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Bihar Board 12th Business Economics Important Questions Long Answer Type Part 4 in Hindi

प्रश्न 1.
विनिमय दर से आप क्या समझते हैं ? विनिमय को निर्धारित करनेवाले मुख्य कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एक मुद्रा का दूसरी मुद्रा में मूल्य विनिमय दर कहलाती है। दूसरे शब्दों में दूसरी मुद्रा के रूप में एक मुद्रा की कीमत को विनिमय दर कहते हैं। वास्तव में विदेशी मुद्रा की एक इकाई मुद्रा का क्रय करने के लिए घरेलू मुद्रा की जितनी इकाइयों की जरूरत पड़ती है उसे विनिमय दर कहते हैं।

विनिमय दर का निर्धारण- जहाँ विदेशी मुद्रा की माँग को पूर्ति समान हो जाती है, विनिमय दर वहाँ निर्धारित होती है। विदेशी मुद्रा की माँग व पूर्ति का साम्य बिन्दु वह होता है जब मुद्रा का माँग वक्र तथा पूर्ति एक-दूसरे को काटते हैं। साम्य बिन्दु पर विनिमय दर को साम्य विनिमय दर तथा माँग व पूर्ति की मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं।

विनिमय दर को निर्धारित करने वाले कारक-
1. स्थिर विनिमय दर- इस विनिमय दर से अभिप्राय सरकार द्वारा निर्धारित स्थिर विनिमय दर से है। स्थिर विनिमय दर की उप-पद्धतियाँ इस प्रकार है-

(a) विनिमय दर की स्वर्णमान पद्धति- 1920 में पूरे विश्व में इस पद्धति को व्यापक स्तर पर प्रयोग किया गया। इस व्यवस्था में प्रत्येक भागीदार देश को अपनी मुद्रा की कीमत सोने के रूप में घोषित करनी पड़ती थी। मुद्राओं का विनिमय स्वर्ण के रूप में तय की गयी कीमत सोने की स्थिर कीमत पर होता है।

(b) बेनवड पद्धति- विनिमय दर की इस प्रणाली में भी विनिमय दर स्थिर रहती है। इस प्रणाली में सरकार अथवा मौद्रिक अधिकारी तय की गयी विनिमय दर में एक निश्चित सीमा तक परिवर्तन की अनुमति प्रदान कर सकते हैं। सभी वस्तुओं का मूल्य इस प्रणाली में अमेरिकन डॉलर में घोषित करना पड़ता था। अमेरिकन डॉलर की सोने में कीमत घोषित की जाती थी लेकिन दो देश मुद्राओं का समता मूल्य अंत में केवल स्वर्ण पर ही निर्भर होता था। प्रत्येक देश की मुद्रा के. समता मूल्य में समायोजन विश्व मुद्रा कोष का विषय था।

2. लोचशील विनिमय दर- यह वह विनिमय दर होती है जिसका निर्धारण अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विदेशी मुद्रा की माँग व पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है। जिस विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा की माँग व पूर्ति समान हो जाती है वही दर साम्य विनिमय दर कहलाती है। आजकल समूचे विश्व में विभिन्न देशों के मध्य आर्थिक लेन-देन का निपटारा लोचशील विनिमय दर के आधार पर होता है।

प्रश्न 2.
एकाधिकार क्या है ? इसकी प्रमुख विशेषताओं में से किसी एक का वर्णन करें।
उत्तर:
एकाधिकार बाजार की वह स्थिति है जिसमें एक वस्तु का एक ही उत्पादक अथवा एक ही विक्रेता होता है तथा उसकी वस्तु का कोई निकट का स्थानापन्न नहीं होती है।

एकाधिकार बाजार की निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ होती हैं-

  • अकेला उत्पादक
  • स्वतंत्र कीमत नीति
  • प्रवेश पर प्रतिबंध
  • निकट की स्थापन्न वस्तु का नहीं होता
  • कीमत विभेद संभव हैं कीमत विभेद का अर्थ है उत्पादक द्वारा अपनी वस्तु को अलग-अलग व्यक्तियों को अथवा अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग कीमतों पर बेच सकता है। यह कीमत विभेद तभी संभव है जब दो बाजारों के बीच पर्याप्त दूरी हो ताकि एक बाजार के क्रेता दूसरे बाजार में नहीं पहुँच सकें।

प्रश्न 3.
राजस्व घाटा किसे कहते हैं ? इसे कम करने के दो उपाय बतायें।
उत्तर:
राजस्व घाटा सरकार के राजस्व व्यय की राजस्व प्राप्तियाँ पर अधिकता को दर्शाता है। राजस्व घटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ राजस्व घाटा यह बताता है कि सरकार अबचत कर रही है। अर्थात् सरकार की परिसंपत्तियों में कमी हो जाती है। इसे कम करने के दो उपाय निम्नांकित हैं-

  • करों की दरों में वृद्धि करके सरकार अपनी राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि करती है जिससे प्राप्तियों तथा व्यय का अंतर कम किया जा सकता है।
  • करों के आधार को विस्तृत करके भी सरकार अपनी राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि करती है तथा प्राप्तियों एवं व्यय के अंतर को कम करने का प्रयास करती है।
  • सार्वजनिक व्यय में कटौती करके।

प्रश्न 4.
अत्यधिक मांग क्या है ? इसे किस प्रकार नियंत्रित किया जा सकता है ?
उत्तर:
जब एक बार पूर्ण रोजगार स्तर निर्धारित हो जाता है तो माँग में वृद्धि का उत्पाद तथा रोजगार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। माँग में वृद्धि से उत्पाद तथा रोजगार में वृद्धि हुए बिना केवल मौद्रिक व्यय में वृद्धि होती है। ऐसी अवस्था को अतिरेक माँग अथवा अत्याधिक मांग की अवस्था कहते हैं। अतिरेक माँग कुल माँग का वह स्तर है जो पूर्ण रोजगार के लिए आवश्यक कुल पूर्ति के स्तर से अधिक है। यदि आय. का संतुलन स्तर पूर्ण रोजगार बिन्दु के बाद निर्धारित होता है तो यह अत्यधिक माँग की स्थिति है। यह स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब पूर्ण रोजगार के स्तर पर सामूहिक मांग, सामूहिक पूर्ति से अधिक होती है।

ऐसी स्थिति में सामूहिक माँग उस स्तर से अधिक होगी जितनी की पूर्ण रोजगार के स्तर के उत्पादन के लिए आवश्यक है। दूसरे शब्दों में माँग का स्तर, अधिक है और उसके लिए साधनों के पूर्ण प्रयोग द्वारा संभव उत्पादन पर्याप्त नहीं है। पूर्ण रोजगार के स्तर पर सामूहिक माँग जितनी अधिक है, सामूहिक पूर्ति से यह अत्याधिक माँग का विस्तार (Extent) है। अत्यधिक माँग का विस्तार स्फीतिक अंतराल (Inflationary gap) भी कहलाता है। पूर्ण रोजगार के स्तर के बाद सामूहिक माँग में वृद्धि से उत्पादन और रोजगार नहीं बढ़ते, फलतः कीमतें बढ़ती हैं। अतः इस स्थिति में मौद्रिक आय बढ़ती है, वास्तविक आय नहीं बढ़ती है।
Bihar Board 12th Business Economics Important Questions Long Answer Type Part 4, 1
उपरोक्त चित्र में AS कुल पूर्ति वक्र तथा AD कुल माँग वक्र है। प्रारम्भिक स्थिति में माना संतुलन पूर्ण रोजगार आय के स्तर अर्थात् OZ पर होता है। माना अर्थव्यवस्था की कुल माँग AD से बढ़कर AD1 हो जाता है और नया संतुलन बिन्दु G के स्थान पर E हो जाता है। अर्थव्यवस्था में OZ आय स्तर पर पूर्ण रोजगार की स्थिति विद्यमान है। अतः अब रोजगार का स्तर नहीं बढ़ सकता। मौद्रिक आय बढ़ने से कीमत स्तर में वृद्धि हो जाती है। FG अर्थव्यवस्था में अत्यधिक माँग का स्तर है। इसे हम स्फीतिक अंतराल भी कहते हैं।

सरकार तीन प्रकार की नीतियों द्वारा अतिरिक्त माँग पर नियंत्रण रख पाने में सफल हो सकती है-
1.मौद्रिक नीति (Monetary Policy)- मौद्रिक नीति में केन्द्रीय बैंक द्वारा संपन्न किए जाने वाले कार्य आते हैं जिनके माध्यम से मौद्रिक अधिक मुद्रा तथा साख नियंत्रण रखने में सफल होता है।

(a) बैंक मदा पर नियंत्रण- केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों द्वारा किए जाने वाले साख निर्माण पर नियंत्रण रखने के लिए अपनी बैंक दर नीति (bank rate policy), खुली बाजार प्रक्रियाएँ (Open market operations), साख की राशनिंग (Rationing of credit), न्यूनतम नकद कोष में परिवर्तन (Variation in reserve requirements) आदि रीतियों का प्रयोग कर सकता है। जब मुद्रा अधिकारी केवल कुछ बैंकों अथवा विशेष प्रकार के लेन-देन पर ही नियंत्रण लगाना पर्याप्त समझता है तो साख नियंत्रण की गुणात्मक रीतियाँ (Qualitative methods of credit control) का प्रयोग किया जाता है।

अतिरेक माँग को अर्थात् उपभोग को हतोत्साहित कर बचत प्रोत्साहित करनी चाहिए। बचत को प्रोत्साहन देने के लिए ब्याज की दर में वृद्धि करनी चाहिये। इससे आवश्यक निवेश स्वयं ही हतोत्साहित हो जाता है।

2. राजकोषीय नीति (Fiscal Policy)- इस श्रेणी में सरकार के वे सभी वित्त संबंधी कार्य आते हैं जो प्रचलन में मुद्रा की मात्रा कम करने में सहायक होते हैं। मुद्रा स्फीति पर नियंत्रण लगाने के लिए करों में वृद्धि करनी चाहिये जिससे उपभोग व्यय में कमी हो। सरकारी व्यय में कमी करनी चाहिए। इससे सरकार को घाटे के स्थान पर बेशी (Surplus) का बजट होना चाहिए। सरकार को अधिकाधिक मात्रा में जनता से ऋण लेकर उन्हें उत्पादक कार्यों पर व्यय करना चाहिए। सरकार को अपनी राजकोषीय नीति के द्वारा उपभोग को हतोत्साहित और बचत को प्रोत्साहित करना चाहिये।

3. अन्य उपाय (Other Measures)- मुद्रा स्फीति को रोकने के अन्य उपायों में विशेष रूप से दो अधिक महत्वपूर्ण हैं-प्रथम उत्पादन में वृद्धि तथा द्वितीय व्यापार कीमतों पर नियंत्रण रखना।

  • उत्पादन बढ़ाने की दिशा में सरकार को हर संभव प्रयास करना चाहिये।
  • घरेलू संसाधनों की माँग का सही अनुमान लगाने के लिए कुल माँग में से आयात माँग को घटाना पड़ता है।
  • अतिरेक माँग को कम करने का एक अन्य प्रत्यक्ष उपाय यह है कि मजदूरी की दरों पर नियंत्रण रखा जाए।

प्रश्न 5.
किसी वस्तु की माँग को निर्धारित करने वाले कारकों को समझाइये।
उत्तर:
किसी वस्तु की माँग को निर्धारित करने वाले कारक (Factors determining the demand for a commodity)- किसी वस्तु की माँग को निर्धारित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

(i) वस्तु की कीमत (Price of a commodity)- सामान्यतः किसी वस्तु की माँग की मात्रा उस वस्तु की कीमत पर आश्रित होती है। अन्य बातें पूर्ववत् रहने पर कीमत कम होने पर वस्तु की मांग बढ़ती है और कीमत के बढ़ने पर माँग घटती है। किसी वस्तु की कीमत और उसकी माँग में विपरीत सम्बन्ध होता है।

(ii) संबंधित वस्तुओं की कीमतें (Prices of related goods)- संबंधित वस्तुएँ दो प्रकार की होती हैं-
पूरक वस्तुएँ तथा स्थानापन्न वस्तुएँ- पूरक वस्तुएँ वे वस्तुएँ होती हैं जो किसी आवश्यकता को संयुक्त रूप से पूरा करती हैं और स्थानापन्न वस्तुएँ वे वस्तुएँ होती हैं जो एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग की जा सकती हैं। पूरक वस्तुओं में यदि एक वस्तु की कीमत कम हो जाती है तो उसकी पूरक वस्तु की माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत यदि स्थानापन्न वस्तुओं में किसी एक की कीमत कम हो जाती है तो दूसरी वस्तु की माँग भी कम हो जाती है।

(iii) उपभोक्ता की आय (Income of Consumer)- उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर सामान्यतया उसके द्वारा वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है।

आय में वृद्धि के साथ अनिवार्य वस्तुओं की माँग एक सीमा तक बढ़ती है तथा उसके बाद स्थिर हो जाती है। कुछ परिस्थितियों में आय में वृद्धि का वस्तु की माँग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसा खाने-पीने की सस्ती वस्तुओं में होता है। जैसे नमक आदि।

विलासितापूर्ण वस्तुओं की माँग आय में वृद्धि के साथ-साथ लगातार बढ़ती रहती है।
घटिया (निम्नस्तरीय) वस्तुओं की माँग आय में वृद्धि साथ-साथ कम हो जाती है लेकिन सामान्य वस्तुओं की माँग आय में वृद्धि के साथ बढ़ती है और आय में कमी से कम हो जाती है।

(iv) उपभोक्ता की रुचि तथा फैशन (Interest of Consumer and Fashion)- परिवार या उपभोक्ता की रुचि भी किसी वस्तु को खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है। यदि पड़ोसियों के पास कार या स्कूटर है तो प्रदर्शनकारी प्रभाव के कारण एक परिवार की कार या स्कूटर की माँग बढ़ सकती है।

(v) विज्ञापन तथ प्रदर्शनकारी प्रभाव (Advertisement and Demonstration Effect)- विज्ञापन भी उपभोक्ता को किसी विशेष वस्तु को खरीदने के लिए प्रेरित कर सकता है। यदि पड़ोसियों के पास कार या स्कूटर है तो प्रदर्शनकारी प्रभाव के कारण एक परिवार की कार या स्कूटर की माँग बढ़ सकती है।

(vi) जनसंख्या की मात्रा और बनावट (Quantity and Composition of population) अधिक जनसंख्या का अर्थ है परिवारों की अधिक संख्या और वस्तुओं की अधिक माँग। इसी प्रकार जनसंख्या की बनावट से भी विभिन्न वस्तुओं की माँग निर्धारित होती है।

(vii) आय का वितरण (Distribution of Income)- जिन अर्थव्यवस्था में आय का वितरण सामान है वहाँ वस्तुओं की माँग अधिक होगी तथा इसके विपरीत जिन अर्थव्यवस्था में आय का वितरण असमान है, वहाँ वस्तुओं की माँग कम होगी।

(viii) जलवायु तथा रीति-रिवाज (Climate and Customs)- मौसम, त्योहार तथा विभिन्न परंपराएँ भी वस्तु की माँग को प्रभावित करती हैं। जैसे-गर्मी के मौसम में कूलर, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक आदि की माँग बढ़ जाती है।

प्रश्न 6.
माँग की लोच को निर्धारित करने वाले कारक समझाएँ।
उत्तर:
माँग की लोच को निर्धारित करने वाले कारक (Factors determining the elasticity of demand)- माँग की लोच को निर्धारित करने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं-
(i) प्रतिस्थापन वस्तुओं की उपलब्धता (Availability of substitute goods)- यदि किसी वस्तु की बहुत सी प्रतिस्थापन वस्तुएँ बाजार में उपलब्ध हैं तो उसकी माँग लोचदार होगी। इसके विपरीत उत्तम प्रतिस्थापन वस्तुओं के अभाव में माँग बेलोचदार होगी। जैसे-नमक की माँग इसलिए अधिक बेलोचदार है, क्योंकि उसकी अच्छी प्रतिस्थापन्न वस्तु नहीं है।

(ii) वस्तु की प्रकृति (Nature of goods)- अनिवार्य वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है जबकि विलासितापूर्ण या आरामदायक वस्तुओं की माँग लोचदार होती है।

(iii) वस्तु के विविध उपयोग (Different Uses of Goods)- यदि किसी वस्तु का प्रयोग एक से अधिक कार्यों में किया जाता है तो उसकी माँग लोचदार होगी क्योंकि कीमत बढ़ने पर उपभोक्ता उस वस्तु का प्रयोग केवल आवश्यकता पड़ने पर ही करेगा। जैसे-बिजली, ऐलुमिनियम।

(iv) उपभोग का स्थगन (Postponement of the use)- जिन वस्तुओं के उपभोग को भविष्य के लिए स्थगित किया जा सकता है, उनकी माँग बेलोचदार (inelastic) होती है, इसके विपरीत जिन वस्तुओं की माँग को भविष्य के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता, उनकी माँग बेलोचदार होती है।

(v) उपभोक्ता की आय (Income of the Consumer)- जिन लोगों की आय बहुत अधिक या कम होती है उनके द्वारा माँगी जाने वाली वस्तुओं की माँग साधारणतया बेलोचदार होती है। इसके विपरीत, मध्यम वर्ग के लोगों द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं की माँग लोचदार होती है।

(vi) उपभोक्ता की आदत (Habit of the Consumer)- लोगों को जिन वस्तुओं की आदत पड़ जाती है जैसे-पान, सिगरेट, चाय आदि इनकी माँग बेलोचदार होती है। इन वस्तुओं की कीमत बढ़ने पर भी एक उपभोक्ता इसकी माँग को कम नहीं कर पाता।

(vii) किसी वस्तु पर खर्च की जाने वाली आय का अनुपात (Proportion of incomes spent on the purchase of commodity)- एक उपभोक्ता जिन वस्तुओं पर अपनी आय का बहुत थोड़ा भाग खर्च करता है जैसे-अखबार, टूथपेस्ट, सुइयाँ आदि इनकी माँग बेलोचदार (inelastic) होती है इसके विपरीत एक उपभोक्ता जिन वस्तुओं पर अपनी आय का अधिक भाग व्यय करता है, उसकी माँग लोचदार (elastic) होती है।

प्रश्न 7.
माँग की लोच का महत्त्व लिखें।
उत्तर:
माँग की लोच का महत्त्व (Importance of elasticity of demand)- माँग की लोच का महत्व निम्नलिखित कारणों में है-
(i) एकाधिकारी के लिए उपयोगी (Useful for monopolist)- अपने उत्पादन के मूल्य निर्धारण में एकाधिकारी माँग की लोच का ध्यान रखता है। एकाधिकारी का मख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। वह उस वस्तु का मूल्य उस वर्ग के लिए कम रखेगा जिसकी माँग अधिक लोचदार है और उस वर्ग के लिए अधिक रखेगा जिस वर्ग के लिए वस्तु की माँग बेलोचदार है।

(ii) वित्त मंत्री के लिए उपयोगी- माँग की लोच वित्त मंत्री के लिए भी उपयोगी है। वित्त मंत्री कर लगाते समय माँग की लोच को ध्यान में रखेगा। जिस वस्तु की माँग अधिक लोचदार होती है उस पर कम दर से कम कर लगाकर अधिक धनराशि प्राप्त करता है। इसके विपरीत वह उन वस्तुओं पर अधिक कर लगाएगा जिन वस्तुओं की माँग की लोच कम है।”

(iii) साधन कीमत के निर्धारण में सहायक (Helpful in determining the price of factors)- उत्पादक प्रक्रिया में साधनों को मिलने वाले प्रतिफल की स्थिति इसके द्वारा स्पष्ट होती है वे साधन जिनकी माँग बेलोचदार होती है, लोचदार माँग वाले साधनों की तुलना में अधिक कीमत प्राप्त करते हैं।

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में उपयोगी (Useful in international trade)- माँग की लोच की जानकारी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में बहुत ही सहायक है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में निर्यात की जाने .वाली जिन वस्तुओं की माँग विदेशों में बेलोचदार है उनकी कीमत अधिक रखी जाएगी और जिन वस्तुओं की माँग विदेशों में बेलोचदार है उनकी कीमत अधिक रखी जाएगी।

(v) निर्धनता का विरोधाभास (Paradox of Poverty)- कई वस्तुओं की फसल बहुत अच्छी होने पर भी उनसे प्राप्त होने वाली आय बहुत कम होती है। इसका अर्थ यह है कि किसी वस्तु के उत्पादन में वृद्धि होने से आय बढ़ने के स्थान पर कम हो गई। इस अस्वाभाविक अवस्था को ही निर्धनता का विरोधाभास कहते हैं। इसका कारण यह है कि अधिकतर कृषि पदार्थों की माँग बेलोचदार होती है। इन वस्तुओं की पूर्ति के बढ़ने पर कीमत में काफी कमी आती है तो भी इनकी माँग में विशेष वृद्धि नहीं हो पाती। इसलिए इनकी बिक्री से प्राप्त कुल आय पहले की तुलना में कम हो जाती है।

(vi) राष्ट्रीयकरण की नीति के लिये महत्त्वपूर्ण (Important for the policy of nationalisation)- राष्ट्रीयकरण की नीति से अभिप्राय है कि सरकार का निजी क्षेत्र के उद्योगों का स्वामित्व, नियन्त्रण तथा प्रबंध स्वयं अपने हाथों में लेना। जिन उद्योगों में उत्पादित वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है, उनकी कीमत में बहुत अधिक वृद्धि किये जाने पर भी उनकी माँग में विशेष कमी नहीं आती। यदि ऐसे उद्योग निजी क्षेत्र में रहते हैं तो उन उद्योगों के स्वामी अपनी उत्पादित वस्तुओं की अधिक कीमत लेकर जनता का शोषण कर सकते हैं। जनता को उनके शोषण से बचाने के लिए सरकार उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है।

(vii) कर लगाने में सहायक (Helpful in imposing taxes)- कर लगाते समय सरकार वस्तु की माँग लोच को ध्यान में रखती है।

प्रश्न 8.
पूर्ण प्रतियोगी श्रम बाजार में मजदूरी का निर्धारण कैसे किया जाता है ?
उत्तर:
पूर्ण प्रतियोगी श्रम बाजार में मजदूरी का निर्धारण (Determination of wage in Perfectly Competitive Labour Market)- श्रम बाजार में परिवार श्रम की पूर्ति करते हैं और श्रम की माँग फर्मों द्वारा की जाती है। श्रम से अभिप्राय श्रमिकों द्वारा किए गए काम के घंटों से है न कि श्रमिकों की संख्या से। श्रम बाजार में मजदूरी का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ पर माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र आपस में काटते हैं।

मजदूरी निर्धारण में हम यह मान लेते हैं कि श्रम ही केवल परिवर्तनशील उत्पादन का साधन है तथा मजदूर बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता है अर्थात् प्रत्येक फर्म के लिए मजदूरी दी गई है। प्रत्येक फर्म का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना है। हम यह भी मानकर चलते हैं कि फर्म की उत्पादन तकनीक दी गई है और उत्पाद का ह्रासमान नियम लागू है।

जैसा कि प्रत्येक फर्म का उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना है, अत: फर्म उस बिन्दु तक श्रमिकों की नियुक्ति करती रहेगी जब तक अन्तिम श्रम पर होने वाला अतिरिक्त (Extra) व्यय उस श्रम से प्राप्त अतिरिक्त लाभ के समान नहीं होता। एक अतिरिक्त श्रम के लगाने की अनि मजदूरी पर (W) कहलाती है और एक अतिरिक्त मजदूर के लगाने से प्राप्त आय उस श्रम की सीमान्त उत्पादकता (MPL) कहलाती है। उत्पाद की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के बचने से प्राप्त होने वाली आय सीमान्त आय (आगम) कहलाती है। फर्म उस बिन्दु तक श्रम को लगाती है,

जहाँ
W = MRPL
यहाँ MRPL = MR x MPL

प्रश्न 9.
परिवर्तनशील साधन के प्रतिफल तथा पैमाने के प्रतिफल में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परिवर्तनशील साधन के प्रतिफल तथा पैमाने के प्रतिफल में निम्नलिखित अन्तर है-
परिवर्तनशील साधन के प्रतिफल:

  1. उत्पादन के चारों साधनों के एक निश्चित अनुपात में वृद्धि करने से कुल उत्पादन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन पैमाने के प्रतिफल के अन्तर्गत किया जाता है।
  2. यह नियम दीर्घकाल में लागू होता है।
  3. इसमें उत्पत्ति के चारों साधन परिवर्तन शील हैं।
  4. चारों साधनों में अनुपात स्थिर रहता है।
  5. उत्पादन का पैमाना बदल जाता है।
  6. पैमाने के वर्द्धमान प्रतिफल-चारों साधनों में एक निश्चित अनुपात में वृद्धि करने से कुल उत्पादन उस अनुपात से अधिक बढ़ता है।
  7. पैमाने के ह्रासमान प्रतिफलः चारों साधनों में एक निश्चित अनुपात में वृद्धि करने से कुल उत्पादन उस अनुपात से कम बढ़ता है।

पैमाने के प्रतिफल:

  1. अन्य साधनों को स्थिर रखकर किसी एक परिवर्तनशील साधन की इकाई में वृद्धि करने से कुल उत्पादन का क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन परिवर्तनशील साधन के प्रतिफल के अन्तर्गत किया जाता है।
  2. यह नियम अल्पकाल में लागू होता है।
  3. इसमें एक साधन परिवर्तनशील है जबकि अन्य साधन स्थिर हैं।
  4. परिवर्तनशील तथा स्थिर साधनों में अनुपात बदला जाता है।
  5. उत्पादन के पैमाने में कोई परिवर्तन नहीं होती।
  6. उत्पत्ति वृद्धि नियमः अन्य साधनों को स्थिर रखकर श्रम की इकाइयों में वृद्धि करने पर कुल उत्पादन बढ़ती हुई दर से बढ़ता है तथा औसत और सीमान्त उत्पादन बढ़ते हैं।
  7. उत्पत्ति वृद्धि नियमः अन्य साधनों को स्थिर रखकर श्रम की इकाइयों में वृद्धि करने पर कुल उत्पादन घटती हुई दर से बढ़ता है तथा औसत और सीमान्त उत्पादन घटता है।

प्रश्न 10.
तीन विभिन्न विधियों की सूची बनाइए जिसमें अल्पाधिकारी फर्म व्यवहार कर सकता है।
उत्तर:
तीन विभिन्न विधियाँ (Three different ways)- नीचे तीन विभिन्न विधियाँ दी गई हैं जिनमें अल्पाधिकार फर्म व्यवहार कर सकती हैं-

1. द्वि-अधिकारी फर्म आपस में सांठ-गांठ करके यह निर्णय ले सकती हैं कि वे एक दूसरे से स्पर्धा नहीं करेंगे और एक साथ दोनों फर्मों के लाभ को अधिकतम स्तर तक ले जाने का प्रयत्न करेंगे। इस स्थिति में दोनों फर्मे एकल एकाधिकारी की तरह व्यवहार करेंगी जिनके पास दो अलग-अलग वस्तु उत्पादन करने वाले कारखाने होंगे।

2. दो फर्मों में प्रत्येक यह निर्णय ले सकती है कि अपने लाभ को अधिकतम करने के लिये वह वस्तु की कितनी मात्रा का उत्पादन करेंगी। यहाँ यह मान लिया जाता है कि उनकी वस्तु की मात्रा की पूर्ति को कोई अन्य फर्म प्रभावित नहीं करेंगी।

3. कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है अल्पाधिकार बाजार संरचना में वस्तु की अनन्य पहुँचेगा, क्योंकि इस स्तर पर सीमांत संप्राप्ति और सीमांत लागत समान होंगे और निर्गत में वृद्धि के लाभ से किसी प्रकार की वृद्धि नहीं होगी।

दूसरी ओर यदि फर्म प्रतिशत से अधिक मात्रा में निर्गत का उत्पादन करती है तो सीमांत लागत सीमांत संप्राप्ति से अधिक होती है। अभिप्राय यह है कि निर्गत की एक इकाई कम करने से कुल लागत में जो कमी होती है, वह इसी कमी के कारण कुल संप्राप्ति में हुई हानि से अधिक होती है। अतः फर्म के लिए यह उपयुक्त है कि वह निर्गत में कमी लाए। यह तर्क तब तक समीचीन होगा जब तक सीमांत लागत वक्र सीमांत संप्राप्ति वक्र के ऊपर अवस्थित और फर्म अपने निर्गत संप्राप्ति के मूल्य समान हो जाएँगे और फर्म अपने निर्गत में कमी को रोक देगी।

फर्म अनिवार्य रूप से प्रतिशत निर्गत स्तर पर पहुँचती है। अतः इस स्तर को निर्गत स्तर का संतुलन स्तर कहते हैं। निर्गत का यह संतुलन स्तर उस बिन्दु के संगत होता है जहाँ सीमांत संप्राप्ति सीमांत लागत के बराबर होती है। इस समानता को एकाधिकारी फर्म द्वारा उत्पादित निर्गत के लिये संतुलन की शर्त कहते हैं।

प्रश्न 11.
एक फर्म की कुल स्थिर लागत, कुल परिवर्तनशील. लागत तथा कुल लागत क्या हैं ? ये आपस में किस प्रकार संबंधित हैं ?
उत्तर:
(i) कुल स्थिर लागत (Total Fixed Cost)- बेन्हम के अनुसार एक फर्म की स्थिर लागतें वे लागतें होती हैं, जो उत्पादन के आकार के साथ परिवर्तित नहीं होती। ये लागतें सदैव स्थिर रहती हैं। इनका संबंध उत्पादन की मात्रा के साथ नहीं होता अर्थात् उत्पादन की मात्रा के घटने या बढ़ने का इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। स्थिर लागतों में भूमि अथवा फैक्टरी, इमारत का किराया, बीमा व्यय, लाइसेंस, फीस, सम्पत्ति कर आदि लागतें शामिल होती हैं। स्थिर लागतों को अप्रत्यक्ष कर भी कहा जाता है।
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बगल के चित्र द्वारा स्थिर लागत को दर्शाया गया है।

(ii) कुल परिवती लागत (Total Variable Cost)- कुल परिवर्ती (अथवा परिवर्तनशील) लागतें वे लागतें हैं जो उत्पाद के आकार के साथ घटती बढ़ती रहती हैं। ये लागतें उत्पादन की मात्रा के साथ बढ़ती हैं और उत्पादन के घटने पर घटती हैं। कच्चा माल, बिजली, ईंधन, परिवहन आदि पर होने वाले व्यय परिवर्ती लागतें कहलाती हैं। बेन्हम के अनुसार, “एक फर्म की परिवर्ती लागतों में वे लागतें शामिल की जाती हैं जो उसके उत्पादन के आकार के साथ परिवर्तित होती हैं।” कुल परिवर्ती लागतों के सम्बन्ध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि आरम्भ में ये लागतें घटती दर से बढ़ती हैं, परन्तु एक सीमा के बाद वे बढ़ती हुई दर से बढ़ती हैं। कुल परिवर्ती लागतों को ऊपर के चित्र द्वारा दर्शाया गया है।
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(iii) कुल लागत (Total Cost)- कुल लागत कुल स्थिर लागत तथा कुल परिवर्ती लागत का योग होती है। कुल लागत से अभिप्राय किसी वस्तु के उत्पादन पर होने वाले कुल व्यय से है। उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर उत्पादन की कुल लागत में भी परिवर्तन हो जाता है।
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कुल परिवर्ती लागत, कुल स्थिर लागत तथा कुल लागत का पारस्परिक सम्बन्ध (Interrelationship between Total Variable Costs. Total Fixed Costs and Total Costs) कुल परिवर्ती लागतों, कुल स्थिर लागतों तथा कुल लागतों के आपसी सम्बन्धों को ऊपर चित्र द्वारा दर्शाया गया है।

चित्र से पता चलता है कि कुल लागत, कुल स्थिर लागत तथा कुल परिवर्ती लागत के योग हैं। उत्पादन के शून्य स्तर पर कुल लागत तथा स्थिर लागत बराबर होती है। परिवर्तनशील लागतों के बढ़ने से कुल लागतें बढ़ती हैं।

प्रश्न 12.
आर्थिक क्रियाओं के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आर्थिक क्रियाएँ वैसी क्रियाएँ हैं जिनसे आय के रूप में धन की प्राप्ति होती है। इसके विभिन्न प्रकार होते हैं, जो निम्नलिखित हैं-
(i) व्यवसाय- व्यवसाय के अंतर्गत उन सभी मानवीय आर्थिक क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन एवं वितरण के लिए की जाती है और जिनका उद्देश्य लाभ कमाना होता है तथा जो निजी अथवा सार्वजनिक संस्थाओं के माध्यम से स्वतंत्रतापूर्वक एवं नियमित रूप से की जाती है।।

(ii) पेशा- पेशा वह धन्धा है जिसमें एक व्यक्ति अपने विशिष्ट ज्ञान और प्रशिक्षण के आधार पर अन्य व्यक्तियों की व्यक्तिगत सेवा करता है। जैसे-एक डॉक्टर अपनी योग्यता एवं अनुभव के आधार पर रोग का पता करता है और उसका उपचार करता है। .

(iii) रोजगार या नौकरी- वे व्यक्ति रोजगार या नौकरी में आते हैं जो एक विशिष्ट समझौते के अधीन मासिक, साप्ताहिक अथवा दैनिक वेतन पाते हैं तथा किसी व्यक्ति अथवा संस्था के अधीन व उनके निर्देशन में काम करते हैं। यह नौकरी अथवा सेवा सरकारी भी हो सकती है अथवा निजी भी। पेशेवर व्यक्ति भी नौकरी कर सकते हैं और गैर-पेशेवर भी।

प्रश्न 13.
वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है ? इसकी कठिनाइयाँ बताइए।
उत्तर:
वस्तु विनिमय प्रणाली को अदला-बदली भी कहते हैं। वस्तुओं की वस्तुओं के साथ प्रत्यक्ष अदल-बदल की प्रणाली को वस्तु विनिमय या अदल-बदल कहते हैं। मुद्रा के माध्यम के बिना एक वस्तु अथवा सेवा का दूसरी वस्तु अथवा सेवा के साथ-साथ सीधा विनिमय ही अदल-बदल अथवा वस्तु-विनिमय कहलाता है।

दूसरे शब्दों में वस्तु विनिमय प्रणाली वह प्रणाली है जिनमें वस्तु का वस्तु द्वारा ही लेनदेन होता है और विनिमय का कोई सर्वमान्य माध्यम नहीं होता।

प्रो० आर० पी० केन्ट के शब्दों में वस्तु विनिमय मुद्रा का विनिमय माध्यम के रूप में प्रयोग किए. बिना वस्तुओं के लिए प्रयत्न विनिमय है।

इसके प्रमुख दोष निम्न हैं-

  • दोहरे संयोग का अभाव- वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत विनिमय केवल उसी समय संभव हो सकता है जबकि व्यक्तियों के पास एक-दूसरे की आवश्यकता की वस्तु हो और साथ ही वे आपस में एक-दूसरे से बदलने को तैयार हो परन्तु ऐसा संयोग सदैव संभव नहीं है।
  • संचय में कठिनाई- वस्तु विनिमय प्रणाली में एक प्रमुख कठिनाई यह है कि भविष्य के लिए विनिमय शक्ति संचय नहीं किया जा सकता क्योंकि अधिकांश वस्तुएँ क्षयशील प्रकृति की होती है।
  • सर्वमान्य मूल्य मापक का अभाव- वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत मूल्य का कोई मानक न होने के कारण विनिमय की जानेवाली वस्तु का मूल्य निश्चित करना एक कठिन काम है।
  • वस्तु विभाजन में कठिनाई- विनिमय होनेवाली वस्तुओं में कुछ वस्तुएँ ऐसी होती है जिनका विभाजन नहीं किया जा सकता।
  • मूल्य हस्तान्तरण का अभाव- वस्तु विनिमय में मूल्य या क्रयशक्ति के स्थानान्तरण में बहुत कठिनाई होती है।
  • भावी भुगतान का अभाव- बहुत सी वस्तुओं का क्रय-विक्रय ऐसे होता है जिनका भुगतान तुरन्त न होकर भविष्य में किया जाता है परन्तु वस्तु-विनिमय प्रणाली में ऐसा संभव नहीं था क्योंकि वस्तु-विनिमय प्रणाली में सभी वस्तुओं के मूल्य में स्थिरता का अभाव था इसलिए एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु का विनिमय के समय ही लेना अथवा देना आवश्यक होता था।

प्रश्न 14.
दोहरी गणना की समस्या से क्या अभिप्राय है ? इस समस्या से कैसे बचा जा सकता है ? उदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर:
राष्ट्रीय आय की गणना के लिए जब किसी वस्तु या सेवा के मूल्य की गणना एक से अधिक बार होती है, तो उसे दोहरी गणना कहते हैं। दोहरी गणना के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय बहुत अधिक हो जाती है। दोहरी गणना की समस्या को निम्न उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है-

मान लीजिए एक किसान 500 रुपये के गेहूँ का उत्पादन करता है और उसे आटा मिल को बेच देता है। आटा मिल द्वारा गेहूँ की खरीद मध्यवर्ती उपभोग व्यव है। आटा मिल गेहूँ से आटे का उत्पादन करने के बाद उस आटे को बेकरी को 700 रुपये में बेच देती है। बेकरी के लिए आटे पर व्यव मध्यवर्ती उपभोग पर व्यव है। बेकरी वाला आटे से बिस्कुट का निर्माण करके 900 रुपये के बिस्कुट उपभोक्ताओं को बेच देता है।

जहाँ तक किसान आटा मिल और बेकरी वाले का संबध है। उत्पादन को मूल्य 500 + 700 + 900 = 2100 रुपये हैं, क्योंकि प्रत्येक उत्पादन जब वस्तु बेचता है। उसे अन्तिम मानता है। लेकिन आटे के मूल्य में गेहूँ का मूल्य शामिल है और बिस्कुट के मूल्य में गेहूँ का मुल्य तथा आटे मिल की सेवाओं का मूल्य शामिल है। इस प्रकार गेहूँ के मूल्य की तीन बार और आटा मिल की सेवाओं की दो बार गणना होती है। अतः एक वस्तु या सेवा के मूल्य की गणना जब एक से अधिक बार होती है तो इसे दोहरी गणना कहते हैं।

मूल्य वृद्धि विधि द्वारा दोहरी गणना की समस्या से बचा जा सकता है। या दोहरी गणना से बचने के लिए हमें अंतिम वस्तुएँ के मूल्य को ही राष्ट्रीय आय में शामिल करना चाहिए।

प्रश्न 15.
निवेश गुणक की परिभाषा दें। निवेश गुणक तथा उपभोग की सीमान्त प्रवृत्ति में क्या सम्बन्ध हैं ?
उत्तर:
निवेश में वृद्धि के फलस्वरूप राष्ट्रीय आय वृद्धि के अनुपात को निवेश गुणक कहते हैं।
Bihar Board 12th Business Economics Important Questions Long Answer Type Part 4, 5
संक्षेप में निवेश गुणक से आशय निवेश में परिवर्तन और आय में परिवर्तन के अनुपात से है।

  • वेंज- के अनुसार, “निवेश गुणक से ज्ञात होता है कि जब कुल निवेश में वृद्धि की जाती है तो आय में जो वृद्धि होगी वह निवेश में होने वाली वृद्धि से K गुणा अधिक होगी।”
  • डिल्लर्ड- के अनुसार, “निवेश में की गयी वृद्धि के फलस्वरूप आय में होने वाली वृद्धि के अनुपात को निवेश गुणक कहा जाता है।”
  • निवेश गुणक तथा उपभोग की सीमांत प्रवृति में संबंध- निवेश गुणक का सीमांत उपयोग प्रवृति (MPC) से प्रत्यक्ष संबंध है। MPC के बढ़ने से निवेश गुणक बढ़ता है तथा कम होने से कम होता है।

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