Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 1 Chapter 5 हमारी सरकार Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

Bihar Board Class 6 Social Science हमारी सरकार Text Book Questions and Answers

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
ऊपर दिये गये अखबारों के मुख्य समाचार सरकार के किन-किन कार्यों को दर्शाते हैं? आपस में चर्चा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

प्रश्न 2.
सरकार क्या-क्या काम करती है ? अपने शब्दों में समझाएँ।
उत्तर-
सरकार-सरकार देश को आगे बढ़ाने और उन्नति करने के लिए अनेक कार्य करती है। सड़क का निर्माण, स्कल का निर्माण, बहत ज्यादा महंगाई हो जाने पर किसी चीज के दाम कैसे घटाया जाए अथवा बिजली की आपूर्ति को कैसे बढ़ायी जाए, सरकार कई समाजिक मुद्दों पर भी कार्रवाई करती है। सरकार गरीबों की मदद करने के लिए कई कार्यक्रम चलाती है। इनके अलावा वह अन्य महत्वपूर्ण काम भी करती है, जैसे-तार. फोन.

रेल सेवाएँ आदि । सरकार का काम देश की सीमाओं की सुरक्षा करना और दूसरे देशों से शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखना, देश के सभी नागरिकों को पर्याप्त भोजन, शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ, प्राकृतिक आपदा, सूखा, बाढ़ या भूकंप से पीड़ित लोगों की सहायता करना है। सरकार कई तरह के काम करती है। वह नियम बनाती है और निर्णय लेती है और अपनी सीमा में रहने वाले लोगों पर उन्हें लागू करती है।

प्रश्न 3.
सरकार के कुछ ऐसे कार्यों का उदाहरण दें जिसकी चर्चा यहाँ नहीं की गई है।
उत्तर-
सरकार अपने देश को विकास में आगे बढ़ने के लिए अनेक नये तरीकों के द्वारा देश को विकासशील बनाने का हर संभव प्रयास करती है। सरकार महत्वपूर्ण योजनाएं लागू कर अपने राष्ट्र को विकसित करने में अपना योगदान देती है।

सरकार के द्वारा चलाये गये योजनाओं को समय-समय पर लागू करके विभिन्न क्षेत्रों में अपना विशेष योगदान देती है। भारत सरकार गरीबों पर विशेष ध्यान में रखकर उसे आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करने का भी काम करती है। राज्य सरकार राज्य स्तर पर कार्य करती है। स्थानीय सरकार केवल एक ही स्थान जैसे पटना की सरकार पटना के लिए कार्य करती

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

प्रश्न 4.
लोकतंत्र और राजतंत्र की तीन मुख्य अंतर को रेखांकित करें।
उत्तर-
लोकतंत्र-

  1. लोकतंत्र में जनता अपनी इच्छा से मताधिकार का प्रयोग कर सरकार को चुनती है।
  2. लोकतंत्र में अपने किये गये कार्यों पर सफाई देनी पड़ती है।
  3. लोकतंत्र में सभी वयस्क लोगों को चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार प्राप्त होता है।

राजतंत्र-

  1. राजतंत्र में राजा अपने वंश परम्परा से आते हैं।
  2. वे स्वयं निर्णय लेते हैं, जिनके लिए उन्हें कोई सफाई नहीं देनी पड़ती
  3. राजतांत्रिक सरकार में सत्ता की सारी शक्ति राजा में निहित होती

प्रश्न 5.
दोनों में क्या बहस हई होगी? अभिनय द्वारा दर्शाएँ।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करें।

प्रश्न 6.
शिक्षक की मदद से ऊपर दिये गए तरीकों के कुछ उदाहरण ढूंढें और चर्चा करें कि उनका क्या प्रभाव पड़ सकता है।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

प्रश्न 7.
अपने अध्यापक की सहायता से ऊपर लिखित विवादों के पीछे क्या कारण थे समझें और उसके समाधान के रास्ते क्या हैं ? चर्चा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

अभ्यास

प्रश्न 1.
रिक्त स्थानों को भरें

  1. सरकार राज्य का ………………… रूप है।
  2. राज्य अपना कार्य ………….. के माध्यम से करती है।
  3. सरकार के ……………….. अंग हैं।
  4. कानून …………….. बनाती है।
  5. राजतंत्र में शक्ति …………….. के हाथ में होता है।

उत्तर-

  1. मूर्त
  2. राज्य सरकार
  3. तीन
  4. विधायिका
  5. राजा।

प्रश्न 2.
सरकार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित निर्णय लेने एवं काम करने के लिए सरकार की जरूरत होती है। ये निर्णय कई विषयों से संबंधित हो सकते हैंसड़क और स्कूल कहाँ बनाये जाएँ, अधिक से अधिक बच्चे स्कूल कैसे पहुँचे, बहुत ज्यादा महँगाई हो जाने पर किसी चीज के दाम कैसे घटाए जाएँ अथवा बिजली की आपूर्ति को कैसे बढ़ाई जाए. आदि ।

सरकार ही पूरी व्यवस्था को बनाये रखती है। उसकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करती है कि देश के सभी नागरिकों को पर्याप्त भोजन, शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ मिले । जब प्राकृतिक विपदा घेरती है, जैसे सूखा, बाढ़ या भूकंप तो मुख्य रूप से सरकार ही पीडित लोगों की सहायता करती है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

प्रश्न 3.
लोकतांत्रिक सरकार क्या है?
उत्तर-
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र की प्रमुख बात यह है कि इसमें जनता अपना प्रतिनिधि मतदान के द्वारा चुनती है। वही प्रतिनिधि शासन भी चलात हैं। लोकतंत्र की महत्वपूर्ण बात यह है कि लोग खुद सरकार में अपने प्रतिनिधि द्वारा शामिल होकर शासन करते हैं लोकतांत्रिक सरकार कहलाते हैं।

प्रश्न 4.
लोकतांत्रिक सरकार में कौन-कौन तत्व हैं? व्याख्या करें।
उत्तर-
लोकतांत्रिक सरकार तीन अधारभूत सिद्धान्तों पर काम करती है।

  1. लोगों की भागीदारी
  2. समस्याओं का समाधान
  3. समानता एवं न्याय इसके प्रमुख सिद्धान्त हैं।

1. भागीदारी लोकतांत्रिक सरकार चुनने में जनता की सबसे अहम, भागीदारी होती है। जनता अपने मताधिकार का प्रयोग कर अपने लिए प्रतिनिधि चुनती है और प्रतिनिधि के जरिए अपनी हर समस्याओं को सरकार के सामने रखती है ताकि उनकी समस्याओं का समाधान हो सके । अगर जनता सरकार के कार्यों से संतुष्ट नहीं होती है तो, धरने, जुलुस, हड़ताल, सत्याग्रह आदि के द्वारा अपनी बात सरकार तक पहुँचाती है और शासन में भागीदार बनती है। लोकतांत्रिक सरकार में सरकार बनाने से लेकर सरकार के कार्यों की समीक्षा में भी भागीदारी रहती है।

2. समस्याओं का समाधान हमारा देश लोकतांत्रिक है। यहाँ विभिन्न प्रकार के विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। जहाँ लोगों के बीच मतभिन्नता होती है लोग अपने-अपने कार्यों की स्वार्थसिद्धि में रहते है। दूसरे के हितों का ख्याल नहीं रखते है, आपसी समझ का उपयोग नहीं करते हैं लोगों के बीच सामंजस्य का अभाव होता है।

इन सभी कारणों से ही विवाद उत्पन्न होते हैं। कुछ लोग इन विवादों को अपने ढंग से सुलझाना चाहते हैं जिससे कभी-कभी विवादों का समाधान होने की जगह ये और बढ़ जाते हैं तथा हिंसात्मक रूप ले लेता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह विवादों का सामाधान करे। विवाद कई स्तरों पर होते हैं. ग्रामीण या राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय । जैसे-कृष्णा-कावेरी विवाद, दो राज्य तमिलनाडु कर्नाटक के बीच, कोशी नदी विवाद, दो देशों नेपाल-भारत के बीच, पाकिस्तान-भारत के बीच । सरकार प्रायः विवादों का समाधान दो पक्षीय वार्ता के आधार पर करती है।

3. समानता और न्याय-समानता के बिना न्याय संभव नहीं हो सकता है। लोकतात्रिक सरकार समानता एवं न्याय के लिए कटिबद्ध होती है। सरकार द्वारा कानून के माध्यम से महिलाओं को विशेष दर्जा देकर समान अवसर प्रदान किया गया है, जैसे-पैतृक धन-सम्पत्ति में बाँटना । लडकों को समाज में अधिक महत्व दिया जाता है, लेकिन अब लड़कियों को भी समान अधिकार दिये गये हैं। सरकार ने छुआ-छूत पर भी रोक लगायी है जिससे अभिवंचित वर्ग के लोगों को भी समाज में समान अवसर मिले।

सरकार ने लड़के-लड़कियों के बीच होने वाले भेद-भाव पर विशेष ध्यान देते हुए लड़कियों की शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षा निशुल्क कर दी है। ताकि उन्हें भी समाज में समान अवसर मिल सके और वे भी आगे बढ़े। लोकतांत्रिक सरकार लोक कल्याण की भावना पर आधारित होती है जो स्वतंत्रता, समानता न्याय एवं बंधुत्व की अवधारणाओं को प्रश्रय देती है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

प्रश्न 5.
नचे दिये गये प्रश्न आपके विद्यालय से संबंधित हैं। इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास शिक्षक अथवा अभिभावक के साथ करें।

प्रश्न (i)
आपके विद्यालय भवन बनाने के लिए राशि कहाँ से प्राप्त हई?
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न (ii)
मध्याह्न भोजन की व्यवस्था कौन करता है?
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न (iii)
आपके विद्यालय तथा गाँव या मोहल्ले के बीच की सड़क किसने बनवायी है ?
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

प्रश्न (iv)
आपको मिलने वाले पुस्तकों की व्यवस्था कौन करता है ?
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science हमारी सरकार Notes

पाठ का सारांश

हम अक्सर सरकार का शब्द सुनते हैं। सरकार क्या है ? लोकतांत्रिक सरकार की विशेषतायें।

विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित निर्णय लेने का काम करने के लिए सरकार की आवश्यकता होती है। सरकार कई समाजिक, राजनीतिक आर्थिक तथा महत्वपूर्ण कार्यों पर भी ध्यान देती है। जैसे-डाक, तार, फोन, रेल सेवाएँ आदि । देश की सीमाओं की सुरक्षा करना और दूसरे देशों से शांतिपूर्ण संबंध बनाए रखने का भी काम सरकार ही करती है। उसकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि सभी नागरिकों को पर्याप्त भोजन, शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएँ मिले।

जब प्राकृतिक विपदा घेरती है, जैसे सूखा, बाढ़ या भूकंप तो मुख्य रूप से सरकार ही पीड़ित लोगों की सहायता करती है।

सरकार हमारे देश में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना भी लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। निर्णय लेना, कानून बनाना, उनको लागू करना, उनकी समीक्षा करना, उनमें परिवर्तन करना इत्यादि सभी सरकार के द्वारा संचालित होते हैं। सरकार के नियमों को भंग करने वालों को सरकार दंडित भी करती है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

सरकार की आवश्यकता हमारे जीवन को सहज, सखद एवं नियमित बनाने के लिए होती है।

बिहार राज्य में सरकार पूरे बिहार के लोगों के लिए कार्य करती है। उसी प्रकार झारखण्ड, उत्तरप्रदेश, अन्य राज्यों की सरकार अपने प्रदेश के निवासियों के लिए कार्य करती है।

मतदान के द्वारा सरकार की नियुक्ति की जाती है। लोग अपने मताधिकार का उपयोग कर मतदान देकर लोग सरकार का निर्माण करती है। ऐसी सरकार को लोकतांत्रिक सरकार कहते हैं। इससे अलग भी एक और सरकार होती है, जिसे राजतंत्र कहते हैं। राजतंत्र में सत्ता की सारी शक्ति राजा में निहित · होतो है। राजतंत्र में राजा के द्वारा शासन चलता है।

लोकतंत्र में जनता अपनी इच्छा से मताधिकार का प्रयोग कर सरकार को चुनती है और अपने किये गये कार्यों की सफाई भी देनी होती है। जबकि राजतंत्र में राजा अपने वंश परम्परा से आते हैं। वे स्वयं निर्णय लेते हैं, जिनके लिए उन्हें कोई सफाई नहीं देनी पड़ती है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं । लोकतंत्र की प्रमुख बात यह है कि इसमें जनता अपना प्रतिनिधि मतदान द्वारा चुनती है। वही प्रतिनिधि शासन भी चलाते हैं। लोकतंत्र की महत्वपूर्ण बात है । लोकतंत्र में सभी वयस्क लोगों को चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार है।

लोकतांत्रिक सरकार-सरकार जनता के लिए कुछ कायदे बनाती है जो संसद में बहुमत से पारित होने के पश्चात कानून बन जाते हैं। लोकतांत्रिक सरकार जनता के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती है। हर नागरिक जो 18 वर्ष से ज्यादा का है, मतदान करने का अधिकार प्राप्त है।

लोकतांत्रिक सरकार – सरकार के मुख्य तत्वों में भागीदारी समस्याओं का समाधान, संमानता एवं न्याय प्रमुख होते हैं। भागीदारी मतदान से जनता शासन चलाने में भागीदार बन सकती है। अगर वह जनता के भले के लिए कार्य नहीं करती तो जनता धरने, जुलूस, हड़ताल, हस्ताक्षर अभियान, सत्याग्रह आदि के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुँचा सकती है। जनता सरकार बनाने से लेकर उसके कार्यों की समीक्षा तक में भागीदारी होती है।

समानता – समानता का सवाल तभी उठता है। जब कही भेदभाव या असमानता होती है। असमानता भी दो प्रकार की होती है

प्राकृतिक असमानता जा प्रकृति की देन होती है तथा जिसमें बदलाव संभव नहीं होता है। दूसरी असमानता समाज द्वारा उत्पन्न की हुई होती है जैसे छुआ-छूत, लिंग-भेद, आर्थिक असमानता, अमीर-गरीब आदि । समानता तभी आ सकती है जब राज्य द्वारा सभी व्यक्तियों को विकास के लिए समान अवसर मिले।

न्याय – समानता के अधिकार के बगैर न्याय संभव नहीं है। छुआछत पर रोक लगाकर सरकार ने निम्न वर्ग के लोगों को समान अवसर प्रदान करने का प्रयास किया। लड़कियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी विद्यालयों एवं कॉलेजों में फीस माफ कर दी गई है। पोशाक योजना आरंभ की गई है। महादलित बच्चे-बच्चियों के लिए छात्रावृति योजना का आरंभ किया गया है। सरकार द्वारा कानून के माध्यम से महिलाओं को विशेष दर्जा देकर समान अवसर प्रदान किया गया है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 5 हमारी सरकार

जैसे – पैतृक धन-सम्पत्ति में समान बँटवारा । सरकार नियम, कायदे बनाती है। कोई व्यक्ति यदि किसी दूसरे व्यक्ति की सम्पत्ति को क्षति या नुकसान पहुंचाता है, उसके चीजों की चोरी करता है. तो सरकार द्वारा बनाए गए कानून के तहत उसे न्यायलय की प्रक्रिया द्वारा दण्डित किया जा सकता है। सरकार को भी अपने बनाये नियमों का पालन करना होता है।

लोकतांत्रिक सरकार लोक कल्याण की भावना पर अधारित होती है जो स्वतंत्रता, समानता, न्याय एवं बंधुत्व की अवधारणाओं को प्रश्रय देती है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 1 Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

Bihar Board Class 6 Social Science लेन-देन का बदलता स्वरूप Text Book Questions and Answers

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आपने या आपके परिवार के किसी सदस्य ने वस्तु देकर किसी वस्तु को खरीदा है ? यदि हाँ तो वर्णन करें।
उत्तर-
हाँ हमारे परिवार में दादाजी ने वस्तु देकर वस्तु को खरीदा है। एक बार दादाजी ने एक गरीब किसान से अनाज लेकर उसके बदले में उसे खाद, बीज और कीटनाशक दवाईया दी थी। इस तरह वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुओं की अदला-बदली करते थे।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 2.
यदि आपको बाजार से कुछ बर्तन और चादर खरीदना हो तो आप इसे पैसे से खरीदना चाहेंगे या वस्तु के माध्यम से और क्यों?
उत्तर-
यदि हमको बाजार से कुछ बर्तन और चादर खरीदना होगा तो मैं इस पैसे से खरीदना चाहूँगी । क्योंकि रुपयों के चलन शुरू होने से लेन-देन, वस्तुओं की खरीद-बिक्री तथा व्यापार में काफी सहूलियत होती है और इसी सहूलियत के लिए मैं वस्तुओं की खरीद रुपयों के माध्यम से करना पसंद करूँगा।

प्रश्न 3.
गाँवों/शहरों में वस्तु-विनिमय प्रणाली का और कौन-कौन-सा उदाहरण दिखता है?
उत्तर-

  1. लहार को चमड़े की किसी वस्तु या चप्पल की आवश्यकता हो तो वह चर्मकार उसे उस वस्तु को खरीदता है। इसके बदले वह उसे लोहे की निर्मित कोई वस्तु या कहीं से प्राप्त अनाज उसे देता है।
  2. यदि लहार खेती कार्य के लिए कदाल या हल बनाता है। तो किसान उसे अनाज देकर भी उससे खरीद लेता है। अनाज की मात्रा या वस्तुओं की संख्या निर्धारण आपसी बातचीत से तय होते है। उसे ही वस्तु विनियम प्रणाली कहा जाता है।

प्रश्न 4.
क्या इसके अतिरिक्त भी कोई अन्य परम्परा जिसके माध्यम से लेन-देन देखने को मिलता है? जैसे शादी विवाह के समय?
उत्तर-
दहेज प्रथा एक ऐसी परम्परा है जिसके माध्यम से लेन-देन देखने को मिलता है।

प्रश्न 5.
क्या आप आपस में लेन-देन कर सकते हैं?
उत्तर-
ऊपर के चित्र से स्पष्ट है। यदि किसी के पास गेहूँ है और उसके बदले वह आम चाहता है तो उसे ऐसे व्यक्ति की खोज करनी होगी जिसके पास आम हो और वह उसके बदले गेहूँ चाहता है। लेकिन सामान्यता इस प्रकार के दोहरे संयोग का अभाव होता है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 6.
दोनों के बीच मूल्य कैसे तय होगा?
उत्तर-
दोनों के बीच मूल्य मुद्रा के द्वारा तय होगा। मुद्रा के चलने से वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाईयों को दूर करना शुरू कर दिया तथा लेन-देन मुद्रा के माध्यम से होने लगा। इससे व्यापार में भी सुविधा होने लगी।

प्रश्न 7.
उपरोक्त चित्रों तथा विवरण से आप वस्तु विनिमय की कठिनाईयों को अपने शब्दों में समझाएँ।
उत्तर-
मान लें कि अविनाश का मकान सहरसा में है जिसे बेचकर वह ‘ पटना जाकर बसना चाहता है । वस्तु विनिमय प्रणाली में मकान का जो मूल्य वस्तु (गाय, अनाज आदि) के रूप में प्राप्त होगा उसे पटना ले जाना काफी कठिन होगा। अर्थात इस प्रणाली में मूल्य के हस्तांतरण का अभाव होता है जिससे वस्तु विनिमय प्रणाली में अनेक प्रकार की कठिनाईयाँ आती थी। उन कठिनाईयों के कारण व्यापार में भी दिक्कतें आने लगी थीं।

प्रश्न 8.
लेन-देन के माध्यम के रूप में पैसा सभी द्वारा स्वीकार किया जाता है। पैसे द्वारा किसी भी वस्तु का मूल्य आसानी से तय किया जा सकता है। इसका संग्रह, संचय या बचत करना सविधाजनक है। इसे एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना आसान होता है। समझाएँ।
उत्तर-
जब किसी वस्तु की खरीद-बिक्री मुद्रा अथवा रुपये-पैसे के माध्यम से किया जाता है तो मुद्रा विनिमय प्रणाली कहा जाता है। मुद्रा के चलन से वस्तु विनिमय प्रणाली में आ रही कठिनाईयों को दूर कर दिया तथा लेन-देन मुद्रा के माध्यम से व्यापार में भी काफी सुविधा होने लगी है और उसे इस स्थान से उस स्थान ले जाना और लाना भी काफी सहूलियत होने लगी है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर वस्तुओं का व्यापार भी बढ़ने लगा।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 9.
रचित और दुकानदार को क्या सुविधा प्राप्त हुई?
उत्तर-
रचित अपने मुहल्ले की दुकान पर कॉपी, किताब, पेंसिल एवं रबर खरीदने के लिए जाता है। उसके सभी मूल्यों को जोड़कर 50 रुपये होता है। रचित दुकानदार को 50 रुपये का नोट देता है । यहाँ रचित मुद्रा देकर वस्तुओं को खरीदता है। दुकानदार मुद्रा लेकर वस्तुओं को बेचता है। दुकानदार को बिक्री से जो रुपये प्राप्त हुए उसका प्रयोग वह आगे दुकान में बिक्री के लिए सामान खरीदने में करता है। आमदनी के कुछ रुपयों से वह अपनी तथा अपने परिवार की जरूरत की वस्तुओं को खरीदता है तथा कुछ रुपये वह भविष्य के लिए बचाकर रखता है।

प्रश्न 10.
यहाँ मुद्रा विनिमय का कौन-सा गुण दिखाई दिया जो वस्तु विनिमय में नहीं है ?
उत्तर-
मुद्रा विनिमय करने की क्रिया से बचत करने की क्रिया भी सम्पन्न हुई। जब मौद्रिक विनिमय प्रणाली का प्रचलन शुरू हो गया तब आमदनी के रुपयों का संग्रह आसान हो गया। जो बाद में मार रुपयों को सरक्षित रखने के लिए बैंक की अवधारणा शुरू हो गई। ज. पस्तु विनिमय में नहीं है।

प्रश्न 11.
चेक द्वारा लेन-देन कैसे किया जाता है? परिवार एवं शिक्षक के साथ चर्चा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 12.
एटीएम मशीन के आने से क्या सुविधा मिली ? इसके प्रयोग में क्या सावधानी बरतनी चाहिए? शिक्षक के साथ चर्चा करें।
उत्तर-
ए टी एम-सह-डेबिट कार्ड जारी होता है। इसे प्लास्टिक मुद्रा भी कहा जाता है । इसके द्वारा कोई बिना पास में रुपया रखे बैंक में जमा रुपये के आधार पर किसी वस्तु को खरीद सकता है। लेकिन आपको ए टी एम कार्ड को संभाल कर रखना चाहिए और पासवर्ड का अंक किसी को नहीं बताना चाहिए।

प्रश्न 13.
क्या चेक से लेन-देन करने में पत्र मद्रा की आवश्यकता होती है?
उत्तर-
नहीं चेक से लेन-देन करने में पत्र मद्रा की आवश्यकता नहीं होती है।

अभ्यास

प्रश्न 1.
बिना पैसे के लेन-देन में ‘भाव’ कैसे तय होता है?
उत्तर-
अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की वे वस्तुओं की अदला-बदली के द्वारा करते हैं। अनाज की मात्रा या वस्तुओं की संख्या का निर्धारण परम्परा या आपसी बातचीत से तय होते हैं। इस प्रणाली को वस्तु विनिमय प्रणाली कहा जाता है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 2.
पैसे के माध्यम से लेन-देन में किस प्रकार की सहूलियत होती है?
उत्तर-
पैसे के माध्यम से लेन-देन वस्तुओं की खरीद-बिक्री तथा व्यापार में काफी सहूलियत होने लगी और इसी सहलियत के लिए लोग मुद्रा माध्यम से लेन-देन करने लगे। जिसके बदले में जरूरत की सभी चीजें वह असानी से खरीद सकता है और वह अपनी आमदनी को बचाकर बैंक में भी जमा कर सकता है। इससे व्यापार करने में काफी आसान हो गया। मुद्रा के चलन से व्यापार में सुविधा होने लगी।

प्रश्न 3.
नीचे दी गयी तालिका देखकर समझाएँ कि किसी भी दो व्यक्तियों के बीच सौदा क्यों नहीं हो पा रहा है?
उत्तर-
Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप 1

राजन गुड़ खरीदना चाहता है और बकरी बेचता है।
रंजीत बकरी खरीदना चाहता है और चावल बेचना चाहता है।
रबीन चावल खरीदना चाहता है और गड बेचना चाहता है।
दो व्यक्तियों के बीच अलग-अलग सामग्री होने के कारण दोनों के बीच में सौदा नहीं हो पा रहा है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 4.
रचित तथा दुकानदार को लेन-देन में क्या सहूलियत हुई ?
उत्तर-
रचित दुकानदार से मुद्रा के द्वारा वस्तु को खरीदता है । इस प्रकार दुकानदार को बिक्री से जो रुपये प्राप्त हाः उसका प्रयोग वह दुकान की बिक्री के लिए सामान खरीदता है। आमदनी के कुछ रुपयों से वह अपनी तथा अपने परिवार के लिए जरूरत की वस्तुओं को भी खरीदता है और कुछ पैसे भविष्य के लिए बचाकर रखता है। इससे दोनों को ही सामान खरीदने और बेचने में आसानी होती है। मुद्रा के लेन-देन की क्रिया भुगतान करने की क्रिया तथा बचत करने की क्रिया भी आसान हो गई। इसमें वस्तु के बदले कितनी कीमत चुकायी जाए, यह भी निर्धारित किया गया।

प्रश्न 5.
मुद्रा का चलन कैसे शुरू हुआ?
उत्तर-
प्राचीन काल से आज तक मुद्रा का स्वरूप निरंतर बदलता ही रहा. है। वस्तु-मुद्रा के बाद सर्वप्रथम् धातु मुद्रा का चलन शुरू हुआ। इसमें लोहा, तांबा, पीतल, सोना, चाँदी आदि का प्रयोग किया जाता था। लेकिन धातु मुद्रा के बाद सिक्कों का चलन शुरू हुआ। भारत में सबसे पहले चांदी के सिक्के बने । दिल्ली की गद्दी पर बैठे शेरशाह सूरी ने चांदी के सिक्के को चलाया जिसे ‘रुपया’ नाम दिया । रुपया तथा ताँबे का बना दाम चलता था परंतु आज जो सिक्के चलते हैं वे एल्यूमीनियम तथा निकिल के बने होते हैं। इन सिक्कों की लागत इनके मूल्य से कम होती है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 6.
पत्र मुद्रा कैसे शुरू हुई होगी?
उत्तर-
सिक्कों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में होने वाली परेशानी एवं सिक्कों को घिस-घिस कर अपना फायदा बनाने की आदत को देखते हुए कागज के नोट का चलन शुरू हुआ । इसे पत्र या कागजी मुद्रा कहा जाता है। भारत में कागज के नोट को छपवाने तथा जारी करने का अधिकार सिर्फ भारतीय रिजर्व बैंक को ही है।

प्रश्न 7.
आप अपनी कक्षा के दोस्तों के साथ वस्तुओं की अदला-बदली द्वारा लेन-देन या अदान-प्रदान करते हैं। इनकी सूची बनाएँ। क्या यह वस्तु विनिमय प्रणाली का उदाहरण है ?
उत्तर-
छा शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

प्रश्न 8.
इस पाठ में वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाईयों से सम्बंधित कुछ चित्र दिये गये हैं। इन कठिनाईयों को दर्शाते हुए कुछ अन्य चित्र बनाएँ।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science लेन-देन का बदलता स्वरूप Notes

पाठ का सारांश

जब किसी वस्तु की खरीद बिक्री दूसरी वस्तु के माध्यम से की जाती है तो उसे वस्तु विनिमय प्रणाली कहा जाता है।

प्राचीन काल से आज तक मुद्रा का स्वरूप निरंतर बदलता रहा है। वस्तु-मुद्रा के बाद सर्वप्रथम धातु मुद्रा का चलन शुरू हुआ। इसमें लोहा, तांबा,पीतल, सोना, चाँदी आदि का प्रयोग किया जाता था। यह भारी होता था लेन-देन के बीच हमेशा संदेह बना रहता था क्योंकि इनका वजन और शुद्धता जाँचना कठिन था।

इसके बाद सिक्कों का चलन शुरू हुआ। भारत में सबसे पहले चाँदी के सिक्के बने।

दिल्ली की गद्दी पर बैठे शेरशाह सूरी ने ऐसा ही एक चाँदी का सिक्का चलाया जिसे उसने ‘रुपया’ नाम दिया सिक्के के आने से हर बार वजन करना और शुद्धता जाँचने की जरूरत नहीं रही।

उस समय ताँबे का बना सिक्के का चलन या आज जो सिक्के चलते हैं वे एल्यूमीनियम तथा निकल के बने होते हैं। इन सिक्कों की लागत इनके मूल्य से कम होती है। पत्र-मुद्रा या कागजी मुद्रा-सिक्कों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में होने वाली परेशानी को देखते हुए कागज के नोट का चलन शुरू हुआ। इसे पत्र या कागजी मुद्रा कहते हैं।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 4 लेन-देन का बदलता स्वरूप

भारत में कागज के नोट छपवाने तथा जारी करने का अधिकार सिर्फ भारतीय रिजर्व बैंक को है। हमारे देश में दो रुपये, पाँच रुपये, दस रुपये, बीस रुपये, पचास रुपये, सौ रुपये, पाँच सौ रुपये तथा एक हजार रुपये का नोट भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किया जाता है। बाजार एवं व्यापार के फैलने के साथ मुद्रा के स्वरूप में बदलाव आते गया। मुद्रा के विकास के साथ-साथ बाजार का विकास हुआ। एक स्थान से दूसरे स्थान पर वस्तुओं का व्यापार बढ़ने लगा। इस प्रकार खरीद-बिक्री का रूप भी बदला।

जब मौद्रिक विनिमय प्रणाली का प्रचलन शुरू हो गया तब आमदनी या अर्जित रुपयों का संग्रह आसान हो गया।

बाद में संग्रहित रुपयों को सुरक्षित रखने के लिए बैंक की अवधारणा शुरू हुई।

इसके अतिरिक्त वर्तमान समय में लेन-देन अथवा खरीद-बिक्री के लिए बैंक अपने ग्राहकों को ए टी एम–सह-डेबिट कार्ड जारी करने लगा। इसे प्लास्टिक मुद्रा भी कहा जाता है। इसके द्वारा कोई बिना पास में रुपया रखे, बैंक में जमा रुपये के आधार पर किसी वस्तु को खरीद सकता है । इस प्रकार शुरू से अंत तक लेन-देन का यह स्वरूप बदलता रहा।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 1 Chapter 1 विविधता की समझ Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

Bihar Board Class 6 Social Science विविधता की समझ Text Book Questions and Answers

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आपने किसी के साथ भेदभाव होते हुए देखा है? उदाहरण के साथ बताइए।
उत्तर-
हम सबसे ज्यादा भेदभाव अपने समाज में, अपने आस-पास ही देखते हैं। हमारे समाज में जाति, धर्म, अमीर-गरीब, रंग, लिंग इत्यादि के आधार पर भेदभाव होता है। आज सबसे ज्यादा भेदभाव लिंग के आधार पर होता है। भ्रूण जाँच के द्वारा लिंग पता करवा लिया जाता है तथा कन्या होने पर उसकी हत्या करवा दी जाती है। हमारे आस-पास, अगर किसी परिवार में पुत्र तथा पुत्री दोनों हैं तो परिवार की मानसिकता होती है कि वह पत्र को हर सुविधा उपलब्ध करवाये ।

लेकिन पुत्री को वह घर की चारदीवारी में बंद करके रखना पसंद करता है। पुत्री की शिक्षा उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती है जितना पुत्र की। पुत्री के जन्म को ही एक बोझ समझा जाता है। पुत्री को वह प्यार-दुलार नहीं मिलता जिसकी वह हकदार होती है। उदाहरण के तौर ए रामजीवन के ही परिवार में पुत्री के साथ कितना भेद-भाव किया गया। उन्हें वह हक नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। फिर भी पुत्र लाड़-दुलार की वजह से भविष्य में कुछ नहीं कर सका जबकि पुत्रियों ने पिता का सर ऊँचा कर दिया।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

प्रश्न 2.
अगर किसी के साथ भेदभाव होता है तो क्या आपने इस स्थिति में उसकी मदद करने का प्रयास किया ?
उत्तर-
हमारे आस-पास वैसे तो कई प्रकार के भेदभाव होते हैं। मेरे बगल में एक लड़की की शादी हो रही थी जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम थी अर्थात् वह नाबालिग थी। कानूनन यह अत्याचार था। मैंने अपनी सभी सहेलियों के साथ मिलकर पुलिस को इसकी जानकारी दे दी जिससे उस नाबालिग की जिंदगी बर्बाद होने से बच गई।

प्रश्न 3.
आपकी समझ से इस समाज में किस प्रकार के भेदभाव होते हैं?
उत्तर-
हमारे समाज में विभिन्न प्रकार के भेदभाव होते हैं। लैंगिक भेदभाव जिसमें लड़के तथा लड़कियों के बीच भेद-भाव किया जाता है। नि:शक्तों एवं सामान्य सवर्णों के बीच भेदभाव जिसमें सिर्फ ऊँची जाति के लोगों को ही मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत होती है तथा नीची जाति के लोगों को गाँव में भी अंदर आने की इजाजत नहीं होती, अमीर तथा गरीब के बीच का भेदभाव तो हर जगह नजर आता है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

प्रश्न 4.
समाज में भेदभाव क्यों होता है?
उत्तर-
समाज में भेदभाव होते हैं। अमीर-गरीब, पढ़े-लिखे अनपढ़, सवर्णों-दलितों, महिलाएं पुरुषों में देखा जाता है। ऐसे लोग अपनी अज्ञानता एवं संकुचित मानसिकता के कारण समाज में हो रहे परिवर्तन को नजरअंदाज करते हैं और पुरानी रूढ़िवादी परम्पराओं को अपनाते हैं जिससे वह इन सभी चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें नयी क्रियाशीलता और बराबरी का व्यवहार को न अपनाने की वजह से समाज में 3 कतम भेदभाव देखे जाते हैं।

अभ्यास

प्रश्न 1.
किस आधार पर आप कह सकते हैं कि रामजीवन अपने बेटा एवं बेटियों के बीच भेदभाव करता था।
उत्तर-
रामजीवन अपने बेटियों की अपेक्षा बेटे के रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, खेलकूद आदि पर विशेष ध्यान देता था जबकि बेटियों से घर का सारा काम (जैसे-भोजन, चौका, बर्तन, झाडू-पोछा आदि काम) करवाया जाता था। बेटियाँ इन कामों के अलावा पढ़ाई पर खुद ध्यान देती थी। वही बेटे के लिए स्कूली शिक्षा अच्छे विद्यालय में होती है और साथ में ही घर पर शिक्षक आकर पढ़ाते थे। इस तरह राम जीवन बेटियों की अपेक्षा बेटा को ज्यादा महत्व देता था।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

प्रश्न 2.
व्यक्तियों के बीच विभिन्नताओं में कौन-कौन से आधार
उत्तर-
व्यक्तियों के बीच हमारे समाज में विभिन्न प्रकार के भेद-भाव होते हैं। लैंगिक भेदभाव जिसमें लड़के तथा लड़कियों के बीच की विभिन्नताएँ हैं। नि:शक्तों एवं सामान्य सवर्णों के बीच भेदभाव, अमार-गराव, पढ़े-लिखे, अनपढ़ ये सभी समाज की विभिन्नता है।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में कितनी भाषाओं का उल्लेख किया गया है?
उत्तर-
भारतीय संविधान आठवीं अनुसूची में कंवल 22 भाषाएँ सूचीबद्ध की गयी हैं।

प्रश्न 4.
आपके विचार में बिहार की समृद्धि-विविधता एवं विरासत आपके जीवन को बेहतर कैसे बनाती है?
उत्तर-
बिहार भी विविधताओं से भरा पड़ा है। हम अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं। अनेक प्रकार का खान-पान खाते हैं। अलग-अलग त्योहार मनाते हैं और खान-पान के साथ-साथ भिन्न-भिन्न धर्मों का पालन करते हैं। बिहार के लोग जब भारत के अन्य राज्यों जैसे – दिल्ली, मुम्बई, पंजाब, हरियाणा में काम अथवा व्यवसाय करने जाते हैं। उन्ह. कई हद तक अपनाने की कोशिश भी करते हैं। इन सभी चीजों से एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। उन्हें अपने जीवन में लाने का प्रयास करते हैं। यह बिहार की समृद्धि, विविधता एवं विरासत-हमारे जीवन को काफी हद तक बेहतर बनाती है।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

प्रश्न 5.
आपके अनुसार जिस व्यक्ति के साथ भेदभाव होता है, उसे कैसा महसूस होता है?
उत्तर-
हमारे अनुसार जिस व्यक्ति के साथ भेदभाव किया जाता है। वह व्यक्ति अपने को संकुचित रखता है जिससे की उसकी अवहेलना कम हो और वह मानसिक रूप से परेशान होता है। हमें किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए जिससे कि उसे परेशानियों का सामना करना पड़े। आज समाज में लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार हो जिससे नये समाज का विकास हो सभी प्रकार की विभिन्नताओं को समाहित करते हुए राष्ट्र की एकता को कायम रखना चाहिए।

प्रश्न 6.
दो व्यक्तियों के चित्र एकत्र करें जिन्होंने भेद-भाव एवं असमानता के विरुद्ध कार्य किया है।
उत्तर-

  1. महात्मा गाँधी
  2. डॉ. अम्बेडकर छात्र शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science Civics Solutions Chapter 1 विविधता की समझ

प्रश्न 7.
पाँच लड़कियों के नाम एकत्र करें जिन्होंने अपने देश का नाम रोशन किया है।
उत्तर-

  1. कल्पना चावला
  2. किरण वेदी
  3. सरोजनी नायडू
  4. मदर टेरेसा।
  5. इंदिरा गाँधी।।

Bihar Board Class 6 Social Science विविधता की समझ Notes

पाठ का सारांश

  • उत्तर बिहार की नदियों में घाघरा, गंडक, कोशी तथा बागमती प्रमुख है।
  • शुष्क पतझड़ वन उत्तर-पूर्व में पाए जाते हैं।
  • उत्तरी बिहार में मिट्टी प्रायः बलुई होती है।
  • बिहार का यह हिस्सा अक्सर बाढ़ के चपेट में आ जाया करता है।
  • मछली भात इस क्षेत्र का लोकप्रिय भोजन है।
  • भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है, साथ ही अपना बिहार भी विविधता से भरा पड़ा है।
  • सामान्यतः विविधता का तात्पर्य असमानता है ।
  • हमारे यहाँ प्रजातियों, धों, भाषाओं, जातियों और संस्कृतियों की विविधता है।
  • भारत के विभिन्न राज्यों के निवासियों का खानपान, वेशभूषा, रीति-रिवाज, त्योहार एक-दूसरे से अलग हैं, यही भिन्नता विविधता है।
  • दक्षिणी बिहार एक विशाल समतल मैदान के रूप में गंगा नदी के दक्षिणी तट पर अवस्थित है।
  • यहां की मिट्टी बहुत उपजाऊ है, किन्तु मानसून के नहीं आने के बाद यह क्षेत्र कभी-कभी भयानक सुखा का सामना करता है।
  • भारत में 3000 से भी अधिक जातियां हैं।
  • भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था एक विशेष स्थान आम राय के विपरित जातीय व्यवस्था हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्कि, सिक्ख, मुस्लिम एवं ईसाई धर्म में भी पाया जाता है।
  • डॉ. अम्बेडकर ने दलित समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

Bihar Board Class 11 Sociology सामाजिक संस्थाओं को समझना Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विवाह संस्था की उत्पत्ति के महत्त्वपूर्ण कारण बताइए।
उत्तर:
विवाह संस्था की उत्पत्ति के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  • यौन संतुष्टि-यह जैविक आवश्यकता है।
  • संतानों का वैधानीकरण-यह सामाजिक आवश्यकता है।
  • आर्थिक सहयोग करना-यह आर्थिक आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
विवाह की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:

  • हैरी एम. जॉनसन के अनुसार, “विवाह एक ऐसा स्थायी संबंध है जिससे एक पुरुष और एक स्त्री समुदाय को बिना नुकसान पहुँचाए संतानोत्पत्ति की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होता है।”
  • आर. एच. लॉबी के अनुसार, “विवाह स्पष्टतः स्वीकृत उस संबंध संगठनों को प्रकट कता है जो यौन संबंधी संतुष्टि के उपरांत भी स्थिर रहता है तथा पारिवारिक जीवन की आधारशिला बनाता है।”

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 3.
विवाह संस्था के कोई दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर:

  • विवाह संस्था का मूल उद्देश्य यौन-संबंधों को सामाजिक प्रतिमानों के अनुरूप नियमित करना है। विवाह के माध्यम से परिवार अस्तित्व में आता है।
  • विवाह दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों को यौन संबंध रखने की स्वीकृति देता है तथा। उनसे प्राप्त संतान को सामाजिक वैधता प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
ज्ञात करें कि आपके समाज में विवाह के कौन-कौन से नियमों का पालन किया जाता है? कक्षा में अन्य विद्यार्थियों द्वारा किए गए प्रेक्षणों से अपने प्रेक्षणों की तुलना करें तथा चर्चा करें।
उत्तर:
हमारे समाज में विवाह के अनेक रूप हैं। इन रूपों को विवाह करने वाले साथियों ‘ की संख्या और कौन किससे विवाह कर सकता है, को नियंत्रित किए जाने वाले नियमों के आधार पर पहचाना जा सकता है। वैधानिक रूप से विवाह करने वाले साथियों की संख्या के संदर्भ में विवाह के दो रूप पाए जाते हैं-एकल विवाह तथा बहु-विवाह। एकल विवाह प्रथा एक व्यक्ति को एक समय में एक ही साथी तक सीमित रखती है। इस व्यवस्था में पुरुष केवल एक पत्नी और स्त्री केवल एक पति रख सकती है। यहाँ तक कि जहाँ बहु विवाह की अनुमति है वहाँ भी एक विवाह ही ज्यादा प्रचलित है। व्यावहारिक कार्य-विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 5.
सजातीय विवाह के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
पजातीय विवाह वैवाहिक साथी अर्थात् पति-पत्नी के चुनाव के संबंध में कुछ प्रतिबंध लगाता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति प ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11 – 53 को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ता है। हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” इस प्रकार, सजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति अपनी जाति, धर्म अथवा प्रजाति में ही विवाह कर सकता है। जाति तथा धार्मिक समुदाय भी अंत:विवाही होते हैं।

प्रश्न 6.
विजातीय विवाह के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
विजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह तथा नातेदारी से बाहर विवाह करना पड़ता है। समुदाय के द्वारा अपने सदस्यों पर कुछ विशेष व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। विजातीय विवाह के नियम सभी समुदाय में पाए जाते हैं। हिंदू विवाह में गोत्र तथा सपिण्ड विजातीय विवाह होते हैं। चीन में जिन व्यक्तियों के उपनाम एक ही होते हैं उनके बीच विवाह नहीं हो सकता।

प्रश्न 7.
गोत्र तथा सपिण्ड से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(i) गोत्र – गोत्र से तात्पर्य एक परिवार के ऐसे समूह से होता है जिनके सदस्य अपने वंश की उत्पत्ति एक काल्पनिक पूर्वज से मानते हैं। इस प्रकार हिंदू समाज में गोत्र विवाह वर्जित है।

(ii) सपिण्ड-हिंदू समाज में सपिण्ड विवाह भी वर्जित माना गया है। मिताक्षरा के अनुसार सपिंड उन व्यक्तियों को कहते हैं जिनके द्वारा किसी पूर्वज के शरीर के कणों को अपने शरीर में रखा जाता है। गौतम तथा वरिष्ठ जैसे सूत्रकारों का मत है कि पिता की साथ तथा माता की पाँच पीढ़ियों में विवाह नहीं करना चाहिए।

हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत पिता की पाँच तथा माता की तीन पीढ़ियों तथा विवाह वर्जित कर दिया गया है । इस प्रकार, इन सदस्यों के बीच भी वैवाहिक संबंध वर्जित है।

प्रश्न 8.
निकटाभिगमन निषेध का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:

  • निकटाभिगमन निषेध लगभग सभी समाजों में विजातीय विवाह का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नियम है।
  • सम्पूर्ण विश्व में माता-पुत्र, पिता-पुत्री तथा भाई-बहन के बीच विवाह संबंध निषेध होते हैं।
  • इस प्रकार, प्राथमिक नातेदारों के बीच यौन-संबंधों पर प्रतिबंध को निकटाभिगमन निषेध कहा जाता है। निकटाभिगमन निषेध के नियम का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दंडित किया जाता है।

प्रश्न 9.
निकटाभिगमन निषेध के कारण बताइए।
उत्तर:
विजातीय विवाह के नियमों को स्वतंत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाने के लिए लागू किया जाता है। किंग्सले डेविस के अनुसार, निकटाभिगमन निषेध के द्वारा वैवाहिक संबंधों तथा संवेदनाओं को केवल विवाहित जोड़ों तक ही सीमित करता है। इस प्रकार पिता-पुत्री, भाई-बहन तथा माता-पुत्र के संबंधों को वैवाहिक परिधि से बाहर रखा जाता है। अतः नातेदारी संगठन में आने वाली तमाम भ्रामक स्थितियों को समाप्त कर दिया जाता है। इस प्रकार परिवार संगठन बना रहता है।

निकटाभिगमन निषेध के निम्नलिखित वैज्ञानिक कारण हैं

  • सुजनन विज्ञान की दृष्टि से निकट नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंधों के कारण निषेधात्मक अंत:स्नातिक परिणामों की संभावना बनी रहती है।
  • निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध होने से संतान मंदबुद्धि वाली होती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 10.
विवाह जैविकीय आवश्यकता को सामाजिक वैधता प्रदान करता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यौन संबंध व्यक्ति की मूल जैविकीय आवश्यकताओं में से एक है। सामान्य जीवन के लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों की कामेच्छा सामाजिक मानदंडों के अनुरूप पूरी होती रहे। विवाह के माध्यम से मनुष्य की केवल जैविकीय आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, वरन् मनोवैज्ञानिक संतुष्टि भी होती है।

प्रश्न 11.
बच्चों के वैधानीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. सभ्य समाज में विवाह की संस्था के माध्यम से जहाँ एक तरफ सहवास को नियमित करना आवश्यक समझा जाता है
  2. वहीं दूसरी तरफ पति-पत्नी को आवश्यक समझा जाता है, वहीं दूसरी तरफ पति-पत्नी के संबंधों से उत्पन्न बच्चों को सामाजिक वैधता प्रदान करना भी आवश्यक समझा जाता है।
  3. समाज को निरंतरता प्रदान करने हेतु माता-पिता की यह वैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों की समुचित देखभाल करें।

प्रश्न 12.
आर्थिक सहयोग विवाह संस्था का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार्य है । स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. विवाह संस्था का उद्देश्य मात्र यौन संतुष्टि की जैविकीय आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं है वरन् आर्थिक सहयोग भी इसका एक मुख्य उद्देश्य है।
  2. अर्थव्यवस्था के उत्तरोत्तर विकास, श्रम विभाजन तथा व्यावसायिक भिन्नता के कारण व्यक्तियों के बीच आर्थिक सहयोग की आवश्यकता निरंतर बढ़ती चली जाती है।

प्रश्न 13.
विवाह संस्था के संदर्भ में मार्गन के उद्विकासीय सिद्धांत का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विवाह संस्था के संबंध में लेविस मार्गन का उद्विकासीय सिद्धांत प्रारंभिक जनरीतियों तथा सामाजिक प्रचलनों पर आधारित है। मार्गन का मत है कि व्यक्तियों के समूह के सबसे प्रारंभिक स्वरूप में यौन-संबंधों की प्रकृति पूर्णरूपेण नियंत्रण मुक्त थी। मार्गन का मत है कि मानव समाज का विकास निम्न अवस्था से उच्च अवस्था की ओर होता है।

मार्गन ने विवाह के उद्विकास के विभिन्न चरण बताए हैं –

  • प्रारंभिक काल्पनिक यौन साम्यवादी समाज
  • समूह विवाह
  • बहु विवाह तथा
  • एक विवाह

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 14.
परिवार की संरचना के मुख्य तत्त्व क्या हैं?
उत्तर:
परिवार की संरचना के मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं –
(i) वैवाहिक संबंध –

  • एक सामाजिक संस्था के रूप में परिवार की उत्पत्ति विपरीत लिंगियों के वैवाहिक संबंधों से प्रारम्भ होती है।
  • यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक परिवार एक जैविकीय समूह हो। कभी-कभी बच्चों को गोद भी लिया जाता है।

(ii) रक्त-संबंध – परिवार के सदस्य संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया से परस्पर जुड़े होते हैं। जिस परिवार में व्यक्ति स्वयं जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार कहा जाता है। दूसरी तरफ, जिस परिवार में उसके स्वयं के बच्चे होते हैं उसे प्रजनन का परिवार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
परिवार के दो प्रमुख सामाजिक कार्य बताइए।
उत्तर:
समाज की केंद्रीय इकाई के रूप में परिवार के दो प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नलिखित हैं –
(i) समाजीकरण – जन्म लेते बच्चा परिवार का स्वाभाविक सदस्य बन जाता है। परिवार में – ही अंत:क्रिया के माध्यम से सामाजिकता का पाठ सीखता है। समाज के स्थापित आदर्शों, प्रतिमानों तथा स्वीकृत व्यवहारों को बच्चा परिवार में ही सीखता है। इस प्रकार परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है। बर्गेस तथा लॉक के अनुसार, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली मौलिक समिति है तथा पारिवारिक परंपरा बालक को उसके प्रति प्रारंभिक व्यवहार, प्रतिमान व आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

(ii) सामाजिक नियंत्रण – परिवार एक प्राथमिक समूह है। परिवार सामाजिक नियंत्रण के स्वैच्छिक प्रतिमान विकसित करता है। व्यक्ति इन प्रतिमानों का स्वाभाविक रूप से अनुपालन करते हैं। इस प्रकार परिवार सामाजिक नियंत्रण की स्थायी संस्था है जो अनौपचारिक साधनों के द्वारा सामाजिक नियंत्रण की प्रक्रिया को जारी रखती है।

प्रश्न 16.
परिवार के दो प्रमुख आर्थिक कार्य बताइए।
उत्तर:

  • सामाजिक संरचना की एक महत्त्वपूर्ण तथा मूलभूत प्राथमिक इकाई के रूप में परिवार अनेक आर्थिक कार्य भी करता है। परिवार
  • अपने सदस्यों के लिए रोटी, कपड़ा तथा मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
  • प्राचीन काल से आज तक परिवार आर्थिक क्रियाओं का केंद्र रहा है।
  • परिवार के सदस्य अपनी विभिन्न आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार में ही करते हैं।

प्रश्न 17.
विस्तृत परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
यदि एकाकी या संयुक्त परिवार के सदस्यों के अलावा कोई नातेदार परिवार का हिस्सा बनता है तो उसे विस्तृत परिवार कहते हैं। विस्तृत परिवार में एकाकी नातेदारों के अतिरिक्त दूर के रक्त संबंधी हो सकते हैं या साथ रहने वाले नातेदार और भी अधिक दूर के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सास-ससुर का अपने दामाद के परिवार में रहना।

प्रश्न 18.
मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
बैचोपन तथा मार्गन जैसे समाजशास्त्रियों का मत है कि परिवार का प्रथम स्वरूप मातृक था। मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • मातृवंशीय परिवार में वंशावली माता के माध्यम से चलती है।
  • परिवार में मुख्य सत्ता तथा निर्णय करने का अधिकार माता के पास होती है।
  • बच्चों की देखभल पत्नी के रिश्तेदारों के घर में होती है। इस प्रकार ये परिवार मातृस्थानीय होते हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के नायर परिवार मातृस्थानीय हैं।
  • संपत्ति का उत्तराधिकार स्त्रियों के पास होता है। मेघालय में खासी जनजाति में मातृ-सत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 19.
विवाह के दो सामान्य स्वरूप कौन से हैं? एकल विवाह के संबंध में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
विवाह के दो स्वरूप हैं –

  • एकल विवाह तथा
  • बहु विवाह

एकल विवाह एक ऐसा वैवाहिक संबंध है जिसमें एक समय में एक पुरुष केवल एक ही स्त्री से विवाह कर सकता है। एकल विवाह के अन्तर्गत पति-पत्नी किसी एक की मृत्यु होने या विवाह-विच्छेद के बाद ही दुबारा विवाह कर सकते हैं। पिडिंगटन के अनुसार, “एकल विवाह, विवाह का वह स्वरूप है जिसमें कोई भी व्यक्ति एक समय में एक व्यक्ति से अधिक के साथ विवाह नहीं कर सकता है।” । हिन्दू समाज में एक विवाह को प्रमुखता प्रदान की जाती है। मैलिनोवस्की के अनुसार, “एक पत्नीत्व विवाह का एकमात्र उचित प्रकार है, रहा है तथा रहेगा।”

प्रश्न 20.
बहु-विवाह के संबंध को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहु-विवाह विवाह का वह संगठन है जिसके अंतर्गत एक पुरुष का दो या दो से अधिक स्त्रियों या एक स्त्री का दो या दो से अधिक पुरुषों अथवा सामूहिक रूप से अनेक पुरुषों के बीच वैवाहिक संबंध होते हैं। बलसारा के अनुसार, “विवाह का वह प्रकार जिसमें सदस्यों की बहुलता पायी जाती है बहु-विवाह कहा जाता है।”

बहु-विवाह के निम्नलिखित चार स्वरूप हैं –

  • बहुपति विवाह
  • बहुपत्नी विवाह
  • द्विपत्नी विवाह
  • समूह विवाह

प्रश्न 21.
बहुपति विवाह के संबंध में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहुपति विवाह के निम्नलिखि दो स्वरूप पाए जाते हैं –

  • भ्रातृत्व बहुपति विवाह तथा
  • गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह

भ्रातृत्व बहुपति विवाह के अंतर्गत स्त्री सभी भाइयों की पत्नी समझी जाती है। सभी भाई संतान के पिता होते हैं।
गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह के अंतर्गत एक स्त्री के कई पति होते हैं, लेकिन वे आपस में भाई नहीं होते हैं। गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह में पतियों में से किसी एक को धार्मिक संस्कार के जरिए बच्चे का सामाजिक पिता माना जाता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 22.
परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
परिवार की रचना ऐसे व्यक्तियों से होती है जिनमें नातेदारों के संबंध पाए जाते हैं। क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता और उनकी संतोनों के बीच पायी जाती है।” मेकावर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो यौन संबंधों पर आधारित है और जो इतना छोटा तथा स्थायी है कि उसमें बच्चों की उत्पत्ति तथा पालन-पोषण हो सके।”

प्रश्न 23.
भारतीय परिवार के विशेष संदर्भ में परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
भारतीय परिवार अपेक्षाकृत अधिक जटिल सामजिक संरचना है जिनमें आमतौर पर दो या तीन पीढ़ियाँ निवास करती हैं। इन्हें संयुक्त परिवार भी कहते हैं। डॉ. इरावती कर्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो सामान्यतः एक भवन में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के स्वामी होते हैं तथा जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं तथा जो किसी-न-किसी प्रकार एक-दूसरे के रक्त संबंधी हैं।”

प्रश्न 24.
परिवार की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. परिवार व्यक्तियों की केवल सामूहिकता नहीं है। परिवार के व्यक्ति एक-दूसरे से परस्पर जैविकीय, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से जुड़े होते हैं।
  2. परिवार एक सार्वभौम सामाजिक प्रघटना है। यह समाज की मूल इकाई है तथा इसमें सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध पाया जाता है।

प्रश्न 25.
“समाज के अस्तित्व हेतु नियंत्रण की व्यवस्था आवश्यक है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नियंत्रण तथा नियमों के अभाव में समाज में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जिसके कारण संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था ही अस्त-व्यस्त हो जाएगी। नियंत्रण के साधन प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही पाए जाते हैं। आधुनिक जटिल समाज में नियंत्रण के औपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावी होते हैं लेकिन अनौपचारिक साधनों का महत्त्व भी काफी अधिक होता है। आदिम समाज में परिवार, समुदाय तथा नातेदारी आदि संस्थाएँ सामाजिक नियंत्रण का कार्य करती हैं। आधुनिक जटिल समाजों में नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों की अपेक्षा औपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

प्रश्न 26.
सत्ता की परिभाषा दीजिए सत्ता के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर:
सत्ता की परिभाषा –

  • सी. राइट मिल्स के अनुसार, “सत्ता का तात्पर्य निर्णय लेने के अधिकार तथा दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को अपनी इच्छानुसार तथा
  • संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के विरुद्ध प्रभावित करने की क्षमता से है।
  • रॉस का मत है कि सत्ता का तात्पर्य प्रतिष्ठा से है। प्रतिष्ठित वर्ग के पास सत्ता भी होती है।

सत्ता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  • प्रतिष्ठा
  • प्रसिद्धि
  • प्रभाव
  • क्षमता
  • ज्ञान
  • प्रभुता
  • नेतृत्व
  • शक्ति

प्रश्न 27.
शक्ति तथा सत्ता में मुख्य अंतर बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने शक्ति तथा सत्ता में अंतर बताया है। वैबर के अनुसार यदि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर उसकी इच्छा के विरुद्ध अपना प्रभाव स्थापित करता है तो इस प्रभाव को शक्ति कहते हैं। दूसरी तरफ, सत्ता वह प्रभाव है जिसे उन व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार किया जाता है जिनके प्रति इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार, सत्ता एक वैधानिक शक्ति है। अतः हम सत्ता को सामाजिक रूप से प्रभाव कह सकते हैं। जब शक्ति को वैधता प्रदान कर दी जाती है तो यह सत्ता का स्वरूप धारण कर लेती है तथा व्यक्ति इसे स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार कर लेता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 28.
पारम्परिक सत्ता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पारंपरिक सत्ता को व्यक्तियों द्वारा आदतन स्वीकार किया जाता है। व्यक्तियों द्वारा किसी की शक्ति को केवल इस कारण से स्वीकार किया जाता है कि उनसे पहले के व्यक्तियों ने भी उसे स्वीकार किया था अतः सत्ता का अनुपालन एक परंपरा बन जाता है। परंपरागत सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा अतार्किक होती है।

पारंपरिक सत्ता के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  • जनजाति का मुखिया
  • मध्यकाल के राजा तथा सामंत
  • परंपरागत पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया आदि।

प्रश्न 29.
करिश्माई सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
करिश्माई सत्ता से युक्त व्यक्ति में असाधारण प्रतिभा, नेतृत्व का जादुई गुण तथा निर्णय लेने की क्षमता पायी जाती है। जनता द्वारा ऐसे व्यक्ति का सम्मान किया जाता तथा उसमें विश्वास प्रकट किया जाता है। यही कारण है कि व्यक्तियों द्वारा करिश्माई सत्ता के आदेशों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। करिश्माई सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा तार्किक होती है। अब्राहम लिंकन, महात्मा गाँधी आदि करिश्माई व्यक्तित्व से युक्त थे।

प्रश्न 30.
पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • पितृवंशीय परिवार में पत्नी विवाह के पश्चात् पति के घर में रहने जाती है।
  • पितृवंशीय परिवार में पिता परिवार का मुखिया तथा संपत्ति का सर्वोच्च स्वामी होता है।
  • परिवार की वंशावली पिता के माध्यम से चलती है।
  • पितृवंशीय परिवार पितृस्थानीय होते हैं।

प्रश्न 31.
बहुपत्नी परिवार के विषय में दो बिन्दु दीजिए।
उत्तर:

  • बहुपत्नी परिवार में एक व्यक्ति एक समय में एक से अधिक पत्नियाँ रखता है।
  • अनेक जनजातियों में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 32.
बहुपति परिवार के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहुपति परिवार में एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं। बहुपति परिवार दो प्रकार के होते हैं –
(i) भ्राता बहुपति परिवार – भ्राता बहुपति परिवार में स्त्री के सभी पति आपस में भाई होते हैं। वेस्टर मार्क के अनुसार, “जब एक लड़का किसी स्त्री से शादी कर लेता है तो वह लड़की प्रायः उस समय उसके अन्य सब भाइयों की पत्नी बन जाती है तथा उसी प्रकार बाद में पैदा होने वाला भाई भी बड़े भाईयों के अधिकारों में भागीदार माना जाता है।”
हमारे देश में भ्राता बहुपति परिवार खासी तथा टोडा जनजाति में पाये जाते हैं।

(ii) अभ्राता बहुपति परिवार – अभ्राता बहुपति परिवार में स्त्री के अनेक पति परस्पर भ्राता न होकर अनेक गोत्रों के व्यक्ति होते हैं जो एक-दूसरे से अपरिचित होते हैं। नायर जनजाति में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

प्रश्न 33.
नातेदारी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। नातेदारी के प्रकार बताइए।
उत्तर:
नातेदारी का अर्थ-नातेदारी रक्त तथा विवाह का ऐसा बंधन है जो व्यक्तियों को एक समूह से बाँधता है। इस, प्रकार नातेदारी व्यवस्था किसी परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों तथा इन सदस्यों से जुड़े दूसरे परिवारों के सदस्यों के आपसी संबंधों को संगठित और वर्गीकृत करने की केवल एक प्रणाली है। मुरडाक के अनुसार, “यह मात्र संबंधों की ऐसी रचना है जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे से जटिल आंतरिक बंधन एवं शाखाकृत बंधनों द्वारा जुड़े होते हैं।”

नातेदारी के प्रकार –

  • वैवाहिक नातेदारी-जब किसी पुरुष द्वारा किसी कन्या से विवाह किया जाता है तो उसका संबंध न केवल कन्या से होता है वरन् कन्या के परिवार के अनेक सदस्यों से भी स्थापित हो जाता है।
  • समरक्तीय नातेदारी-समरक्तीय नातेदारी का संबंध रक्त के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए माता-पिता तथा बच्चों के बीच समरक्तीय संबंध होते हैं।

प्रश्न 34.
राजनीतिक संस्थाएँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक समाज में नियंत्रण – उन्मुख नियम तथा संगठन व इन नियमों से संबंधित संगठनात्मक शक्तियाँ पायी जाती हैं, इन्हें ही राजनीतिक संस्थाएँ कहा जाता है।

प्रश्न 35.
धर्म के संबंध में ई. बी. टायलर के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए। अथवा, ‘आत्मवाद’ के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ई. बी. टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमिटिव कल्चर में धर्म की उत्पत्ति के विषय में आत्मवाद के सिद्धांत का वर्णन किया है। आत्मवाद के सिद्धांत के अनुसार धर्म की उत्पत्ति आत्मा की धारणा से हुई है। मृत्यु के तथ्यों तथा स्वप्नों की प्रघटना से आदिम लोगों के मन में विचार की उत्पत्ति हुई कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का देहांतरण होता है। निद्रा के समय इन देहारित आत्माओं द्वारा शरीर का आत्माओं से अर्संबंध स्थापित होता है। वास्तव में, स्वप्न को इसी अन्तःक्रिया की अभिव्यक्ति कहा जाता है।

प्रश्न 36.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में जे. जी. फ्रेजर के विचार बताइए।
उत्तर:
फ्रेजर ने अपनी पुस्तक गोल्डन बो में धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत का उल्लेख किया है। उसने धर्म की उत्पत्ति के बारे में एक नए सिद्धांत ‘जादू से धर्म की संक्रांति’ का प्रतिपादन किया है। फ्रेजर का विचार है कि जादू धर्म से पहले का स्तर है। फ्रेजर के अनुसार, “जादू प्रकृति पर बलपूर्वक नियंत्रण का प्रयास है।”

जादू का संबंध कार्य तथा कारण से है। कार्य तथा कारण की असफलता के कारण ही धर्म की उत्पत्ति हुई है। आदिम लोगों के द्वारा शुरू में जादू के माध्यम से शक्तियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया, लेकिन नियंत्रण में असफल हो जाने के बाद उन्हें किसी अलौकिक शक्ति की सत्ता का अहसास हुआ।

फ्रेजर मानव विचारधारा के विकास की निम्नलिखित अवस्थाएँ बताते हैं –

  • जादुई अवस्था
  • धार्मिक अवस्था तथा
  • वैज्ञानिक अवस्था

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 37.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में मैक्समूलर के सिद्धांत को संक्षेप में लिखिए। अथवा, धर्म की उत्पत्ति के विषय में प्रकृतिवाद के सिद्धांत को लिखिए।
उत्तर:
धर्म की उत्पत्ति के विषय में मैक्समूलर के सिद्धांत को प्रकृतिवाद के नाम से जाना जाता है। मैक्समूलर के सिद्धांत का आधार आदिम मानव की बौद्धिक भूल है। मैक्समूलर का मत है कि आदिम मानव को प्रथम चरण में प्रकृति अत्यधिक भयपूर्ण तथा विस्मयकारी प्रतीत हुई । मूलर का मत है कि प्रकृति भय तथा विस्मय का एक विस्तृत क्षेत्र था। इसी ने प्रारम्भ से ही धार्मिक विचारों तथा भाषा के लिए मनोवेग प्रदान किया। इसी अनंत संवेदना से धर्म की उत्पत्ति हुई।

प्रश्न 38.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में दुर्खाइम के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने अपनी पुस्तक में धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की। दुर्खाइम के अनुसार सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। प्रत्येक समाज में पवित्र वस्तुओं को श्रेष्ठ समझा जाता है तथा उन्हें संरक्षित किया जाता है जबकि साधारण वस्तुओं को निषिद्ध किया जाता है।

दुर्खाइम के अनुसार धर्म का संबंध पवित्र वस्तुओं से होता है तथा धर्म के समाजशास्त्र में साहिकता पर जो दिया जाता है। दुर्खाइम के सिद्धांत में धर्म उपयोगिता को प्रकार्यात्मक ढंग से स्पष्ट किया गया है। दुर्खाइम के अनुसार टोटमवाद धर्म का आदिम स्वरूप था।

प्रश्न 39.
विवेकपूर्ण वैधानिक समाजों में सत्ता का स्वरूप बताइए। अथवा, विवेकपूर्ण वैधानिक सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

  • आधुनिक औद्योगिक समाजों में सत्ता का स्वरूप वैधानिक तथा तार्किक होता है।
  • वैधानिक तथा तार्किक सत्ता औपचारिक होती है तथा इसके विशेषाधिकार सीमित तथा कानून द्वारा सुपरिभाषित होते हैं।
  • वैधानिक-तार्किक सत्ता का समावेश व्यक्ति विशेष में निहित न होकर उसके पद तथा प्रस्थिति में निहित होता है।
  • वैधानिक-तार्किक सत्ता की प्रकृति अवैयक्तिक तथा तार्किक होती है।
  • आधुनिक औद्योगिक समाज में नौकरशाही को वैधानिक तार्किक सत्ता का उपयुक्त उदाहरण समझा जाता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 40.
राज्य की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
राज्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संस्था है। मैक्स वैबर के अनुसार, “राज्य एक ऐसा संघ है जिसके पास हिंसा के वैध प्रयोग का एकाधिकार होता है तथा जिसे अन्य किसी प्रकार से परिभाषित नहीं किया जा सकता है।” आगबर्न के अनुसार, “राज्य एक ऐसा संगठन है जो निश्चित भू-प्रदेश पर सर्वोच्च सरकार द्वारा शासन करता है।”

प्रश्न 41.
राज्य के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर:
राज्य के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –
जनसंख्या – जनसंख्या के अभाव में राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए जनसंख्या एक आवश्यक तत्त्व है।

निश्चित भू – प्रदेश-राज्य के लिए सुपरिभाषित भू-प्रदेश होना अनिवार्य है। इलियट के अनुसार, “अपनी सीमाओं में सब व्यक्तियों के ऊपर सर्वोच्चता अथवा प्रदेशीय प्रभुसत्ता तथा बाह्य नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता आधुनिक राज्य जीवन का मूल नियम है।”

संप्रभुता-संप्रभुता का तात्पर्य है कि सरकार के पास एक निश्चित भू-प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने की सर्वोच्च शक्ति होती है। लॉस्की के अनुसार, “संप्रभुता का तत्व ही राज्य को अन्य संघों से पृथक कर देता है।”

सरकार-राज्य के कार्यों के संचालन तथा नियंत्रण हेतु सरकार का होना अपरिहार्य है। सरकार के अभाव में राज्य की कल्पना निरर्थक है। सरकार का स्वरूप अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न हो सकता है।

प्रश्न 42.
धर्म की परिभाषा लिखें। धर्म की आधारभूत विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
टायलर के अनुसार, “धर्म एक अलौकिक सत्ता में विश्वास है।” दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म विश्वासों की एकबद्धता है तथा इसमें पवित्र वस्तुओं से संबंधित क्रियाएँ होती हैं।”

धर्म की आधारभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • धर्म अलौकिक शक्तियों में विश्वास है।
  • धर्म अंततः समस्याओं के बारे में विचार प्रकट करता है तथा यह मोक्ष की विधि है।
  • प्रत्येक धर्म में कुछ विशिष्ट अनुष्ठान पाए जाते हैं।
  • प्रत्येक धर्म में स्वर्ग-नरक तथा पवित्र-अपवित्र की धारणा विद्यमान होती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 43.
शिक्षा के मूल उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
शिक्षा के मूल उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  • शिक्षा व्यक्ति का समाज से एकीकरण करती है।
  • शिक्षा समूह में परिवर्तन की सकारात्मक प्रक्रिया है।
  • शिक्षा पर्यावरण से समायोजन की प्रक्रिया है।
  • शिक्षा व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि करती है।

प्रश्न 44.
शिक्षा की पद्धतियों के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा की दो प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं :
(i) अनौपचारिक शिक्षा – अनौपचारिक शिक्षा एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अनौपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम, उद्देश्य तथा पद्धति आदि नहीं होते हैं । अनौपचारिक शिक्षा की प्रक्रिया अचेतन रूप से चलती रहती है। परिवार, मित्रमण्डली, पड़ोस सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ अनौपचारिक शिक्षा के प्रमुख अभिकरण हैं।

(ii) औपचारिक शिक्षा-औपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम, पद्धतियों के माध्यम से शिक्षा दी जाती है । औपचारिक शिक्षा चेतन रूप से चलती है। इसके द्वारा अनौपचारिक शिक्षा की कमियों को पूरा किया जाता है। विद्यालय, पुस्तकालय, विचार गोष्ठी तथा संग्रहालय आदि. इसके साधन हैं।

प्रश्न 45.
औपचारिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
औपचारिक शिक्षा की निम्नलिखित विशषताएँ हैं –

  • औपचारिक शिक्षा का स्वरूप संस्थागत होता है।
  • औपचारिक शिक्षा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा मान्यताप्राप्त विद्यालयों के द्वारा दी जाती है।
  • औपचारिक शिक्षा प्रशिक्षित अध्यापकों के द्वारा दी जाती है।
  • औपचारिक शिक्षा में पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए एक निश्चित अवधि होती है। पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् विद्यार्थी को परीक्षा
  • में उत्तीर्ण होना पड़ता है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद विद्यार्थी को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

प्रश्न 46.
आधुनिक शिक्षा के प्रमुख प्रकार्यों को बताइए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • सामाजिकरण
  • ज्ञान तथा सूचना का संप्रेषण
  • व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास
  • मानवीय संसाधनों का समुचित तथा संतुलित विकास
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा नवीन मूल्यों का विकास।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 47.
पूर्व-औद्योगिक समाजों में शिक्षा की विषय-वस्तु क्या थी?
उत्तर:
पूर्व-औद्योगिक समाजों में शिक्षा की विषय-वस्तु सीमित थी। विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी। शिक्षा की विषय-वस्तु में सम्मिलित किए जाने वाले मुख्य विषय थे-धर्म, दर्शन . अध्यात्म तथा नीतिशास्त्र आदि।

प्रश्न 48.
आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु तर्कपूर्ण, क्रमिक तथा वैज्ञानिक है।
  • विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु सहगामी तथा पाठ्येत्तर क्रियाओं को प्राथमिकता दी जाती है। पाठ्यक्रम में समानता, स्वतंत्रता,
  • अंतराष्ट्रीय बंधुत्व तथा मानवाधिकार के विचारों को महत्त्व दिया जाता है। आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु परिवर्तनोन्मुखी है।
  • शिक्षा के क्षेत्र में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में नए आयाम तथा अवधारणाएँ विकसित किए जा रहे हैं।

प्रश्न 49.
हिंदू धर्म की सामान्य विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू धर्म की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • हिन्दू धर्म विश्व के महान धर्मों में सर्वाधिक प्राचीन है। यह धर्म लगभग 6 हजार वर्ष प्राचीन है।
  • हिन्दू धर्म बहुदेववादी है अर्थात् इसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।
  • हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के चक्र को माना जाता है।
  • जन्म तथा मृत्यु के चक्र को माना जाता है।

प्रश्न 50.
धार्मिक अनुष्ठान का अर्थ बताइए।
उत्तर:
डेविस के अनुसार, “धार्मिक अनुष्ठान धर्म का गतिशील पक्ष है।” धार्मिक अनुष्ठान को अधिप्राकृतिक तथा पवित्र वस्तुओं के संदर्भ में व्यक्तियों के व्यवहार से संबंधित माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठान उपकरणात्मक क्रिया है जिसमें लक्ष्य प्रेरित होती है। धार्मिक अनुष्ठान किसी निश्चित लक्ष्य अथवा कामनाओं को प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं। धार्मिक व्यवहार में विशेष वस्त्र धारण करना उपवास करना, नृत्य तथा भिक्षा आदि को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 51.
पंथ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पंथ का अर्थ-पंथ की उत्पत्ति आमतौर पर पुराने स्थापित धर्मों के विरुद्ध प्रतिवाद के रूप में होती है। पंथ द्वारा प्रचलित धार्मिक आस्थाओं, नियमों तथा विश्वासों से हटकर एक नई मानसिक स्थिति का विकास किया जाता है। पंथ की उत्पत्ति सामाजिक असंतोष में पायी। जाती है। पंथ की सदस्यता ऐच्छिक होती है। पंथ में परंपरागत धर्म के सिद्धांतों को अस्वीकार किया जाता है। पंथ में पंथ की शिक्षाओं का अनुकरण करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है।

हिंदू धर्म में अनेक पंथ पाए जाते हैं, जैसे-नाथ पंथ, कबीर पंथ, नानक पंथ, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन तथा राधा स्वामी आदि। ईसाई धर्म में भी पंथ पाए जाते हैं : जैसे मेथेडिस्ट तथा बैपटिस्ट।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 52.
धार्मिक संप्रदाय की परिभाषा कीजिए।
उत्तर:
धार्मिक संप्रदाय : धार्मिक संप्रदाय एक धार्मिक संगठन है। इनकी उत्पत्ति किसी नेता विशेष की विचारधारा. तथा चिंतन से होती है। ऐसी विशिष्ट विचारधरा वाले नेता का अनुसरण उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जिनकी विचारधारा समान होती है। एक धार्मिक संप्रदाय के लोग विशिष्ट देवी-देवताओं में विश्वास रखते हैं। एक व्यक्ति के द्वारा एक धार्मिक संप्रदाय का अनुसरण करने केथ-साथः किसी अन्य धर्म के सिद्धांतों में भी आस्था रखी जा सकती है. उदाहरण के लिए हमारे देश में बय गुरुदेव तथाः साई बाबा आदि धार्मिक संप्रदाय मणका कल्ट हैं।

प्रश्न 53.
शिक्षा की सीमान दीजिए।
उत्तर:
मा हिम के अनुसार, यस्क मोदी उस ऐसे व्यक्तियों पर डाला नाका जीवनपोत चलती रहती है.जया जॉन के प्रत्येक अनुभव से इसकी वृद्धि होती है।

प्रश्न 54.
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। शिक्षा के द्वारा व्यक्तियों में. तर्कपूर्ण, कैज्ञानिक तथा गतिशील दृष्टिकोण का विकास किया जाता है। शिक्षा द्वारा व्यक्तियों के रूढ़िवादी; अतार्किक तथा जड़ विचारों को परिमार्जन किया जाता है।

शिक्षा समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में आवश्यक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। शिक्षा मनुष्यों में सामाजिक चेतना का संचार करती है। इस संदर्भ में स्त्री शिक्षा का काफी महत्त्व है। शिक्षा के द्वारा लाए गए परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन व्यक्तियों के अर्जित गुणों को महत्त्व प्रदान करना है। शिक्षा के द्वारा समाज में समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व की भावना का विकास करके सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को एक नयी तथा व्यापक दिशा प्रदान की जाती है।

प्रश्न 55.
विकासशील देशों के संदर्भ में आधुनिक शिक्षा के सम्मुख चुनौतियाँ बताइए।
उत्तर:
विकासशील देशों के संदर्भ में आधुनिक शिक्षा के सम्मुख दो चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं – शिक्षा का लोकतंत्रीकरण करना-इसके अंतर्गत अशिक्षित लोगों को शिक्षित करके साक्षरता की दर में वृद्धि करने का प्रयास किया जाता है। लोगों के जीवन स्तर में सुधर करना ताकि वे शिक्षा की ओर स्वाभाविक रुचि दिखा सकें। स्त्री शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा के लिए विशेष प्रयास करना । सीमित साधनों का यथोचित तथा अधिकतम उपयोग करना।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 56.
शिक्षा के सांगठनिक ढाँचे अथवा संरचना के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं तथा प्रत्येक स्तर का एक निश्चित सांगठनिक ढाँचा है -\
(i) प्रारंभिक स्तर-इसके निम्नलिखित दो स्तर होते हैं –

  • प्राथमिक स्तर-कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर-कक्षा 6 से 8 तक।

(ii) माध्यमिक स्तर –

  • माध्यमिक स्तर-कक्षा 9 से 10 तक।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर-कक्षा 11 से 12 तक।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर-इसके अंतर्गत विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 57.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा का महत्व बताइए।
उत्तर:
लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुख्य आदर्श हैं –

  • समानता
  • स्वतंत्रता
  • बंधुत्व

शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों में लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश किया जाता है। शिक्षा व्यक्तियों को उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों के बारे में समुचित ज्ञान कराती है। शिक्षित व्यक्तियों में राजनीतिक चेतना का स्तर अपेक्षाकृत अधिक होता है। यही कारण है कि प्रत्येक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने के लिए शिक्षा के सार्वभौमीकरण का गंभीर प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 58.
शिक्षा के प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत समाज पर शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। समाजवादी दुर्खाइम के अनुसार, “समाज उसी स्थिति में जीवित रह सकता है जब समाज के सदस्यों में पर्याप्त अंशों में समरूपंता हो। शिक्षा के द्वारा उस समरूपता को स्थायी बनाया जाता है तथा संवर्धित किया जाता है।

समाज में व्यक्ति निश्चित नियमों के अनुसार अंतःक्रिया करते हैं। टालकॉट पारसंस के अनुसार विद्यालय के द्वारा नवयुवकों का समाज के मूलभूत मूल्यों के साथ समाजीकरण किया जाता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस तथा मूर ने भी समाज में शिक्षा की प्रकार्यवादी भूमिका को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है।

प्रश्न 59.
शिक्षा के मार्क्सवादी दृष्टिकोण के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा व्यवस्था के मूल्यों तथा सिद्धांतों का निर्धारण समाज की वर्ग स्थापना के द्वारा किया जाता है। समाज में अभिजात वर्ग शिक्षा व्यवस्था के सिद्धांतों तथा स्वरूपों पर अपना प्राधिकार रखता है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार अभिजात वर्ग द्वारा शिक्षा के सिद्धांतों तथा संरचना का निर्धारण अपने हितों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। शिक्षा के अंतर्गत केवल उन्हीं कौशलों का विकास किया जाता है जो अभिजात वर्ग के हितों की पूर्ति करते हों।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विजातीय विवाह से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विजातीय विवाह का अर्थ-विजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह के बाहर विवाह करना पड़ता है। यद्यपि हिंदू समाज में जाति के अंदर विवाह करने का प्रावधान है, तथापि अपने गोत्र, प्रवर तथा सपिंड में विवाह करने का निषेध है। प्रत्येक समाज में सदस्यों पर कुछ विशेष व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध है।

के. डेविस के अनुसार परिवारिक व्यभिचार वर्जन इसलिए मौजूद है, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा परिवारिक संरचना का एक भाग है। जॉर्ज मूरडॉक के अनुसार, “लैंगिक प्रतियोगिता तथा ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है। माता-पिता तथा बच्चों के मध्य सहोदरों के बीच यौन ईर्ष्या का अभाव परिवार को एक सहकारी सामाजिक समूह के रूप में मजबूत करता है, इसकी समाज संबंधी सेवाओं की कुशलता में वृद्धि करता है तथा समाज को पूर्ण रूप से शक्तिशाली बनाता है।

इस प्रकार, विजातीय विवाह के अंतर्गत एक जाति के सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी ही जाति के अंतर्गत विवाह करें, लेकिन साथ-साथ अपने निकट रक्त संबंधियों, परिवार के सदस्यों, अपने गोत्र, पिंड तथा प्रवर के मध्य विवाह न करें।

विजातीय विवाह के स्वरूप-भारत में बहिर्विवाह के निम्नलिखित रूप पाए जाते हैं
(i) गोत्र विजातीय विवाह-गोत्र का संबंध प्रायः परिवार के किसी आदिकालीन पुरुष से होता है। जिन व्यक्तियों का आदि पुरुष एक होता है, भाई-बहन समझा जाता है। दूसरे शब्दों : में हम कह सकते है कि एक गोत्र के व्यक्तियों का खून समान होता है। अतः एक ही गोत्र के व्यक्तियों में विवाह निषेध समझा जाता है।

(ii) प्रवर विजातीय विवाह-प्रवर शब्द का तात्पर्य आह्वान करना है। यज्ञ के समय – पुरोहितों द्वारा चुने गए ऋषियों के नाम ही प्रवर हैं। चूँकि यजमान द्वारा पुरोहितों को यश के लिए
आमंत्रित किया जाता है, अतः यजमान तथा पुरोहितों के प्रवर एक समझे जाने के कारण उनके बीच वैवाहिक संबंध नहीं हो सकते थे।

(iii) पिंड विजातीय विवाह-हिंदू धर्म के अनुसार पिंड का तात्पर्य है सामान्य पूर्वज । जो व्यक्ति एक ही पियर को पिंड अथवा श्राद्ध अर्पित करते हैं, उन्हें परस्पर सपिंड कहा जाता है। वशिष्ट तथा गौतम के अनुसार पिता की सात पीढ़ियों तथा माता की पांच पीढ़ियों में विवाह निषेध। हिन्दू विवाह अधिनियम में पीढ़ियों के क्रमशः पाँच तथा तीन कर दिया गया है।

विजातीय विवाह के लाभ –

  • विजातीय विवाह प्राणिशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित है। इससे संतान बलवान तथा बुद्धिमान पैदा होती है।
  • समनर तथा कैलर ने विजातीय विवाह को प्रगतिवादी कहा है।
  • विजातीय विवाह के विभिन्न संस्कृतियों का संपर्क होता है।
  • विजातीय विवाह से हानियाँ –
  • विवाह का क्षेत्र अत्यधिक सीमित हो जाता है।
  • बाल विवाह तथा दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 2.
विजातीय विवाह क्यों प्रचलित है?
उत्तर:
विजातीय विवाह के अंतर्गत एक जाति के सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी ही जाति के अंतर्गत विवाह करें, लेकिन इनके साथ-साथ अपने निकट रक्त संबंधियों, परिवार के सदस्यों, अपने गोत्र, पिंड तथा प्रवर के मध्य विवाह न करें।

विजातीय विवाह के नियम प्रचलित होने के निम्नलिखित कारण हैं –

  • विजातीय विवाह प्राणिशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित माना गया है। इसके कारण संतान हृष्ट-पुष्ट होती है।
  • समनर तथा कैलर ने विजातीय विवाह को प्रगतिवादी माना है।
  • विजातीय विवाह में निकट के रक्त संबंधियों में वैवाहिक संबंधों में पर प्रतिबंध लगाया जाता है । के. डेविस के अनुसार, “पारिवारिक व्यभिचार वर्जन इसलिए मौजूद है, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा पारिवारिक संरचना का एक भाग है।”
  • जॉर्ज मूरडॉक ने इस संबंध में उचित ही कहा है, “लैंगिक प्रतियोगिता तथा ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है।
  • माता-पिता तथा बच्चों के मध्य तथा सहोदरों के बीच यौन इस प्रकार, विजातीय विवाह परिवार को एक संस्था के रूप में बनाए रखता है।
  • सभी समाजों में किसी-न-किसी रूप में विजातीय विवाह के नियमों का पालन किया जाता है।
  • हिंदू विवाह में सगोत्र, प्रवर तथा सपिंड विजातीय विवाह होते हैं।
  • विजातीय विवाह सामाजिक संबंधों में समरसता तथा स्थायीपन बनाए रखता है। इसके कारण नातेदारी संगठन में आने वाली भ्रामक स्थितियाँ समाप्त हो जाती हैं।
  • सुजन विज्ञान की दृष्टि से निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध होने से जो संतानें उत्पन्न होती हैं, वे सामान्यतः मंद बुद्धि वाली होती हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 3.
विवाह के नियम तथा प्रतिमान समझाइए।
उत्तर:
विवाह के नियम तथा प्रतिमान निम्नलिखित हैं –
(i) अंत: या सजातीय विवाह के नियम-अंतः विवाह के नियम के अंतर्गत एक व्यक्ति आमतौर पर अपनी प्रजाति, जाति तथा धर्म के ही विवाह कर सकता है। फोलसम के शब्दों में, “अंतः विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी ही जाति यः समूह में विवाह करना पड़ेगा हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों में विवाह की अनुमति। नहीं होती है।” भारत में जाति एक अंत:विवाही समूह है। इसका तात्पर्य है कि कोई भी पुरुष अथवा स्त्री अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता।

(ii) बहिर्विवाह या विजातीय विवाह के नियम –

  • बहिर्विवाह के नियम के अंतर्गत ऐसे विवाहों को रोका जाता है जिनमें आपस में रक्त का संबंध अथवा नजदीकी संबंध हो।
  • हिन्दू विवाह में सगोत्र तथा सपिंड विजातीय समूह होते हैं। गोत्र परिवारों का एक समूह हैं जो अपनी उत्पत्ति की समानता काल्पनिक पूर्वज से स्वीकारते हैं।

(iii) निकटाभिगमन निषेध –

  • निकटाभिगमन निषेध का तात्पर्य है कि प्राथमिक नातेदारों के बीच यौन-संबंधों पर प्रतिबंध।
  • निकटाभिगमन निषेध लगभग सभी समाजों में विजातीय विवाहों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नियम है।
  • विश्व के किसी समाज में माता-पुत्र, भाई-बहन, पिता-पुत्री के बीच संबंध नहीं पाए जाते हैं।

प्रश्न 4.
विवाह संबंधों तथा रक्त संबंधों में भेद कीजिए।
उत्तर:
विवाह संबंध तथा रक्त संबंध दोनों ही सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दोनों ही प्रकार से संबंधों में निम्नलिखित भेद हैं –
(i) वैवाहिक संबंध-परिवार का प्रारंभ विपरीत लिंगियों के वैवाहिक संबंधों से प्रारम्भ होता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो लिंग संबंध पर आधारित है तथा काफी छोटा व इतना स्थायी है कि बच्चों की उत्पत्ति और पालन-पोषण करने योग्य है।” क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता और उनकी संतानों के बीच पायी जाती है।”

जहाँ तक परिवार की संरचना का प्रश्न है परिवार में पति-पत्नी संतान के बिना भी हो सकते हैं, लेकिन परिवार संस्था के रूप में फिर भी रहता है। हालांकि, यह आंशिक परिवार कहलाएगा। इस प्रकार प्रत्येक परिवार के लिए एक जैविकीय समूह होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी पति-पत्नी बच्चों को गोद लेते हैं। ये गोद लिए बच्चे भी परिवार के सदस्य होते हैं। इस प्रकार, परिवार में केवल दांपत्य संबंध ही पाए जा सकते हैं।

(ii) रक्त संबंध-परिवार के सदस्य एक-दूसरे से प्रजनन की प्रक्रिया के माध्यम से परस्पर संबद्ध होते हैं। इस प्रकार, जैविकीय अंतर्संबंध रक्त संबंध है जिन्हें सामाजिक दृष्टिकोण से नातेदारी कहा जाता है। अतः परिवार एक नातेदारी समूह कहलाता है। प्रत्येक नातेदारी व्यवस्था में रक्त संबंध तथा निकटता के संबंध पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, पिता तथा पुत्र के संबंध रक्त पर आधारित हैं। नातेदारी संबंधों द्वारा विवाह के नियमों का निर्धारण होता है। नातेदारी संबंधों में परिवर्तन होता रहता है, हालांकि, परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है।

प्रश्न 5.
औद्योगीकरण ने नातेदारी व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर:
समाज लोगों में सामाजिक संबंधों का विकास परिवार, विवाह तथा समान वंश परंपरा के कारण होता है। वास्तव में संबंध तथा संबोधन ही नातेदारी के आधार हैं। उदाहरण के लिए पितामह, पिता, माता, भाई, बहन, चाचा ताऊ आदि संबोधन सामाजिक संबंधों की स्थापना करते हैं। रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “नातेदारी प्रथा वह व्यवस्था है जो व्यक्तियों को व्यवस्थित सामाजिक जीवन में परस्पर संहयोग करने की प्रेरणा देती है।”

चार्ल्स विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आ जाते हैं जो कि अनुमानित तथा वास्तविक, वंशावली संबंधों पर आधारित हैं।”

औद्योगीकरण का नातेदारी व्यवस्था पर प्रभाव :

  • औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण ग्रामीण जनता रोजगार की तलाश में नगरों की ओर पलायन करती है।
  • औद्योगीकरण के कारण प्राथमिक संबंध कमजोर हो जाते हैं तथा द्वितीयक संबंध महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
  • औद्योगीकरण के कारण आर्थिक संबंधों का विकास होता है जिससे सामाजिक संबंध के स्वरूप में परिवर्तन होने लगता है।
  • औद्योगीकरण के कारण नगरीकरण की प्रक्रिया में तेजी आती है। सामाजिक संबंधों तथा सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होने लगता है।
  • औद्योगीकरणं के कारण नए प्रकार के सामाजिक संबंध विकसित होने लगते हैं तथा नातेदारी व्यवस्था कमजोर हाने लगती है।
  • औद्योगीकरण के कारण सामाजिक अलगाव, मापदंडहीनता तथा व्यक्ति में केंद्रित जीवन पद्धति का विकास होने लगता है। इसके कारण संबंधों का महत्त्व बढ़ता चला जाता है।

अंततः हम कह सकते हैं कि औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण नातेदारी संबंध दिन-प्रतिदिन कम महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। द्वितीयक तथा तृतीयक संबंधों को बढ़ता हुआ विस्तार प्राथमिक – संबंधों के दायरे को सीमित कर देता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 6.
नातेदारी के. प्रकार बत्ताइए।
उत्तर:
नातेदारी के प्रकार – नातेदारी को तकनिकी रूप से विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है । मोरंगन द्वारा नातेदारी शब्दावली को निम्नलिखित दो श्रेणियों में बाँटा गया है –

  • वर्गीकृत प्रणाली तथा
  • वर्णनात्मक प्रणाली।

1. वर्गीकृत प्रणाली – वर्गीकृत प्रणाली के अन्तर्गत विभिन्न संबंधियों को एक ही श्रेणी में शामिल किय जाता है। इनके लिए समान शब्द प्रयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए अंकल शब्द एक वर्गीकृत शब्द है जिसका इस्तेमाल मंचा, जाऊ मांथा फूका, मौमा आदि रिश्तेदारों के लिए किया जाता है। अक्ल को प्रति कक्ति, वेश्यू गया सची कपकच मामलों की श्रेणी मो इंगित करता है। इस प्रणाली में एक शब्द दो व्यक्तियों के मध्य निश्चित सबंध का का करता है।

2. वर्णनात्मक प्रणाली – उदाहरण के लिए, माता तथा पिता वर्णनात्मक शब्द है. इसी प्रकार हिंदी भाषा के चाचा, मामा, मौसा, साऊ, साला, अंजा, नंदोई, भाभी, भतीजा सादि वर्णनात्मक शब्द है, जो एक ही मातेदार को निर्दिष्ट करते हैं। निष्कर्षः किसी एक नातेदारी शब्दावली अर्थात् वर्गीकृत प्रणाली या वर्णनात्मक प्रणाली का प्रयोग विशुद्ध रूप से नहीं किया जाता है। दोनों ही प्रणालियाँ मिले-जुले रूप में प्रचलित हैं।

प्रश्न 7.
सजातीय विवाह से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति अपने समूह के अंदर ही विवाह कर सकता है। सजातीय विवाह में बाह्य के सदस्यों के साथ विवाह निषेध होता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी ही जातीय समूह में विवाह करना पड़ेगा हालांकि निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” वस्तुतः सजातीय विवाह तथा विजातीय विवाह सापेक्ष शब्द हैं। एक दृष्टिकोण से जो सजातीय विवाह है, वह दूसरे दृष्टिकोण से विजातीय विवाह है। हमारे देश में जाति एक सजातीय विवाह समूह है अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर के पुरुष अथवा स्त्री से विवाह नहीं कर सकता। जाति की तरह धार्मिक समुदाय भी सजातीय विवाह समूह होता है। इसका तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति अपने धर्म वाले पुरुष या स्त्री से ही विवाह कर सकता है।

सजातीय विवाह के कारण –

  • समूह की सजातीयता को बनाए रखना
  • समूह के संख्याबल को बनाए रखना
  • समूह की रक्त शुद्धता को बनाए रखना
  • समूह में एकता की भावमा को बनाए रखना
  • धर्म की पृथकता के कारण।

सजातीय विवाह के प्रकार –

  • विभागीय अथवा जनजातीय सजातीय विवाह – इस प्रकार के सजातीय विवाह के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपनी जनजाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • जाति सजातीय विवाह – इस प्रकार के विवाह में व्यक्ति अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • उपजाति सजातीय विवाह – इस प्रकार के सजातीय में विवाह उप-जातियों तक सीमित है। डॉ. एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, “जाति से मेरा तात्पर्य वेदों के अनुसार जातियों से नहीं है, वरन् उपजाति से है जो अंत:विवाह की वास्तविक इकाई है।”
  • प्रजाति सजातीय विवाह – सजातीय विवाह के इस प्रकार के अनुसार एक राष्ट्र के व्यक्ति ही परस्पर विवाह कर सकते हैं।

सजातीय विवाह के गुण –

  • समूह में एकता की भावना कायम रहती है
  • समूह के व्यावसायिक रहस्य कायम रहते हैं।

सजातीय विवाह के दोष –

  • राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक
  • जीवन साथी के चुनाव ‘का क्षेत्र सीमित हो जाता है
  • आधुनिक युग में इस सिद्धांत की जरूरत नहीं है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 8.
एकाकी परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(i) एकाकी परिवार का अर्थ-एकाकी परिवार व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जिसमें पति, पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे सम्मिलित होते हैं। एकाकी परिवार सबसे छोटी इकाई है। एकाकी परिवार में निम्नलिखित नातेदारी संबंध होते हैं-पति-पत्नी, पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्री, भाई-बहन, बहन-बहन तथा भाई-भाई।

(ii) पूरित एकाकी परिवार-पूरित एकाकी परिवार में एकाकी. परिवार के सदस्यों के अलावा पति की विधवा माता या विधुर पिता या उसके अविवाहित भाई तथा बहन सम्मिलित होते हैं।
प ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11969

(iii) एकाकी परिवार के उदय के कारण –

  • नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की सामाजिक व आर्थिक प्रवृत्तियों के कारण लोग नगरों में आकर बसने लगते हैं।
  • नगरों में स्थानाभाव के कारण संयुक्त परिवार साधारणतया एक साथ नहीं रह पाते हैं।
  • आधुनिक विचारों तथा सभ्यता के कारण एकाकी परिवार लगातार महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। डॉ. आर. के. मुकर्जी के अनुसार, “इस प्रकार संयुक्त परिवार एक महत्त्वपूर्ण विशेषता खो रहा है।” संयुक्त परिवार द्वारा सम्पादित किए जाने वाले अनेक कार्य अन्य
  • सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओं द्वारा किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए बीमा, पेंशन, छोटे बच्चों की देखभाल के लिए केंद्र आदि।
  • जैसे-जैसे गाँवों में कृषि कार्यों का यंत्रीकरण हो रहा है तथा कृषि में लोगों की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती जा रही है, वैसे-वैसे गाँवों में भी एकाकी परिवार की प्रवृत्ति का उदय हो रहा है।

(iv) एकाकी परिवार के गुण –

  • परिवार के सदस्यों में पारस्परिक घनिष्ठता
  • परिवार के सदस्यों में आर्थिक समायोजन
  • परिवार में सदस्यों को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा
  • व्यक्तित्व के विकास में सहायक
  • स्त्री का सम्मानपूर्ण दर्जा
  • बच्चों की अच्छी देख-भाल

(v) एकाकी परिवार के दोष –

  • बच्चों का समुचित पालन-पोषण नहीं हो पाता
  • आपत्तियों का सामना करने में कठिनाई
  • सुरक्षा की भावना का अभाव
  • वृद्धावस्था में सुरक्षा का अभाव

प्रश्न 9.
कौन-सा देश वास्तविक रूप से लोकतंत्र नहीं है और क्यों?
उत्तर:
यद्यपि समकालीन विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था एक प्रतिनिधि राजनीतिक व्यवस्था है तथापि विश्व के अनेक देशों में अभी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं पायी जाती है। विश्व के कुछ देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था क्यों नहीं पायी जाती है इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले लोकतंत्र का अर्थ समझ लेना आवश्यक है।

लोकतंत्र एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषमताओं को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। लोकतांत्रिक सरकार बहुमत के सिद्धांत पर आधारित होती है। सरकार द्वारा निर्णय पारस्परिक सहनशीलता तथा सहमति के आधार पर लिए जाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को भी अपनी पृथक् पहचान बनाए रखने की गारंटी दी जाती है।
देश जो कि वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हैं-विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जो लोकतांत्रिक होने की बात तो कहते हैं, लेकिन उनकी शासन व्यवस्था सत्तावादी है, जैसे-पाकिस्तान, अमेरिका, रूस, ईरान आदि। इन देशों में जनता की इच्छाओं तथा भावनाओं का सम्मान नहीं किया जाता है।

सत्तावादी सरकारें जनहित के बजाए स्वहित में विश्वास करती हैं। जनता को राजनीतिक अधिकार भी प्रदान नहीं किए जाते हैं। लोकतंत्र के सार्वभौम आदर्शों, जैसे–स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व का सत्तावादी सरकारों में कोई स्थान नहीं है। – सत्तावादी सरकारें मानवाधिकारों की अवहेलना भी करती हैं। इन देशों में सरकार विरोधियों का दमन किया जाता है। उदाहरण के लिए म्यांमार (बर्मा) तथा सिंगापुर इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
ज्ञात करें की व्यापक संदर्भ में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन होने से परिवार में सदस्यता, आवासीय प्रतिमान और यहाँ तक कि पारस्परिक संपर्क का सरीका परिवर्तित होता है, उदाहरण के लिए प्रवास।
उत्तर:
हमारे दैनिक जीवन में प्रायः हम परिवार को अन्य क्षेत्रों जैसे आर्थिक या राजनीतिक से भिन्न और अलग देखते हैं। फिर भी हम देखगें कि परिवार, गृह, उसकी संरचना और मानक, शेष समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। एक अच्छा उदाहरण जर्मन एकीकरण के अज्ञात परिणामों का है। सन् 1990 ई. के दशक में एकीकरण के बाद जर्मनी में विवाह प्रणाली में तेजी से गिरावट आई क्योंकि नए जर्मन राज्य ने एकीकरण से पूर्व परिवारों को प्राप्त संरक्षण और कल्याण की सभी योजनाएँ रद्द कर दी थीं।

आर्थिक असुरक्षा की बढ़ती भावना के कारण लोग विवाह से इंकार करने लगे। परिवार के निर्माण पर प्रश्न चिह्न लग गया। इसे अनजाने परिणाम के रूप में भी जाना जा सकता है। इस प्रकार बड़ी आर्थिक प्रक्रियाओं के कारण परिवार और नातेदारी परिवर्तित और रूपांतरित होते रहते हैं लेकिन परिवर्तन की दिशा सभी देशों और क्षेत्रों में हमेशा एक समान नहीं हो सकती। हालांकि इस परिवर्तन का यह अर्थ नहीं है कि पिछले नियम और संरचना पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, क्योंकि परिवर्तन और निरंतरता सहवर्ती होते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 11.
आधुनिक राज्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
आधुनिक राज्य केवल नियंत्रणकारी संस्था नहीं है। आधुनिक युग में राज्य के कार्यों तथा उत्तरदायित्वों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। कल्याणकारी राज्य की कल्पना ने राज्य के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि की है। संक्षेप में आधुनिक राज्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(i) राज्य सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का मुख्य आधार-आधुनिक समय में राज्य सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का मुख्य आधार है। राज्य के द्वारा उन समस्त परिस्थितियों का निर्माण करने का प्रयत्न किया जाता है, जिनसे व्यक्तियों को आर्थिक व सामाजिक न्याय प्राप्त हो सके।

(ii) कल्याणकारी राज्य-आधुनिक राज्य कल्याणकारी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि राज्य व्यक्तियों के सर्वांगीण विकास हेतु निरंतर प्रयास करेगा। कल्याणकारी राज्य जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्तियों के कल्याण की बात करता है।

(iii) नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करना-आधुनिक राज्य द्वारा नागरिकों के समुचित तथा सर्वागीण विकास हेतु मौलिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं। हमारे देश में नागरिकों को छः मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

(iv) नियंत्रण तथा संतुलन का सिद्धांत-आधुनिक राज्य में कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक् रखा जाता है। इसके अलावा सरकार के तीनों अंगों (कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका) के संदर्भ में नियंत्रण तथा संतुलन का सिद्धांत अपनाया जाता है। सरकार के तीनों अंगों को एक-दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता आधुनिक
राज्य की विशिष्ट विशेषता है।

प्रश्न 12.
शक्ति और राज्य पर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शक्ति-व्यक्ति द्वारा सामाजिक जीवन में कुछ कार्य स्वेच्छा से किए जाते हैं तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। शक्ति वस्तुतः सत्ता अनुभवात्मक पहलू है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाए जाते हैं। वैधानिक शक्ति राजनीतिक संस्थाओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है। रास्य-जैसा कि एन्डर्सन तथा पार्कर ने कहा है कि “राज्य समाज में वह निकाय है जिसे किसी भू-प्रदेश की सीमा में दमनात्मक नियंत्रण के प्रयोग का अधिकार प्राप्त है।”

राज्य वास्तव में शक्ति का वैधानिक प्रयोग करने का अधिकार रखता है। समाजशास्त्र के शब्दकोष में फेयरचाइल्ड ने “राज्य को ऐसा निकाय, समाज का स्वरूप अथवा उसकी संस्था बतलाया है जिसे बल प्रयोग करने तथा दमनात्मक नियंत्रण प्रयुक्त करने का अधिकार है।” उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शक्ति तथा राज्य एक दूसरे से संबंधित हैं। राज्य ही वैधानिक रूप से शक्ति के प्रयोग का अधिकारी है। राज्य व्यक्ति तथा समाज के हितों की सुरक्षा हेतु शक्ति का प्रयोग करता है।

प्रश्न 13.
आधुनिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चे का सर्वांगीण विकास करना है। श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण के इस युग में शिक्षा व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि करती है तथा उन्हें समाज का उपयोगी सदस्य बनाती है। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “शिक्षा से एक एकीकृत मनुष्य का विकास करने की आशा की जाती है तथा इसके द्वारा समाज में उपयोगी कार्य करने के लिए नवयुवक तैयार किए जाते हैं जिससे वे सामूहिक जीवन में भागीदारी कर सकें।”

(i) आधुनिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्य – आधुनिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं के विश्लेषण हेतु शिक्षा के उद्देश्यों तथा प्रकार्यों का अध्ययन आवश्यक है।

(a) सुकरात, अरस्तू तथा बेकन आदि दार्शनिकों के अनुसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है। अपने व्यापक अर्थ में ज्ञान का तात्पर्य है मानसिक विकास ज्ञान के समुचित विकास से व्यक्ति उचित तथा अनुचित में अंतर कर सकता है।

(b) शिक्षा द्वारा व्यक्तियों का सांस्कृतिक विकास किया जाता है। संस्कृति द्वारा बालक की जन्मजात प्रवृत्तियों का परिमार्जन किया जाता है । संस्कृति द्वारा ही व्यक्ति पर्यावरण से समायोजन सीखता है।

(c) शिक्षा द्वारा चरित्र निर्माण किया जाता है। जॉन डीवी के अनुसार, “विद्यालयी शिक्षा तथा अनुशासन का एक व्यापक उद्देश्य नागरिकों में लोकतंत्रात्मक आदर्शों तथा मूल्यों का विकास करना है, जिससे वे आदर्श नागरिक बन सकें।

(ii) आधुनिक समाज में शिक्षा के प्रकार्य-आधुनिक समाज में शिक्षा के मुख्य प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • संतुलित सामाजिकरण
  • श्रम एवं सूचना का प्रसारण
  • व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तथा चरित्र निर्मा
  • मानव संसाधनों का समुचित विकास
  • प्रभावशाली सामाजिक नियंत्रण
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा मूल्यों का विकास
  • सांस्कृतिक आधार पर निर्माण

आधुनिक शिक्षा ज्ञान के नए आयामों तथा अवधारणाओं का अवलंबन करती हुई विशेषीकरण की ओर निरंतर अग्रसर हो रही है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 14.
धर्म पर दुर्खाइम की समाजशास्त्रीय दृष्टि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने धर्म की उत्पत्ति के सभी पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या निम्नलिखित तरीके से प्रस्तुत की
(i) दुर्खाइम का मत है कि धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों ने आदिम मनुष्य को दार्शनिक बना दिया जबकि, आदिम मानव के विचार तथा सामाजिक जीवन अत्यंत सरल थे।

(ii) दुर्खाइम का मत है कि धर्म के सभी पूर्ववर्ती सिद्धांतों में मनोवैज्ञानिक पहलू पर अधिक जोर दिया गया जबकि धर्म की भावना पूर्णरूपेण सामाजिक है।

(iii) दुर्खाइम के अनुसार सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। पवित्र वस्तुएँ विशेष तथा श्रेष्ठ समझी जाती हैं तथा उन्हें संरक्षित व पृथक् रखा जाता है जबकि साधारण वस्तुएँ निषिद्ध समझी जाती हैं तथा उन्हें पवित्र वस्तुओं से दूर रखा जाता है।

(iv) दुर्खाइम टोटमवाद को धर्म का अत्यंत आदित स्वरूप मानते हैं। दुर्खाइम का मत है कि टोटम की उत्पत्ति समूह से हुई है। दुर्खाइम पवित्र तथा अपवित्र, देवी-देवता, स्वर्ग-नरक तथा । टोटम को समूह का सामूहिक प्रतिनिधान मानते हैं। समूह जीवन से संबंधित होने के कारण टोटम को पवित्र समझा जाता है। व्यक्तियों द्वारा टोटम का सम्मान इसलिए किया जाता है क्योंकि वे सामाजिक मूल्यों का सम्मान करते हैं।

इस प्रकार, टोटम के द्वारा सामूहिक चेतना का सम्मान किया जाता है। व्यक्तियों की धर्म में निष्ठा सामूहिक एकता को अधिक मजबूत करती है। समारोह तथा अनुष्ठान लोगों को समुदाय में बंधने का काम करते हैं। दुर्खाइम ने धर्म के समाजशास्त्र में सामूहिकता पर अधिक जोर दिया है। धार्मिक अनुष्ठान तथा उत्सव व्यक्तियों के बीच सामाजिकता की भावना उत्पन्न करते हैं।

(v) अनेक समाजशास्त्रियों द्वारा दुर्खाइम के धर्म के सिद्धांत की आलोचना इसमें अंतर्निहित दार्शनिकता के आधार पर की गई है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैलिनॉस्की तथा रेडक्लिफ ब्राउन ने कहा है कि धर्म सामाजिक समरसता बनाए रखता है तथा व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 15.
धर्म की सामाजिक भूमिका के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
अथवा
“संगठित धर्म का समाज तथा व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
धर्म की सामाजिक भूमिका का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान-संगठित धर्म का व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। धर्म के द्वारा व्यक्ति की आध्यात्मिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है। धर्म के द्वारा वैचारिक स्तर पर सृजन-विनाश, जन्म तथा मृत्यु, सामाजिक तथा वैयक्तिक आदर्शों, लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्यों को व्यापक दर्शन प्रदान किया जाता है।

(ii) सामाजिकरण नियंत्रण का सशक्त साधन-प्रसिद्ध समाजशास्त्री पारसंस के अनुसार धर्म के मूल्य-प्रतिमान समाजीकरण तथा सामाजिक नियंत्रण में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं । धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही व्यक्ति वांछनीय तथा अवांछनीय क्रियाओं में अंतर करना सीखते हैं। दुर्खाइम के अनुसार सामाजिक उत्सवों, कर्मकांडों तथा संस्कारों के माध्यम से धर्म के द्वारा सामाजिक सुदृढ़ता को मजबूत बनाया जाता है।

(iii) सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना-संगठित धर्म के द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने तथा सामाजिक नियंत्रण को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। अपने व्यापक तथा व्यावहारिक संदभ्र में धर्म के द्वारा व्यक्ति और समूह के दृष्टिकोण को नियंत्रित किया जाता है। प्रथाएँ तथा परंपराएँ धर्म के नियंत्रणकारी साधन बन जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप ही सामाजिक व्यवस्था का विकास होता है।

(iv) नैतिकता को बढ़ाता है-धर्म के द्वारा समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाया जाता है। नैतिकता के माध्यम से समूह के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सकारात्मक प्रेरणा मिलती है। धर्म नैतिकता को दिशा तथा निर्देशन प्रदान करता है।

प्रश्न 16.
सामाजिक संरचना किस तरह से आधुनिक शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करती है?
उत्तर:
सामाजिक संरचना निम्नलिखित तरीके से आधुनिक शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करती है –
(i) सामाजिक संरचना के द्वारा शिक्षा के स्वरूप तथा दिशा का निर्धारण किया जाता है। शिक्षा समाज की उप-व्यवस्था है। प्रत्येक समाज की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएँ, इतिहास, मूल्य तथा परंपराएँ होती हैं, इन सबका स्वरूप समाज की विरासत कहलाता है। प्रत्येक समाज अपनी विरासत को न केवल जीवित रखना चाहता है वरन् उसका हस्तांतरण अगली पीढ़ी को भी करना चाहता है।

सामाजिक संरचना का प्रभाव शिक्षा का अवश्य पड़ता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संस्कृति के परंपरागत स्वरूप का प्रभाव आधुनिक शिक्षा पर साफ-साफ दिखाई देता है। आधुनिक शिक्षा द्वारा विद्यालयों में छात्रों को भारत के इतिहास तथा संस्कृति के ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विषयों जैसे-विज्ञान, पर्यावरण, तकनीकी ज्ञान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती है।

(ii) सामाजिक संरचना की आर्थिक आवश्यकताएँ के अनुसार शिक्षा प्रणाली का विकास होता है। प्राचीन तथा मध्यकाल में समाज में धर्म का प्रभाव अत्यधिक था अतः शिक्षा भी धार्मिक आवश्यकताओं के अनुरूप थी। आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन कर दिए अतः शिक्षा के स्वरूप का निर्धारण भी इस प्रकार किया गया है कि वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था की उत्पादन पद्धति तथा आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।

(iii) किसी देश में पायी जाने वाली राजनीतिक व्यवस्था शिक्षा की प्रकृति को निर्धारित करती है। समाज की प्रभावशाली राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव शिक्षा के उद्देश्यों तथा मूल्यों पर साफ-साफ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए एक लोकतांत्रिक समाज में शिक्षा का मौलिक’ उद्देश्य निम्नलिखित तत्त्वों से निर्धारित होता है

  • समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व
  • पंथ-निरपेक्षता
  • आदर्श नागरिकों का निर्माण
  • राष्ट्रीय एकीकरण की भावना का विकास

लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत लोकतांत्रिक मूल्यों तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाता है। शिक्षा के प्रसार से आर्थिक तथा सामाजिक असमानता भी उत्तरोत्तर कम होती चली जाती है।

(iv) सामाजिक संरचना के अनुरूप ही पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाता है। लोकतांत्रिक, साम्यवादी तथा तानाशाही राजनीतिक व्यवस्थाओं में शिक्षा के मूल उद्देश्य तथा मूल्य पृथक-पृथक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में समानता, स्वतंत्रता तथा पंथ-निरपेक्षता शिक्षा के मूल उद्देश्य वर्गविहीन तथा राज्यविहीन समाज की स्थापना है।

(v) कोई भी शिक्षा व्यवस्था सामाजिक संरचना की प्रकृति के प्रतिकूल नहीं जा सकती है। शिक्षा के माध्यम से छात्रों को सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय परंपराओं से परिचित कराया जाता है। सरकार द्वारा शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय लक्ष्यों की जानकारी दी जाती है तथा नागरिकों को इन लक्ष्यों के प्रति सचेत किया जाता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 17.
समाज में शिक्षा की भूमिका पर प्रकार्यवादी समाजशास्त्रियों के विचारों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
प्रकार्यवादी समाजवादी समाजशास्त्रियों द्वारा समाज पर शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “समाज तब तक जीवित रह सकता है जब तक समाज के सदस्यों में पर्याप्त अंशों में समरूपता पाई जाती है। शिक्षा के द्वारा समरूपता को स्थायी बनाया जाता है तथा संवर्धित किया जाता है।”

दुर्खाइम का मत है कि जटिल औद्योगिक समाजों में शिक्षा के द्वारा उन महत्त्वपूर्ण कार्यों को किया जाता है जो परिवार या मित्र समूह नहीं कर सकते हैं। परिवार तथा मित्र समूह में व्यक्ति अपने संबंधियों अथवा मित्रों से पारस्परिक अंतःक्रिया करते हैं जबकि दूसरी तरफ, समाज में व्यक्ति को ऐसे लोगों से भी अंत:क्रिया करनी पड़ती है जो न उसका संबंधी होता है और न ही मित्र। विद्यालय में विद्यार्थी इस तरह के अपरिचितों से अंत:क्रिया करता है तथा सीखता एवं सहयोग करता है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री टालकॉट पारसन्स के अनुसार विद्यालय के द्वारा नवयुवकों का समाज के मूलभूत नियमों का सम्मान करने की शिक्षा के साथ-साथ औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप होने वाली परिस्थितियों तथा दशाओं में आए परिवर्तनों से समायोजन करना भी सिखाया जाता है।

समाज में शिक्षा की प्रकार्यवादी भूमिका को किंग्सले डेविस तथा विल्वर्ट मूर द्वारा भी महत्त्व प्रदान किया गया है। इन दोनों समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत समाज में व्यक्तियों के पदों का निर्धारण उनकी योग्यतानुसार किया जाता है। शिक्षा व्यवस्था समाज में व्यक्तियों के पदों का उनकी योग्यतानुसार निर्धारण करती है ताकि योग्य व्यक्ति महत्त्वपूर्ण पद पा सकें।

प्रश्न 18.
उदाहरणों सहित अनौपचारिक तथा औपचारिक शिक्षा के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) अनौपचारिक शिक्षा का अर् थ- अनौपचारिक शिक्षा के अंतर्गत बालक परिवार, पड़ोस तथा मित्रमंडली में भाषा, परंपरा, प्रथा, लोकगीत तथा संगीत आदि के माध्यम से सीखता है। – अनौपचारिक शिक्षा संस्थागत नहीं होती है। परिवार में ही वर्णमाला, गणित, लेखन, पठनपाठन का संप्रेषण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता रहता है। अनौपचारिक शिक्षा अनवरत जीवनपर्यंत चलती रहती है।

(ii) औपचारिक शिक्षा का अर्थ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत बालक को पूर्व नियोजित पाठ्यक्रम, उद्देश्यों तथा शिक्षा पद्धतियों के द्वारा विद्यालय में अध्यापकों द्वारा प्रदान किया जाता है। औपचारिक शिक्षा में पाठ्यक्रम को पूर्ण करने की निश्चित अवधि होती है। निश्चित अवधि में पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् विद्यार्थियों को परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् विद्यार्थियों को परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात्। विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 19.
भारत में संयुक्त परिवार की प्रणाली को बनाए रखने वाले मूल कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित मूल कारक उत्तरदायी हैं –
(i) अर्थव्यवस्था का कृषि पर आधारित होना – भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था संयुक्त परिवार प्रणाली को प्रमुख रूप से बनाए रखने में उत्तरदायी है। आज भी देश की लगभग 70 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी हुई हैं।

(ii) पितृपूजा की परंपरा – हिन्दू समुदाय में प्राचीन काल से ही पितृपूजा अथवा पूर्वजों की पूजा की परंपरा प्रचलित रही है। परिवार के सदस्य संयुक्त रूप से अपने पितरों की पूजा करते हैं।

(iii) धर्म – प्राचीन काल से ही धर्म भारतीय सामाजिक संगठन का मूल आधार रहा है। सामान्य देवी-देवताओं की अराधना तथा अनेक धार्मिक कार्यों को संयुक्त रूप से करने की परंपरा ने संयुक्त परिवार प्रणाली को सशक्त आधार प्रदान किया है।

राधा विनोद पाल के शब्दों में, “धार्मिक विधियों का प्रारंभिक रूप मृत व्यक्तियों की पूजा थी। वंशजों का यह कर्त्तव्य था कि वे उस पूजा को जारी रखें। इसलिए इससे पूर्णरूपेण न सही आंशिक रूप से परिवार के संरक्षण को सर्वत्र अत्यधिक महत्त्व मिला। परिवार के सदस्यों के पितरों के प्रति धर्मपालन के कुछ कर्त्तव्य होते थे। वे उन कर्तव्यों से पारिवारिक भूमि और यज्ञ-वेदी से जुड़े रहते थे। जैसे यज्ञ-वेदी भूमि से संयुक्त रहती थी, उसी प्रकार परिवार भूमि के साथ बंधा रहता था।”

प्रश्न 20.
शक्ति से आप क्या समझते हैं? शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक बताइए।
अथवा
शक्ति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शक्ति की परिभाषा – व्यक्ति सामाजिक जीवन में कुछ कार्यों को स्वेच्छा से करता है तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होता है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाये जाते हैं। शक्ति, सत्ता का अनुभावात्मक तथा भौतिक पहलू होता है । शक्ति के कारण ही संपूर्ण समाज तथा उसके सदस्य सत्ता के निर्णयों को बाध्यता अथवा दबाव के कारण स्वीकार करते हैं।

शक्ति के कारक – शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं –

  • सामाजिक प्रस्थिति
  • सामाजिक प्रतिष्ठा
  • सामाजिक ख्याति
  • शारीरिक भौतिक शक्ति
  • शिक्षा, ज्ञान तथा योग्यता

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 21.
परिवर्तन के उपकरण के रूप में शिक्षा की भूमिका क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का मुख्य उपकरण है। शैक्षिक मूल्य तथा संरचनाएँ सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में उत्प्रेरक का काम करती हैं। परिवर्तन के उपकरण के रूप में शिक्षा की भूमिका का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –

(i) सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना में परिवर्तन – शिक्षा सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचनाओं में परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। आधुनिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों के कट्टर, रूढ़िवादी तथा अवैज्ञानिक विचारों को आधुनिक, तार्किक तथा गतिशील विचारों में परिवर्तित किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारतीय समाज में परिवार तथा जाति-व्यवस्था में आने वाले परिवर्तनों का मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा का प्रसार है।

(ii) सामाजिक चेतना में वृद्धि करना – आधुनिक शिक्षा सामाजिक चेतना में वृद्धि करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। व्यक्तियों को उनके अधिकारों तथा भूमिकाओं के विषय में जानकारी शिक्षा के माध्यम से दी जा रही है। शिक्षा के द्वारा स्त्री-पुरुष की समानता को मुख्य लक्ष्य बनाया गया है। इसके परिणामस्वरूप स्त्रियों को पुरुषों के समान राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था का तो आधार ही सामाजिक तथा आर्थिक समानता है। लिंग भेद समस्या को काफी हद तक कम किया गया है। आज शिक्षित महिलाएं राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण तथा गतिशील भूमिका निभा रही हैं।

(iii) सामाजिक परिवर्तन के नए आयाम – शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के नए आयाम विकसित किए जा रहे हैं। परंपरागत भारतीय समाज में व्यवसायों का निर्धारण भी जाति के आधार पर होता था। इस प्रकार, अंतर्जातीय संबंधों प्रकृति की असमानता तथा शोषणकारी होती थी।

आधुनिक शिक्षा ने समानता तथा स्वतंत्रता को वैचारिकी का मुख्य लक्ष्य बनाया। स्वतंत्र भारत के संविधान में भी समानता, स्वतंत्रता तथा धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों की सूची में सम्मिलित करके इस बात का स्पष्ट संकेत दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को जाति, वंश, लिंग, धर्म तथा रंग आदि में भेदभाव के बिना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्रियाओं में प्रगति के समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।

(iv) शिक्षा का सार्वभौमीकरण – शिक्षा के सार्वभौमीकरण ने सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन किए हैं। साक्षरता की बढ़ती हुई दर ने सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में चेतना के नए आयाम स्थापित किए हैं। स्त्रियों में साक्षरता की बढ़ती हुई दर ने सामाजिक संरचना को गतिशील बनाया है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व के आधार एक शोषण रहित समाज की स्थापना करना है। तार्किक तथा वैज्ञानिक विचारों के प्रसार ने परंपरागत अवैज्ञानिक तथा अतार्किक शृंखलाओं को काफी हद तक कम कर दिया है। परिवर्तन के एक उपकरण के रूप में शिक्षा व्यक्तियों को उनकी अर्जित योग्यताओं के आधार पर सामाजिक स्तर प्रदान कराने में अनवरत रूप से प्रयासरत है।

प्रश्न 22.
सामाजिक संस्थाएँ परस्पर किस प्रकार व्यवहार करती हैं? विवेचना कीजिए। एक उच्च कक्षा के विद्यार्थी के रूप में स्वयं से प्रारम्भ करते हुए, दो विविध प्रकार की सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन कीजिए। क्या वे आप पर नियंत्रण रखती हैं या आप इन संस्थाओं के नियंत्रण में रहते हैं?
उत्तर:
समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक संस्थएँ हैं, जैसे-परिवार, विद्यालय, चर्च आदि ये सभी परस्पर मिलकर कार्य करती हैं। बालक सर्वप्रथम परिवार में शिक्षा ग्रहण करता है। तत्पश्चात् वह विद्यालय जाता है, जहाँ वह विधिवत् शिक्षा ग्रहण करता है। इस प्रकार परिवार व विद्यालय नामक संस्थाएँ आपस में व्यवहार करती हैं।

समाज में अनेक संस्थाएँ व्यक्ति पर नियंत्रण का भी काम करती हैं-जैसे कानून, कानून व्यक्ति की उद्देयता पर नियंत्रण करता है। हम संस्थाओं के नियंत्रण में स्वेच्छा से रहते हैं। क्योंकि सामाजिक बंधन इसके लिए प्रेरित करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक औपचारिक शिक्षा पद्धति के संगठन और पाठ्यक्रम संबंधी विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक औपचारिक शिक्षा पद्धति के संगठन तथा पाठ्यक्रम संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) औपचारिक शिक्षा का अर्थ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा अध्यापन पद्धतियों के माध्यम से समयबद्ध कार्यक्रम के आधार पर विद्यालय में शिक्षक द्वारा ज्ञान प्राप्त कराया जाता है। नियमित तथा स्वीकृत विद्यालयों में निश्चित अवधि में पाठ्यक्रम की समाप्ति के बाद परीक्षा का आयोजन किया जाता है। परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने के बाद विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

औपचारिक शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • संगठनिक संरचना
  • निश्चित तथा स्पष्ट पाठ्यक्रम
  • निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ

(ii) संगठनिक संरचना-शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं –
(a) प्रारम्भिक स्तर – प्रारम्भिक शिक्ष के निम्नलिखित दो स्तर होते हैं –

  • प्राथमिक स्तरः कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर : कक्षा 6 से 8 तक।

हमारे देश में प्रारंभिक स्तर की शिक्षा को बालक साधारणतया 14 वर्ष तक की आयु तक प्राप्त कर लेते हैं। भारत सरकार द्वारा इस स्तर की शिक्षा को नि:शुल्क तथा अनिवार्य बना दिया गया है।

(ii) माध्यमिक स्तर – माध्यमिक शिक्षा के अंतर्गत कक्षा 9 तथा 10 की शिक्षा को सम्मिलित किया जाता है। कक्षा 11 तथा 12 की शिक्षा को उच्चतर माध्यमिक स्तर अथवा इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा में सम्मिलित किया जाता है।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर – उच्चतर माध्यमिक स्तर अथवा इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा के पश्चात् विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा प्रारंभ होती है। इस स्तर पर विद्यार्थी उच्चस्तरीय तथा विशेषीकृत अध्ययन करते हैं।

(iv) निश्चित तथा स्पष्ट पाठ्यक्रम – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत शिक्षा के प्रत्येक स्तर अर्थात् प्रारंभिक स्तर, माध्यमिक स्तर तथा विश्वविद्यालय स्तर के लिए पृथक-पृथक पाठ्यक्रम विकसित किया जाता है।

माध्यमिक शिक्षा आयोग – (1952-53 ई.) ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है कि “पाठ्यक्रम का तात्पर्य विद्यालय में पढ़ाए जाने वाले पारस्परिक विषयों से नहीं है, इसके अंतर्गत उन अनुभवों को पूर्णरूपेण सम्मिलित किया जाता है जिन्हें विद्यार्थी विद्यालय की अनेक गतिविधियों के माध्यम से प्राप्त करता है। ये गतिविधियाँ विद्यालय, कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कार्यशाला, खेल का मैदान और अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के बीच अनौपचारिक संपर्क द्वारा चलती रहती है। इस प्रकार, विद्यालय का पूरा जीवन (गतिविधियाँ) ही पाठ्यक्रम बन जाता है जो कि विद्यार्थियों के जीवन को प्रत्येक बिंदु पर छू सकता है तथा एक संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है।

मुनरो के अनुसार, “पाठ्यक्रम में वे समस्त गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं जिन्हें विद्यालय द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपयोग में लाया जाता है।” लैटिन भाषा में पाठ्यक्रम का तात्पर्य है ‘रेस कोर्स’ अथवा दौड़ का मैदान। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि पाठ्यक्रम रूपी मार्ग पर दौड़कर बच्चा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करता है। पाठ्यक्रम संरचना के मुख्य आधार प्रारंभिक, माध्यमिक तथा विश्वविद्यालय स्तर पर श्रेणीबद्ध क्रम के अंतर्गत बदलते रहते हैं।

ये मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

  • दार्शनिक आधार
  • मनोवैज्ञानिक आधार
  • समाजशास्त्रीय आधार
  • वैज्ञानिक आधार

(v) निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ होती हैं। विद्यार्थियों को किसी भी पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु न्यूनतम योग्यता का निर्धारण किया जाता है। विद्यार्थियों को शिक्षा संस्थाओं के नियमों का पालन करना पड़ता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 2.
अधिकारों के प्रकारों की विवेचना कीजिए। उनका समाज में क्या अस्तित्व है ? वे आपके जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
अधिकार की परिभाषा-व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार बन जाती हैं भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परंतु उसे अधिकार ही माना जाएगा क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बेन तथा पीटर्स ने अधिकार की परिभाषा करते हुए कहा है, “अधिकारों की स्थापना एक सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहते कानून पर आधारित हो या परंपरा पर।” ऑस्टिन के अनुसार, “अधिकार एक व्यक्ति का वह सामर्थ्य है जिसमें वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता है।” लास्की के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं कर सकता।”

अधिकारों के प्रकार –
(i) नैतिक अधिकार – नैतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति की भावना पर आधारित हैं । माता-पिता का यह नैतिक अधिकार है,कि बुढ़ापे की अवस्था में उनकी संतान उनकी सहायता करे । इन अधिकारों के पीछे कोई सत्ता नहीं होती अर्थात् यदि पुत्र अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा न करे तो उसको कानून के अनुसार दंडित नहीं किया जा सकता केवल समाज उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखता।

(ii) वैधानिक अधिकार – जो अधिकार राज्य द्वारा हम पर लागू किए जाते हैं और उनका उल्लंघन करने पर व्यक्ति को कानून के अनुसार दंडित किया जाता है। ये अधिकार निम्नलिखित हैं

(a) मौलिक अधिकार-वे वैधानिक अधिकार जो संविधान द्वारा उस राज्य के नागरिकों को दिए जाते हैं, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। देश का संविधान मौलिक कानून होता है। उसमें मिलने वाले अधिकार भी मौलिक होते हैं। ये अधिकार व्यक्ति के विकास में बहुत उपयोगी होते हैं –

  • समानता का अधिकार
  • स्वतंत्रता का अधिकार
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार, सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार ये सभी अधिकार मौलिक अधिकार हैं।

(b) राजनीतिक अधिकार – चुनाव में भाग लेना, मतदान का अधिकार, उम्मीदवार बनने का अधिकार तथा सरकारी पद ग्रहण करना, सरकार की आलोचना, राजनीतिक दल बनाना आदि राजनीतिक अधिकारों के श्रेणी में आते हैं।

(c) सामाजिक या नागरिक अधिकार-जीवन का अधिकार, भाषण एवं अभिव्यक्ति का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, समुदाय बनाने का अधिकार, आवागमन का अधिकार आदि इन श्रेणी में आते हैं।

(d) आर्थिक अधिकार-काम करने का अधिकार, अवकाश का अधिकार तथा आर्थिक सुरक्षा का अधिकार आर्थिक अधिकार की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 3.
कार्य पर एक निबंध लिखिए। कार्यों की विद्यमान श्रेणी और ये किस तरह बदलती हैं, दोनों पर ध्यान केंद्रित करें?
उत्तर:
बच्चे अक्सर कल्पना करते हैं कि जब बड़े होंगे तो किस प्रकार कौन-सा कार्य करेंगे। यह कार्य वास्तव में ‘रोजगार’ होता है। यह ‘कार्य’ सरल का सर्वाधिक अर्थ है। वास्तव में, यह.एक अत्यधिक सरल विचार है। अनेक प्रकार के कार्य वेतन सहित रोजगार के विचार की पुष्टि नहीं करते। जैसे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में किए जाने वाले अधिकांश कार्य प्रत्यक्षतः किसी औपचारिक रोजगार आँकड़ों में नहीं गिने जाते हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से आशय है नियमित रोजगार के क्षेत्र से हटकर किया जाने वाला कार्य-ब्यवहार। इसमें कभी-कभी किए गए कार्य अथवा सेवा के बदले नकद भुगतान किया जाता है। लेकिन प्रायः इसमें वस्तुओं अथवा सेवाओं का आदान-प्रदान भी किया जाता है।

हम कार्य को शारीरिक और मानसिक परिश्श्रमों के द्वारा किए जाने वाले ऐसे स्वैतनिक या अवैतनिक कार्यों के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिनका उद्देश्य मानव की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करना है।

कार्य के आधुनिक रूप और श्रम विभाजन-प्राचीन समाज में अधिकतर लोग खेतों में कृषि कार्य करते थे अथवा पशुओं की देखभाल करते थे। औद्योगिक रूप से विकसित समाज में जनसंख्या का बहुत छोटा भाग कृषि कार्यों में लगा हुआ है और अब कृषि का भी औद्योगीकरण हो गया है। कृषि कार्य मानव द्वारा करने की अपेक्षा अधिकांशतः मशीनों द्वारा किया जाने लगा है। भारत जैसे देश में आज भी अधिकतर आबादी ग्रामीण और कृषि कार्यों में अथवा अन्य ग्राम आधारित व्यवसायों में संलग्न है। भारत में और भी कई प्रवृत्तियाँ हैं उदाहरण के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार। आधुनिक समाज में अर्थव्यवस्था की एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है, श्रम का जटिल विभाजन।

कार्य असंख्य विभिन्न व्यवसायों में विभक्त हो गया है जिनमें लोग विशेषज्ञ हैं। पारंपरिक समाज में गैर-कृषि कार्य को शिल्प की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। शिल्प लंबे प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जाता था और सामान्यतः श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक सभी कार्य करता था। आधुनिक समाज में भी कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा है औद्योगीकरण से पूर्व, अधिकतर कार्य घर पर किए जाते थे और कार्य पूरा करने में परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से उसमें हाथ बँटाते थे। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास, जैसे बिजली और कोयले से मशीन संचालन से घर पर भी कार्य अलग-अलग होने लगे। पूँजीपति, उद्योगपतियों के उद्योग व औद्योगिक विकास का केंद्र बिंदु बन गए।

उद्योगों में नौकरी करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित थे और इस कार्य के बदले उन्हें वेतन प्राप्त होता था। प्रबंधक कार्यों का निरीक्षण किया करता था क्योंकि उनका उद्देश्य श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाना और अनुशासन बनाए रखना था।

आधुनिक समाज की एक मुख्य विशेषता है आर्थिक अन्योन्याश्रियता का असीमित विस्तार। हम सभी अत्यधिक रूप से श्रमिकों पर निर्भर करते हैं जो हमारे जीवन को बनाए रखने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए संपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधुनिक समाजों में अधिकतर लो अपने भोजन व रहने के मकान का या अपनी उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं।

कार्य का रूपांतरण – औद्योगिक प्रक्रियाएँ उन सरंल प्रक्रियाओं में विभाजित हो गई जिनका सही समय निर्धारण, संगठन और निगरानी संभव है। थोक उत्पादन के लिए थोक बाजारों की आवश्यकता होती है। साथ ही उत्पादन की प्रक्रिया में कई नवपरिवर्तन हुए। संभवतया इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्वचलित उत्पादन की कड़ियों (मूविंग असेंबली लाइन) का निर्माण था। आधुनिक औद्योगिक उत्पादन के लिए कीमती उपकरणों और निगरानी व्यवस्थाओं के माध्यम से कर्मचारियों की निरंतर निगरानी करना आवश्यक है।

विगत कई दशकों से ‘उदार उत्पादन’ और ‘कार्य के विकेंद्रीकरण’ की ओर झुकाव हुआ ‘ है। यह तर्क दिया जाता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में व्यवसाय और देशों के मध्य प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हो रही है इसलिए व्यवसाय के लिए बदलती बाजार अवस्थाओं के अनुकूल उत्पादन को व्यवस्थित करना आवश्यक हो गया है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र धर्म का अध्ययन करता है. कैसे?
उत्तर:
धर्म काफी लंबे समय से अध्ययन और चिंतन का विषय रहा है। समाज के बारे में सामाजिक निष्कर्ष धार्मिक चिंतनों से अलग हटकर है। धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन धर्म के धार्मिक या ईश्वरमीमांसीय अध्ययन से कई तरह से भिन्न है।

धर्म समाज में वास्तव में कैसे कार्य करता है और अन्य संस्थाओं के साथ इसका क्या संबंध है, के बारे में यह आनुभाविक अध्ययन करता है।
यह तुलनात्मक पद्धति का उपयोग करता है।
यह समाज और संस्कृति के अन्य पक्षों के संबंध में धार्मिक विश्वासों, रिवाजों और संस्थाओं की जाँच करता है।

अनुभविक पद्धति का अर्थ है कि समाजशास्त्री धार्मिक प्रघटनाओं के लिए निर्णायक उपागम को नहीं अपनाना। यहाँ तुलनात्मक पद्धति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक अर्थ में सभी समाजों को एक-दूसरे के समान स्तर पर रखती है। यह बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के अध्ययन में सहायता करती है। समाजशास्त्री दृष्टिकोण का अर्थ है कि धार्मिक जीवन को केवल घरेलू जीवन, आर्थिक जीवन और राजनीतिक जीवन के साथ संबंद्ध करके ही बोधगम्य बनाया जा सकता है।

धर्म सभी ज्ञात समाजों में विद्यमान है हालांकि धार्मिक विश्वास और रिवाज एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में परिवर्तित होते रहते हैं। सभी धर्मों की समान विशेषताएँ हैं –

  • प्रतीकों का समुच्चय, श्रद्धा या सम्मान की भावनाएँ
  • कर्मकांड या अनुष्ठान
  • विश्वासकर्ताओं का एक समुदाय।

धर्म के साथ संबंद्ध कर्मकांड विविध प्रकार के होते हैं । कर्मकांडीय कार्यों में प्रार्थना करना, भजन गाना, प्रभु का गुणगान करना, विशेष प्रकार का भोजन करना या ऐसा भोजन नहीं करना समाहित होते हैं। कुछ दिनों का उपवास रखना और इसी प्रकार के अन्य कार्यों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। चूँकि कर्मकांडीय धार्मिक प्रतिकों से संबद्ध होते हैं अतः इन्हें प्रायः आदतों

और सामान्य जीवन प्रक्रियाओं से एकदम भिन्न रूप में देखा जाता है। दैवीय सम्मान में मोमबत्ती या दीया जलाने का महत्त्व सामान्यतया कमरे में रोशनी करने से एकदम भिन्न होता है । धार्मिक कर्मकांड प्रायः व्यक्तियों द्वारा अपने दैनिक जीवन में किए जाते हैं लेकिन सभी धर्मों में विश्वासाकर्ताओं द्वारा सामूहिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं । सामान्यतः ये नियमित अनुष्ठान विशेष संस्थानों-चर्चों, मस्जिदों, मंदिरों, तीर्थों में आयोजित किए जाते हैं।

विश्वभर में धर्म एक पवित्र क्षेत्र है। इस बात पर विचार करें कि विभिन्न धर्मों के सदस्य पवित्र क्षेत्र में प्रवेश करने के पूर्व क्या करते हैं। उदाहरण के लिए, सिर को ढंकते हैं या नहीं ढकते, जूते उतारते हैं या विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करते हैं आदि। इन सबमें जो बात समान है वह श्रद्धा की भावना, पवित्र स्थानों या स्थितियों की पहचान और प्रति सम्मान की भावना।

एमिल दुर्खाइम का अनुसरण करने वाले धर्म के समाजशास्त्री उस पवित्र क्षेत्र को समझने में रुचि रखते हैं जो प्रत्येक समाज में सांसारिक चीजों से भिन्न होता है। अधिकतर मामलों में पवित्रता में अलौकिकता का तत्त्व होता है। अधिकांशतः किसी वक्ष या मंदिर की पवित्रता के साथ यह विश्वास जुड़ा होता है कि इसके पीछे कोई अलौकिक शक्ति है, इसलिए यह पवित्र है। फिर भी यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आरंभ में बौद्ध और कंफ्यूशियसवाद में अलौकिकता की कोई संकल्पना नहीं थी लेकिन जिन व्यक्तियों और चीजों को वे पवित्र मानते थे उनके लिए उनमें पूर्णरूपेण श्रद्धा थी।

धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन करते हुए प्रश्न उत्पन्न होता है कि धर्म का अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ क्या संबंध है। धर्म का शक्ति और राजनीति के साथ बहुत निकट का संबंध रहा है। उदाहरण के लिए, इतिहास में समय-समय पर सामाजिक परिवर्तन के लिए धार्मिक आंदोलन हुए हैं, जैसे विभिन्न जाति-विरोधी आंदोलन अथवा लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन। धर्म किसी व्यक्ति के निजी विश्वास का मामला ही नहीं है अपितु इसका सार्वजनिक स्वरूप भी होता है और धर्म को इसी सार्वजनिक स्वरूप के कारण ही यह समाज के अन्य संस्थाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण होता है।

समाजशास्त्र शक्ति को व्यापक संदर्भ में देखता है। अतः राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र के बीच संबंध को जानना समाजशास्त्रीय हित में है। प्राचीन समाजशास्त्रियों को विश्वास था कि जैसे-जैसे समाज आधुनिक होता जाएगा धर्म का जीवन के अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव कम होता जाएगा । धर्म निरपेक्षता की अवधारण इस प्रक्रिया का वर्णन करती है। समकालीन घटनाएँ समाज के विभिन्न पक्षों में धर्म की दृढ़ भूमिका की जानकारी देती हैं।

समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920 ई.) के महत्त्वपूर्ण कार्य दर्शाते हैं कि किस तरह समाजशास्त्र सामाजिक और आर्थिक व्यवहार के न्य पक्षों के साथ धर्म के संबंधों को देखता है । वेबर का तर्क है कि कैल्विनवाद (प्रोटेस्टेंट इसाई धर्म की एक शाखा) आर्थिक संगठन की पद्धति के रूप में पूँजीवाद के उद्भव और विकास को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है। कैल्विनवादियों का मत था कि विश्व की रचना भगवान की महिमा के लिए हुई। इसका अभिप्राय है कि संसार में किया गया कोई भी कार्य उसके गौरव के लिए किया जाता है, यहाँ तक कि सांसारिक कार्य को भी पूजा कार्य बना दिया गया। हालांकि इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कैल्विनवादी भाग्य की अवधारणा में विश्वास करते थे जिसका अर्थ है कि कौन स्वर्ग में जाएगा

और कौन नर्क में, यह पूर्व से ही निश्चित था। चूँकि यह ज्ञात नहीं हो सकता था कि किसे स्वर्ग मिलेगा और किसे नर्क, लोग इस संसार में अपने कार्य में भगवान की इच्छा के संकेत देखने लगे। इस प्रकार व्यक्ति चाहे जो भी व्यवसाय करता हो यदि वह अपने व्यवसाय में दृढ़ और सफल है तो उसे भगवान की प्रसन्नता का संकेत माना जाता था। अर्जित किया गया धन सांसारिक उपभोग में लगाने के लिए नहीं था अपितु कैल्विनवाद का सिद्धांत मितव्ययता से रहने का था।

धर्म का अलग क्षेत्र के रूप में अध्ययन नहीं किया जा सकता। सामाजिक शक्तियाँ हमेशा और अनिवार्यतः धार्मिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक बहस, आर्थिक स्थितियाँ और लिंग संबंधी मानक हमेशा धार्मिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत धार्मिक मानक सामाजिक समझ को प्रभावित और कभी-कभी निर्धारित भी करते हैं। विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है। इसलिए समाजशास्त्रीय रूप से यह पूछना भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि मानव आबादी के इतने बड़े हिस्से का धर्म से क्या संबंध है। धर्म समाज का महत्त्वपूर्ण भाग है और अन्य भागों से अनिवार्यतः संबद्ध है। समाजशास्त्र या समाजशास्त्रियों का कार्य इन विभिन्न अंत:संबंधों को उजागर करना है। धार्मिक प्रतीक एवं कर्मकांड अक्सर समाज की भौतिक और कलात्मक संस्कृति से जुड़े होते हैं।

प्रश्न 5.
सामाजिक संस्था के रूप में विद्यालय पर एक निबंध लिखिए। अपनी पढ़ाई और वैयक्तिक प्रेक्षणों, दोनों का इसमें प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
विद्यालय एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। परिवार से निकलकर बच्चा विद्यालय के अपरिचित वातावरण में पहुँचता है, जहाँ वह धीरे-धीरे सामंजस्य बिठाकर शिक्षा की कई . सीढ़ियों को पार करता है। हमारे विद्यालय का नाम सर्वोदय विद्यालय है। इसका भवन पक्का है। इसमें 25 कमरे हैं। सभी कमरों में खिड़कियाँ एवं रोशनदान हैं। विद्यालय में एक बड़ा हॉल है जहाँ सामूहिक बैठकें होती हैं । सांस्कृतिक कार्यक्रम भी यहीं आयोजित होते हैं।

सभी कक्षाओं में बिजली के पंखे लगे हुए हैं। प्रत्येक कक्षा में एक अलमारी .बनी है। इसमें चॉक, डस्टर एवं उपस्थित रजिस्टर रखा जाता है। हमारे विद्यालय में बहुत अच्छे ढंग से पढ़ाई-लिखाई होती है। यहाँ लगभग 600 छात्र-छात्राएँ हैं। इनमें से लगभग आधी छात्राएँ हैं। हमारे विद्यालय में ग्यारह शिक्षक एवं सात शिक्षिकाएँ हैं। हमारी प्रधानाध्यापिका का नाम श्रीमती सुधा जैन है। सभी अध्यापक अनुशासन प्रिय एवं कार्यकुशल हैं। हमारी समाजशास्त्र की कक्षा डॉ. अमित राज लेते हैं। वे समाजशास्त्र विषय को ऐसे पढ़ाते हैं कि वह शीघ्र ही समझ में आ जाता है।

हमारा विद्यालय एक आदर्श विद्यालय है। यहाँ पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ खेल-कूद की भी अच्छी व्यवस्था है। विद्यार्थियों को समय-समय पर खेल-कूद, शारीरिक शिक्षा एवं योग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। विद्यालय में हर वर्ष मार्च महीने में वार्षिक खेल प्रतियोगिता का आयोजन होता है। बच्चे विद्यालय के मैदान में प्रतिदिन तरह-तरह के खेल खेलते हैं। हमारे खेल शिक्षक हमें नए-नए खेल खेलना सिखाते हैं।

पुस्तकालय का बड़ महत्त्व है। इसलिए हमारे विद्यालय में एक छोटा पुस्तकालय खोला गया है। यहाँ विभिन्न विषयों की पुस्तकों के अलावा कहानियों, नाटकों एवं बाल-कविताओं की पुस्तकें उपलब्ध हैं। पुस्तकालय में बैठकर विभिन्न प्रकार की पुस्तकों का अध्ययन किया जा सकता है।

हमारे विद्यालय में पेय जल एवं शौचालय का अच्छा प्रबंध है। विद्यालय में एक कैंटीन है। यहाँ शिक्षक एवं विद्यार्थी मध्यावकाश के समय जलपान करते हैं। विद्यालय के आँगन में कई सुंदर एवं हरे-भरे पड़े हैं। छोटे बच्चों के लिए यहाँ झूले हुए हैं।

हमारा विद्यालय हर दृष्टिकोण से अच्छा है। हमारे विद्यालय का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत आता है। यहाँ सभी प्रकार की सुविधाएँ हैं। इन सुविधाओं के कारण हमारा विद्यालय पूरे शहर में प्रसिद्ध है। हमारे विद्यालय में दूर-दराज के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। हमारे विद्यालय में निर्धन एवं बेसहारा बच्चों को निःशुल्क किताबें तथा वर्दी दी जाती हैं। मुझे अपने विद्यालय पर गर्व है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 6.
विवाह की परिभाषा कीजिए और इसका.सामाजिक महत्त्व बताए।
उत्तर:
विवाह मानव समाज की एक मौलिक, प्राचीन तथा अनिवार्य संस्था है। प्रत्येक समाज में विपरीत लिंगियों के मध्य यौन संबंध स्थापित करने के कुछ नियम होते हैं, इन्हीं नियमों के पुंज को विवाह संस्था कहा जाता है। विवाह के माध्यम से केवल यौन संबंधों का निर्धारण नहीं होता, वरन् पति-पत्नी के कुछ अधिकार तथा कर्त्तव्य भी निर्धारित हो जाते हैं।

विवाह की परिभाषाएँ-हैरी एम. जॉनसन के अनुसार, “विवाह एक ऐसा स्थायी संबंध है जिससे एक पुरुष तथा एक स्त्री को समुदाय की स्थिति को क्षति पहुँचाये बिना संतोनोत्पत्ति की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है।” कॉलिन्स डिक्शनरी ऑफ सोश्योलोजी के अनुसार, “विवाह एक वयस्क पुरुष तथा एक वयस्क स्त्री के मध्य सामाजिक रूप से स्वीकृत तथा कभी-कभी कानूनी रूप से वैध मिलन है।”

ई. ए. हॉबल के अनुसार, “विवाह सामाजिक नियमों का एक पुंज है जो कि विवाहित युग्म के पारस्परिक, उसके रक्त संबंधियों के, उनके बच्चों के तथा समाज के प्रति संबंधों को नियंत्रित तथा परिभाषित करता है। वेस्टर मार्क के अनुसार, “विवाह एक या अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है जो प्रथा अथवा कानून द्वारा स्वीकृत होता है जिसमें संगठन में आने वाले दोनों पक्षों तथा उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकार एवं कर्तव्यों का समावेश होता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “विवाह एक प्रजनन मूलक परिवार के स्थापना की समाज स्वीकृत विधि है।” आर. एच. लॉवी के अनुसार, “विवाह उन स्पष्ट स्वीकृत संगठनों को प्रकट करता है जो लिंग संबंधी संतुष्टि के उपरांत भी स्थिर रहता है एवं पारिवारिक जीवन की आधारशिला का निर्माण करता है।”

बील्स तथा हॉइजर के अनुसार, “विवाह प्रत्येक मानव समाज में जिससे हम परिचित हैं, एक जटिल सांस्कृतिक प्रघटना है जिसमें कि पूर्णतया प्राणिशास्त्रीय यौन संबंधों का निर्वाह होता है, किन्तु इसके अतिरिक्त बच्चों तथा गृहस्थी का पालन-पोषण तथा परिवार पर लादी गई सांस्कृतिक आवश्यकताएँ आदि सामाजिक क्रियाएँ भी होती हैं।” हार्टन तथा हंट के अनुसार, “विवाह एक स्वीकृत सामाजिक प्रणाली है, जिसके अनुसार दो या दो से अधिक व्यक्ति परिवार की स्थापना करते हैं।” मेलीनोवस्की के अनुसार, “विवाह बच्चों की उत्पत्ति तथा देखभाल हेतु समझौता है।” ई. आर. ग्रोब्ज के अनुसार, “विवाह साथी बनकर रहने की सार्वजनिक स्वीकृति तथा कानूनी पंजीकरण है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि विवाह एक सामाजिक संस्था है जो कि –

  • एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रियों के साथ लिंग संबंधों को परिभाषित करता है।
  • पति-पत्नी तथा बच्चों के अधिकारों तथा कर्तव्यों को निर्धारित करता है।

वैवाहित संस्था की उन्नति में निम्नलिखित कारण महत्त्वपूर्ण हैं –

  • यौन संतुष्टि अर्थात् जैविकीय आवश्यकता
  • संतानों का वैधानिक अर्थात् सामाजिक आवश्यकता

विवाह के प्रकार-समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विवाह के निम्नलिखित स्वरूप हैं –
(i) एक विवाह –

  • जोड़ा विवाह
  • मोनोजिनी
  • अस्थायी एक विवाह

(ii) बहु-विवाह –

  • द्विपत्नी विवाह
  • बहुपत्नी विवाह
  • असीमित
  • सशर्त

(iii) बहुपति विवाह –

  • भ्राता संबंधी
  • अभ्राता संबंधी।

(iv) रक्त संबंधी विवाह –

  • देवर अथवा भाभी विवाह
  • कनिष्ठ देवर विवाह
  • ज्येष्ठ देवर विवाह
  • अनुमानतः देवर विवाह

(v) साली विवाह –

  • सीमित
  • एक साथ

विवाह का सामाजिक महत्त्व –

  • एक सामाजिक संस्था के रूप में विवाह सामाजिक ताने-बाने को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है।
  • प्रसिद्ध समाजशास्त्री जी. पी. मुरडॉक के अनुसार विवाह नियमित यौन संबंध तथा आर्थिक सहयो का केंद्र बिंदु है।
  • विवाह के माध्यम से मनुष्य के जैविकीय संबंधों का नियमन हो जाता है।
  • विवाह के माध्यम से बच्चों के प्रजनन को वैधता प्रदान की जाती है तथा इसके द्वारा परिवार की संरचना होती है। परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है।
  • विवाह के माध्यम से समाज नियमबद्ध यौन संतुष्टि की अनुमति प्रदान करता है। इस प्रकार विवाह समाज में संगठन तथा सामाजिक नियमन की स्थायी संस्था है।

प्रश्न 7
सजातीय विवाह और विजातीय विवाह के नियमों से आपका क्या तात्पर्य है? उपयुक्त उदाहरणों के साथ अपने उत्तर को समझाइए।
उत्तर:
प्रत्येक समाज में जीवन साथी के चुनाव के बारे में कुछ प्रतिबंध लगाए जाते हैं। सजातीय विवाह तथा विजातीय विवाह इसी प्रकार के नियम हैं।
(i) सजातीय विवाह – सजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति अपने समूह के अंदर ही विवाह कर सकता है। सजातीय विवाह में बाह्य समूह के सदस्यों के साथ विवाह निषेध होता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है, जिसके अनुसार व्यक्ति को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ेगा। हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” सजातीय विवाह के अंतर्गत जीवन-साथी के चुनाव पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं

  • सामान्यतः एक व्यक्ति अपनी जाति, धर्म तथा प्रजाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • हमारे देश में जाति एक अंत:विवाह समूह है, अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के। बाहर के पुरुष या स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता है।
  • जाति की तरह धार्मिक समुदाय भी सजातीय विवाह होता है, अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के बाहर के पुरुष या स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता।
  • सजातीय विवाह द्वारा दो रेखाओं के बीच विवाह करने की अनुमति प्रदान की जाती है।
  • सजातीय विवाह के द्वारा ऐसी सीमाओं का निर्धारण किया जाता है जिनके द्वारा व्यक्ति को किसी समूह विशेष से बाहर तथा किसी समूह के अंदर विवाह करना पड़ता है।

सजातीय विवाह के निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट करते हैं कि व्यक्ति के विवाह करने की सीमाएँ क्या हैं –

  • विभागीय तथा जनजातीय सजातीय विवाह-इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपने विभाग तथा जनजाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • वर्ग सजातीय विवाह-प्रत्येक व्यक्ति का विवाह उसके वर्ग अथवा श्रेणी के अंतर्गत ही होना चाहिए।
  • जाति-सजातीय विवाह-इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • उपजाति सजातीय विवाह-हमारे देश में विवाह की सीमा उप-जाति तक सीमित हो जाती है।
  • प्रजाति सजातीय विवाह-प्रजाति सजातीय विवाह के अंतर्गत अपनी प्रजाति के अंतर्गत ही विवाह किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय सजातीय विवाह-इस प्रकार के सजातीय विवाह के अंतर्गत एक राष्ट्र के व्यक्ति परस्पर विवाह कर सकते हैं।

(ii) विजातीय विवाह – विजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह से बाहर ही विवाह करना पड़ता है। विजातीय विवाह के नियम निम्नलिखित हैं
(a) अनेक ऐसे नातेदार तथा समूह होते हैं, जिनके साथ व्यक्ति को वैवाहिक संबंध कायम करने की अनुमति नहीं दी जाती है।

(b) प्रत्येक समुदाय अपने सदस्यों पर कुछ व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध कायम करने पर प्रतिबंध लगाता है।

(c) निकट के नातेदारों से वैवाहिक संबंध नहीं कायम किए जा सकते हैं। डेविस के अनुसार पारिवारिक व्यभिचार-वर्जन इसलिए विद्यमान हैं, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा पारिवारिक संरचना का एक भाग है। इनके अभाव में परिवार की संरचना तथा प्रकार्यात्मक कुशलता समाप्त हो जाएगी।

(d) नजदीकी संबंधों में विवाह की अनुमति देने पर संपूर्ण सामाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। यही कारण है कि प्रत्येक समाज में पारिवारिक व्यभिचार पर वर्जनाएँ लगायी जाती हैं। उदाहरण के लिए भाई-बहन, पिता-पुत्री, माता-पुत्र के बीच वैवाहिक संबंधों पर प्रत्येक समाज में प्रतिबंध लगाए जाते हैं। ज़ार्ज मुरडॉक के अनुसार, “लैंगिक प्रतियोगिता एवं ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है। माता-पिता तथा सहोदरों के बीच यौन ईर्ष्या का अभाव परिवार को एक सहकारी सामाजिक समूह के रूप में मजबूत करता है, इसकी समाज संबंधी सेवाओं की कुशलता में वृद्धि करता है तथा समाज को पूर्णरूप से शक्तिशाली बनाता है।”

(iii) विजातीय विवाह के निम्नलिखित प्रकार भारत में प्रचलित हैं –
(a) गोत्र विजातीय विवाह – हिंदुओं में ऐसा विश्वास किया जाता है कि एक ही गोत्र के व्यक्तियों में एक सा खून पाया जाता है, अतः उनके बीच सजातीय विवाह प्रतिबंधित हैं।

(b) प्रवर विजातीय विवाह – प्रवर शब्द का तात्पर्य हाह्वान करना है। यज्ञ के समय पुरोहितों द्वारा चुने गए ऋषियों का नाम ही प्रवर है। चूँकि यजमान द्वारा पुराहितों को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया जाता था; अतः यजमान तथा पुराहितों के प्रवर एक समझे जाने के कारण उनके बीच वैवाहित संबंध नहीं हो सकते।

(c) पिंड विजातीय विवाह – हिन्दू धर्म के अनुसार पिंड का तात्पर्य है सामान्य पूर्वज। जो व्यक्ति एक ही पितर को पिंड अथवा श्राद्ध अर्पित करते हैं. परस्पर सपिंड कहा जाता है। वशिष्ठ तथा गौतम के अनुसार पिडा को संत पौडियों तथा माता की. पाँच पीड़ियों में विवाह निषेध है। हिंदू विवाह अधिनिया में इन पीढ़ियों में विवाह को क्रमशः पाच तथा बैन कर दिया गया है। सवसीय विवाह तथा विजातीय विवाह सापेक्ष याद हैं। इसका हात्पर्य है कि बोका विवाह एक प्रम में अपनाने की सिक्योकि जान माह के कर दिया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण नियम है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 8.
परिवार को परिभाषित-जिए। परिवार की मूलभूत विशेषताएँ बंबा हैं?
उत्तर:
परिवार-परिकार शब्द अंग्रेजी भाषा के फैली. शब्द का रूपांतर हैं, जिसकी उत्पत्रि लैटिन भाषा के पुलस’ शब्द से हुई है। इसका अर्थ है नौकर रोमन काननू में मुलस’ शब्द । स्वामियों, दासों, नौकरों व अन्य संबंधित व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता था।

कार्य असंख्य विभिन्न व्यवसायों में विभक्त हो गया है जिनमें लोग विशेषज्ञ हैं। पारंपरिक समाज में गैर-कृषि कार्य को शिल्प की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। शिल्प लंबे प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जाता था और सामान्यतः श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक सभी कार्य करता था। आधुनिक समाज में भी कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा है औद्योगीकरण से पूर्व, अधिकतर कार्य घर पर किए जाते थे और कार्य पूरा करने में परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से उसमें हाथ बँटाते थे। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास, जैसे बिजली और कोयले से मशीन संचालन से घर पर भी कार्य अलग-अलग होने लगे। पूँजीपति, उद्योगपतियों के उद्योग व औद्योगिक विकास का केंद्र बिंदु बन गए।

उद्योगों में नौकरी करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित थे और इस कार्य के बदले उन्हें वेतन प्राप्त होता था। प्रबंधक कार्यों का निरीक्षण किया करता था क्योंकि उनका उद्देश्य श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाना और अनुशासन बनाए रखना था।

आधुनिक समाज की एक मुख्य विशेषता है आर्थिक अन्योन्याश्रियता का असीमित विस्तार। हम सभी अत्यधिक रूप से श्रमिकों पर निर्भर करते हैं जो हमारे जीवन को बनाए रखने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए संपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधुनिक समाजों में अधिकतर लो अपने भोजन व रहने के मकान का या अपनी उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
परिवार के सामाजिक कार्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:एक
संस्था तथा समिति के रूप में समाज के रूप में समाज में परिवार काप केंद्रीय स्थान है। परिवार समाज का सूक्ष्म स्वरूप है। सामाजिक संगठन की इकाई के रूप में परिवार का अत्यधिक महत्त्व है। आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “किसी भी संस्कृति में परिवार के महत्त्व का मूल्यांकन करने के लिए यह मालूम करना जरूरी है कि उसके क्या कार्य हैं तथा किस सीमा तक उन्हें पूर्ण किया जा सकता है।” एक संस्था तथा समिति के रूप में परिवार के विविध कार्य हैं।

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “किसी भी संस्था के विविध कार्य होते हैं। संभवतः सभी संस्थाओं में परिवार अत्यंत विविध कार्यों वाली संस्था है।” डेविस ने अपनी पुस्तक ह्यूमन सोसायटी तथा डब्लू जे. मूर ने अपनी पुस्तक फैमली में परिवार के निम्नलिखित सामाजिक कार्य बताए हैं

(i) प्रजनन कार्य – समाज का अस्तित्व व्यक्तियों से होता है। परिवार में कुछ विशेष व्यक्तियों के बीच यौन संबंध स्थापित करके वह कार्य पूरा किया जाता है। इस प्रकार परिवार व्यक्तियों की यौन आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ समाज को स्थायित्व भी प्रदान करता है।

(ii) परिवार के सदस्यों की देखभाल करना – नवजात शिशुओं का समुचित पालन-पोषण परिवार में ही होता है। गर्भवती स्त्री की देखभाल तथा बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य
परिवार में ही किया जाता है।

प्रश्न 10.
परिवार की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
परिवार व्यक्तियों की केवल सामूहिकता नहीं है। परिवार में व्यक्ति जैविकीय, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से परस्पर अंतर्संबंधित होते हैं । परिवार की मूलभूम विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) सार्वभौमिकता-एक सामाजिक संगठन के रूप में परिवार सार्वभौमिक है। एकं संस्था के रूप में परिवार प्रत्येक समाज में पाया जाता है।

(ii) सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध-परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध पाए जाते हैं। भावनात्मक संबंध त्याग, वात्सल्य तथा पारस्परिक प्रेम पर आधारित होते हैं। भावनात्मक संबंध रूपी सेतु परिवार के सदस्यों को परस्पर अंतर्संबंधित रखता है।

(iii) सीमित आकार-परिवार का आकार सीमित होता है। वर्तमान समय में परिवार में साधारणतया पिता, पत्नी तथा उनकी वैध संतानें सम्मिलित किए जाते हैं। नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रियाओं ने भी परिवार के आकार को सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, भारत में पाए जाने वाले नगरीय परिवारों को एकाकी परिवार नहीं कहा जा सकता है। डॉ. एम. एन. श्रीवास्तव का मत है कि भारत में संयुक्त परिवार टूट नहीं रहे हैं वरन् उनके स्वरूप में परिवर्तन आ रहा है।

(iv) समाज की मूल इकाई के रूप में-परिवार सामाजिक संगठन की मूल इकाई है। परिवार के अंतर्गत ही सामाजिक मूल्यों, आदर्शों तथा प्रतिमानों का विकास होता है। परिवार में . प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं। इस प्रकार, सामाजिक संरचना में परिवार की केंद्रीय स्थिति होती है।

(v) संस्कारों की प्राथमिक पाठशाला-व्यक्ति परिवार में ही सामाजिक तथा सांस्कृतिक संस्कार सीखते हैं। संस्कारों का यह क्रम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनवरत रूप से चलता रहता है। संस्कारों का प्रभाव व्यक्तियों पर अमिट रहता है।

(vi) सदस्यों का पारस्परिक उत्तरदायित्व – एक प्राथमि पूह के रूप में परिवार के सदस्यों के बीच घनिष्ठ तथा आमने-सामने के अनौपचारिक पाए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 11.
परिवार के विभिन्न स्वरूपों की विशेषताएँ बताइए
उत्तर:
एक सार्वभौमिक संस्था के रूप में परिवार मानव समाज को मौलिक इकाई है लेकिन विश्व के सभी समाजों में इसका स्वरूप एकसमान नहीं। सामाजिक परिस्थिति तथा सांस्कृतिक भिन्नता के कारण परिवार के अनेक स्वरूप पाए जाते हैं।

वर्तमान समय में परिवार के दो प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं –

  • एकाकी परिवार तथा
  • संयुक्त परिवार

परिवार के अन्य स्वरूप इसके अतिरिक्त, परिवार के निम्नलिखित स्वरूप भी अनेक समाजों तथा जनतातीय समाजों में पाए जाते हैं –

  • विस्तृत परिवार
  • मातृवंशीय तथा मातृस्थानीय परिवार
  • पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय परिवार
  • बहुपत्नी परिवार
  • बहुपति परिवार

(i) एकाकी परिवार-एकाकी परिवार वास्तव में परिवार का सबसे छोटा स्वरूप है। इसमें पति-पत्नी तथा उनके वैध एवं अविवाहित बच्चे होते हैं । एकाकी परिवार में निम्नलिखित नातेदारी संबंध पाए जाते हैं –

  • पति-पत्नी
  • पिता-पुत्र
  • पिता-पुत्री
  • माता-पुत्र
  • माता-पुत्री
  • भाई-भाई
  • भाई-बहन

पूरित एकाकी परिवार भी पाए जाते हैं। इन परिवारों में पति की विधवा माता या विधुर पिता या उसके छोटे अविवाहित भाई-बहन होते हैं।

(ii) संयुक्त परिवार – संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। अति प्राचीन काल से ही संयुक्त परिवारों का अस्तित्व भारतीय समाज में रहा है। डॉ. इरावती कर्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों के समूह है जो सामान्यतः एक भवन में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के स्वामी होते हैं, जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं और जो किसी न किसी प्रकार एक-दूसरे के रक्त संबंधी हैं।”

आई. पी. देसाई के अनुसार, “हम ऐसे परिवार को संयुक्त परिवार कहते हैं, जिसमें पीढ़ी की गहराई की अपेक्षा अधिक लंबाई पायी जाती है और जिसके सदस्य परस्पर संपत्ति, आय तथा पारस्परिक अधिकारों व दायित्वों के आधार पर संबंधित होते हैं।” यद्यपि औद्योगीकरण, नगरीकरण, कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ह्रास, पश्चिम के प्रभाव तथा नवीन सामाजिक विधानों ने संयुक्त परिवार को काफी क्षीण कर दिया है तथापि एक परिवर्तित रूप में उनका अस्तित्व भारतीय समाज में आज भी विद्यमान है।

डॉ. एम. एन. श्रीनिवास का मत है कि भारत में संयुक्त परिवार विघटित नहीं हो रहे हैं अपितु उनके स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है। डॉ. के. एम. कपाड़िया के अनुसार, “अभी तक संयुक्त परिवार ने काफी कष्टमय समय को पार किया है फिर भी उसका भविष्य खराब नहीं है।”

परिवार के अन्य स्वरूप –
(i) विस्तृत परिवार-विस्तृत परिवार के अन्तर्गत एकाकी नातेदारों के अतिरिक्त दूर के रक्त संबंधी भी हो सकते हैं, उदाहरण के लिए सास-ससुर तथा दामाद का. एक साथ रहना। इस प्रकार एकांकी या संयुक्त परिवार के सदस्यों के अलावा कोई अन्य नातेदार परिवार का हिस्सा बनता है तो उसे संयुक्त परिवार कहते हैं।

(ii) मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार-मातृवंशीय परिवार के अंतर्गत पति अपनी पत्नी के साथ पत्नी की माँ अर्थात् अपनी सास के घर में रहता है। मातृवंशीय परिवार में वंशावली माँ के पक्ष में पायी
जाती है तथा परिवार में निर्णय करने की सत्ता भी माँ के पास ही होती है। माँ ही परिवार की मुखिया होती है। हालांकि, इस प्रकार के परिवार अधिक प्रचलन में नहीं हैं। दक्षिण भारत के नायर परिवार तथा मेघालय की खासी जनजाति के लोग ‘मातृसत्तात्मक परिवारों में निवास करते हैं।

(iii) पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार-विश्व के. लगभग सभी समाजों में पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय परिवार पाए जाते हैं। इन परिवारों में वंशावली पिता के पक्ष में पायी जाती है। इन परिवारों में विवाह के बाद पत्नी पति के घर रहती है। परिवार का मुखिया पिता होता है तथा परिवार की सत्ता उसी के पास होती है।

(iv) बहुपत्नी परिवार-बहुपत्नी परिवार में एक व्यक्ति एक समय में एक से अधिक पत्नियाँ . रखता है। इस प्रकार के परिवार अनेक जनजातियों में पाए जाते हैं।

(v) बहुपति परिवार-बहुपति परिवार के अंतर्गत एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं। इन परिवार की संरचना भ्रातृत्व बहुपति विवाह से होती हैं। भारत में इस प्रकार के परिवार खासी तथा टोडा जनजातियों में पाए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 12.
नातेदारी में आप क्या समझते हैं? सामाजिक जीवन में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं कि परिवार घनिष्ठ संबंधियों से बना एक संस्था है। परिवार के सदस्यों के बीच परस्पर रक्त अथवा वैवाहिक संबंध पाए जाते हैं। इन बंधनों द्वारा संबद्ध व्यक्तियों को हो नातेदार कहा जाता है लेकिन नावेदारी संबंधों का क्षेत्र परिवार तक ही सीमितन होकरें व्यापक है। वैवाहिक संखों के जरिए एक परिवार के सदस्य दूसरे परिवार के सदस्यों उपरोक्त विवेचन को पर महम कह सकते कि गावर पाक्ति है, हो सका।

बाने नोटर मुरडाक के अनुसार, “यहा (मात्र सम की एक वना है। बिसमें व्यक्ति एक-दूसरे से इंटिलं आंतरिक तथा शाखाकृत अपनी द्वारा संबंध होते हैं। डक्लिफ बाउन के अनुसार, “जावेदारी प्रथा वह व्यवस्था है जो व्यक्तियों को

व्यवस्थित सामाजिक जीवन में परस्पर सहयोग करने की प्रेरणा देती है।
वास्तव में, रैडक्लिफ ब्राउन नातेदारी व्यवस्था को सामाजिक संरचना के एक अंग के रूप स्वीकार करते हैं।
चार्ल्स विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आ जाते हैं जो कि अनुमानित तथा वास्तविक, वंशावली संबंधों पर आधारित हैं।

नातेदारी संबंधों के बदलते आयाम –

  • नातेदारी संबंध जनजातीय समाजों तथा ग्रामीण समुदायों में काफी प्रबल तथा विस्तृत होते हैं।
  • औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा प्रौद्योगिक विकास के कारण नातेदारी संबंधों की प्रगाढ़ता में कमी आयी है।
  • प्राथमिक समूहों के स्थान पर द्वितीयक समूहों के बढ़ते महत्त्व के कारण भी नातेदारी संबंध न केवल शिथिल हुए हैं, वरन् उनका परिवार भी कम हुआ है।

नातेदारी के प्रकार –

  • वैवाहिक नातेदारी तथा
  • रक्त संबंधी नातेदारी।

1. वैवाहिक नातेदारी – वैवाहिक नातेदारी संबंधों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति किसी स्त्री से विवाह करता है तो उसका संबंध न केवल उस स्त्री से स्थापित हो जाता है वरन् स्त्री के परिवार के अन्य सदस्यों से भी उसका संबंध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार विवाह के पश्चात् कोई व्यक्ति न केवल पति बनता है, अपितु वह बहनोई तथा दामाद भी बन जाता है। इसी प्रकार कोई स्त्री विवाह के पश्चात् न केवल पत्नी बनती अपितु पुत्रवधू, चाची, भाभी, जेठानी, देवरानी तथा मामी आदि बन जाती है।

2. रक्त संबंधी नातेदारी – रक्त संबंधी नातेदारी के अंतर्गत रक्त अथवा सामूहिक वंशावली से जुड़े व्यक्ति आते हैं। वैवाहिक नातेदारी में संबंधों का आधार विवाह होता है जबकि रक्त संबंधी नातेदारी में संबंध रक्त के आधार पर होते हैं । उदाहरण के लिए, माता-पिता व उनके बच्चों तथा सहादारों के बीच रक्त संबंध पाए जाते हैं। रक्त संबंध वास्तविक तथा काल्पनिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, गोद लिए हुए बच्चे की पहचान वास्तविक पुत्र की भाँति होती है।

नातेदारी के विभिन्न आधार-हैरी एम. जॉनसन के द्वारा नातेदारी के निम्नलिखित आधार बनाए गए हैं –

  • लिंग-बहन तथा भाई शब्द रक्त संबंधियों के लिंग को बताते हैं।
  • पीढ़ी-पिता तथा पुत्र के द्वारा जहाँ एक तरफ दो पीढ़ियों की ओर संकेत करते हैं, दूसरी तरफ वे रक्त संबंधी भी हैं।
  • निकटता-दामाद तथा फूफा से निकटता के आधार पर संबंध होते हैं, लेकिन ये संबंध रक्त पर आधारित नहीं होते हैं।
  • विभाजन-सभी नातेदारी संबंधे को साधारणतया दो शाखाओं में बाँटा जाता है उदाहरण के लिए पितामह तथा नाना, भतीजी आदि ।
  • पहली शाखा का संबंध पिता के जन्म वाले परिवार से होता है तथा दूसरी शाखा का संबंध माता के जन्म लेने वाले परिवार से होता है।
  • श्रृंखला सूत्र-उपरोक्त वर्णित विभाजन का संबंध संबंधियों की निकटता के साथ है। इन संबंध की श्रृंखला का आधार निकटता अथवा रक्त संबंध है।

नातेदारी का सामाजिक जीवन में महत्त्व –

  • सामाजिक संरचना में नातेदारी संबंधों का विशेष महत्त्व है। यह परिवारिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
  • परिवार में व्यक्तियों की प्रस्थितियों के अनुसार निश्चित अधिकार तथा उत्तरदायित्व होते हैं।
  • नातेदार एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए होते हैं तथा एक-दूसरे की सहायता अन्य संस्थाओं या व्यक्तियों की अपेक्षा अत्यधिक तत्परता से करते हैं।

प्रश्न 13.
नातेदारी संबंधों की विभिन्न श्रेणियों की.सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निकटता अथवा दूरी के आधार पर नातेदारों में विभिन्न श्रेणियाँ पायी जाती हैं। एक व्यक्ति के नातेदारों में कुछ अत्यधिक निकट, कुछ निकट तथा कुछ अपेक्षाकृत कम निकट होते हैं। इसी प्रकार कुछ नातेदारों से दूर तथा कुछ से बहुत दूर के संबंध होते हैं । निकटता अथवा दूरी के आधार पर नातेदारों को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता है

(i) प्राथमिक नातेदारी-एक ही परिवार से संबंधित व्यक्तियों को प्राथमिक नातेदार कहा जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक एकाकी परिवार में आठ प्राथमिक नातेदार हो सकते हैं। डॉ. दुबे ने भी इसी मत का समर्थन किया है। ये आठ नातेदार निम्नलिखित हो सकते हैं –

  • पति-पत्नी
  • पिता-पुत्र
  • माता-पुत्री
  • पिता-पुत्री
  • माता-पुत्र
  • छोटे-बड़े भाई
  • छोटी-बड़ी बहनें
  • भाई-बहन

(ii) द्वितीयक नातेदारी – एक व्यक्ति के प्राथमिक नातेदारों में से प्रत्येक नातेदार के प्राथमिक नातेदार के अथवा संबंधी होते हैं। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि वे प्राथमिक संबंधी न होकर हमारे प्राथमिक संबंधियों के संबंधी होते हैं। इसी प्रकार, वे हमारे द्वितीयक संबंधी कहलाते हैं। उदाहरण के लिए चाचा (पिता या भाई) तथा बहनोई (बहन का पति), द्वितीयक अथवा गौण संबंधी हैं। ठीक इसी प्रकार, पिता-पुत्र का प्राथमिक संबंधी है जबकि चाचा अर्थात् पिता का भाई पिता का प्राथमिक संबंधी है। इस प्रकार चाचा अर्थात् पिता का भाई द्वितीयक संबंधी कहलाता है। ठीक इसी प्रकार बहन भाई की प्राथमिक संबंधी है, लेकिन बहनोई भाई का द्वितीयक संबंधी है।

(iii) तृतीयक नातेदारी – तृतीयक नातेदार प्राथमिक संबंधी के द्वितीयक संबंधी तथा द्वितीयक संबंधी के प्राथमिक संबंधी होते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हमारे प्राथमिक नातेदार के द्वितीयक अथवा गौण नातेदार हमारे तृतीयक नातेदार कहलाएंगे। उदाहरण के लिए, साले की पत्नी जिसे ‘सलाहज’ कहते हैं, तृतीयक नातेदार हैं, क्योंकि साला मेंरा द्वितीयक नातेदार है। एक अन्य उदाहरण के द्वारा भी तृतीयक नातेदारी को स्पष्ट किया जा सकता है-किसी व्यक्ति के भाई के भाई का साला उसका तृतीयक नातेदार होगा, क्योंकि भाई मेरा प्राथमिक नातेदार है तथा उसका साला मेरे भाई का द्वितीयक नातेदार है।

वे समस्त संबंधी जो तृतीयक नातेदारों से भी दूर होते हैं, उन्हें मुरडाक ने दूरस्थ नातेदार का नाम दिया है। मुरडाक ने किसी व्यक्ति के द्वितीयक नातेदारों की संख्या 33 तथा तृतीयक नातेदारों की संख्या 151 बताई है। व्यावहारिक तौर पर तृतीयक श्रेणी के नातेदारों के बीच आमतौर पर सामाजिक अंत:क्रिया पायी जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक श्रेणी के

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 14.
धर्म को परिभाषित कीजिए। धर्म की आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
धर्म एक सावभौमिक तथा मूलभूत सामाजिक प्रघटना है। प्रत्येक समाज में धर्म अवश्य विद्यमान रहा है। धर्म मंदव के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण आयाम है। एक संस्था के रूप में धर्म सामाजिक संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म एक अद्भत तथा अलौकिक शक्ति है।

धर्म की परिभाषाएँ –

  • ई. बी. टायलर के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास है।
  • होबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है, जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।
  • एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की वह समग्र व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संयुक्त करती है।”
  • आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “धर्म अतिमानवीय शक्तियों के प्रति अभिवृत्तियाँ हैं।”
  • फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मैं मनुष्य ने श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना समझता हूँ जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वे प्रकृति तथा मानव जीवन को मार्ग दिखलाती हैं और नियंत्रित करती हैं।”
  • सपीर के अनुसार, “धर्म जीवन की परेशानियों तथा उनके खतरों से परे अध्यात्मिक शांति के मार्ग की खोज करने में मनुष्य का सतत् प्रयास है।”
  • मैलिनावस्की के अनुसार, “धर्म क्रिया का एक तरीका है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म एक समाजशास्त्री प्रघटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।

धर्म की आधारभूत विशेषताएँ – धर्म की आधाभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास है।
  • धर्म से संबंधित वस्तुएँ, प्राणी तथा स्थान पवित्र माने जाते हैं एवं उनके प्रति सम्मान तथा भय-मिश्रित व्यवहार किया जाता है।
  • जो भौतिक वस्तुएँ धार्मिक व्यवहारों में पायी जाती हैं, वे प्रत्येक संस्कृति में पृथक्-पृथक् हो सकती हैं।
  • प्रत्येक धर्म में विशिष्ट अनुष्ठान जैसे-क्रीड़ा, नृत्य, गायन, उपवास तथा विशिष्ट भोजन आदि सम्मिलित होते हैं।
  • आमतौर पर धार्मिक अनुष्ठान एकांत में किए जाते हैं, लेकिन कभी-कभी इनका आयोजन सामूहिक रूप से भी किया जाता है। “
  • प्रत्येक धर्म में एक विशिष्ट पूजा पद्धति पायी जाती है।
  • प्रत्येक धर्म में स्वर्ग-नरक तथा पवित्र-अववित्र की अवधारणा पायी जाती है।
  • धर्म अवलोकण से परे तथा विज्ञानोपरि है।
  • धर्म का आधार विश्वास तथा आस्था है, तर्क से इसका संबंध नहीं है।
  • धर्म अनुभवोपरि है।

प्रश्न 15.
धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांतों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्रीय तथा मानवशास्त्रियों के अनुसार आधुनिक संगठित धर्मों के विकास का प्रमुख कारण आदिम मानव का भय तथा असुरक्षा की भावना, कर्मकांड तथा उपासना पद्धति आदि हैं। धर्म का उत्पत्ति सिद्धांत आमतौर पर उद्विकासीय है। इन सिद्धांतों के द्वारा समाज में धर्म और संस्था के विकास के क्रमिक स्तरों का वर्णन किया जाता है। टायलर तथा स्पेंसर का मत है कि धर्म की उत्पत्ति आदिम मनुष्य के जीवन में आत्मा की अवधारणा के कारण हुई। धर्म की उत्पत्ति के विषय में प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचार निम्नलिखित हैं :

(i) आत्मवाद का सिद्धांत-ई. बी. टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमिटिव कल्चर में धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत का उल्लेख किया है। आत्मवाद के सिद्धांत के अनुसार आदिम मनुष्य के मस्तिष्क में आत्मा के अस्तित्व का विचार मृत्यु तथा जन्म से संबंधित उसकी कल्पना से आया। टायलर का मत है कि आदिम मनुष्य का यकीन था कि मनुष्य शरीर में आत्मा का है जो निद्रार की हालत में बाहर चली जाती है। आदिम मनुष्य के अनुसार जब आत्मा शरीर में वापस लौटकर नहीं आती है तो उसे मृत्यु की स्थिति कहते हैं। यही कारण था कि आदिम मनुष्य अपने निकट संबंधियों के मृत शरीरें का इस उम्मीद में रखता था कि मुमकिन है कि उसकी आत्मा वापस लौटकर आ जाए।

आदिम मनुष्य के मन में मृत्यु की वास्तविकता तथा स्वप्न की प्रघटना से इस विचार की उत्पत्ति हुई कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का देहांतरण होता है। आदिम मनुष्य का यह भी विश्वास था कि यदि उसके पूर्वजों की आत्मा असंतुष्ट तथा दु:खी है तो वह भी दुःखी रहेगा। यही कारण है कि आदिम मनुष्य द्वारा पूर्वजों की आत्मा की संतुष्टि हेतु अनेक कमकांडों तथा अनुष्ठानों की उत्पत्ति हुई। इस संबंध में डॉ. मजूमदार तथा मदान ने कहा है कि “आदिमवासियों का संपूर्ण धार्मिक जीवन एक निश्चित, अज्ञेय, अवैयक्तिक, अलौकिक शक्ति में विश्वास से उत्पन्न हुआ है, जो सभी सजीव तथा निर्जीव वस्तुओं में रहती है जो विश्व में विद्यमान है।”

(ii) प्रकृतिवाद का सिद्धांत – फ्रेजर ने अपनी पुस्तक में धर्म की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया है। फ्रेजर का मत है कि आदिम मनुष्य सदैव प्रकृति से संघर्ष करता रहा। इस संघर्ष में कभी आदिम मनुष्य सफल हो जाता था तो कभी असफल। प्रकृति को नियंत्रित करने के लिए आदिम मनुष्य ने अनेक मंत्रों तथा विधियों का विकास किया। फ्रेजर इन्हें जादू कहते हैं। फ्रेजर का मत है कि जादू, धर्म से पहले का स्तर है।

आदिम मनुष्य ने पहले जादू के द्वारा प्रकृति की शक्तियों पर नियंत्रण का प्रयास किया, लेकिन इस प्रयास में असफलता के बाद उसने अलौकिक शक्ति की सत्ता को पहचाना। फ्रेजर के अनुसार, “जादू प्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक क्रम को प्रभावित करता है तथा विज्ञान के इस मौलिक विश्वींस में भाग लेता है कि यह क्रम पूर्ण तथा स्थिर है किन्तु धर्म एक भिन्न कल्पित वस्तु पर आधारित है अर्थात् मानव से उच्च शक्ति का अस्तित्व जिस पर ऐसा विश्वास किया जाता है कि वह मानव जीवन तथा प्रकृति की घटनाओं को निर्देशित तथा नियंत्रित करती है।

विश्वास का यह स्तर जो जादू में विश्वास के परे है, उस समय आता है जब मनुष्य जादू के व्यवहारों की असारता को महसूस करता है तथा इसके मुकाबले उन शक्तियों का सहारा लेता है जो यह विश्वास करता है, कारण तथा कार्य के साधारण क्रम को अपने आदेश के माध्यम से परिवर्तित कर सकता है।” फ्रेजर के सिद्धांत को जादू से धर्म की संक्रांति भी कहा जाता है। उसने मानव विचारधारा की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ बतायी हैं –

  • जादुई अवस्था
  • धार्मिक अवस्था
  • वैज्ञानिक अवस्था

फ्रेजर के अनुसार प्रकृति से संघर्ष करते समय पराजित होने की स्थिति में आदिम मनुष्य प्रकृति को प्रसन्न करने के लिए उसकी (प्रकृति की) पूजा करता था। इस प्रकार, आदिम मनुष्य द्वारा प्रकृति की पूजा से ही धर्म की उत्पत्ति हुई। पिडिंगटन के अनुसार, “आदिम कालीन धर्म का स्रोत वह (जेम्स फ्रेजर) उचित परिणामों को प्रभावित करने के लिए जादू की असफलता में पाता है। वह विश्वास करता है कि जादू, संपर्क के सिद्धांतों का अनुचित प्रयोग है, जो उचित रूप से प्रयोग में लोने पर विज्ञान की ओर ले जाता है।”

(ii) धर्म का समाजशास्त्रीय सिद्धांत – प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने अपनी पुस्तक में धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की हैं। दुर्खाइम का मत है कि सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। सभी समाजों में पवित्र वस्तुओं को श्रेष्ठ समझा जाता है तथा उन्हें संरक्षित किया जाता है जबकि साधारण वस्तुओं को निषिद्ध किया जाता है।

दुर्खाइम ‘टोटमवाद’ को धर्म का आदिम स्वरूप मानते हैं। दुर्खाइम के अनुसार टोटम तथा सभी धार्मिक विचारों की उत्पत्ति सामाजिक समूह से हुई है। इस प्रकार, देवी-देवता, उचित-अनुचित तथा स्वर्ग-नरक टोटम समूह के सामूहिक प्रतिनिधान हैं। सामूहिक जीवन का प्रतीक होने के कारण टोटम को पवित्र समझा जाता है। व्यक्तियों द्वारा टोटम का सम्मान किया जाता है, क्योंकि वे सामाजिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। इस प्रकार, टोटम सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। समारोह तथा अनुष्ठान समुदाय के लोगों को एक साथ बाँधने का काम करते हैं। धर्म में व्यक्तियों की आस्था समूह एकता को सुदृढ़ करती है।

दुर्खाइम का मत है जन्म, मृत्यु तथा विवाह आदि के समय अनेक नयी सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है। सामूहिक समारोह तथा अनुष्ठान प्रभावित व्यक्तियों को नई परिस्थितियों से समायोजन करने में सहयोगी होते हैं। अनेक विद्वानों ने दुर्खाइम के सिद्धांत में अंतर्निहित दार्शनिकता के कारण इसकी आलोचना भी की है।

प्रश्न 16.
आधुनिक समाज में धर्म का क्या स्वरूप है?
उत्तर:
आधुनिक समाज में धर्म के स्वरूप को समझने से पहले आवश्यक है कि धर्म के अर्थ तथा इसकी मूलभूत विशेषताओं पर प्रकार डाला जाए। हॉबल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है, जिसके अंतर्गत आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित होते हैं।” दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की वह व्यवस्था है, जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संयुक्त करती है।”

मेकाइवर के अनुसार, “धर्म, जैसा कि हम समझते आये हैं, से केवल मनुष्य के बीच का संबंध ही नहीं, एक उच्चतर शक्ति के प्रति मनुष्य का संबंध भी सूचित होता है।” मैलिनोवस्की के अनुसार, “धर्म, क्रिया का एक तरीका है, साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था है तथा समाजशास्त्रीय प्रघटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।”

  • धर्म अलौकिक शक्ति अथवा समाजोपरि उच्चतर शक्ति में विश्वास है।
  • धर्म से संबंधित प्राणी, वस्तुओं तथा स्थान को पवित्र माना जाता है तथा उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
  • धर्म से संबंधित विश्वास उद्वेगपूर्ण तथा भावात्मक होते हैं।

आधुनिक समय में औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा लौकिकीकरण, वैज्ञानिक विचारों तथा तर्कपूर्ण चिंतन के कारण धर्म के स्वरूप में कुछ परिवर्तन आए हैं –

  • परंपरागत समाजों में धर्म जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता था। आधुनिक समाजों में धर्म का प्रभाव क्षेत्र कुछ सीमित हुआ है।
  • परंपरागत समाज में धार्मिक आस्था तथा विश्वास अत्यधिक सुदृढ़ होते थे तथा विभिन्न अनुष्ठानों का पालन संपूर्ण धार्मिक पद्धतियों के द्वारा किया जाता था।
  • आधुनिक समाजों में धार्मिक विश्वास तथा आस्था का सम्मान होना आवश्यक नहीं है। धर्म में विश्वास रखते हुए भी कुछ व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठानों का संपादन अनवार्य नहीं समझते हैं।
  • प्राचीन काल तथा मध्यकाल में धर्म तथा राज्य आमतौर पर अविभाज्य थे। आधुनिक राज्य आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष हैं। धर्म तथा. राज्य की गतिविधियों के क्षेत्र अलग-अलग हैं।

आधुनिक समय में धर्म में निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ तेजी से विकसित हो रही है –

  • धर्म रूढ़ियों, परंपराओं तथा अनुष्ठानों आदि का महत्त्व कम हो रहा है।
  • धर्म में मानवतावाद की प्रवृत्ति का उदय हो रहा है।
  • धर्म में लौकिकीकरण तथा तर्कबाद की प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं।
  • धार्मिक क्रियाओं, पद्धतियों तथा अनुष्ठानों का संक्षिप्तीकरण हो रहा है।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि नवीन धार्मिक मान्यताओं, विचारधाराओं तथा प्रवृत्तियों ने धर्म के प्रभाव को कुछ सीमित किया है लेकिन वैज्ञानिक खोजों के कारण मानवजाति के संपूर्ण विनाश के भय ने तथा आते-भौतिकवादी प्रवृत्तियों के नकारात्मक परिणामों ने व्यक्तियों का रुझान आध्यात्मिक शांति तथा धर्म की ओर पुनः आकर्षित किया है। धार्मिक असहिष्णुता, संकीर्णता तथा धार्मिक कट्टरता ने राष्ट्रीय स्तर पर तनाव भी उत्पन्न किया है।

प्रश्न 17.
धर्म और संस्कृति के संबंधों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि धर्म संस्कृति का अभिन्न अंग है तथापि यह संस्कृति के अधिकांश तत्त्वों को प्रभावित करने की स्वायत्त शक्ति रखता है। यह व्यक्तियों की संपूर्ण जीवन पद्धति को प्रभावित करता है। धर्म के अंतर्गत अभौतिक तथा भौतिक दोनों ही सांस्कृतिक तत्त्व सम्मिलित होते हैं। धर्म के अभौतिक पक्षों में रहस्मयी सर्वोच्च शक्ति, आत्मा का देहांतरण तथा पवित्र और उपवित्र की धारण सम्मिलित होती है। धर्म के भौतिक पक्ष में धार्मिक क्रियाएँ तथा अनुष्ठान सम्मिलित होते हैं।

हॉबल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है।” टालयर ने संस्कृति की व्यापक परिभाषा देते हुए लिखा है कि “संस्कृति वह संश्लिष्ट अभियोजना है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा सभी तरह की क्षमताएं तथा आदतें जो . व्यक्ति समाज के एक सदस्य के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

धर्म का संस्कृति पर प्रभाव – धर्म संस्कृति के अनेक तत्त्वों को प्रभावित करता है । सभी धर्मों में आस्था, अलौकिक शक्ति में विश्वास, ईश्वर की पूजा तथा पवित्र व अपवित्र जैसे सामान्य तत्त्व पाए जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 18.
धर्म के अकार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म के सकारात्मक पहलू के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी हैं। धर्म रूढ़िवादी प्रवृत्ति के कारण प्रगति की धारा में अवरोध उत्पन्न करता है। धर्म के लिए निम्नलिखित अकार्य किए जाते हैं –
(i) धर्म परंपरागत सामाजिक रूढ़ियों को मान्यता देता है, जिससे प्रगतिवादी विचारों का विकास नहीं हो पाता है।

(ii) धर्म मनुष्य को भाग्यवादी बना देता है। व्यक्ति संसार को मिथ्या समझने लगता है। भाग्यवादी होने के कारण व्यक्ति परिश्रम नहीं करते हैं। यही कारण है कि प्रसिद्ध साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने धर्म को जनता की अफीम कहा है।

(iii) भाग्यवादिता के कारण व्यक्ति कार्य तथा कारण में संबंधस स्थापित नहीं कर पाते हैं। ब्लैकमार तथा गिलिन के अनुसार, “धर्म की कट्टरता तथा हठधर्मिता ने बार-बार सत्य की में बाधा पहुंचाई है तथा जिज्ञासु व्यक्तियों को तथ्यों के अन्वेषण करने से रोका है। इसने विज्ञान की प्रगति को अवरुद्ध किया। विद्वानों तथा स्वतंत्र खोज में धर्म ने हस्तक्षेप किया तथा आम जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का दमन किया।

(iv) धर्म तर्क तथा विज्ञान का विरोध करता है। हैरी एल्मर बार्स के अनुसार, “जबकि रूढ़िवादी धर्म एवं आधुनिक विज्ञान के मध्य परस्पर विरोधी संघर्ष है…..।” यही कारण है कि म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11999 कोपरनिकस तथा गैलीलियो को अपनी खोजों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। गैलीलियों को धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध अपनी बात कहने के कारण फाँसी दी गई। धार्मिक मान्यताओं के चलते डार्विन तथा हक्सले की खोजों को मिथ्या सिद्ध करने का प्रसार किया गया।

(v) धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता, हठधर्मिता तथा अलगाव के कारण समाज में विघटनकारी शक्तियों के ताने-बाने ने अत्यधिक हानि पहुँचाई है। धार्मिक उन्माद मनुष्य को तर्कशून्य बना देता है।

प्रश्न 19.
शिक्षा की परिभाषा दीजिए। शिक्षा के सांगठनिक स्वरूप का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनुष्य को जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार, शिक्षा के माध्यम से पुरानी पीढ़ी द्वारा अपने ज्ञान को नयी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है । प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम का मत है कि “शिक्षा का ऐसा प्रभाव है जिसका उपयोग पुरानी पीढ़ी उस पीढ़ी पर करती है जो अभी वयस्क जीवन के लिए तैयार नहीं है।” शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में उन शारीरिक बौद्धिक तथ नैतिक दशाओं को विकसित एवं जागृत करना है जिसकी अपेक्षा उससे संपूर्ण समाज तथा तात्कालिक सामाजिक पर्यावरण द्वारा की जाती है

शिक्षा की परिभाषा –
पैस्टालॉली के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरस तथा प्रगतिशील विकास है।” एस. एस. मैकेंजी के अनुसार, “अपने व्यापक अर्थ में, यह (शिक्षा) एक प्रक्रिया है जो जीवन-पर्यंत चलती रहती है तथा जीवन के प्रत्येक अनुभव से वृद्धि होती है।” बोगार्डस के अनुसार, “सांस्कृतिक विरासत तथा जीवन के अर्थ को ग्रहण करना ही शिक्षा है।” महात्मा गाँधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन तथा आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है।”

स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही विद्यमान संपूर्णता का प्रकटीकरण है।” अमेरिका के सेकेंड्री स्कूल पुनर्गठन आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार, “शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान, रुचियों, आदर्शों, आदतों तथा शक्तियों का विकास करना है जिससे उसे अपना स्थान मिलेगा तथा वह उस स्थान का प्रयोग स्वयं तथा समाज को बनाने में श्रेष्ठ उद्देश्य हेतु करेगा।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शिक्षा द्वारा बालक की जन्मजात शक्तियों का पूर्ण विकास किया जाता है। शिक्षा द्वारा बालक को वास्तविक जीवन के लिए तैयार किया जाता है . शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तिव का सर्वांगीण विकास करना है।

शिक्षा के मुख्य उद्देश्य –

  • ज्ञान
  • सांस्कृतिक विकास
  • चरित्र निर्माण
  • शारीरिव विकास
  • आत्म-अभिव्यक्ति
  • अवकाश का सदुपयोग।

शिक्षा का सांगठनिक स्वरूप – शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं तथा प्रत्येक स्तर का / एक सांगठनिक ढांचा है –
(i) प्रारंभिक स्तर-प्रारंभिक स्तर के निम्नलिखित दो स्तर है –

  • प्राथमिक स्तर-कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर-कक्षा 6 से 8 तक।

(ii) माध्यमिक स्तर-माध्यमिक स्तर के निम्नलिखित दो स्तर हैं –

  • माध्यमिक स्तर-कक्षा 9 से 10 तक।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर-कक्षा 11 से 12 तक।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर – इसके अंतर्गत विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 20.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 ई. की प्रमुख विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर:
1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्ष के राष्ट्रीय मूल्यों तथा आदर्शों का उल्लेख किया गया है। इस नीति के अंतर्गत समस्त देश के लिए एक समान शैक्षिक ढाँचे को स्वीकृत किया गया है तथा ज्यादातर राज्यों में 10+2+3 शिक्षा प्रणाली अपनाई गई है। 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निम्नलिखित उद्देश्यों पर विशेष बल दिया गया है:

(i) एक गतिशील तथा सुसंगठित राष्ट्र के निर्माण हेतु शिक्षा के माध्यम से भारतीयों में ज्ञान, उद्देश्य की भावना और विश्वास का प्रसार करना।

(ii) शिक्षा का नियोजन इस प्रकार करना है कि वह सामाजिक तथा राजनीतिक विकास, गतिविधियों में वृद्धि, कल्याणकारी गतिविधियाँ, लोकतांत्रिक व्यवस्था, बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा सौंदर्यगत विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

(iii) देश में राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति पर बल दिया गया जिसका तात्पर्य था कि एक निश्चित स्तर तक सभी विद्यार्थियों को चाहे किसी भी जाति, वंश, स्थिति या लिंग के हों, गुणात्मक शिक्षा प्राप्त हो।

(iv) राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड को प्रस्तावित किया गया जिसमें इस आवश्यकता पर बल दिया गया कि एक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम –

  • दो बड़े कमरे हों तथा जो प्रत्येक मौसम में प्रयोग में लाए जा सकें।
  • आवश्यक खिलौने तथा खेल का समान हों।
  • श्यामपट्ट हों।
  • मानचित्र, चार्ट तथा अन्य अध्ययन का समान हो।

(v) राष्ट्रीय नीति में समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया। स्त्रियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षाणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा भारतीय समाज के अल्पसंख्यकों से शैक्षणिक अवसरों की समानता का वायदा किया गया।

(vi) नीति में शिक्षा प्रणाली को इस प्रकार पुनर्गठित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया जिससे संविधान में वर्णित भारतीय जनता की आकांक्षाओं के अनुसार एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सके जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय तथा अवसरों की समानता पर आधारित हो।

(vii) शिक्षा के माध्यम से वैज्ञानिक, नैतिक तथा विवेकपूर्ण सामाजिक मूल्यों में वृद्धि पर बल दिया गया।

(viii) नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास, मूल्यबोध, राष्ट्रीय एकीकरण, सांप्रदायिक तथा जातिगत विभाजन के खतरों तथा भारत की मिली-जुली संस्कृति से परिचित कराना।

(ix) व्यावसायिक शिक्षा का प्रबंध करना जिससे विद्यार्थी हाथ से काम करने के महत्त्व को समझ सके।

(x) छात्रों में अतीत तथा वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में जागरुकता उत्पन्न करना जिससे कि उनमें अपनी क्षमताओं के प्रति विश्वास हो, राष्ट्र की उपलब्धियों के प्रति गौरव की अनूभूति हो। 1992 ई. से 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा की समीक्षा की गई तथा कहा गया कि इस नीति के पुनर्गठन की आवश्यकता नहीं है। 1992 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में “ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड” को उच्च प्राथमिक स्तर तक बढ़ाने की योजना बनाई गई तथा प्रत्येक विद्यालय में कम-से-कम तीन कमरों का प्रावधान किया गया।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 21.
शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
विभिन्न दार्शनिकों, समाज-सुधारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के विभिन्न उद्देश्य बताए हैं। प्रसित्र समाजशास्त्री गिलीन तथा गिलीन ने शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं –

  • भाषा लिखने, बोलने एवं व्याकरण तथा गणित का ज्ञान देना।
  • जटिल संस्कृति को समझने हेतु ज्ञान देना।
  • बच्चे में सामाजिक अनुकूलन की क्षमता पैदा करना।
  • आर्थिक अनुकूलन की ट्रेनिंग देना।
  • सांस्कृतिक सुधार एवं वृद्धि में सहायता प्रदान करना।

पं. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “शिक्षा द्वारा मानव का एकीकृत विकास किया जाता है तथा नवयुवकों को समाज के लिए तैयार किया जाता है तथा नवयुवकों को समाज के लिए उपयोगी कार्य करने तथा सामूहिक जीवन में भाग लेने के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन जब समाज में दिन-प्रतिदिन परिवर्तन हो रहे हों, यह जानना काफी कठिन है कि नवयुवकों को किस प्रकार तैरूार किया जाए तथा क्या लक्ष्य हों।”

प्रत्येक समाज के अपने मूल्य, आदर्श, संस्कृति, परंपराएं, विरासत तथा विचारधाराएँ होती हैं तथा शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण भी इन्हीं के अनुसार होता है। शिक्षा के कुछ उद्देश्य तो सार्वभौम होते हैं तथा कुछ उद्देश्य स्थानीय आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों के अनुसार होते हैं।

शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
(i) ज्ञान प्रदान करना-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है इसका तात्पर्य है बालक का मानसिक विकास करना। अपने व्यापक अर्थ में ज्ञान प्रदान करने का तार्य है कि मानसिक शक्तियों जैसे चिंतन, तर्क निर्णय आदि का समुचित तथा संतुलित विकास करना। वस्तुतः ज्ञान मानसिक विकास के लिए होता है न कि ज्ञान-ज्ञान के लिए।

(ii) सांस्कृतिक विकास-कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि शिक्षा का उद्देश्य सांस्कृतिक विकास करना अर्थात् व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाना है। महात्मा गाँधी के अनुसार, “संस्कृत प्रारंभिक वस्तु का आधार है। यह आपके व्यवहार के छोटे-से-छोटे हिस्से में परिलक्षित होनी चाहिए।”

(iii) चरित्र निर्माण-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण है। चरित्र का तात्पर्य है कि व्यक्ति में आंतरिक स्थायित्व तथा शक्ति का समुचित विकास हो। व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों का समुचित सामाजिकरण ही शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा के विभिन्न नैतिक गुणों जैसे प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, बलिदान तथा सामाजिक सेवा आदि का सशक्त माध्यम है।

(iv) सर्वांगीण विकास-शिक्षा का उद्देश्य बालक का मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक विकास करना है। महात्मा गाँधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन तथा आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है।”

(v) सामाजिक अनुकूलन की क्षमता विकसित करना-शिक्षा के माध्यम से बालक सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करना सीखता है। लैंडिस के अनुसार, “चूँकि शिक्षा आरंभ से ही कार्य करना प्रारंभ कर देती है तथा यह अभिवृत्तियों व मूल्यों को अत्यधिक प्रभावित करती है, अतः यह सामाजिक नियंत्रण के अन्य प्रकारों की तुलना में अधिक सफल होती है।”

(vi) आत्म-अभिव्यक्ति-आत्म-अभिव्यक्ति का तात्पर्य है कि बालक का विकास स्वतंत्र रूप से उसकी रुचियों, प्रवृत्तियों तथा क्षमताओं के अनुरूप होना चाहिए। आत्म-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सामाजिक नियंत्रण के मापदंडों के दायरे में होनी चाहिए।

(vii) आत्म अनुभूति-शिक्षा का उद्देश्य बालक में ऐसी भावनाओं का विकास करना है जिससे वह उच्च नैतिक गुणों तथा आध्यात्मिक विचारों को प्राप्त कर सके। आत्म-अनुभूति का तात्पर्य है कि प्रकृति तथा मनुष्य को समझना एवं उनके मध्य अंतर्संबंध स्थापित करना। एक प्रजातांत्रिक देश में शिक्षा के उद्देश्य-कोठारी आयोग के द्वारा शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए गए हैं –

  • उत्पादकता में वृद्धि करन
  • सामाजिक तथा राष्ट्रीय एकता का विकास करना
  • लोकतंत्र को सुदृढीकरण करना
  • राष्ट्र का आधुनिकीकरण करना
  • सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास

प्रश्न 22.
क्या शिक्षा का निजीकरण होना चाहिए? अपने विचार दीजिए।
उत्तर:
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु विकासोन्मुखी शिक्षा नीति अपरिहार्य है। शिक्षा का सार्वभौम उद्देश्य व्यक्तित्व तथा चरित्र का संतुलित विकास करना है जिससे सामाजिक विकास की धारा निर्वाध रूप से चलती रहे।

विकासशील देशों के सामने दो चुनौतियाँ प्रमुख हैं –

  • साक्षरता में वृद्धि करना
  • सर्वशिक्षा अभियान

सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु से सभी बच्चों को सन् 2010 ई. तक प्रारंभिक शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद में 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट कहा गया है कि –
(i) एक निश्चित स्तर तक सभी विद्यार्थियों को चाहे वे किसी भी जाति, वंश, स्थिति और लिंग के हों, गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए।

(ii) समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए। स्त्रियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा भारतीय समाज के असंख्यकों से शैक्षिक अवसरों की समानता का वायदा किया गया।

शिक्षा के उद्देश्यों के संदर्भ में हमारा मूल प्रश्न यह है कि शिक्षा के निजीकरण द्वारा इन उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है अथवा नहीं –

(i) शिक्षा के निजीकरण के अंतर्गत शिक्षण संस्थाओं का प्रबंधन तथा प्रशासन निजी संस्थाओं अथवा व्यक्तिगत उद्यमियों के नियंत्रण में होगा।

(ii) विचारणीय प्रश्न यह है कि निजीकरण के माध्यम से शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है ?

(iii) समाज के कमजोर वर्गों, स्त्रियों, अनुसूचित जाति, ग्राम्य समुदायों, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की शिक्षा हेतु प्रयास की दिशा क्या होगी जबकि शिक्षा बाजार के लाभ-हानि के सिद्धांत पर संचालित की जाएगी।

(iv) भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक असमानता है निजीकरण से यह असमानता और बढ़ेगी। अनेक समाज-सुधारक तथा शिक्षाशास्त्री वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर अभिजात्य होने का आरोप लगाते हैं। यदि ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा का निजीकरण कर दिया गया तो शिक्षा संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बन जाएगी।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हमारे देश की परिस्थितियों में शिक्षा के निजीकरण का परिणाम होगा –

  • शिक्षा के सार्वभौमिकरण की प्रक्रिया में बाधा आएगी।
  • कमजोर, वर्गों, जनजातीय तथा सुदूर पहाड़ी इलाकों तथा ग्राम्य समुदायों में शिक्षा का प्रसार अवरुद्ध हो जाएगा।
  • शिक्षा संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी।
  • देश के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विकास में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा।
  • राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न होगी।

अंततः हम कह सकते हैं कि हमारे देश में शिक्षा का पूर्ण निजीकरण शिक्षा की प्रक्रिया को जनसाधारण से दूर कर देगा। भारत एक कल्याणकारी राज्य है, अतः सरकार का पुनीत कर्त्तव्य है शिक्षा के माध्यम से ज्ञान रूपी प्रकाश जन-जन तक पहुँचाए ।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 23.
समाज में धर्म के संगठन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सभी धर्मों में कोई-न-कोई संगठनात्मक स्वरूप अवश्य पाया जाता है। धार्मिक संगठनों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है
(i) सदस्यता की प्रकृति –

  • अनिवार्य तथा
  • ऐच्छिक

(ii) धार्मिक समूहों का अन्य धार्मिक समूहों के प्रति दृष्टिकोण-एक धार्मिक समूह का दृष्टिकोण दूसरे धार्मिक समूह के प्रति दो प्रकार का हो सकता है –

  • उदार तथा
  • अनुदार

(iii) धर्मांतरण –

  • धर्मोतरण की आज्ञा तथा
  • धर्मांतरण का न होना।

(iv) धार्मिक समूह के संगठन की प्रकृति –

  • नमनीय तथा
  • अनमनीय

(v) पुरोहितों की भूमिक –

  • साधारण सदस्यों के हितों के लिए पुरोहितों की आवश्यकता।
  • साधारण सदस्यों के हितों के लिए पुराहितों की आवश्यकता न होना।

धार्मिक समूहों में संगठन की दृष्टि से रोमन कैथोलिक चर्च सबसे अधिक संगठित धार्मिक समूह है –

  • संपूर्ण विश्व के रोमन कैथोलिक चर्च का प्रधान पोप है, जो वेटिकन सिटी (रोम) में रहता है।
  • रोमन कैथोलिक चर्च में विश्व स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक पदसोपानक्रम पाया जाता है।
  • इसमें नौकरशाही जैसी संरचना पायी जाती है।

ईसाई धर्म में दो प्रमुख पंथ हैं –

  • कैथोलिक तथा
  • प्रोटेस्टेंट

पंथ की सदस्यता ऐच्छिक होती है तथा ये साधारणतया स्वयंसेवी समूह के रूप में कार्य करते हैं। पंथ पारस्परिक भाईचारी, समान उद्देश्य तथा समानता की भावना पर आधारित होते हैं। अन्य धार्मिक समूहों के प्रति असहिष्णुता के बावजूद पंथों का आंतरिक संगठन आमतौर पर लोकतांत्रिक होता है।

(ii) धार्मिक संप्रदाय – धार्मिक संप्रदाय अवयव कल्ट का निर्माण किसी विशिष्ट व्यक्ति की विचारधारा तथा चिंतन के परिणामस्वरूप होता है। समान विचार रखने वाले व्यक्तियों द्वारा इसका अनुसरण किया जाता है। कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए किसी अन्य धर्म में आस्था रख सकता है। पंथ की तुलना में संप्रदाय का आकार छोटा है तथा इसका जीवन भी कम होता है। वर्तमान समय में भारत में साईं बाबा तथा जयगुरुदेव आदि धार्मिक संप्रदाय हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समुदाय को परिभाषित करनेवाला आवश्यक कारक है …………………..
(अ) सामान्य प्रथाएँ
(ब) सामान्य भाषा
(स) सामान्य धर्म
(द) सामान्य मात्रा
उत्तर:
(द) सामान्य मात्रा

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन समिति का उदाहरण नहीं है?
(अ) कॉलेज का छात्रावास
(ब) केन्द्रीय लोक सेवा आयोग
(स) गुप्त मतदान प्रणाली।
(द) भारतीय क्रिकेट टीम
उत्तर:
(ब) केन्द्रीय लोक सेवा आयोग

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 3.
संघ के सदस्यों के बीच संबंध होते हैं ……………………..
(अ) बाहरी और स्थायी
(ब) भतरी और अस्थायी
(स) अन्तः संबंध एवं अस्थायी
(द) अन्तः संबंध तथा स्थायी
उत्तर:
(स) अन्तः संबंध एवं अस्थायी

प्रश्न 4.
खर्चे और बचत की आदतें बनती है …………………….
(अ) सांस्कृतिक रूप से
(ब) लघु अस्थायी अन्त:क्रिया से
(स) दार्शनिक रूप से
(द) मनोवैज्ञानिक रूप से
उत्तर:
(स) दार्शनिक रूप से

प्रश्न 5.
सामाजिक संस्था ‘नैसर्गिक’ है तो वह है …………………….
(अ) वर्ग
(ब) परिवार
(स) राजनैतिक दल
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) राजनैतिक दल

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र में संस्था के रूप में परिभाषित है?
(अ) समुदाय
(ब) विवाह
(स) समाज
(द) व्यक्ति
उत्तर:
(स) समाज

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 7.
भारत में अल्पायु समूह में लड़कियों का मृत्युदर लड़कों से ज्यादा है …………………..
(अ) ज्यादा
(ब) कम है
(स) निश्चित अनुपात में है
(द) अनिश्चित अनुपात में है
उत्तर:
(स) समाज

प्रश्न 8.
किस परिवार शास्त्री का मानना है? परिवार पति, पत्नी का बच्चों सहित अथवा बिना बच्चों का एक संघ है ………………….
(अ) मेकाइवर
(ब) एण्डरसन
(स) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(द) किंग्सले
उत्तर:
(अ) मेकाइवर

प्रश्न 9.
ऐसा परिवार जो स्त्री अथवा माता के विकास स्थान पर बसता है उसे क्या कहते हैं?
(अ) मातृ स्थानीय
(ब) मातृवंशीय
(स) मातृसत्तात्मक
(द) पितृस्थानीय
उत्तर:
(अ) मातृ स्थानीय

प्रश्न 10.
विवाह के रूप में होते हैं …………………..
(अ) दो
(ब) तीन
(स) पाँच
(द) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(अ) दो

प्रश्न 11.
समाजशास्त्री एम. एम. साह का कथन है कि स्वतंत्रता के बाद संयुक्त परिवार में …………………
(अ) निरंतर कमी हुई है
(ब) रूक-रूक वृद्धि हुई है
(स) रूक-रूक कर कमी हुई
(द) निरंतर वृद्धि हुई है
उत्तर:
(द) निरंतर वृद्धि हुई है

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 12.
निम्न में कौन-सा समाज नहीं है ………………
(अ) आर्यसमाज
(ब) ब्रह्म समाज
(स) प्रार्थना समाज
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
संस्था की अवधारणा किसने दिया था?
(अ) हेर्वटस्पेंसर
(ब) कॉर्ल मार्क्स
(स) मैक्स वेबर
(द) वीरकान्त
उत्तर:
(अ) हेर्वटस्पेंसर

प्रश्न 14.
मॉर्गन के अनुसार पविार की प्रथम अवस्था की ………………….
(अ) पुनालुअन परिवार
(ब) एक विवाही परिवार
(स) समरक्त परिवार
(द) सिण्डस्मियन परिवार
उत्तर:
(स) समरक्त परिवार

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5 Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 1.
उपयुक्त सर्वसमिकाओं का प्रयोग करके निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए
(i) (x + 4) (x + 10)
(ii) (x + 8) (x – 101
(iii) (3x + 4) (3x – 5)
(iv) (y² + \(\frac{3}{2}\)) (y² – \(\frac{3}{2}\))
(v) (3 – 2x) (3 + 2x),
उत्तर:
(i) सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x² + (a + b) x + ab को लागू करने पर,
(x + 4) (x + 10) = x² + (4 + 10) x + (4) (10)
= x² + 14x + 40

(ii) सर्वसमिका (x + a)(x + b) = x² + (a + b) x + ab को लागू करने पर,
(x + 8)(x – 10) = x² + [8 + (-10)] x + (8) (-10)
= x² – 2x – 80

(iii) सर्वसमिका (x + a) (x + b) = x² + (a + b) x + ab को लागू करने पर,
(3x + 4)(3x – 5) = (3x)² + [4 + (-5)] x + (3x) + (4) (-5)
= 9x² – 3x – 20

(iv) सर्वसमिका (x + a) (x – a) = x² – a² को लागू करने पर,
(y² + \(\frac{3}{2}\)) (y² – \(\frac{3}{2}\)) = (y²)² – (\(\frac{3}{2}\))²
= y4 – \(\frac{9}{4}\)

(v) सर्वसमिका (x + a) (x – a) = x² – a² को लागू करने पर,
(3 – 2x) (3 + 2x) = 3² – (2x)²
= 9 – 4x²

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 2.
सीधे गुणा किए बिना निम्नलिखित गुणनफालों के मान ज्ञात कीजिए
(i) 103 × 107
(ii) 95 × 96
(iii) 104 × 96.
उत्तर:
(i) 103 × 107 = (100 + 3) × (100 + 7)
= (100)² + (3 + 7) (100) + (3) (7)
(∵ सर्वसमिका (x + a) (x + b)
= x² + (a + b) x + ab)
= 10000 + 1000 + 21
= 11021.

(ii) 95 × 96 = (100 – 5) × (100 – 4)
(100)² + [(-5) + (-4)] (100) + (-5) (-4)
(∵ सर्वसमिका (x + a) (x + b)
= x² + (a + b) x + ab)
= 10000 – 900 + 20
= 91210.

(iii) 104 × 96 = (100 + 4)(100 – 4)
= (100)² -(4)²
(∵सर्वसमिका (x + a) (x + a) = x² – a²)
= 10000 = 16
= 9984.

प्रश्न 3.
उपर्युक्त सर्वसमिकाएं प्रयोग करके निम्नलिखित का गुणनखण्ड कीजिए
(i) 9x² + 6xy + y²
(ii) 4y² – 4y + 1
(iii) x² – \(\frac{y^2}{100}\)
उत्तर:
(i) 9x² + 6xy + y²
सर्वमिका, x² + 2xy + y² = (x + y)² लागू करने पर,
9x² + 6xy + y² = (3x)² + 2(3x)(y) + y²
= (3x + y)²

(ii) 4y² – 4y + 1
सर्वसमिका x² – 2xy + y² = (x – y)² लागू करने पर,
4y² – 4y + 1 = (2y)² – 2(2y)(1) + 1²
= (2y – 1)²

(iii) x² – \(\frac{y^2}{100}\)
कार्यसमिका, x² – y² = (x + y) (x – y) लागू करने पर,
x² – (\(\frac{y}{10}\))² = (x + \(\frac{y}{10}\)) = (x – \(\frac{y}{10}\))²

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 4.
उपर्युक्त सर्वसमिकाओं का प्रयोग करके निम्नलिखित में से प्रत्येक का प्रसार कीजिए
(i) (x + 2y + 4z)²
(ii) (2x – y + z)²
(iii) (-2x + 3y + 2z)²
(iv) (3a – 7b – c)²
(v) (-2x + 5y – 3z)²
(vi) [\(\frac{1}{4}\)a – \(\frac{1}{2}\)b + 1]²
उत्तर:
(i) (x + 2y + 4z)²
सर्वसमिका (x + y + z)² = x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2zx लागू करने पर
(x + 2y + 4z)² = x² + (2y)² + (4z)² + 2(x)2(y) (2(2y) (4y) + 2(4z) (x)
= x² + 4y² + 16z² + 4xy + 16yz + 8xz

(ii) (2x – y + z)²
सर्वसमिका (x + y + z)² = x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2zx लागू करने पर
(2x – y + z)² = (2x)² + (-y)² + z² + 2(2x) (-y) + 2(-y) (z) + 2(2x) z
= 4x² + y² + z² – 4xy – 2yz + 4xz

(iii) (-2x + 3y +2z)²
सर्वसमिका (x + y + z)² = x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2zx लागू करने पर
(-2x + 3y + 2z)² = (-2x)² + (3y)² + (2z)² + 2(-2x) (3y) + 2(3y) (2z) + 2(2z)(-2x)
= 4x² + 9y² + 4z² – 12xy + 12yz – 8xz

(iv) (3a – 7b – c)²
सर्वसमिका (x + y + z)² = x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2zx लागू करने पर
(3a + 7b + c)² = (3a)² + (-7b)² + (-c)² + 2(3a) (-7b) + 2(-7b) (-c) + 2(3a)(-c)
= 9a² + 49b² + c² – 42ab + 14bc – 6ac

(v) (-2x + 5y – 3z)²
सर्वसमिका (x + y + z)² = x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2zx लागू करने पर
(-2x + 5y – 3z)² = (-2x)² + (5y)² + (-3z)² + 2(-2x) (5y) + 2(5y) (-3z) + 2(-3z)(-2x)
= 4x² + 25y² + 9z² – 20xy – 30yz + 12xz

(vi) [\(\frac{1}{4}\)a – \(\frac{1}{2}\)b + 1]²
सर्वसमिका (x + y + z)² = x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2zx लागू करने पर
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 5.
गुणनखण्ड कीजिए
(i) 4x² + 9y² + 16z² + 12xy – 24yz – 16xz
(ii) 2x² + y² + 8z² – 2√2 xy + 4√2 yz – 8xz.
उत्तर:
(i) 4x² + 9y² + 16z² + 12xy – 24yz – 16xz
= (2x)² + (3y)² + (-4z)² + 2 (2x) (3y) + 2(3y)(-4z) + 2(-4z)(2x)
= (2x + 3y – 4z)²
[∵ x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2z = (x + y + z)²]

(ii) 2x² + y² + 8z² – 2√2 xy + 4√2 yz – 8xz.
= (-√2x)² + y² + (2√2z)² + 2(-√2x)(y) + 2(y) (2√2 z) +2 (-√2x) (2√2z)
= (-√2x + y + 2√z)²
[∵ x² + y² + z² + 2xy + 2yz + 2z = (x + y + z)²]

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 6.
निम्नलिखित धनों को प्रसारित रूप में लिखिए
(i) (2x + 1)³
(ii) (2a – 3b)³
(iii) [\(\frac{3}{2}\)x + 1]³
(iv) [x – \(\frac{2}{3}\)y]³
उत्तर:
(i) (2x + 1)³ = (2x)³ + (1)³ + 3(2x) (1) (2x + 1)
सर्वसमिका (a + b)³ = a³ + b³ + 3ab (a + b) से]
= 8x³ + 1 + 6x (2x + 1)
= 8x³ + 12x² + 6x + 1.

(ii) (2a – 3b)³ = (2a)³ – (3b)³ – 3(2a) (3b) (2a – 3b)
सर्वसमिका (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab (a – b) से]
= 8a³ – 27b³ – 18ab (2a – 3b)
= 8a³ – 36a²b + 54ab² – 27b³

(iii) [\(\frac{3x}{2}\) x + 1]³
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5
[सर्वसमिका (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab (a – b) से]
= x³ – \(\frac{8}{27}\) y³ – 2xy (x – \(\frac{2}{3}\) y)
= x³ – 2x²y + \(\frac{4}{3}\) xy² – \(\frac{8}{27}\) y³

प्रश्न 7.
उपयुक्त सर्वसमिकाएँ प्रयोग करके निम्नलिखित के मान ज्ञात कीजिए
(i) (99)³
(ii) (102)³
(iii) (998)³
उत्तर:
(i) (99)³ = (100 – 1)³
= (100)³ – (1)³ – 3(100) (1) (100 – 1)
[∵ (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab(a – b)]
= 1000000 – 1 – 300 (100 – 1)
= 1000000 – 1 – 30000 + 300
= 970290

(ii) (102)³ = (100 + 2)³
= (100)³ + (2)³ + 3(100) (2) (100 + 2)
[∵ (a + b)³ = a³ + b³ + 3ab(a + b)]
= 1000000 + 8 + 300 (100 + 1)
= 1000000 + 8 + 60000 + 1200
= 1061208

(iii) (998)³ = (1000 – 2)³
= (1000)³ – (2)³ – 3(1000) (2) (1000 – 1)
[∵ (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab(a – b)]
= 1000000000 – 8 – 6000 (1000 – 2)
= 1000000000 – 8 – 6000000 + 12000
= 994011992

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से प्रत्येक का गुणनखण्ड कीजिए-
(i) 8a³ + b³ + 12a²b + 6ab²
(ii) 8a³ – b³ – 12a²b + 6ab²
(iii) 27 – 125a³ – 135a + 225a²
(iv) 64a³ – 27b³ – 144a²b + 108ab²
(v) 27p³ – \(\frac{1}{216}\) – \(\frac{9}{2}\)p² + \(\frac{1}{4}\)p.
उत्तर:
(i) 8a³ + b³ + 12a²b + 6ab²
= (2a)³ +(b)³ + 6ab (2a + b)
= (2a)³ + (b)³ + 3(2a) (b) (2a + b)
[∵ a³ + b³ + 3ab(a + b) = (a + b)³]
= (2a + b)³

(ii) 8a³ – b³ – 12a²b + 6ab²
(2a)³ – (b)³ – 3 × 2a × b (2a – b)
[सर्वसमिका (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab(a – b)से]
= (2a – b)³.

(iii) 27 – 125a³ – 135a + 225a²
= (3)³ – (5a)³ – 3 × 3 × 5a(3 – 5a)
[सर्वसमिका (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab(a – b)से]
= (3 – 5a)³.

(iv) 64a³ – 27b³ – 144a²b + 108ab²
= (4a)³ – (3b)³ – 3 × 4a × 3b (4a – 3b)
[सर्वसमिका (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab (a – b) से]
= (4a – 3b)³

(v) 27p³ – \(\frac{1}{216}\) – \(\frac{9}{2}\)p² + \(\frac{1}{4}\)p.
= (3p)³ – (\(\frac{1}{6}\))³ – 3 × 3p × \(\frac{1}{6}\) (3p – \(\frac{1}{6}\))
[सर्वसमिका (a – b)³ = a³ – b³ – 3ab (a – b) से]
(3p – \(\frac{1}{6}\))

प्रश्न 9.
सत्यापित कीजिए
(i) x³ + y³ = (x + y) (x² – xy + y²)
(ii) x³ – y³ = (x – y) (x² + xy + y²)
उत्तर:
(i) हम जानते हैं कि,
(x + y)³ = x³ + y³ + 3xy (x + y)
⇒ बायाँ पक्ष x³ + y³ = (x + y)³ – 3xy (x + y)
= (x + y) [(x + y)² – 3xy]
= (x + y) [x² + y² + 2xy – 3xy]
= (x + y) (x² + y² – xy)
= (x + y) (x² – xy + y²) = दायाँ पक्ष।

(ii) हम जानते है कि,
(x – y)³ = x³ – y³ – 3xy (x – y)
⇒ बायाँ पक्ष x³ – y³ = (x – y)³ + 3xy (x – y)
= (x – y) [(x – y)² + 3xy]
= (x – y) [x² + y² – 2xy + 3xy]
= (x – y) (x² + y² + xy)
= (x – y) (x² + xy + y²) = दायाँ पक्ष।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से प्रत्येक का गुणनखण्ड कीजिए.
(i) 27y³ + 125z³
(ii) 64m³ – 343n³.
उत्तर:
(i) 27y³ + 125z³ = (3y)³ + (5z)³
= (3y + 5z)[(3y)² + (5z)² – (3y) (5z)]
[∵ x³ + y³ = (x + y) (x² + y² – xy)]
= (3y + 5z) (9y² + 25z² – 15yz)

(ii) 64m³ – 343n³ = (4m)³ – (7n)³
= (4m – 7n)[(4m)² + (7n)² + (4m) (7n)]
[∵ x³ – y³ = (x + y) (x² + y² + xy)]
= (4m – 7n) (16m² + 49n² + 28mn)

प्रश्न 11.
गुणनखण्ड कीजिए-
27x³ + y³ + z³ – 9xyz.
उत्तर:
27x³ + y³ + z³ – 9xyz
= (3x)³ + y³ + z³ – 3 (3x) (y) (z)
= (3x + y + z) [(3x)² + y² + z² – 3xy – yz – 3xz]
[∵ x³ + y³ + z³ = (x + y + z)(x² + y² + z² – xy + yz + zx)]
= (3x + y + z) (9x² + y² + z² – 3xy – yz – 3xz]

प्रश्न 12.
सत्यापित कीजिए-
x³ + y³ + z² – 3xyz = \(\frac{1}{2}\) (x + y + z) (x – y)² + (y – z)² + (z – x)²
उत्तर:
बार्यो पक्ष = x³ + y³ + z² – 3xyz
= (x + y + z) (x² + y² + z² – xy – yz – zx)
= \(\frac{1}{2}\) (x + y + z) (2x² + 2y² + 2z² – 2xy – 2yz – 2zx)
= \(\frac{1}{2}\) (x + y + z) (x² + x² + y² + y² + z² + z² – 2xy – 2yz – 2zx)
= \(\frac{1}{2}\) (x + y + z) ([x² + y² – 2xy] + [y² + z² – 2yz] + [z² + x² – 2zx])
= \(\frac{1}{2}\) (x + y + z) [(x – y)² + (y – z)² + (z – x)²]
= दायाँ पक्ष इति सिद्धम्।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 13.
यदि x + y + z = 0 हो, तो दिखाइए कि x³ + y³ + z³ = 3xyz है।
उत्तर:
हम जानते है कि,
x³ + y³ + z³ – 3xyz
= (x + y + z) (x² + y² + z² – xy – yz – zx)
प्रश्नानुसार x + y + z = 0 है,
तो. x³ + y³ + z³ – 3xyz = 0
अतः x³ + y³ + z³ = 3xyz

प्रश्न 14.
वास्तव में प्रनों का परिकलन किए बिना निम्नलिखित में से प्रत्येक का मान ज्ञात कीजिए-
(i) (-12)³ + (7)³ + (5)³
(ii) (28)³ + (-15)³ + (-13)³
उत्तर:
(i) (-12)³ + (7)³ + (5)³
⇒ हम जानते हैं कि यदि x + y + z = 0 है तो,
x³ + y³ + z³ = 3xyz होगा।
यहाँ x = -12, y = 7 तथा z = 5 है।
तो. x + y + z = -12 + 7 + 5 = 0
अतः (-12)³ + (7)³ + (5)³ = 3(-12) (7) (5)
= -1260

(ii) (28)³ + (-15)³ + (-13)³
⇒ हम जानते हैं कि यदि x + y + z = 10 है तो,
x³ + y³ + z³ = 3xyz होगा।
पह x = 28,y = -15 तथा z = -13 है
तो, x + y + z = 28 – 15 – 13 = 0
अत: (28)³ + (-15)³ + (-13)³
= 3(28) (-15)(-13)
= 16380

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

प्रश्न 15.
नीचे दिए गए आयतों, जिनमें उनके क्षेत्रफल दिए गए हैं, में से प्रत्येक की लम्बाई और चौड़ाई के लिए सम्भव व्यंजक दीजिए-
(i) क्षेत्रफल : 25a² – 35a + 12
(a) क्षेत्रफल : 35y² + 13y – 12
उत्तर:
(i) प्रश्नानुसार, क्षेत्रफल = 25a² – 35a + 12
= 25a² – 20a – 15a + 12
(मध्य पद को विभका करने पर)
= 5a (5a – 4)-3 (5a – 4)
= (5a – 4)(5a – 3)
अतः, आवता की लम्बाई के लिए सम्भव व्यंजक = 5a – 4
तथा, आयत की चौड़ाई के लिए सम्भव व्यंजक = 5a – 3.

(ii) प्रश्नानुसार, क्षेत्रफल = 35y² + 13y – 12
= 35y² + 28y – 15y – 12
(मध्य पद को विभका करने पर)
= 7y (5y + 4) -3 (5y + 4)
= (5y + 4) (7y – 3)
अतः आयत की लम्बाई के लिए सम्भव व्यंजक = 5y + 4
तथा, आयत की चौड़ाई के लिए सम्भव व्यंजक = 7y – 3.

प्रश्न 16.
घनाभों (Cuboids) जिनके आयतन नीचे दिए गए हैं, की विमाओं के लिए सम्भव व्यंजक क्या है?
(i) आयतन : 3x² – 12
(ii) आयतन : 12ky² + 8ky – 20k
उत्तर:
(i) प्रश्नानुसार, आयतन = 3x² – 12x
= 3x (x – 4)
अत: घनाभ की विमाओं के लिए सम्भव व्यंजक 3, x तथा (x – 4) हैं।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 2 बहुपद Ex 2.5

(ii) मनानुसार, आयतन = 12ky² + 8ky – 20k
= k (12y² + 8y – 20)
= k (12y² + 20 – 12y – 20)
= k [(4y (3y + 5) -4 (3y + 5)]
(मध्य पद को विभका करने पर)
= k (3y + 5) (4y – 4)
= 4k (3y + 5) (y – 1)
अत: घनाभ को विमाओं के लिए सम्भव व्यंजक 4k. (3y + 5) तथा (y – 1) हैं।

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science अधिकार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिकार क्या हैं? वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकता?
उत्तर:
अधिकार का अर्थ-अधिकार मनुष्य के सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं, जिनके अभाव में मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। जिस देश में नागरिकों को अधिकार प्राप्त नहीं होते, वहाँ के नागरिक अपना विकास नहीं कर सकते। राज्य द्वारा अपने नागरिकों को दिए अधिकारों को देखकर ही उस राज्य को अच्छा या बुरा कहा जा सकता है। अधिकारों की सृष्टि सामज में ही होती है और इनका आधार व्यक्ति और समाज का कल्याण करना है।

इसके सम्बन्ध में कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. लास्की: “अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं। जिनके बिना साधारणतः कोई मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता।”
  2. हालैंड: “अधिकार एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के कर्त्तव्यों को समाज के मन और शान्ति द्वारा प्रभावित करने की क्षमता है।”

अधिकार का महत्त्व –

  1. अधिकार से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।
  2. अधिकार से व्यक्ति के अन्दर पाई जाने वाली शक्तियों का विकास होता है।
  3. इससे व्यक्ति और समाज की उन्नति होती है।
  4. अधिकार सरकार को निरन्कुश बनने से रोकते हैं।
  5. अधिकार सामाजिक कल्याण का एक साधन है।
  6. अधिकार व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाता है।

अधिकार के मांग का आधार:

1. मनुष्य अपनी अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है, इसी से उसके जीवन का विकास होता है। इन आवश्कयताओं की पूर्ति के लिए उसे अबसर मिलना चाहिए। इस अवसरों की प्राप्ति के लिए वह प्रयत्न करता है। उसकी सबसे पहली मार यही होती है कि उसे ऐसे अवसर मिले जिनसे वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। अधिकारों का निर्माण इन्हीं मांगों के आधार पर होता है।

2. मांग अधिकार तभी बन सकती है जबकि उनकी प्राप्ति उन्हें जीवन के लिए आवश्यक दिखाई दे। यदि कोई ऐसी मांग करता है, जो जीवन के विकास में सहायक के स्थान पर बाधक बन जाए, तो उस मांग को अधिकार के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

3. समाज उस मांग को उचित समझकर स्वीकार करे।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 2.
किन आधारों पर, यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?
उत्तर:
यद्यपि सभी अधिकार जीवन की परिस्थितियों के रूप मे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हैं परन्तु अधिकारों को सार्वभौमिक कहा जा सकता है, क्योंकि उनकी सभी कालों में सभी लोगों द्वारा मांग रही है और दावे रहे हैं। वे अपने व्यवहार और सभ्यता के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। ये अधिकार मानव अस्तित्व के लिए मौलिक अधिकार हैं। वस्तुतः अधिकार मौलिक शर्ते हैं जो सुरक्षित और सुव्यवस्थित मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं। विस्तृतः अधिकार वे शर्ते हैं जो मानव जाति के लिए आत्मसम्मान और महत्त्वपूर्ण हैं। निम्नलिखित अधिकारों को सार्वभौमिक अधिकार कहा जा सकता है –

  1. जीविका का अधिकार
  2. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता
  3. शिक्षा का अधिकार

1. जीविका का अधिकार:
जीविका का अधिकार व्यक्ति के जीवन का आधार है, जिससे उसका जीवन चलता है। इसलिए यह अति महत्त्वपूर्ण आवश्यक और सार्वभौमिक है। यदि एक व्यक्ति को अच्छा रोजगार प्राप्त है, तो इससे उसको आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनने का अवसर मिलेगा और इससे उसका महत्त्व और स्तर बढ़ जाएगा। जब एक व्यक्ति की आवश्यकताएँ, विशेष रूप से आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं, तो उसके प्रतिभा और कौशल में विकास होता है, और उसका शोषण समाप्त हो जाता है।

2. अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता:
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमें विभिन्न प्रकार से अपने को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति रचनात्मक और मौलिक बनता है। इस अधिकार द्वारा लोग अपने को लिखित, बोलकर या कलात्मक रूप से व्यक्त कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सरकार की प्रजातान्त्रिक सांस्कृतिक और प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का प्रदर्शन है। इस अधिकार के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।

3. शिक्षा का अधिकार:
शिक्षा का अधिकार व्यक्ति को मानसिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक विकास में सहायता करता है। इससे हमें उपयोगी कौशल प्राप्त होते हैं, जिससे हम जीवन के विविध पक्षों के चुनाव में सक्षम हो जाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार को सार्वभौमिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिए आदिवासियों के अपने वास और जीने के तरीके को संरक्षित रखने तथा बच्चों के बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार जैसे नए अधिकारों को लिया जा सकता है।
उत्तर:
आज का विश्व प्रजातान्त्रिक सरकार का विश्व है, जिसमें संस्कृति, जाति, रंग, क्षेत्र, धार्मिक और व्यवसाय के प्रति जागरुकता और चेतना बढ़ रही है। व्यक्ति का सर्वागीण विकास शिक्षा, संस्कृति और धर्म के अधिकार से जुड़ा हुआ है। इसलिए लोगों को उनके नये क्षेत्रों जैसे शिक्षा, संस्कृति, बाल अधिकार, महिला अधिकार, बुजुर्गों के अधिकार, मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, कृषक अधिकार, पर्यावरण आदि अधिकार दिए जा रहे हैं। आज का समाज सामान्य रूप से बहवादी समाज है, जिसमें नागरिकों को विकास करने का और लोगों के सामाजिक, सांस्कृतिक आवास की सुरक्षा के अधिकार दिए गए हैं।

भारतीय मक सामान्य संविधान में शिक्षा और संस्कृति को कायम रखने और उनको विकसित करने का अधिकार दिया गया है। वे लोग विभिन्न प्रकार के रहन-सहन से सम्बन्धित होते हैं। वे विभिन्न प्रकार के वेश-भूषा, व्यवहार, त्योहर और अन्य सभ्यताओं में सम्बद्ध होते हैं। वे शिक्षा से अपनी संस्कृति की प्रगति कर सकते हैं। बच्चों को शोषण के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार दिया गया है। जिससे वे पुरानी प्रथाओं एवं बुराईयों जैसे बँधुआ मजदूरी को दूर कर सकते हैं। उनकी सम्मान की रक्षा के लिए मौलिक अधिकार भी दिए गए हैं।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 4.
राजनितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अन्तर बताइए। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर:
यद्यपि लोगों को विभिन्न प्रकार की दशाओं और सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जिनको वे अधिकार के रूप में प्राप्त करना चाहते हैं, परन्तु सार्वभौमिक रूप से लोगों के सर्वागीण विकास के लिए सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। राजनीतिक अधिकार वे सुविधाएँ और परिस्थितियाँ हैं, जिसमें लोगों को व्यक्तिगत विकास के अधिकार दिए जाते हैं, और प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर दिया जाता है। कुछ महत्त्वपूर्ण राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. कानून के समक्ष समानता
  2. अभिव्यक्ति का अधिकार
  3. मतदान का अधिकार
  4. निर्वाचित होने का अधिकार
  5. संघ बनाने का अधिकार
  6. प्रतिनिधि चुनने का अधिकार
  7. राजनैतिक दल बनाने का अधिकार

आर्थिक अधिकार:
आर्थिक अधिकार वे जीवित दशाएँ और परिस्थितियाँ हैं, जो व्यक्ति के भौतिक विकास जैसे भोजन, कपड़ा, मकान, विश्राम और रोजगार आदि की आवश्यकताओं से सम्बन्धित हैं। आर्थिक अधिकार के अन्तर्गत पर्याप्त मजदूरी भी है जो आवश्यकताओं और उचित कार्यदशाओं से जुड़ा है। राजनैतिक अधिकार और आर्थिक अधिकार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मुख्य आर्थिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. कार्य करने का अधिकार
  2. आवास एवं कार्य करने की उचित दशाएँ
  3. रोजगार का अधिकार
  4. पर्याप्त मजदूरी का अधिकार
  5. विश्राम का अधिकार
  6. न्यूनतम आवश्यकता जैसे-आवास, भोजन, वस्त्र आदि का अधिकार
  7. सम्पत्ति का अधिकार
  8. चिकित्सा सुविधा का अधिकार

सांस्कृतिक अधिकार-आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों के अलावा सांस्कृतिक अधिकार भी मानव विकास, सुव्यवस्थित जीवन मनोवैज्ञानिक और नैतिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है। महत्त्वपूर्ण सांकृतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

  1. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार
  2. स्थानीय वेशभूषा, त्योहार, पूजा और उत्सव मनाने का अधिकार
  3. शौक्षिक संस्थाओं (स्थानीय भाषायें और भूगोल के विकास के लिए) की स्थापना का अधिकार।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 5.
अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
क्योंकि अधिकार राज्य से प्राप्त मांग एवं दावे हैं, इसलिए यह स्वाभाविक है, कि राज्य की यह जिम्मेदारी है, कि वह लोगों को सुनिश्चित दशाएँ और सुविधाएँ उनके कल्याण और रोजगार के लिए प्रबन्ध करे। ऐसा करने से राज्य के कार्य में कुछ कमियां आ जाती हैं। नागरिकों के अधिकार सुनिश्चित करते हुए राज्य प्राधिकरण को लोगों के जीवन और स्वतन्त्रमा को अक्षुण्ण रखते हुए अपना कार्य करना चाहिए। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि राज्य अपनी प्रभुता के कारण शक्तिशाली है, परन्तु नागरिकों के साथ सम्बन्ध राज्य की प्रभुता की प्रकृति पर निर्भर है।

राज्य अपनी रक्षा से ही अस्तित्व में नहीं होता बल्कि लोगों की सुरक्षा से ही कायम रह सकता है। यह नागरिक ही होता है, जिसका महत्त्व अधिक होता है, कल्याण और विकास के लिए कार्य करना चाहिए जो राज्य की प्रभुता का क्षेत्र होता है। राज्य के कानून लोगों के लिए उनके कार्य के लिए उत्तरदायी और संतुलित है। कानून राज्य और लोगों के मध्य सम्बन्ध को नियन्त्रित करता है। यह राज्य का कर्त्तव्य है, कि वह आवश्यक दशाएँ उपलब्ध कराए जिनकी नागरिकों द्वारा अपने कल्याण एवं विकास में मांग या दावे किए जाते हैं। राज्य को इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। परन्तु प्राधिकरण द्वारा इसे रोका और सीमित कर दिया जाता है।

Bihar Board Class 11 Political Science अधिकार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन्हीं दो राजनैतिक अधिकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any two political rights)
उत्तर:
दो राजनीतिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

1. मतदान का अधिकार (Rights to Vote):
जिन देशों में प्रजातंत्रीय शासन है, वहाँ नागरिकों को वयस्कता के आधार पर मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है।

2. चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Contest Election):
लोकतंत्रीय देशों में प्रत्येक व्यक्ति को निर्वाचन में खड़ा होने का अधिकार प्राप्त है। निर्वाचित होने पर उन्हें सरकार के निर्माण में शामिल होने का भी अधिकार है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 2.
नागरिक का क्या अर्थ है? (What is meant by citizenship?)
उत्तर:
नागरिकता (Citizenship):
नागरिकता से नागरिक के जीवन की एक स्थिति निश्चित होती है, जिसके कारण वह राज्य द्वारा दिए गए सभी सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग करता है। राज्य के प्रति कुछ कर्त्तव्य का पालन करता है। अतः एक नागरिक को राज्य का सदस्य होने के नाते जो स्तर (Status) अथवा पद प्राप्त होता है, उसे नागरिकता कहते हैं।

प्रश्न 3.
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकार का वर्णन कीजिए। (Describe two religious rights of the citizens)
उत्तर:
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकार निम्नलिखित हैं –

1. धार्मिक विश्वास का अधिकार (Right to religious belief):
कोई भी मनुष्य अपनी इच्छानुसार धार्मिक विश्वास रख सकता है। धर्म उसका व्यक्तिगत मामला है। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार है।

2. धार्मिक प्रचार का अधिकार (Right to religious preaching):
प्रत्येक धर्म के मानने वालों को अपने धर्म का प्रचार करने का समान अधिकार प्राप्त है। धर्म प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिए शान्तिपूर्ण सम्मेलन कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में दिए गए किन्हीं दो मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख कीजिए। (Mention any two fundamental duties as prescribed in the constitution of India) अथवा, नागरिकों के किन्हीं दो कर्तव्यों का उल्लेख करें। (State any two duties performed by a citizen)
उत्तर:
भारत के संविधान में 1976 ई. में नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्यों को 42वीं संशोधन द्वारा जोड़ा गया। उनमें से दो मौलिक कर्तव्यों का विवेचन निम्नलिखित है –

  1. भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है, कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
  2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए और उनका पालन करें।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 5.
नागरिक द्वारा निभाए जाने वाले कुछ कर्त्तव्यों का उल्लेख कीजिए। (Mention some of the duties which are performed by the citizen)
उत्तर:
नागरिकों द्वारा निभाए जाने वाले कुछ कर्तव्यों का उल्लेख निम्नलिखित है –

  1. हमें अपने राज्य के प्रति निष्ठावान होना चाहिए।
  2. सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन करना चाहिए।
  3. सरकार द्वारा लगाए करों को देना चाहिए।
  4. सैनिक सेवा हमारा एक अन्य कर्त्तव्य है।
  5. जन-सम्पत्ति की रक्षा नागरिक का कर्त्तव्य होता है।
  6. नागरिक के अन्य कर्तव्यों में मताधिकार का प्रयोग, सरकार को सहयोग देना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना आदि सम्मिलित किए जा सकते हैं।

प्रश्न 6.
“अधिकार में कर्तव्य निहित है”, स्पष्ट करो। (“Rights imply duties.”Clarify) अथवा, अधिकार और कर्तव्य के आपसी सम्बन्धों के किन्हीं दो उदाहरणों का उल्लेख कीजिए। (Give any two examples of the relations between rights and duties)
उत्तर:
यद्यपि अधिकार और कर्त्तव्य देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तव में वे एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं। अधिकार और कर्त्तव्य सदैव साथ-साथ चलते हैं। अधिकार और कर्तव्यों में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। कर्तव्य के बिना अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। कर्तव्यों के पालन करने के बाद ही अधिकारों की कल्पना की जा सकती है। अतः अधिकारों और कर्तव्यों को एक दुसरे से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का दुसरे के बिना कोई अस्तित्व नहीं। अतः यह ठीक ही कहा गया है, कि “अधिकारों में कर्त्तव्य निहित हैं।” उदाहरणत:

  1. यदि एक नागरिक भाषण की स्वतन्त्रता का अधिकार माँगता है, तो यह उसका कर्त्तव्य है, कि वह अपने भाषण में किसी दुसरे नागरिक का अपमान न करे।
  2. यदि कोई व्यक्ति किसी अधिकार का उपयोग करता है, तो उसका कर्तव्य है, कि यह दुसरे के अधिकारों में बाधा न डाले, जैसे एक व्यक्ति को मतदान का अधिकार है, तो उसका यह कर्त्तव्य है, कि वह दूसरे के मताधिकार में किसी प्रकार की बाधा न डाले।

प्रश्न 7.
‘समानता का अधिकार’ पर टिप्पणी लिखो। (Write a note on ‘Right to Equality’)
उत्तर:
भारतीय संविधान में नागरिकों को 6 मूल अधिकार दिए गए हैं। इनमें सबसे पहला मूल अधिकार समानता का अधिकार है। अनुच्छेद 14 से 18 तक समानता का अधिकार इस प्रकार दिया गया है –

  1. कानून के समक्ष समानता (Equality before law): यह अनुच्छेद 14 में दिया गया है।
  2. सामाजिक समानता (Social Equality): अनुच्छेद 15 में दिया गया है।
  3. सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार (Equality of opportunity in matter of public employement): अनुच्छेद 16 में दिया गया है।
  4. अस्पृश्यता का अन्त (Abilition of Untouchability): अनुच्छेद 17 में दिया गया है।
  5. अपराधियों की समाप्ति (Abilition of Titles): संविधान के अनुच्छेद 18 में दिया गया है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 8.
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखो। (Write a note on Freedom of Speech and Expression)
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों में स्वतन्त्रता का अधिकार भी प्रमुख है। संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार नागरिकों को भाषण, लेखन, पुस्तक, चलचित्र व अन्य किंसी माध्यम से विचार प्रकट करने की स्वतन्त्रता है। लास्की का कथन है,कि “एक मनुष्य को जो वह सोचता है, उसे कहने का अधिकार देना, उसके व्यक्तित्व की पूर्णता का एकमात्र साधन है।” अनुच्छेद 19 में दी गई छः स्वतन्त्रताओं में भाषण और विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अनुच्छेद 19 (2) के अनुसार कुछ सीमाएँ भी लगाई गई हैं –

  1. राज्य की सुरक्षा
  2. विदेशी राज्यों के साथ मैत्री सम्बन्ध
  3. सार्वजनिक व्यवस्था
  4. सदाचार व नैतिकता
  5. विशिष्टता
  6. अपराध करने को उकसाने से रोकना आदि

प्रश्न 9.
कानूनी अधिकार की परिभाषा दें। इसके कोई दो उदाहरण दीजिए। (Define legal rights. Give its two examples)
उत्तर:
कानूनी अधिकार (Legal Rights):
कानूनी अधिकार वे अधिकार हैं, जो किसी भी समाज में राज्य के कानूनों द्वारा निश्चित और सुरक्षित होते हैं। इनमें बाधा डालने वालों को राज्य द्वारा दण्ड दिया जाता है। दो उदाहरण निम्नलिखित हैं –

1. समानता का अधिकार (Right to Equality):
समानता के अधिकार का अर्थ समान अवसरों की प्राप्ति से है। भारत के नागरिक कानून की दृष्टि से समान हैं। जाति, धर्म, लिंग, वंश अथवा जन्म के आधार पर उनमें भेदभाव नहीं किया जाएगा।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Liberty):
प्रत्येक नागरिक को स्वयं के विकास की पूर्ण स्वतन्त्रता है। वह भाषण दे सकता है, सभा कर सकता है, समुदाय बना सकता है। उसे देश के किसी भी, भाग में जाने की स्वतन्त्रता है। व्यवसाय करने के लिए भी वह स्वतन्त्र है। देश के किसी भी भाग में उसे निवास की स्वतन्त्रता है। उसे न्याय प्राप्ति की भी स्वतन्त्रता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 10.
भारत में मतदान का अधिकार किसको है?
उत्तर:
भारत में मतदान का अधिकार प्रत्येक वयस्क स्त्री-पुरुष को प्राप्त है, परन्तु इन सभी वयस्कों में निम्न योग्यताएँ होनी चाहिए।

  1. वह देश का नागरिक हो और देश के प्रति आस्था रखता हो।
  2. वह निर्धारित आयु रखता हो । भारत में यह आयु सीमा 18 वर्ष कर दी गई है।
  3. वह देशद्रोही, सजायाफ्ता पागल, अथवा दिवालिया न हो।
  4. उसका नाम मतदाता सूची में हो।

प्रश्न 11.
कानून के सम्मुख समानता पर एक संक्षित टिप्पणी लिखो। (Write a short note on equality before law)
उत्तर:
कानून के सम्मुख समानता (Equality before law) का अर्थ है:
विशेषाधिकार का अभाव व सभी सामाजिक वर्गों पर कानून की समान बाध्यता। कानून के समक्ष समानता के अन्तर्गत सभी कमजोर व शक्तिशाली समान समझे जाते हैं। इस अधिकार के अन्तर्गत मूल भाव यह है, कि समान व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाए तथा किसी के साथ धर्म, जाति, भाषा, रंग, नस्ल, लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। इस अधिकार में यह तथ्य भी निहित है, कि कमजोर को राज्य का संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। भारत में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के साथ विशेष व्यवहार इस तथ्य का उदाहरण है।

प्रश्न 12.
‘काम का अधिकार’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on ‘Right to Work’)
उत्तर:
काम के अधिकार का अर्थ है, कि सरकार नागरिकों के लिए ऐसी व्यवस्था करे जिससे कि वे कोई सरकारी का गैर-सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकें या उन्हें कोई व्यवसाय करने का अवसर मिल सके और वे अपना जीवन निर्वाह कर सके। अभी तक भारत में काम का अधिकार मूल अधिकार में सम्मिलित नहीं किया गया है, यद्यपि समय-समय पर इसकी माँग उठती रहती है।

प्रश्न 13.
अधिकार से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by rights?)
उत्तर:
अधिकार:
व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त न हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगे भी अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो, परन्तु उसे अधिकार ही कहा जाएगा, क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बैन तथा पीटर्स (Benn and Peters) ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, “अधिकार की स्थापना एक सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहे कानून पर आधारित हो या परम्परा पर।” वास्तव में अधिकार समाज या राज्य द्वारा स्वीकार की गई वे परिस्थितियाँ हैं, जो मानव विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं, और चूँकि समाज का उद्देश्य श्रेष्ठ मानव का निर्माण करना है, अतः आदर्श समाज उसी को कहा जा सकता है, जिसमें मनुष्य बिना संघर्ष किए इन अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त कर ले।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 14.
अधिकारों के आवश्यक तत्व बताइए। (Mention the essential elements of rights)
उत्तर:
अधिकारों के आवश्यक तत्व (Essential Elements of Rights):

  1. किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह की माँग अधिकार होनी चाहिए।
  2. माँग उसके विकसित उच्च जीवन के लिए आवश्यक एवं न्यायोचित हो।
  3. समाज उस माँग को उचित समझकर स्वीकार करे।

प्रश्न 15.
अधिकारों की परिभाषा दीजिए। (Define Rights)
उत्तर:
ऑस्टिन के अनुसार:
“अधिकार एक व्यक्ति की वह सामर्थ्य है, जिसमे वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता हो।” माण लास्की (Laski) के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं, जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं कर सकता।” इस प्रकार अधिकार ऐसी अनिवार्य परिस्थिति है, जो मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक है।

वह व्यक्ति की माँग है, तथा उसका हक है, जिसे समाज, राज्य तथा कानून भौतिक मान्यता देते हैं, और उसकी रक्षा करते हैं। उदाहरणार्थ, यदि मनुष्य जीवित न रहे तो वह कुछ भी नहीं कर सकता और यदि स्वतन्त्रता न मिले तो वह अपनी उन्नति के लिए कुछ भी नहीं कर सकता। अत: व्यक्ति का जीवन, जीविका तथा स्वतन्त्रता उसके व्यक्तित्व के विकास की आवश्यक परिस्थितियाँ हैं। अतः वे मनुष्य के अधिकार हैं।

प्रश्न 16.
अधिकार और दावों में क्या अन्तर है? (What are the difference between rights and claims?)
उत्तर:
अधिकार सामान्य जीवन का एक ऐसा वातावरण है, जिसके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन का विकास नहीं कर सकता। अधिकार व्यक्ति के विकास और स्वतन्त्रता का एक ऐसा दावा है, जो कि व्यक्ति और समाज दोनों के लिए लाभदायक है, तथा जिसे समाज मानता है, और राज्य लागू करता है। अधिकार उन सामाजिक दावों का नाम है, जो यदि व्यक्ति को प्राप्त न हो तो वह विकास नहीं कर सकता। अधिकार और दावों में निम्न अन्तर है –

  1. अधिकार वे दावे हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है, और जो राज्य द्वारा लागू किए जाते हैं। ऐसी मान्यता के अभाव में अधिकार केवल खोखले दावे ही सिद्ध होंगे।
  2. केवल वे ही दावे अधिकार बनते हैं, जिन्हें समाज मान्यता देता है।
  3. दावों को अधिकार कहलाने के लिए यह आवश्यक है, कि उसका उद्देश्य समाज का हित हो।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 17.
व्यक्ति को प्राप्त किन्हीं तीन अधिकारों का वर्णन कीजिए। (Describe any three rights of individuals) अथवा, विभिन्न प्रकार के अधिकारों के नाम लिखिए। उनमें से किन्हीं तीन का वर्णन कीजिए।
(Name the different kinds of rights Describe any three of them)
उत्तर:
व्यक्ति को समाज द्वारा अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं। जैसे मौलिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार, सामाजिक अधिकार, आर्थिक अधिकार, धार्मिक अधिकार, कानूनी अधिकार, प्राकृतिक अधिकार, नैतिक अधिकार आदि। इनमें तीन अधिकारों का वर्णन निम्न प्रकार से किया जा सकता है –

1. आर्थिक अधिकार (Economic Rights):
प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को अपना सकता है, परन्तु किसी भी व्यक्ति को समाज विरोधी व्यवसाय अपनाने का अधिकार नहीं है।

2. धार्मिक अधिकार (Religious Rights):
व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार धर्म मानने का अधिकार है। धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को किसी ऐसी सुविधा से वन्चित नहीं किया जा सकता जो कि राज्य अपने नागरिकों को प्रदान करता है।

3. राजनैतिक अधिकार (Political Rights):
जिन देशों में प्रजातंत्र की स्थापना है, उन राज्यों में प्रत्येक व्यक्ति को वयस्कता के आधार पर मताधिकार प्रदान किया गया है। बिना किसी भेदभाव के सरकारी पद पर नियुक्त होने का अधिकार है। चुनाव लड़ने का भी अधिकार है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नैतिक और वैधानिक (कानूनी) अधिकारों में अन्तरं कीजिए। (Distinguish between moral and legal rights)
उत्तर:
अधिकार एक प्रकार की सुविधाएँ हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति अपना विकास सरलता व शीघ्रता से कर सकता है। नैतिक और वैधानिक अधिकारों में निम्नलिखित अन्तर होता है –
नैतिक अधिकारों की उत्पत्ति व्यक्ति की नैतिक भावना द्वारा होती है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति के नैतिक आचरण से होता है। ये अधिकार नैतिक सन्हिता (esthical code) पर आधारित होते हैं। इन अधिकारों का अनुमोदन राज्य द्वारा नहीं किया जाता बल्कि समाज की नैतिक भावना, जनमत तथा धर्मशास्त्रों द्वारा इन्हें स्वीकार किया जाता है। दूसरी ओर वैधानिक अधिकार उन अधिकारों को कहा जाता है, जो राज्य द्वारा व्यक्ति को प्रदान किए जाते हैं, और कानून द्वारा जिनको सुरक्षा प्रदान की जाती है। इन अधिकारों का प्रयोग कानून के अन्तर्गत किया जा सकता है, और इनका उल्लंघन अपराध माना जाता है। जिसके लिए राज्य दंड की व्यवस्था कर सकता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 2.
प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए। (Explain the theory of Natural Rights)
उत्तर:
अधिकारों के जन्म, उदय तथा विकास से सम्बन्धित अनेक सिद्धान्त बताए जाते हैं। इस सिद्धान्तों में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त भी उल्लेखनीय है। प्राकृतिक अधिकारों से अभिप्राय वे अधिकार जो मनुष्य को प्रकृति एवं ईश्वर की देन होते हैं। ये अधिकार मनुष्य को इसलिए प्राप्त होते हैं, कि वे मनुष्य हैं। इस प्रकार के अधिकारों से सम्बन्धित सिद्धान्त के समर्थकों में हॉब्स, लॉक तथा रूसो का नाम लिया जाता है। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को आज कोई नहीं मानता। इसका कारण यह है, कि समाज से पहले, समाज से ऊपर समाज से बाहर तथा उसके विरुद्ध कोई अधिकार नहीं होता।

प्रश्न 3.
किन परिस्थितियों में नागरिक राज्य के आज्ञा की अवहेलना कर सकता है? (Under what circumstances can a citizen disobey the State?)
उत्तर:
राज्य की अवज्ञा के अधिकार का अर्थ है, गैर-कानूनी सत्ता की अवज्ञा। यह अधिकार जनता को प्राप्त अधिकारों में सर्वाधिक मौलिक माना गया है। एक अच्छे संविधान को ऐसे अधिकार अपने नागरिकों को प्रदान करना चाहिए। ऐसे अधिकारों के कारण लोग तानाशाही व स्वेच्छाचारी सरकार के विरुद्ध आवाज उठा सकते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले, भारत में महात्मा गाँधी ने अवज्ञा के अधिकार का प्रयोग असहयोग आन्दोलन (सन् 1920-22 ई.) तथा सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34 ई.) में किया था।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 4.
आप यह कैसे कहेंगे कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? (How would you say that rights and duties are two sides of a coin?) अथवा, अधिकार एवं कर्तव्यों के बीच सम्बन्ध बताइए। (Describe the relationship between rights and duties)
उत्तर:
यद्यपि अधिकार और कर्त्तव्य देखने में अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में ये एक-दूसरे से भिन्न हैं। अधिकार एवं कर्त्तव्य सदैव साथ-साथ चलते हैं। जब हम किसी के अधिकारों का उल्लेख करते हैं, तो उसका अर्थ समझा जाता है, कि इस व्यक्ति के कुछ कर्त्तव्य भी हैं। कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों का न कोई प्रश्न है, और न ही काई अस्तित्व।

अधिकार और कर्तव्यों में सम्बन्ध (Relationship between Rights and Duties):

1. अधिकार एवं कर्त्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं (Rights and Duties are complemen tary to each other):
यह बात सर्वमान्य है, कि किसी भी व्यक्ति को कोई भी अधिकार उस समय ही मिल सकता है, जब वह अपने कर्तव्य का पालन करे। अधिकार एवं कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे यदि एक नागरिक भाषण की स्वतन्त्रता का अधिकार माँगता है, तो इस अधिकार में ही उसका यह कर्त्तव्य निहित है, कि वह अधिकार से अनुचित लाभ न उठाए तथा अपने भाषण से सरकार अथवा किसी नागरिक का अपमान न करे।

2. अधिकार एवं कर्तव्यों का एक ही उद्देश्य है (Same Objectives of Rights and Duties):
अधिकारों तथा कर्त्तव्यों की उत्पत्ति मनुष्य को सुखी करने के लिए हुई है। दोनों का उद्देश्य तथा लक्ष्य नागरिकों को सुखी बनाना है। नागरिकों की, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक उन्नति कराना ही मुख्य उद्देश्य है। ये दोनों व्यक्ति के सफल जीवन व्यतीत करने में सहायता देते हैं।

3. कर्तव्यों के बिना अधिकारों का अस्तित्व असंभव है (No Right without Duties):
कर्त्तव्यों के बिना अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। जहाँ मनुष्य को केवल अधिकार ही मिले हो, वहाँ वास्तव में अधिकार न होकर शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपरोक्त सभी बातों का मनन करने के उपरान्त हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं, कि अधिकार एवं कर्त्तव्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा एक के बिना दूसरों का न अस्तित्व हो सकता है, और न ही महत्त्व।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों में अन्तर कीजिए। (Distinguish between Civil Rights and Political Rights)
उत्तर:
नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों में निम्नलिखित अन्तर हैं –

1. नागरिक अधिकार (Civil Rights) का अभिप्राय उन अधिकारों से है, जिनके बिना नागरिक या राज्य में रहने वाले अन्य व्यक्ति सभ्य जीवन नही बिता सकते हैं। नागरिक अधिकार में सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार है। लोकतन्त्रीय राज्यों में किसी भी व्यक्ति को कानून के उल्लंघन पर निश्चित कानूनों के आधार पर न्यायालय द्वारा दण्डित किया जा सकता है। इस प्रकार कानून द्वारा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता बनी रहती है।

2. राजनीतिक अधिकार (Political Rights) से अभिप्राय उन अधिकारों से है, जो नागरिक को निश्चित योग्यताएँ प्राप्त करने पर शासन में भागीदारी का अधिकार देते हैं। ये अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त होते हैं। चुनाव में भाग लेने का अधिकार एक राजनीतिक अधिकार है। भारत में नागरिक अन्य योग्यताओं के साथ 25 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद लोकसभा तथा 30 वर्ष की आयु पूरी करने पर राज्य सभा का चुनाव लड़ने का अधिकार रखता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 2.
अधिकार सम्बन्धी प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए। (Discuss important theories of rights)
उत्तर:
1. अधिकारों का प्राकृतिक सिद्धान्त (Natural Theory of Rights):
प्राकृतिक अधिकार जन्मजात होते हैं, और उनका अस्तित्व किसी न किसी रूप से राज्य के गठन से पूर्व भी था। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त ने निरन्कुश शासकों की निरन्कुशता पर बन्धन लगाकर मनुष्य की स्वतन्त्रता को प्रकट किया। लॉक (Locke) का मत है, कि प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को प्राकृतिक अधिकार प्राप्त थे। रूसो (Rouseau) प्राकृतिक अवस्था को स्वर्ग के समान समझता है। प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य पर किसी प्रकार के बन्धन नहीं थे। टामस पेन, जेफरसन ने भी जीवन, स्वतन्त्रता, समानता तथा सम्पत्ति के अधिकारों को प्राकृतिक अधिकार माना है।

2. अधिकारों के उदारवादी सिद्धान्त (Liberal Theory of Rights):
लॉक (Locke) को आधुनिक युग के उदारवाद का जन्मदाता कहा जाता है। उसने घोषित किया कि राज्य का निर्माण मनुष्य ने स्वयं किया है, और उसका कार्य शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित करना मात्र है। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण अधिकार व्यक्ति ने अपने पास रखे हैं। राज्य व्यक्ति के जीवन, स्वतन्त्रता व सम्पत्ति के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कानून नहीं बना सकता। लोगों को यह भी अधिकार है, कि सीमा से बाहर जाने वाले व शक्ति दुरुपयोग करने वाले शासक को वे अपहस्त कर दें।

3. ऐतिहासिक अधिकारों का सिद्धान्त (Historical Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के अनुसार अधिकारों का जन्म इतिहास से हुआ है। वे उन रीति-रिवाजों और प्रयोगों पर आधारित हैं, जो उपयोगी समझे जाते थे तथा जो काफी समय तक माने जाते रहे।

4. लोक कल्याणकारी अधिकार सिद्धान्त (Social Welfare Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के समर्थकों का विचार है, कि व्यक्ति को अधिकार इसलिए दिया जाता है, ताकि वह समाज का उपयोगी अंग बन जाए। बेन्थम तथा ज. एस. मिल इस सिद्धान्त के समर्थक थे। लास्की (Laski) कहते हैं, “समाज उपयोगिता के बिना अधिकार निरर्थक है।” (Right have no meaning without social utility)

5. आदर्शवादी सिद्धान्त (Idealist Theory of Rights):
इस सिद्धान्त के समर्थक राज्य को एक दैवी संस्था मानते हैं। हेगेल (Hegal) ने कहा था- “राज्य पृथ्वी पर भगवान् का अवतरण है।” (State is march of God on the earth) इस सिद्धान्त के समर्थक कहते हैं कि व्यक्ति को अधिकार समाज का सदस्य होने के नोते प्राप्त होता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 3.
संवैधानिक अधिकारों तथा प्राकृतिक अधिकारों में अन्तर कीजिए। (Distinguish between Constitutional Rights and Natural Rights)
उत्तर:
संवैधानिक अधिकारों को कानूनी अधिकार भी कह सकते हैं। यह वे अधिकार हैं, जो हमें संविधान द्वारा प्रदान किए जाते हैं। नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकारों का स्रोत “दैवी नियम” या नैतिक मूल्य है। लॉक तथा अन्य कई विचारकों का मत है, कि राज्य की स्थापना से पहले भी व्यक्ति को कुछ अधिकार प्राप्त थे जिन्हें इन विद्वानों ने प्राकृतिक अधिकार माना है। इन दोनों के बीच चार प्रमुख भेद हैं –

  1. दोनों प्रकार के अधिकारों का उद्गम अलग-अलग स्रोतों से हुआ।
  2. संवैधानिक या विधिक अधिकार लिखित रूप में पाये जाते हैं अतः वे निश्चित व स्पष्ट होते हैं। इसके ठीक विपरीत प्राकृतिक अधिकारों का स्वरूप प्रायः अनिश्चित रहता है। अलग-अलग विद्वानों की प्राकृतिक अधिकारों के बारे में अलग-अलग मान्यताएँ हैं। अरस्तू ने तो दासों की खरीद-फरोख्त को भी व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार माना है।
  3. संवैधानिक या विधिक अधिकारों की अवहेलना अपराध है, जिसकी सजा कानून के अनुसार दी जा सकेगी। परन्तु प्राकृतिक अधिकारों का स्वरूप एकदम अस्पष्ट है। अतः उनकी अवहेलना करने वालों को किस आधार पर दण्ड दिया जा सकता है।
  4. प्राकृतिक अधिकारों के समर्थक सम्पत्ति और नागरिक स्वतन्त्रता पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध सहन नहीं करते, जबकि संवैधानिक अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 4.
अधिकार से क्या अभिप्राय है? अधिकार के आधारभूत तत्व (लक्षण) समझाइए। (What are rights? Mention the basic elements (attributes of right)
उत्तर:
व्यक्ति की उन माँगो को, जिन्हें, समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार कहलाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरणार्थ, काम पाने का अधिकार (Rights to work) राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परन्तु उसे अधिकार ही माना जाएगा, क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता। बेन और पीटर्स (Benn and Peters) ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, अधिकारों की स्थापना एक ‘सुस्थापित’ नियम द्वारा होती है, वह नियम चाहे कानून पर आधरित हो या परम्परा पर (Rights is an established rule either legal or conventional, which accords the right)

अधिकार के आवश्यक तत्व (Basic Elements of Right):

1. माँग अथवा दावा (A Claim):
व्यक्ति अथवा समाज की कुछ आवश्यकताएँ होती हैं जिन्हें किसी विशेष स्थिति या अवस्था में ही पूरा किया जा सकता है। व्यक्ति इस प्रकार की स्थिति की माँग कहता है।

2. माँगे न्यायोचित होनी चाहिए (Claim would be justify):
अधिकार केवल एक माँग या दावा ही नहीं है, वरन् वह नैतिक मान्यताओं के अनुकूल माँग या दावा होना चाहिए।

3. राज्य अथवा समाज की स्वीकृति (Social Sanction):
कोई भी माँग तब तक अधिकार का रूप ग्रहण नहीं करती जब तक कि उसे समाज की स्वीकृति न मिल जाए । समाज की स्वीकृति मिलने पर माँगे अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानूनी मान्यता न मिली हो। समाज की स्वीकृति न मिलने से माँगे अधिकार नहीं बन सकती, क्योंकि समाज से पृथक, व्यक्ति का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करता वरन् उसकी पूर्ति के लिए प्रयास भी करता है। समाज उन्हीं माँगों को स्वीकृति देता है, जो सबके हित की अर्थात् समाज हित में हो।

4. अधिकार व कर्त्तव्य आपस में जुड़े रहते हैं (Rights implies duties):
अधिकारों में कर्त्तव्य निहित है। मेरा-कर्त्तव्य है, कि मैं दूसरों को भी उन स्वतन्त्रताओं का उपभोग करने दूं जिनका मैं स्वयं उपभोग कर रहा हूँ। इस प्रकार एक-व्यक्ति का अधिकार दूसरे व्यक्ति का कर्तव्य तथा एक व्यक्ति का कर्तव्य दूसरे व्यक्ति का अधिकार बन जाता है।

5. काल और देश के अनुसार अधिकारों का स्वरूप बदलता रहता है (Rights change with time and place):
अधिकारों की कोई ऐसी सूची बन सकना असंभव है, जिसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश न हो। एक समय दास खरीदना व बेचना अधिकारों में सम्मिलित था, परन्तु अब यह पूरे विश्व में कहीं भी मान्य नहीं है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 5.
किन्हीं तीन ऐसी परिस्थितियों का वर्णन कीजिए जिनमें अधिकारों को प्रतिबन्धित किया जा सकता है। (Describe any three situations in which rights can be restricted)
उत्तर:
अधिकार कभी भी निरन्कुश या असीम नहीं होते, उनके साथ कर्तव्य जुड़े रहते हैं। व्यक्ति के अधिकार दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों से भी बँधे तथा सीमित होते हैं। जैसा मैं चाहता हूँ वैसा दूसरे व्यक्ति भी चाहते हैं। अतः अधिकारों को सीमित किया जा सकता है। जिन तीन परिस्थितियों में अधिकारों को प्रतिबन्धित किया जा सकता है, उनका विवरण निम्नलिखित है –

1. अन्य सदस्यों के अधिकार के लिए (For Other’s Rights):
व्यक्ति समाज का अंग है, और दूसरों के साथ मिल-जुलकर ही वह रह जाता है। व्यक्ति के अधिकार उसके अन्य साथियों के अधिकार से प्रतिबन्धित रहते हैं। कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार का प्रयोग इस प्रकार नहीं कर सकता जिससे दूसरे लोगों को अपने अधिकार का प्रयोग करने में बाधा पड़े। अधिकार सबको समान रूप से मिले होते हैं अतः उनका प्रयोग भी इस प्रकार किया जा सकता है, कि भी अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें।

2. समाज हित के लिए (For Social Welfare):
अधिकार समाज में ही मिल सकते हैं। समाज से बाहर उनका कोई अर्थ नहीं होता। इसलिए व्यक्ति के अधिकार सामाजिक कल्याण से ‘सीमित हैं। इसका अर्थ यह है, किसी व्यक्ति को कोई ऐसा अधिकार नहीं दिया जा सकता जो समाज का अहित करता हो। सामाजिक कल्याण की दृष्टि से व्यक्ति के अधिकार पर सीमा लगायी जा सकती है।

3. राज्य की स्वतन्त्रता तथा सूरक्षा हेतु (For the liberty and security of the State):
यदि किसी व्यक्ति के अधिकार की पूर्ति करने से राज्य की स्वतन्त्रता अथवा सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो जाए तो उस व्यक्ति के ऐसे अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, कि वह अपने राष्ट्र के विषय में सूचनाएँ प्राप्त कर सके, परन्तु किसी सूचना को प्रकट करने पर यदि राज्य की सुरक्षा को खतरा होने की सम्भावना हो तो सूचना गोपनीय रखी जा सकती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन से अधिकारों की विशेषता नहीं है –
(क) असीमित होते हैं
(ख) केवल राज्य में ही संभव है
(ग) परिस्थिति के अनुसर बदलते रहते हैं
(घ) अधिकार विकास का द्योतक है
उत्तर:
(क) असीमित होते हैं

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 2.
अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्त का समर्थन किसने किया था?
(क) रूसो
(ख) वाल्टेयर
(ग) टॉमन पेन
(घ) आस्टिन
उत्तर:
(घ) आस्टिन

प्रश्न 3.
मौलिक अधिकार का वर्णन भारतीय संविधान के किस भाग में है?
(क) भाग-4
(ख) भाग-3
(ग) भाग-2
(घ) भाग-1
उत्तर:
(ख) भाग-3

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 4.
मूल अधिकारों का निम्न कौन-सा वर्ग अस्पृश्यता की समिति है?
(क) धर्म का अधिकार
(ख) समानता का अधिकार
(ग) स्वतन्त्रता का अधिकार
(घ) शोषण के विरुद्ध अधिकार
उत्तर:
(ख) समानता का अधिकार

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख करते हुए निम्न में से किस देश का अनुसरण किया गया है –
(क) ब्रिटेन
(ख) अमेरिका
(ग) आस्ट्रेलिया
(घ) स्विट्जरलैंड
उत्तर:
(क) ब्रिटेन

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 5 अधिकार

प्रश्न 6.
संपत्ति का अधिकार निम्न में से किस वर्ग में आता है –
(क) विधिक अधिकार
(ख) मानव अधिकार
(ग) मूल अधिकार
(घ) नैसर्गिक अधिकार
उत्तर:
(क) विधिक अधिकार

प्रश्न 7.
किसने कहा है? अधिकार एवं कार्य आपस में जुड़े हुए हैं।
(क) लास्की
(ख) लॉक
(ग) हाब्स
(घ) जे. एस. मिल
उत्तर:
(क) लास्की

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

Bihar Board Class 11 Political Science सामाजिक न्याय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
हर किसी को उसका प्राप्य देने का मतलब समय के साथ-साथ कैसे बदला?
उत्तर:
न्याय की संकल्पना के विषय में विभिन्न कालों और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक माहौल में विभिन्न अर्थ रहा है। न्याय शब्द की मूल आवश्यकता ‘जस’ से है जिसका अर्थ ‘उचित’ है अर्थात् ‘किसी को देने को’ है। परन्तु क्या ‘किसी को देने को’ (One’s due): का अर्थ विभिन्न अवधि में विभिन्न समाजों में विभिन्न है। उदाहरण के लिए समय के एक बिन्दु पर महिलाओं को समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। परन्तु कालान्तर में इसकी उपेक्षा की गयी और उनकी स्थिति खराब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएँ दी जाने लगीं। वे उदारवादी, प्रजातान्त्रिक और विकासवादी विश्व में अपने उचित स्थान की खोज में हैं। अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक तत्व माने गए हैं।

प्लूटो का न्याय की स्थिति के विषय में अलग दृष्टिकोण है। वह न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग की अपनी क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरी के कार्यों में हस्तक्षेप न करना को माना है। अरस्तु ने उपयोगिता के आधार पर गुलामी को न्यायसंगत ठहराया है। उसने न्याय को स्वामी के द्वारा कार्य को करने और स्वामी का दास के प्रति कर्त्तव्य को न्याय माना है। उसने राजा की सेवा के अर्थ में भी न्याय पर प्रकाश डाला है। उसके अनुसार सेवक का यह कर्त्तव्य है, कि वह अपने राजा की सेवा अच्छी तरह से करे।

मार्क्सवादी विचार न्याय की अवधारणा की दृष्टि से अलग है और इसलिए ‘किसी का उचित स्थान’ का विचार भी अलग है। मार्क्स पूँजीवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था जो अन्याय पर आधारित था। इसलिए उसने न्याय की अलग आवश्यकताएँ बताई। उसने अपने न्याय की योजना में सुझाव दिया कि उत्पादन के साधनों और वितरण पर सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति की मूल आवश्यकताओं को पूर्ति होनी चाहिए। वर्तमान में न्याय की आवधारणा में कुछ तथ्यों का समावेश हो गया है। आज न्याय न केवल सामाजिक, आर्थिक पक्ष की व्याख्या करता है बल्कि नैतिक, मनोविज्ञान, आत्मिक और मानववादी पक्ष की व्याख्या करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 2.
अध्याय में दिए गए न्याय के तीन सिद्धान्तों की संक्षेप में चर्चा करो। प्रत्येक को उदाहरण के साथ समझाइए।
उत्तर:
किसी को उसका देना’ न्याय के विचार का केन्द्रीय सिद्धान्त था परन्तु “किसको क्या देना है”-के सम्बन्ध में विभिन्न कालों में विभिन्न विचार रहे हैं। विभिन्न प्रकार के अनेक सिद्धान्त उनके अनुसार बनाये गए हैं। ये निम्नलिखित हैं –

  1. समान के लिए समान व्यवहार
  2. आनुपातिक न्याय
  3. विशेष आवश्यकता की पहचान

1. समान के लिए समान व्यवहार:
समान के लिए सामन व्यवहार अति महत्त्वपूर्ण और न्याय का आवश्यक सिद्धान्त माना जाता है। यह अपेक्षा स्वीकार किया जाता है कि व्यक्ति में कुछ विशेषताएँ मानव जाति के रूप में दिखता है, इसलिए प्रत्येक समान दशाओं में समान व्यवहार कायम रहता है। अधिकांश क्षेत्रों में जिसमें हम समानता के व्यवहार की आशा करते हैं, ये निम्नलिखित हैं –

  • नागरिक अधिकार अर्थात् समान आधार पर मूलभूत आवश्यकताओं की उपलब्धता।
  • राजनीतिक अधिकार जैसे-मतदान का अधिकार और राजनीतिक कार्यों में शामिल होने का अधिकार।
  • सामाजिक अधिकार जैसे-समान व्यवहार और सामाजिक कार्यों में मूलभूत आवश्यकताओं को प्राप्त करने का अधिकार। समान के लिए समान व्यवहार का एक अन्य पहलू यह है कि वर्ग, जाति या लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  • प्रत्येक व्यक्ति को उसके प्रतिभा और कौशल के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए।

2. आनुपातिक न्याय:
समानता का व्यवहार समान हो सकता है। इसे स्वीकार करना चाहिए और आनुपातिक स्तर को ढूढ़ना चाहिए। हम कह सकते हैं कि प्रत्येक को सभी दशाओं में समान व्यवहार की आवश्यकता होती है। आनुपातिक न्याय का तात्पर्य है-लोगों का वेतन और गुण में एक अनुपात होना चाहिए। कर्त्तव्य और पुरस्कार का निर्धारण करना चाहिए और परिभाषित करना चाहिए। वास्तविक न्याय के लिए आधुनिक समाज में समान व्यवहार का सिद्धान्त आनुपातिक सिद्धान्त में सन्तुलित करने की आवश्यकता है।

3. विशेष आवश्यकता की पहचान:
तीसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त विशेष आवश्यकताओं की पहचान है। यह लोगों की विशेष आवश्यकताओं के सन्दर्भ में पहचान करती है। जब किसी को पुरस्कार या कार्य वितरित किया जाता है, तो हमें अपनाया जाता है। कभी-कभी हमें न्याय के लिए सन्शोधित उपायों का सहारा लेना पड़ता है और लोगों के साथ विशेष व्यवहार करना पड़ता है। इसको ही विशेष आवश्यकता की पहचान कहते हैं। इसे असन्तुलन को सन्तुलन करना भी कहा जाता है।

इससे समान व्यवहार के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं होता। यह सकारात्मक कार्य का प्रकार है। लोगों के कुछ प्राकृतिक अयोग्यता के कारण उनके लिए विशेष व्यवहार या इलाज की आवश्यकता होती है। यद्यपि वे असमान दिखाई देते हैं परन्तु न्याय के लिए उनकी विशेष आवश्यकता की पूर्ति जरूरी होती है। वे लोग जो सुविधा सम्पन्न हैं और सुविधाहीन हैं, इन सबको कुछ भिन्न व्यवहार या इलाज देने की आवश्यकता पड़ती है। सुविधाहीन लोगों को विशेष मदद की जरूरत होती है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 3.
क्या विशेष जरूरतों का सिद्धान्त सभी के साथ समान बर्ताव के सिद्धान्त के विरुद्ध है?
उत्तर:
लोगों की विशेष आवश्यकता का विचार करने का सिद्धान्त सभी के लिए समान व्यवहार के सिद्धान्त से विरोधाभास उत्पन्न कर सकता है, परन्तु अब इसे विस्तृत दुष्टिकोण से न्याय के विचार से देखते हैं तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। कि किसी व्यक्ति को विशेष आवश्यकता का विचार करने के सिद्धान्त से सभी के लिए समान व्यवहार के सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं होता। वस्तुतः यह वितरण योग्य न्याय पर आधारित है। सन्शोधित उपाय के रूप में हम उस व्यक्ति की विशेष सहायता करते हैं जो अयोग्य हैं, और उसे समान स्तर पर लाने की जरूरत होती है।

समान रूप से समाज के साथ व्यवहार लागू हो सकता है कि लोग जो कुछ दृष्टियों से समान नहीं हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार से विचार कर सकते हैं। शारीरिक अयोग्यताएँ, आयु, सफलता की कमी, अच्छी शिक्षा या स्वास्थ्य आदि कुछ महत्त्वपूर्ण कारक हैं, जो विशेष व्यवहार के रूप में विचार किया जा सकता है। यदि दोनों समूहों के लोगों अर्थात् सामान्य लोग और अपंग लोग दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाय तो यह अन्याय होगा। इसलिए यदि अपंग व्यक्तियों को विशेष मदद या उनकी कुछ आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके तो इससे न्याय की आवश्यकता की पूर्ति होगी परन्तु यह न्याय से अलग या समान न्याय नहीं होगा।

प्रश्न 4.
निष्पक्ष और न्यायपूर्ण वितरण को युक्तिसंगत आधार पर सही ठहराया जा सकता है। रॉल्स ने इस तर्क को आगे बढ़ाने में ‘अज्ञानता के आवरण’ के विचार का उपयोग किस प्रकार किया।
उत्तर:
उपेक्षित स्थान के आवरण की योग्यता यह है कि यह लोगों के लिए न्याय की आशा करता है। उनसे यह सोचने के लिए आशा की जाती है कि वे अपनी रुचि के लिए क्या चाहते हैं। वे उपेक्षा के आवरण के अन्तर्गत चुनाव करते हैं, वे यह पायेंगे कि यह उनकी रुचि ही है जो अरुचि की स्थिति से हटकर सोचने के लिए है। इसलिए यह प्रथम चरण है, जिससे सही कानून और नीतियों की व्यवस्था आती है। बुद्धिमान लोग न केवल खराब स्थिति में वस्तुओं को देखेंगें, सही बनाने के लिए प्रयास भी कर सकते हैं। वे जो नीतियां बनाते हैं वह समाज के लिए होती हैं। इसलिए यह कोई नहीं जानता कि भविष्य के समाज में उनकी क्या स्थिति होगी? वे ऐसे कानूनों का निर्धारण करते हैं जो सुरक्षा प्रदान करते हैं चाहे वे भले ही अनैच्छिक लोगों के हों।

इसलिए यह सभी की भलाई में है कि कानून और नीतियों से सम्पूर्ण समाज के लोगों को लाभान्वित करावें। केवल किसी विशेष वर्ग के लिए ऐसा न किया जाय। इस प्रकार की ईमानदारी अच्छे कार्य की उपलब्धि होगी। इसलिए रॉल यह तर्क देते हैं कि यह योग्य विचार है न कि नैतिक, जो समाज के कार्यों और लाभ के वितरण के सन्दर्भ में उचित और पक्षपातरहित हो सकता है। यह उनका सामान्यीकरण है जो रॉल के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण बनाता है और ईमानदारी और न्याय के लिए पहुँच (Approach) प्रदान करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 5.
आम तौर पर एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी जरूरतें क्या मानी गई हैं? इस न्युनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की क्या जिम्मेदारी है?
उत्तर:
समाज उस समय अन्यायपूर्ण माना जाता है जब व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर इतना बड़ा होता है जो उनके न्यूनतम् आवश्यकताओं के पहुँच के सन्दर्भ में पर्याप्त नहीं होते हैं। इसलिए एक न्यायपूर्ण समाज को लोगों के न्यूनतम मूल आवश्कयताओं के साधन उपलब्ध करना चाहिए जिससे लोग स्वस्थ, सुरक्षित जीवन जी सके तथा अपने प्रतिभा का विकास कर सकें। लोगों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने के लिए समान अवसर भी उपलब्ध कराना चाहिए।

लोगों की आवश्यकताओं, जो जीवन के मूल न्यूनतम दशाएँ होती हैं, संचालन के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा विभिन्न प्रकार के उपाय किए गए। इसमें अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों-विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन आवश्यकताओं में स्वास्थ्य, आवास, खान-पान, पेयजल, शिक्षा और न्यूनतम मजदूरी आदि शामिल हैं। देशवासियों को मूल आवश्यकता की सुविधाएँ प्रदान करना प्रजातान्त्रिक सरकार का उत्तरदायित्व है। आज राज्य एक कल्याणकरी संगठन है। इसलिए लोगों के कल्याण का ध्यान रखना उसका कर्त्तव्य है। प्रजातान्त्रिक सरकार लोगों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करके लोगों के दशाओं में सुधार लाती है।

प्रश्न 6.
सभी नागरिकों को जीवन की न्यूनतम बुनियादी स्थितियाँ उपलब्ध कराने के लिए राज्य की कार्यवाई को निम्न में से कौन-से तर्क से वाजिब ठहराया जा सकता है?
(क) गरीब और जरूरत मन्दों को निशुल्क सेवाएँ देना एक धर्म कार्य के रूप में न्यायोचित है।
(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है।
(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी, मानवता और मानव अधिकार की स्वीकृति है।
उत्तर:
कथन (ख) और (घ) लोगों के जीवन की न्यूनतम् दशाएँ उपलब्ध कराने में राज्य के कार्यों के सम्बन्ध में न्यायसंगत है।
(ब) सभी के लिए मूल सुविधाएँ और न्यूनतम स्तर की जीविका प्रदान करना मानवता और मानव अधिकार की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Political Science सामाजिक न्याय Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आनुपातिक न्याय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। (Write a short note on Proportional Justice?)
उत्तर:
आनुपातिक न्याय का अर्थ परिस्थितियों की समता अर्थात् समान मामलों को समान रूप से और असमान को असमान रूप में लिया जाए। निष्पक्षता के रूप में न्याय का अर्थ कठोर समानता नहीं है। इसका अभिप्राय तो न्याय-संगत आनुवादि वितरण से है। इसके अन्तर्गत राज्य कुछ विशिष्ट वर्गीकरणों के आधार पर भेदभाव कर सकता है। ऐसा वर्गीकरण लिंग, आवश्यकता, परिस्थिति, योग्यता, तथा क्षमता के आधार पर किया जा सकता है। समाज के कमजोर लोगों की विशेष सहायता की जानी चाहिए।

प्रश्न 2.
संरक्षणकारी विभेद क्या है? (What is protective discrimination?)
उत्तर:
हमारे संविधान में कानून के समक्ष समानता को एक शासन के आधारभूत सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया गया है। धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। परन्तु जो लोग अधिक पिछड़े हैं उनके लिए संरक्षणात्मक भेदभाव रखे गए हैं। राज्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और अन्य पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए विशेष प्रकार की व्यवस्था कर सकता है। राज्य उन्हें सरकारी नौकरियों में स्थान दिलाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 3.
सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए पूर्ण सुविधाएँ उपलब्ध करवाना तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही सामाजिक न्याय है।

सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of Social Justice):

  1. धर्म, जाति, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त किया जाता है। सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाते हैं।
  2. सार्वजनिक स्थानों के प्रयोग के लिए नागरिकों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  3. व्यक्ति के रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास तथा अन्य निजी मामलों में राज्य द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाता।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के क्या प्रावधान हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सभी भारतीय नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय प्रदान करना संविधान का सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए –

  1. नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।
  2. प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता प्रदान की गई है।
  3. सरकारी नौकरी पाने के क्षेत्र में सभी नागरिक को समान अवसर प्रदान किए गए हैं।
  4. छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। इसका प्रयोग करने वाले को राज्य द्वारा दण्डित किया जाता है।
  5. समाज में असमानता उत्पन्न करने वाली सभी उपाधियों का अन्त कर दिया गया है।
  6. प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतन्त्रता दी गयी है। धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। राज्य को उसमें हस्तक्षेप करने की मनाही कर दी गई है।
  7. उच्च वर्ग के व्यक्तियों के द्वारा पिछड़े, दलितों तथा कम आयु के बच्चों को शोषण करने की मनाही कर दी गई है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 5.
न्याय से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you understand by Justice?) अथवा, न्याय का अर्थ समझाइए। (Explain the term Justice)
उत्तर:
इतिहास में न्याय की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। किसी ने न्याय को जैसी करनी वैसी भरनी’ के रूप में तो किसी ने उसे ईश्वर की इच्छा कहकर अथवा पूर्वजन्मों का फल कहकर पुकारा है। सालमण्ड के अनुसार “न्याय का अर्थ है, प्रत्येक व्यक्ति को उसका भाग प्रदान करना।” जे. एस. मिल के अनुसार, “न्याय उन नैतिक नियमों का नाम है जो मानव कल्याण की धारणाओं से सम्बन्धित है, और इसलिए जीवन के पथ-प्रदर्शन के लिए किसी भी अन्य नियम से अधिक महत्त्वपूर्ण है।”

प्रश्न 6.
न्याय के किन्हीं दो आधारभूत तत्वों का वर्णन कीजिए। (Describe any two fundamental postulates of Justice)
उत्तर:
न्याय के दो आधारभूत तत्व निम्नलिखित हैं –
1. सत्य (Truth):
सत्य की कसौटी पर खरा उतरने वाला न्याय अमीर-गरीब सबको एक दृष्टि से देखता है। घटनाओं का प्रस्तुतीकरण ज्यों का त्यों किया जाता है।

2. स्वतन्त्रता (Freedom):
राज्य को व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर केवल सामाजिक हित में प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। बहुत से तानाशाह शासक अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अनुचित प्रतिबन्ध लगाकर न्याय का गला घोंट देते हैं।

प्रश्न 7.
संरक्षणकारी न्याय से क्या तात्पर्य है? (What is meant by Protective Justice?)
उत्तर:
यदि राज्य कमजोर तथा दरिद्र वर्ग के हित में कुछ कार्य करता है तो यह स्पष्ट है कि वह ऐसा उन लोगों की उन्नति के लिए कर रहा है जिन्हें दूसरे वर्गों ने उनको उनके अधिकारों से वंचित कर रखा है, उसे संरक्षणकारी न्याय कहा जाता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 8.
आर्थिक न्याय का क्या अर्थ है? (What is meant by Economic Justice?)
उत्तर:
आर्थिक न्याय का अर्थ (Meaning of the term Economic Justice):
आर्थिक न्याय से यह अभिप्राय है कि राष्ट्र की सम्पत्ति व आय में सब समान रूप से भागीदार हों। आर्थिक न्याय के अनुसार लोगों की न्यूनतम भौतिक आवश्यकताएँ पूरी होनी चाहिए। एक जैसा काम करने वालों को समान वेतन दिया जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार काम करे और उसे अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति में कोई रूकावट न आए। स्त्रियों और बच्चों का आर्थिक शेषण न हो। बुढ़ापे, बीमारी, व अपंग अवस्था में राज्य उनके कल्याण के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करे।

प्रश्न 9.
नैतिक न्याय का अर्थ बताइए। (Discuss the meaning of Moral Justice)
उत्तर:
संसार में कुछ नियम सर्वव्यापी, अपरिवर्तनशील और प्राकृतिक हैं। इनके अनुसार होने वाले आचरण व व्यवहार को ही नैतिक न्याय कहते हैं। उदाहरणस्वरूप, सच बोलना, प्रतिज्ञा-पालन, दया, सहानुभूति, उदारता, क्षमता आदि नैतिक न्याय के अन्तर्गत आते हैं। ऐसे व्यवहार की स्थापना में राज्य को हस्तक्षेप, करने की आवश्यकता ही न पड़ेगी। स्वतः ही सबको नैतिक न्याय की प्राप्ति हो जाएगी।

प्रश्न 10.
कानूनी न्याय से क्या तात्पर्य है? (What is meant by Legal Justice?)
उत्तर:
न्याय की समाज में जो भी मान्यताएँ होती हैं, जब उन्हें विधियों के द्वारा मूर्त रूप दे दिया जाता है, तब वह कानूनी न्याय कहलाता है। कानूनी न्याय-संगत होना चाहिए। कानूनी न्याय निष्पक्ष व सस्ता हो।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 11.
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में क्या अन्तर है? (What is the difference between the legal justice and the moral Justice?
उत्तर:
कानूनी न्याय और नैतिक न्याय में अन्तर:
Bihar Board Class 11 Political Science Chapter 4 सामाजिक न्याय Part - 1 Image 1

लघु उत्तरीय प्रश एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कानूनी न्याय का तात्पर्य क्या है? (What is the meaning of legal justice?)
उत्तर:
कानूनी न्याय का तात्पर्य यह है कि कानून अपने सैद्धान्तिकता में जहाँ नैतिक मूल्यों के अनुरूप है, वहीं अपने क्रियान्वयन के स्तर पर इसी सैद्धान्तिकता के कारण नैतिक हो। इसलिए कानूनी न्याय का स्थायित्व सिर्फ मूल्यों और नैतिकता पर निर्भर होता है, राज्य का शासक वर्ग इसी के माध्यम से कानून को गठित और उसका क्रियान्वयन करता है लेकिन यह सिद्धान्त कानून की निरंकुशता का मूल तात्पर्य नहीं होता है।

इसलिए कानूनी न्याय का मूल अर्थ है कि कानून नैतिक मूल्यों के अनुरूप हो तथा इसको लागू कराने सम्बन्धी व्यावहारिकता भी नैतिक हो। कानून न्याय जब राज्य के माध्यम से लागू होता है, तो स्वाभाविक है कि राज्य को बलपूर्वक भी न्या को लागू करवाना पड़ता है। इसलिए कानूनी न्याय का अर्थ और परिभाषा का क्षेत्र काफी वृहद होता है, जो न्याय के हर स्तर पर उस व्यावहारिकता को खत्म कर दे, जो न्याय को काल्पनिक यां कानून को निरंकुश बनाना चाहता है। इसलिए कानूनी न्याय का तात्पर्य न्याय से और काफी वृहद् और प्रभावी हो जाता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता, समानता और न्याय के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करें। (Find out the inter relationship of liberty, equality and justice)
उत्तर:
न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के सन्दर्भ में इस मौलिक तत्व की और विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है कि न्याय, स्वतन्त्रता और समानता के मूल्यों का मूल्यांकन करके स्वतन्त्रता और समानता को लोगों पर लागू करवाता है। न्याय वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता के वास्ताविक मूल्यों की पहचान करवाता है। वही न्याय स्वतन्त्रता और समानता को बिना किसी भेदभाव के लागू करवाने का माध्यम बनता है।

स्वतन्त्रता का मूल्य ही स्वतन्त्रता के अस्तित्व और उसके प्रभाव का कारण बनता है तथा स्वतन्त्रता तभी तक हितकर है, जब तक कि उसके साथ न्याय का भाव जुड़ा हुआ है। वैसे ही समानता लोगों पर जब तक न्यायपूर्ण लागू होगी, तभी तक समानता का अस्तित्व है, नहीं तो समानता का अस्तित्व खत्म हो जाएगा क्योंकि समानता का अस्तित्व समानता के मूल्यों पर निर्भर करता है और मूल्यों का सम्बन्ध न्याय से होता है। न्याय वास्तव में स्वतन्त्रता और समानता को स्थायी रूप से प्रभावी बनाता है इसलिए न्याय की अवधारणा को स्वयं स्वतन्त्रता और समानता नकार नहीं सकते हैं।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता और न्याय के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करें। (Clarify the inter relationship of liberty and justice)
उत्तर:
स्वतन्त्रता और न्याय के बीच का सम्बन्ध इसलिए है, कि स्वतन्त्रता वास्तव में लोगों पर अपने गुण के अनुरूप ढंग से लागू हो सके। स्वतन्त्रता बिना अपने गुणों के असीमित होने से लोगों के लिए अन्यायपूर्ण हो जाती है, और इसी अपार स्वतन्त्रता से इसका प्रयोग करने वाले लोगों का अन्त होता है इसलिए स्वतन्त्रता का न्यायपूर्ण पहलू स्वतन्त्रता के अस्तित्व को कारगर ढंग से लागू कारने में सहायक होता है। स्वतन्त्रता पर अंकुश न्यायपूर्ण ढंग से और कोई नहीं स्वयं स्वतन्त्रता के मूल्य लगते हैं। स्वतन्त्रता के मूल्यों का निर्धारण नैतिक नियमों के स्रोत से ही होता है, इस कारण स्वतन्त्रता का सीमित स्वरूप को सही ढंग से लागू करवाने के लिये न्याय की आवश्यकता होता है।

स्वतन्त्रता का सीमित स्वरूप और उसका न्यायपूर्ण परिपालन राज्य के माध्यम से ही होगा। वह न्याय के आधार पर ही होगा लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि राज्य लोकतान्त्रिक पद्धति के लोक कल्याणाकारी राज्य में विश्वास करता हो। इसलिए न्याय का स्थान, स्वतन्त्रता सम्बन्धी तथ्यों के बावजूद राज्य, व्यक्ति और समाज के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राज्य स्वतन्त्रता के सन्दर्भ के किस प्रकार व्यक्ति और व्यक्तियों के बीच संतुलन करता है यह राज्य की न्याय व्यवस्था पर निर्भर करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 4.
न्याय के किन्हीं दो पक्षों का उल्लेख करो। (Mention any two dimensions of Justice)
उत्तर:
न्याय अंग्रेजी शब्द Justice का हिन्दी रूपान्तर है। Justice शब्द लैटिन भाषा के शब्द Jus से बना है जिसका अर्थ होता है बन्धन या बाँधना (Bind or Tie) जिसका अभिप्राय यह है कि ‘न्याय’ उस व्यवस्था का नाम है जिससे व्यक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों का उचित एवं सामंजस्यपूर्ण सन्योजन किया जाता है।

1. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
न्याय का एक पक्ष राजनीतिक न्याय माना जाता है। अरस्तू ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बन्धी न्याय (Distributive Justice) बेताया था जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था। राजनीतिक न्याय का तात्पर्य व्यक्ति का शासन में भाग लेना, चुनाव में खड़े होना, चुनाव में मतदान करना, योग्यता के अनुसार राजकीय पद ग्रहण करना आदि से है। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए उचित एवं निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को हम राजनीतिक न्याय की व्यवस्था कहते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय का होना आवश्यक है।

2. कानूनी न्याय (Legal Justice):
कानूनी न्याय से अभिप्राय है कानून न्याय-संगत हो, समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हो। कानून जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाए जाएँ और उनका औचित्य समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परखा जाए। न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो।

प्रश्न 5.
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में क्या सम्बन्ध है? (What is the relationship between Legal and Moral Justice?)
उत्तर:
कानूनी न्याय तथा नैतिक न्याय में सम्बन्ध (Relationship between Legal & Moral Justice):
कानूनी तथा नैतिक न्याय में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन दार्शनिकों ने इस दृष्टिकोण का समर्थन किया कि न्याय नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। अभी भी एक सीमा तक न्याय नैतिकता पर आधारित है परन्तु दोनों एक नहीं हैं। दोनों में अन्तर पाया जाता है। कानूनी न्याय का सम्बन्ध उन सिद्धान्तों और कार्यविधियों से है जो किसी राज्य के कानून द्वारा निर्धारित होती हैं।

कानूनी न्याय का सम्बन्ध कानूनों, रीति-रिवाजों, पूर्व निर्णय तथा मानवीय अभिकरण द्वारा निर्मित कानूनों से होता है। नैतिक न्याय वह होता है जिसके द्वारा हमें पता चलता है, कि क्या ठीक है और क्या गलत है? मनुष्य के रूप में हमारे क्या अधिकार हैं? हमारे क्या कर्त्तव्य हैं? कानूनी न्याय इन अधिकारों और कर्तव्यों को सुरक्षा प्रदान करता है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 6.
भारतीय राजनीतिक चिन्तन में न्याय की धारणा समझाइए। (Explain the concept of Justice in Indian political thought)
उत्तर:
भारतीय सामाजिक चिन्तन में राज्य की व्यवस्था के लिए न्याय को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। मनु, कौटिल्य, वृहस्पति, शुक्राचार्य, भारद्वाज एवं सोमदेव आदि उनके महान् भारतीय राजनीतिक चिन्तक हुए हैं। इनकी विशेषता यह रही है कि उन्होंने न्याय के विषय में उस कानूनी दृष्टिकोण को प्राचीनकाल में ही अपना लिया था, जिसे पाश्चात्य जगत् के विचारक आधुनिक युग में आकर ही अपना सके हैं। कौटिल्य ने कहा है, “न्याय की सुव्यवस्था राज्य का प्राण है। जिसके बिना राज्य जीवित नहीं रह सकता।”

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान में न्याय की अवधारणा पर टिप्पणी लिखिए। (Write a short note on “The concept of Justice in Indian Constitution”)
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तीनों प्रकार के न्याय की गारंटी दी गयी है। राजनैतिक न्याय सुलभ कराने के लिए समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतान्त्रिक गणराज्य की स्थापना की गई है। आर्थिक न्याय की व्यवस्था के लिए संविधान में नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन है जो राज्य को अनेक कार्य करने का निर्देश देते हैं। समान कार्य के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को समान वेतन, बाल श्रमिकों का शोषण रोकना, बन्धुआ मजदूरी पर रोक लगाना, वृद्धावस्था या बीमरी, की अवस्था में राजकीय सहायता आदि।

सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए अनुच्छेद 14 के अनुसार सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं। अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलपंथ, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव की मनाही है। अनुच्छेद 16 में सब नागरिकों को राज्य के अधीन पदों पर नियुक्ति का समान अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 17 द्वारा छुआछूत की समाप्ति कर दी गई है। अनुच्छेद 24 व 25 में बेगार तथा शोषण को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है।

प्रश्न 8.
सामाजिक न्याय का अर्थ और महत्त्व बताइए। (Discuss the meaning and importance of Social Justice)
उत्तर:
सामाजिक न्याय का अर्थ है कि नागरिकों के बीच सामाजिक दृष्टिकोण से किसी प्रकार का भेदभाव न किया जाए। श्री गजेन्द्र गड़कर के अनुसार ‘सामाजिक न्याय का अर्थ सामाजिक असमानताओं को समाप्त करके सामाजिक क्षेत्र में व्यक्ति को अवसर प्रदान करने से है। सामाजिक न्याय की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. धर्म, जाति रंग आदि के आधार पर भेदभाव की समाप्ति।
  2. सार्वजानिक स्थानों के प्रयोग में भेदभाव की समाप्ति।
  3. राज्य के हस्तक्षेप की सीमा अर्थात् रीति-रिवाज या धार्मिक विश्वास जैसे व्यक्तिगत मामालों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

सामाजिक न्याय का महत्त्व-आधुनिक युग में सामाजिक न्याय का बहुत महत्त्व है क्योंकि समाज के अन्तर्गत सबको उचित स्थान प्राप्त होता है। सभी लोग उन्नति करने लगते हैं।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 9.
न्याय से आपका क्या अभिप्राय है? (What do you mean by Justice?)
उत्तर:
पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन में न्याय का अध्ययन प्लेटो से प्रारम्भ किया जा सकता है। प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘रिपब्लिक’ (Republic) में न्याय की स्थापना के उद्देश्य में नागरिकों के कर्त्तव्यों पर बल दिया है। प्लूटो के न्याय सम्बन्धी विवेचन में बार्कर का कथन है कि “न्याय का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा उस कर्त्तव्य का पालन, जो उसके प्राकृतिक गुणों तथा सामाजिक स्थिति के अनुकूल है। नागरिक को अपने धर्म की चेतना तथा सार्वजनिक जीवन में उसकी अभिव्यंजना ही राज्य का न्याय है।”

अरस्तू ने न्याय की इस समस्या को व्यक्तियों के आपसी विनिमय में राज्य के पदों के वितरण में किन-किन नियमों का पालन होना चाहिए पर विचार करके ‘न्याय’ को व्यावहारिक रूप प्रदान किया है। जिन राज्यों में न्याय नहीं रह जाता वह डाकुओं के झुण्ड के समान है। एक्वीनाव के अनुसार “न्याय प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकार दिए जाने की निश्चित व सनातन इच्छा है।”

प्रश्न 10.
न्याय के विभिन्न रूपों को वर्णित करें। (Describe the different forms of Justice)
उत्तर:
न्याय के विभिन्न रूपों को निम्न विषयों से जाना जाता है, जैसे नैतिक न्याय, सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय, कानूनी न्याय और आर्थिक न्याय। नैतिक न्याय की सर्वोच्च अवधारणा है। नैतिक न्याय का स्रोत प्राकृतिक नियम है, और प्राकृतिक नियम मनुष्यों द्वारा अपरिवर्तनीय हैं। मनुष्यों को वास्तव में सत्य की अवधारणा का पहचानना और लागू करना है तो उसका मूल रास्ता और कोई नहीं सिर्फ नैतिक न्याय ही है। बिना नैतिक मूल्यों के न्याय का न तो व्यावहारिक स्वरूप रह पाता है और न ही सैद्धान्तिक स्वरूप रह पाता है।

इस कारण न्याय की सच्ची अवधारणा को पहचानने का एकमात्र रास्ता और कोई नहीं बल्कि नैतिक मूल्य है। सामाजिक न्याय में समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जब उसके सामाजिक अधिकार के अनुरूप न्यायगत तरीके से अधिकार एक दूसरे से प्राप्त होंगे तो निश्चित है, कि सामाजिक न्याय वास्तव में संबके विकास और स्वयं समाज के विकास का कारण बनेगा। राजनीतिक न्याय वास्तव में केवल प्रजातान्त्रिक शासन पद्धति के ही माध्यम से सम्भव है, क्योंकि राजनीतिक न्याय का. मूल तात्पर्य यह है कि सत्ता में प्रत्येक व्यक्ति को भागीदारी का अधिकार तथा बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों को सार्वजानिक पद प्राप्त होना। कानूनी न्याय में कानून वास्तव में ऐसा हो जो लोगों को न्याय देने में मदद करे न कि न्याय देने में रोड़े अटकाए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्लूटो के न्याय सिद्धान्त पर एक निबन्ध लिखिए। (Write an essay on Plato’s concept of Justice)
उत्तर:
प्लूटो का न्याय सिद्धान्त (Plato’s Concept of Justice):
प्लूटो के अनुसार न्याय का सम्बन्ध मनुष्य की आत्मा से है। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दी रिपब्लिक’ (The Republic) में न्याय की विस्तृत व्याख्या की है। प्लूटो के अनुसार भूख (Appetite), साहस (Spirit) व विवेक (Wisdom) मानव आत्मा के तीन तत्त्व हैं। इसी प्रकार राज्य में क्रमशः उत्पादन (Producers) सैनिक (रक्षक) (Guardians) तथा शासक (Rulers) तीन वर्ग होते हैं। तीनों वर्गों को अपने-अपने निर्धारित कार्यों को करना होता है। प्रत्यके वर्ग को ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

मानव आत्मा में निहित न्याय व्यक्तित्व के विविध पक्षों जैसे-क्षुधा, साहस और विवेक का समुचित संतुलन और समन्वय उपलब्ध कराता है। प्लूटो की दृष्टि में राज्य के सन्दर्भ में न्याय विभिन्न सामाजिक वर्गों में सामंजस्य स्थापित करता है। जब हर वर्ग अपने कार्य से ही सम्बद्ध रहता है तथा केवल वही कार्य करता है जिसके लिए वह प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक उपयुक्त होता है और दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है तो उस स्थिति में उस राज्य में न्याय चरितार्थ होता है। प्लूटो के न्याय का सिद्धान्त कानूनी न होकर नैतिक है जो कि यह बताता है कि क्या सही है और क्या गलत, क्या उचित है और क्या अनुचित। उचित और सही कार्य को करना न्याय है जबकि अनुचित और गलत कार्य को करना अन्याय है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 2.
पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य में न्याय की अवधारणा का अर्थ समझाइए। (Explain the meaning of the concept of Justice in Western perspective)
उत्तर:
अति प्राचिन काल में न्याय का रूप कबीलाई था। तब “दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख” के सिद्धान्त पर कार्य किया जाता था। प्राचीन यूनानी न्याय में सोफिस्टो, पाइथागोरस, प्लूटो और अरस्तू के द्वारा न्याय की धारणा बताई गयी। सोफिस्टो के द्वारा न्याय शक्तिशाली का हित है। पाइथागोरस ने समानता के आधार पर न्याय को परिभाषित किया है। प्लूटो के अनुसार न्याय समाज को एक सूत्र में रखने वाली शक्ति है। न्याय का अर्थ व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्यों को पूरा करना है। अरस्तू ने न्याय दो प्रकार का बताया। प्रथम, समानान्तर न्याय, वह न्याय है जो सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करता है।

दूसरा आनुपातिक न्याय, वह न्याय है जो राजनीतिक जीवन को व्यवस्थित करता है। मध्य युग में ईसाई धर्म के आधार पर न्याय को सामाजिक गुण के रूप में देखा गया। सन्त ऑगस्टाइन ने कहा, “न्याय केवल इसाई राज्य में होता है। वह चर्च को प्रधानता देता है, उसका विचार है, कि राज्य का चर्च के मामलों में हस्तक्षेप न्याय का उल्लंघन है। रोमन धारणा के अनुसार व्यक्ति के अधिकारों की न्यायपूर्वक सुरक्षा ही न्याय है। बीसवीं सदी में कल्याणकारी राज्यों में न्याय की अवधारणा में कानूनी, राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक पक्ष भी सम्मिलित. किए गए। विश्व के सभी राज्य, जिनमें भारत भी शामिल है, आज न्याय की पाश्चात्यो अवधारणा को ही मानते हैं। इस अवधारणा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य की देखभाल, कानून पर आधारित शासन तथा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा आवश्यक है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 3.
न्याय की अवधारणा के विविध रूपों का वर्णन कीजिए। (Describe the various forms of the concept of Justice)
उत्तर:
न्याय की अवधारणा के विविध रूप (Various forms of concept of Justice):
न्याय की अवधारणा के विविध रूप निम्न प्रकार हैं –

1. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice):
समाज में व्यवस्था तभी बनी रहेगी यदि व्यक्तियों को स्वतन्त्रता और समानता प्रदान की जाए परन्तु यह अव्यावहारिक है। प्राकृतिक स्वतन्त्रता व्यवस्थित समाज के अस्तित्व में आने से पहले की कल्पना हो सकती है।

2. नैतिक न्याय (Moral Justice):
परम्परागत रूप से न्याय की नैतिक धारणा को ही अपनाया जा रहा है। नैतिक न्याय के प्रमुख नियमों में जो आदर्श सम्मिलित हैं, उनमें सत्य बोलना, प्राणिमात्र के प्रति दया का व्यवहार करना, परस्पर प्रेम करना, प्रतिज्ञा पूरी करना, वचन का पालन करना, उदारता व दान का परिचय देना आदि है।

3. राजनीतिक न्याय (Political Justice):
अरस्तू ने न्याय को एक प्रकार का वितरण सम्बन्धी (Distributive) न्याय बताया था, जिसका अर्थ राजनीतिक समाज में व्यक्ति को उसका उचित स्थान प्रदान करना था। आधुनिक युग में राजनीतिक समाज के सदस्य होने के नाते व्यक्ति द्वारा उसकी योग्यता के अनुसार शासन में भाग लेने, उसके सम्बन्ध में मत व्यक्त करने, चुनाव में अपना मत देने, चुनाव में स्वयं खड़े होने तथा राजकीय पद ग्रहण करने आदि के अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों की उचित व्यवस्था सबके लिए तथा निष्पक्ष रूप से होने की स्थिति को ही राजनीतिक न्याय कहते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए राजनीतिक न्याय अत्यन्त: आवश्यक हैं।

4. सामाजिक न्याय (Social Justice):
सामाजिक न्याय का अर्थ है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व है। समाज में जाति, धर्म, वर्ग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। दास प्रथा के समय दासों को अन्य नागरिकों से हेय समझा जाता था। संसार के अनेक भागों में अब भी समाज में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समान नहीं है। ये सब सामाजिक अन्याय की स्थितियाँ हैं। सामाजिक न्याय की स्थिति में सबको समाज में उचित स्थान प्राप्त होता है।

5. आर्थिक न्याय (Economic Justice):
आर्थिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन के साधन और सम्पत्ति के वितरण की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें सबको उनके श्रम का उचित पारिश्रमिक मिल सके तथा कोई व्यक्ति, समुदाय या वर्ग किसी अन्य व्यक्ति, समुदाय या वर्ग का शोषण न कर सके। सभी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। आधुनिक युग में आर्थिक न्याय का बड़ा महत्त्व है। आर्थिक विषमता होने पर समाज धनी और निर्धन, पूँजीपति और श्रमिकों एवं शोषक और शोषित के वर्गों में विभाजित हो जाता है। फलतः समाज उन्नति नहीं कर सकता।

6. कानूनी न्याय (Legal Justice):
कानूनी न्याय से अभिप्राय है कि कानून न्याय-संगत हो समान व्यक्तियों के लिए समान कानून हो। किसी भी वर्ग को विशेषाधिकार प्राप्त न हो। कानून जनता द्वारा समय-समय पर परखा जाए न्याय निष्पक्ष, सरल व सस्ता हो ताकि निर्धन व्यक्ति भी धन के अभाव मे कहीं न्याय से वंचित न रहें और धनी वर्ग के शोषण के शिकार न हो जाए।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 4.
भारत में नागरिकों के सामाजिक न्याय की सुरक्षा के क्या उपाय किए गए हैं? (With measures have been taken in India to secure social justice to its citizens?)
उत्तर:
सामाजिक न्याय का अर्थ है, कि समाज में निर्बल वर्ग के लोगों, अशिक्षितों, निर्धनों को शक्तिशाली वर्ग, शिक्षितों और धनवानों की भाँति उन्नति के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय दिलाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं –

सामाजिक न्याय के उपबन्ध (Provisions of Social Justice):

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार छुआछूत को पूर्णतया समाप्त कर दिया गया है।
  2. अनुच्छेद 16 के अनुसार सरकार का कर्तव्य है कि हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों कि शिक्षा को अधिक उन्नत कर तथा उनके अधिक हितों की रक्षा करे।
  3. अनुच्छेद 15 के अनुसार सरकार का कर्तव्य है, कि दुकानों, होटलों, सार्वजानिक विश्राम गृहों या भोजनालयों, कुओं, तालाबों, स्नानघरों, सड़कों, मनोविनोद के स्थानों में हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों के प्रवेश के लिए कोई रुकावट है तो उसे दूर करे।
  4. अनुच्छेद 25 के अनुसार हिन्दुओं के सब धार्मिक स्थान हरिजनों, पिछड़ी जातियों और कबीलों के प्रवेश के लिए खोल दिए जाएँ।
  5. हरिजन, कबीले और पिछड़ी हुई जातियाँ कोई भी काम-धन्धा और व्यापार कर सकती हैं और उनपर कोई रूकावट नहीं होगी।
  6. अनुच्छेद 19 के अनुसार हरिजनों, कबीलों और पिछड़ी जातियों को राज्य की ओर से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश की मनाही नहीं की जाएगी।
  7. सरकार का यह परम कर्त्तव्य है, कि नौकरियों में पिछड़ी हुई जातियों तथा जनजातियों को उचित प्रतिनिधित्व दे।
  8. संविधान के आरम्भ होने से 10 वर्ष तक अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्यों के विधानमण्डलों में स्थान आरक्षित किए गए थे। हर 10 वर्ष के बाद फिर से संविधान में संशोधन करके यह आरक्षण अभी तक लागू है।
  9. समान कार्य के लिए समान वेतन की नीति अपनायी जा रही है।
  10. कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन कर सकता है।
  11. प्रत्येक जाति एवं सम्प्रदाय को अपनी संस्कृति, भाषा तथा लिपि को सुरक्षित रखने का अधिकार दिया गया है।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 5.
भारतीय परिप्रेक्ष्य में न्याय की आवधारणा का वर्णन कीजिए। (Describe the concept of Justice in Indian Perspective)
उत्तर:
हिन्दू धर्म की स्मृतियाँ के अनुसार कानून धर्म की एक शाखा है। विभिन्न स्मृतियाँ, धर्म के नियमों के अनुसार ही न्याय व्यवस्था को निश्चित करती हैं। स्मृतियों के अनुसार दण्ड की व्यवस्था न्याय से सम्बन्धित है। इनके अनुसार राजा को दैवीय गुणों के अनुसार कार्य करना चाहिए। जो भी प्राणी अपने स्वधर्म का पालन नहीं करता था उसे धर्म के नियमों के अनुसार दण्डित किया जाता था। मनुस्मृति में फौजदारी और दीवानी कानूनों से सम्बन्धित धर्म-कर्तव्यों के उल्लंघन के लिए कानून विधि, दण्ड-विधि की व्यवस्था की गई है।

मनु ने अपराध के अनुपात के अनुसार दण्ड-फटकार लगाना, जुर्माना करना, वनवास देना तथा मृत्युदण्ड का विधान किया है, परन्तु यह दण्ड वर्णमूलक व्यवस्था के अनुसार समय, स्थान व उद्देश्य के आधार पर दिए जाते थे। समान अपराध पर, जातिगत आधार पर असमान दण्ड की व्यवस्था थी। ब्राह्मणों को मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था, परन्तु भयंकर अपराध के लिए ब्राह्मण को मौत की सजा जल में डुबोकर मारने की थी। जुआ खेलने वालों को कोड़ों की सजा दी जाती थी। उत्तराधिकार कानून की सूक्ष्म व्यवस्था थी जिसमें बड़े भाई की सम्पत्ति के अलावा कुँआरी बहनों का भी भाग होता था। न्याय प्रशासन का उद्देश्य सुधारात्मक था। मनु ने चार प्रकार के दण्ड बताए हैं –

  1. वाक दण्ड
  2. धिक दण्ड
  3. धन दण्ड
  4. मृत्यु दण्ड न्यायालयों के चार श्रेणी थे

1. राजा द्वारा नियुक्त अधिकारी:
सभा की अध्यक्षता राजा करता था। सभा में वेदों, धर्म-शास्त्रों और स्मृतियों के योग्य, निष्पक्ष, अनुभवी ब्राह्मण सलाहकार होते थे।

2. पूग-पूग:
अथवा गण जाति वालों के समूह को कहते थे । इनका अलग न्यायालय होता था।

3. श्रेणी:
एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाला व्यक्ति या समूह चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो, श्रेणी कहलाता था। उनके लिए अलग न्यायालय की व्यवस्था थी।

4. कुल:
चौथे प्रकार का न्यायालय था। इसमें जाति विशेष के बन्धु-बन्धव होते थे। मनुस्मृति में यह भी बताया गया है कि न्यायकर्ताओं की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए। न्यायालयों के संगठन में सबसे नीचे की इकाई एक ग्राम तक ही सीमित थी। इसका न्यायिक अधिकारों के पास विवाद भेजा जाता था। उसके बाद अति, सहस्त्राधिपति के पास विवाद भेज दिया जाता था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसने कहा है? न्यायपूर्ण समाज वह है जिसमें परस्पर सम्मान की बढ़ती हुई भावना और अपमान ही घटती हुई भावना मिलकर एक करुणा भरे समाज का निर्माण करें।
(क) डॉ. भीमराव अम्बेदकर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) पंडित जवाहर लाल नेहरू
(घ) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
उत्तर:
(क) डॉ. भीमराव अम्बेदकर

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 2.
‘न्याय का सिद्धान्त’ नामक पुस्तक के लेखक कौन है?
(क) आस्टिन
(ख) प्रोंधा
(ग) जॉन राल्स
(घ) डायसी
उत्तर:
(ग) जॉन राल्स

प्रश्न 3.
“सामाजिक न्याय’ का प्रमुख तत्व क्या है?
(क) अवसर की समानता
(ख) विधि के समक्ष समानता
(ग) विधि की तार्किकता
(घ) कल्याणकारी विधिक प्रावधान
उत्तर:
(क) अवसर की समानता

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 4 सामाजिक न्याय

प्रश्न 4.
राजनीतिक न्याय का सरोवर है –
(क) कानून न्यायसंगत होने चाहिए
(ख)कानून के अनुसार न्याय मिलना चाहिए
(ग) जनता की राज्य सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए
(घ) बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समाज में समान अवसर एवं सुख सुविधा उपलब्ध है
उत्तर:
(ग) जनता की राज्य सत्ता में भागीदारी होनी चाहिए

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

BSEB Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 10 Science मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार InText Questions and Answers

अनुच्छेद 11.1 और 11.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
नेत्र की समंजन क्षमता से क्या अभिप्राय है? (2011, 13, 15, 16)
उत्तर:
नेत्र की वह क्षमता जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को समायोजित करके निकट तथा दूरस्थ वस्तुओं को फोकसित कर लेता है, नेत्र की समंजन क्षमता कहलाती है।

प्रश्न 2.
निकट दृष्टिदोष का कोई व्यक्ति 1.2 m से अधिक दूरी पर रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख सकता। इस दोष को दूर करने के लिए प्रयुक्त संशोधक लेंस किस प्रकार का होना चाहिए?
उत्तर:
अवतल लेंस।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 3.
मानव नेत्र की सामान्य दृष्टि के लिए दूर बिंदु तथा निकट बिंदु नेत्र से कितनी दूरी पर होते हैं?
उत्तर:
मानव नेत्र की सामान्य दृष्टि के लिए दूर बिंदु अनन्त पर तथा निकट बिंदु 25 cm पर होते हैं।

प्रश्न 4.
अंतिम पंक्ति में बैठे किसी विद्यार्थी को श्यामपटद पढ़ने में कठिनाई होती है। यह विद्यार्थी किस दृष्टिदोष से पीड़ित है? इसे किस प्रकार संशोधित किया जा सकता है?
उत्तर:
विद्यार्थी निकट-दृष्टि दोष से पीड़ित है। इस दृष्टि दोष को संशोधित करने के लिए उसे उचित फोकस दूरी वाले अवतल लेंस का चश्मा पहनना होगा।

Bihar Board Class 10 Science मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मानव नेत्र अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी को समायोजित करके विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को फोकसित कर सकता है।
ऐसा हो पाने का कारण है –
(a) जरा-दूरदृष्टिता
(b) समंजन
(c) निकट-दृष्टि
(d) दीर्घ-दृष्टि
उत्तर:
(b) समंजन

प्रश्न 2.
मानव नेत्र जिस भाग पर किसी वस्तु का प्रतिबिंब बनाते हैं, वह है –
(a) कॉर्निया
(b) परितारिका
(c) पुतली
(d) दृष्टिपटल
उत्तर:
(d) दृष्टिपटल

प्रश्न 3.
सामान्य दृष्टि के वयस्क के लिए सुस्पष्ट दर्शन की अल्पतम दूरी होती है, लगभग –
(a) 25 m
(b) 2.5 cm
(c) 25 cm
(d) 2.5 m
उत्तर:
(c) 25 cm

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 4.
अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी में परिवर्तन किया जाता है –
(a) पुतली द्वारा
(b) दृष्टिपटल द्वारा
(c) पक्ष्माभी द्वारा
(d) परितारिका द्वारा
उत्तर:
(c) पक्ष्माभी द्वारा

प्रश्न 5.
किसी व्यक्ति को अपनी दूर की दृष्टि को संशोधित करने के लिए – 5.5 डायॉप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। अपनी निकट की दृष्टि को संशोधित करने के लिए उसे +1.5 डायॉप्टर क्षमता के लेंस की आवश्यकता है। संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की फोकस दूरी क्या होगी
1. दूर की दृष्टि के लिए
2. निकट की दृष्टि के लिए?
हल:
1. दूर की दृष्टि के लिए
P = \(\frac {1}{f}\) (मीटर में)
f = \(\frac {1}{p}\) = – \(\frac {1}{5.5}\) = \(\frac {10}{55}\) = \(\frac {-2}{11}\) m
f = \(\frac {-2}{11}\) x 100 cm = \(\frac {-200}{11}\) cm
f = -18.2 cm = – 0.18 m
ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि लेंस अवतल है।

2. निकट की दृष्टि के लिए –
f = \(\frac {1}{p}\) = \(\frac {1}{1.5}\)
\(\frac {10}{15}\) x 100 cm = \(\frac {2}{3}\) x 100 cm
= \(\frac {200}{3}\) cm = 66.67 cm = + 0.67 m
धनात्मक चिह्न दर्शाता है कि लेंस उत्तल है।

प्रश्न 6.
किसी निकट-दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का दूर बिंदु नेत्र के सामने 80 cm दूरी पर है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की प्रकृति तथा
क्षमता क्या होगी?
हल:
इस दोष के निवारण के लिए अवतल लेंस का प्रयोग करना होगा।
अतः
u = – ∞  υ = -80 cm, f = ?
सूत्र \(\frac {1}{υ}\) – \(\frac {1}{ u}\) = \(\frac {1}{ f}\) से,
\(\frac {1}{ -80}\) – \(\frac {1}{ u}\) = \(\frac {1}{ f}\)
– \(\frac {1}{ f}\) = \(\frac {1}{80}\)
अतः फोकस दूरी’ f =-80 cm = -0.8 m
लेन्स की क्षमता P = \(\frac {1}{ f}\) = \(\frac {1}{80}\) D = -1.25 D
अत: आवश्यक लेन्स की प्रकृति अपसारी तथा क्षमता -1.25 D है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 7.
चित्र बनाकर दर्शाइए कि दीर्घ-दृष्टि दोष कैसे संशोधित किया जाता है। एक दीर्घ-दृष्टि दोषयुक्त नेत्र का निकट बिंदु 1 m है। इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की क्षमता क्या होगी? यह मान लीजिए कि सामान्य नेत्र का निकट-बिंदु 25 cm है।
हल:
दीर्घ-दृष्टि दोष का निवारण उत्तल लेंस से किया जाता है।
दिया है, υ = 1 m = -100 cm, u = -25 cm
सूत्र, \(\frac {1}{υ}\) – \(\frac {1}{ u}\) = \(\frac {1}{ f}\) से,
\(\frac {1}{-100}\) – \(\frac {1}{ 25}\) = \(\frac {1}{ f}\)
\(\frac {1 + 4}{100}\) = \(\frac {1}{ f}\)
\(\frac {3}{ 100}\) = \(\frac {1}{ f}\)
f = \(\frac {100}{3}\) cm
f = \(\frac{\frac{100}{3}}{100} \mathrm{m}\) या \(\frac {100}{3}\) x \(\frac {1}{100}\) m
f = \(\frac {1}{3}\) m
अब, क्षमता, P =\(\frac {1}{ f}\) (मीटर में)
\(\frac {1}{ f}\) = m
P = +3D

(a) दीर्घ-दृष्टि दोष युक्त नेत्र का निकट बिंदु
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
(b) दीर्घ-दृष्टि दोष युक्त नेत्र
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
(c) दीर्घ-दृष्टि दोष का निवारण
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 8.
सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट क्यों नहीं देख पाते?
उत्तर:
सामान्य नेत्र 25 cm से निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट नहीं देख पाते; क्योंकि 25 cm से निकट रखी वस्तुओं से आने वाली प्रकाश किरण नेत्र के रेटिना पर उचित प्रकार से फोकस नहीं हो पाती, जिस कारण वस्तु का धुंधला प्रतिबिंब बनता है और वह सुस्पष्ट नहीं दिखाई देती।

प्रश्न 9.
जब हम नेत्र से किसी वस्तु की दूरी को बढ़ा देते हैं तो नेत्र में प्रतिबिंब-दूरी का क्या होता है?
उत्तर:
जब हम नेत्र से किसी वस्तु की दूरी को बढ़ा देते हैं तो नेत्र में प्रतिबिंब-दूरी अपरिवर्तित रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि जब नेत्र से वस्तु की दूरी बढ़ाई जाती है तो पक्ष्माभी पेशियाँ नेत्र लेंस की फोकस दूरी को समायोजित कर देती हैं जिससे वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिंब रेटिना पर प्राप्त होता है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 10.
तारे क्यों टिमटिमाते हैं?
उत्तर:
तारों के प्रकाश के वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण तारे टिमटिमाते प्रतीत होते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने के पश्चात् पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचने तक तारे का प्रकाश निरंतर अपवर्तित होता रहता है। चूँकि वायुमंडल तारे के प्रकाश को अभिलंब की ओर झुका देता है, अतः तारे की आभासी स्थिति उसकी वास्तविक स्थिति से कुछ भिन्न प्रतीत होती है और वे हमें टिमटिमाते हुए प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 11.
व्याख्या कीजिए कि ग्रह क्यों नहीं टिमटिमाते?
उत्तर:
ग्रह तारों की अपेक्षा पृथ्वी के बहुत पास हैं और इसलिए उन्हें विस्तृत स्रोत की भाँति माना जा सकता है। यदि हम ग्रह को बिन्दु-साइज़ के अनेक प्रकाश स्रोतों का संग्रह मान लें तो सभी बिन्दु-साइज़ के प्रकाश-स्रोतों से हमारे नेत्रों में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा में कुल परिवर्तन का औसत मान शून्य होगा, इसी कारण टिमटिमाने का प्रभाव निष्प्रभावित हो जाता है।

प्रश्न 12.
सूर्योदय के समय सूर्य रक्ताभ क्यों प्रतीत होता है?
उत्तर:
सूर्योदय के समय सूर्य क्षैतिज के निकट होता है इसलिए सूर्य से आने वाला अधिकांश नीला प्रकाश और कम तरंगदैर्घ्य का प्रकाश वायुमंडल में उपस्थित कणों द्वारा दूर प्रकीर्णित कर दिया जाता है। इस प्रकार हमारे नेत्रों तक जो प्रकाश पहुँचता है वह अधिक तरंगदैर्घ्य वाला होता है। यही घटना सूर्योदय के समय सूर्य को रक्ताभ प्रदान करती है।

प्रश्न 13.
किसी अंतरिक्षयात्री को आकाश नीले की अपेक्षा काला क्यों प्रतीत होता है? (2016)
उत्तर:
हम जानते हैं कि अंतरिक्ष में वायुमंडल नहीं होता है जिस कारण वहाँ पर सूर्य का प्रकाश प्रकीर्णित नहीं होता है। यही कारण है कि अंतरिक्षयात्री को आकाश नीले की अपेक्षा काला प्रतीत होता है।

Bihar Board Class 10 Science मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार Additional Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव नेत्र द्वारा किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब बनता है
(a) कॉर्निया पर
(b) आइरिस पर
(c) पुतली पर
(d) रेटिना पर
उत्तर:
(d) रेटिना पर

प्रश्न 2.
नेत्र-लेंस होता है
(a) अभिसारी
(b) अपसारी
(c) अपसारी या अभिसारी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) अभिसारी

प्रश्न 3. स्वस्थ आँख के लिए दूर-बिन्दु होता है (2011, 12, 15)
(a) 25 सेमी
(b) 50 सेमी
(c) 100 सेमी
(d) अनन्त पर
उत्तर:
(d) अनन्त पर।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 4.
स्वस्थ आँख के लिए स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी होती है स्वस्थ नेत्र का निकट बिन्दु होता है (2011)
या स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी है – (2014, 18)
(a) 25 सेमी पर
(b) 50 सेमी पर
(c) 100 सेमी पर
(d) अनन्त पर
उत्तर:
(a) 25 सेमी पर

प्रश्न 5.
निकट दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का दूर बिन्दु स्थित होता है (2013)
(a) 25 सेमी पर
(b) 25 सेमी से कम दूरी पर
(c) अनन्त पर
(d) अनन्त से कम दूरी पर
उत्तर:
(d) अनन्त से कम दूरी पर

प्रश्न 6.
दूर-दृष्टि दोष के कारण प्रतिबिम्ब बनता है – (2012)
(a) रेटिना पर
(b) रेटिना के पीछे
(c) रेटिना के आगे
(d) कहीं नहीं
उत्तर:
(b) रेटिना के पीछे

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य की आँख में रेटिना का क्या कार्य है ?
उत्तर:
मनुष्य की आँख में रेटिना का कार्य वस्तु का प्रतिबिम्ब बनाना है।

प्रश्न 2.
निकट-दृष्टि दोष निवारण हेतु किस प्रकार के लेंस का प्रयोग किया जाता है ? (2011)
उत्तर:
उचित फोकस-दूरी के अवतल लेंस का।

प्रश्न 3.
दीर्घ दृष्टि दोष निवारण के लिए किस प्रकार के लेंस का उपयोग किया जाता है? (2011, 13, 14)
या दूर-दृष्टि दोष दूर करने के लिए चश्मे में किस प्रकार के लेंस का प्रयोग करना होगा?
उत्तर:
उचित फोकस दूरी के उत्तल लेंस का।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 4.
एक व्यक्ति के चश्मे के ऊपरी भाग में अवतल लेंस तथा निचले भाग में उत्तल लेंस लगा है। बताइए उस व्यक्ति की आँख में कौन-कौन से दोष हैं? (2018)
उत्तर:
मनुष्य की आँख में निकट-दृष्टि एवं दूर-दृष्टि दोनों दोष हैं।

प्रश्न 5.
एक व्यक्ति के चश्मे में उत्तल लेंस लगा है। बताइए उस व्यक्ति की आँख में ., कौन-सा दोष है ? (2015)
उत्तर:
व्यक्ति की आँख में दूर-दृष्टि दोष है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य की आँख के निकट-बिन्दु तथा दूर-बिन्दु से क्या तात्पर्य है ? स्वस्थ आँख के लिए इनका मान लिखिए। (2015, 17)
उत्तर:
निकट-बिन्दु आँख के अधिक-से-अधिक निकट का वह बिन्दु जिसे आँख अपनी अधिकतम समंजन क्षमता लगाकर स्पष्ट देख सकती है; आँख का निकट-बिन्दु कहलाता है। स्वस्थ आँख के लिए यह दूरी 25 सेमी होती है। दूर-बिन्दु वह दूरतम बिन्दु जिसे आँख बिना समंजन क्षमता लगाये स्पष्ट देख सकती है, आँख का दूर-बिन्दु कहलाता है। सामान्य आँख के लिए यह अनन्त पर होता है।

प्रश्न 2.
स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी किसे कहते हैं ? (2014)
उत्तर:
वह निकटतम बिन्दु जिसे आँख अपनी अधिकतम समंजन क्षमता लगाकर स्पष्ट देख सकती है, आँख का निकट-बिन्दु कहलाता है तथा आँख से इस बिन्दु की दूरी स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी कहलाती है। स्वस्थ आँख के लिए यह दूरी 25 सेमी होती है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 3.
दृष्टि दोष क्या है ? इसके प्रकार लिखिए। (2013)
उत्तर:
जब नेत्र में प्रतिबिम्ब रेटिना के आगे या पीछे बनता है तब वस्तु स्पष्ट नजर नहीं आती। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब नेत्र की समंजन क्षमता प्रतिबिम्ब को रेटिना पर बनाने के लिए कम हो जाती है या पूर्णत: समाप्त हो जाती है। इसी को दृष्टि दोष कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है –
1. निकट-दृष्टि दोष
2. दूर-दृष्टि दोष।

प्रश्न 4.
दूर-दृष्टि दोष किसे कहते हैं ? इस दोष के निवारण के लिए किस प्रकार का लेंस प्रयुक्त किया जाता है ? किरण-आरेख द्वारा समझाइए। (2012, 15, 16, 17, 18)
दूर-दृष्टि दोष से क्या तात्पर्य है? इसका निवारण किस प्रकार किया जा सकता है? (2011, 15, 16)
उत्तर:
इस दोष से पीड़ित व्यक्ति को दूर की वस्तुएँ तो स्पष्ट दिखायी देती हैं, परन्तु निकट की वस्तुएँ स्पष्ट दिखायी नहीं देतीं। यह दोष निम्नलिखित दो कारणों में से किसी एक कारण से हो सकता
1. नेत्र-लेंस की वक्रता कम हो जाए, जिससे उसकी फोकस दूरी बढ़ जाए।
2. नेत्र-लेंस तथा रेटिना के बीच की दूरी कम हो जाए अर्थात् नेत्र के गोलक का व्यास कम हो जाए।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
इस दृष्टि दोष वाले व्यक्ति का निकट बिन्दु 25 सेमी के स्थान पर अधिक दूरी पर हो जाता है। इस कारण 25 सेमी दूर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना F पर न बनकर रेटिना के पीछे A पर बनता है [देखें चित्र (a)]| दूर-दृष्टि दोष का निवारण इस दोष के निवारण के लिए ऐसे अभिसारी (उत्तल) लेंस की आवश्यकता होगी, जो 25 सेमी दूर-बिन्दु S पर रखी वस्तु (किताब) से आने वाली किरणों को इतना अभिसरित कर दे कि किरणें दूषित आँख के निकट-बिन्दु N से आती हुई नेत्र-लेंस पर आपतित हों तथा प्रतिबिम्ब रेटिना R पर बने [देखें चित्र (b)]। इस प्रकार S पर रखी वस्तु भी आँख को स्पष्ट दिखायी देगी।

प्रश्न 5.
निकट दृष्टि दोष किसे कहते हैं ? इस दोष के क्या कारण हैं? इसके निवारण के लिए किस प्रकार का लेंस प्रयुक्त किया जाता है ? किरण-आरेख द्वारा समझाइए। (2009, 12, 14, 16, 17, 18) या निकट दृष्टि दोष से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
निकट-दृष्टि दोष वाले व्यक्ति को पास की वस्तुएँ स्पष्ट दिखायी देती हैं; परन्तु अधिक दूर की वस्तुएँ स्पष्ट दिखायी नहीं देती अर्थात् नेत्र का दूर-बिन्दु अनन्त पर न होकर कम दूरी पर आ जाता है। इस दोष के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –
1. नेत्र-लेंस की वक्रता बढ़ जाए जिससे उसकी फोकस दूरी कम हो जाए।
2. नेत्र-लेंस और रेटिना के बीच की दूरी बढ़ जाए अर्थात् नेत्र के गोलक का व्यास बढ़ जाए।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
इस दोष के कारण दूर की वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर न बनकर रेटिना व नेत्र-लेंस के बीच P पर बन जाने से [देखें चित्र (a)] प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं दिखता। ऐसे मनुष्य का दूर-बिन्दु अनन्त पर न होकर आँख के काफी पास F पर होता है तथा निकट बिन्दु भी 25 सेमी से कम दूरी पर होता है। निकट-दृष्टि दोष का निवारण निकट-दृष्टि दोष में नेत्र का दूर-बिन्दु F अनन्त से कम दूरी पर ऐसी स्थिति में होता है; जहाँ से चलने वाली किरणें बिना समंजन क्षमता लगाये रेटिना पर मिलती हैं देखें चित्र (b)]।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

इस दोष को दूर करने के लिए ऐसे अवतल लेंस का उपयोग किया जाता है कि अनन्तता पर रखी वस्तु से चलने वाली किरणें इस लेंस से निकलने पर, नेत्र के दूर-बिन्दु F से चली हुई प्रतीत हों। तब ये किरणें नेत्र-लेंस से अपवर्तित होकर रेटिना F पर मिलती हैं; जहाँ वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब बन जाता है तथा वस्तु स्पष्ट दिखायी देने लगती है।

प्रश्न 6.
37.5 सेमी फोकस दूरी के अवतल लेंस की सहायता से 25 सेमी दूर रखी पुस्तक पढ़ने वाले व्यक्ति की दृष्टि में कौन-सा दोष होगा? उसकी आँख से कितनी दूरी पर प्रतिबिम्ब बनेगा? (2009)
हल:
दिया है : f = – 37.5 सेमी (चूँकि लेंस अवतल है) मनुष्य अवतल लेंस की सहायता से पुस्तक को 25 सेमी दूर रखकर स्पष्ट पढ़ सकता है। अत: यदि मनुष्य बिना लेंस के पुस्तक को दूरी पर रखकर पढ़ सकता है, तो लेंस 25 सेमी की दूरी पर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब υ दूरी पर बनाता है; अत: u = – 25 सेमी, υ = ?
लेंस का सत्र = \(\frac {1}{f}\) – \(\frac {1}{ υ}\) = \(\frac {1}{ u}\) से \(\frac {1}{υ}\) = \(\frac {1}{ f}\) – \(\frac {1}{ u}\)
= \(\frac {1}{-37.5}\) – \(\frac {1}{25}\) = –\(\frac {2}{75}\) – \(\frac {1}{ 25}\)
= \(\frac {-2-3}{ 75}\) = \(\frac {-5}{75}\)
υ = – \(\frac {75}{5}\) = -15 सेमी
अतः प्रतिबिम्ब 15 सेमी की दूरी पर बनेगा। पुन: चूँकि वह अवतल लेंस का प्रयोग करता है, अत: व्यक्ति की दृष्टि में निकट दृष्टि दोष है।

प्रश्न 7.
एक निकट दृष्टि दोष वाला मनुष्य अपनी आँख से 10 मीटर से दर की वस्तओं को स्पष्ट नहीं देख सकता। अनन्त पर स्थित किसी वस्तु को देखने के लिए कितनी फोकस दूरी, प्रकृति व क्षमता वाले लेंस की आवश्यकता होगी? (2009, 12, 13, 14, 15, 17)
हल:
इस दोष के निवारण के लिए व्यक्ति को ऐसे लेंस का उपयोग करना होगा, जो अनन्त पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब 10 मीटर की दूरी पर बना सके, अर्थात् = -10, υ = -10 मीटर =1000 सेमी

लेंस के सूत्र
\(\frac {1}{f}\) – \(\frac {1}{ υ}\) = \(\frac {1}{ u}\) से
\(\frac {1}{f}\) = \(\frac {1}{-1000}\) – \(\frac {1}{-r}\)
या \(\frac {1}{f}\) = \(\frac {1}{-1000}\)
f = -100 सेमी = – 10 मीटर
तथा लेंस की क्षमता =
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
= – 0.1 D
चूँकि लेंस की क्षमता ऋणात्मक है; अत: लेंस अवतल होगा।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 8.
एक निकट दृष्टि दोष वाला व्यक्ति 15 सेमी दूर स्थित पुस्तक को स्पष्टतः पढ़ सकता है। पुस्तक को 25 सेमी दूर रखकर पढ़ने के लिए उसे कैसा और कितनी फोकस-दूरी का लेंस अपने चश्मे में प्रयुक्त करना पड़ेगा? (2009)
हल:
इस व्यक्ति को ऐसी फोकस-दूरी के लेंस का प्रयोग करना चाहिए जिससे कि पुस्तक को 25 सेमी दूर रखने पर उसका प्रतिबिम्ब चश्मे से 15 सेमी की दूरी पर बने अर्थात्
u = – 25 सेमी (उचित चिह्न सहित), υ = – 15 सेमी (उचित चिह्न सहित)
लेंस के सूत्र \(\frac {1}{f}\) – \(\frac {1}{ υ}\) = \(\frac {1}{ u}\) से,
\(\frac {1}{f}\) = \(\frac {1}{ -15}\) – \(\frac {1}{ (-25)}\) = \(\frac {1}{ -15}\) + \(\frac {1}{ (-25)}\)
\(\frac {1}{f}\) = \(\frac {-10 + 6}{150}\) = \(\frac {4}{150}\) = – \(\frac {2}{75 }\)
f = \(\frac {75}{2}\) = – 37.5 सेमी
चूँकि फोकस-दूरी ऋणात्मक है, अत: उसे 37.5 सेमी फोकस दूरी के अवतल लेंस का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 9.
एक मनुष्य चश्मा पहनकर 25 सेमी दूरी पर रखी पुस्तक पढ़ सकता है। चश्मे में प्रयुक्त लेंस की क्षमता – 2.0 D है। यह मनुष्य बिना चश्मा लगाये हुए पुस्तक को कितनी दूर रखकर पढ़ेगा? हल-इस चश्मे के द्वारा मनुष्य की आँख से 25 सेमी दूर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब उस स्थान पर बनेगाः जहाँ बिना चश्मा लगाये वह पुस्तक को रखकर पढ़ सकता है। माना यह दूरी ५ है तथा u = – 25 सेमी।
:: P = \(\frac {1}{f}\) या – 2 = \(\frac {1}{f}\) या -2f = 1 म
या f = \(\frac {1}{2}\) सेमी या f = – 50 सेमी
लेंस के सूत्र
\(\frac {1}{υ}\) – \(\frac {1}{ u}\) = \(\frac {1}{f}\) से,
\(\frac {1}{υ}\) – \(\frac {1}{ (-25)}\) = \(\frac {1}{(-50)}\) या \(\frac {1}{υ}\) + \(\frac {1}{ 25}\) = – \(\frac {1}{50}\)
या \(\frac {1}{υ}\) = – \(\frac {1}{50}\) – \(\frac {1}{25}\) या \(\frac {1}{υ}\) + \(\frac {-1-2}{ 50}\) = \(\frac {-3}{50}\)
υ = \(\frac {50}{3}\) = – 16.7 सेमी
अत: वह बिना चश्मा लगाये 16.7 सेमी की दूरी पर आँख के सामने रखी पुस्तक को पढ़ सकता है।

प्रश्न 10.
दूर दृष्टि दोष से पीड़ित एक मनुष्य के निकट बिन्दु की दूरी 0.40 मीटर है अर्थात् वह कम से कम 40 सेमी की दूरी तक देख सकता है। इस दोष के निवारण हेतु उपयोग में लाये गये लेंस की प्रकृति बताइए तथा फोकस दूरी व क्षमता का परिकलन कीजिए। स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी 25 सेमी है। (2009, 12, 13, 14)
हल:
इस दोष को दूर करने के लिए उत्तल लेंस का प्रयोग करना चाहिए। इस व्यक्ति द्वारा प्रयोग किये गये उत्तल लेंस की फोकस-दूरी इतनी होनी चाहिए जिससे कि 25 सेमी दूरी पर रखी वस्तु का प्रतिबिम्ब आँख के सामने 0.40 मीटर अर्थात् 40 सेमी पर बने। अर्थात् u = – 25 सेमी (उचित चिह्न सहित) υ = – 40 सेमी (उचित चिह्न सहित)
लेंस के सूत्र
\(\frac {1}{f}\) = \(\frac {1}{ υ}\) = \(\frac {1}{u}\) से,
\(\frac {1}{f}\) = \(\frac {1}{ -40}\) – \(\frac {1}{-25}\)
=-\(\frac {1}{40}\) + \(\frac {1}{ 25}\) = \(\frac {-5+ 8}{200}\) = \(\frac {3}{ 200}\)
या लेंस की फोकस दूरी f = \(\frac {200}{3}\) = 66.7 सेमी
लेंस की क्षमता = \(\frac {100}{66.7}\) = 1.5 डायोप्टर

प्रश्न 11.
वर्णान्धता से आप क्या समझते हैं? (2015)
उत्तर:
नेत्र में यह ऐसा दोष होता है जिसके कारण मनुष्य कुछ निश्चित रंगों में अन्तर नहीं कर पाता। यह दोष एक आनुवंशिक दोष है जो जन्मजात होता है। इसका कोई उपचार नहीं है। जिन व्यक्तियों में यह दोष होता है, वे सामान्यत: देख तो ठीक सकते हैं परन्तु ये विभिन्न रंगों में अन्तर नहीं कर सकते।

प्रश्न 12.
प्रकाश के प्रकीर्णन को समझाइए। किस रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम किसका सबसे अधिक होता है ? (2011, 12, 16, 18)
उत्तर:
जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से गुजरता है जिसमें अति सूक्ष्म आकार के कण (जैसे-धूल व धुएँ के कण, वायु के अणु) विद्यमान हों तो इन कणों के द्वारा प्रकाश का कुछ भाग सभी दिशाओं में फैल जाता है। इस घटना को ‘प्रकाश का प्रकीर्णन’ कहते हैं। प्रयोग द्वारा ज्ञात हुआ है कि लाल रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम तथा बैंगनी रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन ‘सबसे अधिक होता है।

प्रश्ना13.
हीरा क्यों चमकता है ? (2014)
उत्तर:
हीरे से वायु में आने वाली किरण के लिए क्रान्तिक कोण बहुत कम, केवल 24° होता है। अत: जब बाहर का प्रकाश किसी कटे हुए हीरे में प्रवेश करता है तो वह उसके भीतर विभिन्न तलों पर बार-बार पूर्ण परावर्तित होता रहता है। जब किसी तल पर आपतन कोण 24° से कम हो जाता है, तब ही प्रकाश हीरे से बाहर आ पाता है। इस प्रकार हीरे में सभी दिशाओं से प्रवेश करने वाला प्रकाश केवल कुछ ही दिशाओं में हीरे से बाहर निकलता है। अत: इन दिशाओं से देखने पर हीरा अत्यन्त चमकदार दिखाई देता है।

प्रश्न 14.
मरीचिका से क्या तात्पर्य है? (2014)
या रेगिस्तान में मरीचिका दिखाई देती है। कारण स्पष्ट कीजिए। (2016, 17)
उत्तर:
कभी-कभी रेगिस्तान में यात्रियों को दूर से पेड़ के साथ-साथ उसका उल्टा प्रतिबिम्ब भी दिखाई देता है। अतः इन्हें ऐसा भ्रम हो जाता है कि वहाँ कोई जल का तालाब है जिसमें पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है। परन्तु वास्तव में वहाँ तालाब नहीं होता है। जब सूर्य की गर्मी से रेगिस्तान का रेत गर्म होता है ठण्डी वायु – तो उसे छूकर पृथ्वी के पास की वायु अधिक गर्म (सघन) FAR हो जाती है। इससे कुछ ऊपर तक वाय की परतों का ताप लगातार घटता जाता है। अत: वायु की गर्म वायु – नीचे वाली परतें अपेक्षाकृत विरल होती हैं। जब (विरल) पेड़ से प्रकाश-किरणें पृथ्वी की ओर आती हैं तो उन्हें अधिकाधिक विरल परतों से होकर आना पड़ता है, इसलिए प्रत्येक परत पर अपवर्तित किरण अभिलम्ब से दूर हटती जाती है।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
अत: प्रत्येक अगली परत पर आपतन कोण बढ़ता जाता है तथा किसी विशेष परत पर क्रान्तिक कोण से चित्र बड़ा हो जाता है। इस परत पर किरण पूर्ण परावर्तित होकर ऊपर की ओर चलने लगती है। चूँकि ऊपर वाली परतें अधिकाधिक सघन हैं, अत: ऊपर उठती हुई किरण अभिलम्ब की ओर झुकती जाती है। जब यह किरण यात्री की आँख में प्रवेश करती है तो पृथ्वी के नीचे से आती प्रतीत होती है तथा यात्री को पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।

प्रश्न 15.
सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सूर्य लाल क्यों दिखाई देता है ?
उत्तर:
उगते अथवा डूबते सूर्य की किरणें वायुमण्डल में काफी अधिक दूरी तय करके हमारी आँख में पहुँचती हैं। इन किरणों का मार्ग में धूल के कणों तथा वायु के अणुओं द्वारा बहुत अधिक प्रकीर्णन होता है। इस प्रकीर्णन के कारण सूर्य के प्रकाश में से नीली व बैंगनी किरणें निकल जाती हैं, क्योंकि इन किरणों का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है। अत: आँख में विशेष रूप से शेष लाल किरणें ही पहुँचती हैं जिसके कारण सर्य लाल दिखाई देता है। दोपहर के समय जब सर्य सिर के ऊपर होता है तब किरणें वायुमण्डल में अपेक्षाकृत बहुत कम दूरी तय करती हैं। अतः प्रकीर्णन कम होता है और लगभग सभी रंगों की किरणें आँख तक पहुँच जाती हैं। अत: सूर्य श्वेत दिखाई देता है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 16.
पृथ्वी से आकाश का रंग हल्का नीला क्यों दिखाई देता है ? समझाइये। (2013)
या चन्द्रमा से देखने पर आकाश किस रंग का दिखाई देता है? (2017)
उत्तर:
सूर्य से आने वाला प्रकाश, जिसमें अनेक रंग होते हैं, जब वायुमण्डल में को होकर गुजरता है तो वायु के अणुओं एवं धूल के महीन कणों द्वारा इसका प्रकीर्णन होता है। बैंगनी व नीले रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन लाल रंग के प्रकाश की अपेक्षा लगभग 16 गुना अधिक होता है। अत: नीला व बैंगनी प्रकाश चारों ओर बिखर जाता है। यह बिखरा हुआ प्रकाश हमारी आँख में पहुँचता है तथा हमें आकाश नीला दिखाई देता है।

यदि वायुमण्डल न होता (चन्द्रमा पर वायुमण्डल नहीं होता) तो सूर्य के प्रकाश का मार्ग में प्रकीर्णन नहीं होता तथा हमें आकाश काला (dark) दिखाई देता। यही कारण है कि चन्द्रमा के तल से देखने पर आकाश काला दिखाई पड़ता है। अन्तरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी के वायुमण्डल से बाहर पहुँचने पर आकाश काला ही दिखाई देता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मानव नेत्र के प्रमुख भागों का वर्णन कीजिए। किसी वस्तु का मानव नेत्र से प्रतिबिम्ब बनना किरण आरेख द्वारा स्पष्ट कीजिए। (2010)
या मानव नेत्र का नामांकित चित्र बनाइए तथा रेटिना पर प्रतिबिम्ब का बनना किरण आरेख द्वारा समझाइए। (2010, 11, 12, 17)
या मानव नेत्र का चित्र बनाकर विभिन्न भागों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानव नेत्र एक प्रकार का कैमरा है। इसके द्वारा फोटो कैमरे की भाँति वस्तुओं के वास्तविक प्रतिबिम्ब रेटिना पर बनते हैं।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
मानव नेत्र का गोलक (Eye-ball) यह लगभग गोलाकार पिण्ड है, जो सामने के भाग को छोड़कर चारों ओर से दृढ़ अपारदर्शी परत से ढका होता है। इसके प्रमुख अवयव निम्नलिखित हैं –
1. दृढ़-पटल तथा रक्तक-पटल (Sclerotic and Choroid) नेत्र-गोलक की बाहरी अपारदर्शी कठोर परत को दृढ़-पटल कहते हैं। यह श्वेत होता है। दृढ़-पटल नेत्र के भीतरी भागों की सुरक्षा करता है। इसके भीतरी पृष्ठ से लगी काले रंग की झिल्ली होती है, जिसे रक्तक-पटल कहते हैं।

2. कॉर्निया (Cornea) नेत्र-गोलक के सामने का भाग कुछ उभरा हुआ तथा पारदर्शी होता है। इसे कॉर्निया कहते हैं। प्रकाश इसी भाग से नेत्र में प्रवेश करता है।

3. आइरिस (Iris) कॉर्निया के पीछे की ओर रंगीन (काली, भूरी अथवा नीली) अपारदर्शी झिल्ली का एक पर्दा होता है; जिसे आइरिस कहते हैं। इसके बीच में एक छिद्र होता है, जिसे पुतली (pupil) कहते हैं। आइरिस का कार्य नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा को नियन्त्रित करना है। अधिक प्रकाश में यह संकुचित होकर पुतली को छोटा कर देती है तथा कम प्रकाश में पुतली को फैला देती है जिससे नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा बढ़ जाती है। नेत्र में यह क्रिया स्वत: होती है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

4.  नेत्र-लेंस (Eye-lens) पुतली के पीछे पारदर्शी ऊतकों (tissues) का बना द्वि-उत्तल लेंस होता है, जिसके द्वारा बाहरी वस्तुओं का उल्टा, छोटा तथा वास्तविक प्रतिबिम्ब लेंस के पीछे दृश्य-पटल (retina) पर बनता है। लेंस, मांसपेशियों की एक विशेष प्रणाली, जिसे सिलियरी प्रणाली (ciliary system) कहते हैं, द्वारा टिका रहता है। ये पेशियाँ लेंस पर उपयुक्त दाब डालकर उसके पृष्ठों की वक्रता को बढ़ा-घटा सकती हैं, जिससे लेंस की फोकस दूरी कम या अधिक हो जाती है। इन पेशियों द्वारा लेंस पर ठीक उतना दाब पड़ता है कि बाहरी वस्तु का प्रतिबिम्ब दृश्य-पटल पर स्पष्ट बने।

5. दृष्टि-पटल (Retina) नेत्र-गोलक के भीतर पीछे की ओर रक्तक-पटल के ऊपर पारदर्शी झिल्ली दृष्टि-पटल (रेटिना) होती है। इस परदे पर विशेष प्रकार की तन्त्रिकाओं (nerves) के सिरे होते हैं, जिन पर प्रकाश पड़ने से संवेदन उत्पन्न होते हैं। यह संवेदन तन्त्रिकाओं के एक समूह, जिसे दृष्टि-तन्त्रिका (optic nerve) कहते हैं, के द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचते हैं।

6. जलीय द्रव तथा कांचाभ द्रव (Aqueous Humor and Vitreous Humor) कॉर्निया तथा नेत्र-लेंस के बीच के स्थान में जल के समान द्रव भरा होता है, जो अत्यन्त पारदर्शी तथा 1.336 अपवर्तनांक का होता है। इसे जलीय द्रव कहते हैं। इसी प्रकार लेंस के पीछे दृश्य-पटल तक का स्थान एक गाढ़े, पारदर्शी एवं उच्च अपवर्तनांक के द्रव से भरा होता है। इसे कांचाभ द्रव कहते हैं। ये दोनों द्रव प्रकाश के अपवर्तन में लेंस की सहायता करते हैं।

7.  पीत बिन्दु (Yellow Spot) दृष्टि-पटल के मध्य में पीला भाग होता है; जिस पर बना प्रतिबिम्ब बहुत ही स्पष्ट होता है।

8. अन्ध बिन्दु (Blind Spot) दृष्टि-पटल के जिस स्थान को छेदकर दृष्टि तन्त्रिकाएँ मस्तिष्क को जाती हैं; उस स्थान पर पड़ने वाले प्रकाश का दृष्टि-पटल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस स्थान को अन्ध बिन्दु कहते हैं।

मानव नेत्र से प्रतिबिम्ब बनना नेत्र के सामने रखी किसी वस्तु से चली प्रकाश की किरणें कॉर्निया पर गिरती हैं तथा अपवर्तित होकर नेत्र में प्रवेश करती हैं। फिर ये क्रमशः जलीय द्रव, लेंस व कांचाभ द्रव में से होती हुई रेटिना पर गिरती हैं; जहाँ वस्तु का उल्टा प्रतिबिम्ब बनता है। प्रतिबिम्ब बनने का सन्देश दुक तन्त्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क में पहुँचता है; जिससे यह प्रतिबिम्ब अनुभव के आधार पर सीधा दिखायी देता है।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 2.
प्रिज्म क्या है ? किसी प्रिज्म द्वारा प्रकाश का अपवर्तन समझाइए। या प्रिज्म क्या है? प्रिज्म द्वारा प्रकाश का विचलन समझाइए तथा प्रिज्म के पदार्थ के अपवर्तनांक के लिए व्यंजक लिखिए। (2009)
उत्तर:
प्रिज्म प्रिज्म किसी पारदर्शी माध्यम के उस भाग को कहते हैं जो कि किसी कोण पर झुके हुए दो समतल पृष्ठों के बीच में स्थित होता है। इन पृष्ठों को ‘अपवर्तक पृष्ठ’ तथा इनके बीच के कोण को ‘अपवर्तक कोण’ कहते हैं। दोनों पृष्ठों को मिलाने वाली रेखा को ‘अपवर्तक कोर’ कहते हैं। प्रिज्म द्वारा प्रकाश का विचलन माना कि ABC (देखें चित्र) काँच के एक प्रिज्म का मुख्य-परिच्छेद है। कोण BAC अपवर्तक कोण है तथा वायु के सापेक्ष काँच का अपवर्तनांक ang है। माना कि आपतित । किरण PQ, प्रिज्म के पृष्ठ AB के बिन्दु Q पर गिरती है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

इस पृष्ठ पर किरण अपवर्तन के पश्चात् Q पर खींचे गये अभिलम्ब की ओर झुक कर QR दिशा में चली जाती है। किरण QR पृष्ठ AC पर अपवर्तन के पश्चात् R पर खींचे P गये अभिलम्ब से दूर हट कर, RS दिशा में बाहर निकलती है। स्पष्ट है कि प्रिज्म, PQ दिशा में आने वाली किरण को RS दिशा में विचलित कर देता है। इस प्रकार यह प्रकाश की दिशा में विचलन (deviation) उत्पन्न कर देता है। आपतित किरण PQ को आगे तथा निर्गत किरण RS को पीछे बढ़ाने पर वे बिन्दु D पर काटती हैं। इन दोनों किरणों के बीच बना कोण δ (डेल्टा) ‘विचलन कोण’ (angle of deviation) कहलाता है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
यदि हम प्रिज्म पर गिरने वाली किरण के आपतन कोण i को बढ़ाते जाएँ तो विचलन कोण δ का मान घटता जाता है तथा एक विशेष आपतन कोण के लिए विचलन कोण न्यूनतम हो जाता है। आपतन कोण और बढ़ाने पर विचलन कोण फिर बढ़ने लगता है।

इस प्रकार एक, और केवल एक ही, विशेष आपतन कोण के लिए विचलन कोण न्यूनतम होता है। इस न्यूनतम विचलन कोण को ‘अल्पतम विचलन कोण’ (angle of minimum deviation) कहते हैं। यदि किसी प्रिज्म का कोण A तथा किसी रंग की किरण के लिए अल्पतम विचलन कोण δ. हो, तो प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 3.
वर्ण विक्षेपण से क्या तात्पर्य है। उदाहरण देकर समझाइए। (2011, 17)
एक किरण आरेख द्वारा प्रिज्म से श्वेत प्रकाश के विक्षेपण को समझाइए। (2016, 17)
या प्रिज्म में श्वेत प्रकाश के गुजरने पर न्यूनतम व अधिकतम विचलन किन रंगों का होता (2018)
उत्तर:
प्रकाश का विक्षेपण जब सूर्य के प्रकाश की संकीर्ण प्रकाश-पुंज को प्रिज्म के एक फलक पर डाला जाता है, तो प्रिज्म के दूसरे पटल या फलक से निर्गत प्रकाश सात रंगों में विभाजित हो जाता है तथा इसे पर्दे पर लेने पर सात रंगों की एक पट्टी प्राप्त होती है। प्रकाश का इस प्रकार सात रंगों में विभाजित होना प्रकाश का विक्षेपण या वर्ण-विक्षेपण कहलाता है। प्रकाश के विक्षेपण के दौरान पर्दे पर प्राप्त विशेष क्रम में सात रंगों की पट्टी को स्पेक्ट्रम कहते हैं; जिसका अर्थ है रंगों का मिश्रण।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार
श्वेत प्रकाश के विक्षेपण के दौरान प्राप्त सात रंगों में एक क्रम होता है जो इस प्रकार है, नीचे से ऊपर की ओर बैंगनी (Violet), जामुनी (Indigo), नीला (Blue), हरा (Green), पीला (Yellow), नारंगी (Orange) तथा लाल (Red)। इन रंगों के क्रम को याद रखने के लिए शब्द ‘VIBGYOR’ को याद रखें; जो इन रंगों के अंग्रेजी भाषा के शब्दों के पहले अक्षर से बना है।

परिक्षेपण का कारण यह है कि विभिन्न रंगों के प्रकाश का अपवर्तन भिन्न-भिन्न होता है। बैंगनी प्रकाश का अपवर्तन (विचलन) सबसे अधिक तथा लाल प्रकाश का अपवर्तन (विचलन) सबसे कम होता है। इसी कारण बैंगनी रंग स्पेक्ट्रम में सबसे नीचे तथा लाल रंग स्पेक्ट्रम में सबसे ऊपर प्राप्त होता है।

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

प्रश्न 4.
आवश्यक किरण आरेख खींचकर प्रिज्म की सहायता से पुष्टि कीजिए कि सूर्य का श्वेत प्रकाश विभिन्न रंगों का सम्मिश्रण है। (2016)
उत्तर:
किसी झिरों से आते हुए सूर्य के प्रकाश को यदि किसी प्रिज्म में से गुजारा जाए, तो प्रिज्म के दूसरी ओर रखे पर्दे पर वर्णक्रम (spectrum) प्राप्त होता है। इस वर्णक्रम में प्रिज्म के आधार की ओर से बैंगनी (Violet), जामुनी (Indigo), नीला (Blue), हरा (Green), पीला (Yellow), नारंगी (Orange) और लाल (Red) रंग प्राप्त होते हैं। प्रिज्म द्वारा सूर्य के प्रकाश के स्पेक्ट्रम प्राप्त होने के दो कारण हो सकते हैं –
1. सूर्य का प्रकाश विभिन्न रंगों के प्रकाश से मिलकर बना है। प्रिज्म इन रंगों को अलग-अलग कर देता है।
2. प्रिज्म अपने में से गुजरने वाले प्रकाश को विभिन्न रंगों में रंग देता है। इसके लिए निम्नलिखित प्रयोग करते हैं –

यदि हम एक प्रिज्म पर सूर्य के प्रकाश की पतली किरण डालें तथा पर्दे के स्थान पर वैसा ही दूसरा प्रिज्म उल्टा करके इस प्रकार रखें कि उनके संलग्न फलक समान्तर हों, तो दूसरे प्रिज्म से बाहर निकलने वाला प्रकाश पुनः श्वेत हो जाता है। इस प्रयोग में पहले प्रिज्म द्वारा अलग-अलग किये गये रंगों को दूसरे प्रिज्म ने पुन: जोड़ दिया जिससे श्वेत प्रकाश बन गया। यदि प्रिज्म प्रकाश को रँगता, तो दूसरे प्रिज्म से श्वेत प्रकाश न निकलता बल्कि और रंग निकलते। इससे सिद्ध होता है कि श्वेत प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना है। प्रिज्म श्वेत प्रकाश को केवल अवयवी रंगों में विभक्त कर देता है।
Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 11 मानव नेत्र एवं रंगबिरंगा संसार

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 1 Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर

Bihar Board Class 6 Social Science हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर Text Book Questions and Answers

अभ्यास

प्रश्न 1.
दिए गए चार विकल्पों में से उत्तर को चुनें :

प्रश्न (i)
काशीप्रसाद जयसवाल का सम्पर्क लन्दन में किससे नहीं हुआ ?
(क) श्याम जी कृष्ण वर्मा
(ख) लाला हरदयाल
(ग) सारवरकर
(घ) जवाहर लाल नेहरू
उत्तर-
(घ) जवाहर लाल नेहरू

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर

प्रश्न (ii)
के0 पी0 जयसवाल ने सबसे पहले किस विश्वविद्यालय में योगदान दिया ?
(क) मद्रास विश्वविद्यालय
(ख) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(ग) पटना विश्वविद्यालय
(घ) लाहौर विश्वविद्यालय
उत्तर-
(ख) कलकत्ता विश्वविद्यालय

प्रश्न (iii)
के0 पी0 जयसवाल मर्मज्ञ थे :
(क) इस्लामिक कानून
(ख) हिन्दू कानून
(ग) इसाई कानून
(घ) अंग्रेजी कानून
उत्तर-
(ख) हिन्दू कानून

प्रश्न (iv)
पटना संग्रहालय की स्थापना किनके प्रयासों का परिणाम है ?
(क) ए० एस० अल्तेकर
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) के0 पी0 जयसवाल
(घ) यदुनाथ सरकार
उत्तर-
(ग) के0 पी0 जयसवाल

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर

प्रश्न (v)
के0 पी0 जयसवाल के बारे में क्या सही नहीं है ?
(क) पटना विश्वविद्यालय में योगदान दिया।
(ख) ये एक अच्छे अधिवक्ता नहीं थे।
(ग) रामधारी सिंह दिनकर से इनके नजदीकी संबंध थे।
(घ) 1942 में इनकी पुस्तक हिन्दू पोलिटी’ प्रकाशित हुई।
उत्तर-
(घ) 1942 में इनकी पुस्तक हिन्दू पोलिटी’ प्रकाशित हुई।

प्रश्न (vi)
ए0 एस0 अल्तेकर पटना विश्वविद्यालय के पूर्व किस विश्वविद्यालय में कार्यरत थे ?
(क) मद्रास विश्वविद्यालय
(ख) बंबई विश्वविद्यालय
(ग) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(घ) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ।
उत्तर-
(घ) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ।

प्रश्न (vii)
ए० एस० अल्तेकर ने अपनी डी० लिट0 उपाधि प्राप्त की।
(क) राष्ट्रकुटों के इतिहास पर
(ख) गुप्तों के इतिहास पर
(ग) मौर्यों के इतिहास पर
(घ) चालुक्यों के इतिहास पर
उत्तर-
(क) राष्ट्रकुटों के इतिहास पर

प्रश्न 2.
के0 पी0 जयसवाल ने इतिहास लेखन में कौन-कौन से विषयों को उठाया?
उत्तर-
के0 पी0 जयसवाल ने इतिहास लेखन में हिन्दू विचार, दर्शन, धर्म , शासन, गणराज्य एवं सामाजिक व्यवस्था, विषयों को उठाया।

प्रश्न 3.
के0पी0 जयसवाल एक अच्छे शैक्षणिक स्तर पर संगठनकर्ता थे। कैसे ?
उत्तर-
के0 पी0 जयसवाल पुरालिपि और प्राचीन मुद्रा के ज्ञाता थे। अशोक के अभिलेख राज्यारोहण की तिथि, ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति तथा भुवनेश्वर मंदिर के अभिलेखों का सम्पादन, अयोध्या का शुंग अभिलेख, समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख, महरों का अध्ययन तथा अनेक अभिलेखों का तिथिक्रम के अनुसार व्याख्या की। अतः ये अच्छे शैक्षणिक -स्तर पर संगठनकर्ता थे।

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर

प्रश्न 4.
ए० एस० अल्ते कर की विशेषज्ञता किन-किन क्षेत्रों में थी ?
उत्तर-
ए0 एस0 अल्तेकर कुम्हरार, वैशाली और सोनपुर जगहों पर उत्खनन करवाया। द ऐंटिक्वेरियन रिमेन्स ऑफ बिहार’ इनके प्रयास से पुस्तक छपी। प्राचीन भारतीय शासन पद्धति’ ग्रंथ लिखी । राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम था। पुराभिलेखों एवं मुद्राशास्त्र के ज्ञाता थे। ‘लीडर’ पत्र में लिखा कि वेद पढ़ने का अधिकार स्त्री और शूद्र को है। राष्ट्रभाषा प्रेम, खादी कपड़ा पहनते थे।

प्रश्न 5.
ए० एस० अल्तेकर को क्यों हड़बड़िया’ कहा जाता था ?
उत्तर-
इतिहास लेखन में किसी बात से नहीं बँधे थे। ये हमेशा व्यस्त रहने में विश्वास करते थे। वे मानते थे कि यदि पुस्तक की पांडुलिपि तैयार हो जाए तो प्रकाशित कर देना चाहिए। इसे संवारने का काम नये शोध पत्रों पर छोड़ देना चाहिए। इसी कारण से उन्हें ‘हड़बड़िया’ कहा जाता था

प्रश्न 6.
इतिहास कैसे लिखा जाता है ? क्या आवश्यक शर्ते हैं ?
उत्तर-
छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 14 हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर

प्रश्न 7.
आप अपने पास उपलब्ध सिक्कों एवं आसपास के पुराने भवनों को देखकर शिक्षक की मदद से तत्कालीन इतिहास लिखने का प्रयास करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करें।

Bihar Board Class 6 Social Science हमारे इतिहासकार के.पि. जायसवाल, ए.एस.अल्तेकर Notes

पाठ का सारांश

  • डा० अनंत सदाशिव अल्तेकर महान पुरातत्वविद् एवं इतिहासकार थे।
  • डा० अल्तेकर ने पटना वि०वि० में योगदान के पूर्व बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पुरातत्व, मुद्राशास्त्र एवं सांस्कृतिक उत्थान के लिए … प्रशंसनीय कार्य किया।
  • बिहार के राज्यपाल आर० आर० दिवाकर द्वारा संपादित पुस्तक ‘बिहार श्रू द एजेज’ के प्रकाशन में डा० अल्तेकर का महत्वपूर्ण योगदार रहा।
  • डा० अल्तेकर पटना विश्वविद्यालय से अवकाश करने के बाद के०पी० जायसवाल शोध संस्थान के पूर्णकालिक निदेशक बने और जीवन पर्यन्त रहे।
  • डा० अल्तेकर ने कुम्हरार, वैशाली और सोनपुर आदि जगहों का उत्खनन
    भी करवाया।
  • डा०अल्तेकर छात्र जीवन से ही प्रतिभा सम्पन्न एवं अत्यंत मेधावी थे।
  • डा०अल्तेकर को 1954 में अमेरिका में अतिथि व्याख्याता के रूप में बुलाया गया। इसी वर्ष भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान देने वेस्टइंडीज गए।
  • काशी प्रसाद जयसवाल मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के निवासी थे लेकिन इनकी कर्मभूमि पटना थी।
  • काशी प्रसाद जयसवाल की आर्थिक स्थिति बचपन से अच्छी नहीं थी।
  • काशी प्रसाद जयसवाल ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से इतिहास में एम०ए० की डिग्री हासिल की।
  • 1910 में स्वदेश लौटकर कलकत्ता में इन्होंने वकालत शुरू किया।
  • जायसवाल साहब पुरालिपि और प्राचीन मुद्रा के ज्ञाता थे।
  • जायसवाल साहब बिहार एण्ड उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के संस्थापक सदस्य थे।
  • के०पी० जायसवाल को एक दूसरी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ (150 ई० से 350 ई० तक) 1930 में प्रकाशित हुई।

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 1 Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान

Bihar Board Class 6 Social Science संस्कृति और विज्ञान Text Book Questions and Answers

अभ्यास

प्रश्न 1.
अभिज्ञान शाकुन्तलम् की रचना कालिदास ने की। यह क्या है?
(क) उपन्यास
(ख) नाटक
(ग) कहानी
(घ) कविता
उत्तर-
(ख) नाटक

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान

प्रश्न 2.
मंदिर के महत्वपूर्ण भाग जहाँ देवताओं की प्रतिमा रखी जाती थी?
(क) प्रदक्षिणापथ
(ख) गोपुरम
(ग) गर्भगृह
(घ) दालान
उत्तर-
(ग) गर्भगृह

प्रश्न 3.
दशावतार मंदिर में किस देवता की प्रतिमा है?
(क) विष्णु
(ख) शिव
(ग) बुद्ध
(घ) ब्रह्मा
उत्तर-
(क) विष्णु

प्रश्न 4.
इनमें से सबसे पहले किस पुस्तक की रचना हुई?
(क) ऋग्वेद
(ख) रामायण
(ग) महाभारत
(घ) पुराण
उत्तर-
(ग) महाभारत

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान

प्रश्न 5.
इनमें से ‘तमिल साहित्य कौन है ?
(क) देवी चंद्रगुप्तम
(ख) कुमारसंभवम्
(ग) मृच्छकटिकम
(घ) सिलपदिकारम
उत्तर-
(घ)

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें 

प्रश्न 1.
दिल्ली (मेहरौली) के लौह स्तम्भ के बारे में पाँच वाक्य लिखें।
उत्तर-
दिल्ली के लौह स्तम्भ में ऐसे तकनीक का प्रयोग हुआ कि आज तक इसमें जंग नहीं लगा.है। धातु कला काफी विकसित थी। यह अवशेष कुतुबमीनार परिसर में है। जंग न लगना तकनीक की जानकारी हमें प्राप्त नहीं है।

प्रश्न 2.
ऐतिहासिक महत्व के दो इमारतों के बारे में नाम के साथ पाँच पक्तियाँ लिखें।
उत्तर-
गुप्त काल के सर्वोत्कृष्ट मंदिर देवगढ़ का दशावतार मंदिर है। यहाँ विष्णु की मूर्ति है। मंदिर का शिखर 12 मीटर ऊँचा है। इस मंदिर में चार मंडप चारों दिशाओं में स्थित है। गर्भ गृह में मूर्तियाँ स्थित हैं।

उदय गिरि में गुहा मंदिर है, जिसे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का सेनापति वीर सेन ने बनवाया। इसके सामने गर्भ गृह और सामने मंडप है। इसमें वराह अवतार की विशाल मूर्ति है।

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान

प्रश्न 3.
बौद्ध बिहार से क्या समझते हैं ? यह किस धर्म से संबंधित है?
उत्तर-
बौद्ध बिहार का मतलब बौद्ध दशन, जहाँ बौद्ध से जुड़ी सभी प्रकार की वस्तुएँ एकत्रित हों। यह बौद्ध धर्म से संबंधित है। आइये चर्चा करें !

प्रश्न 4.
अपने गाँव के मंदिर में जाकर उनकी तुलना किसी प्राचीन मंदिर से करें। इसमें आप अपने परिवार के – किसी सदस्य की मदद ले सकते हों।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करें ।

प्रश्न 5.
अजंता की गुफाएँ कहाँ हैं ? शिक्षक की सहायता से इनके महत्व के बारे में जानकारी प्राप्त करो ।
उत्तर-
अजन्ता की गुफा उत्तरप्रदेश में है। यहाँ चित्रकारी की गई है। बुद्ध और बोधिसत्व का चित्र, ततीय जातक कथाओं की चित्रकारी। पशु, पक्षी, वृक्ष, नदी, पुरुष आदि के चित्र से वेशभूषा, सजावट की’ जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 6.
किसी दो महत्वपूर्ण महाकाव्यों के बारे में अपने घर/विद्यालय में चर्चा करें।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करें ।

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 13 संस्कृति और विज्ञान

प्रश्न 7.
किसी जातक कथा के विषय में अपने परिवार के किसी सदस्य या शिक्षक से जानकारी प्राप्त करो, जो तुम्हारी नैतिक शिक्षा प्राप्त करने में मददगार साबित होगा।
उत्तर-
छात्र शिक्षक की मदद से स्वयं करें ।

Bihar Board Class 6 Social Science संस्कृति और विज्ञान Notes

पाठ का सारांश

  • अभिज्ञानशकुन्तलम का विषय-वस्तु राजा दुष्यंत और शकुन्तला का मिलन है
  • गुप्तकाल के सर्वोत्कृष्ट मंदिर, झांसी (उत्तर प्रदेश) जिले में देवगढ़ का दशावतार मंदिर है।
  • बौद्ध गुहामंदिरों में अजन्ता, बाघ तथा सितनवासल की गुफाएँ महत्वपूर्ण हैं।
  • विष्णु की प्रसिद्ध मूर्ति देवगढ़ दशावतार मंदिर में है।
  • भारतीय इतिहास में चौथी से सातवीं सदी का समय सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक प्रगति के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है।
  • पुराण महाकाव्यकाल – चौथी सदी के प्रारंभ से सातवीं सदी के मध्य तक का समय जिसमें पुराणों, रामायण, महाभारत एवं तमिल साहित्यों का वर्तमान रूप में संकलन हुआ तथा अन्य लौकिक महालाव्यों की रचना हई (जिसके काल इसे) महाकाव्य काल कहते हैं।
  • कुमारसंभव में शिव-पार्वजी के प्रेम और प्रणय दृश्यों का वर्णन
  • अभिज्ञानशाकुन्तलम् में साहित्य और नाट्य कला दोनों की गुणात्मकता चरमोत्कर्ष पर दिखाई देती है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1 Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

प्रश्न 1.
एक क्रिकेट मैच में, एक महिला बल्लेबाज खेली गई 30 गेंदों में 6 बार चौका मारती है। चौका न मारे जाने की प्रायिकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
खेली गई गेदों की संख्या, n(S) = 30
वह गेंद जिन पर महिला ने चौके नहीं मारे
n(E) = 30 – 6 = 24
अतः प्रायिकता p(E) = \(\frac{n(E)}{n(S)}\)
= \(\frac{24}{30}\) = \(\frac{4}{5}\)

प्रश्न 2.
2 बच्चों वाले 1500 परिवारों का यदृच्छया चयन किया गया है और निम्नलिखित आंकड़े लिख लिए गए हैं:
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1
यदृच्छया चुने गए उस परिवार की प्रायिकता ज्ञान कीजिए, जिसमें
(i) दो लड़कियाँ हों (ii) एक लड़की हो (iii) कोई लड़की न हो। साथ ही यह भी जाँच कीजिए कि इन प्रायिकताओं का योग 1 है या नहीं।
उत्तर:
परिवारों की कुल संख्या n(S) = 1500,
(i) दो लड़कियाँ रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E1) = 475
∴ एक परिवार में दो लड़कियां होने की प्रायिकता
p(E1) = \(\frac{n(E_1)}{n(S)}\)
= \(\frac{475}{1500}\) = \(\frac{19}{60}\)

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

(ii) एक लड़की रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E2) = 814
एक परिवार में एक लड़की के होने की प्रायिकता
n(E2) = \(\frac{n(E_2)}{n(S)}\)
= \(\frac{814}{1500}\) = \(\frac{407}{750}\)

(iii) कोई भी लड़की न रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E3) = 211
बिना लड़की वाले परिवारों को प्रायिकता
\(\frac{n(E_3)}{n(S)}\) = \(\frac{n(E_3)}{n(S)}\) = \(\frac{211}{1500}\)
∴ कुल प्रायिकता = तीनों प्रायिकताओं का योग
= \(\frac{19}{60}\) + \(\frac{407}{750}\) + \(\frac{211}{1500}\) = \(\frac{1500}{1500}\) = 1

प्रश्न 3.
अध्याय 14 के अनुच्छेद 14.4 का बाहरण 5 सौजिए। कक्षा के किसी एक विद्यार्थी का जन्म अगस्त में होने की प्रायिकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
कुल विद्यार्थियों की संख्या n(S) = 40
अगस्त में जन्म लेने वाले विद्यार्थीयों की कुल संख्या
n(E) = 6
∴ अभीष्ट प्राषिकता, p (E) = \(\frac{n(E)}{n(S)}\) = \(\frac{6}{40}\) = \(\frac{2}{30}\)

प्रश्न 4.
तीन सिक्कों को एक साथ 200 बार उछाला जाता है तथा इनमें विभिन परिणामों की वारंवारताएं ये हैं :
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1
यदि तीनों सिक्कों को पन: एक साथ जठाला जाए तो दो चित के आने की प्रायिकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
तीन सिक्कों को एक साथ उडालने की कुल संख्या n(S) = 200
दो चित आने की प्रायिकता n(E) = 72
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E) = \(\frac{n(E)}{n(S)}\) = \(\frac{72}{200}\) = \(\frac{9}{25}\).

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

प्रश्न 5.
एक कंपनी ने यदृच्छया 2400 परिवार चुनकर एक घर की आय सार और वाहनों की संख्या के बीच संबंध स्थापित करने के लिए उनका सर्वेक्षण किया। एकषित किए गए आंकड़े नीचे सारणी में दिए गए हैं।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1
मान लीजिए एक परिवार चुना गया है। प्रायिकता ज्ञात कीजिए कि चुने गए परिवार
(i) की आय Rs 10000-13000 प्रति माह है और उसके पास केवल दो वाहन है।
(ii) की आय प्रति माह Rs 16000 या इससे अधिक है और उसके पास केवल 1 वाहन है।
(iii) की आव Rs 7000 प्रति माह से कम है और उसके पास कोई वाहन नहीं है।
(iv) की आयर 13010-16000 प्रति माह के अन्तराल में है और उसके पास 2 से अधिक वाहन हैं।
(v) जिसके पास 1 से अधिक वाहन नहीं है।
उत्तर:
कम्पनी द्वारा चुने गये कुल परिवारों की संख्या,
n(S) = 2400
(i) दो बाहन रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E1) = 29
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E1) = \(\frac{n(E_1)}{n(S)}\) = \(\frac{29}{2400}\)

(ii) एक वाहन रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E2) = 579
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E2) = \(\frac{n(E_2)}{n(S)}\) = \(\frac{579}{2400}\)

(iii) वाहन नहीं रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E3) = 10
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E3) = \(\frac{n(E_3)}{n(S)}\) = \(\frac{10}{2400}\) = \(\frac{1}{240}\)

(iv) दो से अधिक साइन रखने वाले परिवारों की संख्या
n(E4) = 25
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E4) = \(\frac{n(E_4)}{n(S)}\) = \(\frac{25}{2400}\) = \(\frac{1}{96}\)

(v) वह परिवार जिसके पास 1 से अधिक वाहन नहीं है n(E5) = जान नहीं रखने वाले परिवार + एक वाहन वाले परिवार
= (10 + 0 + 1 + 2 + 1) + (160 + 305 + 535 + 469 + 579) = 2062
अतः अभीष्ट प्रायिकता p(E5) = \(\frac{n(E_5)}{n(S)}\) = \(\frac{2062}{2400}\) = \(\frac{1031}{1200}\)

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

प्रश्न 6.
अध्याय 14 की सारणी 14.7 लीजिए।
(i) गणित की परीक्षा में एक विद्यार्थी द्वारा 20% कम अंक प्राप्त करने की प्रायिकता ज्ञात कीजिए।
(ii) एक विद्यार्थी द्वारा 60 या इससे अधिक अंक प्राप्त करने की प्रायिकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
कुल विद्यार्थियों की संख्या n(S) = 90
(i) 20 अंक से कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी
n(E1) = 7
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E1) = \(\frac{n(E_1)}{n(S)}\) = \(\frac{7}{90}\)

(ii) 60 या इससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी
n(E2) = 15 + 8 = 23
∴ अभीष्ट प्राविकता p(E2) = \(\frac{n(E_2)}{n(S)}\) = \(\frac{23}{90}\)

प्रश्न 7.
सांख्यिकी के बारे में विद्यार्थियों का मत जानने के लिए 200 विद्यार्थियों का सर्वेक्षण किया गया। प्राप्त आंकड़ों को नीचे दी गई सारणी में लिख लिया गया है।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1
प्राधिकता ज्ञात कीजिए कि बच्छया चुना गया विद्यार्थी
(i) सांख्यिकी पसंद करता है.
(ii) सांख्यिकी पसंद नहीं करता है।
उत्तर:
विद्यार्थियों की कुल संख्या, n(S) = 200
(i) सोख्यिकी पसन्द करने वाले विद्यार्थियों की संख्या
n(E1) = 135
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E1) = \(\frac{n(E_1)}{n(S)}\) = \(\frac{135}{200}\) = \(\frac{27}{40}\)

(ii) सांख्यिकी न पसन्द करने माले विद्यार्थियों की संख्या
n(E2) = 65
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E2) = \(\frac{n(E_2)}{n(S)}\) = \(\frac{65}{200}\) = \(\frac{13}{40}\)

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

प्रश्न 8.
प्रश्नावली 14.2 का प्रश्न 2 देखिए। इसको अनुभाविक प्रायिकता क्या होगी कि इंजीनियर
(i) अपने कार्यशाला से 7 km से कम दूरी पर रहती है ?
(i) अपने कार्यस्थल से 7 km या इससे अधिक दूरी पर रहते है?
(iii) अपने कार्यस्थल से \(\frac{1}{2}\) km या इससे कम दूरी पर रहते है?
उत्तर:
इंजीनियरों की कुल संख्या n(S) = 40
(i) 7 किमी से दूर रहने वाले इंजीनियरों की संख्या
n(E1) = 9
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E1) = \(\frac{n(E_1)}{n(S)}\) = \(\frac{9}{40}\)

(ii) 7 किमी या उससे अधिक दूरी पर रहने वाले इंजीनियरों की संख्या
n(E2) = 9
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E2) = \(\frac{n(E_2)}{n(S)}\) = \(\frac{13}{40}\)

(ii) किमो या इससे कम दूरी पर रहने वाले इंजीनियरों की संख्या
n(E3) = 9
∴ अभीष्ट प्रायिकता p(E3) = \(\frac{n(E_3)}{n(S)}\) = \(\frac{0}{40}\) = 0

प्रश्न 9.
क्रियाकलाप : अपने विद्यालय के गेट के सामने से एक समय-अंतराल में गुजरने वाले दो पहिया, तीन पहिया और चार पहिया वाहनों की बारंबारता लिख लीजिए। आष द्वारा देखे गए वाहनों में से किसी एक वाहन का दो पहिया वाइन होने की प्रायिकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
स्वयं आँकड़े एकत्रित करें तथा अभीष्ट प्रायिकता प्राप्त करें।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

प्रश्न 10.
क्रियाकलाप : आप अपनी कक्षा के विद्यार्थियों से एक 3 अंक वाली संख्या लिखने को काहिए। आप कक्षा से एक विद्यार्थी को यदृच्छया चुन लीजिए। इस बात की प्रायिकता क्या होगी कि उसके द्वारा लिखी गई संख्या 3 से भाज्य है? याद रखिए कि कोई संख्या 3 से भाज्य होती है, यदि उसके अंकों का योग 4 से भाज्य हो।
उत्तर:
समस्या : स्वयं ओंकड़े एकत्रित करें तथा अभीष्ट प्राषिकता ज्ञात करें।

प्रश्न 11.
आटे की जन ग्यारह थैलियों में, जिन पर 5 kg अंकित है, वास्तव में आटे के निम्नलिखित भार (kg में) हैं:
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1
बच्च्या चुनी गई एक प्रैली में 5 kg से अधिक आटा होने की प्रायिकता क्या होगी?
उत्तर:
पैलियों की कुल संख्या n(S) = 11
5 kg से अधिक वजन वाली थैलियाँ n(E) = 7
∴ अभीष्ट प्राविकता = p(E) = \(\frac{n(E)}{n(S)}\) = \(\frac{7}{11}\)

प्रश्न 12.
प्रश्नावली 14.2 के प्रश्न 5 में आपसे 30 दिनों तक एक नगर की प्रति वायु में सल्फर डाइ-आक्साइड की भाग प्रति मिलियन में सांद्रता से संबंधित एक बारंबारता बंटन सारणी बनाने के लिए कहा गया था। इस सारणी की सहायता से इनमें से किसी एक दिन अंतराल (0.12 – 0.16) में सल्फार डाइ-ऑक्साइड के सांद्रण होने की प्राषिकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिनों की कुल संख्या, n(S) = 30, दिए गए वर्ग-अन्तराल में SO2 की सांगता n(E) = 2
∴ अभीष्ट प्राविकता = p(E) = \(\frac{n(E)}{n(S)}\) = \(\frac{2}{30}\) = \(\frac{1}{15}\)

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 15 प्रायिकता Ex 15.1

प्रश्न 13.
प्रश्नावली 14.2 के प्रश्न 1 में आपसे एक कक्षा के 30 विद्यार्थियों के रक्त-समूह से संबंधित बारंबारता बंटन सारणी बनाने के लिए कहा गया था। इस सारणी की सहायता से इस कक्षा में यदच्छया चुने गए एक विद्याओं का रक्त समूह AB होने की प्राविकता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थियों की कुल संख्या n(S) = 30
रक्त समूह AB रखने वाले विद्यार्थियों की संख्या n(E) = 3
∴ अभीष्ट प्राविकता = p(E) = \(\frac{n(E)}{n(S)}\) = \(\frac{3}{30}\) = \(\frac{1}{10}\)