Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 13 दादा-दादी के साथ Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ

Bihar Board Class 6 Hindi दादा-दादी के साथ Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से –

प्रश्न 1.
सभी लोग घर की सफाई क्यों कर रहे थे?
उत्तर:
क्योंकि घर में कुछ खास मेहमान आने वाले थे। इन मेहमानों की खासियत यह थी कि वे थे तो अपने रिश्तेदार पर इनका आगमन इंगलैंड से होने वाला था और घर के लोगों को ऐसा लग रहा था कि इंगलैंड से आ रहे इन मेहमानों को कहीं हमारे घर की गंदगी अच्छी न लगे और उनके सामने हमारी हँसाई न हो जाय – अतः सभी मिलकर घर का कोना-कोना साफ कर रहे थे।

प्रश्न 2.
पद्मिनी और राहुल को पिंकी-विकी की कौन-सी बात खटकती थी?
उत्तर:
पद्मनी और राहुल को यह बात खटकती थी कि अपनी भाषा में न बोलकर, न जाने क्यों वे सदा अंगरेजी में ही बोलते हैं। यद्यपि वे यानी पिंकी-विकी इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि राहुल और पद्मिनी अंगरेजी के साथ हिन्दी भी अच्छी तरह समझते और बोलते हैं। इन्होंने तो सोचा था कि भारत आकर इनकी हिन्दी का ज्ञान और निखर जायेगा।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ

प्रश्न 3.
पद्मिनी की उत्सुकता का क्या कारण था?
उत्तर:
पद्मिनी दादी के पास रस्सी से बुनी चारपाई पर बैठी थी। दादी ने उसको अपने से बिल्कुल सटा लिया था और उसके रेशमी बालों को प्यार से सहला रही थी। बाहर काली रात के साये में मेढ़कों का टरांना सुनाई दे रहा था। आकाश में तारे छिटक रहे थे। पद्मिनी को लगा वह किसी बीते हुये अतीत में वापस आ गयी है। यह था डैड का देश और इस देश का जीवन और प्राचीन सभ्यता।

प्रश्न 4.
किसने कहा, किससे कहा और क्यों कहा?
प्रश्नोत्तर –

(क) अच्छा किया जो इन्हें हिन्दी सिखाई।।
उत्तर:
राहुल और पद्मिनी के आगमन पर सभी नाते, रिश्तेदार, संबंधी उनसे मिलने आ गये। दिनभर लोगों का घर में आना-जाना लगा रहा। रिश्ते के भाई-बहन, चाचा-चाची, दादा-दादी, बुआ-फूफा के आने से घर भरा रहा। बच्चों को देखकर ये सभी अपनी-अपनी टिप्पणी देने लगे।

किसी और ने कहा- “अच्छा किया, इन्हें हिन्दी सिखाई। नहीं तो हमारी बात नहीं समझ पाते।”

(ख) “ओ हो! आई एम सो सॉरी।”
उत्तर:
पदमिनी और राहुल के संग घर के लोगों का दिन बीत गया- शाम हो गयो और आज फिर बिजली गुल हो गयी। इस स्थिति से निबटने के लिये पिंकी ने सफाई देते हुये कहा- “ओ हो!,आई एम सो सॉरी! तुम सोचोगे कैसी कंट्री है इंडिया।”

(ग) “अपनी भाषा जानते हुये भी न जाने क्यों वे सदा अंगरेजी ही बोलते हैं।”
उत्तर:
ये विचार हैं पद्मिनी के। वह सोचने लगी कि अपनी भाषा जानते हुये भी वे न जाने क्यों सदा अंगरेजी में बोलते हैं। उन्हें मालूम था राहुल और पद्मिनी दोनों भाषा (हिन्दी और अंगरेजी) भली-भांति जानते हैं।

(घ) “अच्छा! यही है तुम्हारी बेटी?”
उत्तर:
ये शब्द बुआ-फुआ ने पद्मिनी से पहली मुलाकात पर कहे।

(ङ) “लगता है बेटी माँ जैसी है। वही नीली आँखें और काले बाल, बड़ी सुन्दर निकली है।”
उत्तर:
ये वाक्य भी घर में आये रिश्तेदारों में से ही किसी के हैं। डैड, ये शब्द सुनकर फूले न समाते थे। उन्हें अपने इन भतीजे और भतीजी पर गर्व हो रहा था।

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पाठ से आगे –

प्रश्न 1.
इस कहानी में किसकी भूमिका आपको सबसे अच्छी लगी और क्यों ?
उत्तर:
दस पूरी कथा में सबसे अच्छी भूमिका दादी की लगी। दादी ने विदेश से आये बच्चों का अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति का एहसास कराया जो पद्मिनी और राहुल के भारत आने का उद्देश्य था। दादी का मधुर प्यार भरा सामीप्य पाकर दोनों बच्चे अत्यन्त आह्लादित थे।

प्रश्न 2.
क्या आपको लगता है कि यह कहानी अधूरी है? क्यों?
उत्तर:
इस कहानी का अन्त अचानक होता है, ऐसा लगता है, खंडहर देखने जाने की बात पर कहानी का अन्त हो जाता है। खंडहर की यात्रा का विवरण आने से कहानी को एक परिपक्वता मिलती- कहानी के विकास को .. एक अन्तिम पड़ाव तक पहुँचाया जा सकता है जो कहानीकार ने नहीं किया। शायद वे पाठकों को आगे की घटना को जानने के लिये उनकी कल्पनाशीलता को उभारना चाहते थे।

प्रश्न 3.
सोचिये, इस कहानी के अन्त में अगले दिन क्या हुआ होगा?
उत्तर:
उसी कल्पनाशीलता की कड़ी को जोड़ते हुये यह समझा जा सकता है कि दोनों बच्चे अगले दिन खंडहर की यात्रा पर गये होंगे। वहाँ इन्होंने खंडहर के चित्र उतारे होंगे जिसे यादगार के रूप में इंग्लैण्ड ले जायेंगे। कुछ नये पक्षी राहुल ने देखे होंगे और उनकी बोली, उनके कार्यकलापों को आत्मसात किया होगा जिसे वे अपनी डायरी में नोट करेंगे ताकि इस पर वे गहरायी से अध्ययन कर सकें।

प्रश्न 4.
अगर ऐसा हो कि आपके यहाँ कोई सम्बन्धी आये तो आप क्या-क्या करेंगे?
उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग परिवार और व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला होगा और फिर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आने वाले मेहमान की श्रेणी क्या है?

अगर मेहमान या संबंधी अत्यन्त करीबी हैं तो वह घर के परिवार के सदस्यों की तरह सम्मान और आदर का अधिकारी होगा। औपचारिक संबंधी का स्वागत औपचारिक ढंग से किया जायेगा यथा स्वागत, बातचीत, नाश्ता-चाय आदि और फिर दरवाजे तक जाकर उनकी गर्मजोशी के साथ विदाई।

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व्याकरण –

प्रश्न 1.
निम्न शब्दों के शुद्ध रूप लिखिए।
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ 1
उत्तर:
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ 2

प्रश्न 2.
इन शब्दों के वचन बदले –
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ 3
उत्तर:
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 13 दादा-दादी के साथ 4

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प्रश्न 3.
इन वाक्यों में सर्वनाम शब्द को रेखांकित कीजिए।
(क) “अच्छा, यही है तुम्हारी बेटी?”
(ख) वह उसकी मदद करने लगा।
(ग) जो ढूँढ़े उसे मिले।
(घ) मैं अवश्य देखना चाहूँगी उन खण्डहरों को।
उत्तर:
(क) अच्छा, यही है तुम्हारी बेटी ?
(ख) वह उसकी मदद करने लगा।
(ग) जो ढूँढे उसे मिले।
(घ) मैं अवश्य देखना चाहूँगी उन खण्डहरों को।

कुछ करने को –

प्रश्न 1.
आपके यहाँ कई मौकों (अवसर) पर कौन-कौन से सम्बन्धी/रिश्तेदार आते हैं ? उनकी सूची बनाइए।
उत्तर:
परिवार में आयोजित विवाह आदि के अवसरों पर सबसे अधि क मेहमान घर में आते हैं। इनमें सभी करीब के संबंधी, पारिवारिक मित्र, पास-पड़ोस के लोग, परिचित, बंधु-बांधव बुलाये जाते हैं।

संबंधियों में – नाना-नानी, मामा-मामी, बुआ-फुफा, दीदी-जीजाजी, भैया-भाभी, इनके बच्चे सभी आमंत्रित होते हैं।

प्रश्न 2.
पधिनी और राहुल को दादी पास बुलाकर कहानी सुनाई। क्या आपको भी दादी/नानी कोई कहानी सुनाती है? कहानी सुनते समय आप क्या महसूस करते हैं? अपनी कक्षा में सुनाइए।
उत्तर:
अलग-अलग छात्र अपने-अपने अनुभव के आधार पर इसका उत्तर तैयार करेंगे और अपने अनुभव कक्षा में सुनायेंगे।

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दादा-दादी के साथ Summary in Hindi

पाठ का सार-संक्षेप

‘दादा-दादी के साथ’ शीर्षक यह फीचर एक छोटी-सी कहानी है जिसके सहारे लेखक हमारे देश में आ रहे बदलाव, खासकर सांस्कृतिक धरातल पर आ रहे परिवर्तन की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। आज के बच्चे किस प्रकार अपनी भाषा, संस्कृति और प्राचीन विरासतों को भुलाकर, ठुकराकर पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं इसकी झाँकी इस पाठ में प्रस्तुत की गयी है।

भारत के किसी हिन्दी प्रदेश का एक छोटा-सा कस्बा है हमीरपुर-यह न पूरा विकसित शहर है और न ठेठ देहात। यहाँ के लोग देहाती जीवन-शैली का त्याग कर शहरीपन अपनाने की चेष्टा कर रहे हैं। हमीरपुर के जिस परिवार की यह कथा है, उसमें कुल चार सदस्य हैं- एक गृहिणी, दूसरे उनके पति तथा उनके दो बच्चे। इन्होंने अपने दोनों बच्चों का नाम भारतीय परिवेश का नहीं रखकर, पाश्चात्य शैली का रखा है – लड़की का नाम पिंकी और लड़के का नाम विकी। अब ये दोनों बच्चे बातचीत में अंगरेजी वाक्यों का उपयोग करते हैं। इन्हें भारत से बाहर के बात-व्यवहार, रहन-सहन की शैली ज्यादा भाति है और अपनी श्रेष्ठता के भाव का प्रदर्शन करने के लिये ये अपनी अंगरेजी भाषा की जानकारी का खुलकर प्रयोग करते हैं।

एक दिन इन्हें पता चलता है कि इनके दो संबंधी (रिश्तेदार) जो विदेश – में रहते हैं, इनके घर इंगलैंड से आ रहे हैं। ये इनके अपने चाचा विपिन प्रताप . सिंह के बच्चे हैं। इनमें एक का नाम है राहुल और दूसरे का नाम है पद्मिनी। रिश्ते में ये पिंकी और विकी के भाई-बहन हुये। अब यहाँ ध्यान देने की बात है कि इंगलैंड से आने वाले बच्चों के नाम पूर्णरूपेण भारतीय हैं। इसके द्वारा हमारी हीन मानसिकता पर लेखक ने प्रकाश डाला है जो अत्यन्त स्पष्ट है।

हमीरपुर का पूरा परिवार अपने अतिथियों के स्वागत की तैयारी में लग जाता है। घर के नौकर-चाकर, माली, चौकीदार सभी घर की सफाई में लग जाते हैं- मेहमान विदेश से आ रहे हैं -पता नहीं हमारे रहन-सहन के स्तर में कहीं कोई कमी न दिखाई पड़ जाय? विदेश से आये ये बच्चे पास-पड़ोस, नाते रिश्तेदारों के आकर्षण का केन्द्र बन जाते हैं क्योंकि ये विदेश से स्वदेश आ रहे हैं। इनसे मिलकर लोग-बाग अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। लोग यह कहना नहीं भूलते कि ये हिन्दी बोलते और समझते हैं – यह कितनी अच्छी बात है।

प्रारंभिक परिचय का सिलसिला शाम तक चलता रहता है। पिंकी को इस ..बात की चिन्ता हो जाती है कि आज भी यहाँ अन्य दिनों की तरह बिजली गायब है। पिंकी, राहुल और पद्मिनी के सामने इस असुविधा के लिये खेद प्रकट करते हुये कहती है – “ओ हो! आई एम सो सॉरी! तुम सोच रहे होगे कैसी कंट्री है इण्डिया।” पदमिनी ने अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की केवल मुस्कुरा भर दिया। वह सोचने लगी-अपनी भाषा होते हुये भी वे न जाने सदा अंगरेजी में ही क्यों बोलते हैं? इन्होंने तो यह सोचा था कि भारत आकर उनके हिन्दी बोलने का अभ्यास और अच्छा हो जायेगा। लेकिन यहाँ तो बात उल्टी ही हो रही थी।

लालटेन जला दी गयी और सब आकर दादी के पास आँगन पर बैठ गये। रस्सी से बुनी चारपाई उन्हें अच्छी लगी। दादी का प्यार और दुलार पद्मिनी __ को बड़ा अच्छा लग रहा था। दादी उसके रेशमी बालों को प्यार से सहलाने लगी।

दादी ने पूछा बेटा! तुमने रामायण-महाभारत की कहानियाँ सुनी हैं?

राहुल ने कहा- “सुनाइये न दादी – डैड ने कुछ सुनाया है परन्तु।” पिंकी ने मुँह बनाकर कहा – ” ओह नो. नॉट अगेन। वही परानी कथायें।”

दादी बोली – “बेटा, पौराणिक कथाओं में कितना ज्ञान भरा है।”

पिंकी ने बहस की – “आजकल के साइंस के जमाने में तुम्हारी कहानियाँ बिल्कुल फिट नहीं बैठती। क्या मिलेगा हमें उनसे।” बहस सुन, दादाजी भी हाजिर हो गये और कहा “जो ढूँढे उसे मिले।” इन कहानियों से “मनोरंजन के साथ आदर्श व मूल्य समझने का कार्य भी हो जाता था।”

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फिर दादी ने कहानियाँ सुनायी क्योंकि राहुल और पद्मिनी इन्हें सुनना चाहते थे। रात का भोजन बाहर आँगन में ही किया गया। इन बच्चों के लिये विशेष रूप से स्वदेशी जायके वाले लिट्टी की व्यवस्था की गयी थी। उस बेक किये गये पकवान का इन्होंने भरपर आनन्द लिया। ये उपले पर सेंके गये थे और उनका सोंधापन गजब का आनन्द दे रहा था। पिंकी ने इसकी जगह सूप, ब्रेड और अंडे अपने लिये बनवाये थे।

भोजन के क्रम में अगले दिन के कार्यक्रम की चर्चा होने लगी। पिंकी बोली “हमीरपुर छोटी जगह है।” तुमलोगों को शायद मुम्बई, दिल्ली, कलकत्ता जैसे शहर अच्छे लगते हैं और पता चलता कि इंडिया कैसा है? पर राहुल की इच्छा तो भारत के गाँव देखने की थी। पिंकी ने समझाया- ” इसका मतलब रियल विलेज से है जहाँ केवल ‘हट’ हो – चलो कल दिखा देंगे।”

विकी सोचने लगा- “हाँ, वे जो खंडहर हैं, उनके पास बसा एक छोटा-सा स्थित विलेज है। वहीं चला जाया”

पदमिनी की आँखें नीली रोशनी में चमक उठी – खंडहर? कब के हैं? क्या वे बहुत प्राचीन हैं? पद्मिनी ने वहाँ जाने का अपना संकल्प पक्का कर लिया।

पिंकी हँसने लगी – “उन टूटी-फूटी दीवारों को देखने में मेरी तो कोई रुचि नहीं है।”

पद्मिनी ने कहा – ” मुझे है, मुझे इतिहास में विशेष रुचि है।”

राहुल ने भी हामी भरी – ” मैं भी। शायद उधर कुछ दुर्लभ पक्षियों के भी संकेत मिल जाय।

“उल्लू और चमगादड़ के सिवा और क्या मिलेगा?” विकी ने हँसते हुये कहा।

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“वे भी ठीक रहेंगे” – राहुल खुशी-खुशी बोला – “चमगादड़ भी एक ऐसा पक्षी है जो हर जगह नहीं मिलता और फिर भारतीय चमगादड़ कैसे होते हैं, इसका भी तो पता चलेगा।

पद्मिनी को लगा- पिंकी-विकी इस योजना पर बहुत खुश नहीं हुये पर राहुल और पद्मिनी ने अपना इरादा पक्का बना लिया कि वे कल खंडहर देखने अवश्य जायेंगे। उन्हें अगर बिना किसी मार्ग-दर्शक के भी जाना पड़े तो वे जायेंगे क्योंकि उन्हें हिन्दी आती है और वे अपना रास्ता स्वयं ढूँढ लेंगे। वे स्वयं वहाँ से घूम आयेंगे।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करती है?
(क) 46 लाख वर्ष
(ख) 4600 मिलियन वर्ष
(ग) 13.7 अरब वर्ष
(घ) 13.7 खरब वर्ष उत्तर
उत्तर:
(ख) 4600 मिलियन वर्ष

प्रश्न 2.
निम्न में कौन-सी अवधि सबसे लम्बी है ………………..
(क) इओन (Eons)
(ख) कल्प (Period)
(ग) महाकल्प (Era)
(घ) युग (Epoch)
उत्तर:
(क) इओन (Eons)

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प्रश्न 3.
निम्न में कौन सा-तत्त्व वर्तमान वायुमण्डल के निर्माण व संशोधन में सहायक नहीं है?
(क) सौर पवन
(ख) गैस उत्सर्जन
(ग) विभेदन
(घ) प्रकाश संश्लेषण
उत्तर:
(क) सौर पवन

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से भीतरी ग्रह कौन से हैं …………………
(क) पृथ्वी व सूर्य के बीच पाए जाने वाले ग्रह।
(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।
(ग) वे ग्रह जो गैसीय हैं।
(घ) बिना उपग्रह वाले ग्रह।
उत्तर:
(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

प्रश्न 5.
पृथ्वी पर जीवन निम्नलिखित में से लगभग कितने वर्षों पहले आरम्भ हुआ।
(क) 1 अरब 37 करोड़ वर्ष पहले
(ख) 460 करोड़ वर्ष पहले
(ग) 38 लाख वर्ष पहले
(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।
उत्तर:
(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?
उत्तर:
ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं और अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। पार्थिव ग्रह जनक तारे के बहुत नजदीक होने के कारण और अत्यधिक तापमान के कारण इनकी गैसें संघनित नहीं हो पाई और घनीभूत भी न हो सकी। ये ग्रह छोटे होने के कारण उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी कम रही जिसके फलस्वरूप इनसे निकली हुई गैस इन पर रुकी नहीं रह सकी।

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प्रश्न 2.
पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधित दिये गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिकों के मूलभूत अंतर बताएँ –
(क) कान्ट व लाप्लेस
(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन
उत्तर:
(क) कान्ट व लाप्लेस की परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल से हुआ जो कि सूर्य की युवा अवस्था से संबद्ध थे।
(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन ने कहा कि ब्रह्मांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के पास से गुजरा। इसके परिणामस्वरूप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से सिगार के आकार का कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया। यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यहीं पर धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।

प्रश्न 3.
विभेदन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान और उत्पत्ति के तुरंत बाद अत्यधिक ताप के कारण, पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई और तापमान की अधिकता के कारण ही हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए । इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए। समय के साथ यह और ठंडे हुए और ठोस रूप में परिवर्तित होकर छोटे आकार के हो गए। अंततोगत्वा यह पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। हल्के व भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है।

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प्रश्न 4.
प्रारंभिक काल में पृथ्वी के धरातल का स्वरूप क्या था?
उत्तर:
प्रारंभ में पृथ्वी, चट्टानी गर्म और वीरान ग्रह थी जिसका वायुमण्डल विरल था जो हाइड्रोजन व हीलीयम से बना था।

प्रश्न 5.
पृथ्वी के वायुमंडल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन-सी थीं?
उत्तर:
हाइड्रोजन व हीलीयम।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
बिग बैंग सिद्धांत का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्न अवस्थाओं में हुआ है –
1. आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड बना है, अति छोटे गोलक (एकाकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। जिसका आयतन अत्यधिक सक्ष्म एवं तापमान तथा घनत्व अनंत था ।

2. बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की , विस्फोट प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ । वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की घटना आज
से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी। ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट (Bang) के बाद एक सेकेंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई। बिग बैंग होने के आरम्भिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ।
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3. बिग बैंग के कारण 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500° केल्विन तक गिर गया और परमाणवीय पदार्थ का निर्माण हुआ। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया। ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ है आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में विस्तार का होना। हॉयल (Hoyle) ने इसका विकल्प ‘स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Concept) के नाम से प्रस्तुत किया । इस संकल्पना के अनुसार ब्रह्मांड किसी भी समय में एक ही जैसा रहा हैं। यद्यपि ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी अनेक प्रमाणों के मिलने पर वैज्ञानिक समुदाय अब ब्रह्मांड विस्तार सिद्धांत के ही पक्षधर हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के विकास संबंधी अवस्थाओं को बताते हुए हर अवस्था या चरण को संक्षेप में वर्णित करें।
उत्तर:
पृथ्वी की संरचना परतदार है । वायुमण्डल के बाहरी छोर से पृथ्वी के क्रोड तक जो पदार्थ हैं वे एक समान नहीं हैं। वायुमंडलीय पदार्थ का घनत्व सबसे कम है। पृथ्वी की सतह से इसके भीतरी भाग तक अनेक मंडल हैं और हर एक भाग के पदार्थ की अलग विशेषताएँ हैं। उल्काओं के अध्ययन से हमें इस बात का पता चलता है कि बहुत से ग्रहाणुओं के इकट्ठा होने से ग्रह बने हैं, पृथ्वी की रचना भी इसी प्रक्रम के अनुरूप हुई है। जब पदार्थ गुरुत्वबल के कारण संहत हो रहा था, तो इन इकट्ठा होते पिंडों ने पदार्थ को प्रभावित किया । इससे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न हुई। यह क्रिया जारी रही और उत्पन्न ताप से पदार्थ पिघलने लगा।

ऐसा पृथ्वी की उत्पत्ति के समय और उत्पत्ति के तुरंत बाद में हआ। अधिकता के कारण हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए । इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए तथा पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। चंद्रमा की उत्पत्ति के समय, भीषण संघट्ट (Giant impact) के कारण, पृथ्वी का तापमान पुन: बढ़ा या फिर ऊर्जा उत्पन्न हुई और यह विभेदन का दूसरा चरण था।

विभेदन की इस प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी का पदार्थ अनेक परतों में अलग हो गया जैसे-पर्पटी (Crust) प्रवार (Mantle), बाह्य क्रोड (Outer core) और आंतरिक क्रोड (Inner core) वर्तमान वायुमंडल के विकास की तीन अवस्थाएँ हैं। इसकी पहली अवस्था में आदिकालिक वायुमंडलीय गैसों का हास है। दूसरी अवस्था में, पृथ्वी के भीतर से निकली भाप एवं जलवाष्प ने वायुमंडल की संरचना को जैव प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया (Photo-synthesis) ने संशोधित किया। ऐसा माना जाता है कि जीवन का विकास लगभग 380 करोड़ वर्ष पहले आरंभ हुआ। एक कोशीय जीवाणु से आज के मनुष्य तक जीवन के विकास का सार भू-वैज्ञानिक काल मापक्रम से ज्ञात किया जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक भारतीय वैज्ञानिक का नाम बातइए जिसने सूर्य-केन्द्रित परिकल्पना प्रस्तुत की।
उत्तर:
आर्यभट्ट

प्रश्न 2.
सूर्य केन्द्रित सौर मण्डल किसे कहते हैं?
उत्तर:
सौर मण्डल जिसका केन्द्र सूर्य है, सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

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प्रश्न 3.
भू-केन्द्रित परिकल्पना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इससे अभिप्राय है कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र था तथा सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, आदि पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं।

प्रश्न 4.
ऐसे दार्शनिक का नाम बताओं जिसके अनुसार पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र थी।
उत्तर:
यूनानी दार्शनिक अरस्तू

प्रश्न 5.
पृथ्वी पर ऑक्सीजन का स्रोत क्या है ?
उत्तर:
संश्लेषण क्रिया से महासागरों में ऑक्सीजन का बढ़ना।

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प्रश्न 6.
चन्द्रमा की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
लगभग 4.44 अरब वर्ष पूर्व।

प्रश्न 7.
The Big Splat से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक बड़े पिण्ड का पृथ्वी से टकराना।

प्रश्न 8.
बाहरी ग्रह कौन-से हैं ?
उत्तर:
वृहस्पति, शनि, अरुण, कुबेर।

प्रश्न 9.
आन्तरिक ग्रह कौन-से हैं ?
उत्तर:
बुध, शुक्र, पृथ्वी व मंगल।

प्रश्न 10.
तारों का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
लगभग 5 से 6 अरब वर्ष पहले।

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प्रश्न 11.
प्रकाश वर्ष में प्रकाश कितनी दूरी तय करता है?
उत्तर:
9.461 x 1012 किमी।

प्रश्न 12.
आधुनिक समय में सर्वमान्य सिद्धान्त कौन-सा है?
उत्तर:
बिग बैंग सिद्धान्त (विस्तृत ब्रह्माण्ड परिकल्पना)।

प्रश्न 13.
जींस और जैफरी का कौन-सा सिद्धान्त है?
उत्तर:
द्वैतारिक सिद्धान्त।

प्रश्न 14.
1950 ई० में रूस के किस वैज्ञानिक ने नीहारिका परिकल्पना में संशोधन किया?
उत्तर:
ओटो शिमिड ने।

प्रश्न 15.
अभिनव तारे से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सूर्य की अपेक्षा लाखों गुणा अधिक प्रकाशमय तारा।

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प्रश्न 16.
सूर्य से बाहर निकले जीह्वाकार पदार्थ का क्या आकार है?
उत्तर:
सिगार के आकार का।

प्रश्न 17.
किस वैज्ञानिक ने संघट्ट परिकल्पना प्रस्तुत किया?
उत्तर:
जेम्स जीन्स तथा जेफ्रीज ने।

प्रश्न 18.
किस दार्शनिक ने नीहारिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया?
उत्तर:
जर्मनी के दार्शनिक एमैनुल कान्त ने।

प्रश्न 19.
उस अद्वितीय ग्रह का नाम लिखें जहाँ जीवन मौजूद है।
उत्तर:
पृथ्वी।

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प्रश्न 20.
बाह्य ग्रहों के नाम लिखें।
उत्तर:
वृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, कुबेर।

प्रश्न 21.
आन्तरिक ग्रहों के नाम लिखें।
उत्तर:
बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल ग्रह।

प्रश्न 22.
सौर मण्डल में कितने ग्रह हैं?
उत्तर:
9

प्रश्न 23.
पृथ्वी के वायुमण्डल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन सी थीं।
उत्तर:
पृथ्वी के ठंडा होने और विभेदन के दौरान, पृथ्वी के अंदरुनी भाग से बहुत सी गैसें व जलवाष्प बाहर निकले । इसी से आज के वायुमंडल का उद्भव हुआ। आरम्भ में वायुमण्डल में जलवाष्प, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन व अमोनिया अधिक मात्रा में और स्वतंत्र ऑक्सीजन बहुत कम थी। वह प्रक्रिया जिससे पृथ्वी के भीतरी भाग से गैसें धरती पर आई, इसे गैस उत्सर्जन (Degassir.g) कहा जाता है।

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प्रश्न 24.
वर्तमान वायुमण्डल के विकास की अवस्थाएँ बताएँ।
उत्तर:
वर्तमान वायुमण्डल के विकास की तीन अवस्थाएँ हैं –

  1. इसकी पहली अवस्था में आदिकालिक वायुमण्डलीय गैसों का न रहना है।
  2. दुसरी अवस्था में पृथ्वी के भीतर से निकली भाप एवं जलवाष्प ने वायुमण्डल के विकास में सहयोग किया।
  3. अन्त में वायुमण्डल की संरचना को जैव मण्डल की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया (Photosynthesis) ने संशोधित किया।

प्रश्न 25.
महासागरों की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
अधिक संघनन के कारण पृथ्वी पर अत्यधिक वर्षा हुइ। पृथ्वी के धरातल पर वर्षा का जल गर्तों में इकट्ठा होने लगा जिससे महासागर बने । महासागर पृथ्वी की उत्पत्ति से 50 करोड़ सालों के अन्तर्गत बने । इससे पता चलता है कि महासागर 400 करोड़ साल पुराने हैं।

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प्रश्न 26.
सौरमंडल क्या है? इसकी रचना कब हुई?
उत्तर:
हमारे सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। जिस नीहारिका को सौर मण्डल का जनक माना जाता है उसके ध्वस्त होने व क्रोड के बनने की शुरुआत लगभग 5 से 5.6 अरब वर्ष पहले हुई व ग्रह लगभग 4.6 से 4.56 अरब वर्ष पहले बने । हमारे सौर मण्डल में सूर्य (तारा), 9 ग्रह, 63 उपग्रह, लाखों छोटे पिण्ड जैसे क्षुद्र ग्रह (ग्रहों के टुकड़े) (Asterodis), धूमकेतु (Comets) एवं वृहत् मात्रा में धूलकण व गैसें हैं।

प्रश्न 27.
प्रकाश वर्ष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रकाश वर्ष (Light Year) समय का नहीं वरन् दूरी का माप है। प्रकाश की गति 3 लाख कि० मी० प्रति सेकण्ड है। विचारणीय है कि एक साल में प्रकाश जितनी दूरी तय करेगा. वह एक प्रकाश वर्ष होगा। वह 9.461 x 1012 किमी के बराबर है। पृथ्वी व सूर्य की औसत दूरी 14 करोड़ 95 लाख, 98 हजार किलोमीटर है। प्रकाश वर्षको सन्दर्भ में यह प्रकाश वर्ष का केवल 8.311 मिनट है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आन्तरिक तथा बाहरी ग्रहों की तुलना करें।
उत्तर:
इन नौग्रहों में बुध, शुक्र, पृथ्वी व मंगल भीतरी ग्रह (Inner Planets) कहलाते हैं, क्योंकि ये सूर्य व छुद्रग्रहों की पट्टी के बीच स्थित हैं। अन्य पाँच ग्रह बाहरी ग्रह (Outer Planets) कहलाते हैं। पहले चार ग्रह पार्थिव (Terrestrial) ग्रह भी कहे जाते हैं। इसका अर्थ है कि ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। अन्य पाँच ग्रह गैस से बने विशाल ग्रह या जोवियन (Jovian) ग्रह कहलाते हैं। जोवियन का अर्थ है बृहस्पति (Jupiter) की तरह । इनमें से अधिकतर पार्थिव ग्रहों से विशाल हैं और हाइड्रोजन व हीलियम से बना सघन वायुमण्डल युक्त हैं। सभी ग्रहों का निर्माण लगभग 4.6 अरब साल पहले एक ही समय में हुआ।

प्रश्न 2.
चन्द्रमा की उत्पत्ति सम्बन्धी मत प्रस्तुत करें।
उत्तर:
चन्द्रमा पृथ्वी का अकेला प्राकृतिक उपग्रह है। पृथ्वी की तरह चन्द्रमा की उत्पत्ति सम्बन्धी मत प्रस्तुत किए गए हैं।
1. सन् 1883 ई० में सर जार्ज डार्विन (Sir George Darwin) ने सझाया कि प्रारम्भ में पृथ्वी व चन्द्रमा तेजी से घूमते एक ही पण्डि थे। यह परा पिण्ड डंबल (बीच से पतला व किनारों से मोटा) की अकृति में परिवर्तित हुआ और अंततोगत्वा टूट गया। उनके अनुसार चन्द्रमा का निर्माण उसी पदार्थ से हुआ जहाँ आज प्रशांत महासागर एक गर्त के रूप में मौजूद हैं।

2. यद्यपि वर्तमान समय के वैज्ञानिक इनमें से किसी भी व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी के उपग्रह के रूप में चन्द्रमा की उत्पत्ति एक बड़े टकराव (giant impact) का नतीजा है जिसे द बिग स्पलैट (The big splat) कहा गया है। ऐसा मानना है कि पृथ्वी के बनने के कुछ समय बाद ही मंगल ग्रह के 1 से 3 गुणा बड़े आकार का पिण्ड पृथ्वी से टकराया। इस टकराव से पृथ्वी का एक हिस्सा टूटकर अंतरिक्ष में बिखर गया । टकराव से अलग हुआ यह पदार्थ फिर पृथ्वी के कक्ष में घूमने लगा और क्रमशः आज का चन्द्रमा बना। यह घटना या चन्द्रमा की उत्पत्ति लगभग 4.44 अरब वर्षों पहले हई।

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प्रश्न 3.
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?
उत्तर:
आधुनिक वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति को एक सतह की रासायनिक प्रतिक्रिया बताते हैं, जिससे पहले जटिल जैव (कार्बनिक) अणु (Complex organic molecules) बने और उनका समूहन हुआ। यह समूहन ऐसा था जो अपने आपको दोहराता था। पुनः बनने में सक्षम था) और निर्जीव पदार्थों को जीवित तत्त्व में परिवर्तित कर सका । हमारे ग्रह पर जीवन के चिह्न अलग-अलग समय की चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्म के रूप में हैं।

300 करोड़ साल पुरानी भूगर्भिक शैलों में पाई जाने वाली सूक्ष्मदर्शी संरचना आज की शैवाल (Blue green algae) की संरचना से मिलती जुलती है। यह कल्पना की जा सकती है कि इससे पहले समय में साधारण संरचना वाली शैवाल रही होगी। यह माना जाता है कि जीवन का विकास लगभग 380 करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हुआ। एक कोशीय जीवाणु से आज के मनुष्य तक जीवन के विकास का सारा भवैज्ञानिक काल मापक्रम से प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
ओटोशिमिड द्वारा संशोधित सिद्धान्त पर नोट लिखें।
उत्तर:
1950 ई० में रूस के ऑटो शिमिड (Otto schmidt) व जर्मनी ने कार्ल वाइजास्कर (Carml weizascar) ने नीहारिका परिकल्पना (Nebular hypothesis) में कुछ संशोधन किया, जिसमें नीहारिका से घिरा हुआ था जो मुख्यतः हाइड्रोजन, हीलियम और धूलकणों की बनी थी। इन कणों के घर्षण व टकराने (Collusion) से एक चपटी तश्तरी की आकृति के बादल का निर्माण हुआ और अभिवृद्धि (Acceretion) प्रक्रम द्वारा ही ग्रहों का निर्माण हुआ।

प्रश्न 5.
ग्रहों का सूर्य से दूरी, घनत्व तथा अर्द्धव्यासकी दृष्टि से तुलनात्मक वर्णन करें।
उत्तर:
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दूरियाँ खगोलीय एकक में हैं। अर्थात् अगर पृथ्वी की मध्यम दूरी 14 करोड़ 95 लाख 98 हजार किमी एक एकक के बराबर है तो बाकी ग्रहों की सूर्य से दूरी ………………..।
@ घनत्व ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर (gm/cm3)
# अर्द्धव्यास : अगर भूमध्यसागर अर्द्धव्यास 6378.137 किमी = 1 है तो ……………….

प्रश्न 6.
तारों के निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन करो।
उत्तर:
तारों का निर्माण-प्रारम्भिक ब्रह्मांड में ऊर्जा व पदार्थ का वितरण समान नहीं था। घनत्व में आरम्भिक भिन्नता से गुरुत्वाकर्षण बलों में भिन्नता आई, जिसके परिणामस्वरूप पदार्थ का एकत्रण हुआ। यह एकत्रण आकाशगंगाओं के विकास का आधार बना। एक आकाशगंगा असंख्य तारों का समूह है। आकाशगंगाओं का विस्तार इतना अधिक होता है कि उनकी दूरी हजारों प्रकाश वर्षों में (Light years) मापी जाती है। एक अकेली आकाशगंगा का व्यास 80 हजार से 1 लाख 50 हजार वर्ष के बीच हो सकता है।

एक आकशगंगा के निर्माण की शुरुआत हाइड्रोजन गैस से बने विशाल बादल के संचयन से होती है जिसे नीहारिका (Nebula) कहा गया । क्रमशः इस बढ़ती हुई नीहारिका में गैस के झुण्ड विकसित हुए। ये झुण्ड बढ़ते-बढ़ते घने गैसीय पिण्ड बने जिनसे तारों का निर्माण आरम्भ हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता है कि तारों का निर्माण लगभग 5 से 6 अरब वर्ष पहले हुआ।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दें –
(i) नीहारिका किसे कहते हैं?
उत्तर:
धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल को नीहारिका कहते हैं। इसमें गर्म गैसीय पदार्थ तथा धूल गैस के बादल होते हैं।

(ii) ग्रहाणु क्या हैं?
उत्तर:
सूर्य तथा गुजरते तारे के टकराव के कारण गैसीय पदार्थ एक फिलामेंट के रूप में पूर्व-स्थित सूर्य से निकल कर बाहर आ गया। यह जिह्वा आकार के पदार्थ छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गए। ये टुकड़े ठंडे पिंडों के रूप में उड़ते सूर्य के चारें ओर कक्षाओं में घूमने लगे इन्हें ग्रहाणु (Planetesimals) कहते हैं ।

(iii) सर्वप्रथम किसने नीहारिका परिकल्पना को प्रस्तावित किया?
उत्तर:
नीहारिका परिकल्पना सर्वप्रथम जर्मनी के दार्शनिक एमैनुल कांट ने 1755 में प्रस्तुत की।

(iv) आदि तारा (प्रोटोस्टार) क्या है?
उत्तर:
गर्म गैसों के बादल से बनी नीहारिका में विस्फोट से अभिनव तारे की उत्पत्ति हुई। इसके सघन भाग अपने ही गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से विखण्डित हो गए। सघन क्रोड विशाल तथा अधिक गर्म हो गया। इसे आदि तारा (Proto Star) कहते हैं जो अन्त में सूर्य बन गया ।

प्रश्न 8.
पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धि दिए गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिक के मूलभूत अन्तर बताइए – (क) कान्त व लाप्लेस (ख) चैम्बरलेन व मोल्टन।
उत्तर:
कान्त व लाप्लेस के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल (नीहारिका) से हुई परन्तु चैम्बरलेन व मोल्टन के अनुसार द्वैतारक सिद्धान्त के अनुसार एक भ्रमणशील तारे के सूर्य से टकराने से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित किसी एक सिद्धांत का वर्णन करें।
उत्तर:
पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सन् 1755 में जर्मन दार्शनिक एमैनुल काण्ट ने यह परिकल्पना की कि धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल, जिन्हें निहारिका कहा गया अनेक पृथक-पृथक गोलाकार पिण्डों में निर्दिष्ट तरीके से संघनित हुए हैं। सन् 1796 में फ्रांसिसी लाप्लास ने लगभग इसी प्रकार के सिद्धान्त का प्रस्ताव दिया । काण्ट एवं लाप्लास के अनुसार गैस का मूल पिंड ठंढा होकर सिकुड़ने लगा । कोपीय संवेग के संरक्षण नियमानुसार इसके घूर्णन गति में वृद्धि हुई। इस प्रकार केन्द्रीय गैस पिंड से गैसीय पदार्थों के क्रमिक छल्ले अपकेन्द्रीय बल द्वारा अलग होते हैं। अंतिम चरण में छल्ले संघनित होकर ग्रहों में बदल गये। अर्थात् काण्ट लाप्लास ने पृथ्वी के उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो सिद्धान्त दिये हैं निहारिका सिद्धांत (Nebular Hybothesis) कहलाता है। यह एक तारक सिद्धांत ग्रहों की उत्पत्ति को समझाने का प्रयत्न करते हैं। निहारिका सिद्धांत गरुत्वाकर्षण पर आधारित है।

काण्ट एवं लाप्लास का निहारिका सिद्धांत –

  • काण्ट के अनुसार आदि पदार्थ अन्तरिक्ष में बिखरा पड़ा था।
  • इस आदि पदार्थ का जन्म परा प्रकृति से हुआ था।
  • अन्तरीक्ष में धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल को निहारिका (Nebula) कहा गया है।
  • प्रारंभ में यह पदार्थ ठंढा तथा गतिहीन था, परन्तु यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण गर्म गतिशील हो गया। फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने भी इसी प्रकार की परिकल्पना 1796 में प्रस्तुत किया।
  • कोणीय संवेग के नियमानुसार इस निहारिका की परिभ्रमण गति बढ़ गयी।
  • इस प्रभाव के मध्य भाग से लगातार छल्ले (Rings) अलग होने लगे। कलान्तर में छल्ले संघनित होकर ग्रह बन गया। अवशिष्ट भाग सूर्य के रूप में रह गया।

आलोचना –

  • यह पहला सिद्धान्त पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित होने के कारण सराहा गया।
  • किसी बाह्य शक्ति के बिना गतिहीन निहारिका में गति नहीं उत्पन्न हो सकती।
  • इस आलोचना के बावजूद काण्ट ने कहा “मुझे पर्याप्त पदार्थ राशि दो जिससे इस ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है तो मैं एक नया ब्रह्मांड बना कर दिख सकता हूँ।

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प्रश्न 2.
ग्रहों की उत्पत्ति सम्बन्धी नीहारिका परिकल्पना का वर्णन करें।
उत्तर:
नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)-एक तारक सिद्धान्त ग्रहों की सिद्धान्त है। 1755 में एमैनुल कांत नामक जर्मन दार्शनिक ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की। यह परिकल्पना न्यूटन के गुरुत्वाकषर्ण (Newton’s Law of Gravitation) पर आधारित है।

परिकल्पनाकी रूप – रेखा (Qutlines of Hypothesis) –

  • कान्ट के अनुसार आदि पदार्थ अन्तरिक्ष में बिखरा हुआ था।
  • इस आदि पदार्थ का जन्म परा-प्रकृति से हुआ था।
  • आन्तरिक्ष में धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल को नीहारिका (Nebula) कहा गया।
  • प्रारम्भ में यह पदार्थ ठंडा तथा गतिहीन था। परन्तु यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण गर्म तथा गतिशील हो गया । फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने भी लगभग इसी प्रकार की परिकल्पना 1796 में प्रस्तुत की।
  • कोणीस संवेग के नियमानुसार इस नीहारिका की परिभ्रमण गति बढ़ गई तथा विकेन्द्रीय शक्ति भी अधिक हो गई।
  • इस प्रभाव के मध्य भाग से लगातार छल्ले (Rings) अलग होने लगे। कालान्तर में छल्ले संघनित होकर ग्रह बन गए । अवशिष्ट भाग सूर्य के रूप में रह गया।

आलोचना (Criticism) –

  • यह पहला सिद्धान्त होने के कारण सराहा गया।
  • किसी बाह्य शक्ति के बिना गतिहीन नीहारिका में गति उत्पन्न नहीं हो सकती।
  • इस आलोचना के बावजूद कान्ट ने कहा मुझे पर्याप्त पदार्थ राशि दो मैं विश्व का निर्माण करके बता दूँगा। (Give me matter and I can create the earth)।

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प्रश्न 3.
सौर मण्डल के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सौर मण्डल में कई तारा पुंज या मंदाकिनियां (Galaxies) हैं। पृथ्वी की मंदाकिनी को आकाश गंगा (Milky Way) कहते हैं । पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य तथा अन्य ग्रहों के साथ ही एक समय पर हुई। सौर मण्डल का विकास (Evoluation of Solar System)

सौर मण्डल की उत्पत्ति एक अभिनव तारे (Super Nova) – से हुई। ऐसा होयल ने सुझाव दिया है। पूर्व स्थित गैस के बादल में विस्फोट से अभिनव तारे की उत्पत्ति हुई । एक अभिनव तारा सूर्य की तुलना में कई मिलियन गुणा अधिक प्रकाशमय है। इस अभिनव तारे का तापमान तथा दबाव बहुत अधिक हो गया। इससे आण्विक प्रतिक्रिया (Nuclear Reaction) का आरम्भ हुआ। मेघ में उपस्थित कुछ हाइड्रोजन का संगलन हीलियम में हुआ जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा विमुक्त हुई।

अभिनव तारे में विस्फोट से प्रघाती तरंगें (Shock) – उत्पन्न हुई जिन्होंने मेघ के अधिक सघन भाग को धक्का दिया और इससे वे अपने ही गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से विखंडित हो गए। सघन क्रोड (Dense Core) अधिक बड़ा तथा गर्म होता गया। इसके गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से अधिक-से-अधिक पदार्थ इसकी ओर आकर्षित हुए। इस प्रक्रिया से गर्म क्रोड आदि तारे (Protostar) के रूप में विकसित हुआ जो कालान्तर में सूर्य बन गया।

गणा तथा दोष (Merits and Demerits) –

  • यह परिकल्पना अभिनव तारे में सघन तथा हल्के पदार्थों को होना समझाता है।
  • परिभ्रमण गति के बढ़ने से ग्रहों में कोणात्मक गति अधिक है।
  • इससे यह समझा जा सकता है कि ग्रहों में 98% भाग ऑक्सीजन एल्यूमीनियम आदि से बना है जबकि केवल 1% भाग हाइड्रोजन तथा हीलियम से बना है।

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 9 18 वीं शताब्दी में नयी राजनैतिक संरचनाएँ

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 2 Chapter 9 18 वीं शताब्दी में नयी राजनैतिक संरचनाएँ Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 9 18 वीं शताब्दी में नयी राजनैतिक संरचनाएँ

Bihar Board Class 7 Social Science 18 वीं शताब्दी में नयी राजनैतिक संरचनाएँ Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
स्वयात्त राज्य किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
जो राज्य अपना सम्पूर्ण प्रशासनिक निर्णय और नीति-निर्धारण स्वयं करता है, उस राज्य को ‘स्वायत्त राज्य’ कहते हैं।

प्रश्न 2.
नये राज्यों को तीन समूह में विभाजित करने के आधार क्या रहा होगा?
उत्तर-
पहले से चले आ रहे केन्द्रीय शासकों का कमजोर हो जाना ही ऐसा प्रमुख कारण रहा होगा, जिससे राज्य तीन राज्यों में विभाजित हो गया।

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प्रश्न 3.
तकावी ऋण क्या था ?
उत्तर-
राज्य द्वारा किसानों को दिये गये ऐसे ऋण को तकावी ऋण कहा जाता था, जिस ऋण की रकम का मकसद उपज को बढ़ाना था ।

प्रश्न 4.
ठेकेदारी या इजारेदारी व्यवस्था क्या थी ?
उत्तर-
राजस्व वसूली के लिये एक निश्चित क्षेत्र पर निर्धारित रकम के लिए कुछ लोगों से शासक द्वारा किए गए समझौता ठेकेदारी या इजारेदारी व्यवस्था थी।

प्रश्न 5.
चौथ किसे कहा जाता था ?
उत्तर-
मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों पर हमला नहीं किये जाने के बदले किसानों से ली जाने वाली उपज का चौथाई भाग के कर को चौथ कहा गया ।

प्रश्न 6.
सरदेशमुखी क्या था ?
उत्तर-
मराठों से बड़े जमींदार परिवारों, जिन्हें सरदेशमुख कहा जाता था, ” इनके द्वारा लोगों के हितों की रक्षा के बदले लिया जाने वाला उपज का दसवाँ भाग होता था । ऐसे कर वसूलने वाले को सरदेशमुख कहा जाता है ।

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

आइए याद करें :

प्रश्न (i)
मुगलों के उत्तराधिकारी राज्य में कौन राज्य आता है ?
(क) सिक्ख
(ख) जाट
(ग) मराठा
(घ) अवध
उत्तर-
(घ) अवध

प्रश्न (ii)
बंगाल में स्वायत राज्य की स्थापना किसने की ?
(क) मुर्शिद कुली खाँ
(ख) शुजाउद्दीन
(ग) बुरहान-उल-मुल्क
(घ) शुजाउद्दौला
उत्तर-
(क) मुर्शिद कुली खाँ

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प्रश्न (iii)
सिक्खों के एक शक्तिशाली राजनैतिक और सैनिक शक्ति के रूप में किसने परिवर्तित किया :
(क) गुरुनानक
(ख) गुरु तेगबहादुर
(ग) गुरु अर्जुनदेव
(घ) गुरु गोविन्द सिंह
उत्तर-
(घ) गुरु गोविन्द सिंह

प्रश्न (iv)
शिवाजी ने किस वर्ष स्वतंत्र राज्य की स्थापना की ?
(क) 1665
(ख) 1680
(ग) 1674
(घ) 1660
उत्तर-
(ग) 1674

प्रश्न (v)
मराठा परिसंघ का प्रमुख कौन था?
(क) पेशवा
(ख) भोंसले
(ग) सिंधिया
(घ) गायकवाड़
उत्तर-
(क) पेशवा

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में मेल बैठाएँ :

  1. ठेकेदारी प्रथा – मराठा
  2. सरदेशमुखी – औरंगजेब का निधन
  3. निजाम-उल-मुल्क – जाट
  4. सूरजमल – हैदराबाद
  5. 1707 ई० – भू-राजस्व प्रशासन

उत्तर-

  1. ठेकेदारी प्रथा – भू-राजस्व प्रशासन
  2. सरदेशमुखी – मराठा
  3. निजाम-उल-मुल्क – हैदराबाद
  4. सूरजमल – जाट
  5. 1707 ई० – औरंगजेब का निधन

आइए विचार करें

प्रश्न (i)
अवध और बंगाल के नवाबों ने जागीरदारी प्रथा को हटाने की कोशिश क्यों की?
उत्तर-
अवध और बंगाल के नवाबों ने जागीरदारी प्रथा को हटाने की कोशिश इसलिए की कि वे मुगल-प्रभाव को कम करना चाहते थे । यही हाल हैदराबाद का भी था । इस प्रकार धीरे-धीरे ये मुगलों से पूर्णतः मुक्त होकर स्वतंत्र शासक बन बैठे ।

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प्रश्न (ii)
शिवाजी ने अपने राज्य में कैसी प्रशासनिक व्यवस्था कायम की?
उत्तर-
शिवाजी के काल में प्रशासन का केन्द्र राजा अर्थात स्वयं शिवाजी थे । राजा को सहयोग देने के लिए आठ मंत्री थे जिन्हें ‘अष्ठ प्रधान’ कहा जाता था ।

  1. पेशवा-पेशवा प्रधानमंत्री था । प्रशासन और अर्थ विभाग की देखरेख करता था । राजा के बाद यही सबसे अधिक शक्ति वाला अधिकारी था ।
  2. सर-ए-नौबत-यह सेनापति की नियुक्ति करता था तथा घोडा के साथ ही अन्य सैनिक साजो-सामान की देखरेख करता था ।
  3. मजुमदार-लेखाकार-इनका काम राज्य के आय-व्यय का लेखा रखना था ।
  4. वाके नवीस-गृह विभाग के साथ ही गुप्तचर विभाग का यह प्रध न होता था । राज्य के विरोधी शक्तियों का यह विवरण रखता था ।
  5. सुरु नवीस-राजा को पत्र व्यवहार में मदद करना सुरु नवीस का ही काम था ।
  6. दबीर-दबीर विदेश विभाग का प्रधान होता था । पड़ासी राज्यों से सम्बंध बनाये रखना इसी का काम था ।
  7. पंडित राव-पंडित राव धार्मिक मामलों का प्रभारी था। विद्वानों और धार्मिक कार्यों हेतु मिलने वाले अनुदानों का वितरण यही करता था
  8. न्यायाधीश शास्त्री-हिन्दू न्याय प्रणाली का व्याख्याता न्यायाधीश शास्त्री ही हुआ करता था ।

प्रश्न (iii)
पेशवाओं के नेतृत्व में मराठा राज्य का विस्तार क्यों हुआ?
उत्तर-
शिवाजी की मृत्यु के बाद और औरंगजेब के जीवित रहने तक मराठा क्षेत्रों पर पुन: मुगलों का अधिकार हो गया । लेकिन जैसे ही 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई, शिवाजी के राज्य पर चितपावन ब्राह्मणों के एक परिवार का प्रभाव स्थापित हो गया। शिवाजी के उत्तराधिकारियों ने उसे पेशवा का पद दे दिया । इस नये बने पेशवा ने पुणा को मराठा राज्य का केन्द्र बनाया। पेशवाओं ने मराठों के नेतृत्व में सफल सेन्य संगठन का विकास किया, जि

सके बल पर उन्होंने अपने राज्य का बहुत विस्तार दिया । मुगलों के कई परवर्ती शासकों ने पेशवाओं का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। इसी कारण पेशवाओं के नेतृत्व में मराठा राज्य का विस्तार हुआ।

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प्रश्न (iv)
मुगल सत्ता के कमजोर होने का भारतीय इतिहास पर क्या . प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
मुगल सत्ता के कमजोर होने का भारतीय इतिहास पर दरगामी प्रभाव पड़ा । छोटे-छोटे राज्यों की भरमार हो गई । छोटे राज्यों के सभी नायक ऐश-मौज का जीवन व्यतीत करते रहे। खर्च को पूरा करने के लिए किसानों पर कर-पर-कर बढ़ाये गये । किसान तबाह होने लगे । इनकी इन कमजोरियों को अंग्रेज पैनी नजर से देख रहे थे । फल हुआ कि अंग्रेजों ने एक-एक कर . सभी छोटे राज्यों को अपने अधिकार में कर लिया । इसके लिये इनको बल के साथ छल का भी व्यवहार करना पड़ा । अंततोगत्वा किसी भी रूप में ये पूरे भारत पर अधिकार करने में सफल हो गये ।

प्रश्न (v)
अठारहवीं शताब्दी में उदित होने वाले राज्यों के बीच क्या समानताएँ थीं?
उत्तर-
अठारहवीं शताब्दी में उदित होने वाले राज्यों तीन राज्य प्रमुख थे-बंगाल, अवध और हैदराबाद । तीनों गुलाम शासन के अधीन रहने वाले सूबे थे । इसका फल हुआ कि बहुत बातों में ये तीनों राज्य समान थे । आय का स्रोत भूत-राजस्व वसूली की व्यवस्था तीनों ने एक समान ही रखी । इन तीनों ने जागीरदारी व्यवस्था को समाप्त कर दिया ताकि राज्य शासन पर इनका आधिपत्य पूरी तरह स्थापित हो जाय । इस प्रकार तीनों राज्यों के बी क .. समानताएँ थीं।

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पाठ का सार संक्षेप

अठारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में अनेक स्वतंत्र भारतीय राज्यों का उदय हुआ। इसका परिणाम हुआ कि मुगल साम्राज्य सिमटकर छोटा हो गया । 1707 में औरंगजंघ की मृत्यु के बाद मुगलों के अनेक सूबे स्वतंत्र हो गये । विरोधी शक्तियाँ भी सशक्त होकर स्वतंत्र राज्य बनकर निष्कटंक हो गई । मुगलों के जो सूबेदार औरंगजेब के जितने विश्वासी थे, उन्होंने उतना ही बड़ा विश्वासघात किया और सूबों के स्वतंत्र शासक बन बैठे ।

भारतीय उपमहाद्वीप में प्रथम साम्राज्य के खंडहर पर निम्नलिखित राज्य थे : मुगल साम्राज्य के सूबेदार : बंगाल, अवध और हैदराबाद । मुगलों के मनसबदार-जागीरदार : राजपुताना, क्षेत्र के सभी राज्य । मुगलों से युद्ध कर चुके राज्य : मराठा, सिक्ख, जाट एवं बुन्देल।।

इन नये राज्यों में सर्वाधिक प्रमुख राज्य थे : बंगाल, अवध और हैदराबाद । हैदराबाद के नवाबों को ‘निजाम’ कहा जाता था । इन तीनों का मुगल दरबार . में बहुत इज्जत किया जाता था। इन्होंने इसी का लाभ उठाया ।

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बंगाल-बंगाल को स्वतंत्र राज्य बनाने में दो नवाबों का हाथ था : मुर्शिद कली खाँ और अलीवर्दी खाँ । मुर्शिद कुली खाँ को 1700 में बंगाल का सूबेदार बनाया गया था, तभी से उसने यहाँ एकाधिकारी प्रवृति दिखाने लगा था । भूमिकर वसूलने के लिए उसने जमींदारी तथा ठेकेदारी व्यवस्था कायम कर अपने लिए अनेक हसबखाह बना लिये । इन लोगों ने उसके शासन को व्यवस्थित रखने में मदद की । इसने हिन्दुओं और मुसलमानों को रोजगार में समान अवसर देकर शासन में स्थिरता कायम की । हैदराबाद-हैदराबाद का सूबेदार निजाम-उल-मुल्क आसफजाह था । इसका मुगल दरबार में काफी प्रभाव था । दरबार के षड्यंत्रों से तं

ग आकर इसने अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया। इसने भी बंगाल के तर्ज पर भू-राजस्व वसूली के लिए जमींदार और ठेकेदार नियुक्त किये । चौक राज्य में हिन्दुओं की संख्या अधिक थी इसलिए इसके राज्य में हिन्दू जमींदारों की संख्या अधिक थी । इससे राज्य में स्थिरता आई ।

राजपूत राज्य-अकबर ने जिन राजपूतों को जोड़कर अपना साम्राज्य फैलाया था, औरंगजेब और उसके बाद के मुगल शासकों से राजपूतों की दूरी बढ़ती गई । अब राजपूतों में भी अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की आकांक्षा जागने लगी । क्षेत्र तथा प्रभूत्व बढाने के लिये ये आपस में ही लड़ने लगे और अपने को कमजोर करते रहे । सर्वाधिक श्रेष्ठ राजपूत शासक आमेर का सवाई जयसिंह था जिसका काल 1681 से 1743 तक माना जाता है। इसी ने गुलाबी नगर जयपुर की स्थापना की थी।

उसने जयपुर को जाटों से प्राप्त की थी । जयसिंह ने ही आगरा, दिल्ली, जयपुर, मथुरा और उज्जैन में पर्यवेक्षणशालाएँ बनवाई थीं, जिन्हें जन्तर-मन्तर कहा जाता है।

मराठा राज्य-मराठों का उदय मुगलों से संघर्ष के कारण हुआ था । मुगलों के विरुद्ध तलवार उठाने वाले पहले व्यक्ति थे शिवाजी । शिवाजी का जन्म 1627 में शाहजी भोंसले के घर हुआ। इनका आरंभिक जीवन मना जीजाबाई तथा अभिभावक दादाजी कोण देव के संरक्षण में हुआ । शिवाजी अपनो छोटी जागीर को सैनिक शक्ति द्वारा बढ़ाना चाहते थे । ये मात्र 18 वर्ष की आयु में ही रायगढ़, कोंकण तथा तोरण के किलों पर कब्जा करके अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा का परिचय दे दिया । मुगल बीजापुर को अपने नियंत्रण में करना चाहते थे । लेकिन शिवाजी ने ऐसा नहीं होने दिया ।

औरंगजेब शिवाजी की शक्ति को कम करना चाहता था । उसने छल-बल सभी का प्रयास किया लेकिन शिवाजी को दबा नहीं पाया । शिवाजी

ने रायगढ़ के किले में अपना राज्याभिषेक करवाया और अपने को एक स्वतंत्र राजा घोषित किया ।

शिवाजी की प्रशासनिक व्यवस्था बहत ही उत्तम कोटि की थी। इनके आठ मंत्री थे जिन्हें अष्ट प्रधान कहा जाता था । वे थे:

  1. पेशवा
  2. सर-ए-नौबत
  3. मजुमदार-लेखाकार
  4. वाके नवीस
  5. गुरु नवीस
  6. दबीर
  7. पंडित राव और
  8. न्यायाधीश शास्त्री ।

इन सभी के कार्य बँटे हुए थे। इन सबके ऊपर राजा अर्थात शिवाजी थे।

पेशवाओं के अधीन मराठा शक्ति का विकास-शिवाजी की मृत्यु 1680 में हुई । फिर औरंगजेब के 1707 में मरने के बाद मराठा क्षेत्रपर चितपावन ब्राह्मणों के एक परिवार का प्रभुत्व स्थापित हो गया । शिवाजी के उत्तराधिकारियों द्वारा उसे पेशवा का पद प्रदान किया गया । पेशवा ने पुणा को मराठा राज की राजधानी बनाया । पेशवाओं ने मराठों के नेतृत्व में सफल सैन्य संगठन का विकास किया ।

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बाद में पेशवाओं ने पाँच परिवारों में मराठा क्षेत्र को बाँटकर अलग-अलग राज्य करने लगे। पुणे के इलाका पर पेशवाओं का अधिकार रहा । ग्वालियर का इलाका सिंधिया के अधीन हो गया । इन्दौर पर होल्कर राज्य करने लगे। विदर्भ का इलाका गायकवाड़ के पास रहा तो नागपुर का इलाका भोंसले के अधिकार में रहे ।

इन सबका सैद्धांतिक प्रमुख पेशवा ही था । सबको मिलाकर मराठा परिसंघ कहा जाता था । पेशवा के अधीन मराठा राज्य भारत का एक शक्तिशाली राज्य बन गया । लेकिन 1761 में पानीपत की दूसरी लड़ाई में मराठा अहमद शाह अब्दाली से हार गये, जिससे उनकी शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई । हार का कारण राजपूतों का चुप रहना और मराठों की स्वार्थ नीति भी थी । अब सिंधिया, होल्कर, गायकवाड, भोंसले तथा पुणे में पेशवा अपने-अपने क्षेत्र में सिमटकर रह गए ।

जाट एक कृषक समूह होने के बावजूद मुगलों से संघर्ष कर अपने को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में बदल लिया । इनका प्रभाव दिल्ली और आगरा के क्षेत्रों में बढ़ा । जाट राज्य की स्थापना चूडामन और बदन सिंह के नेतृत्व में हुआ । लेकिन इस राज्य का पूर्ण विकास 1750 और 1763 ई० के बीच सूरजमल के नेतृत्व में हुआ।

सिक्ख राज्य-सिक्ख एक धर्म था, जिसे गुरु नानक ने स्थापित किया था । सतरहवीं शताब्दी में सिक्ख एक राजनैतिक समुदाय में संगठित होने लगे। . सिक्खों के अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह (1666-1708) के नेतृत्व में सिक्खों ने अपने को धार्मिक और राजनैतिक रूपों में संगठित करने का प्रयास किया । गुरु गोविन्द सिंह के बाद गुरु परम्पग समाप्त हो गई । इनके अनुयायी बन्दा बहादुर के नेतृत्व में सिक्खों ने 8 वर्षों तक मुगलों से संघर्ष किया लेकिन राज्य निर्माण नहीं कर सके

नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के कारण पंजाब के प्रशासन में अव्यवस्था फैल गई । अब्दाली की वापसी के बाद सिक्ख पुनः संगठित होने लगे । पहले ये जत्थों तथा बाद में मिस्लों में संगठित हुए। इन मिस्लों के ही एक मिस्ल के प्रधान रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिक्खों ने उन्नीसवीं शताब्दी में एक शक्तिशाली राज्य का गठन कर लिया।

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भारतीय राज्य और राजाओं के बिखराव का लाभ अंग्रेजों ने खब उठाया। 1857 में इन सभी राज्यों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध करने का संकल्प लिया था, लेकिन वे अंग्रेजों को दबा नहीं सके । इसका कारण कुछ राज्यों का धोखा देना भी था ।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.2

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प्रश्न 1.
नीचे दिए गए कमान सत्य हुँया असत्य हैं,कारण के साथ अपने उत्तर दीजिए

  1. प्रत्येक अपरिमेय संख्या एक वास्तविक संख्या होती
  2. संख्या रेखा का प्रत्येक बिन्दु के रूप का होता है, जहाँ एक प्राकृत संख्या है।
  3. प्रत्येक वास्तविक संख्या एक अपरिमेव संख्या होती

उत्तर:

  1. सत्य है, क्योंकि वास्तविक संख्याओं के संसाह में अपरिमेय संख्याएँ सम्मिलित है।।
  2. असत्य है, क्योंकि किसी भी प्राकृत संख्या का वर्गमूल ऋपात्मक संख्या नहीं हो सकती है।
  3. असत्य है, क्योंकि सभी परिमेय एवं अपरिमेय संख्याएँ सम्मिलित रूप से वास्तविक संख्याएँ कहलाती हैं।

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प्रश्न 2.
क्या सभी धनात्मक पूर्णाकों के वर्गमूल अपरिमेय होते हैं? यदि नहीं तो एक ऐसी संख्या के वर्गमूल का उदाहरण दीजिए जो एक परिमेय संख्या है।
उत्तर:
नहीं, सभी धनात्मक पूर्णांकों का वर्गमूल अपरिमेय नहीं होता है।
ज्दाहरण- √4 = 2, जहाँ 2 एक परिमेय संख्या (=\(\frac{2}{1}\)) है।

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प्रश्न 3.
दिखाइए कि संख्या रेखा पर √5 को किस प्रकार निरूपित किया जा सकता है?
उत्तर:
∵ “हम जानते हैं.
√5 = \(\sqrt{4+1}\) = \(\sqrt{2²+1²}\)
समकोण ΔOAD इस प्रकार बनाते हैं कि
OA = 2 इकाई, AB = 1 इकाई तथा ∠OAR = 90° पाइथागोरस प्रमेय से,
OB² = OA² + AB²
= 2² + 1²
= 4 + 1 = 5
⇒ OB = √5
अब, O को केन्द्र मानकर तथा OB = √5 की त्रिज्या लेकर एक चाप बनाते हैं जो संख्या रेखा को बिन्दु पर प्रतिच्छेद करता है।
अतः बिन्दु P. √5 को प्रदर्शित करता है।
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प्रश्न 4.
कक्षा के लिए क्रियाकलाप (वर्गमूल सर्पिल की रचना) कीजिए।
उत्तर:
कागज की एक बड़ी शीट लीजिए और नीचे दी गई विधि से “वर्गमूल सर्पिल’ (square root spiral) की रचना कीजिए।
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सबसे पहले एक बिन्दु O लीजिए और एकक सम्बाई का रेखाखण्ड (line segment) OP1 खौथिए। एकक सम्बाई वाले OP1 पर लम्ब रेखाखण्ड P1P1 खोचिए (देखिए आकृति 1.2)। अब OP1 पर साम्ब रेखाखण्ड P2P3 खोचिए। तब OP3 पर लाग्य रेखाखण्ड P3P4 खाँचिए।

इस प्रक्रिया को जारी रखते हुए 0Pn-1 पर एकक लम्बाई वाला लम्ब रेखाखण्ड खाँचकर आप रेखाखण्ड Pn-1Pn प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार आप बिन्दु O, P1, P2, P3……, Pn….. प्राप्त कर लेंगे और उन्हें मिलाकर √2, √3, √4… को दर्शाने वाला एक सुन्दर सर्पिल प्राप्त कर लेंगे।

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Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 8 क्षेत्रीय संस्कृतियों का उत्कर्ष

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 2 Chapter 8 क्षेत्रीय संस्कृतियों का उत्कर्ष Text Book Questions and Answers, Notes.

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Bihar Board Class 7 Social Science क्षेत्रीय संस्कृतियों का उत्कर्ष Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:

  1. उर्दू एक ……….. भाषा है । (मिश्रित/एकल/मधुर)
  2. उर्दू की उत्पत्ति………. शताब्दी में हुयी । (ग्यारहवीं /चौदहवीं/बारहवीं)
  3. उर्दू का शाब्दिक अर्थ है ……….. । (घर/महल/शिविर/खेमा)
  4. इरानी लोग सिंधु को ……… कहने थे । (हिन्द/हिन्दू/हिन्दी)
  5. तुलसीदास ने……की रचना की । (महाभारत/मेघदूतम्/रामचरितमानस)
  6. पहाड़ी चित्रकला ……….. क्षेत्र में विकसित हुयी। (मध्य भारत/उत्तर पश्चिम हिमालय/राजस्थान)

उत्तर-

  1. मिश्रित
  2. ग्यारहवीं
  3. शिविर
  4. हिन्दू
  5. रामचरितमानस
  6. उत्तर-पश्चिम हिमालय ।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें:

प्रश्न (a)
उर्दू का विकास कैसे हुआ ?
उत्तर-
उर्दू का विकास एक अपभ्रंश भाषा के रूप में हुआ। इसमें अनेक भाषाओं के शब्द मिले हैं, जैसे : अरबी, फारसी तथा तुर्की । इसी कारण उर्दू को एक मिश्रित भाषा कहते हैं । इसकी लिपि फारसी है, लेकिन व्याकरण हिन्दी-अंग्रेजी जैसा ही है।

प्रश्न (b)
लौकिक साहित्य के बारे में पाँच पंक्तियों में बताइए ।
उत्तर-
लौकिक साहित्य में ‘ढोला-मारुहा’ नामक काव्य लिखा गया । इसमें ढोला नामक राजकुमार और मारवाणी नामक राजकुमारी की प्रणय लीला का वर्णन है । इस काव्य में महिलाओं के कोमल भावों का मार्मिक वर्णन किया गया है । इसी काल के लौकिक साहित्य के रचनाकारों में अमीर खुसरो भी हैं । अमीर खुसरु ने पहेलियों से हिन्दी के भंडार को भरा ।।

प्रश्न (c)
रहीम कौन थे ? उनके द्वारा रचित किसी एक दोहा को लिखें।
उत्तर-
रहिम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था । ये अकबर के दरबार के नवरत्नों में एक थे । इनकी अधिक पहचान कृष्ण भक्त कवि के रूप में है । इन्होंने हिन्दी में अनेक कविताओं की रचना की । इनकी एक प्रसिद्ध रचना का अंश निम्नलिखित है :

रहिमन विपदा तू भली. जो थोड़े दिन होई । हित अनहित या जगत में जान पड़े सब कोई

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प्रश्न (d)
‘हम्जानामा’ क्या है ?
उत्तर-
हम्जानामा’ मुगलकाल का बना चित्रों का एक अलबम है । मुगलों ने चित्रकला की जिस शैली की नींव डाली वह मुगल चित्रकला के नाम से प्रसिद्ध हुई । ‘हम्जानामा’ मुगल शैली की ही एक अद्भुत कृति है । यह ऐसी – पाण्डुलिपि है, जिसमें 1200 चित्र हैं । सभी चित्र स्थूल और नटकीन्ने गंगों में कपड़े पर बने हुए हैं।

प्रश्न (e)
पहाड़ी चिरकला में किन-किन विषयों पर चित्र बराये जाते थे ?
उत्तर-
पहाड़ी चित्रकला में विशेष रूप से सामाजिक विषय चुने गरे । चित्र सामाजिक विषयों पर ही बने । बच्चियों को गेंद खेलते, संगीत के साज बजाते, पक्षियों या पशुओं के साथ मनोरंजन करते हुए चित्र बनाये जाते थे । राजा-महाराजाओं का अंकेले या दरबारियों के साथ बैठे हुए चित्र बनाये जाते थे । प्राकृतिक दृश्यों के चित्र भी बने । पत्तों और फलों से लदे वृक्षों के चित्र सराहनीय हैं । पहाड़ी चित्रकला में इन्हीं विषयों पर चित्र बनाये जाते थे ।

प्रश्न (f)
गजल और कव्वाली में अंतर बताएँ।
उत्तर-
सल्तनत काल में दो प्रकार की गायन शैली का विकास हुआ-पहला था गजल और दूसरा कव्वाली । गजल को अरबी भाषा में स्त्रीलिंग माना जाता है, जबकि हिन्दी में इसे पुल्लिग मानते हैं । गजल का शाब्दिक अर्थ है अपने प्रेम पात्र से वार्ता । एक गजल में कम-से-कम पाँच और अधिक-से-अधि क ग्यारह शेर होते थे। इसके संग्रह को दीवान कहा जाता है । गजलें कि शृंगार रस में लिखी होती थी, जिस कारण इसका गायन संगीत प्रेमियों को अच्छा लगता था । सूफियों को भी गजल प्रिय रहा ।

कव्वाली का चलन विशेषतः सूफी गायकों में था । ‘कौल’ का अर्थ है कथन । इसको गाने वाला कव्वाल कहलाता था । यही शैली कौव्वाली कहलायी । कोदाली गाते हुए गायक भक्तिमय हो जाता था । उसके समक्ष लगता था कि अल्ला सामने आ गया हो । गाते-गाते वे झूमने और नाचने लगते

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चर्चा करें

प्रश्न 1.
क्षेत्रीय भाषा एवं साहित्य के विकास का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
सोलहवीं शतादी से क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन कार्य होने लगा था । सत्रहवीं शताब्दी के आते-आते इसमें काफी परिपक्वता आ गई । संगीतमय काव्य भी रचे गये । बंगला, उड़िया, हिन्दी, गजस्थानी तथा गुजराती भाषाओं के काव्य में राधाकृष्ण एवं गोपियों की लीला तथा भागवत की कहानियों का भरपूर उपयोग हुआ । इसी काल में मल्लिक महम्मद जायसी ने हिन्दी में ‘पद्मावत’ लिखा । इसका बंगला में भी अनुवाद हुआ । अब्दुर्रहीम खानखाना ने कृष्ण को सामने रख अनेक काव्यमय रचनाएँ की ।

तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना अवधी में की जिसमें भोजपुरी शब्दों का खुब उपयोग हुआ है । सूरदास ने ब्रज भाषा में कृष्ण के बाल रूप का वर्णन किया । यह इनका महत्त्वपूर्ण योगदान था ।

दक्षिण भारत में मलयालम भाषा की साहित्यिक परम्परा का प्रारंभ मध्यकाल में ही हुआ। महाराष्ट्र में एकनाथ और तुकाराम ने मराठी भाषा में काफी कुछ लिखा ।

बिहार अनेक भाषाओं का क्षेत्र है । यहाँ की कुछ भाषाएँ पूरे देश में । बोली-समझी जाती हैं। बिहार के चन्द्रेश्वर मध्यकाल के नामी टीकाकार थे। इन्होंने सूफी संतों से प्रभावित होकर धर्म की व्याख्या की ।

खासकर बिहार हिन्दी भाषी क्षेत्र है । यहाँ हिन्दी की उत्पत्ति संस्कृत के अपभ्रंश के रूप में हुई । अन्य भाषाओं में, जिन्हें शुद्ध क्षेत्रीय कहा जा सकता है, वे हैं भोजपुरी, मगही, मैथिली और उर्दू आदि । मैथिली भाषा को कवि कोकिल विद्यापति ने बहुत ऊँचाई पर पहुंचा दिया । मंडन मिश्र तथा भारती मिथिला की ही देन थे। भोजपुरी का क्षेत्र बहुत विस्तृत हैं।

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प्रश्न 2.
आपके घर में जो भाषा बोली जाती है ? उसका प्रयोग लिखने में कब से शुरू हुआ?
उत्तर-
में अपने घर में भोजपुरी भाषा बोलता हैं । लेखन में इसका आरम्भ कबीर के समय से हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के समय अनेक महाकाव्य भोजपुरी में रचे गए । बटोहिया, फिरंगिया और कुंवर सिंह महाकाव्य अधिक प्रशसित रहे हैं । महेन्द्र मिश्र तथा भिखारी ठाकुर भोजपुरी के महान गीतकार रह चुके हैं । आज तो भोजपुरी भाषा का काफी विकास हो चुका है।

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पाठ का सार संक्षेप

गुप्त साम्राज्य के विघटन के फलस्वरूप छठी शताब्दी में क्षेत्रीय शासकों को पनपने का मौका मिला। इनमें प्रमख थे पाल, गर्जर प्रतिहार, राष्ट्रकूट, पल्लव, चोल आदि । क्षेत्रीयता के साथ ही इस काल को साहित्य, चित्रकला, संगीत में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया । फलतः उत्तर भारत में जहाँ बंगला, असमिया, मैथिली, भोजपुरी, उड़िया तथा अवधि के साथ-साथ ब्रज भाषा का भी विकास हुआ । दक्षिण भारत में तमिल और मलयालम भाषाएँ विकसित हुई । आगे आने वाली शताब्दियों में हिन्दी और उर्दू भाषाओं के विकास के साथ-साथ इन भाषाओं के साहित्य का भी भंडार भरा । इस काल में भाषा के साथ चित्रकला और संगीत कलाएँ भी विकसित हुईं।

क्षेत्रीय भाषाओं की उत्पत्ति लगभग आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच हुई। कई राज्यों में संस्कृत के साथ-साथ तमिल, कन्नड़ एवं मराठी का प्रयोग प्रशासन में किया जाता था । विजयनगर राज्य में तेलुगु विकसित हुआ तो बहमनी राज्य में मराठी का विकास हुआ। इन भाषाओं के विकास में मुस्लिम शासकों ने भी सहयोग दिया । बंगाल के शासक नुशरतशाहा ने ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ का बंगला में अनुवाद कराया ।

दिल्ली के शासकों ने भी हिन्दी, उर्दू, बंगला जैसी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को पहचान दिलाने का काम किया । आम लोग अपने-अपने क्षेत्र की क्षेत्रीय भाषाओं का व्यवहार करते रहे, जिन्हें अपभ्रंश कहते हैं । इसी अपभ्रंश से हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, बंगला आदि भाषाओं की उत्पत्ति हुई थी । उर्दू एक मिश्रित भाषा है, जिसमें अरबी, फारसी, तुर्की के शब्द शामिल हैं । उर्दू की लिपि फारसी है, लेकिन व्याकरण हिन्दी जैसा ही है।

उर्दू भाषा का विकास ग्यारहवीं शताब्दी से शरू हुआ । विभिन्न भाषा / बोलने वाले सैनिक आपसी बातचीत में जिस भाषा का प्रयोग करते थे वही भाषा उर्दू कहलाई । ‘उर्दू’ का शाब्दिक अर्थ है ‘शिविर’ या ‘खेमा’ । सूफी संतों ने धर्म प्रचार के क्रम में वहीं के लोगों जैसा बोलना चाहते थे, लेकिन अपनी अंतरंग भावना को व्यक्त करते हुए उन्हें अपनी मातृभाषा का व्यवहार करना पड़ता था । फलतः स्थानीय भाषाओं में फारसी, अरबी, तुर्की के शब्द प्रवेश करते गये। आज ही हिन्दी बिना इन शब्दों के व्यवहार के लिखी ही नहीं जा सकती । हिन्दी वाले भी इसके इतने निकट हो गए हैं कि उर्दू के शब्द भी उन्हें हिन्दी ही लगते हैं। केवल बंगला भाषा है. जिसमें विशद्ध संस्कृत

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शब्द का व्यवहार होता है, जिसे बंगलादेश के मुसलमान भी व्यवहार में लाते हैं। तात्पर्य कि सूफी संतों के कारण भी उर्दू एक भाषा के रूप में जानी जाने

लगी । चौदहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने इस भाषा को उर्दू न कहकर रेख्ता’ या ‘हिन्दवी’ नाम दिया । इसी भाषा में उन्होंने अपनी काव्य रचनाएँ । की थीं । उनके काव्य का एक नमूना है :

गोरी सोये सेजपर, मुख पर डाले केश । जल खुसरो घर आपनो, रैन भई चाहूँ देश ।

दक्षिण भारत में जिस उर्दू का विकास हआ वह ‘दक्कनी’ कहलाई । अठारहवीं शताब्दी के अंत तक उर्दू को ‘दक्कनी’, हिन्दवी, हिन्दुस्थानी कहा जाता रहा । मुगल काल में उर्दू मुगलों की मातभाषा बन गई।

‘हिन्दी’, ‘हिन्द’, ‘हिन्दवी’ और हिन्दुस्तान आदि शब्दों की उत्पत्ति का कारण उत्तर-पश्चिम में बनने वाली नदी ‘सिंध’ थी । समकालीन लौकिक हिन्दी साहित्य के अमर कति अमीर खुसरो हैं। इनकी पहेलियाँ बहुत प्रसिद्ध हुई । गद्य साहित्य में इतिहास की प्रमुखता रही । जियाउद्दीन बरनी, अधीक, इसानी आदि इस युग के प्रसिद्ध इतिहासकार थे । जिया नक्शवी ने ‘तुतीनामा’ लिखा, जिसमें एक तोता एक विरहिणी नायिका को कथा सुनाता है । यह कहानी मूलतः संस्कृत में थी, जिमका नक्शवी ने फारसी में अनुवाद किया।

अकबर के काल में साहित्यिक विकास शिखर पर था । अब्दुल रहीम खान खाना, जिन्हें ‘रहीम’ के नाम से जानते हैं, अकबरी दरबार के नवरत्नों में थे । ये कृष्ण भक्त थे और उन्हीं के गुणगान में रचना की । तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई आदि इसी काल के कवि थे । तुलसी दास ने अवधि में रामचरित मानस लिखा तो सूरदास ने ब्रजभाषा में सूरसागर लिखा । मीराबाई भी कृष्ण भक्त थीं जिन्होंने राजस्थानी में कृष्ण के गीत गाये ।

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मुगलों ने मानां भारत में चित्रकला की नींव ही रख दी । मुगल दरबार में चित्रकारों का बहुत मान था । इस काल का एक चित्र संग्रह है ‘हज्जानाम’, जिसमें 1200 चित्र हैं । जसवंत तथा दसावन गुगल दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार थे । औरंगजेब के काल में चित्रकला का पतन हो गया। चित्रकार अब छोटे-छोटे क्षेत्रीय राजाओं के शरण में चले गये । वे दिल्ली से चलकर जौनपुर, लखनऊ, पटना और मुर्शिदाबाद तक फैल गये । वहाँ के नवाबों. सुबेदारों से उन्हें संरक्षण मिला। पटना में जो चित्रकला विकसित हुई उसे ‘पटना कलम’ कहा गया । सल्तनत काल से ही संगीत का विकास शुरू हो चुका था जो आज तक जारी है ।

अकबर के दरबार में एक-से-एक शास्त्रीय गायक थे। तानसेन अकबर के नवरत्नों में थे । दरगाहों में कव्वाली का विकास हुआ वहाँ अमीर-उमरा लोगों में गजल को प्रोत्साहित किरण । बिहार भी संगीत से अछूता नहीं था । यहाँ पटना, गया, आरा, छपरा आदि शहर संगीत के प्रमुख क्षेत्र थे। लखनऊ और बनारस के गायक पटना में आकर बस गये । गजल, दादरा, जरी, चैता, ख्याल, टुमरी आदि का विशेष विकास हुआ।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography भूगोल एक विषय के रूप में Text Book Questions and Answers

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने भूगोल शब्द का प्रयोग किया?
(क) हेरोडोटस
(ख) गैलिलियो
(ग) इरेटास्थिनीज
(घ) अरस्तू
उत्तर:
(ग) इरेटास्थिनीज

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?
(क) बंदरगाह
(ख) मैदान
(ग) सड़क
(घ) जल उद्यान
उत्तर:
(ग) सड़क

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है?
(क) क्यों
(ख) क्या
(ग) कहाँ
(घ) कब
उत्तर:
(क) क्यों

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प्रश्न 4.
अनलिखित में से कौन-सा विषयकालिक संश्लेषण करता है?
(क) समाजशास्त्र
(ख) मानवशास्त्र
(ग) इतिहास
(घ) भूगोल
उत्तर:
(ग) इतिहास

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस विद्वान द्वारा क्रमबद्ध भूगोल प्रवर्तित किया गया?
(क) इरेटॉस्थनीज
(ख) इम्बोल्ट
(ग) स्ट्रेबो
(घ) टॉलेमी
उत्तर:
(ख) इम्बोल्ट

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर:
हम विद्यालय जाते समय मानव द्वारा सृजित ग्रामों, नगरों, सड़कों, रेलों, बदंरगाहों, बाजारों एवं मानव-जनित अन्य कई महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं। वे सभी लक्षण असमान हैं। उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि भूगोल एवं सांस्कृतिक लक्षणों के मष्य संवों को समझने का संकेत निहित होता है।

प्रश्न 2.
आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना?
उत्तर:
पृथ्वी का आकार भू-आम (Geoid) है, क्योंकि पूनों पर यह चपटी है। इसलिए व्यवहार में इसे संतरे की तरह गोल माना जाता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

प्रश्न 3.
क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधा रोषा क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं?
उत्तर:
जी हाँ, हम अपने विद्यालय में वन महोत्सव का आयोजन करते है। हम इतने पौधा रोपण इसलिए करते हैं कि वृक्ष पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते है। प्रकृति के विभिन्न संघटक जीवन तथा विकास के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते है। स्थलाकृतियाँ, वनस्पति तथा जीव-जन्तु एक-दूसरे से मिलकर एक वातावरण का निर्माण करते हैं. जिसे पारास्थितिक तंत्र कहते हैं।वध रस पारिस्थतिक तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण घटक हैं। जैसे वृक्ष वाष्पोत्सर्वन की प्रक्रिया द्वारा विशाल माश में जल मुक्त करते है. इससे वर्षा वाले बादल बनते हैं। वर्षा के ऊपर ही पूरा जैवमण्डल निर्भर करता है। नक्ष उपजाऊ भूमि के अपरदन को रोकने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।

प्रश्न 4.
आपने हाथी, हिरण केंचुए, वृक्ष एवं घास को देखा है। ये कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मण्डल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मण्डल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?
उत्तर:
हाथी, हिरण, केंचुआ, वृक एवं घास को हमने वनों में देखा है जहाँ वे रहते हैं, एवं बढ़ते हैं। उस जगह को जैवमण्डल का नाम दिया गया है। जीवन को आश्रय देने वाला पृथ्वी का यह घेरा हाँ जायमण्डल. स्थलमण्डल तथा जलमहल एक-दूसरे से मिलकर जीवन संभव बनाते हैं उसे जीवमण्डल कहते हैं। सजीय, जीयमण्डल के जैविक और अजैविक घटकों के बीच का सामजस्य जीवमण्डल को गतिशील और स्थिर बनाता है। जैव घटक की पोषण पद्धति के आधार पर, इसे उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में वर्गीकृत किया गया है. उनकी भोजन बनाने की तथा उपभोग संबंधित परस्परिक क्रियायें जीवमण्डल का एक अन्य मनोरंजक लक्षण है।

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प्रश्न 5.
आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुंचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी का क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान था, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते?
उत्तर:
हमारे निवास स्थान से विद्यालय जाने में हमें पैदल एक घण्टा लगता है। यदि विद्यालय मेरे घर की सडक के उस पार होता तो गरे । पाटा 30 मिनट लगता। यदि मैं साइकिल दाग विद्यालय आऊं तो मई 20 मिनट लगते हैं। यदि मैं बस द्वारा विद्यालय जाता हूँ तो 15 मिनट लगते हैं। यदि बम विभिन्न स्थानों पर समकर जाने की बजाय सीधे जाय तो में विद्यालय 7 मिनट में पहुँच जाता हूँ। एक स्थान में दूसरे स्थान तक हम बिना रुकं गए तो हम कम समय में पहुँचते हैं। यदि हम तेज गति वाहन का प्रयोग करें तो कम से कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आप अपने परिस्थान (Surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तब्धयों में मिलता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पार एवं पक्षी जिसे आप देशो* भिन-भिन होते है। ये सभी भिन तत्व धरातल पर पाये जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक क्षेत्रीय भिनता का अध्ययन है?
उत्तर:
भूगोल अध्ययन का एक आंतरिक्षण (Interdisciplinary) विषय है। प्रत्येक विषय का अध्यायन कुछ उपागमों के अनुसार किया जाता है। इस दृष्टि से भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम है –

  1. विषय-वस्तुगत क्रमबद्ध, एवं
  2. प्रादेशिक।

विषय – वस्तुगत उपागम में एक तथ्य को पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है। तत्पश्चात क्षेत्रीय स्वरूप के वर्गीकृत प्रकारों की पहचान की जाती है। पहले विद्वान भौतिक भूगोल पर बल देते थे। लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया गया कि मानव धपतल का समाकलित भाग है, वह प्रकृति का अनिवार्य अंग है। उसने सांस्कृतिक विकास के माध्यम से भी योगदान दिया है। विषय-वस्तगत या क्रमबद्ध उपागम के आधार र भूगोल को विभिन शाखाओं में बाँय है-भौतिक भूगोल भू-आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान, जल-विज्ञान तथा मृदा धगेल के विषय में जानकारी देता है।

मानव भगोलके अंतर्गत समाज जया इसकी स्थानिक/प्रादेशिक गत्यात्मकता (Dynamism) एवं समाज के वोगदान से निर्मित सांस्कृतिक तत्वों का अध्यपन आता है। जीव-भगोल के अंतर्गत वनस्पति पारितिक विज्ञान, पर्यावरण का अध्ययन अवा है। प्रादेशिक उपागम के अंतर्गत प्रादेशिक या क्षेत्रीय जानकारियों का अध्यक्त किया जाता है। उपडत ती के आधार पर हम कह सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक वा क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन कराता है।

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प्रश्न 2.
आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।
उत्तर:
भूगल एक संश्लेषणात्मक (Synthesis) विषय है जो क्षेत्रीय संश्लेषण का प्रयास करता है तथा इतिहास कालिक संश्लेषण का प्रवास करता है। इसके उपगम की प्रकृति समवात्मक (Holistic) होती है। भूगोलका एक सरलेषणात्मक विषय के रूप में अनेक प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञानों से अंतरापृष्ठ (Interface) संबंध है। दर्शन किसी विषय को जड़ प्रदान कर उसके क्रमशः विकास की प्रक्रिया में स्पष्ट ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करता है। सामाजिक जिन के सभी विषय यथा समाजशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान, नागरिक भूगोल, अर्थशास्त्र जनकिकी, सामाजिक वाचता का अध्ययन करते हैं।

भूगोल की सभी शाखायें-सामाजिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल (नागरिक शास्त्र), आर्षिक भूगोल, जनसंख्या भूगोत, अधिवास भूगोल आदि विषयों से पनिष्ठता से बड़े हैं क्योंकि इनमें से प्रत्येक में स्थानिक (Spatial) विशेषतायें मिलती हैं। राजनीतिक शास्त्र का मूल उद्देश्य राज्यक्षेत्र, जनसंख्या, प्रभुसत्ता का विश्लेषण है, जबकि राजनीतिक भूगोल एक क्षेत्रीय इकाई के रूप में राज्य तब इसको जनसंख्या के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करता है।

अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था की मूल विशेषताओं जैसे उत्पादन, वितरण, बिनिमय एवं उपभोग का विवेचन करता है। इसी प्रकार जनसंख्या विधान भूगोल जनकिकी से निकरण से जुदा हुआ है। उपर्युक्त विवेचन से सष्ट है कि भूगोल इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में गहरा संबंध है।

(घ) परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
वन को एक संसाधन के रूप में एनिए, एवं
(i) भारत के मानचित्र पर विभिन्न प्रकार के वनों के वितरण को दर्शाइए।
(ii) देश के लिए बनों के आर्थिक महाच’ के विषय पर एक लेख लिखिए।
(iii) भारत में वन संरक्षण का ऐतिहासिक विवरण राजाधान एवं उत्तरांचल में “चिपको आंदोलन’ पर प्रकाश डालते ए प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
(i) (a) पर्वतीय वन
(b) उष्ण कटिबन्धीय शुष्क-महरित एवं भई-सपाहरित वन
(c) उष्ण करिबंधीय पवादीय बन
(d) शुल्क पर्णपाती वन
(e) मॅग्रोव वन

(ii) वनों का भी हमारे जीवित रहने के लिए उतना ही महत्व है, जितना जल का। हमारे देशका लगभग 22.5 प्रतिशत स्थाल भाग वन के रूप में है। वन से हमें लकडी, इंधन, चाय, खाद्य पदार्थ, फल, औषधियाँ, रेशो भावि प्राण होते है। छोटे-छोटे जीवाणुओं से लेकर शेर, चीता आदि वनों में आवास करते हैं. जीव सम्पदा।सभी वन और सौर ऊर्जा को ग्रहण करते हैं, ऑक्सीजन, वातावरण में छोड़ते हैं, उत्पादित पदार्थो को उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं वर्षा करवाते हैं तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।
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वन प्रदूषण कम करते हैं। वे वातावरण में उपस्थित कर्मों को अवशोषित करते हैं, तब मार्बन डाइऑभमाह का अवशोषण करते हैं। वर्षों से प्रदेश की सुन्दरता बढ़ती है। हमारी पला,
साहित्य तथा संगीत भीमा विशेष महत्व सिटिक प्रवेशालाई भाव इनका प्रयोग अनुसंधान लिए किया विरें में विद्यमान चे मागी मनुष्य के लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकते है. इस पर काफी अनुसंधान हो सास आवास की सुविधा श्री प्रदान करते।

(iii) विषको आन्दोलन र संरक्षण के लिए गढ़वाल क्षेत्र में सुन्दरलाल नाग द्वारा बताया गया था। इसके अंतर्गत नियों वृक्षों से चिपक गयी थी जिससे कोई भीलों को अपने स्वार्थवश न काट पायें। चिपको आन्दोलन की प्रेरणा सुन्दरलाल बहाणा को आज से लगभग 300 साल पूर्व राजस्थान में चलने गए वन संरक्षण आन्दोलन से मिली थी। इस आन्दोलन में भी औरतों पक्षों से चिपककर उनकी रक्षा की थी। खंजरी’ के नाम से प्रसिद्ध आन्दोलन में अमतादेवी विश्नोई नेताब में सियों ने पंडों की रक्षा के लिए नया से विकरकर पक्षों की रक्षा की थी।

Bihar Board Class 11 Geography निर्माण उद्योग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन विषय अध्ययन ने भूगोल को पतिय चरित्र दिया।
उत्तर:
सौरमण्डल पच्चीका आकार, शव्या देशान्तर।

प्रश्न 2.
अवारहवी शताब्दी में विद्यालयों में भूगोलको लोकप्रियता क्यों मिली?
उत्तर:
भूगोल का विद्यालय में एक लोकप्रिय विषय बनने का मुख्य कारण यह है कि इसके अध्ययन से पच्ची के निवासियों तथा मानों के विषय में जानकारी प्राण होती है। इससे प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक कार होता है। इस अध्ययन से मनुष्य तथा पर्यावरण सम्बन्धों का अनुमान होता है।

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प्रश्न 3.
उस भूगोलवेत्ता का नाम बताइए जिन्होंने ‘भौतिक तथा मानव भूगाल के संश्लेषण का समर्थन किया था।
उत्तर:
एच. मेकिंडर (H. J. Mac-kinder)।

प्रश्न 4.
भूगोल में कौन-सा आधुनिकतम विकास हुआ है।
उत्तर:
पूर्वसमिकीच विश्लेषण का उपयोग निरन्तर नहा है।

प्रश्न 5.
प्रकृतिक भदाय के मुख्य लक्ष्य बताएं।
उत्ता:
सरिया बनामी आदि।

प्रश्न 6.
बातावरण को कौन-से दो मुख्य भागों में बांटा जाता है।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक
  2. मानवीय

प्रश्न 7.
भौतिक भूगोल के चार मुख्य उपक्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. भू-आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान
  2. जल विज्ञान

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प्रश्न 8.
18 वीं शताबी में जर्मनी के दो प्रसिद्ध भूगोल-बेताओं के नाम लिखें।
उत्तर:
हम्बोला तथा रिटर।

प्रश्न 9.
भूगोल के हो स्पष्ट क्षेत्र कौन-से है।
उत्तर:
भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल।

प्रश्न 10.
भौतिक भूगोल के दो उपक्षेत्र बताएं।
उत्तर:

  1. भू-आकृतिक विज्ञान
  2. जलवायु विज्ञान

प्रश्न 11.
मानवीय भूगोल के दो उप-क्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. आर्थिक भूगोल
  2. सांस्कृतिक भूगोला

प्रश्न 12.
बाबुमण्डल दशाओं का अध्ययन करने वाले दो विज्ञान बताएँ।
उत्तर:

  1. जलवा
  2. मौसम विज्ञान

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प्रश्न 13.
‘मनुष्य के कार्य प्रकृति द्वारा निर्धारित होते हैं। वह किस भूगोलवेत्ता का कथन है?
उत्तर:
रैसेल (Ratael) का।

प्रश्न 14.
भूगोल किन तीन प्रमुख विषयों का अध्ययन है?
उत्तर:

  1. भौतिक वातावरण
  2. मारलीय क्रियाएं
  3. दोनों का अंतक्रियात्मक सम्बन्य।

प्रश्न 15.
Geography किन दो शब्दों के सुमेल वे बना है?
उत्तर:
यह शब्द ग्रीक भाषा के दो गल (Geo) पुच्ची तय ‘Graphor’ वर्णन से प्राप्त हुआ है।

प्रश्न 16.
मानव भूगोल के चार मुख्य उपक्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. सांस्कृतिक भूगोल
  2. भार्षिक भूगोल
  3. जनसंख्या भूगोल
  4. ऐतिहासिक भूगोला।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘पृथ्वी की सतह एक सप नहीं है।’ दो उदाहरण दो।
उत्तर:

  1. पृथ्वी के श्रीनिक स्वरूप में भिन्नता होती है। वहाँ पर्वत, पहाड़ियाँ, पारियाँ, मैदान पठार, बन, रेगिस्तान मिलते हैं।
  2. यहाँ सामाजिक तथा संस्कृतिक तत्वों में भी भिन्नता है। यहाँ ग्रामों नगरों सड़को. रेलों. बाजारों के रूप में ना पाई जाती है। पृथ्वी पर मैतिक वातावरण, सम्पविक संगठन तथा सांस्कृतिक विकास में विभिन्नता पाई जाती है।

प्रश्न 2.
‘भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है।’ स्पष्ट को।
उत्तर:
भूगोल पच्ची पर भौतिक तय समाजिक क्षेत्र में मिलताओं का अध्ययन कराता है। भूगोल उन कारकों का भी अध्ययन कराता है जो इस विभिन्नता को उत्पन करते हैं। उदाहरणार्थ: फसल का स्वरूप एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन होता है। यह चिना मिट्टी, जलवायु, तकनीकी निवेश की चिन्नता के कारण प्रकार भूगोल दो तत्वों के मध्य कार्य-कारण (Cause and effect) के सम्बना को ज्ञात करने में सहायक है।

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प्रश्न 3.
भगोल विषय में पच्ची के किन चार परिमण्डलों का अध्ययन होता है?
उत्तर:

  1. स्थल मण्डल
  2. जस पाठल
  3. वायुमण्डल
  4. जैव मण्डल

प्रश्न 4.
हमें भूगोल क्यों पढ़ना चाहिए?
उत्तर:
पृथ्वी मनुष्य का घर है। वहाँ हमारा जीवन अनेक रूपों से प्रभावित होता है। हम आसपास के संसाधनों पर निर्भर करते हैं। हम तकनीकों द्वारा प्राकृतिक संसाधन भूमि, मा, जल का उपयोग करने गए अपच आगार प्राप्त करते हैं। हम मौसमी शाके अनुसार अपना जीवन समायोजित करते है। इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 5.
भूगोल पच्ची पर विविधताओं को सम्माने के लिए क्षमता प्रदान करता है। दो उदाहरण दो।
उत्तर:
पृथ्वी पर भौतिक वातावरण, सामाजिक संगठन तथा सांस्कृतिक विकास में विविधता मिलती हैं।

  1. आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक तथा भौगोलिक सूचना नत्र (G.LS) ग्लोब पर स्थिति शात करने में सहायक हैं।
  2. संगणक मानचित्र कला (Computer Cartography) मानचित्र बनाने में कुशलता प्रदान करती है।

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प्रश्न 6.
भौतिक भूगोल किस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों के मयांकन सहायक?
उत्तर:
भौतिक पूल प्रकृतिक संसाधनों के मूल्यांकन एवं प्रबंधन सीधा विषय के रूप में विकसित होतास उद्देश्य की पूर्ति हो भौतिक पर्यावरण वंगालमयसम्मयों को समझना आवश्यक।तिक पर्यावरण संसाधन प्रदान करतीवं सं साधनों का उपयोग करते हुए अपन आर्मिक एवं सांस्कृतिक विकास सुनिश्चिातानीकी की सहायता से संसाधनों के बदले उपयोग में विश्व में पारिस्थतिक असन्तुलन अपन कर दिया है। अतएव सतत विकास (Sustainable development) के लिए मैतिक चालवाण का जन नितान्त आवश्यक जोतिक भूगल के महत्व को रेखांकित करता है।

प्रश्न 7.
विश्व एक परस्पर निर्भर है। व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व एक प्रदेश दूसरे प्रदेश से उड़े है तथा एक-दूसरे पर निर है। वर्तमान विश्व को एक वैश्विक मास (Global Village) को संज्ञा दी जा सकती है। परिवार के बीच साधनातीर काकी -दृश्य माध्यमों (Audio – visual) सुचना तकनीको कह को बहर समृद्ध का दिया है। प्रकृतिक विज्ञान तथ साजिक विज्ञान एक-खरे र रिचर।

प्रश्न 8.
भूगोल की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पूर्गाल की परिभाषा (Definition of Geography) – पूस पीक विक्षन है (Geography is the science of the Earh)। भूगोल को औजी पवायोग्राफी’ कहा गता है। ज्योपासी राम पूनी भाषा के जी (Ge) तथा ‘चाको’ (Gerpho) शब्दों से मिलकर बना है। (Geography = Ge + Grapho) ‘जी’ (Ge) का अर्थ है ‘पनी का मान करना। जिस प्रकार असनका मूल माल्य है, -गर्भ विज्ञान चट्टान का अमर वनस्पति विज्ञान पेड़-पौधों से इतिहास समय से सम्बन्धित भूगोल ‘स्थान’ से सम्बन्धित है। ‘पृथ्वी-जाल व भूतल का अध्ययन है। भूगोल पृथ्वी को मानव निवास स्थान पाकर उसका अध्ययन करता है (Geography studies the Earth as home of man)।

प्रश्न 9.
भूगोल को ज्ञान का भण्डार क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
प्राचीनकाल में गीत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य पलीकेचारे में सामान्य ज्ञान प्राप्त करना ही बाब शाम यात्रियों, व्यापारियों, वेषकों तथा विजेताओं को कचाओं न. आधारित पाकिएबीमाकार तथा रेशन्ता, और मालरिकी जनकली का सपकेश पुरोल निगम अनर्गत किया। पृथ्वी के बारे में जानकारी अधिकतर विषयों से प्रजटलरोतको ज्ञानका भण्डारात।

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प्रश्न 10.
‘भौतिक पर्यावरण एक मंच प्रदान करती सिपापाव कार्य को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मफेल पच्ची पर भौतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक लक्षणों के मध्य सम्मका अध्यक्त। अनेकामों में समानता तथा कई में असमाता पाई जाती। भगोल भौतिक वातावरण तथा मानवअन्योन्यक्रिया का अध्ययन है। एक लेखनके अनुहार चौतिक पर्यावरण एक मंच प्रस्तुत करता पर मानव समाज अपने विकाससमाचाकरता. आकनियाँ आश्चर प्रदान करती। जिस पर मानवीय क्रियाएँ होती हैं। गानों परषि , पता, पर खनन, पशुपालन, पर्वतों सेभनि निकलती हैं। जलवाप मारवघरों के प्रकार, सस, भोजन, वनस्पति को प्रभावित करता है।

प्रश्न 11.
भूगोलापानी पुच्ची का अध्ययन किस प्रकार करता है?
उत्तर:
भूगल पवार्यता अध्ययन करता है। पृथ्वी भी पचायतको मातिापायी है। इसलिए इस अध्ययन अनेक प्रकृतिक विज्ञान जैसे-भौमिको मया विद्यार, समुद्र पिताल, वनस्पति शास्त्र, जीवन ग्ज्ञिान, मैसम न्जिान महापक हैं। अन्य सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास. समाज शास्त्र, राजनीतिक विज्ञान -विज्ञान की पराल की बचाता का अध्ययन करते हैं। भूगोल सभी प्राकृतिक तथा सामाजिक विपनों से सुचनाधार प्राप्त करके संश्लेषण करता है।

प्रश्न 12.
भूगोल हमें एक अच्छा नागरिक बनने में कसे सहायता करता है?
उत्तर:
प्रायः यह समझा जाता है कि इतिहास, नागरिक शास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञान हमें अच्छा नागरिक बनाने में सहायता करते हैं। भूगोल भी इसी उरद की पूर्ति करता है।
इसके अध्ययन द्वारा हमें भौतिक पर्यावरण तथा मानवीय क्रियाओं के सम्बन्ध (Man environment relation) की जानकारी होती है।

  1. भूगोल हमें भू-मण्डल पर अपने मिति के बारे में जानकारी देते हए संसार के अन्य देश के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के बारे में अवगत कराता है। अतः भूगोल का अध्यापन एक अन्तर्राष्ट्रीय भावना को जन्म देता है।
  2. भूगोल मानव भूगोल का आधार है। इससे हमें संसार की विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक तक्ष आर्थिक समस्याएं हल करने में सहायता मिलती है।
  3. भूगोल मानवीय कल्याण के लिए विश्व साधनों के उचित उपयोग में सहायता करता है।
  4. भूगोस हमें विभिन्न देशों के विकास स्तर (Stage of development) में अन्तर क कारण समझने में सहायता करता है, इस प्रकार अन्य सामाजिक शास्त्रों की भांति एक अच्छा नागरिक बनने में सहायता करता है।

प्रश्न 13.
भूगोल के अध्ययन में तबादका महत्व बलाएँ।
उत्तर:
भूगोल का अध्ययन दो उपागमों के आधार पर किया जाता है –

  1. विषय वस्तुगत उपागम (Systematic Approach)
  2. प्रादेशिक उपागम (Regional Approach)

1. विषय वस्तुगत उपागम (Systematic Approach)-इस उपागम में एक वष्य का पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है। इसके पश्चात् क्षेत्रीय स्वरूप के बाँकृत प्रकारों की पहचान की जाती है। उदाहरणार्थ यदि कोई प्राकृतिक बनस्पति के अध्ययन में रुचि रखता है, तो सर्वप्रथम विश्व स्तर पर उसका अध्ययन किया जायेगा, फिर प्रकारात्मक वर्गीकरण जैसे-विषुवत् रेखीय सदाबहार बन, नाम लकड़ी वाले कोणधारी वर अथवा मानसूनी वन इत्यादि की पहचान उनका विवेचन तथा सीनकन करना होगा।

2. प्रादेशिक उपागम (Regional Approach)-प्रादेशिक उपागम में विश्व को विभिन पदानक्रमिक स्तर के प्रदेशों में विभक्त किया जाय और फिर एक विशेष प्रदेश में सभी भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है। ये प्रदेश प्राकृतिक राजनतिक चा निर्दिष्ट (मित) प्रदेश हो सकते हैं। एक प्रदेश में तथ्यों का अध्ययन समता से विविधता में एकता की खोज कर हए किया जाता है।

दैतवाद का महत्त्व-दैतवाद भरोल की एक मुख्य विशेषता है। इसका प्रारम्भ से ही विषय में प्रवर्तन हो चुका है। बैतवाद (दिया) अध्ययन में महल रिये जाने वाले पक्ष पर निर्भर करते हैं। पहले निदान भौतिक भूगोत पर बल देते थे परनवार में स्वीकार किया गया था कि मानव धरातलका समकलित भागमा प्रकृति का अनिवार्य अंग है। उसने सांस्कृतिक विकास के माध्यम से भी योगदान दिया है। इस प्रकार मनवीय क्रियाओं पर बल देने के साथ मानव भूगोल का विकास हुआ।

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प्रश्न 14.
मानव प्रकृति का वास है।” इस कथन की व्याख्या कौटि।
उत्तर:
मनुष्य तथा प्रकृति के घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रकृति के विभिन्न लक्षण ये भूमि की बनावट, जलवायु, मिट्टी, पदार्थ, जल तथा वनस्पति मनुष्य के रहन-सहन तथा आदिक सामाजि क्रियाओं पर प्रभाव डालते हैं। प्रकृति मनुष्य के कार्य एवं जीवन को निश्चित पा निर्धारित करती है। इस विचारधारा को नियतिवार (determinism) कहा जाता है। जैसे रैसेल के अगसार “मानव अपने बातावरण की उपज है। (Man is the product of environment)। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मानव प्रकृति का दास है।

मानव जीवन प्राकृतिक साधनों पर आधारित है। मानव वातावरण को एक सीमा तक ही बदल सकता है। उसे वातावरण के साथ समायोजन करना आवश्यक है। इस प्रकार मनुष्य तथा प्रकृति एक – दूसरे के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रतिक्रिया द्वारा ही सम्पूर्ण जीवन प्रभावित होता है। इस प्रकार मनुष्य तथा प्रकृति के साबन्धों को देखकर प्रकृति में मनष्य (Man in Nature) कहना ही उचित है। जैसे कि विख्यात भूगोलवेता विडाल-डि-बनाश (Vidal – de -Blach) ने कहा है ‘प्रकृति मानव को मंच प्रदान करती है और यह मनुष्य पर निर्भर है कि बह इस पर कार्य करे।’ (Nature provides the stage and it is for man to act on it.)

प्रश्न 15.
क्रमबद्ध भूगोल से क्या अभिप्रायजसकी उप-शाखाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
भूगोल में भू-पृष्ठ का अध्ययन दो विधियों द्वारा किया जाता है –

(क) क्रमबद्ध भूगोल
(ख) क्षेत्रीय भूगोल।

क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) – विशिष्ट प्रकृतिक अथवा समरिक घटनाओं से पृष्ठ पर उत्पन्न होने वाले क्षेत्रीय प्रतिरूपों तथा संरचनाओं का अध्ययन क्रमबद्ध भूगोल कहलाता है। इस संदर्भ में किसी एक भौगोलिक कारक को चन कर (जैसे जलवाय) अध्ययन किया जाता है। भगोल के उस कारक के क्षेत्रीय वितरण के कारण तथा प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। मुख्य उद्देश्य जलवायु तथा जलवायके प्रकार होते है। कृषि का अध्ययन कृषि प्रदेशों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार यह किसी एक परक का विस्तृत अध्ययन होता है। साधारणतः क्रमबद्ध भूगोल को चार प्रमण शाखाओं में बांटा गया है

  • भू-आकृतिक भूगोल-परम्परा अनुसार इसे भौतिक भगोल कहते है।
  • मानव-भूगोल-इसे संस्कृतिक भूगोल भी कहते है।
  • जैव-भगोल-इसमें पर्यावरण भगोल शामिल है।
  • भौगोलिक विधियाँ और तकनीकें-यह विधियों मानचित्र बनाने में प्रयोग की जाती हैं।

प्रश्न 16.
“भूगोल प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान दोनों ही व्याख्या करें।
उत्तर:
भूगोल एक समकलन का विज्ञान है। भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल के विभिन्न पक्षों का अध्यवन करके किसी क्षेत्र का एक भौगोलिक चित्र प्रस्ता किया जात है। भौतिक बातावरण का अध्यपन करने के लिए प्राकृतिक विज्ञान जैसे भौतिकी, रसायन विज्ञान आदि बहुत उपयोगी हैं। सामाजिक विज्ञान में मानवीय क्रियाओं भौतिक तत्वों का कृषि, मानव बस्तियों आदि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार पुगोल प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञानों को परस्पर जोड़ता है तो दोनों वर्ग के विज्ञान में गिना जाता है।

प्रान 17.
‘भूगोल को समाकलन एवं संश्लेषण का विज्ञान कड़ा जाता है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भूगोल का विज्ञान की कई शाखाओं से निकट का सम्बन्ध है। विभिन्न शाखाओं के कई तलों का अध्ययर भूगोल में उपयोगी होता है। इसमें केवल उन्ही घटकों का अध्ययन किया जाता है जो हमारे उद्देश्य के लिए प्रासंगिक हो। विभिन्न घटकों को आपस में संयुक्त रूप में अध्ययन करने को क्रिया को समाकलन कहते हैं। इन विभिन्न घटकों को संयुक्त (Composite) तथा सश्लिष्ट रूप (Synthetic form) में सम्झना अधिक उपयोग तथा महत्वपूर्ण होता है।

भूगोल को समाकलन एवं संश्लेषण का विज्ञान (Science of Integration of Synthesis) कहा जाता है। विभिन्न शाखाओं के अंश भौगोलिक अध्ययन में सहायक होते है। वह घरक अलग-अलग पहचाने जाते हैं। इन घटकों को आपस में संयुक्त करने को ही समाकलन कहा जाता है। किसी भी प्रदेश के धरातल, कपि, यातायात, जलवान अदि के अलग-अलग मानचिों में सम्बन्ध स्थापित करने से का उपयोगी परिणाम निकल पाते हैं।

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प्रश्न 18.
भौतिक भूगोल की विषय वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
यहाँ भूगल की इस शाखा के महत्व को बताना युकिा संगा होगा। भौतिक भूगोल में भूखण्ड (भू-आकृतियाँ, प्रवाह, उच्चावच), वायुमण्डल (इसकी बनावट, संरचना तत्व एवं मौसम तथा जलवायु तापक्रम, वायुपाय, वायु वर्षा, जलवायु के प्रकार इत्यादि) जलमण्डल में संबद्ध तत्व जैव मण्डल (जीव स्वरुप-मास तथा नद) जीव एवं उनके पोषक प्रक्रम जैस-पाय शृंखला पारिस्पैतिक प्राचल (Ecological parameters) एवं परिस्थिति सन्तुलन) का सम्मिलित प्राचत (Ecological parameters) एवं पारिस्थितिक सन्तुलन का अध्ययन सम्मिलित होता है। मिट्टियाँ मृदा-निर्माण प्रक्रिया के माध्यम को निर्मित होती है क्या वे मूल चट्टान, जलवायु जैविक प्रक्रिया एवं कालावधि पर निर्भर करती है। कालावधि मिदियों को परिपक्वता प्रदान करती तथा मृदा धाविका (Profile) के विकास में सहायक होती हैं। माना के लिए प्रत्येक तत्व महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 19.
“भूगोल भू-पृष्ठ पर बदलते हए लक्षणों का अध्ययन है।” व्याख्या करें।
उत्तर:
भू-पृष्ठ निरंतर बदल रहा है, कभी धीरे-धीरे तथा अदृश्य रुप में तो कभी बड़ी शीघ्रता से और दृश्य रूप में मान्यता प्राकतिक लक्षण जैसे-पा, नदियाँ गीरों आदि धीरे-धीरे परिवर्तित होते हैं. जबकि सांस्कृतिक लक्षण जैसे भवन, सहर्क, फसलें आदि शीघ्रता से बदलते हैं। भूगोल इन बदलते हुए लक्षणों की उत्पति तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है वो इन लक्षणों को वर्तमान स्वरूप में लाने और बारित करने के लिए उत्तरदायी है। इन लक्षणं की अवस्थिति तथा व्यवस्थाओं का मानवों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है, उसका भी अध्ययन करता है।

प्रश्न 20.
क्षेत्रीय भूगोल से क्या अभिप्राय उसकी शाखाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
बोजीय भूगोल किसी क्षेत्रका समूचा अध्ययर होता है। इसे किसी क्षेत्र, राज्य या नदी घाटी के अध्ययन से आरम्भ किया जा सकता है। फिर इसे विभिन्न विधियों द्वारा अध्यायन किया जाता है। प्रत्येक प्रदेश या क्षेत्र का एक समूचे अध्ययन (Total Setting) के रूप में अध्ययन किया जाता है। प्रदेशों का आधार केवल एक अकेला कारक जैसे उच्चावच वर्षा, बनस्पति साक्षरता हो सकता है। इसी प्रकार बहकारक प्रदेश भी हो सकते हैं। प्रशासनिक क्षेत्र को भी एक प्रदेश लिया जा सकता है। योजना प्रदेश भी बनाए जाते हैं। क्षेत्रीय भूगेल की निम्नलिखित प्रमुख उप-शवाई हैं-

  1. प्रादेशिक अध्ययन
  2. प्रादेशिक विश्लेषण
  3. प्रादेशिक विकास
  4. योजना प्रदेश

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प्रश्न 21.
मानव ने प्रकृति के साथ अनक्ल न (Adaptation) तथा आपरिवर्तन (Modification) द्वारा सम्ता कर लिया है। व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी मानव का घर है। आदिम मानव समान प्रकृति वा पर्यावरण पर सीधे तौर पर निर्भर था। मानव प्रकृति का एक अंग है तब वह भी प्रकति पर अपनी छाप छोड़ता है। मनन ने तकनीकी खोजों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके प्रकृति के बंधन को डीला किया है। मानव ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो सीमित क्षेत्र में जलवायु को अपरिवर्तित कर देती हैं। जैसे-मानानकलक (Air conditioner) वायु शीतक आदि । वर्षा, भूमिगत जल पटक, प्रस्तर (Aquifer) को पुनरावेशित करके कृषि आदि के लिए जल प्राप्त करना । समदी बोत्रों में तेल तथा मैंगनीज पिड प्राप्त काला, मृदा को पुनः नयीकरणीय बनाकर कृषि को स्थापित करन इत्यादि। इस प्रकार मानय ने प्रकृति से समझौता किया है।

प्रश्न 22.
वातावरण एवं मानव के अन्योन्यक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव और वातावरण में एक अटूट सम्बन्ध है। मानस बालय में प्रकृति की उपल है क्या आ कुछ मा परिवर्तन करता है। मानव विपरीत भौतिक परिमितियों के साथ सदा प्रयत्नशील हा एक कविता संक्षेप में मानस संचाच सिमानालाप के माध्यम से इस सम्बन्धको मल किया गया है। आपने मिट्टी का पूजन किया मैंने कप का निर्माण किया आपने पत्रिकाएर किया मैंने दीपक बनाया, आपरेचरम पहाडी भू-भाग एवं मरुस्थलोका राजन किया मैंने फलों की स्यारी तथा बाग बगीचे बनाए । इस प्रकार मानव ने तकनीकी की लापता से एक स्वतन्त्र साप छोडी तथा प्रकृति के सागसाधावनाओं का सुजन किया। भूगोल इसी अनक्रियात्मक सम्बन्ध का अध्ययर करता है।

प्रल 23.
निम्नलिखित शब्दों की परिभाषाएँ दें –

  1. भौतिक विज्ञान
  2. जैव-भूगोल
  3. भू-आकृति
  4. जलवायु विज्ञान
  5. जल-विज्ञान
  6. मृदया- भूगोल
  7. बनापति भूगोल
  8. प्राणि भूगोल
  9. मानव पारिस्थितिकी
  10. पर्यावरण भूगोल।

उत्तर:

  1. भौतिक विज्ञान (Physiography) – पह वास्तव में मैतिक भूगोल है जो -पृष्ठ -आकारों का पर करत है।
  2. जैव-भूगोल (Bio-Geography) – यह पर्यावरण पर्थमजीव-जन्तुओं का अध्यक्त।
  3. भू-आकृतिक विज्ञान (Geo morphology) – अकारों का अध्यन
  4. जालवायु विज्ञान (Climatology) – यह जलवायु तथा इसके तत्वों का अपन।
  5. जल-विज्ञान hydrology) – यह महासागरों, नदियों हिम नदियों आदि जल की भूमिका का अध्ययन है।
  6. पदा-भूगोल (Soil Geography) – मृदा भूगल मृदा के निर्माण, प्रा या लिलाण का अध्यायन है।
  7. बनायी भूगोल (Plant Geography) – यह परदेशमा चार मैदानों के वितरण का विज्ञान
  8. प्राणि भूगोल (zoo Geography) – यह बीच जनुओं और सूक्ष्म जीवाणुओं के
  9. मानव याशियतिकी (Human Ecology) – मामी बालो सम्बयों का अध्ययन करतो।
  10. पर्यावरण भूगोल (Environmental Geography) – जीवन पर्यावरण की गुणवता तथा मानव उसके प्रभाव का अध्ययन है।

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प्रश्न 24.
भौतिक भूगोल के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल का महत्त-भौतिक भूगोल में सभी त्यों को सम्मिलित किया गया है जो प्राकृतिक उथलमाण, वागमण्डल, जलमण्डल एवं रमाला सलमण्डल में भू-आकृति शमित। वायुमण्डल का सम्बन्ध सभी जीवन वस्तु जैसे-बड़-पौधे, पशुओं सूक्ष्म जीव और मनुष्य अध्ययन से है। मथा भौतिक भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले इन चारों तत्वों यामाहाका उत्पाद है।

पर्यावरण निर्धारणहरका सामाजिक निर्धारण के विद्वान एक ऐसी मनोति को जन्म दिया जिसने प्राकृतिक पर्यावरण-भूमि, जल, वायु मुदा, वनस्पति, पशु आदि को कंवस आधिक प्रगति प्राप्तकरलेबले सपना देखा। समापनका हर कांजनेय किया बस गई इससे वायु सहित लगभग सभी प्रकार के प्राकृतिक संसाधन का विनाश प्रदूषण और अधाय मानव ने महसूस किया कि पृथ्वी पर प्रकृतिक संसाधन जीवन को आधार मान करते हैं। उनके निास से पथ्वी पर समस्त जीवन समाप हो सकता है। पान्नु पर्यावरण संकट से उत्पन ह, नवीन परिस्थिति को देखते हुए भूगोल फिर से अपने भौतिक आधार पर सौट आया।

प्रश्न 25.
भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल में अनार स्पष्ट करो।
उत्तर:
मबद्ध भूगोत तथा प्रादेशिक भूगोल अन्तर:
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प्रश्न 26.
प्राकृतिक वातावरण तथा समा वातावरण में अना समट करें।
उत्तर:
प्राकृतिक वातावरण तथा समग्र जतावरण में अन्तर –
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प्रश्न 27.
भूगोल को सभी विद्वानों का जनक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
भूगोल को सभी विद्याओं का जनक कहा जाता है इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. आज भूगोल मात्र एक ऐसा विषय शेष है जो भूतनी मानिक रूपरेखा की परिवर्तनशीलता को समझाने हेतु सभी प्राकृतिक तथा मानव विज्ञान के विद्वानों को एक प्लेटफार्म पर लाता है।
  2. यह एक अन्नविषयक तथा समाकलात्मक (विभिन्न विषयों को जोड़ने वाला) विज्ञान है, जिसकी अनेक शाखायें हैं।
  3. भौगोलिक शब्दावली में दिक, स्थान भूपृष्ठ के सोने का सामूहिक स्वरूप है जिससे प्रतिरूपों तथा संरचनाओं का जन्म होता है और जो जीवन विशेष कर मार जीवन को आधार प्रदान करते है।

प्रश्न 28.
भौतिक भूगोल तथा जैव भूगोल में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल तथा जैव गोल में अन्नर –
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प्रश्न 29.
भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल में अंतर बतायें।
उत्तर:
भौतिक पूोल-इसाय प्राकृतिक वातावरण को विहोचता वितरण चिनताओं और जटिलता अध्ययन किया जाता है। इसके चार प्रमुख विभाग –

  1. आकृतिक विज्ञान
  2. समुद्र विज्ञान
  3. जलवायु विज्ञान और
  4. वनस्पति एवं जन्तु भूगोल।

मानव भूगोल – नसमें अनुमके विधिन कार्यकलापों, आर्थिक, राजनीतिक एतिहासिक, समाजिक और सांस्कृतिक एवं स्वयं मनुष्य के वितरण और उसके आवास का अध्ययन भौतिक बातमरण के संदर्भ में किया जाता है। इसके कई उपविभाग है जिसमें प्रमुख जनसंख्या भूगोल, आवासीय भूगोल, संसाधन भूगोल आदि हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भूगोल एक प्राकृतिक एवं मानवीय विज्ञान है।’ व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राचीन समाज में मानव और प्रकृति के बीच की अंतःक्रिया एक-दूसरे के साथ प्रावध रूप में घों पर जैसे-जैसे समय गुजरता गया, अनुभवों के संचय में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों को जन्म दिया। संस्कृतियों केवल मानव और प्रकृति के बीच क्रियाओं का ही नहीं बल्कि बिभिन्न प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण में रहने वाले लोगों के बीच होने वाली: क्रियाओं का भी परिणाम हैं। यह एक निस्तर विकासशील तथा परिवर्तनशील घटना है। यही कारण है कि समान प्रकृतिक वातावरण में हमेश एक ही प्रकार की संस्कृति और सध्यता नहीं, मिलती। इसलिए वह मुष्ठ जिसका अध्ययन भूगोलवेता करता है, एक समान नहीं है।

इसके अतिकमा सांस्कृतिक दोनों ही लक्षणं में शान अंतर है। इस प्रकार भूगोल एक प्राकृतिक तथा मालोष विज्ञान है, जो भूपृष्ठ को आकृति, और विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं को जम सेवाले, प्राकृतिक और मानवीय दोनों ही कारकों एवं प्रक्रियाओं का अध्यक्त करता है। यह भोप प्रतिरूप तथा मोचन को जानने के लिए -लक्षणों का वर्गीकरण तथा चित्रण करता है। यह वर्तमान प्राप को बदलने में कार्यरत कारकों तथा प्रक्रियाओं की पहचान भी कराया इनसे होने वाले संभावित परिण की भविष्यवाणी भी करता है।समा भूगोल इन प्रमों का उत्तर देने का प्रयास करता है

  1. भूपृष्ठ पर कौन-कौग में प्रकृतिक तथा सांस्कृतिक लक्षण है?
  2. ये किस प्रकार मास्तित्व में आए?
  3. किस प्रकार वितरित और ऐसे क्यों हैं?
  4. एक-दूसरे से संबंधित हैं?
  5. क्या इनका पर्तमान वितरण-प्रतिरूप मानव कल्याण के अनुकूल है।
  6. रूपांतरित करने के लिए क्या किया जा सकता है।
  7. प्रस्तावित परिवर्तनों का माना पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इस प्रकार पूल एक विज्ञान प्रकृति और मानव के बीच गतिशील अनक्रियाओं के परिणामस्वरूप उत्पन गाम लक्षणों को स्थानिक व्यवस्था का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 2.
“भूगोल के अनेक उप-विषय विज्ञान पर आधारित है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। अघवा, भूगोल का अन्य विषयों से क्या सम्बन्ध हैं?
उत्तर:
मानवीय विकास भौतिक तत्त्वों के सदुपयोग पर आधारित है। इसलिस भूगोल भौतिक वातावरण तथा सामाजिक वातावरण के विभिन्न तत्त्वों का अध्ययन करता है। भूगोल काफी हद तक प्राकृतिक विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान दोनों पर निर्भर है। कई उप-विषयों (Allied Sciences) में भूगोल अन्य विज्ञान शाखाओं के निकट है। प्राकृतिक विज्ञान के अन्तर्गत भूगोल तथा अन्य विषयों का निम्नलिखित सम्बन्ध है –

1. जीव – भू विस्तार विज्ञान (Chrological Science) – इस विज्ञान का मुम सम्बन्ध क्षेत्रीय अध्ययन (Study of an area) प्रादेशिक अध्ययन से होता। नितान (Astronomy) तथा भूगोल मिलकर जीव-विवार विज्ञान की रचना करते हैं। गया विज्ञान में कई विषय, को-औरमण्डल, पच्ची का आकार, अक्षांश-देशाला भूगोल को एक विज्ञान का रूपरे।

2. कालानुक्रमिक विज्ञान (Chronological Science) – तिहास में समय का तत्व महत्वपूर्ण होता है।तिहास भूगोलके समय के साथ सामन्य स्थापित करता सो प्राचीन काल से लेकर वर्तमाम तक मानवीय विकास को समझने में सहायता मिलती है । इस विज्ञान से भू-संघटनाओंकामानुसार अध्ययन किया जाता है।

3. क्रमबद्ध विज्ञान (Systematic Science) – सके मा पृथ्वी की घरकों का अब अपर किया जाता है। भौतिक विज्ञान, रसायन विधान, पारि विकार ज्या प्रांग विधान किसी प्रदेश के मानव एवं कावरणमयों को सर कर समझनेसहायता करते हैं। यह अमन वर्गकरण (Classification System) के आचरम किया जाता है।

4. अर्थशास्त्र से सम्बन्ध (Relation with Economics Science) – मनुष्य के अधिक कल्याण मनदेशिक विकास सम्बन्धी समाना अध्ययन के लिए भूगोत का सम्बन्ध अर्थशालो किटतम तम उपयोगी होत जाता है।

5. अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध – भूगोल के उप-विषय अन्न विज्ञानों निकर हैं, जैसे- आकृतिक विज्ञान का भूगर्ण विज्ञान से निकर का सम्बम। आर्थिक भूगोल का अर्थशास्त्र से सम्मान भूगोल का प्रामी विज्ञान से गहरा सम्बनी,स्था राजनीतिक भगोरण का राजनीतिक सिरसावा है।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 17 फसलों का त्योहार Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार

Bihar Board Class 6 Hindi फसलों का त्योहार Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से –

प्रश्न 1.
अप्पी दिदिया बुरी फँसी कैसे?
उत्तर:
दिदिया को चुड़ा-दही, खिचड़ी, तिलकुट आदि पसंद नहीं है ये सब चीज तो मकर संक्रांति के दिन खाने ही पड़ेंगे। इसलिए दिदिया बुरी फंसी।

प्रश्न 2.
संथाल के लोग सरहुल कब और कैसे मनाते हैं ?
उत्तर:
संथाल परगना क्षेत्र या उसके बाहर रहने वाले संथाली फरवरी-मार्च में सरहुल मनाते हैं।

इस दिन विशेष रूप से ‘साल’ के पेड़ की पूजा की जाती है। इस समय साल के वृक्ष में फूल आने लगते हैं जिसका स्वागत और शृंगार संथाल लोग करते हैं। रात भर नाचने-गाने का क्रम चलता है। अगले दिन घर-घर जाकर फूलों के पौधे लगाये जाते हैं। तीसरे दिन पूजा होती है और फिर कानों पर ‘सरई’ के फूल लगाय जाते हैं जो सौभाग्य-सूचक माना जाता है। चावल, मुर्गा का विशेष पकवान बनता है जिसे खाना, खिलाना उत्सव का अंग होता है। भावार्थ का कॉलम 2 भी देखें।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार

प्रश्न 3.
आपके यहाँ फसलों के त्योहार को किस नाम से जाना जाता है और कैसे मनाया जाता है ?
उत्तर:
बिहार राज्य के अधिकतर भाग में फसलों का यह त्योहार खिचड़ी, मकर-संक्रान्ति, तिल-संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। इसके मनाये जाने का सविस्तार चर्चा भावार्थ के कॉलम । (एक) में की गयी है। छात्र इस प्रश्न के उत्तर के लिये वह अंश देखें और उनके घर या क्षेत्र में कोई और समारोह भी इस उपलक्ष में होता है तो इसकी भी चर्चा यहाँ कर दें।

प्रश्न 4.
मकर संक्रांति के दिन तिल को किस रूप में प्रयोग करते हैं ?
उत्तर:
मकर संक्रांति के दिन तिल-गुड़ चावल मिलाकर पूजा किया जाता है। उसको प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। तील का दान होता है । तिल-गुड़ या चीनी से बने तिलकुट खाया जाता है ।

प्रश्न 5.
स्तंभ ‘क’ में त्योहारों के नाम दिए गए हैं, जिसे स्तंभ ‘ख’ में दिए गए राज्यों के नाम से मिलान कीजिए।
प्रश्नोत्तर –
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार 1

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों के आगे कोष्ठक में सही (✓) या गलत (☓) का निशान लगाइए।
प्रश्नोत्तर –
(क) तिलकुट गया से आया था। (✓)
(ख) भारत में फसलों का त्योहार अप्रैल के मध्य में मनाया जाता है । (☓)
(ग) सरहुल का जश्न चार दिनों तक चलता है। (☓)
(घ) पोंगल पर्व में ‘साल’ के पेड़ की पूजा की जाती है। (☓)

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पाठ से आगे –

प्रश्न 1.
इसके अतिरिक्त आपको कौन-सा त्योहार/पर्व अच्छा लगता है? इस त्योहार/पर्व को आप कैसे मनाते हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
उदाहरण : चैत्र-रामनवमी।
उत्तर:
मुझे दीपावली अच्छी लगती है। दीपावली आने के पूर्व से ही घरों की सफाई शुरू हो जाती है। उस दिन घर-दरवाजे को सजाया जाता है। _ छोटे-छोटे दीयों, सीरीज बल्बों से घर को रोशन किया जाता है। घर में गणेश-लक्ष्मी की विधिवत पूजा की जाती है। तरह-तरह के पकवान घर में बनते हैं। मिठाइयाँ आती हैं। छोटे-छोटे बच्चे घरौंदा बनाते हैं, उसे सजाते हैं। मिट्टी के खिलौनें तथा कुल्ही-चुकिया से घरौंदे का संस्कार किया जाता है। उन मिट्टी के बर्तनों में लावा, मुढ़ी, बताशे आदि भरे जाते हैं जो प्रसाद के रूप में सबको बाँटा जाता है। फिर पटाखे, फुलझड़ियाँ, आसमान तारे, घिरनी आदि से आतिशबाजी की जाती है जिसमें घर के सभी सदस्य सम्मिलित होते हैं। यह ज्योति और आनन्द का पर्व है जो भारत में सर्वत्र मनाया जाता है।

प्रश्न 2.
हिन्दी महीनों के नाम लिखिए तथा उस महीने में मनाये जाने वाले पर्वो का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार 2
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार 3
प्रश्न 3.
निम्नांकित पंक्तियाँ भोजपुरी भाषा में लिखी गई हैं। इन पंक्तियों को आप अपनी मातृभाषा में लिखिए।

(क) आज ई लोग के उठे के नइखे का? बोल जल्दी तैयार होखस”
उत्तर:
आज लगता है कि इनलोगों को जगना नहीं है- इनलोगों को कहो कि जल्दी उठकर तैयार हो जायें।

(ख)” जा भाग के देख, केरा के पत्ता आईल कि ना?”
उत्तर:
दौड़कर जाकर देखो कि केले का पत्ता अभी तक आया या नहीं?

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व्याकरण –

प्रश्न 1.
नीचे दिये गये शब्दों की ध्वनि के आधार पर तीन-तीन शब्द लिखें
उत्तर:
बुराई – भलाई, अच्छाई, मिठाई
गाड़ीवान – धनवान, भगवान, पहलवान
पाठशाला – धर्मशाला अतिथिशाला, पनशाला।
मचिया – खटिया, रसिया, धनिया!
तूफान – उफान, जूबान, मेहरबान

प्रश्न 2.
इन शब्द-समूहों को वाक्य से स्पष्ट करें.
उत्तर:
(क) तिल-तिल जलना : अपनी शिकायत सुनकर वह तिल-तिल जलता रहा।
(ख) तिल रखने की जगह : उस सभा में अपार भीड़ के कारण कहीं तिल रखने की भी जगह नहीं थी।
(ग) तिल का ताड़ करना : उस बात का उसने तिल का ताड बना दिया।
(घ) तिल दान करना : मकर-संक्रान्ति के दिन तिल का दान करना चाहिये।
(ङ) तिलमिलाना : उसकी बेसिर पैर की बात सनकर वह तिलमिला गया।

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फसलों का त्योहार Summary in Hindi

पाठ का सार-संक्षेप

भारत एक विशाल देश है । विशालता के साथ इस देश में विविधता पलती है और इस विविधता में ही इसकी विशेषता है। अनेक जातियाँ, इन जातियों के अपने संस्कार, पर्व-त्योहार वेष-भूषा, रंगीन गीत, नृत्य और बाद्य, ‘तरह-तरह के भोजन-पकवान और बोलियाँ भी। पर इन विविधताओं के बीच एक एकता है जो पूरे देश को बाँधता है – हमारी संस्कृति एक है. हमारी राष्ट्रीयता एक है। पर्व-त्योहारों का तो प्राचर्य है इस देश में। ये पर्व-त्योहार ही हमारे जीवन को गति देते हैं और जीवन में रस घोलते हैं।

रोमन (अंगरेजी)कैलेण्डर के अनुसार जो पहला पर्व जनवरी माह में आता है उसे हम मकर संक्रान्ति के नाम से जानते हैं। इसे तिल संक्रान्ति भी कहते हैं क्योंकि इस पर्व में तिल का बड़ा महत्व होता है -तिल स्नान, तिल दान, भगवान को तिल-गुड़ का अर्पण और. तिल से बनी मिठाइयों का रसास्वादन (खाया जाना)। पूरा दिन तिलमय रहता है। इसी दिन खिचड़ी खाये जाने की भी प्रथा है। ये खिचड़ी खंत की नयी फसल के पहले अन्न (चावल) से बनायी जाती है और इसका अपना एक विशेष महत्व माना जाता है।

1. इस पर्व को मनाये जाने का एक सुन्दर चित्र लेखक ने निबन्ध के आरम्भ में दिया। सबसे पहले लेखक उस काल में मौसम का चित्र खींचता है- सारा दिन बारसी (आग की अंगीठी) के आगे बैठकर हाथ तापते गजर’ जाता है। पूरे दस दिन हो गये सूरज भगवान दिखायी नहीं दिये। सुबह, रजाई से निकलने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। बाहर समय का अंदाज बिल्कुल नहीं हो रहा था पर घर में चहल-पहल आरम्भ हो गया था। चापाकल चलने की आवाज और उससे बहते पानी का स्वर कानों में पड़ रहा था। कोई हाँक लगा रहा था “जा भाग के देख, केरा के पत्ता आइल कि ना?”

नहा-धोकर सभी एक कमरे में इकट्ठा हुये। चाचा और चाची ने चकाचक सफेद धोती और कुर्ता पहन रखा था। “खिचड़ी में अइसन जाड़ हम कब्बो ना देखनी, देह कनकना दे ता।” पापा को धोती में ज्यादा ठंढ लग रही थी। सामने मचिया पर खादी की सफेद साड़ी पहने दादी बैठी थी। दादी के आज धुले बाल-सफेद सेमल की रूई की तरह हल्के-फुल्के दूर से ही चमक रहे थे। दादी के सामने केले के कई पत्ते कतार में रखे थे जिनमें तिल, मीठा यानी गुड, चावल आदि के छोटे-छोटे ढेर रखे थे। परिवार के सभी लोगों को बारी-बारी से आकर पत्ते पर सजाये नवान्न (नया अन्य) और मीठा, तिल आदि को प्रणाम करना था और यह सभी प्रार्थना-भाव से कर रहे थे कि उनका जीवन अन्न से पूर्ण रहे। अन्य उनके कुल-परिवार को परिपूर्णता दे। इस अनुष्ठान की समाप्ति के बाद इस अन्न, तिल आदि को दान कर दिया जाता

आज दही-चूड़ा खाने का दिन है पर अप्पी दीदी को यह पसन्द नहीं, पर आज उनकी मनपसन्द का नाश्ता मिलने वाला नहीं था – आज का भोजन तो यही है। फिर घर में आज नये चावल से स्वादिष्ट खिचड़ी बनायी जायेगी। मुझे स्कूल के दिनों की याद आती है जब हम नाव पर बैठकर गंगा की सैर को जाते थे और रेत में उसपार पतंग उड़ाने का आनन्द लेते थे। यह एक पिकनिक का दिन होता था जब गुरुजी और अन्य छात्र दोस्त मिलकर वहाँ खिचड़ी बनाते थे। कोई मटर, प्याज छीलने का काम करता, कोई ईंट इकट्टी कर चूल्हा बना लेता और फिर लजीज खिचड़ी बनती। वैसी खिचड़ी फिर दुबारा खाने को नहीं मिली। उस खिचड़ी में एक अद्भुत स्वाद मिलता।

फसलों का यह त्योहार देश के सभी राज्यों में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य का ताप बढने और ठिठुरन के क्रमशः कम होने का भी स्वागत किया जाता है। सूर्य इस दिन से मकर रेखा से उत्तर की ओर संचरण करते हैं और सूर्य की गर्मी से शरीर में स्फूर्ति आती है। अच्छी पैदावार और अन्न के घर में आने का स्वागत किसान करते हैं- यह पर्व उनकी प्रसन्नता को व्यक्त करने का माध्यम बनता है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में इसे मकर-संक्रान्ति या तिल संक्रान्ति, असम में बीहू, केरल में ओणम – तमिलनाडु में पोंगल, पंजाब में लोहड़ी झारखंड में सरहुल और गुजरात का पतंग-उत्सव के रूप में मनाया जाता है। ये सभी फसल से जुड़े त्योहार हैं और जनवरी से मध्य अप्रैल तक अलग-अलग क्षेत्रों में मनाया जाता है।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार

इस निबन्ध में लेखक: लग-अलग राज्यों. क्षेत्रों में मनाये जाने वाले इस फसल त्योहार की एक झाँकी प्रस्तुत की है। इसे हम एक-एक कर देखते है।

2. झारखंड में यह त्योहार ‘सरहुल’ के नाम से मनाया जाता है। समारोह चार दिनों तक चलता है। अलग – अलग जनजातियाँ इसे अलग-अलग समय, में मनाती हैं। संताल लोग इसका आयोजन फरवरी-मार्च में, ओरांव जनजाति के लोग मार्च-अप्रिल में मनाते हैं। इस पर्व में आदिवासी भाई-बहन प्रकृति की पूजा करते हैं। वृक्ष पेड़-पौधे उनके सहचर होते हैं अतः उस दिन विशेष रूप से ‘साल’ वृक्ष की पूजा की जाती है। आदिवासी अपने गाँव, घर को अत्यन्त साफ-सुथरा रखते हैं पर इस अवसर पर घरों की विशेष लिपाई-पुताई होती है और उन्हें सजाया जाता है। फिर स्त्री-पुरुष मिलकर कमर में बाँहें डालकर नृत्य करते हैं। नृत्य के बोल और मांदर की ध्वनि से घाटी गूंज उठती है। यह सिलसिला रातभर चलता है। अगले दिन लोग घर-घर जाकर फूल लगाते हैं और उन्हें वर्ष की शुभकामना देते हैं। घरों से चंदे, मांगे जाते हैं जिनमें विशेष रूप से चावल, मिश्री और मुर्गा की मांग होती है। फिर सहभोज का दौर चलता है। तीसरे दिन पूजा की जाती है और ‘सरई’ के फूल कानों पर लगाकर आशीर्वाद लेते और देते हैं। इस अवसर पर धान की भी पूजा की जाती है। पूजा किया हुआ आशीर्वादी धान ही अगली फसल में बोया जाता है।

3. दक्षिण क्षेत्र के राज्य तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति का पर्व ‘पोंगल’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन खरीफ की पैदावार के अन्न घरों में आते हैं। नये धान को कूटकर चावल निकाला जाता है और मिट्टी के नये मटके में चावल, दूध और गुड़ मिलाकर धूप में रखा जाता है। हल्दी की गांठे मटके के चारों ओर बाँध दी जाती है जो शुभ फलदायक माना जाता है। इस मटके को दिन के दस-बारह बजे तक धूप में रखा जाता है। धूप के ताप से मटके के मिश्रण में उबाल आने लगता है और मटके के अन्न के दाने बाहर गिरने लगते हैं। फिर घर के लोग आहलादित स्तर में बोल उठते हैं – पोंगल-पोंगल! यह एक प्रकार की सीठी खिचड़ी ही प्रकृति के नैसर्गिक ताप से बनती है और शुभ फल देने वाली मानी जाती है।

4. अब लेखक गुजरात राज्य की चर्चा करता है जहाँ ‘मकर-संक्रान्ति का उत्सव पतंगबाजी का उत्सव होता है। प्रत्येक गुजराती इस दिन, चाहे वह किसी जाति, धर्म या आयु का हो पतंग अवश्य उडाता है। विभिन्न प्रकार, आकार एवं रंग के पतंग आकाश में एक साथ घरों की छतों से उड़ते दिखायी देते हैं। मानों ये बदलती प्रकृति का स्वागत कर रहे हैं। उड़ते पतंग इनके हृदय – की उमंग और प्रफुल्लता को व्यक्त करते हैं।

5. समुद्र तल के पास बसा तमिलनाडु, जंगलों के बीच बसा झारखंड, बिहार मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश के मैदानी भाग, गुजरात की धरती जो रेगिस्तान को छूती है, से बढ़कर लेखक हमको पहाड़ पर ले चलता है। उत्तराखंड की हिमालय-शृंखला के मध्य में स्थित कुमाऊँ का क्षेत्र। इस क्षेत्र में मकर संक्रान्ति का पर्व ‘धुधुतिया’ के नाम से मनाया जाता है। इस दिन आटे में गड मिलाकर अच्छी तरह गूंधा जाता है और फिर उसके पकवान बनाये जाते हैं। इस पकवान को विभिन्न आकार देकर बनाया जाता है। जैसे डमरू, तलवार, अनार (दाड़िम)फूल आदि। फिर इस पकवान से माला बनायी जाती है जिसके बीच-बीच में संतरा और गन्ने के टुकड़े पिरोये जाते हैं। सुबह-सुबह यह माला बच्चों को दी जाती है। बच्चे इसे लेकर पहाड़ों पर चले जाते हैं और माला के पकवान तोड़-तोड़कर पक्षियों को खिलाते हैं और उनसे अपनी कामना प्रकट करते हैं।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 17 फसलों का त्योहार

वे एक गीत गाते हैं- कौआ आओ, धुधूत आओ

ले कौआ बड़ौ, म के दे जा सोने का घड़ौ, खा लै पूड़ी, म के दे जा सोने की छडी

तो यह है पूरे देश के अंचलों से मकर-संक्रान्ति मनाने की झाँकी। लोग ठंड से सिकुड़े चले जाते हैं पर पवित्र नदियों में डुबकी लगाने के लिये उमड़ पड़ते हैं और उसके बाद दही-चूड़ा का रसास्वादन करते हैं। इस दिन तिल का स्थान यानी पानी में तिल डालकर स्नान, तिल का विशेष पकवान बनाना, खाना, तिल का दान, आग में तिल डालना या हवन करना श्रेयस्कर है। यह क्रिया सभी स्थानों पर किसी न किसी रूप में सम्पन्न होती है। पाँच प्रकार के नये अन्नों से बनी खिचड़ी या चावल गुड़ की खीर मकर संक्रान्ति या तिल संक्रान्ति के अलग-अलग स्वरूप हैं।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.6

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.6 Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.6

प्रश्न 1.
ज्ञात कीजिए
(i) 64\(\frac{1}{2}\)
(ii) 32\(\frac{1}{5}\)
(iii) 125\(\frac{1}{3}\)
हाल:
(i) (64)\(\frac{1}{2}\) = (8 × 8)\(\frac{1}{2}\)
= (8²)\(\frac{1}{2}\) [∵ (xa)b = xab]
= 8

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(ii) 32\(\frac{1}{5}\) = (2 × 2 × 2 × 2 × 2)\(\frac{1}{5}\)
= (25)\(\frac{1}{5}\)
= 25×\(\frac{1}{5}\) [∵ (xa)b = xab]
= 2

(iii) 125\(\frac{1}{3}\) = (5 × 5 × 5)\(\frac{1}{3}\)
= (53)\(\frac{1}{3}\)
= 53×\(\frac{1}{3}\) [∵ (xa)b = xab]
= 5

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प्रश्न 2.
ज्ञात कीजिए
(i) 9\(\frac{3}{2}\)
(ii) 32\(\frac{2}{5}\)
(iii) 16\(\frac{3}{4}\)
(iv) 125\(\frac{-1}{3}\)
हल:
(i) 9\(\frac{3}{2}\) = (3 × 3)\(\frac{3}{2}\)
= (32)\(\frac{3}{2}\)
= 32×\(\frac{3}{2}\) [∵ (xa)b = xab]
= 3³
= 27

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(ii) 32\(\frac{2}{5}\) = (2 × 2 × 2 × 2 × 2)\(\frac{2}{5}\)
= (25)\(\frac{2}{5}\)
= 25×\(\frac{2}{5}\) [∵ (xa)b = xab]
= 2²
= 4

(iii) 16\(\frac{3}{4}\) = (2 × 2 × 2 × 2)\(\frac{3}{4}\)
= (24)\(\frac{3}{4}\)
= 24×\(\frac{3}{4}\) [∵ (xa)b = xab]
= 2³
= 8

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(iv) 125\(\frac{-1}{3}\) = (5 × 5 × 5)-\(\frac{1}{3}\)
= (53)-\(\frac{1}{3}\)
= 53×-\(\frac{1}{3}\) [∵ (xa)b = xab]
= 5-1
= \(\frac{1}{5}\) [∵ (x-a) = \(\frac{1}{x^a}\)]

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.6

प्रश्न 3.
सरल कीजिए
(i) 2\(\frac{2}{3}\). 2\(\frac{1}{5}\)
(ii) (\(\frac{1}{3³}\))7
(iii) \(\frac{11^\frac{1}{2}}{11^\frac{1}{4}}\)
(iv) 71/2.81/2
हल:
(i) 2\(\frac{2}{3}\). 2\(\frac{1}{5}\) = 2(\(\frac{2}{3}\)+\(\frac{1}{5}\)) [∵ xaxb = xa+b]
= 2\(\frac{10+3}{5}\)
= 213/15

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.6

(ii) (\(\frac{1}{3³}\))7 = \(\frac{1}{3^{3×7}}\) [∵ (xa)b = xab]
= \(\frac{1}{3^{21}}\)
= 3-21

(iii) \(\frac{11^\frac{1}{2}}{11^\frac{1}{4}}\) = 11\(\frac{1}{2}\) – \(\frac{1}{4}\) [∵ \(\frac{x^a}{x^b} = x^{a-b}\)]

= 11\(\frac{2-1}{4}\)
= 11\(\frac{1}{4}\)

(iv) 71/2.81/2 = (7.8)\(\frac{1}{2}\) [∵ xaya = (xy)a]
= (56)1/2

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 1 संख्या पद्धति Ex 1.6

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 2 Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

Bihar Board Class 7 Social Science सामाजिक-सांस्कृतिक विकास Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आप बता सकते हैं कि इस्लाम धर्म अपने साथ खाने-पीने और पहनने की कौन-कौन-सी चीजें साथ लेकर आया ?
उत्तर-
इस्लाम धर्म अपने साथ पहनने के लिये कुर्ता-पायजामा, सलवार-समीज, लँगी, कमीज अचकन आदि लाये, जिन्हें हिन्दुओं ने भी अपना लिया । इस्लाम खाने की चीजों में हलवा, समोसा, पोलाव, बिरयानी आदि लाये, जिसे हिन्दू भी खाते हैं।

प्रश्न 2.
विभिन्न धर्मों के समानताओं एवं असमानतों को चार्ट के माध्यम से बताएँ।
उत्तर-
Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास 1
इन छोटी-मोटी समानता या असमानता किसी तरह मेल-जोल में बाधक नहीं बनतीं । सभी मिल-जुलकर रहते हैं ।

प्रश्न 3.
आप अपने शिक्षक या माता-पिता की सहायता से पाँच-पाँच हिन्दू देवी-देवताओं, सूफी एवं भक्ति संतों से जुड़े स्थलों की सूची बनाइए।
उत्तर-
Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास 2

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

आइए याद करें:

प्रश्न 1.
सिंध विजय किसने की?
(क) मुहम्मद-बिन-तुगलक
(ख) मुहम्मद बिन कासिम
(ग) जलालुद्दीन अकबर
(घ) फिरोशाह तुगलक
उत्तर-
(ख) मुहम्मद बिन कासिम

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प्रश्न 2.
महमूद गजनी के साथ कौन-सा विद्वान भारत आया ?
(क) अल-बहार
(ख) अल जवाहिरी
(ग) अल-बेरूनी
(घ) मिनहाज उस सिराज
उत्तर-
(ग) अल-बेरूनी

प्रश्न 3.
भारत में कुर्ता-पायजामा का प्रचलन किनके आगमन से शरू हुआ?
(क) ईसाई
(ख) मुसलमान
(ग) पारसी
(घ) यहूदी
उत्तर-
(ख) मुसलमान

प्रश्न 4.
अलवार और नयनार कहाँ के भक्त संत थे ?
(क) उत्तर भारत
(ख) पूर्वी भारत
(ग) महाराष्ट्र
(घ) दक्षिण भारत
उत्तर-
(घ) दक्षिण भारत

प्रश्न 5.
मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है ?
(क) दिल्ली
(ख) ढाका
(ग) अजमेर
(घ) आगरा
उत्तर-
(ग) अजमेर

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 2.
इन्हें सुमेलित करें :

  1. निजामुद्दीन औलियां – (1) बिहार
  2. शंकर देव – (2) दिल्ली
  3. नानकदेव – (3) असम
  4. एकनाथ – (4) राजस्थान
  5. मीराबाई – (5) महाराष्ट्र
  6. संत दरिया साहब – (6) पंजाब

उत्तर-

  1. निजामुद्दीन औलियां – (2) दिल्ली
  2. शंकर देव – (3) असम
  3. नानकदेव – (6) पंजाब
  4. एकनाथ – (5) महाराष्ट्र
  5. मीराबाई – (4) राजस्थान
  6. संत दरिया साहब – (1) बिहार

आइए समझकर विचार करें 

प्रश्न 1.
भारत में मिली-जुली संस्कृति का विकास कैसे हुआ ? प्रकाश डालें।
उत्तर-
1206 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तर पर हिन्दू और मुसलमानों का सम्पर्क बना । इसके पूर्व जहाँ भारत के लोग तुर्क-अफगानों को एक लुटेरा और मूर्ति भंजक समझते थे, अब शासक के रूप में स्वीकारने लगे । इस भावना को फैलाने में उन भारतीयों की याददाश्त भी थी, जिन्हें मालूम था कि कभी अफगानिस्तान पर भारत का शासन था ।

अतः यहाँ के लोग अफगानों को गैर नहीं मानते थे । खासकर बिहार में, क्योंकि अशोक बिहार का ही था । अलबरूनी, जो महमूद गजनी के साथ भारत आया था, यहाँ रहकर संस्कृत की शिक्षा ली और हिन्दू धर्मग्रंथों और विज्ञान का अध्ययन किया । उसने यहाँ के सामाजिक जीवन को भी निकट से देखा । खूब सोच-समझकर उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘किताब-उल-हिन्द’ लिखी ।

दूसरी ओर अनेक सूफी संत और धर्म प्रचारक भारत के विभिन्न नगरों में बसने लगे। इससे इन दोनों धर्मों को मानने वालों के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान और समन्वय का वातावरण बना ।

मुस्लिम शासकों, खासकर मुगलों द्वारा स्थापित राजनीतिक एकता का सबसे बड़ा प्रभाव हिन्दू भक्त संतों एवं सुफी संतों के मेल मिलाप बढ़ने पर दोनों ने इस भावना का प्रचार किया कि भगवान एक है । ईश्वर और अल्लाह में कोई फर्क नहीं । सभी धर्म के लोगों की चरम अभिलाषा खुदा तक पहुँचने की होती है। तुम खुद में खुदा को देखो ।

आगे चलकर एक के पहनावे और खानपान को दूसरे ने अपनाया । राज काज में हिस्सा लेने वाले हिन्दू भी फारसी पढ़ने लगे और पायजामा और अचकन का व्यवहार करने लगे । इसी प्रकार भारत में मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ।

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प्रश्न 2.
निर्गुण भक्त संतों की भारत में एक समृद्ध परम्परा रही है। कैसे?
उत्तर-
रामानन्द के अनुयायियों काएक अन्य वर्ग उदारवादी अथवा निर्गुण सम्प्रदाय कहलाता है । इन निर्गुण भक्त संतों ने ईश्वर को तो माना लेकिन उसके किसी रूप को मानने से इंकार कर दिया। ये निराकार ईश्वर में विश्वास करते थे । निर्गुण भक्त संतों ने, जाति-पात, छुआछूत, ऊँच-नीच, मूर्ति-पूजा का घोर विरोध किया ।

ये कर्मकांडों में भी विश्वास नहीं करते थे। निर्गुण भक्त संतों में कबीर को सर्वाधिक प्रमुख संत माना जाता है । ये एक मुखर कवि के रूप में भी प्रसिद्ध है । कबीर इस्लाम और हिन्दू-दोनों धर्म के माहिर जानकार थे । इन्होंने दोनों धर्मों के ढकोसलेबाजी की घोर भर्त्सना की । इनके विचार ‘साखी’ और ‘सबद’ नामक ग्रंथ में सकलित हैं । इन दोनों को मिलाकर जो ग्रंथ बना है उसे ‘बीजक’ कहते हैं ।

कबीर के उपदेशों में ब्राह्मणवादी हिन्दु धर्म और इस्लाम धर्म, दोनों के आडम्बरपूर्ण पूजा-पाठ और आचार-व्यवहार पर कठोर कुठारापात किया गया । यद्यपि इन्होंने सरल भाषा का उपयोग किया किन्तु कहीं-कहीं रहस्यमयी भाषा का भी उपयोग किया है। ये राम को. तो मानते थे लेकिन इनके राम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र नहीं थे । इन्होंने अपने राम के रूप का इन शब्दों में बताया है :

“दशरथ के गृह ब्रह्म न जनमें, ईछल माया किन्हा ।” इन्होंने दशरथ के पुत्र राम को विष्णु का अवतार मानने से भी इंकार किया :

चारि भुजा के भजन में भूल पड़ा संसार । कबिरा सुमिरे ताहि को जाकि भुजा अपार गुरु नानक देव तथा दरिया साहेब निर्गुण भक्त संतों की परम्परा में ही थे।

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प्रश्न 3.
बिहार के संत दरिया साहेब के बारे में आप क्या जानते हैं ? लिखें।
उत्तर-
दरिया साहब का कार्य क्षेत्र तत्कालीन शाहाबाद जिला था, जिसके अब चार जिले-भोजपुर, रोहतास, बक्सर और कैमूर हो गये हैं।

विचार से दरिया साहेब एकेश्वरवादी थे । इनका मानना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है तथा वेद और पुराण दोनों में ही उसी का प्रकाश है । ईश्वर को. दरिया साहब ने निर्गुण और निराकार माना। इन्होंने अवतार और पूजा-पाठ को मानने से इंकार कर दिया । इन्होंने मात्र प्रेम, भक्ति और ज्ञान को मोक्ष प्राप्ति का साधन माना ।

इनके अनुसार प्रेम के बिना भक्ति असंभव है और भक्ति के बिना ज्ञान भी अधूरा है । इनका कहना था कि ईश्वर के प्रति प्रेम पाप से बचाता है और ईश्वर की अनुभूति में सहायक बनता है । ये मानते थे कि ज्ञान पुस्तकों में नहीं है, बल्कि चेतना में निहित है, जबकि विश्वास ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण मात्र है । दरिया साहब ने जाति-प्रथा, छुआछूत का विरोध किया । इनके विचारों पर इस्लाम का एवं व्यावहारिक पहलुओं पर निर्गुण भक्ति का प्रभाव दिखाई देता है । इनको मानने वालों में दलित वर्ग की संख्या अधिक थी।

दरिया साहब के विचारों को मानने वालों की सख्या आज के भोजपर, बक्सर, रोहतास और भभुआ जिलों में अधिक थी । उन्होंने वहाँ मठ की भी स्थापना की । इनके मानने वालों की संख्या वाराणसी में भी कम नहीं थी।

दरिया साहब के क्या उपदेश थे, उसे निम्नांकित अंशों से मिल सकते हैं: “एक ब्रह्म सकल घटवासी, वेदा कितेबा दुनों परणासी -1”. “ब्रह्म, विसुन, महेश्वर देवा, सभी मिली रहिन ज्योति सेवा।” “तीन लोक से बाहरे सो सद्गुरु का देश ।” “तीर्थ, वरत, भक्ति बिनु फीका तथा पड़ही पाखण्ड पथल का पूजा ।” दरिया साहब को बहुत हद तक कबीर का अनुगामी कहा जा सकता है।

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प्रश्न 4.
मनेरी साहब बिहार के महान सुफी संत थे। कैसे?
उत्तर-
मनेरी, साहब का पूरा नाम था ‘हजरत मखदुम शरफुद्दीन याहिया मनेरी । बिहार में फिरदौसी परम्परा के संतों में मनेरी साहब का विशेष महत्व है। भारत में मिली-जुली संस्कृति की जो पवित्र धारा सूफी संतों ने बहायी, उस संस्कृति को बिहार में मजबूत करने का काम मनेरी साहब ने ही किया। इन्होंने संकीर्ण विचारधारा का न केवल विरोध किया, बल्कि जाति-पाति एवं धार्मिक कट्टरता का भी विरोध किया । इन्होंने समन्वयवादी संस्कृति के निर्माण का सक्रिय प्रयास किया ।

इनके प्रयास से फिरदौसी परम्परा को बिहार में काफी लोकप्रियता मिली । मनेरी साहब ने मनेर से मुनारगाँव, जो अभी बांग्लादेश में पड़ता है, तक की यात्रा की और ज्ञानार्जन किया । इसके बाद ये राजगीर तथा बिहारशरीफ में तपस्या करते हुए धर्म प्रचार में भी लीन रहे। फारसी भाषा में उनके पत्रों के दो संकलन मकतुबाते सदी एवं मकतुबात दो ग्रंथ प्रमुख हैं। मनेरी साहब ने हिन्दी में भी बहुत लिखा है, जिनमें इन्होंने ईश्वर को अपने सूफियाना ढंग से व्यक्त किया है । इन्होंने इस लेख में अपने को प्रेयसी तथा ईश्वर या अल्ला को प्रेमी माना है ।

मनेरी साहब का मजार मनेर में न होकर बिहार शरीफ में इनकी मजार के बगल में ही उनकी माँ बीबी रजिया का भी मजार है । बीबी रजिया सूफी संत पीर जगजोत की बेटी थी।

प्रश्न 5.
महाराष्ट्र के भक्त संतों की क्या विशेषता थी?
उत्तर-
महाराष्ट्र के भक्त संतों की विशेषता को जानने के लिये हमें 13वीं सदी से 17वीं सदी तक ध्यान देना होगा । भक्त संतों की परम्परा के जन्मदाता रामानुज थे जो दक्षिण भारत के थे। उन्हीं के उपदेशों को भक्त संतों ने पक्षिण

भारत से लेकर महाराष्ट्र तक फैलाया । महाराष्ट्र में 13वीं सदी में नामदेव ने। भक्ति धारा को प्रवाहित किया, जिसे 17वीं सदी में तुकाराम ने आगे बढ़ाया।

इस बीच हम भक्त संतों की एक समृद्ध परम्परा को देखते हैं । इन भक्त संतों ने ईश्वर के प्रति श्रद्धा, भक्ति एवं प्रेम के सिद्धान्त को लोकप्रिय बनाया । इन संतों ने धार्मिक आडम्बर, मूर्ति पूजा, तीर्थ व्रत, उपासना और कर्मकाण्डों का घोर विरोध किया और कहा कि यह सब कुछ नहीं, केवल दिखावा मात्र है।

इन्होंने आयों की वर्ण व्यवस्था को भी मानने से इंकार कर दिया और जाति-पाति, ऊंच-नीच के भेदभाव का घोर विरोध किया । इनके अनुयायियों ने सभी जाति के लोगों, महिलाओं और मुसलमानों को भी शामिल किया।

महाराष्ट्र के इन संतों ने भक्ति की यह परम्परा पंढरपुर में विट्ठल स्वामी को जन-जन के ईश्वर और आराध्य के रूप में स्थापित किया । ये विठ्ठल स्वामी विष्णु के ही एक रूप श्रीकृष्ण थे । महाराष्ट्रीय भक्त संतों की रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों पर करारा प्रहार किया गया । इन्होंने सभी वर्गों, जातियों, यहाँ तक कि अंत्यज कहे जाने वाले दलितों को भी समान दृष्टि से देखा । इन भक्त संतों ने अपने अभंग द्वारा सामाजिक व्यवस्था पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया।

संत तुकाराम ने अपने अभंग में लिखा
जो दीन-दुखियों, पीड़ितों को
अपना समझता है वही संत है क्योंकि ईश्वर उसके साथ है।

विचारणीय मुद्दे

प्रश्न 1.
मध्यकालीन भक्त संतों में कुछ अपवादों को छोड़कर एक समान विशेषताएँ थीं। कैसे?
उत्तर-
मध्यकालीन भारत में भक्त आंदोलन के उद्भव और विकास में कई परिस्थितियाँ जिम्मेदार थीं । वैदिक पंडा-पुरोहित कर्मकांडों को आधार बनाकर जनता का शोषण करते थे । जो कर्मकांडों के व्यय को वहन करने योग्य नहीं थे, उन्हें नीच करार दिया गया । इस कारण समाज में दलितों की संख्या बढ़ गई । इन्हीं बुराइयों को दूर करने में भक्त संत लगे रहे । यद्यपि आगे चलकर इनमें भी दो मतावलम्बी हो गये, लेकिन धर्म सुधार की जिस मकसद से ये संत बने थे उसमें कोई अन्तर नहीं आया । इसलिये कहा गया है कि कुछ अपवादों को छोड़कर भक्त संतों की एक समान विशेषताएँ थीं।

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 2.
शंकराचार्य ने भारत को सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बांधा। कैसे?
उत्तर-
शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में मठों का निर्माण कर भारत को सांस्कृतिक रूप में एक सूत्र में बाँधने का काम किया । वे चारों मठ थे:

उत्तर में बद्रीकाश्रम, दक्षिण में शृंगेरी, परब में परी तथा पश्चिम में द्वारिका । इस प्रकार हर भारतीय जीवन में एक बार इन मठों में जाकर पूजा अर्चना करना अपना एक कृत्य मानने लगा । इससे सम्पूर्ण भारत धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से एक सूत्र में बंध गया । उस शंकराचार्य को आदि शंकराचार्य कहते हैं। अभी हर मठ के अलग-अलग शंकराचार्य होते हैं, ताकि परम्परा कायम रहे । एक शंकराचार्य की मृत्यु के बाद दूसरे शंकराचार्य नियुक्त ‘ हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
क्या आपके गाँव के पुजारी मध्यकालीन संतों की तरह कर्मकांड, जात-पात, आडम्बर आदि का विरोध करते हैं? अगर नहीं तो क्यों ?
उत्तर-
ग्रामीण क्षेत्रों में अभी बहुत बदलाव नहीं आया । अभी भी यहाँ के पुजारी कर्मकांड, जातपात, आडम्बर आदि का विरोध नहीं करते । कारण कि यदि वे ऐसा करें तो उनकी रोजी ही समाप्त हो जाय । दूसरी बात है कि गाँव के ऊँची जातियाँ उनका समर्थन भी करती है । इसलिये कानून की परवाह किये बिना वे लगातार लकीर के फकीर बने हुए है । आर्य समाज का जबतक बोलबाला था तब तक इसमें कुछ कमी आई थी । लेकिन अब वे निरंकुश हो गये हैं। सरकार भी कुछ नहीं कर पाती ।

प्रश्न 4.
क्या आपने हिन्दू और मुसलमानों को साथ रहते हुए देखा है? उनमें क्या-क्या समानताएँ हैं ?
उत्तर-
मैं तो जन्म से ही हिन्दू और मुसलमानों को साथ-साथ रहते हुए देखा है। हमने देखा ही नहीं है, बल्कि साथ-साथ रहे भी हैं और आज भी साथ-साथ रह रहे हैं। अभी का आर्थिक जीवन इतना पेचिदा हो गया है कि बिना एक-दूसरे का सहयोग लिये हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। हम सभी साथ-साथ है । कभी-कभी कुछ राजनीतिक कारणों से विभेद-सा लगता है, हे अन्दर से सभी साथ-साथ हैं । कुछ राजनीतिक दल तो ऐसे

हैं जो एक होने ही नहीं देना चाहते हैं ? सदैव लड़ाते रहना चाहते हैं । वे यही दिखाने में मशगूल रहते हैं कि कौन पार्टी कितना मुसलमानों की हितैषी है। लेकिन इस धूर्तता को मुसलमान भी समझ गये हैं । इसका उदाहरण अभी बिहार और गुजरात है। अब राजनीतिक आधार पर वोट पड़ने लगे हैं । ध म और जाति के आधार पर नहीं ।

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 5.
सांस्कृतिक रूप से सभी धर्मावलम्बियों को और करीब लाने के लिये आप क्या-क्या करना चाहेंगे, जिससे सौहार्दपूर्ण माहौल बने ?
उत्तर-
सांस्कृतिक रूप से सभी धर्मावलम्बियों को और करीब लाने के लिये हम सभी मिलजुलकर संस्कृत उत्सव मनाएँगे । उनके शादी-विवाह आदि खुशी के मौके पर उनको अपने यहाँ बुलाएँगे और उनके बुलावे पर उनके यहाँ जाएँगे । ऐसा करना क्या है, सदियों से ऐसा होता भी आया है और अभी भी हो रहा है । यदि राजनीतिक नेता चुप रहें तो कहीं कोई गड़बड़ी नहीं होगी।

Bihar Board Class 7 Social Science सामाजिक-सांस्कृतिक विकास Notes

पाठ का सार संक्षेप

भारत में प्राचीन काल से ही मेल-जोल की परम्परा रही है। तर्क-अफगान आक्रमणकारियों के पहले जितने भी आक्रमणकारी आये, वे हारे या जीते यहीं के होकर रह गये । आज कौन यूनानी है और कौन शक या हूण किसी की कोई पहचान नहीं, सब परस्पर घुल-मिल गये । तुर्क-अफगानों के बाद मुगल आये । आरम्भ में थोड़ा-बहुत मनोमालिन्य के बाद सभी एक-दूसरे के साथ घुलमिल गये, लेकिन इन्होंने अपनी पहचान कायम रखी । वैसे तो व्यापारिक काम से अरब के लोग सातवीं सदी के आरम्भ से ही आना आरम्भ कर दिये थे, जिस समय इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था । इस्लाम के फैलने के बाद पहला आक्रमण आठवीं सदी में मुहम्मद-बिन-कासिम के नेतृत्व में सिंध और दक्षिण-पश्चिम पंजाब पर हुआ और वहाँ उनका शासन स्थापित हो गया। लेकिन ये अल्पकाल तक ही टीक पाये।

सिलसिलेवार आक्रमण महमूद गजनवी का था, किन्तु राज्य विस्तार के लिये नहीं, बल्कि लूट-पाट मचाने के लिये । इसके लूट-पाट की खबरों से भारतीय राजाओं की शक्ति की पोल खुल गई । मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर यहाँ दिल्ली को हड़प लिया । उसी ने यहाँ उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र को अपने नियंत्रण में कर दिल्ली सल्तनत की नींव डाल दी। स्वयं तो गोरी लौट गया किन्तु अपने एक विश्वासी सेनापति को यहाँ का शासन सौंप गया । सेनापति चूँकि उसका गुलाम था, अत: उसके वंश को गुलाम वंश कहा गया । 1206 में गुलाम वंश की स्थापना हो चुकी थी।

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ से तुर्क-अफगानों के साथ कुछ बौद्धिक स्तर, पर मेलजोल बढ़ने लगा था । अलबरूनी ने हिन्दुओं के धर्म, विज्ञान और सामाजिक जीवन से सम्बद्ध ‘किताब-उल-हिन्द’ लिखी । सूफी संत और इस्लाम धर्म प्रचारक गाँव-गाँव घूमकर लोगों को मन से तुर्कों के निकट लाने का सफल प्रयास किया । सूफी संतों के प्रति हिन्दुओं का उतना ही सम्मान . था जितना मुसलमानों का । खानकाहों और पीरों के दरगाहों पर हिन्दुओं का आना-जाना बढ़ गया । तुर्क-अफगान और मुगलों के शासन कार्य की भाषा फारसी थी । अतः हिन्दू राज्य कर्मचारियों को फारसी पढ़ना पड़ा । आगे चलकर फारसी, तुर्की, ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली हिन्दी को मिलाकर उर्दू भाषा का विकास हुआ । उर्दू ने हिन्दू-मुसलमानों को और भी निकट ला दिया ।

यद्यपि कागज का आविष्कार चीन में हुआ, लेकिन इसके तकनीक को भारत में लाने वाले फारस वाले ही थे । इससे लाभ हुआ कि अब भारत में पुस्तक लेखन का काम पत्तों के बजाय कागज पर होने लगा । जिन हिन्दुओं ने इस्लाम धर्म को कबूला, उन्होंने शादी-विवाह की अपनी पुरानी परम्परा को । जारी रखा । कुछ बाहरी मुसलमान भारतीय परम्पराओं को अपनाने लगे । इससे एक मिल-जुली संस्कृति का विकास हुआ ।
भारत में भक्ति अर्थात ईश्वर के प्रति अनुराग की परम्परा प्राचीन काल से ही चलती आई है। दक्षिण भारत में भक्ति एक आन्दोलन के रूप में चल पड़ी । इन्होंने तीन मार्ग, बताए :

  1. ज्ञान मार्ग
  2. कर्म मार्ग तथा
  3. भक्ति मार्ग ।

श्रीमद्भागवत बताता है कि मनुष्य भक्ति भाव से ईश्वर की शरण में जाकर पुनर्जन्म के झंझट से मुक्ति प्राप्त कर सकता है । पुराणों में उल्लेख है कि भक्त भले ही किसी जाति-पाति का हो, वह सच्ची भक्ति से ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है । वेदों और उपनिषदों में आत्मा-परमात्मा के बीच सीधा सम्बंध स्थापित करने का विचार व्यक्त किया गया है । उपनिषदों ने धार्मिक ब्राह्माडम्बर को त्यागने को कहा ।

वैदिक रीति-रिवाज, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड काफी महंगा हो गया था । पुरोहित अपने लाभ के लिये कर्मकाण्ड को खर्चीला बनाते जा रहे थे । सर्वसाधारण इन पाखंडों से ऊबने लगा था । दलित वर्ग छुआ-छूत और ऊँच-नीच के भेद-भाव से अपने को अपमानित महसूस कर रहा था ।

इस्लाम धर्म एकेश्वरवादी एवं समतावादी सिद्धान्त का प्रचार करता था। इस्लाम में कोई ऊँच और न कोई नीच होता है । इससे भक्त संतों ने हिन्दू-ध म में आत्म सुधार के प्रयास शुरू किए और भक्ति आन्दोलन चल पड़ा । भक्ति आन्दोलन को आप लोगों तक पहुँचाने का काम तमिल क्षेत्र के अलवार और नयनार संतों ने किया । इन्होंने भी पुनर्जन्म से मुक्ति और ईश्वर के पूर्ण भक्ति पर बल दिया । इन्होंने समाज के सभी लोगों के बीच अपने

मत का प्रचार किया । भक्त संतों का आम जनों से सीधा संबंध था । फलतः लोगों ने इनके सम्मान में मंदिरों का निर्माण किया तथा इनकी जीवनियाँ लिखीं।

भक्ति काल में ही महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य का प्रादुर्भाव हुआ। … अपनी 32 वर्ष की अल्पाआयु में इन्होंने भारत के चारों ओर मठों का निर्माण

कराया, जिससे देश की एकता हर तरह से बनी रहे । शंकराचार्य ने उत्तर में बद्रीकाश्रम, दक्षिण में शृंगेरी मठ, पूरब में पुरी तथा पश्चिम में द्वारिका मठ का निर्माण कराया और वहाँ पुजारियों को नियुक्त किया । शंकराचार्य अद्वैतवादी सिद्धांत के प्रतिपादक थे। उनका मानना था कि केवल ब्रह्म ही सत्य है, बाकी सब मिथ्या हैं। इनके मत को रामानुज ने आगे बढ़ाया।

दक्षिण भारत में ‘वीरशैव’ आन्दोलन शुरू हुआ । इन्होंने ब्राह्मणवाद के विरुद्ध निम्न जातियों और नारियों के प्रति समर.कदी विचार प्रस्तुत किये । मूर्तिपूजा और कर्मकाण्डों का विरोध किया गया । रामानुज के विचार सम्पूर्ण दक्षिण भारत से लेकर महाराष्ट्र तक फैल गया ।

महाराष्ट्र की वैष्णव भक्ति की धारा में 13वीं सदी के नामदेव से 17वीं सदी के तुकाराम तक भक्तों की एक समृद्ध परम्परा देखने को मिलती है। इन लोगों ने ईश्वर के प्रति श्रद्धा, भक्ति और प्रेम के सिद्धान्त का प्रचार किया। इन्होंने मूर्ति पूजा, तीर्थ, कर्मकाण्ड आदि का खण्डन किया, ऊँच-नीच के भेद-भाव का विरोध किया तथा अपने अनुयायियों में सभी जाति के लोगों, महिलाओं और मुसलमानों को भी शामिल किया ।

तेरहवीं सदी के बाद उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन सुधारवादी आन्दोलन में बदल गया। इस आधार पर ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म, इस्लाम, सूफी संतों एवं तत्कालिन धार्मिक सम्प्रदायों नाथ पंथियों, सिद्धों तथा योगियों आदि की विचारधाराओं को स्पष्ट झलक देखने को मिलती है । इसमें सूफी संतों का भी योग था ।

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

रामानुज की भक्ति परम्परा को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाने का श्रेय रामानन्द को है । कबीर रामानन्द को ही अपना गुरु मानते थे । कबीर ने इनके मत के प्रचार के लिये बहुत कुछ किया । जाति-पाति और धर्म आदि सबसे ऊपर उठकर कबीर ने कहा : “जात-पात पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सी हरि को होई ।”

सगुण सम्प्रदाय वाले राम को विष्णु का अवतार मानते हैं, जबकि निर्गुण सम्प्रदाय वाले ईश्वर की कल्पना निराकार ब्रह्म के रूप में करते हैं । सगुण सम्प्रदाय के प्रमुख संत तुलसी दास थे। वैष्णव धर्म की परम्परा में कृष्ण भक्तों की भी अच्छी जमात है। इस परम्परा के प्रमुख कवि थे मीरा बाई, चैतन्य महाप्रभु, सूरदास, रसखान आदि ।

कबोर ने ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म और इस्लाम-दोनों के ब्राह्मडबर तथा कार्यकलापों की निन्दा की । कबीर के समकालीन गुरुनानक थे । ये भी सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के विरोधी थे। इनको मानने वाले ‘सिक्ख’ कहलाते हैं । एसे संतों में दरिया साहब भी एक प्रमुख संत थे । बिहार के शाहाबाद क्षेत्र में इन्होंने अपने मत का प्रचार किया । ये भी एकेश्वरवादी थे। इन्हें मानने वाले वाराणसी तक में थे ।

सूफीवाद के तहत रहस्यवाद की भावना का अर्थ था कि ईश्वर के रहस्य को जानने का प्रयास करना । भक्त संतों तथा सूफी संतों में काफी समानता थी। सूफी संतों ने मूर्ति पूजा को अस्वीकार किया और एकेश्वरवाद को माना ।

इस्लाम ने शरियत एवं नमाज को प्रधानता दी. जबकि सफी ईश्वर के साथ किसी की परवाह किये बगैर वैसे ही जुड़ा रहना चाहते थे जिस प्रकार बच्चा अपनी माँ से ।

भारत में सबसे पहले सूफी खानकाह की स्थापना का श्रेय सुहरावर्दी परम्परा के संत बहाउद्दीन जकरिया को है । इस परम्परा के संतों ने राजकीय सहयोग से सुखमय जीवन व्यतीत किया और धर्मान्तरण को बढ़ावा दिया ।

खानकाह शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र थे । यहाँ अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती थी। यहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों शिक्षा पाते थे । फुलवारी शरीफ का खानकाह बहुत प्रसिद्ध था । यहाँ की लाइब्रेरी अत्यंत समृद्ध है और यहाँ पाण्डुलिपियों का अम्बार है। देश-विदेश के शोधकर्ता यहाँ आते थे और आते हैं।

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 7 सामाजिक-सांस्कृतिक विकास

भारत में चिश्ती परम्परा भी काफी लोकप्रिय हुई । इसकी स्थापना अजमेर, शरीफ में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने की थी। इस परम्परा के महत्त्वपूर्ण चिश्ती थे राजस्थान के हमीदुद्दीन नागोरी, दिल्ली के ख्वाजा निजामद्दीन औलिया । निजामुद्दीन औलिया को इस सम्प्रदाय के फैलाने का श्रेय दिया जाता है।

भारत की मिली-जुली संस्कृति को बिहार में मजबूत करने का काम मनेरी साहब ने किया। इन्होंने समन्वयवादी संस्कृति के निर्माण का सक्रिय प्रयास किया। मनेरी साहब ने मनेर से सुनार गाँव की यात्रा की और ज्ञानार्जन किया । इन्होंने राजगीर एवं बिहार शरीफ में तपस्या की और धर्म प्रचार किया । मनेरी साहब का मजार बिहार शरीफ में है ।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

Bihar Board Class 6 Hindi भीष्म की प्रतिज्ञा Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से –

प्रश्न 1.
शान्तनु कहाँ के महाराजा थे?
उत्तर:
शान्तनु हस्तिनापुर के महाराजा थे।

प्रश्न 2.
निषादराज ने राजा से अपनी कन्या का विवाह के लिए क्या शर्त रखी?
उत्तर:
निषादराज ने राजा से अपनी कन्या के विवाह के लिए शर्त रखी कि मेरे पुत्री से उत्पन्न बालक ही राजगद्दी पर बैठेगा। तब हम अपनी कन्या का विवाह आपके साथ करेंगे।

प्रश्न 3.
राजा को निषादराज की शर्त मानने में क्या कठिनाई थी?
उत्तर:
राजा को देवव्रत नामक एक पुत्र थे जो महान योद्धा थे। उनमें राजा होने के सारे गुण वर्तमान थे। निषादराज की शर्त मानना देवव्रत के साथ अन्याय होता । राजा से देवव्रत के प्रति अन्याय करना असम्भव था। यही कठिनाई थी।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

प्रश्न 4.
देवव्रत ने हस्तिनापुर की गद्दी पर नहीं बैठने की क्यों प्रतिज्ञा की?
उत्तर:
देवव्रत महान पितृभक्त थे । वे अपने पिता को उदास नहीं देखना चाहते थे। अतः उन्होंने पिता के दुख दूर करने के लिए प्रतिज्ञा की।

प्रश्न 5.
देवव्रत का नाम भीष्म क्यों पड़ा?
उत्तर:
जब देवव्रत ने निषाद राज के सामने भीष्म (कठिन) प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं आजीवन विवाह नहीं करूँगा। उस समय देवताओं ने उनका नाम भीष्म रख दिया।

प्रश्न 6.
देवव्रत ने दाशराज की शर्त क्यों मान ली ? सही कथन के आगे सही (✓) का निशान लगाइए।
(क) वह राजा नहीं होना चाहते थे।
(ख) उन्हें निषादराज को प्रसन्न करना था।
(ग) वह ब्रह्मचारी बनकर यश कमाना चाहते थे।
(घ) वह अपने पिताजी को सुखी देखना चाहते थे?
उत्तर:
(घ) वह अपने पिताजी को सुखी देखना चाहते थे?

प्रश्न 7.
मिलान करे
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा 1
उत्तर:

शान्तनु – हस्तिनापुर के सम्राट ।
भीष्म – हस्तिनापुर के युवराज ।
दाशराज – निषादों के राजा ।
सत्यवती – दाशराज की पुत्री।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

पाठ से आगे –

प्रश्न 1.
अगर आप भीष्म की जगह होते तो क्या करते?
उत्तर:
अगर भीष्म की जगह मैं होता तो वही काम करता जो भीष्म ने किया।

प्रश्न 2.
इस एकांकी का कौन-सा पात्र आपको अच्छा लगा। क्यों ?
उत्तर:
इस एकांकी के पात्रों में देवव्रत मुझे अच्छा लगा क्योंकि अपने पिता की खुशी के लिए उन्होंने सब कुछ त्यागने की प्रतिज्ञा कर ली।

प्रश्न 3.
हस्तिनापुर को वर्तमान में क्या कहा जाता है?
उतर:
पिरली।

प्रश्न 4.
दाशराज की शर्त उचित थी तो क्यों ?
अथवा
अनुचित थी तो क्यों?
उत्तर:
दाशराज की शर्त उचित ही था क्योंकि अगर बिना शर्त के यदि शान्तनु से सत्यवती का विवाह होता तो राजगद्दी के लिए कलह अवश्य होता। अतः हस्तिनापुर को कलह का केन्द्र होने से बचाने के लिए उसने शर्त रखी।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

व्याकरण –

प्रश्न 1.
वाक्य-प्रयोग द्वारा अंतर बताएँ।

(क) कुल – कुल कितने रुपये हैं।
कूल – गंगा के दोनों कूलों पर शहरें हैं।

(ख) सौभाग्य – मदन सौभाग्यशाली व्यक्ति है।
दुर्भाग्य – पिता के मरने पर मेरा दुर्भाग्य आरम्भ हो गया।

(ग) अस्त्र – गदा एक अस्त्र है।
शस्त्र – वाण फेंककर चलाने वाला शस्त्र है।

(घ) पुरी – द्वारिका शहर को द्वारिका पुरी कहते हैं।
पूरी – भोज की व्यवस्था पूरी कर ली गई है।

(ङ) सेवा – नौकर मालिक की सेवा करता है।
सुश्रूषा – पुत्र पिता का शुश्रूषा करता है।

प्रश्न 2.
निवास-स्थान में योजक चिह्न (-) लगे हुए हैं। इस तरह के अन्य उदाहरण पाठ से चनकर लिखिए।
उत्तर:
निवास-स्थान । नारी-रत्न । सूर्य-चन्द्र । भरत-कुल । भीष्म-देवव्रत । देवता-तुल्य। स्नेह-सूत्र । साफ-साफ।

प्रश्न 3.
उदाहरण के अनुसार लिखें –
प्रश्नोत्तर –
Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा 2

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

कुछ करने को –

प्रश्न 1.
इस एकांकी का अभिनय बाल-सभा में कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
महाभारत के कुछ महारथियों का नाम पता कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

भीष्म की प्रतिज्ञा Summary in Hindi

पाठ का सार-संक्षेप

शान्तनु – हस्तिनापुर के सम्राट ।
भीष्म – हस्तिनापुर के युवराज ।
दाशराज – निषादों का राजा।
सत्यवती – दाशराज की पुत्री ।
सैनिक, द्वारपाल, देवगण और सत्यवती की सखियाँ ।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

पहला दृश्य

स्थान यमुना के ‘निकटवर्ती प्रांत में दाशराज का निवास स्थान ।

दाशराज की पुत्री सत्यवती अत्यन्त सुन्दरी थी जिसको देखकर हस्तिनापुर के राजा शान्तनु मोहित हो गये तथा उसे पाने के लिए दाशराज के घर जाकर सत्यवती के लिए आग्रह किया। लेकिन दाशराज ने शान्तन के सामने एक शर्त रखी कि यदि मेरे पुत्री से उत्पन्न बालक ही हस्तिनापुर के राजा बने तो मैं अपनी पुत्री को आपके साथ भेज सकता हूँ। यह शर्त राजा शान्तनु को मंजूर नहीं था क्योंकि शान्तनु का प्रथम पुत्र देवव्रत (गंगा पुत्र) में राजा होने के सारे गुण वर्तमान थे। यह शर्त मानना देवव्रत के साथ अन्याय होगा यह कहकर राजा उदास मन वापस घर लौट गये। जब उनकी उदासी के कारण देवव्रत को मालूम हुआ तो अपने पिता के दुख को दूर करने की इच्छा से दाशराज के घर गये।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 10 भीष्म की प्रतिज्ञा

दूसरा दृश्य

स्थान – दाशराज का घर।

दाशराज ने देवव्रत का स्वागत कर आने का कारण पूछा । देवव्रत ने कहा “मैं माता सत्यवती को लेने आया हूँ। दाशराज ने अपनी शर्त को पुनः देवव्रत के सामने दुहराया । देवव्रत ने कहा –

ठाह है “मैं वचन देता हूँ कि मैं हस्तिनापुर का राजा नहीं बनूंगा। सत्यवती से उत्पन्न मेरा भाई ही राजा बनेगा। मैं उसकी सेवा उसी प्रकार करूँगा जैसे पिताजी का कर रहा हूँ।”

दाशराज ने कहा, लेकिन बाद में आपके पत्र तो उस अधिकार को प्राप्त कर ही लेंगे। अत: यह सम्बन्ध मैं नहीं स्थापित करूँगा । देवव्रत ने उसी समय हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं विवाह भी नहीं करूंगा। सब ओर से “धन्य हैं देवव्रत” की ध्वनि सुनाई पड़ने लगी। देवताओं ने फूल बरसाकर देवव्रत के कठिन प्रतिज्ञा के लिए खुशी जाहिर की। देवताओं ने ही उसी समय देवव्रत को भीष्म (कठिन) प्रतिज्ञा करने के कारण देवव्रत का नाम भीष्म रख दिया।

दाशराज प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुत्री की विदाई कर दी। भीष्म ने सत्यवती का पैर छूकर प्रणाम किया तथा रथ पर बैठाकर घर ले गये।

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

Bihar Board Class 12 Economics खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
संतुलित व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यापार शेष एवं चालू खाता शेष में अन्तर –

  1. व्यापार के निर्यात एवं आयात शेष को कहते हैं जबकि व्यापार शेष, सेवाओं के निर्यात व आयात शेष तथा हस्तातरण भुगतान शेष के योग को चालू खाता शेष कहते हैं।
  2. चालू खाता शेष की तुलना में व्यापार शेष एक संकुचित अवधारण है।
  3. व्यापार शेष में केवल भौतिक वस्तुओं के आयात-निर्यात को ही शामिल किया जाता है जबकि चालू खाता शेष में भौतिक वस्तुओं के निर्यात आयात के साथ-साथ सेवाओं व हस्तातरण भुगतान के लेन-देन को भी शामिल करते हैं।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 2.
आधिकारिक आरक्षित निधि का लेन-देन क्या है? अदायगी-संतुलन में इनके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मौद्रिक अधिकारियों द्वारा वित्तीय घाटे का वित्तीयन करने के लिए परिसपत्तियों को बेचना अथवा ऋण लेना आधिकारिक लेन-देन कहलाता है। दूसरा भुगतान शेष धनात्मक होने पर मौद्रिक अधिकारियों द्वारा उधार देना या परिसंपत्तियों का क्रय करना भी आधिकारिक लेन-देन की श्रेणी में आता है।

आधिकारिक लेन-देन का महत्त्व:

  1. समग्र भुगतान शेष घाटे या अधिशेष का समायोजन आधिकारिक लेन-देन से किया जा सकता है।
  2. भुगतान शेष घाटे का भुगतान मौद्रिक सत्ता का दायित्व होता है तथा भुगतान शेष अधिशेष मौद्रिक सत्ता की लेनदारी होती है इस उद्देश्य की पूर्ति आधिकारिक लेन-देन से पूरी होती है।
  3. रेखा से ऊपर व रेखा से नीचे के समायोजन आधिकारिक लेन-देन पूरा करते हैं।

प्रश्न 3.
मौद्रिक विनिमय दर और वास्तविक विनिमय दर में भेद कीजिए। यदि अपको घेरलू वस्तु अथवा विदेशी वस्तुओं के बीच किसी को खरीदने का निर्णय करना हो, तो कौन सी दर अधिक प्रासंगिक होगी?
उत्तर:
दूसरी मुद्रा के रूप में एक मुद्रा की कीमत को विनिमय दर कहते हैं। दूसरे शब्दों में विदेशी मुद्रा की एक इकाई मुद्रा का क्रय करने के लिए घरेलू मुद्रा की जितनी इकाइयों की जरूरत पड़ती है उसे विनिमय दर कहते हैं। इसे मौद्रिक अथवा सांकेतिक विनिमय दर कहते हैं क्योंकि इसे मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जाता है। एक ही मुद्र में मापित विदेशी एवं घरेलू कीमतों के अनुपात को वास्तविक विनिमय दर कहते हैं।

वास्तविक विनिमय दर = e \(\frac { P_{ F } }{ P } \) जहाँ e विदेशी की एक इकाई की कीमत अथवा सांकेतिक विनिमय दर P r विदेशी कीमत स्तर तथा P देशी कीमत स्तर

घरेलू अथवा विदेशी वस्तुओं को खरीदने के लिए सांकेतिक विनिमय दर अधिक प्रभावशाली होती हैं क्योंकि एक देश का संबंध कई देशों से होता है अतः द्विवर्षीय दर के बजाय एकल दर अधिक पसंद की जाती है। करेन्सियों की विनिमय दर की सूची सांकेतिक विनियिम दर के आधार पर की जाती है जिससे विदेशी करेंसियों की प्रतिनिधि टोकरी की कीमत प्रकट होती है। वास्तविक विनिमय दर का प्रयोग किसी देश की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की माप के लिए किया जाता है।

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 4.
यदि 1 रुपये की कीमत 1.25 येन है और जापान में कीमत स्तर 3 हो तथा भारत में 1.2 हो, तो भारत और जापान के बीच वास्तविक विनिमय दर की गणना कीजिए (जापानी वस्तु की कीमत भारतीय वस्तु के संदर्भ में) संकेत : रुपये में येन की कीमत के रूप में मौद्रिक विनिमय दर को पहले ज्ञात कीजिए।
हल:
PF = 3 एवं P = 1.2; 1.25 येन की कीमत = 1 रुपया
1 येन की कीमत \(\frac{1}{1.25}\) रूपय \(\frac{1}{125}\) रुपया = \(\frac{1}{125}\) रुपया
वास्तविक विनिमय दर = \(\frac{1}{100}\), \(\frac{4}{5}\) × \(\frac{30}{100}\) = 2
उत्तर:
वास्तविक विनिमय दर = 2

प्रश्न 5.
स्वचलित युक्ति की व्याख्या कीजिए जिसके द्वारा स्वर्णमान के अंतर्गत अदायगी-संतुलन प्राप्त किया जाता था।
उत्तर:
वर्ष 1870 से प्रथव विश्व युद्ध तक स्थायी विनिमय दर के लिए मानक स्वर्ण-मान पद्धित ही आधार थी। इस पद्धति में सभी देश अपनी मुद्रा की कीमत सोने के रूप में परिभाषित करते थे। प्रत्येक भागीदार देश को अपनी मुद्रा को निःशुल्क स्वर्ण में परिवर्तित करने की गारंटी देनी पड़ती थी। स्थिर कीमतों पर मुद्रा की सोने में परिवर्तनीयता सभी देशों को स्वीक त थी।

विनिमय दर समष्टीय खुली अर्थव्यवस्थाओं के द्वारा सोने की कीमत के आधार पर परिकलित किए जाते थे। विनिमय दर उच्चतम एवं न्यूनतम सीमाओं के मध्य उच्चवचन करते थे। उच्चतम एवं न्यूनतम सीमाओं का निर्धारण मुद्रा की ढलाई, दुलाई आदि के आधार पर तय की जाती थी। आधिकारिक विश्वसनीयता कायम रखने के लिए प्रत्येक देश को स्वर्ण का पर्याप्त भण्डार आरक्षित रखना पड़ता था। स्वर्ण के आधार पर सभी देश स्थायी विनिमय दर रखते थे।

प्रश्न 6.
नम्य विनिमय दर व्यवस्था मे विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है?
उत्तर:
परिवर्तनशील विनिमय दर का निर्धारण विदेशी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है। लोचशील विनिमय दर प्रणाली में केन्द्रीय साधारण नियमों को अपनाता है। ये नियम प्रत्यक्ष रूप से लोचशील दर को निर्धारित करने में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। इस प्रणाली में आधिकारिक लेन-देन का स्तर शून्य होता है।

लोचशील विनिमय दर में परिवर्तन विदेशी मुद्रा की मांग व पूर्ति की समानता लाने के लिए होता है। दूसरे शब्दों में एक दूसरी मुद्रा के रूप में कीमत के रूप में विनिमय दर तय होती हैं। एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा के रूप में कीमत मुद्रा की मांग व पूर्ति पर निर्भर करती हैं। विदेशी मुद्रा की मांग-निम्नलिखित कारको के कारण विदेशी मुद्रा की मांग उत्पन्न होती है।

  1. वस्तुओं एवं सेवाओं का आयात करने के लिए।
  2. वित्तीय परिसंपत्तियों का आयात करने के लिए।
  3. उपहार या हस्तातरण भुगतान विदेशों को भेजने के लिए।
  4. विदेशी विनिमय दर पर सट्टा उद्देश्य के लिए। विदेशी मुद्रा की मांग एवं विनिमय दर से विपरीत संबंध होता है इसलिए विदेशी मुद्रा का मांग वक्र ऋणात्मक ढ़ाल का होता है।

विदेशी मुद्रा की आपूर्ति:
विदेशी मुद्रा की पूर्ति के निम्नलिखित स्रोत हैं –

  1. घरेलू वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात
  2. वित्तीय परिसपत्तियों का निर्यात
  3. विदेशों से उपहार तथा हस्तातरण भुगतान की प्राप्ति
  4.  सट्टा उद्देश्य के लिए

विदेशी मुद्रा की आपूर्ति एवं विनिमय दर में सीधा संबंध होता है अतः विदेशी मुद्रा का आपूर्ति वक्र धनात्मक ढाल का होता है। विनिमय दर का निर्धारण-जहाँ विदेशी मुद्रा की मांग व पूर्ति समान हो जाती है, विनिमय दर वहाँ निर्धारित होती है। विदेशी मुद्रा की मांग व पूर्ति का साम्य बिन्दु वह होता है मुद्रा का मांग वक्र तथा पूर्ति वक्र एक-दूसरे को काटते हैं। साध्य बिन्दु पर विनिमय दर को साम्य विनिमय दर तथा मांग व पूर्ति की मात्रा को साम्य मात्रा कहते हैं। इसे निम्नलिखित चित्र में दर्शाया गया है –
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 part - 1 खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र img 1

Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न 7.
अवमूल्यन और मूल्यह्रास में अंतर कीजिए।
उत्तर:
मुद्रा अवमूल्न का अभिप्राय सामाजिक क्रिया के द्वारा विनिमय दर को बढ़ाने से है। विनिमय दर Pagged Exchange पद्धति से बढ़ायी जाती है। व्यापार शेष घाटे को पूरा करने के लिए अवमूल्न एक उपकरण माना जाता है। अवमूल्यन से घरेलू उत्पाद सापेक्ष रूप से सस्ते हो जाते हैं इसके विपरीत विदेशी उत्पादों की घरेलू बाजार में मांग बढ़ जाती है। बार-बार अवमूल्न से आधिकारिक आरक्षित कोष समाप्त हो जाते हैं। जब बाजार की मांग एंव पूर्ति शक्तियों के प्रभाव से एक देश की मुद्रा का मूल्य बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के विदेशी मुद्रा में कम हो जाता है तो इसे मूल्य ह्रास कहते हैं।

प्रश्न 8.
क्या केंद्रीय बैंक प्रबंधित तिरती व्यवस्था में हस्तक्षेप करेगा? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्धित तरणशीलता पद्धति दो विनिमय दर पद्धतियों का मिश्रण होती है। यह दो चरम विनिमय दरों-स्थिर विनिमय दर एवं लोचशील विनिमय दर के बीच की दर हैं। इस पद्धति में सरकार विनिमय दर निर्धारण में हस्तक्षेप कर सकती है जब कभी केन्द्रीय बैंक विनिमय दर में मामूली परिवर्तन उचित समझता है तो विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करके हस्तक्षेप कर सकता है। अर्थात् विनिमय दर की इस पद्धति में आधिकारिक लेन-देन शून्य नहीं होता है।

प्रश्न 9.
क्या देशी वस्तुओं की मांग और वस्तुओं की देशीय माँग की संकल्पनाएँ एक समान है?
उत्तर:
एक बन्द अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की मांग तथा वस्तुओं की घरेलू मांग समान होती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि देश की घरेलू सीमा के बाहर न तो घरेलू वस्तुओं की मांग होती है और न ही घरेलू सीमा में विदेशी वस्तुओं की मांग होती है। लेकिन एक खुली अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की मांग तथा वस्तुओं की घरेलू मांग समान नहीं होती है।

घरेलू वस्तुओं की मांग में उपभोग मांग (परिवार क्षेत्र द्वारा), निवेश मांग, सरकारी उपभोग के लिए मांग व निर्यात के लिए मांग के योग में आयात की मांग को घटाते हैं। संक्षेप में घरेलू वस्तुओं की मांग = परिवार क्षेत्र की उपयोग मांग + निवेश मांग + सरकारी व्यय मांग + निर्यात (मांग) – आयात (मांग)
= C + I + G + X – M
= C + I + G + NX (NX शुद्ध निर्यात)

वस्तुओं के लिए घरेलू मांग में परिवार क्षेत्र का उपयोग व्यय, निवेश व्यय, सरकारी व्यय व आयात के योग से निर्यात मांग को घटाते हैं।
वस्तुओं की घरेलू मांग = C + I + G + M – X
= C + I + G + NX (NX शुद्ध निर्यात)

यदि शुद्ध निर्यात का मूल्य शून्य होता होगा तो घरेलू वस्तुओं की मांग तथा वस्तुओं की घरेलू मांग दोनों समान होंगे। यदि शुद्ध निर्यात का मूल्य धनात्मक होता है तो घरेलू वस्तुओं की मांग, वस्तुओं की घरेलू मांग से अधिक होगी। इसके विपरीत यदि शुद्ध निर्यात का मान ऋणात्मक होता है तो घरेलू वस्तुओं की मांग, वस्तुओं को घरेलू मांग से कम होगी।

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प्रश्न 10.
जब M = 3D60 + 0.06Y हो, तो आयात की सीमांत प्रवृत्ति कया होगी? आयात की सीमांत प्रवृत्ति और समस्त माँग फलन में क्या संबंध है?
उत्तर:
आयात की सीमान्त प्रवृत्ति अतिरिक्त मुद्रा आय का वह भाग है जो आयात पर व्यय किया जाता है। आयात की सीमान्त प्रवृत्ति की अवधारणा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति जैसी ही है। इसलिए आयात की मांग आय के स्तर पर निर्भर करती है तथा कुछ भाग स्वायत्त होता है। M = m + my M स्वायत्त आयात, m आयात की सीमान्त प्रवृत्ति m = 60 + 0.06Y उक्त दोनों समीकरणों की तुलना करने पर स्वायत्त आयात M = 60, आयात की सीमान्त प्रवृत्ति m = 0.06 आयात की सीमान्त प्रवृत्ति का मान 1 से कम तथा शून्य से अधिक होता है।

MPC का मान शून्य से अधिक उपभोग होने पर प्रेरित प्रभाव विदेशी वस्तुओं की मांग पर चला जाता है। इससे घरेलू वस्तुओं की मांग घट जाती है। आयात एक प्रकार का स्राव होता है अतः साम्य आय का स्तर कम हो जायेगा। अत: आयात की स्वायत्त मांग में वृद्धि घरेलू वस्तुओं की मांग को घटाता है।

प्रश्न 11.
खुली अर्थव्यवस्था स्वायत्व व्यय खर्च गुणक बंद अर्थव्यवस्था के गुणक की तुलना में छोटा कयों होता है?
उत्तर:
बंद अर्थव्यवस्था में साम्य आय कर स्तर
Y = C + cY + 1 + G या, Y – cY = C + 1 + G
या, Y(1 – c) = C + 1 + G या, Y = \(\frac{C+1+G}{1-c}\) = \(\frac{A}{1-c}\) (C + 1 + G = A)
\(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-c}\), व्यय गुणक = \(\frac{1}{1-c}\)

खुली अर्थव्यस्था में साम्य आय का स्तर Y = C+ cY + 1 + G + X – M – mY
Y – cY + mY = C + 1 + G + X
Y(1 – c + m) = C + 1 + G + X
Y = \(\frac{C+1+G+X}{1-C+m}\) या Y = \(\frac{A}{1-c+m}\) (A = C + 1 + G + X)

व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-c+m}\)
आयात की सीमान्त प्रवृत्ति का मान शून्य से अधिक है अतः उपभोग का प्रेरित कुछ भाग आयात के लिए वस्तुओं की मांग पर चला जाता है। दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं के व्यय गुणकों की तुलना करने पर बन्द अर्थव्यवस्था का व्यय गुणक, बन्द अर्थव्यवस्था के व्यय गुणक से ज्यादा है।

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प्रश्न 12.
पाठ में एकमुश्त कर की कल्पना के स्थान पर आनुपातिक कर T = tY के साथ खुली अर्थव्यवस्था गुणक की गणना कीजिए।
उत्तर:
अनुपतिक कर की स्थिति में साम्य आय स्तर
Y = 3DC + C (I – t)Y + I + G + X – M – mY
Y – C (1 – t)Y+ mY = C + I + G + X – M
Y [1 – C + ct + m] = C + I + G + X – M
Y = \(\frac{C + I + G + X – M}{1 – C(1 – t) + m}\) (A = DC + I + G + X – M)

व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-c(1-t)+m}\)
एकमुश्त कर की स्थिति में साम्य आय
Y = C + C (Y – T) + I + G + X – M – mY
Y – cY + mY = C – CT + I + G + X – M
Y [1 – c + m] = C – CT + I + G + X – M
Y = \(\frac{c – ct + I + G + X – M}{1 – c + m}\)
= \(\frac{A}{1 – c + m}\) (A = C – CT + I + G + X – M)

व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-c+m}\)

प्रश्न 13.
मान लीजिए C = 40 + 08YD, T = 50,G = 40, X = 90, M = 50 + 0.05Y
(a) संतुलन आया ज्ञात कीजिए
(b) संतुलन आय पर निवल निर्यात संतुलन ज्ञात कीजिए
(c) संतुलन आय और निवल निर्यात संतुलन क्या होता है, जब सरकार के क्रय में 40 से 50 की वृद्धि होती है।
उत्तर:
C = 40 + 0.8YD, T = 50, 1 = 60, G = 40, X = 90, M = 50 + 0.05Y
(a) साम्य आय का स्तर:
Y = C + C(Y – T) + I + G + X – (M + mY)
या Y = \(\frac{A}{1-C+M}\), = \(\frac{C-CT+I+G+X-M}{1-C+M}\)
= \(\frac{40 – 0.8 × 50 + 60 + 40 + 90 – 50}{1 – 0.8 + 0.05}\) = \(\frac{40 – 40 + 60 + 40 + 90 – 50}{1 – 0.75}\)
= \(\frac{140}{0.25}\) = \(\frac{140×100}{25}\) = 560

(b) साम्य आय स्तर पर शुद्ध निर्यात –
NX = X – M – my = 90 – 50 – 0.05 × 560 = 40 – 28.0 = 12

(c) जब सरकारी व्यय 40 से 50 हो जायेगा साम्य आय
Y = C – CT + 1 + G + X – MI – C + m
= 40 – 8 × 50 + 60 + 50 + 90 – 50
= 1 – 0.08 – 0.05
= 150.25
= 600

साम्य आय सतर शुद्ध निर्यात शेष NX = X – M – mY
= 90 – 50 + 0.05 × 600 = 90 – 50 + 30
= 10
उत्तर:
(a) साम्य आय = 560
(b) साम्य आय पर शुद्ध निर्यात शेष = 12
(c) नई साम्य आय = 600
शुद्ध निर्मात शेष = 10

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प्रश्न 14.
उपर्युक्त उदाहरण में यदि निर्यात में x = 100 का परिवर्तन हो, तो सन्तुलन आय और निवल निर्यात संतुलन में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
C = 40 + 0.08 YD, T = 50, I = 60, G = 40, X = 100, M = 50 + 0.05Y
साम्य आय Y = \(\frac{A}{1-C+M}\) = \(\frac{C-CT+G+I+X-M}{I-C+M}\)
[∵ A = C – CT + G + I + X – M]
= \(\frac{40-0.8×50+40+60+100-50}{1-0.8+0.05}\)
= \(\frac{40-40+40+60+100-50}{1-0.75}\) = \(\frac{150}{0.25}\) = \(\frac{150 × 100}{25}\) = 600
= 100 – 50 – 30 = 20
उत्तर:
साम्य आय स्तर = 600
शुद्ध निर्यात शेष = 20

प्रश्न 15.
व्याख्या कीजिए कि G – T = (SG – 1) – (X – M)
उत्तर:
एक बन्द अर्थव्यवस्था में बचत एवं निवेश आय के साम्य स्तर पर समान होते है। लेकिन एक खुली अर्थव्यवस्था में साम्य आय स्तर पर बचत एवं निवेश असमान हो सकते हैं।
Y = C + G + I + NX
S – I + NX
एक अर्थव्यवस्था में निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की बचतों का योग समग्र बचत के बराबर होता है –
NX = SP + SG – 1
NX = Y – T + T – G – 1
[∵SP = Y – C – T & SG = T – G]
NX = Y – C – G – 1
G = Y – C – 1 – NX
G – T = Y – C – T – 1 – NX
= [SP – 1] – N [∵ SP = Y – C – T]

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प्रश्न 16.
यदि देश B से देश A में मुद्रास्फीति ऊँची हो और दोनों देशों में विनिमय दर स्थिर हो, तो दोनों देशों के व्यापार शेष का क्या होगा?
उत्तर:
देश ‘अ’ में स्फीति का स्तर देश ‘ब’ से ऊंचा है। स्थिर विनयम दर की स्थिति में देश ‘ब’ से देश ‘अ’ को वस्तुओं का आयात करना लाभ-प्रद होगा। परिणाम स्वरूप देश ‘अ’ अधिक वस्तुओं का अधिक मात्रा में आयात करेगा और देश ब को कम मात्रा में वस्तुओं का निर्यात करेगा। अतः ‘अ’ के सामने व्यापार शेष घाटे की समस्या उत्पन्न होगी। दूसरी ओर देश ‘ब’ देश ‘अ’ से कम मात्रा में वस्तुओं का आयात करेगा और निर्यात अधिक मात्रा में करेगा। अतः देश ‘ब’ का व्यापार शेष अधिशेष (धनात्मक) होगा।

प्रश्न 17.
क्या चालू पूँजीगत घाटा खतरे का संकेत होगा? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यदि व्यापार शेष घाटा कम बचत और अधिक बजट घाटे को जन्म देता है यह चिन्ता का विषय हो भी सकता है और नहीं भी। यदि इस स्थिति में निजी क्षेत्र अथवा सरकारी क्षेत्र का उपभोग अधिक हो तो उस देश के पूंजी भण्डार अधिक दर से नहीं बढ़ेगा और पर्याप्त आर्थिक समृद्धि नहीं होगी। इसके अलावा इसे ऋण का भुगतान भी करना होगा पडेगा। इस दशा में चालू खाता घाटा चेतावनीपूर्ण एवं चिन्ता का विषय होता है। यदि व्यापार शेष व्यापार शेष घाटा अधिक निवेश के लिए काम आता है तो भण्डार स्टॉक अधिक दर बढ़कर पर्याप्त आर्थिक सवृद्धि को जन्म देता है। इस दशा में चालू खाता घाटा चिन्तनीय नहीं होता है।

प्रश्न 18.
मान लीजिए C + 100 + 0.75 YD, I = 500, G – 750, कर आय का 20 प्रतिशत है, x = 150, M = 100 + 0.2Y, तो संतुलन आय, बजट घाटा अथवा आधिक्य और व्यापार घाटा अथवा आधिक्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
साम्य आय Y = C + C(Y – T) + 1 + G + X – M – mY
= 100 + 0.75 (Y – Y) का 20%) + 500 + 750 + 150 – 100 – 0.2Y
= 100 + 7.5 [y – 5) + 500 + 750 + 150 – 100 – 0.2Y
= 1400 + 2 + 4y – 0.2Y
= 1400 + \(\frac{3}{4}\) + \(\frac{4}{5}\) Y – 0.2Y = 1400 + \(\frac{2}{5}\)Y
Y – \(\frac{2}{5}\)Y = 1400 – \(\frac{3}{5}\)Y = 1400
Y = 1400 × \(\frac{5}{3}\) = \(\frac{7000}{3}\)

सरकारी व्यय = 750
सरकारी प्राप्तियाँ = 20% of Y
20% of Y \(\frac{7000}{3}\) = \(\frac{20×7000}{3×100}\) = \(\frac{140000}{3×100}\) = 466.67

सरकारी व्यय सरकारी प्राप्तियों से अधिक हैं इसलिए यह बजट घाटा है।
NX = X – M – mY
Y = 150 – 100 – 2 × \(\frac{7000}{3}\) = 150 – 100 – 466.67 = – 416.67

यह व्यापार घाटा दर्शा रहा है क्योंकि NX ऋणात्मक है।

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प्रश्न 19.
उन विनिमय दर व्यवस्थाओं की चर्चा कीजिए, जिन्हें कुछ देशों ने अपने बाहा खाते में स्थायित्व लाने के लिए किया है।
उत्तर:
विभिन्न देशों ने अपने विदेशी खातों में स्थायित्व लाने के उद्देश्य विभिन्न विनिमय दर पद्धतियों को अपनाया जैसे –
(I) स्थिर विनिमय दर:
इस विनिमय दर से अभिप्राय सरकार द्वारा निर्धारित स्थिर विनिमय दर से है। स्थिर विनिमय दर की उप-पद्धतियां इस प्रकार है –

1. विनिमय दर की स्वर्णमान पद्धति:
1920 तक पूरे विश्व में इस पद्धति को व्यापक स्तर पर प्रयोग किया गया। इस व्यवस्था में प्रत्येक भागीदार देश को अपनी मुद्रा की कीमत सोने के रूप में घोषित करनी पड़ती थी। मुद्राओं का विनिमय स्वर्ण के रूप में तय की गई कीमत सोने की स्थिर कीमत पर होता है।

2. ब्रैटन वुड पद्धति:
विनिमय की इस प्रणाली में भी विनिमय दर स्थिर रहती है। इस प्रणाली में सरकार अथवा मौद्रिक अधिकारी तय की गई विनिमय दर में एक निश्चित सीमा तक परिवर्तन की अनुमति प्रदान कर सकते हैं। सभी मुद्राओं का मूल्य इस प्रणाली में अमेरिकन डालर में घोषित करना पड़ता था। अमेरिकन डालर की सोने में कीमत घोषित की जाती थी। लेकिन दो देश मुद्राओं का समता मूल्य अन्त में केवल स्वर्ण पर ही निर्भर होता था। प्रत्येक देश की मुद्रा के समता मूल्य में समायोजन विश्व मुद्रा कोष का विषय था।

(II) लोचशील विनिमय दर:
यह वह विनिमय दर होती है जिसका निर्धारण अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विदेशी मुद्रा की मांग व पूर्ति की शक्तियां के द्वारा होता है। जिस विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा की मांग व पूर्ति समान हो जाती है वही दर साम्य विनिमय दर कहलाती है। आजकल समूचे विश्व में विभिन्न देशों के मध्य आर्थिक लेन-देन का निपटरा लोचशील विनिमय दर के आधार पर होता है।

Bihar Board Class 12 Economics खुली अर्थव्यवस्था : समष्टि अर्थशास्त्र Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों का सार क्या होता है?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों का सार है कि आय से अधिक खर्च की भरपाई स्वर्ण, स्टाँक, विदेशी ऋण आदि के द्वारा की जायेगी।

प्रश्न 2.
चालू खाते में घाटे का वित्तीय स्रोत लिखो।
उत्तर:
चालू खाते में घाटे का वित्तीय स्रोत शुद्ध पूंजी प्रवाह से किया जाता है।

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प्रश्न 3.
वह अवधि लिखो जिसमें भारत का व्यापार शेष घाटे वाला था।
उत्तर:
लगभग 24 वर्ष भारत का व्यापार शेष घाटे वाला था।

प्रश्न 4.
वह अवधि लिखो जिसमें भारत का व्यापार शेष घाटा कम हो गया और अधिशेष में बदल गया।
उत्तर:
2001 – 02 से 2003 – 04 की अवधि में भारत का चालू घाटे में अधिशेष था।

प्रश्न 5.
चालू खाते में अधिक घाटे को किससे पूरा नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
अदृश्य अधिशेष से चालू खाते के घाटे की भरपाई नहीं करनी चाहिए।

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प्रश्न 6.
अर्थव्यवस्था के खुलेपन की माप क्या होती है?
उत्तर:
कुल विदेशी व्यापार (आयात व निर्यात) का सकल घरेलू उत्पाद के साथ अनुपात से अर्थव्यवस्था के खुलेपन को मापते हैं।

प्रश्न 7.
2004 – 05 में भारत का विदेशी व्यापार कितना था?
उत्तर:
2004 – 05 में भारत की विदेशी व्यापार सकल घरेलू उत्पाद का 38.9 प्र.श. था। इसमें 17.1 प्र.श. आयात व 11.8 प्र.श निर्यात था।

प्रश्न 8.
5 वर्ष 1985-86 में भारत का विदेशी व्यापार कितना था?
उत्तर:
वर्ष 1985-86 में भारत का विदेशी व्यापार सकल घरेलू उत्पाद का 16 प्र.श. था।

प्रश्न 9.
विदेशी आर्थिक एजेन्ट राष्ट्रीय मुद्रा को कब स्वीकार करते हैं?
उत्तर:
विदेशी आर्थिक एजेन्ट राष्ट्रीय मुद्रा को तब स्वीकार करते है जब उन्हें विश्वास होता मुद्रा की क्रय शक्ति स्थिर रहेगी।

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प्रश्न 10.
मुद्रा का अधिक मात्रा में प्रयोग करने वाले लोगों का विश्वास जीतने के लिए सरकार क्या काम करती है?
उत्तर:
सरकार को यह घोषणा करनी पड़ती है कि मुद्रा को दूसरी परिसपत्तियों में स्थिर कीमतों पर परिवर्तित किया जायेगा।

प्रश्न 11.
भुगतान शेष के चालू खाते में क्या दर्ज किया जाता है?
उत्तर:
वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात-आयात तथा हस्तातरण भुगतान चालू खाते में दर्ज किए जाते हैं।

प्रश्न 12.
भुगतान शेष के पूंजीगत खाते में क्या दर्ज किया जाता है?
उत्तर:
भुगतान शेष के पूंजीगत खाते में मुद्रा, स्टॉक, बॉण्ड आदि का विदेशों के साथ क्रय विक्रय दर्ज किया जाता है।

प्रश्न 13.
आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं कैसी हैं?
उत्तर:
आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं खुली अर्थव्यवस्थाएं हैं।

प्रश्न 14.
एक खुली अर्थव्यवस्था क्या होती है?
उत्तर:
एक खुली अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था होती है जिसके दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक संबंध होते हैं खुली अर्थव्यवस्था कहलाती है।

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प्रश्न 15.
विनिमय दर की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
एक मुद्रा का दसूरी मुद्रा में मूल्य विनिमय दर कहलाता है।

प्रश्न 16.
विदेशी विनिमय बाजार के मुख्य भागीदार के नाम लिखो।
उत्तर:
विदेशी बाजार के मुख्य भागीदार होते हैं –

  1. व्यापारिक बैंक
  2. विदेशी विनिमय एजेन्ट
  3. आधिकारिक डीलर्स तथा
  4. मौद्रिक सत्ता

प्रश्न 17.
विदेशी विनिमय बाजार की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
वह अन्तर्राष्ट्रीय बाजार जिसमें विभिन्न देशों की मुद्राओं का आदान-प्रदान होता है विदेशी विनिमय बाजार कहलाता है।

प्रश्न 18.
वास्तविक विनिमय दर की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
एक मुद्रा में मापी गई विदेशी कीमत एसं घरेलू कीमत के अनुपात को वास्तविक विनिमय दर कहते हैं।
वास्तविक विनिमय दर = ePF eP
जहाँ e सांकेतिक/मौद्रिक विनिमय दर, PF विदेशी कीमत तथा P घरेलू कीमत

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प्रश्न 19.
लोचशील विनिमय दर की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
वह विनिमय दर जिसका निर्धारण विदेशी मुद्रा की मांग तथा पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है लोचशील विनिमय दर कहलाती है।

प्रश्न 20.
विदेशी विनिमय दरों में परिवर्तन को क्या कहते हैं?
उत्तर:
विदेशी विनिमय दरों में परिवर्तनों को मुद्रा का अपमूल्यन या अवमूल्यन कहते हैं।

प्रश्न 21.
स्थिर विनिमय दर की परिभाषा लिखो।
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर से अभिप्राय उस विनिमय दर से जो एक निश्चित स्तर पर रहती है। इसमें मुद्रा की मांग व पूर्ति में परिवर्तन होने पर परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 22.
क्या स्थिर विनिमय दर से भुगतान शेष घाटे या अधिशेष को समायोजित किया जा सकता है?
उत्तर:
स्थिर विनियिम दर से भुगतान शेष घाटे या अधिशेष को समायोजित नहीं किया जा सकता है।

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प्रश्न 23.
भुगतान शेष के समग्र घाटे (अधिशेष) का अर्थ लिखो।
उत्तर:
आधिकारिक आरक्षित कोष में कमी (वृद्धि) को भुगतान शेष का समग्र घाटा (अधिशेष) कहते हैं।

प्रश्न 24.
भुगतान शेष का मूल वचन (वायदा) क्या है?
उत्तर:
भुगतान शेष का मूल वचन यह है कि मौद्रिक सत्ता भुगतान शेष के किसी घाटे को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 25.
एक अर्थव्यवस्था साम्य की अवस्था में कब कही जाती है?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था भुगतान शेष के संबंध में सन्तुलन में कही जाती हैं जब इसके चाले खाते तथा पूंजी के गैर आरक्षित कोषों का योग शून्य होता है।

प्रश्न 26.
भुगतान शेष के चालू खाते को सन्तुलित करने की विधि लिखो।
उत्तर:
बिना आरक्षित कोष में परिवर्तन किए अन्तर्राष्ट्रीय उधार से चालू खाते को संतुलित किया जाता है।

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प्रश्न 27.
किन मदों का अर्थ लिखो।
उत्तर:
स्वायत्त मदों को रेखा से ऊपर कहते हैं।

प्रश्न 28.
स्वायत्त मदों का अर्थ लिखो।
उत्तर:
ऐसे विनिमय (लेन-देन) जो भुगतान शेष की स्थिति से स्वतंत्र होते हैं स्वायत्त मदें कहलाती हैं।

प्रश्न 29.
किन मदों को रेखा से नीचे कहा जाता है?
उत्तर:
समायोजन मदों को रेखा से नीचे कहा जाता है।

प्रश्न 30.
आधिकारिका लेन-देन किस श्रेणी में रखे जाते हैं?
उत्तर:
आधिकारिक लेन-देन समायोजन या रेखा से नीचे वाले मंदों में रखे जाते हैं।

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प्रश्न 31.
खुली अर्थव्यस्था में घरेलू वस्तुओं की मांग के स्रोत लिखो।
उत्तर:
घरेलू वस्तुओं की मांग के स्रोत –

  1. उपभोग
  2. सरकारी व्यय
  3. घरेलू निवेश
  4. शुद्ध निर्यात

प्रश्न 32.
एक बंद अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं के मांग के स्रोत लिखो।
उत्तर:
घरेलू वस्तुओं की मांग के स्रोत –

  1. उपभोग
  2. सरकारी उपभागे
  3. घरेलू निवेश

प्रश्न 33.
उन देशों के नाम लिखो जिन्होंने लोचशील विनिमय दर को अपनाया।
उत्तर:
1970 के दशक के आरंभ में स्विट्जलैंड एवं जापान ने लोचशील विनिमय दर को अपनाया था।

प्रश्न 34.
प्रबंधित तरणशील विनिमय दर का अर्थ लिखो।
उत्तर:
प्रबंधित तरण शील विनिमय दर, स्थिर विनिमय दर तथा लोचशील विनिमय दर का मिश्रण होती है। इस प्रणाली में प्रत्येक अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय बैंक विनिमय दर में मामूली परिवर्तन के द्वारा विदेशी मुद्रा को क्रय-विक्रय में हस्तक्षेप कर सकता है।

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प्रश्न 35.
खुली अर्थव्यवस्था के लिए गुणक का सूत्र लिखो।
उत्तर:
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 part - 1  खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र img 2

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक अर्थव्यवस्था में आयात की मांग के लिए निर्धारक कारक बताइए।
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था में आयात की वस्तुओं की मांग के निर्धारक कारक –

  1. घरेलू आग एवं
  2. विनिमय

घरेलू आय का स्तर जितना ऊँचा होता है आयात की मांग की उतनी ज्यादा होती है। इस प्रकार घरेलू आय तथा आयात की मांग में सीधा संबंध होता है। विनियिम दर और आयात में विपरीत संबंध होता है। ऊंची विनिमय से आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती है। इसलिए ऊँची विनिमय दर आयात की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा कम हो जाती है।

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प्रश्न 2.
एक खुली अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय आय प्रतिमान को समझाए।
उत्तर:
एक खुली अर्थव्यस्था में आर्थिक लेन-देन देश की भौगोलिक सीमा तक ही सीमित नहीं रहते हैं बल्कि आर्थिक क्रियाओं का विस्तार समूचे विश्व में रहता है। खुली अर्थव्यवस्था निर्यात के लिए घरेलू वस्तुओं की मांग, घरेलू वस्तुओं की मांग अतिरिक्त रूप में बढ़ाती है।

इसके विपरीत घरेलू अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की आपूर्ति को बढ़ाती है। इस प्रकार घरेलू अर्थव्यवस्था में उपभोग, निवेश सरकारी व्यय तथा शुद्ध निर्यात से राष्ट्रीय आय प्रतिमान बनता है, संक्षेप में इसे निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है –
Y + M = DC + I + G + x
Y = C + I + G + X – M
Y = C + I + G + NX
जहाँ NX शुद्ध निर्यात है।

प्रश्न 3.
एक अर्थव्यवस्था में शुद्ध निर्यात का अर्थ लिखो।
उत्तर:
एक लेखा वर्ष की अवधि में एक देश कके शेष विश्व को निर्यात एवं अर्थव्यवस्था द्वारा शेष विश्व से आयात के अन्तर को शुद्ध निर्यात कहते हैं। जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से अधिक होता है तो शुद्ध निर्यात धनात्मक होता है। जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से कम होता है तो शुद्ध निर्यात का मूल्य ऋणात्मक होता है, जब निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य के बराबर होता है तो शुद्ध निर्यात शून्य होता है, शुद्ध निर्यात के मूल्य पर व्यापार शेष निर्भर करता है। इसे निम्नलिखित ढंग से व्यस्त किया जा सकता है –

  1. निर्यात – आयात = धनात्मक शुद्ध निर्यात = व्यापार शेष
  2. निर्यात – आयात = ऋणात्मक शुद्ध निर्यात = व्यापार शेष घाटा
  3. निर्यात – आयात = शून्य निर्यात = सन्तुलित व्यापार शेष

प्रश्न 4.
निर्यात को स्थिर मानकर X = \(\bar { X } \), अपनी अर्थव्यवस्था के लिए आय का निर्धारण करो।
उत्तर:
आयात की मांग अर्थव्यवस्था में घरेलू आय पर निर्भर करती है और आयात की मांग का एक स्वायत्त भाग तथा दूसरा भाग सीमान्त आयात प्रवत्ति पर निर्भर करता है –
M = M + mY
जहाँ M → स्वायत्त आयात मांग एवं m – सीमान्त आयात प्रवृत्ति
अर्थव्यवस्था में आय के स्तर को उपभोग व्यय, निवेश, सरकारी व्यय के साथ आयात-निर्यात की मांग को समायोजित करके साम्य आय को निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है –
Y = C + C(Y – T) + I + G + X – (M – mY)
Y = C – CT + I + G + X – M = A
माना Y = A + CY – MY
Y – CY + mY = A
Y(I – C + m) = A
Y = \(\frac{A}{1-C+M}\)

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प्रश्न 5.
एक बन्द एवं खुली अर्थव्यवस्था के लिए साम्य आय के स्तर गुणक की तुलना करो।
उत्तर:
एक बन्द अर्थव्यवस्था में आर्थिक लेन-देन घरेलू अर्थव्यवस्था तक ही सीमित रहते है अतः साम्य आय को गणितीय रूप में निम्न प्रकार दर्शाया जा सकता है –
Y = C + C(Y – T) + G + 1
Y = C + CY – CT + G + 1
Y – Cy = C – CT + G + 1
Y(1 – C) = C – CT + G + 1
Y = \(\frac{C-CT+G+1}{1-C}\) = \(\frac{A}{1-C}\) = (जहाँ A = C – CT + G + I)

एक खुली अर्थव्यवस्था में आर्थिक लेन-देन घरेलू अर्थव्यवस्था तक ही सीमित नहीं रहते हैं बल्कि खुली अर्थव्यवस्था वस्तुओं एवं सेवाओं का लेन-देन शेष विश्व के साथ भी करती है। खुली अर्थव्यवस्था में साम्य आय प्रतिमान को गणितीय रूप में निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है –
Y = C + C(Y – T) + I + G + X – (M + mY)
Y = C + CY – CT + I + G + X – M – mY
या Y – CY + mY = C – CT + I + G + X – M
Y (1 – C + M) = C – CT + 1 + G + X – M
Y = \(\frac{A}{1-C+M}\), [∵A = C – CT + I + G + X – M]

दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्था में साम्य आय, स्वायत व्यय गुणक तथा स्वायत्त व्यय के गुणनफल के समपन है सीमान्त आयात प्रवृत्ति का मान शून्य से अधिक होता है अत: 1 – C + m का मान 1 – C के मान से अधिक होता है। अतः खुली अर्थव्यवस्था गुणक का मान बन्द अर्थव्यवस्था में गुणक के मान से छोटा होता है।

प्रश्न 6.
निर्यात के लिए वस्तुओं की मांग का स्वायत्त व्यय गुणक पर प्रभाव समझाए।
उत्तर:
निर्यात के लिए वस्तुओं की मांग घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए वस्तुओं की सामूहिक मांग को बढ़ाती है। बन्द अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की मांग वृद्धि उपभोग, सरकारी व्यय एवं निवेश में वृद्धि के कारण होती है। खुली अर्थव्यवस्था में निर्यात के लिए वस्तुओं की मांग गुणक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में अतिरिक्त अन्तः क्षेपण को जन्म देती है इसलिए स्वायत्त गुणक में वृद्धि होती है। इसकी गुणना निम्नलिखित सूत्र से की जाती है –
\(\frac{∆Y}{∆X}\) = \(\frac{1}{1-C+M}\)

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प्रश्न 7.
पत्राचार निवेश क्या है? परिसंपत्ति की खरीददारी को क्रेता देश के पूंजी खाते में ऋणात्मक चिन्ह के साथ क्यों अंकित किया जाता है?
उत्तर:
किसी देश द्वारा विदेशों के अंश पत्रों तथा ऋण पत्रों की खरीददारी को पत्राचार निवेश कहते हैं। इस प्रकार के निवेश से क्रेता का परिसंपत्ति पर नियंत्रण नहीं होता है। परंपरानुसार यदि कोई देश दूसरे देश से परिसंपत्ति की खरीददारी करता है तो इसे क्रेता देश के पूंजी खाते में ऋणात्मक चिन्ह के साथ दर्शाया जाता है क्योंकि इस लेन-देन में विदेशी मुद्रा का प्रवाह देश से बाहर की ओर होता है। यदि विदेशी मुद्रा का प्रवाह दूसरे देश की तरफ होता है तो इसे ऋणात्मक चिह्न दिया जाता है। इसके विपरीत यदि विदेशी मुद्रा का प्रवाह दूसरे से उस देश की ओर होता है तो उसे धनात्मक चिन्ह से दर्शाया जाता है।

प्रश्न 8.
आयात में वृद्धि घरेलू आय के चक्रीय प्रवाह में अतिरिक्त स्राव को जन्म देती है। समझाइए।
उत्तर:
उपभोग पर प्रेरित उपभोग का कुछ भाग विदेशी वस्तुओं की मांग पर हस्तांतरित हो जाता है। MPC में वृद्धि का मान धनात्मक या शून्य से अधिक होता है। अतः घरेलू वस्तुओं की मांग व घरेलू आय प्ररेति प्रभाव कम हो जाएगा। इसीलिए आयात में अतिरिक्त वृद्धि घरेलू आय के चक्रीय प्रवाह में अतिरिक्त स्राव का कारण बनता है। गुणक प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में घरेलू आय का अधिक स्राव होता है। व्यय गुणक का मान कम हो जाता है –
\(\frac{∆Y}{∆M}\) = \(\frac{1}{1-C+M}\)

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प्रश्न 9.
एक खुली अर्थव्यवस्था में सामूहिक मांग वक्र बन्द अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक चपटा होता है। समझाए।
उत्तर:
एक खुली अर्थव्यवस्था में उपभोग, निवेश एवं सरकारी व्यय के योग को सामूहिक मांग कहते हैं।
AD = C + I + G

एक खुली अर्थव्यवस्था में उपभोग, निवेश एवं सरकारी व्यय के अलावा निर्यात व आयात भी सामूहिक मांग को प्रभावित करते हैं। आयात के लिए विदेशी वस्तुओं की मांग से घरेलू अर्थव्यवस्था की वस्तुओं की मांग कम होती है तथा निर्यात के लिए वस्तुओं की मांग से घरेलू अर्थव्यवस्था की वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है। खुली अर्थव्यवस्था के सामूहिक मांग को निम्नलिखित सूत्र से दर्शाया जाता है –
AA = C + I + G + X – M

AA वक्र तथा AD वक्र के बीच की दूरी आयात की मात्रा की समान होती है। दोनों रेखाओं के बीच दूरी, आयात की मांग बढ़ने से अधिक हो जाती है। आय बढ़ने पर घरेलू अर्थव्यवस्था की वस्तुओं की घरेलू मांग घटती है जबकि निर्यात के लए वस्तुओं की मांग आय बढ़ने पर नहीं बढ़ती है। इसलिए खुली अर्थव्यवस्था का सामूहिक मांग वक्र AA बन्द अर्थव्यवस्था के लिए सामूहिक मांग AD से चपटा या कम ढालू होता है। दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्था के लिए सामूहिक मांग वक्र नीचे चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 part - 1 खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र img 3

प्रश्न 10.
खुली अर्थव्यवस्था के दो बुरे प्रभाव बताइए।
उत्तर:
खुली अर्थव्यवस्था के दो बुरे प्रभाव निम्नलिखित हैं –

  1. अर्थव्यवस्था में जितना अधिक खुलापन होता है गुणक का मान उतना कम होता है।
  2. अर्थव्यवस्था जितनी ज्यादा खुली होती है व्यापार शेष उतना ज्यादा घाटे वाला होता है।

खुली अर्थव्यवस्था में सरकारी व्यय में वृद्धि व्यापार शेष घाटे को जन्म देती है। खुली अर्थव्यवस्था में व्यय गुणक का प्रभाव उत्पाद व आय पर कम होता है। इस प्रकार अर्थव्यव्था का अधिक खुलापन अर्थव्यवस्था के लिए कम लाभ प्रद या कम आकर्षक होता है।

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प्रश्न 11.
शुद्ध निर्यात की आय के फलन के रूप में समझाइए।
उत्तर:
एक लेखा वर्ष की अवधि के लाए एक अर्थव्यवस्था के निर्यात मूल्य एवं आयात मूल्य के अन्तर को शुद्ध निर्यात कहते है। शुद्ध निर्यात घरेलू आय का घटता फलन है। घरेलू आय बढ़ने पर निर्यात मूल्य पर प्रभाव नहीं पढ़ता है लेकिन आयात मूल्य में बढ़ोतरी होती है। दूसरे शब्दों में आय बढ़ने व्यापार शेष घाटे में बढोतरी होती है। इसे निम्नलिखित चित्र दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 part - 1  खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र img 4

प्रश्न 12.
उत्पाद में वृद्धि व्यापार शेष घाटे के द्वार है? अथवा व्यापार शेष घाटा उत्पाद में वृद्धि के गलियारे से होकर गुजरता है। समझाइए।
उत्तर:
घरेलू उत्पाद अथवा घरेलू आय में वृद्धि व्यापार शेष घाटे को बढ़ाती है। व्यापार शेष में घाटा अथवा छोटा (कम) गुणक दोनों के उदय का मूल कारण एक है। घरेलू आय बढ़ने पर घरेलू अर्थव्यवस्था में घरेलू वस्तुओं की मांग कम हो जाती है और घरेलू अर्थव्यवस्था में गुणक प्रभाव के कारण आयात-वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है आयात वस्तुओं की मांग में परिवर्तन स्वायत्त प्रभाव व प्रेरित प्रभाव के सामूहिक प्रभाव से आयात वस्तुओं की मांग आय से प्रभावित होती है, इस कारण आय बढ़ने पर व्यापार शेष घाटे में बढ़ोतरी होती है अथवा व्यापार शेष घाटे में वृद्धि होती है इस प्रभाव को निम्नलिखित चित्र में दर्शाया गया है।
Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 part - 1 खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र  img 5

प्रश्न 13.
स्थायी क्रय शक्ति के विश्वास के अभाव में होता मुद्रा अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विनिमय का माध्यम अथवा लेखे की इकाई का काम नहीं करती है। टिप्पणी करो।
उत्तर:
जब वस्तुओं का प्रवाह अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं में होता है तो मुद्रा का प्रवाह, वस्तुओं के प्रवाह की विपरीत दिशा में होता है अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अकेली मुद्रा से विनिमय कार्य नहीं होता है। अतः विदेशी आर्थिक एजेन्ट ऐसी किसी मुद्रा को स्वीकार नहीं करते हैं जिसकी क्रय शक्ति में स्थिरता न हो। इसलिए सरकार समूचे विश्व को मुद्रा की क्रय शक्ति की स्थिरता का दायित्व लेने का विश्वास दिलाती है। अतः स्थायी क्रय शक्ति के विश्वास के अभाव में कोई भी मुद्रा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विनिमय का माध्यम अथवा लेखे की इकाई नहीं बन सकती है।

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प्रश्न 14.
किस प्रकार से एक अर्थव्यवस्था का दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ लेन-देन चयन व्यापक बनाता है?
उत्तर:
एक अर्थव्यवस्था का दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के साथ लेन-देन तीन प्रकार से चयन को व्यापक बनाता है –

  1. उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों को घरेलू एवं विदेशी वस्तुओं में चयन का अधिक अवसर प्राप्त होता है। इससे वस्तु बाजार का आकार अधिक व्यापक हो जाता है।
  2. निवेशकों को घरेलू एवं विदेशी पूंजी बाजारों में निवेश करने के लिए अधिक अवसर प्राप्त होते हैं। इससे अनेक पूंजी बाजार आपस में जुड़कर वृहत्त पूंजी बाजार को जन्म देते हैं।
  3. फर्म उत्पादन करने के लिए सर्वोत्तम स्थिति का चयन कर सकती है। उत्पादन साधनों विशेष रूप से श्रमिकों को कम करने के लिए सर्वोत्तम विकल्प चुनने के अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 15.
विदेशी व्यापार से अर्थव्यवस्था की सामूहिक मांग किस प्रकार से प्रभावित होती है?
उत्तर:
विदेशी व्यापार एक अर्थव्यवस्था में सामूहिक मांग को दो प्रकार से प्रभावित करता है –

  1. जब एक देश के निवासी विदेशों से वस्तुओं को खरीदते हैं तो घरेलू आय के चक्रीय प्रवाह में से स्राव होता है इससे उस अर्थव्यवस्था में आय का स्तर गिरता है और अर्थव्यवस्था में सामूहिक मांग का स्तर कम हो जाता है।
  2. जब एक देश निवासी उत्पादक वस्तुओं को विदेशों में बेचते हैं तो इससे आय के चक्रीय प्रवाह में अन्तःक्षेपण होता है अर्थात् आय में बढ़ोतरी होती है। सामूहिक मांग का स्तर निर्यात के कारण बढ़ जाता है।

प्रश्न 16.
आय एवं विनिमय दर में संबंध लिखो।
उत्तर:
जब घरेलू आय बढ़ती है तो उपभोक्ताओं का व्यय बढ़ जाता है। घरेलू अर्थव्यवस्था की वस्तुओं की मांग बढ़ने के साथ-साथ आयातित वस्तुओं या विदेशी वस्तुओं की मांग में भी वृद्धि होती है। अर्थात् विदेशी वस्तुओं की खरीद पर व्यय बढ़ जाता है। विदेशी वस्तुओं की मांग में वृद्धि होने पर विदेशी मुद्रा का मांग वक्र दायीं ओर खिसक जाता है और घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है।

इसके विपरीत यदि विदेशी अर्थव्यवस्थाओं की आय बढ़ती है तो घरेलू अर्थव्यवस्था की वस्तुओं की वस्तुओं का मांग वक्र अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मे दायीं ओर खिसक जायेगा इससे घरेलू मुद्रा का अपमूल्यन होगा। अन्य बाते समान रहने पर जिस देश में वस्तुओं की मांग तेजी से बढ़ती है उस देश की मुद्रा का अवमूल्यन होता है क्योंकि ऐसे देश में निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से अधिक होता है। इस देश में विदेशी मुद्रा का मांग वक्र पूर्ति की तुलना में ज्यादा दायीं ओर खिसक जाता है।

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प्रश्न 17.
ब्याज दर एवं विनिमय दर में संबंध लिखिए।
उत्तर:
अल्पकाल में विनिमय दर निर्धारण में ब्याज दर की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। विनिमय दर में चलन ब्याज दरों का अन्तर होता है। बैंकों के कोष, बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ, धनी व्यक्ति ऊंची ब्याज दर की तलाश में पूरे विश्व में घूमते हैं। जिन देशों में ब्याज दर कम होती है उनकी मुद्रा की मांग वक्र बायीं ओर तथा पूर्ति वक्र दायीं ओर खिसक जाता है। उपरोक्त ढंग से मांग व पूर्ति में खिसकाव से मुद्रा का अवमूल्यन होता है। इसके विपरीत जिन देशों में ब्याज दर ऊंची पायी जाती है उनकी मुद्रा का मांग वक्र दायीं ओर तथा पूर्ति वक्र बायीं ओर खिसकता है वहाँ मुद्रा अपमूल्यन होता है।

प्रश्न 18.
सट्टा उद्देश्य एवं विनिमय दर में संबंध लिखो।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार विनियिम दर निर्यात व आयात के लिए वस्तुओं की मांग व पूर्ति की शक्तियों पर निर्भर करने के साथ-साथ सट्टा उद्देश्य के लिए मुद्रा की मांग पर भी निर्भर करती है। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में मुद्रा की मांग मुद्रा के अपमूल्यन से होने वाले संभावित लाभ पर निर्भर करती है। मुद्रा अपमूल्यन से जितने अधिक लाभ की संभावना होती है उतनी अधिक मात्रा में मुद्रा की मांग की जाती है विनिमय दर ऊँची होती है। इसके विपरीत मुद्रा के अवमूल्यन से होने वाली हानि की स्थिति में मुद्रा की मांग कम की जाती है और विनिमय दर नीची पायी जाती है।

प्रश्न 19.
एक मुद्रा की साथ को प्रभावित करने वाले कथनों को बताइए।
उत्तर:
एक मुद्रा की साख कथनों से निम्न प्रकार से प्रभावित होती है –

1. असीमित रूप से निः
शुल्क परिवर्तनीयता का गुण। मुद्रा के परिवर्तन की कीमत जिस मुद्रा में अरिवर्तनीयता का गुण जितना अधिक एवे कीमत स्थिरता का दावा पेश किया जायेगा उस मुद्रा की साख उतनी ही ज्यादा होती है। इसके विपरीत मुद्रा में परिर्वनीयता का गुण जितना कम होगा और कीमत स्थिरता का कमजोर दावा पेश किया जायेगा मुद्रा की साख उतनी ही ज्यादा कमजोर होगी।

2. अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक सत्ता (पद्धति) जो अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन में स्थिरता का आश्वासन दे।

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प्रश्न 20.
लोचशील विनिमय दर को समझाए।
उत्तर:
वह विनिमय दर जो विदेशी मुद्रा बाजार में मुद्रा की मांग व आपूर्ति के सन्तुलन के आधार पर तय की जाती है उसे लोचशील विनिमय दर कहते हैं। लोचशील विनिमय दर विदेशी बाजार में मुद्रा की मांग अथवा आपूर्ति अथवा दोनों में परिवर्तन होने पर बदल जाती है। लोचशील विनिमय दर दो प्रकार की होती है –

  1. स्वतन्त्र लोचशील
  2. प्रबंधित लोचशील

स्वतन्त्र लोचशील विनिमय दर पूरी तरह मुद्रा की मांग व आपूर्ति की शक्तियों के आधार पर तय होती है केन्द्रीय बैंक इसके निर्धारण में कोई हस्तक्षेप नहीं करता है जबकि प्रबन्धित लोचशील विनिमय दर को प्रभावित करने के लिए केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्राओं का क्रय-विक्रय करता है।

प्रश्न 21.
स्थिर और नम्य विनिमय दरों में भेद समझाइए।
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर:
स्थिर विनिमय दर व्यवस्था के अन्तर्गत एक देश की सरकार अपनी विनिमय दर की घोषणा करती है। यह दर स्थिर रखी जाती है। इस दर में होने वाले मामूली परिवर्तन भी अर्थव्यवस्था में सहनीय नहीं होते हैं।

नम्य विनिमय दरः
यदि विनिमय की दर बाजार में आपूर्ति और मांग के सन्तुलन के द्वारा तय होती है तो इसे नम्य विनिमय दर कहते हैं। नम्य विनिमय दर का मान बदलता रहता है।

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प्रश्न 22.
स्थिर विनिमय दर प्रणाली को समझाइए।
उत्तर:
स्थिर विनयिम दर सरकार द्वारा तय की जाती है। अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय बैंक इस विनिमय दर का निर्धारण करता है। सामान्यतः स्थिर विनिमय दर में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता है। केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में विनिमय दर को स्थिर बनाए रखने के लिए निश्चित सीमाओं के बीच में परिवर्तन कर सकता है। केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्राओं का कोष स्थापित करता है इसका प्रयोग विनिमय दर को स्थिर बनाए रखने के लिए किया जाता है।

स्थिर विनयिम दर देश की स्टैण्डर्ड मुद्रा सोने (Gold) की मात्रा पर निर्भर करती है। देसरे शब्दो में, स्थिर विनिमय दर का निर्धारण मुद्रा के सरकार द्वारा घोषित सोने के मूल्य पर निर्भर करता है। माना भारत की सरकार ने एक रूपये की कीमत 1 ग्राम सोना तथा इंग्लैण्ड की सरकार ने एक पौंड कीमत 10 ग्राम सोना तय की तो पौण्ड की विनिमय दर 10 रूपया होती तथा रूपये विनिमय दर। 110 पौंड होगी। 1977 के बाद इस विनिमय दर का प्रचलन अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सदस्यों ने समाप्त कर दिया है।

प्रश्न 23.
विनिमय दर तथा दीर्घकाल में संबंध लिखो।
उत्तर:
समयावधि जितनी अधिक होती है उतने ही व्यापार प्रतिबन्ध जैसे प्रशुल्क, कोटा, विनयम दर आदि समायोजित हो जाते हैं। विभिन्न मुद्राओं में मापी जाने वाले उत्पाद की कीमत समान होनी चाहिए लेकिन लेन-देन का स्तर भिन्न-भिन्न हो सकता है। इसलिए लम्बी समयावधि में दो देशों के बीच विनिमय दर दो देशों में कीमत स्तरों के आधार पर समायोजित होती है। इस प्रकार देशों में विनिमय की दर दो देशों में कीमतों में अन्तर के आधार पर निर्धारित होती है।

प्रश्न 24.
विदेशी मुद्रा की पूर्ति को समझाइए।
उत्तर:
एक लेखा वर्ष की अवधि में ऐ देश को समस्त लेनदारियों के बदले जितनी मुद्रा प्राप्त होती हैं उसे विदेशी मुद्रा की पूर्ति कहते हैं।
विदेशी विनिमय की पूर्ति को निम्नलिखित बातें प्रभावित करती हैं –

  1. निर्यात दृश्य व अदृश्य सभी मदें शामिल की जाती हैं।
  2. निर्यात दृश्य उस देश में निवेश।
  3. विदेशों से प्राप्त हस्तातरण भुगतान।

विदेशी विनिमय की दर तथा आपूर्ति में सीधा संबंध होता है। ऊंची विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा की अधिक आपूर्ति होती हैं।

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प्रश्न 25.
विदेशी मुद्रा की मांग को समझाएं। यह विनिमय दर को किस प्रकार प्रभावित करती है।
उत्तर:
एक लेखा वर्ष के दौरान एक देश को समस्त विदेशी दायित्वों का निपटारा करने के लिए जितनी विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है उसे विदेशी मुद्रा की मांग कहते हैं। एक देश निम्नलिखित कार्यों के लिए विदेशी मुद्रा की मांग करता है –

  1. आयात का भुगतान करने के लिए दृश्य एवं अदृश्य सभी मदें शामिल की जाती है।
  2. विदेशी अल्पकालीन ऋणों का भुगतान करने के लिए।
  3. विदेशी दीर्घकालीन ऋणों का भुगतान करने के लिए।
  4. शेष विश्व में निवेश करने के लिए।
  5. विदेशों को उपहार या आर्थिक सहायता देने के लिए। विदेशी मुद्रा की मांग व विनिमय दर में उल्टा संबंध है। विनिमय दर ऊँची हाने पर विदेशी मुद्रा की मांग कम हो जाती है।

प्रश्न 26.
भारतीय नागरिकों द्वारा विदेशों में खर्च विदेशी मुद्रा बाजार भारतीय रूपयों की आपूर्ति के समान है। समझाइए।
उत्तर:
यदि भारत के लोग विदेशों से वस्तुएं एवं सेवाएं क्रय करते हैं तो भुगतान करने के लिए भारत के लोगों के पास रूपये होते हैं। परन्तु विदेशी विक्रेता अपनी वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य अपने देश की मुद्रा में स्वीकार करते हैं। अतः भारत के लोग भारतीय मुद्रा रूपये से विदेशी मुद्रा प्राप्त करते हैं। विदेशी मुद्रा के समान भारत लोग रूपये की आपूर्ति विदेशी मुद्रा बाजार को करते हैं। इस प्रकार भारत के लोग का खर्च विदेशी मुद्रा बाजार को भारतीय रूपयों की आपूर्ति होती है। माना एक भारतीय पर्यटक अमेरिका में बीमार पड़ने पर चिकित्सक की सेवाएं प्राप्त करता है। चिकित्सक की फीस 20 डालर प्राप्त करने के विदेशी मुद्रा बाजार को 800 रूपये देगा। अतः विदेशी मुद्रा बाजार को 800 रूपये की आपूर्ति होती है।

प्रश्न 27.
क्रय शक्ति समता सिद्धांत की तीन आलोचनाएं लिखें।
उत्तर:

  1. यह सिद्धांत कीमत सूचकांक पर आधारित है। जबकि कीमत सूचकांक अनिश्चित एवं अविश्वसनीय होते हैं।
  2. अदृश्य मदों की उपेक्षाः यह सिद्धांत यह मानता है कि विनिमय दर केवल वस्तुओं के आयात निर्यात से प्रभावित होती है। सेवाएं प्रभावित नहीं करती हैं जबकि व्यवहार में यह बात सही नहीं है।
  3. ऊपरी लागतों की उपेक्षा: इस सिद्धांत में परिवहन व्यय की अनदेखी की गई है जबकि परिवहन व्यय एक देश में वस्तुओं की कीमत कम ज्यादा कर सकता है।

प्रश्न 28.
विस्तृत सीमा पट्टी व्यवस्था पर चर्चा करें।
उत्तर:
विस्तृत सीमा पट्टी व्यवस्था में देश की सरकार अपनी मुद्रा की विनिमय दर की घोषणा करती है। परन्तु इस व्यवस्था के स्थिर घोषित विनिमय दर के दोनों ओर 10 प्रतिशत उतार-चढाव मान होने चाहिए। ससे सदस्य देश अपने भुगतान शेष के समजन का काम आसानी से कर सकते हैं। उहाहरण के लिए यदि किसी देश का भुगतान शेष घाटे का है तो इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उस देश को अपनी मुद्धा की दर 10 प्रतिशत तक घटाने को छूट होनी चाहिए। मुद्रा की दर कम होने पर दूसरे देशों के लिए उस देश की वस्तुएं एव सेवाएं सस्ती हो जाती हैं जिससे विदेशों में उस देश की वस्तुओं की मांग बढ़ जाती हैं और उस देश को विदेशी मुद्रा पहले से ज्यादा प्राप्त होती है।

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प्रश्न 29.
प्रबंधित तरणशीलता की अवधारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबंधित तरणशीलता स्थिर एवं नम्य विनिमय दर के बीच की व्यवस्था है। इस व्यवस्था में विनिमय दर को स्वतंत्र रखा जाता है। देश के मौद्रिक अधिकारी यदा कदा हस्तक्षेप करते हैं। मौद्रिक अधिकारी अधिकारिक रूप से बनाए गए नियमों एवं सूत्रों के अन्तर्गत ही हस्तक्षेप कर सकते हैं। अधिकारी विनिमय दर तय नहीं करते हैं। विनिमय दर के उतार-चढ़ाव की कोई सीमा तय नहीं की जाती है। हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस होने पर मौद्रिक अधिकारी समन्वय के लिए उचित कदम उठा सकते हैं। नियमों एवं मार्गदर्शकों के अभाव में यह व्यवस्था गन्दी तरणशीलता बन जाती है।

प्रश्न 30.
चालू खाते व पूंजीगत खाते में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चालू खाता:

  1. भुगतान शेष के चालू खाते में वस्तुओं व सेवाओं के निर्यात व आयात शामिल करते हैं।
  2. भुगतान शेष के चालू खाते के शेष का एक देश की आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। यदि किसी देश का चालू खाते का शेष उस देश के पत्र में होता हैं तो उस देश की राष्ट्रीय आय बढ़ती है।

पूंजी खाता:

  1. भुगतान शेष के पूंजी खातों में विदेशी ऋणों का लेन-देन ऋणों का भुगतान व प्राप्तियों, बैंकिग पूंजी प्रवाह आदि को दर्शाते हैं।
  2. भुगतान शेष का देश की राष्ट्रीय आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता है ये केवल परसिम्पतियों की मात्रा को दर्शाते हैं।

प्रश्न 31.
लोग विदेशी मुद्रा की मांग किसलिए करते हैं?
उत्तर:
लोग विदेशी मुद्रा की मांग निम्नाकिंत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करते हैं –

  1. दूसरे देशों से वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदने के लिए।
  2. विदेशों में उपहार भेजने के लिए।
  3. दूसरे णों का लेन-देन ऋणों का भाव देश में भौतिक एवं वित्तीय परिसंपत्तियों को क्रय करने के लिए।
  4. विदेशी मुद्राओं के मूल्य के संदर्भ में व्यापारिक दृष्टि से सट्टेबाजी के लिए।
  5. विदेशों में पर्यटन के लिए।
  6. विदेशों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाएं प्रापत करने के उद्देश्य के लिए आदि।

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प्रश्न 32.
भुगतान शेष की संरचना के पूंजी खाते को समझाएं।
उत्तर:
पूंजी खातों में दीर्घकालीन पूंजी के लेन-देन को दर्शाया जाता है। इस खाते में निजी व सरकारी पूंजी लेन-देन, बैंकिंग पूंजी प्रवाह व अन्य वित्तीय विनिमय दर्शाए जाते हैं। पूंजी खाते की मदें: इस खाते की प्रमुख मदें निम्नलिखित हैं –

1. सरकारी पूंजी का विनिमय:
इसमें सरकार द्वारा विदेशों से लिए गए ऋण तथा विदेशों को दिए गए ऋणों के लेन-देन, ऋणों के भुगतान तथा ऋणों की प्राप्तियों के अलावा विदेशी मुद्रा भण्डार, केन्द्रीय बैंक के स्वर्ण भण्डार, विश्व मुद्रा कोष के लेन-देन आदि को दर्शाया जाता है।

2. बैंकिग पूंजी:
बैंकिग पूंजी प्रवाह में वाणिज्य बैंकों तथा सहकारी बैंकों की विदेशी लेनदारियों एवं देनदारियों को दर्शाया जाता है। इसमें केन्द्रीय बैंक के पूंजी प्रवाह को शामिल नहीं करते हैं।

3. निजी ऋण:
इसमें दीर्घकालीन निजी पूंजी में विदेशी निवेश ऋण, विदेशी जमा आदि को शामिल करते हैं। प्रत्यक्ष पूंजीगत वस्तुओं का आयात व निर्यात प्रत्यक्ष रूप से विदेशी निवेश में शामिल किया जाता है।

प्रश्न 33.
इनकी परिभाषा करें:

  1. NEER
  2. REER
  3. Rer

उत्तर:
1. NEER(मौद्रिक प्रभावी विनिमय दर):
मुद्रा की औसत सापेक्ष पर कीमत स्तर के परिवर्तन के प्रभावों को खत्म नहीं करने का प्रयास नहीं किया जाता है अर्थात् मुद्रा की औसत सापेक्ष शक्ति कीमत स्तर के परिवर्तन प्रभावों से प्रभावित होती है इसिलए इसे मौद्रिक प्रभावी विनिमय दर कहते हैं।

2. REER:
वास्तविक प्रभावी विनिमय दर इससे वास्तविक विनिमय की गणना की जाती है।
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3. RER:
स्थिर कीमतों पर आधारित विनिमय दर को (RER) कहते है। इसमें कीमत परिवर्तन का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
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प्रश्न 34.
विदेशी मुद्रा के –

  1. हाजिर बाजार तथा
  2. वायदा बाजार क्या होते हैं?

उत्तर:
1. हाजिर बाजार:
विदेशी विनिमय बाजार में यदि लेन-देन दैनिक आधार पर होते हैं तो ऐसे बाजार को हाजिर बाजार या चालू बाजार कहते हैं। इस बाजार में विदेशी मुद्रा की तात्कालिक दरों पर विनिमय होता है।

2. वायदा बाजार:
विदेशी विनिमय बाजार में यदि लेन-देन भविष्य में देयता के आधार पर होता है तो इसे वायदा बाजार कहते हैं। इस बाजार में भविष्य में निश्चित तिथि पूरी होने पर लेन-देन का काम होता है।

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प्रश्न 35.
विदेशी विनिमय बाजार में चलित सीमाबन्ध व्यवस्था की भूमिका समझाइए।
उत्तर:
चलित सीमा बन्ध व्यवस्था स्थिर एवं नम्य व्यवस्थाओं के बीच की व्यवस्था होती है। इस व्यवस्था में एक देश की सरकार विनिमय दर की घोषणा करने के बाद उसे दोनों ओर 1 प्रतिशत परिवर्तन कर सकती है अथात् विनिमय दर को 1 प्रतिशत बढ़ा भी सकती है और घटा भी सकती है। परन्तु देश के विनिमय भण्डरों की समीक्षा के कारण निश्चित विनिमय दर में समय-समय पर संशोधन किए जाते हैं। संशोधन करते वक्त मुद्रा की आपूर्ति व कीमतों में उतार-चढ़ाव का भी ध्यान रखा जाता है। देश के मौद्रिक अधिकारी उच्चतम एवं न्यूनतम सीमाओं के माध्यम से वित्तीय अनुशासन रख सकते हैं।

प्रश्न 36.
क्रोलिंग पेग और मैनेजड फ्लोटिंग समझाइए।
उत्तर:
क्रोलिग पेग:
(स्थिर विनिमय दर) वह योजना जिसके द्वारा एक देश अपनी मुद्रा के सम मूल्य (Parity Vaiue) की घोषणा करता है और सम मूल्य में बहुत कम उच्चावन 1 प्रतिशत का समायोजन करता है उसे क्रोलिग पेग कहते हैं। हालाकि सम मूल्य में समायोजन देश के विदेशी भण्डार के आधार पर बहुत कम मात्रा में निरन्तर समायोजित किये जाते हैं। सम मूल्य में परिवर्तन मुद्रा की आपूर्ति, कीमत व विनिमय दर के आधार पर भी किए जाते हैं।

प्रबंधित लोचशल (मैनेजड फ्लोटिंग):
स्थिर व परिवर्तनशील विनिमय दर के प्रबन्धन में यह अंतिम और विकसित विधि है। इस व्यवस्था में विनिमय दर की बाधाओं को मुद्रा अधिकारी बातचीत के जरिए ठीक कर देते हैं। दूसरे शब्दों में इस व्यवस्था में सम मूल्य पूर्व निर्धारित नहीं होता है, उच्चावन की घोषणा का समय भी नहीं होता, मुद्रा अधिकारी स्थिति को भांप कर हस्तक्षेप करते हैं। हस्तक्षेप दूसरे देशों के साथ ताल मेल के आधार पर भी हो सकता है। लेकिन इस व्यवस्था में विनिमय दर से संबंधित दिशा निर्देशों की औपचारिक घोषणा की जाती है। दिशा निर्देशों के अभाव में यह अभिशाप भी सिद्ध हो सकता है।

प्रश्न 37.
भुगतान शेष तथा राष्ट्रीय आय लेखों के बीच संबंध की व्याख्या करें।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दो प्रकार से भुगतान प्राप्त करने एवं भुगतान प्राप्त करने की जरूरत होती है। एक उत्पादन एवं बिक्री तथा दो, वित्तीय ओर वास्तविक परिसंपत्तियों का क्रय-विक्रय। खुली अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन पर कुल व्यय में निजी उपभोग, सरकारी अन्तिम उपभोग, निवेश के अलावा विदेशियों द्वारा आयात पर व्यय को शामिल किया जाता है।

राष्ट्रीय आय = उपभोग + सरकारी उपभोग + निर्यात
सृजित आय का प्रयोग, बचत, कर भुगतान एवं आयात पर किया जाता है।
राष्ट्रीय आया = उपभोग + बचत + कर + आयात।

इस प्रकार भुगतान शेष की मदें निर्यात एवं आयात राष्ट्रीय आय अथवा राष्ट्रीय व्यय को प्रभावित करते हैं। अतः भुगतान शेष एवं राष्ट्रीय आय लेखें परस्पर संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त खुली अर्थव्यवस्थाएं अदृश्य मदों का भी लेन-देन करती हैं। विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय राष्ट्रीय आय का अंग हैं अर्थात् भुगतान शेष की अदृश्य मदें भी राष्ट्रीय लेखा से संबंध रखती हैं। भुगतान शेष एवं राष्ट्रीय आय दोनों के लेखांकन की पद्धति द्विअंकन प्रणाली है।

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प्रश्न 38.
भुगतान शेष में असंतुलन के कारण बताएं।
उत्तर:
भुगतान शेष में असंतुलन के निम्नलिखित कारण है –
1. एक देश का वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात, आयात से कम ज्यादा होने पर। यदि निर्यात का मूल्य आयात से अधिक होगा तो भुगतान शेष पक्ष का होगा लेकिन यदि निर्यात का मूल्य आयात के मूल्य से कम होगा तो भुगतान शेष प्रतिकूल होता है।

2. एक देश को विदेशों से प्राप्त अन्तरण भुगतान प्राप्ति एवं व्यय की असमानता। यदि देश को अन्तरण भुगतान प्राप्त होते हैं तो जमा में और यदि देश अन्तरण भुगतान देता है तो ये नामें में दर्शाए जाते हैं। यदि एक देश को विदेशों से प्राप्त अन्तरण ज्यादा होते हैं। अन्तरण भुगतान व्यय प्राप्ति की तुलना में ज्यादा होते हैं तो भुगतान शेष पक्ष का होता है। समष्टीय आधार पर भुगतान शेष संतुलन में होता है। भुगतान शेष में असंतुलन चालू खातें एवं अन्तरण खातों के असन्तुलन की वजह से होता है।

प्रश्न 39.
इन खातों के घटकों की व्याख्या करें –

  1. चालू खाता।
  2. पूंजी खाता।

उत्तर:
1. चालू खाता:
चालू खाते के घटक निम्नलिखित है –

  • वस्तुओं का आयात-निर्यात।
  • सेवाओं का आयात-निर्यात।
  • एक पक्षीय अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति एवं वयय।

वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात एवं विदेशों से अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति को ‘जमा’ में तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात तथा अन्तरण भुगतानों पर व्यय को ‘नामे’ में दर्शाया जाता है।

2. पूंजीगत खाता:
इस खाते में पूंजीगत परिसंपत्तियों तथा दायित्वों का लेन-देन दर्शाया जाता है। इस खाते के घटक निम्नलिखित हैं –

  • निजी लेन-देन
  • सरकारी लेन-देन
  • प्रत्यक्ष निवेश
  • पत्राचार निवेश

एक देश द्वारा विदेशों से परिसंपत्ति की खरीद को उस देश के पूंजी खाते के नामे में और देश द्वारा विदेशों को परिसपत्तियों की बिक्री को जमा में दर्शाया जाता है।

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प्रश्न 40.
भुगतान सन्तुलन की संरचना में शामिल ‘चालू खाते’ पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
भुगतान शेष के चालू खाते में अल्पकालीन वास्तविक सौदों को दर्शाया जाता है।

चालू खाते की मदें:
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के के अनुसार चालू खाते में निम्नलिखित मदों को दर्शाया जाता है –

1. दृश्य मदें:
इसमें एक देश द्वारा निर्यात व आयात की जाने वाली सभी भौतिक वस्तुओं को शामिल किया जाता है।

2. अदृश्य मदें:
इसमें एक देश द्वारा निर्यात व आयात की जाने वाली सेवाओं को शामिल करते हैं। जैसे: व्यक्तियों द्वारा सेवाओं का विनिमय (सेवाओं का निर्यात व आयात
व्यापारिक उपक्रमों की सेवाएं –

  • बीमा व बैकिंग
  • परिवहन सेवाएं
  • सरकारी लेन-देन
  • निवेश/पूंजी की आय
  • हस्तातरण भुगतान
  • विशेषज्ञों की सेवाएं आदि

चालू खाते का भुगतान शेष = निर्यात (दृश्य + अदृश्य मदें) – आयात (दृश्य + अदृश्य)

प्रश्न 41.
व्यापार शेष तथा भुगतान शेष में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यापार शेष:

  1. व्यापार शेष विदेशी विनिमय की एक संकुचित अवधारण हैं।
  2. इसमें निर्यात व आयात की केवल दृश्य मदों को शामिल करते हैं।
  3. व्यापार शेष संतुलित एवं असंतुलित दोनों तरह का हो सकता हैं।
  4. व्यापार शेष विदेशी आर्थिक विश्लेषण के लिए पूरी जानकारी नहीं देता है।

भुगतान शेष:

  1. भुगतान शेष विदेशी विनिमय की विस्तृत अवधारणा है।
  2. भुगतान शेष में दृश्य एवं अदृश्य सभी प्रकार की मदों को शामिल करते हैं।
  3. भुगतान शेष सदैव संतुलन शेष में हो सकता है।
  4. भुगतान शेष विदेशी लेनदारियों व देनदारियों के आर्थिक विश्लेषण के लिए पर्याप्त जानकारी देता है।

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प्रश्न 42.
भुगतान शेष के खातों का महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
भुगतान शेष के खातों का निम्नलिखित महत्त्व है –

  1. भुगतान शेष के खाते एक देश की विदेशों से सभी लेनदारियों तथा उस देश की विदेशों को देनदारियों का विवरण प्रदान करते हैं। जिससे किसी भी विनिमय के गलत दिशा में जाने पर उसे रोका जा सकता है।
  2. इन खातों से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक लेन-देन की कमजोरियों की जानकारी प्राप्त होती है।
  3. इन खातों के आधार पर एक देश भावी आर्थिक नीति का निर्माण कर सकता है।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में होने वाले लाभ व हानि की भी जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 43.
किसी देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा विदेशी सुरक्षित निधियों का परिवर्तन भुगतान शेष खाते को किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
यदि किसी देश का केन्द्रीय बैंक सुरक्षित निधियों में वृद्धि या किसी करता है तो इसे अधिकारिक विदेशी परिसंपत्तियों में परिवर्तन कहते हैं। यदि किसी देश का केन्द्रीय बैंक विदेशी मुद्रा का सुरक्षित भण्डार बढ़ाता है तो दूसरे देश के भुगतान शेष खाते के धनात्मक पक्ष (जमा पक्ष) में प्रविष्टि होगी क्योंकि दूसरे देश में विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ेगा या उस देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी।

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प्रश्न 44.
विशेष आहरण अधिकार व्यवस्था को समझाइए।
उत्तर:
विशेष आहरण अधिकार व्यवस्था के अन्तर्गत एक देश अपनी मुद्रा के बदले एक तय सीमा के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से जरूरी विदेशी मुद्राएं प्राप्त कर सकता है। किसी देश के निधि कोष के परिवर्तन उस देश के भुगतान शेष खाते के बाकी सभी घटकों के परिणामस्वरूप होते हैं। इन कोषों की कमी से विदेशी में व्यय करने की जरूरत पूरी होती है। कमियां उत्पन्न करने से विदेशी मुद्रा का प्रवाह उस देश की ओर होता है अतः भुगतान शेष खाते के जमा पक्ष में प्रविष्टि पाते हैं। यदि नामे पक्ष की ओर दर्शाया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी अर्थव्यवस्था के लिए भुगतान संतुलन का महत्त्व समझाइए।
उत्तर:
आर्थिक दृष्टि से किसी देश के लिए भुगतान संतुलन का बड़ा महत्त्व होता है। इस बात की पुष्टि निम्न तथ्यों से हो जाती है –
1. आर्थिक स्थिति का सूचक:
भूगतान संतुलन अर्थव्यवस्था की स्थिति के अनेक पक्षों को उजागर करता है। जिन देशों में भुगतान संतुलन की स्थिति होती है वहाँ इसे ठीक माना जाता है जबकि प्रतिकूल भुगतान संतुलन की स्थिति में अर्थव्यवस्था को ठीक नहीं समझा जाता।

2. विदेशी निर्भरता का सूचक:
भुगतान संतुलन से पता चल जाता है कि कोई देश किस सीमा तक विदेशों पर निर्भर है। किसी देश के भुगतान शेष में प्रतिकूलता जितनी अधिक होती है उसकी अन्य देशों पर निर्भरता उतनी ही ज्यादा होती है।

3. शेष विश्व प्राप्तियों एवं भुगतानों का ज्ञान:
शेष विश्व को दिए गए कुल भुगतानों व प्राप्तियों का ज्ञान भुगतान संतुलन खाते लग जाता है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की स्थिति का सूचक:
भुगतान संतुलन के अध्ययन से देश के विदेशी व्यापार की स्थिति का ज्ञान होता है।

5. आर्थिक नीतियों का निर्धारण:
भुगतान संतुलन राष्ट्रीय आर्थिक नीति के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। अनेक बार भुगतान संतुलन की स्थिति के आधार पर ही देश की आर्थिक नीतियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए जाते हैं।

6. विदेशी निवेश का ज्ञान:
भुगतान संतुलन से पता चल जाता है कि विदेशियों द्वारा किसी देश में किए गए निवेश से उनको कितनी आय प्राप्त हुई है और इसी प्रकार किसी देश द्वारा विदेशों में किए गए निवेश से क्या लाभ हो रहा है।

7. अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के लिए सूचक:
भुगतान संतुलन की स्थिति के आधार पर ही अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं जैसे-विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि किसी देश के लिए सहायता राशि को तय करती है।

8. भुगतान शेष के खातों की सहायता से हम यह जान सकते हैं कि संसार के साथ लेन-देन का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है और वह उन्हें कैसे प्रभावित करती है।

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प्रश्न 2.
भुगतान शेष के असन्तुलन का क्या अर्थ है? यह कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
समुचित भुगतान शेष सदैव सन्तुलन में रहता है। भुगतान शेष से अभिप्राय एक देश की विदेशों से समस्त लेनदारियों व विदेशों के प्रति समस्त दायित्त्वों के अन्तर से है। तुलन पत्र (Balance Sheet) में समस्त लेनदारियां व देनदारियां बराबर दर्शायी जाती है। भुगतान शेष के असंतुलन को समझने के लिए भुगतान शेष में शामिल खातों को जानना पड़ेगा। भुगतान शेष में शामिल खाते निम्नलिखित हैं –

  1. चालू खाता-चालू खाते का सन्तुलन = निर्यात (दृश्य + अदृश्य) आयात (दृश्य + अदृश्य)।
  2. पूंजी खाता पूंजी खाते का सन्तुलन = स्वर्ण आदान – प्रदान + दीर्घकालीन ऋणों का आदान – प्रदान अल्पकालीन ऋणों का आदान – प्रदान

उपरोक्त दोनों खातों में समग्र रूप से सन्तुलन रहता है। परन्तु चालू खाते में सदैव सन्तुलन होना जरूरी नहीं है। जब किसी देश के चालू खाते में असंतुलन होता है तो उसे पूंजी खाते से पूरा किया जाता है। इसे पूरा करने के लिए कर्को देश आरक्षित स्वर्ण भण्डारों व विदेशी आरक्षित मुद्रा भण्डारों में परिवर्तन कर सकता है। जैसे भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए वह अपने उक्त भण्डारों में कमी कर सकता है।

भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए एक देश विदेशों से अल्पकालीन व दीर्घकालीन ऋण भी ले सकता है। परन्तु भुगतान शेष के घाटे को पूरा करने के लिए उपरोक्त उपाय हमेशा उचित नहीं होते हैं। वास्तविक भुगतान शेष को जानने के लिए सन्तुलन के लिए इस्तेमाल किये जाने वाली मदों को अलग रखना चाहिए जैसे स्वर्ण भण्डारों व विदेशी मुद्रा के आरक्षित भण्डारों में कमी, विदेशी से अल्पकालीन या दीर्घकालीन ऋण। यदि इन मदों को निकाल कर किसी देश का भुगतान में है तो यह वास्तविक सन्तुलन माना जायेगा अन्यथा भुगतान शेष वास्तव में असन्तुलन में माना जायेगा । सन्तुलन संबंधी तीन स्थितियां हो सकती हैं –

  1. सन्तुलित भुगतान शेष – निर्यात = आयात
  2. बचत का भुगतान शेष – निर्यात > आयात
  3. घाटे का भुगतान शेष – निर्यात < आयात

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प्रश्न 3.
विदेशी मुद्रा बाजार मे संतुलन की प्रक्रिया समझाए।
उत्तर:
विनिमय बाजार में संतुलन की प्रक्रिया सामान्य बाजार की तरह मुद्रा की मांग और आपूर्ति के साम्य द्वारा तय होती है। विदेशी विनिमय बाजार में मुद्रा का मांग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला और आपूर्ति वक्र धनात्मक ढाल वाला होता है। मांग वक्र तथा पूर्ति वक्र जिस बिन्दु पर काटते हैं उस बिन्दु को साम्य बिन्दु कहते हैं। साम्य बिन्दु पर विनिमय की दर संतुलन विनिमय दर कहलाती है तथा मात्रा को संतुलन मात्रा कहते हैं। विनिमय बाजार में संतुलन को चित्र की सहायता से भी दर्शाया जा सकता है। आपूर्ति वक्र S का ढाल धनात्मक है।

जिसका अभिप्राय यह है कि विनिमय दर ऊँची होने पर विदेशी मुद्रा अधिक मात्रा में प्राप्त हो सकती है। इससे विदेशियों को वस्तुएं सस्ती लगती हैं और परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ जाती है। मुद्रा का मांग वक्र DD ऋणात्मक ढाल वाला है। पूर्ति वक्र और वक्र दोनों बिन्दु E पर काटते हैं। बिन्दु E साम्य बिन्दु है। बिन्दु Eसे X अक्ष पर डाले गए लम्ब का पाद (फुट) संतुलन मात्रा को दर्शाया है तथा साम्य बिन्दु से Y अक्ष पर डाले गए लम्ब का पाद संतुलन विनिमय दर को दर्शाया है।
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प्रश्न 4.
विश्व व्यापार में नम्य विनिमय दर व्यवस्था पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
विश्व व्यापार में नम्य विनिमय दर व्यवस्था स्थिर विनिमय दर व्यवस्था से एकदम उल्टी है। विश्व स्थिर विनिमय दर का निर्धारण सरकार करती है और उसमें परिवर्तन की गुंजाइश बहुत कम होती है। जबकि नम्य विनिमय दर व्यवस्था में सरकार अथवा मौद्रिक अधिकारियों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत विश्व मुद्रा बाजार में विनिमय की दर विश्व बाजार में मुद्रा की मांग एवं आपूर्ति के साम्य से तय होती है। मांग और आपूर्ति में परिवर्तन होने पर विनिमय दर बदलती रहती है।
पूर्णतः नम्य विनिमय दर व्यवस्था के निम्नलिखित गुण हैं –

  1. विश्व मुद्रा बाजार में नम्य विनिमय दर व्यवस्था के कारकों की वजह से देशों के केन्द्रीय बैकों को विदेशी मुद्राओं के भण्डार रखने की जरूरत नहीं होती है।
  2. नम्य विनिमय दर व्यवस्था लागू होने से सदस्य देशों के बीच व्यापार तथा पूंजी के आवागमन की रुकावटें समाप्त हो जाती हैं।
  3. नम्य विनिमय दर व्यवस्था से अर्थव्यवस्था संसाधनों का अभीष्टतम वितरण करके अर्थव्यवस्था की कुशलता में बढ़ोतरी करती है।

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प्रश्न 5.
भारत के भुगतान शेष खातों की संरचना समझाइए।
उत्तर:
भुगतान शेष खाते को द्विअंकन पद्धित (Double Entry System) में तैयार किया जाता है। अतः भुगतान शेष खाते में जमा व नामे की दो प्रविष्टियां होती है। इस प्रविष्टियों का आकार समान होता है इसलिए यह खाता हमेशा संतुलन में होगा है। भुगतान शेष के सभी लेन-देनों को 5 वर्गों में बाटकर निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है नामे (-)

(I) श्रेणी – 1:

  • वस्तु का आयात
  • सेवाओं का आयात

श्रेणी – 2:
प्रदान गए अन्तरण भुगतान

श्रेणी – 3

  • देश के निवासियों एवं सरकार द्वारा धारित दीर्घकालिक विदेशी परिसंपत्तियों में वृद्धि
  • विदेशी नागरिको एवं सरकारों द्वारा धारित इस देश की दीर्घकालिक परिसपत्तियों में कमी।

श्रेणी – 4

  • देश के नागरिकों द्वारा अल्पकालिक विदेशी परिसंपत्तियों में वृद्धि।
  • विदेशी नागरिकों द्वारा धारित विदेशी परिसंपत्तियों में कमी।

जमा (+)

  • वस्तुओं का निर्यात
  • सेवाओं का आयात

(II) प्राप्त किए गए हस्तातरण भुगतान

(III)

  • देश के नागरिकों और सरकार द्वारा धारित दीर्घ कालिक विदेशी परिसंपत्तियों में कमी।
  • विदेशी नागरिकों एवं सरकारों द्वारा धारित इस देश की दीर्घकालिक परिसंपत्तियों में वृद्धि।

(IV)

  • देश के नागरिकों द्वारा धारित अल्पकालिक विदेशी परिसंपत्तियों में कमी।
  • विदेशी नागरिकों द्वारा धारित इस देश की अल्पकालिक परिसपत्तियों में वृद्धि।

प्रश्न 6.
विदेशी विनिमय बाजार की कार्यपद्धति के हाजिर बाजार एवं वायदा बाजार पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
विदेशी विनिमय बाजार के विश्लेषण में लेन-देन की विधि समय अवधि से जुड़ी होती है। लेन-देन के समय अवधि के आधार पर इसे दो भागों में बांटा जा सकता है –

1. हाजिर बाजार:
इस बाजार को चालू बाजार भी कहा जाता है। इस बाजार में लेन-देन दैनिक आधार पर किया जता है। किसी देश की मुद्रा की औसत सापेक्ष शक्ति के नाम को प्रभावी विनिमय दर कहते हैं। प्रभावी विनिमय दर में कीमत परिवर्तन के प्रभावों को समाप्त नहीं किया जाता है। इसलिए इसे मौद्रिक प्रभावी विनिमय दर भी कहते है। विश्व विनिमय दर सुधार या गिरावट का अनुमान वास्तविक विनिमय दर के आधार पर किया जाता है। इसमें केवल चालू खाते के लेन-देनों में संतुलन होता है। इसका आधार यह है कि एक ही मुद्रा में आकलन करने से सभी देशों में कीमतें एक समान हो जाती है। सापेक्ष क्रय शक्ति दर से सदस्य देशों की कीमत वृद्धि दर को विश्व विनिमय दर से जोड़ा जाता है।

2. वायदा बाजार:
इस बाजार में लेन-देन भविष्य में देयता के आधार पर होता है। इस बाजार में भविष्य में किसी तिथि पर पूरे होने वाले लेन-देन का कामकाज होता है। विश्व व्यापार में ज्यादातर लेन-देन उसी दिन पूरे नहीं होते हैं जिस दिन लेन-देन के दस्तावेजों पर दो देश हस्ताक्षर करते हैं। लेन-देन उसके कई दिन बाद होता है इसलिए इस बाजार में भविष्य में होने वाली सम्भावित विनिमय दर पर भी ध्यान दिया जाता है। इससे सदस्य देशों को सम्भावित विनिमय दर से उत्पन्न होने वाले जोखिमों का उपाय करने का मौका मिल जाता है। वायदा बाजार में ऐसे व्यापारी भागीदार होते हैं जिनको भविष्य में किसी दिन किसी मुद्रा की जरूरत होगी अथवा वे मुद्रा की आपूर्ति करेंगे। भविष्य के सौदे करने में दो उद्देश्य होते हैं –

  • विनिमय दर परिवर्तन के कारण सम्भवित जोखित को कम करना।
  • लाभ कमाना, पहले उद्देश्य को जोखिम का पूर्व उपाय कहते हैं और दूसरे को सट्टेबाजी।

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प्रश्न 7.
भुगतान शेष के चालू एवं पूंजी खाते में सम्मिलित विभिन्न मदों के ब्यौरे दर्शाइए।
उत्तर:
चालू खाता-चालू खाते के घटक निम्नलिखित हैं –

  1. वस्तुओं का आयात निर्यात
  2. सेवाओं का आयात निर्यात
  3. एक पक्षीय अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति एवं व्यय

वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात विदेशों से अन्तरण भुगतानों की प्राप्ति जमा में तथा वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात तथा अन्तरण भुगतानों पर व्यय को नामे में दर्शाया जाता है। चालू खाते की मदों को तालिका में निम्न प्रकार से दर्शाया जा सकता है –

चालू खाते की मदें लेनदारी:

  1. वस्तओं का निर्यात (दृश्य)
  2. अदृश्य मदें

शेष विश्व को दी गई सेवाएं (शिक्षा, स्वास्थ, यात्रा, बीमा, यातायात, बैकिंग आदि।)
शेष विश्व से हस्तातरण भुगतान –

  1. सरकारी
  2. निजी

शेष विश्व से प्राप्त/आर्जित निवेश –

  1. शेष विश्व से प्राप्त निवेश आय
  2. शेष विश्व से प्राप्त कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति। मुआवजा।

देनदारी:

  1. वस्तुओं का आयात (दृश्य)
  2. अदृश्य मदें
  3. शेष विश्व से प्राप्त सेवाए
  4. शेष विश्व से हस्तातरण भुगतान (दान एवं उपहार)
  5. शेष विश्व को प्रदान की गई अर्जित आय
  6. शेष विश्व को दी गई निवेश आय
  7. शेष विश्व को दी गई कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति/मुआवजा

पूंजीगत खाता:
इस खाते में पूंजीगत परिसंपत्तियों तथा दायित्वों का लेन-देन दर्शाया जाता है। इस खाते के घटक निम्नलिखित हैं –

  1. निजी लेन-देन
  2. सरकारी लेन-देन
  3. प्रत्यक्ष निवेश
  4. पत्राचार निवेश

एक देश द्वारा विदेशों से परिसम्पत्तियों की खरीद को उस देश के पूंजी खाते के नामे में और देश द्वारा विदेशों को परिसम्पत्तियों की बिक्री को जमा में दर्शाया जाता है। पूंजी खाते की मदें कुल पूंजीगत प्राप्तियां –

  1. विदेशी निजी ऋणों की प्राप्ति।
  2. बैकिंग पूंजी का आन्तरिक प्रवाह।
  3. सरकारी क्षेत्र द्वारा प्राप्त ऋण।
  4. रिजर्व एवं मौद्रिक स्वर्ण प्राप्तियां।
  5. स्वर्ण अन्तर विक्रय।

कुल पूंजीगत भुगतान –

  1. स्वदेशियों द्वारा निजी ऋणों की वापसी।
  2. बैकिंग पूंजी का बाहा प्रवाह।
  3. सरकार क्षेत्र द्वारा ऋणों का भुगतान।
  4. रिजर्व एवं मौद्रिक स्वर्ण अन्तरण भुगतान।
  5. स्वर्ण क्रय।

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प्रश्न 8.
विनिमय दर के भुगतान संतुलन सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
विनिमय दर के भुगतान सन्तुलन सिद्धान्त को विनिमय दर का आधुनिक सिद्धान्त भी कहते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार विनिमय दर का निर्धारण एक देश की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार ‘मैं मुद्रा की मांग व आपूर्ति के सन्तुलन से तय होती है। प्रो. कुरीहारा के अनुसार स्वतन्त्र विनिमय दर उस बिन्दु पर तय हाती है जिस पर विदेश विनिमय की मांग तथा आपूर्ति दोनों बराबर हो जाए। इस सिद्धांत के अनुसार निम्न स्थितियों में विनिमय दर में परिवर्तन होता है –

1. अनुकूल भुगतान शेष:
यदि किसी देश का भुगतान शेष अनुकूल होता है तो इसका अभिप्राय यह है कि उसे देश की विदेशों से समस्त लेनदारियां, समस्त देनदारियों से ज्यादा हैं। इससे विदेशी मुद्रा की आपूर्ति उस देश में बढ़ जाएगी और उस देश की मुद्रा की विनिमय दर में वृद्धि हो जाएगी।

2. प्रतिकूल भुगतान शेष:
प्रतिकूल भुगतान शेष की अवस्था में एक देश की विदेशों में समस्त लेनदारियां, समस्त देनदारियों से कम होती हैं। इससे उसे देश में विदेशी पूंजी की आपूर्ति कम हो जायेगी और उस देश की मुद्रा की विनिमय दर में कमी आ जायेगी।

3. सन्तुलित भुगतान शेष:
इस स्थिति में एक देश की विदेशों से स्मस्त लेनदारियां, समस्त देनदारियां के समान होती हैं अर्थात् विदेशी पूंजी की आपूर्ति स्थिर रहेगी और उस देश की मुद्रा की विनिमय दर भी स्थिर रहेगी। इस सिद्धान्त को मुद्रा की मांग व आपूर्ति वक्रों के सन्तुलन से भी समझाया जा सकता है।

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चित्र में विदेशी मुद्रा का मांग वक्र = DD
विदेशी मुद्रा का पूर्ति वक्र = SS
सन्तुलन बिन्दु E पर विनिमय दर = OR
सन्तुलित मांग व आपूर्ति = OQ

सिद्धान्त की मान्यताएं –

  1. अर्थव्यवस्था में पूर्ण प्रतियोगिता पायी जाती है।
  2. सरकारी हस्तक्षप आर्थिक मामलों में नगण्य होता है।
  3. विनिमय दर आयात व निर्यात से प्रभावित होता है।
  4. विनिमय दर निर्धारण से देश के कीमत स्तर पर प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. विनिमय दर केवल विदेशी मुद्रा की मांग व आपूर्ति के सन्तुलन से निर्धारित होती है।

सिद्धान्त की आलोचनाएं –

  1. अर्थव्यवस्था में पूर्णप्रतियोगिता की मान्यता कोरी कल्पना है।
  2. सरकारी अहस्तक्षेप की मान्यता भी अव्यावहारिक है।
  3. विनियिम दर आयात-निर्यात से प्रभावित होती है परन्तु विनिमय दर भी आयात-निर्यात से परिवर्तन करती है।
  4. देश का कीमत स्तर भी आयात व निर्यात को प्रभावित करता है अर्थात् अप्रत्यक्ष रूप से देश में कीमत स्तर विदेशी विनिमय को प्रभावित करता है।
  5. विदेशी विनिमय दर केवल विदेशी मुद्रा की मांग व पूर्ति से ही प्रभावित नहीं होती है बल्कि सट्टा बाजार, राजनैतिक परिवर्तन, वित्तीय संस्थाओं की कार्यपद्धति, विदेशी आर्थिक क्रियाकलाप भी विदेशी विनिमय दर पर प्रभाव डालते हैं।

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प्रश्न 9.
स्थिर विनिमय दर व्यवस्था तथा समजंनीय सीमा व्यवस्था को समझाइए।
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर व्यवस्था:
इस व्यवस्था के अन्तर्गत देश की सरकार देश की अपनी मुद्रा की विनिमय दर की घोषणा करती है। सरकार द्वारा घोषित दर स्थिर रखी जाती है। इसमें बहुत मामूली परिवर्तन ही मान्य होते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था 1880 से लेकर 1914 तक स्वर्ण मांग व्यवस्था के रूप में थी। प्रत्येक देश स्वर्ण मांग में स्वर्ण के निश्चित भार का देश की मुद्राओं का निर्धारण किया जाता था। घोषित मूल्यों के अधार पर विभिन्न देशों की मुद्राओं का निर्धारण किया जाता था। इसे टकसाल मांग समता दर कहते थे। उदाहरण के लिए यदि 1 रूपये के बदले 150 शुद्ध कण मिल रहे हैं ओर एक येन के बदले 25 तो 1 = 150/25 = 6 येन अर्थात् एक रूपया = 6 येन की विनिमय दर तय की जाती थी।

समजनीय सीमा व्यवस्था:
विनिमय दर की स्वर्ण व्यवस्था भुगतान शेष की समस्याओं को सुलझाने में नाकाम रही। अतः इस व्यवस्था को 1920 में त्याग दिया गया और 1944 में ब्रेटन बुडस व्यवस्था लागू की गई। इस व्यवस्था में केवल बार घोषित दर को बनाए रखने का दायित्व सरकार का रहता था। अतः यह व्यवस्था स्थिर विनिमय दर व्यवस्था का संशोधित रूप है। स्थिर विनिमय दर व्यवस्था के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं –

  1. स्थिर विनिमय दर की सहायता से आर्थिक नीतियों को कमजोर बनाने वाले संकटों पर नियंत्रण रहता है।
  2. स्थिर विनिमय दर सदस्य देशों की समष्टि स्तरीय आर्थिक नीतियों में समन्वय बनाने में मदद करती है।
  3. स्थिर विनिमय दर से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता और जोखिम समाप्त होते हैं और विश्व व्यापार में बढ़ोतरी होती है।

आंकिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आपको एक प्रतिदर्श दिया गया है जो एक काल्पनिक अर्थव्यवस्था के उपभोग फलन को दर्शाता है:Bihar Board Class 12th Economics Solutions Chapter 6 खुली अर्थव्यवस्था समष्टि अर्थशास्त्र part - 1  img 10

उत्तर:
(a) Y = C + I + G + X – M
= 100 + 8(y – 40) + 38 + 75 + 25 – 0.05(y – 40)
= 238 + 8y – 8 × 40 – 0.05Y + 0.056 × 40 = 208 + 0.75y
y – 0.75y = 208
25y = 208

(b) सरकारी घाटा = G – T
= 75 – 40 = 35

(c) चालू खाता शेष = X – M = X – 0.05 yD [∵YD = Y – T]
= 25 – 0.05 (832 – 40) T = tax
325 – 0.05 × 792
= 25 – 39.60 = -14.6

(a) साम्य राष्ट्रीय आय = 432
(b) सरकारी घाटा = 35
(c) चालू खाता शेष = -14.6

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प्रश्न 2.
माना एक रुपया खरीदने के लिए 2.45 येन देने पड़ते हैं। जापान में कीमत स्तर और भारत में कीमत स्तर 2.21 है भारत व जापान के बीच वास्तविक विनिमय दर ज्ञात करो।
उत्तर:
PF = 5 व P = 2.2 अ
2.45 येन की कीमत = 1 रुपया
1 येन की कीमत = \(\frac{1}{2.46}\) रुपया
= \(\frac { 100 }{ 245 } \) = 0.408 रुपया

वास्तविक विनिमय दर –
= ePF/P
= \(\frac { 0.408\times 5 }{ 2.2 } \)
= 0.92
वास्तविक विनिमय दर = 0.92

प्रश्न 3.
जब M = – 40 + 0.25 y है तो आयात की सीमान्त प्रवृत्ति क्या होगी? आयात की सीमान्त प्रवृत्ति व सामूहिक व्यय में क्या संबंध होगा?
उत्तर:
M = – 40 + 0.25y (दी गई समीकरण)
M = m + my (मानक समीकरण) दोनों समीकरणों की तुलना करने पर स्वायत आयात
M = -40 आयात की सीमान्त प्रवृत्ति
m = 0.25 आयात की सीमान्त प्रवृत्ति 0.25 है इसका अभिप्राय यह है कि सामूहिक व्यय प्रयोज्य आय बढ़ने पर इसका 25 प्र. श. आयात बढ़ेगा । अर्थात् आयात की सीमान्त प्रवृत्ति व सामूहिक व्यय में सीधा संबंध है।

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प्रश्न 4.
माना C = 85 + 5yD, T = 60, I = 85, G = 60, X = 90, M = 40 + 0.05 y
(a) साम्य आय क्या होगी?
(b) साम्य आय पर शुद्ध निर्यात ज्ञात करो।
उत्तर:
(a) साम्य आय
y = \(\frac{C-CT+I+G+X-M}{1-C+m}\)
= \(\frac{85 – 0.5 60 + 85 + 60 + 90 – 45}{1-0.5+0.5}\)
= \(\frac{250}{0.55}\) = 454.5

(b) साम्य आय पर शुद्ध निर्यात शेष
NX = X – M – mY
= 90 – 40 – 0.5 × 454.5
= 52 – 22.7 = 27.3
(a) साम्य आय = 454.3
(b) साम्य आय पर शुद्ध निर्यात शेष = 27.3

प्रश्न 5.
माना MPC = 0.8 or C = 0.8, M = 60 + 0.06Y तो व्यय गुणक ज्ञात करो।
उत्तर:
MPC = 0.8
c = 0.8
M = M + mY (मानक समीकरण)
M = 60 + 0.06Y (दी गई समीकरण)
दोनों समीकरणों की तुलना करने पर
M = 0.06
\(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C+m}\) = \(\frac{1}{1-0.5+0.6}\)
= \(\frac{1}{2+0.06}\) = \(\frac{1}{0.26}\) = \(\frac{100}{26}\) = 3.84
व्यय गुणक = 3.84

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प्रश्न 6.
यदि C = 0.05 व M = 0.45 बन्द व खुली अर्थव्यवस्था के लिए व्यय गुणक ज्ञात करो।
उत्तर:
बन्द अर्थव्यवस्था के लिए – \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C+m}\) = \(\frac{1}{1-0.5}\) = \(\frac{1}{95}\) = 1.05
खुली अर्थव्यवस्था के लिए – \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C+m}\) = \(\frac{1}{1-0.05+0.45}\) = \(\frac{1}{1.4}\) = 0.71
बन्द अर्थव्यवस्था में व्यय गुणक = 1.05
खुली अर्थव्यवस्था में व्यय गुणक = 0.71

प्रश्न 7.
माना एक रुपया खरीदने के लिए 0.25 येन की आवश्यकता पड़ती है। जापान व पाकिस्तान में कीमत स्तर 5 व 0.2 है। जापान व पाकिस्तान के बीच वास्तविक विनिमय दर ज्ञात करो।
उत्तर:
PF = 5, P = 0.2
0.25 येन की कीमत = 1 रुपया
1 येन की कीमत = \(\frac{1}{0.25}\) = \(\frac{100}{25}\) = 4 रुपया
वास्तविक विनिमय दर = e\(\frac { P_{ F } }{ P } \) = 4 × \(\frac{5}{0.2}\) = 20 × 5 = 100
वास्तविक विनिमय दर = 100

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प्रश्न 8.
यदि C = 0.5 एवं m = 0.2, बन्द व खुली अर्थव्यवस्था का व्यय गुणक ज्ञात करो।
उत्तर:
1. बन्द अर्थव्यवस्था का व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C}\) = \(\frac{1}{1-0.5}\) = \(\frac{1}{0.5}\) = 2

2. खुली अर्थव्यवस्था का व्यय गुणक \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C+m}\) = \(\frac{1}{1-0.5+0.2}\) = \(\frac{1}{0.7}\) = 1.42
बन्द अर्थव्यवस्था में व्यय गुणम = 2
खुली अर्थव्यवस्था में व्यय गुणक = 1.42

प्रश्न 9.
आपको नीचे एक प्रतिदर्श दिया गया है जो एक काल्पनिक अर्थव्यवस्था से संबंधित है –
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उत्तर:
(a) Y = C + I + G + X – M
= 85 + 5(y – 50) + 60 + 85 + 90 – 0.05(y – 60)
= 85 + 5y – 25 + 60 + 85 + 90 – 0.5y + 30 = 325 + 0 = 325

(b) सरकारी घाटा = G – T = 85 – 50 = 35

(c) निर्यात शेष = X – M = 90 – 0.5 (325 – 60)
= 90 – 132.5 = -42.5
उत्तर:
(a) साम्य आय = 325
(b) सरकारी घाटा 335
(c) निर्यात शेष = – 42.5

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
केन्द्रीय दर से 25 प्र. श. ऊपर या नीचे विनिमय पट्टी पर चलन देश घाटे के प्रभाव को कम करते हैं यह तर्क संबंधित है –
(A) 1971 में स्मिथ सोनियन तर्क से
(B) कीनस के आय, रोजगार और मुद्रा सिद्धांत से
(C) रिकार्डो सिद्धांत से
(D) उपभोक्ता सिद्धांत से
उत्तर:
(A) 1971 में स्मिथ सोनियन तर्क से

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प्रश्न 2.
कुछ देश अपनी मुद्राओं को जोड़ते हैं –
(A) पौड़ से
(B) रुपये से
(C) येन से
(D) डालर से
उत्तर:
(D) डालर से

प्रश्न 3.
यूरोपियन मुद्रा संघ का गठन किया गया
(A) जनवरी 1999 में
(B) फरवरी 1999 में
(C) मार्च 1999 में
(D)अप्रैल 1999 में
उत्तर:
(A) जनवरी 1999 में

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प्रश्न 4.
यूरोप के देशों की सामान्य (common) मुद्रा है –
(A) डालर
(B) पौड़
(C) यूरो
(D) स्टर्लिंग
उत्तर:
(C) यूरो

प्रश्न 5.
25 में से 12 यूरोप के देशों के सदस्यों ने यूरो को स्वीकृत किया?
(A) 1991 में
(B) 1981 में
(C) 1971 में
(D) 1961 में
उत्तर:
(A) 1991 में

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प्रश्न 6.
समग्र रूप से अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति की विशेषता है –
(A) वर्गीकृत पद्धति
(B) बहुविकल्पीय पद्धति
(C) पद्धतियों का योग
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बहुविकल्पीय पद्धति

प्रश्न 7.
अर्जेन्टिना ने यूरो बोर्ड पद्धति को अपनाया?
(A) 1991 में
(B) 1981 में
(C) 1996 में
(D) 1961 में
उत्तर:
(A) 1991 में

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प्रश्न 8.
एक बंद अर्थव्यवस्था के लिए साम्य आय का प्रारूप है –
(A) Y = C + I + G
(B) Y = C + I + G + X – M
(C) Y = C + I + G – X – M
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) Y = C + I + G

प्रश्न 9.
एक खुली अर्थव्यवस्था के लिए साम्य आय का प्रारुप है –
(A) Y = C + I + G
(B) Y = C + I + G + X – M
(C) Y = C + I + G – X – M
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) Y = C + I + G + X – M

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प्रश्न 10.
खुली अर्थव्यवस्था का व्यय गुणक है –
(A) \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C+m}\)
(B) \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C}\)
(C) \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{-C}{1-C}\)
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) \(\frac{∆Y}{∆A}\) = \(\frac{1}{1-C+m}\)