Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)

Bihar Board Class 11 Economics भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
योजना की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
योजना से अभिप्राय किसी निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयत्नों से है। नियोजन के अन्तर्गत देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए लक्ष्य रखे जाते हैं जिसकी प्राप्ति के लिए देश में और देश के बाहर सभी साधन जुटाए जाते हैं। उद्देश्यों की प्राप्ति तथा साधनों का जुटाने के लिए सम्बन्धित देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को देखते हुए विकास की व्यूह रचना निर्धारित की जाती है।

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प्रश्न 2.
भारत ने योजना को क्यों चुना?
उत्तर:
देश की आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने के लिए भारत ने योजना को चुना। आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने का आर्थिक नियोजन के अतिरिक्त दूसरा विकल्प स्वतंत्र बाजार व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत उत्पादक सभी क्रियाओं को लाभ की दृष्टि से करता है परंतु यह व्यवस्था भारत के लिए निम्नलिखित कारणों से अनुपयुक्त थी –

  1. भारत में आय में भारी असमानता पाई जाती है। उत्पादन धनी व्यक्तियों के लिए किया जायेगा क्योंकि उनके पास वस्तुएँ खरीदने की शक्ति है।
  2. अधिकांश व्यक्ति निर्धन होने के कारण साख, पैसा एवं उपयोगी वस्तुओं पर खर्च कर देंगे और बचत नहीं होगी।
  3. निर्धन व्यक्तियों के लिए आवास, शिक्षा, चिकित्सा आदि की ओर ध्यान नहीं दिया जायेगा क्योंकि वे आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं हैं।
  4. इस बात की संभावना है कि दीर्घकालिक आर्थिक बातों पर ध्यान न दिया जाए जैसे आधारभूत और भारी उद्योग आदि।

प्रश्न 3.
योजना का लक्ष्य क्या होना चाहिए।
उत्तर:
योजना के निम्नलिखित लक्ष्य होने चाहिए –

  1. संवृद्धि
  2. आधुनिकीकरण
  3. आत्मनिर्भरता
  4. समानता

परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक योजना में इन लक्ष्यों को एक समान महत्त्व दिया जाए। सीमित संसाधनों के कारण प्रत्येक योजना में ऐसे लक्ष्यों का चयन करना पड़ता है, जिनको प्राथमिकता दी जानी है। हाँ, योजनाओं में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जहाँ तक संभव हो, इनके उद्देश्य में अन्त:विरोध न हो।

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प्रश्न 4.
चमत्कारी बीज क्या होते हैं?
उत्तर:
उच्च पैदावार वाली किस्मों की बीजों को चमत्कारी बीज कहा जाता है। इन बीजों के प्रयोग से अनाज के उत्पादन में वृद्धि होती है, विशेषकर गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में। इन बीजों के प्रयोग में पर्याप्त मात्रा में उवर्रकों, कीटनाशकों तथा निश्चित जल-आपूर्ति की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 5.
विक्रय अधिशेष क्या है?
उत्तर:
विक्रय अधिशेष किसानों द्वारा उत्पादन का वह अंश है जो उनके द्वारा बाजार में बेचा जाता है।

प्रश्न 6.
कृषि क्षेत्रक में लागू किए गए भूमि सुधारों की आवश्यकता और उनके प्रकारों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कृषि क्षेत्रक में लागू किए गए भूमि सुधारों की आवश्यकता (Necessity of land reforms):
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में कृषि पिछड़ी हुई अवस्था में थी। कृषि में उत्पादकता कम थी। कृषि में निम्न उत्पादकता के कई कारण थे। उनमें से कुछ कारण थे-कृषि जोतों का असमान वितरण, भू-जोतों का छोटा आकार, भूमि का उपविभाजन तथा अपखण्डन, विभिन्न भू-धारण पद्धतियाँ। कृषि क्षेत्र की निम्न उत्पादकता के कारण भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका (यू.एस.ए.) से अनाज का आयात करना पड़ा।

कृषि उत्पादन में वृद्धि लाने के लिए तथा देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाने के लिए भूमि सुधारों की आवश्यकता पड़ी। भूमि-सुधार से अभिप्राय कृषि से सम्बन्धित संस्थागत परिवर्तनों से है। जैसे जोत के आकार में परिवर्तन, भू-धारण प्रणाली में परिवर्तन या उनका उन्मूलन।

भूमि-सुधार के प्रकार (Types of land-reforms):
भूमि सुधार के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं –

1. मध्यस्थों की समाप्ति (Abolition of intermediates):
विभाजन से पूर्व लगभग 43% भाग में जमींदारी प्रथा प्रचलित थी। यह प्रथा राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से बहुत ही दोषपूर्ण थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न राज्यों में इस प्रथा का उन्मूलन करने के लिए कानून बनाये गए। बिचौलियों का उन्मूलन करने का मुख्य उद्देश्य किसानों को भूमि का स्वामी बनाना था।

बिचौलियों के उन्मूलन का नतीजा यह था कि लगभग 200 लाख काश्तकारों का सरकार से सीधा सम्पर्क हो गया तथा वे जमींदारों के द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्त हो गए। भू-स्वामित्व से उन्हें उत्पादन में वृद्धि के लिए प्रोत्साहन मिला। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई किन्तु बिचौलियों के उन्मूलन से सरकार समानता के लक्ष्य को प्राप्त न कर सकी।

2. जोतों की उच्चतम सीमा का निर्धारण करना:
जोतों की उच्चतम सीमा के निर्धारण का अर्थ है कि किसी व्यक्ति की कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा निर्धारण करना। इस नीति का उद्देश्य कुछ लोगों में भू-स्वामित्व के संकेन्द्रण को कम करना है। इस निर्धारित सीमा से किसान के पास जो भूमि होती है, वह अतिरिक्त भूमि के रूप में सरकार के पास चली जाती है और सरकार इसे भूमिहीन किसानों में वितरित कर, देती है।

देश के अधिकांश राज्यों में जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित की जा चुकी है। अधिकतम भूमि-सीमा निर्धारण कानून में भी कई बाधाएँ आई। बड़े जमींदारों ने इस कानून को न्यायालयों में चुनौती दी जिसके कारण इसे लागू में देर हुई। इस अवधि में वे अपनी भूमि निकट सम्बन्धियों आदि के नाम करवाकर कानून से बच गये।

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प्रश्न 7.
हरित क्रांति क्या है? इसे क्यों लागू किया गया और इसे किसानों को कैसे लाभ पहुँच? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
हरित क्रांति (Green Revolution):
हरित क्रांति से अभिप्राय उत्पादन की तकनीक को सुधारने तथा कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि करने से है। हरित क्रांति की दो मुख्य विशेषताएँ हैं –

  1. उत्पादन की तकनीकी को सुधारना तथा
  2. उत्पादन में वृद्धि करना इस संदर्भ में स्व. श्रीमति इंदिरा गाँधी ने लिखा था, “हरित क्रांति का आशय यह है कि खेती में मेड़बंदी करवाकर, फावड़े, तगारी, गेंती, हल इत्यादि उपयोगी कृषि के साधन प्राप्त करके कृषि की जाएं, अपितु इन साधनों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि की जाए।

हरित क्रांति लागू करने के कारण (Caused of Green Revolution):
हरित क्रांति लागू करने का उद्देश्य कृषि क्षेत्रक में उत्पादकता में वृद्धि करना है तथा औपनिवेशिक काल के कृषि गतिरोध को स्थायी रूप से समाप्त करना।

किसानों को लाभ (Advantages of the farmers):
हरित क्रांति से किसानों को निम्नलिखित लाभ हुआ –

  1. हरित क्रांति में किसान अधिक गेहूँ तथा चावल उत्पन्न करने में समर्थ हुए। किसान के पास अब बाजार में बेचने के लिए काफी अनाज है।
  2. किसानों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है।

प्रश्न 8.
योजना उद्देश्य के रूप में समानता के साथ संवृद्धि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समानता के साथ संवृद्धि (Growth with equality):
केवल संवृद्धि के द्वारा ही जनसामान्य के जीवन में सुधार नहीं आ सकता। किसी देश में संवृद्धि दर बढ़ने पर भी अधिकांश लोग गरीब हो सकते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि समृद्धि (आर्थिक) के साथ देश के निर्धन वर्ग को भी वे सब साधन सुलभ हो, केवल धनी लोगों तक सीमित न हो। अतः संवृद्धि के साथ-साथ समानता भी महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक भारतीय को भोजन, अच्छा आवास शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ होना चाहिए और धन-सम्पत्ति के वितरण की असमानताएँ भी कम होनी चाहिए।

प्रश्न 9.
क्या रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारतीय योजना के कई उद्देश्य हैं। इनमें एक उद्देश्य आधुनिकीकरण है। आधुनिकीकरण से अभिप्राय वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए नई तकनीकी को अपनाना है। उदाहरण के लिए किसान पुराने बीजों के स्थान पर नई किस्म के बीजों का प्रयोग करके खेती में पैदावार बढ़ा सकता है। आधुनिकीकरण केवल नई तकनीकी के प्रयोग तक सीमित नहीं है अपीत इसका उद्देश्य सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना है। जैसे यह स्वीकार करना कि महिलाओं का अधिकार भी पुरुषों के समान होना चाहिए। कई लोगों का विचार है कि रोजगार सृजन की दृष्टि से योजना उद्देश्य के रूप में आधुनिकीकरण विरोधाभास पैदा करता है। उनका यह मत. गलत है। आधुनिकीकरण से रोजगार के अवसरों में विस्तार होगा।

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प्रश्न 10.
भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना क्यों आवश्यक था?
उत्तर:
भारत जैसे विकासशील देश के रूप में आत्मनिर्भरता का पालन करना आवश्यक है। आत्मनिर्भरता इसलिए आवश्यक है ताकि विकसित देश उन वस्तुओं के आयात करने से बच जाएँ जिनका उत्पादन देश में ही संभव है। इस नीति का विशेषकर खाद्यान्न के लिए अन्य देशों पर निर्भरता कम करने के लिए पालन आवश्यक समझा गया है। ऐसी आशंका भी थी कि आयतिक खाद्यान्न विदेशी तकनीकी और पूँजी पर निर्भरता, किसी न किसी रूप में हमारी देश की नीतियों में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ाकर हमारी संप्रभुता (Soveregnity) में बाधा डाल सकती थी।

प्रश्न 11.
किसी अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन क्यों होता है ? क्या यह आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था के जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्रक.को सबसे अधिक योगदान करना चाहिए? टिप्पणी करें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन (SectoralShedule of an economy):
कार्यशील जनसंख्या के विभिन्न क्षेत्र में वितरण को अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन कहते हैं। अर्थव्यवस्था की संरचना के तीन क्षेत्रक होते हैं –

1. प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि)

2. द्वितीयक क्षेत्रक (विनिर्माण) तथा तृतीयक क्षेत्रक (सेवा)। प्राथमिक क्षेत्र में मुख्य रूप से उन सब आर्थिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनमें प्राकृतिक साधनों का शोषण किया जाता है। जैसे-खेती करना, मछली, पकड़ना, वन काटना आदि। द्वितीयक क्षेत्रक में वे व्यवसाय आते हैं जो प्रकृति से प्राप्त कच्चे माल का रूप बदल कर पक्का माल तैयार करते हैं। जैसे-रुई से कपड़ा बनाना, चमड़े से जूते बनाना, गन्ने से चीनी बनाना आदि। तृतीयक क्षेत्रक में सेवाओं का उत्पादन करने वाले शामिल होते हैं जैसे-बैंकिंग, परिवहन आदि।

देश का सकल घरेलू उत्पाद देश की अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों से प्राप्त होता है। इन क्षेत्रकों के योगदान से अर्थव्यवस्था का ढाँचा तैयार होता है। कुछ देशों में सकल घरेलू उत्पाद में संवृद्धि में कृषि का योगदान अधिक होता है तो कुछ में सेवा क्षेत्र की वृद्धि इसमें अधिक योगदान करती है। देश के विकास के साथ-साथ इसमें संरचनात्मक परिवर्तन आता है। भारत में तो यह परिवर्तन बहुत विचित्र रहा।

सामान्यतः विकास के साथ-साथ सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का अंश कम होता है और उद्योगों का अंश प्रधान होता है। विकास के उच्चतर स्तर पर पहुँच कर जी.डी.पी. में सेवाओं का अंशदान अन्य दो क्षेत्रकों से अधिक हो जाता है। 1990 से पूर्व भारत में जी.डी.पी. में कृषि का अंश 50 प्रतिशत अधिक था, परंतु 1990 में सेवा क्षेत्रक का अंश बढ़कर 40.59% हो गया। यह अंश कृषि तथा उद्योगों दोनों से ही अधिक था। ऐसी स्थिति तो प्रायः विकसित देशों में पाई जाती है। 1991 के बाद तो सेवा क्षेत्रक के अंश की संवृद्धि की यह प्रवृत्ति और बढ़ गई। इस प्रकार हम देखते हैं कि जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्रक का सबसे अधिक योगदान वांछनीय है।

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प्रश्न 12.
योजना अवधि के दौरान औद्योगिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक को ही। अग्रणी भूमिका क्यों सौंपी गई थी?
उत्तर:
सावर्जनिक उपक्रम (Public Enterprises):
सार्वजनिक उपक्रम से अभिप्राय ऐसी व्यावसायिक या औद्योगिक संस्थाओं से है जिनका स्वामित्व, प्रबंध एवं संचालन सरकार (केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय संस्था) के अधीन होता है। स्वतंत्रता के बाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र को निम्नलिखित कारणों से महत्त्व दिया गया है –

1. विशाल विनियोग की आवश्यकता (Need for huge investment):
कई ऐसे आधारभूत तथा देश के लिये आवश्यक उद्योग होते हैं जिनमें इतने निवेश की आवश्यकता होती है कि निजी क्षेत्र के उद्योग रुचि नहीं लेते।

2. क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए (For removing regional disparities):
भारत जब स्वतंत्र हुआ था तो उस समय क्षेत्रीय असमानताएँ बहुत थीं। इन क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रमों की स्थापना आवश्यक थी। सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों की स्थापना उन क्षेत्रों में की जाती है जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं।

3. आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकने के लिए (Tocheck concentration of economic power):
जब भारत स्वतत्रं हुआ था तो उस समय आय तथा सम्पत्ति का असमान वितरण था। देश के कुछ लोगों के पास का धन केन्द्रित था। अमीर लोग बहुत अमीर थे और गरीब लोग बहुत ही गरीब थे। आय की विषमताओं को कम करने के लिये स्वतंत्रता के पश्चात् सार्वजनिक क्षेत्र को महत्त्व दिया गया।

4. आधारभूत संरचनाओं का विकास करने के लिये (To develop the infrastructure):
स्वतंत्रता के समय भारत में आधारभूत संरचनायें अविकसित तथा असंतोषजनक थीं। बिना आधारभूत संरचनाओं में सुधार लाये देश का विकास नहीं हो सकता। आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने के लिए निजी क्षेत्र आगे आने को तैयार नहीं थे, क्योंकि आधारभूत संरचनाओं में काफी निवेश होता है और काफी समय के पश्चात् उनसे आय प्राप्त होती है। अतः इन संरचनाओं को विकसित करने के लिये सरकार को आगे आना पड़ा।

5. सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण (Important for defence purposes):
जब देश स्वतंत्र हुआ तो उस समय भारत की सुरक्षा खतरे में थी। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध सामग्री (बम, गोले, अस्त्र शस्त्र) के निर्माण की आवश्यकता थी। युद्ध सामग्री के निर्माण के लिये हम निजी क्षेत्र पर भरोसा नहीं कर सकते। अतः इन सबका निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र में किया गया।

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प्रश्न 13.
इस कथन की व्याख्या करें “हरित क्रांति ने सरकार को खाद्यान्न के प्रति प्रापण द्वारा विशाल सुरक्षित भण्डार बनाने के योग्य बनाया गया ताकि वह कमी के समय उसका उपयोग कर सकें।
उत्तर:
प्रश्न में दिए गए कथन से अभिप्राय यह है कि हरित क्रांति के फलस्वरूप अनाज में विशेषकर गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में बहुत ही अधिक वृद्धि हुई। इसके फलस्वरूप भारत को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त हो गई। अब हम अपने राष्ट्र की खाद्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अमेरिका या किसी देश की कृषि पर निर्भर नहीं रहे। अनाज के अधिक उत्पादन से किसान के पास इतना अनाज हो गया कि वह उसका अंश बाजार में बेचने के लिए लाता है सरकार उनसे समर्थित मूल्य (न्यूनतम मूल्य) पर अनाज खरीदती है और खाद्यान्न का सुरक्षित स्टॉक बनाती है ताकि खाद्यान्न की कमी के समय इस स्टॉक का प्रयोग किया जा सके।

प्रश्न 14.
भारत में कृषि-अनुदान के पक्ष क्या विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
भारत में कृषि अनुदान (Agricultural Subsidies in India):
कृषि अनुदान से अभिप्राय सरकार द्वारा कृषकों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता से है जिससे वे अपने उत्पाद को उत्पादन लागत में भी कम कीमत पर बेच सकें। अब कृषि अनुदान के पक्ष तथा विपक्ष में काफी वाद-विवाद हो रहा है। कुछ विद्वानों के अनुसार कृषि अनुदान को समाप्त कर दिया जाना चाहिये जबकि कुछ विद्वान इसे जारी रखने के पक्ष में हैं।

विपक्ष के तर्क (Arguments against agricultural subsidies):
यह आम सहमति है कि किसानों को नई HYV तकनीकी अपनाने हेतु प्रेरित करने के लिये उन्हें कृषि अनुदान देना आवश्यक था। नई तकनीकी अपनाना जोखिम भरा काम है। अत: नई तकनीकी का परीक्षण करने के लिये प्रोत्साहन देने के लिये कृषि अनुदान आवश्यक है। अब परीक्षण करने पर नई तकनीकों को लाभप्रद पाया गया है तथा इसे व्यापक रूप से अपनाया जा रहा है। अतः अब कृषि अनुदान देना समाप्त किया जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त कृषि अनुदान का उद्देश्य किसानों को लाभ पहुँचाना है जबकि इसका लाभ रसायन उद्योग (Fertilizer Industry) तथा समृद्ध इलाकों के किसानों को हो रहा है। अत: यह दलील दी जाती है कि इसे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह सरकार के वित्त पर बहुत बड़ा बोझ है।

पक्ष के तर्क (Arguments in favour of agricultural subsidies):
कुछ विद्वानों का विचार है कि कृषि अनुदान को जारी रखा जाना चाहिये क्योंकि भारत में कृषि एक जोखिम व्यवसाय है और जोखिम व्यवसाय रहेगा। अधिकांश किसान बहुत निर्धन हैं और बिना अनुदान के वांछित आदानों को खरीदने में समर्थ नहीं होंगे। अनुदान के उन्मुलन से निर्धन तथा धनी किसानों में असमानता बढ़ जायेगी और न्याय का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा। इसके अतिरिक्त कुछ विद्वानों का विचार है कि यदि अनुदानों से रसायन उद्योग तथा बड़े किसानों को लाभ हो रहा है तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि सरकार अनुदान देना बंद कर दे। इसके विपरीत सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिये जिससे निर्धन किसानों को लाभ पहुँचे।

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प्रश्न 15.
हरित क्रांति के बाद भी 1990 तक हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्रक में ही क्यों लगी रही?
उत्तर:
अर्थशास्त्रियों के अनुसार जैसे-जैसे देश सम्पन्न होता है कृषि के योगदान में और उस पर निर्भर जनसंख्या में पर्याप्त कमी आती है। भारत में 1950-1990 की अवधि में यद्यपि जी.डी.पी. में कृषि के अंशदान में तो भारी कमी आई है, पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में कमी न के बराबर आई। दूसरे शब्दों में 1990 तक की देश की 65% जनसंख्या कृषि में लगी हुई थी। इसका कारण यह है कि उद्योग क्षेत्रक और सेवा क्षेत्रक, कृषि क्षेत्रक में काम करने वाले लोगों को नहीं खपा पाए। अनेक अर्थशास्त्री इसे 1950-1990 के दौरान अपनाई गई नीतियों की विफलता मानते हैं।

प्रश्न 16.
यद्यपि उद्योगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र बहुत आवश्यक रहा है, पर सार्वजनिक क्षेत्रक के अनेक ऐसे उपक्रम हैं जो भारी हानि उठा रहे हैं और इस क्षेत्रक के अर्थव्यवस्था के संसाधनों के बरबादी के साधन बने हुए हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्रक के उपक्रमों की उपयोगिता पर चर्चा करें।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा किए गए योगदान के बावजूद कुछ अर्थशास्त्रियों ने सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उद्यमों के निष्पादन को आलोचना की है। अनेक क्षेत्रक की फर्मों ने भारी हानि उठाई, लेकिन उन्होंने काम जारी रखा क्योंकि किसी सरकारी उपक्रम को बंद किया जाना अत्यन्त कठिन और लगभग असंभव होता है। भले ही इसके कारण राष्ट्र के सीमित संसाधनों का विकास होता रहे। इसका अर्थ यह नहीं है कि निजी फर्मों को सदा लाभ ही होता हो।

इसके अतिरिक्त सार्वजनिक क्षेत्रक का प्रयोजन लाभ कमाना नहीं है, अपितु राष्ट्र के कल्याण को बढ़ावा देना है। इस दृष्टि से सार्वजनिक क्षेत्रक की फर्मों का मूल्यांकन जनता के कल्याण के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका मूल्यांकन उनके द्वारा कमाए गए लाभों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। सार्वजनिक उपक्रमों की उपयोगिता निम्न तथ्यों के आधार पर स्पष्ट होती है –

  1. सार्वजनिक उपक्रम क्षेत्रीय असमानता को दूर करते हैं।
  2. ये आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकते हैं।
  3. ये आधारभूत संरचनाओं को विकसित करने में बहुत ही अधिक सहायक होते हैं।
  4. ये देश की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  5. ये श्रमिकों के कल्याण की ओर अधिक ध्यान देते हैं।

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प्रश्न 17.
आयात प्रतिस्थापन किस प्रकार घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करता है?
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन-आयात प्रतिस्थापन से अभिप्राय है कि आयात की जाने वाली वस्तुओं का घरेलू (देशी) उत्पादन द्वारा प्रतिस्थापन करना। उदाहरण के लिए विदेशों में निर्मित वाहनों का आयात करने के स्थान पर उन्हें भारत में ही निर्मित करने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाय। इस नीति के अनुसार सरकार ने विदेशी प्रतिस्पर्धा से उद्योगों की रक्षा की। आयात संरक्षण के दो प्रकार थे: प्रशुल्क और कोटा –

1. प्रशुल्क (Tariff):
प्रशुल्क आयातिक वस्तुओं पर लगाया गया कर है। प्रशुल्क लगाने पर आयातिक वस्तुएँ अधिक महंगी हो जाती हैं जो वस्तुओं के प्रयोग को हतोत्साहित करती हैं।

2. कोटा (Quota):
कोटे में वस्तुओं की मात्रा निर्दिष्ट रहती है, जिन्हें आयात किया जा सकता है।

प्रश्न 18.
औद्योगिकी नीति प्रस्ताव 1956 में निजी क्षेत्रक का नियमन क्यों और कैसे किया गया था?
उत्तर:
औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956-निजी क्षेत्र के भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के राज्य के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 को अंगीकार किया गया। इस प्रस्ताव को द्वितीय पंचवर्षीय योजना का आधार बनाया गया। इस प्रस्ताव के अनुसार उद्योगों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। प्रथम वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जिन पर राज्य का अनन्य स्वामित्व था। दूसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जिनके लिए निजी क्षेत्रक सरकारी क्षेत्रक के साथ मिलकर प्रयास कर सकते थे, परंतु जिनमें नई इकाइयों को शुरू करने की एकमात्र जिम्मेदारी। राज्य की होती है। तीसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जो निजी क्षेत्रक के अन्तर्गत आते थे।

इस प्रस्ताव के अन्तर्गत निजी क्षेत्रक को लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया है। नये उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जाती थी, जब तक सरकार से लाइसेंस नहीं प्राप्त कर लिया जाता था। इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। यदि उद्योग आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में लगाए गए तो लाइसेंस प्राप्त करना आसान था। इसके अतिरिक्त उन इकाइयों को कुछ रियासतें भी दी गईं, जैसे-कर लगाना तथा कम प्रशुल्क पर बिजली देना।

इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय समानान्तर को बढ़ावा देना था। वर्तमान उद्योग को भी उत्पादन बढ़ाने या विविध प्रकार के उत्पादन (वस्तुओं की नई किस्मों का उत्पादन) करने के लिए लाइसेंस प्राप्त करना होता था। इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना था कि उत्पादित वस्तुओं की मात्रा अर्थव्यवस्था द्वारा अपेक्षित मात्रा से अधिक न हो, उत्पादन बढ़ाने का लाइसेंस केवल तभी दिया जाता था जब सरकार इस बात से आश्वस्त होती थी कि अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में वस्तुओं की आवश्यकता है।

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प्रश्न 19.
निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 1
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 2f

Bihar Board Class 11 Economics भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अर्थव्यवस्था मुख्यतः कितने प्रकार की हैं-उनके नाम लिखें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था मुख्यतः तीन प्रकार की हैं –

  1. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था
  2. समाजवादी अर्थव्यवस्था तथा
  3. मिश्रित अर्थव्यवस्था

प्रश्न 2.
उस अर्थव्यवस्था का नाम लिखो जो पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था दोनों की विशेषताएँ लिए हुए है?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था।

प्रश्न 3.
बाजार अर्थव्यवस्था का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर:
बाजार अर्थव्यवस्था का दूसरा नाम पूँजीवादी अर्थव्यवस्था है।

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प्रश्न 4.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में किन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है?
उत्तर:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिनका विक्रय लाभप्रदाता के साथ अपने देश में या दूसरे देशों में सरलता से किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
समाजवादी अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
समाजवादी अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें सरकार समाज की आवश्यकतानुसार वस्तुओं के उत्पादन का निर्णय करती है।

प्रश्न 6.
मिश्रित अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें सरकार तथा बाजार (मांग तथा पूर्ति शक्तियाँ) दोनों मिलकर यह निर्णय लेते हैं कि क्या उत्पादन किया जाये, कैसे उत्पादन किया जाये तथा उत्पादित वस्तुओं का वितरण कैसे किया जाये।

प्रश्न 7.
योजना आयोग की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
योजना आयोग की स्थापना 1950 में की गई।

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प्रश्न 8.
आर्थिक नियोजन क्या है?
उत्तर:
आर्थिक नियोजन एक ऐसी रणनीति है जिसके अन्तर्गत किसी देश के साधनों को ध्यान में रखकर एक निश्चित समय में आर्थिक विकास के निश्चित लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।

प्रश्न 9.
भारतीय योजना की अवधि क्या है?
उत्तर:
भारतीय योजना की अवधि पाँच वर्ष है।

प्रश्न 10.
उत्पादन की श्रम-प्रधान तकनीक में क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उत्पादन की श्रम-प्रधान तकनीक से अभिप्राय उत्पादन की उस विधि से है जिसमें पूँजी की अपेक्षा श्रम का अधिक प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
उत्पादन की उस तकनीक को क्या कहते हैं जिसमें श्रम की अपेक्षा पूँजी का अधिक प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
उत्पादन की पूँजी प्रधान तकनीक।

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प्रश्न 12.
भूमि सुधार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि सुधार से अभिप्राय भूमि जोतों के स्वामित्व में परिवर्तन करना है। इसका उद्देश्य कृषि से समता (न्याय) लाना है।

प्रश्न 13.
भूमि सीमा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि सीमा का उद्देश्य भूमि के कुछ हाथों में स्वामित्व के केन्द्रीकरण को कम करना है।

प्रश्न 14.
भूमि सीमा का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
भूमि सीमा का उद्देश्य भूमि के कुछ हाथों में स्वामित्व के केन्द्रीकरण को कम करना है।

प्रश्न 15.
भारत में किस उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिश्रित अर्थव्यवस्था के मार्ग को अपनाया गया?
उत्तर:
भारत में सामाजिक समता के साथ आर्थिक विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिश्रित अर्थव्यवस्था में मार्ग को अपनाया गया।

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प्रश्न 16.
हमारी पंचवर्षीय योजना को बनाने में कई विख्यात विचारकों को योगदान रहा है। उनमें से एक विचारक का नाम लिखें।
उत्तर:
प्रो. पी. सी. महालनोबिस (Prof. Prasanta Chandra Mahalanobis)।

प्रश्न 17.
योजना आयोग ने देश के आर्थिक विकास के लिये पहली पंचवर्षीय योजना कब आरम्भ की?
उत्तर:
योजना आयोग ने देश के आर्थिक विकास के लिये पहली पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल, 1951 से आरम्भ की।

प्रश्न 18.
पहली पंचवर्षीय योजना में किस क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया?
उत्तर:
पहली पंचवर्षीय योजना में कृषि क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया था।

प्रश्न 19.
पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को क्यों अधिक महत्त्व दिया गया है? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं में निम्नलिखित कारणों से औद्योगिक विकास को अधिक महत्त्व दिया गया है –

  1. औद्योगिक विकास से देश में रोजगार के अवसरों की अधिक वृद्धि होती है अपेक्षाकृत कृषि के।
  2. इससे आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिलता है।

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प्रश्न 20.
चकबंदी (Consolidation of Holdings) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
चकबंदी से अभिप्राय ऐसी प्रक्रिया से है जिसके द्वारा एक भू-स्वामी के इधर-उधर बिखरे हुए खेतों के बदले में उसी किस्म के उतने ही आकार के एक या दो खेत इकट्ठ दे दिये जाते हैं।

प्रश्न 21.
चकबंदी से क्या लाभ है?
उत्तर:
चकबंदी से कृषकों को उन्नत किस्म के आदानों का प्रयोग करने में सहायता मिलता है तथा कम से कम से प्रयत्नों में अधिकतम उत्पादन में सफलता मिलती है। इससे उत्पादन लागत में भी कमी आती है।

प्रश्न 22.
भूमि सुधार से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भूमि सुधार से अभिप्राय भूमि (जोतों) के स्वामित्व में परिवर्तन लाना। दूसरे शब्दों में भूमि सुधार में भूमि के स्वामित्व के पुनः वितरण को शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 23.
भूमि सुधार क्यों अपनाया गया?
उत्तर:
कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा सामाजिक न्याय की स्थापना करने के लिये भूमि सुधार अपनाया गया।

प्रश्न 24.
पंचवर्षीय योजनाओं के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं के उद्देश्य हैं –

  1. वृद्धि
  2. आधुनिकीकरण
  3. आत्म-निर्भरता तथा
  4. न्याय (equity)

प्रश्न 25.
जी.डी.पी. का पूरा नाम लिखो?
उत्तर:
डी.डी.पी. का पूरा नाम सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) है।

प्रश्न 26.
पं. जवाहरलाल नेहरू तथा अन्य नेताओं और विचारकों ने किस प्रकार की अर्थव्यवस्था को भारत के अनुकूल समझा?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था को।

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प्रश्न 27.
पं. जवाहरलाल नेहरू पूर्व सोवियत संघ में प्रचलित समाजवाद के पक्ष में क्यों नहीं थे?
उत्तर:
क्योंकि पूर्व सोवियत संघ में उत्पादन के सब साधनों पर सरकार का स्वामित्व था। वहाँ कोई निजी सम्पत्ति नहीं थी। भारत जैसे प्रजातंत्र देश में यह सम्भव नहीं था।

प्रश्न 28.
सकल घरेलू उत्पादन क्या है?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद एक वर्ष में उत्पादित कुल वस्तुओं तथा सेवाओं का बाजार मूल्य है।

प्रश्न 29.
आधुनिकीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
नई तकनीकी को अपनाना और सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन को आधुनिकीकरण कहते हैं।

प्रश्न 30.
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में किस उद्देश्य को महत्व दिया गया?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता को।

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प्रश्न 31.
आत्मनिर्भरता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता से अभिप्राय उन वस्तुओं का आयात न करना जिन वस्तुओं का उत्पादन – देश में किया जा सकता है।

प्रश्न 32.
औद्योगिक नीति को कौन-सी नीति कार्य रूप प्रदान करती है?
उत्तर:
औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति औद्योगिक नीति को कार्य रूप प्रदान करती है।

प्रश्न 33.
हरित क्रांति से खाद्यान्नों की कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ा।
उत्तर:
हरित क्रांति के फलस्वरूप खाद्यान्नों की कीमतों में उपभोग की दूसरी मदों की अपेक्षा कमी आई।

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प्रश्न 34.
हरित क्रांति से सरकार को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
हरित क्रांति से स्टॉक बनाने के लिये काफी मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध हो गया।

प्रश्न 35.
हरित क्रांति के विषय में दो भ्रांतियाँ क्या थीं?
उत्तर:

  1. हरित क्रांति से छोटे तथा बड़े किसानों में विषमता बढ़ जायेगी, तथा
  2. उन्नत बीज से उत्पन्न पौधों पर कीट आक्रमण करेंगे।

प्रश्न 36.
एक अर्थव्यवस्था की कौन-सी प्रमुख समस्याएँ हैं?
उत्तर:

  1. क्या उत्पादन किया जाये
  2. कितनी मात्रा में, कैसे उत्पादन किया जाय और
  3. किसके लिये उत्पादन किया जाये।

प्रश्न 37.
योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष कौन होता है?
उत्तर:
योजना आयोग का पदेन अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है।

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प्रश्न 38.
वास्तविक रूप में (In Real Sense) भारत में योजना काल कब आरम्भ हुआ?
उत्तर:
दूसरी पंचवर्षीय योजना से।

प्रश्न 39.
ब्रिटिश शासन काल में कृषि किस अवस्था में थी?
उत्तर:
कृषि गतिहीन थी। कृषि में वृद्धि नगण्य थी। कृषि में असमानता थी।

प्रश्न 40.
कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए क्या प्रयत्न किये गये?
उत्तर:
समानता को दूर करने के लिए भूमि सुधार किया गया तथा उत्पादन में वृद्धि लाने के लिये उन्नत बीजों का प्रयोग किया गया। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया गया। कृषि में आधुनिक मशीनों तथा उपकरणों को प्रयोग में लाया गया।

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प्रश्न 41.
जमींदारी उन्मूलन से होने वाले दो लाभ लिखें।
उत्तर:

  1. कृषकों को शोषण होना बंद हो गया।
  2. कृषि-उत्पादन में वृद्धि हुई।

प्रश्न 42.
जमींदारी उन्मूलन से क्या न्याय का उद्देश्य (Goal of Equity) पूर्णतः प्राप्त हो गया?
उत्तर:
नहीं, जमींदारी उन्मूलन से न्याय का उद्देश्य पूरी तरह से नहीं प्राप्त किया जा सका।

प्रश्न 43.
दूसरी योजना के आरम्भ में विकास पद्धति अपनाई गई थी। इस विकास पद्धति को तैयार करने का श्रेय किसको दिया जा सकता है?
उत्तर:
विकास पद्धति को तैयार करने का श्रेय प्रो. पी. सी. महालनोबिस को दिया जा सकता है।

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प्रश्न 44.
योजना की विकास पद्धति में औद्योगीकरण पर बल क्यों दिया गया? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  1. औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादकता का स्तर कृषि क्षेत्र में उत्पादकता के स्तर की तुलना में अधिक होता है।
  2. बेरोजगारी की समस्या का समाधान औद्योगीकरण में सम्भव होता है।

प्रश्न 45.
योजना काल में ग्रामीण क्षेत्र में आय की विषमताओं के बढ़ने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
ग्रामीण क्षेत्र में आय की विषमता के बढ़ने का प्रमुख कारण है – योजना के दौरान कृषि विकास के लिये उठाये गये विभिन्न कदमों का लाभ प्रमुख रूप से बड़े-बड़े किसानों को दो पहुँचा है। छोटे किसान इन लाभों से वंचित रहे।

प्रश्न 46.
किस अर्थव्यवस्था में लोगों की आवयश्कतानुसार उत्पादित वस्तुओं का वितरण किया जाता है?
उत्तर:
समाजवादी अर्थव्यवस्था में।

प्रश्न 47.
औद्योगिक विकास के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने क्या कहा था?
उत्तर:
औद्योगिक विकास के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्वर्गीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “सभी राष्ट्र जिस देवता की पूजा करते हैं, वह देवता है औद्योगिकरण, वह देवता है, मशीनीकरण, वह देवता है, उच्च उत्पादन तथा प्राकृतिक साधनों एवम् साधनों का अधिक से अधिक लाभप्रद प्रयोग की औद्योगिक विकास है।”

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प्रश्न 48.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता लाना था।

प्रश्न 49.
औद्योगिक लाईसेंसिंग नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औद्योगिक लाईसेंसिंग नीति से अभिप्राय उस नीति से है जिसके अन्तर्गत औद्योगिक उपक्रमों की स्थापना अथवा विस्तार के लिये सरकार से आज्ञपत्र लेना अनिवार्य होता है।

प्रश्न 50.
भारत के विदेशी व्यापार की संरचना तथा प्रतिबंध मात्रा को ब्रिटिश सरकार ने किस प्रकार कुप्रभावित किया?
उत्तर:
भारत के विदेशी व्यापार की संरचना तथा प्रतिबंध मात्रा को ब्रिटिश सरकार ने वस्तु उत्पादन, व्यापार तथा टैरिफ (Tariff) की प्रतिबंधात्मक नीतियों द्वारा कुप्रभावित किया।

प्रश्न 51.
ब्रिटिश सरकार की वस्तु उत्पादन, व्यापार तथा टैरिफ की प्रतिबंधात्मक नीतियों के फलस्वरूप भारत किन-किन वस्तुओं का निर्यातक बन गया?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार की वस्तु उत्पादन, व्यापार प्रतिबंध तथा टैरिफ की प्रतिबंधात्मक नीतियों के फलस्वरूप भारत कच्चा रेशम, सूत, ऊन, चीनी, पटसन आदि प्राथमिक वस्तुओं का उत्पादक बन गया।

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प्रश्न 52.
उपनिवेश शासन में कृषि में गतिहीनता हमेशा के लिये किस क्रांति के द्वारा तोड़ी गई?
उत्तर:
उपनिवेश शासन में कृषि में गतिहीनता हमेशा के लिये हरित क्रांति के द्वारा तोड़ी गई।

प्रश्न 53.
हरित-क्रांति के प्रथम चरण की समयावधि लिखें। इस चरण में HYV बीजों का प्रयोग किन-किन राज्यों में किया गया?
उत्तर:
हरित क्रांति के प्रथम चरण की समयावधि मध्य 1960 से 1970 तक की है। पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश (पश्चिमी) राज्यों में किया गया।

प्रश्न 54.
कोटा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कोटा से अभिप्राय आयात की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा का निर्धारण करने से है।

प्रश्न 55.
1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का कितना योगदान था और 1950-51 में कितना था?
उत्तर:
1990-91 में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 24.6% था जबकि 1950-51 में यह 11.80% था।

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प्रश्न 56.
उन्नत किस्म के बीज (High Yielding Variety Seeds) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उन्नत किस्म के बीजों से अभिप्राय ऐसे बीजों से है जिन्हें बोकर कम क्षेत्र में अधिक मात्रा में फसल प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 57.
जीतों की अधिकतम सीमा (Ceiling of Holdings) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जोतों की अधिकतम सीमा से अभिप्राय जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना और अतिरिक्त (Surplus) भूमि को भूमिहीनों में बाँटकर सामाजिक न्याय की स्थापना करना व अधिक से अधिक लोगों को रोजगार की सुविधाएँ देना था।

प्रश्न 58.
बाजार में कीमतों का निर्धारण किसके द्वारा होता है?
उत्तर:
बाजार में कीमतों का निर्धारण माँग तथा पूर्ति की शक्तियों के द्वारा होता है।

प्रश्न 59.
कीमतें किस बात की संकेतक हैं?
उत्तर:
कीमतें बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता की संकेतक हैं।

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प्रश्न 60.
वस्तुओं की उपलब्धता में कमी कीमतों में क्या परिवर्तन लाती हैं?
उत्तर:
कीमतों में वृद्धि होती है।

प्रश्न 61.
वस्तुओं की उपलब्धता में कमी आने के फलस्वरूप कीमतों में होने वाली वृद्धि वस्तुओं के उपभोग पर क्या प्रभाव डालती है?
उत्तर:
वस्तुओं का उपभोग बुद्धिमत्ता तथा कुशलता से किया जाता है।

प्रश्न 62.
लोग वस्तुओं का कुशलता से प्रयोग करने को कब प्रेरित होते हैं?
उत्तर:
जब वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है।

प्रश्न 63.
यदि विद्युत निःशुल्क कर दी जाय तो उसका प्रयोग किस प्रकार से किया जायेगा?
उत्तर:
अकुशलता तथा लापरवाही से विद्युत का प्रयोग किया जाएगा।

प्रश्न 64.
मान लो किसानों को जल की आपूर्ति निःशुल्क की जाती है। ऐसी अवस्था में किसान जल का प्रयोग किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
ऐसी अवस्था में पानी की कमी की ओर बिना ध्यान दिये उसका अनावश्यक प्रयोग करंगे और वे ऐसी फसलें बोयेंगे जिनके लिए अधिक मात्र में पानी की आवश्यकता होगी।

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प्रश्न 65.
ब्रिटिश शासन में भारत किन-किन वस्तुओं का आयात करता था?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन में भारत सूती, रेशमी और ऊनी कपड़ों (निर्मित उपभोग वस्तुएँ) तथा ब्रिटेन की फैक्ट्रियों में निर्मित वस्तुओं का आयात करता था।

प्रश्न 66.
HYV बीजों का प्रयोग किन-किन राज्यों में किया गया।
उत्तर:
HYV बीजों का प्रयोग पंजाब, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्यों में किया गया।

प्रश्न 67.
हरित क्रांति के दूसरे चरण का कार्यकाल लिखें।
उत्तर:
हरित क्रांति के दूसरे चरण का कार्यकाल 1970 से 1980 ई. है।

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प्रश्न 68.
विपणित अधिशेष (Marketed Surplus) किसे कहते हैं?
उत्तर:
कृषि उत्पाद का वह भाग जो कृषकों के द्वारा बाजार में बेचा जाता है, उसे विपणित अधिशेष कहते हैं।

प्रश्न 69.
उद्योग के दो लाभ लिखें।
उत्तर:
लाभ (Advantages):

  1. उद्योग रोजगार प्रदान करता है।
  2. यह आधुनिकीकरण को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 70.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 (Industrial Policy of Resolution of 1956) के उद्योगों को कितनी श्रेणियों में वर्गीकृत किया है? पहले वर्ग में किन उद्योगों को रखा गया है?
उत्तर:
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 ने उद्योगों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। पहली श्रेणी में उन उद्योगों को रखा गया है जो पूर्णतः राज्य के स्वामित्व में होंगे।

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प्रश्न 71.
औद्योगिक नीति 1956 में द्वितीय श्रेणी में कौन-कौन से उद्योग रखे गये हैं?
उत्तर:
औद्योगिक नीति 1956 में 12 महत्त्वपूर्ण उद्योगों को द्वितीय श्रेणी में रखा गया जैसे लोहे की धातुएँ एवम् एल्युमीनियम, औजार, मशीन, दवाइयाँ आदि। इन उद्योगों के विकास के लिये सरकार अधिक भाग देगी।

प्रश्न 72.
आयात प्रतिस्थापन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन से अभिप्राय उन वस्तुओं के आयात से बचना है, जिनका उत्पादन अपने देश में किया जा सकता है।

प्रश्न 73.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें वस्तुओं का उत्पादन तथा वितरण लोगों की आवश्यकता के आधार पर नहीं अपितु लोगों की क्रय शक्ति तथा क्रय इच्छा के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 74.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 में तृतीय श्रेणी में कौन-कौन से. उद्योग रखे. गये हैं?
उत्तर:
तृतीय श्रेणी (वर्ग) में उन सभी उद्योगों को रखा गया है जो निजी क्षेत्र के लिये सुरक्षित रहेंगे। इनका विकास सामान्यतः निजी क्षेत्र की प्रेरणा से होगा। किन्तु इस श्रेणी में भी राज्य नये उद्योगों की स्थापना कर सकता है।

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प्रश्न 75.
1990 में देश की जनसंख्या का कितना प्रतिशत भाग कृषि में कार्यरत था?
उत्तर:
1990 में देश की जनसंख्या का 65% भाग कृषि में कार्यरत था।

प्रश्न 76.
1990 में सकल घरेलू उत्पादन में कृषि के योगदान का अनुपात घटा है परंतु कृषि पर निर्भर करने वाली जनसंख्या में कमी नहीं आई है। कारण बताएँ।
उत्तर:
इसका कारण यह है कि कृषि में कार्यरत जनसंख्या को औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्र खपा नहीं सकते।

प्रश्न 77.
निर्धन राष्ट्र कैसे उन्नति कर सकते हैं?
उत्तर:
निर्धन राष्ट्र उन्नति कर सकते हैं यदि वे उद्योगों को बढ़ावा दें।

प्रश्न 78.
पंचवर्षीय योजनाओं में (पहली पंचवर्षीय योजना को छोड़कर) औद्योगिक विकास को क्यों अधिक महत्त्व दिया गया है?
उत्तर:
हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को इसलिए महत्त्व दिया गया है क्योंकि उद्योग कृषि की अपेक्षा अधिक स्थायी रोजगार देते हैं। वह आधुनिकीकरण को बढ़ावा देते हैं और देश में समृद्धि लाते हैं।

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प्रश्न 79.
भारत में किस वर्ष से पंचवर्षीय योजनाओं की एक निरंतर प्रक्रिया चल रही है?
उत्तर:
भारत में सन् 1951 से पंचवर्षीय योजनाओं की एक निरंतर प्रक्रिया चल रही है।

प्रश्न 80.
आर्थिक विकास के उच्चतर स्तर पर किस क्षेत्र का योगदान सबसे अधिक होता है?
उत्तर:
आर्थिक विकास के उच्चतर स्तर पर सेवा क्षेत्र (तृतीयक क्षेत्र) का योगदान सबसे अधिक होता है।

प्रश्न 81.
1990 में सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान कितना था?
उत्तर:
1990 में सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 40.59 (कृषि तथा विनिर्माण क्षेत्र से अधिक) था।

प्रश्न 82.
किस तकनीकी ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया?
उत्तर:
हरित क्रांति तकनीकी ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया।

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प्रश्न 83.
वस्तु की कीमत में वृद्धि होने से उस वस्तु के उपयोग पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कीमत में वृद्धि होने से उस वस्तु का प्रयोग बड़ी बुद्धिमत्ता तथा कुशलता से किया जाता है।

प्रश्न 84.
व्यावसायिक संरचना तथा आर्थिक विकास में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
आर्थिक संरचना तथा आर्थिक विकास में अटूट सम्बन्ध है। ज्यों-ज्यों आर्थिक विकास होता है त्यों-त्यों कृषि क्षेत्र पर निर्भर जनसंख्या का प्रतिशत कम होता जाता है तथा द्वितीयक क्षेत्र तृतीयक क्षेत्र पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या का प्रतिशत बढ़ता जाता है।

प्रश्न 85.
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का क्रम क्यों आरम्भ किया गया?
उत्तर:
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में अल्पविकसितता को दूर करने के लिए और देश में उपलब्ध साधनों का उचित उपयोग करने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं के क्रम को शुरू किया गया।

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प्रश्न 86.
औद्योगिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औद्योगिक नीति से अभिप्राय उस नीति से है जिसमें मौलिक और औद्योगिक मुद्दों को स्पष्ट किया जाता है। जैसे उद्योगों का निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में विभाजन, पैमाने के आधार पर उद्योगों के स्वरूप का निर्धारण, पूँजीगत अथवा उपभोक्ता वस्तुओं के उद्यमों की स्थापना।

प्रश्न 87.
आर्थिक संवृद्धि को परिभाषित करें।
उत्तर:
आर्थिक संवृद्धि-को एक अर्थव्यवस्था में लम्बे समय तक प्रति व्यक्ति सकल घरेलू . उत्पाद में निरंतर वृद्धि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

प्रश्न 88.
आर्थिक संवृद्धि को किन दो तरीकों से परिभाषित किया जा सकता है?
उत्तर:

  1. सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि
  2. प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि।

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प्रश्न 89.
एक देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान देने वाले क्षेत्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
एक देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान देने वाले तीन क्षेत्र हैं –

  1. प्राथमिक क्षेत्र
  2. द्वितीयक क्षेत्र तथा
  3. तृतीयक क्षेत्र

प्रश्न 90.
प्राथमिक क्षेत्र में किन आर्थिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है?
उत्तर:
प्राथमिक क्षेत्र को कृषि क्षेत्र भी कहते हैं। इस क्षेत्र में उन सब आर्थिक क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है जिनमें प्राकृतिक साधनों का शोषण किया जाता है। जैसे-खेती – करना, मछली पकड़ना, वन काटना आदि।

प्रश्न 91.
द्वितीयक क्षेत्र में कौन-कौन से व्यवसाय आते हैं?
उत्तर:
द्वितीय क्षेत्र को विनिर्माण क्षेत्र भी कहते हैं। इस क्षेत्र में वे व्यवसाय आते है। जो प्रकृति से प्राप्त कच्चे माल का रूप बदलकर पक्का माल तैयार करते हैं अथवा एक प्रकार की वस्तु को दूसरी प्रकार की वस्तु में बदलते हैं, जैसे-रुई से कपड़ा बनाना, चमड़े से जूता बनाना, गन्ने से चीनी बनाना आदि।

प्रश्न 92.
तृतीयक क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
तृतीयक क्षेत्र उस क्षेत्र को कहते हैं जिसमें बैंकिंग, परिवहन, संचार आदि सेवाओं का उत्पादन किया जाता है। इसे सेवा क्षेत्र भी कहते हैं।

प्रश्न 93.
अर्थशास्त्र की भाषा में आर्थिक संवृद्धि का अच्छा संकेतक कौन है?
उत्तर:
अर्थशास्त्र की भाषा में आर्थिक संवृद्धि का अच्छा संकेतक सकल घरेलू उत्पाद में निरंतर वृद्धि है।

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प्रश्न 94.
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की गणना कैसे की जाती है?
उत्तर:
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद निकालने के लिये सकल घरेलू उत्पाद को जनसंख्या से विभाजित किया जाता है।

प्रश्न 95.
आर्थिक विकास से सकल घरेलू उत्पाद में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान में क्या परिवर्तन आते हैं?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था में जैसे-जैसे विकास होता है, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान कम होता जाता है और विनिर्माण क्षेत्र तथा सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ता जाता है।

प्रश्न 96.
संरचनात्मक परिवर्तन से क्या अभिप्राय है? यह कब होता है?
उत्तर:
संरचनात्मक परिवर्तन से अभिप्राय सकल घरेलू उत्पाद में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान में परिवर्तन होना है। यह परिवर्तन देश के आर्थिक विकास के कारण होता है।

प्रश्न 97.
स्वतंत्रता के समय प्राथमिक, द्वितीयक एवम् तृतीयक क्षेत्र की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत के संरचनात्मक ढाँचे में कृषि का महत्त्व सबसे अधिक था। इसके विपरीत उद्योगों का बहुत कम महत्त्व था। सेवा क्षेत्र का भी योगदान कम था।

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प्रश्न 98.
भूमि सुधार की दिशा में कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण उठाये गये हैं? कोई तीन कदम लिखें।
उत्तर:

  1. मध्यस्थों एवम् जमींदारी का उन्मूलन
  2. जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण करना तथा
  3. चकबंदी

प्रश्न 99.
किन-किन राज्यों में भूमि सुधारों ने सफलता प्राप्त की और क्यों?
उत्तर:
केरल तथा पश्चिमी बंगाल में भूमि सुधार आंदोलन ने सफलता प्राप्त की क्योंकि वहाँ की सरकार काश्तकारों को भूमि देने पर दृढ़संकल्प थी।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और समाजवादी अर्थव्यवस्था में कोई दो अंतर बतायें।
उत्तर:
पूँजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था में अंतर –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 3

प्रश्न 2.
पूँजीवाद किन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है? वह किस उत्पादन विधि को अपनाता है और किस आधार पर वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण करता है?
उत्तर:
पूँजीवाद उन उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनको देश या विदेश में लाभ पर बेचा जा सकता है। वह उत्पादन की उस विधि को अपनाता है जो तुलनात्मक रूप से कम खर्चीली हो। वह लोगों की क्रयशक्ति और क्रय-इच्छा को आधार पर वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण करता है।

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प्रश्न 3.
समाजवादी अर्थव्यवस्था में किन वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन किया जाता हैं? इस अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं का वितरण किस आधार पर किया जाता है? यह अर्थव्यवस्था किस देश में अपनाई गई थी?
उत्तर:
समाजवादी अर्थव्यवस्था में समाज तथा सेवाओं का वितरण भी लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार ही किया जाता है। यह अर्थव्यवस्था पूर्व सोवियत संघ में अपनाई गई थी।

प्रश्न 4.
प्रत्येक समाज को किन तीन प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है?
उत्तर:
प्रत्येक समाज को निम्न तीन प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता है –

  1. देश में किन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाये?
  2. वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन कैसे किया जाये? वस्तुओं के उत्पादन के लिये उत्पादकों द्वारा अधिक मानवीय श्रम का प्रयोग किया जाना चाहिये या अधिक पूँजी का?
  3. लोगों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का वितरण कैसे किया जाना चाहिये?

प्रश्न 5.
लघु उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
लघु उद्योग को निवेश की मात्रा के आधार पर परिभापित किया जाता है। समय-समय पर निवेश की मात्रा में परिवर्तन किया जाता है। 1950 में उस उद्योग को लघु उद्योग कहा जाता था जिसमें अधिकतम निवेश 5,00,000 रुपये है। वर्तमान समय में इस सीमा को बढ़ा कर एक करोड़ कर दिया गया है।

प्रश्न 6.
लघु उद्योगों को विकसित करने के लिये भारत सरकार द्वारा कई कदम उठाये गये हैं। कोई चार उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. सरकार ने लघु उद्योगों को कुछ वस्तुओं को कर से मुक्त रखा है।
  2. इन्हें बैंकों से कम ब्याज दर पर ऋण दिया जाता है।
  3. लघु उद्योगों के विकास के लिये देश में बड़ी संख्या में औद्योगिक वस्तियों की स्थापना की गई है।
  4. इस बात की संभावना है कि दीर्घकालिक आर्थिक बातों पर ध्यान न दिया जाए जैसे आधारभूत और भारी उद्योग आदि।

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प्रश्न 7.
घरेलू उद्योगों के विदेशी प्रतियोगिता से किन दो रूपों में संरक्षण दिया गया? उन रूपों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता सं किन दो रूपों में संरक्षण दिया गया-प्रशुल्क (Tarifls) तथा कोटा (Quotas)। प्रशुल्क से अभिप्राय आयतित वस्तुओं पर कर से है। प्रशुल्क में आयात की जाने वाली वस्तु महंगी हो जाती है। परिणामस्वरूप आयात की जाने वाली वस्तुओं का आयात किया जा सकता है। प्रशुल्क और कोटे का उद्देश्य आयात पर प्रतिबंध लगाना और घरेलू फर्मों को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देना है। विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण मिलने पर हमारे देश में घरेलू इलेक्ट्रॉनिक (Electronic) तथा आटोमोबाइल (Automobile) उद्योग विकसित हो सके।

प्रश्न 8.
हरित क्रांति के विषय में कौन-कौन सी आशंकाएँ थीं? क्या वे आशंकाएँ सच निकलीं।
उत्तर:
हरित क्रांति के विषय में दो भ्रान्तियाँ थीं –
1. हरित क्रांति से अमीरों तथा गरीबों में विषमत्ता बढ़ जायेगी क्योंकि बड़े जमींदार ही इच्छित अनुदानों का क्रय कर सकेंगे और उन्हें ही हरित क्रांति का लाभ मिलेगा और वे और अधिक धनी हो जायेंगे। निर्धनों को हरित क्रांति से कुछ लाभ नहीं होगा।

2. उन्नत बीज वाली फसलों पर जंतु एवं कीड़े आक्रमण करेंगे। ये दोनों भ्रान्तियाँ सच नहीं हुई क्योंकि सरकार ने छोटे किसानों को निम्न ब्याज दर पर ऋणों की व्यवस्था की और रासायनिक खादों पर आर्थिक सहायता दी ताकि वे उन्नत बीज तथा रासायनिक खाद सरलता से खरीद सकें और उनका उपयोग कर सकें। जीव-जन्तुओं के आक्रमणों को भी सरकार द्वारा स्थापित अनुसंधान संस्थाओं (Reserch Institutes) की सेवाओं द्वारा कम कर दिया गया।

प्रश्न 9.
सार्वजनिक उपक्रम से क्या अभिप्राय है? इसकी विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रम से अभिप्राय ऐसी व्यावसायिक अथवा औद्योगिक संस्था से है जिसका स्वामित्व, प्रबंध एवम् संचालन सरकार (केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन या किसी सार्वजनिक संस्था) के अधीन होता है। राव, चौधरी एवम् चक्रवर्ती के अनुसार, “व्यवसाय में राजकीय उपक्रम से आशय एक ऐसे प्रतिष्ठान से है जो सरकार के द्वारा एकल स्वामी या बहुमत अंशधारी के रूप में भी नियंत्रित या संचालित किया जाता है।”
विशेषताएँ (Features):

  1. ये सरकारी संस्थाएँ होती हैं।
  2. इनका स्वामित्व, प्रबंध एवम् संचालन सरकार के हाथों में होता है।
  3. सरकार जैसे केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार अथवा स्थानीय प्रशासन अथवा कोई सार्वजनिक संस्था इनका स्वामित्व हो सकता है।
  4. इन उपक्रमों पर या तो सरकार का पूर्ण स्वामित्व होता है या इनकी अधिकांश पूँजी पर सरकार का नियंत्रण होता है।
  5. इन संस्थाओं द्वारा निजी संस्थाओं की भाँति ही वस्तुओं एवं सेवाओं का विक्रय किया जाता है।

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प्रश्न 10.
संरक्षण की नीति किस अवधारणा पर आधारित है?
उत्तर:
संरक्षण की नीति इस अवधारणा पर आधारित है कि विकासशील देश के उद्योग. अधिक विकसित देशों में निर्मित वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसी मान्यता है कि यदि घरेलू उद्योगों को संरक्षण दिया जाता है तो वे कुछ समय के पश्चात् विकसित देशों में निर्मित वस्तुओं का मुकाबला कर सकेंगे।

प्रश्न 11.
विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण की आलोचना किस आधार पर की जाती है?
उत्तर:
ऐसा माना जाता है कि अधिक समय तक संरक्षण देने से उद्योग अपनी वस्तुओं की गुणवत्ता नहीं बढ़ायेगी क्योंकि उन्हें पता है कि वह ऊँची कीमत पर अपनी निकृष्ट वस्तुओं को अपने देश में बेच सकते हैं।

प्रश्न 12.
सार्वजनिक उपक्रमों के औचित्य में कई तर्क दिये जाते हैं। कोई चार तर्क लिखें।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रमों के औचित्य में तर्क (Rational of Public Sector):

  1. सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना लाभ के उद्देश्य से नहीं अपितु जनकल्याण हेतु की जाती है।
  2. इन उपक्रमों में कर्मचारियों की हितों की रक्षा की जाती है।
  3. ये उपक्रम कर्मचारियों को आवास तथा यातायात की सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं।
  4. ये उपक्रम क्षेत्रीय असमानता को दूर करने का प्रयत्न करते हैं।

प्रश्न 13.
सार्वजनिक संस्थाओं के महत्त्व को दर्शाने वाले किन्हीं दो बिन्दुओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
सार्वजनिक उपक्रमों का महत्त्व (Importance of public sector undertakings):
निम्नलिखित बिन्दु सार्वजनिक उपक्रमों के महत्त्व को दर्शाते हैं –

1. सामाजिक न्याय (Social Justice):
सार्वजनिक उपक्रमों में सामाजिक न्याय की प्राप्ति में सहायता मिलती है। इन संस्थाओं के द्वारा अधिकतम संभव मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने का प्रयास किया जाता है। आय की असमानताओं को न्यूनतम किया जाता है तथा राष्ट्रीय आय का वितरण समानता एवं न्याय के आधार पर किया जाता है।

2. क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना (Removing Regional Disparities):
सार्वजमिक उद्योगों के द्वारा क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है। इन उद्योगों की स्थापना उन क्षेत्रों में की जाती है जिन क्षेत्रों की निजी उद्योगपतियों द्वारा अवहेलना की जाती है। इसमें उद्योगों की स्थापना इस प्रकार की जाती है कि उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो।

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प्रश्न 14.
एक देश में केवल तीन वस्तुओं का उत्पादन होता है –

  1. दूध
  2. लकड़ी और
  3. कपड़ा। 2005 में इन तीन वस्तुओं का उत्पादन क्रमशः 10,000 लीटर, 20,000 क्विंटल तथा 30,000 मीटर हुआ। इन वस्तुओं की कीमत क्रमशः 8 रुपये प्रति लीटर, 5 रुपये क्विंटल तथा 10 रुपये प्रति मीटर है। इस देश की सकल घरेलू उत्पाद की गणना करें।

उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product):
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 2 भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) img 4a
अतः देश का. सकल घरेलू उत्पाद 3,80,000 रुपये है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि विकास का संक्षेप में वर्णन करें?
उत्तर:
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि क्षेत्र में होने वाली प्रगति (Progress in Agricultures during First Seven Fiveyear Plans):
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं की समयावधि 1951 से 1990 है। इस समयावधि में कृषि के विकास को उच्च प्राथमिकता दी गई। कृषि विकास में योजनाओं का योगदान दो प्रकार का है-भूमि सुधार तथा तकनीकी सुधार।

1. भूमि सुधार (Land Reforms):
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत में अधिकतर कृषकों की स्थिति शोचनीय थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत पश्चात् भारत सरकार ने भूमि सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। भूमि सुधार से अभिप्राय जोतों के स्वामित्व में परिवर्तन से है। अब तक भूमि सुधार में काफी प्रगति की जा चुकी है। भूमि सुधारों में मुख्यतः निम्न को शामिल किया गया –

  • जमींदारों एवम् मध्यस्थों का उन्मूलन
  • जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण
  • चकबंदी
  • काश्तकारी व्यवस्था में सुधार

जमींदारों एवम् मध्यस्थों का उन्मूलन (Abolition of Zamindari System):
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में तीन प्रकार की काश्तकारी प्रथा प्रचलन में थी –

  • जमींदारी प्रथा
  • रैयतवाड़ी प्रथा तथा
  • महालवाड़ी प्रथा।

ये तीनों प्रथाएँ उत्पादन एवम् उत्पादकता के विकास में बाधक थीं तथा सामाजिक व आर्थिक न्याय के दृष्टिकोण से अनुचित थीं। अतः सरकार ने सर्वप्रथम इन्हें समाप्त करने का निर्णय किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् काश्तकारों को भूमि का स्वामी बनाने के लिये तथा मध्यस्थों को समाप्त करने के लिए कदम उठाये गये। बिचौलियों के उन्मूलन से लगभग 200 लाख काश्तकारों का सरकार से सीधा सम्बन्ध हो गया है। अब वे जमींदारों के शोषण से मुक्त हैं। भूमि के स्वामित्व ने उनको अधिक उत्पादन करने की प्रेरणा दी है। परंतु जमींदारी उन्मूलन से सामाजिक न्याय का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं किया जा सका। कानून में कुछ कमियाँ होने के कारण पूर्व जमींदार बड़ी-बड़ी जमीनों के स्वामी बने हुए हैं।

2. जोतों की अधिकतम सीमा का निर्धारण (Ceiling of Holdings):
भारत में भूमिहीन श्रमिक काफी संख्या में हैं। हमारे देश में जहाँ एक ओर अधिकांश लोगों के पास खेती के लिये एक बीघा भी भूमि नहीं है, वहाँ दूसरी ओर कुछ गिने-चुने लोग इतनी अधिक भूमि के स्वामी हैं कि उसकी ठीक प्रकार से देखभाल भी नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था में यह आवश्यक हो जाता है कि जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित की जाए ताकि अतिरिक्त भूमि को भूमिहीनों में बाँट कर सामाजिक न्याय की स्थापना की जा सके और अधिक से अधिक लोगों को रोजगार की सुविधायें उपलब्ध कराई जा सकें।

लगभग सभी राज्य सरकारों ने जोतों की अधिकतम सीमा के सम्बन्ध में आवश्यक अधिनियम पारित किये हैं। जोतों की उच्चतम सीमा से अभिप्राय जोत की उस अधिकतम सीमा से है जो कि एक कृषक या एक गृहस्थ अपने अधिकार में रख सकता हैं। इस सीमा से जितनी अधिक भूमि एक व्यक्ति के पास होती है वह सरकारी कब्जे में आ जाती है और सरकार इसका पुनः वितरण भूमिहीन किसानों के बीच कर देती है। अधिकतमत जोत सीमा सम्बन्धी कानूनों के फलस्वरूप 1991-92 के आरम्भ में अनुमानित घोषित अतिरिक्त भूमि का क्षेत्रफल लगभग 8.8 मिलियन हेक्टेयर था।

सरकार के द्वारा प्राप्त किया गया क्षेत्र 3.0 मिलियन हेक्टेयर था तथा वास्तव में वितरित क्षेत्र केवल 1.8 मिलियन हेक्टेयर था। वितरित किया गया क्षेत्र कुल उपलब्ध अतिरिक्त क्षेत्र का दो-तिहाई भाग है। इससे स्पष्ट है कि हमारे देश में भूमि सीमा कानूनों की प्रगति बहुत धीमी है। उच्चतम सीमा के नियमों को लागू करने में कई कठिनाई सामने आईं।

बड़े जमींदारों ने उच्चतम सीमा अधिनियमों को न्यायालयों में चुनौती दी और इस प्रकार इन अधिनियमों को लागू करने में विलम्ब हुआ। इस विलम्ब में बड़े-बड़े जमींदारों ने अपनी भूमियों को अपने निकट सम्बन्धियों के नाम पंजीकृत करा ली और इन अधिनियमों से बच गये। भूमि सुधार ने केरल तथा पश्चिम बंगाल में सफलता प्राप्त की क्योंकि वहाँ की राज्य सरकारें भूमि में सुधार लाने हेतु वचनबद्ध थीं। दुर्भाग्यवश दूसरे राज्यों की सरकारें भूमिहीनों को भूमि देने में रुचि नहीं रखती थीं और आज उन राज्यों में भूमि जोतों में काफी असमानता है।

3. तकनीकी सुधार और हरित क्रांति (Technical Reforms and Green Revolution):
तकनीकी सुधार से अभिप्राय कृषि उत्पादन की विधियों में सुधार करना तथा उन्नत बीजों का प्रयोग करना। कृषि क्षेत्र में उत्पादकता काफी सीमा तक कृषि आदानों (बीज, खाद तथा उर्वरक, सिंचाई सुविधा) एवं उत्पादन की तकनीक पर निर्भर करती है। यदि उन्नत किस्म के कृषि आदानों एवम तकनीक का प्रयोग किया जाये तो कृषि के क्षेत्र में प्रगति की जा सकती है। कृषि आदानों से अभिप्राय उन साधनों से है जिनकी सहायता से कृषि उत्पादन किया जा सकता है। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित को शामिल किया जा सकता है-सिंचाई की सुविधाएँ, खाद एवम् उर्वरक, कृषि मशीनी आदि।

स्वतंत्रता के समय देश 75% लोग कृषि पर निर्भर करते थे और कृषि पिछड़ी हुई अवस्था में थी। कृषि के पिछड़ेपन के मुख्य कारण कृषि उत्पादन के पुराने तरीकों को अपनाना, सिंचाई सुविधाओं का अभाव। भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर थी और यदि मानसून की वर्षा अपर्याप्त होती थी तो किसानों पर संकट के बादल मंडरा जाते थे, क्योंकि सिंचाई सुविधाओं का अभाव था। औपनिवेशकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन (slagnat) थी। इस गतिहीनता को स्थायी रूप से हरित क्रांति (Green Revolution) द्वारा तोड़ा गया। हरित क्रांति से अभिप्राय उत्पादन की तकनीक को सुधारने एवम् कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि करने से है।

हरित क्रांति की दो मुख्य विशेषतायें थीं –
1. उत्पादन की तकनीक को सुधारना तथा

2. उत्पादन में वृद्धि करना। इस संदर्भ में स्व. श्रीमती इंदिरा गाँधी ने लिखा था, “हरित क्रांति का आशय यह नहीं है कि खेतों में मेड़बंदी करवा कर फावड़े, तगारी, गेंती, हल, बक्खर इत्यादि उपयोगी कृषि के साधन प्राप्त करके कृषि की जाये अपितु इन साधनों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि करना है।”

इस क्रांति का मुख्य आधार नवीन व उच्च उत्पादन वाली वस्तुओं का प्रयोग है जिससे कृषक तीन से चार गुने अधिक तक उत्पादन कर सकता है। हल के स्थान पर ट्रैक्टर से जुताई करने, मानसून पर निर्भर न रह कर ट्यूबवेलों से सिंचाई की व्यवस्था करने तथा उपज को जानवरों के पैरों से अलग न करा कर थ्रेशर मशीन का प्रयोग करने, उन्नत बीजों तथा अच्छी रासायनिक खादों का प्रयोग कर तथा उचित समय पर पानी देने से कृषि उत्पाद में वृद्धि हुई। इसे ही हरित क्रांति कहते हैं।

हरित क्रांति का देश के कृषि क्षेत्र पर अच्छा प्रभाव पड़ा। इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन बढ़ कर तीन गुने से भी अधिक हो गया। हरित क्रांति से पूर्व देश को भारी मात्रा में खाद्यान्नों का आयात करना पड़ता था परंतु अब भारत इस क्षेत्र में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। हरित क्रांति से कृषि आय में वृद्धि हुई परंतु इस क्रांति की कुछ कमियाँ भी थीं जो मुख्य रूप से निम्नलिखित हैं –

  1. हरित क्रांति मुख्य रूप से गेहूँ, ज्वार, बाजार तक ही सीमित है। फसलों जैसे पटसन और कपास आदि के उत्पादन में केवल सीमित वृद्धि हुई है।
  2. खाद्यान्नों में वृद्धि पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश तथा तमिलनाडु में ही हुई।

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प्रश्न 2.
पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
पंचवर्षीय योजना के लक्ष्य (Goals of Five Year Plans):
पंचवर्षीय योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

1. संवृद्धि (Growth):
संवृद्धि से अभिप्राय एक देश में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में देश की क्षमता में वृद्धि है। दूसरे शब्दों में देश में यातायात, बैंकिंग आदि सेवाओं का विस्तार करना। उत्पादक पूँजी की कार्यकुशलता में वृद्धि करना, उत्पादन पूँजी के स्टॉक में वृद्धि करना। आर्थिक विकास का अच्छा संकेतक सकल घरेलू उत्पादन में निरंतर वृद्धि है।

सकल घरेलू उत्पाद से अभिप्राय एक देश में उत्पादित वस्तुओं तथा सवाओं के बाजार मूल्य से है। वस्तुओं तथा सेवाएँ के उत्पाद में वृद्धि होने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी और देशवासियों को अधिक मात्रा में सेवाएँ और वस्तुएँ उपलब्ध होंगी। संवृद्धि में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है। यदि हम यह चाहते हैं कि देशवासियों का जीवन स्तर ऊँचा हो, उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त हों तो हमें देश में अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करना पड़ेगा।

2. आधुनिकीकरण (Modernisation):
देश में वस्तुओं और सेवाओं का अधिक उत्पादन करने के लिए हमें उत्पादन की नई तकनीकी अपनानी होगी। उदाहरण के लिये एक किसान खेती में अधिक उत्पादन कर सकेगा यदि वह पुराने बीजों के साथ उन्नत किस्म के बीज का प्रयोग करे। इसी प्रकार नई किस्म के मशीन के प्रयोग से एक फैक्टरी अधिक उत्पादन कर सकन्नी है।

नई तकनीक के अपनाने को ही आधुनिकीकरण कहते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आधुनिकीकरण से अभिप्राय न केवल नई तकनीकों को अपनाना है अपितु सामाजिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन लाना है। सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन में अभिप्राय स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देना, उन्हें घर की चारदीवारी में न बांधना। उन्हें भी कार्यस्थल पर (बैंकों, कारखानों, स्कूलों आदि में) अपनी योग्यता का सुअवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

3. आत्मनिर्भरता (Self-reliance):
पंचवर्षीय योजनाओं का एक लक्ष्य भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। आत्मनिर्भरता से अभिप्राय उन वस्तुओं का आयात न करना जिन वस्तुओं का अपने देश में उत्पादन किया जा सकता है। आत्मनिर्भरता की नीति को पंचवर्षीय योजनाओं में इसलिये महत्त्व दिया जाये ताकि विदेशों पर निर्भरता को कम किया जा सके।

4. न्याय (Equity):
एक देश के निवासियों के जीवन स्तर में सुधार केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता से नहीं आ सकता। यह सम्भव है कि एक देश में संवृद्धि अधिक ऊँची हैं, देश में उच्च तकनीक है और फिर भी अधिकांश लोग निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहे हों। आर्थिक समृद्धि का लाभ केवल धनी वर्ग को ही नहीं मिलना चाहिये अपितु निर्धन वर्ग को भी उससे लाभ होना चाहिये। अतः संवृद्धि, आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता के साथ-साथ समानता (न्याय) भी आवश्यक है। प्रत्येक भारतवासी को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये समर्थ होना चाहिये।

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प्रश्न 3.
एक अर्थव्यवस्था की कौन-सी समस्या है? विस्तारपूर्वक समझाएँ?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्याएँ (Main problems of an economy):
एक अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

1. किन वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन किया जाए और कितनी मात्रा में (Which commodities are to be produced and in what quantity):
प्रत्येक अर्थव्यवस्था की सबसे पहली समस्या यह है कि कौन-सी वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन किया जाए जिससे लोगों की अधिकतम आवश्यकताओं को संतुष्टि किया जा सके। इस समस्या के उत्पन्न होने का मुख्य कारण आवश्यकताओं की तुलना में साधन सीमित होना है। प्रत्येक अर्थव्यवस्था को यह चुनाव करना पड़ता है कि किन आवश्यकताओं को संतुष्ट किया जाए तथा किनका त्याग किया जाए।

इस विषय में दो बातें तय करनी पड़ती हैं –

  • यह तो यह निर्णय लेना पड़ता है कि कौन-सी वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जाए। अर्थात् क्या उपभोक्ता वस्तुएँ, पूँजीगत वस्तुएँ, युद्धकालीन वस्तुएँ या शांतिकालीन वस्तुओं का उत्पादन किया जाए।
  • जब एक अर्थव्यवस्था यह तय कर लेती है कि कौन-सी वस्तु का उत्पादन करना है तो उसे यह भी निर्णय लेना पड़ता है कि उपभोक्ता वस्तुओं का कितना उत्पादन किया जाए पूँजीगत वस्तुओं का कितना उत्पादन किया जाए। उत्पादक उन्हीं वस्तुओं का तथा उतनी ही मात्रा में उत्पादन करते हैं जिनसे उन्हें अधिकतम लाभ प्राप्त होता है।

2. वस्तुओं का उत्पादन किस प्रकार किया जाए (How to Produce):
एक अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या है वस्तुओं का उत्पादन कैसे किया जाए। इस समस्या का संबंध उत्पादन की तकनीक का चुनाव करने से है। इसमें उत्पादन की कई तकनीकों को अपनाया जा सकता है। जैसे –

श्रम प्रधान तकनीक (Labour intensive technique):
इस तकनीक में श्रम का उपयोग पूँजी की तुलना में अधिक किया जाता है।

श्रम प्रधान तकनीक (Labour intensive technique):
इस तकनीक में श्रम का उपयोग पूँजी की तुलना में अधिक किया जाता है। एक अर्थव्यवस्था को यह तय करना पड़ता है कि वह कौन-सी तकनीक का प्रयोग किस उद्योग में करे जिससे उत्पादन अधिक कुशलतापूर्वक किया जा सके। किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन की कौन-सी तकनीक अपनाई जाए, यह साधनों की उपलब्धता तथा उनके सापेक्षिक मूल्यों पर निर्भर करेगा।

3. उत्पादन किसके लिए किया जाए (For whom to Produce):
एक अर्थव्यवस्था को यह भी निर्धारित करना पड़ता है कि उत्पादन किसके लिये किया जाए। उत्पादन एवं उपभोग या बाजार में विनिमय के लिए किया जाता है। इसके मुख्य दो पहलू हैं –

  • प्रथम पहलू का संबंध व्यक्तिगत वितरण से है। इसका अभिप्राय यह है कि उत्पादन का समाज के विभिन्न व्यक्तियों तथा परिवारों में किस प्रकार वितरण किया जाए।
  • वितरण की समस्या का एक दूसरा पहलू कार्यात्मक वितरण है। इसका संबंध यह ज्ञात करने से है उत्पादन के विभिन्न साधनों अर्थात् भूमि, श्रम, पूँजी तथा उद्यम में उत्पादन का बँटवारा कैसे हो।

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प्रश्न 4.
क्या सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का सामाजिक दायित्व लाभ-उपार्जन से अधिक आवश्यक है?
उत्तर:
भारत में औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 तथा औद्योगिक अधिनियम 1951 को क्रियान्वित करने के फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र का प्रादुर्भाव हुआ। औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1948 तथा औद्योगिक अधिनियम 1951 में सार्वजनिक एवम् निजी क्षेत्र के कार्यों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। क्षेत्रों के स्पष्ट विभाजन के बाद से ही सार्वजनिक क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ।

आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामाजिक क्षेत्र, सामाजिक मूल्यों तथा व्यापक हित के विचार को महत्त्व देता है। बड़ी-बड़ी सार्वजनिक कल्याण संस्थाओं की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र में ही संभव है क्योंकि निजी क्षेत्र इतना बड़ा निवेश करने का साहस नहीं करता। सार्वजनिक क्षेत्र का दायित्व सामाजिक है। यह लाभ कमाने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। सामाजिक दायित्व में निम्नलिखित दायित्व सम्मिलित हैं –

  1. समाज को रोजगार देना।
  2. बीमार (रुग्न) उद्योगों को स्वस्थ बनाना।
  3. एकाधिकार प्रवृत्ति को रोकना।
  4. आय की असमानता को कम करना।
  5. धन तथा सम्पत्ति का उचित वितरण करना।
  6. व्यापारिक शोषण समाप्त करना तथा।
  7. वस्तुओं की कमी को दूर करना।

यदि इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये सार्वजनिक उपक्रमों को हानि भी हो तो भी उन्हें सामाजिक दायित्वों को निभाना चाहिये।

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प्रश्न 5.
पंचवर्षीय योजना के उद्देश्य के रूप में समानता या न्याय से क्या अभिप्राय है? क्या हम पंचवर्षीय योजना के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए हैं? कारण सहित उत्तर दें।
उत्तर:
न्याय या समानता (Equity):
नियोजन का एक प्रमुख लक्ष्य न्याय की प्राप्ति है। राज्य के नीति निर्देशक तत्व संविधान के आवश्यक तत्त्व हैं। उनमें यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि सरकार एक ऐसी व्यवस्था उत्पन्न करने का प्रयत्न करेगी जिसमें आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक न्याय सभी को उपलब्ध होगा। दूसरे भारत में यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि यहाँ समाजवादी ढंग से समाज की रचना करनी है। इन मौलिक बातों को ध्यान में रखकर सभी योजनाओं का यह प्रमुख लक्ष्य रहा है कि –

1. आय की विषमता को कम किया जाये।

2. बेकारी और निर्धनता को दूर किया जाये।

3. आर्थिक सत्ता के केन्द्रीयकरण को कम किया जाये जिससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले तथा।

4. लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाये रखा जाये। केवल संवृद्धि, आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता से लोगों का जीवनस्तर सुधार नहीं सकता जब तक आर्थिक समृद्धि का फल निर्धन व्यक्तियों को नहीं प्राप्त होता। ऐसी अवस्था में तो अमीर और अधिक अमीर होते जायेंगे तथा गरीब और अधिक निर्धन हो जायेंगे। इस तरह अमीरों तथा गरीबों के बीच में अंतर बढ़ता जायेगा।

अतः आर्थिक समृद्धि के साथ आधुनिकीकरण तथा आत्मनिर्भरता के साथ-साथ न्याय (सामाजिक तथा आर्थिक) का भी महत्व है। प्रत्येक भारतीय नागरिक को इस योग्य बनाना है कि वह भोजन, आवास, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। इसके अतिरिक्त सम्पत्ति के असमान वितरण को भी घटाया जाना चाहिये।

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उस समय नगरों तथा ग्रामों में आर्थिक, असमानता थी। भारत में जमींदारी प्रथा थी। जमींदार बड़ी-बड़ी भू-जोतों के स्वामी थे। वे काश्त करने के लिए काश्तकारों को जमीन देते थे और मनमाना भूमि का किराया लेते थे। काश्तकार उनकी दया पर निर्भर करते थे। जमींदार जब भी चाहें उनको बेदखल कर देते थे। किसान लोग अति निर्धन थे, ऋणगस्त थे।

कहा जाता था कि किसान ऋण में पैदा होता है, ऋण में रहता है और ऋण में मरता है। इसके विपरीत जमींदार ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें हर प्रकार सुविधाएँ प्राप्त थीं। इस तरह गाँवों में आर्थिक तथा सामाजिक विषमता व्याप्त थीं। ग्राम में आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए योजना काल में कई भूमि सुधार किए गये। कृषि उत्पादन में वृद्धि और सामाजिक न्याय के लिये कृषि में किये गये संस्थागत परिवर्तनों को भूमि सुधार कहते हैं। ये कृषि जोतों को पुनर्गठित कर तथा भूमि के स्वामित्त्व करके किये जाते हैं।

भूमि सुधारों के दो मुख्य उद्देश्य हैं –

  1. कृषि विकास अर्थात् कृषि में वृद्धि तथा
  2. सामाजिक न्याय अर्थात् मध्यस्थों द्वारा काश्तकारों की समाप्ति और भूमि के जोतने वालों को भूमि का स्वामी बनाना

भारत में भूमि-सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। जैसे जमींदारों (मध्यस्थों): का उन्मूलन, काश्तकारी व्यवस्था में सुधार, जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना, चकबंदी, सहकारी खेती आदि। भारत के भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने की गति काफी धीमी रही इस कारण इनके परिणाम संतोषजनक नहीं रहे हैं। प्रो. दान्तवाला ने कहा है कि, “अब तक भारत में जो भूमि सुधार हुए हैं या निकट भविष्य में होने वाले हैं, वे सभी सही दिशा में हैं लेकिन लियान्वयन के अभाव में इनके परिणाम संतोषजनक नहीं रहे हैं।”

शहरों में भी आय तथा सम्पत्ति का असमान वितरण है। भारत जैसे पिछड़े देशों में आय को असमानता गरीबी की संख्या को बढ़ाने में हवन में आहुति की तरह काम करती है। पंचवर्षीय योजनाओं में आय की अंसमानता को दूर करने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाये गये हैं।

  1. सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार किया गया है।
  2. औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति अपनाया गया है।
  3. लघु और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किये गये हैं।
  4. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अपनाय गया है।
  5. बीस सूत्री कार्यक्रम अपनाया गया है।
  6. कई राज्यों में बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था की गई है।
  7. स्वरोजगार को प्रोत्साहन दिया गया है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि योजनाओं में अपनाई गई नीतियों के परिणामस्वरूप आय की विषमताएँ कम होने के बजाय बढ़ी हैं। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में जितनी आय अर्जित हुई उसका एक बड़ा भाग कुछ औद्योगिक घरानों के पास ही केन्द्रित रह गया तथा सामान्य जनता तक उसका लाभ बहुत मात्रा में नहीं पहुँचा। अन्य शब्दों में विभिन्न योजनाओं में अपनाये गये विभिन्न विकास कार्यक्रमों के फलस्वरूप अर्थव्यवस्था में आय की मात्रा में वृद्धि। तो हुई है किन्तु इसका समान बंटवारा नहीं हुआ है।

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प्रश्न 6.
आर्थिक नियोजन के कई लक्ष्य हैं। उनमें एक लक्ष्य आत्मनिर्भरता है। आत्मनिर्भरता के लिये भारत में क्या प्रयल किये गये हैं और उसमें हम कहाँ तक सफल हुए हैं?
उत्तर:
आत्मनिर्भरता-पंचवर्षीय नियोजनों का एक लक्ष्य (Self Reliance-Goal of Five year Plans):
पंचवर्षीय योजनाओं के कई लक्ष्य हैं। उनमें से एक लक्ष्य आत्मनिर्भरता है। आत्मनिर्भरता से अभिप्राय उन वस्तुओं के आयात से बचना है जिनका उत्पादन स्वयं देश में किया जा सकता है। लगभग 200 वर्षों की परतंत्रता के पश्चात् भारत 15 अगस्त, 1947: को स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के समय हम अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं के लिये विदेशों पर। निर्भर थे। उस समय खाद्यान्न की कमी थी और इस कमी को पूरा करने के लिये हमें काफी मात्रा में खाद्यान्नों का आयात करना पड़ा।

देश में भारी और आधारभूत उद्योग लगभग नहीं के बराबर थे और इस कारण पूँजीगत वस्तुओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अतः भारत को दूसरे देशों की निर्भरता (विशेषकर खाद्यान्नों के लिये) कम करने के लिए आत्मनिर्भरता की नीति को आवश्यक समझा गया। हमें यह डर था कि कहीं आयात खाद्यान्न, विदेशी तकनीकी तथा विदेशी पूँजी पर हमारी निर्भरता से हमारी नीतियों पर विदेशी हस्तक्षेप करना न आरम्भ कर दें। अतः हमने आत्मनिर्भरता की नीति को अपनाया।

योजनाओं के आरम्भ में ही आत्मनिर्भरता की बात कही गई परंतु तीसरी योजना में इस पर विशेष बल दिया गया। पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में तो विदेशी सहायता पर निर्भरता को न्यूनतम करने की बात कही गई। भारत में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य प्राप्त करने के कई प्रत्यन किये गये। कृषि में उत्पादकता को बढ़ाने के कई भूमि सुधार किये गये। जमींदारी प्रथा उन्मूलन के लिये कानून बनाये गये। काश्तकारों को भूमि का स्वामी बनाया गया।

भमि की उच्चतम सीमा निर्धारित की गई। हरित क्रांति द्वारा कृषि उत्पादों में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप 1960 में भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया। भारत में खाद्यान्नों का एक विपुल भण्डार भी बनाया जा चुका है। अब हमें (कुछ अपवादों को छोड़कर) खाद्यान्नों के आयात की आवश्यकता नहीं है, परंतु खादों तथा रासायनिक पदार्थों का अब भी हमें भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है। देश में उद्योगों को विकसित करने के लिए भी कई प्रयत्न किये गये हैं। दूसरी पंचवर्षीय योजना में उद्यमों को मुख्य रूप से प्रधानता दी गई ताकि औद्योगिक प्रगति की नींव रखी जा सके। सातवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि में औद्योगिक विकास की दिशा में अनेक आधारभूत परिवर्तन हुए हैं जिससे देश में आर्थिक विकास को बल मिला।

पूँजीगत वस्तुओं एवं उपभोक्ता वस्तुओं दोनों के उत्पादन में विकास की समान महत्त्व दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ। उपभोग उद्योगों के सम्बन्ध में देश लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है। उद्योगों का विविधीकरण तथा आधुनिकीकरण किया गया। औद्योगिक उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। लघु उद्योगों के विकास के लिये प्रयत्न किये गये।

उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देने के लिए संरक्षण तथा कोटा की नीति अपनाई गई। पहली पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक क्षेत्र में उपलब्धियाँ वास्तव में प्रभावशाली रहीं। इस काल में औद्योगिक क्षेत्र में 6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि प्रशंसनीय है। दूसरे योजनाकाल के आरम्भ में आयात प्रतिस्थापन के लिये सब प्रकार के उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया। इतना होने पर भी हम अभी तक औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं।

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प्रश्न 7.
औद्योगिक नीति 1956 ने भारत के उद्योगों को कितनी श्रेणियों में बाँटा? इन वर्गों में किन उद्योगों को रखा गया?
उत्तर:
उद्योगों का वर्गीकरण (Classification of Industries):
औद्योगिक नीति 1956 के अनुसार भारतीय उद्योगों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया –

  1. प्रथम वर्ग
  2. द्वितीय वर्ग तथा
  3. तृतीय वर्ग

1. प्रथम श्रेणी (First Category):
प्रथम श्रेणी में युद्ध सामग्री का निर्माण, परमाणु शक्ति के उत्पादन एवम् नियंत्रण, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, रेल यातायात तथा डाकघर को रखा गया। इनके स्वामित्व और प्रबंध तथा स्थापना एवं विकास का दायित्व पूर्ण रूप से केन्द्रीय सरकार को सौंपा गया।

2. द्वितीय श्रेणी (Second Category):
इस श्रेणी में वे उद्योग रखे गये जिनके विकास में सरकार अधिक भाग लेगी। 12 उद्योगों को इस श्रेणी में रखा गया जैसे-औजार, मशीन, दवाइयाँ, रासायनिक खाद, रबड़, जल यातायात, सड़क यातायात आदि। भाविष्य में इस श्रेणी उद्योगों की स्थापना सरकारी क्षेत्र में ही की जायेगी।

3. तृतीय श्रेणी (Third Category):
इस श्रेणी में उन सभी उद्योगों को रखा गया जो निजी क्षेत्र के लिये सुरक्षित रहेंगे। इनका विकास निजी क्षेत्र की प्रेरणा से हागा किन्तु इस श्रेणी में भी राज्य नये उद्योगों की स्थापना कर सकता है।

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प्रश्न 8.
भारत में औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के क्या प्रमुख उद्देश्य रहे हैं?
उत्तर:
भारत में औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के प्रमुख उद्देश्य (Main Objectives of Industrial Licensing):
भारत में औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. विभिन्न योजनाओं के लक्ष्यों के अनुसार औद्योगिक निवेश तथा उत्पादन को विकसित एवं नियंत्रित करना।
  2. छोटे और लघु उद्यमों को प्रोत्साहन देना तथा उन्हें संरक्षण प्रदान करना।
  3. औद्योगिक स्वामित्व के रूप में आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकना।
  4. आर्थिक विकास के क्षेत्र में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना तथा समुचित संतुलित औरद्योगिक विकास के लिये प्रेरित करना।

प्रश्न 9.
व्यापार नीतियों के औद्योगिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
व्यापार नीतियों का औद्योगिक विकास, पर प्रभाव (Effect of tradepolicies on industrial development):
प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत भारत के औद्योगिक क्षेत्र की उपलब्धियाँ बहुत ही प्रभावशाली रहीं। 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 11.8 प्रतिशत था जो कि 1990-91 में बढ़कर 24.6 प्रतिशत हो गया। सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी में वृद्धि विकास का संकेतक है। भारत का उद्योग क्षेत्र अब केवल सूती उद्योग और पटसन तक ही सीमित नहीं रह गया था। 1990 तक इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के कारण विविधता आ गई।

सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ औद्योगिक इकाइयाँ थीं-चितरंजन डीजल लोकोमोटिव वर्क्स, इन्टेगरल कोच फैक्टरी, हिन्दुस्तान शिपयार्ड, इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन आदि। प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में सार्वजनिक प्रतिष्ठानों ने आश्चर्यजनक प्रगति की है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के आरम्भ होने के समय अर्थात 1950 में भारत में केन्द्रीय सरकार के अधीन केवल 5 प्रतिष्ठान थे जिनमें 29 करोड़ रुपये की पूँजी का निवेश किया गया था इसके मुकाबले इनकी संख्या बढ़कर 7 वीं योजना के अन्त में 244 हो गई थी जिसमें 1,06,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश हो चुका था। लघु उद्योगों के विकास ने उन व्यवसायियों को व्यवसाय चलाये जाने का सुअवसर प्रदान किया जिनके पास बड़े-बड़े उद्योग चलाने की पूँजी नहीं थी। विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण ने घरेलू उद्योगों को विकसित होने का सुअवसर प्रदान किया।

भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के योगदान होने पर भी कुछ अर्थशास्त्री सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की उपलब्धियों की आलोचना करते हैं। उनका विचार है कि आरम्भ में सार्वजनिक उपक्रमों की बहुत ही आवश्यकता थी और इन उपक्रमों ने सकल घरेलू उत्पाद में काफी योगदान दिया है। परंतु अब अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, अकुशलता, भ्रष्टाचार, मितव्ययता, लालफीताशाही आदि व्याप्त हैं, जिनके फलस्वरूप वे उपक्रम घाटे में चल रहे हैं। कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम अपने उत्पादों का मनमाना मूल्य निर्धारित करते हैं और उपभोक्ता का शोषण करते हैं जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का उद्देश्य जन कल्याण है न कि जनता का शोषण।

इनमें उत्पाद की गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। परंतु इन कारणों से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को समाप्त नहीं किया जाना चाहिये। इनमें कुशलता लाई जानी चाहिये। भ्रष्टाचार, अकुशल तथा कामचोर कर्मचारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही की जानी चाहिये। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवम् सेवाओं का मूल्य निर्धारित करने के लिये मूल्य बोर्ड का गठन किया जाना चाहिये । इतना होने पर भी यदि कोई सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम घाटे में चल रहा है तो उसे बंद नहीं करना चाहिये क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना नहीं है, अपितु जनकल्याण है। इसके अतिरिक्त इस बात की क्या गारंटी है कि उस उपक्रम में लाभ होगा यदि वह उपक्रम निजी क्षेत्र में चलाया जाये निजी क्षेत्र के उपक्रम भी तो घाटे में चलते हैं।

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प्रश्न 10.
भारत में व्यापार नीति पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारत की व्यापार नीति (Trade Policy of India):
व्यापार नीति को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है –
1. बाह्य उन्मुख नीति (Outward looking Policy) तथा

2. अन्तर्मुख नीति (Inward looking Policy)। बाह्य उन्मुख नीति निर्यात संवर्धन पर जोर देती है जबकि अन्तर्मुख नीति आयात प्रतिस्थापन पर। हमारे देश की प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में हमारी व्यापार नीति अन्तर्मुखी (Inward looking) रही है। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि व्यापार की अन्तर्मुखी नीति आयात प्रतिस्थापन पर जोर देती है। हमारी प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में आयात प्रतिस्थापन पर अधिक बल दिया गया है। आयात प्रतिस्थापन का अर्थ है कि आयात की जाने वाले वस्तुओं का घरेलू (देशी) उत्पादन द्वारा प्रतिस्थापन करना।

उदाहरण के लिये परिवहन के साधनों को दूसरे देशों से आयात करने के स्थान पर अपने देश में उनका निर्माण करना। जिन देशों में आयात प्रतिस्थापन की नीति को अपनाया जाता है वहाँ घरेलू उद्योगों को अत्यधिक संरक्षण प्रदान किया जाता है। आयातों व विदेशी निवेश पर कड़े नियंत्रण रखे जाते हैं। आयात से संरक्षण दो तरीकों से किया जा सकता है –

2. टैरिफ (Tariffs) एवं कोटा (Quotas)। आयात की जाने वाली वस्तुएँ महंगी हो जाती हैं और इससे उनके उपयोग को हतोत्साहित किया जाता है। कोटे से यह निर्धारित किया जाता है कि कोई विशेष वस्तु कितनी मात्रा में दूसरे देशों से मंगवाई जा सकती है। टैरिफ और कोटे से आयात पर प्रतिबंध लग जाता है और विदेशी प्रतियोगिता से घरेलू फर्मों को संरक्षण प्राप्त होता है। संरक्षण की नीति इस अवधारणा पर आधारित होती है कि विकसित देश के उद्योग अधिक विकसित देशों में उत्पादित वस्तुओं का मुकाबला नहीं कर सकते। ऐसी मान्यता है कि यदि घरेलू उद्योगों को संरक्षण किया जाता है तो कुछ समय के पश्चात् वे विदेशी उद्योगों से मुकाबला करने में समर्थ जो जाते हैं।

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प्रश्न 11.
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विभिन्न उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विभिन्न उद्देश्य (Various Objective of Public Sector in India):
भारत में सार्वजनिक उपक्रमों को विभिन्न उद्देश्यों के लिये स्थापित किया गया है। भिन्न-भिन्न उपक्रमों के भिन्न-भिन्न उद्देश्य हैं। इन सभी उद्देश्यों को चार शीर्षकों में विभाजित किया गया है –
1. राष्ट्रीय उद्देश्य (National Objectives):
बहुत से सार्वजनिक उपक्रम राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रख कर स्थापित किये गये हैं। जैसे-राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु शक्ति आदि।

2. सामाजिक उद्देश्य (Economic objectives):
भारत में सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना के कुछ मुख्य उद्देश्य सामाजिक भी हैं जो इस प्रकार हैं –

  • समाज को रोजगार देना
  • बीमार उद्योगों को स्वस्थ बनाना
  • एकाधिकार प्रवृत्ति को रोकना
  • आय की असमानता को कम करना
  • उचित वितरण
  • व्यापारिक शोषण समाप्त करना
  • वस्तुओं की कमी को दूर करना

3. आर्थिक उद्देश्य (Economic Objectives):
कुछ सार्वजनिक उपक्रम आर्थिक उद्देश्य से प्रेरित होकर भी स्थापित किये गये हैं। जैसे –

  • योजनाबद्ध विकास करना
  • संतुलित क्षेत्रीय विकास करना
  • भावी विकास हेतु वित्तीय साधन जुटाना
  • विकास दर में वृद्धि करना
  • निर्यात में वृद्धि करना
  • आधारभूत उद्योगों का विकास करना

4. अन्य उद्देश्य (Other Objectives):

  • निजी उपक्रमों की स्थापना करना
  • तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना
  • लघु तथा कुटीर उद्योगों की सहायता करना

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प्रश्न 12.
महालनोबिस के जीवन तथा उपलब्धियों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
महालनोबिस की उपलब्धियाँ (Achievements of Mahalanobis):
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में पहली पंचवर्षीय योजना का सूत्रपात 1951 में हुआ था। इस योजना में कृषि को बहुत महत्त्व दिया गया था। परंतु वास्तव में भारत में योजना का वास्तविक रूप में आरम्भ द्वितीय पंचवर्षीय योजना से हुआ था। द्वितीय पंचवर्षीय योजना में ही भारतीय योजना के उद्देश्य के विषय में वास्तविक विचारों का उल्लेख किया गया था और वह दूसरी पंचवर्षीय योजना महालनोबिस के विचारों पर आधारित थी। इस दृष्टिकोण से उन्हें भारतीय योजना का निर्माता कहा जा सकता है।

महालनोबिस का जन्म 1893 में कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई, प्रेसीडेंसी कॉलेज (Presidency College) तथा इंगलैण्ड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (Cambridge University) में की। उन्होंने सांख्यिकी (Statistics) के विषय में इतना अधिक योगदान दिया कि उनकी विश्व में प्रसिद्ध हो गई और उन्हें 1946 में Britian’s Royal Society का सदस्य बना लिया गया। उन्होंने कोलकाता में भारतीय सांख्यिकीय ‘संस्था’ (Indian Statistical Institute) की स्थापना की और सांख्य (Snakhya) नाम की एक पत्रिका (Journal) शुरू की।
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दूसरी पंचवर्षीय योजना में उन्होंने भारत तथा विश्व के विख्यात अर्थशास्त्रियों को आमंत्रित किया ताकि वे उन्हें भारत के आर्थिक विकास के बारे में परामर्श दे सके। वे भारत को आर्थिक विकास के पथ पर डालने के लिये सर्वदा स्मरणीय रहेंगे।

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प्रश्न 13.
भू-धारण प्रणाली से क्या अभिप्राय है? स्वतंत्रता के समय भारत में कितने प्रकार की भू-स्वामित्व प्रणालियाँ अस्तित्व में थीं? प्रत्येक प्रणाली का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भू-धारण प्रणाली (Land Tenure System):
सरकार के प्रति काश्तकारों के कर्त्तव्यों तथा अधिकारों के निर्धारण और वर्णन को भू-धारण प्रणाली कहते हैं। स्वतंत्रता के समय भारत में तीन भू-धारण प्रणालियाँ प्रचलित थीं –

  1. जमींदारी प्रथा
  2. महालवाड़ी प्रथा, तथा
  3. रैयतवाड़ी प्रथा

1. जमींदारी प्रथा (ZamindariSystem):
इस प्रणाली का आरम्भ लार्ड कार्नवालिस ने 1971 में बंगाल में स्थायी बंदोस्त चलाकर किया था। इसके अनुसार कुछ किसानों को भूमि का स्वामी बना दिया गया जो वास्तव में पहले मालगुजारी एकत्रित करने वाले सरकारी कर्मचारी थे। इन नये भू-स्वामियों ने अधिकांश भूमि पट्टे पर काश्तकारों को दी और वे उसका मनमाना लगान प्राप्त करते थे। ये जमींदार अब काश्तकारों तथा सरकार के बीच में मध्यस्थ (बिचौलिये) बन गये। वे स्वयं काश्तकारी नहीं करते थे। उनका मुख्य कार्य काश्तकारों से मनचाहा लगान वसूलना होता था।

वे सरकार को एक निश्चित मालगुजारी देते थे। वे देश के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न नाम से जाने जाते थे। ये जमींदार भूमि के विकास की ओर कोई ध्यान देते थे। काश्तकार भी भूमि में कोई सुधार नहीं लाते थे क्योंकि उन्हें भूमि से कभी भी बेदखल किया जा सकता था। जमींदार काश्तकारों से न केवल लगान वसूल करते थे अपितु अन्य गैर-कानूनी कर भी लगाते थे, जिसके परिणामस्वरूप यह प्रणाली कृषि तथा देश की उन्नति में निश्चित रूप से बाधक सिद्ध हुई। इस प्रथा के फलस्वरूप आर्थिक दृष्टि से किसान कंगाल तथा ऋणगस्त हो गये। सामाजिक दृष्टि से वे दास की अवस्था में आ गये।

स्वतंत्रता के पश्चात् इस प्रथा का उन्मूलन करने के लिये सरकार द्वारा कई कानून पास किये गये। इस सम्बन्ध में सबसे पहले अधिनियम 1943 में मद्रास (चेन्नई) में पारित किया गया। 1955 तक लगभग सभी राज्यों में ऐसे अधिनियम पारित किये जा चुके थे। कई राज्यों में मध्यस्थों की और से इन कानूनों को चुनौती दी गई जिन्हें 1951 के संविधान में संशोधन के द्वारा दूर करना पड़ा। भू-धारण की इस प्रणाली के उन्मूलन से लगभग दो करोड़ काश्तकारों का सरकार से प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो गया है।

2. महालवाड़ी प्रथा (Mahalwari System):
भू-धारण की इस प्रणाली (प्रथा) के अन्तर्गत सारी भूमि ग्राम समुदाय की होती है ग्राम समुदाय के सदस्य व्यक्तिगत और सामूहिक रूपों में लगान के भुगतान के लिये उत्तरदायी होते हैं। भू-धारण की यह प्रणाली 1863 में शुरू हुई थी और देश के कुछ क्षेत्रों में जैसे आगरा, अवध और पंजाब के कुछ भागों में प्रचलित थी। यद्यपि आरम्भ में भूमि का स्वामित्व सामूहिक था परंतु समय के साथ-साथ काश्तकार अपनी भूमि के लगान. के लिये व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी समझा जाने लगा।

3. रैयतवाड़ी प्रथा (RayatwariSystem):
यह प्रथा हमारे देश में सबसे अधिक जानी जाती है। इस प्रथा के अन्तर्गत भूमि पर काश्तकारों का अलग-अलग वैयक्तिक स्वामित्व होता है। ये सभी भू-स्वामी (काश्तकार) व्यक्तिगत रूप से राज्य को लगान देने के लिए उत्तरदायी होते हैं। इस प्रथा के अन्तर्गत काश्तकारों और राज्य के बीच किसी भी प्रकार का कोई मध्यस्थता नहीं है। यह प्रथा आरम्भ में मद्रास में लागू की गई और बाद में ब्रिटिश भारत के अधिकतर प्रदेशों बम्बई, बिहार और मद्रास में की गई।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन योजना आयोग का अध्यक्ष है?
(a) वितमंत्री
(b) योजना मंत्री
(c) प्रधानमंत्री
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) प्रधानमंत्री

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प्रश्न 2.
स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में किस आर्थिक प्रणाली को अपनाया गया?
(a) पूंजीवादी
(b) मिश्रित
(c) समाजवादी
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) मिश्रित

प्रश्न 3.
किस आर्थिक प्रणाली में उत्पादन के सभी साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है?
(a) समाजवादी
(b) मिश्रित
(c) पूँजीवादी
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) पूँजीवादी

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प्रश्न 4.
ब्रिटीशकाल मुख्यतः कितनी भू-धारण प्रणालीयाँ थीं?
(a) दो
(b) तीन
(c) एक
(d) चार
उत्तर:
(b) तीन

प्रश्न 5.
जमींदार प्रथा के उन्मूलन से कितने काश्तकारों का सरकार से प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो गया?
(a) 300 लाख
(b) 200 लाख
(c) 250 लाख
(d) 350 लाख
उत्तर:
(b) 200 लाख

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प्रश्न 6.
1990 में देश का लगभग कितना प्रतिशत भाग कृषि कार्य में कार्यरत था?
(a) 80 %
(b) 65 %
(c) 70 %
(d) 40 %
उत्तर:
(b) 65 %

प्रश्न 7.
औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 ने भारत के उद्योगों को कितनी श्रेणयों में वर्गीकृत किया?
(a) चार
(b) दो
(c) तीन
(d) पाँच
उत्तर:
(c) तीन

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प्रश्न 8.
1990-91 में औद्योगिक क्षेत्र का सकल घेरलू उत्पाद में योगदान कितना था?
(a) 26 %
(b) 23 %
(c) 28 %
(d) 24.6 %
उत्तर:
(d) 24.6 %

प्रश्न 9.
भारत में आर्थिक नियोजन का काल कब आरम्भ हुआ?
(a) 1 अप्रैल 1961
(b) 1 अप्रैल 1980
(c) 1 अप्रैल 1951
(d) 14 अप्रैल 1974
उत्तर:
(c) 1 अप्रैल 1951

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प्रश्न 10.
1-4-1979 से 31-2-1980 का वर्ष किस योजना के अन्तर्गत आता है?
(a) प्रथम पंचवर्षीय योजना
(b) योजना का अवकाश काल
(c) द्वितीय पंचवर्षीय योजना
(d) पांचवीं पंचवर्षीय योजना
उत्तर:
(b) योजना का अवकाश काल

प्रश्न 11.
योजना काला में निम्नखित किस कारण से अभी निर्मित वस्तुओं का उत्पादन निध लक्ष्यों से कम रहा?
(a) बिजली की कमी
(b) कच्चे माल की कमी
(c) औद्योगिक अशान्ति
(d) उपयुक्त सभी कारण
उत्तर:
(d) उपयुक्त सभी कारण

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प्रश्न 12.
भारत मे आर्थिक आयोजन का एक प्रमुख उद्देश्य था –
(a) सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास
(b) हिन्दी को प्रोत्साहन देना
(c) सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर
(d) आर्थिक विषमता का बढ़ाना
उत्तर:
(d) आर्थिक विषमता का बढ़ाना

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Economics स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत में औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों का केन्द्र बिन्दु क्या था? उन नीतियों के क्या प्रभाव हुए?
उत्तर:
औपनिवेशिक शासन की आर्थिक नीतियों के केन्द्र बिन्दु निम्नलिखित थे –

  1. भारत का इंगलैंड को कच्चे माल की पूर्ति करने वाला बनाना।
  2. भारत को इंगलैंड में बने तैयार माल की पूर्ति करने वाला बनाना।

नीतियों का प्रभाव (Effects of Policies):
इससे भारत का स्वरूप मूल रूप से बदल गया। भारत कच्चे माल का निर्यातक और निर्मित माल का आयातक बन गया। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत में राष्ट्रीय आय की वार्षिक संवृद्धि दर 20% से कम हो गई तथा प्रति व्यक्ति उत्पादन वृद्धि दर तो मात्र आधा प्रतिशत रह गई।

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प्रश्न 2.
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत की राष्ट्रीय आय का आकलन करने वाले प्रमुख अर्थशास्त्री दादाभाई नौरोजी, विलियम, डिगबी, किडल शिराज, डा० वी० के० आर० वी० राव० आर० सी० देसाई आदि थे।

प्रश्न 3.
औपनिवेशिक शासन काल में कृषि की गतिहीनता के मुख्य कारण क्या थे?
उत्तर:
कृषि क्षेत्र की गतिहीनता का मुख्य कारण औपनिवेशिक शासन द्वारा लागू की गई भू-व्यवस्था प्रणालियाँ थीं। साथ ही राजस्व और कृषि का व्यवसायीकरण भी प्रमुख कारण थे।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता के समय देश में कार्य कर रहे कुछ आधुनिक उद्योगों के नाम बताइए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता के समय देश में कार्य कर रहे आधुनिक उद्योग निम्नलिखित थे:

  1. सूती उद्योग
  2. पटसन उद्योग
  3. लोहा इस्पात उद्योग
  4. चीनी
  5. सीमेंट तथा
  6. कागज उद्योग

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प्रश्न 5.
स्वतंत्रता के पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत में व्यवस्थित वि-उद्योगीकरण के दोहरे ध्येय क्या थे?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के पूर्व अंग्रेजों द्वारा भारत में अर्थव्यवस्था वि-उद्योगीकरण के दोहरे ध्येय निम्नलिखित थे –

  1. भारत को इंगलैंड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के लिए कच्चे माल का निर्यातक बनाना।
  2. इंगलैंड में विकसित हो रहे आधुनिक उद्योगों के उत्पादन के लिए भारत को ही एक विशाल बाजार बनाना।

प्रश्न 6.
अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परम्परागत हस्तकला उद्योगों का विनाश हुआ। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कारण बताएँ।
उत्तर:
हम इस विचार से पूर्ण सहमत हैं कि अंग्रेजी शासन के दौरान भारत के परंपरागत हस्तकला उद्यागों का विनाश हुआ। ब्रिटिश काल में भारत की विश्व प्रसिद्ध शिल्पकलाओं का पतन हुआ। शिल्पकला के पतन के प्रमुख कारण देशी राजाओं एवं नवाबों का अन्त, मशीनों द्वारा निर्मित विदेशी वस्तुओं की प्रतियोगिता, परिवहन के साधनों का विकास, ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश संसद की नीति आदि थे।

प्रश्न 7.
भारत में आधारिक संरचना विकास की नीतियों से अंग्रेज अपने क्या उद्देश्य पूरा करना चाहते थे?
उत्तर:
ब्रिटिश शासन काल में रेलों, बंदरगाहों, जल परिवहन आदि आधारिक संरचना का विकास प्रारंभ हुआ। इसका मकसद आम जनता को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि देश के भीतर प्रशासन एवं पुलिस को चुस्त-दुरुस्त रखने एवं देश के कोने-कोने से कच्चा माल एकत्र करके अपने देश में भेजने एवं वहाँ तैयार किए गए माल को भारत के सुदूर क्षेत्रों में पहुंचाने के लिए आधारिक संरचना का विकास किया गया।

प्रश्न 8.
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीतियों की कमियों की आलोचनात्मक विवेचना करें।
उत्तर:
प्राचीन समय से ही भारत एक महत्त्वपूर्ण देश रहा है किन्तु ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई नीतियों का भारत के विदेशी व्यपार की संरचना, स्वरूप और आकार पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप भारत कच्चे उत्पाद जैसे रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील, पटसन आदि का निर्यातक होकर रह गया।

साथ ही वह सूती, रेशमी ऊनी वस्त्रों जैसे अन्तिम उपभोक्ता वस्तुओं और इंगलैंण्ड के कारखानों में बनी हल्की मशीनों आदि का आयातक हो गया। व्यावहारिक रूप से इंग्लैण्ड ने भारत के आयात-निर्यात व्यापार पर अपना एकाधिकार जमाए रखा। भारत का आधे से अधिक व्यापार तो केवल इंगलैंड तक सीमित रहा और कुछ व्यापार चीन, श्रीलंका और ईरान से भी होने दिया। स्वेज नहर का व्यापार मार्ग खुलने से तो भारत के व्यापार पर अंग्रेजी नियन्त्रण और भी सख्त हो गया।

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प्रश्न 9.
औपनिवेशिक काल में भारतीय सम्पत्ति के निष्कासन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत के विदेशी व्यापार पर ब्रिटिश शासन का एकाधिकार सा उत्पन्न हो गया था। भारत के विदेशी व्यापार में निर्यात अधिशेष होने के बावजूद भी इसका लाभ भारत को नहीं मिला। निर्यात अधिशेष के निष्कासन को अंग्रेजी सरकार ने बड़ी चालाकी से कानून, प्रशासन एवं युद्ध पर खर्च करके अपने हित में कर लिया। हमारे देश को निर्यात अधिशेष का कोई फायदा नहीं मिला बल्कि हमारी कई आवश्यक वस्तुओं का अभाव पैदा हो गया। संक्षेप में, अंग्रेज प्रशासन ने आयात व्यय, युद्ध व्यय, पुलिस-प्रशासन व्यय आदि के निमित्त भारतीय संमत्ति का निष्कासन किया।

प्रश्न 10.
जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष कौन-सा माना जाता है।
उत्तर:
1921 वर्ष जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम से द्वितीय सोपान की ओर संक्रमण का विभाजन वर्ष माना जाता है।

प्रश्न 11.
औपनिवेशिक काल में भारत की जनांकिकीय स्थिति का एक संख्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत की जनांकिकीय स्थितियों का एक संख्यात्मक चित्रण –

  1. 1921 वर्ष: भारत के जनसंख्या का अधिक विशाल न होना तथा उसकी संवृद्धि दर का बहुत अधिक न होना।
  2. साक्षरता दर: 16 प्रतिशत से कम (महिला साक्षरता दर केवल 7 प्रतिशत)।
  3. सकल मृत्यु दर: बहुत ऊँची विशेषकर शिशु मृत्युदर (लगभग 218 प्रति हजार)।
  4. जीवन प्रत्याशा स्तर: केवल 32 वर्ष (जो अब 63 वर्ष है)।

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प्रश्न 12.
स्वतंत्रता पूर्व भारत की जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ समझाइए।
उत्तर:
स्वतंत्रता पूर्व भारतीय जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ:
स्वतंत्रता पूर्व भारत में कृषि सबसे बड़ा व्यवसाय था जिसमें 70-75 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी। विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र में क्रमश: 10 प्रतिशत तथा 10-25 प्रतिशत जनता लगी थी।
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प्रश्न 13.
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष उपस्थित प्रमुख आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित करें।
उत्तर:
प्रमुख आर्थिक चुनौतियाँ (Main Economic Challenges):

1. स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष व्यवसायीकरण था। भूमि पर जनसंख्या का अधिक भार था। जोतों की उपविभाजन तथा विखण्डन की समस्या थी। अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई भू-राजस्व प्रणालियों के कारण सरकार तथा किसानों के बीच कई बिचौलिये (मध्यस्थ) हो गये। ये मध्यस्थ किसानों से बहुत अधिक लगान वसूल करने लगे। परिणामस्वरूप कृषि की उत्पादकता पर बुरा प्रभाव पड़ा। किसानों की ऋणग्रस्ता में वृद्धि हुई।

2. औद्योगिक क्षेत्रक (Industrial Sector):
औद्योगिक क्षेत्रक आधुनीकीकरण वैविध्य। (Diversity) क्षमता संवर्धन और सार्वजनिक निवेश में वृद्धि की माँग कर रहा था।

3. विदेशी व्यापार (Foreign Trade):
स्वतंत्रता के समय भारत का विदेशी व्यापार अधिकांश इंग्लैंड से होता था। यह व्यपार तो केवल इंग्लैंड की औद्योगिक क्रान्ति को पोषित कर रहा था। विदेशी शासन के दौरान भारत के विदेशी व्यापार का स्वरूप पूर्णरूप से औपनिवेशिक हो गया जिसके अनुसार मुख्य रूप से खाद्यान्न और कच्चे माल को निर्यात किया जाता था और उद्योगों में नियमित उपभोक्ता वस्तुओं को आयात किया जाता था।

4. आधारिक संरचनाएँ (Infrastractures):
आधारित संरचनाएँ पिछड़ी हुई थीं। उपनिवेशिक शासन के अन्तर्गत देश में रेलों, पत्तनों जल परिवहन व डाक-तार आदि का विकास हुआ किन्तु इनका विकास संतोषजनक नहीं हुआ। उस समय के आन्तरिक जलमार्ग अलाभकारी सिद्ध हुए। डाक सेवाएँ अवश्यक जन सामान्य को सुविधाएँ प्रदान कर रही थीं किन्तु वे बहुत ही अपर्याप्त थी। स्वतंत्रता के समय प्रसिद्ध रेलवे नेटवर्क सहित सभी आधारिक संरचनाओं में उन्नयन प्रसार तथा जनोन्मुखी विकास की आवश्यकता थी।

5. गरीबी तथा बेरोजगारी (Poverty and Unemployment):
स्वतंत्रता के समय भारत में बेरोजगारी व्यापक रूप से प्रचलित थी। बेरोजगारी के साथ-साथ भारत के सामने गरीबी की चुनौती थी। व्यापक गरीबी और बेरोजगारी सार्वजनिक आर्थिक नीतियों को कल्याणोन्मुखी बनाने पर आग्रह कर रही थी।

6. निष्कर्ष (Conclusion):
संक्षेप में हम वह सकते हैं कि स्वतंत्रता के समय देश में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बहुत अधिक थीं।

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प्रश्न 14.
भारत में प्रथम सरकारी जनगणना किस वर्ष में हुई थी?
उत्तर:
भारत में प्रथम सरकारी जनगणना, 1881 में हुई थे।

प्रश्न 15.
स्वतन्त्रता के समय भारत के विदेशी व्यापार के परिणाम और दिशा की जानकारी दें।
उत्तर:
विदेशी व्यापार की संरचना (Composition of Foreign Trade):
विदेशी व्यापार की संरचना से अभिप्राय आयात और निर्यात की जाने वाली मों से है। दूसरे शब्दों में विदेशी व्यापार की संरचना से हम इस बात का अध्ययन करते हैं कि एक देश किन-किन वस्तुओं का आयात तथा निर्यात करता है।

प्राचीन काल से ही भारत एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक देश रहा है, किन्तु औपनिवेशिक सरकार द्वारा अपनाई गई वस्तु उत्पादन, व्यापार और सीमा शुल्क और प्रतिबन्ध नीतियों का भारत के विदेशी व्यापार की संरचना पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप भारत कच्चे उत्पादन जैसे रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील और पटसन आदि का निर्यातक रह गया है और वह सूती रेशमी ऊनी वस्तुओं जैसी अन्तिम उपभोक्ता वस्तुओं और हल्की मशीने का आयात करने लगा।

विदेशी व्यापार की दिशा (Direction of Foreign Trade):
विदेशी व्यापार की दिशा का अर्थ है कि एक देश किन-किन देशों से वस्तुओं का आयात करता है और किन-किन देशों को वस्तुओं का निर्यात करता है। स्वतंत्रता के समय भारत का व्यापार केवल इंगलैंड तक सीमित रहा। शेष कुछ व्यापार चीन, श्रीलंका और ईरान से भी होने दिया जाता था। स्वेज नहर का व्यापार मार्ग खुलने से तो व्यापार पर अंग्रेजी नियंत्रण और भी सख्त हो गया।

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प्रश्न 16.
क्या अंग्रेजों ने भारत में कुछ सकारात्मक योगदान भी दिया था? विवेचना करें।
उत्तर:
अंग्रेजी साम्राज्य का सकारात्मक योगदान (Constructive Contribution of the British Rule):
भारत में ब्रिटेश अपनी विनाशक भूमिका के लिये याद किए जाते हैं। स्वार्थों ने अंग्रेजों को अन्धा बना दिया था और वे भारत के हितों को सदा ही ताक पर रखकर बैठे रहे किन्तु, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजों का भारत में राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक उत्थान में बहुत योगदान है। प्रसिद्ध विचारात्मक और चिन्तक कार्ल मार्क्स भारत में ब्रिटिश शासन के इतिहास को अचेतक साधन मानते हैं। ब्रिटिश शासन ने भारत को निम्न प्रकार से योगदान दिया है –

  1. देश की राजनीतिक और आर्थिक एकता ब्रिटिश शासन की देन है।
  2. विदेशी पूँजी के प्रयोग से देश में औद्योगिक विकास हुआ। रेलवे की स्थापना से आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य की नींव पड़ी।
  3. विदेशी पूँजी से भारत में औद्योगिक पूँजीवाद का जन्म हुआ जो अनेक रूपों में भारत के लिए वरदान सिद्ध हुआ है।
  4. विदेशी पूँजी से भारत में आधुनिक बैंकिंग बीमा तथा वित्तीय एवं व्यापारिक प्रणाली का सूत्रपात हुआ।
  5. विदेशी पूँजी के कदमों का अनुकरण करते हुए भारतीय पूँजीपति भी निवेश क्रियाओं में रुचि लेने लगे जो कि भावी विकास का प्रमुख उपकरण सिद्ध हुआ।
  6. नये उद्योगों और नई तरह की आर्थिक क्रियाओं को बढ़ावा देने से ब्रिटिश पूँजी तथा प्रबन्ध अभिकर्ता ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  7. ब्रिटिश शासन के फलस्वरूप भारत में जाति का बन्धन टूटने लगा।
  8. डाक व्यवस्था में पर्याप्त सुधार से सारे देश में एक निश्चित दर पर पत्र-व्यवहार करना सम्भव हो गया।
  9. डाक-तार के विकास के जरिए व्यापारी तथा लोगों के आपसी सम्बन्धों को बढ़ावा मिला।
  10. शिक्षा के प्रसार से भारतवासियों में विकास और स्वतंत्रता की चेतना जागी।

Bihar Board Class 11th Economics स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पूँजीगत वस्तु उद्योगों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पूँजीगत वस्तु उद्योगों से अभिप्राय उन उद्योगों से है जो वर्तमान उपभोग में वस्तुओं के निर्माण के लिये मशीनों तथा औजारों का उत्पादन करते हैं।

प्रश्न 2.
कृषि के व्यवसायीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि के व्यवसायीकरण से अभिप्राय बाजार में बिक्री के लिए फसलों का उत्पादन करना है।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में कितने प्रकार की भू-राजस्व प्रणालियाँ प्रचलित थीं? उनके नाम लिखें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत में तीन प्रकार की भू-राजस्व प्रणालियाँ प्रचलित थीं –

  1. जमींदारी प्रथा
  2. महालवाड़ी प्रथा तथा
  3. रैयतवाड़ी प्रथा

प्रश्न 4.
स्वतंत्रता के समय भारत के विदेशी व्यापार की मात्रा तथा दिशा लिखें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत का कुल विदेशी व्यापार 782 करोड़ रुपये का था। भारत का अधिकतर व्यापार इंगलैंड और राष्ट्रमंडल देशों से होता था।

प्रश्न 5.
देश के विभाजन से भारत के पटसन वस्तु उद्योग पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
देश के विभाजन से कच्चे माल की कमी के कारण भारत के पीटसन वस्तु उद्योग पर बुरा बहुत प्रभाव पड़ा। इसका मुख्य कारण पटसन उत्पन्न करने वाला क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) का बन गया था।

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प्रश्न 6.
औपनिवेशिक अवधि के दौरान भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषता क्या थी।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल के दौरान भारत के विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषता निर्यात आधिक्य का अर्जन करना था।

प्रश्न 7.
व्यावसायिक संरचना (ढाँचे) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यावसायिक से अभिप्राय किसी देश की श्रम शक्ति शक्ति का विभिन्न उद्योगों तथा। क्षेत्रों में वितरण करना है। क्षेत्रों को हम मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित करते हैं –

  1. कृषि
  2. उद्योग
  3. सेवाएँ

प्रश्न 8.
ब्रिटिश भारत की व्यावसायिक संरचना की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. कार्यशील जनसंख्या का 70%-75% भाग कृषि में काम करता था।
  2. विनिर्माण क्षेत्र में कर्मचारियों का अनुपात केवल 10% था।

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प्रश्न 9.
भारत में रेलवे का आरंभ कब हुआ?
उत्तर:
भारत में रेलवे का आरम्भ 1850 ई० में हुआ। प्रथम रेलगाड़ी 1853 ई० में चली।

प्रश्न 10.
1921 से पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की कौन-सी अवस्था में था?
उत्तर:
1921 से पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की पहली अवस्था में था।

प्रश्न 11.
ब्रिटिश का में भारत की जनांकिकीय संक्रमण की मुख्य विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
1921 से पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की पहली अवस्था में था। जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनों ही ऊँची थी। जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या में संतुलन बना हुआ था परंतु 1921 के पश्चात् भारत ने जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में प्रवश किया।

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प्रश्न 12.
1921 के पश्चात् भारत के जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में क्यों प्रवेश किया।
उत्तर:
क्योंकि 1921 के पश्चात् देश में आधारभूत सुविधाओं के प्राप्त होने तथा नये विचारों के विकसित होने से देश में मृत्यु दर में कमी आने लगी, परंतु जन्म दर में कोई कमी नहीं आई। ऐसी अवस्था में जनंसख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी।

प्रश्न 13.
ब्रिटिश काल में कृषि में निम्न उत्पादकता के क्या कारण थे?
उत्तर:
ब्रिटिश काल में कृषि में निम्न उत्पादन के मुख्य कारण पिछड़ी तकनीकी का प्रयोग, पर्याप्त वित्त का आवाज,दोषपूर्ण काश्तकारी प्रथा, सिंचाई सुविधाओं का अभाव, खाद नगण्य प्रयोग आदि थे।

प्रश्न 14.
विभाजन का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
विभाजन के फलस्वरूप अधिक सिंचित तथा उपजाऊ भूमि का बहुत बड़ा भाग पाकिस्तान में चला गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत के कृषि उत्पादन को बहुत बड़ा धक्का लगा।

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प्रश्न 15.
आधारिक संरचना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आधारिक संरचना से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा सेवाओं से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं। आधारिक संरचनाओं द्वारा स्वयं वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन नहीं किया जाता, अपितु उनके द्वारा वस्तुओं के उत्पादन के प्रवाह को बनाया जाता है।

प्रश्न 16.
भारत को स्वतंत्रता कब प्राप्त हुई?
उत्तर:
भारत को स्वतंत्रता 15 अगस्त, 1947 ई० को प्राप्त हुई।

प्रश्न 17.
प्राचीन भारत में अधिकांश लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था?
उत्तर:
प्राचीन भारत में अधिकांश लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।

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प्रश्न 18.
प्राचीन भारत में सरकार की आय का मुख्य स्रोत क्या था?
उत्तर:
प्राचीन भारत में सरकार की आय का मुख्य स्रोत कृषि था।

प्रश्न 19.
औपनिवेशिक काल की आय की गणना करने वाले कुछ विद्वानों के नाम लिखें।
उत्तर:
दादाभाई नौरोजी, विलियिम डिगबोई, वी० के० आर० वी० राव०, आर० सी० देसाई आदि।

प्रश्न 20.
ब्रिटिश राज्य में भारत की कितने प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई थी?
उत्तर:
ब्रिटिश काल में भारत की लगभग 85% जनसंख्या कृषि कार्य में लगी हुई थी।

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प्रश्न 21.
ब्रिटिश काल में भारत में कृषिक्षेत्र गतिहीन क्यों था? कोई तीन कारण लिखें।
उत्तर:

  1. दोषपूर्ण भू-प्रणालियाँ (इसमें एक जमींदारी प्रणाली थी)
  2. तकनीकी का निम्न स्तर
  3. सिंचाई सुविधाओं का अभाव

प्रश्न 22.
18 वीं शताब्दी के मध्य में भारतीय कृषि की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  1. भारत की कुल जनसंख्या का 85% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ था।
  2. कृषि के उत्पादन में पुरान ढंग अपनाये जाते थे।

प्रश्न 23.
18 वीं शताब्दी के मध्य में भारत के तीन प्रमुख उद्योग कोन से थे?
उत्तर:

  1. वस्त्र उद्योग
  2. चीनी उद्योग
  3. लोहा इस्पात उद्योग

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प्रश्न 24.
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में हस्तशिल्प उद्योगों के पतन के कोई दो दुष्परिणाम लिखें।
उत्तर:

  1. बड़े पैमाने पर बेरोजगारी में वृद्धि हुई।
  2. भारतीय उपभोक्ता बाजार में ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओ की माँग में वृद्धि हुई।

प्रश्न 25.
भारत की प्रथम लोहा और इस्पात कंपनी का क्या नाम था? इसकी स्थापना कब की गई?
उत्तर:
भारत की प्रथम लोहा और इस्पात कंपनी का नाम टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी (TISCO) था। इसकी स्थापना अगस्त 1907 में की गई।

प्रश्न 26.
टैरिफ किन कारणों से लगाया जा सकता है।
उत्तर:
निम्न कारणों से टैरिफ लगाया जा सकता है –

  1. सरकारी आय में वृद्धि लाने के लिये।
  2. भुगतान शेष के घाटे को कम करने के लिये।
  3. घरेलू रोजगार को बढ़ाने के लिये या कम लागत वाली आयात वस्तुओं से घरेलू उद्योग को बचाने के लिये।

प्रश्न 27.
अदृश्य मदों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अदृश्य मदों से अभिप्राय वे मदें, जो दिखाई नहीं देती। इन्हें चालू खाते में दिखाया जाता है। परिवहन, बैकिंग, बीमा तकनीकी, सेवाएँ आदि।

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प्रश्न 28.
उपभोक्ता वस्तुओं तथा पूंजीगत वस्तुओं में किन-किन वस्तुओं को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
उपभोक्ता वस्तुओं में मुख्यतया खाद्य पदार्थों को शामिल किया जाता है जबकि पूँजीगत वस्तुओं में भारी मशीनों आधारभूत वस्तुओं तथा सुरक्षा उपकरणों को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 29.
टैरिफ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आयात वस्तुओं पर लगाये जाने वाले कर शुल्क को टैरिफ कहते हैं। यह कर भौतिक . इकाइयों (प्रतिटन) या कीमत के आधार पर लगाया जाता है।

प्रश्न 30.
भौतिक इकाई के आधार पर कर लगाने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भौतिक इकाई के आधार पर कर लगाने से अभिप्राय वस्तु के वजन के हिसाब से कर लगाना है। भारी वस्तु पर अधिक कर लगेगा और हल्की वस्तु पर कम। मान लें आयात की गई वस्तु पर कर की दर 100 रुपये क्विंटल है। यदि आयात की गई वस्तु का वजन दो क्विंटल है तो उस पर 200 रु. टैरिफ लगेगा और 4 क्विंटल पर 400 रुपये वस्तु के मूल्य से इसका कोई संबंध नहीं है।

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प्रश्न 31.
वस्तु की कीमत के आधार पर कर लगाने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वस्तु की कीमत के आधार पर कर लगाने कर लगाने के लिये आयात की गई वस्तु की कीमत को आधार बनाया जायेगा। मान लो कर 3 रुपये प्रति हजार है आयात की गई वस्तु की कीमत 30,000 रुपये है ऐसी अवस्था में वस्तु 90 रुपये टैरिफ लगेगा।

प्रश्न 32.
जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था की विशेषताएं लिखें।
उत्तर:
जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था में जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनो ही ऊँची होती हैं। अत: जनसंख्या वृद्धि की दर कम होती है।

प्रश्न 33.
स्वतंत्रता के समय हमारी अर्थव्यवस्था में कौन-कौन से उद्योग थे?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित उद्योग थे –

  1. सूती कपड़ा उद्योग
  2. पटसन उद्योग
  3. लोहा तथा इस्पात उद्योग
  4. कागज उद्योग

प्रश्न 34.
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यस्था की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था उपनिवेशवादी अर्थव्यवस्था तथा-विक्षत अर्थव्यवस्था थी।

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प्रश्न 35.
1921 ई० से पूर्व भारत में मृत्यु दर ऊँची क्यों थी?
उत्तर:
1921 ई० से पूर्व भारत में मृत्यु दर ऊँची होने के कई कारण थे। जैसे-बीमारियों की रोकथाम करने तथा उनके इलाज का ज्ञान होना खाने-पीने की कमी, सफाई व्यवस्था का उत्तम न होना। प्रभावशाली स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव आदि।

प्रश्न 36.
कुछ खाद्य फसलों के नाम लिखें।
उत्तर:
गेहूँ, ज्वार, बाजरा, चुना आदि।

प्रश्न 37.
कुछ नकदी फसलों के नाम लिखें।
उत्तर:
चाय, काफी आदि।

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प्रश्न 38.
ब्रिटिश भारत में जीवन प्रत्याशा कितनी थी और अब कितनी हैं?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत में जीवन प्रयाश 32 वर्ष थी जबकि अब यह 63 वर्ष है।

प्रश्न 39.
ब्रिटिश भारत में शिशु मृत्यु दर कितनी थी और अब कितनी है?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत में शिशु मृत्यु दर 218 प्रति हजार थी। अब यह 63 प्रति हजार है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निर्यात के आधिक्य पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
निर्यात का आधिक्य (Large export surplus):
ब्रिटिश काल में भारतीय विदेशी व्यापार की मुख्य विशेषता निर्यात का आधिक्य था। निर्यात आधिक्य से अभिप्राय भारत का आयातित निर्यात आयात से अधिक होना। परन्तु इस आधिक्य का भारतीय अर्थव्यवस्था का बुरा प्रभाव पड़ा। इससे घरेलू बाजार में कई आवश्यक वस्तुओं की बहुत कमी हो गई। इसके अतिरिक्त इस आधिक्य के परिणामस्वरूप भारत में सोने या चाँदी का कोई प्रभाव नहीं हुआ। निर्यात आधिक्य का प्रयोग निम्नलिखित खर्चों पर किया गया।

  1. अंग्रेजों द्वारा भारत, अफ्रीका आदि स्थानों पर भेजी गई सेना पर खर्च।
  2. भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा विभिन्न युद्धों में किये गये खर्चे।
  3. भारत द्वारा विदेशों से लिये गये ऋणों पर ब्याज, पेंशन अवकाश भत्ता, सामान की खरीद पर किये गये खर्चे।
  4. इंग्लैण्ड में स्थित भारतीय कार्यालय का व्यय।
  5. विदेशी जहाजरानी, विदेशी विनिमय बैंक और विदेशी कंपनियों को किया जाने वाला भुगतान।

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प्रश्न 2.
जमींदारी प्रथा पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
जमींदारी प्रथा (ZamindariSystem):
भारत में भू-राजस्व की इस प्रणाली का आरंभ लार्ड कार्नवालिस ने बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (Permanent settlement) के अंतर्गत किया, इसके अनुसार कुछ किसानों को भूमि का स्वामित्व दे दिया गया जो वास्तव में पहले मालजुगारी एकत्रित करने वाले सरकारी कर्मचारी थे। इन नये भू-स्वामियों ने अधिकांश भूमि पट्टे पर दे दी जिससे वे मनचाहा लगान प्राप्त करते थे।

ये जमींदार सरकार तथा काश्तकारों के बीच मध्यस्त थे। जमींदार सरकार को स्थायी रूप से निर्धारित लगान की निश्चित राशि देते थे। जमींदार के रुचि काश्तकरों से अधिक से अधिक लगान ऐठने तक ही सीमित थी। वे भूमि के विकास में रुचि नहीं लेते थे। इधर काश्तकार भूमि से किसी भी समय बेदखल किये जाने के डर से भूमि सुधार में कम रुचि लेते थे। फलस्वरूप कृषि की उत्पादकता कम होती गई।

प्रश्न 3.
ब्रिटिश प्रशासन के खर्चों पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
ब्रिटिश प्रशासन के खर्चे (Cost of British Administration):
ब्रिटिश प्रशासन के खर्चों से अभिप्राय उन खर्गों से है जिनका वहन भारत को करना पड़ा। इन खर्चों की पूर्ति भारत में ही आय जुटाकर की जाती थी। ये खर्चे निम्नलिखित थे –

  1. भारत द्वारा विदेशों से लिये गये ऋणों पर ब्याज, पेंशन सामान पर किये गये व्यय।
  2. ब्रिटिश शासन अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए युद्ध करता था। इन खर्चों का वहन भी भारत को करना पड़ा। मैसूर युद्ध, मराठा युद्ध, अफगान और बर्मा की लड़ाइयाँ आदि युद्धों और लड़ाई में किये गये खर्च का बोझ भारत पर ही थोपा गया।
  3. इंगलैण्ड से भारत के बीच जो टेलीग्राम लाइनें बिछाई गईं, उन सबका खर्चा भारत के नाम लिख दिया गया।
  4. अदृश्य वस्तुओं के भुगतान का खर्च आदि।

प्रश्न 4.
कृषि के वाणिज्यीकरण पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialisation of Agriculture):
कृषि के वाणिज्यीकरण से अभिप्राय यह है कि व्यापारिक फसलों का अधिक बोया जाना। व्यापारिक फसलों के अंतर्गत कपास, जूट, गन्ना, रोपण फसलें, तिहलन आदि फसलें आती हैं। ब्रिटिश शासन में कृषि का वाणिज्यीकरण एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। इस परिवर्तन के कारण खाद्यान्नों और स्वयं उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन के स्थान पर व्यापारिक फसलों का उत्पादन अधिक हो गया।

इसका मुख्य कारण ब्रिटेन के उद्योगों के लिये कच्चे माल की पूर्ति को बढ़ाना था। साथ ही बढ़ती हुई लगान की राशि के लिये किसान पहले की अपेक्षा अधिक व्यापारिक फसलों का उत्पादन करने लगे क्योंकि इन फसलों का मूल्य खाद्यान्नों की अपेक्षा ऊँचा होता था। वाणिज्यीकरण के कारण खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी आई। अकाल की भयंकरता बढ़ गई।

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प्रश्न 5.
अंग्रेजों के मन में भारत के रेल विकास के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
भारत में रेल विकास के प्रमुख उद्देश्य (Main objectives for developing Railways):
भारत की पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल, 1853 में चली। इसने कुल 34 किलोमीटर की दूरी तय की थी। अंग्रेजों ने भारत में रेल का विकास निम्नलिखित उद्देश्यों से किया –

1. प्रशासनिक उद्देश्य (Administrative objectives):
अंग्रेजों ने विशाल भारतीय क्षेत्र पर कड़ा नियंत्रण रखने के लिए प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से रेलवे के विस्तृत जाल का निर्माण किया।

2. व्यापारिक उद्देश्य:
रेलवे के विकास का पहला उद्देश्य इंगलैंड के कारखानों के लिये आवश्यक कच्चे माल को देश के भीतरी भागों से लेकर बंदरगाहों तक पहुँचाना था। दूसरा यापारिक उद्देश्य इंग्लैण्ड के कारखानों में उत्पादित तैयार माल को देश के विभिन्न भागों में हुँचाना था।

3. लाभकारी निवेश संबंधी उद्देश्य (Objective of Profitable investment):
रेलवे के विकास का उद्देश्य अंग्रेजों के धन का लाभकारी निवेश था। रेल विकास में इंग्लैण्ड के पूंजीपतियों ने भारी राशि का निवेश किया और लाभ कमाये।

प्रश्न 6.
ब्रिटिश सरकार ने भारत में 1850 में रेल यातायात आरंभ किया था। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
रेलवे का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (Impact of Railway on Indian Economy):
रेलवे से भारतीय अर्थव्यवस्था कई तरह से प्रभावित हुई। इनका वर्णन नीचे किया जा रहा है –

  1. रेलवे के शुरू होने से भारतीय लोग लंबी दूरी तक यात्रा करने के योग्य बन गये।
  2. इससे भौगोलिक तथा सांस्कृतिक बाधाएँ समाप्त हो गई।
  3. रेलवे ने कृषि का व्यवसायीकरण किया।
  4. इसने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता को समाप्त किया।
  5. भारत में विदेशी व्यापार का बहुत ही अधिक विस्तार हुआ।

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प्रश्न 7.
भारत के आर्थिक निष्कासन से क्या अभिप्राय है? उन सभी साधनों की समीक्षा कीजिए, जिनसे भारत का आर्थिक निष्कासन संभव हो पाया?
उत्तर:
आर्थिक निष्कासन का अर्थ (Meaning of drain of Indian wealth):
भारतीय आर्थिक निष्कासन से अभिप्राय भारतीय अर्थव्यवस्था का नियमित ढंग से शोषण करना (exploitation) और उपहारस्वरूप भारी मात्रा में भारत की सम्पत्ति को अपने देश में भेजना। दूसरे शब्दों में ब्याज, रायल्टी विदेश व्यापार का अधिकांश लाभ आदि के रूप में भारत के वित्तीय साधनों के निष्कासन से है। भारतीय आर्थिक निष्कासन की विधियाँ (Methods of drains of Indian wealth) भारतीय आर्थिक निष्कासन निम्नलिखित विधियों में से किया गया –

  1. अंग्रेज कर्मचारियों की आवश्यकता पूर्ति के लिये विदेशों से खरीदी गई वस्तुओं के भुगतान के रूप में प्रेषण।
  2. इंगलैण्ड में रखे गये भारत के सार्वजनिक साख के ब्याज के रूप में आने वाले व्यय का प्रेषण।
  3. ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों द्वारा भारत में की गई बचतों का इंगलैण्ड में निवेश के लिए प्रेषण क्योंकि ये कर्मचारी अपनी पूँजी अपने ही देश में प्रयोग करना अधिक बेहतर समझते थे।
  4. यूरोपीय कर्मचारियों द्वारा इंगलैण्ड स्थित अपने परिवारों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मुद्रा का प्रेषण।
  5. अंग्रेजों द्वारा भारत अफ्रीका आदि स्थानों पर भेजी गई सेना का खर्च को करना पड़ा।

प्रश्न 8.
कृषि के वाणिज्यीकरण के प्रभाव लिखें।
उत्तर:
वाणिज्यीकरण के प्रभाव (Effect of Commercialisation):
कृषि के वाणिज्यीकरण के फलस्वरूप खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी आई जिसके फलस्वरूप प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की उपलब्धता में कमी हो गई।

  1. ब्रिटिश उद्योगों को कच्चा माल मिलने लगा।
  2. अकाल की भयंकरता बढ़ गई।
  3. अकाल के समय विदेशों पर खाद्यान्नों की निर्भरता बढ़ गई।
  4. भारत के घरेलू उद्योगों पर द्यातक प्रभाव पड़ा।

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प्रश्न 9.
स्वतंत्रता पूर्व भारत के विदेशी व्यापार की क्या दशा थी?
उत्तर:
1. विदेशी व्यापार की दशा (Direction of foreign trade):
स्वतंत्रता पूर्व भारत का अधिकतर व्यापार इंगलैण्ड तथा राष्ट्रमण्डल के देशों के साथ होता था। कुल निर्यात का 34% तथा कुल आयात का 31% व्यापार इंगलैण्ड के साथ होता था। इसके अतिरिक्त दूसरे ब्रिटिश उपनिवेशों जैसे बर्मा (म्यांमार) कनाडा श्रीलंका आदि से निर्यात व्यापार 21% और आयात 10% था।

2. विदेशी व्यापार की संरचना (Composition of Foreign trade):
स्वतंत्रता पूर्व भारत के विदेशी व्यापार में बहुत कम वस्तुएँ सम्मिलित थीं। भारत से कच्चे माल और कृषि वस्तुओं का निर्यात किया जाता था। भारत के निर्यातों में मुख्य स्थान सूती वस्त्र और कपास अनाज, जूट की वस्तुएं चाय और तिलहन का था।

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प्रश्न 10.
भारत के विभाजन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
भारत के विभाजन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (Efects of partition of Indian Economy):
भारत के विभाजन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा –

1. खाद्यान्न में कमी (Food shortage):
विभाजन के फलस्वरूप भारत में खाद्यान्न की। गंभीर कमी अनुभव की जाने लगी।

2. कच्चे माल की कमी (Shortage of raw materials):
विभाजन का दूसरा गंभीर प्रभाव कच्चे माल की पूर्ति पर पड़ा। विभाजन के बाद पाकिस्तान में वे क्षेत्र खोले गये जो कृषिजन्य पदार्थों की पूर्ति करते थे और इन पदार्थों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करने वाली अधिकांश मिलें भारत में स्थित थीं। अत: भारत को कच्चे माल की कमी अनुभव हुई। इस तरह से प्रभावित उद्योगों में पंटसन और सूती उद्योग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

3. संकुचित बाजार (Loss of Market):
विभाजन के परिणामस्वरूप भारत के कई उद्योगों के बाजार का अकार बहुत ही सीमित हो गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्वतंत्रता के समय अथवा कुछ समय बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की क्या स्थिति थी? संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति (Condition of the Indian Economy at the time of Independence):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था निम्न प्रकार की थी –

1. गतिहीन अर्थव्यवस्था (Stagnant Economy):
अंग्रेजों ने भारतीय अर्थव्यवस्था का गतिहीन अर्थव्यवस्था बना दिया था। गतिहीन अर्थव्यवस्था से अभिप्राय उस अर्थव्यवस्था से है जिसमें वृद्धि दर न के बराबर होती है। स्वतंत्रता से पूर्व 100 वर्ष की अवधि में प्रति व्यक्ति आय की औसत दर 0.5 प्रतिशत के लगभग थी। अर्थव्यवस्था की गतिहीनता के कारण भारत एक पिछड़ा हुआ निर्धन देश बनकर रह गया जबकि संसार के अधिकतर देशों ने बड़ी तीव्रता से प्रगति
की थी।

2. पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था (Backward Economy):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई थी। भारतीय अर्थव्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएँ इसके पिछड़ेपन को प्रकट करती हैं –

(क) स्वतंत्रता के समय भारत में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी। कृषि का सकल घरेलू में योगदान लगभग चालू कीमतों पर 54% थी।
(ख) स्वतंत्रता के समय मशीनरी तथा अन्य आवश्यक यंत्रों का आयात करता था।
(ग) स्वतंत्रता के समय भारत में उद्योगों का बहुत ही कम विकास हुआ था।
(घ) स्वतंत्रता के समय भारत में सीमेंट, चीनी, लोहा, इस्पात आदि कुछ ही गिने-चुने उद्योग थे।
(ङ) भारत में उस समय न के बराबर पूँजीगत वस्तु उद्योग थे।
(च) राष्ट्रीय आय में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान ही कम था।

3. औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था (Colonial Economy):
विभाजन के समय भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्णरूप से औपनिवेशिक थी। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होती है –

(क) 17 वीं और 18 वीं शताब्दी में भारत के निर्यात व्यापार में कपास जूट और चाय का हिस्सा 60% से अधिक था।
(ख) औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यूरोप के देशों में ओद्योगिक क्षमता का निर्माण हो चुका था और वे अपने बने माल को भारत तथा अन्य अपनिवेशों को भेजते थे।
(ग) विदेशी पूंजी का उपयोग कृषि और बागान (Plantation) उद्योगों में किया जाता था जिसका मुख्य कारण औद्योगिक देशों की कच्चे माल की मांग को पूरा करना था।

4. क्षीण अर्थव्यवस्था (Deplected Economy):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था क्षीण तथा खोखली थी। इंगलैंड और इसके भिन्न देशों की युद्ध संबंधी आवश्यकताओं पूर्ति के लिये भारतीय उद्योगों को निरंतर रूप से 24 घंटे कार्य करना पड़ा। सारे उत्पादन का निर्यात किया जाता और भारतीयों को प्रायः सामान्य जीवन की वस्तुओं से वंचित रहना पड़ता है।

5. विच्छेदित अर्थव्यवस्था (Amputed Economy):
स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था विच्छेदित हो गई थी। देश का विभाजन अनेक रूपों से काफी समय तक आर्थिक दृष्टि से देश के लिये घातक सिद्ध हुआ। विभाजन के घातक प्रभाव निम्नलिखित थे –

(क) भारत में स्थापित जूट (पटसन) मिलों को कच्चा माल (Raw Material) मिलान बंद हो गया क्योंकि विभाजन के फलस्वरूप पटसन के लिये कच्चा माल पैदा करने वाले इलाके पाकिस्तान में चले गये।
(ख) बम्बई तथा अहमदाबाद के कपड़ों की मिलों को कपास मिलना बंद हो गया।
(ग) देश खाद्यन्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं रहा।
(घ) सभी वस्तुओं के लिए बाजार सीमित हो गया।
(ङ) लाखों की संख्या में जनसंख्या के हस्तानान्तरण में अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई।

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प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यस्था की मुख्य विशेषताएँ (Main features of Indian Economy at the eve of independence)

1. कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था (Agriculatural Economy):
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान था। देश की जनसंख्या का लगभग 85% भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से. अपनी आजीविका कृषि से ही कमाता था।

देश की लगभग 72% श्रमशक्ति कृषि में लगी हुई थी। इतना होने पर भी भारत की कृषि पिछड़ेपन के कई कारण थे, जैसे जमींदारी प्रथा, वर्षा पर अधिक निर्भरता या सिंचाई सुविधाओं का अभाव, भूमि पर जनसंख्या का अधिक दबाव, कृषि करने के पुराने ढंग, खाद का नगण्य प्रयोग आदि। भारत के विभाजन ने कृषि व्यवसाय को एक और झटका दिया। अविभाज्य देश का सिंचित तथा उपजाऊ भाग पाकिस्तान में चला गया।

2. औद्योगिक क्षेत्र (Industrial Sector):
कृषि की ही तरह स्वतंत्रता के समय औद्योगिक क्षेत्र भी पिछड़ा हुआ था। ब्रिटिश भारत में के विश्व-प्रसिद्ध हस्तकला उद्योगों का पतन हुआ। अंग्रेजी सरकार ने ऐसी नीति अपनाई जिससे भारत में उद्योगों का विकास न हो सका। उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन में उद्योगों को विकसित करने के लिये भारत को केवल कच्ची वस्तुओं का निर्यातक बनाया तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुओं का उपभोक्ता बनाना था। भारत में देशी हस्तशिल्प उद्योगों के पतन से बेरोजगारी को बढ़ावा मिला।

19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में आधुनिक उद्योग शुरू हुए परन्तु वे बहुत ही धीमी गति से विकसित हुए। प्रारम्भ में सूती और पटसन मिलें स्थापित की गई। सूती कारखानों पर अधिकतर भारतीयों का स्वामित्व था और ये कारखाने भारत के पश्चिमी भागों (महाराष्ट्र तथा गुजरात) में स्थित थे। जूट के कारखानों पर अंग्रेजों का स्वामित्व था और वे बंगाल में केन्द्रित थे। 20 वीं शताब्दी के आरंम्भ में लोहा तथा इस्पात उद्योग शुरू हुआ।

प्रथम लोहा तथा इस्पात कंपनी (टाटा आयरन तथा स्टील कंपनी) अर्थात TISCO) की स्थापना जमशेदुर में हुई। इस कंपनी ने 1912 में उत्पादन करना शुरू कर दिया था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत का और अधिक औद्योगीकरण करने के लिये यहाँ पर पूंजीगत वस्तु उद्योग न बराबर थे। देश के अधिकतर उद्योग अपने पूँजीगत पदार्थों अर्थात् मशीनों के लिये इंग्लैण्ड पर निर्भर करते थे। औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर तथा इसका सकल घरेलू उत्पादन में योगदान बहुत ही कम था। अधिकांश उद्योग निजी स्वामित्व में थे। रेलवे, संचार तथा बंदरगाहों पर स्वामित्व सरकार का था।

3. विदेशी व्यापर (Foreign Trade):
स्वतंत्रता के समय भारत के कच्चे माल और कृषि पदार्थों का निर्यात करता था। भारत के निर्यातों में मुख्य स्थान कपास, चीनी, नील, पटसन आदि का था। भारत, इंग्लैंड तथा अन्य देशे से अधिकतर उपभोग की तैयार वस्तुएँ, मशीन आदि मंगवाता था। भारत का अधिकतर इंगलैंड तथा राष्ट्रमण्डल देशों से होता था।

4. आर्थिक संरचना का अल्प विकास (Less development of economic infrastructure):
स्वतंत्रता के समय भारत में आर्थिक संरचना जैसे यातायात, बिजली, संचार, बैंकिंग आदि का कम विकास हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने 1850 ई० में रेलवे की शुरुआत की थी। रेलवे ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कई प्रकार से प्रभावित किया। रेलवे के अतिरिक्त ब्रिटिश शासन ने सड़क परिवहन का भी विकास किया। सड़क और रेलवे परिवहन के विकास के साथ-साथ आंतरिक जल यातायात तटीय जल यातयात तथा सामुद्रिक यातायात को विकसित करने का प्रयत्न किया गया। परन्तु इनका विकास संतोषजनक नहीं था।

5. जनांकिकीय दशा (Demographic condition):
जनांकिकीय संक्रमण की तीन अवस्थाएँ होती हैं-प्रथम अवस्था, द्वितीय अवस्था तथा तृतीय अवस्था। 1921 के पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था में था। इस अवस्था में अंधविश्वास तथा चिकित्सा की सुविधाएँ न होने के कारण मृत्यु दर ऊँची होती है। मृत्यु दर के ऊँचा होने के साथ-साथ जन्म दर भी ऊँची होती है। अतः जनसंख्या में वृद्धि दर बहुत ही कम होती है। 1921 के पश्चात् भारत ने जनांकिकीय संक्रमण की दूसरी अवस्था में प्रवेश किया। ऊँची जन्म दर तथा कम मृत्यु दर के कारण भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। स्वतंत्रता के समय भारत की जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी।

6. व्यावसायिक संरचना (Occupational structure):
व्यावसायिक संरचना का अभिप्राय है अर्थव्यवस्था में कार्यशील जनसंख्या का विभिन्न व्यवसायों में वितरण। साधारणतया इसका अध्ययन किसी अर्थव्यवस्था के विभिन्न व्यवसायों अथवा विभिन्न क्षेत्रों में कार्यशील कुल श्रम-शक्ति के प्रतिशत के रूप में किया जाता है –

  1. प्राथमिक क्षेत्र के व्यवसाय
  2. द्वितीयक क्षेत्र के व्यवसाय, तथा
  3. तृतीयक क्षेत्र के व्यवसाय। औपनिवेशिक काल में भारत की व्यावसायिक संरचना में नगण्य परिवर्तन हुए। स्वतंत्रता के समय 70-75% कार्यशल जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्र में लगी हुई थी। 10% तथा 15-20% कार्यशील जनसंख्या क्रमशः द्वितीयक क्षेत्र तथा तृतीयक क्षेत्र में लगी हुई थी।

अतिरिक्त गतिविधियाँ (Suggested Additional Activities)

प्रश्न 1.
अपने शिक्षक के सहयोग से इस विषय पर परिचर्चा करें-क्या भारत में जमींदारी प्रथा का सचमुच उन्मूलन हो गया है? यदि आपका सामान्य मत नकारात्मक है, तो आपके विचार से इसे समाप्त करने के लिए क्या कदम उठाया जाना चाहिए और क्यों?
उत्तर:
छात्र कक्षा मे जमींदारी प्रथा के आरम्भ एवं दुष्परिणाम आदि पर वहस करेंगे तथा तथ्यों आँकड़ों से यह सिद्ध करेंगे कि जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के लिये सरकार द्वारा किये गये प्रयत्न पूर्ण रूप से सफल नहीं हुए हैं। अब भी भारत के अधिकांश भागों में जमींदारी प्रथा प्रचलन में है। इसके बाद छात्र सुझाव देंगे कि किस प्रकार जमींदारी प्रथा का पूर्ण रूप से उन्मूलन किया जा सकता है – जैसे कानून ऐसे बनाये जायें जिनकी अवमानना संभव न हो। कानूनों को सख्ती से लागू किया जाये। वह कार्य अनुभवी योग्य, ईमानदार तथा निष्ठावान सरकारी अधिकारियों को सौंपा जाना चाहिए। राजनैतिक नेताओं का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

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प्रश्न 2.
स्वतंत्रता के समय हमारे देश की जनता अपनी आजीविका के लिए क्या-क्या कार्य करती थी? आज जनता के मुख्य व्यवसाय क्या हैं? देश में चल रहे आर्थिक सुधारों को ध्यान में रखकर आज से पंद्रह वर्ष 2020 में आप किस प्रकार के व्यावसायिक परिदृश्य की कल्पना करेंगे।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय हमारी अर्थव्यवस्था के लोगों का मुख्य व्यवसाय (Majar occupation followed by the people of our economy at the time of independence):

स्वतंत्रता के समय हमारे देश के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेतीवाड़ी (कृषि) था। राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक था। कृषि के उतार-चढ़ाव भारतीय अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से प्रभावित करते थे। भारत की जनसंख्या का लगभग 85% भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से अपनी आजीविका का अर्जन करते थे। वर्तमान समय में यद्यपि भारतीय लोगों का व्यावसाय कृषि है, परन्तु समय के साथ लोग कृषि कार्य को छोड़कर शहरों में नौकरी करने लगे हैं। आज से 15 वर्ष के बाद सन् 2020 तक परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा। भारत एक कृषि प्रधान देश नहीं रहेगा। वह अमेरिका की तरह एक विकसित राष्ट्र होगा और उसकी अर्थव्यवस्था वर्तमान अमेरिका के समान होगी। व्यावसायिक परिदृश्य में कम्प्यूटर तकनीक अपने चरम पर होगी तथा सुपर कम्प्यूटरों का युग प्रारम्भ हो गया होगा।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में लोगों की उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं की सूची बनाइए। उस सूची की आज के उपभोग स्वरूप से तुलना करें। इस प्रकार जन-सामान्य के जीवन स्तर में आए परिवर्तनों का आकलन करें।
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय ग्रामीण क्षेत्र में उपलब्ध होने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की सूची (List of goods and services available in rural sector at the time of Independence):
स्वतंत्रता के समय ग्रामीण क्षेत्र में निम्नलिखित वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपलब्ध थीं –

  1. कुओं से जल की आपूर्ति।
  2. खेतों से ताजी सब्जियाँ तथा फल।
  3. खाद्यान्न पदार्थ।
  4. पहनने के लिए मोटा कपड़ा।
  5. बैलगाड़ियाँ, घोड़े खच्चर द्वारा प्रदान की गई सेवाएँ।
  6. गाय, भैसों तथा बकरियों से दूध की प्राप्ति।
  7. चूसने के लिए गन्ना और खाने के लिए गुड़ की प्राप्ति।
  8. मनोरंजन के लिए कुश्ती या दंगल आदि।
  9. लोहार, बढ़ई, नाई आदि की सेवाएँ।
  10. दाइयों, हकीमों को सेवाएँ।
  11. रहने के लिए कच्चे मकान तथा झोपड़ियाँ।

स्वतंत्रता के समय शहरी क्षेत्र में उपलब्ध होने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं की सूची (List of goods and services available inurban sector in urban sector at the time of independence):

स्वतंत्रता के समय शहरी क्षेत्र में निम्नलिखित वस्तुएँ तथा सेवाएँ उपलब्ध थीं –

  1. रहने के लिए पक्के मकान।
  2. इलाज कराने के लिए अस्पताल तथा डॉक्टर।
  3. बड़े शहरों में विद्युत की सुविधाएँ।
  4. यातायात के साधन-टांगा, बसें रेलवे।
  5. जल-आपूर्ति (कुओं, नलकों से)।
  6. जल निकासी की सुविधाएँ।
  7. कई शहरों में पक्की सड़कें।
  8. वस्तुएँ खरीदने के लिये बाजार।
  9. शिक्षा प्राप्त करने के लिये स्कूल तथा कॉलेज।
  10. मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल।

जीवन स्तरों में तुलना (Comparison of Standard of living):
गाँवों की अपेक्षा शहरों में जीवन स्तर अच्छा था। गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिकतर लोग पिछड़े हुए अन्धविश्वासी शिक्षित आदि थे। वे अपने स्वास्थ्य के प्रति भी सचेत नहीं थे। गाँव वालों का मुख्य व्यवसाय कृषि था जो कि पिछड़ी हुई थी। भूमिहीन किसानों की हालत तो बहुत ही खराब थी। उन्हें दो समय का खाना भी नसीब नहीं होता था। साहूकार उनका शोषण करते थे। वे ऋणग्रस्त थे। कहा जाता है कि वे कर्जे में पैदा होते थे, कर्ज में रहते थे और कर्ज में ही मर जाते थे।

उनकी आय बहुत ही कम थी। गाँवों में प्रच्छन (छिपी हुई) बेरोजगारी थी। इसके विपरीत शहरों में लोग कारखानों कार्यालयों तथा दुकानों में काम करते थे। उनकी निश्चित आय/वेतन था। उनको समय का भोजन सरलता से मिल जाता था। वे शिक्षित भी थे। कुछ ऐसे लोग भी जो बहुत ही गरीब थे। वे मजदूरी करते थे रिक्शा चलाते थे, घरों में काम करते थे फेरी लगाते थे। स्टेशनों तथा बस अड्डों पर कली का काम करते थे। इनमें से अधिकांश वे लोग थे जो गाँवों से शहर में रोजगार की तलाश में आते थे। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शहर में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर गाँव में रहने वाले लोगों की अपेक्षा ऊँचा था।

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प्रश्न 4.
अपने आस-पास के गाँवों और शहरों के स्वतंत्रता पूर्व के चित्र संग्रहित करें। उन्हें आज के परिदृश्यों से मिला कर देखें। आप उसमें क्या परिवर्तन देखते हैं? क्या इनमें आए परिवर्तन सुखद हैं या दुखद? चर्चा करें।
उत्तर:
हमने अपने निकट के शहर की स्वतंत्रता से पूर्व तथा स्वतंत्रता के बाद की तस्वीरें तथा फोटोग्राफ एकत्रित किये। इन चित्रों से प्राप्त होने वाले परिदृश्य की वर्तमान परिदृश्य से तुलना करने पर हमें निम्नलिखित अन्तर दिखाई देते हैं –

  1. पहले शहर में पक्की सड़कें बहुत कम थीं पर अब सड़कों का जाल बिछा हुआ है।
  2. पहले उस शहर में केवल एक ही सरकारी विद्यालय था, जिसमें केवल दसवीं तक शिक्षा दी जाती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये विद्यार्थियों को दूसरे शहर में जाना पड़ता था। परन्तु इस शहर में कई सरकारी, मान्यताप्राप्त तथा पलिब्क स्कूल हैं जिसमें 12 वीं तक शिक्षा दी जाती है। इसके अतिरिक्त इस शहर में एक डिग्री कॉलेज भी हैं।
  3. पहले शहर में यातयात का साधन मुख्यतः साइकिल तथा बसें थीं। कार या स्कूटर मोटर साइकिल बहुत ही कम लोगों के पास थे। परन्तु अब स्कूटरों मोटरसाइकिलों तथा कारों की भरमार है।
  4. पहले शहर में केवल एक ही सरकारी अस्पताल था परन्तु अब कई सरकारी तथा गैरसरकारी अस्पताल हैं। डॉक्टरों तथा दवाइयों की दुकानों की भरमार है जबकि पहले उस शहर में इक्का-दुक्का डॉक्टर और दवाई की दुकान होती थी।
  5. पहले शहर में केवल एक ही मंदिर गुरुद्वारा तथा मस्जिद थे पर अब तो इनकी भरमार हो गई है।
  6. इस शहर में पहले होटल, चाय की दुकानें रेस्टोरेंट ढाबे कम मात्रा में पाये जाते थे, परन्तु अब इनकी भरमार है। अब तो इस शहर में एक पाँच सितार होटल भी है।
  7. पहले एक सिनेमाघर था, परन्तु अब सिनेमाघर हैं।
  8. पहल केवल एक बैंक था (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) परन्तु अब अनेकों बैंक हैं जहाँ हमेशा भीड़ लगी रहती हैं।
  9. पहले बच्चे पैदल या रिक्शा पर पढ़ने के लिये जाते थे परन्तु अब में प्रायः स्कूल की बसों में जाते हैं।
  10. पहले मकान एकमंजिला थे और आबादी कम थी परन्तु अब लगभग सभी मकान दो मंजिले हो गये हैं, अब आबादी भी बढ़ गई है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
TISCO का मतलब है –
(a) टाटा आयरन एण्ड स्टील कंम्पनी
(b) टाइटन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी
उत्तर:
(a) टाटा आयरन एण्ड स्टील कंम्पनी

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प्रश्न 2.
आर्थिक विकास के लिए कौन-सा कम महत्वपूर्ण है –
(a) उद्योग
(b) कृषि
उत्तर:
(b) कृषि

प्रश्न 3.
लोहा, इस्पात, चीनी और सीमेण्ट, कागज और वस्त्र उद्योग किस शताब्दी में शुरू होने लगे –
(a) अठारहवीं शताब्दी
(b) उन्नीसवीं शताब्दी
(c) बीसवीं शताब्दी
उत्तर:
(c) बीसवीं शताब्दी

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प्रश्न 4.
ब्रिटिश शासन काल में कितनी प्र. श. जनसंख्या भारत के गाँवों में रहती थी –
(a) 60 प्र. श.
(b) 70 प्र. श.
(c) 85 प्र. श.
उत्तर:
(c) 85 प्र. श.

प्रश्न 5.
भारत में प्रथम जनगणना किस वर्ष में हुई –
(a) 1881
(b) 1882
उत्तर:
(a) 1881

प्रश्न 6.
TARIFF का मतलब है –
(a) आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर
(b) निर्यातित वस्तुओं पर लगाया गया कर
उत्तर:
(a) आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर

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प्रश्न 7.
20 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कुल वास्तविक उत्पाद बढ़ोतरी दर थी –
(a) 2 प्र. श.
(b) 2 प्र. श. से कम
उत्तर:
(b) 2 प्र. श. से कम

प्रश्न 8.
20 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर थी –
(a) आधा प्र. श.
(b) एक प्र. श.
उत्तर:
(a) आधा प्र. श.

प्रश्न 9.
अंग्रेजी शासन में जीवन प्रत्याशा थी –
(a) 32 वर्ष
(b) 30 वर्ष
उत्तर:
(a) 32 वर्ष

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 1 स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रश्न 10.
वर्तमान जीवन प्रत्याशा है –
(a) 65 वर्ष
(b) 60 वर्ष
उत्तर:
(a) 65 वर्ष

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Bihar Board Class 11 Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है।
(क) 1990
(ख) 1998
(ग) 1885
(घ) 1950
उत्तर:
(ख) 1998

प्रश्न 2.
नीचे लिखे गए चार जलवायु के समूहों में से कौन-सा समूह आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता है।
(क) A-B-C-D
(ख) A-C-D-E
(ग) B-C-D-E
(घ) A-C-D-F
उत्तर:
(ख) A-C-D-E

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में किस प्रकार के क्षेत्र में कोपेन की H जलवायु पायी जाती है?
(क) उच्च अक्षांश
(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र
(ग) उच्च तापमान
(घ) अधिक वर्षा
उत्तर:
(ख) उच्च पर्वतीय क्षेत्र

प्रश्न 4.
कोपेन द्वारा जलवायु वर्गीकरण के क्या आधार हैं?
(क) तापमान एवं वृष्टि के मासिक मान
(ख) वृष्टि एवं वाष्पीकरण के मासिक मान
(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान
(घ) वाष्पोत्सर्जन के मासिक मान
उत्तर:
(ग) निरपेक्ष एवं सापेक्ष आर्द्रता के मासिक मान

प्रश्न 5.
कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अहंक हैं?
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(ख) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिन्द से अधिक
(ग) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस से नीचे
उत्तर:
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा

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प्रश्न 6.
जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है ………………
(क) अनुप्रयुक्त
(ख) व्यवस्थित
(ग) जननिक
(घ) आनुभविक
उत्तर:
(ख) व्यवस्थित

प्रश्न 7.
भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा
(क) “Af”
(ख) “BSh”
(ग) “Cfb”
(घ) “Am”
उत्तर:
(घ) “Am”

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तलना करें।
उत्तर:
A उष्णकटिबंधीय जलवायु-उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु मकर रेखा और कक रेखा के बीच माई जाती है। पूरा वर्ष सूर्य के उर्ध्वस्थ तथा अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसर कटिबंध की उपस्थिति के कारण यहाँ की जलवायु उष्ण एवं आर्द्र रहती है। यहाँ वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। जलवायु के इस उष्णकटिबंधीय समूह को तीन प्रकारों में बाँटा जाता है, जिनके नाम हैं –

  • Af उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवाय जो कि विषवत रेखा के निकट पाई जाती है।
  • Am उष्णकटिबंधीय जलवायु जो कि भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण अमेरिका के पूर्वी भाग तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में पायी जाती है।
  • Aw उष्णकटिबंधीय आई तथा शुष्क शीत ऋतु वाली जलवायु जो कि Af प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है।

समूह B शुष्क जलवायु (Dry Climates : B) – यह जलवायु इस ग्रह के बहुत बड़े भाग को ढके हुए है जो विषुवत् रेखा से 15° से 60° उत्तर व दक्षिणी अक्षांशो के बीच विस्तृत है। 15 से 30 के निम्न अक्षांशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है, जहाँ तापमान की गिरावट और उत्क्रमण वर्षा नहीं होने देते। महाद्वीपों के पश्चिमी सीमांतों पर, ठंडी धाराओं के आसन्न, विशेषत: दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर, यह जलवायु विषुवत् रेखा की ओर अधिक विस्तृत है और तटीय भूमि पर पायी जाती है।

मध्य अक्षांशों में विषुवत् रेखा से 35° और 600 उत्तर व दक्षिण के बीच यह जलवायु महाद्वीपों के उन आंतरिक भागों तक परिरुद्ध होतो है जहाँ पर्वतों से घिरे होने के कारण प्रायः समुद्री आई पवनें नहीं पहुंच पातीं। शुष्कं जलवायु को स्टेपी अथवा अर्ध – शुष्क जलवायु (BS) और मरुस्थल जलवायु (Bw) में विभाजित किया जाता है। इसे आगे 15° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण कटिबंधीय (BSh) और उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल (BWh) में बाँटा जाता है। 35° और 60° अक्षांशों के बीच इसे मध्य अक्षांशीय स्टैपी (BSK) तथा मध्य अक्षांशीय मरुस्थल (BWk) में विभाजित किया जाता है।

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प्रश्न 2.
C एवं A प्रकार की जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएंगे?
उत्तर:
C प्रकार की जलवायु में सदाबहार कोणधारी वन जैसे-पाईन, फर व स्पूस आदि तटीय मरुस्थल में न्यून वनस्पति। A प्रकार की जलवायु में असंख्य वृक्षों के झुण्ड लंबे व घने वृक्ष, कम घने मध्य ऊंचाई के वृक्ष, न्यून वनस्पति, घास, पेड़ व लंबी झाड़ियों की अनुपस्थिति, शैवाल व अन्य जलीय व समुद्रीय पादप समुदाय, पर्णपाती से लेकर टुण्डा प्रकार की वनस्पति।

प्रश्न 3.
ग्रीन हाउस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाउस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर:
वे गैसें जो विकिरण की लंबी तरंगों का अवशोषण करती हैं, हरित गृह गैसें कहलाती हैं। हरित गृह गैसों की उपस्थिति के कारण वायुमंडल एक हरित गृह की भाँति व्यवहार करता है। वायुमंडल प्रवेशी सौर विकिरण परिवेषण भी करता है लेकिन पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर उत्सर्जित होने वाली अधिकतम लंबी तरंगों को अवशोषित कर लेता है।

वर्तमान में चिंता का कारण बनी मुख्य हरित गृह गैसें कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), क्लोरोफ्लोकार्बन्स (CFCs) तथ हैलंस, मिथेन (CH4) नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और ओजोन (O) हैं। कुछ अन्य गैसें जैसे नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) आसानी से हरित गृह गैसों से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमण्डल में उनके सांद्रण को प्रभावित करती हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक घरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
अंग्रेजी के बड़े अक्षर A, C, D, तथा E आर्द्र जलवायु को तथा B अक्षर शुष्क जलवायु को निरूपित करता है।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभाविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जननिक वर्गीकरण (genetic classification) जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास है जबकि आनुमाविक प्रणाली (empirical classification) प्रेक्षित किए गए विशेष रूप से तपमान एवं वर्षण से संबंधित आंकड़ों पर आधारित होता है।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवाकुओं में तापांतर बहुत कम होता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय आई जलायु में वार्षिक तापांतर बहुत कम तथा वर्षा अधिक होती है। इस प्रकार की जलवायु मकर रेखा और कर्क रेखा के बीच पाई जाती है।

प्रश्न 4.
सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रभावित होंगी?
उत्तर:
कुछ मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार सौर कलंकों (Sun Spots) की संख्या बढ़ने पर मौसम ठंडा और आर्द्र हो जाता है और उसमें प्रचण्डता बढ़ जाती है।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
भूमंडलीय जलवायु परिवर्तनों से संबंधित ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ से संबंधित जानकारियाँ एकत्रित कीजिए।
उत्तर:
वायुमण्डल में हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास किए गए हैं। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ है जिसकी उद्घोषणा सन् 1991 में की गई थी। सन् 2005 में प्रभावी हुई इस उद्घोषणा का 141 देशों में अनुमोदन किया है। क्योटो प्रोटोकॉल ने 35 औद्योगिक राष्ट्रों को बद्ध किया है कि वे सन् 1990 के उत्सर्जन स्तर में वर्ष 2012 तक 5% की कमी लायें। तापमान के उपलव्य आँकड़े पश्चिमी यूरोप के हैं, जो 19वीं शताब्दी के मध्य के हैं। इस अध्ययन की संदर्भित अवधि 1961-80 है।

इससे पहले व बाद की अवधियों की तापमान की असंगतियों का अनुमान 1961-90 की अवधि के औसत तापमान में लगाया गया है। पृथ्वी के घरातल के निकट वायु का औसत वार्षिक तापमान लगभग 14° सेल्सियस है। काल श्रेणी 196190 के ग्लोब सामान्य तापमान की तुलना में 1856-2000 के दौरान पृथ्वी के धरातल के निकट वार्षिक तापमान में असंगति को दर्शाती है।

तापमान के बढ़ने की प्रवृत्ति 20वीं शताब्दी में दिखाई दी। 20वीं शताब्दी में सबसे अधिक तापन दो अवधियों में हुआ। 1901-44 और 1977-991 इन दोनों में से प्रत्येक अवधि में भूमंडलीय तापन 0-4 सेल्सियस बढ़ा है। इन दोनों अवधियों के बीच थोड़ा शीतलन भी हुआ जो उत्तरी गोलार्द्ध में अधिक चिह्नित था।

20वीं शताब्दी के अंत में औसत वार्षिक तापमान का वैश्विक अध्ययन 19वीं शताब्दी में दर्ज किए गए तापमान में 0.6° सेल्सियस अधिक था। 1856-2000 के दौरान सबसे गर्म साल अतिम दशक में दर्ज किया गया था। सन् 1998 संभवतः न केवल 20वीं शताब्दी का बल्कि पूरी सहस्राब्दि का सबसे गर्म वर्ष था।

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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘चीन तुल्य’ जलवायु किस क्षेत्र में पाई जाती है?
उत्तर:
इस प्रकार की जलवायु दक्षिणी-पूर्वी चीन, संयुक्त राज्य, अर्जेन्टीना, दक्षिणी-ब्राजील, जापान तथ आस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर पाई जाती है।

प्रश्न 2.
कोणधारी वन किस क्षेत्र में पाए जाते हैं?
उत्तर:
कोणधारी वन टैगा जलवायु क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसमें उत्तरी अमेरिका तथा युरेशिया। उत्तरी भाग शामिल है।

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प्रश्न 3.
टुण्डा जलवायु की क्या विशेषता है?
उत्तर:
इसमें कठोर ठंड वाली शीत ऋतु, ठंडी ग्रीष्म ऋतु, जिसका औसत तापमान 10°c से ऊपर नहीं होता, पाई जाती है।

प्रश्न 4.
कोपेन का वर्गीकरण कितने वर्गों में बंटा है?
उत्तर:
कोपेन का वर्गीकरण मुख्य रूप से 6 वर्गों में बंट है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के Capital Letters द्वारा लिखा जाता है।

  1. Tropical Rainy Climates (आई उष्णकटिबंधीय जलवायु)
  2. Dry Climates (शुष्क जलवायु)
  3. Warm Temperatures Climates (आई शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु)
  4. Cool Temperate Climates (शीतल हिम-वन जलवायु)
  5. Polar Climates (ध्रुवीय जलवायु)
  6. High Mountain Climates (उच्च पर्वतीय जलवायु)

प्रश्न 5.
जैतून (Olive) किस प्रदेश के प्रतिनिधि वृक्ष हैं?
उत्तर:
जैतून कैलीफोर्निया, मध्य चिल्ली तथा दक्षिणी अफ्रीका का प्रतिनिधि वृक्ष है। यह भूमध्य सागरीय जलवायु में पाया जाता है। इसकी जड़ें लम्बी और तने मोटे होते हैं।

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प्रश्न 6.
जलवायु विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
तापमान, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता-इन वायुमंडलीय अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले शास्त्र को जलवायु विज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 7.
उन तत्त्वों के नाम बताएं जिनके आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
जलवायु का वर्गीकरण निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया जाता है –

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वाष्पीकरण
  4. वाष्पोत्सर्जन
  5. जल संतुलन

प्रश्न 8.
दो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ताओं के नाम बताएं जिनके नाम पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया है?
उत्तर:
थानवेट तथा कोपेन दो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हैं जिनके नाम पर जलवायु का वर्गीकरण किया गया। प्रसिद्ध वर्गीकरण है –

  1. थार्नवेट वर्गीकरण
  2. कोपेन वर्गीकरण

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प्रश्न 9.
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण में किस प्रकार के जलवायु आँकड़े प्रयोग किए जाते हैं।
उत्तर:

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वर्षा तथा तापमान का वनस्पति से सम्बन्ध कोपेन ने इन आंकड़ों के आधार पर जलवायु का वर्गीकरण किया।

प्रश्न 10.
मानसून जलवायु वाले क्षेत्र में किस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है?
उत्तर:
मानसून जलवायु वाले क्षेत्र में सदाबहार वन (महोगनी, देवदार) मिलते हैं। साल, सागवान मानसून धन में पाए जाते हैं, कम वर्षा वाले शुष्क वनों में झाड़ियाँ मिलती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
द्विवार्था के जलवायु वर्गीकरण के उद्देश्य स्पष्ट थे?
उत्तर:
उनका मानना था कि भूगोलवेत्ता, जीव वैज्ञानिक अथवा किसान, जैसे लोगों, को जिन्हें जलवायविक पर्यावरण को, अपने-अपने उद्देश्यों को समझने तथा उपयोग करने की आवश्यकता पड़ती है जलवायु के तथ्यों को सही जानकारी होनी चाहिए। इसके साथ उन्होंने जलवायु के जननिक प्रकार के वर्गीकरण के गुणों को भी स्वीकार किया। उनके अनुसार-‘उत्पति’ न केवल रुचि बढ़ाती है, बल्कि वर्णन को समझने में विद्यार्थियों को अंत:दृष्टि का अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन की मात्रा बढ़ने से जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर:
कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन गैस की वायुमण्डल में निरंतर वृद्धि से तापमान इस सीमा तक बढ़ जायगा कि इससे ग्रीनलैण्ड तथा अंटार्कटिका महाद्वीप में बर्फ पिघलनी आरम्भ हो जाएगी। फलतः समुद्र तक ऊपर उठगा जिससे तटीय भाग तथा द्वीप डूब जाएंगे। इससे वाष्पन एवं वर्षा के प्रतिरूपों में परिवर्तन आयेगा, पौधों की नई-नई बीमारियाँ तथा नाश आदि की समस्याएँ खड़ी होंगी और अंटार्कटिका के ऊपर स्थित ओजोन छिट बडा हो जायगा।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर कम से कम होता है?
उत्तर:
भूमध्यरेखीय खंड में वार्षिक तापान्तर सबसे कम होता है। यह प्रायः 5° सेमी से कम होता है। इस खंड में वर्ष भर समान रूप से वर्षा होती है तथा मेघ छाए रहते हैं। कम तापमान मिलते हैं तथा दिन-रात सदा समान होते हैं। परिणामस्वरूप वार्षिक तापान्तर होता है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डलीय प्रभाव किस प्रकार कार्य करता है?
उत्तर:
भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह प्रभाव कहते हैं, जिसे सामान्यतः वायुमंडलीय प्रभाव भी कहते हैं। वायुमण्डल का प्रभाव एक शीशे की भाँति काम करता है, जो आने वाली सौर ऊर्जा की, लघु तरंगों को अपने से होकर गुजरने देता है, लेकिन बाहर जाने वाली पार्थिव विकिरण की दीर्घ तरंगों को रोकता है। वायुमण्डलीय प्रभाव को समझने के लिए खिडकियाँ बंद करके अपनी कार को दो घंटों के लिए धूप में खड़ी कर दीजिए। अब कार के अंदर के तापमान का अनुभव कीजिए। यह बाहर के तापमान से अधिक होगा। शीत ऋतु में हरित गृह में काँच की छत की पारदर्शिता का उपयोग लघु तरंगों को ट्रैप करके टमाटर उगाने के लिए किया जा सकता है। चित्र में वायुमण्डलीय प्रभाव को दिखाया गया है।
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प्रश्न 5.
चीन तुल्य जलवायु वाले प्रदेशों के जलवायु लक्षण तथा वनस्पति का वर्णन करों।
उत्तर:
लक्षण-यह जलवायु चीन दक्षिणी-पूर्वी, संयुक्त राज्य, अर्जेन्टीना, दक्षिणी-ब्राजील, जापान तथा आस्ट्रेलिया के पूर्वी तटों पर पाई जाती हैं। वार्षिक औसत तापमान 19°C तथा वर्षा 120 सेमी भी होती है। यहाँ हरिकेन तथा टाईफन भयानक रूप से चलते हैं। यहाँ ग्रीष्म और आई ऋतुएँ होती हैं। शीत ऋतु में हल्की ठंड पड़ती है। … प्राकृतिक वनस्पति-इस खंड में चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वन मिलते हैं। मैदानी भाग में ओक, कपूर, शहतूत, यूकेलिप्टस प्रमुख हैं, पर्वतीय भाग में पाईन तथा साइप्रस के कोणधारी वन मिलते हैं।

प्रश्न 6.
पश्चिमी यूरोपीय जलवायु उत्तरी दक्षिणी अमेरिका में केवल पतली समुद्र तटीय पट्टियों में ही क्यों पाई जाती है?
उत्तर:
उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में पश्चिमी यरोपीय खंड एक तंग पड़ी के रूप में चिली और कनाडा में मिलता है। निरंतर ऊँचे रॉकीज तथा एण्डीज पर्वतों की रोक के कारण इस खंड का विस्तार सीमित है। इस प्रकार की जलवायु 40° से 60° अक्षांशों के मध्य पाई जाती है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 10°C तथा वर्षा 140 सेमी के लगभग होती हैं। यहाँ समुद्र की निकटता, उष्ण सागरीय धाराओं तथा चक्रवातों के कारण सारा वर्ष परिवर्तनशील मौसम रहता है जो शारीरिक तथा मानसिक विकास के अनुकूल होता है। पश्चिमी पवनें वर्ष भर पर्याप्त वर्षा करती है।

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प्रश्न 7.
जलवायु विज्ञान की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर वायु का एक विस्तृत आवरण फैला हुआ है। तापमान, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता-इन वायुमंडलीय अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले शास्त्र को जलवाय विज्ञान कहते हैं। इनमें केवल वायुमण्डलीय क्रियाओं का ही नहीं अपितु जलवायु के विभिन्न तत्त्वों एवं नियंत्रकों का भी अध्ययन किया जाता है। जलवायु प्राकृतिक आवरण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह कृषि, सिंचाई भूमि उपयोग, परिवहन तथा मानवीय जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 8.
जलवायु का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?
उत्तर:
जलवायु में बहुत प्रकार की क्षेत्रीय विभिन्नताएं पाई जाती हैं। इसलिए जलवायु को कुछ मुख्य वर्गों में बांटा गया है। अनेक विधियों के आधार पर वर्गीकरण किया गया, परंतु कोई भी वर्गीकरण सर्वगुण संपन्न नहीं है। संसार की मुख्य जलवायु का वर्गीकरण निम्नलिखित तत्त्वों के आधार पर किया गया है –

  1. तापमान
  2. वर्षा
  3. वाष्पीकरण
  4. वाष्पोत्सर्जन
  5. जल संतुलन

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित प्रकार की जलवायु की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताइए

  1. सवाना जलवायु
  2. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु
  3. मानसूनी जलवायु
  4. भूमध्य रेखीय जलवायु
  5. भूमध्य-सागरीय जलवायु
  6. टैगा जलवायु
  7. टुण्डा जलवायु

उत्तर:

  1. सवाना जलवायु – वर्ष भर ऊँचा तापमान, आई ग्रीष्म ऋतु तथा शुष्क शीत ऋतु।
  2. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु – उच्चतम तापमान, 58° वर्षा कम, शुष्क ऋतु।
  3. मानसूनी जलवायु – गर्मियों में भारी वर्षा, शीत ऋतु, शुष्क।
  4. भूमध्य रेखीय जलवायु – अधिक वर्षा 35 से 90 सेमी, ग्रीष्म ऋतु में तापमान 25°C, शीत ऋतु में तापमान 10°C से भी कम।
  5. भूमध्य – सागरीय जलवायु-उष्ण और शुष्क ग्रीष्म ऋतु, मृदु शीत ऋतु, साधारण वर्षा शीत ऋतु में।
  6. टैगा जलवायु – छोटी ग्रीष्म ऋतु 10°C से 15°C तापमान, लंबी और कठोर शीत ऋतु, कम वर्षा गर्मी के महीनों में।
  7. टुण्ड्रा – कठोर ठंड वाली शीत ऋतु, ठंडी ग्रीष्म ऋतु, जिसका औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं होता।

प्रश्न 10.
मरुस्थलीय जलवायु तथ स्टेपी जलवायु में क्या अंतर है?
उत्तर:
मरुस्थलीय जलवायु तथा स्टेपी जलवाय में अंतर –
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प्रश्न 11.
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु 20° से 40° अक्षांशें के मध्य अनियमित पट्टी में क्यों पाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
उष्णकटिबंधीय आई जलवायु 20 से 40 अक्षांशों के बीच एक अनियमित पट्टी के रूप में फैली हुई है। यहाँ का तापमान तथा वर्षा पूरे वर्ष भर अत्यधिक रहती है।

  • इस जलवायु क्षेत्र के आंतरिक भाग उपार्द्र होते हैं।
  • यह जलवायु विषुवत् रेखा के दोनों ओर लगभग 5 से 10 अक्षांशों के मध्य पाई जाती है।
  • महाद्वीपों के पूर्वी भाग में यह उपोष्ण जेट धारा तथा अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र के प्रभाव में रहती है।
  • महाद्वीपों के पूर्वी भागों में इनका विस्तार काफी अधिक है, क्योंकि व्यापारिक पवनें उत्तर:पूर्व से तटों की ओर आती हैं।

प्रश्न 12.
कोपेन के जलवायु वर्गीकरण के अपेक्षा ट्विार्था के जलवायु वर्गीकरण के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोपेन का वर्गीकरण तापमान एवं वर्षण के मासिक तथा वार्षिक माध्यमों पर आधारित था। ट्रिवार्थी ने भी कोपेन के नियमों का अनुसरण किया।

दिवाओं के जलवायु वर्गीकरण के लाभ –

  • यह वर्गीकरण जननिक आधार पर किया गया है।
  • यह सरल तथा वर्णनात्मक है।
  • ट्रिवार्था ने केवल सीमित संख्या में, जो 15 से कम है, जलवायविक प्रकारों की पहचान की।
  • जलवायु के तथ्यों की सही जानकारी देती है।
  • जलवायु के विश्लेषण में वैज्ञानिक गुणवत्ता को बढ़ाती है।
  • वर्णन को समझने के लिए विद्यार्थियों को अंतर्दृष्टि का अतिरिक्त आयाम प्रदान करती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल में कार्बन वितरण का वर्णन कीजिए तथा कार्बन चक्र एवं ग्रीन हाऊस प्रभाव के मध्य सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
तीन प्रमुख हरित गृह गैसें-कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मिथेन (CH5), तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स (CFC) में कार्बन होता है, जो पर्यावरण का सबसे सामान्य तत्त्व है, यह सभी जैविक पदार्थों में मौजूद है तथा साधारण गैस से लेकर पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन के अति विषम व्युत्पन्नों तका का एक घटक है, पर्यावरण में उपस्थित कार्बन गतिशील है। यह गतिशीलता एक’ प्राकृतिक जैव भू-रासायनिक चक्र द्वारा नियंत्रित की जाती है। सामान्यतः प्राकृतिक कार्बन चक्र स्वमेव नियमित होता है। तंत्र में कार्बन अनेक बड़े भंडारों से होकर गुजरता है।

वायुमण्डल में 750 अरब टन कार्बन रहता है, जबकि 2,000 अरब टन कार्बन स्थल तथा 4,000 अरब टन कार्बन महासागरों में संचित है, जैविक पदार्थ लगभग 450 से 600 अरब टन कार्बन अपने में रखता है, जो वायुमण्डल में संचित कार्बन से कुछ कम है। विश्व जीवश्मी इंधन भण्डार भी लगभग 5,000 अरब टन कार्बन का मुख्य भंडार है। इनके द्वारा रखे गए कार्बन लाखों वर्षों से कार्बन चक्र में शामिल नहीं है। जीवाश्मी ईधन को जलाने से प्रतिवर्ष वायुमण्डल में पाँच अरब टन कार्बन की मात्रा जोड़ दी जाती है।

मानव जनित कार्बन का प्राथमिक स्रोत जीवाश्मी ईंधन का उपयोग है। प्राकृतिक वनस्पति के विनाश से इसका संवर्धन होता है, क्योंकि प्राकृतिक वनस्पति प्रकाश संश्लेषण के दौरान पुनर्चक्रित कार्बन की मात्रा को घटाता है। ये प्रक्रियाएँ वर्तमान मानवजनित कार्बन निष्कासन के 5 से 20 प्रतिशत भाग के लिए उत्तरदायी हैं। 1850 और 1950 के बीच लगभग 120 अरब टन कार्बन, वनोन्मूलन तथा आग द्वारा अन्य वनस्पति के विनाश के फलस्वरूप वायुमण्डल में छोड़ा गया।

हरित गृह तथा कार्बन – चक्र में संबंध-वायुमण्डलीय गैसों के परमाणु एवं अणु हरित गृह गैसों, विशेषकर जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा मिथेन द्वारा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण तथा पश्च विकिरण करते हैं। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड ज्वालामुखी क्रियाओं द्वारा लाया जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड की उतनी ही मात्रा वर्षण द्वारा हटा दी जाती है। मिथेन लकडी में बैक्टीरिया के उपापचय तथा घास चरने वाले पशुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है।

औद्योगिक तथा परिवहन क्षेत्रों में कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसें पहुँचाई जाती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती हुई मात्रा भूमण्डलीय तापमान को बढ़ाने का काम करती है। भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह प्रभाव कहते हैं। यह एक शीशे की भाँति काम करता है। यह भपृष्ठीय तापमान को उस तापमान से ऊँचा रखता है, जो इस प्रक्रिया के अभाव में होता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण
  2. उपोष्ण जलवायु
  3. भूमण्डलीय जलवायु परिवर्तन।

उत्तर:
1. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण – जर्मनी के प्रसिद्ध जलवायु वैज्ञानिक डॉ. कोपेन ने सन् 1936 में जलवायु वर्गीकरण की योजना बनाई। यह वर्गीकरण तापमान और वर्षा पर आधारित है। इसमें तापमान और वर्षा के संख्यात्मक मूल्यों का प्रयोग किया गया है। इन आंकड़ों को प्राकृतिक वनस्पति के विकास का आधार माना गया है। इसके अनुसार प्राकृतिक वनस्पति का विकास वर्षा की प्रभावशीलता पर निर्भर करता है। जलवायु प्रकारों की सीमाओं का निर्धारण करते समय अधिक गर्म तथा सबसे ठंडे महीनों के तापमान को आधार बनाया गया है। कोपेन का वर्गीकरण मुख्य रूप से 6 वर्गों में बँटा है जिन्हें अंग्रेजी भाषा के Capital Letter द्वारा लिखा गया है
(A) आर्द्र उष्णकटिबंधीय जलवायु
(B) शुष्क जलवायु
(C) आई शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु
(D) शीतल हिम-वन
(E) ध्रुवीय जलवायु
(F) उच्च पर्वतीय जलवायु

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण:
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2. उपोष्ण जलवायु – यह जलवायु उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के बीच पाई जाती है। इस प्रकार की जलवायु में तापमान वर्ष के 8 महीने 18° से ऊपर रहता है। शीत ऋतु अल्पकालीन होती है। तटीय भागों में वर्ष भर वर्षा होती है। वर्षा वितरण के आधार पर उपोष्ण जलवायु दो प्रकार की है

(क) उपोष्ण आर्द्र (cfw) – यह महाद्वीपों के पूर्वी भागों में मिलती है। इस जलवायु में वर्ष भर वर्षा होती है।
उपोष्ण शुष्क ग्रीष्म – इस प्रकार में मध्यम वर्षा से कम वर्षा प्राप्त होती है। वर्षा सर्दियों में होती है, जबकि गर्मियाँ शुष्क होती हैं।

3. भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन – वायुमण्डल प्रकृतिवश गतिशील है। इसमें होने वाले परिवर्तन क्षेत्रीय होने के साथ-साथ समयानुसार भी होते हैं। ये परिवर्तन पृथ्वी के वायुमंडलीय प्रणाली में अंत: प्रेरित हो सकते हैं, अथवा पार्थिवेतर कारकों द्वारा बहिप्रेरित हो सकते हैं। भूमण्डलीय ऊष्मन एक ऐसा ही परिवर्तन है, जो मानव द्वारा लगातार और अधिकाधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य ‘हरित गृह’ गैसों को वायुमण्डल में पहुंचाए जाने से उत्पन्न हुआ है।

वायुमण्डलीय गैसों के परमाणु एवं अणु हरित गृह गैसों द्वारा सूर्य के प्रकाश का अवशोषण तथा पश्च विकिरण करते हैं। वायुमण्डल में CO2 ज्वालामुखी क्रिया द्वारा लाई जाती है। CO2 की उतनी ही मात्रा वर्षण द्वारा हटा दी जाती है। मिथेन, जो CO2 से बीस गुना अधिक प्रभावशाली है, लकड़ी में बैक्टीरिया के उपापचय तथा घास चरने वाले पशुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है। मिथेन का शीघ्रता से कार्बन डाइऑक्साइड में ऑक्सीकरण होता है।

मानवीय क्रियाओं, जैसे जीवाश्मी तेल को जलाने तथा विभिन्न कृषकीय क्रियाओं द्वारा मिथेन एवं कार्बन डाईऑक्साइड वायुमण्डल में जमा की जा रही है। वायुमण्डल में CO2 की मात्रा सम्पूर्ण विश्व की जलवायु बदलने में मुख्य भूमिका अदा करती है। इससे यह स्पष्ट है कि CO2 की मात्रा में परिवर्तन वायुमण्डल के निचले स्तर के तापमान में परिवर्तन लायेगा।

तीन औद्योगीकरण तथा कृषि और परिवहन क्षेत्रों में हुई तकनीकी क्रांति से भी वायुमण्डल में CO2 मिथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन की मात्रा बढ़ी है। इनमें से कुछ गैसें पेड़-पौधों द्वारा उपभोग कर ली जाती हैं तथा कुछ भाग महासागरों में घुल जाता है। फिर भी 50% वायुमण्डल में बच जाता है। चावल उत्पादन करने वाले किसान, कोयला खनिज, डेरी में लगे लोग तथा स्थानांतरी कृषक भी भूमण्डलीय ऊष्मन में अपना योगदान देते हैं। भूपृष्ठ से वायुमण्डल के अप्रत्यक्ष रूप से गर्म होने की संकल्पना को हरित गृह कहते हैं।

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प्रश्न 3.
जलवायु तथा मौसम में क्या अंतर है? उदाहरण सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
मौसम के मुख्य तत्त्व हैं-तापक्रम, दबाव, हवाएँ, नमी, मेघ और वर्षा। वायुमण्डल की इन दशाओं का अध्ययन ही जलवायु या मौसम है।

मौसम – मौसम का अर्थ किसी स्थान पर किसी विशेष या निश्चित समय में वायुमण्डल की। दशाओं, तापक्रम, दबाव, हवाओं, नमी, मेघ और वर्षा के कल जोड का अध्ययन करना है। इसलिए मौसम मानचित्रों पर दिन व समय अवश्य लिखे जाते हैं। मौसम प्रतिदिन, प्रति सप्ताह, प्रति मास बदलता रहता है।

एक ही स्थान पर कभी मौसम गर्म, कभी उमस वाला, कभी आई हो सकता है। इंगलैण्ड में दिन-प्रतिदिन के मौसम में इतनी विभिन्नता है कि कहा जाता है, “Britain has no climate, only weather” इस प्रकार वायुमण्डल की बदलती हुई अवस्थाओं को मौसम कहा जाता है। आकाशवाणी से मौसम की स्थितियों का प्रसारण भी होता है।

जलवायु – किसी स्थान की जलवायु उस स्थान पर एक लम्बे समय की वायुमंडल की दशाओं के कुल योग का अध्ययन होती है। यह एक लम्बे समय का औसत मौसम होती है। जलवाय तथा मौसम में भिन्नता समय पर निर्भर करती है। मौसम का सम्बन्ध थोडे समय से है जबकि जलवायु का सम्बन्ध एक लम्बे समय से है।

मिन का हर रोज एक जैसा मौसम न होने के कारण जलवायु तथा मौसम में कोई अंतर नहीं है। इसलिए कहा जाता है, “Egypt has no weather, only climate.” इस प्रकार किसी स्थान पर कम से कम पिछले 35 वर्षों के मौसम की औसत दशाओं को उस स्थान पर जलवायु कहते हैं। भारतीय जलवायु के अध्ययन के आँकड़ों का सम्बन्ध पिछले 100 वर्षों से है।

उदाहरण – दिल्ली में किसी विशेष दिन अधिक वर्षा हो तो हम कहते हैं कि आज मौसम आई है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि दिल्ली की जलवायु ‘आई’ है। दिल्ली में ग्रीष्मकाल में अधिक वर्षा होती है तथा जलवायु मानसूनी है।

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प्रश्न 4.
मनुष्य के लिए जलवायु विज्ञान का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
जलवायु सबसे व्यापक और शक्तिशाली तत्त्व है जो कि मानवीय जीवन पद्धति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती है। मानवीय क्रियाकलापों, स्वास्थ्य, भोजन वस्त्र, मकान, परिवहन तथा संस्कृति आदि पर जलवायु का व्यापक नियंत्रण रहता है।

1. जलवायु तथा भोजन – जलवायु मानव के जीवन को निर्धारित करती है। ठंडे प्रदेशों में शरीर की उष्णता बनाए रखने के लिए मांस, मदिरा तथा अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। उष्ण प्रदेशों में कम मात्रा में भोजन का प्रयोग किया जाता है। मानसूनी जलवायु में चावल मुख्य भोजन है। शीत-कृष्ण जलवायु में डेयरी पदार्थों का अधिक प्रयोग किया जाता है। शुष्क प्रदेशों में बकरी, भेड़ तथा ऊँट के दूध का प्रयोग किया जाता है।

2. जलवायु तथा वस्व – जलवायु की विभिन्नता के अनुसार वस्त्रों के उपयोग में भी विभिन्नता पाई जाती है। भूमध्य रेखीय प्रदेशों में वस्त्रों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। ठंडे प्रदेशों में ऊनी वस्त्र प्रयोग किए जाते हैं। टुण्डा प्रदेश में खाल या समूर के वस्त्र पहने जाते हैं।

3. जलवायु तथा मकान – मकानों की रचना पर जलवायु का प्रभाव पड़ता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बलानदार छतें बनाई जाती है। टुण्ड्रा प्रदेश में बर्फ से बने घर (इग्लू) बनाए जाते हैं। भूमध्य खण्ड में लोग झोपड़ियों में निवास करते हैं, जबकि मध्य एशिया के किरगीज लोग तम्बओं में रहते हैं।

4. जलवायु तथा कृषि – जलवायु कृषि को निर्धारित करती है। अधिक वर्षा तथा उच्च तापमान के कारण मानसूनी प्रदेशों में चावल की कृषि होती है तथा वर्ष में तीन-तीन फसलें पैदा होती हैं। टुण्ड्रा प्रदेश में कम तापमान के कारण कृषि नहीं होती। शुष्क प्रदेशों में सिंचाई से फसलें उत्पन्न की जाती हैं। .

5. जलवायु तथा कार्य क्षमता – जलवायु मनुष्य के स्वास्थ्य, शारीरिक तथा मानसिक विकास पर प्रभाव डालती है। शीत जलवायु प्रदेश के लोग परिश्रमी व साहसी होते हैं तथा उनकी कार्यक्षमता अधिक होती है। उष्ण प्रदेशों के लोग आलसी तथा कम परिश्रमी होते हैं तथा इनका मानसिक विकास भी कम होता है । उष्ण-आर्द्र भूमध्यरेखीय जलवायु में कई बीमारियों तथा कीड़ों के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

6. जलवायु तथा मानवीय क्रियाकलाप – मानवीय क्रियाओं के निर्धारण में जलवायु एक महत्त्वपूर्ण कारक है। आई प्रदेशों में सूती वस्त्र उद्योग, शुष्क प्रदेशों में फिल्म उद्योग तथा सागरीय जलवायु में फलों पर आधारित उद्योग स्थापित हैं। जलवायु आर्थिक विकास तथा सभ्यता के विकास में एक सम्पन्न भौगोलिक तत्त्व है। शीत-उष्ण प्रदेशों में अनुकूल जलवायु के कारण ही जनसंख्या अधिक है। जलवायु का प्रभाव परिवहन साधनों तथा व्यापारिक मार्गों पर भी पड़ता है। इस प्रकार जलवायु मानवीय क्रियाकलापों, सभ्यता तथा जीवन पद्धति पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

प्रश्न 5.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. जलवायु का जननिक एवं आनुभाविक वर्गीकरण
  2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु तथा उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु
  3. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु

उत्तर:
1. जलवायु का जननिक एवं आनुभाविक वर्गीकरण –
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2. उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु तथा उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु –
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3. बोरियल तथा ध्रुवीय जलवायु –
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प्रश्न 6.
ट्विार्था द्वारा बनाए गए बड़े जलवायु समूहों का वर्णन कीजिए। इसके वर्गीकरण के क्या आधार हैं?
उत्तर:
ट्रिवार्था ने तापमान तथा वर्षा के आधार पर विश्व की जलवायु को 6 बड़े जलवायु समूहों में बाँटा है। इन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में चिह्नित किया गया है। इसमें से पाँच-‘ए’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘एफ’ तापमान पर आधारित हैं और छठा ‘बी’ शुष्क वर्ग में है, जो वर्षा पर आधारित है।

तापमान के आधार पर जलवायु समूह –
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु (ए) – यह जलवायु विषुवत् रेखा के साथ 20° से 40° अक्षांशों के मध्य अनियमित पट्टी के रूप में फैली हुई है। तटीय क्षेत्रों में सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18° से. से ऊपर रहता है। ‘ए’ जलवायु क्षेत्र के आंतरिक भाग उपार्द्र होते हैं। इसे उष्णकटिबंधीय आई जलवायु कहते हैं।

महाद्वीपों के पूर्वी भागों में यह जलवायु अंत: उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र तथा उपोष्ण जेट धारा के प्रभाव में रहती है। इसे उष्णकटिबंधीय वर्षा वन भी कहते हैं। उष्णकटिबंधीय आई एवं शुष्क जलवायु में शीत ऋतु शुष्क होती है। इस जलवायु को सवाना जलवायु भी कहते हैं।

उपोष्ण जलवायु ‘सी’ – यह जलवायु उष्णकटिबंधीय एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के बीच पाई जाती है यहाँ तापमान वर्ष के 8 महीने 18° से. से ऊपर रहता है। तटीय भाग में वर्ष भर वर्षा होती है। ऋतुनिष्ठ वर्षा वितरण के आधार पर उपोष्ण जलवायु दो प्रकार की है-उपोष्ण आर्द्र तथा उपोष्ण शुष्क ग्रीष्म।

  • उपोष्ण आर्द्र – वर्ष भर वर्षा होती है।
  • उपोष्ण शुष्क – मध्य से कम वर्षा। वर्षा सर्दियों में होती है।

शीतोष्ण जलवायु ‘डी’ – यह मध्य अक्षांशों (40 से 65° उत्तर – दक्षिण) के विस्तृत भू-भागों में मिलती है। शीतोष्ण जलवायु के दो प्रकार हैं

  • शीतोष्ण जलवायु – शीत ऋतु मृदु तथा ग्रीष्म ऋतु कुछ गर्म होती है। वर्ष भर औसतन तापमान 0°C से ऊपर रहता है और वर्षा होती है।
  • शीतोष्ण महाद्वीपीय जलवायु – शीत ऋतु अत्यधिक सर्द तथा ग्रीष्म ऋतु शीतल होती हैं। वार्षिक वर्षा कम है। भूमि का शीतलन प्रतिचक्रवातों से जुड़ा है।

बोरियल जलवायु ‘ई’ – उच्चतर-मध्य अक्षांशों में यह जलवायु मिलती है। ग्रीष्म ऋतु छोटी और शीतल होती है। वार्षिक तापमान 0° से 10°C के मध्य रहता है। वर्षा बहुत कप और गर्मियों में होती है। विश्व के शंकुधारी वनों में यह जलवायु देखने को मिलती है।

ध्रुवीय जलवायु ‘एफ’ – ध्रुवीय जलवायु उच्च अक्षांशों तथा हिमालय के आल्प्स पर्वतों के ऊँचे भागों में मिलती है। औसत तापमान 10°C से ऊपर नहीं जाता । यहाँ गर्मियों का मौसम नहीं होता। तापमान के आधार पर ध्रुवीय जलवायु को दो प्रकारों में बाँटा गया है

  • टुण्डा जलवायु – यह केवल उत्तरी-गोलार्द्ध में पाई जाती है। यह चरम शीत प्रदेश है। यहाँ स्थाई रूप से पाला रहता है।
  • हिमटोप जलवायु – यह ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के आंतरिक भागों में पाई जाती है। गर्मियों में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है। इस क्षेत्र में वर्षा थोड़ी मात्रा में होती है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल में जल Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव के लिए वायुमण्डल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है ……………….
(क) जलवाष्प
(ख) धूल कण
(ग) नाइट्रोजन
(घ) ऑक्सीजन
उत्तर:
(क) जलवाष्प

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन सी है जिसके द्वारा जल द्रव से गैस में बदल जाता है ……………….
(क) संघनन
(ख) वाष्पीकरण
(ग) वाष्पोत्सर्जन
(घ) अवक्षेपण
उत्तर:
(ख) वाष्पीकरण

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है?
(क) सापेक्ष आर्द्रता
(ख) निरपेक्ष आर्द्रता
(ग) विशिष्ट आर्द्रता
(घ) संतृप्त हवा
उत्तर:
(घ) संतृप्त हवा

प्रश्न 4.
निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन-सा है?
(क) पक्षाभ
(ख) वर्षा मेघ
(ग) स्तरी
(घ) कपासी
उत्तर:
(घ) कपासी

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वषर्ण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:
उत्पत्ति के आधार पर वर्षा के तीन प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है –

  1. संवहनीय वर्षा
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. चक्रवाती वर्षा

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

  1. निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute humidity) – वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहा जाता है।
  2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative humidity) – दिये गये तापमान पर अपनी पूरी क्षमता की तुलना में मौजूद आर्द्रता के प्रतिशत को सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
  3. संतृप्त आर्द्रता (Saturated humidity) – दिये गये तापमान पर जलवाष्प से पूरी तरह पूरित हवा को संतृप्त आर्द्रता कहते हैं।

प्रश्न 3.
(i) ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों बढ़ती है?
उत्तर:
वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण तथा संघनन के कारण क्रमश बढ़ती-घटती रहती है। वाष्पीकरण का मुख्य कारण ताप है। ऊष्मा का ह्रास ही संघनन का कारण होता है।

(ii) बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
बादल पानी की छोटी बूंदों या बर्फ के छोटे रवों की संहति होते हैं जो कि पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण बनते हैं। इनकी ऊंचाई, विस्तार, घनत्व तथा पारदर्शिता या अपारदर्शिता के आधार पर बादलों को चार प्रकार में वर्गीकृत किया गया है –

  • पक्षाभ मेघ (Citrus)
  • कपासी (Cumulus)
  • स्तरी (Stratus) और
  • वर्षा मेघ (Nimbus)

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वार्षिक वर्षन की कुल मात्रा के आधार पर विश्व की मुख्य वर्षण प्रवृति को निम्नलिखित रूपों में पहचाना जाता है विषुवतरेखीय पट्टी, शीतोष्ण प्रदेशों में पश्चिमी तटीय किनारों के पास के पर्वतों की वायु की ढाल पर तथा मानसून वाले क्षेत्रों के तटीय भागों में वर्षा बहुत अधिक होती है, जो प्रतिवर्ष 200 सेमी से ऊपर होती है। महाद्वीपों के आंतरिक भागों में प्रतिवर्ष 100 से 200 सेमी वर्षा होती है। महाद्वीपों के तटीय क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा 50 से 100 सेमी प्रतिवर्ष तक होती है। महाद्वीपों के भीतरी भाग के वृष्टि छाया क्षेत्रों में पड़ने वाले भाग तथा ऊँचे-अक्षांशों वाले क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 50 सेमी से भी कम वर्षा होती है। कुछ क्षेत्रों में जैसे विषुवतरेखीय पट्टी तथा ठंडे समशीतोष्ण प्रदेशों में वर्षा पूरे वर्ष होती रहती है।

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प्रश्न 2.
संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने के प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ओस, कुहरा, तुषार एवं बादल; स्थिति एवं तापमान के आधार पर संघनन के प्रकारों को वर्गीकृत किया जा सकता है। संघनन तब होता है जब ओसांक जमाव बिन्दु से नीचे होता है तथा तब भी संभव है जब ओसांक जमाव बिंदु से ऊपर होता है।

ओस (Dew) – जब आर्द्रता धरातल के ऊपर हवा में संघनन केन्द्रकों पर संघनित न होकर ठोस वस्तु जैसे-पत्थर, घास तथा पौधों की पत्तियों की ठंडी सतहों पर पानी की बूंदों के रूप में जमा होती है तब इसे ओस के नाम से जाना जाता है। इसके बनने के लिए सबसे उपयुक्त अवस्थाएँ साफ आकाश, शांत हवा, उच्च सापेक्ष आर्द्रता तथा ठंडी एवं लम्बी रातें हैं। ओस बनने के लिए यह आवश्यक है कि ओसांक जमाव बिंदु से ऊपर हो।

तुषार (Frost) – ठंडी सतहों पर बनता है जब संघनन तापमान के जमाव बिंदु से नीचे (0°से) चले जाने पर होता है अर्थात् ओसांक बिंदु पर या उसके नीचे होता है। अतिरिक्त नमी पानी की बूंदों की बजाए छोटे-छोटे बर्फ के रवों के रूप में जमा होती है। उजले तुषार के बनने की सबसे उपर्युक्त अवस्थायें, ओस के बनने की अवस्थाओं के समान है, केवल हवा का तापमान जमाव बिन्दु पर या उससे नीचे होना चाहिए ।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
जून से 31 दिसम्बर तक के समाचार-पत्रों से सूचनाएँ एकत्र कीजिए कि देश के किन भागों में अत्यधिक वर्षा हुई।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अध्यापक या माता-पिता की मदद से इन परियोजना को स्वयं करें।
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Bihar Board Class 11 वायुमंडल में जल Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ओसांक क्या है?
उत्तर:
जिस तापमान पर किसी वायु का जलवाष्प जल रूप में बदलना शुरू हो जाता है, उस तापमान को ओसांक कहते हैं।

प्रश्न 2.
वृष्टि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मुक्त वायु से वर्षा जल, हिम वर्षा तथा ओलों के रूप में जलवाष्प का धरातल पर गिरना वृष्टि कहलाता है। किसी क्षेत्र पर वायुमण्डल से गिरने वाली समस्त जलराशि को तृष्टि कहा जाता है।

प्रश्न 3.
संघनन प्रक्रिया कब होती है?
उत्तर:
जिस प्रक्रिया द्वारा वायु के जलवाष्प जल के रूप में बदल जाएँ, उसे संघनन कहते हैं। जलकणों के वाष्प का गैस से तरल अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन कहते हैं।

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प्रश्न 4.
आर्द्रता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वाय में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वाय में सदा जलवाष्प भरे होते हैं, जिससे वायु नमी प्राप्त करती है। जलवाष्प की मात्रा वायुमण्डल में आर्द्रता का बोध कराती है।

प्रश्न 5.
वाष्पीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस क्रिया द्वारा तरल तथा जल-गैसीय पदार्थ जलवाष्प में बदल जाते हैं, उसे वाष्पीकरण कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा परिमाण चार घटकों पर निर्भर करती हैं-शुष्कता, तापमान, वायु परिसंचरण तथा जलखंड।

प्रश्न 6.
सापेक्ष आर्द्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी तापमान पर वायु में कुल जितनी नमी समा सकती है उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

प्रश्न 7.
हल्के कोहरे को क्या कहते हैं?
उत्तर:
हल्के कोहरे को धुंध कहते हैं। औद्योगिक नगरों में धुंए के साथ उड़ी हुई राख पर जल-बिंदु टिकने से कोहरे छाया रहता है। ऐसे कोहरे को धुंध (Smog) कहते हैं।

प्रश्न 8.
‘हिमपात’ कैसे होता है?
उत्तर:
जब संघनन हिमांक (32°F) से कम तापमान पर होता है तो जल कण हिम में बदल जाते हैं और हिमपात होता है। दण्डा प्रदेश की समस्त वर्षा हिमपात के रूप में होती है।

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प्रश्न 9.
बादल (मेघ) कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
ऊंचाई के अनुसार मेघ तीन प्रकार के होते हैं

  1. उच्च स्तरीय मेघ – (6000 से 10000 मीटर तक ऊंचे) जैसे-पक्षाभ, स्तरी तथा कपास मेघ ।
  2. मध्यम स्तरीय मेघ – (3000 से 6000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-मध्य कपासी शिखर मेघ ।
  3. निम्न स्तरीय मेघ – (3000 मीटर तक ऊंचे मेघ) जिनमें स्तरी, कपासी मेघ, वर्षा स्तरी मेघ, कपासी वर्षा मेघ शामिल हैं।

प्रश्न 10.
बादल कैसे बनते हैं?
उत्तर:
वायु के ऊपर उठने तथा फैलने से उसका तापमान ओसांक से नीचे हो जाता है। इससे हवा में संघनन होता है। ये जलकण वायु में आर्द्रताग्राही कणों पर जमकर बादल बन ‘जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ओसांक क्या है? नमी की मात्रा से इसका क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
संतप्त वायु के ठंडे होने से जलवाष्प जल के रूप में बदल जाते हैं। जिस तापमान पर किसी वायु का जलवाष्प जल रूप में बदलना शुरू हो जाता है उस तापमान को ओसांक कहते हैं। जिस तापमान पर संघनन की क्रिया आरम्भ होती है उसे ओसाांक या संघनन तापमान कहा जाता है। ओसांक तथा नमी की मात्रा में प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है, जब सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है तो संघनन की क्रिया जल्दी होती है। थोड़ी मात्रा में शीतलन की क्रिया से वायु ओसांक पर पहुँच जाती है। परन्तु कम सापेक्ष आर्द्रता के कारण संघनन नहीं होता । संघनन के लिए तापमान का ओसांक के निकट या नीचे होना आवश्यक है।

प्रश्न 2.
आर्द्रता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायु में उपस्थित जलवाष्म की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वायु में सदा जलवाष्प होते हैं, जिससे वायु नमी प्राप्त करती है। वायुमण्डल में कुल भार का 2% भाग जलवाष्प के रूप में मौजूद है। यह जलवाष्प महासागरों, समुद्रों, झीलों, नदियों आदि के जल से वाष्पीकरण द्वारा प्राप्त होता है। आर्द्रता के दो माप हैं-सापेक्ष आर्द्रता तथा निरपेक्ष आर्द्रता । वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा से ही आर्द्रता का बोध होता है।

प्रश्न 3.
‘कोहरा’ कैसे बनता है?
उत्तर:
कोहरा एक प्रकार का बादल है जो धरातल के समीप वायु में धूल कणों पर लटके हुए जल-बिन्दुओं से बनता है। ठंडे धरातल या ठंडी वायु के सम्पर्क से नमी से भरी हुई वायु जल्दी ठंडी हो जाती है। वायु में उड़ते रहने वाले धूल कणों पर जलवाष्प का कुछ भाग जल बिन्दुओं के रूप में जमा हो जाता है। जिससे वातावरण धुंधला हो जाता है तथा 200 मीटर से अधिक दूरी की वस्तु दिखाई नहीं देती तब वायुयानों की उड़ाने स्थगित करनी पड़ती हैं। यह प्रायः साफ तथा शांत मौसम में, शीत ऋतु की लम्बी रातों के कारण बनता है जब धरातल पूरी तरह ठंडा हो जाता है। इसे कोहरा भी कहते हैं। नदियों, झीलों व समुद्रों के समीप के प्रदेशों में भी कोहरा मिलता है।

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प्रश्न 4.
संसार में वर्षा का वार्षिक वितरण बताएँ।
उत्तर:
संसार में वर्षा का वितरण समान नहीं है। भूपृष्ठ पर होने वाली कुल वर्षा का 19 प्रतिशत महाद्वीपों पर तथा 81 प्रतिशत महासागरों से प्राप्त होता है। संसार की औसत वार्षिक वर्षा 975 मिलीमीटर है।

  1. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र – इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा का औसत 200 सेंटीमीटर है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र तथा मानसूनी प्रदेशों के तटीय भागों में अधिक वर्षा होती है।
  2. सामान्य वर्षा वाले क्षेत्र – इन क्षेत्रों में 100 से 200 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। यह क्षेत्र उष्ण कटिबन्ध में स्थित है तथा ये मध्यवर्ती पर्वतों पर मिलते हैं।
  3. कम वर्षा वाले क्षेत्र – महाद्वीपों के मध्यवर्ती भाग तथा शीतोष्ण कटिबन्ध के पूर्वी तटों पर 25 से 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है।
  4. वर्षा विहीन प्रदेश – गर्म मरुस्थल, ध्रुवीय प्रदेश तथा वृष्टि छाया प्रदेशों में 25 सेंटीमीटर से कम वर्षा होती है।

प्रश्न 5.
वृष्टि किसे कहते हैं? वृष्टि के कौन-कौन से रूप हैं?
उत्तर:
किसी क्षेत्र पर वायुमण्डल से गिरने वाली समस्त जलराशि को वृष्टि कहा जाता है। मुक्त वायु से वर्षा, जल, हिम वर्षा तथा ओलों के रूप में जलवाष्प का धरातल पर गिरना वृष्टि कहलाता है। वृष्टि मुख्य रूप से तरल तथा ठोस रूप में पाई जाती है। इसके तीन रूप हैं –

  • जलवर्षा
  • हिमवर्षा
  • ओला वृष्टि

वृष्टि ओसांक से कम तापमान पर संघनन से होने वाली ओला वृष्टि 0°C या 32°F से कम तापमान पर होती है।

प्रश्न 6.
संघनन कब और कैसे होता है?
उत्तर:
जिस क्रिया द्वारा वायु के जलवाष्प जल के रूप में बदल जाएँ, उसे संघनन कहते हैं। जल कणों के वाष्प का गैस से तरल अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन कहते हैं। वायु का तापमान कम होने से उस वायु की वाष्प धारण करने की शक्ति कम हो जाती है। कई बार तापमान इतना कम हो जाता है कि वायु जलवाष्प का सहारा नहीं ले सकती और जलवाष्प तरल रूप में वर्षा के रूप में गिरता है।

इस क्रिया के उत्पन्न होने के कई कारण हैं –

  • जब वायु लगातार ऊपर उठकर ठंडी हो जाए।
  • जब नमी से लदी वायु किसी पर्वत के सहारे ऊँचे उठकर ठंडी हो जाए।
  • जब गर्म तथा ठंडी वायुराशियाँ आपस में मिलती हैं। कोहरा, धुंध, मेघ, ओले, हिम, ओस, पाला आदि संघनन के विभिन्न रूप हैं।

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प्रश्न 7.
किसी स्थान की वर्षा किन तत्त्वों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
किसी स्थान की वर्षा निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती हैं –

  1. भूमध्य रेखा से दूरी – भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अधिक गर्मी के कारण वर्षा अधिक होता है।
  2. समुद्र से दूरी – तटवती प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में कम।
  3. समुद्र तल से ऊँचाई – पर्वतीय भागों में मैदानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।
  4. प्रचलित पवनें – सागर से आने वाली पवनें वर्षा करती हैं परन्तु स्थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।
  5. महासागरीय धाराएँ – ऊष्ण धाराओं के ऊपर गुजरने वाली पवनें अधिक वर्षा करती हैं, इसके विपरीत शीतल पवनों के ऊपर से गुजरने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

प्रश्न 8.
ओस तथा ओसांक में क्या अंतर है?
उत्तर:
ओस तथा ओसांक में अंतर –
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प्रश्न 9.
वर्षा तथा वृष्टि में क्या अंतर है?
उत्तर:
वर्षा तथा वृष्टि में अंतर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वर्षा किस प्रकार होती है? वर्षा के विभिन्न प्रकारों का उदाहरण सहित वर्णन करो।
उत्तर:
वायु की आर्द्रता ही वर्षा का आधार है। वर्षा होने का मुख्य कारण संतृप्त वायु का ठंडा होना है। वर्षा होने की क्रिया कई पदों में होती है –
1. संघनन होना – नम वायु के ऊपर उठने से उसका तापक्रम प्रति 1000 फूट (300 मीटर) पर 5.6°F घटता जाता है। तापमान के निरन्तर घटने से वायु की वाष्प शक्ति घट जाती है। वायु संतृप्त हो जाती है तथा संघनन क्रिया होती है।

2. मेघों का बनना – वायु में लाखों धूल कण तैरते-फिरते हैं। जलवाष्प इन कणों पर जमा हो जाते हैं। ये मेघों का रूप धारण कर लेते हैं।

3. जल कणों का बनना – छोटे-छोटे मेघ कणों के आपस में मिलने से जल की बँदें बनती हैं। जब इन जल कणों का आकार व भार बढ़ जाता है तो वायु इसे सम्भाल नहीं पाती । ये जल कण पृथ्वी पर वर्षा के रूप में गिरते हैं। इस प्रकार जल कणों का पृथ्वी पर गिरना ही वर्षा कहलाता है।

वर्षा के प्रकार – वायु तीन दशाओं में ठंडी होती है –

  • गर्म तथा नम वायु का संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठना।
  • किसी पर्वत से टकराकर नम वायु का ऊपर उठना।
  • ठंडी तथा नर्म वायु का आपस में मिलना।

इन दशाओं के आधार पर वर्षा तीन प्रकार की होती है –
1. संवहनीय वर्षा – स्थल पर अधिक गर्मी के कारण वायु गर्म होकर फैलती है तथा हल्की हो जाती है। यह वायु हल्की होकर ऊपर उठती है और इस वायु का स्थान लेने के लिए पास वाले अधिक दबाव वाले खंड से ठंडी वायु आती है। यह वायु भी गर्म होकर ऊपर उठती है। इस प्रकार संवाहिक धाराएँ उत्पन्न हो जाती है तथा वर्षा होती है। यह वर्षा घनघोर, अधिक मात्रा में तथा तीव्र बौछारों के रूप में होती है।
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2. पर्वतीय वर्षा – किसी पर्वत के सहारे ऊपर उठती हुई नम पवनों द्वारा वर्षा को पर्वतीय वर्षा कहते हैं। यह वर्षा पर्वतों की पवन विमुख ढाल पर बहुत कम होती है।
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3. चक्रवातीय वर्षा – चक्रवात में गर्म व नम वायु ठंडी शुष्क वायु के मिलने से ठंडी वायु गर्म वायु को ऊपर उठा देती है। आई वायु ऊष्ण धारा के सहारे ठंडे वायु से ऊपर चढ़ जाती . है। ऊपर उठने पर गर्म वायु का जलवाष्प ठंडा होकर वर्षा के रूप में गिरता है। इसे चक्रवातीय वर्षा कहते हैं। यह वर्षा लगातार, बहुत थोड़ी देर तक, परन्तु थोड़ी मात्रा में होती है।
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प्रश्न 2.
निरपेक्ष आर्द्रता तथा सापेक्ष आर्द्रता क्या है? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।।
उत्तर:
किसी समय किसी तापमान पर वायु में जितनी नमी मौजूद हो, उसे वायु की निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। यह ग्राम प्रति घन सेमी द्वारा प्रकट की जाती है। इस प्रकार निरपेक्ष आर्द्रता को वायु के प्रति आयतन जलवाष्प के भार के रूप में परिभाषित किया जाता है। तापमान बढ़ने या घटने पर भी वायु की वास्तविक आर्द्रता वही रहेगी जब तक उसमें और अधिक जलवाष्प शामिल न हो या कुल जलवाष्प पृथक् न हो जाए वाष्पीकरण द्वारा निरपेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है तथा वर्षा द्वारा कम हो जाती है। वायु के ऊपर उठकर फैलने या नीचे उतरकर सिकुड़ने से भी यह मात्रा बढ़ या घट जाती है।

वितरण –

  • भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक निरपेक्ष आर्द्रता होती है तथा ध्रुवों की ओर घटती जाती है।
  • ग्रीष्म ऋतु में शीतकाल की अपेक्षा तथा दिन में रात की अपेक्षा वायु की निरपेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
  • निरपेक्ष आर्द्रता महासागरों पर स्थल खंडों की अपेक्षा अधिक होती है।
  • इससे वर्षा के सम्बन्ध में अनुमान लगाने में सहायता नहीं मिलती।

सापेक्ष आर्द्रता – किसी तापमान पर वायु में कुल जितनी नमी समा सकती है उसका जितना प्रतिशत अंश उस वायु में मौजूद हो, उसे सापेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
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दूसरे शब्दों में यह वायु की निरपेक्ष नमी तथा उसकी वाष्प धारण करने की क्षमता में प्रतिशत अनुपात है।
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सापेक्ष आर्द्रता को प्रतिशत में प्रकट किया जाता है। इसे वायु संतृप्तता का प्रतिशत अंश भी कहा जाता है। वायु के फैलने व सिकुड़ने में सापेक्ष आर्द्रता बदल जाती है। तापमान के बढ़ने से वायु की वाष्प ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है तथा सापेक्ष आर्द्रता कम हो जाती है। तापमान घटने से वायु ठंडी हो जाती है तथा वाष्प ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है। इस प्रकार सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है।

वितरण –

  • भूमध्य रेखा पर सापेक्ष आर्द्रता अधिक होती है।
  • उष्ण मरुस्थलों में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है।
  • कम वायु दबाव क्षेत्रों में सापेक्ष आर्द्रता अधिक परन्तु अधिक दबाव क्षेत्रों में कम होती है।
  • महाद्वीपों के भीतरी क्षेत्रों में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है।
  • दिन में सापेक्ष आर्द्रता कम होती है, परन्तु रात्रि में अधिक।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –

  1. संघनन
  2. पर्वतीय वर्षा
  3. उच्च मेघ
  4. वृष्टि छाया

उत्तर:
1. संघनन – जलवाष्प के तरल अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं। यदि हवा अपने ओसांक से नीचे ठंडी होती है, तो इसके जलवाष्प की मात्रा जल में बदल जाती है। जब भी ओसांक तापमान, हिमांक से नीचे गिर जाता है, तो जलवाष्प सीधे क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया द्वारा हिम में बदल जाता है।

संघनन दो कारकों पर निर्भर करता है। प्रथम वायु की आपेक्षित आर्द्रता तथा द्वितीय शीतलन की मात्रा। इसीलिए मरुस्थल क्षेत्रों में ओसांक तक पहुँचने के लिए अधिक मात्रा में शीतलन की जरूरत पड़ती है जबकि आई जलवायु में शीतलन की कम मात्रा भी संघनन प्रक्रिया को आरंभ कर देती है। कोई भी संघनन प्रक्रिया उस समय तक सम्पन्न नहीं हो सकती, जब तक ऐसा धरातल उपलब्ध न हो, जिस पर द्रव संघनित हो सके।

2. पर्वतीय वर्षा – पर्वतीय वर्षा उस समय होती है, जब आई वायु अपने मार्ग में आए किसी पर्वत अथवा किसी अन्य ऊँचे भूभाग से होकर गुजरती है, और ऊपर उठने के लिए विवश होती – है। कपर उठने से यह ठंडी होती है, और अपनी आर्द्रता को वर्षा के रूप में गिरा देती है। इस प्रकार अनेक पर्वतों के पवनाभिमुखी ढाल भारी वर्षा प्राप्त करते हैं, जबकि प्रतिपवन ढाल, जिन पर हवा ऊपर से नीचे उतरती है कम वर्षा पाते हैं। इस प्रकार की परिस्थिति विस्तृत रूप में भारत, उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों पर पाई जाती है।

वर्षण की मात्रा ‘ढाल’ पहाड़ी की ऊंचाई तथा वायुराशि के तापमान तथा इसमें मौजूद आर्द्रता की मात्रा पर निर्भर करती है। पर्वत के दूसरी ओर ऊपर से नीचे उतरती हवा जलविहीन होती है, और इसलिए किसी प्रकार की वर्षा नहीं होती। अतः क्षेत्र शुष्क रहता है, जिसे वृष्टि छाया कहते हैं।

3. उच्च मेष (5 से 14 किमी)-इसके निम्नलिखित प्रकार हैं –
(क) पक्षाभ मेघ – यह तंतुनमा, कोमल तथा सिल्क जैसी आकति के मेघ हैं। जब ये मेघ समूह से अलग होकर आकाश में अव्यवस्थित तरीके से तैरते नजर आते हैं, तो ये साफ मौसम लाते हैं। जब ये व्यवस्थित तरीके से, मध्य स्तरी मेघों से जुड़े हुए हैं, तो आई मौसम की पूर्व सूचना देते हैं।

(ख) पक्षाभ स्तरी मेघ – ये पतले श्वेत चादर की तरह होते हैं। ये समस्त आकाश को घेरकर दूध जैसी शक्ल प्रदान करते हैं। सामान्यतः ये आने वाले तूफान के लक्षण हैं।

(ग) पक्षाभ कपासी मेघ – ये मेघ छोटे-छोटे श्वेत पत्रकों अथवा छोटे गोलाकार रूप में दिखाई देते हैं, इनकी कोई छाया नहीं पड़ती। ये समूहों, रेखाओं अथवा उर्मिकाओं में व्यवस्थित होते हैं। ऐसी व्यवस्था को मैकरेल आकाश कहते हैं।

4. वृष्टि छाया – पश्चिमी घाट की सहयाद्रि पहाड़ियों द्वारा अरब सागर की आई हवा ऊपर उठने के लिए विवश करती है, जिससे ये फैलकर ठंडी हो जाती हैं और वर्षा करती हैं। वर्षण की मात्रा ढाल, पहाड़ी की ऊँचाई तथा वायुराशि के तापमान तथा इसमें मौजूद आर्द्रता पर निर्भर करती है। पर्वत के दूसरी ओर ऊपर से नीचे उतरती हवा जलविहीन होती है और इसीलिए किसी प्रकार की वर्षा नहीं होती।

अत: यह क्षेत्र शुष्क रहता है, जिसे वृष्टि छाया कहते हैं। वष्टि छाया वाले क्षेत्र महाद्वीपों के भीतरी भाग तथा उच्च अक्षांश निम्न वर्णन के क्षेत्र हैं, जहाँ वार्षिक वर्षण 50 सेमी से कम होता है। उष्णकटिबंध में स्थित महाद्वीपों के पश्चिमी भाग तथा शुष्क मरुस्थल इसी श्रेणी में आते हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट कीजिए

  1. विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा
  2. निरपेक्ष आर्द्रता एवं आपेक्षिक आर्द्रता
  3. वाष्पन एवं वाष्पन वाष्पोत्सर्जन
  4. ओस एवं पाला
  5. मेघ एवं कहरा
  6. संवहनीय वर्षा एवं चक्रवातीय वर्षा

उत्तर:
1. विशिष्ट ऊष्मा और गुप्त ऊष्मा में अंतर –
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2. निरपेक्ष आर्द्रता एवं आपेक्षिक आर्द्रता में अंतर –
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3. वाष्पन एवं वाष्पन वाष्पोत्सर्जन –
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4. ओस एवं पाला –
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5. मेघ एवं कोहरा में अंतर –
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6. संवहनीय वर्षा एवं चक्रवाती वर्षा में अंतर –
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प्रश्न 5.
विश्व में वर्षण के वितरण के प्रमुख लक्षणों तथा इन्हें नियंत्रित करने वा. कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वर्षण के मुख्य लक्षण भूमंडलीय दाब तथा पवन प्रणाली, स्थल एवं जल के वितर नथा उच्चावच लक्षणों के प्रकृति द्वारा समझाए जा सकते हैं –
1. उच्च अक्षांश सामान्यत: उच्च दाब रखते हैं, जिनका सम्बन्ध नीचे उतरती तथा अपसरिट होती हवाओं से है, और इसलिए यहाँ शुष्क दशा रहती है।

2. विषुवतीय निम्न दाब पट्टी, जहाँ हवाएँ अभिसरित होकर ऊपर उठती हैं, काफी वर्षा प्राप्त करती हैं। पवनों एवं दाब प्रणालियों के अतिरिक्त यहाँ की वायु की प्रकृति भी वर्षण की संभावना निर्धारित को में प्रमुख कारक है।

3. वर्षा के अक्षांशीय विभिन्नता के अतिरिक्त, स्थल एवं जल का वितरण भूमंडलीय वर्षा प्रतिरूप को जटिल बना देता है। मध्य अक्षांशों में स्थित स्थलीय भू-भाग कम वर्षा प्राप्त करते हैं।

4. पर्वतीय बाधाएँ भूमंडलीय पवन प्रणाली से अपेक्षित आदर्श वर्षा के प्रतिरूप को बदल देती हैं। पर्वतों के पवनाभिमुख ढाल खूब वर्षा

5. प्राप्त करते हैं, जबकि प्रतिपवन ढाल तथा इनके आस-पास के निम्न क्षेत्र वृष्टि छाया में आते हैं।

किसी स्थान की वर्षा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है –
1. तापमान – यदि संघनन O°C से ऊपर होता है तो होने वाला वर्षण, वर्षा के रूप में होता है।

2. जल की बूंदों के हवा से गुजरते समय वायुमंडल की दशा – यदि वर्षा की बूंदें नीचे गिरते समय ठंडी हवा परत से गुजरती हैं, तो ये जमकर बजरी का रूप ले लेती हैं। तड़ितझंझा की शक्तिशाली धाराओं में, जल बूंदें ऊपर की ओर हिमाशीतित तापमान पर ले जाई जाती हैं और ओले के रूप में गिरती हैं।

3. भूमध्य रेखा से दूरी – भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में अधिक गर्मी के कारण वर्षा अधिक होती है।

4. समुद्र से दूरी – तटवर्ती प्रदेशों में वर्षा अधिक होती है, परन्तु महाद्वीपों के भीतरी भागों में कम। समुद्र तल से ऊंचाई-पर्वतीय भागों में मैदानों की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है।

5. प्रचलित पवनें – सागर से आनेवाली पवनें वर्ष करती हैं, परन्तु स्थल से आने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

6. महासागरीय धाराएँ – उष्ण धाराओं के ऊपर से गुजरने वाली पवनें अधिक वर्षा करती हैं। इसलिए विपरीत, शीतल पवनों के ऊपर से गुजरने वाली पवनें शुष्क होती हैं।

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प्रश्न 6.
वायन तथा वाष्पोत्सर्जन की दर को नियंत्रित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिस प्रक्रिया के द्वारा तरल पदार्थ एवं जल-गैसीय पदार्थ जलवाष्प में बदल जाते हैं, उसे वाष्पीकरण अथवा वाष्पन कहते हैं। वाष्पीकरण की दर तथा परिणाम चार घटकों पर निर्भर करते हैं –

  1. शुष्कता – शुष्क वायु में जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है। आई वायु होने पर वाष्पीकरण की दर एवं मात्रा कम हो जाती है।
  2. तापमान – धरातल का तापक्रम बढ़ जाने से वाष्पीकरण बढ़ जाता है तथा ठंडे धरातल पर कम वाष्पीकरण होता है।
  3. वायु परिसंचरण – वायु संरचरण से वाष्पीकरण की मात्रा में वृद्धि होती है।
  4. जलखंड – विशाल जलखण्डों के ऊपर वाष्पीकरण स्थल की अपेक्षा अधिक होती है।

प्रश्न 7.
मेघ कैसे बनते हैं? औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों के तीन प्रकार बताइए।
उत्तर:
मुक्त वायु में, ऊंचाई पर, धूल कणों पर लदे जलकणों या हिमकणों या हिमकणों के समूह को मेघ कहते हैं। वायु के तापमान के ओसांक से नीचे गिरने पर बादल बनते हैं। वायु के ऊपर उठने तथा फैलने से उसका तापमान ओसांक से नीचे हो जाता है। इससे हवा में संघनन होता है। ये जलकण वायु में आर्द्रताग्राही कणों पर जमकर बादल बन जाते हैं। अधिकांश मेघ गर्म एवं आई वायु के ऊपर उठने से बनते हैं।

ऊपर उठती हवा फैलती है और जब तक ओसांक तक न पहुँच जाए, ठंडी होती जाती है और कुछ जलवाष्य मेघों के रूप में संघनित होते हैं। दो विभिन्न तापमान रखने वाली वायुराशियों के मिश्रण से भी मेघों की रचना होती है। मेघ-आधार की औसत ऊँचाई के आधार पर मेघों को तीन वर्गों में रखा गया है

  • उच्च स्तरीय मेघ – (6000 से 10000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-पक्षाभ, स्तरीय तथा कपासी मेघ।
  • मध्यम स्तरीय मेघ – (3000 से 6000 मीटर तक ऊँचे) जैसे-मध्य कपासी शिखर मेघ ।
  • निम्न स्तरीय मेघ – (3000 मीटर तक ऊँचे) जिनमें स्तरी कपासी मेघ, वर्षा स्तरी मेघ, कपासी मेघ, कपासी वर्षा मेघ शामिल हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन

Bihar Board Class 11 Biology पादप वृद्धि एवं परिवर्धन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वृद्धि, विभेदन, परिवर्धन, निर्विभेदन, पुनर्विभेदन, सीमित वृद्धि मेरिस्टेम तथा वृद्धि दर की परिभाषा दें।
उत्तर:
वृद्धि (Growth):
वृद्धि समस्त उपापचयी प्रक्रियाओं (उपचय तथा अपचय) का अन्तिम परिणाम है। इसमें पौधे के आकार एवं आयतन में परिवर्तनीय या चिरस्थायी वर्धन होता है। इसके साथ प्रायः शुष्क भार एवं जीवद्रव्य की मात्रा में भी वर्धन होता है।

विभेदन (Differentiation):
तने या जड़ के शीर्ष पर स्थित अग्रस्थ विभज्योतक (apical meristem) या एधा (cambium) कोशिका से बनने वाले कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित या विशिष्टीकृत हो जाती है। इस क्रिया को विभेदन (differentiation) कहते हैं।

परिवर्धन (Development):
बीज के अंकुरण से लेकर मृत्यु तक होने वाले समस्त परिवर्धन जिसके फलस्वरूप पौधे के जटिल शरीर का गठन होता है, जिससे जड़, तना, पत्तियाँ, फूल और फल बनते हैं, परिवर्धन के अन्तर्गत आते हैं। इन क्रियाओं को दो प्रमुख समूह में बाँट लेते हैं –
(क) वृद्धि तथा
(ख) विभेदन।

निर्विभेदन : (Dedifferentiation):
जीवित विभेदित स्थायी कोशिकाएँ जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता नहीं होती, उनमें से कुछ कोशिकाओं में पुन: विभाजन की क्षमता स्थापित हो जाती है। इस प्रक्रिया को निर्विभेदन (dedifferentiation) कहते हैं; जैसे-कॉर्क एधा, अन्तरापूलीय एधा।

पुनर्विभेदन (Redifferentiation):
निर्विभेदित कोशिकाओं या ऊतकों से बनी कोशिकाएँ अपनी विभाजन क्षमता पुन: खो देती है और विशिष्ट कार्य करने के लिए रूपान्तरित हो जाती है। इस प्रक्रिया को पुनर्विभेदन (redifferentiation) कहते है।

सीमित वृद्धि (Determinate Growth):
यह पौधों में वृद्धि का खुला स्वरूप होता है। यह पौधे के विभिन्न भागों में पाई जाती है। इसमें विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ पादप शरीर का गठन करती हैं, उसे सीमित वृद्धि कहते हैं।

मेरिस्टेम (Meristem):
जड़ तथा तने के शीर्ष पर स्थित कोशिकाओं का वह समूह जिनमें कोशिका विभाजन की क्षमता होती है, मेरिस्टेम (meristem) कहलाता है। इससे स्थायी ऊतक तथा अन्तर्विष्ट एवं पार्श्व मेरिस्टेम (intercalary & lateral meristem) का निर्माण होता है।

वृद्धि दर (Growth Rate):
समय की प्रति इकाई के दौखन बढ़ी हुई वृद्धि को वृद्धि दर (growth rate) कहते हैं। वृद्धि दर को गणितीय ढंग से (mathematically) व्यक्त किया जा सकता है। एक जीव या उसके अंग विभिन्न तरीकों से कोशिकाओं का निर्माण कर सकते हैं।

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प्रश्न 2.
पुष्पित पौधों के जीवन में किसी एक प्राचालिक (parameter) से वृद्धि को वर्णित नहीं किया जा सकता है, क्यों?
उत्तर:
वृद्धि के प्राचालिक (Parameter of Growth):
वृद्धि सभी जीवधारियों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। पौधों में वृद्धि कोशिका विभाजन, कोशिका विवर्धन या दीर्धीकरण तथा कोशिका विभेदन के फलस्वरूप होती है।

पौधे के मेरिस्टेम कोशिकाओं (meristematic cells) में कोशा विभाजन की क्षमता पाई जाती है। सामान्तया कोशिका विभाजन जड़ तथा तने के शीर्ष (apex) पर होता है। इसके फलस्वरूप जड़ तथा तने की लम्बाई में वृद्धि होती है। एधा (cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है।

इसे द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth) कहते हैं। कोशिकीय स्तर पर वृद्धि मुख्यतः जीवद्रव्य मात्रा में वर्धन का परिणाम है। जीवद्रव्य की बढ़ोत्तरी या वर्धन का मापन कठिन है। वृद्धि पर मापन के कुछ मापदण्ड हैं – ताजे भार में वृद्धि, शुष्क भार में वृद्धि, लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन तथा कोशिका संख्या में वृद्धि आदि।

मक्का की जड़ का अग्रस्थ मेरिस्टेम प्रति घण्टे लगभग 17,500 कोशिकाओं का निर्माण करता है। तरबूज की कोशिका के आकार में लगभग 3,50,000 गुना वृद्धि हो सकती है। पराग नलिका की लम्बाई में वृद्धि होने से यह वर्तिकाग्र, वर्तिका से होती हुई अण्डाशय में स्थित बीजाण्ड में प्रवेश करती है।

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प्रश्न 3.
संक्षिप्त वर्णित करें –
(अ) अंकगणितीय वृद्धि
(ब) ज्यामितीय वृद्धि
(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र
(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर।
उत्तर:
(अ) अंकगणितीय वृद्धि (Arithmetic Growth):
समसूत्री विभाजन के पश्चात् बनने वाली दो संतति कोशिकाओं में से एक कोशिका निरन्तर विभाजित होती रहती है और दूसरी कोशिका विभेदित एवं परिपक्व होती रहती है।

अंकगणितीय वृद्धि को हम निश्चित दर पर वृद्धि करती जड़ में देख सकते हैं। यह एक सरलतम अभिव्यक्ति होती है। चित्र में वृद्धि (लम्बाई) समय के विरुद्ध आलेखित की गई है। इसके फलस्वरूप रेखीय वक्र (linear curve) प्राप्त होता है। इस वृद्धि को हम गणितीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं –
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चित्र – नियत रेखीय वृद्धि (लम्बाई) और समय के विरुद्ध आलेख।
L1 = L0 + rt
(L1 = समय ‘t’ पर लम्बाई,
L0 = समय ‘O’ पर लम्बाई
r = वृद्धि दर। दीर्धीकरण प्रति इकाई समय में)

(ब) ज्यामितीय वृद्धि (Geometrical Growth):
एक कोशिका की वृद्धि अथवा पौधे के एक अंग की वृद्धि अथवा पूर्ण पौधे की वृद्धि सदैव एकसमान नहीं होती। प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (initial lag chase) में वृद्धि की दर पर्याप्त धीमी होती है। तत्पश्चात् यह दर तीव्र हो जाती है और उच्चतम बिन्दु (maximum point) तक पहुँच जाती है। इसे मध्य तीव्र वृद्धि काल (middle logarithmic phase) कहते हैं। इसके पश्चात् यह दर धीरे-धीरे कम होती जाती है और अन्त –
Bihar Board Class 11 Biology Chapter 15 पादप वृद्धि एवं परिवर्धन
चित्र – (A) अंकगणितीय और (B) ज्यामितिक वृद्धि, (C) भ्रूण विकास के समय अंकगणितीय और ज्यामितिक वृद्धि।

में स्थिर हो जाती है। इसे अन्तिम धीमा वृद्धि काल (last stationary phase) कहते हैं। इसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं। इनमें सूत्री विभाजन से बनी दोनों संतति कोशिकाएँ एक समसूत्री कोशिका विभाजन का अनुकरण करती हैं और इसी प्रकार विभाजित होने की क्षमता बनाए रखती हैं।

यद्यपि सीमित पोषण आपूर्ति के साथ वृद्धि दर धीमी होकर स्थिर हो जाती है। समय के प्रति वृद्धि दर को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्मॉइड वक्र (Sigmoid curve) प्राप्त होता है। यह ‘S’ की आकृति का होता है। ज्यामितीय वृद्धि (geometrical growth) को गणितीय रूप से निम्नलिखित प्रकार व्यक्त कर सकते हैं –
W1 = \(W_{0}^{e n}\)
जहाँ (W1 = अन्तिम आकार – भार, ऊँचाई, संख्या आदि
W0 = प्रारम्भिक आकार, वृद्धि के प्रारम्भ में
r = वृद्धि दर (सापेक्ष वृद्धि दर)
t = समय में वृद्धि
e = स्वाभाविक लघुगणक का आधार (base of natural logarithms)
r = एक सापेक्ष वृद्धि दर है। यह पौधे द्वारा नई पादप सामग्री का निर्माण क्षमता को मापने के लिए है, जिसे एक दक्षता सूचकांक (efficiency index) के रूप में संदर्भित किया जाता है; अत: W1 का अन्तिम आकार W0 के प्रारम्भिक आकार पर निर्भर करता है।

(स) सिग्मॉइड वृद्धि वक्र (Sigmoid Growth Curve):
ज्यामितिक वृद्धि को तीन प्रावस्थाओं में विभक्त कर सकते हैं –

  • प्रारम्भिक धीमा वृद्धि काल (Initial lag phase)
  • मध्य तीव्र वृद्धि काल (Middle lag phase)
  • अन्तिम धीमा वृद्धि काल (Last stationary phase)
  • यदि वृद्धि दर का समय के प्रति ग्राफ बनाएं तो ‘S’ की आकृति का वक्र प्राप्त होता है। इसे सिग्मॉइड वृद्धि वक्र कहते है।

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(द) सम्पूर्ण एवं सापेक्ष वृद्धि दर (Absolute and Relative Growth Rate):

  • मापन और प्रति यूनिट समय में कुल वृद्धि को सम्पूर्ण या परम वृद्धि दर (absolute growth rate) कहते हैं।
  • किसी दी गई प्रणाली की प्रति यूनिट समय में वृद्धि को सामान्य आधार पर प्रदर्शित करना सापेक्ष वृद्धि दर (relative growth rate) कहलाता है।

चित्र – सम्पूर्ण और सापेक्ष वृद्धि दर। पत्ती A तथा B को देखें। दोनों ने अपने क्षेत्रफल दिए गए समय में A से A’ और B से B’ तक 5 सेमी-2 बढ़ा लिए हैं। दोनों पत्तियों ने एक निश्चित समय में अपने सम्पूर्ण क्षेत्रफल में समान वृद्धि की है, फिर भी A की सापेक्ष वृद्धि दर अधिक है।

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प्रश्न 4.
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामकों के पाँच मुख्य समूहों के बारे में लिखिए। इनके आविष्कार, कार्यिकी प्रभाव तथा कृषि/बागवानी में इनके प्रयोग के बारे में लिखिए।
उत्तर:
प्राकृतिक पादप वृद्धि नियामक (Natural Plant Growth Regulators):
पौधों की विभज्योतकी कोशिकाओं (Meristematic cells) और विकास करती पत्तियों एवं फलों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले विशेष कार्बनिक यौगिकों को पादप हार्मोन्स (Phytohormones) कहते हैं।

ये अति सूक्ष्म मात्रा में परिवहन के पश्चात् पौधों के अन्य अंगों (भागों) में पहुँचकर वृद्धि एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित एवं नियन्त्रित करते हैं। अनेक कृत्रिम कार्बनिक यौगिक में पादप हार्मोन्स की तरह कार्य करते हैं। वेण्ट (Went 1928) के अनुसार वृद्धि नियामक पदार्थों के अभाव में वृद्धि नहीं होती।

पादप हार्मोन्स को हम निम्नलिखित पाँच प्रमुख समूहों में बाँट लेते हैं –

  1. ऑक्सिन (Auxins)
  2. जिबरेलिन (Gibberellins)
  3. सायटोकाइनिन (Cytokinins)
  4. ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)
  5. एथिलीन (Ethylene)

1. ऑक्सिन (Auxins):
सर्वप्रथम डार्विन (Darwin, 1880) ने देखा कि कैनरी घास (Phalaris canariensis) के नवोद्भिद् के प्रांकुर चोल (coleoptile) एक तरफा प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं, परन्तु प्रांकुर चोल के शीर्ष को काट देने पर यह एक तरफा प्रकाश की ओर नहीं मुड़ता।
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चित्र – प्रांकुर चोल को पार्श्व दिशा से एकतरफा प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ता है।

बायसेन:
जेन्सन (Boysen-Jensen 1910-1913) ने कटे हुए प्राकुंर चोल को अगार (agar) के घनाकार टुकड़े पर रखा, कुछ समय पश्चात् अगार के घनाकार टुकड़े को कटे हुए प्रांकुर चोल के स्थान पर रखने के पश्चात् एकतरफा प्रकाश से प्रकाशित करने पर प्रांकुर चोल प्रकाश की ओर मुड़ जाता है। वेण्ट (Went, 1928) ने इसी प्रकार के प्रयोग जई (Avena sativa) के नवोद्भिद् पर किए।

उन्होंने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला की प्रांकुर चोल के शीर्ष पर बना रासायनिक पदार्थ अगार के टुकड़ों (block) में आ गया था। वेण्ट ने प्रांकुर चोल के कटे हुए शीर्ष को दो अगार के टुकड़ों पर रखा जिनके मध्य अभ्रक (माइका) की पतली प्लेट लगी थी, एकतरफा प्रकाश डालने पर रासायनिक पदार्थ के 65% भाग अप्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र हो जाता है और केवल 35% रासायनिक पदार्थ प्रकाशित दिशा के टुकड़े में एकत्र होता है।

वेण्ट ने इस रासायनिक पदार्थ को ऑक्सिन (auxin) नाम दिया। ऑक्सिन की सान्द्रता तने में वृद्धि को प्रेरित करती है और जड़ में वृद्धि का संदमन करती है। ऑक्सिन के असमान वितरण के फलस्वरूप ही प्रकाशानुवर्तन (phototropism) और गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) गति होती है। केनेथ थीमान (Kenneth Thimann) ने ऑक्सिन को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इसकी आण्विक संरचना ज्ञात की।
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चित्र – वेण्ट द्वारा जई के प्रांकुर चोल के शीर्ष पर किया गया प्रयोग।

ऑक्सिन के कार्यिकी प्रभाव एवं उपयोग (Physiological effects & Uses of Auxins):

1. प्रकाशानुवर्तन एवं गुरुत्वानुवर्तन (Phototropism and Geotropism):
ऑक्सिन की अधिक मात्रा तने के लिए वृद्धिवर्धक (promotional) तथा जड़ के लिए वृद्धिरोधक (inhibition) प्रभाव रखती है।

2. शीर्ष प्रभाविता (Apical dominance):
सामान्तया पौधों के तने या शाखाओं के शीर्ष पर स्थित कलिका से स्रावित ऑक्सिन पाश्वीय कक्षस्थ कलिकाओं की वृद्धि का संदमन (inhibition) करते हैं। शीर्ष कलिका को काट देने से पाश्र्वीय कलिकाएँ शीघ्रता से वृद्धि करती है। चाय बागान में तथा चाहरदीवारी के लिए प्रयोग की जाने वाली हैज को निरन्तर काटते रहने से झाड़ियाँ घनी होती हैं।

3. विलगन (Abscission):
परिपक्व, पत्तियाँ, पुष्प और फल विलगन पर्त के बनने के कारण पौधे से पृथक् हो जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IAA, IBA की विशेष सान्द्रता का छिड़काव करके अपरिपक्व फलों के विलयन को रोका जा सकता है। इससे फलों का उचित मूल्य प्राप्त होगा।

4. अनिषेकफलन (Parthenocarpy):
अनेक फलों में बिना परागण और निषेचन के भी फल का विकास हो जाता है; जैसे-अंगूर, केला, सन्तरा आदि में। ये फल बीजरहित होते हैं। ऑक्सिन का वर्तिकान पर लेपन करने से बिना निषेचन के फल विकसित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया को अनिषेकफलन कहते हैं। बीजरहित फलों में खाने योग्य पदार्थ की मात्रा अधिक होती है।

5. खरपतवार निवारण (Weed Destruction):
खेतों में प्रायः अनेक जंगली पौधे उग आते हैं, इन्हें खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करके पैदावार को प्रभावित करते हैं। परम्परागत तरीके से निराई-गुड़ाई, फसल चक्र अपनाकर खरपतवार नियन्त्रण किया जाता है। 2, 4-D नामक संश्लेषी ऑक्सिन का उपयोग करके एकबीजपत्री फसलों में उगने वाले द्विबीजपत्री खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।

6. कटे तनों पर जड़ निभेदन (Root differentiation on Stem cutting):
अनेक पौधों में कलम लगाकर नए पौधे तैयार किए जाते हैं। ऑक्सिन; जैसे – IBA का उपयोग कलम के निचले सिरे पर करने से जड़ें शीघ्र निकल आती है। अतः ऑक्सिन का उपयोग मुख्यतया सजावटी पौधों को तैयार करने में किया जाता है।

7. प्रसुप्तता नियन्त्रण (Control of Dormancy):
आलू के कन्द तथा अन्य भूमिगत भोजन संचय करने वाले भागों की प्रसुप्त कलिकाओं के प्रस्फुटन को रोकने के लिए इन्हें कम ताप पर संगृहीत किया जाता है। ऑक्सिन का छिड़काव करके इन्हें सामान्य ताप पर संगृहीत किया जा सकता है। ऑक्सिन कलिकाओं के लिए वृद्धिरोधक का कार्य करते हैं।

8. जिबरेलिन (Gibberellins):
धान की फसल में बैकेन (फूलिश सीडलिंग – foolish seedling) नामक रोग एक कवक जिबेरेल फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) से होता है। इसमें पौधे अधिक लम्बे, पत्तियाँ पीली लम्बी और दाने छोटे होते हैं।

कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने प्रमाणित किया कि यदि कवक द्वारा स्रावित रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का जाए तो स्वस्थ पौधा भी रोगी हो जाता है। याबुता और हयाशी (Yabuta and Hayashi, 1939) ने कवक रस से वृद्धि नियामक पदार्थ को पृथक् किया, इसे जिबरेलिन – A3 (GA) नाम दिया गया। सबसे पहले खोजा गया जिबरेलिन – A3 है। अब तक लगभग 110 प्रकार के GA खोजे जा चुके हैं।

जिबरेलिन का पादप कार्यिकी पर प्रभाव एवं कृषि या बागवानी में महत्त्व (Physiological Effects and Importance of Gibberellins in Agriculture & Horticulture):

I. लम्बाई बढ़ाने की क्षमता (Efficiency of inrease the length):
जिबरेलिन के प्रयोग से आनुवंशिक रूप से बौने पौधे लम्बे हो जाते हैं, लेकिन यह लक्षण उन्हीं पौधों तक सीमित रहता है जिन पर GA का छिड़काव किया जाता है। GA के उपयोग से सेब जैसे फल लम्बे हो जाते हैं। अंगूर के डंठल की लम्बाई बढ़ जाती है। गन्ने की खेती पर GA छिड़कने से तनों की लम्बाई बढ़ जाती है। इससे फसल का उत्पादन 20 टन प्रति एकड़ बढ़ जाता है।

II. पुष्यन पर प्रभाव (Effect of Flowering):
कुछ पौधों को पुष्पन हेतु कम ताप तथा दीर्घ प्रकाश अवधि (long photoperiod) की आवश्यकता होती है। यदि इन पौधों पर GA का छिड़काव किया जाए तो पुष्पन सुगमता से हो जाता है। द्विवर्षी पौधे एकवर्षी पौधों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। GA के इस प्रभाव को बोल्टिंग प्रभाव (Bolting effect) कहते हैं। इसका उपयोग चुकन्दर, गाजर, मूली, पत्तागोभी आदि के पुष्पन के लिए किया जाता है।

(i) अनिषेकफलन (Parthenocarphy):
GA के छिड़काव से पुष्प से बिना निषेचन के फल बन जाता है। फल बीजरहित होते हैं।

(ii) जीर्णता या जरावस्था (Senescence):
GA फलों को जल्दी गिरने से रोकने में सहायक होते हैं।

(iii) बीजों का अंकुरण (Seeds Germination):
GA बीजों के अंकुरण को प्रेरित करते हैं।

(iv) पौधों की परिपक्वता (Maturity of Plants):
GA का छिड़काव करने से अनावृत्तबीजी (gymnosperm) पौधे शीघ्र परिपक्व होते हैं और बीज जल्दी तैयार हो जाता है।

III. सायटोकाइनिन (Cytokinin):
सायटोकाइनिन (Cytokinin) – सायटोकायनिन ऑक्सिन की सहायता से कोशिका विभाजन को उद्दीपित करते हैं। एफ० स्कूग (E Skoog) तथा उसके सहयोगियों ने देखा कि तम्बाकू के तने के अन्तस्पर्व खण्ड से अविभेदित कोशिकाओं का समूह तभी बनता है, जब माध्यम में आक्सिन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन नामक बढ़ावा देने वाला तत्व मिलाया गया। इसका नाम काइनेटिन रखा। लेथम तथा सहयोगियों ने मक्का के बीज से ऐसा ही पदार्थ प्राप्त करके इसका नाम जिएटिन (zeatin) रखा। काइनेटिन और जिएटिन सायटोकाइनिन ही है।

सायटोकाइनिन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Cytokinin):

  • ये पदार्थ कोशिका विभाजन को प्रेरित करते हैं।
  • ये जीर्णता (senescence) को रोकते हैं।
  • कोशिका विभाजन के अतिरिक्त सायटोकाइनिन पौधों के अगों के निर्माण को नियन्त्रित करते हैं।

यदि तम्बाकू की कोशिकाओं का संवर्धन शर्करा तथा खनिज लवणयुक्त माध्यम में किया जाए तो केवल कैलस (callus) ही विकसित होता है। यदि माध्यम में सायटोकाइनिनि और ऑक्सिन का अनुपात बदलता रहे तो जड़ अथवा प्ररोह का विकास होता है। संवर्धन के प्रयोग आनुवंशिक इन्जीनियरी के लिए लाभदायक हैं; क्योंकि नई किस्म के पौधे उत्पन्न करने में कोशिका संवर्धन लाभदायक हैं।

IV. ऐब्सीलिक अम्ल (Abscisic Acid : ABA):
कार्स एवं एडिकोट ने कपास के पौधे की पुष्पकलिकाओं से एक पदार्थ ऐब्सीसिन (abscisin) प्राप्त किया। इस पदार्थ को किसी पौधे पर छिड़कने से पत्तियों का विलगन हो जाता है।

वेयरिंग (Wareing, 1963) ने एसर की पत्तियों से डॉरमिन (dormin) प्राप्त किया, यह बीजों के अंकुरण और कलिकाओं की वृद्धि का अवरोधन करता है। इन दोनों पदार्थों को ऐब्सीसिक अम्ल कहा गया।

ऐब्सीसिक अम्ल का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Abscisic Acid):

(i) विलगन (Abscission):
यह पत्तियों के विलगन को प्रेरित करता है।

(ii) कलिकाओं की वृद्धि एरं बीजों का अंकुरण (Growth of buds and germination of seeds):
यह कलिकाओं की वृद्धि और बीजों के अंकुरण को रोकता है।

(iii) जीर्णता (Senescence):
यह जीर्णता को प्रेरित करता है।

(iv) वाष्पोत्सर्जन नियन्त्रण (Control of Transpiration):
यह रन्ध्रों को बन्द करके वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करता है। इसका उपयोग कम जल वाली भूमि में खेती करने के लिए उपुयक्त है।

(v) कन्द निर्माण (Tuber Formation):
आलू में कन्द निर्माण में सहायता करता है।

(vi) कोशिकाविभाजन एवं कोशिका दीर्धीकरण (Cell division and Cell Elongation):
ऐब्सीसिक अम्ल कोशिका विभाजन तथा कोशिका दीर्धीकरण को अवरुद्ध करता है। ऐब्सीसिक अम्ल बीजों को प्रसुप्ति के लिए प्रेरित करने और शुष्क परिस्थितियों में पौधे का बचाव करता है।

V. एथिलीन (Ethylene):
बर्ग (Burge, 1962) ने एथिलीन को पादप हार्मोन सिद्ध किया। यह मुख्यत: पकने वाले फलों से निकलने वाला गैसीय हार्मोन होता है।

एथिलीन का कार्यिकी प्रभाव एवं महत्त्व (Physiological Effect and Importance of Ethylene):

(i) पुष्पन (Flowering):
यह सामान्यतया पुष्पन को कम करता है, लेकिन अनन्नास में पुष्पन को प्रेरित करता है।

(ii) विलगन (Abscission):
यह पत्ती, पुष्प तथा फलों के विलगन को तीव्र करता है।

(iii) पुष्प परिवर्तन (Flower Modification):
कुकरबिटेसी कुल के पौधों में एथिलीन नर पुष्पों की संख्या को कम करके मादा पुष्पों की संख्या को बढ़ाता है।

(iv) फलों का पकना (Fruit Ripening):
यह फलों को पकाने में सहायक होता है। (आम, केला, अंगूर आदि फलों को पकाने के लिए इथेफोन (ethephon) का प्रयोग औद्योगिक स्तर पर किया जा रहा है। इससे पके फल प्राकृतिक रूप से पके फलों के समान होते हैं। इथेफोन से एथिलीन गैस निकलती है।

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प्रश्न 5.
दीप्तिकालिता तथा वसन्तीकरण क्या है? इनके महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
दीप्तिकालिता (Photoperiodism):
पौधों के फलने-फूलने, वृद्धि, पुष्पन आदि पर प्रकाश की अवधि (photoperiod) का प्रभाव पड़ता है। पौधों द्वारा प्रकाश की अवधि तथा समय के प्रति अनुक्रिया को दीप्तिकालिता (photoperiodism) कहते हैं। (अथवा) दिन व रात के परिवर्तनों के प्रति कार्यात्मक अनुक्रियाएँ दीप्तिकालिता कहलाती है। दीप्तिकालिता शब्द का प्रयोग गार्नर तथा एलार्ड (Garmer and Allard, 1920) ने किया।

(क) दीप्तिकालिता के आधार पर पौधों को मुख्य रूप से तीन समूहों में बाँट लेते हैं –

  • अल्प प्रदीप्तकाली पौधा (Short day plant)
  • दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा (Long day plant)
  • तटस्थ प्रदीप्तकाली पौधा (Photo neutral plant)

अल्प प्रदीप्तकाली पौधो को मिलने वाली प्रकाश अवधि को कम करके और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों को अतिरिक्त प्रकाश अवधि प्रदान करके पुष्पन शीघ्र कराया जा सकता है।

(ख) कायिक शीर्षस्थ या कक्षस्थ कलिका उपयुक्त प्रकाश अवधि प्राप्त होने पर ही पुष्प कलिका में रूपान्तरित होती है। यह परिवर्तन फ्लोरिजन (florigen) हॉर्मोन के कारण होता है जो दिन और रात्री के अन्तराल के कारण संश्लेषित होता है।

वसन्तीकरण (Varnalization):
कम ताप काल में पुष्पन को प्रोत्साहन वसन्तीकरण कहलाता है। कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक या मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत्त होने पर निर्भर करता है। इस गुण को वसन्तीकरण कहते हैं। वसन्तीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम टी० डी० लाइसेन्को (T.D. Lysenko, 1928) ने किया था।

गेहूँ की शीत प्रजाति को वसन्तु ऋतु में बोने योग्य बनाने के लिए इसके भीगे बीजों को 10-12 दिन तक 3°C ताप पर रखते हैं और फिर वसन्ती गेहूँ के साथ बोने से यह बसन्ती गेहूँ के साथ ही पककर तैयार हो जाता है। पौधों में कायिक वृद्धि कम होती है।

कम ताप पर उपचार से पौधे की कायिक अवधि कम हो जाती अनेक द्विवर्षी पौधों को कम तापक्रम में अनावृत कर दिए जाने से पौधों में दीप्तिकालिता के कारण पुष्पन की अनुक्रिया बढ़ जाती है। वसन्तीकरण के फलस्वरूप द्विवर्षी पौधों में प्रथम वृद्धिकाल में ही पुष्पन किया जा सकता है। पौधों में शीत के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है। वसन्तीकरण द्वारा पौधों को प्राकृतिक कुप्रभावों; जैसे-पाला, कुहरा आदि से बचाया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
ऐब्सीसिक एसिड को तनाव हॉर्मोन कहते हैं क्यों?
उत्तर:
ऐब्सीसिक अम्ल वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए बाह्य त्वचीय रन्ध्रों को बन्द करने के लिए प्रोत्साहित करत है। वह विपरीत परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के तनावों को सहन करने में सहायक होता है, इस कारण इसे तनाव हॉर्मोन
कहते हैं।

प्रश्न 7.
उच्च पादपों में वृद्धि एवं विभेदन खुला होता है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
पौधों में वृद्धि एवं विभेदन भी उन्मुक्त होता है। विभज्योतक से उत्पन्न कोशिकाएँ/ऊतक परिपक्व होने पर भिन्न-भिन्न संरचनाएँ बनती हैं। कोशिका/ऊतक की परिपक्वता के समय अन्तिम संरचना कोशिका के आन्तरिक स्थान पर भी निर्भर करती है; जैसे – मूल के शीर्ष पर स्थित विभज्योतक से मूलगोप कोशिकाएँ, परिधि की ओर मूलीय त्वचा के रूप में विभेदित होती है।

इसी प्रकार कुछ कोशिकाएँ जाइलम, फ्लोएम, परिरम्भ, वल्कुट आदि के रूप में विभेदित होती है। इसी प्रकार प्ररोह शीर्ष पर स्थित विभज्योतक विभिन्न कोशिकाओं/ऊतकों और अंगों के रूप में विभेदित होती है। इस प्रकार विभज्योतक की क्रियात्मकता से पौधे के शरीर की विभिन्न कोशिकाओं, ऊतक और अंगों के निर्माण को वृद्धि का खुला स्वरूप कहा जाता है।

प्रश्न 8.
अल्प प्रदीप्तकाली पौधे और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधे किसी एक स्थान पर साथ-साथ फूलते हैं। विस्तृत व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अल्प प्रदीप्तकाली पौधों (short day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिस पर या इससे कम प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे अधिक प्रकाश अवधि में पौधा पुष्प उत्पन्न नहीं कर सकता।

दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों (long day plants) में निर्णायक दीप्तिकाल प्रकाश की वह अवधि है जिससे अधिक प्रकाश अवधि पर पौधे पुष्प उत्पन्न करते हैं, परन्तु उससे कम प्रकाश अवधि मे पुष्प उत्पन्न नहीं होते। अतः अल्प प्रदीप्तकाली पौधों और दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधों में विभेदन उनमें निर्णायक दीप्तिकाल से कम अवधि पर पुष्पन होना अथवा अधिक अवधि पर पुष्प उत्पन्न होने के आधार पर किया जाता है।

दो जातियों के पौधे समान अवधि के प्रकाश में पुष्प उत्पन्न करते हैं; उनमें से एक अल्प प्रदीप्तकाली पौधा तथा दूसरा दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा हो सकता है; जैसे – जैन्थियम (Xanthium) का निर्णायक दीप्तिकाल 15\(\frac{1}{2}\) घण्टे हैं और हाइओसायमस नाइजर (Hyoscyamus niger) का निर्णायक दीप्तिकाल 11 घण्टे है।

दोनों पौधे 14 घण्टे की प्रकाशीय अवधि में पुष्प उत्पन्न कर सकते हैं। इस आधा पर जैन्थियम अल्प प्रदीप्तकाली पौधा है क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल से कम प्रकाशीय अवधि में पुष्पन करता है तथा हाइओसायमस नाइजर दीर्घ प्रदीप्तकाली पौधा है; क्योंकि यह निर्णायक दीप्तिकाल में अधिक प्रकाश अवधि में पुष्पन करता है।

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प्रश्न 9.
अगर आपको ऐसा करने को कहा जाए तो एक पादप वृद्धि नियामक नाम दीजिए –
(क) किसी टहनी में जड़ पैदा करने हेतु
(ख) फल को जल्दी पकाने हेतु
(ग) पत्तियों की जरावस्था को रोकने हेतु
(घ) कक्षस्थ कलिकाओं में वृद्धि कराने हेतु
(ङ) एक रोजेट पौधे में वोल्ट हेतु
(च) पत्तियों के रन्ध्र को तुरन्त बन्द करने हेतु।
उत्तर:
(क) ऑक्सिन (Auxins)
(ख) एथिलीन (Ethylene)
(ग) सायटोकाइनिन (Cytokinins)
(घ) सायटोकाइनिनि (Cytokinins)
(ङ) जिबरेलिन (Gibberellins)
(च) ऐब्सीसिक अम्ल (Abscisic acid)।

प्रश्न 10.
क्या एक पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया कर सकता है? यदि हाँ या नहीं तो क्यों?
उत्तर:
पौधों में पुष्पन क्रिया प्रतिदिन उपलब्ध प्रकाश अवधि (Photoperiod) से प्रभावित होती है। पर्णहरित पादप दीप्तिकालिता के चक्र से अनुक्रिया नहीं करता, क्योंकि पौधे की पत्तियाँ ही प्रकाश को ग्रहण करने की क्षमता रखती हैं। पत्तियों में एक प्रेरक हॉर्मोन फ्लोरिजन (florigen) उत्पन्न होता है। इसकी निश्चित मात्रा पुष्पन को प्रभावित करती है। प्लोरिजन के अभाव में पुष्पन नहीं होता।

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प्रश्न 11.
क्या हो सकता है, अगर –
(क) जी ए3 (GA3) को धान के नवोद्भिद् पर दिया जाए।
(ख) विभाजित कोशिका विभेदन करना बन्द कर दें।
(ग) एक सड़ा फल कच्चे फलों के साथ मिला दिया जाए।
(घ) अगर आप संवर्धन माध्यम में साइटोकाइनिन्स डालना भूल जाएँ।
उत्तर:
(क) नवोद्भिद् पादप GA3 के प्रभाव में अधिक लम्बे हो जाते हैं। इनकी पत्तियाँ पीली और लम्बी हो जाती हैं। इस लक्षण को बैकेन (फूलिश सीडलिंग) रोग कहते हैं।
(ख) अविभेदित कोशिकाओं का समूह बन जाएगा।
(ग) सड़े फल से एथिलीन हॉर्मोन निकलता है, जिसके प्रभाव से कच्चे फल जल्दी पक जाएँगे।
(घ) सायटोकाइनिन्स मिलाने से अविभेदित कैलस में प्ररोह तथा जड़ का विकास हो जाता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
यदि धरातल पर वायुदाब 1000 मिलीबार है तो घरातल से 1किमी की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(क) 700 मिलीबार
(ख) 900 मिलीबार
(ग) 1100 मिलीबार
(घ) 1300 मिलीबार
उत्तर:
(ख) 900 मिलीबार

प्रश्न 2.
अंतर ऊष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(क) भूमध्य रेखा के निकट
(ख) कर्क रेखा के निकट
(ग) मकर रेखा के निकट
(घ) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर:
(क) भूमध्य रेखा के निकट

प्रश्न 3.
उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(क) घड़ी की सुईयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(ग) समदाब रेखाओं के समकोण पर
(घ) समदाब रेखाओं के सामानंतर
उत्तर:
(ख) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

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प्रश्न 4.
वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है?
(क) विषुवतीय वन
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग
(ग) हिमालय पर्वत
(घ) दक्कन पठार न पठार
उत्तर:
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में कौन सा बल अथवा प्रभाव भूमंडलीय पवनों को विक्षेपित करता है? [B.M.2009A]
(क) दाब प्रवलता
(ख) अभिकेंद्रीय लक्षण
(ग) कोरियोलीसि
(घ) भू-घर्षण
उत्तर:
(ख) साइबेरिया का मैदानी भाग

प्रश्न 6.
सामान्यतः कितनी ऊंचाई पर 1°C तापमान घट जाता है?
(क) 65 मी०
(ख) 165 मी०
(ग) 500 मी०
(घ) 1000 मी०
उत्तर:
(ख) 165 मी०

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर:
वायुदाब मापने की इकाई मिलीबार है। व्यापक रूप से प्रयोग की जानेवाली इकाई किलो पास्कल है जिसे (hpa) लिखा जाता है। दाब ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने के लिए और तुलनात्मक बनाने के लिए, वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्र तल के स्तर पर घटा लिया जाता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 2.
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोषण उच्च दाब से विषुवत् वृत की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी-पूर्वी क्यों होती हैं?
उत्तर:
पृथ्वी का अपने पक्ष पर घूर्णन पवनों को दिशा को प्रभावित करता हैं। इसे कोरिआलिस बल कहा जाता है। इसके प्रभाव से पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्द्ध में अपने बाईं तरफ विक्षेपित (deflect) हो जाती हैं। कोरिआलिस प्रभाव दाब प्रणवता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणताबल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। जितनी दाब प्रवणता अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी।

प्रश्न 3.
भूविक्षेपी पवनें (Geotrophic winds) क्या हैं?
उत्तर:
पृथ्वी की सतह से 2-3 किमी की ऊँचाई पर ऊपरी वायुमण्डल में पवने धरातलीय घर्षण के प्रभाव से मुक्त होती है तथा दाब प्रवणता तथा कोरिआलिस प्रभाव से नियंत्रित होती हैं। जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, दाब प्रवणता बल कोरिआलिसि प्रभाव से संतुलित हो जाता है और फलस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानांतर बहती हैं। यह पवनें भूविक्षेपी (Geotrophic wind) पवनों के नाम से जानी जाती हैं।

प्रश्न 4.
समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर:
ऊष्मा के अवशेषण के स्थल व समुद्र में भिन्नता पाई जाती है। दिन के दौरान स्थल भाग शीघ्र गर्म हो जाते हैं और समुद्र की अपेक्षा अधिक ताप ग्रहण करते हैं। अतः स्थल पर हवाएँ ऊपर उठती हैं और न्यून दाब क्षेत्र बनता है, जबकि समुद्र अपेक्षाकृत ठण्डे रहते हैं और उन पर उच्च वायुदाब बना रहता है। इससे समुद्र से स्थल की ओर दाब प्रवणता उत्पन्न होती है और पवनें समुद्र से स्थल की तरफ समुद्र समीर के रूप में प्रवाहित होती हैं। रात्रि में इसके एकदम विपरीत प्रक्रिया होती है। स्थल समुद्र की अपेक्षा जल्दी ठण्डा होता है। दाब प्रवणता स्थल से समुद्र की तरफ होने पर स्थल समीर प्रवाहित होती है।

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प्रश्न 5.
पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पवनों की दिशा एवं गति को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं –

  1. दाब प्रवणता बल
  2. कोरिऑक्तिस प्रभाव
  3. अभिकेन्द्रीय त्वरण
  4. भू-घर्षण

1. दाब प्रवणता बल – क्षैतिज वायुदाब के अंतर के कारण वायु में गति आती है। दो स्थानों के बीच में दाब प्रणवता जितनी अधिक होगी वायु उतनी ही तीव्र गति से चलेगी। वायु उच्च भार वाले क्षेत्र से निम्न भार वाले क्षेत्र की ओर चलती है।

2. कोरीऑलेस प्रभाव – पृथ्वी के घूर्णनगति के कारण वायु अपनी मूल दिशा से विक्षेपित हो जाती है जिसे कोरिऑलिस बल कहा जाता है। इस बल के कारण उत्तरार्द्ध में पवन दाहिने और दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड जाती हैं जिसे फेटेल का नियम भी कहा जाता है। यह बल भूमध्य रेखा पर शुन्य है जबकि ध्रुवों पर अधिक हो जाता है। यह बल की दिशा में परिवर्तन करता है न कि वायु की दिशा को।

3. अभिकेन्द्रीय त्वरण – भ्रमणशील पृथ्वी के घूर्णन केंद्र की दिशा में वायु के अंदर होनें वाले त्वरण के कारण ही पवन हेतु स्थानीय उच्च या न्यून वायु दाब चारों ओर फैल जाता है।

4. भू-घर्षण – धरातलीय विषमताओं के कारण पवन के रास्ते में घर्षण तथा अवरोध पैदा होते हैं जो पवनों की गति एवं दिशा को प्रभावित करती हैं। पर्वत. पठार आदि धरातलीय आकतियाँ पवनों की दिशा एवं गति को बदल देती है। महासागरों के पवनें, महाद्वीपों की अपेक्षा अधिक गति से चलती है।

प्रश्न 6.
पवन के अपरदन कार्य से उत्पन्न स्थलाकतियों का वर्णन करें?
उत्तर:
पवन के अपरदन कार्य से निम्नलिखित स्थलाकृतियों का निर्माण होता है।
1. प्लाया (Playa) – प्लाया एक आंतरिक प्रवाह का बेसिन होता है जिसमें एक झील होती है। प्लाया में जल थोड़ी देर हेतु ही रहती है क्योंकि शुष्क जलवायु के कारण वाष्पीकरण की दर अधिक है। प्रायः प्लाया में लवनों का निक्षेप होता है, जिसे प्लाया के क्षारीय निक्षेप कहते हैं?

2. मुरु कटटिम (Desert Pavement) – अपवहन महीन पदार्थों को हटा देता है, जिससे भू-पृष्ठ पर बड़ी-बड़ी गुटिकाएँ बच जाती है। इस प्रकार के अवशिष्ट गुटिकाओं वाले परत को मरुकुट्टिम कहते हैं।

3. वातगर्त (Deflation Hollows) – पवन अपरदन से उत्पन्न उथले गत्तों का अपवहन गर्त अथवा वातर्गत कहते हैं?

4. छत्रक या गारा (Mushroom) – पवन द्वारा अपरदित शैल के हल्के तथा बारीक कण अधिक ऊंचाई तक उठाये जाते हैं, जब बाल के कण गैस पृष्ठ के अनावहित भाग पर परे जोर से टकराते हैं। इससे मरुभूमियों में अधिक तथा ऊपरी मात्रा में कम होता है। इस प्रकार एक छतरीनुमा आकृति बन जाती है, जिसे छत्रक कहते हैं। अरबी भाषा में इसे ‘गारा’ (Gara) कहा जाता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पवना की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारक बताएँ।
उत्तर:
पवनें उच्च दाब से कम दाब की तरफ प्रवाहित होती हैं। भूतल पर धरातलीय विषमताओं के कारण घर्षण पैदा होता है, जो पवनों की गति को प्रभावित करता है। इसके साथ पृथ्वी का घूर्णन भी पवनों के वेग को प्रभावित करता है। अतः पृथ्वी के धरातल पर क्षैतिज पवनें तीन संयुक्त प्रभावों का परिणाम है –

  1. दाब प्रवणता प्रभाव
  2. घर्षण बल तथा
  3. कोरिआलिस प्रभाव।

इसके अतिरिक्त, गुरुत्वाकर्षण बल पवनों को नीचे प्रवाहित करता है।

1. दाब प्रवणता बल – वायुमण्डलीय दाब भिन्नता एक बल उत्पन्न करता है। दूरी के संदर्भ में दाब परिवर्तन की दर दाब प्रवणता है। जहाँ समदाब रेखाएँ पास-पास हों, वहाँ दाब प्रणवता अधिक व समदाब रेखाओं के दूर-दूर होने से दाब प्रवणता कम होती है।

2. घर्षण बल – यह पवनों की गति को प्रभावित करता है। धरातल पर घर्षण सर्वाधिक होता है और इसका प्रभाव धरातल से 1 से 3 किमी ऊँचाई तक होता है। समुद्र पर इसका प्रभाव न्यूनतम होता है।

3. कोरिऑलिस प्रभाव – पृथवी अपने अक्ष पर घूर्णन पवनों की दिशा को प्रभावित करती है। सन् 1844 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने इसका विवरण प्रस्तुत किया और इसी पर इसे कोरिआलिस बल कहा जाता है। इसके प्रभावों से पवनें उत्तरी गालार्द्ध में अपनी मूल दिशा से दाहिने तरफ व दक्षिण गोलार्द्ध में अपने मूल दिशा से बाईं तरफ विक्षेपित (deflect) हो जाती हैं। जब पवनों का वेग अधिक होता है तब विक्षेपण भी अधिक होता है। कोरिऑलिस प्रभाव अक्षांशों के समानुपात में बढ़ता है। यह ध्रुवों पर सर्वाधिक और भूमध्यरेखा पर अनुपस्थित होता है।

कोरिऑलिस प्रभाव दाब प्रवणता के समकोण पर कार्य करता है। दाब प्रवणता बल समदाब रेखाओं के समकोण पर होता है। जितनी दाब प्रवणता अधिक होगी, पवनों का वेग उतना ही अधिक होगा और पवनों की दिशा उतनी ही अधिक विक्षेपित होगी। इन दो बलों को एक-दूसरे के समकोण पर होने के कारण न्यून दाब क्षेत्र में पवनें इसी के इर्द-गिर्द बहती हैं। भूमध्य रेखा पर कोरिऑलिस प्रभाव शून्य होता है और पवनें समदाब रेखाओं के समकोण बहती हैं। अतः न्यून दाब क्षेत्र और अधिक गहन होने की अपेक्षा भर जाता है। यही कारण है कि भूमध्य रेखा के निकट उष्णकटिबंधीय चक्रवात नहीं बनते।

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प्रश्न 2.
पथ्वी पर वायमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हए चित्र बनाएँ। 300 उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के सम्भव कारण बताएँ।
उत्तर:
उच्च तापमान व न्यूनदाब होने से अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती हैं। उष्णकटिबंधों से आने वाली पवनें इस न्यून दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। अभिसरित वायु संवहन कोष्ठों के साथ ऊपर उठती हैं। यह क्षोभमण्डल के ऊपर 14 कि. मी. की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है और फिर ध्रुवों की तरह प्रवाहित होती हैं। इसके परिणामस्वरूप लगभग 30° उत्तर व दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्र वायु का कुछ भाग अवतलन करता है और उपोष्ण उच्चदाब बनता है।

अवतलन का एक कारण यह है कि जब वायु 30° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों पर पहुँचती है तो यह ठंडी हो जाती है। धरातल के निकट वायु का अपसरण होता है और यह भूमध्यरेखा की ओर पूर्वी पवनों के रूप में बहती है। भूमध्यरेखा के दोनों तरफ से प्राहित होने वाली पूर्वी पवनें अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसंचरण क्षेत्र (ITCZ) पर मिलती हैं। पृथ्वी की सतह से ऊँचाई पर ऐसा परिसंचरण और इसके विपरीत परिसंचरण कोष्ठों (Cells) के रूप में होता है।

उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्र में ऐसे कोष्ठों को हेडले कोष्ठ (Hadley Cell) कहा जाता है। मध्य अक्षांशाय वायु परिसंचरण में ध्रुवों से प्रवाहित होती ठण्डी पवनों का अवतलन होता है और उपोष्ण उच्चदाब कटिबंधीय क्षेत्रों से आती गर्म हवा ऊपर उठती है। धरातल पर ये पवनें पछुआ पवनों के नाम से जानी जाती हैं और इसके कोष्ठ फैरल कोष्ठ के नाम से जाने जाते हैं। ध्रुवीय अक्षोंशों पर ठंडी सघन वायु का ध्रुवों पर अवतलन होता है और मध्य अक्षांशों की ओर ध्रुवीय पवनों के रूप में प्रवाहित होती हैं। इन कोष्ठों को ध्रुवीय कोष्ठ कहा जाता है। ये तीन कोष्ठ वायुमण्डलीय सामान्य परिसंचरण का प्रारूप निर्धारित करते हैं। तापीय ऊर्जा का निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों में स्थानांतर सामान्य परिसंचरण को बनाए रखता है।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात से किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं, क्यों?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में महासागरों पर होती हैं और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गति करते हैं। ये चक्रवात पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं। ये ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरिकेन’ के नाम से, पश्चिम प्रशान्त और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफून’ और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विली’ के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं –

  • वृहत समुद्री सतह जहाँ तापमान 27° सेल्सियम से अधिक हो
  • कोरिऑलिस प्रभाव का होना
  • उर्ध्वाधर पवनों की गति में कम अंतर होना
  • कमजोर न्यूनदाब क्षेत्र का होना या कम स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण
  • समुद्री स्तर पर ऊपरी अपसरण।

चक्रवातों को और अधिक विध्वंसक करने वाली ऊर्जा संघनन प्रक्रिया द्वारा ऊँचे कपासी स्तरी मेघों से प्राप्त होती है जो इस तूफान के केन्द्र को घेरे होती हैं। समुद्रों से लगातार आर्द्रता की आपूर्ति की जाती है। ये क्षीण होकर क्षय हो जाते हैं। वह स्थान जहाँ से उष्ण कटिबंधीय चक्रवात गुजरते हैं, वह तट landfall of cyclone कहलाता है जो चक्रवात 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केन्द्र के चारों तरफ प्रबल सर्पिल (Spiral) पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँखें कहा जाता है। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 किलोमीटर तक होता है। इसका केंद्रीय क्षेत्र शांत होता है जहाँ पवनों का अवतलन होता है।

केन्द्र के चारों तरफ जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप में आरोहण होता है, यह आरोहण क्षोभमण्डल की ऊँचाई तक पहुँचता है। इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है जो 250 कि० मी० प्रति घंटा तक होता है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती हैं। इनका व्यास बंगाल की खाड़ी, अरब सागर व इंडियन महासागर पर 600 से 120 कि० मी० के बीच होता है। यह परिसंचरण प्रणाली धीमी गति से 300 से 500 किमी प्रतिदिन की दर से गति

करते हैं। ये तूफान तरंग उत्पन्न करते हैं और तटीय निम्न क्षेत्रों को जलप्लावित कर देते हैं। ये तूफान स्थल पर धीरे-धीरे क्षीण होकर खत्म हो जाते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
(i) मौसम पद्धति को समझने के लिए मीडिया, अखबार, दूरदर्शन तथा रेडियो से मौसम संबंधी सूचना को एकत्र कीजिए।
(ii) किसी अखबार का मौसम संबंधी भाग, विशेषकर वह जिसमें उपग्रह से भेजा गया मानचित्र दिखाया गया है, पढ़ें। मेघाच्छादित क्षेत्र को रेखांकित करें। मेघों के वितरण से वायुमण्डलीय परिसंचरण की व्याख्या करें। अखबार व दूरदर्शन पर दिखाए गए पूर्वानुमान से तुलना करें। यह भी बताएँ कि सप्ताह के कितने दिन का पूर्वानुमान ठीक था।
उत्तर:
परियोजना कार्य (i) एवं (ii) कि किसी अखबार, रेडियो या दूरदर्शन या सभी से मौसमी संबंधी विवरणों को इकट्ठा करके स्वयं करें।
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अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कोरियोलिस बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
‘कोरियोलिस’ बल को विक्षेपित बल भी कहा जाता है। सभी गतिशील वस्तुएँ विषुवत् रेखा की ओर संचलन के समय अपने पथ से विक्षेपित हो जाती हैं जिसे कोरियोलिस बल कहते हैं, क्योंकि कोरियोलिस नामक वैज्ञानिक ने इसकी खोज की थी।

प्रश्न 2.
किस क्षेत्र को ‘घोड़ों’ का अक्षांश कहा जाता है?
उत्तर:
उपोष्ण उच्च दाब पट्टी, जो कर्क एवं मकर रेखाओं के पास (25° उ०व०८०) से क्रमशः 35° उ०व०८० अक्षांशों के बीच दोनों गोलाद्धों में स्थित है, हवाओं के ऊपर व नीचे उतरने से यहाँ उच्च दाब बनता है। इस क्षेत्र में दुर्बल पवनों के फलस्वरूप शांत वायु की दशा उत्पन्न हो जाती है। इस क्षेत्र को घोड़ों का अक्षांश कहा जाता है।

प्रश्न 3.
वायुदाब किस प्रकार मापा जाता है?
उत्तर:
वायुदाब प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पड़ने वाले दाब के रूप में मापा जाता है। वायदाब के मापन के लिए जिस इकाई का प्रयोग करते हैं उसे मिलीबार (मि०बा०) कहते हैं।

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प्रश्न 4.
समदाब रेखा क्या है?
उत्तर:
समदाब रेखा एक काल्पनिक रेखा हे, जो समुद्र तल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हुई खींची जाती है।

प्रश्न 5.
“मिस्ट्रल’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
यह हवा का स्थानीय नाम है। यह फ्रांस में आल्प्स में भूमध्य सागर की ओर चलती है। यह अत्यधिक ठंडी, शुष्क एवं तेज बहने वाली पवन है।

प्रश्न 6.
वायुदाब प्रणालियों के दो प्रकार कौन से हैं?
उत्तर:

  1. उच्च दाब
  2. निम्न दाब

प्रश्न 7.
60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों पर किस प्रकार का दाब पाया जाता है?
उत्तर:
निम्न दाब।

प्रश्न 8.
उच्च दाब कहाँ पाया जाता है?
उत्तर:
30° उत्तरी व 30° दक्षिणी अक्षांशों के साथ।

प्रश्न 9.
विषुवत् वृत्त के दोनों तरफ से प्रवाहित होने वाली पूर्वी पवने कहाँ मिलती हैं?
उत्तर:
अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) पर।

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प्रश्न 10.
कब दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है?
उत्तर:
जब समदाब रेखाएँ सीधी हों और घर्षण का प्रभाव न हो, तो दाब प्रवणता बल कोरिऑलिस बल से संतुलित हो जाता है।

प्रश्न 11.
पवनें क्या होती हैं?
उत्तर:
धरातल के समानांतर चलने वाली हवा को पवन कहते हैं। जितनी. दाब प्रवणता अधिक होगी, पवन का वेग उतना ही अधिक होगा।

प्रश्न 12.
‘डोलड्रम’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
विषुवत रेखा के दोनों ओर एक शांत क्षेत्र स्थित है। यहाँ पवनें दुर्बल हैं तथा इनका धरातलीय प्रवाह बहुत कम है। इन्हें ‘डोलड्रम’ कहते हैं।

प्रश्न 13.
‘गरजने वाला चालीसा, प्रचंड पचासा तथा चीखता साठ’ किसके नाम हैं?
उत्तर:
ये पछुआ पवनें हैं जिनका वेग प्रचंड है। कभी-कभी ये दोनों ऋतुओं में बड़ी तुफानी होती हैं। अतः पुराने समय में नाविकों ने इनका नाम गरजने वाला चालीसा, प्रचण्ड पचासा तथा चीखता साठ रखा था।

प्रश्न 14.
स्थल समीर किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये पवनें रात को स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, समुद्र पर वायुदाब कम हो जाता है, परन्तु स्थल पर वायुदाब अधिक होता है । इस प्रकार ये पवनें स्थल से समद्र की ओर चलती हैं।

प्रश्न 15.
‘चिनूक’ को ‘हिम भक्षी’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि यह हवा सर्दियों के अधिकांश दिनों में घास के मैदानों को हिम से मुक्त रखती हैं। इस प्रकार की हवा रॉकीज पर्वतमाला के पूर्वी ढालों पर ऊपर से नीचे उतरती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उन उत्तर

प्रश्न 1.
वायुदाब प्रवणता की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
वायुदाब का वितरण समदाब रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। समदाब रेखाओं के अन्तर को वायुदाब प्रवणता कहते हैं। यह दो समदाब रेखाओं पर समकोण बनाती हुई होती हैं। यह दाब प्रवणता वायु दिशा अथवा आयु वेग को प्रदर्शित करती है। यदि समदाब रेखाएँ एक-दूसरे के निकट हों तो दाब प्रवणता तीव्र होती है तथा तेज पवनें चलती हैं। यदि समदाब रेखाएँ दूर-दूर हों तो वायु की गति मन्द होती है। उँचाई के साथ-साथ 34 मिलीबार प्रति 300 मीटर की दर से वायु दाब कम होता है । वायुमण्डल की ऊपरी परतें हल्की होती हैं। ऊपरी परतों के बोझ तथा दबाव के कारण नीचे की परतों पर सम्पीड़न क्रिया होती है। इसलिए धरातल के निकट की परतों में वायुदाब अधिक होता है।

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प्रश्न 2.
घोड़ों के अक्षांश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
22°से 35° मध्य के अक्षांशों को अश्व अक्षांश कहते हैं। कर्क रेखा तथा मकर रेखा के निकट का यह शांत मंडल कहलाता है। शांत भूखण्ड में धरातल पर वायु की क्षैतिज गति नहीं होती। पवनें ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर को चलती रहती हैं। ये पवनें न तो स्थाई हैं और न अधिक गति से चलती हैं। वायुमण्डल शांत तथा मौसम साफ रहता है। लगातार उतरती हुई वायु तथा दबाव के कारण यहाँ उच्च वायु दाब होता है। इन अक्षांशों से ध्रुवों की ओर पश्चिमी पवनें तथा भूमध्य रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं।

प्रश्न 3.
‘डोलडुम क्षेत्र’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
यह शांत खंड भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5°N तथा 5°s के बीच स्थित है। इसे भूमध्य रेखा का शांत खंड भी कहते हैं। धरातल पर चलने वाली वायु का अभाव होता है या बहुत ही शांत चलती है। यह शांत खंड भूमध्य रेखा के चारों ओर फैला हुआ है। इस खंड में वर्ष भर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं तथा तापमान ऊँचा रहता है। वायु गर्म तथा हल्की होकर लगातार संवाहिक धाराओं के रूप में ऊपर उठती हैं तथा धरातल पर वायुदाब कम हो जाता है।

प्रश्न 4.
फैरल का नियम क्या है? चित्र द्वारा स्पष्ट करो।
उत्तर:
धरातल पर पवनें कभी उत्तर से दक्षिण की ओर नहीं चलती। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं और मुड़ जाती हैं। इसें फैरल का नियम कहते हैं। हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण, पृथ्वी की दैनिक गति है जब हवाएँ कम चाल वाले भागों से अधिक चाल वाले भागों की ओर जाती हैं तो पीछे रह जाती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कोरोलिस बल भी कहा जाता है। .
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प्रश्न 5.
वायुमंडलीय दाब से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वायुमंडलीय दाब पृथ्वी के धरातल पर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण टिका है। गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु में भार होता है। वायु में भी एक घनफुट में 1.2 औंस भार होता है। इस भार के कारण पृथ्वी के धरातल पर दबाव पड़ता है। वायुमंडलीय दाब का अर्थ है किसी भी स्थान पर वहाँ की हवा की उच्चतम सीमा के स्तम्भ का भार । समुद्र तल प्रति वर्ग इंच पर वायुमण्डल का दबाव 6.68 किलोग्राम या 1.3 किलोग्राम प्रति वर्ग सेंटीमीटर होता है। वायुमंडल का औसत या सामान्य दाब 45° अक्षांश पर समुद्र तल पर 29.92 इंच या 76.92 इंच या 76 सेंटीमीटर या 1013.2 मिलीबार होता है।।

प्रश्न 6.
एक मिलीबार से क्या अभिप्राय है? वायुदाब की माप इकाइयों में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
एक वर्ग सेमी पर एक ग्राम भार के बल को एक मिलीबार कहते हैं। दूसरे शब्दों में 1000 डाईन प्रति वर्ग सेमी के वायु भार को एक मिलीबार कहते हैं। 1000 मिलीबार के वायुभार को एक बार (Bar) कहते हैं।
विभिन्न माप इकाइयों में सम्बन्ध –
30 इंच वायुदाब =76 सेमी = 1013.2 मिलीबार
1 इंच वायुदाब = 34 मिलीबार
1 सेमी वायुदाब = 13.3 मिलीबार

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प्रश्न 7.
‘चिनूक’ तथा ‘फोएन’ पवनें क्या हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ये गर्म तथा शुष्क पवनें हैं। ये पवनें पर्वतों के सम्मख ढाल पर टकराकर ऊपर चढती है। इस क्रिया के कारण ये ठंडी होकर पवन के सामने वाले ढाल पर काफी वर्षा करती हैं। चिनक पवने-अमेरिका में रॉकीज पर्वतों को पार करके प्रेयरी के मैदान में चलने वाली ऐसी पवनों को चिनूक पवनें कहते हैं। चिनूक का अर्थ है-बर्फ खाऊ, क्योंकि ये पवनें अधिक तापक्रम के कारण बर्फ को पिघला देती हैं। कई बार 24 घंटे के समय में 50F(10°C) तापक्रम बढ़ जाता है।

फोएन पवनें – यूरोप में आल्प्स को पार करके स्विट्जरलैंड में उतरने वाली पवने को फोएन पवनें कहते हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी के सात दाब कटिबंधों के नाम लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वी के सात दाब कटिबंध इस प्रकार हैं –

  1. विषुवतीय निम्न दाब पट्टी
  2. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  3. उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  4. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  5. उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  6. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  7. ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)।

प्रश्न 9.
पवन और वायुधारा में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
पवन और वायुधारा में अंतर –
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प्रश्न 10.
भूमंडलीय और सामयिक पवनों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भूमंडलीय और सामयिक पवनों में अंतर –
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प्रश्न 11.
वायुराशि क्या होती है? पवन से यह किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
वायुराशि वायुमण्डल का एक छोटा तथा विस्तृत भाग है जिसमें तापमान और आर्द्रता के लक्षण एक समान होते हैं। इस प्रकार वायुराशियों में एकरूपता का पाया जाना इसका मुख्य लक्षण है। एक वायुराशि में एक-दूसरे के ऊपर वाय की विभिन्न परतें होती हैं। इस प्रकार वायुमंडल में पर्याप्त ऊँचाई तक एक विशाल वायुराशि में एकरूपता पाई जाती है।

प्रश्न 12.
स्रोत प्रदेश किसे कहे हैं? धुवीय महाद्वीपीय स्रोत प्रदेशों का वर्णन करें।
उत्तर:
धरातल के ऐसे समान क्षेत्र जहाँ वायुराशियों की उत्पत्ति होती है, स्रोत प्रदेश कहलाते हैं। यह प्रदेश पृथ्वी के धरातल पर विस्तृत क्षेत्र है जहाँ एक सम लक्षण पाए जाते है। ऐसे प्रदेश में एक सम धरातल तथा प्रति चक्रवातीय वायु तथा प्रति चक्रवातीय वायु व्यवस्था पाई जाती है। इस अवस्था में अपसारी वायु संचरण होता है। प्रायः स्रोत प्रदेश ध्रुवीय तथा उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में पाए जाते हैं। शीतकाल में उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया या ध्रुवीय प्रदेश बर्फ से ढके रहते हैं। यहाँ प्रति चक्रवात चलते हैं। वायु स्थिर तथा शुष्क होती है तापमान तथा आर्द्रता में एकरूपता पाई जाती है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 13.
पृथ्वी के धरातल पर कुछ वायुदाब कटिबंध तापीय कारणों से नहीं बल्कि गतिक कारणों से उत्पन्न हुए हैं। ये कटिबंध कौन-से हैं? इनकी उत्पत्ति की व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी भूमध्य रेखा तथा ध्रुवों के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब तथा उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की उत्पत्ति होती है। इनकी उत्पत्ति गतिक कारणों से है। भूमध्य रेखा से ऊपर उठने वाली वायु ठंडी होकर तथा भारी होकर 30° अक्षांशों के निकट नीचे उतरने लगती है, इसके अतिरिक्त पृथ्वी के घूर्णन के कारण ध्रुवों से आने वाली वायु भी यहाँ नीचे उतरती है, इसलिए यहाँ उच्च वायुदाब उत्पन्न होता है।
60° अक्षांशों के निकट वायुदाब की उत्पत्ति गति कारणों से होती है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण इन अक्षांशों से वायु भूमध्य रेखा की ओर तथा ध्रुवों की ओर खिसक जाती है इसलिए यहाँ निम्न वायुदाब स्थापित हो जाता है।

प्रश्न 14.
मिस्ट्रल और फॉन में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मिस्ट्रल और फॉन में अंतर –
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प्रश्न 15.
स्थल और समुद्र समीर में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
स्थल और समुद्र समीर में अंतर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुदाब के क्षैतिज वितरण के विश्व प्रतिरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायुदाब का क्षैतिज वितरण सामान्य रूप से उच्च वायुदाब और निम्न वायुदाब को एकांतर कटिबंध के रूप में प्रस्तुत करता है। वायुदाब और तापमान में प्रतिलोमी संबंध है। 30° उत्तर एवं दक्षिणी अक्षांशों के पास दो उपोष्ण उच्चदाब के और 60° उत्तर तथा दक्षिण अक्षांशों के पास दो उपध्रुवीय निम्नदाब के मध्यवर्ती क्षेत्र हैं। जिस दिशा में वायुदाब सबसे तेजी से घट रहा हो, उस दिशा में प्रति इकाई दूरी पर वायुदाब में आई गिरावट को दाब प्रवणता कहते हैं। विषुवतीय निम्न वायुदाब कटिबंध की गर्म हवा ऊपर उठने के साथ धीरे-धीरे ठंडी होती जाती है। ऊपरी स्तर पर पहुँचने के बाद यह ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने लगती है और अधिक ठंडी होने पर यह 20° तथा 35° अक्षांशों के मध्य नीचे उतरने लगती है। इसके लिए दो कारक उत्तरदायी हैं।
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प्रथम-वायु के ठंडा होने से इसका घनत्व बढ़ जाता है, जिससे यह नीचे उतरने लगती है। दूसरा-पृथ्वी का घूर्णन पश्चिमी से पूर्व की ओर होने के कारण ध्रुवों की ओर जाने वाली हवाएँ पूर्व की ओर विक्षेपित हो जाती हैं। अपने पक्ष पर घूर्णन करती हुई पृथ्वी पर विषुवत रेखा के पास कोई भी बिन्दु सर्वाधिक तीव्र गति से संचलन करता है। जैसे-जैसे हम ध्रुवों की ओर जाते हैं, वेग कम होता जाता है और ध्रुवों पर लगभग शून्य हो जाता है। वेग में अन्तर के कारण सभी गतिशील वस्तुएँ, विषुवत रेखा की ओर अथवा विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर संचलन के समय पथ से विक्षेपित हो जाती हैं। विक्षेपण बल की खोज सर्वप्रथम फ्रांसीसी गणितज्ञ कोरियोलिस ने की थी। इसलिए इसे कोरियोलिस बल कहते हैं बाद में इसे फैरेल के नियम से जाना गया।
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इस नियम के अनुसार-सभी गतिशील वस्तुएँ अपने पथ से विक्षेपित हो जाती हैं, जैसे पवन और महासागरीय धाराएँ, जिसकी दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में बाएँ हैं। विषुवत रेखा से दूर जाने के साथ विक्षेपण दर में वृद्धि होती जाती है। इससे अवरोध उत्पन्न होने लगता है और हवा ऊपर की ओर संचित होने लगती है। इससे कर्क रेखा और 35° उत्तरी अक्षांश मकर रेखा और 35° दक्षिणी अक्षांश के मध्य हवाएँ ऊपर से नीचे उतरने लगती हैं जिससे यहाँ उच्च दाब कटिबंधों की उत्पत्ति होती है। उपोष्ण कटिबंध तथा ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली हवाएँ 45° उत्तर व दक्षिण आर्कटिक वृत एवं 40° दक्षिण व अंटार्कटिक वृत्त के मध्य स्थित क्षेत्रों में मिलती हैं। ये उपध्रुवीय निम्न दाब के क्षेत्र हैं।

इस प्रकार कुल सात कटिबन्ध हैं –

  • विषुवतीय निम्न दाब पट्टी
  • उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • उपोष्ण उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  • उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • उपध्रुवीय निम्न दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)
  • ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (उत्तरी गोलार्द्ध)
  • ध्रुवीय उच्च दाब पट्टी (दक्षिणी गोलार्द्ध)

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प्रश्न 2.
पवनों के मुख्य प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायु परिसंचरण के तीन विभिन्न तंत्र हैं – प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक।
(i) प्राथमिक पवनें – इन पवनों का सम्बन्ध घूर्णन करती हुई पृथ्वी के धरातल पर वनों के सामान्य परिसंचरण प्रतिरूप से है। प्राथमिक पवनों में डोलड्रम, व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें तथा ध्रुवीय पवनें शामिल हैं।

डोलड़म – ये पवनें विषुवत रेखा के दोनों ओर एक शांत क्षेत्र में होती हैं। इनका धरातलीय प्रवाह बहुत कम है।

व्यापारिक पवनें – ये पवनें दोनों- गोलार्द्ध में 5°से 30° अक्षांशों के मध्य चलती हैं। उत्तर में इन्हें उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें तथा दक्षिण में दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनें कहते हैं। दोनों पवनों विषुवत रेखा पर अभिसरण करती हैं, जिसे अंतर उष्णकटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र कहते हैं।

पछुआ पवनें – ये मध्य अक्षांशों में 35° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के बीच चलती हैं। इनकी दिशा परिवर्तशनशील है और वेग भी प्रचण्ड है। पछुआ पवनें गर्मी एवं सर्दी दोनों ही ऋतुओं में बड़ी तूफानी होती हैं।

धृवीय पूर्वी पवनें – ये विषुवत रेखा की ओर बहती हैं. जो शीघ्रता से पर्व से पश्चिम की दिशा ले लेती हैं। इन्हें ध्रुवीय पवनें कहते हैं।

(ii) द्वितीयक पवनें – ये हवाएँ, जो ऋतु के अनुसार अपनी दिशा बदल लेती हैं, मानसून पवनें, वायुराशियाँ एवं साताग्र, चक्रवात एवं प्रति-चक्रवात, स्थल समीर, पर्वत एवं घाटी समीर ऐसी पवन प्रणालियाँ हैं।

मानसून पवनें – ये वे मौसमी पवनें हैं जिनकी दिशा मौसम के अनुसार बिल्कुल विपरीत होती हैं। ये पवनें गर्मी में 6 मास समुद्र से स्थल की ओर तथा शीतकाल के 6 मास स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं। ये एक प्रकार से जल तथा स्थल पवनें हैं। इनकी उत्पत्ति का कारण जल तथा स्थल के ठंडा व गर्म होने में विभिन्नता है। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायुदाब में भी अन्तर हो जाता है जिससे हवाओं की दिशा पलट जाती हैं।

पर्वतीय तथा घाटीय पवनें – ये साधारण दैनिक पवनें हैं जो दैनिक तापान्तर के फलस्वरूप वाय दबाब की विभिन्नता के कारण चलती हैं पर्वतीय पवनें पर्वतीय प्रदेश में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर बहती हैं। यह तीव्र विकिरण तथा गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती हैं। इसे वायु प्रवाह भी कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ ठंडी वायु से भर जाती हैं जिससे घाटी के निचले भाग में पाला पड़ता है।
घाटीय पवनें-दिन के समय घाटी की गर्म वायु ढाल से होकर शिखर की ओर ऊपर चढ़ती हैं इन्हें घाटीय पवनें कहते हैं । ये पवनें घाटियों में गर्मी की तीव्रता को कम करती हैं। ऊपर चढ़ने के कारण ये पवनें ठंडी होकर घनघोर वर्षा करती हैं।
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(iii) तृतीयक अथवा स्थानीय पवनें-इन पवनों की उत्पत्ति भू-भाग के तत्काल प्रभाव द्वारा होती है। जब ये पवनें अत्यधिक गर्म एवं शुष्क होती हैं तो पशु एवं वनस्पति जगत पर शक्तिशाली प्रभाव डालती हैं। स्थानीय पवनों का एक अन्य वर्ग वायु अपवाह कहलाता है। बर्फीली हवाओं का स्थानीय नाम उत्तरी एडियाटिक तट में बोरा तथा दक्षिणी फ्रांस में मिस्टूल है। अन्य प्रकार की स्थानीय पवनें लू, फॉन तथा चिनूक हैं, ये गर्म एवं शुष्क पवनें हैं। ये द्वितीयक प्रकार की पवनों को जन्म देते हैं।

(iv) वायुराशियाँ एवं वातान-ये अभिगामी वायुमंडलीय विक्षोभ हैं, जो पूरे विश्व भर में द्वितीयक प्रकार की पवनों को जन्म देते हैं। वायुराशियाँ-यह हवा का एक विशाल समूह है, जिसमें तापमान तथा आर्द्रता की दशाएँ, एक समान होती हैं। वायुराशि अपनी विशेषताएँ अपने स्रोत से प्राप्त करती हैं। दो आधारभूत वायुराशियाँ हैं-ध्रुवीय (P) तथा उष्णकटिबंधीय (T). इनके तापमान में भारी अंतर रहता है। ध्रुवीय वायुराशियाँ-ये वायुराशियाँ उच्च अक्षांशों में जन्म लेती हैं। ये ठंडी तथा क्रम आर्द्र होती हैं। उष्णकटिबंधीय वायुराशियाँ-अधिक आर्द्र होती हैं।

(v) वाताग्र – विभिन्न गुणों वाली वायुराशियों के मध्य की संपर्क रेखा वाताग्र कहलाती हैं। शीत वाताग्र की उत्पत्ति वहाँ से होती हैं, जहाँ ठंडी हवा गर्म हवा के नीचे संचलन करती है। ठंडी वायु का पिछला सिरा जिसका अनुसरण गर्म वायु राशि करती है, उष्ण वाताग्न कहलाता है। प्रत्येक स्थिति में वर्षा होने की संभावना रहती है। जब दोनों वातान मिल जाते है तब इसे अधिधारित वाताग्र कहते हैं।

(vi) चक्रवात – जलवायु की दृष्टि से वायुमंडलीय विक्षोभों में चक्रवात सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, जो मौसम को प्रभावित करते हैं। चक्रवातों को उनकी उत्पत्ति के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है-शीतोष्ण चक्रवात तथा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात।

शीतोष्ण चक्रवात – इनका क्षेत्र दोनों गोलाद्धों के मध्य अक्षांशों में 35° से 65° अक्षांशों के बीच संकेन्द्रित है। ये बड़े विस्तृत होते हैं। ये श्वेत मेघों की पृष्ठभूमि में काले मेघों का आगमन आने का सूचक हैं। जैसे ही चक्रवात किसी स्थान पर पहुंचता है, बूंदाबांदी, शुरू हो जाती है और फिर भारी वर्षा होती है। इससे शीत वाताग्र के आगमन की सूचना मिलती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात – ये अपने उग्रता तथा व्यापक विनाश के लिए जाने जाते हैं। इनकी जलवायविक विशेषता वर्षा करना है। ये महासागरों के ऊपर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विकसित होते हैं। इन हवाओं का वेग 120 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा तक होता है। ये कम क्षेत्रफल घेरते हैं। भारत में इनकी प्रचण्डता का अनुभव सर्वाधिक बंगाल की खाड़ी में पूर्वी तट पर होता है। चक्रवात वायुमण्डलीय गतिशीलता के सूचक हैं तथा मानव एवं मानव समाज कल्याण की दृष्टि से बड़े महत्त्वपूर्ण हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?
(क) ऑक्सीजन
(ख) आर्गन
(ग) नाइट्रोजन
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(ग) नाइट्रोजन

प्रश्न 2.
वह वायुमण्डलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है ………………
(क) समताप मण्डल
(ख) क्षोभमण्डल
(ग) मध्य मण्डल
(घ) आयनमण्डल
उत्तर:
(ग) नाइट्रोजन

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प्रश्न 3.
समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी-किससे सम्बन्धित हैं?
(क) गैस
(ख) जलवाष्प
(ग) धूलकण
(घ) उल्कापात
उत्तर:
(ग) धूलकण

प्रश्न 4.
निलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?
(क) 90 किमी
(ख) 100 किमी
(ग) 120 किमी
(घ) 150 किमी
उत्तर:
(ग) 120 किमी

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी?
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन
(ग) हिलीयम
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड

प्रश्न 6.
वायुमण्डल की कौन-सी परत पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगों को परावर्तित कर पुनः वापस कर पृथ्वी तल पर भेज देती है?
(क) समताप मण्डल
(ख) मध्य मण्डल
(ग) आयन मण्डल
(घ) बर्हिमण्डल
उत्तर:
(ग) आयन मण्डल

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमण्डल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है और यह पृथ्वी को सभी ओर से ढके हुए है। इसमें मनुष्यों एवं जन्तुओं के जीवन के लिए आवश्यक गैसों जैसे ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन डाईऑक्साइड पाई जाती हैं।

प्रश्न 2.
मौसम और जववायु के कौन-कौन से तत्त्व हैं?
उत्तर:
ताप, दाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षण ये मौसम और जलवायु के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं, जो पृथ्वी पर मुनष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं।

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प्रश्न 3.
वायुमण्डल की संरचना के बारे में लिखिए।
उत्तर:
वायुमण्डल का निर्माण लगभग एक अरब वर्ष पूर्व हुआ। यह अनेक गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन 78.8% तथा ऑक्सीजन 20.95% मुख्य गैसें हैं। इनके अतिरिक्त आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, नीऑन, हीलियम, क्रेप्टो, जेनन तथा हाइड्रोजन भी कुछ मात्रा में है। वायुमण्डल में पाँच मुख्य संस्तर हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्ममण्डल । कुल वायुमण्डल का 99% भाग भूपृष्ठ से 32 कि.मी. की ऊँचाई तक सीमित हैं और गुरुत्वाकर्षक बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है। वायुमण्डल को ऊर्जा सूर्य से मिलती है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डल के सभी संस्तरों से क्षोभमण्डल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
उत्तर:
क्षोभमण्डल वायुमण्डल का सबसे नीचे का संस्तर है। इसकी ऊंचाई 13 किमी है, तथा यह ध्रुव के निकट 8 किमी तथा विषुवत् रेखा पर 18 किमी की ऊँचाई तक है। इस मण्डल में धुलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165 मी. की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्तर है।

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प्रश्न 5.
ग्रीन हाऊस प्रभाव से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वायु प्रदूषण से सम्बन्धित एक बड़ी समस्या विश्व के तापमान में वृद्धि (Global Warming) या हरित गृह प्रभाव (Green House effect) है । मानवीय स्त्रोतों से उत्पन्न कुछ गैस कार्बन डायऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रस ऑक्साइड और मीथेन है, जो हरित गृह प्रभाव में वृद्धि करतें हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कार्बन डाइऑक्साइड है, जो सौर ऊर्जा को पृथ्वी की ओर आने तो देता है, किन्तु पृथ्वी से जो धरातलीय विकरण होता है, उसे बाहर जाने से रोकती है और उसका अवशोषण करता है। अतः वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड के वृद्धि होने से पृथ्वी की सतह और वायुमण्डल के निचले भाग में तापमान की वृद्धि होती है जिसे हरित गृह प्रभाव कहा जाता है।

प्रश्न 6.
वायुमण्डल के मुख्य संघटनों का संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर:
1. वायुमण्डल गैसों का एक आवरण है, जो भूपृष्ठ के ऊपर हजारों किमी. की ऊँचाई तक फैला है। लगभग 90 किमी. की ऊँचाई तक यह तीन प्रमुख गैसों-नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा आर्गन में एक समान है। इसके अतिरिक्त इनमें नियॉन, क्रिप्टन एवं जीनॉन जैसी दुर्लभ गैसें हैं, जिन्हें उत्कृष्ट गैसें कहते हैं।

2. 90 किमी. से ऊपर का संघटन अधिकाधिक हल्की गैसों की वृद्धि के साथ परिवर्तित होने लगता है। इसमें कम मात्रा में कार्बन डाय ऑक्साइड, जलवाष्प, ओजोन, अक्रीय गैसें जैसे जीनॉन, क्रिप्टन, नियान, आखान तथा अधिक मात्रा में ठोस एवं द्रव कण जिन्हें सामूहिक रूप से वायु कहते है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की संरचना की व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है और यह पृथ्वी को सभी ओर से ढके हुए है। इसमें मनुष्यों एवं जन्तुओं के जीवन के लिए आवश्यक गैसों जैसे ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड पाई जाती है। वायु पृथ्वी के द्रव्यमान का अभिन्न भाग है, तथा इसके कुल द्रव्यमान का 99% पृथ्वी की सतह से 32 किमी की ऊँचाई तक स्थित है । वायु रंगहीन तथा गंधहीन होती है, तथा जब यह पवन की तरह बहती है, तभी हम इसे महसूस कर सकते हैं। वायुमण्डल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाले विभिन्न परतों का बना होता है। पृथ्वी की सतह के पास घनत्व अधिक होता है, जबकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ यह घटता जाता है। तापमान की स्थिति के अनुसार वायुमण्डल को पाँच विभिन्न संस्तरों में बांटा गया है। ये हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्यमण्डल।

क्षोभमण्डल वायुमण्डल का सबसे नीचे का संस्तर है.। इसकी ऊँचाई 13 किमी है। यह ध्रुव के निकट 8 किमी तथा विषुवत रेखा पर 18 किमी की ऊँचाई तक है। क्षोभमण्डल की मोटाई विषुवत् रेखा पर सबसे अधिक है; क्योंकि तेज वायु प्रवाह के कारण ताप का अधिक ऊँचाई तक सम्वहन किया जाता है। इस संस्तर में धुलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165मी की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्तर है। वायुमण्डल का सबसे ऊपरी संस्तर जो आयनमण्डल के ऊपर स्थित होता है, उसे बाह्यमण्डल कहते हैं। यह सबसे ऊँचा संस्तर है, तथा इसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इस संस्तर में मौजूद सभी घटक विरल है, जो धीरे-धीरे बाहरी आंतरिक्ष में मिल जोते हैं।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल की संरचना का चित्र खींचे और व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है। इनमें सबसे अधिक 78.8% नाइट्रोजन (N2) गैस, ऑक्सीजन (O2)20.95% आर्गन (Ar) 0.93% कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) 0.036% नीऑन (Ne) 0.002% हिलीयम (He) 0.0005% क्रेप्टो (Kr) 00.001% जेनन (Xe) 0.00009% तथा हाइड्रोजन (H20.)00005% पाई जाती है। इसके पांच विभिन्न संस्तर है। वायुमण्डल का चित्र नीचे है।
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Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल को कितने भागों में विभक्त किया गया है?
उत्तर:
रासायनिक संघटन के आधार पर वायुमण्डल को दो विस्तृत परतों में विभक्त किया गया है-होमोस्फेयर तथा हेट्रोस्फेयर।

प्रश्न 2.
सीमा किसे कहते हैं ?
उत्तर:
होमोस्फेयर की तीन परतें हैं-क्षोभमण्डल. समतापमण्डल तथा मध्यमण्डल । प्रत्येक उप-परत अपने साथ वाली परत से एक पतले संक्रमण क्षेत्र द्वारा अलग होती है, इसे सीमा कहते हैं।

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प्रश्न 3.
जेट वायुयान वायुमण्डल के किस भाग में उड़ते हैं ?
उत्तर:
जेटवायुयान निम्न समतापमण्डल में उड़ते है, क्योंकि यह परत उड़ान के लिए अत्यन्त सुविधाजनक दशाएँ रखती है। यह मण्डल क्षोभ सीमा के ऊपर स्थित है।

प्रश्न 4.
मौसम और जलवायु के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
मौसम एवं जलवायु के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित है –

  1. तापमान
  2. वायुदाब एवं पवनें
  3. आर्द्रता एवं वर्षण।

ये जलवायु तत्त्व कहलाते हैं, इन्हीं से विभिन्न प्रकार की जलवायु और मौसम की रचना होती है।

प्रश्न 5.
मौसम किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी दिए गए समय में वायुमण्डल की भौतिक दशा को मौसम कहते है, जैसे ही. ये दशाएँ बदलती हैं, वैसे ही मौसम बदल जाता है।

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प्रश्न 6.
वायुमण्डल किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायुमण्डल गैस का एक आवरण हैं, जो पृथ्वी के ऊपर हजारों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ है। पृथ्वी पर अधिकांश जीवन तथा जीवन प्रक्रियाओं का अस्तित्व वायुमण्डल से जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 7.
वायुमण्डल की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
वायुमण्डल की उत्पत्ति लगभग पाँच अरब वर्ष पूर्व ठण्डे कणों, मुख्य रूप से लोहे एवं मैग्नीशियम के सिलिकेट, लोहे एवं ग्रेफाइट की अभिवृद्धि द्वारा धीमे परिवर्तनों से हुई।

प्रश्न 8.
वायुमण्डल में नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन की प्रतिशत मात्रा कितनी है ?
उत्तर:
ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन मिलकर स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करती हैं फिर भी जलवायु की दुष्टि से इनकी महत्ता कम है।

प्रश्न 9.
कौन सी गैसें हमें हानिकारक किरणों से बचाती हैं ?
उत्तर:
ओजोन गैस अत्यन्त उपयोगी गैस है, क्योंकि यह पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती है, तथा इन हानिकारक किरणों से पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।

प्रश्न 10.
मौसम तथा जलवायु के प्रमुख चर क्या हैं?
उत्तर:
जलवाष्प एवं धूलकण मौसम एवं जलवायु में प्रमुख चर है। ये सभी प्रकार के संसाधन के स्रोत हैं तथा सूर्य से प्राप्त होने वाली अथवा पृथ्वी से विकसित ऊर्जा के प्रमुख अवशोषक हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न क्षेत्रों में वायुमण्डल का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:

  1. जीवन का आधार-पृथ्वी पर मानव जीवन का आधार वायुमण्डल ही है। सौरमण्डल में केवल पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है. जिस पर वायुमण्डल विद्यमान है। ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जीवन का आधार है।
  2. ताप सन्तुलन-वायुमण्डल एक ग्रीन हाउस की भाँति कार्य करता है। इस प्रभाव से पृथ्वी का तापमान औसत रूप से 35°C रहता है। वायुमण्डल के बिना बहुत अधिक तापमान पर जीवन असम्भव होता है।
  3. ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। आयनमण्डल रेडियो. तरंगों को पृथ्वी पर लौटाकर रेडियो प्रसारण में सहायता करता है।
  4. वायुमण्डल की विभिन्न घटनाएँ, जैसे वाष्पीकरण, वर्षा, पवनें आदि मानव जीवन पर प्रभाव डालती है। सौरमण्डल से पृथ्वी पर गिरने वाली उल्काएँ वायुमण्डल में जलकर नष्ट हो जाती है।

प्रश्न 2.
क्षोभमण्डल तथा समतापमण्डल में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
क्षोभमण्डल तथा समतापमण्डल में अन्तर –
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प्रश्न 3.
वायुमण्डल कैसे पृथ्वी से जुड़ा रहता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर अधिकांश जीवन वायुमण्डल की तली, जहाँ स्थल तथा महासागर मिलते हैं, पर मौजद है। जीवन प्रतिक्रियाओं का अस्तित्व इससे जुड़ा हुआ है। मानव पर वायुमण्डल का न केवल प्रत्यक्ष बल्कि अप्रत्यक्ष प्रभाव भी है। कुल वायुमण्डल का 99 प्रतिशत भाग भूपृष्ठ से 32 किमी की ऊँचाई तक सीमित है और गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 4.
विषमण्डल (हेट्रोस्फेयर) क्या है?
उत्तर:
विषमण्डल (हेट्रोस्फेयर) एक परतदार ऊष्ण मण्डल है, जो मध्य सीमा के ऊपर स्थित है और आंतरिक्ष के आधार तक विस्तृत है। ऊष्ण मण्डल के निम्न भाग में 100 से 400 किमी के मध्य की ऊँचाई तक सीमित है और गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है।

प्रश्न 5.
वायुमण्डल की स्वच्छ शुष्क हवा के मुख्य संघटक कौन-से हैं ?
उत्तर:
ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन वायुमण्डल की स्वच्छ शुष्क हवा के मुख्य घटक हैं। ये दोनों मिलकर होमोस्फेयर की स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 6.
कौन-सी गैस कम मात्रा में होने पर भी वायुमण्डल प्रक्रियाओं के लिए महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम है, फिर भी वायुमण्डलीय प्रक्रिया में यह एक महत्त्वपूर्ण गैस है। यह ऊष्मा को अवशोषित कर सकता है और इस प्रकार निचले वायुमण्डल को सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म होने का अवसर प्रदान करता है। प्रकाश संश्लेषण क्रिया में हरे पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 7.
वायुमण्डल की परिभाषा बताएँ।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर घिरे हुए वायु के आवरण को वायुमण्डल कहते हैं। पृथ्वी की गुरुवाकर्षण शक्ति के कारण वायुमण्डल सदा पृथ्वी के साथ सटा रहता है, तथा पृथ्वी का एक अभिन्न अंग है। वायुमण्डल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन है, तथा पृथ्वी एक महत्त्वपूर्ण ग्रह है। वायुमण्डल का निर्माण लगभग एक अरब वर्ष पूर्व हुआ वायुमण्डल अनेक गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन मुख्य गैसें हैं। वायुमण्डल में पाँच मुख्य संस्तर हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्यमण्डल।।

प्रश्न 8.
वायुमण्डल का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमण्डल का मानवीय जीवन में बहुत महत्त्व हैं –

  1. ऑक्सीजन गैस पृथ्वी पर जीवन का आधार है।
  2. पेड़ – पौधों तथा वनस्पति के लिए कार्बन डाइऑक्साइड महत्त्वपूर्ण है।
  3. वायुमण्डल सूर्यताप की अवशोषित करके ग्लास हाऊस का काम करता है।
  4. वायुमण्डल का जलवाष्प वर्षा का मुख्य साधन है।
  5. वायुमण्डल फसलों, मौसम, जलवायु तथा वायुमार्गों पर प्रभाव डालता है।

प्रश्न 9.
वायुमण्डल की मुख्य परतों के नाम बताएँ।
उत्तर:
वायुमण्डल में मुख्य रूप से पाँच परतें पाई जाती हैं। रासायनिक संरचना के आधार पर वायुमण्डल को इन परतों में विभक्त किया गया है,

  1. क्षोभमण्डल – यह वायुमण्डल की सबसे निचली परत है।
  2. समतापमण्डल – इस भाग में वायूयान उड़ते है।
  3. आयनमण्डल – इसका तापमान आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ता है।
  4. बाह्यमण्डल।
  5. चुम्बकमण्डल।

प्रश्न 10.
वायुमण्डल की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
वायुमण्डल की उत्पत्ति पाँच अरब वर्ष ठण्डे कणों, मुख्य रूप से लोहे एवं मैग्नीशियम सिलिकेट, लोहे एवं ग्रेफाइट की अभिवृद्धि द्वारा शुरू हुए धीमें परिवर्तनों का परिणाम है। गुरुत्वाकर्षण विखण्डन तथा रेडियोधर्मी क्षति से पृथ्वी गर्म हुई, जिसमें पृथ्वी के केन्द्र में ठोस निकिल, लौह धातु निर्मित क्रोड, द्रव लौह सिलिकेट खोल, मैंटल तथा स्थलमण्डल की रचना हुई। इस प्रक्रिया में गैस का निकास हुआ, जिससे एक नए वायुमण्डल एवं जलमण्डल की रचना हुई। कार्बन नाइटोजन, ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन के यौगिकों की उत्पत्ति, ऊर्जा स्रोतों जैसे बिजली का चमकना, सौर विकिरण अथवा रेडियोधर्मी विसर्जन से हुई।

कार्बन डाइऑक्साइड और भूपर्पटी के सिलिकेट के मध्य हुई प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप कार्बनेट का निर्माण हुआ। अत: कार्बन डाइऑक्साइड धीरे-धीरे वायुमण्डल से लुप्त हो गई। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम हुई। ओजोन ने पृथ्वी पर आने वाली पराबैंगनी विकिरण के विरुद्ध एक परदे या आवरण का काम किया तथा जैविक निक्षेप कोयले एवं तेल भण्डारों के रूप से संचित होने लगे। इन सभी घटनाओं ने मौलिक रूप से पृथ्वी के भू-रसायन को परिवर्तित कर दिया। अधिकांश रासायनिक तत्त्वों के चक्रों का पुन-अभिविन्यास हुआ। इस प्रकार पृथ्वी के वायुमण्डल की रचना हुई।

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प्रश्न 11.
आयनमण्डल का वर्णन करो।
उत्तर:
यह धरातल के ऊपर वायुमण्डल का चौथा संस्तर है। इसकी ऊँचाई 80 से 400 कि.मी. के मध्य है। इस मण्डल में तापमान ऊंचाई बढ़ने के साथ बढ़ता है। यहाँ की हवा विद्युत आवेशित होती है। रेडियो तरंगें इसी मण्डल से परावर्तित होकर पुनः पृथ्वी पर लौट जाती हैं। यह परत रेडियो प्रसारण में उपयोगी है। इसमें तापमान का वितरण असमान एवं अनिश्चित है। इस मण्डल में बड़ी ही विस्मयकारी विद्युतकीय घटनाएँ दृष्टिगोचर होती हैं।

प्रश्न 12.
क्षोभमण्डल सीमा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में एक असमान दर से परिवर्तन होता है –

  1. 15 किमी तक तापमान में एक असमान दर से परिवर्तन होता है।
  2. 80 किमी तक तापमान स्थिर रहता है।
  3. 80 किमी से ऊपर तापमान में वृद्धि होने लगती है।

इस ऊँचाई के पश्चात् क्षोभमण्डल से ऊपर समतापमण्डल का भाग आरम्भ होता है। समताप मण्डल तथा क्षोभमण्डल को अलग करने वाले संक्रमण क्षेत्र को क्षोभमण्डल सीमा कहते हैं।

प्रश्न 13.
वायुमण्डल में धुल कणों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमण्डल में धूल कण निचले भागों में पाए जाते हैं। वायुमण्डल में धूल कणों का कई प्रकार से विशेष महत्त्व है –

  1. धूल कण सौर ताप का कुछ भाग सोख लेते हैं, तथा कुछ भाग परावर्तन हो जाता है। ताप सोख लेने के कारण वायुमण्डल का तापक्रम अधिक हो जाता है।
  2. धूल कण आर्द्रताग्रही नाभि के रूप में काम करते हैं। इनके चारों ओर जलवाष्प का संघनन होता है, जिससे वर्षा, कोहरा, बादल बनते हैं। धूल कणों के अभाव के कारण वर्षा नहीं हो सकती।
  3. धूल कणों के कारण वायूमण्डल की दर्शन क्षमता कम होती है, तथा धुंधलापन छा जाता है।
  4. धूल कणों के सन्योग से कई रंग-बिरगे दृश्य सूर्य उदय, सूर्य अस्त तथा इन्द्रधनुष दृश्य बनते हैं।

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प्रश्न 14.
क्षोभमण्डल को वायुमण्डल की सबसे महत्त्वपूर्ण परत क्यों माना जाता है?
उत्तर:
क्षोभमण्डल वायुमण्डल की सबसे निचली परत है, जो कई कारणों से महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. पृथ्वी के धरातल पर जलवायु स्थितियों का निर्माण करने वाली महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ इसी परत में होती हैं।
  2. इस परत में गैसों, धूल कण तथा जलवाष्म की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसलिए मेघ, वर्षा, कोहरा आदि क्रियाएँ इसी परत में होती हैं।
  3. इस अस्थिर भाग में संवाहिक धाराएँ चलती हैं, जो ताप और आर्द्रता को ऊँचाई तक ले जाती हैं।
  4. इस भाग में संचालन क्रिया द्वारा वायुमण्डल की विभिन्न परतें गर्म होती हैं। ऊंचाई के साथ-साथ तापमान कम होता है। तापमान कम होने की दर 1°C प्रति 165 मीटर हैं।
  5. क्षोभमण्डल में अस्थिर वायु के कारण आँधी-तूफान चलते हैं। वायु परिवर्तन से मौसम परिवर्तन होता है। इसी क्षेत्र मे चक्रवात उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 15.
क्षोभ सीमा पर भूमध्य रेखा के ऊपर न्यूनतम ताप क्यों पाया जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर निम्नतम तापमान धुवों पर पाया जाता है। परन्तु वायु में क्षोभ सीमा पर निम्नतम तापमान भूमध्य रेखा पर पाया जाता है। क्षोभमण्डल पर भूमध्य रेखा पर -80C तथा ध्रुवों पर-45°C तापमान पाया जाता है। इसका कारण यह है, कि भूमध्य रेखा पर क्षोभ सीमा की ऊँचाई 18 किमी होती है, जबकि ध्रुवों पर यह ऊँचाई केवल 8 किमी होती है। ऊँचाई के साथ तापमान कम होता है, इसलिए अधिक ऊंचाई होने के कारण भूमध्य रेखा पर निग्नताप पाए जाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की संरचना एवं प्रत्येक परत की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रासायनिक संघटन के आधार पर वायुमण्डल को दो विस्तृत परतों में विभक्त किया गया है-होमोस्फेयर हेट्रोस्फेयर। होमोस्फेयर (सममण्डल)-यह 90 किमी की ऊंचाई के मध्य स्थित है। इसकी तीन परतें हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल तथा मध्यमण्डल। प्रत्येक उप-परत अपने साथ वाली परत से एक पतले संक्रमण क्षेत्र द्वारा अलग होती है, जिसे सीमा कहते हैं । क्षोभमण्डल वायुमण्डल की सबसे निचली परत है। यहाँ ऊँचाई के साथ तापमान घटता है। इस परत में तापमान प्रत्येक 100 मीटर. की ऊँचाई पर 0.65°C से कम हो जाता है। इसे सामान्य क्रास दर कहते हैं। सभी वायुमण्डलीय प्रक्रियाएँ, जो जलवायु से सम्बन्धित हैं, इस परत में घटती है।

क्षोभ सीमा के ऊपर समतापमण्डल की स्वच्छ एवं शान्त वायु मौजूद है। इस परत में जलवाष्य का पूर्ण अभाव मेघों के निर्माण को रोकता है, जिससे यहाँ दृश्यता सर्वाधिक होती है। ओजोन परत भी समतापमण्डल में ही है। यह पृथ्वी को पराबैगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है। समताप सीमा के ऊपर मध्यमण्डल स्थित है। इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान फिर कम होने लगता है। मध्यमण्डल के उच्च अक्षांशों में गर्मियों में तंतुनुमा मेघ देखने को मिलते है, जो उल्का धूल कणों से परावर्तित सूर्य किरणें हैं।

विषय मण्डल (हेस्ट्रोस्फेयर)-यह एक परतदार उष्णमण्डल है। यह मध्यसीमा के ऊपर स्थिल है और अंतरिक्ष एक विस्तृत क्षेत्र है। उष्णमण्डल के निम्न भाग में 100 से 400 किमी के मध्य की ऊँचाई और वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण हो जाता है। यह परत रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है। आयनीकृत धूल कण अंतर्विराम पर चादर के समान प्रकाश फैलाते हैं, जिसे उत्तरी गोलाद्ध ऑरोरा बोरिलिस तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में ऑरोरा आस्ट्रेलिस कहते हैं। ऊष्णमण्डल के ऊपरी भाग में फिर से आयनों का संकेन्द्रण होता है। इसे एलेन विकिरण पट्टी कहते हैं। सबसे ऊपरी परत को चुबकीय मण्डल भी कहते हैं। इस मण्डल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम तथा हाइड्रोजन की विशिष्ट परतें होती है।

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प्रश्न 2.
वायुमण्डल की संरचना एवं प्रत्येक परत की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर सैकड़ों किमी की ऊँचाई में आवृत करनेवाला गैसीय आवरण ही वायुमण्डल है। इसकी संरचना लगभग 1 अरब वर्ष पूर्व सम्भावित मानी गयी है, जबकि यह वर्तमान अवस्था में लगभग 58 करोड़ वर्ष पूर्व आया। पृथ्वी का गैसीय आवरण पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही बंधा है। वायुमण्डल में वायु एवं गैसों की अनेक संकेन्द्रित परतें विद्यमान है, जो घनत्व, तापमान एवं संभव की दष्टि से एक दूसरे से पूर्णतः भिन्न है।

सामान्यतः वायुमण्डल पाँच मण्डलों में विभक्त है –

  1. क्षोभ मण्डल
  2. समताप मण्डल
  3. मध्य मण्डल
  4. आयन मण्डल
  5. बाह्य मण्डल

1. क्षोभ मण्डल – मानव हेतु अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। ऋतु एवं मौसम सम्बन्धी लगभग सभी घटनाएँ इसी परत में होती है। बादल, वर्षा, धूलकण, आँधी-तूफान आदि मौसम सम्बन्धी घटनाएँ घटित होती है।

2. समताप मण्डल – की ऊँचाई 50km तक मानी जाती है। यहाँ संवाहनीय धाराएँ, आँधी, बादलों की गरज, धूल-कण आदि कुछ भी नहीं पाया जाता है। कभी-कभी मोतियों जैसे दुर्लभ बादल दिखाई पड़ते हैं।

3. मध्य मण्डल – का विस्तार 50 से 90km. तक है, इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान गिरने लगता है।

4. आयन मण्डल – इसकी सीमा 100 km. से 400 km. ऊ तक है। यहाँ पर उपस्थित गैस के कण विद्युत आवेशित होते हैं। जिसे आयन मण्डल कहा जाता है।

5. बाह्य मण्डल – वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत बाह्य मण्डल कहा जाता है। यहाँ वायु नहीं के बराबर होती है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल की संरचना एवं संघटन का वर्णन करें।
उत्तर:
वायुमण्डल की संरचना –

  • रासायनिक संघटन के आधार पर वायुमण्डल दो विस्तृत परतें होमोस्फेयर तथा हेट्रोस्फेयर में विभक्त है। होमोस्फेयर 90 कि०मी० तक स्थित है।
  • इसकी तीन तापीय परतें हैं-क्षोभमण्डल, समताप मण्डल तथा मध्य मण्डल।
  • प्रत्येक उपपरत अपने साथ वाली परत से एक पतले संक्रमण क्षेत्र द्वारा अलग होती है, जिसे सीमा कहते है और उसे निचले परत के नाम से जोड़ते हैं, जैसे क्षोभ सीमा।
  • ट्रेटोस्फेयर का रासायनिक संगठन असमान है। इसमें क्रमशः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम है। इसमें क्रमशः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम तथा हाइड्रोजन की परतदार सरचनाएँ हैं।

वायुमण्डल का संघटन –
1. वायुमण्डल गैस का एक आवरण है, जो भूपष्ठ के ऊपर हजारों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला है। लगभग 90 कि०मी० की ऊंचाई तक यह तीन प्रमुख गैसों-नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा आरगन में एक समान है। इसके अतिरिक्त इनमें नियॉन क्रिप्टन एवं नीयॉन जैसी दुर्लभ गैसें है, जिन्हें उत्कृष्ट गैसें भी कहते हैं।

2. ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन मिलकर होमोस्फेयर की स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करते है। इसके अतिरिक्त कार्बन डायऑक्साइड, जलवाष्प ओजोन, अक्रिय गैसें जैसे-क्रिप्टन निर्यान, आरगन तथा अधिक मात्रा में ठोस एवं द्रव कण जिन्हें सामूहिक रूप से सेरोसॉल या वायुविलय कहते हैं। .

प्रश्न 4.
वायुमण्डल की रचना का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
वायुमण्डल अनेक गैसों, जलवाष्प तथा धूल कणों के मिश्रण से बना हुआ है। वायुमण्डल में ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन प्रमुख गैसें हैं। ये दोनों मिलकर वायुमण्डल का 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करती है। शेष 1 प्रतिशत में अन्य गैसें कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, ओजोन, आर्गन, हाइड्रोजन, हीलियम आदि शामिल हैं। इन गैसों की मात्रा कम व अधिक होती रहती है। भारी गैसें वायुमण्डल की निचली परतों में तथा हल्की गैसें ऊपरी परतों में पाई जाती हैं ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड जीव-जन्तुओं तथा पौधों के जीवन का मूल आधार है।
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वायुमण्डल में लगभग 2% मात्रा में जलवाष्प पाया जाता है। ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। कुल जलवाष्प का लगभग आधा हिस्सा दो हजार मीटर ऊँचाई के नीचे पाया जाता है। जलवाष्प तापमान पर भी निर्भर करता है। भमध्य रेखा से धवों की ओर जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। पृथ्वी पर वर्षा एवं संघनन का मुख्य स्रोत जलवाष्प ही है। सूर्यताप को सोखकर जलवाष्प तापक्रम नियन्त्रण करता है । इसके अतिरिक्त वायुमण्डल में बहुत अधिक ठोस कण पाए जाते हैं जिनमें धूलकण प्रमुख है। इनके स्रोत मरुस्थलीय मैदान, समुद्री तट, शुष्क घाटियाँ तथा झील तल होते हैं। धूल कण सूर्यताप को बिखेरते तथा विकेन्द्रित करते हैं। धूल कण अधिकतर वायुमण्डल के निचले हिस्सों में पाए जाते हैं। वायुमण्डल में धूल कणों का विशेष महत्त्व है।

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प्रश्न 5.
वायुमण्डलीय क्रियाएँ मौसम तथा जलवायु को किस प्रकार प्रभावित करती हैं? वर्णन करें। अथवा, मौसम और जलवायु के मुख्य तत्त्वों तथा जलवायु के प्रमुख नियन्त्रकों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मौसम और जलवायु के प्रमुख तत्त्व हैं –

  • तापमान
  • वायुदाब एवं पवनें
  • आर्द्रता एवं वर्षण।

ये जलवायु तत्त्व कहलाते हैं, क्योंकि इन्हीं से विभिन्न प्रकार के मौसम और जलवायु के प्रकारों की रचना होती है। तापमान तथा वर्षण मुख्य आधारभूत तत्त्व है, जिनसे वायुदाब, पवनें तथा अन्य तत्त्व जुडे हुए हैं। व्यावहारिक रूप से पृथ्वी पर समस्त ऊर्जा सूर्याताप अथवा सूर्य से आने वाले विकिरणों को फल है । पृथ्वी के तापमान के असमान वितरण से वायुदाब में भिन्नता आती है, जिससे पवनों की उत्पत्ति होती है। वायुमण्डल में आर्द्रता जलवाष्प के रूप में उपस्थित रहती है, जो अक्सर संघटित होकर मेघों को जन्म देती हैं। इसका वर्षण वर्षा, ओले, बजरी अथवा हिम के रूप में हो सकता है। वायु की अपने अन्दर जलवाष्य रखने की क्षमता इसके तापमान पर निर्भर करती है। जलवायु नियंत्रकों के कारण जलवायु के तत्त्व एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न-भिन्न होते हैं।

जलवायु नियन्त्रक निम्न हैं –

  • अक्षांश अथवा सूर्यताप
  • स्थल एवं जल का वितरण
  • अर्धस्थाई उच्च दाब एवं निम्न दाब की विशाल पट्टियाँ
  • पवनें
  • ऊँचाई
  • महासागरीय धाराएँ
  • विभिन्न प्रकार के तुफान
  • पर्वतीय अवरोध

ये नियन्त्रक विभिन्न गहनता तथा विभिन्न संयोजनों के साथ काम करते हुए, तापमान एवं वर्षण में परिवर्तन लाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की जलवायु और मौसम के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें –

  1. होमोस्फेयर
  2. वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण।

उत्तर:
1. होमोस्फेयर (सममण्डल) – वायुमण्डल की सबसे निचली परत क्षोभमण्डल कहलाती है। यह भूमध्य रेखा पर 16 किमी. तथा धुवों पर 10 किमी की ऊँचाई पर स्थिल है। यहाँ तापमान घटता जाता है, क्योंकि वायुमण्डल अधिकतर भूपृष्ठ द्वारा विकरित ऊष्मा से गर्म होता है। इस परत में तापमान प्रत्येक 100 मीटर की ऊँचाई पर 0.65°C कम हो जाता है। इसे सामान्य ह्यास दर कहते हैं। क्षोभ सीमा के पास यह न्यूनतम -60°C पर पहुँच जाता है सभी वायुमण्डलीय प्रक्रियाएँ जो जलवायविक तथा मौसमी दशाओं के लिए उत्तरदायी हैं, इस परत में घटती हैं।

क्षोभ सीमा के ऊपर समतामण्डल की स्वच्छ एवं शान्त वायु मौजूद है। ओजोन परत भी समतापमण्डल में ही है। इसकी अधिकता 20 से 22 किमी. ऊँचाई वाले क्षेत्र में है। ओजोन परत पृथ्वी को पराबैगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है। तापमान समतापमण्डल के आधार पर -600 C से बढ़कर इसकी ऊपरी सीमा पर जिसे समताप सीमा कहते हैं,0°C हो जाता है। समताप सीमा के ऊपर मध्यमण्डल स्थित है, जो 50 से 90 किमी की ऊँचाई के मध्य स्थित है।

2. वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण – उष्णमण्डल अंतरिक्ष के आधार तक विस्तृत है। इस परत का तापमान आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ता है। उष्णमण्डल के निम्न भाग में 100 से 400 किमी के मध्य ऊँचाई पर वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण हो जाता है। इन आयनीकृत कणों का 250 किमी. की ऊंचाई पर सर्वाधिक संकेन्द्रता होता है। यह परत रेडियो तरंगों को परिवर्तित करती है।

आयनीकृत धूलकण अंत विराम पर चादर के समान प्रकाश फैलाती है, जिसे उत्तरी गोलार्द्ध में ऑरोरा बोरिलिस और दक्षिणी गोलार्ध में ऑरोरा आस्ट्रेलिस कहते हैं। उष्णमण्डल के ऊपरी भाग में फिर से आयनों का संकेन्द्रण होता है। इसे वान एलेन विकिरण पट्टी कहते हैं। सबसे ऊपरी भाग को चुम्बकीय मण्डल भी कहते हैं । ऊष्णमण्डल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम तथा हाइड्रोजन की विशिष्ट परतें हैं, जो भूपृष्ठ से क्रमशः 200 किमी., 1000 किमी, 2600 किमी. तथा 9600 किमी. की औसत ऊँचाईयों पर स्थित हैं।

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प्रश्न 7.
वायुमण्डल के संघटन और ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, तथा कार्बन डाइऑक्साइड के महत्त्व की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
लगभग 90 किमी. की ऊँचाई तक नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा आर्गन एक समान है। इसके अतिरिक्त इनमें नियॉन, क्रिष्टन, एवं जीनॉन जैसी दुलर्भ गैसें हैं। इन्हें उत्कृष्ठ गैसें भी कहते हैं। ये अक्रिय गैसें हैं। यह परत सामान्यतः होमोस्फेयर या सममण्डल कहलाती है। ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन मिलकर होमोस्फेयर की स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करते हैं। इसके अतिरिक्त कम मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प, आजोन, अक्रिय गैसें तथा अधिक मात्रा में ठोस एवं द्रव कण, जिन्हें, सामूहिक रूप से ऐरासॉल या वायु-विलय कहते है, शामिल हैं।

नाइट्रोजन अन्य पदार्थों के साथ रासायनिक संयोग नहीं करता है, लेकिन मृदा में स्थिर हो जाता है। यह एक घोलक का काम करता है तथा दहन को नियन्त्रित करता है। इसके विपरीत, ऑक्सीजन लगभग सभी तत्त्वों के साथ मिल जाता है और अत्यधिक दहनशील है। यद्यपि वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड का भाग कम है फिर भी वायुमण्डलीय प्रक्रिया में यह एक महत्त्वपूर्ण गैस है।

यह ऊष्मा को अवशोषित कर सकता है और इस प्रकार निचले वायुमण्डल को सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म करता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में हरे पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं। ओजोन बहुत कम मात्रा में समतापमण्डल में भूपृष्ठ के मध्य मिलती है, परन्तु यह अत्यन्त उपयोगी गैस है, यह परबैंगनी किरणों का अवशोषण करती हैं और हानिकारक किरणों से भूपृष्ठ पर जीवन की रक्षा करती हैं।

वायुमण्डल का संघटन – (देखें तालिका 8.1)
जलवाष्प एवं धूल कण मौसम एवं जलवायु के प्रमुख चर हैं। ये सभी संघनन के स्रोत है, तथा सूर्य से प्राप्त होने वाली अथवा पृथ्वी से विकिरित ऊर्जा के प्रमुख अवशोषक हैं। ये वायुमण्डल की स्थिरता को भी प्रभावित करते हैं। वायुमण्डल में जलवाष्य की मात्रा विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने के साथ कम होती जाती है। इसका लगभग 90 प्रतिशत भाग वायुमण्डल से 6 किमी नीचे रहता है। वायुमण्डल के इस भाग में ही धूल कण, नमक तथा पराग आदि के ठोस कण निलम्बित रहते है।

वायुमण्डल की ऊपरी परत मे अति सूक्ष्म धूल कण पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की किरणों को प्रकीर्णन कर देते हैं और नीले रंग के अतिरिक्त सभी रंगों को अवशोषित कर लेते हैं। इसके विपरीत बड़े आकार वाले कण सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय के लाल और नारंगी रंगों के लिए उत्तरदायी हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?
(क) तरुणावस्था
(ख) प्रथम प्रौढ़ावस्था
(ग) अन्तिम प्रौढ़ावस्था
(घ) वृद्धावस्था
उत्तर:
(क) तरुणावस्था

प्रश्न 2.
एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैं; किस नाम से जानी जाती है?
(क) U – आकार की घाटी
(ख) अन्धी घाटी
(ग) गॉर्ज
(घ) कैनियन
उत्तर:
(घ) कैनियन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

प्रश्न 3.
निम्न में से किन प्रदेशों में रसायनिक अपक्षय प्रक्रिया यान्त्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है?
(क) आई प्रदेश
(ख) शुष्क प्रदेश
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश
(घ) हिमनद प्रदेश
उत्तर:
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा वक्तव्य लेपीज (Lapies) शब्द को परिभाषित करता है?
(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।
(ख) ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे से कीप के आकार के होते हैं।
(ग) ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं।
(घ) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों।
उत्तर:
(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।

प्रश्न 5.
गहरे, लम्बे व विस्तृत गर्त या बेसिन जिनके शीर्ष दीवार खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं, उन्हें क्या कहते हैं?
(क) सर्क
(ख) पाश्विक हिमोढ़
(ग) घाटी हिमनद
(घ) एस्कर
उत्तर:
(क) सर्क

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

प्रश्न 6.
यू-आकार की घाटी बनती है ……………
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
चट्टानों में अध: कर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?
उत्तर:
नदी विकास की प्रारम्भिक अवस्था में प्रारम्भिक मन्द ढाल पर विसर्प लूप विकसित होते हैं और ये लूप चट्टानों में गहराई तक होते हैं, जो प्रायः नदी अपरदन या भूतल के धीमे व लगातार उत्थान के कारण बनते हैं। कालान्तर में ये गहरे तथा विस्तृत हो जाते हैं और कठोर चट्टानी भागों में गहरे गॉर्ज व कैनियन के रूप में पाए जाते हैं।

ये उन प्राचीन धरातलों के परिचायक है जिन पर नदियाँ विकसित हुई है। बाढ व डेल्टाई मैदानों पर लूप जैसे चैनल प्रारूप विकसित होते हैं-जिन्हें विसर्प कहा जाता है । नदी विसर्प के निर्मित होने का कारण तटों पर जलोढ़ का अनियमित व असंगठित जमाव है, जिससे जल के दबाव का नदी पाश्वों की तरफ बढ़ता है। प्रायः बड़ी नदियों के विसर्प में उत्तल किनारों पर सक्रिय निक्षेपण होते हैं और अवतल किनारों पर अधोमुखी (Undercutting) कटाव होते हैं।

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प्रश्न 2.
घाटी रंध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
सामान्यतः धरातलीय प्रवाहित जल घोल रंध्रों व विलयन रंगों में से गुजरता हुआ भूमि के अन्दर नदी के रूप में विलीन हो जाता है और फिर कुछ दूर के पश्चात् किसी कंदरा से भूमिगत नदी के रूप में फिर से निकल आता है। जब घोलरंध्र व डोजाइन इन कंदराओं की छत के गिरने से या पदों के स्खलन द्वारा आपस में मिल जाते हैं, तो लम्बी तंग तथा विस्तृत खाइयाँ बनती है जो कि घाटी का युवाला कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
चूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौमजल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि, जब चानें पारगम्य, कम सघन अत्यधिक जोड़ों/सन्धियों व दरारों वाली हो, तो घरातलीय जल का अन्त:स्रवण आसानी से होता है। लम्बवत् गहराई पर जाने के बाद धरातल के नीचे चट्टानों की संधियाँ, छिद्रों व संस्तरण तल से होकर क्षैतिज अवस्था में बहना प्रारंभ करता है।

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प्रश्न 4.
हिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति व नाम बताएं।
उत्तर:
हिमनद घाटियों में निम्नलिखित रैखिक निक्षेपण स्थलरूप पाए जाते हैं –

  1. हिमोढ़-हिमोद, हिमनद टिल (Till) – या गोलाश्मी मृहिका के जमाव की लम्बी कटकें।
  2. एस्कर (Eskers) – बड़े गोलाश्म, चट्टानी टुकड़े और छोटा चट्टानी मलबा हिमनद के नीचे बर्फ की घाटी में जमा हो जाते हैं, जो वक्राकार कटक के रूप में मिलते हैं।
  3. हिमानी धौत मैदान (Outwash plains) – हिमानी-जलोढ़ निक्षेपों से हिमानी धैत मैदान नर्मित होते हैं।
  4. ड्रमलिन का निर्माण हिमनद दरारों में भारी चट्टान मलबे के भरने व उसके बर्फ के चे रहने से होता है।

प्रश्न 5.
मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरनदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?
उत्तर:
उष्ण मरूस्थलों के दो प्रभावशाली अनाच्छादनकर्ता कारकों में से पवन एक महत्त्वपूर्ण अपरदन का कारक है। मरुस्थलीय धरातल शीघ्र गर्म और शीघ्र ठंडे हो जाते हैं। उष्ण धरातलों के ठीक ऊपर वायु गर्म हो जाती है, जिससे हल्की गर्म हवा प्रक्षुब्दता के साथ उर्ध्वाधर गति करती है। इसके मार्ग में कोई रुकावट आने पर भँवर, वातावृत बनते हैं तथा अनुवात एवं उत्वात प्रवाह उत्पन्न होता है।

पवन, अपवाहन, घर्षण आदि द्वारा अपरदन करती हैं। मरुस्थलों में अपक्षय जनित मलबा केवल पवन द्वारा ही नहीं, बल्कि वर्षा च सृष्टि धोवन से भी प्रवाहित होता है। पवन केवल महीन मलबे का ही अपवाहन कर सकती है। जबकि वृहत् अपरदन मख्यतः परत बाढ़ या वृष्टि धोवन से ही सम्पन्न होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आई व शुक्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
आई व शुष्क जलवायु प्रदेशों में, जहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, प्रवाहित जल सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक हैं जो धरातल के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल के दो तत्त्व हैं। एक, धरातल परत के रूप में फैला हुआ प्रवाह है। दूसरा रैखिक प्रवाह है जो घाटियों में नदियों सरिताओं के रूप में बहता है।

प्रवाहित जल द्वारा निर्मित अधिकतर अपरदित स्थलरूप ढाल प्रवणता के अनुरूप बहती हुई नदियों की आक्रामक युवावस्था से संबंधित है। कालांतर में तेज ढाल लगातार अपरदन के कारण मंद ढाल में परिवर्तित हो जाते हैं और परिणामस्वरूप नदियों का वक्र कम हो जाता है, जिससे निक्षेपण आरंभ होता है।

तेज ढाल से बहती हुई, सरिताएं भी कुछ निक्षेपित भू-आकृतियाँ बनाती हैं, लेकिन ये नदियों के माध्यम तथा धीमे ढाल पर बने आकारों की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। प्रवाहित जल का ढाल जितना मंद होगा, उतना ही अधिक निक्षेपण होगा। जब लगातार अपरदन के कारण नदी तल समतल हो जाए, तो अधोमुखी कटाव कम हो जाता है और तटों का पार्श्व अपरदन बढ़ जाता है और इसके फलस्वरूप पहाड़ियाँ और घाटियाँ समतल मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।

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प्रश्न 2.
चूना घट्टानें आई व शुष्क जलवायु में भिन व्यवहार करती हैं क्यों ? चूना प्रदेश में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन-सी हैं और इसके क्या परिणाम हैं।
उत्तर:
चूने का पत्थर पतली एवं मोटी दोनों प्रकार की परतों में पाया जाता है तथा इसके कण महीन भी हो सकते हैं, साथ ही साथ बड़े भी। चूँकि लाइमस्टोन की रचना घुलनशील तत्त्व कैल्शियम कार्बोनेट से होती है, अत: यह आर्द्र जलवायु में शीघ्रता से घुल जाता है। इस कारण इस चट्टान पर रासायनिक अपक्षय का प्रभाव सर्वाधिक होता है।

लेकिन शष्क जलवाय में या शुष्क जलवायु वाले भागों में यह अपक्षय के लिए अवरोधक होता है। इसका मुख्य कारण ह है कि लाइमस्टोन की रचना में समानता होती है तथा परिवर्तन के कारण चट्टान में फैलाव तथा संकुचन नहीं होता है, कारण चट्टान का बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन अधिक मात्रा में नहीं हो पाता है।

चूना पत्थर (Limestone) या डोलोमाइट चट्टनों के क्षेत्र में भौम जल द्वारा घुलन प्रक्रिया और उसकी निशेपण प्रक्रिया से बने ऐसे स्थलरूपों को कार्स्ट (Karst topography) स्थलाकृति का नाम दिया गया है। अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक (दोनों प्रकार के स्थललरूप कार्ट स्थलाकृतियों की विशेषताएँ हैं। अपरदित स्थलरूप-कुंड (Pools) घोलरंध्र (Sinkholes), लैपिज (Lapies), और चूना पत्थर चबूतरे (Limestone pavements) हैं।

निक्षेपित स्थलरूप कंदराओं के भीतर ही निर्मित होते हैं। चूनायुक्त चट्टानों के अधिकतर भाग गतों व खाइयों के हवाले हो जाते हैं और पूरे क्षेत्र में अत्यधिक अनियमित, पतले व नुकीले कटक आदि रह जाते हैं, जिन्हें लेपीस (Lapies) कहते हैं। इन कटकों या लेपोस का निर्माण चट्टानों की संधियों में भिन्न घुलन प्रक्रियाओं द्वारा होता है। कभी-कभी लेपीज के विस्तृत क्षेत्र समतल चूना युक्त चबूतरों में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं या किस प्रक्रिया से यह सम्पन्न होता है बताएँ?
उत्तर:
हिमनदों से प्रबल अपरदन होता है जिसका कारण इसके अपने भार से उत्पन्न घर्षण होता है। हिमनद द्वारा कर्षित चट्टानी पदार्थ (प्रायः बड़े गोलाश्म व शैलखंड) इसके तल में ही इसके साथ घसीटे जाते हैं या घाटी के किनारों पर अपघर्षण व घर्षण द्वारा अत्यधिक अपरदन करते हैं। हिमनद अपक्षय रहित चट्टानों का भी प्रभावशाली अपरदन करते हैं, जिससे ऊँचे पर्वत छोटी पहाड़ियों व मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।
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हिमनद के लगातार संचलित होने से हिमनद मलबा हटता जाता है विभाजक नीचे हो जाता है और कालान्तर में ढाल इतने निम्न हो जो हैं कि हिमनद ही संचलन शक्ति समाप्त हो जाती है तथा निम्न पहाड़ियों व अन्य निक्षेपित स्थलरूपों वाला एक, मिनी धौत (Outwash plain) रह जाता है। चित्र (a) तथा (b) हिमनद के अपरदन व निक्षेपण से निर्मित स्थलरूपों को दर्शात हैं। हिमानीकृत पर्वतीय भागों में हिमनद द्वारा उत्पन्न स्थलरंध्रों में सर्क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सर्क के शीर्ष पर अपरदन होने से हॉर्न निर्मित होते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र के आस-पास के स्थलरूप, उनके पदार्थ तथा वह जिन प्रक्रियाओं से निर्मित हैं, पहचानें।
उत्तर:
अध्यापकों या अपने अभिभावकों के साथ अपने आस-पास के क्षेत्रों में जाएँ और स्थलाकृतियों को पहचानने की कोशिश करें। पाठ्य-पुस्तक साथ में रखें (इस परियोजना का कार्य स्वयं करें)।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘U’-घाटी किस प्रकार बनती है?
उत्तर:
हिम का असमान संचलन हिम को खंडित कर देता है, जिससे इसमें दरारें पड़ जाती हैं। इन्हें हिमबिदर कहते हैं। ‘U’ आकार की हिम गह्वार तथा मेष शिलाएँ बनती हैं।

प्रश्न 2.
तरंगापवर्तन किसे कहते हैं?
उत्तर:
धीमी होने पर तरंगों की पंक्तियाँ विभिन्न खंडों में नहीं बल्कि तरंग शीष के साथ-साथ निरन्तर परिवर्तित होते हुए मुड़ती हैं। इस प्रक्रिया को तरंगापर्वतन कहते हैं।

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प्रश्न 3.
लैगून (Lagoon) कैसे निर्मित होते हैं?
उत्तर:
जब रोधिका तथा स्पिट किसी खाड़ी के मुख पर निर्मित होकर उसके मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं तब लैगून (Lagoon) निर्मित होते हैं।

प्रश्न 4.
पुलिन क्या है? ये कैसे बनते हैं?
उत्तर:
पुलिन अस्थाई स्थलाकृतियाँ हैं। ये अधिकतर थल से नदियों व सरिताओं द्वारा अथवा तरंगों के अपरदन द्वारा बहाकर लाए गए पदार्थ होते हैं।

प्रश्न 5.
स्कंध ढाल किसे कहते हैं?
उत्तर:
उत्तर किनारों का ढाल मंद होता है ओर ये स्कंध ढाल (Slip-off-bank) कहलाते हैं।

प्रश्न 6.
भू-आकृतिक विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-आकृतिक विज्ञान भू-आकृतियों की उत्पत्ति का विज्ञान है। परंपरागत रूप में यह अध्ययन भू-आकृतियों की उत्पत्ति एवं विकास तक ही सीमित था।

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प्रश्न 7.
एकरूपता का नियम क्या है?
उत्तर:
चार्ल्स लीयल के अनुसार प्रकृति सभी कालों में एक समान आचरण करती है। इसे एकरूपता का नियम कहते हैं। वास्तव में भौतिक एवं रसायनिक नियम ही एक समान रहते हैं और भू-वैज्ञानिक क्रियाओं को निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 8.
प्रथम कोटि की भू-आकृतियाँ किस प्रकार की है?
उत्तर:
प्रथम कोटि की भू-आकृतियों में महाद्वीप और महासागर द्रोणियाँ सम्मिलित है, जो पृथ्वी के उच्चावचकी सबसे बड़ी इकाइयों को अपने में समेटे हुए हैं।

प्रश्न 9.
तुषार-क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
मध्य एवं उच्च अक्षांशों की जलवायु तथा उच्च तुंगता के क्षेत्रों में पानी का बारी-बारी जमना एवं पिघलना-तुषार क्रिया कहलाता है।

प्रश्न 10.
कणिकी विघटन किसे कहते हैं?
उत्तर:
शैल सबसे पहले खंडों में टूटती है, जिसे खंड विघटन कहते हैं। इसके बाद यह कणों में बदलती है, जिसे किणका विघटन कहते हैं।

प्रश्न 11.
सॉलीफ्लक्शन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वृक्ष विहीन टुंडा प्रदेश में मृदा-प्रवाह को अंग्रेजी में सॉलीफ्लक्शन कहते हैं।

प्रश्न 12.
अवसर्पण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब कोई अकेला शैल खंड अपने क्षैतिज अक्ष पर पीछे की ओर सर्पिल होकर एक चक्र विभंग तल पर लढकता है. उसे अवसर्पण कहते हैं।

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प्रश्न 13.
हिमानी का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्राकृतिक रूप से भूमि पर संचित किसी भी विशाल हिमराशि को हिमानों कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘द्रोणी झील’ की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
भूमि पर संचित विशाल हिमराशि को हिमानी कहते हैं। हिमानियों द्वारा अपने तल का कर्षण करने से हिमनद-द्रोणी का निर्माण होता है। यदि हिमनद-द्रोणी जल से भर जाता है. तो द्रोणी झील की उत्पत्ति होता है, जो हिमनद द्रोणी समुद्र के पास बनती है, वह समुद्र जल से भर जाती है। प्रत्येक द्रोणी के शीर्ष पर अति तीव्र ढाल वाली एक अर्ध-वृताकार बेसिन की रचना होती है, जिसे गह्वर कहते हैं।

प्रश्न 2.
यान्त्रिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
यान्त्रिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 3.
भू-प्रवाह एवं पंक प्रवाह में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भू-प्रवाह एवं पंक प्रवाह में अन्तर –
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प्रश्न 4.
जलोढ़ पंख एवं डेल्टा में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
जलोढ़ पंख एवं डेल्टा में अन्तर –
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प्रश्न 5.
V आकार घाटी एवं U आकार घाटी में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
V आकार घाटी एवं U आकार घाटी में अन्तर –
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प्रश्न 6.
पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ कौन-सी है?
उत्तर:
पृथ्वी के निर्माण के पश्चात् महाद्वीपों तथा महासागरों का निर्माण हआ। ये प्रथम श्रेणी की भू-आकृतियाँ हैं। इसके पश्चात् विवर्तनिक भू-संचरणों के कारण पर्वत, पठार तथा मैदान बनें। इन्हें पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ कहते हैं। इन भू-आकृतियों का मानव के लिए अलग-अलग महत्त्व है। पर्वत तथा पठार सम्पदाओं के भण्डार हैं। ये भू-आकृतियाँ भूगोलवेत्ताओं के लिए विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि वह इन क्षेत्रों में मानव-क्रियाकलापों का अध्ययन करता है।

प्रश्न 7.
विवर्तनिक संचरण से उत्पन्न पर्वतों के प्रकार बताएँ एवं उदाहरण दें।
उत्तर:
पर्वत ऐसे उँचे प्रदेश को कहते हैं, जो अपने आस-पास के क्षेत्र में 900 मीटर से अधिक ऊँचा हो। 900 मीटर से कम ऊँचे प्रदेश को पहाडी कहते हैं। कई क्षेत्र सापेक्ष ऊँचाद्र कम होने पर भी पहाडी कहे जाते हैं। जैसे-पारसनाथ की पहाडी. लेकिन कई क्षेत्र कम ऊँचे होते हैं और उनकी ऊँचाई अधिक होती है, पर्वत कहलाते हैं। जैसे-इंग्लैण्ड में पेनाइन पर्वत। भूसंचरण से उत्पन्न पर्वतों को विवर्तनिक पर्वत कहते हैं। ये प्रायः दो प्रकार के हैं-वलित पर्वत तथा खण्ड पर्वत।

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प्रश्न 8.
भू-द्रोणी से आपका क्या अभिप्राय है? उदाहरण देकर बताएँ।
उत्तर:
पतले लम्बे तथा गहरे समुद्री अथवा झील बेसिन को भू-द्रोणी कहते हैं। इन भू-द्रोणियों में एकत्रित मलबे पर दबाव पड़ने तथा उठान से बलित पर्वत बनते हैं। टैथीज भू-द्रोणी में ही हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ है। भूपृष्ठीय ढाल, जो स्थल प्रवाह द्वारा जलमागों के जल के साथ मिलकर एक अपवाह द्रोणी की रचना करता है। इस द्रोणी की सीमा एक रेखा के रूप में पहाड़ियों की अविरत श्रृंखला का अनुसरण करती है।

प्रश्न 9.
युवा वलित तथा प्राचीन वलित पर्वत किसे कहते हैं?
उत्तर:
युवा वलित पर्वत-वे पर्वत जिमका निर्माण हए अधिक समय नहीं हुआ है। इन पर्वतों की निर्माण क्रिया अभी चल रही है। हिमालय पर्वत, रॉकी पर्वत, आल्पस पर्वत इसके प्रमुख उदाहरण हैं। प्राचीन वलित पर्वत-ये पर्वत है, जिनका निर्माण प्राचीन काल में हआ है। ये पर्वत अपरदन के कारण कम ऊँचे हैं। यूराल पर्वत, अप्लेशियन पर्वत तथा शॉन पर्वत इनके उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
मैदानों का मानव के लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर:
महत्त्व –

  • मैदानों में निवास की सुविधाएँ होती हैं।
  • मैदानों के समतल धरातल तथा गहरी उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि की सुविधा है।
  • मैदान अन्न के भण्डार है।
  • मैदानों की समतल भूमि पर यातायात के साधन सरलता से बनाए जाते हैं।
  • मैदानों में बड़े-बड़े उद्योग तथा नगर स्थित होते हैं।
  • मैदान प्राचीन सभ्यताओं के पालने हैं।

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प्रश्न 11.
विभिन्न प्रकार की जलवायु में भू-आकृतियों पर भिन्न संरचनाओं वाली चट्टानों के प्रभावों का वर्णन करो।
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र में भू-आकृतियों के निर्माण में चट्टानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। निम्नलिखित गुण महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं –

  1. कठोरता
  2. संधियाँ
  3. पारगम्यता
  4. संरन्ध्रता।

विभिन्न प्रकार की जलवायु में विभिन्न भू-आकृतियाँ बनती है। उष्ण-आर्द्र जलवायु में चूने का पत्थर अपक्षयित हो जाता है। परन्तु शुष्क प्रदेशों में तीव्र ढाल वाली चट्टान के रूप में रहता है। शीत प्रदेशों में पाले के प्रहार से चट्टानें टूट जाती है। शुष्क प्रदेशों में ग्रेनाइट से गुम्बदनुमा भू-आकार बनते हैं, जिन्हें ‘टोर’ कहा जाता है।

प्रश्न 12.
भूस्खलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया से शैल अदृढ बन जाती है। जब गरुत्वाकर्षण बल उन्हें नीचे लाता है, तो इन्हें शैलपात कहते हैं। गिरते हुए शैल खंड छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाते हैं और एक ऐसी ढाल का निर्माण करते हैं, जिस पर अदृढ़ पदार्थ बिखरे पड़े होते हैं, इन्हें शैल मलबा कहते हैं। शैल खंड का अकेले धरातल पर नीचे लुढ़कना भूस्खलन (शैल स्खलन) कहलाता है।
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प्रश्न 13.
नदी निक्षेपण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
नदी का वेग कम होने लगता है, गाद के मोटे कण नीचे बैठने लगते हैं, जबकि बारीक मृत्तिका अनिश्चित रूप से परिवहन जारी रखती है। इसे नदी निक्षेपण कहते हैं। मृत्तिका समुद्र में पहुँचकर समुद्र के नमकीन जल के सम्पर्क में आती है और इसमें उपस्थित कण बड़े हो जाते हैं। इसे ऊर्णन कहते हैं। मध्यम तथा मोटे आकार वाले बालू के कण तथा बड़े टुकड़े नदी के तल पर तल भार के रूप में यात्रा करते हैं। नदी विसर्प, बाढ़ के मैदान, गुंफित मार्ग, गोखुर झील तथा डेल्टा आदि का निर्माण नदी निक्षेपण के कारण होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न प्रकार के वृहत क्षरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वृहत क्षरण के रूप प्रलयंकारी अवसर्पण से लेकर जलसंतृप्त मृदा के मन्द प्रवाह तक हो सकते हैं। मृदा लम्बे काल से पर्वत ढाल के सहारे अति मन्द गति से नीचे की ओर निरन्तर संचालित हो रही है। इसे मृदा सर्पण कहते हैं। आर्द जलवायु वाले पर्वतीय तथा पहाड़ी क्षेत्रों में जलसंतृप्त मिश्रित मृदा मृत्तिका खनिजों में धनी रेगोलिथ मृदा प्रवाह का रूप लेती है। जब खनिज पदार्थों के अनुपात में जल की मात्रा अधिक होती है, तो वह वृहत क्षरण पंक प्रवाह का रूप ले लेता है। यह नदी मागों में तेजी के साथ यात्रा करता है।

सीधे शैल-भृगु के किनारे भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया शैल को अदृढ़ बना देती है। गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें नीचे लाता है, तो उसे शैलपात का नाम दिया जाता है। शैलखंड टूट-टूटकर एक ऐसे ढाल का निर्माण करती है, जिन्हें शैल मलबा कहते हैं। शैलखंड का धरातल पर नीचे लुढ़कना शैल स्खलन कहलाता है । जब कोई अकेला शेलखंड सर्पिल होकर एक वक्र विभाग तल पर लुढ़कता है, तो उसे अवसर्पण कहते हैं।
अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण की प्रक्रियाएँ अनेक कारकों, जैसे-प्रवाहित जल, हिमनदी । या हिमानी, समुद्री तरंगों तथा पवनों द्वारा क्रियान्वित की जाती है।
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1. प्रवाहित जल – प्रवाहित जल अनाच्छादन का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है। अपक्षय एक वृहत् क्षरण के साथ मिलकर नदी क्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया, जिसे नदीय अनाच्छादन कहते हैं, के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल भू-आकृतिक कारक के रूप में दो आधारभूत विधि से कार्य करता है। पहला है स्थल प्रवाह। इसमें भूपृष्ठ के ऊपर जल प्रवाह ढाल के सहारे लगभग एक विस्तृत परत के रूप में गतिशील रहता है।

दूसरा है मार्ग प्रवाह अथवा नदी प्रवाह, जिसमें जल एक सुनिश्चित लम्बे संकीर्ण तथा गहरे मार्ग से होकर नीचे तल की ओर बहता है, जिसे नदी मार्ग कहते हैं। नदी मार्ग अनेक शाखाओं के रूप में जलमार्ग का एक जाल बनाती है। जब नदी का वेग कम होने लगता है, गोद के मोटे कण नीचे बैठने लगते हैं। यह नदी का निक्षेपण है। नदी विसर्प, बाढ़ के मैदान, गुफीत मार्ग, गोखुर झील तथा डेल्टा आदि का निर्माण नदी के निक्षेपण के कारण होता है।

2. हिमानी – प्राकृतिक रूप से संचित विशाल हिम राशि को हिमानी कहते हैं । हिम विनाश की औसत दर हिमपात से अपेक्षाकृत कम होती है। हिमानी के निचले भाग में अपक्षरण की दर विनाश की संचयन दर से बढ़ जाती है। हिम की शुद्ध हानि का यह क्षेत्र अपक्षरण क्षेत्र कहलाता है।

3. पवनें – पवनें पृथ्वी पर पवन अपरदन तथा निक्षेपण की अवस्थितियों को प्रभावित करती हैं। पवन अपरदन एक प्रकार की अपवाहन है। पवन अपरदन से उत्पन्न उथले गर्तो अपवाहन गर्त अथवा वातगर्त कहते हैं। वालूवात्या क्रिया पवन अपरदन का दूसरा रूप है। यह अपरदन तब होता है, जब बालू के कण शैल पृष्ठ के अनावरित भाग पर जोर से टकराते हैं। छत्रक शैल, खोंच, मधुछत्ता कुछ ऐसे लक्षण है, जो बालूवात्या पवन परिवहन से बनी भू-आकृति को लोएस कहते हैं। बालू टिब्बे मरुस्थलों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भू-आकृतियाँ हैं।
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4. तरंगें – समुद्री तरंगों द्वारा अपरदन विनाशकारी प्रक्रियाएँ है, जो पदार्थों को परिवहन तथा निक्षेपण के साथ क्रियाशील हैं। तरंग-क्रिया अपरदन का प्रमुख कारक है। पवन द्वारा उत्पन्न महासागरीय तरंगें दो प्रकार की होती है-प्रगामी तरंगें, जिसमें जल से होकर तरंगें तेजी से संचलन करती है, तथा दोलनी तरंग, जो केवल ऊपर-नीचे संचलन करती हैं। इससे तरंग-अपरदित आलों (खाँचों) तथा समुद्री गुफाओं की रचना होती है। समुद्र का अपरदन का कार्य मुख्य रूप से तरंग के आकार तथा शक्ति, समुद्र की ओर ढाल, उच्च एवं निम्न ज्वारभाटा के मध्य तट की ऊँचाई, शैल संघटन तथा जल की गहराई पर निर्भर करता है। अपरदन समुद्री तरंगों के घुलनशील तथा रासायनिक क्रियाओं द्वारा भी प्रभावित होता है।
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प्रश्न 2.
मैदान क्या होते हैं? मैदानों का वर्गीकरण करें। प्रत्येक के उदाहरण दें।
उत्तर:
प्रमुख भू-आकृतियों में मैदान सबसे अधिक स्पष्ट तथा सरल है। स्थल के अधिकांश भाग (40 प्रतिशत) पर इनका विस्तार है। मैदान भू-धरातल पर निचले तथा समतल प्रदेश होते हैं। मैदान स्थल के वे समतल भाग हैं, जो सागर तल से 150 मी. से कम ऊँचाई पर हों तथा उनकी ढाल धीमी तथा साधारण हो।

मैदान समुद्रतल से ऊँचे या नीचे हो सकते हैं। परन्तु अपने आस-पास के पठार या पर्वत से कभी भी ऊँचे नहीं हो सकते। सभी मैदान समुद्र तल से समान ऊँचाई पर नहीं होते । कई मैदान समुद्र तल से बहुत ऊँचे होते हैं, जैस संयुक्त राज्य अमेरिका के महान् मैदान 1500 मीटर ऊँचे हैं। परन्तु हॉलैंड का तट समुद्र तल से नीचा है।

मैदान तीन प्रकार से बनते हैं –

  • अपरदन से – बाहरी शक्तियों के अपरदन से ऊँचे-नीचे मैदान बनते हैं।
  • निक्षेपण से – नदी, हिमनदी तथा वायु द्वारा लाई गई सामग्री के निक्षेपण से मैदान बनते हैं।
  • पृथ्वी की हलचल – पृथ्वी की भीतरी शक्तियों की हिलडुल के कारण तटवर्ती मैदान बनते हैं।

वर्गीकरण – रचना के आधार पर मैदानों को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:

  1. जलोढ़ मैदान
  2. अपरदन के मैदान
  3. हिमानी मैदान
  4. सरोबरीय मैदान
  5. तटीय मैदान
  6. लोएस मैदान

1. जलोढ़ मैदान – नदियों द्वारा तलछट के जमाव से विशाल जलोढ़ मैदान बनते हैं। नदियों का उद्देश्य स्थल भाग को काटकर सागर तल तक ले जाना होता है। पर्वतों से निकलकर नदियाँ भाभर का मैदान बनाती है। निचली घाटी में बाढ़ के समय बारीक मिट्टी के जमाव से बाढ़ का मैदान बनता है। सागर में गिरने से पहले एक समतल त्रिकोण आकार का मैदान बनाती है, जिसे डेल्टा कहते हैं। नदियों द्वारा बने मैदान बड़े उपजाऊ होते हैं।

उदाहरण – भारत में गंगा-सतलुज का विशाल मैदान चीन में ह्वांग हो तथा यंगसीक्यांग नदी का मैदान, अमेरिका में मिसीसिपी का मैदान।

2. अपरदन के मैदान – लम्बे समय तक हिम, जल, वायु आदि के निरंतर कटाव के कारण पर्वत या पठार घिस कर नीचे हो जाते हैं तथा मैदानों का रूप धारण कर लेते हैं। ये मैदान पूर्ण रूप से समतल नहीं होते । इन मैदानों का ढाल अत्यन्त हल्का होता है। इनके बीच कठोर चट्टानों के रूप में ऊँचे टीले मिलते हैं। ऐसे मैदान में कठोर चट्टानों के टीले नष्ट नहीं होते । इन्हें मोनेडनाक कहते हैं। इन्हें उपान्त मैदान भी कहते हैं।

उदाहरण – फिनलैंड तथा साइबेरिया का मैदान, भारत में अरावली प्रदेश, अफ्रीका में सहारा मैदान, यूरोप का मैदान ।

3. हिमानी मैदान – ये मैदान हिम नदी या ग्लेशियर के निक्षेप से बनते हैं । हिम नदी कटाव द्वारा ऊँचे भागों को काट-छाँटकर सपाट मैदान का निर्माण करती हैं। इनमें झीलें, जल प्रपात तथा ऊँचे-नीचे दलदली प्रदेश मिले हैं। जब बर्फ पिघलती है, तो अपने साथ बहाकर लाई मिट्टी बजरी, कंकर आदि निचले स्थानों तथा गड्ढों में भर देती है। इससे धरातल समतल बन जाता है। इन मैदानों में हिमोढ़ के जमाव से बने मैदान को ड्रिफ्ट मैदान भी कहते हैं। हिम नदी के अपरदन से भी मैदान बनते हैं, जिनमें छोटे-छोटे टीले इधर-उधर बिखरे होते हैं।

उदाहरण – हिम युग में उत्तरी अमेरिका, कनाडा तथा यूरोप बर्फ से ढके हुए थे। बर्फ पिघलने से वहाँ हिमानी मैदान बन गए। जैसे-उत्तर-पूर्वी लद्दाख का मैदान।

4. सरोवरीय मैदान – झीलों के भरने या सूख जाने से उन स्थानों पर सरोवरीय मैदान बनते हैं। झीलों में गिरने वाली नदियाँ अपने साथ लाई हुई मिट्टी आदि झील में जमा करती हैं, जिससे झील की तली ऊँची हो जाती है, गहराई कम हो जाती है और धीरे-धीरे झील पूरी तरह भरकर एक सपाट मैदान बन जाती है, पृथ्वी की भीतरी हलचल के कारण झील की तली ऊपर उठ जाने से भी मैदान बनते हैं।

उदाहरण – उत्तरी अमेरिका का प्रेवरीज का हरा भरा मैदान, हंगरी का मैदान, भारत में कश्मीर घाटी, मणिपुर में इम्फाल बेसिन ।

5. तटीय मैदान – तटीय मैदान प्रायः समुद्र के किनारे स्थित होते हैं, जो तटीय भाग जल में डूब जाते हैं उन पर तलछट के जमाव के कारण तटीय मैदान बनते हैं। सागरों के पीछे हटने से भी स्थल भाग सूखकर मैदान बन जाते हैं। पृथ्वी की हलचल के कारण तट के समीप कम गहरा समुद्र ऊँचा उठ जाता है। प्रायः तटीय मैदान का ढाल समुद्र की ओर धीमा होता है। इनका महत्त्व बन्दरगाहों तथा समुद्री व्यापार से है।।

उदाहरण – अमेरिका की खाड़ी का तटीय मैदान तथा महान् मैदान, भारत का पूर्वी तटीय मैदान, रूस का मैदान ।

6. लोएस का मैदान – वायु द्वारा बने मैदान की रेगिस्तानी या लोएस का मैदान कहते हैं। वायु रेत को उड़ाकर दूर-दूर के स्थानों में जमा करती है। एक पर्त के ऊपर दूसरी पर्त के बिछ जाने से इन मैदानों की रचना होती है। ऐसे मैदानों में रेत के डिब्बे अधिक होते हैं।

उदाहरण – उत्तर पश्चिमी चीन में सैंसी तथा शांसी प्रदेशों में लोएस का मैदान मिलते हैं। । पंजाब तथा हरियाणा की सीमा पर लोएस का मैदान मिलते हैं, रूसी तुर्किस्तान का मैदान ।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?
(क) निक्षेपण
(ख) ज्वालामुखियता
(ग) पटल विरूपन
(घ) अपरदन
उत्तर:
(घ) अपरदन

प्रश्न 2.
जल योजना प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) क्ले
(घ) लवण
उत्तर:
(घ) लवण

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प्रश्न 3.
मलबा अवधाव की घाटी बनती है।
(क) भूस्खलन
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन
(ग) मंदी प्रवाही वृहत् संचलन
(घ) अवतलन/धसकन
उत्तर:
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन

प्रश्न 4.
भू-आकार की घाटी बनती है।
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रफ़्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे?
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने एवं मुदा निर्माण कार्य में सहायक होती हैं बल्कि वे अपदन्न एवं वृहत संचलन के लिए भी उत्तरदायी हैं । जैव मात्रा एवं जैव विविधता प्रमुखतः वन (वनस्पति) की उपज हैं तथा वन अपक्षयी प्रावार की गहराई अर्थात् न केवल आवरण प्रस्तर एवं मिट्टी अपितु वृहत् संचलन पर निर्भर करता है।

यदि चट्टानों का अपक्षय न हो तो अपरदन का बोई महत्त्व नहीं होता। चट्टान का अपक्षय एवं निक्षेपण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान है। यह कुछ खनिजों जैसे लोहा, मैंगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा अयस्कों के समृद्धिकरण (enrichment) एवं संकेन्द्रण (concentration) में सहायक होता है।

प्रश्न 2.
वृहत् संचलन जो वारविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य (Perceptible) हैं, वे क्या हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
वृहत् संचलन के अन्तर्गत वे सभी संचलन आते हैं, जिनमें चट्टानों के मलवा (debris) का गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढाल के सहारे बना गतिज ऊर्जा या किसी भू-आकृतिक कारक की सहारप्ता के स्थानान्तरण निहित होता है। वृहत संचलन के लिए अपक्षय अनिवार्य नहीं है, यद्यपि वृहत् संचलन को बढ़ावा देता है।

असम्बद्ध कमजोर पदार्थ, छिछले संस्तर वाली चट्टानें, अंश, तीव्रता से झूके हुए संस्तर, खड़े भृगु या तीव्र ढाल, पर्याप्त वर्षा, मूसलाधार वर्षा तथा वनस्पति का अभाव, झीलों, नदियों जलाशयों से भरी मात्रा में जल निष्कासन, विस्फोट आदि वृहत् संचलन को अनुकूलित करते हैं।

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प्रश्न 3.
विभिन्न गतिशिल एवं शक्तिशाली बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य सम्पन करते हैं।
उत्तर:
बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपनी उर्जा से अन्तर्जनित शक्तियों से नियन्त्रित विवर्तनिक (tectonic) कारकों से उत्पन्न प्रवणता द्वारा निर्धारित वायुमण्डल से प्राप्त करते हैं। ढाल या प्रवणता बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारकों से नियन्त्रित विवर्तनिक कारकों द्वारा निर्मित होती हैं। बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपक्षय, वृहत क्षरण संचलन, अपरदन परिवहन आदि सभी प्रधान कार्य सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 4.
क्या मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?
उत्तर:
हाँ, मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है क्योंकि अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों के समुच्चय पर निर्भर करता है। कालान्तर में ये समुदाय (combine) अपक्षयी प्रावार (Mantle) की मूल विशेषताओं को जन्म देते है और यह अपक्षयी प्रवार ही मृदा निर्माण का मल निवेश होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
“हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है,” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धरातल पृथ्वी मण्डल के अन्तर्गत उत्पन्न हुई बाह्य शक्तियों एवं पृथ्वी के अन्दर अद्भुत आन्तरिक शक्तियों से अनवरत प्रभावित होता है तथा यह सर्वदा परिवर्तनशील है। बाह्य शक्तियों को बहिर्जनिक (exogenic) तथा आन्तरिक शक्तियों को अन्तर्जनित (endogenic) शक्तियाँ कहते हैं।

बहिर्जनिक शक्तियों के क्रियाओं का परिणाम होता है उमड़ी हुई भू-आकृतियों का विघर्षण (wearing down) तथा बेसिन/निम्नक्षेत्रों/गों के भराव (अधिवृद्धि/तल्लोचन) धरातल पर अपरदन के माध्यम से उच्चावच के मध्य अन्तर के कम होने के तथ्य को कहते हैं, क्रमस्थापन radation) अन्तर्जनित शक्तियाँ निरन्तर धरातल के भागों के ऊपर उठाती हैं या उनका निर्माण करती है तथा इस प्रकार वे उच्चावच में मिलता को सम (बराबर) करने में असफल रहती है। अतएव भिन्नता तब तक बनी रहती है जब तक बर्हिजनिक एवं अन्तर्जनिक शक्तियों के विरोधात्मक प्रतिकूल कार्य चलते रहते हैं।

सामान्यतः अन्तर्जनित शक्तियाँ मूल रूप से आकति निर्मात्री शक्तियाँ हैं तथा बर्हिजनिक प्रक्रियायें मुख्य रूप से भूमि विघर्षण शक्तियाँ होती हैं। धरातल का निर्माण एवं विघटन क्रमशः अन्तर्जनित एवं बर्हिजनिक शक्तियों द्वारा भूपर्पटी के उद्भव एवं उसके वायुमण्डल द्वारा आवृत होने के समय से चला आ रहा है।

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प्रश्न 2.
‘बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यह कहना बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है कि बाहाजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य गर्मी से प्राप्त करती हैं। तापक्रम तथा वर्षा दो महत्त्वपूर्ण जलवायविक तत्व हैं जो विभिन्न प्रक्रियाओं को नियन्त्रित करते हैं। सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को एक सामान्य शब्दावली अनाच्छादन (denudation) के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अपक्षय,

वहत क्षरण संचलन, अपरदन, परिवहन आदि इसमें सम्मिलित होते हैं। अनाच्छाद प्रक्रियाओं तथा उनसे सम्बन्धित परिचालक/प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। वनस्पति का घनत्व, प्रकार एवं वितरण, जो मुख्यतः उर्जा एवं तापमान पर निर्भर करते हैं, बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्राक्रियाओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। इन सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की शक्ति का स्त्रोत ऊर्जा है। अत: हम कह सकते हैं कि बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियायें अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती है।

प्रश्न 3.
क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय – प्रक्रियाएँ कुछ अनुप्रयुक्त शक्तियों (forces) पर निर्भर करती हैं। ये अनुप्रयुक्त शक्तियाँ हो सकती हैं –
1. गुरुत्वाकर्षण शक्तियाँ, जैसे अधिक भार का दबाव, भार एवं अपरूपण प्रतिबल (sheadr stress)

2. तापक्रम में परिवर्तन क्रिस्टल वृद्धि पशुओं के कार्य के कारण उत्पन्न विस्तारण (expansion) शक्तियाँ, शुष्कण एवं आईन चक्रों से नियामित जल का दबाव। भौतिक अपक्षय प्रक्रियाओं में अधिकांश तापीय विस्तारण एवं दबाव के निर्मुक्त होने (release) के कारण होती है। ये प्राक्रियाएँ लघु एवं मन्द होती हैं।

लेकिन बार-बार संकुचन एवं विस्तारण के कारण चट्टान के सन्तति श्रांति (Fatigue) के फलस्वरूप ये चट्टानों को बड़ी हानि पहुंचा सकती हैं। रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाओं का एक वर्ग, जैसे जलयोजन, ऑक्सीजन न्यूनीकरण, कार्बोनेटीकरण, विलयन, चट्टानों पर उन्हें अपघटित/वियोजित, घुलित या सूक्ष्म खण्डन अवस्था में रसायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ऑक्सीजन, सतही और मृदा जल एवं अन्य अम्ल द्वारा न्यूनीकरण के लिए कार्यरत रहता है।

इसमें ऊष्मा के साथ जल एवं वायु को विद्यमानता सभी रासयनिक प्रतिक्रियाओं को तीव्र गति देने के लिए आवश्यक है। अतः भौतिक एवं रसायनिक अपक्षय की ये प्रक्रियाएँ अतसम्बन्धित हैं। ये साथ-साथ चलती रहती हैं तथा अपक्षय प्रक्रिया को त्वरित बना देती हैं।

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प्रश्न 4.
आप किस प्रकार मृदा निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा निर्माण कारकों के बीच अन्तर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा निर्माण में दो महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाएं सर्वधम अपक्षय पर निर्भर करती हैं तथा अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों समुच्चय पर निर्भर करता है। मृदा निर्माण पाँच मूल कारकों के द्वारा नियन्त्रित होता है। ये कारक हैं –

  • जलवायु
  • स्थलाकृति
  • उच्चावच मूल पदार्थ
  • चट्टान जैविक प्रक्रियाएँ
  • कालावधि वस्तुतः मृदा निर्माण कारक संयुक्त रूप से कार्यरत रहते हैं एवं एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करते हैं।

जलवायु (Climate) – जलवायु मृदा निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण सक्रिय कारक है। मृदा के विकास में संलग्न जलवायविक तत्त्वों में प्रमुख हैं –

प्रवणता, बारम्बारता एवं वर्षा-वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता के सन्दर्भ में नमी।
तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

  • वर्षा से मृदा को जल मिलता है। रासायनिक एवं जैविक क्रियाएँ इसके बिना सम्भव नहीं होती । कुछ रसायन पानी में घुल जाती हैं एवं
  • सकारात्मक तथा नकारात्मक रूप से आवेशित घटकों में अपने को अलग कर लेती हैं।
  • ये तत्त्वों के जटिल रासायनिक अन्तः परिवर्तन/विनिमय में सहायक होते हैं जो मिट्टी के विकास एवं पौधे की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं।

जैविक क्रियायें (Biological Activities) – वनस्पति आवरण एवं जीव जो मूल पदार्थों पर प्रारम्भ तथा बाद में विद्यमान रहते हैं मृदा में जैव पदार्थ, नमीधारण की क्षमता तथा नाइट्रोजन इत्यादि जोड़ने में सहायक होते हैं। मृत पौधे मृदा को सूक्ष्मता विभाजित जैव पदार्थ ह्यूमस प्रदान करते हैं। कुछ जैविक अम्ल जो ह्यूमस बनने की अवधि में निर्मित होते हैं मृदा के मूल पदार्थों के खनिजों के विनियोजन में सहायता करते हैं। बैक्टेरियल कार्य की प्रवणता ठण्डी एवं गर्म जलवायु की मिट्टियों/मृदाओं में अन्तर को दर्शाती हैं।

राइजोबियम (Rhizobium) एक प्रकार के बैक्टेरिया, जंतुवाले पौधे की जड़ ग्राथिका में रहता है तथा मेजबान पौधों के लिए लाभकारी नाइट्रोजन निर्धारित करता है। चींटी, दीमक, केचुए, कृतक (roderts) इत्यादि जानवरों का महत्त्व अभियान्त्रिकी (mechanical) सा होता है, लेकिन मृदा निर्माण में यह महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि वे मृदा को बार-बार ऊपर नीचे करते रहते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने चतुर्दिक विद्यमान भू-आकृतिक/उच्चावच एवं पदार्थों के आधार पर जलवायु, सम्भव अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्त्वों और विशेषताओं को परखिए एवं अंकित कीजिए।
उत्तर:
इस अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित जानकारियों एवं विशेषताओं को सूचीबद्ध करें परियोजना को स्वयं करें। इस अध्याय में जूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ दी गई हैं।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवसर्पण तथा शैल पतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
दाल जिस पर संचलन होता है, के संदर्भ में पश्च-आवर्तन (Rotation) के साथ शैल-मलबा की एक या कई इकाइयों के फिसलन (slipping) को अवसर्पण कहते हैं। किसी तीव्र ढाल के सहारे शैल खण्डों का ढाल से दूरी रखते हुए स्वतन्त्र रूप से गिरना शैल पतन (Fall) कहलाता है।

प्रश्न 2.
अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, अनिवार्य नहीं। इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपरदन द्वारा उच्चावचन का निम्नीकरण होता है। अर्थात् भू-दृश्य विधर्षित होते जाते हैं। इसका तात्पर्य ये है कि अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, लेकिन अपक्षय अपरदन के लिए अनिवार्य दशा नहीं है। अपक्षय, वृहत् क्षरण एवं अपरदन निम्नीकरण की प्रक्रियाएँ हैं।

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प्रश्न 3.
वृहत् संचलन और अपरदन में अन्तर बतायें।
उत्तर:
वृहत् संचलन में शैल मलबा चाहे वह शुष्क हो अथवा नम, गुरुत्वाकर्षण के कारण स्वयं आधार तल पर जाते हैं। लेकिन प्रवाहशील जल, हिमानी लहरें एवं धाराएँ तथा वायु निलाम्बित मलबे को नहीं ढोते हैं। वस्तुत: यह अपरदन ही है जो धरातल में होने वाले अनवरत परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। अपरदन एवं परिवहन गतिज ऊर्जा द्वारा नियन्त्रित होता है। धरातल के पदार्थों का अपरदन एवं परिवहन वायु, प्रवाहशील जल, हिमानी लहरों एवं धाराओं तथा भूमिगत जल द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
मृदा निर्माण में समय (कालवधि-time) की क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाओं के प्रचलन में लगने वाले काल (समय) की अवधि मृदा की · परिपक्वता एवं उसके पार्थिवका (profile) का विकास निर्धारण करती है। एक मृदा तभी परिपक्व होती है जब मृदा निर्माण की सभी प्रक्रियाएँ लम्बे काल तक पार्थिवका विकास करते हुए कार्यरत रहती है। कुछ समय पहले निक्षेपित जलोढ़ मिट्टी या हिमानी टिले से विकसित मृदायें तरुण या युवा (Young) मानी जाती हैं तथा उनमें संस्तर (Horizon) का अभाव होता है अथवा कम विकसित संस्तर मिलता है।

प्रश्न 5.
मृदा निर्माण में जलवायु किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
मृदा के विकास में संलग्न जलवायवी तत्त्वों में प्रमख हैं –

  1. प्रवणता वर्षा एवं बारम्बारता वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता बारम्बारता
  2. तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

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प्रश्न 6.
ऑक्सीकरण एवं न्यूनीकरण में अन्तर बताइए।
उत्तर:
खनिज एवं ऑक्सीजन का संयोग, ऑक्सीकरण कहलाता है। जहाँ वायुमण्डल एवं ऑक्सीजन युक्त जल मिलते हैं। इस प्रक्रिया में लौह, मैंगनीज, गंधक (Suphur) इत्यादि सर्वाधिक शामिल होते हैं। ऑक्सीकरण एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जो लौह धारक बायोटाइट, ओलीवाइन एवं पाइरोक्सीन जैसे खनिजों को प्रभावित करती है। ऑक्सीकरण होने पर लौह का लाल रंग भूरे या पीले रंग में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 7.
अपक्षय के महत्त्व पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ शैलों को छोटे-छोटे टुकड़ो में तोड़ने के लिए तथा न केवल आवरण प्रस्तर एवं मृदा निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करती है अपितु अपरदन एवं वृहत् संचालन के लिए भी उत्तरदायी होती है। यदि शैलों का अपक्षय न हो तो अपरदन का कोई महत्त्व नहीं होता । शैलों का अपक्षय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मूल्यवान कुछ खनिजों जैसे-लोहा, मैगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा के अयस्कों के समृद्धिकरण एवं संकेन्द्रण में सहायक होता है। अपक्षय मृदा निर्माण की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।

प्रश्न 8.
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 9.
अन्तर्जात बल तथा बर्हिजात बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के आन्तरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल अन्तर्जात बल कहे जाते हैं। इन बलों द्वारा भूतल पर असमानताओं का सूत्रपात होता है। पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होने वाले बल बर्हिजात बल कहे जाते हैं। इन्हें समतल स्थापक बल भी कहते हैं। ये बल पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा भूतल पर उत्पन्न विषमताओं को दूर करने में हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं।

प्रश्न 10.
संचलन के कौन-से तीन रूप होते हैं?
उत्तर:
संचलन के निम्न तीन रूप होते हैं –

  1. अनुप्रस्थ विस्थापन (तुषार वृद्धि या अन्य कारणों से मृदा का अनुप्रस्थ विस्थापन)
  2. प्रवाह एवं
  3. स्खलन

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प्रश्न 11.
वृहत् संचलन की संक्रियता के लिए जिम्मेवार किन्हीं तीन कारकों के बारे में बताइए।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक एवं कृत्रिम साधनों के माध्यम से टिकने के आधार का हटना
  2. ढालों की प्रवणता एवं ऊँचाई में वृद्धि
  3. पदार्थों के प्राकृतिक अथवा कृत्रिम भराव के कारण उत्पन्न अतिभार।

प्रश्न 12.
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 13.
मिट्टी और शैल में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:
मिट्टी और शैल में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ किसे कहते हैं? क्या भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं या दोनों एक ही हैं?
उत्तर:
धरातल के पदार्थों पर अन्तर्जनित एवं बर्हिजनित बलों द्वारा भौतिक दबाव तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। पटल विरूपण (Diastrophism) एवं ज्वालामुखीयता (Volcanism) अन्तर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। अपक्षय, वृहत् क्षरण (Mass wasting), अपरदन एवं निक्षेपण (Deposition) बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। प्रकृति के किसी भी बाह्यजनिक तत्त्व (जैसे जल, हिम, वायु इत्यादि) जो धरातल के पदार्थों का अधिग्रहण (Acquire) तथा परिवहन करने में सक्षम हैं, को भू-आकृतिक कारक कहा जा सकता है।

जब प्रकृति के तत्त्व ढाल प्रवणता के कारण गतिशील हो जाते है तो पदार्थों को हटाकर ढाल के सहारे ले जाते हैं और निचले भागों में निक्षेपित कर देते हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ तथा भू-आकृतिक कारक, विशेषकर बर्हिजनिक, को यदि स्पष्ट रूप से अलग-अलग न कहा जाए तो इन्हें एक ही समझना होगा क्योंकि ये दोनों एक ही होते है।

एक प्रक्रिया एक बल होता है जो धरातल के पदार्थों के साथ अनूप्रयूक्त होने पर प्रभावी हो जाता है। एक कारक (Agent) एक गतिशील माध्यम (जैसे प्रवाहित जल, हिमानी हवा लहरें एवं धाराएँ इत्यादि) हैं जो धरातल के पदार्थों को हटाता, ले जाता है तथा निक्षेपित करता है। इस प्रकार प्रवाहयुक्त जल, भूमिगत जल, हिमानी, हवा, लहरों, धाराओं इत्यादि को भू-आकृतिक कारक कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
गुरुत्वकर्षण बल और पटल विरूपण (Diastrophism) के विषय में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुरुत्वाकर्षण हाल के सहारे सभी गतिशील पदार्थों को सक्रिय बनाने वाला दिशात्मक (Directional) बल होने के साथ-साथ धरातल के पदार्थों पर दबाव (stress) डालता है। अप्रत्यक्ष गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल (stress) लहरों एवं ज्वार भाटा जनित धाराओं को क्रियाशील बनाता है। निःसन्देह गुरुत्वाकर्षण एवं ढाल प्रवणता के अभाव में गतिशीलता सम्भव नहीं है। अतः अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण भी नहीं होगा। गुरुत्वाकर्षण एक ऐसा बल है जो भूतल के सभी पदार्थों के संचलन को प्रारम्भ करते हैं। सभी संचलन, चाहे वे पृथ्वी के अन्दर हो या सतह पर, प्रवणता के कारण ही घटित होते हैं, जैसे ऊँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर, तथा उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु दाब क्षेत्र की ओर ।

पटल विरुपण (Diastrophism) – सभी प्रक्रियाएँ जो भू-पर्पटी को संचालित, उत्थापित तथा निर्मित करती हैं, पटल विरूपण के अन्तर्गत आती हैं। इनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  • तीक्ष्ण वलयन के माध्यम से पर्वत निर्माण तथा भू-पर्पटी की लम्बी एवं संकीर्ण पट्टियों को प्रभावित करने वाली पर्वतनी प्रक्रियाएँ
  • धरातल के बड़े भाग के उतापन या विकृति में संलग्न महाद्वीप रकम सम्बन्धी प्रक्रियाएँ
  • अपेक्षाकृत छोटे स्थानीय संचलन के कारण उत्पन्न भूकम्प
  • पपटी प्लेट के क्षैतिज संचलन करने में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका।

प्लेट विवर्तनिक/प्रवर्तनी की प्रक्रिया में भू-पर्पटी वलयन के रूप में तीक्ष्णता से विकृत हो जाती है। महाद्वीप रचना के कारण साधारण विकृति हो सकती है। प्रवर्तनी पर्वत निर्माण प्रक्रिया है, जबकि महाद्वीप रचना महाद्वीप निर्माण प्रक्रिया है। प्रवर्तनी, महाद्वीप रचना (Empeirogeny) भूकम्प एवं प्लेट विवर्तनिक की प्रक्रियाओं से भू-पर्पटी में घंश तथा विभंग हो सकता है। इन सभी प्रक्रियाओं के कारण दबाव, आयतन तथा तापक्रम में परिवर्तन होता है, जिसके फलस्वरूप शैलों का कायान्तरण प्रेरित होता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

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BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

Bihar Board Class 11 Geography खनिज एवं शैल Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन ग्रेनाइट के दो प्रमुख घटक हैं?
(क) लोहा एवं निकिल
(ख) सिलिका एवं एल्यूमिनिमय
(ग) लोहा एवं चाँदी
(घ) लौह ऑक्साइड एवं पोटैशियम
उत्तर:
(ख) सिलिका एवं एल्यूमिनिमय

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन सा कायांतरित शैलों का प्रमुख लक्षण है?
(क) परिवर्तनीय
(ख) क्रिस्टलीय
(ग) शांत
(घ) पल्ल्व न
उत्तर:
(क) परिवर्तनीय

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प्रश्न 3.
निम्न में से कौन सा एकमात्र तत्त्व वाला खनिज नहीं है?
(क) स्वर्ण
(ख) माइका
(ग) चाँदी
(घ) ग्रेफाइट
उत्तर:
(ख) माइका

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन सा कठोरतम खनिज है?
(क) टोपाज
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) हीरा
(घ) फेल्डस्पर
उत्तर:
(ग) हीरा

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन सी शैल अवसादी नहीं है?
(क) टायलाइट
(ख) ब्रेशिया
(ग) बोरैक्स
(घ) संगमरमर
उत्तर:
(क) टायलाइट

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन सा अवसादी शैल है?
(क) बलुआ पत्थर
(ख) अभ्रक
(ग) ग्रेनाइट
(घ) नीस
उत्तर:
(क) बलुआ पत्थर

प्रश्न 7.
चट्टानों का टूटकर अपने स्थानों पर ही पड़े रहना कहलाता है?
(क) अपक्षय
(ख) अपरदन
(ग) अनाच्छादन
(घ) अनावृतिकरण
उत्तर:
(क) अपक्षय

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
शैल से आप क्या समझते हैं? शैल के तीन प्रमुख वर्गों के नाम बताएँ।
उत्तर:पृथ्वी की पर्पटी चट्टानों से बनी है। चट्टान का निर्माण एक या एक से अधिक खनिजों से मिलकर होता है। चट्टान कठोर या नरम तथा विभिन्न रंगों की हो सकती है। जैसे ग्रेनाइट कठोर तथा सोपस्टोन नरम है। चट्टानों में सामान्यतः पाए जाने वाले खनिज पदार्थ फेल्डस्पर तथा क्वार्ट्ज़ हैं। चट्टानों को उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया गया है –

  1. आग्नेय चट्टान-मैग्मा तथा लावा से घनीभूत
  2. वसादी चट्टान-बहिर्जनित प्रक्रियाओं के द्वारा चट्टानों के अंशों के निक्षेपन का परिणामः तथा
  3. कायांतरित चट्टान-उपस्थित चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया से निर्मित।

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प्रश्न 2.
आग्नेय शैल क्या है? आग्नेय शैल के निर्माण पद्धति एवं उनके लक्षण बताएँ।
उत्तर:
चूँकि आग्नेय चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में मैग्मा एवं लावा से होता है। अतः जब अपनी ऊपरीगामी गति में मैग्मा ठंडा होकर ठोस बन जाता है, तो यह आग्नेय चट्टान कहलाता है। इसकी बनवाट कणों के आकार एवं व्यवस्था अथवा पदार्थ की भौतिक अवस्था पर निर्भर करती है। यदि पिघले हुए पदार्थ धीरे-धीरे गहराई तक ठंडे होते हैं तो खनिज के कण पर्याप्त बडे हो सकते हैं। सतह पर हई आकस्मिक शीतलता के कारण छोटे एवं चिकने कण बनते हैं। शीतलता की माध्यम परिस्थितियाँ होने पर आग्नेय चट्टान को बनाने वाले कण मध्यम आकार के हो सकते हैं। ग्रेनाइट, बैसाल्ट, वोल्कैनिक ब्रेशिया आग्नेय चट्टानों के कुछ उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.
वसादी शैल का क्या अर्थ है? अवसादी शैल के निर्माण की पद्धति बताइए।
उत्तर:
अवसादी अर्थात् (Sedimentary) का अर्थ है, व्यवस्थित होना । पृथ्वी की सतह की चट्टानों अपच्छादनकारी कारकों के प्रति अनावृत होती हैं, जो विभिन्न आकार के विखण्डों में विभाजित होती हैं। ऐसे उपखण्डों का विभिन्न बहिर्जनित कारकों के द्वारा संवहन एवं संचय होता है। संघनता के द्वारा ये सचित पदार्थ चट्टानों में परिवर्तित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रस्तारीकरण (Lithification) कहलाती है। इसी कारणवश बालुकाश्म, शैल जैसे अवसादी चट्टानों में विविध सान्द्रता वाली अनेक सतह होती है।

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प्रश्न 4.
शैली चक्र के अनुसार प्रमुख प्रकार की शैलों के मध्य क्या संबंध होता है ?
उत्तर:
चट्टानी चक्र एक सतत् प्रक्रिया होती है, जिसमें पुरानी चट्टानें परिवर्तित होकर नवीन रूप लेती हैं। आग्नेय चट्टानें प्राथमिक चट्टानें हैं, तथा अन्य (अवसादी एवं कायॉरित) चट्टानें इन प्राथमिक चट्टानों से निर्मित होती है। आग्नेय चट्टानों को कायांतरित चट्टानों में परिवर्तित किया जा सकता है। अवसादी चट्टानें अपखण्डों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा ये अपखण्ड अवसादी चट्टानों के निर्माण का एक स्रोत हो सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
‘खनिज’ शब्द को परिभाषित करें, एवं प्रमुख प्रकार के खनिजों के नाम लिखें।
उत्तर:
खनिज एक ऐसा प्राकृतिक, अकार्बनिक तत्त्व जिसमें एक क्रमबद्ध परमाण्विक संरचना, निश्चित रसायनिक संघटन तथा भौतिक गुणधर्म होता है। खनिज का निर्माण दो या दो से अधिक तत्त्वों से मिलकर होता है। लेकिन कभी-कभी सल्फर ताँबा चाँदी, स्वर्ण ग्रेफाइट जैसे एक तत्त्वीय खनिज भी पाए जाते हैं। भूपर्पटी पर कम से कम 2,000 प्रकार के खनिजों को पहचाना गया है, और उनको नाम दिया गया है। लेकिन इनमें से सामान्यत: उपलब्ध लगभग सभी खनिज तत्त्व, छह प्रमुख खनिज समूहों से संबंधित होते हैं, जिनको चट्टानों का निर्माण करने वाले प्रमुख खनिज माना गया है।

कुछ प्रमुख खनिजों के नाम –

  1. फेल्डस्पर – सिलिका, ऑक्सीजन, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, अल्युमिनियम आदि तत्त्व इसमें शामिल हैं।
  2. क्वार्ट्ज – ये रेत एवं ग्रेनाइट के प्रमुख घटक हैं। इसमें सिलिका होता है। यह एक कठोर खनिज है तथा पानी में सर्वथा अघुलनशील होता है।
  3. पाइरॉक्सीन – कैल्शियम, एल्यूमिनियम, मैग्नेशियम, आयरन तथा सिलिका इसमें शामिल हैं।
  4. एम्फीबोल – एम्फीबोल के प्रमुख तत्त्व एल्यूमीनियम, कैल्शियम, सिलिका, लौह, मैग्नीशियम है।
  5. माइका – इसमें पोटैशियम, एल्यूमिनियम, मैग्नेशियम, लौह, सिलिका आदि निहित होते हैं।
  6. धात्विक खनिज – इनको तीन प्रकार में विभाजित किया जा सकता है –
    (i) बहुमूल्य धातु-स्वर्ण, चाँदी, प्लैटिनम आदि।
    (ii) लौह धातु-लौह एवं स्टील के निर्माण के लिए लोहे में मिलाई जाने वाली अन्य धातुएँ।
    (iii) अलौहिक धातु-इनमें कम मात्रा में लौह तत्त्व तथा ताम्र, सीमा, जिंक, टिन, एल्यूमिनियम आदि शामिल होते हैं।

अधात्विक खनिज – गंधक, फॉस्फेट तथा नाइट्रेट अधात्विक खनिज हैं। सीमेन्ट अधात्विक खनिज का मिश्रण है।

प्रश्न 2.
भूपृष्ठीय शैलों में प्रमुख प्रकार की शैलों की प्रकृति एवं उनकी उत्पत्ति की पद्धति का वर्णन करें। आप उनमें अन्तर स्थापित केसे करेंगे?
उत्तर:
चट्टानों को उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया गया है:
1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks) – चूँकि आग्नेय चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में मैग्मा एवं लावा से होता है, अत: इनको प्राथमिक चट्टानें भी कहते हैं। मैग्मा के ठंडे होकर घनीभूत हो जाने पर आग्नेय चट्टानों का निर्माण होता है। ठण्डा तथा ठोस बनने की यह प्रक्रिया पृथ्वी की पर्पटी या पृथ्वी की सतह पर हो सकती है। आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण इनकी बनावट के आधार पर किया गया है। इसकी बनावट इसके कणों के आकार एवं व्यवस्था अथवा पदार्थ के भौतिक अवस्था पर निर्भर करती है। ग्रेनाइट, ग्रेबो, पेग्मैटाइट, बैसाल्ट, वोल्कैनिक ब्रेशिया तथा टफ आग्नेय चट्टानों के कुछ उदाहरण हैं।

2. अवसादी चट्टान (Sedimentary Rocks) – पृथ्वी की सतह की चट्टानों (आग्नेय अवसादी एवं कायॉरित) अपच्छादनकारी कारकों के प्रति अनावत होती हैं, जो विभिन्न आकार के विखण्डों में विभाजित होती हैं। ऐसे उपखण्डों का विभिन्न बहिर्जनित कारकों के द्वारा संवहन एवं संचय होता है। संघनता के द्वारा से संचित पदार्थ चट्टानों में परिवर्तित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रस्तरीकरण (Lithification) कहलाती है। इसी कारणवश बालुकाश्म, शैल जैसे अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण तीन प्रमुख समूहों में किया गया है –

  • यांत्रिकी रूप से निर्मित – उदाहरणार्थ – बालुकाश्म, पिण्डाशला, चूना-प्रस्तर, शैल, विमृदा आदि।
  • काबनिक रूप से निर्मित – उदाहरणार्थ -गीजराइट; खड़िया, चूना-पत्थर, कोयला आदि; तथा
  • रसायनिक रूप से निर्मित – उदाहरणार्थ – शृंग प्रस्तर, चूना पत्थर, हेलाइट, पोटैश आदि।

3. कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks) – कायांतरित का अर्थ है, ‘स्वरूप में परिवर्तन’ । दाब आयतन एवं तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया के फलस्वरूप इन चट्टानों का निर्माण होता है। जब विवर्तनिक प्रक्रिया के कारण चट्टानों निचले स्तर की ओर बलपूर्वक खिसक जाती हैं, या जब भूपृष्ठ से उठता, पिघला हुआ मैग्मा भू-पृष्ठीय चट्टानों के संपर्क में आता है, या जब ऊपरी चट्टानों के कारण निचली चट्टानों पर अत्यधिक दाब पड़ता है, तब कायंतरण होता है। कायांतरण वह प्रक्रिया है, जिसमें समेकित चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण होता है तथा वास्तविक चट्टानों में पदार्थ पुनः संगठित हो जाते हैं।
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आग्नेय चट्टानों प्राथमिक चट्टानें हैं, तथा अन्य चट्टानें इन प्राथमिक चट्टानों से निर्मित होती हैं। आग्नेय चट्टानों को कायांतरित चट्टानों में परिवर्तित किया जा सकता है। आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों से प्राप्त अंशों से अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है। अवसादी चट्टानों अपखण्डों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा ये अपखण्ड अवसादी चट्टानों के निर्माण का एक स्रोत हो सकते हैं। निर्मित भूपृष्ठीय चट्टानें (आग्नेय, कायांतरित एवं अवसादी) प्रत्यावर्तन के द्वारा पृथवी के आंतरिक भाग में नीचे की ओर जा सकती हैं।

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प्रश्न 3.
कायांतरित चट्टान क्या है ? इनके प्रकार एवं निर्माण की पद्धति का वर्णन करें।
उत्तर:
दाब आयतन एवं तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया के फलस्वरूप कायांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। जब विवर्तनिक प्रक्रिया के कारण चट्टानें निचले स्तर की ओर बलपूर्वक खिसक जाती हैं, या जब भूपष्ठ से उठता, पिघला हुआ मैग्मा भू-पृष्ठीय चट्टानों के संपर्क में आता है, या जब ऊपरी चट्टानों के कारण निचली चट्टानों पर अत्यधिक दाब पड़ता है, तब कायांतरण होता है । कायांतरण वह प्रक्रिया है जिससे समेकित चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण होता है तथा वास्तविक चट्टानों में पदार्थ पुनः संगठित हो जाते हैं।

बिना किसी विशेष रसायनिक परिवर्तनों के ट्टने एवं घिसने के कारण वास्तविक चट्टानों में यांत्रिकी व्यवधान एवं उनका पुनः संगठित होना गतिशील कायांतरित कहलाता है। ऊष्मीय कायंतरण के कारण चट्टानों के पदार्थों में रसायनिक परिवर्तन एवं पुनः क्रिस्टलीकरण होता है। ऊष्मीय कायांतरण के दो प्रकार होते हैं-संपर्क कायांतरण एवं स्थानीय कायंतरण। संपर्क रूपांतरण में चट्टानें गर्म, ऊपर आते हुए मैग्मा एवं लावा के संपर्क में आती हैं, तथा उच्च तापमान में चट्टान के पदार्थों का पुनः क्रिस्टलीकरण होता है। अक्सर चट्टानों में मैग्मा अथवा लावा के योग से नए पदार्थ उत्पन्न होते हैं।

स्थानीय कायंतरण में उच्च तापमान अथवा दबाव अथवा इन दोनों के कारण चट्टानों में विवर्तनिक दबाव के कारण विकृत्तियाँ होती हैं, जिससे चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण होता है। कायांतरण की प्रक्रिया में चट्टानों के कुछ कण या खनिज सतहों या रेखाओं के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। कायांतरित चट्टानों में खनिज अथवा कणों की इस व्यवस्था को पल्लवन या रेखांकन कहते हैं। कभी-कभी खनिज या विभिन्न समूहों के कण पतली से मोटी सतह में इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं, कि वो हल्के एवं गहरे रंगों में दिखाई देते हैं।

कायांतरित चट्टानों में ऐसी संरचनाओं को बैंडिंग (Banding) कहते हैं, तथा बैंडिग प्रदर्शित करने वाले चट्टानों को बैंडेड (Banded) चट्टानों कहते हैं। कायांतरित होने वाली वास्तविकचट्टानों पर ही कायांतरित चट्टानों के प्रकार निर्भर करते हैं। कायांतरित चट्टानें दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत की जा सकती हैं-पल्लवित चट्टान अपल्लवित चट्टान । पट्टिताश्मीय, ग्रेनाइट, सायनाइट, स्लेट, शिल्ट, संगमरमर, क्वार्ट्ज आदि रूपांतरित चट्टानों के कुछ उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 11 Geography खनिज एवं शैल Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आग्नेय चट्टानों का रूप कैसा होता है
उत्तर:
शीशे तथा रवेदार जैसा।

प्रश्न 2.
लावा पृथ्वी के धरातल पर तेजी से क्यों ठण्डा हो जाता है?
उत्तर:
वायुमण्डल के सम्पर्क में होने के कारण।

प्रश्न 3.
बाह्य आग्नेय चट्टान का एक उदाहरण दें?
उत्तर:
बैसाल्ट।

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प्रश्न 4.
स्थिति के आधार पर आग्नेय चट्टानों के दो प्रकार लिखो।
उत्तर:
बाह्य तथा भीतरी चट्टानें।

प्रश्न 5.
उत्पत्ति के आधार पर आग्नेय चट्टानें कौन-कौनसी होती हैं?
उत्तर:
ज्वालामुखी चट्टानों तथा पातालीय चट्टानें।

प्रश्न 6.
पातालीय शब्द कहाँ से बना?
उत्तर:
यह शब्द (Pluto) से बना जिसका अर्थ पाताल देवता है।

प्रश्न 7.
बेसॉल्ट में रवे क्यों नहीं होते?
उत्तर:
लावा के तेजी से ठण्डा होने के कारण।

प्रश्न 8.
आग्नेय चट्टानों के निर्माण के लिये मुख्य साधन कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
क्रियाशील ज्वालामुखी।

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प्रश्न 9.
IGNEOUS शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
यह लैटिन शब्द Ignis से बना है (अर्थ अग्नि है)।

प्रश्न 10.
चट्टानों की तीन मुख्य किस्मों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. आग्नेय चट्टानें
  2. अवसादी या तलछटी चट्टानें
  3. रूपांतरित चट्टानें

प्रश्न 11.
चट्टानों से प्रभावित एक वस्तु का नाम लिखो।
उत्तर:
भू-आकार।

प्रश्न 12.
चट्टान के रंग तथा कठोरता किन तत्त्वों पर निर्भर करते हैं?
उत्तर:
खनिजों की रचना।

प्रश्न 13.
स्थलमण्डल में पाये जाने वाले दो तत्त्वों का नाम लिखें।
उत्तर:
सिलिकॉन तथा एल्यूमीनियम।

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प्रश्न 14.
चट्टान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थलमण्डल के ठोस पदार्थ।

प्रश्न 15.
बनावट के आधार पर अवसादी चट्टानों की तीन किस्में कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. यांत्रिक क्रिया द्वारा
  2. रसायनिक क्रिया द्वारा
  3. जैविक क्रिया द्वारा।

प्रश्न 16.
यांत्रिक क्रिया द्वारा बनी अवसादी चट्टानों का उदाहरण दें।
उत्तर:
रेत का पत्थर, चीनी मिट्टी, ग्रिट।

प्रश्न 17.
निट किसे कहते हैं?
उत्तर:
खुरदरे रेत के पत्थर को।

प्रश्न 18.
कांग्लोमरेट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गोल पत्थरों के आपस में जुड़ने से बनने वाला भू-आकार।

प्रश्न 19.
काबर्न प्रधान चट्टान का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
कोयला।

प्रश्न 20.
कोयले की विभिन्न किस्मों के नाम लिखें।
उत्तर:
पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस तथा एंथ्रासाइट।

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प्रश्न 21.
चूना प्रधान चट्टानों का दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
चाक तथा चूने का पत्थर।

प्रश्न 22.
अवसादी चट्टानों में पाये जानेवाले दो फॉसिल ईंधन बताएँ।
उत्तर:
कोयला तथा पेट्रालियम।

प्रश्न 23.
रसायनिक क्रिया द्वारा निर्मित दो चट्टानों के नाम लिखें।
उत्तर:
जिप्सम तथा चट्टानी नमक।

प्रश्न 24.
तलछट को कठोर बनाने में किस तत्त्व का योगदान है।
उत्तर:
सिलिका, कैल्साइट आदि संयोजक पदार्थ।

प्रश्न 25.
अवसादी चट्टानों के लिए निक्षेप करने वाले कार्यकर्ता बताएँ।
उत्तर:
नदी, वायु, ग्लेशियर।

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प्रश्न 26.
‘Sadimentary’ शब्द किस शब्द से बना है?
उत्तर:
‘Sadimentum’ शब्द से जिसका अर्थ है नीचे बैठना।

प्रश्न 27.
पश्चिमी भारत में बैसाल्ट में घिरे हुए विशाल क्षेत्र का नाम लिखें।
उत्तर:
दक्कन ट्रैप।

प्रश्न 28.
लैकोलिथ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नीचे से मैग्मा के उभार से बने टीले।

प्रश्न 29.
बैथोलिथ शब्द का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
बैथोलिथ भीतरी आग्नेय चट्टान का गुम्बद आकार ग्रेनाइट का भू-खण्ड होता है।

प्रश्न 30.
ग्रेनाइट में बड़े रवे क्यों होते हैं?
उत्तर:
मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने के कारण।

प्रश्न 31.
पातालीय चट्टानों का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
ग्रेनाइट।

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प्रश्न 32.
अधिक गहराई में मैग्मा अन्दर क्यों ठण्डा हो जाता है?
उत्तर:
ऊपरी चट्टानों में दबाव होने के कारण।

प्रश्न 33.
PVT क्रिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
यह कायांतरित क्रिया का संक्षेप रूप है, यह क्रिया P= Pressure, V= Volume, T= Temperature द्वारा होती है।

प्रश्न 34.
निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी शैलों का वर्गीकरण करो।
उत्तर:
निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी शैलों का वर्गीकरण तीन प्रमुख समूहों में किया गया है –

  1. यांत्रिकी रूप में निर्मित उदाहरणार्थ, बालुकाश्म, पिंडशिल, चूना प्रस्तर, शैल, विमृदा आदि
  2. कार्बनिक रूप में निर्मित उदाहरणार्थ, गीजराइट, खड़िया चूना, पत्थर कोयला आदि तथा
  3. रसायनिक रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ, शृंग, प्रस्तर चूना पत्थर, पोटैश आदि।

प्रश्न 35.
प्रस्तीकरण (Lithification) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अपरदन के कार्यकर्ता शैलों को छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित करते हैं। सघनता के कारण ये पदार्थ शैलों में बदल जाते हैं। इसे प्रस्तीकरण कहते हैं।

प्रश्न 36.
पेट्रोलॉजी का शुद्ध अर्थ क्या है ?
उत्तर:
पेट्रोलॉजी शैलों का विज्ञान है। एक पेट्रो-शास्त्री शैलों के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन करता है। जैसे-खनिज की संरचना, बनावट, स्रोत, प्राप्ति स्थान, परिवर्तन एवं दूसरी शैलों के साथ सम्बन्ध ।

प्रश्न 37.
निर्माण पद्धति के अनुसार शैलों के प्रकार बताएँ।
उत्तर:
शैलों के विभिन्न प्रकार हैं। जिनको उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया जाता है –

  1. आग्नेय शैल – मैग्मा तथा लावा से घनीभूत
  2. अवसादी शैल-बहिर्जनित प्रक्रियाओं के द्वारा शैलों के अंशों के निक्षेपन का परिणाम तथा
  3. कायंतरित शैल उपस्थित शैलों में पुनक्रिस्टलीकरण प्रक्रिया से निर्मित।

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प्रश्न 38.
शैलों का ज्ञान क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
शैलों एवं स्थालाकृतियों तथा शैलों एवं मृदा में निकट सम्बन्ध होने के कारण भूगोलशास्त्री को शैलों का मौलिक ज्ञान होना आवश्यक होता है।

प्रश्न 39.
किन खनिजों का निर्माण एक तत्त्वों से बना है?
उत्तर:
सल्फर, ताँबा, चाँदी, स्वर्ण, ग्रेफाइट।

प्रश्न 40.
शैल तथा कोयला किन चट्टानों में बदल जाते है?
उत्तर:
शैल स्लेट में तथा कोयला ग्रेफाइट में बदल जाता है।

प्रश्न 41.
ग्रेनाइट तथा बैसाल्ट किन चट्टानों में बदल जाती है?
उत्तर:
ग्रेनाइट नीस में तथा बैसाल्ट शिल्ट में बदल जाता है।

प्रश्न 42.
रेत का पत्थर तथा चूने का पत्थर किन चट्टानों में परिवर्तित हो जाता है?
उत्तर:
रेत का पत्थर क्वार्ट्साइट तथा चूने का पत्थर संगमरमर में बदल जाता है।

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प्रश्न 43.
चटटानें अपना रंग तथा रचना क्यों बदल लेती हैं?
उत्तर:
ताप तथा दबाव के कारण।

प्रश्न 44.
रूपांतरित शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
रूप में परिवर्तन।

प्रश्न 45.
रसायनिक क्रिया से बनने वाली चट्टानों में मुख्य क्रिया कौन-सी है?
उत्तर:
वाष्पीकरण।

प्रश्न 46.
शैली चक्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शैली चक्र एक सतत् प्रक्रिया है जिसमें पुरानी शैलें परिवर्तित होकर नवीन रूप लेती है।

प्रश्न 47.
पल्लवन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कायांतरण की प्रक्रिया में शैलों के कुछ कण या खनिज सतहों या रेखाओं के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। इस व्यवस्था को पल्लवन या रेखांकन कहते हैं।

प्रश्न 48.
कायंतरित क्रिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कायांतरित वह प्रक्रिया है जिसमें समेकित शैलों में पनः क्रिस्टलीकरण होता है तथा वास्तविक शैलों में पदार्थ पुनः संगठित हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खनिज की परिभाषा दें।
उत्तर:
शैलों की रचना पदार्थों के इकट्ठा होने से होती है। खनिज प्राकृतिक रूप में पाया जाने वाला एक अजैव तत्त्व (Inorganicelement) था यौगिक (Compound) है । इसकी एक निश्चित रसायनिक रचना होती है । इसके संघटन में आण्विक संरचना पाई जाती है। इसके भौतिक गुण भी निश्चित होते हैं। अतः खनिज प्रकृति में पाये जाने वाले रसायनिक पदार्थ हैं। ये पदार्थ तत्त्व भी हो सकते हैं और यौगिक भी।

प्रश्न 2.
शैल निर्माणकारी खनिज किसे कहते हैं ?
उत्तर:
पृथ्वी पर लगभग 2000 प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। परन्तु इनमें से केवल 12 खनिज ही मुख्य रूप से भू-पृष्ठ की शैलों का निर्माण करते हैं। इन खनिजों को शैल निर्माणकारी खनिज (Rock forming Minerals) कहते हैं इन खिनिजों में सिलिकेट सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रधान होता है। इन शैलों में सबसे सामान्य खनिज क्वार्ट्ज (Quartz) पाया जाता है।

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प्रश्न 3.
खनिज कितने तत्त्वों से बनते हैं ? मुख्य तत्त्व कौन-से हैं ? सिलिका तथा चूने के कार्बोनेट में कौन-से तत्त्व हैं?
उत्तर:
सामान्य खनिज 8 मुख्य तत्त्वों (Elements) से बनते हैं। इनमें से सिलिकेट कर्बोनेट, ऑक्साइड तत्त्वों की मात्रा अधिक है । भू-पटल के खनिजों में 87% खनिज सिलिकेट हैं। सिलिका में 2 तत्त्व है-सिलिकॉन तथा ऑक्सीजन । चूने के कार्बोनेट में 3 तत्त्व हैं-कैल्श्यिम, कार्बन ऑक्सीजन।

प्रश्न 4.
शैल (Rock) की परिभाषा दो।
उत्तर:
भू-पृष्ठ (Crust) का निर्माण करने वाले सम्पूर्ण ठोस जैव एवं अजैव पदार्थों को शैल (चट्टान) कहते हैं (“Any natural, solid organic or inorganic material out of which the crust is formed is called a Rock”)। शैल ग्रेनाइट की भांति कठोर या पंक की भाँति नरम भी हो सकती है। भू-पृष्ठ शैलों का बना हुआ है। शैल की रचना कई खनिज पदार्थों के मिलने से होती है। कुछ शैल ऐसे भी हैं जिनमें एक ही प्रकार के खनिज पाए जाते हैं । खनिज पदार्थों की विभिन्न मात्रा के कारण ही हर शैल की कोमलता या कठोरता रंग-रूप गुण शक्ति अलग-अलग होती है।

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प्रश्न 5.
स्थलमण्डल किसे कहते हैं? स्थलमण्डल की कितनी गहराई तक चट्टानें पाई जाती हैं?
उत्तर:
स्थल मण्डल (Lithosphere) का अर्थ है चट्टानों का परिमण्डल । पृथ्वी की बाहरी ठोस पर्त को भूपर्पटी (Crust) कहते हैं। यह क्षेत्र चट्टानों का बना हुआ है। धतराल से लगभग 16 कि० मी० की गहराई तक स्थलमण्डल में चट्टानें पाई जाती हैं।

प्रश्न 6.
धात्विक तथा अधात्वि खनिजों में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
धात्विक खनिज – इनमें धातु तत्त्व होते हैं तथा इनको तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है।

  • बहुमूल्य धातु – स्वर्ण, चाँदी, प्लैटिनम आदि।
  • लौह धातु – लौह एवं स्टील के निर्माण के लिए लोहे में मिलाई जाने वाली अन्य धातुएँ।
  • अलौहिक धातु – इनमें ताम्र, सीशा, जिंक, टिन, एलूमिनियम आदि धातु शामिल होते हैं।

अधात्विक गनिज – इनमें धातु के अंश उपस्थित नहीं होते हैं। गंधक फॉस्फेट तथा नाइट्रेट अधात्वि खनिज हैं। सीमेंट अधात्विक खनिजों का मिश्रण है।

प्रश्न 7.
‘चट्टानें पृथ्वी के इतिहास के पृष्ठ हैं।’ व्याख्या करें।
उत्तर:
चट्टानों पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करती हैं। इसमें पाये जाने वाले खनिज तथा इससे बनी मिट्टी प्राकृतिक वातावरण का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं। चट्टानों की तहों में जीव-जन्तु और वनस्पतियों के अवशेष सुरक्षित रहते हैं। ये जीवावशेष इन चट्टानों की उत्पत्ति व समय के बारे में जानकारी देते हैं। इसलिए कहा जाता है, “चट्टानें पृथ्वी के इतिहास के पृष्ठ हैं तथा जीवावशेष उसके क्षर हैं ” (“Rocks are the pages of Earth History and Fossils are the writing on it”.)।

प्रश्न 8.
पृथ्वी की पर्पटी में कौन से प्रमुख तत्त्व हैं ?
उत्तर:
पृथ्वी विभिन्न तत्त्वों से बनी हुई है। इनकी बाहरी परत पर ये तत्त्व ठोस रूप में और और आंतरिक परत में ये गर्म एवं पिघली हुई अवस्था में पाये जाते हैं। पृथ्वी के सम्पूर्ण पर्पटी क, लगभग 98 प्रशित भाग आठ तत्त्वों, जैसे-ऑक्सीजन, सिलिकन, एलुमिनियम लोहा, कैल्शियम, सोडियम पोटाशियम तथा मैग्नीशियम से बना है तथा शेष भाग टायटेनियम, हाइड्रोजन, फॉस्फोरस मैंगनीज सल्फर, कार्बन निकिल एवं अन्य पदार्थों से बना है।
सारणी : पृथ्वी के पर्पटी के प्रमुख तत्त्व
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प्रश्न 9.
भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में निम्नलिखित अंतर हैं –

  1. भौतिक अपक्षय चट्टानों : का विघटन भौतिक बलों द्वारा होता है, जिससे चटटानों में कोई रासायनिक परिवर्तन नहीं होता। जबकि रासायनिक अपक्षय में चट्टानों का अपघटन रासायनिक क्रिया द्वारा होता है, जिससे चट्टानों में रासायनिक परिवर्तन आ जाता है।
  2. भौतिक अपक्षय के मुख्य कारक ताप, पाला तथा दाब है, जबकि रासायनिक अपक्षय के मुख्य कारक ऑक्सीकरण, कार्बोनिकरण जलयोजन तथा बिलयन है।
  3. भौतिक अपक्षय के उदाहरण शुष्क तथा शीत प्रदेश में पाये जाते हैं जबकि रासायनिक अपक्षय के उदाहरण उष्ण तथा आर्द्र प्रदेशों में मिलते हैं।

प्रश्न 10.
स्लेट चट्टानों के किस वर्ग से सम्बन्धित है? इसका क्या उपयोग है? भारत के किन भागों में स्लेट चट्टानों मिलती हैं?
उत्तर:
स्लेट एक रूपांतरित चट्टान है। यह शैल चट्टान पर अधिक दबाव से बनती है। यह भवन निर्माण में छत डालने (Roofing) के काम आती हैं। इसे बच्चों के लिखने में प्रयोग किया जाता है। इसे बिलियर्डस की मेज बनाने में प्रयोग करते हैं। भारत में यह रेवाड़ी (हरियाणा), कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) तथा बिहार में पाई जाती है।

प्रश्न 11.
कोयले के विभिन्न प्रकारों के नाम तथा उनमें कार्बन की मात्रा लिखो।
उत्तर:
कोयले में कार्बन की मात्रा के अनुसार निम्नलिखित प्रकार पाये जाते हैं –

  1. पीट (Peat) – इसमें कार्बन की मात्रा 40% से कम होती है।
  2. लिग्नाइट (Lignite) – इसमें कार्बन की मात्रा 50% से 70% तक होती है।
  3. बिटुमिनस (Bituminus) – इसमें कार्बन की मात्रा 50% से 70% तक होती है।
  4. एन्थासाइट (Anthracite) – इसमें कार्बन की मात्रा 70% से अधिक होती है।

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प्रश्न 12.
संगमरमर मूल रूप से कौन-सी चट्टान है? इसकी रचना कैसी होती? इसका उपयोग बताओ।
उत्तर:
संगमरमर एक परिवर्तित चट्टान है। चूने का पत्थर संगमरमर की मूल चट्टान है। गर्म मैग के संस्पर्श से चूने का पत्थर संगमरमर में परिवर्तित हो जाता है। संगमरमर इमारती पत्थर के मूल्य में बहुमूल्य है। आगरे का ताजमहल संगमरमर का बना हुआ है। भारत में यह अलवर, अजमेर जयपुर तथा जोधपुर के समीप पाया जाता है।

प्रश्न 13.
ग्रेनाइट, चट्टानों के किस वर्ग से सम्बन्धित है? इसका क्या उपयोग है? भारत के किन भागों में ग्रनाइट चट्टानों मिलती हैं?
उत्तर:
ग्रेनाइट पातालीय आग्नेय चट्टान है। यह एक कठोर चट्टान है जो विभिन्न रंगों जैसे-भूरे, लाल तथा सफेद में पाई जाती है। इसका उपयोग इमारतें, किलें, मन्दिर, मर्तियाँ तथा सड़क बनाने में किया जाता है। दक्षिण भारत के दक्कन पठार मध्य प्रदेश, छोटा नागपुर पठार तथा राजस्थान में ग्रेनाइट पत्थर मिलता है।

प्रश्न 14.
दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) से क्या अभिप्राय है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारतीय प्रायद्धीप के उत्तर:पश्चिमी भाग में बैसाल्ट चट्टानों से ढंके हए विशाल क्षेत्र को ढक्कन ट्रैप कहते हैं । इस क्षेत्र का विस्तार लगभग 5,00,000 वर्ग किमी है । इन चट्टानों के अपक्षरण से उपजाऊ काली मिट्टी का निर्माण हुआ है जिसे रेगूर (Regur) मिट्टी कहते हैं। यह मिट्टी कपास की कृषि के लिए उत्तम है।

प्रश्न 15.
रवों (Crystals) का निर्माण किस तत्त्व पर निर्भर करता है?
उत्तर:
पिघले हुए लावा के ठण्डा होने से रवों का निर्माण होता है। रवों का आकार छोटा या बडा हो सकता है। रवों का आकार मैग्मा के शीतलन (rate of cooling of magma) की क्रिया पर निर्भर करता है। धरातल पर शीघ्र ही ठण्डा होने के कारण धरातल पर बनने वाले रवों का आकार छोटा होता है। इनका गठन कांच जैसा होता है, जैसे-बैसाल्ट । मैग्मा के शीतलन की क्रमिक क्रिया से बड़े-बड़े रवों का निर्माण होता है। मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से पातालीय चट्टानों में बड़े आकार के रवों या मोटे दोनों वाले गठन का निर्माण होता है. जैसे-ग्रेनाइट।

प्रश्न 16.
चूना पत्थर तथा कोयला के बनने की प्रक्रियाओं में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
चूना पत्थर तथा कोयला के बनने की प्रक्रियाओं में अन्तर –
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प्रश्न 17.
शैल तथा खनिज में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
शैल तथा खनिज में अन्तर –
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प्रश्न 18.
अम्लीय तथा क्षारीय चट्टानों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
अम्लीय तथा क्षारीय चट्टानों में अन्तर –
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प्रश्न 19.
निम्नलिखित शैलों को आग्नेय, अवसादी व कायांतरित शैलों में वर्गीकृत कीजिए

  1. ग्रेनाइट
  2. स्टेल
  3. चूना पत्थर
  4. संगमरमर
  5. मृतिका
  6. बेसाल्ट
  7. बलुआ पत्थर
  8. कोयला
  9. खड़िया
  10. जिप्सम
  11. नीस तथा
  12. शिल्ट

उत्तर:
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प्रश्न 20.
मैग्मा एवं लावा में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मैग्मा तथा लावा में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवसादी चट्टानें क्या होती हैं? ये किस प्रकार बनती है? इनकी विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
अवसादी चट्टानों का निर्माण अपरदन द्वारा प्राप्त अवसाद के जमाव से होता है। तलछट में छोटे व बड़े आकार के कण होते हैं इन कणों के एकत्र होकर नीचे बैठ जाने से अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है। पृथ्वी के धरातल पर अपरदन से प्राप्त पदार्थ को जल, वायु, हिमनदी जमा करते रहते है। ये तलछट समुद्रों, झीलों, नदियों, डेल्टाओं या मरुस्थलों के धरातल आदि क्षेत्रों में जमा होते है। – इन चट्टानों की रचना कई पदो (Stages) में पूरी होती है। तलछट की परतों के संवहन तथा संयोजन से अवसादी शैलों का निर्माण होता है।

  • तलछट का निक्षेप – यह पदार्थ एक निश्चित क्रम के अनुसार जमा होते रहते हैं। पहले बड़े कण तथा उसके बाद छोटे कण ।
  • परतों का निर्माण – लगातार जमाव के कारण परतों का निर्माण होता है। पदार्थ एक परत के ऊपर, दूसरी परत के रूप में जमा होते हैं।
  • ठोस होना – ऊपरी परतों के भार के कारण परते संगठित होने लगती हैं। सिलिका, कैलसाइट, चिकनी मिट्टी आदि संयोजक चट्टानों को ठोस रूप दे देते हैं। इस प्रकार इन दोनों क्रियाओं के सम्मिलत रूप को शिलाभवन कहते हैं।

तलछटी चट्टान तीन प्रकार से बनती हैं –

  1. यांत्रिक क्रिया द्वारा
  2. जैविक पदार्थों द्वारा तथा
  3. रसायनिक तत्त्वों द्वारा।।

1. यांत्रिक क्रिया द्वारा – इन चट्टानों का निर्माण अपरदन व परिवहन करने वाली शक्तियों द्वारा होता है, जैसे-नदी, पवन, हिम आदि । बालुकामय तथा मृणमय चट्टानें इस प्रकार के उदाहरण हैं।
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2. जैविक पदार्थों द्वारा – इन चट्टानों का निर्माण जीव – जन्तुओं तथा वनस्पति के अवशेषों के दब जाने से होता है। ये चट्टानों मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है

  • काबर्न प्रधान चट्टानें – कोयला इस प्रकार की चट्टान हैं।
  • चूना प्रधान चट्टानें – उदाहरण-चूने का पत्थर, खड़िया, डोलोमाईट आदि।

3. रासायनिक तत्त्वों द्वारा – उदाहरण – नमक, जिप्सम।

4. अवसादी चट्टानों की विशेषताएँ –

  • इन चट्टानों में विभिन्न परतें पाई जाती हैं, इसलिए इन्हें परतदार चट्टानें कहते हैं। दो परतों को अलग करने वाले तल को संस्तरण तल कहते हैं।
  • इनका निर्माण छोटे – छोटे कणों से होता है।
  • इनमें जीव – जन्तुओं तथा वनस्पति के अवशेष पाए जाते हैं।
  • जल में निर्माण के कारण इनमें लहरों, धाराओं और कीचड़ के चिह्न मिलते हैं।
  • ये चट्टानें मुलायम तथा प्रवेशीय होती हैं। इनका अपरदन शीघ्र होता है। अधिकतर क्षैतिज स्थिति में पाई जाती हैं।
  • ये पृथ्वी के धरातल पर 75 प्रतिशत भाग में फैली हुई हैं। परन्तु पृथ्वी की गहराई में 5 प्रतिशत है।

प्रश्न 2.
तीन प्रकार की चट्टानों में सम्बन्ध की व्याख्या चट्टानी चक्र की सहायता से कीजिए।
उत्तर:
एक वर्ग की चट्टानों को दूसरे वर्ग की चट्टानों में बदलने की क्रिया को चट्टानी चक्र (Rock Cycle) कहते हैं। इस चक्र में दो प्रकार की शक्तियाँ कार्य करती हैं –

  1. पृथ्वी के भू – गर्भ की गर्मी
  2. बाह्य शक्तियों से अपरदन

पृथ्वी पर सबसे पहले आग्नेय चट्टानों का निर्माण हुआ। विभिन्न कारकों जैसे पवन, जल, हिम द्वारा अपरदन से तलछट प्राप्त कर तथा जमाव से तलछटी चट्टानें बनती हैं। ये चट्टानें ताप, दाब तथा रसायनिक क्रिया से रूपान्तरित चट्टानें बनाती हैं। रूपान्तरित फिर पिघलकर आग्नेय चट्टानें बन जाती हैं। अपक्षय तथा अपरदन से ये मलछटी चट्टानें बन जाती हैं। इस प्रकार एक वर्ग की चट्टानों में परिवर्तित हो जाती हैं । इस क्रिया को चट्टान चक्र (Rock Cycle) कहते हैं।

उदाहरण के लिए, चूने का पत्थर संगमरमर की मूल चट्टान है। गर्म मैग्मा के सस्पर्श से चूने का पत्थर संगमरमर में परिवर्तित हो जाता है। स्लेट एक रूपान्तरित चट्टान है। यह शैल चट्टान पर अधिक दबाव से बनती है। चूने का पत्थर क्षेत्रीय रूपान्तरण के कारण क्वार्ट्साइट में बदल जाता है।

रूपान्तरित चट्टानें तथा आग्नेय लगभग समान परिस्थितियों में बनती हैं। इस प्रकार, पवन, जल, हिम, ताप तथा दाब के प्रभावों से चट्टानें; एक वर्ग से दूसरे वर्ग की चट्टान में परिवर्तित होती रहती हैं।
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें

  1. अवसादी शैल
  2. कायान्तरण के प्रकार
  3. खनिजों का आर्थिक महत्त्व।

उत्तर:
1. अवसादी शैल:
इन शैलों का निर्माण शैलों के अपक्षय तथा अपरदन से प्राप्त अवसादों से होता है। पवन, जल तथा हिम शैलों को अपरदित करते हैं, और अवसाद को निम्न क्षेत्रों में परिवहित करते हैं। जब इनका निक्षेप समुद्र में होता है, वे सन्पीड़ित और कठोर होकर शैल परतों की रचना करते हैं। अवसाद खंडित खनिज तथा जैविक पदार्थ हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, पूर्व स्थित शैलों तथा जीवन-प्रक्रियाओं से प्राप्त होते हैं और वायु, जल अथवा हिम द्वारा परिवहित और निक्षेपित किए जाते हैं बलुआ पत्थर बालू के कणों से बनता है।

खड़िया करोड़ों सूक्ष्म जीवों के छोटे-छोटे कैल्शियम कार्बोनेटी (चूना) अवशेषों से बनती है। कठोर परतों के निर्माण की प्रक्रिया को शिलीभवन कहते हैं कभी-कभी अवसादों में निक्षेप के बाद रासायनिक परिवर्तन भी होते हैं। भौतिक तथा रसायनिक परिवर्तनों की सभी प्रक्रियाएँ जो अवसादों को उनके ठोस शैल में परिवर्तित होने के दौरान प्रभावित करती हैं, प्रसंघनन कहलाती हैं।

अवसादी शैलों को खंडज तथा अखंडज-दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। शैलों का नामकरण, शैलों में उपस्थित खनिज कणों के आकार पर निर्भर करता है। खनिज कणों के आकार के अनुसार कोटि-निर्धारण करने के लिए ‘वेंटवर्थ मापक’ मापन का प्रयोग किया जाता है । अखंडज अवसादी शैल दो प्रकार से बनती है-रासायनिक अवक्षेप तथा जैव पदार्थों से प्राप्त अवसाद। जैव पदार्थों से प्राप्त अवसादों में कोयला, चूना पत्थर इसके उदाहरण हैं। रासायनिक अवसादों के उदाहरण हैं-कैल्शियम सल्फेट, एनहाइड्राइट, जिप्सम (कैल्सियम सल्फेट हाइड्स)।

2. कायान्तरण के प्रकार:
ताप तथा दाब के कारण नई खनिज शैलों का निर्माण होता है। मृतिका ताप तथा दाब से प्रभावित होकर स्टेल में कायान्तरित हो जाती है। इसी प्रकार चूना पत्थर संगमरमर में कायान्तरित हो जाता है। कायान्तरित शैलों को दो बड़ी भागों में बाँटा जा सकता है – अपदलनी तथा पुनक्रिस्टलीकृत शैल। अपदलनी का निर्माण पूर्व-स्थित खनिजों का पर्याप्त रासायनिक परिवर्तन के बिना यौगिक विघटन से हुआ है।

इस प्रक्रिया को गतिक कायान्तरण कहते हैं। पुनक्रिस्टलिकृत शैल मूल खनिजों के पुनः क्रिस्टलीकरण होने से बनती है। पुनर्किस्टलीकृत शैल को दो उपभागों में बाँटा गया है-संस्पर्श कायान्तरित तथा प्रादेशिक कायान्तरित कार्यातरण की प्रक्रिया जारी रहने पर खनिजों का एक बड़ा प्रतिशत प्लेट जैसा शक्ति ग्रहण कर लेता है। ये खनिज शैल एक सामान्तर रेखा में एकत्र हो जाते हैं। इस संरचना को शल्कन कहते हैं।

सुविकसित शल्कन को शिल्ट कहते हैं। शिल्ट की आकृति में वृद्धि हो जाती है जिन्हें पॅफिरोब्लास्ट कहते हैं। कायान्तरित चट्टान का एक अन्य रूप है। सरेखण, इसमें खनिजों के कण एक लम्बी, पतली पेन्सिल जैसी वस्तु के रूप में एकत्र हो जाते हैं।

3. खनिजों का आर्थिक महत्त्व : उपयोगिता की दृष्टि से खनिजों को चार प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है –

(क) आवश्यक संसाधन, ऊर्जा सन्साधन, धातु सन्साधन तथा औद्योगिक सन्साधन । इनमें से सर्वाधिक आधारभूत वर्ग आवश्यक सन्साधन है, जिनमें मृदा तथा जल शमिल हैं।

(ख) ऊर्जा सन्साधन को जीवाश्मी ईंधन तथा परमाणु ईंधन में विभक्त किया जा सकता है। धात्विक सन्साधनों में संरचनात्मक धातुओं, जैसे-लोहा, एल्यूमिनियम एवं रिटेनियम से लेकर अलंकारी एवं औद्योगिक धातुएँ जैसे-सोना, प्लेटिनम तथा गैलियम शामिल हैं।

(ग) औद्योगिक खनिजों में 30 से अधिक वस्तुएँ शामिल हैं। जैसे-नमक, एस्बेस्टस तथा बालु।

(घ) खनिज निक्षेपों को उनके उपभोग की दर के बराबर पैदा करने की हमारी योग्यता तथा क्षमता होने की कोई सम्भावना नहीं है। द्वितीय खनिज निक्षेपों की महत्ता स्थानबद्ध है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट करें –

  1. रासायनिक अवक्षेप तथा जैव पदार्थों से प्राप्त अवसाद
  2. अपदलनी शैल और पुनक्रिस्टलीकृत शैल
  3. शल्कण संरेखण।

उत्तर:
1. रासायनिक अवक्षेप तथा जैव पदार्थों से प्राप्त अवसाद –
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2. अपदलनी शैल और पुनक्रिस्टलीकृत शैल –
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3. शल्कन और संरेखण –
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प्रश्न 5.
आग्नेय शैलों के निर्माण का वर्णन, उनके विभिन्न प्रकारों को उपयुक्त उदाहरण देते हुए वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आग्नेय शैलों का निर्माण ज्वालामुखी से निकले हुए लावा से अथवा उष्ण मैग्मा के भूपर्पटी के नीचे ठण्डा होने से हुआ है। ग्रेनाइट मोटे दाने वाली आग्नेय शैल है। यह मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से बनी है। . बैसाल्ट महीन दानों वाली काली आग्नेय शैल है, जो लावा के शीघ्र ठण्डा होने से बनी है। मैग्मा के रासायनिक विभेदन के आधार पर आग्नेय शैलें दो प्रकार की होती है-मैफिक और फेल्सिक।

आग्नेय शैल में खनिज क्रिस्टलों का आकार मैग्मा के ठण्डा होने की दर पर निर्भर है। सामान्य तौर पर मैग्मा के शीघ्र ठण्डा होने पर छोटे क्रिस्टल तथा धीरे-धीरे ठण्डा होने पर बड़े क्रिस्टल बनते हैं। अतिशीघ्र ठण्डा होने से प्राकृतिक काँच या ग्लास की उत्पत्ति होती है, जो क्रिस्टलविहीन होती है। मैग्मा को चारों ओर से घेरने वाली शैले ऊष्मा के निष्कासन में बाधा डालती है।

बड़े क्रिस्टल, जो आँखों से देखे जा सकते हैं, दृश्यक्रिस्टल कहलाते हैं, जो क्रिस्टल केवल माइक्रोस्कोप की सहायता से देखे जाते हैं, ऐफान क्रिस्टल कहलाते हैं। जब शैल में सभी क्रिस्टल एक ही आकार के हों, उस शैल गठन को समणिक कहते हैं। जब बड़े क्रिस्टल छोटे क्रिस्टलों के आव्यूह में अन्तः स्थापित होते हैं, उन्हें दीर्घ क्रिस्टल अन्तर्वेशी या पॅर्फिराइटिक कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

Bihar Board Class 11 Geography महासागरों और महाद्वीपों का वितरण Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?
(क) अल्फ्रेड वेगनर
(ख) अब्राहम आरटेलियस
(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी
(घ) एमंड हैस
उत्तर:
(ख) अब्राहम आरटेलियस

प्रश्न 2.
निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?
(क) अल्फ्रेड वेगनर
(ख) अब्राहम आरटेलियस
(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी
(घ) एमंड हैस
उत्तर:
(ख) अब्राहम आरटेलियस

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

प्रश्न 3.
पोलर फ्लिंग बल (Polar fleeing force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(क) पृथ्वी का परिक्रमण
(ख) पृथ्वा का घूर्णन
(ग) गुरुत्वाकर्षण
(घ) ज्वारीय बल
उत्तर:
(ख) पृथ्वा का घूर्णन (ग) गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 3.
इनमें से कौन सी लघु (Minor) प्लेट नहीं है?
(क) नाजका
(ख) फिलिप्पिन
(ग) अरब
(घ) अंटार्कटिक
उत्तर:
(घ) अंटार्कटिक

प्रश्न 4.
सागरीय तल विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हेस ने निम्न से किस अवधारणा को नहीं विचारा?
(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ
(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना।
(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण
(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु।
उत्तर:
(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

प्रश्न 5.
हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?
(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण
(ख) अपसारी सीमा
(ग) रूपांतर सीमा
(घ) महाद्वीपीय अभिसरण
उत्तर:
(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण

प्रश्न 6.
महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?
(क) वेगनर
(ख) बेकन
(ग) टेलर
(घ) हेनरी हेस
उत्तर:
(ग) टेलर

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
(क) हिन्द महासागर
(ख) आर्कटिक महासागर
(ग) अटलांटिक महासागर
(घ) प्रशांत महासागर
उत्तर:
(ख) आर्कटिक महासागर

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन-सा पटल विरूपण से संबंधित नहीं है?
(क) पर्वत बल
(ख) प्लेट विवर्तनिक
(ग) महादेश जनक बल।
(घ) संतुलन
उत्तर:
(ग) महादेश जनक बल।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

प्रश्न 9.
समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब कितना होता है?
(क) 1031.25 मिलीबार
(ख) 1013.25 मिलीबार
(ग) 1013.52 मिलीबार
(घ) 1031.52 मिलीबार
उत्तर:
(ख) 1013.25 मिलीबार

प्रश्न 10.
लवणता को प्रति, समुद्र तल में घुले हुए नमक (ग्राम) को मात्रा से व्यक्त किया जाता है
(क) 10 ग्राम
(ख) 100 ग्राम
(ग) 1000 ग्राम
(घ) 10,000 ग्राम
उत्तर:
(ग) 1000 ग्राम

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने निम्नलिखित में से किन बलों का उल्लेख किया?
उत्तर:
वेनगर के अनुसार, महाद्वीपीय विस्थापन के दो कारण थे –

  1. पोलर या ध्रुवीय फ्लिंग बल (Polar fleeing force) और
  2. ज्वारीय बल (Tidal force)| ध्रुवीय फ्लिंग बल पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित है। यह ज्वारीय बल सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण से संबंद्ध है जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते हैं।

प्रश्न 2.
मैटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
ये धाराएँ रेडियाऐक्टिव तत्त्वों से उत्पन्न ताप भिन्नता से मैटल भाग में उत्पन्न होती हैं। आर्थर हाम्स ने तर्क दिया कि पूरे मैंटल भाग में इस प्रकार की धाराओं का तंत्र विद्यमान है।

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प्रश्न 3.
प्लेट की रूपांतर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमान्त में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:

  1. जहाँ न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पर्पटी का विनाश होता है उन्हें रूपान्तरण सीमा (Transform boundries) कहते हैं।
  2. जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे फंसती है और जहाँ क्रस्ट नष्ट होती है,वह अभिसरण सीमा (Convergent boundries) है।
  3. जब दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है उन्हें अपसारी सीमा (Divergent boundries) कहते हैं।

प्रश्न 4.
दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?
उत्तर:
आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पहले यह उपमहाद्वीप सुदूर दक्षिण में 50° दक्षिणी आक्षांश पर स्थित था। इन दो प्रमुख प्लेटों को टिथीस सागर अलग करता था और तिब्बतीय खंड एशियाई स्थलखंड के करीब था। इंडियन प्लेट के एशियाई प्लेट की तरफ प्रवाह के दौरान एक प्रमुख घटना घटी-वह थी लावा प्रवाह से दक्कन ट्रेप का निर्माण होना । ऐसा लगभग 6 करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हुआ और एक लम्बे समय तक जारी रहा।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिये गये प्रमाणों का वर्णन करें?
उत्तर:
जर्मन मौसमविद् अलफ्रेड वेनगर (Affred Wegner) ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत सन् 1912 में प्रस्तावित किया, यह सिद्धांत महाद्वीपीय एवं महासागरों के वितरण से संबंधित था। इस सिद्धान्त के पक्ष में दिए गए प्रमाण इस प्रकार थे –
(a) महाद्वीपों में साम्य – दक्षिणी अमेरिका व अक्रीका के आमने-सामने की तटरेखाएँ अद्भुत व त्रुटिरहित साम्य दिखाती हैं। 1964 ई० में बुलर्ड (Bullard) ने एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की सहायता से अटलांटिक तटों को जोड़ते हुए एक मानचित्र तैयार किया था तटों का यह साम्य बिल्कुल सही सिद्ध हुआ।

(b) महासागरों के पार चट्टानों की आयु में समानता – आधुनिक समय में विकसित की गई रेडियोमिट्रिक काल निर्धारण (Radiometric dating) विधि से महासागरों के पार महाद्वीपों के चट्टानों के निर्माण के समय को सरलता से मापा जा सकता है। 200 करोड़ वर्ष प्राचीन शैल समूहों की एक श्रृंखला यही ब्राजील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर मिलती है जो आपस में मेल खाती है।

(c) टिलाइट (Tillite) – टिलाइट वे अवसादी चट्टानें हैं जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती है। भारत में पाए जाने वाले गोंडवाना श्रेणी के तलछटों के प्रतिरूप दक्षिण गोलाद्धों के छः विभिन्न स्थलखण्डों में मिलते हैं। गोंडवाना श्रेणी के आधार तल में घने टिलाइट हैं जो विस्तृत व लम्बे समय तक हिम आवरण या हिमाच्छादन की तरफ इशारा करते हैं।

(d) प्लेसर निक्षेप (Placer Deposits) – घाना तट पर सोने के बड़े निक्षेपों कोउपस्थिति व चट्टानों की अनुपस्थिति एक आश्चर्यजनक तथ्य है। अतः यह स्पष्ट है कि घाना में मिलने वाले सोने के निक्षेप ब्राजील पठार से उस समय निकले होंगे, जब ये दोनों महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े थे।

(e) जीवाश्मों का वितरण (Distribution of Fossils) – कुछ वैज्ञानिकों ने इन तीनों स्थलखण्डों को जोड़कर एक सतत् स्थलखण्ड ‘लेमूरिया’ (Lemuria) की उपस्थिति को स्वीकारा । ये ‘लैग्मूर’ भारत, मेडागास्कर व अफ्रीका में मिलते हैं । मेसोसारस (Mrsosaurus) नाम के छोटे रेंगने वाले जीव केवल उथले खारे पानी में ही रह सकते थे। इनकी अस्थियाँ केवल दक्षिण अफ्रीका के दक्षिणी प्रान्त और ब्राजील में इरावर शैल समूहों में ही मिलती हैं। ये दोनों स्थान आज एक-दूसरे से 4,800 किमी. की दूरी पर हैं और इनके बीच में एक महासागर विद्यमान है।

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प्रश्न 2.
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त में मूलभूत अंतर बताइए।
उत्तर:
इस सिद्धांत की आधारभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप एक अकेले भूखण्ड में जुड़े हुए थे। वेगनर के अनुसार, आज के सभी महाद्वीप इस भूखण्ड के भाग थे तथा एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था। उन्होंने इस बड़े महाद्वीप को पैजिया (Pangea) का नाम दिया । पंजिया का अर्थ-सम्पूर्ण पृथ्वी। विशाल महासागर को पैंथालासा (Panthalasa) कहा जिसका अर्थ है-जल ही जल। वेगनर के तर्क के अनुसार लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले इस बड़े महाद्वीप पैजिया का विभाजन आरम्भ हुआ।

पैजिया पहले दो बड़े महाद्वीपीय पिण्डो लारेशिया (Laurasia) और गोंडवाना लैण्ड (Gondwanaland) क्रमश: उत्तरी व दक्षिणी भूखण्डों का रूप में विभक्त हुआ। इसके बाद लॉरशिया व गोंडवानालैण्ड धीरे-धीरे अनेक छोटे हिस्सों में बंट गए जो आज के महाद्वीप के रूप में हैं। प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमण्डल सात मुख्य प्लेटों व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त किया जाता है। नवीन वलित पर्वत श्रेणियाँ खाइयाँ और भ्रंश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं।

ग्लोब पर ये प्लेटें पृथ्वी के पूरे इतिहास काल में लगातार विचरण कर रही हैं। वेगनर की संकल्पना के अनुसार केवल महाद्वीप गतिमान है, सही नहीं है। महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट चलायमान है। भू-वैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेटें गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी।

प्रश्न 3.
महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरान्त की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?
उत्तर:
महाद्वीपीय प्रवाह उपरान्त अध्ययनों ने महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की जो वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के समय उपलब्ध नहीं थी। चट्टानों के पूरे चुम्बकीय अध्ययन और महासागरीय तल के मानचित्रण ने विशेष रूप से निम्न तथ्यों को उजागर किया।

  1. यह देखा गया है कि मध्य महासागरीय कटकों के साथ-साथ ज्वालामुखी उद्गार सामान्य क्रिया और ये उद्गार इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में लावा बाहर निकालते हैं।
  2. महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरफ समान दूरी पर पायी जाने वाली चट्टानों के निर्माण का समय संरचना संघटन और
  3. चुम्बकीय गुणों में समानता पाई जाती है। महासागरीय कटकों के समीप की चट्टानों में सामान्य चुम्बकत्व ध्रुवण (Normal polarity)
  4. पाई जाती है तथा ये चट्टानें नवीनतम हैं। कटकों के शीर्ष से दूर चट्टानों की आयु भी अधिक है।
  5. महासागरीय पर्पटी की चट्टानें महाद्वीपीय पर्पटी की चट्टानों की अपेक्षा अधिक नई हैं। महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कही भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं।
  6. गहरी खाइयों के भूकम्प के उद्गम अधिक गहराई पर हैं। जबकि मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र में भूकम्प उद्गम केन्द्र (Focil) कम गहराई पर विद्यमान हैं।

इन तथ्यों और मध्य महासागरीय कटकों के दोनों तरफ की चट्टानों के चुम्बकीय गुणों के विश्लेषण के आधार पर हैस (Hess) ने सन् 1961 में एक परिकल्पना प्रस्तुत की, जिसे सागरीय तल विस्तार (Sea floor spreading) के नाम से जाना जाता है। सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् विद्वानों की महाद्वीपों व महासागरों के वितरण के अध्ययन में फिर से रुचि पैदा हुई। सन् 1967 में मैक्कैन्जी (Mackenzie) पार्कर (Parker) और मार्गन (Morgan) ने स्वतंत्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) कहा गया।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
भूकंप के कारण हुई क्षति से संबंधित एक कोलाज बनाइए।
उत्तर:
इस परियोजना को समाचार पत्रों की कटिंग, दूरदर्शन, रेडियों आदि पर वार्ताओं एवं पाठ्य पुस्तक (अध्याय तीन, चार एवं अन्य) से जानकारी इकट्ठा करके स्वयं कोलाज बनाइए ।

Bihar Board Class 11 Geography महासागरों और महाद्वीपों का वितरण Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पेंजिया से पृथक् होने वाले दक्षिणी महाद्वीप का नाम लिखो।
उत्तर:
गौंडवानालैंड।

प्रश्न 2.
गौंडवानालैंड में शामिल भू-खण्डों के नाम लिखो।
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका।

प्रश्न 3.
उस पौधे का नाम लिखो जिसका जीवाश्म सभी महाद्वीपों में मिलते हैं।
उत्तर:
ग्लोसोप्टैरिस

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प्रश्न 4.
मूल महाद्वीप का क्या नाम था? यह कब बना?
उत्तर:
पेंजिया – काल्पनिक कल्प में 280 मिलियन वर्ष पूर्व।

प्रश्न 5.
किसने और कब महाद्वीपीय संचलन सिद्धान्त प्रस्तुत किया?
उत्तर:
अल्फ्रेड वैगनर ने 1912 ई० में।

प्रश्न 6.
लैमूरिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लैमूर प्रजाति के जीवाश्म भारत के मैडागास्कर व अफ्रीका में मिलते हैं। कुछ वैज्ञानिक ने इन तीनों खण्डों को जोड़ कर एक सतत् स्थलखंड की उपस्थिति को स्वीकारा है जिसे ‘लैमूरिया’ कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्लेसर निक्षेप कहाँ-कहाँ मिलते हैं?
उत्तर:
घाना तट व ब्राजील तट पर सोने के बड़े निक्षेप मिलते हैं। यहाँ सोनायुक्त शिराएँ पाई जाती हैं। इस से स्पष्ट है कि ये दोनों महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे।

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प्रश्न 8.
टिलाइट से क्या अभिप्राय है? ये कहाँ मिलते हैं?
उत्तर:
टिलाइट वे अवसादी चट्टानें हैं जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती हैं। गोंडवाना श्रेणी के आधार तल में घने टिलाइट हैं जो लम्बे समय तक हिमावरण की ओर संकेत करते हैं। इसी क्रम के प्रतिरूप भारत के अतिरिक्त दक्षिणी गोलार्द्ध में अफ्रीका, फॉकलैंड द्वीप, मैडागास्कर, अंटार्कटिक और आस्ट्रेलिया में मिलते हैं। ये पुरातन जलवायु और महाद्वीपों में विस्थापन का स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रश्न 9.
किस मानचित्रकार ने तीनों महाद्वीपों को इकट्ठा मानचित्र पर दिखाया?
उत्तर:
एन्टोनियो पैलरिगरनी ने।।

प्रश्न 10.
अन्य महासागरीय तटरेखा की समानता का संभावना सर्वप्रथम किसने व्यक्त किया?
उत्तर:
एक उच्च मानचित्र वेता अब्राहम ऑरटेलियस ने।

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प्रश्न 11.
दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका को एक दूसरे से पृथक् होने में कितना समय लगा?
उत्तर:
20 करोड़ वर्ष

प्रश्न 12.
हिमालय पर्वत की उत्पत्ति का क्या कारण था?
उत्तर:
भारतीय प्लेट तथा युरेशियन प्लेट का आपसी टकराव।

प्रश्न 13.
हिन्द महासागर में ज्वालामुखी के दो तप्त स्थलों के नाम बताएँ।
उत्तर:
90° पूर्व कटक तथा लक्षद्वीप कटक।

प्रश्न 14.
सबसे बड़ी भू-प्लेट कौन-सी है?
उत्तर:
प्रशान्त महासागरीय प्लेट।

प्रश्न 15.
स्थलमंडल पर कुल कितनी प्लेटें हैं?
उत्तर:
7

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प्रश्न 16.
संवहन क्रिया सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर:
सन् 1928 ई० में आर्थर होम्स ने।

प्रश्न 17.
प्लेटों के संचलन का क्या कारण है?
उत्तर:
तापीय संवहन क्रिया।

प्रश्न 18.
समुद्र के अधस्तल के विस्तारण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
महासागरीय द्रोणी का फैलना तथा चौड़ा होना।

प्रश्न 19.
प्रवों के घूमने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विभिन्न युगों में ध्रुवों की स्थिति का बदलना।

प्रश्न 20.
अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका में स्वर्ण निक्षेप कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर:
घाना तथा ब्राजील में।

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प्रश्न 21.
अभिसरण से क्या अभिप्राय है? इसके कारण बताइये।
उत्तर:
जब एक प्लेट नीचे धंसती है और जहाँ भूपर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण सीमा है। वह स्थान जहाँ प्लेट सती हैं, इसे प्रविष्ठन क्षेत्र (Subduction Zone) भी कहते हैं। अभिसरण तीन प्रकार से हो सकता है –

  1. महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के बीच
  2. दो महासागरीय प्लेटों के बीच
  3. दो महाद्वीपीय प्लेटों के बीच।

प्रश्न 22.
प्राचीन भूकाल में भारत की स्थिति कहाँ थी?
उत्तर:
पुराचुंबकीय (Palaeomagnetic) आँकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने विभिन्न भूकालों में प्रत्येक महाद्वीपीय खंड की अवस्थिति निर्धारित की है। भारतीय उपमहाद्वीप (अधिकांशतः प्रायद्वीपीय भारत) की अवस्थिति नागपुर क्षेत्र में पाई जाने वाली चट्टानों के विश्लेषण के आधार पर आंकी गई है।

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प्रश्न 23.
प्लेटों के दो प्रमुख प्रकार बताओ।
उत्तर:
एक प्लेट को महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेट भी कहा जा सकता है। जो इस बात पर निर्भर है कि उस प्लेट का अधिकतर भाग महासागर अथवा महाद्वीप से संबद्ध है। उदाहरणार्थ प्रशांत प्लेट मुख्यतः महासागरीय प्लेट है जबकि युरेशियन प्लेट को महद्वीपीय प्लेट कहा जाता है। प्लेट विविर्तनिकी के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमण्डल सात मुख्य प्लेटों कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त है। नवीन वलित पर्वत श्रेणियाँ खाइयाँ और भ्रंश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं।

प्रश्न 24.
महासागरीय तल को किन भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर:
गहराई व उच्चावच के आधार पर महासागरीय तल को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है –

  1. महाद्वीपीय सीमा
  2. गहरे समुद्री बेसिन
  3. मध्य महासागरीय कटक

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धुवों के घूमने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
घुवों का घूमना (Polar Wandering) – पहले महद्वीप पेंजिया के रूप में परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, इसका सबसे शक्तिशाली प्रमाण पुराचुबकत्व से प्राप्त हुआ है। मैग्मा, लावा तथा असंगठित अवसाद में उपस्थित चुंबकीय प्रवृत्ति वाले खनिज जैसे मैग्नेटाइट, हेमाटाइट, इल्मेनाइट और पाइरोटाइट इसी प्रवृत्ति के कारण उस समय के चुंबकीय क्षेत्र के समानांतर एकत्र हो गए। यह गुण शैलों में स्थाई चुंबकत्व के रूप में रह जाता है। चुंबकीय ध्रुव की स्थिति में कालिक परिवर्तन होता रहा है, जो शौलों में स्थाई चुंबकत्व के रूप में अभिलेखित किया जाता है।

वैज्ञानिक विधियों द्वारा पुराने शैलों में हुए ऐसे परिवर्तनों को जाना जा सकता है। जिनसे भूवैज्ञानिक काल में ध्रुवों की बदलती हुई स्थिति की जानकारी होती है। इसे ही घुवों का घूमना कहते हैं। ध्रुवों का घूमना यह स्पष्ट करता है कि महाद्वीपों का समय-समय पर संचलन होता रहा है और वे अपनी गति की दिशा भी बदलते है।

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प्रश्न 2.
प्रवालों की स्थिति किस प्रकार स्पष्ट करती है कि भू-खण्ड उत्तर की ओर विस्थापित हुए?
उत्तर:
प्रवाल 30° उत्तर 30दक्षिण अक्षांशों के मध्य कोष्ण जल में पनपता है। इस क्षेत्र से बाहर के महाद्वीपों पर प्रवालों का पाया जाना, इस बात का प्रबल प्रमाण है कि प्राचीन भूवैज्ञानिक काल में ये महाद्वीप विषुवत रेखा के निकट थे। महाद्वीपों का संचलन उत्तर की ओर हुआ और इसलिए ये आज शीत एवं उष्ण जलवायु का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 3.
पैजिया किसे कहते हैं? इसकी उत्पत्ति कब हुई? इसमे मिलने वाले भू-खण्ड बताएँ। पैंजिया के टूटने की क्रिया बताएं।
उत्तर:
विश्व के सभी भू-खण्ड पेंजिया नाम एक महा-महाद्वीपीय से विलग होकर बने हैं, यह बात अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में कही। जिया नामक यह महाद्वीप 28 करोड़ वर्ष पूर्व, कार्बनी कल्प के अन्त में अस्तित्व में आया। मध्य जुरैसिक कल्प तक यानि 15 करोड़ वर्ष पूर्व पंजिया उत्तरी महाद्वीप लॉरशिया तथा दक्षिणी महाद्वीप गौंडवानालैंड में विभक्त हो गया था। लगभग 6.5 करोड़ वर्ष अर्थात् क्रिटेशस कल्प के अन्त में गौंडवानालैंड फर से खंडित हुआ और इससे कई अन्य महाद्वीपों जैसे दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका की रचना हुई।

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प्रश्न 4.
महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटों का वर्णन करें।
उत्तर:
कुछ महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटें निम्नलिखित हैं –

  1. कोकोस प्लेट (Cocoas Plate) – यह प्लेट मध्यवर्ती अमेरिका और प्रशांत मासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  2. नाजका प्लेट (Nazca plate) – यह दक्षिण अमेरिका व प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  3. अरेबियन प्लेट (Arabian plate) – इसमें अघितर सऊदी अरब का भू-भाग सम्मिलित है।
  4. फिलिपाइन प्लेट (Philoppine plate) – यह एशिया महाद्वीपी और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।

प्रश्न 5.
महासागरीय तल के मानचित्र से क्या निष्कर्ष निकलता है?
उत्तर:
महासागरीय तल का मानचित्रण (Mapping of the ocean floor) – महासगरी की तली एक विस्तृत मैदान नहीं है, वरन् उनमें भी उच्चावच पाया जाता है। इसकी तली में जलमग्न पर्वतीय कटके व गहरी खाइयाँ हैं, जो प्रायः महाद्वीपों के किनारों पर स्थित हैं। मध्य महासागरीय कटके ज्वालामुखी उद्गार के रूप में सबसे अधिक सक्रिय पायी गयीं। महासागरीय पर्पटी की चट्टानों के काल निर्धारण (Dating) ने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया कि महासागरों की नितल की चट्टानें महाद्वीपीय भागों में पाई जाने वाली चट्टानें, जो कटक से बराबर दूरी पर स्थित हैं, उन की आयु व रचना में भी आश्चर्यजनक समानता पाई जाती है।

प्रश्न 6.
महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वैगनर ने किन-किन बलों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
प्रवाह सम्बन्धी बल (Force for drifting) – वैगनर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थान के दो कारण थे:

  1. पोलर या ध्रुवीय फ्लिंग बल (Polar fleeing force) और
  2. ज्वारीय बल (Tidal force)

घुवीय फ्लिंग बल पृथ्वी की आकृति एक सम्पूर्ण गोले जैसी नहीं है: वरन् यह भूमध्यरेखा पर उभरी हुई है। यह उभार के घूर्णन के कारण है। दूसरा बल, जो वैगनर महोदय ने सुझाया-वह ज्वारीय बल है, जो सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है, जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते हैं। वैगनर का मानना था कि करोड़ों वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली होकर विस्थापन के लिए सक्षम हो गये । यद्यपि कि बहुत से वैज्ञानिक इन दोनों ही बलों को महाद्वीपीय विस्थापन के लिए सर्वथा अपर्याप्त समझते हैं।

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प्रश्न 7.
अपसरण क्षेत्र तथा अभिसरण क्षेत्र में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
अपसरण क्षेत्र – ये वे सीमाएँ हैं जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से अलग होती हैं। भूगर्भ से मैग्मा बाहर आता है। ये महासागरीय कटकों के साथ-साथ देखा जाता है। इन सीमाओं के साथ ज्वालामुखी तथा भूकम्प मिलते हैं। इसका उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है जहाँ से अमेरिकी प्लेटें तथा यूरेशियम व अफ्रीकी प्लेटे अलग होती है।

अभिसरण क्षेत्र – ये वे सीमाएँ हैं जहाँ एक प्लेट का किनारा दूसरे के ऊपर चढ़ जाता है। इनसे गहरी खाइयों तथा वलित श्रेणियों की रचना होती है । ज्वालामुखी तथा गहरे भूकम्प उत्पन्न होते हैं।

रूपांतर सीमा – जहाँ न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही विनाश होता है, उसे रूपांतरण सीमा कहते हैं। इसका कारण है कि इस सीमा पर प्लेटें एक-दूसरे के साथ-साथ क्षैतिज दिशा में सरक जाती हैं।

प्रश्न 8.
भारतीय प्लेट के विषय में बताएँ। हिमालय पर्वत की उत्पत्ति किस प्रकार हुई?
उत्तर:
भारत में हिन्द महासागर की सतह पर ऊँचे कटक तथा पठार शामिल हैं। इनमें से दो महासागरीय कटक, जिनके नाम नाइंटी ईस्ट कटक एवं मैस्केरेन पठार तथा चैगोस-मालद्वीव-लक्षद्वीप द्वीपीय कटक हैं, तप्त स्थलों के ज्वालामुखी मार्ग समझे जाते हैं। नाइंटी-ईस्ट कटक का उत्तरी विस्तार एक महासागरीय खाई में समाप्त हो जाता है, जिसने भारतीय महाद्वीपीय खंड के उत्तर में स्थित समुद्र अधस्तल को अपने में विलीन कर लिया।

चैगोस-लक्षद्वीप कटक आदि नूतन कल्प में पुरातन कार्ल्सबर्ग कटक को दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक से जोड़ती थी। मध्य-महासागर कटक का विस्तार हो रहा है। इसकी गति लगभग 14 से 20 सेमी प्रति वर्ष है। कार्ल्सबर्ग दक्षिण-पूर्व हिन्दमहासागर कटक के पश्चात् भारतीय प्लेट एवं यूरेशियन प्लेट का टकराव भारतीय प्लेट के उत्तर में हुआ, जिससे हिमालय की उत्पत्ति हुई। हिमालय प्रदेश में भारतीय प्लेट एवं यूरेशियन प्लेट के मध्य का जोड़ सिंधु तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के साथ हैं।

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प्रश्न 9.
सर्वाधिक नवीन प्लेट कौन-सी है?
उत्तर:
मुख्य सात प्लेटों में सर्वाधिक नवीन प्लेट प्रशांत प्लेट है, जो लगभग पूरी तरह महासागरीय पटल से बनी है और भूपृष्ठ के 20 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है। अन्य प्लेटों का निर्माण महासागरीय तथा महाद्वीपीय दोनों प्रकार के पटलों से हुआ है। कोई भी अन्य प्लेट केवल महाद्वीपीय पटल से निर्मित नहीं है। प्लेटों की मोटाई में अंतर महासागरों के नीचे 70 किमी से लेकर महाद्वीप के नीचे 150 किमी तक है।

प्रश्न 10.
प्रवाह दर पर नोट लिखें।
उत्तर:
प्लेट प्रवाह दरें (Rates of plate movement) – सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकीय । क्षेत्र की पट्टियाँ जो मध्य-महासागरीय कटक के समानंतर हैं। प्लेट प्रवाह की दर समझने में वैज्ञानिकों के लिए सहायक सिद्ध हुई हैं। प्रवाह की ये दरें बहुत भिन्न हैं। आर्कटिक कटक की प्रवाह, दर सबसे कम है (2.5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष से भी कम) । ईस्टर द्वीप के निकट पूर्वी प्रशांत महासागरीय उभार, जो चिली से 3,400 किमी पश्चिम की ओर दक्षिण प्रशांत महासागर में है, इसकी प्रवाह दर सर्वाधिक है (जो 5 सेमी प्रति वर्ष से भी अधिक है)।

प्रश्न 11.
प्लेट विवर्तनिकी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्लेट विवर्तनिकी (Plate tectonics) – सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् विद्वानों की महाद्वीपों व महासागरों के वितरण के अध्ययन में फिर से रुचि पैदा हुई। सन् 1967 में मैक्कैन्जी (Mackenzie) पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतंत्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर अवधारणा प्रस्तुत की ‘जिसे प्लेट विवर्तनिको’ (Plate tectronics) कहा गया।

एक विवर्तनिक प्लेट (जिसे लिथास्फेरिक प्लेट भी कहा जाता है) ठोस, चट्टान का विशाल व अनियमित आकार खंड है जो महाद्वीपीय व महासागरीय स्थलमण्डलों से मिलकर बना है। ये प्लेटें दुर्बलता मण्डल (Asthenosphere) पर एक दृढ़ इकाई के रूप में क्षैतिज अवस्था में चलायमान हैं। स्थलमण्डल में पर्पटी एवं ऊपरी मैंटल को सम्मिलित किया जाता है, जिसकी मोटाई महासागरों में 5 से 100 किमी और महाद्वीपीय भागों में लगभग 200 किमी है।