Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 7 हिरोशिमा

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड Chapter 7 हिरोशिमा Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 7 हिरोशिमा

Bihar Board Class 10 Hindi हिरोशिमा Text Book Questions and Answers

कविता के साथ

हिरोशिमा कविता का भावार्थ Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 1.
कविता के प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज क्या है ? वह कैसे निकलता है?
उत्तर-
कविता के प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज आण्विक बम का प्रचण्ड गोला है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह क्षितिज से न निकलकर धरती फाड़कर निकलता है। अर्थात् हिरोशिमा की धरती पर बम गिरने से आग का गोला चारों ओर फैल जाता है, चारों ओर आग की लपटें फैल जाती हैं। धरती पर भयावह दृश्य उपस्थित हो जाता है। आण्विक बम नरसंहार करते हुए उपस्थित होता है।

हिरोशिमा कविता का सारांश Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 2.
छायाएं दिशाहीन सब ओर क्यों पड़ती हैं ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
सूर्य के उगने से जो भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब या छाया का निर्माण होता है वे सभी निश्चित दिशा में लेकिन बम-विस्फोट से निकले हुए प्रकाश से जो छायाएँ बनती हैं वे दिशाहीन होती
हैं। क्योंकि आण्विक शक्ति से निकले हुए प्रकाश सम्पूर्ण दिशाओं में पड़ता है। उसका कोई निश्चित दिशा नहीं है। बम के प्रहार से मरने वालों की क्षत-विक्षत लाशें विभिन्न दिशाओं में जहाँ-तहाँ पड़ी हुई हैं। ये लाशें छाया-स्वरूप हैं परन्तु चतुर्दिक फैली होने के कारण दिशाहीन छाया कही गयी है। बम के रूप में सूरज की छायाएँ दिशाहीन सब ओर पड़ती हैं।

Hiroshima Kavita Ka Saransh In Hindi Bihar Board प्रश्न 3.
प्रज्ज्वलित क्षण की दोपहरी से कवि का आशय क्या है ?
उत्तर-
हिरोशिमा में जब बम का प्रहार हुआ तो प्रचण्ड गोलों से तेज प्रकाश निकला और वह चतुर्दिक फैल गया। इस अप्रत्याशित प्रहार से हिरोशिमा के लोग हतप्रभ रहे गये। उन्हें सोचने  का अवसर नहीं मिला। उन्हें ऐसा लगा कि धीरे-धीरे आनेवाला दोपहर आज एक क्षण में ही उपस्थित हो गया। बम से प्रज्वलित अग्नि एक क्षण के लिए दोपहर का दृश्य प्रस्तुत कर दिया। कवि उस क्षण में उपस्थित भयावह दृश्य का आभास करते हैं जो तात्कालिक था। वह दोपहर उसी क्षण वातावरण से गायब भी हो गया।

Hiroshima Kavita Ki Vyakhya Bihar Board प्रश्न 4.
मनुष्य की छायाएँ कहाँ और क्यों पड़ी हुई हैं?
उत्तर-
मनुष्य की छायाएँ हिरोशिमा की धरती पर सब ओर दिशाहीन होकर पड़ी हुई हैं।
जहाँ-तहाँ घर की दीवारों पर मनुष्य छायाएँ मिलती हैं। टूटी-फूटी सड़कों से लेकर पत्थरों पर छायाएँ प्राप्त होती हैं। आण्विक आयुध का विस्फोट इतनी तीव्र गति में हुई कि कुछ देर के लिए समय का चक्र भी ठहर गया और उन विस्फोट में जो जहाँ थे वहीं उनकी लाश गिरकर सट गयी। वही सटी हुई लाश अमिट छाया के रूप में प्रदर्शित हुई।

Hiroshima Poem By Agyeya In Hindi Bihar Board प्रश्न 5.
हिरोशिमा में मनुष्य की साखी के रूप में क्या है ?
उत्तर-
आज भी हिरोशिमा में साखी के रूप में अर्थात् प्रमाण के रूप में जहाँ-तहाँ जले हुए पत्थर दीवारें पड़ी हुई हैं यहाँ तक कि पत्थरों पर, टूटी-फूटी सड़कों पर, घर के दीवारों पर लाश के निशान छाया के रूप में साक्षी है। यही साक्षी से पता चलता है कि अतीत में यहाँ अमानवीय दुर्दान्तता का नंगा नाच हुआ था।

हिरोशिमा कविता Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 6.
व्याख्या करें:
(क) “एक दिन सहसा / सूरज निकता’
(ख) ‘काल-सूर्य के रथ के पहियों के ज्यों अरे टूट कर / बिखर गये हों / दसों दिशा में’
(ग) ‘मानव का रचा हुआ सूरज / मानव को भाप बनाकर सोख गया।
उत्तर-
(क)प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी प्रयोगवादी विचारधारा के महान प्रवर्तक कवि अज्ञेय द्वारा लिखित ‘हिरोशिमा’ नामक शीर्षक से अवतरित है। प्रस्तुत अंश में हिरोशिमा में हुए बम विस्फोट के बाद दुष्परिणाम का जो अंश उपस्थित हुआ है उसी का मार्मिक चित्रण है। – कवि कहना चाहते हैं कि जब हिरोशिमा में आण्विक आयुध का प्रयोग हुआ उस समय प्रकृति के शाश्वत तत्त्व भी कुंठित हो गये। सूरज जैसा ब्रह्माण्ड का शक्ति सनव को ही वाष्प बनाकर सांख गया। उस समय सड़कों, गलियों में चल-फिर रहे लोग, वाष्प की भाँति विलीन हो गए। आस-पास के पत्थरों पर, सड़कों पर, दीवारों पर उस त्रासदी के फलस्वरूप बनी मानव छायाएँ दुर्दान्त मानव के कुकृत्य की साक्षी हैं।

यहीं द्वितीय विश्व युद्ध अणु-बम का विस्फोट हुआ और एक अनहोनी होती है।

भाषा की बात

हिरोशिमा’ कविता की व्याख्या Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 1.
कविता में प्रयुक्त निम्नांकित शब्दों का कारक स्पष्ट कीजिए-
क्षितिज, अंतरिक्ष, चौक, मिट्टी, बीचो-बीच; नगर, रथ, गय, छाया।
उत्तर-
क्षितिज – अधिकरण कारक
अंतरिक्ष – अपादान कारक
चौक – संबंधकारक
मिट्टी – अपादान कारक
बीचो-बीच – संबंध कारक
नगर – संबंध कारक
रथ – संबंध कारक
गच – अधिकरण
छाया – कृर्ता कारक

Hiroshima Poem In Hindi Bihar Board Class 10 प्रश्न 2.
कविता में प्रयुक्त क्रियारूपी का चयन करते हुए उनकी काल रचना स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
निकला – वर्तमान काल
पड़ी – भूतकाल
उगा था – भूतकाल
गये हां – भूतकाल
लिखी हैं – भूतकाल
लिखी हुई – भूतकाल
है – वर्तमान काल

हिरोशिमा’ कविता का भावार्थ Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 3.
कविता से तद्भव शब्द चुनिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर-
सूरज – सूरज निकल आया।
धूप – धूप निकल गया।
मिट्टी – मिट्टी गीली है।
पहिया – पहिया टूट गया।
पत्थर – पत्थर बड़ा है।
सड़क – सड़क चौड़ी है।

हिरोशिमा की पीड़ा कविता का अर्थ Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 4.
कविता से संज्ञा पद चुनें और उनकी प्रकार भी बताएँ।
उत्तर-
सूरज – व्यक्तिवाचक
नगर – जातिवाचक
चौक – जातिवाचक
मानव – जातिवाचक
रथ – जातिवाचक
पहिया – जातिवाचक
अरे – जातिवाचक
पत्थर – जातिवाचक
सड़क – जातिवाचक

Sakhi Class 10 Question Answers Bihar Board Hindi प्रश्न 5.
निम्नांकित के वचन परिवर्तित कीजिए-
छायाएँ, पड़ी, उगा, हैं, पहियों, अरे, पत्थरों, साखी।
उत्तर-
छायाएँ – छाया
पड़ीं – पड़ी
उगा – उगे
हैं – है
पहियों – पहिया
अरे – अरें
पत्थरों – पत्थर
साखी – साखियाँ

काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

1. एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं,
नगर के चौक
धूप बरसी
पर अन्तरिक्ष से नहीं,
फटी मिट्टी से।
छायाएँ मानव-जन की
दिशाहीन
सब ओर पड़ीं-वह सूरज
नहीं उगा था पूरब में, वह
बरसा सहसा
बीचों-बीच नगर के
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्यों अरे टूट कर
बिखर गये हों
दसों दिशा में।

हिरोशिमा नागासाकी Bihar Board Class 10 Hindi  प्रश्न
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता–हिरोशिमा।
कवि-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

(ख) प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश में प्रयोगवादी विचारधारा के प्रमुख कवि अज्ञेय ने आधुनिक सभ्यता का दुर्दात मानवीय विभीषिका का चित्रण किया है। जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा पर मानव जाति ने आण्विक तत्त्वों का क्रूरता के साथ दुरुपयोग करने से जो भीषणतम परिणाम सामने आया उसी का एक साक्ष्य है। इस साक्ष्य के माध्यम से कवि एक अनिवार्य चेतावनी दे रहे हैं।

(ग) सरलार्थ-प्रस्तुत पद्यांश में जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा पर अमरीका द्वारा क्रूरता से जब आण्विक आयुध का प्रयोग किया गया तो हिरोशिमा तो क्या संपूर्ण विश्व की सभ्यता कराह उठी। उस भीषणतम आण्विक शक्ति के प्रयोग के बाद जो हिरोशिमा की स्थिति हुई उसी स्थिति का वर्णन कवि साक्ष्य के धरातल पर करते हैं। कवि कहते हैं कि अचानक एक प्रचण्ड ज्वाला से प्रज्वलित धरातल को फोड़ता हुआ आण्विक बम रूपी सूरज निकला। हिरोशिमा नामक शहर के खबूसरत चौक चौराहे पर प्रचण्ड ताप लिये हुए धूप निकली।

यह धूप अंतरिक्ष के स्थल से नहीं निकलकर धरती की छाती को फोड़कर निकली और अपनी प्रचण्डता को बिखरती हुई पूरे हिरोशिमा को जलाने लगी। बम विस्फोट से चारों ओर इतनी ज्वाला फैली कि समस्त जन-जीवन क्रूरता के गाल में समाहृत हो गया। प्रकृति प्रदत्त सूरज जब पूरब से उगता है तब एक निश्चित दिशा में निश्चित छाया बनती है लेकिन इस आण्विक बम रूपी सूर्य के उगने से समस्त जीवों की छायाएँ जहाँ-तहाँ पड़ी हुई मिलीं। जैसे लगा कि पूर्व दिशा का एक सूरज नहीं उगा है चारों ओर सूर्य ही सूर्य उगा हुआ है। कवि साक्ष्य के आधार पर कहते हैं कि जैसे लगता है महाकाल-रूपी सूर्य के रथ के पहिये टूटकर दसों दिशाओं के साथ शहर के केन्द्र में बिखर गये हैं। अर्थात् चारों ओर हाहाकार और कोहराम की ध्वनि गुजित हो रही है। आधुनिक सभ्यता की दुर्दात मानवीय विभीषिका चित्र दिखाई पड़ रहे थे। विनाश का भीषणतम लीला का रूप मुंह बाये खड़ा था।

(घ) भाव-सौंदर्य – प्रस्तुत पद्यांश का भाव पूर्ण रूप से चित्रात्मक शैली में उद्धत है। प्रयोगवादी वातावरण स्पष्ट रूप से मिल रहे हैं। हिरोशिमा पर बम विस्फोट के बाद उभरे हुए नतीजे वर्षों तक मानव के, संवेदनाओं को झकझोर रहे हैं और जैसे उनसे प्रश्न पूछ रहे हैं कि क्या तुम्हारी सभ्यता की यही पहचान है?

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) कविता की भाषा पूर्णतः खड़ी बोली है।
(ii) यहाँ तद्भव के साथ तत्सम शब्दों का प्रयोग अर्थ की गंभीरता में सहायक है।
(iii) सम्पूर्ण कविता मुक्तक छंद में लिखी गयी है।
(iv) अलंकार योजना की दृष्टि से उपमा, अनुप्रास, दृष्टांत की छटा प्रशंसनीय है।
(v) इसमें वस्तु, भाव, भाषा, शिल्प आदि के धरातल पर प्रयोगों और नवाचरों की बहुलता है।
(vi) कविता में प्रयोगवाद की झलक मिल रही है।
(vii) ओजगुण में लिखी कविता भाव को सार्थक बना रही है।

2. कुछ क्षण का वह उदय-अस्त !
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी।
फिर?
छायाएँ मानव जन की
नहीं मिटीं लम्बी हो-हो कर;
मानव ही सब भाप हो गये।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर।
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बना कर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।

Hiroshima Poem Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ). काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता-हिरोशिमा।
कवि- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

(ख) प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में कवि अज्ञेय हिरोशिमा पर हुए बम विस्फोट के कठोरतम परिणाम का साक्ष्य प्रकट करते हैं। साक्ष्य इतना अमानवीय है कि आज भी इसके समस्त मानस पटल पर किसी-न-किसी रूप में उभरते रहते हैं।

(ग) सरलार्थ- इतिहास प्रसिद्ध हिरोशिमा की घटना आज भी राजनीति से उपजते संकट की आशंकाओं से जुड़ी हुई है। कवि कहते हैं कि यह घटना कुछ क्षण के उदयास्त में इस तरह का दोपहरी वातावरण निर्माण हुआ जिसमें केवल धूप की प्रचण्डता ही थी। वह प्रचण्डता उदय-अस्त के वातावरण को मिटाकर केवल ज्वलनशीलता रूपी दोपहर सामने उभरकर आया।

अनेक लोग जलकर राख हो गये। जो जहाँ था इस आण्विक बम प्रयोग से वहीं मरकर सट गया। जिसके दाग और निशान वर्षों तक अंकित रहे। मानवीय छायाएँ इतनी लम्बी और गहरी हुई कि अभी भी यह अंकित है। जैसे लगा कि सभी मानव भाप बनकर ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गये हैं। ज्वाला इतनी भीषण थी कि पत्थर भी झुलस गए। सड़कें क्षत-विक्षत हो गईं। मानव के द्वारा निर्मित बम रूपी सूरज खुद मानव को ही भाप बनाकर सोख गया। अर्थात् मानव के द्वारा रचित यह आण्विक बम मानव को ही विनाश कर बैठा। आज भी जहाँ-तहाँ मरे हुए मानव की छाया जो अंकित है वह आधुनिक सभ्यता की दुर्दात मानवीय विभीषिका की कहानी का गवाह है।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत अंश में अतीत की भीषणतम मानवीय दुर्घटना का साक्ष्य प्रकट किया गया है। साथ ही आण्विक आयुधों की होड़ में फंसी आज की वैश्विक राजनीति से उपजते
संकट की आशंकाओं से जुड़ी हुई है।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) कविता खड़ी बोली में है।
(ii) सम्पूर्ण कविता में प्रयोगवाद की झलक मिलती है। स्वतंत्र छंद में लिखी कविता मुक्तक की पहचान करा रही है।
(ii) साहित्यिक गुण की दृष्टि से ओज गुण के अंश देखने को मिल रहे हैं।
(iv) इसमें वस्तु, भाव, भाषा, शिल्प आदि के धरातल पर प्रयोगों और नवाचरों की बहुलता है। अलंकार की योजनाओं से उपमा पुनरुक्ति प्रकाश एवं अनुप्रास की छटा प्रशंसनीय है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्व

I. सही विकल्प चुनें

Hiroshima Poem By Agyeya Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 1.
‘हिरोशिमा’ के कवि कौन हैं ?
(क) रामधारी सिंह दिनकर
(ख) कुँवर नारायण
(ग) ‘अज्ञेय’
(घ) जीवानंद दास
उत्तर-
(ग) ‘अज्ञेय’

प्रश्न 2.
‘अज्ञेय’ किसका उपनाम है ?
(क) सच्चिदानंद वात्स्यायन
(ख) रामधानी सिंह
(ग) बदरी नारायण चौधरी
(घ) वीरेन डंगवाल
उत्तर-
(क) सच्चिदानंद वात्स्यायन

प्रश्न 3.
‘हिरोशिमा’ कहाँ है ?
(क) जापान में
(ख) म्यानमार में
(ग) कोरिया में
‘(घ) चीन में
उत्तर-
(क) जापान में

प्रश्न 4.
‘हिरोशिमा’ कविता में सूरज की संज्ञा किसे दी गई है ?
(क) जापान बम को
(ख) अणुबम को
(ग) हाइड्रोजन बम को
(घ) रडार को
उत्तर-
(ख) अणुबम को

प्रश्न 5.
“अज्ञेय’ किस काव्य-धारा के कवि हैं?
(क) रहस्यवाद
(ख) छायावाद
(ग) नकेनवाद
(घ) प्रयोगवाद
उत्तर-
(घ) प्रयोगवाद

प्रश्न 6.
किस काव्य-संकलन के प्रकाशन से हिन्दी में नयी हवा के झोंके आए
(क) तार-सप्तक
(ख) हरी घास पर क्षण भर
(ग) चक्रवाल
(घ) इन दिनों
उत्तर-
(क) तार-सप्तक

II. रिक्त स्थानों की पर्ति करें-

प्रश्न 1.
‘अज्ञेय’ का असली नाम …………. है।
उत्तर-
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन

प्रश्न 2.
अज्ञेय कवि कथाकार, नाटककार के अतिरिक्त सुधी ………… भी थे।
उत्तर-
सम्पादक

प्रश्न 3.
‘हिरोशिमा’ कविता अणु बम विस्फोट की ………….. में लिखी गई।
उत्तर-
पृष्ठभूमि

प्रश्न 4.
अणु बम फटने पर मानव ही सब ………….. हो गए।
उत्तर-
भाप

प्रश्न 5.
धूप बरसी पर ………. से नहीं।
उत्तर-
अन्तरिक्ष

प्रश्न 6.
‘अज्ञेय’ हिन्दी में ……… प्रवृत्तियाँ लेकर आए।
उत्तर-
नयी।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हिन्दी काव्य में ‘अज्ञेय’ ने क्या किया?
उत्तर-
हिन्दी-काव्य में ‘अज्ञेय’ ने छायावाद की धारा को प्रगतिवाद में समाहित किया और प्रयोगवाद की शुरुआत की।

प्रश्न 2.
‘तार सप्तक’ क्या है ?
उत्तर-
तार सप्तक’ सात प्रयोगधर्मी कवियों के काव्य का संकलन है।

प्रश्न 3.
‘काल-सूर्य’ का अर्थ क्या है ?
उत्तर-
काल-सूर्य का अर्थ है मृत्यु का सूरज।

प्रश्न 4.
‘अज्ञेय’ किस-किस साहित्य-पुरस्कार से सम्मानित हुए ?
उत्तर-
‘अज्ञेय’ को साहित्य अकादमी के अतिरिक्त ज्ञानपीठ सुगा (युगोस्लाविया) का अंतर्राष्ट्रीय स्वर्णमाल और अनेकों पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 5.
‘अज्ञेय’ ने किस साप्ताहिक पत्र का संपादन कर हिन्दी पत्रकारिता का हिमालय खड़ा किया?
उत्तर-
‘अज्ञेय’ ने साप्ताहिक ‘दिनमान’ का संपादन कर हिन्दी पत्रकारिता का हिमालय खड़ा किया।

प्रश्न 6.
“हिरोशिमा’ कविता किस छंद में लिखी गई है ?
उत्तर-
‘हिरोशिमा’ कविता मुक्त छंद में लिखी गई है।

व्याख्या खण्ड

1. एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं,
नगर के चौक
धूप बरसी
पर अन्तरिक्ष से नहीं,
फटी मिट्टी से।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘हिरोशिमा’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग हिरोशिमा पर गिराये गये बम से हैं।
कवि कहता है कि अचानक एक दिन चौक पर सूरज का विस्फोट हुआ। उस सूरज ने क्षितिज पर नहीं, पूरब में नहीं बल्कि चौक पर अपनी तीखी धूप से जन-जीवन को तहस-नहस कर दिया।

अंतरिक्ष से सूरज नहीं निकला था। बम विस्फोट से धरती दहल गयी थी और उसकी आंतरिक संरचना में उथल-पुथल मच गयी थी। यहाँ कवि ने नये प्रयोगों द्वारा शब्दों के माध्यम से मानवीय क्रूरतम् पक्षों को उद्घाटित किया है। हिरोशिमा पर बम विस्फोट भयंकर मानवीय दुर्घटना थी। आज के आणविक आयुध की होड़ में हम कितने क्रूर हो गए हैं। इस सृष्टि के विनाश में सदैव तत्पर रहते हैं। वैश्विक राजनीति के कारण अनेक संकट की आशंकाएँ बनी रहती हैं। सृष्टि का पालनकर्ता सूर्य नहीं बल्कि सृष्टि का विनाशक सूर्य धरती पर उगा था। कहने का मूल भाव है कि मनुष्य ही आज सबसे खतरनाक जीव हो गया है। वह दिन-रात विध्वंसक कार्यों में संलग्न रहता है।

उसी के काले कारनामों में हिरोशिमा पर बरसाया गया बम भी था जो सृष्टिकाल का भयंकर विस्फोट था। अपार धन-जन और संस्कृति की हानि हुई थी। इन पंक्तियों में सूर्य को प्रतीक रूप में कवि ने प्रयोग किया है। कवि ने मानव के विध्वंसकारी रूप का वर्णन किया है। कैसे हम वैसे विनाशकारी सूर्य की कल्पना और सृजन कर रहे हैं जो सारी सृष्टि का विनाशक सिद्ध हो रहा है।

प्रश्न 2.
छायाएँ मानव-जन की
दशाहीन
सब ओर पड़ीं-वह सूरज
नहीं उगा था पूरब में, वह
बरसा सहसा
बीचों-बीच नगर के
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्यों अरे टूट कर
बिखर गये हों
दसों दिशा में।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक हिरोशिमा काव्य-पाठ से ली गयी हैं।
इन पंक्तियों का प्रसंग हिरोशिमा पर बरसाए गए बम और उससे हुए अपार धन-जन के महाविनाश से है। कवि ने अपनी काव्य-पक्तियों में अपने भावों को व्यक्त करते हुए कहा है कि जब बम विस्फोट हुआ था उस समय चारों तरफ अफरा-तफरी मच गयी थी—कुहराम मच गया था। लोग जान बचाने के लिए दिशाहीन होकर जिधर-जिधर भाग रहे थे। अपनी प्राण रक्षा के लिए आकुल-व्याकुल दिख रहे थे। वह सूरज पूरब में उगकर नहीं आया था-धरती पर। वह अचानक शहर के बीचोंबीच में गिरा। लगता था कि कालरूपी सूर्य के रथ के पहिये धूरी के साथ टूटकर बिखर गये हों।

इन पंक्तियों में सूर्य को प्रतीक मानते हुए बम की विध्वंसकारी लीलाओं, उससे हुई अपार धन-जन की हानि, मानवीय पीड़ाओं का यथार्थ और पीडादायी वर्णन हुआ है। यह कवि के जीवन : की सबसे बड़ी दर्दनाक घटना है आज आदमी अपनी क्रूरता की सीमाओं को लाँघ गया है और स्वयं के महाविनाश में लगा हुआ है।

3. कुछ क्षण का वह उदय-अस्त।
केवल एक प्रज्वलित क्षण की
दृश्य सोख लेनेवाली दोपहरी।
फिर?
छायाएँ मानव जन की
नहीं मिटीं लम्बी हो-होकर;
मानव ही सब भाप हो गए।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्थरों पर
उजड़ी सड़कों की गच पर।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘हिरोशिमा’ नामक काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग हिरोशिमा पर गिराये गए बम से है जिससे अपार धन-जन की हानि हुई थी।

कवि कहता है कि बम विस्फोट काल में कुछ क्षण तक स्तब्धता छा गयी थी। चारों तरफ धुआँ ही धुआँ और विस्फोटक पदार्थों से धरती पट गयी थी। प्रतीत होता था कि यह दोपहरी प्रज्ज्वलित क्षण के दृश्यों को सोख लेगी। कहने का मूल भाव यह है कि दोपहर का सूर्य ज्यादा गरमी वाला होता है। उसने यानी सूर्यरूपी बम ने जन-जन के अस्तित्व को मिटा दिया था क्षणभर

प्रश्न 4.
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह जली हुई छाया
मानव की साखी है।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक के “हिरोशिमा” शीर्षक काव्य-पाठ से उद्धृत हैं। इन पंक्तियों का संबंध मानव तथा उसके द्वारा रचे गए सूरज अर्थात् अणु-बम से है जिसके विस्फोट के समय चारों ओर प्रकाश फैलता है, जिस प्रकार सूर्य प्रकाश-पुंज है ऊर्जावान है, उसी प्रकार अणु बम में भी अपार ऊर्जा है तथा मानव-निर्मित सूरज है। किन्तु प्राकृतिक सूरज जहाँ सृष्टि का निर्माण एवं रक्षा करता है वहीं मानव-निर्मित यह सूरज अणु-बम ध्वंस एवं संहार का प्रतीक है।

मानव निर्मित सूरज-‘अणु-बम’ ने मानव को ही वाष्प बनाकर सोख लिया, चट कर गया, दीवारों, पत्थरों और सड़कों के धरातल पर अंकित वाली छायाएँ मानव के इस अमानवीय एवं क्रूर कृत्य की साक्षी हैं।

उपरोक्त पंक्तियों में व्यक्त भाव का तात्पर्य यह है कि मानव ने अपनी रचनात्मक शक्ति का जो दुरुपयोग किया है उसका दुष्परिणाम आज उसके सामने है। वस्तुतः विश्व-राजनीति में आयुद्धों की होड़ से जो संकट गहरा गया है वह नितान्त दुःखद है।

हिरोशिमा कवि परिचय

अज्ञेय का जन्म 7 मार्च 1911 ई० में कसेया, कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ, किंतु उनका मूल निवास कर्तारपुर (पंजाब) था। अज्ञेय की माता व्यंती देवी थीं और पिता डॉ० हीरानंद शास्त्री एक प्रख्यात पुरातत्त्वेत्ता थे । अज्ञेय की प्रारंभिक शिक्षा लखनऊ में घर पर हुई। उन्होंने मैट्रिक 1925 ई० में पंजाब विश्वविद्यालय से, इंटर 1927 ई० में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से, बी० एससी० 1929 ई० में फोरमन कॉलेज, लाहौर से और एम० ए० (अंग्रेजी) लाहौर से किया ।

अज्ञेय बहुभाषाविद् थे। उन्हें संस्कृत, अंग्रेजी, हिन्दी, फारसी, तमिल आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान था । वे आधुनिक हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कवि, कथाकार, विचारक एवं पत्रकार थे । उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – काव्य : भग्नदूत’, ‘चिंता’, ‘इत्यलम’, ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘बावरा अहेरी’, ‘आँगन के पार द्वार’, ‘कितनी नावों में कितनी बार’, ‘सदानीरा’ आदि; कहानी संग्रह : ‘विपथगा’, ‘जयदोल’, ‘ये तेरे प्रतिरूप’, ‘छोड़ा हुआ रास्ता’, ‘लौटती पगडडियाँ’ आदि; उपन्यास : ‘शेखर : एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’, ‘अपने-अपने अजनबी’, यात्रा-साहित्यः अरे यायावर रहेगा याद’, ‘एक बूँद सहसा उछली’; निबंध : ‘त्रिशंकु’, ‘आत्मनेपद’, ‘अद्यतन’, ‘भवंती’, ‘अंतरा’, ‘शाश्वती’ आदि; नाटक : ‘उत्तर प्रियदर्शी’; संपादित ग्रंथ : ‘तार सप्तक’, ‘दूसरा सप्तक’, ‘तीसरा सप्तक’, ‘चौथा सप्तक’, ‘पुष्करिणी’, ‘रूपांबरा’ आदि । अज्ञेय ने अंग्रेजी में भी मौलिक रचनाएँ की और अनेक ग्रंथों के अनुवाद भी किए । वे देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे । उन्हें साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, नुगा (युगोस्लाविया) का अंतरराष्ट्रीय स्वर्णमाल आदि अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए । 4 अप्रैल 1987 ई० में उनका देहांत हो गया ।

अज्ञेय हिंदी के आधुनिक साहित्य में एक प्रमुख प्रतिभा थे। उन्होंने हिंदी कविता में प्रयोगवाद का सूत्रपात किया । सात कवियों का चयन कर उन्होंने ‘तार सप्तक’ को पेश किया और बताया कि कैसे प्रयोगधर्मिता के द्वारा बासीपन से मुक्त हुआ जा सकता है । उनमें वस्तु, भाव, भाषा, शिल्प आदि के धरातल पर प्रयोगों और नवाचरों की बहुलता है।

आधुनिक सभ्यता की दुर्दात मानवीय विभीषिका का चित्रण करनेवाली यह कविता एक अनिवार्य प्रासंगिक चेतावनी भी है । कविता अतीत की भीषणतम मानवीय दुर्घटना का ही साक्ष्य नहीं है, बल्कि आणविक आयुधों की होड़ में फंसी आज की वैश्विक राजनीति से उपजते संकट की आशंकाओं से भी जुड़ी हुई है । आधुनिक कवि अज्ञेय की प्रस्तुत कविता उनकी समग्र कविताओं के संग्रह ‘सदानीरा’ से यहाँ संकलित है ।

हिरोशिमा Summary in Hindi

पाठ का अर्थ

बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित ‘हिरोशिमा’ शीर्षक कविता मानवीय विभीषिका का सजीवात्मक चित्रण करती है। ‘अज्ञेय’ आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक प्रखर कवि, कथाकार, विचारक और पत्रकार हैं। उन्होंने हिन्दी कविता में प्रयोगवाद का सूत्रपात किया है। सात कवियों का चयन कर उन्होंने ‘तार सप्तक’ प्रस्तुत की यह सिद्ध कर दिया कि प्रयोगधर्मिता के द्वारा बासीपन से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है।

प्रस्तुत कविता में कवि आज की वैश्विक राजनीति से उपजाते संकर और आशंकाओं को प्रदर्शित किया है। आज दुनिया आण्विक आयुधों को जमा करने में लगी है। विश्व में छायं काले त्रासदी के बादल ये संकेत कर रहे हैं कि कभी वीभत्सकारी रूप ले सकते हैं। ‘हिरोशिमा’ इसी शक्ति का शिकार हुआ है। आज भी वहाँ की त्रासदी कण-कण में प्रदीप्त दिख रही है। अमेरिका द्वारा गिराया गया ‘बम’ साधारण शक्तिवाला नहीं था। वह आग के गोली की तरह आकाश से उनर और पूरे हिरोशिमा को निःशेष कर गया। आज भी उस त्रासदी का दंश वहाँ के वासी झेल रहे हैं। मानव द्वारा निर्मित वह सूरज मानव को ही जलाकर राख कर दिया।

शब्दार्थ

अरं : पहिये की धुरी और परिधि या नमि को जोड़ने वाले दंड
गच : पत्थर या सीमेंट से बना पक्का धरातल
साखी (साक्षी) : गवाही, सबूत

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 हार-जीत

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 12 हार-जीत

 

हार-जीत वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

हार जीत कविता का भावार्थ लिखें Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
अशोक वाजपेयी के पिता जी कौन थे?
(क) परमानंद वाजपेयी
(ख) रमाकांत वाजपेयी
(ग) शियानंद वाजपेयी
(घ) दयानंद वाजपेयी
उत्तर-
(क)

हार जीत पर कविता Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
अशोक वाजपेयी की माँ का नाम क्या था?
(क) निर्मला देवी
(ख) विमला देवी
(ग) सुधा देवी
(घ) राधिका देवी
उत्तर-
(क)

Hindi Bihar Board Class 12 प्रश्न 3.
इनमें अशोक वाजपेयी की कौन–सी रचना है?
(क) गाँव का घर
(क) गाव ५
(ख) हार–जीत
(ग) कवित्त
(घ) कड़बक
उत्तर-
(ख)

4. अशोक वाजपेयी का जन्म कब हुआ था?
(क) 16 जनवरी, 1941 ई.
(ख) 16 जनवरी, 1940 ई.
(ग) 16 जनवरी, 1930 ई.
(घ) 16 जनवरी, 1935 ई.
उत्तर-
(क)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

हार जीत कविता Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
वे……… मना रहे है।
उत्तर-
उत्सव

Bihar Board Class 12 Hindi Book Solution प्रश्न 2.
सारे शहर में……… की जा रही है।
उत्तर-
रौशनी

Bihar Board Class 12 Hindi Book Solution प्रश्न 3.
उन्हें बताया गया है कि उनकी सेना और रथ………….. लौट रहे हैं।
उत्तर-
विजय प्राप्त कर

बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 12 Pdf Bihar Board प्रश्न 4.
नागरिकों में से ज्यादातर को पता नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और……….. थे, युद्ध कि बात पर था।
उत्तर-
शासक गए

Bihar Board Hindi Book Class 12 प्रश्न 5.
यह भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे………… की तैयारी में व्यस्त हैं।
उत्तर-
विजय पर्व मनाने

बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 12 Bihar Board प्रश्न 6.
उन्हें सिर्फ इतना पता हैं कि…….. हुई।
उत्तर-
उनकी विजय

हार-जीत अति लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Hindi Book Class 12 Pdf Download प्रश्न 1.
अशोक वाजपेयी की कविता का नाम है :
उत्तर-
हार–जीत।

Hindi Book Class 12 Bihar Board 100 Marks प्रश्न 2.
हार–जीत कैसी कविता है?
उत्तर-
गद्य कविता है।

Hindi Class 12 Bihar Board प्रश्न 3.
उत्सव कौन मना रहे हैं?
उत्तर-
शासक वर्ग।

बिहार बोर्ड हिंदी बुक 12th Bihar Board प्रश्न 4.
हार–जीत कविता में किसका प्रश्न उठाया गया है?
उत्तर-
हार और जीत का।

हार-जीत पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

Class 12th Hindi Book Bihar Board प्रश्न 1.
उत्सव कौन और क्यों मना रहे हैं?
उत्तर-
किसी शहर विशेष में रहने वाले सामान्य नागरिक उत्सव मना रहे हैं। उनके उत्सव मनाने के कारण निम्नलिखित हैं

  • कुछ लोगों द्वारा यह बता दिया गया है कि उनकी सेना ने विजय प्राप्त कर ली है और वह युद्ध क्षेत्र से वापस आ रही है।
  • उन्हें इस युद्ध की वास्तविक स्थिति का ज्ञान नहीं है।
  • उन्हें युद्ध में मारे गए लोगों के विषय में कुछ भी पता नहीं है।
  • सच बोलने वाले अपनी जिम्मेदारी का उचित निर्वहन नहीं कर रहे हैं।

Hindi Chapter 1 Class 12 Pdf Bihar Board प्रश्न 2.
नागरिक क्यों व्यस्त हैं? क्या उनकी व्यस्तता जायज है?
उत्तर-
नगारिक इसलिए व्यस्त है क्योंकि

  • उन्हें उत्सव मनाने के लिए नाना प्रकार की तैयारियाँ करनी है।
  • उन्हें विजयी भाव प्रदर्शित करते हुए विजयी सेना तथा शासक का स्वागत करना है।
  • उन्हें युद्ध में गए लोगों की संख्या का पता है पर लौटकर आने वालों का ठीक–ठीक पता नहीं है।
  • अर्थात् युद्ध में कितने लोग मारे गए इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उन्हें तो बस सुखद परन्तु असत्यपूर्ण समाचार ही ज्ञात हुआ है।

उनकी व्यस्तता जायज नहीं है क्योंकि उन्हें वास्तविक स्थिति का पता नहीं है। उन्हें नहीं है पता है कि वास्तव में उनकी जीत नहीं बल्कि हार हुई है।.

हार-जीत कविता Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 3.
किसकी विजय हुई सेना की, कि नागरिकों की? कवि ने यह प्रश्न क्यों खड़ा किया है? यह विजय किनकी है? आप क्या सोचते हैं? बताएँ।
उत्तर-
किसी की विजय नहीं हुई। विजय प्रतिपक्ष की हुई। कवि ने देश की वस्तुस्थिति से अवगत कराया है। कवि के विचारों पर चिन्तन करते हुए यही बात समझ में आती है कि झूठ–मूठ के आश्वासनों एवं भुलावे में हमें रखा गया है। यथार्थ का ज्ञान हमें नहीं कराया जाता। यानि सत्य से दूर रखने का प्रयास शासन की ओर से किया जा रहा है।

हार की जीत Question Answer Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 4.
‘खेत रहनेवालों की सूची अप्रकाशित है।’ इस पंक्ति के द्वारा कवि ने क्या कहना चाहा है? कविता में इस पंक्ति की क्या सार्थकता है? बताइए।
उत्तर-
‘खेत रहनेवालों की सूची अप्रकाशित है’ के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि युद्ध में दोनों पक्षों के अनेक वीर मारे जाते हैं। विजय के मद में चूर सेना इन मृत सैनिकों या लोगों की परवाह नहीं करती। वह भूल जाती है कि इस विजय में उनका भी अप्रत्यक्ष योगदान है। उनके बिना विजय मिलनी संभव न थी।

इस पंक्ति की कविता में यह सार्थकता है कि विजय की खुशी में चूर विजयोत्सव मना रहे लोगों को. मरे हुए लोगों तथा सैनिकों का जरा भी ध्यान नहीं है। उनके आश्रितों पर क्या बीत. रही है, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। वे तो बस विजयोत्सव मनाने में व्यस्त है।

वास्तव में शासक अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए जनता के जीवन का मोल नहीं समझता है। वह बनावटी राष्ट्रीयता का नारा देकर पूरे राष्ट्र को युद्ध की भीषण ज्वाला में झोंक देता है। वह तो अपना अधिनायकत्व बनाये रखने के लिए युद्ध लड़ते हैं। इस पंक्ति के माध्यम से सत्ता वर्ग की सत्तालोलुप प्रवृत्ति का पर्दाफाश होता है।

हार जीत कविता का सारांश Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 5.
सड़कों को क्यों सींचा जा रहा है?
उत्तर-
सड़कों को इसलिए सींचा जा रहा है ताकि उनकी धूल–गुबार समाप्त हो सके और युद्ध क्षेत्र से छत्र चंवर और गाजे–बाजे के साथ जो विजयी राजा आ रहे हैं उन पर धूल न उड़े। उन्हें पहले जैसा बनाया जा सके। अर्थात् युद्ध के कारण उनकी टूटी–फूटी हालत में सुधार लाया जा सके।

प्रश्न 6.
बूढ़ा मशकवाला क्या कहता है और क्यों कहता है?
उत्तर-
बूढ़ा मशकवाला कहता है कि–

  • एक बार फिर हमारी हार हुई है।
  • गाजे–बाजे के साथ विजय नहीं हार लौट रही है।
  • ऐसी विजय पर खुश होकर जश्न मनाने का कोई औचित्य नहीं है वह।

ऐसा इसलिए कहता है क्योंकि–

  • बूढा अनुभवी व्यक्ति है। उसे जीवन के यथार्थ का अनुभव है।.
  • उसे पता है कि समाज में घृणा, द्वेष, हत्या, लूटपाट, दंगे, आतंकवाद आदि मानवता के विनाश के कारण बने हुए हैं। इन पर विजय पाए बिना विजय का जश्न मनाना अनुचित है।
  • लोगों को मरने वालों की कोई जानकारी न देकर वास्तविक स्थिति पर पर्दा डाला जा रहा है।
  • उसकी बातों में सच्चाई तो है पर उसे कोई सुनना नहीं चाहता है।

प्रश्न 7.
बूढा, मशकवाला किस जिम्मेवारी से मुक्त है? सोचिए, अगर वह जिम्मेवारी उसे मिलती तो क्या होता?
उत्तर-
बूढ़ा मशकवाला देश की राजनीति से वंचित है। अगर उसे जिम्मेवारी मिली होती तो हार को हार कहता जीत नहीं कहता। वह सत्य प्रकट करता। उसे तो मात्र सड़क सींचने का काम सौंपा गया है। यही उसकी जिम्मेवारी है। सत्य लिखने और बोलने की मनाही है। इसलिए वह मौन है और अपनी सीमाओं के भीतर ही जी रहा है। वह विवश है, विकल है फिर भी दूसरे क्षेत्र में दखल नहीं देना केवल सींचने से ही मतलब रखता है। इसमेकं बौद्धि वर्ग की विवशता झलकती है। अगर उसे सत्य कहने और लिखने की जिम्मेवारी मिली होती तो राष्ट्र की यह स्थिति नहीं होती। झूठी बातों और झूठी शान में जश्न नहीं मनाया जाता। जीवन के हर क्षेत्र में अमन–चैन, शिक्षा–दीक्षा, विकास की धारा बहती। अबोधता ओर अंधकार में प्रजा विवश बनकर नहीं जीती।

प्रश्न 8.
‘जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट रहे हैं जिन किनके लिए आया है? वे सेना के साथ कहाँ से आ रहे हैं? वे सेना के साथ क्यों थे? वे क्या जीतकर लौटे हैं? बताएँ।
उत्तर-
इन पंक्तियों में ‘जिन’ नेताओं के लिए प्रयोग हुआ है। वे लड़ाई के मैदान से लौट रहे हैं। वे सेना के साथ इसलिए हैं कि सेना सच न बोले। वे हारकर लौटे हैं। इन पंक्तियों में नेताओं के चरित्र पर प्रकाश डाला गया है। उनका जीवन–चरित्र कितना भ्रम में डालनेवाला है। कथनी–करनी में कितना अंतर है? झूठी प्रशंसा और अविश्वसनीय कारनामों के बीच उनका समय कट रहा है। उनके व्यवहार और विचार में काफी विरोधाभास है। तनिक समानता और स्वच्छता नहीं दिखायी पड़ती।

प्रश्न 9.
गद्य कविता क्या है? इसकी क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर-
दैनदिन जीवन अनुभवों की धरती से बोलचाल बातचीत और सामान्य मन:चिन्तन के रूप में उगा हुआ, विवरणधर्मी और चौरस कविता गद्य कविता है। इस कविता की विशेषता ये होती हैं कि सबसे पहले यह कविता विचार कविता होती है। एक–एक शब्द के कई अर्थ परत–दर–परत खुलते जाते हैं। इस प्रकार की कविता में जीवनानुभव की बात भोगे हुए यथार्थ मानों सामने दिखलाई पड़ती है। क्योंकि ये वर्णनात्मक होती हैं। इनकी भाषा बोल–चाल से सम्पृक्त होने के कारण उसमें स्थानीयता का गहरा रंग भी झलकता है।

प्रश्न 10.
कविता में किस प्रश्न को उठाया गया है? आपकी समझ में इसके भीतर से और कौन से प्रश्न उठते हैं?
उत्तर-
प्रस्तुत कविता में देश की ज्वलन्त समस्याओं की ओर कवि ने ध्यान आकृष्ट किया। है। इस देश की जनता अबोध और चेतनाविहीन है। वह अंधविश्वासों, अफवाहों में जी रही है।

सत्य से कोसों दूर नीति–नियम हैं। सिद्धान्त और व्यवहार में काफी असमानता है।

कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन की विसंगतियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। जनता की हालत दयनीय है। श्रमिक वर्ग कष्ट में जी रहा है। बौद्धिक वर्ग संकट मेकं जी , रहा है। उसे विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिली है। संस्कृति पर खतरा दिखायी पड़ता है। शासक वर्ग बेपरवाह मौज–मस्ती जश्न में अपना समय बीता रहा है और नागरिक भूख की. ज्वाला में तड़प रहा है। सुरक्षा देनेवाले भी गैर जिम्मेवार है। झूठे–मूठे भुलावा में सभी लोग जी रहे हैं। सत्य से प्रजा को दूर रखने की कोशिश हो रही है। बौद्धिक वर्ग सर्वाधिक संकट में जी रहा है। वह राष्ट्र निर्माण में संकल्पित होकर तो लगा है लेकिन उचित सम्मान और स्थान नहीं मिलता। इतिहास हम भूल रहे हैं। दिग्भ्रमित होकर भटकाव की स्थिति में जी रहे हैं।

हार-जीत भाषा की बात।

प्रश्न 1.
हार–जीत में कौन समास है?
उत्तर-
हार–जीत = हार और जीत–द्वन्द्व समास।

प्रश्न 2.
ज्यादातर में ‘तर’ प्रत्यय है, ‘तर’ प्रत्यय से पाँच अन्य शब्द बनाएँ।
उत्तर-
कमतर, लघुतर, अधिकतर, निम्नतर, मेहतर।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित के पर्यायवाची शब्द चुनें

  • युद्ध–जंग, फसाद, रण, लड़ाई, वार, संग्राम, समर, कलह।
  • सेना–वाहिनी, लश्कर, सैन्य।
  • शत्रु–अप्रिय, अरिष्ट, दुश्मन, द्रोही।
  • सड़क–पथ, रास्ता, राह, पंथ, मार्ग, डगर।
  • रोशनी–प्रकाश, उजाला, ज्योति, उजियाला।
  • उत्सव–जश्न, त्योहार, पर्व, महोत्सव।
  • शहर–नगर, पुर, पुरी, टाउन, स्थान, नगरी।
  • विजय–जय, जीत, फतह, सफलता।
  • हार–पराजय, पराभव, शिकस्त, नाकामयाबी।

प्रश्न 4.
उत्पत्ति की दृष्टि से निम्नलिखित शब्दों की प्रकृति बताएँ। रोशनी, सड़क, अवकाश, रथ, सिर्फ, सच, बूढ़ा।
उत्तर-

  • रोशनी – फारसी
  • सड़क – अरबी
  • अवकाश – संस्कृत
  • रथ – संस्कृत
  • सेना – संस्कृत
  • सिर्फ – फारसी
  • नागरिक – संस्कृत
  • सच – संस्कृत
  • बूढ़ा – हिन्दी

प्रश्न 5.
‘हार’ प्रत्यक्ष से पाँच अन्य शब्द बनाएँ और उसका अर्थ बताएँ।
उत्तर-

  • खेवनहार = खेनेवाला।
  • पालनहार = पालन करने वाला।
  • चन्द्रहार = एक तरह का कंठहार।

प्रश्न 6.
‘विजय पर्व’ में कौन समास है?
उत्तर-
विजय पर्व = विजय का पर्व (षष्ठी तत्पुरुष समास)

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों से सर्वनाम चुनें एवं यह बताएँ कि वे किस सर्वनाम के उदाहरण हैं?
(क) किसी के पास पूछने का अवकाश नहीं है।
(ख) यह भी नहीं कि शत्रु कौन था।
(ग) वे उत्सव मना रहे हैं।
(घ) उन्हें सिर्फ इतना पता है कि उनकी विजय हुई।
उत्तर-
शब्द – सर्वनाम

  • किसी के – अनिश्चय वाचक सर्वनाम
  • यह भी – निश्चयवाचक सर्वनाम
  • कौन – प्रश्नावाचक सर्वनाम
  • वे – पुरुषवाचक सर्वनाम
  • उन्हें – पुरुषवाचक सर्वनाम
  • उनकी – पुरुषवाचक सर्वनाम (अन्य पुरुष)

हार–जीत कवि परिचय अशोक वाजपेयी (1941)

अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी, 1941 ई. को दुर्ग, छत्तीसगढ़ (मध्यप्रदेश) में हुआ था। उनकी माता का नाम निर्मला देवी एवं पिता का नाम परमानन्द वाजपेयी था। उनकी. प्राथमिक शिक्षा गवर्नमेंट हायर सेकेन्ड्री स्कूल में हुई। सागर विश्वविद्यालय से बी. ए. और सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से अंग्रेजी में एम. ए. किये। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे तथा महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति पद से सेवानिवृत्ति हुए। वे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार, दयाविती मोदी कवि शेखर सम्मान प्रमुख है। सम्प्रति वे दिल्ली में रहकर स्वतन्त्र लेखन कर रहे हैं।

अशोक वाजपेयी की तीन दर्जन के लगभग उनकी मौलिक एवं संपादित रचनाएँ प्रकाशित हुई। इनकी निम्नलिखित कविताएँ प्रकाशित हुई–”शहर अब भी संभावना है”, “एक पलंग अनन्त में” “अगर इतने से”, “तत्पुरुष”, “कहीं नहीं वहीं”, बहुरि अकेला, थोड़ी सी जगह, “घास में दुबका आकाश”, आविन्यों, अभी कुछ और समय के पास समय, इबादत से गिरी मात्राएँ, कुछ रफू कुछ थिगड़े, उम्मीद का दूसरा नाम, विवक्षा, “दुख चिट्ठीरसा है” (कविता संग्रह) है।

अशोक वाजपेयी समसामयिक हिन्दी के एक प्रमुख कवि, आलोचक, विचारक, कला मर्मज्ञ, संपादक एवं संस्कृतिकर्मी हैं। उनकी संवेदना भाषा और रचनात्मक चिन्ताओं ने व्यापक पाठक वर्ग का ध्यान आकृष्ट किया। उनकी कविता में वैयक्तिक आग्रह बढ़ने लगे। खुशहाल मध्यवर्ग की अभिरुचियों को तुष्ट करने में उनकी कविता में एक तरह की स्वच्छंदता विकसित हुई। एक समर्थ कवि की पहचान उनकी कविता में कौंधती है, एक ऐसी कवि जिसका मानस विस्तृत है, उदार है; संवेदनायुक्त है और भाषा स्फूर्त, समर्थ, भारहीन और अर्थग्रहिणी है।

कविता का सारांश हिन्दी साहित्य के प्रखर प्रतिभा संपन्न कवि अशोक वाजपेयी की “हार–जीत” कविता अत्यन्त ही प्रामाणिक है। इसमें कवि ने युग–बोध और इतिहास बोध का सम्यक् ज्ञान जनता को. कराने का प्रयास किया है। इस कविता में जन–जीवन की ज्वलन्त समस्याओं एवं जनता की अबोधता, निर्दोष छवि को रेखांकित किया गया है?

कवि का कहना है कि सारे शहर को प्रकाशमय किया जा रहा है और वे यानी जनता जिसे हम तटस्थ प्रजा भी कह सकते हैं, उत्सव से सहभागी हो रहे हैं। ऐसा इसलिए वे कर रहे हैं कि ऐसा ही राज्यादेश है। तटस्थ प्रजा अंधानुकरण से.प्रभावित है। गैर जवाबदेह भी है। तटस्थ जनता को यह बताया गया है कि उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं लेकिन नागरिक में से अधिकांश को सत्यता की जानकारी नहीं है। उन्हें सही–सही बातों की जानकारी नही है।. किस युद्ध में उनकी सेना और शासक शरीक हुए थे। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि शत्रु कौन थे।

विडंबना की बात यह है कि इसके बावजूद भी वे विजय पर्व मनाने की तैयारी में जी–जान से लगे हुए हैं। उन्हें सिर्फ यह बताया गया है कि उनकी विजय हुई है? ‘उनकी’ से आशय क्या है यानी उनकी माने किनकी? यह एक प्रश्न उभरता है। यह भी स्थिति साफ नहीं है कि वे जश्न मनाने में इतना मशगूल हैं कि उन्हें यह भी सही–सही पता नहीं है कि आखिर विजय किसकी हुई–सेना की, शासक की या नागरिकों की कितनी भयावह शोचनीय स्थिति है कि किसी के पास यह फुर्सत नहीं है कि वह पूछे कि आखिर ये कैसे और क्यों हुआ?

वे अपनी निजी समस्याओं में इतना खोए हुए हैं कि मूल समस्याओं की ओर ध्यान ही नहीं जाता, यह उनकी विवशता ही तो है। वह कौन–सी विवशता है, यह भी विवेचना का विषय है। नागरिकों की यह भी सही–सही पता नहीं है कि युद्ध में कितने सैनिक गए थे और कितने विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं। खेत रहने वालों यानी जो शहीद हुए हैं उनकी सूची भी नदारत है।

कवि उपरोक्त पंक्तियों पर इतिहास और लोक जीवन की ज्वलंत समस्याओं की ओर अपनी कविताओं के माध्यम से सच्चाई से वाकिफ कराने का प्रयास किया है।

कवि कहता है–इन सारी बातों की जानकारी रखने वाला चाहे कोई साक्षी है तो वह है मशकवाला। वह मशकवाला जिसका काम है मशक के पानी से सड़क को सींचना। मशकवाला कह रहा है कि हम एक बार फिर हार गए हैं और गाजे–बाजे के साथ जीत नहीं हारकर लौट रही है? मूल बात की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। विडंबना है कि मशकवाले की एकमात्र जिम्मेवारी सड़क सींचने भर की है। सच लिखने या बोलने की नहीं। जिनकी हैं वे सेना के साथ जीतकर लौट रहे हैं”. यह एक प्रश्नवाचक चिह्न खड़ा करता है।

प्रस्तुत कविता अत्यन्त ही यथार्थपरक रचना है। कवि सच्चाई से वाकिफ कराना चाहता है। वर्तमान में राष्ट्र और जन की क्या स्थिति है, इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। उक्त गद्य कविता में कवि द्वारा प्रयुक्त शासक, सेना, नागरिक और मशकवाला शब्द प्रतीक प्रयोग हैं। शासक वर्ग अपनी दुनिया में रमा हुआ है। उसमें उसके अन्य प्रशासकीय वर्ग भी सम्मिलित है। नागरिकों की स्थिति बड़ी ही असमंजस वाली है। मशकवाला पूरे घटनाक्रम की सही जानकारी रखता है लेकिन उस पर बंदिशें हैं कि वह सत्य से अवगत किसी को नहीं कराये। इसे सख्त हिदायत है न लिखने की, न बोलने की।

उक्त कविता में कवि ने पूरे देश की जो वस्तुस्थिति है, उससे अवगत कराने का काम किया है–राज्यादेश के कारण तटस्थ प्रजा जश्न मनाने में मशगूल है। प्रजा चेनता के अभाव में गैर जिम्मेवार भी है। उसे यह भी ज्ञान नहीं है कि उसकी जिम्मेवारी, कर्तव्य और अधिकार क्या है? नागरिकों को पेट की चिन्ता है। नागरिक स्वार्थ में अंधा है वे अपनी स्वार्थपरता में इतना अंधे हैं कि राष्ट्र की चिन्ता ही नहीं याद आती। यह एक प्रश्न खड़ा करता है हमारे राष्ट्र के समक्ष, जबतक जना सुशिक्षित प्रज्ञ एवं चेतना संपन्न नहीं होगी तबतक राष्ट्र विकसित और कल्याणकारी नहीं हो सकता।

कवि कहता है कि आजादी के लिए जिन्होंने अपने को बलिवेदी पर चढ़ाया आज उनका इतिहास ही नहीं है। उनकी सूची अपूर्ण है। उनकी शहादत को देश और शासक भूल गए हैं। शहीदों की कुरबानी के महत्व को तरजीब नहीं दी जाती है। उधर किसी का न ध्यान जाता है न श्रद्धा ही है। बड़ी ही त्रासद स्थिति है।

श्रमिकों/मजदूरों/किसानों की दीन–दशा की ओर भी कवि ने ध्यान आकृष्ट किया है। वे सड़क सींचते हैं यानी अपने श्रम द्वारा राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं लेकिन आजादी के इतने दिनों बाद उनकी सामाजिक, आर्थिक दशा सुधरी क्या? वे जीवन बोध से अवगत हुए क्या? अगर हुआ होता तो वे ऐसा नहीं करते यानि गैर जवाबदेही और अंधभक्त होकर शासनादेश के अविवेकपूर्ण आदेश को नहीं मानते।

किसकी जीत हुई या हार यह भी सोचने की बात है। चिन्तन करने की बात है। जीवन के यथार्थ और देश की वास्तविक समस्याओं की ओर से हमारा ध्यान हटकर झूठमूठ के दिखावे, ठाकुरसुहाती बातों के द्वारा जश्न मनाने की तैयारी यह लोकतंत्र के लिए खिलवाड़ नहीं तो क्या है? देश की प्रजा राजनीतिक चेतना से चर्चित है। वह राजनैतिक अधिकारों की बातें क्या समझे या जानें। उसे तो भूख के आगे कुछ सूझता नहीं।

अबोधता और अज्ञानता में पल रही प्रजा सत्य से कोसों दूर है। अगर उसे राजनीति की सही शिक्षा मिलती तो वह जिम्मेवारी से भागता नहीं तथा हार को, हार कहती जीत नहीं कहती। यानि सत्य के लिए संघर्ष करती, आन्दोलन करती। अपने अधिकारों के लिए सचेत रहती। अपनी अबोधता और विवशता के कारण ही वह दूसरे क्षेत्रों में दखल नहीं देती।।

इस कविता में देश के नेताओं के चरित्र को भी उद्घाटित किया गया है। नेताओं के चारित्रिक गुणों का पर्दाफाश किया जाता है। लड़ाई के मैदान से वे लौटे हैं लेकिन सेना के साथी। इसका तात्पर्य है कि सेना सच बोलकर भेद नहीं खोल दे कि वे हार कर लौट रहे हैं और झूठी प्रशंसा में जीत का प्रचार कर रहे हैं। उक्त गद्य कविता में कवि का कहना है कि देश की वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराया जा रहा है। झूठे–प्रचारतंत्र के द्वारा यह शासन चल रहे हैं। मशकवाला बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतीक है। बुद्धिजीवियों के आगे भी संकट है–क्या वे सत्य के उद्घाटन में स्वयं को सक्षम पाते हैं?

कई प्रकार की बंदिशें हैं–सत्य कहने, लिखने की। जनता मूकदर्शक बनकर सही स्थितियों को देख रही है किन्तु उसे ज्ञान ही नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है, क्योंकि अपनी विवशता में वह अभिशप्त है। घोर दुर्व्यवस्था, प्रपंच, झूठे आडम्बरों एवं दकियानूसी बातों में समय व्यतीत हो रहा है। लोक जीवन में अराजकता, अशिक्षा, बेकारी, बेरोजगारी भवाह रूप से परिव्याप्त है। उसे और किसी का भी ध्यान नहीं आ रहा है।

शासक वर्ग को इन समस्याओं से निजात दिलाने के लिए न कोई उपाय है और न वे हृदय से इसे चाहते हैं। वे तो अपने शान–शौकत, जय–जयकार में लीन है। प्रजा मौन है। बुद्धिजीवी विवश है लोकतंत्र खतरे में है। राष्ट्रीय चेतना सुषुप्तावस्था में है। सांस्कृति और राजनीतिक संकट के आवरण में देश घिरा हुआ है। अनेक सामाजिक विसंगतियों एवं समस्याओं से जन–जलवन त्रस्त है। कवि व्यग्र है, चिन्तित है। इन समस्याओं से कैसे मुक्ति मिले।

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Bihar Board Class 12 History भक्ति सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए(100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि सम्प्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?
उत्तर:
सम्प्रदाय के समन्वय का अर्थ:
इतिहासकारों के अनुसार विभिन्न पूजा प्रणालियों का एक-दूसरे में मिलन और सहिष्णुता की भावना ही संप्रदाय का समन्वय है। इतिहासकारों के विचार से इस विकास में दो प्रक्रियायें कार्य कर रही थीं। पहली पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और संरक्षण से ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। ये ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में थे और स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी इन्हें पढ़ा जा सकता था।

दूसरी प्रक्रिया स्त्री, शूद्रों व समाज के अन्य वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मणों की स्वीकृति वाली और उसे एक नया रूप प्रदान करने की थी। समाज शास्त्रियों का विचार है कि सम्पूर्ण महाद्वीप में धार्मिक विचारधाराएँ और पद्धतियाँ एक-दूसरे के साथ संवाद की ही परिणाम हैं। इस प्रक्रिया का सबसे विशिष्ट उदाहरण पुरी (उड़ीसा) में दिखाई देता है। यहाँ मुख्य देवता को 12वीं शताब्दी तक आते-आते जगन्नाथ (सम्पूर्ण विश्व का स्वामी) विष्णु के रूप में प्रस्तुत किया गया।

प्रश्न 2.
किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?
उत्तर:
कुछ सीमा तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण दिखाई पड़ता है। उदाहरणार्थ-मस्जिदों इमारत का मक्का की ओर मेहराब (प्रार्थना का आला) के रूप में अनुस्थापन मंदिरों में मिलबार (व्यासपीठ) की स्थापना से दिखाई पड़ता है। अनेक छत और निर्माण के मामले में कुछ भिन्नता भी दिखाई पड़ती है।

केरल में तेरहवीं शताब्दी की एक मस्जिद की छत चौकोर है जबकि भारत में बनी कई मस्जिदों की छत गुम्बदाकार है। उदाहरणार्थ-दिल्ली की जामा मस्जिद। बांग्लादेश की ईंट की बनी अतिया मस्जिद की छत भी गुम्बदाकार है। श्रीनगर की झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद की छत चौकार है। इसके शिखर और नक्काशीदार छज्जे बहुत आकर्षक हैं।

प्रश्न 3.
बे-शरिया और बा-शरिया सूफी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर दोनों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बे-शरिया और बा-शरिया सूफी परम्परा के बीच एकरूपता और अंतर:
मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाला कानून शरिया कहलाता है। यह कुरानशरीफ और हदीस पर आधारित है। शरिया की अवहेलना करने वालों को बे-शरिया कहा जाता था। कुछ रहस्यवादियों ने सूफी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या से भिन्न कुछ नए सिद्धान्तों को जन्म दिया। ये सिद्धांत मौलिक सिद्धांतों पर ही आधारित थे। परंतु खानकाह (सूफी संगठन) का तिरस्कार करते थे। ये सूफी समुदाय रहस्यावादी फकीर का जीवन व्यतीत करते थे। निर्धनता और ब्रह्मचर्य को इन्होंने गौरव प्रदान किया।

शरिया का पालन करने वालों को बा-शरिया कहा जाता था जिनको सूफियों से अलग माना जाता था। बा-शरिया के लोग शेख से जुड़े रहते थे अर्थात् उनकी कड़ी पैगम्बर मुहम्मद से जुड़ी थी। इस कड़ी के द्वारा अध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों (शिष्यों) तक पहुँचता था। दीक्षा के विशिष्ट अनुष्ठान विकसित किए गए जिसमें दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था और सिर मुंडाकर थेगड़ी लगे वस्त्र धारण करने होते थे।

प्रश्न 4.
चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीर शैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
उत्तर:
कुछ इतिहासकारों के अनुसार अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा की आलोचना की। उन्होंने ब्राह्मणों की प्रभुता को गैर-आवश्यक बताया। वस्तुतः समाज में ब्राह्मणों का आदर था और उनके आदेशों का पालन राजाओं द्वारा भी किया जाता था जिससे अन्य जातियों की उपेक्षा होती थी। अलवार, नयनार और वीर शैवों ने ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और यहाँ तक कि अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियों को भी समान आदर दिया और इस धर्म का अनुयायी स्वीकार किया। उल्लेखनीय है कि ब्राह्मणों ने वेदों को प्रश्रय दिया था। चारों वेदों का महत्त्व आज भी है। अलवार और नयनार संतों की रचनाओं को वेदों जैसा ही महत्त्व दिया गया। उदाहरण के लिए अलवार संतों के एक मुख्य काव्य संकलन ‘नलयिरा दिव्य प्रबंधम्’ का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था।

प्रश्न 5.
कबीर तथा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ।
उत्तर:
(I) कबीर के उपदेश:

  • कबीर एकेश्वरवाद के प्रबल समर्थक थे। उनका कहना था कि ईश्वर एक है और उसे ही राम, रहीम, साईं, साहिब, अल्लाह आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है।
  • कबीर ईश्वर को सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ, सर्वत्र तथा सर्वरूप मानते थे। वे परमात्मा के निराकार स्वरूप के उपासक थे। इसके लिए किसी मंदिर, मस्जिद तथा तीर्थस्थान की कोई आवश्यकता नहीं थी।
  • कबीरदास जी का कहना था कि ईश्वर की भक्ति गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए करनी चाहिए। वे आजीवन गृहस्थी रहे। वे व्यावहारिक ज्ञान तथा सत्संग में विश्वास रखते थे। वे पुस्तकीय ज्ञान को व्यर्थ बताते थे। पंडितों को यह कहकर निरूत्तर कर देते थे कि “तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी।”
  • कबीर ज्ञान मार्ग को अधिक कठिन समझते थे। उन्होंने ईश्वर प्राप्ति के लिए भक्ति मार्ग पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भक्ति के बिना ईश्वर प्राप्ति असंभव है।
  • गाँधीजी की तरह वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के महान् पक्षधर थे। उन्हें धर्म के नाम पर हिन्दू मुसलमानों की कलह पसंद नहीं थी। वे समन्वयकारी थे। उन्होंने दोनों को फटकारते हुए कहा था “अरे इन दोउन राह न पाई। हिन्दुवन की हिन्दुता देखी, देखी तुर्कन की तुर्काई”।
  • कबीर बाह्य आडम्बरों, व्यर्थ की रूढ़ियों, अन्धविश्वासों, रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों, रोजा, नमाज, पूजा आदि के विरोधी थे। अपने प्रवचनों में उन्होंने इन पर निर्मम प्रहार किया है। मूर्तिपूजा का खंडन करते हुए उन्होंने कहा है: “पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़। याते तो चक्की भली, पीस खाय संसार।”

(II) बाबा गुरु नानक के उपदेश-गुरु नानक की शिक्षाएँ:

1. एक ईश्वर में विश्वास:
गुरु नानक के अनुसार ईश्वर एक है और उसके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। “ईश्वर से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है, ईश्वर अद्वितीय है। “परब्रह्म प्रभु एक है, दूजा नहीं कोय। वह अलख, अपर, अकाल, अजन्मा, अगम तथा इन्द्रियों से परे हैं।” मैकालिक के शब्दों में, “नानक जी ईश्वर को बहुत ऊँचा स्थान देते हैं और कहते हैं कि मुहम्मद सैकड़ों और हजारों हैं, परंतु ईश्वर एक और केवल एक ही है।”

2. ईश्वर सर्वव्यापी और इन्द्रियों से परे हैं:
भारत में असंख्य ऋषि-मुनि ईश्वर को सगुण तथा साकार मानते हैं, किन्तु नानक ईश्वर के निर्गुण रूप में विश्वास रखते हैं अत: उनका ईश्वर इन्द्रियों से परे अगम-अगोचर है। ईश्वर सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान है। उसे मन्दिरों तथा मस्जिदों की चारदीवारी में बंद नहीं किया जा सकता।

3. आत्म-समर्पण ही ईश्वर-प्राप्ति का एकमात्र साधन है:
नानकदेव जी की यह धारणा है कि ईश्वर उन लोगों पर दया करता है, जो दया के पात्र तथा अधिकारी हैं। किन्तु ईश्वर की दया को आत्म-समर्पण तथा इच्छाओं के परित्याग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। वे अपने को ईश-इच्छा पर छोड़ना ही आत्म-समर्पण मानते हैं।

4. ‘सत्यनाम’ की उपासना पर बल:
नानक देव जी मोक्ष प्राप्ति के लिए ‘सत्यनाम’ की उपासना पर बल देते हैं। उनका विश्वास है कि “जो ईश्वर का नाम नहीं जपता, वह जन्म और मृत्यु के झमेलों में फँसकर रह जाएगा।” एक बार कुछ साधुओं ने उन्हें कोई चमत्कार दिखाने को कहा। उन्होंने बड़े सरल भाव से उत्तर दिया-“सच्चे नाम के अतिरिक्त मेरे पास कोई चमत्कार नहीं।” यहाँ तक कि उन्होंने अपनी माता से भी एक बार कहा था … “उसके नाम का जाप करना जीवन है और उसे भूल जाना ही मृत्यु है।”

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए। (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वास और आधार:
इस्लाम के अन्तर्गत रहस्यवादियों का उदय हुआ जो सूफी कहलाते थे। सूफियों ने ईश्वर और व्यक्ति के बीच प्रेम सम्बन्ध पर बल दिया। वे राज्य से सरोकार नहीं रखते थे। सूफी मत का आधार इस्लाम ही था, परंतु भारत में हिन्दू धर्म के सम्पर्क में आने के बाद हिन्दू धर्म के अनुयायियों की विचारधारा और रीति-रिवाजों में काफी समानता आती गई। इस मत का उदय पहले-पहल ईरान में हुआ।

सूफी मत के बहुत से सिद्धांत भक्ति-मार्ग के सिद्धांतों से मिलते-जुलते हैं –

  1. ईश्वर एक है और संसार के सभी लोग उसकी संतान हैं। ईश्वर सृष्टि की रचना करता है। सभी पदार्थ उसी से पैदा होते हैं और अंत में उसी में समा जाते हैं।
  2. संसार के विभिन्न मतों में कोई विशेष अंतर नहीं है। सभी मार्ग भिन्न-भिन्न हैं तथापि उनका उद्देश्य एक ही है अर्थात्-सभी मत एक ही ईश्वर तक पहुँचने का साधन हैं।
  3. सूफी मानवतावाद में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि ईश्वर को पाने के लिए मनुष्यमात्र से प्रेम करना जरूरी है। किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म के आधार पर भिन्न समझना भारो भूल है।
  4. मनुष्य अपने शुद्ध कर्मों द्वारा उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।
  5. समाज में सब बराबर हैं-न कोई बड़ा है और न छोटा।
  6. मनुष्य को बाह्य आडम्बरों से बचना चाहिए। भोग-विलास से दूर रहकर सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। उसका नैतिक स्तर बहुत ऊँचा होना चाहिए।
  7. सूफियों ने अपने आपको जंजीर अथवा सिलसिलों में संगठित किया। प्रत्येक सिलसिले का नियंत्रण शेख, पीर या मुर्शीद के हाथ में।
  8. गुरु (पीर) और शिष्य (मुरीद) के बीच सम्बन्ध को बहुत महत्त्व दिया जाता था। गुरु ही शिष्यों के लिए नियमों का निर्माण करता था। उनका वारिस खलीफा कहलाता था।
  9. सूफी आश्रम-व्यवस्था, प्रायश्चित, व्रत, योग तथा साधना आदि पर भी बल देते थे।
  10. सूफी संगीत पर भी बहुत जोर देते थे।

प्रश्न 7.
क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफी संतो से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?
उत्तर:
शासकों के संबंध नयनार और सूफी संतों के साथ : नयनार शैव परम्परा के संत थे। नयनार और सूफी संतों को शासकों ने अनेक प्रकार से संरक्षण दिया। चोल सम्राटों ने ब्राह्मणीय और भक्ति परम्परा को समर्थन दिया तथा विष्णु और शिव के मन्दिरों के निर्माण हेतु भूमि दान किया। चिदम्बरम्, तंजावुर और गंगैकोडा चोलापुरम् के विशाल शिव मंदिर चोल सम्राटों की सहायता से बनाये गये। इसी काल में कांस्य से ढाली गई शिव की प्रतिमाओं का भी निर्माण हुआ। स्पष्ट है कि नयनार संतों का दर्शन शिल्पकारों के लिए प्रेरणा स्रोत बना।

बेल्लाल क किसान नयनार और अलवार संतों का विशेष सम्मान करते थे। इसीलिए सम्राटों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा अपने उत्कीर्ण अभिलेखों में किया है। अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए उन्होंने सुन्दर मंदिरों का निर्माण करवाया जिनमें पत्थर और धातु निर्मित मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की गयी थीं। नयनारों का समर्थन पाने के लिए इन सम्राटों ने मंदिरों में तमिल भाषा के शैव भजनों का गायन प्रचलित किया। उन्होंने ऐसे भजनों का संकलन एक ग्रंथ ‘तवरम’ में करने की जिम्मेदारी ली।

945 ई० के एक अभिलेख के अनुसार चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवायी। इन मूर्तियों को उत्सव में एक जुलूस में निकाला जाता था। सूफी संतों के साथ शासकों के संबंध जोड़ने का प्रयास मुगल बादशाह जहाँगीर का अजमेर की दरगाह पर जाने, गियासुद्दीन खलजी द्वारा शेख की मजार का निर्माण कराए जाने एवं अकबर का अजमेर की दरगाह पर 14 बार दर्शन करने हेतु जाने आदि से दिखाई पड़ता है। सुलतानों ने खानकाहों को कर मुक्त भूमि अनुदान में दी और दान संबंधी न्यास स्थापित किए। सुल्तान गियासुद्दीन ने शेख फरीदुद्दीन को चार गाँवों का पट्टा भेंट किया और धनराशि भी भेंट की थी।

प्रश्न 8.
उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?
उत्तर:
भक्ति और सूफी चितकों द्वारा विभिन्न भाषाओं का प्रयोग –
1. भक्ति और सूफी चिन्तक अपने उपदेशों और विचारों को आम-जनता तक पहुँचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने कई क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग किया।

2. पंजाब से दक्षिण भारत तक, बंगाल से गुजरात तक भक्ति आंदोलन का व्यापक प्रभाव रहा। जहाँ-जहाँ संत सुधारक उपदेश देते थे, स्थानीय शब्द उनकी भाषा का माध्यम और अंग बन जाते थे। ब्रजभाषा, खड़ी बोली, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी, अरबी, आदि का उनके उपदेशों में अजीब समावेश है। इसी ने आगे चलकर आधुनिक भाषाओं का रूप निर्धारित किया।

3. स्थानीय भाषा संतों की रचनाओं को विशेष लोकप्रिय बनाती थी। उल्लेखनीय है कि चिश्ती सिलसिले के लोग दिल्ली हिन्दी में बातचीत करते थे ! बाबा फरीद ने भी क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचना की जो गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है। मोहम्मद जायसी का पद्मावत भी मसनवी शैली में है।

4. सूफियों ने लम्बी कवितायें मसनवी लिखी। उदाहरण के लिए मलिक मोहम्मद जायसी का पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतन सेन की प्रेम कथा को रोचक बनाकर प्रस्तुत करता है। वह मसनवी शैली में लिखा गया है।

5. सूफी संत स्थानीय भक्ति भावना से सुपरिचित थे। उन्होंने स्थानीय भाषा में ही रचनाएँ की। 17-18वीं शताब्दी में बीजापुर (कर्नाटक) में दक्खनी (उर्दू का रूप) में छोटी कविताओं की रचना हुई। ये रचनाएँ औरतों द्वारा चक्की पीसते और चरखा कातते हुए गाई जाती थीं। कुछ और रचनाएँ लोरीनाना और शादीनामा के रूप में लिखी गईं।

6. भक्ति और सूफी चिन्तक अपनी बात दूर-दराज के क्षेत्रों में फैलाना चाहते थे। लिंगायतों द्वारा लिखे गए कन्नड़ की वचन और पंढरपुर के संतों द्वारा लिखे गए मराठी के अभंगों ने भी तत्कालीन समाज पर अपनी अमिट छाप अंकित की। दक्खनी भाषा के माध्यम से दक्कन के गाँवों में भी इस्लाम धर्म का खूब प्रचार-प्रसार हुआ।

प्रश्न 9.
इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
अध्याय में प्रयुक्त पाँच स्रोत:
1. मारिची की मूर्ति:
मारिची बौद्ध देवी थी। यह मूर्ति बिहार की 10वीं शताब्दी की है, जो तांत्रिक पूजा पद्धति का एक उदाहरण है। तांत्रिक पूजा पद्धति में देवी की आराधना की जाती है। यह मूर्ति शिल्पकला का उत्तम उदाहरण है।

2. तोंदराडिप्पोडि का काव्य:
तोंदराडिप्पोडि एक ब्राह्मण अलवार था। उसने अपने काव्य में वर्ण व्यवस्था की अपेक्षा प्रेम को महत्त्व दिया है। “चतुर्वेदी जो अजनबी हैं और तुम्हारी सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते उनसे भी ज्यादा आप (हे विष्णु) उन “दासों” को पसंद करते हो-जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वह वर्ण व्यवस्था के परे हों।

3. नलयिरा दिव्य प्रबंधम्:
यह अलवारों (विष्णु के भक्त) की रचनाओं का संग्रह है। इसकी रचना 12वीं शताब्दी में की गई। इसमें अलवारों के विचारों की विस्तृत चर्चा है।

4. हमदान मस्जिद:
यह मस्जिद कश्मीर की सभी मस्जिदों में ‘मुकुट का नगीना’ समझी जाती है। यह कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह पेपरमैशी से सजाई गई है। (5) कश्फ-उल-महजुब-यह सूफी खानकाहों की एक पुस्तिका है। यह अली बिन उस्मान हुजाविरी द्वारा लिखी गई। इससे पता चलता है कि उपमहाद्वीप के बाहर की परम्पराओं ने भारत में सूफी चिंतन को कितना प्रभावित किया। यह सूफी विचारों और व्यवहारों के प्रबंध की उत्तम पुस्तक है।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
भारत के एक मानचित्र पर 3 सूफी स्थल ओर 3 वे स्थल जो मंदिर (विष्णु, शिव, तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर ) से संबद्ध है, निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 6 भक्ति सूफी परंपराएँ धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ img 1a

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
इस अध्याय में वर्णित किन्हीं दो धार्मिक उपदेशकों/चिंतकों/संतों का चयन कीजिए और उनके जीवन व उपदेशों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। इनके समय, कार्य क्षेत्रों और मुख्य विचारों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए। हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है और हमें क्यों लगता है कि वे महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 12.
इस अध्याय में वर्णित सूफी. एवं देवस्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या यह यात्राएँ अभी भी की जाती हैं। इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं? वे यहाँ क्यों जाते हैं? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class 12 History भक्ति सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पुरी (उड़ीसा) के मंदिर की विशेषतायें बताइये।
उत्तर:

  1. पुरी (उड़ीसा) का मंदिर पूजा प्रणालियों के समन्वय का एक अच्छा उदाहरण है। हिन्दू धर्म से 12वीं शताब्दी तक विष्णु को संपूर्ण विश्व का स्वामी या जगन्नाथ माना जाता है। हिन्दू धर्मापुरी (उड़ीसा) का मंदिर की विशेषतायें बताइये मए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट था। इस मंदिर से ऐसी जानकारी मिलती है।
  2. इस स्थानीय प्रतिमा को पहले और आज स्थानीय जनजाति के विशेषज्ञ काष्ठ-प्रतिमा के रूप में गढ़ते हैं। विष्णु का यह रूप देश के अन्य भागों में स्थित विष्णु प्रतिमाओं में दर्शित रूप से भिन्न है।

प्रश्न 2.
तांत्रिक पूजा पद्धति से आप क्या समझते हैं और इसकी क्या विशेषता है?
उत्तर:

  1. प्रायः देवी की आराधना पद्धति को तांत्रिक पूजा पद्धति या शाक्त पद्धति कहा जाता है।
  2. कर्मकाण्ड और अनुष्ठान की दृष्टि से इस पद्धति में स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से भाग ले सकते हैं।

प्रश्न 3.
आराधना पद्धतियों में कौन-सी दो प्रक्रियायें कार्य कर रही थीं?
उत्तर:

  1. एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। इसका प्रसार पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और संरक्षण द्वारा हुआ।
  2. स्त्री, शूद्रों और अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकार किया गया और उसे एक नया रूप प्रदान किया।

प्रश्न 4.
उलमा कौन थे?
उत्तर:

  1. उलमा ‘आलिम’ शब्द का बहुवचन है। इसका अर्थ है-ज्ञाता या जानकार। वस्तुत: उलमा इस्लाम धर्म के ज्ञाता थे।
  2. इस परिपाटी के संरक्षक होने से उनकी कार्य धार्मिक कृत्य संपन्न करने, कानून बनाने, उसका अनुपालन कराने और शिक्षा देने का था।

प्रश्न 5.
बासन्ना ने अपनी कविताओं में कौन से विचार व्यक्त किये हैं?
उत्तर:

  1. संसार में लोग जीवित व्यक्ति या जानवर से घृणा करते हैं परंतु निर्जीव वस्तु को पूजा करते हैं जो सर्वथा असंगत है।
  2. उदाहरण- “जब वे एक पत्थर से बने सर्प को देखते हैं तो उस पर दूध चढ़ाते हैं। यदि असली साँप आ जाएं तो कहते हैं “मारो-मारो।”

प्रश्न 6.
भक्ति परम्परा की दो मुख्य शाखाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. भक्ति परम्परा दो मुख्य शाखाओं में विभाजित है-सगुण और निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा। सगुण उपासना में शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियों की मूर्तियाँ बनाकर पूजी जाती है। इसमें देवताओं के मूर्त रूप की पूजा होती है।
  2. निर्गुण भक्ति परम्परा में अमूर्त एवं निराकार ईश्वर की उपासना की जाती है।

प्रश्न 7.
अंडाल कौन थी?
उत्तर:

  1. अंडाल एक अलवार स्त्री और प्रसिद्ध कवयित्री थी। उसके द्वारा रचित भक्ति गीत व्यापक स्तर पर गाये जाते थे और आज भी गाये जाते हैं।
  2. अंडाल स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपनी प्रेम भावना को छंदों में व्यक्त करती थी।

प्रश्न 8.
नयनारों द्वारा जैन और बौद्ध धर्म की आलोचना क्यों की जाती थी?
उत्तर:
राजकीय संरक्षण और आर्थिक अनुदान की प्रतिस्पर्धा रहने के कारण ही नयनार इन दोनों धर्मों में दोषारोपण किया करते थे। इनकी रचनाएँ अन्तत: शासकों से विशेष संरक्षण दिलाने में कारगर साबित हुई।

प्रश्न 9.
बासवन्ना (1106-68) कौन थे?
उत्तर:

  1. बासवन्ना वीर शैव परम्परा के संस्थापक थे। वे ब्राह्मण थे और प्रारम्भ में जैन धर्म के अनुयायी थे। चालुक्य राजदरबार में उन्होंने मंत्री का पद संभाला था।
  2. इनके अनुयायी वीर शैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।

प्रश्न 10.
खोजकी लिपि की विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:

  1. इस देशी साहित्यिक विधा या लिपि का प्रयोग पंजाब, सिंध और गुजरात के खोजा करते थे। ये इस्माइली (शिया) समुदाय के थे।
  2. खोजकी लिपि में “जीनन” नाम से राग बद्ध, भक्ति गीत लिखे गए। इसमें पंजाबी, मुल्तानी, सिंध, कच्छी, हिन्दी और गुजराती भाषाओं का सम्मिश्रण था।

प्रश्न 11.
सैद्धान्तिक रूप से इस्लाम धर्म के प्रमुख उपदेश क्या हैं?
उत्तर:

  1. अल्लाह एकमात्र ईश्वर है।
  2. पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत (शाहद) हैं।
  3. दिन में पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए।
  4. खैरात (जकात) बांटनी चाहिए। (रमजान के महीने में रोजा रखना चाहिए और हज के लिए मक्का जाना चाहिए।

प्रश्न 12.
जिम्मियों ने अपने को संरक्षित कैसे किया?
उत्तर:

  1. जिम्मी अरबी शब्द ‘जिम्मा’ से व्युत्पन्न है। यह संरक्षित श्रेणी में थे।
  2. जिम्मी उद्घटित धर्मग्रंथ को मानने वाले थे। इस्लामी शासकों के क्षेत्र में रहने वाले यहूदी और ईसाई इस धर्म के अनुयायी थे। ये लोग जजिया नामक कर का भुगतान करने मात्र से मुसलमान शासकों का संरक्षण प्राप्त कर लेते थे। भारत के हिन्दुओं को भी मुस्लिम शासक ‘जिम्मी कहते थे और उनसे जजिया नामक कर की वसूली की जाती थी।

प्रश्न 13.
इस्लामी परम्परा में शासकों को शासितों के प्रति क्या नीति थी?
उत्तर:

  1. शासक शासितों के प्रति पर्याप्त लचीली नीति अपनाते थे। उदाहरण के लिए अनेक शासकों ने हिन्दू, जैन, फारसी, ईसाई और यहूदी धर्मों के अनुयायियों और धर्मगुरुओं को मंदिर आदि निर्माण के लिए भूमियाँ दान में दी तथा आर्थिक अनुदान भी दिए।
  2. गैर मुसलमान धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करना भी उनकी उदार नीति का एक हिस्सा था। अकबर और औरंगजेब जैसे मुगल सम्राटों ने ऐसी उदार नीति अपनाई थी।

प्रश्न 14.
अकबर की खम्बात के गिरजाघर के प्रति कैसी नीति रही?
उत्तर:

  1. यीशु की मुकद्दस जमात के पादरी खम्बात (गुजरात) में एक गिरजाघर का निर्माण करना चाहते थे। अकबर ने उनकी माँग स्वीकार कर ली और अपनी स्वीकृति दे दी।
  2. उसने अपने हुक्मनामें से खम्बात के अधिकारियों को यह आदेश दिया कि वे इस कार्य में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करें। वस्तुतः यह अकबर की उदार धर्मनीति का एक उदाहरण है।

प्रश्न 15.
वली का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. पीर या गुरु के उत्तराधिकारी को वली या खलीफा कहा जाता है।
  2. सूफीमत के प्रत्येक सिलसिले या वर्ग अथवा कड़ी का पीर या गुरु शिक्षा-दीक्षा का कार्य संपन्न करने के लिए अपना उत्तराधिकारी या वली अथवा खलीफा नियुक्त करता था।
  3. वली’ शब्द का अर्थ है-ईश्वर का मित्र। कई “वली” को एक साथ ‘औलिया’ कहा जाता था।

प्रश्न 16.
पीर और मुरीद में अंतर बताइए।
उत्तर:

  1. सूफीमत में अध्यात्मिक गुरु को पीर कहा जाता है। इनका बहुत अधिक महत्त्व था। यह मानता थी की पीर के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
  2. सूफी परम्परा में शिष्य या अनुयायी को मुरीद कहा जाता है। ये सूफी विचारधारा के बारे में पीर से ज्ञान प्राप्त करते थे। इन्हें भी पीर के आश्रम में रहना पड़ता था।

प्रश्न 17.
मातृगृहता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. वह परिपाटी जिसमें स्त्रियाँ विवाह के बाद अपने मायके में ही अपनी संतान के साथ् रहती हैं और उनके पति उनके साथ आकर रह सकते हैं।
  2. यह एक प्रकार की मातृसत्तात्मक परिपाटी है।

प्रश्न 18.
‘मुकुट का नगीना’ किस मस्जिद को कहा जाता है? इसकी क्या विशेषता है?
उत्तर:

  1. श्रीनगर की झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद कश्मीर की सभी मस्जिदों में मुकुट का नगीना मानी जाती है।
  2. इसका निर्माण 1395 में हुआ और यह कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम नमूना है। इसके शिखर और नक्काशीदार छज्जे पेपरमैशी से अलंकृत है।

प्रश्न 19.
खानकाह क्या है?
उत्तर:

  1. खानकाह का अर्थ है-एक संगठित समुदाय का आश्रय स्थल या दरगाह। यह प्राचीन काल के गुरुकुल जैसा था क्योंकि इसमें खलीफा दुवारा मुरीदों को इस्लाम धर्म की शिक्षा दी जाती थी।
  2. सूफीवादी नेता या शेख अथवा पीर द्वारा इस समुदाय की व्यवस्था की जाती थी।

प्रश्न 20.
खालसा पंथ की नींव किसने रखी? इस पंथ के पाँच प्रतीक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की स्थापना गुरु गोविंद सिंह जी ने की।
  2. खालसा पंथ के पाँच प्रतीक निम्नलिखित हैं: हाथ में कड़ा, कमर में कृपण, सिर में पगड़ी (केश), बालों में कंघा तथा कच्छ धारण करना।

प्रश्न 21.
मसनवी का किससे संबंध था?
उत्तर:

  1. मसनवी सूफियों द्वारा लिखित लम्बी कवितायें श्रीं । इनमें ईश्वर के प्रति प्रेम को मानवीय या दुनियावी प्रेम से अभिव्यक्त किया गया है।
  2. उदाहरण के लिए मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत नामक प्रेम काव्य की कथा-वस्तु पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के इर्द-गिर्द घूमती है।
  3. पद्मिनी और रत्नसेन का प्रेम आत्मा को परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है।

प्रश्न 22.
वैदिक परम्परा तथा तांत्रिक आराधना में क्या अंतर है?
उत्तर:

  1. वैदिक परंपरा को मानने वाले उन सभी तरीकों की निंदा करते थे जो ईश्वर की उपासना के लिए मंत्रों के उच्चारण तथा यज्ञों के सम्पादन से हटकर थे।
  2. तांत्रिक लोग वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे। इसलिए उनमें कभी-कभी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी।
  3. तांत्रिक आराधना में देवियों की मूर्ति पूजा हेतु कई तरह के भौतिक या वस्तु प्रधान साधन अपनाए जाते थे जबकि वैदिक परंपरा जप, मंत्रोच्चारण और यज्ञ पर आधारित थी।

प्रश्न 23.
अलवार और नयनार कौन थे?
उत्तर:

  1. अलवार तथा नयनार दक्षिण भारत के संत थे। अलवार विष्णु के पुजारी थे।
  2. नयनार शैव थे और शिव की उपासना करते थे।

प्रश्न 24.
चिश्ती उपासना से जुड़े कोई दो व्यवहार बताइए।
उत्तर:

  1. इस्लाम धर्म के सभी अनुयायी या मुसलमानों के साथ ही विश्व के लगभग सभी धर्मानुयायी सूफी संतों की दरगाह की जियारत (तीर्थयात्रा) करते हैं। इस अवसर पर संत के अध्यात्मिक आशीर्वाद अर्थात् बरकत की कामना की जाती है।
  2. नृत्य तथा कव्वाली जियारत के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनके द्वारा अलौकिक आनन्द की भावना जगाई जाती है। हिन्दी भाषा में चिश्ती का अर्थ है-उपदेशक।

प्रश्न 25.
उर्स से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. उर्स का अर्थ है-विवाह अर्थात् पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन होना।
  2. सूफियों का यह मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर में समा जाते हैं। इस प्रकार वे पहले की अपेक्षा ईश्वर के और अधिक निकट हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
महान् और लघु परम्परा में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. इन दो शब्दों को 20वीं शताब्दी के समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड ने एक कृषक समाज के सांस्कृतिक आचरणों का वर्णन करने के लिए किया।
  2. इस समाजशास्त्री ने देखा कि किसान उन्हीं कर्मकाण्डों और पद्धतियों का अनुकरण करते थे जिनका पालन समाज के पुरोहित और राजा जैसे प्रभावशाली वर्ग द्वारा किया जाता था। इन कर्मकाण्डों को उसने ‘महान परम्परा’ की संज्ञा दी।
  3. कृषक समुदाय के अन्य लोकाचारों का पालन लघु परम्परा कहा गया।
  4. रेडफील्ड के अनुसार महान् और लघु दोनों प्रकार की परम्पराओं में समय के साथ परिवर्तन हुए।

प्रश्न 2.
वैदिक परिपाटी और तांत्रिक परिपाटी में संघर्ष की स्थिति क्यों उत्पन्न हो जाती थी?
उत्तर:
वैदिक परिपाटी और तांत्रिक परिपाटी में संघर्ष की स्थिति के कारण –

  1. वैदिक देवकुल के अग्नि, इन्द्र और सोम जैसे देवता पूर्णरूप से गौण हो गये थे। साहित्य और मूर्तिकला दोनों का निरूपण बंद हो गया था।
  2. वैदिक मंत्रों में विष्णु, शिव और देवी की झलक मिलती है और वेदों को प्रमाणिक माना जाता रहा। इसके बावजूद इनका महत्त्व कम हो रहा था।
  3. वैदिक परिपाटों के प्रशंसक ईश्वर की उपासना के लिए मंत्रों के उच्चारण और यज्ञों के संपादन से भिन्न आचरणों की निंदा करते थे।
  4. तांत्रिक पद्धति के लोग वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे। उनका बौद्ध अथवा जैन धर्म के अनुयायियों के साध भी टकराव होता रहता था।

प्रश्न 3.
आठवीं से अठारहवीं सदी के मध्य की साहित्यिक विशेषताएँ इंगित कीजिए।
उत्तर:
आठवीं से अठारहवीं सदी के मध्य की साहित्यिक विशेषतायें –

  1. इस काल की नूतन साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनायें हैं। इनमें उन्होंने जनसामान्य की क्षेत्रीय भाषाओं में अपने उपदेश दिए हैं।
  2. ये रचनाएँ प्रायः संगीतबद्ध हैं और संतों के अनुयायियों द्वारा उनकी मृत्यु के उपरांत संकलित की गई।
  3. ये परम्परायें प्रवाहमान थी-अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने मूल संदेश का न केवल विस्तार किया अपितु राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य में संदिग्ध और अनावश्यक लगने वाली बातों को बदल दिया या हटा दिया गया।
  4. इन रचनाओं का मूल्यांकन करना इतिहासकारों के लिए एक चुनौती का विषय बना है।

प्रश्न 4.
शरिया कैसे उद्भूत हुआ?
उत्तर:
शरिया का उद्भव –

  1. शरिया मुसलमान समुदायों को निर्देशित करने वाला कानून है। यह ‘कुरान शरीफ’ और ‘हदीस’ पर आधारित है।
  2. हदीस’ पैगम्बर साहब से जुड़ी परम्परायें हैं। इनके अंतर्गत उनके स्मृत शब्द और क्रियाकलाप भी आते हैं।
  3. जब अरब क्षेत्र के बाहर इस्लाम धर्म से भिन्न आचार-विचार वाले देशों में इस धर्म का प्रसार हुआ तो शरिया में कियास (समानता के आधार पर तर्क) और इजमा (समुदाय की सहमति) को भी कानूनी स्रोत मान लिया गया।
  4. इस प्रकार कुरान, हदीस, कियास और इजमा से शरिया का अभ्युदय एवं विकास हुआ।

प्रश्न 5.
लिंगायत सम्प्रदाय के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
लिंगायत सम्प्रदाय –

  1. कर्नाटक में लिंगायत सम्प्रदाय का विशेष महत्त्व है। शिव की आराधना लिंग के रूप में करना इस संप्रदाय का प्रमुख लक्षण है।
  2. इस समुदाय के पुरुष बायें कंधे पर चाँदी के एक पिटारे में एक लघु शिव लिंग धारण करते हैं।
  3. इस संप्रदाय में जंगम अर्थात् यायावर भिक्षु भी शामिल हैं।
  4. लिंगायतों का विश्वास है कि मृत्योंपरांत सभी शिव भक्त उन्हीं में लीन हो जायेंगे तथा जन्म एवं मरण चक्र से मुक्त हो जाएंगे।
  5. इस सप्रदाय के लोग धर्मशास्त्रीय श्राद्ध एवं मुंडन आदि संस्कारों का पालन नहीं करते थे परंतु अपने मृतकों को भली-भाँति दफनाते थे।

प्रश्न 6.
सूफीमत के प्रभावों की गणना कीजिए।
उत्तर:
सूफीमत के प्रभाव –
1. हिन्दू समाज में पहले की अपेक्षा निम्न वर्ग के साथ अच्छा व्यवहार होने लगा।

2. इस्लाम धर्म में हिन्दू धर्म की अच्छी बातों को स्थान दिया जाने लगा। भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति ने इस्लाम को प्रभावित किया और मुसलमानों ने हिन्दू रीति-रिवाजों को अपनाना आरंभ कर दिया।

3. सूफी मत ने अपने प्रचार में मुसलमानों को पहले की अपेक्षा अधिक उदार बनने में सहयोग दिया। मुसलमान हिन्दुओं को अपने समान समझने लगे। आपसी वैर-भाव दूर हुआ और एकता की भावना को बल मिला।

4. सम्राट अकबर की धार्मिक सहनशीलता की नीति तथा राजपूतों से विवाह सम्बन्ध, हिन्दुओं को राज्य के उच्च तथा महत्त्वपूर्ण पद प्रदान करना जैसे कार्य सूफी मत पर उसकी निष्ठा के ही परिणाम थे।

5. सूफी आंदोलन ने भारत की स्थापत्य कला को भी प्रभावित किया। सन्तों की समाधियों पर अनेक भव्य भवन खड़े किए गए। अजमेर में शेख मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह तथा दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया का मकबरा कला की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

6. सूफी आंदोलन का भारतीय साहित्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा। जायसी ने पद्मावत तथा अन्य रचनाएँ की। खुसरो ने अनेक काव्य-ग्रन्थ लिखे। निःसन्देह सूफी संतों की भारतीय समाज को यह बहुत बड़ी देन थी।

प्रश्न 7.
चिश्ती सिलसिला के विषय में एक नोट लिखिए।
उत्तर:
चिश्ती सिलसिला-मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन की तरह ही सूफी संप्रदाय का “सिलसिला” भी हिन्दु-मुस्लिम एकता, सामाजिक समानता तथा भाईचारे का संदेश दे रहा था। सूफी आंदोलन के साथ हुसैन बिन मंसूर अल हज्जाज, अब्दुल करीम, शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी, ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया और शेख सलीम चिश्ती जैसे ‘सिलसिलों’ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

“सिलसिलों” के सभी चिश्ती (उपदेशक) बड़े विद्वान तथा महान् संत थे। इन्हें फारसी, अरबी तक अनेक भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर (राजस्थान) में है। उन्होंने भारत के अनेक भागों की पैदल यात्रा की। शेख सलीम चिश्ती उनके शिष्य थे। उनके आशीर्वाद से ही मुगल सम्राट अकबर के पुत्र सलीम (बाद का नाम जहाँगीर) का जन्म हुआ था। अकबर ने उसके सम्मान में फतेहपुर सीकरी में एक दरगाह बनवाई थी।

आज भी अजमेर की दरगाह पर हजारों हिन्दू तथा मुसलमान हर वर्ष जाते हैं। वहाँ के मेले में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अन्य देशों के लोग भी आते हैं। निजामुद्दीन औलिया की दरगाह दिल्ली में है, उनके भी हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्प्रदाय के लोग शिष्य थे। सूफी सम्प्रदाय में चिश्ती सिलसिला के अनुयायी बहुत ही उदार थे। वे खुदा की एकता, शुद्ध जीवन तथा मानव मूल्यों पर बहुत जोर देते थे। वे सभी धर्मों की मौलिक एकता में यकीन रखते थे। चिश्ती सन्त घूम-घूमकर मानव प्रेम तथा एकता का उपदेश देते थे।

प्रश्न 8.
भक्ति परम्परा के सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural Effects):
1. सांस्कृतिक विकास:
भक्ति आन्दोलनों के नेताओं ने अपनी शिक्षा का प्रचार जनसाधारण की भाषा में किया। इसके परिणामस्वरूप बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, हिन्दी आदि अनेक देशी भाषाओं का विकास हुआ। जयदेव का ‘गीत गोबिन्द’ सूरदास का ‘सूरसागर’, जायसी का ‘पद्मावत’, सिक्खों का ‘आदि ग्रन्थ साहिब’, तुलसीदास जी का ‘रामचरित मानस’, कबीर और रहीम के ‘दोहे’ एवं रसखान की ‘साखियां’ जैसा हृदयस्पर्शी सद्साहित्य रचा गया।

2. हिन्दू-मुस्लिम कलाओं में समन्वय:
राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक भेदभाव, कटुता तथा वैमनस्य के कम होने पर हिन्दू और मुस्लिम कलाओं में समन्वय का एक नया युग प्रारम्भ हुआ और वास्तुकला, चित्रकला तथा संगीत का चरण विकास हुआ। ईरानी कलाओं का सम्मिश्रण तथा संगम हुआ और सभी क्षेत्रों में नई भारतीय कला का जन्म हुआ। इसका निखरा हुआ रूप मुगलकालीन भारतीय कलाकृतियों में देखने को मिलता है।

3. आर्थिक प्रभाव (Economic Effects):
इस आंदोलन के भारतीय सामाजिक जीवन पर कुछ आर्थिक प्रभाव भी पड़े । संत भक्तों ने यह महसूस किया कि अधिकांश सामाजिक बुराइयों की जड़ आर्थिक विषमता है। संत कबीर तथा गुरु नानकदेव जी ने धनी वर्ग के उन लोगों को फटकारा, जो गरीबों का शोषण करके धन संग्रह करते हैं। गुरु नानकदेव जी ने भी इस बात पर बल दिया कि लोगों को अपनी मेहनत तथा नेक कमाई पर ही संतोष करना चाहिए।

प्रश्न 9.
भक्ति आंदोलन के मुख्य सामाजिक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
सामाजिक प्रभाव:
1. जाति-प्रथा पर प्रहार-भक्त संतों ने जाति-प्रथा, ऊँच-नीच तथा छुआछूत पर करारी चोट की। इससे देश की विभिन्न जातियों में भेदभाव के बंधन शिथिल पड़ गये और छुआछूत की भावना कम होने लगी।

2. हिन्दुओं नया मुसलमानों में मेल-मिलाप-भक्ति आंदोलन के फलस्वरूप हिन्दुओं और मुसलमानों में विद्यमान आपसी वैमनस्य, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष, अविश्वास तथा सन्देह की भावना कम होने लगी। वे एक-दूसरे को सम्मान देने लगे और उनमें आपसी मेल-जोल बढ़ा।

3. व्यापक दृष्टिकोण-भक्ति आंदोलन ने संकीर्णता की भावना को दूर किया तथा लोगों के दृष्टिकोण को व्यापक तथा उदार बनाने में सहायता की। लोग अब प्रत्येक बात को तर्क तथा बुद्धि की कसौटी पर कसने लगे। ब्राह्मणों का प्रत्येक वचन उनके लिए ‘वेद-वाक्य’ न रहा। अंधविश्वास तथा धर्मांधता की दीवारें गिरने लगीं। देश की दोनों प्रमुख जातियों-हिन्दुओं तथा मुसलमानों का दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक होने लगा।

4. निम्न जातियों का उद्धार-भक्ति आंदोलन के नेताओं ने समाज में एक नया वातावरण पैदा किया। जाति-पालि के बंधन शिथिल होने लगे, ऊँच-नीच तथा धनी-निर्धन का भेदभाव कम हुआ और उनमें आपसी घृणा समाप्त होने लगी।

प्रश्न 10.
प्रारम्भिक भक्ति परम्परा के स्वरूप की विशेषतायें बताइए।
उत्तर:
प्रारम्भिक भक्ति परम्परा के स्वरूप की विशेषतायें –

  1. देवताओं की पूजा के तरीकों विकास के दौरान संत कवि ऐसे नेता के रूप में उदित हुए जिनके आस-पास भक्तजनों की भीड़ लगी रहती थी। इन्हीं के नेतृत्व में प्रारम्भिक भक्ति आंदोलन आरम्भ हुआ।
  2. भारतीय भक्ति परम्परा में विविधता थी। कुछ कृष्ण के भक्त थे तो कुछ राम के। कुछ सगुण उपासक थे तो कुछ निर्गुण।
  3. भक्ति परम्परा में सभी वर्गों को स्थान दिया गया। स्त्रियों और समाज के निम्न वर्गों को भी सहज स्वीकृति दी गयी।
  4. इतिहासकारों ने भक्ति परम्परा को दो वर्गों में विभाजित किया है-सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति। प्रथम वर्ग में शिव, विष्णु और उनके अवतार तथा देवियों को मूर्त आराधना शामिल है। निर्गुण भक्ति परम्परा में अमूर्त अर्थात् निराकार ईश्वर की उपासना की जाती थी।

प्रश्न 11.
“सूफी सम्प्रदाय और भक्ति सम्प्रदाय के विचारों में पर्याप्त समानता मिलती है।” तर्क दीजिए।
उत्तर:
सूफी सम्प्रदाय और भक्ति सम्प्रदाय के विचारों में समानतायें:

  1. दोनों सम्प्रदाय एकेश्वरवादी थे। सूफियों का कहना था कि परमात्मा एक है और हम उसकी संतान है। भक्ति आंदोलन ने एक ईश्वर को माना और उसका भजन कीर्तन किया।
  2. दोनों ने मानवता को समान महत्त्व दिया और मानव-जाति को प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।
  3. सूफी और भक्त संत दोनों ने गुरु को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। सूफी गुरु को पीर कहते थे।
  4. दोनों सम्प्रदायों ने हिन्दुओं और मुसलमानों को साथ मिलकर रहने और एक दूसरे की मदद करने का उपदेश दिया।
  5. सूफियों, हिंदू संतों और रहस्यवादियों के बीच प्रकृति, ईश्वर, आत्मा और संसार से सम्बन्धित विचारधारा में पर्याप्त समानता थी।
  6. दोनों ने ही यह बताया कि मानव प्रेम ही ईश्वर प्रेम है और नर-सेवा ही नारायण-सेवा है।

प्रश्न 12.
अलवार और नयनार कौन थे। इनकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी?
उत्तर:
अलवार और नयनार तथा उनकी उपलब्धियाँ –

  1. तमिलनाडु में प्रारम्भिक भक्ति आंदोलन का नेतृत्व अलवारों (वैष्णव भक्त) और नयनारों (शैव भक्त) ने दिया।
  2. वे एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करते थे और अपने ईष्ट देव की स्तुति में गीत गाते थे। इन यात्राओं के दौरान इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने पूजनीय देवता का निवास स्थान घोषित किया।
  3. ये स्थान तीर्थ स्थल बन गये और यहाँ विशाल मंदिर बनाये गये। इन संत कवियों के भजनों को मंदिर में उत्सव के समय गाया जाता था और साथ ही संतों की मूर्तियाँ बनाकर पूजा की जाने लगी।
  4. अलवार और नयनार जाति प्रथा के विरोधी थे और ब्राह्मणों को विशेष महत्त्व नहीं देते थे।
  5. इन संतों की रचनाओं को वेदों के समान महत्त्वपूर्ण माना जाता था। एक प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘नलयिरा दिव्य प्रबंधम्’ का उल्लेख वेद के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 13.
मस्जिद के स्थापत्य की विशेषतायें बताइए।
उत्तर:
मस्जिद के स्थापत्य की विशेषतायें –

  1. मस्जिद को इस्लामिक कला को मूल रूप माना गया है। इसका मौलिक ढाँचा साधारण होता है।
  2. मस्जिद का अनुस्थापन मक्का की ओर किया जाता था। इसमें एक खुला प्रांगण होता है जिसके चारों ओर स्तम्भों वाली छतें होती हैं।
  3. आँगन के मध्य में नमाज से पूर्व स्नान करने के लिए एक सरोवर या जलाशय होता है। इसके पश्चिम में मेहराबों वाला एक विशाल कक्ष होता है। मक्का को सम्मुख दिशा में स्थित यह विशाल कक्ष नमाज की दिशा बताता है।
  4. इस विशाल कक्ष के दक्षिण की ओर एक मंच होता है जहाँ से इमाम प्रवचन देता है। मस्जिद में एक या अधिक मीनारें भी होती हैं जहाँ से अजान दी जाती है।
  5. जिस मस्जिद में मुसलमान जुम्मा की नमाज के लिए एकत्रित होते हैं उसे ‘जामी मस्जिद’ कहा जाता है।

प्रश्न 14.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि बाबा गुरु नानक की परम्पराएँ 21 वीं शताब्दी में महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
21 वीं शताब्दी के सन्दर्भ में नानक की परम्पराओं का महत्त्व –

  1. गुरु नानक ने बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञों तथा मूर्ति पूजा का खंडन किया, जो आज भी उपयोगी हैं।
  2. उनका कहना था कि ईश्वर एक है और निराकार है। उसके साथ केवल शब्द के द्वारा ही संबंध जोड़ा जा सकता है।
  3. उनकी शिक्षायें इतनी सरल थीं कि आज भी व्यावहारिक हैं।
  4. नानक ने अपने शिष्यों को एक समुदाय के रूप में गठित किया और उनके लिए उपासना के नियम बनाये। ऐसे संगठन और एकता की आज भी खासी आवश्यकता है।
  5. उन्होंने जाति-प्रथा का विरोध किया और किसी को ऊँच-नीच नहीं समझा। भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में आज भी ऐसी धारणा का रहना प्रासंगिक और श्रेष्ठ है।
  6. उन्होंने मानव सेवा तथा आपसी। प्रेम तथा भाईचारे को बढ़ावा दिया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सल्तनत काल में उत्तर भारत की धार्पिक दशा का वर्णन कीजिए। इसने ब्राह्मणों की स्थिति कि कैसे प्रभावित किया। अथवा, 13-14 वीं शताब्दी की धार्मिक स्थिति की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सल्तनत काल में धार्मिक दशा:
दिल्ली सल्तनत एक इस्लामी राज्य था जिसमें इस्लाम राज्य धर्म था। दिल्ली के सुल्तान और अन्य विदेशी मुसलमान कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। इन शासकों का यह धार्मिक कर्त्तव्य था कि वे धर्म का प्रसार करें और अन्य धर्मावलम्बियों को इस्लाम धर्म में दीक्षित करें। भारत में हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की कई मुहिम चलाई गयीं। जनता को डरा-धमका कर, लालच देकर तथा सम्मानित करके धर्म परिवर्तन कराने के अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं।

वस्तुतः धर्मान्तरण उनके लिए धार्मिक कृत्य था। हिन्दुओं को ‘जिम्भी’ कहा जाता था। इसका अर्थ यह है कि वे समझौता करके जीवित रहने का अधिकार प्राप्त करने वाले लोग हैं। जजिया नामक कर देकर हिन्दू जीवित रहने का अधिकार प्राप्त करते थे। जो लोग जजिया नहीं देते थे उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना लिया जाता था। हिन्दुओं के लिए अपने मंदिरों में पूजा करना, घंटा-घड़ियाल बजाना अथवा धार्मिक जुलूस निकालना अत्यन्त कठिन था। इस प्रकार धार्मिक क्षेत्र में आजादी नहीं थी और इस दृष्टि से राज्य असहिष्णु था। भारत में शिया मुसलमानों का भी वर्ग था ! सुन्नी मुसलमान शियाओं के भी विरोधी थे। उन्होंने शियाओं का दमन किया। शियाओं को प्राय: दूर ही रखा जाता था तथा उनके धार्मिक कार्यों में विघ्न डाला जाता था।

ब्राह्मणों की स्थिति पर प्रभाव:
ब्राह्मणों के प्रभाव में कमी होने लगी थी और गैर-ब्राह्मणीय नेताओं के प्रभाव बढ़ रहे थे। इन नेताओं में नाथ, जोगी और सिद्ध शामिल थे। उनमें में अनेक लोग शिल्पी समुदाय के थे। इनमें मुख्यतः जुलाहे थे। शिल्प कला के विकास के साथ उनका महत्त्व भी बढ़ रहा था। नगरों के विस्तार तथा मध्य एवं पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार बढ़ने के कारण शिल्पी वस्तुओं की मांग बढ़ गई थी। सभी शिल्पकार धनाढ्य थे।

अनेक धार्मिक नये नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और अपने विचार आम-लोगों की भाषा में सामने रखे। समय के साथ इन भाषाओं ने वह रूप धारण कर लिया जिस रूप में वे आज प्रयोग में लाई जाती हैं। अपनी लोकप्रियता के बावजूद नए धार्मिक नेता विशिष्ट शासक वर्ग का समर्थन प्राप्त न कर सके। सल्तनत राज्य की स्थापना से राजपूत राज्यों तथा उनसे जुड़े ब्राह्मणों का महत्त कम हो गया था। इन परिवर्तनों का प्रभाव संस्कृति और धर्म पर भी पड़ा। भारत में सूफियों का आगमन इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।

प्रश्न 2.
सूफी मत क्या है? इसकी विशेषताओं अथवा सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सूफी मत (Sufism):
मध्यकालीन भारत में इस्लाम धर्म दो वर्गों-सुन्नी और शिया में बँट गया था। इनके बीच लगाकर तनाव और संघर्षों की स्थिति बन रही थी। इस बढ़ते हुए वैमनस्य को दूर करने के लिए कुछ मुसलमान संतों ने प्रेम एवं भक्ति पर बल दिया। ये सूफी संत कहलाए। सूफी मत के सम्बन्ध में इतिहासकार राय चौधरी ने लिखा है, “सूफी मत ईश्वर तथा जीवन की समस्याओं के प्रति मस्तिष्क तथा हृदय की भावना है ओर वह कट्टर इस्लाम से उसी प्रकार भिन्न है, जिस प्रकार कैथोलिक धर्म से “प्रोटेस्टेन्ट” भिन्न है।” जिस प्रकार हिन्दू धर्म की बुराइयों को दूर करने के लिए भक्ति आंदोलन का जन्म हुआ था, उसी प्रकार इस्लाम धर्म में आई हुई बुराइयों को दूर करने के लिए सूफीमत अस्तित्त्व में आया। यह मत प्रेम और मानवमात्र की समानता के सिद्धांत पर आधारित था।

सूफी मत का आरम्भ:
सूफी मत का जन्म ईरान में हुआ। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् इस्लाम धर्म के अनुयायी शिया और सुन्नी के दो वर्गों में बँट गए और एक-दूसरे से ईर्ष्या, घृणा तथा द्वेष रखने लगे। सूफी मत इन झगड़ों को समाप्त कर दोनों वर्गों में समन्वय स्थापित करना चाहता था। इस विचारधारा में प्रेम तथा आपसी भाइचारे का सन्देश दिया गया। सूफी उदार प्रकृति के मुसलमान थे और सभी धर्मों को समान समझते थे। सूफी विचार प्रेमपूर्ण भक्ति का द्योतक है। डॉ. ताराचन्द के अनुसार, “सूफीवाद प्रगाढ़ भक्ति का धर्म है, प्रेम इसका भाव है, कविता संगीत तथा नृत्य इसकी आराधना के साधन हैं, तथा परमात्मा में विलीन हो जाना इसका आदर्श है।”

सूफीमत के सिद्धांत अथवा विशेषताएँ (Principles or Characteristics of Sufism):
सूफी सन्त मानवीय गुणों के उपासक थे। वे नैतिक जीवन बिताने पर बल देते थे और धार्मिक संकीर्णता की भावना से दूर थे। सूफी नत के सिद्धांत इस प्रकार थे।

1. एकेश्वरवाद-सूफी सन्त केवल एक ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते थे। वे पीरों तथा अवतारों को ईश्वर नहीं मानते थे, किन्तु उनकी निन्दा भी नहीं करते थे। वे राम, कृष्ण, रहीम को महापुरुष मानते थे। उनका विचार था कि सब-कुछ ईश्वर में है, उससे बाहर कुछ नहीं है।

2. मानव मात्र से प्रेम-सूफी संत सब लोगों को एक ईश्वर की सन्तान होने के कारण समान समझते थे। वे मानव-मानव में कोई भेदभाव नहीं करते थे। वे वर्ग तथा जाति-पाति तथा ऊँच-नीच के आधार पर भेदभाव के विरोधी थे। वे मानवमात्र से प्रेम तथा सहानुभूति में विश्वास रखते थे। वे सभी धर्मों को समान समझते थे। हिन्दु धर्म तथा इस्लाम उनकी दृष्टि में समान थे।

3. बाह्य आडम्बरों का विरोध-सूफी संत बाह्य आडम्बर, कर्मकाण्ड विधि-विधान, रोजा-नमाज के घोर विरोधी थे। वे जीवन की पवित्रता में विश्वास रखते थे। वे नैतिक सिद्धांतों के पोषक थे। वे मूर्ति-पूजा, हिंसा, माँस-भक्षण के पक्ष में नहीं थे। वे सांसारिक वस्तुओं का त्याग चाहते थे। वे ईश्वर को दयालु तथा उदार मानते थे। वे प्रेम तथा ईश्वर भक्ति में विश्वास रखते थे।

4. कर्म सिद्धांत में विश्वास-सूफी कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। उनके विचार से मनुष्य अपने कर्मों से अच्छा या बुरा होता है न कि जन्म से। उच्च वंश, में जन्म लेकर दुष्कर्म करने वाला व्यक्ति भी नीच कहलाएगा और निम्न वंश में जन्म लेकर अच्छे कर्म करने से आदर का पात्र होगा-उनका ऐसा विश्वास था।

5. दैवी चमत्कार में विश्वास-सूफी संत दैवी चमत्कार में विश्वास रखते थे। इसमें मनुष्य मानवीय स्थिति से ऊपर उठकर देवत्व को प्राप्त होता है। इस अवस्था में वह ईश्वर की शिक्षा
को सुन सकता है और लोगों के सामने उत्तम विचारों को रख सकता है।

6. गुरु की महिमा पर बल-सूफी संतों ने गुरु महिमा पर भी बल दिया है। एक व्यक्ति को धर्म में दीक्षित होने से पूर्व गुरु के सामने कुछ प्रतिज्ञाएँ करनी पड़ती हैं। शिष्य को गुरु की आज्ञा का पालन तथा उसकी सब प्रकार से सेवा करनी चाहिए। उनके अनुसार कठिन मार्ग को पार करने के लिए गुरु का होना परमावश्यक है। गुरु की सहायता से ही प्रत्येक व्यक्ति अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर लेता है।

7. मनुष्य को प्रधानता-सूफी मत में मनुष्य को प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है और उसकी प्रधानता को स्वीकार किया गया है। मनुष्य की आत्मा सार्वभौमिक है। उसकी आत्मा कर्मों से प्रभावित होती है, अतः मनुष्य को सदा अच्छे कर्म करने चाहिए।

8. प्रेम का विशेष महत्त्व-सूफी मत में प्रेम को विशेष महत्त्व दिया गया है। सूफी मत का आधार ही प्रेम है। सूफी सन्तों के अनुसार ईश्वर परम सुन्दर है और उसे प्रेम के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। प्रेम की त्रिवेणी शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक है।

प्रश्न 3.
सन्त कबीर एवं गुरु नानक के आरम्भिक जीवन और शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(I) सन्त कबीर का आरम्भिक जीवन:
सन्त कबीर भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता के महान् प्रचारक थे। वे भक्ति सुधारकों में सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी से हुआ था। उसने लोक-लाज के भय से बालक को काशी के लहरतारा तालाब के किनारे फेंक दिया। नि:संतान जुलाहे नीरु ने उसे वहाँ से उठा लिया और उसकी पत्नी नीमा ने अपने पुत्र की तरह उसका पालन-पोषण किया। बड़े होने पर कबीर रामानन्द के शिष्य बन गए। कबीर का विवाह लोई नाम की लड़की से हुआ। उनके कमाल तथा कमाली नाम के दो बच्चे भी हुए लेकिन गृहस्थ जीवन में रहकर भी वे ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे।

कबीर की शिक्षाएँ-सन्त कबीर की प्रमुख शिक्षाएँ इस प्रकार हैं:
1. ईश्वर एक है, उसका कोई आकार नहीं है। कथन है कि-‘हिन्दु तुरक का कर्ता एकता गति लिखी न जाई।

2. ईश्वर सर्वव्यापक है। मूर्ति-पूजा से कोई लाभ नहीं। उसे पाने के लिए मन की पवित्रता आवश्यक है।

3. ईश्वर को पाने के लिए गुरु की अत्यन्त आवश्यकता है। यदि ईश्वर अप्रसन्न हो जाए तो गुरु के सहारे उसे फिर पाया जा सकता है, किन्तु यदि गुरु रूठ जाए तो कहीं भी सहारा नहीं मिलता (हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर)।

4. कबीर जाति-पाँति के भेद-भाव को स्वीकार नहीं करते थे उनका विश्वास था कि जाति के आधार पर कोई छोटा या बड़ा नहीं हो सकता। कबीर ने ब्राह्मणों की जाति को ऊँचा मानने से साफ इन्कार कर दिया था।

5. कबीर व्यर्थ के रीति-रिवाजों को आडम्बरों के विरोधी थे। उन्होंने पूजा-पाठ, रोजा-नमाज, तीर्थ-यात्रा और हज आदि का विरोध किया है। उन्होंने मुसलमानों की नमाज का विरोध करते हुए लिखा है:

“काँकर पाथर जोरि के, मसजिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, बहरा हुआ खुदाय।” इसी तरह उन्होंने हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा का भी विरोध किया:

“पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजें पहार।
ताते या चाकी भली, पीस खाय संसार ”

6. कबीर कर्म-सिद्धान में विश्वास रखते थे। उनका विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके अच्छे या बुरे कर्म का फल अवश्य भुगतना पड़ेगा। उनके शब्दों में:

“कबिरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास।
जो करे सो भरे, तू क्यों भया उदास।

7. कबीर सभी धर्मों की एकता में विश्वास रखते थे। उनके अनुसार हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं है। उनके अनुसार दोनों की मौजल एक ही है, केवल रास्ते अलग-अलग हैं। इस प्रकार कवीर ने जाति-भेद का विरोध किया, कुसंग की निन्दा की तथा साधना और प्रेम पर बल दिया। उन्होंने गुरु को गोविन्द (ईश्वर) के समान मानः। उन्होंने हिन्दू-मुसलमान दोनों के आडम्बरों का विरोध किया। उनमें बैर-विरोध कम करके एकता की स्थापना की। डॉ० ताराचन्द के अनुसार, “कबीर का उद्देश्य प्रेम के धर्म का प्रचार करना था, जो धर्मों और जातियों के नाम पर पड़े भेदों को मिटा दे।” अत: डॉ० बनर्जी ने ठीक ही लिखा है कि “कबीर मध्यकाल के सुधारक मार्ग के पहले पथ-प्रदर्शक थे, जिन्होंने धर्म के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए सक्रिय प्रयास किया।”

(II) गुरु नानक:
सिक्ख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का जन्म 1469 ई० में रावी नदी के तट पर स्थित एक गाँव जलवण्टी में हुआ। इनके पिता का नाम मेहता कालूराम और माता का नाम तृप्ता देवी था। इनका विवाह बचपन में ही कर दिया गया था। पिता के व्यवसाय-का लेखा-जोखा तैयार करने का प्रशिक्षण फारसी में दिया गया। आपके दो पुत्र भी हुए जिनका नाम श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द था। नानक जी का झुकाव अध्यात्मवाद की ओर था। उन्हें साधु-सन्तों की संगति अच्छी लगती थी। कुछ समय बाद उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ।

उन्होंने मानवता को सच्ची राह दिखाने के लिए दूर-दूर तक यात्राएँ की जिन्हें सिक्ख धर्म में ‘उदासियाँ’ कहा जाता है। कहा जाता है कि वे सारे भारत के अतिरिक्त श्रीलंका, बर्मा, चीन और अरब (मक्का और मदीना) भी गए लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में वे गुरदासपुर जिले के करतारपुर गाँव में बस गए। वे काव्य रचना करते थे और उनके शिष्य मरदाना और बाला, सारंगी व रबाब बजाते थे। उन्होंने करतारपुर में यात्रियों के लिए धर्मशाला बनवाई और अपने शिष्यों में समानता लाने का प्रयास किया। 1539 ई० में उनका देहांत हो गया।

कबीर की तरह गुरु नानक ने भी एकेश्वरवाद पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ईश्वर के स्मरण और उसके प्रति भक्ति से ही मुक्ति मिल सकती है। वे ईश्वर की निकटता पाने के लिए व्यवहार और चरित्र की पवित्रता पर बहुत बल देते थे। मार्गदर्शन के लिए उन्होंने गुरु की अनिवार्यता पर भी बल दिया। कबीर की तरह वे भी मूर्ति-पूजा, तीर्थ-यात्रा तथा धार्मिक आडम्बरों के विरोधी थे। उन्होंने मध्यम मार्ग पर बल दिया। वे गृहस्थ जीवन के पक्षपाती थे। उन्होंने उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया तथा शान्ति, सद्भावना और भाई-चारे की भावना द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता की स्थापना की। इस प्रकार, कबीर और नानक ने एक ऐसा जनमत तैयार किया जो शताब्दियों तक धार्मिक उदारता के लिए प्रयत्नशील रहा।

प्रश्न 4.
भक्ति आंदोलन के उदय के कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भक्ति आंदोलन के उदय के कारण-भक्ति आंदोलन के उदय के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. हिन्दू धर्म का विघटन (Degeneration of Hindusim):
मध्ययुग में हिन्दू धर्म में अनेक बुराइयाँ आ चुकी थीं। धर्म अपनी पवित्रता और प्रभाव खो चुका था। अन्धविश्वास, रूढ़िवाद, आडम्बर और जातिवाद में लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा था। ब्राह्मण, भ्रष्ट और निर्दयी हो चुके थे। वे जनता का अधिक से अधिक शोषण करते थे। इन बुराइयों के विरुद्ध कुछ लोगों ने साहसी कदम उठाया और इस प्रकार भक्ति आंदोलन का श्रीगणेश हुआ।

2. इस्लाम धर्म का खतरा (Danger from Islam):
भारत में मुस्लिम शासन के कारण इस्लाम धर्म का प्रचार तेजी से हो रहा था इसके कारण हिन्दू धर्म समाप्त हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया था। इस्लाम-धर्म के सिद्धांतों ने एक ईश्वर और भाई-चारे के सिद्धांत का प्रचार किया। इन सिद्धांतों ने भारत के अधिसंख्यक निम्नवर्ग को बहुत अधिक प्रभावित किया। इस खतरे से हिन्दू धर्म को बचाने के लिए कुछ सुधारकों ने अपना कार्य शुरू कर दिया।

3. मुस्लिम शासन (Reign of Muslims):
भक्ति-आंदोलन के उदय का एक प्रमुख कारण मुस्लिम शासन था। धीरे-धीरे मुसलमान भारत में स्थायी रूप से बस गये और उन्होंने हिन्दुओं पर शासन करना शुरू कर दिया। जब उनका स्थायी राज्य स्थापित हो गया तो हिन्दू जनता उन्हें बाहर निकालने में असमर्थ हो गयी। ऐसी स्थिति में दोनों के सम्पर्क बढ़ने लगे। इस सम्पर्क को बढ़ाने वाले सन्त थे।

4. सूफी संत (Sufi Saint):
इस समय सूफी संतों जैसे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया और नसीरूद्दीन चिराग-ए-दिल्ली आदि के कारण सूफी प्रभाव बढ़ता जा रहा था। इन्होंने कट्टर मुस्लिम विचारों पर अंकुश लगाया। इनके प्रभाव से भारत में सगुण-भक्ति विचारधारा को बल मिला।

5. भक्ति मार्ग को अपनाया (Selection of Bhakti Marg):
इस्लामी खतरे का सामना करने के लिए हिन्दू सुधारकों ने भक्ति मार्ग की शिक्षा को अपना प्रमुख सिद्धांत बनाये रखा। मोक्ष के तीन मार्गों-ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग में सबसे सरल भक्ति मार्ग ही था। इसलिए मध्ययुग के धार्मिक सुधारकों ने इसी मार्ग पर जोर दिया।

प्रश्न 5.
भारत में सूफी सिलसिले पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत में सूफी:
सिलसिले (Sufi Order in India):
भारत में 13 वीं और 14 वीं शताब्दी में चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिले अधिक प्रचलित थे और इनके अनुयायियों की संख्या भी काफी थी।

चिश्ती सिलसिला (the Chisti Order):
भारत में चिश्ती की स्थापना का श्रेय ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को जाता है। इनका जन्म 1142 ई० में मध्य एशिया में हुआ। 1192 ई० में वे भारत आये और कुछ समय लाहौर और दिल्ली में रहने के बाद अजमेर में आबाद हो गये जो उस समय एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक केन्द्र था। उनके स्वतंत्र विचारों का प्रचार बहुत जल्दी हुआ और उनके अनुयायियों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती गई।

उनकी मृत्यु 1223 ई० में हुई। आज भी हजारों मुसलमान हर साल अजमेर में उनकी दरगाह पर जाते हैं। उनके शिष्यों में शेख हमीमुद्दीन और ख्वाजा बख्तियार उद्दीन काकी के नाम उल्लेखनीय हैं। काकी के शिष्य फरीदउद्दीन-गंज-ए-शंकर थे जिन्होंने पंजाब अपना केन्द्र बनाया। इन सन्तों ने अपने आपको राजनीति, शासकों तथा सरकारों से सदा दूर रखा। वे निजी सम्पत्ति नहीं रखते थे।

चिश्ती सन्तों में निजामुद्दीन औलिया और नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली के नाम विशेषकर उल्लेखनीय हैं। उन्होंने दिल्ली को अपने प्रचार का केन्द्र बनाया। निजामुद्दीन औलिया सादा और पवित्र जीवन, मानववाद, ईश्वरीय प्रेम, अध्यात्मिक विकास एवं गीत-संगीत (सभा) पर बल देते थे। निम्न वर्ग के लोगों से विशेष सहानुभूति रखते थे। धर्म-परिवर्तन में वे विश्वास नहीं रखते थे। नसीरुद्दीन ने भी इस सिलसिले की उन्नति में बहुत योगदान दिया। उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली में उनका प्रभुत्व कम होने लगा। तत्पश्चात् उनके शिष्यों ने उनके सिद्धांतों का प्रचार दक्षिणी और पूर्वी भारत में किया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संत कवियों के विवरण का स्रोत क्या है?
(अ) अभिलेख
(ब) महाकाव्य
(स) उनकी मूर्तियाँ
(द) अनुयायियों द्वारा लिखी गयी जीवनियाँ
उत्तर:
(द) अनुयायियों द्वारा लिखी गयी जीवनियाँ

प्रश्न 2.
लोग जजिया कर क्यों देते थे?
(अ) सुल्तान का खजाना भरने के लिए
(ब) सुल्तानों का संरक्षण प्राप्त करने के लिए
(स) सुल्तान के भय से
(द) राज्य निष्कासन से बचने के लिए
उत्तर:
(ब) सुल्तानों का संरक्षण प्राप्त करने के लिए

प्रश्न 3.
रेडफील्ड कौन था?
(अ) समाजशास्त्री
(ब) इतिहासकार
(स) राजनेता
(द) समाज सुधारक
उत्तर:
(अ) समाजशास्त्री

प्रश्न 4.
तांत्रिक पूजा पद्धति में पूजा की जाती है?
(अ) देवताओं की
(ब) देवियों की
(स) दोनों की
(द) दानवों की
उत्तर:
(ब) देवियों की

प्रश्न 5.
चतुर्वेदी का क्या अर्थ है?
(अ) हवन कुंड के चारों ओर बनी वेदी
(ब) चतुर वैद
(स) चारों वेदों का ज्ञाता
(द) विष्णु का पुजारी
उत्तर:
(स) चारों वेदों का ज्ञाता

प्रश्न 6.
करइक्काल अम्मइयार किससे संबंधित थी?
(अ) इस्लाम
(ब) भक्ति परम्परा
(स) अलवर
(द) नयनार
उत्तर:
(द) नयनार

प्रश्न 7.
नयनार संत बौद्ध और जैन धर्म को किस दृष्टि से देखते थे?
(अ) प्रेम
(ब) सौहार्द
(स) घृणा
(द) विरोधी
उत्तर:
(द) विरोधी

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में शिव मंदिर कहाँ नहीं है?
(अ) भीतरी
(ब) चिदम्बरम्
(स) तंजावुर
(द) गंगा कोडाचोलपुरम्
उत्तर:
(अ) भीतरी

प्रश्न 9.
किसका संबंध ब्राह्मणीय परम्परा से था?
(अ) नाथ परम्परा
(ब) भक्ति परम्परा
(स) जोगी परम्परा
(द) सिद्ध परम्परा
उत्तर:
(ब) भक्ति परम्परा

प्रश्न 10.
इस्लाम का उद्भव कब हुआ?
(अ) 10 वीं शताब्दी
(ब) 9वीं शताब्दी
(स) सातवीं शताब्दी
(द) छठी शताब्दी
उत्तर:
(स) सातवीं शताब्दी

प्रश्न 11.
जाजिया कर कौन देता था?
(अ) मुस्लिम वर्ग
(ब) गैर मुस्लिम वर्ग
(स) दोनों वर्ग
(द) कोई नहीं
उत्तर:
(ब) गैर मुस्लिम वर्ग

प्रश्न 12.
मालाबार तट पर बसे मुसलमान व्यापारियों की भाषा क्या थी?
(अ) उर्दू
(ब) अरबी
(स) तमिल
(द) मलयालम
उत्तर:
(द) मलयालम

प्रश्न 13.
पारसीक कहाँ के रहने वाले थे?
(अ) तजाकिस्तान
(ब) सीरिया
(स) फारस
(द) काबुल
उत्तर:
(स) फारस

प्रश्न 14.
खानकाह का नियंत्रण कौन करता था?
(अ) शेख
(ब) मुरीद
(स) खलीफा
(द) संत
उत्तर:
(अ) शेख

प्रश्न 15.
ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है?
(अ) दिल्ली
(ब) अजमेर
(स) पाकिस्तान
(द) ईरान
उत्तर:
(ब) अजमेर

Bihar Board Class 10 Political Science Solutions Chapter 1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी

Bihar Board Class 10 Social Science Solutions Political Science राजनीति विज्ञान : लोकतांत्रिक राजनीति भाग 2 Chapter 1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Social Science Political Science Solutions Chapter 1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी

Bihar Board Class 10 Political Science लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती’। कैसे?
उत्तर-
प्रत्येक समाज में सामाजिक विभिन्नता पायी जाती है। समाज में विभिन्न धर्म, जाति, भाषा, समुदाय, लिंग इत्यादि के लोग रहते हैं जो सामाजिक विभिन्नता का सूचक है। यह आवश्यक नहीं है कि ये राजनीतिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का आधार हो, क्योंकि भिन्न समुदाय के विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन हित समान होगा। उदाहरण के लिए मुम्बई में मराठियों की हिंसा का शिकार व्यक्तियसों की जातियाँ भिन्न थीं, धर्म भिन्न थे और लिंग भी भिन्न हो सकता है, परन्तु उनका क्षेत्र एक ही था। वे सभी एक ही क्षेत्र विशेष के उत्तर भारतीय थे। उनका हित समान था। वे सभी अपने व्यवसाय और पेशा में संलग्न थे। उपर्युक्त कथनों के अध्ययन करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जायेगा कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं ले पाती है।

प्रश्न 2.
सामाजिक अन्तर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं?
उत्तर-
सामाजिक अन्तर एवं सामाजिक विभाजन में बहुत बड़ा अन्तर पाया जाता है। सामाजिक विभाजन तब होता है जब कुछ सामाजिक अन्तर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं। सवर्णों और दलितों का अन्तर एक सामाजिक विभाजन है, क्योंकि दलित सम्पूर्ण देश में आमतौर पर गरीब, वंचित एवं बेघर हैं और भेदभाव के शिकार हैं जबकि सवर्ण आमतौर पर सम्पन्न एवं सुविधायुक्त हैं। अर्थात् दलितों को महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं। अतः हम कह सकते हैं कि जब एक तरह का सामाजिक अन्तर अन्य अन्तरों से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है और लोगों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं तो इससे सामाजिक विभाजन की स्थिति पैदा होती है। जैसे- अमेरिका में श्वेत और अश्वेत का अन्तर सामाजिक विभाजन है। वास्तव में उपर्युक्त कथनों के अध्ययन के बाद यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक अन्तर उस समय सामाजिक विभाजन बन जाता है जब अन्य अन्तरों से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है।

प्रश्न 3.
‘सामाजिक विभाजनों की राजनीति के परिणामस्वरूप ही लोकतंत्र के व्यवहार में परिवर्तन होता है। भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में इसे स्पष्ट करें।
उत्तर-
सामाजिक विभाजन दुनिया के अधिकतर देशों में किसी-न-किसी रूप में मौजूद है और यह विभाजन राजनीतिक रूप अख्तियार करती ही है। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के लिए सामाजिक विभाजनों की बात करना और विभिन्न समूहों से अलग-अलग वायदे करना स्वाभाविक बात है। हमारे देश भारत में लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था पायी जाती है। जनता अपने प्रतिनिधियों को मतदान के माध्यम से चुनकर देश की संसद या राज्य की विधानसभाओं में भेजती है।

भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक विभाजन का असर देश की राजनीति पर बहुत हद तक पड़ता है। साथ ही सरकार की नीतियाँ भी प्रभावित होती हैं। अगर भारत में पिछड़ों एवं दलितों के प्रति न्याय की मांग को सरकार शुरू से खारिज करती रहती है तो आज भारत विखंडन के कगार पर होता। लोकतंत्र में सामाजिक विभाजन की राजनीतिक अभिव्यक्ति एक सामान्य बात है और यह एक स्वस्थ राजनीतिक का लक्षण भी है। राजनीति में विभिन्न तरह के सामाजिक विभाजन की अभिव्यक्ति ऐसे विभाजनों की बीच संतुलन पैदा करने का भी काम रहती है। परिणामतः कोई भी सामाजिक विभाजन एक हद से ज्यादा उग्र नहीं हो पाता और यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को मजबूत करने में सहायक भी होता है। लोग शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीक से अपनी मांगों को उठाते हैं और चुनावों के माध्यम से उनके लिए दबाव बनाते हैं। उनका समाधान पाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक विभाजन की राजनीति के फलस्वरूप भारतीय लोकतंत्र के व्यवहार में परिवर्तन होता है।

प्रश्न 4.
सत्तर के दशक से आधुनिक दशक के बीच भारतीय लोकतंत्र का सफर (सामाजिक न्याय के संदर्भ में) का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-
सत्तर के दशक के पहले भारत की राजनीति सवर्ण सुविधापरस्त हित समूहों के हाथों में थी। अर्थात् 1967 तक भारतीय राजनीति में सवर्ण जातियों का वर्चस्व रहना। सत्तर से नब्बे तक के दशक के बीच सवर्ण और मध्यम पिछड़े के उपरान्त पिछड़ी जातियों का वर्चस्व तथा तथा दलितों की जागृति की अवधारणाएँ राजनीतिक गलियारों में उपस्थित दर्ज कराती रहीं और नीतियों को प्रभावित करती रहीं। भारतीय राजनीति के इस महामंथन में पिछड़े और दलितों का संघर्ष प्रभावी रहा। आधुनिक दशक के वर्षों में राजनीति का पलड़ा दलितों और महादलितों (बिहार के संदर्भ में) के पक्ष में झकता दिखाई दे रहा है। सरकार की नीतियों के सभी परिदृश्यों में दलित न्याय की पहचान सबके केन्द्र-बिन्दु का विषय बन गया है।

प्रश्न 5.
सामाजिक विभाजनों की राजनीति का परिणाम किन-किन चीजों पर निर्भर करता है?
उत्तर-
सामाजिक विभाजन की राजनीति तीन तत्वों पर निर्भर करती है जो निम्नलिखित हैं

1. लोग अपनी पहचान स्व. अस्तित्व तक ही सीमित रखना चाहते हैं, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य में राष्ट्रीय चेतना के अलावा उप-राष्ट्रीय या स्थानीय चेतना भी होती है। कोई एक घटना बाकी चेतनाओं की कीमत पर उग्र होने लगती है तो समाज में असंतुलन पैदा हो जाता है। भारत के संदर्भ में कहा जा सकता है कि जबतक बंगाल बंगालियों का, तमिलनाडु तमिलों का, महाराष्ट्र मराठियों का, आसाम असमियों का, गुजरात गुजरातियों की भावना का दमन नहीं होगा तबतक भारत की अखण्डता, एकता तथा सामंजस्य खतरा में रहेगा। अतएव उचित यही है कि पहचान के लिए सभी चेतनाएँ अपनी-अपनी मर्यादा में रहें और एक दूसरे की सीमा में दखल न दें. सरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि अगर लोग अपने बहु-स्तरीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा मानते हैं तो कोई समस्या नहीं हो सकती। उदाहरण स्वरूप-बेल्जियम के अधिकतर लोग खुद को बेल्जियाई (Belgian) ही मानते हैं, भले ही वे डच और जर्मन बोलते हैं। हमारे देश में भी ज्यादातर लोग अपनी पहचान को लेकर ऐसा ही नजरिया रखते हैं। भारत विभिन्नताओं का देश है, फिर भी सभी नागरिक सर्वप्रथम अपने को भारतीय मानते हैं। तभी तो हमारा देश अखण्डता और एकता का प्रतीक है।

2. किसी समुदाय या क्षेत्र विशेष की मांगों को राजनीतिक दल कैसे उठा रहे हैं। संविधान ” के दायरे में आने वाली और दूसरे समुदायों को नुकसान न पहुँचाने वाली माँगों को मान लेना आसान ‘ है। सत्तर के दशक के पूर्व के राजनीतिक स्वरूप तथा अस्सी एवं नब्बे के दशक में राजनीति परिदृश्य में बदलाव हुआ और भारतीय समाज में सामंजस्य अभी तक बरकरार है। इसके विपरीत युगोस्लाविया में विभिन्न समुदाय के नेताओं ने अपने जातीय समूहों की तरफ से ऐसी माँगें रखीं कि जिन्हें एक देश की सीमा के अन्दर पूरा करना संभव न था। इसी के परिणामस्वरूप युगोस्लाविया कई टुकड़ों में बँट गया।

3. सामाजिक विभाजन के राजनीति का परिणाम सरकार के खर्च पर भी निर्भर करता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार इन मांगों पर क्या प्रतिक्रियाएं व्यक्त करती हैं। अगर भारत में पिछड़ों एवं दलितों के प्रति न्याय की माँग को सरकार शुरू से ही खारिज रहती तो आज भारत बिखराव के कगार पर होता। लेकिन सरकार ने इनके सामाजिक न्याय को चिह्न मानते हुए सत्ता में साझेदार बनाया और उनको देश की मुख्य धारा में जोड़ने का ईमानदारी से प्रयास किया। फलतः छोटे संघर्ष के बावजूद भी भारतीय समाज में समरसत्ता और सामंजस्य स्थापित है। पुनः बेल्जियम में भी सभी समुदायों के हितों को सामुदायिक सरकार में उचित प्रतिनिधित्व दिया गया। परन्तु . श्रीलंका में राष्ट्रीय एकता के नाम पर तमिलों के न्यायपूर्ण माँगों को दबाया जा रहा है। ताकत के दम पर एकता बनाये रखने की कोशिश अकसर विभाजन की ओर ले जाती है।

प्रश्न 6.
सामाजिक विभाजनों को संभालने के संदर्भ में इनमें से कौन-सा बयान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लागू नहीं होता?
(क) लोकतंत्र राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते सामाजिक विभाजनों की छाया (reflection) राजनीति पर भी पड़ता है।
(ख) लोकतंत्र में विभिन्न समुदायों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से अपनी शिकायतें जाहिर करना संभव है।
(ग) लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों को हल (accomodate) करने का सबसे अच्छा तरीका है।
(घ) लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों के आधार पर (on the basis of social division) समाज विखण्डन (disintegration) की ओर ले जाता है।
उत्तर-
(क) लोकतंत्र राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते सामाजिक विभाजनों की छाया (reflection) राजनीति पर भी पड़ता है।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित तीन बयानों पर विचार करें
(क) जहाँ सामाजिक अन्तर एक दूसरे से टकराते हैं (Social differences overlaps), वहाँ सामाजिक विभाजन होता है।
(ख) यह संभव है एक व्यक्ति की कई पहचान (multiple indentities) हो।
(ग) सिर्फ भारत जैसे बड़े देशों में ही सामाजिक विभाजन होते हैं।

इन बयानों में स कौन-कौन से बयान सही हैं?
(अ) क, ख और ग
(ब) के और ख
(स) ख और ग
(द) सिर्फ ग
उत्तर-
(ब) के और ख

प्रश्न 8.
निम्नलिखित व्यक्तियों में कौन लोकतंत्र में रंगभेद के विरोधी नहीं थे?
(क) किग मार्टिन लूथर
(ख) महात्मा गांधी
(ग) ओलंपिक धावक टोमी स्मिथ एवं जॉन कॉलेंस
(घ) जेड गुडी
उत्तर-
(ग) ओलंपिक धावक टोमी स्मिथ एवं जॉन कॉलेंस

प्रश्न 9.
निम्नलिखित का मिलान करें
(क) पाकिस्तान
(अ) धर्मनिरपेक्ष
(ख) हिन्दुस्तान
(ब) इस्लाम
(ग) इंग्लैंड
(स) प्रोस्टेंट
उत्तर-
(क) (ब), (ख) (अ), (ग) (स)।

प्रश्न 10.
भावी समाज में लोकतंत्र की जिम्मेवारी और उद्देश्य पर एक अक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
वर्तमान में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था संसार के अधिकतर देश अपना रहे हैं, क्योंकि लोकतंत्र में लोगों के कल्याण की बातों को प्रमुखता दी जाती है आज लोकतंत्र अपनी जड़ें जमा .. चुका है और यह धीरे-धीरे परिपक्वता की ओर अग्रसर है।

लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था एक ऐसी शासन-व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद या विधानसभा में भेजते हैं। यह लोगों के कल्याण, सामाजिक समानता, आर्थिक समानता तथा धार्मिक समानता इत्यादि का पक्षधर है। इसी शासनतंत्र के अन्तर्गत लोक-कल्याणकारी राज्य बनाया जा सकता है। इस शासन-व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और वे प्रतिनिधि जनता की भलाई के लिए कार्य करते हैं।

वर्तमान समय में लोकतंत्र का क्रमिक विकास इस बात का सूचक है कि यह शासन-व्यवस्था औरों से अच्छी है लोकतंत्र एक ऐसा आधार प्रस्तुत करती है जिसमें लोगों के कल्याण के साथ-साथ समाज का विकास भी संभव है। यह भावी समय के लिए एक ऐसा आधार प्रस्तुत करती है जिसमें लोगों के कल्याण की भावना छुपी है। लोकतंत्र का दीर्घकालीन उद्देश्य है-एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना जिसमें आम लोग का विकास, आर्थिक समानता, धार्मिक. समानता एवं सामाजिक समानता निहित होती है। इस प्रकार लोकतंत्र भावी समाज के लिए जिम्मेवारीपूर्ण कार्य करता है।

प्रश्न 11.
भारत में किस तरह जातिगत असमानताएँ जारी हैं ?
उत्तर-
भारत में भिन्न जाति के लोग रहते हैं, चाहे वे किसी धर्म से संबंध रखते हों। यहाँ जातिगत विशेषताएँ पायी जाती हैं, क्योंकि भारत विविधताओं का देश है।
दुनिया भर के सभी समाज में सामाजिक असमानताएँ और श्रम विभाजन पर आधारित समुदाय विद्यमान है। भारत इससे अछूता नहीं है। भारत की तरह दूसरे देशों में भी पेशा का आधार वंशानुत है। पेशा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में स्वयं ही चला आता है। पेशे पर आधारित सामुदायिक व्यवस्था ही जाति कहलाती है। यह व्यवस्था जब स्थायी हो जाती है तो श्रम विभाजन का अतिवादी रूप कहलाता है जिसे हम जाति के नाम से पुकारने लगते हैं। यह एक खास अर्थ में समाज में दूसरे समुदाय से भिन्न हो जाता है। इस प्रकार के वंशानुगत पेशा पर आधारित समुदाय जिसे हम जाति कहते हैं, की स्वीकृति ति-रिवाज से भी हो जाती है। इनकी पहचान एक अलग समुदाय के रूप में होती है और इस समुदा. के सभी व्यक्तियों की एक या मिलती-जुलती पेशा होती है। इनके बेटे-बेटियों को शादा-आपस के समुदाय में ही होती है और खान-पान भी समान समुदाय में ही होता है। अन्य समुदाय में इनके संतानों की शादी न तो हो सकती है, और न ही करने की कोशिश करते हैं। महत्वपूर्ण परिवारिक आयोजन और सामुदायिक आयोजन में अपने समुदाय के साथ एक पांत में बैठकर भोजन करते हैं। कहीं-कहीं तो ऐसा देखा गया है कि अगर एक समुदाय के बेटा या बेटी दूसरे समुदाय के बेटा या बेटी से शादी कर लेते हैं तो उसे. पांत से काट दिया जाता है। अपने समुदाय से हटकर दूसरे समुदाय में वैवाहिक संबंध बनाने वाले परिवार को समुदाय से निष्कासित भी कर दिया जाता है।

प्रश्न 12.
क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनावी नतीजे तय नहीं हो सकते? इसके _ : दो कारण बतावें। .
उत्तर-
(i) किसी भी निर्वाचन क्षेत्र का गठन इस प्रकार नहीं किया गया है कि उसमें मात्र एक जाति के मतदाता रहें। ऐसा हो सकता है कि एक जाति के मतदाता की संख्या अधिक हो सकती है, परन्तु दूसरे जाति के मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अतएव हर पार्टी एक या एक से अधिक जाति के लोगों का भरोसा करना चाहता है।
(ii) अगर जातीय भावना स्थायी और अटूट होती तो जातीय गोलबंदी पर सत्ता में आनेवाली पार्टी की कभी हार नहीं होती है। यह माना जा सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियाँ जातीय गुटों से संबंध बनाकर.सत्ता में आ जाये, परन्तु अखिल भारतीय चेहरा पाने के लिए जाति विहीन, साम्प्रदायिकता के परे विचार रखना आवश्यक होगा।

प्रश्न 13.
विभिन्न तरह की साम्प्रदायिक राजनीति का ब्योरा दें और सबके साथ एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर-
जब हम यह कहना आरंभ करते हैं कि धर्म ही समुदाय का निर्माण करता है तो साम्प्रदायिक राजनीति का जन्म होता है और इस अवधारणा पर आधारित सोच ही साम्प्रदायिकता कहलाती है। हम प्रत्येक दिन साम्प्रदायिकता की अभिव्यक्ति देखते हैं, महसूस करते हैं, यथा धार्मिक पूर्वाग्रह, परम्परागत धार्मिक अवधारणायें एवं एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानने की मान्यताएँ।

साम्प्रदायिकता की सोच प्रायः अपने धार्मिक समुदाय की प्रमुख राजनीति में बरकरार रखना चाहती है। जो लोग बहुसंख्यक समुदाय के होते हैं उनकी यह कोशिश बहुसंख्यकवाद का रूप ले लेती है, उदाहरणार्थ श्रीलंका में सिंहलियों का बहुसंख्यकवाद। यहाँ लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ने भी सिंहली समुदाय की प्रभुता कायम करने के लिए अपने बहुसंख्यकपरस्ती के तहत . कई कदम उठाये। यथा–1956 में सिंहली को एकमात्र राज्यभाषा के रूप में घोषित करना, विश्वविद्यालय और सरकारी नौकरियों में सिंहलियों को प्राथमिकता देना, बौद्ध धर्म के संरक्षण हेतु कई कदम उठाना आदि। साम्प्रदायिकता के आधार पर राजनीति गोलबंदी साम्प्रदायिकता का दूसरा रूप है। इस हेतु पवित्र प्रतीकों; धर्मगुरुओं और भावनात्मक अपील आदि का सहारा लिया जाता है। निर्वाचन के वक्त हम अक्सर ऐसा देखते हैं। किसी खास धर्म के अनुयायियों से किसी पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान करने की अपील करायी जाती है और अन्त में साम्प्रदायिकता का भयावह रूप तब हम देखते हैं, जब सम्प्रदाय के आधार पर हिंसा, दंगा और नरसंहार होता है। : विभाजन के समय हमने इस त्रासदी को झेला है। आजादी के बाद भी कई जगहों पर बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई है। उदाहरण-नोआखली में भयावह साम्प्रदायिक दंगे हुए।

प्रश्न 14.
जीवन के विभिन्न पहलुओं का जिक्र कर जिसमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव है या वे कमजोर स्थिति में हैं ?
उत्तर-
भारत एक विकासशील देश है। यहाँ स्त्रियों की स्थिति उतनी बेहतर नहीं है जितना एक विकसित देश में होती है। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले स्त्रियों की स्थिति बहुत ही विकट थी और आजादी के बाद स्त्रियों की स्थिति में बहुत थोड़ा बदलाव आया लेकिन वह काफी नहीं था। अगर वर्तमान परिदृश्य में देखा जाय तो भारत में स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ है, परन्तु उनके सुधार के लिए बहुत कुछ किया जाना शेष है।

भारत में समय-समय पर महिलाओं ने अपनी स्थिति को सुधारने के लिए या जागृति लाने के लिए समय-समय पर मान्दोलन किया। पुरुषों के बराबर दर्जा पाने के लिए गोलबंद होना आरंभ किया। सार्वजनिक बोवन के विभिन्न क्षेत्र पुरुष के कब्जे में है। यद्यपि मनुष्य जाति की आबादी में महिलाओं का हिस्सा आया है। आज महिलाएं वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षक इत्यादि पेशे में दिखाई पड़ती हैं, परन्तु हमारे देश में महिलाओं की तस्वीर अभी भी उतनी संतोषजनक नहीं है, अभी भी महिलाओं के साथ कई तरह के भेदभाव होते हैं। इस बात का संकेत निम्नलिखित तथ्यों से हमें प्राप्त होता है

  • महिलाओं में साक्षरता की दर अब भी मात्र 54% है जबकि पुरुष 76%। यद्यपि स्कूली शिक्षा में कई जगह लड़कियाँ अव्वल रही हैं, फिर भी उच्च शिक्षा प्राप्त करनेवाली लड़कियों का प्रतिशत बहुत ही कम है। इस संदर्भ के लिए माता-पिता के नजरिये में भी फर्क है। माता-पिता की मानसिकता बेटों पर अधिक खर्च करने की होती है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा में लड़कियों की संख्या सीमित है।
  • शिक्षा में लड़कियों के इसी पिछड़ेपन के कारण अब भी ऊँची तनख्वाह वाली और ऊँचे पदों पर पहुँचनेवाली महिलाओं की संख्या बहुत ही कम है।
  • यद्यपि एक सर्वेक्षण के अनुसार एक औरत औसतन रोजना साढ़े सात घंटे से ज्यादा काम करती है, जबकि एक पुरुष औसतन रोज छ: घंटे ही काम करता है। फिर भी पुरुषों द्वारा किया गया काम ही ज्यादा दिखाई पड़ता है क्योंकि उससे आमदनी होती है। हालांकि औरतें भी ढेर सारे ऐसे काम करती हैं जिनसे प्रत्यक्ष रूप से आमदनी होती है। लेकिन इनका ज्यादातर काम घर की चहारदीवारी के अन्दर होती है। इसके लिए उन्हें पैसे नहीं मिलते। इसलिए औरतों का काम दिखलाई नहीं देता।
  • लैंगिक पूर्वाग्रह का काला पक्ष बड़ा दुखदायी है, जब भारत के अनेक हिस्से में माँ-बाप को सिर्प लड़के की चाह होती है। लड़की जन्म लेने से पहले हत्या कर देने की प्रवृति इसी मानसिकता का परिणाम है।

उपर्युक्त तथ्यों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारत में स्त्रियों की स्थिति कमजोर है, उनके साथ भेदभाव किया जाता है।

प्रश्न 15.
भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है ?
उत्तर-
भारत में महिला आन्दोलन की मुख्य मांगों में सत्ता में भागीदारी की मांग सर्वोपरि रही। औरतों ने यह सोचना प्रारंभ कर दिया कि जबतक औरतों का सत्ता पर नियंत्रण नहीं होगा, तबतक . इस समस्या का निपटारा नहीं होगा। परिणामस्वरूप राजनीतिक गलियचारों के इस बात की बहस … शुरू हो गयी कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने का सबसे बेहतर तरीका यह होगा कि चुने हुए प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी बढ़ायी जाये। यद्यपि भारत के लोकसभा में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 59 हो गयी है, फिर भी यह 11 प्रतिशत के नीचे है। पिछले लोकसभा चुनाव में 40% महिलाओं की पारिवारिक पृष्ठभूमि आपराधिक थी, परन्तु इस बार 15वीं लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने अपराधियों को नकार दिया। 90% महिला सांसद स्नातक हैं। महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ना लोकतंत्र के लिए शुभ है। अतः भारत की विधायिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पुरुषों की तुलना में बहुत कम है।

प्रश्न 16.
किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाते हैं
उत्तर-
हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना के लिए अनेक प्रावधान किये गये हैं जिनमें दो इस प्रकार हैं

  • हमारे देश में किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। . श्रीलंका में बौद्ध धर्म, पाकिस्तान में इस्लाम और इंगलैण्ड में ईसाई धर्म को जो दर्जा दिया गया ‘ है, उसके विपरीत भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।
  • हमारे संविधान के अनुसार धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव असंवैधानिक घोषित है।

प्रश्न 17.
जब हम लगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है
(क) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अन्तर।
(ख) समाज द्वारा स्त्रियों और पुरुषों को दी गयी असमान भूमिकाएँ।
(ग) बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात।
(घ) लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं को मतदान अधिकार न मिलना।
उत्तर-
(क) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अन्तर।

प्रश्न 18.
भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है-
(क) लोकसभा
(ख) विधानसभा
(ग) मंत्रीमण्डल
(घ) पंचायती राज्य संस्थाएँ
उत्तर-
(घ) पंचायती राज्य संस्थाएँ

प्रश्न 19.
साम्प्रदायिक राजनीतिक के अर्थ संबंधी निम्न कथनों पर गौर करें। साम्प्रदायिक राजनीति किस पर आधारित है?
(क) एक धर्म दूसरे धर्म से श्रेष्ठ है।
(ख) विभिन्न धर्मों के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी-खुशी साथ रहते हैं।
(ग) एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं।
(घ) एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम रहने में शासन की शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
उत्तर-
(घ) एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम रहने में शासन की शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 20.
भारतीय संविधान के बारे में इनमें से कौन-सा कथन सही है ?
(क) यह धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।
(ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बनाता है।
(ग) सभी लोगों को कोई भी धर्म मानने की आजादी देता है।
(घ) किसी धार्मिक समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है।
उत्तर-
(क) यह धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।

प्रश्न 21.
……….पर आधारित विभाजन सिर्फ भारत में है।
उत्तर-
जाति, धर्म और लिंगा

प्रश्न 22.
सूची I और सूची II का मेल कराएं
Bihar Board Class 10 Political Science Solutions Chapter 1 लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी - 1
उत्तर-
1. (ख), 2. (क), 3. (ग), 4. (ग)

Bihar Board Class 10 History लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी Additional Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संविधान के किस अनुच्छद में नागरिकों को स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है ?
(क) अनुच्छेद 15
(ख) अनुच्छेद 19
(ग) अनुच्छेद 18
(घ) अनुच्छेद 14
उत्तर-
(ख) अनुच्छेद 19

प्रश्न 2.
मैक्सिको ओलंपिक की घटना एक
(क) रंगभेद का
(ख) सांप्रदायिकता
(ग) जातिवाद का
(घ) आतंकवाद
उत्तर-
(क) रंगभेद का

प्रश्न 3.
देश को सामाजिक विभेद के कारण विखंडन का सामना करना पड़ा?
(क) श्रीलंका
(ख) बाल्जयम
(ग) यूगोस्लाविया
(घ) भारत
उत्तर-
(ग) यूगोस्लाविया

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में एक गलत बयान कौन-सा है ?
(क) लोकतंत्र में सामाजिक विभेद का राजनीति पर अवश्य प्रभाव पड़ता है।
(ख) लोकतंत्र सामाजिक विभेद के आधार पर देश को विखंडित करने में सहायक होता है।
(ग) लोकतंत्र को सामाजिक विभेद से उत्पन्न समस्याओं को हल ढूँढने का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है।
(घ) लोकतंत्र में विभिन्न समुदाय अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से शासन के सामने उपस्थित कर सकते हैं।
उत्तर-
(ख) लोकतंत्र सामाजिक विभेद के आधार पर देश को विखंडित करने में सहायक होता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में एक सही बयान, कौन-सा है?
(क) बड़े लोकतांत्रिक देशों में ही सामाजिक विभेद उत्पन्न होते हैं।
(ख) सामाजिक विभेद का राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
(ग) एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक व्यक्ति की कई पहचान होती है।
(घ) सामाजिक विभेद हमेशा लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होते हैं।
उत्तर-
(ख) सामाजिक विभेद का राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (20 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
सामाजिक विभेद की उत्पत्ति का एक कारण बताएं ?
उतर-
सामाजिक विभेद की उत्पत्ति को एक प्रमुख कारण जन्म है।।

प्रश्न 2.
विविधता राष्ट्र के लिए कब घातक बन जाती है ?
उत्तर-
जब धर्म, क्षत्र, भाषा, जाति, संप्रदाय के नाम पर लोग आपस में उलझ पड़ते हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर बना देता है। विविधताएँ जब सीमा का उल्लंघन करने लगती है तब सामाजिक विभाजन अवश्यंभावी हो जाता है तथा राष्ट्र के लिए घातक बन जाते हैं।

प्रश्न 3.
भारत में सर्वधर्म समन्वय का एक उदाहरण प्रस्तत करें।
उत्तर-
भारत म मादरी के शहर वाराणसी में नाजनीन नामक एक मुस्लिम लड़की ने हनुमान-भक्तों की पवित्र पुस्तक हनुमान चालीसा को उर्दू में लिपिबद्ध कर सर्वधर्म समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया।

प्रश्न 4.
उत्तरी आयरलैंड में एक ही धर्म के दो समूहों के प्रतिनिधित्व करनेवाली दो राजनीतिक पार्टियों के नाम बताएँ। .
उत्तर-
उत्तरी आयरलैंड में एक ही धर्म को दो समूहों प्रोटेस्टैंटो और कैथोलिकों को प्रतिनिधित्व करनेवाली दो राजनीतिक पार्टियाँ थी-नेशनलिस्ट पार्टियाँ तथा यूनियनिस्ट पार्टियाँ।

प्रश्न 5.
सामाजिक विभेद्रों की राजनीति का एक अच्छा परिणाम बताएं।
उत्तर-
सामाजिक विभेदों की राजनीति का एक अच्छा परिणाम यह है कि अधिकांश लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सामाजिक विभेद और राजनीति में अटूट संबंध देखने को मिलता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (60 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
सामाजिक विभाजन राजनीतिक विभाजन में कैसे बदल जाता है?
उत्तर-
लोकतंत्र में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बीच प्रतिद्वन्द्विता का माहोल होता है। इस प्रतिद्वन्द्विता के कारण कोई भी समाज फूट का शिकार बन सकता है। अगर राजनीतिक दल समाज में मौजूद विभाजनों को हिसाब से राजनीतिक होड़ करने लगे तो इससे सामाजिक विभाजन राजनीतिक विभाजन में बदल सकता है और ऐसे में देश विखंडन की तरफ जा सकता है। ऐसा कई देशों में हो चुका है।

प्रश्न 2.
‘विविधता में एकता’ का अर्थ बताएँ।
उत्तर-
विविधता में एकता भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपनी विशेषता रही है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। भारत में विविधता धार्मिक तथा सांस्कृतिक आधार पर है। हिन्दू मुस्लिम, सिक्ख तथा ईसाई विभिन्न धर्मों के माननेवाले लोग भारत में हैं तथा उनकी सांस्कृतिक पहचान भी अलग-अलग है। लेकिन एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में वे शरीक होते हैं तथा वे अलग-अलग होते हुए पहले वे भारतवासी हैं। इसलिए कहा जाता है कि भारत में विविधता ये भी एकता विद्यमान है।

प्रश्न 3.
सामाजिक विभेद किस प्रकार सामाजिक विभाजन के लिए उत्तरदायी है ? …
उत्तर-
समाज में व्यक्ति के बीच कई प्रकार के सामाजिक विभेद देखने को मिलते हैं जैसे जाति के आधार पर विभेद, आर्थिक स्तर पर विभेद धर्म के आधार पर तथा भाषाई आधार पर विभेद। ये सामाजिक विभेद तब सामाजिक विभाजन का रूप ले लेती हैं. जब इनमें से कोई एक सामाजिक विभेद दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं। जब किसी एक समूह को यह महसूस होने लगता है कि वे समाज में बिल्कुल अलग हैं तो उसी समय सामाजिक विभाजन प्रारंभ हो जाता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक विभेद एवं सामाजिक विभाजन का अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
जब हम क्षेत्र में रहनेवाले विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय के द्वारा लोगों के बीच विभिन्नताएं पाई जाती हैं तो वे सामाजिक विभेद का रूप धारण कर लेते हैं। वहीं दूसरी तरफ – धन, रंग, क्षेत्र के आधार पर विभेद सामाजिक विभाजन का रूप ले लेता है। श्वेतों का अश्वेतों
के प्रति, अमीरों का गरीबों के प्रति व्यवहार सामाजिक विभाजन का कारण बन जाता है। भारत में सवर्णों और दलितों का अंतर सामाजिक विभाजन का रूप ले रखा है।

प्रश्न 5.
सामाजिक विभेदों में तालमेल किस प्रकार स्थापित किया जाता है ?
उत्तर-
लोकतंत्र में विविधता स्वाभाविक होता है परंतु ‘विविधता में एकता’ भी लोकतंत्र का ही एक गुण है। अधिकांश लोकतांत्रिक राज्यों में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को गले लगाया जाता है। एक धर्मनिरपेक्ष ये विभिन्न धर्म, भाषा तथा संस्कृति के लोग एक साथ मिलजुलकर रहते हैं। उनमें यही धारणा विकसित हो जाती है कि उनके धर्म, भाषा रीति-रिवाज अलग-अलग तो अवश्य है परंतु उनका राष्ट्र एक है। बेल्जियम की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न भाषा-भाषी एवं क्षेत्र के लोगों के बीच अच्छा तालमेल है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें)

प्रश्न 1.
हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती। कैसे?
उत्तर-
यह आवश्यक नहीं है कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप ले ले। सामाजिक विभिन्नता के कारण लोगों में विभेद की विचारधारा अवश्य बनती है, परन्तु यही विभिन्नता कहीं-कहीं पर समान उद्देश्य के कारण मूल का काम भी करती है। सामाजिक विभाजन एवं विभिन्नता में बहुत बड़ा अंतर है।

सामाजिक विभाजन तब होता है जब कुछ सामाजिक अंतर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं। सवर्णों एवं दलितों के बीच अंतर एक सामाजिक विभाजन है, क्योंकि दलित संपूर्ण देश में आमतौर पर गरीब वंचित, सुविधाविहिन एवं भेदभाव के शिकार हैं, जबकि सवर्ण आमतौर पर सम्पन्न एवं सुविधायुक्त हैं। दलितों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं।

परंतु इन सबके बावजूद जब क्षेत्र अथवा राष्ट्र की बात होती है तो सभी एक हो जाते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं हो तो।

प्रश्न 2.
सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति के कारणों पर प्रकाश डालें। ..
उत्तर-
किसी भी समाज में सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति के अनेक कारण होते हैं। प्रत्येक . समाज में विभिन्न भाषा, धर्म, जाति संप्रदाय एवं क्षेत्र के लोग रहते हैं। इन सबों के आधार पर उनमें विभेद बना रहता है। सामाजिक विभेद का सबसे मुख्य कारण जन्म को माना जाता है। किसी व्यक्ति का जन्म किसी परिवार विशेष में होता है। उस परिवार का संबंध किसी न किसी जाति, समुदाय, धर्म, भाषा क्षेत्र से होता है। इस तरह उस व्यक्ति विशेष का संबंध भी उसी जाति, समुदाय, धर्म, भाषा तथा क्षेत्र से हो जाता है। इस प्रकार जाति, समुदाय, धर्म, भाषा, क्षेत्र के नाम पर सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति होती है।

कुछ अन्य प्रकार से भी सामाजिक विभेद उत्पन्न होते हैं जिनका जन्म से कोई संबंध नहीं। होता है। जैसे लिंग, रंग, नस्ल; धन आदि भी विभेद लोगों में पाया जाता है जो कालांतर में सामाजिक विभेद का रूप ले लेते हैं। स्त्री-पुरुष; काला-गोरा लंबा-नाटा, गरीब-अमीर, शक्तिशाली और कमजोर का विभेद भी सामाजिक विभेद की उत्पत्ति का कारण होते हैं। व्यक्तिगत पसंद से भी सामाजिक विभेद की उत्पत्ति होती है। कई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करके एक अलग समुदाय बना लेते हैं। कुछ लोग अंतरजातीय विवाह संबंध स्थापित कर अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। कुछ लोग अपने परिवार की परंपराओं से हटकर अलग विषय का अध्ययन करने, पेशे, खेल, उद्योग-धंधे तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का चयन कर अलग सामाजिक समूह के सदस्य बन जाते हैं और इस तरीके से भी सामाजिक विभेद उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 3.
सामाजिक विभेदों में तालमेल और संघर्ष पर प्रकाश डालें।
उत्तर-
लोकतंत्र में विविधता स्वाभाविक है। परंतु विविधता में बनता भी लोकतंत्र का ही 24 गुण है। अधिकांश लोकतांत्रिक राज्यों में धर्म निरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया जाता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य में विभिन्न धर्मों के माननेवाले लोग मिल-जुलकर साथ रहते हैं। उनमें यह धारणा .. विकसित हो जाती है कि उनके धर्म अलग-अलग अवश्य हैं, परंतु उनका राष्ट्र एक है। एक से सामाजिक असमानताएँ कई समूहों में मौजूद हों तो फिर एक समूह के लोगों के लिए दूसरे समूहों से अलग पहचान बनाना मुश्किल हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि किसी एक मुद्दे पर कई समूहों के हित एक जैसे हो जाते हैं। विभिन्नताओं के बावजूद लोगों में सामंजस्य का भाव पैदा होता है। उत्तरी आयरलैंड और नीदरलैंड दोनों ही ईसाई बहुल देश हैं। उत्तरी आयरलैंड में वर्ज और धर्म के बीच गहरी समानता है।

सामाजिक विभाजन तब होता है जब कुछ सामाजिक अंतर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़े हो जाते हैं। अमरीका में श्वेत और अश्वेत का अंतर एक सामाजिक विभाज्य भी बन जाता है क्योंकि अश्वेत लोग आमतौर पर गरीब हैं, बेघर हैं तथा भेदभाव का शिकार हैं। हमारे देश में भी दलित आमतौर पर गरीब और भूमिहीन हैं। उन्हें भी अक्सर भेदभाव और अन्याय का शिकार होना पड़ता है। जब एक तरह का सामाजिक अंतर अन्य अंतरों से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है और लोगों को यह महसूस होने लगता है कि वे दूसरे समुदाय के हैं तो इससे एक सामाजिक विभाजन की स्थिति पैदा होती है। विभिन्नताओं में टकराव की स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए लाभदायक नहीं हो सकती।

Bihar Board Class 10 History लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी Notes

  • लोकतांत्रिक राज्य में केवल भाषा और क्षेत्र की विविधता ही नहीं होती है, वरन ग धर्म जाति संप्रदाय लिंग जैसे विभेद भी अवश्य देखने को मिलते हैं।
  • लोकतांत्रिक राज्यों में जनता के बीच विभिन्नताओं असमानताओं तथा विभेदों के रहते हुए भी उनके बीच तालमेल स्थापित किया जाता है।
  • लोकतंत्र सैद्धांतिक रूप से समानता पर आधृत शासन-पद्धति है।
  • विभिन्न लोकतांत्रिक पद्धतियों में विरोधाभास के उदाहरण भी मिलते हैं जिसे विद्वानों ने लोकतंत्र में इंद्व की भी संज्ञा दी है।
  • लोकतंत्र में विविधता तथा विभिन्नताओं के कारण सामाजिक विभाजन की संभावना बनी रहती है।
  • सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति के कारणों में जन्म सबसे बड़ा कारण होता है। जन्म के अतिरिक्त व्यक्तिगत विभेद तथा व्यक्तिगत पसंद के कारण भी सामाजिक विभेदों की उत्पत्ति होती है।
  • सामाजिक विभेद ही सामाजिक विभाजन और सामाजिक संघर्ष के लिए मूलरूप से उत्तरदायी है।
  • विविधता कभी-कभी सामाजिक एकता को बनाए रखने में भी सहायक होता है।
  • सामाजिक विभेद हमेशा सामाजिक विभाजन का कारण बने, यह आवश्यक नहीं है।
  • भिन्न-भिन्न जाति के लोग भी समान धर्म में आस्था रखते हुए सामाजिक विभेद को मिटाने में सहायक होते हैं।
  • लोकतंत्र में विविधता स्वामित्व है, परंतु विविधता में एकता भी लोकतंत्र का ही एक गुण है।
  • सामाजिक विभेद लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक भी है। धर्म धन क्षेत्र भाषा जाति संप्रदाय के नाम पर आपस में उलझना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर बना डालता है। इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
  • जब तक विविधताएँ एक सीमा में रहती है तब तक कोई परेशानी नहीं होती है, परंतु जब विविधताएँ सीमा का उल्लंघन करने लगती है तब सामाजिक विभाजन अवश्यभावी हो जाता है और आपसी संघर्ष में वृद्धि हो जाती है।
  • जब सामाजिक विभेद अन्य विभेदों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है तब स्वाभाविक रूप से सामाजिक विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • विभिन्नताओं में टकराव की स्थिति लोकतानिक व्यवस्था के लिए घातक है।
  • सामाजिक विभेदों का लोकतांत्रिक राजनीति पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता है। विभिन्न राजनीतिक दलों का गठन भी सामाजिक विभेदों के आधार पर होता है। उत्तरी आयरलैंड में नेशनलिस्ट पार्टियाँ तथा युनियननिष्ट पार्टियों का गठन प्रोटेस्टेंटो और कैथोलिको का प्रतिनिधित्व करने के लिए हुआ है। विभिन्न राजनीतिक दल अपनी प्रतिदिता का आधार भासामाजिक विभेद को बना लेते हैं।
  • जब सामाजिक विभेद सजनीतिक विभेद में परिवर्तित हो जाता है तब देश का विखंडन अवश्यभावी हो जाता है। यूगोस्लाविया इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
  • सामाजिक विभेदों की राजनीति के अच्छे परिणाम भी देखने को मिलते हैं। अधिकांश लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सामाजिक विभेद और राजनीतिक में अटूट संबंध देखने को मिलता है।
  • सामाजिक विभेद की राजनीति के परिणाम तीन बातों पर निर्भर करते हैं- स्वयं की पहचान की चेतना, समाज के विभिन्न समुदायों की मांग को राजनीतिक दलों द्वारा उपस्थित करने का तरीका तथा सरकार की मांगों के प्रति सोच।
  • सामाजिक विभेदों की राजनीति का हमेशा गलत परिणाम होगा, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि सामाजिक विभेदों की राजनीति लोकतंत्र को सशक्त करने में सहायक होता है।
  • सामाजिक विभेदों की राजनीति से लोकतांत्रिक व्यवस्था में संघर्ष और हिंसा की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है, परंतु इसपर काबू करने का प्रयास भी होता रहता है।
  • सामाजिक विभेद की राजनीति का परिणाम अच्छा ही हो, इसके लिए शासन को कुछ सावधानियां बरतने की आवश्यकता है।

Bihar Board Class 12 English Book Solutions Chapter 11 A Marriage Proposal

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Bihar Board Class 12 English A Marriage Proposal Text Book Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss the following :

A Marriage Proposal Question Answer Bihar Board Class 12 English Question 1.
How are marriages settled in your family ?
Answer:
Marriages in our family are settled in the customary manner by the elders. However the consent of the bride/bridegroom is assured.

The Marriage Proposal Questions And Answers Bihar Board Class 12 English Question 2.
What are the major factors that decide the relation of brides/ grooms ?
Ans
Bride: The following factors are important: good looking, education, age, status of the family.
groom: education, income of the boy, status of the family, age

B. 1.1. Read the following sentences and write T’ for true and ‘F’ for false statements :

  1. Lomov is a neighbour of the Stepanovnas.
  2. He wore the morning coat to attend a party.
  3. Mr. Choobookov becomes angry To know Lomov’s desire.
  4. Lomov is a man of nervous temperament
  5. Natalia is a quiet and peace loving lady.
  6. The ownership of Ox-meadows is disputed.

Answer:

  1. T
  2. F
  3. F
  4. T
  5. F
  6. T

B. 1.2. Answer the following questions briefly :

The Proposal Question Answer Class 12 Bihar Board English Question 1.
How is Lomov greeted by Choobookov ?
Answer:
Choobookov is surprised to see Lomov dressed in formal clothes. He thinks Lomov is going to a party. But he greets him cordially.

The Proposal Question Answer Class 12 Bihar Board English Question 2.
How does Choobookov react when he comes to know that Lomov wants to marry Natalia ?
Answer:
Choobookov is truly overjoyed when he learns that Lomov wants to marry his daughter Natalia. He says that he has wished to happen it for a long time. He embraces and kisses Lomov.

A Marriage Proposal Short Question Answer Bihar Board Class 12 English Question 3.
Why does Lomov think that his is a critical age ?
Answer:
Lomov is already thirty-five. He is still unmarried. He thinks his is a critical age because if he does not get married soon he will never be able to marry.

The Proposal Class 12 Long Questions And Answers Bihar Board Question 4.
Why does Lomov feel nervous before proposing to Natalia ?
Answer:
Primarily Lomov is a man of nervous temperament. Then, he is not sure whether Natalia will accept him. He feels nervous before proposing to her as if he is going to take the final examination.

The Proposal Class 10 Questions And Answers Bihar Board Question 5.
Why is Natalia afraid that all her hay may rot ?
Answer:
Natalia has had all her meadow mown. But it has started raining. The hay may not get dried without the sun. It is likely to rot. So she is worried.

Bihar Board Rainbow English Book Class 12 Pdf Download Question 6.
What according to her, is the real worth of Ox meadows ?
Answer:
Natalia thinks that the Ox-meadows are worth about three hundred rubles.

Bihar Board Class 12 English Book Solution Question 7.
Who, according to Lomov, had let the meadows and to whom ?
Answer:
According to Lomov the meadows were lent by his aunt grandmother to the peasants of Natalia’s great grandfather for an indefinite period without any payment.

B. 2.1. Read the following sentences and write T for true and ‘F’ for false statement :

  1. Choobookov supports Lomov’s claim over Ox- meadows.
  2. His peasants used the land for forty years.
  3. It is Natalia who threatens to take the matter court.
  4. She does not use abusive language of Lomov.
  5. She feels delighted to have behaved decently with Lomov.

Answer:

  1. F
  2. F
  3. F
  4. F
  5. F

B.2.2. Answer the following questions briefly :

The Proposal Class 12 Questions And Answers Bihar Board Question 1.
What is Lomov’s explanation of Ox-meadow becoming a disputed piece of land ?
Answer:
Lomov tells Natalia that his aunt’s grandmother lent the Ox-meadows to the peasants of her great-grandfather for free use. They used it for forty years, and then, they began to treat it as their own. This caused the dispute.

Class 12th English Book Bihar Board Question 2.
What does Choobookov say about Lomov’s father and grandfather ?
Answer:
Choobookov says that Lomov’s father was a gambler and ate like a pig and his grandfather drank like a fish.

Rainbow Part 2 English Book Class 12 In Hindi Bihar Board Question 3.
Why does Lomov refer to the land settlement ?
Answer:
Lomov refers to the land settlement to assert that now there is no dispute about the Ox-meadows. They rightfully belong to him.

Bihar Board Solution Class 12th English Question 4.
Why does he complain all the time of palpitation and veins throbbing ?
Answer:
Lomov is a very excitable person. Whenever there is an argument, he gets excited. His heart begins to palpitate and his nerves begin to throb. He feels like having a heart stroke.

Rainbow English Book For Class 12 Solutions Bihar Board Question 5.
Why does Natalia cry and weep to know that Lomov has come to propose to her ?
Answer:
Natalia is already twenty-five years old. She is still unmarried. Probably nobody has proposed to her. She is eager to married. She weeps and cries because she feels that she is losing her chance to marry Lomov too.

B.3.1. Read the following sentences and write ‘T’ for true and ‘F’ for false statements :

  1. Lomov refuses to come back to Natalia.
  2. The name of Lomov’s dog is Leap.
  3. Choobookov bought his dog for eighty five ‘rubbles’ rubles.
  4. According to Lomov, Leap is pug-jawed.
  5. Lomov claims to have the memory of an elephant.
  6. Choobookov thinks that Lomov is possessed by some ‘demon of contrandiction’.
  7. Lomov faints when he realises that he will not succeed in marrying Natalia.
  8. Choobookov takes the lead to settle the marriage of his daughter with Lomov.

Answer:

  1. F
  2. F
  3. T
  4. T
  5. F
  6. F
  7. F
  8. T

B.3.2. Compelete the following sentences on the basis of the unit you have just studied :

(a) It is not very nice of you to …………… your neighbours.
(b) Do you think I may …………… on her accepting me ?
(c) I’m always getting terribly …………… up.
(d) I was so greedy that I had the whole meadows ……………
(e) I have had the of …………… knowing your family.
(f) Your Leap …………… behind by half a mile.
(g) You only tag along in order to …………… with other people’s dogs.

Answer:

(a) cheat
(b) count
(c) wrought
(d) mown
(e) honour
(f) lagged
(g) meddle

B. 3.3. Answer the following questions briefly :

12th English Book Writer Name Bihar Board Question 1.
Why does Natalia want to talk about something else ?
Answer:
Natalia wishes that Lomov should propose to her immediately. So she tries her best to avoid any further arguments on Ox-meadows. She wants to avoid a quarrel.

A Marriage Proposal Summary Bihar Board Question 2.
What, according to Lomov, is the main defect of Leap ?
Answer:
According to Lomov, Leap is pug-jawed, which makes him a poor hunting dog.

The Proposal Question Answer Bihar Board Question 3.
How does Natalia describe her own pet dog, Leap ?
Answer:
Natalia proudly describes her Leap as a pedigreed greyhound. She says Lomov’s Guess is piebald. So her Leap is a hundred times superior to Lomov’s Guess.

A Marriage Proposal Bihar Board Question 4.
‘That’s a load off my back.’ What is this ‘load’ ? Why does Choobookov say so ?
Answer:
Choobookov is the father of a 25-year old daughter, Natalia. He was keen that she should be married off as early as possible. But it was not easy. He considered this responsibility as a load on her back. Now she is married to Lomov, he feels relieved. The load is off his back.

C. 1. Long Answer Questions:

Question 1.
On the basis of your reading of scene I, do you think that Lomov and Choobookov are cordial neighbours ?
Answer:
Yes, I think that Lomov and Choobookov are cordial neighbours When Lomov calls at Choobookov, the later welcomes him. He calls him his esteemed neighbour. He rather complains that Lomov has almost neglected him because he has paid a visit after a long time. Lomov on his part admires Choobookov. He says that Choobookov has always been kind and helpful to him.

Question 2.
Write a short note on the character of Lomov on the basis of his self-revelation in scene II ?
Answer:
Lomov is an old bachelor. He is thirty-five and has not been able to decide who to marry. Probably he has been looking for an ideal woman to marry. He is unable to take a firm decision. He suffers from a number of serious ailments. He suffers from palpitations of the heart and throbbing of veins and eyelids. He is also shy and lacks confidence. He is afraid that Natalia may not accept him.

Question 3.
Are Lomov and Natalia really interested in laying claim to Ox- meadows ?
Answer:
Lomov and Natalia don’t seem to be actually interested in laying claim to the Ox-meadows. As Natalia says it is not worth much. The meadows are lying neglected for a long time. But it is the vanity of both Lomov and Natalia to lay claim to it. Both of them are willing to gift it to each other. But they say as a matter of principle, they cannot allow anyone to take them away because they are their property. In this quarrel they forget the more serious and urgent matter—the marriage proposal. Any how when Natalia learns that Lomov has come to propose to her she says to him that she was mistaken. The meadows belong to him. But Lomov again harps on his claim to them. He is not willing to let the matter rest there because of his vanity.

Question 4.
Do you think that Natalia was also interested in marrying Lomov ? What makes you think so ?
Answer:
Yes, Natalia is very much interested in marrying Lomov. She has had a serious quarrel with him because she does not know he has come to propose to her. But when he has gone and her father tells her the real motive of Lomov a visit, Natalia goes hysterical. She moans and wails. She asks her father to bring him back because she wants to accept him at once.

When Lomov has come back, he begins to talk of the meadows, she wishes he talked of the proposal instead. She gives up her claim to the meadows. She is eager not to lose her suitor. After all she is twenty-five years old and does not want to remain unmarried all her life. When Lomov kisses her, she says, “I’m very happy.”

Question 5.
Despite his heated arguments with Lomov, Choobookov in the last scene shows haste in finalising the marriage. What could be the reason of his haste?
Answer:
Choobookov is over worried about his old daughter Natalia’s marriage. He is eager that she is married off without any further delay. When he learns that Lomov has come to propose to her, he is overjoyed. He embrances and kisses Lomov. He calls him his son. He assures him that Natalia will accept him.

Unluckily Lomov and Natalia are easily excited. They quarrel over the question of the ownership of the meadows. When Choobookov hears the noise, he immediately rushes to see what the matter is. But he supports his daughter and thus the real purpose of Lomov’s visit is lost. But when Lomov is gone, and he tells Natalia that Lomov wanted to propose to her, she blames Choobookov for the quarrel. She asks him to bring him back. He feels like killing himself.

Lomov comes again. Once again they quarrel over the superiority of their dogs. Once again Choobookov supports his daughter.

But Lomov is too excited and he collapses. Once again Natalia weeps because the chances of. her marriage seem to have gone forever.

When Lomov regains consciousness Choobookov does not lose the opportunity to get them married. He hastily joins their hands, and makes them kiss each other. He is happy because the burden is off his back. Now he can live in peace.

Question 6.
Do you think the title of the drama is suitable ? Give reasons in support of your views. Suggest a different title of the drama ?
Answer:
The contents of the play do not justify the title. We find there is no marriage proposal, there is no love-talk, and there is no acceptance or refusal by the lady-love. Instead we find that the young man is an old bachelor who suffers from a number of ailments. The lady is not a young charming woman but a grown up woman of twenty-five.

Lomov shyly tells Choobookov that he has come to propose to his daughter Natalia. But when Lomov and Natalia are together they exchange no sweet words like love-birds. Instead they begin to quarrel over the ownership of the Ox-meadows. Choobookov who knows the purpose of Lomov’s visit, does not try to pacify them. Instead he supports his daughter and the quarrel takes a serious turn. Poor Lomov is excited, his heart palpitates and he leaves. But neithbour Choobookov nor Natalia show mercy on him.

But soon Natalia learns the purpose of his visit. She wails and asks her father to bring him back.

Shemeless Lomov comes back. This time Natalia is soft and sweet. She wants him to propose so that she may accept him immediately. But both Natalia and Lomov are vain to the core. They begin to quarrel over an insignificant matter, the superiority of their respective dogs. They have no restraint. They do not think of the actual questions—the marriage proposal. Neither Lomov proposes nor Natalia accept him. It is Choobookov who appears to be more concerned.

Lomov is almost dead and Natalia is hysterical. When Lomov regains consciousness. Choobookov joins their hands though they are still quarrelling.

In fact the title of the play is far from being suitable. The title of the play should be ‘A comedy of Human Vanity’.

Question 7.
Natalia and lomov would be an ideal couple Do you agree? Give reasons
Answer:
The basic requirement of an ideal couple is mutual respect, understanding and sacrifice. But Natalia and Lomov are made of a different stuff. Both of them have obstinate vanity. They are not willing to yield a bit. For example, the Ox-meadows are a worthless piece of land. It is disputed. Both Lomov and Natalia lay their claim to it. Lomov is prepared to take the matter to a court of law to prove his claim. On the other hand Natalia asks her father to send men to mow the meadow immediately. Both of them call each other names, Lomov is about to faint but he goes on repeating how it belonged to his aunt’s grandmother.

This matter ends. But they again begin to quarrel over the superiority of their dogs. It is an insignificant matter but both Natalia and Lomov make it a question of life and death. Even after they are engaged, the quarrel continues. Neither of them is willing to yield or be quiet. This qurrel, and many more quarrels like these, will adorn their married life. They will continue to quarrel over trifles. But, since both need each other, they will live together. But they will be far from being an ideal couple.

C. 2. Group Discussion

Discuss the following in groups or pairs :

Question 1.
Arguments for the sake of arguments lead to nowhere.
Answer:
Humans are the only creation of God that are endowed with a faculty or reasoning and a sophisticated language. They are great blessings. All human civilizations and progress are the result of these. Science and philosophy, literature and commerce couldn’t have been developed without power of reasoning and communicated from person to person, and generation to generation without language. But human have one terrible weakness. Sometimes they would argue for its own sake. They would not given in even though they have no substantial basis to support their point. Such arguments can be continued for as long as they desire. But they lead to nowhere.

Question 2.
Marriages are settled in heaven but are solemnised on the earth.
Answer:
Much can be said in favour and gainst this statement. Most people believe that it is perfectly true. There is a destiny that decides marriages. It is not a unilateral matter. You cannot marry a person without the consent of the other. People say that try however hard you may. You are sure to tie the knot with the person you are destined to. But there are some people who do not agree with this. They say if marriages were settled in heaven, why there are divorces. Marriage is a social custom. It binds two persons together in a special manner. Divorce, like marriage is also a social custom. Marriages and divorces are social and legal matters. They are the inventions of our civilication. We could do without marriage. But if we did, it would lead to social chaos. But heaven has nothing to do with marriages and divorces.

C. 3. Composition

Question 1.
Write a short essay in about 150 words on the following:

Question a.
Role and responsibility of parents in marriage.
Answer:
Role and responsibility of parents in marriage of their children varies from society to society and culture to culture. In the East parents were supposed to have the fullest responsibility in the marriage of their children. In India, the marriage of daughter was a sole and grave responsibility of the parents. As a girl reached marriageable age, parents had sleepless night. The girl’s father would go about looking for a suitable match for her. He tried his best. In several cases he had to in debts or sell his land to give dowry and fulfil other social and religious obligations. In olden days the girl in question has no say in the matter of her own marriage.

But now things have changed much. First, the social fabric, especially in towns and cities, has greatly changed. Secondly, joint familier do not exist. Thirdly the boys and girls enjoys far more indepedence than ever before. So the role and responsiblity of parents are very little. According to the latest trends, boys and girls choose their own partners, and parents consent is a formality.

Question b.
Social relevance of marriage.
Answer:
Marriage in human society is of paramount relevance. In fact the institution of marriage has deep roots in our civilizaiton. It will be no exaggeration to say that marriage and civilization evloved together. And human society will be no better than a herd of animal without marriage. Our laws of inheritance, the responsibility of parents towards children, and children’s responsiblity towards parent are the offshoots of the institution of marriage. There are some philosophers like G.B. Shaw who advocate the abolition of marriage. They want the government to take the responsibility of bringing up children and looking after the aged. But it is only a theoretical idea. It is not practicable. Marriage is recognised in every culture and has the sanctity of all religions. Marriage is not a matter between two persons only. It is the basis of the family, and the family is the basis of society.

Question 2.
Write a letter to your friend describing the marriage ceremony that you attended recently in your family.
Answer:

ASHOK RAJPATH
Patna
My 25,200.

Dear Rishiksh

I hope my letter finds you in the pink of your health. Recenlty, I visited my cousin’s house to attend the marriage ceremony of my cousin sister. Everywhere it was happiness. All were busy in arranging things and enjoying each moment of it. All wanted to be an important part of it. All relatives had come. Many rituals were performed. The marriage was conducted with great pomp and show. We really enjoyed it very much. Howevei all were weeping at her departure to her new house.

Give my regards to elders and love to youngers.

Yours lovingly
Shashank sinha

D. Word Study

D. 1. Dictionary Use :

Ex. 1. correct the spelling of the following words :
Bihar Board Class 12 English Book Solutions Chapter 11 A Marriage Proposal 1
Answer:
Bihar Board Class 12 English Book Solutions Chapter 11 A Marriage Proposal 2
D. 2. Word-formation

Go through the drama and underline the use of the following words, wherever they occur.

land-garbber windbag countryside horseback house keeper These are compound words, made by joining two words. Make at least five similar words, using the following ones :
air college right cyber young
Answer:
fresh air, women’s college, night mare, cybercafe, young mountains

D. 3. Word-meaning

Ex. 1. Fill in the blanks with suitable phrases given in the box :
Bihar Board Class 12 English Book Solutions Chapter 11 A Marriage Proposal 3

(a) Snighdha’s intelligence made her to her classmates.
(b) It time of crisis you may your friends.
(c) We must the glorious tradition of the past.
(d) I advised Ankita to a doctor.
(e) You should your mind before joining the army.
(f) Shylock was Antonio’s popularity.
(g) We were asked to our aim in life.
(h) Priya is not such severe cold.

Answer:

(a) superior
(b) call on
(c) talk about
(d) run after
(e) make up
(f) envious of
(g) talk about
(h) accustomed to

E. Grammar

Ex. 1. The following verbs in their past participle forms have been used an adjectives in the drama. Go through the text and underline them wherever they have been used as ajectives.
Bihar Board Class 12 English Book Solutions Chapter 11 A Marriage Proposal 4
use each of these words both as verb and adjective in sentences of your own. The first one is done for you:
esteemed (v): Tendulkar is esteemed as the best batsman.
esteemed (adj): He is my estmeed neighbour.
Answer:
delighted (v): He is delighted of the news.
delighted (adj): This is delighted experience.
inherited (v): He has inherited this house.
inherited (adj): It is an inherited property.
maintained (v): They have maintained their norms.
maintained (adj): It is a maintained house.
mistaken (v): He has mistaken them sum.
mistaken (adj): It is a mistaken happiness.
disputed (v): They have disputed over the matter.
disputed (adj): They were discussing the disputed matter.
paralyzed (v): They paralyzed the scorpion.
paralyzed (adj): It is a paralysed dog.
accustomed (v): He is accustomed of such situation.
accustomed (adj): This is an accustomed rituals.
abused (v): They have abused him.
abused (adj): This is an abused house.
insulted (v): He has insulted me.
insulted (adj): He is an insulted person.
twisted (v): They have twisted the matters.
twisted (adj): It is a twisted rod.

The main aim is to share the knowledge and help the students of Class 12 to secure the best score in their final exams. Use the concepts of Bihar Board Class 12 Chapter 11 A Marriage Proposal English Solutions in Real time to enhance your skills. If you have any doubts you can post your comments in the comment section, We will clarify your doubts as soon as possible without any delay.

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 9 हमारी नींद

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड Chapter 9 हमारी नींद Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 9 हमारी नींद

Bihar Board Class 10 Hindi हमारी नींद Text Book Questions and Answers

कविता के साथ

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solution प्रश्न 1.
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि एक बिप्य की रचना करता है। उसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि वीरेन डंगवाल ने मानव जीवन एक बिंब उपस्थित किया है। सुविधाभोगी आरामपसंद जीवन नींद रूपी अकर्मण्यता के चादर से अपने आपको ढंककर जब सो जाता है तब भी प्रकृति के वातावरण के एक छोटा बीज अपनी कर्मठता रूपी सींगों से धरती के सतह रूपी संकटों को तोड़ते हुए आगे बढ़ जाता है। यहाँ नींद, अंकुर, कोमल सींग, फूली हुई बीज, छत ये सभी बिम्ब रूप में उपस्थित है।

हमारी नींद Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 2.
मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किये जाने का क्या आशय है ?
उत्तर-
मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किये जाने का आशय है निम्न स्तरीय जीवन की संकीर्णता को दर्शाना। सष्टि में अनेक जीवन-क्रम चलता रहता है। उसका जीवन-क्रम की व्यापकता को लेकर कर्मठता और अकर्मठता का बोध कराता है लेकिन मक्खी के जीवन-क्रम केवल सुविधापयोगी एवं परजीवी-जीवन का बोध कराता है।

Class 10th Hindi Godhuli Question Answer प्रश्न 3.
कवि गरीब बस्तियों का क्यों उल्लेख करता है ?
उत्तर-
कवि गरीब बस्तियों के उल्लेख के माध्यम से कहना चाहता है कि जहाँ के लोग दो जून रोटी के लिए काफी मसक्कत करने के बाद भी तरसते हैं वहाँ पूजा-पाठ, देवी जागरण जैसे महोत्सव कितना सार्थक हो सकता है ? यहाँ कुछ स्वार्थी लोग अपनी उल्लू सीधा करने के लिए गरीब लोगों का उपयोग करते हैं। लेकिन गरीबी से ग्रसित लोग अपने वास्तविक विकास हेतु सचेत नहीं होते हैं।

बिहार बोर्ड हिंदी बुक 10 Bihar Board प्रश्न 4.
कवि किन अत्याचारियों का और क्यों जिक्र करता है?
उत्तर-
कवि यहाँ उन अत्याचारियों का जिक्र करता है जो हमारी सुविधाभोगी, आराम पसंद जीवन से लाभ उठाते हैं। समाज का एक वर्ग जो ऐशो-आराम की जिंदगी में अपने आपको ढाल लेता है उसी का लाभ अत्याचारी उठाते हैं। हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जाने वाले जीवन नहीं रह पाते हैं और इस अवस्था में अत्याचारी अत्याचार करने के बाह्य और आंतरिक सभी साधन जुटा लेते हैं।

Bihar Board 10th Class Hindi Book Pdf प्रश्न 5.
इनकार करना न भूलने वाले कौन हैं ? कवि का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे हठधर्मी हैं जो संवैधानिक और वैधानिक स्तर पर ‘कई गलतियाँ कर जाते हैं लेकिन अपनी भूलें या गलतियों को स्वीकार नहीं करते हैं। वे साफ तौर पर अपनी भूल को इनकार कर देते हैं। जैसे लगता है कि उनका दलील काफी साफ और मजबूत है।

Class 10 Hindi Kavita Bihar Board प्रश्न 6.
कविता के शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर-
किसी भी कविता का शीर्षक कवितारूपी शरीर का मुख होता है। शीर्षक कविता की सारगर्भिता लिए रहता है। शीर्षक रखने के समय कुछ बातें इस प्रकार होती हैं-शीर्षक, सार्थक लघु और समीचीन होना चाहिए। साथ ही शीर्षक घटना प्रधान, जीवन प्रधान या विषय-वस्तु प्रधान होता है। यहाँ शीर्षक विषय-वस्तु प्रधान हैं। शीर्षक छोटा है और आकर्षक भी है। इसका शीर्षक पूर्ण रूप से केन्द्र में चक्कर लगाता है जहाँ शीर्षक सुनकर ही जानने की इच्छा प्रकट हो जाता है। अत: सब मिलाकर शीर्षक सार्थक है।

Hindi Kavita For Class 10 Bihar Board प्रश्न 7.
व्याख्या करें-
गरीब बस्तियों में भी
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउडस्पीकर पर।
उत्तर –
प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि वीरेन डंगवाल के द्वारा लिखित ‘हमारी नींद’ से ली गई है। इस अंश में कवि उन लोगों का चित्र खींचा है जो गरीब बस्तियों में जाकर अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए देवी जागरण जैसे महोत्सव का आयोजन करते हैं।

कवि कहते हैं कि आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे स्वार्थपरक लोग हैं जिनके हृदय में गरीबों के प्रति हमदर्दी नहीं है। केवल उनसे समय-समय पर झूठे -वादे करते हैं। नेता, पूँजीपति एवं अत्याचारी ये सभी गरीबों की आंतरिक व्यथा से खिलवाड़ कर उनकी विवशता से लाभ उठाते हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solution In Hindi प्रश्न 8.
‘याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी साहित्य के हमारी नींद नामक शीर्षक से उद्धृत है। कवि वीरेन डंगवाल सामाजिक अत्याचारियों के करतूतों का पर्दाफाश किये हैं।
आज हमारे समाज में अनेक लोग हैं जो अपनी जिंदगी को आरामतलबी बना लिये हैं। ऐसी जिंदगी समाज और राष्ट्र के लिए खतरनाक परिधि में रहती है और इन्हीं में से कुछ लोग ऐसे हैं जो इनकी विवशता का लाभ उठाने के लिए गलत अंजाम देने में पीछे नहीं हटते हैं। अत्याचारी आंतरिक और बाह्य रूप से अपने स्वार्थपूर्ति के लिए सभी प्रकार के साधन अपनाते हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions प्रश्न 9.
“हमारी नींद के बावजूद’ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्य-पुस्तक के “हमारी- नींद” नामक शीर्षक से उद्धृत है। इस अंश में हिन्दी काव्यधारा के समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने वैसे लोगों का चित्रण किया है जो आरामतलबी जीवन पंसद करते हैं।
प्रस्तुत अंश में कवि कहते हैं कि जीवन-क्रम कभी रुकता नहीं है। समय-चक्र के समान बिना किसी की प्रतीक्षा किये हुए अनवरत आगे ही बढ़ता जाता है। यदि हमारे समाज के कोई भी व्यक्ति सुविधोपयोगी आराम पसंद जीवन पसंद करते हैं तो भी कहीं एक पक्ष जरूर ऐसा होता है जिसका सिलसिला हमेशा आगे बढ़ते जाता है जो कर्मवाद का संदेश देता है।

Bihar Board Hindi Solution प्रश्न 10.
‘हमारी नींद’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने हमारी नींद’ कविता में विभिन्न चित्रों के माध्यम से सुविधाभोगी जीवन और हमारी बेपरवाही के बावजूद बेहतर जिन्दगी के लिए चलने वाले संघर्ष का चित्रण बड़ी स्पष्टता से किया है।

कवि कहता है कि छोटी धरती के नीचे बीज अंकुरा और उस छोटे अंकुर ने अपने ऊपर की धरती को दरकाया और खुली हवा में उसने साँस ली। उसने अपने ऊपर के अवरोध को तोड़ा। पेड़ ने भी अपना कद ऊँचा किया।

प्रकृति के इस क्रम के बाद कवि समाज की ओर निहारता है। मक्खियों की तरह लोग जी रहे हैं और उनकी तरह ही बच्चे उत्पन्न कर रहे हैं। नतीजा है कि जीवन की इस अफरा-तफरी में ही रंगे हो रहे कुछ लोग आगजनी कर रहे हैं, बम फोड़ रहे हैं ताकि अपने लिए सुविधा का सामान जुटा सकें। कुछ की जिन्दगी जाती है तो जाए। हमें क्या ?

दूसरी ओर कुछ गरीब लोग हैं जो अपनी गरीबी को अपना नसीब मान चुके हैं, वे गरीबी से छुटकारा पाने के लिए लड़ने की अपेक्षा अपनी गाढ़ी कमाई में लाउडस्पीकर लगाकर, रात-रात भर देवी के भजन गा रहे हैं वे इस भ्रम में हैं कि देवी-पूजा से उनका जीवन बदल जाएगा। वस्तुतः वे नींद में हैं। दरअसल भाग्य, पूजा-पाठ समाज के दुश्मनों के बिछाए हुए जाल हैं ताकि ये अत्याचारी आनन्द-सुख भोग सकें। किन्तु जीवन ऐसा है कि उनके लाख चाहने के बाद रुकता नहीं है। उपेक्षाकृत से उस पर कोई असर नहीं पड़ता।

कवि कहता है कि लाख कोशिशों के बावजूद कुछ लोग हैं जो अनाचार के आगे सिर नहीं झुकाते। वे दृढतापूर्वक अनुचित कार्य करने से मना कर देते हैं। उनकी ओर से आँख बन्द कर लेने पर भी वे रुकते नहीं, बढ़ते जाते हैं। यह संघर्ष ही उनकी ताकत है, मानव के विकास की यही कहानी है।

प्रश्न 11.
कविता में एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिसका अर्थ जानने की कोशिश करनी पड़े। यह कविता की भाषा की शक्ति है या सीमा ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
यह भाषा की शक्ति है जो अपने साधारण अर्थ से सबकुछ समझाने में सफल हो जाती है। सीमा का रूपान्तर नहीं होता है किन्तु भाषा का रूपान्तर कविता की सौष्ठवता को प्रदर्शित करने में समर्थ हो जाती है।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नांकित के दो-दो समानार्थी शब्द लिखें-
पेड़, शिशु, दंगा, गरीब, अत्याचारी, हठीला, साफ, इनकारा
उत्तर-
पेड़ – तरू, वृक्ष
शिशु- बालक, बाल
दंगा – सांप्रदायिकता, सांप्रदायिक युद्ध
गरीब – दीन, निर्धन
अत्याचारी – दुराचारी
हठीला – स्थैर्य, अडिग रहने वाला
साफ – एकदम, बेहिचक
इनकार – मनाही, मना करना।

प्रश्न 2.
निम्नांकित वाक्यों में कर्ता कारक बताएँ
(क) मेरी नींद के दौरान / कुछ इंच बढ़ गए / कुछ सूत पौधे।
(ख) अंकुर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से धकेलना शुरू की। बीज की फूली हुई। छत भीतर से।
(ग) गरीब बस्तियों में भी / धमाके से हा देवी जागरण लाउडस्पीकर पर।
(घ) मगर जीवन हठीला फिर भी : बढ़ता ही जाता आगे / हमारी नींद के बावजूद।
उत्तर-
(क) पौधे
(ख) अंकुर
(ग) देवी जागरण
(घ) जीवन

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों में कर्मकारक की पहचान कीजिए
(क)अंकर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से / धकेलना शुरू की / बीज की फूली हुई / छत भीतर से।
(ख) कई लोग हैं / अभी भी / जो भूले नहीं करना , साफ और मजबूत / इनकार।
उत्तर-
(क) छत
(ख) इनकार

काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेरी नींद के दौरान
कुछ इंच बढ़ गए पेड़
कुछ सूत पौधे
अंकर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से
धकेलना शुरू की
बीज की फूली हुई
छत, भीतर से।
एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ
कई शिशु पैदा हुए, और उनमें से
कई तो मारे भी गए
दंगे, आगजनी और बमबारी में।

प्रश्न
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता-हमारी नींद।
कवि-वीरेन डंगवाल।

(ख) प्रसंग हिन्दी साहित्य के समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सुविधाभोगी, आराम पसंद जीवन अथवा हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जीवन का चित्रण किया है।

(ग) सरलार्थ प्रस्तुत पद्यांश में कवि एक बिम्ब की रचना करते हैं जो मानव जीवन और मानवेत्तर प्राणियों के आंतरिक और बाह्य जीवन चक्र, संघर्षशीलता के साथ चल रहे हैं। कवि स्वयं कविता के केन्द्र में बिम्ब के रूप में उपस्थित होकर कहता है कि जब मैं सुविधाभोगी बनकर आराम की नींद में सो रहा था तो इधर प्रकृति अन्य प्राणियों के जीवनक्रम को आगे बढ़ा रही थी। प्रकृति के आगोश में पलने वाले पेड़-पौधे के बीज भी धरातल के अन्दर प्रवेश कर अपने अंकुररूपी कोमल सींगों से बीज की छत को धकेल कर कुछ इंच पौधे के रूप में आगे बढ़ आये हैं। उसी प्रकार मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ तो इस जीवन क्रम में कई शिशु उत्पन्न हुए, उनमें से कई मारे गये। कई जगह दंगे-फसाद, आगजनी और बमबारी से मानव और मानवेत्तर प्राणियों का जीवनक्रम चलता रहा।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत पद्यांश में कवि आराम तलबी, विलासिता में लिप्त जो मानव जीवन-यापन करते हैं और उनके ही इर्द-गिर्द घूमने वाले अन्य प्राणियों का जीवन-चक्र किस तरह से चलता है इसी का यहाँ दार्शनिक आकलन किया गया है। कवि मानवीय जीवन की लधुता और विधाता के समय की व्यापकता के माध्यम से कहता है कि मानव जीवन अति लघु है। इस लघु जीवन दुःख-सुख, जुल्म-अत्याचार, सहते हुए जीवन को विकास क्रम में ले जाना है। अतः विलासितापूर्ण जीवन को छोड़कर जीवन की यथार्थता को समझना चाहिए।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) सम्पूर्ण कविता खड़ी बोली में रचित है।
(ii) छंद मुक्त होते हुए भी कहीं-कहीं कविता में संगीतमयता आ गयी है।
(iii) कवि की भाषा सरल और सुबोध है।
(iv) बिम्ब-प्रतिबिम्ब की झलक कविता की लाक्षणिकता पूर्णरूप से प्रकट होती है।
(v) भाव के अनुसार भाषा का वर्णन कविता की परिपक्वता दिखाई पड़ रही है।

2. गरीब बस्तियों में भी ।
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउडस्पीकर पर।
याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने
मगर जीवन हठीला फिर भी
बढ़ता ही जाता आगे
हमारी नींद के बावजूद
और लोग भी हैं, कई लोग हैं
अभी भी
जो भूले नहीं करना
साफ और मजबूत
इनकार।

प्रश्न
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) दिये गये पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता- हमारी नींद।
कवि- वीरेन डंगवाल।

(ख) प्रसंग-पस्तुत पद्यांश में कवि काल-क्रम की व्यापक एवं संघर्षशील गतिविधियों के दार्शनिक रूप का वर्णन करता है। जीवन-क्रम में जीव-जंतु से लेकर मानवीय जीवन जो प्रभावित होता है उनमें विपरीत परिस्थितियाँ जीवन को कुछ कहने-सुनने के लिए बाध्य करती है। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि सर्वदा सामंतशाहियों के चक्र में कमजोर और ईमानदार पिसता रहा है।

(ग) सरलार्थ-कवि मानव जीवन-क्रम का चित्रण करते हुए कहता है कि जहाँ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब लोग हैं जो केवल किसी तरह से अपने पेट की ज्वाला शांत करने की अपेक्षा कुछ नहीं जानते हैं। वहाँ भी विलासी लोग भगवती जागरण तथा अन्य ढोंगी कार्यक्रम के आड़ में लाउडस्पीकर बजवाकर ठगने का कार्य करते हैं। साथ ही समाज के कुछ लोग सुशिक्षित होकर भी मानवता की परिभाषा को झुठलाते हुए अत्याचारियों के द्वारा जुटाये गये साधनों को मूक होकर देखते रहते हैं। हम आराम तलबी जिंदगी में कर्महीनता का परिचय देकर मानवता को कलंकित करने में पीछे नहीं हट रहे हैं। इनमें आज भी ऐसे लोग हैं जो अपने सामने कमजोर, बेबस, मजबूर लोगों पर अत्याचारियों के द्वारा होते अत्याचार को देखकर केवल यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत कविता का भाव यह है कि आज के परिवेश में मनुष्य केवल स्वार्थपरता पर केन्द्रित है। साथ ही साथ कहा जा रहा है कि जमाना बाह्य जगत से काफी खतरनाक पैमाने पर टूट रहा है। लोग सच्चाई से मुख मोड़ रहे हैं।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) सम्पूर्ण कविता खड़ी बोली में है।
(ii) तद्भव तत्सम के साथ-साथ कहीं-कहीं उर्दू शब्दों का भी समागम हुआ है।
(iii) पूरी कविता लक्षण शक्ति पर आधारित है।
(iv) भाव के अनुसार कविता में ओज गुण के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।
(v) अलंकार और छंद के विशेष परिस्थितियों से दूर रहने पर भी कविता के उद्देश्य में अंतर नहीं आया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें

प्रश्न 1.
‘हमारी नींद’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) सुमित्रानंदन पंत
(ख) वीरेन डंगवाल
(ग) रामधारी सिंह दिनकर
(घ) कुँवर नारायण
उनर-
(ख) वीरेन डंगवाल

प्रश्न 2.
वीरेन डंगवाल किस विचारधारा के कवि हैं ?
(क) जनवाद
(ख) रहस्यवादी
(ग) रीतिवादी
(घ) सूफी
उत्तर-
(क) जनवाद

प्रश्न 3.
‘हमारी नींद’ में ‘नींद’ किसका प्रतीक है?
(क) गफलत
(ख) बेहोशी
(ग) पागलनपन
(घ) मदहोशी
उत्तर-
(क) गफलत

प्रश्न 4.
‘दुश्चक्र में सृष्टा’ पुस्तक पर वीरेन डंगवाल को कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(क) ज्ञानपीठ
(ख) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार
(ग) साहित्य अकादमी
(घ) नोबेल पुरस्कार
उत्तर-
(ग) साहित्य अकादमी

प्रश्न 5.
हमारी नींद’ कैसी कविता है ?
(क) समकालीन
(ख) नकेनवादी
(ग) हालावादी
(घ) छायावादी
उत्तर-
(क) समकालीन

प्रश्न 6.
कवि वीरेन डंगवाल के अनुसार जीवन में महत्त्वपूर्ण क्या है ?
(क) सुख
(ख) नकेनवादी
(ग) भ्रमण
(घ) संघर्ष
उत्तर-
(घ) संघर्ष

II. रिक्त स्थानों की पर्ति करें

प्रश्न 1.
वीरेन डंगवाल ………….. परिवर्तन के पक्षधर हैं।
उत्तर-
जनवादी

प्रश्न 2.
‘हमारी नींद’ कविता काव्य-संकलन …….से संकलित है।
उत्तर-
दुष्चक्र में स्रष्टा

प्रश्न 3.
मेरी नींद के दौरान कुछ इंच बढ़ गए ………… ।
उत्तर-
पंड

प्रश्न 4.
कई लोग मारे गए दंगे, आगजनी और …….. में।
उत्तर-
बमबारी

प्रश्न 5.
गरीब बस्तियों में भी धमाके से हुआ ………. जागरण।
उत्तर-
देवी

प्रश्न 6.
डंगवाल की कविताओं के दृश्य “………” करनेवाले हैं।
उत्तर-
बेचैन

प्रश्न 7.
नाजिम हिकमत ………. भाषा के महाकवि हैं।
उत्तर-
तुकी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वीरेन डंगवाल का जन्म कहाँ हुआ है ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल का जन्म उत्तरांचल के कीर्तिनगर में हुआ।

प्रश्न 2.
वीरेन डंगवाल ने काव्य रचना के अलावा क्या कर हिन्दी को समृद्ध किया है ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल ने काव्य-रचना के अलावा विश्व के श्रेष्ठ कवियों की कविताओं का अनुवाद कर हिन्दी को समृद्ध किया है।

प्रश्न 3.
यथार्थ को डंगवाल किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं?
उत्तर-
यथार्थ को डंगवाल बिल्कुल नये अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 4.
वीरेन डंगवाल कैसे कवि हैं ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल जनवादी परिवर्तन के पक्षधर प्रमुख सामयिक कवि हैं।

प्रश्न 5.
‘हमारी नींद’ कविता का संदेश क्या है ?
उत्तर-
‘हमारी नींद’ कविता का संदेश है संघर्ष ही जीवन है।

प्रश्न 6.
वीरेन डंगवाल की काव्य भाषा कैसी है ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल की काव्य-भाषा में देशी ठाठ दिखाई देता है।

व्याख्या खण्ड

प्रश्न 1.
मेरी नींद के दौरान
कुछ इंच बढ़ गए पेड़
कुछ सूत पौधे
अंकुर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से
धकेलना शुरू की
बीज की फूली हुई
छत, भीतर से।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी प नुस्तक के ‘हमारी नींद’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन काव्य पंक्तियों का प्रसंग कवि की नींद से जुड़ा हुआ है जिसमें नींद के माध्यम से एक पेड़ के सृजन एवं विकास-क्रम की चर्चा है। कवि सपने देखता है। सपने में पेड़ कुछ इंच बढ़ गए हैं—कुछ छोटे-छोटे पौधे पेड़ पुत्र के रूप में विकसित हो रहे हैं। अंकुर अपने स्वरूप में कैसे बदलाव क्रमानुसार लाता है, उसकी व्याख्या कवि ने अपनी कविता में किया है। बीज जब अंकुरित होते हैं, धीरे-धीरे फूल के रूप में छतनुमा आकार ग्रहण करते हैं। भीतर से बीज का अंकुरित रूप विकसित होकर पौधे-पेड़ के रूप में अपने विराट अस्तित्व को प्राप्त कर लेता है।

कवि की नींद कितनी सुखद है इसकी व्याख्या स्वयं कवि ने किया है। जैसे मनुष्य का जीवन-क्रम है—ठीक वैसा ही बीज-पौधे-पेड़ का है। कवि ने नींद में देखे गए सपने के माध्यम से पेड़ के जन्म से लेकर विकसित रूप तक का सूक्ष्म चित्रण करते हुए मानवीय जीवन से उसके संबंधों को व्याख्यायित किया है। जैसे मानव के भीतर कई विचार मंथन के द्वारा एक आकार रूप ग्रहण करता है। ठीक उसी प्रकार बीजरूप भी अंकुरण के द्वारा विराटता को प्राप्त करता है। इस कविता में प्रकृति की सृजन-प्रक्रिया का चित्रण हुआ है।

प्रश्न 2.
एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ
कई शिशु पैदा हुए और उनमें से
कई तो मारे भी गए
दंगे, आगजनी और बमबारी में।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘हमारी नींद’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन काव्य पक्तियों का संबंध मक्खी के जीवन-क्रम, शिशु-प्रजनन, आगजनी, बमबारी से जुड़ा हुआ है।

कवि कहता है कि एक मक्खी का जीवन-क्रम धीरे-धीरे पूर्णता को प्राप्त करता है। कई शिशु पैदा होते हैं और उनमें से कई मार दिये भी जाते हैं-दंगों द्वारा, आगजनी द्वारा और बमबारी द्वारा। यहाँ मक्खी के जीवन क्रम को मानव के जीवन क्रम को तुलनात्मक रूप में दिखाया गया है। मनुष्य आज अपने जीवन-क्रम ने विकास की सीढ़ियों पर दूर-दूर तक पहुँचाया है। हमारे बच्चे भी सृजन-प्रक्रिया से गुजरते हुए विकास की सीढ़ियों पर चढ़ते हैं। आज चारों तरफ कितनी भयावह स्थिति है। कहीं दंगे हो रहे हैं, कहीं आगजनी हो रही है, कहीं बमबारी हो रही है। पूरी मानवता आज कराह रही है। आज चारों तरफ अराजक स्थिति है। सभी असुरक्षित हैं। जीवन को खतरे से बचाकर विकास-पथ की ओर ले चलने में आज काफी कठिनाइयाँ हो रही हैं।

प्रश्न 3.
गरीब बस्तियों में भी
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउा पीकर पर।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “हमारी नींद” नामक काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन काव्य पंक्तियों का प्रसंग दीन-हीन जन के अंध-विश्वासों, देवी-जागरण और धूम-धमाका से है। कवि कहता है कि गरीब बस्तियों में भी देवी-जागरण के बहाने धूम-धमाका, लाउडस्पीकर को बजाना आदि कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। ये दीन-जन अपनी यथार्थ स्थिति से रू-ब-रू न होकर भटके हुए हैं। भावुकता एवं अंधविश्वास में समय और शक्ति का अपव्यय करते हैं। इनमें अपनी गरीबी, बेबसी-लाचारी के प्रति चेतना नहीं जगी है। ये कोरे अंधविश्वास और नकलची जीव ! अभी भी जी रहे हैं। इनमें सारी शक्तियाँ तो हैं किन्तु चेतना के अभाव में अपने लक्ष्य से भटके हुए हैं। कवि गरीबों, उनकी बस्तियों, उनके कार्यक्रमों के प्रति ध्यान आकृष्ट करता है। उनके जीवन की विसंगतियों का सही चित्रण प्रस्तुत कर कवि ने सच्चाई से हमें अवगत कराया है।

प्रश्न 4.
याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने
मगर जीवन हठीला फिर भी
बढ़ता ही जाता आगे
हमारी नींद के बावजूद।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “हमारी नींद” काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन कविताओं का प्रसंग हमारे मानवीय जीवन के अनेक पक्षों से जुड़ा है। समाज में रह रहे अनेक किस्म के लोगों, उनके रहन-सहन और क्रियाकलापों से संबंधित है। कवि कहता है कि अनेक तरह के साधन-संसाधन को लोगों ने जुटा लिया है। अत्याचारियों ने अपने अत्याचार से, ‘ शोषण दमन से सबको त्रस्त कर रखा है। किन्तु जीवन की गति भी कहाँ अवरुद्ध हो रही है। वह तो अपनी गति में अग्रसर है। जीवन तो संघर्ष का ही नाम है। उसे जीवटता के साथ जीने में ही मजा है। जीवन सदैव प्रगति-पथ पर आगे की ओर ही बढ़ता गया है, भले ही उसके मार्ग में क्यों न अनेक बाधाएँ खड़ी हों। जीवन हठधर्मी होता है। उसमें दृढ़-संकल्प शक्ति निहित होती है। लाख नींद बाधा बनकर खड़ी हो किन्तु यात्रा-क्रम कभी रुका है क्या ? सीमित लोगों के पास संसाधन सिमटे हुए हैं। विषमता के बीच जीवन को जीते हुए लक्ष्य के शिखर तक पहुँचाना है। कवि सामाजिक विसंगतियों के बीच जीते हुए लड़ते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है।

प्रश्न 5.
और लोग भी हैं, कई लोग हैं
अभी भी
जो भूलें नहीं करता
साफ और मजबूत
इनकार।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “हमारी नींद” काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग समाज के आमलोगों से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी को सृजन कर्म में लगाया है।

इस धरा पर उन अत्याचारियों के अलावा दूसरे लोग भी हैं जो अभी भी अपने साफ और मजबूत इरादों के साथ भूलों को स्वीकार करते हैं इनकार नहीं करते हैं। उनके भीतर नैतिकता, ईमानदारी, कर्मठता और साहस विद्यमान है। समाज के ये तपे-तपाये लोग हैं जिन्होंने समाज के लिए, राष्ट्र के लिए, लोकहित के लिए मजबूत इरादों के साथ संघर्ष किया है, संघर्ष कर रहे हैं। समाज के ये अगली पंक्ति के लोग हैं जिनमें त्याग, करुणा, दया और सहनशक्ति भरी हुई है। इस प्रकार समाज के शोषक वर्ग के अलावा एक सृजन वर्ग भी है जो अपनी कर्तव्यनिष्ठता के साथ, संकल्पशक्ति के साथ समाज-निर्माण, राष्ट्र निर्माण में लगा हुआ है।

हमारी नींद कवि परिचय

प्रमुख समकालीन कवि वीरेन डंगवाल का जन्म 5 अगस्त 1947, ई० में कीर्तिनगर, टिहरी-गढ़वाल, उत्तरांचल में हुआ । मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद डंगवाल जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम० ए० किया और यहीं से आधुनिक हिंदी कविता के मिथकों और प्रतीकों पर डी० लिट् की उपाधि पायी । वे 1971 ई० से बरेली कॉलेज में अध्यापन करते रहे । डंगवाल जी हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता भी करते हैं। उन्होंने इलाहाबाद से प्रकाशित अमृत प्रभात’ में कुछ वर्षों तक ‘घूमता आईना’ शीर्षक . से स्तंभ लेखन भी किया । वे दैनिक ‘अमर उजाला’ के संपादकीय सलाहकार भी हैं। ]

कविता में यथार्थ को देखने और पहचानने का वीरेन डंगवाल का तरीका बहुत अलग, अनूठा और बुनियादी किस्म का है । सन् 1991 में प्रकाशित उनका पहला कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में आज भी उतना ही प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण लगता है । उन्होंने कविता में समाज के साध परण जनों और हाशिये पर स्थित जीवन के जो विलक्षण ब्यौरे और दृश्य रचे हैं, वे कविता में और कविता से बाहर भी बेचैन करने वाले हैं । उन्होंने कविता के मार्फत ऐसी बहुत-सी वस्तुओं और उपस्थितियों के विमर्श का संसार निर्मित किया है जो प्रायः ओझल और अनदेखी थीं। उनकी कविता में जनवादी परिवर्तन की मूल प्रतिज्ञा है और उसकी बुनावट में ठेठ देसी किस्म के, खास और आम, तत्सम और तद्भव, क्लासिक और देशज अनुभवों की संश्लिष्टता है।

वीरेन डंगवाल को ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ काव्य संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उन्हें ‘इसी दुनिया में’ पर रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार मिला । उन्हें श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार और कविता के लिए शमशेर सम्मान भी प्राप्त हो चुका है । डंगवाल जी ने विपुल परिमाण में अनुवाद कार्य भी किए हैं। तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद उन्होंने ‘पहल पुस्तिका’ के रूप में किया । उन्होंने विश्वकविता से पाब्लो नेरुदा, वर्ताल्त ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊष रूजेविच आदि की कविताओं के अलावा कुछ आदिवासी लोक कविताओं के भी अनुवाद किए ।

समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल की कविताओं के संकलन ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ से उनकी कविता ‘हमारी नींद’ यहाँ प्रस्तुत है । सुविधाभोगी आराम पसंद जीवन अथवा हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जानेवाले जीवन का चित्रण करती है यह कविता।

हमारी नींद Summary in Hindi

पाठ का अर्थ

नई कविता के यशस्वी कवि हिन्दी साहित्य में अपना अलग पहचान बनानेवाले वीरेन डंगवाल एक चर्चित कवि हैं। इनकी रचनाओं में यथार्थ का बहुत अलग, अनूठा और बुनियादी किस्म का . वर्णन मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं ने समाज के साधरण जनों और हाशिये पर स्थित जीवन को विशेष रूप से स्थान दिया है। उनकी कविता में जनवादी परिवर्तन की मूल प्रतिज्ञा है और उसकी बनावट में ठेठ देशी किस्म के खास और आम, तत्सम और तद्भव, क्लासिक और देशज अनुभवों की संश्लिष्टता है।

प्रस्तुत कविता कवि की कविताओं के संकलन ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ से संकलित है। इस कविता में कवि सुविधाभोगी आराम पसंद जीवन अथवा हमारी लपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितओं से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जानेवाले जीवन का चित्रण है। ‘हमारी नींद’ अनमना-सा है। नींद में भी सूत के पौधे कुछ बढ़ते हुए नजर आते हैं। मक्खियों की भाँति अत्याचारी अपना जीवन यापन करते हैं। अत्याचारी बढ़ते हैं और मारे जाते हैं। आर्थिक स्थिति से कमजोर वाले भी धना के के साथ जीवन जीना चाहते हैं। हम उन अत्याचारियों से डरते हैं फिर भी हमारी नींद में कोई परिवर्तन नहीं होता है। हम बेपरवाह जीवन जीते हैं। बहुत से ऐसे लोग हैं ज्यों अपने जीवन जीने की कला से इंकार नहीं कर सकते हैं। वस्तुतः यहाँ कवि कहना चाहता है कि हम देखकर भी न देखने का भाव दिखाते हैं। न सो कर भी गहरी नींद का ढोंग करते हैं।

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 बहुत दिनों के बाद

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 बहुत दिनों के बाद (नागार्जन)

 

बहुत दिनों के बाद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

बहुत दिनों के बाद कविता का सारांश Bihar Board Class 11th प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कवि ने क्या देखा और क्या सुना?
उत्तर-
‘बहुत दिनों के बाद’ घुमक्कड़ कवि की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना का एक दुलर्भ साक्ष्य प्रस्तुत करती है। घुमक्कड़ प्रवृत्ति का होने के कारण बहुत दिनों के बाद कवि अपने ग्रामीण वातावरण में आकर पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान देखकर आह्वादित हो जाता है। का धान कूटती किशोरियों की कोकिल-कंठी तान सुनकर मंत्र-मुग्ध हो जाता है। उसका जन अ। . उल्लसित हो जाता है।

बहुत दिनों के बाद कविता का भावार्थ Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
कवि ने अपने गाँव की धूल को क्या कहा है? और क्यों?
उत्तर-
कवि नागार्जुन ने अपने गाँव की धूल को चन्दनवर्णी कहा है। ऐसा कहने के पीछे कवि का आशय है कि जिस तरह चन्दन स्निग्धता, सुगंध और शीतलता देता है। ठीक उसी तरह कवि के गाँव की धूल जिसका रंग चंदन की तरह ही है, जिससे ऐसी सोंधी महक आ रही है, उसका स्पर्श चन्दवत्, स्निग्ध और शीतलता प्रदान कर रहा है।

बहुत दिनों के बाद कविता की व्याख्या Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
कविता में ‘बहुत दिनों के बाद’ पंक्ति बार-बार आयी है। इसका क्या औचित्य है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
घुमक्कड़ी प्रवृत्ति का होने के कारण कवि ‘बहुत दिनों के बाद’ अपने गाँव का उल्लासपूर्ण वातावरण देखकर मंत्र-मुग्ध है। प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल में हरियाली देखकर कवि का हृदय कल्पना को ऊँची उड़ान भरने लगता है। बहुत दिनों के बाद कवि को पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान तथा धान कूटती नवयौवनाओं की सुरीली तान सुनने को मिलता है। मौलसिरी के ताजे-टटके फूल के सुवास कवि के नासारन्ध्रों में समाती है। प्रकृति की मेहरबानी से गन्ने, ताल-मखाना की हरी-भरी फसलें लहलहाते हुए देखकर कवि ताल-मखाना खाता है और गन्ना चूसता है।

प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल प्राय: उजार-बियावान-सा दिखाई पड़ता था। प्रकृति की असीम कृपा से बहुत दिनों के बाद कवि को गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ भोगने का अवसर प्राप्त हुआ है। कवि कहना चाहता है कि उजड़े उपवन में फिर से हरियाली छा गई है, प्रायः बाढ़ के प्रकोप से आच्छादित भूमि को स्पर्श करने का अवसर भी उसे बहुत दिनों के बाद मिलता है। लंबी इन्तजारी के बाद मिलने वाली ग्रामीण परिवेश का सच्चा सुख मिलना ‘सुख’ के महत्व में चार-चाँद लगा दिया है।

बहुत दिनों के बाद कविता Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
पूरी कविता में कवि उल्लसित है। इसका क्या कारण है?
उत्तर-
‘बहुत दिनों के बाद’ शीर्षक कविता घुमक्कड़ कवि नागार्जुन की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदनाओं का एक दुर्लभ साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कवि बहुत दिनों के बाद पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान जी-भर देखता है। धान के उपज की प्रचुरता से कोकिल कंठी नवयौवन द्वारा धान कूटते हुए मधुर संगीत फिजाँ में फैला हुआ है जिसे सुनकर कवि मंत्र-मुग्ध हो जाता है। मौलसिरी के ताजे-टटके फूल भी सूंघने को मिलती है।

साथ-ही-साथ चंदनवर्णी धूल को भी अपने तिलक के रूप में माथे पर लगाने का अवसर प्राप्त होता है। कवि का हृदय गाँव की खुशहाली से आह्वादित है। वह जी-भर ताल-मखाना खाता है और गन्ने भी जी-भर चूसता है। कवि को गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब अपनी जन्मभूमि पर साथ-साथ प्राप्त हो जाता है। इस मनोहर तथा मन को आह्वादित करने वाले प्रकृति के मनोरम दृश्य को देखकर कवि भवविभोर हो जाता है। उसका हृदय उल्लास से भर जाता है।

Bahut Dino Ke Baad Kavita Question Answer Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
“अब की मैंने जी-भर भोगे गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर” इन पंक्तियों का गर्भ उद्घाटित करें।
उत्तर-
प्रतिबद्ध मार्क्सवादी, सहृदय साहित्यसेवी कवि नागार्जुन रचित कविता “बहुत दिनों के बाद” से ली गयी इन पंक्तियाँ में तृप्ति का आख्यान हुआ है। मानव जीवन मृग मरीचिका में व्यतीत हो रहा है। सुख की वांछा में व्यक्ति अपनी जड़ों से कट कर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ सारा कुछ मानव निर्मित, कृत्रिम होता है। चाँदनी होती है, चाँद नहीं होता। खूशबू आती है, फूल कागजी होते हैं, रूप मोहित करता है लेकिन मेकअप की मोटी परत चुपड़ी हुई है। भेद खुलने पर, छले जाने पर काफी दुःख होता है, क्लेष होता है और मानव मन अपनी जड़ की ओर लौटता है।

जीवन शहरों और महानगरों जैसे अजगर के गुंजलक में किस स्थिति में है, सभी जानते हैं। उगता सूरज, डूबता सूरज के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। भागमभाग लगा रहता है। इसी भागमभाग से ऊबकर, भाग कर या निजात पाकर कवि अपने प्राकृतिक परिवेश में लौटा जहाँ मौलसिरी, हर शृंगार, रातरानी, रजनीगंधा जैसे सुगंध बिखेरने वाले फूलों का सान्निध्य मिला, हृदय तृप्त हुए। प्रकृति के विभिन्न अंगों के प्रकृत रूप देखकर धूल धूसरित बालक को देखकर, धान रोपती, काटती, कूटती किशोरियों को गीत गाते देखकर मन को तृप्ति मिली।

पकी फसल की झूमती बालियों को छूने का सुख मिला। खेत-खलिहान से उठने वाली महक। भरते मंजर और चू रहे महुए की सुगंध से मन प्राण तृप्त हुए। लगा जैसे सदियों बीत गयी हो, इन सब का भोग किये हुए। पता नहीं, फिर जीवन के संघर्ष से मुक्ति मिले न मिले। इसलिए कवि ने इन सबका पान, भोग जी भर कर किया।

बहुत दिनो के बाद कविता Bihar Board Class 11th प्रश्न 6.
इस कविता में ग्रामीण परिवेश का कैसा चित्र उभरता है?
उत्तर-
मार्क्सवादी विचार के कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता “बहुत दिनों के बाद” शीर्षक कविता में ग्रामीण परिवेश अपनी पूर्ण वस्तुवाचकता और गुणवाचकता के साथ उपस्थित है। उत्तर बिहार के नेपाल से सटे मिथिलांचल जिसे ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, में ही बाबा नागार्जुन का गाँव है, जवार है, अपना परिवेश है। यहाँ धान की पकी सुनहली फसल से भरे खेत हैं। धान से चावल निकलाने के लिए श्रमसाध्य उद्योग है और इसी से जुड़ा है श्रम परिहार हेतु “धान कूटनी” का गीत।

वस्तुतः अकृत्रिम अकृत्रिम ग्रामीण परिवेश का हर उपक्रम हर गतिविधि गीत, संगीत से आबद्ध है। शहरों में फूल या तो बिकते हैं, नकली होते हैं बासी होते हैं। यहाँ मौलसिरी, हर शृंगार, रजनीगंधा, रातरानी सब ताजा टटके रूप में प्राप्त होते हैं। इन्हें तोड़ने सजाने की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, इनके रूप-गंध में स्वयं को निमज्जित करने की। गाँवों की पक्की सड़कें हो भी तो जो मजा पगडंडियों पर स्वयं को साधते हुए चलने का, उससे उड़ती चंदन जैसी धूल में सराबोर होने का है, उसका कहना ही क्या?

शुद्ध देशी घी में भुना हुआ कुरकुराता ताल मखाना खाने का और खेत से ताजे गन्ने तोड़कर अपने दाँतों-जबड़ों से उसे चीर चूस कर आस्वाद लेने का आनंद तो गाँव में ही मिलेगा। जहाँ सब कुछ उपलब्ध है बिना पैसे के, केवल प्यार के दो मीठे बोल खर्च करने पड़ते हैं। ऐसा ही है नागार्जुन का ग्रामीण परिवेश।

बहुत दिनों के बाद नागार्जुन Bihar Board Class 11th प्रश्न 7.
“धान कूटनी किशोरियों की कोकिल-कंठी तान” में जो सौन्दर्य चेतना दिखलाई पड़ती है, उसे स्पष्ट करें।
उत्तर-
अपने गाँव से गहरे जुड़े सरोकर रखनेवालं वैताली कवि नागार्जुन ग्रामीण सौंदर्य के सूक्ष्म द्रष्टा, पारखी और प्रस्तोता हैं।

धान कूटने के लिए ओखल-मूसल या फिर ढेकुली का प्रयोग होता है। ओखल धान रखकर बार-बार मूसल को बीच से पकड़ते हुए हाथ को शिर के ऊपर तक उठाना फिर कुछ झुकतं हुए धान पर प्रहार करना। चूड़ियों की खनखन, आपस में चूहल करती किशोरियों, नारियों और उनके गले से निकले ग्राम्य गीत के बोल, लगे जैसे किसी अमराई में कोयल पंचम का आलाप ले रही हो। यह सारा वातावरण ऐन्द्रिक, चाक्षुष और घ्राण बिम्बों को कोलाज़, प्रस्तुत करता है। कवि का कथन संक्षिप्त है किन्तु उसका सौन्दर्य अति सचेत, चेतनायुक्त और प्रभावी है।

Bahut Dinon Ke Bad Bihar Board Class 11th प्रश्न 8.
कविता में जिन क्रियाओं का उल्लेख है वे सभी सकर्मक हैं। सकर्मक क्रियाओं का सुनियोजित प्रयोग कवि ने क्यों किया है?
उत्तर-
देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना के ध्वजावाहक प्रकृतिप्रेमी कविवर नागार्जुन ने चिंतन रचना, आचरण के धरातल पर बैठकर जनहित से संबंधित विषयों को कविता के माध्यम से उद्घाटित किया है। कवि के अनुसार शहरी जीवन के सीलन-भरी जिन्दगी की अपेक्षा प्रकृति की उन्मुक्त वातावरण, ग्रामीण परिवेश, सहज, सरस तथा आनन्ददायक होता है। इसकी बोधगम्यता ‘सकर्मक क्रिया’ के सुनियोजित प्रयोग करने में सहज और स्वाभाविक द्रष्टव्य होती है। पात्रों के कार्यों में जीवंतता प्रदान करने के लिए सार्थक क्रियाओं का प्रयोग करना कवि की कल्पना को। यथार्थ से दृढ़तापूर्वक संवेदित करता है।

बहुत दिनों के बाद Bihar Board Class 11th प्रश्न 9.
कविता के हर बंद में एक-एक ऐन्द्रिय अनुभव का जिक्र है और अंतिम बंद में उन सबका सारा-समवेत कथन है। कैसे? इसे रेखांकित करें।
उत्तर-
“बहुत दिनों के बाद” शीर्षक कविता के हर बंद में एक ऐंद्रिय अनुभव है। हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं, जिनके माध्यम से सृष्टि का वस्तुमय साक्षात्कर होता है।

प्रथमबंद में पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान देखने का, दूसरे बंद में धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान सुनने का, तीसरे बंद में मौलसिरी के ताजे टटके फूल सूंघने का, चौथे बंद में गवई पगडंडी के चन्दनवर्णी धूल का स्पर्श करने का, पाँचवें बंद में ताल मखाना खाने और गन्ना चूसने का ऐन्द्रिय अनुभव वर्णित है और अंतिम बंद में भोगने शब्द कार प्रयोग करते हुए कवि ने समवेत ढंग से ऊपर के ही ऐन्द्रिय अनुभवों को सान्द्रित रूप से प्रस्तुत किया है। गंध का संबंध नाक से, रूप का आँख से, रस का जीभ से, शब्द का कान से, स्पर्श का त्वचा से, अनुभव का भोग होता है। अतः अंतिम बंद ऐन्द्रिय अनुभवों का सारांश ही है।

बहुत दिनों के बाद भाषा की बात

Bahut Dino Ke Baad Poem In Hindi Question Answer प्रश्न 1.
कोकिलकंठी, चंदनवी में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर-
कोकिलकंठी और चंदनवर्णी में रूपक और उदाहरण अलंकार प्रयोग भेद से उपस्थित है।

Bahut Dino Ke Baad Kavita Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
‘मैंने’ सर्वनाम के किस भेद के अंतर्गत है?
उत्तर-‘
मैंने’ सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम के अन्तर्गत उत्तम पुरुष के अंतर्गत आता है जिसका कारक ‘कर्ता’ है। मैंने का प्रयोग भूतकाल के निम्न भेदों में आते हैं।

सामान्य भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी।
आसन्न भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी है।
पूर्ण भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी थी।

वैसे पंजाब-हरियाणा में मैंने का प्रयोग वर्तमान काल में होता है, जहाँ इसका अर्थ मुझे, मुझको लिया जाता है।

मैंने खाना है (मुझे खाना है)।

Bahut Dino Ke Baad Poem In Hindi Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों को तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज समूहों में विभक्त करें
पगडंडी, तालमखाना, गंध, मौलसिरी, टटका, फूल, मुसकान, फसल, स्पर्श, गवई, गन्ना
उत्तर-

  • तत्सम-गंध, स्पर्श
  • तद्भव-फूल, पगडंडी, मौलसिरी।
  • देशज-तालमखाना, टटका, गवई, गन्ना।
  • विदेशज-मुस्कान, फसल।।

Bahut Dinon Ke Bad Kavita Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
सकर्मक और अकर्मक क्रिया में क्या अंतर है? सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
सकर्मक क्रिया उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की संभावना हो अर्थात् जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्त्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु पर अर्थात् कर्म पर पड़े। जैसे-राम आम खाता है। जिन क्रियाओं पर व्यापार और फल कर्ता पर हो, वे अकर्मक क्रिया कहलाती है। जैसे-राम सोता है।

Bahut Din Ke Bad Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के लिए प्रयुक्त विशेष्य बताइए
(i) कोकिल-कंठी,
(ii) पकी सुनहली,
(iii) गँवई,
(iv) चंदनवर्णी,
(v) ताजे-टटकी,
(vi) धान कूटती।
उत्तर-
(i) तान,
(i) फसलों,
(iii) पगडंडी,
(iv) धूल,
(v) फूल,
(vi) किशोरियाँ।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुत दिनों के बाद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता का परिचय दीजिए।
उत्तर-
नागार्जुन की यह कविता मिथिला की धरती तरौनी जो कवि की जन्मभूमि रही है, की सुरभि से सुरभित है। कवि यथार्थ का शिल्पी और रागात्मक संवेदनाओं का अमर गायक रहा है। अपने गाँव-जवार की प्रति कवि के मन में प्रगाढ़ स्नेह एवं दुलार है। ग्रामीण परिवेश की टटकी छवियों का चित्रांकन ‘बहुत दिनों के बाद’ कविता में सफलतापूर्वक किया गया है। पठित कविता में कवि की सहृदयता, सौन्दर्यानुभूति एवं विशिष्ट रागात्मक संवेदना उकेरी गई है। कवि की संवेदना मानव-जीवन के चित्रण में शहर की अपेक्षा गाँवों के प्रति अधिक उभरी है।

कवि जब रोजी-रोटी की तलाश में देश-देशान्तर की खाक छान रहा था, तब उसे अपने ग्राम ‘तरउनी’ की याद सताने लगती है। यह कविता घुमक्कड़ कवि की ग्रामीण प्रकृति और घरेलू संवेदना का दुर्लभ अहसास कराती है। ‘तरउनी’ मिथिला का एक अदना-सा गाँव है, इस गाँव का अदना कवि यहाँ की मिट्टी से इतना प्रभावित है कि उसे वह गाँव स्वर्ग-तुल्य लगता है। यह कविता उनकी ‘सतरंगे पंखों वाली’ काव्यकृति में संकलित है। कृति का प्रकाशन 1950 ई. में हुआ था।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु को देखकर आँखों का सुख प्राप्त किया? .
उत्तर-
पकी सुनहली फसलों की मुस्कान को देखकर।

प्रश्न 2.
बहुत दिनों के बाद कवि को क्या सुनने का सुख प्राप्त हुआ?
उत्तर-
गाँव में धान कूटती हुई किशोरियों के कोकिल कंठ से निकली तान सुनकर।

प्रश्न 3.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु की गन्ध का सुख प्राप्त किया?
उत्तर-
मौलश्री के ढेर सारे टटके फूलों की गन्ध का।

प्रश्न 4.
बहुत दिनों के बाद कवि ने कहाँ की धूल का स्पर्श-सुख प्राप्त किया?
उत्तर-
अपने गाँव की चन्दनवर्णी धूल को स्पर्श करने का सुख प्राप्त किया।

प्रश्न 5.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु का स्वाद प्राप्त किया?
उत्तर-
ताल मखाने को खाने और गन्ने को चूसने का।

प्रश्न 6.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में किस बात की अभिव्यक्ति हुयी है?
उत्तर-
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में सौंदर्य चेतना की अभिव्यक्ति हुयी है।

प्रश्न 7.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में कहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन हुआ है?
उत्तर-
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में कवि नागार्जुन ने गाँव की प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है।

प्रश्न 8.
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान में कौन-सा बिंब दिखाई पड़ता है?
उत्तर-
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान में स्राय बिंब दिखाई पड़ता है।

बहुत दिनों के बाद वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कविता के कवि हैं?
(क) नरेश सक्सेना
(ख) दिनकर
(ग) अरुण कमल
(घ) नागार्जुन
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 2.
नागार्जुन का जन्म कब हुआ था?
(क) 1911 ई०
(ख) 1813 ई०
(ग) 1907 ई०
(घ) 1905 ई०
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
‘नागार्जुन’ का जन्म स्थान था
(क) बेगूसराय
(ख) मुजफ्फरपुर
(ग) दरभंगा
(घ) मोतिहारी
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
‘नागार्जुन’ की कविता का नाम था
(क) बहुत दिनों के बाद
(ख) भस्मांकर
(ग) प्यासी पथराई आँखें
(घ) चंदना
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 5.
‘नागार्जुन’ का मूल नाम था
(क) वैद्यनाथ मिश्र
(ख) गोवर्धन मिश्र
(ग) सकलदेव मिश्र
(घ) जगदंबी मिश्र
उत्तर-
(क)

प्रश्न 6.
‘नागार्जुन’ की शिक्षा हुई थी
(क) बंगला में
(ख) हिन्दी में
(ग) संस्कृत में
(घ) उर्दू में
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 7.
कवि ‘नागार्जुन’ को कौन-सा जीवन पसंद था?
(क) सधुक्कड़ी
(ख) धुमक्कड़ी
(ग) शहरी
(घ) ग्रामीण
उत्तर-
(ख)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
कवि ने गाँव की धूल को ……………… कहा है।
उत्तर-
चन्दवर्णी।

प्रश्न 2.
कवि की कविता में ग्रामीण परिवेश का …………….. उभरता है।
उत्तर-
मार्मिक चित्र।

प्रश्न 3.
नागार्जुन को आधुनिक ……. कहा जाता है।
उत्तर-
कबीर।

प्रश्न 4.
नागार्जुन ने अपनी कविता में मिथिलांचल की …………….. का वर्णन किया है।
उत्तर-
अनुपम छटा।

प्रश्न 5.
बहुत दिनों के बाद कवि गाँव की पक्की सुनहली फसल को देखकर …………….. हो जाता है।
उत्तर-
आह्वादित।

प्रश्न 6.
प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल प्रायः …………….. दिखाई पड़ता था।
उत्तर-
उजार-वियावान।

प्रश्न 7.
लंबी इंतजारी के बाद ग्रामीण परिवेश का सच्चा सुख मिलना सुख के महत्व में ……………… लगा दिया है।
उत्तर-
चार चाँद।

प्रश्न 8.
कवि की कविता देशज प्रकृति और घेरलू संवेदनाओं का …………….. प्रस्तुत करती है।
उत्तर-
दुर्लभ साक्ष्य

प्रश्न 9.
ऐन्द्रिय आधार और स्थायी मन-मिजाज का यह कविता एक दुर्लभ और ……………… है।
उत्तर-
अद्वितीय उदाहरण।

बहुत दिनों के बाद कवि परिचय – नागार्जुन (1911-1998)

जीवन-परिचय-
नागार्जुन का जन्म 1911 ई. में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव (उनके ननिहाल) में हुआ था। वे तरौनी के निवासी थे एवं उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई। 1936 ई. में श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म में दीक्षित जेल की यात्रा भी करनी पड़ी।

1935 में उन्होंने ‘दीपक’ (हिंदी मासिक) तथा 1942-43 में ‘विश्वबंधु’ (साप्ताहिक) पत्रिका का संपादन किया। मैथिली काव्य-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित किए गए। 1998 ई. में उनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ-बाबा नागार्जुन की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं-युगधारा, प्यासी पथराई आँखें, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, रत्नगर्भा, ऐसे भी हम क्या, ऐसे भी तुम क्या, पका है कटहल, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा, भस्मांकुर (खंडकाव्य)। मैथिली में उनकी कविताओं के दो संकलन हैं-चित्रा, पत्रहीन नग्नगाछ। बलचनमा, रतिनाथ की चाची, कुंभी पाक, उग्रतारा, जुमनिया का बाबा, वरुण के बेटे (हिंदी), पारो, नवतुरिया, बलचनमा (मैथिली) जैसे उनके उपन्यास विशेष महत्त्व के हैं।

भाषा-शैली-नागार्जुन का हिंदी और मैथिली के साथ संस्कृत पर भी समान अधिकार होने के कारण उनकी काव्य भाषा में हाँ एक ओर संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि मिलती है, वहीं दूसरी ओर बोलचाल की भाषा की सहजता भी दिखाई देती हैं। उनके काव्य में तत्सम शब्दों के प्रयोग के साथ ही ग्राम्यांचल शब्दों का भी समुचित प्रयोग हुआ है। उन्होंने मुहावरों का भी समावेश अपनी कविताओं में किया है। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण शैली का सफल प्रयोग सामाजिक-विसंगतियों के चित्रण में किया है।

साहित्यिक विशेषताएँ-नागार्जुन प्रगतिवादी विचारधारा के कवि हैं। वे जनसामान्य, श्रम तथा धरती से जुड़े लोगों की बात अपनी कविताओं में कहते हैं। वे जन भावनाओं और समाज की पीड़ा को व्यक्त करते हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त विषमताओं को देखा है, समझा है, अतः उनका वर्णन स्वाभाविक है। विषय की जितनी विराटता और प्रस्तुति की जितनी सहजता नागार्जुन के रचना संचार में है, उतनी शायद ही कहीं और हो। लोक जीवन और प्रकृति उनकी रचनाओं की नस-नस में रची-बसी है। छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं, जिनकी कविताओं का ग्रामीण चौपाल से लेकर विद्वानों तक में समान रूप से आदर प्राप्त है। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गई उनकी कविताएँ इतनी सहज, संप्रेषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि वे पाठक के मानस-लोक में बस जाती हैं।

बाबा नागार्जुन कभी मार्क्सवाद की वकालत करते हैं, कभी समाज में व्याप्त शोषण का वर्णन करते हैं और कभी प्रकृति का मनोहारी वर्णन करते हैं। उनकी कविताओं में शिष्टगंभीर हास्य और सूक्ष्म चुटीले व्यंग्यों की अधिकता है।

कवि के मन में श्रम के प्रति सम्मान का भाव है। प्रकृति से भी नागार्जुन को बहुत लगाव है। बादल कवि को मृग रूप में दिखाई देता है। उसने रूपक के माध्यम से बादलों को चौकड़ी करते देखा है।

नागार्जुन संस्कृत भाषा का गंभीर ज्ञान रखते थे। अतः उनकी भाषा संस्कृत शब्दावली से युक्त है। उनकी काव्यभाषा में संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि मिलती। वे प्रगतिवादी विचारध रा के कवि हैं, अतः उन्होंने बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया है। उनकी भाषा में सरता है, स्वाभाविकता है। उन्होंने खड़ी बोली के लोक प्रचलित रूप को अपनाया है। उनकी अभिव्यक्ति एकदम स्पष्ट, यथार्थ और ठोस है। व्यंग्य का बाहुल्य है। लोकमंगल उनकी कविता की मुख्य विशेषता है, इस कारण व्यावहारिक धरातल भी दिखाई देती है। उन्होंने विभिन्न छंदों में काव्य रचना की है और मुक्त छंद में भी। अलंकारों का आकर्षण उनमें नहीं है। आधुनिक कवियों में नागार्जुन का विशेष स्थान है।

बहुत दिनों के बाद कविता का सारांश

वर्तमान के वैताली प्रतिबद्ध मार्क्सवादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और जनकवि बाबा नागार्जुन रचित कविता शुद्ध प्रकृति प्रेम की कविता है। जो स्वयं को खोजना चाहता है, स्वयं को परिपूर्ण ऊर्जावान और अर्थवान बनाना चाहता है। वह प्रकृति की गोद में जाता है। प्रकृति से प्रकृत रूप में मिलन की कविता है, बहुत दिनों के बाद।

आधुनिक युग संत्रास, विषाद असंतोष का पर्याय है। जीवन-यापन के लिए आपा-धापी लगी हुई गला काट प्रतियोगिता जारी है। निजता की स्थापना में निजता का छिजन, क्षरण होता जा रहा है। अपने अस्तित्व को पुनः पाने रस पूर्ण, गंध पूर्ण करने के लिए कवि कार्तिक माह में अपने मिथिलांचल स्थिति “तरौनी” गाँव आए। और उसे दूर से धान की सुनहली पकी बालियाँ झूमती मुस्कराती नजर आयीं। इन्हें देखकर कवि का मन प्रसन्न हो गया। ऐन्द्रिय भोग का एक साधन नेत्र है। जो दूर से दृश्य दिखाकर भी तृप्ति प्रदान करती है।

कवि नागार्जुन जब अपने गाँव में प्रविष्ट हुआ तो ओखल में मूसल की मार, ढेंकी की चोट के साथ कोयल-सी मधुर आवाज में गाँव की किशोरियों के गले से गाँव के गीत सुनने को मिले, कानों को भी तृप्ति प्राप्त हुई।

आगे बढ़ा तो मौलसिरी अपनी मादकता अपने अगणित फूलों के माध्यम से बिखेर रही थी। “अंजुली-अंजुली” उठाकर इन फूलों को कवि ने सूंधे, नाक की प्यास भी बूझी। गाँव की पगडंडियों पर खाली पाँव चलते हुए गाँव की मिट्टी धूल का स्पर्श सुख चंदन सुवासित सुख सम प्रतीत हुआ।

अब बारी आई षट्स की पहचान करने वाली जिह्वा की। मिथिला के ताल मखाने में और ईखों (गन्नों) में जो स्वाद है, वह ‘फाइव स्टार’ या काटिनेंटल डिसेज में कहाँ है। जिह्वा के माध्यम से पेट भी भर गया। ऐसी तृप्ति कवि को बहुत दिनों के बाद हुई। यदि वह लगातार इसी परिवेश में रहता तो शायद तब यह कविता नहीं रची जाती।

वियोग, विछोह, असंतुष्टि के कारण प्रकृति के इन उपादानों को देखने, सुनने, सुंघने, छूने और खाने का अवसर मिला। सब कुछ मुफ्त, निःशुल्क शुद्ध, सात्विक और पवित्र अवस्था में। कवि अतिम बंद में ‘भोगे’ शब्द का उपयोग करता है। कहा भी गया है “वीर भोग्य वसुन्धरा धरती” भू का प्रत्येक अवयव, घटक भोग्य है। उपयोगी है। आवश्यकता है प्रकृति के इस योगदान को स्वीकार करने का। आवश्कता है कृत्रिमता का केचुल उतारकर प्रकृत रूप में हम रहें।

‘बहुत दिनों के बाद’ कविता प्रकृति प्रेम की अपने प्रकार की अनूठी कविता है। इसमें उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकार भी सहज चले आये हैं। सम्पूर्ण कविता उल्लास का सृजन करती है। प्रकृति की ओर लौटने का आह्वान करती है।

वास्तव मे, बहुत दिनों के बाद मिथिला के घुमक्कड़ नागार्जुन की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना एक दुर्लभ साक्ष्य को दर्शाती है।

बहुत दिनों के बाद कठिन शब्दों का अर्थ

जी-भर-मन भर, इच्छा भर। किशोरी-नयी उम्र की लड़की। कोकिलकंठी-कोयल जैसे मीठे स्वर वाली। गवई-गाँव की। चंदनवर्णी-चंदन के रंग की। मोलसिरी (मोलिश्री)-एक बड़ा सदाबहार पेड़ जिसमें छोटे-छोटे सुगंधित फूल लगते हैं, बकुल। तालमखाना-एक मेवा जो मिथिला की ताल-तलैया में विशेष रूप से उपजाया जाता है। गन्ना-ईख। पगडंडो-कच्चा-पतला-इकहरा रास्ता। भू-पृथ्वी।

बहुत दिनों के बाद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. बहुत दिनों के बाद ………………. साथ-साथ इस भू पर। .
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवादी कवि नागार्जुन की कविता “बहुत दिनों के बाद” से ली गयी है। कवि ने इस कविता में बहुत दिनों के बाद गाँव में रहकर विविध वस्तुओं का सुख भोगने की स्थिति का वर्णन किया है।

कवि कहता है कि बहुत दिनों के बाद इस बार गाँव में रहकर रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श का भरपूर सुख लिया। कवि ने कविता के प्रथम छन्द में पकी सुनहली फसल की मुस्कान का सुख भोगने की बात कही है जो नये सुख के अन्तर्गत आता है। अतः रूप है। दूसरे छन्द में गाँव की किशोरियों द्वारा धान कूटने के समय कोकिल कंठ से गीत गाने या मधुर वार्तालाप करने का वर्णन किया है जो श्रवण सुख का विषय है। यही शब्द है। तीसरे छन्द में मौलश्री के ताजा पुष्पों की गंध सूंघने का वर्णन है जो घ्राण सुख का विषय है अतः गन्ध है।

चौथे छन्द में गाँव की चन्दनी-माटी छूने का वर्णन है जो स्पर्श का विषय है। पाँचवें छन्द में तालमखाना खाने और गन्ने का रस चूसने का उल्लेख है जो रस के अन्तर्गत है। यह स्वाद संवेदना का विषय है। इस तरह इस छन्द में पूर्व के पाँच छन्दों में वर्णित विषयों का समाहार हो गया है। पूर्व के पाँच छन्दों में क्रमशः रूप, शब्द, गन्ध, स्पर्श और रस की व्याख्या है और इस छन्द में इन पाँचों – को सूत्र रूप में पिरो कर कहा गया है। इस तरह सूत्र शैली तथ्य-कथन के कारण ये पतियों महत्त्वपूर्ण है। कथावस्तु के आलोक में यह तत्त्व प्रकाश में आया है।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 6 गंगा स्तृति

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 6 गंगा स्तृति Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 6 गंगा स्तृति

Bihar Board Class 7 Hindi गंगा स्तृति Text Book Questions and Answers

पाठ से –

गंगा स्तुति भावार्थ Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 1.
‘गंगा स्तुति’ कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर:
मैथिल कोकिल कवि विद्यापति ।

गंगा स्तुति कविता का भावार्थ Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 2.
गंगा के किनारे को छोड़ते समय कवि के आँखों से आँसू क्यों बह रहे.थे?
उत्तर:
गंगा के किनारे पर रहकर कवि विद्यापति को जो अध्यात्मिक सुख की अनुमति हुई वह अब कवि के लिए वास्तविक सुख था। अब कवि जब गंगा की निकटता को छोड़ रहा है तो उसके आँखों में आँस आ गये।

गंगा स्तुति कविता Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 3.
कवि गंगा से किस अपराध की क्षमा माँगता है?
उत्तर:
कवि स्नान काल में जो अपना पैर गंगा जल में रखा उसे वह अपराध मानता है तथा इसके लिए क्षमा माँगता है।

Ganga Stuti Class 7 Bihar Board Hindi प्रश्न 4.
कविता की निम्नलिखित पंक्तियों को पूरा कीजिए –
उत्तर:
(क) कि करब जप-तप जोग धेयाने।
जनम कृतारथ एकहि सनाने ।

(ख) भनई विद्यापति समदओं तोही।
अन्तकाल जनु विसरहु मोही ॥

पाठ से आगे –

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solution प्रश्न 1.
इस पाट’ शीर्षक “मंगा स्तुति” रखा गया है। क्या आप इस शीर्षक से सहमत है? यदि हाँ तो क्यों और नहीं तो क्यों ?
उत्तर:
इस पाठ का शीर्षक “गंगा स्तुति” रखा गया है। इस शीर्षक से हम पूर्णत: सहमत हैं। क्योंकि कवि विद्यापति अपने इष्ट देवी गंगा से सम्पूर्ण कविता में मात्र प्रार्थना की है।

Ganga Stuti Kavita Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 2.
गंगा के अतिरिक्त अन्य नदियाँ भी हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं। इन नदियों का हमारे दैनिक जीवन में क्या महत्व है, उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गंगा के अतिरिक्त अन्य नदियाँ भी हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं क्योंकि इन नदियों का हमारे दैनिक जीवन में बहुत महत्व है।
जैसे – नदियों में हम स्नान करते हैं। नदियों का पानी पीने के काम में भी आता है। नदियों के जल से सिंचाई होती है। नदियों के पानी से बिजली उत्पादन होता है। नदियों के रास्ते से व्यापार भी होता है। नदियों के रास्ते से हम यात्रा भी करते हैं।

व्याकरण –

Bihar Board Solution Class 7 Hindi प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का पर्याय लिखिए
उत्तर:
(क) पाओल – प्राप्त किया; पाया।
(ख) छोड़इत – छोड़ते, त्यागते।
(ग) समदओं – मनाऊँ, विनमऊ
(घ) सननि – स्नान, नहाना।
(ङ) पाय – पाद, चरण, पैर

कुछ करने को –

Bihar Board Class 7 Hindi Book Pdf प्रश्न 1.
गंगा के उद्गम स्थल से उसके समुद्र में मिलने तक की यात्रा के प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
गंगा का उद्गम स्थान हिमालय का गोमुख (गंगोत्री) है वहाँ से चलकर गंगा अनेक ऊँची पर्वतीय एवं वन प्रदेश से गुजरते हुए हरिद्वार में आकर समतल भूमि पर बहने लगती है। रास्ते में वह अनेक नदियों को अपने साथ लेकर तीन रास्ते से चलकर गंगा सागर तक पहुँच जाती है जो गंगा-सागर कहलाता है।

Hindi Class 7 Bihar Board Solution प्रश्न 2.
गंगा के किनारे बसे शहरों की सूची बनाइए। इन शहरों में स्थित कल-कारखानों से गंगा नदी पर किस प्रकार का दुष्प्रभाव पड़ता है। इस पर अपने सहपाठियों से चर्चा कीजिए एवं लिखिए।
उत्तर:
गंगा के दोनों तटों पर अनेक शहर बसे हैं –

जैसे – हरिद्वार, काशी, मुगलसराय, बक्सर, पटना, बरौनी, मुंगेर भागलपुर, कलकत्ता इत्यादि।

इन सभी शहरों में कल-कारखाने हैं जिसके रासायनिक पदार्थ युक्त गंदे जल गंगा में गिर रहे हैं जिससे गंगा में स्थित जलीय जीव पर दुष्प्रभाव तो पड़ ही रहा है साथ-साथ हमारे जीवन पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। हमलोग मलयुक्त विषाक्त गंगा जल का दैनिक जीवन में उपयोग कर रहे हैं जिससे अनेक रोगों का आक्रमण हमारे ऊपर हो रहा है। गन्दगी से गंगा पट रही है परिणामतः गंगा दिन-प्रतिदिन दूषित कमजोर हो रही है। ऐसा भी दिन आ सकता है जब गंगा कूड़े-कर्कटों से भर जायेगी तथा गंगा के जल का दर्शन भी नहीं होगा।

गंगा स्तृति Summary in Hindi

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे॥
छोड़इत निकट नयन बह नीरे।

भावार्थ – हे माता गंगे ! आपके तट पर रहकर मैंने अद्वितीय श्रेष्ठ सुख को प्राप्त किया है। आपकी निकटता को छोड़ते हुए मेरे आँखों से आँसू बह रहे है।

कर जोरी विनमऔं विमल तरंगें,
पुन दरसन होए, पुन मति गंगे।

भावार्थ – हे पवित्र तरंग वाली ! आपको मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि हे पुण्यमयी गंगे! आपका पुनः दर्शन हो।

एक अपराध छेमब मोर जानी।
परसल माय पाय तुअ पानी॥

भावार्थ-हे मातु गंगे-मेरा एक अपराध समझकर क्षमा कर दें। क्योंकि हे माता, आपके पवित्र जल को मैंने अपने पैर से स्पर्श कर दिया है।

कि करब जप-तप जोग द्येयानि ।
जनम कृतारथ एकहि सनाने ॥

भावार्थ-हे मातु गंगे! जब आपके जल में मात्र एक बार स्नान करने – से जन्म सफल हो जाता है तो जप-तप-योग-ध्यान करने की क्या आवश्यकता है।

भनई विद्यापति समदओं तोही।
अन्तकाल जनु विसरहु मोही॥
भावार्थ – हे मातु गंगे ! कवि विद्यापति आपसे प्रार्थना करता है किआप हमें अन्त समय (मृत्युकाल) में नहीं भूलियेगा।
अर्थात् अवश्य दर्शन दीजियेगा।

Bihar Board Class 12 English Book Solutions Poem 9 Snake

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Rainbow English Book Class 12 Solutions Poem 9 Snake

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Bihar Board Class 12 English Snake Text Book Questions and Answers

B. 1.1. Write T for true and F for false statements

(a) It was a hot day when the thirsty snake came to drink water.
(b) The speaker was in a haste to drink water.
(c) The colour of the snake was yellow-black.
(d) The speaker considered himself a second comer to the trough.
Answer:
(a) T (b) T (c) F (d) T.

B.1.2. Answer the following questions briefly 

Snake Question Answer Bihar Board Class 12 Question 1.
Where did the speaker meet the snake?
Answer:
The speaker met the snake near water trough of his house. It had come there to drink water. The speaker had also went there for the same purpose i.e. for drinking water.

Snake Questions And Answers Bihar Board Class 12 Question 2.
Why had it come out of its hole near the trough?
Answer:
It had come out of its hole near the trough to drink water because it was too hot and the snake was thirsty.

Snake Poem Questions And Answers Bihar Board Class 12 Question 3.
Why did the speaker decide to wait?
Answer:
The speaker decided to wait because the snake had come first near the water through and he (speaker) was a second-comer.

B. 2.1. Write T for true and F for false statements

(a) The snake looked at the speaker vaguely.
(b) The day mentioned in the poem is that of June.
(c) There was a superstitious belief in Sicily to kill a black snake.
(d) The speaker was glad playing host to a snake.
(e) The snake departed in an obliged way.
(1) The speaker had a desire to talk to the snake.
Answer:
(a) T (b) F (c) F (d) T (e) F (f) T

B.2.2. Answer the following questions briefly 

Snake Dh Lawrence Questions Bihar Board Class 12 Question 1.
How did the snake drink water?
Answer:
The snake went to the water-trough and put his mouth upon the depth (bottom) of that trough. He sipped (drank slowly) the water with its straight mouth.

Bihar Board Rainbow English Book Class 12 Pdf Download Question 2.
What is the meaning of ‘Sicilian July’ with Etna smoking?
Answer:
‘Sicilian July’ with Etna smoking means extreme heat like the one caused when Etna erupted i.e. it was so hot as the volcano Etna in Sicily.

Bihar Board Class 12 English Book Solution Question 3.
What is the belief prevailing in Sicily about a snake?
Answer:
The belief prevailing in Sicily about a snake was that black snakes are innocent, the gold are venomous. So yellow-brown (golden) snake would be killed.

Class 12th English Book Bihar Board Question 4.
Why did the speaker like the snake?
Answer:
The speaker liked the snake because it looked most innocent. It drank the water peacefully for which it came there.

Rainbow English Book For Class 12 Solutions Question 5.
Do you think he had a conflict in mind?
Answer:
Yes, I think that he had a conflict in mind. He was afraid of it and also thought that it was a guest which came to drink water at his house.

B. 3.1. Write T for true and F for false statements 

(a) The speaker found the slow movement of the snake quite impressive.
(b) The speaker did not like the snake going back to the dark hole.
(c) He threw the pitcher at the snake.
(d) He later regretted having hit it.
(e) He compares it to a sea-bird, albatross.
(f) The snake appeared like a king in exile.
Answer:
(a) T (b) T (c) F (d) T (e) T (f) T.

B.3.2. Answer the following questions briefly

Bihar Board Solution Class 12th English Question 1.
What thing about the snake did appeal him most?
Answer:
It came to the poet’s house to drink water as a guest. It came calmly for the purpose and departed peacefully being satisfied, had appealed him most.

Class 12 English Book Bihar Board Question 2.
Why did he not like it going back to the dark hole?
Answer:
The poet did not like it going back to the dark hole because he was just thinking about the snake that it was just like a guest and as such like a god.

English Book For Class 12 Bihar Board Question 3.
What was his reaction after hitting the snake?
Answer:
He (the speaker) regretted after hitting it (snake). He felt that he had done wrong. How mean, how much uncivilized was his act. By doing so he had committed a sin, was his reaction.

Question 4.
Why did the speaker consider it “a king in exile”?
Answer:
The speaker considered it ‘a king in exile’ because it was peaceful and had done nothing wrong with him. He was his guest as well. Its look was like a king in exite. It did not misuse its power.

C. 1. Long Answer Questions

Question 1.
The speaker was fascinated by the snake. Do you think the time mentioned and the place it belonged to has anything to do with fascination?
Answer:
It was an extremely hot summer’s night. The speaker felt thirsty and as such he came out of his room with a pitcher to take water to drink. He saw a snake near the water trough, who had come from a nearby hole for the same purpose i.e. to drink water, after feeling thirsty. Though it was a yellow-brown fierceful cobra with its eyes shinning but its manners were decent. It sipped the water softly and peacefully with its straight gums from the water-trough. Being pacified it returned back to the black hole of the earth, from where it had come. It vaguely looked at the speaker but did no harm. The speaker was so much enchanted with its action and behaviour that he liked its association for some time. He was so admired that he thought it to be his guest. Further¬more, he was so fascinated that it (snake) looked like a god to him. As such the time and the place of its arrival on the scene bears no importance, but its gentle and sober look and behaviour impressed the speaker.

Question 2.
What does he mean by ‘the voice of my education?’
Answer:
It is privilent that snakes become poisonous. If most of them who are poisonous bite a human being, he will not survive and is bound to die. People become frightened it a snake appears before them. As such they kill the snake. Such type of training to kill the snake is being imparted by elderly persons to youngers. Elderly persons instruct their youngsters to kill the snake as and when they happen to see it. Here voice of my education denotes the same meaning to kill the snake when it appears before you. Here there is a special reference, a special meaning of the above term. In Sicily, where the speaker resides, there is a proverb “the black serpant are innocent and the gold (yellow) are poisonous”. This cobra happens to be brown-yellow and ought to be killed.

Question 3.
There was a conflict in the mind of the poet How did he analyse this conflict?
Answer:
Of course, there was a conflict in the poet’s mind when he met with the cobra. The cobra feeling thirsty in the hot summer night had come to drink water in the out-house of his residence. The poet was in the state of confusion regarding his role at that time and situation Several ideas and feelings engulfed his mind, such as

  • was it cowardise that he did not dare to kill it.
  • was it improper, out of his coriosity not to talk with the snake?
  • was it his humble act or feeling of humanity to feel so honoured (The poet had really felt honoured.)
  • and then he remembered the advice of elderly persons that if he was not afraid he would kill it (snake)
  • and feeling of its being a guest too haunted his mind.
  • and for its (snake’s) humbleness and peaceful behaviour, it (snake) appears to him as uncrowned king in exile.

These were the issues of conflict in his mind.

Question 4.
In what roles did he find the snake and himself ? Describe.
Answer:
He (The poet) found the snake and himself in different roles according to the situation. The snake felt thirsty in the hot summer’s night and came out of the hole beneath the earth and moved towards the water-trough in the out¬house of the poet’s residence. Being thirsty, he also came out of his house with a pitcher and found the snake siping wafer from the water trough there. Poet, being the second person to go there thought it proper to wait. He considered the snake as his guest also, who had come there to drink water. He thought it proper to welcome his guest, at his place. The snake was gentle by behaviour according to the poet. It peacefully left the place after getting satisfied and did not cause any harm to him. So, both of them-the poet and the snake very well performed their roles.

Question. 5.
The snake seemed like a king in exile. What are the qualities that makes the snake so majestic?
Answer:
The snake was very sober and peaceful. It quietly came and satisfied its thirst by sipping water and looked around like a god. The poet was highly impressed with its make and gentle behavior. It caused no damage to the speaker nor it attacked on him. Most cordially it returned back to the black hole, through which it had come from. It did not react to the poet’s hitting its body by a stick. So it (snake) seemed to him like an uncrowned king in exile.

Question 6.
What makes you think that hitting the snake was quite against the sensibility of the speaker?
Answer:
Being panicky the speaker picked up an awkward piece of stick and threw it towards the snake which hit its latter part of the body. He thought that it did not hit it (snake). The part of the body left behind convulsed (suddenly shakened) which indicated that the stick had caused injury to its body that left behind. It was shocking to him. He became felt sorry for his indecent and undesirable act. He thought that he had committed a wrong. It shows that hitting the snake was quite against his sensibility.

Question 7.
What is the sin committed by the speaker that he wanted to expiate?
Answer:
A sort of horror and a sort of protest to see the snake, sipping water by its straight mouth from the water trough, compelled him to hit the snake by a stick (log). But immediately after hitting it (snake), the speaker regretted it. He thought that he had done a vulgar, shameful, and mean act. He felt that by doing this he had committed a sin, which he would not have done. He hated on himself and of such human education to kill a snake. He wanted to accept punishment for such ‘sin’.

Question 8.
Give in short the summary of the poem, “Snake”. [B.M. 2009]
Or, Write a short note on the poem, “Snake”.
Answer:
D. H. Lawrence is a noted poet, novelist, essayist, short story writer and letter-writer. In this poem, the poet describes how one night he felt thirsty and got up to drink water. While he was moving towards the tap he found a snake coming out from the fissure of the earth. The poet was fascinated by the look and movement of the snake. Instead of killing it, he began to watch its movement. It moved towards the tap and drank water. Thereafter it began to return towards the hole. A conflict seized the mind of the poet whether to kill the snake or not. In fact, he began to like it. The poet was confused. Sometimes he considered himself a coward, sometimes prevers and sometimes an honurable being. Finally, when the snake entered partly in the hole the poet killed it with a piece of log. The poet is filled with remorse. He considers this act of his as paltry, vulgar, and mean. He condemns human education that prompted him to kill it. The poet remembers and he thinks that he has done an albatross. To him, the snake was like a king in exile. He regrets that he has missed a chance “With o.ie of the Lords of Life”.

C. 3. Composition

Write a short essay in about 150 words on the following:
(a) Human greed and environmental degradation.
Answer:
All our Si mounding together forms our environment. It is the most essential part of our life. Nowadays the environment has degraded a lot. The most important cause of this degradation is human greed. It has increased the pollution to the extent that the earth has come in danger. We are over¬exploiting our resources. This has resulted in the depletion of resources. Harmful gases are spread all around inviting many diseases. So, human need to get aware to eradicate this problem.

(b) Religion teaches tolerance and humility.
Answer:
Religion is known to give a specific identity to one in the society. There are many religions in the world having their different religious customs and belief. All religions have many good qualities in them. All teach us to walk in the path of honesty, love, and humanity. It teaches us the lesson of tolerance and humility. One who is truly a religious person always respects not only his own religion but also other religions. This forms the basis of social development and prosperity. It improves fraternity and strengthens national unity.

D. Word Study :
D.l. Dictionary Use

Ex. 1. Correct the spelling of the following words:
fishure, streight, flikered, muzed, parvarsity, delibarately, convalsed, wreethed, fassination, uncrouned
Answer:
fishure — fissure streight
flikered — flickered
parvarsity — perversity
convalsed — convulsed
fassination — fascination
streight — straight
muzed — muzzed
delibarately — deliberately
wreethed — writhed
uncrouned — uncrowned

D.2. Word-formation

Read the following lines from the poem carefully:
But suddenly that part of him that was left behind cunvulsed in undignified haste. Like a king in exile, uncrowned in the underworld.
In the above lines ‘undignified’ and ‘uncrowned’ have prefix ‘un—’ which make them ‘negative’ in meaning.
Add prefixes ‘un-‘, in-‘, il—’ir’, ‘dis-‘ to the following words and fill in the blanks to complete the sentences given below:
(i) Pragya could not get good marks in the ‘writing test’ because of her……………….. writing fast.
(ii) Man becomes……………….. because of his action.
(iii) His……………….. behavior is not liked by us.
(iv) You cannot win the case by your………………… arguments.
(v) There are still many…………………. planets and stars in the universe.
(vi) His blunt refusal to come was a sign of………………….
Answer:
(i) disability, (ii) immortal, (iii) irresponsible, (iv) unlogical, (v) unknown, (vi) disrespect.

D. 3. Word-meaning

Ex. 1. Read the poem carefully to find out where the following phrases have been used.
looked at, looked around, drew up, put down. left behind, the thought of
Fill in the blanks with appropriate phrases listed above:
(i) Varsha…………………. her papers on the table and went out.
(ii) We could not a…………… better plan.
(iii) He ran slowly and soon was………………all other runners.
(iv) We…………. the painting in admiration.
(v) The acrobat……………. himself before jumping over the rope.
(vi) The thirsty man……………….. in search of water.
Answer:
(i) put down, (ii) drew up, (iii) left behind by, (iv) looked at, (v) drew up, (vi) looked around.

E. Grammar

Ex. 1. Go through the poem carefully and underline the lines where the following words/nouns have been used:
slackness clearness cowardice perversity
hospitality blackness pettiness humility

Q. Change the above words in adjectives and use them in the following sentences:
(i) Mr. John has very…………… ideas on the success of democracy in India.
(ii) …………..men die several times.
(iii) Films should not glorify sex……………. behaviors.
(iv) The sky suddenly turned………………….
(v) He often perturbs his parents with demands.
(vi) Though he occupies a high post, he is quite
(vii) His……………… approach aggravated the problem.
(viii) Mrs. Juber was quite………………. with her guests.
Answer:
(i) clear, (ii) Coward, (iii) slack, (iv) black, (v) petty, (vi) humble, (vii) perversive, (viii) hospitable.

Comprehension Based Questions with Answers

Q.1. Read the following extracts of the poem, “Snake” and answer the questions that follow: [B.M.2009A]
A snake came to my water-trough:

on a hot day, and I in Pyjamas for the heat,
To drink there.
In the deep, strange scented shade of the great dark,
I came down the steps with my pitcher
And must wait, must stand and wait,
for there he was at the trough before me.

5. The voice of my education said to me He must be killed,
For in a Sicily the black, black snakes are innocent, the gold is venomous.
And the voice in me said if you were a man
You would take a stick and break him now, and finish him off.

Questions:
1. What is Sicillian belief?
2. What does the poet mean by “The voice of education”?
3. What does “The voice of education” tell the poet?
4. Why does the poet not kill the snake?
5. What should have he done if he were a man?
Answers:
1. The Sicilian belief is that a black snake must be killed because it is an evil creature.
2. “The voice of education” means a civilized intellectual approach to life as opened to the instinctive approach where man and nature are one.
3. The voice of education tells the poet to kill the snake them and there. It should not be allowed to move freely in the human world.
4. The poet does not kill the snake, going against the voice of education because he loves it, heart and soul.
5. He should have taken a stick and finished the snake off if he were a man.

2. He reached down from a fissure in the earth-wall in the gloom
And trailed his yellow-brown slackness soft-bellied down,
Over the edge of the stone trough
And rested his throat upon the stone bottom,

3. And where the water had dripped from the tap, in a small clearness,
He sipped with his straight mouth,
Softly drank through his straight gums into his long body, silently.
Someone was before me at my water-trough,
And I, like a second comer, waiting.

4. He lifted his head from his drinking, as cattle do,
And looked at me vaguely, as drinking cattle do,
And flickered his two-forked tongue from his lips and mused a moment,
And stooped and drank a little more,
Being earth-brown, earth-golden from the burning bowels of the earth
On the day of “Sicilian July with Etna smoking.

5. The voice of my education said to me He must be killed,
For in a sicily the black, black snakes are innocent, the gold are venomous.
And voice in me said if you were a man
You would take a stick and break him now, and finish him off.

Questions:
1. What is the Sicillian belief?
2. What does the poet mean by “The voice of education”?
3. What does “The voice of education” tell the poet?
4. Why does the poet not kill the snake?
5. What should have he done if he were a man?
Answers:
1. The Sicilian belief is that a black snake must be killed because it is an evil creature.
2. “The voice of education” means civilized intellectual approach to life as opened to the instinctive approach where man and nature are one.
3. The voice of education tells the poet to kill the snake them and there. It shoul not be allowed to move freely in the human world.
4. The poet does not kill the snake, going against the voice of education because he loves it heart and soul.
5. He should have taken a stick and finished the snake off if he were a man.

6. But must I confess how I liked him,
How glad I was he had come like a guest in quiet, to drink at my water- trough.
And depart peaceful, pacified and thankless,
Into the burning bowels of this earth?

7. Was it cowardice, that I dared not kill him?
Was it perversity, that I longed to talk to him?
Was it humility, to feel so honoured?
I felt so honoured.
And yet those voices
“If you were not afraid, you would kill him”.

8. And truly I was afraid, I was most afraid
But even so, honoured still more
That he should seek my hospitality
From out the dark door or the secret earth,

9. He drank enough
And lifted his head dreamily as one who has drunken,
and flickered his tongue like a forked night on the air, so black,
Seeming to lick his lips,
And looked around like a god, unseeing, into the air,
And slowly turned his head,
And slowly, very slowly, as if thrice adream,
Proceeded to draw his slow length curving round,
And climb again the broken bank of my wall-face,

10. And as he put his head into that dreadful hole,
And as he slowly drew up, snake-easing his shoulders and entered farther,
Deliberately going into the blackness, and slowly drawing himself after.
Overcame me now his back was turned.

11. I looked round, I put down my pitcher,
I picked up a clumsy log
And threw it at the water trough with a clatter.

12. I think it did not hit him,
But suddenly that part of him that was left behind convulsed in. undignified haste.
Writhed like lightning, and was gone into the black hole, the earth lipped fissure in the wall front,
At which, in the intense still noon, I stared with fascination.

13. And immediately I regretted it.
I thought how paltry, how vulgar, what a meant act!
I despised myself and the voices of my accursed human education.

14. And I thought of the albatross,
And I wished he would come back, my snake.

15. For he seemed to me again like L king?
Like a king in exile, uncrowned in the underworld,
Now due to be crowned again.

16. And so, I missed my chance with one of the lords of life.
And I have something to expiate:
Pettiness.

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Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 9 प्रगीत और समाज

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 9 प्रगीत और समाज

 

प्रगीत और समाज वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रगीत और समाज Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
‘प्रगीत’ और समाज, के लेखक हैं
(क) बालकृष्ण भट्ट
(ख) जयप्रकाश नारायण
(ग) नामवर सिंह
(घ) उदय प्रकाश
उत्तर-
(ग)

Prageet Aur Samaj Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
नामवर सिंह किस पत्रिका के संपादक थे?
(क) आलोचना
(ख) समन्वय
(ग) गंगा
(घ) माधुरी
उत्तर-
(क)

Bihar Board 12th Hindi Book Pdf प्रश्न 3.
‘सूर सागर’ क्या है?
(क) प्रबंध काव्य
(ख) गीति काव्य
(ग) चंपू काव्य
(घ) खंड काव्य
उत्तर-
(ग)

Bihar Board Hindi Book Class 12 Pdf Download प्रश्न 4.
कामायनी किनकी महाकृति है?
(क) बच्चन
(ख) श्यामनारायण पाण्डेय
(ग) नागार्जुन
(घ) जयशंकर प्रसाद
उत्तर-
(घ)

Hindi Gadya Sahitya Ka Itihas Class 12 Bihar Board प्रश्न 5.
नामवर सिंह द्वारा लिखित ‘प्रगीत’ और समाज क्या है?
(क) आलोचना
(ख) निबंध
(ग) एकांकी
(घ) आत्मकथा
उत्तर-
(ख)

Digant Hindi Book 12th Class Bihar Board प्रश्न 6.
“राम की शक्तिपूजा” किनका अख्यानक काव्य है?
(क) मोहनलाल महतो ‘वियोगी’
(ख) दिनकर
(ग) बच्चन
(घ) निराला
उत्तर-
(घ)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
नामवर सिंह का जन्म स्थान ……… वाराणसी, उत्तर प्रदेश है।
उत्तर-
जीअनपुर

प्रश्न 2.
नामवर सिंह काशी वि. वि. में अस्थायी ……… थे।
उत्तर-
व्याख्याता

प्रश्न 3.
नामवर सिंह का जन्म स्थान 28 जुलाई ……… हुआ था।
उत्तर-
1927 ई. को

प्रश्न 4.
नामवर सिंह को ‘कविता के नए प्रतिमान’ कृति पर साहित्य …….. पुरस्कार मिला था।
उत्तर-
अकादमी

प्रश्न 5.
नामवर सिंह के पिता जी एक ……….. थे।
उत्तर-
शिक्षक

प्रश्न 6.
नामवर सिंह की माता जी …………. हैं।
उत्तर-
वानेशरी देवी

प्रगीत और समाज अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण’ किनका आख्यानक काव्य है?
उत्तर-
जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 2.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य सिद्धान्त के आदर्श क्या थे?
उत्तर-
प्रबंध काव्य।

प्रश्न 3.
किस काव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है?
उत्तर-
प्रबंध काव्य।

प्रश्न 4.
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान किनकी कृति है?
उत्तर-
डॉ. त्रिभुवन सिंह।

प्रश्न 5.
नामवर सिंह का जन्म हुआ था।
उत्तर-
28 जुलाई, 1927 ई.।

प्रगीत और समाज पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर-
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य सिद्धान्त के आदर्श प्रबंधकाव्य थे। प्रबंधकाव्य में मानव जीवन का पूर्ण दृश्य होता है। उसमें घटनाओं की सम्बद्ध श्रृंखला और स्वाभाविक क्रम से ठीक-ठीक निर्वाह के साथ हृदय को स्पर्श करने वाले, उसे नावा भावों को रसाफक अनुभव करानेवाले प्रसंग होते हैं। यही नहीं प्रबन्ध काव्य में राष्ट्रीय-प्रेम, जातीय-भावना धर्म-प्रेम या आदर्श जीवन की प्रेरणा देना ही उसका उद्देश्य होता है।

प्रबंधकाव्य की कथा चूँकि यथार्थ जीवन पर आधारित होती है इससे उसमें असम्भव और काल्पनिक कथा का चमत्कार नहीं बल्कि यथार्थ जीवन के विविध पक्षों का स्वाभाविक और औचित्यपूर्ण चित्रण होता है। शुक्ल को ‘सूरसागर’ इसलिए परिसीमित लगा क्योंकि वह गीतिकाव्य है। आधुनिक कविता से उन्हें शिकायत थी कि ‘कला कला के लिए’ की पुकार के कारण यूरोप में प्रगीत मुक्तकों का ही चलन अधिक देखकर यहाँ भी उसी का जमाना यह बताकर कहा जाने लगा कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ पढ़ने की किसी को फुरसत कहाँ जिनमें कुछ दतिवृत भी मिला रहता हो।

इस प्रकार काव्य में जीवन की अनेक परिस्थितियों की ओर ले जानेवाले प्रसंगों या आख्यानों की उद्भावना बंद सी हो गई। इसीलिए ज्योंही प्रसाद की शेरसिंह का शस्त्र-समर्पण, पेथोला की प्रतिध्वनि, प्रलय की छाया तथा कामायनी और निराला की राम की शक्तिपूजा तथा तुलसीदास के आख्यानक काव्य सामने आए तो शुक्ल जी संतोष व्यक्त करते हैं।

शुक्ल के संतोष व्यक्त करने का कारण है कि प्रबंध काव्य में जीवन का पूरा चित्र खींचा जाता है। कवि अपनी पूरी बात को प्रबलता के साथ कह पाता है। यही कारण है कि रामचन्द्र शुक्ल को काव्यों में प्रबंधकाव्य प्रिय लगता है।

प्रश्न 2.
‘कला-कला के लिए’ सिद्धान्त क्या है?
उत्तर-
‘कला-कला के लिए’ सिद्धान्त का अर्थ है कि कला लोगों में कलात्मकता का भाव उत्पन्न करने के लिए है। इसके द्वारा रस एवं माधुर्य की अनुभूति होती है, इसीलिए प्रगीत मुक्तकों (लिरिक्स) की रचना का प्रचलन बढ़ा है। इसके लिए यह भी तर्क दिया जाता है कि अब लंबी कविताओं को पढ़ने तथा सुनने की फुरसत किसी के पास नहीं है। ऐसी कविताएँ जिसमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता है, उबाऊ होती है। विशुद्ध काव्य की सामग्रियाँ ही कविता का आनन्द दे सकती हैं। यह केवल प्रगीत-मुक्तकों से ही संभव है।

प्रश्न 3.
प्रगीत को आप किस रूप परिभाषित करेंगे? इसके बारे में क्या धारणा प्रचलित रही है?
उत्तर-
अपनी वैयक्तिकता और आत्मपरकता के कारण “लिरिक” अथवा “प्रगीत” काव्य की कोटि में आती है। प्रगीतधर्मी कविताएँ न तो सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त समझी जाती हैं, न उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में गीति और मुक्तक के मिश्रण से नूतन भाव भूमि पर जो गीत लिखे जाते हैं उन्हें ही ‘प्रगति’ की संज्ञा दी जाती है। सामान्य समझ के अनुसार प्रगीतधर्मी कविताएँ नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र हैं, यह सामान्य धारणा है। इसके विपरीत अब कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जाने लगा है कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ जिसमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता है, इन्हें पढ़ने तथा सुनने की किसी को फुरसत कहाँ है अर्थात् नहीं है।

प्रश्न 4.
वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अन्तर है?
उत्तर-
वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं में जीवन के समग्र चित्र उपस्थित हो जाते हैं। वस्तुतः मुक्तिबोध की लम्बी रचनाएँ वस्तुपरक हैं परन्तु आत्मसंघर्ष ज्यादा मुखरित है। ये कविताएँ अपने रचना-विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। किसी-किसी में तो नाटकीय रूप के बावजूद काव्यभूमि मुख्यतः प्रगीतभूमि है। कहीं नाटकीय एकालाप मिलता है तो कहीं पूर्णतः शुद्ध प्रगीत, जैसे ‘सहर्ष स्वीकारा है’ अथवा ‘मैं तुमलोगों से दूर हूँ।’ जैसा कि मुक्तिबोध स्वयं लिखते हैं कि निस्संदेह उसमें कथा केवल आभास है नाटकीयता केवल मरीचिका है, वह विशुद्ध आत्मगत काव्य है। जहाँ नाटकीयता, है वहाँ भी “कविता के भीतर की सारी नाटकीयता” वस्तुतः भावों की है। जहाँ नाटकीयता है वहाँ वस्तुतः भावों की गतिमयता है “क्योंकि” वहाँ जीवन-यथार्थ केवल भाव बनकर प्रस्तुत होता है। इस प्रकार यह आत्मपरकता अथवा भावमयता किसी कवि की सीमा नहीं बल्कि शक्ति है जो उसकी प्रत्येक कविता को गति और ऊर्जा प्रदान करती है।।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश्य ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि यहाँ वस्तुगत यथार्थ को अंतर्जगत उस मात्रा में घुला लेता है जितनी उस यथार्थ की ऐन्द्रिय उबुद्धता के लिए आवश्यक है। इस प्रकार एक प्रगीतधर्मी कविता में वस्तुगत यथार्थ अपनी चरम आत्मपरकता के रूप में ही व्यक्त होता है। मुक्तिबोध की आत्मपरक छोटी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता का बोध स्वभावतः होता है।

प्रश्न 5.
हिन्दी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रगीत वे कविताएँ हैं जिन्हें अक्सर माना जाता है कि ये कविताएँ सीधे-सीधे सामाजिक न होकर अपनी वैयक्तिकता और आत्मपरकता के कारण ‘लिरिक’ अथवा प्रगीत काव्य की कोटि में आती हैं। गीतिकाव्य गीतशैली का नव्यतम विकास है। प्रगीतधर्मी कविताएँ न तो सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त समझी जाती हैं न उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है क्योंकि साम्राज्य समझ के अनुसार वे अंततः नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र हैं।

परन्तु छायावादीकाल में प्रसाद की शेरसिंह का शस्त्रसमर्पण, पेथोला की प्रतिध्वनि, ‘प्रलय की छाया’ तथा ‘कामायनी’ और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ तुलसीदास जैसे आख्यानक काव्य इस मिथक को तोड़ते हुए प्रगीतों की अलग कोटि विकसित करते हैं। आगे मुक्तिबोध, नागार्जुन, समशेर बहादुर सिंह के प्रगीत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ प्रगीत वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं के रूप में हैं जो आत्मपरक हैं। आत्मसंघर्ष से उपजी हैं जिनमें सामाजिक भी निहित है।

ये नई कविता के अन्दर आत्मपरक कविताओं की ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिसकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। परन्तु इनमें जीवन यथार्थ भाव बनकर प्रस्तुत होता है। त्रिलोचन ने वर्णनात्मक कविताओं के बावजूद ज्यादातर सॉनेट और गीत ही लिखे हैं। कहने के लिए तो ये प्रगीत हैं लेकिन जीव जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रगीतों में मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है। अतः प्रगीत का इतिहास समकालीन कवियों का इतिहास कह सकते हैं।

प्रश्न 6.
आधुनिक प्रगीत-काव्य किन अर्थों में भक्ति काव्य से भिन्न एवं गुप्तजी के आदि के प्रबंध काव्य से विशिष्ट है? क्या आप आलोचक से सहमत हैं? अपने विचार
उत्तर-
आधुनिक प्रगीत काव्य में भी प्रबंध काव्य की भाँति जीवन के सारे चित्र खींचे जाते हैं। मुक्तिबोध, प्रसाद, निराला, नागार्जुन शमशेर की लम्बी कविताएँ क्रमशः ब्रह्मराक्षस, पेथोला की प्रतिध्वनि, शेर सिंह का आत्मसमर्पण, तुलसीदास, राम की शक्तिपूजा, अकाल और उसके बाद इत्यादि की कविताएँ उदाहरण हैं। इन कविताओं की खास बात यह है कि मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है और यही बात इनमें कही गयी है। प्रबंधकाव्य की तरह इनमें भी नाटकीयता का समावेश है। साथ ही सामाजिक संघर्ष के बदले आत्मसंघर्ष मुखरित है। परन्तु निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’, तुलसीदास में सामाजिक संघर्ष के साथ आत्मसंघर्ष का मिश्रित रूप है।

आधुनिक युग के प्रगीत काव्यों की मुख्य भाव-भूमि राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष है जो गुप्त के काव्यों में दिखलाई पड़ती है। इनमें भक्तिकाव्य से भिन्न इस रोमांटिक प्रगीतात्मकता के मूल में एक नया व्यक्तिवाद है, जहाँ ‘समाज’ के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है। इन रोमांटिक गीतों में भक्तिकाव्य जैसी तन्मयता नहीं है किन्तु आत्मयता और ऐन्द्रियता कहीं अधिक है। गुप्त का प्रबन्ध काव्य सीधे-सीधे राष्ट्रीय विचारों को रखता है और रोमांटिक प्रगीत उस युग की चेतना को अपनी असामाजिकता में ही अधिक गहराई से वाणी दे रहे थे। इसलिए विशिष्ट है। आलोचक ने जो उदाहरण निराला आदि कवियों की कविताओं को प्रगीत के जो रूप में दिये हैं उदाहरण इनमें सच्चे अर्थों में सामाजिकता छिपी है। अतः लेखक के विचार में सामाजिक संघर्ष के साथ आत्मसंघर्ष भी मायने रखता है। अतः प्रगीत काव्य भक्ति काव्य से अधिक सूक्ष्म रूप में वाणी देता है।।

प्रश्न 7.
“कविता जो कुछ कह रही है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इसके एकाकीपन में मानवता की आवाज सुन सकता है।” इस कथन का आशय स्पष्ट करें। साथ ही किसी उपयुक्त उदाहरण से अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर-
आलोचक की दृष्टि में प्रगीत वैसा काव्य है जिसमें व्यक्ति का एकाकीपन झलके अथवा समाज के विरुद्ध व्यक्ति या समाज से कटा हुआ हो। प्रगीतात्मकता का अर्थ है एकांत संगीत अथवा अकेले कंठ की पुकार। प्रगीत की यह धारणा इतनी बद्धमूल हो गयी है कि आज भी प्रगीत के रूप में प्रायः उसी कविता को स्वीकार किया जाता है जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक है।

परन्तु थियोडोर एडोनों ने कहा है कि व्यक्ति अकेला है यह ठीक है परन्तु उसका आत्मसंघर्ष अकेला नहीं है। उसका आत्मसंघर्ष समाज में प्रतिफलित होता है। यही कारण है कि बच्चन जैसे कवि सरल सपाट निराशा से अलग करते हुए एक गहरी सामाजिक सच्चाई को “जक संघर्ष के सारण इनमें सच्चे अरण निराला आदि व्यक्त करता है। कवि अपने अकेलेपन में समाज के बारे में सोचता है। नई प्रक्रिया द्वारा उसका निर्माण करना चाहता है। यहाँ व्यक्ति बनाम समाज जैसे सरल द्वन्द्व का स्थान समाज के अपने अंतर्विरोधों ने ले लिया है।

व्यक्तिवाद उतना आश्वस्त नहीं रहा बल्कि स्वयं व्यक्ति के अन्दर भी अंत:संघर्ष पैदा हुआ। विद्रोह का स्थान आत्मविडंबना ने ले लिया। यहाँ समाज के उस दबाव को महसूस किया जा सकता है जिसमें अकेले होने की विडंबना के साथ उसका अन्तर्द्वन्द्व उसे सामाजिकता की प्रेरणा देता है और कवि प्रगतिवादी हो जाता है। परिणाम अन्दर से निकलकर बाहर जनता के पास जाना।।

प्रश्न 8.
मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता क्यों है? आलोचक के इस विषय में क्या निष्कर्ष है?
उत्तर-
मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता इसलिए है कि उनकी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता की संभावनाओं का पूरा-पूरा एहसास किसी को न था। नई कविता के अन्दर आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिनकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। इसलिए इन सीमित अर्थभूमिवाली कविताओं के आधार पर निर्मित एकांगी एवं अपर्याप्त काव्य सिद्धान्त के दायरे को तोड़कर एक व्यापक काव्य-सिद्धान्त की स्थापना के लिए मुक्तिबोध की कविताओं का समावेश ऐतिहासिक आवश्यकता थी।

किन्तु इनके बाद भी ऐसी अनेक आत्मपरक प्रगीतधर्मी छोटी कविताएँ बची रहती हैं जो अपनी सामाजिक अर्थवत्ता के कारण उस काव्य सिद्धान्त को व्यापक बनाने में समर्थ हैं। मुक्तिबोध की कविता रचना विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। नाटकीय रूप के बावजूद काव्यभूमि मुख्यतः प्रगीतधर्मी है। इसमें कोई शक नहीं कि उनका समूचा काव्य मूलत: आत्मपरक है। रचना-विन्यास में कहीं पूर्णतः नाट्यधर्मिता है, कहीं नाटकीय एकालाप है, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत भी है। कवि स्वयं उसके बारे में लिखते हैं कि इसमें कथा केवल आभास है, नाटकीयता केवल मरीचिका है, वह विशुद्ध आत्मगत काव्य है। जहाँ नाटकीयता है वहाँ जीवन-यथार्थ भाव बनकर प्रस्तुत होता या बिंब या विचार बनकर।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। इस प्रकार उनकी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता का बोध स्वभावतः संभावनाओं की तलाश करता है जिसके लिए मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार आवश्यक है।

प्रश्न 9.
त्रिलोचन और नागार्जुन के प्रगीतों की विशेषताएँ क्या हैं? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। नामवर सिंह ने त्रिलोचन के सॉनेट, वही त्रिलोचन है वह और नागार्जुन की कविता ‘तन गई रीढ़’ का उल्लेख किया है। ये दोनों रचनाएँ पाठ के आस-पास खंड में दी गई हैं। उन्हें भी पढ़ते हुए अपने विचार दें।
उत्तर-
त्रिलोचन की कविताएँ कहने के लिए प्रगीत हैं लेकिन जीव-जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं वे अन्यत्र दुर्लभ है। किन्तु इन भास्वर चित्रों को अंततः जीवंत बनानेवाला प्रगीत नायक का एक अनूठा व्यक्तित्व है जिसका स्पष्ट चित्र ‘उस जनपद का कवि हूँ। संग्रह के उन आत्मपरक सॉनेटों में मिलता है। इनमें आत्मचित्र वस्तुतः एक प्रगीत-नायक की निर्वैयक्तिक कल्प-सृष्टि है जिनसे नितांत वैयक्तिकता के बीच भी एक प्रतिनिधि चरित्र से परिचय की अनुभूति होती है।

वहीं नागार्जुन की बहिर्मुखी आक्रामक काव्य-प्रतिभा के बीच आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण भी आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार का एक झटके से छिन्न-भिन्न कर देती है फिर चाहे ‘वह तन गई रीढ़’ जैसे प्रेम और ममता की नितांत निजी अनुभूति हो, चाहे जेल के सीखंचों से सिर टिकाए चलने वाला अनुचिंतन और अनुताप नागार्जुन के काव्य-संसार के प्रगीत-नायक का निष्कवच फक्कड़ व्यक्तित्व उनके प्रगीतों को विशिष्ट रंग तो देता ही है, सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है।

कवि त्रिलोचन ‘वही त्रिलोचन है वह’ और नागार्जुन की ‘तन गई रीढ़’ कविता में अपनी वैयक्तिकता में विशिष्ट और सामाजिकता में सामान्य है। यहाँ कवि व्यक्तिवादी न होते हुए भी व्यक्ति-विशिष्ट के प्रति झुका हुआ है। अपने समाज से लड़ते हुए सामाजिक है। दुनियादारी न होते हुए भी इसी दुनिया का है। यह नया प्रगीत उनके नये व्यक्तित्व से ही संभव हो सका है। उनके व्यक्तित्व के साथ निश्चित सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है। इन कविताओं में कवि समाज के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है और व्यक्तिवाद को जन्म देनेवाली औद्योगिक पूँजीवादी समाजव्यवस्था का पुरजोर विरोध करते हैं। कवि की मानसिक स्थिति बदल जाती है। व्यक्ति बनाम समाज जैसे सरल द्वन्द्व का स्थान समाज के अपने अंतर्विरोधों ने ले लिया है। स्वयं व्यक्ति के अंदर के अंत:संघर्ष को दिखलाते हैं।

प्रश्न 10.
मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है। केदारनाथ सिंह की उद्धृत कविता से इस कथन की पुष्टि करें। दिगंत (भाग-1) में प्रस्तुत ‘हिमालय’ कविता के प्रसंग में भी इस कथन पर विचार करें।
उत्तर-
हिन्दी के साहित्य के दौर में कविता में एक नया उभार पैदा होता है जिसमें कवि का अपना आत्मसंघर्ष तो है ही वह सामाजिक संभावनाओं की तलाश भी उसमें करता है। आज का कवि न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच करता है न बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचक। अन्दर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूटा गाड़ने की जिद है और न बाहर व्यवस्था को एक विराट पहाड़ बनाकर आँकने की हवस। वह बाहर से छोटी-से-छोटी, वस्तु घटना आदि पर नजर रखता है और कोशिश करता है कि उसे मुकम्मल अर्थ दिया जाए, छोटी-सी बात को बात में ही बहुत कुछ कह दिया जाय। वह अपने आत्मसंघर्ष की सामाजिक संघर्ष बनाने की चाहत है।

इसका उदाहरण मुक्तिबोध की कविताएँ हैं। नई कविता का आत्मसंघर्ष उनके कवियों का आत्मसंघर्ष है जो बहिसंघर्ष का रूप ले लेता है। एक में प्रगीतात्मकता सीमित हुई नजर आती है तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम उद्घाटित होते हैं। कवि कम ही शब्दों में बहुत कुछ कहता है, जो बात कम शब्द में कही जाती है वह गहरे अर्थ रखती है। कविता का अर्थ करने पर उसके कई स्तर धीरे-धीरे खुलते जाते हैं। केदारनाथ सिंह यहाँ कहना चाहते हैं कि सम्बन्धों में कभी खटास नहीं आनी चाहिए। उसमें हमेशा गर्माहट और उसकी सुन्दरता बनी रहनी चाहिए। ‘हाथ की तरह गर्म और सुन्दर में’ कवि बहुत सारे सपने संजोये हुए हैं और भविष्य की आकांक्षा को मजबूती बनाये रखना चाहता है।।

इन थोड़े से शब्दों में कवि अधिक गहरी चोट करता है। अतः अधिक बोलने से अच्छा कम बोलना है क्योंकि वह ज्यादा प्रभावी होता है।

प्रश्न 11.
हिन्दी की आधुनिक कविता की क्या विशेषताएँ आलोचक ने बताई हैं?
उत्तर-
हिन्दी की आधुनिक कविता में नई प्रगीतात्मकता का उभार देखता है। वह देखता है आज के कवि को न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच है न बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचक। अंदर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूटा गाड़ने की जिद है और न बाहर की व्यवस्था को एक विराट पहाड़ के रूप में आँकने की हवस। बाहर छोटी-से-छोटी घटना स्थिति वस्तु आदि पर नजर है और कोशिश है उसे अर्थ देने की। इसी प्रकार बाहर की प्रतिक्रियास्वरूप अंदर उठनेवाली छोटी-से-छोटी लहर को भी पकड़कर उसे शब्दों में बांध लेने का उत्साह है। एक नए स्तर पर कवि व्यक्तित्व अपने और समाज के बीच के रिश्ते को साधने की कोशिश कर रहा है और इस प्रक्रिया में जो व्यक्तित्व बनता दिखाई दे रहा। है वह निश्चय ही नए ढंग की प्रगीतात्मकता के उभार का संकेत है।

प्रगीत और समाज भाषा की बात

प्रश्न 1.
दिए गए शब्दों से विशेषण बनाइए तीव्रता, समाज, व्यक्ति, आत्मा, प्रसंग, विचार, इतिहास, स्मरण, शर्म, लक्षण, इन्द्रिय।
उत्तर-

  • तीव्रता – तीव्रतम
  • समाज – सामाजिक
  • व्यक्ति – वैयक्तिक
  • आत्मा – आत्मीय
  • प्रसंग – प्रासंगिक
  • विचार – वैचारिक
  • इतिहास – ऐतिहासिक
  • स्मरण – स्मरणीय
  • शर्म – शर्मिला
  • लक्षण – लाक्षणिक
  • इन्द्रिय – ऐन्द्रिय

प्रश्न 2.
नीचे लिखे वाक्यों से अव्ययों और कारक चिह्नों को अलग करें; कारक के चिह्न किस कारक के हैं, यह भी बताएँ।
(क) कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं।
(ख) इस दिशा में पुनर्विवचार के लिए सच पूछिए तो मुझे सबसे पहले प्रेरणा स्वयं मुक्तिबोध के काव्य से ही मिली।
(ग) आज भी प्रगीत के रूप में प्रायः उसी कविता को स्वीकार किया जाता है जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक हो।
(घ) एक में प्रगीतात्मकता सीमित हुई तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम उद्घाटित हुए।
उत्तर-
(क) अव्यय-भी, ही, कि कारक चिह्न-के, की (संबंध कारक), को (सम्प्रदान कारक) (ख) अव्यय-तो, ही कारक चिह्न-में (अधिकरण कारक), के लिए (सम्प्रदान कारक), के (संबंध कारक), से (करण कारक)
(ग) अव्यय-भी, और कारक-के (संबंध कारक), में (अधिकरण कारक), को (संप्रदान कारक)
(घ) अव्यय-तो कारक चिह्न-में (अधिकरण कारक) के (संबंध कारक)

प्रश्न 3.
रचना की दृष्टि से निम्नलिखित वाक्यों की प्रकृति बताएँ एवं संयुक्त वाक्य को सरल वाक्य में बदलें
(क) कविता पर समाज का दबाव तीव्रता से महसूस किया जा रहा है।
(ख) यह परिवर्तन न बहुत बड़ा है न क्रांतिकारी।
(ग) मुक्तिबोध ने सिर्फ लम्बी कविताएँ ही नहीं लिखी हैं।
(घ) आलोचकों की दृष्टि से सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का आरंभ यही है जिसका आधार है समाज के विरुद्ध व्यक्ति।
(ङ) पिछले पाँच छह वर्षों से हिन्दी कविता के वातावरण में फिर कुछ परिवर्तन के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।
उत्तर-
(क) मिश्र वाक्य
(ख) संयुक्त वाक्य
(ग) संयुक्त वाक्य
(घ) संयुक्त वाक्य
(ङ) संयुक्त वाक्य।

“प्रगीत’ और समाज लेखक परिचय नामवर सिंह (1927)

जीवन-परिचय-
हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, सन् 1927 को जीअनपुर वाराणसी, उत्तरप्रदेश में हुआ। इनकी माता का नाम वागेश्वरी देवी और पिता का नाम नागर सिंह था जो एक शिक्षक थे। इनकी प्राथमिक शिक्षा आवाजापुर एवं कमलापुर, उत्तप्रदेश के गाँवों में हुई। वहीं इन्होंने हाई स्कूल हीवेट क्षत्रिय स्कूल, बनारस और इंटर उदय प्रताप कॉलेज, बनारस से किया। इसके बाद बी.एच.यू. से क्रमशः सन् 1949 एवं 1951 में बी. ए. और एम.ए. किया। साथ ही बी.एच.यू. से ही सन् 1956 में ‘पृथ्वीराजरासो की भाषा’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1953 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अस्थाई व्याख्याता रहे।

सन् 1959-60 में सागर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। इसके बाद सन् 1960-65 तक बनारस में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। वे ‘जनयुग’ (साप्ताहिक), दिल्ली में सम्पादक और राजकमल प्रकाशन में साहित्य सलाहकार भी रहे। सन् 1967 से ‘आलोचना’ त्रैमासिक के संपादन का कार्य संभाला। सन् 1970 में जोधपुर विश्वविद्यालय, राजस्थान में ही हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए।

इसके बाद सन् 1974 में कुछ समय के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक और सन् 1974 में ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफेसर के पद पर इनकी नियुक्ति हुई। जे.एन.यू. से सन् 1987 में सेवामुक्ति के बाद अगले पाँच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति ! बाद में सन् 1993-96 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। संप्रतिः ‘आलोचना’ त्रैमासिक के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत।।

आलोचना-हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, . छायावाद, पृथ्वीराजरासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, कहानी : नई कहानी, कविता के लिए. प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, वाद-विवाद संवाद।

व्यक्ति व्यंजक ललित निबन्ध-बकलम खुद।। साक्षात्कारों का संग्रह-कहना न होगा।

भाषा-शिल्प की विशेषताएँ-नामवर सिंह जी ने सहित्य के अतिरिक्त भी अनेक विषयों का गहन अध्ययन किया था। साहित्य, भाषाशास्त्र, काव्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना आदि विषय तो इनकी अभिरुचि के अंग हैं जिस कारण भाषा पर इनकी मजबूत पकड़ है। अपनी सशक्त, भाषा के कारण ही इन्होंने समीक्षा तथा सैद्धान्तिक व्याख्या में भी रचनात्मक साहित्य जैसा लालित्य उत्पन्न कर दिया है।

प्रगीत और समाज पाठ के सारांश

कविता संबंधी सामाजिक प्रश्न-कविता पर समाज का दबाव तीव्रता से महसूस किया जा रहा है। प्रगीत काव्य समाज शास्त्रीय विश्लेषण और सामाजिक व्याख्या के लिए सबसे कठिन चुनौती रखता है। लेकिन प्रगीतधर्मी कविताएँ सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं समझी जाती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी प्रबंधकाव्यों को ही अपना आदर्श माना है। वे प्रगीत मुक्तकों को अधिक पसंद नहीं करते थे, इसीलिए आख्यानक काव्यों की रचना से संतोष व्यक्त करते थे।

मुक्तिबोध की कविताएँ-नई कविता के अंदर आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिसकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। इसलिए . व्यापक काव्य सिद्धान्त की स्थापना के लिए मुक्तिबोध की कविताओं का समावेश आवश्यक था। लेकिन मुक्तिबोध ने केवल लम्बी कविताएँ ही नहीं लिखीं। उनकी अनेक कविताएँ छोटी भी हैं जो कि कम सार्थक नहीं हैं। मुक्तिबोध का समूचा काव्य मूलतः आत्मपरक है। रचना-विन्यास में कहीं वह पूर्णतः नाट्यधर्मी है, कहीं नाटकीय एकालाप है, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत भी है। आत्मपरकता तथा भावमयता मुक्तिबोध की शक्ति है जो उनकी प्रत्येक कविता को गति और ऊर्जा प्रदान करती है।। . आत्मपरक प्रगीत-आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के समान ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। एक प्रगीतधर्मी कविता में वस्तुगत यथार्थ अपनी चरम आत्मपरकता के रूप में ही व्यक्त होता है।

त्रिलोचन तथा नागार्जुन का काव्य-त्रिलोचन में कुछ चरित्र केन्द्रित लम्बी वर्णनात्मक कविताओं के अलावा ज्यादातर छोटे-छोटे गीत ही लिखे हैं। लेकिन जीवन, जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। वहीं नागार्जुन की आक्रामक काव्य प्रतिभा के बीच आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण कम ही आते हैं। लेकिन जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार को एक झटके में छिन्न-भिन्न कर देती है। प्रगीत काव्य के प्रसंग में मुक्तिबोध, त्रिलोचन और नागार्जुन का उल्लेख एक नया प्रगीतधर्मी कवि-व्यक्तित्व है।

विभिन्न कवियों द्वारा प्रगीतों का निर्माण-यद्यपि हमारे साहित्य काव्योत्कर्ष के मानदंड प्रबंधकाव्यों के आधार पर बने हैं। लेकिन यहाँ की कविता का इतिहास मुख्यतः प्रगीत मुक्तकों. का है। कबीर, सूर, मीरा, नानक, रैदास आदि संतों ने प्रायः दोहे तथा गेय पद ही लिखे हैं। विद्यापति को हिन्दी का पहला कवि माना जाए तो हिन्दी कविता का उदय ही गीतों से हुआ है। लोकभाषा को साफ-सुथरी प्रगीतात्मकता का यह उन्मेष भारतीय साहित्य की अभूतपूर्व घटना है।

प्रगीतात्मकता का दूसरा उन्मेष-प्रगीतात्मकता का दूसरा उन्मेष रोमैंटिक उत्थान के साथ हुआ। इस रोमांटिक प्रगीतात्मकता के मूल में एक नया व्यक्तिवाद है, जहाँ समाज के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है। इन रोमैंटिक प्रगीतों में आत्मीयता और ऐन्द्रियता कहीं अधिक है। इस दौरान राष्ट्रीयता संबंधी विचारों को काव्य रूप देनेवाले मैथिलीशरण गुप्त भी हुए। आलोचकों की दृष्टि में सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का आरंभ यही है, जिसका आधार है समाज के विरुद्ध व्यक्ति। इस प्रकार प्रगीतात्मकता का अर्थ हुआ ‘एकांत संगीत’ अथवा ‘अकेले कंठ की पुकार’। लेकिन आगे चलकर स्वयं व्यक्ति के अंदर भी अंत:संघर्ष पैदा हुआ। विद्रोह का स्थान-आत्मविडंबना ने ले लिया और आत्मपरकता कदाचित् बढ़ी।

समाज पर आधारित काव्य-अकेलेपन के बाद कुछ लोगों ने जनता की स्थिति को काव्य – जावार बनाया जिससे कविता नितांत सामाजिक हो गई। इस कारण यह कवित्व से भी वंचित हो गई। फिर कुछ ही समय में नई कविता के अनेक कवियों ने हृदयगत स्थितियों का वर्णन करना शुरू किया। इसके बाद एक दौर ऐसा आया जब अनेक कवि अपने अंदर का दरवाजा तोड़कर एकदम बाहर निकल आए और व्यवस्था के विरोध के जुनून में उन्होंने ढेर सारी ‘सामाजिक’ कविताएँ लिख डाली, लेकिन यह दौर जल्दी ही समाप्त हो गया।

नई प्रगीतात्मकता का उभार-युवा पीढ़ी के कवियों द्वारा कविता के क्षेत्र में कुछ और परिवर्तन हुए। यह एक नई प्रगीतात्मकता का उभार है। आज कवि को अपने अंदर झाँकने या बाहरी यथार्थ का सामना करने में कोई हिचक नहीं है। उसकी नजर हर छोटी-से-छोटी घटना, स्थिति, वस्तु आदि पर है। इसी प्रकार उसमें अपने अंदर उठनेवाली छोटी-से-छोटी लहर को पकड़कर शब्दों में बाँध लेने का उत्साह भी है। कवि अपने और समाज के बीच के रिश्ते को साधने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह रोमैंटिक गीतों को समाप्त करने या वैयक्तिक कविता को बढ़ाने का प्रयास नहीं है। अपितु इन कविताओं से यह बात पुष्ट होती जा रही है कि मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है और कभी-कभी ठंडे स्वर का प्रभाव गर्म होता है। यह एक नए ढंग की प्रगीतात्मकता के उभार का संकेत है।

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 13 शिक्षा

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Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 13 शिक्षा

 

शिक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

13 Shiksha Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म कब हुआ था?
(क) 12 मई, 1895 ई.
(ख) 10 मई, 1890 ई.
(ग) 7 मई, 1870 ई.
(घ) 5 मई, 1830 ई.
उत्तर-
(क)

Bihar Board Solution Class 12 Hindi प्रश्न 2.
निर्भयता पूर्ण वातावरण निर्माण करने का कार्य कैसा है?
(क) बड़ा कठिन है
(ख) आसान है
(ग) श्रम युक्त है
(घ) बेकार है
उत्तर-
(क)

Class 12 Hindi Chapter 13 Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
आप विद्यालय क्यों जाते हैं?
(क) शिक्षा प्राप्ति के लिए
(ख) नौकरी करने के लिए
(ग) खेल प्रशिक्षण देने के लिए
(घ) पढ़ाने के लिए
उत्तर-
(क)

बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 12 Pdf प्रश्न 4.
साधारणतया सुरक्षा में जीने का क्या अर्थ है?
(क) भय में जीना
(ख) खुशी में जीना
(ग) लोभ में जीना
(घ) लाभ के लिए जीना
उत्तर-
(क)

Bihar Board Hindi Book Class 12 Pdf Download प्रश्न 5.
संपूर्ण विश्व किधर अग्रसर हो रहा है?
(क) नारा की ओर
(ख) विकास की ओर
(ग) निर्माण की ओर
(घ) बोकर बातों की ओर
उत्तर-
(क)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
जे. कृष्णमूर्ति के बचपन का नाम ……… था।
उत्तर-
जिदू कृष्णमूर्ति

प्रश्न 2.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 12 मई ……. को हुआ था।
उत्तर-
1895 ई.

प्रश्न 3.
जे. कृष्णमूर्ति का निधन 17 फरवरी ………… को हुआ था।
उत्तर-
1986 ई.

प्रश्न 4.
कृष्णमूर्ति का जन्म स्थान ………….. चितूर (आन्ध्र प्रदेश)में है।
उत्तर-
मदनपल्सी

प्रश्न 5.
नि:संदेह केवल उद्योग या कोई …….. ही जीवन नहीं है?
उत्तर-

प्रश्न 6.
‘जीवन दीन है, जीवन ………. भी।
उत्तर-
अमीर

शिक्षा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बचपन में कैसे वातावरण में रहना आवश्यक है?
उत्तर-
स्वतंत्र।

प्रश्न 2.
मेधा कहाँ नहीं हो सकती है?
उत्तर-
जहाँ भय हो।

प्रश्न 3.
शिक्षा पाठ के रचयिता कौन हैं?
उत्तर-
जे. कृष्णमूर्ति।

प्रश्न 4.
जे. कृष्णमूर्ति की शिक्षा कृति क्या है?
उत्तर-
संभाषण।

प्रश्न 5.
जे. कृष्णमूर्ति का निधन इनमें से किस स्थान पर हुआ?
उत्तर-
कैलिफोर्निया।

प्रश्न 6.
लीडब्रेटर जे. कृष्णमूर्ति में किसका रूप देखते थे?
उत्तर-
विश्व शिक्षकः।

शिक्षा पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्सर

प्रश्न 1.
शिक्षा का क्या अर्थ है एवं इसके क्या कार्य हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर-
शिक्षा का क्या अर्थ जीवन के सत्य से परिचित होना और संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया को समझने में हमारी मदद करना है। क्योंकि जीवन विलक्षण है, ये पक्षी, ये पूल, ये वैभवशाली वृक्ष, ये आसमान, ये सितारे, ये मत्स्य सब हमारा जीवन है। जीवन दीन है, जीवन अमीर भी। जीवन गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ ईष्याएं, महत्वाकांक्षाएँ वासनाएँ, या सफलताएँ एवं चिन्ताएँ हैं। केवल इतना ही नहीं अपितु इससे कहीं ज्यादा जीवन है। हम कुछ परीक्षाएँ उत्र्तीण कर लेते हैं, हम विवाह कर लेते हैं, बच्चे पैदा कर लेते हैं और इस प्रकार अधिकाधिक यंत्रवत् बन जाते हैं।

हम सदैव जीवन से भयाकुल, चिन्तित और भयभीत बने रहते हैं। शिक्षा इन सबों का निराकरण करती है। भय के कारण मेधा शक्ति कुंठित हो जाती है। शिक्षा इसे दूर करता है। शिक्षा समाज के ढाँचे के अनुकूल बनने में आपकी सहायता करती है या आपको पूर्ण स्वतंत्रता होती है। वह सामाजिक समस्याओं का निराकरण करे शिक्षा का यही कार्य है।

प्रश्न 2.
जीवन क्या है? इसका परिचय लेखक ने किस रूप में दिया है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार यह सारी सृष्टि ही जीवन है। जीवन बड़ा अद्भुत है, यह असीम और अगाध है। यह अनंत रहस्यों को लिए हुए है, यह विशाल साम्राज्य है जहाँ हम मानव कर्म करते हैं। लेखक जीवन की क्षुद्रताओं से दुखी होता है। वह कहता है, हम अपने आपको आजीविका के लिए तैयार करते हैं तो हम जीवन का पूरा लक्ष्य से खो देते हैं। यह जीवन विलक्षण है। ये पक्षी, ये फूल, ये वैभवशाली वृक्ष, यह आसमान, ये सितारे, ये सरिताएँ, ये मत्स्य यह सब हमारा जीवन है। जीवन दीन है, जीवन अमीर भी।

जीवन समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक सतत संघर्ष है, जीवन ध्यान है, जीवन धर्म है जीवन गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ है-ईष्याएँ, महत्वाकांक्षाएँ, वासनाएँ, भय सफलताएँ एवं चिन्ताएँ। केवल इतना ही नहीं अपितु इससे कहीं ज्यादा है। हम सदैव जीवन से भयाकुल, चिन्तित और भयभीत बने रहते हैं अतएव इस जीवन को समझने में शिक्षा हमारी मदद करती है। शिक्षा इस विशाल विस्तीर्ण जीवन, गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट को इसके समस्त रहस्यों को, इसकी अद्भुत रमणीयताओं को इसके दुखों और हर्षों को समझने में सहायता करती है।

प्रश्न 3.
बचपन से ही आपको ऐसे वातावरण में रहना अत्यन्त आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो। क्यों?
उत्तर-
बचपन से ही यदि व्यक्ति स्वतंत्र वातावरण में नहीं रहता है तो व्यक्ति में भय का संचार हो जाता है। यह भय मन में ग्रन्थि बनकर घर कर जाता है और व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षा को दबा देता है। हममें से अधिकांश व्यक्ति ज्यों-ज्यों बड़े हो जाते हैं त्यों-त्यों ज्यादा भयभीत होते जाते हैं, हम जीवन से भयभीत रहते हैं, नौकरी के छूटने से, परंपराओं से और इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी, पत्नी या पति क्या कहेंगे, हम मृत्यु से भयभीत रहते हैं। हममें से अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रूप में भयभीत हैं और जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं है।

इसलिए हमें बचपन से ही ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जहाँ भय न हो, जहाँ स्वतंत्रता हो, मनचाहे कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं अपितु एक ऐसी स्वतंत्रता जहाँ आप जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया समझ सकें। हमने जीवन को कितना कुरूप बना दिया है। सचमुच जीवन के इस ऐश्वर्य और इसकी अनंत गहराई और इसके अद्भुत सौन्दर्य की मान्यता तो तभी महसूस करेंगे जब आप सड़े हुए समाज के खिलाफ विद्रोह करेंगे ताकि आप एक मानव की भाँति अपने लिए सत्य की खोज कर सकें।

प्रश्न 4.
जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती। क्यों?
उत्तर-
हम जानते हैं कि बचपन से ही हमारे लिए ऐसे वातावरण में रहना अत्यन्त आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो। हममें से अधिकांश व्यक्ति ज्यों-ज्यों बड़े होते जाते हैं, त्यों-त्यों ज्यादा भयभीत होते जाते हैं, हम जीवन से भयभीत रहते हैं, नौकरी के छूटने से, परंपराओं से और इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी या पत्नी या पति क्या कहेंगे, हम मृत्यु से भयभीत रहते हैं। हममें से अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रूप में भयभीत है और जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं है।

निस्संदेह यह मेधा शक्ति भय के कारण दब जाती है। मेधा शक्ति वह शक्ति है जिससे आप भय और सिद्धान्तों की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता के साथ सोचते हैं ताकि आप अपने लिए सत्य की, वास्तविकता की खोज कर सकें। यदि आप भयभीत हैं तो फिर आप कभी मेधावी नहीं हो सकेंगे। क्योंकि भय मनुष्य को किसी कार्य को करने से रोकता है। वह महत्त्वाकांक्षा फिर चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक, चिन्ता और भय को जन्म देती है। अत: यह ऐसे मन का निर्माण करने में सहायता नहीं कर सकती जो सुस्पष्ट हो, सरल हो, सीधा हो और दूसरे शब्दों में मेधावी हो।

प्रश्न 5.
जीवन में विद्रोह का क्या स्थान है?
उत्तर-
जब कोई व्यक्ति सचमुच जीवन के इस ऐश्वर्य की, इसकी अनंत गहराई और इसके अद्भुत सौन्दर्य की धन्यता महसूस कर लेता है तो जीवन के प्रति तनिक भी कसमसाहट का भाव आता है तो वह विद्रोह कर बैठता है, संगठित धर्म के विरुद्ध, परंपरा के खिलाफ और इस सड़े हुए समाज के खिलाफ ताकि एक मानव की भाँति लिए सत्य की खोज कर सके। जिन्दगी का अर्थ है अपने लिए सत्य की खोज और यह तभी संभव है जब स्वतंत्रता हो, जब आपके अंदर में सतत् क्रान्ति की ज्वाला प्रकाशमान हो। समाज में व्यक्ति सुरक्षित रहना चाहता है और साधारणतया सुरक्षा में जीने का अर्थ है अनुकरण में जीना अर्थात् भय में जीना। भय से मुक्त होने के लिए व्यक्ति को विद्रोह करना पड़ता है अतः जीवन में विद्रोह का महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 6.
व्याख्या करें-यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा है।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ जे. कृष्णमूर्ति द्वारा लिखित संभाषण ‘शिक्षा’ से ली गई है। इसमें संभाषक कहना चाहते हैं हमने ऐसे समाज का निर्माण कर रखा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के विरोध में खड़ा है। चूंकि यह व्यवस्था इतनी जटिल है कि यह शोषक और शोषित वर्ग में बँट गया है। मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण हो रहा है। एक-दूसरे पर वर्चस्व के लिए आपस में होड़ है। यह पूरा विश्व ही अंतहीन युद्धों में जकड़ा हुआ है। इसके मार्गदर्शक राजनीतिज्ञ बने हैं जो सतत् शक्ति की खोज में लगे हैं। यह दुनिया वकीलों, सिपाहियों और सैनिकों की दुनिया है। यह उन महत्त्वाकांक्षी स्त्री-पुरुषों की दुनिया है जो प्रतिष्ठा के पीछे दौड़े जा रहे हैं और इसे पाने के लिए एक-दूसरे के साथ संघर्षरत हैं।

दूसरी ओर अपने-अपने अनुयायियों के साथ संन्यासी और धर्मगुरु हैं जो इस दुनिया में या दूसरी दुनिया में शक्ति और प्रतिष्ठा की चाह कर रहे हैं। यह विश्व ही पूरा पागल है, पूर्णतया भ्रांत। यहाँ एक ओर साम्यवादी पूँजीपति से लड़ रहा है तो दूसरी ओर समाजवादी दोनों का प्रतिरोध कर रहा है। इसीलिए संभाषक कहता। है कि यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए संघर्ष कर रहा है। यह सम्पूर्ण विश्व ही परस्पर विरोधी विश्वासों, विभिन्न वर्गों, जातियों, पृथक्-पृथक् विरोधी राष्ट्रीयताओं और हर प्रकार की मूढ़ता और क्रूरता में छिन्न-भिन्न होता जा रहा है।

और हम उसी दुनिया में रह सकने के लिए शिक्षित किए जा रहे हैं। इसीलिए संभाषक को दुख है कि व्यक्ति निर्भयतापूर्ण वातावरण के बदले सड़े हुए समाज में जीने को विवश है। अतः हमें अविलंब एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा ताकि हम उसमें रहकर अपने लिए सत्य की अविलम्ब एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा ताकि हम उसमें रहकर अपने लिए सत्य की खोज कर सकें, मेधावी बन सकें ताकि हम अपने अंदर सतत् एक गहरी मनोवैज्ञानिक विद्रोह की अवस्था में रह सकें।

प्रश्न 7.
नूतन विश्व का निर्माण कैसे हो सकता है?
उत्तर-
आज सम्पूर्ण विश्व में महत्त्वाकांक्षा तथा प्रतिस्पर्धा के कारण अराजकता फैली हुई है। विश्व के सभी देश पतन की ओर अग्रसर है। इसे रोकना मानव समाज के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती का प्रत्युत्तर पूर्णता से तभी दिया जा सकता है जब हम अभय हों, हम एक हिन्दू या एक साम्यवादी या एक पूँजीपति की भाँति न सोचें अपितु एक समग्र मानव की भाँति इस समस्या का हल खोजने का प्रयत्न करें। हम इस समस्या का हल तब तक नहीं खोज सकते हैं जब तक कि हम स्वयं सम्पूर्ण समाज के खिलाफ क्रान्ति नहीं करते, इस महत्वाकांक्षा के खिलाफ विद्रोह नहीं करते जिस पर सम्पूर्ण मानव समाज आधारित है। जब हम स्वयं महत्वाकांक्षी न हों, परिग्रही न हों एवं अपनी ही सुरक्षा से न चिपके हों, तभी हम इस चुनौती का प्रत्युत्तर दे सकेंगे। तभी हम नूतन विश्व का निर्माण कर सकेंगे।

प्रश्न 8.
क्रान्ति करना. सीखना और प्रेम करना तीनों पृथक-पृथक प्रक्रियाएँ नहीं हैं, कैसे?
उत्तर-
हमें यह मानकर चलना चाहिए कि विश्व में पहले से ही अराजकता फैली है। इसलिए हमारे समाज को अराजक स्थिति से निकालने के लिए समाज में क्रान्ति की आवश्यकता है। तभी हम सुव्यवस्थित समाज का निर्माण कर सकेंगे। यदि हम सचमुच इसका क्षय देखते हैं तो हमारे लिए एक चुनौती है। इस ज्वलन्त समस्या का हल खोजें। इस चुनौती का उत्तर हम किस प्रकार देते हैं यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस ज्वलंत समस्या की खोज में समाज के खिलाफ क्रान्ति करें तभी इस चुनौती का प्रत्युत्तर दे सकेंगे। इस दौरान हम जो भी करते हैं वह वास्तव में अपने पूरे जीवन से सीखते हैं।

तब हमारे लिए न कोई गुरु रह जाता है न मार्गदर्शक। हर वस्तु हमें एक नयी सीख दे जाती है। तब हमारा जीवन स्वयं गुरु हो जाता है और हम सीखते जाते हैं। जिस किसी वस्तु में सीखने के क्रम में गहरी दिलचस्पी रखते हैं उसके संबंध में प्रेम से खोजते हैं। उस समय हमारा सम्पूर्ण मन, सम्पूर्ण सत्ता उसी में रहती है। ठीक इसी भाँति जिस क्षण यह गहराई से महसूस कर लेते हैं कि यदि हम महत्वाकांक्षी नहीं होंगे तो क्या हमारा ह्रास नहीं होगा? यह अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। इस महत्वकांक्षा को पूरा करने के क्रम में क्रान्ति, सीखना, प्रेम सब साथ-साथ चलता है। अत: हम कह सकते हैं कि प्रेम, क्रान्ति और सीखना पृथक, प्रक्रियाएँ नहीं हैं।

शिक्षा भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का पर्यायवाची लिखें सरिता, वसुधा, मत्स्य, चिड़िया, मनुष्य, नूतन
उत्तर-

  • सरिता – नदी, तरंगिनी
  • वसुधा – धरा, वसुन्धरा
  • मत्स्य – मीन, मछली
  • चिड़िया – खग, परिन्दा, पक्षी
  • मनुष्य – मानव, व्यक्ति
  • नूतन – नया, नवीन

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों से क्रियापद और सर्वनाम चुनें
(क) आप विद्यालय क्यों जाते हैं?
क्रियापद – जाते हैं।
सर्वनाम – आप

(ख) हम कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लेते हैं।
क्रियापद – कर लेते हैं।
सर्वनाम – हम

(ग) कोई भी आपको यह नहीं कहता कि आप प्रश्न करें, स्वयं सोचकर देखें कि परमात्मा क्या है?
क्रियापद – कहता कि
सर्वनाम – आप

(घ) तभी आप नूतन विश्व का निर्माण कर सकेंगे।
क्रियापद – कर सकेंगे।
सर्वनाम – आप

(ङ) आप अपने आस-पास देखें और उन व्यक्तियों का निरीक्षण करें।
क्रियापद – देखें, निरीक्षण करें
सर्वनाम – आप

(च) जब आप वास्तव में सीख रहे होते हैं तब पूरा जीवन ही सीखते हैं।
क्रियापद – सीखते हैं।
सर्वनाम – आप

प्रश्न 3.
वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग-निर्णय करें परंपरा, प्रयत्न, चुनौती, विश्व, प्रतिष्ठा, शक्ति, जीवन, स्वतंत्रता, शिक्षा, महत्त्वाकांक्षा।
उत्तर-

  • परंपरा (स्त्री.)- हमारी परंपरा बड़ी पुरानी है।
  • प्रयत्न (पु.)-मैं सोने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
  • चुनौती (स्त्री.)-मैं आपकी चुनौती स्वीकार करता हूँ।
  • विश्व (पु.)-यह विश्व अंधविश्वास से भरा है।
  • प्रतिष्ठा (स्त्री.)-मैं आपकी प्रतिष्ठा करता हूँ।
  • शक्ति (पु.)-मोहन की शक्ति क्षीण हो गई।
  • जीवन (पु.)-यह जीवन कष्ट से भरा है।
  • स्वतंत्रता (स्त्री.)-हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता बड़ी मेहनत से मिली है।
  • शिक्षा (स्त्री.)-शिक्षा हमें महान् बनाती है।
  • महत्त्वाकांक्षा (स्त्री.)-उसकी महत्त्वाकांक्षा बड़ी है।

प्रश्न 4.
विपरीतार्थक शब्द लिखें प्रोत्साहन, स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा, संन्यासी, सम्पन्न, भय, समस्या, विद्रोह, सम्मान, परिग्रह
उत्तर-

  • प्रोत्साहन – हतोत्साहन
  • स्वतंत्रता – परतंत्रता
  • प्रतिष्ठा – अप्रतिष्ठा
  • संन्यासी – गृहस्थ
  • संपन्न – विपन्न
  • भय – निर्भय
  • समस्या – निदान
  • विद्रोह – समर्थन
  • सम्मान – अपमान
  • परिग्रह – अपरिग्रह

शिक्षा लेखक परिचय जे. कृष्णमूर्ति (1895-1986)

जीवन-परिचय-
बीसवीं शती के महान भारतीय जीवनद्रष्टा, दार्शनिक, शिक्षामनीषी एवं संत जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 12 मई, 1895 के दिन चित्तूर, आन्ध्रप्रदेश के मदनपल्ली नामक स्थान पर हुआ। इनका पूरा नाम जिदू कृष्णमूर्ति था। इनकी माता का नाम संजीवम्मा तथा पिता का नाम नारायण जिद् था। दस वर्ष की अवस्था में ही इनकी माता का निधन हो गया था। इस कारण इन्हें बचपन में मिलने वाले प्यार से वंचित रहना पड़ा। लेकिन इन्हें बचपन से ही विलक्षण मानसिक अनुभव हो गए थे। अपनी शिक्षा-दीक्षा के उपरान्त इन्होंने कुछ लेखन कार्य भी किया, लेकिन ये मूलतः वक्ता थे।

इन्होंने व्याख्यान भी किए, जिनके विषय शिक्षा, दर्शन एवं अध्यात्म से संबंधित थे। ये परंपरित शिक्षा प्रणाली से असन्तुष्ट थे, इसलिए उस प्रणाली में फेरबदल चाहते थे। किशोरावस्था में इनका संपर्क सी. डब्ल्यू. लीडबेटर एवं एनी बेसेन्ट से हो गया, जिन्होंने इनका संरक्षण भी किया। बाद में ये थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े। लीडरबेटर तो इनमें ‘विश्व शिक्षक’ का रूप देखते थे। सन् 1938 में ये एतडुअस हक्सले के संपर्क में आए। इन्होंने कई देशों की यात्राएँ भी की। ये मूलतः सार्वभौम तत्त्ववेत्ता और परम स्वाधीन आत्मविद् थे अथवा इन्हें प्राचीन स्वाधीनता ऋषियों की परंपरा की एक आधुनिक कड़ी भी माना जा सकता है। मनुष्य को सच्ची शिक्षा प्रदान करने वाले इस महापुरुष का निधन 17 फरवरी, 1986 के दिन ओजई, कैलिफोर्निया में हुआ।

रचनाएँ : जे. कृष्णमूर्ति की प्रमुख रचनाएँ हैं-द फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम, द ऑनली रिवॉल्यूशन और कृष्णामूर्तिज नोट बुक आदि। इसके अतिरिक्त उनके व्याख्यानों के कई संग्रह विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हैं।

साहित्यिक विशेषताएं : जे. कृष्णमूर्ति कोई साहित्याकार नहीं थे, बल्कि वे तो एक दार्शनिक, शिक्षामनीषी एवं संत थे। वे प्रायः लिखते नहीं थे, अपित संभाषण करते थे। इनके संभाषणों को ही प्रकाशित किया गया है, जिनसे हमें ज्ञात होता है कि वे भारत के प्राचीन स्वाधीनचेता ऋषियों को परंपरा की एक आधुनिक कड़ी थे।

शिक्षा पाठ के सारांश

जे. कृष्णमूर्ति मानते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य भी यही है। मनुष्य को पूरी तरह भारहीन, स्वतंत्र और प्रज्ञा निर्भर बनाना है। तभी उसमें सच्चा सहयोग, सद्भाव, प्रेम और करुणा सच्चा दायित्व बोध कराती है, हमें गहरा बनाती है। वह हमें सीमाओं और संकीर्णताओं से उबारती है। शिक्षा का ध्येय पेशेवर दक्षता, आजीविका और महज कुछ कर्म, कौशल ही नहीं है। उसका ध्येय हमारा सम्पूर्ण उन्नयन है। कृष्णमूर्ति अपने शिक्षा विषयक प्रयोगधर्मी चिन्तन. में आज की सभी प्रचलित प्रणालियों का भीतर-बाहर से पर्यालोचन करते हैं।

कृष्णमूर्ति प्रायः लिखते नहीं थे। वे बोलते संभाषण करते थे। प्रश्नकर्ताओं को उत्तर देते थे। यह शैली भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में अत्यन्त प्राचीन है। ‘शिक्षा’ नामक संभाषण के जरिए उनके विचारों एवं शिक्षा से लाभ की प्रेरणा मिलती है।

जे. कृष्णमूर्ति मानते हैं कि शिक्षा मनुष्य का उन्नयन करती है। वह जीवन के सत्य, जीवन जीने के तरीके में मदद करती है। इस संदर्भ को देते हुए वे बताते हैं कि शिक्षक हों या विद्यार्थी उन्हें यह पूछना आवश्यक नहीं कि वे क्यों शिक्षित हो रहे हैं। क्योंकि जीवन विलक्षण है। ये पक्षी ये फूल, ये वैभवशाली वृक्ष, ये आसमान, ये सितारे ये सरिताएँ, ये मत्स्य, यह सब हमारा जीवन है। जीवन समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक सतत् संघर्ष है, जीवन ध्यान है जीवन धर्म भी है। जीवन गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ हैं-ईर्ष्याएँ महत्त्वाकांक्षाएँ, वासनाएँ, भय, सफलताएँ चिन्ताएँ।

शिक्षा इन सबका अनावरण करती है। शिक्षा का कार्य है कि वह संपूर्ण जीवन प्रक्रिया को समझने में हमारी सहायता करे, न किस हमें केवल कुछ व्यवसाय या ऊँची नौकरी के योग्य बनाएँ। कृष्णमूर्ति कहते हैं कि हमें बचपन से ही ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जहाँ भय का वास न हो नहीं तो व्यक्ति जीवन भर कुठित हो जाता है। उसकी महत्त्वाकांक्षाएँ दब कर रह जाती है। मेधाशक्ति दब जाती है। मेधा शक्ति के बारे में कहते हैं कि मेधा वह शक्ति है जिससे आप भय और सिद्धान्तों की अनुपस्थिति में आप स्वतंत्रता से सोचते हैं ताकि आप सत्य की, वास्तविकता को अपने लिए खोज कर सकें।

पूरा विश्व इस भय से सहमा हुआ है। चूँकि यह दुनिया वकीलों, सिपाहियों और सैनिकों की दुनिया है। यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है। किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा सम्मान शक्ति व आराम के लिए संघर्ष कर रहा है। अतः निर्विकार रूप से शिक्षा का कार्य यह है कि वह इस अतिरिक्त और बाह्य भय का उच्छेदन करे।