Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science अधिकार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिकार क्या हैं? वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकता?
उत्तर:
अधिकार का अर्थ-अधिकार मनुष्य के सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। जिस देश में नागरिकों को अधिकार प्राप्त नहीं होते, वहाँ के नागरिक अपना विकास नहीं कर सकते। राज्य द्वारा अपने नागरिकों को दिए अधिकारों को देखकर ही उस राज्य को अच्छा या बुरा कहा जा सकता है। अधिकारों की सृष्टि सामज में ही होती है और इनका आधार व्यक्ति और समाज का कल्याण करना है।

इसके सम्बन्ध में कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. लास्की: “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं। जिनके बिना साधारणतः कोई मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता।”
  2. हालैंड: “अधिकार एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के कर्त्तव्यों को समाज के मन और शान्ति द्वारा प्रभावित करने की क्षमता है।”

अधिकार का महत्त्व –

  1. अधिकार से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।
  2. अधिकार से व्यक्ति के अन्दर पाई जाने वाली शक्तियों का विकास होता है।
  3. इससे व्यक्ति और समाज की उन्नति होती है।
  4. अधिकार सरकार को निरन्कुश बनने से रोकते हैं।
  5. अधिकार सामाजिक कल्याण का एक साधन है।
  6. अधिकार व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाता है।

अधिकार के मांग का आधार:

1. मनुष्य अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है, इसी से उसके जीवन का विकास होता है। इन आवश्कयताओं की पूर्ति के लिए उसे अबसर मिलना चाहिए। इस अवसरों की प्राप्ति के लिए वह प्रयत्न करता है। उसकी सबसे पहली मार यही होती है कि उसे ऐसे अवसर मिले जिनसे वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। अधिकारों का निर्माण इन्हीं मांगों के आधार पर होता है।

2. मांग अधिकार तभी बन सकती है जबकि उनकी प्राप्ति उन्हें जीवन के लिए आवश्यक दिखाई दे। यदि कोई ऐसी मांग करता है, जो जीवन के विकास में सहायक के स्थान पर बाधक बन जाए, तो उस मांग को अधिकार के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

3. समाज उस मांग को उचित समझकर स्वीकार करे।

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प्रश्न 2.
किन आधारों पर, यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?
उत्तर:
यद्यपि सभी अधिकार जीवन की परिस्थितियों के रूप मे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हैं परन्तु अधिकारों को सार्वभौमिक कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी सभी कालों में सभी लोगों द्वारा मांग रही है और दावे रहे हैं। वे अपने व्यवहार और सभ्यता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। ये अधिकार मानव अस्तित्व के लिए मौलिक अधिकार हैं। वस्तुतः अधिकार मौलिक शर्ते हैं जो सुरक्षित और सुव्यवस्थित मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं। विस्तृतः अधिकार वे शर्ते हैं जो मानव जाति के लिए आत्मसम्मान और महत्त्वपूर्ण हैं। निम्नलिखित अधिकारों को सार्वभौमिक अधिकार कहा जा सकता है –

  1. जीविका का अधिकार
  2. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता
  3. शिक्षा का अधिकार

1. जीविका का अधिकार:
जीविका का अधिकार व्यक्ति के जीवन का आधार है, जिससे उसका जीवन चलता है। इसलिए यह अति महत्त्वपूर्ण आवश्यक और सार्वभौमिक है। यदि एक व्यक्ति को अच्छा रोजगार प्राप्त है, तो इससे उसको आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनने का अवसर मिलेगा और इससे उसका महत्त्व और स्तर बढ़ जाएगा। जब एक व्यक्ति की आवश्यकताएँ, विशेष रूप से आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं, तो उसके प्रतिभा और कौशल में विकास होता है, और उसका शोषण समाप्त हो जाता है।

2. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता:
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमें विभिन्न प्रकार से अपने को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति रचनात्मक और मौलिक बनता है। इस अधिकार द्वारा लोग अपने को लिखित, बोलकर या कलात्मक रूप से व्यक्त कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकार की प्रजातान्त्रिक सांस्कृतिक और प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का प्रदर्शन है। इस अधिकार के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।

3. शिक्षा का अधिकार:
शिक्षा का अधिकार व्यक्ति को मानसिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक विकास में सहायता करता है। इससे हमें उपयोगी कौशल प्राप्त होते हैं, जिससे हम जीवन के विविध पक्षों के चुनाव में सक्षम हो जाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार को सार्वभौमिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए आदिवासियों के अपने वास और जीने के तरीके को संरक्षित रखने तथा बच्चों के बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार जैसे नए अधिकारों को लिया जा सकता है।
उत्तर:
आज का विश्व प्रजातान्त्रिक सरकार का विश्व है, जिसमें संस्कृति, जाति, रंग, क्षेत्र, धार्मिक और व्यवसाय के प्रति जागरुकता और चेतना बढ़ रही है। व्यक्ति का सर्वागीण विकास शिक्षा, संस्कृति और धर्म के अधिकार से जुड़ा हुआ है। इसलिए लोगों को उनके नये क्षेत्रों जैसे शिक्षा, संस्कृति, बाल अधिकार, महिला अधिकार, बुजुर्गों के अधिकार, मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, कृषक अधिकार, पर्यावरण आदि अधिकार दिए जा रहे हैं। आज का समाज सामान्य रूप से बहवादी समाज है, जिसमें नागरिकों को विकास करने का और लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक आवास की सुरक्षा के अधिकार दिए गए हैं।

भारतीय मक सामान्य संविधान में शिक्षा और संस्कृति को कायम रखने और उनको विकसित करने का अधिकार दिया गया है। वे लोग विभिन्न प्रकार के रहन-सहन से सम्बन्धित होते हैं। वे विभिन्न प्रकार के वेश-भूषा, व्यवहार, त्योहर और अन्य सभ्यताओं में सम्बद्ध होते हैं। वे शिक्षा से अपनी संस्कृति की प्रगति कर सकते हैं। बच्चों को शोषण के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार दिया गया है। जिससे वे पुरानी प्रथाओं एवं बुराईयों जैसे बँधुआ मजदूरी को दूर कर सकते हैं। उनकी सम्मान की रक्षा के लिए मौलिक अधिकार भी दिए गए हैं।

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प्रश्न 4.
राजनितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर बताइए। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
यद्यपि लोगों को विभिन्न प्रकार की दशाओं और सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जिनको वे अधिकार के रूप में प्राप्त करना चाहते हैं, परन्तु सार्वभौमिक रूप से लोगों के सर्वागीण विकास के लिए सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। राजनीतिक अधिकार वे सुविधाएँ और परिस्थितियाँ हैं, जिसमें लोगों को व्यक्तिगत विकास के अधिकार दिए जाते हैं, और प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया जाता है। कुछ महत्त्वपूर्ण राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. कानून के समक्ष समानता
  2. अभिव्यक्ति का अधिकार
  3. मतदान का अधिकार
  4. निर्वाचित होने का अधिकार
  5. संघ बनाने का अधिकार
  6. प्रतिनिधि चुनने का अधिकार
  7. राजनैतिक दल बनाने का अधिकार

आर्थिक अधिकार:
आर्थिक अधिकार वे जीवित दशाएँ और परिस्थितियाँ हैं, जो व्यक्ति के भौतिक विकास जैसे भोजन, कपड़ा, मकान, विश्राम और रोजगार आदि की आवश्यकताओं से सम्बन्धित हैं। आर्थिक अधिकार के अन्तर्गत पर्याप्त मजदूरी भी है जो आवश्यकताओं और उचित कार्यदशाओं से जुड़ा है। राजनैतिक अधिकार और आर्थिक अधिकार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मुख्य आर्थिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. कार्य करने का अधिकार
  2. आवास एवं कार्य करने की उचित दशाएँ
  3. रोजगार का अधिकार
  4. पर्याप्त मजदूरी का अधिकार
  5. विश्राम का अधिकार
  6. न्यूनतम आवश्यकता जैसे-आवास, भोजन, वस्त्र आदि का अधिकार
  7. सम्पत्ति का अधिकार
  8. चिकित्सा सुविधा का अधिकार

सांस्कृतिक अधिकार-आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों के अलावा सांस्कृतिक अधिकार भी मानव विकास, सुव्यवस्थित जीवन मनोवैज्ञानिक और नैतिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है। महत्त्वपूर्ण सांकृतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार
  2. स्थानीय वेशभूषा, त्योहार, पूजा और उत्सव मनाने का अधिकार
  3. शौक्षिक संस्थाओं (स्थानीय भाषायें और भूगोल के विकास के लिए) की स्थापना का अधिकार।

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प्रश्न 5.
अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
क्योंकि अधिकार राज्य से प्राप्त मांग एवं दावे हैं, इसलिए यह स्वाभाविक है, कि राज्य की यह जिम्मेदारी है, कि वह लोगों को सुनिश्चित दशाएँ और सुविधाएँ उनके कल्याण और रोजगार के लिए प्रबन्ध करे। ऐसा करने से राज्य के कार्य में कुछ कमियां आ जाती हैं। नागरिकों के अधिकार सुनिश्चित करते हुए राज्य प्राधिकरण को लोगों के जीवन और स्वतन्त्रमा को अक्षुण्ण रखते हुए अपना कार्य करना चाहिए। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि राज्य अपनी प्रभुता के कारण शक्तिशाली है, परन्तु नागरिकों के साथ सम्बन्ध राज्य की प्रभुता की प्रकृति पर निर्भर है।

राज्य अपनी रक्षा से ही अस्तित्व में नहीं होता बल्कि लोगों की सुरक्षा से ही कायम रह सकता है। यह नागरिक ही होता है, जिसका महत्त्व अधिक होता है, कल्याण और विकास के लिए कार्य करना चाहिए जो राज्य की प्रभुता का क्षेत्र होता है। राज्य के कानून लोगों के लिए उनके कार्य के लिए उत्तरदायी और संतुलित है। कानून राज्य और लोगों के मध्य सम्बन्ध को नियन्त्रित करता है। यह राज्य का कर्त्तव्य है, कि वह आवश्यक दशाएँ उपलब्ध कराए जिनकी नागरिकों द्वारा अपने कल्याण एवं विकास में मांग या दावे किए जाते हैं। राज्य को इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। परन्तु प्राधिकरण द्वारा इसे रोका और सीमित कर दिया जाता है।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन्हीं दो राजनैतिक अधिकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any two political rights)
उत्तर:
दो राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

1. मतदान का अधिकार (Rights to Vote):
जिन देशों में प्रजातंत्रीय शासन है, वहाँ नागरिकों को वयस्कता के आधार पर मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है।

2. चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Contest Election):
लोकतंत्रीय देशों में प्रत्येक व्यक्ति को निर्वाचन में खड़ा होने का अधिकार प्राप्त है। निर्वाचित होने पर उन्हें सरकार के निर्माण में शामिल होने का भी अधिकार है।

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प्रश्न 2.
नागरिक का क्या अर्थ है? (What is meant by citizenship?)
उत्तर:
नागरिकता (Citizenship):
नागरिकता से नागरिक के जीवन की एक स्थिति निश्चित होती है, जिसके कारण वह राज्य द्वारा दिए गए सभी सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग करता है। राज्य के प्रति कुछ कर्त्तव्य का पालन करता है। अतः एक नागरिक को राज्य का सदस्य होने के नाते जो स्तर (Status) अथवा पद प्राप्त होता है, उसे नागरिकता कहते हैं।

प्रश्न 3.
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकार का वर्णन कीजिए। (Describe two religious rights of the citizens)
उत्तर:
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

1. धार्मिक विश्वास का अधिकार (Right to religious belief):
कोई भी मनुष्य अपनी इच्छानुसार धार्मिक विश्वास रख सकता है। धर्म उसका व्यक्तिगत मामला है। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार है।

2. धार्मिक प्रचार का अधिकार (Right to religious preaching):
प्रत्येक धर्म के मानने वालों को अपने धर्म का प्रचार करने का समान अधिकार प्राप्त है। धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिए शान्तिपूर्ण सम्मेलन कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में दिए गए किन्हीं दो मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख कीजिए। (Mention any two fundamental duties as prescribed in the constitution of India) अथवा, नागरिकों के किन्हीं दो कर्तव्यों का उल्लेख करें। (State any two duties performed by a citizen)
उत्तर:
भारत के संविधान में 1976 ई. में नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्यों को 42वीं संशोधन द्वारा जोड़ा गया। उनमें से दो मौलिक कर्तव्यों का विवेचन निम्नलिखित है –

  1. भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है, कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
  2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए और उनका पालन करें।

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प्रश्न 5.
नागरिक द्वारा निभाए जाने वाले कुछ कर्त्तव्यों का उल्लेख कीजिए। (Mention some of the duties which are performed by the citizen)
उत्तर:
नागरिकों द्वारा निभाए जाने वाले कुछ कर्तव्यों का उल्लेख निम्नलिखित है –

  1. हमें अपने राज्य के प्रति निष्ठावान होना चाहिए।
  2. सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करना चाहिए।
  3. सरकार द्वारा लगाए करों को देना चाहिए।
  4. सैनिक सेवा हमारा एक अन्य कर्त्तव्य है।
  5. जन-सम्पत्ति की रक्षा नागरिक का कर्त्तव्य होता है।
  6. नागरिक के अन्य कर्तव्यों में मताधिकार का प्रयोग, सरकार को सहयोग देना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना आदि सम्मिलित किए जा सकते हैं।

प्रश्न 6.
“अधिकार में कर्तव्य निहित है”, स्पष्ट करो। (“Rights imply duties.”Clarify) अथवा, अधिकार और कर्तव्य के आपसी सम्बन्धों के किन्हीं दो उदाहरणों का उल्लेख कीजिए। (Give any two examples of the relations between rights and duties)
उत्तर:
यद्यपि अधिकार और कर्त्तव्य देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तव में वे एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं। अधिकार और कर्त्तव्य सदैव साथ-साथ चलते हैं। अधिकार और कर्तव्यों में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। कर्तव्य के बिना अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। कर्तव्यों के पालन करने के बाद ही अधिकारों की कल्पना की जा सकती है। अतः अधिकारों और कर्तव्यों को एक दुसरे से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का दुसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं। अतः यह ठीक ही कहा गया है, कि “अधिकारों में कर्त्तव्य निहित हैं।” उदाहरणत:

  1. यदि एक नागरिक भाषण की स्वतन्त्रता का अधिकार माँगता है, तो यह उसका कर्त्तव्य है, कि वह अपने भाषण में किसी दुसरे नागरिक का अपमान न करे।
  2. यदि कोई व्यक्ति किसी अधिकार का उपयोग करता है, तो उसका कर्तव्य है, कि यह दुसरे के अधिकारों में बाधा न डाले, जैसे एक व्यक्ति को मतदान का अधिकार है, तो उसका यह कर्त्तव्य है, कि वह दूसरे के मताधिकार में किसी प्रकार की बाधा न डाले।

प्रश्न 7.
‘समानता का अधिकार’ पर टिप्पणी लिखो। (Write a note on ‘Right to Equality’)
उत्तर:
भारतीय संविधान में नागरिकों को 6 मूल अधिकार दिए गए हैं। इनमें सबसे पहला मूल अधिकार समानता का अधिकार है। अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार इस प्रकार दिया गया है –

  1. कानून के समक्ष समानता (Equality before law): यह अनुच्छेद 14 में दिया गया है।
  2. सामाजिक समानता (Social Equality): अनुच्छेद 15 में दिया गया है।
  3. सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार (Equality of opportunity in matter of public employement): अनुच्छेद 16 में दिया गया है।
  4. अस्पृश्यता का अन्त (Abilition of Untouchability): अनुच्छेद 17 में दिया गया है।
  5. अपराधियों की समाप्ति (Abilition of Titles): संविधान के अनुच्छेद 18 में दिया गया है।

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प्रश्न 8.
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखो। (Write a note on Freedom of Speech and Expression)
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों में स्वतन्त्रता का अधिकार भी प्रमुख है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार नागरिकों को भाषण, लेखन, पुस्तक, चलचित्र व अन्य किंसी माध्यम से विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता है। लास्की का कथन है,कि “एक मनुष्य को जो वह सोचता है, उसे कहने का अधिकार देना, उसके व्यक्तित्व की पूर्णता का एकमात्र साधन है।” अनुच्छेद 19 में दी गई छः स्वतन्त्रताओं में भाषण और विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार कुछ सीमाएँ भी लगाई गई हैं –

  1. राज्य की सुरक्षा
  2. विदेशी राज्यों के साथ मैत्री सम्बन्ध
  3. सार्वजनिक व्यवस्था
  4. सदाचार व नैतिकता
  5. विशिष्टता
  6. अपराध करने को उकसाने से रोकना आदि

प्रश्न 9.
कानूनी अधिकार की परिभाषा दें। इसके कोई दो उदाहरण दीजिए। (Define legal rights. Give its two examples)
उत्तर:
कानूनी अधिकार (Legal Rights):
कानूनी अधिकार वे अधिकार हैं, जो किसी भी समाज में राज्य के कानूनों द्वारा निश्चित और सुरक्षित होते हैं। इनमें बाधा डालने वालों को राज्य द्वारा दण्ड दिया जाता है। दो उदाहरण निम्नलिखित हैं –

1. समानता का अधिकार (Right to Equality):
समानता के अधिकार का अर्थ समान अवसरों की प्राप्ति से है। भारत के नागरिक कानून की दृष्टि से समान हैं। जाति, धर्म, लिंग, वंश अथवा जन्म के आधार पर उनमें भेदभाव नहीं किया जाएगा।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Liberty):
प्रत्येक नागरिक को स्वयं के विकास की पूर्ण स्वतन्त्रता है। वह भाषण दे सकता है, सभा कर सकता है, समुदाय बना सकता है। उसे देश के किसी भी, भाग में जाने की स्वतन्त्रता है। व्यवसाय करने के लिए भी वह स्वतन्त्र है। देश के किसी भी भाग में उसे निवास की स्वतन्त्रता है। उसे न्याय प्राप्ति की भी स्वतन्त्रता है।

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प्रश्न 10.
भारत में मतदान का अधिकार किसको है?
उत्तर:
भारत में मतदान का अधिकार प्रत्येक वयस्क स्त्री-पुरुष को प्राप्त है, परन्तु इन सभी वयस्कों में निम्न योग्यताएँ होनी चाहिए।

  1. वह देश का नागरिक हो और देश के प्रति आस्था रखता हो।
  2. वह निर्धारित आयु रखता हो । भारत में यह आयु सीमा 18 वर्ष कर दी गई है।
  3. वह देशद्रोही, सजायाफ्ता पागल, अथवा दिवालिया न हो।
  4. उसका नाम मतदाता सूची में हो।

प्रश्न 11.
कानून के सम्मुख समानता पर एक संक्षित टिप्पणी लिखो। (Write a short note on equality before law)
उत्तर:
कानून के सम्मुख समानता (Equality before law) का अर्थ है:
विशेषाधिकार का अभाव व सभी सामाजिक वर्गों पर कानून की समान बाध्यता। कानून के समक्ष समानता के अन्तर्गत सभी कमजोर व शक्तिशाली समान समझे जाते हैं। इस अधिकार के अन्तर्गत मूल भाव यह है, कि समान व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाए तथा किसी के साथ धर्म, जाति, भाषा, रंग, नस्ल, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस अधिकार में यह तथ्य भी निहित है, कि कमजोर को राज्य का संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। भारत में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के साथ विशेष व्यवहार इस तथ्य का उदाहरण है।

प्रश्न 12.
‘काम का अधिकार’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on ‘Right to Work’)
उत्तर:
काम के अधिकार का अर्थ है, कि सरकार नागरिकों के लिए ऐसी व्यवस्था करे जिससे कि वे कोई सरकारी का गैर-सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकें या उन्हें कोई व्यवसाय करने का अवसर मिल सके और वे अपना जीवन निर्वाह कर सके। अभी तक भारत में काम का अधिकार मूल अधिकार में सम्मिलित नहीं किया गया है, यद्यपि समय-समय पर इसकी माँग उठती रहती है।

प्रश्न 13.
अधिकार से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by rights?)
उत्तर:
अधिकार:
व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त न हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगे भी अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो, परन्तु उसे अधिकार ही कहा जाएगा, क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बैन तथा पीटर्स (Benn and Peters) ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, “अधिकार की स्थापना एक सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहे कानून पर आधारित हो या परम्परा पर।” वास्तव में अधिकार समाज या राज्य द्वारा स्वीकार की गई वे परिस्थितियाँ हैं, जो मानव विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं, और चूँकि समाज का उद्देश्य श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना है, अतः आदर्श समाज उसी को कहा जा सकता है, जिसमें मनुष्य बिना संघर्ष किए इन अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त कर ले।

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प्रश्न 14.
अधिकारों के आवश्यक तत्व बताइए। (Mention the essential elements of rights)
उत्तर:
अधिकारों के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Rights):

  1. किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह की माँग अधिकार होनी चाहिए।
  2. माँग उसके विकसित उच्च जीवन के लिए आवश्यक एवं न्यायोचित हो।
  3. समाज उस माँग को उचित समझकर स्वीकार करे।

प्रश्न 15.
अधिकारों की परिभाषा दीजिए। (Define Rights)
उत्तर:
ऑस्टिन के अनुसार:
“अधिकार एक व्यक्ति की वह सामर्थ्य है, जिसमे वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता हो।” माण लास्की (Laski) के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं, जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं कर सकता।” इस प्रकार अधिकार ऐसी अनिवार्य परिस्थिति है, जो मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक है।

वह व्यक्ति की माँग है, तथा उसका हक है, जिसे समाज, राज्य तथा कानून भौतिक मान्यता देते हैं, और उसकी रक्षा करते हैं। उदाहरणार्थ, यदि मनुष्य जीवित न रहे तो वह कुछ भी नहीं कर सकता और यदि स्वतन्त्रता न मिले तो वह अपनी उन्नति के लिए कुछ भी नहीं कर सकता। अत: व्यक्ति का जीवन, जीविका तथा स्वतन्त्रता उसके व्यक्तित्व के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ हैं। अतः वे मनुष्य के अधिकार हैं।

प्रश्न 16.
अधिकार और दावों में क्या अन्तर है? (What are the difference between rights and claims?)
उत्तर:
अधिकार सामान्य जीवन का एक ऐसा वातावरण है, जिसके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन का विकास नहीं कर सकता। अधिकार व्यक्ति के विकास और स्वतन्त्रता का एक ऐसा दावा है, जो कि व्यक्ति और समाज दोनों के लिए लाभदायक है, तथा जिसे समाज मानता है, और राज्य लागू करता है। अधिकार उन सामाजिक दावों का नाम है, जो यदि व्यक्ति को प्राप्त न हो तो वह विकास नहीं कर सकता। अधिकार और दावों में निम्न अन्तर है –

  1. अधिकार वे दावे हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है, और जो राज्य द्वारा लागू किए जाते हैं। ऐसी मान्यता के अभाव में अधिकार केवल खोखले दावे ही सिद्ध होंगे।
  2. केवल वे ही दावे अधिकार बनते हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है।
  3. दावों को अधिकार कहलाने के लिए यह आवश्यक है, कि उसका उद्देश्य समाज का हित हो।

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प्रश्न 17.
व्यक्ति को प्राप्त किन्हीं तीन अधिकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any three rights of individuals) अथवा, विभिन्न प्रकार के अधिकारों के नाम लिखिए। उनमें से किन्हीं तीन का वर्णन कीजिए।
(Name the different kinds of rights Describe any three of them)
उत्तर:
व्यक्ति को समाज द्वारा अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं। जैसे मौलिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार, सामाजिक अधिकार, आर्थिक अधिकार, धार्मिक अधिकार, कानूनी अधिकार, प्राकृतिक अधिकार, नैतिक अधिकार आदि। इनमें तीन अधिकारों का वर्णन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

1. आर्थिक अधिकार (Economic Rights):
प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को अपना सकता है, परन्तु किसी भी व्यक्ति को समाज विरोधी व्यवसाय अपनाने का अधिकार नहीं है।

2. धार्मिक अधिकार (Religious Rights):
व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार धर्म मानने का अधिकार है। धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को किसी ऐसी सुविधा से वन्चित नहीं किया जा सकता जो कि राज्य अपने नागरिकों को प्रदान करता है।

3. राजनैतिक अधिकार (Political Rights):
जिन देशों में प्रजातंत्र की स्थापना है, उन राज्यों में प्रत्येक व्यक्ति को वयस्कता के आधार पर मताधिकार प्रदान किया गया है। बिना किसी भेदभाव के सरकारी पद पर नियुक्त होने का अधिकार है। चुनाव लड़ने का भी अधिकार है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नैतिक और वैधानिक (कानूनी) अधिकारों में अन्तरं कीजिए। (Distinguish between moral and legal rights)
उत्तर:
अधिकार एक प्रकार की सुविधाएँ हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति अपना विकास सरलता व शीघ्रता से कर सकता है। नैतिक और वैधानिक अधिकारों में निम्नलिखित अन्तर होता है –
नैतिक अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति की नैतिक भावना द्वारा होती है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति के नैतिक आचरण से होता है। ये अधिकार नैतिक सन्हिता (esthical code) पर आधारित होते हैं। इन अधिकारों का अनुमोदन राज्य द्वारा नहीं किया जाता बल्कि समाज की नैतिक भावना, जनमत तथा धर्मशास्त्रों द्वारा इन्हें स्वीकार किया जाता है। दूसरी ओर वैधानिक अधिकार उन अधिकारों को कहा जाता है, जो राज्य द्वारा व्यक्ति को प्रदान किए जाते हैं, और कानून द्वारा जिनको सुरक्षा प्रदान की जाती है। इन अधिकारों का प्रयोग कानून के अन्तर्गत किया जा सकता है, और इनका उल्लंघन अपराध माना जाता है। जिसके लिए राज्य दंड की व्यवस्था कर सकता है।

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प्रश्न 2.
प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। (Explain the theory of Natural Rights)
उत्तर:
अधिकारों के जन्म, उदय तथा विकास से सम्बन्धित अनेक सिद्धान्त बताए जाते हैं। इस सिद्धान्तों में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त भी उल्लेखनीय है। प्राकृतिक अधिकारों से अभिप्राय वे अधिकार जो मनुष्य को प्रकृति एवं ईश्वर की देन होते हैं। ये अधिकार मनुष्य को इसलिए प्राप्त होते हैं, कि वे मनुष्य हैं। इस प्रकार के अधिकारों से सम्बन्धित सिद्धान्त के समर्थकों में हॉब्स, लॉक तथा रूसो का नाम लिया जाता है। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को आज कोई नहीं मानता। इसका कारण यह है, कि समाज से पहले, समाज से ऊपर समाज से बाहर तथा उसके विरुद्ध कोई अधिकार नहीं होता।

प्रश्न 3.
किन परिस्थितियों में नागरिक राज्य के आज्ञा की अवहेलना कर सकता है? (Under what circumstances can a citizen disobey the State?)
उत्तर:
राज्य की अवज्ञा के अधिकार का अर्थ है, गैर-कानूनी सत्ता की अवज्ञा। यह अधिकार जनता को प्राप्त अधिकारों में सर्वाधिक मौलिक माना गया है। एक अच्छे संविधान को ऐसे अधिकार अपने नागरिकों को प्रदान करना चाहिए। ऐसे अधिकारों के कारण लोग तानाशाही व स्वेच्छाचारी सरकार के विरुद्ध आवाज उठा सकते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले, भारत में महात्मा गाँधी ने अवज्ञा के अधिकार का प्रयोग असहयोग आन्दोलन (सन् 1920-22 ई.) तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34 ई.) में किया था।

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प्रश्न 4.
आप यह कैसे कहेंगे कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? (How would you say that rights and duties are two sides of a coin?) अथवा, अधिकार एवं कर्तव्यों के बीच सम्बन्ध बताइए। (Describe the relationship between rights and duties)
उत्तर:
यद्यपि अधिकार और कर्त्तव्य देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। अधिकार एवं कर्त्तव्य सदैव साथ-साथ चलते हैं। जब हम किसी के अधिकारों का उल्लेख करते हैं, तो उसका अर्थ समझा जाता है, कि इस व्यक्ति के कुछ कर्त्तव्य भी हैं। कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों का न कोई प्रश्न है, और न ही काई अस्तित्व।

अधिकार और कर्तव्यों में सम्बन्ध (Relationship between Rights and Duties):

1. अधिकार एवं कर्त्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं (Rights and Duties are complemen tary to each other):
यह बात सर्वमान्य है, कि किसी भी व्यक्ति को कोई भी अधिकार उस समय ही मिल सकता है, जब वह अपने कर्तव्य का पालन करे। अधिकार एवं कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे यदि एक नागरिक भाषण की स्वतन्त्रता का अधिकार माँगता है, तो इस अधिकार में ही उसका यह कर्त्तव्य निहित है, कि वह अधिकार से अनुचित लाभ न उठाए तथा अपने भाषण से सरकार अथवा किसी नागरिक का अपमान न करे।

2. अधिकार एवं कर्तव्यों का एक ही उद्देश्य है (Same Objectives of Rights and Duties):
अधिकारों तथा कर्त्तव्यों की उत्पत्ति मनुष्य को सुखी करने के लिए हुई है। दोनों का उद्देश्य तथा लक्ष्य नागरिकों को सुखी बनाना है। नागरिकों की, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक उन्नति कराना ही मुख्य उद्देश्य है। ये दोनों व्यक्ति के सफल जीवन व्यतीत करने में सहायता देते हैं।

3. कर्तव्यों के बिना अधिकारों का अस्तित्व असंभव है (No Right without Duties):
कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। जहाँ मनुष्य को केवल अधिकार ही मिले हो, वहाँ वास्तव में अधिकार न होकर शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपरोक्त सभी बातों का मनन करने के उपरान्त हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं, कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा एक के बिना दूसरों का न अस्तित्व हो सकता है, और न ही महत्त्व।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों में अन्तर कीजिए। (Distinguish between Civil Rights and Political Rights)
उत्तर:
नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों में निम्नलिखित अन्तर हैं –

1. नागरिक अधिकार (Civil Rights) का अभिप्राय उन अधिकारों से है, जिनके बिना नागरिक या राज्य में रहने वाले अन्य व्यक्ति सभ्य जीवन नही बिता सकते हैं। नागरिक अधिकार में सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार है। लोकतन्त्रीय राज्यों में किसी भी व्यक्ति को कानून के उल्लंघन पर निश्चित कानूनों के आधार पर न्यायालय द्वारा दण्डित किया जा सकता है। इस प्रकार कानून द्वारा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता बनी रहती है।

2. राजनीतिक अधिकार (Political Rights) से अभिप्राय उन अधिकारों से है, जो नागरिक को निश्चित योग्यताएँ प्राप्त करने पर शासन में भागीदारी का अधिकार देते हैं। ये अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त होते हैं। चुनाव में भाग लेने का अधिकार एक राजनीतिक अधिकार है। भारत में नागरिक अन्य योग्यताओं के साथ 25 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद लोकसभा तथा 30 वर्ष की आयु पूरी करने पर राज्य सभा का चुनाव लड़ने का अधिकार रखता है।

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प्रश्न 2.
अधिकार सम्बन्धी प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। (Discuss important theories of rights)
उत्तर:
1. अधिकारों का प्राकृतिक सिद्धान्त (Natural Theory of Rights):
प्राकृतिक अधिकार जन्मजात होते हैं, और उनका अस्तित्व किसी न किसी रूप से राज्य के गठन से पूर्व भी था। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त ने निरन्कुश शासकों की निरन्कुशता पर बन्धन लगाकर मनुष्य की स्वतन्त्रता को प्रकट किया। लॉक (Locke) का मत है, कि प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे। रूसो (Rouseau) प्राकृतिक अवस्था को स्वर्ग के समान समझता है। प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य पर किसी प्रकार के बन्धन नहीं थे। टामस पेन, जेफरसन ने भी जीवन, स्वतन्त्रता, समानता तथा सम्पत्ति के अधिकारों को प्राकृतिक अधिकार माना है।

2. अधिकारों के उदारवादी सिद्धान्त (Liberal Theory of Rights):
लॉक (Locke) को आधुनिक युग के उदारवाद का जन्मदाता कहा जाता है। उसने घोषित किया कि राज्य का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया है, और उसका कार्य शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित करना मात्र है। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण अधिकार व्यक्ति ने अपने पास रखे हैं। राज्य व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता व सम्पत्ति के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कानून नहीं बना सकता। लोगों को यह भी अधिकार है, कि सीमा से बाहर जाने वाले व शक्ति दुरुपयोग करने वाले शासक को वे अपहस्त कर दें।

3. ऐतिहासिक अधिकारों का सिद्धान्त (Historical Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों का जन्म इतिहास से हुआ है। वे उन रीति-रिवाजों और प्रयोगों पर आधारित हैं, जो उपयोगी समझे जाते थे तथा जो काफी समय तक माने जाते रहे।

4. लोक कल्याणकारी अधिकार सिद्धान्त (Social Welfare Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के समर्थकों का विचार है, कि व्यक्ति को अधिकार इसलिए दिया जाता है, ताकि वह समाज का उपयोगी अंग बन जाए। बेन्थम तथा ज. एस. मिल इस सिद्धान्त के समर्थक थे। लास्की (Laski) कहते हैं, “समाज उपयोगिता के बिना अधिकार निरर्थक है।” (Right have no meaning without social utility)

5. आदर्शवादी सिद्धान्त (Idealist Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के समर्थक राज्य को एक दैवी संस्था मानते हैं। हेगेल (Hegal) ने कहा था- “राज्य पृथ्वी पर भगवान् का अवतरण है।” (State is march of God on the earth) इस सिद्धान्त के समर्थक कहते हैं कि व्यक्ति को अधिकार समाज का सदस्य होने के नोते प्राप्त होता है।

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प्रश्न 3.
संवैधानिक अधिकारों तथा प्राकृतिक अधिकारों में अन्तर कीजिए। (Distinguish between Constitutional Rights and Natural Rights)
उत्तर:
संवैधानिक अधिकारों को कानूनी अधिकार भी कह सकते हैं। यह वे अधिकार हैं, जो हमें संविधान द्वारा प्रदान किए जाते हैं। नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकारों का स्रोत “दैवी नियम” या नैतिक मूल्य है। लॉक तथा अन्य कई विचारकों का मत है, कि राज्य की स्थापना से पहले भी व्यक्ति को कुछ अधिकार प्राप्त थे जिन्हें इन विद्वानों ने प्राकृतिक अधिकार माना है। इन दोनों के बीच चार प्रमुख भेद हैं –

  1. दोनों प्रकार के अधिकारों का उद्गम अलग-अलग स्रोतों से हुआ।
  2. संवैधानिक या विधिक अधिकार लिखित रूप में पाये जाते हैं अतः वे निश्चित व स्पष्ट होते हैं। इसके ठीक विपरीत प्राकृतिक अधिकारों का स्वरूप प्रायः अनिश्चित रहता है। अलग-अलग विद्वानों की प्राकृतिक अधिकारों के बारे में अलग-अलग मान्यताएँ हैं। अरस्तू ने तो दासों की खरीद-फरोख्त को भी व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार माना है।
  3. संवैधानिक या विधिक अधिकारों की अवहेलना अपराध है, जिसकी सजा कानून के अनुसार दी जा सकेगी। परन्तु प्राकृतिक अधिकारों का स्वरूप एकदम अस्पष्ट है। अतः उनकी अवहेलना करने वालों को किस आधार पर दण्ड दिया जा सकता है।
  4. प्राकृतिक अधिकारों के समर्थक सम्पत्ति और नागरिक स्वतन्त्रता पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध सहन नहीं करते, जबकि संवैधानिक अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 4.
अधिकार से क्या अभिप्राय है? अधिकार के आधारभूत तत्व (लक्षण) समझाइए। (What are rights? Mention the basic elements (attributes of right)
उत्तर:
व्यक्ति की उन माँगो को, जिन्हें, समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार कहलाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरणार्थ, काम पाने का अधिकार (Rights to work) राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परन्तु उसे अधिकार ही माना जाएगा, क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता। बेन और पीटर्स (Benn and Peters) ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, अधिकारों की स्थापना एक ‘सुस्थापित’ नियम द्वारा होती है, वह नियम चाहे कानून पर आधरित हो या परम्परा पर (Rights is an established rule either legal or conventional, which accords the right)

अधिकार के आवश्यक तत्व (Basic Elements of Right):

1. माँग अथवा दावा (A Claim):
व्यक्ति अथवा समाज की कुछ आवश्यकताएँ होती हैं जिन्हें किसी विशेष स्थिति या अवस्था में ही पूरा किया जा सकता है। व्यक्ति इस प्रकार की स्थिति की माँग कहता है।

2. माँगे न्यायोचित होनी चाहिए (Claim would be justify):
अधिकार केवल एक माँग या दावा ही नहीं है, वरन् वह नैतिक मान्यताओं के अनुकूल माँग या दावा होना चाहिए।

3. राज्य अथवा समाज की स्वीकृति (Social Sanction):
कोई भी माँग तब तक अधिकार का रूप ग्रहण नहीं करती जब तक कि उसे समाज की स्वीकृति न मिल जाए । समाज की स्वीकृति मिलने पर माँगे अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानूनी मान्यता न मिली हो। समाज की स्वीकृति न मिलने से माँगे अधिकार नहीं बन सकती, क्योंकि समाज से पृथक, व्यक्ति का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करता वरन् उसकी पूर्ति के लिए प्रयास भी करता है। समाज उन्हीं माँगों को स्वीकृति देता है, जो सबके हित की अर्थात् समाज हित में हो।

4. अधिकार व कर्त्तव्य आपस में जुड़े रहते हैं (Rights implies duties):
अधिकारों में कर्त्तव्य निहित है। मेरा-कर्त्तव्य है, कि मैं दूसरों को भी उन स्वतन्त्रताओं का उपभोग करने दूं जिनका मैं स्वयं उपभोग कर रहा हूँ। इस प्रकार एक-व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्ति का कर्तव्य तथा एक व्यक्ति का कर्तव्य दूसरे व्यक्ति का अधिकार बन जाता है।

5. काल और देश के अनुसार अधिकारों का स्वरूप बदलता रहता है (Rights change with time and place):
अधिकारों की कोई ऐसी सूची बन सकना असंभव है, जिसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश न हो। एक समय दास खरीदना व बेचना अधिकारों में सम्मिलित था, परन्तु अब यह पूरे विश्व में कहीं भी मान्य नहीं है।

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प्रश्न 5.
किन्हीं तीन ऐसी परिस्थितियों का वर्णन कीजिए जिनमें अधिकारों को प्रतिबन्धित किया जा सकता है। (Describe any three situations in which rights can be restricted)
उत्तर:
अधिकार कभी भी निरन्कुश या असीम नहीं होते, उनके साथ कर्तव्य जुड़े रहते हैं। व्यक्ति के अधिकार दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों से भी बँधे तथा सीमित होते हैं। जैसा मैं चाहता हूँ वैसा दूसरे व्यक्ति भी चाहते हैं। अतः अधिकारों को सीमित किया जा सकता है। जिन तीन परिस्थितियों में अधिकारों को प्रतिबन्धित किया जा सकता है, उनका विवरण निम्नलिखित है –

1. अन्य सदस्यों के अधिकार के लिए (For Other’s Rights):
व्यक्ति समाज का अंग है, और दूसरों के साथ मिल-जुलकर ही वह रह जाता है। व्यक्ति के अधिकार उसके अन्य साथियों के अधिकार से प्रतिबन्धित रहते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार का प्रयोग इस प्रकार नहीं कर सकता जिससे दूसरे लोगों को अपने अधिकार का प्रयोग करने में बाधा पड़े। अधिकार सबको समान रूप से मिले होते हैं अतः उनका प्रयोग भी इस प्रकार किया जा सकता है, कि भी अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें।

2. समाज हित के लिए (For Social Welfare):
अधिकार समाज में ही मिल सकते हैं। समाज से बाहर उनका कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए व्यक्ति के अधिकार सामाजिक कल्याण से ‘सीमित हैं। इसका अर्थ यह है, किसी व्यक्ति को कोई ऐसा अधिकार नहीं दिया जा सकता जो समाज का अहित करता हो। सामाजिक कल्याण की दृष्टि से व्यक्ति के अधिकार पर सीमा लगायी जा सकती है।

3. राज्य की स्वतन्त्रता तथा सूरक्षा हेतु (For the liberty and security of the State):
यदि किसी व्यक्ति के अधिकार की पूर्ति करने से राज्य की स्वतन्त्रता अथवा सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाए तो उस व्यक्ति के ऐसे अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, कि वह अपने राष्ट्र के विषय में सूचनाएँ प्राप्त कर सके, परन्तु किसी सूचना को प्रकट करने पर यदि राज्य की सुरक्षा को खतरा होने की सम्भावना हो तो सूचना गोपनीय रखी जा सकती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन से अधिकारों की विशेषता नहीं है –
(क) असीमित होते हैं
(ख) केवल राज्य में ही संभव है
(ग) परिस्थिति के अनुसर बदलते रहते हैं
(घ) अधिकार विकास का द्योतक है
उत्तर:
(क) असीमित होते हैं

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प्रश्न 2.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त का समर्थन किसने किया था?
(क) रूसो
(ख) वाल्टेयर
(ग) टॉमन पेन
(घ) आस्टिन
उत्तर:
(घ) आस्टिन

प्रश्न 3.
मौलिक अधिकार का वर्णन भारतीय संविधान के किस भाग में है?
(क) भाग-4
(ख) भाग-3
(ग) भाग-2
(घ) भाग-1
उत्तर:
(ख) भाग-3

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प्रश्न 4.
मूल अधिकारों का निम्न कौन-सा वर्ग अस्पृश्यता की समिति है?
(क) धर्म का अधिकार
(ख) समानता का अधिकार
(ग) स्वतन्त्रता का अधिकार
(घ) शोषण के विरुद्ध अधिकार
उत्तर:
(ख) समानता का अधिकार

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख करते हुए निम्न में से किस देश का अनुसरण किया गया है –
(क) ब्रिटेन
(ख) अमेरिका
(ग) आस्ट्रेलिया
(घ) स्विट्जरलैंड
उत्तर:
(क) ब्रिटेन

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प्रश्न 6.
संपत्ति का अधिकार निम्न में से किस वर्ग में आता है –
(क) विधिक अधिकार
(ख) मानव अधिकार
(ग) मूल अधिकार
(घ) नैसर्गिक अधिकार
उत्तर:
(क) विधिक अधिकार

प्रश्न 7.
किसने कहा है? अधिकार एवं कार्य आपस में जुड़े हुए हैं।
(क) लास्की
(ख) लॉक
(ग) हाब्स
(घ) जे. एस. मिल
उत्तर:
(क) लास्की

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

Bihar Board Class 11 Political Science सामाजिक न्याय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ-साथ कैसे बदला?
उत्तर:
न्याय की संकल्पना के विषय में विभिन्न कालों और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक माहौल में विभिन्न अर्थ रहा है। न्याय शब्द की मूल आवश्यकता ‘जस’ से है जिसका अर्थ ‘उचित’ है अर्थात् ‘किसी को देने को’ है। परन्तु क्या ‘किसी को देने को’ (One’s due): का अर्थ विभिन्न अवधि में विभिन्न समाजों में विभिन्न है। उदाहरण के लिए समय के एक बिन्दु पर महिलाओं को समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। परन्तु कालान्तर में इसकी उपेक्षा की गयी और उनकी स्थिति खराब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएँ दी जाने लगीं। वे उदारवादी, प्रजातान्त्रिक और विकासवादी विश्व में अपने उचित स्थान की खोज में हैं। अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक तत्व माने गए हैं।

प्लूटो का न्याय की स्थिति के विषय में अलग दृष्टिकोण है। वह न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग की अपनी क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरी के कार्यों में हस्तक्षेप न करना को माना है। अरस्तु ने उपयोगिता के आधार पर गुलामी को न्यायसंगत ठहराया है। उसने न्याय को स्वामी के द्वारा कार्य को करने और स्वामी का दास के प्रति कर्त्तव्य को न्याय माना है। उसने राजा की सेवा के अर्थ में भी न्याय पर प्रकाश डाला है। उसके अनुसार सेवक का यह कर्त्तव्य है, कि वह अपने राजा की सेवा अच्छी तरह से करे।

मार्क्सवादी विचार न्याय की अवधारणा की दृष्टि से अलग है और इसलिए ‘किसी का उचित स्थान’ का विचार भी अलग है। मार्क्स पूँजीवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था जो अन्याय पर आधारित था। इसलिए उसने न्याय की अलग आवश्यकताएँ बताई। उसने अपने न्याय की योजना में सुझाव दिया कि उत्पादन के साधनों और वितरण पर सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति की मूल आवश्यकताओं को पूर्ति होनी चाहिए। वर्तमान में न्याय की आवधारणा में कुछ तथ्यों का समावेश हो गया है। आज न्याय न केवल सामाजिक, आर्थिक पक्ष की व्याख्या करता है बल्कि नैतिक, मनोविज्ञान, आत्मिक और मानववादी पक्ष की व्याख्या करता है।

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प्रश्न 2.
अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धान्तों की संक्षेप में चर्चा करो। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइए।
उत्तर:
किसी को उसका देना’ न्याय के विचार का केन्द्रीय सिद्धान्त था परन्तु “किसको क्या देना है”-के सम्बन्ध में विभिन्न कालों में विभिन्न विचार रहे हैं। विभिन्न प्रकार के अनेक सिद्धान्त उनके अनुसार बनाये गए हैं। ये निम्नलिखित हैं –

  1. समान के लिए समान व्यवहार
  2. आनुपातिक न्याय
  3. विशेष आवश्यकता की पहचान

1. समान के लिए समान व्यवहार:
समान के लिए सामन व्यवहार अति महत्त्वपूर्ण और न्याय का आवश्यक सिद्धान्त माना जाता है। यह अपेक्षा स्वीकार किया जाता है कि व्यक्ति में कुछ विशेषताएँ मानव जाति के रूप में दिखता है, इसलिए प्रत्येक समान दशाओं में समान व्यवहार कायम रहता है। अधिकांश क्षेत्रों में जिसमें हम समानता के व्यवहार की आशा करते हैं, ये निम्नलिखित हैं –

  • नागरिक अधिकार अर्थात् समान आधार पर मूलभूत आवश्यकताओं की उपलब्धता।
  • राजनीतिक अधिकार जैसे-मतदान का अधिकार और राजनीतिक कार्यों में शामिल होने का अधिकार।
  • सामाजिक अधिकार जैसे-समान व्यवहार और सामाजिक कार्यों में मूलभूत आवश्यकताओं को प्राप्त करने का अधिकार। समान के लिए समान व्यवहार का एक अन्य पहलू यह है कि वर्ग, जाति या लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  • प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रतिभा और कौशल के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए।

2. आनुपातिक न्याय:
समानता का व्यवहार समान हो सकता है। इसे स्वीकार करना चाहिए और आनुपातिक स्तर को ढूढ़ना चाहिए। हम कह सकते हैं कि प्रत्येक को सभी दशाओं में समान व्यवहार की आवश्यकता होती है। आनुपातिक न्याय का तात्पर्य है-लोगों का वेतन और गुण में एक अनुपात होना चाहिए। कर्त्तव्य और पुरस्कार का निर्धारण करना चाहिए और परिभाषित करना चाहिए। वास्तविक न्याय के लिए आधुनिक समाज में समान व्यवहार का सिद्धान्त आनुपातिक सिद्धान्त में सन्तुलित करने की आवश्यकता है।

3. विशेष आवश्यकता की पहचान:
तीसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त विशेष आवश्यकताओं की पहचान है। यह लोगों की विशेष आवश्यकताओं के सन्दर्भ में पहचान करती है। जब किसी को पुरस्कार या कार्य वितरित किया जाता है, तो हमें अपनाया जाता है। कभी-कभी हमें न्याय के लिए सन्शोधित उपायों का सहारा लेना पड़ता है और लोगों के साथ विशेष व्यवहार करना पड़ता है। इसको ही विशेष आवश्यकता की पहचान कहते हैं। इसे असन्तुलन को सन्तुलन करना भी कहा जाता है।

इससे समान व्यवहार के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं होता। यह सकारात्मक कार्य का प्रकार है। लोगों के कुछ प्राकृतिक अयोग्यता के कारण उनके लिए विशेष व्यवहार या इलाज की आवश्यकता होती है। यद्यपि वे असमान दिखाई देते हैं परन्तु न्याय के लिए उनकी विशेष आवश्यकता की पूर्ति जरूरी होती है। वे लोग जो सुविधा सम्पन्न हैं और सुविधाहीन हैं, इन सबको कुछ भिन्न व्यवहार या इलाज देने की आवश्यकता पड़ती है। सुविधाहीन लोगों को विशेष मदद की जरूरत होती है।

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प्रश्न 3.
क्या विशेष जरूरतों का सिद्धान्त सभी के साथ समान बर्ताव के सिद्धान्त के विरुद्ध है?
उत्तर:
लोगों की विशेष आवश्यकता का विचार करने का सिद्धान्त सभी के लिए समान व्यवहार के सिद्धान्त से विरोधाभास उत्पन्न कर सकता है, परन्तु अब इसे विस्तृत दुष्टिकोण से न्याय के विचार से देखते हैं तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। कि किसी व्यक्ति को विशेष आवश्यकता का विचार करने के सिद्धान्त से सभी के लिए समान व्यवहार के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं होता। वस्तुतः यह वितरण योग्य न्याय पर आधारित है। सन्शोधित उपाय के रूप में हम उस व्यक्ति की विशेष सहायता करते हैं जो अयोग्य हैं, और उसे समान स्तर पर लाने की जरूरत होती है।

समान रूप से समाज के साथ व्यवहार लागू हो सकता है कि लोग जो कुछ दृष्टियों से समान नहीं हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार से विचार कर सकते हैं। शारीरिक अयोग्यताएँ, आयु, सफलता की कमी, अच्छी शिक्षा या स्वास्थ्य आदि कुछ महत्त्वपूर्ण कारक हैं, जो विशेष व्यवहार के रूप में विचार किया जा सकता है। यदि दोनों समूहों के लोगों अर्थात् सामान्य लोग और अपंग लोग दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाय तो यह अन्याय होगा। इसलिए यदि अपंग व्यक्तियों को विशेष मदद या उनकी कुछ आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके तो इससे न्याय की आवश्यकता की पूर्ति होगी परन्तु यह न्याय से अलग या समान न्याय नहीं होगा।

प्रश्न 4.
निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में ‘अज्ञानता के आवरण’ के विचार का उपयोग किस प्रकार किया।
उत्तर:
उपेक्षित स्थान के आवरण की योग्यता यह है कि यह लोगों के लिए न्याय की आशा करता है। उनसे यह सोचने के लिए आशा की जाती है कि वे अपनी रुचि के लिए क्या चाहते हैं। वे उपेक्षा के आवरण के अन्तर्गत चुनाव करते हैं, वे यह पायेंगे कि यह उनकी रुचि ही है जो अरुचि की स्थिति से हटकर सोचने के लिए है। इसलिए यह प्रथम चरण है, जिससे सही कानून और नीतियों की व्यवस्था आती है। बुद्धिमान लोग न केवल खराब स्थिति में वस्तुओं को देखेंगें, सही बनाने के लिए प्रयास भी कर सकते हैं। वे जो नीतियां बनाते हैं वह समाज के लिए होती हैं। इसलिए यह कोई नहीं जानता कि भविष्य के समाज में उनकी क्या स्थिति होगी? वे ऐसे कानूनों का निर्धारण करते हैं जो सुरक्षा प्रदान करते हैं चाहे वे भले ही अनैच्छिक लोगों के हों।

इसलिए यह सभी की भलाई में है कि कानून और नीतियों से सम्पूर्ण समाज के लोगों को लाभान्वित करावें। केवल किसी विशेष वर्ग के लिए ऐसा न किया जाय। इस प्रकार की ईमानदारी अच्छे कार्य की उपलब्धि होगी। इसलिए रॉल यह तर्क देते हैं कि यह योग्य विचार है न कि नैतिक, जो समाज के कार्यों और लाभ के वितरण के सन्दर्भ में उचित और पक्षपातरहित हो सकता है। यह उनका सामान्यीकरण है जो रॉल के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण बनाता है और ईमानदारी और न्याय के लिए पहुँच (Approach) प्रदान करता है।

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प्रश्न 5.
आम तौर पर एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी जरूरतें क्या मानी गई हैं? इस न्युनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की क्या जिम्मेदारी है?
उत्तर:
समाज उस समय अन्यायपूर्ण माना जाता है जब व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर इतना बड़ा होता है जो उनके न्यूनतम् आवश्यकताओं के पहुँच के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं होते हैं। इसलिए एक न्यायपूर्ण समाज को लोगों के न्यूनतम मूल आवश्कयताओं के साधन उपलब्ध करना चाहिए जिससे लोग स्वस्थ, सुरक्षित जीवन जी सके तथा अपने प्रतिभा का विकास कर सकें। लोगों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराना चाहिए।

लोगों की आवश्यकताओं, जो जीवन के मूल न्यूनतम दशाएँ होती हैं, संचालन के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा विभिन्न प्रकार के उपाय किए गए। इसमें अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों-विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन आवश्यकताओं में स्वास्थ्य, आवास, खान-पान, पेयजल, शिक्षा और न्यूनतम मजदूरी आदि शामिल हैं। देशवासियों को मूल आवश्यकता की सुविधाएँ प्रदान करना प्रजातान्त्रिक सरकार का उत्तरदायित्व है। आज राज्य एक कल्याणकरी संगठन है। इसलिए लोगों के कल्याण का ध्यान रखना उसका कर्त्तव्य है। प्रजातान्त्रिक सरकार लोगों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करके लोगों के दशाओं में सुधार लाती है।

प्रश्न 6.
सभी नागरिकों को जीवन की न्यूनतम बुनियादी स्थितियाँ उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कार्यवाई को निम्न में से कौन-से तर्क से वाजिब ठहराया जा सकता है?
(क) गरीब और जरूरत मन्दों को निशुल्क सेवाएँ देना एक धर्म कार्य के रूप में न्यायोचित है।
(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है।
(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी, मानवता और मानव अधिकार की स्वीकृति है।
उत्तर:
कथन (ख) और (घ) लोगों के जीवन की न्यूनतम् दशाएँ उपलब्ध कराने में राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में न्यायसंगत है।
(ब) सभी के लिए मूल सुविधाएँ और न्यूनतम स्तर की जीविका प्रदान करना मानवता और मानव अधिकार की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Political Science सामाजिक न्याय Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आनुपातिक न्याय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। (Write a short note on Proportional Justice?)
उत्तर:
आनुपातिक न्याय का अर्थ परिस्थितियों की समता अर्थात् समान मामलों को समान रूप से और असमान को असमान रूप में लिया जाए। निष्पक्षता के रूप में न्याय का अर्थ कठोर समानता नहीं है। इसका अभिप्राय तो न्याय-संगत आनुवादि वितरण से है। इसके अन्तर्गत राज्य कुछ विशिष्ट वर्गीकरणों के आधार पर भेदभाव कर सकता है। ऐसा वर्गीकरण लिंग, आवश्यकता, परिस्थिति, योग्यता, तथा क्षमता के आधार पर किया जा सकता है। समाज के कमजोर लोगों की विशेष सहायता की जानी चाहिए।

प्रश्न 2.
संरक्षणकारी विभेद क्या है? (What is protective discrimination?)
उत्तर:
हमारे संविधान में कानून के समक्ष समानता को एक शासन के आधारभूत सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया गया है। धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। परन्तु जो लोग अधिक पिछड़े हैं उनके लिए संरक्षणात्मक भेदभाव रखे गए हैं। राज्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और अन्य पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए विशेष प्रकार की व्यवस्था कर सकता है। राज्य उन्हें सरकारी नौकरियों में स्थान दिलाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 3.
सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए पूर्ण सुविधाएँ उपलब्ध करवाना तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही सामाजिक न्याय है।

सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of Social Justice):

  1. धर्म, जाति, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त किया जाता है। सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाते हैं।
  2. सार्वजनिक स्थानों के प्रयोग के लिए नागरिकों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  3. व्यक्ति के रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास तथा अन्य निजी मामलों में राज्य द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाता।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के क्या प्रावधान हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सभी भारतीय नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्रदान करना संविधान का सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए –

  1. नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।
  2. प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता प्रदान की गई है।
  3. सरकारी नौकरी पाने के क्षेत्र में सभी नागरिक को समान अवसर प्रदान किए गए हैं।
  4. छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। इसका प्रयोग करने वाले को राज्य द्वारा दण्डित किया जाता है।
  5. समाज में असमानता उत्पन्न करने वाली सभी उपाधियों का अन्त कर दिया गया है।
  6. प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतन्त्रता दी गयी है। धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। राज्य को उसमें हस्तक्षेप करने की मनाही कर दी गई है।
  7. उच्च वर्ग के व्यक्तियों के द्वारा पिछड़े, दलितों तथा कम आयु के बच्चों को शोषण करने की मनाही कर दी गई है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 5.
न्याय से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you understand by Justice?) अथवा, न्याय का अर्थ समझाइए। (Explain the term Justice)
उत्तर:
इतिहास में न्याय की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। किसी ने न्याय को जैसी करनी वैसी भरनी’ के रूप में तो किसी ने उसे ईश्वर की इच्छा कहकर अथवा पूर्वजन्मों का फल कहकर पुकारा है। सालमण्ड के अनुसार “न्याय का अर्थ है, प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग प्रदान करना।” जे. एस. मिल के अनुसार, “न्याय उन नैतिक नियमों का नाम है जो मानव कल्याण की धारणाओं से सम्बन्धित है, और इसलिए जीवन के पथ-प्रदर्शन के लिए किसी भी अन्य नियम से अधिक महत्त्वपूर्ण है।”

प्रश्न 6.
न्याय के किन्हीं दो आधारभूत तत्वों का वर्णन कीजिए। (Describe any two fundamental postulates of Justice)
उत्तर:
न्याय के दो आधारभूत तत्व निम्नलिखित हैं –
1. सत्य (Truth):
सत्य की कसौटी पर खरा उतरने वाला न्याय अमीर-गरीब सबको एक दृष्टि से देखता है। घटनाओं का प्रस्तुतीकरण ज्यों का त्यों किया जाता है।

2. स्वतन्त्रता (Freedom):
राज्य को व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर केवल सामाजिक हित में प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। बहुत से तानाशाह शासक अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाकर न्याय का गला घोंट देते हैं।

प्रश्न 7.
संरक्षणकारी न्याय से क्या तात्पर्य है? (What is meant by Protective Justice?)
उत्तर:
यदि राज्य कमजोर तथा दरिद्र वर्ग के हित में कुछ कार्य करता है तो यह स्पष्ट है कि वह ऐसा उन लोगों की उन्नति के लिए कर रहा है जिन्हें दूसरे वर्गों ने उनको उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है, उसे संरक्षणकारी न्याय कहा जाता है।

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प्रश्न 8.
आर्थिक न्याय का क्या अर्थ है? (What is meant by Economic Justice?)
उत्तर:
आर्थिक न्याय का अर्थ (Meaning of the term Economic Justice):
आर्थिक न्याय से यह अभिप्राय है कि राष्ट्र की सम्पत्ति व आय में सब समान रूप से भागीदार हों। आर्थिक न्याय के अनुसार लोगों की न्यूनतम भौतिक आवश्यकताएँ पूरी होनी चाहिए। एक जैसा काम करने वालों को समान वेतन दिया जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार काम करे और उसे अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति में कोई रूकावट न आए। स्त्रियों और बच्चों का आर्थिक शेषण न हो। बुढ़ापे, बीमारी, व अपंग अवस्था में राज्य उनके कल्याण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करे।

प्रश्न 9.
नैतिक न्याय का अर्थ बताइए। (Discuss the meaning of Moral Justice)
उत्तर:
संसार में कुछ नियम सर्वव्यापी, अपरिवर्तनशील और प्राकृतिक हैं। इनके अनुसार होने वाले आचरण व व्यवहार को ही नैतिक न्याय कहते हैं। उदाहरणस्वरूप, सच बोलना, प्रतिज्ञा-पालन, दया, सहानुभूति, उदारता, क्षमता आदि नैतिक न्याय के अन्तर्गत आते हैं। ऐसे व्यवहार की स्थापना में राज्य को हस्तक्षेप, करने की आवश्यकता ही न पड़ेगी। स्वतः ही सबको नैतिक न्याय की प्राप्ति हो जाएगी।

प्रश्न 10.
कानूनी न्याय से क्या तात्पर्य है? (What is meant by Legal Justice?)
उत्तर:
न्याय की समाज में जो भी मान्यताएँ होती हैं, जब उन्हें विधियों के द्वारा मूर्त रूप दे दिया जाता है, तब वह कानूनी न्याय कहलाता है। कानूनी न्याय-संगत होना चाहिए। कानूनी न्याय निष्पक्ष व सस्ता हो।

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प्रश्न 11.
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में क्या अन्तर है? (What is the difference between the legal justice and the moral Justice?
उत्तर:
कानूनी न्याय और नैतिक न्याय में अन्तर:
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लघु उत्तरीय प्रश एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कानूनी न्याय का तात्पर्य क्या है? (What is the meaning of legal justice?)
उत्तर:
कानूनी न्याय का तात्पर्य यह है कि कानून अपने सैद्धान्तिकता में जहाँ नैतिक मूल्यों के अनुरूप है, वहीं अपने क्रियान्वयन के स्तर पर इसी सैद्धान्तिकता के कारण नैतिक हो। इसलिए कानूनी न्याय का स्थायित्व सिर्फ मूल्यों और नैतिकता पर निर्भर होता है, राज्य का शासक वर्ग इसी के माध्यम से कानून को गठित और उसका क्रियान्वयन करता है लेकिन यह सिद्धान्त कानून की निरंकुशता का मूल तात्पर्य नहीं होता है।

इसलिए कानूनी न्याय का मूल अर्थ है कि कानून नैतिक मूल्यों के अनुरूप हो तथा इसको लागू कराने सम्बन्धी व्यावहारिकता भी नैतिक हो। कानून न्याय जब राज्य के माध्यम से लागू होता है, तो स्वाभाविक है कि राज्य को बलपूर्वक भी न्या को लागू करवाना पड़ता है। इसलिए कानूनी न्याय का अर्थ और परिभाषा का क्षेत्र काफी वृहद होता है, जो न्याय के हर स्तर पर उस व्यावहारिकता को खत्म कर दे, जो न्याय को काल्पनिक यां कानून को निरंकुश बनाना चाहता है। इसलिए कानूनी न्याय का तात्पर्य न्याय से और काफी वृहद् और प्रभावी हो जाता है।

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प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता, समानता और न्याय के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करें। (Find out the inter relationship of liberty, equality and justice)
उत्तर:
न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के सन्दर्भ में इस मौलिक तत्व की और विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है कि न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के मूल्यों का मूल्यांकन करके स्वतन्त्रता और समानता को लोगों पर लागू करवाता है। न्याय वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता के वास्ताविक मूल्यों की पहचान करवाता है। वही न्याय स्वतन्त्रता और समानता को बिना किसी भेदभाव के लागू करवाने का माध्यम बनता है।

स्वतन्त्रता का मूल्य ही स्वतन्त्रता के अस्तित्व और उसके प्रभाव का कारण बनता है तथा स्वतन्त्रता तभी तक हितकर है, जब तक कि उसके साथ न्याय का भाव जुड़ा हुआ है। वैसे ही समानता लोगों पर जब तक न्यायपूर्ण लागू होगी, तभी तक समानता का अस्तित्व है, नहीं तो समानता का अस्तित्व खत्म हो जाएगा क्योंकि समानता का अस्तित्व समानता के मूल्यों पर निर्भर करता है और मूल्यों का सम्बन्ध न्याय से होता है। न्याय वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता को स्थायी रूप से प्रभावी बनाता है इसलिए न्याय की अवधारणा को स्वयं स्वतन्त्रता और समानता नकार नहीं सकते हैं।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता और न्याय के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करें। (Clarify the inter relationship of liberty and justice)
उत्तर:
स्वतन्त्रता और न्याय के बीच का सम्बन्ध इसलिए है, कि स्वतन्त्रता वास्तव में लोगों पर अपने गुण के अनुरूप ढंग से लागू हो सके। स्वतन्त्रता बिना अपने गुणों के असीमित होने से लोगों के लिए अन्यायपूर्ण हो जाती है, और इसी अपार स्वतन्त्रता से इसका प्रयोग करने वाले लोगों का अन्त होता है इसलिए स्वतन्त्रता का न्यायपूर्ण पहलू स्वतन्त्रता के अस्तित्व को कारगर ढंग से लागू कारने में सहायक होता है। स्वतन्त्रता पर अंकुश न्यायपूर्ण ढंग से और कोई नहीं स्वयं स्वतन्त्रता के मूल्य लगते हैं। स्वतन्त्रता के मूल्यों का निर्धारण नैतिक नियमों के स्रोत से ही होता है, इस कारण स्वतन्त्रता का सीमित स्वरूप को सही ढंग से लागू करवाने के लिये न्याय की आवश्यकता होता है।

स्वतन्त्रता का सीमित स्वरूप और उसका न्यायपूर्ण परिपालन राज्य के माध्यम से ही होगा। वह न्याय के आधार पर ही होगा लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि राज्य लोकतान्त्रिक पद्धति के लोक कल्याणाकारी राज्य में विश्वास करता हो। इसलिए न्याय का स्थान, स्वतन्त्रता सम्बन्धी तथ्यों के बावजूद राज्य, व्यक्ति और समाज के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राज्य स्वतन्त्रता के सन्दर्भ के किस प्रकार व्यक्ति और व्यक्तियों के बीच संतुलन करता है यह राज्य की न्याय व्यवस्था पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 4.
न्याय के किन्हीं दो पक्षों का उल्लेख करो। (Mention any two dimensions of Justice)
उत्तर:
न्याय अंग्रेजी शब्द Justice का हिन्दी रूपान्तर है। Justice शब्द लैटिन भाषा के शब्द Jus से बना है जिसका अर्थ होता है बन्धन या बाँधना (Bind or Tie) जिसका अभिप्राय यह है कि ‘न्याय’ उस व्यवस्था का नाम है जिससे व्यक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों का उचित एवं सामंजस्यपूर्ण सन्योजन किया जाता है।

1. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
न्याय का एक पक्ष राजनीतिक न्याय माना जाता है। अरस्तू ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बन्धी न्याय (Distributive Justice) बेताया था जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था। राजनीतिक न्याय का तात्पर्य व्यक्ति का शासन में भाग लेना, चुनाव में खड़े होना, चुनाव में मतदान करना, योग्यता के अनुसार राजकीय पद ग्रहण करना आदि से है। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए उचित एवं निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को हम राजनीतिक न्याय की व्यवस्था कहते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय का होना आवश्यक है।

2. कानूनी न्याय (Legal Justice):
कानूनी न्याय से अभिप्राय है कानून न्याय-संगत हो, समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हो। कानून जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाएँ और उनका औचित्य समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परखा जाए। न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो।

प्रश्न 5.
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में क्या सम्बन्ध है? (What is the relationship between Legal and Moral Justice?)
उत्तर:
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में सम्बन्ध (Relationship between Legal & Moral Justice):
कानूनी तथा नैतिक न्याय में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन दार्शनिकों ने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया कि न्याय नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। अभी भी एक सीमा तक न्याय नैतिकता पर आधारित है परन्तु दोनों एक नहीं हैं। दोनों में अन्तर पाया जाता है। कानूनी न्याय का सम्बन्ध उन सिद्धान्तों और कार्यविधियों से है जो किसी राज्य के कानून द्वारा निर्धारित होती हैं।

कानूनी न्याय का सम्बन्ध कानूनों, रीति-रिवाजों, पूर्व निर्णय तथा मानवीय अभिकरण द्वारा निर्मित कानूनों से होता है। नैतिक न्याय वह होता है जिसके द्वारा हमें पता चलता है, कि क्या ठीक है और क्या गलत है? मनुष्य के रूप में हमारे क्या अधिकार हैं? हमारे क्या कर्त्तव्य हैं? कानूनी न्याय इन अधिकारों और कर्तव्यों को सुरक्षा प्रदान करता है।

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प्रश्न 6.
भारतीय राजनीतिक चिन्तन में न्याय की धारणा समझाइए। (Explain the concept of Justice in Indian political thought)
उत्तर:
भारतीय सामाजिक चिन्तन में राज्य की व्यवस्था के लिए न्याय को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। मनु, कौटिल्य, वृहस्पति, शुक्राचार्य, भारद्वाज एवं सोमदेव आदि उनके महान् भारतीय राजनीतिक चिन्तक हुए हैं। इनकी विशेषता यह रही है कि उन्होंने न्याय के विषय में उस कानूनी दृष्टिकोण को प्राचीनकाल में ही अपना लिया था, जिसे पाश्चात्य जगत् के विचारक आधुनिक युग में आकर ही अपना सके हैं। कौटिल्य ने कहा है, “न्याय की सुव्यवस्था राज्य का प्राण है। जिसके बिना राज्य जीवित नहीं रह सकता।”

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान में न्याय की अवधारणा पर टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on “The concept of Justice in Indian Constitution”)
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों प्रकार के न्याय की गारंटी दी गयी है। राजनैतिक न्याय सुलभ कराने के लिए समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना की गई है। आर्थिक न्याय की व्यवस्था के लिए संविधान में नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन है जो राज्य को अनेक कार्य करने का निर्देश देते हैं। समान कार्य के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को समान वेतन, बाल श्रमिकों का शोषण रोकना, बन्धुआ मजदूरी पर रोक लगाना, वृद्धावस्था या बीमरी, की अवस्था में राजकीय सहायता आदि।

सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए अनुच्छेद 14 के अनुसार सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं। अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलपंथ, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव की मनाही है। अनुच्छेद 16 में सब नागरिकों को राज्य के अधीन पदों पर नियुक्ति का समान अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 17 द्वारा छुआछूत की समाप्ति कर दी गई है। अनुच्छेद 24 व 25 में बेगार तथा शोषण को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।

प्रश्न 8.
सामाजिक न्याय का अर्थ और महत्त्व बताइए। (Discuss the meaning and importance of Social Justice)
उत्तर:
सामाजिक न्याय का अर्थ है कि नागरिकों के बीच सामाजिक दृष्टिकोण से किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए। श्री गजेन्द्र गड़कर के अनुसार ‘सामाजिक न्याय का अर्थ सामाजिक असमानताओं को समाप्त करके सामाजिक क्षेत्र में व्यक्ति को अवसर प्रदान करने से है। सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. धर्म, जाति रंग आदि के आधार पर भेदभाव की समाप्ति।
  2. सार्वजानिक स्थानों के प्रयोग में भेदभाव की समाप्ति।
  3. राज्य के हस्तक्षेप की सीमा अर्थात् रीति-रिवाज या धार्मिक विश्वास जैसे व्यक्तिगत मामालों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

सामाजिक न्याय का महत्त्व-आधुनिक युग में सामाजिक न्याय का बहुत महत्त्व है क्योंकि समाज के अन्तर्गत सबको उचित स्थान प्राप्त होता है। सभी लोग उन्नति करने लगते हैं।

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प्रश्न 9.
न्याय से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you mean by Justice?)
उत्तर:
पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय का अध्ययन प्लेटो से प्रारम्भ किया जा सकता है। प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘रिपब्लिक’ (Republic) में न्याय की स्थापना के उद्देश्य में नागरिकों के कर्त्तव्यों पर बल दिया है। प्लूटो के न्याय सम्बन्धी विवेचन में बार्कर का कथन है कि “न्याय का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उस कर्त्तव्य का पालन, जो उसके प्राकृतिक गुणों तथा सामाजिक स्थिति के अनुकूल है। नागरिक को अपने धर्म की चेतना तथा सार्वजनिक जीवन में उसकी अभिव्यंजना ही राज्य का न्याय है।”

अरस्तू ने न्याय की इस समस्या को व्यक्तियों के आपसी विनिमय में राज्य के पदों के वितरण में किन-किन नियमों का पालन होना चाहिए पर विचार करके ‘न्याय’ को व्यावहारिक रूप प्रदान किया है। जिन राज्यों में न्याय नहीं रह जाता वह डाकुओं के झुण्ड के समान है। एक्वीनाव के अनुसार “न्याय प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार दिए जाने की निश्चित व सनातन इच्छा है।”

प्रश्न 10.
न्याय के विभिन्न रूपों को वर्णित करें। (Describe the different forms of Justice)
उत्तर:
न्याय के विभिन्न रूपों को निम्न विषयों से जाना जाता है, जैसे नैतिक न्याय, सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय, कानूनी न्याय और आर्थिक न्याय। नैतिक न्याय की सर्वोच्च अवधारणा है। नैतिक न्याय का स्रोत प्राकृतिक नियम है, और प्राकृतिक नियम मनुष्यों द्वारा अपरिवर्तनीय हैं। मनुष्यों को वास्तव में सत्य की अवधारणा का पहचानना और लागू करना है तो उसका मूल रास्ता और कोई नहीं सिर्फ नैतिक न्याय ही है। बिना नैतिक मूल्यों के न्याय का न तो व्यावहारिक स्वरूप रह पाता है और न ही सैद्धान्तिक स्वरूप रह पाता है।

इस कारण न्याय की सच्ची अवधारणा को पहचानने का एकमात्र रास्ता और कोई नहीं बल्कि नैतिक मूल्य है। सामाजिक न्याय में समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जब उसके सामाजिक अधिकार के अनुरूप न्यायगत तरीके से अधिकार एक दूसरे से प्राप्त होंगे तो निश्चित है, कि सामाजिक न्याय वास्तव में संबके विकास और स्वयं समाज के विकास का कारण बनेगा। राजनीतिक न्याय वास्तव में केवल प्रजातान्त्रिक शासन पद्धति के ही माध्यम से सम्भव है, क्योंकि राजनीतिक न्याय का. मूल तात्पर्य यह है कि सत्ता में प्रत्येक व्यक्ति को भागीदारी का अधिकार तथा बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों को सार्वजानिक पद प्राप्त होना। कानूनी न्याय में कानून वास्तव में ऐसा हो जो लोगों को न्याय देने में मदद करे न कि न्याय देने में रोड़े अटकाए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्लूटो के न्याय सिद्धान्त पर एक निबन्ध लिखिए। (Write an essay on Plato’s concept of Justice)
उत्तर:
प्लूटो का न्याय सिद्धान्त (Plato’s Concept of Justice):
प्लूटो के अनुसार न्याय का सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दी रिपब्लिक’ (The Republic) में न्याय की विस्तृत व्याख्या की है। प्लूटो के अनुसार भूख (Appetite), साहस (Spirit) व विवेक (Wisdom) मानव आत्मा के तीन तत्त्व हैं। इसी प्रकार राज्य में क्रमशः उत्पादन (Producers) सैनिक (रक्षक) (Guardians) तथा शासक (Rulers) तीन वर्ग होते हैं। तीनों वर्गों को अपने-अपने निर्धारित कार्यों को करना होता है। प्रत्यके वर्ग को ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

मानव आत्मा में निहित न्याय व्यक्तित्व के विविध पक्षों जैसे-क्षुधा, साहस और विवेक का समुचित संतुलन और समन्वय उपलब्ध कराता है। प्लूटो की दृष्टि में राज्य के सन्दर्भ में न्याय विभिन्न सामाजिक वर्गों में सामंजस्य स्थापित करता है। जब हर वर्ग अपने कार्य से ही सम्बद्ध रहता है तथा केवल वही कार्य करता है जिसके लिए वह प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक उपयुक्त होता है और दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है तो उस स्थिति में उस राज्य में न्याय चरितार्थ होता है। प्लूटो के न्याय का सिद्धान्त कानूनी न होकर नैतिक है जो कि यह बताता है कि क्या सही है और क्या गलत, क्या उचित है और क्या अनुचित। उचित और सही कार्य को करना न्याय है जबकि अनुचित और गलत कार्य को करना अन्याय है।

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प्रश्न 2.
पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य में न्याय की अवधारणा का अर्थ समझाइए। (Explain the meaning of the concept of Justice in Western perspective)
उत्तर:
अति प्राचिन काल में न्याय का रूप कबीलाई था। तब “दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख” के सिद्धान्त पर कार्य किया जाता था। प्राचीन यूनानी न्याय में सोफिस्टो, पाइथागोरस, प्लूटो और अरस्तू के द्वारा न्याय की धारणा बताई गयी। सोफिस्टो के द्वारा न्याय शक्तिशाली का हित है। पाइथागोरस ने समानता के आधार पर न्याय को परिभाषित किया है। प्लूटो के अनुसार न्याय समाज को एक सूत्र में रखने वाली शक्ति है। न्याय का अर्थ व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्यों को पूरा करना है। अरस्तू ने न्याय दो प्रकार का बताया। प्रथम, समानान्तर न्याय, वह न्याय है जो सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करता है।

दूसरा आनुपातिक न्याय, वह न्याय है जो राजनीतिक जीवन को व्यवस्थित करता है। मध्य युग में ईसाई धर्म के आधार पर न्याय को सामाजिक गुण के रूप में देखा गया। सन्त ऑगस्टाइन ने कहा, “न्याय केवल इसाई राज्य में होता है। वह चर्च को प्रधानता देता है, उसका विचार है, कि राज्य का चर्च के मामलों में हस्तक्षेप न्याय का उल्लंघन है। रोमन धारणा के अनुसार व्यक्ति के अधिकारों की न्यायपूर्वक सुरक्षा ही न्याय है। बीसवीं सदी में कल्याणकारी राज्यों में न्याय की अवधारणा में कानूनी, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक पक्ष भी सम्मिलित. किए गए। विश्व के सभी राज्य, जिनमें भारत भी शामिल है, आज न्याय की पाश्चात्यो अवधारणा को ही मानते हैं। इस अवधारणा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल, कानून पर आधारित शासन तथा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा आवश्यक है।

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प्रश्न 3.
न्याय की अवधारणा के विविध रूपों का वर्णन कीजिए। (Describe the various forms of the concept of Justice)
उत्तर:
न्याय की अवधारणा के विविध रूप (Various forms of concept of Justice):
न्याय की अवधारणा के विविध रूप निम्न प्रकार हैं –

1. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice):
समाज में व्यवस्था तभी बनी रहेगी यदि व्यक्तियों को स्वतन्त्रता और समानता प्रदान की जाए परन्तु यह अव्यावहारिक है। प्राकृतिक स्वतन्त्रता व्यवस्थित समाज के अस्तित्व में आने से पहले की कल्पना हो सकती है।

2. नैतिक न्याय (Moral Justice):
परम्परागत रूप से न्याय की नैतिक धारणा को ही अपनाया जा रहा है। नैतिक न्याय के प्रमुख नियमों में जो आदर्श सम्मिलित हैं, उनमें सत्य बोलना, प्राणिमात्र के प्रति दया का व्यवहार करना, परस्पर प्रेम करना, प्रतिज्ञा पूरी करना, वचन का पालन करना, उदारता व दान का परिचय देना आदि है।

3. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
अरस्तू ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बन्धी (Distributive) न्याय बताया था, जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था। आधुनिक युग में राजनीतिक समाज के सदस्य होने के नाते व्यक्ति द्वारा उसकी योग्यता के अनुसार शासन में भाग लेने, उसके सम्बन्ध में मत व्यक्त करने, चुनाव में अपना मत देने, चुनाव में स्वयं खड़े होने तथा राजकीय पद ग्रहण करने आदि के अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए तथा निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को ही राजनीतिक न्याय कहते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय अत्यन्त: आवश्यक हैं।

4. सामाजिक न्याय (Social Justice):
सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व है। समाज में जाति, धर्म, वर्ग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। दास प्रथा के समय दासों को अन्य नागरिकों से हेय समझा जाता था। संसार के अनेक भागों में अब भी समाज में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समान नहीं है। ये सब सामाजिक अन्याय की स्थितियाँ हैं। सामाजिक न्याय की स्थिति में सबको समाज में उचित स्थान प्राप्त होता है।

5. आर्थिक न्याय (Economic Justice):
आर्थिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन के साधन और सम्पत्ति के वितरण की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें सबको उनके श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके तथा कोई व्यक्ति, समुदाय या वर्ग किसी अन्य व्यक्ति, समुदाय या वर्ग का शोषण न कर सके। सभी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। आधुनिक युग में आर्थिक न्याय का बड़ा महत्त्व है। आर्थिक विषमता होने पर समाज धनी और निर्धन, पूँजीपति और श्रमिकों एवं शोषक और शोषित के वर्गों में विभाजित हो जाता है। फलतः समाज उन्नति नहीं कर सकता।

6. कानूनी न्याय (Legal Justice):
कानूनी न्याय से अभिप्राय है कि कानून न्याय-संगत हो समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हो। किसी भी वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त न हो। कानून जनता द्वारा समय-समय पर परखा जाए न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो ताकि निर्धन व्यक्ति भी धन के अभाव मे कहीं न्याय से वंचित न रहें और धनी वर्ग के शोषण के शिकार न हो जाए।

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प्रश्न 4.
भारत में नागरिकों के सामाजिक न्याय की सुरक्षा के क्या उपाय किए गए हैं? (With measures have been taken in India to secure social justice to its citizens?)
उत्तर:
सामाजिक न्याय का अर्थ है, कि समाज में निर्बल वर्ग के लोगों, अशिक्षितों, निर्धनों को शक्तिशाली वर्ग, शिक्षितों और धनवानों की भाँति उन्नति के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय दिलाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं –

सामाजिक न्याय के उपबन्ध (Provisions of Social Justice):

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार छुआछूत को पूर्णतया समाप्त कर दिया गया है।
  2. अनुच्छेद 16 के अनुसार सरकार का कर्तव्य है कि हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों कि शिक्षा को अधिक उन्नत कर तथा उनके अधिक हितों की रक्षा करे।
  3. अनुच्छेद 15 के अनुसार सरकार का कर्तव्य है, कि दुकानों, होटलों, सार्वजानिक विश्राम गृहों या भोजनालयों, कुओं, तालाबों, स्नानघरों, सड़कों, मनोविनोद के स्थानों में हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों के प्रवेश के लिए कोई रुकावट है तो उसे दूर करे।
  4. अनुच्छेद 25 के अनुसार हिन्दुओं के सब धार्मिक स्थान हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों के प्रवेश के लिए खोल दिए जाएँ।
  5. हरिजन, कबीले और पिछड़ी हुई जातियाँ कोई भी काम-धन्धा और व्यापार कर सकती हैं और उनपर कोई रूकावट नहीं होगी।
  6. अनुच्छेद 19 के अनुसार हरिजनों, कबीलों और पिछड़ी जातियों को राज्य की ओर से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश की मनाही नहीं की जाएगी।
  7. सरकार का यह परम कर्त्तव्य है, कि नौकरियों में पिछड़ी हुई जातियों तथा जनजातियों को उचित प्रतिनिधित्व दे।
  8. संविधान के आरम्भ होने से 10 वर्ष तक अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्यों के विधानमण्डलों में स्थान आरक्षित किए गए थे। हर 10 वर्ष के बाद फिर से संविधान में संशोधन करके यह आरक्षण अभी तक लागू है।
  9. समान कार्य के लिए समान वेतन की नीति अपनायी जा रही है।
  10. कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन कर सकता है।
  11. प्रत्येक जाति एवं सम्प्रदाय को अपनी संस्कृति, भाषा तथा लिपि को सुरक्षित रखने का अधिकार दिया गया है।

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प्रश्न 5.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में न्याय की आवधारणा का वर्णन कीजिए। (Describe the concept of Justice in Indian Perspective)
उत्तर:
हिन्दू धर्म की स्मृतियाँ के अनुसार कानून धर्म की एक शाखा है। विभिन्न स्मृतियाँ, धर्म के नियमों के अनुसार ही न्याय व्यवस्था को निश्चित करती हैं। स्मृतियों के अनुसार दण्ड की व्यवस्था न्याय से सम्बन्धित है। इनके अनुसार राजा को दैवीय गुणों के अनुसार कार्य करना चाहिए। जो भी प्राणी अपने स्वधर्म का पालन नहीं करता था उसे धर्म के नियमों के अनुसार दण्डित किया जाता था। मनुस्मृति में फौजदारी और दीवानी कानूनों से सम्बन्धित धर्म-कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए कानून विधि, दण्ड-विधि की व्यवस्था की गई है।

मनु ने अपराध के अनुपात के अनुसार दण्ड-फटकार लगाना, जुर्माना करना, वनवास देना तथा मृत्युदण्ड का विधान किया है, परन्तु यह दण्ड वर्णमूलक व्यवस्था के अनुसार समय, स्थान व उद्देश्य के आधार पर दिए जाते थे। समान अपराध पर, जातिगत आधार पर असमान दण्ड की व्यवस्था थी। ब्राह्मणों को मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था, परन्तु भयंकर अपराध के लिए ब्राह्मण को मौत की सजा जल में डुबोकर मारने की थी। जुआ खेलने वालों को कोड़ों की सजा दी जाती थी। उत्तराधिकार कानून की सूक्ष्म व्यवस्था थी जिसमें बड़े भाई की सम्पत्ति के अलावा कुँआरी बहनों का भी भाग होता था। न्याय प्रशासन का उद्देश्य सुधारात्मक था। मनु ने चार प्रकार के दण्ड बताए हैं –

  1. वाक दण्ड
  2. धिक दण्ड
  3. धन दण्ड
  4. मृत्यु दण्ड न्यायालयों के चार श्रेणी थे

1. राजा द्वारा नियुक्त अधिकारी:
सभा की अध्यक्षता राजा करता था। सभा में वेदों, धर्म-शास्त्रों और स्मृतियों के योग्य, निष्पक्ष, अनुभवी ब्राह्मण सलाहकार होते थे।

2. पूग-पूग:
अथवा गण जाति वालों के समूह को कहते थे । इनका अलग न्यायालय होता था।

3. श्रेणी:
एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाला व्यक्ति या समूह चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो, श्रेणी कहलाता था। उनके लिए अलग न्यायालय की व्यवस्था थी।

4. कुल:
चौथे प्रकार का न्यायालय था। इसमें जाति विशेष के बन्धु-बन्धव होते थे। मनुस्मृति में यह भी बताया गया है कि न्यायकर्ताओं की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए। न्यायालयों के संगठन में सबसे नीचे की इकाई एक ग्राम तक ही सीमित थी। इसका न्यायिक अधिकारों के पास विवाद भेजा जाता था। उसके बाद अति, सहस्त्राधिपति के पास विवाद भेज दिया जाता था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा है? न्यायपूर्ण समाज वह है जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान ही घटती हुई भावना मिलकर एक करुणा भरे समाज का निर्माण करें।
(क) डॉ. भीमराव अम्बेदकर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) पंडित जवाहर लाल नेहरू
(घ) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
उत्तर:
(क) डॉ. भीमराव अम्बेदकर

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 2.
‘न्याय का सिद्धान्त’ नामक पुस्तक के लेखक कौन है?
(क) आस्टिन
(ख) प्रोंधा
(ग) जॉन राल्स
(घ) डायसी
उत्तर:
(ग) जॉन राल्स

प्रश्न 3.
“सामाजिक न्याय’ का प्रमुख तत्व क्या है?
(क) अवसर की समानता
(ख) विधि के समक्ष समानता
(ग) विधि की तार्किकता
(घ) कल्याणकारी विधिक प्रावधान
उत्तर:
(क) अवसर की समानता

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 4.
राजनीतिक न्याय का सरोवर है –
(क) कानून न्यायसंगत होने चाहिए
(ख)कानून के अनुसार न्याय मिलना चाहिए
(ग) जनता की राज्य सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए
(घ) बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समाज में समान अवसर एवं सुख सुविधा उपलब्ध है
उत्तर:
(ग) जनता की राज्य सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

Bihar Board Class 11 Sociology समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक श्रेणी को परिभाषित कीजिए?
उत्तर:
सामाजिक श्रेणी के अंतर्गत उन व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है जिनकी समाज में समान प्रस्थिति तथा भूमिका होती है। सामाजिक श्रेणी एक सांख्यिकीय संकलन है। इनमें व्यक्तियों की विशिष्ट विशेषताओं के आधार पर उनका वर्गीकरण किया जाता है। उदाहरण के लिए समान व्यवसाय वाले अथवा समान आय वाले व्यक्ति ।

प्रश्न 2.
‘समग्र’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समग्र ऐसे व्यक्यिों का संकलन है, जो एक ही समय व एक ही जगह पर रहते हैं, लेकिन उनमें एक दूसरे के साथ व्यक्तिगत संबंध नहीं पाए जाते हैं। इरविंग गफमेन के अनुसार समग्र व्यक्तियों का ऐसा संकलन है, जिन्में एक-दूसरे के प्रति अंतः क्रिया नहीं पायी जाती है। उदाहरण के लिए 5 फुट लम्बे सभी पुरुषों का संकलन समग्र कहलाएगा।

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प्रश्न 3.
प्राथमिक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह मे आमने-सामने के घनिष्ठ संबंध होते हैं। प्राथमिक समूह का आकार छोटा होता है। इसके सदस्यों के उद्देश्य एवं इच्छाएँ साधारणतया समान होती हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री कूले के अनुसार, “प्राथमिक समूह से मेरा तात्पर्य उन समूहों से है जो घनिष्ठ, आमने-सामने के संबंध एवं सहयोग के जरिए लक्षित होते हैं। वे प्राथमिक कई दृष्टिकोणों से हैं, लेकिन मुख्य रूप से इस कारण से है कि वे व्यक्ति की समाजिक प्रकृति तथा आदेशों के निर्माण करने में मौलिक हैं……….”

प्रश्न 4.
कूले द्वारा वर्णित प्राथमिक समूह की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री कूले ने अपनी पुस्तक में प्राथमिक समूह की निम्नलिखत विशेषताएँ बतायी हैं –

  • घनिष्ठ आमने-सामने के संबंध
  • तुलनात्मक रूप से स्थापित
  • सीमित आकार एवं सदस्यों की सीमित संख्यासदस्यों के माध्य आत्मीयता
  • सहानुभूति तथा पारस्परिक अभिज्ञान
  • हम की भावना

प्रश्न 5.
द्वितीयक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
द्वितीयक समूह अपेक्षाकृत आकार में बड़े होते हैं। इनमें घनिष्ठता की कमी पायी जाती है। व्यक्तियों के बीच संबंध अस्थायी, अव्यक्तिगत तथा औपाचारिक होते हैं । इनका लक्ष्य विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति होता है तथा सदस्यता ऐच्छिक होती है। आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “वे समूह जो घनिष्ठता की कमी का अनुभव प्रस्तुत करते हैं, तो द्वितीयक समूह कहलाते हैं।”

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प्रश्न 6.
औपचारिक समूह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
औपचारिक समूह या तो विशाल होते हैं, या विशाल संगठन का एक हिस्सा होते हैं, उदाहरण के लिए श्रम-संगठन तथा सेना। औपचारिक समूह में सदैव एक नियामक स्तरीकृत संरचना अथवा प्रस्थिति व्यवस्था पायी जाती है।

प्रश्न 7.
अनौपचारिक स्तरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अनौपचारिक समूह अपेक्षाकृत लघु होते हैं तथा इनका निर्माण अचानक हो जाता है। इन समूहों में समान उद्देश्य तथा पारस्परिक व्यवहार के आधार पर अंतः क्रियाएँ पायी जाती हैं, उदाहरण के लिए बच्चों के खेल समूह तथा टीम आदि अनौपचारिक समूह हैं। अनौपचारिक समूह एक सामाजिक इकाई हैं तथा इनमें समूह की समस्त विशेषताएँ पायी जाती हैं। इसके सदस्यों में अंतर्वैयक्तिक संबंध, संयुक्त गतिविधियाँ तथा समूह से संबद्ध होने की भावना होती है।

प्रश्न 8.
सामाजिक स्तरीकरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सामाजिक स्तरीकरण से तात्पर्य भौतिक या प्रतीकात्मक लाभों तक पहुँच के आधार पर समाज में समूहों के बीच की संरचनात्मक असमानताओं के अस्तित्व से है। अतः स्तरीकरण को सरलतम शब्दों में, लोगों के विभिन्न समूहों के बीच की संरचनात्मक असमानताओं के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
प्रस्थिति किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रस्थिति समाज या एक समूह में एक स्थिति है। प्रत्येक समाज और प्रत्येक समूह में ऐसी कई स्थितियाँ होती हैं और व्यक्ति ऐसी कई स्थितियों पर अधिकार रखता हैं। अतः प्रस्थिति से तात्पर्य सामाजिक स्थिति और इन स्थितियों से जुड़े निश्चित अधिकरों और कर्तव्यों से है। उदाहरण के लिए, माता की एक प्रस्थिति होती है जिसमें आचरण के कई मानक होते हैं और साथ ही निश्चित जिम्मेदारियाँ और विशेषाधिकार भी होते हैं।

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प्रश्न 10.
भूमिका किसे कहते हैं?
उत्तर:
भूमिका प्रस्थिति का एक सक्रिय रूप हैं। प्रस्थितियाँ ग्रहण की जाती हैं एवं भूमिकाएँ निभाई जाती हैं। हम यह कह सकते हैं। प्रस्थिति एक संस्थागत भूमिका है। यह वह भूमिका है जो समाज में या समाज की किसी विशेष संस्था में नियमित, मानकीय और औपचारिक बन चुकी है।

प्रश्न 11.
सामाजिक नियंत्रण से क्या आशय है?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य सामाजिक प्रक्रियाओं, तकनीकों और रणनीतियों से है जिनके द्वारा व्यक्ति या समूह के व्यवहार को नियमित किया जाता है। इनका अर्थ व्यक्तियों और समूहों के व्यवहार को नियमित करने के लिए बल प्रयोग से है और समाज में व्यवस्था के लिए मूल्यों व प्रतिमानों को लागू करने से है।

प्रश्न 12.
सामाजिक नियंत्रण के कोई दो औपचारिक साधन बताइए?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण के दो औपचारिक साधन निम्नलिखित हैं –
1. कानून – कानून सामाजिक नियंत्रण का एक औपचारिक तथा सशक्त साधन है। वर्तमान समय में द्वितीयक तथा तृतीयक समूह लगातार महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। कानून के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था के लिए प्रारूप नियमों तथा दंडो की व्यवस्था की जाती है। कानून का शासन तथा कानून के सम्मुख समानता आधुनिक युग की विशेषताएँ हैं।

2. राज्य – राज्य सामाजिक नियंत्रण का औपचारिक साधन है। राज्य संप्रभु होता है अतः समस्त संस्थाएँ समितियाँ तथा समुदाय राज्य क अधीन होते हैं। राज्य के नियमों, व्यवस्थाओं तथा कानून के सम्मुख समानता आधुनिक युग की विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 13.
औपचारिक सामाजिक नियंत्रण क्या है?
उत्तर:
औपचारिक सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत राज्य, कानून, सरकार, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका व संवैधानिक व्यवस्थाओं को सम्मिलित किया जाता हैसामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों में विधिसम्मत व्यवस्था का अनुसरण किया जाता है। प्रत्येक संस्था तथा निकाय आदि के कार्य सुपरिभाषित तथा स्पष्ट होते हैं।

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प्रश्न 14.
अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण क्या है?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों का विकास समाज की आवश्यकताओं के अनुसार स्वतः होता रहता है। प्राथमिक समूहों तथा आदिवासी समाजों में समाजिक नियंत्रण के अनौपचरिक साधन काफी प्रभावशाली होते हैं।

लोकरीतियों, लोकाचारों, प्रथाओं तथा परम्पराओं आदि को समाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों में सम्मिलित किया जाता है। ई.ए. रॉस के अनुसार, “सहानुभूति, सामाजिकता, न्याय की भावना तथा क्रोध अनुकूल परिस्थितियों में स्वयं एक वास्तविक प्राकृतिक व्यवस्था अथवा वह व्यवस्था है जिसका कोई ढाँचा या योजना नहीं होती ।”

प्रश्न 15.
समाजशास्त्र में हमें विशिष्ट शब्दावली और संकल्पणाओं के प्रयोग की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
समाजशास्त्र के वे विषय जिन्हें सामान्य लोग नहीं जानते तथा जिनके लिए सामान्य भाषा में कोई शब्द नहीं है, उनके लिए यह आवश्यक है कि समाजशास्त्र की अपनी एक शब्दावली हो शब्दावली समाजशास्त्र के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह विषय अपने आपमें अपने अनेक संकल्पनाओं को जन्म देता है।

प्रश्न 16.
सामाजिक समूह से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक व्यक्ति सामान्य उद्देश्य या स्वार्थ हेतु एक-दूसरे से अंतः क्रिया करते हैं तथा एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं, तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 17.
सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सामाजिक समूह की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना
  • लोगों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंधों का होन
  • सदस्यों के बीच स्वार्थ अथवा हित का पाया जाना। पारस्परिक हित समूह के संबंध-सूत्र होते है
  • समूह में श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण पाया जाता है
  • समूह में पारस्परिक जागरूकता पायी जाती है।

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प्रश्न 18.
मानव द्वारा समूहों की रचना क्यों की गई?
उत्तर:
मनुष्यों द्वारा समूहों की रचना निम्नलिखित कारणों से की गई –

  • मानव आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु।
  • मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए प्रारम्भ से ही दूसरे मनुष्यों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए शिशु का पालन-पोषण नहीं हो सकता है।
  • समूह मनुष्यों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • समूह द्वारा भाई-चारे की भावना विकसित होती है जो सामाजिक अंतः क्रिया के लिए जरूरी है।

प्रश्न 19.
समूह की कोई दो विशेषताएँ बताइए?
उत्तर:
समूह की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • कोई एक व्यक्ति समूह की रचना नहीं कर सकता। समूह के सदस्यों के बीच पारस्परिक अंतः क्रिया पायी जाती है। परिवार, जाति तथा नातेदारी आदि समूह के उदाहरण हैं।
  • समूह के सदस्यों के संबंधों में स्थायित्व पाया जाता है। समूह की सदस्यता औपचारिक अथवा अनौपचारिक हो सकती है।

प्रश्न 20.
समूह की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समूह से हमारा तात्पर्य व्यक्तियों के उस संजलन से है जो एक-दूसरे के साथ सामाजिक संबंध रखते हैं।” दूसरे शब्दों में समूह वह है जसमें एकीकृत करने वाले संबंधों के आधार पर कुछ लोग एक स्थान पर एकत्रित होता है।

प्रश्न 21.
सामाजिक नियंत्रण के कोई दो उद्देश्य बताइए?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण के दो उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
(i) सामाजिक व्यवस्था को कायम रखना-किबाल यंग के अनुसार, “सामाजिक नियंत्रण का उद्देश्य एक विशिष्ट समूह अथवा समाज की समरूपता, एकता एवं निरंतरता को लाना है।” अतः प्रत्येक समाज अथवा समूह सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखता है। समाज के सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सामाजिक व्यवस्था, मूल्यों तथा प्रतिमानों के अनुरूप कार्य करें।

(ii) सामूहिक निर्णयों का पालन-सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत समाज के सदस्य सामूहिक निर्णयों का पालन करते हैं। सामूहिक निर्णयों के पालन करने से सामाजिक एकरूपता तथा व्यवस्था कायम रहती है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक युग में प्राथमिक समूह के क्या-क्या कार्य हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह समस्त सामाजिक संगठन का केन्द्र बिंदु है। इसका आकार लघु होता है तथा इसमें सदस्यों की संख्या कम होती है।

प्राथमिक समूहों के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं –

  • व्यक्ति के विकास में प्राथमिक समूहों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, उदाहरण के लिए परिवार व्यक्ति के विकास की नर्सरी है।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक नियंत्रण के महत्त्वपर्ण अभिकरण हैं, उदाहरण के लिए परिवार तथा मित्र मंडली आदि सदस्यों को समाज के आदर्शों तथा मूल्यों से अवगत कराते हैं।
  • प्राथमिक समूह व्यक्तियों को भावनात्मक तथा मानसिक संतुष्टि प्रदान करते हैं।
  • प्राथमिक समूह व्यक्तियों को समाज में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए मंच प्रदान करते हैं प्राथमिक समूहों में व्यक्तियों में समाजिक तथा संस्कारो का पाठ पढ़ाया जाता है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक समूह और द्वितीयक समूह की तुलना कीजिए?
उत्तर:
प्राथमिक समूह तथा द्वितीयक समूह में निम्नलिखित अन्तर हैं –
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प्रश्न 3.
समूह किस प्रकार बनते है?
उत्तर:
(i) मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जन्म के समय केवल एक जैविक समावयव होता है, लेकिन सामाजिक समूहों में उसका समाजीकरण होता है।

(ii) समूह में मनुष्य की जैविक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। इस प्रकार समूहों का निर्माण सामान्य स्वार्थों के कारण होता
है। एडवर्ड सेपीर के अनुसार, “किसी समूह का निर्माण इस तथ्य पर आधारित होता है कि कोई स्वार्थ समूह के सदस्यों को परस्पर बांधे रखता है।”

(iii) समूह निर्माण दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा कुछ सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जाता है। बोगार्डस के अनुसार, “एक सामाजिक समूह दो या दो अधिक व्यक्तियों की ऐसी संख्या को कहते हैं जिनका ध्यान कुछ सामान्य उद्देश्यों पर हो तथा जो एक-दूसरे को प्रेरणा दें, जिनमें सामान्य निष्ठा हो तथा जो सामन्य क्रियाओं में सम्मिलित हों।”

(iv) सामाजिक समूह के निर्माण के लिए सदस्यों में पारस्परिक चेतना तथा अंतः क्रिया का होना बहुत आवश्यक है। केवल भौतिक निकटता के द्वारा समूह का निर्माण नहीं होता है।

(v) समूह के सदस्यों में सहयोग, संघर्ष तथा प्रतिस्पर्धा पायी जाती है।

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प्रश्न 4.
“व्यक्ति का जीवन समूह का जीवन है। चर्चा कीजिए?
उत्तर:
(i) व्यक्ति तथा समूह एक-दूसरे के पूरक हैं। समूह वास्तविक रूप में समाजिक जीवन के केंद्र बिंदु हैं।

(ii) समूह का अर्थ जैसा कि मेकाइवर तथा पेज ने लिखा है कि “मनुष्यों के ऐसे संकलन से है जो एक-दूसरे के साथ सामाजिक संबंध रखते हैं।

(iii) समूह अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिए समूह पर निर्भर रहता है। समूह में ही व्यक्ति अपनी क्षमताओं तथा उपलब्धियों का प्रदर्शन करता है। हॉर्टन तथा हंट के अनुसार, “समूह व्यक्तियों का संग्रह अथवा श्रेणियाँ होती हैं, जिनमें सदस्यता एवं अतः क्रिया की चेतना पायी जाती है।”

(iv) समूहों में पाया जाने वाला विभेदीकरण, श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण सामाजिक जीवन व्यतीत करने का अपरिहार्य तत्त्व है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि समूह द्वारा वह सब प्रस्तुत किया जाता है, जो मानव-जीवन के लिए आवश्यक है।

(v) पारस्परिक संबंध, हम की भावना, अंत: क्रिया, सामान्य हित तथा समूह के आदर्श नियम व्यक्ति के सामजिक तथा जैविक अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। आगबर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “……. जब कभी दो या दो से अधिक व्यक्ति एक साथ मिलते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।

सारांशः समूह तथा ब्यक्ति इस प्रकार एक-दूसरे के पूरक हैं कि एक के अभाव में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 5.
समूह के लिए मानकों की सार्थकता बताइए?
उत्तर:
मानक समाज तथा समूह में व्यक्ति का वांछित तथा अपेक्षित व्यवहार है। वे निर्देश, जिनका अनुसरण व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के साथ अंतः क्रिया करते समय करता है, मानक कहलाते हैं।

मानक वस्तुतः समाज में व्यवहार के वे पुंजी है जो व्यक्तियों को परिस्थिति में विशेष में व्यवहार करने के बारे में बतलाता है। ब्रूम तथा सेल्जनिक के अनुसार, “आदर्श मानक व्यवहार की वे रूप-रेखाएँ हैं जो उन सीमाओं का निर्धारण करती हैं जिनके अंदर व्यक्ति अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु विकल्पात्मक विधियों की खोज कर सकता है।”

समूह के लिए मानकों की सार्थकता का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) सभी समाजों के मानकों की एक सुपरिभाषित व्यवस्था होती है जो उचित तथा म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11 9 31 अनुचित नैतिक एवं अनैतिक में स्पष्ट भेद करती है। इनका अभाव में सामाजिक व्यवस्था अराजकता ग्रसित हो जाएगी।

(ii) मानक वास्तव में समूह द्वारा मानकीकृत अवधारणाएँ हैं। मानकों के द्वारा व्यक्तियों का व्यवहार सीमित किया जाता है । डेविस के अनुसार, “सामाजिक मानक एक प्रकार का नियंत्रण . है। मानव समाज इन्हीं नियंत्रणों के आधार पर अपने सदस्यों के व्यवहार पर इस प्रकार अंकुश लगाता है, जससे वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान के रूप में कार्य करते रहें, भले ही उनकी प्राणीशास्त्रीय जरूरतों में इसे बाधा पहुँचती है।”

(iii) मानकों का औचित्य समाज तथा समूह के अनुसार बदलता रहता है।

(iv) जो मानक हमें एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करने का निर्देश देते हैं तथा कुछ कार्य करने से रोकते हैं, आदेशात्मक मानक कहलाते हैं। उदाहरण के लिए यातायात के नियमों के अनुसार हम वाहनों को बाई ओर चला सकते हैं लेकिन लालबत्ती होने पर वाहन चलाना यातायात के नियमों के विरुद्ध है। निषेधात्मक मानक है।

(v) मानकों ही द्वारा व्यक्ति के व्यवहार का समाज में निर्धारण होता है। विशेष सामाजिक परिस्थितियों के लिए विशेष मानक निश्चित होते हैं। उहारण के लिए, किसी व्यक्ति के अंतिम संस्कार के समय अन्य व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे उदास तथा दुःखी होंगे।

(vi) मानक सार्वभौम होते हैं। बीरस्टीड के असार, “जहाँ आदर्श मानक नहीं है, वहाँ समाज भी नहीं है।”

(vii) सामाजिक मानकों का संबंध सामाजिक उपयोगिता से है।

(viii) आदर्श मानक सामाजिक ताने-बाने को दृढ़ता प्रदान करते हैं।

(ix) मानक व्यक्तियों की मनोवृत्तियों तथा उद्देश्यों को प्रभावित करते हैं।

(x) मानक विहीन समाज असंभव है।

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प्रश्न 6.
टिप्पणी लिखिए – (i) प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति, (ii) मानक तथा (iii) भूमिका कुलक।
उत्तर:
(i) (क) प्रदत्त तथा अर्जित प्रस्थिति – समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धारण निम्नलिखित दो प्रक्रियाओं के द्वारा होता है

प्रदत प्रस्थिति – लेपियर के अदुसार, “वह परिस्थिति जो एक व्यक्ति के जन्म पर या उसके कुछ क्षण बाद ही प्रदत्त होती है, विस्तृत रूप में निश्चित करती है कि उसका समाजीकरण कौन-सी दिशा लेगा।”

व्यक्ति की प्रदत्त स्थिति क निर्धारण में निम्नलिखित तत्त्व महत्त्वपूर्ण हैं –

  • लिंग
  • आयु
  • नातेदारी तथा
  • सामाजिक कारक

(ख) (ii) अर्जित प्रस्थिति-अर्जित प्रस्थिति व्यक्ति अपने निजी परिश्रम तथा योग्यता के आधार पर प्राप्त करता है। अर्जित प्रस्थिति आधुनिक समाज की विशेषता है। अर्जित प्रस्थिति के अंतर्गत व्यक्ति के समूह में स्थिति उसमें व्यक्तिगत गुणों के आधार पर निश्चित की जाती है। जिन समाजों के श्रम विभाजन, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण उच्च श्रेणी का होता है, वहाँ अर्जित प्रस्थिति अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।

मानक – वे निर्देश जिनका पालन समाज में व्यक्ति अन्य व्यक्यिों के साथ अंतः क्रिया करते समय करता है, मानक कहलाते हैं। मानकों द्वारा इस बात का निर्धारण किया जाता है कि परिस्थिति विशेष में व्यक्ति का किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। समाज तथा समूह की प्रकृति के अनुसार मानक बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए एक सामज में किसी कार्य को सामाजिक मान्यता मिलती है, जबकि दूसरे समाज में वही कार्य निंदनीय हो सकता है। मानक दो प्रकार के होते हैं –

  • आदेशात्मक मानक तथा
  • निषेधात्मक मानक

बर्टन राइट के अनुसार, “सामाजिक मानकों की एक सामान्य यह है कि वे व्यवहार के उचित तरीकों को स्पष्ट करते हैं।”

मानकों की विशेषताएँ –

  • उचित तथा अनुचित के आधार पर व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करना।
  • मानक सामाजिक नियंत्रण के प्रभाव साधन हैं।
  • मानक सामाजिक संरचना को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • मानकों का विकास सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार होता है।
  • कुछ मानकों की प्रकृति सर्वमान्य होती है।
  • मानकों में समाज के नियमों, आदर्शों, विचारों तथा मूल्यों का समावेश होता है।
  • सामाजिक मानक समूह की अपेक्षाएँ हैं।

(iii) भूमिका-कुलक – समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति के अनुसार ही उसका अपेक्षित व्यवहार होता है। लुंडबर्ग के अनुसार, “सामाजिक भूमिका किसी समूह अथवा प्रस्थिति में व्यक्ति से प्रत्याशित व्यवहार का प्रतिमान है।” डेविस के अनुसार, भूमिका वह ढंग है जिसके अनुसार कोई व्यक्ति अपने पद के दायित्वों को वास्तविक रूप से पुरा करता है।” प्रत्येक प्रस्थिति से भूमिका अथवा भूमिकाएँ जुड़ी रहती हैं। व्यक्ति की प्रस्थिति संबद्ध समस्त भूमिकाएँ मिलकर भूमिका-कुलक का निर्माण करती है।

रॉबर्ट मर्टन के अनुसार, “भूमिका कुलक संबंधों का वह पूरक है जिसे व्यक्ति किसी एक सामाजिक स्थिति के धारक के कारण प्राप्त करता है।” उदाहरण के लिए एक स्कूल का विद्यार्थी होने के कारण उस विद्यार्थी होने के कारण उस विद्यार्थी को कक्षध्यक्ष अन्य शिक्षकाओं के इस कुलक को भूमिका-कुलक कहते हैं। अपने परिवार में इस विद्यार्थी का भूमिका-कुलक पृथक् होगा । वह माता-पिता, भाई-बहन तथा परिवार के अन्य सदस्यों से अंतः क्रिया करेगा।

प्रश्न 7.
अंत: समूह तथा बाह्य समूह में अंतर है –
उत्तर:
अंतः समूह तथा बाह्य समूह में निम्नलिखित अंतर हैं –
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प्रश्न 8.
कुछ समाजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण को अपरिहार्य क्यों मानते हैं?
उत्तर:
कुछ सामजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण को निम्नलिखित कारणों से अपरिहार्य मानते हैं –
(i) मानव समाज में असमानता प्रारम्भ से ही पायी जाती है। असमानता पाये जाने का प्रमुख कारण यह है कि समाज में भूमि, धन, संमत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा जैसे संसाधनों का वितरण . समान नहीं होता है।

(ii) विद्वानों का मत है कि यदि किसी समाज के समस्त सदस्यों को समानता का दर्जा दे भी दिया जाए तो कुछ समय पश्चात् उस समाज के व्यक्तियों में असमानता आ जाएगी। इस प्रकार में असमानता एक सामाजिक तथ्य है।

(iii) गम्पलोविज तथा ओपेनहीमर आदि समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण की शुरूआत एक समूह द्वारा दूसरे समूह पर हुई।

(iv) जीतने वाला समूह अपने को उच्च तथा श्रेष्ठ श्रेणी का समझने लगा। सीसल नार्थ का विचार है कि “जब तक जीवन का शांति पूर्ण क्रम चलता रहा, तब तक कोई तीव्र तथा स्थायी श्रेणी-विभाजन प्रकट नहीं हुआ।”

(v) प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस का मत है कि सामाजिक अचेतना अचेतन रूप से अपनायी जाती है। इसके माध्यम से विभिन्न समाज यह बात कहते हैं कि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पदों पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का नियुक्त किया गया है । इस प्रकार प्रत्येक समाज में सामाजिक स्तरीकरण अपरिहार्य है।

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प्रश्न 9.
स्तरीकरण की खुली व बंद व्यवस्था में अंतर स्पष्ट किजिए?
उत्तर:
स्तरीकरण की खुली तथा बंद व्यवस्था में अग्रलिखित अंतर है –
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प्रश्न 10.
औपचारिक तथा अनौपचारिक समूहों में क्या अंतर स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
औपचारिक तथा अनौपचारिक समूहों में निम्नलिखित अंतर हैं –
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प्रश्न 11.
प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति में अंतर बताइए ? उचित उदाहरण देकर समझाए ?
उत्तर:
(i) प्रदत्त प्रस्थिति – प्रदत्त प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जो किसी व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर या आयु, लिंग, वंश; जाति तथा विवाह आदि के आधार पर प्राप्त होता है। लेपियर के अनुसार, “वह स्थिति जो एक व्यक्ति जन्म पर या उसके कुछ ही क्षण बाद अभिरोपित होती है, विस्तृत रूप में निश्चित करती है कि उसका समाजीकरण कौन सी दिशा लेगा। अपनी संस्कृति के अनुसार-पुलिंग या स्त्रिीलिंग निम्न या उच्च वर्ग के व्यक्ति के रूप में उसका पोषण किया जो सकेगा। वह कम या अधिक प्रभावशाली रूप में अपनी उस स्थिति से समजीकृत होगा जो उस पर अभिरोपित है।”

प्रदत्त प्रस्थिति का निर्धारण सामाजिक व्यवस्था के मानकों द्वारा निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उच्च जाति में जन्म के द्वारा किसी व्यक्ति को समाज में जो प्रस्थिति प्राप्त होती है वह उसकी प्रदत्त प्रस्थिति है। इसी प्रकार एक धनी परिवार में जन्म लेने वाले बालक की। सामाजिक प्रस्थिति एक निर्धन परिवार में जन्म लेने वाले बालक से भिन्न होती है।

(ii) अर्जित प्रस्थिति अर्जित प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जिसे व्यक्ति अपने निजी प्रयासों से प्राप्त करता है। लेपियर के अनुसार, “अर्जित प्रस्थिति वह स्थिति है, जो साधारणतः लेकिन अनिर्वायता: नहीं किसी व्यक्तिगत सफलता के लिए, इस अनुमान पर पुरस्कारस्वरूप स्वीकृत होती है कि जो सेवाएँ अपने अतीत में की सब भविष्य में भी जारी रहेगी। “उदाहरण के लिए कोई भी व्यक्ति अपने निजी प्रयासों के आधार पर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, अधिकरी आदि बन सकता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक नियंत्रण प्राथमिक समूहों में कैसे कार्य करते हैं?
उत्तर:
(i) प्राथमिक समूहों में सामाजिक नियंत्रण काफी अधिक होता है। परिवार, धर्म वैवाहिक नियम, जनरीतियाँ, रूढ़ियाँ प्रथाएँ गोत्र तथा पड़ोस आदि प्राथमिक समूह हैं।

(ii) प्राथमिक समूह व्यक्ति के व्यवहार तथा सामाजिक आचरण पर कठोर नियंत्रण रखते हैं। पी. एच. लैडिस के अनुसार, “जितना ही एक समूह अधिक समरस होता है उतनी ही अधिक कठोर तथा प्रभावी सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था होती है।”

(iii) प्रेम, स्नेह, सहानुभूति, ईमानदारी, निष्ठा, विनम्रता तथा न्याय आदि समूहों के प्राथमिक आदर्श होते हैं। प्राथमिक समूहों में एक-दूसरे की भावनाओं तथा मान-मर्यादा का ध्यान रखा जाता है। उदाहरण के लिए परिवार की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए युवक-युवतियाँ अन्तर्जातीय विवाह के पक्ष में होते हुए भी ऐसा इसलिए नहीं करते हैं, क्योंकि इससे उनके माता-पिता की भावनाओं को ठोस पहुंचेगी।

(iv) प्राथमिक समूहों में प्रतिष्ठा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति ऐसे कार्य नहीं करते हैं जिनके उनके परिवार, जाति या समुदाय की प्रतिष्ठा का धब्बा लगे। व्यक्ति यह भी नहीं चाहते हैं कि दूसरे लोग उनका मजाक करें अथवा उनके बारे में अफवाहें उड़ाएँ । प्राथमिक समूह के लोग यह भी सोचते हैं कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं अथवा क्या मत रखते हैं।

(v) हँसी भी एक अत्यधिक प्रभावशाली समाजिक नियंत्रण है। कोई भी व्यक्ति अपने समूह में हँसी का पात्र नहीं बनना चाहता है। लैडिस क अनुसार, “हँसी एक प्रसन्नमुखी सिपाही है, ….. यह व्यक्ति की बुद्धिमत्ता की माप है तथा कभी-कभी एक भंयकर हथियार सिपाही है,” . इस प्रकार हम कह सकते है कि सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन तथा विधियाँ प्राथमिक समूहों में प्रभावशाली ढंग से कार्य करते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

प्रश्न 13.
सामाजिक नियंत्रण में रीति-रिवाजों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
(i) रीति-रिवाज सामाजिक नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रीति-रिवाज प्राथमिक समूहों में अत्यधिक प्रभावी होते हैं।

(ii) रीति-रिवाज सामूहिक व्यवहार के रूप में समाज में मान्यता प्राप्त कर लेते हैं तथा व्यक्ति इन्हें बिना सोचे-विचारे स्वीकार कर लेता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज से मान्यता प्राप्त कार्य करने की विधियाँ ही समाज की प्रथाएँ हैं।”

(iii) रीति-रिवाजों को सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में स्वीकार कने के पीछे एक मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है। व्यक्ति साधारणतया यह सोचते हैं कि जिस कार्य को उसे पूर्वजों के द्वारा किया गया तथा उसमें उन्हें लाभ हुआ है तो उन कार्यों को जारी रखना चाहिए । इस प्रकार रीति-रिवाजों का पालन करने के पीछे दो भावनाएँ निहित हैं –

  • पूर्वजों की भावनाओं का समान करना।
  • रीति-रिवाजों का स्थायित्व तथा उपयोगिता।

(iv) रीति-रिवाज समाजिक विरासत के. भंडार हैं। इनके द्वारा संस्कृति का संरक्षण किया जाता है तथा उसे (स्वीकृति को) आने वाली पीढ़ी का हस्तांतरित कर दिया जाता है। बोगार्डस के अनुसार, “रीति-रिवाजों तथा परंपराएँ समूह के द्वारा स्वीकृत नियंत्रण की वे पद्धतियाँ है जो सुव्यवस्थिति हो जाती हैं तथा जिन्हें बिना सोचे-विचारे मान्यता प्रदान कर दी जाती है तथा जो. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती हैं।”

(v) रीति-रिवाजों व्यक्ति के संपूर्ण जीवन के चारों तरफ एक ताना-बाना बुन देते हैं। व्यक्ति के जीवन से मृत्यु तक रीति-रिवाजों का न टूटने वाला सिलसिला जारी रहता है। रीति-रिवाज उनकी मनोवृति, संस्कार तथा आचार, व्यवहार को प्रभावित करते हुए सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख साधन हैं। कोई भी समूह, संप्रदाय तथा समाज रीति-रिवाजों से मुक्त नहीं है। बेकन ने रीति-रिवाजों को ‘मनुष्य के जीवन का प्रमुख न्यायाधीश’ माना है जिन-जातियों में रिति-रिवाजों के उल्लंघन की कल्पना की नहीं की जा सकती है।
अतः हम कह सकते हैं कि समाजिक नियंत्रण में रीति-रिवाजों की महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावशाली भूमिका है।

प्रश्न 14.
लिंग के आधार पर स्तरीकरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर:

  • लिंग के आधार पर भी सामाजिक संस्तरण किया जाता है। इसके अंतर्गत पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग में अंतर किया जाता है।
  • महिला आंदोलन के कारण लिंग पर आधारित भेदभावों को हटाने का सतत् प्रयास किया जा रहा है।
  • वर्तमान समाय में लिंग भेद की अवधारणा जैविक भिन्नता से अलग हो गई है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार भिन्नता भूमिकाओं तथा संबंधों के संदर्भ में देखी जानी चाहिए।
  • लिंग की भूमिकाएं अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं लेकिन लिंग आधारित स्तरीकरण सार्वभौमिक होता है। उदाहरण के लिए, पितृसत्तात्मक समाजों में पुरूषों के कार्यों को स्त्रियों की अपेक्षा अधिक महत्त्व प्रदान किया जाता है।
  • समाज में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा संस्कृतिक संरचनाओं पर पुरुषों का दबदबा कायम रहता है।
  • लिंग की समानता के समर्थक शिक्षा, सार्वजनिक अधिकरों में भागीदारी तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए स्त्रियों को समर्थ बनाए जाने के हिमायती हैं।
  • वर्तमान समय में लिंग पर आधारित असमानताओं को हटाने की बात अधिक जोरदार तरीके से उठायी जा रही है।

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प्रश्न 15.
समाजिक नियंत्रण समाज में किस प्रकार कार्य करता है?
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण समाज में निम्नलिखित प्रकार से कार्य करता है –

  •  सामाजिक नियंत्रण एक बाह्य शक्ति के रूप में समाज अथवा समूह में व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करता है।
  • लैंडिस के अनुसार, “सामाजिक नियंत्रण, व्यक्ति की स्वयं अपने से रक्षा करने तथा समाज को अव्यवस्था से बचाने के लिए आवश्यक है।”
  • सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक तथा औपचारिक साधन सामाजिक व्यवहार में एकता, समरूपता तथा स्थायित्व बनाए रखने का कार्य करते हैं।
  • के यंग के अनुसार, “समाजिक नियंत्रण का उद्देश्य एक विशिष्ट समूह अथवा सामाज की समरूपता, एकता तथा निरन्तरता का लाना है”
  • सामाजिक नियंत्रण के साधन समाज या समूह के अनुरूप बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिमी समाजों की संरचना भारतीय समाज की संरचना से भिन्न है।
  • इस भिन्नता के कारण सामाजिक नियंत्रण के कार्यों तथा स्वरूपों में भी भिन्नता आ जाती है।
  • सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन अनौपचारिक साधनों के रूप में भी कार्य करते है।
  • ग्रामीण समाजों में प्राथमिक समूह तथा संस्थाएँ जैसे परिवार तथा विवाह संस्था सामाजिक नियंत्रित के प्रभावशाली साधन हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक नियंत्रण क्या है? क्या आप सोचते हैं कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में समाजिक नियंत्रण के साधन अलग-अलग होते हैं? चर्चा करें।
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण का अर्थ – समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। सामाजिक संबंधों को नियमित, निर्देशित तथा सकारात्मक बनाने के लिए उन्हें नियंत्रित किया जाना आवश्यक है। सामाजिक संगठन के अस्तित्व तथा प्रगति के लिए भी नियंत्रिण आवश्यक है। समाजशास्त्रियों द्वारा नियंत्रण के इन प्रकारों को ही ‘सामाजिक नियंत्रण’ कहा गया है।

सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न साधन – सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तथा उसे स्थायित्व एवं निरन्तरता प्रदान के लिए सामाजिक नियंत्रण अपरिहार्य है। वस्तुतः सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न साधन तथा प्रकार सामाजिक संरचना तथा समाज के प्रकार के अनुरूप होते हैं। विभिन्न सामाजशास्त्रियों ने सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न प्रकार बताए हैं

(i) ई० ए० रॉस० के अनुसार –

  • जनमत
  • कानून
  • प्रथा
  • धर्म
  • नैतिकता
  • सामाजिक सुझाव
  • व्यक्तित्व
  • लोकरीतियाँ
  • लोकाचार

(ii) किंबाल यंग के अनुसार –

  • सकारात्मक साधन
  • नकारात्मक साधन

(iii) एफ० ई० लूम्बे के अनुसार –

  • बल पर आधारित साधन
  • प्रतीकों पर आधारित साधन

वर्तमान समय में समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक नियंत्रण के साधनों को निम्नलिखित दो प्रकारों में बाँटा गया है –

  • अनौपचारिक साधन तथा
  • औपचारिक साधन

(i) सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन – समाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों का विकास स्वतः हो जाता है। समाज की आवश्यकताओं के अनुसार विकसित होने वाले साधन निम्नलिखित हैं –

(a) जनरीतियाँ – जनरीतियाँ सामाजिक व्यवहार की स्वीकृत विधियाँ हैं। सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “जनरीतियाँ समाज में मान्यताप्राप्त अथवा स्वीकृत व्यवहार करने की विधियाँ हैं। जनरीतियाँ सामाजिक संस्कृति की आधारशिलाएँ हैं। जनरीतियों का उल्लंघन आसानी से नहीं किया जा सकता है।

(b) प्रथाएँ – सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में प्रथाएँ भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। वास्तव में, प्रथाएँ जनरीतियों का ही विकसित रूप हैं। प्रथाओं का उल्लंघन करना ‘सामाजिक अपराध’ समझा जाता है। बोगार्डस के अनुसार, “प्रथाएँ तथा परंपराएँ समूह के द्वारा स्वीकृत नियंत्रण की वे पद्धतियाँ हैं जो सुव्यवस्थित हो जाती हैं तथा जिन्हें बिना सोचे-विचारे मान्यता दे दी जाती है और जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं।

(c) रूढ़ियाँ या लोकाचार – रूढ़ियाँ या लोकाचार को समूह कल्याण के लिए आवश्यक समझा जाता है। समाज के लोकाचार समाजिक नियंत्रण के सशक्त साधन हैं। लोकाचार मानव व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। उदाहरण के लिए मद्यनिषेध तथा एक पत्नी विवाह आदि स्थापित लोकाचर हैं। लोकाचार का उल्लघंन करने पर समाज दंड देता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “इसलिये ऐसा तर्क दिया जाता है कि जब जनरीतियाँ अपने साथ में समूह के कल्याण की भावना व अनुचित के मापदंड को जोड़ लेती हैं तो वे रूढ़ियों में बदल जाती हैं।”

(d) धर्म – समाज में मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म आस्थाओं पर आधारित होता है। धर्म सामाजिक संबंधों स्वरूप को प्रभावित करता है। होबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।”

(e) जनमत – जनमत भी समाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक साधन है। सार्वजनिक अपमान तथ उपहास के कारण व्यक्ति जनमत की अवहेलना नहीं करता है । व्यक्ति सामज द्वारा स्वीकृत प्रतिमानों के अनुरूप ही कार्य करता है। द्वितीयक तथा तृतीयक समूहों में जनमत का प्रभाव काफी अधिक होता है।

(ii) सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधन –

(a) कानून-सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों में कानून सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। जैसे-जैसे समाज विस्तृत तथा जटिल होता चला जाता है वैसे-वैस प्राथमिक संबंधों के स्थान पर द्वितीयक तथा तृतीयक संबंध अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। आधुनिक समाज में व्यक्तियों के संबंधों को नियमित तथा निर्देशित करने के लिए कानून तथा दंड की व्यवस्था की गई है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि जटिल अथवा आधुनिक समाजों में अनेक जनरीतियों, लोकाचारों तथा प्रथाओं को औपचारीकृत कर कानून का स्वरूप प्रदान कर दिया जाता है।

(b) राज्य – राज्य औपचारिक तरीकों द्वारा सामाजिक नियंत्रण स्थापित करता है। राज्य का कार्यक्षेत्र अत्यधिक व्यापक होता है। राज्य के संवैधानिक कानूनों द्वारा व्यक्तियों पर सामजिक नियंत्रण रखा जाता है।

(c) शिक्षा-शिक्षा औपचारिक सामाजिक नियंत्रण किा अत्यंत सशक्त तथा सर्वव्यापी साधन है। शिक्षा के माध्यम से बच्चों को समाजीकरण किया जाता है। तर्कपूर्ण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण के संतुलित विकास हेतु शिक्षा अपरिहार्य है। शिक्षा द्वारा सामाजिक संरचना के उस आधार को विकसित किया जाता है जो व्यक्तियों को सामाजिक विचलन तथा विघटन के नकारात्मक मार्ग से रोकते हैं।

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प्रश्न 2.
समाज के सदस्य के रूप में आप समूहों में और विभिन्न समूहों के साथ अंतः क्रिया करते होंगे। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इन समूहों को आप किस प्रकार देखते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्र मानव के सामाजिक जीवन का अध्ययन है। मानवीय जीवन की एक पारिभाषिक विशेषता यह है कि मनुष्य परस्पर अंतः क्रिया करता है, बातचीत करता है और सामाजिक सामूहिकता को बनाता भी है। समाजशास्त्र का तुलनात्मक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण दो स्पष्ट अहानिकारक तथ्यों को सामने लाता है। प्रथम, प्रत्येक समाज में चाहे वह प्राचीन अथवा सामंतीय तथा आधुनिक हो, एशियन या यूरोपियन अथवा अफ्रीकन हो, मानवीय समूह और सामूहिकता पाई जाती है।

द्वितीय, विभिन्न समाजों में समूहों और सामूहिकताओं के प्रकार अलग-अलग होते हैं। – किसी भी तरह से लोगों का इक्ट्ठा होना एक सामाजिक समूह बनाता है। समुच्चय केवल लोगों का जमावड़ा होता है जो एक समय में एक ही स्थान पर होते हैं लेकिन एक-दूसरे से कोई निश्चित संबंध नहीं रखते। एक रेलवे स्टेशन अथवा हवाई अड्डा अथवा बस स्टॉप पर प्रतीक्षा करते यात्री अथवा सिनेमा दर्शक समुच्चयों के उदाहरण हैं। इन समुच्चयस को प्रायः अर्ध-समूहों का नाम दिया जाता है।

एक अर्ध-समूह एक समुच्चय अथवा संयोजन होता है, जिसमें संरचना अथवा संगठन की कमी होती है और जिसके सदस्य समूह के अस्तित्व के प्रति अनभिज्ञ अथवा कम जागरूकता होते हैं। सामाजिक वर्गों, प्रस्थिति समूहों, आयु एवं लिंग समूहों व भीड़ को अर्थ-समूह के उदाहरणों के रूप में देखा जा सकता है। जैसा कि उदाहरण दर्शाते हैं, अर्ध-समूह समय और विशेष परिस्थतियों में सामाजिक समूह बन सकते हैं।

उदाहरणार्थ यह संभव है कि एक विशेष सामाजिक वर्ग अथवा जाति अथवा समुदाय से संबंधित व्यक्ति एक सामूहिक निकाय के रूप में संगठित न हो.। उनमें अभी ‘हम’ की भावना आना शेष हो, परन्तु वर्गों और जातियों ने समय के बीतने के साथ-साथ राजनीतिक दलों का जन्म दिया है। उसी प्रकार भारत के विभिन्न समुदायों के लोगों ने लंबे उपनिवेशिक विरोधी संघर्ष के साथ-साथ अपनी पहचान एक सामूहिक और समूह के रूप में विकसित की है: एक राष्ट्र जिसका मिला-जुला अतीत और साझा भविष्य है। महिला आंदोलन ने महिलाओं के समूह और संगठनों का विचार सामने रखा। ये सभी उदाहरण इस बात की ओर ध्यान खींचते हैं कि किस प्रकार सामाजिक समूह उभरते हैं, परिवर्तित होते हैं और संशोधित होते हैं।

एक सामाजिक समूह में कम से कम निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए –

  • निरंतरता के लिए स्थायी अंतः क्रिया
  • इन अंत: क्रियाओं का स्थिर प्रतिमान
  • दूसरे सदस्यों के साथ पहचान बनाने के लिए अपनत्व की भावना
  • सांझी रुचि
  • सामान्य मानकों और मूल्यों को अपनाना
  • एक परिभाषित संरचना।

प्रश्न 3.
अपने समाज में उपस्थित स्तरीकरण की व्यवस्था के बारे में आपका क्या प्रेक्षण है? स्तरीकरण से व्यक्तिगत जीवन कि प्रकार प्रभावित होते हैं?
उत्तर:
हमारे समाज में जाति पर आधारित स्तरीकरण व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति की स्थिति पूरी तरह से जन्म द्वारा प्रदत्त प्रस्थिति पर आधारित होती है न कि उन पदों पर जो व्यक्ति ने अपने जीवन में प्राप्त किए हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि एक वर्ग समाज में उपलब्धि पर कोई योजनाबद्ध प्रतिबंध नहीं होता जो कि प्रजाति और लिंग सरीखी प्रदत्त प्रस्थिति द्वारा थोपा जाता है। हालांकि एक जातिवादी समाज में जन्म द्वारा प्रदत्त एक व्यक्ति की स्थिति को, एक वर्ग समाज की तुलना में ज्यादा पूर्ण ढंग से परिभाषित करती है।

परंपरागत भारतीय समाज में, विभिन्न जातियाँ सामाजिक श्रेष्ठता को श्रेणीबद्ध करती हैं। जाति संरचना में प्रत्येक स्थान दूसरों के संबंध में इसकी शुद्धता या अपवित्रता के रूप में परिभाषित था। इसके पीछे यह विश्वास था कि पुरोहितीय जाति ब्राह्मण जो कि सबसे अधिक पवित्र है, शेष सबसे श्रेष्ठ है और पंचम, जिनको कई बार ‘बाह्य जाति’ कहा गया, सबसे निम्न है। परम्परागत व्यवस्था को सामान्यतः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के चार वर्णों; के रूप में व्यक्त किया गया है। वास्तव में व्यवसाय पर आधारित अनगिनत जाति समूह होते हैं जिन्हें जाति कहा जाता है।

स्तरीकरण की इस व्यवस्था से व्यक्तिगत जीवन बहुत अधिक प्रभावित हो रहा है। आज भी बहुत से जातिगत भेदभाव उपस्थित है। समाज में निम्न श्रेणी का कार्य करने वाली जातियों को समाज आज भी हेय दृष्टि से देखता है पर साथ ही लोकतंत्र की कार्य प्रणाली ने जाति व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। जाति समूह के रूप में सुदृढ़ हुई है। भेदभावग्रस्त जातियों को समाज में अपने लोकतंत्रीय अधिकारों के प्रयोग के लिए संघर्ष करते भी देखा गया है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

प्रश्न 4.
प्राथमिक समूह का अर्थ, विशेषताएँ तथा महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) प्राथमिक समूह का अर्थ – प्रसिद्ध समाजशास्त्री कूले द्वारा प्राथमिक समूह की अवधारणा का प्रतिपादन किया गया। कूले ने अपनी पुस्तक Social Organisation में प्राथमिक समूह की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “प्राथमिक समूह से मेरा तात्पर्य उन समूहों से है जिनकी विशेषता आमने-सामने का घनिष्ठ संपर्क तथा सहयोग है । वे प्राथमिक कई दृष्टिकोणों से हैं, परंतु मुख्यतः इस कारण से हैं कि वे व्यक्ति की सामाजिक प्रकृति एवं आदर्शों के निर्माण करने में मौलिक हैं………जिसके लिए ‘हम’ स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।”

कूले की प्राथमिक समूह की परिभाषा से निम्नलिखित बिन्दु स्पष्ट हो जाते हैं –

  • प्राथमिक समूह में आमने-सामने के घनिष्ठ संपर्क होते हैं।
  • प्राथमिक समूह में ‘हम की भावना’ पायी जाती है।
  • प्राथमिक समूह में सहानुभूति तथा एकता पायी जाती है।
  • प्राथमिक समूहों में घनिष्ठ वैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं, उदाहरण के लिए परिवार, क्रीड़ा मंडली, मित्र-मंडली तथा पड़ोस आदि प्राथमिक समूह हैं।

(ii) प्राथमिक समूह की विशेषताएँ –

  • शारीरिक समीपता-प्राथमिक समूहों में व्यक्तियों के बीच शारीरिक समीपता पायी जाती है। प्राथमिक समूह के सदस्य साथ-साथ रहते हैं तथा उनमें भावनात्मक घनिष्ठता पायी जाती है। सदस्यों के बीच वैयक्तिक संबंध होते हैं।
  • लघु आकार-प्राथमिक समूहों का आकार छोटा होता है तथा सदस्यों की संख्या कम होती है। समूह के सदस्यों के बीच आमने-सामने के संबंध पाए जाते हैं।
  • निरन्तरता तथा स्थिरता-प्राथमिक समूहों में आपसी संबंधां में निरंतरता तथा स्थिरता पायी जाती है। उदाहरण के लिए परिवार के सदस्यों के बीच निरन्तरता तथा स्थिरता पायी जाती है।
  • उद्देश्यों की समानता-प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच उद्देश्यों की समानता पायी जाती है। समूह के सभी सदस्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए मिल-जुलकर प्रयत्न करते हैं। पारस्परिक कल्याण तथा हित प्रमुख उद्देश्य होता है।
  • संबंध स्वयं साध्य होता है-प्राथमिक समूह के सदस्यों के बीच संबंध किसी विशिष्ट उद्देश्य के साधन के रूप में न होकर साध्य होते हैं, उन्हें आर्थिक या सामाजिक पैमानों पर नहीं मापा जा सकता है।
  • उदाहरण के लिए, पिता-पुत्र तथा पति-पत्नी के बीच संबंधों को अनिवार्य रूप से स्वीकार नहीं कराया जाता अपितु वे स्वयं विकसित हो जाते हैं।
  • संबंध वैयक्तिक होते हैं-प्राथमिक समूहों में सदस्यों के बीच वैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं। इन संबंधों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, भाई तथा बहन के बीच संबंधों का प्रतिस्थापन नहीं किया जा सकता है।
  • स्वाभाविक संबंध-प्राथमिक समूहों के सदस्यों के बीच स्वाभाविक संबंध पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए परिवार के सदस्यों के बीच संबंध किसी दबाव से स्थापित नहीं होते है, वरन् संबंधों का आधार स्वाभाविक होता है।
  • अत्यधिक नियंत्रण शक्ति-प्राथमिक समूह में नियंत्रण के मानक सामान्य आदर्शों, परंपराओं तथा सांस्कृतिक नियामकों पर आधारित होते हैं।
  • उदाहरण के लिए बच्चों पर माता-पिता का नियंत्रण होता है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि नियंत्रण के सूत्र प्राथमिक संबंधों को बाँधे रखते हैं।

(iii) प्राथमिक समूह का महत्व –

  • प्राथमिक समूह सदस्यों को सामाजिक, मानसिक, आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए बच्चों के संतुलित तथा समुचित विकास के लिए परिवार एक स्वाभाविक वातावरण प्रस्तुत करता है।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक अनुकूलन में सहायक होते हैं। उदाहरण के लिए बच्चा परिवार, पड़ोस, मित्र-मंडली तथा खेल समूहों में अनुकूलन तथा पारस्परिक सामंजस्य का महत्वपूर्ण पाठ सीखता है।
  • प्राथमिक समूह में सदस्य सहानुभूति, दया तथा सहयोग के गुणों को सीखता है। उदाहरण के लिए संतान के प्रति माता-पिता का त्याग अतुलनीय है।
  • प्राथमिक समूह सामाजिक नियंत्रण तथा संगठन को बनाए रखते हैं। सामाजिक नियंत्रण सामाजिकता को दिशा प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
समूहों का वर्गीकरण करने के लिए किस प्रक्रिया का प्रयोग किया जाता है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
सामाजिक समूहों का वर्गीकरण एक कठिन समस्या है। फिर भी, अनेक समाजशास्त्रियों ने आकार, सदस्य संख्या, उद्देश्य, साधन, स्थिरता, व्यवहार तथा हितों आदि के आधार पर समूहों का वर्गीकरण किया है। प्रमुख समाजशास्त्रियों द्वारा किए गए समूह के वर्गीकरण निम्नलिखित हैं –

(i) कूले के अनुसार –

  • प्राथमिक समूह-प्राथमिक समूहों में आमने-सामने के घनिष्ठ संबंध होते हैं।
  • द्वितीयक समूह-द्वितीय समूह में परोक्ष संबंध पाए जाते हैं। सदस्यों के बीच सामाजिक दूरी होती है।

(ii) एफ. एच. गिडिंग्स के अनुसार –

  • जननिक समूह-परिवार एक जननिक समूह है।
  • इकट्ठे समूह-यह ऐच्छिक समूह होते हैं।

(iii) मिलर के अनुसार

  • उर्ध्वाधर समूह-से समूह आकार में छोटे होते हैं।
  • क्षैतिज समूह-ये समूह आकार में विशाल होते हैं।

(iv) विलियम ग्राहम समनर के अनुसार

  • अंत: समूह-इनमें सामाजिक निकटता तथा हम की भावना पायी जाती है।
  • बाह्य समूह-इनमें सामाजिक दूरी तथा एकता का अभाव होता है।

कुछ समाजशास्त्रियों ने समूहों को निम्नलिखित रूप में भी बाँटा है –

  • औपचारिक समूह-आकार में छोटे होते हैं तथा सदस्यों के बीच वैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं।
  • अनौपचारिक समूह-आकर में बड़े होते हैं तथा सदस्यों के बीच अवैयक्तिक संबंध पाए जाते हैं।

(v) जॉर्ज हासन के अनुसार –

  • असामाजिक समूह-असामाजिक समूह समाज के मानकों तथा मूल्यों का विरोधी होता है।
  • आभासी सामाजिक समूह-आभासी सामाजिक समूह अपने हितों के लिए सामाजिक जीवन में भाग लेता है।
  • समाज विरोधी समूह-यह समूह समाज के हितों के विरुद्ध गतिविधियाँ करता है।
  • समाज समर्थक समूह-यह समाज के हितों के लिए रचनात्मक कार्य करता है।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि समाजशास्त्रियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से समूहों का वर्गीकरण पृथक-पृथक रूपों तथा आधारों पर किया है। व्यक्तियों के उद्देश्य, हित, स्वार्थ तथा संबंध सदैव परिवर्तनशील तथा गतिशील हैं। मानव-व्यवहार की जटिलता के कारण ही अभी तक समाजशास्त्री समूहों का कोई सर्वमान्य वर्गीकरण नहीं दे पाए हैं। इस संबंध में क्यूबर ने उचित ही कहा है कि “समाजशास्त्रियों ने समूहों का वर्गीकरण करने में काफी समय तथा प्रयत्न लगाया है।

यद्यपि शुरू में तो ऐसा करना आसान प्रतीत होता तथापि आगे सोचने पर इसमें बहुत-सी कठिनाइयाँ महसूस होंगी । वास्तव में ये कठिनाइयाँ इतनी अधिक हैं कि अभी तक हमारे पास समूहों का कोई क्रमबद्ध वर्गीकरण नहीं है जो सभी समाजशास्त्रियों को पूर्णतया स्वीकार्य हो।”

प्रश्न 6.
अनौपचारिक सामाजिकरण नियंत्रण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति एवं समूह के व्यवहारों के नियमन की पद्धति प्रत्येक समाज में पायी जाती है। इसी पद्धति को सामाजिक नियंत्रण कहा जाता है। एच. सी. ब्रियरले के अनुसार, “सामाजिक नियंत्रण उन प्रक्रियाओं, चाहे वे नियोजित अथवा अनियोजित हों के लिए सामूहिक शब्द है जिनके द्वारा व्यक्तियों को समूह के रिवाजों तथा जीवन मूल्यों के अनुरूप बनने के लिए शिक्षा दी जाती है, अनुनय किया जाता है या विवश किया जाता है।”

सामाजिक नियंत्रण के दो प्रमुख रूप हैं –

  • औपचारिक साधन तथा
  • अनौपचारिक साधन

1. औपचारिक साधन – सामाजिक नियंत्रण के औपचारिक साधनों का विकास समाज में स्वतः हो जाता है। उनके निर्माण अथवा विकास के लिए किसी विशेष अभिकरण की जरूरत नहीं होती है। औपचारिक सामाजिक नियंत्रण के साधन गैर-सरकारी होते हैं। ये साधन छोटे अथवा प्राथमिक समूहों में अधिक प्रभावशाली होते हैं । क्रोसबी ने अपनी पुस्तक Interaction in Small Groups में अनौपचारिक नियंत्रण के निम्नलिखित चार मूलभूत प्रकार बताए हैं।

(a) सामाजिक परितोषिक – सामाजिक पारितोषिक के अंतर्गत मुस्कुराना, स्वीकृति की सहमति एवं अधिक परिवर्तन वाले कार्य जैसे कर्मचारी की प्रोन्नति, परितोषिक अनुरूपता आदि सम्मिलित किए जाते हैं। ये सभी कारक प्रत्यक्ष रूप से विचलन को दूर करते हैं।

(b) दंड – दंड के अंतर्गत अप्रसन्नता, आलोचना तथा शारीरिक धमकियाँ आदि सम्मिलित किए जाते हैं। इनमें प्रत्यक्ष रूप से विचलित कार्यों को रोकने का लक्ष्य सम्मिलित किया जाता है।

(c) अनुनय – अनुनय के माध्यम से विचलित व्यक्तियों को सामाजिक नियमों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए कहा जाता है। उदाहरण के लिए, बेसबॉल के खिलाड़ी को जो नियमों का उल्लंघन कता है, खेल के नियमों को गंभीरता पूर्वक पालन करने के लिए अनुनय किया जाता है।

(d) पुनः परिभाषित प्रतिमान-बदली हुई परिस्थितियों तथा मूल्यों में प्रतिमानों को पुनः परिभाषित करना सामाजिक नियंत्रण का एक अन्य जटिल प्रकार है। उदाहरण के लिए, नगरीय परिवेश में काम करने वाली पत्नियों के पति गृह-कार्य करते हैं तथा बच्चों की देखभाल करते हैं। हालांकि, कुछ समय पहले यह सब कुछ अकल्पनीय था।

2. सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन – परिवार, समुदाय, पड़ोस, गोत्र, जनरीतियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, रीतिरिवाज तथा धर्म आदि सामाजिक नियंत्रण के अनौपचारिक साधन हैं।

(a) परिवार – परिवार अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण का एक सशक्त तथा स्थायी साधन है। क्लेयर ने कहा है कि “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता तथा उनकी संतानों के बीच पायी जाती है।” परिवार सामाजिक नियंत्रण की प्राथमिक म अनौपचारिक पाठशाला है। बर्गेस तथा लॉक के अनुसार, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली एक मौलिक समिति है तथा पारिवारिक परम्परा बालक को उसके प्रति प्रारंभिक व्यवहार, प्रतिमान एवं आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

(b) समुदाय, पड़ोस तथा गोत्र – समुदाय, पड़ोस तथा गोत्र भी सामाजिक नियंत्रण के अनौपचाकि साधन हैं। उदाहरण के लिए व्यक्ति के व्यवहार तथा कार्यों पर रक्त संबंधों का काफी सामाजिक दबाव रहता है। विवाह के पश्चात् नव-वधू को नए पारिवारिक-परिवेश के साथ अनुकूलन करना पड़ता है। ग्रामीण समुदाय भी अपने सदस्यों पर काफी अधिक नियंत्रण रखते हैं। समुदाय के नियमों की अवहेलना करने पर व्यक्तियों को सामाजिक निन्दा तथा सामाजिक प्रताड़ना अथवा बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।

(c) जनरीतियाँ – जनरीतियाँ समूह के सामूहिक व्यवहार का प्रतिमान हैं तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “जनरीतियाँ समाज में मान्यता प्राप्त या स्वीकृत व्यवहार करने की पद्धतियाँ हैं।” गिडिंग्स जनरीतियों को राज्य द्वारा बनाए गए कानूनों से भी अधिक प्रभावी मानता है। जनरीतियाँ व्यक्तियों के अवैयक्तिक व्यवहार का नियमन करती हैं।

(d) सामाजिक रूढ़ियाँ – सामाजिक रूढ़ियाँ भी सामाजिक नियंत्रण के प्रभावी साधन हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, जब जनरीतियाँ अपने साथ समूह के कल्याण की भावना तथा उचित व अनुचित के प्रभावों को जोड़ लेती हैं तब वे रूढ़ियों में बदल जाती हैं। रूढ़ियों को समाज की स्वीकृति प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए जातीय नियमों की अवहेलना करना निन्दनीय समझा जाता है।

(e) धर्म – धर्म भी सामाजिक नियंत्रण का प्रभावशाली साधन है। हॉबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।” दुर्खाइम का मत है कि धर्म जीवन का वह पक्ष है जिसका संबंध पवित्र वस्तुओं से है। धर्म पाप तथा पुण्य की धारणा से जुड़ा है। धर्म का उल्लंघन करना ‘पाप’ है अतः धर्म सामाजिक नियंत्रण का सशक्त अनौपचारिक साधन है।

(f) प्रथाएँ – प्रथाएँ भी अनौपचारिक सामाजिक नियंत्रण के साधन हैं। प्रथाएँ सामाजिक व्यवहार हैं तथा व्यक्ति इन्हें बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेते हैं। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज से मान्यता प्राप्त कार्य करने की विधियाँ ही समाज की प्रथाएँ हैं। प्रथाएँ व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रथाएँ जन्म से मृत्यु तक व्यक्ति के जीवन को नियमित तथा निर्देशित करती हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग

प्रश्न 7.
द्वितीयक समूहों का अर्थ, विशेषताएँ तथा महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) द्वितीयक समूह का अर्थ – द्वितीयक समूह आकार में बड़े होते हैं तथा इनके द्वारा विशिष्ट स्वार्थों की पूर्ति की जाती है। द्वितीयक समूहों में घनिष्ठता, एकता तथा आमने-सामने के संबंधों का अभाव पाया जाता है। संबंधों की प्रकृति अवैयक्तिक होती है। ऑग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “वे समूह जो घनिष्ठता की कमी का अनुभव प्रस्तुत करते हैं, द्वितीयक समूह कहलाते हैं।” केडेविस के अनुसार, “द्वितीयक समूहों को मोटे तौर पर प्राथमिक समूहों के विरोधी समूहों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

एच. टी. मजूमदार के अनुसार, “जब सदस्यों के संबंधों में आमने-सामने के संपर्क नहीं होते हैं, तो द्वितीयक समूह होता है। पी. एच. लैंडिस के अनुसार, “द्वितीयक समूह वे हैं जो संबंधों में अपेक्षाकृत अनिरंतर तथा अवैयक्तिक होते हैं।” रॉबर्ट बीरस्टेड के अनुसार, “वे समूह द्वितीयक हैं, जो प्राथमिक नहीं हैं।”

(ii) द्वितीयक समूहों की विशेषताएँ –
(a) बड़ा आकर – द्वितीयक समूहों का आकार बड़ा होता है इनका विस्तार राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है। उदाहरण के लिए, राजनीतिक दल तथा यूनेस्को आदि द्वितीयक समूह हैं।

(b) सहयोग की प्रकृति – द्वितीयक समूहों के सदस्यों के बीच साधारणतया परोक्ष सहयोग पाया जाता है। द्वितीयक समूहों में व्यक्ति मिलकर काम करने के बजाए एक-दूसरे के लिए कार्य करते हैं। समूह के सदस्यों का सहयोग उद्देश्य विशेष की प्राप्ति तक ही सीमित होता है।

(c) औपचारिक संरचना – द्वितीयक समूह औपचारिक नियमों के द्वारा संचालित होते हैं। सदस्यों के कार्य श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण के नियमों के द्वारा निर्धारित होते हैं।

(d) अस्थायी संबंध – द्वितीयक समूह उद्देश्य की पूर्ति के लिए, कायम किए जाते हैं। सदस्यों के बीच औपचारिक संबंध होते हैं। अतः सदस्यों के बीच स्थायी संबंध नहीं पाए जाते हैं।

(e) सीमित उत्तरदायित्व – द्वितीयक समूहों के सदस्यों के बीच औपचारिक संबंध पाए जाते हैं। वैयक्तिक संबंधों के अभाव में उत्तरदायित्व भी सीमित होता है अतः हम कह सकते हैं कि द्वितीयक समूहों में प्राथमिक समूहों जैसे असीमित उत्तरदायित्व न होकर सीमित उत्तरदायित्व होता है।

(f) ऐच्छिक सदस्यता – द्वितीयक समूहों की सदस्यता आमतौर पर ऐच्छिक होती है। उदाहरण के लिए, लायन्स क्लब या किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेना अनिवार्य नहीं है।

(iii) द्वितीयक समूहों का महत्त्व –

  • द्वितीयक समूह समाजीकरण के व्यापक तथा विस्तृत प्रतिमान प्रस्तुत करते हैं।
  • द्वितीयक समूह मानव प्रगति के द्योतक हैं।
  • द्वितीयक समूह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की व्याख्या करते हैं।
  • द्वितीयक समूह श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण को बढ़ावा देते हैं।
  • द्वितीयक समूह समाज में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देते हैं।

प्रश्न 8.
सामाजिक नियंत्रण के अभिकरणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
अभिकरण एवं साधन संयुक्त रूप से सामूहिक एवं व्यक्तिगत व्यवहार को नियमित करते हैं और सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था को प्रभावशली बनाते हैं। सामाजिक नियंत्रण के प्रमुख अभिकरणों के उल्लेख निम्नलिखित हैं –
(i) परिवार – परिवार सामाजिक नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण अभिकरण है परिवार को सामाजिक जीवन की सर्वोत्तम पाठशाला कहा गया है। परिवार में बच्चा प्रक्ताओं और परम्पराओं के बीच पतला है। परिवार में माँ का प्यार एवं पिता के संरक्षण में बच्चे पलते हैं। सामाजिक नियंत्रण में परिवार की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है।

(ii) धर्म – सामाजिक नियंत्रण में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। धर्म का प्रभाव प्रत्येक समाज में होता है। प्रत्येक धर्म का आधार किसी शक्ति पर विश्वास है और यह मानव से श्रेष्ठ है। धर्म के विरुद्ध कार्य करने से लोग डरते हैं। लोगों को विश्वास है कि धर्म के अनुकूल कार्य करने में ही उनका हित सुरक्षित होता है।

(iii) प्रथा – प्रथा सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक सशक्त अभिकरण है। प्रथा का व्यक्ति पर कठोर नियंत्रण होता है। प्रथाएँ समाज द्वारा मान्यता प्राप्त व्यवहार की विधियाँ हैं। प्रथाओं सामाजिक अनुकूलन में सहायता प्रदान करती हैं, प्रथाओं के पीछे समाज के अनुभवों का लम्बा इतिहास होता है।

(iv) कानून – कानून सामाजिक नियंत्रण का महत्वपूर्ण अभिकरण है। वर्तमान युग में कानून सामाजिक नियंत्रण का प्रमुख आधार है।

(v) नैतिकता – नैतिकता सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक अभिकरण है। नैतिक नियमों की अवहेलना से समाज को भय होता है। वर्तमान समय में नैतिकता का प्रभाव अधिक है।

(vi) शिक्षा – शिक्षा सामाजिक नियंत्रण का प्रभावशाली अभिकरण है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति में अच्छे गुणों का विकास होता है। वर्तमान समय में शिक्षा का महत्व दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहा है।

(vii) नेतृत्व – नेता का प्रमुख कार्य अपने अनुयायियों को मार्गदर्शन करना है। नेता का चरित्र उसके अनुयायी को प्रभावित करता है।

(viii) प्रचार – वर्तमान युग प्रचार का युग है। प्रचार द्वारा वस्तु विशेष के गुणों पर प्रकाश डाला जाता है।

(ix) जनमत – जनमत भी सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में प्रमुख भूमिका अदा करता है। प्रत्येक व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे से संबंधित होते हैं । जनमत व्यक्ति के व्यवहारों को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 9.
सामाजिक नियंत्रण की संस्थाओं का वर्णन करें। किसी एक संस्था की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक नियंत्रण की संस्थाएँ तथा उनके कार्य-सामाजिक संस्थाओं द्वारा व्यक्ति तथा. समूह के व्यवहार को नियंत्रित एवं नियमित किया जाता है। सामाजिक नियंत्रण की विभिन्न संस्थाओं का अध्ययन करने से पहले संस्था का समाजशास्त्रीय अर्थ जान लेना आवश्यक है।

डब्लू. जी. समनर के अनुसार, “एक संस्था एक अवधारणा (विचार, मत, सिद्धांत या स्वार्थ) तथा एक ढाँचे से मिलकर बनती है।” रॉस के अनुसार, “सामाजिक संस्था सामान्य इच्छा से स्थापित या अभिमति प्राप्त संगठित मानव संबंधों का समूह है।” बोगार्डस के अनुसार, “एक सामाजिक संस्था समाज का वह ढाँचा होता है जो मुख्य रूप से सुव्यवस्थित विधियों द्वारा व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संगठित किया जाता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सामाजिक संस्थाएँ व्यक्तियों अथवा समूह की विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जनरीतियों तथा रूढ़ियों का समूह है।

संस्थाओं के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • व्यक्तियों की आवश्यकताओं की पूर्ति
  • एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को संस्कृति का हस्तांतरण
  • व्यक्तियों के व्यवहार पर नियंत्रण
  • व्यक्तियों के व्यवहार में एकता तथा अनुरूपता उत्पन्न करना
  • समाज की समसामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा मार्गदर्शन करना
  • संस्थाएँ व्यक्ति तथा समूह के व्यवहारों को सामाजिक प्रतिमानों के अनुरूप ढालती हैं।

सामाजिक नियंत्रण की प्रमुख संस्थाएँ-सामाजिक नियंत्रण की प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं –

  • परिवार
  • नातेदारी
  • जाति
  • धर्म
  • राज्य
  • आर्थिक संगठन और
  • शिक्षा

सामाजिक नियंत्रण की उपरोक्त संस्थाओं में राज्य तथा धर्म की संस्थाएँ संभवतः सर्वाधिक शक्तिशाली हैं। संस्थाएँ अनौपचारिक तथा औपचारिक रूप से सामाजिक नियंत्रण करती हैं। राज्य तथा विद्यालय औपचारिक संस्थाएँ हैं जबकि परिवार, नातेदारी, धर्म आदि अनौपचारिक संस्थाएँ हैं।

संस्थाओं के महत्त्व –

  • संस्थाएँ प्रतिस्थापित, प्रतिमानों, मूल्यों तथा अवधारणाओं का अवलंबन करती हैं।
  • संस्थाएँ सामाजिक स्वास्थ्य की प्रतीक हैं।
  • संस्थाओं के द्वारा विचलन, अलगावाद तथा आपराधिक मनोवृत्तियों पर अंकुश लगाया जाता है।
  • संस्थाएँ सामाजिक ढाँचे तथा तान-बाने को बनाए रखती हैं।
  • संस्थाओं द्वारा स्थापित प्रतिमान समाज, समूह तथा समुदाय को व्यवस्थित तथा निर्देशित करते हैं।

परिवार सामाजिक नियंत्रण की एक सार्वभौमिक संस्था है। यह समाज की प्राथमिक इकाई है। व्यक्ति परिवार में ही भाषा, व्यवहार, पद्धति तथा सामाजिक प्रतिमानों को ग्रहण करता है।

यद्यपि परिवार का स्वरूप सार्वदेशिक होता है, तथापि इसकी संरचना में व्यापक भिन्नताएँ पायी जाती हैं –

  • कृषक समाजों तथा जनजाति समाजों में संयुक्त परिवार पाए जाते हैं।
  • औद्योगिक समाजों तथा नगरीय समुदायों में एकाकी परिवार पाए जाते हैं।

परिवार की परिभाषा –

  • मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो यौन संबंधों पर आधारित है तथा काफी छोटा एवं स्थायी है वह बच्चों को प्रजनन और पालन-पोषण की व्यवस्था करने योग्य है।”
  • आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “परिवार, पति-पत्नी, बच्चों सहित या उनके बिना अथवा मनुष्य अथवा स्त्री अकेले या बच्चों सहित कम या अधिक; स्थिर समिति है।”
  • जुकरमेन के अनुसार, “एक परिवार समूह, पुरुष स्वामी, उसकी स्त्री या स्त्रियों तथा उनके बच्चों को मिलाकर बनता है। कभी-कभी एक या अधिक अविवाहित पुरुषों को भी सम्मिलित किया जा सकता है।”

दी गई परिभाषाओं के आधार पर परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • सार्वभौमिकता
  • भावनात्मक आधार
  • सीमित आकार
  • सामाजिक संरचना में केन्द्रीय स्थिति
  • सदस्यों में उत्तरदायित्व की भावना
  • सामाजिक नियमन
  • स्थायी तथा अस्थायी प्रकृति

परिवार के कार्य – एक संस्था के रूप में परिवार सामाजिक संगठन की महत्त्वपूर्ण ईकाई है। परिवार के प्रकार्य बहु-आयामी हैं। मैरिल के अनुसार “किसी भी संस्था के विविध कार्य होते हैं। सम्भवतया समस्त संस्थाओं में परिवार अत्यन्त विविध कार्यों वाली संस्था है।”

परिवार के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –
(i) डेविस के अनुसार –

  • संतानोत्पत्ति
  • भरण-पोषण
  • स्थान-व्यवस्था
  • बच्चों का समाजीकरण

(ii) मरडोक के अनुसार –

  • यौनगत
  • प्रजननात्मक
  • आर्थिक
  • शैक्षणिक

(iii) गुडे के अनुसार –

  • बच्चों का प्रजनन
  • पविार के सदस्यों की सामाजिक सदस्यों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा
  • परिवार के सदस्यों की स्थिति का निर्धारण
  • समाजीकरण तथा भावनात्मक समर्थन
  • सामाजिक नियंत्रण।

(iv) मेकाइवर ने परिवार के प्रकार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा है –
(a) अनिवार्य प्रकार्य-इसके अनुसार परिवार के निम्नलिखित प्रकार्य हैं –

  • यौन आवश्यकताओं की पूर्ति
  • प्रजनन तथा पालन-पाषण
  • घर की व्यवस्था।

(b) ऐच्छिक प्रकार्य-ऐच्छिक प्रकार्यों में निम्नलिखित प्रकार्य सम्मिलित किए गए हैं –

  • धार्मिक प्रकार्य
  • शैक्षिक प्रकार्य
  • आर्थिक प्रकार्य
  • स्वास्थ्य संबंधी प्रकार्य तथा
  • मनोरंजन संबंधी प्रकार्य

उपरोक्त समाजशास्त्रियों द्वारा बताए गए परिवार के प्रकार्यों के आधार पर निम्नलिखित प्रकार्य प्रमुख हैं –

  • जैविक प्रकार्य
  • सामाजिक प्रकार्य
  • मनोवैज्ञानिक प्रकार्य
  • आर्थिक प्रकार्य

एक संस्था के रूप में परिवार के कार्य व्यापक हैं। आधुनिक युग में नगरीकरण, औद्योगीकरण, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक संस्थाओं के प्रकार्यों में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। अतः आधुनिक परिवार के प्रकार्यों में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

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प्रश्न 10.
परिवार के कार्यों की विवेचना करें।
उत्तर:
परिवार समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई है। परिवार में ही व्यक्ति का समाजीकरण होता है और वह एक सामाजिक प्राणी बन जाता है। समाज का अस्तित्व बहुत हद तक परिवार नाम की संस्था पर निर्भर है। प्रत्येक समाज की अपनी संस्कृति होती है। जिसे परिवार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित एवं प्रवाहित करता है। परिवार का सार्वभौमिक संस्था के रूप में प्रत्येक समाज में पाया जाता है और परिवार एक संस्था के साथ-साथ समिति भी है। परिवार में प्रेम, सेवा, कर्त्तव्य, सहयोग एवं सहानुभूति की भावना पायी जाती है। परिवार अंग्रेजी शब्द ‘Family’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘Famules’ शब्द से हुई है, जिसके अन्तर्गत माता-पिता, बच्चे नौकर और गुलाम सम्मिलित हैं।

परिवार एक अनोखा संगठन है जिनकी पूर्ति अन्य संगठन, संस्था या समिति द्वारा नहीं हो सकती। परिवार के विभिन्न कार्यों के माध्यम से ही मानव आज सभ्यता के उच्च शिखर पर पहुँच गया है। परिवार के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • जैविकीय कार्य
  • शारीरिक सुरक्षा संबंधी कार्य
  • आर्थिक एवं सामाजिक कार्य
  • सांस्कृतिक कार्य और
  • मनोवैज्ञानिक कार्य

1. जैविक कार्य – इस कार्य के अन्तर्गत परिवार यौन संबंधों की पूर्ति करता है साथ ही मानव अपनी प्रजातीय तत्त्वों की निरंतरता को बनाये रखता है।

शारीरिक सुरक्षा संबंधी कार्य-इस कार्य के अन्तर्गत बूढ़े, असहाय, अनाथ, विधवा तथा रोगी सदस्यों को शारीरिक सुरक्षा मिलती है।

(iii) आर्थिक कार्य-परिवार एक आर्थिक इकाई है। आर्थिक क्षेत्र में भी परिवार के द्वारा महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पादित होते हैं। उत्पादन का कार्य परिवार द्वारा होता है। परिवार अपने सदस्यों के मध्य श्रम विभाजन का कार्य करता है। सम्पत्ति का निर्धारण परिवार द्वारा होता है।

(iv) सामाजिक कार्य-परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार से ही आरंभ होती है। प्रत्येक समाज के अपने नियम और तरीके होते हैं। सामाजिक कार्य के माध्यम से परिवार समाज पर नियंत्रण रखता है। परिवार समाज को अनुशासन की शिक्षा प्रदान करता है।

(v) सांस्कृतिक कार्य-संस्कृति तत्वों को परिवार के माध्यम से हस्तांतरित करती है । परिवार अपने सदस्यों को सांस्कृतिक विशेषताओं को सिखाने का प्रयत्न करता है।

(vi) वैज्ञानिक कार्य-इस कार्य के अन्तर्गत सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानसिक सुरक्षा तथा संतोष प्रदान करना है। अतः उपर्युक्त परिवार के कार्य हैं जो स्वाभाविक रूप से परिवार द्वारा सम्पादित किये जाते हैं।

प्रश्न 11.
समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दार्थ से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में वह जन्म लेता और समाज में ही उसका भरण-पोषण होता है। व्यक्ति समाज से जो कुछ भी सीखता है या अर्जित करता है। उसकी संस्कृति कहलाती है। संस्कृति के अनुरूप ही व्यक्ति अपने आप को ढालने की कोशिश करता है। समाज में अच्छे-बुरे हर प्रकार के लोग निवास करते हैं। बुरे व्यवहारों पर समाज द्वारा जो रोक लगाया जाता है उसे सामाजिक नियंत्रण कहा जाता है।

“दबाव प्रतिमान है जिसके द्वारा समाज में व्यवस्था कायम रखी जाती है तथा स्थापित नियमों को बनाये रखने हेतु जो प्रस्तुत किया जाता है सामाजिक नियंत्रण कहलाता है। “सामाजिक नियंत्रण का अर्थ उस तरीक से है जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में एकता एवं स्थायित्व बना रहता है तथा जिसके द्वारा सम्पूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील संतुलन के रूप में क्रियाशील रहती है।” उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक नियंत्रण एक विधि है, जिसके द्वारा व्यक्तियों के सामाजिक आदर्शों एवं मूल्यों का पालन कराया जाता है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राथमिक समूह की अवधारणा सर्वप्रथम किस समाजशास्त्री ने दिया?
(a) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(b) डेविस
(c) समनर
(d) कूर्ल
उत्तर:
(b) डेविस

प्रश्न 2.
सामाजिक नियंत्रण का अर्थ उस तरीके से है जिसके द्वारा सम्पूर्ण व्यवसायी एक परिवर्तन संतुलन के रूप में क्रियाशील रहती है?
(a) प्लेटो
(b) रॉस
(c) काम्टे
(d) मेकाइवर
उत्तर:
(b) रॉस

प्रश्न 3.
किस विज्ञान का कहना है? सामाजिक परिवर्तनों से तात्पर्य उन परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना एवं प्रकार्यों में उत्पन्न होते हैं ………………..
(a) फिक्टर
(b) मेकाइवर
(c) किंग्सले डेविस
(d) जिन्सवर्ग
उत्तर:
(c) किंग्सले डेविस

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प्रश्न 4.
सामाजिक नियंत्रण हो सकता है …………………..
(a) सकारात्मक केवल
(b) सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों
(c) केवल नकारात्मक
(d) उपर्युक्त कोई नहीं
उत्तर:
(b) सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों

प्रश्न 5.
नागरिकता के अधिकारों में शामिल है …………………..
(a) सामाजिक
(b) राजनैतिक
(c) नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
सामाजिक समूह की एक विशेषता है ……………………..
(a) निरंतरता हेतु दीर्घ अत:क्रिया
(b) लघुस्थायी अन्तःक्रिया
(c) लघु अंतःक्रिया
(d) निरंतरता हेतु अस्थायी क्रिया
उत्तर:
(a) निरंतरता हेतु दीर्घ अत:क्रिया

प्रश्न 7.
प्रत्यक्ष सहयोग पाया जाता है।
(a) प्राथमिक समूहों में
(b) द्वितीयक समूहों में
(c) संदर्भ समूहों में
(d) भीड़ में
उत्तर:
(a) प्राथमिक समूहों में

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प्रश्न 8.
गिलिन एवं गिलिन के अनुसार भीड़ एवं श्रोता समूह किस प्रकार के समूह हैं?
(a) संस्कृतिक समूह
(b) अस्थायी समूह
(c) प्राथमिक समूह
(d) संदर्भ समूह
उत्तर:
(d) संदर्भ समूह

प्रश्न 9.
किसने कहा है? जब दो या दो से अधिक व्यक्ति एक-दूसरे से मिलते हैं और एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं तो एक समूह का निर्माण करते हैं।
(a) मेकाइवर
(b) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(c) फिक्टर
(d) वीयर स्टीड
उत्तर:
(b) ऑगबर्न एवं निमकॉफ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Sociology समाजशास्त्र एवं समाज Additional Important Questions and Answers

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्रीय उपागम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्रीय उपागम द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानव समाज का एक व्यवस्था के रूप में मनुष्य तथा मनुष्यों के बीच, मनुष्यों तथा समूहों के बीच तथा विभिन्न समूहों के बीच अंत:क्रिया के रूप में अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
उन महत्त्वपूर्ण परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए जिन्होंने समाजशास्त्र का एक विषय के रूप में आविर्भाव अपरिहार्य बना दिया।
उत्तर:
समाजशास्त्र की उत्पत्ति यूरोप में 10वीं सदी में हुई। औद्योगिक क्रांति, नगरीकरण तथा पूँजीवादी व्यवस्था से उत्पन्न होने वाले सामाजिक तथा आर्थिक दुष्परिणामों ने एक विषय के रूप में समाजशास्त्र के आविर्भाव को अपरिहार्य बना दिया।

प्रश्न 3.
उन प्रमुख समाजशास्त्रियों के नामों का उल्लेख कीजिए जिन्हें समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है।
उत्तर:
अगस्त कोंत, एमिल दुर्खाइम, हरबर्ट स्पैंसर, कार्ल मार्क्स तथा बैबर को समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है। इन समाजशास्त्रियों के द्वारा समाज की विभिन्न समस्याओं तथा पहलुओं का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर अध्ययन किया गया।

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प्रश्न 4.
भारत में सर्वप्रथम समाजशास्त्र का अध्ययन कब और कहाँ प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
भारत में समाजशास्त्र का अध्यापन 1908 में कोलकाता (कलकत्ता) विश्वविद्यालय के राजनीतिक, आर्थिक तथा दर्शन विभाग में प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 5.
भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति का इतिहास मुंबई (बंबई) विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से किस प्रकार संबद्ध है?
उत्तर:
पैट्रिक गीड्स को मुंबई (बंबई) विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है। जी. एस. घुर्ये द्वारा गीड्स के समाजशास्त्रीय प्रतिमानों को आगे जारी रखा गया। 1919 में मुंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र को स्नातकोत्तर स्तर पर राजनीति विज्ञान के साथ जोड़ा गया।

प्रश्न 6.
भारतीय समाज को समझने तथा उसका विश्लेषण करने में प्रसिद्ध सामाजिक क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा के योगदान का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी तथा सामाजिक क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने पैट्रिक गीड्स से भी पहले भारतीय समाज को समझने में अपनी रुचि दिखाई थी। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने यूरोप के प्रसिद्ध समाजशास्त्री अगस्त कोंत तथा हरबर्ट स्पैंसर से विचार-विमर्श के पश्चात् ‘इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ नामक शोध पत्रिका का प्रकाशन किया था।

प्रश्न 7.
भारत के किन तीन विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र की प्रथम पीढ़ी तैयार हुई? तत्कालीन प्रसिद्ध समाजशास्त्रीयों के नाम बताइए।
उत्तर:
भारत के तीन विश्वविद्यालय हैं-कोलकाता, मुंबई तथा लखनऊ। इन विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्रियों की प्रथम पीढ़ी तैयार हुई। समकालीन प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों में राधाकमल मुखर्जी, डी. एन. मजूमदार, एम. एन. श्रीनिवास, के. एम. कपाड़िया, एम. आर. देसाई तथा एस. सी. दुबे आदि के नाम प्रमुख हैं।

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प्रश्न 8.
समाजशास्त्र की प्रकृति के विषय में एमिल दुर्खाइम के विचारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र की प्रकृति के विषय में एमिल दुर्खाइम के विचार अधिक स्पष्ट तथा तथ्यात्मक हैं। दुर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र के द्वारा सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 9.
समाज क्या है?
उत्तर:
समाज सामाजिक संबंधों का जाल है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज रीतियों, कार्य प्रणालियों, अधिकार एवं पारस्परिक सहयोग, अनेक समूह और उनके विभागों, मानव व्यवहारों के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है।”

प्रश्न 10.
मानव समाज तथा पशु समाज में दो अंतर बताइए।
उत्तर:
मानव समाज तथा पशु समाज में दो मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं –

  • मानव समाज मूल प्रवृत्तियों को परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित करने की क्षमता रखता है, जबकि पशु सामज पूर्णरूपेण मूल प्रवृत्तियों तथा सहज क्रियाओं पर आधारित है।
  • भाषा का स्पष्ट विकास होने के कारण मनुष्य अपनी एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित कर सकने में सक्षम है जबकि पशु
  • समाज भाषा का विकास न होने के कारण ज्ञान का हस्तांतरण नहीं कर सकता है।

प्रश्न 11.
मेकाइवर तथा पेज के अनुसार समाज के प्रमुख आधार क्या हैं?
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मेकाइवर तथा पेज के अनुसार समाज के प्रमुख आधार इस प्रकार हैं –

  • रीतियाँ
  • कार्यप्रणालियाँ
  • अधिकार
  • आपसी सहयोग
  • समूह तथा विभाग
  • मानव-व्यवहार का नियंत्रण एवं
  • स्वतंत्रता

प्रश्न 12.
जैमिन शैफ्ट का अर्थ बताइए।
उत्तर:
ग्रामीण जीवन में जैमिन शैफ्ट संबंध मिलते हैं। इसमें हम सामूहिक जीवन का वास्तविक तथा स्थायी रूप पाते हैं। सदस्यों के बीच प्राथमिक संबंध पाये जाते हैं। एफ. टॉनीज ने जैमिन शैफ्ट का अर्थ बताते हुए कहा है कि जैमिन शैफ्ट (समुदाय) के समस्त सदस्य आत्मीयता से व्यक्तिगत और अनन्य रूप से साथ रहते हुए जीवन व्यतीत करते हैं।

प्रश्न 13.
गैसिल शैफ्ट का अर्थ बताइए।
उत्तर:
एफ. टॉनीज के अनुसार गैसिल शैफ्ट का अर्थ बताते हुए कहा है कि –

  • गैसिल शैफ्ट समाज में लोगों का जीवन है।
  • गैसिल शैफ्ट एक नयी सामाजिक प्रघटना है तथा यह अल्पकालिक व औपचारिक है। इसमें सदस्यों के बीच द्वितीयक संबंध पाये जाते हैं।

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प्रश्न 14.
हेरी एम. जॉनसन द्वारा बताई गई समाज की विशेषताएं बताइए।
उत्तर:
हेरी एम. जॉनसन ने समाज की निम्नलिखित विशेषताएँ बतायी हैं –

  • निश्चित भू-क्षेत्र
  • संतति
  • संस्कृति तथा
  • स्वावलंबन

प्रश्न 15.
समाज में संतति का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
समाज में संपति का महत्त्व निम्नलिखित है –

  • मनुष्य अपने जन्म के आधार पर ही एक समूह का सदस्य होता है।
  • अनेक समाजों में मनुष्यों की सदस्यता गोद लेने, दासता, जाति या अप्रवास के जरिए भी मिल जाती है लेकिन समूह में नए सदस्यों के लिए पुनरुत्पादन ही मौलिक स्रोत है।

प्रश्न 16.
समाज को एक प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाज को एक प्रक्रिया के रूप में निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है –

  • समाज में ही व्यक्ति एक-दूसरे से निरंतर अंत:क्रिया करते हैं। समाज को व्यक्तियों पर थोपा नहीं जाता है, अपितु सहभागियों द्वारा इसका अनुमोदन किया जाता है।
  • सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से समाज की रचना तथा पुनर्रचना होती है। संधिवार्ता स्व अन्य तथा प्रतिबिंबिता इसके प्रमुख शब्द हैं।

प्रश्न 17.
क्या समाज स्वतंत्र रूप से स्थिर रह सकता है?
उत्तर:
समाज निश्चित रूप से स्वतंत्र रूप से स्थिर रह सकता है। इस संबंध में निम्नलिखित तथ्य दिये जा सकते हैं –

  • समाज एक मौलिक संस्था है। यह किसी का उप-समूह नहीं है।
  • समाज एक स्थानीय, अपने आप में निहित तथा एकीकृत समूह है।

प्रश्न 18.
समाज का संगठन किस प्रकार सामाजिक नियंत्रणों पर आधारित है?
उत्तर:
समाज के संगठन को सुचारु रूप से चलाने के लिए व्यक्तियों के व्यवहार पर निम्नलिखित परम्पराएँ, रुढ़ियाँ, जनरीतियाँ, संहिताएँ तथा कानून आदि द्वारा समाज की प्रत्येक सामाजिक संरचना सामाजिक नियंत्रण का कार्य करती है।

प्रश्न 19.
अगस्त कोंत को समाजशास्त्र का जनक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
फ्रांस के दार्शनिक अगस्त कोंत सन् 1839 में मानव-व्यवहार का अध्ययन करने वाली सामाजिक विज्ञान की शाखा को समाजशास्त्र का नाम दिया था। इसलिए उन्हें समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है।

प्रश्न 20.
समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दों ‘सोशियस’ तथा ‘लोगोस’ से हुई है। ‘सोशियस’ का अर्थ समाज तथा ‘लोगोस’ का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाजशास्त्र का अर्थ है-समाज का विज्ञान।

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प्रश्न 21.
अपनी या अपने दोस्त अथवा रिश्तेदार को किसी व्यक्तिगत समस्या को चिह्नित कीजिए। इसे सामाजशास्त्रीय समझ द्वारा जानने की कोशिश कीजिए।
उत्तर:
आप कोई भी समस्या लें इस प्रश्न को छात्र या छात्राओं को स्वयं हल करना है। जैसे पढ़ाई में मन न लगना, किसी बात से डर लगना, स्कूल जाने में भव, समय के समायोजन को समग्या आदि। इन सभी पर आप आपने परिवार के लोगों की राय या मशविरा ले सकते हैं, शिक्षक से सलाह भी ले सकते हैं।

प्रश्न 22.
अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र मूल रूप से समाज में मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन करता है। एफ. आर. फेयरचाइल्ड तथा अन्य के अनुसार, “अर्थशास्त्र में मनुष्य की उन क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जो आवश्यकताओं की संतुष्टि हेतु मौलिक साधनों की प्राप्ति के लिए की जाती हैं।”

प्रश्न 23.
अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र मानव समाज का करते हैं। प्रत्येक आर्थिक घटना का सामाजिक पहलू होता है। आर्थिक पहलुओं का व्यापक अध्ययन करने के लिए उनका समाजशास्त्रीय विश्लेषण आवश्यक है।

मेकाइवर के अनुसार, “इकार, आर्थिक घटनाएँ सदैव सामाजिक आवश्यकताओं तथा। क्रियाओं के समस्त स्वरूपों द्वारा निश्चित होती हैं तथा वे (आर्थिक घटनाएँ) सदैव प्रत्येक प्रकार की सामाजिक क्रियाओं को पुनः निर्धारित, सृजित, स्वरूपित तथा परिवर्तित करती हैं।”

प्रश्न 24.
अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र में मौलिक अंतर बताइए।
उत्तर:

  • समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन करता है, इसलिए यह एक सामान्य विज्ञान है। अर्थशास्त्र आर्थिक संबंधों का अध्ययन करता है अतएव यह एक विशेष विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र मनुष्य की समस्त सामाजिक गतिविधियों का अध्ययन करता है। अतः समाजशास्त्र का क्षेत्र व्यापक है।
  • अर्थशास्त्र का अध्ययन-क्षेत्र मनुष्य की आर्थिक गतिविधियों तक ही सीमित है।
  • अतः अर्थशास्त्र का क्षेत्र समाजशास्त्र की अपेक्षा क व्यापक है।

प्रश्न 25.
राजनीति शास्त्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
राजनीति शास्त्र के अंतर्गत अनेक राजनीतिक संस्थाओं जैसे राज्य सरकार तथा उसके अंगों, संवैधानिक तथा न्यायिक संस्थाओं एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं तथा संबंधों का अध्ययन किया जाता है।

वेनबर्ग तथा शेबत के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र उन पद्धतियों का अध्ययन है जिनमें कि एक समाज अपने को संगठित करता है तथा राज्य का संचालन करता है।”

प्रश्न 26.
समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में अंतर बताएँ।
उत्तर:
समाजशास्त्र का मनोविज्ञान के साथ घनिष्ठ संबंध है। समाजशास्त्र समाज का अध्ययन करता है तो मनोविज्ञान मानसिक प्रक्रियाओं एवं विचारों का अध्ययन है। मनोविज्ञान की एक प्रमुख शाखा है-सामाजिक मनोविज्ञान इसे मनोविज्ञान समाजशास्त्र भी कहते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान में व्यक्ति मनोविज्ञान और समाजशास्त्र दोनों का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 28.
मैक्स वैबर ने समाजशास्त्र को किस रूप में परिभाषित किया है?
उत्तर:
मैक्स वैबर के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रिया का अर्थपूर्ण बोध कराने का प्रयास करता है।” उनका मत है कि समस्त मानवीय गतिविधियों का संबध क्रिया से होता है। ये क्रियाएँ ही समाजशास्त्र की विषय-वस्तु हैं।

प्रश्न 29.
समाजशास्त्रीय परिपेक्ष्य का अर्थ समझाइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र द्वारा सामाजिक संबंधों का नियामक रूप में तथा प्रयोगात्मक स्तरों पर अध्ययन किया जाता है। इसके अलावा समाजशास्त्रीय अध्ययन के अंतर्गत निरंतरता तथा परिवर्तन का विश्लेषण तथा व्याख्या भी की जाती है। वस्तुतः यही समाजशास्त्रीय परिपेक्ष्य है।

प्रश्न 30.
अगस्त कोंत के प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्र की दो मूल अवधारणाएँ बताइए।
उत्तर:
अगस्त कोंत के प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्र की दो मूल अवधारणाएँ इस प्रकार हैं –

  • सामाजिक स्थितिक (सामाजिक संरचना) तथा
  • सामाजिक गतिशीलता (सामाजिक परिवर्तन)।

प्रश्न 31.
अगस्त कोंत के त्रि-स्तरीय नियम को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
भौतिक शास्त्र के नियमों की तर ही समाज में नियम बनाए जा सकते हैं। इसी धारणा को आधार मानकर कोंत ने त्रि-स्तरीय नियम का प्रतिपादन किया –

  • धर्मशास्त्रीय स्थिति
  • तत्त्व मीमांसा स्थिति तथा
  • प्रत्यक्षात्मक स्थिति

कोंत ने पोजिटिविस्ट फिलॉसोफी द्वारा अपनी उपरोक्त धारणा का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 32.
मैक्स वैबर की एक प्रसिद्ध कृति का नाम बताइए। समाजशास्त्र की उनकी। परिभाषा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मैक्स वैबर की एक प्रसिद्ध कृति ‘थ्योरी ऑफ सोशल ऑरगेनाइजेशन’ है। मैक्स वैबर के समाजशास्त्र की परिभाषा “यह एक विज्ञान है जो सामाजिक क्रियाओं की विवेचनात्मक व्याख्या करने का प्रयत्न करता है, जो अंततः अपने कार्यों के परिणामों में कार्य-कारण सम्बन्धों की व्याख्या प्राप्त करता है।”

प्रश्न 33.
इतिहास की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
इतिहास में अतीत की घटनाओं का क्रमबद्ध तरीके तथा वैज्ञानिक नजरिए से अध्ययन किया जाता है। पार्क के अनुसार, “इतिहास मानव-अनुभवों तथा मानव-प्रकृति का स्थूल विज्ञान है।”

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प्रश्न 34.
‘समाजशास्त्र तथा इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इतिहास तथा समाजशास्त्र मानव समाज का अध्ययन करते हैं। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना का एक सामाजिक पहलू होता है। वर्तमान समय के सामाजिक परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए आवश्यक है कि ऐतिहासिक तथ्यों की समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से व्याख्या की जाए। जी. ई. हॉवर्ड ने सही कहा है कि “इतिहास भूतकाल का समाजशास्त्र है तथा समाजाशास्त्र – वर्तमान इतिहास है।”

प्रश्न 35.
इतिहास तथा समाजशास्त्र में मौलिक अंतर बताइए।
उत्तर:
इतिहासकार के लिए मुख्य अध्ययन की वस्तु ऐतिहासिक घटनाएँ हैं जबकि समाजशास्त्र के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु वे प्रतिमान होते हैं, जिनमें से घटनाएँ घटती हैं। इतिहास में एक जैसी घटनाओं में पायी जाने वाली विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है जबकि समाजशास्त्र में विभिन्न घटनाओं में पायी जाने वाली समानता का अध्ययन किया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धर्मशास्त्र, अधिभौतिक तथा प्रत्यक्षवाद अवस्थाओं में विभेद कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्रीय अगस्त कोंत भौतिक शास्त्र के सिद्धांतों की भाँति समाज के सिद्धांतों का निर्धारण करना चाहते थे। उनका मत था कि सभी समाजों में मानवीय बुद्धि का विकास निम्नलिखित तीन सोपानों से होकर गुजरता है –

  • धर्मशास्त्र का सोपान – धर्मशास्त्र के सोपान के अंतर्गत सभी व्याख्याएँ अति प्राकृतिक होती हैं। इस अवस्था में मानव-मन विभिन्न घटनाओं, पदार्थों तथा वस्तुओं की व्याख्या करने का प्रयत्न करता है।
  • अधिभौतिक सोपान – अधिभौतिक अवस्था के अंतर्गत व्याख्याएँ अति प्राकृतिक न होकर परंपराओं, अंतर्ज्ञान तथा अनुमानों पर आधारित होती हैं लेकिन ये व्याख्याएँ किसी प्रमाण द्वारा समर्थित नहीं होती हैं।
  • प्रत्यक्षवाद का सोपान – प्रत्यक्षता के सोपान के अंतर्गत व्याख्याएँ अवलोकित तथ्यों पर आधारित होती हैं। इस सोपान में तार्किक आधार पर निरीक्षण तथ परीक्षण योग्य सिद्धांतों का विकास किया जाता है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र में एमिल दुर्खाइम का मुख्य संबंध किस बात से था?
उत्तर:
एमिल दुर्खाइम (1858-1917 ई.) ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में एकीकरण को समाजशास्त्र के केन्द्रीय अध्ययन की वस्तु स्वीकार किया है। दुर्खाइम का मुख्य संबंध निम्नलिखित बातों से था –

  • सामाजिक तथ्य
  • आत्महत्या तथा
  • धर्म

1. सामाजिक तथ्य – दुर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र वास्तव में सामाजिक तथ्यों का अध्ययन है। दुर्खाइम का कहना है कि समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र कुछ घटनाओं तक सीमित है। इन्हीं घटनाओं को उसने सामाजिक तथ्य कहा है। दुर्खाइम का मत है कि सामाजिक तथ्य कार्य करने, चिंतन तथा अनुभव की ऐसी पद्धति है जिसका अस्तित्व व्यक्ति की चेतना के बाहर होता है। उसने सामाजिक तथ्य की निम्नलिखित दो विशेषताएँ बतायी हैं-बाह्यता तथा बाध्यता।

2. आत्महत्या – दुर्खाइम ने आत्महत्या की व्याख्या सामाजिक एकता, सामूहिक चेतना, सामाजिकता तथा प्रतिमानहीनता के विशिष्ट संदर्भ में की है। दुर्खाइम ने आत्महत्या के निम्नलिखित तीन प्रकार बताए हैं –

  • परमार्थमूलक आत्महत्या
  • अहंवादी आत्महत्या तथा
  • प्रतिमानहीनता मूलक आत्महत्या।

3. धर्म – धर्म की उत्पत्ति के बारे में दुर्खाइम सामूहिक उत्सवों तथा कर्मकाडों को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने धर्म को पवित्रता की धारणा से संबद्ध किया है।

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प्रश्न 3.
“समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की न तो गृह-स्वामिनी है और न ही उनकी दासी है वरन् उनकी बहन मानी जाती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के सम्बन्ध में प्रश्नान्तर्गत पूछी गई बातों का स्पष्टीकरण इसका प्रकार दी जा सकती है –

  • समाजशास्त्र एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है। गिडिंग्स का मत है कि समाजशास्त्र के द्वारा समाज का व्यापक तथा संपूर्ण अध्ययन में किया जाता है।
  • अतः अन्य सामाजिक विज्ञानों से इसका संबंध स्वाभाविक है लेकिन समाजशास्त्र का अपना विशिष्ट दृष्टिकोण है।
    समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण ही समाजशास्त्र को एक विशिष्ट स्थान दिलाता है।
  • इस प्रकार समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों का योग समन्वय मात्र नहीं है।
  • प्रसिद्ध समाजशास्त्री सोरोकिन समाजशास्त्र को एक विशिष्ट सामाजिक विज्ञान मानते हैं।
  • उनका मत है कि समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है।
  • समाजशास्त्र के द्वारा ने केवल समाज के सामान्य सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है वरन् विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के मध्य संबंध भी स्थापित किया जाता है।

इस प्रकार, समाजशास्त्र एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान है। अन्य सामाजिक विज्ञानों से इसके संबंध समानता के आधार पर हैं। इसकी विशिष्ट अध्ययन पद्धतियाँ तथा दृष्टिकोण इसे एक पृथक् सामाजिक विज्ञान बनाते हैं।

प्रश्न 4.
क्या समाज अमूर्त है?
उत्तर:
निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है समाज अमूर्त है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री यूटर के अनुसार, “समाज एक अमूर्त धारणा है जो एक समूह के सदस्यों के बीच पाए जाने वाले पारस्परिक संबंधों की संपूर्णता का ज्ञान कराती है।”

मेकाइवर तथा पेज ने समाज को सामाजिक संबंधों का जाल कहा है। सामाजिक संबंधों को न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है, उन्हें केवल अनुभव किया जा सकता है। अतः समाज अमूर्त है। यह वस्तु के मुकाबले प्रक्रिया तथा संरचना के मुकाबले गति है।

राइट के अनुसार, “यह (समाज) व्यक्तियों का समूह नहीं है। यह समूह के सदस्यों के बीच स्थापित संबंधों की व्यवस्था है।” राइट ने समाज को सामाजिक संबंधों के समूह के रूप में परिभाषित किया है न कि व्यक्तियों के समूह के रूप में।

समाज के संबंधों का निर्माण तथा विस्तार सामाजिक अंत:क्रियाओं से होता है। चूंकि सामाजिक अंत:क्रियाओं का स्वरूप अमूर्त है। अतः समाज भी अमूर्त है। निष्कर्षतः राइट के शब्दों में कहा जा सकता है कि समाज सार रूप में एक स्थिति, अवस्था अथवा संबंध है, इसलिए आवश्यक रूप से यह अमूर्त है।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र के उद्भव के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
एक सामाजिक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र का जन्म यूरोप में 19वीं सदी में हुआ। प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक अगस्त कोंत ने 1839 ई. में समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया। हालांकि, कोंत ने शुरू में इस विज्ञान का नाम सामाजिक भौतिकी रखा था। एक पृथक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र का अध्ययन अमेरिका में 1879 में, फ्रांस में 1989 ई. में, ब्रिटेन में 1907 ई. में तथा भारत में 1919 ई. में शुरू हुआ।

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प्रश्न 6.
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की क्या विशेषता है?
उत्तर:
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की विशेषताओं का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –

  1. समाजाशास्त्र के जनक अगस्त कोंत से लेकर वर्तमान समय तक समाजशास्त्रीय समाजशास्त्र की एक स्वीकार्य परिभाषा निर्धारित करने के लिए सतत् प्रयासरत हैं।
  2. समाजशास्त्री समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र तथा उसके अध्ययन के लिए विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों को निर्धारित करने में लगे हुए हैं।
    समाजशास्त्र के द्वारा मानव व्यवहार तथा सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।
  3. दुर्खाइम, सोरोकिन तथा हॉबहाउस का मत है कि समाजशास्त्र भी अन्य प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति एक सामान्य विज्ञान है।
  4. जहाँ तक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का सवाल है, यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र के द्वारा सामाजिक प्रयोगात्मक स्तरों पर अध्ययन किया जाता है।
  5. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अंतर्गत समाज तथा उससे संबंधित तथ्यों का अध्ययन निरंतरता व वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र क्या है?
उत्तर:
समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘सोशियस’ तथा यूनानी भाषा के शब्द ‘लोगोस’ से हुई है। ‘सोशियस’ का अर्थ है। सामाजिक ‘लोगोस’ का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक विज्ञान। समाजशास्त्र समूह में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। विभिन्न विद्वानों का समाजशास्त्र के संबंध में निम्न मत है वार्ड के अनुसार-“समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।” ए. एम. रोज के अनुसार – “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में तथा संबंधों के जाल को हम समाज कहते हैं।” “समाजशास्त्र सामूहिक व्यवहारों का विज्ञान है।” पार्क तथा बर्गेस “समाजशास्त्र सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन करता है।”

एमिल दुर्खाइम अर्थात् सामाजिक संबंधों का नियामक के रूप में तथा प्रयोगात्मक स्तरों पर क्रमबद्ध ज्ञान को समाजशास्त्र कहा जाता है, जो समाज का विज्ञान है और इसमें समाज के सामूहिक व्यवहारों का सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक कारणों सहित क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 8.
समाज के उद्विकास पर स्पेंसर का क्या दृष्टिकोण है?
उत्तर:
समाज के उद्विकास पर हरबर्ट स्पेंसर (1820-1903 ई.) के विचारों का निम्नलिखित बिन्दुओं के अंतर्गत अध्ययन किया जा सकता है –

  • अगस्त कोंट की भाँति स्पेंसर भी समाज की व्याख्या उद्विकासीय पद्धति के आधार पर करते हैं।
  • स्पेंसर के दृष्टिकोण में समाज अनेक व्यक्तियों का सामूहिक नाम है।
  • स्पेंसर समाज के पृथक-पृथक अंगों की तुलना सजीव शरीर के अलग-अलग अंगों से करते हैं। उनकी मान्यता है कि जिस प्रकार प्राणी का उद्विकास हुआ, उसी प्रकार समाज भी उद्विकास का परिणाम है।

स्पेंसर सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया के निम्नलिखित सोपान बताते हैं –

  • समाज सदैव सरल स्थिति से स्थिति की तरफ आगे बढ़ता है।
  • सामाजिक उद्विकास के साथ-साथ सामाजिक सजातीयता के बजाए सामाजिक विजातीयता की स्थिति बन जाती है।
  • समाज में उद्विकास की प्रक्रिया कम विभिन्नीकृत से अधिक विभिन्नीकृत स्थिति की तरफ तथा निम्न स्तर से उच्च स्तर की तरफ बढ़ती रहती है।

प्रश्न 9.
समाजशास्त्र के उद्गत और विकास का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
समाजशास्त्र का उद्गम यूरोप में हुआ। समाजशास्त्र के अधिकांश मुद्दे एवं सरोकार भी उस समय की बात करते हैं जब यूरोपियन समाज 18वीं और 19वीं सदी के औद्योगिक और पूँजीवाद के आने के कारण गंभीर रूप से परिवर्तन की चपेट में था। जैसे नगरीकरण या कारखानों के उत्पादन, सभी आधुनिक समाजों के लिए प्रासांगिक थे, यद्यपि उनकी कुछ विशेषताएँ हटकर हो सकती थीं, जबकि भारतीय समाज अपने औपनिवेशिक अतीत और अविश्वसनीय विविधता के कारण भिन्न है। भारत का समाजशास्त्र इसे दर्शाता है।

यूरोप में समाजशास्त्र के आरम्भ और विकास को पढ़ना क्यों आवश्यक है? वहाँ से शुरूआत करना क्यों प्रासंगिक है? क्योंकि भारतीय होने के नाते हमारे अतीत अंग्रेजी पूँजीवाद और उपनिवेशवाद के इतिहास से गहरा जुड़ा है। पश्चिम में पूँजीवाद विश्वव्यापी विस्तार पर गया था। उपनिवेशवाद आधुनिक पूँजीवाद एवं औद्योगिकरण का आवश्यक हिस्सा था। इसलिए पश्चिमी समाजशास्त्रियों का पूँजीवाद एवं आधुनिक समाज के अन्य पक्षों पर लिखित दस्तावेज भारत में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों को समझने के लिए सर्वथा प्रासंगिक है। इस प्रकार उपर्युक्त कारकों से समाजशास्त्र के उद्गम और विकास का अध्ययन आवश्यक है।

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प्रश्न 10.
‘सभी सामाजिक विज्ञानों के विषय-वस्तु समान है, फिर भी विभिन्न सामाजिक विज्ञान पृथक-पृथक हैं।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सभी सामाजिक विज्ञान जैसे राजनीतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास, मानवशास्त्र, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र आदि समाज में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करते हैं। सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु समान होते हुए भी उनके दृष्टिकोण में अंतर पाया जाता है। जिस प्रकार एक वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ अलग-अलग दिशाओं की ओर संकेत करती हैं ठीक उसी प्रकार ज्ञान रूपी वृक्ष की विभिन्न शाखाएँ मानव व्यवहार का विभिन्न गतिविधियों का अध्ययन करती हैं।

सामाजिक विज्ञानों को एक-दूसरे से पृथक् करके उनका एकीकृत अध्ययन नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए चिकित्सा के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ हैं। ठीक उसी प्रकार समाज का अध्ययन करने के लिए अलग-अलग सामाजिक विज्ञान हैं। इस प्रकार, सभी सामाजिक विज्ञानों की विषय-वस्तु समान होते हुए भी दृष्टिकोणों में विभिन्नता पायी जाती है लेकिन विभिन्न विषयों के बीच पायी जाने वाली विभिन्नताएँ ज्ञान रूपी नदी हैं जिनके उद्गम का स्रोत एक ही है।

जार्ज सिम्पसन ने अपनी पुस्तक ‘Man in Society’ में लिखा है कि “सामाजिक विज्ञानों के बीच एक अटूट एकता है, यह एकता काल्पनिक एकता नहीं है, यह विभिन्न भागों की गतिशील एकता है तथा एक भाग दूसरे प्रत्येक भाग के लिए तथा अन्य भागों के लिए आवश्यक है।’

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ – समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘सोशियस’ तथा यूनानी भाषा के शब्द ‘लोगोस’ से हुई है। सोशियस का अर्थ है सामाजिक तथा लोगोस का अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ है सामाजिक विज्ञान।

समाजशास्त्र की परिभाषा – समाजशास्त्र समूह में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समाजशास्त्रियों द्वारा समाजशास्त्र की परिभाषा निम्नलिखित रूपों में दी गई है –
1. समाजशास्त्र समाज एक विज्ञान के रूप में – वार्ड के अनुसार, “समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।” ओडम के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।” गिडिंग्स के अनुसार, “समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।”

2. समाजशास्त्रीय सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में – ए. एम. रोज के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में तथा संबंधों के जाल को हम समाज कहते हैं।”

3. समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के अध्ययन के रूप में – आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।” बेनट तथा ट्यमिन के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन की संरचना तथा कार्यों का विज्ञान है।”

4. समाजशास्त्र समूह में मानव – व्यवहार के अध्ययन के रूप में-पार्क तथा बर्गेस के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक व्यवहारों का विज्ञान है।” किंबाल यंग के अनुसार, “समाजशास्त्र समूह में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करता है।”

5. समाजशास्त्र सामाजिक प्रघटनाओं के अध्ययन के रूप में – एमिल दुर्खाइम के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन करता है।

6. समाजशास्त्र सामाजिक क्रियाओं के अध्ययन के रूप में – मैक्स वैबर के अनुसार समस्त मानवीय गतिविधियों का सामाजिक संबंध क्रिया से होता है।

प्रश्न 2.
चर्चा कीजिए कि आजकल अलग-अलग विषयों में परस्पर लेन-देन कितना ज्यादा है?
उत्तर:
समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है। यह एक दुकानदार और उपभोक्ता के बीच, एक अध्यापक और विद्यार्थी के बीच, दो मित्रों के बीच अथवा परिवार के सदस्यों के बीच की अंतः क्रिया के विश्लेषण को अपना केन्द्रबिन्दु बना सकता है। इसी प्रकार यह राष्ट्रीय मुद्दों जैसे बेरोजगारी अथवा जातीय संघर्ष या सरकारी नीतियों या आदिवासी जनसंख्या के जंगल पर अधिकार या ग्रामीण कों को अपना केन्द्र बिन्दु बना सकता है अथवा वैश्विक सामाजिक प्रक्रिया, जैसे-नए लचीले श्रम कानूनों का श्रमिक वर्ग पर प्रभाव अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का नौजवानों पर प्रभाव अथवा विदेशी विश्वविद्यालयों के आगमन का देश की शिक्षा-प्रणाली पर प्रभाव की जाँच कर सकता है।

इस प्रकार समाजशास्त्र का विषय परिभाषित नहीं होता कि वह क्या अध्ययन (परिवार या व्यापार संघ अथवा गाँव) करता है बल्कि इससे परिभाषित होता है वह एक चयनित क्षेत्र का अध्ययन कैसे करता है। समाजशास्त्र के ये विवेचित विषय अन्य विषयों के भी अंग हैं। इसलिए अन्य विषय आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और विषय-सामग्री का इनमें परस्पर लेन-देन अनिवार्य है।

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प्रश्न 3.
समाजशास्त्र के जनक के रूप में अगस्त कोंत जाने जाते हैं, कैसे?
उत्तर:
समाजशास्त्र शब्द से संसार को सर्वप्रथम परिचित कराने का श्रेय फ्रांसीसी दार्शनिक तथा समाजशास्त्री अगस्त कोंत को है। सर्वप्रथम अगस्त कोंत ही सामाजिक विचारक थे। जिन्होंने सामाजिक घटनाओं के अध्ययन क्षेत्र की कल्पना या आध्यात्मिक विचारों को दृढ़ता से निकालकर उसे वैज्ञानिक तथ्यों से सींचा। वे 1789 ई. के फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप उत्पन्न फ्रांस की राजनीतिक उथल-पुथल सधे प्रभावित थे।

उनकी प्रारंभिक रचनाओं में पुर्नजागरण और परम्पराओं के अवैज्ञानिक विचारों पर प्रत्यक्ष प्रहार किया गया। उन्होंने अवलोकन और प्रयोग पर आधारित समाज के अध्ययन हेतु तार्किक उपागम का विकास किया। कोंत एक ऐसे विज्ञान का सृजन करना चाहते थे जो कि सामाजिक घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से कर सके।

प्रश्न 4.
‘समाज’ शब्द के विभिन्न पक्षों की चर्चा कीजिए। यह आपके सामान्य बौद्धिक ज्ञान की समझ से किस प्रकार अलग है?
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मेकाइवर तथा पेज ने समाज के प्रमुख आधारों को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “समाज रीतियों, कार्य-प्रणालियों, अधिकार-सत्ता एवं पारस्परिक संयोग, अनेक समूह तथा उनके विभागों, मानव-व्यवहार के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है।”

उपरोक्त परिभाषा के समाज के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –
1. रीतियाँ – रीतियों के अंतर्गत समाज के उन स्वीकृत तरीकों को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें समाज व्यवहार के क्षेत्र में उचित मानता है। रीतियाँ अथवा चलन समाज में मनुष्य की एक निश्चित तथा समाज स्वीकृत व्यवहार करने के लिए बाध्य करते हैं। इस प्रकार रीतियाँ सामाजिक संबंधों को निश्चित स्वरूप प्रदान करने में सहयोग देती हैं।

2. कार्य – प्रणालियाँ – कार्य-प्रणालियों का तात्पर्य सामाजिक संस्थाओं से है। संस्थाएँ वास्तव में प्रस्थापित कार्यविधियाँ होती हैं। समाज के सदस्यों से यह अपेक्षित है कि वे प्रचलित कार्य-प्रणालियों के माध्यम से अपने कार्यों को पूरा करें। कार्य-प्रणालियाँ समाज को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करने में सहायक होती हैं।

3. अधिकार – सत्ता-अधिकार-सत्ता भी सामाजिक संबंधों को सुचारू रूप से चलाने तथा नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री जॉर्ज सिमल ने अधिकार-सत्ता पर विशेष जोर दिया है। अधिकार सत्ता तथा अधीनता दो परस्पर संबंधित सामाजिक संबंध हैं। किसी स्थिति में व्यक्ति अधिकार-सत्ता तथा किसी अन्य स्थिति में अधीनता रखता है। अधिकार-सत्ता व्यवहार के प्रतिमानों को परिभाषित तथा परिचालित करती है।

4. पारस्परिक सहयोग – पारस्परिक सहयोग समाज के अस्तित्व को स्थायित्व तथा निरंतरता प्रदान करता है। क्रोप्टकिन ने पारस्परिक सहयोग को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया है। बोगार्डस के अनुसार, “पारस्परिक सहयोग, सहयोग का एक विशिष्ट नाम है।” समाज की प्रगति, श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण की प्रक्रियाएँ पारस्परिक सहयोग पर निर्भर हैं। राइट के अनुसार, “यह (समाज) व्यक्तियों का एक समूह नहीं है। यह समूह के सदस्यों के बीच स्थापित संबंधों की व्यवस्था है।”

पारस्परिक सहयोग की अनुपस्थिति में सामाजिक अंतः क्रियाओं की कल्पना नहीं की जाप सकती है।

5. समूह तथा विभाग – समाज विभिन्न समूहों, विभागों तथा उप-विभागों का समीकरण है। मनुष्य इन समूहों तथा विभागों में रहकर ही सामाजिक व्यवहार करता है। समाज एक व्यापक तथा विस्तृत अवधारणा है तथा इसके अंतर्गत राष्ट्र, नगर, गाँव, विभिन्न समुदाय, समितियाँ तथा संस्थाएँ आदि सभी सम्मिलित होते हैं। समूह तथा विभागों के माध्यम से मानव-व्यवहार को एक निश्चित आधार तथा दिशा मिलती है।

6. मानव – व्यवहार का नियंत्रण-सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए मानव-व्यवहार पर नियंत्रण आवश्यक है। मानव व्यवहार को आपैचारिक तथा अनौपचारिक नियंत्रणें द्वारा नियंत्रित किया जाता है। औपचारिक नियंत्रण के अंतर्गत राज्य द्वारा निर्मित कानून तथा पुलिस व्यवस्था आदि आते हैं। अनौपचारिक नियंत्रण के अंतर्गत परंपराएँ, रूढ़ियाँ जनरीतियाँ तथा रिवाज आदि आते हैं।

7. मानव – व्यवहार की स्वतंत्रताएँ – मानव-व्यवहार में नियंत्रणों के साथ-साथ स्वतंत्रताएँ भी आवश्यक हैं। मनुष्यों को समाज द्वारा प्रतिस्थापित नियमों की संरचना के अंतर्गत व्यवहार करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। स्वतंत्रताओं के माध्यम से सामाजिक प्रतिमानों का विकास होता है जो सामाजिक परिवर्तन तथा प्रगति के लिए जरूरी हैं। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मेकाइवर तथा पेज द्वारा दिए गए समाज के विभिन्न आधार सामाजिक संबंधों के जाल को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करने में सहायक हैं।

समाजशास्त्र और सामान्य बौद्धिक ज्ञान-समाजशास्त्रीय ज्ञान ईश्वरमीमांसीय और दार्शनिक अवलोकनों से अलग है। इसी प्रकार समाजशास्त्र सामान्य बौद्धिक अवलोकनों से भी अलग है। सामान्य बौद्धिक वर्णन सामान्यतः उन पर आधारित होते हैं जिन्हें हम प्रकृतिवादी और व्यक्तिवादी वणन कह सकते हैं। व्यवहार का एक प्रकृतिवादी वर्णन इस मान्यता पर निर्भर करता है कि एक व्यक्ति व्यवहार के प्राकृतिक कारणों की पहचान कर सकता है।

अतः समाजशास्त्र सामान्य बौद्धिक अवलोकनों एवं विचारों तथा साथ ही साथ दार्शनिक विचारों दोनों से ही अलग है। यह हमेशा या सामान्यत: भी चमत्कारिक परिणाम नहीं देता लेकिन अर्थपूर्ण और असंदिग्ध संपर्कों की छानबीन द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। समाजशास्त्री ज्ञान में बहुत अधिक प्रगति हुई है। ज्यादा प्रगति तो सामान्य रूप से हुई परंतु कभी-कभी नाटकीय उद्भवों से भी प्रगति हुई है।

समाजशास्त्र में अवधारणाओं, पद्धतियों और आँकड़ों का एक पुरा तंत्र है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह किस तरह संयोजित है। यह सामान्य बौद्धिक ज्ञान से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। सामान्य बौद्धिक ज्ञान अपरावर्तनीय है क्योंकि यह अपने उद्गम के बारे में कोई प्रश्न नहीं पूछता है। या दूसरे शब्दों में यह अपने आप से यह नहीं पूछता–“मैं यह विचार क्यों रखता हूँ?” एक समाजशास्त्री को अपने स्वयं के बारे में तथा अपने किसी भी विश्वास के बारे में प्रश्न पूछने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए चाहे वह विश्वास कितना भी प्रिय क्यों न हों-“क्या वास्तव में ऐसा है?”

समाजशास्त्र के दोनों ही उपागम, व्यवस्थित एवं प्रश्नकारी, वैज्ञानिक खोज की एक विस्तृत परंपरा से निकलते हैं। वैज्ञानिक विधियों के इस महत्व को तभी समझा जा सकता है, जब हम अतीत की तरफ लौटे और उस समय की सामाजिक परिस्थिति को समझें जिसमें समाजशास्त्री दृष्टिकोण का उद्भव हुआ था क्योंकि आधुनिक विज्ञान में हुए विकासों का समाजशास्त्र पर गहरा पड़ा था।

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प्रश्न 5.
समाजशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में संबंध की व्याख्या कीजिए। अथवा, समाजशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में समानताएँ तथा विभिन्नताएँ बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र तथा राजीतिशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं । यही कारण है कि मोरिस गिंसबर्ग ने कहा है कि “ऐतिहासिक दृष्टि से समाजशास्त्र की मुख्य जड़ें राजनीति एवं इतिहास दर्शन में हैं।” समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अभाव में राजनीतिशास्त्र का अध्ययन अधूरा ही रहेगा । बार्स के अनुसार, “समाजशास्त्र तथा आधुनिक राजनीतिशास्त्र के विषय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पिछले 30 वर्षों में राजनीतिक सिद्धांत में जो परिवर्तन हुए हैं, वे सभी समाजशास्त्र द्वारा अंकित तथा सुझाए गए विकास के अनुसार ही हुए हैं।

समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र में समानता –
1. समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र दोनों ही समाज में मनुष्य के व्यवहार तथा गतिविधियों का अध्ययन करते हैं। प्रसिद्ध विद्वान अरस्तू के अनुसार, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।”

2. सामाजिक जीवन तथा राजनीतिक जीवन एक-दूसरे से अत्यधिक जुड़े हुए हैं। जी. ई. जी. कॉलिन के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र तथा समाजशास्त्र एक ही आकृति के दो रूप हैं।’ इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए एफ. जी. विल्सन ने कहा है कि “यह अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि आम तौर पर यह फैसला करना कठिन हो जाता है कि विशिष्ट लेखक को समाजशास्त्री, राजनीतिशास्त्री या दर्शनशास्त्री क्या मान जाए?”

3. समाजशास्त्री संस्थाएँ राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप तथा प्रकृति समाज के स्वरूप तथा प्रकृति से निर्धारित होते हैं । गिडिंग्स के अनुसार, “जिस व्यक्ति को पहले समाजशास्त्र के मूल सिद्धांतों का ज्ञान न हो, उसे राज्य के सिद्धांत की शिक्षा देना वैसा ही है, जैसे न्यूटन के गति सिद्धांत को न जानने वाले को खगोलशास्त्र या ऊष्मा विज्ञान की शिक्षा देना।”

4. मनुष्य के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में अत्यधिक पारस्परिकता तथा अंत:निर्भरता पायी जाती है। दोनों ही एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। प्रसिद्ध विद्वान गिंसबर्ग के अनुसार, “यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र की उत्पत्ति राज्य के अतिरिक्त अन्य संस्थाओं के अध्ययन हेतु राजनीतिक अन्वेषण के क्षेत्र में विकास के परिणामस्वरूप हुई । उदाहरण के लिए परिवार या सम्पत्ति के स्वरूप और संस्कृति और सभ्यता के अन्य तत्त्व जैसे आचार, धर्म और कला, ये सामाजिक उपज माने जाते हैं तथा एक-दूसरे के संदर्भ में इनका अवलोकन किया जाता है।

समाजशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में विभिन्नताएँ अथवा अंतर –
1. समाजशास्त्र का क्षेत्र तथा दृष्टिकोण राजनीतिशास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक तथा विस्तृत है। समाजशास्त्र में सभी सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में राज्य तथा सरकार के संगठन का ही अध्ययन किया जाता है। गार्नर के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र मानव समुदाय के केवल एक रूप-राज्य से संबंधित, समाजशास्त्र मानव समुदाय के सभी रूपों से संबंधित है।”

2. समाजशास्त्र के द्वारा जीवन के समान्य पक्षों का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीतिशास्त्र जीवन के एक विशिष्ट पक्ष का अध्ययन करता है। गिलक्राइस्ट के अनुसार, “समाजशास्त्र मनुष्य का सामाजिक प्राणी के रूप में अध्ययन करता है। चूंकि राजनीति संगठन सामाजिक संगठन का एक विशिष्ट स्वरूप होता है, अतः राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की अपेक्षा अधिक विशिष्ट शास्त्र है।”

3. समाजशास्त्र का दृष्टिकोण समग्र है तथा यह चेतन व अचेतन दोनों ही अवस्थाओं का अध्ययन करता है जबकि राजनीतिशास्त्र का दृष्टिकोण एकपक्षीय है तथा यह केवल चेतन अवस्था का ही अध्ययन करता है।

4. समाजशास्त्रीय अध्ययन तथा ज्ञान जीवन के समस्त क्षेत्रों के लिए लाभदायक हैं जबकि राजनीति शास्त्र का ज्ञान केवल राजनीति के लिए लाभदायक है।

5. समाजशास्त्र के अंतर्गत सामाजिक संगठन तथा विघटन की उत्तरदायी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीतिशास्त्र शास्त्र में मुख्य रूप से राज्य तथा सरकार का अध्ययन किया जाता है जो मूल रूप से संगठित संस्थाएँ हैं।

अंत में गिलक्राइस्ट के शब्दां में हम कह सकते हैं कि “दोनों विज्ञानों की वास्तविक सीमाएँ अनमनीय रूप से परिभाषित नहीं की जा सकतीं। वे कभी-कभी एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण करती हैं लेकिन दोनों के बीच एक स्पष्ट सामान्य भेद है।”

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र तथा इतिहास में समानताएँ तथा विभिन्नताएँ बताइए। अथवा, समाजशास्त्र तथा इतिहास के बीच संबंध बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र तथा इतिहास दोनों ही मानव समाज का अध्ययन करते हैं । इतिहास द्वारा प्रदान किए गए तथ्यों की व्याख्या तथा उनमें समन्वय समाजशास्त्र के द्वारा किया जाता है।

समाजशास्त्र तथा इतिहास में समानताएँ –

  • दोनों ही विषय मानव समाज का अध्ययन करते हैं।
  • समाजशास्त्रीय विश्लेषण ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
  • समाजशास्त्र तथा इतिहास दोनों ही मानवीय गतिविधियों तथा घटनाओं का अध्ययन करते हैं।
  • सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए ऐतिहिासिक घटनाओं का अध्ययन आवश्यक है।
  • इतिहास तथा समाजशास्त्र की पारस्परिक निर्भरता के विषय में जी. ई. हावर्ड ने लिखा है कि, “इतिहास भूतकाल का समाजशास्त्र है और समाजशास्त्र वर्तमान इतिहास है।”
  • समाजशास्त्र के द्वारा ऐतिहासिक घटनाओं के अध्ययन हेतु सामाजिक पृष्ठभूमि प्रदान की जाती है । इसी प्रकार समाजशास्त्र अपनी अध्ययन सामग्री के लिए इतिहास पर निर्भर करता है।
  • यही कारण है कि बुलो ने समाजशास्त्र को इतिहास से पृथक् मानने से इंकार कर दिया

समाजशास्त्र तथा इतिहास में विभिन्नताएँ अथवा अंतर –

  • समाजशास्त्र विभिन्न घटनाओं में पायी जाने वाली समानताओं का अध्ययन करता है; जबकि इतिहास में समान घटनाओं में पायी जाने वाली भिन्नता का अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र के द्वारा समाज का समाजीकरण किया जाता है जबकि इतिहास के द्वारा विशिष्टीकरण तथा वैयक्तिकता की खोज की जाती है।
  • पार्क के अनुसार, “इतिहास जहाँ मानव अनुभवों तथा मानव प्रकृति का मूर्त विज्ञान है, समाजशास्त्र एवं अमूर्त विज्ञान है।”
  • समाजशास्त्र सामाजिक घटनाओं का अध्ययन सामाजिक संबंधों की दृष्टि से करता है जबकि इतिहास में घटनाओं के समस्त पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  • उदाहरण के लिए समाजशास्त्रीय युद्ध को सामाजिक घटना स्वीकार करके उसका व्यक्तियों के जीवन तथा सामाजिक संस्थाओं पर प्रभाव का अध्ययन करेगा। दूसरी तरफ, इतिहासकार युद्ध तथा उससे संबंधित सभी परिस्थिति का अध्ययन करेगा।

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प्रश्न 7.
समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र का संबंध स्पष्ट कीजिए। अथवा, समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में समानताएँ तथा विभिन्नताएँ बताइए।
उत्तर:
समाजशास्त्र तथा इतिहास एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। सामाजिक गतिविधियों तथा व्यवहार आर्थिक गतिविधियों तथा व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। समाजशास्त्र तथा इतिहास के पारस्परिक संबंधों के बारे में मेकाइवर ने लिखा है कि “इस प्रकार की आर्थिक घटनाएँ सदेव सामाजिक आवश्यकताओं तथा क्रियाओं के समस्त रूपों से निश्चित होती हैं तथा वे (आर्थिक घटनाएँ) सदैव प्रत्येक प्रकार की सामाजिक आवश्यकताओं व क्रियाओं को पुनर्निर्धारित, सृजित, स्वरूपीकृत एवं परिवर्तित करती हैं।”

वास्तव में आर्थिक संबंधों तथा गतिविधियों का पर्यावरण से सामाजिक संबंध है। थॉमस के अनुसार, “वास्तव में, अर्थशास्त्र समाजशास्त्र के विस्तृत विज्ञान की एक शाखा है…..”।

समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में समानताएँ –
1. समाजशास्त्रीय अध्ययन तथा अर्थशास्त्रीय अध्ययन समाजरूपी वस्त्र के ताने-बाने हैं। यही कारण है कि सामाजिक कारकों तथा आर्थिक कारकों को पृथक नहीं किया जा सकता है। अनेक विद्वानों ने सामाजिक तथा आर्थिक प्रघटनाओं का मिला-जुला अध्ययन किया है। इन विद्वानों में कार्ल मार्क्स, मैक्स वैबर तथा वेबलन आदि प्रमुख हैं।

2. सामाजिक घटनाओं का आर्थिक पहलू भी होता है। उदाहरण के लिए अपराध, निर्धनता, बेकारी, दहेज आदि सामाजिक घटनाओं का सशक्त आर्थिक पहल है। कार्ल मार्क्स ने तो आर्थिक तत्वों को समाज की एकमात्र गत्यात्मक शक्ति स्वीकार किया है।

समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में विभिन्नताएँ अथवा अंतर –
1. समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन के समस्त पहलुओं तथा गतिविधियों का अध्ययन करता है जबकि अर्थशास्त्र मनुष्य के केवल आर्थिक पहलू का अध्ययन करता है।

2. समाजशास्त्र का अध्ययन, क्षेत्र तथा विषय-सामग्री अधिक व्यापक है जबकि अर्थशास्त्र के अध्ययन की प्रकृति व्यक्तिवादी है।

3. अध्ययन की प्रकृति एवं दृष्टिकोण से समाजशास्त्र समूहवादी सामाजिक विज्ञान है, जबकि अर्थशास्त्र के अध्ययन की प्रकृति व्यक्तिवादी है।

4. समाजशास्त्रीय विश्लेषण बहुकारकीय होते हैं जबकि अर्थशास्त्रीय विश्लेषण में आर्थिक कारकों को ही प्रमुखता तथा महत्त्व प्रदान किया जाता है।

5. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जबकि अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण से मनुष्य एक आर्थिक प्राणी है।

प्रश्न 8.
समाजशास्त्र की प्रकृति तथा विषय-क्षेत्र की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(i) समाजशास्त्र की प्रकृति-समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। समाजशास्त्र वैज्ञानिक पद्धति के निम्नलिखित सोपानों का प्रयोग करता है –

  • आनुभाविकता
  • सिद्धांत
  • संचयी ज्ञान तथा
  • मूल्य तटस्थता

जबकि दूसरी तरफ, कुछ विद्वान निम्नलिखित तर्कों के आधार पर समाजशास्त्र को एक विज्ञान स्वीकार नहीं करते हैं –

  • वस्तुनिष्ठता का अभाव
  • अवलोकन का अभाव
  • प्रयोग का अभाव
  • विषय-सामग्री मापने का अभाव तथा
  • भीवष्यवाणी का अभाव

समाजशास्त्र के विरुद्ध उपरोक्त वर्णित उपलब्धियों का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाजशास्त्र में विषय-वस्तु का क्रमबद्ध तरीके से वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र में निम्नलिखित विधियों अथवा यंत्रों का प्रयोग किया जाता है –

  • समाजमिति
  • प्रश्नावली
  • अनुसूची
  • साक्षात्कार
  • केस स्टडी

समाजशास्त्री का विषय – क्षेत्र-समाजशास्त्र की परिभाषा तथा प्रकृति की भाँति इसके विषय-क्षेत्र के बारे में भी विद्वानों में मतभेद हैं। वी. एफ. काल्बर्टन का मत है कि “क्योंकि समाजशास्त्र एक ऐसा लचीला विज्ञान है कि यह निर्णय करना कठिन है कि इसकी सीमा कहाँ शुरू होती है तथा कहाँ समाप्त…….”

समाजशास्त्र के क्षेत्र के बारे में समाजशास्त्रियों में निम्नलिखित दो संप्रदाय प्रचलित हैं –
1. विशिष्टीकृत या स्वरूपात्मक संप्रदाय – स्वरूपात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विशिष्ट स्वरूपों का अमूर्त दृष्टिकोण से अध्ययन करता है। उदाहरण के लिए यदि किसी बोतल में कोई भी द्रव पदार्थ जैसे दूध या पानी आदि डाला जाए तो बोतल के स्वरूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस संप्रदाय के विद्वानों का मत है कि सामाजिक संबंध भी बोतल के समान हैं तथा उनका आकार अंतर्वस्तु के अनुसार नहीं बदलता है।

उदाहरण के लिए संघर्ष, सहयोग तथा प्रतिस्पर्धा के स्वरूप में कोई अंतर नहीं आएगा, चाहे उनका अध्ययन आर्थिक क्षेत्र में किया जाए अथवा राजनीतिक क्षेत्र में। इस संप्रदाय के प्रमुख समाजशास्त्री हैं-जॉर्ज सिमल, स्माल, वीरकांत, मैक्स वैबर तथा वॉन वीडा आदि।

आलोचना –

  • समाजशास्त्र में सामाजिक संबंधों के स्वरूपों के स्वरूप तथा अन्तर्वस्तु के बीच भेद भ्रामक है।
  • स्वरूपात्मक संप्रदाय ने समाजशास्त्र के क्षेत्र को संकुचित बना दिया है।
  • स्वरूपों का अध्ययन अंतर्वस्तुओं से पृथक नहीं किया जा सकता।

सोरोकिन ने ठीक ही कहा है कि “हम एक गिलास को उसके स्वरूप को बदले बिना शराब, पानी या चीनी से भर सकते हैं, परंतु मैं एक ऐसी सामाजिक संस्था के विषय में कल्पना भी नहीं कर सकता जिसका स्वरूप सदस्यों के बदलने पर भी न बदले।”

2. समन्वयात्मक संप्रदाय – समन्वयात्मक संप्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है जिसका प्रमुख कार्य सामाजिक जीवन की सामान्य दशाओं का अध्ययन करना है। इस संप्रदाय के प्रमुख समाजशास्त्री हैं-दुर्खाइम, हॉबहाउस, सोरोकिन तथा गिंसबर्ग आदि।

आलोचना –

  • समन्वयात्मक संप्रदाय की विचारधारा भ्रामक है।
  • समाजशास्त्र अनेक सामाजिक विज्ञानों का समन्वय मात्र नहीं हो सकता।

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प्रश्न 9.
समाजशास्त्र के विभिन्न दृष्टिकोणों का स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के विभिन्न दृष्टिकोणों का अध्ययन करने के लिए कुछ प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचारों का उल्लेख आवश्यक है –
(i) अगस्त कोंत (-1778-1857 ई.)-फ्रांस के दार्शनिक अगस्त कोंत को समाजशास्त्र का पिता कहा जाता है। उनका मत था कि समाजशास्त्र का स्वरूप वैज्ञानिक है तथा यह समग्र रूप से समाज का अध्ययन करेगा।

कोंत का मत था कि जो उपकरण तथा यंत्र प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा प्रयोग में लाये जाते हैं, उनका प्रयोग समाजशास्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिए।

अगस्त कोत ने समाजशास्त्र के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए निम्नलिखित विधियों का उल्लेख किया –

  • निरीक्षण
  • परीक्षण
  • ऐतिहासिक तथा
  • तुलनात्मक

अगस्त कोत ने सामाजिक यथार्थ को प्रत्यक्षवाद कहा। उसने प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्र की दो मूल अवधारणाएँ बतायीं –

  • स्थिति मूलक तथा
  • गति मूलक

अगस्त कोंत का मत था कि भौतिकशास्त्र के नियमों की भाँति समाज के नियमों का विकास किया जा सकता है तथा इसी आधार पर उन्होंने अपना त्रि-स्तरीय नियम दिया –

  • धर्मशास्त्रीय स्थिति
  • तत्व मीमांसा स्थिति तथा
  • प्रत्यक्षात्मक अथवा वैज्ञानिक स्थिति

अगस्त कोंत के प्रमुख ग्रंथ हैं –

  • Positive Philosophy
  • System of Positive Polity
  • Religion of Humanity

(ii) हरबर्ट स्पेंसर (1820-1903 ई.) –

  • हरबर्ट स्पेंसर का जन्म इंगलैण्ड में हुआ था। कोंत की भाँति उन्होंने भी समाज की व्याख्या उद्विकासीय पद्धति के आधार पर की है।
    स्पेंसर का मत था कि सभी समाज सरलता से जटिलता की ओर बढ़ते हैं।
  • स्पेंसर का विचार था कि जिस प्रकार प्राणी का विकास हआ है, उसी प्रकार समाज का भी विकास हुआ है।
  • स्पेंसर ने समितियों, समुदायों, श्रम-विभाजन, सामाजिक विभेदीकरण, सामाजिक स्तरीकरण, विज्ञान तथा कलात्मक समाजशास्त्र के अध्ययन पर विशेष बल दिया है।
  • स्पेंसर के अनुसार समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र हैं-परिवार, धर्म, राजनीति, सामाजिक नियंत्रण तथा उद्योग आदि।

स्पेंसर के प्रमुख ग्रंथ –

  • Social Statics
  • The study of Sociology
  • The Principles of Sociology

(iii) कार्ल मार्क्स (1818-1883 ई.)-कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी में हुआ था। यद्यपि मार्क्स ने अपने लेखों में कहीं भी समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग नहीं किया है तथापि उन्होंने ‘सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्म निरीक्षण तथा विश्लेषण किया है। – यदि मार्क्स के विचारों को समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के अन्तर्गत रखा जाए तो उनके विचारों का प्रभाव परिवार, संपत्ति, राज्य. विकास तथा स्तरण पर दिखाई देता है।

सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए मार्क्स की निम्नलिखित अवधारणाएँ महत्त्वपूर्ण हैं-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, ऐतिहासिक भौतिकवाद तथ वर्ग तथा वर्ग-संघर्ष की अवधारणा। मार्क्स द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की अवधारणा को आर्थिक प्रघटनाओं की व्याख्या हेतु आवश्यक मानते थे। यही कारण है कि उन्होंने भौतिक जगत में वाद, प्रतिववाद तथा संश्लेषण को प्रमुखता प्रदान की है।

मार्क्स ने कहा है कि आज तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। मार्क्स के अनुसार समाज अपने विकास की प्रक्रिया में इतिहास के निम्नलिखित विकास क्रमों से होकर गुजरता है

  • आदिम साम्यवादी व्यवस्था
  • दास प्रथा
  • कृषि व्यवस्था
  • सामंतवादी व्यवस्था
  • पूँजीवादी व्यवस्था।

मार्क्स का मत था कि वर्ग विहीन समाज संघर्ष के द्वारा प्राप्त हो सकता है। कार्ल मार्क्स के प्रमुख ग्रंथ –

  • The Proverty of Philosophy
  • The Communist Manifesto
  • The First Indian War of Independence

(iv) एमिल दुर्खाइम (1858-1917) – फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खाइम ने समाजशास्त्र के क्षेत्र में अगस्त कोंत की परंपरा का अनुसरण किया है। उनका मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक समाजशासत्र का विकास करना था।

दुर्खाइम का मत है कि समाजशास्त्र का क्षेत्र कुछ घटनाओं तक सीमित है तथा ये घटनाएँ सामाजिक तथ्य हैं । दुर्खाइम के अनुसार सामाजिक तथ्य कार्य करने, चिंतन तथा अनुभव करने की पद्धति है जो व्यक्ति की चेतना से बाहर होता है। बाह्यता बाध्यता सामाजिक तथ्य की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं।

दुर्खाइम ने धर्म को समाज के सदस्यों के मध्य एक शक्तिशाली एकीकरण का माध्यम बताया है। वे धर्म को एक सामाजिक तथ्य बातते हैं।

दुर्खाइम के चिंतन के दो मुख्य केन्द्र हैं –

  • सामाजिक दृढ़ता एवं
  • सामूहिक चेतना।

दुर्खाइम के मुख्य अध्ययन क्षेत्र थे –

  • सामाजिक तथ्य
  • आत्महत्या एवं
  • धर्म

दुर्खाइम के प्रमुख ग्रंथ –

  • Division of Labour in Society
  • Suicide
  • The Elementary forms of Religious Life.

(v) मैक्स वैबर (1864-1920) – मैक्स वैबर का जन्म जर्मनी में हुआ था। वैबर ने समाजशास्त्र की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “यह एक विज्ञान है, जो सामाजिक क्रियाओं की विवेचनात्मक व्याख्या करने का प्रयास करता है।”

मैक्स वैबर ने समाजशास्त्र को सामाजिक क्रिया का व्याख्यात्मक बोध बताया है। प्रत्येक क्रिया के लक्ष्य होते हैं। सामाजिक क्रिया के निम्नलिखित चार प्रकार हैं –

  • धार्मिक क्रिया
  • विवेकपूर्ण क्रिया
  • परंपरागत क्रिया
  • भावात्मक क्रिया
  • मैक्स वैबर द्वारा अधिकारी तंत्र, प्राधिकार, सत्ता तथा रजानीति आदि की विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है।

मैक्स वैबर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Methodology of Social Sciences में कहा कि समाजशास्त्र को एक विषय के रूप में बोध की पद्धति को अपनाना चाहिए। मैक्स वैबर ने अपनी अध्ययन विधि को आदर्श रूप कहा है। उसने वस्तुपरकता की बजाए आंतरिकता एवं निरीक्षण-परीक्षण की बजाए बोध पर अधिक बल दिया है।

मैक्स वैबर के प्रमुख ग्रंथ –

  • The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism
  • The Theory of Social and Economic Organisation
  • The City

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र एवं समाज

प्रश्न 10.
समाजशास्त्र क्या है? समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र-समाजशास्त्र शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘सोशियस’ तथा यूनानी भाषा के ‘लोगोंस’ शब्द से हुई है। ‘सोशियस’ का अर्थ है सामाजिक तथा ‘लोगोस’ का अर्थ है विज्ञान । इस प्रकार शाब्दिक अर्थ के दृष्टिकोण से समाजशास्त्र का अर्थ है सामाजिक अथवा समाज का विज्ञान।

अगस्त कोंत को ‘समाजशास्त्र का पिता’ कहा जाता है। 1839 ई. में उन्होंने समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया था। कोंत का मत था कि समाजशास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक है तथा यह संपूर्ण समाज का समग्रतापूर्ण अध्ययन करेगा।

हॉबहाउस के अनुसार, ‘समाजशास्त्र मानव मस्तिष्क की अंत:क्रियाओं का अध्ययन करता है।” पार्क तथा बर्गेस के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक व्यवहारों का विज्ञान है।” एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “समाजशास्त्र सामूहिक प्रतिनिधियों का अध्ययन है।”

सोरोकिन के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक-सांस्कृतिक घटनाओं, सामान्य स्वरूपों तथा विभिन्न प्रकार के अंत:संबंधों का सामान्य विज्ञान है।” प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने सामाजिक क्रियाओं को समाजशास्त्र का प्रमुख अध्ययन विषय स्वीकार किया है। समाजशास्त्र समूह में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति की व्याख्या-समाजशास्त्र विज्ञान है अथवा नहीं, इस संबंधों में विद्वानों में अत्यधिक मतभेद हैं।

इस प्रश्न का सही समाधान प्राप्त करने के लिए यह जानना जरूरी है कि विज्ञान किसे कहते हैं तथा विज्ञान द्वारा कौन-कौन सी पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है? जहाँ तक विज्ञान का प्रश्न है-कोई भी विषय सामग्री विज्ञान हो सकती है, यदि उसे क्रमबद्ध तरीके से, वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा प्राप्त किया गया हो।

इस संबंध में गिलिन तथा गिलिन ने लिखा है कि “जिस क्षेत्र में हम अनुसंधान करना चाहते हैं, उसकी ओर एक निश्चित प्रकार की पद्धति ही विज्ञान का वास्तविक चिह्न है।” समाजशास्त्र अन्वेष” हेतु वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता तथा व्यवस्थित सिद्धांतों का अवलंबन करता है।

समाजशास्त्र द्वारा अध्ययन हेतु वैज्ञानिक विविध के निम्नलिखित सोपानों का प्रयोग किया जाता है –
(i) आनुभाविकता – आनुभाविकता का अर्थ है अनुभवों की जानकारी हासिल करना। अवलोकन तथा तार्किकता के आधार पर तथ्यों का सामान्यीकरण किया जाता है। आनुभाविक प्रमाण के आधार पर समाजशास्त्रीय ज्ञान के समस्त पक्षों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है।

(ii) सिद्धांत – सिद्धांत समाजशास्त्रीय अध्ययन का केन्द्रीय बिन्दु है। सिद्धांत आनुभाविक तथा तार्किक दोनों होता है। सिद्धांत तथा तथ्य में घनिष्ठ पारस्परिकता होती है। सिद्धांत के माध्यम से जटिल अवलोकनों को सार रूप में अमूर्त तार्किक अंतर्संबंधित अवस्था में प्रस्तुत किया जाता है। सिद्धांत कार्य-कारण संबंधों के वैज्ञानिक तथा तार्किक विश्लेषण में सहायक सिद्ध हो सकता है। सिद्धांतों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक प्रघटनाओं तथा प्राकल्पनाओं की प्रकृति को समझने के लिए सामाजिक तथ्यों की व्याख्या करना तथा उनमें अंतर्संबंध स्थापित करना है। इन प्राकलपनाओं की वैधता की जाँच पुनः आनुभाविक अनुसंधान के द्वारा की जा सकती है।

(iii) संचयी ज्ञान – समाजशास्त्री के संचयी ज्ञान अथवा ज्ञान भंडार का व्यवस्थित परीक्षण किया जा सकता है। अत: हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र संचयी ज्ञान है क्योंकि इसके सिद्धांत परस्पर संबद्ध हैं। पुराने सिद्धांतों के आधार पर ही नवीन संशोधित सिद्धांतों को विकसित किया जाता है।

(iv) मूल्य तटस्थता – समाजशास्त्र को एक आदेशात्मक या अग्रदर्शी विज्ञान नहीं कहा जा सकता है। समाजशास्त्र का संबंध विषयों से है। मैक्स वैबर का मत है कि मूल्य-तटस्थता उपागम ही वैज्ञानिक विकास को संभव बना सकता है। वास्तव में, समाजशास्त्र के शोधकर्ता को मूल्यों के बारे में तटस्थ रहना चाहिए। मोरिस गिंसबर्ग का भी मत है कि वस्तुनिष्ठता तथा तार्किकता का अवलंबन करके ही समाजशास्त्र को वैज्ञानिक स्थिति प्रदान की जा सकती है। अतः शोधकर्ता को पूर्वग्रहों तथा पक्षपातों से दूर रहना चाहिए। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है। समाजशास्त्र के द्वारा समाजमिति के पैमाने, प्रश्नावली, अनुसूची, साक्षात्कार तथा केस स्टडी आदि यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
आप समाज की अवधारण को कैसे स्पट करेंगे?
उत्तर:
समाज की अवधारणा निम्नलिखित बिन्दुओं के द्वारा स्पष्ट की जा सकती है –
(i) समाज एक संरचना के रूप में-समाज को समझने के लिए इसे एक संरचना के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसका अभिप्राय है कि समाज अंतर्संबंधित संस्थाओं का ‘अभिज्ञेय’ ताना-बाना है। इस संदर्भ में अभिज्ञेय शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण तथा सार्थक है।

(ii) समाज पुनरावर्तन के रूप में-यह धारणा कि समाज संरचनात्मक होते हैं, यह उनके पुनरुत्पादन पर निर्भर है। इस संदर्भ में ‘संस्था’ शब्द अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सामाजिक व्यवहार के संस्थागत स्वरूप विश्वास तथा व्यवहार के प्रकारों को बताते हैं तथा जिसकी आवृत्ति तथा पुनरावृत्ति होती रहती है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि उनका सामाजिक पुनरुत्पादन होता रहता है।

(iii) समाज अंतर्विरोध के रूप में यह बात स्वीकार की जाती है कि समाज संरचनात्मक है तथा इसका पुनरुत्पादन होता है लेकिन यह बात नहीं बताई जाती है कि संरचनात्मक तथा पुनरुत्पादन क्यों और कैसे होता है ? प्रसिद्ध विद्वान कार्ल मार्क्स उन आधारों को स्पष्ट करते हैं जिनसे पता चलता है कि विशिष्ट सामाजिक रचनाओं की उत्पत्ति कैसे होती है तथा विशिष्ट उत्पादनों के प्रकारों से इसका क्या संबंध है ? इस प्रकार समाज को स्थायी या शांतिपूर्ण उद्विकास संरचना नहीं कहा जा सकता है लेकिन इसे उत्पादन के बोर में सामाजिक संबंधों के परस्पर विरोधों द्वारा उत्पन्न संघर्षों के एक अस्थायी समाधान के रूप में समझा जा सकता है। इस प्रकार, पूँजीबादी समाज की प्रक्रिया में होने वाली परिवर्तन उत्पादकता के साधनों में होने वाले तनावों तथा अंत:क्रियाओं में पाए जाते हैं।

(iv) समाज संस्कृति के रूप में-समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक संबंधों के सांस्कृतिक पहलुओं को लगातार महत्त्व प्रदान किया गया है। समाज की रचना सदस्यों की पारस्परिक समझदारी से ही संभव है। मनुष्याओं के द्वारा भाषा का निर्माण किया गया है, क्योंकि उनका (मनुष्य का) अस्तित्व भाषा तथा सांकेतिक रूप से विचारों के आदान-प्रदान पर निर्भर करता है। मैक्स वैबर तथा टालकॉप परसंस ने संस्कृति का संबंध समाज के विचारों तथा मूल्यों की धारणाओं से स्वीकार किया है।

(v) समाज एक प्रक्रिया के रूप में-समाज सामाजिक संबंधे का जाल है तथा सामाजिक संबंधों का निर्माण मनुष्यों के बीच अंतःक्रियाओं से होता है। समाज गतिशील हैं, अत: उसमें निरंतर परिवर्तन होते रहता है। इस प्रकार समाज एक प्रक्रिया है। वास्तव में, जब सामाजिक परिवर्तन निरंतर तथा निश्चयात्मक होता है, तो ऐसे परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है।
सामाजिक प्रक्रिया के मुख्य शब्द निम्नलिखित हैं –

  • संधिवार्ता
  • स्व तथा अन्य तथा
  • प्रतिबिंबता।

समाज का निर्माण तथा पुनःनिर्माण सामाजिक अंतःक्रिया के द्वारा होता है। समाज को व्यक्तियों पर थोपा नहीं जाता है, वरन् सहभागियों द्वारा इसे स्वीकार किया जाता है। मेकाइवर तथा पेज ने सामाजिक प्रक्रिया की परिभाषा करते हुए लिखा है कि “एक प्रक्रिया का तात्पर्य होता है कि अवस्थाओं में अंतर्निहित शक्तियों की क्रियाओं के द्वारा उत्पन्न निरंतर परिवर्तन, जो निश्चित प्रकार से होता है।”
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र सामाजिक प्रतिनिधियों का अध्ययन है, यह किसका कथन है?
(a) मेकाइवर
(b) दुर्थीम
(c) मैक्स वैबर
(d) कोई नहीं
उत्तर:
(b) दुर्थीम

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प्रश्न 2.
मानवशास्त्र और समाजशास्त्र जुड़वाँ बहनें हैं, किसने कहा है?
(a) मेकाइवर
(b) क्रोवर
(c) हॉवेल
(d) मैक्स बेबर
उत्तर:
(b) क्रोवर

प्रश्न 3.
दोनों विज्ञानों को जोड़नेवाली शाखा कौन है?
(a) समाजशास्त्र और मनोविज्ञान
(b) समाजशास्त्र और मानवशास्त्र
(c) समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र
(d) समाजशास्त्र और इतिहास
उत्तर:
(d) समाजशास्त्र और इतिहास

प्रश्न 4.
किसका कथन है? सामाजिक प्रक्रियाएँ सामाजिक अन्तःक्रिया के विशिष्ट रूप हैं।
(a) मेकाइवर
(b) ग्रीन
(c) लुण्डवर्ग
(d) गिलिन एवं गिलिन
उत्तर:
(b) ग्रीन

प्रश्न 5.
संगठनकारी सामाजिक प्रक्रिया समूह में एकता संतुलन एवं संगठन बनाये रखने में सहयोग देती है …………………..
(a) सहयोग
(b) समायोजन
(c) समाजीकरण
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 6.
समितियों की विशेषता निम्नलिखित में से क्या है?
(a) संगठन
(b) निश्चित उद्देश्य
(c) मनुष्यों का समूह
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र संबंध स्थापित करती है …………………
(a) व्यक्तिगत समस्या एवं जनहित मुद्दों के बीच
(b) समाज एवं परिवार के बीच
(c) व्यक्ति और परिवार के बीच
(d) उपर्युक्त कोई सही नहीं हैं
उत्तर:
(a) व्यक्तिगत समस्या एवं जनहित मुद्दों के बीच

प्रश्न 8.
समाजशास्त्र बँधा हुआ है …………………
(a) दार्शनिक अनुचिंतनों से
(b) ईश्वरवादी व्याख्यानों से
(c) सामान्य बौद्धिक प्रेक्षणों से
(d) वैज्ञानिक कार्यविधियों से
उत्तर:
(d) वैज्ञानिक कार्यविधियों से

प्रश्न 9.
एक समाजशास्त्री का दायित्व है …………………
(a) मूल्यरहित रिपोर्ट तैयार करना
(b) मूल्य रिपोर्ट तैयार करना
(c) सापेक्ष रिपोर्ट तैयार करना
(d) उपर्युक्त सभी तीनों
उत्तर:
(a) मूल्यरहित रिपोर्ट तैयार करना

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प्रश्न 10.
समाजशास्त्र संघ को समझता है …………………..
(a) कला
(b) कला, विज्ञान
(c) कला, विज्ञान और गणित
(d) विज्ञान
उत्तर:
(d) विज्ञान

प्रश्न 11.
समाजशास्त्र में मूल संबंधित होते हैं ………………….
(a) वस्तुओं के नियत से
(b) आचरण के प्रतिमानों से
(c) अनैतिक व्यवहारों से
(d) क्रिया-प्रतिक्रिया से
उत्तर:
(b) आचरण के प्रतिमानों से

प्रश्न 12.
समाजशास्त्र के पिता या जनक कौन थे?
(a) अगस्त कोंत
(b) कार्ल मार्क्स
(c) मैक्स वैबर
(d) हॉव हाउस
उत्तर:
(a) अगस्त कोंत

प्रश्न 13.
समाजशास्त्र के क्षेत्रों को कितने भागों में बाँटा गया है?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) पाँच
उत्तर:
(a) दो

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में समाजशास्त्र की विजय सामग्री क्या है?
(a) सभी सामाजिक तथा असामाजिक प्रक्रियाएँ
(b) सभी सामाजिक संस्थाएँ तथा प्रक्रियाएँ
(c) सभी प्रकार की संस्थाएँ
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(d) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 15.
किस वैज्ञानिक का मानना है कि समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है?
(a) मेकाइवर
(b) मैक्स बेवर
(c) वार्ड
(d) सारोकिन
उत्तर:
(a) मेकाइवर

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प्रश्न 16.
समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का विज्ञान है, यह किसने कहा है?
(a) सोरोकिन
(b) मेकाइवर
(c) मैक्स बेवर
(d) दुखाईम
उत्तर:
(a) सोरोकिन

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 समानता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 समानता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 3 समानता

Bihar Board Class 11 Political Science समानता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कुछ लोगों का तर्क है कि असमानता प्राकृतिक है जबकि कुछ अन्य का कहना है कि वास्तव में समानता प्राकृतिक है और जो असमानता हम चारों ओर देखते हैं उसे समाज ने पैदा किया है। आप किस मत का समर्थन करते हैं? कारण दीजिए।
उत्तर:
ये दोनों दृष्टिकोण सही प्रतीत होते हैं। यह कि अमानता प्राकृतिक है और समानता भी प्राकृतिक है। इस दृष्टिकोण के बिन्दु को इस प्रकार समझा जा सकता है। इन दोनों अवधारणाओं में भिन्नता है परंतु स्थान विशेष पर दोनों सत्य हो सकती हैं। प्राकृतिक असमानता कहीं सही हो सकती है तो कहीं गलत। यह वैसे ही है जैसे कहीं रात होती है, तो कहीं दिन।

इस प्रकार कहीं गर्म होता है तो कहीं ठंडा, कुछ स्थान पर भूमि समतल होती है तो कुछ स्थानों पर पहाड़ी होती है। कहीं सुबह होती है तो कहीं शाम होती है। इसी प्रकार एक आदमी काला हो सकता है तो दूसरा गोरा हो सकता है, एक व्यक्ति लम्बा हो सकता है तो दूसरा ठीगना हो सकता है। इसी प्रकार व्यक्ति में भी जैविक असमानता मिलती है यथा कुछ लोग पुरुष होते हैं तो दूसरे स्त्री हो सकती हैं। इन दोनों में जैविक असमानताएँ होती हैं।

प्रकृति ने भी व्यक्ति को योग्यताओं और क्षमताओं में समान बनाया है और प्रत्येक व्यक्ति समान होना चाहता है। समानता एक प्राकृतिक शर्त भी है परंतु समानता पूर्ण दृष्टिकोण है, सामूहिक दृष्टिकोण में सम्भव नहीं है। इसलिए समानता का अर्थ समाज के सामाजिक – आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखकर निकाला जा सकता है। समानता की आवश्यकता व्यक्ति के रहने पर पर्यावरणीय प्रभाव में सुनिश्ति किया जा सकता है। यहाँ तक कि असमान दशा को भी समझा जा सकता है। व्यक्ति द्वारा निर्मित अन्यायपूर्ण समानता को हटाया नहीं जा सकता एक डॉक्टर के काम और मजदूर के काम में अंतर स्वाभाविक है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 3 समानता

प्रश्न 2.
एक मत है कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो संभव है और न ही वांछनीय। एक समाज ज्यादा से ज्यादा बहुत अमीर और बहुत लोगों के बीच की खाई को कम करने का प्रयास कर सकता है। क्या आप इस तर्क से सहमत हैं? अपना तर्क दीजिए।
उत्तर:
हम इस कथन से कारणों सहित सहमत हैं कि पूर्ण समानता न तो सम्भव है और न ही ऐच्छिक है। इस सम्बन्ध में डाक्टर और मजदूर की उदाहरण ले सकते हैं। एक डाक्टर और एक मजदूर को समान पारिश्रमिक (Wages) न तो सम्भव है और न ऐच्छिक है, क्योंकि डाक्टर ने अधिक निवेश करके अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को बढ़ाया है। यही नहीं, डाक्टर का उत्तरदायित्व और कार्य मजदूर के उत्तरदायित्व और कार्य से अधिक होता है।

एक डाक्टर को 10 हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाता है। यह आशा नहीं की जा सकती कि एक मजदूर को 10000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जाय। उसकी न्यायसंगत मजदूरी 3000 रुपये प्रतिमाह हो सकती है इसलिए यहाँ दोनों के पारिश्रमिक में 7000 रुपये प्रतिमाह का अंतर है।

इसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए और इसे समानता के रूप में स्वीकार करना चाहिए। यदि दो मजदूरों में पुरुष मजदूर को 3000 रुपये प्रतिमाह और दूसरे स्त्री मजदूर को 1000 रुपये प्रतिमाह दिया जाता है, तो उस स्थिति को व्यक्ति निर्मित असमानता कहा जा सकता है। यह समानता का अलगाव भी है जो लिंग (Sex) के आधार पर किया जाता है।

सभी व्यक्ति अत्यधिक धनी या अत्यधिक गरीब नहीं हो सकते। यह कल्पना नहीं किया जा सकता कि सभी व्यक्ति महलों में रह सकते हैं या सभी व्यक्ति बिना किसी आवश्यकता के झोपड़ियों में रह सकते हैं। समानता सापेक्षिक शर्त के रूप में होनी चाहिए जिसमें सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। योग्यताओं एवं क्षमताओं के विकास और जीवन की आवश्यकताओं पर ही पूर्ति होनी चाहिए।

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प्रश्न 3.
नीचे दी गई अवधारणा और उसके उचित उदाहरणों में मेल बैठायें।
Bihar Board Class 11 Political Science Chapter 3 समानता Part - 1 Image 1
उत्तर:
(क) – (ii)
(ख) – (iii)
(ग) – (i)

प्रश्न 4.
किसानों की समस्या से संबंधित एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार छोटे और सीमांत किसानों को बाजार से अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। रिपोर्ट में सलाह दी गई कि सरकार को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन यह प्रयास केवल लघु और सीमांत किसानों तक ही सीमित रहना चाहिए।.क्या यह सलाह समानता के सिद्धांत से संभव है?
उत्तर:
यह तथ्य स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है और समानता के सिद्धांत से मेल नहीं खाता। क्योंकि विभिन्न लोगों के लिए दो नीतियों नहीं अपनाई जा सकतीं। एक छोटे और सीमांकित किसानों के लिए और दूसरी बड़े और धनी किसानों के दो नीतियाँ हो जाती हैं। यदि लघु किसान अपनी उपज की अच्छी कीमत नहीं प्राप्त कर रहे हैं, तो इसका कारण भिन्न हो सकता है। लघु और सीमांकित किसानों की कुछ स्वीकृत कार्यों यथा-उच्च रियायत (Subsidiary) और निम्न ब्याज वाले ऋण देकर उनकी सहायता की जा सकती है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस में समानता के किस सिद्धांत का उल्लंघन होता है और क्यों?
(क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पढ़ेगा।
(ख) कनाडा सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से 1960 तक यूरोप के श्वेत नागरिक को कनाडा में आने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया।
(ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की एक खिड़की खोली गई।
(घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उत्तर:
प्रश्न के पैरा में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। कनाडा की सरकार ने रंग के आधार पर भिन्न कार्य अपनाया। उसने केवल गोरे यूरोपीय लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से 1960 तक कनाडा प्रवजन का आदेश दिया। यह स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। प्रश्न के पैरा ‘क’ और पैरा ‘ग’ में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है। प्रश्न के पैरा ‘घ’ में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि इसमें कुछ जंगल केवल जनजाति समुदाय को देने की बात कही गई है जबकि सभी के लिए इस प्रकार प्रावधान करना चाहिए।

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प्रश्न 6.
यहाँ महिलाओं को मताधिकार देने के पक्ष में तर्क दिए गए हैं। इसमें से कौन-से तर्क समानता के विचार से संगत हैं। कारण भी दीजिए।
(क) स्त्रियाँ हमारी माताएँ हैं। हम अपनी माताओं को मताधिकार से वंचित करके अपमानित नहीं करेंगे?
(ख) सरकार के निर्णय पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रभावित करते हैं इसलिए शासकों के चुनाव में उनका भी मत होना चाहिए।
(ग) महिलाओं को मताधिकार न देने से परिवारों में मतभेद पैदा हो जाएंगे।
(घ) महिलाओं से मिलकर आधी दुनिया बनती है। मताधिकार से वंचित करके लंबे समय तक उन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता है।
उत्तर:
प्रश्न के पैरा ‘ख’ और पैरा ‘घ’ समानता से अधिक मेल रखते हैं। पैरा ‘ख’ में कहा गया है कि सरकार के निर्णय पुरुष और महिला दोनों को प्रभावित करते हैं। इसलिए दोनों को शासकों के चुनाव में सहभागी होना चाहिए। पैरा ‘घ’ में कहा गया है महिलाओं के मतदान के अधिकार को इंकार किया जा सकता है जो सम्पूर्ण जनसंख्या का 50% है।

Bihar Board Class 11 Political Science समानता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत को स्पष्ट करें। (Explain the concept of equality before law) अथवा, कानून के समक्ष समानता से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by equality before law)
उत्तर:
कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने सब समान होंगे “कानून सबकी एक जैसे तरीके से रक्षा करेगा।” इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा या ऊपर नहीं है। कानून के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। कानून सबको एक समान मानता है। कानून धनी-निर्धन, छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा, शिक्षित-अशिक्षित का भेदभाव नहीं मानता है।

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प्रश्न 2.
असमानता के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. प्राकृतिक असमानता:
सभी व्यक्ति जन्म से ही असमान होते हैं। कोई भी दो व्यक्ति एक समान नहीं हैं। किन्तु कुछ समाजशास्त्रियों का मत है कि जन्म से ही नैतिकता की भावना सबमें समान रूप से होती है। यह माना जा सकता है कि नैतिकता की भावना समान हो, परंतु दो व्यक्तियों की प्रकृति कभी एक समान नहीं होती। एक विकलांग व्यक्ति को कभी भी एक स्वस्थ शरीर की तुलना में नहीं रखा जा सकता है। इस प्रकार यह प्राकृतिक असमानता है।

2. नागरिक असमानता:
नागरिक असमानता के अन्तर्गत एक देश के सभी व्यक्तियों को समान रूप से अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। दूसरा, मौलिक अधिकारों व अन्य अधिकारों से भी जब कुछ नागरिकों को दूर रखा जाए तो उसे नागरिक असमानता कहते हैं। इसलिए सभी को समान रूप से नागरिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए व सभी नागरिक कानून के सम्मुख बराबर होने चाहिए।

प्रश्न 3.
समानता से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by the term equality?)
उत्तर:
साधारण भाषा में समानता का अर्थ है:
सब व्यक्तियों का समान दर्जा हो, सबकी आय एक जैसी हो, सब एक ही प्रकार से जीवन-यापन करें। पर यह सम्भव नहीं है। लास्की ने कहा है, “समानता का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को समान वेतन दिया जाए, यदि ईंट ढोने वाले का वेतन एक प्रसिद्ध गणितज्ञ अथवा वैज्ञानिक के समान कर दिया जाए, तो समाज का उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा। इसलिए समानता का यह अर्थ है कि कोई विशेष अधिकार वाला वर्ग न. रहे। सबको उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों।”

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प्रश्न 4.
समानता के कोई चार रूप बताइए। (Explain any four kinds of equality)
उत्तर:
समानता के चार रूपों की विवेचना निम्नलिखित हैं –

1. प्राकृतिक समानता (Natural of Equality):
प्राकृतिक समानता का अर्थ है कि प्रकृति ने सभी व्यक्तियों को समान बनाया है, परंतु यह विचार ठीक नहीं है। सभी व्यक्तियों के रंग, रूप, बनावट, शक्ति, बुद्धि तथा स्वभाव में असमानता होती है। वास्तव में प्राकृतिक समानता का यह अर्थ है कि प्रत्येक में कुछ मौलिक समानताएँ हैं जिनके कारण सभी व्यक्तियों को समान माना जाना चाहिए।

2. नागरिक समानता (Civil Equality):
सभी व्यक्तियों को समान अधिकार प्राप्त हों और सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हों।

3. सामाजिक समानता (Social Equality):
सामाजिक समानता का अर्थ है कि समाज के सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। ऊँच-नीच की भावना नहीं होनी चाहिए।

4. राजनीतिक समानता (Political Equality):
समाज में सभी व्यक्तियों को समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। चुनाव में खड़े होने या मतदान करने के अधिकार से किसी को वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 5.
आर्थिक समानता के बारे में आप क्या जानते हैं? (What do you know about economic euqality?)
उत्तर:
वर्तमान काल में आर्थिक समानता ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि सब व्यक्तियों की आय अथवा वेतन समान कर दिया जाए। इसका अर्थ है-सबको उन्नति के समान अवसर प्रदान किए जाएँ। सभी की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए। प्रत्येक व्यक्ति को काम मिले।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। (“All men are born equal.” Discuss)
उत्तर:
सभी व्यक्ति समान पैदा होते हैं (All men are born equal):
यह बात साधारण तौर पर भी कही जाती है और अमेरिका के स्वतंत्रता घोषणा-पत्र में भी कही गयी है। सब व्यक्ति समान पैदा हुए हैं। फ्रांस की राष्ट्रीय सभा में मानवीय अधिकारों की घोषणा में इस समानता को स्वीकार किया गया है कि “मनुष्य जन्म से समान पैदा होते हैं और अपने अधिकारों के सम्बन्ध में समान ही रहते हैं।” परंतु इसका आशय यह भी नहीं है कि सब व्यक्ति पूर्ण रूप से समान होंगे। सबको समान नहीं बनाया जा सकता। गोरा-काला, छोटा-बड़ा, बुद्धिमान-निर्बुद्धि सभी प्रकार के व्यक्ति होते हैं।

प्रश्न 2.
“समानता के अभाव में स्वतंत्रता निरर्थक है।” अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए। (“Liberty is meaningless without equality.” Do you agree with this view ? Give reason for your answer)
उत्तर:
लास्की के शब्दों में ‘जहाँ धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित हैं वहाँ पर स्वामी और दास सदैव पाए जाते हैं।’ (Where there are rich and poor, educated and uneducated, we find always master and servant)। समानता ही स्वतंत्रता को सुनिश्चित करती है और उसे लाभदायक बनाती है। निर्बल व्यक्ति शक्तिशाली के सामने और निर्धन व्यक्ति धनवान के सामने अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक प्रयोग नहीं कर सकता। जिसके पास धन की शक्ति होती है उसके पास राजनीतिक शक्ति भी चली जाती है। अतः निर्धन व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तविक नहीं रहती। जहाँ सामाजिक समानता नहीं मिलती वहाँ निम्न श्रेणी के लोगों की स्वतंत्रता व्यर्थ और निरर्थक हो जाती है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 3 समानता

प्रश्न 3.
समानता किसे कहते हैं? सामाजिक समानता का वर्णन करें। (What is equality? Discuss social equality)
उत्तर:
लास्की ने कहा है कि “समानता का अर्थ सर्वप्रथम तो विशेषाधिकारों का अभाव है और दूसरे उसका अर्थ है कि सभी लोगों को विकास के लिए उपयुक्त अवसर प्राप्त हों।” सामाजिक समानता का अर्थ समाज में जाति, धर्म, रंग, वंश आदि के आधार पर भेदभाव के बिना विकास के समान अवसरों की प्राप्ति है।

सामाजिक समानता (Social Equality):
सामाजिक समानता का अर्थ है कि समाज में जाति, धर्म, वंश, रंग विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होना चाहिए। सबका सामाजिक स्तर समान होना चाहिए। छुआछूत अवैध होनी चाहिए। अमेरिका में गोरे-काले का भेद आज भी सामाजिक असमानता का प्रमाण है।

प्रश्न 4.
प्राकृतिक समानता किसे कहते हैं? (What is Natural Equality?)
उत्तर:
प्राकृतिक समानता (Natural Equality):
कुछ लोग इस बात पर जोर देते हैं कि “सभी व्यक्ति प्राकृतिक रूप से समान हैं” तथा कुछ धार्मिक परम्पराओं तथा विचारकों को समान नहीं बनाया है। यहाँ तक कि जुड़वाँ भाई-बहनों में भी कुछ अंतर मिलता है।

प्रश्न 5.
समानता के राजनीति पक्ष का विवेचन कीजिए। (Describe the poltical dimension of equality)
उत्तर:
राजनीतिक समानता का अर्थ है कि राज्य में सभी नागरिकों को समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए। प्रत्येक नागरिक को चुनाव में खड़ा होने का अधिकार होना चाहिए। अपनी योग्यता के अनुसार सरकारी पद प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। सरकार यदि नागरिकों पर अत्याचार करती है तो प्रत्येक नागरिक को उसकी आलोचना करने का अधिकार होना चाहिए। किसी भी नागरिक को उसकी जाति, रंग, लिंग, संपत्ति, शिक्षा तथा धर्म आदि के आधार पर मतदान करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। एशिया और अफ्रीका के अभी ऐसे बहुत से देश हैं जहाँ राजनीतिक समानता स्थापित नहीं हुई है।

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प्रश्न 6.
राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता में सम्बन्ध बताइए। (Define the relation between political freedom and economic freedom)
उत्तर:
स्वतंत्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं। लास्की का कहना है कि आर्थिक समानता के बिना राजनैतिक स्वतंत्रता मात्र एक कल्पना है। इस कथन का आशय यह है कि जब तक आर्थिक समानता स्थापित नहीं होती तब तक राजनैतिक स्वतंत्रता व्यर्थ होती है। इस आशय को निम्न तर्कों द्वारा समझा जा सकता है –

  1. पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता से आर्थिक शोषण में वृद्धि होती है तथा उससे आर्थिक असमानता पनपती है।
  2. स्वतंत्रता का अर्थ मात्र बंधनों का अभाव नहीं होता। बंधन मुक्त स्वतंत्रता शक्तिशाली की स्वतंत्रता होती है। ऐसी स्वतंत्रता से आर्थिक समानता नष्ट हो जाती है।
  3. आर्थिक असमानता के वातावरण में व्यक्ति का विकास असम्भव होता है। हॉब्स का कहना है कि भूख से मरते व्यक्ति के लिए स्वंत्रता का कोई अर्थ नहीं होता।
  4. आर्थिक असमानता के अन्तर्गत लोकतंत्र की सफलता की आशा नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 7.
समानता की परिभाषा कीजिए। इसके विभिन्न प्रकार समझाइए। (Define the equality. What are its type?)
उत्तर:
समानता प्रजातंत्र का एक मुख्य स्तम्भ है। व्यक्तित्व के विकास के लिए यह एक आवश्यक शर्त है। समानता का तात्पर्य ऐसे परिस्थितियों के अस्तित्व से होता है जिसके कारण सब व्यक्तियों के विकास हेतु समान अवसर प्राप्त हो सके और इस प्रकार उस असमानता का अंत हो सके, जिनका मूल कारण सामाजिक वैषम्य है। लास्की ने भी लिखा है कि समानता मूल रूप में समानीकरण की एक प्रक्रिया है। समानता का आशय विशेषाधिकारों के अभाव से है और इसका यह भी आशय है कि सभी व्यक्तियों को विकास हेतु समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।

स्वतंत्रता के समान ही समानता के अनेक प्रकार हैं जो निम्नलिखित हैं –

  1. सामाजिक समानता (Social Equality): सामाजिक दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए और उन्हें सामाजिक उत्थान के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।
  2. नागरिक समानता (Civics Equality): नागरिक समानता के दो भेद हैं। प्रथम राज्य के कानूनों की दृष्टि से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए। द्वितीय सभी व्यक्तियों को नागरिकता के अवसर या नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएँ समान रूप से प्राप्त होनी चाहिए।
  3. राजनीतिक समानता (Political Equality): राजनीतिक समानता का अभिप्राय सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार एवं अवसर प्राप्त होने से है।
  4. आर्थिक समानता (Economics Equality): आर्थिक समानता से तात्पर्य है कि मनुष्यों की आय में बहुत अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए।

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प्रश्न 8.
राजनीतिक समानता क्या है? (What is political equality?)
उत्तर:
राजनीतिक समानता का तात्पर्य है कि सभी नागरिकों को राज्य की राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित तथा उसमें भागीदारी करने का अवसर समान रूप से प्राप्त हो। हालांकि यह धारणा सिर्फ लोकतांत्रिक राज्य से ही सम्बन्धित होती है, नहीं तो राजतंत्र, तानाशाही राज्यों में लोकतंत्र की इस राजनीतिक समानता के विचारधारा को उत्पन्न किया जाता है, वह वास्तव में राजनीतिक समानता के गुण को प्रदर्शित करती है, अर्थात् इसके अलावा राज्य और व्यक्ति को लेकर न्यायपूर्ण राजनीतिक समानता का अर्थ नहीं हो सकता है।

लोकतंत्रीय पद्धति में नागरिकों की राजनीतिक समानता का तात्पर्य निम्न तथ्यों से पाया जा सकता है। जैसे मतदान का अधिकार, चुनाव में उम्मीदवार बनने का अधिकार, प्रार्थना पत्र का अधिकार, सार्वजनिक नियुक्ति जो राज्य के माध्यम से हो उसे प्राप्त करने का सभी को समान अधिकार प्राप्त है। विचारों की स्वतंत्रतापूर्ण अभिव्यक्ति और राजनीतिक दलों का स्वतंत्रतापूर्वक निर्माण सम्बन्धी समानता सभी नागरिकों को समान रूप से प्रदान की जाती है, जबकि ऐसी पद्धति राजनीतिक समानता को लेकर निरंकुशवादी राज्यों के संदर्भ में नहीं पायी जाती हैं। अतः उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि राजनीतिक समानता का वास्तविक अर्थ सिर्फ लोकतंत्रीय पद्धति में दिए गए अर्थ के माध्यम से स्पष्ट होता है।

प्रश्न 9.
सामाजिक समानता के अर्थ को वर्णित करें। (Define the social equality)
उत्तर:
सामाजिक समानता का अर्थ-सामाजिक जीवन में सभी व्यक्तियों को समान समझा जाना चाहिए और धर्म, जाति, वंश, लिंग अथवा जन्म के आधार और स्थान पर किसी व्यक्ति का व्यक्ति से कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक समानता के अर्थ में समाज के सभी अधिकार व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हो सकें, यही सामाजिक समानता का मूलभूत उद्देश्य है और इस तथ्य की वास्तविकता सिर्फ लोकतंत्रीय समाज में ही है। भारतीय संविधान में सामाजिक समानता को मूल अधिकार के तहत वर्णित किया गया है।

अर्थात् अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को एक दण्डनीय अपराध माना गया है। सामाजिक समानता के मुख्यतः इन तथ्यों को प्रबल रूप से स्थान दिया जाता है कि वंश, धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या किसी को हेय न समझा जाए। स्त्रियों और पुरुषों में किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव न हो। अर्थात् सामाजिक समानता की माँग है कि स्त्रियों और पुरुषों को बराबर सम्मानजनक व्यवहार प्राप्त होना चाहिए।

सामाजिक समानता ही वास्तव में लोगों के बीच राजनीतिक समानता को उत्पन्न करने का कारण बनती है। सामाजिक समानता की अवधारणा निरंकुश राज्य पद्धति में सम्भव नहीं होती, क्योंकि वहाँ पर स्वतंत्रता, समानता और न्याय का कोई अर्थ नहीं रहता है, यहाँ पर यह सब सम्बन्धित अधिकार केवल निरंकुश शासक वर्ग के लिये होते हैं। इस कारण सामाजिक समानता की मूल अवधारणा केवल लोकतंत्रीय पद्धति में ही सम्भव है।

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प्रश्न 10.
आर्थिक समानता से आप क्या समझते हैं? (What do you know about the economic equality?)
उत्तर:
आर्थिक समानता का मूल अभिप्राय रूसो के इस कथन में समझा जा सकता है, अर्थात् रूसो ने कहा, “सरकार की नीति यह होनी चाहिए कि न तो अमीरों की संख्या बढ़ने पाये और न ही भिखमंगों की।” अर्थात् यह कथन आर्थिक समानता के इस रूप को प्रदर्शित करता है कि पूँजी की व्यवस्था और उसका वितरण इस रूप में हो कि पूँजी किसी के शोषण का माध्यम न बन जाए। मार्क्सवादी साम्यवाद ने इसी पूँजीवादी शोषण व्यवस्था को खत्म करने के लिए अपने तरीके से वर्गविहीन समाज को आर्थिक समानता के साथ सम्बद्ध किया।

आर्थिक समानता की मूल अवधारणा यही थी कि समाज का कोई वर्ग दूसरे वर्ग का आर्थिक शोषण न कर सके तथा इसके लिए आर्थिक समानता की यह मूल अवधारणा रही कि आर्थिक स्वतंत्रता सभी वर्गों को इस रूप में प्रदान की गई कि हर व्यक्ति अपनी दक्षता से किसी को अन्यायपूर्ण तरीके से आर्थिक स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। इसलिए आर्थिक समानता की मूल अवधारणा ही आर्थिक समानता की न्यायगत अवधारणा बनी। इस आर्थिक समानता की अवधारणा को लोकतंत्रीय और समाजवादी देशों की शासन व्यवस्था में अपनाया जाता है, न कि निरंकुशवादी व्यवस्था में।

प्रश्न 11.
समानता किन तीन तत्वों पर आधारित है? (On Which three elements is equality based?)
उत्तर:
समानता निम्नलिखित तीन आवश्यक तत्वों पर आधारित है –

  1. विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति-किसी व्यक्ति को वंश, लिंग, धर्म व स्थान के कारण ऐसे विशेष अधिकारों की प्राप्ति न हो, जिससे अन्य लोग वंचित हों।
  2. सभी के लिए उचित अवसरों की प्राप्ति हो।
  3. व्यक्तियों के बीच भेदभाव तर्कसंगत आधार पर हो।

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प्रश्न 12.
समानता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण क्या है? (What is Marxist view of equality?)
उत्तर:
समानता का मार्क्सवादी दृष्टिकोण (marxist view of Equality):]
समानता के मार्क्सवादी दृष्टिकोण में आर्थिक रूप से समानता पर बल दिया जाता है। उनके अनुसार जब सम्पत्ति कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में केन्द्रित हो जाती है तो समाज में विषमता पैदा होती है और राजनीतिक सत्ता भी कुछ ही व्यक्तियों के हाथ में आने लगती है। इसलिए सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए ताकि समाज के सभी लोग आर्थिक समानता का उपभोग कर सकें।

प्रश्न 13.
व्यवहार की समानता से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you understand by equality of treatment?)
उत्तर:
व्यवहार की समानता (Equality of Treatment):
साधारण शब्दों में व्यवहार की समानता का यह अर्थ है कि राज्य अथवा सरकार द्वारा किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग के पक्ष या विपक्ष में किसी प्रकार का कोई पक्षपात न किया जाए। राज्य द्वारा अपने नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाए। जाति, धर्म, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर उनमें किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या समानता तथा स्वतंत्रता परस्पर विरोधी हैं? चर्चा कीजिए। (Are equality and liberty opposed to each other? Explain) अथवा, “समानता के अभाव में स्वतंत्रता निरर्थक है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? (“Liberty is meaningless without equality.” Do you agree with this line?)
उत्तर:
हाँ। स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्र के मूल आधार हैं। दोनों के परस्परिक सम्बन्धों का विवेचना निम्नलिखित है –

(क) स्वतंत्रता व समानता परस्पर विरोधी हैं (Liberty and equality are opposed to each other):
इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक लॉर्ड एक्टन व डी. टॉकविल हैं। उनके विचार में स्वतंत्रता और समानता दोनों एक साथ नहीं रह सकते, क्योंकि समानता व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है। इन विचारकों ने निम्न आधारों पर स्वतंत्रता तथा समानता को एक-दूसरे का विरोधी माना है –

1. सभी मनुष्य समान नहीं हैं (All the individuals are not equal):
संसार में सभी व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। असमानता प्राकृतिक देन है। कुछ व्यक्ति शक्तिशाली होते हैं तो कुछ कमजोर। कुछ व्यक्ति बहुत बुद्धिमान होते हैं तो कुछ मूर्ख। इन असमानताओं के होते हुए सभी व्यक्तियों को समान नहीं समझा जा सकता।

2. समान स्वतंत्रता का सिद्धांत अनैतिक हैं (The theory of equal liberty is immoral):
सभी व्यक्तियों की मूल योग्यताएँ समान नहीं होती। अतः सबको समान अधिकार देना या समान स्वतंत्रता प्रदान करना अन्यायपूर्ण होगा।

(ख) स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी नहीं है (Liberty and equality are not opposed to each other):
जो विचारक स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी न मानकर एक-दूसरे का पूरक मानते हैं और इनका आपस में घनिष्ठ संबंध बतलाते हैं, उनमें रूसो, आर, एच. टोनी व पोलार्ड प्रमुख हैं। रूसो के अनुसार, “बिना स्वतंत्रता के समानता जीवित नहीं रह सकती। “आर. एच. टोनी के अनुसार, “समानता की प्रचुर मात्रा स्वतंत्रता की विरोधी नहीं वरन् अत्यन्त आवश्यक है।” प्रो. पोलार्ड के अनुसार “स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही समाधान है और वह समानता।” ये विचारक अपने पक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं –

1. स्वतंत्रता और समानता का विकास एक साथ हुआ है (Liberty and equality have grown simul-taneously):
स्वतंत्रता और समानता का सम्बन्ध जन्म से है। जब निरंकुशता और असमानता के विरुद्ध मानव ने आवाज उठाई और क्रांतियाँ हुईं तो स्वतंत्रता और असमानता के सिद्धांतों का जन्म हुआ।

2. दोनों के उद्देश्य समान हैं (Both have the same objectives):
दोनों का एक ही उद्देश्य है और वह है-व्यक्ति के विकास के लिए सुविधाएँ प्रदान करना ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके। एक के बिना दूसरे का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के बिना समानता असम्भव है और समानता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।

निष्कर्ष (Conclusion):
स्वतंत्रता और समानता के आपसी सम्बन्धों के उपरोक्त विवेचन का अध्ययन करने के बाद कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता व समानता एक-दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि दोनों का एक ही उद्देश्य है। दोनों ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने के लिए उचित वातावरण की व्यवस्था करती हैं।

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प्रश्न 2.
राजनीतिक समानता और आर्थिक समानता के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए। (Describe the relationship between Political Equality and Economic Equality)
उत्तर:
समानता के अनेक रूप हैं, परंतु राजनीतिक समानता तथा आर्थिक समानता का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। राजनीतिक समानता का अर्थ है कि सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो, जबकि आर्थिक समानता का अर्थ है कि लोगों में कोई आर्थिक भेदभाव न हो। राज्य में एक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण न करे। समाजवादी दलों का आधार आर्थिक समानता ही है। यदि आर्थिक समानता रूपी नीवें पक्की हैं तो राजनीतिक समानता रूपी भवन का निर्माण भी मजबूत हो सकता है। यदि आर्थिक समानता न हो तो राजनीतिक समानता की कल्पना करना ही व्यर्थ है। लास्की (Laski) के शब्दों में, “जहाँ धनी और निर्धन, शिक्षित और अशिक्षित हैं वहाँ स्वामी और दास सदैव पाये जाते हैं।” (Where there are rich and poor, educated and uneducated we find always masters and servants.-Laski)

वर्तमान काल में आर्थिक समानता ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। इसका अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को न्यूनतम आय की गारंटी होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए। सभी लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान सरलता से सुलभ हो जाए। शोषण का अन्त हो। इतिहास बताता है कि जब तक धनी व्यक्ति निर्धनों का शोषण करते रहते हैं अथवा उन्हें शोषण करने की छूट रहती है तब तक समाज शोषक व शोषित, स्वामी तथा सेवक, धनी और निर्धन दो वर्गों में बँटा रहता है। शासन पर उन्हीं शक्तियों का नियंत्रण रहता है जो आर्थिक साधनों पर नियंत्रण रखते हैं।

शासन उन्हीं के इच्छानुसार चलता है। स्टालिन के इस कथन में सच्चाई है कि “बेरोजगार व्यक्ति जिसे उसके परिश्रम का फल नहीं मिलता, जो भूखा रहता है उसके लिए राजनीतिक समानता का कोई अर्थ नहीं।” केवल सिद्धांत रूप में सबको वोट देने का अधिकार देने या चुनाव लड़ने या सरकारी पद पर चुने जाने का समान रूप से अधिकार देने मात्र से कोई व्यक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग नहीं कर सकता जब तक कि उसे आर्थिक रूप से भी समानता प्राप्त नहीं हो जाती। निर्धन राजनीतिक में सक्रिय भाग नहीं लेते। उनको न्याय प्राप्त करने में भी कठिनाई होती है।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता और समानता में सम्बन्ध स्थापित कीजिए। (Discuss the relationship between liberty and equality) अथवा, “समानता का तात्पर्य यह नहीं है कि सभी व्यक्तियों से समान व्यवहार किया जाए।” व्याख्या कीजिए। (“Equality does not mean equal treatment to all the people.” Discuss)
उत्तर:
समानता की भ्रामक धारण (Wrong view of Equality):
कुछ लोग समानता का यह अर्थ लगाते हैं कि जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्हें समान होना चाहिए। सभी समान रूप से शिक्षित हों, सबको समान धन प्राप्त हो, समान नौकरी करें तथा सब समान वेतन प्राप्त करें। किन्तु यह धारणा भ्रामक है। सबको समान नहीं बनाया जा सकता। हाथ की पाँचों उंगलियाँ भी समान नहीं होती हैं। ईश्वर ने भी सबको समान नहीं बनाया है। कोई गोरा, कोई काला, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई दुर्बल है कोई सबल है, कोई बुद्धिमान है, कोई मूर्ख है।

समानता का वास्तविक अर्थ (Correct view of Equality):
अब प्रश्न यह उठता है कि समानता का वास्तविक अर्थ क्या है? वास्तव में समानता एक ओर उस अवस्था का नाम है जिसमें विशेषाधिकारों का अन्त तक दिया गया हो और दूसरी ओर सबको आत्मविकास के समान अवसर प्राप्त हों। समान अवसरों की प्राप्ति से तात्पर्य केवल यह है कि सभी को बिना अवरोध के विकास के समान अवसर प्राप्त हों।

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प्रश्न 4.
“नागरिक समानता स्वतंत्रता की पूर्व शर्त के रूप में” पर टिप्पणी लिखों। (Write shortnote on “Civil equality as a precondition of freedom.”)
उत्तर:
नागरिक समानता अर्थात् कानून के समक्ष समानता और सभी के लिए एक सा कानून लागू होना स्वतंत्रता के उपभोग के लिए एक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक शर्त है। इसके बिना कोई भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक उपभोग नहीं कर सकता। नागरिक समानता अर्थात् किसी भी व्यक्ति के साथ उसके वंश, जाति, धर्म, रंग, जन्म स्थान तथा लिंग के आधार पर कानून कोई भेदभाव नहीं करेगा और कानून का उल्लंघन करने वाले सभी व्यक्तियों को, चाहे उनका सामाजिक स्तर कुछ भी हो, समान दण्ड मिलेगा।

कानूनी दृष्टि से समान समझे जाने पर ही प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति कानून की परवाह न करे और कानून उसका कुछ न बिगाड़ सके तो वह अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात कर सकता है। जब कानून समान रूप से सब व्यक्तियों के जीवन तथा सम्पत्ति की रक्षा करता है तभी वह निर्भीक होकर अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग वास्तविक रूप में कर सकता है। इस प्रकार नागरिक समानता स्वतंत्रता की पूर्व शर्त है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समानता का अर्थ है?
(क) सभी के लिए समान अवसर
(ख) समान शिक्षा
(ग) समान कार्य के लिए समान वेतन
(घ) विशेषाधिकारों का अभाव
उत्तर:
(क) सभी के लिए समान अवसर

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प्रश्न 2.
बीसवीं शताब्दी में निम्नलिखित में से किस पर तुलनात्मक दृष्टि पर जोर दिया गया था?
(क) राजनीतिक समानता पर
(ख) नागरिक समानता पर
(ग) सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर
(घ) राजनीतिक एवं आर्थिक समानता पर
उत्तर:
(ग) सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर

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प्रश्न 3.
राजनीति समानता की सर्वश्रेष्ठ गारंटी है।
(क) लोकतंत्र में
(ख) तानाशाही में
(ग) उच्चतम न्यायालय
(घ) अभिजात तंत्र
उत्तर:
(क) लोकतंत्र में

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता

Bihar Board Class 11 Political Science स्वतंत्रता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता से क्या आशय है? क्या व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता और राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता में कोई संबंध है?
उत्तर:
स्वतंत्रता का अर्थ (The meaning of Freedom):
सामान्य अर्थों में स्वतंत्रता का अर्थ ‘प्रतिरोध रहित’ अवस्था से लिया जाता है। प्रतिरोधों के लगने पर स्वतंत्रता छिन जाती है। स्वतंत्रता अंग्रेजी भाषा के लिबर्टी (Liberty) शब्द के लिए प्रयुक्त होता है जो लैटिन भाषा के (Liber) शब्द से निकला है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘बंधनों का अभाव’। इस प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ हुआ ‘बंधन रहित अवस्था’ अर्थात् मनुष्य के व्यवहार पर किसी प्रकार का अंकुश न होना।

वह जैसा चाहे व्यवहार करे। किन्तु यहाँ यह विचारणीय है कि यदि इच्छानुसार आचरण करने की स्वतंत्रता दे दी जाएगी तब केवल शक्तिशाली मनुष्य ही इस स्वतंत्रता का उपभोग कर सकेंगे और स्वतंत्रता केवल कुछ व्यक्तियों को ही मिल सकेगी। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि अंकुशरहित अथवा ‘अनियंत्रित स्वतंत्रता’ वास्तव में स्वतंत्रता है।

प्रतिरोध रहित अवस्था’ और उच्छृखलता में कोई अंतर नहीं है। हमें स्वतंत्रता पर कुछ न कुछ बंधन अवश्य लगाने पड़ेंगे जिससे कि वह सम्पूर्ण समाज के लिए हितकर बन सके। वास्तव में स्वतंत्रता का अर्थ ऐसी अवस्थाओं से है जिससे मनुष्य अपना पूर्ण विकास कर सकता है। अतः कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता से तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता पर बंधन लगना चाहिए जिनसे किसी दूसरे व्यक्ति अर्थात् समाज को हानि पहुँचती हो। मैकेंजी ने कहा है कि ‘स्वतंत्रता सभी प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं है बल्कि अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों की स्थापना है।”

(“Freedom is not the absence of all restraints, but rather the substitution of rational ones for the irrational”)

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता में संबंध:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्र व्यक्ति का समूह होता है जो एक व्यक्ति के समान होता है। इसलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता और देश का समूह होता है जो एक व्यक्ति के समान होता है। इसलिए व्यक्तिगत की स्वतंत्रता और देश की स्वतंत्रता के योगदान में विशेष अंतर नहीं होता। राष्ट्र एक जीवित जीव की तरह कार्य करता है और व्यक्ति पर नियंत्रण रखता है। देश की हानि, उसके देशवासियों की हानि होती है। व्यक्ति राष्ट्र स्तर पर दूसरे राष्ट्र के विरुद्ध संघर्ष करता है। सामुदायिक हानि व्यक्ति स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता के मध्य की हानि है।

विश्व के अन्य देशों के समान भारत ने शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। उसने विदेशी शक्तियों के साथ उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष किया और बड़े शानदार तरीके से 15 अगस्त, 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की। नेल्सन मंडेला और उसके साथियों ने जातीयता की ब्रिटिश नीति के खिलाफ कालों के हित के लिए लम्बे समय तक संघर्ष किया। इन संघर्षों द्वारा दक्षिण अफ्रीका के लोगों के स्वतंत्रता में आने वाले बाधाओं को भी दूर किया। मंडेला ने अपनी पुस्तक ‘स्वतंत्रता के लम्बे कदम’ (Long Walk to Freedom) में स्वतंत्रता की विस्तृत व्याख्या की है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की माँग राष्ट्रीय स्वतंत्रता या राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता की माँग का पथ प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 2.
स्वतंत्रता की नकारात्मक और सकारात्मक अवधारणा में क्या अंतर है?
उत्तर:
स्वतंत्रता की अवधारणा के नकारात्मक पक्ष और सकारात्मक पक्ष में अंतर –

1. स्वतंत्रता की अवधारणा का नकारात्मक पक्ष:
प्राचीन विचारक नकारात्मक स्वतंत्रता को महत्व देते हैं। उनके अनुसार “स्वतंत्रता से अभिप्राय, ‘बंधनों के अभाव’ से है अर्थात् मनुष्य पूर्ण रूप से स्वतंत्र है। उसकी इच्छा तथा उसके कार्यों पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। मनुष्य को अपने अंत:करण के अनुसार कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।

उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र-राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक तथा धार्मिक क्षेत्र में स्वतंत्र होना चाहिए। व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार जो कुछ करना चाहता है, उसे करने देना चाहिए। राज्य उस पर किसी प्रकार की रुकावट नहीं लगाएगा। जॉन लॉक, एडम स्मिथ और मिल आदि विचारक स्वतंत्रता के इसी रूप के समर्थक थे। लॉक को नकारात्मक स्वतंत्रता का प्रतिपादक माना जाता है।

स्वतंत्रता का नकारात्मक दृष्टिकोण निम्नलिखित विचारों पर आधारित है –

  • स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव है।
  • व्यक्ति पर राज्य द्वारा कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए।
  • वह सरकार सर्वोत्तम है जो कम से कम शासन करे।
  • सम्पत्ति और जीवन की स्वतंत्रता असीमित होती है।

2. स्वतंत्रता का सकारात्मक पक्ष (Positive Aspects of Liberty):
मैक्नी (Mekechine) के अनुसार, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु उचित नियंत्रण होता है।” ये विचार स्वतंत्रता के सकारात्मक रूप को दर्शाते हैं। स्वतंत्रता के सकारात्मक रूप को 20 वीं शताब्दी के उदारवादी विचारकों में महत्व दिया। उनके अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता विवेक के अनुसार कार्य करने में है।

लास्की और मेकाइवर स्वतंत्रता के सकारात्मक सिद्धांत के प्रमुख समर्थक हैं। उनका कहना है कि स्वतंत्रता केवल बंधनों का अभाव है। मनुष्य समाज में रहता है और समाज का हित ही उसका हित है। समाज हित के लिए सामाजिक नियमों तथा आचरणों द्वारा नियंत्रित रहकर व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए अवसर की प्राप्ति ही स्वतंत्रता है। लास्की के शब्दों में, स्वतंत्रता एक सकारात्मक चीज है। इसका तात्पर्य केवल बंधनों का अभाव नहीं है।

स्वतंत्रता के सकारात्मक पक्ष की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं है। सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक उचित ” प्रतिबंधों को स्वीकार करते हैं परंतु वे अनुचित प्रतिबंधों के विरुद्ध हैं। सामाजिक हित के लिए व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं।
  • स्वतंत्रता और राज्य के कानून परस्पर विरोधी नहीं हैं। कानून स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करते बल्कि स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
  • स्वतंत्रता का अर्थ उन सामाजिक परिस्थितियों का विद्यमान होना है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हों।

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प्रश्न 3.
सामाजिक प्रतिबंधों से क्या आशय है? क्या किसी भी प्रकार के प्रतिबंध स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है?
उत्तर:
सामाजिक प्रतिरोध (Social constraints) शब्द का तात्पर्य सामाजिक बंधन और अभिव्यक्ति पर जातीय एवं व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण से है। ये बंधन (Restructions) प्रभुत्व और बाह्य नियंत्रण से आता है। ये बंधन विभिन्न विधियों से थोपे जा सकते हैं। ये बंधन कानून, रीतिरिवाज, जाति, असमानता, समाज की रचना आदि हो सकते हैं। स्वतंत्रता या मुक्ति (Liberty) के वास्तविक अनुभव के लिए सामाजिक और कानूनी बंधन (Constraints) आवश्यक है। प्रतिरोध और प्रतिबंध न्यायसंगत और उचित होना चाहिए। लोगों की स्वतंत्रता के लिए प्रतिरोध जरूरी है क्योंकि बिना उचित प्रतिरोध या बंधन के समाज में आवश्यक व्यवस्था नहीं होगी जिससे लोगों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

प्रश्न 4.
नागरिकों की स्वतंत्रता को बनाए रखने में राज्य की क्या भूमिका है?
उत्तर:
नागरिकों के स्वतंत्रता की सुरक्षा में राज्य की भूमिका-राज्य के सम्बन्ध में कई लोगों का कहना है कि राज्य लोगों की स्वतंत्रता का बाधक है। इसलिए उनकी राय में राज्य के समान कोई संस्था नहीं होनी चाहिए। व्यक्तिवादियों का मानना है कि राज्य एक आवश्यक बुराई है। इसलिए वे एक पुलिस राज्य चाहते हैं जो मानव की स्वतंत्रता की रक्षा बाहरी आक्रमणों और भीतरी खतरों से कर सके। इसलिए आधुनिक स्थिति में स्वतंत्रता की अवधारणा और स्वतंत्रता के आवश्यक अवयव बदल गए हैं।

इसलिए राज्य की भूमिका बदल गयी है। आज इस तथ्य को स्वीकार किया जाता है कि प्रतिरोध और उचित बंधन आवश्यक हैं। यह स्वतंत्रता की सुरक्षा और रक्षा के लिए जरूरी है। उचित प्रतिरोध (Reasonable Constraints) राज्य द्वारा उपलब्ध कराया जाता है क्योंकि राज्य इसके लिए अधिकृत है। राज्य लोगों द्वारा समर्पित एक संस्था है। इसलिए वे राज्य के निर्देशों को स्वीकार करते हैं और उसके अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं। लोगों के जीवन को आरामदायक और व्यवस्थित रखने के लिए राज्य उपयोगी नीतियों और कल्याणकारी कानूनों का निर्माण करता है। ये सब स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है। इस प्रकार राज्य स्वतंत्रता के उत्थान में सकारात्मक भूमिका निभाता है।

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प्रश्न 5.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? आपकी राय में इस स्वतंत्रता पर समुचित प्रतिबंध क्या होगा? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर:
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ (The meaning of freedom expression):
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्ति की मौलिक आवश्यकता है जो प्रजातंत्र को सफल और उपयोगी बनाता है। इसका अर्थ है कि एक पुरुष या स्त्री को अभिव्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। उसे लिखने, कार्य करने, चित्रकारी करने, बोलने या कलात्मक काम करने की पूर्ण आजादी होनी चाहिए। अभिव्यक्ति के भाव या अभिव्यक्ति की स्वतंत्र प्रजातंत्र की जरूरत है। हमें यह भी मानना पड़ेगा कि अभिव्यक्ति की असीमित स्वतंत्रता प्रजातंत्र के लिए हानिकारक है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्वीकृति उचित बंधन के द्वारा उत्तरदायित्वपूर्ण एवं नियंत्रित होना चाहिए। जब हम यह कहते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंधन होना चाहिए तब यह निश्चित करना होगा। अधिक बंधन तर्कसंगत होना चाहिए। वह मानवता पर आधारित न्यायपूर्ण हो जिससे बंधन लादते समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कोई हानि न पहुँचे। न्यायसंगत बंधन के उदाहरण-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बंधनों (Restrictions) को उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है।

भारतीय संविधान में नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है, परंतु साथ ही कानून-व्यवस्था, नैतिकता, शांति और राष्ट्रीय सुरक्षा.को यदि नागरिक द्वारा हानि होने की आशंका की अवस्था में न्यायसंगत बंधन लगाने का प्रावधान है। इस प्रकार विद्यमान परिस्थितियों में न्यायसंगत प्रतिबंध लगाया जा सकता है। परंतु इस प्रतिबंध का विशेष उद्देश्य होता है और यह न्यायिक समीक्षा के योग्य हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Political Science स्वतंत्रता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीतिक स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है? (What is meant by Political Liberty?)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता से अभिप्राय ऐसी स्वतंत्रता से है जिसके अनुसार किसी राज्य के नागरिक अपने यहाँ की सरकार में भाग ले सकें। नागरिकों को मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, आवेदन देने का अधिकार तथा सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किए जाते हैं। रंग, जाति, नस्ल धर्म व लिंग आदि के आधार पर किसी नागरिक को उसके राजनीतिक अधिकारों से वाचत नहीं किया जाता है।

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प्रश्न 2.
भाषण तथा विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से क्या अभिप्राय है? (What do you understand by freedom of speech and expression?)
उत्तर:
लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में जन सहभागिता तथा लोकमत का विशेष प्रभाव होता हैं। लोकमत के निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि नागरिकों को अपने विचारों को भाषण या विचार अभिव्यक्ति द्वारा प्रकट करने का अधिकार होना चाहिए। भाषण तथा विचार अभिव्यक्ति लोकतंत्र की आधारशिला है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में समाचार-पत्र, रेडियो, दूरदर्शन तथा चलचित्र का प्रयोग शामिल है। शब्दों, लेखों, चित्रों, मुद्रण अथवा किसी अन्य प्रकार से अपने विचारों को व्यक्त करना इस प्रकार की स्वतंत्रता में आता है।

आज के वैज्ञानिक युग में नये आविष्कारों के कारण जो भी अभिव्यक्ति के साधन विकसित हो रहे हैं, वे भी अभिव्यक्ति की परिभाषा में शामिल हो रहे हैं। समाचार-पत्रों पर सेन्सरशिप लगाना प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात है, जो विचार अभिव्यक्ति को रोकता है। हाँ, यदि कोई भाषण, लेख या विचार अभिव्यक्ति समाज के अंदर हिंसा, घृणा, साम्प्रदायिकता आदि को बढ़ावा दे तो उस पर रोक लगायी जा सकती है। भारत के संविधान में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों में सम्मिलित की गई है।

प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के किन्हीं दो प्रकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any two kinds of Liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता के बहुत प्रकार होते हैं जैसे –

  1. राजनीतिक स्वतंत्रता
  2. आर्थिक स्वतंत्रता
  3. धार्मिक स्वतंत्रता
  4. नागरिक स्वतंत्रताएँ
  5. प्राकृतिक स्वतंत्रता
  6. राष्ट्रीय स्वतंत्रताएँ
  7. निजी स्वतंत्रता

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प्रश्न 4.
क्या प्रतेक कानून स्वतंत्रता का समर्थक है? (Does each and every law support Liberty?)
उत्तर:
यद्यपि कानून और स्वतंत्रता का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक कानून स्वतंत्रता का समर्थक है। ब्रिटिश काल में अनेक कानून भारतीयों की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए ही बनाए गए थे।

प्रश्न 5.
राजनीतिक स्वतंत्रता के दो लक्षण बताइए। (Mention two features of Political Liberty)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता के दो लक्षण (Two feature of Political Liberty):

  1. प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार होता है।
  2. प्रत्येक नागरिक को सरकारी नौकरी पाने का अधिकार होता है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो:
(क) नैतिक स्वतंत्रता
(ख) नकारात्मक स्वतंत्रता (Write short notes on (a) Moral Liberty, (b) Negative concept of Liberty)
उत्तर:
(क) नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
काण्ट (Kant) के अनुसार नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्तिगत स्वायत्तता ताकि हम अपने आप में मालिक बन सकें। नैतिक स्वतंत्रता केवल राज्य में ही प्राप्त हो सकती है क्योंकि राज्य ही उन परिस्थितियों की स्थापना करता है जिनमें मनुष्य नैतिक रूप से उन्नति कर सकता है।

(ख) नकारात्मक स्वतंत्रता (Negative Aspect of Liberty):
स्वतंत्रता के नकारात्मक पहलू का अर्थ है कि व्यक्ति पर किसी प्रकार का बंधन न हो। हॉब्स के अनुसार-स्वतंत्रता का अर्थ बंधनों का अभाव है। मिल के अनुसार-व्यक्ति के जो कार्य स्वयं से सम्बन्धित हैं, उन पर किसी प्रकार का बंधन नहीं होना चाहिए परंतु स्वतंत्रता की यह नकारात्मक अवधारणा अव्यावहारिक है। समाज में इस प्रकार की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती।

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प्रश्न 7.
स्वतंत्रता की परिभाषा दीजिए। (Define Liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता जिसे अंग्रेजी में Liberty कहते हैं, लैटिन भाषा के लाइबर (Liber) शब्द ‘से बनी है, जिसका अर्थ होता है ‘बंधनों का अभाव’। इस प्रकार शब्द-उत्पत्ति के आधार पर स्वतंत्रता का अभिप्राय है ‘किसी भी बाहरी दबाव से प्रभावित हुए बिना सोचने-विचारे और सोचे हुए काम की करने की शक्ति’। परंतु इस प्रकार की चरम स्वतंत्रता सदा संभव नहीं है।

प्रश्न 8.
लास्की के द्वारा दी गयी स्वतंत्रता की परिभाषा बताइए। (How has Laski defined Liberty?)
उत्तर:
लास्की (Laski) के अनुसार “आधुनिक सभ्यता में मनुष्यों की व्यक्तिगत प्रसन्नता की गारंटी के लिए जो सामाजिक परिस्थितियाँ आवश्यक हैं उनके अस्तित्व में किसी प्रकार के प्रतिबंध का अभाव ही स्वतंत्रता है।” इसी बात को लास्की ने इस प्रकार भी प्रकट किया है – “स्वतंत्रता का अभिप्राय यह है कि उस वातावरण की उत्साहपूर्वक रक्षा की जाए जिसमें कि मनुष्यों को अपना सर्वोत्तम रूप प्रकट करने का अवसर मिलता है।”

प्रश्न 9.
स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by Liberty?) अथवा, स्वतंत्रता की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। (Explain the concept of Liberty)
उत्तर:
मनुष्य जो चाहे कर सके, इसे स्वतंत्रता नहीं कहते। स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति को अपने विकास के लिए पूर्ण अवसर सुलभ हों। लास्की के अनुसार-“स्वतंत्रता का अर्थ उस वातावरण की स्थापना से है जिसमें व्यक्ति को अपने पूर्ण विकास के लिये अवसर प्राप्त हों।” गैटेल के अनुसार-“स्वतंत्रता से अभिप्राय उस सकारात्मक शक्ति से है जिससे उन बातों को करके आनंद प्राप्त होता है जो करने योग्य हैं। कोल के अनुसार-“बिना किसी बाधा के अपने व्यक्तित्व को प्रकट: रने का नाम स्वतंत्रता है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“स्वतंत्रता का निहितार्थ है जंजीर से मुक्ति, बन्दीकरण से मुक्ति, दासता से मुक्ति।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (“Liberty implies freedom from chains, from imprisonment and from ensalyement” Discuss)
उत्तर:
स्वतंत्रता क अर्थ है व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक या सामाजिक दबाव नहीं होना। जे. एस. मिल इसी प्रकार की स्वतंत्रता के समर्थक थे परंतु ऐसी पूर्ण स्वतंत्रता समाज में संभव नहीं। शासको एवं अधिकारियों को भी कानून के अनुसार चलना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता तभी मिल सकती है जबकि उसके कार्यों पर सामाजिक हित में उचित प्रतिबंध भी हो। वास्तविक स्वतंत्रता में अनुचित प्रतिबंधों का अभाव है, सभी प्रकार के कानूनों तथा सभी प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं।

लॉक का कहना है, “जहाँ कानून नहीं वहाँ स्वतंत्रता नहीं। (Where there is no law there is no freedom)। इस प्रकार स्वतंत्रता अनुचित प्रतिबंधों का अभाव है, उनसे मुक्ति है दासता, बन्दीकरण तथा बैड़ियाँ ऐसे अनुचित प्रतिबंध हैं जिनके कारण व्यक्ति स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं कर सकता। इसीलिए कहा गया है कि स्वतंत्रता के अर्थों में यह बात निहित है कि व्यक्ति को बेड़ियों से मुक्ति प्राप्त हो, बंदी बनाए जाने के डर से मुक्ति हो, दासता की बेड़ियों से छुटकारा प्राप्त हो।

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प्रश्न 2.
क्या स्वतंत्रता असीम है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बिना किसी बाधा के अपने व्यक्तित्व को प्रकट करने का नाम स्वतंत्रता है परंतु यदि प्रत्येक को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता दे दी जाए तो समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी। एक-दूसरे की स्वतंत्रता में बाधा पहुँचेगी। असीमित स्वतंत्रता अपने आप में विरोधाभास है। सभ्य समाज में स्वतंत्रता बंधन व कानूनों की सीमा में ही होनी चाहिए। जब भी स्वतंत्रता असीम हो जाती है, तो वह वह नकारात्मक स्वतंत्रता बन जाती है और व्यक्ति के ऊपर किसी प्रकार का बंधन नहीं होता।

इस प्रकार की स्वतंत्रता के अन्तर्गत व्यक्ति कुछ भी कर सकता हैं जिससे दूसरे व्यक्तियों की स्वतंत्रता नष्ट हो सकती है। अत: व्यक्ति को केवल ऐसे कार्य करने चाहिए, जिससे दूसरों की स्वतंत्रता पर चोट न पहुँचती हो। बार्कर ने लिखा है, “जिस प्रकार कुरूपता का न होना सुन्दरता नहीं है, उसी प्रकार बंधनों का न होना स्वतंत्रता नहीं है।” (“As beauty is not the absence of ugliness so liberty is not the absence of restraints”) अतः स्वतंत्रता असीम नहीं हो सकती।

प्रश्न 3.
क्या प्रत्येक कानून स्वतंत्रता का रक्षक है? (Does every law defend liberty?)
उत्तर:
प्रत्येक कानून से स्वतंत्रता की रक्षा होती है ऐसा आवश्यक नहीं है। ब्रिटिश काल के अनेक कानून भारतीय जनता की स्वतंत्रता को कुचलने वाले थे। रौलेट एक्ट, सेफ्टी एक्ट, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट आदि इस प्रकार के कानून बनाए गए थे जिनके विरुद्ध भारतीयों ने घोर संघर्ष किया। गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ने के लिए सत्याग्रह किया।

यदि कानून अच्छे हों तो जनता उनका खुशी से पालन करती है, परंतु यदि कानून जनता के हित में नहीं है तो ऐसे कानूनों का जनता सख्ती से विरोध करती है। स्वतंत्रता और प्रभुता के सामंजस्य से जो कानून बनते हैं वे अधिक अच्छे हैं। गेटेल ने लिखा है-“प्रभुत्ता की अधिकता से स्वतंत्रता का नाश होता है। वह अत्याचार में बदल जाती है। इसी प्रकार स्वतंत्रता की अति से अराजकता फैल जाता है और प्रभुता का नाश होता है।” कई बार मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए कानून बनाए जाते हैं। वे कानून स्वतंत्रता में बाधा नहीं पहुँचाते वरन् स्वतंत्रता के समर्थक होते हैं।

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प्रश्न 4.
राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता तथा नैतिक स्वतंत्रता क्या हैं? (What are political, economic and moral liberties?)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है ऐसी स्वतंत्रता जिसके द्वारा नागरिकों को राज्य के कार्यों में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। लास्की के अनुसार, “राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ राज्य के कार्यों में क्रियाशील होना है।” लीकॉक के अनुसार, “राजनीतिक स्वतंत्रता संवैधानिक स्वतंत्रता है और इसका अर्थ यह है कि लोगों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार होना चाहिए।

“राजनीतिक स्वतंत्रता में नागरिकों को मतदान करने का अधिकार प्राप्त रहता है। इसके अतिरिक्त चुने जाने का अधिकार तथा सार्वजनिक पद पाने का अधिकार एवं सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना करने का अधिकार भी राजनीतिक स्वतंत्रता से संबंधित हैं। प्रो. लास्की का मत है कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सबको शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हो। साथ ही स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रेस भी आवश्यक है।

आर्थिक स्वतंत्रता (Economic Liberty):
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है-बिना दूसरों पर निर्भर हुए जीवन-यापन की सभी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति। व्यक्ति की भूख तथा बेरोजगारी से मुक्ति, आर्थिक स्वतंत्रता कहलाती है। मनुष्य को अपनी आर्थिक उन्नति के लिए समान अवसर प्राप्त हों। काम करने का अधिकार, न्यूनतम वेतन, काम के निश्चित घंटे, अवकाश पाने का अधिकार, बेकारी, बीमारी तथा बुढ़ापे में सहायता प्राप्त होना आदि आर्थिक स्वतंत्रता की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं।

एक निर्धन व्यक्ति को मतदान का अधिकार मिलने से ही उसकी स्वतंत्रता पूरी नहीं हो जाती, क्योंकि जब तक वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होगा तब तक वह अपनी इस राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग भी नहीं कर पायेगा, क्योंकि वह मतदान में या तो भाग ही नहीं ले पाता या अपने मत का प्रयोग स्वतंत्रतापूर्वक अपनी इच्छानुसार नहीं कर पाता; धनी व्यक्ति उसके मत को खरीद लेते हैं अथवा धनी एवं बाहुबली उसको डराकर उसे अपने पक्ष में कर लेते हैं। अत: आर्थिक समानता आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का होना भी निरर्थक होता है।

नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
काण्ट (Kant) के अनुसार नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्तिगत स्वायत्तता अर्थात् हम स्वयं अपने मालिक हैं। व्यक्ति में समाज के प्रति प्रेम, त्याग, सहानुभूति, सहयोग आदि भावनाओं का विकास होना चाहिए। नैतिक स्वतंत्रता केवल राज्य में ही प्राप्त हो सकती है, क्योंकि राज्य ही उन परिस्थितियों की स्थापना करता है जिसमें व्यक्ति नैतिक रूप से उन्नति कर सकता है। लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था के लिए तो नैतिक स्वतंत्रता और भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि नैतिक स्वतंत्रता व्यक्ति की मानसिक स्थिति से संबद्ध है जिससे वह बिना लोभ-लालच के अपना सामाजिक जीवन-यापन करता है और अपनी विवेकपूर्ण शक्ति का प्रयोग समाज के हित में करता है।

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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता और समानता के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करें। (What is the relationship between liberty and equality?)
उत्तर:
स्वतंत्रता और समानता के बीच वैचारिक स्तर पर कोई समानता न होकर स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के सिद्धांतों को लागू करने का माध्यम बनते हैं। हालांकि स्वतंत्रता और समानता को कुछ विचारक एक समान मानते हैं लेकिन उनकी यह धारणा पूर्णतया इस आधार पर गलत है कि समानता अपने मूल अभिप्राय से किसी को स्वतंत्रता प्रदान नहीं करती है, वैसे ही स्वतंत्रता अपने उद्देश्यों के लिए किया जाता है जिससे कि स्वतंत्रता को समानता के सिद्धांत के अनुरूप सबको समान रूप से वितरित किया जाए।

अब इस समानता के आधार पर प्राप्त होने वाली स्वतंत्रता को लोग कैसे इस्तेमाल करते हैं, यह उनकी क्षमता पर निर्भर करता है। इसीलिए स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे की विचारधारा की विरोधी नहीं अपितु स्वतंत्रता और समानता की विचारधारा एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी यह दोनों विचारधारा एक दूसरे के साथ सहयोग करके ही स्वतंत्रता को समानातापूर्वक लोगों के बीच क्रियान्वित किया जा सकता है। इस कारण स्वतंत्रता और समानता के बीच का सम्बन्ध स्वतंत्रता को समानतापूर्वक लोगों के बीच लागू करने का एकमात्र माध्यम बनता है अर्थात् बिना समानता के स्वतंत्रता लोगों पर समान रूप से लागू नहीं हो सकती है।

प्रश्न 6.
स्वतंत्रता का अर्थ और कार्य क्षेत्र को वर्णित करें। (Describe the meaning and scope of liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता के अर्थ को सामान्यत: इस रूप से जाना जाता है कि स्वतंत्रता वह सब कुछ करने की शक्ति है जिससे किसी दूसरे को आघात न पहुँचे। स्वतंत्र व्यक्ति को अपनी इच्छा स्वरूप कार्य करने की स्वतंत्रता होती है। व्यक्ति के व्यक्तित्व में मूल सहायक तत्व स्वतंत्रता, जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छा को पहचानता है और अपनी अच्छी अनुरूप अपने कार्य को पूर्ण करता है। अगर स्वतंत्रता सम्बन्धी अधिकार व्यक्ति को प्राप्त न हो तो निश्चित है कि व्यक्ति का विकास होना सम्भव नहीं है।

इस मूल तथ्य को स्वीकारते हुए कि स्वतंत्रता व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार है, स्वतंत्रता को मूल रूप से व्यक्ति द्वारा निर्मित किया गया है। इसीलिए स्वतंत्रता व्यक्ति का मूल अधिकार है। भारतीय संविधान में स्वतंत्रता के अधिकार को अनुच्छेद 19 से लेकर अनुच्छेद 22 तेक में वर्णित किया गया है। स्वतंत्रता के क्षेत्र में दो प्रकार की स्वतंत्रता व्यक्ति के संदर्भ में आती है। पहली व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दूसरी सामाजिक स्वतंत्रता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता दोनों ही मनुष्य के विकास के लिए अनिवार्य होती हैं। बिना इन दो तत्वों के संतुलन के व्यक्ति न तो स्वयं अपना स्वतंत्रतापूर्वक विकास कर सकता है और न ही व्यक्ति अपने को स्वतंत्र समझ सकता है। इस कारण स्वतंत्रता व्यक्ति की आवश्यकता का मूल आधार बन जाती है।

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प्रश्न 7.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता को स्पष्ट करें। (Define the Personal Liberty)
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मूल अभिप्राय है कि व्यक्ति के वह कार्य जो उसकी निजी आवश्यकताओं से संबंधित हों, तथा इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए वह अपनी निजी इच्छा अनुरूप स्वतंत्र हो। व्यक्तिगत स्वतंत्रता में भोजन, वस्त्र, धर्म, पारिवारिक जीवन, निजी सम्पत्ति आदि सम्मिलित हैं। मिल ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “मानव समाज को केवल आत्मरक्षा के उद्देश्य से ही किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से हस्तक्षेप करने का अधिकार हो सकता है। अपने ऊपर, अपने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा पर व्यक्ति सम्प्रभु है।”

उपरोक्त कथन यह स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व्यक्ति की स्वयं की इच्छा से संबंधित होती है तथा ऐसी इच्छा को हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता कह सकते हैं जो अपने निर्णय के अनुरूप कार्य कर सकने में अपने को स्वतंत्र महसूस कर सके। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का निर्धारण स्वयं व्यक्ति की अपनी निजी परिस्थितियों और निजी आवश्यकताओं के अनुरूप होता है। व्यक्तिवादी स्वतंत्रता सम्बन्धी अवधारणा को बहुलवादी और उदारवादी विचारकों द्वारा किया गया, तथा यह भी सत्य है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सैद्धान्तिक और उसका व्यावहारिक पक्ष केवल लोकतंत्रीय राजनीतिक विचारधारा से सम्बद्ध है।

प्रश्न 8.
नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता के बीच अंतर को स्पष्ट करें। (Distinguish between Civil Liberty and Political liberty)
उत्तर:
नागरिक स्वतंत्रता का मूल तात्पर्य यह है कि ऐसी स्वतंत्रता को राज्य के माध्यम से दिया जाता है। यह स्वतंत्रता व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता होती है, जिसका संरक्षण और प्रभाव राज्य द्वारा संरक्षित अवश्य होना चाहिए, तभी इस मूलभूत स्वतंत्रता को व्यक्ति अपने विकास में प्रयोग करेगा, बिना किसी की स्वतंत्रता को बाधित किए हुए। नागरिक स्वतंत्रता को दो भागों में विभक्त किया गया है –

  1. शासन के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतंत्रता और
  2. व्यक्ति की व्यक्ति से और व्यक्तियों के समुदाय से स्वतंत्रता।

लास्की ने राजनीतिक स्वतंत्रता के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “राज्य के कार्यों में सक्रिय भाग लेने की शक्ति को राजनीतिक स्वतंत्रता कहा जाता है।” लेकिन यह राजनीतिक स्वतंत्रता लोकतांत्रिक पद्धति में ही सम्भव है, न कि अन्य किसी निरंकुश रूप में। लीकॉक द्वारा राजनीतिक स्वतंत्रता को संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में देखा गया जिसका विस्तृत अर्थ यह था कि जनता अपने शासक को अपनी इच्छा के अनुसार चुन सके और चुने जाने के उपरांत यह शासक वर्ग जनता के प्रति उत्तरदायी हो। इस कारण राजनीतिक स्वतंत्रता ने व्यक्ति को दो अधिकार दिए –

  1. मतदान का अधिकार और
  2. निर्वाचित होने का अधिकार। इस प्रकार राजनीतिक स्वतंत्रता लोगों को राज्य के संदर्भ में सक्रिय रूप से भाग लेने का अधिकार देती है।

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प्रश्न 9.
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ और क्षेत्र वर्णित कीजिए। (Describe the meaning and scope of Economic Liberty)
उत्तर:
आर्थिक स्वतंत्रता के अर्थ और सिद्धांत को उदारवाद के संदर्भ में जाना जाता है। आर्थिक स्वतंत्रता का तात्पर्य उदारवाद के संदर्भ में यह है कि व्यक्तियों के आर्थिक जीवन में राज्य के माध्यम से किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। यह धारणा उदारवादियों में इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि मध्य युग में सामंती राज्यों ने भूमि, वस्तुओं तथा सम्पत्ति के क्रय-विक्रय, ‘श्रमिक, धन के लेन-देन आदि पर काफी प्रकार के कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे, जिसके कारण आर्थिक सम्पन्नता का सारा केन्द्र राज्य और शासक वर्ग बना तथा राज्य का शासक वर्ग राज्य शक्ति और धन शक्ति को अपने नियंत्रण में रखकर इससे लोगों पर वह अपनी निरंकुशता स्थापित करता था।

इसलिए इस पद्धति को बदलने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता में आर्थिक न्याय और आर्थिक समानता की धारणा आर्थिक तत्व का मूल आधार बन गयी। इसलिए राज्य की उदारवादी आर्थिक स्वतंत्रता की धारणा व्यक्ति को स्वतंत्रतापूर्वक आर्थिक विकास करने पर विशेष बल देने लगी और इस आर्थिक स्वतंत्रता में संतुलन की वास्तविक सीमा स्वयं उभरना स्वाभाविक हुई और इसी धारणा ने राज्य के आर्थिक स्वतंत्रता को संतुलित रूप में पेश करने में महत्वपूर्ण मार्ग प्रशस्त किया। इस कारण आर्थिक स्वतंत्रता का उपरोक्त तथ्य आर्थिक स्वतंत्रता विकास का मूल मंत्र बन गया लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता की अवधारणा केवल लोकतांत्रिक राज्यों से ही सम्बद्ध हुई न कि निरंकुश राज्य से सम्बद्ध हुई।

प्रश्न 10.
आर्थिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के परस्पर सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए। (Explain the mutual relationship between economics and political liberties)
उत्तर:
आर्थिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है जीवन-यापन की सभी सुविधाओं या अवसरों की प्राप्ति होना। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर ही व्यक्ति अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता का उचित रूप से प्रयोग कर सकता है। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है, अपने प्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता का अर्थात् मतदान का अधिकार प्राप्त हो।

सार्वजनिक पद पाने का अधिकार हो तथा सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना करने का अधिकार होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना राज्य के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले सकता। एक धनी व्यक्ति निर्धनों के मत खरीद कर सत्ता पर अपना अधिकार प्राप्त कर लेता है और तब वह गरीबों का शोषण करता है। वास्तव में राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक उसे आर्थिक स्वतंत्रता का ठोस आधार नहीं मिलता।

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प्रश्न 11.
राष्ट्रीय स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by national liberty?)
उत्तर:
राष्ट्रीय स्वतंत्रता (National Liberty):
राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ है स्वराज्य। व्यक्ति की भाँति राष्ट्र को भी स्वतंत्र रहने का अधिकार है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के अन्तर्गत प्रत्येक राष्ट्र का यह अधिकार है कि वह स्वतंत्रतापूर्वक अपनी नीतियों का निर्धारण कर सके तथा उन्हें लागू कर सके। दास देशों द्वारा अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता की माँग करना राष्ट्रीय स्वतंत्रता है। 20 वीं शताब्दी में अफ्रीकी व एशिया के बहुत देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया तथा अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्त की।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by Personal Liberty?)
उत्तर:
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ है कि मनुष्यों को व्यक्तिगत मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र होनी चाहिए। भोजन, वस्त्र, शादी तथा रहन-सहन आदि व्यक्ति के व्यक्तिगत मामले हैं। राज्य को चाहिए कि वह उन मामलों में हस्तक्षेप न करे। जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार, “उस सीमा तक व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वंतत्रता प्राप्त होनी चाहिए जहाँ तक कि उसके कार्यों से अन्य व्यक्तियों को हानि न पहुँचती हो।” मिल के अतिरिक्त बर्नार्ड रसेल तथा रूसो आदि राजनीतिक दार्शनिकों ने भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया है।

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प्रश्न 13.
किसी व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता के उपभोग के लिए आवश्यक दो दशाएँ बताइए। (Describe any two conditions which are essential for the individual to enjoy liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता का अर्थ है ‘प्रतिबंधों का अभाव’, परंतु सकारात्मक रूप में स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति पर उन प्रतिबंधों को हटाना जो अनैतिक और अन्यायपूर्ण हों। किसी व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता के उपभोग की दो आवश्यक दशाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. स्वतंत्रता समाज के सभी व्यक्तियों को समान रूप से होनी चाहिए। समाज के एक वर्ग को स्वतंत्रता प्राप्त होने और दूसरे को प्राप्त न होने से स्वतंत्रता का उपभोग कठिन होता है।
  2. जिनके पास राजसत्ता है उनके द्वारा सत्ता का दुरुपयोग न हो। यदि किसी देश या समाज में ऐसा हो तो वहाँ के लोग स्वतंत्रता का उपभोग ठीक प्रकार से नहीं कर सकते।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में तर्क दीजिए। अथवा, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु उचित नियंत्रण का होना है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (Give arguments in favour of Positive Liberty) Or, (“Liberty does not mean absence of restraints but imposition of rational restraints. “Explain)
उत्तर:
गैटेल (Gatel) का कथन है कि स्वतंत्रता का केवल नकारात्मक रूप ही नहीं है वरन् सकारात्मक रूप भी है। उसके शब्दों में, “स्वतंत्रता वह सकारात्मक शक्ति है जिसके द्वारा उन कार्यों को करके आनंद प्राप्त किया जाता है जो करने योग्य हैं।”

(Liberty is the positive power of doing and enjoying those thing which are worthy of enjoyment and work-Gettel)
इस कथन से स्पष्ट है कि केवल बंधनों को दूर करने मात्र से ही सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती। जिस प्रकार कुरूपता के अभाव को सौन्दर्य नहीं कह सकते, सौन्दर्य के लिए कुछ और अधिक भी चाहिए। उसी प्रकार स्वतंत्रता के लिए बंधनों के अभाव के अतिरिक्त भी किसी और वस्तु की आवश्यता है; जो वह है अवसर की उपस्थिति। इसीलिए मैकेन्जी (Machenjie) ने कहा है, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु उचित नियंत्रण का होना है।”

(Liberty does not mean absence of restraints but imposition of rational restraints)

सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थन में तर्क (Arguments in favour of positive liberty):

सकारात्मक स्वतंत्रता की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव नहीं, स्वतंत्रता को वास्तविक बनाने के लिए उस पर उचित प्रतिबंध आवश्यक है।
  2. समाज और व्यक्ति के हितों में कोई विरोध नहीं है।
  3. स्वतंत्रता और राज्य के कानून परस्पर विरोधी नहीं हैं। कानून स्वतंत्रता को नष्ट नहीं करते वरन् स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।
  4. स्वतंत्रता का अर्थ उन सामाजिक परिस्थितियों का विद्यमान होना है जो व्यक्ति के विकास में सहायक हों।
  5. स्वतंत्रता अधिकारों के साथ जुड़ी हुई है। जितनी अधिक स्वतंत्रता होगी उतने अधिक अधिकार होंगे। अधिकारों के बिना व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।
  6. राजनीतिक व नागरिक स्वतंत्रता का मूल्य आर्थिक स्वतत्रंता के अभाव में निरर्थक है।
  7. राज्य का कार्य ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करना है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हों।
  8. वांछनीय व उचित कार्यों को करने की सुविधा होती है। यदि अवांछनीय एवं अनुचित कार्य करने की स्वतंत्रता हो तो स्वतंत्रता स्वेच्छाचारिता बन जाएगी।

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प्रश्न 2.
“स्वतंत्रता का अर्थ प्रतिबंधों का अभाव है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? (“Liberty means absence of restraints.” Do you agree with this view?)
उत्तर:
स्वतंत्रता का अर्थ दो प्रकार से लिया जाता है। एक अर्थ ‘प्रतिबंधों का अभाव’ और दूसरे अर्थ में व्यक्ति के कार्यों पर उचित प्रतिबंध लगाना।

1. स्वतंत्रता प्रतिबंधों का अभाव है (Liberty is the absence of restraints):
कुछ विचारकों का मत है कि व्यक्ति तभी स्वतंत्र रह सकता है जब उसके कार्यों से सभी प्रतिबंध हटा लिए जाएँ और उसे इच्छानुसार कार्य करने दिया जाए। जे. एस. मिल इस प्रकार की स्वतंत्रता के समर्थक थे। उनका कहना है कि “व्यक्ति अपना भला-बुरा स्वयं सोच सकता है और पूर्ण स्वतंत्रता मिलने पर वह अपना सर्वोत्तम विकास कर सकता है।

“यदि व्यक्ति के आचरण या कार्यों पर किसी प्रकार का भी प्रतिबंध है तो उसकी स्वतंत्रता वास्तविक नहीं हो सकती और ऐसी दशा में वह अपना सर्वोत्तम विकास नहीं कर सकता। इस प्रकार की विचारधारा को मानने वाले विद्वान नैतिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक सभी प्रकार के तर्कों के आधार पर इस बात पर जोर देते हैं कि व्यक्ति के कार्यों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। यही वास्तविक स्वतंत्रता है।

2. व्यक्ति के कार्यों पर उचित प्रतिबंध लगाना ही स्वतंत्रता है (Liberty is the imposition of rational restraints):
प्रतिबंधों के अभाव में समाज में जंगल जैसा वातावरण हो सकता है। शक्तिशाली निर्बलों को सताने लगते हैं, अव्यवस्था फैलने लगती है। अतः स्वतंत्रता सबको तभी मिल सकती हैं जबकि सभी व्यक्तियों के कार्यों और आचरण पर उचित प्रतिबंध हो। कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को हानि न पहुँचा सके। कानून द्वारा समाज में व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। लॉक के अनुसार, “जहाँ कानून नहीं वहाँ स्वतंत्रता नहीं।” कानून द्वारा ही ऐसा वातावरण स्थापित किया जा सकता है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार स्वतंत्रतापूर्वक कार्य कर सके; परंतु मनमानी नहीं करे।

स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति को करने योग्य कार्य करने की छूट और भोगने योग्य वस्तु को भोगने की स्वतंत्रता या शक्ति प्राप्त करना। परंतु मनमानी (निरंकुशता) करना नहीं। यह तभी हो सकता है जब प्रत्येक व्यक्ति पर उचित प्रतिबंध लगाए जाएँ, जिससे कि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के कार्यों में हस्तक्षेप न करे। प्रतिबंधों के अभाव में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ होने लगती है। अतः यह सत्य है कि वास्तविक स्वतंत्रता प्रतिबंधों का अभाव नहीं वरन् अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों को लगाना है। तभी प्रत्येक व्यक्ति अपना सर्वोत्तम विकास कर सकता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 2 स्वतंत्रता

प्रश्न 3.
“राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक समानता के अभाव में निरर्थक है।” इस कथन पर टिप्पणी कीजिए। (“Political liberty is meaningless without economic equality.” Comment)
उत्तर:
स्वतंत्रता और समानता प्रजातंत्र के दो स्तंभ माने जाते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता के सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए लास्की और सामानला धजातंत्र कोके दो स्तंभम्बन्धबातो हैं या डोयों एक-दसुरे के प्रका (Laski) ने कहा है, “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता एक धोखा मात्र है, मिथ्या है, पाखण्ड है और कहने की ही बात है।” लोस्की के इस कथन की सत्यता जानने के लिए यह आवश्यक है कि हम पहले राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता का अर्थ समझें।

राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता का अभिप्राय है कि व्यक्ति देश के शासन में भाग ले सकता है। नागरिकों को मतदान का अधिकार होता है। प्रतिनिधि चुने जाने का अधिकार है। सार्वजनिक पद पाने का अधिकार है। सरकार की नीतियों की आलोचना का अधिकार है।

आर्थिक समानता (Economics Equality):
आर्थिक समानता का अर्थ है कि सभी नागरिकों को अपनी आजीविका कमाने हेतु समान अवसर उपलब्ध हों। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन प्राप्त होने चाहिए। आर्थिक असमानता कम से कम होनी चाहिए। आर्थिक शोषण नहीं होना चाहिए तथा उत्पादन और वितरण के साधनों की ऐसी व्यवस्था हो जो सबके हित में हों।

राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता में संबंध (Relationship between Liberty and. Economic Equality)

1. निर्धन व्यक्ति के लिए मताधिकार अर्थहीन है (Right to vote is meaningless for a poor person):
राजनीतिक अधिकारों में वोट का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है परंतु एक निर्धन व्यक्ति के लिए, जिसे रोटी खाने को नहीं मिलती, रोटी का वोट के अधिकार से अधिक मूल्य है। राजनीतिक स्वतंत्रता के समर्थक यह भूल जाते हैं कि व्यक्ति के लिए वोट डालने और चुनाव लड़ने के अधिकार से अधिक आवश्यक रोटी, कपड़ा और मकान है।

2. निर्धन व्यक्ति द्वारा मत का सदुपयोग असंभव (Proper use of vote is impossible for a poor person):
मताधिकार न केवल अधिकार है वरन् परम कर्तव्य भी है। निर्धन व्यक्ति न तो शिक्षा प्राप्त कर सकता है, न ही देश की समस्याओं को समझ सकता है। अतः वह अपने मत का सदुपयोग भी नहीं कर सकता।

3. निर्धन व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना असंभव है (Contesting an Election is impossible for a poor man):
आजकल चुनाव लड़ने में लाखों रुपया खर्च होता है। निर्धन व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं कर सकता। चुनाव लड़ना तो दूर रहा, वह चुनाव लड़ने का स्वप्न भी नहीं देख सकता।

4. राजनीतिक दलों पर भी धनियों का ही नियंत्रण रहता है (Political parties are controlled by the rich):
राजनीतिक दल धनी व्यक्तियों के निर्देशन पर ही चलते हैं। निर्धन व्यक्ति का राजनीतिक दल पर भी कोई प्रभाव नहीं होता। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक समानता के अभाव में निरर्थक है।

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प्रश्न 4.
“कानून तथा स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। (“Law and liberty are not antagonistic.” Comment, अथवा, कानून तथा स्वतंत्रता के परस्पर संबंधों का वर्णन कीजिए। (Discuss the mutual relationship between law and liberty)
उत्तर:
राजनीतिक विज्ञान के कुछ विचारकों का मत है कि कानून और स्वतंत्रता परस्पर विरोधी हैं। वे कहते हैं कि कानूनों द्वारा स्वतंत्रता पर अंकुश लगता है और स्वतंत्रता कम हो जाती है। राजनीतिक विज्ञान के कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि कानून स्वतंत्रता विरोधी नहीं है बल्कि कानून के द्वारा ही व्यक्ति को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त होती है।

कानून स्वतंत्रता का विरोधी है (Law is opposed to Liberty):
इस विचार को मानने वालों का मत है कि राज्य जितने अधिक कानून बनाता है व्यक्ति की स्वतंत्रता उतनी ही कम हो जाती है। व्यक्तिवादियों व अराजकतावादियों का यही मत है।

1. व्यक्तिवादियों का मत (Views of Individualists):
18 वीं शताब्दी में व्यक्तिवादियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर दिया और यह कहा था कि राज्य के कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक प्रतिबंध हैं, इसलिए व्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है जब राज्य अपनी सत्ता का प्रयोग कम से कम करे अर्थात् उनके अनुसार वह सरकार सबसे अच्छी है जो कम से कम शासन करती है।

2. अराजकतावादियों का मत (Views of Anarchists):
अराजकतावादियों के अनुसार राज्य प्रभुसत्ता का प्रयोग करके नागरिकों की स्वतंत्रता को नष्ट करता है, अतः अराजकतावादियों ने राज्य को समाप्त करने पर जोर दिया ताकि राज्यविहीन समाज की स्थापना की जा सके।

कानून स्वतंत्रता का रक्षक है (Law protects the Liberty):
राजनीति विज्ञान के जो विचारक स्वतंत्रता का सकारात्मक अर्थ स्वीकार करते हैं और स्वतंत्रता पर उचित बंधनों को आवश्यक मानते हैं, वे कानून को स्वतंत्रता की पहली शर्त समझते हैं और सत्ता को आवश्यक मानते हैं। हॉब्स जो निरंकुशवादी माना जाता है, स्वीकार करता है कि कानून के अभाव में व्यक्ति हिंसक पशु बन जाता है।

अतः सत्ता व कानून का होना आवश्यक है, ताकि व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक जीवन बिता सके । लॉक (Locke) ने कहा कि “जहाँ कानून नहीं है वहाँ स्वतंत्रता नहीं है” रिची (Rithce) के शब्दों में, “कानून आत्म विकास के सुअवसर के रूप में स्वतंत्रता को संभव बनाते हैं और सत्ता के अभाव में इस प्रकार की स्वतंत्रता संभव नहीं हो सकती।”

आदर्शवादी विचारकों ने कानून व स्वतंत्रता में गहरा संबंध स्वीकार किया है और उनके अनुसार स्वतंत्रता न केवल कानून द्वारा सुरक्षित है अपितु कानून की देन है। हीगल के अनुसार, “राज्य में रहते हुए कानून के पालन में ही स्वतंत्रता निहित है।” हीगल ने राज्य को सामाजिक नैतिकता की साक्षात् मूर्ति कहा है और कानून चूँकि राज्य की इच्छा की अभिव्यक्ति है, अत: नैतिक रूप से भी स्वतंत्रता कानून के पालन में ही निहित है। अन्त में निष्कर्ष कहा जा सकता है कि कानून स्वतंत्रता का विरोधी नहीं वरन् कानून के पालन से ही स्वतंत्रता संभव है। यदि कानून समाज के प्रबल व्यक्तियों पर अंकुश लगाए तो समाज के बहुत से व्यक्तियों को किसी प्रकार की कोई स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।’

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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं? व्याख्या कीजिए। (What are the different kinds of liberty? Explain)
उत्तर:
स्वतंत्रता के प्रकार (Kinds of Liberty):

1. प्राकृतिक स्वतंत्रता (Natural Liberty):
प्राकृतिक स्वतंत्रता वह स्वतंत्रता है जिसका मनुष्य राज्य की स्थापना से पहले प्रयोग करता था। रूसो (Rousseau) के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र पैदा होता है, परंतु समाज में आकर वह बंधन में बंध जाता है। प्रकृति की ओर से व्यक्ति पर किसी प्रकार के बंधन नहीं होते परंतु अधिकतर राजनीति शास्त्री इस मत से सहमत नहीं हैं। हरबर्ट स्पेन्सर कहता है, “स्वतंत्रता का अर्थ उस व्यवस्था से है जिसमें प्रत्येक मनुष्य को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता रहे, यदि वह दूसरों की उतनी ही स्वतंत्रता का उल्लंघन न कर रहा हो।”

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Liberty):
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ है कि मनुष्यों को व्यक्तिगत मामलों में पूरी तरह से स्वतंत्रता होना चाहिए। भोजन, वस्त्र, शादी-विवाह, रहन-सहन आदि मामलों में राज्य को दखल नहीं देना चाहिए।

3. राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Liberty):
राजनीतिक स्वतंत्रता ऐसी स्वतंत्रता को कहते हैं जिसके अनुसार किसी देश के नागरिक अपने देश की सरकार में भाग लेने का अधिकार रखते हैं। नागरिकों को मताधिकार, चुनाव में खड़े होने का अधिकार, आवेदन देने का अधिकार तथा सरकारी नौकरी पाने का अधिकार रंग, जाति व धर्म आदि के भेदभाव के बिना सबको प्रदान किए जाते हैं।

4. आर्थिक स्वतंत्रता (Economics Liberty):
आर्थिक स्वतंत्रता से अभिप्राय ऐसी स्वतंत्रता से है जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रुचि व योग्यतानुसार व्यवसाय करने की स्वतंत्रता हो, देश में उद्योग-धंधों को सुचारू रूप से चलाने की स्वतंत्रता हो और उनको सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था बनायी जाए। धन का उत्पादन व वितरण ठीक ढंग से हो व बेरोजगारी न हो।

5. धार्मिक स्वतंत्रता (Religious Liberty):
धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है-प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता हो। राज्य का कोई विशेष धर्म नहीं होता। विभिन्न धर्म के मानने वालों में कोई भेद नहीं किया जाता। इसी भावना के अनुसार भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है।

6. राष्ट्रीय स्वतंत्रता (National Liberty):
राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ है कि राष्ट्र को विदेशी नियंत्रण से स्वतंत्रता प्राप्त होती है। एक स्वतंत्र राष्ट्र ही अपने नागरिकों को अधिकार तथा स्वतंत्रता प्रदान कर सकता है जिससे नागरिक अपना सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनैतिक विकास कर सकें।

7. नैतिक स्वतंत्रता (Moral Liberty):
व्यक्ति पूर्ण रूप से तभी स्वतंत्र हो सकता है जबकि वह नैतिक रूप से भी स्वतंत्र हो। नैतिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी बुद्धि तथा विवेक के अनुसार निर्णय ले सके। हीगल तथा ग्रीन ने नैतिक स्वतंत्रता पर बल दिया है। उनके अनुसार राज्य ऐसी परिस्थितियों की स्थापना करता है, जिससे मनुष्य नैतिक रूप से उन्नति कर सकता है।

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प्रश्न 6.
स्वतंत्रता की परिभाषा दें। इसके नकारात्मक एवं सकारात्मक पहलुओं के अंतर की व्याख्या कीजिए। (Define liberty Discuss the difference between negative and positive aspects of liberty)
उत्तर:
स्वतंत्रता शब्द जिसे अंग्रेजी में Liberty कहते हैं, लैटिन भाषा के शब्द लिबर (Liber) से लिया गया है। जिसका अर्थ है किसी प्रकार के बंधनों का न होना। इस प्रकार स्वतंत्रता का अर्थ है – व्यक्ति के ऊपर किसी प्रकार का बंधन न होना जिससे कि वह अपनी इच्छानुसार कार्य कर सके, परंतु यह उचित नहीं है कि यदि एक जेबकतरे को जेब काटने की पूर्ण स्वतंत्रता दे दी जाए या एक डाकू को नागरिकों को लूटने के लिए स्वतंत्रता दे दी जाए तो समाज में कुव्यवस्था फैल जाएगी। वास्तव में स्वतंत्रता का वास्तविक एंव औचित्यपूर्ण अर्थ यह है कि व्यक्ति को उस सीमा तक कार्य करने की स्वतंत्रता हो जिससे अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता का अतिक्रमण न हो, इसके साथ ही सभी व्यक्तियों को विकास के समान अवसर प्राप्त हों।

गैटेल (Géttel) का कथन है कि “स्वतंत्रता वह सकारात्मक शक्ति है जिसके द्वारा उन कार्यों को करके आनंद प्राप्त किया जाता है, जो करने योग्य है।” (“’Liberty is the positive power of doing and enjoining those things which are worthy of enjoyment and work.”)। स्वतंत्रता के नकारात्मक तथा सकारात्मक पहलुओं में अंतर (Difference between Negative and positive aspects of Liberty)
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प्रश्न 7.
आर्थिक स्वतंत्रता एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। (Discuss the relations between Economic Liberty and Political Liberty)
उत्तर:
राजनीतिक स्वतंत्रता तथा आर्थिक स्वतंत्रता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक कि उसे आर्थिक स्वतंत्रता का ठोस आधार नहीं मिलता। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ है नागरिकों को राज्य के कार्यों में भाग लेने का अवसर प्राप्त होना। राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग है कि नागरिक शासन कार्यों में सहयोग करें तथा सहभागी बनें तथा राजनीतिक गतिविधियों में अपना योगदान दें। परंतु राजनीतिक स्वतंत्रता उस समय तक अर्थहीन है जब तक कि नागरिक को आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिलती।

कोई भी नागरिक आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना राज्य की राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले सकता। वह अपने मत का प्रयोग भी उचित प्रकार से नहीं कर सकता। लालच में पड़कर भूखा व्यक्ति अपना मत बेच सकता है और इस प्रकार स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। धनी व्यक्ति लालच देकर निर्धन व्यक्तियों के मत अपने पक्ष में प्राप्त करके सत्ता पर अधिकार कर लेते हैं और फिर प्रजा का शोषण करते रहते हैं। धीरे-धीरे क्रांति की सम्भावना बढ़ने लगती है।

1917 ई. में रूस की क्रांति इन्हीं कारणों से हुई थी। आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ है-व्यक्ति की बेरोजगारी तथा भूख से मुक्ति। प्रो. लास्की ने आर्थिक स्वतंत्रता की परिभाषा देते हुए कहा है “आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि व्यक्ति को अपनी जीविका कमाने के लिए समुचित सुरक्षा तथा सुविधा प्राप्त हो।” आर्थिक स्वतंत्रता कसी भी स्वतंत्र समाज का मूल आधार है। आर्थिक स्वतंत्रता में यह बात भी निहित है कि जहाँ व्यक्ति अपनी रोजी-रोटी कमा सके, वहाँ वह अपने बच्चों को भी साक्षर बना सके जिससे कि वे राष्ट्र के प्रति अपने नागरिक कर्तव्यों की पूर्ति कर सकें।

आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर ही व्यक्ति राजनीतिक स्वतंत्रता का उपयोग कर सकता है। जो व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं के लिए दूसरों की दया पर निर्भर है वह कभी भी नागरिकता के कर्तव्यों को पूरा नहीं कर सकता। आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में व्यक्ति समाज में अपना श्रेष्ठ योगदान नहीं कर सकता।

राज्य में भले ही किसी भी प्रकार की व्यवस्था हो किसान व मजदूर को आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए। देश में बेरोजगारी नहीं होनी चाहिए। संसार में आर्थिक दृष्टि से विकसित राज्यों में जहाँ पूँजीवादी व्यवस्था अपनायी गयी है, नागरिकों को आर्थिक स्वतंत्रता देने का प्रयत्न किया गया है। ऐसी राज्यों में मजदूर संगठित हैं और वे राष्ट्र की राजनीति में सक्रिय भाग लेते हैं। स्पष्ट है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन है जब तक उसे आर्थिक स्वतंत्रता का ठोस आधार नहीं मिलता।

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प्रश्न 8.
स्वतंत्रता का अर्थ समझाइए। क्या आप स्वतंत्रता और समानता को पूरक मानते हैं? (Explain the meaning of the term Liberty Do you think that Liberty and Equality are complementary?)
उत्तर:
स्वतंत्रता को अंग्रेजी में ‘बिलर्टी’ कहा जाता है। यह लैटिन भाषा के ‘लिबर’ शब्द से बना है। इसका अर्थ है बंधनों का न होना। परंतु स्वतंत्रता का यह अर्थ पूर्णतः उचित नहीं है। गाँधीजी के अनुसार, “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं अपितु व्यक्तित्व के विकास की अवस्थाओं की प्राप्ति है।” लास्की का कथन है कि “अधिकारों के अभाव में स्वतंत्रता का होना असंभव है, क्योंकि अधिकारों से रहित जनता कानून का पालन करती हुई भी अपने व्यक्तित्व की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकती।”

स्वतंत्रता और समानता (Liberty and Equality):
स्वतंत्रता और समानता में गहरा संबंध है। जब तक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती तब तक समानता भी स्थापित नहीं हो सकती। भारत जब पराधीन था तो शासक वर्ग के लोग अपने आपको भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे परंतु 15 अगस्त, 1947 ई. में भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गया। भारत का अपना संविधान बना और राजनीतिक तथा सामाजिक समानता की स्थापना की गई।

प्रत्येक वयस्क को जाति, नस्ल, रंग, धर्म, लिंग आदि के भेदभाव के बिना वोट का अधिकार दिया गया। छुआछूत समाप्त कर दी गई। आर. एच. टोनी ने सत्य ही कहा है कि “समानता स्वतंत्रता की विरोधी न होकर इसके लिए आवश्यक है।” वास्तव में स्वतंत्रता और समानता इकट्ठी चलती हैं। एक के बिना दूसरी निरर्थक है। प्रो. पोलार्ड के अनुसार-“स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक समाधान है और वह है समानता।”

स्वतंत्रता और समानता का सम्बन्ध जन्म से है। जब निरंकुशता और समानता के विरुद्ध मानव ने आवाज उठायी और क्रांतियाँ हुई तो स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों का जन्म हुआ। स्वतंत्रता और समानता दोनों का एक ही उद्देश्य है और वह है व्यक्ति के विकास के लिए सुविधाएँ प्रदान करना। अतः एक के बिना दूसरे का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के बिना समानता असंभव है और समानता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है। निष्कर्ष तौर पर कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक भूख से मरते हुए व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का क्या लाभ है ? वह स्वतंत्रता को न खा सकता है और न पी सकता है। यह कथन किसका है –
(क) हाब्स
(ख) लास्की
(ग) मिल
(घ) आर्शिवादम
उत्तर:
(क) हाब्स

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प्रश्न 2.
जहाँ कानून नहीं है वहाँ स्वतंत्रता नहीं है। यह किसने कहा था?
(क) ग्रीन
(ख) लॉक
(ग) हाब्स
(घ) मेकाइवर
उत्तर:
(ख) लॉक

प्रश्न 3.
लांग वाक टू फ्रीडम (स्वतंत्रता के लिए लंबी यात्रा)’ किसकी आत्म कथा है?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) दलाई लामा
(ग) नेल्सन मंडेला
(घ) मार्टिन लूथर किंग
उत्तर:
(ग) नेल्सन मंडेला

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन सकारात्मक स्वतंत्रता का पक्षधर था?
(क) मार्क्स
(ख) ग्रीन
(ग) बेंथम
(घ) जे. एस. मिल
उत्तर:
(ख) ग्रीन

प्रश्न 5.
‘स्वतंत्रता एवं समानता’ को किसने पूरक माना है?
(क) रूसो ने
(ख) लास्की ने
(ग) मेकाइवर ने
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) लास्की ने

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प्रश्न 6.
‘आर्थिक न्याय’ से क्या आशय है?
(क) वर्गीय आय का अंतराल कम करना
(ख) सभी की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति
(ग) उपरोक्त दोनों ही
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) उपरोक्त दोनों ही

प्रश्न 7.
टी. एच. ग्रीन किस प्रकार की स्वतंत्रता के पोषक हैं?
(क) नकारात्मक
(ख) सकारात्मक
(ग) आर्थिक
(घ) राजनीतिक
उत्तर:
(ख) सकारात्मक

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प्रश्न 8.
नकारात्मक स्वतंत्रता का अर्थ है?
(क) अराजकता
(ख) बंधनों का अभाव
(ग) लोगों के बीच भेदभाव
(घ) स्वच्छन्दता
उत्तर:
(ख) बंधनों का अभाव

प्रश्न 9.
सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक विचारक हैं:
(क) रूसो
(ख) ग्रीन
(ग) हीगल
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

Bihar Board Class 11 Political Science राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
राजनीतिक सिद्धांत के बारे में नीचे लिखे कौन-से कथन सही हैं और कौन-से गलत?
(क) राजनीतिक सिद्धांत उन विचारों पर चर्चा करता है जिनके आधार पर राजनीतिक संस्थाएं बनती हैं।
(ख) राजनीतिक सिद्धांत विभिन्न धर्मों के अन्तर्सम्बन्धों की व्याख्या करता है।
(ग) यह समानता और स्वतंत्रता जैसी अवधारणाओं के अर्थ की व्याख्या करता है।
(घ) यह राजनीतिक दलों के प्रदर्शन की भविष्यवाणी करता है।
उत्तर:
(अ) सत्य
(ब) असत्य
(स) सत्य
(द) असत्य

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प्रश्न 2.
‘राजनीति उन सबसे बढ़कर है, जो राजनेता करते हैं।’ क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
राजनीति में मानव स्वभाव की गहरी पैठ है। व्यक्ति मौलिक रूप से एक स्वार्थी जीव है जो हमेशा प्रतियोगिता में या छिपे रूप में होता है। राजनीति दूसरों के व्यवहार के प्रबंधन की कला है जो उस पर लादा जाता है या निर्देशित किया जाता है। राजनीति प्रभाव की एक कला है और यह अधिकृत स्थिति प्राप्त करने की विधि है। यह निश्चित रूप से राजनीतिज्ञ के उस कार्य से सम्बन्धित नहीं है जो वह करता है या वह विभिन्न कार्यों में निर्णय लेता है।

वस्तुतः राजनीति उससे कहीं अधिक है। राजनीति किसी भी समाज का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग है। राजनीति सरकार के अच्छे मार्गों का एक प्रयास है। महात्मा गाँधी ने एक बार अवलोकन किया कि राजनीति हमें सर्प की कुण्डली के समान ढंकता, है और बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं देता परंतु यह एक संघर्ष है। राजनीति का प्रयोग समूह, समाज और राजनीतिक संगठन के कुछ रूपों में सामूहिक निर्णय निर्माण के लिए होता है। राजनीतिक बातचीत में सामूहिक निर्णय पर इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीति एक विस्तृत संकल्पना है जिसका क्षेत्र विस्तृत है।

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प्रश्न 3.
लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए नागरिकों का जागरूक होना जरूरी है। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
लोकतंत्र को लोगों की सरकार कहा जाता है। यह कहा जाता है कि सरकार की लोकतंत्रीय प्रणाली में वास्तविक शक्ति जनता के पास होती है। यह एक अत्यधिक उत्तरदायी और उत्तरदायित्व पूर्ण सरकार होती है। यह विभिन्न मुद्दों पर विभिन्न स्तरों पर बातचीत और वाद-विवाद पर आधारित होती है। लोकतंत्र का उद्देश्य जनता हेतु महत्वपूर्ण मूल्यों जैसे-समानता, न्याय, स्वतंत्रता इत्यादि को प्राप्त करना होता है। लोकतंत्र में लोगों का महत्व दिया जाता है और समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य भाईचारा भी स्थापित करना होता है।

लोकतंत्र की सफलता के लिए कुछ पूर्व आवश्यकताएँ जरूरी हैं जिनमें सतर्क नागरिक होना अति आवश्यक है। यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति और कर्तव्यों के प्रति चैतन्य नहीं हैं। यदि वे यह नहीं जानता है कि सरकार क्या करने जा रही है और सरकार की नीति क्या है? यदि वे प्रशासन और विधान पर प्रतिरोध या रुकावट नहीं डालते, वे घमंडी हो जाएंगे और अपनी स्थिति और अधिकारों का दुरुपयोग करेंगे। ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता और अधिकार प्रभावित होंगे और प्रजातंत्र के सम्मान में भी गिरावट आयगी।

इसीलिए लोगों को विभिन्न स्तरों पर जातीय वाद-विवाद और भाषण के आधार पर स्वस्थ जनमत बनाना चाहिए। इसके लिए लोगों में निम्नलिखित गुण होना चाहिए –

  1. उनमें उच्च स्तर की साक्षरता होनी चाहिए।
  2. लोगों में आर्थिक और सामाजिक समानता होनी चाहिए।
  3. लोगों में पर्याप्त रोजगार होना चाहिए।
  4. लोगों को जाति, भाषा और धर्म के ऊपर उठना चाहिए जिससे लोगों में भाई-चारे का दृष्टिकोण विकसित हो। यदि समाज में योग्यता का अभाव होगा तो प्रजातंत्र केवल एक भीड़ के रूप में होगा और सरकार पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं कायम हो पायगा।
  5. चैतन्य नागरिक का तात्पर्य उत्तरदायी और जागरूक नागरिक से है जो सरकार के कार्यों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग ले सकता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

प्रश्न 4.
राजनीतिक सिद्धांत का अध्ययन हमारे लिए किन रूपों में उपयोगी है? ऐसे चार तरीकों की पहचान करें जिनमें राजनीतिक सिद्धांत हमारे लिए उपयोगी हों।
उत्तर:
प्रत्येक विषय का अपना सिद्धांत होता है। वस्तुतः कोई विषय भी विषय सिद्धांतों के बगैर हो ही नहीं सकता। जब एक परिकल्पना तथ्यों से समर्थित होती है, तो यह सिद्धांत बन जाता है। सिद्धांत एक सामान्यीकरण है जो सम्पूर्ण स्थिति की व्याख्या करता है। यह एक तथ्यात्मक कथन है। यदि विज्ञान (शारीरिक विज्ञान) है या सामाजिक विज्ञान, सभी विषयों के सिद्धांत होते हैं। हमने डार्विन सिद्धांत, न्यूटन नियम और आर्किमिडीज के सिद्धांत के विषय में सुना है। ये सभी सिद्धांत नये नियमों, सिद्धांतों और कानूनों के प्रेरणा-स्रोत हैं।

उसी प्रकार सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, नागरिक प्रशासन आदि के सभी शाखाओं में सिद्धांतों की उपयोग की बात है उसे निम्नलिखित उपयोगी बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है –

  1. राजनीतिक सिद्धांत समाज को राजनीतिक दिशा प्रदान करता है।
  2. राजनीतिक सिद्धांत सामान्यीकरण, साधन और अवधारणा प्रदान करता है जो समाज में प्रभावी प्रवृत्तियों को समझने में सहायता करता है।
  3. राजनीतिक सिद्धांत आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा का कार्य करता है।
  4. राजनीतिक सिद्धांत समाज को बदलता है।
  5. राजनीतिक सिद्धांत समाज को गतिशील और आंदोलनकारी बनाता है।
  6. ये सिद्धांत समाज में सुधार लाते हैं।
  7. राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विचार और संस्थाओं के मौलिक ज्ञान को प्राप्त करने में सहायता करते हैं जो समाज को एक विशेष आकार देते हैं जिसमें हम रहते हैं।
  8. राजनीतिक सिद्धांत समाज को निरंतर बनाये रखते हैं।

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प्रश्न 5.
क्या एक अच्छा या प्रभावपूर्ण तर्क औरों को आपकी बात सुनने के लिए बाध्य कर सकता है?
उत्तर:
सिद्धांत तथ्यों और हेतुवाद (Rationalism) को बताता है। सिद्धांत तार्किक वाद-विवाद और भाषण पर आधारित होता है। सिद्धांत व्यक्ति के उचित सामर्थ्य और मानव व्यवहार में निहित होता है। यह बहुत हद तक सही है कि अतार्किक कथन दूसरों के लिए अनुसरण योग्य नहीं होते। यह केवल तार्किक और विवेकी तर्क ही हैं जो दूसरों के लिए अनुसरण योग्य होते हैं। राजनीतिक सिद्धांत उन प्रश्नों का परीक्षण करता है जो समाज से सम्बन्धित और व्यवस्थित होते हैं।

ये विचार मूल्यों के विषय में होते हैं जो राजनैतिक जीवन और मूल्यों को वैसे और महत्व और सम्बन्धित संकल्पना की व्याख्या करते हैं। ऊँचे स्तर पर यह उन वर्तमान संस्थाओं को देखता है जो पर्याप्त है और वे किस प्रकार अस्तित्व में हैं। वह नीति कार्यान्वयन को भी देखता है ताकि वे लोकतांत्रिक और सही रूप में परिवर्तित हो। राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नों और राजनीतिक घटनाओं का मूल्यांकन करने में विवेकयुक्त विचार करने में पशिक्षित करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

प्रश्न 6.
क्या राजनीतिक सिद्धांत पढ़ना, गणित पढ़ने के समान है? अपने उत्तर के पक्ष में कारण दीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक सिद्धांतों का अध्ययन निश्चित रूप से केवल कुछ पहलुओं में गणित अध्ययन के समान है। यह पूर्ण रूप से समान नहीं है। राजनीतिक सिद्धांत एक तथ्यात्मक कथन है जो कुछ तथ्यों पर आधारित होते हैं। उनमें सूत्रीय औचित्य होता है। तथ्य अंकों के समान गणितीय नहीं होते। राजनीतिक सिद्धांत परिकल्पना करता है। यह एक तार्किक और विवेकी है। यह गुण समस्याओं और गणितीय समीकरणों में दिखाई देता है। हम कह सकते हैं कि राजनीतिक सिद्धांत गुणात्मक तथ्यों के गणित के निकट है और मात्रात्मक की अपेक्षा विवेकयुक्त है। विधि की दृष्टि से भी राजनीतिक सिद्धांत और गणित में निकटता दिखाई देती है।

Bihar Board Class 11 Political Science राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (What is the meaning of the term Politics)
उत्तर:
प्राचीन काल में राज्य के क्रियात्मक रूप के लिए ‘राजनीति’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। अरस्तू के ग्रन्थ का नाम भी ‘राजनीति’ (Politics) था। पालिटिक्स शब्द की उत्पति यूनानी शब्द के पोलिस (Polis) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ नगर-राज्य (City-State) होता है। राजनीति के अन्तर्गत राज्य सरकार, अन्य राजनीतिक संगठनों और उनकी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

आधुनिक विद्वान-जेलिनिक, होल्जन बर्क, सिजविक, ट्रीटरके आदि भी राजनीति के अन्तर्गत राज्य और सरकार से सम्बद्ध बातों का अध्ययन मानते हैं। फ्रेडरिक पोलक इसे सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक राजनीति में बाँटते हैं। सैद्धान्तिक राजनीति राज्य, सरकार तथा विधान से सम्बन्धित मूल सिद्धांत तथा व्यावहारिक राजनीति राज्य के कार्य, कानून का स्वरूप, व्यक्ति तथा राज्य के सम्बन्धों आदि का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 2.
राजनीतिक सिद्धांत का आशय स्पष्ट कीजिए। (Clarify the meanings of Political theory)
उत्तर:
कुछ विद्वानों ने ‘राजनीतिशास्त्र’ अथवा ‘राजनीतिक दर्शन’ के लिये राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग किया किन्तु आशीर्वाद जैसे विद्वानों ने दोनों की विषय वस्तु को एक नहीं माना है। आशीर्वाद के विचार में ‘राजनीतिक सिद्धांत’ शब्द का प्रयोग ‘राजनीतिक दर्शन’ की अपेक्षा अधिक उचित है। ‘राजनीतिक दर्शन’ अनिश्चितता, अस्पष्टता तथा काल्पनिक पक्ष का द्योतक है, जबकि राजनीतिक सिद्धांत शब्द अधिक स्पष्ट, अधिक निश्चित और अधिक नियोजित है।

किन्तु वर्तमान काल में राज्य-विषयक ज्ञान के लिये राजनीतिक सिद्धांत का प्रयोग उचित और तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि, “राजनीतिक सिद्धांत’ सरकार और शासन कला से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। ‘राजनीतिक सिद्धांत’ का सम्बन्ध राज्य के मौलिक सिद्धांतों तथा उसके भूत और वर्तमान तक सीमित है। इसका राज्य के भावी स्वरूप तथा कार्यक्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान एक विज्ञान है। इस सम्बन्ध में तथ्य प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को अनेक विद्वानों ने निम्न तथ्यों के आधार पर एक विज्ञान माना है –

  1. प्रयोगात्मक विधि द्वारा राजनीतिशास्त्र का अध्ययन सम्भव है।
  2. विज्ञान की तरह राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी की जा सकती है।
  3. राज्य रूपी प्रयोगशाला में राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत परीक्षण एवं पर्यवेक्षण कर एक निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता है।
  4. राजनीति विज्ञान में भी कार्य कारण-प्रभाव सम्बन्ध देखा जा सकता है।

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प्रश्न 4.
राजनीति विज्ञान एक विज्ञान नहीं है। तर्क दीजिए। (Political Science is not a science. Give reason)
उत्तर:
निम्न तथ्यों के आधार पर राजनीति विज्ञान को विज्ञान नहीं माना जाता है।

  1. इसमें वैज्ञानिक विधियों का अभाव है।
  2. कार्य-कारण सम्बन्ध का अभाव है।
  3. इसके अन्तर्गत सही भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है।
  4. इसमें शुद्ध एवं शाश्वत निष्कर्ष का अभाव है।
  5. इसमें सार्वभौम रूप से मान्य नियमों का अभाव है।
  6. प्रयोगशालाओं का अभाव।
  7. राजनीति विज्ञान का आधार अनिश्चित तथा विचारों में एकता का अभाव है।
  8. इसमें अचूक माप का अभाव है।
  9. इसमें वस्तुपरक अध्ययन की कमी है।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान किसे कहते हैं? (What is Political Science?) अथवा, राजनीति विज्ञान से आप क्या समझते हैं? (What do you know about Political Science?)
उत्तर:
विश्व के बहुत से. दार्शनिकों ने राजनीति विज्ञान को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है। प्रो. गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का अध्ययन राज्य के साथ आरम्भ होता है और राज्य के साथ समाप्त होता है।” प्रो. सीले के अनुसार, “जिस तरह अर्थशास्त्र धन का, जीव-शास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का तथा रेखागणित स्थान और दूरी का अध्ययन करता है, उसी प्रकार राजनीति विज्ञान ‘शासन’ के बारे में छानबीन करता है।”

प्रो. गेटेल के अनुसार, “जिन विषयों में राजनीति विज्ञान की सर्वाधिक दिलचस्पी है वे हैं-राज्य, सरकार और कानून।” इन परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान, राज्य, सरकार, व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार तथा राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन है। इसमें राज्य के भूत, वर्तमान और भविष्य के हर पहलू का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 6.
राजनीति विज्ञान ‘पोलिस’ शब्द से किस प्रकार सम्बन्धित है? (How is Political Science related with the word ‘Polis’?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को अंग्रेजी भाषा में Political Science कहा जाता है। अरस्तू ने इसे Politics का नाम दिया है। पोलिटिक्स (Politics) शब्द यूनानी भाषा के ‘पोलिस’ (Polis) से बना है जिसका अर्थ है ‘नगर राज्य’ (City State)। प्राचीन काल में छोटे-छोटे नगर राज्य हुआ करते थे परंतु अब विशाल राज्यों का युग है। अत: राजनीति विज्ञान वह विषय है जो राज्यों के बारे में अध्ययन करता है।

प्रश्न 7.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के दो महत्व बताइए। (Write two significance of study of Political Science)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के दो महत्व निम्नलिखित हैं –

  1. राजनीति विज्ञान देश के नागरिकों को उनके अधिकारों व कर्तव्यों का ज्ञान कराता है।
  2. राजनीति विज्ञान का अध्ययन लोकतंत्र की सफलता के लिए भी. आवश्यक माना जाता है। नागरिकों को राजनीति विज्ञान से राजनीतिक शिक्षा मिलती है। नागरिकों को यह पता चलता है कि इन्हें अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कैसे करना चाहिए तथा उनके प्रतिनिधि कैसे होने चाहिए।

प्रश्न 8.
राजनीति विज्ञान में मुख्यतः किन बातों का अध्ययन किया जाता है? (What is the main subject matter of Political Science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान में मुख्यतः जिन बातों का अध्ययन किया जाता है उनमें से अधिकांश निम्नलिखित हैं –

  1. राज्य का अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन।
  2. सरकार और उसके विभिन्न रूपों का अध्ययन।
  3. मानव के राजनीतिक आचरण का अध्ययन।
  4. विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन।

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प्रश्न 9.
राजनीति विज्ञान को सर्वव्यापी विज्ञान किसने तथा क्यों कहा? (Why has called Political Science. “A Master Science” and why?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को कुछ विद्वान विज्ञान मानते हैं और कुछ अन्य विद्वान इस विषय को कला मानते हैं। अरस्तु यूनान का एक बड़ा दार्शनिक था। उसके अनुसार राजनीति विज्ञान न केवल विज्ञान है बल्कि यह अन्य विज्ञानों से ऊपर भी है। अरस्तू के विचार में इसे इसलिए सर्वव्यापी विज्ञान (Master Science) कहना आवश्यक है क्योंकि यह मानव की सभी क्रियाओं और पहलुओं का अध्ययन करता है। उसके अनुसार राजनीति विज्ञान के क्षेत्रों में केवल राजनीतिक संस्थाएँ ही नहीं आतीं बल्कि सामाजिक संस्थाएं भी आती हैं।

प्रश्न 10.
राजनीति क्या है? (What is Politics?)
उत्तर:
राजनीति (Politics) शब्द यूनानी भाषा के शब्द (Polis) से बना है जिसका अर्थ नगर राज्य (City State) है। प्राचीन काल में नगर राज्य हुआ करते थे। अतः राजनीति का अर्थ राज्य संबंधी समस्याओं से ही माना जाता था, परंतु आधुनिक धारणा यह है कि राजनीति एक व्यापक सामाजिक प्रक्रिया है। इसके अन्तर्गत राजनीतिक दल, दबाव, गुट, राजनीतिक संस्कृति, जनमत, मतदान आचरण सभी आ जाते हैं। कुछ आधुनिक लेखकों ने राजनीतिक को ‘शक्ति के लिए सघर्ष’ कहा है। कुछ अन्य लेखक राजनीति को मूल्यों के अधिकारिक आबंटन से संबंधित करते हैं।

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प्रश्न 11.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के क्या लाभ हैं? (What are the advantage of studying Political science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के प्रमुख लाभ –

  1. राजनीति विज्ञान के अध्ययन से हमें राज्य और सरकार के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।
  2. नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान होता है।
  3. विभिन्न समुदायों के संगठनं कार्य तथा उद्देश्यों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  4. लोकतंत्र की सफलता विज्ञान के अध्ययन पर निर्भर है।
  5. राजनीतिक चेतना जागृत होती है।
  6. मानव के दृष्टिकोण को उदार बनाता है।
  7. जन कल्याण सम्बन्धी नीति बनाने में सहायक होता है।
  8. व्यक्ति में नैतिक गुणों का विकास करता है। उसे एक आदर्श नागरिक बनाता है।

प्रश्न 12.
राजनीति और राजनीति विज्ञान में क्या अंतर है? (What is the distinction between Politics and Political Science?)
उत्तर:
राजनीति और राजनीति विज्ञान में अंतर (Distinction between Politics and Political Science):
प्राचीन काल में राजनीति शास्त्र को राजनीति ही कहा जाता था। अरस्तू ने अपनी पुस्तक का नाम ‘Politics’ ही रखा था, परंतु आजकल इन दोनों में भेद किया जाता है। ‘Politics’ (राजनीति) शब्द ग्रीक भाषा के Polis से बना है जिसका अर्थ नगर राज्य है। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे नगर राज्य थे, परंतु अब बड़े-बड़े राज्य बन गए हैं। आजकल राजनीति शब्द का अर्थ उन राजनीतिक समस्याओं से लगाया जाता है जो कि किसी ग्राम, नगर, प्रान्त, देश अथवा विश्व की समस्याएँ हैं।

राजनीति दो प्रकार की होती हैं-सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक। राजनीतिक विज्ञान, राजनीति से प्राचीन है। राजनीति विज्ञान का उद्देश्य आदर्श राज्य, आदर्श नागरिक तथा आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है जबकि राजनीति का उद्देश्य किसी भी प्रकार सत्ता प्राप्त करने से है। राजनीति का अर्थ ही सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष है जबकि राजनीति शास्त्र सहयोग, सौहार्द्र, सहिष्णुता, प्रेम तथा त्याग की भावना सिखाता है। राजनीति विज्ञान निश्चित आदर्शों पर आधारित है जबकि राजनीति स्वार्थ व अवसरवादिता पर आधारित है।

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प्रश्न 13.
“राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है।” व्याख्या कीजिए। (“Politics is the struggle for power.” Explain)
उत्तर:
कई आधुनिक लेखकों ने राजनीति को ‘शक्ति के लिए संघर्ष’ के रूप में देखा है। वेल और केपलेन (Lasswel and Kaplan) के शब्दों में, “राजनीतिक विज्ञान शक्ति को सँवारने और उसका मिल-बाँटकर प्रयोग करने का अध्ययन है।” राबर्ट डैल (Robert Dahl) का कहना है “राजनीति में शक्ति और प्रभाव का अध्ययन शामिल है।” (Politics involves power and influence) लोग दूसरों पर शासन करना चाहते हैं। ये सत्ता के भूखे होते हैं और शक्ति के लिए संघर्ष करते हैं। राजनीतिक दलों, दबाव गुटों और अन्य संगठित समुदायों के बीच सत्ता या सुविधाओं के लिए संघर्ष चलता रहता है। अत: यह ठीक ही कहा गया है कि राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है।

प्रश्न 14.
राजनीति विज्ञान की इतिहास को क्या देन है? (What is the contribution of Political Science to History?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान की इतिहास को देन (Contribution of Political Science to History):

  1. राजनीति विज्ञान इतिहास को सरस बनाता है।
  2. राजनीति विज्ञान इतिहास को नयी दिशा प्रदान करता है, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना न होती तो भारत का इतिहास कुछ और ही होता।
  3. राजनीतिक विचारधाराएँ ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती है। रूसो और मांटेस्क्यू के विचारों ने फ्रांस को जन्म दिया।
  4. “राजनीति विज्ञान ही वह शास्त्र है जो स्वर्ण कणों के रूप में इतिहास रूपी नदी की रेत में संगृहीत किया जाता है।”

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प्रश्न 15.
राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को क्या देन है? (What is the contribution of Political Science to Economics?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Economics):
राजनीति विज्ञान का उद्देश्य नागरिकों को उन्नति व विकास द्वारा जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना है। राजनीतिक विचारधाराओं का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। “जैसे प्रजातंत्र की विचारधारा आर्थिक न्याय पर बल देती है। राजनीतिक संगठनों का भी देश की अर्थशास्त्र पर प्रभाव पड़ता है। यदि सत्ता दल में एकता और अनुशासन है तो वहाँ की आर्थिक नीतियाँ उचित और स्थायी होंगी। सरकारी नीतियाँ, आयात-निर्यात, बैंक नीति, विनिमय दर, सीमा शुल्क आदि नीतियों का भी अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 16.
“राजनीति विज्ञान और इतिहास परस्पर सहायक और पूरक हैं।” स्पष्ट करो। (“Political Science and History are matually contributory and complementary.” Explain)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान और इतिहास का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। दोनों को एक दूसरे से अलग करना बहुत कठिन है। सीले का कथन है कि, “राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास का कोई फल नहीं; इतिहास के बिना राजनीति विज्ञान का कोई मूल्य नहीं।” राजनीति विज्ञान इतिहास पर निर्भर है। सभी राजनीति संस्थाएँ विकास का परिणाम होती हैं।

उन्हें समझने के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है। इतिहास राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला है। ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर वर्तमान राजनीतिक जीवन में सुधार करने हेतु भविष्य के लिए मार्ग निश्चित किया जा सकता है। दूसरी ओर राजनीति विज्ञान भी इतिहास को अध्ययन सामग्री प्रदान करता है। ऐतिहासिक घटनाएँ राजनीतिक विचारधाराओं का परिणाम होती हैं। निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि राजनीति विज्ञान और इतिहास परस्पर सहायक और पूरक हैं।

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प्रश्न 17.
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति के किन्हीं दो विषयों का नाम बताओ। (Mention the name of any two subjects of Political Science according to Modern Approach)
उत्तर:
आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान के मुख्य विषय निम्नलिखित हैं –

  1. सत्ता तथा शक्ति का अध्ययन
  2. मूल्यों की सत्तावादी व्यवस्था का अध्ययन

प्रश्न 18.
परम्परागत दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान के अध्ययन के कोई दो विषय बताओ। ( Mention any two subject of Political Science according to traditional view)
उत्तर:
परम्परागत दृष्टिकोण के अध्ययन के अनुसार राजनीति विज्ञान के अध्ययन में निम्नलिखित विषयों को मुख्यरूप से शामिल किया जाता है:

  1. राजनीति शास्त्र का अध्ययन (Study of Political Science) है। इसमें राज्य के भूत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है।
  2. सरकार का अध्ययन (Study of Government): राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत सरकार का अध्ययन किया जाता है। सरकार राज्य का आवश्यक अंग है। सरकार का संगठन सरकार के अंग तथा विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियों का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 19.
राजनीति की परिभाषा दीजिए। (Define politics)
उत्तर:
सामान्य राजनीति से आशय ‘निर्णय लेने की प्रक्रिया’ है। यह प्रक्रिया सार्वभौमिक है। जीन ब्लान्डल के अनुसार “राजनीति एक सार्वभौमिक क्रिया है।” हरबर्ट जे. स्पेंसर के अनुसार “राजनीति वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानव समाज अपनी समस्याओं का समाधान करता है।”

प्रश्न 20.
घरेलू मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप को उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए। (Clarify with example the political interference in internal affairs)
उत्तर:
राजनीति का घरेलू मामलों में हस्तक्षेप 10वीं सदी के उत्तरार्द्ध में प्रारंभ हुआ। महिलाओं का शोषण रोकने के लिए भारत में भी अन्य देशों के समान घरेलू हिंसारोधक अधिनियम बनाकर उन्हें घरेलू हिंसा से निदान के क्षेत्र में पहल हुई।

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प्रश्न 21.
क्या राजनीतिक विवादों को तर्कों द्वारा सुलझाया जा सकता है? (Does the solution of Political conflicts is settled by arguments?)
उत्तर:
राजनीतिक तर्कों का एकमात्र उद्देश्य अपनी बात को मनवाना होता है और इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए मनुष्य अनेक तरीकों को अपना सकता है, जैसे-विज्ञापन अथवा प्रचार-प्रसार द्वारा। इराक पर आक्रमण के अपने तर्क को सही ठहराने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका ने विज्ञापन तथा प्रचार, दोनों तरीकों का सहारा लिया था।

ऐसे समय राजनीतिक विवाद उन तक ही सीमित रह जाते हैं जिनका प्रदर्शन अच्छे तरीके से किया जाता है चाहे वह तर्क गलत ही क्यों न हों। प्रचार के माध्यमों से राजनीतिक उद्देश्यों को जनता के सामने तोड़-मरोड़ कर तथ्यों के द्वारा रखा जाता है और अपने मनमाने निष्कर्षों को लोगों के ऊपर थोप दिया जाता है। यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विचारक यह म ते हैं कि राजनीतिक विवादों को तर्कों के माध्यम से ठीक ढंग से नहीं सुलझाया जा सकता है।

प्रश्न 22.
सिद्धांत किसे कहते हैं? (What is theroy?)
उत्तर:
सिद्धांत अंग्रेजी शब्द (Theory) का हिन्दी रूपांतर है और Theory यूनानी शब्द ‘थ्योरिया’ (Thoria), थ्योरमा’ (Theorema) थ्योराइन’ (Theorein) नामक शब्द से लिया गया है। इसका अर्थ है “भावात्मक सोच-विचार” (Sentimental Thinking)। एक ऐसी मानसिक दृष्टि जो कि एक वस्तु के अस्तित्व और उसके कारणों को प्रकट करती है। ओनोल्ड बेश्ट के अनुसार सिद्धांत के अन्तर्गत “किसी भी विषय के संबंध में एक लेखक की पूरी की पूरी सोच या समझ शामिल रहती है। इसमें तथ्यों का वर्णन विश्लेषण व व्याख्या सहित उसका इतिहास के प्रति दृष्टिकोण, उसकी मान्यताएँ और वे लक्ष्य शामिल हैं जिनके लिए किसी भी सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है। पॉपर के अनुसार: “सिद्धांत मानसिक आँखों में रेखांकित, अनुभाविक व्यवस्था का विकल्प है।”

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प्रश्न 23.
राजनीतिक सिद्धांत की परिभाषा दीजिए। (Give the difinition of political theory)
उत्तर:
जार्ज कैटलिन के अनुसार, राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक दर्शन तथा राजनीति विज्ञान दोनों सम्मिलित हैं। डेविड हैल्ड के अनुसार “राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक जीवन से संबंधित अवधारणाओं और व्यापक अनुमानों का एक ऐसा ताना-बाना है जिसमें शासन, राज्य और समाज की प्रकृति व लक्ष्यों और मनुष्यों की राजनीतिक क्षमताओं का विवरण शामिल है।”

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करें। (Explain relations between Political Science and Economics)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान और तर्कशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन समय से ही इन दोनों शास्त्रों को एक ही शास्त्र के दो अंगों के रूप में माना जाता रहा है। राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के घनिष्ठ संबंधों के बारे में विभिन्न विद्वानों के विचार निम्नलिखित हैं –
प्रो. गार्नर के अनुसार, “वर्तमान काल में राजनीति के ज्वलन्त प्रश्न मूल रूप में अर्थशास्त्र के भी प्रश्न हैं। वास्तव में प्रशासन के सम्पूर्ण सैद्धान्तिक पक्ष का स्वरूप अधिकांशतः आर्थिक है। मार्क्स ने तो यहाँ तक कहा है कि, “किसी युग के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के स्वरूप का निश्चिय आर्थिक परिस्थितियाँ ही करती है।” बिस्मार्क का कथन था कि, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं वरन् व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।”

राजनीति विज्ञान की अर्थशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Economics):
राजनैतिक विचारधाराओं का आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक संगठन का भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो उस देश के लोगों की आर्थिक दशा अच्छी होगी। अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science) अर्थशास्त्र को धन का विज्ञान कहते हैं। अर्थशास्त्र में धन के उत्पादन, विनिमय, वितरण तथा उपभोग में लगे व्यक्ति के सामाजिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह मानव आवश्यकताओं और उनकी संतुष्टि का विज्ञान है। जब तक व्यक्ति की आर्थिक दशा अच्छी नहीं होगी, वह अच्छा नागरिक नहीं बन सकता। अतः अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में गहरा सम्बन्ध है।

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प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र क्या है? (What is the scope of Political Science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का क्षेत्र (Scope of Political Science):
राजनीति विज्ञान का विषय क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। राजनीति विज्ञान में मुख्यतः निम्नलिखित तथ्यों का अध्ययन होता है:

1. राज्य का अध्ययन (Study of State):
राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य के भूत वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का आरंभ और अन्त राज्य के साथ होता है।” गिलक्राइस्ट ने भी कहा है; “राज्य क्या है, क्या रहा है और क्या होना चाहिए का अध्ययन राजनीति विज्ञान का विषय है।”

2. सरकार का अध्ययन (Study of Govemment):
सरकार राज्य का एक अनिवार्य तत्व है। सरकार के विभिन्न रूप सरकार के अंग तथा सरकार का संगठन आदि का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में किया जाता है।

3. मानव व्यवहार का अध्ययन (Study of Human Behaviour):
राज्य का व्यक्ति के साथ अटूट संबंध है। व्यक्ति और राज्य का क्या सम्बन्ध है? व्यक्ति को कौन-कौन से अधिकार मिलने चाहिए और कौन-कौन से कर्त्तव्य करने चाहिए? व्यक्ति का राजनैतिक आचरण। क्या है ? इन सब बातों का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में किया जाता है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का अध्ययन (Study of International relations):
राजनीति विज्ञान में अन्तर्राष्ट्रीय कानून, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, संयुक्त राष्ट्र संघ आदि का भी अध्ययन किया जाता है। उपरोक्त के अतिरिक्त राजनीति विज्ञान शक्ति का भी अध्ययन है। इसमें नीति निर्माण प्रक्रिया भी अध्ययन की जाती है। इसमें शास्त्र संबंधी कार्य, मतदान, राजनैतिक दल एवं आम राजनीतिक संस्थाओं का भी अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान के परम्परागत तथा आधुनिक अर्थ बताएँ। (Give traditional and modern meaning of Political Science)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान के अंग्रेजी पर्याय (Political Science) की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है, जिसका अर्थ है (City State) अर्थात् नगर राज्य। प्राचीन काल में यूनान में छोटे-छोटे नगर राज्य होते थे। आज के युग में छोटे-छोटे नगर राज्यों का स्थान विशाल राज्यों ने ले लिया है। राज्य के इस विकसित और विस्तृत रूप से संबंधित विषय को राजनीति विज्ञान कहा जाने लगा। राजनीतिक विज्ञान की परिभाषाएँ विभिन्न विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रस्तुत की गई हैं –

1. राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन है –
ब्लंटशली के अनुसार, “राजनीतिक विज्ञान वह विज्ञान है, जिसका संबंध राज्य से है और जो यह समझने का प्रयत्न करता है कि राज्य के आधारभूत तत्व क्या हैं, उसका आवश्यक स्वरूप क्या है, उसकी किन विविध रूपों में अभिव्यक्ति होती है तथा उसका विकास कैसे हुआ?” प्रसिद्ध विद्वान डॉ. गार्नर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान विषय के अध्ययन का आरंभ और अन्त राज्य के साथ होता है।”

2. राजनीति विज्ञान ‘राज्य और सरकार’ दोनों का अध्ययन है:
पॉल जैनट के अनुसार, “राजनीति विज्ञान समाज का वह अंग है जिसमें राज्य के आधार और सरकार के सिद्धांतों पर विचार किया जाता है।” डिमॉक (Dimock) के अनुसार, “राजनीति विज्ञान का संबंध राज्य तथा उसके साधक सरकार से है।”

3. मानवीय तत्त्व-राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान का वह अंग है, जिसके अंतर्गत मानवीय जीवन के राजनीतिक पक्ष और जीवन के पक्ष से संबंधित राज्य, सरकार तथा अन्य संबंधित संगठनों का अध्ययन किया जाता है।

राजनीति विज्ञान की परिभाषा-आधुनिक दृष्टिकोण (Definition of Political Science A moderm approach):
परम्परागत रूप से राजनीति विज्ञान को व्यक्तियों के राजनीतिक क्रिया-कलापों तक ही सीमित समझा जाता था और जिसमें राज्य सरकार और अन्य राजनीतिक संस्थाओं को ही महत्वपूर्ण समझा जाता था। परंतु आधुनिक दृष्टिकोण अधिक व्यापक और यथार्थवादी हैं। इसमें अन्तः अनुशासनात्मक दृष्टिकोण (Inter-disciplinary approach) अपनाया गया है। इसमें राज्य को ही नहीं वरन् समाज को भी सम्मिलित किया गया है। आधुनिक लेखकों के द्वारा राजनीति विज्ञान को शक्ति, प्रभाव, सत्ता, नियंत्रण, निर्णय और मूल्यों का अध्ययन बताया गया है।

डेविट इस्टन के अनुसार, “राजनीति विज्ञान मूल्यों का सत्तात्मक आबंटन है।” (Political Science deals with the authoriative allocation of values) केटलिन ने राजनीति विज्ञान को शक्ति का विज्ञान (Science of Power) कहा है। पिनॉक और स्मिथ के अनुसार, “राजनीति विज्ञान किसी भी समाज में उन सभी शक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनात्मक ढाँचों से संबंधित होता है जिन्हें उस समाज में सुव्यवस्था की स्थापना, सदस्यों के सामूहिक कर्मों का सम्पादन तथा उनके मतभेदों का समाधान करने के लिए सर्वाधिक अन्तर्भावी (Inclusive) और अंतिम माना जाता है।” इस प्रकार राजनीति विज्ञान व्यक्ति के राजनीतिक व्यवहार को उसके समस्त सामाजिक जीवन के संदर्भ में ही ठीक प्रकार से समझने की कोशिश करता है।

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प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखो (Write short notes on:)
(क) शक्ति की अवधारणा (Concept of Power)
(ख) सामाजिक विज्ञान का परिप्रेक्ष्य (Social Science Perspective)
उत्तर:
(क) शक्ति की अवधारणा (Concept of Power):
शक्ति एक ऐसी अवधारणा है जो राज्य के लिए आवश्यक है। राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिये नागरिकों द्वारा कानूनों का पालन किए जाने की अपेक्षा रखी जाती है परंतु जो व्यक्ति ऐसा नहीं करते उन्हें शक्ति द्वारा बाध्य किया जाता है कि कानूनों का पालन करें।

(ख) सामाजिक विज्ञान का परिप्रेक्ष्य (Social Science Perspective):
इतिहास अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, राजनीति विज्ञान आदि अनेक विषय मानव सम्बन्धों का वर्णन करते हैं तथा वे परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। अतः विषयी दृष्टिकोण में ही मानव समस्याओं को उचित रूप से समझा जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों में इस प्रकार के दृष्टिकोण की आवश्यकता है। मानव समाज में पायी जाने वाली गरीबी की समस्या की कई दिशाएँ होती हैं। आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक और यहाँ तक की राजनीतिक सभी दृष्टिकोणों से समस्या का अध्ययन किया जा सकता है और तभी उसका निराकरण संभव है।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान के क्षेत्र की व्याख्या कीजिए। (Explain the scope of Political Science)
उत्तर:
प्रत्येक विषय का अपना क्षेत्र होता है जिसकी व्यापकता उस शासन की विषय वस्तु पर निर्भर करती है। गार्नर ने राजनीति विज्ञान के क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित किया है:

  1. राज्य की प्रकृति तथा उत्पत्ति का अनुसंधान।
  2. राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप, उनके इतिहास तथा विभिन्न रूपों की गवेषणा।
  3. इन दोनों आधार पर राजनीतिक विकास के नियोजन का यथासम्भव आकलन।

राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र की व्याख्या करते हुए गेटल (Gettell) ने कहा है “राजनीति विज्ञान को राज्य का विज्ञान कहा जाता है। यह संगठित राजनीतिक इकाइयों के रूप में मानवजाति का अध्ययन करता है। राज्य के जन्म की ऐतिहासिक व्याख्या भी इसके अन्तर्गत की जाती है। यह राज्य के विकास की व्याख्या भी करता है और वर्तमान समय के विशिष्ट शासन वाले राज्यों के विषय में भी चर्चा करता है।

“राजनीति विज्ञान एक सीमा तक राज्य के आदर्श स्वरूप तथा उसके सर्वोच्च लक्ष्य और शासन के उचित प्रकारों का भी अध्ययन करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अभिकरण UNESCO के संयोजन में हुए सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राजनीति के सिद्धांत, राजनीतिक संस्थाएं, राजनीतिक दल, दबाव समूह एवं लोकमत, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध आदि विषय सम्मिलित समझा जाना चाहिए।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 राजनीतिक सिद्धान्त : एक परिचय

प्रश्न 6.
राजनीतिशास्त्र का कला के रूप में विवेचना कीजिए। (Explain the Political Science as an Art)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान न केवल विज्ञान है, अपितु इसे कला भी कहा जा सकता है। यह कला की समस्त विशेषताओं को अपने में समाहित करता है और किसी भी सिद्धांत या सूत्र को व्यवहार में क्रियान्वित करने का प्रयास करता है। अब प्रश्न यह है कि कला क्या है? कला वह विद्या है जो किसी भी कार्य को अच्छी तरह करना सिखाती है और व्यावहारिक जीवन में विभिन्न सिद्धांतों का प्रयोग बताकर जीवन का आदर्श प्रस्तुत करती है अर्थात् कला मानव जीवन का सर्वांगीण चित्र तथा किसी ज्ञान का व्यावहारिक पहलू है। इस दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान भी एक कला है।

प्रोफेसर गैटल के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र की कला का उद्देश्य मनुष्य के क्रिया-कलापों से संबंधित उन सिद्धांतों तथा नियमों का निर्धारण करना है जिन पर चलना राजनीतिक संस्थाओं के कुशल संचालन के लिए आवश्यक है।” बकल (Buckle) राजनीति विज्ञान को कलाओं में पिछड़ी हुई कला मानते हुए यह स्वीकार करते हैं कि राजनीति विज्ञान एक कला है, “राजनीति विज्ञान से अधिक कला है। इसका राज्य के व्यावहारिक पक्ष से ज्यादा सम्बन्ध है।”

प्रश्न 7.
राजनीति विज्ञान, विज्ञान और कला दोनों है, स्पष्ट कीजिए। (The Political Science is both the Science and Arts Discuss)
उत्तर:
यह एक सामान्य अभिमत है कि कोई भी अध्ययन या तो विज्ञान की श्रेणी में आता है या कला की, लेकिन वस्तुतः ऐसा सोचना त्रुटिपूर्ण है। विलियम एस. लिंगर के अनुसार “विज्ञान और कला का परस्पर विरोधी आवश्यक नहीं है। कला विज्ञान पर आधारित हो सकती है।” राजनीतिशास्त्र के बारे में यह कहा जा सकता है कि यह विज्ञान और कला दोनों है।

विज्ञान और कला दोनों ही रूपों में यह हमारे लिये उपयोगी है। गार्नर के अनुसार, “राजनीतिक विज्ञान व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करता है, भ्रममूलक राजनीति दर्शन के सिद्धांत का खण्डन करता है तथा विवेकपूर्ण राजनीतिक क्रियाकलाप के आधार के रूप में सुदृढ़ सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है।” (It renders practical service by deducting sound principles as a basis for wise political action and by exposing the teaching of false political philosophy)

इस प्रकार राजनीतिशास्त्र एक विज्ञान भी है और एक उच्चस्तरीय कला भी। जब हम राजनीति विज्ञान के सिद्धांतों का क्रमबद्ध एवं व्यवस्थित विवेचन करते हैं तथा कुछ सामान्य व सार्वभौम निष्कर्षों की खोज करते हैं तो यह एक विज्ञान है लेकिन जब हम इन सिद्धांतों व व्यवहार के मध्य भिन्नता व सापेक्षता पाते हैं तो राजनीति विज्ञान कला के निकट होती है। सिद्धांतों व व्यवहार का यह अंतर कुशलता व कल्पना (कला) के विकास का अवसर प्रदान करता है।

वर्तमान समय में चुनाव एवं राज्यों के पारस्परिक जीवन में बहुत अधिक अंतर आ गया है और ऐसी परिस्थितियों में राजनीति विज्ञान का कला रूप ही विश्वशान्ति एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत को प्रोत्साहन देकर विश्व को विनाश के गर्त से बचा सकता है। इसलिए, यह स्पष्ट विस्तार करते हुए उसे कला, दर्शन और विज्ञान तीनों मानता है। लासवेल ने भी राजनीति विज्ञान को कला, विज्ञान और दर्शन का संगम माना है।

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प्रश्न 8.
राजनीति विज्ञान के अर्थ और कार्यक्षेत्र को स्पष्ट करें। (Clarify the meaning and scope of Political Science)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का अर्थ “राज्य की नीति” से होता है। राज्य की नीति में यह अत्यन्त आवश्यक तत्त्व होता है कि राज्य की उत्पत्ति की जाए। राज्य की शक्ति का व्यवहार और सैद्धान्तिक स्वरूप का संचालन सम्प्रभुता के हाथों में निहित किया जाए और साथ ही साथ राज्य में राजनीतिक विचारधारा और राज्य में विधि के स्तर पर राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव हो।

राजनीति के अर्थ की उपरोक्त प्रासंगिकता को उजागर करते हुए अरस्तू ने राजनीति के अर्थ और उसके कार्यक्षेत्र को उजागर करते हुए इससे इस महत्वपूर्ण कथन के माध्यम से किया कि “समाज द्वारा सुसंस्कृत मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठतम होता है, परंतु जब वह कानून तथा न्याय के बिना जीवन व्यतीत करता है तो वह निकृष्टतम हो जाता है। यदि कोई मनुष्य एसा है जो समाज में न रह सकता हो अथवा जिसे समाज की आवश्यकता ही न हो क्योंकि वह अपने आप में पूर्ण है, तो उसे मानव समाज का सदस्य मत समझो, वह जंगली जानवर या देवता ही हो सकता है।”

प्रश्न 9.
राजनीति विज्ञान राज्य का ही अध्ययन है, स्पष्ट करें। (The Political Science is study of the state, Explain)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान को राज्य का अध्ययन इसलिए कहा जाता है कि राजनीति का अर्थ ही है “राज्य की नीति”। अगर राजनीति अपने इस महत्वपूर्ण अंग का अवलोकन नहीं, करेगी तो निश्चित है कि राजनीति विज्ञान का अस्तित्व कभी भी सम्भव नहीं हो पायेगा। इसलिये राजनीति विज्ञान में राज्य और राज्य की नीति चाहे वह राजनीतिक विचारधारा के रूप हो या किसी विधि के रूप में हो, इन सबको राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता है।

राजनीति की कोई भी विचारधारा चाहे वह लोकतंत्रीय हो और या फिर समाजवादी, साम्यवादी और निरंकुशवादी विचारधारा हो। इन सबको उत्पन्न करने का मूल स्रोत राजनीति है और राजनीति ने निरंकुशवादी विचारधाराओं को राज्य की व्यवस्था चलाने के लिये इसकी उपयोगिता की प्रासंगिकता को स्थापित किया। इस कारण राजनीति विज्ञान का आधार स्तम्भ राज्य है और राज्य से जुड़े होने वाले आवश्यक तत्व जैसे सरकार, विधि, जनता की राज्य के प्रति उसकी राजनीतिक विचारधारा आदि की अवहेलना राजनीति विज्ञान के सन्दर्भ में कोई भी नहीं कर सकता।

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प्रश्न 10.
परम्परागत राजनीति विज्ञान से आप क्या समझते हैं, स्पष्ट कीजिए। (What do youknow about Iraditional Political Science?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान का परम्परागत दृष्टिकोण राजनीति विज्ञान का जहाँ मूल आधार स्तम्भ है, वहीं राज्य और सरकार की संरचना का मूल आधार स्तम्भ भी है। इसके साथ ही परम्परागत राजनीति ने राज्य और सरकार को संचालित करने के लिये राजनीतिक मूल्यों यानि नैतिक दृष्टिकोण पर ही क्रियान्वित होती है। परम्परागत राजनीति बिना नैतिक मूल्यों के किसी भी राजनीतिक सिद्धांत की संरचना को निर्मित नहीं करती, नैतिक मूल्य राजनीति का मूलभूत आधार स्तम्भ है।

परम्परागत राजनीति का यह दृष्टिकोण था कि बिना नैतिक मूल्यों के राज्य की शक्ति निरंकुश होगी, वहीं राजनीति विचारधारा का मार्ग अस्पष्ट और अमर्यादित होगा। इसलिये परम्परावादी राजनीतिक विचारकों ने नैतिकता से ही राजनीति के आदर्श खोजे तथा नैतिकता से राजनीति को मर्यादित किया। अतः यह आदर्श और मर्यादा का स्वरूप होने से राज्य और सरकार की उपयोगिता स्वयं शासक के लिये भी उपयोगी बनी और जनता के लिये भी उपयोगी बनी।

प्रश्न 11.
राजनीतिक विचारधारा की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए। (Clarify the importance of Political Ideology)
उत्तर:
राजनीतिक विचारधाराओं ने ही संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की राज्य तथा इसके अंग, सरकार और विधि पर राजनीतिक विचारधाराओं का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। जैसे लोकतंत्रीय पद्धति में राज्य के यह दो महत्वपूर्ण तत्व सरकार और विधि कभी भी निरंकुश नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें अपने मूल्यों में प्राकृतिक नियमों को अपनाना पड़ेगा, न्याय की व्यवस्था बनाये रखने के लिये और दूसरा राजनीति जनता के प्रति जवाबदेह हो।

यही लोकतंत्रीय राजनीतिक विचारधारा का मूल स्वरूप रहा है। इसके साथ ही ठीक इसके विपरीत जो राजनीति को बल और शक्ति की निरंकुशता से संचालित करने पर विशेष बल देते हैं और साथ ही साथ यह निरंकुश विचारधारा प्राकृतिक नियमों का अवहेलना अपने विधि निर्माण के सन्दर्भ में व्यापक स्तर पर करती है। इसलिये निरंकुशवादी राज्य व्यवस्था के लिये न्याय की अवधारणा, उसके अस्तित्व के लिये खतरे का मूल आधार बन जाती है।

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प्रश्न 12.
राजनीति विज्ञान में दर्शन की उपयोगिता से आप क्या समझते हैं? (What do you know about the importance of philosophy in political science)
उत्तर:
राजनीतिक दर्शन की मूल जड़ नैतिक नियमों से संबंधित होती है। नैतिक नियमों और उद्देश्यों से ही राजनीति के आदर्शात्मक स्वरूप और सीमा पर सही नियंत्रण स्थापित होता है, तथा राज्य इसी के बल पर निरंकुश नहीं हो सकता है अर्थात् राज्य को यदि निरंकुश नहीं होना है, तो उसे निश्चित रूप से आदर्शवादी सिद्धांतों के अनुरूप ढलना होगा।

इस संदर्भ में चाहे प्राचीन राजनीतिक विचारक हों या फिर आधुनिक राजनीतिक विचारक हों, सबने आदर्शवाद की उपयोगिता को राज्य के सन्दर्भ में उपयोगी इसलिए माना, क्योंकि आदर्शवादी ही निरंकुशता को खत्म करने का एकमात्र मौलिक साधन है। बिना आदर्शवाद के निरंकुशवाद को खत्म नहीं किया जा सकता है। हालांकि राजनीतिक दर्शन की आलोचना इस तथ्य पर की गई कि ऐसा दर्शन काल्पनिक और अव्यावहारिक स्तर पर होता है। इसलिये राजनीति दर्शन को उन्हीं लोगों द्वारा काल्पनिक माना गया जो राजनीति को निरंकुशवादी ज्यादा समझते थे।

प्रश्न 13.
आधुनिक राजनीति विज्ञान और परम्परावादी राजनीति विज्ञान में अंतर में स्पष्ट करें। (Distinguish between Modern Political Science and Traditional Political Science)
उत्तर:
आधुनिक राजनीति विज्ञान के विचारक विज्ञान को केवल राज्य का विषय न मानकर वरन् वह मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार को भी राजनीति विज्ञान का विषय मानते हैं। उन्होंने आधुनिक सहभागिता के रूप में प्रदर्शित करके यह स्पष्ट किया, जैसे लासवेल और केपलन ने अपने कथन के द्वारा यह भाव प्रकट किया कि “राजनीति विज्ञान एक व्यवहारवादी विषय के रूप में शक्ति को संवारने और मिल-बांटकर प्रयोग करने का अध्ययन है।” इसलिये राजनीतिक सहभागिता में जनता की भावना और जनता द्वारा शासन में दिए जाने वाले योगदान का विशेष ध्यान रखा जाने लगा, जिससे कि वे राज्य कानून के प्रति जवाबदेह हो।

परम्परावादी राजनीति विज्ञान के विचारक राज्य और सरकार की संरचना को राजनीति विज्ञान का एक अहम् हिस्सा मानते थे। उनका मत था कि यदि सरकार और राज्य के संदर्भ में उनके निर्माण और क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो निश्चित है कि राज्य व्यवस्था वास्तव में एक अनुशासित व्यवस्था को जन्म दे सकेगी तथा स्थायी रूप से शासन व्यवस्था का संचालन कर सकेगी इसलिये परम्परावादी राजनीति विज्ञान के विचारकों ने राज्य और सरकार के स्थायित्व के लिये ही कई राजनीतिक विचारों का प्रतिवादन किया और इन राजनीतिक विचारों का दार्शनिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक पद्धति से सम्बन्ध था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के महत्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (Briefly describe the importance of studying Political Science)
उत्तर:
आधुनिक युग प्रजातंत्र का युग है और इस युग में राजनीति विज्ञान के अध्ययन का बहुत महत्व है। इस विषय की गणना संसार के महत्वपूर्ण विषयों में की जाती है। इसका कारण यह है कि आधुनिक जीवन राजनीतिक जीवन ही है। मनुष्य का कार्य राजनीतिक व्यवस्था से प्रभावित होता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी राज्य का नागरिक है और उसका राज्य के साथ अटूट संबंध है। अत: राजनीति शास्त्र के अध्ययन के महत्व का विस्तृत विवेचन निम्नलिखित है –

1. राज्य तथा सरकार का ज्ञान (Knowledge of State and Government):
राजनीति विज्ञान राज्य का विज्ञान है और इसके द्वारा ही हमें राज्य तथा सरकार के बारे में ज्ञान होता है। राज्य का होना सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक है क्योंकि समाज में शान्ति व व्यवस्था राजनीतिक संगठन के बिना स्थापित नहीं की जा सकती। राज्य के सभी काम सरकार द्वारा किए जाते हैं। इस कारण सरकार के बारे में भी जानना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि सरकार का गठन कैसे होता है और किस प्रकार की सरकार अच्छी होती है। इस सब बातों का ज्ञान हुए बिना कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का पूरी तरह विकास नहीं कर सकता। अतः इस विज्ञान के अध्ययन के बहुत लाभ हैं।

2. अधिकारों व कर्तव्यों का ज्ञान (Knowledge of Rights and Duties):
राजनीति विज्ञान व्यक्ति को उनके अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान कराता है। समाज और राज्य दोनों में ही रहते हुए व्यक्ति को कुछ अधिकार मिलते हैं और ये अधिकार व्यक्ति को जीवित रहने तथा अपने जीवन का विकास करने में सहायक होते हैं। अधिकारों के बदले व्यक्ति को कुछ कर्त्तव्यों का पालन भी करना पड़ता है ताकि शान्ति और व्यवस्था बनी रहे और दूसरों को भी अधिकार मिल सके।

3. विविध समुदायों का ज्ञान होता है (It gives knowledge about many kinds of associations):
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में रहते हुए उसे कई प्रकार के समुदायों में पारा लेना पटता है, जैसे कि धार्मिक, सामाजिक तथा मनोरंजन संबंधी समुदाय। किस समुदाय का संगठन कैसे होता है, उसके क्या उद्देश्य तथा कार्य हैं? व्यक्ति को उनसे क्या लाभ तथा हानियाँ हैं? इन सब बातों का ज्ञान हमे राजनीति विज्ञान द्वारा मिलता है।

4. दूसरे देशों की शासन प्रणाली का ज्ञान होता है (Knowledge of the Government system of other countries):
आज कोई भी व्यक्ति अकेला नहीं रह सकता। देश-विदेश की घटनाओं में प्रत्येक व्यक्ति की दिलचस्पी रहती है और उनका प्रभाव पड़ता है। राजनीतिक विज्ञान के पता चलता है कि किस-किस देश में कौन-कौन सी शासन प्रणाली प्रचलित है? वहाँ पर किस राजनीतिक विचारधारा को अपनाया गया है और उनके अनुसार ही हमें अपने सम्बन्ध उन देशों से स्थापित करने पड़ते हैं। कहीं राजतंत्र, कहीं लोकतंत्र, कहीं तानाशाही, कहीं संघात्मक सरकार, कहीं अध्यक्षात्मक सरकार और कहीं संसदीय प्रणाली।

5. लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक (Essential for the Success of democracy):
आज का युग लोकतंत्र का युग है। इस शासन प्रणाली में सम्पूर्ण शासन प्रणाली नागरिकों के हाथों में होती है। वे अपने प्रतिनिधि चुनते हैं जो कानून बनाते और शासन चलाते हैं। अतः लोकतंत्र उसी देश में सफल हो सकता है, जिस देश के लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिली हो और राजनीतिक शिक्षा के लिए राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है।

6. राजनीतिक चेतना जागृत होती है (Its study awakens the political consciousness):
आज लोकतंत्र का युग है और शासन की बागडोर जनता के हाथों में होती है। राजनीति शास्त्र का अध्ययन व्यक्ति को सरकार के विभिन्न अंगों, उनके संगठन तथा कार्यों से परिचित करा देता है। यदि किसी व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी के रूप में काम करने का अवसर मिले तो राजनीति विज्ञान के अध्ययन की सहायता से वह व्यक्ति अपने कार्यों को आसानी से कर सकता है। इस प्रकार से राजनीतिक चेतना का भी विकास होता है और शासन में भी कुशलता आती है।

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प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र की प्रकृति व विषय क्षेत्र की समीक्षा कीजिए। (Explain the nature and scope of Political Science)
उत्तर:
राजनीति शास्त्र की प्रकृति (Nature of Political Science) क्या राजनीति शास्त्र विज्ञान है? यह प्रश्न राजनीति विज्ञान में अत्यधिक चर्चित रहता है। कुछ विचारक जो इसे विज्ञान मानते हैं उनमें प्रमुख हॉब्स, माण्टेस्क्यू, ब्राइस, जैविक गार्नर आदि। महान दार्शनिक एवं राजनीति विज्ञान के जनक (Father of Political Science) अरस्तू ने तो इसे सर्वोच्च विज्ञान (Master Science) कहा है। राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग होता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन है। तार्किक विश्लेषण एवं पर्यवेक्षण आधारित है। कार्य और कारण में संबंध है।

विज्ञान के लक्ष्य अर्थात् सत्य की खोज का राजनीति विज्ञान में भी पुट मिलता है। किस प्रकार के राजनैतिक नियम एक आदर्श राज्य के अन्तर्गत नागरिकों का अधिकतम हित कर सकते हैं, उनका प्रयोग राजनीति विज्ञान में होता रहता है। इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी भी की जा सकती है। परंतु दूसरे विचारक इसे विज्ञान नहीं मानते। इसमें मटलेण्ड एवं बकल प्रमुख हैं। इनके अनुसार राजनीति विज्ञान में न तो कोई प्रयोगशाला है और न ही उसमें प्रयोग किए जा सकते हैं।

व्यक्ति को मेढ़क आदि की तरह स्थिर करके प्रयोग नहीं किए जा सकते। राजनीति विज्ञान में निष्पक्षता का अभाव रहता है। कारण और कार्य में वास्तविकता का सम्बन्ध नहीं हो सकता। भविष्यवाणी सही रूप में नहीं की जा सकती। कुछ विचारक राजनीति विज्ञान को कला भी कहते हैं। कला का अर्थ है कि सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्। कला का अर्थ है किसी कार्य को सफलतापूर्वक किया जाना। इन सभी बातों को राजनीति शास्त्र में पाया जाना उसे कला सिद्ध करता है।

विषय क्षेत्र (Scope of Political Science):
राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य का अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान में राज्य और सरकार का भी अध्ययन किया जाता है। राजनीति विज्ञान का मानवीय तत्वों पर विशेष बल दिया जाता है। अत: यह मानव संबंधों का भी अध्ययन है। इसमें नागरिकों के कर्त्तव्य और नागरिकों के अधिकारों का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न प्रकार की राजनीतिक संस्थाओं, अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों, अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, विश्व शांति के उपायों आदि सभी का अध्ययन इसमें सम्मिलित है। व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान व्यक्ति के समाज में विभिन्न प्रकार के संबंधों में भी अध्ययन करता है। आधुनिक विचारकों के अनुसार राजनीति विज्ञान शक्ति का अध्ययन है तथा मानव मूल्यों का भी अध्ययन है।

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प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र और इतिहास में संबंध स्थापित कीजिए। (What is the relationship between Political Science and History?)
उत्तर:
राजनीति विज्ञान और इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। सीले (Seelay) का कथन है, “राजनीति विज्ञान के बिना इतिहास एक ऐसे वृक्ष के समान है जिसमें कोई फल नहीं लगता और इतिहास के बिना राजनीति शास्त्र बिना जड़ के वृक्ष के समान है।” (Without History Political Science has no root and without Political Science History has no fruit.”) राज्य ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। इतिहास राजनीति शास्त्र की प्रयोगशाला भी है। अकबर ने राजपूतों के साथ सुलह की नीति अपनाकर अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया जबकि औरंगजेब ने जजिया कर लगाकर सिक्ख, मराठे तथा अन्य हिन्दुओं को अपने विमुख कर लिया।

धीरे-धीरे उसका राज्य खण्डित होता गया। इसी प्रकार राजनीति शास्त्र भी इतिहास को सामग्री प्रदान करता है। यदि इतिहास में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन न किया जाए तो इतिहास नीरस बन जाता है। बहुत सी राजनीतिक घटनाएँ इतिहास को एक नई दिशा में मोड़ देती हैं। यदि 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना न हुई होती तो भारत का इतिहास आज कुछ और ही होता। जून 1975 में इन्दिरा गाँधी ने आपात स्थिति न लगायी होती हो शायद भारत के राजनीतिक दलों का यह इतिहास न होता जो आज है। इस प्रकार इतिहास राजनीतिक विज्ञान का बहुत ऋणी है।

अंतर-इतिहास और राजनीति विज्ञान में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में विशेष अंतर है। इतिहास में घटनाओं का यथार्थ वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति विज्ञान में घटनाओं का विश्लेषण करके आदर्श रूप को लाने का प्रयास होता है। आदर्श राज्य भविष्य में कैसा होना चाहिए इस पर राजनीति विज्ञान में विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त दोनों विषयों के विषय क्षेत्र भी अलग-अलग होते हैं। उनमें उद्देश्य की दृष्टि से भी अंतर होता है।

प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र के साथ संबंध विस्तार से बताइए। (Describe in detail the relationship of Political Science with Economics)
उत्तर:
राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र का घनिष्ठ सम्बन्ध है। आर्थिक परिस्थितियाँ राजनीतिक दशा पर प्रभाव डालती हैं तथा राजनीतिक परिस्थितियाँ आर्थिक दशा को प्रभावित करती हैं। राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों मानव कल्याण के लिए प्रयासरत हैं। आर्थिक समस्याओं को राजनीति विज्ञान की सहायता से ही सुलझाया जाता है। राज्य द्वारा निर्धारित नीतियों के आधार पर आर्थिक कार्यक्रम चलाए जाते हैं। हिटलर और मुसोलिनी के नेतृत्व में जर्मनी तथा इटली में जो एक नए प्रकार का शासन (राष्ट्रीय समाजवाद पर आश्रित) स्थापित हुआ था, उसके कारण इन राज्यों का आर्थिक संगठन बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था। समाजवाद के विकास का प्रधान कारण आर्थिक विषमता ही है।

ब्रिटेन और भारत में राजकीय समष्टिवाद के कारण इन देशों के आर्थिक जीवन पर राज्य का नियंत्रण बहुत बढ़ गया है। राज्य के कानून मजदूरी की निम्नतम दर, काम के घंटे व इसी प्रकार की अन्य बातों की व्यवस्था करते हैं। इसी प्रकार चुंगी, आयातकर, निर्यातकर, मूल्य का नियंत्रण, मुद्रा पद्धति आदि द्वारा सरकारें वस्तुओं के आदान-प्रदान व विनियम को नियंत्रित करती हैं। इन विविध प्रकार के राजकीय कानूनों द्वारा आर्थिक जीवन बहुत अशों तक मर्यादित हो जाता है। मानव सभ्यता के विकास में आर्थिक परिस्थितियाँ विशेष महत्व रखती हैं। अनेक विचारक इतिहास की घटनाओं का मूल कारण आर्थिक ही मानते हैं। कार्ल मार्क्स ऐसे ही विचारक थे।

अंतर:
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में विशेष अंतर भी है जिसका वर्णन निम्न प्रकार है –

1. राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध व्यक्तियों से व अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है (Political Science deals with men and the Economics deals with materials):
राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय समाज में रहने वाले व्यक्ति हैं। राजनीति विज्ञान मनुष्य के राजनीतिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है परंतु अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है। यह शास्त्र वस्तुओं के उत्पादन, वितरण और विनियम का अध्ययन करता है जबकि राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध राजनीतिक विचारधाराओं से है। संक्षेप में, अर्थशास्त्र कीमतों (Prices) का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान मूल्यों (Values) का।

2. राजनीति विज्ञान का क्षेत्र अर्थशास्त्र से विस्तृत है (The Scope of Political Science is wider than Economics):
अर्थशास्त्र मानव की केवल आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है जिसमें कि धन का उत्पादन, वितरण और उपयोग सम्मिलित हैं जबकि राजनीति विज्ञान मानव के राजनीतिक जीवन का अध्ययन करता है। राजनीति विज्ञान में व्यक्ति के राजनीतिक पक्ष के अतिरिक्त उसके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व नैतिक पक्ष का ही अध्ययन किया जाता है। अत: राजनीति विज्ञान का क्षेत्र अर्थशास्त्र से व्यापक है।

निष्कर्ष (Conclusion):
राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आज के युग में ये दोनों विषय एक-दूसरे के पूरक, हैं।

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प्रश्न 5.
वैधता से क्या अभिप्राय है? इसका महत्व भी बताइए। (What do you mean by Legitimacy? What is its importance?)
उत्तर:
राज्य को शक्ति प्रयोग करने का अधिकार है। वह नागरिकों के ऊपर बाध्यकारी शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है ताकि नागरिक राज्य के कानूनों का पालन करते रहें। नागरिकों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए सदैव शक्ति का प्रयोग न तो सम्भव है और न ही इसका कोई औचित्य है। अतः राज्य शक्ति का प्रयोग अंतिम विकल्प के आधार पर ही करता है। शक्ति का प्रयोग केवल उन व्यक्तियों के लिये ही किया जाता है जो कानून का पालन नहीं करते।

व्यक्तियों के द्वारा राज्य की आज्ञा का पालन इस विश्वास पर ही किया जाता है कि राज्य व्यक्तियों के हित में शासन करता है। जब संसद में किसी एक दल का बहुमत नहीं होता है और कुछ दल मिलकर एक संगठन बना लेते हैं तो गठबंधन में सम्मिलित दलों का बहुमत हो जाता है और वे ही सरकार भी बनाते हैं परंतु उनमें से कोई भी एक दल बहुमत नहीं रखता। इस प्रकार अल्पमत की सरकारें बनती रहती हैं परंतु इस प्रकार की सरकारों को भी न्यायोचित माना जाता है क्योंकि कुछ निश्चित नियम व विधियों का इसमें प्रयोग होता है। राज्य में इस प्रकार बनी सरकार का भी औचित्य रहता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राजनीति विज्ञान का जनक माना जाता है –
(क) सुकरात
(ख) प्लेटो
(ग) अरस्तु
(घ) गार्नर
उत्तर:
(ग) अरस्तु

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प्रश्न 2.
“सदा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना प्रजातंत्र का मूल्य है।” यह किसका कथन है?
(क) जॉन स्टुअर्ट मिल
(ख) रूसो
(ग) लास्की
(घ) हीगल
उत्तर:
(ग) लास्की

प्रश्न 3.
किस लैटिन शब्द से Justice अर्थात् ‘न्याय’ शब्द की उत्पत्ति हुई?
(क) जस्टिसिया
(ख) जज
(ग) जस
(घ) ज्यूडिशिया
उत्तर:
(घ) ज्यूडिशिया

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प्रश्न 4.
लोकतंत्र की आधारशिला है:
(क) स्थानीय शासन
(ख) राष्ट्रपति शासन
(ग) बहुदलीय शासन
(घ) मिली-जुली सरकार
उत्तर:
(ग) बहुदलीय शासन

प्रश्न 5.
‘पॉलिटिक्स’ नामक पुस्तक के लेखक हैं –
(क) प्लेटो
(ख) अरस्तू
(ग) सुकरात
(घ) कौटिल्य
उत्तर:
(ख) अरस्तू

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प्रश्न 6.
प्रजातंत्र (Democracy) किस भाषा के शब्द से बना है।
(क) ग्रीक
(ख) लैटिन
(ग) फ्रेंच
(घ) जर्मन
उत्तर:
(क) ग्रीक

प्रश्न 7.
अमेरिका में ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ पर आतंकी हमला कब हुआ था।
(क) 9 सितम्बर, 2001
(ख) 11 सितंबर, 2001
(ग) 6 अगस्त, 2001
(घ) 9 मार्च, 2001
उत्तर:
(ख) 11 सितंबर, 2001

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

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पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मेजी पुर्नस्थापना से पहले की वे अहम घटनाएँ क्या थीं, जिन्होंने जापान के तीव्र आधुनिकीकरण को सम्भव किया?
उत्तर:
मेजी पुर्नस्थापना 1867-68 में हुई। इससे पहले की निम्नलिखित मुख्य घटनाओं ने जापान के तीव्र .आधुनिकीकरण को सम्भव बनाया-

(i) किसानों से शस्त्र ले लिए गए। अब केवल समुराई ही तलवार रख सकते थे। इससे शान्ति और व्यवस्था बनी रही जबकि पिछली शताब्दी में प्रायः लड़ाइयाँ होती रहती थीं। शान्ति एवं व्यवस्था को आधुनिकीकरण का मूल आधार माना जाता है।

(ii) दैम्यो को अपने क्षेत्रों की राजधानी में रहने के आदेश दिए गए। उन्हें काफी हद तक स्वायत्तता भी प्रदान की गई।

(iii) मालिकों और करदाताओं का निर्धारण करने के लिए भूमि का सर्वेक्षण किया गया और भूमि का वर्गीकरण उत्पादकता के आधार पर किया गया। इसका उद्देश्य राजस्व के लिए स्थायी आधार बनाना था।

(iv) दैम्यों की राजधानियों का आकार लगातार बढ़ने लगा। अतः 17 वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में एदो (आधुनिक तोक्यों) संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर बन गया। इसके अतिरिक्त ओसाका और क्योतो भी बड़े शहरों के रूप में उभरे दुर्गों वाले कम-से-कम छः शहर ऐसे थे जहाँ की जनसंख्या 50,000 से अधिक थी। इसकी तुलना में उस समय के अधिकतर यूरोपीय देशों में केवल एक ही बड़ा शहर था। बड़े शहरों के परिणमस्वरूप जापान की वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का विकास हुआ और वित्त एवं ऋण की प्रणालियाँ स्थपित हुई।

(v) व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान समझे जाने लगे।

(vi) शहरों में जीवंत संस्कृति कर प्रसार होने लगा। बढ़ते हुए व्यापारी वर्ग ने नाटकों और कलाओं को संरक्षण प्रदान किया।

(vii) लोगों की पढ़ने में रुचि ने होनहार लेखकों को अपने लेखन द्वारा अपनी जीविका चलाने में सहायता पहुँचाई। कहते हैं कि एदो में लोग नूडल की कटोरी के मूल्य पर पुस्तक किराये पर ले सकते थे। इससे पता चलता है कि पुस्तकें पढ़ना अत्यधिक लोकप्रिय था और पुस्तकों की छपाई भी व्यापक स्तर पर होती थी।

(viii) मूल्यवान धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी गई।

(ix) रेशम के आयात पर रोक लगाने के लिए क्योतो में निशिजिन में रेशम उद्योग के विकास के लिए पग उठाये गए। कुछ ही वर्षों में निशिजिन का रेशम विश्वभर में सबसे अच्छा रेशम माना जाने लगा।

(x) मुद्रा के बढ़ते हुए प्रयोग और चावल के शेयर बाजार के निर्माण से भी जापानी अर्थतंत्र का विकास नयी दिशाओं में हुआ।

प्रश्न 2.
जापान के एक आधुनिक समाज में रूपान्तरण की झलक दैनिक जीवन में कैसे दिखाई दी?
अथवा
जापान के विकास के साथ-साथ वहाँ की रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह बदलाव आए? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
जापान में पहले पैतृक परिवार व्यवस्था प्रचलित थी, जिसमें कई पीढ़ियाँ परिवार के मुखिया के नियन्त्रण में रहती थी। परन्तु जैसे-जैसे लोग समृद्ध हुए पृथक परिवार प्रणाली अथवा नयी घर व्यवस्था अस्तित्व में आई । इसमें पति-पत्नी साथ रहकर कमाते थे और घर बसाते थे। बिजली से चलने वाले नए घरेलू उत्पादों तथा नए परिवारिक मनोरंजनों की मांग भी बढ़ने लगी।

प्रश्न 3.
पश्चिमी ताकतों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना छींग (क्विंग) राजवंश ने किया?
उत्तर:
चीन का छींग राजवंश पश्चिमी शक्तियों द्वारा पेश की गई चुनौतियों का सामना करने। में असफल रहा। (1839-42) में ब्रिटेन के साथ हुए पहले अफीम युद्ध ने इसे कमजोर बना दिया। देश में सुधारों एवं परिवर्तन की मांग उठने लगी । राजवंश इसमें भी असफल रहा और देश गृहयुद्ध की लपेट में आ गया।

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प्रश्न 4.
सन-यात-सेन के तीन सिद्धान्त थे ?
उत्तर:
सनयात सेन के तीन सिद्धान्त (सन मिन चुई) निम्नलिखित थे-

  • राष्ट्रवाद-इसका अर्थ था मांचू राजवंश को सत्ता से हटाना, क्योंकि उसे विदेशी राजवंश माना जाता था।
  • गणतन्त्र-देश में गणतान्त्रिक सरकार की स्थापना करना।
  • समाजवाद-पुंजी का नियमन करना तथा भूमि के स्वामित्व में बराबरी लाना।।

प्रश्न 5.
क्या पड़ोसियों के साथ जापान कि युद्ध और पर्यावरण का विनाश तीव्र औधोगीकरण की जापानी नीति के चलते हुआ?
उत्तर:
यह बात सत्य है कि जापान के तीव्र औद्योगीकरण के कारण ही जापान ने पर्यावरण के विनाश तथा युद्ध को जन्म दिया।

  • उद्योगों के अनियन्त्रित विकास से लकड़ी तथा अन्य संसाधनों की मांग बढ़ी। इसका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ा।
  • कच्चा माल प्राप्त करने तथा तैयार माल की खपत के लिए जापान को उपनिवेशों की आवश्यकता पड़ी। इसके कारण जापान को पड़ोसियों के साथ युद्ध करने पड़े।

प्रश्न 6.
क्या आप मानते हैं कि माओ-त्से-तुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की नींब डालने में सफलता प्राप्त की?
उत्तर:
इसमें कोई सन्देह नहीं कि माओ-त्से-तुंग अथवा माओजेदांग और उसके साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की नींव डालने में सफलता प्राप्त की। यह बात नीचे दिए गए घटनाक्रम से स्पष्ट हो जाएगी.

सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् कोमिनतांग की गतिविधियाँ – 1925 में सनयाप्त सेन की मृत्यु के पश्चात् कोमिंतांग का नेतृत्व च्यांग-काई-शेक के हाथों में आ गया। इससे पूर्व 1927 में चीन में साम्यवादी दल की स्थापना हुई थी। यद्यपि उसने कोमिंतांग के शासन को सुदृढ़ बनाया, ”तो भी उसने, सनयात सेन के तीन क्रान्तिकारी उद्देश्यों को पूरा करने की दिशा में कोई कदम न. उठाया। इसके विपरीत उसने कोमिंतांग में अपने विरोधियों तथा साम्यवादियों को कुचलने की नीति अपनाई। उसे सोवियत संघ का समर्थन भी प्राप्त था। इसके अतिरिक्त उसने जमींदारों के एक नये वर्ग को उभारने का प्रयास किया जो किसानों का शोषण करते थे। इसी बीच माओ-जेदांग नामक साम्यवादी नेता ने किसान आन्दोलन को मजबूत बनाने के लिए लाल सेना का निर्माण किया।

माओ जेदांग का उत्कर्ष – 1930 में माओ जेदांग किसानों तथा मजदूरों की सभा का सभापति बन गया और भूमिगत होकर काम करने लगा। उसके सिर पर 25 लाख डालर का इनाम था। उसने नए सिरे से लाल सेना का संगठन किया और च्यांग-काई-शेक की विशाल सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध आरम्भ कर दिया। उसने च्यांग की सेना को चार बार भारी पराजय दी। परन्तु पाँचवें आक्रमण में उस पर इतना दबाव पड़ा कि उसने ‘महाप्रस्थान’ (Long March) की योजना बनाई और उसे कार्यान्वित किया। लाल सेना के इस प्रस्थान की गणना विश्व की अद्भुत घटनाओं में की जाती है। इस यात्रा में लगभग एक लाख साम्यवादियों ने भाग लिया। उन्होंने 268 दिनों में 6000 मील की दूरी तय की और देश के उत्तरी प्रान्तों शेंसी तथा कांसू (Shensi and Kansu) पहुँचे। यहाँ तक पहुँचने वालों की संख्या केवल 20,000 ही थी।

1935 में मांओ ने जापानियों के विरुद्ध साम्यवादी मोर्चा खड़ा किया। उसने अनुभव किया कि जापान के विरुद्ध संघर्ष उसे लोकप्रिय बना देगा और उसके जन-आन्दोलन को भी अधिक प्रभावशील बनाएगा। उसने यह भी. सुझाव दिया कि कोमिंतांग लाल सेना के साथ मिल कर कार्य करे और संयुक्त मोर्चे की स्थापना की जाए, परन्तु च्यांग ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस बात से च्यांग की प्रतिष्ठा को इतना अधिक आघात पहुँचा कि उसके अपने ही सैनिकों ने उसे बन्दी बना लिया। माओ ने तब तक जापान के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा, जब तक उसे सफलता नहीं मिली।

च्यांग के विरुद्ध संघर्ष-च्यांग माओ की बढ़ती हुई शक्ति से बहुत चिन्तित था। वह उसके साथ मिलकर काम नहीं करना चाहता था। बहुत कठिनाई के बाद वह जापान के विरुद्ध माओ का साथ देने के लिए तैयार हुआ। जब युद्ध समाप्त हुआ तो माओ ने च्यांग के सामने मिली-जुली सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा। परन्तु च्यांग ने इसे स्वीकार नहीं किया। माओ ने अपना संघर्ष जारी रखा। 1949 में च्यांग को चीन से भाग कर फारमोसा (वर्तमान ताइवान) में शरण लेनी पड़ी। माओ जेदांग को चीन की सरकार का अध्यक्ष (Chairman) चुना गया। अपनी मृत्यु तक वह इसी पद पर बना रहा।

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Bihar Board Class 11 History आधुनिकीकरण के रास्ते Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अफीम युद्धों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अफीम युद्ध चीन में अफीम के ‘अवैध व्यापार के कारण हुए। अंग्रेज व्यापारी भारी . मात्रा में चीन अफीम ले जाते थे। इस प्रकार चीनी लोग पूरी तरह अफीम खाने के आदी हो गए, जिससे उनका शारीरिक और नैतिक पतन हुआ। इस व्यापार के कारण ही चीन को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ना पड़ा।’

प्रश्न 2.
चीन में बॉक्सर विद्रोह कब हुआ? इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
चीन में बॉक्सर विद्रोह 1889-90 ई. में हुआ। इस विद्रोह को अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जापानी, जर्मन तथा अमेरिकी सेनाओं ने मिलकर दबाया। इस विद्रोह के कारण चीन विभाजित होने से बच गया।

प्रश्न 3.
चीन में गणराज्य की स्थापना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चीन में 1911 में मंचू शासन के पतन के बाद गणराज्य की स्थापना हुई। इसकी घोषणा 1 जनवरी, 1912 ई. को की गई।
नानकिंग को इसकी राजधानी बनाया गया। डॉ. सनयात सेन इस गणराज्य के राष्ट्रपति बने।

प्रश्न 4.
चीन में आगे की ओर बड़ी छलांग (Great Leap Forward 1958-59) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आगे की ओर बड़ी छलांग से अभिप्राय चीन द्वारा आश्चर्यजनक उन्नति करने का प्रस्ताव था। परन्तु चीनी नेता इसमें विफल रहे। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

  • चीन में कम्यूनों की स्थापना की गई और लोगों को इसमें शामिल होने के लिए बाध्य किया गया।
  • कृषि उत्पादन में गिरावट आई।
  • मूल्यवान् साधन बर्बाद किए गए। इन सबके परिणामस्वरूप 1960-62 के दौरान देश में गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया। आगे की ओर छलांग चीन को आगे ले जाने की बजाय पीछे ले गई।

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प्रश्न 5.
चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति क्या थी?
उत्तर:
सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (Cultural Revolution) चीन में आरम्भ की गई। चीन आर्थिक क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाने में विफल रहा था। चीन के नेता यह दिखाना चाहते थे कि विफलता के लिए माओ-जेडांग तथा अन्य नेता जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि अन्य लोग जिम्मेदार थे। अतः क्रान्ति के नाम पर मनमाने ढंग से निर्दोष व्यक्तियों पर झूठे आरोप लगाए गए और उन्हें बन्दी बनाया गया। परणिामस्वरूप पूरे देश में अव्यवस्था फैल गई और सारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।

प्रश्न 6.
चीन में प्रचलित कंफ्यूशियसवाद की विचारधारा क्या थी?
उत्तर:
कंफ्यूशियसवाद की विचारधारा कंफ्यूशियस (551-479 ई.पू.) और इनके अनुयायियों की शिक्षा से विकसित की गई थी। इसका सम्बन्ध अच्छे व्यवहार, व्यावहारिक समझदारी तथा उचित सामाजिक सम्बन्धों से था। इस विचारधारा ने सामाजिक मानक स्थापित किए और चीनी राजनीतिक सोंच तथा संगठनों को ठोस आधार प्रदान किया।

प्रश्न 7.
1905 ई. में चीन में प्रचलित परीक्षा प्रणाली को समाप्त क्यों कर दिया गया?
उत्तर:
चीन में प्रचलित परीक्षा प्रणाली में केवल साहित्यिक कौशल की ही माँग होती है। यह क्लासिक चीनी सीखने की कला पर ही आधारित थी, जिसकी आधुनिक विश्व में कोई प्रासंगिकता नजर नहीं आती थी। दूसरे, यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास में भी बाधक थी। इसलिए 1905 ई. में इस परीक्षा प्रणाली को समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 8.
चियांग काइ शेक कौन थे? उन्होंने महिलाओं को कौन-से चार सद्गुण अपनाने के लिए प्रेरित किया?
उत्तर:
चियांग काइ शेक (1887-1975) कुओमीनतांग के नेता थे। वह सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् कुओमीनतांग के नेता बने। उन्होंने महिलाओं को ये चार सद्गुण अपनाने के लिए प्रेरित किया-सतीत्व, रंगरूप, वाणी और काम।

प्रश्न 9.
चीनी गणराज्य में महिला मजदूरों (शहरी) की क्या समस्याएँ थीं?
उत्तर:

  • महिला मजदूरों को बहुत कम वेतन मिलता था।
  • काम करने के घंटे बहुत लम्बे थे।
  • काम करने की परिस्थितियाँ बहुत खराब थीं।

प्रश्न 10.
देश (चीन) को एकीकृत करने के प्रयासों के बावजूद कुओमीनतांग असफल रहा। क्यों?
उत्तर:

  • कुओमीनतांग का सामाजिक आधार संकीर्ण था और राजनीतिक दृष्टिकोण सीमित था।
  • सनयात सेन के कार्यक्रम में शामिल पूंजी के नियमन और भूमि-अधिकारों में समानता को लागू न किया जा सका।
  • पार्टी ने किसानों की अनदेशी की और लोगों की समस्याओं की ओर कोई ध्यान न दिया।

प्रश्न 11.
1945-49 के दौरान ग्राणीम चीन में कौन-से दो मुख्य संकट थे?
उत्तर:

  • पर्यावरण सम्बन्धी संकट-इसमें बंजर भूमि, वनों का विनाश तथा बाढ़ शामिल थे।
  • सामाजिक आर्थिक संकट-यह संकट विनाशकारी भूमि-प्रथा, ऋण, प्राचीन प्रौद्योगिकी तथा निम्न स्तरीय संचार के कारण था।

प्रश्न 12.
1930 ई. में माओत्सेतुंग ने किस बात का सर्वेक्षण किया? इसका क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
1930 ई. में माओत्सेतुंग ने जुनवू में एक सर्वेक्षण किया। इसमें नमक तथा सोयाबीन जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुओं, स्थानीय संगठनों की तुलनात्मक मजबूतियों, धार्मिक संगठनों की मजबूतियों, दस्तकारों, लोहारों तथा वेश्याओं आदि का सर्वेक्षण किया। इसका उद्देश्य शोषण के स्तर की जानकारी प्राप्त करना था।

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प्रश्न 13.
लाँग मार्च (1934-35) क्या था? इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
लाँग मार्च चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की शांग्सी तक 6000 मील की एक कठिन यात्रा थी। इस यात्रा के बाद येनान पार्टी का नया अड्डा बन गया। यहाँ माओत्सेतुंग ने वारलॉर्डिज्म को आगे बढ़ाया। इसमें उन्हें मजबूत सामाजिक आधार मिला।

प्रश्न 14.
चीन के लिए 4 मई का आन्दोलन क्यों महत्त्वपूर्ण था?
उत्तर:
4 मई का आन्दोलन 1919 में पीकिंग में हुआ। इस आन्दोलन में छात्रों की सक्रिय भूमिका थी। इसके परिणामस्वरूप चीन में साम्यवादी दल की स्थापना का मार्ग खुला और चीन के छात्रों और श्रमिकों में जागृति की भावनाएँ उत्पन्न हुईं।

प्रश्न 15.
कुओमितांग दल की स्थापना के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
डॉ. सनयात सेन ने 1919 में तुंग-हुई तथा कई अन्य दलों को मिलाकर चीन में एक राष्ट्रीय दल की स्थापना की। यह दल कुओमिनतांग दल के नाम से जाना गया। इसी दल ने 1920 में दक्षिणी चीन में कैन्टन सरकार की स्थापना थी।

प्रश्न 16.
1911 की चीनी क्रान्ति के दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • मन्चू सरकार अप्रिय हो रही थी और जनता का रोष उसके प्रति बढ़ रहा था।
  • मन्चू सरकार की रेल नीति 1911 की क्रान्ति का तात्कालिक कारण बनी। रेल नीति को केन्द्र के अधीन करने से अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुईं और अन्ततः इसी ने 1911 की क्रान्ति को भड़काया।

प्रश्न 17.
1911 की चीनी क्रान्ति के दो परिणाम बताएँ।
उत्तर:

  • 1911 की चीनी क्रान्ति के परिणामस्वरूप चीन में मंचू राजवंश का शासन समाप्त हो गया।
  • चीन की जनता को नवीन संविधान प्राप्त हुआ और चीनी गणतन्त्र की स्थापना हुई।

प्रश्न 18.
1949 की चीनी क्रान्ति के क्या कारण थे?
उत्तर:

  • साम्यवादियों ने जेंसी में साम्यवादी शासन का गठन कर लिया था। यह समाजवादी राज्य पूरे चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना करना चाहता था।
  • चीन में गृह-युद्ध छिड़ गया। परन्तु साम्यवादी और राष्ट्रीय सरकार किसी साँझे संविधान पर राजी न हुए।

प्रश्न 19.
चीन में साम्यवादी राज्य का आरम्भ कब और कैसे हुआ?
उत्तर:
अक्टूबर, 1949 में साम्यवादियों ने राष्ट्रीय सरकार की राजधानी कैन्टन पर अधिकार कर लिया। च्यांग-काई-शेक भागकर फारमूसा चला गया। पहली अक्टूबर, 1949 को साम्यवादियों ने चीन की राष्ट्रीय सरकार की घोषणा की और पीकिंग को चीन की राजधानी बना दिया।

प्रश्न 20.
कमोडोर पैरी की जापान यात्रा के बारे में दो तथ्य लिखो।
उत्तर:

  • पैरी मिशन 1854 में अमेरिका के राष्ट्रपति फिलमोर ने जापान भेजा था। उसका काम अमेरिका की सरकार का सन्देश जापार की सरकार तक पहुँचाना था।
  • वह युद्ध करके भी जापान से अपना उद्देश्य पूरा कर सकता था।

प्रश्न 21.
कमोडोर पैरी के दो मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:

  • यदि कोई अमेरिकन जहाज जापान के समुद्र तट पर टूट जाए, तो उसके नाविकों और यात्रियों को जापान मे आश्रय दिया जाए।
  • अमेरिकन जहाजों को यह अनुमति हो कि वे जापान के बन्दरगाहों से कोयला, जल खाद्य सामग्री आदि ले सकें।

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प्रश्न 22.
कंगावा की सन्धि किन दो देशों बीच हुई ? इसकी दो शर्ते कौन-सी थीं?
उत्तर:
कंगावा की सन्धि जापान और अमेरिका में होने वाली पहली सन्धि थी। दो शर्ते-

  • विदेशी जहाजों को जापान के कुछ बन्दरगाहों से कोयला भरने तथा खाद्यान एवं जल लेने का अधिकार होगा।
  • अमेरिका के किसी जहाज के टूटने पर उसके नाविकों और यात्रियों के साथ परम मित्रता का व्यवहार किया जाएगा।

प्रश्न 23.
पश्चिमी देशों से सन्धियाँ करने से जापान पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:

  • पश्चिमी देशों के सम्पर्क में आकर जापान ने उनके ज्ञान को अपनाया और पचास वर्षों के भीतर ही उनके समान सबल हो गया।
  • विदेशी सम्पर्क के कारण गोकुगावा वंश के शोगुनों का प्रभाव समाप्त हुआ और देश में जापानी सम्राट ने फिर से शक्ति पकड़ ली।

प्रश्न 24.
जापान में मेजियों की पुर्नस्थापना के लिए उत्तरदायी कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:
1867-1868 में मेजी वंश के नेतृत्व में तोकुगावा वंश के शासन को समाप्त कर दिया गया। मेन्जियों की पुर्नस्थापना के पीछे कई कारण थे-

  • देश में विभिन्न क्षेत्रों में असन्तोष व्याप्त था।
  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार तथा कूटनीतिक सम्बन्धों की मांग की जा रही थी।

प्रश्न 25.
मेजी युग में जापान ने कृषि क्षेत्र में क्या प्रगति की?
उत्तर:

  • कृषक कृषि करने वाली भूमि के स्वामी बन गए।
  • जापान ने पश्चिमी देशों से कृषि विशेषज्ञों की सेवाएँ प्राप्त की और कृषि क्रान्ति के बीज बोए।

प्रश्न 26.
मेजी युग के दो महत्त्वपूर्ण कार्य लिखें।
उत्तर:

  • जापान में संयुक्त राज्य अमेरिका की पद्धति पर एक राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की गई। इस बैंक को नोट छापने का अधिकार दिया गया।
  • जापान में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। छः साल के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दी गई।

प्रश्न 27.
रूस-जापान युद्ध की दो विशेष बातें बताएँ।
उत्तर:

  • रूस-जापान युद्ध 1904-05 में हुआ था।
  • इसमें छोटे से देश जापान ने रूस को पराजित किया।

प्रश्न 28.
‘सर्वहारा की तानाशाही’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘सर्वहारा की तानाशाही’ की अवधारणा कार्ल मार्क्स की देन है। इसमें इस बात पर बल दिया गया था कि धनी वर्ग की दमनकारी सरकार का स्थान श्रमिक वर्ग की क्रान्तिकारी सरकार लेगी। यह लोकतन्त्र वर्तमान अर्थ में अधिनायकतन्त्र नहीं होगा।

प्रश्न 29.
पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना कब हुई? यह सरकार रूस की सात्यवादी सरकार से किस प्रकार भिन्न थी?
उत्तर:
‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना 1949 में हुई। यह नये लोकतन्त्र को सिद्धान्तों पर आधारित थी, जो सभी सामाजिक वर्गों का गठबन्धन था। इसके विपरित सरकार साम्यवादी सरकार का आधार ‘सर्वहारा की तानाशाही’ था।

प्रश्न 30.
चीन के पीपुल्स कम्यूंस क्या थे?
उत्तर:
पीपुल्स कम्यूंस चीन के ग्रामीण क्षेत्रों में आरम्भ किए गए। इनमें लोग सामूहिक रूप से भूमि के स्वामी होते थे और मिल-जुलकर फसल उगाते थे। 1954 तक देश में 26,000 ऐसे समुदाय थे।

प्रश्न 31.
सांस्कृतिक क्रान्ति का चीन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:

  • सांस्कृतिक क्रान्ति से देश में अव्यवस्था फैल गई जिससे पार्टी कमजोर हुई।
  • अर्थव्यवस्था तथा शिक्षा के प्रसार में भी बाधा पड़ी।

प्रश्न 32.
1976 में चीन में आधुनिकीकरण के लिए किस चार सूत्री लक्ष्य की घोषणा की गई?
उत्तर:
इस चार सूत्री लक्ष्य में ये चार बातें शामिल थीं-विज्ञान, उद्योग, कृषि तथा रक्षा का। विकास।

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प्रश्न 33.
चीन में 4 मई के आन्दोलन की 70वीं वर्षगांठ (1989 में) पर घठित घटना की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:

  • इस अवसर पर अनेक बुद्धिजीवियों ने अधिक खुलेपन की माँग की और कड़े सिद्धान्तों को समाप्त करने के लिए आवाज उठाई।
  • बीजिंग के तियानमेन चौक पर लोकतन्त्र की मांग करने वाले छात्रों के प्रदर्शन का क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया गया।

प्रश्न 34.
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आज ताइवान की क्या स्थिति है?
उत्तर:
आज राजनयिक स्तर पर अधिकांश देशों के व्यापार मिशन केवल ताइवान में ही हैं। परन्तु वे ताइवान में अपने दूतावास स्थापित नहीं कर सकते और न ही. वहाँ की सरकार के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि ताइवान को आज भी चीन का अंग माना जाता है।

प्रश्न 35.
चीन के साम्यवादी दल और उसके समर्थकों ने परम्परा को समाप्त करने का प्रयास क्यों किया?
उत्तर:
चीन के साम्यवादी दल तथा उसके समर्थकों ने निम्नलिखित कारणों से परम्परा को समाप्त करने का प्रयास किया-

  • उनका विचार था कि परम्परा लोगों को गरीबी में जकड़े हुए है।
  • उनका मानना था कि परम्परा महिलाओं को उनकी स्वतन्त्रता से वंचित रखती है और देश के विकास में बाधा डालती है।

प्रश्न 36.
19वीं शताब्दी के आरम्भ में चीन और जापान की राजनीतिक स्थिति की तुलना कीजिए।
उत्तर:
19वीं शताब्दी के आरम्भ में चीन का पूर्वी एशिया पर प्रभुत्व था। वहाँ छींग राजवंश की सत्ता बहुत ही सुरक्षित जान पड़ती थी। दूसरी ओर जापान एक छोटा-सा देश था, जो अलग-अलग जान पड़ता था।

प्रश्न 37.
चीन और जापान के भौतिक भूगोल में कोई दो अन्तर बताइए।
उत्तर:

  • चीन एक विशाल महाद्वीपीय देश है। इसमें कई तरह के जलवायु क्षेत्र हैं। इसके विपरीत जापान एक द्वीप श्रृंखला है। इसमें चार मुख्य द्वीप हैं। होश, क्यूश, शिकोक तथा होकाइदो।
  • चीन भूकम्प क्षेत्र में नहीं आता, जबकि जापान बहुत ही सक्रिय भूकम्प क्षेत्र में आता है।

प्रश्न 38.
चीन के प्रमुख जातीय समूह तथा प्रमुख भाषा का नाम बताएँ। यहाँ की अन्य राष्ट्रीयताएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
चीन का प्रमुख जातीय समूह ‘हान’ तथा प्रमुख भाषा चीनी (पुतोंगहुआ) है। यहाँ की अन्य राष्ट्रीयताएँ हैं-उइघुर, हुई, मांचू तथा तिब्बती।

प्रश्न 39.
जापान की जनसंख्या में कौन-कौन लोग शामिल हैं?
उत्तर:
जापान की अधिकतर जनसंख्या जापानी है। इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ आयनू अल्पसंख्यक तथा कुछ कोरिया के लोग भी रहते हैं। कोरिया के लोगों को यहाँ उस समय मजदूर के रूप में लाया गया था जब कोरिया जापान का उपनिवेश था।

प्रश्न 40.
जापान के लोगों के भोजन.की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
जापान के लोगों का मुख्य भोजन चावल है और मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। यहाँ कच्ची मछली साशिमी या सूशी बहुत ही लोकप्रिय है क्योंकि इसे बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।

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प्रश्न 41.
16वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में जापान में भविश्य के राजनीतिक विकास की भूमिका तैयार करने में किन परिवर्तनों का योगदान था?
उत्तर:

  • किसानों से शस्त्र ले लिए गए। अब केवल समुराई ही तलवार रख सकते थे। इससे शान्ति और व्यवस्था बनी रही।
  • दैम्यो को अपने क्षेत्रों की राजधानी में रहने के आदेश दिए गए। उन्हें काफी सीमा तक स्वायत्तता प्रदान की गई।
  • मालिकों और करदाताओं का निर्धारण करने के लिए भूमि का सर्वेक्षण किया गया और भूमि का वर्गीकरण उत्पादकता के आधार पर किया गया। इसका उद्देश्य राजस्व के लिए स्थायी आधार बनाना था।

प्रश्न 42.
17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में होने वाले नगरों के विस्तार की विशेषताएं बताओ।
उत्तर:

  • 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान का एदो नगर संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर बन गया।
  • ओसाका और क्योतो भी बड़े शहरों के रूप में उभरे।
  • दुर्गों वाले कम-से-कम 6 शहर ऐसे थे जहाँ की जनसंख्या 50,000 से अधिक थी। इसकी तुलना में अधिकतर यूरोपीय देशों में केवल एक-एक ही बड़ा शहर था।

प्रश्न 43.
जापानी लोग (16वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में) छपाई कैसे करते थे?
उत्तर:
जापानी लोगों को यूरोपीय छपाई पसन्द नहीं थी। वे लकड़ी के ब्लाकों से छपाई करते थे। पुस्तकों की लोकप्रियता से पता. चलता है कि पुस्तकों की छपाई व्यापक स्तर पर की जाती थी।

प्रश्न 44.
16वीं तथा 17वीं शताब्दी में जापान को एक धनी देश क्यों समझा जाता था?
उत्तर:
जापान चीन से रेशम जैसी विलास की वस्तुएँ तथा भारत से कपड़े का आयात करता था। जापान इसका मूल्य सोने में चुकाता था। इसी कारण जापान को एक धनी देश समझा जाता था।

प्रश्न 45.
जापान द्वारा अपने आयातों का मूल्य सोने में चुकाने से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़े बोझ को कम करने के लिए उठाए गए कोई दो पग बताइए।
उत्तर:

  • बहुमूल्य धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी गई।
  • निशिजिन (क्योतो) में रेशम उद्योग का विकास किया गया, ताकि रेशम का आयात न करना पड़े। शीघ्र ही यह उद्योग संसार का सबसे बड़ा उद्योग बन गया।

प्रश्न 46.
कॉमोडोर पेरी (अमेरिका) जापान कब आया? उसके प्रयत्नों से अमेरिका तथा जापान के बीच हुई सन्धि की कोई दो शर्ते बताएँ।
उत्तर:
कॉमोडोर पेरी 1853 ई. में जापान आया। उसके प्रयत्नों से अमेरिका तथा जापान के बीच हुई सन्धि के अनुसार-

  • जापान के दो बन्दरगाह अमेरिकी जहाजों के लिए खोल दिए गए।
  • अमेरिका को जापान में थोड़ा-बहुत व्यापार करने की छूट भी मिल गई। इस घटन को ‘जापान का खुलना’ भी कहते हैं।

प्रश्न 47.
निशिजिन (क्योतो) में रेशम उद्योग के विकास के कोई तीन पहलू बताइए :
उत्तर:

  • 1713 से यहाँ केवल देशी रेशमी धागा प्रयोग किया जाने लगा, जिससे इस उद्योग को और अधिक प्रोत्साहन मिला।
  • निशिजिन में केवल विशिष्ट प्रकार के महंगे उत्पाद बनार जाते थे।
  • 1859 ई. में देश का व्यापार आरम्भ होने पर रेशम जापान की अर्थव्यवस्था व लिए मुनाफे का प्रमुख स्रोत बन गया।

प्रश्न 48.
मेजी पुर्नस्थापना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
1867-68 ई. में जापान में शोगुन (तोकुगोवा वंश का) शासन समाप्त कर दिए गया और उसके स्थान पर नये अधिकारी तथा सलाहकार सामने आये। ये लोग जापानी सम्रा के नाम पर शासन चलाते थे। इस प्रकार देश में सम्राट फिर से सर्वेसर्वा बन गया। उसने मेज की उपाधि धारण की। जापान के इतिहास में इस घटना को मेजी पुर्नस्थापना कहा जाता है।

प्रश्न 49.
जापान में मेजी शासन के अधीन ‘फुकोकु क्योहे’ के नारे से क्या तात्पर्य था?
उत्तर:
फुकोकु क्योहे के नारे से तात्पर्य था-समृद्ध देश, मजबूत सेना। वास्तव में सरकार ने यह जान लिया था कि उसे अपनी अर्थव्यवस्था का विकास तथा मजबूत सेना का निर्माण करने की आवश्यकता है, वरना उन्हें भी भारत की तरह दास बना लिया जाएगा। इसीलिए फुकोकु क्योहे का नारा दिया गया।

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प्रश्न 50.
‘सम्राट व्यवस्था’ से जापानी विद्वानों का क्या अभिप्राय था?
उत्तर:
सम्राट व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था, जिसमें सम्राट नौकरशाही और सेना मिलकर सत्ता चलाते थे। नौकरशाही तथा सेना सम्राट के प्रति उत्तरदायी होती थी।

प्रश्न 51.
जापान में नयी विद्यालय व्यवस्था क्या थी? इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
1870 के दशक से जापान में नयी विद्यालय-व्यवस्था अपनाई गई। इसके अनुसार सभी लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल जाना अनिवार्य कर दिया गया। पढ़ाई की फीस बहुत कम थी। परिणाम यह हुआ कि 1910 तक ऐसी स्थिति आ गई कि कोई भी बच्चा स्कूल जाने से वंचित नहीं रहा।

प्रश्न 52.
मेजी शासन के अधीन किए गए कोई दो सैनिक परिवर्तन बताएँ।
उत्तर:
मेजी शासन के अधीन निम्नलिखित सैनिक परिवर्तन हुए-

  • 20 साल से अधिक आयु वाले प्रत्येक नवयुवक के लिए एक निश्चित समय के लिए सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी गई।
  • एक आधुनिक सैन्य बल तैयार किया गया।

प्रश्न 53.
जापान में लोकतान्त्रिक संविधान और आधुनिक सेना के दो अलग आदर्शों को महत्त्व देने के क्या परिणाम निकलें ?
उत्तर:

  • जापान आर्थिक रूप से विकास करता रहा।
  • सेना ने साम्राज्य विस्तार के लिए दृढ़ विदेश नीति अपनाने के लिए दबाव डाला। इस कारण चीन और रूस के साथ युद्ध हुए, जिनमें जापान विजयी रहा। शीघ्र ही उसने अपना एक औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर लिया।

प्रश्न 54.
1902 की आंग्ल-जापान संधि पर ब्रिटेन ने हस्ताक्षर क्यों किए? जापान के लिए इस संधि का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
1902 की आंग्ल-जापान संधि पर ब्रिटेन ने इसलिए हस्ताक्षर किए क्योंकि वह चीन में रूसी प्रभाव को रोकना चाहता था। जापान के लिए इस संधि.का यह महत्त्व था कि इसके अनुसार उसे विश्व के अन्य उपनिवेशवादियों के बराबर का दर्जा मिल गया।

प्रश्न 55.
मेजी युग में अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के लिए उठाए गए कोई तीन कदम बताइए।
उत्तर:

  • कृषि पर कर लगाकर धन एकत्रित किया गया।
  • 1870-1872 में तोक्यो (Tokyho) और योकोहामा बन्दरगाह के बीच जापान की पहली रेल लाइन बिछाई गई।
  • वस्तु उद्योग के विकास के लिए यूरोप में मशीनें आयात की गई।

प्रश्न 56.
जापान में 1920 के बाद जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए क्या कदम उठाए गए?
उत्तर:
जापान में जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए सरकार ने प्रवास को बढ़ावा दिया। पहले लोगों को उत्तरी द्वीप होकायदो की ओर भेजा गया। यह काफी हद तक एक स्वतन्त्र प्रदेश था और वहाँ आयनू कहे जाने वाले लोग रहते थे। इसके बाद उन्हें हवाई, ब्राजील और जापान का बढ़ते हुए औपनिवेशिक साम्राज्य की ओर भेजा गया।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चीनी कोमितांग पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें।
उत्तर:
कोमितांग की स्थापना 1912 ई. में चीन के राष्ट्रवादी नेता सनयात सेन ने की थी। उनके तीन मुख्य उद्देश्य थे-

  • चीन को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करवाना
  • चीन में आधुनिक लोकतन्त्र की स्थापना करना तथा
  • भूमि सुधारों द्वारा कृषकों को सामन्ती नियन्त्रण से मूक्त। करवाना।

सनयात सेन के अधीन कोमिनतांग की लोकप्रियता दूर-दूर तक फैल गई। इस संस्था के उद्देश्य 1921 ई. में स्थापित साम्यवादी दल से मेल खाते थे। परन्तु शीघ्र ही दोनों दलों में मतभेद उत्पन्न हो गए। 1925 ई. में सनयात सेनं की मृत्यु हो गई और कोमिनतांग का नेतृत्व च्यांग-काई-शेक के हाथों में आ गया। उसने साम्यवादियों पर क्रूर अत्याचार करना आरम्भ कर दिए। विवश होकर साम्यवादी नेता माओ जेड़ांग ने महाप्रस्थान (600 मील की लम्बी यात्रा) का कार्यक्रम अपनाया और उत्तरी चीन में अपना प्रभाव बढ़ा लिया। अन्ततः 1949 ई. में उसने च्यांग-काई-शेक को फारमोसा (वर्तमान ताइवान) भाग जाने के लिए विवश कर दिया। इस प्रकार कोतिनतांग का पतन हो गया।

प्रश्न 2.
चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1965) क्या थी? इसका क्या। परिणाम निकला?
उत्तर:
‘समाजवादी व्यक्ति’ की रचना के इच्छुक माओवादियों और माओ की साम्यवादी विचारधारा के आलोचकों के बीच संघर्ष छिड़ गया। 1965 की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति इसी संघर्ष का परिणाम थी। माओ ने यह क्रान्ति आलोचकों का सामना करने के लिए आरम्भ की थी पुरानी संस्कृति, पुराने रिवाजों और पुरानी आदतों के विरुद्ध अभियान छेड़ने के लिए रेड गार्ड्स-मुख्यतः छात्रों और सेना का प्रयोग किया गया। छात्रों और पेशेवर लोगों को जनता से सीख लेने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में भेजा गया। साम्यवादी होने की विचारधारा पेशेवर ज्ञान से भी अधिक महत्त्वपुर्ण बन गई। तर्कसंगत वादविवाद का स्थान दोषरोपण और नारेबाजी ने ले लिया।

परिणाम – सांस्कृतिक क्रान्ति से देश में खलबली मच गई, जिससे पार्टी कमजोर हुई अर्थव्यवस्था और शिक्षा के प्रसार में भी भारी बाधा आई। परन्तु 1960 के उत्तरार्द्ध से स्थिति बदलने लगी। 1975 में पार्टी ने एक बार फिर कड़े सामाजिक अनुशासन और औद्योगिक अर्थव्यवस्था के निर्माण पर बल दिया, ताकि देश बीसवीं शताब्दी के अन्त तक एक शक्तिशाली देश बन सके।

प्रश्न 3.
चीन में हुई सांस्कृतिक क्रान्ति की व्याख्या करें।
उत्तर:
चीन में सन् 1965 में माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरूआत की। माओ समाजवादी व्यक्ति की रचना के इच्छुक थे तथा दक्षता के बजाय विचारधारा पर बल देते थे। इसके विपरीत चीन में कुछ लोग समाजवादी विचारधारा के स्थान पर पूँजीवाद पर बल दे रहे थे। माओ ने इसी द्वन्द की समाप्ति हेतु सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरुआत की जिसके तहत प्राचीन संस्कृति और पुराने रिवाजों और पुरानी आदतों के खिलाफ रेड गार्डस का इस्तेमाल किया गया। रेड गार्डस में मुख्यत: सेना एवं छात्रों का प्रयोग होता था। नागरिकों के दोषरोपण ने तर्कसंगत बहस का स्थान ले लिया और चीन सांस्कृतिक परिवर्तन की करवट लेने लग गया।

प्रश्न 4.
माओ-त्से-तुंग ने पार्टी (साम्यवादी) द्वारा निर्धारित लक्ष्या की प्राप्ति के लिए क्या किया? क्या उनके तौर-तरीके पार्टी के सभी लोगों को पसंद थे?
उत्तर:
माओ-त्से-तुंग पार्टी द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जनसमुदाय को प्रेरित करने में सफल रहे। उनकी चिन्ता ‘समाजवादी व्यक्ति’ बनाने की थी जिसे पांच चीजें प्रिय होनी थीं-पितृभूमि, जनतप, काम, विज्ञान और जन सम्पत्ति। किसानों, महिलाओं, छात्रों और अन्य गुटों के लिए जन संस्थाएँ बनाई गईं। उदाहरण के लिए ‘ऑल चाइना डेमोक्रेटिक वीमेंस फेडरेशन’ के 760 लाख सदस्य थे। इसी प्रकार ‘ऑल चाइना स्टूडेंट्स फेडरेशन’ के 32 लाख 90 हजार सदस्य थे। परन्तु ये लक्ष्य और तरीके पार्टी के सभी लोगों को पसन्द नहीं थे। 1953-54 में कुछ लोग. औद्योगिक (1896-1969) तथा तंग शीयाओफी (1904-97) ने कम्यून प्रथा को बदलने की चेष्ठा को क्योंकि यह कुशलतापूर्वक काम नहीं कर रही थी। घरों के पिछवाड़े में बनाया गया स्टील औद्योगिक दृष्टि से उपयोगी नहीं था।

प्रश्न 5.
चीन में भयंकर अकाल क्यों पड़ा? अथवा, माओ का ‘आगे की ओर महान छलांग’ कार्यक्रम क्यों असफल रहा?
उत्तर:
चीन का भयंकर अकाल ‘आगे की ओर महान छलांग’ कार्यक्रम की असफलता का परिणाम था। यह कार्यक्रम मुख्यतः तकनीकी कारणों से असफल रहा। कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए त्रुटिपूर्ण कृषि तकनीकों का प्रयोग किया गया। उदाहरण के लिए-

  • भूमि में सामान्य मात्रा से दस गुणा अधिक बीज डाला गया। इससे पौधे बढ़ने से पहले ही मर गए।
  • गेहूँ और मक्का को एक साथ बोने का प्रयास किया गया। परन्तु यह प्रयास असफल रहा।
  • चिड़ियाँ खेत में बिखरे बीजों को खा जाती थी। इसलिए उन्हें बड़ी संख्या में मार दिया गया। दुर्भाग्य से इसके भी बुरे परिणाम निकले। जब फसलों पर कीड़े आए तो उन्हें खाने के लिए चिड़ियाँ न रहीं।

अतः फसलें नष्ट हो गई। इसके अतिरिक्त सिंचाई यन्त्रों को गलत स्थानों पर स्थापित किया गया, जिससे भूमि का बड़े पैमाने पर अपरदन हुआ। बोई जाने वाली फसलों के सम्बन्ध में कोई विशेष दिशा-निर्देश नहीं दिए गए थे। इसके परिणामस्वरूप सब्जियों तथा अन्य फसलों का उत्पादन शून्य हो गया। इस प्रकार देश में भयंकर अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गई।

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प्रश्न 6.
चीन में भयंकर अकाल के दौरान सरकार द्वारा भ्रामक प्रचार तथा उसकी त्रुटिपूर्ण नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चीनी नेता केवल आधिकारिक आंकड़ों में विश्वास रखने लगे थे। फसलों की रिकार्ड वृद्धि केवल मात्र दिखावा थी। वास्तव में उत्पादन आँकड़ों का मात्र एक तिहाई था। सरकार ने स्थिति को वश में रखने के लिए भ्रामक प्रचार की नीति अपनाई तथा नये-नये नारे गढ़ लिए। उदाहरण के लिए 1959 ई. में अकाल के समय लोगों को घास को उबालकर खाना पड़ रहा था उस समय पार्टी ने लोगों को सुझाव दिया कि “अधिक उत्पादन वाले वर्ष में भी कम खायें”। लोग इतने कमजोर हो गए कि वह काम भी नहीं कर सकते थे। वे सारा दिन घर पर रहने लगे। इस स्थिति में देश के रेडियो लोगों को आराम करने की सलाह देने लगे। देश के डॉक्टरों ने प्रचार किया कि चीन के लोगों को विटामिन तथा वसा की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनका शारीरिक गठन ही विशेष प्रकार का है। सरकार की इस त्रुटिपूर्ण नीति ने अकाल की स्थिति को और भी गम्भीर बना दिया।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए
(i) माओ की आगे की महान छलांग (Great Leap Forward) कार्यक्रम
(ii) पिंगपोंग (Ping Pong) कूटनीति
(iii) तियाननमेन स्क्वायर हत्याकांड।
उत्तर:
(i) माओ की आगे की ओर महान छलांग (Great Leap Forward) कार्यक्रम – ‘आगे की ओर महान् छलांग’ माओ का एक आर्थिक कार्यक्रम था। यह कार्यक्रम 1959 ई. में आरम्भ किया गया। इसके अन्तर्गत ग्रामीण सहकारी समितियों और सामूहिक खेतों को मिलाकर बड़े-बड़े कम्यून बना दिए गए। ये कम्यून राष्ट्र के स्वामित्व के प्रतीक थे। इसका उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ औद्योगिकीरण को बढ़ावा देना था। परन्तु इसके विनाशकारी परिणाम निकले। इसका कारण यह था कि कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी के अधिकारी इसे उस पैमाने पर लागू करने में सक्षम नहीं थे, जैसा माओ ने सोचा था। अत: एक बार फिर चीन को खाद्यान्न के अभाव तथा औद्योगिक मन्दी का सामना करना पड़ा।

(ii) पिंगपोंग (Ping Pong) कूटनीति – साम्यवादी चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण थे। इसके दो मुख्य कारण थे-एक तो दोनों देशों की अर्थव्यवस्था अलग-अलग थी। दूसरे अमेरिका ने अभी तक जनबादी चीन को मान्यता नहीं दी थी। वह ताइवान में स्थित च्यांग-काई-शेक को चीन की वास्तविक सरकार मानता था। संयुक्त राष्ट्र में भी ताइवान को ही सदस्यता प्राप्त थी। परन्तु 1972 ई. में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्यन ने एकाएक चीन की यात्रा करने का कार्यक्रम बना लिया।

यह कार्यक्रम दोनों देशों के अधिकारियों के बीच लगभग दस वर्षों से चल रही कूटनीतिक वार्ताओं का परिणाम था। इन्हीं गुप्त वार्ताओं को ही पिंगपोंग कूटनीति का नाम दिया जाता था। दोनों देशों के बीच सम्बन्ध में पाकिस्तान ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अन्ततः मार्च, 1972 ई. में निक्सन ने चीन की यात्रा की। उसने जनवादी चीन को ही वास्तविक चीन स्वीकार कर लिया और उसे मान्यता दे दी। इसके परिणामस्वरूप ताइवान का स्थान जनवादी चीन को मिल गया। इस प्रकार अमेरिका और चीन के बीच स्थायी रूप से राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित हो गए।

(iii) तियाननमेन स्क्वायर हत्याकांड – चीन में साम्यवादी पार्टी के कुछ नेता कठोर नीति में विश्वास रखते थे। उन्हें चीनी शासक डेंग के उदारवादी तरीके पसन्द नहीं थे। इसलिए वे डेंग पर कठोर नीति अपनाने के लिए दबाव डाल रहे थे। डेंग ने अपनी स्थिति को मजबूत बनाने के लिए विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे पार्टी की कठोर नीतियों के समर्थकों की कमजोरियों का पता लगाएँ। परन्तु 1988-89 में उसके अपने आर्थिक सुधार ही असफल होते दिखाई देने लगे। वस्तुओं के दाम वेतनों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गए। मई, 1989 ई. में बीजिंग के विद्यार्थी नगर के प्रसिद्ध तियाननमेन चौक में शान्तिपूर्वक इकट्ठे होने लगे। वे और अधिक राजनीतिक सुधारों, प्रजातन्त्र तथा पार्टी में भ्रष्टाचार को समाप्त करने की मांग करने लगे।

अपनी मांग को पूरा करवाने के लिए उन्होंने संगीतमय रंगारंग प्रदर्शन भी किए। प्रजातन्त्र को अर्पित एक बुत भी बनाया गया, जिसके गाने में उत्साहपूर्वक मालाएं पहनाई गई। इन प्रदर्शनों की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए सरकार के कान खड़े हो गए। उसने इन्हें साम्यवादी पार्टी की सत्ता के लिए चुनौती माना। डेंग स्वयं कठोर नीतिः पर उतर आया। उसने अपने दो उदारवादी अधिकारियों को हय दिया। 3 जून, 1989 की रात को चौक में टैंकों सहित सेना भेज दी गई। चौक में एकत्रित 1500-3000 लोगों को गोलियों से उड़ा दिया गया। इस हत्याकांड की पूरे विश्व में भर्त्सना हुई। परन्तु चीन ने इसकी कोई परवाह न की।

प्रश्न 8.
1911 ई. की चीनी क्रान्ति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
कारण-1911 ई. की क्रान्ति का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसकी बढ़ती हुई जनसंख्या थी। इससे भोजन की समस्या गम्भीर होती जा रही थी। इसके अतिरिक्त 1910-1911 ई. की भयंकर बाढ़ों के कारण लाखों लोगों की जानें गई तथा देश में भुखमरी फैल गई। इससे लोगों में असन्तोष बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह की आग भड़क उठी। क्रान्ति का दूसरा कारण ‘प्रवासी चीनियों का योगदान’ था। विदेशों में रहने वाले चीनी लोग काफी धनी हो गए थे। वे चीन में सत्ता परिवर्तन के पक्ष में थे।

अतः उन्होंने क्रान्तिकारी संस्थाओं की खूब सहायता की। मंचू सरकार के नए कर भी क्रान्ति लाने में सहायक सिद्ध हुए। इन करों के लगने से चीन के लोगों में क्रान्ति की भावनाएँ भड़क उठीं। जापान की उन्नति भी चीनी क्रान्ति एक कारण था। चीन के लोग मंचू सरकार को समाप्त करके जापान की भाँति उन्नति करना चाहते थे। चीन में यातायात के साधनों का सुधार होने के कारण चीनी क्रान्ति के विचारों के प्रसार को काफी बल मिला। अतः यह भी क्रान्ति का एक अन्य कारण था।

प्रश्न 9.
1911 की चीनी क्रान्ति के परिणामों तथा महत्त्व की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1911 ई. की क्रान्ति के दो मुख्य परिणाम निकले-मंचू राजवंश का अन्त तथा गणतन्त्र की स्थापना। परन्तु इस क्रान्ति का महत्त्व इन्हीं दो बातों तक ही सीमित नहीं था। वास्तव में यह क्रान्ति गणतन्त्र की राजतन्त्र पर विजय थी। इसकी एक विशेष बात यह भी थी कि वह विजय बिना किसी रक्तपात के प्राप्त की गई थी। इसके अतिरिक्त चीन की जनता को एक संविधान प्राप्त हुआ और देश में जनता की सम्प्रभुत्ता की घोषणा की गई। इस क्रान्ति की एक और विशेष बात यह रही कि क्रान्तिकारियों ने सम्राट के प्रतिनिधि युआन शिकाई को ही चीनी गणतन्त्र के राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त विदेशी शक्तियाँ भी इस क्रान्ति के प्रति पूर्णतया तटस्थ (Neutral) रहीं। देश में 1911 की क्रान्ति ने राष्ट्रीय भावना का संचार किया। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इसने चीनियों को शोषण से मुक्ति दिलाई और उनके सम्मान को बढ़ाया।

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प्रश्न 10.
आधुनिक चीन का संस्थापक किसे माना जाता है? उनका तथा उनके सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
सन-यात-सेन (1866-1925) को आधुनिक चीन का संस्थापक माना जाता है। वह एक गरीब परिवार से थे। उन्होंने मिशन स्कूलों में शिक्षा ग्रहण की जहाँ उनका परिचय लोकतन्त्र और ईसाई धर्म से हुआ। उन्होंने टास्टरी की पढ़ाई की। परन्तु वह चीन में भविष्य को लेकर चिन्तित थे। उनका कार्यक्रम तीन सिद्धान्त (सन-मिन-चुई) के नाम से विख्यात है। ये तीन सिद्धान्त हैं-

  • राष्ट्रवाद-इसका अर्थ था मांचू वंश, जिसे विदेशी राजवंश माना जाता था को सत्ता से हटाना।
  • गणतन्त्र-गणतान्त्रिक सरकार की स्थापना करना।
  • समाजवाद-पूँजी का नियमन करना और भूस्वामित्व में बराबरी लाना। सन-यात-सेन के विचार फुओयीनतांग के राजनीतिक दर्शन का. आधार बने। उन्होंने कपड़ा, भोजन, घर और परिवहन-इन चार बड़ी आवश्यकताओं को रेखांकित किया।

प्रश्न 11.
चीन में 4 मई के आन्दोलन पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
4 मई, 1919 को प्रथम विश्व युद्ध के बाद हुए शान्ति सम्मेलन के निर्णयों के विरोध में बीजिंग में एक जोरदार प्रदर्शन हुआ। भले ही चीन ने ब्रिटेन के नेतृत्व में विजयी आन्दोलन का रूप ले लिया जिसने एक पूरी पीढ़ी को परम्परा से हटकर चीन को अधुनिक विज्ञान, लोकतन्त्र और राष्ट्रवाद द्वारा बचाने के लिए प्रेरित किया। क्रान्तिकारियों ने देश के संसाधनों को विदेशियों से मुक्त कराने, असमानताएँ समाप्त करने और गरीबी को कम करने का नारा लगाया। उन्होंने लेखन में सरल भाषा का प्रयोग करने, पैरों को बाँधने की प्रथा और औरतों की अधीनस्थता को समाप्त करने, विवाह में बराबरी लाने और गरीबी को समाप्त करने के लिए आर्थिक विकास की माँग की।

प्रश्न 12.
चीन में अभिजात सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश दिलाने वाली परीक्षा प्रणाली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चीन में अभिजात सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश अधिकतर परीक्षा द्वारा ही होता था। इसमें 8 भाग वाला निबन्ध निर्धारित प्रपत्र में (पा-कू-वेन) शास्त्रीय चीनी में लिखना होता था। यह परीक्षा विभिन्न स्तरों पर प्रत्येक 3 वर्ष में 2 बार आयोजित की जाती थी। पहले स्तर की परीक्षा में केवल 1-2 प्रतिशत लोग ही 24 साल की आयु तक पास हो पाते थे और वे ‘सुन्दर प्रतिभा’ बन जाते थे। इस डिग्री से उन्हें निचले कुलीन वर्ग में प्रवेश मिल जाता था। 1850 से पहले देश में 526869 सिविल और 212330 सैन्य प्रान्तीय (शेंग हुआन) डिग्री वाले लोग मौजूद थे।

क्योंकि देश में केवल 27000 राजकीय पद थे। इसलिए निचले दर्जे के कई डिग्रीधारकों को नौकरी नहीं मिल पाती थी। यह परीक्षा विज्ञान और प्रोद्योगिकी के विकास में बाधक थी। इसका कारण यह था कि इसमें केवल साहित्यिक कौशल पर ही बल दिया जाता था। केवल क्लासिक चीनी सीखने की कला पर ही आधारित होने के कारण 1905 ई. में इस परीक्षा प्रणाली को समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 13.
1930 ई. जुनवू (चीन) में क्या सर्वेक्षण किया गया? इसका क्या उद्देश्य और महत्त्व था?
उत्तर:
1930 में जुनवू में किए गए एक सर्वेक्षण में माओ-त्से-तुंग ने नमक और सोयाबीन जैसे दैनिक प्रयोग की वस्तुओं, स्थानीय संगठनों की तुलनात्मक मजबूतियों, छोटे व्यापारियों, दस्तकारों और लोहारों, वेश्याओं तथा धार्मिक संगठनों की मजबूतियों का परीक्षण किया। इसका उद्देश्य शोषण के अलग-अलग स्तरों को समझना था। उन्होंने ऐसे आँकड़े इकट्ठे किए कि कितने किसानों ने अपने बच्चों को बेचा है और इसके लिए उन्हें कितने पैसे मिले। लड़के 100-200 यूआन पर बिकते थे। परन्तु लड़कियों की बिक्री के कोई प्रमाण नहीं मिले, क्योंकि जरूरत मजदूरों की थी लैंगिक शोषण की नहीं। इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के तरीके पेश किए।

प्रश्न 14.
चीन की ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ सरकार की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चीन में 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार स्थापित हुई। यह ‘नए लोकतन्त्र’ के सिद्धान्तों पर आधारित थी। नया लोकतन्त्र सभी सामाजिक वर्गों का गठबन्धन था। अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्र सरकार के नियन्त्रण में रखे गए। निजी कारखानों और भूस्वामित्व को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया। यह कार्यक्रम 1953 तक चला, जब सरकार ने समाजवादी परिवर्तन का कार्यक्रम आरम्भ करने की घोषणा की। 1958 में ‘लम्बी छलांग वाले’ आन्दोलन द्वारा देश का तेजी से औद्योगीकरण करने का प्रयास किया गया। लोगों को अपने घर के पिछवाड़े में इस्पात की भट्टियाँ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। ग्रामीण इलाकों में पीपुल्स कम्यूंस आरम्भ किए गए। इसमें लोग सामूहिक रूप से भूमि के स्वामी थे और मिल-जुल कर फसल उगाते थे।

प्रश्न 15.
चीन के भौतिक भूगोल, प्रमुख जातीय समूहों तथा भाषाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भौतिक भूगोल – चीन एक विशालकाय महाद्वीपीय देश है। इसमें कई प्रकार की जलवायु वाले क्षेत्र शामिल हैं। इसके मुख्य क्षेत्र में 3 प्रमुख नदियाँ हैं-पीली नदी अथवा हुआंग हो, संसार की तीसरी सबसे लम्बी नदी यांग्त्सी और पर्ल नदी। देश का बहुत बड़ा भाग पहाड़ी है।

जातीय समूह तथा भाषाएँ – चीन का सबसे प्रमुख जातीय समूह हान है और यहाँ की प्रमुख भाषा है-चीनी । हाल के अतिरिक्त चीन में कई अन्य राष्ट्रीयताएं भी हैं; जैसे-उइघुर, हुई, मांचू और तिब्बती। इसी प्रकार कई अन्य भाषाएं भी बोली जाती हैं । जैस-कैंटनीज कैंटन (गुआंगजाओ) की बोली-उए और शंघाईनीज (शंघाई की बोली-वू)।

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प्रश्न 16.
चीनी भोजनों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
चीनी भोजनों में क्षेत्रीय विविधता पायी जाती है। इनमें मुख्य रूप से चार प्रकार के भोजन शामिल हैं।-

  • सबसे प्रसिद्ध पाक प्रणाली दक्षिणी या केंटोनी है। यह कैंटन तथा उसके आन्तरिक क्षेत्रों की पाक प्रणाली है। इसकी प्रसिद्धि इस बात के कारण है कि विदेशों में रहने वाले अधिकतर चीनी कैंटन प्रान्त से सम्बन्धित हैं। डिम सम (शाब्दिक अर्थ दिल को छूना) यहीं का जाना माना खाना है। यह गुंधे हुए आटे को सब्जी आदि भरकर उबाल कर बनाया गया व्यंजन है।
  • उत्तर में गेहूँ मुख्य आहार है।
  • शेचुओं में प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लाए गए मसाले और रेशम मार्ग द्वारा पन्द्रहवीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा लाई गई मिर्च के कारण झालदार और तीखा खाना मिलता है।
  • पूर्वी चीन में चावल और गेहूँ दोनों खाए जाते हैं।

प्रश्न 17.
जापान की भौतिक विशेषताओं की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
जापान की मुख्य भौतिक विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • जापान एक द्वीप शृंखला है । इनमें से चार सबसे बड़े द्वीप हैं-होंशू, क्यूशू, शिकोकू और होकाइदो। सबसे दक्षिण में ओकिनावा द्वीपों की श्रृंखला है। मुख्य द्वीपों की 50 प्रतिशत से अधिक भूमि पहाड़ी है।
  • जापान बहुत ही सक्रिय भूकम्प क्षेत्र में आता है।
  • जापान की भौगोलिक परिस्थितियों ने वहाँ की वास्तुकला को प्रभावित किया है।
  • देश की अधिकतर जनसंख्या जापानी है। परन्तु यहाँ कुछ आयनू अल्पसंख्यक और कुछ कोरिया के लोग भी रहते हैं। कोरिया के लोगों को यहाँ श्रमिकों के रूप में उस समय लाया गया था जब कोरिया जापान का उपनिवेश था।
  • जापान में पशु नहीं पाले जाते हैं।
  • चावल यहाँ की मुख्य खाद्य फसल है और मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। यहाँ की कच्ची मछली साशिमी अथवा सूशी अब संसार भर में लोकप्रिय है क्योंकि इसे बहुत ही स्वास्थ्यवर्द्धक माना जाता है।

प्रश्न 18.
जापान पर तोकुगावा वंश के शोगुनों ने कब से कब तक शासन किया? वे अपना शासन किस प्रकार चलाते थे?
उत्तर:
जापान.पर क्योतो में रहने वाले सम्राट का शासन हुआ करता था। परन्तु बारहवीं शताब्दी तक वास्तविक सत्ता शोगुनों के हाथ में आ गई। वे सैद्धान्तिक रूप से राजा के नाम पर शासन करते थे। 1603 से 1867 तक तोकुगावा परिवार के लोग शोगुन पद पर आसीन थे। देश 250 भागों में विभाजित था, जिनका शासन दैम्यों लार्ड चलाते थे। शोगुन दैम्यो पर नियन्त्रण रखते थे। उन्होंने दैम्यो को लम्बे समय तक राजधानी एदो (आधुनिक तोक्यो) में रहने का आदेश दिया, ताकि वे उनके लिए कोई खतरा न बन जाएँ। शोगुन प्रमुख शहरों और खदानों पर भी नियन्त्रण रखते थे। जापान का योद्धा वर्ग सामुराई (शासन करने वाला) अभिजात था। वे शोगुन तथा दैम्यो की सेवा में थे।

प्रश्न 19.
जापान में नगरों का आकार कैसे बढ़ा ? इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
जापान में दैम्यो की राजधानियों का आकार लगातार बढ़ने लगा। 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में एदो (आधुनिक तोक्यो) संसार का सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर बन गया। इसके अतिरिक्त ओसाका और क्योतो भी बड़े शहरों के रूप में उभरे। दुर्गों बाले कम-से-कम छ: शहर ऐसे थे जहाँ की जनसंख्या 50,000 से भी अधिक थी। इसकी तुलना में उस समय के अधिकतर यूरोपीय देशों में केवल एक-एक ही बड़ा शहर था।
महत्तव-

  • बड़े शहरों के परिणामस्वरूप जापान की वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का विकास हुआ और वित्त एवं ऋण की प्रणालियाँ स्थापित हुईं।
  • व्यक्ति के गुण उसके पद से अधिक मूल्यवान समझे जाने लगे।
  • शहरों में जीवंत संस्कृति का प्रसार होने लगा।
  • बढ़ते हुए व्यापारी वर्ग ने नाटकों और कलाओं को संरक्षण प्रदान किया।
  • लोगों की पढ़ने में रुचि ने होनहार लेखकों को अपने लेखन द्वारा अपनी जीविका चलाने में सहायता पहुँचाई।

प्रश्न 20.
ताकुगावा शासन के अधीन जापान की अर्थव्यवस्था में आए परिवर्तनों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
ताकुगावा शासन के अधीन जापान को बस धनी देश समझा जाता था। इसका कारण यह था कि वह चीन से रेशम जैसी विलासी वस्तुएँ, भारत से कपड़े का आयात करता था। इन आयतों का मूल्य चाँदी और सोने में चुकाया जाता था। इसका देश की अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक भार पड़ा। अतः तामुगावा ने मूल्यवान् धातुओं के निर्यात पर रोक लगा दी। उन्होंने क्योतो में निशिजिन में रेशम उद्योग के विकास के लिए भी पग उठाये, ताकि रेशम का आयात कम किया जा सके। निशिजिन का रेशम विश्व भर में सबसे अच्छा. रेशम माना जाने लगा। मुद्रा के बढ़ते हुए प्रयोग और चावल के शेयर बाजार के निर्माण से पता चलता है कि अर्थतन्त्र नयी दिशाओं में विकसित हो रहा था।

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प्रश्न 21.
जापान में कामोडोर पेरी के आगमन और इसके महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1853 में अमेरिका ने कॉमोडोर मैथ्यू पेरी को जापान भेजा। उसने जापान सरकार से ए’ समझौते पर हस्ताक्षर करने की माँग। इसके अनुसार को अमेरिका के रराजनयिक और व्यापारिक सम्बन्ध बनाने थे। इस समझौते पर जापान ने अगले वर्ष हस्ताक्षर किए। वास्तव में जापान चीन के रास्ते में पड़ता था और अमेरिका के लिए चीन का विस्तृत बाजार बहुत ही महत्त्व रखता था। इसके अतिरिक्त अमेरिका को प्रशान्त महासागर में अपने बेड़ों के लिए ईंधन लेने के लिए स्थान चाहिए था। उस समय केवल एक ही पश्चिमी देश जापान के साथ व्यापार करता था और वह था-हालैंड।

महत्त्व – पेरी के आगमन ने जापान की राजनीति पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला। सम्राट का अचानक ही महत्त्व बढ़ गया। इससे पहले तक उसे बहुत ही कम राजनैतिक अधिकार प्राप्त थे। 1864 में एक आन्दोलन द्वारा शोगुन को जबरदस्ती सत्ता से हटा दिया गया और सम्राट मेजी को एदो में लाया गया। एदो को राजधनी बना दिया गया । इसका नया नाम तोक्यो रख गया जिसका अर्थ है पूर्वी राजधानी।

प्रश्न 22.
जापान को बाहरी संसार के लिए खोलने के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क दिया गए?
उत्तर:
जापान के अधिकारीगण और लोग यह जानते थे कि कुछ यूरोपीय देश भारत तथा कई अन्य स्थानों पर औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं। अंग्रेजों के हाथों चीन की पराजय के समाचार फैल रहे थे और इन्हें लोकप्रिय नाटकों में भी दर्शाया जा रहा था। इससे लोगों में यह भय उत्त्पन्न हो गया कि बाहरी दुनिया के साथ सम्पर्क से जापान को भी उपनिवेश बनाया जा सकता है। फिर भी देश के बहुत से विद्वान और नेता युरोप के नए विचारों तथा तकनीकों से सीख लेना चाहते थे. जबकि कछ अन्य विद्वान यरोपीय लोगों को अपने से दूर रखना चाहते थे। कुछ लोगों ने देश को बाहरी संसार के लिए धीरे-धीरे और सीमित रूप से खोलने के लिए तर्क दिया।

अतः जापानी सरकार ने फुकोकु क्योहे (समृद्ध देश, मजबूत सेना) के नारे के साथ नयी नीति की घोषणा की। उन्होंने यह समझ लिया कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था का विकास और मजबुत सेना का निर्माण करने की आवश्यकता है, अन्यथा उन्हें भी भारत की तरह दास बना दिया जाएगा। इस कार्य के लिए जनता में राष्ट्रीय भावना का विकास करने और प्रजा को नागरिक की श्रेणी में लाने की आवश्यकता थी।

प्रश्न 23.
जापान में ‘सम्राट व्यवस्था’ का पुनर्निर्माण किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
जापान में मेजी सरकार ने ‘सम्राट-व्यवस्था’ के पुनर्निर्माण का काम शुरू किया। सम्राट व्यवस्था से जापानी विद्वानों का अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से था जिसमें सम्राट नौकरशाही और सेना मिलकर सत्ता चलाते थे और नौकरशाही तथा सेना सम्राट से प्रति उत्तरदायी होती थी। राजतान्त्रिक व्यवस्था की पूरी जानकारी के लिए कुछ अधिकारियों को यूरोप भेजा गया। सम्राट को सीधे-सीधे सूर्य देवी का वंशज माना गया। वह पश्चिमी ढंग के सैनिक वस्त्र पहनने लगा। उसके नाम से आधुनिक संस्थाएँ स्थापित करने के लिए अधिनियम बनाए जाने लगे। 1890 की शिक्षा सम्बन्धी राजाज्ञा ने लोगों को पढ़ने तथा जनता के सार्वजनिक एवं साँझे हितों को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया।

प्रश्न 24.
जापान में 1870 के दशक में अपनाई गई नयी विद्यालय-व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
1870 के दशक से जापान में नयी विद्यालय-व्यवस्था अपनाई गई। इसके अनुसार सभी लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल जाना अनिवार्य कर दिया गया। 1910 तक ऐसी स्थिति आ गई कोई भी बच्चा स्कूल जाने से वो नहीं रहा। पढ़ाई की फीस बहुत न थी। आरम्भ में पाठ्यक्रम पश्चिमी नमूनों पर आधारित था। परन्तु बाद में आधुनिक विचारों पर बल देने के साथ-साथ राज्य के प्रति निष्ठा और जापानी इतिहास के अध्ययन पर बल दिया जाने लगा। पाठ्यक्रम किताबों के चयन तथा शिक्षकों के प्रशिक्षण पर शिक्षा मन्त्रालय नियन्त्रण रखता था। नैतिक संस्कृति का विषय पढ़ना प्रत्येक के लिए जरूरी था। पुस्तकों में माता-पिता के प्रति आदर, राष्ट्र के प्रति बफादारी और अच्छा नागरिक बनने की प्रेरणा विकसित की जाती थी।

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प्रश्न 25.
राष्ट्र के एकीकरण के लिए जापान की मेजी सरकार ने क्या पग उठाए?
उत्तर:
राष्ट्र के एकीकरण के लिए मेजी सरकार ने पुराने गाँव और क्षेत्रीय सीमाओं को बदल कर एक नया प्रशासनिक ढाँचा तैयार किया। प्रत्येक प्रशासनिक इकाई के पास पर्याप्त राजस्व होना जरूरी था, ताकि स्थानीय स्कूल तथा स्वस्थ्य सुविधाएँ जारी रखी जा सकें। साथ ही ये इकाइयाँ सेना के लिए भर्ती केन्द्रों के रूप में भी कार्य कर सके 20 साल से अधिक आयु वाले प्रत्येक नवयुवक के लिए निश्चित अवधि के लिए सैनिक सेवा अनिवार्य कर दी गई।

एक आधुनिक सैन्य बल तैयार किया गया। राजनीतिक दलों के गठन को नियन्त्रित करने के लिए एक कानून-प्रणाली स्थापित की गई। सेंसर व्यवस्था को भी कठोर बनाया जाना था। ऐसे परिवर्तनों के कारण सरकार को विरोध का सामना करना पड़ा। सेना और नौकरशाही को सीधा सम्राट के अधीन रखा गया। इसका उद्देश्य यह था कि संविधान बनने के बाद भी सेना और नौकरशाही सरकारी नियन्त्रण से बाहर रहे।

प्रश्न 26.
जापान की लिपियों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
जापानियों ने अपनी लिपि छठी शताब्दी में चीनियों से ली थी। परन्तु जापानी भाषा चीनी भाषा से बहुत अलग है। इसलिए उन्होंने दो ध्वन्यात्मक वर्णमालाओं का विकास भी किया-हीरागाना और काकाना। हीरागाना नारी सुलभ समझी जाती है, क्योंकि हेआन काल में बहुत-सी लेखिकाएँ इसका प्रयोग करती थीं। यह चीनी चित्रात्मक चिन्हों और ध्वन्यात्मक अक्षरों को मिलाकर लिखी जाती है। शब्द का प्रमुख भाग चीनी लिपि कांजी के चिह्न से लिया जाता है और शेष भाग हीरागाना से-

ध्वन्यात्मक अक्षरमाला द्वारा ज्ञान को पूरे समाज में फैलाने में सहायता मिली। 1880 के दशक में यह सुझाव दिया गया कि जापानी या तो पुरी तरह से ध्वन्यात्मक लिपि का विकास करें या कोई यूरोपीय भाषा अपना लें। परन्तु दोनों में कुछ भी नहीं किया जा सका।

प्रश्न 27.
1889 में जापान को जो नया संविधान मिला, उसकी कोई चार विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
1889 में जापान को जो नया सम्विधान मिला, उसकी चार मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है-
(i) सम्राट कार्यकारिणी का प्रधान था। उसकी स्थिति काफी महत्त्वपुर्ण थी। सभी मन्त्रियों की नियुक्ति सम्राट ही करता था और वे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। लोगों का विश्वास। था कि सम्राट पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है और वह दैवी-गुणों से सम्पन्न है। इसलिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए।

(ii) संविधान में एक संसद का प्रावधान था, जिसे डाएट (राजा की सभा) कहते थे। डाएट की शक्तियाँ काफी सीमित थीं। सेना के अधिकार इतने अधिक थे कि धीरे-धीरे डाएट पर सेना का प्रभुत्त्व स्थापित हो गया।

(iii) माताधिकार बहुत अधिक सीमित था। यह अधिकार देश की तीन प्रतिशत से भी कम जनता को प्राप्त था।

(iv) राजसत्ता पर कुलीनतन्त्र का नियन्त्रण बढ़ाने के लिए पुलिस को व्यापक अधिकार दिए गए। प्रेस को नियन्त्रित करने, जनसभाओं पर रोक लगाने तथा प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिस को विशेष शक्तियाँ प्राप्त थीं।

प्रश्न 28.
प्रथम विश्व-युद्ध से पूर्व कोई दो घटानाओं को बताइए, जिन्होंने जापान का एक साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में अभ्युदय किया। कोई दो देश बताइए जिनके साथ जापान का इस काल में टकराव हुआ।
उत्तर:
1853 में अमेरिका का जल सेनानायक पैरी जापान के एक बन्दरगाह पर पहुँचा। उसने जापान में अनेक सुविधाएँ प्राप्त की, परन्तु जापान एशियाई देशों की तुलना में भाग्यशाली निकला। वहाँ मेजी शासन के बाद सैनिक तथा औद्योगिक उन्नति हुई। अतः जापान भी यूरोप के साम्राज्यवादी देशों की भाँति मंडियों की खोज में लग गया।
(i) जापान के निकट चीन था और चीन उसके लिए अच्छी मंडी सिद्ध हो सकता था। दोनों देश 1894 में कोरिया के प्रश्न पर एक-दूसरे से युद्ध कर चुके थे। इसके बाद जापान का चीन में प्रभाव काफी बढ़ गया था।

(ii) 1902 में इंग्लैंड तथा जापान का समझौता हुआ। इसके अनुसार जापान को अन्य यूरोपियन शक्तियों के समान दर्जा मिल गया।

(iii) 1904 में उसने रूस को पराजित किया। इसके परिणामस्वरूप उसे सखालिन का दक्षिणी भाग प्राप्त हुआ। जापान के लियोनतुंग प्रायद्वीप पर भी उसका अधिकार हो गया। उसने पोर्ट आर्थर पट्टे पर ले ली।

(iv) 1910 में कोरिया जापान का उपनिवेश बन गया। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के समय जापान एक महाशक्ति बन चुका था। अत: जापान की आकांक्षाएँ भी हर साम्राज्यवादी देश की भाँति आर्थिक तथा राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने की थी। टकराव-जापान का प्रथम विश्व-युद्ध से पूर्व चीन तथा रूस से टकराव हुआ।

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प्रश्न 29.
जापान की उपनिवेशवादी (साम्राज्यवादी) नीति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जापान 1890 के दशक में औपनिवेशिक होड़ में सक्रिय हुआ। उसका पहला निशाना चीन था। वह चीन में अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करके पूर्वी एशिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। बाद में उसने समस्त एशिया तथा प्रशांत महासागर क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करना अपना लक्ष्य बना लिया। 1895 ई. में उसने चीन से युद्ध किया और उसे परास्त करके फारमोंसा को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। यह प्रदेश पहले चीन का भाग था। 1905 ई. में कोरिया को जापान का संरक्षित राज्य बना दिया गया और इसके पाँच वर्ष बाद कोरिया का जापान में विलय हो गया।

कोरिया भी पहले चीन के अन्तर्गत था। इससे पूर्व 1899 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोपीय देशों ने जापान को महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया था। 1902 ई. में आंग्ल-जापान सन्धि हुई। इसके अनुसार जापान को अन्य उपनिवेशवादियों के बराबर का स्थान दिया गया। 1904-1905 में रूस-जापान युद्ध में जापान विजयी रहा। परिणामस्वरूप पंचूरिया के दक्षिणी भाग को जापान का प्रभाव क्षेत्र मान लिया गया। इसके अतिरिक्त सखालिन द्वीप का आधा भाग तथा लियोनतुंग प्रायद्वीप भी उसके नियन्त्रण में आ गए। इस प्रकार जापान ने एक बहुत बड़े औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना कर ली।

प्रश्न 30.
फुफुजावा यूकिची कौन थे? उनकी सफलताओं तथा विचारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फुफुजावा यूकिची (1835-1901) का जन्म एक निर्धन सामुराई परिवार में हुआ था। इनकी शिक्षा नागासाका और ओसाका में हुई। उन्होंने डच और पश्चिमी विज्ञान पढ़ा और बाद में अंग्रेजी भी सीखी। 1860 में वह अमरीका में पहले जापानी दूतावास में अनुवादक के रूप में गए। इससे इन्हें पश्चिम पर पुस्तक लिखने के लिए पर्याप्त सामग्री मिली। उन्होंने अपने विचार क्लासिकी में नहीं बल्कि बोल-चाल की भाषा में लिखे। यह पुस्तक बहुत ही लोकप्रिय हुई।

उन्होंने एक शिक्षा संस्थान स्थापित किया, जो आज केओ विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। वह मेरोकुश संस्था के मुख्य सदस्यों में से थे। यह संस्था पश्चिमी शिक्षा का प्रचार करती थी। . अपनी एक पुस्तक ‘ज्ञान को प्रोत्साहन’ में उन्होंने जापानी ज्ञान की कड़ी आलोचना की। उन्होंने लिखा ‘जापान के पास प्राकृतिक दृश्यों के अतिरिक्त गर्व करने के लिए कुछ भी नहीं है।’ इनका सिद्धान्त था, “स्वर्ग ने इंसान को इंसान के ऊपर नहीं बनाया न ही इंसान को इंसान के नीचे।”

प्रश्न 31.
जापान में सत्ता केन्द्रित राष्ट्रवाद के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
1930-40 में जापान में सत्ता केन्द्रित राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला। इस अवधि में जापान ने साम्राज्य विस्तार के लिए चीन और एशिया के अन्य भागों में युद्ध किए। जापान द्वारा अमेरिका के पर्ल हार्बर पर आक्रमण, दूसरे विश्व युद्ध का भाग बन गया। इसी आक्रमण के परिणामस्वरूप अमेरीका द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल हो गया।

इस दौर में जापान में सामाजिक नियन्त्रण में वृद्धि हुई। असहमति प्रकट करने वालों पर अत्याचार किए गए और उन्हें जल भेजा गया। देशभक्तों की ऐसी संस्थाएँ बनीं, जो बुद्ध का समर्थन करती थीं। इनमें महिलाओं के भी कई संगठन शामिल थे। 1943 में एक संगोष्ठी हुई ‘आधुनिकता पर विजय’ का आयोजन हुआ। इसमें इस विषय पर विचार किया गया कि आधुनिक रहते हुए पश्चिम पर कैसे विजय पाई जाए। दर्शनशास्त्री निशिवानी केजी ने ‘आधुनिक को तीन पश्चिमी धाराओं के मिलन और एकता से परिभाषित किया-पुर्नजागरण, प्रोटस्टेन्ट सुधार और प्राकृतिक विज्ञानों का विकास। उन्होंने कहा कि जापान की ‘नैतिक ऊर्जा’ ने उसे एक उपनिवेश बनने से बचा लिया। अब जापान को एक नई विश्व पद्धति अर्थात् एक विशाल पूर्वी एशिया का निर्माण करना चाहिए।

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प्रश्न 32.
चीन के आधुनिक इतिहास से सम्बन्धित विषयों के बारे में तीन अलग-अलग विचारधाराएँ कौन-सी थीं ?
उत्तर:
चीन के आधुनिक इतिहास का सम्बन्ध सम्प्रभुत्ता की पुनः प्राप्ति, विदेशी नियन्त्रण से हुए अपमान से मुक्ति तथा समानता एवं विकास को सम्भव बनाने से है। इस सम्बन्ध में तीन अलग-अलग विचारधाराएँ थीं-

  • कांग योवेल (1858-1927) तथा लियांग किचाउ (1873-1929) जैसे सुधारक पश्चिम की चुनौतियों का सामना करने के लिए पारम्परिक विचारों के नए ढंग से प्रयोग करने के पक्ष में थे।
  • चीनी गणतन्त्र के पहले राष्ट्राध्यक्ष सन-यात-सेन जैसे गणतान्त्रिक क्रान्तिकारी जापान और पश्चिम के विचारों से प्रभावित थे।
  • चीन की कम्युनिष्ट पार्टी युगों-युगों की असमानताओं को समाप्त करना और देश से विदेशियों को खदेड़ना चाहती थी।

प्रश्न 33.
चीन में साम्राज्यवादी प्रभुत्व का आरम्भ कौन-से प्रसिद्ध युद्धों से हुआ? इन युद्ध के दो कारण तथा दो परिणाम व गएँ।
उत्तर:
चीन में साम्राज्यवादी प्रभुत्व का आरम्भ ‘अफीम के युद्धों’ से हुआ।
कारण-

  • अंग्रेज व्यापारी चीन में बड़े पैमाने पर चोरी-चोरी अफीम ला रहे थे, जिससे चीनियों का शारीरिक एवं नैतिक पतन हो रहा था।
  • 1839 ई. में चीन के एक सरकारी अफसर ने जहाजों पर लदी अफीम को पकड़ लिया और उसे नष्ट कर दिया। अतः ब्रिटेन ने चीन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

परिणाम-

  • इन युद्धों में चीन की पराजय हुई। चीनियों को हर्जाने के रूप में अत्यधिक धनराशि देनी पड़ी। उन्हें अपने पाँच बन्दरगाहों में व्यापार का अधिकार भी अंग्रेजों को देना पड़ा।
  • चीनी सरकार को इस बात के लिए सहमत होना पड़ा कि इन बन्दरगाहों में यदि कोई अंग्रेज अपराध करेगा तो उस पर मुकदमा चीन की नहीं बल्कि इंग्लैंड की अदालतों में चलाया जाएगा।

प्रश्न 34.
उन्नीसवीं शताब्दी में साम्राज्यवादियों ने चीन में अपना प्रभुत्व किस प्रकार स्थापित किया?
अथवा
‘चीनी खरबूजे का काटा जाना’ उक्ति की व्याख्या कीजिए।
अथवा
चीन पर साम्राज्यवाद के प्रभाव का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटेन के विरुद्ध अफीम युद्धों में चीन पराजित हुआ था। परिणामस्वरूप उसे हांग-कांग का प्रदेश अंग्रेजों को देना पड़ा और अपने पाँच बन्दरगाह अंग्रेज व्यापारियों के लिए खोलने पड़े। शीघ्र ही फ्राँस ने भी ऐसी असमान संधियाँ चीन पर लाद दी और उससे अनेक सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। तत्पश्चात् चीन तथा जापान के बीच युद्ध हुआ, जिसमें जापान विजयी रहा। इसके परिणामस्वरूप चीन ने फारमोसा तथा कुछ अन्य द्वीप जापान को सौंप दिए। चीन पर 15 करोड़ डालर का हर्जाना भी डाला गया।

चीन को यह राशि फ्राँस, रूस, ब्रिटेन तथा जर्मनी ने ऋण के रूप में दी और बदले में चीन को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में बाँट लिया। संयुक्त राज्य अमेरिका भी पीछे न रहा। उसने ‘मुझे भी’ की नीति द्वारा चीन में पश्चिमी देशों के बराबर की सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। इस प्रकार चीन पूरी तरह से भिन्न-भिन्न देशों के प्रभाव क्षेत्रों में बँट गया। इसी प्रक्रिया को ‘चीनी खरबूजे का काटा जाना’ कहते हैं।

प्रश्न 35.
‘खुले द्वार’ अथवा ‘मुझे भी’ नीति से क्या अभिप्राय था ? ब्रिटेन ने इस नीति का समर्थन क्यों किया?
उत्तर:
‘खुले द्वार’ अथवा ‘मुझे भी’ नीति का सुझाव संयुक्त राज्य अमेरिका ने दिया था। इस नीति का अर्थ यह था कि सभी देशों को चीन के प्रत्येक भाग में व्यापार करने के समान अवसर मिलने चाहिए। अमेरिका ने यह सुझाव इसलिए दिया था, क्योंकि उसे भय था कि अन्य देश चीन में पूर्ण रूप से अपने प्रभाव क्षेत्र स्थापित कर लेंगे और उसे वहाँ व्यापार करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। ब्रिटेन ने भी इस नीति का समर्थन किया, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि जापान और रूस चीन को हड़प जाएँ। दूसरे, संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह वह भी चीन में अपनी सेनाएँ आसानी से भेज सकता था।

प्रश्न 36.
संयुक्त राज्य अमरिका ने ‘खुले द्वार की नीति’ (Open Door Policy) क्यों और कैसे अपनाई?
उत्तर:
अमेरिका ने खुले द्वार की नीति चीन के सम्बन्ध में अपनाई। 1890 के दशक में यूरोपीय शक्तियाँ चीन को आपस में विभाजित कर लेने की योजना बना रही थीं। अमेरिका को इस बात का भय था कि कहीं उसे अलग-थलग न कर दिया जाए। वह चाहता था कि यूरोपीय शक्तियों की भाँति उसे भी चीन में सुविधाएँ प्राप्त हों। इसलिए उसने एक नई ति की घोषणा की जो इतिहास में ‘खुले द्वार की नीति’ के नाम से विख्यात है।

इसका अर्थ था कि चीन के मामले में किसी भी देश के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, उन क्षेत्रों के सम्बन्ध में भी नहीं जिन्हें यूरोपीय देश अपना प्रभाव क्षेत्र बताते हैं। परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों की भाँति अमेरिका ने भी सन्धि द्वारा चीन से सुविधाएँ प्राप्त की। कुछ समय पश्चात् चीन में विदेशी शक्तियों के बढ़ते हुए प्रभाव के विरुद्ध बॉक्सर विद्रोह हुआ । इस विद्रोह को दबाने में अमेरीकी सेनाओं ने भी यूरोपीय सेनाओं का पूरा साथ दिया।

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प्रश्न 37.
प्रथम आंग्ल-चीन युद्ध अथवा अफीम युद्ध के क्या कारण थे?
उत्तर:
प्रथम आंग्ल-चीन युद्ध, अथवा अफीम युद्ध के अनेक कारण थे-

  • अंग्रेज व्यापारी चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करना चाहते थे। परन्तु चीनी शासक विदेशियों को असभ्य समझते थे और उनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहते थे।
  • चीनी सरकार ने देश में चोरी छिपे अफीम का व्यापार करने वाले व्यापारियों को कैंटन से बाहर निकल जाने का आदेश दिया। इससे चीन और इंग्लैंड के बीच तनाव पैदा हुआ।
  • ब्रिटेन और चीन के बीच इस बात का भी झगड़ा था कि कैंटन के अंग्रेज निवासी कानून की दृष्टि से चीन की बजाय इंग्लैंड के अधीन थे।
  • अंग्रेज व्यापारी इस बात से चिढ़े हुए थे कि चीनी व्यापारियों पर उनका जो ऋण बकाया था, उसे वे दे नहीं पा रहे थे। अत: इंग्लैंड की सरकार के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह अंग्रेज व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए चीन में हस्तक्षेप करें।
  • अंग्रेज व्यापारियों ने अपनी सरकार पर दबाव डाला कि वह शक्ति प्रदर्शन अथवा युद्ध द्वारा चीनी सरकार को इस बात के लिए विवश करे कि वह अफीम व्यापार पर रोक न लगाए।

इसी बीच अंग्रेज तथा चीनी नाविकों की एक झड़प में एक चीनी नाविक मारा गया। परिणामस्वरूप चीनी सरकार अंग्रेज व्यापारियों के प्रति कठोर नीति अपनाने लगी। मामला गम्भीर होता गया। आखिर-इंग्लैंड के प्रधानमन्त्री पामर्स्टन ने चीन के विरुद्ध युद्ध के आदेश जारी कर दिए।

प्रश्न 38.
प्रथम अफीम युद्ध के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
प्रथम अफीम युद्ध के परिणाम चीन के लिए बड़े हानिकारक सिद्ध हुए। इस युद्ध के परिणामों का वर्णन इस प्रकार है-
(i) इस युद्ध के परिणामस्वरूप चीन का आर्थिक शोषण होना आरम्भ हो गया। अब अंग्रेज चीन में बिना किसी रोक-टोक के अफीम का व्यापार करने लगे। इससे चीन पर आर्थिक दबाव काफी बढ़ गया

(ii) नानकिंग की सन्धि के कारण चीन के सम्मान को भारी ठेस पहुंची। इसके साथ ही चीन की सैनिक शक्ति का महत्त्व भी घट गया। अतः अब वे विदेशी शक्तियाँ चीन पर दबाव डालकर सुविधाएँ प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगीं।

(iii) प्रथम अफीम युद्ध के पश्चात् चीन को विशेषाधिकार के सिद्धान्त को विवश होकर स्वीकार करना पड़ा। चीन ने इस बात को स्वीकार कर लिया कि वह अपराध करने वाले विदेशियों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करेगा। इसके परिणामस्वरूप चीन की सर्वोच्चता का अन्त हो गया।

(iv) चीन ने काफी लम्बे समय से अपने व्यापार के लिए बन्द द्वार की नीति अपना रखी थी। विदेशी व्यापारियों को कैंटन के अतिरिक्त कहीं और व्यापारिक केन्द्र स्थापित करने की आज्ञा नहीं थी। परन्तु प्रथम अफीम युद्ध के परिणामस्वरूप चीन सरकार को खुले द्वार की नीति अपनाने के लिए विवश होना पड़ा।

(v) कुछ ही समय पश्चात् यूरोपीय देशों ने चीन में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना आरम्भ कर दिया। इसके परिणामकारूप साम्राज्यवादी युग आरम्भ हो गया और चीन अपनी स्वाधीनता खोने लगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक चीन का आरम्भ कब से माना जाता है ? इसका उदय किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
आधुनिक चीन का आरम्भ सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में, पश्चिम के साथ उसका पहला सामना होने के समय से, माना जाता है। इस काल में जेसुइट मिशनरियों ने खगोलविद्या और गणित जैसे पश्चिमी विज्ञानों को चीन पहुँचाया।
(i) अफीम युद्ध की भूमिका-आधुनिक चीन का उदय – 19वीं शताब्दी में ब्रिटेन ने अपने अफीम के व्यापार को बढ़ाने के जिए चीन के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग किया। इस प्रकार पहला युद्ध (1839-42) हुआ। इसने सत्ताधारी क्विंग (छांग) राजवंश को कमजोर किया और सुधार तथा बदलाव की मांगों को मजबुती दी।

वास्तव में चीनी उत्पादों जैसे चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तनों की माँग ने ब्रिटिश व्यापार में भारी असन्तुलन पैदा कर दिया था। परन्तु पश्चिमी उत्पादों को चीन में बाजार नहीं मिला। इसलिए चीन से आयातित माल का भुगतान चाँदी में करना पड़ता था। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने एक विकल्प ढुंढा-अफीम। यह भारत के कई भागों में उगाई जाती थी। चीन में अफीम की बिक्री द्वारा चाँदी कमाकर कैंटन में उधार पत्रों के बदले कम्पनी के प्रतिनिधियों को देने लगे।

कम्पनी इस चाँदी का प्रयोग ब्रिटेन के लिए चाय, रेशम और चीनी मिट्टी के बर्तन खरीदने के लिए करने लगी। ब्रिटेन, भारत और चीन के बीच यह उत्पादों का ‘त्रिकोणीय व्यापार’ था।

(ii) आधुनिक व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण-क्विंग सुधारकों कांग यूवेई और लियांग किचाउ ने व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया। इस उद्देश्य से उन्होंने एक आधुनिक प्रशासकीय व्यवस्था, नयी सेना और शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के लिए नीतियाँ बनाइँ। संवैधानिक सरकार की स्थपना के लिए स्थानीय विधानपालिकाओं का गठन भी किया गया। उन्होंने चीन को उपनिवेशीकरण से बचाने पर विचार किया।

(iii) उपनिवेश बनाये गए देशों के नकारात्मक उदाहरण-उपनिवेश बनाए गए देशों के नकारात्मक उदाहरणों ने चीनी विचारकों पर गहरा प्रभाव डाला। 18वीं शताब्दी में पोलैंड का बँटवारा. इसका सर्वाधिक चर्चित उदाहरण था। यहाँ तक कि 1890 के दशक में पोलैंड का शब्द ‘बोलान ब’ नामक क्रिया (Verb) के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। क्रिया इसका अर्थ था-‘हमें पोलैंड करने के लिए’। चीन के सामने भारत का उदाहरण भी था। लियांग किचाउ का मानना था कि चीनी लोगों में एक राष्ट्र की भावना जागृत करके ही पश्चिम का विरोध किया जा सकता है।

1930 में उन्होंने लिखा कि भारत ऐसा देश है, जो किसी अन्य देश द्वारा नहीं, बल्कि एक कम्पनी अर्थात् ईस्ट इंडिया कम्पनी के हार्थों बर्बाद हो गया। ब्रिटेन की सेवा करने और अपने ही लोगों के प्रति क्रूर होने के लिए भारतीयों की आलोचना करते थे। उनके तर्कों से अधिकांश चीनी प्रभावित थे, क्योंकि ब्रिटेन ने चीन के साथ युद्ध में भारतीय सैनिकों का ही प्रयोग किया था।

(iv) चीनियों की परम्परागत सोंच में बदलाव-चीनियों की परम्परागत सोंच को बदलना भी आवश्यक था। कन्फयूशिसवाद चीन की प्रमुख विचारधारा कन्फयूशियस (551-479 ई.पू) और उसके अनुयायियों की शिक्षा से विकसित की गई थी। इसका सम्बन्ध अच्छे व्यवहार, समझदारी और उति। सामाजिक सम्बन्धों से था। इस वि रधारा ने चीनियों के जीवन के प्रति दृष्टिकोण को बदल दिया और नये समाजिक मानक स्थापित किए। इसने चीनी राजनीतिक सोच और संगठनों को भी ठोस आधार प्रदान किया।

(v) नए विषय-लोगों को नये विषयों में प्रशिक्षित करने के लिए विद्यार्थियों को जापान, ब्रिटेन और फ्रांस में पढ़ने के लिए भेजा गया। 1890 के दशक में बहुत बड़ी संख्या में चीनी विद्यार्थी पढ़ने लिए जापान गए। वे नये विचार लेकर वापस आए उन्होंने चीन में गणतन्त्र की स्थापना में भी अग्रणी भुमिका निभाई। चीन ने जापान से ‘न्याय’ ‘अधिकार’ और ‘क्रान्ति’ के शब्द ग्रहण किए। 1905 में रूस-जापान युद्ध हुआ। यह एक ऐसा युद्ध था, जो चीन की धरती पर और चीनी प्रदेशों पर प्रभुत्व के लिए लड़ा गया था। इस युद्ध के बाद सदियों पुरानी चीनी परीक्षा-प्रणाली समाप्त कर दी गई। यह परीक्षा प्रणाली प्रत्याशियों को अभिजात सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश दिलाने का काम करती थी।

(vi) गणतन्त्र की स्थापना-1911 ई. में चीन में क्रान्ति हुई, जिसने मंचू शासन का अन्त कर दिया। इसके साथ ही चीन ने सच्चे अर्थों में आधुनिक युग में प्रवेश किया।

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प्रश्न 2.
सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् कुओतिनतांग के अधीन देश के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विकास की समीक्षा किजिए।
उत्तर-सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् च्यांग काइ शेक (1878-1975) कुओमिनतांग के नेता बनकर उभरे।
(i) उन्होंने सैन्य अभियान द्वारा वार-लार्डस (स्थानीय नेता जिन्होंने सत्ता छीन ली थी) को अपने नियन्त्रण में किया और साम्यवादियों की शक्ति नष्ट की। उन्होंने सेक्युलर और विवेकपुर्ण इहलौकिक, कन्फूशियसवाद का समर्थन किया। इसके साथ-साथ उन्होंने राष्ट्र का सैन्यीकरण करने की भी चेष्टा की।

(ii) उन्होंने कहा कि लोगों को एकताबद्ध व्यवहार की प्रवृत्ति और आदत का विकास करना चाहिए।

(iii) उन्होंने महिलाओं को चार सदगुण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया-सतीत्व, रूप-रंग, वाणी और काम। महिलाओं की भूमिका को घरेलू स्तर पर ही रखने पर बल दिया गया। यहाँ तक कि उनके कपड़ों की लम्बाई निर्धारित करने का प्रस्ताव भी रखा गया।

(iv) कुओमितांग का सामाजिक आधार शहरी प्रदेश में थों। देश का औद्योगिक विकास धीमा था और गिने-चुने क्षेत्रों तक सीमित था। शंघाई जैसे शहरों में 1919 में औद्योगिक मजदूर वर्ग का विस्तार हो रहा था। इनकी संख्या लगभग 5 लाख थी। परन्तु इनमें से केवल कुछ प्रतिशत मजदूर ही जहाज निर्माण जैसे आधुनिक उद्योगों में लगे हुए थे। अधिकतर लोग ‘नगण्य शहरी’ (शियाओं शिमिन), व्यापारी और दुकानदार होते थे।

(v) शहरी मजदूरों, विशेषकर महिलाओं को बहुत कम वेतन मिलता था। काम करने के घंटे बहुत लम्बे थे और काम करने की परिस्थितियाँ बहुत खराब थीं। जैसे-जैसे व्यक्तिवाद बढ़ा, महिलाओं के अधिकारों, परिवार बनाने के तरीकों और प्रेम-प्यार आदि विषयों पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा।

(vi) समाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन लाने में स्कूलों और विश्वविद्यालयों के विस्तार से सहायता मिली। 1920 में पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। पत्रकारिता फली-फूली जो कि सांच का प्रतिरूप थी। शाओ तोआफैन (1895-1944) द्वारा सम्पादित लोकप्रिय ‘लाइफ व: ली’ उसी नयी विचारधारा का प्रति त्व करती थी। इसने अपने पाठक को नए विचारों के साथ-साथ महात्मा गाँधी और तुर्की के आधुनिकतावादी नेता कमाल आतातुर्क से अवगत करवाया।

(vii) देश को एकीकृत करने के प्रयासों के बावजूद कुओमिनतांग अपने संकीर्ण सामाजिक आधार और सीमित राजनीतिक दृष्टिकोण के कारण असफल रहा। सन-यात सेन के कार्यक्रम का बहुत ही महत्त्वपूर्ण भाग “पुंजी नियमन और भूमि-अधिकारों में समानता” को कभी भी लागू न किया जा सका। इसका कारण यह था कि पार्टी ने किसानों और बढ़ती सामाजिक असमानता की अनदेखी की। इसने लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय सैनिक व्यवस्था थोपने का प्रयास किया।

(viii) 1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया तो कुओमीनतांग पीछे हट गया। इस लम्बे और थका देने वाले युद्ध ने चीन की कमजोर बना दिया। 1945 और 1949 के दौरान कीमतें 30 प्रतिशत प्रति महीने की दर से बढ़ीं। इससे आम आदमी को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। ग्रामीण चीन में भी दो संकट थे। एक पर्यावरण सम्बन्धी था, जिससे बंजर भूमि, वनों का नाश और बाढ़ शामिल थे। दूसरा सामाजिक-आर्थिक था। यह संकट भूमि-प्रथा, ऋण, प्राचीन प्रौद्योगिकी और निम्न स्तरीय सन्चार के कारण था।

प्रश्न 3.
चीन में साम्यवादी पार्टी की स्थापना कब और कैसे हुई ? 1949 माओत्सेतुंग के अधीन यह किस प्रकार शक्तिशाली बनी?
उत्तर:
चीन में साम्यवादी पार्टी की स्थापना 1921 में, रूस क्रान्ति के कुछ समय बाद हुई थी। रूसी क्रान्ति कि सफलता ने पूरे विश्व पर गहरा प्रभाव डाला था। लेनिन और ट्राट्स्की जैसे नेताओं ने मार्च 1918 में कौमिंटर्न अथवा तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय (Third International) का गठन किया, ताकि विश्व स्तरीय सरकार बनाई जा सके जो शोषण को समाप्त करे। कौमिंटर्न और सोवियत संघ विश्व भर में साम्यवादी पार्टियों का समर्थन किया। मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित इन पार्टियों का मानना था कि शहरी क्षेत्रों में क्रान्ति मजदूर वर्गो द्वारा आयेगी। आरम्भ में विभिन्न देशों के लोग कौटिर्न के प्रति बहुत आकर्षित हुए। शीघ्र ही यह सोवियत संघ के स्वार्थों की पूर्ति का शस्त्र बन गया। 1943 में इसे समाप्त कर दिया गया।

माओत्सेतुंग (1893-1976) के अधीन साम्यवादी पार्टी सी.सी.पी. (साम्यवादी पार्टी)-माओ-त्से तुंग मार्क्सवादी पार्टी (सी.सी.पी.) के प्रमुख नेता के रूप में उभरे। उन्होंने क्रान्ति के कार्यक्रम को किसानों से जोड़ते हुए .एक अलग मार्ग अपनाया। उनकी सफलता से चीनी साम्यवादी पार्टी एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बन गई, जिसने अन्ततः कुओमिनतांग पर विजय प्राप्त की।

माओत्सेतुंग के आमूल परिवर्तनवादी तौर तरीके-माओत्सेतुंग के आमूल परिवर्तनवादी तौर-तरीके जियांग्सी नामक स्थान पर दिखाई दिए। 1928-1934 के बीच उन्होंने यहाँ के पर्वतों में कुओमितांग के आक्रमणों से सुरक्षित शिविर लगाए। एक सशक्त किसान परिषद् (सोवियत) का गठन किया गया। भूमि पर नियन्त्रण और इसके पुनर्वितरण के साथ इसका एकीकरण हुआ। अन्य नेताओं से हटकर, माओने स्वतन्त्र सरकार और सेना पर बल दिया। माओत्सेतुंग महिलाओं की समस्याओं से भी अवगत थे। इसलिए उन्होंने ग्रामीण महिला संघों को प्रोत्साहन दिया। उन्होंने विवाह के नए कानून बनाए। आयोजित विवाहों और विवाह के समझौतों के क्रय-विक्रय पर रोक लगा दी गई। तलाक को आसान बनाया गया।

लाँग मार्च तथा साम्यवादियों का सत्ता में आना-कुओमितांग द्वारा कम्यनिस्टों की सोवियत का नाकेबन्दी ने पार्टी को कोई अन्य आधार ढूंढ़ने पर विवश किया। इसके च। उन्हें लाँग मार्च (1934-1935) पर जाना पड़ा, जो कि शांग्सी तक 6000 मील की कठिन यात्रा थी। अपने नये अड्डे येनान में उन्होंने वारलॉर्डिज्म को समाप्त करने, भूमि सुधार लागू करने और विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इससे उन्हें मजबूत सामाजिक आधार मिला द्वितीय विश्व युद्ध के कठिन वर्षों में साम्यवादियों और कुओमीनतांग ने मिलकर काम किया। युद्ध समाप्त होने के बाद कुओमीनतांग की पराजय हुई और साम्यवादी सत्ता में आ गए।

प्रश्न 4.
प्रथम विश्व युद्ध के तत्काल बाद के सालों में चीन के राष्ट्रवादी आन्दोलन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? सनयात सेन की मौत के बाद वहाँ जो घटनाएँ घटी, उनका वर्णन कीजिए और यह भी बताइए कि उनके क्या परिणाम निकले।
उत्तर:
राष्ट्रीय आन्दोलन का आरम्भ तथा विशेषताएँ-प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के समय चीन में दो प्रमुख सरकारें थीं। इनमें से एक पर कोमिनतांग का अधिकार था। इस सरकार का मुख्यालय कैन्टन में था। दूसरे सरकार का शासनाध्यक्ष एक सैनिक जनरल था। उसका मुख्यालय बीजिंग में था। 1919 ई. में पेरिस शान्ति सम्मेलन ने शान्तुंग को जापान के हवाले करने का निर्णय दिया। इससे चीन में साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक राष्ट्रीय आन्दोलन आरम्भ हो गया इसका श्रीगणेश 4 मई, 1919 को बीजिंग विविद्यालय के छात्रों द्वारा साम्राज्यवाद विरोधी प्रदर्शन से हुआ। ‘यह आन्दोलन ‘चार मई आन्दोलन’ के नाम से विख्यात है।

आन्दोलन शीघ्र ही वीन के अन्य भागों में भी फैल गया। 1921 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई जो शीघ्र ही देश की एक प्रमुख शक्ति बन गई। इस समय प्रसिद्ध चीनी नेता सनयात सेन भी चीन को एकीकृत करने के लिए प्रयत्नशील थे। वे पश्चिमी देशों की सहायता से अपने उद्देश्य की पूर्ति करना चाहते थे। परन्तु जब उन्हें पश्चिम की ओर से कोई सहायता न मिली, तो उन्होंने सोवियत संघ से समर्थन माँगा। अन्ततः 1925 ई. में कोमिनतांग तथा कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से एक राष्ट्रीय सरकार गठित करने का निर्णय लिया गया। इस सेना ने शीघ्र ही युद्ध सरदारों के विरुद्ध अपना अभियान आरम्भ कर दिया। परन्तु मार्च, 1925 ई. में डॉ. सनयात सेन का देहान्त हो गया, जिससे स्थिति बदल गई।।

डॉ. सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् की घटनाएँ-
(i) डॉ. सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् कोमिनतांग तथा कम्युनिस्ट का गठबन्धन हो गया और देश में गृह-युद्ध छिड़ गया। अब वहाँ किसान तथा मजदूर सक्रिय हो उठे। 1925 में शंघई में मजदूर की हत्या के विरोध में हड़तालें और. प्रदर्शन हुए। ये हत्याएँ जापानी उद्योगपतियों तथा ब्रिटिश पुलिस की कार्यवाही से हुई थीं। विद्रोही किसानों ने कई स्थानों पर अपने भू-स्वामियों से उनकी भूमि छीन ली।

(ii) 1927 ई. के मार्च मास में राष्ट्रीय क्रान्तिकारी सेना नानकिंग पहुँचा। वहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका तथा ब्रिटेन के युद्ध पोतों ने गोलाबारी आरम्भ कर दी। इस गोलाबारी में सैकड़ों लोग मारे गए। परन्तु उसी समय कोविनतांग में फूट पड़ गई और राष्ट्रीय क्रान्तिकारी सेना के नेता च्यांग-काई शेक ने नानकिंग में अपनी सरकार स्थापित कर ली। कोतिनतांग में विद्यमान वामपन्थी तत्वों में कम्युनिस्ट दल (मजदूरों) की शक्ति का दमन करना चाहता था। उसकी सैनिक टुकड़ियों ने शंघाई में मजदूरों के घरों में छापे मार कर हजारों की संख्या में मजदूरों को मार डाला।

(iii) 1 दिसम्बर, 1927 को कैन्टन में कम्युनिस्टों में एक विद्रोह का नेतृत्व किया और सोवियत रूप की एक सरकार स्थापित की, परन्तु इस विद्रोह को कुचल दिया गया। इस घटना में लगभग 5000 मजदूर मारे गये। इससे चीन के राष्ट्रीय आन्दोलन में फूट पड़ गयी। सोवियत सलाहकारों को चीन से बाहर निकाल दिया गया तथा कगिनतांग के अनेक नेता देश छोड़कर चले गये। इनमें सनयात सेन की विधवा भी शामिल थी। परन्तु देश में कम्युनिस्टों की शक्ति का पूरी तरह पतन नहीं हुआ। कई कम्युनिस्ट देश के विभिन्न भागों में फैल गये और उन्होंने कुछ प्रदेशों को अपने नियन्त्रण में ले लिया। इस प्रकार चीन का गृह-युद्ध एक नये चरण में प्रवेश कर गया, जो कम्युनिस्टों तथा च्यांग-काई-शेक सरकार के बीच चला।

(iv) मंचूरिया पर जापानी अधिकार के कारण चीन में जापानी माल के बहिष्कार का भी एक आन्दोलन चला। परन्तु इस सम्बन्ध में कोमिनतांग के नेता च्यांग-काई-शेक तथा कम्युनिस्टों के बीच एकता स्थापित न हो सकी । कोमिनतांग ने जापान के विरुद्ध कार्यवाही करने की बजाय कम्युनिस्टों की शक्ति कुचलने की ओर ही अपना ध्यान लगाया। परन्तु ग्रामीण प्रदेशों में कम्युनिस्टों की शक्ति निरन्तर बढ़ती ही चली गई। इसी बीच माओ-त्से-तुंग एक प्रभावशाली कम्युनिस्ट नेता के रूप में उभर कर सामने आये। उन्होंने किसान शक्ति की सहायता से देश में समाजवादी क्रान्ति लाने की योजना बनाई। परन्तु 1934 ई. में च्यांग-काई-शेक ने एक विशाल सेना के साथ कम्युनिस्टों के प्रभाव क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया।

कम्युनिस्ट यह नहीं चाहते थे कि उनका पूरी तरह सफाया कर दिया जाये। अतः वे अपने प्रभाव क्षेत्रों को छोड़कर चले गये। उनमें से लगभग 1 लाख कम्युनिस्ट उत्तर-पश्चिम की ओर येनान क्षेत्र में पहुँचे। येनान पहुँचने में कम्युनिस्टों ने लगभग छः हजार मील की लम्बी यात्रा की। इसी कारण इतिहास में यह घटना ‘लम्बी यात्रा’ (Long March) के नाम से विख्यात है। इस घटना के कारण कम्युनिस्टों की लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान अनेक जमींदारों से भूमि छीन कर किसानों में बाँट दी थी। अतः लोगों के मन में यह बात पूरी तरह बैठ गई कि कम्युनिस्ट दल ही जन-साधारण का भला कर सकता है। लोग च्यांग-काई-शेक की सरकार को जमींदारों, सूदखोरों तथा सौदागरों की सरकार समझने लगे।

(v) 1937 में चीन पर एक भीषण जापानी आक्रमण हुआ। च्यांग-काई-शेक की सेना, जो केवल कम्युनिस्ट विरोधी कार्यवाही में ही व्यस्त थी, जापानी सेना के सामने न टिक सकी। परिणामस्वरूप उसे पीछे हटना पड़ा। उनकी सरकार का मुख्यालय मानकिंग से हटकर चंगकिंग में पहुंच गया। परन्तु इसी बीच जापानी आक्रमण को रोकने के लिए एक संयुक्त मोर्चे का गठन भी किया जा चुका था। यह सब एक महत्त्वपूर्ण घटना के कारण सम्भव हुआ था, जिसमें च्यांग-काई-शेक को बन्दी बना लिया गया था और उसे तब तक नहीं छोड़ा गया था, जब तक कि कोमिनतांग कम्युनिस्टों के साथ मिलकर जापान का विरोध करने के लिए तैयार न हो गये। परन्तु इस एकता के बावजुद भी दोनों दलों के लोग एक-दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखते रहे।

परिणाम – डॉ. सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात् चीन में जो घटना. चक्र चला, उसका सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि कम्यूनिस्ट दल एक शक्शिाली दल के रूप में उभरकर सामने आया।

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प्रश्न 5.
मेइजी पुर्नस्थापना के पश्चात् जापान के आधुनिकीकरण हेतु कौन-कौन से कदम उठाये गये।
उत्तर:
मेइजी पुर्नस्थापना के पश्चात जापान ने शिक्षा, उद्योग, सैन्य, राजनीति, आधुनिकीकरण के पीछे यूरोपीय देशों द्वारा जापान को अपने अपने उपनिवेश बना लेने का डर उच्च करों को वसूलने में उठने वाले विद्रोहों को दबाने तथा विश्व के मान चित्र पर एक सशक्त देश के उभरने की महत्त्वकांक्षा थी। अतः इन्हीं बातों के आधार पर जापान ने अपने सैन्य आधुनिकीकरण के औचित्य को सही हराया। अशिक्षा, सामन्ती व्यवस्था, ..र्थिक अव्यवस्था तथा विदेशी शक्ति द्वारा जापान की आन्तरिक व्यवस्था से लाभ उठाकर उपनिवेश बनाने की कोशिश ने 1867 में जापान के सम्राट मुत्सहितो को, जिसने ‘मेइजी’ की उपाधि धारण की, सत्ता सौंप दिया। इसे ही इतिहास में मेइजी पुर्नस्थापना कहते हैं।

उपर्युक्त समस्याओं के निराकरण हेतु आवश्यकता थी जापान के आधुनिकीकरण करने की, जिसे सम्राट ने धैर्य के साथ किया। इसी हेतु 1871 में सामन्तवादी व्यवस्था का वहाँ अन्त कर दिया गया। शासन में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिये दो सदन वाली डायर की स्थापना की गई। नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का दर्जा दिया गया। – मेइजी पुर्नस्थापना के पश्चात् शिक्षा की अतीव उन्नति जापान में हुई। जापान में शिक्षा का आधार राष्ट्रीयता के प्रसार को बनाया गया।

प्रश्न 6.
जापान ने अपने सैन्य आधुनिकीकरण के औचित्य को किस प्रकार सही ठहराया?
उत्तर:
जापान में मेजी पुर्नस्थापना के पश्चात जापान ने शिक्षा, उद्योग, सैन्य, राजनीति आदि अनेक क्षेत्रों का आधुनिकीकरण किया। सैन्य आधुनिकीकरण के पीछे यूरोपीय देशें द्वारा जापान को अपने-अपने उपनिवेश बना लेने का डर, उच्च करों को वसूलने में उठने वाले विद्रोहों को दबाने तथा विश्व के मानचित्र पर एक सशक्त देश के उभरने की महत्वाकांक्षा थी। अतः इन्हीं बातों के आधार पर जापान ने अपने सैन्य आधुनिकीकरण के औचित्य को सही ठहराया।

प्रश्न 7.
चीन में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना कैसे हुई? इस क्रान्ति के चीन पर पड़े प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
चीन में 1949 की क्रान्ति कैसे हुई। चीन पर इसके क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
चीन में साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना निम्नलिखित चरणों में हुई
(i) डॉ. सनयात-सेन की मृत्यु के पश्चात् च्यांग-काई के नेतृत्व में कोमिंतांग और माओ जेदांग (माओ-त्ये-तुंग) के नेतृत्व में कम्युनिष्ट पार्टी के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया।

(ii) चीन पर जापानी आक्रमण के समय दोनों पार्टियों और उनकी सेनाओं ने जापानी आक्रमण का सामना करने के लिए कुछ समय तक आपस में सहयोग किया। परन्तु इनका आपसी टकराव फिर भी समाप्त न हुआ।

(iii) कोमिंतांग मुख्यतः पुंजीपतियों और जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी थी। दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी मजदूरों और किसानों की पार्टी थी। कम्यूनिस्ट पार्टी के नियन्त्रण वाले क्षेत्रों में जमींदारों की जागीरें जब्त करके जमीन को किसानों के बीच बाँट दिया गया। अपनी इन नीतियों से कम्युनिस्ट पार्टी ने धीरे-धीरे करोड़ों चीनी लोगों को अपना समर्थक बना लिया था। कम्युनिस्ट पार्टी ने जनमुक्ति सेना नाम से एक बड़ी सेना भी बना ली थी।

(iv) जापान की हार तथा चीन से जापानी सैनिकों के भागने के बाद गृहयुद्ध फिर से भड़क उठा। अमेरिकी सरकार ने च्यांग-काई-शेक को भारी सहायता दी। परन्तु उसकी सेनाएँ 1949 तक पूरी तरह नष्ट हो चुकी थीं। अपनी बची-खुची सेना के साथ च्यांग-काई-शेक ताइवान (फारमोसा) चला गया। अक्टूबर, 1949 को चीनी लोक गणराज्य की स्थापना की घोषणा की गई औरी माओ जंदांग के नेतृत्व में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई।

चीन पर क्रान्ति के प्रभाव –

  • 1949 की चीनी क्रान्ति ने चीनी समाज के स्वरूप को बदल डाला। परम्परागत चीनी समाज कन्फयूशियस के सिद्धान्तों और विचारों पर आधारित था। परन्तु क्रान्ति के बाद देश में नई विचारधारा उन्न हुई। अब श्रमिक वर्ग और चीनी गरिकों को उचित सम्मान दिया जाने लगा।
  • इस क्रान्ति से चीनी लोगों का दैनिक जीवन काफी सुखी हो गया। क्रान्ति के बाद साम्यवादी सरकार ने देश में राशन प्रणाली आरम्भ की और जीवन की आवश्यकताओं को लोगों तक पहुँचाया। बीमारियों, आगजनी और लूटमार के अपराधों पर भी नियन्त्रण करने का प्रयास किया गया।
  • इस क्रान्ति से भूमिहीन किसानों को भूमि मिली। इसके अतिरिक्त सरकार ने किसानों की सहायता के लिए सहकारी समितियाँ बनाई।
  • इस क्रान्ति से स्त्रियों की दशा में भी परिवर्तन आया। क्रान्तिकारी सरकार ने स्त्रियों के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाये। उनके क्रय-विक्रय को अवैध घोषित कर दिया गया।
  • चीनी क्रान्ति से विश्व में समाजवादी विचारधारा को बल मिला।

प्रश्न 8.
जापान में मेजी शासन के अधीन अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण किस प्रकार हुआ ? उद्योगों के विकास का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण मेजी सुधारों की एक महत्त्वपर्ण विशेषता थी। इसके लिए निम्नलिखित पग उठाए गए-
(i) कृषि पर कर लगाकर धन एकत्रित किया गया।

(ii) 1870-1872 में तोक्यो (Tokyo) से योकोहामा बन्दरगाह के बीच जापान की पहली रेल लाइन बिछाई गई।

(iii) वस्त्र उद्योग के लिए यूरोप से मशीनें आयात की गईं। मजदूरों के प्रशिक्षण तथा देश के विश्वविद्यालयों और स्कूलों में पढ़ाने के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया गया ।

(iv) कई जापानी विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए विदेश भी भेजा गया।

(v) 1872 में आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं की स्थापना की गई।

(vi) मित्सुबिशी और सुमितोमो जैसी कम्पनियाँ सब्सिडी और करों में छूट के कारण प्रमुख जहाज निर्माता कम्पनियाँ बन गईं। अब जापान का व्यापार जापानी जहाजों द्वारा होने लगा। बड़ी-बड़ी व्यापारिक संस्थाओं ‘जायबात्सु’ का प्रभुत्व दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक अर्थव्यवस्था पर बना रहा।

(vii) 1874 में जापान की जनसंख्या 3.5 करोड़ थी, जो 1920 में 5.5 करोड़ हो गई। जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए सरकार ने प्रवास को बढ़ावा दिया। पहले लोगों को उत्तरी द्वीप होकायदो की ओर भेजा गया। यह काफी सीमा तक एक स्वतन्त्र प्रदेश था और वहाँ आयनू कहे जाने वाले लोग रहते थे। इसके बाद उन्हें हवाई, ब्राजील और जापान के बढ़ते हुए औपनिवेशिक साम्राज्य की ओर भेजा गया। उद्योगों के विकास के साथ-साथ लोग शहरों की ओर आने लगे। 1925 तक 21 प्रतिशत जनता शहरों में रहती थी। 1935 तक यह बढ़ कर 32 प्रतिशत हो गई।

(viii) जापान में औद्योगिक मजदूरों की संख्या 1870 में 7 लाख से बढ़कर 1913 में 40 लाख पहुँच गई। अधिकतर मजदूर ऐसी इकाइयों में काम करते थे, जिनमें 5 से भी कम लोग थे और जिनमें मशीनों तथा विद्युत्त-ऊर्जा का प्रयोग नहीं होता था। कारखानों में काम करने वाले मजदूरों में आधे से अधिक महिलाएँ थीं। 1900 के बाद कारखानों में पुरुषों की संख्या बढ़ने लगी। परन्तु 1930 के दशक में ही आकर पुरुषों की संख्या महिलाओं में अधिक हुई। कारखानों में मजदूरों की संख भी बढ़ने लगी। फिर भी 1940 में 5 लाख 50 हजार कारखानों में पाँच-पाँच से भी कम मजदूर काम करते थे।

पर्यावरण पर प्रभाव – उद्योगों के तीव्र और अनियन्त्रित विकास तथा लकड़ी की अधिक माँग से पर्यावरण का विनाश हुआ। संसद के निम्न सदन में सदस्य तनाको शोजो ने 1897 में औद्योगिक प्रदूषण के विरुद्ध पहला आन्दोलन छेड़ा। 800 गाँववासी जन विरोध में एकत्रित हुए और उन्होंने सरकार को कार्यवाही करने के लिए विवश किया।

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प्रश्न 9.
जापान के आक्रामक राष्ट्रवाद, पश्चिमीकरण तथा परम्परा की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आक्रामक राष्ट्रवाद-मेजी संविधान सीमित मताधिकार पर आधारित था। संविधान द्वारा बनाई गई डायट (संसद) के अधिकार सीमित थे। शाही पुनः स्थापना करने वाले नेता सत्ता में बने रहे और उन्होंने राजनीतिक पार्टियों का गठन किया। 1918-1931 के दौरान जनमत द्वारा चुने गए प्रधानमंत्रियों ने मंत्रिपरिषद् बनाई। इसके बाद उन्होंने पार्टियों का भेद भुला कर राष्ट्रीय मंत्रिपरिषद् बनाईं। सम्राट सैन्य बलों का कमांडर था और 1890 से यह माना जाने लगा कि थलसेना और नौसेना का नियन्त्रण स्वतन्त्र है। 1899 में प्रधानमंत्री ने आदेश दिया कि केवल सेवारत जनरल और एडमिरल ही मंत्री बन सकते हैं। सेना को मजबूत बनाने का अभियान और जापान के उपनिवेशों की वृद्धि इस भय से एक-दूसरे से सम्बन्धित थी कि जापान पश्चिमी शक्तियों की दया पर निर्भर है। यह भय दिखा कर सैन्य-विस्तार के और सैन्यबलों को अधिक धन जुटाने के उद्देश्य से ऊँचे कर वसूले गए। इन करों के विरुद्ध आवाजें उठीं परन्तु उन्हें दबा दिया गया।

पश्चिमीकरण तथा परम्परा – अन्य देशों के साथ जापान के सम्बन्धों के बारे में जापानी बुद्धिजीवियों की आने वाली पीढ़ियों के विचार भिन्न-भिन्न थे। कुछ का विचार था कि अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देश सभ्यता की ऊँचाइयों पर हैं। जापान को भी उसी ऊँचाई पर पहुँचने की आकांक्षा रखनी चाहिए। फुकुजावा यूकिची मेजी काल के प्रमुख बुद्धिजीवियों में से थे। उनका कहना था कि जापान को ‘अपने में से एशिया को निकाल फेंकना’ चाहिए। उनके कहने का अभिप्राय यह था कि जापान को अपने एशियाई लक्षण छोड़ कर पश्चिम का भाग बन जाना चाहिए।

अगली पीढ़ी ने पश्चिमी विचारों को पूरी तरह से अपनाने पर आपत्ति की और कहा कि राष्ट्रीय गौरव का निर्माण देशी मूल्यों पर ही होना चाहिए। दर्शनशास्त्री मियाके सेत्सरे (18601945) ने तर्क पेश किया कि विश्व सभ्यता के हित में प्रत्येक राष्ट्र को अपने विशेष गुणों का विकास करना चाहिए। स्वयं को अपने देश के लिए समर्पित करना स्वयं को विश्व के प्रति समर्पित करने के समान है। दूसरी ओर बहुत से बुद्धिजीवी पश्चिमी उदारवाद की ओर आकर्षित थे। वे चाहते थे कि जापान अपना निर्माण सेना की बजाय लोकतन्त्र के आधार पर करे।

संवैधानिक सरकार की माँग करने वाले आन्दोलन के नेता उएको एमोरी (1857-1892) फ्रांसीसी क्रान्ति के मानव के प्राकृतिक अधिकारों और जन प्रभुसत्ता के सिद्धान्तों के प्रशंसक थे। वह उदारवादी शिक्षा के पक्ष में थे, जो प्रत्येक व्यक्ति को विकसित कर सके। कुछ दूसरे लोगों ने तो महिलाओं के मताधिकार की भी सिफारिश की। इस दबाव ने सरकार को संविधान की घोषणा करने पर बाध्य किया।

प्रश्न 10.
दो विश्वयुद्धों के बीच में जापान में सैनिकवाद के उत्थान की विवेचना कीजिए। यह विकास जापान द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने के लिए कहाँ तक उत्तरदायी था?
उत्तर:
1918 ई. तक जापान आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध था। परन्तु देश में राजनीतिक अस्थि॥ का वातावरण था। देश में लोकतन्त्र की स्थापना के प्रयास किए जा रहे थे। परन्तु सेना सता पर अपना प्रभाव बढ़ाने में व्यस्त थी। फलस्वरूप जापान पुनः सैनिकवाद की ओर बढ़ने
लगा।
माणन में सैनिकवाद के बढ़ते कदम – द्वितीय विश्व युद्ध तक जापान में सैनिकवाद के विकास र्णन इस प्रकार है-
(i) 1929 की महान् आर्थिक मन्दी-1929 ई. में विश्व तथा. विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका। महान् आर्थिक मन्दी का सामना करना पड़ा। फलस्वरूप संयुक्त राज्य में वस्तुओं का उपभोग बहुत ही कम हो गया। इसका जापान की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। इसका कारण यह था कि अमेरिका जापान से निर्यात होने वाले कृषि उत्पादन का सबसे बड़ा बाजार था। देश का निर्यात कम होने से कृषकों को घोर निर्धनता का सामना करना पड़ा। तंग आकर वे सेना में भर्ती होने लगे। इस अवसर का लाभ उठा कर देश के सेनानायकों ने सैन्यवाद महिमा गान करना आरम्भ कर दिया । वे चाहते थे कि जापान चीन में चल रहे गृह युद्ध का लाभ उठा कर चीन को एक उपनिवेश के रूप में प्रयोग करे।

(ii) मंचूरिया संकट 1931-मंचूरिया चीन का एक प्रान्त था। यहाँ चीन की कम्पनियों का बहुत अधिक प्रभाव था। चीन की राष्ट्रवादी सरकार ने उसकी शक्ति को नियन्त्रित करने का प्रयास किया। अतः टोक्यो (जापान) के सैनिकवादियों ने देश के अनुसार राजनेताओं के सहयोग से मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया और वहाँ एक कठपुतली सरकार की स्थापना कर दी। इस सम्बन्ध में देश के प्रधानमंत्री इनुकई (Inukai) से पूछा तक नहीं गया। जब इनुकई ने इस घटना का विरोध किया, तो उसकी हत्या कर दी गई और देश का शासन सेना के अधीन कर दिया गया। फलस्वरूप जापान में सैनिकवाद की जड़ें और अधिक गहरी हो गईं।

(iii) सैनिक फासीवाद-उपरोक्त घटना के पश्चात् द्वितीय विश्व युद्ध तक जापान में सैनिक फासीवाद का बोलबाला रहा। वहाँ सेना सर्वेसर्वा बन गई और सम्राट नाममात्र का मुखिया बना रहा। सैनिक सत्ता का विरोध करने वाले लोगों के साथ सख्ती के साथ निपटा गया। ऐसे अधिकांश लोगों को साम्यवादी होने की आड़ में गोलियों से उड़ा दिया गया। विचारों की अभिव्यक्ति तथा शिक्षा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जापान की विदेश नीति ने आक्रामक रूप धारण कर लिया। इसका मुख्य उद्देश्य एशिया में तेजी से औपनिवेशिक विस्तार करना था।

इस दिशा में ब्रिटेन तथा अमेरिका के हितों को चोट पहुँचाने का हर सम्भव प्रयास किया गया। जापान द्वारा 1937 में चीन पर आक्रमण के समय अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस हत्याकांड का जापानी सम्राट भी विरोध करने का साहस न कर सका। इस प्रकार जापान में सैनिकवाद इतना अधिक हावी हो गया कि इसने जापान को द्वितीय विश्व युद्ध में धकेल दिया। उसने अन्य दो फासीवादी देशों इटली तथा जर्मनी का साथ दिया।

प्रश्न 11.
‘मेजी पुनःस्थापन’ का अर्थ क्या है? जापान के विकास पर इसके भावी परिणाम क्या थे?
उत्तर:
जापान में शताब्दियों तक ‘शोगुन’ शासक सत्ता के वास्तविक स्वामी बने रहे। परन्तु 1869 में ‘शोगुन’ गासन समाप्त कर दिया गया और उस स्थान पर नए शासक तथा सलाहकाः सामने आए। ये लोग जापानी सम्राट के नाम पर शासन चलाते थे। इस प्रकार देश में सम्राट फिर से सर्वेसर्वा बन गया। उसने ‘मेजी’ की उपाधि धारण की। इसलिए जापान के इतिहास में इस घटना को ‘मेजी पुनः स्थापना’ का नाम दिया गया।

महत्त्व – ‘मेजी पुनःस्थापना’ का जापान की भावी प्रगति पर गहरा प्रभाव पड़ा जिसका वर्णन इस प्रकार है-
(i) औद्योगिक प्रगति-मेजी युग में जापान ने औद्योगिक क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति की। देश की सरकार ने उद्योगों में व्यापक पूंजी निवेश किया। बाद में उद्योग पूंजीपतियों को बेच दिए गए। इस प्रकार ब नए उद्योग आरम्भ करने के लिए सरकारी सहायता की कोई आवश्यकता न रही। किसानों की दरिद्रता का भी उद्योगों को लाभ पहुँचा। अनेक निर्धन किसान गाँवों को छोड़कर नगरों में बसे। परिणमस्वरूप उद्योगों के लिए सस्ते मजदूर उपलब्ध होने लगे। 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक जापान उद्योगों में इतना अधिक शक्तिशाली हो गया कि वह अन्तराष्ट्रीय बाजार में यूरोप के औद्योगिक देशों के साथ टक्कर लेने लगा।

(ii) नवीन संविधान-सन् 1889 में जापान को एक नया संविधान मिला। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
1. सम्राट को कार्यकारिणी के प्रधान के रूप में विशेष शक्तियाँ दी गईं थीं। सभी मन्त्रियों की नियुक्ति सम्राट द्वारा होती थी और वे अपने कार्यों के लिए सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। वास्तव में सम्राट को दैवी शक्तियाँ प्राप्त थीं उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था। अतः उसे पवित्र एवं श्रेष्ठतम मानकर उसकी पूजा की जाती थी।
2. संविधान में एक संसद का प्रावधान था, जिसे डायट कहते थे। परन्तु डायट की शक्तियाँ काफी सीमित थीं। उस पर सेना का नियन्त्रण स्थापित किया गया था ।
3. पुलिस को व्यापक अधिकार दिए गए थे। वह राजतन्त्र विरोधी गतिविधियों पर आसानी से रोक लगा सकती थी।

(iii) औपनिवेशिक विस्तार-1890 के दशक में जापान यूरोपीय देशों के साथ औपनिवेशिक होड़ में शमिल हो गया। इसने 1895 ई. में चीन से युद्ध किया और उसे परास्त करके फारमोसा पर अपना अधिकार कर लिया। फिर 1905 ई. में कोरिया उसका संरक्षित राज्य बन गया और इसके पाँच वर्ष पश्चात् यह प्रदेश जापानी सम्राज्य का अंग बन गया।
इस प्रकार मेजी पुनः स्थापना के बाद जापान एक शक्तिशाली देश के रूप में उभरने लगा। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा यूरोपीय देशों ने 1899 में ही उसे एक महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया था। कुछ देरों ने उसके साथ समानता के आधार पर संधियाँ भी की थीं।

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प्रश्न 12.
19वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों से लेकर प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति तक एक विश्व शक्ति के रूप में जापान के विकास क्रम का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जापान एशिया का एकमात्र साम्राज्यवादी शक्ति था। उसने अपना साम्राज्यवादी प्रसार 19वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में किया। इससे पूर्व जापान स्वयं साम्राज्यवाद का शिकार होते-होते बचा था। 1853 ई. में कमोडोर पेरी के नेतृत्व में जंगी जहाज जापान के तट पर पहुँचे थे। पेरी ने बल प्रयोग द्वारा जापान को अमेरिकी जहाजरानी तथा व्यापार की छूट देने के लिए बाध्य किया। जापान के साथ ब्रिटेन, हालैंड तथा रूस ने भी समझौते किए। फिर भी जापान अन्य एशियाई देशों के कटु अनुभव से बचा रहा।

जापान का शक्तिशाली बनना – 1876 ई. में जापान में महत्त्वपूर्ण सत्ता-परिवर्तन हुआ, जिसे मेजी पुर्नस्थापना कहा जाता है मेजी काल में जापान ने बहुत उन्नति की। उसने अपनी अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाना आरम्भ कर दिया और कुछ ही दशकों में वह विश्व का एक प्रमुख औद्योगिक देश बन गया। इसके अतिरिक्त वे शक्तियाँ जिन्होंने पश्चिमी देशों को साम्राज्यवादी बनया था, जापान में भी सक्रिय थीं पश्चिमी देशों की भांति जापान के पास भी अपने उद्योगों के लिए कच्चा माल बहुत कम था। उसे अपने माल की खपत के लिए नए बाजार नी चाहिए थे। अतः उसकी नजर ऐसे देश पर पड़ी जो उसकी इन दोनों आवश्यक्ताओं की ते कर सकते थे। इस प्रकार वह भी साम्राज्यवाद की होड़ में सम्मिलित हो गया।

साम्राज्यवाद विस्तार – जापान के साम्राज्यवादी विस्तार प वर्णन इस प्रकार है-

  • जापान के निकट चीन था और चीन में उसके साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पर्याप्त अवसर थे। दोनों देश 1894 में कोरिया के प्रश्न पर एक-दूसरे से युद्ध कर चुके थे। इसके बाद जापान का चीन में प्रभाव काफी बढ़ गया था।
  • 1902 में इंग्लैंड तथा जापान का समझौता हुआ। इसके अनुसार जापान को अन्य यूरोपीय शक्तियों के समान दर्जा मिल गया।
  • 1940-05 में उसने रूस को पराजित किया। इसके परिणामस्वरूप उसे सखालिन का दक्षिणी भाग प्राप्त हुआ । जापान का लियाओतुंग प्रायद्वीप के दक्षिणी भाग पर भी अधिकार हो गया। उसने पोर्ट आर्थर पट्टे (किराये)पर ले ली।
  • 1910 में कारिया जापान का उपनिवेश बन गया।

इस प्रकार प्रथम विश्व-युद्ध के समय तक जापान एक महाशक्ति बन चुका था। यदि पश्चिमी शक्तियाँ उसके मार्ग में बाधा न बनतीं, तो वह चीन में अपना और अधिक प्रसार कर सकता था। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि पश्चिमी देशों की तुलना में जापान के साम्राज्यवादी कारनामे काफी बदतर थे।

प्रश्न 13.
द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजय के पश्चात् जापान का विश्व की आर्थिक शक्ति। के रूप में उत्थान किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
युद्ध के बाद की स्थिति-द्वितीय विश्व युद्ध में पराजय के बाद जापान के औपनिवेशिक साम्राज्य के प्रयास थम गए। यह तर्क दिया गया था कि युद्ध को जल्दी समाप्त करने के लिए जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये गये थे। परन्तु बहुत से लोगों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली विनाशलीला पूरी तरह से अनावश्यक थी। अमेरिका नियन्त्रण (1945-47) के दौरान जापान का विसैन्यीकरण कर दिया गया।

एक नया संविधान भी लागू हुआ। इसके अनुच्छेद 9 के ‘युद्ध न करने’ की तथाकथित धारा के अनुसार जापान युद्ध को राष्ट्रीय नीति नहीं बना सकता । कृषि सुधार, व्यापारिक संगठनों के पुनर्गठन और जापानी अर्थव्यवस्था में जायबात्सु अर्थात् बड़ी एकाधिकार कम्पनियों को पकड़ को समाप्त करने का प्रयास किया गया । राजनीतिक पार्टियों को पुनर्जीवित किया गया और युद्ध के पश्चात् 1946 में पहले चुनाव हुए । इन चुनावों में पहली बार महिलाओं ने भी मतदान किया।

आर्थिक शक्ति के रूप में उत्थान – युद्ध में भयंकर हार के बावजूद जापानी अर्थव्यवस्था का बड़ी तेजी से पुनर्निर्माण हुआ। संविधान को औपचारिक रूप से लोकतान्त्रिक बनाया गया। परन्तु जापान में जनवादी आन्दोलन और राजनीतिक भागीदार का आधार बढ़ाने की ऐतिहासिक परम्परा रही थी। अतः युद्ध से पहले के काल की सामाजिक सम्बद्धता को सुदृढ़ किया गया। इसके परिणामस्वरूप सरकार नौकरशाही और उद्योग के बीच एक निकट सम्बन्ध स्थापित हुआ।

अमेरीकी समर्थन और कोरिया तथा वयतनाम में युद्ध से उत्पन्न माँग ने जापानी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में सहायता की। 1964 में हुए ओलम्पिक खेल जापानी अर्थव्यवस्था की परिपक्वता। के प्रतीक थे। तेज गति वाली शिकाँसेन अर्थात् बुलेट ट्रेन का जाल भी 1964 में आरम्भ हुआ। ये गाड़ियाँ 200 मील प्रति घंटे की गति से चलती थीं। अब वे 300 मील प्रति घंटे की गति से चलती हैं। यह बात भी जापानियों की सक्षमता को दर्शाती है कि उन्होंने नयी प्रौद्योगिकी द्वारा बेहतर और सस्ते उत्पाद बाजार में उतारे।

1960 के दशक में ‘नागरिक समाज आन्दोलन’ का उदय हुआ। इस आन्दोलन द्वारा बढ़ते औद्योगीकरण के कारण स्वास्थ और पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव की पुरी तरह से उपेक्षा कर देने का विरोध किया गया। कैडमियम का विष, जिसके कारण एक बहुत ही कष्टप्रद बीमारी होती थी, औद्योगिक दुष्प्रभाव का आरम्भिक सूचक था। इसके बाद 1960 के दशक में वायु प्रदूषण से भी समस्याएँ उत्पन्न हुई। दबाव गुटों ने इन समस्याओं को पहचानने और भृतकों के लिए मुआवजा देने की माँग की।

सक्रियता से नए कानूनों से स्थिति में सुधार आने लगा। 1980 के दशक के मध्य से पर्यावरण सम्बन्धी विषयों में लोगों की रुचि में कमी आई है, क्योंकि जापान ने विश्व के कुछ कठोरतम पर्यावरण नियन्त्रण कानून बनाए हैं। आज जापान एक विकसित देश है। वह अपनी राजनीतिक और प्रौद्योगिकीय क्षमताओं का प्रयोग करके स्वयं को एक विश्व शक्ति बनाए रखने का प्रयास रहा है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
रेड गार्डस में कौन शामिल थे?
(क) किसान और मजदूर
(ख) सामन्त
(ग) छात्र और सेना
(घ) गाँवों के लोग
उत्तर:
(ग) छात्र और सेना

प्रश्न 2.
कोमिंतांग पार्टी का निम्नलिखित में कौन-सा कार्य नहीं होता?
(क) एक दमनकारी सरकार की स्थापना की।
(ख) सत्ता में स्थनीय आबादी को शामिल नहीं किया गया।
(ग) भूमि सुधार का कार्यक्रम चलाया।
(घ) बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगा दी।
उत्तर:
(घ) बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगा दी।

प्रश्न 3.
ताइवान में मार्शल-लॉ कब हटाया गया?
(क) 1687
(ख) 1787
(ग) 1887
(घ) 1987
उत्तर:
(ग) 1887

प्रश्न 4.
जापान के आधुनिकीकरण का एक दुष्परिणाम था?
(क) सैनिकवाद
(ख) शैक्षणिक विकास
(ग) औद्योगिक विकास
(घ) सांस्कृतिक पतन
उत्तर:
(क) सैनिकवाद

प्रश्न 5.
जापानी सैन्यबलों का सर्वोच्च कमांडर निम्न में से कौन है?
(क) सम्राट
(ख) जनरल
(ग) एडमिरल
(घ) ब्रिगेडियर
उत्तर:
(क) सम्राट

प्रश्न 6.
जापान में आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं का प्रारम्भ कब हुआ?
(क) 1772
(ख 1815
(ग) 1852
(घ) 1872
उत्तर:
(घ) 1872

प्रश्न 7.
कोमिंतांग (नेशनल पीपुल्स पार्टी) का संस्थापक कौन था?
(क) सनयात-सेन
(ख) चियांग काई शेक
(ग) माओ जेदोंग
(घ) देंग जियोपिंग
उत्तर:
(क) सनयात-सेन

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन-सी समस्या कारखानों के मजदूनरों की समसया नहीं थी?
(क) काम करने के घंटे बहुत लम्बे थे।
(ख) शहर में कार बहुत चलती थी।
(ग) मजदूरों को कम वेतन मिलता था।
(घ) काम करने की परिस्थितियाँ खराब होती थीं।
उत्तर:
(ख) शहर में कार बहुत चलती थी।

प्रश्न 9.
चीन में पीकिंग विश्वविद्यालय कब स्थापित हुआ?
(क) 1802
(ख) 1812
(ग) 1902
(घ) 2002
उत्तर:
(ग) 1902

प्रश्न 10.
कौंमिटर्न का अन्य नाम क्या है?
(क) प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय
(ख) द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय
(ग) तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय
(घ) चतुर्थ अन्तर्राष्ट्रीय
उत्तर:
(ग) तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय

प्रश्न 11.
लाँग मार्च (1934-35) के यात्रा की दूरी क्या थी?
(क) 3000 मील
(ख) 4000 मील
(ग) 5000 मील
(घ) 6000 मील
उत्तर:
(घ) 6000 मील

प्रश्न 12.
पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना कब हुई?
(क) 1948
(ख) 1949
(ग) 1950
(घ) 1951
उत्तर:
(ख) 1949

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प्रश्न 13.
पीपुल्स कम्यून्स क्या थे?
(क) जहाँ लोग एकत्र जमीन के मालिक थे और मिल-जुलकर फसल उगाते थे।
(ख) जहाँ एकत्र होकर लोग युद्ध करते थे।
(ग) जहाँ राजा के साथ मनोरंजन किया जाता था।
(घ) जहाँ सामन्तों की महत्त्वपुर्ण बैठकें होती थीं।
उत्तर:
(क) जहाँ लोग एकत्र जमीन के मालिक थे और मिल-जुलकर फसल उगाते थे।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग

Bihar Board Class 11 Economics सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राथमिक आँकड़े किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्राथमिक आँकड़े वे होते हैं जिन्हें अनुसंधानकर्ता अपने उद्देश्य के लिये पहली बार मौलिक रूप से संकलित करता है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक आँकड़ों का संग्रह करने के लिये किन-किन विधियों का प्रयोग किया जा सकता है? उन विधियों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान
  2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसंधान
  3. संवाददाता द्वारा सूचना
  4. सूचना देने वालों द्वारा अनुसूचियों को भरना
  5. प्रगणकों द्वारा अनुसूचियों द्वारा भरना

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प्रश्न 3.
एक अच्छी प्रश्नावली (अनुसूची) की कोई तीन विशेषतायें लिखें।
उत्तर:

  1. प्रश्न सरल स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष होना चाहिये
  2. प्रश्नों की संख्या सीमित होनी चाहिये
  3. प्रश्नों का एक निश्चित और सुव्यवस्थित क्रम होना चाहिये

प्रश्न 4.
द्वितीयक आँकड़े किसे कहते है?
उत्तर:
1. द्वितीयक आँकड़े उन आंकड़ों को कहते हैं जिन्हें अनुसंधानकर्ता अपने प्रयोग के लिये स्वयं एकत्रित नहीं करता अपितु किसी अन्य स्रोत कार्यलय आदि से प्राप्त करता है।

प्रश्न 5.
द्वितीय आंकड़ों के स्रोत लिखें।
उत्तर:
सरकारी प्रकाशन तथा अर्द्धसरकारी प्रकाशन द्वितीयक आँकड़ों के प्रमुख्य स्रोत है। इसे अतिरिक्त द्वितीयक आँकड़ों के गैर-प्राकशित स्रोत भी हैं-जैसे निजी शोध संस्थाएँ विश्वविद्यालय आदि।

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प्रश्न 6.
द्वितीयक आँकड़ों का प्रयोग प्राय: कब किया जाता है?
उत्तर:
द्वितीयक स्रोतों के आँकड़ों का प्रयोग प्रायः तब किया जाता है जब समय, धन एवं मानव संसाधन कीकमी हो या सूचनाएँ आसानी से उपलब्ध हों।

प्रश्न 7.
कोई तीन आर्थिक गतिविधियाँ लिखें।
उत्तर:

  1. बैंकिंग
  2. बीमा तथा
  3. व्यापार

प्रश्न 8.
परियोजना का प्रथम चरण लिखें।
उत्तर:
परियोजना का प्रथम चरण समस्या को पहचानना है।

प्रश्न 9.
आपके अध्ययन के क्षेत्र कौन-कौन से हो सकते हैं? कोई से तीन क्षेत्र लिखें।
उत्तर:

  1. कार
  2. मोबाइल फोन
  3. नहाने का साबुन

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प्रश्न 10.
अध्ययन के लिये उपयुक्त प्रश्नों की प्रश्नावली बनाने के लिये क्या महत्त्वपूर्ण होता है?
उत्तर:
अध्ययन के लिये उपयुक्त प्रश्नों की एक प्रश्नावली बनाने के लिये लक्षित समूह का .. चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।

प्रश्न 11.
यदि आपकी परियोजना कार से सम्बन्धित है तब आपका लक्ष्य समूह मुख्यतः क्या होगा?
उत्तर:
यदि हमारी परियोजना कार से सम्बन्धित है तब हमारा लक्ष्य मुख्यतः मध्य आय वर्ग या उच्च वर्ग होगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएं लिखें।
उत्तर:

  1. प्रश्न सरल, स्पष्ट तथा प्रत्यक्ष होना चाहिये।
  2. प्रश्न वैयक्तिक नहीं होना चाहिए।
  3. प्रश्न की संख्या समिति होनी चाहिये।
  4. प्रश्नों का निर्माण इस ढंग से किया जाना चाहिये ताकि उनका उत्तर हाँ या न में संभव हो सके।
  5. प्रश्न एक-दूसरे के पूरक होना चाहिये।
  6. प्रश्न सर्वेक्षण से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होना चाहिये।
  7. बहुविकल्पीय उत्तर वाले प्रश्नों के साथ सभी विकल्प उत्तर संख्या दिया जाना चाहिये।
  8. प्रश्न क्रम में पूछ जाना चाहिये।

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प्रश्न 2.
प्राथमिक आंकड़े तथा द्वितीयक आँकड़ों में अंतर बतायें।
उत्तर:
प्राथमिक आंकड़ों तथा द्वितीयक आँकड़ों में अंतर –
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प्रश्न 3.
निम्न तालिका से बतायें कि लोग किस प्रकार से एयरकंडीशनर को प्राथमिकता देते हैं। (आधार निम्नलिखित हैं)

  1. ब्राण्ड
  2. कीमत
  3. विक्रयव उपान्त सेवायें तथा
  4. तकीकी
    Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 2

उत्तर:
तालिका से मिली जानकारी:

  1. ब्राण्ड: विडियोंकान या सेमसंग।
  2. कीमत: एल० जी० या विडियोकान।
  3. विक्रय सेवा के बाद सेवाएं: जी० एल० या विडियोकॉन।
  4. तकनीकी: विडियोकान अथवा एल० जी०।
    Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 3

उत्तर:
उच्च एयर कंडीशनर जानने के लिए हम समान्तर माध्य की गणना करेंगे।
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उत्तर:
ब्राण्ड, कीमत, विक्रय के पश्चात सेवाओं तथा तकनीक को ध्यान में रखते हुए हम पा सकते हैं कि लोग विडियो एयरकंडीशनर खरीदेंगे क्योंकि औसत प्रतिशत सबसे अधिक है (22.5%)।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित सूचना को दंड – आरेख में प्रकट करें और बतायें कि परिवार किस संचार माध्यम से अधिक प्रभावित होते हैं।
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 6
प्रक्षेप: अधिकांश लोगों को उत्पादन के बारे में टेलीविजन या समचार पत्रों के माध्यम से जानकारी मिली।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
घरेलू ईंधन के रूप में रसोई वाली गैस की माँग का अनुमान लगाने के लिए प्रश्नावली तैयार करें।
उत्तर:
प्रश्नावली …………………….. घरेलू ईंधन के रूप में रसोई वाली गैस की माँग का अनुमान (Estimation of demond for cooking gas as sources of house hold fuel)
1. घर के मुखिया का नाम …………………………

2. आयु ………………………………………….

3. घर का पता ……………………………….

4. वैवाहिक स्थिति Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 विवाहित Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 अविवाहित Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

5. परिवार के सदस्यों की संख्या (आश्रित) ………………..

6. व्यवसाय: नौकरी Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 स्वयं नियोजन Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

7. औसत मासिक आय (रुपया में) –

  • 500 रुपए में 1000 रुपए के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 1000 रुपए से 1200 रुपए के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 2000 रुपए से 5000 रुपए के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 5000 रुपए से 10,000 रुपए के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 10,000 रुपए से अधिक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

8. किस ईंधन – पदार्थ का प्रयोग करते हैं?
लकड़ी Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 कोयला Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 मिट्टी का तेल गैस Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

9. क्या आप गैस का प्रयोग करते हैं?
हाँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

10. क्या आप केवल गैस का ही प्रयोग करते हैं?
हाँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

11. यदि आप गैस का प्रयोग करते हैं तो उसका मुख्य कारण क्या है?

  • गैस कनैक्शन का न मिलना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • कनैक्शन लेने के लिये पैसों की कमी Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • गैस के प्रयोग का ठीक न समझना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • गैस का प्रयोग सुरक्षित नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

12. यदि आप गैस साथ अन्य ईंधन पदार्थ का प्रयोग करते हैं तो उसका मुख्य कारण है –

  • पर्याप्त गैस का न मिलना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • गैस की कीमत अधिक होने के कारण केवल आवश्यक कार्यों के लिये इसका प्रयोग Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • स्वास्थ्य की दृष्टि से गैस का प्रयोग सभी कार्यों के लिये ठीक नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

13. यदि आप गैस का प्रयोग करते हैं तो इसका मुख्य कारण है –

  • अन्य ईंधन पदार्थों की अपेक्षा सस्ती होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • इसका प्रयोग सुविधाजनक होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • कोई अन्य कारण Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

14. आपका गैस वितरण एजेन्सी आपके निवास स्थान से कितना दूर है?

  • एक किलोमीटर तक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • एक किलोमीटर से पाँच किलोमीटर तक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • पाँच किलोमीटर से अधिक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

15. आपके पास कितने गैस सिलेंडर हैं?

  • एक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • दो Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • दो से अधिक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

16. यदि आपके पास गैस कनेक्शन नहीं है तो मिलने पर आप इसे लेना चाहेंगे –
हाँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

17. आपके गैस सिलेंडर की सप्लाई कब मिलती है?

  • सूचना देते ही Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • एक सप्ताह के अंदर Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • एक सप्ताह के बाद Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

18. आपका गैस कनैक्शन क्या आपके नाम है?
हाँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

19. एक महीने में आपके कितने गैस सिलेंडर प्रयुक्त किये जाते हैं?

  • कम से कम Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • एक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • दो Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • दो से अधिक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग

प्रश्न 2.
समस्त जनता को उचित मूल्यों की दुकानों द्वारा वितरण सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुविधाओं का मूल्यांकन करने के लिए एक प्रश्नावली तैयार करें।
उत्तर:
प्रश्नावली
1. उपभोक्ता का नाम ………………………

2. निवास स्थान ………………………

3. परिवार में सदस्यों की संख्या ……………………….

4. औसत मासिक आय (रुपयों में) –

  • 1000 रुपये तक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 1000 रुपये से 20000 रुपये के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 2000 रुपये से 5000 रुपये के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 5000 रुपये से 10,000 हजार रुपये के बीच Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 10,000 रुपये से अधिक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

5. आपका व्यवसाय
नौकरी Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 व्यापार Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 अन्य Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

6. राशन की दुकान आपके घर में कितनी दूर है?

  • 200 मीटर तक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • 500 मीटर तक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • एक किलो मीटर तक Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

7. क्या आप उचित मूल्य की दुकान से राशन लेते हैं ?
हाँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

8. आप उचित मूल्यों की दुकान से किन-किन वस्तुओं का राशन लेते हैं?
चीनी Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 गेहूँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 चावल Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 पी Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 अन्य Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 दालें Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

9. यदि आप उचित मूल्यों की दुकानों से राशन नहीं लेते तो उसका मुख्य कारण है –

  • लम्बी कतारें Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • घटिया, वस्तुएँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • कीमतों में विशेष अन्तर न होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • समय का अभाव Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • प्रायः संबंधित वस्तु का उपलब्ध न होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • राशन की दुकान का दूर होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

10. यदि आप उचित मूल्यों की दुकानों से राशन लेते हैं, तो उसका मुख्य कारण है –

  • कीमतों का कम होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • आय का कम होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • निसास स्थान के पास होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

11. क्या आप केवल चीनी का ही राशन लेते हैं? हाँ/नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 यदि हाँ तो उसका मुख्य कारण है –

  • खुले बाजार की चीनी और राशन की चीनी की कीमतों में अंतर बहुत है। Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • चीनी प्रायः मिल जाती है, अन्य वस्तुओं का स्टॉक का अभाव रहता है। Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

12. क्या आप राशन के गेहूँ का प्रयोग करते हैं? हाँ नहीं। यदि हाँ तो उसका मुख्य कारण है –

  • गेहूँ का घटिया किस्म का होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • गेहूँ का प्रायः उपलब्ध न होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • चावल का प्रयोग Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • प्रत्यक्ष आटे का प्रयोग Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

13. क्या राशन के खाद्य-तेल (घी) का प्रयोग करते हैं?
हाँ Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7 नहीं Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

यदि नहीं तो उसका मुख्य कारण है –

  • घी का प्रायः उपलब्ध न होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • उपभोग की जाने वाली ब्राण्ड का उपलब्ध न होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • अन्य कारण Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

14. आपकी दृष्टि से राशन-वितरण प्रणाली में सुधार के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय होगा –

  • सभी वस्तुओं का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • और अधिक बस्तुओं का उपलब्ध होना, जैसे जूते, कपड़े आदि Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7
  • उचित मूल्यों की दुकानों की संख्या में वृद्धि Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 7

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प्रश्न 3.
प्राथमिक आँकड़ों की सहायता से मदर डेयरी में कुछ सब्जियों की कीमतों में होने वाले परिवर्तनों पर एक परियोजना तैयार करना
उत्तर:
मद डेयरी सब्जी विभाग में जनवरी-फरवरी-2006 में सब्जियों की कीमतें।, (Vegetable Prices at Mother Dairy (Vegetable outlet) durig Jan-Feb-2006)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 10

आँकड़ों का वर्गीकरण:
आँकड़ों को पहले ही तालिका में संकलित किया गया है।

आँकड़ों का चित्रमय प्रदर्शन (Graphic Presentation of Data):
सब्जियों की कीमतों का चित्रमय प्रदर्शन किया जा सकता है। हम यहाँ केवल आलू की कीमतों का चित्रमय प्रदर्शन करेंगे।
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प्रश्न 4.
उपभोक्ता में जागृति के विषय में निम्नलिखित जानकारी प्राप्त की गई है। इन्हें तालिका में प्रदर्शित करें।
(क) ग्रामीण उपभोक्ता से सम्बन्धित आंकड़े
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 13
उत्तर:
गृहस्थों में उपभोक्ता जागृति (Consumed Awarness among Households):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 9 सांख्यिकीय विधियों के उपयोग Part - 2 img 15

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 8 सूचकांक

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 8 सूचकांक Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Economics सूचकांक Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मदों के सापेक्षिक महत्त्व को बताने वाले सूचकांक को –
(a) भारित सूचकांक कहते हैं।
(b) सरल समूहित सूचकांक कहते हैं।
(c) सरलमूल्यानुपात का औस कहते हैं।
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) भारित सूचकांक कहते हैं।

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प्रश्न 2.
अधिकांश भारित सूचकांकों में भार का संबंध –
(a) आधार वर्ष होता है।
(b) वर्तमान वर्ष होता है।
(c) आधार एवं वर्तमान वर्ष दोनों से होता है।
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) आधार वर्ष होता है।

प्रश्न 3.
ऐसी वस्तु जिसका सूचकांक से कम भार है, उसकी कीमत में परिवर्तन से सूचकांक में कैसा परिवर्तन होगा?
(a) कम
(b) अधिक
(c) अनिश्चित
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कम

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प्रश्न 4.
कोई उपभोक्ता कीमत सूचकांक किस परिवर्तन को मापता है?
(a) खुदरा कीमत
(b) थोक कीमत
(c) उत्पादकों की कीमत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) खुदरा कीमत

प्रश्न 5.
औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक में किस मद के लिए उच्चतम भार होता है?
(a) खाद्य पदार्थ
(b) आवास
(c) कपड़े
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) खाद्य पदार्थ

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प्रश्न 6.
सामान्यतः मुद्रा स्फीति के परिवर्तन में किसका प्रयोग होता है?
(a) थोक कीमत सूचकांक
(b) उपभोक्ता कीमत सूचकांक
(c) उत्पादक कीमत सूचकांक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) थोक कीमत सूचकांक

प्रश्न 7.
हमें सूचकांक की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
आर्थिक चरों में दो समय बिंदुओं से सम्बन्धित औसत प्रतिशत परिवर्तन की जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें सूचकांक की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 8.
आधार वर्ष अवधि के वांछित गुण क्या होते हैं?
उत्तर:
आधार अवधि के वांछित गुण (Desirable properties of the base year) इस प्रकार हैं –

  1. आधार अवधि सामान्य अवधि होनी चाहिए।
  2. आधार अवधि ने तो अधिक पुरानी होनी चाहिए और न ही अधिक नई।
  3. यह वह अवधि होनी चाहिए जिसके आंकड़े उपलब्ध हों।

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प्रश्न 9.
भिन्न उपभोक्ताओं के लिए भिन्न उपभोक्ता कीमत सूचकांकों की अनिवार्यता क्यों होती है?
उत्तर:
उपभोक्ता की विभिन्न श्रेणियों के लिए विभिन्न उपभोक्ता सूचकांक बनाना इलिए आवश्यक है क्योंकि उनके खान-पान (कोई वर्ग गेहूँ की रोटी खाता है और कोई वर्ग गेहूँ के स्थान पर चावल का अधिक प्रयोग करता है), पहनावे जीवन-स्तर और रीति-रिवाजों में विभिन्नता पाई जाती है।

प्रश्न 10.
औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक क्या मापता है?
उत्तर:
औद्योगिक कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सामान्य स्फीति मापता है।

प्रश्न 11.
कीमत सूचकांक तथा मात्रा सूचकांक में क्या अन्तर है?
उत्तर:
कीमत सूचकांक को बनाने का उद्देश्य वस्तुओं के समूहों के कीमतों में होने वाले सापेक्ष परिवर्तनों को मापना है जबकि मात्रा सूचकांक बनाने का उद्देश्य विभिन्न वस्तुओं की मात्रा में होने वाले सापेक्ष परिवर्तनों को मापना है।

प्रश्न 12.
क्या किसी भी तरह का कीमत परिवर्तन एक कीमत सूचकांक में प्रतिबिंबित होता है?
उत्तर:
नहीं।

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प्रश्न 13.
क्या शहरी गैर-शारीरिक कर्मचारियों के उपभोक्ता कीमत सूचकांक भारत के राष्ट्रपति के निर्वाह लागत में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व कर सकता है?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 14.
नीचे एक औद्योगिक केन्द्र के श्रमिकों द्वारा 1980 एवं 2005 के दौरान निम्न मदों पर प्रतिव्यक्ति मासिक व्यय को दर्शाया गया है। इन मदों का भार 75, 10,5,6 तथा 4 है। 1980 को आधार मानकर 2005 के लिए जीवन निर्वाह लागत का एक भारित सूचकांक तैयार कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 1
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 2

प्रश्न 15.
निम्नलिखित सारणी को ध्यानपूर्वक पढ़िए एवं अपनी टिप्पणी कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 3
उत्तर:
सारणी से पता चलता है कि व्यापक श्रेणियों के संवृद्धि निष्पादन में विभिन्नता है, सामान्य सूचकांक इन श्रेणियों के औसत निष्पादन को दिखाता है।
खनन तथा उत्खनन के अपेक्षाकृत निम्न निष्पादन के बावजूद सामान्य सूचकांक नीचे नहीं गिरा। इसका मुख्य कारण विनिर्माण तथा विद्युत में अच्छा निष्पादन होना है।

प्रश्न 16.
स्फीति परिवार में उपभोग की जाने वाली महत्त्वपूर्ण मदों की सूची बनाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
गेहूँ, चीनी, चावल, दाल, कपड़ा, पैट्रोल, मकान, मनोरंजन, टेलीफोन, मोबाइल, टी. वी., रेडियो, वाहन, स्टेशनरी, पुस्तकें आदि।

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प्रश्न 17.
यदि एक व्यक्ति का वेतन आधार वर्ष में 4000 रु0 प्रति वर्ष था और उका वर्तमान वर्ष में वेतन 6000 रु0 है।
उसके जीवन स्तर को पहले जैसा ही बनाए रखने के लिए उसके वेतन में कितनी वृद्धि होनी चाहिए, यदि उपभोक्ता कीमत सूचकांक 400 हो।
उत्तर:
आधार वर्ष में आय = 4000 रुपये
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक = 400 रुपये
अतः वर्तमान आय हो होनी चाहिए = 4000 × \(\frac{400}{100}\) = 1600 रुपये
वर्तमान वार्षिक आय = 6,000 रुपये
आय में वृद्धि हो होनी चाहिए = 16000 – 6,000 = 10,000 रुपये

प्रश्न 18.
जून 2005 में उपभोक्ता कीमत सूचकांक 125 था। खाद्य सूचकांक 120 तथा अन्य मदों को सूचकांक 135 था। खाद्य पदार्थों को दिया जाने वाला भार कुल भार का कितना प्रतिशत था।
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक = 125
भोजन का सूचकांक = 120
उपभोक्ता सूचकांक का विचलन = 125 – 120 = 5
अन्य मदों का सूचकांक = 135
उपभोक्ता सूचकांक से विचलन = 135 – 120 = 5
अतः भोजन का भार = \(\frac{5}{5+15}\) × 100 = 25%

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प्रश्न 19.
किसी शहर में एक मध्यवर्गीय पारिवारिक वजट में जांच-पड़ताल से निम्नलिखित जानकारी प्राप्त होती है:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 4
1995 की तुलना में 2004 में निर्वाह सूचकांक का मान क्या होगा?
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 5
निर्वाह सूचकांक = \(\frac{18650}{100}\) = 186.5

प्रश्न 20.
दो सप्ताह तक अपने परिवार के (प्रति इकाई) दैनिक व्यय, खरीदी गई मात्रा तथा दैनिक खरीददारी को अभिलिखित कीजिए। कीमत में आए परिवर्तन आपको किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
उत्तर:
विद्यार्थियों को परामर्श दिया जाता है कि वे अपने माता/पिता से पिछले दो सप्ताह होने वाले दैनिक व्ययों के बारे में पूछे।
उनसे यह भी पूछे कि वह कौन-सी वस्तु कितनी मात्रा में क्रय करते हैं और प्रति इकाई उस वस्तु की क्या कीमत है। इन सब बातों को अपनी कापी में लिखें।

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प्रश्न 21.
निम्नलिखित आँकड़ों दिए गए हैं –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 6
(क) विभिन्न सूचकांकों को प्रयुक्त करते हुए मुद्रा स्फीति की दर का परिकलन कीजिए।
(ख) सूकांकों के सापेक्षिक मानों पर टिप्पणी लिखें।
(ग) क्या ये तुलना योग्य हैं?
उत्तर:
(क) मुद्रा स्फीति की दर गणना –

1. औद्योगिक श्रमिक –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 7

2. नगरीय गैर-शारीरिक कर्मचारी –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 8

3. कृषि श्रमिक –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 9

4. थोक कीमत सूचकांक –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 10

(ख) सूचकांकों के सापेक्षिक मान पर टिप्पणी –

  • औद्योगिक श्रमिकों का C.P.I. आरम्भ के वर्षों में तेजी से बढ़ा परन्तु बाद में इसकी वृद्धि दरों में कमी आई।
  • नगरीय गैर-शारीरिक कर्मचारियों के C.P.I. में काफ़ी उतार-चढाव आए।
  • कृषि श्रमिकों के C.P.I में काफी उतार-चढ़ाव पाए गए।

(ग) ये तुलना योग्य नहीं हैं।

Bihar Board Class 11 Economics सूचकांक Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्फीति दर की गणना का सूत्र लिखें।
उत्तर:
स्फीति दर = \(\frac { X_{ 1 }-X_{ t }-1 }{ X-t-1 } \times 100\)
xt – 1 = पिछले माह, वर्ष, सप्ताह या दिन थोक मूल्य सूचकांक (WPI)
Xt = वर्तमान मास, वर्ष, सप्ताह या दिनों का थोक मूल्य सूचकांक।

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प्रश्न 2.
मुद्रा की क्रय शक्ति तथा वास्तविक मजदूरी की गणना करने के लिए किस सूचकांक का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)।

प्रश्न 3.
पाशे की सूचकांक के भार क्या आधार है?
उत्तर:
पाशे की सूचकांक के भार का आधार चालू वर्ष की मात्रा है।

प्रश्न 4.
सामान्य मूल्य सूचकांक क्या माप करते हैं?
उत्तर:
सामान्य मूल्य सूचकांक मूल्य स्तर पर होने वाले परिवर्तन की माप करते हैं।

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प्रश्न 5.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक क्या है?
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किसी वर्ग के व्यक्तियों द्वारा उपयोग की जाने वाली वस्तुओं के फुटकर मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों का मापन करते हैं।

प्रश्न 6.
सूचकांक बनाने में कौन-सी माध्य विधि उपयुक्त है?
उत्तर:
गुणात्मक. माध्य (Geometric Mean)।

प्रश्न 7.
सरल समूही विधि सूचकांक को ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
P01 = \(\frac { ΣP_{ 1 } }{ ΣP_{ 0 } } \times 100\) × 100

प्रश्न 8.
मूल्यानुपामों (Price Relatives) से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 11

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प्रश्न 9.
मूल्यानुपात सूचकांक ज्ञान करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
P01 \(\frac { Σ(P_{ 1 }/P_{ 0 }\times 10) }{ N } \)

प्रश्न 10.
सूचकांकों को बनाने की भारित समूही विधि में किसी प्रकार के भार प्रयोग में लाये जाते हैं?
उत्तर:
मात्रा के भार (Quantity weight)।

प्रश्न 11.
भारित समूही विधि द्वारा सूचकांक ज्ञात करने का सूत्र लिखिए।
उत्तर:
P01 = \(\frac { ΣP_{ 1 } q_{ 1 }}{ ΣP_{ 0 } q_{ 0 }} \times 100\) × 100

प्रश्न 12.
सचूकांको की भारित मूल्यानुपात विधि में किस प्रकार के भार का प्रयोग किया जाता हैं?
उत्तर:
मूल्य भार (Value Weight)।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 8 सूचकांक

प्रश्न 13.
भारित मूल्यानुपात विधि से सूचकांक को ज्ञात करने का सूत्र दीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 12

प्रश्न 14.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किसे कहते हैं?
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक वे सूचकांक हैं जो एक समयाविधि में कीमत स्तर में होने वाले परिवर्तनों को उपभोक्ताओं के जीवन निर्वाह पर पड़ने वाले प्रभाव को मापता है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को जीवन-निर्वाह व्यय सूचकांक कहते हैं।

प्रश्न 15.
थोक मूल्य सूचकांक किसे कहते हैं?
उत्तर:
थोक मूल्य सूचकांक वे सूचकांक हैं जो एक समयाविधि में वस्तुओं के थोक मूल्यों में हाने वाले परिवर्तनों को मापते हैं। भारत में सूचकांक सप्ताहिक आधार पर तैयार किये जाते हैं।

प्रश्न 16.
मुद्रा-स्फीति की दर निकालने का सूत्र लिखें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 13

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प्रश्न 17.
वर्ष 1999 में एक देश की चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय 800 करोड़ रुपये थी जो बढ़कर वर्ष 2000 में 910 करोड़ रुपये हो गई। इसी अवधि में थोक मूल्य सूचकांक 120 से बढ़कर 130 हो गया।
राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि कितनी हुई?
उत्तर:
वर्ष 2000 में वास्तविक राष्ट्रीय आय = \(\frac{910×120}{130}\) = 840 करोड़ रुपये।
राष्ट्रीय आय मे वास्तविक वृद्धि = 840 – 800 = 40 करोड़ रुपये।

प्रश्न 18.
अभारित सूचकांक को परिभारित करें।
उत्तर:
अभारित सूचकांक को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 14

प्रश्न 19.
भारित सूचकांक क्या है?
उत्तर:
भारित सूचकांक कीमत सापेक्षों का भारित माध्य है।
सूत्र के रूप में P01 = Σwl\(\frac { P_{ 11 } }{ P_{ 10 } } \)

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प्रश्न 20.
भारत में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के निर्माण के लिये उद्योगों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है? उन श्रेणियों के नाम लिखें।
उत्तर:
भारत में औद्योगिक सूचकांकों का निर्माण करने के लिए उद्योगों का निम्न तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है –
(क) खनन (Mining)।
(ख) विनिर्माण (Manufacturing)।
(ग) बिजली (Electricity)।

प्रश्न 21.
अभारित सूचकांक की क्या सीमाएँ (दोष) हैं?
उत्तर:
अभारित सूचकांक की एक सीमा यह है कि सभी मदों को एक जैसा भार (महत्त्व) देता है चाहे कुछ मदें दूसरी मदों से अधिक आवश्यक ही क्यों न हों। जैसे-यह माचिस कीकीमत और मकान के किराये को एक जैसा महत्त्व देता है।

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प्रश्न 22.
सूचकांक बनाने की विभिन्न विधियां कौन-सी हैं?
उत्तर:
सूचकांक बनाने की मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. साधारण समूह विधि (Simple Aggregative Method)
  2. साधारण मूल्यानुपात माध्य विधि (Simple Average of Price Relative Method)
  3. भारित समूह विधि (Weighted Aggregative Method)
  4. मूल्यों की भारित माध्य विधि (Weighted average ofPrice Relative Method)

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक क्या है?
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक किसी स्थान विशेष पर वर्ग विशेष के व्यक्तियों के निर्वाह-व्यय में होनेवाले परिवर्तनों की दिशा व मात्रा को प्रकट करते हैं।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को निर्वाह व्यय सूचकांक भी कहते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक विभिन्न स्थानों के लिए अलग-अलग बनाये जाते हैं।

प्रश्न 2.
सूचकांक क्या है?
उत्तर:
सूचकांक एक विशेष प्रकार का माध्यम है जो किसी समय अथवा के आधार पर सम्बन्धित चरों के समूह में होने वाले सापेक्षिक परिवर्तनों को मापता है।
इसमें किसी एक समय के मूल्यों को 100 मानकर दूसरे समय के मूल्यों का प्रतिशत ज्ञात किया जाता है ओर इन प्रतिशतों की माध्य निकाली जाती है। प्रतिशतों की यह माध्य ही सूचकांक या निर्देशांक कहलाता है। प्रो. ब्लेयर के शब्दों में, “सूचकांक विशिष्ट प्रकार के माध्य होते हैं।” (Index Number are specified type of averages)

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प्रश्न 3.
थोक मूल्य सूचकांक तालिका बनाएँ जिसमें उद्योगों के समूहीकरण तथा उनके दिये गये भार दिखाये गये हों।
उत्तर:
उद्योगों का समूहीकरण तथा उनके भार (Industrial grouping and their weights)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 15

प्रश्न 4.
सूचकांक बनाने में अनेकों कठिनाइयां सामने आती हैं। किन्हीं तीन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. आधार वर्ष का चुनाव (Selection of Base Year):
आधार वर्ष सामान्य होना चाहिए अर्थात् वह एक ऐसा वर्ष हो जो बाढ़, युद्ध, महामारी आदि असाधारण प्रकोपों से मुक्त हो। आधार वर्ष बहुत ही छोटा या बहुत बढ़ा नहीं होना चाहि। यह बहुत पुराना भी नहीं होना चाहिए।

2. वस्तुओं का चुनाव (Selection of Commodities):
केवल उन्हीं चुनाव किया जाना चाहिए जो सम्बन्धित वर्ग में लोकप्रिय हों तथा उनकी आदतों व आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करें। वस्तुओं के गुणों में स्थिरता होनी चाहिए।

3. मूल्यों का चुनाव (Selection of Prices):
वस्तुओं के कवेल प्रतिनिधि मूल्यों का ही चुनाव किया जाना चाहिए। ये मूल्य उन मण्डियों से प्राप्त किया जाने चाहिये जहाँ पर उन वस्तुओं का काफी मात्रा में क्रय-विक्रय होता है।

प्रश्न 5.
थोक कीमत सूचकांक के लाभ लिखें।
उत्तर:
थोक मूल्य सूचकांक के लाभ इस प्रकार हैं –

  1. थोक मूल्य सूचकांक के द्वारा मुद्रास्फिीति दर की गणना की जाती है। मुद्रास्फीति दर की गणना करने के लिये निम्नसूत्र का प्रयोग किया जाता है।
    Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 16
  2. थोक कीमत सूचकांक में परिवर्तनों की दशाओं को देखकर भविष्य में मांग और पूर्ति में होने वाले परिवर्तनों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  3. थोक कीमतों की सूचकांक की सहायता से राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि ओर कमी की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  4. विभिन्न परियोजनाओं की लागत अंकन में थोक कीमत सूचकांक सहायक होते हैं।

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प्रश्न 6.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक या जीवन-निर्वाह सूचकांक की उपयोगिता लिखें।
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की उपयोगिता निम्नलिखित है –

  1. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की सहायत से एक वर्ग विशेष के रहन सहन के व्यय में होने। वाले परिवर्तनों का ज्ञान होता है।
  2. इसके आधार पर सरकार विभिन्न कर्मचारियों को महंगाई भत्ता व न्यूनतम आदि निश्चित करती है।
  3. व्यय में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार यथासम्भव नीतियों निर्धारण किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
साधारण सूचकांक का निर्माण की कौन-सी विधियाँ हैं? प्रत्येक किया जाने वाला सूत्र लिखिए।
उत्तर:
1. सही समूह विधि (Aggregative Method):
इस विधि द्वारा सूचकांक को ज्ञात करने का सूत्र निम्न है –
P01 = \(Σ(\frac { P_{ 1 } }{ P_{ 0 } } \times 100)\)
P1 = चालू वर्ष की कीमतों का योग
P0 = आधार वर्ष की कीमतों का योग

2. मूल्यानुपति विधि इस विधि द्वारा सूचकांक को ज्ञात करने का सूत्र निम्लिखित है –
P01 = \(\frac { Σ(\frac { P_{ 1 } }{ P_{ 0 } } \times 100) }{ N } \)

प्रश्न 8.
भारित सूचकांक बनाने की लैसपियर तथा पाश्चे विधियों में अन्तर के तीन बिन्दु बताएँ।
उत्तर:
लैसपियर तथा पाश्चे विधियों में अन्तर (Difference between Laspeyre’s method and Pasche’s method)
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प्रश्न 9.
थोक कीमत सूचकांक के लाभ लिखें।
उत्तर:
थोक कीमत सूचकांक के लाभ निम्नलिखित हैं –

  1. थोक मूल्य सूचकांक के द्वारा स्फीति की दर की गणना की जाती है। मुद्रा-स्फीति दर की गणना करने क लिये निम्नलिखित सूख का प्रयोग किया जाता है –
    Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 18
  2. थोक कीमत सूचकांक में परिवर्तनों की दशाओं को देखकर भविष्य में मांग और पूर्ति में होने वाले परिवर्तनों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  3. थोक कीमतों की सूचकांक की सहायता से राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि और कमी की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  4. विभिन्न परियोजनाओं की लागत अंकन में थोक कीमत सूचकांक सहायक होते हैं।

प्रश्न 10.
सेंसेक्स पर एक संक्षिप्त नोट लिखों।
उत्तर:
सेंसेक्स का पूरा नाम Bomaby Stock Exchange Sensitive Index है। इसका आधार वर्ष 1978-79 सूचकांक की मूल्य इसी आधार वर्ष के संदर्भ में होता है।
यदि हम कहें कि सेंसेक्स अब 10,000 रुपये है। इसका अभिप्राय यह है कि 1978-78 में सेंक्स 100 रुपये था जो अब बढ़कर 10,000 रुपये हो गया है।
बम्बई स्टॉक एक्यचेंज में 30 स्टाक हैं जो 30 उद्योगों का प्रतिनिधि करते हैं। यदि सेंसेक्स बढ़ जाता है, तो इसका अभिप्राय है कि बाजार ठीक चल रहा है और निवेशाक अधिक लाभ कमाने की आशा करते हैं।

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प्रश्न 11.
कुछ मुख्य सूचकांकों के नाम लिखकर किसी सूचकांक को समझाएँ।
उत्तर:
कुछ मुख्य सूचकांक (Some Important Index Number):
उपभोक्ता सूचकांक, थोक मूल्य सूचकांक, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, कृषि उत्पादन का सूचकांक, सेंसेक्स, उत्पादन मूल्य सूचकांक, मानव विकास सूचकांक आदि कुछ महत्त्वपूर्ण सूचकांक हैं।

मानव विकास सूचकांक (Human Development Index):
यह आर्थिक विकास के माप का एक संयुक्त सूचकांक है। इसका निर्माण तीन तत्त्वों (जीवन दीर्घता, ज्ञान या शिक्षा प्राप्ति प्रति व्यक्ति वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद) के आधार पर तैयार किया जाता है।
समीकरण के रूप में HdI = \(\frac{1}{3}\) (IRI + EAI + SLI)

प्रश्न 12.
सरल समूह विधि की सीमाएँ लिखें।
उत्तर:
सीमाएँ (Limitations):
सरल समूह विधिक की मुख्य सीमाएं निम्नलिखित हैं –

  1. जिस वस्तु की कीमत अधिक होगी उसके पक्ष मे छिपे रूप में भार मिल जाता है। उदाहरण के लिये सोने की कीमत अधिक होने से अधिक भार मिल जाता है।
  2. जिस इकाई की कीमत व्यक्त की जाती है, यदि उसका आकारया मात्रा बड़ी है तो उसको अधिक भार मिल जाता है।
    उदाहरण के लिये जिस वस्तु की कीमत प्रति टन मे व्यक्त की जायेगी उसको अधिक भार मिलेगा और जिस वस्तु की कीमत कि ग्राम में व्यक्त की जायेगी उसको भार कम मिलेगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उपभोक्ता कीमत सूचकांक निर्माण विधि में निहित चरण लिखें। उपभोक्ता कीमत सूचकांक किन-किन मान्यताओं पर आधारित है?
उत्तर:
उपभोक्ता कीमत सूचकांक के निर्माण की प्रक्रिया में निहित चरण-उपभोक्ता कीमत सूचकांक के निर्माण चरण निहित हैं –

1. कार्यक्षेत्र (Scope):
सबसे पहला महत्त्वपूर्ण चरण यह तय करना है कि समाज के किस वर्ग के विषय में सूचकांक बनाना है।

2. सीमाक्षेत्र (Coverage):
कार्य क्षेत्र निर्धारित करने के बाद सीमा क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है अर्थात् किस क्षेत्र में श्रमिकों, विद्यार्थियों आदि से सूचकांक का सम्बन्ध है। एक जिला या एक राज्य।

3. आधार वर्ष का चुनाव (Selection of the base year):
यह एक महत्त्वपूर्ण चरण आधार वर्ष का चुनाव करते समय दो बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। एक आधार वर्ष आर्थिक दृष्टि से न एक सामान्य वर्ष होना चाहिए। दूसरे वह चालू वर्ष से अधिक दूर और न ही अधिक नजदीक होना चाहिए।

4. परिवार बजट के विषय में सूचना प्राप्त करना (Conducting an enquires about family budget):
इसके अन्तर्गत एक परिवार बजट में एक समय काल में विभिन्न मदों की जानकारी प्राप्त की जाती है।

5. कीमत की जानकारी प्राप्त करना (Obtaining Prince Quotation):
परिवार बजट के बाद उन कीमतों की जानकारी ली जाती है जिनको सूचकांक में शामिल किया जाना है। कीमतें प्रायः उन्हीं बाजारों से प्राप्त करनी चाहिए जहाँ से सामान्यत: सम्बन्धित वर्ग समूह सामान खरीदता है।

मान्यताएँ (Assumption):
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक निम्न मान्यताओं पर आधारित है –

  1. उपभोक्ता के एक विशेष वर्ग में सभी व्यक्तियों की आवश्यकतायें एक जैसी हों।
  2. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में सम्मिलित की जाने वाली वस्तुओं की कीमतें विभिन्न स्थानों पर समान हों।
  3. उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की मात्रायें आधार वर्ष चालू वर्ष में समान रहती हैं।

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प्रश्न 2.
सूचकांको (निर्देशांकों) के निर्माण की साधारण विधि लिखें।अथवा, सूचकांक का निर्माण करते समय कौन-कौन सी समस्याएं आती हैं? अथवा, एक सूचकांक बनाते समय हमें कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिये?
उत्तर:
सूचकांक के निर्माण की साधारण विधि (General method of Constructing of index Numbers)
सूचकांक के निर्माण में निम्नलिखित मुख्य समस्याएँ हैं –

1. सूचकांक का उद्देश्य (Purpose of Index Number):
सूचकांक बनाने के पूर्व यह निर्धारित कर लेना आवश्यक है कि इसका उद्देश्य क्या है क्योंकि उद्देश्य के अनुसार ही सूचनाएँ एकत्र की जायेंगी। उदाहरणार्थ जीवन निर्वाह लागत सूचकांक (Cost of Living Index Number) उत्पादन सूचकांक का निर्माण करता है।

2. आधार वर्ष का चुनाव (Selection of the Base Year):
सूचकांक के निर्माण में एक आधार वर्ष का चुनाव आवश्यक है क्योंकि इसकी तुलना में चर मूल्यों के परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। आधार वर्ष का चुनाव कठिन होता है।
आधार वर्ष का चुनाव इस बात को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए कि वह आर्थिक दृष्टि से सामान्य वर्ष हो। उस वर्ष कोई राजनैतिक, प्राकृतिक आर्थिक दृष्टि से असामान्य घटना न घटी हो।

3. मदों का चुनाव (Selection of Items):
निर्देश में शामिल की जाने वाली मदों का चुनाव करना आवश्यक है। यह चुनाव के अनुकूल होना चाहिए। निर्देशांक बनाने के लिए उद्देश्य के अनुसार उचित संख्या में प्रतिनिधि वस्तुओं को शामिल किया जा सकता है।

4. प्रतिनिधि मूल्यों का चुनाव (Selection of Representative):
दिर्नेशांक बनाते समय चुनी हुई वस्तुओं के मूल्यों की समस्या आती है। अत: उपभोक्ता सूचकांक बनाते समय वे मूल्य लेने जिन पर आम उपभोक्ता को वस्तु उपलब्ध होती है।

5. वस्तुओं को भार देना (Assigning Weightage):
निर्देशांक के लिए चुनी हुई वस्तुओं का महत्त्व या भार एक समान उपभोक्ता को वस्तु उपलबध होती है।

6. माध्य का चुनाव (Selection of Suitable Average):
सूचकांक एक विशेष प्रकार को माध्य होते हैं। केन्द्रीय प्रवृत्तियों की मापों के लिए माध्य, माध्यिका भूयिष्ठक में से किसी का भी प्रयोग किया जा सकता हैं।
यहाँ किसी औसत का प्रयोग करने से यह समस्या आती है। प्रायः समान्तर माध्य प्रयोग किया जाता है। अलग-अलग माध्यमों से भिन्न भिन्न सूचकांक प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 3.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की विशेषतायें (Features of Consumer Price Index):
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित हैं –

1. भारत में तीन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बनाये जाते हैं –

  • औद्योगिक कर्मचारियों के लिये
  • शहरी गैर-शारीरिक कार्य करने वाले कर्मचारियों के लिये
  • कृषि श्रमिकों के लिये।

2. इन तीन प्रकार के उपभोक्ता मूल्य सचूकांकों के आधार वर्ष 1982 (औद्योगिक कर्मचारियों के लिये), 1984-85 (शहरी गैर-शारीरिक कार्य करने वाले कर्मचारियों के लिये) तथा 1986-82 (कृषि श्रमिकों के लिये) हैं।

3. इन तीनों सूचकांकों की गणना प्रतिमास की जाती है ताकि इस बात का विश्लेषण किया जा सके कि कीमतों में होने वाले परिवर्तनों का प्रभाव इन तीन श्रेणीके लोगों के जीवन निर्वाह व्यय पर क्या पड़ा है।

4. औद्योगिक कर्मचारियों तथा कृषि श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का प्रकाशन श्रमिक ब्यूरों (Bureau) द्वारा किया जाता है।

5. शहरी गैर कार्मिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का प्रकाशन केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा किया जाता है।

6. औद्योगिक श्रमिकों के लिये उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में ली गई मुख्य मदों को निम्न तालिका में दर्शाया गया है। तालिका से हमें पता चलता है कि भोजन को सबसे अधिक भार दिया गया है।
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प्रश्न 4.
सूचकांक के लाभ लिखें।
उत्तर:
निर्देशांक ठीक उसी प्रकार से देश के आर्थिक परिवर्तनों को मापने के लिए उपयोगी हैं, जैसे वायुमापक यन्त्र (Barometer) के द्वारा वायु के दबाव व मौसम की स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है। निर्देशांकों की उपयोगिता अथवा लाभ निम्नलिखित हैं –
1. जटिल तथ्यों को सरल करना (To Simplify Complexities):
व्यापार या व्यवसाय में ऐसे परिवर्तन होते रहते हैं जिनका प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन नहीं हो सकता। निर्देशांक ऐसे जटिल तथ्यों को सरल करके उन्हें ऐसा रूप प्रदान करते हैं ताकि वे तथ्य प्रत्येक व्यक्ति की समझ में आ सकें।

2. भविष्य के लिए पूर्वानुमान लगाना (To Make Predicitions):
सूचकांकों द्वारा भूतकाल के तथ्यों तथा उनमें वर्तमान में होने वाले परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए ‘भविष्य’. में क्या होगा’ इसका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

3. तुलनात्मक अध्ययन में सहायक (Helpful in Comparative Study):
सूचकांकों या निर्देशांकों की सहायता से तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। जैसे-इनके द्वारा यह ज्ञात किया जा सकता है कि किसी वस्तु किस वर्ष कितनी थी तथा अब कितनी है। इसमें कितने प्रतिशत कमी या वृद्धि हुई है।

4. सापेक्ष माप करना (Relative Measurement):
सूचकांक केवल सापेक्ष परिवर्तनों का मापने का कार्य करते हैं। अत: जहाँ आर्थिक तथ्यों का निरपेक्ष या प्रत्यक्ष माप संभव न हो वहाँ सूचकांक तथ्यों का सापेक्ष या अप्रत्यक्ष माप प्रस्तुत करते हैं।

5. मुद्रा की क्रय का माप (To Measure Value of Money):
निर्देशांक मुद्रा के मूल्य में होने वाले परिवर्तनों को मापता है। यदि मूल्यों में कमी होती है तो मुद्रा का मूल्य बढ़ जाता है और यदि वृद्धि का मूल्य कम हो जाता है।

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प्रश्न 5.
निम्न मूल्य से 1984 को आधार मानकर 1985 से 2001 के लिए सूचकांक ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 20
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 21

प्रश्न 6.
निम्नलिखित आंकड़ों से वर्ष 1984 को आधार मानकर मूल्यानुपात ज्ञात कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 22
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 23

प्रश्न 7.
1985 को आधार मानकर निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से वर्ष 1988 के लिए सूचकांक (index) तैयार करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 24
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 25

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का निर्धारण करें –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 26
उत्तर:
उपभोक्ता-मूल्य सूचकांक का निर्माण
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 27

प्रश्न 9.
निम्न आँकड़ों की सहायता से जीवन निर्वाह लागत सूचकांक ज्ञात कीजिये। (Calculate the cost of living index number from the following data)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 28
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 29

प्रश्न 10.
1980 को आधार मानकर 1985 का भारित सूचकांक मूल्यानुपात निकालो।
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 31

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प्रश्न 11.
मूल्यानुपात माध्य कीमत विधि द्वारा सूचकांक ज्ञात करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 32
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 33
दूसरे शब्दों में कीमतों में 70.3% वृद्धि हुई।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से जीवन-निर्वाह लागत सूचकांक की गणना करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 34
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 35
जीवन निर्वाह सूचकांक = \(\frac{25350}{100}\) = 253.50

प्रश्न 13.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से मूल्यनुपात माध्य विधि द्वारा साधारण सूचकांक ज्ञात कीजिए:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 36
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 37
दूसरे शब्दों में कीमतों में 49% वृद्धि हुई।

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प्रश्न 14.
भारित मूल्यानुपात माध्य विधि से सूचकांक की गणना कीजिये।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 37
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 39

प्रश्न 15.
निम्न तालिका को ध्यान से पढ़े और अपनी टिप्पणी दें:
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक आधार वर्ष 1993-94 (Index of Industrial Production Base 1993-94)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 40
उत्तर:
टिप्पणी तालिका से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था की मुख्य श्रेणियों के संवर्धन में वृद्धि में अंतर है।
सामान्य इन श्रेणियों की औसत उपलब्धियों को दर्शाता है। सामान्य सूचकांक में 45% की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में खनन उत्खनन में केवल 25% हुई है। खनन तथा उत्खनन में उत्पादन में कम प्रतिशत उत्पादन होने पर भी सामान्य सूचकांक में कमी नहीं आई है। इसका कारण विनिर्माण में 47% तथा विद्युत में 41% वृद्धि होना है। इसके अतिरिक्त विनिर्माण को अधिक भार दिया गया है।

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प्रश्न 16.
निम्नलिखित तालिका को ध्यान से पढ़े और उस टिप्पणी करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 41
उत्तर:
तालिका से हमें निम्नलिखित बातों की जानकारी प्राप्त होती है –

  1. भारत के उद्योगों को मुख्य तीन समूहों में विभाजित किया गया है।
  2. विनिर्माण को सबसे अधिक भार दिया गया है।
  3. मई 2005 में सामान्य सूचकांक 213 था।
  4. खनन और उत्खनन में तुलनात्मक रूप से सबसे कम वृद्धि हुई है।
  5. खनन और उत्खनन में कम वृद्धि होने के बावजूद सामान्य सूचकांक नीचे नहीं आया। इसका मुख्य कारण विनिर्माण में अधिक वृद्धि होना है।

प्रश्न 17.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से आप क्या समझते हैं? उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की उपयोगिता का वर्णन करें।
उत्तर:
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumber price Index):
यह किसी स्थान विशेष पर वर्ग विशेष के व्यक्तियों के निर्वाह व्यय में होने वाले परिवर्तन की दशा व मात्रा को प्रकट करती हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को निर्वाह व्यय सूचकांक भी कहते हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक विभिन्न स्थानों के लिए अलग-अलग बनाए जाते हैं।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की उपयोगिता –

  1. इनकी सहायता से एक वर्ग विशेष के रहन-सहन में व्यय में होने वाले परिवर्तनों का ज्ञान होता है।
  2. इसके आधार पर विभिन्न कर्मचारियों का महँगाई भत्ता व न्यूनतम वेतन आदि निश्चित किया जाता है।
  3. व्यय में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार यथासंभव नीतियों का निर्धारण किया जाता है।

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प्रश्न 18.
थोक मूल्य सूचकांक क्या है? इसके लाभों का वर्णन करो।
उत्तर:
थोक मूल्य सूचकांक किसी स्थान पर विभिन्न वस्तुओं के थोक मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों की दिशा व मात्रा का ज्ञान कराते हैं।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 42

  1. थोक मूल्य सूचकांक में परिवर्तन की दशाओं को देखकर भविष्य में माँग और पूर्ति में होने वाले परिवर्तनों को अनुमान लगाया जा सकता है।
  2. थोक कीमतों की सपकांक की सहायता से राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि और कमी की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  3. विभिन्न परिजयोजनों के लागत अंकन में थोक कीमत सूचकांक सहायक होते हैं।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से 1985 को आधार मानकर समूह रीति से 1989 का मूल्यानुप ती निर्देशांक ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 43
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 8 सूचकांक Part - 2 img 44

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सूचकांक के स्तर में लगातार वृद्धि होने पर मुद्रा स्फीति की दर।
(a) बढ़ती है
(b) कम होती है
(c) स्थिति रहती है
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) बढ़ती है

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प्रश्न 2.
उपभोक्ता कीमत सूचकांक का वैकल्पिक नाम है –
(a) अभारित सूचकांक
(b) भारित सूचकांक
(c) निर्वाह व्यय सचकांक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) निर्वाह व्यय सचकांक

प्रश्न 3.
भारत वर्ष में सूचकांकों का निर्माण करने के लिए आधार वर्ष है –
(a) 1981 – 82
(b) 1993 – 94
(c) 2000 – 2001
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 1993 – 94

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प्रश्न 4.
कीमत सूचकांक में वृद्धि से मुद्रा की क्रय शक्ति –
(a) घटती है
(b) बढ़ती है
(c) कोई फर्क नहीं पड़ता है
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5.
सूचकांक का निर्माण करने के लिए आधार वर्ष होना चाहिए –
(a) सामान्य वर्ष
(b) असमान्य वर्ष
(c) कोई भी नहीं
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सामान्य वर्ष

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 8 सूचकांक

प्रश्न 6.
कीमत सापेक्ष होती हैं –
(a) अशुद्ध संख्या
(b) शुद्ध संख्या
(c) शब्दों में विवरणात्मक
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(d) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 7.
संयुक्त सूचकांक के निर्माण में शामिल कीजाती हैं –
(a) दो वस्तुएँ
(b) एक वस्तु
(c) दोनों
(a) और (c)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दो वस्तुएँ

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प्रश्न 8.
संयुक्त सूचकांक होता है –
(a) सापेक्ष कीमतों का गुणात्मक माध्य
(b) सापेक्ष कीमतों का सामांतर माध्य
(c) दोनों (a) और (b)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) सापेक्ष कीमतों का सामांतर माध्य

प्रश्न 9.
सूचकांक निर्माण के लिए जो वस्तुएँ ली जाती हैं वे नहीं होना चाहिए।
(a) समूह की प्रतिनिधि
(b) समूह से कोई संबंध नहीं होना चाहिए
(c) दोनों (a) और (c)
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) समूह की प्रतिनिधि

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प्रश्न 10.
थोक मूल्य सूचकांक का प्रकाशन भारत में होता है –
(a) दैनिक आधार पर
(b) साप्ताहिक आधार पर
(c) मासिक आधार पर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) साप्ताहिक आधार पर

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 7 सहसंबंध

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 7 सहसंबंध Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 7 सहसंबंध

Bihar Board Class 11 Economics सहसंबंध Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. कद (फूटों) में तथा वजन (कि. ग्राम) के बीच सहसम्बन्ध गुणांक की इकाई है –
(क) कि. ग्राम/पुट
(ख) प्रतिशत
(ग) अविद्यमान
उत्तर:
(क) कद (फूटों में) तथा वजन (किग्रा.) के बीच सहसम्बन्ध गुणांक की इकाई अविद्यमान है।

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प्रश्न 2.
सरल सहसम्बन्ध गुणांक का परास निम्नलिखित होगा –
(क) 0 से अनन्त तक
(ख) -1 से +1 तक
(ग) ऋणात्मक अनन्त से धनात्मक अनन्तक तक
उत्तर:
सरल सहसम्बन्ध गुणांक का परास -1 तथा +1 के बीच है।

प्रश्न 3.
यदि rxy धनात्मक है तो और y के बीच का संबंध इस प्रकार का होता है –
(क) जब y में बढ़ता है, तो x बढ़ता है
(ख) जब y में घटता है, तो x बढ़ता है
(ग) जब y में बढ़ता है, तो x नहीं बदलता है
उत्तर:
यदि ru धनात्मक है तो x और y के बीच का सम्बन्ध इस प्रकार का होता है जब y में बढ़ता है, तो x बढ़ता है।

प्रश्न 4.
यदि rxy = 0 है तब चर x तथा y के बीच:
(क) रैखिक संबंध होगा
(ख) रैखीय संबंध नहीं होगा
(ग) स्वतंत्र संबंध होगा
उत्तर:
यदि rsy = 0 है तब चर x तथा y के बीच स्वतंत्र होगा।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित तीन मापों में, कौन – सा माप किसी भी प्रकार के संबंध की माप सकता है –
(क) कार्ल पियरसन सहसम्बन्ध
(ख) स्पीयरमैन का कोटि सहसम्बन्ध
(ग) प्रकीर्ण आरेख
उत्तर:
प्रकीर्ण आरेख सभी प्रकार के सम्बन्धों को माप सकता है।

प्रश्न 6.
यदि परिशुद्ध रूप से मापित आँकड़े उपलब्ध हों तो सरल महासंबंध गुणांक –
(क) कोटि सहसम्बन्ध गुणांक से अधिक सही होता है।
(ख) कोटि सहसम्बन्ध गुणांक से कम सही होता है।
(ग) कोटि सहसम्बन्ध की ही भांति सही होता है।
उत्तर:
यदि परिशुद्ध रूप से मापित ऑकड़े उपलब्ध हों, तो सरल सहसम्बन्ध गुणांक कोटि सहसम्बन्ध गुणांक से अधिक सही होता है।

प्रश्न 7.
साहचर्य के माप के लिए 7 को सहप्रसरण से अधिक प्राथमिकता क्यों दी जाती है?
उत्तर:
साहचर्य के माप के लिए को तब अधिक प्राथमिकता दी जाती है जब चरम मान दिए गए हों। सामान्यत: rk का मान r से कम या इसके बराबर होता है।

प्रश्न 8.
क्या आंकड़ों के प्रकार के आधार पर r – 1 तथा +1 के बाहर स्थित हो सकता है?
उत्तर:
नहीं।

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प्रश्न 9.
क्या सहसम्बन्ध के द्वारा कार्यकारण संबंध की जानकारी मिलती है?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 10.
सरल सहसम्बन्ध गुणांक की तुलना में कोटि सहसम्बन्ध गुणांक कब अधिक परिशुद्ध होता है?
उत्तर:
कोटि सहसम्बन्ध साधारण सहसम्बन्ध गुणांक से इस अवस्था में अच्छा है जब चरों का मापन सही ढंग से किया जा सके।

प्रश्न 11.
क्या शून्य सहसम्बन्ध का अर्थ स्वतंत्रता है?
उत्तर:
नहीं। किन्तु स्वतंत्रता की संभावना बनी रहती है।

प्रश्न 12.
क्या सरल सहसम्बन्ध गुणांक किसी भी प्रकार के सम्बन्ध को माप सकता है?
उत्तर:
नहीं।

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प्रश्न 13.
एक सप्ताह तक अपने स्थानीय बाजार से 5 प्रकार की सब्जियों की कीमतें प्रतिदिन एकत्र करें । उनका सहसम्बन्ध गुणांक परिकलित कीजिए। परिणाम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं प्रत्यन करें।

प्रश्न 14.
अपनी कक्षा के सहपाठियों के कद मापिए। उनसे उनके बेंच पर बैठे सहपाठी का कद पूछिए। इन दो चरों का सहसम्बन्ध गुणांक परिकलित कीजिए और परिणाम का निर्वचन कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं प्रयत्न करें।

प्रश्न 15.
कुछ ऐसे चरों की सूची बनाएं जिनका परिशुद्ध मापन कठिन हो।
उत्तर:
निष्पक्षता, धर्मनिरपेक्षता, ईमानदारी, सत्यता, देशभक्ति, सद्भावना, परोपकार, नि:स्वार्थता आदि कुछ ऐसे चर हैं जिनका परिशुद्ध मापन कठिन है।

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प्रश्न 16.
r के विभिन्न मानों +1, -1 तथा 0 की व्याख्या करें।
उत्तर:

  1. यदि का मूल्य 1 है तो इसका तात्पर्य यह है कि दो चरों X तथा Y में पूर्णत: धनात्मक सम्बन्ध है।
  2. यदि का मूल्य -1 है तो इसका तात्पर्य यह है कि दो चरों x तथा Y में पूर्णत: ऋणात्मक सम्बन्ध है।
  3. यदि r का मूल्य 0 है तो इसका तात्पर्य यह है कि x तथा Y चरों में कोई सहसम्बन्ध नहीं है।

प्रश्न 17.
पियरसन सहसम्बन्ध गुणांक से कोटि सहसम्बन्य गुणांक क्यों भिन्न होता है?
उत्तर:
पियरसन का सहसम्बन्ध गुणांक दो चरों X एवं Y के बीच रेखीय संबंधों के सही संख्यात्मक मान की कोटि दर्शाता है। जबकि कोटि सहसम्बन्ध जब चरों का सार्थक रूप से मापन नहीं किया जा सकता, जैसे कीमत, आय, वजन आदि। कोटि निर्धारण तब अधिक होता है जब चरों की माप भ्रामक हो।

प्रश्न 18.
पिताओं (x) और उनके पुत्रों (Y) के कदों का माप नीचे इंचों में दिया गया है। इन दोनों के बीच सहसम्बन्ध गुणांक को परिकलित कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 1
उत्तर:
सहसम्बन्ध की गणना
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 2
Rk = 1 – \(\frac { 6ΣD^{ 2 } }{ N(N^{ 2 }-1) } \) = 1 – \(\frac{6×22.50}{8(64-1)}\)
= 1 – \(\frac{6×22.50}{8×6.3}\) = 1 – \(\frac{135}{504}\) = 1 – 0.305 = 0.695

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प्रश्न 19.
X और Y के बीच सहसम्बन्ध गुणांक को परिकलित कीजिए और उसके सम्बन्धों पर टिप्पणी कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 3
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 4

प्रश्न 20.
X तथा Y के बीच सहसम्बन्ध गुणांक को परिकलित कीजिए तथा उनके संबंध पर टिप्पणी कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 5
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 6

Bihar Board Class 11 Economics सहसंबंध Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सहसम्बन्ध ज्ञात करने की तीन प्रमुख विधियों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. विक्षेप चित्र
  2. काल पियर्सन का सहसम्बन्ध गुणांक तथा
  3. कोटि अंतर विधि

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प्रश्न 2.
विक्षेप चित्र का प्रमुख दोष क्या है?
उत्तर:
विक्षेप चित्र सहसम्बन्ध की मात्रा का संख्यात्मक माप नहीं देता।

प्रश्न 3.
सहसम्बन्ध गुणांक क्या है?
उत्तर:
सहसम्बन्ध गुणांक दो चरों के बीच सहसम्बन्ध की मात्रा का संख्यात्मक माप (Numerical Measurement) है।

प्रश्न 4.
यदि r = ±1, तो इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
यदि = ± 1 तो इसका अर्थ पूर्ण धनात्मक यसा ऋणात्मक सहसम्बन्ध है।

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प्रश्न 5.
सहसम्बन्ध गुणांक (r) की सीमाएँ लिखिए।
उत्तर:
सहसम्बन्ध गुणांक (r) प्रायः -1 तथा + 1 के बीच होता है। गणित की भाषा में – 1 ≤ r ≤ 1

प्रश्न 6.
सहसम्बन्ध से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
दो या अधिक चरों में सम्बन्ध की मात्रा के मापन को सहसम्बन्ध कहते हैं।

प्रश्न 7.
सहसम्बन्ध गुणांक सदैव –
तथा +1 के बीच होता है। गणित की भाषा में इसे आप किस प्रकार व्यक्त करेंगे?
उत्तर:
1 ≤ r ≤ + 1

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प्रश्न 8.
धनात्मक (Positive) सहसम्बन्ध से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब दो चर x तथा y एक ही दिशा में विचरित (परिवर्तित) होते हैं, तो उनके बीच सम्बन्ध धनात्मक सह-सम्बन्ध कहलाता है।

प्रश्न 9.
विलोम (Negative) सहसम्बन्ध से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब एक चर में परिवर्तन दूसरे चर के विपरीत होता है तो उनके बीच सम्बन्ध विलोम सहसम्बन्ध कहलाता है।

प्रश्न 10.
धनात्मक सहसम्बन्ध का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी वस्तु की कीमत तथा पूर्ति के बीच धनात्मक सहसम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 11.
विलोम सहसम्बन्ध का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
किसी वस्तु की मांगी गई मात्रा तथा उसके मूल्य के बीच विलोम सहसम्बन्ध पाया जाता है।

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प्रश्न 12.
यदि x तथा y स्वतंत्र चर हों, उनके बीच सहसम्बन्ध गुणांक (r) (Coefficient. of Correlation) का क्या मूल्य होगा?
उत्तर:
सहसम्बन्ध गुणांक (r) = 0

प्रश्न 13.
यदि दो श्रणियों में पूर्ण सहसम्बन्ध (Perfect Correlation) है तो ऐसी स्थिति में सहसम्बन्ध गुणांक (r) का मूल्य क्या होगा?
उत्तर:
सहसम्बन्ध गुणांक (r) = ±1

प्रश्न 14.
सहसम्बन्ध को रेखीय कब कहा जाता है?
उत्तर:
जब दो श्रेणियों के मूल्यों में परिवर्तन का अनुपात होता है तो उसे रेखीय सहसम्बन्ध कहते हैं।

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प्रश्न 15.
सहसम्बन्ध की अनुपस्थिति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब दो श्रेणियों के मूल्यों में किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता तो ऐसी स्थिति में सहसम्बन्ध अनुस्थिति होती है अर्थात् सहसम्बन्ध का अभाव होता है। सहसम्बन्ध गुणांक का मूल्य शून्य होता है।

प्रश्न 16.
यदि विक्षेप रेखा का झुकाव ऊपर से नीचे दाहिनी ओर हो तो वर्गों में किस प्रकार सहसम्बन्ध होगा?
उत्तर:
दो चरों में ऋणात्मक सम्बन्ध होगा।

प्रश्न 17.
निम्नलिखित आंकड़ों में सहसम्बन्ध गुणांक ज्ञात कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 7
उत्तर:
% r = -1 क्योंकि चरों का विपरीत सम्बन्ध है।

प्रश्न 18.
जब कोटियाँ (Ranks)समान होती हैं तो ऐसी अवस्था में Rk की गणना करने के लिये कौन सा सूत्र लगाया जाता है? वह सूत्र लिखें।
उत्तर:
कोटियाँ समान होने का अवस्था में Rk की गणना के लिये निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 8

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प्रश्न 19.
यदि r = 0 तो इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
यदि r = 0 तो इसका अर्थ सहसम्बन्ध का अभाव है।

प्रश्न 20.
सहसम्बन्ध गुणांक को ज्ञात करने का कार्ल पियरसन द्वारा दिया गया सूत्र लिखिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 9

प्रश्न 21.
कोटि सहसम्बन्ध गुणांक का प्रतिपादन किसने किया?
उत्तर:
स्पियरमैन ने।

प्रश्न 22.
कोटि सहसम्बन्ध विधि का प्रयोग कहाँ उपयुक्त होता है?
उत्तर:
कोटि सहसम्बन्ध विधि का प्रयोग वहाँ उपयुक्त होता है जहाँ तथ्यों का प्रत्यक्ष संख्यात्मक माप संभव न हो तथा उन्हें क्रम के अनुसार रखा जा सकता है।

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प्रश्न 23.
सहसम्बन्ध को मापने के लिये स्पियरमैन का सूत्र लिखो।
उत्तर:
\(\frac { 6ΣD^{ 2 } }{ N(N^{ 2 }-1) } \)

प्रश्न 24.
r को सह के माप का सहचर क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि r सहचर को मापता है न कि कारणों को।

प्रश्न 25.
क्या शून्य सहसम्बन्ध का अर्थ स्वतंत्रता है?
उत्तर:
हाँ

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धनात्मक तथा ऋणात्मक सहसम्बन्ध की परिभाषा दीजिए तथा प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिये।
उत्तर:
धनात्मक सहसम्बन्ध:
जब दो चरों x तथा y में परिवर्तन एक ही दिशा की ओर होता है, तो उनमें धनात्मक सहसम्बन्ध होगा। उदाहरण के लिए यदि आय में वृद्धि के साथ उपभोग में भी वृद्धि होती है तो उपभोग और आय में धनात्मक सहसम्बन्ध है।

ऋणात्मक सहसम्बन्ध:
जब दो चरों x तथा y में परिवर्तन विभिन्न दिशाओं में होते हैं अर्थात् जब x चर में वृद्धि होने से y चर में कमी होती है तो उनमें ऋणात्मक सहसम्बन्ध होगा।

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प्रश्न 2.
पूर्ण सहसम्बन्ध से क्या अभिप्राय है? इसके दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
यदि दो चरों में मूल्यों के परिवर्तन की मात्रा बिल्कुल समान है, तो उनमें पूर्ण धनात्मक या ऋणात्मक सहसम्बन्ध होता है। ऐसी स्थिति में सहसम्बन्ध का गुणांक (r) का मूल्य + 1 होगा।
उदाहरण:
(a)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 10
अतः कीमत तथा में पूर्ण में पूर्ण धनात्मक सहसम्बन्ध है।

(b)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 11
अतः कीमत तथा में पूर्ण में पूर्ण धनात्मक सहसम्बन्ध है।

प्रश्न 3.
सरल बहुगुणी एवं आंशिक सहसम्बन्ध की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
सरल सहसम्बन्ध दो चरों में सम्बन्ध की मात्रा का मापन करता है। बहुगुणी सहसम्बन्ध दो से अधिक चरों में सम्बन्ध की मात्रा का मापन करता है। आंशिक सहसम्बन्ध भी दो से अधिक चरों का अध्ययन करता है, परंतु अन्य चरों के प्रभाव को स्थिर रखकर केवल दो चरों का पारस्परिक सम्बन्ध निकलता है।

प्रश्न 4.
कार्ल पियरसन का सह-सम्बन्ध गुणांक क्या है? इसकी गणना का सूत्र दीजिए। इसकी सीमाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
कार्ल पियरसन का सहसम्बन्ध गुणांक दो चरों में सम्बन्ध की मात्रा का संख्यात्मक माप है। इसकी गणना का सूत्र निम्नलिखित है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 12
r = सहसम्बन्ध गुणांक।

सीमाएँ (Limited degree of correlation cd-efficient):
सहसम्बन्ध गुणांक का मान सदैव ही -1 तथा +1 के बीच में होगा 1 गणित की भाषा में इसे निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है – -1 ≤ r ≤ + 1

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प्रश्न 5.
सहसम्बन्ध की परिभाषा दीजिए। सहसम्बन्ध के निम्न मानों से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
दो या दो से अधिक चरों में सम्बन्ध की मात्रा मापने को सहसम्बन्ध कहते हैं। सहसम्बन्ध द्वारा विभिन्न चरों में पाये जाने वाले परस्पर सम्बन्धों व मात्रा को दिशा का ज्ञान होता है।

  1. जब r = 0, तो इसका अभिप्राय है कि चरों में सहसम्बन्ध का अभाव पाया जाता है।
  2. जब r = 1, तो इसका अभिप्राय है कि दो चरों में पूर्ण धनात्मक सहसम्बन्ध पाया जाता है।
  3. जब r = 1, तो इसका अभिप्राय है कि दो चरों में पूर्ण ऋणात्मक सहसम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 6.
निम्न अवस्था में सहसम्बन्ध का मूल्य बताओ –
(क) सहसम्बन्ध ऋणात्मक तथा पूर्ण।
(ख) सहसम्बन्ध धनात्मक तथा पूर्ण।
(ग) कोई सहसम्बन्ध नहीं।
उत्तर:

  • जब सहसम्बन्ध पूर्ण ऋणात्मक तथा पूर्ण होता है, तो सहसम्बन्ध गुणांक r = -1
  • जब सहसम्बन्ध गुणांक धनात्मक तथा पूर्ण होता है, तो सहसम्बन्ध गुणांक r = +1
  • जब कोई सहसम्बन्ध नहीं पाया जाता है तो सहसम्बन्ध गुणांक r = 0

प्रश्न 7.
10 विद्यार्थियों के अंग्रेजी और अर्थशास्त्र के प्राप्तांकों की कोटियों के अंतर, में वर्गों का योग 33 है। कोटि सम्बन्ध गुणांक (Rank Correlation Coefficient) ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
चिह्नों के रूप में निम्नलिखित दिया हुआ है –
R = 10, ΣD2 = 33
R = 1 – \(\frac { 6ΣD^{ 2 } }{ N(N^{ 2 }-1) } \) = 1 – \(\frac { 6\times 33 }{ 10^{ 0 }(10-1^{ 0 }) } \) = 1 – \(\frac{198}{990}\) = \(\frac{990-198}{990}\) = 8

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प्रश्न 8.
सहसम्बन्ध ज्ञात करने की कोटि क्रम विधि की विवेचना करो।
उत्तर:
कोटि क्रम विधि के अन्तर्गत सर्वप्रथम x तथा y पद मूल्यों को अलग-अलग कोटि प्रदान किये जाते हैं। सबसे अधिक आकार वाले मूल्य को 1 उससे कम आकार वाले को 2 और इसी प्रकार क्रम निश्चित किये जाते हैं। द्वितीय x के क्रमों में से y के तत्सम्बन्धी क्रम घटाए जाते हैं और कोटि अंतर निकाले जाते हैं। तृतीय कोटि क्रम वर्ग करके उन वर्गों का जोड़ निकाला जाता है। अन्त में निम्न सूत्र प्रयोग किया जाता है –
R = 1 – \(\frac { 6ΣD^{ 2 } }{ N(N^{ 2 }-1) } \)
R = कोटि सहसम्बन्ध गुणांक
ΣD2 = क्रम अंतर में वर्गों का जोड़
N = पद युग्मों की संख्या

प्रश्न 9.
निम्नलिखित आँकड़ों में विक्षेप चित्र (Scatter Diagram) द्वारा सहसम्बन्ध (Correlation) बताइये:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 13
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 14
विक्षेप चित्र में स्पष्ट है कि X तथा Y में पूर्ण धनात्मक (Perfect positive) सहसम्बन्ध पाया जाता है।

प्रश्न 10.
यदि विक्षेप चित्र में बिन्दु उस सरल रेखा पर जमघट लगाते हैं जो रेखा x अक्ष पर 30° का कोण बनाती है तो आप x तथा Yचरों में किस प्रकार का सम्बन्ध पायेंगे?
उत्तर:
इससे पता चलता है कि X तथा Y में कम मात्रा में सहसम्बन्ध है। दूसरे शब्दों में Y में उसी अनुपात में परिवर्तन नहीं होता जिस अनुपात में X में।

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प्रश्न 11.
निम्न X और Y युग्मों को विक्षेप चित्र में प्रस्तुत कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 15
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 16

प्रश्न 12.
कार्ल पियरसन के सहसम्बन्ध के गुणांक को कैसे परिभाषित किया गया?
उत्तर:
सहसम्बन्ध के ज्ञान को गणितीय विधि से प्रतिपादित करने का श्रेय प्रो. कार्ल पियरसन को है। कार्ल पियरसन का सहसम्बन्ध गुणांक समांतर माध्य तथा प्रमाप विचलन पर आधारित है। इस गुणांक को गुण परिघात सहसम्बन्ध (Product, moment correlation) कहते हैं। इस सहसंबंध को कहते हैं। यदि x तथा Y दो चरों का सम्बन्ध रेखिक (Linear) है तो हम. उनमें कार्ल पियरसन के सहसम्बन्ध गुणांक की सहायता से सम्बन्ध की मात्रा का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 13.
(क) सहसम्बन्ध गुणांक
(r) की क्या सीमायें हैं?
(ख) यदि r = +1 है तो दो चरों X और Y में किस प्रकार का सम्बन्ध है?
उत्तर:
(क) सह – सम्बन्ध गुणांक हमेशा -1 और +1 की सीमा में होगा।
(ख) यदि r = +1 या r = -1 है तो उसका अभिप्राय है कि दो घरों X तथा Y में सम्बन्ध निश्चित (Exact) है।
यदि r = +1 है तो दोनों चरों में पूर्णतः धनात्मक सम्बन्ध होगा और यदि r = -1 है तो दोनों चरों (x, y) में पूर्णतः ऋणात्मक सम्बन्ध होगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विक्षेप चित्र के गुण तथ दोष लिखिए।
उत्तर:
गुण (merits):

  1. दो चरों में सम्बन्ध जानने की यह बहुत ही सरल विधि है।
  2. चित्र पर नजर डालते ही पता चल जाता है कि दो चरों के बीच कोई सम्बन्ध है या नहीं।
  3. विक्षेप चित्रों की सहायता से इस बात का भी ज्ञान होता है कि सहसम्बन्ध धनात्मक है या ऋणात्मक।

दोष (Demerits):

  1. विक्षेप चित्र सहसम्बन्ध के गुणांक का पूरा माप नहीं है।
  2. यह सम्बन्धों के बारे में अनुमानतः ज्ञान देता है।
  3. यह संख्यात्मक परिवर्तन को संख्या में ही प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 2.
सहसम्बन्ध गुणांक की विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
सहसम्बन्ध गुणांक की विशेषताएँ (Properties of correlationcoefficient) सहसम्बन्ध गुणांक की विशेषताएं अनलिखित हैं –

  1. r की कोई इकाई (unit) नहीं है। यह एक शुद्ध संख्या है। इसका तात्पर्य यह है कि माप की इकाइयाँ इसका भाग नहीं हैं। दूसरे शब्दों में फुटों में ऊँचाई तथा किलोग्राम में वजन का r 0.7 है।
  2. r के ऋणात्मक मूल्य का अर्थ है कि दो चरों X तथा Y में विपरीत सम्बन्ध है। एक चर में परिवर्तन होने से दूसरे चर में विपरीत दिशा में परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिये जब एक वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है तो उसकी मांग में कमी आती है।
  3. यदि धनात्मक है तो इसका अभिप्राय है कि X तथा Y चर एक ही दिशा की ओर चलते हैं। जब कॉफी (चाय का प्रतिस्थापन) की कीमत में वृद्धि होती है, चाय की मांग में वृद्धि होती है, जब तापक्रम में वृद्धि होती है, आइसक्रीम की बिक्री में वृद्धि होती है।
  4. यदि r = 0 तो X तथा Y चरों में सहसम्बन्ध का अभाव होता है। उनके बीच कोई रेखीय सम्बन्ध नहीं होता।
  5. यदि r = 1 अथवा r = – 1 है तो सहसम्बन्ध पूर्णता है। उन दो चरों में सम्बन्ध निश्चित है।
  6. r का अधिक मूल्य इस बात का संकेत देता है कि दो चरों x तथा Y में दृढ़ रैखीय सम्बन्ध है। इसका मूल्य तभी ऊँचा कहा जायेगा जब यह +1 अथवा -1 के समीप होगा।
  7. r का कम मूल्य इस बात को इंगित करता है कि दो चरों X तथा Y में कमजोर रेखीय. सम्बन्ध है। इसका मूल्य तभी नीचा कहा जायेगा जब वह शून्य के समीप होगा।
  8. सहसम्बन्ध गुणांक का मूल्य -1 तथा +1 के बीच में होता है। दूसरे शब्दों में 1 ≤ r ≤ 1 यदि किसी प्रश्न में r का मूल्य इस सीमा के बाहर आता है, इसका तात्पर्य यह है कि की गणना करने में कोई त्रुटि हुई है।
  9. मूल में परिवर्तन से या पैमाने के परिवर्तन से के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं रहता। मान लो दो चर X तथा Y दिये गये हैं। इन दो चरों को निम्न प्रकार परिभाषित करें -rxy = ruy

A तथा B क्रमश: X और Y के काल्पनिक औसत (A.M.) हैं। B तथा D कॉमन फैक्टर (Common factors) हैं।

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प्रश्न 3.
विक्षेप चित्र से क्या अभिप्राय है? इस विधि के द्वारा सहसम्बन्ध कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
विक्षेप चित्र (Scatter Diagram):
विक्षेप चित्र दो चरों के बीच सहसम्बन्ध मापने की एक विधि है। इस विधि के द्वारा सहसम्बन्ध की दिशा के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जाता है। विक्षेप चित्र बनाने की प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण निहित है –

  1. स्वतंत्र चरों को X अक्ष पर लिया जाता है।
  2. आश्रित चरों को Y अक्ष पर प्रदर्शित किया जाता है।
  3. बिन्दु अंकित समंक से एक मूल्य स्वतंत्र चर कर लिया जाता है तथा एक मूल्य आश्रित चर। इन मूल्यों की सहायता से ग्राफ पेपर पर एक बिन्दु अंकित किया जाता है।
  4. श्रेणी में जितने जोड़े होते हैं, उतने ही बिन्दु अकित किये जाते हैं।
  5. बिन्दु जितने एक दूसरे के पास होंगे, सहसम्बन्ध को डिग्री उतनी ही अधिक होगी और बिन्दु जितने अधिक बिखरे होंगे, सहसम्बन्धों की डिग्री उतनी ही कम होगी। बिन्दुओं की दिशा को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है।

विक्षेप चित्र में प्रदर्शित बिन्दुओं की प्रवृत्ति यदि एक निश्चित दिशा में जाने की हो तो दोनों चरों में सहसम्बन्ध होगा। यदि बिन्दु सारे चित्र में फैले हुए हैं तो सहसम्बन्ध की अनुपस्थिति होगी।

यदि बिन्दुओं को छूती हुई सरल रेखा का झुकाव नीचे से ऊपर दहिनी ओर हो तो चरों में धनात्मक सम्बन्ध होगा। यदि बिन्दु सारे चित्र में फैले हुए हैं तो सहसम्बन्ध की अनुपस्थिति होगी। यदि बिन्दुओं की छूती हुई सरल रेखा का झुकाव नीचे से ऊपर दाहिनी ओर हो तो चरों में धनात्मक सम्बन्ध होगा।
इसके विपरीत यदि रेखा का झुकाव ऊपर से नीचे दाहिनी ओर है तो चरों में ऋणात्मक सम्बन्ध होगा।

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प्रश्न 4.
कार्ल पियरसन के सहसम्बन्ध गुणांक की प्रत्यक्ष विधि से गणना करने की प्रक्रिया में कौन-कौन से चरण निहित हैं?
उत्तर:

  1. सबसे पहले X और Y श्रेणी का माध्य मूल्य ज्ञात करें।
  2. फिर X श्रेणी के मूल्यों का उसी श्रेणी के समांतर माध्य से विचलन लें और विचलनों को x से प्रकट करें।
  3. इसके बाद Y श्रेणी के मूल्यों का उसी श्रेणी से समांतर माध्य से विचलन लें और विचलनों को Y से प्रकट करें।
  4. अब इन विचलनों का वर्ग लें।
  5. X तथा Y का गुणनफल लें और गुणनफल को XY से प्रकट करें।
  6. सहसम्बन्ध गुणांक करने के लिये निम्न सूत्र का प्रयोग करें:

r = \(\frac { Σxy }{ \sqrt { Σx^{ 2 }.Σy^{ 2 } } } \)
r = \(\frac { Σxy }{ N\sigma x\times \sigma y } \)
x = X – \(\bar { X } \) y = Y – \(\bar { Y } \)
σx = x श्रेणी का प्रमाप विचलन
σy = y श्रेणी का प्रमाप विचलन
N = मदों की संख्या

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प्रश्न 5.
पद विचलन विधि से r ज्ञात कीजिये।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 17
उत्तर:
माना A = 100, h = 10, B = 1700 तथा k = 100
पद विचलन विधि से की गणना
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प्रश्न 6.
वास्तविक समान्तर माध्य से कार्ल पियरसन के सहसम्बन्ध के गुणांक की गणना करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 19
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 20
सहसम्बन्ध निम्न धनात्मक है।

प्रश्न 7.
दो श्रृंखलाएँ हैं। प्रत्येक के 50 पद हैं। उनका प्रमाप विचलन क्रमश: 4.5 और 3.5 है। दोनों श्रृंखलाओं के वास्तविक माध्य से विचलनों का गुणनफल 420 है।x और Y सहसम्बन्ध गुणांक ज्ञात कीजिये।
उत्तर:
दिया है N = 50
σx = 4.5 σy = 33.5
Σdxdy = 420
r = \(\frac{Σdxdy}{Nσx×σy}\) = \(\frac{420}{50×4.5×3.5}\) = \(\frac{420×10×10}{50×45×35}\) = 533

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प्रश्न 8.
X और Y के बीच में निम्नलिखित समंकों से सह-सम्बन्ध गुणांक ज्ञात करें –

  1. X श्रेणी का समांतर माध्य = 15
  2. Y श्रेणी का समांतर माध्य = 28
  3. X श्रेणी के समांतर माध्य से विचलनों के वर्गों का योग = 144
  4. Y श्रेणी के समांतर माध्य से विचलनों के वर्गों का योग = 225
  5. X व Y श्रेणियों के समांतर माध्य से विचलनों के गुणनफल का योग = 20
  6. मदों की संख्या

उत्तर:
दिया हुआ है –
\(\bar { X } \) = 15 \(\bar { Y } \) = 28
Σx2 = 144 Σy2 = 225
r = \(\frac { Σxy }{ \sqrt { Σx^{ 2 }\times y^{ 2 } } } \) = \(\frac { 20 }{ \sqrt { 144\times 225 } } \) = \(\frac{20}{12×15}\)
= \(\frac{20}{80}\) = \(\frac{1}{9}\) = 0.111

प्रश्न 9.
निम्न समंकों से कार्ल पियरसन का सहसम्बन्ध गुणांक ज्ञात कीजिए –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 21
उत्तर:
कार्ल पियसरन के सहसम्बन्ध गुणांक की गणना:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 22

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प्रश्न 10.
वास्तविक समांतर माध्य से कार्ल पियसरन के सहसम्बन्ध के गुणांक की गणना करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 23
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 24
सहसम्बन्ध पूर्णतया ऋणात्मक है।

प्रश्न 11.
कल्पित माध्य से कार्ल पियसरन के सहसम्बन्ध गुणांक की गणना करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 25
उत्तर:
कार्ल पियरसन सहसम्बन्ध गुणांक
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 26
x का कल्पित माध्य = 85
y का कल्पित माध्य = 80
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प्रश्न 12.
A तथा B में कोटि सहसम्बन्ध ज्ञात करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 28
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 29

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प्रश्न 13.
A तथा B के बीच कोटि सहसम्बन्ध ज्ञात करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 30
उत्तर:
यहाँ पर A तथा B के कोटि क्रम दिये गये हैं। अतः हम सीधे ही कोटि क्रम का अंतर निकालेंगे और सूत्र की सहायता से A तथा B के बीच कोटि सहसम्बन्ध की गणना करेंगे।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 31

प्रश्न 14.
5 विद्यार्थियों को गणित तथा अर्थशास्त्र में योग्यता के अनुसार दर्जा (Rank) दिया गया है।
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स्पीयरमैन का कोटि सहसम्बन्ध ज्ञात करें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 33
r = 1 – \(\frac { 6ΣD^{ 2 } }{ N(N^{ 2 }-1) } \) = 1 – \(\frac{6×0}{6(36-1)}\) = 1

प्रश्न 15.
दो जजों द्वारा 5 व्यक्तियों को सौंदर्य में निम्नलिखित कोटियाँ दी गई हैं। कोटि सहसम्बन्ध ज्ञात करें।
उत्तर:
कोटि सहसम्बन्ध की गणना –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 34

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प्रश्न 16.
A तथा C द्वारा 5 व्यक्तियों को निम्न कोटियाँ दी गई हैं। कोटि सहसम्बन्ध की गणना करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 35
उत्तर:
कोटि सहसम्बन्ध की गणना
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 36

प्रश्न 17.
यदि D2 = 39.50 और N = 10 हो तो R का मूल्य ज्ञात करें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 37

प्रश्न 18.
निम्नलिखित आँकड़ों से कोटि सहसम्बन्ध गुणांक की गणना करें –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 38
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 39
(नोट : कोटि बढ़ते हुए क्रम से दी गई है अर्थात् सबसे छोटे मूल्य को एक तथा सबसे बड़े मूल्य को दस।)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 40

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प्रश्न 19.
नीचे 5 विद्यार्थियों के द्वारा अर्थशास्त्र और सांख्यिकी में प्राप्त अंक प्रतिशत में दिये गये हैं। कोटि सहसम्बन्य ज्ञात करें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 41

प्रश्न 20.
नीचे दिये समंकों से कोटि सहसम्बन्ध गुणांक की गणना करें।
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 43

प्रश्न 21.
कोटि सहसम्बन्ध गुणांक की गणना करें।
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उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 45

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि चरों में का मूल्य -1 है तो यह सहसंबंध है –
(a) पूर्ण ऋणात्मक
(b) पूर्ण धनात्मक
(c) सहसंबंध का अभाव
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) पूर्ण ऋणात्मक

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प्रश्न 2.
यदि चरों में r का मूल्य +1 है को यह सहसंबंध है –
(a) पूर्ण ऋणात्मक
(b) पूर्ण धनात्मक
(c) सहसंबंध का अभाव
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) पूर्ण धनात्मक

प्रश्न 3.
दो चरों के बीच सहसम्बन्ध शून्य है तो इसका अर्थ है –
(a) उच्च सहसंबंध
(b) सहसंबंध का अभाव
(c) निम्न सहसंबंध
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) सहसंबंध का अभाव

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प्रश्न 4.
rk = 1 – \(\frac { 6ΣD^{ 2 } }{ N^{ 3 }-N } \) सूत्र है –
(a) कार्ल पियरसन सहसंबंध गुणांक का
(b) स्पियरमैन का कोटि सहसंबंध का
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) स्पियरमैन का कोटि सहसंबंध का

प्रश्न 5.
सहसंबंध को गणितीय विधि से प्रतिपादन करने का श्रेय जाता है –
(a) मार्शल को
(b) बाउले को
(c) कार्ल पियरसन को
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) कार्ल पियरसन को

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प्रश्न 6.
यदि दो चर एक-दूसरे के प्रति एक दिशा में या विपरीत दिशा में परिवर्तित होते हैं तो इसे कहा जाता है –
(a) केंद्रीय प्रवृत्ति की माप
(b) परिक्षेपण की माप
(c) सहसंबंध
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) सहसंबंध

प्रश्न 7.
यदि एक चर के बढ़ने पर दूसरे चर में भी बढ़ोतरी होती है तो उनमें सहसंबंध होगा –
(a) धनात्मक
(b) ऋणात्मक
(c) शून्य
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) धनात्मक

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प्रश्न 8.
कार्ल पियरसन विधि से सहसंबंध गुणांक ज्ञात करने का सूत्र है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 46
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Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 48
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter 7 सहसंबंध Part - 2 img 47

प्रश्न 9.
यदि कोटि सहसंबंध में किसी चर की पुनरावृत्ति होती है तो प्रत्येक मूल्य कोटि प्रदान करते हैं –
(a) अलग-अलग क्रमागत आधार पर
(b) औसत के आधार पर कोटि प्रदान की जाती है
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) औसत के आधार पर कोटि प्रदान की जाती है

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प्रश्न 10.
कोटि सहसंबंध (rk) तथा गुणन आघूर्ण सहसंबंध में संबंध होता है –
(a) कोटि सहसंबंध rk = गुणन आघूर्ण सहसंबंध
(b) rk > गुणन आघूर्ण सहसंबंध
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कोटि सहसंबंध rk = गुणन आघूर्ण सहसंबंध