Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 19 कपड़ों का निर्माण

Bihar Board Class 11 Home Science कपड़ों का निर्माण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कताई प्रकार की होती है – [B.M.2009A]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

प्रश्न 2.
धागे को तंतुओं के आधार पर बाँटा गया है –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

प्रश्न 3.
ताने के आप-पार बुने जाने वाले धागे को कहते हैं –
(क) ताने (Warp)
(ख) बाने (Weft)
(ग) फेल्टिंग (Felting)
(घ) निटिंग (Knitting)
उत्तर:
(ग) फेल्टिंग (Felting)

प्रश्न 4.
धागे से कपड़ा बनाने की प्रमुख विधियाँ हैं –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ग) चार

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प्रश्न 5.
साटिन बुनाई में तंतुओं (Filament) का प्रयोग किया जाता है –
(क) लंबा
(ख) छोटा
(ग) मोटा
(घ) गोलाकार
उत्तर:
(क) लंबा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सूत (Yam) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
अनेक तन्तुओं को एक साथ खींच कर ऐंठने से जो अविरल धागा बनाया जाता है, उसे सूत कहते हैं।

प्रश्न 2.
कताई (Spinning) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
कताई तन्तुओं के समूह में से धागा खींचकर व ऐंठन देते हुए अविरल सूत प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 3.
यान्त्रिक कताई के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
यान्त्रिक कताई (Mechanical Spinning): यान्त्रिक कताई अधिकतर प्राकृतिक तन्तुओं से की जाती है, जैसे-सूती, ऊनी व रेशमी तन्तुओं की कताई यान्त्रिक विधि से होती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

  • कच्चे माल की सफाई (Opening and cleaning of raw material) ।
  • धुनाई व कंघी करना (Carding and combing)।
  • कताई (Spinning)।
  • खींचना व ऐंठन देना।

प्रश्न 4.
सूत कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर:
सूतों के प्रकार (Types of Yam):
1. साधारण सूत (Simple Yarm):

  • इकहरा सूत (Simple Standard Yarm)
  • दोहरा सूत (Two Ply or Cable yam)
  • डोरिया सूत ।

2. सम्मिश्रित सूत (Complex or Novelty Yam)।

प्रश्न 5.
सम्मिश्रित सूत (Novelty or Complex Yarm) किसे कहते हैं ?
उत्तर;
दो या अधिक सूतों को मिलाकर बनने वाले सूत को सम्मिश्रित सूत कहते हैं। इससे बनने वाले वस्त्र में भी इन सभी धागों के गुण पाए जाते हैं।

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प्रश्न 6.
वस्त्र निर्माण की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ? उनके नाम बताएँ।
उत्तर:

  • करघे पर बुनाई (Weaving)।
  • सिलाई द्वारा बुनाई (Knitting)।
  • दबाकर वस्त्र बनाना (Felting)।

प्रश्न 7.
‘कताई’ (Spinning) की पहली अवस्था क्या होती है ?
उत्तर:
कताई की पहली अवस्था खोलना तथा सफाई करना है।

प्रश्न 8.
फेल्टिंग (Felting) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
फेल्टिंग से अभिप्राय, तन्तुओं के जुड़ने से है। यह एक प्रकार की कपड़े की बुनाई है, जिससे कम्बल, नमदा आदि बनाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
‘ताना बाना’ (Wasp & Weft) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कपड़े की बुनाई करघे पर की जाती है। लम्बाई की ओर जो धागा जाता है, उसे ‘ताना’ और चौड़ाई की ओर से जाने वाले धागे को ‘बाना’ कहते हैं। दोनों ओर से इन्हीं धागों को आपस में गूंथने की प्रक्रिया के द्वारा ही कपड़े का निर्माण होता है।

प्रश्न 10.
उस बुनाई का नाम बताएं जिससे सस्ता व चमकीला (Lumstrous) कपड़ा बनाया जा सके।
उत्तर:
साटिन बुनाई (Satin Weave)।

प्रश्न 11.
अन्तर बताएं:
(क) सिलाई द्वारा बुनाई (Knitting) व लेस बनाना (Lace making)।
(ख) बुनाई (Weaving) फेल्टिंग बनाना (Felting)।
उत्तर:
(क) सिलाई द्वारा बुनाई
1. लूप बनाना
(Looping)

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2. लेस बनाना
गाँठ लगाना (knotting)

(ख) बुनाई

  1. इन्टर लेसिंग (Interlacing)
  2. फेल्टिंग तन्तुओं का जोड़ना आर्द्र गर्मी द्वारा

प्रश्न 12.
तन्तु और सूत (Fibre and Yarm) में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
तन्तु सूत निर्माण की छोटी-से-छोटी इकाई है जबकि सूत में कई सारे तन्तु होते हैं। अनेक तन्तुओं को एक साथ ऐंठने से जो अविरल धागा बनता है, सूत कहलाता है।

प्रश्न 13.
एक व्यापारी धागे में ऐंठन देना भूल गया था। उसका सूत (Yarm) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
धागे में ऐंठन न देने से कमजोर सूत (weak yarm) बनेगा । ऐंठन से सूत में मजबूती आती है।

प्रश्न 14.
कपड़ा बुनने की दो प्रक्रियाओं के नाम लिखें । इनका कपड़े के गुणों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
1. सिलाई द्वारा बुनना (Knitting)
2. बुनाई (Weaving)।

कपड़े के गुणों पर प्रभाव :
1. बुनाई (Weaving):
(क) मजबूत सूत
(ख) विभिन्न प्रकार के डिजाइन बनाए जा सकते हैं।

2. सिलाई द्वारा बुनना (Knitting):
(क) रिब प्रभाव (Rib Effect)
(ख) लचीलापन (Elasticity)
(ग) बनावट (Shape) जल्दी खराब हो जाती है।
(घ) कम मजबूत होता है (Less strong)।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रेशे से धागे का निर्माण (Construction of yarn from fibre) किस प्रकार होता. है ?
उत्तर:
रेशे से धागे का निर्माण-सभी रेशों की लम्बाई एक-दूसरे से भिन्न होती है, कुछ बहुत छोटे तथा कुछ लम्बे होते हैं। छोटे रेशों को स्टेपल कहते हैं। अधिकतर प्राकृतिक रेशे स्टेपल (Staple) ही होते हैं। कृत्रिम रेशों को काट-काट कर छोटा कर लिया जाता है। छोटे-छोटे रेशों से बने वस्त्रों के अलग ही प्रकार के गुण होते हैं। लम्बे रेशों को फिलामेंट (Filament) कहते हैं। इससे बने धागे अपेक्षाकृत चिकने होते हैं क्योंकि उनकी सतह पर कम संख्या में रेशों के सिरे रहते हैं।

चिकनी, सीधी तथा यथाक्रम सतह होने के कारण, ऐसे लम्बे फिलामेंट से निर्मित धागों में चमक आ जाती है। चिकनी सतह के कारण धूलकण इनमें सटने या फंसने नहीं पाते तथा वस्त्र जल्दी गंदा नहीं होता। लम्बे रेशों के कारण ये बहुत मजबूत होते हैं। कृत्रिम रेशों को आवश्यकतानुसार छोटा, लम्बा, सीधा, मोटा या पतला बनाया जाता है।

अतः रेशों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है –

  • स्टेपल फाइबर (Staple fibre)।
  • फिलामेंट फाइबर (Filament fibre)।

प्रश्न 2.
धागा निर्माण की कौन-कौन-सी अवस्थाएँ हैं ?
उत्तर:
धागा निर्माण की अवस्थाएँ-रेशों को अविरल धागों के रूप में बदलने के लिए अधिकतर प्राकृतिक धागों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है ताकि वे अविरल रूप में तैयार किए जा सकें।
स्टेपल रेशों से धागा (Yam) बनाने की मूलभूत प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं:

  • रेशों को स्वच्छ करना (Cleaning of fibres)
  • रेशों को थोड़ा-बहुत समान्तर करना (Making the fiblres more or less paralled)।
  • लम्बी पट्ट बनाना (पूनी) (Forming a long strand called sliver)।
  • तैयार धागे को बोबिन पर चढ़ाना (Winding the yarn on bobbin) ।
  • धागा बनाने के लिए पूनी पर बटाई देना (Twisting to form yarn)।

प्रश्न 3.
रासायनिक कताई की चार प्रक्रियाएँ क्या हैं ?
उत्तर:
रासायनिक कताई (Chemical Spinning): मानव-निर्मित तन्तु प्रकृति में लम्बे रिबन के आकार में होते हैं। उनको धागे में बदलने से पहले संसाधित करने की आवश्यकता होती है।

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रासायनिक कताई में मूल रूप से चार प्रक्रियाँ हैं:
(क) गीली कताई
(ख) शुष्क कताई
(ग) पिघली कताई
(घ) इमलशन कताई।

(क) गीली कताई (Wet Spinning): जब तन्तु निर्माण करने वाले घोल को स्पिनरेट में से निकालने के पश्चात् रासायनिक पदार्थ भरे टब में सख्त होने के लिए डाला जाए तो उसे गीली कताई कहते हैं। रेयान इस प्रकार से बनाई जाती है।

(ख) शुष्क कताई (Dry Spinning): जब तन्तु निर्माण करने वाले घोल को स्पिनरेट से निकालने के पश्चात् गर्म हवा द्वारा वाष्पीकरण करके सुखाया जाता है तो उसे शुष्क कताई कहते हैं। ऐसिटेट और एक्रेलिक तन्तु इस प्रकार बनाए जाते हैं।

(ग) पिघली कताई-जब तन्तु निर्माण करने वाले पदार्थ को पिघला कर स्पिनरेट में से निकाला जाता है तथा ठण्डा होने पर सख्त कर लिया जाता है तो उसे पिघली कताई कहते हैं। पॉलिएस्टर/टेरीलीन तन्तु इस क्रिया से बनाये जाते हैं।

(घ) इमलशन कताई (Melt Spinning): जटिल तरीका होने के कारण यह कताई सामान्यतः प्रयोग में नहीं लाई जाती है । तन्तु निर्माण वाले पदार्थ को किसी दूसरे रासायनिक द्रव्य में मिलाया जाता है तथा फिर स्पिनरेट से निकाला जाता है।

प्रश्न 4.
कताई व बुनाई में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कताई (Spinning): कताई वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत तन्तुओं को एक समूह में से खींचकर व ऐंठ कर मजबूत अविरल सूत प्राप्त किया जाता है।
बुनाई (Weaving): यह कपड़ा निर्माण की विधि है जिसमें कम से कम दो धागों ताने और बाने का प्रयोग करके हथकरघे या मशीन पर कपड़ा निर्मित किया जाता है।

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प्रश्न 5.
तन्तु व सूत में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. तन्तु (Fibre): कपड़ा निर्माण की सबसे छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं। इससे तुरत कपड़ा निर्मित नहीं किया जा सकता जब तक कि इससे सूत या धागे का निर्माण नहीं किया जाता।
2. सूत (Yarn): सूत या धागा वह अखंड तार है जो अनेक तन्तुओं को एक साथ ऐंठने से बनता है। इससे कपड़े का निर्माण होता है। यह तन्तु से अधिक लम्बे, चौड़े और मजबूत होते हैं।

प्रश्न 6.
सम्मिश्रित वस्त्र (Novelty Clothes) क्यों उपयोगी हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सम्मिश्रित वस्त्र जैसे टेरीकॉट, टेरीवुल आदि इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि

  • ये सस्ते होते हैं, अतः मितव्ययी हैं।
  • इनका रख-रखाव भी सरल है।
  • प्रेस करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • इनमें कीड़ा नहीं लगता।

प्रश्न 7.
‘हन परीक्षण’ (Flame Tact) को स्पष्ट करें।
उत्तर:
दहन परीक्षण अर्थात् कपड़े के तन्तु को ज्वाला के समीप ले जाने पर प्रभाव देखना। इसके लिए कपड़े की लम्बाई से एक रेशा निकाला जाता है। ऐंठन खोल कर तन्तु अलग किया जाता है । तन्तु को चिमटी से पकड़कर उसके सिरों को ज्वाला के निकट ले जाया जाता है और फिर निम्न प्रभाव आंके जाते हैं

  • ज्वाला के समीप ले जाने पर तन्तु पर प्रभाव
  • ज्वाला में तन्तु पर प्रभाव
  • लौ का रंग
  • गंध
  • राख का प्रकार।

प्रश्न 8.
कपड़ा फाड़ परीक्षण (Tearing Test) का वर्णन करें।
उत्तर:
इसे विदीर्ण परीक्षण भी कहते हैं। किसी कपड़े के टुकड़े को फाड़ने में कितनी शक्ति लगती है, फटते समय कैसी ध्वनि उत्पन्न होती है एवं फटे हुए सिरों का स्वरूप कैसा होता है, इसके आधार पर रेशे की पहचान की जाती है।

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प्रश्न 9.
सूत निर्माण (Yarm construction) की दो विधियाँ बताएँ। प्रत्येक का एक उदाहरण दें। किसमें सूत ज्यादा मजबूत है और क्यों ?
उत्तर:
1. तकली अथवा चरखा द्वारा सूत बनाना, जैसे सूती (cotton) व ऊनी (wool) सूत।
2. स्पिनरेट्स द्वारा (through Spinerrattes)-नाइलोन (Nylon) व पोलीएस्टर (Polyester) । (Spinerrates) द्वारा बनाया गया सूत ज्यादा मजबूत होता है क्योंकि इसकी विधि अत्यधिक वैज्ञानिक है और पर्याप्त लम्बाई का सूत प्राप्त होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धागों के विभिन्न प्रकार का वर्णन करें ? [B.M.2009A]
उत्तर:
धागा प्राकृतिक व मानवकृत तंतुओं से प्राप्त होता है। दोनों स्रोत से धागा बनाने की विधि अलग होती है । धागे का उपयोग वस्त्र के अतिरिक्त कई कार्यों के लिए किया जाता है
जैसे-सिलाई कढ़ाई करना । प्रत्येक कार्य के लिए धागे की प्रकार अलग होती है। कढ़ाई के लिए रेशमी चमकीले धागे का प्रयोग किया जाता है। सिलाई के लिए मजबूत धागा लिया जाता है।
कपड़े की बुनाई के लिए दो प्रकार के धागों का प्रयोग किया जाता है।
1. ताना
2. बाना।

1. ताना-इसका धागा मजबूत होता है।
2. बाना-बाने का धागा कम मजबूत होता है। धागे को तंतुओं के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है।
(a) साधारण धागे
(b) मिश्रित धागे
(c) जटिल धागे।

(a) साधारण धागा-यह एक ही आकार और प्रकार वाले तंतओं से बनता है इनका व्यास एक समान होता है। इन धागे की ऐंठन भी एक समान होती है। साधारण धागे को आवश्यकता अनुसार एकहरा, दोहरा, चौहरा या इनका केतल भी बनाया जा सकता है।

(b) मिश्रित धागा-यह एक से अधिक प्रकार के तंतुओं के रेशे को मिलाकर बनाया जाता है। उदाहरण-सूती धागे के साथ रेशमी धागा मिलाकर सिल्कों का निर्माण होता है। कॉटन में पालिएस्टर मिलाकर टेरिकॉट का निर्माण होता है।

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(c) जटिल धागा-इसका प्रयोग वस्त्रों में भिन्नता लाने के लिए किया जाता है। यह एक दो या तीन धागों के लिए किया जाता है। इस विधि में प्रयोग किये जाने वाले धागे निम्न प्रकार से हैं –

  • गाँठ वाला धागा
  • चक्रदार या कॉर्क स्कू धागा
  • स्लव धागा
  • फ्लैक धागा
  • फंदेदार एवं घुमाउदार धागा
  • बीज धागा
  • क्रेप धागा

प्रश्न 2.
कताई (Spinning) के विभिन्न प्रकारों को विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
कताई के प्रकार (Kinds of Spinning): यह दो प्रकार की होती है:
1. यांत्रिक कताई (Mechanical Spinning)
2. रासायनिक कताई (Chemical Spinning)

1. यान्त्रिक कताई-यान्त्रिक कताई अधिकतर प्राकृतिक तन्तुओं से की जाती है, जैसे-सूती, ऊनी व रेशमी तन्तुओं की कताई यान्त्रिक विधि से होती है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

  • खोलना व सफाई करना
  • कार्डिंग व कैबिंग
  • पूनियाँ बनाना
  • खींचना व घुमाना

यान्त्रिक कताई के चरण (Steps of Mechanical Spinning):
1. कच्चे माल की सफाई (Opening and Cleaning of Raw Material): सर्वप्रथम प्राकृतिक तन्तुओं को खोलकर उनकी सफाई की जाती है क्योंकि प्राकृतिक तन्तुओं में अशुद्धि काफी होती है।
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2. धुनाई व कंघी करना (Carding and Combing): अब तन्तुओं को अच्छी तरह साफ किया जाता है और सुलझाया जाता है। छोटे-छोटे तन्तुओं को अलग कर दिया जाता है और लम्बे तन्तुओं को समान्तर बिछा दिया जाता है, इन्हें पूनियाँ बनाना कहते हैं।

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3. खींचना व ऐंठन देना: अब पूनियों को खींचा जाता है व साथ ही साथ हल्का-सा घुमाव दिया जाता है ताकि रेशे एक साथ रह सकें और अलग-अलग न हो जाएँ।
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4. कताई-सूत को अधिक मजबूत बनाने के लिए इससे तकली या चरखे या मशीनों पर चढ़ाकर ज्यादा घुमाव व ऐंठन दिया जाता है, जिससे यह सूत अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और टिकाऊ हो जाता है। इस विधि द्वारा कपास व ऊन का सूत बनाया जाता है। रेशम का सूत काकून गोंद को हटाने के पश्चात् सीधा चरखे पर ही चढ़ाया जाता है।
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2. रासायनिक कताई (Chemical Spinning): मानव-कृत तन्तुओं का निर्माण रासायनिक तरल पदार्थों द्वारा किया जाता है। यह एक गाढ़े घोल के रूप में होता है। इसे एक विशेष रूप से बने कातने वाले यन्त्र से, जिसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, तेजी से निकाला जाता है। जैसे ही यह तन्तु हवा को स्पर्श करते हैं तो ठोस बन जाते हैं और अपारदर्शी हो जाते हैं। इन्हें सूत के रूप में एकत्रित कर दिया जाता है। फिर इन सूतों को खींचा जाता है। यह लम्बा, लचीला और मजबूत बन जाता है।
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प्रश्न 3.
सूत कितने प्रकार के होते हैं ? समझाइए।
उत्तर:
सूतों के प्रकार (Types of Yams): सूत का प्रयोग कहाँ करना है इस पर उसकी बनावट निर्धारित होती है। उसको कितनी ऐंठन देनी है ताकि इच्छित प्रकार का सूत प्राप्त किया जा सके । सूत में विभिन्न परिवर्तन करके उसकी विशेषताओं का निर्धारण किया जा सकता है। सूत को मुख्य रूप से हम दो भागों में बाँटते हैं
1. साधारण सूत (Simple Yam)
2. सम्मिश्रित सूत (Novelty Yam)

साधारण सूत-यह तीन प्रकार का होता है –
(क) इकहरा सूत (Simple Standard Yarn): इसे बनाने में एक प्रकार के तन्तु का इस्तेमाल किया जाता है। यह सभी भागों में समान होता है। ऐंठन भी एक-सी और एक ही दिशा में दी जाती है।
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(ख) दोहरा सूत (Two Ply or Cable Yarn): यह दो या अधिक सूतों को ऐंठन देकर बनाया जाता है।
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(ग) डोरिया सूत-बहुत से सूत मिलाकर रस्सी जैसी सूत बनाया जाता है।
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2. सम्मिश्रित सूत (Complex or Novelty Yarm): इस प्रकार का सूत बनाने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। यह विभिन्न प्रकार के दोहरे सूत व अलग-अलग रंगों के धागों को मिला कर ऐंठन देकर एक सूत बनाने से बनता है। इसमें ऐंठन में परिवर्तन करके नए प्रकार का सूत बनाया जा सकता है। इसमें अलग-अलग तरीके के तन्तु मिलाए जा सकते हैं। जैसे रेयान व रुई, रुई व ऊन, रुई व रेशम आदि।

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इससे धागे में नवीनता लायी जाती है। एक सूत आधार रहता है व दूसरा उस पर लपेटा जाता है। यह कई प्रकार से बनाए जाते हैं। जैसे-तौलिए के लिए, शनील के लिए, लेस के लिए आदि। इनमें ऐंठन देने की क्रिया में परिवर्तन लाते हैं। लपेटने वाले धागे को कहीं कसके लपेटा जाता है तो कहीं ढीला रखा जाता है।

कहीं अधिक लपेटा जाता है कहीं दूरी पर कम लपेटा जाता है। इस प्रकार की कई तरह की विभिन्न विशेषताओं वाले सूत व कपड़े का निर्माण हो सकता है। दो या अधिक सूतों को मिलाकर बनने वाले सूत को सम्मिश्रित सूत कहते हैं। इससे बनने वाले वस्त्र में इन सभी धागों के गुण पाए जाते हैं। आजकल ऐसे वस्त्रों का चलन खूब है, जैसे-टेरीकॉट, कॉट्सवुल, टेरीसिल्क आदि ।
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प्रश्न 4.
बुनाई कला (weaving) से आप क्या समझती हैं ? इसके विभिन्न चरण लिखिए।
उत्तर:
बुनाई कला (Weaving): कपड़े का निर्माण करने की एक प्राचीन एवं लोकप्रिय विधि बुनाई है। प्राचीन काल में जब करघों का आविष्कार नहीं हुआ था तब जमीन पर निश्चित दूरी पर दोनों ओर खूटियां गाड़कर उनमें ताने के धागे कसकर बांधे जाते थे और हाथ से बाने के धागों को गूंथा जाता था। आज के युग में बुनाई हथकरघों (Hand-Loom) अथवा मशीनी करघों (Power Loom) से की जाती है, जिसमें कपड़ा बुनने की मूल विधि एक ही है। इसमें कपड़े की लम्बाई के समान्तर व्यवस्थित धागे अर्थात् बाने (Weft) के धागे होते हैं। इन दो जोड़ी धागों, तानों एवं बानों के पारस्परिक गुंथाव (Interlacing) को बुनाई कहते हैं।

बुनाई के चरण (Steps in Weaving):
करघे द्वारा बुनाई के निम्नलिखित चरण हैं –
1. ताना तनना एवं शेडिंग (Shedding): सर्वप्रथम जितना लम्बा कपड़ा बनाना हो उतने लम्बे ताने के धागे करघे पर कसे जाते हैं और फिर उन्हें करघे के पीछे के बेलन पर लपेटा जाता है जिस पर कपड़ा बुनने के बाद भी लपेटा जाता है। ताने के धागों को हार्नेस में से निकाल कर कसा जाता है। हार्नेस धातु की बनी तार होती है जिसके बीच में छेद होता है और एक फ्रेम में लगी होती है, जिसे हैंडल कहते हैं।

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ताने के धागे इन्हीं हार्नेस के छेदों में से पिरो कर कसे जाते हैं। प्रत्येक करघे में सादी बुनाई के लिए कम से कम दो हार्नेस तो अवश्य होते हैं, परन्तु अन्य विभिन्न प्रकार की बुनाइयों के लिए 3 से लेकर 8 तक हार्नेस करघे में लगाए जा सकते हैं। हैंडलों एवं हार्नेसों के द्वारा ताने के कुछ निश्चित धागों को ऊपर या कुछ धागों के नीचे करने को शैडिंग कहते हैं। जब ताने के कुछ निश्चित धागे ऊपर और कुछ नीचे हो जाते हैं तो उनके बीच में एक सुरंग (शैड) जैसा मार्ग बन जाता है जिसमें से शटल पर लिपटा हुआ बाने का धागा एक ओर से दूसरी ओर अथवा दायीं से बायीं ओर ले जाया जाता है।

2. पिकिंग (Picking): बुनाई का दूसरा चरण पिकिंग है। यह क्रिया हार्नेस द्वारा ही होती है। इसमें दूसरा हार्नेस अन्य निश्चित धागों को ऊपर उठाता है तो पुनः एक सुरंग (शैड) जैसा मार्ग बनता है, जिसमें से अब शटल को बायीं ओर से पुनः दायी ओर ले जाते हैं। इस प्रकार बाने के धागे को दायीं से बायीं और बायीं से दायीं ओर ले जाकर गुथाई करने को पिकिंग कहते हैं।

3. बेटनिंग (Battening): बाने के धागों को ताने के धागों में पिरोने के बाद एक दांतेदार कंघी (रीड़) द्वारा अच्छी प्रकार ठोका जाता है। इसके अतिरिक्त करघे में एक छड़ जिसे बैटन कहते हैं बाने के धागे के समान्तर लगी होती है और यह बाने के नए धागों को ठोक पीटकर पहले धागे के अत्यन्त निकट लाती है, जिससे कपड़े में सघनता आए और बाने के धागे एक समान दूरी पर रहें।

4. कपड़ा लपेटना तथा धागे छोड़ना (Taking up and Letting Off): इस प्रक्रिया में जो कपड़ा बुना जाता है उसे सामने की छड़ पर लपेटा जाता है और पीछे के बेलन से ताने के धागे और कपड़ा बुनने के लिए छोड़े जाते हैं। इस प्रकार उपर्युक्त क्रियों को दोहरा कर कपड़े की बुनाई की जाती है।

प्रश्न 5.
विभिन्न प्रकार की बुनावटें कौन-कौन-सी हैं ? विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर:
विभिन्न प्रकार की बुनावटें (Different Weaves): कपड़ा कई प्रकार की बुनावटों से बुना जा सकता है। कुछ बुनावटें उत्तम धागे के लिए होती हैं जबकि दूसरी को मोटे व खुरदुरे धागे के लिए प्रयोग किया जाता है। भिन्न-भिन्न बुनावटों से जादुई प्रभाव पड़ते हैं। कुछ बुनावटों के नाम हैं-साधारण, धारीदार, बास्केट, ट्विल, साटिन, कार्डेराय, मखमलनुमा, पाइल इत्यादि। कुछ

महत्त्वपूर्ण बुनावटें निम्नलिखित हैं –
साधारण बुनाई (Plain weave): कपड़ा बनाने की सबसे सरल प्रकार की बुनाई साधारण बुनाई है। सूती कपड़ा आमतौर पर इस बुनाई से बनता है। बाने को एक-एक ताने को छोड़कर डाला जाता है। ऐसे कपड़े की उल्टी सतह नहीं होती। साधारण बुनाई सस्ती व सरल है। कपड़ा मजबूत होता है तथा समतल दिखाई देता है। यह बुनाई लट्ठा, मलमल, वायल के कपड़ों के लिए उपयुक्त है।
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विल बुनाई (Twill weave): यह भी एक मूलभूत बुनाई है। इससे कपड़े की सतह पर एक प्रकार की तिरछी धारी बनने लगती है। ये धारियाँ कपड़े की उल्टी सतह पर भी दिखाई देती हैं तथा ताने से 14° से 75° तक का कोण बना सकती हैं। ये धारियां दो दिशाओं में चल सकती हैं। चित्र में बायां भुजा ट्विल और दायां ट्विल दिखाया गया है।
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बाना दो तानों के ऊपर तथा एक के नीचे, नियमित रूप से चलता है तथा धारियाँ बनाता है। हैरिंगवोन डिजाइन बनाना एक भिन्नता है। यह धारियों की दिशा, कुल लम्बाई के बाद, बदलने से बन सकती है। यह नियमित रूप से V डिजाइन बनाता है। ट्विल बुनाई द्वारा फलालेन, डेनिम, ड्रिल, गेबरडीन, जीन आदि सूती कपड़े बनाये जाते हैं।

ताने-बाने की कर्ण व्यवस्था से कपड़े में मजबूती होती है, क्रीज जल्दी नष्ट नहीं होती। ट्विल बुनाई वाले कपड़े साधारण बुनाई के कपड़ों से महंगे होते हैं क्योंकि इनका उत्पादन मूल्य और कच्चा माल अधिक महंगा होता है। ऐसे कपड़े देखने में सुन्दर होते हैं तथा रख-रखाव साधारण बुनाई वाले कपड़ों के अनुकूल होता है।

साटिन बुनाई (Satin weave): इस बुनाई में बाने का धागा, ताने के एक धागे के ऊपर से और एक से अधिक धागों से नीचे से गुजरता है। ताने के साधारणत: 4 धागे ऊपर रहते हैं। यह 7 धागों तक भी हो सकता है। इस प्रकार का बना हुआ कपड़ा ‘साटिन’ कहा जाता है। अगर ताने के स्थान पर बाने का धागा ऊपर हो तो कपड़े को ‘स्टन’ कहा जाता है। साटिन बुनाई द्वारा बने कपड़ों में अधिक चमक होती है परन्तु यह कपड़ा अन्य बुनाई द्वारा बने कपड़ों की अपेक्षा कमजोर होता है।

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कई बार अधिक चमक लाने के लिए तन्तुओं में कम ऐंठन दी जाती है। इस प्रकार की बुनाई (Snag) में अधिक आ जाते हैं। साटिन का रख-रखाव सुविधाजनक नहीं है। साटिन के कपड़ों को अधिक चमक वाला करने के लिए ताने में ऊन, रेयान तथा रेशम का प्रयोग किया जाता है। सूती कपड़े भी साटिन बुनाई से बुने जाते हैं।
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बायीं ओर का चित्र दर्शाता है कि धागे में ऐंठन अच्छा साटिन बनाता है। दायीं ओर का चित्र दर्शाता है कि धागे में असमान ऐंठना टूटा ट्विल हुआ बनाता है।

बुना हुआ कपड़ा (Knitting Fabrics): बुनने की क्रिया में कपड़ा (वस्त्र) तैयार करने के लिए धागे के फंदे बनाए जाते हैं तथा फिर फंदों में डालकर कपड़ा बुना जाता है। बुने हुए कपड़े बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि ये वजन में हल्के तथा पहनने में आरामदायक होते हैं। इनमें ताने-बाने वाले कपड़ों की अपेक्षा कम सिलवटें पड़ती हैं तथा यह सुविधा से रखे अर्थात् संभाले जाते हैं। धागे इस प्रकार व्यवस्थित किये जाते हैं कि एक फंदों की पंक्ति ऊपर व नीचे की फंदों की पंक्ति के सहारे लटकी हो।
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फंदों के स्तम्भ को Wale कहा जाता है जबकि लगातार फंदों की पंक्ति को Course कहते हैं। Gauge शब्द का अर्थ है – एक इंच में फंदों की संख्या। इस गिनती से कपड़े की दृढ़ता पता लगाई जा सकती है।

बुनाई वाले कपड़े दो प्रकार के होते हैं –
Tubular और flat गोलाकार (Tubular) बुनाई के कपड़ों में फंदे गोलाई में डाले जाते हैं। यह जुराबों के लिए उपयुक्त होता है। समतल (Flat) बुनाई में फंदे सीधी पंक्ति में होते हैं। यह उन कपड़ों के लिए उपयुक्त है जिनसे शरीर की गति होनी होती है। जब बुनाई के कपड़े का धागा टूटता है तो फंदा पंक्ति-दर-पक्ति नीचे गिरने लगता है, इसे laddering effect कहते हैं। बुनाई के समय एक अन्य ताने का धागा डालकर इसे रोका जा सकता है।

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नमदे का कपड़ा (Felt fabrics): नमदे के कपड़े में बुने हुए कपड़े की तरह कोई ताना-बाना नहीं होता। वे ऊनी बुनाई से भी भिन्न होते हैं। इस प्रकार के कपड़े बुनने वाले कपड़ों की खोज से पहले प्रयोग होते थे। ये कपड़े ऊन, बालों व चर्म से बनते थे। आजकल ऊन व अन्य जानवरों से उपलब्ध तन्तुओं के मिश्रण से बनाये जाते हैं। कश्मीर के नमदों के ऊपर विभिन्न रंगों से सुन्दर डिजाइनों की कढ़ाई की जाती है। नमदे का कपड़ा नई या पुरानी ऊन के रेशों से बनाया जाता है।

इन तन्तुओं को यांत्रिक शक्ति से रासायनिक क्रिया, नमी और गर्मी से जुड़ाव किया जाता है तथा इसमें कोई चिपकने वाला पदार्थ का प्रयोग नहीं किया जाता। नमदे का कपड़ा फर्श को ढंकने के लिए कालीन बनाने में तथा विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के काम आता है। यह विद्युत का कुचालक होता है तथा आवाजरोधी है। यह किसी भी आकार में काटा जा सकता है। कोनों को किसी भी परिसज्जा की आवश्यकता नहीं होती। नमदे का पतला कपड़ा लचीला होता है, अत: जैकेट बनाने में प्रयोग होता है। खुरदरी फेल्ट से टोप बनाए जाते हैं। फैल्ट या नमदे के कपड़ों के गुण बढ़ाये जा सकते हैं अगर हम उन्हें प्रतिरोधक, पानीरोधक व आगरोधक बना दें।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 18 तन्तु विज्ञान

Bihar Board Class 11 Home Science तन्तु विज्ञान Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वस्त्र निर्माण की सबसे छोटी इकाई को कहते हैं –
(क) रेशा
(ख) धागा
(ग) कपड़ा (Cloth)
(घ) वस्त्र (Textile)
उत्तर:
(क) रेशा

प्रश्न 2.
तंतुओं की न्यूनतम लम्बाई 5 मि. मी. होने पर उससे निर्माण किया जा सकता है – [B.M.2009A]
(क) कपड़ा का
(ख) वस्त्र का
(ग) धागा का
(घ) तंतु का
उत्तर:
(ग) धागा का

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प्रश्न 3.
कंबल किस विधि से तैयार किया जाता है। [B.M.2009A]
(क) ब्रेडस तथा लेंस
(ख) निटिंग
(ग) फेल्टिंग
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) फेल्टिंग

प्रश्न 4.
तंतुओं से सभी प्रकार की गंदगी और अशुद्धियों को दूर करने की विधि को कहते – [B.M.2009A]
(क) ट्राईंग आऊट
(ख) कोंबिग
(ग) काडिग
(घ) रोविंग
उत्तर:
(ग) काडिग

प्रश्न 5.
दो सूती कपड़े किस विधि से तैयार किया जाता है ? [B.M. 2009A]
(क) ट्विल बुनाई
(ख) धारीदार बुनाई
(ग) साटीन बुनाई
(घ) बासकेट बुनाई
उत्तर:
(घ) बासकेट बुनाई

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
तन्तु (Fibre) शब्द को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
“वस्त्र निर्माण की छोटी-से-छोटी इकाई को तन्तु या रेशा कहते हैं।”

प्रश्न 2.
तन्तुओं का वर्गीकरण (Classification of fibre) किस आधार पर किया जाता है ?
उत्तर:
तन्तुओं का वर्गीकरण उनकी लम्बाई या स्रोत के आधार पर किया जा सकता है।
1. लम्बाई के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण:

  • प्राकृतिक तन्तु (Natural fibre)
  • मानवकृत तन्तु (Man-made fibre)
  • मिश्रित तन्तु (Blended fibre)

प्रश्न 3.
वानस्पतिक तन्तु (Vegetative fibre) का मुख्य तत्त्व कौन-सा होता है ?
उत्तर:
वानस्पतिक तन्तु का मुख्य तत्त्व सेलूलोज होता है।

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प्रश्न 4.
टेक्सटाइल (Textile) या वस्त्र विज्ञान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
टेक्सटाइल शब्द लैटिन भाषा का शब्द है जो टैक्सटिली शब्द से बना है। जिसका अर्थ रेशों से या तन्तुओं से निर्मित कपड़ा अर्थात् बुना कपड़ा है

प्रश्न 5.
रेशम (Silk) की प्राप्ति कहाँ से होती है ?
उत्तर:
रेशम एक विशेष प्रकार के कीड़े से प्राप्त होता है।

प्रश्न 6.
तन्तुओं की दृढ़ता (Rigidity) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
किसी भी तन्तु को तोड़ने के लिए जितनी शक्ति लगाने की आवश्यकता होती है, उतनी ही उस तन्त की दढता होती है।

प्रश्न 7.
तन्तुओं के लचीलेपन (Flexibility) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जब तन्तु बिना टूटे मुड़ जाता है तो इस क्षमता को तन्तुओं का लचीलापन कहा जाता है।

प्रश्न 8.
प्रत्यास्थता.(Elasticity) का क्या गुण होता है ?
उत्तर:
तन्तुओं को खींचने पर लम्बा हो जाना और छोड़ने पर वापस अपनी लम्बाई में आ जाना ही प्रत्यास्थता का गुण कहलाता है।

प्रश्न 9.
कृत्रिम तन्तु (Artificial fibre) ने क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
मानव निर्मित तन्तु जो रासायनिक विधि द्वारा बनाए जाते हैं, उन्हें कृत्रिम तन्तु कहते हैं।

प्रश्न 10.
पॉलिएस्टर (Polyester fibre) तन्तु को किस नाम से जाना जाता है ?

प्रश्न 11.
ऊन (Wool) कैसा तन्तु है ?
उत्तर:
ऊन एक प्राकृतिक, प्राणिज तन्तु है जो पशुओं के बाल से बनाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
अन्दर पहनने वाले वस्त्रों के लिए कौन सा कपड़ा चयन करोगे?
उत्तर:
अन्दर पहनने के लिए सूती कपड़ों का चयन करेंगे यह नमी को जल्दी सोख लेता है ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्रोत के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
स्रोत के आधार पर तन्तुओं का वर्गीकरण :
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प्रश्न 3.
कपास के तन्तु की कोई भौतिक एवं रासायनिक चार-चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • संरचना (Composition)।
  • बनावट (Microscopic Structure)।
  • लम्बाई (Length)।
  • नमी सोखने की क्षमता (Absorbency)।
  • ताप का प्रभाव (Effect of Heat)।

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रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):

  • अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid)।
  • क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali)।
  • रंगों का प्रभाव (Effect of Colours)।
  • जीवाणु का प्रभाव (Effect of Moth and Mildew)।

प्रश्न 4.
रेशम के तन्तु की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
रेशम के तन्तु की विशेषताएँ (Properties of Silk Fibre):
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • संरचना (Composition)।
  • बनावट (Microscopic Structure)
  • मजबूती (Strength)।
  • लोच (Elasticity)।
  • नमी सोखने की क्षमता (Absorbency)।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):

  • क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali)।
  • रंगों का प्रभाव (Effect of Colours)।
  • अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid)।
  • जीवाणुओं का प्रभाव (Effect of Moth and Mildew)।

प्रश्न 5.
ऊन के तन्तुओं से कितने प्रकार का ऊनी कपड़ा तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
1. ऊनी कपड़े (Woollens): इन्हें बनाने के लिए छोटे तन्तुओं का प्रयोग किया जाता है जिनकी अधिक कंघी व कताई नहीं की जाती। ये वस्त्र खुरदरे व मोटे होते हैं।

2. वस्टेंड (Worsted): इन्हें बनाने के लिए लम्बे रेशों का प्रयोग किया जाता है। इन रेशों की कंघी तथा कताई अच्छी तरह की जाती है। इससे बने वस्त्र अधिक मजबूत तथा चिकनी सतह वाले होते हैं। पैंट, सूट आदि इन्हीं वस्त्रों से बनते हैं।

3. नमदा (Felted Fabrics): कुछ ऊनी वस्त्र फेल्ट विधि से तैयार किये जाते हैं। ये वस्त्र सीधे तन्तुओं से बनाये जाते हैं। तन्तुओं को उचित नमी, तापमान तथा दबाव से जोड़ दिया जाता है। ऐसे वस्त्र खुरदरे होते हैं, जिससे नमदा, पटू आदि बनते हैं। ऊनी वस्त्रों के उत्पादन के लिए सबसे पहले भेड़ों पर से बाल काटे जाते हैं। फिर इनकी छंटाई की जाती है। अगली प्रक्रिया में इन्हें क्षार के घोल में कई बार धोया जाता है जिससे तन्तु स्वच्छ व कोमल हो जाते हैं।

अब इन्हें सुखाया जाता है। धोने व सुखाने से तन्तु थोड़े कड़े हो जाते हैं इसलिए इन पर जैतून के तेल का छिड़काव किया जाता है। ऊनी वस्त्र बनाने के लिए रेशों को केवल सुलझाया जाता है, लेकिन वर्टेड वस्त्र बनाने के लिए रेशों की धुनाई (Carding) तथा कंघी (Combing) की जाती है, जिससे रेशे पूर्ण रूप से समानान्तर हो जाते हैं तथा छोटे रेशे अलग निकल जाते हैं। इन रेशों की पूनिया बनाकर कताई की जाती है। इस प्रकार ऊनी धागा वस्त्र बनाने के लिए तैयार हो जाता है।

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प्रश्न 6.
नायलोन (Nylon) की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
नायलोन की विशेषताएँ (Characteristics of Nylon):

  1. सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि नायलोन के तन्तु गोलाकार, चमकदार, सीधे और चिकने होते हैं।
  2. नायलोन मानव निर्मित तन्तुओं में सबसे अधिक मजबूत होता है।
  3. नायलोन के रेशे लम्बे व मजबूत होते हैं।
  4. नायलोन के कपड़े पर पसीने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता हालांकि रंग नष्ट हो जाते हैं।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):
1. इस पर क्षार का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु प्रत्येक अम्ल का रेशों पर अत्यन्त बुरा प्रभाव पड़ता है। .
2. ब्लीज व धब्बे मिटाने वाले रसायनों का नायलोन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
जैविक विशेषताएँ (Biological Properties): नायलोन के तन्तुओं पर जीवाणुओं का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। अगर चीटियाँ या कॉकरोच कपड़े में फंस जाएँ तो वह इसे काट खाकर बाहर निकल जाएगा।

प्रश्न 7.
मिश्रित तन्तु के नाम लिखें:
(क) जो ठंडी जलवायु में पहने जाएँ।
(ख) जो आर्द्र जलवायु में पहने जाए। कारण भी लिखें।
उत्तर:
मिश्रित तन्तु –
(क) ठंडी जलवायु के लिए-टेरीवुल (Terrywool) क्योंकि यह ऊन की तरह ही गरम हैं
(ख) आर्द्र जलवायु के लिए-टेरीकॉट (Terrycot) क्योंकि यह टेरीलीन की अपेक्षा ज्यादा ठंडा व अवशोषक शक्ति वाला है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कपास की भौतिक विशेषताएँ समझाएँ ? [B.M.2009A]
उत्तर:
कपास की भौतिक विशेषताएँ निम्नलिखित है –
(a) दृढ़ता
(b) प्रत्यास्थता
(c) पुनरुत्थान
(d) अवशोषकता
(e) ताप का प्रभाव
(f) रगड़ का प्रभाव
(g) चमक
(h) स्वच्छता।

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(a) सूखे तंतु के अपेक्षा गीले होने पर बढ़ जाती है।
(b) कपास में यह गुण नहीं होता इसलिए इसमें आकार बड़ा नहीं होता है।
(c) यह गुणा नहीं होने के कारण सलवट पड़ती है।
(d) 15-20 गुण अधिक नमी सोखने की क्षमता होती है।
(e) ताप सहन करने की बहुत अधिक क्षमता रहती है।
(f) मजबूत होने के कारण जल्दी फटता नहीं है।
(g) चमक कम होती है परिसज्जा द्वारा दी जाती है।
(h) आसानी से साफ किया जाता है ।

प्रश्न 2.
रूई (Cotton) की भौतिक, रासायनिक व जैविक विशेषताएँ एवं देखभाल व प्रयोग विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
रूई (Cotton): यह प्राकृतिक तन्तु है जो 90% सेलूलोज व 10% खनिज लवण, मोम और प्रोटीन से बनते हैं। मोहनजोदड़ो युग के मिले फूलदानों पर भी रूई के तन्तु लगे मिले हैं। रूई के बीजों के ऊपर उगे बालों द्वारा रूई बनती है। यह नर्म तथा गद्देदार होती है। रूई को ‘पेड़ की ऊन’ कहा जाता है। भारत, मिस्र, ब्राजील, अफ्रीका, अमेरिका रूई उत्पादन के कुछ मुख्य देश हैं।

सारे विश्व की रूई की माँग का 40% केवल अमेरिका में उत्पादित होता है। उत्पादन व निर्यात में भारत का दूसरा स्थान आता है। रूई की उत्पादकता सस्ती है और इसका प्रयोग बहुत से क्षेत्रों में किया जाता है। जैसे-कपड़े, चादरें, तौलिये, बनियान, घर की सजावट के लिए कपड़े आदि रूई से ही बनते हैं। रूई के तन्तु मिट्टी, बीज, उगाने का तरीका व मौसम से प्रभावित होते हैं तथा उनकी लम्बाई, नमी और चमक

1. भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):

  • कपास के रेशे कई प्रकार के होते हैं। सामान्यतः रूई के रेशे 1 सेमी. से 5 सेमी. तक लम्बे होते हैं तथा इनके व्यास 16-20 माइक्रोन तक होता है। रूई का रेशा ऊपर से एक कोशीय प्रतीत होता है परन्तु सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि यह तन्तु कुछ चपटी घुमावदार नली के समान होता है जिसकी भीतरी सतह खुरदरी होती है। ऐंठन तन्तु को शक्ति देती है तथा लम्बे तन्तुओं में बुनने में सहायक होती है। इस ऐंठन को “कनवोल्यूशन्स” कहते हैं। इनमें चमक कम होती है।
  • कपास के रेशे रंग में भिन्न-भिन्न होते हैं अर्थात् सफेद से क्रीम तक।
  • कपास में सलवटें शीघ्र पड़ जाती हैं। कपास को संसाधित करके सलवट-रोधक बनाया जाता है।
  • रूई के तन्तुओं में नमी को सोखने का एक विशेष गुण होता है। यही कारण है कि सूती कपड़ा शरीर का पसीना आसानी से शीघ्र सोख लेता है। इसीलिए कपास गर्म प्रदेशों में अधिक लोकप्रिय होती है।
  • सूती कपड़े में सिकुड़न-प्रवृत्ति पायी जाती है। इसे सिकुड़नरोधी बनाया जाता है।
  • इनमें लचक बहुत कम होती है।
  • सूखे तन्तु की तुलना में गीले तन्तु 25% अधिक मजबूत होते हैं। अतः इनका विशेष ध्यान नहीं रखा जाता।

2. तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties):
कपास के तन्तुओं पर ताप का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि इनमें ताप सहन करने की क्षमता होती है। यही कारण है कि सूती कपड़ों पर गर्म इस्त्री कर सकते हैं।

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3. रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :

  • कपास के तन्तुओं पर सामान्य रूप से क्षार का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः क्षारयुक्त साबुन व डिटर्जेंट से सूती कपड़ा आसानी से धोया जा सकता है, परन्तु रंगीन सूती कपड़ों को अधिक क्षारयुक्त साबुन से धोने से उनके रंग खराब होने का भय बना रहता है।
  • नमक व गन्धक के तेजाब के सम्पर्क में सूती वस्त्र नष्ट हो जाते हैं।
  • भारी पानी से रंग के नष्ट होने की आशंका रहती है जबकि ताप का इस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

4. जैविक विशेषताएँ (Biological Properties) :

  • सिल्वर फिश सैलूलोज पर जिन्दा रहती है तथा सूती कपड़े को नष्ट कर सकती है।
  • सूती वस्त्र सीलन वाली गर्म जगह पर कुछ समय तक रखें तो उसमें दुर्गन्ध आने लगती है और फफूंदी लग सकती है।

कपास की देखभाल व प्रयोग (Use and Care of Cotton): धुलाई करते समय सूती वस्त्रों को आसानी से रगड़ कर धोया जा सकता है। रंग नष्ट होने के लिए रंगीन कपड़ों को छाया में सुखाना चाहिए। गीले कपड़ों पर इस्त्री करने से सिलवटें दूर की जा सकती हैं। मांड लगाये कपड़े अच्छी परिसज्जा देते हैं।

सूती कपड़ों की मूल विशेषताएँ (Properties of Cotten Cloth):
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प्रश्न 3.
रेशम के तन्तु की खोज, भौतिक व रासायनिक विशेषताएँ तथा उपयोगिताएँ विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
रेशम का तन्तु एक कीड़े के लार से बनाया जाता है। इसकी खोज सबसे पहले चीन में हुई। एक दंतकथा के अनुसार एक चीनी राजकुमारी ने अचानक एक ककून गर्म चाय में डाल दिया। जब उसे निकाला गया तो बारीक. सन्दर. आकर्षक व लम्बा तन्त खिंचता निकल आया। इन तन्तुओं को एकत्र करके, इन्हें बुनकर सुन्दर कपड़ा तैयार किया। कई वर्षों तक रेशम के उत्पादन का रहस्य चीनियों ने अपने तक ही सीमित रखा।

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लगभग 3000 वर्ष बाद यह रहस्य चीन से बाहर आया और कई देशों, जैसे-जापान, भारत, इटली, स्पेन, फ्रांस तथा अन्य यूरोपीय देशों में रेशम का उत्पादन होने लगा। भारत में प्राचीन ग्रन्थों में रेशमी वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक विधि से रेशम बनाने का श्रेय जापान को जाता है। रेशम के उत्पादन के लिए रेशम के कीड़ों को शहतूत के पेड़ पर पाला जाता है। कीड़े की खुराक शहतूत के पत्ते ही हैं।

रेशम के कीड़े के जीवन की चार अवस्थाएँ हैं :

  • अण्डा
  • लारवा
  • प्यूपा
  • कीड़ा।

रेशम के कीड़े से जब लारवा बनता है तब यह अपनी खुराक बन्द कर देता है। इसके मुख के पास दो छिद्रों से लार बाहर आने लगती है। यह दोहरा धागा एक गोंद सेरीसिन (Sericin) से आपस में जुड़ता जाता है और कीड़े के शरीर के चारों ओर लिपटता जाता है। जब कीड़ा पूरी तरह इससे ढक जाता है, तब इसे ककून कहते हैं। रेशम के रेशे प्राप्त करने के लिए ककून पानी में गर्म किए जाते हैं। इस क्रिया में थोड़ा-सा गोंद ढीला पड़ जाता है और रेशे आसानी से खुल जाते हैं।

ककून से रेशों को खोल कर सीधा किया जाता है। इस प्रक्रिया को रीलिंग (Reeling) कहते हैं । रेशम का तन्तु बहुत ही महीन होता है इसलिए 8-10 रेशों को इकट्ठे सीधा किया जाता है। फिर इन्हें एक साथ मिलाकर ऐंठन देकर रेशम का तन्तु बनाया जाता है। रेशम के तन्तु पर से गोंद को हटाने के लिए इसे फिर गर्म पानी में डाला जाता है। इस क्रिया को गोंद हटाना (Degumming) कहते हैं। अब रेशम का तन्तु वस्त्र बनाने के लिए तैयार है।

रेशम के तन्तु की विशेषताएँ (Properties of Silk Fibre) :
भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties):
1. संरचना (Composition): रेशम के तन्तु का मुख्य भाग प्रोटीन से बना है। इसमें 90% प्रोटीन फाइब्रोइन (Fibroin) पायी जाती है।

इसके अतिरिक्त गोंद सेरीसिन (Sericin): पाया जाता है। रेशे का 95% भाग प्रोटीन तथा सेरीसिन से बनता है। शेष 5% मोम, लवण, वसा आदि से बनता है।
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2. बनावट (Microscopic Structure): सूक्ष्मदर्शी से देखने पर रेशम का तन्तु दो रेशों से मिलकर बना दिखाई देता है। दोनों रेशे स्थान-स्थान पर गोंद से सटे दिखाई देते हैं। गोंद के कारण रेशा असमान सतह वाला दिखाई देता है, लेकिन गोंद हटा देने पर यह चिकना, चमकदार, सीधी रेखा के समान दिखाई देता है।

3. लम्बाई (Length): रेशम का तन्तु प्राकृतिक तन्तुओं में सबसे लम्बा है। इसकी लम्बाई 1200 फीट से 4000 फीट तक रहती है। इसी कारण इनसे चिकने व चमकदार वस्त्र बनते हैं।

4. रंग एवं चमक (Colour and Lustre): रेशम में प्राकृतिक चमक रहती है। गोंद हटा देने पर यह और भी चमकीला हो जाता है। रंग सफेद से क्रीम होता है।

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5. मजबूती (Strength): प्राकृतिक तन्तुओं में रेशम के तन्तु सबसे अधिक मजबूत होते हैं। गीली अवस्था में इनकी शक्ति कम हो जाती है परन्तु सूखने पर फिर से शक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

6. लोच (Elasticity): प्राकृतिक तन्तुओं में प्रत्यास्थता (लोच) का गुण रेशम में दूसरे स्थान पर रहता है। खींचने पर यह बिना टूटे अपनी लम्बाई से अधिक खिंच सकता है और छोड़ने पर अपनी पूर्व अवस्था में आ जाता है।

7.ताप की संवाहकता (Heat Conductivity): रेशम के तन्तु ताप के बुरे संवाहक हैं। शरीर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देते इसलिए रेशमी वस्त्र सर्द ऋतु में पहनने के लिए उपयुक्त हैं।

8. प्रतिस्कंदता (Resiliency): रेशम के तन्तु में लचक की क्षमता भी होती है। इसमें सलवटें नहीं पड़ती।

9.सिकुड़न (Shrinkage): तन्तु सीधे तथा लम्बे होने के कारण सिकुड़ते नहीं। थोड़ी बहुत सिकुड़न गीली अवस्था में प्रेस करने पर दूर हो जाती है।

10. रगड़ का प्रभाव (Effect of Friction): रगड़ से रेशम की चिकनी सतह पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इसकी कोमल सतह खुरदरी हो जाती है। इसलिए सिल्क के वस्त्रों को सावधानी से हल्के दबाव से धोना चाहिए।

11. ताप का प्रभाव (Effect of Heat): रेशम के तन्तु अत्यन्त कोमल होते हैं। इसलिए अधिक ताप नहीं सह पाते । 300°F ताप पर यह नष्ट होने लगता है। सिल्क के वस्त्रों पर हल्की गर्म प्रेस ही करनी चाहिए।

12. नमी सोखने की क्षमता (Absorbency): रेशम के तन्तु नमी को जल्दी सोखते हैं परन्तु जल्दी नमी को छोड़ते नहीं । कुछ मात्रा में इसमें नमी रह जाती है जिसे बाहर से देखने पर जानना कठिन होता है।

13. सफाई एवं धुलाई (Cleanliness and Washability): चिकनी सतह होने के कारण सिल्क के वस्त्र जल्दी गन्दे नहीं होते । रगड़ से रेशे खराब हो जाते हैं। सिल्क के वस्त्रों को निचोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि गीली अवस्था में ये कमजोर हो जाते हैं। हल्के से दबा कर पानी निकालना चाहिए।

14. प्रकाश का प्रभाव (Effect of Light): धूप एवं प्रकाश में तन्तु बहुत जल्दी खराब होने लगते हैं। रंग भी उड़ने लगता है। सिल्क का प्रयोग पर्दे बनाने के लिए उचित नहीं।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :
1. क्षार का प्रभाव (Effect of Alkali): क्षार का रेशम के तन्तुओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है इसलिए रेशमी वस्त्र धोने के लिए क्षारयुक्त साबुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऊन के साथ यदि इसकी तुलना की जाए तो रेशम का रेशा ऊन की अपेक्षा क्षार के प्रति अधिक सहनशील है।

2. अम्ल का प्रभाव (Effect of Acid): कार्बनिक अम्ल को कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता । अकार्बनिक अम्ल का तनु घोल भी रेशम के वस्त्रों पर इस्तेमाल किया जा सकता है, किन्तु सान्द्र अम्ल रेशम के तन्तु को क्षति पहुँचाते हैं। नाइट्रिक अम्ल से इसका रंग एवं चटक पीला पड़ जाता है।

3. रंगों का प्रभाव (Effect of Colours): रेशम पर रंग आसानी से चढ़ जाते हैं और पक्के होते हैं।

4. जीवाणुओं का प्रभाव (Effect of Moth and mildew): सिल्क पर फफूंदी नहीं लगती लेकिन लम्बे समय तक नमी वाले स्थान पर फफूंदी लगने का डर रहता है । कीड़े का प्रभाव होता है।

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रेशम के वस्त्रों की उपयोगिता (Importance of Silk Clothes) :

1. रेशम को अपनी कोमलता, चिकनेपन, आकर्षण, चमक, मजबूती तथा लटकनशीलता (Draping Quality) के कारण ‘वस्त्रों की रानी’ कहा जाता है। रेशम का प्रयोग राजसी घरानों में होता आया है। इसके उत्पादन में अत्यन्त सावधानी तथा कुशल हाथों की आवश्यकता होती है, इसलिए यह एक महँगा वस्त्र है। रेशमी वस्त्रों का प्रयोग विशेष अवसरों पर ही किया जाता है।

2. ताप का कुचालक होने के कारण रेशमी वस्त्र सर्दी में पहनने के लिए उत्तम है। अपनी महीनता के कारण इन्हें गर्मी में भी पहना जा सकता है। बारीक रेशमी वस्त्रों से शरीर की गर्मी तथा हवा निकलती रहती है।

3. रेशमी वस्त्रों पर रंग आसानी से चढ़ जाते हैं, इसलिए कई रंगों में मिलते हैं। इसे दोबारा भी दूसरे रंग से आसानी से रंगा जा सकता है।

4. रेशमी वस्त्रों पर सलवटें नहीं पड़ती इसलिए अधिक प्रेस की भी जरूरत नहीं होती। रेशमी वस्त्र रंगड़ तथा क्षार में खराब हो जाते हैं।

प्रश्न 4.
ऊन (Wool) के प्राप्ति स्रोत, ऊनी कपड़ा तैयार करना, भौतिक. एवं रासायनिक विशेषताएँ तथा उपयोगिता पर निबन्ध लिखें।
उत्तर:
ऊन (Wool): ऊन एक प्राकृतिक प्राणिज वस्त्रोपयोगी तन्तु है। ऊन के तन्तु हमें विभिन्न पशुओं से मिलते हैं। प्राचीन काल में मनुष्य पशुओं को मार कर उनकी खाल को वस्त्र के रूप में प्रयोग करता था। सभ्यता एवं ज्ञान के विकास से मनुष्य ने यह जाना कि पशुओं को मारे बिना ही उनकी त्वचा पर उगने वाले बालों को काट कर ऊन तैयार की जा सकती है, जिससे ऊनी वस्त्र तैयार करके वह अपने आपको सर्दी से बचा सकता है।

ऊन प्राप्ति के स्रोत (Sources of Wool): ऊन के रेशे हमें विभिन्न पशुओं जैसे भेड़, बकरी, ऊँट, लामा, खरगोश आदि से प्राप्त होते हैं। सर्वाधिक ऊन भेड़ों से प्राप्त की जाती है। अतः ऊन सभी पशुओं से प्राप्त की जा सकती है जिनके शरीर पर लम्बे बाल उगते हैं। भिन्न-भिन्न पशुओं से प्राप्त होने वाली ऊन की विशेषताएँ एवं उपयोगिताएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। भेड़ों से सबसे अच्छी ऊन मोरनी जाति की भेड़ से प्राप्त होती है।

मोरनी जाति की भेड़ स्पेन में है परन्तु अब सभी देशों में इस जाति की भेड़ को पाला जाता है। भारत में कश्मीरी बकरी से उत्तम किस्म की पश्मीना ऊन प्राप्त होती है। अंगोरा जाति की बकरी एवं खरगोश से भी रेशम की भांति कोमल एवं चमकीली ऊन प्राप्त होती है । दक्षिणी अमेरिका के पहाड़ी जानवर लामा-अल्पाका एवं हिकुना जो बोझा ढोने का काम करते हैं, उनके बालों को उतार कर भी ऊन के रेशे प्राप्त किए जाते हैं।

लामा से प्राप्त ऊन हल्की होती है, अल्पाका से प्राप्त ऊन मध्यम श्रेणी की होती है तथा हिकुना से प्राप्त ऊन बहुत बढ़िया किस्म की होती है। एशिया के पठार एवं तिब्बत के प्रदेशों में यॉक नामक पशु, जो बोझ ढोने का काम करता है, से ऊन प्राप्त की जाती है। यह ऊन अत्यन्त नर्म होती है। ऊँट से भी ऊन प्राप्त की जाती है जो कोमल व सुन्दर होती है।

ऊन के रेशे दो प्रकार के होते हैं –

  • कटी ऊन (Fleece):यह रेशे जीवित जानवर की खाल से निकाले जाते हैं।
  • खींची हुई ऊन (Pulled Wool): यह रेशे मरे हुए जानवर की खाल से निकाले जाते हैं।

ऊन के रेशों से तीन प्रकार के कपड़े तैयार करते हैं :
1. ऊनी कपड़े Woollens): इन्हें बनाने के लिए तन्तुओं का प्रयोग करते हैं। यह वस्त्र मोटे व खुरदरे होते हैं।

2. वस्टेंड (Worsted Fabric): इन्हें बनाने के लिए लम्बे तन्तुओं का प्रयोग करते हैं जिनकी कंघी व कटाई भली प्रकार की जाती है। यह वस्त्र चिकने व मजबूत होते हैं, जैसे-पैंट, कोट। आदि।

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3. नमदा (Felted Fabric): यह वस्त्र सीधे तन्तुओं से बनाए जाते हैं जिन्हें उचित नमी, तापमान व दबाव से जोड़ा जाता है। इसे फेल्ट विधि कहते हैं। यह वस्त्र खुरदरे होते हैं, जैसे नमदा आदि। ऊनी कपड़ा तैयार करना-मशीनों द्वारा ऊनी कपड़ा तैयार करने के लिए भेड़ों को गर्मियों के शुरू होते ही अच्छी तरह नहलाया जाता है तथा कुछ सप्ताह पश्चात् ऊन उतार ली जाती है। इस ऊन को गांठों में बांधकर कारखानों में भेज दिया जाता है।

कारखानों में ऊनी कपड़ा बनाते समय निम्नलिखित प्रक्रियाएँ की जाती है –
1. तन्तुओं को छांटना और साफ करना (Sorting & Cleaning): कारखानों में सर्वप्रथम फन को तन्तुओं की लम्बाई, व्यास, कोमलता अथवा मजबूती आदि गुणों के आधार पर अलग-अलग कर लिया जाता है।

साधारण तन्तु जिनकी लम्बाई अधिक नहीं होती है उससे सस्ता ऊनी कपड़ा बनाया जाता }। उत्तम किस्म के लम्बे व मुलायम ऊनी तन्तुओं से बढ़िया किस्म का कपड़ा बनाया जाता है। था सबसे घटिया किस्म के तन्तुओं से मोटे कपड़े, कम्बल या कालीन बनाए जाते हैं। धूल साफ करने वाली मशीन, जिसे डस्टर कहते हैं, की सहायता से तन्तुओं पर लगी धूल को हटा दिया जाता है।

2. तन्तुओं की धुलाई एवं निघर्षण करना (Washing and Scouring): ऊन के तन्तुओं की धुलाई करने के लिए साबुन के गर्म घोल तथा मन्द क्षार का प्रयोग किया जाता है। जब ऊन के तन्तु अच्छी तरह साफ हो जाते हैं तब इन्हें निघर्षण-क्रिया द्वारा सुखा लिया जाता है। इस कार अब ऊनी तन्तु गन्दगी, पसीने आदि से मुक्त हो जाते हैं। कई बार ऊनी तन्तुओं को इसी समय रंग भी दिया जाता है।

3. ऊनी तन्तुओं को धुनना (Carding): ऊनी तन्तुओं को मशीनों की सहायता से धुनाई करके सुलझाया जाता है। धुनाई करने से ऊन के तन्तुओं की गन्दगी भी हट जाती है।

4. कार्बोनीकरण (Carbonizing): धुलाई व धुनाई करने के पश्चात् भी ऊन के तन्तुओं में कुछ न कुछ गन्दगी शेष रह जाती है जिसे दूर करने के लिए कार्बोनीकरण की प्रक्रिया में ऊन । तन्तुओं को सल्फ्यूरिक अम्ल के हल्के घोल में डुबोया जाता है जिससे तन्तुओं में उपस्थित नावश्यक वानस्पतिक पदार्थ जल जाते हैं। इसके पश्चात् तन्तुओं को आहिस्ता से निचोड़ कर ‘पेक्षित सल्फ्यूरिक अम्ल को निकाल कर नियन्त्रित ताप पर इन्हें सावधानीपूर्वक सुखा लिया

5. तन्तुओं पर तेल लगाना (Oiling): कार्बोनाइजिंग की प्रक्रिया के पश्चात् तन्तुओं को | पानी में धोकर सुखा लिया जाता है और उन पर जैतून का तेल अथवा ग्लिसरीन लगाई जाती है नपसे तन्तु कोमल तथा लचीले हो जाते हैं और धुनाई करते समय अधिक नहीं टूटते हैं।

6. कताई करना (Spinning): रूई के तन्तुओं की भाँति ऊनी तन्तुओं में से मशीनों द्वारा धागा खींचकर उसे ऐंठन दी जाती है। वर्सटेड कपड़े (Worsted Cloth) के लिए साधारण ऊनी कपड़े की अपेक्षा धागों को अधिक ऐंठन दी जाती है। यही कारण है कि वर्सटेड कपड़ा पतला, कड़ा व मजबूत हो जाता है तथा साधारण ऊनी कपड़ा जिसके धागे में कम ऐंठन होती है मोटा, नरम, गुदगुदा व रोएँदार होता है।

7. कंघी करना और खींचना (Combing and Drawing): तेल लगाने के पश्चात् तन्तुओं पर कंघा किया जाता है जिससे 10 सेमी. से अधिक लम्बे तन्तु एक-दूसरे समान्तर स्थिति में आ जाते हैं और छोटे-छोटे तन्तु अलग हो जाते हैं। कारखानों में विशेष मशीनों द्वारा कंघी की जाती है जिससे तन्तु खींचकर सीधे धागे का रूप धारण कर लेते हैं। इन सीधे धागों (तन्तुओं) को (Top) टॉप कहते हैं। बहुधा टॉप तन्तुओं को ही रंग लिया जाता है परन्तु कई बार वर्सटेड कपड़ा बनाने के लिए पहले धागा बनाया जाता है फिर उसे रंगा जाता है।

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8. रंगाई तथा विरंजन (Dying and Bleaching): ऊनी कपड़ों को अम्लीय रंगों से रंग कर आकर्षक बनाया जाता है। यदि कपड़ा रंगना न हो तो उसे ब्लीच किया जाता है जिससे उसके पीलेपन को दूर किया जा सके। ऊन के तन्तुओं की विशेषताएँ (Properties of Wool Fibres) :

भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties) :
1. रचना एवं स्वरूप (Construction): ऊन के तन्तु कैरोटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं। तन्तु के बाहर के आवरण स्केल अर्थात् परतदार (Epidermal) कोशिकाओं के बने होते हैं – जो एक-दूसरे पर चढ़ी रहती हैं। परतदार कोशिकाओं के एक-दूसरे पर चढ़े हुए किनारे ही ऊन के रोएँ होते हैं। उत्तम किस्म की ऊन में यह रोएँ अधिक होते हैं।
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2. लम्बाई (Length)-भिन्न-भिन्न जाति के पशुओं से प्राप्त ऊन के रेशों की लम्बाई भिन्न-भिन्न होती है। यहाँ तक कि भिन्न-भिन्न जाति के भेड़ों से प्राप्त ऊन के रेशों की लम्बाई भी भिन्न-भिन्न होती है। ऊन के रेशे जितने लम्बे होते हैं, उतने ही उत्तम कोटि के माने जाते हैं। सामान्यत: ऊन के रेशे 5 सेमी. से लेकर 35 सेमी. तक लम्बे हो सकते हैं। इसी प्रकार ऊन के तन्तुओं का व्यास भी 15 माइक्रोन से 40 माइक्रोन तक हो सकता है।

3. तन्तु की दृढ़ता (Rigidity of Fibres)-ऊनी तन्तु अन्य प्राकृतिक तन्तुओं से अधिक निर्बल होते हैं। लम्बे तन्तुओं की अपेक्षा छोटे तन्तु कमजोर होते हैं। गीली अवस्था में ऊनी तन्तु अपनी 10 से 15 प्रतिशत शक्ति खो देते हैं परन्तु सूखने पर उनकी शक्ति पुनः वापस आ जाती है।

4. लचीलापन (Flexibility)-ऊन का दीर्धीकरण (Elongation) लगभग 20 से 50 प्रतिशत तक होता है परन्तु गीली अवस्था में यह और भी बढ़ जाता है। ऊन का यह लचीलापन उसकी प्राकृतिक ऐंठन के कारण होता है। तन्तुओं की निर्बलता के कारण धुलाई करते समय ऊनी कपड़ों को अधिक दबाव नहीं देना चाहिए। ऊन के रेशे जितने अधिक बारीक एवं मजबूत होते हैं उनमें उतनी ही अधिक लचक पायी जाती है। यही कारण है कि उत्तम कोटि के ऊनी कपड़े सिकुड़ते नहीं और न ही बदशक्ल होते हैं। इसी लचक के कारण ऊनी कपड़ों को वस्त्रों का रूप देने में सरलता रहती है तथा अधिक टिकाऊ भी होते हैं।

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5.अवशोषकता-ऊनी रेशों में नमी सोखने की क्षमता अन्य तन्तुओं की अपेक्षा अधिक होती है। यही कारण है कि ऊनी कपड़े गीले हो जाने पर देर से सूखते हैं और यह वातावरण की नमी को भी शीघ्र सोख लेते हैं।

6. पुनरुत्थान-ऊनी रेशों में पुनरुत्थान का गुण अधिक होता है। यही कारण है कि ऊनी रेशों से बने वस्त्रों को जैसे भी पहना जाए वह अपनी मौलिक अवस्था में आ जाते हैं और इन पर इस्तरी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है।

7.प्रत्यास्थता-ऊनी तन्तुओं को जब खींचते हैं तो वह बिना टूटे अपनी पूर्व लम्बाई से लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं और छोड़ने पर पुनः अपनी मौलिक अवस्था में आ जाते हैं। सभी प्राकृतिक तन्तुओं में ऊन के तन्तुओं में सबसे अधिक प्रत्यास्था होने के कारण ये शरीर पर फिट आ जाते हैं।

8. अपघर्षण प्रतिरोधकता-ऊनी तन्तु रगड़ सहन नहीं कर सकते हैं तथा रगड़ने पर कमजोर पड़ जाते हैं। चूँकि गीले ऊनी कपड़े की शक्ति क्षीण हो जाती है, अतः धोते समय इन्हें रगड़ना नहीं चाहिए। यही कारण है कि महंगे उत्तम किस्म के ऊनी कपड़ों को शुष्क धुलाई (ड्राईक्लीन) से धोया जाता है क्योंकि पानी से इनका आकार बिगड़ने का भय रहता है।

9.ताप की संवाहकता-ऊनी रेशे ताप के अच्छे संवाहक नहीं होते हैं। ऊनी रेशों में रिक्त स्थान होते हैं जिनमें वायु रहती है जो शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है। यही कारण है कि सर्दियों में ऊनी वस्त्र पहनने से हमारा शरीर गर्म रहता है।

10. ताप का प्रभाव-प्रत्यक्ष ताप का ऊनी रेशों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और रेशे की बाहरी परत नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि ऊनी वस्त्रों को इस्तरी करते समय ऊन के ऊपर पतला सूती कपड़ा रखना चाहिए।

11. स्वच्छता-ऊनी रेशों की सतह खुरदरी होने के कारण उन पर धूल के कण आसानी से फंस जाते हैं जिन्हें प्रतिदिन नर्म ब्रुश से झाड़ कर साफ करना चाहिए अन्यथा यह गन्दगी कपड़े की सतह पर जमकर उसे खराब कर देती है।

धोते समय ऊनी कपड़ों को पानी में देर तक भिंगो कर नहीं रखना चाहिए क्योंकि पानी में भिंगोने से उनकी शक्ति कम हो जाती है और तन्तु खुरदरे हो जाते हैं। धोने के पश्चात् ऊनी कपड़ों को लटका कर सुखाना नहीं चाहिए क्योंकि इससे आकार खराब हो जाता है। यही कारण है कि ऊनी कपड़ों को धोते समय अतिरिक्त सावधानी रखी जाती है।

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12. धूप का प्रभाव-ऊनी कपड़ों को अधिक समय तक धूप के सम्मुख रखने से उनका रंग उड़ने लगता है तथा उनकी रासायनिक रचना में परिवर्तन आ जाता है जिससे उन्हें पुनः रंगना भी कठिन हो जाता है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :
1. अम्ल का प्रभाव (Effect of acids)-ऊनी कपड़ों पर सान्धित अम्ल विशेषकर सल्फ्यूरिक अम्ल का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इस अम्ल से ऊनी कपड़ा पूर्णत: नष्ट हो जाता है। हल्के अम्ल के घोलों का ऊनी वस्त्रों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

2.क्षार का प्रभाव (Effect of alkalies)-सभी प्रकार के क्षारीय घोलों का ऊनी तन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सोडियम हाइड्रॉक्साइड के केवल पाँच प्रतिशत घोल में ऊनी तन्तुओं को देर तक रखने से वह शीघ्र घुल जाते हैं। यदि क्षार का घोल गर्म हो तो और भी विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। केवल अमोनिया तथा बोरेक्स जैसे क्षार का ऊन के तन्तुओं पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः ऊनी कपड़ों को धोने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है।

3. कार्बनिक घोलों का प्रभाव-ऊनी तन्तुओं पर कार्बनिक घोलों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। केवल हल्के ब्लीज जैसे हाइड्रोजनपरॉक्साइड का ही प्रयोग ऊनी तन्तुओं पर सुरक्षित रूप से किया जा सकता है।

4.जीवाणुओं का प्रभाव-साधारणतः ऊनी कपड़ों पर फफूंदी का प्रभाव नहीं पड़ता है परन्तु अधिक समय तक ऊनी कपड़े को नमी वाले स्थान पर रखा जाए तो उसमें फफूंदी लग जाती है।

5.कीड़ा लगना-ऊनी कपड़ों पर कीड़ा लगने का भय अधिक होता है। कीड़े ऊनी कपड़े को खाकर नष्ट कर देते हैं। ऊनी कपड़े में नमी होने पर कीड़ा शीघ्र लगता है। ऊनी कपड़ों को कीड़ों से बचाने के लिए समय-समय पर धूप लगाते रहना चाहिए तथा गर्मियों में इन्हें अखबार के कागज में लपेटकर रखना चाहिए। इनके अतिरिक्त नैपथलीन की गोलियों, सूखी नीम की पत्तियों आदि से भी ऊनी कपड़ों की रक्षा की जा सकती है।

6. समय का प्रभाव-यदि ऊनी वस्त्रों को गन्दा ही रख दिया जाए तो यह कमजोर पड़ जाते हैं और इनमें कीड़े भी लग जाते हैं, परन्तु ऊनी वस्त्रों को साफ करके उचित उपायों का पालन करके काफी समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

ऊनी वस्त्रों की उपयोगिता (Importance of Woollen cloth) :

  • ऊनी वस्त्र ताप के कुचालक होने के कारण सर्दियों में पहने जाते हैं। वर्टेड कपड़ा कोट, पैंट, आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है। ऊन से कम्बल, स्वेटर, जुराबें, टोपी आदि बनाई जाती हैं। ऊनी तन्तु को फैल्ट करके नमदा आदि बनाए जाते हैं।
  • ऊनी कपड़ों में सिलवटें नहीं पड़ती हैं।
  • ऊनी कपड़ा लचीला होने के कारण शरीर के आकार पर फिट हो जाता है।
  • ऊन के साथ टेरीलीन अथवा कॉटन मिलाकर मजबूत टेरीवूल (Terrywool) व काट्सवूल (Cotswool) बनाया जाता है।

प्रश्न 5.
मिश्रित तन्तु (Blended Fibres) किसे कहते हैं ? उनकी उपयोगिता दर्शाइए।
उत्तर:
मिश्रित तन्तु (Blended Fibres): हम जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के तन्तुओं के गुण व दोष भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। ऐसा कोई भी तन्तु नहीं है जिससे बने धागे या कपड़े में सभी वांछित गुण विद्यमान हों। प्रत्येक व्यक्ति कपड़े में सभी गुणों जैसे सुन्दरता, टिकाऊपन, सिलवट मुक्त, धुलाई व रंगाई में आसानी तथा फफूंदी, कीड़ा आदि न लगने का समावेश चाहता है। इन सभी विशेष वाछित विशेषताओं का किसी एक तन्तु में पाया जाना असम्भव है तथा सभी तन्तुओं में कोई न कोई दोष भी होता है।

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वस्त्रोद्योग के विशेषज्ञ वर्षों से मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए वांछित गुणों वाले तथा दोषों से मुक्त कपड़े के उत्पादन के लिए प्रयास करते रहे हैं। इन प्रयासों के फलस्वरूप अब मिश्रित (Blended) धागे बनने लगे हैं। जब एक से अधिक प्रकार के तन्तुओं को मिला कर धागा तैयार करते हैं तो उन्हें मिश्रित धागा कहते हैं। प्रायः ऐसे दो तन्तुओं को मिश्रित किया जाता है जिनके द्वारा बनाए गए कपड़े में इन दोनों के मिश्रित गुणों का समावेश चाहते हैं।

अलग-अलग तन्तुओं के आकार-प्रकार एवं लम्बाई में भिन्नता होने के कारण मिश्रित तन्तुओं से बने धागों में समानता का अभाव होता है। यह कहीं से अधिक पतले तो कहीं से अधिक मोटे होते हैं, परन्तु विज्ञान की उन्नति से इस समस्या का समाधान भी हो गया है। आज बाजार में अनेक प्रकार के मिश्रित तन्तुओं से बने कपड़े मिलते हैं।

1. दो प्राकृतिक तन्तुओं के मिश्रण से मिश्रित तन्तु: कपास के तन्तु एवं ऊन के तन्तु को मिलाकर बने तन्तु जैसे काट्सवुल (Cotswool), रेशम के तन्तु एवं सूती तन्तु को मिला कर बने तन्तु-सिल्को (Silkco)।

2. एक प्राकृतिक तन्तु एवं एक कृत्रिम तन्तु के मिश्रण से बने मिश्रित तन्तु:

  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं सूत के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीकॉट (Terry Cot)
  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं रेशम के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीसिल्क (Terry Silk)
  • पॉलीएस्टर तन्तु टेरीलीन एवं ऊन के तन्तुओं को मिलाकर बने टेरीवुल (Terry Wool)

मिश्रित तन्तुओं से बने कपड़े आजकल बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इनमें दोनों तन्तुओं के अच्छे गुणों का समावेश होता है जिससे कपड़ा अधिक सुविधाजनक एवं आकर्षक हो जाता है।

टेरीकॉट की बनी कमीजें शुद्ध टेरीलीन अथवा सूत की बनी कमीजों से अधिक टिकाऊ, आकर्षक एवं सुविधाजनक होती हैं क्योंकि इनमें टेरीलीन व सूत दोनों के अच्छे गुणों का समावेश होता है। शुद्ध ऊनी वस्त्रों को धोने में जहाँ बहुत अधिक सावधानी रखनी पड़ती है वहाँ टेरीवुल को आसानी से धोकर साफ किया जा सकता है।

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इसी प्रकार शुद्ध ऊनी कपड़े अधिक मजबूत नहीं होते हैं परन्तु जब उनमें टेरीलीन के तन्तु मिलाते हैं तो वह अधिक मजबूत हो जाते हैं। टेरीसिल्क से बने कपड़े सिल्क की चमक लिये हुए आकर्षक तो होते ही हैं, परन्तु सिल्क से कहीं अधिक मजबूत एवं टिकाऊ भी होते हैं। मिश्रित कपड़ा बनाने के लिए धागा तैयार करते समय दोनों प्रकार के तन्तुओं को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है और इन रेशों के अनुपात के अनुसार ही तैयार वस्त्र के गुण निर्धारित होते हैं।

प्रश्न 6.
मानव निर्मित (Man-made fibres), नायलोन (Nylon) व टेरीलीन-पॉलिएस्टर रेशा (Terrylene-the Polyster fibre) की भौतिक, रासायनिक, तापीय, जैविक विशेषताएँ तथा प्रयोग व सावधानी विस्तार से लिखें।
उत्तर:
मानव निर्मित तन्तु (Man-made fibres):
नायलोन (Nylon)-यह सबसे पहला मानव-निर्मित रेशा है। डू-पोंट कम्पनी ने इसे 1927-29 ई. में खोज निकाला। यह एक पोलिअमाइड रेशा है। बुनी हौजरी के रूप में यह 1930 ई. से बाजार में बिकती है। सारे विश्व में नायलोन की हौजरी व जुराबें बहुत प्रसिद्ध हैं। पहले नायलोन को 6,6 कहा जाता था। नम्बरों का अर्थ था कि नायलोन बनाने के लिए दो रसायनों का प्रयोग किया गया है जिसमें प्रत्येक 6 कार्बनिक परमाणु हैं। नायलोन 6, 10 नायलोन ब्रश बनाने के काम आता है। भारत में केवल 6, 6 नायलोन का उत्पादन तथा प्रयोग होता है।

नायलोन बनाने के लिए प्रयोग में लाए गए दो यौगिकों के नाम हैं एडीपिक अम्ल और हेक्सामेथीलीन डायमीन। प्रेशर के साथ गर्म करने से इनमें पाए जाने वाले छोटे-छोटे कण परस्पर मिलकर लम्बे-लम्बे कतरों में बदल जाते हैं। इन कतरों को पिघलाकर पम्प के दबाव से स्पिन्नरैट के छिद्रों में से निकालते हैं तो महीन लम्बे रेशे बनते हैं जो हवा के सम्पर्क में आते ही सूख जाते हैं। पोलिमर छोटे-छोटे अणुओं को मिलाकर बनाया गया अणु होता है तथा इस प्रक्रिया को Polymerization कहते हैं।

भौतिक विशेषताएँ (Physical Properties) :
1. सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखने पर ज्ञात होता है कि नायलोन के तन्तु गोलाकार, चमकदार, सीधे और चिकने होते हैं। इन तंतुओं में प्राकृतिक पारदर्शकता होती है। इनकी सहायता से पूर्ण पारदर्शक वस्त्र बनाए जा सकते हैं। नायलोन की राल में सफेद रंग लगाकर अपारदर्शी नायलोन तैयार करने का ही अधिक प्रचलन है।

2. नायलोन मानव-निर्मित तंतुओं में सबसे अधिक मजबूत होता है।

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3. गीले होने पर भी नायलोन के रेशे अपनी मजबूती व प्रत्यास्थता बनाए रखते हैं। अतः इन्हें धोने के समय विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं होती । पानी शीघ्र फैल जाता है तथा वाष्पीकरण में सहायक होता है।
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4. नायलोन के रेशे लम्बे व मजबूत होते हैं। उनमें दूसरे प्रकार के रेशों को काटने की शक्ति होती है। यह फन्दा डालने की कोशिश करते हैं परंतु कमजोर रेशों की तरह टूटते नहीं बल्कि तन जाते हैं। इसी कारण कुछ समय के बाद कपड़ों में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं।

5. नायलोन के कपड़ों पर पसीने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, हालाँकि रंग नष्ट हो जाते हैं।

तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties) :
1. नायलोन आग की लपट में पिघल जाती है तथा लाल रंग की लेसदार राख बन जाती है जो ठंडे होने पर सख्त हो जाती है।
2. नायलोन को ऊष्मता के विरुद्ध बनाया जाता है। इसलिए हर प्रकार के नायलोन 140°C तक का तापमान काफी समय तक बिना किसी हानि के सह लेते हैं। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि इन्हें इस तापमान से अधिक तापमान पर न रखा जाए।
3. सूर्य की किरणें नायलोन को नष्ट कर देती हैं। अधिक देर तक सूर्य की किरणों में रखने से यह कमजोर हो जाते हैं तथा टूटने का खतरा बढ़ जाता है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties):
1. इस पर क्षार का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु प्रत्येक अम्ल का रेशों पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ता है।
2. ब्लीच व धब्बे मिटाने वाले रसायनों का नायलोन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।

जैविक विशेषताएँ (Biological Properties) :
1. नायलोन के तंतुओं पर जीवाणुओं का कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
2. अगर चीटियाँ या कॉकरोच कपड़े में फंस जाए तो वे इसे काटकर बाहर निकल जाएँगे।

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नायलोन का प्रयोग और सावधानी (Use and Care of Nylon): नायलोन को धोना व इसका रख-रखाव आसान है। यह ठंडे या गर्म पानी से धोया जा सकता है और तुरत ही सूख जाता है। ठंडे पानी में धोने से सिलवटें नहीं पड़ती। अगर दूसरे कपड़ों के साथ इसे धोया जाए तो नायलोन का यह स्वभाव होता है कि वह उनका रंग और मैल स्वयं ले ले। इस प्रकार कपड़े में मटमैलापन या पीलापन आ जाता है जो कठिनाई से दूर होता है, अत: तुरत धब्बे मिटाना आवश्यक है। यह वेशभूषा, पर्दो और रात के परिधान के लिए प्रयोग में लाया जाता है। दूसरे देशों के साथ मिलाकर इसका बहुमुखी प्रयोग किया जा सकता है।

टेरीलीन-पॉलिएस्टर रेशा (Terrylene-The Polyester Fibre): डू-पोंट की अनुसंधान संस्था में सबसे पहले इसकी खोज हुई। नायलोन की खोज का श्रेय डू-पोंट को जाता है। पॉलिएस्टर को ब्रिटेन स्थिति कैलिको प्रिंटर्स एसोसिएशन ने परिचित करवाया जिसकी सार्वजनिक सूचना 1946 में ही दी गई चूँकि उस समय द्वितीय महायुद्ध चल रहा था, डू-पोंट ने इसे. डेकरॉन नाम दिया जबकि इम्पीरिल केमिकल इण्डस्ट्रीज ICI ने इंगलैंड व यूरोप में इसे टेरीलीन कहा। पॉलिएस्टर का रख-रखाव आसान है और यह क्रीजरोधक है। अमेरिका में इसके कपड़े सबसे अधिक प्रयोग में लाये जाते हैं।

पॉलिएस्टर के अणु पॉलीमर हैं जो विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाए जाते हैं। इसके भार का लगभग 85% कार्बोक्सिलिक अम्ल होता है। तेज ताप पर प्रतिक्रिया कराकर पॉलीमर बनाए जाते हैं जिससे यन्त्रों द्वारा रिबन जैसी लम्बी-लम्बी पट्टियाँ बनाई जाती हैं। फिर इन पट्टियों के टुकड़े काटे जाते हैं जिन्हें पिघलाकर तथा स्पिन्नरैटों से निकाल कर तंतुओं का निर्माण किया जाता है। इन तंतुओं का भी अन्य तंतुओं की भाँति धागा बनाया जाता है जिससे अनेक प्रकार के सुंदर कपड़े बनाए जाते हैं।

(Physical Properties):

  • सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखने पर यह ज्ञात होता है कि इसके तन्तु नायलोन के तंतुओं के समान ही होते हैं। ये तन्तु चिकने, सीधे और चमकदार होते हैं।
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  • विभिन्न पॉलिएस्टर की अलग-अलग दृढ़ता होती है। कई रेशों की मजबूती नायलोन से भी अधिक होती है व अन्यों की रेयान की तरह कम । सूखी एवं गीली दोनों अवस्थाओं में मजबूती में कोई अंतर नहीं होता।
  • यह स्पर्श पर गर्म होता है।
  • यह ऐसा वस्त्र होता है जो पहनने पर न तो सिकुड़ता है न ही फैलता है। इसलिए ग्राहकों को यह शीघ्र ही पसंद आ जाता है।
  • पॉलिएस्टर के कपड़े की सूती कपड़ों से दो-चार गुना अधिक अपघर्षण प्रतिरोधकता होती है।
  • इन कपड़ों में स्थिर-विद्युत पैदा होती है।
  • इनकी अवशोषकता कम होती है। धब्बे सतह पर ही रहते हैं तथा शीघ्र ही धुल जाते हैं।
  • टेरीलीन में विकिंग प्रभाव होता है। विकिंग (wicking) का अर्थ है कि रेशा पहनने वाले के शरीर से नमी ले लेता है जो वाष्पीकरण के बाद त्वचा पर ठंडक का अहसास कराता है।

तापीय विशेषताएँ (Thermal Properties):

  • पॉलिएस्टर बंधक वाला काला धुआँ छोड़ते हुए जलता है।
  • इसे थोड़ी हल्की इस्त्री चाहिए ।
  • एक बार बैठने के बाद क्रीज व प्लेट अधिक देर तक टिक सकती है।

रासायनिक विशेषताएँ (Chemical Properties) :

  • पॉलिएस्टर के तंतुओं पर हल्के क्षार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
  • पॉलिएस्टर के तंतुओं पर अम्ल के हल्के घोल का कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन तीव्र धातु अम्ल व उच्च तापमान के फलस्वरूप इसके तन्तु नष्ट हो जाते हैं।
  • इन पर कार्बनिक घोलों, ब्लीच और धब्बे छुड़ाने वाले यौगिकों का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • पॉलिएस्टर के कपड़ों को अधिक समय तक धूप में रखने से वे कमजोर हो जाते हैं। शीशे के पीछे से यह अच्छी प्रतिरोधकता रखता है, इसलिए पर्यों के लिए अच्छा कपड़ा है।

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जैविक विशेषताएँ (Biological Properties):सामान्यतः शुद्ध पॉलिएस्टर के तंतुओं पर जीवाणुओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन पर कीड़ों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

पॉलिएस्टर का प्रयोग और सावधानी (Use and Care of Polyester): इन वस्त्रों पर सिलवटें नहीं पड़ती जिससे इन पर इस्त्री करने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए लोगों को यह बहुत पसन्द आते हैं। अम्ल, क्षार और कार्बनिक यौगिकों का भी कोई प्रभाव नहीं होता। अधिक मैले कपड़े को साफ करने के लिए विशेष परिश्रम भी नहीं करना पड़ता। धोने के बाद यह वस्त्र शीघ्र ही सूख जाता है।

पॉलिएस्टर का प्रयोग पर्दे, फर्नीचर तथा फर्श की सजावट के लिए किया जाता है। औद्योगिक वस्तुएँ, जैसे-रस्सियाँ, मछली पकड़ने का जाल, टायर, मशीनों के पट्टे आदि अपनी मजबूती भी पॉलिएस्टर से ही पाते हैं। बिना किसी हानि के पॉलिएस्टर की नाड़ियाँ बनाकर हृदय सर्जरी के काम में लाया जाता है। आधुनिक युग में बिना बुना हुआ पॉलिएस्टर टेरीलीन का छतों व चटाइयों में भी प्रयोग हो रहा है।
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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 16 समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science समय व ऊर्जा का व्यवस्थापन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्वितीयक रंग (Secondry colour) होता है। [B.M.2009A]
(क) लाल-नीला-पीला
(ख) बैंगनी-हरा-केसरी
(ग) काला-सफेद-हरा
(घ) पीला केसरी-नीला-लाल केसरी
उत्तर:
(ख) बैंगनी-हरा-केसरी

प्रश्न 2.
कार्बन हमारे शरीर को – [B.M.2009A]
(क) टूट-फूट का निर्माण करता है
(ख) शक्ति प्रदान करता है
(ग) ऊर्जा प्रदान करता है।
(घ) उष्मा प्रदान करता है
उत्तर:
(ग) ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रश्न 3.
ऊर्जा को पोषण विज्ञान में कैसे मापा जाता है ? [B.M.2009A]
(क) तराजू बाट में
(ख) धन में
(ग) कैलोरीज में
(घ) आय में
उत्तर:
(ग) कैलोरीज में

प्रश्न 4.
अवकाश काल में की जाने वाली क्रियाओं को भागों में बाँटा जा सकता है [B.M.2009A ]
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

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प्रश्न 5.
थकान प्रकार की होती है – [B.M.2009A]
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ख) दो

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समय क्या है ?
उत्तर:
समय (Time) में भूत, वर्तमान व भविष्य सम्मिलित हैं। अपनी सुविधा के लिए मनुष्य ने उसे वर्ष, दिन, मिनट व क्षणों में विभाजित कर दिया है। समय को कई विधियों से मापा जाता है। पृथ्वी के अपनी धुरी पर परिक्रमा करने से, दोलक (Pendulum) के हिलने से मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए समय को वर्ष, महीने, सप्ताह व दिनों में विभाजित करके कैलेण्डर (Calendar) बना लिया है। समय के सही माप के लिए हाथ घड़ी का आविष्कार किया गया ।

प्रश्न 2.
समय व्यवस्था का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
समय व्यवस्था (Time management): कम-से-कम समय खर्च करके अधिक-से-अधिक कार्य सम्पन्न करना।

प्रश्न 3.
समय योजना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समय योजना (Time Plan): समय योजना एक अग्रिम योजना के रूप में परिभाषित की जाती है जिसमें दिए हुए समय में काम करने का कार्यक्रम बनाया जाता है।

प्रश्न 4.
समय व्यवस्था की प्रक्रिया के विभिन्न चरण कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर:
समय व्यवस्था (Step in time management) :

  • योजना बनाना (Planning)
  • क्रियान्वयन एवं नियन्त्रण (Implementation and controls)
  • मूल्यांकन (Evaluation)।

प्रश्न 5.
शक्ति क्या है?
उत्तर:
शक्ति (Energy) – गुडइयर, कलोर, ग्रैसवक़डल के अनुसार “शक्ति एक निहित या आन्तरिक शक्ति है तथा कार्य करने की क्षमता है।”

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प्रश्न 6.
अवकाश काल (Leisure Time) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अपनी इच्छानुसार अपना मनपसंद कार्य करने में या विश्राम करने में बिताया गया समय अवकाश काल कहलाता है।

प्रश्न 7.
शक्ति की व्यवस्था से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
शक्ति की व्यवस्था (Energy Management): कम-से-कम शक्ति खर्च करके, बिना थकान महसूस किए, अधिक-से-अधिक कार्य सम्पन्न करना।

प्रश्न 8.
शक्ति की व्यवस्था करते समय किन-किन घटकों का अध्ययन रखना चाहिए?
उत्तर:

  • विभिन्न कार्यों के लिए अपेक्षित शक्ति।
  • थकान (Fatigue)।
  • कार्य सरलीकरण (Work simplification)।

प्रश्न 9.
थकान (Fatigue) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
यदि कार्य करते समय कार्य क्षमता में कमी आ जाए या पहले की तरह कार्य करने का उत्साह न रहे तो इस अवस्था को थकान कहते हैं।

प्रश्न 10.
थकान (Fatigue) कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर:
थकान के प्रकार (Kinds of Fatigue):

  • शारीरिक थकान (Physiological Fatigue)।
  • मानसिक थकान (Psychological Fatigue)।

प्रश्न 11.
शारीरिक थकान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शारीरिक थकान (Physiological Fatigue) शारीरिक थकान वह शारीरिक शक्ति है जो कि पूर्व किए गए कार्य के कारण कार्यक्षमता को कम कर देती है।

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प्रश्न 12.
मानसिक थकान (Psychological Fatigue) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
मानसिक थकान (Psyshological Fatigue) एक मनोवैज्ञानिक शक्ति है, जिसमें कार्य करने की इच्छा नहीं होती, कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है, जबकि वास्तविक शारीरिक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न 13.
कार्य सरलीकरण से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
कार्य सरलीकरण (Work Simplification)-कार्य सरलीकरण अर्थात् कार्य करने का सबसे सरल, शीघ्र और आसान तरीका । कार्य करने की विधि में ऐसे परिवर्तनों को लाना . जिसमें कम से कम समय व ऊर्जा का व्यय करके अधिक से अधिक कार्य सम्पादित किया जा सके. कार्य सरलीकरण कहलाता है।

प्रश्न 14.
कार्य सरलीकरण के कौन-कौन-से तरीके हैं ?
उत्तर:
कार्य सरलीकरण के तरीके (Methods of work simplification) :
1. हाथ और शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन।
2. कार्य, संग्रहीकरण स्थान एवं उपकरणों में परिवर्तन।
3. तैयार उत्पादन में परिवर्तन, नए उत्पादों का प्रयोग।

प्रश्न 15.
घर में स्थान व्यवस्था करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:

  1. एकान्तता
  2. कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध
  3. घूमने-फिरने की व्यवस्था
  4. कमरों का आकार
  5. उपलब्ध स्थान का उचित प्रयोग
  6. सघन लेकिन पर्याप्त कार्य समय
  7. स्वास्थ्यवर्धक।

प्रश्न 16.
सजावट का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
सजावट (Decoration): रंगों, साधनों तथा उपसाधनों की व्यवस्था इस प्रकार की जा , क कमरा आरामदायक, आकर्षक बने तथा मानसिक सन्तुष्टि दें।

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प्रश्न 17.
कला के सिद्धांत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
कला के सिद्धांत (Principles of Art):

  • अनुरूपता (Harmony)।
  • सन्तुलन (Balance)।
  • अनुपात (Proportion)।
  • लचर (Rhythm)

प्रश्न 18.
रंगों के कौन-कौन-से प्रकार हैं?
उत्तर:
रंगों के प्रकार (Kinds of Colours):

  • प्राथमिक रंग (Primary colour) ।
  • द्वितीयक रंग (Secondary colour)
  • मध्य रंग (Tertiary colour)

प्रश्न 19.
रंग योजनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • एकरंगीय योजना (Monochromatic colour)।
  • समदर्शी योजना ( Analogous colour scheme)
  • fausta 2175191 (Complementary colour scheme)
  • खंडित विपरीत योजना (Split complementary scheme)।

प्रश्न 20.
रीता अपना कार्य समय पर पूरा नहीं कर पाती । ऐसे दो उपाय बताएँ, जिससे वह समय आयोजन का लाभ उठाए।
उत्तर:
समय आयोजन के लाभ:

  • कार्य के प्रत्येक भाग को उपस्थित किया जाए।
  • कार्य को पूरा करें।
  • आराम के लिए समय।
  • कार्य सरलीकरण।
  • संतुष्ट होना।

प्रश्न 21.
कविता को एक बार में एक से ज्यादा कार्य करने में कठिनाई होती है ? उदाहरण के साथ बताइए कि वह कैसे कार्य करे ?
उत्तर:
एक ही समय में एक से अधिक कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे-जब ओवन में केक, बिस्कुट आदि बन रहे हों तो उस समय कपड़े धोना, घर की सफाई करना आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समय व्यवस्था (Management of Time) पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
‘समय’ मानव जीवन की अमूल्य निधि है। बीता हुआ समय पुनः प्राप्त नहीं हो पाता, अतः सत्य ही है कि समय जीवन का निर्माता है, अतः इसे नष्ट नहीं करना चाहिए। व्यावसायिक कार्यों में ही नहीं अवकाश काल के लिए भी समय एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी साधन विकासशील हैं परन्तु समय नहीं।

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यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान ही है परन्तु फिर भी चौबीस के बीस घण्टे कर लेना (समय का पूर्ण उपयोग) तथा चौबीस के तीस घण्टे कर लेना (समय का अपव्यय) आज भी चरितार्थ है। इस समान मात्रा में प्राप्त साधन का प्रयोग करते हुए हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना पड़ता है। सोच-समझकर अथवा व्यवस्थित किया गया समय कठिन कार्यों को आसान बना देता है।

प्रश्न 2.
आयोजन तथा व्यवस्थापन (Planning and Management) में आपसी सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
इस चरण में लक्ष्य का स्पष्टीकरण होना आवश्यक है अर्थात् कार्य, विश्राम तथा. मनोरंजन में सामंजस्य बैठाना। समय आयोजन की आंशिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि इसके द्वारा व्यक्ति को अनेक व्यावहारिक समस्याओं के सम्बन्ध में पूर्व में विचार करने को बाध्य होना पड़ता है। इससे निर्णय न ले पाने की स्थिति समाप्त हो जाती है।

परिणामतः मस्तिष्क अन्य समस्याओं का हल करने तथा निरंतर उपस्थित होने वाले तनावों का सामना करने के लिए मुक्त रहता है। समय आयोजन करना सीखने से धीरे-धीरे विचारों का ढांचा बन जाता है जो आगे चलकर स्वतः ही कार्य करता है। उदाहरण के लिए प्रातः उठते ही शौचादि, स्नानादि करके भगवान का स्मरण करना। प्रारम्भ में कोई कार्य मात्र कार्य लगता है. पर बार-बार दोहराए जाने से वह ‘आदत’ बनकर दिनचर्या में स्वयं ही शामिल हो जाता है।

प्रश्न 3.
‘अवकाश काल’ (Leisure Time) किसे कहते हैं ? इसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
अपनी इच्छानुसार अपने मनपसन्द कार्यों को करने में बिताया गया समय अवकाश काल कहलाता है। यह विश्राम में बिताया हुआ समय भी हो सकता है। प्रतिदिन के व्यस्त जीवन में अवकाश काल बहुत महत्त्व रखता है। इस नीरस जीवन में कुछ सुखद व आनन्दपूर्ण क्षण अवकाश काल में ही प्राप्त हो सकते हैं जब व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार रुचि के कार्य कर पाए । इन क्रियाओं को करने में आनन्द की अनुभूति तो होती ही है, साथ ही थकान का अनुभव भी नहीं होता।

अवकाश काल में की जाने वाली कलात्मक, संग्रहात्मक एवं क्रियात्मक क्रियाएँ जीवन को विकसित करने में सहायता करती हैं। कई संग्रहात्मक क्रियाएँ जैसे सिक्के, टिकट, किताबें, चित्र आदि का संग्रह ज्ञान वृद्धि में सहायक है। विभिन्न प्रकार के खेल हमारे स्वास्थ्य के स्तर को सुधारने में सहायक हैं। कलात्मक क्रियाएँ जैसे संगीत सुनना, मूर्तियां बनाना, चित्र बनाना, नृत्यकला आदि मनोरंजन के साथ-साथ जीवन को सांस्कृतिक दृष्टि से विकसित करने में भी सहायक हैं। अतः व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास में अवकाश काल का विशेष स्थान है।

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प्रश्न 4.
शारीरिक थकान (Physical Fatigue) किसे कहते हैं ? शारीरिक थकान का कारण दें।
उत्तर:
निरन्तर शारीरिक कार्य करने के परिणामस्वरूप जो कार्यक्षमता की गति में कमी आ जाती है, उसे “शारीरिक थकान” कहते हैं। यह थकान शरीर में कुछ रासायनिक परिवर्तनों के कारण होती है। माँसपेशियाँ जो शारीरिक क्रियाएँ करने में प्रयुक्त होती हैं, अपनी ऊर्जा ग्लाईकोजिन से प्राप्त करती हैं। इस क्रिया में लैक्टिक अम्ल व कार्बन डाइऑक्साइड जैसे व्यर्थ पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं जो माँसपेशियों के क्रियाकलापों में अवरोध या बाधा उत्पन्न करते हैं।

इनकी रक्त में अधिकता से हम थकान का अनुभव करते हैं। परिणामस्वरूप ऊर्जा उत्पत्ति व ऊर्जा की माँग में असन्तुलन पैदा हो जाता है जिससे हम थकावट महसूस करना आरम्भ कर देते हैं। विश्राम करने पर ये व्यर्थ के पदार्थ निष्कासित हो जाते हैं और हम पुनः कार्य करने के योग्य हो जाते हैं, क्योंकि ऊर्जा उत्पत्ति नियम के अनुसार होने लगती है।

प्रश्न 5.
कार्य सरलीकरण (Work Simplification) से आप क्या समझती हैं ? कार्य सरलीकरण की कुछ विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
कार्य करने की विधि में ऐसे परिवर्तनों को लाना जिससे कम-से-कम समय व ऊर्जा का व्यय करके अधिक-से-अधिक कार्य सम्पादित किए जा सकें, कार्य का सरलीकरण कहलाता है। कार्य को सरल करने की कुछ विधियाँ निम्नलिखित हैं :
1. हाथ तथा शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन लाकर (By hand & physical changes):
(क) अनावश्यक कदमों को रोक कर: नियोजिन रूप से सामान एक ही समय में एकत्रित कर लिया जाए जैसे ट्रे आदि का प्रयोग करके तो समय, शक्ति दोनों की बचत की जा सकती है।
(ख) कार्यों का क्रम निर्धारित करके (By numbering the work): एक ही प्रकार का कार्य करके जो गति प्राप्त हो जाती है, उसे तोड़ना नहीं चाहिए जैसे झाडू लगा कर फिर पोछा लगाना चाहिए।
(ग) कार्य में निपुणता (Efficiency in work): निपुणता हासिल करके समय तथा श्रम दोनों की बचत की जा सकती है।
(घ) उचित मुद्रा का प्रयोग करके (By using correct posture): लिखते समय सही मुद्रा रखने से पीठ व कमर की माँसपेशियों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा व थकान कम होगी।

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2. कार्य एवं भण्डारण स्थान और उपकरण में परिवर्तन लाकर (By making work, storage place & equipment changes):
(क) स्थान की ऊँचाई आरामदायक हो ताकि कन्धों और बाजुओं पर दबाव न पड़े।

(ख) बैठने के लिए स्टूल व कुर्सी आरामदायक हो जिससे आराम से बैठकर काम किया जा सके।

(ग) वस्तुओं पर लेबल लगा हो ताकि ढूंढने में समय व्यर्थ न जाए। कार्य करने का एक ढंग होता है और उस शारीरिक स्थिति में कार्य करने से कम ऊर्जा व्यय होती है। यदि किसी और स्थिति में कार्य किया जाए तो शारीरिक मांसपेशियों पर तनाव पड़ता है और ऊर्जा अधिक व्यय होने के साथ-साथ थकावट भी अधिक होती है। कुछ भारी चीज उठाते समय कमर से झुक कर उठाने की बजाय घुटनों को झुकाकर उठायी जाए तो थकान कम होती है।

(घ) कार्यकुशलता (Skill in work) किसी कार्य में कुशल होने पर उसके कार्य को करने में कम समय एवं कम ऊर्जा व्यय होती है। जैसे-जैसे कार्यकुशलता बढ़ती जाती है, गतिविधियाँ अधिक नियंत्रित एवं तेज हो जाती हैं, जिससे कार्य शीघ्र सम्पन्न हो जाता है। उपर्युक्त विधियों से कार्य को सरलीकृत किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
उत्प्रेरक या प्रेरणा से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
उत्प्रेरक या प्रेरणा (Motivation): जब कार्यकर्ता किसी कार्य को अनिच्छा से करता है अथवा जब उत्प्रेरण का स्तर निम्न होता है तो थकान शीघ्र अनुभव होने लगती है परन्तु जब यही स्तर उच्च होता है तब काफी मात्रा में शक्ति व्यय होने पर भी थकन दृष्टिगोचर नहीं होती। अतः उच्च स्तर का उत्प्रेरण अधिक शक्ति उपलब्ध कराता है। लक्ष्यों के स्पष्ट परिभाषित होने से कार्य रोचक तथा सरल हो जाते हैं तथा जिन लक्ष्यों को सरलता से प्राप्त किया जाए, वे कार्य को कम नीरस तथा उत्प्रेरक बना देते हैं।

प्रश्न 7.
शक्ति का व्यवस्थापन से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
शक्ति का व्यवस्थापन (Management of Energy): मानवीय शक्ति एक सीमित साधन होने पर भी इसका व्यवस्थापन समय की व्यवस्था अनुसार करना सरल तथा स्पष्ट नहीं है क्योंकि समय की उपलब्धता, मात्रा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है जबकि शक्ति का नहीं । प्रत्येक व्यक्ति की कार्य शक्ति उसकी शारीरिक रचना तथा मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। गृहिणी को अपनी क्रियाओं की योजना इस प्रकार बनानी चाहिए कि उनमें प्रयुक्त होने वाली शक्ति का कम-से-कम व्यय हो ताकि अन्य कार्य-कलापों के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति शेष रहे।

शक्ति की व्यवस्था के निम्नलिखित प्रभावकारी कारक हैं –

  • परिवार का जीवन-चक्र।
  • विभिन्न क्रियाओं पर व्यय होने वाली शक्ति।
  • थकान-कारण तथा प्रकार।
  • व्यवस्थापक के मानवीय गुण-कुशलता, बुद्धिमत्ता, मानव-स्वभाव समझने की क्षमता, उत्साह ।

प्रश्न 8.
चित्र के द्वारा रसोई घर के विभिन्न आकार बताएँ ? [B.M. 2009A]
उत्तर:
(a) I : आई आकार
(b) 1 : एल आकार
(c) UN : यू आकार
(d) : स्ट्रेट आकार

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प्रश्न 9.
घरेलू गतिविधियों को लिखें ? [B.M.2009A]
उत्तर:
घरेलू गतिविधियाँ-घर में किए जाने वाले कार्यों की व्यवस्था करने पर सभी गृह कार्य सुचारु रूप से किए जा सकते हैं। हर कार्य का अपना स्थान होता है। जैसे-पकाने के लिए रसोई कक्ष, सोने के लिए शयन कक्ष इन सभी स्थानों को व्यस्थित करना अनिवार्य है।

प्रश्न 10.
एक अच्छे घर में घरेलू गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित करें।
उत्तर:
घरेलू गतिविधियाँ व उपयुक्त स्थान (Household Activities and Space Ailocation): एक अच्छे घर में सभी घरेलू गतिविधियों के लिए उपयुक्त स्थान निर्धारित होना चाहिए। कुछ सामान्य गतिविधियाँ व उनके लिए स्थान निम्नलिखित तालिका में दिया गया है:

गतिविधियाँ (Activities):

  1. रसोई घर।
  2. खाना खाना
  3. अतिथियों का सत्कार
  4. मौज मस्ती-संगीत सुनना, टी.वी. खना
  5. पढ़ना
  6. सोना
  7. नहाना
  8. कपड़े धोना
  9. मल-मूत्र त्यागना

आवंटित स्थान (Space Allocation):

  1. खाना पकाना
  2. खाने का कमरा, रसोई घर या साथ में कोई लॉबी।
  3. गोल कमरा, बैठक, बरामदा या लॉन, बाग।
  4. गोल कमरा, बैठक, लॉबी, बरामदा, सोने का कमरा इत्यादि।
  5. पढ़ाई का कमरा, सोने का कमरा, बैठक, लॉबी, पिछला बरामदा, बाग इत्यादि।
  6. सोने का कमरा, लॉबी, बरामदा, गोल कमरे में सोफा या बेड पर।
  7. स्नान घर, पिछला बरामदा।
  8. स्नान घर, कोई भी स्थान जहां सुविधाएं उपलब्ध हों।
  9. शहरी घरों में संडास, सामुदायिक सुलभ शौचालय।

प्रश्न 11.
उत्पादन में परिवर्तन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
उत्पादन में परिवर्तन (Change in Product): कार्य के अन्तिम रूप में परिवर्तन लाकर समय एवं ऊर्जा पर हुए व्यय को कम किया जा सकता है। यह परिवर्तन परिवार को उपलब्ध सामान तथा पारिवारिक स्तर पर निर्भर करता है। इस परिवर्तन को लाने में गृहिणी की विशेष भूमिका है। वह अपनी बुद्धिमत्ता, मानव स्वभाव को समझने की क्षमता, जागरूकता आदि जैसे गुणों द्वारा परिवार में स्थित व्यर्थ के विचार हटा सकती है तथा नए और आधुनिक विचारों को स्वीकृत करा सकती है।

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अंतिम रूप या उत्पादनों में परिवर्तनों के उदाहरण –

  • सूती कपड़ों की अपेक्षा कृत्रिम कपड़ों के वस्त्रों का प्रयोग (क्योंकि इनका रख-रखाव अपेक्षाकृत बहुत आसान है।)
  • ताजी सब्जियों की अनुपलब्धि या उनके स्थान पर संरक्षित सब्जियों का प्रयोग (क्योंकि साफ करने तथा काटने का समय बचता है)
  • कपड़ों के रूमाल के स्थान पर कागज के रूमालों का प्रयोग (Napkins) (क्योंकि इससे उन्हें धोने का समय व खर्चा बचता है)
  • साबुत मसालों के स्थान पर पीसे मसालों की खरीद (क्योंकि पीसने के झंझट से मुक्ति मिल जाती है)
  • धातु के स्थान पर प्लास्टिक की बनी वस्तुओं का प्रयोग करना, जैसे-प्लेट, गिलास आदि। (क्योंकि इनका रख-रखाव आसान है)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि कच्ची वस्तुओं के प्रयोग अथवा उसी कच्ची वस्तु से विभिन्न वस्तुएँ उत्पादित करने अथवा कच्ची सामग्री और उत्पादित वस्तु दोनों में ही परिवर्तन करने से . कार्य का सरलीकरण किया जा सकता है।

प्रश्न 12.
रंगों के प्रयोग व प्रकार समझाइए।
उत्तर:
रंग चीजों को सुन्दर व आकर्षक तो बनाते ही हैं, इसके साथ-साथ रंगों का प्रभाव सार्वभौमिक भी रहता है। रंगों के शारीरिक प्रभाव की अपेक्षा मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। रंगों के प्रभाव भिन्न-भिन्न होते हैं-सफेद रंग शान्ति तथा सन्तोष का प्रतीक है, लाल, नारंगी रंग उत्तेजित करते हैं, हरा रंग चंचलता को दर्शाता है, नीला रंग उदासीन तथा शीतल है। रंगों का सही उपयोग करना भी एक कला है। रंगों का प्रयोग करने से पहले उनके बारे में कुछ जानकारी होना आवश्यक है।

रंगों के प्रकार (Kinds of Colour):
रंग मुख्यतः तीन प्रकार के हैं –

  • प्राथमिक रंग (Primary Colour)।
  • द्वितीयक रंग (Secondary Colour)।
  • मध्य रंग (Tertiary Colour)।

प्राथमिक रंग – लाल, पीला तथा नीला प्राथमिक रंग हैं।
द्वितीयक रंग – दो प्राथमिक रंगों को समान अनुपात में मिलाने से एक द्वितीयक रंग बनता हैं। जैसे – लाल + पीला = नारंगी, पीला + नीला = हरा, लाल + नीला = बैंगनी।
मध्य रंग – एक द्वितीयक रंग तथा एक प्राथमिक रंग को मिला कर मध्य रंग बनता है। जैसे – पीला + नारंगी = पीला नारंगी, पीला + नीला = पीला नीला, लाल + नारंगी = लाल नारंगी, लाल + बैंगनी = लाल बैंगनी, पीला + हरा = पीला हरा, नीला + बैंगनी = नीला बैंगनी
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
समय व्यवस्थापन (Time Management) के विभिन्न चरण लिखें।
उत्तर:
एक परिवार की आवश्यकता के अनुकूल व्यावहारिक समय एवं क्रिया का निर्माण करना चाहिए। किन्हीं दो परिवारों की परिस्थितियाँ एक-सी नहीं होतीं। कुछ गृहिणियाँ जैसे किसान व डॉक्टर की पत्नियों को अपने पति के व्यवसाय की दृष्टि से समय व क्रियाओं का आयोजन करना होगा। अप्रत्याशित अवरोधों या आकस्मिक घटनाओं के लिए दैनिक समय-सारणी में पहले से ही कछ समय का आयोजन करना चाहिए।

1. विभिन्न कार्यों की सूची बनाना (Listing different activities):
गृहिणी को सर्वप्रथम सभी कार्यों की सूची बना लेनी चाहिए तथा परिवार की सहायता से उनका विभाजन निम्न रूप से कर लेना चाहिए :

(i) दैनिक कार्य-जैसे-भोजन बनाना, दोपहर का भोजन, शाम की चाय तथा रात्रि का भोजन, बच्चों की देख-रेख करना, घर की सफाई, बिस्तर लगाना, बर्तन साफ करना, नौकरी पर जाना, विश्राम करना आदि।

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(ii) साप्ताहिक एवं विशेष कार्य-जैसे-कपड़े धोना, कपड़े प्रेस करना, गलीचा आदि साफ करना, बाजार से सामान खरीदना, खिड़कियों, दरवाजे आदि की सफाई करना आदि। सिक एवं सामयिक कार्य-जैसे-आटा पिसवाना. कपडे सिलाना. छटिटयों के लिए तैयारी करना, किसी पार्टी आदि के लिए तैयारी करना, अचार बनाना, स्क्वैश आदि बनाना, मौसम के कपड़े सम्भाल कर रखना आदि। यदि सभी कार्यों को दैनिक, साप्ताहिक एवं मासिक कार्यों में विभाजित करके सूची बना ली जाए तो सभी कार्य सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं और जल्दबाजी में कोई भी काम छूटने की आशंका नहीं रहती है।

2. प्रतिदिन के कार्यों एवं समय की मूल योजना बनाना-दूसरे चरण में प्रतिदिन के कार्यों एवं उसमें व्यय होने वाले समय की मूल योजना बनायी जाती है। इस योजना के लिए सबसे पहले वह कार्य लिये जाते हैं जो प्रतिदिन अवश्य करने होते हैं तथा जिन्हें सम्पन्न करने के लिए निश्चित समय का ज्ञान होता है। इस प्रकार दूसरे चरण में समय एवं कार्य योजना का ढाँचा तैयार हो जाता है जिसके आधार पर पूरी योजना बनाई जा सकती है।

प्रतिदिन के आवश्यक कार्य जैसे भोजन बनाना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना और स्कूल भेजना, घर की दैनिक सफाई आदि आते हैं। इस मूल योजना में सुबह तथा दोपहर को खाली समय छोड़ा जाता है तथा इस समय में साप्ताहिक कार्यों को सम्पन्न किया जाता है। एक दैनिक मूल समय-योजना का उदाहरण निम्नलिखित तालिका में दिया गया है –

दैनिक मूलं समय-योजना (Daily Basic Time Plan):
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समय-योजना बनाते समय यह ध्यान भी अवश्य रखना चाहिए कि कौन-सा कार्य किस समय पर करना उचित रहेगा तथा सामान्यतः उसमें कितना समय लगेगा। दैनिक समय योजना में जो काम जिस परिवार के सदस्य को सौंपा हो, उसको घर में उपस्थिति का ध्यान रखना चाहिए। कुछ कार्य जो निश्चित समय पर ही किए जाते हैं, जैसे बच्चों का स्कूल जाना, ऑफिस आदि के लिए निश्चित समय ही प्रयुक्त करना चाहिए।

प्रत्येक परिवार की समय-योजना में काफी अन्तर पाया जाता है। यदि गृहिणी नौकरी भी करती हो तो उसकी दैनिक समय-योजना बिल्कुल भिन्न हो जाएगी। अतः प्रत्येक गृहिणी को अपने दैनिक कार्यों, परिवार के सदस्यों की आवश्यकता एवं सहयोग को ध्यान में रखते हुए ही दैनिक मूल समय-योजना बनानी चाहिए।

3. साप्ताहिक योजना बनाना (Weekly Time Plan): इस साप्ताहिक योजना में सप्ताह के कार्यों, विशेष कार्य तथा सामाजिक कार्यों के लिए समय निश्चित किया जाता है। इस योजना का निर्माण करते समय गृहिणी को घरेलू आवश्यकताओं, कार्य करने की आदतों एवं परिवार के सदस्यों के खाली समय का ध्यान रखना चाहिए। निम्नलिखित तालिका में एक साप्ताहिक योजना का उदाहरण दिया गया है –

साप्ताहिक समय योजना (Weekly Time Plan):
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4. समय-योजना के चौथे चरण में इस बात का निर्णय लिया जाता है कि कौन-सा कार्य कौन-सा सदस्य पूर्ण करेगा। यह निर्णय लेते समय परिवार के सभी सदस्यों से विचार-विनिमय करना चाहिए तथा उस व्यक्ति विशेष के समय, भोजन का भी ध्यान रखना चाहिए। परिवार के विभिन्न सदस्यों में कार्य बाँटते समय तथा उचित समय के उपयोग के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

1. परिवार के सदस्यों के पास उपलब्ध समय तथा वह अपना कितना समय कार्यों के प्रति प्रयोग कर सकता है।

2. परिवार के सदस्यों की विशेष रुचियों को ध्यान में रखते हुए कार्यों को सौंपना चाहिए क्योंकि रुचि होने पर कार्य सफलतापूर्वक समय पर सम्पन्न किए जा सकते हैं। यदि रुचियों के अनुरूप कामों को न सौंपा जाए तो कार्य पूर्ण होने में कई प्रकार की रुकावटें होती हैं।

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3. एक प्रकार के तथा एक साथ किए जाने वाले कार्यों को सदैव एक ही परिवार के सदस्य को सौंपना चाहिए जैसे बाजार से विभिन्न वस्तुएँ खरीदना आदि।

4. एक समय में एक से अधिक कार्य सम्पन्न किए जा सकते हैं। जैसे जब ओवन में केक, बिस्कुट आदि बन रहे हों तो उस समय कपड़े धोना, घर की सफाई आदि।

5. समय बचाऊ उपकरणों जैसे प्रेशर कूकर, मिक्सी आदि का प्रयोग करना चाहिए।

6. प्रतिदिन प्रयोग में आने वाली वस्तुओं को उचित स्थान एवं चालू हालत में रखना चाहिए जैसे चाकू एक छोटी-सी चीज है यदि इसे उचित स्थान पर न रखा जाए तो उसे ढूँढने में काफी समय लग जाता है। इसी प्रकार यदि चाकू का हत्था टूटा हो या उसकी धार तेज न हो तो सब्जियाँ, फल आदि ‘ को काटने में सामान्य से बहुत अधिक समय लगता है।

7. दैनिक उपयोग की वस्तुओं को प्रतिदिन खरीद कर लाने के स्थान पर इकट्ठा खरीदना चाहिए जिससे प्रतिदिन उन्हें खरीद कर इकट्ठा करने की आवश्यकता न पड़े और व्यर्थ ही समय नष्ट न हो।

8. कार्य करने की विधि से पूर्णतया परिचित होने पर काम कम समय में ठीक प्रकार से सम्पन्न हो जाता है तथा समय का अपव्यय नहीं होता है।

9.  प्रत्येक कार्य को एकाग्रचित होकर कुशलतापूर्वक करना चाहिए। ऐसा करने से काम कम समय में उचित रूप से सम्पन्न हो जाता है। किसी भी कार्य को पूरी सूझ-बूझ एवं पूर्व अनुभवों के आधार पर करने से भी समय की बचत होती है। जैसे खाना परोसते समय ट्रे का प्रयोग करना आदि।

10. समय-योजना लचीली होनी चाहिए जिससे आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुरूप उसे बदला जा सके। यदि समय तालिका में लचीलापन नहीं होगा तो उसका सफल होना कठिन है।

11. समय योजना बनाते समय अन्य गृहिणियों की समय योजनाओं को देखकर लाभ उठाना चाहिए या फिर विभिन्न गृहिणियों के समय उपयोग पर हुए अध्ययनों का लाभ उठाना चाहिए।

5. मूल्यांकन (Evaluation):
समय की योजना का सप्ताह के अन्त में मूल्यांकन करना भी अति आवश्यक है। इसके लिए यह देखना चाहिए कि सभी कार्य समय योजना के अनुरूप सम्पन्न हुए अथवा नहीं। समय-योजना का मूल्यांकन करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –

  • क्या पत्येक कार्य समय-योजना के प्रस्तावित समय में पूर्ण हो सका।
  • यदि नहीं, तो प्रत्येक कार्य पूर्ण करने के लिए कितना समय लगा? इस अतिरिक्त समय का अगली योजना बनाते समय पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।
  • क्या परिवार के सभी सदस्यों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हा सका? अथवा नहीं। यदि नहीं तो क्या कारण थे ?
  • क्या गृहिणी को विश्राम, मनोरंजन आदि के लिए पर्याप्त समय मिला अथवा नहीं। यदि नहीं तो क्या कारण थे ?
  • क्या अवकाश के समय का पूर्ण उपयोग हो सका ?
  • अगली समय-योजना में क्या-क्या परिवर्तन लाने आवश्यक हैं ? क्या पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति हो सकी अथवा नहीं?

प्रश्न 2.
अवकाश काल (Leisure Time) पर एक लेख लिखें।
उत्तर:
अवकाश की श्रेणी में वह समय आता है जो न तो कार्य में प्रयुक्त होता है, न विश्राम में। मुख्यतः अवकाश का उपयोग मनोरंजन के लिए होता है। हर व्यक्ति को अवकाश काल बिताने का अपना एक अलग ढंग होता है। अवकाश काल के सदुपयोग के विभिन्न साधन हैं –
(अ) घर में बैठकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ (Indoor Activities)।
(ब) घर के बाहर जाकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ (Outdoor Activities)।

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(अ) घर में बैठकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ-इसके अन्तर्गत क्रियात्मक क्रियाएँ, संग्रहात्मक क्रियाएँ एवं कलात्मक क्रियाएँ आती हैं। जैसे

  • सामाजिकता (Sociability): इसमें सम्भाषण, मित्रों से मिलना व उन्हें घर बुलाना, समय परिवार के साथ बिताना और समाज की गतिविधियों में भाग लेना है।
  • संस्थाओं की सदस्यता (Association): इनके अन्तर्गत विभिन्न संस्थाओं, जैसे-क्लब आदि में जाना।
  • स्थिरता (Immobility): इसके अन्तर्गत सिलाई, कढ़ाई, पढ़ना-लिखना, टेलीविजन देखना. रेडियो सुनना, बागवानी आदि हैं।
  • संग्रहात्मक क्रियाएँ: इसके अन्तर्गत सिक्कों, टिकटों, किताबों, चित्रों, ग्रन्थों आदि का संग्रह सम्मिलित हैं।
  • कलात्मक क्रियाएँ (Arts): मूर्ति बनाना आदि।
  • खेल (Game): दर्शक के रूप में विभिन्न खेल देखना, ताश खेलना आदि।

(ब) घर से बाहर जाकर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाएँ:
1. खेल (Games and Sports): स्वयं कोई खेल जैसे टेबिल टेनिस, बैडमिण्टन आदि खेलना।
2. कला (Arts): इसके अन्तर्गत संगीत, नाटक, नृत्य साहित्य, छायांकन (Photography) आदि में अभिरुचि सम्मिलित हैं।
3. गतिशीलता (Mobility): इस वर्ग में कार या बस में सफर, बाजार में वस्तुएँ क्रय करना, टहलना, नाव में सैर करना आदि आते हैं।
आदर्श रूप में अवकाश एक उपहार स्वरूप है जिसका उपयोग हर व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने, ज्ञान अर्जित करने तथा स्वयं में निरन्तर सुधार करने के लिए करना चाहिए।

प्रश्न 3.
गृह कार्य में लगने वाले श्रम का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
सभी गृह कार्यों में श्रम करना पड़ता है। यह श्रम मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
1. शारीरिक और
2. मानसिक।
व्यावसायिक जीवन में दोनों पूर्णतः भिन्न नहीं हैं। अधिकांश शारीरिक क्रियाओं में भी थोड़ा सोचना पड़ता है।

1. शारीरिक कार्य कई प्रकार के होते हैं। कुछ में हाथों की अधिक आवश्यकता होती है तो कुछ में धड़ की आवश्यकता होती है। कुछ में पैरों की आवश्यकता होती है। वस्तुओं को पकड़ने, उठाने, खिसकाने. खींचने या एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखने में हाथों की विशेष आवश्यकता होती है। बैठने-झुकने, मुड़ने, उठने आदि में शरीर के मध्य भाग का अधिक उपयोग होता है। खड़े होने, चलने-फिरने आदि में पैरों का अधिक उपयोग होता है।

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2. मानसिक श्रम भी गृहिणी के दैनिक जीवन का अंग है। उसे विभिन्न प्रकार के निर्णय लेने होते हैं। साधनों का समुचित व्यवस्थापन करना होता है। भविष्य के लिए योजनाएँ बनानी होती हैं। इन सभी मानसिक क्रियाओं में शक्ति का व्यय होता है परन्तु शारीरिक क्रियाओं से कम।

माँसपेशीय क्रियाओं की विभिन्न दशाओं में प्रति घण्टा शक्ति व्यय –
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प्रश्न 4.
संक्षेप में गृह कार्यों पर उपयोग की गई शक्ति के विषय में लिखें।
उत्तर:
गृह कार्यों को तीन भागों में विभाजित किया गया है :
1. हल्के कार्य (Light Work): इस वर्ग के अन्तर्गत मुख्यत: वही कार्य सम्मिलित किए जाते हैं जिन्हें करते समय खड़ा नहीं होना पड़ता, जैसे हाथ तथा मशीन द्वारा बुनाई करना, रफू करना, सिलाई करना आदि।
2. साधारण कार्य (Normal Work): इसके अन्तर्गत शिशु को वस्त्र पहनाना, प्लेट धोना, तौलिये पर इस्त्री करना, पैर की मशीन से सिलाई करना जैसे कार्य आते हैं।

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3. श्रमशील कार्य (Heavy Work): इन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए अधिक शक्ति. की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत कपड़े धोना, फर्श झाड़ना आदि कार्य आते हैं।
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हमेशा उचित व्यवस्था (Posture) में बैठकर या खड़े होकर कार्य करने से कम शक्ति व्यय होती है। इसके विपरीत कार्य हल्का होने पर भी यदि शारीरिक अवस्था उचित न हो तो शक्ति व्यय बहुत अधिक होती है। उचित व्यवस्था के लिए कुशल गृहणी को कार्यों का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए कि प्रतिदिन शक्ति वाले कार्यों में संतुलन रहे। यदि एक ही दिन में सभी अधिक शक्ति वाले कार्य किए जाएँ तो थकान हो जाती है तथा कार्य भी भली प्रकार से सम्पन्न नहीं होते हैं।

श्रम के अनुसार कार्य का वर्गीकरण (Classification of work according to energy spent):
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प्रश्न 5.
थकान के विभिन्न स्वरूप कौन-कौन-से हैं ? गृहिणी की कार्य-क्षमता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?
अथवा,
मानसिक थकान कम करने के छः तरीके विस्तारपूर्वक सुझाएँ।
उत्तर:
जब हम कोई कार्य करते हैं तब कछ समय बाद ऐसी स्थिति आ जाती है कि कार्य करने की क्षमता कम होती जाती है और शरीर शिथिल हो जाता है और कम काम कर पाते हैं इस अवस्था को थकान कहते हैं। “निरन्तर कार्य करने के परिणामस्वरूप कुशलता में कमी या मानसिक रूप से ऊब जाना या दोनों के होने को थकान कहते हैं।”

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थकान के लक्षण (Symptoms of fatigue):

  • शरीर में सुस्ती, आलस्य और शिथिलता आ जाती है।
  • मन किसी भी कार्य को करने में एकाग्र नहीं होता।
  • सरल कार्य में भी गलती अधिक होती है, समय ज्यादा लगता है।
  • नींद एवं जम्हाई आने लगती है।
  • कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है।

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1. शारीरिक थकान (Physiological Fatigue): जब शरीर की पेशियाँ कार्य करती हैं तब शरीर ईंधन का उपयोग करता है तथा शक्ति को निकालता है। पेशियों में शक्ति-उत्पादन करने वाला पदार्थ ग्लाइकोजीन होता है। ग्लाइकोजीन का निर्माण कला द्वारा लाई गई शर्करा से पेशीय तन्तुओं द्वारा होता है। पेशीय कार्यों में ग्लाइकोजीन रक्त प्रवाह में विद्यमान ऑक्सीजन से संयोग करके शक्ति को निष्क्रमित करता है तथा लैक्टिक अम्ल एवं कार्बन डाइ-आक्साइड नामक निरर्थक पदार्थों का उत्पादन करता है। ये दोनों पदार्थ निरन्तर पेशीय क्रिया-कलापों में अवरोध उत्पन्न करते हैं। किसी भी कार्य को करने के पश्चात् पुनः शक्ति प्राप्त करना अथवा लैक्टिक अम्ल एवं कार्बन डाइ-आक्साइड को माँसपेशियों से निकालना नितान्त आवश्यक है।

इस प्रक्रिया में रक्त-प्रवाह कार्बन डाइऑक्साइड को फेफडे में ले जाते हैं जहाँ इसे निष्कासित किया जाता है। रक्त माँसपेशियों में ऑक्सीजन ले जाता है तथा ऑक्सीजन और ग्लाइकोजिन के पुनः परिवर्तन की प्रक्रिया के द्वारा लैक्टिक अम्ल भी निष्कासित कर दिया जाता है। इस प्रकार ऑक्सीजन लैक्टिक अम्ल को माँसपेशियों से हटाने में योग देकर थकान को रोकने में सहायता प्रदान करता है।

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अधिक थका देने वाले कार्य में लैक्टिक अम्ल अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है जिसे दूर करने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन शीघ्र उत्पन्न नहीं किया जा सकता और इस तरह थकान बढ़ जाती है जिसे पूरा करने के लिए विश्राम करना आवश्यक हो जाता है। गृहिणी में काम करने की शक्ति सुबह के प्रथम चरण में अधिक रहती है। जैसे-जैसे काम करने में थकान बढ़ती है, वैसे-वैसे उसमें कार्यक्षमता कम होती जाती है।
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2. मानसिक थकान (Psychological Fatigue): शारीरिक थकान की भाँति मानसिक थकान से भी कार्य क्षमता कम हो जाती है और कार्य के प्रति अरुचि हो जाती है।
वार्टले के अनुसार “थकान या थकावट एक व्यक्ति की उस परिस्थिति के प्रति संपूर्ण प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसका वह जाने या अनजाने में मूल्यांकन करता है।” मानसिक थकान दो प्रकार की होती है –
(अ) नीरस थकान (Boredom fatigue)।
(ब) कुंठाजन्य थकान (Frustration fatigue)।

(अ) नीरस थकान (Boredom fatigue): एक लम्बी अवधि तक कार्य करने के उपरान्त काम के प्रति अरुचि महसूस करते हैं। इस थकान के बाहरी लक्षण हैं-जम्हाई आना, बेचैनी और कार्य को छोड़ देने की इच्छा। कार्य के प्रति उत्साह समाप्त हो जाता है। कार्य में परिवर्तन अनिवार्य है। एक कार्य अरुचिकर या नीरस हो जाने पर दूसरे कार्य को प्रारंभ करने से थकान दूर हो जाती है।

(ब) कुंठाजन्य थकान (Frustration fatigue): कुण्ठा निराशा का ही एक रूप है। इसे व्यक्ति तब अनुभव करता है जब किसी स्थिति को ठीक से नियन्त्रित नहीं कर पाता । उस स्थिति के समक्ष वह स्वयं को अक्षम अनुभव करता है। तब वह खीज और चिड़चिड़ाहट महसूस करने लगता है। वह पलायन तो करना चाहता है परन्तु कर नहीं पाता।

तब वह मानसिक तनाव महसूस करने लगता है। तनाव कुछ अवधि के लिए बना रहता है तो वह थकान महसूस करता है। कुण्ठाजन्य थकान नीरस थकान से इस रूप में भिन्न है कि कुण्ठित व्यक्ति स्वयं का दोष महसूस करता है जबकि नीरस थकान अनुभव करने वाला व्यक्ति बाहरी वातावरण को अपनी अरुचि के लिए दोषी मानता है।

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वट कम करने के साधन (Ways of Reducing Fatigue) :
1. विश्राम काल (Rest Periods): दिन में कार्य करने की अवधि में विश्राम करने से थकान दूर हो जाती है तथा कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। एक व्यक्ति को दिन में कितनी देर तक तथा कितनी बार विश्राम करने की आवश्यकता होती है। उसके कार्य की प्रकृति तथा व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता निर्धारित करती है। गृहिणी अनेक प्रकार के कार्य करती है। उसके लिए विश्राम की अवधि कितनी हो, यह उसके स्वास्थ्य व उसकी शक्ति की मात्रा पर निर्भर करती है। कुछ गृहिणियाँ कार्य-परिवर्तन में ही विश्राम कर लेती हैं।

2. प्रोत्साहन का महत्त्व (Role of Motivation): जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को पसन्द नहीं करता या उत्प्रेरकों की कमी रहती है तब थकान शीघ्र उत्पन्न हो जाती है। यदि कार्य कार्यकर्ता की रुचि का होता है तथा उसे करने में अगर प्रेरणा मिलती है तब थकान शीघ्र उत्पन्न नहीं होती। ऐसे कार्य तो लगातार अधिक समय तक भी बिना थकान उत्पन्न हुए किये जा सकते हैं। ऐसे लक्ष्य या कार्य जो आसानी से पूरे हो जाते हैं या प्राप्त हो जाते हैं कार्य की नीरसता को दर करते हैं तथा उत्प्रेरक का काम करते हैं।

किसी कार्य को करने में बाधा या अवरोध उत्पन्न होने से सम्पूर्ण कार्य अव्यवस्थित हो जाता है और थकान अनुभव होने लगती है। फलस्वरूप कार्यकर्ता में कण्ठाजन्य थकान होने लगती है। काम की नीरसता तथा शारीरिक तनाव के कारण जो थकान उत्पन्न होती है, वह थोड़ी-सी उत्तेजना-यथा मित्रों से बातचीत. सिनेमा देखना. पिकनिक या कार्य में परिवर्तन-से समाप्त हो ज है। यदि कार्य की पूर्ति के पश्चात् व्यक्ति की प्रशंसा कर दी जाए तो वह भी प्रोत्साहन का कार्य करती है और मानसिक थकान को कम करती है।

3. कार्य करने की उचित सुविधाएँ (Good working condition): अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि यदि कार्य करने के लिए उचित सुविधाएँ प्रयुक्त की जाएँ तो दोनों शारीरिक एवं मानसिक थकान कम होंगी। ये उचित सुविधाएँ निम्नलिखित हैं:

  • कार्य करने के लिए उचितं रोशनी का होना आवश्यक है।
  • कार्य स्थल खुला और हवादार होना चाहिए।
  • श्रम तथा समय बचाऊ उपयोगी यन्त्रों का प्रयोग करना चाहिए।
  • खड़े होकर कार्य करने के लिए कार्यकर्ता की लम्बाई के अनुरूप ऊँची मेज या फट्टा होना चाहिए। अधिक ऊँचे या नीचे मेज पर कार्य करने में थकान अधिक होती है।
  • घर का सारा सामान निश्चित जगह पर व्यवस्थित ढंग से रखा होना चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर आसानी से मिल जाए और समय तथा शक्ति का अपव्यय न हो।
  • कार्य करने के लिए यन्त्र या उपकरण ऐसे होने चाहिए जिससे शरीर को सामान्य स्थिति में ही रखा जाए। अधिक झुककर या उचककर कार्य करने से थकान अधिक होती है। उदाहरण के लिए घर की सफाई करते समय लम्बे झाडू का प्रयोग करना चाहिए तथा पोंछा लगाने के लिए लम्बे डंडे का प्रयोग उचित रहता है।

4. कार्य करने का उचित ढंग (Proper way of doing work): कार्य सदैव उचित ढंग से ही करना चाहिए जिससे उसे करते समय अनावश्यक क्रियाओं को दूर किया जा सके तथा थकावट भी कम की जा सके। बैठकर खाना बनाने से थकावट अधिक होती है। खड़े होकर खाना बनाने से थकावट कम होती है, अतः खाना बनाने का उचित ढंग खड़े होकर खाना बनाना है।

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5. कार्य करने की सही मुद्रा (Good working posture): कार्य करते समय कार्यकर्ता को शरीर की मुद्रा सही रखनी चाहिए। बैठने या खड़े होने की मुद्रा ऐसी होनी चाहिए जिससे मांसेपशियों पर अधिक जोर न पड़े और थकान कम हो। कार्य करने की सतह अधिक ऊँची या नीची होने पर, उन पर कार्य करते समय माँसपेशियों का खिंचाव होता है, जिससे थकान अधिक होती है।

6. कार्य करने का उचित क्रम (Right sequence of work): कार्य करने के उचित क्रम को अपनाना चाहिए जिससे थकान कम हो। उचित क्रम के लिए एक से कार्य एक समय में करने चाहिए। जैसे घर की सफाई करते समय पहले सारे घर को झाड़ लिया जाए फिर झाडू लगानी चाहिए तथा फिर पोंछा लगाना चाहिए। यदि पहले एक कमरे में झाडू और पोंछा लगाया। और फिर दूसरे कमरे में झाडू और पोंछा लगाया जाए तो बार-बार झाडू और पोंछा को बदलने के कारण श्रम और समय दोनों ही अधिक लगते हैं।

7. कार्यकुशलता (Work Skill): किसी कार्य में जब गृहिणी प्रवीण होती है तो उस कार्य को करते समय उसे कम थकावट होती है। यदि एक गृहिणी सिलाई करने में प्रवीण है तो उसे समय कम थकान महसस होगी। इसके विपरीत जो सिलाई करना नया-नया सीखती है, उसे सिलाई करते समय गलतियाँ होने के कारण अधिक थकावट होती है।

8. कार्यों में हेर-फेर (Change in work): बहुधा अधिक समय एक-सा कार्य करते रहने पर भी थकावट हो जाती है। अत: कुछ समय बाद कार्यों में हरे-फेर करते रहने से थकावट कम होती है।

9. कार्य को रोचक बनाना (Make work more interesting): अधिकांश दैनिक कार्य नीरस रहते हैं। उनको अधिक समय तक करते रहने से गृहिणी ऊबने लगती है। इस नीरसता को निम्न विधियों से कम किया जा सकता है –
(अ) कई बार कार्य बड़ा लम्बा व अन्तहीन-सा प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में अल्प अवधि का लक्ष्य रखकर गहिणी कार्य के प्रति उत्साहित अनभव कर सकती है।
(ब) गृहिणी को यदि परिवार के किसी अन्य सदस्य का सहयोग मिल जाता है तो भी वह कार्य के प्रति अधिक उत्साह अनुभव करती है। भोजन पकाने में यदि उसे अपनी पुत्री का सहयोग मिल जाता है तो काम की नीरसता कम हो जाती है और वह कार्य भी अधिक शीघ्रता से होता है।
(स) दैनिक कार्यों में विविधता भी थकान को कम करने में सहायक होती है। एक भारी काम पूरा करने के बाद यदि एक हल्का काम हाथ में लिया जाए तो थकान अत्यधिक नहीं हो पाती।

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10. मनोरंजन (Entertainment) मनोरंजन शरीर को विश्राम देता है और कुछ समय के लिए दैनिक चिन्ताओं को भी भुलाने में सहायता करता है।

प्रश्न 6.
कार्य सरलीकरण (Simplification) क्या है ?
उत्तर:
समय एवं शक्ति दोनों ही गृहिणी के लिए महत्त्वपूर्ण साधन हैं। दोनों के व्यवस्थापन में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनका समाधान गृहिणी को करना होता है। एक निर्धारित समय और शक्ति के अन्तर्गत अधिक कार्य सम्पादित करना ही कार्य का सरलीकरण है। ग्रौस व कैण्डल के अनुसार “यह वह विधि है जिसके द्वारा एक निश्चित समय व शक्ति की मात्रा व्यय करके अधिक कार्य सम्पन्न किया जाता है अथवा एक निश्चित कार्य दोनों का ही कम व्यय करके पूर्ण किया जाता है।” निकिल व डौसी के अनुसार “कार्य सरलीकरण किसी कार्य को सबसे सुविधाजनक व शीघ्रता से सम्पन्न करने की विधि की खोज है।” इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि कार्य सरलीकरण में कुशलता एवं व्यावहारिक प्रबन्ध एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

प्रश्न 7.
कार्य सरल करने की विधियों (Methods of work simplification) का उल्लेख करो।
उत्तर:
ग्रौस व क्रैन्डल ने कार्य सरलीकरण को तीन भागों में वर्गीकृत किया है –

  • हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन (Changes in hand and body motions)।
  • कार्य स्थल, संग्रहण स्थान तथा उपकरणों में परिवर्तन (Changes in work and storage space and equipment)।
  • उत्पादन में परिवर्तन (Change in the products)।

1. हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन : हाथ और शरीर की गतियों में परिवर्तन होने से समय और शक्ति की बचत होती है।
(अ) बर्तनों को साफ करने के बाद यदि गर्म पानी में खंगालकर सूखने रख दिया जाए तो उन्हें कपड़े से पोंछने की अनावश्यक शारीरिक क्रिया की बचत हो सकती है।
(ब) एक हाथ के स्थान पर दोनों हाथों से कार्य करना, विस्तार के अनावश्यक कदमों को समाप्त करना। पूर्व आयोजन से कई कदम अथवा शारीरिक गतियों की बचत सम्भव है।

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2. कियाओं का कम (Work seanence): घर में काम करने के मार्ग में परिवर्तन कर कई कदमों की चाल की बचत की जा सकती है। कई कार्यों को साथ-साथ भी किया जा सकता है। भोजन पकाने के साथ केक बनाना सम्भव है।

3. कदमों में दक्षता (Skill in work): कुशल गृहिणी अपने गृह कार्य तीव्र गति से तथा सरलता से करने में समर्थ होती है। दक्षता जन्म-जात कम और प्रयास से अधिक आती है। कार्यदक्षता प्राप्त करने की तीन अवस्थाएँ होती हैं –

  • प्रारम्भिक अथवा खोजने की अवस्था (Exploratory stage)।
  • कठिन एवं प्रयासयुक्त अवस्था (Awkward and Effortful stage)।
  • दक्षता की अवस्था (Skilled stage)।

उदाहरण के लिए आलू या प्याज छीलने में पहली अवस्था में गृहिणी को यह जानना होता है कि चाकू को तथा काटने वाली वस्तु को सही तरीके से कैसे पकड़ा जाए। आरम्भ में दोनों को ही वह ठीक ढंग से नहीं पकड़ पाती। क्रियाएँ धीमी रहती हैं, छिलाई भी सफाई से नहीं होती। दूसरी अवस्था में धीरे-धीरे वह सीखने लगती है कि दोनों का सही प्रयोग कैसे हो। उसकी कार्य करने की गति बढ़ने लगती है। वह अपनी गलतियाँ सुधारती जाती है। तीसरी अवस्था में वह यह काम तेजी से और सफाई से करने लगती है। एक कार्य में दक्षता गृहिणी को दूसरे कार्य में वैसी ही दक्षता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न 8.
कार्य-स्थल, संग्रहण स्थान तथा उपकरणों में परिवर्तन करने से शक्ति उपयोग पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
1. प्रमुख उपकरण व्यवस्थित रूप से लगे हों-उपकरण इस प्रकार से लगाए जाएँ जिससे गृहिणी को हर वस्तु आसानी से उपलब्ध रहे और उसे कम से कम चलना पड़े। प्रमुख उपकरण उचित स्थान पर ऐसी रखे जायें जहाँ उपयोग करते समय इन्हें बार-बार निकालने व रखने में शक्ति व्यर्थ न जाए।

2. कार्य सतहें सुविधाजनक चौड़ाई की व ऊँचाई की हों (Work surface should be of convenient length & height): app and 944 pirific int 47 3fera feefa to लिए कार्य-स्थल की ऊँचाई एवं चौड़ाई आरामदायक होनी चाहिए। यदि कार्य सतह अधिक नीची है तो झुककर कन्धों को अधिक ऊपर उठाना होता है। यदि कार्य सतह अत्यधिक चौड़ी है तो बाँहों को अधिक फैलाना होता है अथवा झुकाना होता है। ऐसी क्रियाओं से असुविधा व थकान होती है। कार्य सतह व्यक्ति की लम्बाई के अनुरूप होनी चाहिए।

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3. कुर्सियाँ व स्टूल आरामदेह हों (Comfortable Chairs & Stools): आरामदेह कुर्सी या तिपाई वह है जिस पर बैठ कर गृहिणी बिना असुविधा के अपना कार्य कर सकें। कुर्सी व स्टूल की ऊँचाई इतनी होनी चाहिए कि गृहिणी के पाँव जमीन पर रखे जाएँ।

4. सर्वाधिक उपयुक्त उपकरणों का चयन किया जाए (Selection of maximumuse of equipment): उपयुक्त उपकरणों से समय व शक्ति की बचत होती है। कपड़ें सुखाने के लिए डायर, गलीचा साफ करने के लिए वैक्यूम क्लीनर उपयुक्त होता है।

5. खाद्य-सामग्री व छोटे उपकरणों को उपयोग करने के स्थान के पास रखना चाहिए। सभी बर्तन, खाद्य-सामग्री तथा उपकरण इस प्रकार रखे जाएँ, जिससे आवश्यकता पड़ने पर उन्हें शीघ्र उठाया जा सके।

6. कार्य के अन्तिम रूप में परिवर्तन (Changes in the last form of work): नई वस्तुओं के उपयोग से घर का काम सुविधाजनक हुआ है।

प्रश्न 9.
विभिन्न क्रिया कलापों के लिए घर को किन स्थल व कक्षाओं में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर:
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ये मुख्यतः क्रियाएँ हैं जिनको करने के लिए घर में स्थान चाहिए। इस सभी क्रियाओं के आगे कई उप-क्रियाएँ हैं, जिनके लिए स्थान चाहिए। जैसे – बर्तन धोने के लिए –
1. गन्दे बर्तन इकट्ठा रखने का स्थान।
2. बर्तन धोने की सामग्री रखने का स्थान।
3. पानी का प्रबन्ध जहाँ बर्तन धोए जाएँगे।
4. धुले बर्तनों को रखने के लिए उचित स्थान।

यह जरूरी नहीं कि घर में इन सभी क्रिया-कलापों को करने के लिए अलग-अलग स्थान हों। छोटे घरों में एक ही स्थान पर दो-तीन क्रियाएँ की जाती हैं। जैसे शयन कक्ष में बनाव-श्रृंगार, अध्ययन या सिलाई का काम करना। खाने का अलग कमरा नहीं है तो यह काम रसोई घर बरामदे या किसी अन्य कमरे में किया जा सकता है। इसलिए जब एक ही कमरे में एक से अधिक क्रियाओं को स्थान दिया जाता है तो स्थान व्यवस्था करना अनिवार्य है। किन्हीं दो परिवारों के लिए स्थान का विभाजन एक जैसा नही होता।

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किसी परिवार की स्थान व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कारक हैं –

  • परिवार के पास उपलब्ध स्थान।
  • परिवार के सदस्यों की संख्या।
  • परिवार की आर्थिक व सामाजिक स्थिति।

घर चाहे छोटा हो या बड़ा, विभिन्न क्रियाओं के लिए स्थान का विभाजन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –
1. एकान्तता-एकान्तता दो प्रकार की है। एक तो कमरे ऐसे होने चाहिए कि बाहर से अन्दर का दृश्य न दिखाई पड़े। या दरवाजे व खिड़कियों पर पर्दे लगा कर हो सकता है। दूसरे घर के अन्दर ही एक कमरे की दूसरे कमरे से एकान्तता (Privacy) होनी चाहिए। इसके लिए लॉबी या गलियारा बनाना चाहिए, जो विभिन्न कमरों को जोड़े भी तथा कमरों की एकान्ता भी बनी रहे।  लॉबी या गलियारा होने पर एक कमरे से निकल कर बाहर जाने के लिए दूसरे कमरे में से नहीं निकलना पड़ता।
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2. कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध-कमरों में की जाने वाली क्रियाओं के अनुसार कमरों का पारस्परिक सम्बन्ध होना चाहिए। जैसे स्नान गृह, शयन कक्ष के नजदीक होना चाहिए। भोजन कक्ष रसोईघर के नजदीक होना चाहिए।
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3. घूमने-फिरने में सुविधा हो: इसके लिए कमरे में दरवाजे, खिड़कियों की स्थिति तथा फर्नीचर व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। कमरे में यदि अधिक फर्नीचर रख दिए जाएँगें तो कमरे में चलने-फिरने की जगह न बचेगी। कमरों की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए कि एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने के लिए अनावश्यक न चलना पड़े। यदि लॉबी या गलियारा है तो एक कमरे से निकल कर, लॉबी में से होकर दूसरे कमरे में जा सकते हैं। इससे सभी कमरों की एकान्तता बनी रहेगी।

4. कमरों का आकार-आयताकार कमरे, वर्गाकार कमरों की अपेक्षा अधिक बड़े दिखते हैं तथा अधिक सुविधाजनक होते हैं।

5. उपलब्ध स्थान का उचित उपयोग-आजकल अधिकतर लोगों के पास स्थान की कमी रहती है, इसलिए उपलब्ध स्थान का मितव्ययिता से प्रयोग करना चाहिए । इसके लिए दरवाजे व खिड़की के ऊपर के स्थान पर सामान रखने के लिए मियानी बनाई जा सकती है। दीवार में अलमारी बनानी चाहिए, जो कि फर्श पर रखी सामान्य अलमारी की अपेक्षा कम स्थान घेरती है। समान रखने वाले फर्नीचर का अधिक प्रयोग करना चाहिए जैसे बक्सेनुमा पलंग अथवा दीवान।

6. कार्य स्थान सघन लेकिन पर्याप्त हो-किसी भी कार्य को करने के लिए यदि अधि क खुला स्थान है तो वहाँ चलने फिरने के लिए काफी समय व शक्ति का व्यय होगा । अतः कार्य स्थान सघन होना चाहिए, लेकिन इतना स्थान हो कि कार्य करने का सामान रखने तथा कार्य करने की सुविधा हो। घर में स्थान की व्यवस्था परिवार के सदस्यों के अनुकूल एवं सुविधाजनक होनी चाहिए।

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7. स्वास्थ्यवर्धक-कमरों में पर्याप्त खिड़की, दरवाजे हों ताकि प्राकृतिक प्रकाश तथा शुद्ध ताजा हवा का आवागमन हो सके।

घर में विभिन्न क्रियाओं को करने के लिए तीन मुख्य कार्य केंद्र हैं –

  • निजी क्षेत्र-इसमें स्नान घर तथा शयन कक्ष आते हैं। यहाँ सबसे अधिक एकान्तता की आवश्यकता है।
  • कार्य क्षेत्र-इसमें रसोईघर, कपड़े धोने का स्थान, भोजन कक्ष, अध्ययन कक्ष, भण्डार घर आदि आते हैं।
  • मनोरंजन क्षेत्र-इसमें बैठक, बरामदा, आंगन आदि आते हैं।

इस क्षेत्र को अतिथियों के सत्कार, टी.वी. देखने, संगीत सुनने आदि के लिए प्रयोग किया जाता है।

आइए, अब हम देखें कि इन विभिन्न कमरों की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए –
बैठक (Drawing Room or Living Room): इस कमरे का उपयोग आने-जाने वाले मित्रों, अतिथियों को बैठाने, बातचीत करने के लिए किया जाता है। घर के सदस्य भी खाली समय में यहाँ विश्राम तथा मनोरंजन कर सकते हैं। बैठक साधारणतः बाकी कमरों से बड़ा तथा अधिक आकर्षक एवं सुव्यवस्थित होता है। बैठक की व्यवस्था तथा सज्जा से घर के सदस्यों की पसन्द, नापसन्द तथा व्यक्तित्व की झलक मिलती है। बैठक का कमरा प्रवेश द्वार के पास हो।

इसका एक दरवाजा बाहर की तरफ खुलना चाहिए ताकि आने-जाने वाले मेहमानों से घर की एकान्तता बनी रहे। यह कमरा आयताकार होना चाहिए। इसकी लम्बाई और चौड़ाई 3 और 2 के अनुपात में होनी चाहिए। आजकल बैठक के साथ-साथ इसमें भोजन का भी प्रबन्ध रखा जाता है। यदि इन दोनों क्रियाओं के लिए कमरे का प्रबन्ध करना है तो कमरे का आकार भी बड़ा होना चाहिए। इस कमरे में खिड़कियों की स्थिति ऐसी हो कि बाहर का सुन्दर दृश्य दिखे। कमरे में प्राकृतिक प्रकाश तथा स्वच्छ वायु का भी प्रबन्ध होना चाहिए।

बैठक में प्रयुक्त होने वाले फर्नीचर सुन्दर-टिकाऊ तथा हल्की हो जिन्हें आसानी से उठाया जा सके। फर्नीचर में सोफा-सैट या आराम कुर्सियां, बीच की मेज (Centre Table), छोटी मेज (Side Table), दीवान आदि रख सकते हैं। 6-8 लोगों के बैठने के लिए फर्नीचर होना चाहिए। फर्नीचर दीवार के साथ-साथ रखा जाए ताकि घूमने-फिरने में असुविधा न हो।

बैठक की सज्जा सुन्दर तथा सादी होनी चाहिए। यदि परिवार बड़ा है और स्थान की कमी है तो बैठक का प्रयोग रात के समय सोने के लिए भी कर सकते हैं। बैठक का एक भाग पढ़ने-लिखने के काम भी आ सकता है। यदि टी.वी. बैठक में रखा है तो परिवार के सभी सदस्य वहाँ बैठ कर अपना मनोरंजन भी कर सकते हैं।

खाने का कमरा (Dining Room): आजकल घरों में खाने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था रहती है। यदि रसोईघर बड़ा है तो उसी में एक ओर इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। यह कमरा रसोईघर के पास होना चाहिए, लेकिन यहाँ से रसोईघर का भीतरी भाग नहीं दिखाई देना चाहिए। भोजन कक्ष में खाने की मेज तथा कुर्सियों की व्यवस्था की जाती है। मेज कितनी बड़ी हो तथा कितनी कुर्सियाँ हों, यह स्थान की उपलब्धता तथा सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता है। मेज के इर्द-गिर्द घूमने के लिए पर्याप्त स्थान रखना चाहिए।

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भोजन कक्षा में क्राकरी तथा अन्य उपकरण रखने के लिए दीवार में आलमारी बनी होनी चाहिए। इस कमरे में फ्रिज रखने का भी प्रबन्ध कर सकते हैं। भोजन कक्ष में प्रकाश तथा स्वच्छ हवा आनी चाहिए। कमरे में हाथ धोने के लिए सिंक भी रख सकते हैं। स्थान की कमी के कारण यदि भोजन कक्ष की अलग व्यवस्था नहीं है तो रसोईघर, बरामदे या किसी अन्य कमरे में भोजन खाने की व्यवस्था हो सकती है। भोजन कक्ष का प्रयोग पढ़ने-लिखने या अन्य क्रियाएँ जैसे सिलाई, पेन्टिंग आदि करने के लिए भी हो सकता है।

शयन कक्ष (Bed Room): शयन कक्ष का प्रयोग आराम करने तथा रात को सोने के लिए किया जाता है। इसलिए यह कमरा शोरगुल से दूर होना चाहिए। चूंकि यह निजी कमरा है अतः इसमें सबसे अधिक एकान्तता की आवश्यकता है। 10 वर्ष से अधिक उम्र के लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शयन कक्ष होने चाहिए। शयन कक्ष का मुख्य फर्नीचर पलंग है। इसके अतिरिक्त यदि स्थान है तो दो आराम कुर्सी तथा एक छोटी मेज भी रख सकते हैं।

इस कमरे का प्रयोग यदि पढ़ने तथा श्रृंगार के लिए भी करना है तो पढ़ने की मेज तथा शृंगार मेज रखने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। यह मेज ऐसी जगह रखी जाए, जहाँ प्रकाश की उचित व्यवस्था हो। जहाँ तक सम्भव हो, शयन कक्ष के दरवाजे, खिड़कियाँ पूर्व दिशा की ओर हों ताकि सुबह के सूर्य का प्रकाश तथा शुद्ध वायु आ सके। इस कमरे में सुरक्षा, शान्ति तथा आराम होनी चाहिए। भारतीय घरों में गर्मी के मौसम में बरामदा, आंगन या घर की छत भी सोने के काम में आती है।

रसोईघर (Kitchen): यह घर का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है। गृहिणी अपने जीवन का एक तिहाई समय रसोईघर में व्यतीत करती है । सुव्यवस्थित तथा आधुनिक उपकरणों से युक्त रसोईघर में समय तथा शक्ति दोनों की बचत होती है। सफाई भी आसानी से की जा सकती है। रसोईघर भोजन कक्ष के नजदीक होना चाहिए। यह शयन कक्ष तथा बैठक से दूर होना चाहिए ताकि धुआं तथा गन्ध आदि इन कमरों में न पहुंचे। रसोईघर में प्रकाश तथा हवा का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। रसोईघर की दिशा उत्तर-पूर्व की ओर हो तो अच्छा है ताकि सुबह की धूप आ सके तथा बाकी समय रसोईघर ठण्डा रहे।

रसोईघर के दरवाजे और खिड़कियों पर जाली रहनी चाहिए ताकि मक्खी, मच्छर से बचाव रहे। रसोइघर का फर्श ऐसा हो जो आसानी से साफ हो जाए। इसका ढलान भी सही होना चाहिए, जिससे कि सारा पानी नाली में निकल जाए और खड़ा न रहे। खड़ी रसोई में स्लैब के ऊपर की दीवारें टाईल्स की होनी चाहिए ताकि आसानी से साफ हो जाएँ। रसोइघर में गर्म हवा तथा धुआं निकलने के लिए चिमनी या हवा निकालने वाला पंखा (Exhaust Fan) लगा हो। बहुत-से घरों में खाना बनाने के लिए अलग कमरे की व्यवस्था नहीं रहती।

बरामदे या किसी कमरे के कोने में खाना बनाने का काम होता है। यहाँ भोजन बनाने की व्यवस्था बैठ कर कर सकते हैं या एक मेज लगा कर खड़े होकर उस पर खाना बना सकते हैं। रसोइघर की व्यवस्था करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि रसोइघर में काम करने के लिए तीन मुख्य स्थान हैं –

  • खाना बनाने का स्थान (Cooking Area)
  • खाना बनाने की तैयारी करने का स्थान (Preparation Area)
  • बर्तन धोने का स्थान (Washing Area)

सुव्यवस्थित रसोईघर के लिए यह आवश्यक है कि ये तीनों कार्य स्थान इस प्रकार हों कि काम में रुकावट न पड़े। तीनों कार्य क्षेत्रों में 4-5′ का अन्तर होना चाहिए। तैयारी करने का स्थान खाना बनाने के स्थान के नजदीक हो। तैयारी करने में पानी की भी आवश्यकता होती है अतः तैयारी केन्द्र के पास पानी की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

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आजकल अधिकतर घरों में खड़े रसोईघर (Standing Kitchen) बनाए जाते हैं, जहाँ भोजन की तैयारी करने, बनाने तथा बर्तन धोने की व्यवस्था खड़े होकर की जाती है। खड़े होकर काम करने में उठाने, रखने के लिए कम शारीरिक गतिविधियाँ करनी पड़ती हैं, जिससे कम समय तथा शक्ति लगती है, रसोईघर भी अधिक साफ रहता है।

1. खाना बनाने का स्थान-यह स्थान तैयारी केन्द्र के दायीं ओर होना चाहिए। यहाँ मुख्य उपकरण ऊर्जा का स्रोत है। जैसे अंगीठी, स्टोव या गैस । खड़े होकर खाना बनाने के लिए फर्श से उचित ऊँचाई पर स्लैब बनाई जाती है। इस स्लैब पर स्टोव या गैस रखने की व्यवस्था की जाती है। स्लैब चिकना होना चाहिए जो पानी न सोखे तथा आसानी से साफ हो जाए।

2. खाना बनाने की तैयारी करने का स्थान-भोजन पकाने से पहले जो सम्बन्धित तैयारी होती है जैसे-सब्जी काटना, दाल-चावल साफ करना, मसाला पीसना, आटा गूंथना आदि क्रियाएँ यहाँ की जाती है। इस क्षेत्र में बिजली के प्वाइंट की व्यवस्था भी हो ताकि मिक्सी आदि वहीं रख कर प्रयोग कर सकें।

3. बर्तन धोने का स्थान-यहाँ पानी की उपलब्धता तथा पानी के बाहर निकलने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। खड़े होकर बर्तन धोने हैं तो सिंक हो और उसके साथ ढलानदार बोर्ड हो जिस पर बर्तन धोकर सखने के लिए रखे जा सकते हैं। बर्तनों के सख जाने पर उन्हें उचित स्थान पर रख सकते हैं। सिंक के ऊपर खिड़की होनी चाहिए ताकि रसोईघर में गीलापन न रहे।

रसोईघर में संग्रहीकरण के लिए स्थान व्यवस्था-इन कार्य क्षेत्रों के अतिरिक्त खाना बनाने में जो सामान प्रयुक्त होना है जैसे-आटा, चावल, दाल, मसाले, चीनी, चाय पत्ती, घी, तेल आदि तथा बर्तन रखने के लिए भी स्थान होना चाहिए। यदि स्थान उपलब्ध है तो रसोईघर के साथ ही स्टोर बना सकते हैं, जहाँ सारे भोज्य पदार्थ रख सकते हैं। बर्तन रखने के लिए भी अलग स्थान हो सकता है, लेकिन अधिकतर घरों में अलग से स्टोर नहीं होता, वहाँ इन सभी चीजों को रखने की व्यवस्था रसोईघर में ही करनी पड़ती है।

सुविधा के लिए जो सामान जिस कार्य-स्थान से सम्बन्धित है, उसके उसी के पास संग्रह करना चाहिए। स्थान की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए जो स्थान स्लैब तथा फर्श के बीच खाली है, वहाँ अलमारियाँ बनाकर आवश्यक सामान रख सकते हैं। जैसे खाना बनाने के स्थान के नीचे अलमारी बन कर, गैस सिलैण्डर या खाना बनाने में प्रयुक्त होने वाले बर्तन रख सकते हैं। तैयारी स्थान के ऊपर तथा नीचे अलमारी बना कर दाल, मसाले तथा अन्य उपकरण रख सकते हैं। जहाँ सिंक है, उसके पास स्लैब पर रैक लगा कर बर्तन रख सकते हैं। बर्तन धोने में प्रयुक्त होने वाली सामग्री रखने की व्यवस्था भी सिंक के पास होनी चाहिए।

रसोईघर में विभिन्न भोज्य पदार्थ इस प्रकार रखे जाएँ कि उन्हें ढूंढ़ने में कठिनाई न हो। एक प्रकार का सामान एक साथ रखें। जैसे दालें एक साथ, मसाले एक साथ हों। डिब्बों के ऊपर नाम लिखा हो तो ढूँढ़ने में समय नहीं लगता। चाय, चीनी, घी, का उपयोग बार-बार होता है, उन्हें खाना बनाने के स्थान पर एक शेल्फ बनाकर रख सकते हैं।

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रसोईघर में ऊपर की तरफ भी स्लैब डाल सकते हैं, जहाँ कभी-कभी प्रयोग होने वाले बर्तन अथवा अन्य सामान रख सकते हैं। रसोईघर में पानी भर कर रखने के लिए भी स्थान होना चाहिए। आकार के आधार पर रसोईघर चार प्रकार के हो सकते हैं। रसोईघर का आकार कैसा भी हो, उसमें तीन मुख्य कार्य स्थान होने चाहिए।
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बच्चों का कमरा (Children Room): भारतीय परिवारों में साधारणत: बच्चों का अलग कमरा नहीं होता। जगह की कमी के कारण या जगह भी हो तो उसे महत्त्व नहीं दिया जाता है। लेकिन घर में कोई स्थान ऐसा होना चाहिए जिसे बच्चा अपना समझे, अपने अनुसार वहाँ पढ़ या खेल सके। बच्चों के कमरे में खिड़कियाँ नीची हों ताकि आसानी से बाहर का दृश्य दिख सके।

फर्नीचर भी कम ऊँचा, हल्का, सादा हो। अलमारी तथा शैल्फ इतनी ऊँचाई के होने चाहिए कि बच्चा आसानी से अपना सामान रख तथा उठा सके। यह कमरा रसोईघर के पास हो ताकि गृहिणी काम करते समय बच्चे पर नजर रख सके। पढ़ने वाले बच्चों के कमरे में पढ़ने की मेज-कुर्सी की व्यवस्था होनी चाहिए।

लॉबी (Lobby): आधुनिक घरों में लॉबी की व्यवस्था को अधिक महत्त्व दिया जाता है। इससे एकान्तता तो बनी ही रहती है, साथ-साथ यहाँ और भी कई कार्य किए जा सकते हैं। अगर लॉबी थोड़ी बड़ी है तो घर के सदस्य वहाँ बैठ कर टी.वी. देख सकते हैं, बच्चे खेल सकते हैं, पढ़ सकते हैं या गृहिणी सिलाई, बुनाई का काम कर सकती है।

स्नान घर (Bath Room): जहाँ तक हो सके स्नान घर शयन कक्ष के साथ हो। स्नान घर के दो दरवाजे होने चाहिए, एक कमरे में खुले तथा दूसरा बाहर की तरफ। स्नानघर की खिड़की ऊँची तथा बड़ी हो ताकि पर्याप्त रोशनी एवं हवा आ सके। खिड़की पर फ्रॉस्टेड शीशा (Frosted Glass) लगा हो।

स्नान घर में नहाने के लिए नल, फव्वारा हो तथा वाश बेसिन (Wash Basin) लगा हो। यदि कपड़े भी स्नानघर में ही धोए जाने हैं तो कपड़े धोने की मशीन रखने की भी व्यवस्था हो। नहाने से सम्बन्धित सामग्री तथा कपड़े धोने की सामग्री रखने के लिए दीवार में शेल्फ बने हों, कपड़े, तौलिया आदि टाँगने के लिए दरवाजे के पीछे खूटियाँ लगी हों। स्नान घर की फर्श तथा दिवारें चिकनाई रहित एवं मजबूत हों। दीवारों पर टाइल्स लगी हों तो सफाई करना आसान रहता है।

आजकल स्नानघरों साथ शौचालय भी जुड़े रहते हैं। इसमें भारतीय या पश्चिमी पद्धति की सीट लगी होती है। सम्पन्न घरों में प्रक शयन कक्ष के साथ एक स्नानघर जुड़ा हुआ भी हो सकता है। यदि स्नान घर छोटा है तो कपड़े धोने की व्यवस्था बाहर आंगन में की जा सकती है। सम्पन्न घरों में कपड़े धोने का कमरा (Laundry room) अलग ही होता है।

स्टोर (Store बक्से, सूटकेस तथा कभी-कभी प्रयोग होने वाले सामान को रखने के लिए स्टोर बनाया जाता है। छोटे घरों में स्टोर उपलब्ध न होने पर सामान रखने वाला फर्नीचर प्रयोग करना चाहिए या दरवाजे, खिड़कियों के ऊपर मियानी बनानी चाहिए। सीढ़ियों के नीचे भी सामान रखने के लिए जगह बनाई जाती है।

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बरामदा (Verandah): भारतीय घरों में बरामदे का बहुत महत्त्व है। बरामदा हमें गर्मी तथा वर्षा की बौछारों से बचाता है। एकदम अनजान व्यक्ति को, जिसे हम अन्दर नहीं ले जाना चाहते, बरामदे में बैठा सकते हैं। बरामदा घर में आगे या पीछे या दोनों ओर बना सकते हैं। साधारण घरों में अधिकांश समय बरामदे में बीतता है।

बरामदे में सुबह शाम बैठ सकते हैं, बच्चे खेल सकते हैं; गृहिणियाँ सब्जी छीलने, काटने आदि का काम कर सकती हैं। स्थान की कमी के कारण आवश्यकता हो तो इसे बन्द करवा कर कमरा भी बनवाया जा सकता है। अगर धन तथा स्थान की कमी नहीं है तो घर में अलग से शृंगार कक्ष (Dressing Room), अतिथि कक्ष (Guest Room), अध्ययन कक्ष (Study Room), पूजा कक्ष (Prayer Room) कपड़े धोने का कक्ष (Laundry Room) भी बनवाया जा सकता है।

प्रश्न 10.
रंग और सहायक वस्तुओं का सजावट में क्या योगदान है ?
उत्तर:
रंग और सहायक वस्तुओं का सजावट में योगदान (Use of Colour and Accessories in Decoration): स्थान व्यवस्था के क्रियात्मक रूप के साथ-साथ आकर्षण भी महत्त्वपूर्ण रूप है। जब स्थान सीमित हो तो सजावट सोच-विचार कर करनी चाहिए। किसी भी स्थान की सुन्दरता को रंग व सहायक वस्तुओं से बढ़ाया जा सकता है। घर की सुसज्जा के लिए रंग की बहुत महत्ता है। रंग-घर को सुन्दर और आकर्षित दिखाने में रंग का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। इससे भावात्मक प्रभाव पैदा होता है। समस्या केवल यह है कि उसे रंगने तथा कार्य के स्थान के लिए सही-सही चुनना। रंग को पूरी तरह समझने के लिए उसके तीन आयामों को जानना आवश्यक है।

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वे हैं-वर्ण, मात्रा व मूल्य (मान)।
(क) वर्ण (Hue): इससे मूल रंग का पता चलता है। जैसे-लाल, हरा और नीला।
(ख) मूल्य (Value): रंग का हल्कापन या भारीपन जैसे-हल्का हरा, गहरा हरा।
(ग) मात्रा (Intensity): रंग की मन्दता व चमक के बारे में बतायें जैसे रक्त की तरह लाल, गुलाब का लाल इत्यादि।
विभिन्न रंगों का वर्गीकरण तीन भागों में किया जा सकता है, प्राथमिक, द्वितीयक ओर तृतीयक रंग।

पीला, लाल और नीला प्रथम श्रेणी अर्थात् प्राथमिक रंग है।
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दो प्राथमिक रंगों को समानुपात में मिलाने से एक द्वितीयक रंग बनता है। जैसे : नारंगी, हरा बैंगनी।
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तृतीयक रंग को एक प्राथमिक रंग तथा साथ वाले द्वितीयक रंग को मिलाकर बनाया जाता है जैसे लाली-नारंगी, लाल-बैंगनी, पीला-नारंगी और पीला-हरा, काला-सफेद, ग्रे और मटमैला रंग तटस्थ रंग हैं जो बाकी रंगों को सुन्दर दिखाते हैं।
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रंगों की योजना (Colour Schemes): रंगों की योजना बनाना एक दिलचस्प कार्य है। कई प्रकार की रंग योजनायें हैं। उनका वर्गीकरण संबंधित और अलग-अलग रंग योजना में किया जा सकता है।
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एक-रंगीय योजना (Mono-cromatic colour scheme): इसमें कोई भी एक मनपसन्द रंग प्रयोग किया जाता है। एक ही रंग के विभिन्न शेड प्रयोग किये जा सकते हैं। एक-रंगीय लाल योजना में पिंक, लाल, मैरून आदि रंग आते हैं।

समदर्शी योजना (Analogous colour scheme): समदर्शी योजना में प्राथमिक रंग के साथ उसके साथ वाले द्वितीयक रंगों का प्रयोग करते हैं। जैसे लाल-बैंगनी, नीला-बैंगनी इत्यादि । इस योजना में 3-5 रंग हो सकते हैं तथा आप अपनी आवश्यकतानुसार रंग चुन सकते हैं।

विपरीत योजना (Complementary colour scheme): इसमें रंग चक्र के बराबर की दूरी वाले तीनों रंगों को प्रयोग करते हैं जैसे पीला-नीला लाल, हरा व केसरी-बैंगनी, लाल, केसरी-नीला, बैंगनी-पीला हरा आदि।

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खण्डित विपरीत योजना (Split colour scheme): इसमें रंग चक्र के एक रंग के साथ इसके सामने वाले रंग को छोड़कर उसके आस-पास के रंगों को लिया जाता है जैसे पीला-नीला बैंगनी और लाल बैंगनी।

त्रिकोणीय योजना (Triad colour scheme): इसमें रंग चक्र के एक रंग के रंगों को लिया जाता है जैसे पीला-नीला बैंगनी और लाल बैंगनी।

रंगों के लाभ (Uses of colour)
व्यक्तित्व उभारना (Express personality): अगर आप गर्म स्वभाव के व्यक्ति हैं तो आप सारे रंगों के सामने लाल को ही प्रयोग में लायेंगे । पीले को मध्यम स्वभाव का कहा गया है। हरा, नीला ठंडे रंग के नाम से जाने जाते हैं।

रंग कमरे का वातावरण निश्चित करता है –
चमकदार रंग गर्मी, शक्ति व मित्रता के रूप हैं जबकि सफेद रंग सफाई; पवित्रता व शांति का द्योतक है। रंग से कमरे का आकार व स्थान बदल सकता है-एक लंबे और कम चौड़े कमरे का आकार आप बदल सकते हैं। लम्बी दीवारों को गहरे रंगों से रंग कर कमरा अनुपाती बनाया जा सकता है। एक अंधेरा व छोटा कमरा, सफेद रंग करने से बड़ा दिखता है। ठीक ढंग से रंग . का प्रयोग करने से स्थान की सुन्दरता बढ़ जाती है।

कमियों को छुपाने के लिए रंग (Colour for disguising flaws): भवन निर्माण के समय रह गई कुछ कमियों को छुपाने के लिए अक्सर रंग का प्रयोग करके भवन को सुन्दर बना दिया जाता है। सफेद दीवार के सामने लाल रंग की पुष्प परिसज्जा हर व्यक्ति को प्रसन्नचित्त कर देती है। रंग किसी भी स्थान को सुन्दर बना देता है। सजावट के उपसाधनों में रंगों का प्रयोग जगह की सुन्दरता को चार चांद लगा देता है।

प्रश्न 11.
रंगों का गृहसज्जा में प्रयोग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे?
उत्तर:
रंग प्रयोग करने की मार्गदर्शिका (Guidelines for Using Colours):
1. वही रंग प्रयोग करें जो परिवार के सदस्यों को अच्छा लगे।
2. हल्का, कम मात्रा व ठंडे रंग को प्रयोग करने से कमरा बड़ा लगता है।
3. गहरे रंग प्रयोग करने से कमरा छोटा लगता है।
4. विषम रंग अपनी ओर ध्यान आकर्षित करते हैं –
(क) विषम रंग की दीवार के विरुद्ध सफेद सोफा अधिक ध्यान आकर्षित करेगा बजाय इसके कि सफेद दीवार के विरुद्ध सफेद सोफा रखा गया हो।
(ख) एक कमरे में बहुत से विषम रंगों से ध्यान बंट जाएगा तथा थकान पैदा करेगा।
5. एक जैसा रंग आरामदायक होता है।
6. लाल रंग पर आधारित रंग कमरे को गर्म बनाते हैं।
7. नीले रंग पर आधारित रंग कमरे को ठंडा बनाते हैं ।
8. हल्के रंग शीघ्र गंदे हो जाते हैं तथा अतिरिक्त सफाई मांगते हैं। गहरे रंगों पर मिट्टी चमकती है।
9. साथ-साथ रंग प्रयोग करने में उनका अन्तर बढ़ जाता है –
(क) हल्के और गहरे. रं का साथ-साथ प्रयोग करने पर हल्का अधिक हल्का व गहरा अधिक गहरा लगता है
(ख) चमक व फीके रंम को साथ-साथ प्रयोग करने से चमकीले रंग अधिक चमकीले व फीव अधिक फीके लगते हैं।
(ग) जब गर्म व ठंडे रंग साथ-साथ प्रयोग किये जाते हैं तो ठंडे अधिक ठंडे व गर्म अधिक गर्म लगते हैं।
10. रंग का गहरापन उसकी मात्रा पर आधारित होता है। जितना भी क्षेत्र अधिक होगा, रंग उतना ही गहरा लगता है।
11. बड़े क्षेत्र पर हल्का रंग करने से अच्छा लगता है। चमकीले रंगों को थोड़ी मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
12. रंग योजना अच्छी लगती है जब एक रंग का अधिक प्रयोग किया जाए।
13. जब विपरीत रंग प्रयोग में लाये जाते हैं तो दोनों एक-दूसरे को अधिक चमकीला बना देते हैं।
14. रोशनी के साथ रंग भी बदल जाते हैं। बनावटी रोशनी रंगों को नर्म कर देती है। वह रंग जो बनावटी रोशनी में आकर्षित लगते हैं, प्राकृतिक रोशनी में आकर्षक लगें, यह आवश्यक नहीं।
15. तटस्थ रंग भी रंग योजना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
16. खुरदरी सतह पर रंग गहरे लगते हैं तथा वही रंग से चिकनी सतह पर उतने गहरे नहीं लगते।

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित स्थितियों में रंगों का किस प्रकार प्रयोग करेंगे –
(क) एक छोटा कमरा बड़ा लगे
(ख) एक अंधेरा कमरा उज्जवलित लगे
(ग) लम्बा और पतला कमरा अनुपात में लगे।
उत्तर:
रंगों की सहायता से बदलाव लाने के तरीके
I. एक छोटा कमरा बड़ा लगे –
(क) दीवारों को हल्के रंग पेन्ट करने से (By painting the walls with light colours)
(ख) पूरे कमरे में एक ही रंग का प्रयोग करके (Using the same colour throughout the room)
(ग) ठंडे रंगों का प्रयोग करके (Making use of cool colours)
II. एक अंधेरामय कमरा उज्जवलित लगे-गहरे रंगों का प्रयोग करके (Making use of warm colours)
III. एक लम्बा व पतला कमरा अनुपात में लगे –
(क) लम्बी दीवारों को हल्के रंगों से पेन्ट करना तथा छोटी दीवारों को गहरे रंग से पेन्ट करना चाहिए (By painting longer walls in cool colours and shorter walls in warm colours)
(ख) लम्बी दीवारों को रंग की गहराई बढ़ाते हुए प्रयोग करना तथा छोटी दीवारों को रंग की गहराई कम करते हुए प्रयोग करना (By painting longer walls in darker value of the colour and shorter walls in lighter value of the same colour)

प्रश्न 13.
आपकी सहेली अब एक कमरे के मकान में रहने लगी है। उसके लिए फर्नीचर की विशेषताएँ बताएँ। जगह बड़ी लगने के लिए फर्नीचर सज्जा के दो तरीके सुझाएँ।
उनर:
छोटे कमरों के लिए फर्नीचर सज्जा की विशेषताएँ –

  • बहुमुखीय प्रयोग (Multi puniti)
  • हल्का पन (Light)
  • मजबूत व ज्यादा देर तक चलने वाला (durable)
  • तह कग्न वान (Folding)

जगह बड़ी लगने के तरीके (फर्नीचर द्वारा):

  • आवश्यकतानुसार थोड़ा फर्नीचर प्रयोग में रखे।
  • जब फर्नीचर की आवश्यकता न हो तो तह कर दें।
  • बड़ा फर्नीचर जैसे पलंग व अलमारी दीवार के साथ रखें।
  • जगह के इस्तेमाल के अनुसार फर्नीचर रखें। सम्बन्धित कार्य जगह पास-पास होनी चाहिए।
  • दीवारों की जगह का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए। (built in fixtures)

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science कार्याचर या कार्य नैतिकता Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत जैसे विकासशील देश की सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) कम हो जाती है – [B.M.2009A]
(क) समय पर न पहुंचने के कारण
(ख) कार्य का सैद्धांतिक जानकारी (Theoretical knowledge और व्यवहारिक जानकारी (Pratical knowledge) न होने के कारण
(ग) कार्य अवधि में अपने कार्य स्थान पर उपलब्ध न रहना
(घ) उपर्युक्त में सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त में सभी

प्रश्न 2.
टीम की भावना दर्शाता है – [B.M.2009A]
(क) विकास का
(ख) सहयोग का
(ग) अवकाश का
(घ) अपात का
उत्तर:
(क) विकास का

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प्रश्न 3.
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना है – [B.M.2009A]
(क) व्यवहार
(ख) भाषा
(ग) आवाज
(घ) संस्कार
उत्तर:
(ख) भाषा

प्रश्न 4.
एक अच्छे ‘व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है – [B.M.2009A]
(क) विनम्र भाषा
(ख) कटु भाषा
(ग) तुनकता
(घ) उग्र भाषा
उत्तर:
(क) विनम्र भाषा

प्रश्न 5.
हल्का श्रम के अंतर्गत कौन-सा कार्य आता है ? [B.M.2009A]
(क) फर्श साफ करना
(ख) कपड़े धोना
(ग) प्रेस करना
(घ) बुनाई करना
उत्तर:
(घ) बुनाई करना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी कार्य स्थिति के लिए श्रमिक, कार्य उपकरण व कार्य स्थान के कौन-कौन-से तीन महत्त्वपूर्ण संघटक हैं ?
उत्तर:
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प्रश्न 2.
कार्याचार (Work Ethics) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कार्याचार से अभिप्राय है कार्य के समय व्यक्ति का आचार या व्यवहार। कार्याचार या कार्य नैतिकता किसी भी कार्य को आनंदित ढंग से पूर्ण करने के लिए आवश्यक है। कार्याचार से कार्य करने तथा करवाने वाले दोनों को आदर तथा सम्मान का भाव मिलता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

प्रश्न 3.
कार्य नैतिकता (Work Ethics) से संबंधित कोई पांच आदतें लिखें।
उत्तर:

  • कार्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा।
  • कार्य के प्रति नियमित व समयनिष्ठ होना।
  • कार्य को सही रूप में समझना।
  • अपने सहकर्मियों के साथ नम्र व सादर भाषा में बोलना।
  • अपने साधनों का उचित प्रबंध व उपयोग करना।

प्रश्न 4.
कार्य स्थान पर अनुशासन रखने के लिए दो महत्त्वपूर्ण तथ्य लिखिए।
उत्तर:
1. समयनिष्ठा (Punctuality)।
2. नियमितता (Regularity)।

प्रश्न 5.
नम्र व मृदु व्यवहार (Calm & Soft behaviour) कार्यक्षमता को बढ़ाता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कार्यालय में मधुर और प्रसन्न वातावरण बनाए रखने में मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि ऊँची आवाज में बोला जाए तो लोगों में कड़वाहट उत्पन्न होती है, झगड़ा-फसाद हो जाता है और बहसबाजी में न केवल समय व्यर्थ जाता है परन्तु हमारी शान्ति भी व्यर्थ जाती है। परिणामस्वरूप हमारी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है।

प्रश्न 6.
कार्य में दक्षता (Efficiency in work) का कार्यपूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
अपने कार्य को सफलतापूर्वक करने हेतु उस कार्य में दक्षता हासिल करना अति आवश्यक है। कार्य दक्षता हासिल करने से न केवल कार्य समय पर पूरे होते हैं अपितु आत्मिक सन्तुष्टि भी प्रदान करती है। किसी भी कार्य को रुचिपूर्वक करते रहने हेतु सन्तुष्टि की प्राप्ति (Job satisfaction) अति आवश्यक है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्य नैतिकता का क्या अर्थ है तथा इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
कार्य नैतिकता (Work ethics): का अर्थ सदाचार तथा गलत-सही अनुभूति होना है, कार्य नैतिकता कार्य करने की मानक स्थिति है। व्यक्ति की अच्छे-बुरे की सही और गलत अवधारणा ही उसके कार्य पर प्रभाव डालती है।

लाभ (Advantages):
किसी भी कार्य को पूरी लगन से करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • कार्य करने वाले व्यक्ति तथा कार्य करवाने वाले व्यक्ति को सन्तुष्टि होती है और आनन्द प्राप्त होता है।
  • व्यक्ति को कार्य करने का उचित उद्देश्य मिलता है और वह उद्देश्यहीन होकर कार्य को केवल कार्य करने के लिए नहीं करता है।
  • पूरी लगन से कार्य करने पर व्यक्ति अपने द्वारा अपने अधिकारियों द्वारा बनाए लक्ष्यों की प्राप्ति सरलतापूर्वक करता है।
  • कार्य पूर्ण होने अथवा लक्ष्य प्राप्ति से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है जो उसे भविष्य के लिए प्रेरित करता है।
  • व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह भविष्य में कार्यों को और अच्छे ढंग से करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2.
कार्य स्थल पर अनुशासन (Discipline) क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
अनुशासन-व्यवस्था का एक हथियार (Discipline as a Tool of Management): अनुशासन लक्ष्य की सफलता को प्राप्त करने के लिए व्यवस्था का एक अस्त्र है। अनुशासन एक प्रकार का दबाव है जिसके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के लिए बनाए गए निर्देशों तथा नियमों का पालन कराया जाता है। यह संस्था या समूह के सामान्य कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी है। व्यवस्था को उपर्यक्त दोनों प्रकार की विधियों के आवश्यकतानसार प्रयोग द्वारा बनाए रखना चाहिए। इससे एक अच्छे कार्यकर्ता को अभिप्रेरणा मिलती है तथा कर्तव्यों से विमुख कार्यकर्ता को सजा।

इससे अच्छे कार्यकत्तओं की उपलब्धियों को देखकर दूसरे के मन में इसकी इच्छा जागती है तथा वह भी अधिक मेहनत करता है। परन्तु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उस वर्ग के व्यक्तियों को जिनके पास ये सभी अधिकार हैं, उन्हें पहले स्वयं उ.वेत आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए अर्थात् अपने अधीन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आदेश देने से पूर्व उन्हें उन नियमों एवं सिद्धान्तों को स्वयं अमल में लाना चाहिए, जिसका पालन वे दूसरों से करवाना चाहते हैं। तभी सही अनुशासन कायम हो पाएगा।

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प्रश्न 3.
कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करने के नियमों का उल्लेख करें।
उत्तर:
अपने कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करना अति आवश्यक है ताकि कार्य सफलतापूर्वक किया जा सके। ये नियम निम्न हैं –

  • कार्य के प्रति निष्ठा रखना।
  • कार्य में दक्षता हासिल करना।
  • संसाधनों का सुव्यवस्थित ढंग से प्रयोग करना अर्थात् अपना समझ कर प्रयोग करना।
  • सुनियोजित व नियमित ढंग से कार्य करना।
  • अपने स्थान पर उपलब्ध रहना व कार्यरत रहना।
  • मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग करना।
  • संगठन व सहयोग की भावना से कार्य करना।
  • अपने कार्य से सम्बन्धित नई जानकारी प्राप्त करते रहना तथा अपने ज्ञान को विशेष कार्यक्रमों द्वारा आधुनिक बनाना।

उपर्युक्त नियमों का पालन करने से ही वांछित परिणाम मिल सकते हैं अन्यथा उत्तम कार्यस्थल व उपकरण लेने के बाद भी सफलता असम्भव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्यस्थल पर अनुशासन में रहने के लिए किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
कार्य चाहे घर अथवा बाहर का हो, हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है –
1. अनुशासन (Discipline): किसी भी कार्य को करने के लिए अनुशासन के नियमों का पालन करना आवश्यक है। कोई भी कार्य यदि अनुशासित ढंग से न किया जाए तो वह सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं होता और उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होती है। अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रत्येक कार्यालय अथवा घर में कुछ नियम बनाए जाते हैं, जैसे कार्यालय में समय पर पहुँचना, अपने से बड़े पद के अधिकारी का सम्मान करना, सौंपे गए कार्य को उचित ढंग से पूरा करना आदि।

घर में विभिन्न परिवार के सदस्यों के लिए भिन्न-भिन्न नियम होते हैं, जैसे बच्चों को शाम को निश्चित समय तक घर लौटना, समय पर पढ़ना तथा खेलना, समय पर स्कूल में पहुंचने के लिए समय पर प्रात:काल उठना व तैयार होना आदि। अनुशासन के अभाव में कोई भी कार्य सन्तोषजनक रूप से पूर्ण नहीं होता है। अनुशासनहीन व्यक्ति का व्यक्तित्व बिखरा हुआ होने के कारण कार्य के परिणामों में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

कार्यस्थल पर अनुशासन निम्न दो प्रकार से लाया जा सकता है –
(क) सकारात्मक विधि (Positive Method)
(ख) नकारात्मक विधि (Negative Method)

(क) सकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति का कार्य के प्रति अच्छा दृष्टिकोण, उसमें अच्छी आदतों का विकास, उसका प्रोत्साहन तथा उसकी प्रशंसा द्वारा कार्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाया जाता है जिससे वह कार्य को पूरी लगन से करे और उसे अपने पर बोझ न समझे।

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(ख) नकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति को दंड व जुर्माने के डर से अनुशासित किया जाता है जिससे वह कार्य को बोझ समझकर करता है और सदैव कार्यप्रणाली को दोषी ठहराता है।

2. समय पर कार्य करना (Working in time): उचित समय पर कार्य करना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के लिए एक उचित समय होता है और वह समय हाथ से निकलने के पश्चात् दोबारा वापस नहीं आता है। यहाँ पर समय पर कार्य करने से अभिप्राय कार्यस्थल में समय पर पहुँचना भी है। यदि कार्यस्थल में पहुंचने का कोई निश्चित समय नहीं होगा तो वहाँ कार्य करने वाले सभी अपनी सुविधा एवं इच्छानुसार पहुंचेंगे और दूसरों के लिए असुविधा का कारण बनेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति को यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि जो असुविधा एवं खिन्नता उन्हें दूसरों का इन्तजार करने में होती है शायद वही असुविधा एवं खिन्नता दूसरों को भी उनके देर से पहुंचने पर होगी। उदाहरण के लिए बैंक अथवा किसी अन्य कार्यालय में किसी अधिकारी के देर से आने पर यदि कार्य देर से शुरू हो तो वहाँ पर इन्तजार कर रहे व्यक्तियों को किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह उस व्यक्ति से अच्छा और कोई नहीं जान सकता।

कई कार्य स्थल तो ऐसे हैं जहाँ पर यदि देर से पहुँचा जाए तो कार्य में विलम्ब तो होगा ही उसके साथ-साथ हम अनेक व्यक्तियों के लिए एक गलत उदाहरण बनेंगे। उदाहरण के लिए स्कूल, कॉलेज आदि में यदि शिक्षक देर से पहुँचेंगे तो वह विद्यार्थियों के लिए क्या उदाहरण बनाएँगे। इस प्रकार कुछ व्यक्तियों की लापरवाही के कारण अनेक विद्यार्थी अनजाने ही समय की पाबन्दी को अपना जीवन मूल्य नहीं बना पाते हैं।

3. पूर्ण समय तक कार्यालय में उपस्थित रहना (Full time duty at work place): कई व्यक्ति प्रायः यह समझते हैं कि कार्यालय में समय पर पहुँचकर अपनी उपस्थिति लगाने से उनका काम पूरा हो गया है। यह धारणा एकदम गलत है क्योंकि कार्यालय के समय के अनुसार पूरे समय अपनी जगह पर बैठना तथा कार्य करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि कार्यालय में समय पर पहुँचना तथा समय से बाहर निकलना।

प्रत्येक कर्मचारी के लिए यह आवश्यक है कि वह पूरे दिन में सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों की सूची बना ले और इस बात का प्रयत्न करे कि जो कार्य उसे आज पूरा करना है वह उसे कल के लिए न छोड़े। प्रत्येक कर्मचारी चाहे वह अधिकारी हो या क्लर्क हो अथवा किसी मिल में मजदूर हो या मालिक हो, अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इस आदत को डाल ले तो कार्यक्षमता बढ़ने के साथ-साथ देश की उन्नति होगी और देखते ही देखते भारत की गिनती विकासशील देशों से विकसित देशों में हो जाएगी।

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4. कार्य में निपुणता होना (Efficiency in work): किसी भी कार्य को सफलता से करने के लिए कार्य में निपुणता होना अति आवश्यक है। आप इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि बीमार होने पर यदि हम दवाई किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की अपेक्षा नीम हकीम से लें तो बीमारी ठीक होने के स्थान पर अधिक उग्र भी हो सकती है। प्रायः कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर कार्य कुशलता तो कम होगी ही अपितु कार्य के परिणाम भी उत्तम नहीं होंगे।

किसी अधिकारी को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर या तो उसे हर समय अन्य साथियों से पूछना पड़ेगा या फिर जैसे-तैसे गलत-सही कार्य को सम्पन्न करना पड़ेगा। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने काम को भली प्रकार जानता है वह कम समय में ही कार्य को भली प्रकार सम्पन्न करके दूसरों के लिए उदाहरण बन सकता है।

5. शिष्ट भाषा का प्रयोग करना (Use of disciplined language): प्रत्येक व्यक्ति को सदैव शिष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए। शिष्ट भाषा का प्रयोग न केवल कार्यस्थल में अपितु घर, परिवार में व साथियों में करना भी वांछनीय है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना उसकी भाषा है। कोई चाहे कितना भी. शिक्षित हो, ऊँचे से ऊँचे पद पर हो या आयु में बड़ा हो, वह एक शिष्ट व्यक्ति तभी माना जाएगा जब उसमें अन्य वांछित गुणों के साथ-साथ शिष्टतापूर्वक विनम्र भाषा में बोलने का गुण हो।

विनम्र भाषा एक अच्छे व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है। एक अमिट छाप तभी छोड़ी जा सकती है जबकि आपकी भाषा व बोलचाल विनम्र एवं शिष्ट हो। विनम्रता से बोलने के लिए हमें किसी को भी कुछ नहीं देना पड़ता है परन्तु उससे हमें दूसरों से आदर, दोस्ती जैसी अमूल्य चीजें सहज ही मिल जाती हैं।ऐसे कार्यालय जहाँ प्रतिदिन हमें दूसरे व्यक्तियों का सामना करना पड़ता है वहाँ तो भाषा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

एक दुखी व्यक्ति जब कोई समस्या लेकर किसी अधिकारी के पास पहुँचता है तो चाहे वह अधिकारी उसका काम करे अथवा नहीं परन्तु उसके सहानुभूति भरे दो चार विनम्र शब्द ही उस व्यक्ति के आधे दुख को कम कर देते हैं। प्रायः रोगी जब डॉक्टर के पास पहुँचकर उसे रोग के बारे में बता देता है और डॉक्टर उसके रोग के बारे में सुनकर उसे प्यार भरे शब्दों में समझाता है तो रोगी का आधा रोग तो उसी समय दूर हो जाता है।

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प्रश्न 2.
कार्य करते समय किस प्रकार के कार्याचार का पालन करने की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
1. कार्य को भली-भांति समझना (Absolutely knowing the work): किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले उस कार्य को पूरी तरह जान लेना अति आवश्यक है। कार्य के बारे में पहले पूरी रूपरेखा बनानी चाहिए। उस रूपरेखा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। यह जानकारी प्राप्त करनी चाहिए कि इस कार्य को पूरा करने में क्या-क्या सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी, किन-किन विधियों का प्रयोग किया जाएगा इत्यादि। यदि कार्य करने की सही विधि का चुनाव किया जाए तथा कार्य में प्रयोग आने वाली सामग्री पहले से ही प्राप्त कर ली जाए तो कार्य बड़ी कुशलता से और शीघ्र पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार से किया गया कार्य कर्मी को प्रसन्नता तथा सन्तुष्टि देता है।

2. कार्य के समय में कार्य पूरी निष्ठा से करना (Devotion in work while working): कार्य नैतिकता का यह एक महत्त्वपूर्ण पद है। कर्मी को कार्य के समय पर पूरी निष्ठा से कार्य करना चाहिए बहुधा देखा गया है कि कर्मी या तो कार्यस्थल पर देर से आते हैं या अपनी जगह पर नहीं मिलते या अपने सहकर्मियों के साथ गप्पें मारते या चाय, सिगरेट इत्यादि पीते रहते हैं।

इस प्रकार के व्यवहार से न तो कार्य पूरा होता है और न ही कार्य की अधिकता के कारण उसमें कार्य के प्रति सन्तुष्टि की भावना रहती है। कार्यालय के अधिकारी भी ऐसे कर्मी को डाँट-डपट करते हैं जिससे उसमें अशान्ति पैदा हो जाती है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है कि काम के समय कर्मी अपनी जगह मौजूद रहे और कार्य को पूरी लगन तथा निष्ठा से करे। ऐसा करने से उसे कार्य सन्तुष्टि (Work satisfaction) मिलती है।

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3. अनुशासनप्रिय होना (Discipline oriented): प्रत्येक कर्मी को अपने कार्यालय के नियमों का पालन करना ही अनुशासनप्रियता है। कार्यालय समय पर पहुँचना, कार्य के समय कार्य ही करना, कार्यालय में धूम्रपान न करना इत्यादि अनुशासन की कसौटियाँ हैं। परन्तु आमतौर पर देखा गया है कि कर्मी में बहुधा अनुशासनहीनता पायी जाती है जिसके कारण कार्यालय के कार्य उचित प्रकार से नहीं होते। इस प्रकार के कर्मचारियों को उचित प्रकार की प्रेरणा तथा दबाव-विधियों के प्रयोग से अनुशासित किया जाना चाहिए ताकि उस कार्यालय का कार्य सुचारु रूप से हो सके।

4. अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना (Making the knowledge modern): यह एक मनोवैज्ञानिक कहावत है कि मनुष्य जीवन भर सीखता रहता है। यह कहावत बिल्कुल सही है। यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि उसे जितना सीखना था, वह सीख चुका है तो यह उसकी भ्रान्ति है। ऐसा सोचने से जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता, परन्तु दूसरी ओर कोई व्यक्ति इस कहावत के अनुसार अपने ज्ञान में वृद्धि करता है तो उसको अपने कार्य करने में सरलता तथा सुविधा का आभास होता है और वह कार्य को अच्छी तरह करके अपने अधिकारियों तथा कर्मचारियों से प्रशंसा प्राप्त करता है। जैसे कि आजकल कम्प्यूटर का बोलवाला है और बैंक का कार्य करने वाला कम्प्यूटर की सहायता से शीघ्र तथा ठीक प्रकार से खातों का चालन कर सकता है वनिस्पत उसके जिसे कम्प्यूटर का ज्ञान नहीं है। इसलिए प्रत्येक कर्मी को अपने कार्य को सकुशल पूरा करने के लिए अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना अति आवश्यक है।

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5. अच्छा तथा मधुर व्यवहार (Good and soft behaviour): यदि आप चाहते हैं कि अन्य लोग आपके साथ अच्छा तथा मधुर व्यवहार करें, तो आपको उनके साथ भी अच्छा तथा मधुर व्यवहार करना होगा। कार्यालय का वातावरण अच्छा तथा मधुर बनाने के लिए आपको अपने सहकर्मी तथा आगन्तुकों के साथ मित्रतापूर्ण, सहयोगी तथा मधुर व्यवहार करना होगा। इस प्रकार का वातावरण नम्र भाषा के प्रयोग तथा सेवाभाव से बन सकता है। यदि आपके कार्यालय में वातावरण अच्छा, मधुर है तो आपको ऐसे वातावरण में काम करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी और कार्य भी सुगमता से होगा। इसके विपरीत यदि कार्यालय का वातावरण खराब होगा तो उससे आपके तथा आपके अन्य सहकर्मियों की कार्यकुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा कार्य की गति भी धीमी होगी।

6. कार्य को सेवाभाव से करना (Working with devotion): आप चाहे किसी भी कार्यालय में कार्य कर रहे हों या जो भी कार्य कर रहे हों, वह किसी-न-किसी के हित में होता है। यदि कर्मी वह कार्य सेवाभाव से करे तो उसे उस कार्य को करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी क्योंकि उसमें यह भावना आएगी कि मैंने इस कार्य को करके उस जरूरतमन्द व्यक्ति की सेवा की है, यह भावना अपने आप में सन्तुष्टि देती है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कर्मी किसी भी कार्य को करते समय सेवा भाव की भावना से प्रेरित हो तथा इसी भावना के अनुसार कार्य कों
पूरा करे।

7. टीम की भावना का होना (Team Spirit): किसी भी कर्मी को किसी समूह में कार्य करना होता है। उस समूह के यदि सभी कर्मी मिल-जुलकर कार्य करें तो कार्य शीघ्र हो जाएगा तथा उसमें उत्पन्न बाधाएँ भी शीघ्र ही दूर हो जाएंगी। यह सहयोग समूह के सभी सदस्यों की ओर से आना चाहिए चाहे वे समूह का मालिक हों या कार्यकर्ता। यदि टीम भावना से किया . जाता है तो इसमें कर्मियों की कमियाँ भी ढंक जाती हैं और कार्य भी पूरा हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

Bihar Board Class 11 Philosophy तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सत्य कथन को चुनें –
(क) आकारिक सत्यता वास्तविक सत्यता के लिए आवश्यक है
(ख) वास्तविक सत्यता आकारिक सत्यता के लिए आवश्यक नहीं है
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों

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प्रश्न 2.
‘Logike’ किस भाषा का शब्द है?
(क) ग्रीक
(ख) लैटिन
(ग) ग्रीक एवं लैटिन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ग्रीक

प्रश्न 3.
निगमन तर्कशास्त्र में हम जाते हैं –
(क) सामान्य से विशेष की ओर
(ख) विशेष से सामान्य की ओर
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सामान्य से विशेष की ओर

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प्रश्न 4.
आगमन तर्कशास्त्र में हम जाते हैं –
(क) सामान्य से विशेष की ओर
(ख) विशेष से सामान्य की ओर
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) विशेष से सामान्य की ओर

प्रश्न 5.
धुआँ देखकर हमें आग का ज्ञान होता है। यह उदाहरण है –
(क) अनुमान का
(ख) प्रत्यक्ष का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अनुमान का

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प्रश्न 6.
निगमन तर्कशास्त्र का सम्बन्ध है –
(क) आकारिक सत्यता से
(ख) वास्तविक सत्यता से
(ग) उपर्युक्त दोनों से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्यता से

प्रश्न 7.
तर्कशास्त्र की उपयोगिता है –
(क) परिशोधनात्मक
(ख) सृजनात्मक
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) परिशोधनात्मक

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प्रश्न 8.
तर्कशास्त्र है –
(क) आदर्शमूलक विज्ञान
(ख) भौतिक विज्ञान
(ग) यथार्थ विज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आदर्शमूलक विज्ञान

प्रश्न 9.
सोने का पहाड़, उड़ता घोड़ा, दूध की नदी आदि जैसे विचार हैं –
(क) आकारिक सत्य
(ख) वास्तविक सत्य
(ग) आकारिक एवं वास्तविक सत्य
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्य

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प्रश्न 10.
“तर्कशास्त्र तर्क करने की कला एवं विज्ञान दोनों है।” यह किसने कहा था?
(क) हेटली ने
(ख) हैमिल्टन ने
(ग) थॉमसन ने
(घ) मिल ने
उत्तर:
(क) हेटली ने

प्रश्न 11.
“तर्कशास्त्र विचार के नियमों का विज्ञान है।” यह परिभाषा किसने प्रस्तुत की थी?
(क) हेटली
(ख) हैमिल्टन
(ग) थॉमसन
(घ) एलड्रिच
उत्तर:
(ग) थॉमसन

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प्रश्न 12.
“तर्क करने की कला को तर्कशास्त्र कहते हैं।” यह किसकी उक्ति है?
(क) एलड्रिच
(ख) थॉमसन
(ग) हेटली
(घ) यूबरबेग
उत्तर:
(क) एलड्रिच

प्रश्न 13.
“तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी नियमों का विज्ञान है।” यह कथन किसका
(क) हैमिल्टन
(ख) थॉमसन
(ग) एलड्रिच
(घ) किसी का नहीं
उत्तर:
(क) हैमिल्टन

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प्रश्न 14.
‘उड़ता घोड़ा’ यह विचार किसकी सत्यता को प्रस्तुत करेगा?
(क) आकारिक सत्यता
(ख) वास्तविक सत्यता
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आकारिक सत्यता

प्रश्न 15.
दैनिक जीवन में सत्य को क्या कहते हैं?
(क) आकारिक सत्य
(ख) वास्तविक सत्य
(ग) व्यावहारिक सत्य
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ग) व्यावहारिक सत्य

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प्रश्न 16.
“तर्कशास्त्र सभी कलाओं की कला है” यह किसने कहा था?
(क) डन्स स्कॉटस (Duns Scotus)
(ख) हैटली
(ग) हैमिल्टन
(घ) एलड्रिच
उत्तर:
(क) डन्स स्कॉटस (Duns Scotus)

प्रश्न 17.
सभी जीव मरणशील है। घोड़ा एक जीव है। घोड़ा मरणशील है। उपरोक्त में किस प्रकार सत्यता समाहित है?
(क) वास्तविक (Natural truth)
(ख) आकारिक सत्यता (Formal truth)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 18.
तर्कशास्त्र का उद्देश्य है –
(क) सत्य की प्राप्ति एवं असत्य का निराकरण
(ख) सत्य की प्राप्ति
(ग) असत्य का निराकरण
(घ) अनुमान करना
उत्तर:
(क) सत्य की प्राप्ति एवं असत्य का निराकरण

Bihar Board Class 11 Philosophy तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र के दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के दो लाभों की चर्चा हम इस प्रकार कर सकते हैं-प्रथम, प्रत्येक विज्ञान को तार्किक नियमों से परिचित होना आवश्यक है; यह परिचय तर्कशास्त्र से ही मिल पाता है। दूसरा, तर्कशास्त्र के अध्ययन से मानसिक व्यायाम हो जाता है।

प्रश्न 2.
व्यावहारिक सत्य क्या है?
उत्तर:
जो दैनिक जीवन में सत्य हो, उसे व्यावहारिक सत्य कहते हैं। जैसे – ईश्वर, जीव एवं जगत् इत्यादि।

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प्रश्न 3.
तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र वह विज्ञान है जो अनुमान के व्यापक नियमों तथा अन्य सहायक मानसिक क्रियाओं का अध्ययन इस ध्येय से करता है कि उनके व्यवहार से सत्यता की प्राप्ति हो।

प्रश्न 4.
थॉमसन के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
थॉमसन के अनुसार तर्कशास्त्र विचार के नियमों का विज्ञान है।

प्रश्न 5.
हेमिल्टन के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
हेमिल्टन के अनुसार, “तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी नियमों का विज्ञान है।” (Logic is the science of the formal laws of thought)

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प्रश्न 6.
एलचि के अनुसार तर्कशास्त्र की परिभाषा दें।
उत्तर:
एलचि के अनुसार, “तर्कशास्त्र तर्क करने की कला है।” (Logic is the art of reasoning)

प्रश्न 7.
यूबरबेग के अनुसार तर्कशास्त्र की क्या परिभाषा है?
उत्तर:
“तर्कशास्त्र मानव-ज्ञान के व्यवस्थापरक नियमों का विज्ञान है।” (Logic is the science of the regulative laws of human knowledge)

प्रश्न 8.
ह्वेटली ने तर्कशास्त्र की क्या परिभाषा दी?
उत्तर:
हेटली ने तर्कशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार दी, “तर्कशास्त्र तर्क करने का विज्ञान और कला है।” (Logic is the science and also the art of reasoning)

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प्रश्न 9.
Logic शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र को अंग्रेजी में (Logic कहा जाता है, जो ग्रीक भाषा के विशेषण Logike (लॉजिकी) से आया है। यह शब्द पुनः ग्रीक संज्ञा Logos से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है ‘विचार’ या ‘शब्द’।

प्रश्न 10.
आकारिक सत्यता (Formal Truth) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आकारिक सत्य (Formal Truth) केवल हमारे विचारों में या मानसिक प्रदेश में होता है। इस प्रकार के सत्य में हमारे विचारों के बीच संगति रहती है। यह कोई आवश्यक नहीं है कि हमारे विचारों के अनुरूप बाह्य विश्व में कोई वस्तु अस्तित्ववान हो ही। जैसे-सोने का पहाड़, उड़ता घोड़ा आदि।

प्रश्न 11.
वास्तविक सत्यता (Material Truth) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब हमारे मन में विद्यमान विचारों के अनुरूप ही बाह्य विश्व में उस विचार से मिलता-जुलता कोई पदार्थ अस्तित्ववान होता है तब उसे वास्तविक सत्य (Material Truth) कहते हैं। इसकी जाँच निरीक्षण एवं प्रयोग से संभव है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र की ‘आकारिक सत्यता’ का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र में आकारिक सत्यता का तात्पर्य ‘उस तरीका से है जिसके द्वारा हम किसी वस्तु पर विचार करते हैं’ (The way in which we think about a thing) तर्कशास्त्र अनुमान से सम्बद्ध है और अनुमान का भी एक आकार होता है। अनेक अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि तर्कशास्त्र का सम्बन्ध केवल अनुमान के आकार से रहता है। उनके अनुसार यदि तर्कशास्त्र का विषय वास्तविक दृष्टि से सही नहीं भी हो, तब भी तर्कशास्त्र इस बात पर बल देता है कि अनुमान के नियमों का पालन अवश्य हो, जैसे –

All men are dogs
Sohan is a man
∴ Sohan is a dog

उपर्युक्त अनुमान आकारिक रूप में सत्य है क्योंकि इसका निष्कर्ष आधार वाक्य पर आधारित तथा तार्किक नियम के अनुकूल है। इस तर्क की प्रक्रिया में तर्कशास्त्र की आकारिक सत्यता दिखाई पड़ती है।

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प्रश्न 2.
क्या तर्कशास्त्र कला है?
उत्तर:
डन्स स्कॉटस (Duns Scotus) का कथन है कि तर्कशास्त्र सभी कलाओं की कला इसलिए है, क्योंकि यह सबसे अधिक ‘सामान्य कला’ है। इसे ‘सामान्य’ इसलिए कहा जाता है। क्योंकि इसमें प्रत्येक कला का मूल तत्त्व सामान्य रूप से पाया जाता है। प्रत्येक कला का एक निश्चित लक्ष्य होता है तथा उस लक्ष्य की प्राप्ति के कुछ नियम होते हैं। सत्य की प्राप्ति के लिए तर्कशास्त्र में जिन-जिन नियमों व सिद्धान्तों का सहारा लिया जाता है, उन सभी नियमों का अनुसरण अन्य कलाओं में भी किया जाता है।

कला हमें कोई कार्य करना सिखाती है। तैरना एक कला है जिसके कुछ नियम हैं तथा उन नियमों का पालन करने से ही कोई व्यक्ति तैराक बन सकता है। जिस प्रकार संगीतकला संगीत सिखाती है, नृत्यकला नृत्य सिखाती है; उसी प्रकार तर्कशास्त्र तर्क करना सिखाता है। यह कलाओं की कला इस अर्थ में है कि सभी कलाओं में अनुमान के सहारे कलाओं के नियमों की व्यापकता सिद्ध की जाती है और तर्कशास्त्र अनुमान पद पर आधारित होता है।

प्रश्न 3.
शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार तर्कशास्त्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ग्रीक भाषा के ‘Logike शब्द से अंग्रेजी का ‘Logic’ वना है। ‘Logike’ विशेषण शब्द है जिसका संज्ञा रूप ‘Logos’ होता है। ‘Logos’ का अर्थ विचार (thought) और शब्द (word) दोनों होता है। इस प्रकार हम शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार यह कह सकते हैं कि ‘Logic’ (तर्कशास्त्र) उन विचारों का शास्त्र है जो विचार शब्दों में व्यक्त होते हैं। तर्कशास्त्र में हम विचारों को शुद्ध रूप में शब्दों में व्यक्त करते हैं। भाषा में व्यक्त तर्क यदि युक्तिसंगत होता है तो हमें सही निष्कर्षों की प्राप्ति होती है।

शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार ‘Logic’ शब्दों में व्यक्त वह विज्ञान है जो नियमों का निर्धारण भाषा के अनुसार करता है। यदि हम यह कहें कि ‘बर्फ जल रही है’ तो बर्फ के साथ जलना कहना व्याघातक हो जाता है, क्योंकि आग के साथ जलना शब्द कहना ही युक्तिसंगत है। अतः ‘बर्फ जल रही है’ कहना तार्किक नियमों के अनुकूल नहीं है। इसलिए शब्दों में ऐसा व्यक्त करना अशुद्ध है। इस प्रकार तर्कशास्त्र का अर्थ हुआ भाषा में अभिव्यक्त विचारों के वे शब्द जो तार्किक नियमों के अनुकूल और युक्तसंगत हों।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 4.
अनुमान क्या है?
उत्तर:
जो ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित होता है, उसे अनुमान कहते हैं। तर्कशास्त्र की भाषा में अनुमान को इस तरह परिभाषित किया गया है … “अनुमान वह ज्ञान है जिसमें सामने दिये हुए तथ्यों से उसके पीछे के कारणों को जाना जाता है और उसके आधार पर जो सामने .. नहीं है उस तथ्य का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।” अनुमान दो शब्दों के मेल से बना है-अनु का अर्थ है ‘बाद’ और मान का अर्थ है ‘ज्ञान’। इस प्रकार अनुमान का शाब्दिक अर्थ हुआ-‘बाद का ज्ञान’।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष ज्ञान के बाद का ज्ञान ही अनुमान है। उदाहरण के लिए–‘सभी मनुष्य मरणशील हैं – इस तथ्य के आधर पर हम अनुमान (तर्कशास्त्रीय अर्थ में) द्वारा किसी भी व्यक्ति की मरणशीलता का ज्ञान प्राप्त करते हैं। धुएँ को देखकर हम आग का ज्ञान प्राप्त करते हैं। आग होने का ज्ञान अनुमानजन्य ज्ञान है जो धुएँ का ज्ञान होने के बाद हुआ। धुएँ को देखकर हम यह तर्क करते हैं जहाँ-जहाँ धुआँ, वहाँ-वहाँ आग। यहाँ धुआँ यहाँ आग।

प्रश्न 5.
तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक विज्ञान दोनों है। कैसे?
उत्तर:
तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक विज्ञान इसलिए है कि इसमें विभिन्न सिद्धान्तों के द्वारा सत्य-असत्य की जानकारी की जाती है। तर्कशास्त्र अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन आगमनात्मक और निगमनात्मक विधि द्वारा निरीक्षण और विश्लेषण के आधार पर सामान्यीकरण के अनुसार करता है। तर्कशास्त्र सैद्धान्तिक विज्ञान इसलिए है कि इसमें सिद्धान्तों के अनुकूल तर्क किया जाता है और सही ज्ञान की प्राप्ति की जाती है।

तर्कशास्त्र केवल तर्क का शास्त्र नहीं है बल्कि उन सिद्धान्तों का भी विज्ञान है जो तर्क करने में सहायता पहुँचाते हैं। हैमिल्टन ने तर्कशास्त्र को सैद्धान्तिक विज्ञान मानते हुए इन शब्दों में परिभाषित किया है, “तर्कशास्त्र विचार के आकारिक नियमों का विज्ञान है” (Logic is the science of the formal laws of thought)।

तर्कशास्त्रं व्यावहारिक विज्ञान इसलिए है, क्योंकि इसमें तर्क के द्वारा जीवन के व्यावहारिक पक्ष की समस्याओं का हल प्रस्तुत किया जाता है। तर्कशास्त्र का सम्बन्ध अनुमान से है और अपने ‘ व्यावहारिक जीवन में हमें अनुमान की आवश्यकता पड़ती है। विचार करना, तर्क करना मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं, जिस प्रकार बोलना, हँसना, रोना, भूख लगना आदि। चूँकि तर्क करना। हमारे व्यवहार का एक आवश्यक अंग है, इसलिए तर्कशास्त्र एक पूर्ण व्यावहारिक विज्ञान भी है जिसके द्वारा हम व्यवहार के नियमों के शुद्ध निष्कर्ष तक पहुँच पाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तर्कशास्त्र की विभिन्न परिभाषाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रायः देखा गया है कि, “तर्कशास्त्र में जितने लेखक हैं उतनी ही इसकी परिभाषाएँ दी गई है और सबों में कुछ-न-कुछ दोष अवश्य पाया जाता है। इसमें से प्रमुख दोषयुक्त निम्नलिखित परिभाषाओं को रखा जा सकता है जो या तो संकुचित हैं, या वृहत् –

1. थॉमसन के अनुसार:
Logic is the science of the laws of thought अर्थात् “तर्कशास्त्र विचार के नियमों का ‘विज्ञान है।” इस परिभाषा में तर्कशास्त्र को केवल विज्ञान कहा गया है। जबकि तर्कशास्त्र की दूसरी त्रुटि है कि इसे विचार का विज्ञान कहा गया है। जबकि ‘विचार’ बहुत व्यापक शब्द है। अतः यह वृहत् (Wide) परिभाषा है।

2. हैमिल्टन के अनुसार:
Logic is the science of the formal laws of thought Hamilton:
अर्थात् तर्कशास्त्र विचार के आकार संबंधी नियमों का विज्ञान है। इससे भी तर्कशास्त्र को सिर्फ विज्ञान माना गया है परन्तु हम जानते हैं कि तर्कशास्त्र विज्ञान के साथ ही कला भी है।

यह भी स्पष्ट है कि तर्कशास्त्र का संबंध केवल आकारिक सत्यता से ही है क्योंकि इसको आकार संबंधी नियमों का ही विज्ञान कहा गया है। परन्तु हम जानते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ आकारिक सत्यता (Formal truth) से ही नहीं, बल्कि वास्तविक सत्यता (Natural truth) से भी उतना ही है, अतः यहाँ तर्कशास्त्र का क्षेत्र बहुत व्यापक कर दिया गया है, जो अनुचित है।

3. एल्ड्चि के अनुसार:
Logic is the art of reasoning-Aldrich:
अर्थात् तर्कशास्त्र तर्क की कला है।

(क) इस परिभाषा में तर्कशास्त्र को केवल कला ही कहा गया है, जबकि तर्कशास्त्र विज्ञान भी है। जिसकी चर्चा भी नहीं की गई है, अतः यह परिभाषा संकीर्ण है।

(ख) संकीर्णता के अलावा इस परिभाषा में सिर्फ क्रियात्मक पक्ष का ही जिक्र किया गया है जबकि सिद्धान्त पक्ष की ओर भी निर्देश करना चाहिए था।

(ग) इस परिभाषा से यह ज्ञात होता है कि तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ तर्क (Reasoning) से ही है परन्तु ऐसी बात सही नहीं है। तर्कशास्त्र से संबंध तर्क में सही पता पहुँचाने वाली अन्य क्रियाओं जैसे परिभाषा, विभाग, वर्गीकरण, नामकरण इत्यादि से भी है। लेकिन इन क्रियाओं पर एल्ड्रिच महोदय ने विचार ही नहीं किया।

4. अलबर्ट्स मैगनस के अनुसार:
Logic is the science of argumentation Albertus Magnus अर्थात् तर्कशास्त्र तर्क का विज्ञान है। यह परिभाषा भी संकुचित है क्योंकि यहाँ तर्कशास्त्र के सभी आवश्यक एवं सामान्य गुणों का वर्णन नहीं किया गया है।

5. स्पैल्डिंग के अनुसार:
Logic is the theory of inference-Spalding-अर्थात् तर्कशास्त्र अनुमान का सिद्धान्त है। यह परिभाषा भी संकुचित ही है।

6. अरनॉल्ड के अनुसार:
Logic is the science of understanding in the pur suit of truth-Arnauld:
अर्थात् तर्कशास्त्र बुद्धि विषयक विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की प्राप्ति की जाती है। इस परिभाषा में भी दोष है।

(क) यहाँ सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर दिया गया है और क्रियात्मक पक्ष को छोड़ दिया गया है जबकि तर्कशास्त्र सिद्धान्त और क्रिया दोनों से संबंधित है।
(ख) इस परिभाषा में ‘सत्य’ शास्त्र का प्रयोग किया गया है परन्तु यह स्पष्ट नहीं बताया गया है कि इस सत्य में सत्य के दोनों ही पहलू (आकारिक सत्यता और वास्तविक सत्यता) समाविष्ट है या नहीं। अतः ‘सत्य’ शब्द संदिग्ध है।

7. ह्वेटली के अनुसार:
Logic is the art and science of reasoning-Whately:
अर्थात् तर्कशास्त्रा तर्क की कला एवं विज्ञान है। यह भी दोषयुक्त परिभाषा ही है। इसमें अनुमान की चर्चा तो हुई है किन्तु अन्य सहायक क्रियाओं, जैसे विभाजन, परिभाषा, वर्गीकरण आदि की चर्चा नहीं की गई है। अतः यह भी संकुचित परिभाषा है।

8. यूबरवेग के अनुसार:
Logic is the science of the regulative laws of human knowledge-Ueberweg:
अर्थात् तर्कशास्त्र मानव ज्ञान के नियंत्रणात्मक नियमों का विज्ञान है। इस परिभाषा में वृहत् परिभाषा का दोष है। तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान से है प्रत्यक्ष से नहीं। परन्तु इस परिभाषा के अनुसार इसे मानव ज्ञान का शास्त्र बतलाया गया है। मानव-ज्ञान बहुत ही विस्तृत शब्द है। अतः इसमें वृहत् परिभाषा का दोष है।

9. पोर्ट-रॉयल लॉजिक के अनुसार:
Logic is the science of the operation of the human understanding in the persuit of truths-Port Royal Logic:
अर्थात् तर्कशास्त्र मनुष्यों की आकस्मिक प्रक्रियाओं का वह विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की खोज की जाती है। यह परिभाषा भी दोषपूर्ण ही हैं इसमें तर्कशास्त्र का सम्बन्ध सभी मानसिक क्रियाओं में प्रत्यक्ष ज्ञान भी है। परन्तु तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान से है। यह परिभाषा वृहत् (Wide) हो जाती है। दूसरा दोष है कि इसमें ‘सत्य’ शब्द भी है। यहाँ स्पष्ट करना था कि सत्य का अर्थ है आकारिक और वास्तविक सत्यता।

10. वेल्टन के अनुसार:
“Logic is science of the principles which regulate valid thought”-Welton:
अर्थात् तर्कशास्त्र उन सिद्धान्तों का विज्ञान है जिनके द्वारा सत्य विचारों का नियंत्रण होता है।

विश्लेषण:
वेल्टन की परिभाषा में निम्नलिखित गुण हैं।

(क) तर्कशास्त्र विज्ञान है क्योंकि यहाँ सिद्धान्तों का निरूपण तथा उनके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति का प्रयास होता है।

(ख) इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि तर्कशास्त्र विज्ञान होने के साथ ही साथ कला भी है। इसमें तार्किक सिद्धान्तों के द्वारा सत्य की प्राप्ति की चेष्टा की जाती है।

(ग) यह एक आदर्श निर्धारक भी है। क्योंकि इसका लक्ष्य सत्य की प्राप्ति से है।

(घ) तर्कशास्त्र का संबंध तर्क करने के सिद्धान्तों से तो है ही साथ-ही-साथ तर्क करने में सहायता पहुँचाने वाली क्रियाओं परिभाषा, विभाजन, नामकरण, वर्गीकरण से भी इसका अभीष्ट सम्बन्ध है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इन परिभाषाओं में तर्कशास्त्र के सभी सामान्य एवं आवश्यक गुणों (Common essential qualities) का समावेश है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 2.
क्या तर्कशास्त्र विज्ञान है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र का अंग्रेजी शब्द Logic है। यह लौजिक शब्द ग्रीक भाषा के विशेषण Logike से बना है और इसका संज्ञा के रूप में Logos व्यवहार होता है। Logos का अर्थ ‘विचार’ (Thought) या ‘शब्द’ (Word) होता है। अर्थात् Logos का अर्थ Thought and word हुआ जिसका अर्थ विचार और शब्द से हुआ। अतः स्पष्ट सिद्ध है कि ‘विचार एवं शब्द’ में घनिष्ठ संबंध है। यहाँ पर हम तर्कशास्त्र को विचारों का शास्त्र कह सकते हैं।

विचारों को शब्दों में व्यक्त करना आसान काम नहीं है। क्योंकि मन में एक ऐसा भी विचार आ सकता है कि बर्फ जल रही है। लेकिन शब्द में व्यक्त कर देने पर यह युक्तिसंगत नहीं मालूम पड़ता है, क्योंकि बर्फ के साथ जलना कहना व्याघातक हो जाता है।

‘बर्फ जल रही है’ यह तार्किक नियमों के अनुकूल वाक्य नहीं है। शब्दों का उचित प्रयोग नहीं करना अशुद्ध है। अतः तर्कशास्त्र के बारे में कह सकते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध भाषा में अभिव्यक्त तर्क से है, अर्थात् तर्कशास्त्र वह आदर्शात्मक विज्ञान है जो नियमों का निर्धारण सत्य-असत्य के निर्णय के लिए करता है।

‘तर्कशास्त्र’ दो शब्दों के योग से बना है-‘तर्क और शास्त्र’। तर्क का अर्थ है ज्ञात से अज्ञात की ओर जाना। विचारों में सुव्यवस्थित सम्बन्ध हुआ या नहीं यह इसी पर निर्भर करता है कि हमारा तर्क युक्तिसंगत है या नहीं। नियमानुकूल तर्क करने पर ही शुद्ध निष्कर्ष की प्राप्ति होती है। अतः तर्कशास्त्र तर्क’ की शुद्धि एवं अशुद्धि का निर्णय करता है। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
राम मनुष्य है।
∴ राम मरणशील है।

ऐसा निष्कर्ष निकालना अशुद्ध है। अब प्रश्न यह भी उठ सकता है कि ‘राम मरणशील है।’ यही निष्कर्ष क्यों शुद्ध है और ‘राम रोटी दूध खाता है’ यह निष्कर्ष क्यों अशुद्ध है? इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए तर्कशास्त्र का अध्ययन जरूरी हो जाता है। हम जो अनुमान करते हैं, निष्कर्ष निकालते हैं तब हमारा तर्क शुद्ध हुआ या अशुद्ध इसका निर्णय ‘तर्कशास्त्र’ ही करता है। इस तरह कुछ शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि तर्कशास्त्र तर्क को शुद्ध और अशुद्ध घोषित करने का एक मापदंड है।

अतः तर्कशास्त्र वह शास्त्र है जहाँ तर्क के सभी नियमों और सिद्धान्तों का विशद वर्णन है। इन्हीं नियमों और सिद्धान्तों के सहारे तर्क की लड़ी को शुद्ध एवं अशुद्ध सिद्ध किया जाता है। ‘ऊपर के उदाहरण में सभी मनुष्य मरणशील हैं, राम मनुष्य है, इसलिए राम मरणशील है। यही निष्कर्ष शुद्ध होगा और यह निष्कर्ष कि राम रोटी दूध खाता है, अशुद्ध होगा; क्योंकि ऐसा नियम है कि निष्कर्ष आधार-वाक्य से ही निकाले जाते हैं और वह निष्कर्ष इन आधार वाक्यों के अन्तर्गत ही होता है।

परिभाषा भी दो तरह की होती है –
(क) विश्लेषणात्मक और
(ख) संश्लेषणात्मक।

(क) विश्लेषणात्मक:
जब हम किसी वस्तु के अंग-प्रत्यंग का वर्णन अलग-अलग विस्तारपूर्वक करते हैं तब वह विश्लेषणात्मक कहलाती है।

(ख) संश्लेषणात्मक:
जब किसी वस्तु के सार गुणों का वर्णन कुछ ही सारगर्भित शब्दों द्वारा करते हैं तब उसे संश्लेषणात्मक कहते हैं।

तर्कशास्त्र की संश्लेषणात्मक (Synthetic) परिभाषा इस प्रकार दे सकते हैं:
“Logic is the science of reasoning as expressed in language for the attaiment of truth and avoidence of error.” अर्थात् तर्कशास्त्र भाषा में अभिव्यक्त तर्क का वह विज्ञान है जिसके द्वारा सत्य की प्राप्ति एवं दोष का परिहार किया जाता है। इस संश्लेषणात्मक परिभाषा का जब हम विश्लेषण करते हैं तब निम्नलिखित विशेषताएँ पाते हैं –

1. तर्कशास्त्र विज्ञान है:
Logic is the science:
विज्ञान विश्व के किसी खास विभाग के क्रमबद्ध (Systematic) ज्ञान को कहते हैं – Systematic knowledge of anything is called science. क्रमबद्ध का अर्थ होता है जो नियमों से बंधा हुआ हो।

अर्थात् विज्ञान में कुछ नियम होते हैं और जब कुछ निश्चित प्रणाली इन्हीं नियमों से बंधी रहती है, तब उसे हम नियमबद्ध कहते हैं और उस प्रकार का ज्ञान ही विज्ञान कहलाता है। इन नियमों के कारण ही विज्ञान में एक सिलसिला बंध जाता है और यह सिलसिला नियमों पर ही निर्भर करता है।

इसी तरह हम देखते हैं कि तर्कशास्त्र भी प्रकृति के एक खास विभाग से संबंधित है और यह विभाग है तर्क का। यह तर्क मन (mind) से संबंधित है। कोई भी अनुमान (Inference) सत्य है या असत्य, इसकी जाँच के पहले यह देखना जरूरी है कि वह तार्किक नियमों के अनुकूल है या प्रतिकूल। अनुमान तर्कसंगत रहने पर सत्य एवं प्रतिकूल रहने पर असत्य होता है। इस तरह तर्कशास्त्र इन्हीं कारणों से विज्ञान कहा गया है।

2. यह तर्क का विज्ञान है:
“It is the science of reasoning”:
तर्कशास्त्र को तर्क का विज्ञान इसलिए कहा गया है कि इसमें तर्क से संबंधित तर्क करने के अनेक नियम एवं सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। अतः विभिन्न नियमों के प्रतिपादन एवं उसके अनुसार तर्क करने की रीति बताने के कारण तर्कशास्त्र को तर्क का विज्ञान कहा गया है।

3. तर्क को भाषा में व्यक्त करते हैं:
Reasoning is expressed in the language. तर्कशास्त्र का संबंध निर्णय से नहीं बल्कि भाषा में व्यक्त किये हुए निर्णय से है। यहाँ पर यह विचार करना जरूरी है कि जब हम मन-ही-मन सोचते हैं कि ‘बर्फ जल रही है’ तब मानसिक प्रदेश में इस प्रकार के निर्णय का संबंध तर्कशास्त्र से ही रहता है। तार्किक दृष्टि से सत्य या असत्य हम तभी कहते हैं जब निर्णय को व्यक्त किया जाता है। भाषा में व्यक्त हो जाती है तब वह तर्कशास्त्र के अधीन हो जाती है। मन के विचार को कई तरह से व्यक्त किया जाता है यथा लिखकर, बोलकर एवं इशारे से।

लेकिन जब हम कहते हैं कि तर्कशास्त्र का संबंध व्यक्त निर्णय (Expressed judgement) से है तब वहाँ व्यक्ति का संबंध इशारे से नहीं है। इशारे में मनोभाव को व्यक्त करना.तार्किक दृष्टि से सत्य या असत्य नहीं कहा जा सकता है। विचारों को बोलकर या लिखकर व्यक्त करना ही तर्कशास्त्र का विषय बनता है।

जब हम बर्फ जल रही है, ऐसा बोलते हैं या लिख देते हैं तव कहा जाता है कि वह तर्क संगत नहीं हुआ। इन्हीं कारणों से कहा गया है कि “Logic is concerned not with the process of though but with the product of thought” अर्थात् तर्कशास्त्र का संबंध विचारों की प्रक्रिया से नहीं बल्कि उनकी निष्पत्ति से है।

यहाँ प्रक्रिया और निष्पत्ति में अन्तर बताना जरूरी है। कागज बनाने की एक मशीन होती है। इस जगह फटे-पुराने कपड़े, बाँस की कोपलें या कागज संबंधी सामग्री रख दी जाती है और इसके बाद मशीन चला दी जाती है। इसके बाद उन सामग्रियों की पिसाई, बेलाई, सुखाई, कटाई एवं इसी तरह के कई पहलुओं से गुजरने के बाद कागज बन कर निकल आता है। यहाँ पर कागज निकलने के पहले जितने भी पहलू दिखाई देते हैं, वे सब प्रक्रियाएँ हैं और कागज निकलना ही निष्पत्ति है।

इसी तरह विचारों के साथ भी है। किसी अनुमान पर पहुँचने के लिए मानसिक क्षेत्र में अनेक प्रक्रियाएँ होती हैं, जैसे-कुछ विचारों को हटाना, कुछ को चुनना, कुछ को जोड़ना। फिर तार्किक नियमानुसार उन चुने विचारों में सुव्यस्थित संबंध देना। ये सब विचारों की प्रक्रियाएँ हैं और तब ये विचार सुसंगठित होकर अनुमान बनकर मन से निकल आते हैं अर्थात् शब्दों द्वारा व्यक्त हो जाते हैं तव ऐसे व्यक्त विचारों (expressed thought) को विचारों की निष्पत्ति (Product of thought) कहते हैं।

विचारों की इसी निष्पत्ति से तर्कशास्त्र का संबंध है। विचारों की प्रक्रियाओं से तर्कशास्त्र का संबंध नहीं है। जैसे बर्फ के साथ जलना का संबंध मानसिक प्रदेश में एक विचरण है जो विचारों की पक्रिया मात्र है।

तर्कशास्त्र उससे संबंधित नहीं है। परन्तु जब विचार छनकर आपस में संबंधित होकर मन से निकल आता है तब वह तर्कशास्त्र का विषय हो जाता है। बर्फ जल रही है, यह अतार्किक विचार है और बर्फ गल रही है, यही तार्किक विचार है। अतः तर्कशास्त्र भाषा में व्यक्त तर्क से संबंधित है (Resoning expressed in Language)।

4. इसके द्वारा सत्य की प्राप्ति होती है:
It attains truth-अर्थात् संश्लेषणात्मक (Synthetic) दृष्टि से विचार करने पर सत्य के संबंध में तीन विचार दिये गये हैं –

(क) चरम सत्य या परम सत्य (Ultimate truth):
इसमें केवल सत्य को ही चरम लक्ष्य के रूप में समझा जाता है। इस रूप में सत्य का अर्थ है ईश्वर, सत्य के ऐसे रूप का निरूपण तात्विक क्षेत्र में किया गया है जहाँ सत्य के अर्थ को मूलतः मूलतत्त्व (ultimate reality in the metaphysical field) ही समझते हैं।

(ख) व्यावहारिक सत्य (Practical truth):
इसका अर्थ इस सत्य से है जिसका संबंध जीवन के किसी अंग से है। यह सत्य संबंध-युक्त (Relative) हुआ करता है। अर्थात् एक दृष्टि से एक स्थान पर सत्य है तो दूसरी दृष्टि से दूसरे स्थान पर असत्य भी है। अतः व्यावहारिक जीवन में समयानुसार उपयोगिता की दृष्टि से इस सत्यता का महत्त्व होता है, जैसे संसार व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है किन्तु चरम दृष्टि से, दिव्यदृष्टि से असत्य है।

(ग) तार्किक सत्य (Logical truth):
तार्किक सत्य का अर्थ उस सत्य से है जिसका सामंजस्य विचार एवं बाह्य जगत् से है। साथ-ही-साथ यह भी देखा गया है कि तार्किक नियमों से इसकी अनुकूलता है एवं इसमें व्याघातक विचारों की अवहेलना की गई है।

विश्लेषणात्मक (Analytical) ढंग से सत्य को हम दो खंडों में विभाजित कर अध्ययन करते हैं।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth)
(ख) वास्तविक सत्यता (Matetial truth)।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth):
आकारिक सत्य वह है जिसमें सत्यता केवल आकार में ही हो। जैसे एक फूल का चित्र बना दें तो इस चित्र में सिर्फ आकारिक सत्यता ही है। यह चित्र वास्तविक फूल नहीं है यह सिर्फ आकार में ही फूल है परन्तु एक फूल को टेबुल पर रख देते हैं तो वास्तव में फूल में वास्तविकता है।

इस आकारिक और वास्तविक सत्य को अर्थशास्त्र में क्रमशः बाह्य और आंतरिक (Facial and intrinsic) मूल्य कहा गया है और दर्शन शास्त्र में इसे दृश्य तथा तथ्य (appearance and reality) कहते हैं। जैसे यह जगत् जो हम देख रहे हैं झूठा है। यह दृश्य में ही सत्य है वास्तव में यह वैसा नहीं है, जैसा दीख रहा है। इसकी वास्तविकता का संबंध तो चिरंतन सत्य से है जो अदृश्य है किन्तु वास्तव में सत्य है। तर्कशास्त्र में सत्य के उन दोनों अंगों का नाम है आकारिक सत्य एवं वास्तविक सत्य। आकारिक सत्य का अर्थ है तार्किक नियमों की अनुकूलता, जैसे

सभी मनुष्य जानवर हैं।
राम मनुष्य है।
∴ राम जानवर है।

यह अनुमान आकारिक रूप में सत्य है क्योंकि इसका निष्कर्ष आधार वाक्य पर आश्रित एवं तार्किक नियमानुकूल है। अतः इस तर्क की प्रक्रिया में आकारिक सत्यता है।

(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth):
वास्तविक सत्यता हेतु विचार एवं बाह्य जगत् में सामंजस्य होना आवश्यक है। जैसे जब हम कहते हैं कि फूल लाल है तब इसमें वास्तविक सत्यता है, क्योंकि इसमें जो लाल फूल की अवधारणा है उसी के अनुरूप बाह्य जगत् में भी ‘लाल देखने को मिलता है’, अतः बाह्य जगत् एवं अन्तर्जगत में अनुकूलता रहने की वह इसमें वास्तविकता है, जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
सभी भारतीय मनुष्य हैं।
∴ सभी भारतीय मरणशील हैं।

इस अनुमान में आकारिक सत्यता के साथ ही साथ वास्तविक सत्यता भी है। किन्तु आकारिक सत्यता के साथ वास्तविक सत्यता रह भी सकती है और नहीं भी रह सकती है जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन मरणशील है।

तो इसमें वास्तविक सत्यता के साथ-साथ आकारिक सत्यता भी है। परन्तु जब हम यह कहते हैं कि सभी मनुष्य जानवर हैं।

मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन जानवर है।

तो इस अनुमान में आकारिक सत्यता तो है, परन्तु वास्तविक सत्यता नहीं है। तर्कशास्त्र में नियम प्रणाली से आकारिक सत्यता की प्राप्ति होती है तथा आगमन प्रणाली से वास्तविक सत्यता की। इस प्रकार आगमन एवं निगमन प्रणाली से पूर्ण सत्य की प्राप्ति ही तर्कशास्त्र का लक्ष्य है।

(v) तर्कशास्त्र दोष को हटाता है:
Logic avoids error:
तर्कशास्त्र का विषय अनुमान है और अनुमान शुद्ध होना चाहिए। अतः इससे स्पष्ट है कि तर्कशास्त्र का काम शुद्धता से भी है और कहा भी गया है – “Logic is a corrective science and not a creative science.” अर्थात् तर्कशास्त्र शुद्धात्मक विज्ञान है, सर्जनात्मक विज्ञान नहीं है। अनुमान को शुद्ध करने के. लिए बहुत से तार्किक नियमों का अनुसंधान किया गया है जिसके सहारे तर्क की प्रणाली को शुद्ध किया जाता है।

तर्क करने की शक्ति ईश्वरीय देन है। पर इसकी उत्पत्ति पर मनुष्यों का कुछ भी अधिकार नहीं है। तर्क करना और सुधार करना दोनों दो कार्य हैं। सृष्टि करना ब्रह्म का कार्य है और उसमें सुधार कर देना मनुष्य का काम है। इस तरह जिसमें तर्कशक्ति का अभाव है वह तार्किक नहीं हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 3.
आकारिक एवं वास्तविक सत्यता से आप क्या समझते हैं? अथवा, तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष के ज्ञान को अनुमान कहते हैं। अनुमान में अनु + मान दो शब्द हैं जिसका अर्थ है बाद का ज्ञान, अर्थात् किसके बाद का? उत्तर है – प्रत्यक्ष के बाद का। धुएँ को देखकर आग का ज्ञान अनुमान है। इसमें धुएँ का ज्ञान प्रत्यक्ष होता है और आग का ज्ञान अनुमान से प्राप्त करते हैं। जैसे –

जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है।
यहाँ धुआँ है।
∴ यहाँ आग है।

इसी तरह सिगनल झुका हुआ देखकर गाड़ी के आने का अनुमान करते हैं। यहाँ गाड़ी अप्रत्यक्ष है, परन्तु झुके हुए सिगनल के प्रत्यक्ष से इस अप्रत्यक्ष का बोध होता है। अतः ज्ञानोपार्जन का अनुमान एक काव्य साधन है। इस तरह अनुमान करना हमारा स्वाभाविक धर्म है। बुद्धि विकास के साथ-साथ जीवन के अन्त तक अनुमान किया जाता है।

इस तरह हरेक व्यक्ति अनुमान करता है। छात्र-शिक्षक सभी अनुमान करते हैं कि अगर वे चार घंटा प्रतिदिन पढ़ेंगे तो प्रथम श्रेणी में पास कर जाएँगे। इसी तरह अच्छी वर्षा देखकर किसान अच्छी फसल होगी का अनुमान करते हैं। इस तरह ज्ञान का भंडार अनुमान से खूब भरता है। इस तरह ज्ञानोपार्जन के लिए अनुमान की बहुत महत्ता है।

परन्तु अनुमान का दोष यह भी है कि यह गलत भी हो सकता है। उमड़े हुए बादल को देखकर किसान वर्षा का अनुमान करते हैं किन्तु वर्षा नहीं होती है। किसी के मीठे-मीठे वचन को सुनकर हम उसके सज्जन होने का अनुमान करते हैं परन्तु वह दुर्जन रहता है और ठगने हेतु मीठे वचन का प्रयोग करता हैं इस तरह अनुमान असंदिग्ध ज्ञान नहीं दे पाता है। शंका की गुंजाइश रह जाती है। इसीलिए एक शास्त्र बना जिसे तर्कशास्त्र (Logic) कहते हैं जो सही-सही अनुमान करना सिखलाता है।

तर्कशास्त्र अनुमान का नियम प्रतिपादित करता है जिसका अनुशरण कर हम सत्य की प्राप्ति करते हैं। हम किस तरह सोचें, कैसे तर्क करें, कैसे अनुमान करें ताकि सत्य की प्राप्ति हो यही तर्क की समस्या है। तर्कशास्त्र में अनुमान के व्यापक क्रियाओं का वर्णन है। इन नियमों के अनुसार अनुमान करने पर वास्तविकता को प्राप्त करते हैं और गलती से छुटकारा पाते हैं।

इसलिए कहा गया है कि “Attainment of truth and avoidence of error are the aims of Logic” अर्थात् सत्य की प्राप्ति और असत्य का निराकरण ही तर्कशास्त्र का उद्देश्य है।

अतः अनुमान की सत्यता का अध्ययन तर्कशास्त्र में होता है। इससे साफ हो जाता है कि तर्कशास्त्र के अध्ययन का विषय अनुमान है। इसमें अनुमान संबंधी सारी समस्याओं को हल किया जाता है। अतः तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु अनुमान है प्रत्यक्ष नहीं। तर्कशास्त्र का लक्ष्य है सत्यता की प्राप्ति करना और सत्य दो तरह के होते हैं –

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth) तथा
(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth)।

(क) आकारिक सत्यता (Formal truth):
जब हमारे विचारों में विरोध या संघर्ष नहीं होता है तो उनमें आकारिक सत्यता होती है। यहाँ एक भावना दूसरे के अनुकूल होती है। ऐसी भी हो सकता है कि उन विचारों या भावनाओं के अनुकूल बाहर में कोई वस्तु न हो। फिर भी विरोध निहित होने के कारण उनमें आकारिक सत्यता होती है, यथा-सोने का पहाड़, दूध-घी की नदी। यहाँ वास्तविक जगत् में सोने का पहाड़ और दूध-घी की नदी नहीं पाया जाता है। फिर भी इसमें आकारिक सत्यता हैं। ये विचार आपस में विरोधी नहीं हैं। वास्तविक जगत में सोने का पहाड़ नहीं पाया जाता है फिर भी इसकी आकारिक सत्यता है।

बहुत-सी भावनाएँ असंभव होती हैं। उनका विचार नहीं किया जा सकता है। जैसे वृत्ताकार वर्ग (circular square), बंध्या माता (barren mother) आदि। यहाँ वृत्त और वर्ग एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसी तरह बन्ध्या और माता कभी मेल नहीं खा सकते हैं। इनमें वास्तविक सत्यता तो है ही नहीं और आकारिक सत्यता भी नहीं है क्योंकि इनके बारे में सोचा नहीं जा सकता है। स्वर्णिम पर्वत, दूध की नदी, नाचता हुआ नगर, उड़ता हुआ घोड़ा आदि सबों में आकारिक सत्यता है क्योंकि इसकी कल्पनाओं में विरोध नहीं है।

हम इनके बारे में सोच सकते हैं। भले वे वास्तविक जगत् में नहीं पाये जाते हैं परन्तु विचार के जगत् में सत्य हैं। परन्तु वृत्ताकार वर्ग और बन्ध्या माता न तो वास्तविक जगत् में सत्य हैं और न विचार के जगत् में ही। ये असंभव धारणाएँ हैं। इनमें आकारिक सत्यता नहीं है।

(ख) वास्तविक सत्यता (Material truth):
जब विचारों या भावनाओं में मेल रहता है और उनके अनुकूल वस्तुएँ पायी जाती हैं तो उनमें वास्तविक सत्यता होती है। जैसे-‘लाल गुलाब’ एक वास्तविक सत्य है। यहाँ लाल और गुलाव की भावनाओं में विरोध नहीं बल्कि मेल है। लाल गुलाव वास्तविक सत्यता है। स्वर्णिम पहाड़ में आकारिक सत्यता है, वास्तविक सत्यता नहीं है परन्तु जिसमें वास्तविक सत्यता होती है उसमें आकारिक सत्यता भी होती है। परन्तु जिसमें आकारिक सत्यता हो उसमें वास्तविक सत्यता का होना जरूरी नहीं है।

जैसे वास्तविक गुलाव में गुलाब का आकार भी होता ही है, परन्तु कागज के गुलाब में गुलाब का आकार वास्तविक नहीं होती है। अर्थात वास्तविक सत्यता के लिए आकारिक सत्यता का होना जरूरी है, किन्तु आकारिक सत्यता के लिए वास्तविक सत्यता का होना जरूरी नहीं है। (Formal truth is essential for material truth but material truths not essential for formal truth) क्या तर्कशास्त्र का संबंध दोनों तरह के सत्यों से है?

आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध दोनों तरह के सत्यों से है? आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ अनुमान के आकार से रहता है। अनुमान की वस्तु से नहीं। इसलिए इन विचारों के अनुसार तर्कशास्त्र का संबंध सिर्फ आकारिक सत्यता से है। अनुमान का आकार यदि सही है, तो सब ठीक है। जैसे –

सभी छात्र गदहे हैं।
राम छात्र है।
∴ राम गदहा है।

यह अनुमान आकारिक दृष्टि से सही है। निष्कर्ष भी आधार वाक्यों से नियमानुकूल निकाला गया है। यह प्रथम आकार में बारबारा (Barbara) योग में है। परन्तु इसमें वास्तविक सत्यता का सर्वथा अभाव है। आकारिक तर्कशास्त्रियों के अनुसार सत्य का अर्थ आकारिक सत्यता है और निगमन तर्कशास्त्र का संबंध विशेषतः आकारिक सत्यता से है। इसमें अरस्तू, हैमिल्टन, जेवन्स, मैनसेल आदि इस प्रकार के विचार को मानने वाले हैं।

दूसरा विचार वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों का है कि तर्कशास्त्र का संबंध आकारिक सत्यता के साथ-साथ वास्तविक सत्यता से है। आकारिक सत्यता के साथ-ही-साथ वास्तविक सत्यता का रहना आवश्यक है। इस मत के समर्थकों में मिल, बेन, ब्रैडले आदि प्रमुख हैं। इन लोगों के अनुसार अनुमान का संबंध वास्तविक जीवन से होना चाहिए।

यदि तर्कशास्त्र का संबंध केवल आकारिक सत्यता से रहेगा तो तर्कशास्त्र हास्य का विषय हो जाएगा। इसलिए इन लोगों ने आगमन को तर्कशास्त्र का सच्चा रूप माना है। आगमन का संबंध आकारिक सत्यता के साथ-साथ वास्तविक सत्यता से रहता है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि तर्कशास्त्र का संबंध दोनों प्रकार के सत्य से है। निगमन का संबंध आकारिक सत्यता से अधिक है और तर्कशास्त्र का लक्ष्यपूर्ण सत्यता की प्राप्ति से है, जिसमें दोनों प्रकार के सत्य आते हैं। दोनों के द्वारा तर्कशास्त्र अपने लक्ष्य की प्राप्ति करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 6 तर्कशास्त्र की प्रकृति एवं विषय-क्षेत्र

प्रश्न 4.
तर्कशास्त्र की उपयोगिता की विवेचना करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के अध्ययन से निम्नलिखित लाभ हैं –
1. तर्कशास्त्र हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। इसका कारण है कि तर्कशास्त्र का संबंध अनुमान से है तथा अनुमान का संबंध हमारे जीवन से है। अनुमान जीवन के लिए आवश्यक है। अनुमान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता है। अतः तर्कशास्त्र जीवन के लिए बहुत उपयोगी है।

2. यह सत्य है कि तर्कशास्त्र तर्क करने की शक्ति पैदा नहीं कर सकता है क्योंकि यह शक्ति प्राकृतिक है। परन्तु यदि तर्क में गलती हुई तो इसे सुधारने में काम कर सकता है। अतः यह सृजनात्मक नहीं बल्कि परिशोधनात्मक है (The function of logic is not creative but corrective)। जिसने तर्कशास्त्र को नहीं पढ़ा है वह तर्क की गलती को नहीं समझ सकता हैं अनुमान की गलती में वह उधेड़बुन में पड़ जाएगा।

गलती को नहीं समझने के कारण, उसका निराकरण भी नहीं कर सकेगा। परन्तु एक तर्कशास्त्री गलती करने पर गलती को समझ सकता है और सुधार भी सकता है। इसलिए तर्कशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है। प्रकृति ने हमें स्वास्थ्य दिया है, परन्तु बीमार पड़ने पर दवाई की जरूरत पड़ जाती है। इसी तरह प्रकृति न हमें तर्क करने की शक्ति दी है, परन्तु गलती करने पर तर्कशास्त्र की जरूरत हो जाती है।

3. सभी विज्ञान और कला की जड़ में तर्क है। अतः विभिन्न शास्त्रों के लिए तर्कशास्त्र के नियमों से परिचित होना जरूरी है। अतः तर्कशास्त्र का अध्ययन जरूरी है।

4. जिस तरह शरीर वृद्धि के लिए शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता है उसी तरह मानसिक वृद्धि के लिए तर्कशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता है।

5. मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने विचार को भाषा के द्वारा दूसरे के समक्ष रखता है। यदि उसका विचार तर्कसंगत होता है तो उससे लोग प्रभावित होते हैं। इसलिए भी तर्कशास्त्र का अध्ययन लाभकारी है। वक्ता, वकील, व्यापारी, शिक्षक, छात्र, मनोवैज्ञानिक वैज्ञानिक तथा नेताओं के लिए तर्कशास्त्र विशेषकर सहायक होता है।

6. तर्कशास्त्र का अध्ययन दर्शनशास्त्र के लिए भी जरूरी है। दर्शनशास्त्र का विषय अति सूक्ष्म है, जैसे-आत्मा, परमात्मा आदि। इनका ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा प्राप्त नहीं होता है। हम अनुमान से ही इन विषयों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अतः तर्कशास्त्र के अध्ययन से दर्शनशास्त्र के विवेचन में लाभ होता है।

7. तर्कशास्त्र अलंकार शास्त्र के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। अलंकारशास्त्र के बारे में कहा गया है कि यह Art of effective speaking or writing है अर्थात् अलंकार प्रभावशाली भाषण या लेखन की कला है। भाषण या लेखन तभी प्रभावोत्पादक हो सकता है जब तक तर्कपूर्ण है। तर्कपूर्ण अलंकारशास्त्र में छिछलापन नहीं होता है और वह दूसरों पर बराबर समानरूप से प्रभाव डालता है।

इन बातों से हम निष्कर्ष पर आते हैं कि तर्कशास्त्र के अध्ययन पर बहुत महत्त्व है। इसकी महत्ता को पूर्वीय तथा पाश्चात्य दोनों विद्वानों ने स्वीकार किया है। पाश्चात्य विद्वान Bosanquet तर्कशास्त्र के बारे में कहते हैं – यह Morphology of human knowledge अर्थात् मानवीय ज्ञान का ढाँचा है।

वहीं भारतीय विद्वानों ने भी तर्कशास्त्र की महत्ता को सर्वोपरि मानते हुए इसके संबंध में कहा है – “प्रदीपः सर्व शास्त्रानां उपायः सर्वकर्मणाम्” अर्थात् तर्कशास्त्र सभी शास्त्रों के लिए दीपक के समान है एवं सभी कार्यों में सफलता हेतु उपाय बताने वाला शास्त्र है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ज्ञान दीपके से अपने को एवं दूसरों को आलोकित करने के लिए तर्कशास्त्र का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। तर्कशास्त्र बहुत उपयोगी है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy मिल की प्रायोगिक विधियाँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसमें केवल दोनों उदाहरणों की आवश्यकता होती है –
(क) व्यतिरेक विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) अवशेष विधि
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

प्रश्न 2.
मिल की प्रायोगिक विधि को जाना जाता है –
(क) निराकरण विधि के रूप में
(ख) संयोजन विधि के रूप में
(ग) वियोजन विधि के रूप में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निराकरण विधि के रूप में

प्रश्न 3.
व्यतिरेक विधि से प्राप्त निष्कर्ष होते हैं –
(क) निश्चित
(ख) अनिश्चित
(ग) संदिग्ध
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निश्चित

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प्रश्न 4.
अवशेष-विधि एक विशेष रूप है –
(क) व्यतिरेक विधि का
(ख) अन्वय विधि का
(ग) संयुक्त विधि का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि का

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन एक प्रमाण तथा खोज दोनों की विधि है?
(क) अवशेष विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) अन्वय विधि
(घ) संयुक्त विधि
उत्तर:
(क) अवशेष विधि

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प्रश्न 6.
अन्वय विधि –
(क) निरीक्षण प्रधान विधि है
(ख) प्रयोग प्रधान विधि है
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निरीक्षण प्रधान विधि है

प्रश्न 7.
मिल की प्रायोगिक विधियाँ हैं –
(क) पाँच
(ख) चार
(ग) तीन
(घ) दो
उत्तर:
(क) पाँच

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प्रश्न 8.
मिल की प्रयोगात्मक विधियों में कौन-सी विधि कारण की मात्रा की व्याख्या करती है –
(क) अन्वय विधि (Method of agreement)
(ख) व्यतिरेक विधि (Method of difference)
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि (Joint method of agreement)
(घ) सहगामी सहचर विधि (Method of concomitant variations)
उत्तर:
(घ) सहगामी सहचर विधि (Method of concomitant variations)

प्रश्न 9.
घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए किसने प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया?
(क) मिल (Mill) ने
(ख) हेवेल ने
(ग) डेकार्ट ने
(घ) किसी ने नहीं
उत्तर:
(क) मिल (Mill) ने

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प्रश्न 10.
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर जिन प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया था। वह है –
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि
(घ) अवशेष विधि
उत्तर:
(ग) संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि

प्रश्न 11.
कारण के परिमाणात्मक लक्षणों के आधार मिल द्वारा बनाई गई विधियाँ हैं –
(क) सहचरी परिवर्तन विधि
(ख) अवशेष विधि
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 12.
प्रमाण की विधि (Method of proof) है –
(क) व्यतिरेक विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) अवशेष विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) व्यतिरेक विधि

प्रश्न 13.
खोज की विधि है –
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अन्वय विधि

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प्रश्न 14.
किसके द्वारा स्थाई कारणों के कार्य का पता लगाया जा सकता है?
(क) अन्वय विधि
(ख) व्यतिरेक विधि
(ग) सहचरी परिवर्तन विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ग) सहचरी परिवर्तन विधि

प्रश्न 15.
निगमन पर आधारित प्रयोग विधि है –
(क) अवशेष विधि
(ख) अन्वय विधि
(ग) व्यतिरेक विधि
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(क) अवशेष विधि

Bihar Board Class 11 Philosophy मिल की प्रायोगिक विधियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किस विधि में केवल दो उदाहरणों की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
व्यतिरेक विधि में केवल दो उदाहरणों की आवश्यकता होती है। एक उदाहरण भावात्मक होते हैं और दूसरा निषेधात्मक।

प्रश्न 2.
किस विधि में सह परिणामों को कारण-कार्य मान लेने का भ्रम होता है?
उत्तर:
अन्वय विधि में सह परिणामों को कारण-कार्य मान लेने का भ्रम होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमाण की विधि (Method of proof) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
व्यतिरेक विधि (Method of difference) को प्रयोग प्रधान विधि होने के कारण प्रमाण विधि कहा जाता है।

प्रश्न 4.
प्रयोगात्मक विधियाँ किसे कहते हैं? अथ्वा, प्रयोगात्मक विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
कार्य-कारण सम्बन्ध निश्चित करने की विधियों को प्रयोगात्मक विधियाँ कहते हैं।

प्रश्न 5.
मिल की प्रायोगिक विधियाँ कितनी हैं?
उत्तर:
मिल की प्रायोगिक विधियाँ पाँच हैं। वे हैं-अन्वय विधि, व्यतिरेक विधि, संयुक्त अन्वय-व्यतिरेक विधि, सहचारी-परिवर्तन-विधि तथा अवशेष विधि।

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प्रश्न 6.
घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए किसने प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया?
उत्तर:
जे. एस. मिल ने घटना के यथार्थ कारण जानने के लिए प्रायोगिक विधियों का वर्णन किया।

प्रश्न 7.
मिल ने कारण के परिमाणात्मक लक्षण (Quantitative marks of cause) के आधार पर कितनी प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया?
उत्तर:
मिल ने कारण के परिमाणात्मक लक्षण के आधार पर दो प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया। वे हैं-सहचारी-परिवर्तन-विधि (The method of concomitant variations) एवं अवशेष-विधि (The method of residues)।

प्रश्न 8.
अन्वय विधि के मुख्य दोष क्या हैं? अथवा, अन्वय विधि की मुख्य सीमाएँ क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि का मुख्य दोष है कि यह बहुकारणवाद (Plurality of causes) की समस्या से ग्रस्त है। दूसरा दोष यह है कि निरीक्षण-प्रधान विधि के कारण निरीक्षण के सभी दोष इसमें शामिल हैं।

प्रश्न 9.
खोज की विधि (Method of discovery) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
अन्वय विधि को मुख्यतः निरीक्षण पर आधारित होने के कारण खोज की विधि कहा जाता है।

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प्रश्न 10.
कौन-सी प्रायोगिक विधि निगमन पर आधारित विधि है?
उत्तर:
अवशेष विधि (The method of residues) निगमन पर आधारित विधि है।

प्रश्न 11.
किस विधि से स्थायी कारणों के कार्य का पता लगाया जा सकता है?
उत्तर:
सहचारी-परिवर्तन-विधि (The method of concomitant variations) से स्थायी। कारणों के कार्य का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 12.
किस विधि को ‘दुहरा अन्वय विधि’ (Double agreement) कहा जाता है?
उत्तर:
संयुक्त अन्वय-व्यतिरेक-विधि (The joint method of agreement and differ ence) को दुहरा अन्वय विधि कहा जाता है।

प्रश्न 13.
बहिष्करण या निराकरण की विधि (Method of elimination) से आप क्या समझते हैं? अथवा, बहिष्करण या निराकरण विधि का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
बहिष्करण का अर्थ होता है ‘हटाना’ या ‘छाँटना’। किसी घटना के कारण या कार्य का पता तब चलता है जब अनावश्यक बातों को छाँटकर आवश्यक तथ्यों को निकाल लिया जाता है। इसे ही मिल ने निराकरण की विधि कहा है। मिल की प्रायोगिक विधियाँ ही निराकरण की विधियाँ हैं।

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प्रश्न 14.
अन्वय विधि (Method of agreement) के दो मुख्य गुण बताएँ।
उत्तर:
अन्वय विधि निरीक्षण कि विधि होने के कारण इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है। दूसरा, निरीक्षण की विधि होने के कारण इसमें कारण से कार्य की ओर या कार्य से कारण की ओर बढ़ते हैं।

प्रश्न 15.
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर कितने प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया?
उत्तर:
मिल ने कारण के गुणात्मक लक्षणों को आधार बनाकर तीन प्रायोगिक विधियों का निर्माण किया। वे हैं-अन्वय विधि, व्यतिरेक-विधि एवं संयुक्त-अन्वय व्यतिरेक विधि।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अन्वय विधि के दोष क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि के निम्न दोष पाए जाते हैं –

  1. इसमें कई उदाहरणों को निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला जाता है। इसलिए इसमें बहुकारणवाद का दोष आ जाता है।
  2. यह विधि निरीक्षण पर आधारित है, इससे सूक्ष्म एवं गुप्त परिस्थिति का निरीक्षण न हुआ हो, जो कि घटना का वास्तविक कारण और कार्य हो। इन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म तत्त्वों का निरीक्षण संभव नहीं हो पाता है।
  3. इसमें एक ही कारण के दो सहपरिणामों (Co-effects) को एक-दूसरे के कारण कार्य समझने की गलती करते हैं। जैसे दिन के पहले गत और गन के पहले दिन नियत रूप से आते हैं।
  4. इसमें यह त्रुटि है कि उपाधि को पूर्ण कारण मान लिया जाता है।
  5. इस विधि को कागज पर सांकेतिक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना आसान है जो कौमन अक्षर रहता है। यह कारण या कार्य तुरत बतला देते हैं। परन्तु, वास्तविक जगत में इसका व्यवहार आसान नहीं है।
  6. यह विधि एकांकी भी है क्योंकि यह केवल भावात्मक उदाहरणों में अन्वय देखता है। निषेधात्मक उदाहरणों पर विचार नहीं करता है।

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प्रश्न 2.
अन्वय विधि क्या है?
उत्तर:
अन्वय विधि मिल साहब के प्रयोगात्मक विधि का एक प्रथम रूप है। इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी गई है। “यदि किसी जाँच की जानेवाली घटना के दो या उससे अधिक उदाहरणों में उस घटना के अतिरिक्त एक और बात सामान्य हो तो वह बात जो सब उदाहरणों से मिलती है उस घटना के साथ कारण-कार्य का संबंध रखती है।” इसे सांकेतिक उदाहरण के द्वारा दिखाया गया है।
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ
∴ A, X का कारण है या ‘X’ A का कार्य है। यहाँ A सभी उदाहरणों के पूर्ववर्तियों में सामान्य रूप से उपस्थित है अतः ‘X’ घटना का कारण – ‘A’ ही है।

प्रश्न 3.
अवशेष विधि क्या निगमनात्मक है?
उत्तर:
कुछ लोगों के अनुसार अवशेष विधि का स्वरूप निगमनात्मक है। निगमन में आधार वाक्य से निष्कर्ष को निकाला जाता है। उसी प्रकार आगमन में ज्ञात कारण के कार्य को सम्मिलित कार्य से निकाल कर व शेष कार्य और बचे हुए कारण में संबंध स्थापित करते हैं। पुनः आगमन में विशिष्ट उदाहरणों का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण आगमन के लिए आवश्यक है। अवशेष विधि में निरीक्षण से काम नहीं किया जाता है। बल्कि गणना (Calculation) से काम लेते हैं। घटाने की प्रक्रिया एक प्रकार की गणना है, अतः इसका आंतरिक स्वरूप निगमनात्मक है न कि आगमनात्मक है।

लेकिन यह धारणा ठीक नहीं है। निगमन की मदद लेते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह पूर्णतया निगमनात्मक है। इस तरह सभी विधियाँ निगमनात्मक हो जाती है क्योंकि सभी विधियाँ कारणता के नियम से निकाली गई हैं। इसलिए इस विधि को निगमनात्मक कहना न्याय संगत न होगा। अतः निष्कर्ष निकलता है कि अवशेष विधि निगमनात्मक नहीं है। मात्र गणना की क्रिया देखकर इसे निगमनात्मक नहीं कहना चाहिए। अनुभव आगमन के स्वरूप को बतलाता है। अतः इसका स्वरूप आगमनात्मक है न कि निगमनात्मक।

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प्रश्न 4.
अन्वय विधि के गुण क्या हैं?
उत्तर:
अन्वय विधि के निम्नलिखित गुण या लाभ हैं –

  1. अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान होने के कारण इसका क्षेत्र बहुत विशाल है क्योंकि इस विधि 1 के अंतर्गत निरीक्षण करके निष्कर्ष निकाला जाता है। निरीक्षण सभी घटनाओं का होता है।
  2. इस विधि में कारण से कार्य की ओर या कार्य से कारण की ओर बढ़ सकते हैं। इस प्रकार की सुविधाएँ दूसरे विधि में नहीं है।
  3. यह विधि सर्वसाधारण की विधि है, इसका उपयोग कोई भी कर सकता है।
  4. इस विधि से प्राकृतिक घटनाओं जैसे-भूकंप, बाढ़, महामारी इत्यादि के कारण का पता अच्छी तरह लगती है। इन घटनाओं का निरीक्षण ही होता है, इन पर प्रयोग संभव नहीं है। अतः, इन घटनाओं के कारण का पता लगाने में अन्वय विधि ही सक्षम एवं समर्थ हैं।

प्रश्न 5.
निराकरण के सिद्धान्त क्या है?
उत्तर:
मिल साहब द्वारा बताई गई पाँच प्रयोगात्मक विधियों को निराकरण की विधियाँ के नाम से भी पुकारा जाता है। निराकरण का अर्थ है जाँच की जानेवाली घटना के संबंध में अनावश्यक बातों का छाँट देना या असंबंधित स्थितियों को दूरकर कार्य-कारण संबंध की स्थापना करना! निराकरण का अर्थ ही है जो कारण नहीं उसे दूर हटाकर। मिल साहब के अनुसार कारण की व्याख्या उसके गुण और परिमाण दोनों के आधार पर की गई है।

कारण के गुणात्मक स्वरूप को बताते हुए मिल साहब कहते हैं “कारण नियम, आसन्न अनौपाधिक, पूर्ववर्ती घटना है तथा कारण के परिमाण को बताते हुए कहा गया है” कारण और कार्य परिमाण के अनुसार बिल्कुल ही बराबर होते हैं। A cause is equal to effect according to quantity इस तरह हमें ऐसा करने के लिए निराकरण की सहायता लेनी पड़ती है। जिस तरह फुलवारी में घास की पत्ती बढ़ जाने पर हम उसे छाँट देते हैं ताकि फूल-पौधे ठीक से बढ़ सकें, उसी तरह सही कारण को जानने के लिए हमें बहुत-सी अनावश्यक बातों को छाँट या हटा देना पड़ता है।

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प्रश्न 6.
मिल के प्रयोगात्मक विधि क्या हैं?
उत्तर:
आगमन का उद्देश्य सामान्य यथार्थ वाक्य की रचना करना है इसका अर्थ है – दो घटनाओं के बीच कारण-कार्य संबंध की स्थापना करना। मिल ने प्रयोगात्मक विधि के द्वारा आगमन के उद्देश्य की प्राप्ति करने का प्रयास किया। प्रयोगात्मक विधि के द्वारा केवल किसी घटना का पता नहीं लगाया जाता है। बल्कि उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनावश्यक बातों को छाँट भी दिया जाता है। मिल के मुख्यतः पाँच प्रयोगात्मक विधि हैं –

  1. अन्वय विधि
  2. व्यतिरेक विधि
  3. संयुक्त अन्वय व्यतिरेक विधि
  4. सहगामी विवरण विधि और
  5. अवशेष विधि

इन पाँचों विधियों के द्वारा कारण से कार्य और कार्य से कारण की ओर बढ़ते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
व्यतिरेक विधि क्या है? इसके गुण-दोष की व्याख्या करें।
उत्तर:
व्यतिरेक विधि मुख्य रूप से प्रयोग पर आधारित विधि हैं इसमें जिन दो उदाहरणों की आवश्यकता पड़ती है वे प्रयोग से ही प्राप्त होते हैं। फिर भी निरीक्षण के क्षेत्र में भी व्यवहार कर कार्य-कारण संबंध स्थापित किया जाता है। मिल साहब ने इसका परिभाषा इस प्रकार दिए हैं।

“If an instance in which the phenomenon under investigation occurs and an instance in which it does not occur, have every circumstance in common save one that one occuring only in the former the circumstance in which alone the two instances differ is the effect of the cause, or an indisperisable part of the cause of the phenomenon.” अर्थात् “यदि किसी एक उदाहरण में जाँच की जानेवाली घटना घटती हो और दूसरे उदाहरण में जाँच की जानेवाली घटना नहीं घटती हो, सभी बातें समान हों, केवल यही भेद पाया जाए कि प्रथम उदाहरण में किसी एक बात का भाव हो और केवल उसी का दूसरे उदाहरण में अभाव, तो उस बात का उस घटना से कार्य-कारण संबंध पाया जाता है या घटना के कारण का आवश्यक अंश रहता है।” इसकी भाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित बातें हम पाते हैं।

  1. जाँच की जानेवाली घटना के दो उदाहरण दिए जाते हैं। एक उदाहरण में घंटना उपस्थित रहती है और दूसरे उदाहरण में घटना अनुपस्थित रहती है।
  2. दोनों उदाहरणों में एक परिस्थिति को छोड़ कर सभी कुछ समान ही रहते हैं। वह परिस्थिति एवं उदाहरण में स्थित रहती है तथा दूसरे उदाहरण में नहीं।
  3. वह परिस्थिति की अवस्था जिसमें दोनों उदाहरणों को भिन्न पाते हैं घटना का कारण या कार्य होता है या घटना के कारण का आवश्यक अंग होता है। जैसे-सांकेतिक उदाहरण –
    Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

∴ A और X में कार्य कारण-संबंध है यहाँ ‘A’ के रहने पर X और Aके अनुपस्थित रहने पर X भी अनुपस्थित रहता है। इसके दो रूप में पूर्ववर्ती में से एक पूर्ववर्ती को निकाल देते हैं जिससे अनुवर्ती में से भी कोई बात घट जाती है। जैसे-पूर्ववर्ती में से ‘A’ घटता है तो अनुवर्ती में भी ‘A’ घट जाता है दूसरा रूप-पूर्ववर्ती में कुछ जोड़ देते हैं तो अनुवर्ती में भी कुछ जुट जाता है। जैसे –
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

इसलिए D और X में कार्य-कारण संबंध है।

वास्तविक उदाहरण:
जब किसी व्यक्ति को मादा अनोफिल मच्छर काटता है, तो उसे मलेरिया हो जाता है और जब किसी व्यक्ति को मादा अनोफिल मच्छर नहीं काटता है, तो उसे मलेरिया नहीं होता है। इस तरह निष्कर्ष निकलता है कि मादा अनोफिल मच्छर ही मलेरिया का कारण है। अतः सांकेतिक एवं वास्तविक दोनों प्रकार के उदाहरणों से स्पष्ट है कि दो उदाहरणों में सभी बातें समान रहती हैं केवल एक बात का अंतर रहता है और वह घटना का कार्य या कारण होता है।

गुण (Merits):

व्यतिरेक विधि के निम्नलिखित गुण हैं –

  1. इस विधि का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि जो कार्य-कारण संबंध स्थापित होता है वह निश्चित होता है क्योंकि यह विधि प्रयोग की विधि है। अन्वय और संयुक्त विधि की तुलना में इसका निष्कर्ष विश्वसनीय होता है।
  2. इस विधि में केवल दो उदाहरण लिये जाते हैं। अतः, परिश्रम कम लगता है। समय भी बचता है।
  3. जबकि अन्वय एवं संयुक्त विधियों में समय एवं श्रम अधिक लगता है।
  4. अन्वय विधि से कारण का जो संकेत मिलता है उसकी जाँच इस विधि से कर सकते हैं। अन्वय विधि कारण को प्रमाणित नहीं करती है। केवल कारण का संकेत करती है। अन्वय विधि से प्राप्त निष्कर्ष की जाँच अतिरिक्त विधि में की जा सकती है क्योंकि यह प्रयोग प्रधान विधि है।
  5. यह विधि हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए भी लाभप्रद है, जैसे-एक किसान समझता है कि जिस साल अच्छी वर्षा होती है धान की फसल अच्छी होती है और वर्षा के अभाव में धान की फसल भी खराब होती है, अतः अच्छी वर्षा धान के लिए उपयोगी कारण है।
  6. यह विधि बहुकारणवाद से उत्पन्न कठिनाइयों को बहुत अंश में दूर करती है।

व्यतिरेक विधि के दोष (Demerits):

  1. व्यतिरेक विधि प्रयोग प्रधान विधि होने के कारण उसका क्षेत्र सीमित हो जाता है। प्राकृतिक घटनाओं, जैसे-बाढ़, भूकंप, महामारी पर इस विधि का व्यवहार नहीं हो सकता है।
  2. इसमें केवल कारण से कार्य की ओर जाते हैं क्योंकि यह विधि प्रयोग पर आधारित है।
  3. इसमें कारण और कारणांश (Condition) में भेद नहीं कर पाते हैं। कारणांश ही पूर्ण कारण हो जाता है। जैसे-दाल, सब्जी में नमक मिलाकर भोजन करने में अच्छा लगता है। यदि नमक नहीं मिला है तो भोजन अच्छा नहीं लगता है। यहाँ नमक कारणांश है जो कारण बन जाता है, स्वादिष्ट भोजन का।
  4. इस विधि का व्यवहार असावधानी पूर्वक करने से Post hoc ergo propter hoc (यत्पूर्व सकारणम्) का दोष हो जाता है जैसे किसी पुत्र के उत्पन्न होने पर उसकी माँ का देहान्त होना उस बच्चे के जन्म देने का कारण मानते हैं। फिर भी त्रुटियों के बावजूद यह विधि सबसे अच्छी विधि मानी गई है। इसलिए इसे Method of part excullance कहते हैं। इनकी महत्ता मिल बहुत बताते हैं।

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प्रश्न 2.
सहगामी विचरण विधि की सोदाहरण व्याख्या करें। इसके गुण और दोषों को बताएँ।
उत्तर:
सहचारी या सहगामी विचरण विधि अन्वय एवं व्यतिरेक विधि का एक रूप है। इस विधि के द्वारा कारण-कार्य संबंध का पता इस बात को देखकर लगाया जाता है कि किन दो घटनाओं में साथ-साथ परिवर्तन होता है, इस विधि में परिवर्तन के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। इसकी परिभाषा मिल ने दिया है। (What ever phenomenon varies in any manner whatever another phenomenon varies in some particular manner is either a cause or an effect of that phenomenon or is connected with it through some fact of causation) अर्थात् जब कोई घटना किसी दूसरी घटना के साथ किसी खास नियम से घटती है या बढ़ती है तो उन दोनों में कारण-कार्य का संबंध रहता है। इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हम विश्लेषण करने पर पाते हैं।

  1. इस विधि में दो या दो से अधिक उदाहरणों के निरीक्षण हो सकते हैं।
  2. उन उदाहरणों में दो अवस्थाएँ होती हैं-पूर्ववर्ती और अनुवर्ती।
  3. इसमें परिमाण के आधार पर निष्कर्ष की स्थापना की जाती है।
  4. इसमें बदलने वाली अवस्था के वीच कारण-कार्य का संबंध रहता है। दो घटनाएँ साथ-साथ बढ़े, दो घटना साथ-साथ घटे, यह प्रक्रिया उसी अनुपात में होती है।

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∴ A और X में कार्य-कारण संबंध है। इसमें A और X में समानुपाती परिवर्तन हम देखते हैं। अन्वय विधि की तरह ही एक अवस्था में समानता है तथा दूसरी अवस्था में भिन्नता है।
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यहाँ A और X कार्य – कारण संबंध है। यह उदाहरण व्यतिरेक विधि का रूपांतरण है। वास्तविक उदाहरण –

(क) जैसे-जैसे बुखार बढ़ता है थर्मामीटर का पारा बढ़ता है और जैसे-जैसे बुखार घटता है थर्मामीटर का पारा भी घटता है। अतः, दोनों में कार्य-कारण का संबंध है।
(ख) जैसे-जैसे ऊपर की ओर अर्थात् ऊँचाई पर जाते हैं ठंडा बढ़ता है, अतः कार्य-कारण का संबंध है एवं किसी वस्तु की माँग बढ़ती है तो उस वस्तु की कीमत बढ़ती है। माँग घटने पर कीमत भी घट जाती है। अतः, माँग और कीमत (Demand and price) में कार्य कारण संबंध है।
(ग) देखा गया है कि Frustration जैसे – जैसे बढ़ता है हिंसात्मक प्रवृत्ति भी वैसे-वैसे बढ़ती है।

गुण (Merits):

  1. इससे लाभ है कि जब हम किसी घटना के परिणाम या वेग को जानना चाहते हैं तो इस विधि की सहायता लेकर जान लेते हैं।
  2. प्रकृति के अन्दर कुछ ऐसे तत्त्व हैं जिनके बीच कारण-कार्य के संबंध को पता लगाने के लिए सहगामी विचरण विधि की सहायता लेते हैं। यह विधि बिल्कुल सर्वोत्तम विधि है। वायुमंडल का दबाव, ताप, घर्षण, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति इत्यादि के बीच कारण-कार्य का पता इस विधि द्वारा आसानी से लगाया जा सकता है।
  3. कारण को निश्चित करने के लिए कल्पना की सहायता ली जाती है यह इसी विधि से प्राप्त किया जाता है।
  4. जहाँ घटना के वेग और परिणाम की माप होती है वहाँ यह विधि अन्वय और व्यतिरेक विधि से अधिक लाभदायक है।
  5. बेन साहब के अनुसार, असाधारण परिस्थिति में यह विधि बहुत उपयोगी है।
  6. धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्रों में इस विधि से कारण का पता लगता है। जैसे–अंधविश्वास ही धार्मिक उपद्रव में पाया जाता है। जनसंख्या और मृत्यु में आवश्यक संबंध है। इसी तरह अज्ञानता की मात्रा जितनी अधिक होगी दुःख की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती है।

दोष या सीमाएँ (Demerits):

  1. यह विधि केवल परिमाणतः परिवर्तन में सफलीभूत होती है। गुणगत परिवर्तन में इस विधि का व्यवहार कर कारण का पता नहीं लगा सकते।
  2. यहाँ भी सहपरिणामों को एक-दूसरे का कारण समझने की भूल की संभावना बनी रहती
  3. इस विधि का अंतिम सीमा है कि जब परिवर्तन एकाएक होता है, वहाँ इस विधि का व्यवहार नहीं कर सकते हैं। इस विधि का व्यवहार नहीं होता है जहाँ धीरे-धीरे परिवर्तन क्रमशः होता है।

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प्रश्न 3.
अवशेष विधि की सोदाहरण व्याख्या इसके गुण-दोष के साथ करें।
उत्तर:
प्रायोगिक विधियों में अवशेष विधि एक महत्त्वपूर्ण विधि है। इसके द्वारा जटिल कार्य के बचे हुए अंश के कारण का पता लगाते हैं। जटिल कार्य के कुछ अंश के कारण का पता पहले से मालूम रहता है और बचे हुए अंश के कारण का पता अवशेष विधि से लगाते हैं। मिल ने इसकी परिभाषा इस प्रकार दिए हैं।

(“Subduce from any given phenomenon such parts as is known by previous inductions to be the effect of certain anteced ents and the residues of this phenomenon is this effect of this remaining ante cedents-Mill”) अर्थात् “अगर किसी दी हुई घटना से उस भाग को निकाल दिया जाए तो पहले आगमन के आधार पर कुछ पूर्ववर्ती अवस्थाओं का निष्कर्ष समझा गया है, तो घटनाओं का अवशेष भाग अवश्य ही अवशेष अवस्थाओं का कार्य होगा।” इस परिभाषा में निम्नलिखित विशेषताओं को पाते हैं।

  1. कोई जटिल कार्य दिया रहता है जिसके कुछ अंश के कारण का पता पहले से मालूम रहता है, कार्य के शेष अंश के कारण का पता लगाना रहता है।
  2. जो बातें हमें पहले से ज्ञात रहती है उसे सम्मिलित कार्य से हटा देते हैं।
  3. अब कार्य के बचे अंश तथा कारण (पूर्ववर्ती) के बचे अंश में कार्य-कारण स्थापित करते हैं अर्थात् कारण का शेषांश कार्य के शेषांश का कारण होगा। जैसे –

सांकेतिक उदाहरण –
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यहाँ पहले से मालूम है कि कारण B तथा Z का कारण C है। इसलिए Aनिराकरण है ‘X’ का। यह अवशेष विधि निराकरण के सिद्धान्त पर आधारित है, निराकरण का सिद्धांत है “जो किसी एक वस्तु का कारण है वह किसी अन्य वस्तु का कारण नहीं हो सकता है।” इसलिए B, CX का कारण नहीं होता है B, C तो Y, Z का कारण है इसलिए अनुमान करते हैं कि A ही X का कारण है।

वास्तविक उदाहरण –
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अवशेष विधि के गुण (Merits):

1. इस विधि से आविष्कार में सहायता मिलती है। वैज्ञानिकों को मालूम था कि यूरेनस अपनी गति-निर्धारित मार्ग पर नहीं चलकर कुछ भटक जाता है। वैज्ञानिकों ने किसी अज्ञात कारण की कल्पना की और खोज के द्वारा नेपच्युन ग्रह को खोज निकाला। आर्गन गैस की खोज इसी विधि से हुई है। अतः विज्ञान के क्षेत्र में विशेष कर रसायन शास्त्र में इस विधि से अनेक गैसों और तत्त्वों की खोज हुई है।

2. यही एक विधि है जिसके द्वारा किसी सम्मिलित कार्य के बचे हुए अंश के कारण का पता लगा सकते हैं। अन्वय विधि, संयुक्त विधि, व्यतिरेक विधि एवं सहगामी विचरण विधि से बचे हुए अंश के कारण का पता नहीं लगा सकते हैं।

अवशेष विधि का दोष (Demerits):

  1. इस विधि में प्रथम दोष है कि इसका व्यवहार तब होता है जब हमें पहले से घटना के बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त रहता है। पूर्व ज्ञान आवश्यक है यदि कोई व्यक्ति किसी घटना से पूर्ण अनभिज्ञ है तो कारण का पता नहीं लगा सकता है।
  2. सहगामी विचरण विधि की तरह इस विधि का भी व्यवहार केवल परिमाण संबंधी खोज से है। गुण संबंधी खोज में इसका व्यवहार नहीं हो सकता है।
  3. अवशेष विधि व्यतिरेक विधि का विशेष रूप है इसलिए व्यतिरेक विधि के दोष अवशेष विधि में चले आते हैं। इन त्रुटियों के बावजूद यह विधि विज्ञान के क्षेत्र में उपयोगी है।

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प्रश्न 4.
संयुक्त अन्वय विधि क्या है? इसके गुण-दोषों की विवेचना करें।
उत्तर:
संयुक्त विधि अन्वय विधि का रूपांतर या विशेष रूप है। यह विधि अन्वय विधि की कमी को दूर करती है। इसमें दो प्रकार के उदाहरणों के समूहों को लिया जाता है।

  1. भावात्मक तथा
  2. अभावात्मक।

इन दोनों के आधार पर निष्कर्ष को निकाला जाता है। इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी गई है। “If two or more instances in which the phenomenon occurs have and one circumstance in common while two or more instances in which it does not occur have nothing in common save the absence of the circumstance this circumstance in which lend sets of instance differ is the effect of this cause or an indispensable part of the cause of the phenomenon.” “यदि किसी घटना के दो या दो से अधिक उदाहरणों में कोई एक बात सामान्य रूप से पायी जाए तो उस घटना के अभाव वाले दो या दो से अधिक उदाहरणों में उस घटना की अनुपस्थिति के अलावा और कोई बात सामान्य न हो, तो केवल उस बात का जिसमें दोनों प्रकार के उदाहरणों का भेद रहे घटना का कारण या कार्य या कारण अपना कार्य का आवश्यक अंग होता है।” इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • इस विधि से कुछ भावात्मक और कुछ अभावात्मक उदाहरण लिये जाते हैं।
  • भावात्मक उदाहरण के लिए दो या दो से अधिक उदाहरणों की जाँच क़रना, उन सभी उदाहरणों में किसी अमुक घटना का या उसका भाव देखना सभी परिस्थितियों में अन्य बातों में विभिन्नता और एक बात में समता का खोजना अनिवार्य है।
  • अतः, घटना की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर निष्कर्ष को निकाला जाता है। जैसे-सांकेतिक उदाहरण –Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 4 मिल की प्रायोगिक विधियाँ

वास्तविक उदाहरण:
जब परीक्षा के समय मन लगाकर पुस्तकों का अध्ययन किया जाता है तो अच्छी सफलता मिलती है और जब परीक्षा के समय मन लगाकर अध्ययन नहीं किया जाता हे तो परीक्षा में अच्छी सफलता नहीं मिलती है इसलिए अच्छी सफलता का मिलना पुस्तकों का मन लगाकर अध्ययन करना है।

गुण (Merits):

  1. संयुक्त अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान विधि है। इसलिये निरीक्षण के जितने भी लाभ हैं वे सभी इसमें पाए जाते हैं। इस विधि का क्षेत्र भी व्यापक है। इसमें निरीक्षण के द्वारा घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. अन्वय विधि में बहुकारणवाद का दोष पाया जाता है। किन्तु, संयुक्त अन्वय विधि में इन बाधाओं को आंशिक रूप में अवश्य दूर किया गया है। इसके लिए अभावात्मक उदाहरणों की संख्या को बढ़ा दी जाए।
  3. इसमें जिस कारण कार्य नियम की स्थापना की चेष्टा की जाती है, उसके सत्य होने में अधिक संभावना पायी जाती है क्योंकि इसमें हम भावात्मक और अभावात्मक दोनों प्रकार के उदाहरणों को पाते हैं।
  4. इस विधि का उपयोग हम व्यावहारिक जीवन में अधिक करते हैं।
  5. निरीक्षण प्रधान विधि होने से इसका क्षेत्र व्यापक एवं विस्तृत है। प्रयोग आधारित रहने के कारण विधि का क्षेत्र संकुचित है। राजनीतिक, सामाजिक एवं प्राकृतिक घटनाओं पर इसका व्यवहार कर कारण या कार्य का पता लगाना असंभव है।

दोष (Demerits):

  1. संयुक्त अन्वय विधि निरीक्षण प्रधान विधि है इसलिए निरीक्षण के जितने भी दोष हैं इस विधि के भी दोष हो जाते हैं।
  2. दो सहपरिणामों के बारे में जो निष्कर्ष निकाला जाता है, वह सत्य नहीं होता है। इसमें दोष पाया जाता है।
  3. कभी-कभी एक उपाधि या स्थिति को कारण के रूप में समझने से दोष आ जाता है। जैसे दो तीन बार जब बंदूक से गोली निकलती है, तो आवाज होती है। दो-तीन बार गोली नहीं निकलती है तो आवाज भी नहीं होती है। अतः, गोली निकलने को आवाज का कारण मान लेते हैं, परन्तु गोली एक उपाधि है।
  4. यहाँ पर दो घटनाओं में आकस्मिक सहचर देखने पर कार्य-कारण संबंध स्थापित करने की भूल करते हैं। अतः, संयुक्त अन्वय विधि त्रुटि से संयुक्त नहीं है। फिर भी अन्वय विधि से अधिक विश्वसनीय है। इसके निष्कर्ष में सत्य होने की संभावना अधिक रहती है। इसकी त्रुटियों को दूर भी किया जा सकता है।

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प्रश्न 5.
अन्वय विधि के गुण एवं दोषों की व्याख्या करें।
उत्तर:
तार्किकों ने अन्वय विधि का निरीक्षण प्रधान विधि बताए हैं क्योंकि इसके उदाहरण निरीक्षण से प्राप्त होते हैं। मिल साहब ने इसकी परिभाषा में कहा है “If two or more instances of the phenomenon under investigation have only one circumstance in common, the circumstance in which alone are the instances agree is the cause or effect of the given phenomenon.” “यदि जाँच की जानेवाली घटना के दो या दो से अधिक उदाहरणों में एक बात सामान्य हो, तो वह वात जिसमें सभी उदाहरण अनुकूल हो, दी हुई घटना का कारण या कार्य हो।” इस परिभाषा की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. जाँच की जानेवाली घटना के दो या उससे अधिक उदाहरण लिये जाते हैं।
  2. अगर घटना कार्य है तो उसके कारण का पता पूर्ववर्तियों के निरीक्षण का उदाहरण जमा करने से होगा।
  3. पूर्ववर्तियों में देखते हैं कि कौन-सी बातें सभी उदाहरगों में सामान्य रूप से पायी जाती हैं। वही घटना का कारण होगी।
  4. यदि घटना कारण है और उसके कार्य का पता लगाना है तो अनुवर्तियों के उदाहरण को जमा करते हैं।
  5. अनुवर्तियों में जो बातें सभी उदाहरणों में सामान्य रूप से पायी जाती हैं वही घटना का कार्य होता है। इस तरह हम देखते हैं कि अन्वय विधि में एक ही बात की समानता (Agreement in one single point) इस विधि का मूल आधार है। जैसे –

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“A is the cause of Xor X is the effect of A.” अर्थात् A ही X का कारण है या X ही A का कार्य है। क्योंकि इसमें A उदाहरणों में उपस्थित है। अतः Aनियम पूर्ववर्ती है और X कार्य का कारण है। इसमें B,C, D, E, F, ‘X’ कार्य का कारण नहीं है। क्योंकि ये नियम पूर्ववर्ती है।

वास्तविक उदाहरण:
मिल साहब अन्वय विधि के माध्यम से एक व्यक्ति की दिनचर्या के आधार पर उसके सिर दर्द का कारण जानना चाहते हैं।
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मंगलवार:
पकौड़ी खाना, मांस खाना, दूध पीना, रात में शीत में सोना सिर दर्द यहाँ सिर दर्द का कारण बाहर में रात में शीत में सोना ही है क्योंकि सभी उदाहरणों में रात में शीत में सोना सभी दिन है और अन्य कारण सभी दिन उपस्थित नहीं है। अतः सिर दर्द का कारण शीत में सोना मान लिया जाता है। मिल की इस विधि को अन्वय विधि कहते हैं।
गुण या लाभ-अन्वय विधि से निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. अन्वय विधि-निरीक्षण प्रधान विधि होने के कारण व्यापक क्षेत्र रखता है। इसका व्यवहार सभी क्षेत्रों में होता है। प्रयोग की तुलना में।
  2. इस विधि से कारण से कार्य तथा कार्य से कारण का पता लगाते हैं। इस तरह इस विधि में दोनों सुविधाएँ हैं, क्योंकि यह निरीक्षण प्रधान विधि है।
  3. इससे प्राकृतिक घटनाओं का पता आसानी से लगाया जाता है। भृकंप, बाढ़, महामारी इत्यादि के कारणों का पता अच्छी तरह लग जाती है। क्योंकि इन सभी घटनाओं का निरीक्षण ही होता है।
  4. इन पर प्रयोग संभव नहीं है। अतः, इन प्राकृतिक घटनाओं के कारण का पता लगाने में अन्वय विधि ही सक्षम एवं समर्थ है।
  5. यह सरल विधि है। इसका व्यवहार सभी लोग कर सकते हैं। क्योंकि निरीक्षण प्रयोग की तुलना में आसान एवं सरल है। जबकि प्रयोग का काम कठिन है।
  6. निरीक्षण से जितने लाभ हैं वे सभी इस विधि के गुण हैं या लाभ हैं।

दोष:
1. चूँकि यह निरीक्षण प्रधान विधि है क्योंकि अन्वय विधि निरीक्षण पर आधारित होने के कारण सूक्ष्म एवं गुप्त परिस्थितियों का निरीक्षण संभव नहीं भी हो पाता है जो कि घटना का वास्तविक कारण और कार्य हो। इन्द्रियों के द्वारा भी सूक्ष्म तत्त्वों का निरीक्षण संभव नहीं हो पाता है। अतः, वास्तविक कारण खोजने में भूल हो सकती है।

2. कभी-कभी दो घटनाओं में आकस्मिक सहचर के आधार पर दोनों में कार्य-कारण संबंध स्थापित करने की भूल कर बैठते हैं। जैसे-जब-जब मेरे घर में अमुक संबंधी आते हैं तो मेरा नौकर बीमार पड़ जाता है।
अन्वय विधि के अनुसार नौकर का बीमार पड़ना अमुक संबंधी के आने पर एक घटना है जिसका कारण संबंधी के आने से है। लेकिन ऐसा निर्णय लेना अन्याय एवं अतार्किक है। इन दोनों में घटनाओं में आकस्मिक संबंध हैं जो इस विधि की त्रुटि है।

3. एक ही कारणं के दो सहपरिणामों (Co-effects) को एक-दूसरे का कारण-कार्य समझने की गलती करते हैं। जैसे-दिन के पहले रात्रि और रात्रि के पहले दिन नियत रूप से आते हैं। अन्वय विधि के आधार पर दिन और रात एक-दूसरे के कारण-कार्य हो जाते हैं। इसी तरह बिजली और बादल का गर्जन सदा एक साथ पाए जाते हैं। ये भी एक-दूसरे के कारण और कार्य हो जाते हैं। परन्तु, ये सभी सहपरिणाम है जो अन्वय विधि के दोष हैं।

4. इसमें उपाधि को पूर्ण मान लिया जाता है, जो एक भूल है।

5. अन्वय विधि का बहुकारणवाद सिद्धांत से मेल नहीं है। इसलिए कहा गया है कि “The doctrine of plurality of causes for frustrates the method of Agreement.”

6. इस विधि को कागज पर सांकेतिक उदाहरण के द्वारा स्पष्ट करना आसान है। क्योंकि जो कॉमन अक्षर है उसे कारण या कार्य तुरंत बता दिया जाता है। किन्तु, वास्तविक जगत में इसका व्यवहार आसान नहीं है। प्रकृति की घटनाएँ बहुत जटिल होती हैं।

7. यह विधि एकांगी है क्योंकि यह केवल भावात्मक उदाहरणों में अन्वय करता है निषेधात्मक उदाहरणों पर विचार नहीं करता है।

8. निरीक्षण प्रधान विधि होने से आवश्यक को अनावश्यक से पृथक नहीं कर सकते हैं। क्योंकि कारण के साथ अनावश्यक बातें भी मिली रहती हैं। जिससे वास्तविक कारण का पता लगाना कठिन हो जाता है। अतः, यह विधि अनेक त्रुटियों से पूर्ण है। यह विधि कारण कार्य का संकेत करती है। कार्य-कारण संबंध को सिद्ध नहीं करती है। “The method of Agreement merely suggests but cannot prove a casual connection.” अतः, यह विधि आविष्कार की विधि है प्रमाण की नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

Bihar Board Class 11 Philosophy विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निर्णायक उदाहरण किससे प्राप्त होता है?
(क) निरीक्षण से
(ख) प्रयोग से
(ग) दोनों से
(घ) किसी से नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों से

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प्रश्न 2.
किसने कहा था- “आगमन में कल्पना का उद्देश्य आविष्कार है, प्रमाण नहीं।”
(क) हेवेल
(ख) मिल
(ग) पियर्सन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) हेवेल

प्रश्न 3.
वैज्ञानिक पूर्वकल्पना आधारित है –
(क) साधारण विश्वास पर
(ख) वैज्ञानिक विश्वास पर
(ग) कारणता नियम पर
(घ) अंधविश्वास पर
उत्तर:
(ग) कारणता नियम पर

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प्रश्न 4.
विधि-संबंधी पूर्वकल्पना का संबंध है –
(क) परिस्थिति से
(ख) कर्त्ता से
(ग) प्रक्रिया से
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) प्रक्रिया से

प्रश्न 5.
“निर्णायक उदाहरण केवल एक कल्पना का समर्थन ही नहीं करता है, बल्कि दूसरी कल्पना का खंडन भी करता है।” यह कथन किसका है?
(क) बेन का
(ख) बेकन का
(ग) जेवन्स का
(घ) मिल का
उत्तर:
(ग) जेवन्स का

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प्रश्न 6.
प्राक-कल्पना का लक्ष्य है –
(क) सामान्य नियम की स्थापना
(ख) विशेष नियम की स्थापना
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सामान्य नियम की स्थापना

प्रश्न 7.
किसका कथन है – किसी कल्पना के अति पर्याप्त (Super adequacy) भी इसके सत्य होने के प्रमाण हैं?
(क) मिल
(ख) हेवेल
(ग) पियर्सन
(घ) डेकार्ट
उत्तर:
(ख) हेवेल

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प्रश्न 8.
वह प्रयोग जिससे निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) प्राप्त होता है, कहलाता है –
(क) निर्णायक प्रयोग (Experimentum crucis)
(ख) कल्पना की अतिपर्याप्त (Super adequacy)
(ग) वास्तविक कारण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निर्णायक प्रयोग (Experimentum crucis)

प्रश्न 9.
कल्पना की जाँच निरीक्षण एवं प्रयोग द्वारा किया जाता है। यह रीति क्या है?
(क) साक्षात् रीति
(ख) परोक्ष रीति
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) साक्षात् रीति

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प्रश्न 10.
कर्ता सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis concerning agent) का अभिप्राय है –
(क) घटना घटने की परिस्थिति मालूम हो
(ख) घटना घटने की विधि मालूम हो
(ग) कर्ता (Agent) मालूम नहीं रहता है
(घ) उपर्युक्त तीनों
उत्तर:
(घ) घटना घटने की विधि मालूम हो

प्रश्न 11.
“कल्पना व्याख्या करने का एक प्रयत्न है” यह कथन किसका है?
(क) कॉफी
(ख) बेकन
(ग) न्यूटन
(घ) मिल
उत्तर:
(क) कॉफी

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प्रश्न 12.
घटना एक व्याख्या की दृष्टि में प्राक्-कल्पना कितने प्रकार का होता है?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(ग) तीन

प्रश्न 13.
परिस्थिति सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection) होता है?
(क) व्याख्यात्मक
(ख) वर्णनात्मक
(ग) दोनों
(घ) वैज्ञानिक
उत्तर:
(ग) दोनों

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प्रश्न 14.
निर्णायक प्रयोग (Crucial experiment) प्राक्-कल्पना का/की –
(क) शर्त है
(ख) प्रमाण है
(ग) दोनों है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्रमाण है

प्रश्न 15.
वैज्ञानिक सत्यता (Scientific truth) की स्थापना में प्राक्कल्पना –
(क) एक अनावश्यक स्थिति है
(ख) आवश्यक शर्त है
(ग) अनावश्यक शर्त है
(घ) अनुपयोगी है
उत्तर:
(ख) आवश्यक शर्त है

Bihar Board Class 11 Philosophy विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा कि आगमन में कल्पना का स्थान प्रमुख नहीं बल्कि गौण है?
उत्तर:
ऐसा कल्पना के सम्बन्ध में जे. एस. मिल (John Stuart Mill) ने कहा।

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प्रश्न 2.
वास्तविक कारण (Vera cause) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
घटना के सम्बन्ध में वह कल्पना जो तर्कसंगत होती है और जिससे घटना के घटने की संभावना रहती है, वास्तविक कारण (Vera cause) कहलाती है।

प्रश्न 3.
“किसी कल्पना की अतिपर्याप्त (Super adequacy) भी इसके सत्य होने के प्रमाण हैं।” ऐसा किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन तर्कशास्त्री हेवेल (Whewell) का है।

प्रश्न 4.
कल्पना की जाँच के साक्षात् रीति (directly) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कल्पना की जाँच साक्षात् रीति से करने का मतलब है निरीक्षण एवं प्रयोग की विधियों का व्यवहार।

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प्रश्न 5.
निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण (Crucial instance) ऐसे उदाहरण को कहते हैं जो अनेक कल्पनाओं में किसी एक को सत्य प्रमाणित कर देता है।

प्रश्न 6.
कल्पना की जाँच कितने तरह से की जाती है?
उत्तर:
कल्पना की जाँच दो तरह से की जाती हैं। वे हैं-साक्षात् रीति (directly) एवं परोक्ष रीति (indirectly) से।

प्रश्न 7.
प्राक-कल्पना के महत्त्व के सम्बन्ध में हेवेल (Whewell) का क्या कथन हैं।
उत्तर:
प्राक्-कल्पना के महत्व के सम्बन्ध में हेवेल का कहना है कि आगमन में कल्पना का उद्देश्य आविष्कार है, प्रमाण नहीं।

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प्रश्न 8.
निर्णायक प्रयोग (Experimentum Crucis) क्या है?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण जब प्रयोग से पाया जाता है तो इसे निर्णायक प्रयोग कहते हैं।

प्रश्न 9.
कर्ता सम्बन्धी कल्पना (Hypothesis concerning agent) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब घटना घटने की परिस्थिति और विधि मालूम रहे लेकिन कर्ता (agent) मालूम नहीं रहता है। अतः कर्ता (agent) के बारे में अन्दाज लगाना ही कर्ता सम्बन्धी कल्पना है।

प्रश्न 10.
प्राक्-कल्पना (Hypothesis) की एक परिभाषा दें।
उत्तर:
प्राक्-कल्पना व्याख्या करने का प्रयत्न है। यह सामयिक (provisional) कल्पना है जिसके द्वारा हम वैज्ञानिक दृष्टि से लक्ष्यों या घटनाओं की व्याख्या करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
साधारण कल्पना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कल्पना दो तरह की होती है –

  1. साधारण कल्पना
  2. वैज्ञानिक कल्पना।

साधारण कल्पना में एक तरह की अटकलबाजी लगानी पड़ती है। इसमें यह जरूरी नहीं है कि जो कल्पना कर रहे हैं वह अंदाजा सही ही हो। इस तरह की कल्पना का रूप पूर्णव्यापी नहीं होता है। बल्कि व्यक्तिगत या अंशव्यापी होता है। इस तरह की कल्पना साधारण लोग लगाते हैं। इसमें सही कारण कोई कार्य के लिए स्वीकार नहीं किया जाता है। इसमें दूसरे कारण को स्वीकार किया जाता है, जो व्यक्तिगत होता है। अतः, इस तरह की कल्पना साधारण कल्पना कहलाती है।

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प्रश्न 2.
निर्णायक उदाहरण क्या है?
उत्तर:
निर्णायक उदाहरण कल्पना का एक प्रमुख कारण माना जाता है। जब किसी घटना के बारे में कल्पना की जाती है। उसमें एक ऐसा ही प्रमाण मिल जाता है जो घटना को सही प्रमाणित कर देता है, उसी को निर्णायक उदाहरण के रूप में माना जाता है।

निर्णायक उदाहरण निरीक्षण या प्रयोग से पाए जाते हैं। एक पात्र में रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, गैस को पाकर इसमें दो प्रकार की कल्पना की जाती है यह ऑक्सीजन गैस या हाइड्रोजन? इसे प्रमाणित करने के लिए जलती हुई मोमबत्ती ले जाते हैं। मोमबत्ती बुझने पर हाइड्रोजन और जलने पर ऑक्सीजन गैस समझते हैं। यही निर्णायक उदाहरण कहलाता है।

प्रश्न 3.
अच्छी और बुरी कल्पना क्या है?
उत्तर:
कल्पना अच्छा होना या बुरा होना उसकी शत्तों पर निर्भर करता है। इसका अर्थ है कि जो कल्पना शर्तों को पूरा करती है वह अच्छी कल्पना कही जाती है और जो कल्पना शर्तों को पूरा नहीं करती है वह बुरा कल्पना नहीं जाती है। जैसे-जब पृथ्वी में कम्पन्न होती है तो कल्पना करें कि पृथ्वी शेषनाग पर अवस्थित है। इस शेषनाग के हिलने-डूबने से पृथ्वी पर कम्पन्न होती है तो इस प्रकार की कल्पना को बुरी कल्पना कहते हैं। क्योंकि इस प्रकार की कल्पना उटपटांग होती है। परन्तु भौगोलिक कारणों से इस कम्पन्न की व्याख्या करने पर इसे अच्छी कल्पना कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

प्रश्न 4.
वैज्ञानिक कल्पना क्या है?
उत्तर:
वैज्ञानिक कल्पना में कारण-कार्य नियम का पालन किया जाता है। यह पूर्णव्यापी होता है। यह कल्पना जनसमुदाय के लिए किया जाता है। इसमें किसी भी कार्य के लिए सह कारण को स्वीकार किया जाता है। इसमें निष्कर्ष को सत्य होने के लिए वैज्ञानिक आधार रहता है। भले ही कल्पित कारण गलत हो जाए, किन्तु उसकी व्याख्या वैज्ञानिक तरीके से की जाती है।

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक आगमन में प्राक्-कल्पना के महत्त्व की विवेचना करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्री हेवेल वैज्ञानिक आगमन में प्राक्-कल्पना के महत्त्व को बहुत अधिक बताते हैं। उनके अनुसार वैज्ञानिक खोज में प्राक्-कल्पना का महत्त्व अत्यधिक है। घटनाओं के बीच कारण-कार्य का सम्बन्ध स्थापित करने हेतु प्राक्-कल्पना की आवश्यकता होती है। प्राक्-कल्पना का दूसरा महत्त्व यह है कि यह हमारे निरीक्षण एवं प्रयोग को नियंत्रित करता है। कभी-कभी हमारे खोज का विषय ऐसा होता है कि हम उसका अध्ययन निरीक्षण एवं प्रयोग से नहीं कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में हम अपनी सूझ के बल पर उस विषय या वस्तु के स्वरूप की कुछ कल्पना करते हैं तथा उस कल्पना के द्वारा आवश्यक परिणामों को निकालते हैं। यदि हमारी कल्पना यथार्थता से मेल खाती है तो कल्पना की सत्यता सिद्ध हो जाती है। वस्तुतः वैज्ञानिक पद्धति में प्राक्-कल्पना तथ्यों के सागर में दिशा सूचक (Compass) की तरह कार्य करता है। ऊर्जा के सापेक्षवाद का सिद्धान्त वस्तुतः प्राक्-कल्पना की ही देन है। इसी तरह, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का संकेत अवलोकन के द्वारा प्राक्-कल्पना से हुआ है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
न्याय संगत या यथार्थ कल्पना की शर्तों की सोदाहरण व्याख्या करें ।
उत्तर:
आगमन का संबंध सही कल्पना से है। सही कल्पना होने के लिए कुछ शर्तों का पालन करना पड़ता है।

1. कल्पना को आंतरिक विरोध रहित निश्चित एवं स्पष्ट होना चाहिए:
इसमें आंतरिक विरोध रहित का अर्थ है कि इसमें विचारों का आपसी मेल होना चाहिए। तभी उसमें संदेह की कम संभावना होती है। दिन-रात होने के लिए हम यदि यह कल्पना करें कि ‘शायद पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ नहीं घूमती है, तो हमारी यह कल्पना संदेहपूर्ण रहेगी।

वैज्ञानिक कल्पनाएँ संदेह को दूर करना ही निश्चितता को लाना है। ”कल्पना को स्पष्ट होने का अर्थ है कि उटपटांग न होकर युक्ति संगत और सुव्यवस्थित हो। वर्षा के कारण बादल को नहीं मानकर इन्द्र की कृपा को मानें तो ऐसी कल्पना अस्पष्ट होगी। समुद्र का पानी वाष्प बनकर ऊपर जाता है और बादल बनकर वर्षा होती है। कल्पना का यही सही रूप है।

2. कल्पना को किसी स्थापित सत्य का विरोध नहीं होना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पहले से कुछ बातें सत्य हैं जैसे पृथ्वी में एक आकर्षण शक्ति है यह सत्य है। किन्तु, यदि हम यह कल्पना करें कि जहाज जो आकाश में उड़ता है उसमें पृथ्वी की आकर्षण शक्ति काम नहीं करती है, तो असत्य होगी। पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है यह पूर्व स्थापित सत्य है।

3. कल्पना को यथार्थ एवं वास्तविक होना चाहिए। किसी घटना का पता लगाने के लिए कल्पना किया जाता है। यथार्थ कल्पना के लिए यह जरूरी है कि हमें निष्पक्ष भाव से किसी घटना के घटने की कल्पना करनी चाहिए। इसमें वास्तविकता भी होनी चाहिए। अर्थात् घटना का vera cause होना चाहिए। इसका अर्थ है कि सच्चा कारण vera cause जिससे घटना के घटने की संभावना हो। किसी घटना के बारे में वैसा कारण जिससे वह घटना घटती है। जैसे-वर्षा का वास्तविक कारण बादल है। बादल के अभाव में वर्षा नहीं हो सकती है।

4. कल्पना को परीक्षा के योग्य होना चाहिए। इसके अंतर्गत कहा गया है कि कल्पना के सत्य होने के लिए उसकी जाँच या परीक्षा होनी चाहिए। बिना परीक्षा के कल्पना सत्य नहीं हो सकती है। जाँच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से की जाती है। यदि नींद की अवस्था में कोई आवाज आती है तो इसकी परीक्षा करते हैं और देखते हैं कि कहीं चोर तो नहीं है।

या चूहे के द्वारा खट-पट की आवाज आ रही है। अतः, परीक्षा के बाद ही हमारी कल्पना सत्य होती है। कल्पना की ये शर्ते मितव्ययिता नियम (Law of Parsimony) के अनुकूल है। यदि किसी घटना की व्याख्या एक ही कल्पना से हो जाती है तो उसके लिए अधिक अटकलबाजी करने की जरूरत नहीं है। इसलिए सही कारण को जानने के लिए कम-से-कम संख्या में कल्पना को लाना चाहिए।

5. कल्पना को अधिक-से-अधिक सरल होना चाहिये। कल्पना में जटिलता का बहिष्कार करना चाहिए। जैसे-वर्षा के अभाव के कारण अच्छी फसल का नहीं होना सरल कल्पना है। इस तरह कल्पना के सही होने के लिए उपर्युक्त शर्तों की व्याख्या की गई है।

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प्रश्न 2.
कल्पना क्या है? कल्पना के स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर:
साधारण जीवन में साधारण कल्पना के द्वारा मनुष्य अपने या दूसरे के खास व्यक्तिगत जीवन का विभाग खोज सकता है। इस तरह की कल्पना का रूप पूर्णव्यापी न होकर व्यक्तिगत रहता है। इसमें अंधविश्वास का स्थान भी रहता है। किन्तु, आगमन का लक्ष्य पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करना है। इसके लिए कुछ विधियों को बतलाया गया है।

इन्हीं विधियों में से कल्पना भी एक है। कल्पना के माध्यम से हम घटना के कारण का पता लगाना चाहते हैं। इसके लिए छान-बीन भी करना पड़ता है। एक तरह से अटकलबाजी भी करना शुरू कर देते हैं। अतः, घटनाओं के कारण को पता लगाने के लिए जो संभावित कारण को पहले मानते हैं, उसे कल्पना कहते हैं।

कौफी (Coffy) महोदय ने इसकी परिभाषा में कहा है –
“Ahypothesis is an attempt of explanation a provisional supposition made in order to explain scientifi cally some facts or phenomenon.” अर्थात् कल्पना व्याख्या करने का एक प्रयत्न है, यह सामयिक कल्पना है जिसके द्वारा हम वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों या घटनाओं की व्याख्या करते हैं।

इसी कल्पना की परिभाषा Mill महोदय ने इस तरह दिए हैं, “A hypothesis is any supposition which we make in order to endeavour to deduce from its conclusion in accordance with facts which are known to be real under the idea that if the conclusion to which the hypothesis leads are known truths the hypothesis itself either must be or at fast is likely to be true.”

“प्राक्-कल्पना वह कल्पना है जिसे हमलोग इस लक्ष्य से बनाते हैं कि हम उससे वे निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें जो उन तथ्यों के अनुकूल हों, जिन्हें हम सत्य मानते हैं। ऐसा करने में हमारा विचार यह रहता है कि यदि वे निष्कर्ष, जो इस कल्पना के द्वारा प्राप्त करते हैं, वास्तव में सत्य हैं, तो वह कल्पना स्वयं सत्य होगी या कम-से-कम सत्य होने की संभावना होगी।” इस परिभाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित बातें हम पाते हैं।

1. निरीक्षण:
सहज रूप में जब कोई घटना घटती है तो उसके कारण को जानने की इच्छा होती है। उसी के फलस्वरूप कल्पना का जन्म होता है। अतः, जो घटना घटती है उसका सबसे पहले निरीक्षण करना जरूरी हो जाता है, जैसे चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण यदि घटना के रूप में है तो उसके निरीक्षण करने के बाद ही उसके कारण को जानने की कल्पना की गई है। इसी तरह भूकंप के निरीक्षण के बाद ही उसके कारण जानने की प्रक्रिया शुरू करते हैं, जिसे कल्पना कहते हैं।

2. अटकलबाजी या अंदाज:
जब घटी हुई घटना का हम निरीक्षण कर लेते हैं तो उसके कारण को शीघ्र ही जान लेना संभव नहीं होता है। इसके लिए हम तरह-तरह की अटकलें लगाते हैं, अंदाज करते हैं कि अमुक कारण से अमुक घटना घटी है। यही कल्पित कारण कल्पना का एक मुख्य अंग बनकर काम करता है। इसी के द्वारा सही कारण को भी जानने का संकेत मिलता है। न्यूटन ने जब वृक्ष से फल को पृथ्वी पर गिरते हुए निरीक्षण किया तो उसके कारण को जानने की इच्छा हुई। इससे उन्होंने अंदाज लगाया कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, जिसके कारण सभी वस्तुएँ नीचे पृथ्वी पर गिरती हैं।

3. कल्पित कारण से निष्कर्ष निकालना:
कल्पित कारण से निष्कर्ष निकालना भी एक प्रमुख तथ्य रहता है इसमें कल्पित कारण के बाद ही एक संभावित कारण का पता लगाया जाता है। यह कल्पना का निष्कर्ष होता है कि पृथ्वी में आकर्षण-शक्ति है। यह निष्कर्ष तभी निकलता है जब हम कल्पित कारण को पहले स्वीकार कर लेते हैं।

4. निष्कर्ष की परीक्षा:
अटकलबाजी के समय बहुत-सी बातें दिमाग में आती हैं, किन्तु निष्कर्ष पर पहुँचने हेतु बहुत-सी संभावित अटकलों को परीक्षा के द्वारा छाँटकर हटा दिया करते हैं। इस तरह परीक्षा के बाद केवल एक ही कारण सामने आती है, जिसका संबंध कल्पना से रहता है। अतः, यह उत्पत्ति आवश्यक अंग है। कल्पना की सत्यता इसी पर निर्भर करती है।

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प्रश्न 3.
कल्पना के विभिन्न प्रमाणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कल्पना को वैज्ञानिक बनाने के लिए निम्नलिखित कुछ प्रमाणों को बताया गया है –

1. परीक्षा योग्य (Verifiable):
किसी परीक्षा के बाद ही कल्पना की सत्यता जानी जा सकती है। परीक्षा दो तरह की हो सकती है – प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष परीक्षा हमें निरीक्षण और प्रयोग द्वारा पूरी होती है। जैसे किसी के सर पर गाँधी टोपी देखकर कल्पना कर लेते हैं कि यह काँग्रेसी है।

फुलवारी में कोयल की आवाज सुनकर वसन्त ऋतु की कल्पना कर लेते हैं। इसी तरह प्रयोग द्वारा विभिन्न बीमारियों के कारणों के बारे में कल्पना की और उसकी सत्यता भी प्रयोग द्वारा हम स्थापित कर सकते हैं। जैसे-मादा अनोफिल मच्छर के काटने से मलेरिया होता है। इसी तरह अप्रत्यक्ष परीक्षा में बहुत-सी बातों को सत्य मानकर उससे बहुत कुछ अनुमान निकालते हैं।

2. कल्पना के लिए सहज बुद्धि और तेजीपन का होना जरूरी है। जैसे – ‘राम घर से भागकर कोलकात्ता चला गया’ क्योंकि उसके बड़े भाई ने डाँट-डपट की थी। यह परीक्षणीय भी है। लेकिन हमें यहाँ सहज बुद्धि और तेजीपन का व्यवहार कर यह सोचना चाहिए। उसके भागने का कारण और भी है। जैसे-घर में माँ-बाप का प्यार नहीं मिलना, स्वभाव से भावुक होना, कोलकात्ता से किसी मित्र या संबंधी की बुलाहट आना आदि। इसलिए कल्पना के लिए बुद्धि का प्रयोग करना भी जरूरी है।

3. कल्पना को समुचित व्याख्या करने की क्षमता हो – कल्पना ऐसी हो कि जिससे किसी वस्तु की पूर्ण और उपयुक्त व्याख्या हो सके। जैसे-परीक्षा में फेल करने का कारण, परीक्षा के समय बीमार रहना, क्लास से बराबर अनुपस्थित रहना, लिखने की आदत में कमी होना, नोट पढ़ना और फेल करना कल्पना की पूरी व्याख्या नहीं है।

4. कल्पना ऐसी हो कि केवल किसी एक ही वस्तु की व्याख्या हो जाए। यदि उसकी व्याख्या और किसी दूसरी पूर्व कल्पना से उसी तरह की जाए तो उसमें यथार्थता नहीं रह पाती है। अतः, इसे दूर करना चाहिए। कभी-कभी दो प्रतिद्वन्द्वी पूर्व कल्पनाओं में किसी काम को गलत या सही सिद्ध करने का काम निर्णायक उदाहरण से कर सकते हैं।

Crucial Instances:
मानलिया कि सिनेमा के मालिक ने शिकायत किया कि कुछ छात्र आधा घंटे पहले सिनेमा हॉल का शीशा और दरवाजा तोड़-फोड़ दिए हैं। हमारे सामने एक साथ दो कल्पनाएँ उठती हैं कि छात्र कॉलेज का है या स्कूल का। इसी समय एक नौकर आकर दर्शनशास्त्र की किताब देते हुए कहा है कि उस छात्र की यह पुस्तक गिर गई है।

इस किताब से हमें तुरत पता चलता है कि वह छात्र कॉलेज का हैं इस हालत में उस पुस्तक को हम निर्णायक उदाहरण कहेंगे क्योंकि उसी पुस्तक से हम कुछ निर्णय कर सके। इसलिए Jevons का कथन है कि “निर्णायक उदाहरण किसी एक पूर्व कल्पना का समर्थन ही नहीं करता बल्कि दूसरी पूर्व कल्पना का निषेध भी करता है।” निर्णायक उदाहरण की प्राप्ति दो तरह से होता है-निरीक्षण और प्रयोग द्वारा।

गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन पाँच मिनट देर से पहुंचते हैं। दो कल्पनाएँ उठती हैं। गाड़ी आकर चली गई या गाड़ी आने में विलम्ब है। दोनों कल्पनाएँ ठीक हैं। सिगनल को देखने पर पता चला कि सिगनल हरा है। इससे पता चलता है कि गाड़ी अभी आ रही है। यहाँ निर्णायक उदाहरण का निरीक्षण किया जिसमें एक कल्पना सत्य और दूसरा असत्य साबित हुआ।

इसी तरह एक बरतन में गैस है। दो कल्पनाएँ उठती हैं। ऑक्सीजन है या हाइड्रोजन गैस। देखने से दोनों रंगहीन, स्वादहीन एवं गंधहीन होती है। एक निर्णायक उदाहरण की खोज करते हैं। एक जलती हुई लकड़ी को बरतन में डालते हैं। गैस प्रज्वलित हो जाती है। इससे सिद्ध हुआ कि गैसें ऑक्सीजन गैस है। जलती लकड़ी निर्णायक उदाहरण है जो प्रयोग से प्राप्त हुआ है।

5. कल्पना में भविष्यवाणी (Power of prediction) की शक्ति हो। अर्थात् भविष्य की व्याख्या हो सके अर्थात् जो कुछ कल्पना की जाए वह भविष्य में सत्य निकले। ज्योतिषी लोग इसी कारण से भविष्य की घटनाओं का वर्णन पहले कर देते हैं। कल्पना में भविष्यवाणी करने की शक्ति रहने से उसे सत्य होने की अधिक संभावना रहती है।

लेकिन मिल साहब का कथन है कि भविष्यवाणी की कल्पना को यथार्थता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए क्योंकि कभी गलत और कभी सत्य होता रहता है। अतः, पूर्वकल्पना, सिद्धांत, नियम और तथ्य (Hypothesis theory, law and fact) के ऊपर के जितने भी नाम हैं सबों का प्रयोग एक मत और एक अर्थ में न होकर बदलते रूप में रहता है। इस तरह निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि उपर्युक्त प्रमाण कल्पना के बारे में जो दिया गया है, वह सत्य है इसके आधार पर ही कल्पना सत्य होती है।

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प्रश्न 4.
कल्पना के कितने भेद हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
घटना की व्याख्या की दृष्टि से प्राक्कल्पना तीन की प्रकार होती हैं –

  1. कर्ता संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Agent)
  2. विधि संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning law of Method)
  3. परिस्थिति संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection)

1. कर्ता संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Agent):
घटना की व्याख्या तब – होती है जब उसके कारण का पता लगता है। इसका कारण कर्त्ता होता है। कारण के संबंध में जो कल्पना करते हैं वहीं कर्ता संबंधी कल्पना कहलाती है। चोरी की व्याख्या के लिए चोर के संबंध में जो कल्पना की जाएगी वह कर्ता संबंधी कल्पना कहलाएगी।

विज्ञान के क्षेत्र में भी इसी तरह के उदाहरण मिलते हैं। जैसे-यूरेनस ग्रह की गति में गड़बड़ी देखी गई। वैज्ञानिकों ने कल्पना की कि कोई दूसरा ग्रह उसकी गति में बाधा डाल रहा है। जिसके चलते ही गड़बड़ी है और पता चला कि यह नेपच्युन ग्रह के चलते ऐसा हो रहा है। यह कल्पनाकर्त्ता-संबंधी कल्पना कहलाता है।

2. विधि संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning law of Method):
घटना घटने की विधि का अर्थ है कि कर्ता ने किस तरीके से किस नियम से घटना को संपादित किया। जैसे-चोर ने चोरी कैसे की? इस संबंध में जो कल्पना करते हैं वह विधि संबंधी कल्पना है। चोर दरवाजे को खोलकर आया था, उसे तोड़कर या सेंध मारकर आदि।

3. परिस्थिति संबंधी कल्पना (Hypothesis Concerning Collection):
कभी-कभी किसी घटना के कर्ता और विधि या तरीके दोनों मालूम रहते हैं किन्तु परिस्थिति मालूम नहीं रहती है, तो ऐसी स्थिति में परिस्थिति का पता लगाना पड़ता हैं जैसे-गाँव में चोरी हुई। चोरी एक घटना है, इसके कर्ता मालूम है, विधि भी मालूम है। चोरी किवाड़ को तोड़कर हुई है, किन्तु परिस्थिति मालूम नहीं है, इसके लिए परिस्थिति का पता लगाना पड़ता है।

परिस्थिति यही है कि परिवार के सभी लोग सिनेमा देखने चले गये थे। रात में देर से आने के कारण चोरी हुई। इस तरह घटना की परिस्थिति संबंधी कारण का पता लगाने को परिस्थिति संबंधी कल्पना कहते हैं। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि कल्पना के तीन भेद हैं, कर्ता, विधि एवं परिस्थिति संबंधी कल्पना। तीनों के बारे में पता लगाने के बाद ही घटना के सही कारण का पता चल जाता है।

दूसरी दृष्टि से कल्पना के दो भेद बताए गए हैं –

  1. साधारण कल्पना एवं
  2. वैज्ञानिक कल्पना।

1. साधारण कल्पना:
साधारण कल्पना का संबंध किसी व्यक्तिगत समस्याओं के सुलझाने से रहता है। जैसे कोई व्यापारी व्यापार में हानि होने के कारण के संबंध में कल्पना करता है। कोई छात्र परीक्षा में फेल होने के कारण के संबंध में कल्पना करता है।

2. वैज्ञानिक कल्पना:
वैज्ञानिक कल्पना का संबंध ऐसी घटनाओं से रहता है, जिनका संबंध सबों से रहता है। वैज्ञानिक कल्पना तर्क प्रमाण पर आधारित रहती है। विज्ञान के क्षेत्र में जो कल्पनाएँ की जाती हैं, वे वैज्ञानिक कल्पना हैं।

तीसरी दृष्टिकोण से कल्पना दो प्रकार की है –

  1. व्याख्यात्मक कल्पना एवं
  2. वर्णनात्मक कल्पना।

इसमें कारण संबंधी या कर्ता संबंधी कल्पना को व्याख्यात्मक कल्पना कहते हैं। विधि या नियम संबंधी कल्पना को वर्णनात्मक कल्पना कहते हैं। व्याख्यात्मक कल्पना यह बतलाती है कि कोई घटना क्यों घटती है और वर्णनात्मक कल्पना बतलाती है कि घटना कैसे घटती है? व्यावहारिक दृष्टि से कल्पना दो तरह की है –

  1. काम चलाऊ कल्पना एवं
  2. सादृश्यानुमान मूलक कल्पना।

1. काम चलाऊ कल्पना (Working hypothesis):
कभी कभी किसी घटना के कारण के लिए कोई उपयुक्त कल्पना नहीं दिखाई पड़ती है तो उस हालत में हम काम चलाने के लिए एक नकली कल्पना कर बैठते हैं उसे जब मन चाहे तब हटाकर बदल सकते हैं।

जैसे-कलम को जेब में नहीं रहने पर अटकल लगाते हैं कि शायद क्लास में छूट गई, या रास्ते में गिर गई या राम ने चुरा लिया। उसमें एक को परीक्षा के बाद सही पाते हैं। इस तरह की कल्पना को काम चलाऊ कल्पना कहते हैं “A working hypothesis means a provisional support tion.”

2. सादृश्यानुमान मूलक कल्पना (Analogical):
इस तरह की कल्पना में हैं कि जो बात एक वस्तु में सत्य है वह दूसरे में भी सत्य होगी। यदि इन दोनों वस्तुनो में और कुछ बातों की समानता हो तो, जैसे-पृथ्वी और मंगलग्रह में कुछ बातों की समानता है, वैसे दोनों ग्रह हैं, दोनों सूर्य के चारों तरफ घूमते हैं। दोनों का वातावरण एक-सा है। दोनों पर पर्वत, नदी, जंगल हैं। इस तरह पृथ्वी पर आदमी हैं तो कल्पना करते हैं कि मंगल ग्रह पर भी आदमी होंगे। इस तरह की कल्पना सादृश्यानुमान मूलक कल्पना कहलाती है।

काल्पनिक प्रतिरूपक कल्पना (Representative fiction):
बेकन ने कल्पना का एक और रूप दिया है जिसे काल्पनिक प्रतिरूपक कहा जाता है जिसका ज्ञान इन्द्रियों से संभव नहीं है। जैसे-अणु, परमाणु। इस तरह की कल्पना के कारण-स्वरूप हमारे सामने आज अणु-परमाणु के सिद्धान्त ईश्वर की कल्पना, मोझ की कल्पना, प्रकाश तरंग सिद्धान्त तथा भूत-प्रेम या आत्मा-परमात्मा के विषय में दिखाई पड़ते हैं। इस तरह कल्पना के कई प्रकार बताए गए हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 3 विज्ञान एवं प्राक्-कल्पना

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक विधि में प्राक-कल्पना का स्थान क्या है? अथवा, वैज्ञानिक आगमन में कल्पना के स्थान की विवेचना करें। अथवा, आगमन में कल्पना के महत्त्वों को लिखें।
उत्तर:
अज्ञात वस्तुओं की छानबीन करने की प्रवृत्ति मनुष्य में जन्मजात होती है। वह भिन्न-भिन्न वस्तुओं के बीच छिपे रहस्यों को जानना चाहता है। वस्तुतः मनुष्य खोजी प्रवृत्ति का होता है। इन सभी बातों की पूर्ति तभी हो सकती है जब हम प्राक्-कल्पना की सहायता लेते हैं।

अतः प्राक्-कल्पना की आवश्यकता हमें प्रयोग करने, वैज्ञानिक एवं कलात्मक खोजों में होती है। प्राकृतिक नियमों की खोज, प्राकृतिक जटिलताओं के कारणों की खोज आदि में प्राक्-कल्पना की सहायता लेते हैं। वस्तुतः बिना कल्पना के हम कोई भी वैज्ञानिक खोज आरंभ नहीं कर सकते हैं।

किसी भी वैज्ञानिक विधि यानि वैज्ञानिक खोज में प्राक्-कल्पना का प्रथम स्थान है। वैज्ञानिक आगमन में कार्य-कारण (Causal relation) स्थापित करते हैं। यही कारण-सम्बन्ध स्थापित करना वैज्ञानिक विधि का लक्ष्य होता है। कार्य-कारण सम्बन्ध निश्चित करने के लिए हम प्राक्-कल्पना ही करते हैं। उसके बाद उसकी जाँच करते हैं तथा जब प्राक्-कल्पना जाँच में सही उतरती है तब उसे हम सिद्धान्त का रूप देते हैं फिर उसे नियम के रूप में मानकर वैज्ञानिक खोज में निश्चित निष्कर्ष पर आते हैं।

वैज्ञानिक विधि में निरीक्षण एवं प्रयोग (Observation and experiments) की सहायता लेना आवश्यक होता है। इसके बिना निश्चितता नहीं आती है। व्यवहार में हम देखते हैं कि निरीक्षण एवं प्रयोग आरंभ से ही प्राक्-कल्पना के द्वारा नियंत्रित होते हैं। निरीक्षण की तरह प्रयोग (Experiment) में भी प्राक्कल्पना का स्थान प्रमुख है। प्रयोग में हम कृत्रिम ढंग से घटना उपस्थित करते हैं। इसके लिए हम पहले प्राक्-कल्पना करते हैं और इसकी जाँच के लिए प्रयोग का सहारा लेते हैं।

जैसे हम पहले यह प्राक्-कल्पना करते हैं कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की निश्चित मात्रा को मिलाने के बाद जब हम उससे होकर विद्युतधारा प्रवाहित करते हैं तो ‘जल’ बनता है। इस प्राक-कल्पना की जाँच हम प्रयोग के सहारे करते हैं। प्रयोगशाला में हम आवश्यक परिस्थिति उत्पन्न कर प्राक्-कल्पना की सत्यता का पता लगा लेते हैं। प्रयोग के लिए पहले किसी-न-किसी प्रकार की प्राक्-कल्पना करना आवश्यक है, क्योंकि प्रयोग में प्राक्-कल्पना की ही जाँच की जाती है।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि निरीक्षण और प्रयोग जिसका महत्त्व वैज्ञानिक खोज में अधिक है, प्राक्-कल्पना द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। बेकन प्राक्-कल्पना के महत्त्व को कम आँकते हैं। लेकिन हम उनके विचार को गहराई से देखें तो बहिष्कार एवं निरीक्षण में भी शुद्ध निष्कर्ष प्राप्त करने हेतु प्राक्-कल्पना की आवश्यकता होती है।

महान् वैज्ञानिक न्यूटन का कहना है कि “मैं प्राक्-कल्पना की कल्पना ही नहीं करता हूँ।” लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से प्राक्-कल्पना की स्वीकृति गुरुत्वाकर्षण के नियम को सिद्ध करने में दीखता है। न्यूटन ने जब सेव को जमीन पर गिरते हुए देखा था तो सर्वप्रथम इसके कारण के बारे में प्राक्-कल्पना ही की थी। तर्कशास्त्री जेएस मिल के अनुसार, प्राक्-कल्पना का अधिक महत्त्व खोज के सम्बन्ध में होता है, प्रमाण (Proof) के सम्बन्ध में नहीं। तर्कशास्त्री ह्वेवेल के अनुसार वैज्ञानिक आगमन का संबंध आविष्कार से अधिक है। अतः उनकी नजर में प्राक्-कल्पना का महत्त्व बहुत अधिक है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

Bihar Board Class 11 Home Science पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है –
(क) अंडा
(ख) दाल
(ग) पालक
(घ) सोयाबीन
उत्तर:
(घ) सोयाबीन

प्रश्न 2.
40% प्रोटीन पाया जाता है।
(क) सोयाबीन
(ख) दाल
(ग) दूध
(घ) मूंगफली
उत्तर:
(क) सोयाबीन

प्रश्न 3.
राइबोप्लोबिन और फॉलिक अम्ल में विटामिन काफी मात्रा में पाया जाता है।
(क) विटामिन ‘A’ में
(ख) विटामिन ‘B’ में
(ग) विटामिन ‘C’ में
(घ) विटामिन ‘D’ में
उत्तर:
(ग) विटामिन ‘C’ में

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प्रश्न 4.
वयस्क पुरुष-शरीर भार होता है –
(क) 50 किग्रा
(ख) 60 किग्रा
(ग) 80 किग्रा
(घ) 90 किग्रा
उत्तर:
(ख) 60 किग्रा

प्रश्न 5.
वयस्क स्त्री भार कि. ग्रा. होता है.
(क) 60 किग्रा
(ख) 50 किग्रा
(ग) 40 किग्रा
(घ) 70 किग्रा
उत्तर:
(ग) 40 किग्रा

प्रश्न 6.
कार्टिलेज से अस्थियों में परिवर्तित होने की क्रिया को कहते हैं। [B.M.2009A]
(क) कैल्सिकरण
(ख) गम्यता
(ग) निर्जलीकरण
(घ) अवशोषण
उत्तर:
(क) कैल्सिकरण

प्रश्न 7.
भाप द्वारा पकाया गया भोजन – [B.M.2009A]
(क) स्वादहीन होता है।
(ख) स्वास्थ्य के लिए उत्तम है
(ग) कच्चा होता है
(घ) हल्का होता है
उत्तर:
(ख) स्वास्थ्य के लिए उत्तम है

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प्रश्न 8.
भोजन पकाने से क्या बदलाव आता है ? [B.M.2009A]
(क) भोजन में भौतिक बदलाव आता है
(ख) भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है
(ग) पोषक मूल्य घट जाता है
(घ) सुरक्षित रहता है
उत्तर:
(ख) भोजन स्वादिष्ट एवं सुपाच्य हो जाता है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शीघ्र नष्ट होने वाले दो पदार्थों के नाम बताएँ।
उत्तर:
1. दूध
2. मांस।

प्रश्न 2.
शीघ्र नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ कौन-से हैं ?
उत्तर:
अनाज, दालें, तेल, घी, नमक इत्यादि।

प्रश्न 3.
खाद्य पदार्थ खरीदते समय ध्यान रखने योग्य कोई दो बातें बताइए।
उत्तर:
1. खाद्य पदार्थ आवश्यकतानुसार ही खरीदें।
2. संग्रह के लिए उपलब्ध स्थान के अनुसार सामग्री खरीदें।

प्रश्न 4.
शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सामान्य ताप पर रखे जाने पर इन खाद्य पदार्थों के 3 दिन में ही रंग-रूप में परिवर्तन आने लगता है क्योंकि यह शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

प्रश्न 5.
खाद्य पदार्थ दूषित कब माना जाता है ?
उत्तर:
जब निम्नलिखित परिवर्तन पाए जाएँ:

  1. रंग
  2. स्वाद
  3. गंध
  4. दिखावट
  5. रचना
  6. सघनता
  7. आकार
  8. पोषण मूल्य।

प्रश्न 6.
खाद्य संदूषण को प्रभावित करने वाले चार कारक बताइए।
उत्तर:

  1. जीवाणु तथा एन्जाइमों की उपस्थिति।
  2. रासायनिक क्रियाएँ।
  3. बाह्य चोट।
  4. चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा नुकसान या अजैविक संदूषण।

प्रश्न 7.
खाद्य संदूषण की सहायतार्थ परिस्थितियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:

  1. जैविक खाद्य पदार्थ
  2. अनुरूप तापमान
  3. नमी/पानी
  4.  हवा।

प्रश्न 8.
खाद्य परिरक्षण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जब किसी खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक –
1. रोगवाहक जीवाणुओं व रासायनिक पदार्थों के प्रभाव से मुक्त रखा जा सके।
2. उनके रंग, रचना, स्वाद, सुगंध व पोषण मूल्य बनाये रखा जा सके तो उसे खाद्य परिरक्षण कहते हैं।

प्रश्न 9.
पौष्टिक तत्त्वों के स्तर को बढ़ाने के क्या उपाय हैं ?
उत्तर:
पोषक तत्त्वों का स्तर निम्नलिखित तीन उपायों से बढ़ाया जा सकता है:

  1. अंकुरण (Germination)
  2. खमीरीकरण या किण्वन (Fermentation)
  3. मिला-जुलाकर पकाना (Combination)

प्रश्न 10.
पोषण प्रक्रिया बढ़ाने का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
पोषण को मिलने वाली मात्रा और स्तर में सुधार करना। ये उपाय घर पर या औद्योगिक स्तर पर किए जा सकते हैं।

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प्रश्न 11.
आपने दो महीने पहले 50 किलो चावल खरीदा था। आपको यह कैसे पता चलेगा कि यह खराब हो गया है। इसके खराब होने के दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • चावल में नमी
  • ड्रम में नमी
  • चावल में पहले से ही कीड़ा लगा हो
  •  गर्म अंधेरे वाली जगह पर संगृहीत हो।

प्रश्न 12.
खिचड़ी सादे चावलों से ज्यादा पौष्टिक क्यों है ? एक और व्यंजन का नाम लिखें जिसमें यही सिद्धांत पाया जाता हो।
उत्तर:
खिचड़ी में अच्छी किस्म का प्रोटीन पाया जाता है जिसको मिला जुलाकर खाने वाला सिद्धान्त है। अन्य उदाहरण जैसे –
1. अनाज + दाल
2. अनाज + दूध
3. अनाज + सब्जियाँ।
व्यंजन-दलिया, डोसा, रायता, डोकला, भरवां पराठा।

प्रश्न 13.
दो सुविधाजनक खाद्य पदार्थों के नाम बताएँ। अपने प्रतिदिन के भोजन में इन्हें खाने से एक लाभ व एक हानि लिखें।
उत्तर:
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ-बोतलबन्द या डिब्बा बंद सुरक्षित पदार्थ, जैसे-जैम, जैली, अचार, चटनी, फल-चैरी और फलों का रस।

लाभ –

  • समय की बचत
  • ईंधन की बचत
  • आसानी से संगृहीकरण किया जा सकता है
  • मेहनत कम लगती है 5. देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

हानियाँ:

  • यह महंगे होते हैं।
  • खाद्य परिरक्षकों तथा रासायनिक पदार्थों का हानिकारक प्रभाव
  • कम पौष्टिक होना।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खाद्य पदार्थों को उनके नष्ट होने के समय का किन आधारों पर वर्गीकरण किया जा सकता है ?
उत्तर:

  • विकारीय अथवा शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ (Perishable foods): दूध, दूध से बने पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जियाँ आदि।
  • अविकारीय अथवा नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ (Non perishable foods): गेहूँ, दालें, चावल, तेल, घी, आदि।
  • अर्ध-विकारीय अथवा नष्ट न होने वाले खाद्य पदार्थ (Semi-perishable foods): मैदा, सूजी, बेसन, मक्खन आदि।
  • सुविधाजनक खाद्य पदार्थ (Convenience foods): दूध पाउडर, जमे हुए खाद्य पदार्थ, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, डबल रोटी आदि।

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प्रश्न 2.
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सुविधाजनक खाद्य पदार्थ (Convenience Foods): ऐसे पदार्थ जिससे महिला को किसी भी समय परिवार को भोजन देने की सुविधा की सामर्थ्य हो, सुविधाजनक खाद्य-पदार्थ कहलाते हैं। खाद्य पदार्थ को पहले से तैयार, आधे पके या पकाने की आवश्यकता नहीं होती, केवल गर्म करने पड़ते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थों को साफ करके बनाकर जमा दिया जाता है तथा इस प्रकार वह सुविधाजनक खाद्य पदार्थ बन जाते हैं।

ये पदार्थ हैं –

  • बोतल बन्द या डिब्बा बंद सुरक्षित पदार्थ, जैसे जैम, जैली, अचार, चटनी, फल, चैरी और फलों का रस।
  • साग, पुलाव, पालक-पनीर, मटर-पनीर इत्यादि।
  • सूखे हुए खाद्य पदार्थ जैसे दूध का पाउडर, खोआ, सूप का सूखा पाउडर, गाढ़े रस के सत्तु इत्यादि।

जमे हुए पदार्थ-मटर, गाजर, टमाटर, भिंडी और फूलगोभी आदि। आज के समय में भिन्न-भिन्न कंपनियाँ कई प्रकार के खाद्य बाजार में ला रही हैं। __तुरत प्रयोगार्थ जमे हुए तैयार खाद्य पदार्थ भी मिलते हैं, जैसे कटलेट, कबाब, सीख, सलामी, चटनियाँ इत्यादि।

प्रश्न 3.
मसाले खरीदते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखेंगे?
उत्तर:

  • जहाँ तक सम्भव हो, साबुत मसाले ही खरीदें।
  • यदि पिसे हुए खरीदने हों तो खुले मसाले न खरीदें, पैकेट बन्द ही खरीदें।
  • विश्वसनीय नाम व साख के मसाले खरीदें।
  • पैकेट पर एगमार्क (Agmark) की मोहर लगे मसाले ही खरीदें।
  • रंग व स्वाद परख कर ही मसाले खरीदें, यदि मसाला पुराना है तो सुगन्ध नहीं आएगी।
  • विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें, कम मात्रा में खरीदें ताकि उनकी सुगन्ध बनी रहे।

प्रश्न 4.
सूखे मेवों को खरीदने से पूर्व इनका निरीक्षण कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर:

  • सूखे मेवे साफ प्राकृतिक रंग व चमक वाले होने चाहिए।
  • दाग, धब्बे, कीड़े, मिट्टी, पत्थर न हों।
  • सिकुड़े हुए न हों।
  • क्रय करने से पूर्व इन्हें तोड़ कर इनकी गिरी का निरीक्षण कर लेना चाहिए। यदि उनमें किसी प्रकार का जाला अथवा कीड़ा लगा हो तो उन्हें नहीं खरीदना चाहिए।
  • फफूंदी के लिए भी इनका निरीक्षण करना आवश्यक है क्योंकि सूखे मेवों में फफूंदी विषैला पदार्थ उत्पन्न करती है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक होता है।

प्रश्न 5.
दूध संग्रह (Storage of Milk) करते समय आप किन बातों को ध्यान में रखेंगी?
उत्तर:
दूध एक शीघ्र नष्ट होने वाला खाद्य पदार्थ है। अतः इसे उचित प्रकार से संगृहित किया जाना चाहिए।

  • दूध को उबाल कर ठण्डा करके ठण्डे स्थान पर रखें।
  • यदि फ्रिज नहीं है तो गर्मियों में 5-6 घण्टे पश्चात् दोबारा उबाल कर रखने से दूध खराब नहीं होता।
  • पुराने दूध को ताजे दूध में नहीं मिलाना चाहिए।
  • तेज गन्ध वाले पदार्थों जैसे प्याज, लहसुन, खरबूजा आदि से दूध को दूर रखें क्योंकि यह गन्ध को बहुत जल्द ग्रहण कर लेता है।

प्रश्न 6.
भोजन पकाने के सिद्धांत का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भोजन पकाने के सिद्धांत (Principles of Cooking): प्रतिदिन के पकाने के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों के प्रयोग से परिवार के हर सदस्य का स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जाता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम इन सिद्धांतों को बेहतर समझें और उपभोक्ता की जानकारी के लिए अध्ययन करें।

पकाने के सिद्धान्त निम्न हैं –
1. सुगंध को सुरक्षित रखना (To keep ‘Flavour in’): जब आप खाद्य पदार्थों को ढंककर या खुले में वसा माध्यम में पकाते हैं जैसे कि पकौड़े, कटलट, आलू चिप्स आदि तो खाद्य की सुगंध उसकी कड़क परत के अन्दर ही रह जाती है। यह खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ट बना देती है तथा पाचक द्रव को सावित होने में सहायता होती है, जिससे पोषक तत्त्वों का बेहतर प्रयोग हो जाता है।

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2. सुगंध को बाहर निकालना (To keep ‘Flavour out’): कभी-कभी खाने को पकाया जाता है ताकि उसकी सुगंध ग्रेवी व तरल में चली जाए, जैसे मीट करी, समग्र सब्जियों व मटन ब्रोध आदि धीमे-धीमे पकाया जाना, खाने के आकार को भी बदल देता है। पानी में घुलनशील पोषक तत्त्व तरी में आ जाते हैं, जो पौष्टिक होने के अतिरिक्त स्वादिष्ट भी होते हैं।

3. उचित पकाने के तरीकों द्वारा अधिक से अधिक पौष्टिक खाना बनाना-प्रोटीन, कार्बोज व वसा जैसे पोषक तत्त्वों पर पकाने के प्रभाव का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 7.
खाद्य परिरक्षण प्रश्न (Food Preservation) के महत्त्व, लाभ बताइए।
उत्तर:
खाद्य परिरक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • ताजे खाद्य पदार्थ अधिक स्थान घेरते हैं, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ। इनके भार तथा घनत्व में कमी लाने के लिए इन्हें परिरक्षित करना चाहिए।
  • परिरक्षित खाद्य पदार्थ भोजन में विभिन्नता लाते हैं।
  • परिरक्षित खाद्य पदार्थों के आवागमन में सुविधा होती है।
  • पोषण की दृष्टि से परिरक्षित खाद्य पदार्थों के प्रयोग से भोजन को पूर्णतः संतुलित बनाया जा सकता है।
  • खाद्य पदार्थों के परिरक्षण की विधिया सीखकर बचे हुए खाली समय का सदुपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
मिलाने-जुलाने से खाद्य पदार्थ पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पोषक मान में वृद्धि –

  • एक-दूसरे का पूरक होने के कारण सभी पौष्टिक तत्त्वों की प्राप्ति शरीर को हो जाती है।
  • दो अंशतः या पूर्ण प्रोटीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण प्रोटीन की प्राप्ति हो जाती है।

उदाहरण के लिए, अनाजों में लाइसिन (आवश्यक अमीनो अम्ल) कम मात्रा में तथा अन्य सभी उपयुक्त मात्रा में होते हैं। दालों में आवश्यक अमीनो अम्ल, मिथायोनिन कम मात्रा में तथा अन्य सभी उपयुक्त मात्रा में होते हैं, अतः इनका मिश्रण खाने से वे एक-दूसरे के पूरक का कार्य करते हुए लाइसिन मिथायोनिन सहित अन्य सभी आवश्यक अमीनो अम्लों की पूर्ति हो जाती है।

प्रश्न 9.
खमीरीकरण से खाद्य पदार्थों पर प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पोषक मान में वृद्धि –

  • खाद्य पदार्थों में उपस्थित विटामिन B समूह (विशेष रूप से थायमिन) (B), राइबोफ्लेविन (B) तथा निकोटिनिक अम्ल (B) की मात्रा बढ़ कर दुगनी हो जाती है।
  • लौह तत्त्व अपने संयोजी बंधनों से मुक्त होकर शरीर को सरल रूप में उपलब्ध हो जाता है।
  • विटामिन ‘सी’ की मात्रा में भी वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 10.
अंकुरण की प्रक्रिया से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
लाभ:

  1. विटामिन बी समूह के विटामिनों की मात्रा दुगनी हो जाती है। नायसिन भी 48 घंटों में 50-100 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
  2. अनाजों तथा दालों में लोहा रासायनिक यौगिक के रूप में होता है तथा शरीर उसे पूर्णतः अवशोषित करने में समर्थ नहीं होता, परन्तु अंकुरण के कारण लोहा अपने यौगिकों से पृथक् होकर स्वतंत्र हो जाता है जिसका शरीर आसानी से उपयोग कर पाता है।
  3. विटामिन ‘सी’ (एस्कॉर्बिक एसिड) जो सूखी दाल में न के बराबर होता है, अंकुरण से 24 घण्टे में 7-8 मिग्रा., 48 घण्टे में 10-12 मिग्रा. तथा 72 घण्टे में 12-14 मिग्रा. प्रति 100 ग्राम तक हो जाता है।
  4. कुछ पॉलीसैक्राइड्स तथा डाइसैक्राइड्स सरलतम रूप (मोनोसैक्राइड्स) में बदल जाते हैं जो खाद्य पदार्थ को पाचनशील बनाते हैं। उदाहरण के लिए स्टार्च का सूक्रोज, फ्रक्टोज तथा ग्लूकोज में बदलना।
  5. अंकुरण के कारण अनाजों व दालों की ऊपरी परत फट जाती है तथा उन्हें पकाना सरल हो जाता है तथा कम समय लगता है।
  6. अंकुरण के द्वारा खाद्य पदार्थों में उपस्थित पोषण विरोधी तत्त्व नष्ट हो जाते हैं तथा पोषक तत्त्वों के उपयोग को बढ़ाते हैं।
  7. भोजन ज्यादा स्वादिष्ट तथा आकर्षक बन जाता है।

प्रश्न 11.
खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर खाने से क्या लाभ है? .
उत्तर:
सभी खाद्य पदार्थों में सभी पौष्टिक तत्त्व उपस्थित नहीं होते हैं परन्तु प्रत्येक में कोई न कोई तत्त्व अवश्य होता है। शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार यदि इन खाद्य पदार्थों का चयन करके मिश्रित रूप से खाया जाए तो न केवल हम पौष्टिक आहार की प्राप्ति कर सकते हैं वरन् धन तथा श्रम भी बचा सकते हैं।

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प्रश्न 12.
डोसे का पौष्टिक मान अधिक होता है। वे विधियाँ बताइए जिसके द्वारा यह पौष्टिक मान बढ़ाया गया है। प्रत्येक का एक पौष्टिक तत्त्व लिखें जो बढ़ा हो।
उत्तर:
डोसा बनाते समय दो विधियाँ –
1. मिला-जुलाकर खाना
2. खमीरीकरण प्रयोग में लाया जाता है जिससे इसका पौष्टिक मान बढ़ता है। मिला-जुला कर खाने से प्रोटीन की किस्म बेहतर हो जाती है तथा खमीरीकरण से विटामिन बी कम्पलेक्स समूह (B-complex) तथा विटामिन सी (Vitamin C) की मात्रा बढ़ जाती है।

प्रश्न 13.
प्रेशर कूकर द्वारा भोजन पकाने की विधियों के चार लाभ लिखें।
उत्तर:
वाष्प के दबाव द्वारा (Pressure Cooking):

  • प्रेशर कूकर में भोजन बनाने से समय, ईंधन व श्रम की बचत होती है।
  • प्रेशर कूकर के साथ मिले सेपरेटर (Separater) से अलग तरह के भोजन एक साथ पकाए जा सकते हैं।
  • प्रेशर कूकर में खाना बनाने से भोजन के पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं।
  • कूकर में ताप व भाप भोजन में प्रवेश कर उसे जल्दी पका देते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भोजन पकाने का खाद्य पदार्थों की पौष्टिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है ? [B.M. 2009A]
उत्तर:
भोजन में विभिन्नता स्वाद, सुगंध और आकर्षण लाने के लिए तथा भोजन को पाचनशील बनाने के लिए उसे पकाना आवश्यक हो जाता है। भोजन पकाना एक कला है, जो हमारी ‘संस्कृति’ का महत्त्वपूर्ण अंग है। भोजन को विभिन्न विधियों द्वारा पकाया जाता है पकाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें उपस्थित पोषक तत्त्व नष्ट न हो। भोजन पकाने पर कुछ पौष्टिक तत्त्व विघटित होकर आसानी से पचने योग्य हो जाते हैं कुछ कड़े होकर अपचित हो जाते हैं तथा कुछ नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों को पकाने में प्रयुक्त हुए ताप से विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है।

1. कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate): आद्र ताप पर खाद्य पदार्थ में उपस्थित स्टार्च मुलायम हो जाती है, कोशिकाएँ फट जाती हैं और स्टार्च बाहर निकल जाता है जबकि शुष्क ताप पे पकाने पर स्टार्च डेक्सटिन में बदल जाता है और अधिक पाचनशील हो जाता है। चीनी, गुड़ शक्कर आदि गर्म होकर पिघल कर भूरे रंग का हो जाता है।

2. प्रोटीन (Protein): पंकने पर प्रोटीन अधिक पाचनशील हो जाते हैं। ताप से अंडे का प्रोटीन और दूध का प्रोटीन जम जाता है। माँस में उपस्थित प्रोटीन कोलेजन और इलास्टिन अघुलनशील शीघ्र होते है तथा ये शुष्क ताप द्वारा कड़ी हो जाते हैं। दालों में पाई जाने वाली प्रोटीन पकाने पर अधिक पौष्टिक तथा पाचनशील हो जाता है।

3. वसा (Fats): पकने पर वसा पर कोई अधिक प्रभाव न पड़ता है केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वयत्युक पदार्थ को उचित ताप पर रखा जाय एवं सुनहरी रंग होने पर ताप से हटा लिया जाए।

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4. विदामिन्स (Vitamins): पकाने पर विटामिन ‘सी’ सबसे अधिक नष्ट होते हैं अतः विटामिन ‘सी’ युक्त फल एवं सब्जियों को ताजा ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए, विटामिन ‘बी’ समूह पकाने पे ताप द्वारा नष्ट हो जाता है साथ ही विटामिन ‘ए’ ‘डी’ ‘ई’ कुछ मात्रा में वसा में घूल जाते हैं।

5. खनिज लवण (Minerals): सामान्यतः पकने पर खनिज लवण पर प्रभाव नहीं पड़ता है किन्तु यदि भोज्य पदार्थ को पकाने के बाद उनका पानी फेंक दिया जाए तो बहुत से खनिज नष्ट हो जाते हैं। अतः खाद्य पदार्थों को वैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर पकाना चाहिए ताकि पोषण मान उपस्थित रहे और पोषक तत्त्व कम-से-कम बर्बाद हो साथ ही जहाँ तक संभव हो बिना पालीस किया चावल, साबूत दाल, चोकर सहित अनाज का ही प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 2.
खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कारक-जैसा खाओगे अन्य, वैसा होगा मन। कोई भी व्यक्ति अपौष्टिक खुराक पर कुछ समय तक बच जाएगा परन्तु शीघ्र ही उसका स्वास्थ्य गिरना शुरू हो जाता है। इसके परिणाम होंगे, कुपोषण, कमी के रोग, रोगग्रस्तता, शीघ्र व असामयिक मृत्यु।
आपके खाद्य पदार्थों के चयन को प्रभावित करने वाले कुछ कारक निम्नलिखित हैं –

1. माध्यम (Media): खाद्य पदार्थों के उत्पादक विज्ञापनों पर काफी पैसा खर्च करते हैं ताकि वह अपने पदार्थों को प्रचार करके उसकी मांग बढ़ा सकें। यह प्रचार जनता को मोहने के लिए व आकर्षित करने के लिए किया जाता है। आपको ऐसे कई विज्ञापनों के बारे में पता होगा जिन्हें दूरदर्शन, रेडियो पर देखते/सुनते हैं।

  • कौन-सा खाद्य-पदार्थ वृद्धि के लिए आवश्यक होगा?
  • ऊर्जा और बल के लिए आपको क्या लेना चाहिए?
  • पकाने के कौन-से तेल में PUFA की मात्रा अधिक होती है ?
  • अपनी चाय/कॉफी के लिए कौन-सा दूध पाउडर प्रयोग करना चाहिए?
  • ऊपर लिखित उदाहरणों की तरह बहुत कुछ और भी हैं।
  • उत्पादक समय व ऊर्जा बचाने की भी बात करते हैं, जैसे-मिनट में तैयार आदि।

2. सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्य (Cultural and family food values): इनका प्रभाव आपके भोजन पर प्रत्यक्ष रूप से होता है। अंडे, दूध, मांस और दूसरे अच्छे पदार्थ जीविका कमाने वाले को तथा परिवार के पुरुष सदस्यों को दिये जाते हैं। परिवार के दूसरे सदस्यों में शेष भाग बाँटा जाता है। कुछ राज्यों में दालें, ताजे फल और सब्जियाँ गर्भवती और स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को नहीं दिया जाता।

ऐसे सांस्कृतिक रीति-रिवाज मातृत्व स्तर को नीचे गिरा देते हैं। कई परिवारों में मांसाहारी भोजन को खाने पर अधिक जोर दिया जाता है। सब्जियाँ काफी मात्रा में विटामिन और खनिज लवण देती हैं और इसके अतिरिक्त रूक्षांश भी देती हैं जो शारीरिक प्रक्रिया को नियंत्रित करने में सहायता देता है। यह वांछनीय है कि मूल्यों को भूलकर आगे बढ़ें। मिश्रित, ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थ कम दाम पर अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्चित करते हैं।

3. मित्रसमूह वर्ग (Peer Group): मित्रसमूह का विशेषकर किशोरों की खाने-पीने की आदतों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। विकासशील बच्चों में चॉकलेट, शीतल पेय और पीजा, बर्गर आदि खाने की अधिक इच्छा होती है। अक्सर ये सब खाद्य पदार्थ पौष्टिक नहीं होते हालांकि इन पर काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। यह अक्सर देखने में आया है कि बच्चे अपने मित्रों के साथ वह सब कुछ खा लेते हैं जो उनको स्वादिष्ट नहीं लगता। पोषण के अध्ययन से मित्रसमूह में खाने के चयन में बुद्धिमत्ता आती है।

4. आर्थिक कारण (Economical Factors): एक बुद्धिमत्ती गृहस्वामिनी अपने परिवार के लिए किफायती दामों पर संतुलित आहार का चयन करती है। उसे ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थों की उपलब्धि, उनकी पौष्टिक क्षमता के बारे में सब कुछ पता होता है। वह इनके लिए वही पदार्थ चयन करती है जिससे घर के लोगों को फायदा हो।

जैसे-खीर के लिए टूटे चावल और जैम बनाने के लिए सेब। एक बुद्धिमत्ती मां विशेष मौकों के लिए स्वादिष्ट भोजन घर पर बनाना अधिक पसंद करती है बजाय इसके कि बाहरी होटलों से महंगा खाना मंगाकर खाया जाए। कीमत, मात्रा, समय, ऊर्जा और ईंधन, हर ओर किफायत का ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न 3.
खाना पकाने के कौन-कौन-से कारण हैं ?
उत्तर:
खाना पकाने के कारण (Reasons of Cooking Food) :
1. भौतिक और रासायनिक परिवर्तन-पकाने से मांस में प्राकृतिक (भौतिक) बदलाव आता है जिससे इसे खाना आसान हो जाता है। कच्चा मांस खाया नहीं जाता। पकाने से इसका रंग और आकार भी बदल जाता है। आलू, मांस आदि में रासायनिक बदलाव भी आ जाता है। पकाने के बाद वे अधिक मीठे हो जाते हैं। स्टार्च कोशिकाएं फट जाती हैं और सारी मात्रा खाने के योग्य हो जाती हैं।

2. पाचन शक्ति बढ़ जाती है-सख्त खाद्यान्न जैसे सूखे बीज, मटर इत्यादि को नर्म करने के लिए पकाया जाता है। पाचक रस नर्म बीज के अन्दर पहुंच जाता है। यह प्रोटीन और कार्बोज का पूरा उपयोग सुनिश्चित कर लेता है।

3. स्वाद, सुगंध और रुचि में परिवर्तन-पकाने पर शकरकन्द का स्वाद बदल जाता है। मछली और मांस के गन्ध में बेहद सुधार हो जाता है अर्थात् उसकी सुगंध अच्छी हो जाती है तथा अधिक रुचिकर बन जाती है।

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4. पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है-दालों, फलियाँ और सोयाबीन में रोधक ट्राइपसिन होता है। सूखे या नम पकाने पर यह नष्ट हो जाता है तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है।

5.खाद्य पदार्थ को सुरक्षित बनाता है और भण्डारण समय बढ़ जाता है-कच्चा खाद्य पदार्थ खराब होना शुरू हो जाता है तथा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जैसे टमाटर । अगर आप इसको पका लें तो चटनी के रूप में लम्बी अवधि तक खराब नहीं होता। .. जीवाणु की उपस्थिति के कारण दूध फट जाता है। उबालने से वे जीवाणु मर जाते हैं और दूध के खराब होने की अवधि बढ़ जाती है।

6.भिन्नता के लिए पकाना-एक ही प्रकार का खाना खाते-खाते मन ऊब जाता है। पकाने से एक ही खाद्य पदार्थ को विभिन्न रूपों से खाया जा सकता है। जैसे गेहूँ का दलिया, चपाती, पराठा, पूरी-कचौरी और बिस्कुट आदि के रूप में खाया जाता है। पकाने से एक प्रकार से खाने से छुट्टी मिलती है।

प्रश्न 4.
खाद्य पदार्थों का किस प्रकार चयन, क्रय एवं संग्रह करेंगे?
उत्तर:
1. नष्ट होने वाले भोज्य पदार्थों का चयन, क्रय व संग्रह-इसके अन्तर्गत सब्जी, फल, जन्तुजन्य खाद्य पदार्थ जैसे-दूध, मछली, मीट आदि आते हैं। इन खाद्य पदार्थों से हमें प्रोटीन, विटामिन व खनिज लवण प्राप्त होते हैं।

चयन व क्रय (Selection & Purchase) :
1. दूध (Milk): कई प्रकार के दूध बाजार में उपलब्ध हैं। गर्मी पाकर दूध शीघ्र खराब होता है। ताजा दूध की सुगन्ध व स्वाद उत्तम होते हैं व रंग सफेद होता है। बासी दूध की सुगन्ध व स्वाद घटिया होते हैं। दूध का उपयोग करने से पहले उसे उबाल लेना चाहिए।

2. पनीर (Cheese): पनीर में नमी अधिक होती है। इसे स्वच्छ स्थान से ही खरीदना चाहिए व खरीदने के पश्चात् जल्दी ही उपयोग में ले लेना चाहिए। पनीर को छूकर देखें। यह सख्त व पीला न हो।

3. मक्खन (Butter): मक्खन में 11 से 16% नमी होती है। कमरे के तापक्रम पर यह जल्दी ही खराब हो जाता है। घर में बने मक्खन में नमी और भी ज्यादा होती है। नमक वाला प्रोसेस्ड मक्खन कुछ दिन रखा जा सकता है।

पशुजन्य पदार्थ (Animal Product):
1. अण्डा (Egg): यदि अण्डे को प्रकाश, जैसे जलती मोमबत्ती के सामने रखकर देखें तो उसमें उपस्थित वायु कोष (Air cell) छोटा पाएँगे। अण्डों के व्यापारियों द्वारा वर्गीकरण साइज के अनुसार किया जाता है। पुराने अण्डे में वायुकोष बड़ा होता है।

यदि पानी में डालने पर अण्डा ऊपर तैरने लगता है तो इसका अर्थ. अण्डा अन्दर से खराब है। अण्डा ऐसा खरीदें जो ऊपर से साफ व साबुत हो। टूटे अण्डों में जीवाणु प्रवेश पा जाते हैं। ऊपर लगी गन्दगी में उपस्थित जीवाणु साबुत अण्डे के अन्दर प्रवेश पा जाते हैं।
2. मछली (Fish):

  • ताजा मछली का मांस ठोस हो।
  • ऊपर की पर्त (Scales) कसी हुई व त्वचा भी जुड़ी होनी चाहिए।
  • अगर मछली पर अंगुली से दबाव डालें तो गड्ढा नहीं पड़ता।
  • अगर पानी में मरी मछली डालें तो वह डूब जाती है।
  • खरीदते समय देखें कि मछली का गलफड़ा (Gills) चमकीले लाल रंग का हो।
  • आँखें चमकीली हों।
  • यदि छूने पर लसलसी हो तो इसका अर्थ है कि मछली फ्रिज या बर्फ पर नहीं रखी थी व बासी पड़ने लगी है।
  • मछली में किसी प्रकार की गन्ध नहीं होनी चाहिए।

3. मांस (Meat): मांस का रंग चमकीला लाल रंग का होना चाहिए। स्पर्श करने पर चिकना व रेशे महीन प्रतीत होने चाहिए। उसके ऊपर लगा वसा सफेद एवं दृढ़ होना चाहिए। गहरे रंग का मोटे रेशे वाला, पीली नारंगी रंग के वसे वाला व स्पर्श पर अत्यधिक नर्म मांस उपयोग के लिए अच्छा नहीं होता।

मांस निम्न पशु के हो सकते हैं –
एक साल तक भेड़ का मांस (Lambs Meat)। एक साल के ऊपर वाली भेड़ का मांस (Mutton)। सूअर का मांस (Pork)। गाय का मांस (Beef)। पोर्क मांस में छोटे जानवर के मांस का रंग भूरे से गुलाबी रंग का हो सकता है परन्तु बड़े जानवर के मांस का रंग गहरे लाल रंग का होता है। सूअर के मांस को खाने से उसमें उपस्थित जीवाणु (Round worm) शरीर में प्रवेश पाकर Trichinosis नामक रोग उत्पन्न करता है इसलिए इसे अच्छी तरह पकाना चाहिए क्योंकि ऊँचे तापक्रम पर यह जीवाणु नष्ट हो जाता है। मांस सदैव साफ, स्वच्छ दुकानों से ही खरीदें। खास कर ऐसी दुकानों से जहाँ इसे ठण्डा रखने का साधन हो।

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सब्जियाँ और फल (Vegetebles and Fruit): सब्जियों व फलों से भोजन रंग, बनावट व सुगन्ध के कारण अधिक आकर्षक हो जाता है। फल व सब्जियों से आहार में खनिज लवण व बी समूह के विटामिनों के अतिरिक्त विटामिन ए व सी भी पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। फल व सब्जियाँ अधिक दिनों तक रखे नहीं जा सकते।

सब्जियाँ (Vegetables):
1. पत्ते वाली सब्जियाँ (Leafy Vegetables): इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के खाद्य आते हैं। जैसे-बथुआ, पालक, सरसों, हरा धनियाँ, मेथी आदि।

  • पत्ते वाली सब्जी का रंग गहरा हरा हो, पीलापन लिये न हो।
  • पत्तियाँ चमकदार व चिकनी हों व मुरझाई न हों।
  • पत्तियाँ कीड़ों द्वारा खाई हुई या कीटाणुयुक्त नहीं होनी चाहिए।
  • पत्तियाँ आधी टूटी या मिट्टी लगी भी नहीं होनी चाहिए।

2. अन्य सब्जियाँ (Other Vegetables): इनके अन्तर्गत बैंगन, खीरा, लौकी, भिण्डी, टमाटर, मटर, फूलगोभी, बन्दगोभी आदि आते हैं।

  • ठोस, नमकीले रंग की हों।
  • कीड़े या चोट नहीं लगे हों।
  • जरूरत से ज्यादा न पकी हों।
  • सूखी, मुरझाई, बेरंगी सब्जियाँ न खरीदें।
  • फल वाली सब्जियाँ रसदार होनी चाहिए।

सब्जी के आकार देखकर सबसे बड़ी सब्जी न उठाएँ। मध्यम आकार की सब्जी अच्छी रहती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार की विधि से बनानी है उस पर भी चयन निर्भर करेगा। टमाटर सलाद के लिए बड़े व ठोस होने चाहिए, परन्तु सब्जी में डालने के लिए छोटे आकार के भी चलेंगे।

3. फल (Fruits): कई फल सब्जियों की तरह उपयोग में आते हैं, जैसे टमाटर। गहरे पीले-नारंगी फलों में विटामिन ए अधिक होता है। आंवला, अमरूद, अनानास में विटामिन सी की मात्रा अधिक है।

  • फल ताजे, पके, भारी, ठोस तथा चमकदार होने चाहिए।
  • वे अत्यधिक पके न हों तथा फफूंदी आदि न लगी हो।
  • सड़े व दागी फल न खरीदें।
  • फल हरे व अधिक कच्चे भी न हों।

खट्टे रसदार फल जैसे संतरा, मौसमी आदि पतले छिलके वाले तथा मध्य आकार के अनुपात में हों तो ऐसे फल अधिक रसदार होते हैं। अन्य फलों में सेब, अनानास, अंगूर आदि आते हैं। केले पीले, थोड़े सख्त खरीदें व कमरे के तापक्रम पर पकने दें। पकने के पश्चात् केले बहुत जल्दी सड़ने लगते हैं। सेब अब पूरे साल ही उपलब्ध होते हैं। अच्छे सेब दृढ, चमकीले रंग के व भारी होते हैं। सेब को लम्बे समय तक रखने से वे बेस्वाद, सुगन्धरहित व भार में हल्के हो जाते हैं। अंगूर रस से भरे, मोटे, चमकीले, टहनी से लगे व लम्बे होने चाहिए।

अनानास अच्छे आकार का, सुगन्ध से भरपूर, पीले रंग का पका हुआ होना चाहिए। पके होने की जाँच करने के लिए उसके ऊपर की पत्तियों को खींच कर देखें। यदि पत्तियाँ आसानी से खिंच जाए तो समझें कि अनानास पका हुआ है। फल हमेशा मौसम में ही खरीदें। बेमौसम के फलों का स्वाद अच्छा नहीं होता तथा शीतगृहों में पड़े रहने के कारण पौष्टिकता भी कम हो जाती है। संग्रह (Storage) खाद्य पदार्थ एन्जाइम व जीवाणुओं के कारण खराब होता है। एक खराब खाद्य पदार्थ को उसकी खट्टी दुर्गन्ध, ऊपर उगी सफेद पर्त तथा लिसलिसे स्पर्श से पहचाना जा सकता है। निम्न तापक्रम खराब होने की क्रिया को कम कर देता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

1. दूध (Milk): दूध को उबाल कर ठण्डा करके बर्तन को ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। गर्मी पाकर दूध शीघ्र खराब हो जाता है। गर्मी के कुप्रभाव से बचने के लिए दूध के बर्तन को पानी से भरी परात में रखना चाहिए। ढक्कन पर गीला रूमाल डाल दें। रेफ्रीजरेटर व आइस बाक्स में भी दूध सुरक्षित रहता है। उबला दूध 12 – 24 घण्टे कमरे के तापक्रम पर रखा जा सकता है।

2. पनीर: पनीर सख्त न हो जाए इसलिए उसे चिकनाई का असर न होने वाले कागज में रखना चाहिए। यह भी जल्दी खराब हो जाता है। इसलिए बर्फ या फ्रिज में दो सप्ताह तक रख सकते हैं।

3. मक्खन: इसे भी मक्खन के कागज या बर्तन में ढंककर ठण्डे स्थान पर दो सप्ताह तक बिना खराब हुए रखा जा सकता है।

4. पशु जन्य खाद्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, कीमा आदि शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। इन्हें जमाव बिन्दु से कुछ कम तापक्रम पर थोड़े समय के लिए रखा जा सकता है। मांस खरीदते समय यह देखें कि दुकान पर

  • मांस लटका हो ताकि उसे हवा लगती रहे।
  • मक्खियों से बचाने की व्यवस्था हो। मलमल के थैले में लटकाना उचित होगा। थैला मांस से स्पर्श करता हुआ नहीं हो।
  • घरों में रेफ्रीजरेटर में ही रखें।

अण्डों को भी ठण्डे स्थान पर फ्रिज में ही रखें।
फल एवं सब्जियाँ: फल और सब्जियाँ ताजा ही प्रयोग में लाना चाहिए। उन्हें टोकरियों में पृथक् फैलाकर रखें। जिस स्थान पर रखें, वह हवादार हो । आलू, प्याज जैसी जड़दार सब्जियाँ ठण्डे तथा अंधेरे स्थान पर रखें जिससे अंकुर न फूटे। फ्रिज में यदि सब्जियाँ खुली रखी जाती हैं तो वह आकार में छोटी होकर झुरियोंदार हो जाती हैं । फ्रिज में क्रिसपर (Crisper) वाले भाग में सब्जियों व फल को सुखाकर थैलियों में डालकर रखें।

II अर्द्ध नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ (Semi-Perishable Foods): इसके अन्तर्गत निम्नलिखित भोज्य पदार्थ आते हैं :
1. अनाज-अनाज के अन्तर्गत गेहूँ व उससे बने अन्य पदार्थ आते हैं, जैसे-मैदा, सूजी, आटा, दलिया आदि। यह सब गेहूँ को पीसकर बनाया जाता है। गेहूँ पीसने से उसकी ऊपरी सतह का ज्यादा क्षेत्र वातावरण के संपर्क में आता है। पकाने में समय कम लगता है और संग्रह कम समय के लिए कर सकते हैं।

साबुत गेहूँ को एक साल या अधिक समय तक संग्रह कर सकते हैं परन्तु उससे बने पदार्थ, जैसे-रवा, मैदा आदि को दो सप्ताह से कुछ महीनों तक ही रखा जा सकता है। दलिया एक पौष्टिक आहार है। एक अच्छा गुण (Quality) वाला दलिया स्वाद में मीठा, फफूंदी व दुर्गन्धरहित होता है परन्तु रखने पर इसमें जल्दी कीड़े पड़ जाते हैं।

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सूजी के कण कई प्रकार के होते हैं। बहुत ही महीन कण वाली सूजी हलवा बनाने के उपयोग में लाई जाती है। थोड़े मोटे कण वाली सूजी उपमा, चिड़वा बनाने के काम में आती है। चयन करते समय कणों की एकरूपता, कणों का जाले से बंधना, पत्थर व गेहूँ के छिलके की अनुपस्थिति देखनी चाहिए। मैदे में कम प्रोटीन, लोहा, व बी समूह के विटामिन पाए जाते हैं। इसे सूजी से भी कम समय के लिए संग्रह कर सकते हैं। अच्छे गुण वाला मैदा सफेद, कीड़े रहित होता है। इसके कण आपस में जुड़कर ढीले नहीं बन जाने चाहिए।

चावल से चिड़वा व फूलिया (Rice fibres, rice puffs) बनाए जाते हैं। फूलिया काफी समय तक रखी जा सकती है। यह कुरमुरी, कंकड़ रहित, मिट्टी रहित होनी चाहिए। चिड़वा सफेद, कुरकुरा, कीड़े रहित व गन्दगी रहित होना चाहिए। अनाज में बहुधा कीड़े लग जाते हैं जो इन्हें काट देते हैं और पोषक तत्त्व को बिल्कुल नष्ट कर देते हैं।

कीड़े लग जाने से अनाज का भार भी कम हो जाता है। हमारे देश में अनाज का प्रमुख स्थान है। चावलों के लिए तो यह प्रसिद्ध है कि वह जितना पुराना होता है, उतना ही स्वादिष्ट तथा अच्छा बनता है। भारतीय ऐसा चावल पसंद करते हैं जो पकने के पश्चात् दाना-दाना अलग दिखाई दे। गेहूँ बहुत पुराना बढ़िया नहीं माना जाता। मार्च और अप्रैल के महीनों में जब गेहूँ की फसल होती है, तब बहुत से घरों में एक साल तक के लिए गेहूँ जमा कर लिया जाता है।

अनाज चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें –

  1. दिखावट।
  2. छूकर अनुभव करना।
  3. रंग।
  4. विभिन्न जाति या प्रकार।
  5. सुगन्ध।
  6. मिलावट, मिट्टी आदि।
  7. कीड़े।
  8. कीमत।

अनाज के कणों में एकरूपता होनी चाहिए। साफ, टूटे टुकड़ों की अनुपस्थिति, कीड़ेरहित, मिट्टी, कंकड़, रेत, तिनकेरहित अनाज के कुछ दाने मुँह में डाल कर चबाने से यदि दाना सख्त तथा मीठा है तो अनाज की किस्म अच्छी है। नमीयुक्त एवं कड़वे स्वाद के अनाज को नहीं खरीदना चाहिए। सूजी, मैदा आदि अधिक मात्रा में नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इनमें कीड़े पड़ जाते हैं।

2. दाल (Pulse): दालों में अरहर, चना, उड़द आदि दालें आती हैं। इन्हें भी अनाजों के समान देखकर चयन करना चाहिए। दालें साबुत और दली आती हैं। सूखे डिब्बों में भर कर रखें। नमी में बहुत जल्दी खराब हो जाती हैं।

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3. वसा व तेल-घी का उपयोग हलवा, तड़का आदि के लिए किया जाता है। मक्खन, डबल रोटी या बेकिंग में उपयोग होता है। तेल सब्जियों के पकाने, तलने आदि के काम में आता है। हर प्रान्त में भिन्न प्रकार का चिकना पदार्थ पकाने के काम में आता है। बंगाल में सरसों का तेल, केरल में नारियल का तेल, गुजरात में मूंगफली का तेल उपयोग में ज्यादा आता है।
वसा या तेल खरीदते समय

  • सुगन्ध
  • वास्तविक रंग
  • अन्य किसी तेल का मिश्रण
  • गन्दगी
  • दुकान पर सफाई से रखा देखकर ही लेना चाहिए।

तेल, घी खुला न लेकर बन्द डिब्बे में ही खरीदना चाहिए क्योंकि खुली चीजों में मिलावट आसानी से की जा सकती है।

संग्रह (Storage): कई घरों में एक भण्डार गृह होता है।

भण्डार (Store Room): घर में संग्रहीकरण हेतु एक भण्डार गृह का होना आवश्यक है। इसमें नमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा वस्तुएँ खराब हो जाएँगी। दीवारों पर यदा-कदा सफेदी कराते रहना चाहिए। भण्डार गृह में वायु तथा धूप आने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। फर्श पक्का होना चाहिए। कच्चे फर्श पर ईंटें या लकड़ी के तख्ने रखकर उस पर डिब्बे, कनस्तर आदि रखने चाहिए।

उसमें अलमारियाँ, एक मेज, तराजू तथा एक हिसाब लिखने की पुस्तिका भी होनी चाहिए। दाल के लिए ऐसे डिब्बें हों जिनमें वायु प्रवेश न कर सके। आटे के लिए कनस्तर तथा गेहूँ के लिए टंकी होनी चाहिए। डिब्बों, कनस्तरों व टंकियों पर पेण्ट कर देना चाहिए तथा उनमें रखी वस्तु के नाम का लेबिल लगाना चाहिए ताकि इन्हें निकालने में सुविधा रहे।

1. अनाज (Cereals): गेहूँ को सुरक्षित रखने के लिए सर्वप्रथम धूप में भली-भाँति सुखा लेना चाहिए तथा ड्रम में भरते समय छाया में सूखी हुई नीम की पत्तियाँ डाल देनी चाहिए। इससे गेहूँ में घुन नहीं लगता। नीम की पत्तियाँ कीटाणुनाशक एवं नि:संक्रामक होती हैं। यदि नीम की पत्ती न हो तो कीटाणुनाशक औषधि डाल कर सुरक्षित रखा जा सकता है परन्तु प्रयोग में लाने से पूर्व धोकर सुखा लेना चाहिए जिससे कीटाणुनाशक औषधि का असर न हो।

आटा अधिक नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि अधिक रहने पर उसमें सीलन आ जाती है और कीड़े पड़ जाते हैं। आटे को सदैव ढककर सूखे स्थान पर रखना चाहिए। नया आटा लाने से पूर्व पुराने को काम में ले लेना चाहिए। चावल इल्लियों द्वारा नष्ट होता है। इनमें गुच्छियाँ बंध जाती हैं। सुरक्षा के लिए हल्दी व तेल का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने से कीड़े चावल को खराब नहीं करते । चावल को धूप में नहीं सुखाना चाहिए। इससे यह टूट जाता है।

2. दाल (Pulse): प्राय: दालों को भी पूरे मास की आवश्यकतानुसार खरीदा जाता है। साबुत दाल को दलने से पूर्व साफ करके तेल और पानी लगाकर रात भर बोरी या अन्य कपड़े में रख देना चाहिए। दूसरे दिन 3-4 घण्टे तक धूप में सुखाकर दल लेना चाहिए। दाल को संग्रह करने से पूर्व छाँट, फटककर दिन भर तेज धूप में सुखाना चाहिए ताकि नमी न रहे। कीड़ों से बचाने के लिए हींग के टुकड़े रख देने चाहिए। फिर इन्हें सूखे डिब्बों में भली प्रकार बन्द करके रखना चाहिए। डिब्बा हवा बन्द (Air tight) हो व नमी वाले स्थान पर न रखें। समय-समय पर दालों का निरीक्षण करते रहें।

3. शक्कर (Sugar): शक्कर शीघ्रता से खराब नहीं होती । इसलिए इसे पर्याप्त मात्रा में खरीद सकते हैं। इसे नमी से दूर रखना चाहिए । इसे इस प्रकार सुरक्षित बर्तन में रखना चाहिए कि चींटियाँ व कीड़े-मकोड़े प्रवेश न कर सकें।

4. चाय तथा कॉफी (Tea and Coffee): इसके लिए किसी ऐसे बर्तन की आवश्यकता है जिसमें वायु प्रवेश नहीं कर सके । इसे नमी से बचाने के लिए टिन या प्लास्टिक के डिब्बे में रखना चाहिए।

5. घी (Ghee): घी को अधिक दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए उसे खूब गरम करके छान कर छाछ निकाल दें। तत्पश्चात् उसमें थोड़ा-सा नमक का ढेला डालकर किसी बर्तन में संगृहीत कर सकते हैं। इसे शीतल हवादार स्थान पर रखना चाहिए। अधिक गर्मी से इसका स्वाद बिगड़ जाता है।

6. मसाले (Spices): साधारणतः हल्दी, धनिया, लाल मिर्च आदि मसाले घर में प्रयुक्त किए जाते हैं। सभी मसालों को बाजार से खरीदने के बाद भली प्रकार साफ करना चाहिए । इसके बाद उन्हें आवश्यकतानुसार तब तक कड़ी धूप में सुखाना चाहिए जब तक कि उनमें से नमी पूर्णतः न निकल जाए। तत्पश्चात् उन्हें कूटकर सूखे व ढक्कनदार बर्तनों में रखना चाहिए । धनिया को सुरक्षित रखने के लिए उसमें हींग की डेली डाल देनी चाहिए। मिर्च को जाले से सुरक्षित करने के लिए एक किलो पीसी मिर्च में 100 ग्राम पीसा नमक मिला दें। हल्दी समय-समय पर सुखाते रहें। मसालों को नमी से हमेशा बचाते रहें।

III. अनाशवान भोज्य पदार्थ (Non-Perishable Foods): डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ के लिए ISI: FPO अथवा Agmark वाले खाद्य पदार्थों पर दिए गए पैकिग की तारीख देखकर ही खरीदना चाहिए। सुविधा वाले खाद्य-पदार्थों का क्रय-इन खाद्य पदार्थों का सोच-विचार कर चयन करने के पश्चात् इन्हें क्रय करना होता है। क्रय करते समय कई बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जिनका उल्लेख नीचे किया गया है:

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1. डबल रोटी तथा अन्य सेंके हुए पदार्थ (Bakery Products): इन्हें हमेशा साफ, विश्वसनीय दुकानों से खरीदना चाहिए। क्रय करने से. पूर्व उनकी ताजगी का निरीक्षण कर लेना चाहिए। बासी सेंके हुए पदार्थ कदापि नहीं खरीदने चाहिए क्योंकि एक या दो दिन के भीतर अनुचित परिस्थितियों में फफूंदी इन पर उगने लगती है। प्रारम्भ में यह फफूंदी बहुत कम मात्रा में होने के कारण स्पष्ट दिखाई नहीं देती परन्तु खाने पर शरीर के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है। यदि डबल रोटी को फ्रीज में रखना हो तो एक दिन की पुरानी डबल रोटी लेनी चाहिए क्योंकि ताजी डबल रोटी फ्रिज में रखने से गीली-गीली (Soggy) हो जाती है।

2. डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ (Canned foods): डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ, जैसे-जैम, जैली, मांस, फल, सब्जियाँ आदि क्रय करते समय डिब्बे का निरीक्षण करना चाहिए। यदि डिब्बा कहीं से फूला हुआ या पिचका हुआ हो तो उसे कभी भी नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि वह डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ के खराब होने का सूचक है। डिब्बे पर दी हुई खराब होने की सम्भावित तिथि को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिन पदार्थों की तिथि निकल चुकी हो या निकट भविष्य में हो उन्हें क्रय नहीं करना चाहिए। शीशे, प्लास्टिक एवं पालीथिन में पैक किए गए खाद्य पदार्थों को बाहर से देखा जा सकता है। अतः इनका निरीक्षण करने के पश्चात् इन्हें खरीदना चाहिए।

3. पापड़, चिप्स अथवा सूप, डोसा आदि के तैयार पाउडर-इन खाद्य पदार्थों को खरीदने से पूर्व इनके लेबल पर दिए गए निर्देशों से भली प्रकार परिचित हो जाना चाहिए । इनकी खराब होने की सम्भावित तिथि को पढ़कर ही इन्हें खरीदना चाहिए। क्रय करने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि इनके पैकेट अच्छी तरह से बन्द हैं या नहीं। फटे हुए, पुराने पैकेटों को खरीदना उचित नहीं है क्योंकि इनके शीघ्र खराब होने का भय रहता है।

4. जमे हुए खाद्य पदार्थ (Frozen foods): जमे हुए खाद्य पदार्थ केवल उतनी ही मात्रा में खरीदने चाहिए जितनी मात्रा में उन्हें घर पर सुरक्षित फ्रीज में रखा जा सके। इन्हें अधिक समय तक नहीं रखना चाहिए। क्रय करने के तुरत बाद ही प्रयोग में लाने तक इन्हें इसी जमी हुई दशा में रखनी चाहिए। एक बार जमे हए पदार्थ को बाहर निकालने पर प्रयोग कर लेना चाहिए क्योंकि यह कमरे के तापमान पर शीघ्र ही नष्ट होने लगते हैं। हमारे देश में कम साधनों की उपलब्धि के कारण इनका प्रचलन बहुत कम है।

सुविधा वाले खाद्य पदार्थों का संग्रह (Storage): सुविधा वाले खाद्य पदार्थों को खरीदने के पश्चात् उनका संग्रह करना भी आवश्यक है। डबल रोटी तथा सेंके हुए पदार्थों को अधिक समय के लिए संग्रह नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें उपस्थित नमी के कारण इनके खराब होने का भय बना रहता है। जहाँ तक सम्भव हो इन्हें ताजा खरीदकर ही प्रयोग करना चाहिए। यदि इन्हें संग्रह करना पड़े तो किसी चीज में भली प्रकार लपेट कर किसी ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। डबल रोटी का मिट्टी या चीनी-मिट्टी के बर्तन में रखना चाहिए। धातु के बर्तन में रखने से रोटी पसीजकर धातु की दुर्गन्ध से युक्त हो जाती है।

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बर्तन के ऊपर हवादार ढक्कन होना चाहिए. ताकि उसे मक्खियों से बचाया जा सके। पापड़, चिप्स तथा अन्य सूखे हुए पदार्थों या मिश्रणों को पालीथिन के पैकेटों में किसी साफ स्थान पर रखना चाहिए। इन्हें आवश्यकता से बहुत अधिक मात्रा में नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इनके खराब होने का भय रहता है। डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थों को फ्रिज में रखना चाहिए तथा एक बार खोलने के पश्चात् इन्हें शीघ्र ही प्रयोग कर लेना चाहिए। जमे हुए खाद्य पदार्थों को जमे हुए रूप में ही संगृहीत करना चाहिए। यदि इन्हें जमी हुई स्थिति में न रखा जा सके तो शीघ्र ही इनका प्रयोग कर लेना आवश्यक है। इन खाद्य पदार्थों को खरीदने की तिथि इन पर लिख देनी चाहिए तथा इनका निरीक्षण करते रहना चाहिए। खराब होने से पूर्व इनका उपयोग कर लेना चाहिए।

प्रश्न 5.
खाद्य संदूषण को प्रभावित करने वाले कारकों को विस्तारपूर्वक समझाइए। [B.M.2009A]
उत्तर:
खाद्य पदार्थ जीवाणुओं तथा उनमें उपस्थित एन्जाइमों के कारण संदूषित होते हैं। खाद्य पदार्थ में तथा उसके आस-पास के वातावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तन उसे दूषित करते हैं। खाद्य पदार्थों को बाह्य चोट भी उनके खराब होने का एक कारण है। खाद्य पदार्थों : को संदूषित करने वाले कारकों की सूची बना सकते है सूची निम्न है –

  • जीवाणु तथा एन्जाइमों की उपस्थिति।
  • रासायनिक क्रियाएँ।
  • बाह्य चोट।
  • चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा नुकसान या अजैविक संदूषण।

1. जीवाणु तथा एन्जाइमों द्वारा संदूषण (Bacterial / Enzymatic Spoilage): कुछ जावाण तो खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूस से ही पाये जाते हैं और कुछ फसल कटने, यातायात, सग्रहण, हम्तन व पकाने के समय खाद्य पदार्थों में प्रवेश कर जाते हैं। ये जीवाणु हैं बैक्टीरिया, उत्प्रेरक, खमीर, फफूंदी आदि। जैव प्रक्रियाओं में कुछ मात्रा में एन्जाइम की उत्पत्ति होती है।

कुछ बैक्टीरिया औरों की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ते हैं। जल्द ही इनकी संख्या भोज्य पदार्थ में अत्यधिक बढ़ जाती है। अधिकतर बैक्टीरिया कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों में ही अपने नए वातावरण में पूर्ण रूप से ढल जाते हैं। इसलिए आपको यह निश्चित कर लेना चाहिए कि खरीदे हुए खाद्य पदार्थ को चार घंटों में ही खाने से पहले गर्म करना है या ठंडा।

एन्जाइम खाद्य पदार्थों का अभिन्न अंग है। हम जानते हैं कि टमाटर/आम का पकना एन्जाइम के कारण ही होता है। एन्जाइम क्रियाशील होने पर खाद्य पदार्थ के रंग, स्वाद, सुगंध व रचना में परिवर्तन आने लगते हैं। इनके अधिक समय तक क्रियाशील रहने पर खाद्य पदार्थ अत्यधिक पक कर सड़ने लगते हैं। एन्जाइम क्रिया द्वारा लाए गए इच्छित परिवर्तन ‘सकारात्मक’ कहलाते हैं जबकि अनैच्छिक परिवर्तन जिससे भोज्य पदार्थ सड़ने लगते हैं ‘नकारात्मक’ कहलाते हैं।

2. रासायनिक व जैव-रासायनिक संदूषण (Chemical/Biochemical Spoilage): कीटनाशकों, रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से भी खाद्य पदार्थों में संदूषण हो सकता है। जबकि जैव-रासायनिक संदूषण; जीवाणुओं द्वारा उत्पादित विष तथा उनकी जैव-क्रियाओं के अवशेषों द्वारा उत्पन्न होता है।

3. बाह्य चोट द्वारा खाद्य पदार्थों में संदूषण-प्रकृति ने खाद्य पदार्थों को सुरक्षा कवच प्रदान किए हैं। ये हमारी त्वचा की भाँति ही कार्य करते हैं। आहार हस्तन के गलत तरीकों से ये कवच खराब हो जाते हैं। साथ ही बाह्य चोट खाद्य पदार्थ की रचना तथा दिखावट पर भी प्रभाव डालती है। इससे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होते हैं तथा उनका क्रय मूल्य भी कम होता जाता है।

4. चूहों, कीड़ों, झींगुरों द्वारा अजैविक खाद्य संदूषण (Rats, Insects, Non Biological Spoilage of food): चूहे फसलों को अत्यधिक नुकसान पहुंचाते हैं। चूहों के मल-मूत्र से होने वाले संक्रमण को “स्पाइरोचीटल संक्रमण” कहते हैं। कीड़े अनाज में छेद करके उसके कार्बोज को खा जाते हैं। इन छेद वाले दानों में से बदबू-सी आने लगती है और यह खाने के योग्य नहीं होते। झींगुरों के लार से अनाज के दाने चिपके हुए-से दिखाई देते हैं। इनसे अनाज में बदबू पैदा हो जाती है। चूहे, कीड़े व झींगुर खाद्य फसलों को प्रति वर्ष काफी नुकसान पहुंचाते हैं।

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प्रश्न 6.
संदूषण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ (Situations helping in food spoilage) कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:
संदूषण को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं –
1. जैविक खाद्य पदार्थ
2. अनुरूप तापमान
3. नमी/पानी
4. हवा और
5. अनुरूप pH

1. जैविक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता (Availability of Biological Foods): सभी जीवित प्राणियों की भाँति जीवाणुओं को भी जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। बैक्टीरिया सूक्ष्म-जीव होते हैं, इसलिए उन्हें बहुत थोड़ा भोजन चाहिए। थोड़ा-बहुत प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट, चाकू के किनारे पर लगा खाद्य पदार्थ, सब्जी काटने के बोर्ड पर अथवा डिब्बों के किनारों पर थोड़ा बहुत लगा खाद्य पदार्थ उनके लिए दावत के समान हैं। इसलिए खाद्यं पदार्थों के संपर्क में आने वाले सभी उपकरण अच्छी तरह से साफ होने चाहिए। साथ ही खाद्य संग्रहण तथा खाद्य हस्तन स्वच्छता के नियमों के अनुसार ही करना चाहिए।

2. अनुरूप तापमान (Favourable Temperature): विभिन्न बैक्टीरिया की वृद्धि के लिए अलग-अलग तापमान की आवश्यकता होती है। साइक्रोफिलिक (Psychrophilic) बैक्टीरिया शीतल तापमान पर बढ़ते हैं। माइक्रोफिलिक (Microphilic) बैक्टीरिया हमारे सामान्य तापमान पर बढ़ते हैं। गर्मी पसंद करने वाले बैक्टीरिया को थर्मोफिलिक (Thermophilic) कहते हैं, क्योंकि ये अत्यधिक गर्म तापमान लगभग 140°F तक सह सकते हैं, खाद्य पदार्थों को संदूषित करने वाले बैक्टीरिया अधिकतर 70°F-80°F में वृद्धि करते हैं। यदि खाद्य पदार्थ में बैक्टीरिया की. संख्या व तापमान कम है तो वह अधिक समय तक रखा जा सकता है। खाद्य पदार्थ जितने समय के लिए स्वादिष्ट व खाने योग्य (फसल कटने के समय से लेकर, सुरक्षित करने के बाद खाने तक) रहते हैं, उसे उसकी ‘शैल्फ लाइफ’ कहते हैं।

3. नमी, पानी की उपलब्धता (Moist/Water Availability): सभी जीवित पदार्थों के जीवन के लिए पानी की आवश्यकता होती है। ताजे खाद्य पदार्थों में अधिक नमी होती है जो जीवाणुओं की वृद्धि में सहायता करती है। जीवाणु में एन्जाइम उसकी कोशिका से निकलकर खाद्य पदार्थ से मिलकर फिर वापस कोशिका में आ जाते हैं।

यह प्रक्रिया निरन्तर जीवाणुओं की वृद्धि के साथ-साथ चलती रहती है। दुग्ध पाउडर, सूप-पाउडर, व सूखे अनाज देर तक खाने योग्य रहते हैं क्योंकि उनमें कुछ सूक्ष्म जीव तो हैं किन्तु उनमें नमी जो कि इसे सूक्ष्म जीवों की वृद्धि में सहायक है, नहीं होती। इसी प्रकार अचार व जैम में नमक व चीनी डालने से सूक्ष्मजीवियों को नमी नहीं मिल पाती और उनकी वृद्धि नहीं होती।

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4. हवा की उपलब्धता (Availability of Air): हवा सभी जीवों के जीवन का अभिन्न अंग है। सूक्ष्म जीवों को अपनी वृद्धि के लिए वायु की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें हवा न मिले तो उनकी प्रक्रिया धीमी हो जाती है। बोतल बंद, डिब्बा बंद व बाँधे हुए खाद्य पदार्थों में हवा प्रवेश नहीं कर पाती, किंतु कुछ अत्यधिक विषाक्त जीवाणु बिना हवा के भी जीवित रह सकते और इनके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

5. अनुरूप खाद्य pH की उपलब्धता (Availability of Required pH): खाद्य पदार्थों में pH खाद्य संदूषण को प्रभावित करती है। pH पदार्थों की अम्लता व क्षारता को बताती है। pH-7 होने का तात्पर्य है कि खाद्य पदार्थ उदासीन है। अधिक जीवाणु उन खाद्य पदार्थों को संदूषित करते हैं जिनके माध्यम pH-7 के आसपास हो, जैसे प्रोटीन व मांसाहारी खाद्य पदार्थ, नींबू का रस, सिरका, खटाई इत्यादि खाद्य पदार्थ pH को कम करते हैं तथा उन खाद्य पदार्थों को संदूषण से बचाते हैं। खमीर कम pH वाले खाद्य पदार्थों पर हमला करते हैं जिनमें चीनी होती है, जैसे जैम आदि। ये चीनी से जीवित रहने के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं और उसे एल्कोहल व.CO2 में बदल देते हैं। खमीर के इस गुण को शराब बनाने के उद्योग में भरपूर प्रयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 7.
भोजन पकाने की विधियों का उल्लेख करते हुए उनके लाभ-हानि बताइए।
उत्तर:
भोजन पकाने की विधियाँ (Methods of food preparation): भोजन पकाने के लिए कई विभिन्न प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु सभी विधियों में ताप की आवश्यकता होती है।
पकाने के माध्यम के आधार पर इन विधियों को हम दो मुख्य भागों में बांटते है –

  1. आई ताप द्वारा पकाना (Moist Heat)।
  2. शुष्क ताप द्वारा पकाना (Dry Heat)।

1.आर्द्र ताप द्वारा पकाना-आई ताप द्वारा पकाने के लिए माध्यम के रूप में जल का प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग के अन्तर्गत निम्न विधियाँ आती हैं
(a) उबालना (Boiling)
(b) भाप से पकाना (Steaming)।
(c) धीमी आग पर पकाना या स्टूयिंग (Stewing)

(a) उबालना-इस विधि में खाद्य पदार्थ को जल के सीधे सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है। यह भोजन पकाने की सरल विधि है। पकाने की विधि-किसी बर्तन में जल लेकर उसमें खाद्य पदार्थ डालकर, आग पर रखकर तब तक उबाला जाता है, जब तक गल न जाए। उबालने की विधि में ताप 100° सेंटीग्रेड या 212° फारेनहाइट होना चाहिए। पानी गर्म होने पर जब उसकी सतह पर बुलबुले उठने लगे तो समझना चाहिए कि पानी में उबाल आने लगा है। जब पानी उबलने लगे तो आग धीमी कर देनी चाहिए और खाद्य पदार्थ के गलने पर आग बन्द कर देनी चाहिए।

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उबालने के लाभ (Advantages of Boiling): खाद्य पदार्थ को उबाल कर पकाने से निम्न लाभ हैं –
1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना (Easy to digest): पानी में उबाला गया खाद्य पदार्थ गलने पर सुपाच्य हो जाता है। यह आसानी से पक जाता है तथा रोगियों के लिए विशेषकर श्रेष्ठ समझा जाता है।
2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना (Making the food Nutritious): यदि उबालने की विधि का ठीक ढंग से प्रयोग किया जाए तो खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है।

उबालने से हानियाँ (Losses due to Boiling):
खाद्य पदार्थों को जहाँ उबालकर पकाने से लाभ हैं, वहाँ कुछ हानियाँ भी हैं –

1. खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता में कमी होना (Loss of nutritive value of foods): खाद्य पदार्थों को उबालने से उनके कुछ पोषक तत्त्व, स्वाद एवं सुगन्ध जल में आ जाते हैं जिससे खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनाए रखने के लिए उन्हें छिलकों सहित पर्याप्त जल में ही उबालना चाहिए तथा जिस जल में यह उबाले जाएँ उसे सूप बनाने, आटा गूंथने आदि के काम में लाना चाहिए।

उबालने की विधि से खाद्य पदार्थ में उपस्थित जल में घुलनशील विटामिन जैसे बी समूह के विटामिन और विटामिन सी तथा कुछ खनिज लवपानी में आ जाते हैं तथा इस पानी को फेंक देने से ये पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता को बनाए रखने के लिए उबालते समय उसे ढंककर रखना चाहिए। ढंककर पकाने से उबालने की विधि में कम समय लगता है तथा पानी कम सूखता है।

2. खाद्य पदार्थ का रंग नष्ट होना (Loss of colour of food): उबालने की विधि में कुछ मात्रा में खाद्य पदार्थों का रंग भी नष्ट हो जाता है। विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों को ढंककर पर्याप्त जल में पकाने से उनका रंग कम नष्ट होता है। उबालने की विधि द्वारा चावल, दालें, सब्जियाँ, सूप आदि बनाए जाते हैं।

(b) भाप से पकाना (Steaming): इस विधि में जल के स्थान पर पकाने का कार्य भाप के माध्यम से किया जाता है। इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ को पकाने में समय अधिक लगता है परन्तु खाद्य पदार्थ अधिक सुपाच्य एवं हल्का हो जाता है तथा उसमें उपस्थित पोषक तत्त्व कम मात्रा में नष्ट होते हैं । इस विधि द्वारा पकाया हुआ भोजन रोगियों के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है। भाप द्वारा पकाने की विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है। भाप द्वारा खाद्य पदार्थों को तीन विधियों द्वारा पकाया जाता है

  1. प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Direct Steaming)
  2. अप्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Indirect Steaming)
  3. 9474 o Gala GRT 400191 (Pressure Steaming)

1. प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Direct Steaming): इस विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के सीधे सम्पर्क से पकाया जाता है। विधि-किसी बर्तन में पानी उबाला जाता है तथा उस पर छलनी में खाद्य पदार्थों को रखकर बर्तन को ढक्कन से ढंक देते हैं। पानी से भाप निकलकर छलनी के छिद्रों द्वारा खाद्य पदार्थ के सम्पर्क में आती है और वह खाद्य पदार्थ पक जाता है। यदि जाली न हो तो किसी पतले कपड़े में खाद्य पदार्थों को बाँधकर बर्तन में लटकाया जा सकता है।

बाजार में कुछ विशेष प्रकार के स्टीमर भी मिलते हैं। इसमें ढक्कनदार बर्तन होता है तथा ढक्कन में जालीदार थाली सी लगी होती है। जिस पर खाद्य पदार्थों को रखकर पकाया जाता है। कई स्टीमर में दो या अधिक जाली भी होती है जिससे उनमें एक ही समय में एक साथ दो या तीन खाद्य पदार्थों को.पकाया जा सकता है। भाप के सीधे सम्पर्क में आने के कारण इन खाद्य पदार्थों में से जल में घुलनशील विटामिन बी तथा सी नष्ट हो जाते हैं।

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2. अप्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा पकाना (Indirect Steaming): इस विधि में खाद्य पदार्थ को भाप के सीधे सम्पर्क में नहीं लाया जाता है। विधि-किसी बर्तन में पानी को उबालने के लिए आग पर रखते हैं। किसी अन्य छोटे बर्तन में खाद्य पदार्थ को रखकर उस बड़े बर्तन में रख दिया जाता है तथा ढक्कन बन्द कर देते हैं। पानी द्वारा बनी भाप छोटे बर्तन में रखे पदार्थों को गर्म करती है तथा पदार्थ अपने जलांश द्वारा पक जाते हैं।

उदाहरण के लिए कस्टर्ड या पुडिंग बनाते समय दूध, अण्डे आदि के मिश्रण को छोटे बर्तन में रखकर इस बर्तन का मुंह ढक्कन या बटर पेपर (Butter Paper) से भली प्रकार बन्द करके किसी पानी से भरे बर्तन में रख देते हैं तथा इस पानी को उबालते हैं और दूध का मिश्रण पक जाता है। इस विधि में क्योंकि खाद्य पदार्थ केवल अपने जलांश द्वारा ही पकता है तथा पानी या भाप के सम्पर्क में नहीं आता है, अतः इनमें से विटामिन और खनिज लवण बहुत कम मात्रा में नष्ट होते हैं।

3. भाप के दबाव द्वारा पकाना (Pressure Steaming): इस विधि में भाप द्वारा बने दबाव की सहायता से खाद्य पदार्थ को पकाया जाता है। दबाव में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ ताप में भी बढ़ोतरी आ जाती है। कई बार किसी खाद्य पदार्थ को जल्दी उबालने के लिए बर्तन के ढक्कन पर कोई भारी वस्तु रखकर दबाव को अधिक किया जाता है जिससे पानी से बनी भाप बाहर न निकलने के कारण अन्दर दबाव अधिक कर देती है जिससे ताप अधिक हो जाता है और वह खाद्य पदार्थ जल्दी पक जाता है।

आजकल भाप के दबाव द्वारा पकाने के लिए प्रेशर कूकर (Pressure Cooker): का प्रयोग किया जाता है। प्रेशर कूकर का ढक्कन बाहर नहीं निकला होता है जिससे भाप अन्दर दबाव को बढ़ाती है जिससे खाद्य पदार्थ जल्दी पक जाता है। प्रेशर कूकर में विभिन्न खाद्य पदार्थों को उनकी क्षमता के अनुसार भिन्न-भिन्न दबाव पर पकाया जाता है।

इसमें 5, 10 और 15 पौंड दबाव किया जा सकता है। 15 पौंड के दबाव पर प्रेशर कूकर के अन्दर का ताप लगभग 250° फारेनहाइट होता है। यह देखा गया है कि प्रत्येक 20 फारेनहाइट ताप की वृद्धि करने पर खाद्य पदार्थ पकाने का समय लगभग आधा हो जाता है। इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते हैं।

भाप द्वारा पकाने के लाभ (Advantages of Boiling):
भाप द्वारा पकाने के कई लाभ हैं:
1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना (Making the food easy to digest): भाप द्वारा पकाया गया भोजन हल्का एवं सुपाच्य होता है। यही कारण है कि रोगियों एवं वृद्धों के लिए भोजन पकाने की इस विधि का प्रयोग किया जाता है।
2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना (Making the food stuff Nutritious): इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन के पोषक तन्व नष्ट नहीं होते और खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है विशेषकर अप्रत्यक्ष भाप द्वारा पकाने एवं भाप के दबाव द्वारा पकाने की विधि सर्वोत्तम मानी जाती है।
3. ईंधन की बचत (Saving of fuel): भाप के दबाव द्वारा पकाने से भोजन शीघ्र बन जाता है तथा ईंधन की बचत होती है।
4. खाद्य पदार्थ के रंग व रूप में परिवर्तन न होना: खाद्य पदार्थ का रंग व रूप वैसा ही बना रहता है।

(C) धीमी आग पर पकाना या स्टूयिंग (Cooking slow heat or stewing): इस विधि में खाद्य पदार्थ को जल के सीधे सम्पर्क से पकाया जाता है।

विधि: जिस खाद्य पदार्थ को स्टूय बनाना हो, उसे छीलकर उसके बारीक-बारीक टुकड़े करके किसी बर्तन में लेकर इतना पानी डालें कि खाद्य पदार्थ भली प्रकार पक जाए । फिर इसे धीमी-धीमी आग पर खाद्य पदार्थ को गलने तक पकाते रहें। उदाहरण के लिए सेब का स्ट्रय बनाने के लिए सेब को छीलकर उसके बारीक-बारीक टुकड़े काट कर उसमें पर्याप्त मात्रा में पानी डाल कर और थोड़ी-सी चीनी डालकर धीमी-धीमी आग पर पकाते रहें। जब सेब गल जाए तो उसे उसमें उपस्थित पानी-रसे के साथ ही परोसें।

स्टूयिंग करने से लाभ (Advantages of Stewing):

  1. खाद्य पदार्थ सुपाच्य होना-इस विधि से चूँकि खाद्य पदार्थ धीमी-धीमी आग पर अधिक समय के लिए पकाते हैं, अतः वह सुपाच्य हो जाता है।
  2. खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना-खाद्य पदार्थ जिस पानी में पकाया जाता है, उसे साथ ही परोस देते हैं। अत: खाद्य पदार्थ की पौष्टिकता बनी रहती है।
  3. श्रम की बचत-इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ पकाने से श्रम कम लगता है तथा खाद्य पदार्थ के जलने का भय नहीं होता है।
  4. ईंधन की बचत-धीमी-धीमी आग पर पकाने के कारण ईंधन की बचत होती है।

स्टूयिंग से हानियाँ (Disadvantages of Stewing) :
1. अधिक समय लगना-इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ बहुत धीमी-धीमी आग पर पकाया जाता है जिससे समय अधिक लगता है।
2. दाँतों का कम कार्य-इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन को खाने के लिए दाँतों को कम कार्य करना पड़ता है। अतः दाँतों के काटने की क्रिया एवं लार रस द्वारा आशिक पाचन की कमी रहती है।

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2. शुष्क ताप द्वारा पकाना (Dry Heat): शुष्क ताप द्वारा पकाने के लिए माध्यम के रूप में वायु एवं चिकनाई का प्रयोग किया जाता है। इस वर्ग के अन्तर्गत निम्न विधियाँ आती हैं
(क) वायु को माध्यम के रूप में प्रयोग करके निम्न विधियों का प्रयोग करते हैं –

  • भूनना (Roasting)
  • अंगीठी पर भूनना (Grilling)
  • सेंकना (Baking)

(ख) चिकनाई को माध्यम के रूप में प्रयोग करके निम्न विधियों का प्रयोग करते हैं
तलना (Frying):
यह दो प्रकार की होती है:

  • उथली विधि (Shallow frying)
  • गहरी विधि (Deep frying)

(क) वायु को माध्यम के रूप में प्रयोग करना :
1. भूनना (Roasting): इस विधि में खाद्य पदार्थ सीधा आग के सम्पर्क में नहीं आता है, शुष्क गर्म वायु माध्यम का कार्य करती है। भूनने की विधि में खाद्य पदार्थ को गर्म रेत या राख में दबा दिया जाता है। इस विधि द्वारा आलू, शकरकंद, मूंगफली, अरबी आदि भूने जाते हैं। रेत को भट्टी में गर्म करके या अंगीठी के नीचे जो गर्म-गर्म राख निकलती है उसमें खाद्य पदार्थ को दबाकर भूना जाता है। इस विधि द्वारा भोजन छिलकों सहित पकाना चाहिए तथा भूनने के पश्चात् उसे साफ करके छिलका अलग कर देना चाहिए।

भूनने से लाभ (Advantages of Roasting) :
खाद्य पदार्थ पौष्टिक होना-जब खाद्य पदार्थ छिलके सहित भूना जाता है तो उसकी पौष्टिकता बनी रहती है और कोई भी पोषक तत्त्व बाहर नहीं निकलता है।

भूनने से हानियाँ-(Disadvantage of Roasting):

  1. कई बार खाद्य पदार्थ अधिक गर्म रेत या राख के कारण जल जाता है।
  2. यदि रेत या राख गर्म न हो तो खाद्य पदार्थ कच्चे रहने की सम्भावना रहती है।
  3. यदि खाद्य पदार्थ को बराबर उल्टा-पुल्टा न जाए तो वह कहीं से कच्चा और कहीं से पक जाता है।

2. अंगीठी पर भूनना (Grilling): इस विधि में खाद्य पदार्थ को आग के सीधे सम्पर्क में लाकर पकाया जाता है तथा शुष्क वायु ही माध्यम का कार्य करती है। जिस खाद्य पदार्थ को ग्रिलिंग द्वारा पकाना हो उसे आग पर रख दिया जाता है तथा उसे थोड़े-थोड़े समय के बाद उलटते-पलटते रहते हैं जिससे वह चारों ओर से बराबर-बराबर पक जाए।

साबुत खाद्य पदार्थों को ग्रिल करने के लिए उन पर थोड़ा सा घी या तेल लगा देते हैं जिससे वह एकदम जले नहीं और उनका रंग बना रहे। ग्रिलिंग करने के लिए एक विशेष प्रकार का उपकरण जिसे ग्रिल कहते हैं, का प्रयोग किया जाता है। ग्रिल में खाद्य पदार्थ रखने से पहले इसके चारों ओर चिकनाई लगा देते हैं जिससे खाद्य पदार्थ इन पर नहीं चिपके। ग्रिल को उलटने-पलटने के लिए इन पर हत्थे लगे होते हैं।

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बैंगन, मछली, मुर्गी आदि खुली आग पर भूने जाते हैं। सींक कबाब बनाने के लिए मांस के तैयार मिश्रण को सींक में पिरोकर घी लगाकर खुली आग पर भूना जाता है। खुली आग पर भूनने के लिए भी खाद्य पदार्थ को छिलका सहित भूनना चाहिए अन्यथा पौष्टिक तत्त्व काफी मात्रा में नष्ट हो जाते हैं। इस विधि द्वारा पकाने से लाभ और हानियाँ भूनने की विधि से होने वाले लाभ और हानियों जैसी हैं।

3. सेंकना (Baking): इस विधि से भी पकाने के लिए माध्यम के रूप में शुष्क वायु का प्रयोग किया जाता है। सेंकने के लिए तन्दूर या भट्टी का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में गर्म वायु से पूरी भट्टी का तापक्रम एक-सा हो जाता है। किसी भी पदार्थ को लेकर उसे गर्म भट्टी में रख देते हैं और भट्टी का मुँह बन्द कर देते हैं। वायु गर्म होकर खाद्य पदार्थ के चारों ओर घूमती है और उसे पका देती है।

इस विधि द्वारा केक, पेस्ट्री, बिस्कुट, नानखटाई, डबल रोटी आदि बनाये जाते हैं। साधारणतया भट्टी का तापमान 250° फारेनहाइट से लेकर 500° फारेनहाइट का होता है तथा प्रत्येक खाद्य पदार्थ को पकाने के लिए अलग-अलग ताप उचित रहता है। आजकल बिजली की भट्टी (Electric Oven) भी बाजार में उपलब्ध हैं जिनमें तापमान को आवश्यकतानुसार नियन्त्रित किया जा सकता है।

सेंकने के लाभ (Advantages of Baking) :
1. भोजन हल्का व सुपाच्य हो जाता है।
2. इस विधि द्वारा पकाए गए भोजन स्वादिष्ट होते हैं।

सेंकने से हानियाँ (Disadvantages of Baking): कई बार भट्टी का तापमान बहुत अधिक होने पर खाद्य पदार्थ ऊपर से तो बना हुआ प्रतीत होता है परन्तु अन्दर से कच्चा रह जाता है।

(ख) चिकनाई को माध्यम के रूप में प्रयोग करना :
तलना-तलने की विधि से खाद्य पदार्थ के पकाने का प्रमुख माध्यम कोई भी स्निग्ध पदार्थ होता है। अधिकतर घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। इससे भोजन अन्य विधियों की अपेक्षा शीघ्रता से बनता है। स्निग्ध पदार्थ को गर्म करके उसमें खाद्य पदार्थ डाला जाता है जिससे खाद्य पदार्थ की ऊपरी परतें कड़ी हो जाती हैं और ताप के कारण वह भीतर से भी पक जाता है।

तलने के लिए मुख्यतः दो विधियों का प्रयोग करते हैं –
1. उथली विधि
2.  गहरी विधि।

1. उथली विधि (Shallow frying): इस विधि में खाद्य पदार्थ को कम घी या तेल में तला जाता है। किसी भी गहरे बर्तन जैसे तवे, फ्राइंग पैन (Frying pan) आदि में घी या तेल गर्म करके उनमें खाद्य पदार्थ डालकर पकाते हैं। जब खाद्य पदार्थ एक तरफ से पक जाता है तो उसे पलट कर दूसरी तरफ से पकाते हैं। इसमें घी या तेल उतनी ही मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं जितना कि आसानी से सोख सकें। घी व चिकनाई के कारण खाद्य पदार्थ बर्तन से चिपकता नहीं है। इस विधि द्वारा पराठे, पूड़ी डोसा आदि पकाये जाते हैं।

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2. गहरी विधि (Deep-frying): इस विधि में पर्याप्त मात्रा में घी या तेल का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए प्रायः कड़ाही का प्रयोग किया जाता है। जब वह एक तरफ से पक जाता है तो झरनी या पोनी की सहायता से उले पलट देते हैं और दूसरी तरफ से भी पका लेते हैं। तलने के लिए घी का उचित ताप होना आवश्यक है क्योंकि कम ताप पर तलने से, खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में वसा सोख लेता है और देर में पकता है तथा अधिक ताप पर तलने से पदार्थ जल जाता है और वसा भी जल जाती है।

तलने के लाभ (Advantages of frying) :

  • खाद्य पदार्थ बहुत शीघ्र पक जाता है।
  • खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट हो जाता है।
  • खाद्य पदार्थ से पोषक तत्त्व कम मात्रा में बाहर निकलते हैं।

तलने से हानियाँ (Disadvantages of frying):

  • खाद्य पदार्थ में वसा होने के कारण वह शीघ्र नहीं पचता अर्थात् भारी हो जाता है।
  • खाद्य पदार्थ की ऊपरी परत कड़ी हो जाती है।
  • तले खाद्य पदार्थ रोगियों एवं बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।
  • इस विधि द्वारा खाद्य पदार्थ महंगे पड़ते हैं।

प्रश्न 8.
खाद्य परिरक्षण की विधियाँ कौन-कौन-सी हैं ?
उत्तर:
परिरक्षण की घरेलू विधियों द्वारा खाद्य पदार्थों को छोटे पैमाने पर परिवार में प्रयोग के लिए परिरक्षित किया जा सकता है। गृह विज्ञान के छात्र प्रयोगशाला में इन विधियों को सीख सकते हैं। व्यावसायिक पैमाने पर खाद्य पदार्थों की बड़ी मात्रा को सुव्यवस्थित व उचित उपकरणों से लैस फैक्ट्रियों में परिरक्षित किया जा सकता है। व्यावसायिक तौर पर परिरक्षण का प्रयोग मुनाफा पाने के लिए किया जाता है। वह उद्योग/फैक्ट्रियाँ खाद्य कानूनों व योग्य संस्थाओं के नियमों से . बाध्य होती हैं। – परिरक्षण के नियम घरेलू व व्यावसायिक क्षेत्र में एक समान रहते हैं।

1. विसंक्रमण (Asepsis): विसंक्रमण का अर्थ है उन परिस्थितियों को हटाना जो खाद्य पदार्थ के संदूषण में सहायता करती हैं। यह अत्यावश्यक है कि खाद्य पदार्थ को फसल काटने से लेकर, एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने, संग्रह करने, पकाने तथा अंततः खाने तक सुरक्षित रखा जाए। स्वच्छ वातावरण तथा साफ-सुथरे खाद्य हस्तन से खाद्य संदूषण को न्यूनतम किया जा सकता है। जीवाणु संख्या में कमी लाकर खाद्य पदार्थ को लंबे समय तक परिरक्षित किया जा सकता है। इस संदर्भ में प्रयुक्त परिरक्षण का नियम निम्नलिखित है-सूक्ष्मजीवियों को हटाना।

2. छीलना, पकाना तथा कीटाणु हनन (Peeking, Cooling & Disinsecting): खाद्य पदार्थ को उबलते पानी में थोड़ी देर तक रखकर उनके एन्जाइम निष्क्रिय किये जाते हैं। इससे एन्जाइमों की क्रियाशीलता को कम करके खाद्य पदार्थ को खराब होने से बचाया जाता है। इस. प्रक्रिया में ‘एन्जाइमों की निष्क्रियता’ का नियम प्रयोग में लाया जाता है। खाना पकाने की सूखी व गीली विधियों से कुछ जीवाणु को नष्ट किया जा सकता है। पके हुए खाद्य पदार्थ की सुरक्षा उन्हें पकाते समय के तापमान व पकाने की अवधि पर निर्भर करती है। अधिक तापमान पर लम्बे समय तक पकाने से जीवाणु संख्या में काफी कमी लाई जा सकती है।

यह परिरक्षण की ‘जीवाणुनाशक’ विधि है। कीटाणु हनन का अर्थ है सभी एन्जाइमों, सूक्ष्मजीवियों व उनके अंडों का हनन। यह घर में प्रेशर कूकर में भोजन पकाने से संभव हो सकती है। क्या आप प्रेशर कूकर में पकाने की विधि जानती हैं ? व्यावसायिक स्तर पर आवों के प्रयोग से कीटाणु हनन किया जाता है। इस प्रकार के खाद्य पदार्थ सूक्ष्मजीवियों से पूर्णतः मुक्त होते हैं।

3. स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्य हस्तन (Handling of clean & healthy food): यह परिरक्षण की एक प्रक्रिया ही नहीं अपितु खाद्य हस्तन की आवश्यकता भी है। खाद्य पदार्थ से संबंधित व्यक्तिगत स्वच्छता. रसोईघर एवं सभी उपकरण साफ एवं स्वच्छ होने चाहि ताकि सूक्ष्मजीवी आदि भोजन के संपर्क में आकर उसे संदूषित न कर पाएँ। हम जानते हैं कि विसंक्रमित परिस्थितियाँ खाद्य परिरक्षण की नीव हैं।

4. ठंडा करना (Refrigeration): यह खाद्य पदार्थों को कम तापमान पर रखकर परिरक्षित करने की प्रक्रिया है। जीवाणु एवं एन्जाइमों की क्रियाशीलता कम तापमान पर धीमी होती है। यह खाद्य परिरक्षण में ऊष्मा कम करने का नियम है जो क्रियाशीलता में आवश्यक है। विभिन्न प्रकार के रेफ्रीजरेटर व गहरे फ्रीजर जो तापमान को निश्चित करते हैं, बाजार में उपलब्ध हैं। शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थ फ्रीजर में रखने चाहिए। पकाया हुआ खाना सदैव ढंककर फ्रिज की ऊपरी शेल्फों पर रखना चाहिए।

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ताजे फल एवं सब्जियाँ ‘फ्रिज बैग’ में रखने चाहिए जो उनकी नमी व ताजगी बनाए रखते हैं। फ्रिज में अत्यधिक सामान नहीं रखना चाहिए। ठंडी शीतल हवा यदि फ्रिज में घूमती है तो खाद्य पदार्थ लम्बे समय तक ताजा रखा जा सकता है। गाँवों में लोग खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक परिरक्षित रखने के लिए वे खाद्य पदार्थों को गीले कट्टों में या बर्फ की पेटी में तथा ठंडे स्थान पर रखकर थोड़े समय के लिए परिरक्षित रखते हैं।

5. सुखाना (Drying): इस प्रक्रिया में खाद्य पदार्थ की नमी को हटाया जाता है। सदियों से खाद्य पदार्थों को धूप में रखकर परिरक्षित किया जाता रहा है। विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ जैसे हरी पत्तेदार सब्जियाँ, मटर, मछली, टमाटर, आडू आदि को वर्षों से सुखाया जाता रहा है, किन्तु आजकल हम खाद्य पदार्थों को कम समय में निश्चित परिस्थितियों व नवीनतम तकनीकों से सुखा सकते हैं।

इस प्रकार सुखाए गए खाद्य पदार्थ का रंग, स्वाद, सुगंध व पोषण मूल्य नष्ट नहीं होते। खाद्य पदार्थों को अपूर्ण रूप से भी सुखाया जा सकता है, जैसे खोआ, कंडेंस्ड दूध, टमाटर की प्यूरी आदि। अपूर्ण रूप से सुखाये गए खाद्य पदार्थों में नमक/चीनी की मात्रा अधिक होगी। इस माध्यम से सूक्ष्मजीवी क्रियाशील नहीं हो पाते। इस प्रक्रिया में प्रयुक्त परिरक्षण का यह नियम है, नमी/पानी को हटाना।

6. पैकिंग, डिब्बा बंद व बोतल बंद करना (Packing and Canning): इन प्रक्रियाओं से सूक्ष्मजीवियों को हवा उपलब्ध नहीं होती। घरेलू तौर पर हवा बंद डिब्बों में रखे खाद्य पदार्थों का संदूषण न्यूनतम होता है। व्यावसायिक पैमाने पर हवा की उपलब्धता कम करने के अनेक उपाय हैं। किन्तु हवा के बिना जीवित रहने वाले जीवाणुओं से डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ विषाक्त हो सकते हैं। नई तकनीकों द्वारा पैक किए गए खाद्य पदार्थों में हवा के स्थान पर अप्रवृत गैसें भरी जाती हैं।

7. pH को बदलने के लिए रसायनों का प्रयोग:

1. अचार बनाना (Pickles): खट्टे-मीठे स्वाद के अचार व चटनियाँ बनाना भारतीय घरों में प्रचलित है। अचार तेल या तेल के बिना भी बनाए जा सकते हैं। खाद्य पदार्थ पर तेल की सतह उसमें हवा का आवागमन रोक देती है। अम्लीय खाद्य पदार्थों, जैसे आम, नीबू आदि के अचार बनाए जा सकते हैं। सिरका, नींबू का रस, सिट्रिक एसिड व एसिटिक एसिड का प्रयोग सब्जियों का अचार बनाने में किया जाता है।

अचार बनाते समय, पिसी हुई राई के प्रयोग से, खमीरीकरण की प्रक्रिया से अम्लता बढ़ जाती है। अम्लीय खाद्य पदार्थों की pH कम होने के कारण ये देर तक खराब नहीं होते। अचार व चटनियों में नमक प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त होता है। यह जीवाणुओं तक नहीं पहुंचने देता। अचार व चटनियों में मसालों के प्रयोग से विसंक्रमण किया जाता है। अचार खाद्य पदार्थ को लम्बे समय तक परिरक्षित रख सकते हैं, क्योंकि इसमें परिरक्षण के विभिन्न नियमों का प्रयोग करते हैं। ये नियम हैं

(क) नमक का प्रयोग – आर्द्रता हटाना
(ख) अम्लीय पदार्थ मिलाना – pH में बदलाव लाना
(ग) तेल का प्रयोग – हवा उपलब्ध न होने देना
(घ) मसालों का प्रयोग – संक्रमण के कारक हटाना।

2. जैम, जैली व मारमलेड बनाना (Zam, Zelly, Marmalade): इसमें चीनी का प्रयोग किया जाता है। अधिक चीनी नमी को सोखकर जीवाणुओं तक नमी नहीं पहुँचने देती। अम्लीय पदार्थ pH को कम करके जैम आदि को जीवाणुओं से उत्पन्न संदूषण से बचाया जा सकता है। मीठे माध्यम में कभी-कभी फफूंदी आदि से संदूषण हो सकता है। अतः सभी जैम इत्यादि संक्रमित हवा बंद बोतलों में ही संगृहीत किये जाने चाहिए। आप प्रयोगशाला में कुछ घरेलू खाद्य परिरक्षण की विधियाँ सीखें। खाद्य परिरक्षण की कुछ नवीनतम तकनीकें हैं : डीहाइड्रोफ्रीजिंग, प्रकाशमान करना, फ्रीजड्राइंग तथा एंटीबाइटिक के प्रयोग द्वारा।

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प्रश्न 9.
पाक क्रियाओं का भोजन घटकों पर क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर:
“बहुत-से भोज्य पदार्थ अपनी स्वाभाविक स्थिति में मनुष्य के खाने के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। उन्हें खाने के योग्य बनाने के लिए जो क्रिया अपनायी जाती है, वह पाक क्रिया कहलाती है।” प्रत्येक खाद्य-पदार्थ की ताप-ग्रहणता अलग-अलग होती है। अनेक आन्तरिक गुणों पर ताप का पृथक्-पृथक् प्रभाव पड़ता है। ताप की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही भोज्य पदार्थों के स्वाद में वृद्धि होती है तथा उसके स्वरूप में परिवर्तन होता है। भोज्य तत्त्वों अर्थात् वसा, प्रोटीन, श्वेतसार, खनिज लवण, विटामिन आदि पर ताप का निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है :

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन (Colour changes)।
(ख) खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन (Flavour changes)।
(ग) खाद्य पदार्थों की प्रकृति में परिवर्तन (Texture changes)।

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन-खाद्य पदार्थों को पकाने पर उनके रंग में कई परिवर्तन आते हैं। कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जिनसे वह पकने के पश्चात् अधिक आकर्षित हो जाते हैं तथा कुछ खाद्य पदार्थों में ऐसे परिवर्तन आते हैं कि उनका प्राकृतिक रंग नष्ट हो जाता है और वह पहले की भाँति आँचों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाते हैं। उदाहरण के लिए फलों और सब्जियों के चमकीले आकर्षक रंग पकने के पश्चात् कुछ मात्रा में नष्ट हो जाते हैं तथा चमकहीन हो जाते हैं। इसके विपरीत राजमा आदि पकने के पश्चात् लाल रंग के हो जाते हैं और उनका रंग पहले की अपेक्षा अधिक आकर्षक हो जाता है।

(क) खाद्य पदार्थों के रंग में परिवर्तन-खाद्य पदार्थों के रंगों पर निम्न प्रकार से प्रभाव पड़ता है :
1. क्लोरोफिल (Chlorophyll): सब्जियों तथा फलों में हरा रंग उनमें उपस्थित क्लोरोफिल के कारण होता है। पकाने के ताप एवं माध्यम के pH के कारण इस हरे रंग में विशेषकर हरी पत्तेदार सब्जियों में परिवर्तन आते हैं। इनका रंग पकाने पर पहले कुछ गहरा तथा अधिक पकाने पर भूरा हो जाता है। यदि हरी सब्जियों को पकाते समय माध्यम अम्लीय हो तो इनका रंग जल्दी ही भूरा हो जाता है परन्तु क्षारीय माध्यम में इनके रंग में अधिक परिवर्तन नहीं होता और गहरा हरा ही रहता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

यही कारण है कि हरी सब्जियों के रंग को बनाए रखने के लिए कई बार पकाते समय उनमें कुछ खाने वाला सोडा डाल देते हैं जिससे माध्यम क्षारीय हो जाए और उनके रंग में परिवर्तन न हो, परन्तु खाने वाले सोडे या बेकिंग सोडे के प्रयोग से खाद्य पदार्थ में उपस्थित थायमिन और विटामिन सी की काफी मात्रा नष्ट हो जाती है। हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्तम रंग को बनाए रखने के लिए पहले कुछ मिनटों के लिए उन्हें ढकना नहीं चाहिए और खुले बर्तन में ही पकाना चाहिए।

2. कैरोटीनॉयड्स (Carotenoids): सब्जियों या फलों का लाल रंग कैरोटीनॉयड्स के कारण होता है। जब लाल सब्जियाँ या फल जैसे गाजर, आडू आदि को पकाया जाता है तो इनका लाल रंग पानी में बाहर आ जाता है और यह स्वयं पीले रंग के हो जाते हैं। अम्लीय माध्यम में इनका लाल रंग वैसा ही रहता है तथा क्षारीय माध्यम में इनका रंग नीलेपन पर आ जाता है। अतः लाल रंग की गाजर, आडू आदि को पकाते समय थोड़ा सा नींबू डालकर माध्यम को अम्लीय करने से उनका रंग वैसा का वैसा ही बना रहता है।

3. फ्लेवोनॉयड्स (Flevonoids): सब्जियों या फलों का पीला रंग फ्लेवोनॉयड्स के कारण होता है। जब हल्के पीले रंग वाले फल या सब्जियों जैसे प्याज, सेब आदि को क्षारीय पानी में धोते हैं और पकाते हैं तो उनका रंग गहरा पीला या भूरा हो जाता है, अतः इसके क्षारीय माध्यम के प्रभाव को हटाने के लिए इसमें थोड़ा-सा नींबू का रस या टाटरी डाल दी जाती है।
कई बार पानी क्षारीय होने के कारण उसमें पकाए गए चावल पीले हो जाते हैं। इस पीलेपन को चावल पकाते समय उसमें थोड़ा-सा नीबू का रस या टाटरी डालकर रोका जा सकता है।

4. मायोग्लोबिन एवं हीमोग्लोबिन (Mayoglobin and Haemoglobin): मांस का लाल रंग उसमें उपस्थित मायोग्लोबिन एवं हीमोग्लोबिन के कारण होता है। पकाने के ताप द्वारा यह लाल रंग भूरे रंग में बदल जाता है। यही कारण है कि पके हुए मांस का रंग भूरा होता है।

(ख) खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन (Changes in flavour of foods): पकाने पर खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में काफी परिवर्तन आता है तथा यह परिवर्तन उस खाद्य पदार्थ की प्राकृतिक सुगन्ध, उसमें डाले गए मिर्च-मसालों या अन्य पदार्थों पर निर्भर करती है। अच्छी सुगन्ध वाले खाद्य पदार्थ हमारी ज्ञानेन्द्रियों को उत्तेजित करते हैं तथा मुँह में लार रस स्रावित होने लार रस भोजन में उपस्थित कार्बोज के पाचन में सहायता करता है। पकाने पर खाद्य पदार्थों की सुगन्ध में परिवर्तन उनमें हुए कई भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तनों के कारण होता है।

कच्चे मांस, मछली एवं मुर्गे की गन्ध अच्छी नहीं लगती परन्तु पकने के पश्चात् मिर्च-मसालों की सुगन्ध के कारण उसमें जो सुगन्ध उत्पन्न होती है, उसके कारण वही मांस अच्छा लगने लगता है। कॉफी की विशेष सुगन्ध, कॉफी के बीजों को भूनने और पीसने पर ही उत्पन्न होती है अन्यथा कच्चे कॉफी के बीजों में कोई सुगन्ध नहीं होती है।

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खाद्य पदार्थों की प्राकृतिक सुगन्ध को बनाए रखने के लिए उन्हें आवश्यकता से अधिक नहीं पकाना चाहिए, ठीक ताप पर पकाना चाहिए तथा जहाँ तक सम्भव हो, मिर्च-मसाले खाद्य पदार्थ के पकने के पश्चात् ही डालने चाहिए। यदि मिर्च-मसाले जल्दी डाल दिए जाएँ तो खाद्य पदार्थ की प्राकृतिक सुगन्ध पर कुप्रभाव पड़ता है।

(ग) खाद्य पदार्थों की प्रकृति में परिवर्तन (Changes in nature of foods): पकाने से खाद्य पदार्थ की प्रकृति पर बहुत प्रभाव पड़ता है। कुछ खाद्य पदार्थ पकाने के ताप द्वारा मुलायम हो जाते हैं तो कुछ खाद्य पदार्थ ताप द्वारा कड़े हो जाते हैं। प्रत्येक खाद्य पदार्थ अपनी एक विशेष प्रकृति के कारण ही अच्छा लगता है।

1. कार्बोज (Carbohydrates): कार्बोज स्टार्च एवं शर्करा के रूप में ग्रहण की जाती है। जब कच्ची अवस्था में स्टार्च को ग्रहण किया जाता है तो वह आसानी से नहीं पचता । शुष्क ताप या बेकिंग की विधि को डेक्सट्रीन में परिवर्तित करती है जो कि शीघ्र व सरलता से पचने वाला होता है। उबलने की क्रिया द्वारा श्वेतसार के कण अधिक मुलायम होकर फूल जाते हैं। द्रवणांक बिन्दु (Boiling Point) पर पहुँचने पर सेल्यूलोज का आवरण फट जाता है तथा श्वेतसार निकलकर द्रव पदार्थ में मिल जाता है।

द्रव पदार्थ गाढ़ा हो जाता है। यही कारण है कि किसी तरल खाद्य पदार्थ को गाढ़ा करने के लिए मैदे या किसी अन्य स्टार्च का प्रयोग किया जाता है। शुष्क उष्णता से शक्कर जलकर भूरे रंग की शक्कर (Caramel Sugar) बन जाती है तथा और अधिक गर्म होने पर जल जाती है। आर्द्र विधि में गन्ने की शक्कर द्वारा मुरब्बे इत्यादि बनाए जाते हैं।

2. प्रोटीन (Protein): ताप द्वारा कुछ वानस्पतिक प्रोटीन के पौष्टिक मूल्य में वृद्धि होती है तथा भोज्य पदार्थों को पकाने से अधिक पाचनशील बन जाते हैं । उबला दूध कच्चे दूध की अपेक्षा अधिक पाचनशील है। इसका कारण उबले हुए दूध पर रेनिन की क्रिया से जठर में वह सरल प्रकार के दही के कणों के रूप में फटती है और इस क्रिया द्वारा वह शीघ्र पच जाता है।

प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं –
(अ) घुलनशील
(ब) मांसपेशीय

(अ) घुलनशील प्रोटीन दूध, रक्त प्लाज्मा और अण्डे की सफेदी में पाया जाता है। जब इन्हें गर्म करते हैं तो उनकी रचना में अन्तर आ जाता है। ताप में घुलनशील प्रोटीन जमकर ठोस (Coagulate) हो जाता है। जब अण्डे को अधिक. उबाला जाता है तो उसकी सफेदी का ऐल्ब्यूमिन घुलनशीलता के गुण को त्याग कर सख्त अघुलनशील ठोस पदार्थ का रूप धारण कर लेता है। इसलिए अण्डा चाहे उबाला जाए या फेंटकर घी में पकाया जाए परन्तु पकाने की क्रिया में तापक्रम कम ही होना चाहिए नहीं तो उसका प्रोटीन कड़ा हो जाएगा।

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(ब) मांसपेशियों का प्रोटीन लचीले (elastic) रेशों से बना होता है। पकाने से ये रेशे सिकुड़ जाते हैं। यह आम धारणा है कि पकाने से मांस के प्रोटीन का अभिपचन अधिक सरल हो जाता है। परन्तु ऐसा नहीं है, पकाने से केवल मांसपेशियों के रेशों को घेरे हुए संयोजक ऊतकों (Connective tissues) के मजबूत रेशे नरम व कमजोर हो जाते हैं जिससे पाचक रस प्रोटीनों तक सरलता से पहुँच सकता है। मछली मांस की भाँति पकाने से अधिक पाचनशील हो जाती है। इसके संयोजक ऊतक ताप से छिन्न-भिन्न हो जाते हैं जिससे वह नरम हो जाते हैं। ताप से एक और लाभ होता है कि पकाने में मछली में वह एन्जाइम नष्ट हो जाता है जो थायमिन को नष्ट करता है।

3. वसा (Fats): साधारण पकाने में वसा की रासायनिक रचना और उसके पोषक मूल्य में कोई परिवर्तन नहीं होता। जमा हुआ वसा पिघल जाता है और जलांश बुलबुले को आवाज के साथ बाहर निकल जाता है। अधिक गर्म करने पर उसमें से अधिक धुआँ निकलता है और वह जलने लगता है। अत्यधिक ताप पर गर्म करने पर ग्लिसरॉल और स्निग्ध अम्ल तत्त्व विभक्त हो जाते हैं तथा उसमें से एकरोलीन (Acrolein) नामक तत्त्व धुएँ के रूप में निकलता है जो गले. में खरखराहट व अपच उत्पन्न करता है। एकरोलीन अश्रु गैस का कार्य करती है जिससे नेत्रों में कष्ट होता है। जब वसा को बहुत समय तक गर्म किया जाता है तो उसका ऑक्सीकरण हो जाता है। इससे वसा का स्वाद बिगड़ जाता है। ऑक्सीकृत वसा में विटामिन ई नष्ट हो जाता है।

4. खनिज लवण (Mineral Salts): यदि भोज्य पदार्थों को पकाने के बाद उसके पानी को फेंक दिया जाता है तो बहुत से खनिज लवण (मैग्नीशियम, पोटैशियम और सोडियम) नष्ट हो जाते हैं। यदि कठोर जल में सब्जी को उबाला जाता है तो उसका कैल्शियम सब्जी में भी आ जाएगा। पकाने की क्रिया द्वारा लौह लवण आसानी से प्राप्त किया जाता है।

यदि पकाई जाने वाली वस्तु को लोहे की कढ़ाई में पकायी जाए तो लौह लवण की मात्रा में और अधिक वृद्धि हो जाती है। जड़दार तरकारियों को छिलके सहित उबालने से उसमें भोज्य तत्त्वों की मात्रा नष्ट नहीं होती क्योंकि तरकारियों के छिलके ऐसे तत्त्वों से बने होते हैं जिनमें से तत्त्वों का आदान-प्रदान नहीं हो पाता।

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5. विटामिन (Vitamins): विटामिन-ए और डी वसा में घुलनशील तथा जल में अघुलनशील हैं इसलिए सब्जियों को उबालकर पकाने से यह नष्ट नहीं होते, परन्तु घी में तलकर भोज्य पदार्थ बनाने से विटामिन ए नष्ट हो जाता है। विटामिन डी आँच तथा रोशनी के प्रति स्थिर होने के कारण उष्णता से प्रभावित नहीं होता। विटामिन बी जल में अत्यधिक घुलनशील – होता है इसलिए जल में पकाए हुए भोजन में विटामिन बी का बहुत बड़ा भाग जल में ही घुल जाता है।

ऊँचे तापक्रम पर भोज्य पदार्थ पकाने से विटामिन बी अधिक मात्रा में नष्ट हो जाता है। इसके अतिरिक्त बेकिंग पाउडर में क्षार के कारण भी यह विटामिन शीघ्र नष्ट हो जाता है। धूप में दूध को खुला रखने से राइबोफ्लेविन का कुछ अंश नष्ट हो जाता है। विटामिन सी जल में घुलनशील है और ऊँचे ताप पर नष्ट हो जाता है। भोज्य पदार्थ को जल में घोलकर पकाने से यह घुले हुए जल में घुल जाता है। भोज्य पदार्थ उबालने पर उसके जल को फेंकने से इसकी हानि होती है। हरी पत्तेदार सब्जियों में एक एन्जाइम होता है। जो विटामिन सी को नष्ट कर देता है। इस विटामिन का तनिक से ताँबे की उपस्थिति में भी नाश हो जाता है।

भोजन पकाते समय कुछ सब्जियों में विटामिन की हानि –
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प्रश्न 10.
खाद्य पदार्थों को पकाते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए?
अथवा
खाना पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों का ह्रास न हो तथा उन्हें बचाया जा सके, कोई आठ तरीके सुझाएँ।
उत्तर:
खाद्य पदार्थों को पकाते समय हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए –
1. अनाज एवं दालें (Cereals & pulses):
(i) आटे को चोकर सहित प्रयोग करना चाहिए क्योंकि चोकर गेहूँ के दाने की ऊपरी परत होती है और इसमें बी समूह के विटामिन उपस्थित होते हैं। चोकर का प्रयोग न करने से यह विटामिन व्यर्थ हो जाते हैं।

(ii) चावल को कम-से-कम पानी में धोना चाहिए तथा पर्याप्त पानी में भिंगो कर उसी पानी में पकाना चाहिए । बी समूह के विटामिन जो चावल की ऊपरी परत में होते हैं, जल में घुल जाते हैं और यदि इस पानी को फेंक दिया जाए तो यह विटामिन भी व्यर्थ हो जाते हैं।

(iii) दालों को पर्याप्त जल में ही पकाना चाहिए तथा इनको जल्दी गलाने के लिए खाने वाले सोडे का प्रयोग कदाचित् नहीं करना चाहिए क्योंकि सोडे के प्रयोग से माध्यम क्षारीय हो जाने के कारण विटामिन काफी मात्रा में नष्ट हो जाते हैं।

(iv) जहाँ तक सम्भव हो, पकाने के लिए प्रेशर कूकर का प्रयोग करना चाहिए जिससे पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होते तथा भोजन जल्दी पक जाता है।

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2. सब्जियाँ (Vegetables):
(i) सब्जियों को काटने, छीलने से पहले धो लेना चाहिए अन्यथा काफी मात्रा में जल में घुलनशील विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

(ii) सब्जियों का छिलका पतला-पतला उतारना चाहिए क्योंकि मोटे छिलके के साथ बहुत से खनिज लवण और विटामिन भी व्यर्थ हो जाते हैं।

(iii) सब्जियों को हमेशा बड़े-बड़े टुकड़ों में काटना चाहिए जिससे इनकी कम सतह वायु के सम्पर्क में आए तथा ऑक्सीकरण की क्रिया द्वारा अधिक विटामिन ऑक्सीकृत होकर नष्ट न हों।

(iv) सब्जियों को पकाने से बहुत समय पूर्व काट कर नहीं रखना चाहिए। यदि पकाने से बहुत समय पूर्व इन्हें काट कर रख देंगे तो ऑक्सीकरण अधिक होगा और विटामिन अधिक मात्रा में नष्ट होंगे।

(v) सब्जियों को पकाते समय कम-से-कम पानी का प्रयोग करना चाहिए तथा किसी भी दशा में पकाने के लिए प्रयुक्त किए गए पानी को फेंकना नहीं चाहिए। यदि किसी कारणवश पानी अधिक हो जाए तो उसे किसी अन्य कार्य के लिए प्रयोग में लाना चाहिए।

(vi) हरी पत्तेदार सब्जियों में जलांश काफी होता है। अतः जहाँ तक सम्भव हो, इन्हें बिना पानी के ही पकाना चाहिए।

(vii) सब्जियों को पकाने के लिए उबलते हुए पानी में डालना अधिक उचित है क्योंकि उच्च ताप पर एन्जाइम नष्ट हो जाते हैं और विटामिन ऑक्सीकृत नहीं होते तथा नष्ट होने से बच जाते हैं।

(viii) सब्जियों को सदैव ढंक कर पकाना चाहिए परन्तु हरी पत्तेदार सब्जियों के उत्तम रंग को बनाए रखने के लिए इन्हें केवल कुछ मिनटों तक खुला पकाना चाहिए और फिर ढंक देना चाहिए।

(ix) पकाने के पश्चात् सब्जियों को बार-बार गर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से बहुत से विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

(x) कछ मात्रा में सलाद के रूप में कच्ची सब्जियों का अवश्य प्रयोग करना चाहिए जिससे । पोषक तत्त्वों के साथ-साथ भोजन आकर्षक एवं स्वादिष्ट भी लगे।

3. फल (Fruits):

  • फलों को कच्चा ही प्रयोग में लाना चाहिए। केवल रोगियों को या बच्चों को फलों का स्ट्यू बनाकर दिया जाना चाहिए।
  •  जिन फलों के छिलकों को प्रयोग में लाया जा सके, उन्हें छिलकों सहित ही खाना चाहिए या उनके छिलकों को किसी और रूप में प्रयोग में लाना चाहिए।
  • फलों को खाते समय ही काटना चाहिए तथा काटकर नहीं रखना चाहिए।
  • फलों को ताजा ही खा लेना चाहिए क्योंकि बासी फल की पौष्टिकता कम हो जाती है और इसमें उपस्थित पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

4. दूध (Milk):

  • दूध को धूप के सीधे सम्पर्क में नहीं रखना चाहिए। इसे अंधेरे तथा ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।
  • दूध को आवश्यकता से अधिक नहीं उबालना चाहिए।

5. अंडे (Eggs):

  • अण्डों को बहत अधिक ताप तथा बहत अधिक समय तक नहीं पकाना चाहिए।
  • अण्डों को पोंछकर ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।

6. मांस, मछली, मुर्गा आदि (Meat, fish, chicken) :

  • इन्हें पर्याप्त जल में ही पकाना चाहिए तथा पकाने के लिए प्रयुक्त जल को फेंकना नहीं चाहिए ।
  • इन्हें बहुत अधिक ताप पर नहीं पकाना चाहिए क्योंकि अधिक ताप पर प्रोटीन कड़ा होकर अपचय हो जाता है।

7.चाय, कॉफी आदि (Tea, Coffee):

  • इन्हें बनाते समय पानी के साथ उबालना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कुछ हानिकारक तत्त्व इनमें आ जाते हैं ।
  • पहले से बनी हुई चाय को गर्म करके प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

प्रश्न 11.
भोजन के पौष्टिक मान बढ़ाने के क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
लाभ (Advantages): किसी व्यक्ति को पोषण आहार का ज्ञान हो तो वह कम मूल्य में भी पौष्टिक आहार प्राप्त कर सकता है।
1. आहार का मिश्रण-चावल व दालों को समुचित तालमेल में प्रयोग करने से दालों में उपस्थित अधिक लाइसिन चावल में कमी को पूर्ण कर देता है जिससे दोनों खाद्य पदार्थों चावल व दाल की शरीर में उपयोगिता बढ़ जाती है।

2. खाद्य पदार्थों का अधिक सुपाच्य होना-विभिन्न विधियों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ अधिक सुमपाच्य हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों में उपस्थित पोषक तत्त्वों की रासायनिक संरचना में कुछ ऐसे परिवर्तन आते हैं कि यह पाचक रसों से जल्दी विघटित होकर छोटी आंत से सरलतापूर्वक अवशोषित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए अंकुरण की क्रिया में दालों में उपस्थित कार्बोज में कुछ ऐसे रासायनिक परिवर्तन आते हैं जिससे कार्बोज अधिक पाचनशील हो जाते हैं तथा अंकुरित दाल. कच्ची खाने पर भी पच जाती है।

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3. सीमित व्यय में अधिक पौष्टिक तत्त्व प्राप्त होना-भारतीय जनता की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उन्हें संतुलित आहार प्राप्ति हेतु सभी खाद्य पदार्थों के सेवन के लिए नहीं कहा जा सकता है। अत: आज के युग की माँग है कि अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उपलब्ध खाद्य पदार्थों का ही पौष्टिक मान बढ़ाया जाए।

4. खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट होना-पौष्टिक मान बढ़ाने के लिए विभिन्न विधियों के प्रयोग से खाद्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट हो जाते हैं तथा व्यक्ति इन्हें अधिक रुचि से खाते हैं। उदाहरण के लिए चावल और उड़द की दाल से बना डोसा, चावल और दाल की खिचड़ी आदि से अधिक स्वादिष्ट लगता है। इसी प्रकार चने की दाल का बड़ा, चने की दाल से अधिक स्वादिष्ट लगता है।

प्रश्न 12.
खाद्य पदार्थों के पोषण मान बढ़ाने की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ?
उत्तर:
खाद्य पदार्थों के पोषण मान बढ़ाने की विधि-भोजन का पौष्टिक मान निम्न प्रकार से बढ़ाया जा सकता है:

  • भोज्य पदार्थों के पौष्टिक मूल्य को बढ़ाना (Enchanging the nutritive value of foods)
  • भिन्न प्रकार के भोज्य समूह को मिलाकर (Nutritious Combination of different kind of food stuffs)
  • भोजन पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों को बचाकर रखना (Adopting methods of cooking which helps to conserve nutrient losses)
  • भोज्य पदार्थों को खरीदते समय सावधानी (Better buying of Foods)

1. भोजन का पौष्टिक मूल्य बढ़ाना:
अंकुरण (Germination): भोजन का पौष्टिक मूल्य बढ़ाने के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण विधि है। अन्न व दालों दोनों को ही अंकुरित कर सकते हैं। भोजन में अन्न का प्रमुख स्थान है। अन्न से शरीर को ऊर्जा एवं आवश्यक पोषक तत्त्व आसानी से मिल जाते हैं। दालों का उपभोग भी लगभग सभी व्यक्ति करते हैं। यह शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन प्राप्ति का अच्छा साधन है।

अंकुरण करने की विधि (Method of Sprouting):
1. अनाज या दाल को बीनकर धो लें। अन्दाज से पानी डालकर 10 से 12 घण्टे तक भिंगों दें।

2. भीगे हुए दाल या अनाज को गीले या मलमल के कपड़े में ढीला बाँध दें। 24-28 घण्टे में अंकुर निकल सकते हैं। बीच-बीच में नमी रखने के लिए पानी छिड़कते रहें। नमी व गर्मी के कारण अंकुर निकल आएँगे। अंकुर निकलने का समय वातावरण के तापमान पर निर्भर करता है। गर्म मौसम में अंकुरण जल्दी निकलते हैं। ठण्डे में समय अधिक लगता है। अंकुरित दाल व अन्न को विभिन्न तरीकों से उपयोग करके भोजन को पौष्टिक एवं स्वादिष्ट बना सकते हैं।

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उपयोग:

  1. गेहूँ के आटे में कुछ मात्रा में अंकुरित दालों अथवा बाजरे के आटे को मिला देने से आहार की पौष्टिकता बढ़ जाती है।
  2. अंकुरित गेहूँ को छाया में सुखा कर हल्का भून कर दलिया बना लें। यह बच्चों को दे सकते हैं।
  3. अंकुरित दालों एवं रागी इत्यादि को सुखाकर, हल्का भूनकर पीसकर छान लें। यह आटा दूध व चीनी मिलाकर छोटे बच्चों को खिलाइए।
  4. अंकुरित दालों को नीबू का रस व नमक मिला कर कच्चा भी खाया जा सकता है।

अंकुरण से लाभ (Advantages of Germination) अंकुरित करने से दालों में पाए जाने वाले रासायनिक एन्जाइम्स क्रियाशील हो जाते हैं और दालों की पौष्टिकता को बढ़ा देते हैं।

1. विटामिनों की बढ़ोतरी (Increase in Vitamins): दालों व अनाजों में विटामिन सी लगभग न के बराबर होता है। केवल 24 घण्टे अंकुरित करने से विटामिन सी काफी मात्रा में उत्पन्न हो जाता है। अंकुरण के पश्चात् विटामिन सी दस गुना बढ़ जाता है। यह विटामिन हमारी त्वचा व मसूढ़ों की मजबूती बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। नायसिन व बी कम्पलेक्स के अन्य विटामिन 2.3 गुना बढ़ जाते हैं।

अंकरित करने से पौष्टिकता पर प्रभाव –
चना 100 ग्राम
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2. खनिज लवणों की अधिक प्राप्ति-यह देखा गया है कि दालों में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जो पौष्टिक तत्त्वों को ग्रहण करने में बाधा डालते हैं। ऐसे पदार्थ अंकुरित करने पर नष्ट हो जाते हैं। पचने योग्य लोहे खनिज की मात्रा बढ़ जाती हैं।

3. पोषण विरोधी तत्त्वों का नष्ट होना-खाद्य पदार्थों में कुछ पोषण विरोधी तत्त्व होते हैं जो विशेष तत्त्वों के उपभोग में बाधा डालते हैं। अंकुरण की प्रक्रिया के दौरान ये. नष्ट हो जाते हैं। पोषक तत्त्व शरीर में उपयोग हो जाता है।

4. खाद्य पदार्थ अधिक पाचनशील-दालों में उपस्थित प्रोटीन अंकुरण के बाद आसानी से पच जाता है। कठिनाई से पचने वाली दालें जैसे कि सोयाबीन, अंकुरण के बाद आसानी से पच जाती हैं।

5. खाद्य पदार्थों का पकने में कम समय लगना-अंकुरण के दौरान दालों का बाहरी छिलका ढीला पड़ जाता है। परिणामस्वरूप दालें शीघ्र पक जाती हैं।

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6. बच्चों के लिए एक पौष्टिक आहार-अंकुरित दालों को बच्चों के भोजन में निःसंकोच दिया जा सकता है। क्योंकि अंकुरित करने से वायु बनाने वाले पदार्थ कम हो जाते हैं।

7. ईंधन की बचत-अंकुरित दालें शीघ्र पक जाने के कारण ईंधन की बचत भी होती है।

खमीरीकरण (Fermentation): इस विधि द्वारा अनुकूल वातावरण से खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कुछ विशेष प्रकार के वांछनीय (Desirable) जीवाणु तेजी से बढ़ते हैं। ये जीवाणु सूक्ष्म होते हैं। वायुमण्डल की भाँति यह मिट्टी में विद्यमान रहते हैं। इन्हीं जीवाणुओं के कारण फलों के रस, तरल पदार्थ, शर्करा, आटा आदि में खमीरीकरण की क्रिया होती है।

यह वायु के बुलबुलों के रूप में दिखाई देता है तथा खाद्य पदार्थों के स्वाद में भी अन्तर आ जाता है। जीवाणु उपयुक्त स्थल व तापक्रम पाने से 90°F से 102°F पर) अत्यधिक क्रियाशील हो जाता है। खमीरीकरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस बाहर निकलती है जो कि बुलबुलों के रूप में दिखाई देता है।

खमीरीकरण की विधि (Method of Fermentation):

  • खमीर उठाने के लिए अनाज व दालों को पानी में भिंगों देते हैं।
  • फिर महीन पिट्ठी पीस लें। जितना बारीक खाद्य पदार्थों को पीसा जाएगा, उतना अच्छा खमीर उठेगा।
  • पिट्ठी को एक बड़े बर्तन में डाल कर थोड़ा-सा नमक या चीनी मिलाकर रख दें। नमक व शक्कर खमीर उठाने में सहायता करते हैं। इस क्रिया में जीवाणु कार्बन डाइऑक्साइड बनाते हैं जिससे पिट्ठी साधारण मात्रा में दुगनी या तिगुनी बढ़ जाती है। अतः पिट्ठी को बड़े बर्तन में रखते हैं ताकि बर्तन से बाहर न निकले।
  • पिट्ठी को अच्छी तरह फेंट कर खमीर उठाने के लिए रखें। गर्मी के दिनों में खमीर जल्दी उठता है। सर्दी के मौसम में खमीर जल्द उठाने के लिए पिट्ठी में थोड़ा-सा दही भी मिला सकते हैं। बर्तन को चारों ओर से मोटे कपड़े से लपेट कर रखना चाहिए।
  • अनाज व दालों में प्रायः खमीर उठाया जाता है। कभी-कभी दाल व अनाज को अलग-अलग खमीर उठाते हैं और कभी दोनों को मिलाकर। अनाज व दाल के मिश्रित घोल में खमीर उठायें तो अच्छा रहता है क्योंकि इससे स्वाद बढ़ जाता है।

खमीरीकरण से लाभ (Advantages of Fermentation): खमीर उठाने की क्रिया में भोज्य पदार्थ में कुछ परिवर्तन आ जाते हैं जिनके कारण भोज्य पदार्थ अधिक पौष्टिक हो जाते हैं ।

  • खाद्य पदार्थ का पोषक मान बढ़ता है-इस क्रिया से निकोटिनिक अम्ल तथा राइबोफ्लेविन बढ़ जाते हैं।
  • खाद्य पदार्थ का अधिक पाचनशील होना-खमीर की प्रक्रिया में जीवाणुओं द्वारा एन्जाइम बनाते हैं। इनके द्वारा शर्करा तथा प्रोटीन का आशिक पाचन हो जाता है।
  • अधिक प्रोटीन-खमीर से दालों में उपस्थित, ट्रिपसिन प्रतिरोधक भी खण्डित हो जाता है, जिससे शरीर को अधिक मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध हो जाता है।
  • खनिज लवण, लोहे की अधिक प्राप्ति-खमीरीकरण द्वारा खाद्य पदार्थ में उपस्थित लोहे की सम्पूर्ण मात्रा हमें आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
  • खाद्य पदार्थ का अधिक स्वादिष्ट होना-भोज्य पदार्थ का स्वाद तथा बनावट भी अच्छी हो जाती है। खमीरीकरण द्वारा भोज्य पदार्थ में खटास आ जाती है। उदाहरण भठूरे, इडली, डोसा, कांजी आदि।

खमीर का उपयोग (Uses of Fermentation) :

  • डबल रोटी बनाने में यीस्ट या खमीर का उपयोग होता है।
  • अंकुरित जौ (Barley) से बीयर (Beer) बनाई जाती है। जौ को पानी में भिंगोकर उचित ताप में अंकुरित कराते हैं। इसका स्टार्च विकारों के कारण शक्कर में बदल जाता है
  • अंगूर के रस के यीस्ट द्वारा खमीरीकरण से शराब बनाई जाती है। खमीर घर में बनाया जा सकता है तथा बाजार में भी खमीर के पैकेट मिलते हैं जिनकी सहायता से कई खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं।

II. भोजन का मिश्रण (Combination of Foods): यदि भोजन भोज्य समूहों के खाद्यों से मिलाकर तैयार किया जाए तो वह संतुलित और उत्तम श्रेणी का हो जाता है। उदाहरण के लिए अगर गेहूँ का आटा, दाल का आटा और मूंगफली का आटा मिलाकर भोजन का मिश्रण तैयार किया जाए और उस मिश्रण की रोटियाँ बनाई ज्ञाएँ तो उसका प्रोटीन दूध के प्रोटीन के समान गुणकारी बन जाता है।

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 13 पौष्टिक आहार : उचित चयन, तैयारी, पकाना तथा संग्रह

लाभ (Advantages):
1. प्रोटीन की उपयोगिता बढ़ाना-विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर प्रयोग करने से उनमें उपस्थित प्रोटीन की उपयोगिता बढ़ जाती है। हम पिछले अध्यायों में पढ़ चुके हैं कि प्रोटीन की किस्म या उपयोगिता उनमें उपस्थित अनिवार्य अमीनो अम्लों पर निर्भर करती है। जिन खाद्य पदार्थों में अधिक अनिवार्य अमीनो अम्ल पाए जाते हैं वह खाद्य पदार्थ प्रोटीन के उतने ही अच्छे साधन माने जाते हैं। खाद्य पदार्थों विशेषकर वानस्पतिक खाद्य पदार्थों में कोई अमीनो अम्ल अधिक मात्रा में उपस्थित होता है तो कोई दूसरा अमीनो अम्ल बहुत कम मात्रा में या बिल्कुल नहीं होता है।

ऐसी स्थिति में एक खाद्य पदार्थ की कमी को दूसरी खाद्य पदार्थ द्वारा पूरा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अनाजों में अमीनो अम्ल लाइसिन तथा दालों में अमीनो अम्ल मिथायोनिन कम मात्रा में पाए जाते हैं और अनाजों में अमीनो अम्ल मिथायोनिन तथा दालों में अमीनो अम्ल लाइसिन प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। अतः जब अनाजों और दालों के मिश्रण. का प्रयोग करते हैं तो उनमें दोनों ही अनिवार्य अमीनो अम्ल उचित मात्रा में हो जाते हैं।

2. खाद्य पदार्थ का पौष्टिक मान बढ़ाना-इस अनाज और दाल के मिश्रण में यदि सब्जियों का प्रयोग भी किया जाए तो सब्जियों में पाए जाने वाले खनिज लवण और विटामिन भी उचित मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं।

3. पकाने में कम समय लगना-यदि हम खाद्य पदार्थों को अलग-अलग पकाएं तो उन्हें तैयार करने में अधिक समय लगता है। जब गृहिणी नौकरी करती हो या किसी कारणवश उसके पास समय कम हो तो विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिला-जुला कर पकाने से समय तो कम लगता ही है, पोषक तत्त्व भी अधिक मात्रा में प्राप्त हो जाते हैं।

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Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 15 व्यवस्थापन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Home Science व्यवस्थापन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रोटीन उत्तर श्रेणी का होता है –
(क) चावल
(ख) गेहूँ
(ग) दाल
(घ) खिचड़ी
उत्तर:
(घ) खिचड़ी

प्रश्न 2.
आर्द्र ताप द्वारा भोजन पकाने की मुख्य विधियाँ हैं –
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(ख) 4

प्रश्न 3.
भाप द्वारा भोजन पकाने की विधियाँ हैं –
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(ख) तीन

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प्रश्न 4.
नमक में मिलाया जाता है –
(क) सोडियम
(ख) आयोडीन
(ग) खनिज लवण
(घ) विटामिन्स
उत्तर:
(ख) आयोडीन

प्रश्न 5.
पोषण मान में वृद्धि के लिए विधियाँ अपनायी जाती हैं –
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

प्रश्न 6.
आयोडीन की कमी से होता है –
(क) अन्धापन
(ख) एनेमिया
(ग) स्कर्वी
(घ) घेघा
उत्तर:
(घ) घेघा

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
व्यवस्था (Management) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
उपलब्ध साधनों का सदुपयोग करते हुए कार्यों को सर्वोत्तम ढंग से करना ताकि अधिकतम लक्ष्यों की पूर्ति हो सके, व्यवस्था कहलाती है।

प्रश्न 2.
व्यवस्था करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
हमारी आवश्यकताएँ असीमित होती हैं और उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साधन सीमित होते हैं। अत: अधिकाधिक लक्ष्यों और आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सीमित साधनों को समुचित रूप से प्रयोग में लाना आवश्यक है। इसलिए व्यवस्थापन आवश्यक है ताकि अधिकाधिक सन्तुष्टि प्राप्त की जा सके।

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प्रश्न 3.
व्यवस्था (Process of Management) की प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों या चरणों के नाम लिखें।
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया एक शृंखला है जिसके विभिन्न चरण निम्नलिखित हैं –

  • आयोजन (Planning)।
  • संयोजन अर्थात् संगठन (Organising)
  • क्रियान्वयन एवं नियंत्रण (Implementary and controlling)
  • मूल्यांकन (Evaluation)।

प्रश्न 4.
मूल्यांकन (Evaluation) की कोई दो विधियाँ लिखें।
उत्तर:
1. निरपेक्ष मूल्यांकन (Absolute Evaluation): जब योजना का मूल्यांकन लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही किया जाता है, उसे निरपेक्ष मूल्यांकन कहते हैं।
2. सापेक्ष मूल्यांकन (Relative Evaluation): जब योजना का मूल्यांकन पहले के अनुभवों या किसी अन्य व्यक्ति की उपलब्धियों की तुलना के आधार पर किया जाता है तो उसे सापेक्ष मूल्यांकन कहते हैं। अधिकतर सापेक्ष मूल्यांकन का ही प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5.
व्यवस्था की प्रक्रिया की श्रृंखला लिखें।
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया की श्रृंखला (Series of process of management)
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प्रश्न 6.
आयोजन (Planning) के चरण लिखें।
उत्तर:
आयोजन के निम्नलिखित चरण हैं :

  •  सबसे पहले दीर्घकालिक व अल्पकालिक लक्ष्यों को निर्धारित कर परिभाषित कर लें।
  • उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु उपलब्ध साधनों पर सोच-विचार कर सूची बना लें।
  • सभी उपलब्ध साधनों का प्रयोग कब व किसके द्वारा किया जाएगा, इस पर विचार-विनिमय कर लें।

प्रश्न 7.
मूल्यांकन (Evaluation) से क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
मूल्यांकन से अनेक लाभ हैं –

  • इससे निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति या आपूर्ति का ज्ञान होता है।
  • लक्ष्यों की प्राप्ति की असफलता के कारणों का ज्ञान होता है।
  • भविष्य में बनाई जाने वाली योजनाओं हेतु सहायता मिलती है।
  • उचित मूल्यांकन द्वारा लक्ष्यों की पूर्ति या आपूर्ति से क्रमशः प्राप्त सन्तुष्टि या असन्तुष्टि का अंकन होता है जो नयी सूझ-बूझ एवं कल्पनाओं का आधार ही है।

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प्रश्न 8.
व्यवस्था की प्रक्रिया (Process of Management) के मुख्य सोपान आपस में किस प्रकार सम्बन्धित हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था की प्रक्रिया के मुख्य सोपान आयोजन, संगठन, क्रियान्वयन एवं नियंत्रण और मूल्यांकन का पारस्परिक सम्बन्ध होता है। यह चारों सोपान एक-दूसरे पर आश्रित हैं। कोई भी एक सोपान दूसरे के बिना अर्थहीन है। व्यवस्थापन की प्रक्रिया एक श्रृंखला के समान है। अतः जब आयोजन प्रारम्भ होता है तो उसके साथ ही व्यवस्थापन भी आरम्भ होता है तथा जब क्रियान्वन भी हो रहा हो तो साथ-साथ मूल्यांकन भी होता रहता है। इन्हीं सोपानों की सहायता से लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है।

प्रश्न 9.
व्यवस्था की प्रक्रिया से आप क्या समझती हैं ?
उत्तर:
गृह व्यवस्था पारिवारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया पारिवारिक साधनों का आयोजन, नियन्त्रण एवं मूल्यांकन है। उपलब्ध साधनों से निर्धारित लक्ष्यों को किस सीमा तक प्राप्त किया जा सकता है, यह अधिकांशतः पति-पत्नी की प्रबन्ध करने की योग्यता, रुचि तथा नेतृत्व करने की क्षमता पर निर्भर करता है। न्यूमैन व समर ने प्रक्रिया शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया है, “क्रियाओं की ऐसी श्रृंखला जो उद्देश्य की ओर अग्रसरित करती है।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि एक प्रक्रिया में दो प्रमुख तत्त्व होते हैं-कुछ लक्ष्यों की उपस्थिति एवं उनका क्रियान्वयन ।।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रबंध की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर:
प्रबंध की आवश्यकता (Need for Management)-प्रबंध आज की मुख्य आवश्यकता बन गई है। सही प्रबंध की अनुपस्थिति में यह असंभव है कि उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए हम वांछित लक्ष्य तक पहुँच जाएँ। जैसे-जैसे देश विकास करता है, वैसे-वैसे प्रबंध की आवश्यकता भी बढ़ती चली जाती है। उदाहरण के लिए, औद्योगीकरण के परिणाम से महिलाओं के लिए अधिक व लाभप्रद नौकरियाँ, चुनौतीपूर्ण बाजार, घर के उपकरण, परिवार की अधिक गतिशीलता आदि ने महिलाओं के सामने नए विकल्प खोल दिए हैं।

वे सदा अपने आपको बदलाव व चुनौतीपूर्ण वातावरण में पाती हैं। नए वातावरण के अनुसार, समस्या हल करने के लिए उन्हें कई निर्णय करने पड़ते हैं। केवल प्रबंध के द्वारा ही अच्छा परिवर्तन या विकास लाया जा सकता है। बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाने के लिए माता-पिता को भी प्रबंध करना पड़ता है। लोगों को सामाजिक कारणों के लिए भी प्रबंध की आवश्यकता होती है। कुशल प्रबंध व्यक्ति, परिवार और समाज के कल्याण, प्रसन्नता और ऊँचे स्तर पर आधारित होता है।

प्रश्न 2.
प्रबंध की क्या प्रक्रिया है ?
उत्तर:
प्रबंध की प्रक्रिया (The process of management):
घरेलू प्रबंध निम्नलिखित प्रबंध प्रक्रिया से प्राप्त किया जा सकता है –
यह प्रक्रिया, कई कार्यों के द्वारा सफलता की ओर ले जाने वाली है। ये कार्य भिन्न-भिन्न निर्णयों पर, प्रक्रिया की समझ पर तथा कार्य के प्रकार पर आधारित होते हैं। विभिन्न परिवारों का लक्ष्य भी भिन्न होता है। परिवार को वांछित लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए गृहिणी को प्रबंध की वह प्रक्रिया अपनानी पड़ती है जिसमें परिवार के सदस्यों के विभिन्न कार्यों को इकट्ठा कर एक मंजिल की ओर ले जाना पड़ता है।

प्रबंध प्रक्रिया में निम्नलिखित पांच चरण हैं जो एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं –

  • आयोजन
  • संयोजन
  • क्रियान्वयन
  • नियंत्रण
  • मूल्यांकन।

प्रश्न 3.
क्रियान्वयन (Implementation) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
क्रियान्वयन-क्रियान्वयन का अर्थ है योजना को क्रियाशील बनाना। यह प्रबंध प्रक्रिया का क्रियाक्षेत्र है। जब किसी भी योजना को बना लिया गया है तथा साधन जुटाने का काम आयोजित हो चुका है तो अब इसके क्रियाशील होने का समय है। ऊपर लिखित उदाहरण को लेते हुए विद्यार्थी को समय और पढ़ाई की प्रणाली पूरी करनी होगी। यह भी समीक्षा करनी होगी कि लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक तैयारी हो गई या नहीं।

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प्रश्न 4.
संयोजन का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
संयोजन (Organisation): संयोजन प्रबंध का एक कठिन चरण है। योजना की सफलता या असफलता अधिकतर इसी तथ्य पर आधारित होती है कि संयोजन किस प्रकार है ? साधारण शब्दों में संयोजन का अर्थ कहा जा सकता है, वस्तुओं को ठीक ढंग से व्यवस्थित करना। घर मैं अथवा जहाँ कई योजनाएँ बनाई जाती हैं तथा कई कार्य किए जाते हैं, कार्य को कुशलता से करने के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था आवश्यक है।

संयोजन की प्रक्रिया अर्थात् संयोजित करने का अर्थ है परिवार के सभी सदस्यों के कार्य को आवश्यक साधनों के साथ मिलाकर कार्य सम्पन्न करना। उपलब्ध साधनों को मिलाकर लक्ष्य तक पहुंचाना ही संयोजन का कार्य है। ऊपर लिखित उदाहरण में संयोजन का अर्थ होगा आर्किटेक्चरल पद्धति के लिए सम्पूर्ण सूचना व पाठ्यक्रम को एकत्रित करना। आपं अपने परिवार से या अध्यापक से सारी सूचनाएँ ले सकते हैं ताकि प्रवेश निश्चित हो जाए। सारांश में कुशल संयोजन ही बहुत-सी समस्याओं का हल है तथा इसका कोई भी दूसरा विकल्प नहीं है।

प्रश्न 5.
व्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
व्यवस्था का अर्थ एवं विशेषताएँ (Meaning and Characteristics of Man agement): व्यवस्था की प्रक्रिया को गृह में, लगभग प्रत्येक देश में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग किया जाता है जिसके अंतर्गत मानवीय तथा भौतिक साधनों का प्रयोग करके इच्छित लक्ष्यों तक पहुँचा जाता है। व्यवस्था की प्रक्रिया आयोजन, व्यवस्थापन, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन का मिश्रण है तथा व्यवस्थापक को इन सभी चरणों से परिचित होना आवश्यक है। गृह व्यवस्था जीवन का प्रशासनिक पक्ष होने के कारण न केवल उपर्युक्त चरणों को बल्कि कार्य को प्रेरित करने वाली, निर्णय करने की प्रक्रिया को भी सम्मिलित करता है।

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प्रश्न 6.
वैकल्पिक समाधानों की खोज का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
वैकल्पिक समाधानों की खोज-व्यवस्थापक को अपने ज्ञान, जानकारियों, अनुभवों तथा सलाहों द्वारा विकल्पों को ढूंढना पड़ता है। जब व्यक्ति विकल्पों की खोज करता है तो सिद्धांततः उसे समस्त संभावनाओं से विज्ञ होना चाहिए, परन्तु अनुभव, समय आदि के सीमित होने के कारण ऐसा बहुत कम होता है। स्थायी व मूल्यवान वस्तुओं को खरीदते समय ही लोग निर्णय करने के इस सोपान की ओर ध्यान देते हैं। चरण (1) में दिए गए छात्रा के उदाहरण को यदि हम आगे बढाएं तो निम्नलिखित कुछ वैकल्पिक हल हो सकते हैं:

  • छात्रा के अभिभावकों को उसकी समस्या से परिचित कराया जाए तथा उसके इलाज के लिए प्रेरित किया जाए।
  • मानवता के नाम पर उसके सहपाठियों से या विद्यालय के विभिन्न छात्र-छात्राओं से चंदा जमा कराया जाए तथा इलाज कराया जाए।
  • छात्रा के निर्धन होने की दशा में प्रधानाध्यापिका द्वारा विद्यालय के छात्रनिधि में से कुछ धन निकलवाकर उसकी सहायता की जाए।
  • इलाज के लिए अध्यापिकाओं द्वारा चंदा एकत्र कर लिया जाए।
  • नजदीक के अस्पताल से स्वयं ही उसका इलाज कराया जाए।

प्रश्न 7.
निर्णय (Decision) क्या है ?
उत्तर:
मनुष्य के जीवन में अनेक समस्याएँ आती हैं। इनका समाधान करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है। निकलवडोसी के अनुसार, “निर्णय लेने का अर्थ किसी समस्या के समाधान के लिए या किसी स्थिति से निपटने के लिए कई विकल्पों में से किसी एक का चयन है।” गौसवकँडल के अनुसार “निर्णय लेना कई कार्यविधियों में से किसी एक का चयन है अथवा किसी को भी अंगीकार न करना है।”

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
गृह-व्यवस्था की प्रक्रिया के कौन-से मुख्य तत्त्व हैं ?
उत्तर:
अधिकांश लोग यह समझते हैं कि गृह-प्रबन्ध परिवार की सभी समस्याओं का पका-पकाया हल तैयार कर देता है। यह धारणा गलत है। वस्तुतः वह केवल उस ढाँचे का निर्माण कर देता है जिससे समस्याएँ स्वाभाविक रूप से हल होती चली जाएँ। निकिल तथा जरसी के अनुसार “गृह-प्रबन्ध के अन्तर्गत परिवार के साधनों का नियोजन, नियन्त्रण तथा मूल्यांकन आता है, जिसके द्वारा पारिवारिक उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है।”
गृह-प्रबन्ध के तीन मुख्यं अंग होते हैं –
1. नियोजन
2. नियन्त्रण
3. मूल्यांकन।
ये तीनों प्रक्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध होती हैं और इनका उपयोग परिवार के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है। ये तीनों मानसिक प्रक्रियाएँ हैं।
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uifraifich gut an unfa (Achievement of family goals) :
(क) नियोजन (Planning): व्यवस्था प्रक्रिया का प्रथम चरण नियोजन है। आज नियोजन से कोई क्षेत्र नहीं बचा है। नियोजन व्यक्तिगत स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पाया जाता है। घर में गृहिणी सुबह उठते ही दिन भर के कार्यक्रमों की योजना का ध्यान रखती है। वास्तव में “नियोजन किसी भावी कार्य का पर्वानमान है” “किसी भी कार्य को पूरा करने के लिए क्या विधि हो, आयोजन इसका निश्चय करता है।”

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कून्ज व ओडोनेल के अनुसार “आयोजन किसी व्यक्ति को क्या करना है, उस कार्य को कैसे करना है, उसे कब करना है व उसे कौन करेगा इसका पूर्व निर्धारण है।” नियोजन वर्तमान व भविष्य के बीच की कड़ी है। नियोजन कार्य आरम्भ होने से पहले ही कर लिया जाता है। भविष्य में किए जाने वाले कार्य का यह पूर्वाभ्यास (Mental Rehearsal) है। इससे भावी कार्य की रूपरेखा तैयार हो जाती है।

आयोजन का लक्ष्यों से सीधा सम्बन्ध है। यदि लक्ष्य स्पष्ट हैं तो आयोजन आसान हो जाएगा परन्तु यदि लक्ष्यों को प्राप्त करने के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ एवं अवरोध होते हैं तो आयोजन करने में अधिक कठिनाई होती है। आयोजन निर्माण करने का ही कार्य है। इसमें योजना बनाने वाले को विचारण, स्मरण, निरीक्षण, तर्कता तथा कल्पना आदि मानसिक शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है।

नियोजन में स्मरण-शक्ति के माध्यम से अतीत के अनुभवों का उपयोग किया जाता है, तर्कता के माध्यम से तथ्यों के मध्य सम्बन्धों को देखा जाता है तथा कल्पना के माध्यम से तथ्यों को नवीन सम्बन्धों के संदर्भ में व्यवस्थित किया जाता है। ये मानसिक शक्तियाँ जितनी अधिक विकसित होती हैं, अयोजन उतना ही अधिक यथार्थ एवं सरल होता जाता है।

आयोजन की विधि (Techniques of Planning):
1. पूर्वानुमान (Forecasting): यह भविष्य में सम्भावित परिस्थितियों पर दृष्टिपात है। इसमें पहले अधिकतम जानकारी एकत्रित की जाती है। यह निश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि भविष्य में कैसी स्थितियाँ रहने की अधिकतम सम्भावना है।

2. लक्ष्य बनाना (Developing objective): पहले लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित कर लिया जाता है। लक्ष्य स्पष्ट होने पर ही अग्रसर हुआ जा सकता है।

3. कार्यक्रम (Programme): लक्ष्य तक क्रमिक अवस्थाओं में कैसे पहुँचा जाए यह निश्चित किया जाता है। कार्यक्रम का अर्थ है कार्यों का वह क्रम जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। इसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि कार्य को करने में समय, शक्ति, धन व अन्य साधनों का कितना उपयोग करना होगा।

4. समय-तालिका (Scheduling): यह कार्यक्रम में निर्धारित क्रियाओं को करने का समय-क्रम है। कार्यक्रम में परिस्थितियों के अनुसार संशोधन किया जा सकता है।

5. बजट बनाना (Budgeting): यह नियोजन का आर्थिक पक्ष है। गृह प्रबन्ध के संदर्भ में यह चरण सभी गतिविधियों में आवश्यक नहीं है परन्तु धन से सम्बन्धित सभी लक्ष्यों के आयोजन का यह महत्त्वपूर्ण अंग है।

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6. कार्यविधि (Developing procedures): कार्यविधि यह निर्धारित करती है कि किसी कार्य को सफलता से सम्पन्न करने के लिए कौन-सी विधि उचित रहेगी। यह कार्य को सबसे कुशलतापूर्वक करने की विधि की खोज है।

7. नीतियों का विकास (Developing policies): नीति किसी कार्य को एक विशिष् प्रकार से करने का निर्देश है । लक्ष्यों का निर्धारण करने के उपरान्त ही नीतियों का निर्धारण सम्भट है. चूँकि नीति उस लक्ष्य तक पहुँचने का माध्यम है। संक्षेप में नियोजन के विभिन्न चरणों को निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया उ सकता है

आयोजन की क्रिया – निश्चित करती है –

  • पूर्वानुमान – सम्भावित स्थितियों का अनुभव
  • लक्ष्य बनाना – प्राप्त किए जाने वाले परिणाम
  • कार्यक्रम बनाना – किए जाने वाले कार्यों का क्रम
  • समय तालिका बनाना – कार्यों का समय क्रम
  • बजट बनाना – आवश्यक आर्थिक साधन
  • कार्यविधि विकसित – करना कार्य सरलीकरण आदि
  • नीतियों का विकास – इस सम्बन्ध में लिए गए निर्णय

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1. लम्बी अवधि की योजनाएँ (Long term Planning): ये स्वभाविक रूप से दीर्घकालिक व अधिक महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए रहती हैं। एक परिवार द्वारा बनाई गई एक दस वर्षीय बचत योजना इसका उदाहरण है। ऐसी योजनाओं में लचीलापन भी होना चाहिए ताकि उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सके।

2. अल्प अवधि की योजनाएँ (Short term planning): यह अपेक्षाकृत कम महत्त्व व कम अवधि तक चलने वाली क्रियाओं का आयोजन है। इसमें कार्यों की दैनिक, साप्ताहिक अथवा मासिक सूची बनाना सम्मिलित है। ये लघु योजनाएँ दीर्घकालिक योजनाओं के ही अंग हैं। उन्हें क्रमिक रूप से प्राप्त करने का साधन हैं परन्तु सभी लघु योजनाएँ प्रत्यक्ष रूप से लम्बी अवधि की योजनाओं से सम्बन्धित नहीं होती।

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(ख) नियन्त्रण (Controlling): किसी कार्य के सम्बन्ध में योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जब योजना कार्यान्वित की जाए तो यह देखना भी अनिवार्य है कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कार्य हो रहा है अथवा नहीं। यदि नहों, तो इस प्रकार के निर्देश अथवा सुझाव दिए जाएँ कि कार्य योजनानुकूल हो सके।

नियन्त्रण की प्रमुख तीन अवस्थाएँ हैं :

(अ) बल देना (Energizing): कार्य को प्रारम्भ करके उसे बनाए रखना व्यवस्थापन की एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है। व्यक्तियों में योजना को प्रारम्भ करके कार्य करने की योग्यता व प्रेरणा में भिन्नता पायी जाती है। यदि लक्ष्य अपेक्षाकृत अल्प अवधि के हैं तो उन्हें प्राप्त करने की इच्छा अधिक तीव्र रहती है। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति स्वस्थ व प्रसन्नचित्त है तो वह किसी योजना के क्रियान्वयन में अधिक रुचि लेगा। पारिवारिक योजनाओं में परिवार के सदस्यों को प्रेरित करना भी इस चरण का एक भाग है। उत्प्रेरण वह क्रिया है जिसके द्वारा व्यवस्थापक दूसरे सदस्यों को आवश्यक कार्य में सहयोग करने हेतु प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।

(ब) निरीक्षण (Checking): समय-समय पर क्रियान्वित योजना का निरीक्षण करते रहने से योजना पर नियन्त्रण-सा बना रहता है। यदि कार्य की प्रगति सन्तोषजनक नहीं है तो कार्य विधि में कुछ परिवर्तन करने पड़ेंगे। नियन्त्रण में लचीला दृष्टिकोण लेकर चलना होता है। इसके अतिरिक्त कार्य के प्रति जागरूकता व अनुशासन के साथ ही लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। कार्य क्रियान्वयन करते समय नेतृत्व देने वाला व्यक्ति नियोजन तथा नियन्त्रण करता है परन्तु हमे परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से।

निरीक्षण करते समय ध्यान को आकर्षित करने के लिए प्रविधियों (Devices) का होना आवश्यक है। उदाहरण-घड़ी ऐसे व्यक्ति के लिए बिल्कुल ही अनावश्यक सिद्ध होगी जिसे यह ज्ञात नहीं है कि आलू को पकाने के लिए सामान्यतः कितना समय चाहिए।

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(स) समायोजन (Adjusting): यदि आवश्यक हो तो योजना का समायोजन करना पड़ता है। उदाहरण-समय न मिलने पर उबले आलुओं की सब्जी न बनाकर परांठे बना दिए। परिस्थिति बदल जाने पर नवीन निर्णय लेने पड़ते हैं। कभी-कभी स्थितियाँ यथावत् रहती हैं, परन्तु योजना में भी दोष हो सकता है। तब योजना में सुधार कर अपने निर्णयों में परिवर्तन करता पड़ता है।

योजना को व्यावहारिक बनाने में निर्देशन व मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है। कुशल निर्देशन द्वारा स्वयं व दूसरों से अपेक्षाओं के अनुरूप काम लिया जाता है। कार्य की प्रकृति को समझना होता है। उसे पूर्ण करने की विधियाँ भी ज्ञात होनी चाहिए। परिवार के सदस्यों में नई स्फूर्ति भी जागृत करनी होती है ताकि कार्य ठीक से हो सके। परिवार के छोटे सदस्यों के लिए मार्ग-दर्शन भी आवश्यक हो जाता है।

नियन्त्रण की सफलता कई बातों पर निर्भर करती है:
1. उपयुक्त निरीक्षण-निरीक्षण दो प्रकार से किया जा सकता है :
(अ) निर्देशन द्वारा (By Direction): सभी प्रकार के आवश्यक निर्देश दिए जाना आवश्यक है ताकि वांछित परिणाम प्राप्त हो सके।
(ब) मार्गदर्शन द्वारा (By Guidance): मार्गदर्शन में कार्य के परिणाम की अपेक्षा व्यक्ति के व्यक्तिगत गुणों के विकास का प्रमुख उद्देश्य होता है।
कुछ स्थितियों में यात्रिक उपकरणों द्वार माप सम्भव है। यदि रसोई में वैज्ञानिक तुला अथवा साधारण तराजू है तो भोज्य विधि में पदार्थ सही मात्रा में लिये जा सकते हैं।
2. निरीक्षण में शीघ्रता।
3. नए निर्णय-निरीक्षण करने पर यदि दोष दिखाई देते हैं तो शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें दूर किया जाना चाहिए।
4. नियन्त्रण में लचीलापन-योजना के लक्ष्यों में तथा नियन्त्रण की विधियों में वांछनीय परिवर्तन करने की सम्भावना बनी रहनी चाहिए।
5. अनुशासन।
6. उचित नेतृत्व।

(ग) मूल्यांकन (Evaluation): मूल्यांकन में सम्पूर्ण योजना व उसके कार्यान्वयन का पुनरीक्षण है। यहाँ यह देखा जाता है कि योजना में अपेक्षित सफलता मिली है या नहीं। यदि नहीं मिली है तो उसके कारणों पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
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  1. आगामी समस्या हेतु-निर्णय
  2. सफलता का मूल्यांकन-लक्ष्य
  3. योजना के क्रियान्वयन का नियन्त्रण-क्रिया
  4. समस्या-आयोजन

लेविन के अनुसार मूल्यांकन के चार प्रयोजन होते हैं –

  1. यह देखना कि कितनी उपलब्धि हो चुकी है।
  2. आगामी योजना हेतु आधार का कार्य करना।
  3. पूरी योजना को संशोधित करने हेतु आधार का कार्य करना।
  4. नवीन सूत्र प्राप्त करना।

मूल्यांकन किसका-मूल्यांकन के दो प्रमुख तत्त्व हैं –

  1. स्वयं का मूल्यांकन (Self evaluation)।
  2. व्यवस्था प्रक्रिया का मूल्यांकन (Evaluation of the process of management)।

1. स्वयं का मूल्यांकन-शिक्षा उद्योग अथवा व्यवसाय में मूल्यांकन अपेक्षाकृत सरल है। यहाँ चूंकि एक समूह रहता है, अत: उपलब्धि के आधार पर तुलनात्मक विवेचना सम्भव है। परिवार में स्थिति भिन्न है। परिवार छोटा समूह है और उसमें भी गहकार्य करने वाली ज्यादा अकेली गृहिणी होती है। गृहिणी को स्वयं ही मूल्यांकन करना होगा। परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे की उपलब्धियों का निष्पक्ष विवेचन कर सकते हैं। दूसरी गृहिणियों की कार्यावधि तथा उपलब्धियों का निरीक्षण कर अथवा उनकी चर्चा कर गृहिणी तुलनात्मक मापदण्ड बना सकती है जिसके आधार पर मूल्यांकन सम्भव है।

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2. स्व मूल्यांकन-यहाँ गृहिणी स्वयं से एक प्रश्न पूछ सकती है “यदि मुझे यही कार्य पुनः करना पड़ा तो मैं अधिक सफलता प्राप्त करने के लिए क्या परिवर्तन करूँगा?”

3. एक डायरी रखना-इसमें गृहिणी प्रतिदिन की उपलब्धियों का विवरण लिख सकती है। उसे अपनी उपलब्धियाँ देखकर सन्तोष होगा। साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि यहाँ कार्य क्षमता के अनुरूप नहीं हो पाए हैं।

(अ) सापेक्ष मूल्यांकन (Relative Evaluation): सापेक्ष मूल्यांकन में पूरी हो चुकी योजना के प्राप्त लक्ष्यों की तुलना किसी आधार से की जाती है अर्थात् योजना की समाप्ति पर लक्ष्यों की प्राप्ति किस अंश तक हुई है इसकी तुलनात्मक विवेचना की जाती है, जैसे-अन्य परिवारों द्वारा प्राप्त लक्ष्य, पिछली योजनाओं में प्राप्त लक्ष्य आदि।
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(ब) निरपेक्ष मूल्यांकन (Absolute Evaluation): इससे प्राप्त लक्ष्यों की तुलना नहीं. की जाती बिना तुलना के ही यह पता लगाया जाता है कि योजना किस सीमा तक सफल रही परन्तु वास्तव में निरपेक्ष मूल्यांकन असम्भव-सा ही है। जब भी गृह-प्रबन्धकर्ता किसी कार्य को अच्छा अथवा बुरा बताता है तो उसके मस्तिष्क में उस कार्य के परिणाम का चित्र अवश्य होता है। यदि कार्य उस विचार से कम हो तो प्रगति को मन्द तथा यदि कार्य सोचे हुए परिणाम से ज्यादा हो तो उसे लक्ष्य प्राप्ति में सफलता समझा जाता है।

प्रश्न 2.
निर्णय-प्रक्रिया को विस्तार से लिखें।
उत्तर:
निर्णय-प्रक्रिया के निम्नलिखित पाँच प्रमुख सोपान हैं :
1. समस्या की व्याख्या (Definition of Problem):
इसमें किसी समस्या के रूप व उसके महत्त्व को स्पष्टतः समझ लेना चाहिए। कई बार स्थिति को ठीक से समझे बिना ही निर्णय ले लिये जाते हैं। ऐसे निर्णय बाद में हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। इस समस्या के मूल में निहित तत्त्वों को पहचान लेना सदा आसान नहीं होता है। कई बार ऐसी समस्या पर विचार करना होता है जिसके विषय में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं होता।

परिणामतः इसमें अस्पष्टता रह जाती है। जिस समस्या को हल करने के लिये निर्णय लिए जाते हैं वह समस्या परिवार के सभी सदस्यों के मस्तिष्क में स्पष्ट होनी चाहिए। समस्या की जड़ तक जाए बिना उसे ठीक से समझा नहीं जा सकता, न ही उचित समाधान खोजा जा सकता है।

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2. विभिन्न सम्भावित हलों की खोज (Search for Altermate Solutions): विभिन्न विकल्प तथा उनके परिणामों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। विकल्प को ढूँढ़ने की सभी सम्भावनाओं पर विचार करना चाहिए।
उदाहरण-यदि गृहिणी बीमार पड़ जाती है तो घर की देखभाल –

  • या तो पति करेगा।
  • नौकर ढूँढना।
  • महिला सम्बन्धी को कुछ दिन के लिए बुलाना।

इनमें से कौन-सा विकल्प सही है, यह परिस्थिति के अनुसार परिवार को निश्चित करना होगा। अनेक विकल्प होने के कारण निर्णय लेने में गड़बड़ी की सम्भावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के पास समय और अनुभव सीमित होते हैं।

3. विभिन्न सम्भावित हलों पर चिन्तन (Thinking about alternate solution): इस विषय पर गहराई से विचार करना चाहिए। प्रत्येक विकल्प के अच्छे-बुरे परिणाम क्या हो सकते हैं, इनको सूचीबद्ध भी किया जा सकता है। अच्छा विकल्प वह है जिससे परिवार के अल्पकालीन लक्ष्य पूरे करने में सहायता मिले व दीर्घकालीन लक्ष्यों पर भी विपरीत प्रभाव न पड़े। ‘प्रत्येक विकल्प के परिणाम अनिश्चित भविष्य के गर्त में निहित होते हैं।

भविष्य आंशिक रूप से इसलिए अनिश्चित होता है क्योंकि उसे बाहरी परिवर्तन प्रभावित करते हैं। उनके सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना प्रायः असम्भव है। इसके अतिरिक्त वह इसलिए भी अनिश्चित होता है क्योंकि भविष्य में विकल्प के प्रति व्यक्ति की भावना में परिवर्तन आ सकता है। इस सोपान को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए कल्पना-शक्ति महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

4. उपयुक्त हल का चयन (Selection of possible solution)-अपने सम्भावित विकल्पों में से एक को चुन लेना चाहिए जिससे सबसे अधिक वांछित परिणामों की आशा हो। इसके अतिरिक्त अपनी आवश्यकताओं, लक्ष्यों एवं उपलब्ध साधनों के आधार पर सर्वोत्तम विकल्प का चयन किया जाता है।

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5. निर्णय के परिणामों का स्वीकारण (Acceptance of results of decisions)-जो निर्णय लिये जाते हैं वे सदा आकर्षक नहीं दिखते । कभी-कभी यह होता है कि न चुने हुए विकल्पों में कुछ तत्त्व बड़े आकर्षक लगते हैं। ऐसी स्थिति में निर्णय लेने वाले व्यक्ति को परेशानी अनुभव हो सकती है परन्तु सभी स्थितियों में निर्णयों के परिणाम जो भी हों, उनका स्वीकारण आवश्यक है।

प्रश्न 3.
टोस्टर खरीदने के लिए निर्णय प्रक्रिया के सोपान विस्तार से लिखें।
उत्तर:
टोस्टर खरीदने के लिए निर्णय प्रक्रिया के सोपान –
1. सूचना एकत्रित करना (Obtain Information):
(क) ब्रांड्स का मिलना (Brands available)
(ख) गारंटी (Guarantee)
(ग) मानकीकरण चिह्न (Standardization mark)
(घ) कीमत (Cost)
(ङ) वोल्टेज (Voltage)
2. धनात्मक व ऋणात्मक प्रभाव-प्रत्येक विकल्प का मूल्यांकन करना तथा विभिन्न सम्भावित हलों की खोज।
3. विभिन्न सम्भावित हलों पर चिन्तन।
4. उपयुक्त हल का चयन।
5. सबसे अच्छी ब्रांड का चयन और खरीदना।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

Bihar Board Class 11 Psychology मानव स्मृति Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
कूट संकेतन, भंडारण और पुनरुद्धार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्मृति एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम सीखे हुए ज्ञान तथा प्राप्त अनुभवों को संचित करके भविष्य के लिए रखते हैं। स्मृति नामक प्रक्रिया में तीन स्वतंत्र किन्तु अन्तः संबंधित अवस्थाएँ होती हैं –
(क) कूट संकेतन
(ख) भंडारण तथा
(ग) पुनरुद्धार

हमारे द्वार ग्रहण की जाने वाली सूचनाएं जो स्मृति बनकर भविष्य में प्रयोग की जाने योग्य अवस्था में आ जाती हैं, उन सभी सूचनाओं को इन तीन प्रमुख अवस्थाओं (चरणों) से होकर अवश्य गुजरना होता है।
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1. कूट संकेतन:
स्मृति का प्रारम्भ इसी पहली अवस्था के रूप में होता है। वांछित सूचनाएँ कूट संकेतन के द्वारा स्मृति तंत्र तक पहुँचता है। तंत्रिका आवेग की उत्पति ज्ञानेन्द्रियों पर बाह्य उद्दीपक के प्रभाव के कारण होती है। उत्पन्न आवेग मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में पुनः प्रक्रमण के लिए ग्रहण कर लिए जाते हैं।

कूट संकेतन के रूप में आनेवाली सूचनाएँ तंत्रिका तंत्र में ली जाती हैं संचित संकेतनों से अभीष्ट अर्थ पाने का प्रयास किया जाता है तथा उसे भविष्य में पुनः प्रक्रमण के लिए सुरक्षित रखा जाता है। अर्थात् कूट संकेतन एक ऐसी विशिष्ट प्रक्रिया है जिसकी सहायता से सूचनाओं को एक ऐसे आकार या रूप में बदल लिया जाता है ताकि वे स्मृति में स्थान पाकर सार्थक रूप में संचित रहे। इस अवस्था को पंजीकरण भी कहा जा सकता है। यह स्मृति की पहली अवस्था है।

2. भंडारण:
सार्थक एवं उपयोगी सूचनाओं को कूट संकेतन के माध्यम से प्राप्त करने के बाद जिस विशेष प्रक्रिया के द्वारा कुछ समय सीमा तक धारण किये रहने की व्यवस्था की जाती है, उस प्रक्रिया को भंडारण कहते हैं। यह स्मृति की द्वितीय अवस्था है। भंडारित सूचना का उपयोग आवश्यकतानुसार आने वाले समय में किया जाता है। इसे ‘याद रखना’ भी कहा जाता है।

3. पुनरुद्धार:
पुनरुद्धार स्मृति की अंतिम एवं तीसरी अवस्था है। इसे ‘याद आना’ भी माना जा सकता है। समस्या समाधान अथवा किसी आवश्यक प्रपत्र को खोजने में हम अपनी चेतना को जगाकर जानना चाहते हैं कि अमुक व्यक्ति का कागज कहाँ मिलेगा और किस तरह इसका अधिक-से-अधिक उपयोग किया जा सकता है। अतः कूट संकेतन से मिली सूचना का भंडारण करने के पश्चात् संचित सूचना को चेतना में लाने (याद करने) की प्रक्रिया को पुनरुद्धार कहा जाता है। इस प्रक्रिया को स्मरण जैसा नाम भी दिया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
संवेदी, अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक स्मृति तंत्र से सूचना का प्रक्रमण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
मानव स्मृति को कम्प्यूटर की तरह संवेदनशील बनाने के लिए सूचना का पंजीकरण, भंडारण तथा उसमें आवश्यकतानुसार फेर-बदल करने की क्षमता को आधार बनाकर स्मृति को क्रियाशील स्थिति में लाया जाता है। एटकिंशन तथा शिफ्रिन ने सन् 1968 में स्मृति से संबंधित। एक मॉडल तैयार किया जिसे ‘अवस्था मॉडल’ के रूप में जाना जाता है। ‘अवस्था मॉडल’ के आधार परी स्मृति तंत्र को तीन भागों में बाँट कर अध्ययन किया जाने लगा –
(क) संवेदी स्मृति
(ख) अल्पकालिक स्मृति तथा
(ग) दीर्घकालिक स्मृति
तीनों भागें में से प्रत्येक की अपनी-अपनी विशेषताएँ होती हैं तथा इनके द्वारा संवेदी सूचनाओं के संबंध में भिन्न प्रकार्य निष्पादित किए जाते हैं।

1. संवेदी स्मृति:
देखकर या सुनकर जो भी सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उसे सर्वप्रथम संवेदी स्मृति को दिया जाता है। संवेदी स्मृति की संचयी क्षमता तो बहुत अधिक होती है लेकिन धारण अवधि एक सेकेण्ड से भी कम होती है। परिशुद्धता इसकी पहली पसंद होती है। संवेदी स्मृति में संचित सूचनाएँ उद्दीपक की प्रतिकृति की तरह जमा रहती है। उसे चित्रात्मक तथा प्रतिध्वन्यात्मक संवेदी तंत्रिका के रूप में भी अनुभव किया जाता है क्योंकि दृश्य-उत्तर-बिम्ब और ध्वनि-प्रतिध्वनि का अभ्यास कारण स्वयं तंत्रिका ही होती है।

2. अल्पकालिक स्मृति:
प्राप्त सूचनाओं में से कुछ सूचनाओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित हो पाता है। ध्यान दी गई सूचनाओं को अल्पकालिक स्मृति के अन्तर्गत स्थान मिलता है। इस श्रेणी की सूचना सामान्यतः 30 सेकेण्ड से भी कम समय के लिए स्मृति तंत्र में बनी रहती है। एटकिंशन एंव शिफ्रिन के मतानुसार अल्पकालिक स्मृति सूचना का कूट संकेतन मुख्यतः ध्वन्यात्मक होता है।

इसे बनाये रखने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अर्थात् अल्पकालिक स्मृति में व्यक्ति किसी अनुभूति को 30 सेकेण्ड तक ही रख सकता है। इसे प्राथमिक स्मृति भी कहा जाता है। जैसे, किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाष संख्या को सुनकर उसे भूल जाना लघुकालिक स्मृति के कारण ही होता है।

3. दीर्घकालिक स्मृति:
कुछ अति आवश्यक सूचनाएँ स्थायी तौर पर अनन्त समय तक संचित रह जाती है। ऐसी सूचनाएँ अल्पकालिक स्मृति की क्षमताएँ धारण अवधि की सीमा को पार कर जाती है, वही दीर्घकालिक स्मृति में प्रवेश कर पाती है। इस श्रेणी की स्मृति के लिए धारण क्षमता व्यापक मानी जाती है दीर्घकालिक स्मृति में जगह पाने वाली सूचनाएँ भूलने से बची रहती है। कभी-कभी पुनरुद्धार विफलता के कारण कुछ सूचनाएँ स्मृति की सीमा से बाहर हो जाते हैं अतः हम उसे भूल जाते हैं। चेतना ग्रन्थि की सहायता से कुछ क्षण तक प्रयास करने पर भूली गई सूचनाएँ स्मृति में आ जाती हैं।

दीर्घकालिक स्मृति को गौण स्मृति भी कहा जाता है। अपना नाम, पता, दूरभाष संख्या, शत्रु-मित्रों के नाम आदि दीर्घकालिक स्मृति में होने के कारण सदा याद रहते हैं। इन तीनों भागों का संक्षिप्त अध्ययन के लिए निम्नांकित तालिका की मदद ली जा सकती है –
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 2

प्रश्न 3.
अनुरक्षण एवं विस्तृत पूर्वाभ्यास में क्या अंतर है?
उत्तर:
अनुरक्षण एवं विस्तृत पूर्वाभ्यास दोनों स्मृति-तंत्र से सम्बन्धित है। दोनों की विशेषताओं को अलग-अलग अनुच्छेदों के द्वारा सूचित करके उनमें अंतर बताने का प्रयास किया गया है –

(क) अनुरक्षण पूर्वाभ्यास:
अनुरक्षण पूर्वाभ्यास की महत्ता अल्पकालिक स्मृति के लिए नियंत्रक का कार्य करता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास के द्वारा सूचना को वांछित समय तक धारित बनाने का प्रयास किया जाता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास सूचना को अनुरक्षित रहने के लिए सूचना को दुहराने का अभ्यास निरंतर करने की सलाह देता है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास जब रुक जाता है तब सूचना की स्मृति मिटने लग जाती है।

(ख) विस्तृत पूर्वाभ्यास:
विस्तृत पूर्वाभ्यास के प्रयोग से कोई सूचना, अल्पकालिक स्मृति से दीर्घकालिक स्मृति में प्रवेश करती है। अनुरक्षण पूर्वाभ्यास पूर्वाभ्यास के विपरीत, जिसमें मूक या वाचिक रूप से दुहराया जाता है। विस्तृत पूर्वाभ्यास के द्वारा दीर्घकालिक स्मृति में पूर्व निहित सूचना के साथ धारिता के लिए अभीष्ट सूचना को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। विस्तृत पूर्वाभ्यास के द्वारा किसी सूचना को उससे उद्वेलित विभिन्न साहचयो के आधार पर कोई व्यक्ति विश्लेषित कर पाता है।

सूचनाओं को संगठित करने, तार्किक ढाँचे में विस्तृत करना तथा समान स्मृतियों के साथ मिलाने, उपयुक्त मानसिक प्रतिमा बनाने जैसी क्रियाओं में विस्तारपरक पूर्वाभ्यास का सक्रिय योगदान होता है। अर्थात् दोनों पूर्वाभ्यास में स्पष्ट अंतर के रूप में कहा जा सकता है कि अनुरक्षण पूर्वाभ्यास जहाँ अल्पकालिक स्मृति के नियंत्रक के रूप में जाना जाता है वहीं दीर्घकालिक स्मृति के विश्लेषण में विस्तारपरक पूर्वाभ्यास का योगदान होता है।

अनुरक्षण पूर्वाभ्यास अल्पकालिक स्मृति की धारिता को विकसित करने का काम करता है वहीं विस्तारपरक पूर्वाभ्यास दीर्घकालिक स्मृति के स्तर को विकसित करता है। अनुरक्षण विधि का विकल्प खंडीयन विधि के रूप में उपलब्ध हो चुका है जबकि विस्तारपरक पूर्वाभ्यास के लिए कोई विकल्प नहीं मिल सका है। सूचना के अवस्था परिवर्तन की व्याख्या करने में अनुरक्षण पूर्वाभ्यास का कोई योगदान नहीं होता है जबकि विस्तारपरक पूर्वाभ्यास अवस्था परिवर्तन की कला को समझता है।

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प्रश्न 4.
घोषणात्मक एवं प्रक्रिया मूलक स्मृतियों में क्या अंतर है?
उत्तर:
दीर्घकालिक स्मृति में अनेक प्रकार की सूचनाएं संचित रहती हैं। समुचित अध्ययन के लिए दीर्घकालिक स्मृति का वर्गीकरण किया गया है। पहला वर्गीकर में दो वर्गों को प्राथमिकता दी गई है –
(क) घोषणात्मक तथा
(ख) प्रक्रियामूलक (या अघोषणात्मक)।

इन दोनों वर्गों में मुख्य अंतर निम्न वर्णित हैं –

1. आधार:
घोषणात्मक स्मृति में वैसी सूचनाओं का रखा जाता है जो तथ्य, नाम आदि से संबंधित होते हैं जबकि प्रक्रिया झलक स्मृति में किसी क्रिया के सम्पादन के लिए वांछनीय कौशल से जुड़ी सूचनाएं ली जाती हैं।

2. वर्णन:
घोषणात्मक स्मृति से जुड़ी सूचनाओं का वर्णन मौखिक अथवा लिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है जबकि प्रक्रिया मूलक स्मृति के अन्तर्गत जो सूचनाएँ होती हैं उन्हें शब्दों में सहजता से वर्णित नहीं किया जा सकता है।

3. उदाहरण:
घोषणात्मक स्मृति के उदाहरण हैं – आपका नाम क्या है? भारत की राजधानी दिल्ली है। मेढ़क उभयचर प्राणी है। समुद्र में जल भरा रहता है। चिड़िया घोंसला बनाकर रहती है। जबकि प्रक्रिया मूलक के उदाहरण हैं-साइकिल चलाना, चाय बनाना, नीम की पत्तियों तथा मिरचाई के तीखापन में अंतर व्यक्त करना इत्यादि।

प्रश्न 5.
दीर्घकालिक स्मृति में श्रेणीबद्ध संगठन क्या है?
उत्तर:
दीर्घकालिक स्मृति में बड़े पैमाने पर सूचनाओं का संग्रह होता है जिनका उपयोग कुशलतापूर्वक किया जाता है। सूचनाओं के संबंध में भेद और लक्षण जानने के लिए उन्हें संगठित करना आवश्यक होता है। दीर्घकालिक स्मृति के संबंध में निम्नलिखित प्रश्नों के सही उत्तर के आधार पर सूचनाओं को संगठित किया जाता है –

  1. सूचना किसके संबंध में हैं?
  2. सूचना में प्रयुक्त मुख्य पद किस श्रेणी या जाति का है।
  3. किस तरह के प्रश्नों के उत्तर हाँ या नहीं में दिये जा सकते हैं।
  4. सूचना सामाजिक, मानसिक, आर्थिक किस प्रकार के कारकों पर आधारित है।
  5. स्मृति पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देने में कितना समय लिया जाता है।

दीर्घकालिक स्मृति में ज्ञान-प्रतिनिधान की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई संप्रत्यय है जहाँ संप्रत्यय समान लक्षण वाले वस्तुओं अथवा घटनाओं के मानसिक संवर्ग होते हैं। सूचना प्रात्यधिक रूप में प्रतिमाओं के रूप में संकेतित की जा सकती है। सन् 1969 में एलन कोलिन्स तथा रॉस क्युिलियन ने शोध-पत्र के माध्यम से बताया कि दीर्घकालिक स्मृति में सूचना श्रेणीबद्ध रूप से संगठित होती हैं तथा उसकी एक जालीदार संरचना होती है।Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति img 3

संगठन में सूचनाओं को उनके गुणधर्मों के आधार पर संगठित किया जाता है उन्हें श्रेणी सदस्यता के रूप में व्यक्त करते हैं। उदाहरण के रूप में वाक्य संरचना की व्याख्या करके पता लगाया गया कि जैसे-जैसे विधेय किसी वाक्य में कर्ता से पदानुक्रम में दूर होता गया, लोगों ने सूचना सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने में अधिक समय लिया।

अतः सूचनाओं को निम्न स्तर और उच्च स्तर के आधार पर संगठित कर लिया जाता है। अर्थात् दीर्घकालिक स्मृति में सामग्री संप्रत्यय, श्रेणियों एवं प्रतिमाओं के रूप में प्रस्तुत होती है तथा श्रेणीबद्ध रूप से संगठित होती है। श्रेणीबद्ध संगठन का सामान्य अर्थ है कि सूचनाओं को गुण अथवा संरचना अथवा प्रकृति या प्रतिमा के आधार पर निम्न स्तरीय सूचना से उच्च स्तरीय सूचनाओं का क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण।

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प्रश्न 6.
विस्मरण क्यों होता है?
उत्तर:
विस्मरण या भूलना एक मानसिक क्रिया है जिससे स्मृति तंत्र में संचित स्मृति चिह्न मिट जाते हैं तथा हम ज्ञात साधनों या घटनाओं के संबंध में कोई भी सूचना देने में असमर्थ हो . जाते हैं। विस्मरण के कारण परिचितों को पहचानना या गणितीय सूत्र या नियमों को शुद्ध रूप में बतलाना संभव नहीं रह जाता है।

विस्मरण नामक मानसिक विकृति उत्पन्न होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –

1. चिह्न-हास के कारण विस्मरण:
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में स्मृति के द्वारा किये जाने वाले संशोधनों के फलस्वरूप शारीरिक परिवर्तन देखे जाते हैं। शारीरिक विकृति के कारण सूचनाओं को उपयोग से बाहर रहने से स्मृति चिह्न मिट जाते हैं।

2. अवरोध के कारण विस्मरण:
स्मृति भंडार में संचित विभिन्न सामग्री के बीच अवरोध के कारण विस्मरण होता है।

विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

(क) अग्रलक्षी:
पहले सीखी गई क्रिया विधि आने वाली नई क्रिया विधि के सम्पादन में अवरोध प्रकट करता है।

(ख) पूर्वलक्षी अवरोध:
पूर्वलक्षी अवरोध में पश्चात् अधिगम, पूर्व अधिगम सामग्री के प्रत्यावान में अवरोध पहुंचाता है।

3. पुनरुद्धार असफलता के कारण विस्मरण:
प्रत्याहान के समय पुनरुद्धार के संकेतों के अनुपस्थित रहने या अनुपयुक्त होने के कारण विस्मरण होता है।

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प्रश्न 7.
अवरोध के कारण विस्मरण, पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
(क) अवरोध के कारण विस्मरण का आधार संचित साहचर्यों के बीच उत्पन्न प्रतिद्वंद्विता होती है जबकि पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण प्रत्याहान के समय पुनरुद्धार के संकेतों के अनुपस्थित रहने या अनुपयुक्त होने के कारण होता है।
(ख) अवरोध के कारण विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

1. अग्रलक्षी:
पहले सीखी गई क्रिया बाद में सीखी जाने वाली क्रिया को याद करने में अवरोध उत्पन्न करती है।

2. पूर्वलक्षी:
पश्चात् अधिगम, पूर्व अधिगम सामग्री के प्रत्याहान में अवरोध पहुँचाता है। पुनरुद्धार से संबंधित विस्मरण को वर्गीकृत नहीं किया जाता है।

(ग)

  • अंग्रेजी सीखने के क्रम में पूर्व में सीखी गई भाषा का ज्ञान अवरोध का काम करता है।
  • इसके साथ यह भी ज्ञात है कि कई लक्षणों वाले शब्दों को निश्चित क्रम में प्रस्तुत करने पर उसे कुछ समय बाद यथावत बतलाना संभव नहीं होता है क्योंकि पुनरुद्धार के संकेत समय बीतने पर लुप्त हो चुके थे।

प्रश्न 8.
‘स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है जहाँ सूचनाएँ व्यक्ति के पूर्व ज्ञान, समझ एवं प्रत्याशों के अनुसार संकेतित एवं संचित की जाती है। मनोवैज्ञानिक बार्टलेट ने क्रमिक पुनरुत्पादन विधि पर आधारित प्रयोग किया जिसमें प्रतिभागी याद की हुई सामग्री को भिन्न-भिन्न समयांतरालों पर प्रत्याहान करते थे। प्रयोग में पाई जाने वाली को बार्टलेट ने स्मृति की रचनात्मक प्रक्रिया को समझने के लिए उपयोगी माना। उन्होंने गलतियों को वांछनीय संशोधनों तथा समयानुकूल अर्थ प्रकट करने का प्रयास मानकर खुशी व्यक्त की।

बार्टलेट ने बताया कि कोई विशिष्ट स्मृति व्यक्ति के ज्ञान, लक्ष्यों, अभिप्रेरणा; वरीयता तथा अन्य कई मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से प्रभावित होते हैं। स्मृति के कारण ही हम भूतपूर्व अनुभवों और ज्ञान के आधार पर नयी सूचना के विश्लेषण, भंडारण तथा पुनरुद्धार में सहयोग करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। इस आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि स्मृति के कारण विकास के लिए कई उपयोगी प्रक्रियाओं को सफलतापूर्ण पूरा करने में सहयोग मिलता है अर्थात् स्मृति एक रचनात्मक प्रक्रिया है।

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प्रश्न 9.
स्मृति-सहायक संकेत क्या है? अपनी स्मृति सुधार के लिए एक योजना के बारे में सुझाव दीजिए।
उत्तर:
स्मृति को स्थायी, उपयोगी और ऐच्छिक पुनरुद्धार के योग्य बनाने हेतु स्मृति-सुधार संबंधी प्रक्रियाओं का एक संगठन सरल युक्ति पर आधारित होती है। स्मृति सुधार की बहुत सारी युक्तियाँ हैं, जिन्हें स्मृति-सहायक संकेत कहा जाता है। संगठित विधियों की रूप-रेखा पर आधारित ढाँचा बहुत ही उपयोगी होता है। स्मृति सुधार के लिए कई विधियाँ बतलाई गई हैं। जैसे –

1. मुख्य शब्द विधि:
मिलते-जुलते शब्दों का युग्म बनाकर नये शब्दों को अपनी स्मृति में स्थान दिया जा सकता है।

2. स्थान विधि:
स्मृति में रखी जानेवाली सूचनाओं को उनके लिए उपयुक्त स्थानों के साथ याद रखने का प्रयास उपयोगी होता है। जैसे-विद्यालय, अस्पताल, किचेन, बगीचा, दुकान आदि में उपलब्ध सामग्रियों का वर्गीकरण करके नयी सूचना को याद रखना सरल हो जाता है। जैसे, किचन के साथ अंडा, तेल, कड़ाही, ब्रेड, चम्मच आदि नाम सरलता से याद आ जाते हैं।

3. खंडीयन विधि:
यदि सूचना को कई अर्थपूर्ण खण्डों में बाँटकर याद करने का प्रयास किया जाता है तो स्मृति सुगम बन जाती है। जैसे-किसी का दूरभाषा संख्या 186919472004 है तो इसे 1869-1947 तथा 2004 में खंडित करके याद रखना आसान हो जाता है क्योंकि 1869 से गाँधी, 1947 से आजादी तथा 2004 में सुनामी का संबंध है।

4. प्रथम अक्षर तकनीक:
किसी शब्द समूह को याद रखने के लिए प्रत्येक शब्द के पहले अक्षर को लेकर एक नया शब्द बनाकर याद रखना सरल माना जाता है। प्रथम अक्षर तकनीक में शब्द के द्वारा कई शब्दों को स्मृति में रखने की सुविधा मिल जाती है।

जैसे – VIBGYOR से इन्द्रधनुष के सातों रंगों के नाम याद रहते हैं। BISCOMAN से किसी संख्या के सभी लक्षण याद रह जाते हैं। ऊपर वर्णित चार विधियों को स्मृति सहायक-संकेतों पर आधारित माना जाता है जिसे सरल लेकिन जटिल विधियँ मानकर ध्यान से लगभग हटा दिया गया है। स्मृति सुधार के लिए अपेक्षाकृत अधिक बोधगम्य विधियों का प्रचलन प्रारम्भ हो गया है जिसमें स्मृति प्रक्रियाओं में ज्ञान पर बल दिया गया है। नये तकनीकी विधियों से सम्बन्धित सुझाव निम्न वर्णित हैं –

(a) गहन स्तर का प्रक्रमण कीजिए:
मनोवैज्ञानिक कैक एवं लॉकहार्ट के मतानुसार किसी सूचना के सतही गुणों पर ध्यान देने के बजाय उसके अर्थ के रूप में प्रक्रमण किया जाए तो अच्छी स्मृति होती है। सूचना को प्रश्नोत्तर विधि से स्पष्ट करने का प्रयास उपयोगी सिद्ध होता है।

(b) अवरोध घटाइए:
आराम और अभ्यास के बल पर विस्मरण की नौबत आने के पहले ही अवरोध उत्पन्न करने वाले कारकों को निष्क्रिय कर दीजिए।

(c) पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखिए:
थॉमस और रॉबिन्सन से स्मृति को सुदृढ़ बनाने के लिए PQRST विधि को अपनाने की सलाह दी है। विधि के नाम का प्रत्येक अक्षर एक अर्थपूर्ण संदेश देता है। तो P-Preview-पूर्वअवलोकन, Q-Question-प्रश्न करना, RRead-पढ़ना, S Self-recitation-स्वतः जोर से पढ़ना और T Test-परीक्षण करना।

अर्थात् सम्बन्धित विषय के सम्बन्ध में सभी अर्जित ज्ञान का पूर्वअवलोकन करके विषय से सम्बन्धित सभी संभव प्रश्नों का उत्तर जानिए। प्रश्नोत्तर की खोज के बाद स्वयं ध्वनि के साथ जोर-जोर से पढ़िए तथा उन्हें लिखिए। लिखे गये प्रश्नोत्तरों के आधार पर स्वयं परीक्षण कीजिए कि आप विषय के सम्बन्ध में कितना सही जानकारी रखते हैं। स्मृति सुधार के लिए योजना के बारे में सुझाव प्रस्तुत किया जा सकता है। सुझाव के अनुसार –

  • मात्र विधियों अथवा नियमों की जानकारी रखने से स्मति का विकास नहीं होता है।
  • स्वास्थ्य, रुचि, अभिप्रेरणा, शैक्षणिक प्रसाधनों से परिचय आदि पर पर्याप्त समझ रखकर ही स्मृति को मजबूती प्रदान की जा सकती है।
  • स्मृति सुधार सम्बन्धी युक्तियों के लिए वांछित सामाग्रियों की प्रकृति के अनुसार उनका उपयोग करने की कला का ज्ञान भी अति आवश्यक है।
  • शैक्षणिक योजना बनाते समय ध्यान रखना चाहिए ताकि योजना अवरोध मुक्त रहे, स्मृति के अनुकूल वातावरण मिले तथा पर्याप्त सहयोग की गुंजाइश हो।
  • जहाँ तक युक्तियों के चुनाव का प्रश्न है तो पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखने वाली युक्ति (PQRST) सर्वोत्तम है।

Bihar Board Class 11 Psychology मानव स्मृति Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दीर्घकालिक स्मृति किने प्रकार की होती है?
उत्तर:
पहला वर्गीकरण –

  1. घोषणात्मक और
  2. प्रक्रिया मूलक

दूसरा वर्गीकरण –

  1. घटनापरक और
  2. आर्थी स्मृति

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प्रश्न 2.
वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं जो मानव स्मृति की जटिल एवं गयात्मक प्रकृति को प्रदर्शित करती हैं?
उत्तर:

  1. क्षणदीय स्मृतियाँ
  2. जीवनचरित स्मृति और
  3. निहित स्मृतियाँ ऐसी स्मृतियाँ हैं जो जटिल एवं गत्यात्मक प्रकृति को बतलाती है।

प्रश्न 3.
आर्थी स्मृति का परिचय क्या हैं?
उत्तर:
आर्थी स्मृति सामान्य ज्ञान एवं जागरुकता की स्मृति है। सभी प्रकार के संप्रत्यय, विचार तथा तर्कसंगत नियम आर्थी स्मृति में संचित होते हैं।

प्रश्न 4.
स्मृति मापन की प्रमुख विधियाँ क्या हैं?
उत्तर:
स्मृति मापन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. मुक्त प्रत्याह्वान (पुनःस्मरण एवं प्रतिभिज्ञान) विधि-इस विधि का उपयोग तथ्य तथा घटना से संबंधित स्मृति के मापन में होता है।
  2. वाक्य सत्यापन कार्य विधि-इस विधि से आर्थी स्मृति का मापन होता है।
  3. प्राथमिक लेप विधि-इसका उपयोग उन सूचनाओं का मापन करने के लिए होता है जिन्हें शाब्दिक रूप में नहीं बताय जा सकता है।

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प्रश्न 5.
स्मृतियों का संगठन क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति में वृहद मात्रा में सूचनाएं होती हैं। सही समय पर सही सूचना की जानकारी पाने के लिए उन्हें संगठित करना उपयोगी होता है।

प्रश्न 6.
स्कीमा शब्द का प्रयोग किस अर्थ में होता है?
उत्तर:
स्कीमा भूतपूर्व अनुभवों और ज्ञान का एक संगठन है जो आनेवाली नयी सूचना के विश्लेषण, भंडारण तथा पुनरुद्धार को प्रभावित करता है। स्कीमा को एक ऐसी मानसिक ढाँचा के रूप में पहचानते हैं जो इस वस्तु जगत के बारे में अर्जित ज्ञान एवं अभिग्रह का प्रतिनिधिान करता है।

प्रश्न 7.
संज्ञानात्मक लाघव का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक लाघव का तात्पर्य यह है कि दीर्घकालिक स्मृति की क्षमता का अधिकाधिक एवं कुशलतापूर्वक तथा कम-से-कम व्यतिरिक्तता में उपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
बार्टलेट ने स्मृति के सम्बन्ध में क्या बतलाया है?
उत्तर:
बार्टनेट ने स्मृति को रचनात्मक क्रिया माना है।

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प्रश्न 9.
बार्टलेट ने स्मृति समझने के लिए किन अर्थपूर्ण सामग्री का उपयोग किया था?
उत्तर:
बार्टलेट ने अर्थपूर्ण सामग्री के रूप में कहानियाँ, गद्य दंत कथाएँ इत्यादि का उपयोग किया था।

प्रश्न 10.
बार्टलेट ने अपने प्रयोगों से प्राप्त परिणामों की व्याख्या हेतु किस शब्द का उपयोग किया था?
उत्तर:
परिणामों की व्याख्या हेतु बार्टलेट ने स्कीमा शब्द का उपयोग किया था।

प्रश्न 11.
धारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब व्यक्ति किसी विषय को सीखता है तो उसके मस्तिष्क में स्मृति-चिह्नों का निर्माण होता है। अर्थात स्मृति-चिह्नों के रूप में धारण करता है।

प्रश्न 12.
स्मृति क्या है?
उत्तर:
स्मृति एक सामान्य पद है जिसका अर्थ पूर्व अनुभूतियों को दिमाग में इकट्ठा करके रखने की क्षमता होती है।

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प्रश्न 13.
स्मृति की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
स्मरण वह मानसिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा भूतकाल में सीखी गई बातें या पूर्व अनुभूतियाँ मस्तिष्क में स्मृति-चिह्नों के रूप में धारणा की जाती हैं और वर्तमान या भविष्य में उसका प्रत्याह्वान या प्रतिभिज्ञान हो जाती है।

प्रश्न 14.
स्मृति-चिह्न क्या है?
उत्तर:
व्यक्ति जब किसी विषय को सीखता है तो उसे स्मृति-चिह्नों के रूप में मस्तिष्क में धारण करता है। इबिंगहॉस ने कहा है कि सीखे गए विषय को मस्तिष्क में स्मृति-चिह्न के रूप में सुरक्षित करते हैं।

प्रश्न 15.
अल्पकालीन स्मृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति से तात्पर्य वैसी स्मृति से होता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को अधिक से अधिक तीस सेकेण्ड तक याद रखता है।

प्रश्न 16.
दीर्घकालीन स्मृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति के अन्तर्गत वैसी स्मृतियाँ आती हैं जो अधिक समय तक मस्तिष्क में वर्तमान रहती हैं।

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प्रश्न 17.
अल्पकालीन और दीर्घकालीन स्मृति में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति की अधिकतम सीमा तीस सेकेण्ड होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति की कोई अधिकतम समय सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 18.
स्मृति के तीन तत्वों का नाम बताएँ।
उत्तर:
स्मृति के तीन तत्वों के नाम इस प्रकार हैं –

  1. कूट संकेतन
  2. संचयन
  3. पुनः प्राप्ति

प्रश्न 19.
कूट संकेतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कूट संकेतन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके सहारे सूचनाओं को एक ऐसे आकार या। रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे स्मृति में प्रवेश पा सके।

प्रश्न 20.
लघुकालीन स्मृति क्या है?
उत्तर:
लंघुकालीन स्मृति का अर्थ वैसी स्मृति संरचना से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक से अधिक 30 सेकेण्ड तक ही धारण करके रखता है।

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प्रश्न 21.
दीर्घकालीन स्मृति क्या है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति का अर्थ वैसे स्मृति संचयन से होता है जिसमें स्मृति चिह्नों को कम से कम 30 सेकेण्ड तक अवश्य धारण किया जाता है, लेकिन इसकी कोई अधिकतम समय सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 22.
स्मृति के कार्यकारी आधार क्या है?
उत्तर:
किसी सूचना को एक समय तक धारित करना तथा उसका प्रत्याह्वान करना स्मृति का मुख्य कार्यकारी आधार है जो संज्ञानात्मक कार्य की प्रकृति पर निर्भर होता है।

प्रश्न 23.
स्मृति नामक प्रक्रिया में कौन-सी तीन स्वतंत्र किन्तु अंतः संबंधित अवस्थाएँ होती हैं?
उत्तर:

  1. कूट संकेतन
  2. भंडारण तथा
  3. पुनरुद्धार

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प्रश्न 24.
अवस्था मॉडल कब और किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर:
एटकिंसन एवं शिफ्रिन ने 1968 में अवस्था मॉडल प्रस्तुत किया था?

प्रश्न 25.
किस अवस्था की स्मृति स्थायी होती है?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति स्थायी होती है।

प्रश्न 26.
प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण को कब और किसने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण ऊक एवं लॉकहर्ट द्वारा सन् 1972 में प्रतिपादित किया गया था।

प्रश्न 27.
बार्टलेट ने स्मरण को किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया माना है?
उत्तर:
बार्टलेट ने स्मरण को पुनः रचनात्मक मानसिक प्रक्रिया माना है।

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प्रश्न 28.
इबिंगहाँस के अनुसार स्मरण का स्वरूप कैसा होता है?
उत्तर:
इबिंगहॉस के अनुसार स्मरण का स्वरूप रचनात्मक होता है।

प्रश्न 29.
स्मरण में कौन-कौन प्रक्रिया शामिल होती है?
उत्तर:
स्मरण में मुख्य रूप से चार उपक्रियाएँ शामिल होती हैं-सीखना, धारण करना, प्रत्याह्नान करना तथा प्रतिभिज्ञान करना।

प्रश्न 30.
विस्मरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
विस्मरण (भूलना) एक ऐसी मानसिक क्रिया है जिसमें मस्तिष्क में बने स्मृति चिह्न मिट जाते हैं जिसके कारण प्रत्याह्वन तथा पहचानना शून्य स्तर पर पहुँच जाता है।

प्रश्न 31.
विस्मरण में कितने तरह के अवरोध उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
विस्मरण में दो प्रकार के अवरोध उत्पन्न होते हैं –

  1. अग्रलक्षी तथा
  2. पूर्वलक्षी

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प्रश्न 32.
विस्मरण के सम्बन्ध में अवरोध सिद्धांत क्या कहता है?
उत्तर:
विस्मरण, प्रत्याह्वान के समय स्वतंत्र रूप से संचित साहचर्यों के बीच प्रतिद्वंद्विता के कारण होता है।

प्रश्न 33.
इबिंगहॉस के अनुसार विस्मरण किस प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
इबिंगहॉस के अनुसार विस्मरण एक निष्क्रिय मानसिक प्रक्रिया है।

प्रश्न 34.
इबिंगहॉस के प्रयोग में प्रयोज्य कौन था?
उत्तर:
इबिंगहॉस ने अपना प्रयोग अपने आप पर किया है?

प्रश्न 35.
फ्रायड ने विस्मरण का प्रमुख कारण क्या माना है?
उत्तर:
फ्रायड ने विस्मरण का प्रमुख कारण दमन को माना है।

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प्रश्न 36.
स्मृति सहायक संकेत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। क्यों?
उत्तर:
स्मृति सहायक संकेतों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है क्योंकि ये बहुत सरल हैं तथा शायद स्मृति कार्यों की जटिलताओं और याद करने में होनेवाली कठिनाइयों का न्यूनानुमान करते हैं। साथ ही साथ अब तकनीकी स्तर पर बोधगम्य उपागम भी उपलब्ध हो चुके हैं।

प्रश्न 37.
थॉमस और रॉबिन्सन के द्वारा बताई गई युक्ति में PQRST का अर्थ क्या है?
उत्तर:
P = Preview (पूर्व अवलोकन), Q = Question (प्रश्न), R = Read (पढ़ना), S = Self recitation (स्वतः जोर से पढ़ना) तथा T = Test (परीक्षण)।

प्रश्न 38.
धारण की जाँच किस आधर पर होती है?
उत्तर:
धारण की जाँच प्रत्याह्वान एवं प्रतिभिज्ञान के आधार पर होती है।

प्रश्न 39.
प्रत्याह्वान क्या है?
उत्तर:
प्रत्याह्वान में व्यक्ति पूर्व में सीखे गए विषयों या पाठों को उसकी अनुपस्थिति में वर्तमान चेतना में लाता है।

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प्रश्न 40.
प्रतिभिज्ञान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रतिभिज्ञान एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पूर्व में सीखे गए विषय को किसी नए विषय सधे अपनी यादाश्त के आधार पर अलग करता है।

प्रश्न 41.
प्रत्याह्वान एवं प्रतिभिज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर:
प्रत्याहान में पूर्व में सीखे गए विषय को उसकी अनुपस्थिति में वर्तमान चेतना में लाते हैं, जबकि प्रतिभिज्ञान में पूर्व में सीखे गए विषय नए विषयों के साथ उपस्थित होता है जिसे अपनी यादाश्त से अलग करना होता है।

प्रश्न 42.
संचयन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संकेतन द्वारा प्राप्त सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को: कुछ समय के लिए सचित करके रखा जाता है।

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प्रश्न 43.
पुनः प्राप्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पुनः प्राप्ति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आवश्यकता के अनुसार व्यक्ति संचयन में मौजूद सूचनाओं से विशिष्ट सूचना की खोज करता है और उन तक पहुँचने की कोशिश करता है।

प्रश्न 44.
क्रमिक पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
क्रमिक पुनरुत्पादन विधि में बार्टलेट ने एक कहानी के प्रयोज्य को सुनाई, प्रयोज्य ने कही कहानी दूसरे को, दूसरे ने तीसरे को क्रम में कहानी सुनाई। इस प्रकार कई प्रयोज्यों के बाद कहानी का रूप बदल गया था।

प्रश्न 45.
उत्तरोत्तर पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
इस विधि में एक प्रयोज्य को कहानी सुनाई जाती है और उसका प्रत्याह्वान करवाया जाता है।

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प्रश्न 46.
एकाकी पुनरुत्पादन विधि क्या है?
उत्तर:
एकाकी पुनरुत्पादन विधि में कई प्रयोज्यों को एक साथ एक ही कहानी सुनाई जाती है, फिर सभी प्रयोज्यों को बारी-बारी से प्रत्याह्वान करवाया जाता है।

प्रश्न 47.
बार्टलेट ने अपने स्मरण से संबंधित अध्ययन किस विधि से किया?
उत्तर:
बार्टलेट ने अपना अध्ययन तीन विधियों से किया-क्रमिक पुनरुत्पादन विधि, उत्तरोत्तर पुनरुपादन विधि तथा एकाकी पुनरुत्पादन विधि।

प्रश्न 48.
केनेरी क्या है?
उत्तर:
केनेरी एक पक्षी है।

प्रश्न 49.
निस्पंद बिन्दु तथा नामपत्रित सम्बन्ध क्या है?
उत्तर:
जालीदार संरचना के तत्वों को निस्पंद बिन्दु कहते हैं। निस्पंद बिन्दु संप्रत्यय होते है किन्तु उनके बीच के सम्बन्ध को नाम पत्रित संबंध कहा जाता है जो संप्रत्ययों के गुणधर्म या श्रेणी सदस्यता दर्शाते हैं।

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प्रश्न 50.
बार्टलेट की अध्ययन-सामग्री क्या थी?
उत्तर:
बार्टलेट ने अपने अध्ययन सामग्री के रूप में कहानियों, चित्रों आदि को रखा।

प्रश्न 51.
इबिंगहॉस की अध्ययन-सामग्री क्या थी?
उत्तर:
इबिंगहॉस की अध्ययन-सामग्री निरर्थक पद थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अल्पकालीन स्मृति की विशेषता का वर्णन करें।
उत्तर:
अल्पकालीन स्मृति की निम्नलिखित विशेषता है, जो इस प्रकार है –

  1. अल्पकालीन स्मृति में स्मृति चिह्नों को अधिकतम 30 सेकेण्ड तक ही संचित करके रखा जाता है।
  2. इस प्रकार की स्मृति में व्यक्ति विषय या पाठ को मात्र एकाध प्रयास में ही सीख लेता है।
  3. इस प्रकार की स्मृति में स्मृति चिह्नों का नाश बहुत तीव्र गति से होता है, क्योंकि वे कमजोर होते हैं।
  4. इस प्रकार की स्मृति का विस्तार सामान्यतः उसे उद्दीपकों से अधिक का नहीं होता है।

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प्रश्न 2.
लघुकालीन स्मृति की प्रकृति का वर्णन करें।
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति जिसे प्राथमिक स्मृति भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसी स्मृति-संरचना से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक-से-अधिक 30 सेकेंड तक ही धारण करके रखता है। इस तरह की स्मृति की विशेषता यह है कि इसमें जो स्मृति चिह्न बनते हैं, उन पर यदि व्यक्ति ध्यान नहीं देता है या मानसिक रूप से उसका रिहर्सल नहीं करता है तो वह उसे तुरंत भूल जाता है।

सामान्यतः इसमें उन विषयों या पाठों से बनने वाले स्मृति चिह्न संचित हो पाते हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयास में सीख लिया होता है। किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाषा संख्या को एक बार सुनकर 4-5 सेकेण्ड के बाद प्रत्याह्वान करने की कोशिश पर सफल न होना, यह बताया है कि उस दूरभाषा संख्या को 4-5 सेकेण्ड से कम समय तक व्यक्ति धारण करके रख सका। इस तरह की स्मृति संचालन लघुकालीन स्मृति का उदाहरण है।

प्रश्न 3.
दीर्घकालीन स्मृति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
दीर्घकालीन स्मृति, जिसे गौण स्मृति (secondeary memory) भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसे स्मृति संचयन (Memory storage) से होता है जिसमें स्मृति चिह्नों को कम-से-कम 30 सेकण्ड तक तो अवश्य धारण किया जाता है। इसकी कोई अधिकतम समय-सीमा नहीं होती है। शायद यही कारण है कि एक वृद्ध व्यक्ति भी अपने बचपन की अनुभूतियों का प्रत्याह्वान (recall) कर लेता है।

दीर्घकालीन स्मृति की विशेषता यह है कि इससे स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है तथा इसमें उन अनुभूतियों का संचयन होता है जो पर्याप्त अभ्यास (practice) के फलस्वरूप मस्तिष्क में बनते हैं। अपनी दूरभाषा संख्या तथा घनिष्ठ संबंधियों की दूरभाषा, संख्या प्रायः दीर्घकालीन स्मृति में ही संचित होती हैं।

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प्रश्न 4.
संचयन क्या है?
उत्तर:
संचयन (Storgae):
स्मृति की दूसरी अवस्था संचयन (storgae) की अवस्था होती है। संचयन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संकेतन द्वारा प्राप्त सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को कुछ समय के लिए संचित कर रखा जाता है। दूसरे शब्दों में, संचयन की अवस्था में स्मृति में प्रवेश पाचकी सूचनाओं एवं उत्तेजनाओं को कुछ समय के लिए धारित (retained) करके रखा जाता अवस्था को धारण (rentention) भी कहा जाता है।

प्रश्न 5.
प्रक्रमण स्तर का सामान्य परिचय संबंधित मनोवैज्ञानिकों के नाम के साथ लिखें।
उत्तर:
सन् 1972 में कैक और लौकहर्ट नामक दो मनोवैज्ञानिकों ने प्रक्रमण स्तर दृष्टिकोण को प्रतिपादित किया था। इस दृष्टिकोण के अनुसार किसी भी नयी सूचना का प्रक्रमण उसके प्रत्यक्षण और विश्लेषण की विधि पर आधारित है। प्रक्रमण का स्तर यह बतलाता है कि सूचना किस सीमा तक धारित की जाएगी। कैक एवं लॉकहर्ट ने बताया कि सूचना का कई स्तरों (भौतिक या संरचनात्मक) पर विश्लेषण संभव है। प्रक्रमण स्तर पर आधारित प्रयोगों से पता चला कि किसी सूचना के अर्थ को समझना तथा उसे दूसरे संप्रत्ययों, तथ्यों एवं अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ना दीर्घकालिक धारण का सुनिश्चित उपाय है।

प्रश्न 6.
आर्थी स्मृति का प्रमुख लक्षण बतावें।
उत्तर:
टालबिन ने घोषणात्मक स्मृति के रूप में आर्थी स्मृति को पहचाना। आर्थी स्मृति का सीधा संबंध उन सूचनाओं की ओर होता है जो सामान्य ज्ञान से संबंध रखते हैं। हमारी जागरुकता से जुड़ी सूचनाएँ आर्थी स्मृति के रूप में संचित रहती हैं। सभी प्रकार के संप्रत्यय, विचार तथा तर्कसंगत नियम आर्थी स्मृति की पूँजी बन जाती है। जैसे, अर्थगत स्मृति के कारण हम अहिंसा का अर्थ स्थायी तौर पर याद रखते हैं। सामान्य ज्ञान के अन्तर्गत हम भारत की राजधानी दिल्ली है, चार और दो मिलकर छः होते हैं, पटना का S.T.D. कोड 0612 है तथा किताब लिखने में ई का प्रयोग गलत है आदि सूचनाओं को हम देर तक नहीं भूलते हैं।

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प्रश्न 7.
विस्मरण में अवरोध के जभाव को स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्मृति भंडार में संचित तरह-तरह की सूचनाओं के लुप्त हो जाने का प्रमुख कारण अवरोध ही होता है। सीखने और याद करने में विभिन्न पदों के बीच साहचर्य स्थापित हो जाता है। भारी संख्या में जमा हो चुके साहचर्यों में आपसी द्वन्द्व के रूप में प्रतिस्पर्धा होती है जो अवरोधक की तरह कार्य करते हैं। पुनरुद्धार के क्रम में प्रतिस्पर्धा बाधक बनकर स्मृति को क्षति पहुँचाते हैं।

विस्मरण का यह प्रधान कारण है। विस्मरण का यह प्रधान कारण है। अग्रलक्षी अवरोध-पूर्व में प्राप्त की गई सूचना आनेवाली नई सूचना के लिए अवरोधक बन जाता है। अर्थात् पूर्व अधिगम, पश्चात् अधिगम के प्रत्याह्वान में अवरोध पहुंचाता है। इन्हीं अवरोधों के कारण एक भाषा के जानकार को दूसरी भाषा को सीखने में कठिनाई होती है।

प्रश्न 8.
स्मृति वृद्धि के लिए अवरोध को किस प्रकार हटाया जा सकता है?
उत्तर:
अवरोध विस्मरण का प्रमुख कारण है। स्मृति वृद्धि के लिए अवरोधों से मुक्त होना लाभकारी होता है। अवरोध से बचने के लिए अध्ययन के विषयों को इस प्रकार व्यवस्थित की जाती है कि एक विषय के तुरंत बाद लगभग समान लक्षण वाले विषय की बारी न आ जाए। भाषा के बाद गणित के बाद सामाजिक विज्ञान जैसी व्यवस्था करना उपयोगी होता है। असुविधा होने पर अधिगम-अभ्यासों का वितरण करना अच्छा होता है। अर्थात् विषय के बदलने के रूप कुछ देर तक मनोरंजन, खेल या बातचीत में समय व्यतीत कर लेने से पूर्व की स्मृति मजबूत हो जाती है तथा इसका प्रभाव अगले विषय पर नगण्य हो जाता है।

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प्रश्न 9.
स्मृति क्या है?
उत्तर:
स्मृति (memory) एक सामान्य पद है जिससे तात्पर्य पूर्व अनुभूतियों (past experiences) को मस्तिष्क में इकट्ठा करके रखने की क्षमता होती है। संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिक जैसे-लेहमैन, लेहमैन एवं बटरफील्ड (Laechman, Laehman & Buterfield) ने स्मृति को परिभाषित करते हुए कहा है कि विशेष समयावधि के लिए सूचनाओं को संपोषित करके रखना ही स्मृति है। समयावधि एक सेकेंड से कम या सम्पूर्ण जीवन काल की भी हो सकती है। मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के धनात्मक पक्ष से तात्पर्य पूर्व अनुभूतियों को याद करके रखने से माना है। अतः कहा जा सकता है कि स्मृति का धनात्मक पक्ष स्मरण (remembering) है तथा ऋणात्मक पक्ष (negative aspect) विस्मरण (forgetting) है।

प्रश्न 10.
कूट संकेतन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कूट संकेतन (Encoding):
कूट संकेतन में किसी सूचना या बाह्य उत्तेजना (external stimulation) का प्रत्यक्ष करण व्यक्ति उसे एक निश्चित रूप (form) या कूटसंकेत (code) के रूप में तंत्रिका तंत्र (nerous system) में ग्रहण करता है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि कूट संकेत एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके सहारे सूचनाओं को एक ऐसे आकार या रूप form में परिवर्तित कर दिया जाता है कि वे स्मृति में प्रवेश पा सकें। साधारण बोलचाल की भाषा में स्मृति-चिह्नों (memory traces) का निर्माण होना ही संकेतन कहलाता है। स्मृति की पहली अवस्था कूट संकेतन (encoding) की होती है। इस अवस्था को पंजीकरण (registration) भी कहा जाता है।

प्रश्न 11.
लघुकालीन स्मृति किसे कहा जाता है?
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति (short-term momory), जिसे प्राथमिक स्मृति (primary memory) भी कहा जाता है, से तात्पर्य वैसी स्मृति संरचना (memory storage) से होता है जिसमें व्यक्ति किसी विषय या पाठ को अधिक-से-अधिक 30 सेकण्ड तक ही धारण करके रखता है। इस तरह की स्मृति की विशेषता यह है कि इसमें जो स्मृति चिह्न बनते है, उन पर यदि व्यक्ति ध्यान नहीं देता है या मानसिक रूप से उसका रिहर्सल नहीं करता है तो वह उसे तुरंत भूल जाता है।

सामान्यतः इसमें उन विषयों या पाठों से बननेवाले स्मृति चिह्न संचित हो पाते हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयोग में सीख लिया होता है। किसी अपरिचित व्यक्ति की दूरभाष संख्या को एक बार सुनकर 4-5 सेकंड के बाद प्रत्याह्वान करने की कोशिश पर सफल न हो, यह बताय है कि 4-5 सेकण्ड से भी कम समय तक व्यक्ति धारण करके रख सका। इस तरह का स्मृति संचयन (memory storage) लघुकालीन स्मृति का उदाहरण है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्मृति से आप क्या समझते हैं? स्मृति के विभिन्न तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्मृति का अर्थ एवं परिभाषायें (Introduction and Definition of Memory):
मानव जीवन में मुख्यत: व्यवहार का आधार स्मृति ही होती है। स्मृति के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है तथा अनेक अनुसंधानात्मक कार्य भी स्मृति पर ही आधारित होते हैं। अतः मानव-व्यवहार का अध्ययन करने के लिये स्मृति का अध्ययन करना आवश्यक है। स्मृति शुद्ध मानसिक प्रक्रिया है। जब व्यक्ति कोई व्यवहार करता है तब उसका अनुभव मानव मस्तिष्क में संचित हो जाता है। अनुभवों के अर्द्धचेतन मस्तिष्क में संचित होने के कारण जब उसी व्यवहार से सम्बन्धित कोई व्यवहार सम्मुख आता है तब वह पूर्व अनुभव जागृत हो जाता है।

अर्द्धचेतन में संचित अनुभवों का पुनः जागृत हो जाना ही स्मृति कहलाता है। यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल मानसिक प्रक्रिया होती है जिसमें अनेक क्रियाओं का समावेश रहता है यथा-सीखना, धारणा, प्रत्यास्मरण तथा प्रत्याभिज्ञा। इन चारों क्रियाओं के सम्मिलित सहयोग को ही स्मृति कहते हैं, इसलिये ये स्मृति के मुख्य तत्व भी कहलाते हैं।

इस प्रकार स्मृति का सामान्य परिचय यह है कि व्यक्ति के अर्द्धचेतन मस्तिष्क में पूर्व अभवों के संचित रूप के पुनः जागृत होने की क्रिया स्मृति कहलाती है किन्तु मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए यह परिभाषा पर्याप्त नहीं है। मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के स्वरूप को विभिन्न परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट किया है जिनका अवलोकन करके स्मृति के मनोवैज्ञानिक स्वरूप को समझने में सरलता. होगी। मनोवैज्ञानिकों द्वारा दी गई स्मृति की कुछ मुख्य परिभाषायें निम्नलिखित हैं –

1. स्टाउट महोदय की परिभाषा:
स्टाउट महोदय के अनुसार, “स्मृति वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से पुराने फिर जागृत हो जाते हैं।”

2. स्पीयरमैन की परिभाषा:
स्पीयरमैन ने स्मृति की परिभाषा इस प्रकार दी है कि, “समझ में आनेवाली घटनाओं द्वारा जो स्थायी प्रभाव मस्तिष्क में छोड़ा जाता है, उसके पुनः जागृत होने की स्मृति कहते हैं।” इन दोनों परिभाषाओं में एक अनुभव का मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव तथा उनका पुनः स्मरण जागृत होने की स्मृति कहा गया है।

3. मैक्टूगल के अनुसार:
“घटनाओं की उसी रूप में कल्पना करना जिस रूप में उन्हें पूर्वकाल में अनुभव किया गया तथा उन्हें अपने उसी अनुभव के रूप में पहचानना ही स्मृति है।” इस परिभाषा के अनुसार किसी घटना के पूर्व संचित अनुभव को पुनः उसी रूप में पहचानना स्मृति है।

4. वुडवर्थ की परिभाषा:
वुडवर्थ ने स्मृति की अति सरल परिभाषा करते हुए कहा कि “पूर्व समय में सीखी गई बातों का याद करना स्मृति है।”

उपरोक्त परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट है कि स्मृति वह मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने पूर्व अनुभवों को पुनः अपनी चेतना स्तर पर अनुभव या याद करता है। इस अनुभव अथवा याद करने की प्रक्रिया में व्यक्तियों से स्तर भेद तो हो सकता है किन्तु स्मृति की क्रिया के क्रियान्वयन में कोई भेद नहीं होता। स्मृति के आधार पर ही कल्पना शक्ति की उपज होती है।

यदि स्मरण शक्ति का अभाव हो जाये तो मानव जीवन निष्क्रिय हो जाता है। पागलों में असामान्य व्यवहार का आधर स्मृति का अभाव होना ही होता है। व्यक्तियों के स्तर भेद के अतिरिक्त आयु की दृष्टि से भी स्मृति के स्तर में उतार-चढ़ाव आते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि, “स्मृति वस्तुतः चेतन मन का अंग है और इसी से जीवन व्यापार सम्भव होता है तथा मस्तिष्क चेतन एवं अर्द्धचेतन शक्तियों के माध्यम से इस क्रिया को अपनाता है।”

स्मृति के तत्व (Factors of Memory) जैसा कि स्मृति की परिभाषा से स्पष्ट है कि स्मृति एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है। यह क्रिया अनेक क्रियाओं का सम्मिलित रूप होती है। अतः इसके स्वरूप को समझने के लिये इसके विभिन्न अंगों को समझना भी आवश्यक है। उक्त परिभाषाओं के अनुसार स्मृति की क्रिया के चार मुख्य अंग हैं – सीखना, धारणा, पुनःस्मरण तथा पहचानना। इनका विस्तृत वर्णन निम्न प्रकार है –

1. सीखना (Learning):
जैसा कि वुडवर्थ की स्मृति की परिभाषा मे स्पष्ट होता है कि, “पूर्व में सीखे गये कार्य को पुनः याद करना ही स्मृति है।” अत: सीखना स्मृति का प्रथम प्रमुख अंग है। सीखने के अभाव में अनुभव का संचय सम्भव नहीं और अनुभव के संचय के बिना स्मृति की क्रिया सम्भव नहीं, इस कारण स्मृति की क्रिया के लिये ‘सीखना’ क्रिया अत्यावश्यक है।

2. धारणा (Retention):
धारणा एक मानसिक क्षमता पर आधरित क्रिया है। कुछ बालक किसी बात को जल्दी याद कर लेते हैं, कुछ बहुत देर से याद कर पाते हैं। धारण कर भेद का कारण अनेक तत्व हैं। इन तत्वों के द्वारा ही धारण की क्रिया होती है, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है –

धारणा शक्ति तत्व या आधार (Factors of Retention):
धारणा शक्ति के छः मुख्य तत्व हैं, जिनके द्वारा धारणा शक्ति का स्तर प्रभावित होता है। इनका विवरण निम्न प्रकार है –

(i) मस्तिष्क:
धारणा शक्ति का मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध होता है। जो अनुभव प्राप्त किये जाते हैं उनमें अधिकांश को मस्तिष्क ग्रहण करता है। वे अनुभव अर्द्धचेतन भाग में रहते हैं। मस्तिष्क सीखे हुए अनुभव को क्रमबद्ध करता है। यदि मस्तिष्क प्रबल होता है तब उसमें धारणा शक्ति प्रबल होगी तथा वह प्राप्त अनुभव को अधिक समय तक सुरक्षित रख सकती है। जिनका मस्तिष्क दुर्बल होगा उनकी धारणा शक्ति भी दुर्बल होती है तथा प्राप्त अनुभव को अधिक समय तक संचित नहीं रख सकती। इस प्रकार व्यक्ति की स्मरण शक्ति का स्तर धारणा शक्ति पर ही आधारित होता है तथा धारणा शक्ति का स्तर मस्तिष्क के ऊपर निर्भर है।

(ii) स्वास्थ्य:
स्वस्थ व्यक्ति के नाड़ी तन्तु गतिशील होते हैं और अपना काम उचित रूप से कर सकते हैं। इस प्रकार यदि शरीर स्वस्थ होता है तब उसकी धारणा शक्ति भी प्रबल होती है, इसके विपरीत अस्वस्थता की दशा में व्यक्ति की धारणा शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। उदाहरणार्थ, लम्बी बीमारी के कारण व्यक्ति के दुर्बल स्वास्थ्य की स्थिति में उसकी धारणा शक्ति भी दुर्बल भी हो जाती है।

(iii) रुचि और चिन्तन:
धारणा शक्ति का सर्वाधिक सम्बन्ध रुचि और चिन्तन से होता है। रुचिपूर्ण अनुभव को व्यक्ति शीघ्र धारण कर लेता है जबकि अरुचिपूर्ण कार्यों को प्रयत्न के बाद भी धारण नहीं कर पाता और यदि धारण कर भी कर लेता है तो यह धारण करना स्थायी नहीं बन पाता।

(iv) विषय का स्वरूप:
धारण शक्ति सम्बन्धित विषय के स्वरूप पर भी निर्भर करती है। विषय के स्वरूप से अभिप्राय उसकी उद्देश्य पूर्णता एवं सार्थकता से है। विषय जितना उद्देश्यपूर्ण सार्थक होता है उसकी धारणा उतनी ही प्रबल होती है। इसके विपरीत विषय के निरर्थक या उद्देश्यहीन होने पर उसकी धारणा शक्ति भी कमजोर होती है।

(v) सीखने की विधि:
धारणा की प्रबलता सीखने की विधि से भी प्रभावित होती है। यदि किसी कार्य के सीखने की विधि उत्तम है तब उसकी धारणा प्रबल होगी। विषय के स्वरूप के आधार पर सीखने की विधि का निर्धारण करने से सीखे गये कार्य का अनुभव अधिक दिन तक संचित रह सकता है। इसे विपरीत अव्यव-स्थिति पद्धति द्वारा सीखे गये कार्य की धारणा अधिक समय नहीं रह पाती।

(vi) अनुभव:
जिस क्रिया का जितना अधिक अनुभव होता है उसकी धारणा भी उतनी ही प्रबल होती है। अतः अनुभव भी धारणा का महत्त्वपूर्ण अंग है।

3. पुनमरण (Recall):
जब अतीत के अनुभव चेतना में आते हैं, तब उन्हें पुनर्मरण की संज्ञा होती है। पुनः स्मरण की मुख्य विशेषता यह होती है कि इसमें अतीत के अनुभव जैसे वे होते हैं वैसे ही चेतना में नहीं आते। उनमें से अनेक तत्व छूट जाते हैं तथा केवल मुख्य-मुख्य अंश की स्मृति में आते हैं।

कुहलमन ने पुनस्मरण की क्रिया के विषय में कहा कि, “पुनमरण मूल अनुभव की बिल्कुल वैसी की वैसी ही नकल नहीं होती। वस्तुतः वह पुनर्रचना नहीं बल्कि एक रचना मात्र है जो एक ऐसे कल की रचना है, जो मूल वस्तु के पूर्व अनुभव के आधार पर स्वीकृत कर ली जाती है तथा पूर्व प्रत्यक्षीकरण की रचना से बहुत भिन्न होती है।” इस प्रकार पुनमरण पूर्व अनुभवों को याद करने की क्रिया है।

पुनर्मरण के आधार (Factors of Recall):
पुनः स्मरण मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

(i) विचारों का साहचर्य (Association of ideas):
कभी-कभी विचारों के साथ उनसे सम्बद्ध अन्य बातों का भी स्मरण आ जाता है। उदाहरणार्थ ताजमहल के साथ शाहजहाँ का लंका के साथ रावण का तथा महाभारत के साथ श्रीकृष्ण का स्मरण हो जाता है। विचारों के साहचर्य के तीन मुख्य कारण होते हैं –

(अ) समानता:
दो वस्तुओं की पारस्परिक समानता से एक को देखते ही दूसरे का स्मरण हो आता है। जैसे अहिंसा का नाम लेते हैं तो इस सिद्धांत के प्रतिपादक महात्मा गाँधी तथा महावीर जैन का नाम स्मरण आ जाता है।

(ब) विपरीतता:
एक-दूसरे के विपरीत किन्तु परस्पर सम्बन्धित अनुभव भी कुछ स्मरण कराते हैं। जैसे किसी बदमाश को देखकर सज्जन की याद आती है।

(स) सहचारिता:
जब दो विषयों का अनुभव एक साथ हो जाता है तो उसमें से एक का स्मरण होने पर दूसरा भी याद आ जाता है। इसे सहचारिता कहते हैं।

(ii) मानसिक तत्परता:
मानसिक तत्परता से अभिप्राय विचारपूर्वक स्मरण करने से है। जिस अनुभव को पुनः स्मरण करने के लिये व्यक्ति मानसिक रूप से तत्पर होता है वह क्रिया या अनुभव तुरंत पुनः स्मृति में आ जाता है। अतः पुनमरण के लिये मानसिक तत्परता भी प्रभावशाली तत्व है।

(iii) संवेग:
संवेग भी पुनमरण को प्रभावित करते हैं। यदि संवेग अनुकूल होता है तब उसका पुनमरण आसानी से हो जाता है। उदाहरणार्थ, परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने पर परिवार के अन्य दिवंगत व्यक्ति का पुनमरण हो जाता है। वह पुनमरण शोक के संवेग के परिणामस्वरूप ही होता है। इसमें विशेष बात यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि संवेग की अनुकूल अनुभूतियों का ही इस अवस्था में पुनः स्मरण होता है, विपरीत का नहीं। जैसे, विवाहादि के समय किसी की मृत्यु का स्मरण नहीं होता है और मृत्यु के समय किसी उत्सव का स्मरण नहीं होता अर्थात् रोमांच के संवेग द्वारा रोमांचक पुनः स्मरण और शोक के संवेग द्वारा शोकायुक्त।

4. पहचानना (Recognition):
स्मृति की प्रक्रिया का समापन पहचान से होता है। स्मृति में याद, धारणा और पुनमरण द्वारा यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि विषय क्या है, जब यह निश्चित हो जाता है कि चेतना में आने वाला विषय यह है तब उसे पहचान कहा जाता है। इस प्रकार स्मृति विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुजरती हुई पहचान पर अपना वृत्त पूर्ण करती है।

स्मृति की प्रक्रिया द्वारा ‘प्रतिमा’ हमारे मस्तिष्क में बन जाता है। किन्तु जब प्रक्रिया का वृत्त पूर्ण हो जाता है तो प्रतिमा स्पष्ट हो जाती है। उदाहरणार्थ-जब कोई व्यक्ति हमारे सम्मुख आता है तब व्यक्ति की आकृति हमारे मस्तिष्क में बन जाती है, हम सोचने लगते हैं कि इस व्यक्ति को कहीं देखा है या इससे कहीं भेंट हुई है।

हम विभिन्न प्रकार से उसके विषय में घटनाओं का स्मरण करके उस पर विचार करते हैं तब उनका पुनरर्मरण करके अन्त में निश्चित हो जाता है कि उसे कहाँ देखा है या उसकी कहीं भेंट हुई है। व्यवहार के अंदर भी हम देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति काफी समय बाद हमें मिलता है और हम उसकी ओर अनजान से बने देखते हैं तब वह व्यक्ति अनायास ही कह उठता है कि क्या आपने मुझे ‘पहचाना’ नहीं? यह कहने का उसका अभिप्राय उसकी प्रतिमा के स्पष्ट न होने से ही होता है, तब यकायक हम भी कह उठते हैं कि अरे पहचान लिया कि आप अमुक व्यक्ति हैं, यह उनकी स्मृति के लिए पूर्णता का सूचक होता है।

(i) निश्चित पहचान:
जब हम किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से पहचान लेते हैं तथा उससे सम्बन्धित. घटनाओं का भी हमें स्पष्ट स्मरण हो आता है तब इसको निश्चित पहचान कहते हैं।

(ii) अनिश्चित पहचान:
जब हमारे सम्मुख कोई व्यक्ति या वस्तु आती है और हम उसके लिये स्पष्ट पहचान नहीं बना पाते अर्थात् यह तो पहचान लेते हैं कि वह व्यक्ति अपना परिचित है किन्तु उसके सम्बन्धित स्मरण हमें स्पष्ट नहीं हो पाता तब यह अनिश्चित पहचान होती है।

(iii) असत्य पहचान:
जब हम किसी व्यक्ति को पहचानने में असत्य निर्णय ले लेते हैं तब वह असत्य पहचान होती है। उदाहरणार्थ, जब कोई व्यक्ति हमारे सामने आता है और हम किसी अन्य व्यक्ति के साथ उसकी स्मृति को जोड़कर उसे वही समझ लेते हैं तब यह असत्य पहचान होती है।

मनोविज्ञान के अध्ययन क्षेत्र में स्मृति के अंग के रूप में होने वाली पहचान निश्चित पहचान होती है, शेष दोनों भ्रम के क्षेत्र में आती हैं। अतः निश्चित पहचान की पहचानना क्रिया का मनोवैज्ञानिक रूप है।

स्मृति को उत्तम बनाने के साधन:
स्मृति के पूर्ण स्वरूप को समझाने के लिए इसके अर्थ, परिभाषा तथा अंगों को जानने के अलावा इसको उत्तम बनाने के विषय में जानना भी महत्त्वपूर्ण होगा। अच्छी स्मृति बनाने के मुख्य साधन निम्न प्रकार हैं –

(i) उत्तम विधि द्वारा सीखना:
स्मृति का प्रथम मुख्य अंग ‘सीखना’ है। यदि उचित पद्धति द्वारा किसी बात को सीखा जाये तो उसकी स्मृति अच्छी प्रकार होती है। उदाहरणार्थ, यदि हम किसी विषय को उसके अध्ययन के नियमों के अनुसार व्यवस्थित ढंग से पढ़ते हैं तो उसकी स्मृति शीघ्र हो जाती है। इसके विपरीत सीखने की पद्धतियों का उपयोग न करके अव्यवस्थित ढंग से सीखा गया कार्य स्मृति में कठिनता से आता है। अतः उत्तम विधि द्वारा सीखना उत्तम स्मृति का एक अच्छा साधन है।

(ii) प्रबल धारणा:
स्मृति का दूसरा महत्त्व अंग धारण शक्ति है। यदि व्यक्ति की धारणा शक्ति उत्तम होती है तो सीखी गई क्रिया अधिक स्थायी रह सकती है। अन्यथा दुर्बल धारण शक्ति में उत्तम सीखने की विधि भी अधिक सार्थक सिद्ध नहीं होती है। अत: उत्तम स्मृति के लिये प्रबल धारणा का होना भी आवश्यक है।

(iii) निरर्थक तत्वों का विस्मरण:
निरर्थक तत्वों के विस्मरण से अभिप्रेरक विषय से सम्बन्धित गौण बातों को भूल जाने से है। केवल विषय से सम्बन्धित मुख्य बातों को ही हमेशा स्मरण रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, कक्षा में पढ़ते समय जो विषय पढ़ाया जा रहा है वही मुख्य होता है शेष अध्यापक के हावभाव, विद्यार्थियों की शरारतें या अन्य अनेक सम्बन्धी घटक गौण होते हैं। अतः विद्यार्थी यदि विषय के अतिरिक्त अन्य घटनाओं को भी धारण कर लेता है जो निरर्थक होती है तो वह विषय की अच्छी स्मृति नहीं कर सकता। विषय के निरर्थक तत्वों का विस्मरण ही अच्छी स्मृति में सहायक होता है।

(iv) उपयोगिता:
उपयोगिता-वही विषय सार्थक होता है जो उपयोगी होता है। अतः उपयोगी बातों का धारणा करना अच्छी स्मृति के लिये आवश्यक है क्योंकि उपयोगी बातों की आवश्यकता पड़ने पर चेतना के स्तर पर आ जाना अच्छी स्मृति का एक लक्षण है।

(v) सत्य पुनस्र्मरण:
अच्छी स्मृति वही कहलाती है जिसमें पूर्व अनुभव वैसे के वैसे ही चेतना के स्तर पर आ जाते हैं। इसके लिये आवश्यक है कि स्मृति को अच्छा बनाने के साधनों का उपयोग किया जाये क्योंकि पुनमरण ‘सीखने की विधि’ और धारणा शक्ति पर निर्भर करता है। इन दोनों को सही प्रकार से क्रियान्वित करने पर ही पुनमरण यथार्थ होता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 2.
स्मृति से क्या तात्पर्य है? स्मृति को उन्नत बनाने के उपाय का वर्णन करें।
उत्तर:
स्मृति वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम अपने गत अनुभव को संग्रहित कर उसे वर्तमान चेतना में लाते हैं।

उन्नत बनाने के उपाय:
स्मृति सुथर की बहुत सारी युक्तियाँ हैं जिन्हें स्मृति सहायक संकेत कहा जाता है जो निम्न है –

प्रतिभा के उपयोग से स्मृति सहायक संकेत:
इस प्रकार की स्मृति सुधार विधि में याद की जानेवाली सामग्री तथा उसके इर्द-गिर्द सुस्पष्ट प्रतिभा की रचना की जाती हैं इसमें 2 प्रमुख विधि है –

1. मुख्य शब्द विधि:
इस विधि में से प्रतिभा विकसित करने में परिचित शब्द से सीखे जाने शब्द का संबंध जोड़ना होता है जैसे MAT शब्द परिचित होने से बच्चा CAT शब्द आसानी से सीख लेता है।

2. स्थान-विधि:
किसी वस्तु को याद करने में उसे संबंधित स्थान से जोड़कर उसकी प्रतिभा मन में लाने से विषय याद रहता है।

संगठन के उपयोग से स्मृति सायक संकेत:
संगठन के अर्थ हैं याद की जानेवाली सामग्री में एक क्रम सुनिश्चित करना है संगठित विषय की स्मृति तेज होती है।

1. खंडीयन विधि:
यदि किसी विषय को याद करना है तो उसे खंड में बाँटकर यादकर उसे क्रम में सजाकर स्मृति को उन्नत बनाया जा सकता है।

2. प्रथम अक्षर तकनीक:
इसमें अक्षर तकनीक को प्रयुक्त करने के लिए याद किए जाने वाले प्रत्येक शब्द के अक्षर को लेकर उससे एक वाक्य या शब्द बनाया जाता है। इसके अलावा स्मृति को उन्नत बनाने के अन्य उपाय हैं –

(a) गहन-स्तर पर प्रक्रमण कीजिए:
किसी सूचना को अच्छी तरह से याद करने के लिए गहन-स्तर पर प्रक्रमण करना चाहिए।

(b) अवरोध घटाएँ:
स्मृति उन्नत बनाने के लिए एक विषय को सीखने के बाद दूसरा ऐसा विषय सीखना चाहिए जिसमें विषय साम्य न हो। इसके अलावा अवरोध को कम करने के लिए अध्ययन के दौरान बीच में आराम करना चाहिए।

(c) पर्याप्त पुनरुद्धार संकेत रखिए:
किसी विषय को याद करते समय उस सामग्री में निहित कुछ पुनरुद्धार संकेतों को पहचान से और अपने याद करने की सामग्री के अंशों को इनसे जोड़ने से स्मृति उन्नत होती है। इस प्रकार कई प्रविधि और उपाय जिसकी सहायता से स्मृति को उन्नत बनाया जा सकता है। गत अनुभव का स्मरण न होना विस्मृति कहलाता है। अर्थात् विस्मृति (या धारण की किसी जाँच) की असमर्थता है।

कारण:

1. चिह्न हास के कारण विस्मरण:
जब हम किसी विषय को याद करते हैं तो उसके चिह्न मस्तिष्क में बन जाते हैं जिसे स्मृति-चिह्न कहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है स्मृति-चिह्न कमजोर होते जाते हैं। अतः हम विषय को पूरी तरह से भूल जाते हैं इसे अनुप्रयोग सिद्धांत कहा गया है।

2. अवरोध के कारण विस्मरण:
इसे अवरोध सिद्धांत भी कहते हैं इसके अनुसार स्मृति भंडार में संचित विभिन्न सामग्री के बीच अवरोध के कारण विस्मरण होता है सीखने और याद करने में विभिन्न पदों के बीच साहचर्य स्थापित होता है जिससे विषय स्मृति में अक्षत रहता है पुनरुद्धार के समय इसमें अवरोध उत्पन्न होता है जो 2 प्रकार का होता है।

3. अग्रलक्षी अवरोध:
पहले सीखा गया विषय बाद में सीखी गयी क्रिया को याद करने में अवरोध उत्पन्न करता तो अग्रलक्षी अवरोध कहते हैं।

4. पुर्वलक्षी अवरोध:
इसमें बाद में सीखा गया विषय पहले विषय को याद करने में बाधा डालता है।

5. पुनरुद्धार सफलता के कारण विस्मरण:
विस्मरण का एक कारण प्रत्याह के समय पुनरुद्धार के सति का अनुपस्थित रहना भी है पुनरुद्धार के संकेत वे साधन हैं जो हमें स्मृति में संचित सूचना की पुनः प्राप्त करने में मदद करते हैं टलविंग ने अपने सिद्धांत में इसकी विस्मृत: व्याख्या की है। इसके अलावा विस्मरण के कई कारण हैं जैसे विषय का स्वरूप, सीखने की मात्रा, विषय का भावात्मक मूल्य विषय की लंबाई, सीखने की विधि, विषय में रुचि, मस्तिष्क, अद्यात तथा शारीरिक कष्ट, मानसिक, धक्का एवं चिंता, मानसिक पर्यवेक्षण का अभाव।

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प्रश्न 3.
लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति के अर्थ एवं विशेषताओं को बतलाएँ। इन दोनों के अंतर पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
लघुकालीन स्मृति का अर्थ (Meaning of short-term memory of STM):
लघुकालीन स्मृति को विलियम जेम्स (WilliamJames) ने प्राथमिक स्मृति (Primary memory or PM) भी कहा है। लघुकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूतियों को मात्र एकाध प्रयास में ही सीख लेता है। शायद यही कारण है कि ऐसी अनुभूतियाँ कमजोर होती हैं। जब व्यक्ति इन अनुभूतियों पर ध्यान देता है या उनका मानसिक रिहर्सल करता है तब उनका विस्मरण नहीं हो पाता है। परंतु, इन तत्वों के अभाव में लघुकालीन स्मृति-चिह्नों का तुरंत लोप हो जाता है जिसके फलस्वरूप विस्मरण विस्मरण होता है।

इस तरह के विस्मरण को चिह्न-आधुत विस्मरण (trace dependent forgetting) कहा जाता है लघुकालीन स्मृति को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझ सकते हैं-मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति किसी अपरिचित व्यक्ति से किसी कारणवश दूरभाष पर बातचचीत करने के लिए उसकी दूरभाष-संख्या दूरभाष निर्देशिका से प्राप्त करता है। व्यस्त सिगनल मिलने पर वह 15 सेकण्ड के लिए रुककर पुनः उसे डाइल करने की कोशिश करता है।

संभव है इस बार वह दूरभाष-संख्या भूल जाए या संख्या का सही क्रम भूल जाए। यह लघुकालीन स्मृति का उदाहरण होगा, क्योंकि यहाँ व्यक्ति दूरभाष संख्या को अधिकतम समय-सीमा (20-30 सेकंड) से कम ही समय तक संचित रख पाया। लघुकालीन स्मृति को अन्य नामों जैसे सक्रिय स्मृति (active memory) तात्कालिक स्मृति (immediate memory), चयन स्मृति (working memory) एवं लघुकालीन संचयन (short term storage) आदि से भी जाना जाता है। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोधों एवं प्रयोगों से STM की कुछ खास विशेषताओं का पता चला है जिनसे इसका अर्थ और अधिक स्पष्ट हो जाता है। अतः इन विशेषताओं का वर्णन यहाँ अपेक्षित है जो इस प्रकार है –

  1. लघुकालीन स्मृति कमजोर (fragile) होती है, परिणामस्वरूप इससे विस्मरण तेजी से होता है।
  2. लघुकालीन स्मृति-उद्दीपनों (stimuli) को हू-ब-हू संचित न करके उन्हें उनकी आवाज (sound) के आधार पर कूटसंकेतीकृत (coding) कर संचित किया जाता है।
  3. मिलर (Miler) के अनुसार STM की संचयनशक्ति (storage capacity) एक समय में 72 अर्थात् अधिकतम 9 तथा न्यूनतम 5 उद्दीपनों की होती है। इसे मनोवैज्ञानिकों ने जादुई संख्या (magic number) कहा है।
  4. लघुकालीन स्मृति की अवधि अधिक-से-अधिक 25-30 सेकण्ड की होती है। पेटरसन एवं पेटरसन (Peterson & Peterson) तथा ब्राउन (Brown) के अध्ययन से इस तथ्य की संतुष्टि होती है। पेटरसन एवं पेटरसन के अध्ययन में तो STM की अधिकतम अवधि 18-20 सेकण्ड की ही पाई गई थी।

दीर्घकालीन स्मृति का अर्थ (Meaning of long term memory or LTM):
दीर्घकालीन स्मृति को विलियम जैम्स (William James) ने गौण स्मृति (secondary memory of SM) भी कहा है। दीर्घकालीन स्मृति से तात्पर्य वैसे स्मृति-संचयन (memory storage) से होता है जिसमें सूचनाओं को व्यक्ति काफी लम्बी अवधि के लिए संचित करता है। इस लम्बी अवधि की न्यूनतम सीमा 20-30 सेकेण्ड तथा अधिकतम सीमा कुछ निश्चित नहीं होती है। संभव है, व्यक्ति किसी सूचना को मात्र 2 घंटे के लिए LTM में संचित रखे या फिर उसे पूरे जीवनकाल के लिए भी संचित रखे। दीर्घकालीन स्मृति की संचय क्षमता (storage capacity) काफी बड़ी होती है और कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इसकी क्षमता को असीमित बतलाया है।

इसमें वैसे सूचनाएँ संचित होती हैं जिन्हें व्यक्ति महत्त्वपूर्ण समझता है या जिन्हें वह अभ्यास करके प्राप्त करता है। व्यक्ति की अपनी दूरभाष-संख्या तथा अपने नजदीकी रिश्तेदारों की दूरभाष-संख्या LTM में मुख्य रूप से दो तरह की सूचनाएँ संचित होती हैं। पहली तरह की सूचनाओं का संबंध वैसी सूचनाओं से होता है जो सामयिक घटनाओं (temporal events) के क्रमों (sequences) से संबंधित होते हैं तथा दूसरी तरह की सूचनाओं का स्वरूप कुछ वैसा होता है जो तरह-तरह के संकेतों (symbols) एवं शब्दों के अर्थ आदि से संबंधित होता है। पहली तरह की सूचनाओं को प्रासंगिक स्मृति (episodic memory) तथा दूसरी तरह की सूचनाओं की स्मृति को अर्थगत स्मृति (semantic memory) कहा जाता है। LTM को निष्क्रिय स्मृति (inactive memory) भी कहा जाता है।

LTM के क्षेत्र में किए गए अध्ययनों से इसकी कुछ विशेषताओं (characteristics) का पता चला है जिनसे उसके अर्थ को ठीक ढंग से जाना जा सकता है। ऐसी विशेषताओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. LTM में संचित सूचनाएँ सापेक्ष रूप से (relatively) स्थायी होती हैं जिसके कारण इसे विस्मरण देरी से होता है।
  2. STM में संचित सूचनाएँ मौलिक उद्दीपन से प्राप्त सूचनाओं की कार्बन कॉपी नहीं होती, बल्कि उन्हें अर्थ के आधार पर कूटसंकेतीकृत करके संचित किया जाता है।
  3. LTM में सूचनाएँ संगठित एवं साहचर्यात्मक ढंग से संचित की जाती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जो सूचनाएँ या एकांश आपस में अर्थपूर्ण ढंग से संबंधित होती हैं उन्हें व्यक्ति एक साथ संचित करता है।
  4. LTM में संचित वैसी सूचनाएँ कम सक्रिय होती हैं जो किसी घटना या कार्य के पूरा होने के बाद प्राप्त होती हैं। परंतु वैसी सूचनाएँ जो किसी घटना या कार्य के अधूरा ही रह जाने के फलस्वरूप प्राप्त होती हैं, अधिक सक्रिय होती हैं।

लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर (Distinction between short term memory and long-term memory):
STM तथा LTM में प्रमुख अंतर निम्नांकित प्रकार के हैं –

1. STM में सूचनाएँ अधिक-से-अधिक:
20-30 सेकण्ड के लिए संचित करके रखी जाता हैं, परंतु LTM में सूचनाओं के संचयन की अधिकतम अवधि अनश्चित होती है। यह एक बेटे की भी हो सकती है, एक दिन की भी या फिर पूरे जीवन-अवधि के लिए।

2. STM में सक्रिय एवं सतत रिहर्सल (rehearsal) की प्रक्रिया चलती रहती है। म प्रक्रिया के बंद होते ही सूचनाओं का विस्मरण प्रारम्भ हो जाता है। LTM के साथ ऐसी बात नहीं है। LIM में ऐसी सक्रियता की जरूरत नहीं पड़ती है, हालांकि यह बात जरूर है कि प्रारम्भ में LTM में सूचनाओं को संचित करने में व्यक्ति को अधिक प्रयास करना आवश्यक हो जाते है, परंतु बाद में यह एक निष्क्रिय प्रक्रिया हो जाती है।

3. STM की संचयन:
क्षमता (storge capacity) सीमित होती है और मिलर की जादुई संख्या (magic number) के अनुसार यह क्षमता 7 ± 2अर्थात् 5 से 9 तक की (किसी एक समय में) होती है। LTM के साथ ऐसी बात नहीं है। LTM की संचयन-क्षमता असीमित (unlimited) होती है। इसकी न तो कोई न्यूनतम और न ही कोई अधिकतम संख्या निश्चित होती है।

4. STM से हुए विस्मरण का आधार स्मृति:
चिह्नों का नाश या ह्रास होना होता है जबकि LTM में हुए विस्मरण का आधार सामान्यतः पुनः प्राप्ति संकेतों (retrieval clues) का अनुपलब्ध होना है। पहली तरह के विस्मरण को चिह्न-आधृत विस्मरण (trace-dependent forgetting) तथा दूसरी तरह के विस्मरण को संकेत-आधृत विस्मरण (clue-dependent forgetting) कहा जाता है।

5. STM में संचित सूचनाओं का प्रत्याह्वान (recall) काफी आसान होता है। व्यक्ति थोड़ा-सा साधारण प्रयास से ही संचित सूचनाओं का प्रत्याह्वान कर लेता है। परंतु LTM से सूचनाओं का सही प्रत्याह्वान (recall) या प्रत्याभिज्ञान (recognition) कर पाता है।

6. STM ध्वनि-संकेतीकरण (phonological or accustic coding) से अधिक प्रभावित होता है जबकि LTM अर्थगत संकेतीकरण (semantic coding) से अधिक प्रभावित होता है। ध्वनि-संकेतीकरण में व्यक्ति शब्दों को उनकी ध्वनि में समानता (जैसे-CAT, MAT, SAT, BAT आदि) के आधर पर मस्तिष्क से संचित करता है तथा अर्थगत समानता में व्यक्ति शब्दों को उनके अर्थ अर्थात् (LARGE, TALL, BIG आदि) के आधार पर मस्तिष्कम में संचित करता है।

7. STM में नवीनता:
प्रभाव (recency effect) अधिक देखने को मिलता है जबकि LTM पर प्राथमिकी प्रभाव (primacy effect) अधिक देखने को मिलता है। शब्दों या एकांशों की सूची अतिम भागों में किया गया प्रत्याह्वान नवीनता-प्रभाव तथा प्रथम भागों से किया गया प्रत्याह्वान प्राथमिकी प्रभाव कहलाता है।

8. STM तथा LTM को न्यूरोदैहिक सबूतों (neurophysiological evidences) के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न किया गया है। मिलनर (Milner) के अनुसार कुछ ऐसे नैदानिक सबूत (clinical evidences) मिले हैं जिनमें देखा गया है कि व्यक्ति का LTM गंभीर रूप से प्रभावित था, परंतु STM ठीक था। उसी तरह एक अन्य नैदानिक ने इसमें यह देखा कि व्यक्ति का STM बुरी तरह प्रभावित था परंतु LTM बिल्कुल ठीक था। इन सबूतों के आधार पर मनोवैज्ञानिकों ने यह बतलाया है कि STM तथा LTM दो स्मृति तंत्र हैं जो अलग-अलग नियमों एवं सिद्धांतों से निर्देशित होते हैं।

स्पष्ट हुआ कि STM तथा LTM एक-दूसरे से भिन्न हैं। इन अंतरों के बावजूद कुछ मनोवैज्ञानिकों जैसे लॉकहार्ट एवं क्रैक (Lockhart & Craick) ने यह दावा किया है कि इन दोनों का दो अलग-अलग तंत्र (system) न मानकर एक ही स्मृति तंत्र के दो संबंधित पहलू मानकर चलना अधिक उचित होगा। परंतु उनके विचारों को अधिक समर्थन प्राप्त नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि फिलहाल इन दोनों को एक-दूसरे से भिन्न समझना ही उपयुक्त है।

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प्रश्न 4.
लघुकालीन स्मृति से आप क्या समझते हैं? लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर बतावें।
उत्तर:
जब किसी पाठ या विषय को व्यक्ति सीखता है तब उससे उत्पन्न स्मृति चिह्न को मस्तिष्क में धारण करके रखता है। स्मृति चिह्न जितना ही अधिक समय के लिए मस्तिष्क में बना रहता है, धारण भी उतने ही अधिक समय के लिए बना रहता है। स्मृति चिह्नों को धारण करके रखने की अवधि को कसौटी मानकर स्मृति के दो प्रकार बताए गए हैं-(क) लघुकालीन स्मृति (short term memory) (ख) दीर्घकालीन स्मृति (long term memory)।

इन दोनों का वर्णन इस प्रकार है –

(क) लघुकालीन स्मृति (Short term memory):
लघुकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को अधिकतम 20 से 30 सेकण्ड के लिए संचित करके रख पाता है तथा अनुभूतियों को वह मात्र एकाध प्रयासों में ही सीख लिया जाता है। कोई भी अनुभूति पहले व्यक्ति की लघुकालीन स्मृति में ही प्रवेश करती है। जब व्यक्ति उस अनुभूति पर ध्यान देता है या उसका मानसिक रिहर्सल करता है तब तो उसका विस्मरण नहीं हो पाता है। परंतु, इन दोनों तत्वों के अभाव में लघुकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश तेजी से होता है। फलस्वरूप, इसे विस्मरण भी काफी तेजी से होता है।

लघुकालीन स्मृति को एक उदारहण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मान लिया जाए कि किसी अपरिचित से दूरभाष पर बातचीत करने के लिए हम उसकी दूरभाष संख्या दूरभाष निर्देशिका से प्राप्त करते हैं। ‘व्यस्त सिंगनल’ (busy signal) मिलने पर 20 सेकण्ड रुककर पुनः उसे डायल करते हैं। संभव है कि हम उसकी दूरभाष संख्या भूल जाएँ या संख्या का सही क्रम भूल जाएँ। यह लघुकालीन स्मृति का उदाहरण होगा क्योंकि इससे दूरभाष संख्या को 20 सेकण्ड से कम ही समय के लिए स्मृति संचयन (memory store) में रखा गया था। विलियम जेम्स (William James) ने इसे प्राथमिक स्मृति (Primary memory) कहा है।

(ख) दीर्घकालीन स्मृति (Long term memory):
दीर्घकालीन स्मृति वैसी स्मृति को कहा जाता है जिसमें व्यक्ति किसी अनुभूति को. कम-से-कम 30 सेकण्ड से अधिक समय के लिए निश्चित रूप से संचित करके रखता है। इस तरह की स्मृति में अधिकतम कितने समय तक किसी स्मृति चिह्न को सचित रख जाता है, इसकी कोई समय-सीमा नहीं होती है। शायद यही कारण है कि एक वृद्ध व्यक्ति भी अपने बचपन की अनुभूतियों का आसानी से प्रत्याह्वान कर लेता है।

दीर्घकालीन स्मृति में वैसी अनुभूतियाँ संचित होती हैं जिन्हें व्यक्ति एकाध प्रयास में नहीं बल्कि कई प्रयासों में हासिल करता है। व्यक्ति की अपनी दूरभाष संख्या तथा अपने नजदीकी संबंधियों की दूरभाष संख्या दीर्घकालीन स्मृति में संचित होती है। विलियम जेम्स ने इसे गौण स्मृति (secondary memory) भी कहा है। ऐसी स्मृति में स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है।

लघुकालीन स्मृति तथा दीर्घकालीन स्मृति में अंतर (Distinction between short term memory and long term memory):
इन दोनों तरह की स्मृतियों में मुख्य अंतर निम्नांकित हैं –

  • लघुकालीन स्मृति की संचय अवधि (storage duration) अधिकतम 20 से 30 सेकण्ड की होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति में ऐसी कोई अधिकतम समय-सीमा नहीं होती है।
  • लघुकालीन स्मृति में वैसी अनुभूतियाँ होती हैं जो एकाध बार के प्रयास से उत्पन्न हो जाती हैं। परंतु, दीर्घकालीन स्मृति में केवल वैसी ही अनुभूतियाँ होती हैं जिन्हें व्यक्ति कई प्रयासों में काफी अभिरुचि दिखाकर प्राप्त किए हुए होता है।
  • दीर्घकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश तेजी से होता है जबकि लघुकालीन स्मृति से स्मृति चिह्नों का नाश धीरे-धीरे होता है। यही कारण है कि दीर्घकालीन स्मृति से विस्मरण की दर काफी धीमी होती है जबकि लघुकालीन स्मृति से विस्मरण की दर काफी तेज होती है।
  • कोई भी अनुभूति पहले लघुकालीन स्मृति में प्रवेश करती है और जब व्यक्ति उसपर ध्यान देता है या उसका मानसिक रिहर्सल करता है तब उसका स्थानांतरण दीर्घकालीन स्मृति में होता है।
  • लघुकालीन स्मृति की संचयन क्षमता (storgae capacity) काफी सीमित होती है जबकि दीर्घकालीन स्मृति की संचयन क्षमता असीमित होती है।

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प्रश्न 5.
क्षणदीय स्मृतियाँ, जीवन चरित स्मृति तथा निहित स्मृतियों का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
मानव स्मृति की जटिल एवं गत्यात्मक प्रकृति के अध्ययन के आधार पर दीर्घकालिक स्मृति को तीन प्रमुख दशाओं से जोड़ा जाता है –

1. क्षणदीप स्मृतियाँ:
आश्चर्यजनक अथवा विस्मयकारी घटनाओं के कारण उत्पन्न उदीप्त करनेवाली सूचनाओं पर आधारित स्मृतियाँ होती हैं। क्षणदीप स्मृतियाँ किसी विशेष स्थान, तिथि एवं समय से जुड़े ऐसे चित्र होते हैं जिसकी स्मृति लगभग स्थिर होती है। क्षणदीप स्मृतियों को बनाने हेतु लगातार प्रयासरत रहते हैं।

2. जीवन-चरित स्मृति:
यह किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ी स्मृतियाँ होती हैं। प्रथम 4 – 5 वर्षों तक की स्मृतियाँ बताना लगभग कठिन होता है जिसे बाल्यावस्था स्मृतिलेस कहा जाता है। 20 के दशक की स्मृतियों की संख्या बहुत अधिक होती है। वृद्धावस्था की स्मृतियों ताजी और प्रेरणादायक होती हैं।

3. निहित स्मृतियाँ:
ये स्मृतियों जिनके प्रति कोई व्यक्ति अनभिज्ञ होता है तथा जो स्वचालित रूप से पुनरुद्धत होती है। अंधकार में कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर उंगलियों को दौड़ाना निहित स्मृति कहला सकती है क्योंकि यह अनुभव और अभ्यास से प्राप्त ऐसा गुण है जो कब और क्यों उत्पन्न हुआ कोई नहीं बतला सकता है। यह भी पता चला है कि सामान्य स्मृति वाले साधारण लोगों में भी कुछ निहित स्मृतियाँ होती है।

प्रश्न 6.
दमित स्मृतियाँ क्या होती हैं?
उत्तर:
सिगमंड फ्रायड ने बताया है कि लोगों में कुछ अभिधातज अनुभव होते हैं जो संवेगात्मक रूप से दुखदायी होते हैं। धमकी, चोरी, अकाल मृत्यु, धोखा जैसी घटनाओं की याद – भी कष्टदायक होती है। कोई भी व्यक्ति खतरनाक या दुखदायी स्मृति को बनाये रखना नहीं चाहता है। दुखदायी स्मृतियों को लोग अचेतन मन में दमित सामान्य जिन्दगी जीना चाहते हैं।

किसी व्यक्ति के द्वारा कुछ विशेष प्रकार की स्मृति को दबाकर भूल जाने की स्थिति बना लेता है। इस कृत्रिम विस्मरण को दमित स्मृति कहा जा सकता है। दमित स्मृति का कारक भय, आतंक, चिंता, दुख यानी कोई भी भयावह सूचना होती है। यह स्मृति लोप से अलग अवस्था होती है। यह मानसिक विकार भी उत्पन्न कर सकता है। दमित स्मृति की दशा में कोई व्यक्ति जीवन के कठिन यथार्थ के प्रति अपनी आँखें, कान और मन बंद करके, कठिन स्मृति से मानसिक रूप से पालयन कर जाते हैं।

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प्रश्न 7.
कार्यकारी स्मृति को वेर्डले के दृष्टिकोण के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सन् 1986 में मनोवैज्ञानिक बेर्डले ने अल्पकालिक स्मृति का बहुघटकीय दृष्टिकोण का प्रस्ताव रखा था। बेर्डले के अनुसार अल्पकालिक स्मृति निष्क्रिय नहीं होती बल्कि यह एक कार्य-मेज है जिस पर स्मृति अपने विभिन्न रूपों वाली सामग्री को साथ लिए सजी रहती है। जब कभी लोग किसी संज्ञानात्मक कार्यों के लिए आवश्यक मानते हैं तब यह भंडार अपनी स्मृति भंडार से उचित सूचना प्रदान करती है। इस कार्य-मेज का दूसरा नाम कार्यकारी स्मृति है।

कार्यकारी स्मृति के कई घटक होते हैं –

1. स्वनिमिक घेरा:
इसमें ध्वनियों की सीमित संख्या होती है जो अभ्यास के अभाव में दो सेकण्ड के बाद मिटना प्रारम्भ कर देता है।

2. दृष्टि:
स्थानिक स्केच पेड-इसमें चाक्षुष और स्थानिक सूचनाएँ जमा रहती हैं।

3. बेर्डले केन्द्रीय प्रबंधक:
यह सूचनाओं को स्वनिमिक घेरे से, दृष्टि-स्थानिक स्केच पैड से तथा दीर्घकालिक स्मृति संग्रहित करता है। एक सच्चे प्रबंधक के रूप में यह अवधानिक साधनों का निमतन, सूचनाओं का सही वितरण तथा व्यवहार का परिवीक्षण, नियोजन और नियंत्रण करने में अपनी कुशलता का परिचय देता है। अर्थात् कार्यकारी स्मृति के सभी तीनों घटक अपने-अपने कार्यों के द्वारा बेर्डले के दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

प्रश्न 8.
विस्मरण या भूलने के स्वरूप एवं कारणों का वर्णन करें। अथवा, भूलना क्या है? भूलने के क्या-क्या कारण हैं?
उत्तर:
भूलना एक ऐसी मानसिक क्रिया है जिसमें मस्तिष्क में बने हुए मृत्यु-चिह्न मिट जाते हैं, जिसके कारण पूर्व सीखे हुए विषय का न प्रत्याह्वान किया जा सकता है और न पहचाना जा सकता है। मनुष्य आजीवन सीखता या भूलता रहता है। वह किसी विषय को चाहे कितनी गहराई से क्यों न सीखे उसे एक दिन अवश्य भूल जाता है। इस प्रकार भूलना मानव जीवन का एक तथ्य माना जाता है।

जब भूलना मानव जीवन का तथ्य है तो उसका स्वरूप क्या है? इसे जानना परमावश्यक है। जब हम किसी विषय को सीखते हैं, तो उसके स्मृति-चिह्न मस्तिष्क में बन जाते हैं। इन्हीं स्मृति-चिह्न के सहारे हम सीखे हुए विषय को याद करते हैं। लेकिन समय के व्यवधान के कारण या मानसिक आघात के कारण ये स्मृति-चिह्न कमजोर होते जाते हैं और मिट जाते हैं। इन्हें मिटने पर सीखे हुए विषय को याद नहीं कर पाते हैं, यानी उसे भूल जाते हैं।

विस्मरण के कारण-विस्मरण के निम्नलिखित प्रधान कारण हैं –

1. पाठ्य-विषय का स्वरूप:
भूलना बहुत अंशों में सीखे गए विषय पर निर्भर करता है। जो विषय अधिक रोचक होता है, उसे व्यक्ति अधिक दिनों तक याद रखता है; क्योंकि उसके स्मृति-चिह्न बहुत दिनों तक बने रहते हैं।

दूसरी ओर, जो विषय निरर्थक या अरोचक होते हैं, उनके स्मृति-चिह्न मस्तिष्क पर दुर्बल बनते हैं और उनका साहचर्य पूर्व अनुभूतियों से मजबूती के साथ स्थापित नहीं हो पाता है। इसका फल यह होता है कि समय-व्यवधान के साथ उन विषयों के स्मृति-चिह्न मस्तिष्क से मिटने लगते हैं और अंत में हम उन्हें भूल जाते हैं। अत: विषय के स्वरूप के कारण सार्थक तथा रोचक विषय की अपेक्षा निरर्थक विषयों को हम जल्दी भूल जाती हैं।

2. शिक्षण की मात्रा:
जिस विषय को पूर्णरूप से नहीं सीखा जाता है, उसे हम शीघ्र भूल जाते हैं। अल्परूप से सीखने के कारण मस्तिष्क में स्मृति-चिह्न अच्छी तरह नहीं बन पाते हैं और शीघ्र ही पुनर्संरचना को (reconstruction) कहा है। चाहे विकृति को या संरचना या पुनसंरचना, इन तीनों प्रतिक्रियाओं से स्मृति में त्रुटि उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों ने इस प्रश्न पर काफी गंभीरता पूर्वक विचार किया है कि स्मृति में इस तरह की त्रुटि के क्या कारण हो सकते हैं। इनके द्वारा इस विषय पर किये गये शोधों के आलोक में निम्नांकित चार कारकों को महत्त्वपूर्ण बतलाया गया है –

  • सरल अनुमान (simple inference)
  • रूढ़ियुक्ति (stereotypes)
  • स्कीमा (Schema)
  • विविध कारक (Miscellaneous factors)

इनका वर्णन इस प्रकार है –

1. सरल अनुमान (Simple inference):
व्यक्ति जब किसी एकांश (items) या घटना को पहली बार देखता है या उसके बारे में सुनता है, तो वह उसके आधार पर कुछ अनुमान (inferences) निकालता है और बाद में जब वह उस मौलिक एकांश या घटना का प्रत्याह्वान करता है, तो उसके स्मृति में उस अनुमान के कारण कुछ त्रुटियाँ अर्थात् संरचनात्मक (construtive) या पुरसँरचनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण उस एकांश या घटना या प्रत्याह्वान किया गया अंश पहले से भिन्न हो जाता है।

2. रूढ़ियुक्ति (Stereotypes):
सामाजिक रूढ़ियुक्ति के कारण भी व्यक्ति अपनी स्मृति को नये ढंग से संरचित करता है तथा उसमें विकृति उत्पन्न करता है। रूढ़ियुक्ति से तात्पर्य व्यक्तियों के किसी पूरे समूह या वर्ग के शारीरिक गुणों या शीलगुणों के बारे में लगाये गये अनुमानों से होता हालांकि ऐसा लगाय गया अनुमान शायद ही कभी उस वर्ग के अधिकतर व्यक्तियों के लिए सही होता हो। समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि रूढ़ियुक्ति का प्रभाव सामाजिक अंत:क्रिया पर तो काफी पड़ती है।

3. स्कीमा (Schema):
स्कीमा से तात्पर्य बाह्य वातावरण की वस्तुओं, उद्दीपकों, घटनाओं आदि के बारे में व्यक्ति के ज्ञान तथा उसके पूर्वकल्पनाओं (assumptions) से होता है। अतः स्कीमा का विकास अनुभव (experience) के आधार पर होता है और यह एक तरह का मानसिक ढाँचे के समान होता है जिसके माध्यम से व्यक्ति नयी सूचनाओं को संशोधित कर उसे वर्तमान सूचनाओं से संबंधित करता है एक बार स्कीमा का निर्णय हो जाने पर वे स्मृति में सूचनाओं के कूटसंकेतन (encoding) संचयन (storage) तथा पुनः प्राप्ति (retrieval) को काफी प्रभावित करते हैं और स्मृति में विकृति (distortion) उत्पन्न करते हैं।

4. विविध कारक (Miscellaneous factors):
कुछ मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति में उत्पन्न विकृति का कारण उपर्युक्त कारकों के अलावा कुछ अन्य कारकों को मानते हैं। जैसे, कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि कूटसंकेतन (econding) के समय मौजूद प्रक्रिया स्मृति में विकृति उत्पन्न करता है। जब व्यक्ति पहली बार किसी विषय या तथ्य को गहण करता है, तो संभव है कि वह उसके विस्तृत संदर्भ पर न ध्यान देकर और मात्र एक सूचना (अर्थात् कब और कैसे यह सूचना प्राप्त हुई) के रूप में ग्रहण करें।

इसी तरह से कभी-कभी व्यक्ति में बाह्य दुनिया (external world) के बारे में एक स्पष्ट प्रत्यक्षण एवं बोध (understanding) की तीव्र इच्छा होती है। इसका परिणाम यह है कि व्यक्ति किसी वस्तु या घटना के प्रत्यक्षण की विस्तृत (details) को इस तरह से भर देता है या पूरा करता है कि समग्र पैटर्न काफी अर्थपूर्ण एवं व्याख्या योग्य लगता है।

इसका स्पष्ट परिणाम यह होता है कि व्यक्ति के स्मृति में विकृति उत्पन्न हो जाती है अर्थात् वह कई महत्त्वपूर्ण चीजों को अपनी ओर से मौलिक घटना में जोड़ देता है। स्पष्ट हुआ कि स्मृति में संरचनात्मक तथा पुनर्संरचनात्मक प्रक्रियाएँ (reconstructive processes) होते रहती हैं जिससे उसमें विकृति उत्पन्न हो जाती है। स्मृति में उत्पन्न इस तरह के विकृति का आशय (implication) कानूनी प्रक्रिया खासकर प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य (eyewitness testimony) के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है।

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प्रश्न 9.
स्मरण की मुख्य विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्मरण करने के लिए यदि मनमानी पद्धति अपनाई जाये तो उसके परिणामस्वरूप किया गया स्मरण अधिक नहीं रह पाता। मनोवैज्ञानिकों के समक्ष भी स्मृति के सम्बन्ध में यही समस्या उत्पन्न हुई। इस समस्या के समाधान के लिये मनोवैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग किये तथा उनके आधार पर स्मरण के लिये विभिन्न प्रद्धतियों का प्रतिपादन किया। इस समस्त विधियों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। अतः स्मरण के लिये निम्नलिखित पद्धतियों को अपनाना चाहिये –

1. पुनरावृत्ति स्मरण विधि:
पुनरावृति से अभिप्राय किसी विषय को बार-बार दोहराने से है। अतः इस विधि में एक विषय को बार-बार दोहराकर याद करना पुनरावृति स्मरण विधि कहलाती है। इस प्रद्धति में स्मरण करने केलिये एक विषय को बार-बार दोहराकर याद किया जाता है। उदाहरणार्थ, बच्चे जब किसी कविता को याद करते हैं तो उसे बार-बार दोहराते हैं तथा उस कविता को याद कर लेते हैं।

इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें दिये गये विषय को एक दो बार पढ़कर दोहराया जाता है तथा इसके बाद उसे मन में दोराहते हैं। ऐसा करने से विषय का चित्र मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। जितनी बार विषय को दोहराया जाता है। उनका चित्र उतना ही स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार वह स्थायी रूप धारण कर लेता है। सार्थक विषयों को स्मरण करने में यह विधि अति उत्तम है। इसके द्वारा दैनिक जीवन के कार्यों को भी बार-बार दोहराकर स्मरण किया जाता है।

2. पूर्ण स्मरण स्मृति:
इस विधि में किसी विषय को एक साथ पूर्ण रूप से याद किया जाता है इसलिये इसको पूर्ण विधि (Whole Method) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-यदि किसी बालक को कोई कविता याद करनी होती है तो वह पूरी की पूरी कविता एक साथ पढ़ता है तथा इसी प्रकार अनेक बार उसको पूर्ण रूप से दोहराता है। ऐसा करने से पूरी कविता एक साथ याद हो जाती है।

इस विधि पर मनोवैज्ञानिक श्री लोट्री स्टीफेंस (Lotti Steffens) ने एक प्रयोग किया। उसने एक कविता को पहले पूर्णरूप से अनेक बार पढ़वाया। हर बार पढ़ने पर कविता के स्मरण करने में होने वाली गलतियों को लिखा जाता रहा। इस प्रयोग के परिणामस्वरूप उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण विधि द्वारा स्मरण जल्दी होता है। आशिक विधि द्वारा स्मरण करने से इस विधि द्वारा कम समय लगा।

3. स्मरण की आंशिक विधि:
इस विधि द्वारा स्मरण करने के लिये विषय को विभिन्न भागों में विभक्त कर लिया जाता है तथा एक बार में एक भाग को याद करके बारी-बारी से सभी भागों को कंठस्थ कर लिया जाता है, इस प्रकार यह विधि पूर्ण विधि से एकदम विपरीत है। पेकस्टाइम (Pechstein) नामक मनोवैज्ञानिक ने आशिक विधि और पूर्ण-विधि का एक प्रयोग द्वारा तुलनात्मक परीक्षण किया।

उन्होंने कुछ निरर्थक विषयों को बारह व्यक्तियों को कंठस्थ करने के लिये दिया उनमें से छ: व्यक्तियों को आंशिक पद्धति से तथा छः को पूर्ण विधि से उस सामग्री को कंठस्थ करने के लिये कहा गया। इस प्रयोग के परिणामस्वरूप उसने देखा कि आंशिक विधि से याद करने में पूर्णविधि द्वारा स्मरण की अपेक्षा कम समय लगा। अत: उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि आंशिक विधि द्वारा स्मरण करने में कम समय लगता है।

इस प्रकार कुछ विद्वानों ने आशिक विधि को उत्तम बताया तथा कुछ ने पूर्ण विधि को। किन्तु इन दोनों विधियों को समझने के पश्चात् यह स्पष्ट है कि कुछ विषय सामग्री के लिए आंशिक पद्धति स्मरण के लिए उत्तम है तथा कुछ विषयों के लिए पूर्ण विधि उत्तम है। जैसे निरर्थक तथा अव्यवस्थित सामग्री को स्मरण करने के लिये आशिक पद्धति उत्तम है और व्यवस्थित तथा सार्थक विषय सामग्री पूर्ण विधि द्वारा जल्दी कंठस्थ हो जाती है। इसके अतिरिक्त अधिक लम्बी विषय-सामग्री अंशों में अच्छी याद होती है और छोटी सामग्री पूर्ण विधि से इन दोनों विधियों की उत्तमता व्यक्तिगत भिन्नता से भी प्रभावित होती है। अतः उपरोक्त दोनों ही स्मरण विधियाँ अपने-अपने विषय क्षेत्र के स्मरण के लिए उत्तम हैं।

4. मिश्रित विधि:
मिश्रित विधि आशिक तथा पूर्ण विधि की मिश्रित पद्धति है। इस विधि में दोनों विधियों को अपनाया जाता है। अधिक लम्बे विषयों को कंठस्थ करने के लिये ही इस विधि का प्रयोग किया जाता है। इस विध में एक विषय को पहले पूर्ण विधि द्वारा कंठसी करने का प्रयास किया जाता है तथा बाद में उसे अंशों में विभाजित करके दोहराया जाता है। इस प्रकार अनेक विषयों में यह विधि उत्तम सिद्ध हुई। इस विधि के विषय में मनोवैज्ञानिक काल्पिन ने कहा है, “ये दोनों विधियाँ (आशिक और पूर्ण) एक साथ चलाकर विषय सुगमता से कंठस्थ किया जा सकता है।”

5. क्रमिक तथा समय विभाजन विधि:
इस पद्धति के अनुसार किसी वस्तु को लगातार एक क्रम में याद करने का प्रावधान है। इसमें मानसिक थकान के कारण विश्राम के लिये समय का विभाजन किया जाता है। ऐसा करने से मस्तिष्क की शक्ति शिथिल नहीं होती। प्रयोगों द्वारा यह देखा गया है कि वस्तु याद करते समय यदि विश्राम किया जाये और उस विश्राम के समय में अन्य कोई काम कर लिया जाये तो भी मस्तिष्क की शक्ति नहीं घटती। इस विधि की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें मस्तिष्क तो शिथिल होने से बचा ही रहता है। साथ ही मस्किष्क में याद किये विषय के स्मृति चिह्न स्थायी बन जाते हैं। आजकल इस विधि का अधिक उपयोग किया जाता है।

6. निरंतर स्मरण विधि:
यह विधि क्रमिक विधि के एकदम विपरीत है। इस विधि द्वारा स्मरण करने में पूरे के पूरे समय को लगातार एक ही समय में याद किया जाता है। इसमें बीच-बीच में विश्राम नहीं किया जाता। इस प्रकार यह निरंतर चलने वाली विधि है। जब तक पूरा विषय याद नहीं हो जाता इसमें कोई व्यवधन नहीं डाला जाता। यह विधि सामान्य रूप से छोटी विषय सामग्री को याद करने में अधिक उपयोगी सिद्ध होती है।

7. सक्रिय विधि:
इस विधि में स्मरण के समय शारीरिक सक्रियता पर अधिक बल दिया जाता है। बहुधा इस विधि द्वारा जोर-जोर से बोलकर विषय को याद किया जाता है। इस विधि के विषय में एविंग हाउस और उसके अनुयायिों का मत है कि यह विधि स्मरण की उत्तम विधि है। इसमें याद करते समय एक रोचकता बनी रहती है जिसके कारण विषय जल्दी याद हो जाता है। अधिक रोचक बनाने के लिये कभी-कभी इस विधि को लयात्मक भी बनाया जाता है।

8. मनन विधि:
यह विधि सक्रिय-विधि के एकदम विपरीत है। इसमें याद करते समय विषय को मन ही मन में दोहराया जाता है। इसके साथ शरीर और वाणी दोनों इस विधि में शिथिल होते हैं। यदि विधि एक जटिल विधि है और सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति इसका उपयोग नहीं कर सकता, किन्तु फिर भी कुछ विशेष विषयों के स्मरण में यह विधि अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होती है। अधिकांश गम्भीर विषयों को समझने में यह विधि प्रयोग में लाई जाती है।

9. बौद्धिक विश्लेषण विधि:
जैसा कि इस विधि के नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें विषय को प्रयास करके बौद्धिक विश्लेषण के द्वारा याद किया जाता है। इस विधि द्वारा यह याद किया गया विषय अधिक स्थायी रूप से चेतना स्तर पर अंकित हो जाता है। अतः यह विधि स्मरण की उत्तम विधि मानी जाती है।

10. यांत्रिक विधि:
इस विधि द्वारा याद करने वाले विषय को बिना बौद्धिक विश्लेषण किये सीधे रूप में याद किया जाता है। इस प्रकार यह विधि बौद्धिक विश्लेषण विधि के एकदम विपरीत है, इसमें विषय को बिना विचार के बार-बार दोहराकर याद किया जाता है। यह विधि स्मरण विधियों में अच्छी विधि नहीं मानी जाती क्योंकि इस विधि द्वारा याद किये गये विषय के स्मृति चिह्न अधिक समय तक मस्तिष्क में नहीं टिक पाते। इस विधि को बोध रहित विधि भी कहा जाता है। इसे यांत्रिक विधि इसलिये कहते हैं क्योंकि इसमें व्यक्ति एक यंत्र की भांति काम करता है।

इस प्रकार हमने स्मृति को विभिन्न विधियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करके यह पाया कि स्मरण की कौन-सी विधि सर्वोत्तम है और कौन-सी न्यूनतम है यह निर्णय नहीं किया जा सकता क्योंकि स्मरण की समस्त विधियों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं जिसके आधार पर सभी विधियाँ उत्तम हैं किन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि प्रत्येक विधि का विषय की प्रकृति के आधार पर ही समस्त विधियाँ उत्तम हैं। उदाहरणार्थ-लम्बे विषय के लिये आंशिक विधि तथा छोटे विषय को स्मरण करने के लिए आंशिक और व्यवस्थित, सार्थक एवं लघु विषय-वस्तु के लिये पूर्ण विधि महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार स्मरण विधि की उत्तमता विषय-वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करती है। अत: स्मरण स्मृति की विधियाँ उत्तम हैं।

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प्रश्न 10.
विस्मरण के व्यवहारवादी या बाधक सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
बाधक सिद्धांत या जिसे हस्तक्षेप सिद्धांत भी कहा जाता है, विस्मरण का एक प्रमुख सिद्धांत है। इस सिद्धांत में विस्मरण की व्याख्या व्यवहारवादियों के नियमों के अनुकूल की गई है। इसलिए इसे विस्मरण का व्यवहारवादी सिद्धांत (behaviourstic theory) भी कहा जाता है। बाधक सिद्धांत का दावा है कि जब किसी पूर्व सीखी गई अनुक्रिया या विषय अर्थात् मौलिक विषय या पाठ का व्यक्ति प्रत्याह्वान (recall) करता है तो उस समय उन सभी अनुक्रियाओं या विषयों, जिन्हें वह मौलिक विषय के पहले तथा बाद में सीख चुका होता है, से उत्पन्न स्मृति-चिह्न आपस में अन्तःक्रिया (interaction) करते हैं।

इस तरह की अंत:क्रिया के दो परिणाम होते हैं-सरलीकरण (facilitation) तथा बाधा (interference)। विस्मरण इसी बाधक परिणाम की अभिव्यक्ति करता है। इस तरह का बाधक प्रभाव जितना अधिक होता है, विस्मरण की मात्रा भी उतनी ही अधिक होती है। बाधक सिद्धांत की इस व्याख्या से यह स्पष्ट है कि इसमें विस्मरण का कारण मौलिक विषय के बाद सीखे गए विषय या पाठ (अग्रलक्षी अवरोध) दोनों को बतलाया गया है। फलतः बाधक सिद्धांत के दो मुख्य पहलू हैं जो इस प्रकार हैं –

  1. बाधक सिद्धांत-पूर्वलक्षी या पृष्ठोन्मुख अवरोध (Interference theory retroac tive inhibition) और
  2. बाधक सिद्धांत-अग्रलक्षी अंवरोध (Interference theory:proactive inhibition) इन दोनों पहलुओं का वर्णन निम्नांकित है –

बाधक सिद्धांत-पूर्वलक्षी या पृष्ठोन्मुख अवरोध (Interference theory: retro active inhibition):
पृष्ठोन्मुख अवरोध की व्याख्या बाधक सिद्धांत के अनुसार सबसे पहले मैकग्यूश (McGeoch) द्वारा की गई। इन्होंने इसकी व्याख्या करने के लिए एक विशेष प्राक्कल्पना (hyothesis) बनाई जिसे स्वतंत्र प्राक्कल्पना (independence hypothesis) कहा गया। इस प्राक्कल्पना के अनुसार मौलिक विषय के सीखने से उत्पन्न स्मृति-चिह्न तथा अवरोधक विषय से उत्पन्न स्मृति-चिह्न दोनों ही एक साथ स्वतंत्र रूप से बिना एक-दूसरे को प्रभावित किए संचित रहते हैं।

जब व्यक्ति मौलिक पाठ का प्रत्याह्वान करता है तो मौलिक पाठ के स्मृति-चिह्नों एवं अवरोधक पाठ के स्मृति-चिह्नों के बीच एक तरह की प्रतियोगिता उत्पन्न होती है जिसका परिणाम यह होता है कि मौलिक विषय का प्रत्याह्वान कम हो जाता है, यानी उसकी विस्मरण हो जाता है। मैकग्यूश ने यह भी बतलाया है कि जब मौलिक विषय तथा अवरोधक विषय के बीच समानता होती है तो प्रत्याह्वान के समय दोनों विषयों के स्मृति-चिह्नों में प्रतियोगिता अधिक होती है जिससे व्यक्ति मौलिक विषयों या पाठों का प्रत्याह्वान कम कर पाता है और उसका विस्मरण हो जाता है।

चूंकि मैकग्यूश के इस सिद्धांत में विस्मरण की व्याख्या मौलिक पाठ तथा अवरोधक पाठ के स्मृति-चिह्नों के बीच उत्पन्न प्रतियोगिता के आधार पर होती है, इसलिए इसे अनुक्रिया की प्रतियोगिता सिद्धांत (competition of response theory) भी कहा जाता है । इसे स्थानांतरण सिद्धांत (transfer theory) भी कहा जाता है। क्योंकि मैकग्यूश ने यह भी बतलाया है कि इस प्रतियोगिता के कारण एक तरह का नकारात्मक अंतरण (negative transfer) हो जाता है जिससे मौलिक विषय के प्रत्याह्वान में कमी आ जाती है।

मैकग्यूश ने अपने सिद्धांत में यह भी स्पष्ट किया कि मौलिक विषय या पाठ के प्रत्याहह्वान के समय स्मृति-चिह्नों के बीच हुई प्रतियोगिता की अभिव्यक्ति तीन तरह के सूचक (indices) द्वारा होती है-प्रकट अंत:सूची बलप्रवेश (over interlist iotrusion) जिसमें मौलिक पाठ का प्रत्याह्वान करते समय अवरोधक पाठ (interfering task), स्मृति-चिह्न एक तरह से बलप्रवेश (intrusion) कहते हैं तथा प्रकट अंतरासूची बलप्रवेश (over intraclist intrusion) जिसमें मौलिक पाठ या सूची का प्रत्याह्वान करते समय जिस पद का या एकांश का प्रत्याह्वान करना चाहिए था, उसका प्रत्याहह्वान न करके उसकी जगह व्यक्ति एक-दूसरे पद का प्रत्याह्वान करता है।

अप्रकट बलप्रवेश (covert intrusion) में मौलिक विषय या पाठ का प्रत्याह्वान करते समय अवरोधक पाठ का पद या एकांश व्यक्ति के मन में अपने-आप आ जाता है, फिर उसे गलत समझकर वह प्रत्याह्वान न करके चुप रह जाता है। इन तीनों तरह के बलप्रवेश में प्रथम दो तरह के बलप्रदेश से विस्मरण अधिक होता है।

मनोवैज्ञानिकों द्वारा मैकम्यूश के इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएं निम्नांकित बिन्दुओं पर की गई हैं –

1. मैकग्यूश की इस अनुक्रिया की प्रतियोगिता सिद्धांत की आलोचना मेल्टन एवं इर्विन (Melton & Irvin) द्वारा की गई है। इन लोगों ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर यह बतलाया है कि विस्मरण का कारण मात्र प्रतियोगिता कारक (competition factor) नहीं होता है, बल्कि अन-अधिगम कारक (unlearning factor) भी होता है जिसकी चर्चा तक इस सिद्धांत में नहीं की गई है।

2. मैकग्यूश के इस सिद्धांत के अनुसार अगर मौलिक विषय या पाठ की लम्बाई अधिक है तो छोटा विषय या पाठ की तुलना में उसका विस्मरण अधिक होगा, क्योंकि बड़ा पाठ या सूची होने पर प्रतियोगी पदों या एकांशों की संख्या अधिक हो जाती है जिससे प्रतियोगिता बढ़ जाती है और उसके प्रत्याह्वान में कमी आ जाती है।

3. बाधक सिद्धांत-अग्रलक्षी प्रावरोध या अवरोध (Interference theory : proac tive inhibition):
बाधक सिद्धांत का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू अग्रलक्षी अवरोध की वख्या करना है। जब मौलिक विषय या सूची के प्रत्याहवान में कमी वैसे विषय या सूची के सीखने से उत्पन्न स्मृति-चिह्नों द्वारा की गई प्रतियोगिता के कारण होती है जिसे व्यक्ति मौलिक विषय या पाठ के पहले सीख चुका होता है तो इसे अग्रलक्षी अवरोध कहा जाता है। ग्रीनवर्ग तथा अंडरवुड (Greenberg & Underwood) ने एक प्रयोग किया 10-10 विषय की चार सूचियाँ तैयार करके प्रयोज्य को एक-एक करके सीखने के लिए दी और एक-एक करके 48-48 घंटे के बाद उसका प्रत्याह्वान 69% किया जबकि अंतिम सूची का प्रत्याह्वान मात्र 25% किया।

इसका मतलब यह हुआ कि पहली सूची का विस्मरण 31% हुआ जबकि दूसरी सूची का विस्मरण 75% हुआ। प्रयोगकर्ताओं के अनुसार चौथी सूची का विस्मरण इसलिए अधिक हुआ, क्योंकि इसके पहले प्रयोज्य तीन और सूचियों को सीख चुका था। अंडरवुड तथा पोस्टमैन (Underwood & Postmen), स्टार्क तथा फ्रेजर ने भी अपने-अपने प्रयोगों के आधार पर बाधक सिद्धांत द्वारा अग्रलक्षी अवरोध की उक्त व्याख्या का समर्थन किया है।

कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बाधक सिद्धांत द्वारा अग्रलक्षी अवरोध (Proactive inhibition) की प्रदत्त व्याख्या द्वारा एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की व्याख्या नहीं होती है। सामान्यतः अवरोधक पाठ विराम अभ्यास (distributed practice) से सीखने पर अविराम अभ्यास (massed practice) से सीखने की अपेक्षा अधिक मजबूत होता है। फलत: ऐसी हालत में अग्रलक्ष्मी अवरोध की मात्रा विराम अभ्यास में अविराम अभ्यास की अपेक्षा अधिक होनी चाहिए। अंडरवुड एवं एक्ट्रैण्ड (Underwood & Ekstrand) ने अपने प्रयोग में इसके विरुद्ध तथ्य पाया है।

दूसरे शब्दों में, इन्होंने प्रयोगात्मक अध्ययन में पाया कि जब अवरोधक सूची को विराम अभ्यास देकर सीखा गया था तो अग्रलक्षी अवरोध की मात्रा कम थी, परंतु जब उसे अविराम अभ्यास देकर सीखा गया तो अग्रलक्षी अवरोध की मात्रा अधिक थी। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि बाधक सिद्धांत में विस्मरण के दोनों पहलुओं अर्थात् पृष्ठोन्मुख अवरोध तथा अग्रलक्षी अवरोध की जो व्याख्या की गई है वह अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्या है। यद्यपि कुछ मनोवैज्ञानिक इस सिद्धांत से कुछ बिन्दुओं पर असंतुष्ट अवश्य रहे हैं, फिर भी उसी इस सिद्धांत का कोई सर्वमान्य एवं संगत विकल्प नहीं है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 11.
विस्मरण के अनुप्रयोग सिद्धांत या ह्रास नियम या एबिंगहॉस नियम की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
विस्मरण का यह सिद्धांत सबसे पहला है। जिसका प्रतिपादन जर्मन मनोवैज्ञानिक एबिंगहाँस (Ebbinghaus) द्वारा 1885 में किया गया। इस सिद्धांत का दावा है कि जब व्यक्ति किसी पाठ या विषय को सीखता है तो उससे उसके मस्तिष्क में कुछ दैहिक परिवर्तन (physiological changes) होते हैं जिन्हें ‘स्मृति चिह्न’ (memory traces) कहा जाता है। सीखने के बाद जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तो इन स्मृति-चिह्नों का मूल कारण बीते हुए समय में मौलिक पाठ या याद किए गए पाठ (विषय) का अनुप्रयोग (disuse) है अर्थात् उसका नहीं दोहराना है। अनुप्रयोग के कारण स्वभावतः स्मृति-चिह्न क्षीण हो जाते हैं जिसके कारण सीखे गए पाठ का विस्मरण हो जाता है।

एबिंगहॉस के इस सिद्धांत की उक्त व्याख्या से यह स्पष्ट है कि इसमें विस्मरण के मुख्य तीन कारण बतलाए गए हैं –

  1. सीखने के बाद समय का बीतने जाना। समय-अंतराल जितना ही अधिक होगा विस्मरण की मात्रा उतनी ही अधिक होगी।
  2. बीते हुए समय में मौलिक पाठ या विषय को नहीं दोहराना अर्थात् उसका अनुप्रयोग (disuse) करना।
  3. समय बीतने और उसमें विषय या पाठ का अनुप्रयोग होने से स्मृति-चिह्नों का ह्रास होना।

यद्यपि यह सिद्धांत अपने समय का एक काफी महत्त्वपूर्ण रहा है, किन्तु आज इसकी मान्यता समाप्त हो गई है। इसकी व्याख्या को पौराणिक व्याख्या माना जाता है। इस सिद्धांत की आलोचना भी काफी हो गई है। इसकी व्याख्या को पौराणिक व्याख्या माना जाता है। इस सिद्धांत की आलोचना भी काफी हो गई है। इसकी प्रमुख आलोचनाओं में निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. कई प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि विस्मरण का कारण मात्र समय का बीतना नहीं होता है बल्कि जब व्यक्ति उस समय-अंतराल में नई-नई अनुभूतियों को सीखता है तो इससे पहले सीखे गए पाठ या विषय के प्रत्याह्वान (recall) में बाधा पहुँचती है जिससे भी विस्मरण होता है। मुलर एवं पिल्जेकर (Muller & Pilzecker) ने तथा जेनकिन्स एवं डैलेनबैक (Jankins & Dallenback) ने भी अपने-अपने प्रयोगों से इस तथ्य की संतुष्टि की है कि विस्मरण का कारण समय का बीतना नहीं होता है बल्कि उस समय अंतराल में कुछ नई अनुभूतियों को प्राप्त करना होता है। दूसरे शब्दों में, विस्मरण का कारण पृष्ठोन्मुख अवरोध (retroactive inhibition) होता है।

2. विलोपन (extinction) से मिले तथ्य भी हास या अनुप्रयोग सिद्धांत के प्रतिकूल माने जाते हैं। विलोपन की प्रक्रिया में व्यक्ति के सामने उद्दीपन (stimulus) दिया जाता है और व्यक्ति उस उद्दीपन के प्रति सही अनुक्रिया भी करता है, परंतु अनुक्रिया देने के बाद मात्र पुनर्बलन (reinforcement) नहीं दिया जाता है। इस तरह से इस अध्ययन में उद्दीपन-अनुक्रिया मजबूत होने के बजाय कमजोर होती चली जाती है।

3. स्वतः पुनर्लाभ (spontaneous recovery) तथा संस्मरण (reminiscence) की घटना से भी अनुप्रयोग सिद्धांत की आलोचना होती है। ये दोनों मनोवैज्ञानिक घटनाएँ कुछ ऐसी हैं जिनमें समय बीतने के साथ ही मौलिक विषय या पाठ में हास होने के बदले वृद्धि होती है, हालांकि इस समय-अंतराल में व्यक्ति उस सीखे गए विषय को कभी दोहराता नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में सिद्धांत की व्याख्या के अनुसार सीखे गए विषय या पाठ का विस्मरण होना चाहिए था कि उसकी धारणा में वृद्धि होनी चाहिए थी। उपर्युक्त आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि विस्मरण का कारण समय का बीतना नहीं होता। अत: अनुप्रयोग सिद्धांत को विस्मरण का एक वैज्ञानिक सिद्धांत न मानकर एक अनुपयुक्त सिद्धांत कहना अधिक उचित होगा।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 7 मानव स्मृति

प्रश्न 12.
याद करने से संबंधित विधियों तथा नियमों के महत्त्व के अतिरिक्त कर्ता में क्या-क्या अतिरिक्त विशेषताएँ होनी चाहिए?
उत्तर:
स्मृति सहायक संकेत तथा आधुनिक बोधगम्य उपागम के परामर्शों का शत-प्रतिशत पालन करने पर भी कुछ घात अच्छे अंक नहीं प्राप्त कर पाते हैं। सच तो यह है कि ऐसी कोई भी विधि या नियम या शैली या पद्धति नहीं है जो याद करने से संबंधित सारी समस्याओं का समाधान बनकर रातोंरात स्मृति में सुधार ला दे। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अपनायी जाने वाली विधियाँ निरर्थक एवं बेकार हैं। अच्छी स्मृति के लिए सभी प्रचलित विधियों के अलावे निम्नांकित कारकों पर भी ध्यान देना आवश्यक है –

  1. शारीरिक स्वास्थ्य
  2. सीखने के प्रति रुचि एवं ललक
  3. सीखने के लिए प्रेरक दृष्टांत
  4. कलम, कागज, पुस्तक, प्रकाश, मेज परिवेश आदि का अनुकूल प्रबंधन

अतः स्मृति के विकास के लिए, सिद्धांत साधन के अलावा सुधार सम्बन्धी युक्तियों को समझने तथा साधनों के संचालन का ज्ञान भी आवश्यक है। आज तकनीकी ज्ञान तो सभी के लिए अनिवार्य बनता जा रहा है।

प्रश्न 13.
विस्मरण वक्र पर नोट लिखें।
उत्तर:
विस्मरण के संबंध में किये गये प्रयोग से यह अनुमान लगाया गया कि शिक्षण के ‘बाद पहले 20 मिनट की अवधि में ही 47% सीखे गए निरर्थक नदों का विस्मरण हो गया, 24 घंटों, अर्थात् 1 दिन के अंतर पर 66%, 2 दिनों में 72%,3 दिनों में 79% विस्मरण हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि सीखने के बाद धारण-मध्यांतर काल के प्रारम्भ में विस्मरण बड़ी तेजी के साथ हुआ और धीरे-धीरे जैसे-जैसे समय अंतराल की अवधि बढ़ती गई, विस्मरण की गति भी धीमी होती गई। ऊपर के आँकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सीखने के तीसरे और 31 वें दिन के बीच भूलने की मात्रा 79% – 72% = केवल 7% हुई, जबकि पहले 2 दिनों के अंदर ही वे सीखे गए पदों में 72% पद भूल गए। एबिंगहॉस द्वारा निर्मित उपर्युक्त वक्र की निम्नलिखित कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं –

1. उपर्युक्त विस्मरण:
वक्र को देखने से यह स्पष्ट पता चलता है कि विस्मरण की गति या दर सदा एक-सी नहीं होती। अर्थात् भूलने की गति एक नियमित या स्थिर गत से नहीं बढ़ती। सीखने की क्रिया के तत्काल बाद भूलने की क्रिया बहुत अधिक तीव्र या तेज होती है और जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, सीखे गए विषय के शेष अंश अधिक-से-अधिक दृढ़ या स्थायी (fixed) होते जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्ति सीखे हुए विषय में से अधिकांश बातों को सीखने के तुरंत बाद ही भूलता है तथा बाद में इसकी (भूलने की) गति धीमी पड़ जाती है, जिससे भूलने की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है।

2. विस्मरण वक्र (forfetting curve) से यह भी स्पष्ट होता है कि भूलने का एक प्रधान कारण समय व्यवधान या अन्तराल की अवधि है। एबिंगहॉस के अनुसार जो अनुभव जितना पुराना होता है, उसकी स्मृति भी उतनी ही क्षीण होती जाती है। इसका अर्थ यह है कि सीखने की क्रिया समाप्त होने के तुरंत बाद उनका अधिकांश विस्मृत हो जाता है।

फलस्वरूप, जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तत्काल भूले हुए अंश उपयोग में नहीं रहते, क्योंकि व्यक्ति न तो उन अंशों को बाद में दुहरा पाता है और न उन्हें मानसिक रूप से पुनर्जीवित ही कर पाता है। फलतः उन अनुभवों का उपयोग नहीं होता। अतः सीखे गए अनुभवों का अनुप्रयोग ही भूलने का कारण है। इस दृष्टिकोण से भूलना एक निश्चेष्ट या निष्क्रिय प्रक्रिया है। अस्तु, सीखना जितना भी पुराना होता जाता है, उसकी स्मृति भी उतनी ही कमजोर पड़ती जाती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विस्मरण के स्वरूप को समझने का सर्वप्रथम क्रमिक प्रयास किसने किया:
(a) एबिंगहास
(b) गिब्सन
(c) बार्टलेट
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) एबिंगहास

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिगम क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिचय एवं परिभाषा-अभ्यास और अनुभव के कारण व्यवहार में या व्यवहार की क्षमता में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन को अधिगम कहा जाता है। कभी-कभी मानवीय व्यवहारों में अस्थायी अथवा क्षणिक परिवर्तन देखे जाते हैं। इस श्रेणी का परिवर्तन अधिगम नहीं कहलाता है जैसे, संगीत के प्रति उत्पन्न रुझान को अधिगम मान सकते हैं।

यदि यह परिवर्तन स्थायी हो जाए और प्रभावित व्यक्ति संगीत के सभी कार्यक्रमों में भाग लेने की तत्परता दिखाने लगे, लेकिन बेटे की गलती के कारण माँ का रौद्र रूप अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि पीटने वाली माँ कुछ ही देर बाद बच्चे को सहलाने लगती है। अर्थात् उत्पन्न गुस्सा से माँ के व्यवहार में आने वाला परिवर्तन बिल्कुल अस्थायी होने के कारण अधिगम नहीं कहला सका।

अधिगम की विशेषताएं-अधिगम की प्रक्रिया से संबंधित कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है:
उदाहरण के रूप में, एक ऐसे व्यक्ति के व्यवहार पर विचार करते हैं जो चाय पीने वाले को देखकर हँसी उड़ाता था और आज वह चाय पीने का लत का स्वयं शिकार बनकर रोज सात बजे सुबह चाय की दुकान पर पहुंचकर बोलता है कि चाय नहीं पीने से सर दर्द होने लगता है। उस व्यक्ति में चाय की लत स्थायी रूप ले चुकी है।

इसी तरह भींगे हाथ से बिजली का स्विच दबाते ही झटका महसूस करने वाला लड़का स्विच को छूने से डरने लगा है। स्विच के प्रति लड़का के आचरण या व्यवहार में आने वाला अन्तर भी अधिगम माना जाएगा। किन्तु, क्रिकेट में भारत की हार का समाचार सुनते ही मूर्च्छित होकर गिर जाने वाले लड़का के व्यवहार में आने वाला अस्थायी अन्तर अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि सभी दुखद समाचार के प्रभाव से वह मूर्च्छित नहीं हो पाता है।

2. अधिगम के कारण व्यवहार में होने वाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं:
थकान, औषधि, आदत के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अस्थायी होने के कारण अधि गम नहीं कहलाते हैं लेकिन नहीं खाने पर कमजोरी महसूस करने वाला परिवर्तन स्थायी होने के कारण अधिगम कहलाने का अधिकार रखते हैं।

3. अधिगम में मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक क्रम होता है:
बच्चे को अंग्रेजी सिखलाने वाला सर्वप्रथम यह जानना चाहता है कि बच्चा कितने बड़े शब्द भंडार या व्याकरण के नियमों की जानकारी रखता है। इसके बाद वह यह जानने का प्रयास करता है कि बच्चा के पास किस प्रकार के शैक्षणिक साधन (किताब, कॉपी, पेन्सिल) उपलब्ध है। तीसरे क्रम में वह पता लगाता है कि बच्चा अंग्रेजी सीखने की ललक रखता है या नहीं।

अंत में वह सभी तरह से संतुष्ट होकर अंग्रेजी पढ़ाने लगता है। कुछ ही दिनों के बाद बच्चा अंग्रेजी में बातचीत करने में गौरव महसूस करने लगता है। अंग्रेजी के प्रति बच्चे के व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक निश्चित क्रम का स्थायी परिणाम है। अतः इसे अधिगम की श्रेणी में रखा जा सकता है।

4. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है:
निष्पादन किसी व्यक्ति का प्रेक्षित व्यवहार या अनुक्रिया है। एक व्यक्ति कार चलाने की कला (ड्राइवरी) सीखने के लिए अपनी माँ से पैसा लेता है। वह कभी प्रशिक्षण में शामिल होता कभी नहीं लेकिन माँ को अच्छी जानकारी का झांसा दिया करता है। समय समाप्त होने पर माँ उसे कार चलाने को कहती है।

वह व्यक्ति कार को शहर के भीड़वाले रास्ते से होकर माँ को मन्दिर तक पहुँचा देता है। कार चला लेना ही प्रशिक्षण का अंतिम पड़ाव था जिसमें वह व्यक्ति सफल रहा। उस व्यक्ति के व्यवहार से माँ प्रयास का सफल निष्पादन मानते हुए लड़के को सफल चालक के रूप में स्वीकार कर लिया। माँ का यह अनुमान कि लड़का कार चलाना सीख चुका है, अधिगम का एक उदाहरण कहलाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन किस प्रकार साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है और एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के आने की सूचना देने वाला बन जाता है। यहाँ एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के घटित होने की सम्भावना प्रकट होती है।

भरपेट भोजन करने के उपरान्त मनपसन्द मिठाई से भरी थाली को देखते ही एक व्यक्ति के मुँह में लार का उत्पन्न होना एक अनुबंधित अनुक्रिया का उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राचीन अनुबंधन कहलाने वाले अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम ईशान पी पावलव ने किया था। उन्होंने कुत्ता को माध्यम बनाकर उद्दीपकों तथा अनुक्रियाओं के पारस्परिक संबंध को पूर्णतः समझना चाहा।

प्रयोग की शुरूआत में उन्होंने एक कुत्ता को एक बॉक्स में बंद कर दिया बॉक्स के अन्दर कुत्ते के लिए भोजन (मांसचूर्ण) वहुँचाया गया। कई दिनों तक भूखा रखने के बाद जब उसे भोजन पाने का अवसर मिला तो कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। पाइप और मापक बेलन की सहायता से उत्पन्न लार की माप रखी जाने लगी। कई दिनों तक कुत्ते को भोजन देने के पूर्व घंटी बजाई जाती। एक दिन घंटी के ध्वनि सुनते ही कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। घंटी का आवाज भोजन पाने की आशा के बीच साहचर्य संबंध स्थापित हो चुका था।
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सारांशतः प्रयोग से पता चला कि प्रारम्भ में दिया गया भोजन अनुबंधित उद्दीपक (US) जैसा बर्ताव किया और परिणामतः लार का निकलना अननुबंधित अनुक्रिया (UR) का काम किया। प्रयोग के अंत में जब घंटी बजाकर भोजन नहीं दिया गया तो ध्वनि की उपस्थिति में लार निकलने लगता है। इस स्थिति में घंटी को अनुबंधित उद्दीपक (CS) तथा लार स्राव को अनुबंधित अनुक्रिया (CR) जैसा बर्ताव करता हुआ पाया गया। यहाँ एक प्राणी दो उद्दीपकों के मध्य साहचर्य को सीखता है। एक तटस्थ उद्दीपक (अनुबंधित उद्दीपक, एक अननुबंधित उद्दीपक (CS) के आने का संकेत देता है। अनुबंधित उद्दीपक के परिवर्तन होते ही वह अननुबंधित उद्दीपक के आने की प्रत्याशा में अनुबंधित अनुक्रिया (CR) करने लगता है।

एक छोटा बच्चा एक फूले हुए गुब्बारे पर ज्योंहि हाथ लगाता है त्योंहि वह तेज ध्वनि के साथ फट जाता है। बच्चा डर जाता है और अब बच्चा किसी दूसरे गुब्बारे को छूने से डरने लगता है। इस स्थिति में अनुबंधित उद्दीपक (CS) के रूप में गुब्बारे तथा अनुबंधित उद्दीपक के (CS) के रूप में तीव्र ध्वनि की पहचान होती है। इस प्रकार प्रयोग एवं प्रक्षेणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन अनुबंधन साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 3.
क्रिया प्रसूत अनुबंधन की परिभाषा दीजिए। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारकों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
क्रिया प्रसूत अनुबंध की परिभाषा-“मानवों अथवा जानवरों द्वारा ऐच्छिक रूप से प्रकट किये जाने वाले व्यवहार या अनुक्रियाओं को जो उनके नियंत्रण में रहती है, क्रिया-प्रसूत माने जाते हैं।” या क्रिया प्रसूत नामक व्यवहार का अनुबंधन ‘क्रिया प्रसूत’ अनुबंधन कहा जाता है। इसमें प्राणी पर्यावरण में सक्रिय रहता है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन का अन्वेषण सर्वप्रथम बी. एफ. स्किनर के द्वारा किया गया था जो पर्यावरण में सक्रियता प्राणियों की ऐच्छिक अनुक्रियाओं पर आधारित प्रयोगों द्वारा पूरा किया गया था। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारक-क्रिया प्रसूत अनुबंधन अधिगम का एक प्रमुख भेद (प्रकार) है जिसमें अनुक्रिया को प्रबलन द्वारा मजबूत बनाया जाता है।

कोई भी घटना या उद्दीपक एक प्रबलक हो सकती है जो किसी वांछित अनुक्रिया को घटित होने की संभावना को बढ़ाता है अर्थात् पूर्वगामी अनुक्रिया को बढ़ाती है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन की हर प्रबलन के प्रकार (धनात्मक या ऋणात्मक) प्रबलित प्रयासों की संख्या, गुणवत्ता (उच्च या निम्न) प्रबलन अनुसूची (सतत अथवा आशिक) और प्रबलन में विलम्ब से प्रभावित होती है। अनुबंधित की जाने वाली अनुक्रिया अथवा व्यवहार का स्वरूप’ को भी एक कारक का स्थान दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अनुक्रिया के घटित होने और प्रबलन के बीच का अंतराल भी क्रिया प्रसूत अधिगम को प्रभावित करनेवाला कारक माना जाता है।

प्रबलन के प्रकार:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो पूर्व में घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं। प्रबलन का विभाजन दो तरह से किया गया है –

(क) धनात्मक प्रबलक और ऋणात्मक प्रबलक तथा
(ख) प्राथमिक प्रबलक और द्वितीयक प्रबलक

प्रत्येक प्रबलन अनुसूची (व्यवस्था) अनुबंधन की दिशा को अपने – अपने ढंग से बदलती है। अर्जन प्रयास के दिये जाने के क्रम के आधार पर पता चला है कि आंशिक प्रबलन, सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति अधिक विरोध प्रदर्शित करता है। विलंबित प्रबलन-किसी भी प्रबलन की प्रबलनकारी क्षमता विलम्ब के साथ-साथ घटती जाती है। अर्थात् प्रबलन प्रदान करने में बिलम्ब से निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है । जैसे, विलम्ब से मिलने वाले बड़े पुरस्कार की तुलना में शीघ्रता से कार्य कारक के तुरंत बाद मिलने वाला छोटा पुरस्कार अधिक पसन्द किया जाता है।

व्यवहार का स्वरूप:
अधिगम के द्वारा मिलने वाले परिणाम को अच्छा या बुरा, हितकारी या हानिकारक ध्वनि में व्यवहार का स्परूप प्रभावी होता है। अच्छा व्यवहार सुन्दर परिणाम का कारण बन जाता है। प्रबलन का बीच का अंतराल-क्रिया प्रसूत अधिगम को सफलतापूर्वक समाप्त किये जाने में प्रयास के रूप प्रबलन आरोपित करने के क्रम तथा दो प्रबलन के बीच की अवधि में विस्तार प्रबलन के प्रभाव को घटा-बढ़ा सकता है। धनात्मक प्रबलक सुखद परिणाम वाले होते हैं क्योंकि ये भोजन, पानी, धन, प्रतिष्ठा, सूचना-संग्रह आदि के माध्यम से विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होते हैं। फलतः एक धनात्मक प्रबलन के मिलने के पहले जो अनुक्रिया घटित होती है, उसकी दर बढ़ जाती है।

ऋणात्मक प्रबलन, परिहार अनुक्रिया अथवा पलायन अनुक्रिया सिखाते हैं, जैसे जाड़े से बचने के लिए स्वेटर पहनना, आग के डर से भाग जाना। अतः खतरनांक उद्दीपकों से दूर भागने की प्रवृत्ति को जगाना क्योंकि यह ऋणात्मक प्रबलन से जुड़ा होता है। अर्थात् ऋणात्मक प्रबलक अपने हटने या समापन से पहले घटित होनेवाली अनुक्रिया की दर को बढ़ा देता है। प्राथमिक प्रबलक जैविक रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है।

द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच संबंध बनाकर प्रबलक की विशेषताओं को स्पष्ट कर देता है। इसके अन्तर्गत धन, प्रशंसा और श्रेणियों का उपयोग जैसी स्वाभाविक वृत्ति को बढ़ावा मिलता है। प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति-प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति से उन प्रयासों का बोध होता है जो उद्दीपन की अनुक्रियता को प्रभावित करता है। उचित परिणाम में भोजन-पानी की उपलब्धता की उपस्थिति में बार-बार का प्रयास एक परिणामी निष्कर्ष को पान में समर्थ हो सकता है। अतः क्रिया-प्रसूत की गति आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है।

प्रबलन की गुणवत्ता:
आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है। क्रिया-प्रसूत अथवा नैमेत्तिक अनुबंधन की गति सामान्यत: जिस अनुपात में उसकी गुणवत्ता बढ़ती है।

प्रबलन अनुसूचियों:
अनुबंधन से सम्बन्धित प्रयासों के क्रम में प्रबलन उपलब्ध कराने की व्यवस्था के रूप में अनुबंधन की दिशा प्रभावित होती है।

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प्रश्न 4.
एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। अधिगम के उस प्रकार पर विचार-विमर्श कीजिए जो इसका समर्थन करता है।
उत्तर:
बच्चे स्वभाव से नकलची होते है। उनकी सम्पूर्ण क्रिया-विधि पर परिवेशीय क्रियाकलापों की गहरी छाप देखने को मिलती है। बच्चे किसी भी क्रिया के सम्पादन विधि को बड़ी ध्यान से देखते हैं और तुरंत बाद स्वयं उस क्रिया को दुहराने के फिराक में रहते हैं। अर्थात् शिशु अपने घर-परिवार अथवा सामाजिक उत्सवों एवं समारोहों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं जहाँ उन्हें मनपसन्द दृश्य और प्रेरणादायक क्रिया-विधि देखने को मिलता है। शिशु प्रौढ़ व्यक्तियों के अनेक प्रकार के व्यवहारों को ध्यान से प्रेक्षण करके सब कुछ सीखने का प्रयास करते हैं।

समारोह एवं उत्सव के अवसर समाप्त हो जाने के बाद वे देखे गये क्रियाकलापों को अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। विवाह पद्धति, जन्मदिन समारोह, चोर-सिपाही, घर में होनेवाले साफ सफाई का जीवंत वित्रण करने के लिए तरह-तरह के स्वांग रचते हैं। यहाँ तक कि माता-पिता को विवाह करते देखकर वे भी काल्पनिक रूप से माता-पिता का अभिनय करके उन्हीं सब बातों को दुहराते हैं जो वे अपने घर में सुन रखा था। अत: बच्चे अधिकांश सामाजिक व्यवहार प्रौढ़ों को प्रेक्षण तथा उनकी नकल करके सीखते है। वे कपड़ा पहनना, शिक्षक बनकर छात्रों को डाँटना, फोन करना, टी.वी. चलाना, अतिथियों का आदर-सत्कार करना जैसे सभी कार्यों को बड़ों की नकल करके ही सीख लेते हैं।

सच तो यह है कि बढ़ते हुए शिशु में व्यक्तित्व का विकास, आचरण की अच्छाई, व्यवहार में कुशलता, चाय-पानी पीने का तरीका, मनपसन्द भोजन का चयन आदि प्रेक्षणात्मक अधिगम के द्वारा ही संभव होता है। दयालुता, परोपकार, आदर, श्रम-साधना, आलस्य का परित्याग के साथ-साथ तम्बाकू खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, आक्रामक व्यवहार को अपनाना जैसी अच्छी-बुरी आदतों या जानकारियों का मुख्य आधार प्रेरणात्मक अधिगम अथवा भूमिका प्रतिरूप ही होता है। अतः एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अधिगम के सभी प्रकारों में सीखने-जानने की विधि भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती है लेकिन उनमें से प्रेरणात्मक अधिगम शिशुओं के स्वभाव और आवश्यकता के अनुकूल होता है। शिशुओं के द्वारा अनुकरण करने की क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रौढ़ों को अच्छे। भूमिका-प्रतिरूप के प्रदर्शन में संकोच नहीं करना चाहिए। प्रेरणात्मक अधिगम का शिशुओं पर इतना अच्छा प्रभाव पाया गया कि इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाने लगा। शिशु दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण करते हैं और यथासंभव प्रौढ़ों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। व्यवसाय क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उपभोक्ता बनाकर पेश करके अपने उत्पादन की खपत को बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

मनोवैज्ञानिक बंदूरा और उनके सहयोगियों ने भी अध्ययन एवं प्रयोग के आधार पर प्रेरणात्मक अधिगम को शिशुओं के विकास के लिए अनुकूल बताया है। बंदूरा ने प्रेक्षण का महत्व समझने के लिए शिशुओं पर आधारित एक प्रयोग किया। प्रयोग में शिशुओं की तीन अलग टोलियों को चंद मिनट का फिल्म दिखाया। एक फिल्म में आक्रामक व्यवहार करनेवाले को इनाम एवं प्रशंसा पाते हुए दिखाया गया। दूसरे फिल्म में गलती करने वाले को दण्ड पाते दिखाया गया। तीसरे फिल्म में दिखाया गया कि आक्रामक रुख की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती है। इसे स्वाभाविक वृत्ति मानकर लोग उस ओर ध्यान नहीं देते है।

प्रयोग के अंत में तीनों टोलियों को एक साथ मिलाकर आक्रामक व्यवहार करने वाले प्रतिरूप (खिलौना) को उनके बीच छोड़ दिया गया। प्रेक्षक छिपकर प्रतिक्रिया का अवलोकन करता रहा। प्रेक्षण के अवलोकन के आधार पर निर्णय किया गया कि जो बच्चा आक्रामक को इनाम पाते देखा था वह शांत रहा और जिसने दंड पाते देखा था वह क्रोध की मुद्रा बनाकर खिलौने को फेंककर उसे आहत करने का प्रयास किया। अतः अनुकरण के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रेक्षण द्वारा अधिगम की प्रक्रिया में प्रेक्षक मॉडल (प्रतिरूप) के व्यवहार का प्रेक्षण करके जानकारी हासिल करता है परन्तु आचरण की दिशा देखे गये दृश्य पर निर्भर करता है।

इसी प्रकार, यदि कागज की नाव बनाने की कला का प्रदर्शन बच्चों के समक्ष किया जाए तो अधिकांश बच्चे कागज उपलब्ध होते ही उसे नाव बनाने में समाप्त कर देंगे। यह भी पाया जाता है कि बच्चे मोबाइल लेकर माता-पिता की भाषा में बात-चीत करने लग जाते हैं। रीमोट का प्रयोग कर माता-पिता के पसन्द का कार्यक्रम देखने का प्रयास करते है। इस प्रकार तय होता है कि विकास करते शिशुओं का भला चाहने वाले सदा प्रेरक कहानियों, सुन्दर आचरण, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग आदि से सम्बन्धित अच्छी भूमिका प्रस्तुत करें जिसे शिशुओं का भविष्य उज्जवल हो।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 5.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों की व्याख्या कीजिए। या, वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधि का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
मनुष्य अपनी भावना तथा आवश्यकताओं को प्रकट करने में दूसरे के अर्जित झान को अपनाने में तथा संभावित घटनाओं को बतलाने में शब्द को माध्यम बनाता है। मानव बोलकर, सुनकर, लिखकर या पढ़कर शब्दों की महत्ता को बतलाया है। वाचिक अधिगम को अनुबंधन से भिन्न मानते हुए मात्र मनुष्यों तक ही सीमित माना है।

मनोवैज्ञानिक वाचिक अधिगम की प्रक्रिया को समझने तथा प्रयोग में लाने के लिए कई तरह की सामग्रियों का उपयोग करते हैं। जैसे निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, अपरिचित शब्द, वाक्य तथा अनुच्छेद। इस अधिगम को उपयोग में लाने के लिए कई विधियों का विकास किया गया है जिनमें से निम्नलिखित तीन विधियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं –

(क) युग्मित सहचर अधिगम:
परिचय-प्रस्तुत विधि उद्दीपक-उद्दीपक अनुबंधन और उद्दीपक अनुक्रिया अधिगम के समान होती है।

प्रयोग का उद्देश्य:
अपनी मातृभाषा के शब्दों के पर्याय सीखने में इस विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम युग्मित सहचरों की एक सूची बनाई जाती है जिसमें युग्मों का पहला शब्द उद्दीपक तथा दूसरा. शब्द अनुक्रिया के रूप में अपनाया जाता है।
  • उद्दीपक शब्द व्यंजन-स्वर-व्यंजन के रूप में निरर्थक शब्दांश होता है तथा दूसरा शब्द वांछित भाषा के संज्ञा-पद होते हैं।
  • अधिगमकर्ता को उद्दीपक और अनुक्रिया शब्द को एक साथ दिखाया जाता है।
  • दोनों (उद्दीपक और अनुक्रिया) प्रकृति वाले शब्दों को पुनःस्मरण करने का परामर्श दिया जाता है।
  • एक-एक करके उद्दीपक शब्द दिखाकर प्रतिभागी को सही अनुक्रिया शब्द बताने को कहा जाता है।
  • प्रयास में असफल होने की स्थिति में वांछित अनुक्रिया शब्द दिखा दिया जाता है।
  • पहले प्रयास के सभी उद्दीपक पदों को दिखा दिया जाता है।
  • प्रयास का यह क्रम तब तक जारी रखा जाता है जब तक बिना गलती किये सभी अनुक्रिया पद बता दिये जाते हैं।
  • मानक मापदण्ड को पाने के लिए प्रयासों की कुल संख्या को युग्मित सहचर अधिगम मान लिया जाता है।

(ख) क्रमिक अधिगम:
परिचय-उद्दीपक और अनुक्रिया को नियत क्रम में प्रस्तुत करने की यह प्रचलित विधि है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी के द्वारा सीखने की प्रक्रिया को जानना इस विधि का उद्देश्य होता है। अर्थात् प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांश की सूची किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं, जैसे प्रश्नों का सही उत्तर का पता लगाना इस विधि का उपयोग है।

प्रयोग-क्रम:

  • प्रयोग का प्रारम्भ शब्दों की एक सूची को तैयार कर लेने से किया गया जिसमें निरर्थक शब्दांश, अधिक परिचित शब्द, कम परिचित शब्द, परस्पर संबंधित शब्द आदि को जगह दी गई।
  • प्रतिभागी को सूची का पूरा अंश देकर निर्देश दिया गया कि सूची के क्रम को बिना बदले एकांशों को बतलाना है।
  • सूची का मात्र पहला अंश दिखाकर प्रतिभागी से दूसरा एकांश बतलाने को कहा जाता है।
  • प्रतिभागी के असफल हो जाने पर दूसरा एकांश दिखाया जाता है जिससे दूसरा एकांश उद्दीपक बन जाता है।
  • प्रतिभागी तीसरा एकांश (अनुक्रिया शब्द) को ठीक-ठीक बताने का प्रयास करता है।
  • इस बार भी असफल होने की स्थिति में उसे सही एकांश बतला कर उसे चौथा एकांश के लिए उद्दीपक मान लिया जाता है।
  • उद्दीपक-अनुक्रिया के क्रमिक पूर्वाभास विधि क्रम जारी रखा जाता है।
  • अधिगम के प्रयास को तब तक जारी रखा जाता है जब तक प्रतिभागी सभी एकांशों का सही-सही पूर्वाभाव नहीं कर लेता है।

(ग) मुक्त पुनः स्मरण:
परिचय-कुछ निर्धारित शब्दों को स्मरण के द्वारा एक विशिष्ट क्रम में सजाकर बतलाने का प्रयास मुक्त पुनः स्मरण विधि कहलाता है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी शब्दों को किस तरह से संगठित करके उन्हें अपनी स्मृति में संचित करते हैं। स्मृति संबंधी इसी उत्सुकता को मिटाने में पुनः स्मरण विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम दस से अधिक शब्दों की एक सूची प्रतिभागियों को पढ़ने एवं बोलने के लिए दिया जाता है।
  • निश्चित समय तक प्रतिभागी के पास छोड़ा जाता है।
  • प्रतिभागी को किसी भी क्रम में शब्दों को बतलाने का अवसर दिया जाता है।
  • प्रतिभागी द्वारा बतलाये गये शब्दों के क्रम में एक प्रयास से दूसरे प्रयास में भिन्न पाये जाते हैं।
  • शब्दों को स्मृति में संचित करके उनके संगठन करने की प्रक्रिया अथवा विधि का पता लगाया जाता है।
  • प्रेक्षण के निष्कर्ष के रूप में पाया जाता है कि सूची के आरम्भ और अंत में स्थित शब्दों का पुनः स्मरण सूची के बीच में स्थित शब्दों की तुलना में अधिक सरल होता है।
  • स्मरण और शब्दों के संगठन सम्बन्धी तरह-तरह की जानकारियाँ जमा की जाती हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 6.
कौशल से आप क्या समझते हैं? किसी कौशल के अधिगम के कौन-कौन से चरण होते हैं?
उत्तर:
कौशल का परिचय:
सामान्य अथवा अटिल, साधारण अथवा तकनीकी किसी भी तरह के कार्य को सरलता से दक्षतापूर्ण विधि के द्वारा त्रुटिहीन परिणाम के साथ पूरा करने की कला या क्षमता को कौशल कहा जाता है। जैसे, हवाई जहाज चलाना, आशुलिपि में लिखना, कार चलाना आदि कौशल के उदाहरण हैं। किसी कौशल में अनुभव और अभ्यास के द्वारा प्रात्यक्षिपेशीय अनुक्रियाओं की एक श्रृंखला अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया साहचर्यों की एक श्रेणी प्राप्त की जाती है। अभ्यास एवं प्रयास के द्वारा समय, त्रुटि, अवरोध आदि से बचा जाता है। कौशल प्राप्त हो जाने पर कम समय में उच्चस्तरीय परिणाम मिल जाता है।

कौशल के अधिगम के प्रमुख चरण:
महान मनोवैज्ञानिक फिट्स के अनुसार कौशल अधिगम की प्रक्रिया तीन चरणों में होती हैं –

  1. संज्ञानात्मक
  2. साहचर्यात्मक तथा
  3. स्वायत्त

कौशल अधिगम के विभिन्न चरणों में अलग-अलग तरह की मानसिक क्रियाएँ की जाती हैं लेकिन यह भी माना जाता है कि अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है।

1. संज्ञानात्मक चरण:
अभिकर्ता को प्राप्त होने वाले निर्देशों का पालन करते हुए परिवेश से मिलने वाले सभी संकेतों एवं निर्देशों का माँग तथा अपनी अनुक्रियाओं के परिणामों को सदा अपनी चेतना में रखना होता है। कार्य निष्पादन की एक उत्तम विधि का उपयोग करके यथासंभव अच्छे परिणाम पाने के लिए अपनी समझ का प्रयोग करना होता है।

2. साहचर्यात्मक चरण:
कौशल अधिगम के प्रस्तुत चरण में विभिन्न प्रकार की सांवेगिक सूचनाओं अथवा उद्दीपकों को उपयुक्त अनुक्रियाओं से जोड़ना होता है। अभ्यास, त्रुटियाँ, लागत समय, कार्य निष्पादन के साथ उच्चस्तरीय परिणाम की प्राप्ति के प्रति सदा सतर्क रहना होता है। प्रस्तुत चरण से प्राप्त परिणामों के आधार पर ज्ञात होता है कि अभ्यास की मात्रा बढ़ाने से संभावित त्रुटियों में कमी आती है और निष्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है। अभ्यास के द्वारा किसी अनुक्रिया को करने में लागत समय को घटाया जा सकता है। प्रेक्षण कार्य करने में एकाग्रता रखना वांछनीय हो जाता है।

3. स्वायत्त चरण:
स्वायत्त चरण में निष्पादन संबंधी दो परिवर्तन अधिक प्रमुख माने जाते हैं –
(क) पहला साहचर्यात्मक चरण की अवधानिक माँगें कम हो जाती हैं और
(ख) वाह्य कारकों द्वारा उत्पन्न की गई बाधाएँ घट जाती हैं।
अतः इस चरण में सचेतन प्रयत्न की अल्प माँगों के साथ कौशलपूर्ण निष्पादन स्वचालिता प्राप्त करना प्रमुख उद्देश्य बन जाता है।

निष्कर्ष:

  1. कौशल अधिगम का एक मात्र साधन अभ्यास है।
  2. अधिगम के लिए निरंतर अभ्यास और प्रयोग करते रहने की आवश्यकता होती है।
  3. एकाग्रता, सतर्कता और जिज्ञासा सुन्दर परिणाम के लिए वांछनीय होता है।
  4. त्रुटिहीन निष्पादन की स्वचालित, कौशल का प्रमाणक मानी जाती है।
  5. अभ्यास ही मनुष्य की पूर्ण बनाता है।

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प्रश्न 7.
सामान्यीकरण तथा विभेदन के बीच आप किस तरह अंतर करेंगे?
उत्तर:
सामान्यीकरण और विभेदन की प्रक्रियाएँ प्रायः सभी प्रकार के अधिगम का मुख्य लक्षण होता है। समान उद्दीपकों (घंटी का बजना, आकस्मिक प्रकाश का उत्पन्न होना, टेलीफोन की घंटी का बजना) के प्रति समान अनुक्रिया (लार स्राव, भागना, चौंकना) के गोचर को सामान्यीकरण माना जाता है। माँ के द्वारा छिपाई गई मिठाई को बार-बार खोजने की क्रिया समान अनुक्रिया का बोध कराता है। अत: जब तक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं।

विभेदन को समान्यीकरण का पूरक माना जाता है। समान्यीकरण समानता पर आधारित होती है जबकि विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया मानी जाती है। जैसे यदि कोई बच्चा एक बार मूंछ-दाढ़ी वाले व्यक्ति से डर जाता है तो वह नेक आदमी से भी डरने लगता है यदि वह मूंछ-दाढ़ी वाला हो। दूसरी ओर एक खतरनाक प्रकृतिवाला व्यक्ति भी मूंछ-दाढ़ी साफ कराके सफेद धोती में चश्मा लगाकर प्रकट होता है तो बच्चा उसके चश्मा से खेलने लगता है। यहाँ भय का कारण मूंछ-दाढ़ी को माना जाता है। बच्चे का डरना और नहीं डरना विभेदन का एक उदाहरण बन जाता है। सामान्यीकरण होने का अर्थ विभेदन की विफलता होती है। विभेदन की अनुक्रिया किसी भी प्राणी को विभेदक क्षमता या विभेदन के अधिगम का महत्त्व समझा देता है।

प्रश्न 8.
अधिगम अंतरण कैसे घटित होता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रशिक्षण अंतरण भी माना जाता है। इसके अंतर्गत नए अधिगम पर पूर्व अधिनियम के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। अधिगम अंतरण पर आधारित एक रोचक प्रयोग दो भाषाओं (माना अंग्रेजी और फ्रांसीसी) के सीखने के लिए दो समूहों का चयन किया जाता है। प्रतिभागियों के एक समूह को प्रायोगिक दशा के लिए तथा दूसरे समूह को नियंत्रित दशा के लिए निर्धारित कर लिया जाता है। प्रायोगिक दशा वाले प्रतिभागियों को एक वर्ष का समय अंग्रेजी सीखने के लिए दिया जा रहा है जबकि दूसरे नियंत्रक समूह वाले प्रतिभागियों को फ्रांसीसी भाषा सीखने का अवसर दिया जाता है।

एक वर्ष की समाप्ति पर दोनों समूहों के द्वारा अर्जित भाषा-ज्ञान की जाँच की जाती है। एक वर्ष के बाद दूसरे वर्ष में प्रायोगिक समूह को फ्रांसीसी तथा नियंत्रक समूह को अंग्रेजी भाषा सीखने को कहा जाता है। दो वर्ष बीत जाने पर दोनों समूहों को दोनों विषयों के लिए समान समय उपलब्ध होने की बात मानी जाती है। दोनों समूहों को पुनः लब्धांक प्राप्त करना होता है। लब्धांक के आधार पर तया किया जाता है कि किस भाषा को सीखना सरल या कठिन है। अतः उद्दीपकों और अनुक्रियाओं में परस्पर अन्तर लाकर अधिगम की विशिष्टता को पहचानना अधिगम अंतरण के घटित होने का आधार होता है। इसमें समय, स्थिति, विषयों के क्रम, अनुभव एवं सुविधा में अन्तर लाकर सीखने या प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर जुटाता है।

प्रश्न 9.
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा उसे सुगम बनाने वाले कारकों में से एक है। अभिप्रेरणा का सामान्य अर्थ है व्यक्ति को किसी काम के प्रति रुचि जगाना तथा आवश्यक ऊर्जा का संचार करना। प्राणी की एक ऐसी मानसिक एवं शारीरिक अवस्था अभिप्रेरणा के अन्तर्गत आता है जो वांछनीय लक्ष्य या आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति विशेष को प्रबलता से काम करने की ओर धकेलता है। अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना निम्न कारणों से अनिवार्य होता है –

  1. अभिप्रेरणा व्यक्ति के अन्दर क्रियाशीलता को बढ़ाता है।
  2. अभिप्रेरणा हमारे व्यवहार का चयन करने में मदद करता है।
  3. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति के व्यवहार में सुधार लाता है।
  4. अभिप्रेरणा लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति की रुचि जगाता है।
  5. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति को प्रबलन की महत्ता को सीखाता है।
  6. अभिप्रेरणा से व्यक्ति में श्रम करने की योग्यता तथा कुछ खोजने की प्रवृत्ति जगाता है।

अर्थात् किसी भी व्यक्ति की दक्षता को बढ़ाने के लिए सुरक्षा की समझ देने, लक्ष्य, प्रयास, परिणाम की वास्तविकता को समझना अभिप्रेरणा से संभव है। इसी कारण अभिप्रेरणा एक अनिवार्य कारक के रूप में सर्वप्रिय है।

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प्रश्न 10.
अधिगम के लिए तत्परता के विचार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तत्परता का साधारण अर्थ इच्छाशक्ति अथवा किसी काम के प्रति अनुराग का प्रदर्शन है। यदि कोई व्यक्ति किसी काम को पूरा कर लेने पर संतोष व्यक्त करता है अथवा अवसर पाकर काम को पूरा करने हेतु तैयार हो जाता है ता माना जाता है कि उस व्यक्ति के द्वारा तत्परता दिखाई जा रही है। प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों में अपनी संवेदना क्षमताओं तथा अनुक्रिया करने के लिए परम लक्ष्य होता है वही दूसरों के लिए निरर्थक माना जाता है। प्राणियों के लिए उद्दीपक-उद्दीपक (S-S) अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) का मान साहचर्य को स्थापित करने की दृष्टि से अलग-अलग होती है।

रुचि, क्षमता, लगन, दक्षता, कुशलता आदि में से प्रत्येक मामले में सभी प्राणियों की दशा अलग-अलग होती है। सीखने की दृष्टि से यदि तत्परता पर ध्यान देने की बात चले तो स्पष्ट होगा कि सीखे जानेवाले वैसे कार्य या विषय तथा अवश्यकता या रुचि के प्रतिकूल कार्य या विषय के बीच व्यवहार में भारी अन्तर प्रकट होता है। इच्छा शक्ति और लक्ष्य के अनुकूल कार्य सरलता से अच्छे परिणाम के साथ पूरे किये जाते हैं जबकि लक्ष्यहीन कार्य कठिनाई से एवं अनियमित ढंग से किसी तरह पूर्णता तक पहुँचा दिये जाते हैं।

ईंट ढोने को यदि उदाहरण माना जाय तो यदि तत्परता के साथ ईंट लाया जाएगा तो वह पूर्व आकार में रहेंगे तथा सजाकर रखे जाएँगे लेकिन यदि तत्परता का अभाव होगा तो टूटी-फूटी ईंटों का एक बेडौल ढेर देखने को मिलेगा। दोनों हालतों में पूर्व स्थान से ईंट को हटाने का कार्य पूरा कर लिया गया प्रतीत होता है। अतः तत्परता किसी व्यक्ति की कार्यकुशलता को बढ़ाती भी है तथा अच्छे परिणाम को पाने के लिए प्रेरित भी करती है। तत्परता के साथ किसी विषय को सीखना भी सरल हो जाता है तथा तत्परता के साथ सीखा गया विषय स्थायी भी होता है।

प्रश्न 11.
संज्ञानात्मक अधिगम के विभिन्न रूपों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम को मनोवैज्ञानिक अधिगम का मूल माना जाता है। इसमें कार्यकलापों की जगह ज्ञान में परिवर्तन लाने का प्रयास शामिल है। संज्ञानात्मक अधिगम को दो विभिन्न रूपों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है –
(क) अंतर्दृष्टि अधिगम और
(ख) अव्यक्त अधिगम।

(क) अंतर्दृष्टि अधिगम:
अंतर्दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया का बोध होता है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक प्रकट हो जाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम की व्याख्या अनुबंधन के आधार पर सरलता से नहीं की जा सकती है किन्तु इसका सामान्योकरण अन्य मिलती हुई समस्याओं की परिस्थितियों में हो सकता है। अंतर्दृष्टि अधिगम में अचानक समाधान प्राप्त होना अनिवार्य है। इसे सत्य प्रमाणित करने के लिए कोहलर ने चिम्पैंजी को माध्यम बनाकर प्रयोग को पूरा किया।

उन्होंने एक भूखे चिम्पैंजी को एक बड़े बंद खेल क्षेत्र में डाल दिया। वह भूखा था लेकिन भोज्य पदार्थ उसकी पहुँच से बाहर रख दी गई थी। बन्द क्षेत्र में बक्सा तथा छड़ी रख दिया गया। भूखा होने के कारण चिम्पैंजी भोज्य पदार्थ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगा। शीघ्र ही चिम्पैंजी ने बक्सा तथा छड़ी अपने अधीन कर लिया।

वह बक्सा पर चढ़कर छड़ी की सहायता से बार-बार रोटी गिराने का प्रयास करने लगा। चिम्पैंजी अब बक्सा पर चढ़कर छड़ी से रोटी गिराना सीख चुका था। चिम्पैंजी, अब बन्द किये जाने पर तुरंत रोटी को गिरा कर खा लेता था। किसी प्रयोग से परिणाम की प्राप्ति नहीं होने पर अचानक निष्कर्ष को पाकर प्रयोगकर्ता काफी खुश होता है। सिंचाई के लिए परेशान किसान हठात् की वर्षा पाकर खुश हो जाता है। संज्ञानात्मक अधिगम में साधन और साध्य के बीच एक संबंध का होना प्रतीत होता है।

(ख) अव्यक्त अधिगम:
अव्यक्त अधिगम की प्रमुख विशेषता के रूप में माना जाता है कि इसमें एक नया व्यवहार सीख लिया जाता है, किन्तु व्यवहार दर्शाया नहीं जाता है। अपवर्त्य अधिगम से संबंधित एक प्रयोग टॉलमैन के द्वारा किया गया। टॉलमैन ने चूहों के दो समूहों को भूल-भुलैया नामक कक्ष में छोड़ दिया। चूहों के एक समूह को भोज्य पदार्थ की स्थिति ज्ञात थी लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अज्ञात था। भोजन की लालच में चूहा बहुत भटका। कई अंधपथों में आगे बढ़कर लौट आया।

लेकिन अंत में वह भोज्य पदार्थ तक पहुँच ही गया। बार-बार किये गये प्रयास का फल उसे प्राप्त हो गया। अब वह आसानी से कम समय में द्वार से भोजन तक का रास्ता बिना भटके दौड़कर पूरा कर लेता है। दूसरा चूहा कुछ नहीं जानता था फिर भी वह पहले चूहा की तरह रास्ता तय करने लगा। प्रस्तुत प्रयोग के माध्यम से टॉलमैन अपनी खोज का एक निष्कर्ष निकाला जिसके अनुसार चूहों ने अपने अव्यक्त अधिगम के सहारे भोज्य पदार्थ तक पहुँचने का मार्ग चुन लिया। वह किस प्रकार रास्ता का सही अंदाज लगाया यह अव्यक्त ही रहा। अर्थात् अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उन्हें, जिन दिशाओं और स्थानिक अवस्थितियों की आवश्यकता भी उनका मानस चित्रण किया।

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प्रश्न 12.
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम कैसे करते हैं?
उत्तर:
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर करते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले छात्रों को अक्षरों, शब्दों तथा वाक्यांशों को लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती है।
  2. इस श्रेणी के बच्चे सीखने के लिए कोई मनपसन्द योजना अथवा तरीका खोजने में लगभग अक्षम होते हैं।
  3. ये किसी एक विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाते हैं।
  4. ये विभिन्न आवश्यक सामानों को अनवरत रूप से इधर-उधर हटाते रहते हैं।
  5. इन्हें पेशीय समन्वय तथा हस्तनिपुणता प्रकट करने में कठिनाई होती है।
  6. ये बच्चे काम करने के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  7. सामाजिक संबंधों का मूल्यांकन करने में इनसे भूल हो जाया करती है।
  8. भाषा सीखने एवं समझने में भी ये अक्षम होते हैं।
  9. इनमें प्रात्यक्षिक विकार (दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, ध्वनि, गति) भी पाए जाते हैं।
  10. इनमें पठन वैकल्प के लक्षण पाए जाते हैं। अर्थात् ये शब्दों को वाक्यों के रूप में संगठित करने में अपेक्षाकृत अक्षम होते हैं।

अतः अस्वाभाविक स्वभाव तथा शारीरिक गठन की तुलना में मानसिक दुर्बलता का पाया जाना, अधिगम, अशक्तता वाले छात्रों की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राचीन अनुबंधन का सबसे प्रमुख लक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है।

प्रश्न 2.
सहकालिक अनुबंधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब अनुबंधन तथा अननुबंधित उद्दीपक साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं तो इसे सहकालिक अनुबंधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
दो परिवर्तनों का उदाहरण दीजिए जो अधिगम नहीं माने जाते हैं।
उत्तर:

  1. अत्यधिक शराब पीकर लड़खड़ाते हुए चलना।
  2. आँख में धूलकण के चले जाने से कुछ भी देख पाने में असमर्थता व्यक्त करना।

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प्रश्न 4.
अधिगम की तीन विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है।
  2. अधिगम के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं।
  3. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है।

प्रश्न 5.
युग्मित सहचर अधिगम का उपयोग बतावें।
उत्तर:
युग्मित सहचर अधिगम (वाचिक अधिगम) विधि का उपयोग मातृभाषा (हिन्दी) के शब्दों के किसी विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के पर्याय सीखने में किया जाता है।

प्रश्न 6.
क्रमिक अधिगम का संबंध किस प्रकार की जिज्ञासा से है?
उत्तर:
क्रमिक अधिगम (वाचिक अधिगम) का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांशों की सूची को किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन-सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं।

प्रश्न 7.
वर्ग गुच्छन किसे कहा जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक वॉसफील्ड ने पुनः स्मरण विधि को समझने के लिए साठ शब्दों से चार समूहों में रखा। नाम, पशु, पेशा तथा सब्जी से जुड़े शब्दों को अलग-अलग वर्गों में रखा गया। प्रतिभागियों के द्वारा पुनः स्मरण विधि के क्रम में बतलाये गये शब्द समूहों को वॉसफील्ड ने ‘वर्ग गुच्छन’ कहा।

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प्रश्न 8.
संप्रत्यय क्या है?
उत्तर:
संप्रत्यय एक श्रेणी है, जिसका उपयोग अनेक वस्तुओं अथवा घटनाओं (पशु, फल, भवन, भीड़) के लिए किया जाता है। संप्रत्यय के उदाहरण वे वस्तुएँ, व्यवहार या घटनाएँ होती हैं जिनमें समान विशेषताएँ हों।

प्रश्न 9.
कौशल का सामान्य परिचय क्या है?
उत्तर:
किसी जटिल कार्य को आसानी से और दक्षता से करने की योग्यता कर्ता का कौशल कहलाता है। अभ्यास और अनुभव के आधार पर कौशल की मर्यादा रखी जाती है, जैसे, जहाज, कार चलना, रेडियो बजाना, मोबाइल से संदेश भेजना आदि।

प्रश्न 10.
कौशल अर्जन के प्रमुख चरण क्ग हैं?
उत्तर:
फिट्स के अनुसार संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक तथा स्वायन से सम्बोधिर चरणों में मानसिक क्रिया द्वारा कौशल ग्रहण किया जाता है।

प्रश्न 11.
अधिगम अंतरण का दूसरा नाम क्या हो सकता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रायः प्रशिक्षण अंतरण या अंतरण प्रभाव कहा जाता है।

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प्रश्न 12.
अधिगम को सुगम बनाने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
उत्तर:
अधिगम को सुगम बनानेवाले कारकों में अभिप्रेरणा तथा प्राणी की तत्परता प्रमुख है।

प्रश्न 13.
अधिगम शैलियाँ किस प्रकार व्युत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
अधिगम शैलियाँ मुख्यतः प्रात्यक्षिक प्रकारता, सूचना प्रक्रमण तथा व्यक्तित्व प्रतिरूप से व्युत्पन्न होता है।

प्रश्न 14.
संबंधनात्मक शैली और विश्लेषणात्मक शैली में कार्यान्मुख क्षेत्र की दृष्टि से अन्तर बतावें।
उत्तर:
संबंधात्मक शैली अशैक्षणिक क्षेत्रों में अधिक कार्योन्मुख होते हैं जबकि विश्लेषणात्मक शैली शैक्षणिक संदर्भ में अधिक कार्यान्मुख होते हैं।

प्रश्न 15.
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है या नहीं?
उत्तर:
उपचारी अध्ययन विधि के उपयोग से बहुत लाभ होता है। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों के शिक्षण विधियों से अधिकांश लक्षणों को हटाया जा सकता है।

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प्रश्न 16.
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन किस पर किया था?
उत्तर:
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन कबूतर और चूहा पर किया था।

प्रश्न 17.
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार क्या है?
उत्तर:
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार प्रवर्तन व्यवहार (Operant behaviour) है।

प्रश्न 18.
अननुबंधित उद्दीपकों के दो प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रवृत्यात्मक तथा
  2. विमुखी।

प्रश्न 19.
नैमित्तिक अनुबंधन के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. माँ के द्वारा छिपाकर रखे गये मिठाई के डिब्बे को खोज लेना।
  2. रेडियो, टी.वी. आदि को चलाना।

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प्रश्न 20.
धनात्मक एवं ऋणात्मक प्रबलन के उपयोगों को बतावें।
उत्तर:
धनात्मक प्रबलन का परिणाम सुखद होता है क्योंकि धनात्मक प्रबलक आवश्यकताओं (भोजन, पानी, प्रशंसा, प्रतिष्ठा) की पूर्ति करता है। ऋणात्मक प्रबलक अप्रिय एवं पीड़ादायक उद्दीपक होते हैं। ऋणात्मक प्रबलक के प्रभाव के रूप में सर्दी, चिन्ता, रोग, दुर्घटना, दण्ड आदि मिलते हैं।

प्रश्न 21.
आंशिक प्रबलन की एक विशेषता बतावें।
उत्तर:
आंशिक प्रबलन. सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति ज्यादा विरोध पैदा करता है।

प्रश्न 22.
निष्पादन पर विलम्ब का केसा प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विलम्ब स निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है।

प्रश्न 23.
प्रबलक का परिचय दें।
उत्तर:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 24.
प्रबलकों के नियमित उपयोग से क्या लाभ मिलता है?
उत्तर:
प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

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प्रश्न 25.
अधिगम और विलोप का पारस्परिक आचरण क्या है?
उत्तर:
अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 26.
सामान्यीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

प्रश्न 27.
प्रेरणात्मक अधिगम को सामाजिक अधिगम कहलाने का कारण क्या है?
उत्तर:
प्रेरणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को सीखता है इसी कारण इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

प्रश्न 28.
स्वतः पुनः प्राप्ति की स्थिति कब आती है?
उत्तर:
स्वतः पुनः प्राप्ति किसी अधिगत अनुक्रिया के विलोप होने के बाद होती है।

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प्रश्न 29.
संज्ञानात्मक अधिगम की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्य-कलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन आता है।

प्रश्न 30.
अंतर्दृष्टि अधिगम किसे कहते हैं?
उत्तर:
अंतर्दृष्टि ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक (हठात्) स्पष्ट हो जाता है।

प्रश्न 31.
अव्यक्त अधिगम से संबंधित एक मनोवैज्ञानिक का नाम बतावें जो भूल-भुलैया और चूहा को प्रयोग का आधार बनाया था?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक टॉलमैन ने अव्यक्त अधिगम के संप्रत्यय को अपना प्रारम्भिक योगदान दिया।

प्रश्न 32.
वाचिक अधिगम की प्रक्रिया के अध्ययन में मनोवैज्ञानिक किस प्रकार की सामग्रियों का उपयोग कर रहे हैं?
उत्तर:
निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, वाक्य, अनुच्छेद आदि।

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प्रश्न 33.
सामाजिक शिक्षण क्या है?
उत्तर:
समाज में रहकर सामाजिक नियमों के अनुसार व्यावहारिक जीवन के नियमों को सीखना ही सामाजिक शिक्षण कहलाता है।

प्रश्न 34.
अनुबंधन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ साहचर्य द्वारा सीखना होता है।

प्रश्न 35.
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग बतावें।
उत्तर:
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग संगठन, कुसमायोजित प्रतिक्रियाओं के उपचार, बच्चों का पालन-पोषण तथा विद्यालय अधिगम के लिए किया जाता है।

प्रश्न 36.
मनोविश्लेषण का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनोचिकित्मा की एक विधि जिससे मनोचिकित्सक दमित अचेतन सामग्री को सचेतन स्तर पर लान का प्रयास करता हैं मनोविश्लेषण कहलाता है।

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प्रश्न 37.
पॉवलव ने अपना प्रयोग किस पर किया था?
उत्तर:
पॉवलव ने अपना प्रयोग भूखे कुत्ते पर किया था।

प्रश्न 38.
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर:
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में कहा है कि “सीखना और कुछ नहीं बल्कि संबंध प्रत्यावर्तन की एक लम्बी शंखला मात्र है।”

प्रश्न 39.
पॉवलव ने सीखने का आधार क्या बताया?
उत्तर:
पॉवलव ने सीखने का आधार संबंध प्रत्यावर्तन को बताया जिसमें प्राणी अनुबंधित अनुक्रिया करना सीखता है।

प्रश्न 40.
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक क्या था?
उत्तर:
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक मांस था।

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प्रश्न 41.
पॉवलव के सिद्धान्त एवं स्किनर के सिद्धान्त में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
पॉवलव ने प्रत्यार्थी व्यवहार (Respondent behaviour) को सीखने का आधार माना जबकि स्किनर ने प्रवर्तक व्यवहार (Operant behaviour) को सीखने का आधार माना है।

प्रश्न 42.
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त का प्रतिपादन किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धांत का प्रतिपादन रूस के एक महान मनोवैज्ञानिक पॉवलव ने किया।

प्रश्न 43.
अनुबंध या संबंध के सिद्धांत कौन-कौन हैं?
उत्तर:
अनुबंध या संबंध के दो प्रमुख सिद्धांत हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. प्राचीन अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त
  2. साधनात्मक अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेक्षणात्मक अधिगम का स्वरूप एवं उपयोग बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणात्मक अधिगम दूसरों के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का प्रेक्षण का व्यावहारिक परिणाम हैं। इसके अन्तर्गत अनुकरण, सामाजिक अधिगम तथा मॉडलिंग की प्राथमिकता मिली हुई है।

1. अनुकरण:
दूसरों की क्रिया-विधियों की नकल करना, अनुकरण माना जाता है। जैसे, आँख बन्द करके चलना एक अंधे का अनुकरण करने का प्रयास है।

2. सामाजिक अधिगम:
प्रेक्षणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों (अतिथि सत्कार, पूजा-विधि, विवाह पद्धति) को सरलता से सीखता है। इसी कारण इस अधिगम को सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

3. मॉडलिंग:
मॉडलिंग को स्वांग भरना भी कह सकते हैं। बुढ़िया की तरह खाँसना झुककर चलना, बन्दरवाला बनकर डमरू बजाना, टैम्पूवाला बनकर एक सवारी एक सवारी चिल्लाना आदि मॉडलिंग के विभिन्न रूप हैं जो किसी अन्य की तरह व्यवहार करने के रूप में प्रकट होता है।

प्रेक्षणात्मक अधिगम की उपयोगिता:

1. सीखना:
समाज में रहनेवाले तरह-तरह के व्यक्तियों की कार्य-विधियों को देखकर हम भी वैसा कार्य करना सीख लेते हैं। जैसे-रीमोट चलाना, रेडियो बजाना, कुएँ से पानी खींचना अदि।

2. व्यवसाय की प्रगति:
विज्ञापन के माध्यम से प्रभावकारी हस्तियों के द्वारा उत्पादन का व्यवहार करते हुए दिखाकर उत्पादन की खपत बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

3. अच्छी आदतों से परिचय:
बड़ों को टहलते, व्यायाम करते, व्यायाम करते, चबा-चबाकर खाते, देखकर बच्चे भी टहलने, व्यायाम करने, भोजन ग्रहण करने तथा समय पर सोने-जगने की आदत अपनाने लगते हैं।

4. पर्व-त्योहारों का सम्मान:
दीपावली में दीपों को सजाने, होली में रंग-अबीर का प्रयोग करने, आरती करने तथा शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का आदर-सम्मान देने संबंधी आचरण का ज्ञान प्रेक्षणात्मक अधिगम से सरल हो जाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन के प्रमुख कारकों का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधों के अन्तर्गत समय और कार्य-स्तर की दृष्टि से कई कारकों के द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाये जाते हैं। कुछ प्रमुख कारक निम्न वर्णित हैं –

1. उद्दीपकों के बीच समय-संबंध:
अनुबंधित उद्दीपक और अननुबंधित उद्दीपकों की शुरूआत के बीच समय संबंध पर प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ आधारित होती हैं। प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ मुख्यत: चार प्रकार की होती हैं जिनमें से प्रथम तीन प्रक्रियाएँ अग्रवर्ती अनुबंधन की है तथा चौथी प्रक्रिया पश्चगामी अनुबंधन की है।

(क) सहकालिक अनुबंधक:
जब अननुबंधित तथा अनुबंधित उद्दीपक के साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।

(ख) विलंबित अनुबंधन:
जब अनुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ और अन्त दोनों अननुबंधिक उद्दीपक के पहले होता है।

(ग) अवशेष अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में भी अनुबंधित का प्रारम्भ और अंत अननुबंधित उद्दीपक से पहले होता है। किन्तु दोनों के बीच कुछ समय अंतराल होता है।

(घ) पश्चगामी अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में अननुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ अनुबंधित उद्दीपक के पहले होता है। इन चारों प्रक्रियाओं में से पश्चगामी अनुबंधन प्रक्रिया प्राप्त होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है।

2. अननुबंधित उद्दीपकों के प्रकार:
अननुबंधित उद्दीपक दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रवृत्यात्मक:
यह स्वतः सुगम्य अनुक्रियाएँ उत्पन्न करती है।

(ख) विमुखी अनुबंधित उद्दीपक:
ये परिहार तथा पापन की अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो दुखदायी और क्षतिकारक होते हैं।

3. अनुबंधित उद्दीपकों की तीव्रत:
अनुबंधित उद्दीपक जितना अधिक तीव्र होगा उतने ही कम प्रयासों की आवश्यकता अनुबंधन की प्राप्ति के लिए करना होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाओं का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाएँ निम्न वर्णित हैं –

1. प्रबलन:
किसी प्रयोगकर्ता के द्वारा प्रबलक देने की प्रक्रिया को प्रबलन कहते हैं जहाँ प्रबलक के उद्दीपक अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक धनात्मक प्रबलक प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि ऋणात्मक प्रबलक स्वयं को हटाकर अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक प्राथमिक प्रबल प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच के सम्बन्ध को बतलाती है। प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

2. विलोम:
प्रबलन को हटा लेने के परिणामस्वरूप अधिगत अनुक्रिया के लुप्त होने को विलोप कहते हैं। इसमें सीखे हुए व्यवहार को भी लुप्त होना देखा जा सकता है। अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करती है। सीखते समय प्रबलित प्रयासों की संख्या बढ़ने के साथ विलोप का प्रतिरोध बढ़ता है।

3. सामान्यीकरण:
समान उद्दीपकों के प्रति समान अनुक्रिया करते सम्बन्धी गोचर को सामान्यीकरण कहते हैं। अतः जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण माना जाता है। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

4. विभेदन:
सामान्यीकरण के पूरक के रूप में विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया होती है। विभेदन की अनुक्रिया प्राणी की विभेदन क्षमता यदि भेदन के अधिगम पर निर्भर करता है।

5. स्वतः पुनः प्राप्ति-स्वतः पुनः
प्राप्ति किसी अधिगत के विलोप होने के बाद होती है। उदाहरण एवं प्रयोग के माध्यम से यह पाया गया है कि काफी समय बीत जाने के बाद सीखी हुई अनुबंधित अनुक्रिया का पुनरुद्धार हो जाता है और वह अनुबंधित उद्दीपक के प्रति घटित होती है। स्वतः पुनः प्राप्ति की मात्रा विलोप के बाद बीती हुई समयावधि पर निर्भर करती है। यह अवधि जितनी ही अधिक होती है, अधिगत अनुक्रिया की पुनः प्राप्ति उतनी ही अधिक होती है। इस प्रकार की पुनः प्राप्ति स्वाभाविक रूप से होती है।

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प्रश्न 4.
कृत्रिम संप्रत्यय की विशेषताओं पर आधारित उदाहरणों को व्यक्त करें।
उत्तर:
कृत्रिम संप्रत्यय वे होती हैं जो सुपरिभाषित होते हैं और विशेषताओं को जोड़ने वाले नियम परिशुद्ध और कठोर होते हैं। संप्रत्ययों में जैविक वस्तुएँ, वास्तविक जीवन के उत्पाद तथा मनुष्यों द्वारा बनाई गई विभिन्न कलाकृतियों, जैसे, औजार, कपड़े, मकान आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5.
संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्यकलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन होता है। किसी समस्या का एकाएक समाधान पाना तथा नित्य नया व्यवहार सीखना, कार्य पूरा कर लेने का संकल्प लेना, अनवरत प्रयास के महत्व को समझना आदि संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों से ही संभव हो पाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम एवं अव्यक्त अधिगम के द्वारा इसके विस्तृत प्रभावों को समझा जा सकता है। कोहलर के द्वारा चिम्पैंजी पर किये जाने वाले प्रयोग तथा टॉलमैन के द्वारा चूहे और भूल-भुलैया वाले प्रयोग से संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों का प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों के नाम और परिणाम बतावें।
उत्तर:

  1. युग्मित सहचर अधिगम-मातृभाषा के शब्दों के लिए विदेशी शब्द को पर्याय के रूप में सीखना।
  2. क्रमिक अधिगम-किसी समस्या के समाधान के लिए किए जाने वाले प्रयासों को परिणामी प्रक्रम में सजाकर व्यवहार में लाना।
  3. मुक्त पुनः स्मरण-शब्दों को स्थायी रूप से स्मृति में रखने के लिए उनके क्रम को एक संगठन का रूप देना।

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प्रश्न 7.
अनुबंधित अनुक्रिया तथा स्वाभाविक अनुक्रिया में अंतर करें।
उत्तर:
स्वाभाविक अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन funconditioned stimulus) द्वारा उत्पन्न होता है जैसे भोजन देखकर लारस्राव करन में लारस्राव करना एक स्वाभाविक अनुक्रिया है, जो स्वाभाविक रद्दीपन (भोजन) के प्रति किया जा रहा है। अनुबंधित अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन तथा अनुबंधित उद्दीपन में साहचर्य स्थापित होने के बाद प्राणी अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति करता है।

जैसे-पॉवलव के प्रयोग में जब कुत्ता मात्र घंटी की आवाज पर घंटी तथा भोजन में साहचर्य स्थापित करने के बाद लारस्राव करने लगता है तब लारस्राव की यह अनुक्रिया अनुबंधित अनुक्रिया का एक उदाहरण है। परंतु यही लारस्ताव प्रारंभ में जब भोजन को देखकर किया जाता था तब उसे स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) कहा जाता है।

प्रश्न 8.
पुनर्बलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी के आवश्यकता की पूर्ति जिन वस्तुओं से होती है उसे पुनर्बलन (Reinforce ment) कहा जाता है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है क्योंकि भोजन से ही भूख मिट सकती है। पुनर्बलन प्राप्त करने के उद्देश्य से ही प्राणी उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करने के लिए प्रेरित रहता है। वास्तव में अनुबंधन द्वारा किसी अनुक्रिया को सीखने के लिए पुनर्बलन एक आवश्यक शर्त है जिसका पॉवलव ने अपने प्रयोग में स्पष्टीकरण किया है।

प्रश्न 9.
अविशिष्ट अंतरण से क्या स्पष्ट होता है?
उत्तर:
एक कार्य का सीखना अधिगमकर्ता को अगला कार्य ज्यादा सुविधा से सीखने के लिए स्फूर्ति प्रदान करता है। क्रिकेट खिलाड़ी के खड़े होने की स्थिति तथा परीक्षार्थियों को लिखने के लिए बैठने की विधि के आधार पर लिखने की गति में आने वाले अन्तर को स्फूर्ति परिणाम का कारक मानना अविशिष्ट अंतरण का उदाहरण माना जा सकता है। अर्थात् कोई व्यक्ति एक साथ दो या अधिक कार्यों को सीख सकता है।

प्रश्न 10.
अनुबंधन का अर्थ सोदाहरण बतावें।
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ होता है साहचर्य द्वारा सीखना। जब प्राणी के सामने कोई उद्दीपन, जैसे-भोजन तथा उसके ठीक कुछ पहले एक दूसरा उद्दीपन (stimulus), जैसे-रोशीन (light) दी जाती है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है तब प्राणी रोशनी जलते ही यह समझ जाएगा कि भोजन आनेवाला है। इस प्रत्याशा (expectation) में वह ठीक वैसी ही अनुक्रिया करना प्रारंभ कर देता है जो भोजन की वास्तविक उपस्थिति में वह आमतौर पर करता है। इस तरह के सीखना को अनुबंधन कहा जाता है जिसके लिए स्पष्टतः अन्य बातों के अलावा अभ्यास, उद्दीपन आदि का होना अनिवार्य है।

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प्रश्न 11.
अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन में अंतर बतावें।
उत्तर:
स्वाभाविक उद्दीपक वैसे उद्दीपन को कहा जाता है जो बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के ही प्राणी में एक स्वाभाविक अनुक्रिया उत्पन्न करता है। जैसे-भोजन देखकर भूखे व्यक्ति के मुँह में लार आने की अनुक्रिया में भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन के साथ बार-बार उपस्थित किए जाने पर कुछ प्रयासों के बाद वह अकेले ही वैसी अनुक्रिया उत्पन्न कर लता है जो स्वाभाविक उद्दीपन द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

जैसे-भोजन देने के पहले घंटी बजा दी जाए और यह प्रक्रिया कई प्रयासों में दोहराई जाए तो कुछ देर के बाद मात्र घंटी बजते ही प्राणि लारस्राव की अनुक्रिया करने लगेगा। इस तरह के तटस्थ उद्दीपन (neutral stimulus) को अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) कहा जाता है। अत: इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि स्वाभाविक उद्दीपन बिना प्रशिक्षण के ही अनुक्रिया उत्पन्न करता है, परंतु अनुबंधित उद्दीपन प्रशिक्षण के बाद स्वाभाविक उद्धेपन के समान अनुक्रिया करता है।

प्रश्न 12.
सीखना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सीखने से तात्पर्य व्यवहार में परिवर्तन से होता है, परंतु व्यवहार में हुए सभी तरह के परिवर्तनों को सीखना नहीं कहा जाता है। जैसे-व्यक्ति के व्यवहार में परिपक्वता (maturation) के कारण परिवर्तन हो जाता है, औषधि खा लेने से परिवर्तन आ जाता है, थकान होने से परिवर्तन होता है, आदि-आदि। ऐसे सभी परिवर्तनों को सीखने की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। व्यवहार में केवल उन्हीं परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है जो अभ्यास (practice) या अनुभूति (experience) के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। व्यवहार में ऐसे परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी (relatively permanent) होते हैं।

प्रश्न 13.
शिक्षण वक्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक ऐसा वक्र है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रयासों (trials) या अभ्यासों में हुए सीखने की प्रगति या दर को दिखाया जाता है, सामान्यतः सीखने की दर को तीन कसौटियों के रूप में दिखाया जाता है-सीखने की यथार्थता पर परिशुद्धता (accuracy in learning), त्रुटि में कमी (reduction in error) तथा सीखने में लिया गया समय। इससे तीन तरह के शिक्षण वक्रों का निर्माण होता है।

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प्रश्न 14.
शिक्षक वक्र में पठार का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
किसी पाठ या विषय को सीखने की अवधि के बीच में कभी-कभी ऐसा होता है कि अभ्यास जारी रहने के बावजूद सीखने में कोई प्रगति नहीं होती है। फलस्वरूप, ऐसी परिस्थिति में बननेवाला वक्र आधार के समानांतर हो जाता है। शिक्षण वक्र की इस स्थिति को पठार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
शाब्दिक सीखना किसे कहा जाता है?
उत्तर:
शाब्दिक सीखना का तात्पर्य शब्दों, अंकों, आकृतियों के. अर्थ को समझकर उसके प्रति विशेष अनुक्रिया करने से होता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति ‘हाथी’ शब्द लिखता-पढ़ता है, तथा उसका अर्थ समझता है तथा उस शब्द का सही उपयोग भी करता है तो यह शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण होगा। इस तरह के सीखना में ज्ञानेन्द्रियों (sense organs) की भूमिका शरीर के पेशीय अंगों (motor organs) की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। कविता याद करना शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण है।

प्रश्न 16.
संवेदी-पेशीय सीखना का अर्थ बतावें।
उत्तर:
संवेदी:
पेशीय सीखना से तात्पर्य वैसे सीखना से होता है जिसमें शरीर की ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों (motor organs) का संयुक्त योगदान होता है, परंतु कर्मेन्द्रियों या पेशीय अंगों का तुलनात्मक रूप से अधिक सक्रिय योगदान होता है। जैसे-कार चलाना सीखना, टाइप करना सीखना, तैरना सीखना आदि संवेदी-पेशीय सीखना के कुछ उदाहरण हैं। इस तरह के सीखना में कर्मेन्द्रियों अर्थात् हाथ, पैर आदि का योगदान आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से स्पष्टत: अधिक होता है।

प्रश्न 17.
प्रवर्तन अनुकूलन से आप. क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्किनर (Skineer 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूल कोटि में रखा जा सकता है। बक्से में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्से में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा। लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी। इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन को गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भी भेद है।

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प्रश्न 18.
अभ्यास नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभ्यास नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धांत में किया गया। इस नियम के अनुसार सीखने का आधार अभ्यास (exercise) होता है। इस नियम के दो उपनियम हैं-उपयोग नियम (law of use) तथा अनुपयोग नियम (law of disuse)। उपयोग नियम के अनुसार जब किसी अनुक्रिया को प्राणी बार-बार दोहराता है तब उसे वह करना सीख लेता है। अनुपयोग नियम के अनुसार जब प्राणी किसी अनुक्रिया को बार-बार नहीं दोहराता है तब वह उसे सीख नहीं पाता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति मात्र एक या दो बार टाइप करने का प्रयास करता है, तो वह टाइप करना नहीं सीख पाएगा।

प्रश्न 19.
प्रभाव नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रभाव नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धान्त में किया गया। इस नियमं द्वारा यह पता चलता है कि प्राणी किसी अनुक्रिया को उस अनुक्रिया से उत्पन्न प्रभाव के आधार पर सीखता है। अनुक्रिया करने के बाद यदि उसे संतुष्टि (satisfaction) होती है तो वह उस अनुक्रिया को बार-बार दोहराता है और उसे सीख लेता है। परंतु, यदि उसे अनुक्रिया करने के बाद खीझ (annoyance) होती है तो वे उसे दोहराता नहीं है और उसे नहीं सीख पाता है। थार्नडाइक के प्रयोग में भूखी बिल्ली दरवाजा खोलने की अपक्रिया को इसलिए सीख जाती है, क्योंकि दरवाजा खोलने के बाद उसे भोजन मिलता था जिसे खाकर वह संतुष्ट हो जाती थी।

प्रश्न 20.
अधिगम (सीखने) की परिभाषा दें।
उत्तर:
“सीखना” बहुत व्यापक शब्द है, इस मानसिक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति व्यवहार के सहारे होती है। सीखने से प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन या परिमार्जन होता है। सीखने में व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, वह अनुभव या अभ्यास पर आधारित होता है और उससे समायोजन में सहायता मिलती है। मॉर्गन और गिलीलैंड ने सीखने की परिभाषा इस प्रकार दी है-“सीखना अनुभव के परिणाम स्वरूप जीव के व्यवहार में कुछ परिमार्जन है जो कम-से-कम कुछ समय के लिए भी जीव द्वारा धारण किया जाता है।” उपरोक्त परिभाषा में निहित तथ्य इस प्रकार है –

  1. सीखने से व्यवहार में परिवर्तन होता है।
  2. सीखा हुआ व्यवहार कुछ समय तक व्यक्ति के व्यवहार में स्थायी रूप से बना रहता है।
  3. सीखा हुआ व्यवहार अचानक नहीं होता है। यह अनुभव अथवा अभ्यास पर आधारित होता है।
  4. सीखने के पीछे अभिप्रेरण कार्य करता है।
  5. सीखा हुआ व्यवहार का मापन संभव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सीखने में अनुप्रेरणा (motivation) के प्रभाव का वर्णन करें। अथवा, सीखने में अभिप्रेरणा (motivation) की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
सीखने की क्रिया में तीन तत्व संयुक्त होते हैं, जिन्हें हम इस प्रकार कह सकते हैं –

  1. मनोवैज्ञानिक तत्व
  2. शारीरिक तत्व तथा
  3. वातावरण-सम्बन्धी तत्व। मनोवैज्ञानिक तत्व को हम सीखने में ‘अनुप्रेरणा’ (Motivation) कहते हैं।

सीखना प्राणी की वह क्रिया होती है, जिसके द्वारा वह अपने पर्यावरण से प्रतिक्रिया करता है। सीखने वाले के अन्दर क्रिया को हम प्रेरणा के द्वारा ही उत्पन्न करते हैं। उत्तेजना, रुचि, उद्देश्य इत्यादि अनुप्रेरण के विभिन्न रूपों पर बल देते हैं। ‘प्रेरणा’ ही सीखने की क्रिया का मूल तत्व है। अनुप्रेरणा ही बालक को क्रियाशील बनाती है, प्रतिक्रिया, रुचि, प्रयत्न आदि के परिणाम हैं। जिन्हें शिक्षक पसन्द करता है और यह विद्यार्थियों के लिए भी लाभदायक होते हैं। ये सब अनुप्रेरण से ही जन्म लेते हैं।

शिक्षा में अनुप्रेरणा वह कला है जो बालक के अन्दर रुचि उत्पन्न करती है। जब भी बालक किसी कार्य या वस्तु में रुचि अनुभव नहीं करता, अनुप्रेरणा द्वारा रुचि को उसमें जाग्रत किया जा सकता है। स्वीकृत व्यवहार को जाग्रत करना, बनाये रखना तथा निर्देशन देना विद्यमान की शिक्षा में प्रेरणा का ही कार्य है। व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया जो किसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है, अनुप्रेरणात्मक होती है। चूँकि सभी प्रकार सीखना एक विशेष लक्ष्य रखता है, इसलिए सभी प्रकार का सीखना एक अनुप्रेरित क्रिया होती है।

उत्तेजना की तीव्रता, लक्ष्यों को देखने, विविधता आदि सीखने की क्रिया के प्रभावोत्पादन में अन्तर उत्पन्न करते हैं। अध्यापक का कर्तव्य है कि वह बालकों को अनुप्रेरणा द्वारा सीखने को प्रोत्साहित करें। सीखने की क्रिया के अन्तर्गत अनुप्रेरकों और लक्ष्यों का बुद्धिसंगत योग होता है जो अनुकूल और आनुपातिक वातावरण का निर्माण करता है, संवेगात्मक रुचि उत्पन्न करता है और बालकों के अन्दर संतोष की भावना करता है।

सीखने की क्रिया में अनुप्रेरकों के तीन कार्य (Three functions of Motives in Learming process):
मेटल के मतानुसार, अनुप्रेरक सीखने की क्रिया में तीन कार्य करते हैं। वे इस प्रकार हैं –

1. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को शक्तिशाली बनाते हैं (Motives Energise Behaviour):
अनुप्रेरक शक्ति का वर्द्धन करते हैं, जिससे हमारे अन्दर क्रियाशीलता उत्पन्न होती है। इस प्रकार भूख तथा प्यास भी हमारे अन्दर मांसपेशिक तथा ग्रन्थिक (Musculars and Glandular) प्रतिक्रिया होती है। प्रशंसा, आरोप, पुरस्कार, दण्ड आदि शक्तिशाली उत्तेजक हैं, जो हमारे बहुत-से कार्य को प्रभावित करते हैं। ये हमें किसी विशेष दिशा की ओर कार्य करने को बाध्य करते हैं और सीखने की क्रिया में सहायक होते हैं।

2. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को चुनने वाले होते हैं (Motives are selector of behaviour):
प्रेरक व्यक्ति की किसी उत्तेजना-विशेष के प्रति प्रतिक्रिया करने के लिए उत्तेजित करते हैं.और दूसरी वस्तुओं के प्रति अवहेलना। वे यह भी बताते हैं कि किसी अवस्था-विशेष में व्यक्ति किस प्रकार या करेगा। यदि एक समाचार पत्र विभिन्न व्यक्ति को दिया जाय तो हर व्यवि उसी खण्ड को गढ़ेगा जिसके लिए उसे अनुप्रेरणा प्राप्त है। उदाहरण के लिए, बेरोजगा व्यक्ति आवश्यकता पप्बन्धी खण्ड को ध्यान से देखेगा और बहुत-सी आवश्यकताओं को याद कर लेगाः सके विपरीत एक खिलाड़ी खेल के समाचार की ओर अधिक आकृष्ट होगा।

3. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार का संचालन करते हैं (Motive Direct Our Behaviour):
अनुप्रेरक केवल व्यवहार को सुनते ही नहीं वरन् उनका संचालन भी करते हैं। वह व्यवहार का संचालन इस प्रकार करते हैं कि हमारे अन्दर संतुष्टि की भावना जाग्रत हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने सीखने में उन्नति करने के लिए कार्यशीलता को अपनाये, अपनी संपूर्ण शक्ति को आदर्श ग्रहणीय लक्ष्यों की ओर प्रवाहित करे और उन्हीं में अपनी शक्ति का प्रयोग करे।

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प्रश्न 2.
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रमुख अन्तर निम्न प्रकार से है –

1. प्राचीन अनुबन्धन में कुत्ते को लार का स्राव उचित समय पर भोजन देकर कराया जा सकता है। इससे प्रयोगकर्ता प्रयोज्य को उपयुक्त समय पर उत्तेजना प्रस्तुत करता है तभी अनुक्रिया नियंत्रित होती है। नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रयोगकर्ता के हाथ में ऐसी उत्तेजना नहीं होती जिससे वह अपने प्रयोज्य से छड़ दबाने जैसी प्रतिक्रियाएं करा सके।

2. प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलनं (US) अनुक्रिया पर निर्भर नहीं करता। जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन अनुक्रिया पर निर्भर करता है। डी-अमेटो के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन प्रयोज्य को मिलेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रयोज्य उपयुक्त अनुक्रिया करता है अथवा नहीं।

3. अनेक अध्ययनों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि केवल प्राचीन अनुबन्धन प्रक्रियाओं द्वारा स्वतः चालित अनुक्रियाओं का अध्ययन हो सकता है। स्वतः चालित क्रियाएं जैसे लार स्रावित होना, पलक मारना आदि हैं। स्पेन्स और रॉस के कथनानुसार पलक गिरने की क्रिया स्वतः है तथा पलक मारने की क्रिया ऐच्छिक है। दोनों प्रकार की क्रियाओं की प्रकृति तथा अनुक्रिया काल अलग-अलग है। इन मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि पलक गिरने की क्रिया प्राचीन अनुबन्धन का उदाहरण है तथा पलक मारने की क्रिया नैमित्तिक अनुबन्धन के फलस्वरूप होती है।

4. माउरर के अनुसार सैद्धान्तिक दृष्टि से भी प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर है। माउरर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन में अधिगम समीपता के आधार पर होता है। यह देखा गया कि CS तथा Vs की उपस्थिति में जितना की कम अन्तर होगा, CS तथा US में साहचर्य उतनी ही जल्दी स्थापित हो जायेगा। इस प्रकार के अधिगम प्रक्रम में पुनर्बलन आवश्यक नहीं है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन में CD तथा US के मध्य पुनर्बलन के आधार पर साहचर्य स्थापित होता है। एक अनुबन्धन में साहचर्य स्थापित होने का आधार समीपता है तो दूसरी जगह पुनर्बलन। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों अनुबन्धनों में सैद्धान्तिक दृष्टि से अन्तर है।

5. श्लासवर्ग के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में साहचर्य उत्तेजना-अनुक्रिया के मध्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन में उत्तेजना-उत्तेजना के मध्य साहचर्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन एक प्रकार से Stimulus Substitution होता है।

6. स्किनर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन स्वत: है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन एक प्रतिक्रिया है। प्राचीन अनुबन्धन प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलन का सम्बन्ध उत्तेजना के साथ होता है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में यह स्थिति नहीं होती है। दूसरे प्राचीन अनुबन्धन की कुछ निन्दा करते हुए उसने यह कहा है कि शुद्ध प्राचीन अनुबन्धन में प्रायोगिक प्रमाणों का अभाव है।

नैमित्तिक अनुबन्धन में अनुक्रिया और पुनर्बलन के बीच धनात्मक सम्बन्ध होता है। इसमें पुनर्बलन की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि प्रयोज्य किस प्रकार की अनुक्रिया करता है। स्किनर ने यह भी कहा है कि उद्दीपक प्रकार के अनुबन्धन की सीमा सहज क्रियाओं तक तथा नैमित्तिक अनुबन्धन की सीमा ऐच्छिक पेशीय क्रियाओं तक है।

7. मेडिनिक के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रतिक्रियात्मक (Respondant behaviour) अथवा प्रतिकृत (Elicited) प्रकार का व्यवहार है। इस प्रकार का व्यवहार सहज क्रियात्मक तथा उत्तेजना के नियंत्रण से होता है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रवर्तन (operant) व्यवहार कहलाता है। इस प्रकार का व्यवहार ऐच्छिक होता है।

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प्रश्न 3.
साधनात्मक अनुकूलन या नैमित्तिक अनुबंधन का वर्णन करें।
उत्तर:
डी अमेटो (D’Amato, 1970) के अनुसार:
“नैमित्तिक अनुबंधन (Instrumental Conditioning) ऐसा कोई भी सीखना होता है जिसमें अनुक्रिया अवलम्बित पुनर्बलन.पर आधारित हो तथा जिसमें प्रयोगात्मक रूप से परिभाषित विकल्पों का चयन सम्मिलित न हो।” (Instrumental Conditioning is any learning based on response contingent reinforcement that does not involve choice among experimentally defined alternatives)

नैमित्तिक अनुबंधन की मुख्य विशेषता परिभाषा की पहली लाइन में ही दी हुई है जिसका अर्थ है कि प्रयोज्य के लिए पुनर्बलन या पुरस्कार (Reinforcement) की उपलब्धि प्रयोज्य की अनुक्रियाओं पर आश्रित होती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रयोज्य की अनुक्रियाएँ पुनर्बलन (Reinforcement) का Instrument (निमित्त) बन जाती है। नैमित्तिक अनुबंधन उत्तेजना-अनुक्रिया के बीच साहचर्य स्थापित करने की दूसरी विधि है, प्रथम विधि प्राचीन अनुबंधन है।

पुनर्बलन की प्रकृति धनात्मक अथवा निषेधात्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है। धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) वह उत्तेजना है जिसे प्रयोज्य प्राप्त करने के लिए चेष्टा और कार्य करता है। निषेधात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) वह प्रयोज्य है जिसे प्रयोज्य उपेक्षित करने के लिए कार्य करता है अथवा इस उत्तेजना से बचने के लिए कार्य करता है। इस प्रकार के (Reinforcer प्राय: Aversive or Noxious Stmulus) कहे जाते हैं।

ऐसा नैमित्तिक अनुबंधन जिसमें धनात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, प्रवृत्यात्मक अनुबंधन (Appetitive Conditioning) तथा निषेधात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, उन्हें विमुखी अथवा हानिकारक अनुबंधन (Aversive or Noxiopus Conditioning) कहा जाता है। नैमित्तिक अनुबंधन का वर्गीकरण पुनर्बलन का धनात्मकता (Positiveness) अथवा निषेधात्मक (Negativeness) पर आधारित होने के साथ-साथ अधिगम प्रक्रम की उग्र-गमनता (Forward movement) तथा पृष्ठ-गमनता (Backward-movement) पर भी आधारित है।

कोनोस्र्की (1948) ने साधनात्मक नैमित्तिक अनुबंधन के निम्न तीन प्रकार बतलाए हैं –

1. परिहरण-अनुकूलन (Avoidance conditioning):
यदि घंटी बजे, फिर पाँव में विद्युत-आघात लगे और उसपर.कुत्ता पाँव उठा ले तो कुछ यत्नों के बाद घंटी बजते ही कुत्ता अपना पाँव उठाना सीख लेगा। अधोनुकूलन में पाँव उठा लेने पर भी विद्युत आघात लगेगा। यदि पाँव उठा लेने से वह आघात से बच जाए तो वही साधनात्मक स्वरूप का परिहरण-अनुकूलन कहलाता है।

2. पलायन-अनुकूलन (Escape conditioning):
साधनात्मक अनुकूलन के इस रूप में प्राणी धीरे-धीरे किसी कष्टकर परिस्थिति से बचना सीखता है। मौवरर ने एक प्रयोग में चूहे को पिंजड़े में बन्द किया और उसके फर्श को विद्युत-आवेशित कर दिया फिर धीरे-धीरे विद्युत तीव्रता बढ़ती गई। चूहा विविध प्रकार की क्रियाएँ करने लगा, यहाँ तक कि वह एक लीवर पर चढ़ गया जिससे लीवर दबा और विद्युत-आवेश समाप्त हो गया। यही परिस्थिति फिर दुहरायी गयी। इस बार अपेक्षाकृत शीघ्र ही वह लीवर पर चढ़ गया। एक ऐसी अवस्था भी आ गयी कि जब बिजली का आभास होता था तो चूहा लीवर दबा कर आघात से बचने लगा। यही पलायन-अनुकूलन है।

3. प्रवर्तन अनुकूलन (Operant conditioning):
स्किनर (Skinner 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूलन कोटि में रखा जा सकता है। बक्स में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्स में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा, लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी।

इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन की गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन उत्तेजक और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भेद भी है।

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प्रश्न 4.
पॉवलव के शिक्षण सिद्धान्त की विवेचना करें।
उत्तर:
सीखने के अनुबंधित-अनुक्रिया सिद्धांत का प्रतिपादन रूसी शरीर क्रिया-विज्ञानी पॉवलव (Pavlov) द्वारा किया गया। पॉवलव के इस सिद्धान्त का आधार अनुबंधन (conditioning) है जिससे तात्पर्य साहचर्य द्वारा सीखना (learning by association) होता है। जैसे-जब किसी अस्वाभाविक उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति साहचर्य के आधार पर प्राणी स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) करना सीख लेता है तब इस तरह के सीखना को अनुबंध द्वारा सीखना (conditioning learning) कहा जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मानलिया जाए कि एक भूखा व्यक्ति भोजन को देखता है, तो उसके मुँह में लार आने लगता है। यहाँ भोजन एक स्वभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) है जो व्यक्ति में स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) उत्पन्न कर रहा है। अब थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि एक घंटी बजाकर उसके सामने भोजन दिया जाता है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है।

ऐसी परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति घंटी की आवाज को भोजन आने का सूचक मानकर घंटी की आवाज सुनते ही लारस्राव करने लगे। यदि ऐसा होता है तो यह कहा जाएगा कि व्यक्ति घंटी की आवाज (अस्वाभाविक उद्दीपन) के प्रति एक स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) करना सीख लिया है। इस तरह के सीखना को अनुबंध न द्वारा सीखना (learning by conditioning) कहा जाता है। पॉवलव ने इस सिद्धांत की जाँच करने के लिए एक कुत्ते पर प्रयोग किया है तथा वाटसन एवं रेनर (Watson & Raynor) ने एक छोटे शिशु, जिसका नाम अलबर्ट (Albert) था, उसपर एक प्रयोग किया है। इन दोनों प्रयोगों का वर्णन यहाँ अपेक्षित है।

कुत्ते पर पॉवलव द्वारा किया गया प्रयोग (Pavlov’s experiment on dog):
अनुबंधन अनुक्रिया सिद्धांत के तथ्य के समर्थन में पॉवलन ने एक प्रयोग एक भूखे कुत्ता पर किया। कुत्ता को एक ऐसे कमरे में विशेष उपकरण के सहारे खड़ा किया गया जिसमें बाहर से किसी तरह की आवाज नहीं आने पाए।

कुत्ते द्वारा टपकाई गई लार की मात्रा को मापने के लिए उसके गलफड़े में एक खास किस्म का यंत्र लगा दिया गया जिसे चित्र में दिखाया गया है। कुछ प्रयास तक कुत्ते के सामने भोजन दिया और भोजन देखते ही कुत्ते के मुँह में लार आने लगी। कुछ प्रयास के बाद कुत्ते के सामने भोजन उपस्थित करने के चंद सेकंड पहले तक घंटी बजाई जाने लगी। इस प्रक्रिया को कुछ प्रयासों तक दोहराने के बाद घंटी की आवाज सुनते ही बिना भोजन देखे
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम img 2
चित्र: पॉवलव द्वारा कुत्ते पर किया गया प्रयोग

ही कुत्ते के मुंह में लार आने लगी। इस तरह कुत्ता ने घंटी की आवाज पर लारस्राव करने की अनुक्रिया को सीख लिया। पॉवलव के अनुसार यहाँ कुत्ता घंटी की आवाज तथा लारस्राव में संबंध स्थापित करना सीख लिया जिसे अनुबंधन (conditioned stimulus या CS), भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus या UCS) तथा लार का स्राव (अनुबंधन के बाद) एक अस्वाभाविक अनुक्रिया (conditioned response या CR) का उदाहरण है। भोजन के प्रति की गई अनुक्रिया (अनुबंधन के पहले) एक स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response या UCR) का उदाहरण है।

वाटसन तथा रेनर द्वारा किया गया प्रयोग (Experiment done by Waston & Raynor):
वाटसन (Watson) ने अपनी पत्नी रेनर (Raynor) के साथ मिलकर अलबर्ट नामक एक बच्चे पर प्रयोग किया। प्रयोग इस प्रकार है-अलबर्ट एक उजले चूहे के साथ खेल रहा था। तभी जोरों की तीव्र आवाज उत्पन्न कर दी गई।

आवाज से बच्चा डर जाता था। कुछ दिनों तक यह प्रक्रिया दोहराने के बाद यह देखा गया कि बच्चा उजले चूहे को देखते ही डरकर रोने लगता था। आगे चलकर अलबर्ट में और तीव्र अनुबंधन होता पाया जिसें अलबर्ट केवल उजले चूहे बल्कि उसे मिलती-जुलती अन्य चीजों, जैसे उजला रोएँदार कोट, उजला खरगोश आदि से भी डरने लगा। इस प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) जोरों की आवाज तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) चूहा है और अनुबंधित अनुक्रिया डर है जो मात्र चूहा देखकर ही उत्पन्न होता था।

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि अनुबंधन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें स्वाभाविक उद्दीपन तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन में एक विशेष संबंध स्थापित हो जाता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अस्वाभाविक उद्दीपन के प्रति ठीक वैसी ही अनुक्रिया करता है जैसी स्वाभाविक उद्दीपन के प्रति।

अनुबंधन के लिए कुछ प्रमुख बातें –
अनुबंधन द्वारा किसी प्रक्रिया को सीखने के लिए निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य है –

1. आवश्यकता (Need):
सीखनेवाले प्राणी में आवश्यकता का होना अनिवार्य है। पॉवलव के प्रयोग में कुत्ता भूखा था। अतः उसमें भोजन की अवश्यकता (need) थी। ऐसी आवश्यकता नहीं होती तो वह घंटी की आवाज के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

2. पुनर्बलन (Reinforcement):
प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति जिस चीज से होती है, उसे पुनर्बलन की संज्ञा दी जाती है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

3. अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन के बीच का समय-अंतराल (Time interval between conditioned stimulus and unconditioned stimulus):
fortit अनुक्रिया का संबंध अनुबंधित उद्दीपन के स्थापित हो, इसके लिए यह भी आवश्यक है कि अनुबंधित उद्दीपन के तुरंत बाद स्वाभाविक उद्दीपन दिया जाए। शायद यही कारण है कि पॉवलव के प्रयोग में घंटी बजने के तुरंत बाद कुत्ते के सामने भोजन दिया जाता था।

4. व्याघातक उद्दीपनों की अनुपस्थित (Absence of disturbing stimulus):
अनुबंधन द्वारा सीखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रयोग करते समय अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) तथा स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) से मिलते-जुलते दूसरे व्याघातक उद्दीपन वहाँ नहीं हों अन्यथा प्राणी अनुबंधित उद्दीपन के साथ स्वाभाविक अनुक्रिया का साहचर्य स्थापित नहीं कर पाएगा।

आलोचनाएं (Criticis):
इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए पुनर्बलन (reinforcement) आवश्यक है। परन्तु, टॉलमैन (Tolman) तथा ब्लोजेट (Blodgett) आदि द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि पुनर्बलन की अनुपस्थिति में भी प्राणी किसी अनुक्रिया को सीखता है। पुनर्बलन की आवश्यकता सीखी गई अनुक्रिया की अभिव्यक्ति के लिए होती है।

(b) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए अभ्यास या पुनरावृत्ति को महत्त्वपूर्ण कारक माना गया है। परन्तु, बहुत अनुक्रियाएं ऐसी होती है जिसे व्यक्ति मात्र एक बार के अनुभव में ही सीख लेता है।

(c) कुंछ आलोचकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा प्रतिपादित सीखना स्थायी तथा आशिक रूप से ही प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। कुत्ता घंटी की आवाज पर तभी तक लार का स्त्राव करता था जबकि घंटी की आवाज के बाद उसे. भोजन दिया जाता था।

(d) कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा सीखी गई अनुक्रिया अस्वाभाविक होती है जिसके आधार पर स्वाभाविक ढंग से सीखने की प्रक्रियाओं की व्याख्या नहीं की जा सकती है। इन अलोचनाओं के बावजूद पॉवलव का सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।

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प्रश्न 5.
अधिगम अन्तरण का क्या स्वरूप है? कुछ प्रायोगिक उदाहरण द्वारा किसी भूत अधिगम के आगामी अधिगम पर प्रभाव की व्याख्या कीजिए। अथवा, अन्तरण के प्रभावों को निर्धारित करने में समानता एक मुख्य परिवर्तनीय है। (अण्डरवुड) अपने उत्तर की पुष्टि में प्रयोगात्मक प्रभाव दीजिए। अथवा, सीखने के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षक बालक को कक्षाओं में ज्ञान देता है। ज्ञान देने की क्रिया के पीछे अध्यापक की यह भावना अवश्य रहती है कि बालक इस ज्ञान अथवा सीखी हुई क्रिया का उपयोग अन्य परिस्थितियों में करेगा। अत: एक क्रिया का दूसरी परिस्थति में उपयोग किया जाना ही सीखने का स्थानान्तरण कहलाता है। उदाहरणार्थ, एक बालक गणित के सभी प्रश्नों को.बिना किसी की सहायता से स्वयं ही हल कर लेता है। गणित के ज्ञान द्वारा वह विज्ञान के विषयों में भी लाभ उठा सकता है।

इस क्रिया को सीखने का स्थानान्तरण कहते हैं। यहाँ तक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि समाज में ज्ञान का स्थानान्तरण न होता तो मनुष्य को हर क्रिया को सीखने के लिए नये सिरे से प्रयत्न करना पड़ता। इसलिए क्रो ने स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है – “सीखने के स्थानान्तरण से यह अभिप्राय है, जब सीखने में प्राप्त विचार, अनुभव या कार्य, ज्ञान अथवा कौशल का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में उपयोग किया जाय।”

शिक्षा-विश्व-कोष में स्थानान्तरण की व्याख्या इस प्रकार दी गई है-“जब कोई विशेष अनुभव व्यक्ति की योग्यता को दूसरी परिस्थिति में प्रतिक्रिया करने के हेतु प्रभावित करता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर वह नई समस्या को हल करने में उत्तेजना प्रदान करता है।” कॉलसानिक ने भी स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है-“स्थानान्तरण पहली स्थिति में अर्जित ज्ञान, कौशल, स्वभाव, मनोवृत्ति अथवा प्रतिक्रयाओं का अन्य परिस्थितियों में प्रयोग करता है।” इन परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि अर्जित अनुभव का लाभ उठाना ही स्थानान्तरण है। इस प्रकार के विचार सोरेन्स ने भी व्यक्त किये हैं – “स्थानान्तरण के द्वारा व्यक्ति उस सीमा तक सीखता है जहाँ से वह अर्जित योग्याताओं की सहायता दूसरी परिस्थितियों में करता है।

इन परिभाषाओं से प्राप्त निष्कार्षों को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। एक व्यक्ति ने ट्रैक्टर चलाना सीख लिया है। वह उसके संचालन की हर विधि को अच्छी तरह जान गया है। यदि उसे कार या ट्रक चलाने को कहा जाय तो उसे कार या ट्रक का संचालन करने में परेशानी होगी। ट्रैक्टर चलाने की क्रिया का उपयोग कार या ट्रक चलाने में किया गया, इसलिए यह ट्रैक्टर चलाने की क्रिया स्थानान्तरण है।

स्थानान्तरण के प्रकार (Types of Transfer) यदि पूर्व सीखने का अनुभव दूसरे सीखने पर प्रभाव डालता है तो दूसरे सीखने में कम समय तथा कम शक्ति का प्रयोग हो सकता है। यदि दूसरे कार्य के अधिगम में सुगमता हो जाय या कार्य दुरूह हो जाय अथवा प्रभाव शून्य हो जाय तो उन्हें क्रमश: भावात्मक या विधेयात्मक (Positive), नकारात्मक (Negative) तथा शुन्यात्मक (Zero) स्थानान्तरण के नाम से पुकारेंगे। इस प्रकार स्थानान्तरण के तीन प्रकार बताये गये।

1. भावात्मक या विधेयात्मक (Positive) स्थानान्तरण:
इस अधिगम स्थानान्तरण का तात्पर्य है कि जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में सहायक होता है तो उसे भावात्मक या विधेयात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। मार्गन (1956) के अनुसार भावात्मक या विधेयात्मक अन्तरण उस अवस्था में उत्पन्न होता है जब पूर्वानुभव अधिगम में सहायक होता है।

उदाहरणार्थ-दाएँ हाथ से लिखना सीख लेने पर बाएँ हाथ से भी लिखने का कार्य थोड़ा बहुत किया जा सकता है। प्रयोगशालाओं में दर्पण चित्रांकन (Mirror drawing) पर प्रायः धनात्मक या विधेयात्मक अन्तरण पाया जाता है। विधेयात्मक अन्तरण का जीवन में अत्यधिक महत्व है। नवीन परिस्थिति में ऐसा अन्तरण अधिक सहायक होता है। बेबर, फेकनर, डक्कन, ग्रिग एवं किम्मेल, हिलगार्ड आदि ने इस प्रकार विशेष कार्य किया है।

2. निषेधात्मक या नकारात्मक (Negative) स्थानान्तरण:
जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में अवरोध या बाधा उत्पन्न करता है तो उसे नकारात्मक या निषेधात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। आसगुड (Osgood) के अनुसार अवरोधक अन्तरण की निषेधात्मक या नकारात्मक अधिगम अन्तरण है। बोरिंग तथा अन्य के अनुसार यदि पूर्व अनुभव नवीन कार्य पर बाधक प्रभाव डालता है तो अन्तरण निषेधात्मक कहलाता है।

यह कई कारणों से हो सकता है। इसमें अनुक्रिया स्पर्धा या विपरीत अनुक्रिया इत्यादि प्रमुख कारण हैं। उदाहरणार्थ-जब हम किसी कार्य को दायें हाथ से करने में अभ्यस्त हो जाते हैं और इसी क्रिया को जब बायें हाथ से करते हैं तो कार्य में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है तथा दुरूहता आ जाती है। यही नकारात्मक या निषेधात्मक अधिगम स्थानान्तरण है।

3. शून्य स्थानान्तरण (Zero Transfer):
कुछ ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं जब एक क्रिया का सीखना किसी अन्य क्रिया में न भावात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है और न नकारात्मक, अर्थात् शून्य स्थानान्तरण की अवस्था में न तो पूर्वानुभाव सहायक होता है न बाधक। ऐसी स्थिति में अन्तरण प्रभावशून्य होगा।

अधिगम स्थानान्तरण के सिद्धान्त (Theories of Transfer of Learning):
अधिगम स्थानान्तरण के संदर्भ में निम्नलिखित सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है –

1. औपचारिक अनुशान का सिद्धान्त (Theory of FormalDiscipline):
शिक्षा-शास्त्रियों की विचारधारा काफी वर्षों तक यह थी मनुष्य का मस्तिष्क विभिन्न संकायों (Faculties) का स्वरूप है। इसमें स्मृति, विश्लेषण, निर्णय, इच्छा, कल्पना तथा तर्क आदि माने जाते हैं। इस विचारधारा को मानने वालों का मत था कि जिस प्रकार व्यायाम से शरीर की मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं उसी प्रकार प्रशिक्षण से मानसिक शक्तियाँ भी विकसित हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, गणित के ज्ञान से व्यवसाय में तथा कविता के ज्ञान से वाक्य के विभिन्न रूपों के समझने में सहायता मिलती है। स्वयं तर्क करने की शक्ति से समस्या समाधान में सहायता मिलती है। बुडवर्थ तथा विलियम जेम्स ने इसकी आलोचना की।

2. समान अंशों का सिद्धान्त (Theory of Identical Elements):
इसके प्रतिपादक थार्नडाइक (Thorndike) महोदय ने बताया कि एक विषय के संस्कार उसी अनुपात में दूसरे विषय में स्थानान्तरित होते हैं जिस अनुपात में दोनों विषयों में समानता पायी जाती है। विद्यार्थियों को ऐसे विषयों का ज्ञान कराया जाना चाहिए जिसके ज्ञान से जीवन के समान क्षेत्रों में स्थानान्तरण हो सके।

स्पीयरमैन (Spearman) ने भी द्वि-तत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन करके यह बताया कि सामान्य बुद्धि हर मनुष्य में एक-सी होती है जिसका उपयोग सामान्य क्रियाओं में होता है। सामान्य बुद्धि ही स्थानान्तरण का आधार है। विशिष्ट बुद्धि को जो मनुष्य में भिन्न होती है उसका उपयोग हर मनुष्य अपने ढंग से करता है। सामान्य विषयों जैसे भूगोल, इतिहास, गणित तथा साहित्य आदि में भी किसी का स्थानान्तरण करने में उसकी मात्रा कम या अधिक होगी।

3. सामान्य अनुभव का सिद्धान्त (Theory of Generalization of Experience):
चार्ल्स जुड (Charles Judd) इस सिद्धान्त के जन्मदाता हैं। इसे “सिद्धान्त द्वारा स्थानान्तरण” कहा जाता है। जिन सिद्धान्तों को व्यक्ति अपने अनुभवों द्वारा सीख लेता है उनका जीवन परिस्थितियों में स्थानान्तरण होता है। जिन सिद्धान्तों काके राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) ने पतंग उड़ाने में सीखा था उन्हीं के आधार पर जहाज बनाने में सहायता प्राप्त की।

सीखने में स्थानान्तरण का महत्त्व

  1. स्थानान्तरण के महत्त्व को देखते हुए विद्यालयों में बालकों का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाना चाहिए कि उनके भविष्य के जीवन से सम्बन्धित हो। पाठ्यक्रम में सामाजिक, शारीरिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, चरित्र-निर्माण आदि जैसे विषयों का समावेश हो सके तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
  2. स्थानान्तरण से एक विषय के बाद दूसरा विषय सरलता से सीख लिया जाता है जिससे अधिक श्रम एवं समय की भविष्य में बचत होती है।
  3. स्थानान्तरण के महत्व को स्वीकार करके विद्यालय के पाठ्यक्रम से ऐसे विषयों को निकाला जा सकता है जिनका विद्यार्थी के जीवन में नकारात्मक स्थानान्तरण होता है।
  4. वातावरण प्रतिकूल है या अनुकूल इसका ध्यान प्रशिक्षण के दौरान महत्त्वपूर्ण होता है। प्रतिकूल वातावरण में स्थानान्तरण नहीं हो पाता है।
  5. शिक्षकों को स्थानान्तरण के महत्त्व को स्वीकार करके पाठ्यक्रम को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए जिससे कि विद्यार्थी की रुचि अध्ययन में लग सके।

विशिष्ट विषय में स्थानान्तरण:
आज की शिक्षा प्रणाली पर एक मुख्य आरोप यह लगाया जाता है कि वह जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती है। गणित, बीजगणित, रेखागणित या विज्ञान हो, जो हम कक्षा में पढ़ते हैं, वह छात्रों के व्यावहारिक जीवन में अनुपयोगी होती है। थॉर्नडाइक ने विभिन्न विषयों के स्थानान्तरण पर प्रयोग किया। उसने हाईस्कूल के पाठ्यविषयों के आधार पर दसवीं, ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा के 13,500 छात्रों पर तर्क (Logic) के परीक्षणों का प्रयोग किया। उसने यह निष्कर्ष निकाला –

  1. विभिन्न विषयों के तुलनात्मक स्थानान्तरण की प्रतिशत में अन्तर कम होता है।
  2. विषय का स्थानान्तरण शिक्षण विधि पर निर्भर करता है।
  3. स्थानान्तरण इस बात पर निर्भर करता है कि प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस सीमा तक हुआ है।

थार्नडाइक के इन विषयों से हम निम्नलिखित सुझावों को कार्यरूप में परिणत करके विशिष्ट विषयों में स्थानान्तरण की प्रक्रिया को लागू कर सकते हैं।

  1. बालकों को किसी विषय या समस्या के प्रत्येक अंग की जानकारी देनी चाहिए।
  2. बालकों को समय पर चिंतन तथा तर्क करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए।
  3. बालकों को समस्या के विश्लेषण का अवसर देना चाहिए और पश्चात् सामान्य सिद्धान्तों के मध्य से स्थानान्तरण का अवसर देना चाहिए।
  4. गणित जैसे विषय को पर्याप्त सहायक सामग्री (Helping Material) के द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए।

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प्रश्न 6.
अधिगम सिद्धांत के अनुप्रयोग का वर्णन करें।
उत्तर:
1. बच्चों के पालन-पोषण में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग बच्चों के पालन-पोषण में होता है, शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत का उपयोग कर बच्चों को सिखाया जा सकता है कि कौन-सी वस्तु खतरनाक है तथा उससे कैसे बचना चाहिए। नैमित्तिक अनुबंधन का उपयोग कर बच्चों के अनुचित व्यवहार को सुधारा जा सकता है।

2. विद्यालय में अनुप्रयोग:
विद्यालय में बच्चों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू का विकास किया जाता है इस संबंध में शाब्दिक सीखना, प्रेक्षणात्मक सीखना, कौशल सीखना के नियम बहुत उपयोगी हैं शिक्षक को एक आदर्श परामर्शदाता के रूप आचरण करना पड़ता है जिससे वे विद्यार्थी के आदर्श बन सके। वांछित व्यवहार विकसित करने के लिए पुरस्कार का प्रयोग करना चाहिए। इससे छात्रों में विषय संबंधी पढ़ाई में तेजी आती है तथा उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी उन्नत होती है।

3. संगठन में अनुप्रयोग:
संगठन का अर्थ कार्यालय, उद्योग, संघ से है सीखने के सिद्धांत का प्रयोग कर कर्मचारी के संतोष, मनोबल पारस्परिक संबंध को उन्नत बनाया जाता है, जिससे अनुशासनहीनता घटती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है इसके लिए समय-समय पर प्रबंधन द्वारा आकर्षक पुरस्कार की व्यवस्था की जाती है। सीखने के सिद्धांत विशेषकर प्रोत्साहन एवं प्रवलन का प्रयोग सभी प्रकार के संगठन में स्वस्थ वातावरण एवं उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

4. चिकित्सात्मक उपचार में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग मानसिक चिकित्सा के क्षेत्र में किया गया। मनोवैज्ञानिक समायोजन संबंधी समस्या अनावश्यक भय और गलत आदत, सुधारने में व्यवहार सुधार तकनीक का विकास किया।

भय दूर करने के लिए विलोप का, बच्चों और प्रौढ़ों के भय को दूर करने के लिए आदतावन, अत्यधिक भय से पीड़ित व्यक्ति के लिए क्रमिक-विकास, संवेदनीकरण, अवांछित आदत छुड़ाने के लिए विरूचि चिकित्सा, मानसिक रूप से घबराहट और अशांति अनुभव करने वाले के जैव प्रतिपादित दी जाती है। संक्षेप में मनोचिकित्सा की विभिन्न तकनीकों एवं विधियों में सीखने का सिद्धांत के लाभकारी अनुप्रयोग किए जाते हैं। स्पष्ट है कि सीखने के सिद्धांत एवं नियमों का प्रयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है और इसके उत्पादवर्द्धक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

प्रश्न 7.
विभेदन के अर्थ एवं स्वरूप को बताएँ। विभेदन सीखने की विभिन्न विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अर्थ एवं स्वरूप (Meaning and Nature):
विभेदन (discrimination) सामान्यीकरण (generalization) का विपरीत होता है। अनुबन्धन के क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं ने अपने अध्ययनों में यह देखा है कि प्रशिक्षण की आरंभिक अवस्था में प्राणी CS तथा उससे मिलते-जुलते उद्दीपकों में अन्तर नहीं कर पाता है। फलतः वह CS के समान ही इन सभी उद्दीपकों के प्रति अनुक्रिया करता है जिसे सामान्यीकरण (generalization) कहा जाता है। जैसे-जैसे प्रशिक्षण आगे बढ़ता है, प्राणी में CS को अन्य समान उद्दीपकों से भिन्न करने की क्षमता विकसित हो. जाती है और वह अब सिर्फ CS के प्रति अनुक्रिया करता है अन्य समान उद्दीपकों के प्रति नहीं। इसे ही मनोवैज्ञानिकों ने विभेदन (discrimination) की संज्ञा दी है।

जैसे, मान लिया जाए कि पॉवलोवियन अनुबन्धन में 1000 Hz के आवाज को CS के रूप में उपयोग करके कुत्ता को उस पर लार स्राव करने की अनुक्रिया करना सिखलाया जाता है। इस प्रशिक्षण के प्रारंभिक अवस्था में कुत्ता 800 Hz तथा 1200 Hz पर भी वैसी ही अनुक्रिया करेगा। परंतु प्रशिक्षण की अंतिम अवस्था में वह सिर्फ 1000 Hz के आवाज पर ही लार स्राव की अनुक्रिया करेगा, अन्य उद्दीपकों जैसे 800 Hz एवं 1200 Hz पर नहीं करेगा क्योंकि कुत्ता इस अवस्था में CS तथा उन उद्दीपकों के बीच विभेदन करना सीख लेता है। स्पष्ट है कि विभेदन के स्वरूप के बारे में हमें निम्नांकित तथ्य मुख्य रूप से मिलता है –

  1. विभेदन की प्रक्रिया सामान्यीकरण की प्रक्रिया के विपरीत होती है।
  2. विभेदन में प्राणी CS के प्रति ही अनुक्रिया करता है अन्य किसी भी समान उद्दीपक के प्रति के प्रति नहीं।
  3. विभेदन की अवस्था में CS की विशिष्टता की पहचान स्पष्ट हो जाती है।

विभेदन सीखने की विधियाँ (Methods of Discrimination learning):
विभेदन सीखने का क्रमबद्ध प्रयोगशाला (systematic laboratory) अध्ययन करीब 1900 से प्रारम्भ हुआ है। तब से आज तक किये गये प्रयोगों एवं शोधों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि विभेदन सीखना अध्ययन करने के लिए निम्नांकित तीन तरह की विधियों का प्रतिपादन किया गया हैं –

  1. पृथक प्रयास विधियाँ (discrete trial methods)
  2. स्वचालित विधियाँ (automated methods)
  3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (free operant methods)

1. पृथक प्रयास विधियाँ (Discrete trial methods):
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस विधि में प्राणी दिये हुए उद्दीपकों के बीच विभेदन करना प्रत्येक प्रयास में किये गए पृथक अनुक्रियाओं के आधार पर सीखता है।

2. स्वचालित विधियाँ (Automated methods):
स्वचालित विधियों द्वारा भी विभेदन सीखने का अध्ययन किया गया है। इन विधियों की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि पृथक प्रयास विधि (discrete trial method) द्वारा विभेदन सीखना में काफी समय लगता था और साथ ही इनसे एक प्रयास से दूसरे प्रयास में अनुक्रिया परिवर्तनशीलता (response variability) होने लगती है जिसके कभी-कभी गंभीर परिणाम होते हैं।

स्वचालित विधि में ऐसी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। स्वचालित विधि में स्वचालित स्विचिंग उपकरण (automatic switching equipment) होते हैं और पशुओं को पूर्णतः एक पृथक परिस्थिति (isolated condition) में रखा जाता है। जैसे, चूहा को दो खिड़की या दो रास्तों के बीच चुनने के बजाय उसे दो लीवर या दो बटन में से किसी एक लीवर या बटन को दबाकर अनुक्रिया करना होता है।

3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (Free operant methods):
इस विधि में प्राणी के सामने उद्दीपकों, जिनके बीच विभेदन करना सीखना होता है, बारी-बारी से (successively) या कभी-कभी एक ही साथ (simultaneously) उपस्थित किया जाता है। प्राणी को उन उद्दीपनों को इधर-उधर करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।

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प्रश्न 8.
स्किनर के प्रवर्तन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन सिद्धान्त की आलोचना की व्याख्या करें।
उत्तर:
स्किनर ने सीखने के क्षेत्र में एक नए सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो पॉवलव के सम्बन्ध प्रत्यावर्तन एवं थॉर्नडाइक के सम्बन्ध पर आधारित था। इस सिद्धान्त को प्रबन्धन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त में अनुकूलन के बहुत-से ऐसे प्रत्ययों का व्यवहार किया, जो पॉवलव के सिद्धान्त से लिया गया था तथा थॉर्नडाइक के प्रभाव के नियम को अपने सिद्धान्त का आधार माना।

स्किनर ने पॉवलव तथा थॉर्नडाइक के सिद्धान्तं से कुछ कच्चे माल प्राप्त कर एक नए चीज का आविष्कार किया जो एक सफल सिद्धान्त साबित हुआ। उन्होंने क्लासिकल अनुबन्धन का विरोध किया और प्राणी और प्राणी की प्रतिक्रिया के प्रभाव को प्रधानता दी। उन्होंने व्यवहार की संज्ञानात्मक व्याख्या को अस्वीकार किया और व्यवहारवादी व्याख्या पर बल दिया।

स्किनर ने प्रत्यार्थी-व्यवहार और प्रवर्तन-व्यवहार में अन्तर बताया और कहा कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी अपनी समस्याओं का समाधान प्रवर्तन व्यवहार के द्वारा सीखता है, प्रत्यार्थी व्यवहार के द्वारा नहीं। उन्होंने बताया कि प्रत्यार्थी-व्यवहार वह है जो उत्तेजना के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। जैसे-पॉवलव के प्रयोग में भोजन या घंटी की आवाज के बाद कुत्ते के मुँह से लार निकलता था। परन्तु प्रवर्तन-व्यवहार उसे कहते हैं, जिसे उत्पन्न किया जाता है, वहाँ उत्तेजना की प्रधानता होती है। परन्तु यहाँ उत्तेजना के साथ-साथ प्राणी की भी प्रधानता होती है। स्किनर ने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार साधनात्मक होता है। प्रभाव को उत्पन्न करने में प्राणी साधन का काम करता है।

स्किनर ने अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिए कई प्रयोगात्मक अध्ययन किया। उनका प्रयोग मुख्य रूप से चूहों और कबूतरों पर किया गया। इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रकार के बक्से का निर्माण किया, जिससे स्किनर बॉक्स के नाम से जानते हैं। स्किनर बॉक्स में एक छोटी-सी पीतल की कुंजी होती है, जिसकों दबाने से खाने की गोली निकल आती है। कुंजी का सम्बन्ध एक यंत्र से होता है, जिससे भूखे चूहे द्वारा किये गये प्रयासों का पता चलता है। स्किनर ने एक भूखे चूहे को स्किनर बॉक्स में बन्द किया।

उन्होंने देखा कि प्रारंभ में चूहा इधर-उधर घूमने लगा। इसी बीच उसका पंजा पीतल की कुंजी पर पड़ गया। कुंजी के दबते ही भोजन की गोली बाहर निकल गयी, जिसे चूहा खाकर संतुष्ट हुआ। इस प्रकार जब भी वह कुंजी को दबाता था, उसे भोजन की गोली मिल जाती थी। कई प्रयासों के बाद चूहे ने कुंजी को. दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया। स्किनर ने एक दूसरा प्रयोग कबूतरों पर किया। उसे भी एक बक्से में बन्द किया। बक्से की बनावट पहले वाले बक्से से भिन्न थी।

इसमें पीतल की कुंजी की जगह रौशन प्लास्टिक की कुंजी थी। उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर कबूतर द्वारा चोंच मारने से खाने का दाना निकलता था। प्रारंभ में कबूतर ने इधर-उधर चोंच मारी, परन्तु उसे भोजन नहीं मिला। लेकिन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारते ही भोजन का दाना निकल आया। इस तरह कई प्रयासों के बाद कबूतर ने उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सीख लिया।

स्किनर के उपर्युक्त प्रयोगों से स्पष्ट होता है कि प्राणी प्रवर्तन अनुकूलन के आधार पर ही सीखता है। उन्होंने प्रवर्तन अनुकूलन की कुछ विशेषताओं की चर्चा की है, जो निम्नलिखित हैं –

1. प्रवर्तन व्यवहार:
स्किनर ने दावा किया है कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी का व्यवहार-प्रवर्तन होता है। इस बात की पुष्टि उन्होंने चूहे और कबूतरों के प्रयोग से सिद्ध कर दिया। प्रवर्तन से उस पर प्रभाव पड़ता है और प्राणी इस क्रिया को सीख लेता है।

2. साधनात्मक व्यवहार:
स्किनर ने शिक्षण में साधनात्मक व्यवहार पर भी बल दिया है और कहा है कि प्राणी का व्यवहार प्रबलन प्राप्त करने के लिए साधना का काम करता है। गलत व्यवहार करने पर प्रबलन नहीं मिलता है तथा सही व्यवहार करने पर प्रबलन प्राप्त होता है।

3. प्रबलन:
अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह स्किनर ने भी शिक्षण के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है। उन्होंने दो प्रकार के प्रबलन की चर्चा की है, जिसे सकारात्मक प्रबलन तथा नकारात्मक प्रबलन के नाम से जानते हैं। सकारात्मक प्रबलन उसे कहते हैं, जिससे प्राणी की संतुष्टि मिलती है तथा उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है जबकि नकारात्मक प्रबलन से असंतुष्टि मिलती है। प्राणी उससे बचने का प्रयास करता है।

4. व्यवहार-सुसंगठन:
प्रबलन से प्राणी के व्यवहार को सुसंगठित किया जाता है। इस आधार पर पशुओं को जटिल कार्य सिखलाया जाता है। जैसे-स्किनर ने कबूतर को पहले बक्से से परिचय कराया और फिर प्लास्टिक कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सिखाया और अन्त में उस व्यवहार को सुगठित किया। इसलिए कबूतर को बाद में जब भी स्किनर बॉक्स में बन्द किया जाता था, वह तुरंत ही प्लास्टिक कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त कर लेता था।

उन्होंने व्यवहार-सुगठन के पक्ष में और भी प्रयोग किये हैं। व्यवहार सुगठन केवल पशुओं के लिए ही उपयोगी नहीं, बल्कि मनुष्यों के लिए भी प्रभावशाली सिद्ध हुआ। ग्रीन स्पून ने मनुष्यों पर प्रयोग करके इसे प्रमाणित करने का प्रयास किया। इसी तरह वरप्लांक ने भी मनुष्य के व्यवहार के सुगठन को मौखिक अनुकूलन द्वारा प्रमाणित किया है।

5. उत्तेजना सामान्यीकरण:
जब कोई तटस्थ उत्तेजना किसी अनुक्रिया को उत्पन्न करने के लिए अनुकूलित हो जाती है, तो वह अनुक्रिया उस उत्तेजना से मिलती-जुलती उत्तेजनाओं के प्रति भी होने लगती है, जिसे उत्तेजना सामान्यीकरण कहते हैं। स्किनर ने अपने अध्ययनों में देखा कि जब चूहा कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया, तो उससे कुछ भिन्न दूसरे बक्से में छोड़ा गया। यहाँ भी चूहे ने अपनी उसी प्रतिक्रिया को दुहरायी। ग्राइस एवं राल्ज ने भूल-भुलैया के आधार पर उत्तेजना सामान्यीकरण को सिद्ध किया।

6. उत्तेजना-विभेद:
उत्तेजना-विभेद का अर्थ हुआ कि जब प्राणी एक परिस्थिति में कोई व्यवहार सीख लेता है, तो उस परिस्थिति से भिन्न परिस्थितियों में उसे नहीं दुहराता है। स्किनर ने कबूतर को स्किनर-बॉक्स में दाना प्राप्त करना सिखाया। उसके बाद उस बक्से से भिन्न दूसरे बक्से में कबूतर को रखा तो वहाँ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। ग्राइस एवं राल्ज के अध्ययन से भी यह बात प्रमाणित हो जाती है।

7. विलोप:
पॉवलव के क्लासिकल अनुबन्धन की तरह इसमें भी विलोप की विशेषता पायी जाती है। विलोप से तात्पर्य यह है कि प्राणी उत्तेजना के प्रति व्यवहार करना सीख ले और उसे प्रबलन नहीं मिले, तो धीरे-धीरे व्यवहार समाप्त हो जाता है। स्किनर ने देखा कि चूहों को कुंजी दबाने के बाद भी कई बार भोजन नहीं मिला, तो उसने कुंजी को दबाना छोड़ दिया, इसे ही विलोप कहते हैं।

8. स्वतः पुनाप्ति:
अनुबन्धन होने के बाद यदि उसे प्रबलन नहीं दिया जाता है, तो धीरे-धीरे अनुबंधित अनुक्रिया को प्राणी भूल जाता है। स्किनर ने देखा कि भोजन के अभाव में चूहे ने कुंजी दबाना छोड़ दिया, लेकिन कुछ समय बाद उसने स्वतः कुंजी को दबाया। इस तरह स्किनर का शिक्षण-सिद्धान्त एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है।

उन्होंने वाटसन तथा गथरी की तरह शिक्षण से सम्बन्धित अमूर्त विषयों के व्यवहारिक पक्ष पर बल दिया है। उन्होंने शिक्षण में प्रवर्तन व्यवहार को आवश्यक माना तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह प्रबलन को भी आवश्यक माना है। बच्चों के समाजीकरण की व्याख्या करने में भी यह सिद्धान्त सफल है। व्यवहार परिमार्जन की दिशा में इस सिद्धान्त का कोई मुकाबला नहीं है। परन्तु इन गुणों के बावजूद स्किनर का सिद्धान्त दोषों से मुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के निम्नलिखित प्रमुख दोष हैं –

दोष (Demerits):

1. स्किनर ने सीखने के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है, परन्तु टॉलमैन ने प्रबलन को आवश्यक नहीं माना। उन्होंने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर सिद्ध कर दिया है कि बिना प्रबलन के भी प्राणी सीख सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसे ‘लेटेंट शिक्षण’ कहते हैं।

2. स्किनर ने प्रवर्तन तथा प्रत्यार्थी:
व्यवहारों के बीच अन्तर माना है, परन्तु मिलर और टेरिस उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार और प्रत्यार्थी-व्यवहार के बीच सीमा-रेखा खींचना मुश्किल हैं।

3. इस सिद्धान्त पर एक आरोप यह लगाया जाता है कि इसमें परिधीय यंत्रों पर बल दिया गया है तथा केन्द्रीय यंत्रों को छोड़ दिया गया है, जबकि केन्द्रीय यन्त्रों की शिक्षण में प्रधानता होती है।

4. स्किनर ने सीखने तथा सम्पादन के अन्तर की और ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्धन को प्रबलन का परिणाम माना, जबकि बन्धुश ने कहा कि सम्भव है कि एक बालक अपने विषय को अच्छी तरह जानता हो, परन्तु प्रबलन के अभाव में उसे सम्पादन के रूप में व्यक्त न कर सके। प्रबलन से सम्पादन प्रभावित होता है, शिक्षण नहीं।

5. कौसकी ने इस सिद्धान्त की समीक्षा करते हुए तीन बातों का उल्लेख किया है और कहा कि स्किनर ने प्राणी की आन्तरिक अवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया है, जबकि उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्ध में इसका बहुत बड़ा हाथ होता है।

दूसरी बात उन्होंने कहा कि प्रत्ययों का मूल्य सर्जनात्मक निर्देशन पर निर्भर करता है तथा तीसरी की स्किनर ने अपने चूहे को स्किनर बॉक्स के भीतर प्राप्त प्रत्ययों का बहिर्षण करके मानव के मानसिक जीवन की समस्याओं की व्याख्या करने का असफल प्रयास किया है। स्किनर द्वारा प्रस्तुत बहिर्षण या तो गलत है या लाक्षणिक दोषों से पीड़ित है। इस तरह, हम देखते हैं कि स्किनर के सिद्धान्त में बहुत सारे दोष हैं। परन्तु इसके बावजूद इसका व्यावहारिक महत्व कम नहीं हुआ। शिक्षण के क्षेत्र में आज भी इस सिद्धान्त की अलग मान्यता है।

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प्रश्न 9.
सीखना या शिक्षण के प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत सीखने का एक प्रमुख सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन ई. एल. थार्नडाइक (E. L. Thorndike) द्वारा किया गया। बिल्लियों, चूहों, मुर्गियों आदि पर प्रयोग करके थार्नडाइक ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धांत का सारतत्त्व यह है कि जब प्राणी किसी कार्य या कौशल को सीखना चाहता है तब वह प्रयत्न करता है और इस क्रम में उससे भूलें (erors) होती हैं।

जैसे-जैसे प्रयत्नों या प्रयासों की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे भूलों या त्रुटियों में कमी आती जाती है। एक ऐसा समय आता है जब बिना कोई त्रुटि या भूल किए ही प्राणी उस कौशल या अनुक्रिया को करना सीख लेता है। थार्नडाइक का यह सिद्धांत उनके द्वारा किए गए कुछ प्रयोगों पर आधृत है। इन प्रयोगों में निम्नांकित दो तरह के प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1. पहेली बक्स की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to puzzle-box problem):
यह प्रयोग एक भूखी बिल्ली पर किया गया जिससे पहले बक्से (puzzle box) में रख दिया जाता है। पहेली बक्से के सामने बाहर में एक मछली का टुकड़ा रख दिया गया जिसे बिल्ली देख रही थी।

बिल्ली के सामने यह समस्या थी कि वह किस तरह पहेली बक्से से निकलकर मछली खाकर अपनी भूख मिटा ले। बक्से के अन्दर बंद होते ही बिल्ली बाहर निकलने के लिए प्रयत्न अर्थात् उछल-कूद करने लगी। वह भूख से प्रेरित थी जिसके फलस्वरूप वह पहेली बक्से को दाँत से काटती, कभी अपने पंजे से नोचती-खसोटती थी।
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चित्र: थार्नडाइक का पहेली बॉक्स

इन व्यर्थ प्रयासों के दौरान उसका पंजा बक्से के एक बटन या सिटकिनी पर पड़ जाता है जिससे बक्से का दरवाजा खुल गया और बिल्ली बाहर निकलकर मछली खा गई। फिर बाद में उसी बिल्ली को उसे बक्से में रखा गया तो देखा गया कि इस बारी में भी बिल्ली द्वारा कुछ उछल-कूद की व्यर्थ क्रियाएँ हुईं, परंतु पहले की अपेक्षा कम हुई।

बिल्ली थोड़ी देर तक छल-कूद करने के बाद ही दरवाजा खोल सकने में समर्थ हो गई । इस प्रक्रिया को जब कई दिनों तक दोहराया गया तब देखा गया कि प्रयास बढ़ने के साथ-ही-साथ त्रुटियों में काफी कमी आई और अंत में एक समय ऐसा भी आया कि बिल्ली को जैसे ही बक्से में रखा गया, वह सीधे सिटकिनी या बटन दबाकर दरवाजा खोल लेती थी और बाहर आकर मछली खा लेती थी। इस तरह, बिना कोई त्रुटि किए कम-से-कम समय में बिल्ली दरवाजा खोलना सीख गयी।

2. भूल-भूलैया सीखने की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to mazeleaming problem):
इस प्रयोग में थार्नडाइक ने एक भूखे चूहे को भूल-भूलैया में रखा। भूल-भूलैया (maze) एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें लक्ष्य तक पहुँचने का एक ही रास्ता होता है। परंतु अंधपथ (blind ways) कई होते हैं। भुल-भुलैया के लक्ष्य स्थान पर भोजन रख दिया गया। भूखे चूहे को भूल-भूलैया के प्रवेश द्वार पर छोड़ दिया जाता था।

यह देखा गया कि जब पहली बार भूखे चूहे को भूल-भुलैया में छोड़ा गया तब वह बहुत देर तक अंधपथों में भटकता रहा और काफी देर के बाद संयोग से सही रास्ता अपनाकर लक्ष्य स्थान पर पहुँच गया, लेकिन, जब कई बार उस चूहे को भूलभुलैया में छोड़ा गया तब देखा गया कि अंधपथ में जाने की व्यर्थ क्रियाओं में काफी कमी आती गई और वह धीरे-धीरे अंधपथ का त्याग करके सही मार्ग में जाना सीख लिया।
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चित्र: भूल-भुलैया का प्रयोग चित्र

उपर्युक्त दोनों प्रयोगों से स्पष्ट है कि प्राणी किसी कार्य को सीखने के लिए बार-बार प्रयल करता है, उसमें उससे अनेक भूलें (errors) होती हैं। अभ्यास जारी रहने से भूलने की संख्या में धीरे-धीरे कमी आती है और अंत में वह कार्य को बिना किसी तरह की त्रुटि किए ही करना सीख जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार सीखने की पूरी प्रक्रिया में निम्नांकित छह अवस्थाएँ होती हैं –

(a) प्रणोद (Drive):
सीखने के लिए प्रणोद (drive) आवश्यक है, क्योंकि यह प्राणी को क्रियाशील या प्रयत्नशील बनाता है। उपर्युक्त प्रयोगों में बिल्ली तथा चूहा में भूख प्रणोद का एक उदाहरण है।

(b) प्रणोद की तुष्टि में बाधा (Interference in satisfaction of drive):
प्रणोद की तुष्टि में जब बाधा पहुँचती है तब इससे प्राणी में क्रियाशीलता बढ़ती है और वह समस्या को सुलझाने का प्रयत्न करता है।

(c) यादृच्छिक क्रियाएँ (Random activities):
समस्या को सुलझाने के पहले प्राणी कई तरह की यादृचिछक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। बिल्ली द्वारा उछलना, कूदना, नोचना, खसोटना ऐसी ही क्रियाओं के उदाहरण है।

(d) आकस्मिक सफलता (Accidental success):
व्यर्थ की क्रियाएँ या यादृच्छिक क्रियाएँ करते समय मात्र संयोग से ही प्राणी सही अनुक्रिया कर देता है जिसे आकस्मिक सफलता कहा जाता है। बिल्ली द्वारा उछल-कूद करते समय संयोगवश सिटकनी दब जाना एक आकस्मिक सफलता का उदाहरण है।

(e) सही अनुक्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition of correct response):
प्रथम बार सफलता प्राप्त कर लेने के बाद प्राणी धीरे-धीरे यादृच्छिक क्रियाओं का परित्याग करता चला जाता है तथा सही अनुक्रिया को दोहराता जाता है।

(f) सही अनुक्रिया स्थायीकरण (Fixation of correct response):
अंतिम अवस्था में प्राणी में सही अनुक्रिया का स्थायीकरण होता है जिसका परिणाम यह होता है कि प्राणी बिना कोई त्रुटि किए ही सही अनुक्रिया कर पाता है।

आलोचनायें (Criticisms):
इस सिद्धांत की कुछ प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) थार्नडाइक ने सीखने की प्रक्रिया को एक यांत्रिक प्रक्रिया (mechanical process) माना है जिसका मतलब यह हुआ कि प्राणी यदि किसी अनुक्रिया को सीखना प्रारंभ करता है तब शुरू में यह यादृच्छिक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। धीरे-धीरे अभ्यास से ऐसी त्रुटियाँ समाप्त हो जाती हैं और वह सही अनुक्रिया को करना सीख लेता है। आलोचकों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक अनुक्रिया को सीखने में इस तरह की निश्चित एवं यांत्रिक क्रियाएँ नहीं होती हैं।

(b) कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रयत्न तथा भूल के सिद्धान्त के आधार पर सभी प्रकार के सीखना की व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ तक सरल क्रियाओं जैसे टाइप सीखन, साइकिल चलाना सीखना आदि का प्रश्न है, वह तो अभ्यास एवं प्रभाव के नियमों के सहारे सीखा जा सकता है, लेकिन जटिल क्रियाओं को मात्र अभ्यास द्वारा सीखना संभव नहीं है। इसके लिए सूझ (insight) की आवश्यकता पड़ती है जिसकी चर्चा तक थार्नडाइक ने नहीं की।

(c) यह सिद्धांत मूलतः पशुओं, जैसे-बिल्ली तथा चूहों पर किए गए प्रयोगों पर आधारित है। अत: इसकी बहुत-सी बातें मानव सीखना के लिए उपयुक्त नहीं हैं। बिल्ली भले की पहले बक्से के भीतर से कैसे निकला जाए, नहीं जानती पर मनुष्य तो किसी भी परिस्थिति को अच्छी तरह समझकर की कोई अनुक्रिया करता है। जो भी हो, इन आलोचनाओं के बावजूद थार्नडाइक का यह सिद्धांत अपना एक अलग स्थान रखता है।

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प्रश्न 10.
शिक्षण वक्र क्या है? इसके प्रकार और उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक प्रकार का ग्राफ है जो सीखने में हुए विकास को दर्शाता है। इसे एक झलक देखने पर ही सीखने से व्यवहार में हुए परिवर्तनों की झांकी मिलती है। थार्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह बतलाया कि सीखने में जैसे-जैसे प्रयास या अभ्यास की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे अशुद्धियों की संख्या कम होती जाती है। इसमें लगे समय में कमी आती जाती है। अन्त में व्यक्ति कम-से-कम समय में बिना कोई गलती किए सही प्रक्रिया सीख जाता है। जहाँ तक शिक्षण वक्र के विभिन्न प्रकारों का प्रश्न है, इसके निम्नलिखित प्रकारों की व्याख्या की जा सकती है –

(क) भूल वक्र (Error-graph):
किसी भी सीखना-वक्र में दो रेखायें होती हैं-उदग्र रेखा तथा आधार रेखा।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम img 5

रेखा पर स्वतंत्र चर लिखा जाता है। स्वतंत्र चर का अर्थ यहाँ अभ्यास या प्रयत्न है। उदग्र रेखा पर आश्रित चर लिखा जाता है। यहाँ आश्रित चर का तात्पर्य भूल, समय या सीखने की मात्रा से है। जब आधार-रेखा पर प्रयत्न तथा उदग्र रेखा पर भूल अंकित करके वक्र बनाया जाता है तो इस वक्र को भूल-वक्र कहा जाता है। यह वक्र उदग्र रेखा के सिरे से शुरू होकर कभी दाहिने तरफ जाता है और कभी आधार रेखा से मिल भी जाता है। ऐसा तब होता है जबकि अंतिम प्रयत्न में भूल शून्य प्रयत्न हो जाता है।

(ख) समय वक्र (Time-graph):
जब आधार रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर समय अंकित करने वक्र बनाया जाता है तो इसे समय-वक्र कहा जाता है। यह वक्र भी भूल-वक्र की तरह उदग्र रेखा के सिरे से आरम्भ होकर दाहिने ओर आधार की तरफ जाती है। परन्तु, यह आधार-रेखा से कभी भी नहीं मिलता है। कारण, अभ्यास से समय चाहे जितना भी कम हो जाए, किन्तु शून्य नहीं होता।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम img 6

(ग) उत्पादन वक्र:
जब किसी क्रिया को अभ्यास के द्वारा सीखने का प्रयास किया जाता है तो प्रारंभ में काम की मात्रा या उत्पादन कम होता है। जैसे-जैसे अभ्यास की संख्या बढ़ती जाएगी, उत्पादन की गति भी बढ़ती जाएगी। उत्पादन की इस बढ़ती हुई मात्रा को ग्राफ द्वारा दर्शाया जाए तो इससे उत्पादन वक्र प्राप्त होता है। इस प्रकार का वक्र नीचे से दाहिने ऊपर उठता जाता है। यह उठना एक सीमा तक होता है।

इस तरह शिक्षण वक्र के उपर्युक्त प्रकारों का उल्लेख किया जा सकता है। इसी प्रकार इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ भी होती हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. प्रारंभिक चढ़ाव:
सीखना प्रारंभ करने के बाद व्यक्ति विषया या क्रिया से पूर्ण परिचित हो जाता है जब उसमें सीखने की प्रेरणा जागृत होती है और वह पूरी लगन, उत्साह, अभिरुचि तथा उत्सुकता के साथ विषय को सीखने लगता है। इससे शिक्षण वक्र में चढ़ाव देखा जाता है। इसे ही प्रारंभिक चढ़ाव कहा जाता है। शिक्षण वक्र की यह पहली विशेषता है।

2. मध्यवर्ती चढ़ाव:
जब प्रारंभिक चढ़ाव के बाद व्यक्ति की अभिरुचि, लगन, उत्साह और उत्सुकता में कमी आने लगती है तब शिक्षण वक्र में उतार आने लगता है। लेकिन व्यक्ति अपना प्रयास जारी रखता है और जब फिर उसमें उत्साह, लगन, उत्सुकता आने लगती है तब शिक्षण वक्र में चढ़ाव आने लगता है इस प्रकार, शिक्षण-वक्र में चढ़ाव ऊपर देखा जाता है। इसे मध्यवर्ती चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की दूसरी विशेषता हुई।

3. अंतिम चढ़ाव:
जब सीखने वाले व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि अब विषय समाप्त होने वाला है तो वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति और लगन के साथ विषय या क्रिया को समाप्त करने की कोशिश करता है जिससे शिक्षण-वक्र में चढ़ाव. आ जाता है। इसे ही अंतिम चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की तीसरी विशेषता हुई।

4. पठार:
सीखने की अवधि के बीच कभी-कभी शिक्षण वक्र की यह स्थिति हो जाती है कि व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सीखने में अब आगे प्रगति नहीं हो पाएगी। शिक्षण-वक्र आधार के समानान्तर हो जाता है यानी उत्पादन वृद्धि रुक जाती है। लेकिन विशेष प्रयास के बाद उसके कार्य में प्रगति देखी जाती है। शिक्षण-वक्र की इस स्थिति को सीखने में पठार कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की चौथी विशेषता है।

5. दैहिक सीमा:
सीखने की अवधि में एक ऐसी भी अवस्था आती है जब वक्र का चढ़ाव बिल्कुल रुक जाता है। लाख कोशिश करने के बाद भी वक्र का चढ़ाव आगे नहीं बढ़ता है, तो इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। जैसे- भूल-वक्र में जब अशुद्धियाँ एकदम नहीं होती हैं तब भूल-वक्र में कोई परिवर्तन की गुंजाइश नहीं रह पाती है।

ठीक इसी प्रकार समय-वक्र में जब व्यक्ति ऐसी सीमा पर पहुँच जाता है, जहाँ से आगे तीव्र गति से क्रिया करना संभव नहीं रह जाता है, तो समय-वक्र में भी कोई परिवर्तन नहीं हो पाता है। इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। फिर उत्पादन-वक्र में जब व्यक्ति कुशलता की सीमा पर पहुँच जाता है तो वक्र के ऊपर उठने का प्रश्न ही नहीं उठता है। यह दैहिक सीमा का परिचायक है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 11.
अधिगम अशक्तता किसे कहते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों का उल्लेख करें। क्या अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का इलाज संभव है? यदि हाँ, तो कैसे?
उत्तर:
परिचय:
केन्द्रीय तंत्रिका में उत्पन्न विसंगतियों के कारण किसी व्यक्ति (खासकर बच्चे) में अक्षमता प्रकट करने से संबंधित विकार अधिगम अशक्तता माने जाते हैं जिसके कारण व्यक्ति को पढ़ने, लिखने, गणित के प्रश्नों को हल करने में बहुत ही कठिनाई होती है। बच्चों में पाई जानेवाली अधिगम अशक्तता के कारण बच्चे श्रेष्ठ बुद्धि वाले बच्चों की तुलना में सीखने की प्रवृत्ति, आत्म सम्मान, पेशा, सामाजिक परिवेश के बारे में समुचित निर्णय क्षमता प्रकट नहीं कर सकते हैं। ऐसे बच्चों के संवेदी प्रेरक तंत्र दोषी माने जाते हैं।

अधिगम अशक्तता के लक्षण-बच्चों में बुद्धि, अभिप्रेरण तथा अधिगम के लिए किया जाने वाला परिश्रम निरर्थक की श्रेणी में आता है। इस तरह के बच्चों में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में अक्षरों या शब्दों का सही ज्ञान नहीं होता है। वे अपनी भावना को लिखकर नहीं बता पाते हैं। वे पढ़कर कुछ बतलाने की स्थिति में भी नहीं होते।
  2. अशक्तता के शिकार बच्चे सीखने के लिए भोजन बनाने या सामान्य व्यवहार करनेवाले बच्चे के रूप में कार्य करने की विधि खोजने में असमर्थ होते हैं।
  3. अधिगम अशक्तता से पीड़ित बच्चे किसी निर्धारित विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित करके चिंतन की अवस्था में नहीं रह पाते हैं।
  4. घरेलू सामग्रियों के स्थान को अनियमित ढंग से बदल देना इन बच्चों का विशिष्ट लक्षण है।
  5. इनमें स्थान और समय की समझदारी का अभाव होता है ये अच्छे अवसर पाकर भी उसका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं।
  6. इस श्रेणी के बच्चों का पेशीय समन्वय तथा हस्त निपुणता अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी का होता है। ये शारीरिक संतुलन का अभाव, दरवाजे को खोलने की कला से अनभिज्ञ, साइकिल चलाने में अक्षम जैसी जानकारियों से दूर होते हैं।
  7. ये अभिभावकों के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  8. इन्हें सामाजिक संबंधों का मूल्याकंन करके उचित व्यवहार करने में कठिनाई होती है।
  9. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में प्रात्यहित विकार पाए जाते हैं जिसके कारण ये सुनने, पढ़ने, छूने तथा गति से संबंधित संकेतों के अर्थ नहीं समझ पाते हैं।
  10. अक्षरों को मिलाकर सार्थक शब्द की रचना करने में ये लाचार होते हैं।
  11. इन्हें अक्षरों को पहचानने में भी कठिनाई होती है क्योंकि ये समान रचना वाले अक्षरों (ट-ठ, प-फ) में अन्तर समझने में लाचार बना देते हैं।

उपचार:
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है। उपचारी अध्यापन विधि तथा मनोवैज्ञानिक शिक्षण प्रणाली के प्रयोग से उनमें पहले जाने अधिकांश लक्षणों को दूर किए जा सकते हैं। इनके साक्ष सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार तथा क्षमता को प्रोत्साहन देते हुए भरपूर प्यार की स्थिति प्रकट करना हितकर परिणाम देते हैं। इस श्रेणी के बच्चे प्यार और प्रोत्साहन के भूखे होते हैं। इन्हें प्रेरक बल के द्वारा ऊँचाई पर पहुँचाया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अधिक लंबे विषय के अधिगम के लिए कौन विधि अधिक उपयुक्त है?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाइक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 2.
अधिगम पर कोहलर ने अपना प्रयोग किस पशु पर किया:
(a) चूहा
(b) खरगोश
(c) चिम्पैंजी
(d) कुत्ता
उत्तर:
(c) चिम्पैंजी

प्रश्न 3.
पावलव महोदय ने अधिगम से सम्बन्धित प्रयोग किस जानवर पर किया था?
(a) बिल्ली
(b) कुत्ता
(c) चूहा
(d) वनमानुष
उत्तर:
(b) कुत्ता

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प्रश्न 4.
अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम किसने आरंभ किया?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाईक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव