसको काफी मारा है। माँ ने भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की। लड़के का मन माँ से फट गया और वह पूरी रात जंगल में छिपा रहा। अंततः सुबह में घर पहुंचकर चुपके से कुछ रुपया लिया और घर से भाग गया।

Bahadur Kahani Class 10th प्रश्न 6.
बहादुर के नाम से “दिल” शब्द क्यों उड़ा दिया गया ? विचार करें।
उत्तर-
प्रथम बार नाम पूछने में बहादुर ने अपना नाम दिलबहादुर बताया। यहां दिल शब्द का अभिप्राय भावात्मक परिवेश में है। उपदेश देने के दरम्यान उसे कहा जा रहा था कि किसी के साथ भावुकता से पेश नहीं होकर दिमाग से अधिक कार्य करना है। सामाजिक तो उदारता से .. दूर रहकर मन और मस्तिष्क से केवल अपने घर के कार्यों में लीन रहने का उपदेश दिया गया। इस प्रकार से निर्मला द्वारा उसके नाम से दिल शब्द उड़ा दिया गया।

Bahadur Class 10 Hindi प्रश्न 7.
व्याख्या करें –
(क) उसकी हँसी बड़ी कोमल और मीठी थी, जैसे फूल की पंखुड़िया बिखर गई हों।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के वहादुर’ शीर्षक कहानी से ली गई हैं। इन पक्तियों का संदर्भ बहादुर से जुड़ा हुआ है।
जब लेखक शाम को दफ्तर से घर आते थे तो बहादुर सहज भाव से उनके पास आता था और उन्हें एक बार देखकर सिर झुका लेता था तथा धीरे-धीरे मुस्कुराने लगता था। घर की मामूली-सी. घटनाओं को लेखक से सुनाया करता था। कभी कहता-बाबूजी, बहिनजी की सहेली आयीं थीं तो कभी कहता बाबूजी, भैया सिनेमा गया था। इसके बाद वह ऐसी हँसी हँसता था कि लगता था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा किस्सा कह दिया हो। उसके निश्छल, निष्कलुष हाव-भाव से प्रभावित होकर ही लेखक ने लिखा है-उसकी हंसी बड़ी कोमल थी और मीठी थी लगता था फूल की पंखड़ियों बिखरी हुई हों।

इस प्रकार उक्त पंक्तियों में लेखक ने बहादुर की निश्छलता, निर्मलता, ईमानदारी और आत्मीय व्यवहार का यथोचित रेखांकन किया है। बहादुर बच्चा था। उसके होठों पर कोमलता और मिठास थी, फूलों के खिलने जैसा उसकी खिलखिलाहट थी। इस प्रकार उक्त पंक्तियों में लेखक ने बहादुर के कोमल भावों व्यवहारों, ईमानदारी, आत्मीय । संबंधों का सटीक वर्णन किया है।

(ख) पर अब बहादुर से भूल-गलतियों अधिक होने लगी थीं।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘बहादुर’ कहानी. पाठ से ली गयी हैं। इसका संदर्भ बहादुर से जुड़ा हुआ है।
बहादुर को लेखक का पुत्र किशोर बराबर पीट करता था। कुछ दिन बीतने पर लेखक की पत्नी भी बहादुर को मारने-डाँटने लगी थी। लेखक को ऐसा विश्वास था कि हो सकता है घर में मार खाने, गाली-सुनने के कारण बहादुर दुखी होकर रहने लगा था और इसी कारण उससे कई भूलें हो जाती होंगी। ऐसी स्थितियों को लेखक कभी-कभी रोकना चाहते थे। लेकिन बाद में चुप हो जाया करते थे क्योंकि उनके विचार में नौकर-चाकर तो मार-पीट खाते ही रहते हैं, ऐसा ही भाव था।

इस कारण वे भी बहादुर की मदद नहीं कर पाते थे और बहादुर दीन-हीन रूप में, असहाय – बनकर लेखक की पत्नी और पुत्र से डाँट-मारपीट खाता तो और सहता था।

इन पंक्तियों का मूल आशय यह है कि लेखक की मानसिकता भी दो तरह की थी। वे भी सबल. की आलोचना नहीं कर पाते हैं। गरीबों के प्रति नौकर के प्रति उनका भी भाव दोयम दर्जे का था। इसी कारण बहादुर की मानसिक स्थिति संतुलित नहीं रह पाती थी।

(ग) अगर वह कुछ चुराकर ले गया होता तो संतोष होता।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘बहादुर’ कहानी पाठ से ली गयी हैं। इन . पंक्तियों का संबंध उस काल से है जब बहादुर चोरी के इल्जाम और मारपीट, गाली-गलौज से तंग आ चुका था। अचानक सिल उठाते वक्त वह गिर गया और दो टुकड़ा हो। अब क्या था बहादुर घर छोड़कर भाग गया। उसे खोजने के लिए लेखक के लड़के किशोर ने शहर का कोना-कोना छान डाला लेकिन बहादुर का कहीं अता-पता नहीं था।

वह बहादुर के लिए बहुत दुःखी था। वह उसके सुख-दुख को याद कर माँ से कह रहा था-माँ, अगर वह मिल जाता तो मैं उससे माफी मांग लेता किन्तु अब उसे नहीं मारता-पीटता, गालियाँ नहीं देता। उसने हमलोगों को बहुत सुख दिया। बहुत सेवा की। गलती हम लोगों से ही हुई। माँ अगर वह कुछ चुराकर भी ले गया होता तो हमलोगों को संतोष होता। लेकिन वह तो हमलोगों का क्या अपना भी सब ‘सामान छोड़ गया।
इन पंक्तियों से यही आशय निकलता है कि आदमी को सद्व्यवहार करना चाहिए। दुर्व्यवहार के कारण कष्ट भोगना पड़ता है।

(घ) यदि मैं न मारता, तो शायद वह न जाता।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘बहादुर’ कहानी पाठ से ली गयी हैं। यह पंक्ति बहादुर से संबंधित है।
लेखक बहादुर के भाग जाने पर अफसोस करता है और कहता है कि अगर मैं, उसे नहीं मारता तो वह भागता नहीं, ऐसा मेरा विश्वास है। लेखक को अपने आप पर, अपने द्वारा किए गए अमानवीय व्यवहार पर खेद होता है।

जब निर्मला बहादुर के लिए रोने लगती है तब ये वाक्य लेखक उसी समय चारपाई पर बैठकर सिर झुकाकर कह रहे हैं। लेखक इस घटना पर रोना चाहता है किन्तु भीतर ही भीतर छटपटा कर रह जाता है। एक छोटी-सी भूल जीवन में कितना दुख दे जाती है-अब लेखक को समझ में बात आती है। वह पहले से सचेत रहता तो ऐसी घटना कभी नहीं घंटती।

इन पंक्तियों का आशय यह है कि आदमी के साथ सद्व्यवहार होना चाहिए। संदेह के बीज बड़े भयानक होते हैं। उनका प्रतिफल भी कष्टदायक होता है। आज बहादुर के साथ दुर्व्यवहार मारपीट चाहे गाली-गलौज नहीं किया जाता संदेह के आधार पर चोर नहीं ठहराया जाता तो वह नहीं भागता। अतः, संदेह और दुर्व्यवहार से इन्सान को बचना चाहिए।

Bahadur Question Answer Bihar Board Class 10 प्रश्न 8.
काम-धाम के बाद रात को अपने बिस्तर पर गये बहादुर का लेखक किन शब्दों में चित्रण करता है?चित्र का आशय स्पष्ट करें?
उत्तर-
निर्मला ने बहादुर को एक फटी-पुरानी दरी दे दी थी। घर से वह एक चादर भी ले आया था। रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। वह बिस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बाईं ओर काफी झुकी रहती थी। फिर वह छोटा-सा आइना निकालकर बन्दर की तरह उसमें अपना मुँह देखता था। वह बहुत ही प्रसन्न नजर आता था।

इसके बाद कुछ और भी चीजें जेब से निकालकर बिस्तर पर खेलता था। गीत गाता था। पुरानी स्मृतियों में खो जाता था। इससे उसके बाल मन की स्वाभाविकता की झलक मिलती है। उसके अंत:करण में निहित विरह का भाव गीत में मुखरित होता था। इसके माध्यम से लेखक ने बालसुलभ मनोदशा, स्वच्छंदता के आनंद की स्मृति का चित्रण किया है।

बहादुर कहां से भाग कर आया था Bihar Board Class 10 प्रश्न 9.
बहादुर के आने से लेखक के घर और परिवार के सदस्यों पर कैसा प्रभाव पड़ा?
उत्तर-
बहादुर के आने से घर के सदस्यों को आराम मिल रहा था। घर खूब साफ और चिकना रहता। सभी कपड़े चमाचम सफेद दिखाई देते। निर्मला की तबीयत काफी सुधर गई। अब परिवार का कोई सदस्य एक भी काम स्वयं नहीं करता है। सभी बहादुर को आवाज देकर काम बताता था और उस कार्य को वह पूरा करता था। सभी रात में पहले ही सो जाते और सबेरे आठ, बजे से पहले न उठते थे।

बहादुर शीर्षक कहानी की निर्मला कौन थी Bihar Board Class 10 प्रश्न 10.
किन कारणों से बहादुर ने एक दिन लेखक का घर छोड़ दिया ?
उत्तर-
लेखक के घर में प्रारंभ में बहादुर को अच्छा से रखा गया। धीरे-धीरे लेखक का लड़का उस पर दबाव डालकर काम करवाने लगा। कुछ समय पश्चात् पत्नी एवं पुत्र दोनों उसकी पिटाई बात-बात पर कर देते थे। एक रिश्तेदार लेखक के घर पर एक दिन आया और रुपये खो जाने की बात कहते हुए बहादुर पर चोरी का आरोप मढ़ दिया। उस दिन लेखक ने बहादुर की पिटाई कर दी। बार-बार प्रताड़ित होने से एवं मार खाने के कारण एक दिन अचानक बहादुर भाग गया।

प्रश्न 11.
बहादुर पर चोरी का आरोप क्यों लगाया जाता है और उस पर इस आरोप का क्या असर पड़ता है ?
उत्तर-
प्रायः ऐसा देखा जाता है कि लोग घर के नौकर को हेय दृष्टि से देखते हैं। किसी मामले में उसे दोषी मान लेना आसान लगता है। रिश्तेदार ने सोचा कि नौकर पर आरोप लगाने से लोगों को लगेगा कि ऐसा हो सकता है। बहादुर इस आरोप से बहुत दुःखी होता है। उसके … अंतरात्मा पर गहरी चोट लगती है। उस दिन से वह उदास रहने लगता है। उस घटना के बाद से उसे अधिक फटकार का सामना करना पड़ता है। उसे काम में मन नहीं लगता है।

प्रश्न 12.
घर आये रिश्तेदारों ने कैसा प्रपंच रचा और उसका क्या परिणाम निकला?.
उत्तर-
लेखक के घर आए रिश्तेदारों ने अपनी झूठी प्रतिष्ठा कायम करने के लिए रुपया-चोरी का प्रपंच रचा। उनका कहना था कि मैं बच्चों के लिए मिठाई नहीं ला सका इसलिए मिठाई मंगाने के लिए कुछ रुपया निकालकर यहाँ रखा था। लेकिन बाद में हमलोग उलझे हुए रहे इसी दरम्यान रुपये की चोरी हो गई। उन्होंने बहादुर पर इस चोरी का दोषारोपण किया। इस आरोप से बहादुर को पिटाई लगी।

उस दिन से लोग उसे हर हमेशा फटकार लगाने लगे। वह उदास और अन्यमनस्क रूपं से रहकर काम करता था। अंतत: घर से अचानक चला गया। रिश्तेदार के प्रपंच के चलते लेखक के घर का काम करने वाले बहादुर के जाने की घटना घटी और घर अस्त-व्यस्त हो गया।

प्रश्न 13.
बहादुर के चले जाने पर सबको पछतावा क्यों होता है?
उत्तर-
बहादुर घर के सभी कार्य को कुशलतापूर्वक करता था। घर के सभी सदस्य को आराम मिलता था। किसी भी कार्य हेतु हर सदस्य बहादुर को पुकारते रहते थे। वह घर के कार्य से सभी
को मुक्त रखता था। साथ रहते-रहते सबसे हिलमिल गया था। डॉट-फटकार के बावजूद काम . करते रहता था। यही सब कारणों से उसके चले जाने पर सबको पछतावा होता है।

प्रश्न 14.
बहादुर, किशोर, निर्मला और कथावाचक का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर-
बहादुर बहादुर लेखक महोदय का नौकर था। वह एक नेपाली था। उसके पिता का देहावसान युद्ध में हो गया था। माता जी घर चलाती थीं। एक दिन माँ ने बहादुर को बहुत मारा। बहादुर घर छोड़कर भाग गया। और लेखक महोदय के यहाँ नौकरी करने लगा।

किशोर-किशोर लेखक महोदय का लड़का था। जो अपना सारा काम बहादुर से ही करवाता था। धीरे-धीरे बहादुर पर हाथ भी छोड़ने लगा। बहादुर को घर छोड़कर भागने में किशोर का वर्ताव अधिक कारगर हुआ।

निर्मला – निर्मला लेखक महोदय की पत्नी थी। जिसे नौकर रखने का बहुत शौक था। पहले-पहल बहादुर के आने पर काफी लाड़-प्यार दिया। लेकिन धीरे-धीरे व्यवहार बदलने लगा। यहाँ तक की उसे मारने भी लगी। परिणाम हुआ बहादुर भाग गया। बहादुर के भाग जाने पर काफी विलाप की।

कथावाचक – कथावाचक लेखक महोदय का साला है। जो बहादुर के बारे में पूरी कहानी असाधारण विस्तार सुनाता है। बहादुर को लेकर कथावाचक ही आता है। वह अपनी बहन की नौकर रखने की इच्छा को पूरा करता है।

प्रश्न 15.
निर्मला को बहादुर के चले जाने पर किस बात का अफसोस हुआ।
उत्तर-
निर्मला एक भावुक महिला थी। बहादुर के रहने से उसे बहुत आराम मिला था। लेकिन लेखक का रिश्तेदार जब उनके घर में आया तब उसने रुपया चोरी का प्रपंच रचा जिसका शिकार बहादुर को बनाया। निर्मला को बहादुर पर गुस्सा आया और उसे पीट दिया। उसके बाद से कई बार उसे फटकारते रहती थी। अंत में जब रिश्तेदार की सच्चाई का आभास हुआ और यह बात समझ में आ गई कि बहादुर निर्दोष था और उसने रुपये की चोरी नहीं की थी तब उसे पश्चाताप हुआ। वह यह सोचकर अफसोस कर रही थी कि वह बिना बताये क्यों चला गया। वह अपने साथ कुछ लेकर भी नहीं गया था।
उसकी कर्मठता, ईमानदारी को याद करके निर्मला ने अपने द्वारा किये गये व्यवहार के लिए अफसोस किया।

प्रश्न 16.
कहानी छोटा मुंह बड़ी बात कहती है। इस दृष्टि से ‘बहादुर’ कहानी पर विचार करें
उत्तर-
बहादुर कहानी में सबसे बड़ी बात होती है कि एक दिन बहादुर बिना कुछ कहे और बिना सामान लिये भाग गया। यह घटना तो छोटी थी लेकिन बहुत बड़ी-बड़ी बात कह गई। सभी को अपने व्यवहार पर पछतावा होने लगा। हर आदमी अपने-आप को नीचा अनुभव करने लगा। किशोर बहादुर के मिलने पर उससे माफी मांगने को भी तैयार था।

प्रश्न 17.
कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। लेखक ने इसका शीर्षक ‘नौकर’ क्यों नहीं रखा?
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में एक बालक का चित्रण किया गया है। बालक जो लेखक के घर में नौकर का काम करता है कहानी का मुख्य पात्र है। इसमें बहादुर नौकरी करने के पूर्व स्वच्छंद में था। वह माँ से मार खाने के बाद घर से भाग गया था। उसके बाद लेखक के घर काम करने के लिए रखा जाता है। यहाँ उसके नौकर के रूप में चित्रण के साथ-साथ उसके बाल-सुलभ मनोभाव का चित्रण भी किया गया है। ईमानदार, कर्मठ एवं सहनशील बालक के रूप में चित्रित है। प्रताड़ना, झूठा आरोप उसे पसंद नहीं था।

अंतत: फिर वह भागकर स्वछंदु हो जाता है। साथ ही लेखक के पूरे परिवार पर अपने अच्छे छवि का चित्र अंकित कर जाता है ऐसे में बहादुर ही इसका नायक कहा जा सकता है। इस कहानी के केन्द्र में बहादुर है। अत: यह शीर्षक सार्थक है। इसमें बालक को केवल नौकर की भूमिका में नहीं रखा गया है बल्कि उसमें विद्यमान अन्य गुणों की चर्चा की गई है। इसलिए नौकर शीर्षक नहीं रखा गया।

प्रश्न 18.
कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।
उत्तर-
उत्तर के लिए कहानी का सारांश देखें।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित मुहावरों का वाक्य में प्रयोग करते हुए अर्थ स्पष्ट करें
उत्तर-
मारते-मारते मुँह रंग देना- (बहुत मार मारना) निर्मला नौकर को मारते-मारते मुँह रंग दिया।
हुलिया टाइट करना- (बुरा हाल करना) किशोर नौकर को इतना मारता कि हुलिया टाइट हो जाता।
हाथ खुलना- (मारने की आदत होना) आजकल निर्मला का हाथ भी नौकर पर खुलने लगा है।
मजे में होना- (खशी में होना) दिन मजे में बीतने लगे।
बातों की जलेबी छनना– (लंबी-चौडी बातें होना) मोहन अपने दोस्तों के बीच बातों की जलेबी छानता है।
कहीं का न रहना- (बरे फंसना) बहादुर के भाग जाने पर निर्मला कहीं का न रही।
नौ दो ग्यारह होना- (भाग जाना) मौका मिलते ही नौकर नौ दो ग्यारह हो गया।
खाली हाथ जाना- (साथ में कुछ नहीं ले जाना) सोहन घर जाते वक्त खाली हाथ चला गया।
बुरे फंसना-(संकट में फंसना) यात्रा के बीच में बस खराब होने जाने से मैं बुरा फंस गया।
पेट में लबी दाढ़ी-(धूर्तता करना) मोहन के बातों पर मत जाओ उसके पेट में लंबी दाढ़ी है।
चहल-पहल मचना- (खशी होना) मामा जी के आते ही घर में चहल-पहल मच गया।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों का वाक्य में प्रयोग करते हुए लिंग-निर्देश करें
उत्तर-
रूमाल – रूमाल छोटा है।
ओहदा – ओहदा बड़ा है।
भरण – पोषण वह अपने बेटा का भरण-पोषण ठीक से नहीं करता है।
इज्जत – मेरे घर में नौकर को भी इज्जत से रखा जाता है।
झनझनाहट – उसके स्वर में एक मीठी झनझनाहट थी।
फरमाइश – बहादुर सबका फरमाइश पूरा करता था।
छेडखानी – छेड़खानी करना अच्छा नहीं है।
पुलई – वह पेड़ की पुलई पर नजर आता है।
फिक्र – फिक्र मत करो। चादर चादर परानी है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों की बनावटें बदलें-
(क) सहसा मैं काफी गंभीर हो गया था, जैसा की उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, : जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। .
उत्तर-
सहसा भारी दायित्व आने के कारण मैं उस व्यक्ति की तरह गंभीर हो गया था।

(ख) माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी।
उत्तर-
माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी इसलिए उसको बहुत मारती थी।

(ग) मार खाकर भैंसं मागी-मागी उसकी मां के पास चली गई, जो कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी।
उत्तर-
मार खाकर मैंस भागी-भागी उसकी माँ के पास चली गई। वह कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी।

(घ) मैं उससे बातचीत करना चाहता था, पर ऐसी इच्छा रहते हुए भी मैं जानबूझकर गंभीर हो जाता था और दूसरी ओर देखने लगता था।
उत्तर-
मैं उससे बातचीत करना चाहता लेकिन ऐसी इच्छा रहते हुए भी जानबूझकर गंभीर होकर दूसरी ओर देखने लगता था।

(ङ) मिला कमी-कभी उससे पूछती की बहादुर, तुमको अपनी मं की याद आती है।
उत्तर-
निर्मला कभी-कभी उससे पूछती थी कि बहादुर तुमको अपनी माँ की याद आती है।

प्रश्न 4.
अर्थ की दृष्टि से निम्नलिखित वाक्यों के प्रकार बताएँ
(क) वह मारता क्यों था।
(ख) वह कुछ देर तक उससे खेलता था।
(ग) दिन मजे में बीतने लगे।
(घ) इसी तरह की फरमाइशें।
(ङ) देख-बे मेरा काम सबसे पहले होना चाहिए।
(च) रास्ते में कोई ढंग की दुकान नहीं मिली थी, नहीं तो उधर से ही लाती।
उत्तर-
(क) प्रश्नवाचक वाक्य।
(ख) विधानवाचक वाक्य।
(ग) विधानवाचक वाक्य।
(घ) विधानवाचक वाक्य।
(ङ) आज्ञार्थक वाक्य।
(च) संकेतवाचक वाक्य।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण-संबंधी प्रश्नोत्तर

1. सहसा मैं काफी गंभीर हो गया था, जैसा कि उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। वह सामने खड़ा था और आँखों को बुरी तरह मल रहा था। बारह-तेरह वर्ष की उम्र। ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुंह। वह सफेद नेकर, आधी बांह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रूमाल बंधा था। उसको घेरकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे। निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को। निश्चय ही वह पंच-बराबर हो गई थी।

प्रश्न
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ? और इसके लेखक कौन हैं.?
(ख) परिवार के सभी सदस्य किसे घेरकर खड़े थे? और क्यों ?
(ग) नवागन्तुक कौन था? उसका संक्षिप्त चित्रण करें।
(घ) निर्मला कौन थी? और वह पंच-बराबर कैसे हो गई थी?
(ङ) लेखक गंभीर क्यों हो गया था?
उत्तर-
(क) प्रस्तुत गद्यांश ‘बहादुर’ पाठ से लिया गया है। इसके लेखक अमरकांत हैं।
(ख) परिवार के सभी सदस्य नवागन्तुक को घेरकर खड़े थे। यह नवागन्तुक घर के लिए नौकर बनने के लिए आया था। सभी सदस्य नौकर पाकर उस नवागन्तुक को देखने के लिए खड़े थे।
(ग) नवागन्तुक एक नेपाली युवक था। वह माँ द्वारा मार खाने के बाद अपने घर से भाग गया था। लेखक के साले साहब उस नौकर को लाये थे। उसकी अवस्था बारह-तेरह वर्ष की थी। उसका कद ठिगना और चकइठ था। गोरा रंग और चपटा मुंह वाला वह नवागन्तुक सफेद नेकर पहने हुआ था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रूमाल बंधा हुआ था।
(घ) निर्मला लेखक की पत्नी थी। लेखक के सभी भाइयों के पास नौकर थे। अपनी गोतनियों एवं रिश्तेदारों की तरह उसे भी नौकर रखने की दिली इच्छा थी। नौकर पाकर वह भी उनके बराबर हो गई थी।
(ङ) घर के मुखिया होने के नाते नौकर को पाकर लेखक का गंभीर होना लाजिमी था। -घर गृहस्थी का निर्वहण करना मुखिया का परम कर्तव्य होता है। उसके ऊपर भी एक सदस्य का बोझ. पड़ गया था।

2. उसको लेकर मेरे साले साहब आए थे। नौकर रखना कई कारणों से बहुत जरूरी हो गया था। मेरे सभी भाई और रिश्तेदार अच्छे ओहदों पर थे और उन सभी के यहाँ नौकर थे। मैं जब बहन की शादी में घर गया तो वहाँ नौकरों का सुख देखा। मेरी दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती थीं, जबकि निर्मला को सबेरै से लेकर रात तक खटना पड़ता था। मैं ईर्ष्या से जल गया। इसके बाद नौकरी पर वापस आया तो निर्मला दोनों जून ‘नौकर-चाकर’ की माला जपने लगी। उसकी तरह अभागिन और दुखिया स्त्री और भी कोई इस दुनिया में होगी? वे लोग दूसरे होते हैं, जिनके भाग्य में नौकर का सुख होता है ।

प्रश्न
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) नीकर को लेकर कौन आए थे?
(ग) लेखक ने कहाँ नौकरों का सुख देखा?
(घ) लेखक भाग्यशाली किसे मानते हैं?
(ङ) लेखक को ईर्ष्या क्यों होता है?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम बहादुर।
लेखक का नाम अमरकांत।
(ख) नौकर को लेकर लेखक के साले साहब आए थे।
(ग) लेखक जब बहन की शादी में घर गये तब उन्होंने वहाँ नौकरों का सुख देखा।
(घ) लेखक कहते हैं कि जिनको नौकर का सुख प्राप्त होता है वे भाग्यशाली होते हैं।
(ङ) लेखक की पत्नी निर्मला को रात-दिन खाना पकाना पड़ता था। उनकी भाभियों के यहाँ नौकर थे इसलिए उन्हें आराम था। अपने भाभी को रानी की तरह चारपाइयाँ तोड़ते देखकर लेखक ईर्ष्या से जल जाते हैं।

3. पहले साले साहब से असाधारण विस्तार से उसका किस्सा सुनना पड़ा। वह एक नेपाली था, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर था। उसका बाप युद्ध में मारा गया था और उसकी. माँ सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी। माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी। माँ चाहती थी कि लड़को घर के काम-धाम में हाथ बटाये, जबकि वह पहाड़ या .जंगलों में निकल जाता और पेड़ों.पर चढ़कर चिड़ियों के घोंसलों में हाथ डालकर उनके बच्चे पकड़ता या फल तोड़-तोड़कर खाता। कभी-कभी वह पशुओं को चराने के लिए ले जाता था।

उसने एक बार उस भैंस को बहुत मारा, जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी, और इसीलिए जिससे वह बहुत चिढ़ता था। मार खाकर भैंस भागी-भागी उसकी माँ के पास चली गई, जो कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी। माँ का माथा ठनका। बेचारा बेजुबान जानवर चरना छोड़कर वहाँ क्यों आएगा? जरूर लौंडे ने इसको काफी मारा है। वह गुस्से से पागल हो गई। जब लड़का आया तो माँ ने भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की और उसको वहीं कराहता हुआ छोड़कर घर लौट आई। लड़के का मन माँ से फट गया और वह रात भर जंगल में छिपा रहा।

जब सबेरा होने को आया तो वह घर पहुंचा और किसी तरह अन्दर चोरी-चुपके घुस गया। फिर उसने घी की हडिया में हाथ डालकर माँ के रखे रुपयों में से दो रुपये निकाल लिए। अन्त में नौ-दो ग्यारह हो गया। वहाँ से दस मील की दूरी पर बस-स्टेशन था, वहाँ गोरखपुर जानेवाली बस थी।

प्रश्न
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक ने किनसे और किसका किस्सा विस्तार से सुना?
(ग) नौकर की माँ कैसी थी और वह उसके प्रति क्या व्यवहार करती थी?
(घ) लड़के का मन मों से क्यों फट गया?
(ङ) लड़के ने माँ के रुपये में से कितना निकाल लिया और उसके बाद क्या किया?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम बहादुर।
लेखक का नाम अमरकांत।
(ख) लेखक ने अपने साले साहब से उनके द्वारा नौकर के रूप में लाये गये लड़कों की । कहानी विस्तार से सुनी।
(ग) नौकर की माँ गुस्सैल स्वभाव की थी। वह उसको बहुत मारती थी।
(घ) एक दिन भैंस को मारने के बदले माँ ने उस लड़का की खूब पिटाई की जिससे उसका मन माँ से फट गया।
(ङ) लड़के ने घी की हंडिया में हाथ डालकर माँ के रखे रुपयों में से दो रुपये निकाल लिये और अंततः वहाँ से भाग गया।

4. निर्मला ने उसको एक फटी-पुरानी दरी दे दी थी। घर से वह एक चादर भी ले आया था। रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बँसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। वह बिस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बाईं ओर काफी झुकी रहती थी। फिर वह एक छोटा-सा आईना निकालकर बन्दर की तरह उसमें अपना मुँह देखता था। वह बहुत ही प्रसन्न नजर आता था।

उसके बाद कुछ और भी चीजें उसकी जेब से निकलकर उसके बिस्तर पर सज जाती थीं कुछ गोलियाँ, पुराने ताश की एक गड्डी, कुछ खूबसूरत. पत्थर के टुकड़े, ब्लेड, कागज की नावें। वह कुछ देर तक उनसे खेलता था। उसके बाद वह धीमे-धीमे स्वर में गुनगुनाने लगता था। उन पहाड़ी गानों का अर्थ हम समझ नहीं पाते थे, पर उसकी मीठी उदासी सारे घर में फैल जाती, जैसे कोई पहाड़ की निर्जनता में अपने किसी बिछुड़े हुए साथी को बुला रहा हो।

प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिएँ।
(ख) निर्मला ने बहादुर को सोने के लिए क्या व्यवस्था दी थी?
(ग) रात को काम करने के बाद बहादुर कहाँ सोता था ?
(घ)बहादुर सोते समय अपनी जेब से क्या निकालता था और क्या-क्या करता था?
(ङ) बहादुर के गीत का लेखक के घर में क्या प्रभाव पड़ता था ?
उत्तर
(क) पाठ का नाम बहादर
लेखक का नाम अमरकांत।
(ख) निर्मला ने बहादुर को एक फटी-पुरानी दरी एवं एक टूटी हुई बँसखट सोने के लिए दी थी।
(ग) रात को काम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बँसखट पर सोता था।
(घ) बहादुर रात को सोते समय बिस्तर पर बैठ जाता था और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता। फिर एक छोटा-सा आइना निकालकर उसमें अपना मुँह देखता।
(ङ) जब वह रात में सोते समय गीत बजाता था जब पहाड़ी गीत की मीठी उदासी सारं घर में फैल जाती और लगता कि कोई पहाड़ निर्जनता में अपने किसी बिछड़े हुए साथी को बुला रहा है।

5. उसके स्वर में एक मीठी झनझनाहट थी। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने उसको क्या हिदायतें दी। शायद यह कि वह शरारतें छोड़कर ढंग से काम करे और घर को अपना घर समझे। इस घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इज्जत से रखा जाता है। जो सब खाते-पहनते हैं, वही नौकर-चाकर खाते-पहनते हैं। अगर वह यहाँ रह गया तो ढंग-शऊर सीख जाएगा, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाएगा और उसकी जिंदगी सुधर जाएगी। निर्मला ने उसी समय कुछ व्यावहारिक उपदेश दे डाले थे। इस मुहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं, वह न किसी के यहाँ जाए और न किसी का काम करे। कोई बाजार से कुछ लाने की कहे तो वह ‘अभी आता ‘ हूँ’ कहकर अन्दर खिसक जाए। उसको घर के सभी लोगों से सम्मान और तमीज से बोलना चाहिए। और भी बहुत-सी बातें। अन्त में निर्मला ने बहुत ही उदारतापूर्वक लड़के के नाम में से ‘दिल’ शब्द उड़ा दिया।

प्रश्न
(क) लेखक ने दिलबहादुर को कौन-कौन सी हिदायतें दी थीं?
(ख) दिलबहादुर को पाकर लेखक के मन में उसके प्रति कौन-सी मनोदशाएँ जागृत हो गई?
(ग) निर्मला ने दिलबहादुर को कौन-कौन-सी व्यावहारिक शिक्षा दी?
(घ) निर्मला ने दिलबहादुर को बहादुर कैसे बना दिया ?
उत्तर-
(क) लेखक ने दिलबहादुर को हिदायत देते हुए कहा कि उसे शरारतें छोड़कर ठीक. ढंग से काम करना चाहिए। इस घर को अपना ही घर समझना चाहिए। जो हम खाते हैं वही नौकर भी खाते हैं। नौकर-चाकर भी परिवार का ही अंग होता है।
(ख) दिलबहादुर को पाकर लेखक का मन अन्दर ही अंन्दर प्रफुल्लित हो उठा। वह अपनी पत्नी की बात रखने में सफल हो गया था। लेखक अन्तर्मन से सोचने लगा कि यदि यह लड़का इस घर में टिक गया तो वह भी हमारे लड़कों की तरह पढ़-लिख जायेगा और उसकी जिन्दगी भी सुधर जायेगी।
(ग) निर्मला संभवतः व्यावहारिक शिक्षा देने में निपुण थी। उसने दिलबहादुर से कहा कि इस मुहल्ले में वह किसी के घर आना-जाना न करे। बाहर का कोई व्यक्ति कोई सामान लाने के लिए कहे तो अभी आया कहकर घर में घुस जाये। घर के सभी सदस्यों के साथ अच्छी तरह से व्यवहार करे।
(घ) निर्मला को दिलबहादुर कहने में अजीबोगरीब लगता था। व्यावहारिक कुशलता एवं अच्छा लगने के उद्देश्य से उसने दिलबहादुर के नाम से दिल को हटाकर बहादुर नाम दे डाला। दिलबहादुर से वह बहादुर बन गया।

6. दिन मजे में बीतने लगे। बरसात आ गई थी। पानी रुकता था और बरसता था। मैं अपने को बहुत ऊँचा महसूस करने लगा था। अपने परिवार और सम्बन्धियों के बड़प्पन तथा शान-बान पर मुझे सदा गर्व रहा है। अब मैं मुहल्ले के लोगों को पहले से भी तुच्छ समझने लगा। मैं किसी से सीधे मुँह बात नहीं करता। किसी की ओर ठीक से देखता भी नहीं था। दूसरों के बच्चों को मामूली-सी शरारत पर डाँट-डपट देता। कई बार पड़ोसियों को सुना चुका था जिसके पास कलेजा है, वही आजकल नौकर रख सकता है। घर के स्वांग की तरह रहता है। निर्मला भी सारे मुहल्ले में शुभ सूचना दे आई थी-आधी तनख्वाह तो नौकर पर ही खर्च हो रही है, पर रुपया-पैसा कमाया किसलिए जाता है ? वे तो कई बार कह ही चुके थे तुम्हारे लिए दुनिया के किसी कोने से नौकर जरूर लाऊँगा वही हुआ।

प्रश्न
(क) लेखक अपने को ऊँचा क्यों समझने लगा था ?
(ख) नौकर को पाकर लेखक के व्यवहार में कौन-सा परिवर्तन आ गया था? और क्यों?
(ग) लेखक की पत्नी निर्मला ने पड़ोसियों को क्या खबर सुनाई थी?
(घ) घर में नौकर किस तरह होता है ?
(ङ) रुपया-पैसा किसलिए कमाया जाता है ?
उत्तर-
(क) लेखक के भाइयों एवं रिश्तेदारों के घर में नौकर-चाकर थे। सर्वगुण सम्पन्न होने के बाद भी लेखक का घर नौकरविहीन था। बहादुर के आने के साथ ही लेखक भी अपने भाइयों एवं रिश्तेदारों के समतुल्य हो गया था। पड़ोसियों के घर में नौकर नहीं थे। आत्मबड़प्पन ‘ और ईर्ष्यावश ही लेखक अपने को ऊँचा समझने लगा था।
(ख) नौकर के आते ही लेखक के मन में विविध धारणाएँ उत्पन्न होने लगीं। पड़ोसी जीवनयापन करना नहीं जानते हैं ये ऐशोआराम से काफी दूर रहनेवाले हैं। मानव स्वभाववश ईर्षालु हो जाता है। लेखक भी अपने पड़ोसियों से जलने लगता है उनके बच्चों को डाँटने-झपटने लगता है। वह लोगों से कहने लगता है नौकर रखना सबके वश की बात नहीं है। लेखक के मन में ऐसे विचार उन्मादवश आने लगे। उन्माद में मनुष्य सही गलत का विचार छोड़ देता है। झूठी भावनाओं में मनुष्य बह जाता है।
(ग) नारी स्वभाव से आत्मप्रशंसक होती है। निर्मला भी इससे वंचित नहीं रह पाती है। वह पड़ोसियों के समक्ष अपनी बात सर्वोपरि रखना चाहती है। वह कहती है कि आधी कमाई तो नौकर पर ही खर्च हो जाती है।
(घ) घर में नौकर-स्वांग की तरह होता है।
(ङ) रुपया-पैसा अपनी मान-मर्यादा स्थापित करने के लिए कमाया जाता है। रुपये की सार्थकता मान-मर्यादा रखने में ही है। पत्नी की भंगिमाओं की पूर्ति करना पति का दायित्व होता है। लेखक की पत्नी को नौकर चाहिए बस उसने घर में नौकर रख लिया।

7. पर अब बहादुर से भूल-गलतियाँ अधिक होने लगी थीं। शायद इसका कारण मार-पीट और गाली-गलौज हो। मैं कभी-कभी इसको रोकना चाहता था, फिर यह सोचकर चुप लगा जाता कि नौकर-चाकर तो मार-पीट खाते ही रहते हैं।

प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखें।
(ख)बहादुर से भूल-गलतियाँ क्यों होने लगी थीं?
(ग) लेखक द्वारा मार-पीट न रोकने से उसका कैसे स्वभाव का पता चलता है ?
(घ) नौकर के साथ मार-पीट क्या आप उचित मानते हैं ? अपने कथन के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर-
(क) पाठ-बहादुरा लेखक-अमरकांता .
(ख) अधिक मार-पीट और गाली-गलौज के कारण बहादुर का आत्म-विश्वास डिग गया था, वह अनमना-सा हो गया था, इसलिए उससे ज्यादा गलतियाँ होने लगी थीं।
(ग) लेखक द्वारा मार-पीट न रोकने से उसके दब्बू स्वभाव का पता चलता है।
(घ) नौकर के साथ मार-पीट करना उचित नहीं है। उन्हें प्यार से समझाना चाहिए क्योंकि वे भी इन्सान हैं।

8. यही तो अफसास है। कोई भी सामान नहीं ले गया है। उसके कपड़े, उसका बिस्तर, उसके जूते-सभी छोड़ गया है। पता नहीं उसने हमें क्या समझा? अगर वह कहता तो मैं उसे रोकती थोड़े ? बल्कि उसको खूब अच्छी तरह पहना-ओढ़ाकर भेजती, हाथ में उसकी तनख्वाह के रुपये रख देती। दो-चार रुपये और अधिक दे देती। पर वह तो कुछ ले नहीं गया”

प्रश्न
(क) पाठ और लेखक का नाम लिखें।
(ख) प्रस्तुत कथन किसका है और उसे किस बात का अफसोस है? (ग) प्रस्तुत गद्यांश में मालकिन का कौन-सा भाव व्यक्त है ?
(घ) “पर वह तो कुछ ले नहीं गया’ कथन के पीछे कौन-सी कसक है?
उत्तर-
(क) पाठ-बहादुर। लेखक-अमरकात।
(ख) प्रस्तुत कथन मालकिन का है और उसे इस बात का आश्चर्य है कि बहादुर कुछ ले नहीं गया।
(ग) प्रस्तुत कथन से मालकिन का अपराध-बोध प्रकट होता है।.
(घ) दरअसल, बहादुर पर मेहमानों ने चोरी का इल्जाम लगाया और मालकिन और लेखक ‘ने भी डाँटा और पीटा था। किन्तु बहादुर घर छोड़ते हुए कुछ लेकर नहीं गया, अपितु अपने कपड़े आदि भी छोड़ गया। ‘पर वह कुछ ले ही नहीं गया’ कथन के पीछे बहादुर को झूठ-मूठ चोर समझने की कसक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें –

प्रश्न 1.
‘बहादुर’ के कहानीकार कौन हैं ?
(क) नलिन विलोचन शर्मा
(ख) अमरकांत
(ग) विनोद कुमार शुक्ल
(घ) अशोक वाजपेयी
उत्तर-
(ख) अमरकांत

प्रश्न 2.
‘बहादुर’ कैसी कहानी है ?
(क) ऐतिहासिक
(ख) मनोवैज्ञानिक
(ग) सामाजिक
(घ) वैज्ञानिक
उत्तर-
(ग) सामाजिक

प्रश्न 3.
बहादुर अपने घर से क्यों भाग गया था?
(क) गरीबी के कारण
(ख) माँ की मार के कारण
(ग) शहर घूमने के लिए
(घ) भ्रमवश
उत्तर-
(ख) माँ की मार के कारण

प्रश्न 4.
निर्मला’ कौन थी?
(क) शिक्षिका
(ख) बहादुर की माँ
(ग) कथाकार की पत्नी
(घ) कथाकार की पड़ोसन
उत्तर-
(ग) कथाकार की पत्नी

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति ।

प्रश्न 1.
बहादुर को लेकर…………साहब आए थे।
उत्तर-
साले

प्रश्न 2.
………का कर्जा तो जन्म भर भरा जाता है।
उत्तर-
माँ-बाप

प्रश्न 3.
बहादुर घर में……..की तरह नाचता था।
उत्तर-
फिरकी

प्रश्न 4. ………खाकर वह गिरते-गिरते बचा।
उत्तर-तमाचा

प्रश्न 5.
मुझे एक अजीव-सी…….का अनुभव होने लगा।
उत्तर-
लघुता

अतिलघु उत्तरीय प्रश्व

प्रश्न 1.
बहादुर का अपने घर से भागने का कारण क्या था ?
उत्तर-
बहादुर की माँ उसे हमेशा काफी मारा-पीटा करती थी। अतः एक दिन बुरी तरह पीटे जाने पर वह घर से भाग गया।

प्रश्न 2.
लेखक ने बहादुर को पहले दिन क्या हिदायत दी ?
उत्तर-
उना लेखक ने उसे हिदायत दी कि वह शरारतें छोड़कर ढंग से काम करे और घर को अपना घर समझे।

प्रश्न 3.
बहादर का व्यवहार लेखक के परिवार के प्रति कैसा था?
उत्तर-
बहादुर का व्यवहार लेखक के परिवार के प्रति अत्यन्त शालीनतापूर्ण था, वह बहुत हँसमुख तथा मेहनती था।

प्रश्न 4.
निर्मला ने बहादुर को क्या उपदेश दे डाले थे?
उत्तर-
निमला ने बहादुर को समझाया था कि वह मुहल्ले के लोगों से हेल-मेल नहीं बढावे. उनका कोई काम न करे तथा किसी के घर आना-जाना न करे।

प्रश्न 5.
किशोर का व्यवहार बहादुर के प्रति कैसा था? .
उत्तर-
किशोर के सभी काम बहादुर द्वारा किए जाने पर भी किशोर उसके साथ दुर्व्यवहार करता तथा अक्सर मारा पीटा करता था।

प्रश्न 6.
घर में नौकर किस तरह होता है ?
उत्तर-
घर में नौकर “स्वांग” की तरह होता है।

प्रश्न 7.
बहादुर से भूल-गलतियाँ क्यों होने लगी थीं ?
उत्तर-
अधिक मीरपीट और गाली गलौज के कारण बहादुर का आत्म विश्वास डिग गया था, वह अनमना सा हो गया था। इसलिए उससे ज्यादा गलतियाँ होने लगी थीं।

बहादुर लेखक परिचय

हिन्दी के सशक्त कथाकार अमरकांत का जन्म जलाई 1925 ई० में नागरा, बलिया (उत्तरप्रदेश) में हुआ था। उन्होंने गवर्नमेंट हाईस्कूल, बलिया से हाईस्कूल की शिक्षा पायी । कुछ समय तक उन्होंने गोरखपुर और इलाहाबाद में इंटरमीडिएट की पढ़ाई की, जो 1942 के स्वाधीनता संग्राम में शामिल होने से अधूरी रह गयी, और अंततः 1946 ई० में सतीशचंद्र कॉलेज बलिया से इंटरमीडिएट किया। उन्होंने 1947 ई० में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी० ए० किया और 1948 ई० में आगरा के दैनिक पत्र ‘सैनिक’ के संपादकीय विभाग में नौकरी कर ली।

आगरा में ही वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ में शामिल हुए और वहीं से कहानी लेखन की शुरुआत की। बाद में वे दैनिक अमृत. पत्रिका इलाहाबाद, दैनिक ‘भारत’ इलाहाबाद, मासिक पत्रिका ‘कहानी’ इलाहाबाद तथा ‘मनोरमा’ इलाहाबाद के भी संपादकीय विभागों से सम्बद्ध रहें । अखिल भारतीय कहानी.प्रतियोगिता में उनकी कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ पुरस्कृत हुई थी। उन्हें कथा लेखन के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ भी प्राप्त हो चुका है।

आजादी के बाद के हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमरकांत की कहानियों में मध्यवर्ग, विशेषकर निम्न मध्यवर्ग के जीवनानुभवों और जिजीविषा का बेहद प्रभावशाली और अंतरंग चित्रण मिलता है। अक्सर सपाट नजर आनेवाले कथनों में भी वे अपने जीवंत मानवीय संस्पर्श के कारण अनोखी आभा पैदा कर देते हैं। अमरकांत के व्यक्तित्व की तरह उनकी भाषा में भी एक खास किस्म का फक्कड़पन है । लोकजीवन के मुहावरों और देशज शब्दों के प्रयोग से उनकी भाषा में एक ऐसी चमक पैदा हो जाती है जो पाठकों को निजी लोक में ले जाती है।

अमरकांत के कई कहानी संग्रह और उपन्यास हैं। ‘जिंदगी और जोंक’, ‘देश के लोग’, ‘मौत का नगर’, ‘मित्र-मिलन’, ‘कुहासा’ आदि उनके कहानी संग्रह हैं और सूखा पत्ता’, ‘आकाशपक्षी’, – ‘काले उजले दिन’, “सुखजीवी’, “बीच की दीवार’, ‘ग्राम सेविका आदि उपन्यास हैं। उन्होंने ‘वानर सेना नामक एक बाल उपन्यास भी लिखा है।

अमरकांतकी प्रस्तुत कहानी में मंझोले शहर के नौकर की लालसा वाले एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में काम करनेवाले बहादुर की कहानी है – एक नेपाली गवई गोरखे की । परिवार का नौकरी-पेशा मुखिया तटस्थ स्वर में बहादुर के आने और अपने स्वच्छंद निश्छल स्वभाव की आत्मीयता के साथ नौकर के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद एक दिन स्वभाव की उसी स्वच्छंदता के साथ हर हृदय में एक कसकती अंतर्व्यथा देकर चले जाने की कहानी कहता है। . लेखक घर के भीतर और बाहर के यथार्थ को बिना बनाई-सँवारी सहज परिपक्व भाषा में पूरी कहानी बयान करता है । हिंदी कहानी में एक नये नायक को यह कहानी प्रतिष्ठित करती है।

बहादुर Summary in Hindi

पाठ का सारांश

सहसा मैं काफी गंभीर हो गया था, जैसा कि उस व्यक्ति की हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। वह सामने खड़ा था और आँखों को बुरी तरह मलका रहा था। बारह-तेरह वर्ष की उम्रा ठिगना चकइरु शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बांह की. ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था। उसके गले स्काउटों की तरह एक रूमाल बंधा था। उसको घेरकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे। निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को। निश्चय ही वह पंच-बराबर हो .. गई थी।

निर्मला को अपने भाभियों के पास नौकर को देखकर नौकर रखने की इच्छा बहुत प्रबल हो गई थी। उसका भाई एक नौकर लाकर बहन के यहाँ रख देता है। पहले उसके बारे में पूरी कहानी असाधारण विस्तार से बताता है। दिलबहादुर नाम का यह नेपाली गँवइ गोरखा है। उसका पिता युद्ध में मारा गया था। माता जी घर चलाती थी। एक दिन माता जी ने शरारत करने पर दिलबहादुर को बहुत मार मारा। वह वहाँ से भाग गया और लेखक. महोदय के यहाँ नौकरी करने के लिए आ गया। वह मेहनती और भोला-भाला लड़का था। उसके आने पर घर के सभी लोग बहुत स्वागत किया।

निर्मला प्रेम से बहादुर कहने लगी। घर के कामों में वह सहयोग देने लगा। वह घर की सफाई करता, कमरों में पोंछा लगाता, अंगीठी जलाता, चाय बनाता और पिलाता। दोपहर में कपड़े धोता और बर्तन मलता। वह रसोई बनाने की भी जिद करता, पर निर्मला स्वयं सब्जी और रोटी बनाती। निर्मला को उसकी बहुत फिक्र रहती। दिन मजे से बीतने लगे। निस्संदेह बहादुर की वजह से सबको खूब आराम मिल रहा था।

घर खूब साफ और चिकना रहता। कपड़े चमाचम सफेदा निर्मला की तबीयत भी काफी सुधर गई। अब कोई एक खेर भी न टसकाता था। किसी को मामूली से मामूली काम करना होता, तो वह बहादुर को आवाज देता। ‘बहादुर एक गिलास पानी।”बहादुर, पेन्सिल नीचे गिरी है, उठाना।’ इसी तरह की फरमाइशें। बहादुर घर में फिरकी की तरह नाचता रहता। सभी रात में पहले ही सो जाते थे और सबेरे, आठ बजे के पहले न उठते थे।

किशोर अपना सारा काम बहादुर से करवाता। जूते में पॉलिश, साइकिल की सफाई, कपड़ो की धुलाई और इस्त्री भी। इतने सारी फरमाइशों में कोई गड़बड़ी हो गई तो बुरी-बुरी गाली देना, मार-पीट, गर्जन-तर्जन आदि चालू हो गया। धीरे-धीरे निर्मला का हाथ भी खुल गया। अब बहादुर को मारनेवाला दो लोग हो गये। कभी-कभी एक गलती पर दोनों लोग मारते थे।

एक दिन रविवार को निर्मला के रिश्तेदार घर पर मिलने के लिए आये। घर में बड़ी चहल-पहल मच गई। नाश्ता पानी के बाद बातों की जलेबी छनने लगी। इसी समय एक घटना हो गई। अचानक रिश्तेदार की पत्नी ने चोरी इलजाम नौकर पर लगा दिया। सबलोगों ने बारी-बारी से पूछा। लेकिन बहादुर नही-नहीं कहता रहा। पहले लेखक महोदय ने बहादुर को मारा। फिर बाद में निर्मला ने भी बहादुर को मारा। इस घटना के बाद बहादुर काफी डॉट-मार खाने लगा। वह . उदास रहने लगा और काम में लापरवाही करने लगा।

एक दिन मैं दफ्तर से विलम्ब से आया। निर्मला आँगन में चुपचाप सिर पर हाथ रखकर . बैठी थी। अन्यं लड़कों का पता नहीं था, केवल लड़की अपनी माँ के पास खड़ी थी। अंगीठी अभी नहीं जली थी। आँगन गंदा पड़ा था, बर्तन बिना मले हुए रखे थे। सारा घर जैसे काट रहा था।

क्या बात है ?- मैंने पूछा – बहादुर भाग गया। -भाग गया! क्यों ? पता नहीं।
निर्मला आँखों पर आँचल रखकर रोने लगी। मुझे क्रोध आया। मैं चिल्लाना चाहता था, पर भीतर-ही-भीतर कलेजा जैसे बैठ रहा हो। मैं वहीं चारपाई पर सिर झुकाकर बैठ गया। मुझे एक अजीब-सी लघुता का अनुभव हो रहा था। यदि मैं न मारता, तो शायद वह न जाता।

शब्दार्थ

पंच-बराबर : दो पक्षों के बीच निर्णायक की तरह, होना, पंच की तरह
ओहदा : पद
जन : वक्त
बंजुबान : मूक, भाषाविहीन
हिदायत : चेतावनी, सावधानी
शरारत : चंचलता, बदमाशी
शऊर : ढंग, शिष्टाचार, सलीका
तुच्छ : नगण्य, क्षुद्र
फरमाइश : आग्रह, निवेदन
नेकर : पैंट
पुलई : पेड़ की सबसे ऊंची शाखा
सवांग : सगा, परिवार का सदस्य
फिरकी : नाचने वाली घिरनी .
कायल : आकांक्षी, अभ्यस्त, आदी
दायित्व : जिम्मेदारी
दर्पण : आईना
खूँट : साड़ी के आँचल से बंधी हुई गाँठ.
घाघ : घुटा हुआ, चतुर
होडना : मंथना, मॅथाना
अलगनी : कपड़े डालने के लिए बंधी लंबी रस्सी, खूँटी

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 सूरदास के पद

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 2 सूरदास के पद

 

सूरदास के पद वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

Surdas Ke Pad Class 12 Bihar Board प्रश्न 1.
सूरदास का जन्म कब हुआ था?
(क) 1478 ई. में
(ख) 1470 ई. में
(ग) 1475 ई. में
(घ) 1472 ई. में
उत्तर-
(क)

सूरदास के पद अर्थ सहित Class 12 Bihar Board प्रश्न 2.
सूरदास की अभिरुचि किसमें थी?
(क) पर्यटन
(ख) गायन
(ग) नृत्य
(घ) लेखन
उत्तर-
(क)

Surdas Ke Pad Class 12 Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
सूरदास किस भक्ति के कवि हैं?
(क) कृष्ण भक्ति
(ख) रामभक्ति
(ग) देश भक्ति
(घ) मातृभक्ति
उत्तर-
(क)

Surdas Ke Pad Class 12th Bihar Board प्रश्न 4.
इनमें से सूरदास की कौन-सी रचना है?
(क) कड़बक
(ख) छप्पय
(ग) पद
(घ) पुत्र-वियोग
उत्तर-
(ग)

सूरदास के पद कक्षा 12 Bihar Board प्रश्न 5.
सूरदास जी के गुरु कौन थे?
(क) महाप्रभु वल्लभाचार्य
(ख) महावीर गौतम बुद्ध
(ग) महाप्रभु चौतन्य
(घ) महाप्रभु महावीर स्वामी
उत्तर-
(क)

Surdas Ke Pad Class 12 Notes Bihar Board प्रश्न 6.
‘साहित्य लहरी’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) नन्ददास
(ख) सूरदास
(ग) नाभादास
(घ) तुलसीदास
उत्तर-
(ख)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

Surdas Ki Abhiruchi Kis Mein The Bihar Board Class 12th प्रश्न 1.
जागिए, ब्रजराज ……. कँवल-कुसुम फूले।
कुमुद-वृन्द संकुचित भए, भुंग लता भूले।।
उत्तर-
कुँवर

Surdas Ko Abhiruchi Kisme Thi Bihar Board Class 12th प्रश्न 2.
बिधु मलीन रवि ………. गावत नर नारी।
सूर-स्याम प्रात उठौ, अंबुज-कर-धारी।।
उत्तर-
प्रकाश

Surdas Class 12 Bihar Board प्रश्न 3.
तमचुर खर-रोर सुनहु, बोलत बनराई।
राँभति गो खरिकनि में,
………. हित धाई।।
उत्तर-
बछरा

प्रश्न 4.
बरी, बरा, बेसन बहु भाँतिनि, व्यंजन विविध अगनियाँ।
डारत, खात, लेत अपनैं कर, रूचि मानत ……… दोनियाँ।।
उत्तर-
दधि

प्रश्न 5.
जेंवत ……… नंद की कनियाँ
केछुक खात, कछू धरनि गिरावत,
उत्तर-
स्याम

सूरदास के पद अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूरदास हिन्दी साहित्य के किस काल के कवि हैं
उत्तर-
भक्तिकाल के।

प्रश्न 2.
सूरदास का जन्म रुमकता नामक गाँव में किस सन् में हआ?
उत्तर-
1478 ई. में

प्रश्न 3.
सूरदास के काव्य की भाषा कौन-सी है?
उत्तर-
ब्रज भाषा।

प्रश्न 4.
सूरदास के काव्य में किस रस का प्रयोग हुआ है?
उत्तर-
वात्सल्य।

सूरदास के पद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रथम पद में किस रस की व्यंजना हुई है?
उत्तर-
सूरदास रचित “प्रथम पद” में वात्सल्य रस की व्यंजना हुई है। वात्सल्य रस के पदों की विशेषता यह है कि पाठक जीवन की नीरस और जटिल समस्याओं को भूलकर उनमें तन्मय और विभोर हो उठता है। प्रथम पद में दुलार भरे कोमल-मधुर स्वर में सोए हुए बालक कृष्ण को भोर होने की सूचना देते हुए जगाया जा रहा है।

प्रश्न 2.
गायें किस ओर दौड़ पड़ी?
उत्तर-
भोर हो गयी है, दुलार भरे कोमल मधुर स्वर में सोए हुए बालक कृष्ण को भोर होने का संकेत देते हुए जगाया जा रहा है। प्रथम पद में भोर होने के संकेत दिए गए हैं-कमल के फूल खिल उठे है, पक्षीगण शोर मचा रहे हैं, गायें अपनी गौशालाओं से अपने-अपने बछड़ों की ओर दूध पिलाने हेतु दौड़ पड़ी।

प्रश्न 3.
प्रथम पद का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
प्रथम पद में विषय, वस्तु चयन, चित्रण, भाषा-शैली व संगीत आदि गुणों का प्रकर्ष दिखाई पड़ता है। इस पद में दुलार भरे कोमल स्वर में सोए हुए बालक कृष्ण को भोर होने की बात कहते हुए जगाया जा रहा है। कृष्ण को भोर होने के विभिन्न संकेतों जैसे-कमल के फूलों का खिलना, मुर्ग का बांग देना, पक्षियों का चहचहाना, गऊओं का रंभाना, चन्द्रमा का मलिन होना, रवि का प्रकाशित होना आदि के बारे में बताया जा रहा है। इन सबके माध्यम से कृष्ण को जगाने का प्रयास किया जा रहा है।

प्रश्न 4.
पठित पदों के आधार पर सूर के वात्सल्य वर्णन की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
महाकवि सूर को बाल-प्रकृति तथा बाल-सुलभ अंतरवृत्तियों के चित्रण की दृष्टि से विश्व साहित्य में बेजोड़ स्वीकार किया गया है। उनके वात्सल्य वर्णन की विद्वानों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

लाल भगवानदीन लिखते हैं, “सूरदास जी ने बाल-चरित्र का वर्णन में कमाल कर दिया है, यहाँ तक कि हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास जी भी इस विषय में इनकी समता नहीं कर सके हैं। हमें संदेह है कि बालकों की प्रकृति का जितना स्वाभाविक वर्णन सूर ने किया है, उतना किसी अन्य भाषा के कवि ने किया है अथवा नहीं।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं, “जितने विस्तृत और विशद् रूप से सूर ने बाल लीला का वर्णन किया है, उतने विस्तृत रूप में और किसी कवि ने नहीं किया। कवि ने बालकों की अन्त:प्रकृति में भी पूरा प्रवेश किया है और अनेक बाल भावों की सुन्दर स्वाभाविक व्यंजन की है।”

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं, “यशोदा के बहाने सूरदास ने मातृ हृदय का ऐसा स्वाभाविक सरल और हृदयग्राही चित्र खींचा है कि आश्चर्य होता है। माता संसार का ऐसा पवित्र रहस्य है जिसकी कवि के अतिरिक्त और किसी को व्याख्या करने का अधिकार नहीं है।”

यहाँ प्रस्तुत दोनों पद वात्सल्य भाव से ओतप्रोत हैं और ‘सूरसागर’ में हैं। इन पदों में सूर की काव्य और कला से संबंधित विशिष्ट प्रतिभा की अपूर्व झलक मिलती है। प्रथम पद में बालक कृष्ण को सुबह होने के संकेत देकर जगाना, दूसरे पद में नंद द्वारा गोदी में बैठाकर भोजन कराना वात्सल्य भाव के ही उदाहरण हैं। बालक कृष्ण की क्रियाओं, सौन्दर्य तथा शरारतों का मार्मिक चित्रण इन पदों में है। अतः दोनों पदों में वात्सल्य रस की अभिव्यंजना है।

प्रश्न 5.
काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट करें
(क) कछुक खात कछु धरनि गिरावत छवि निरखति नंद-रनियाँ।
(ख) भोजन करि नंद अचमन लीन्है माँगत सूर जुठनियाँ।
(ग) आपुन खाक, नंद-मुख नावत, सो छबि कहत न बनियाँ।
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पद्यांश में वात्सल्य रस के कवि सूरदासजी ने बालक कृष्ण के खाने के ढंग का अत्यन्त स्वाभाविक एवं सजीव वर्णन किया है। पद ब्रज शैली में लिखा गया है। भाषा की अभिव्यक्ति काव्यात्मक है। यह पद गेय और लयात्मक प्रवाह से युक्त है। अतः यह पक्ति काव्य-सौन्दर्य से परिपूर्ण है। इसमें वात्सल्य रस है। इसमें रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।

(ख) प्रस्तुत पद्यांश में वात्सल्य रस के साथ-साथ भक्ति रस की भी अभिव्यक्ति है। बालक कृष्ण के भोजन के बाद नंद बाबा श्याम का हाथ धोते हैं। यह देख सूरदास जी भक्तिरस में डूब जाते हैं। वे बालक कृष्ण की जूठन नंदजी से माँगते हैं। इस पद्यांश को ब्रज शैली में लिखा गया है। बाबा नंद का कार्य वात्सल्य रस को दर्शाता है तथा सूरदास की कृष्ण भक्ति अनुपम है। अभिव्यक्ति सरल एवं सहज है। इसमें रूपक अलंकार है।

(ग) प्रस्तुत पद्यांश में बालक कृष्ण के बाल सुलभ व्यवहार का वर्णन है। कृष्ण स्वयं कुछ खा रहे हैं तथा कुछ नन्द बाबा के मुँह में डाल रहे हैं। इस शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता अर्थात् अनुपम है। इसे ब्रजशैली में लिखा गया है। इसमें वात्सल्य रस का अपूर्व समावेश है। इस पद्यांश में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 6.
कृष्ण खाते समय क्या-क्या करते हैं?
उत्तर-
बालक कृष्ण अपने बालसुलभ व्यवहार से सबका मन मोह लेते हैं। भोजन करते समय कृष्ण कुछ खाते हैं तथा कुछ धरती पर गिरा देते हैं। उन्हें मना-मना कर खिलाया जा रहा है। यशोदा माता यह सब देख-देखकर पुलकित हो रही है। विविध प्रकार के भोजन जैसे बड़ी, बेसन का बड़ा आदि अनगिनत प्रकार के व्यंजन हैं।

बालक कृष्ण अपने हाथों में ले लेते हैं, कुछ खाते हैं तथा जितनी इच्छा करती है उतना खाते हैं, जो स्वादिष्ट लगती है उसे ग्रहण करते हैं। दोनी में रखी दही में विशेष रुचि लेते हैं। मिश्री मिली दही तथा मक्खन को मुँह में डालते हुए उनकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार कृष्ण खाते समय अपनी लीला से सबका मन मोह लेते हैं।

सूरदास के पद भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाएँ।
उत्तर-

  • मलिन-मलिन हृदय से प्रभु स्मरण नहीं हो सकता।
  • रस-काव्य में रस न हो तो व्यर्थ है।
  • भोजन-भोजन एकान्त में करना चाहिए।
  • रूचि-मेरी रुचि अध्ययन-अध्यापन की है।
  • छवि-श्रीकृष्ण की छवि अत्यन्त मनोहारी है।
  • दही-दही को भोजन में शामिल करना चाहिए।
  • माखन-दूध को विलोने से माखन निकलता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दो के पर्यायवाची दें
उत्तर-

  • धरनि-पृथ्वी, धरती, धरा, भू
  • रवि-सूर्य, भास्कर, भानु
  • अम्बुज-कमल, जलज, पंकज
  • कमल-जलज, पंकज, अम्बुज

प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों के मानक रूप लिखें
उत्तर-

  • शब्द – मानक रूप
  • धरनी – धरती
  • गो – गाय
  • कँवल – कमल
  • विधु – विधु
  • स्याम – श्याम
  • प्रकास – प्रकाश
  • बनराई – वनराही

प्रश्न 4.
निम्नलिखित के विपरीतार्थक शब्द लिखें
उत्तर-

  • शब्द – विपरीतार्थक शब्द
  • मलिन – स्वच्छ (निर्मल)
  • नार – नारायण
  • संकुचित – विस्तृत
  • धरणी – आकाश
  • विधु – रवि

प्रश्न 5.
पठित पदों के आधा पर सूर के भाषिक विशेषताओं को लिखिए।
उत्तर-
पठित पदों में सूरदास ने साहित्यिक ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में माधुर्य, लालित्य तथा सौन्दर्य का अद्भुत मिश्रण है। दोनों पदों में वात्सल्य रस की अभिव्यंजना हुई है जिसके लिए गेय शैली का प्रयोग किया गया है। अत: दोनों पदों में संगीतात्मकता व लयात्मकता विद्यमान है।

प्रश्न 6.
विग्रह करते हुए समास बताएँ।
उत्तर-
नंद जसोदा-नंद और जसोदा-द्वन्द्व समसस
ब्रजराज-ब्रज का राजा-तत्पुरुष समास खग
रोर-खग का शोर-तत्पुरुष समास
अम्बुजकरधारी-अम्बुज को हाथ में धारण करनेवाला (श्रीकृष्ण)-बहुव्रीहि समास।

सूरदास के पद कवि परिचय सुरदास (1478-1583)

जीवन-परिचय-
महाप्रभु बल्लभाचार्य के शिष्य तथा गोस्वामी विट्ठलनाथ द्वारा प्रतिष्ठित अष्टछाप के प्रथम कवि महाकवि सूरदास हिन्दी साहित्याकाश के सर्वाधिक प्रकाशमान नक्षत्र हैं। वस्तुतः कृष्ण भक्ति की रसधारा को समाज में बहाने का श्रेय सूरदास को ही जाता है।

महाकवि सूरदास के जन्मस्थान एवं काल के बारे में अनेक मत हैं। अधिकांश साहित्यकारों का मत है कि महाकवि सूरदास का जन्म 1478 ई. में आगरा और मथुरा के बीच स्थित रुमकता नाम गाँव में हुआ था। कुछ अन्य लोग बल्लभगढ़ के निकट सीही नामक ग्राम को उनका जन्मस्थान बताते हैं।

जब वे गऊघाट पर रहते थे तो एक दिन उनकी भेंट महाप्रभु बल्लभाचार्य से हुई। सूर ने अपना एक भजन बड़ी तन्मयता से महाप्रभु को गाकर सुनाया, जिसे सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने सूरदास को अपना शिष्य बना लिया। बल्लभचार्य के आदेश से ही सूरदास ने कृष्ण लीला का गान किया। उनके अनुरोध पर ही सूरदास श्रीनाथ के मन्दिर में आकर भजन-कीर्तन करने लगे। वे निकट के गाँव पारसोली में रहते थे। वहीं से नित्य-प्रति श्रीनाथ जी के मन्दिर में आकर भजन गाते और चले जाते। उन्होंने मृत्युकाल तक इस नियम का पालन किया। 1583 ई. में पारसोली में ही इनका देहांत हो गया।

रचनाएँ-सूरदास द्वारा रचित तीन काव्य ग्रंथ मिलते हैं-

  • सूरदास,
  • सूर सारावली,
  • साहित्य लहरी।

काव्यगत विशेषताएँ-सूरदास वात्यसल्य, प्रेम और सौंदर्य के अमर कवि हैं। उनके काव्य के प्रमुख विषय हैं-विनय और आत्मनिवेदन, बालवर्णन, गोपी-लीला, मुरली-माधुरी और गोपी विरह।

सूरदास के पद कविता का सारांश

प्रस्तुत दोनों पद वात्सल्य भाव से परिपूर्ण हैं जो सगुण भक्तिधारा की कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि सूरदास द्वारा रचित काव्य ग्रंथ ‘सूरसागर’ से उद्धृत है। इन पदों में कवि की काव्य और कला से संबंधित विशिष्ट प्रतिभा की अपूर्व झलक मिलती है।

प्रथम पद में प्यार-दुलार भरे कोमल-मधुर स्वर में सोए हुए बालक को यह कहते हुए जगाया जा रहा है कि व्रजराज कृष्ण उठो, सुबह हो गई है। प्रकृति के अनेक दृष्टांतों तथा गाय-बछड़ों के क्रियाकलापों का वर्णन कर माता यशोदा उन्हें बहुत प्यार से उठने के लिए कह रही हैं। – द्वितीय पद में पिता नंद बाबा की गोद में बैठकर बालक कृष्ण को भोजन करते हुए चित्रित किया गया है। इसमें अन्य बालकों की तरह ही कृष्ण के भोजन करने का अत्यंत स्वाभाविक वर्णन है। सूर वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आए थे। वे बालकों की आदतों, मनोवृत्तियों तथा बाल मनोविज्ञान का गहरा ज्ञान रखते थे, यह उनके इस पद में स्पष्ट देखा जा सकता है। बच्चे के भोजन करने, कुछ खाने, कुछ गिराने, कुछ माता-पिता को खिलाने, खाते-खाते शरीर पर गिरा लेने आदि के इन सुपरिचित दृश्यों और प्रसंगा में कवि-हृदय का ऐसा योग है कि ये प्रसंग रिट बन गए हैं।

कविता का भावार्थ
जागिए, ब्रजराज कुँवर, कँवल-कुसुम फूले।
कुमुद-वृंद संकुचित भए, भुंग लता भूले।
तमचुर खग-रोर सुनहु, बोलत बनराई॥
राँभति गो खरिकनि में, बछरा हित धाई।
बिधु मलीन रवि प्रकास गावत नर नारी।
सूर स्याम प्रात उठौ, अंबुज-कर-धारी॥

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश मध्यकालीन सगुण भक्तिधारा की कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवि ‘सूरदास’ द्वारा रचित उनके विख्यात ग्रंथ ‘सूरसागर’ से उद्धृत है। इस पद में सोए हुए बालक कृष्ण को दुलार भरे कोमल मधुर स्वर में भोर होने की बात कहते हुए जगाने का वर्णन है।

व्याख्या-बालक कृष्ण को जगाने के लिए माँ यशोदा सुबह होने के बहुत से प्रमाण देती है। वह बहुत ही दुलार से उसे कहती है, हे ब्रजराज कुँवर, अर्थात् ब्रज के छोटे राजकुमार! जाग जाओ, उठ जाओ। उठकर देखो-कितने सुन्दर कमल के फूल खिल गए हैं। रात को खिलने वाली कुमुदनियाँ सकुचा गई हैं, अर्थात् रात्रि समाप्त हो गई है क्योंकि भोर में कुमुदनियाँ मुरझा जाती हैं। चारों ओर भँवरे मंडरा रहे हैं और मुर्गा आवाज (बाँग) दे रहा है। हर तरफ पक्षियों की चहचहाहट फैली है। पेड़-पौधों पर बैठे पक्षियों का मधुर संगीत गूंज रहा है। गाएँ भी बाड़ों में जाने के लिए रंभा रही हैं, वे अपने बछड़ों सहित जाना चाहती हैं। चन्द्रमा के प्रकाश की काँति क्षीण हो गई है अर्थात् रात्रि समाप्त हो गई है, वहीं सूर्य का प्रकाश चारों ओर फैल गया है। नर-नारी मधुर स्वर में गा रहे हैं कि हे श्याम! सुबह हो गई है इसलिए उठ जाओ। वे अंबुज करधारी अर्थात् कमल को हाथ में धारण करने वाले कृष्ण को सुबह होने का संकेत देकर जगाना चाहते हैं।

पद-2
2. जेंवत स्याम नंद की कनियाँ।
कछुक खात, कछु धरनि गिरावत, छबि निरखति नंद-रनियाँ।
बरी, बरा बेसन, बहु भाँतिनि, व्यंजन बिविध, अगानियाँ।
डारत, खात, लेत अपनैं कर, रुचि मानत दधि दोनियाँ।
मिस्त्री, दधि, माखन मिम्रित करि मुख नावत छबि धनियाँ।
आपुन खात नंद-मुख नावत, सो छबि कहत न बनियाँ।
जो रस नंद-जसोदा बिलसत, सो नहिं, तिहूँ भुवनियाँ।
भोजन करि नंद अचमन लीन्हौ, माँगत सूर जुठनियाँ॥

व्याख्या-प्रस्तुत पद हमारी पाठ्यपुस्तक दिगन्त भाग-2 के “पद” शीर्षक कविता से उद्धृत है। इसके रचयिता सूरदास हैं। सूरदासजी भक्तिधारा के अन्यतम कवि हैं। उपरोक्त ‘पद’ में इन्होंने बालक कृष्ण की बाल सुलभ चपलता तथा चिताकर्षक लीलाओं का दिग्दर्शन कराते हुए उनके (कृष्ण) द्वारा भोजन करते समय का रोचक विवरण प्रस्तुत किया है।

बालक कृष्ण नंदबाबा की गोद में बैठकर खा रहे हैं। कुछ खा रहे हैं, कुछ भूमि पर गिरा देते हैं। इस प्रकार उनके भोजन करने का ढंग से प्राप्त होनेवाली शोभा को माँ यशोदा (नंद की अत्यन्त प्रभुदित भाव से देख रही हैं। बेसन से बनी बरी-बरा विभिन्न प्रकार के अनेक व्यंजन को अपने हाथों द्वारा खाते हैं, कुछ छोड़ देते हैं। दोनी (मिट्टी के पात्र) में रखी हुई दही में विशेष रुचि ले रहे हैं उन्हें दही अति स्वादिष्ट लग रहा है। मिश्री मिलाया हुआ दही तथा माखन (मक्खन) को अपने मुख में डाल लेते हैं, उनकी यह बाल सुलभ-लीला धन्य है। वे स्वयं भी खा रहे हैं तथा नंद बाबा के मुँह में भी डाल रहे हैं। यह शोभा अवर्णनीय हैं अर्थात् इस शोभा के आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता। जिस रस का पान नंद बाबा और यशोदा माँ कर रही हैं, जो प्रसन्नता उन दोनों को हो रही है वह तीनों लोक में दुर्लभ हैं। नंदजी भोजन करने के बाद कुल्ला करते हैं। सूरदासजी जूठन माँगते हैं, उस जूठन को प्राप्त करना वे अपना सौभाग्य मानते हैं।