Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 9 हमारी नींद

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड Chapter 9 हमारी नींद Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 9 हमारी नींद

Bihar Board Class 10 Hindi हमारी नींद Text Book Questions and Answers

कविता के साथ

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solution प्रश्न 1.
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि एक बिप्य की रचना करता है। उसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि वीरेन डंगवाल ने मानव जीवन एक बिंब उपस्थित किया है। सुविधाभोगी आरामपसंद जीवन नींद रूपी अकर्मण्यता के चादर से अपने आपको ढंककर जब सो जाता है तब भी प्रकृति के वातावरण के एक छोटा बीज अपनी कर्मठता रूपी सींगों से धरती के सतह रूपी संकटों को तोड़ते हुए आगे बढ़ जाता है। यहाँ नींद, अंकुर, कोमल सींग, फूली हुई बीज, छत ये सभी बिम्ब रूप में उपस्थित है।

हमारी नींद Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 2.
मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किये जाने का क्या आशय है ?
उत्तर-
मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किये जाने का आशय है निम्न स्तरीय जीवन की संकीर्णता को दर्शाना। सष्टि में अनेक जीवन-क्रम चलता रहता है। उसका जीवन-क्रम की व्यापकता को लेकर कर्मठता और अकर्मठता का बोध कराता है लेकिन मक्खी के जीवन-क्रम केवल सुविधापयोगी एवं परजीवी-जीवन का बोध कराता है।

Class 10th Hindi Godhuli Question Answer प्रश्न 3.
कवि गरीब बस्तियों का क्यों उल्लेख करता है ?
उत्तर-
कवि गरीब बस्तियों के उल्लेख के माध्यम से कहना चाहता है कि जहाँ के लोग दो जून रोटी के लिए काफी मसक्कत करने के बाद भी तरसते हैं वहाँ पूजा-पाठ, देवी जागरण जैसे महोत्सव कितना सार्थक हो सकता है ? यहाँ कुछ स्वार्थी लोग अपनी उल्लू सीधा करने के लिए गरीब लोगों का उपयोग करते हैं। लेकिन गरीबी से ग्रसित लोग अपने वास्तविक विकास हेतु सचेत नहीं होते हैं।

बिहार बोर्ड हिंदी बुक 10 Bihar Board प्रश्न 4.
कवि किन अत्याचारियों का और क्यों जिक्र करता है?
उत्तर-
कवि यहाँ उन अत्याचारियों का जिक्र करता है जो हमारी सुविधाभोगी, आराम पसंद जीवन से लाभ उठाते हैं। समाज का एक वर्ग जो ऐशो-आराम की जिंदगी में अपने आपको ढाल लेता है उसी का लाभ अत्याचारी उठाते हैं। हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जाने वाले जीवन नहीं रह पाते हैं और इस अवस्था में अत्याचारी अत्याचार करने के बाह्य और आंतरिक सभी साधन जुटा लेते हैं।

Bihar Board 10th Class Hindi Book Pdf प्रश्न 5.
इनकार करना न भूलने वाले कौन हैं ? कवि का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे हठधर्मी हैं जो संवैधानिक और वैधानिक स्तर पर ‘कई गलतियाँ कर जाते हैं लेकिन अपनी भूलें या गलतियों को स्वीकार नहीं करते हैं। वे साफ तौर पर अपनी भूल को इनकार कर देते हैं। जैसे लगता है कि उनका दलील काफी साफ और मजबूत है।

Class 10 Hindi Kavita Bihar Board प्रश्न 6.
कविता के शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
उत्तर-
किसी भी कविता का शीर्षक कवितारूपी शरीर का मुख होता है। शीर्षक कविता की सारगर्भिता लिए रहता है। शीर्षक रखने के समय कुछ बातें इस प्रकार होती हैं-शीर्षक, सार्थक लघु और समीचीन होना चाहिए। साथ ही शीर्षक घटना प्रधान, जीवन प्रधान या विषय-वस्तु प्रधान होता है। यहाँ शीर्षक विषय-वस्तु प्रधान हैं। शीर्षक छोटा है और आकर्षक भी है। इसका शीर्षक पूर्ण रूप से केन्द्र में चक्कर लगाता है जहाँ शीर्षक सुनकर ही जानने की इच्छा प्रकट हो जाता है। अत: सब मिलाकर शीर्षक सार्थक है।

Hindi Kavita For Class 10 Bihar Board प्रश्न 7.
व्याख्या करें-
गरीब बस्तियों में भी
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउडस्पीकर पर।
उत्तर –
प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि वीरेन डंगवाल के द्वारा लिखित ‘हमारी नींद’ से ली गई है। इस अंश में कवि उन लोगों का चित्र खींचा है जो गरीब बस्तियों में जाकर अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए देवी जागरण जैसे महोत्सव का आयोजन करते हैं।

कवि कहते हैं कि आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे स्वार्थपरक लोग हैं जिनके हृदय में गरीबों के प्रति हमदर्दी नहीं है। केवल उनसे समय-समय पर झूठे -वादे करते हैं। नेता, पूँजीपति एवं अत्याचारी ये सभी गरीबों की आंतरिक व्यथा से खिलवाड़ कर उनकी विवशता से लाभ उठाते हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solution In Hindi प्रश्न 8.
‘याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी साहित्य के हमारी नींद नामक शीर्षक से उद्धृत है। कवि वीरेन डंगवाल सामाजिक अत्याचारियों के करतूतों का पर्दाफाश किये हैं।
आज हमारे समाज में अनेक लोग हैं जो अपनी जिंदगी को आरामतलबी बना लिये हैं। ऐसी जिंदगी समाज और राष्ट्र के लिए खतरनाक परिधि में रहती है और इन्हीं में से कुछ लोग ऐसे हैं जो इनकी विवशता का लाभ उठाने के लिए गलत अंजाम देने में पीछे नहीं हटते हैं। अत्याचारी आंतरिक और बाह्य रूप से अपने स्वार्थपूर्ति के लिए सभी प्रकार के साधन अपनाते हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions प्रश्न 9.
“हमारी नींद के बावजूद’ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्य-पुस्तक के “हमारी- नींद” नामक शीर्षक से उद्धृत है। इस अंश में हिन्दी काव्यधारा के समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने वैसे लोगों का चित्रण किया है जो आरामतलबी जीवन पंसद करते हैं।
प्रस्तुत अंश में कवि कहते हैं कि जीवन-क्रम कभी रुकता नहीं है। समय-चक्र के समान बिना किसी की प्रतीक्षा किये हुए अनवरत आगे ही बढ़ता जाता है। यदि हमारे समाज के कोई भी व्यक्ति सुविधोपयोगी आराम पसंद जीवन पसंद करते हैं तो भी कहीं एक पक्ष जरूर ऐसा होता है जिसका सिलसिला हमेशा आगे बढ़ते जाता है जो कर्मवाद का संदेश देता है।

Bihar Board Hindi Solution प्रश्न 10.
‘हमारी नींद’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने हमारी नींद’ कविता में विभिन्न चित्रों के माध्यम से सुविधाभोगी जीवन और हमारी बेपरवाही के बावजूद बेहतर जिन्दगी के लिए चलने वाले संघर्ष का चित्रण बड़ी स्पष्टता से किया है।

कवि कहता है कि छोटी धरती के नीचे बीज अंकुरा और उस छोटे अंकुर ने अपने ऊपर की धरती को दरकाया और खुली हवा में उसने साँस ली। उसने अपने ऊपर के अवरोध को तोड़ा। पेड़ ने भी अपना कद ऊँचा किया।

प्रकृति के इस क्रम के बाद कवि समाज की ओर निहारता है। मक्खियों की तरह लोग जी रहे हैं और उनकी तरह ही बच्चे उत्पन्न कर रहे हैं। नतीजा है कि जीवन की इस अफरा-तफरी में ही रंगे हो रहे कुछ लोग आगजनी कर रहे हैं, बम फोड़ रहे हैं ताकि अपने लिए सुविधा का सामान जुटा सकें। कुछ की जिन्दगी जाती है तो जाए। हमें क्या ?

दूसरी ओर कुछ गरीब लोग हैं जो अपनी गरीबी को अपना नसीब मान चुके हैं, वे गरीबी से छुटकारा पाने के लिए लड़ने की अपेक्षा अपनी गाढ़ी कमाई में लाउडस्पीकर लगाकर, रात-रात भर देवी के भजन गा रहे हैं वे इस भ्रम में हैं कि देवी-पूजा से उनका जीवन बदल जाएगा। वस्तुतः वे नींद में हैं। दरअसल भाग्य, पूजा-पाठ समाज के दुश्मनों के बिछाए हुए जाल हैं ताकि ये अत्याचारी आनन्द-सुख भोग सकें। किन्तु जीवन ऐसा है कि उनके लाख चाहने के बाद रुकता नहीं है। उपेक्षाकृत से उस पर कोई असर नहीं पड़ता।

कवि कहता है कि लाख कोशिशों के बावजूद कुछ लोग हैं जो अनाचार के आगे सिर नहीं झुकाते। वे दृढतापूर्वक अनुचित कार्य करने से मना कर देते हैं। उनकी ओर से आँख बन्द कर लेने पर भी वे रुकते नहीं, बढ़ते जाते हैं। यह संघर्ष ही उनकी ताकत है, मानव के विकास की यही कहानी है।

प्रश्न 11.
कविता में एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिसका अर्थ जानने की कोशिश करनी पड़े। यह कविता की भाषा की शक्ति है या सीमा ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
यह भाषा की शक्ति है जो अपने साधारण अर्थ से सबकुछ समझाने में सफल हो जाती है। सीमा का रूपान्तर नहीं होता है किन्तु भाषा का रूपान्तर कविता की सौष्ठवता को प्रदर्शित करने में समर्थ हो जाती है।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नांकित के दो-दो समानार्थी शब्द लिखें-
पेड़, शिशु, दंगा, गरीब, अत्याचारी, हठीला, साफ, इनकारा
उत्तर-
पेड़ – तरू, वृक्ष
शिशु- बालक, बाल
दंगा – सांप्रदायिकता, सांप्रदायिक युद्ध
गरीब – दीन, निर्धन
अत्याचारी – दुराचारी
हठीला – स्थैर्य, अडिग रहने वाला
साफ – एकदम, बेहिचक
इनकार – मनाही, मना करना।

प्रश्न 2.
निम्नांकित वाक्यों में कर्ता कारक बताएँ
(क) मेरी नींद के दौरान / कुछ इंच बढ़ गए / कुछ सूत पौधे।
(ख) अंकुर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से धकेलना शुरू की। बीज की फूली हुई। छत भीतर से।
(ग) गरीब बस्तियों में भी / धमाके से हा देवी जागरण लाउडस्पीकर पर।
(घ) मगर जीवन हठीला फिर भी : बढ़ता ही जाता आगे / हमारी नींद के बावजूद।
उत्तर-
(क) पौधे
(ख) अंकुर
(ग) देवी जागरण
(घ) जीवन

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों में कर्मकारक की पहचान कीजिए
(क)अंकर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से / धकेलना शुरू की / बीज की फूली हुई / छत भीतर से।
(ख) कई लोग हैं / अभी भी / जो भूले नहीं करना , साफ और मजबूत / इनकार।
उत्तर-
(क) छत
(ख) इनकार

काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मेरी नींद के दौरान
कुछ इंच बढ़ गए पेड़
कुछ सूत पौधे
अंकर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से
धकेलना शुरू की
बीज की फूली हुई
छत, भीतर से।
एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ
कई शिशु पैदा हुए, और उनमें से
कई तो मारे भी गए
दंगे, आगजनी और बमबारी में।

प्रश्न
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता-हमारी नींद।
कवि-वीरेन डंगवाल।

(ख) प्रसंग हिन्दी साहित्य के समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सुविधाभोगी, आराम पसंद जीवन अथवा हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जीवन का चित्रण किया है।

(ग) सरलार्थ प्रस्तुत पद्यांश में कवि एक बिम्ब की रचना करते हैं जो मानव जीवन और मानवेत्तर प्राणियों के आंतरिक और बाह्य जीवन चक्र, संघर्षशीलता के साथ चल रहे हैं। कवि स्वयं कविता के केन्द्र में बिम्ब के रूप में उपस्थित होकर कहता है कि जब मैं सुविधाभोगी बनकर आराम की नींद में सो रहा था तो इधर प्रकृति अन्य प्राणियों के जीवनक्रम को आगे बढ़ा रही थी। प्रकृति के आगोश में पलने वाले पेड़-पौधे के बीज भी धरातल के अन्दर प्रवेश कर अपने अंकुररूपी कोमल सींगों से बीज की छत को धकेल कर कुछ इंच पौधे के रूप में आगे बढ़ आये हैं। उसी प्रकार मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ तो इस जीवन क्रम में कई शिशु उत्पन्न हुए, उनमें से कई मारे गये। कई जगह दंगे-फसाद, आगजनी और बमबारी से मानव और मानवेत्तर प्राणियों का जीवनक्रम चलता रहा।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत पद्यांश में कवि आराम तलबी, विलासिता में लिप्त जो मानव जीवन-यापन करते हैं और उनके ही इर्द-गिर्द घूमने वाले अन्य प्राणियों का जीवन-चक्र किस तरह से चलता है इसी का यहाँ दार्शनिक आकलन किया गया है। कवि मानवीय जीवन की लधुता और विधाता के समय की व्यापकता के माध्यम से कहता है कि मानव जीवन अति लघु है। इस लघु जीवन दुःख-सुख, जुल्म-अत्याचार, सहते हुए जीवन को विकास क्रम में ले जाना है। अतः विलासितापूर्ण जीवन को छोड़कर जीवन की यथार्थता को समझना चाहिए।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) सम्पूर्ण कविता खड़ी बोली में रचित है।
(ii) छंद मुक्त होते हुए भी कहीं-कहीं कविता में संगीतमयता आ गयी है।
(iii) कवि की भाषा सरल और सुबोध है।
(iv) बिम्ब-प्रतिबिम्ब की झलक कविता की लाक्षणिकता पूर्णरूप से प्रकट होती है।
(v) भाव के अनुसार भाषा का वर्णन कविता की परिपक्वता दिखाई पड़ रही है।

2. गरीब बस्तियों में भी ।
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउडस्पीकर पर।
याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने
मगर जीवन हठीला फिर भी
बढ़ता ही जाता आगे
हमारी नींद के बावजूद
और लोग भी हैं, कई लोग हैं
अभी भी
जो भूले नहीं करना
साफ और मजबूत
इनकार।

प्रश्न
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) दिये गये पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता- हमारी नींद।
कवि- वीरेन डंगवाल।

(ख) प्रसंग-पस्तुत पद्यांश में कवि काल-क्रम की व्यापक एवं संघर्षशील गतिविधियों के दार्शनिक रूप का वर्णन करता है। जीवन-क्रम में जीव-जंतु से लेकर मानवीय जीवन जो प्रभावित होता है उनमें विपरीत परिस्थितियाँ जीवन को कुछ कहने-सुनने के लिए बाध्य करती है। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि सर्वदा सामंतशाहियों के चक्र में कमजोर और ईमानदार पिसता रहा है।

(ग) सरलार्थ-कवि मानव जीवन-क्रम का चित्रण करते हुए कहता है कि जहाँ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब लोग हैं जो केवल किसी तरह से अपने पेट की ज्वाला शांत करने की अपेक्षा कुछ नहीं जानते हैं। वहाँ भी विलासी लोग भगवती जागरण तथा अन्य ढोंगी कार्यक्रम के आड़ में लाउडस्पीकर बजवाकर ठगने का कार्य करते हैं। साथ ही समाज के कुछ लोग सुशिक्षित होकर भी मानवता की परिभाषा को झुठलाते हुए अत्याचारियों के द्वारा जुटाये गये साधनों को मूक होकर देखते रहते हैं। हम आराम तलबी जिंदगी में कर्महीनता का परिचय देकर मानवता को कलंकित करने में पीछे नहीं हट रहे हैं। इनमें आज भी ऐसे लोग हैं जो अपने सामने कमजोर, बेबस, मजबूर लोगों पर अत्याचारियों के द्वारा होते अत्याचार को देखकर केवल यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत कविता का भाव यह है कि आज के परिवेश में मनुष्य केवल स्वार्थपरता पर केन्द्रित है। साथ ही साथ कहा जा रहा है कि जमाना बाह्य जगत से काफी खतरनाक पैमाने पर टूट रहा है। लोग सच्चाई से मुख मोड़ रहे हैं।

(ङ) काव्य-सौंदर्य-
(i) सम्पूर्ण कविता खड़ी बोली में है।
(ii) तद्भव तत्सम के साथ-साथ कहीं-कहीं उर्दू शब्दों का भी समागम हुआ है।
(iii) पूरी कविता लक्षण शक्ति पर आधारित है।
(iv) भाव के अनुसार कविता में ओज गुण के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।
(v) अलंकार और छंद के विशेष परिस्थितियों से दूर रहने पर भी कविता के उद्देश्य में अंतर नहीं आया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें

प्रश्न 1.
‘हमारी नींद’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) सुमित्रानंदन पंत
(ख) वीरेन डंगवाल
(ग) रामधारी सिंह दिनकर
(घ) कुँवर नारायण
उनर-
(ख) वीरेन डंगवाल

प्रश्न 2.
वीरेन डंगवाल किस विचारधारा के कवि हैं ?
(क) जनवाद
(ख) रहस्यवादी
(ग) रीतिवादी
(घ) सूफी
उत्तर-
(क) जनवाद

प्रश्न 3.
‘हमारी नींद’ में ‘नींद’ किसका प्रतीक है?
(क) गफलत
(ख) बेहोशी
(ग) पागलनपन
(घ) मदहोशी
उत्तर-
(क) गफलत

प्रश्न 4.
‘दुश्चक्र में सृष्टा’ पुस्तक पर वीरेन डंगवाल को कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(क) ज्ञानपीठ
(ख) सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार
(ग) साहित्य अकादमी
(घ) नोबेल पुरस्कार
उत्तर-
(ग) साहित्य अकादमी

प्रश्न 5.
हमारी नींद’ कैसी कविता है ?
(क) समकालीन
(ख) नकेनवादी
(ग) हालावादी
(घ) छायावादी
उत्तर-
(क) समकालीन

प्रश्न 6.
कवि वीरेन डंगवाल के अनुसार जीवन में महत्त्वपूर्ण क्या है ?
(क) सुख
(ख) नकेनवादी
(ग) भ्रमण
(घ) संघर्ष
उत्तर-
(घ) संघर्ष

II. रिक्त स्थानों की पर्ति करें

प्रश्न 1.
वीरेन डंगवाल ………….. परिवर्तन के पक्षधर हैं।
उत्तर-
जनवादी

प्रश्न 2.
‘हमारी नींद’ कविता काव्य-संकलन …….से संकलित है।
उत्तर-
दुष्चक्र में स्रष्टा

प्रश्न 3.
मेरी नींद के दौरान कुछ इंच बढ़ गए ………… ।
उत्तर-
पंड

प्रश्न 4.
कई लोग मारे गए दंगे, आगजनी और …….. में।
उत्तर-
बमबारी

प्रश्न 5.
गरीब बस्तियों में भी धमाके से हुआ ………. जागरण।
उत्तर-
देवी

प्रश्न 6.
डंगवाल की कविताओं के दृश्य “………” करनेवाले हैं।
उत्तर-
बेचैन

प्रश्न 7.
नाजिम हिकमत ………. भाषा के महाकवि हैं।
उत्तर-
तुकी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वीरेन डंगवाल का जन्म कहाँ हुआ है ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल का जन्म उत्तरांचल के कीर्तिनगर में हुआ।

प्रश्न 2.
वीरेन डंगवाल ने काव्य रचना के अलावा क्या कर हिन्दी को समृद्ध किया है ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल ने काव्य-रचना के अलावा विश्व के श्रेष्ठ कवियों की कविताओं का अनुवाद कर हिन्दी को समृद्ध किया है।

प्रश्न 3.
यथार्थ को डंगवाल किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं?
उत्तर-
यथार्थ को डंगवाल बिल्कुल नये अंदाज में प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 4.
वीरेन डंगवाल कैसे कवि हैं ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल जनवादी परिवर्तन के पक्षधर प्रमुख सामयिक कवि हैं।

प्रश्न 5.
‘हमारी नींद’ कविता का संदेश क्या है ?
उत्तर-
‘हमारी नींद’ कविता का संदेश है संघर्ष ही जीवन है।

प्रश्न 6.
वीरेन डंगवाल की काव्य भाषा कैसी है ?
उत्तर-
वीरेन डंगवाल की काव्य-भाषा में देशी ठाठ दिखाई देता है।

व्याख्या खण्ड

प्रश्न 1.
मेरी नींद के दौरान
कुछ इंच बढ़ गए पेड़
कुछ सूत पौधे
अंकुर ने अपने नाममात्र कोमल सींगों से
धकेलना शुरू की
बीज की फूली हुई
छत, भीतर से।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी प नुस्तक के ‘हमारी नींद’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन काव्य पंक्तियों का प्रसंग कवि की नींद से जुड़ा हुआ है जिसमें नींद के माध्यम से एक पेड़ के सृजन एवं विकास-क्रम की चर्चा है। कवि सपने देखता है। सपने में पेड़ कुछ इंच बढ़ गए हैं—कुछ छोटे-छोटे पौधे पेड़ पुत्र के रूप में विकसित हो रहे हैं। अंकुर अपने स्वरूप में कैसे बदलाव क्रमानुसार लाता है, उसकी व्याख्या कवि ने अपनी कविता में किया है। बीज जब अंकुरित होते हैं, धीरे-धीरे फूल के रूप में छतनुमा आकार ग्रहण करते हैं। भीतर से बीज का अंकुरित रूप विकसित होकर पौधे-पेड़ के रूप में अपने विराट अस्तित्व को प्राप्त कर लेता है।

कवि की नींद कितनी सुखद है इसकी व्याख्या स्वयं कवि ने किया है। जैसे मनुष्य का जीवन-क्रम है—ठीक वैसा ही बीज-पौधे-पेड़ का है। कवि ने नींद में देखे गए सपने के माध्यम से पेड़ के जन्म से लेकर विकसित रूप तक का सूक्ष्म चित्रण करते हुए मानवीय जीवन से उसके संबंधों को व्याख्यायित किया है। जैसे मानव के भीतर कई विचार मंथन के द्वारा एक आकार रूप ग्रहण करता है। ठीक उसी प्रकार बीजरूप भी अंकुरण के द्वारा विराटता को प्राप्त करता है। इस कविता में प्रकृति की सृजन-प्रक्रिया का चित्रण हुआ है।

प्रश्न 2.
एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ
कई शिशु पैदा हुए और उनमें से
कई तो मारे भी गए
दंगे, आगजनी और बमबारी में।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘हमारी नींद’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन काव्य पक्तियों का संबंध मक्खी के जीवन-क्रम, शिशु-प्रजनन, आगजनी, बमबारी से जुड़ा हुआ है।

कवि कहता है कि एक मक्खी का जीवन-क्रम धीरे-धीरे पूर्णता को प्राप्त करता है। कई शिशु पैदा होते हैं और उनमें से कई मार दिये भी जाते हैं-दंगों द्वारा, आगजनी द्वारा और बमबारी द्वारा। यहाँ मक्खी के जीवन क्रम को मानव के जीवन क्रम को तुलनात्मक रूप में दिखाया गया है। मनुष्य आज अपने जीवन-क्रम ने विकास की सीढ़ियों पर दूर-दूर तक पहुँचाया है। हमारे बच्चे भी सृजन-प्रक्रिया से गुजरते हुए विकास की सीढ़ियों पर चढ़ते हैं। आज चारों तरफ कितनी भयावह स्थिति है। कहीं दंगे हो रहे हैं, कहीं आगजनी हो रही है, कहीं बमबारी हो रही है। पूरी मानवता आज कराह रही है। आज चारों तरफ अराजक स्थिति है। सभी असुरक्षित हैं। जीवन को खतरे से बचाकर विकास-पथ की ओर ले चलने में आज काफी कठिनाइयाँ हो रही हैं।

प्रश्न 3.
गरीब बस्तियों में भी
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउा पीकर पर।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “हमारी नींद” नामक काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन काव्य पंक्तियों का प्रसंग दीन-हीन जन के अंध-विश्वासों, देवी-जागरण और धूम-धमाका से है। कवि कहता है कि गरीब बस्तियों में भी देवी-जागरण के बहाने धूम-धमाका, लाउडस्पीकर को बजाना आदि कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। ये दीन-जन अपनी यथार्थ स्थिति से रू-ब-रू न होकर भटके हुए हैं। भावुकता एवं अंधविश्वास में समय और शक्ति का अपव्यय करते हैं। इनमें अपनी गरीबी, बेबसी-लाचारी के प्रति चेतना नहीं जगी है। ये कोरे अंधविश्वास और नकलची जीव ! अभी भी जी रहे हैं। इनमें सारी शक्तियाँ तो हैं किन्तु चेतना के अभाव में अपने लक्ष्य से भटके हुए हैं। कवि गरीबों, उनकी बस्तियों, उनके कार्यक्रमों के प्रति ध्यान आकृष्ट करता है। उनके जीवन की विसंगतियों का सही चित्रण प्रस्तुत कर कवि ने सच्चाई से हमें अवगत कराया है।

प्रश्न 4.
याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने
मगर जीवन हठीला फिर भी
बढ़ता ही जाता आगे
हमारी नींद के बावजूद।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “हमारी नींद” काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन कविताओं का प्रसंग हमारे मानवीय जीवन के अनेक पक्षों से जुड़ा है। समाज में रह रहे अनेक किस्म के लोगों, उनके रहन-सहन और क्रियाकलापों से संबंधित है। कवि कहता है कि अनेक तरह के साधन-संसाधन को लोगों ने जुटा लिया है। अत्याचारियों ने अपने अत्याचार से, ‘ शोषण दमन से सबको त्रस्त कर रखा है। किन्तु जीवन की गति भी कहाँ अवरुद्ध हो रही है। वह तो अपनी गति में अग्रसर है। जीवन तो संघर्ष का ही नाम है। उसे जीवटता के साथ जीने में ही मजा है। जीवन सदैव प्रगति-पथ पर आगे की ओर ही बढ़ता गया है, भले ही उसके मार्ग में क्यों न अनेक बाधाएँ खड़ी हों। जीवन हठधर्मी होता है। उसमें दृढ़-संकल्प शक्ति निहित होती है। लाख नींद बाधा बनकर खड़ी हो किन्तु यात्रा-क्रम कभी रुका है क्या ? सीमित लोगों के पास संसाधन सिमटे हुए हैं। विषमता के बीच जीवन को जीते हुए लक्ष्य के शिखर तक पहुँचाना है। कवि सामाजिक विसंगतियों के बीच जीते हुए लड़ते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है।

प्रश्न 5.
और लोग भी हैं, कई लोग हैं
अभी भी
जो भूलें नहीं करता
साफ और मजबूत
इनकार।
व्याख्या-
प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के “हमारी नींद” काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का प्रसंग समाज के आमलोगों से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी को सृजन कर्म में लगाया है।

इस धरा पर उन अत्याचारियों के अलावा दूसरे लोग भी हैं जो अभी भी अपने साफ और मजबूत इरादों के साथ भूलों को स्वीकार करते हैं इनकार नहीं करते हैं। उनके भीतर नैतिकता, ईमानदारी, कर्मठता और साहस विद्यमान है। समाज के ये तपे-तपाये लोग हैं जिन्होंने समाज के लिए, राष्ट्र के लिए, लोकहित के लिए मजबूत इरादों के साथ संघर्ष किया है, संघर्ष कर रहे हैं। समाज के ये अगली पंक्ति के लोग हैं जिनमें त्याग, करुणा, दया और सहनशक्ति भरी हुई है। इस प्रकार समाज के शोषक वर्ग के अलावा एक सृजन वर्ग भी है जो अपनी कर्तव्यनिष्ठता के साथ, संकल्पशक्ति के साथ समाज-निर्माण, राष्ट्र निर्माण में लगा हुआ है।

हमारी नींद कवि परिचय

प्रमुख समकालीन कवि वीरेन डंगवाल का जन्म 5 अगस्त 1947, ई० में कीर्तिनगर, टिहरी-गढ़वाल, उत्तरांचल में हुआ । मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल में शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद डंगवाल जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम० ए० किया और यहीं से आधुनिक हिंदी कविता के मिथकों और प्रतीकों पर डी० लिट् की उपाधि पायी । वे 1971 ई० से बरेली कॉलेज में अध्यापन करते रहे । डंगवाल जी हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता भी करते हैं। उन्होंने इलाहाबाद से प्रकाशित अमृत प्रभात’ में कुछ वर्षों तक ‘घूमता आईना’ शीर्षक . से स्तंभ लेखन भी किया । वे दैनिक ‘अमर उजाला’ के संपादकीय सलाहकार भी हैं। ]

कविता में यथार्थ को देखने और पहचानने का वीरेन डंगवाल का तरीका बहुत अलग, अनूठा और बुनियादी किस्म का है । सन् 1991 में प्रकाशित उनका पहला कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में आज भी उतना ही प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण लगता है । उन्होंने कविता में समाज के साध परण जनों और हाशिये पर स्थित जीवन के जो विलक्षण ब्यौरे और दृश्य रचे हैं, वे कविता में और कविता से बाहर भी बेचैन करने वाले हैं । उन्होंने कविता के मार्फत ऐसी बहुत-सी वस्तुओं और उपस्थितियों के विमर्श का संसार निर्मित किया है जो प्रायः ओझल और अनदेखी थीं। उनकी कविता में जनवादी परिवर्तन की मूल प्रतिज्ञा है और उसकी बुनावट में ठेठ देसी किस्म के, खास और आम, तत्सम और तद्भव, क्लासिक और देशज अनुभवों की संश्लिष्टता है।

वीरेन डंगवाल को ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ काव्य संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उन्हें ‘इसी दुनिया में’ पर रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार मिला । उन्हें श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार और कविता के लिए शमशेर सम्मान भी प्राप्त हो चुका है । डंगवाल जी ने विपुल परिमाण में अनुवाद कार्य भी किए हैं। तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद उन्होंने ‘पहल पुस्तिका’ के रूप में किया । उन्होंने विश्वकविता से पाब्लो नेरुदा, वर्ताल्त ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊष रूजेविच आदि की कविताओं के अलावा कुछ आदिवासी लोक कविताओं के भी अनुवाद किए ।

समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल की कविताओं के संकलन ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ से उनकी कविता ‘हमारी नींद’ यहाँ प्रस्तुत है । सुविधाभोगी आराम पसंद जीवन अथवा हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जानेवाले जीवन का चित्रण करती है यह कविता।

हमारी नींद Summary in Hindi

पाठ का अर्थ

नई कविता के यशस्वी कवि हिन्दी साहित्य में अपना अलग पहचान बनानेवाले वीरेन डंगवाल एक चर्चित कवि हैं। इनकी रचनाओं में यथार्थ का बहुत अलग, अनूठा और बुनियादी किस्म का . वर्णन मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं ने समाज के साधरण जनों और हाशिये पर स्थित जीवन को विशेष रूप से स्थान दिया है। उनकी कविता में जनवादी परिवर्तन की मूल प्रतिज्ञा है और उसकी बनावट में ठेठ देशी किस्म के खास और आम, तत्सम और तद्भव, क्लासिक और देशज अनुभवों की संश्लिष्टता है।

प्रस्तुत कविता कवि की कविताओं के संकलन ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ से संकलित है। इस कविता में कवि सुविधाभोगी आराम पसंद जीवन अथवा हमारी लपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितओं से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जानेवाले जीवन का चित्रण है। ‘हमारी नींद’ अनमना-सा है। नींद में भी सूत के पौधे कुछ बढ़ते हुए नजर आते हैं। मक्खियों की भाँति अत्याचारी अपना जीवन यापन करते हैं। अत्याचारी बढ़ते हैं और मारे जाते हैं। आर्थिक स्थिति से कमजोर वाले भी धना के के साथ जीवन जीना चाहते हैं। हम उन अत्याचारियों से डरते हैं फिर भी हमारी नींद में कोई परिवर्तन नहीं होता है। हम बेपरवाह जीवन जीते हैं। बहुत से ऐसे लोग हैं ज्यों अपने जीवन जीने की कला से इंकार नहीं कर सकते हैं। वस्तुतः यहाँ कवि कहना चाहता है कि हम देखकर भी न देखने का भाव दिखाते हैं। न सो कर भी गहरी नींद का ढोंग करते हैं।

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 बहुत दिनों के बाद

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 11th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 8 बहुत दिनों के बाद (नागार्जन)

 

बहुत दिनों के बाद पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

बहुत दिनों के बाद कविता का सारांश Bihar Board Class 11th प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कवि ने क्या देखा और क्या सुना?
उत्तर-
‘बहुत दिनों के बाद’ घुमक्कड़ कवि की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना का एक दुलर्भ साक्ष्य प्रस्तुत करती है। घुमक्कड़ प्रवृत्ति का होने के कारण बहुत दिनों के बाद कवि अपने ग्रामीण वातावरण में आकर पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान देखकर आह्वादित हो जाता है। का धान कूटती किशोरियों की कोकिल-कंठी तान सुनकर मंत्र-मुग्ध हो जाता है। उसका जन अ। . उल्लसित हो जाता है।

बहुत दिनों के बाद कविता का भावार्थ Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
कवि ने अपने गाँव की धूल को क्या कहा है? और क्यों?
उत्तर-
कवि नागार्जुन ने अपने गाँव की धूल को चन्दनवर्णी कहा है। ऐसा कहने के पीछे कवि का आशय है कि जिस तरह चन्दन स्निग्धता, सुगंध और शीतलता देता है। ठीक उसी तरह कवि के गाँव की धूल जिसका रंग चंदन की तरह ही है, जिससे ऐसी सोंधी महक आ रही है, उसका स्पर्श चन्दवत्, स्निग्ध और शीतलता प्रदान कर रहा है।

बहुत दिनों के बाद कविता की व्याख्या Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
कविता में ‘बहुत दिनों के बाद’ पंक्ति बार-बार आयी है। इसका क्या औचित्य है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
घुमक्कड़ी प्रवृत्ति का होने के कारण कवि ‘बहुत दिनों के बाद’ अपने गाँव का उल्लासपूर्ण वातावरण देखकर मंत्र-मुग्ध है। प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल में हरियाली देखकर कवि का हृदय कल्पना को ऊँची उड़ान भरने लगता है। बहुत दिनों के बाद कवि को पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान तथा धान कूटती नवयौवनाओं की सुरीली तान सुनने को मिलता है। मौलसिरी के ताजे-टटके फूल के सुवास कवि के नासारन्ध्रों में समाती है। प्रकृति की मेहरबानी से गन्ने, ताल-मखाना की हरी-भरी फसलें लहलहाते हुए देखकर कवि ताल-मखाना खाता है और गन्ना चूसता है।

प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल प्राय: उजार-बियावान-सा दिखाई पड़ता था। प्रकृति की असीम कृपा से बहुत दिनों के बाद कवि को गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ भोगने का अवसर प्राप्त हुआ है। कवि कहना चाहता है कि उजड़े उपवन में फिर से हरियाली छा गई है, प्रायः बाढ़ के प्रकोप से आच्छादित भूमि को स्पर्श करने का अवसर भी उसे बहुत दिनों के बाद मिलता है। लंबी इन्तजारी के बाद मिलने वाली ग्रामीण परिवेश का सच्चा सुख मिलना ‘सुख’ के महत्व में चार-चाँद लगा दिया है।

बहुत दिनों के बाद कविता Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
पूरी कविता में कवि उल्लसित है। इसका क्या कारण है?
उत्तर-
‘बहुत दिनों के बाद’ शीर्षक कविता घुमक्कड़ कवि नागार्जुन की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदनाओं का एक दुर्लभ साक्ष्य प्रस्तुत करती है। कवि बहुत दिनों के बाद पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान जी-भर देखता है। धान के उपज की प्रचुरता से कोकिल कंठी नवयौवन द्वारा धान कूटते हुए मधुर संगीत फिजाँ में फैला हुआ है जिसे सुनकर कवि मंत्र-मुग्ध हो जाता है। मौलसिरी के ताजे-टटके फूल भी सूंघने को मिलती है।

साथ-ही-साथ चंदनवर्णी धूल को भी अपने तिलक के रूप में माथे पर लगाने का अवसर प्राप्त होता है। कवि का हृदय गाँव की खुशहाली से आह्वादित है। वह जी-भर ताल-मखाना खाता है और गन्ने भी जी-भर चूसता है। कवि को गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब अपनी जन्मभूमि पर साथ-साथ प्राप्त हो जाता है। इस मनोहर तथा मन को आह्वादित करने वाले प्रकृति के मनोरम दृश्य को देखकर कवि भवविभोर हो जाता है। उसका हृदय उल्लास से भर जाता है।

Bahut Dino Ke Baad Kavita Question Answer Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
“अब की मैंने जी-भर भोगे गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर” इन पंक्तियों का गर्भ उद्घाटित करें।
उत्तर-
प्रतिबद्ध मार्क्सवादी, सहृदय साहित्यसेवी कवि नागार्जुन रचित कविता “बहुत दिनों के बाद” से ली गयी इन पंक्तियाँ में तृप्ति का आख्यान हुआ है। मानव जीवन मृग मरीचिका में व्यतीत हो रहा है। सुख की वांछा में व्यक्ति अपनी जड़ों से कट कर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ सारा कुछ मानव निर्मित, कृत्रिम होता है। चाँदनी होती है, चाँद नहीं होता। खूशबू आती है, फूल कागजी होते हैं, रूप मोहित करता है लेकिन मेकअप की मोटी परत चुपड़ी हुई है। भेद खुलने पर, छले जाने पर काफी दुःख होता है, क्लेष होता है और मानव मन अपनी जड़ की ओर लौटता है।

जीवन शहरों और महानगरों जैसे अजगर के गुंजलक में किस स्थिति में है, सभी जानते हैं। उगता सूरज, डूबता सूरज के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। भागमभाग लगा रहता है। इसी भागमभाग से ऊबकर, भाग कर या निजात पाकर कवि अपने प्राकृतिक परिवेश में लौटा जहाँ मौलसिरी, हर शृंगार, रातरानी, रजनीगंधा जैसे सुगंध बिखेरने वाले फूलों का सान्निध्य मिला, हृदय तृप्त हुए। प्रकृति के विभिन्न अंगों के प्रकृत रूप देखकर धूल धूसरित बालक को देखकर, धान रोपती, काटती, कूटती किशोरियों को गीत गाते देखकर मन को तृप्ति मिली।

पकी फसल की झूमती बालियों को छूने का सुख मिला। खेत-खलिहान से उठने वाली महक। भरते मंजर और चू रहे महुए की सुगंध से मन प्राण तृप्त हुए। लगा जैसे सदियों बीत गयी हो, इन सब का भोग किये हुए। पता नहीं, फिर जीवन के संघर्ष से मुक्ति मिले न मिले। इसलिए कवि ने इन सबका पान, भोग जी भर कर किया।

बहुत दिनो के बाद कविता Bihar Board Class 11th प्रश्न 6.
इस कविता में ग्रामीण परिवेश का कैसा चित्र उभरता है?
उत्तर-
मार्क्सवादी विचार के कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता “बहुत दिनों के बाद” शीर्षक कविता में ग्रामीण परिवेश अपनी पूर्ण वस्तुवाचकता और गुणवाचकता के साथ उपस्थित है। उत्तर बिहार के नेपाल से सटे मिथिलांचल जिसे ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, में ही बाबा नागार्जुन का गाँव है, जवार है, अपना परिवेश है। यहाँ धान की पकी सुनहली फसल से भरे खेत हैं। धान से चावल निकलाने के लिए श्रमसाध्य उद्योग है और इसी से जुड़ा है श्रम परिहार हेतु “धान कूटनी” का गीत।

वस्तुतः अकृत्रिम अकृत्रिम ग्रामीण परिवेश का हर उपक्रम हर गतिविधि गीत, संगीत से आबद्ध है। शहरों में फूल या तो बिकते हैं, नकली होते हैं बासी होते हैं। यहाँ मौलसिरी, हर शृंगार, रजनीगंधा, रातरानी सब ताजा टटके रूप में प्राप्त होते हैं। इन्हें तोड़ने सजाने की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है, इनके रूप-गंध में स्वयं को निमज्जित करने की। गाँवों की पक्की सड़कें हो भी तो जो मजा पगडंडियों पर स्वयं को साधते हुए चलने का, उससे उड़ती चंदन जैसी धूल में सराबोर होने का है, उसका कहना ही क्या?

शुद्ध देशी घी में भुना हुआ कुरकुराता ताल मखाना खाने का और खेत से ताजे गन्ने तोड़कर अपने दाँतों-जबड़ों से उसे चीर चूस कर आस्वाद लेने का आनंद तो गाँव में ही मिलेगा। जहाँ सब कुछ उपलब्ध है बिना पैसे के, केवल प्यार के दो मीठे बोल खर्च करने पड़ते हैं। ऐसा ही है नागार्जुन का ग्रामीण परिवेश।

बहुत दिनों के बाद नागार्जुन Bihar Board Class 11th प्रश्न 7.
“धान कूटनी किशोरियों की कोकिल-कंठी तान” में जो सौन्दर्य चेतना दिखलाई पड़ती है, उसे स्पष्ट करें।
उत्तर-
अपने गाँव से गहरे जुड़े सरोकर रखनेवालं वैताली कवि नागार्जुन ग्रामीण सौंदर्य के सूक्ष्म द्रष्टा, पारखी और प्रस्तोता हैं।

धान कूटने के लिए ओखल-मूसल या फिर ढेकुली का प्रयोग होता है। ओखल धान रखकर बार-बार मूसल को बीच से पकड़ते हुए हाथ को शिर के ऊपर तक उठाना फिर कुछ झुकतं हुए धान पर प्रहार करना। चूड़ियों की खनखन, आपस में चूहल करती किशोरियों, नारियों और उनके गले से निकले ग्राम्य गीत के बोल, लगे जैसे किसी अमराई में कोयल पंचम का आलाप ले रही हो। यह सारा वातावरण ऐन्द्रिक, चाक्षुष और घ्राण बिम्बों को कोलाज़, प्रस्तुत करता है। कवि का कथन संक्षिप्त है किन्तु उसका सौन्दर्य अति सचेत, चेतनायुक्त और प्रभावी है।

Bahut Dinon Ke Bad Bihar Board Class 11th प्रश्न 8.
कविता में जिन क्रियाओं का उल्लेख है वे सभी सकर्मक हैं। सकर्मक क्रियाओं का सुनियोजित प्रयोग कवि ने क्यों किया है?
उत्तर-
देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना के ध्वजावाहक प्रकृतिप्रेमी कविवर नागार्जुन ने चिंतन रचना, आचरण के धरातल पर बैठकर जनहित से संबंधित विषयों को कविता के माध्यम से उद्घाटित किया है। कवि के अनुसार शहरी जीवन के सीलन-भरी जिन्दगी की अपेक्षा प्रकृति की उन्मुक्त वातावरण, ग्रामीण परिवेश, सहज, सरस तथा आनन्ददायक होता है। इसकी बोधगम्यता ‘सकर्मक क्रिया’ के सुनियोजित प्रयोग करने में सहज और स्वाभाविक द्रष्टव्य होती है। पात्रों के कार्यों में जीवंतता प्रदान करने के लिए सार्थक क्रियाओं का प्रयोग करना कवि की कल्पना को। यथार्थ से दृढ़तापूर्वक संवेदित करता है।

बहुत दिनों के बाद Bihar Board Class 11th प्रश्न 9.
कविता के हर बंद में एक-एक ऐन्द्रिय अनुभव का जिक्र है और अंतिम बंद में उन सबका सारा-समवेत कथन है। कैसे? इसे रेखांकित करें।
उत्तर-
“बहुत दिनों के बाद” शीर्षक कविता के हर बंद में एक ऐंद्रिय अनुभव है। हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं, जिनके माध्यम से सृष्टि का वस्तुमय साक्षात्कर होता है।

प्रथमबंद में पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान देखने का, दूसरे बंद में धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान सुनने का, तीसरे बंद में मौलसिरी के ताजे टटके फूल सूंघने का, चौथे बंद में गवई पगडंडी के चन्दनवर्णी धूल का स्पर्श करने का, पाँचवें बंद में ताल मखाना खाने और गन्ना चूसने का ऐन्द्रिय अनुभव वर्णित है और अंतिम बंद में भोगने शब्द कार प्रयोग करते हुए कवि ने समवेत ढंग से ऊपर के ही ऐन्द्रिय अनुभवों को सान्द्रित रूप से प्रस्तुत किया है। गंध का संबंध नाक से, रूप का आँख से, रस का जीभ से, शब्द का कान से, स्पर्श का त्वचा से, अनुभव का भोग होता है। अतः अंतिम बंद ऐन्द्रिय अनुभवों का सारांश ही है।

बहुत दिनों के बाद भाषा की बात

Bahut Dino Ke Baad Poem In Hindi Question Answer प्रश्न 1.
कोकिलकंठी, चंदनवी में कौन-सा अलंकार है?
उत्तर-
कोकिलकंठी और चंदनवर्णी में रूपक और उदाहरण अलंकार प्रयोग भेद से उपस्थित है।

Bahut Dino Ke Baad Kavita Bihar Board Class 11th प्रश्न 2.
‘मैंने’ सर्वनाम के किस भेद के अंतर्गत है?
उत्तर-‘
मैंने’ सर्वनाम पुरुषवाचक सर्वनाम के अन्तर्गत उत्तम पुरुष के अंतर्गत आता है जिसका कारक ‘कर्ता’ है। मैंने का प्रयोग भूतकाल के निम्न भेदों में आते हैं।

सामान्य भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी।
आसन्न भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी है।
पूर्ण भूत-मैंने पुस्तक पढ़ी थी।

वैसे पंजाब-हरियाणा में मैंने का प्रयोग वर्तमान काल में होता है, जहाँ इसका अर्थ मुझे, मुझको लिया जाता है।

मैंने खाना है (मुझे खाना है)।

Bahut Dino Ke Baad Poem In Hindi Bihar Board Class 11th प्रश्न 3.
निम्नलिखित शब्दों को तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज समूहों में विभक्त करें
पगडंडी, तालमखाना, गंध, मौलसिरी, टटका, फूल, मुसकान, फसल, स्पर्श, गवई, गन्ना
उत्तर-

  • तत्सम-गंध, स्पर्श
  • तद्भव-फूल, पगडंडी, मौलसिरी।
  • देशज-तालमखाना, टटका, गवई, गन्ना।
  • विदेशज-मुस्कान, फसल।।

Bahut Dinon Ke Bad Kavita Bihar Board Class 11th प्रश्न 4.
सकर्मक और अकर्मक क्रिया में क्या अंतर है? सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
सकर्मक क्रिया उसे कहते हैं, जिसका कर्म हो या जिसके साथ कर्म की संभावना हो अर्थात् जिस क्रिया के व्यापार का संचालन तो कर्त्ता से हो, पर जिसका फल या प्रभाव किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु पर अर्थात् कर्म पर पड़े। जैसे-राम आम खाता है। जिन क्रियाओं पर व्यापार और फल कर्ता पर हो, वे अकर्मक क्रिया कहलाती है। जैसे-राम सोता है।

Bahut Din Ke Bad Bihar Board Class 11th प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों के लिए प्रयुक्त विशेष्य बताइए
(i) कोकिल-कंठी,
(ii) पकी सुनहली,
(iii) गँवई,
(iv) चंदनवर्णी,
(v) ताजे-टटकी,
(vi) धान कूटती।
उत्तर-
(i) तान,
(i) फसलों,
(iii) पगडंडी,
(iv) धूल,
(v) फूल,
(vi) किशोरियाँ।

अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

बहुत दिनों के बाद लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता का परिचय दीजिए।
उत्तर-
नागार्जुन की यह कविता मिथिला की धरती तरौनी जो कवि की जन्मभूमि रही है, की सुरभि से सुरभित है। कवि यथार्थ का शिल्पी और रागात्मक संवेदनाओं का अमर गायक रहा है। अपने गाँव-जवार की प्रति कवि के मन में प्रगाढ़ स्नेह एवं दुलार है। ग्रामीण परिवेश की टटकी छवियों का चित्रांकन ‘बहुत दिनों के बाद’ कविता में सफलतापूर्वक किया गया है। पठित कविता में कवि की सहृदयता, सौन्दर्यानुभूति एवं विशिष्ट रागात्मक संवेदना उकेरी गई है। कवि की संवेदना मानव-जीवन के चित्रण में शहर की अपेक्षा गाँवों के प्रति अधिक उभरी है।

कवि जब रोजी-रोटी की तलाश में देश-देशान्तर की खाक छान रहा था, तब उसे अपने ग्राम ‘तरउनी’ की याद सताने लगती है। यह कविता घुमक्कड़ कवि की ग्रामीण प्रकृति और घरेलू संवेदना का दुर्लभ अहसास कराती है। ‘तरउनी’ मिथिला का एक अदना-सा गाँव है, इस गाँव का अदना कवि यहाँ की मिट्टी से इतना प्रभावित है कि उसे वह गाँव स्वर्ग-तुल्य लगता है। यह कविता उनकी ‘सतरंगे पंखों वाली’ काव्यकृति में संकलित है। कृति का प्रकाशन 1950 ई. में हुआ था।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु को देखकर आँखों का सुख प्राप्त किया? .
उत्तर-
पकी सुनहली फसलों की मुस्कान को देखकर।

प्रश्न 2.
बहुत दिनों के बाद कवि को क्या सुनने का सुख प्राप्त हुआ?
उत्तर-
गाँव में धान कूटती हुई किशोरियों के कोकिल कंठ से निकली तान सुनकर।

प्रश्न 3.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु की गन्ध का सुख प्राप्त किया?
उत्तर-
मौलश्री के ढेर सारे टटके फूलों की गन्ध का।

प्रश्न 4.
बहुत दिनों के बाद कवि ने कहाँ की धूल का स्पर्श-सुख प्राप्त किया?
उत्तर-
अपने गाँव की चन्दनवर्णी धूल को स्पर्श करने का सुख प्राप्त किया।

प्रश्न 5.
बहुत दिनों के बाद कवि ने किस वस्तु का स्वाद प्राप्त किया?
उत्तर-
ताल मखाने को खाने और गन्ने को चूसने का।

प्रश्न 6.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में किस बात की अभिव्यक्ति हुयी है?
उत्तर-
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में सौंदर्य चेतना की अभिव्यक्ति हुयी है।

प्रश्न 7.
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में कहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन हुआ है?
उत्तर-
बहुत दिनों के बाद शीर्षक कविता में कवि नागार्जुन ने गाँव की प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है।

प्रश्न 8.
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान में कौन-सा बिंब दिखाई पड़ता है?
उत्तर-
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान में स्राय बिंब दिखाई पड़ता है।

बहुत दिनों के बाद वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

I. निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रश्न 1.
बहुत दिनों के बाद कविता के कवि हैं?
(क) नरेश सक्सेना
(ख) दिनकर
(ग) अरुण कमल
(घ) नागार्जुन
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 2.
नागार्जुन का जन्म कब हुआ था?
(क) 1911 ई०
(ख) 1813 ई०
(ग) 1907 ई०
(घ) 1905 ई०
उत्तर-
(क)

प्रश्न 3.
‘नागार्जुन’ का जन्म स्थान था
(क) बेगूसराय
(ख) मुजफ्फरपुर
(ग) दरभंगा
(घ) मोतिहारी
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 4.
‘नागार्जुन’ की कविता का नाम था
(क) बहुत दिनों के बाद
(ख) भस्मांकर
(ग) प्यासी पथराई आँखें
(घ) चंदना
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 5.
‘नागार्जुन’ का मूल नाम था
(क) वैद्यनाथ मिश्र
(ख) गोवर्धन मिश्र
(ग) सकलदेव मिश्र
(घ) जगदंबी मिश्र
उत्तर-
(क)

प्रश्न 6.
‘नागार्जुन’ की शिक्षा हुई थी
(क) बंगला में
(ख) हिन्दी में
(ग) संस्कृत में
(घ) उर्दू में
उत्तर-
(ग)

प्रश्न 7.
कवि ‘नागार्जुन’ को कौन-सा जीवन पसंद था?
(क) सधुक्कड़ी
(ख) धुमक्कड़ी
(ग) शहरी
(घ) ग्रामीण
उत्तर-
(ख)

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
कवि ने गाँव की धूल को ……………… कहा है।
उत्तर-
चन्दवर्णी।

प्रश्न 2.
कवि की कविता में ग्रामीण परिवेश का …………….. उभरता है।
उत्तर-
मार्मिक चित्र।

प्रश्न 3.
नागार्जुन को आधुनिक ……. कहा जाता है।
उत्तर-
कबीर।

प्रश्न 4.
नागार्जुन ने अपनी कविता में मिथिलांचल की …………….. का वर्णन किया है।
उत्तर-
अनुपम छटा।

प्रश्न 5.
बहुत दिनों के बाद कवि गाँव की पक्की सुनहली फसल को देखकर …………….. हो जाता है।
उत्तर-
आह्वादित।

प्रश्न 6.
प्राकृतिक विपदाओं से त्रस्त मिथिलांचल प्रायः …………….. दिखाई पड़ता था।
उत्तर-
उजार-वियावान।

प्रश्न 7.
लंबी इंतजारी के बाद ग्रामीण परिवेश का सच्चा सुख मिलना सुख के महत्व में ……………… लगा दिया है।
उत्तर-
चार चाँद।

प्रश्न 8.
कवि की कविता देशज प्रकृति और घेरलू संवेदनाओं का …………….. प्रस्तुत करती है।
उत्तर-
दुर्लभ साक्ष्य

प्रश्न 9.
ऐन्द्रिय आधार और स्थायी मन-मिजाज का यह कविता एक दुर्लभ और ……………… है।
उत्तर-
अद्वितीय उदाहरण।

बहुत दिनों के बाद कवि परिचय – नागार्जुन (1911-1998)

जीवन-परिचय-
नागार्जुन का जन्म 1911 ई. में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव (उनके ननिहाल) में हुआ था। वे तरौनी के निवासी थे एवं उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई। 1936 ई. में श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म में दीक्षित जेल की यात्रा भी करनी पड़ी।

1935 में उन्होंने ‘दीपक’ (हिंदी मासिक) तथा 1942-43 में ‘विश्वबंधु’ (साप्ताहिक) पत्रिका का संपादन किया। मैथिली काव्य-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित किए गए। 1998 ई. में उनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ-बाबा नागार्जुन की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं-युगधारा, प्यासी पथराई आँखें, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ, हजार-हजार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, रत्नगर्भा, ऐसे भी हम क्या, ऐसे भी तुम क्या, पका है कटहल, मैं मिलिटरी का बूढ़ा घोड़ा, भस्मांकुर (खंडकाव्य)। मैथिली में उनकी कविताओं के दो संकलन हैं-चित्रा, पत्रहीन नग्नगाछ। बलचनमा, रतिनाथ की चाची, कुंभी पाक, उग्रतारा, जुमनिया का बाबा, वरुण के बेटे (हिंदी), पारो, नवतुरिया, बलचनमा (मैथिली) जैसे उनके उपन्यास विशेष महत्त्व के हैं।

भाषा-शैली-नागार्जुन का हिंदी और मैथिली के साथ संस्कृत पर भी समान अधिकार होने के कारण उनकी काव्य भाषा में हाँ एक ओर संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि मिलती है, वहीं दूसरी ओर बोलचाल की भाषा की सहजता भी दिखाई देती हैं। उनके काव्य में तत्सम शब्दों के प्रयोग के साथ ही ग्राम्यांचल शब्दों का भी समुचित प्रयोग हुआ है। उन्होंने मुहावरों का भी समावेश अपनी कविताओं में किया है। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण शैली का सफल प्रयोग सामाजिक-विसंगतियों के चित्रण में किया है।

साहित्यिक विशेषताएँ-नागार्जुन प्रगतिवादी विचारधारा के कवि हैं। वे जनसामान्य, श्रम तथा धरती से जुड़े लोगों की बात अपनी कविताओं में कहते हैं। वे जन भावनाओं और समाज की पीड़ा को व्यक्त करते हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त विषमताओं को देखा है, समझा है, अतः उनका वर्णन स्वाभाविक है। विषय की जितनी विराटता और प्रस्तुति की जितनी सहजता नागार्जुन के रचना संचार में है, उतनी शायद ही कहीं और हो। लोक जीवन और प्रकृति उनकी रचनाओं की नस-नस में रची-बसी है। छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं, जिनकी कविताओं का ग्रामीण चौपाल से लेकर विद्वानों तक में समान रूप से आदर प्राप्त है। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गई उनकी कविताएँ इतनी सहज, संप्रेषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि वे पाठक के मानस-लोक में बस जाती हैं।

बाबा नागार्जुन कभी मार्क्सवाद की वकालत करते हैं, कभी समाज में व्याप्त शोषण का वर्णन करते हैं और कभी प्रकृति का मनोहारी वर्णन करते हैं। उनकी कविताओं में शिष्टगंभीर हास्य और सूक्ष्म चुटीले व्यंग्यों की अधिकता है।

कवि के मन में श्रम के प्रति सम्मान का भाव है। प्रकृति से भी नागार्जुन को बहुत लगाव है। बादल कवि को मृग रूप में दिखाई देता है। उसने रूपक के माध्यम से बादलों को चौकड़ी करते देखा है।

नागार्जुन संस्कृत भाषा का गंभीर ज्ञान रखते थे। अतः उनकी भाषा संस्कृत शब्दावली से युक्त है। उनकी काव्यभाषा में संस्कृत काव्य परंपरा की प्रतिध्वनि मिलती। वे प्रगतिवादी विचारध रा के कवि हैं, अतः उन्होंने बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया है। उनकी भाषा में सरता है, स्वाभाविकता है। उन्होंने खड़ी बोली के लोक प्रचलित रूप को अपनाया है। उनकी अभिव्यक्ति एकदम स्पष्ट, यथार्थ और ठोस है। व्यंग्य का बाहुल्य है। लोकमंगल उनकी कविता की मुख्य विशेषता है, इस कारण व्यावहारिक धरातल भी दिखाई देती है। उन्होंने विभिन्न छंदों में काव्य रचना की है और मुक्त छंद में भी। अलंकारों का आकर्षण उनमें नहीं है। आधुनिक कवियों में नागार्जुन का विशेष स्थान है।

बहुत दिनों के बाद कविता का सारांश

वर्तमान के वैताली प्रतिबद्ध मार्क्सवादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और जनकवि बाबा नागार्जुन रचित कविता शुद्ध प्रकृति प्रेम की कविता है। जो स्वयं को खोजना चाहता है, स्वयं को परिपूर्ण ऊर्जावान और अर्थवान बनाना चाहता है। वह प्रकृति की गोद में जाता है। प्रकृति से प्रकृत रूप में मिलन की कविता है, बहुत दिनों के बाद।

आधुनिक युग संत्रास, विषाद असंतोष का पर्याय है। जीवन-यापन के लिए आपा-धापी लगी हुई गला काट प्रतियोगिता जारी है। निजता की स्थापना में निजता का छिजन, क्षरण होता जा रहा है। अपने अस्तित्व को पुनः पाने रस पूर्ण, गंध पूर्ण करने के लिए कवि कार्तिक माह में अपने मिथिलांचल स्थिति “तरौनी” गाँव आए। और उसे दूर से धान की सुनहली पकी बालियाँ झूमती मुस्कराती नजर आयीं। इन्हें देखकर कवि का मन प्रसन्न हो गया। ऐन्द्रिय भोग का एक साधन नेत्र है। जो दूर से दृश्य दिखाकर भी तृप्ति प्रदान करती है।

कवि नागार्जुन जब अपने गाँव में प्रविष्ट हुआ तो ओखल में मूसल की मार, ढेंकी की चोट के साथ कोयल-सी मधुर आवाज में गाँव की किशोरियों के गले से गाँव के गीत सुनने को मिले, कानों को भी तृप्ति प्राप्त हुई।

आगे बढ़ा तो मौलसिरी अपनी मादकता अपने अगणित फूलों के माध्यम से बिखेर रही थी। “अंजुली-अंजुली” उठाकर इन फूलों को कवि ने सूंधे, नाक की प्यास भी बूझी। गाँव की पगडंडियों पर खाली पाँव चलते हुए गाँव की मिट्टी धूल का स्पर्श सुख चंदन सुवासित सुख सम प्रतीत हुआ।

अब बारी आई षट्स की पहचान करने वाली जिह्वा की। मिथिला के ताल मखाने में और ईखों (गन्नों) में जो स्वाद है, वह ‘फाइव स्टार’ या काटिनेंटल डिसेज में कहाँ है। जिह्वा के माध्यम से पेट भी भर गया। ऐसी तृप्ति कवि को बहुत दिनों के बाद हुई। यदि वह लगातार इसी परिवेश में रहता तो शायद तब यह कविता नहीं रची जाती।

वियोग, विछोह, असंतुष्टि के कारण प्रकृति के इन उपादानों को देखने, सुनने, सुंघने, छूने और खाने का अवसर मिला। सब कुछ मुफ्त, निःशुल्क शुद्ध, सात्विक और पवित्र अवस्था में। कवि अतिम बंद में ‘भोगे’ शब्द का उपयोग करता है। कहा भी गया है “वीर भोग्य वसुन्धरा धरती” भू का प्रत्येक अवयव, घटक भोग्य है। उपयोगी है। आवश्यकता है प्रकृति के इस योगदान को स्वीकार करने का। आवश्कता है कृत्रिमता का केचुल उतारकर प्रकृत रूप में हम रहें।

‘बहुत दिनों के बाद’ कविता प्रकृति प्रेम की अपने प्रकार की अनूठी कविता है। इसमें उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकार भी सहज चले आये हैं। सम्पूर्ण कविता उल्लास का सृजन करती है। प्रकृति की ओर लौटने का आह्वान करती है।

वास्तव मे, बहुत दिनों के बाद मिथिला के घुमक्कड़ नागार्जुन की देशज प्रकृति और घरेलू संवेदना एक दुर्लभ साक्ष्य को दर्शाती है।

बहुत दिनों के बाद कठिन शब्दों का अर्थ

जी-भर-मन भर, इच्छा भर। किशोरी-नयी उम्र की लड़की। कोकिलकंठी-कोयल जैसे मीठे स्वर वाली। गवई-गाँव की। चंदनवर्णी-चंदन के रंग की। मोलसिरी (मोलिश्री)-एक बड़ा सदाबहार पेड़ जिसमें छोटे-छोटे सुगंधित फूल लगते हैं, बकुल। तालमखाना-एक मेवा जो मिथिला की ताल-तलैया में विशेष रूप से उपजाया जाता है। गन्ना-ईख। पगडंडो-कच्चा-पतला-इकहरा रास्ता। भू-पृथ्वी।

बहुत दिनों के बाद काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. बहुत दिनों के बाद ………………. साथ-साथ इस भू पर। .
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रगतिवादी कवि नागार्जुन की कविता “बहुत दिनों के बाद” से ली गयी है। कवि ने इस कविता में बहुत दिनों के बाद गाँव में रहकर विविध वस्तुओं का सुख भोगने की स्थिति का वर्णन किया है।

कवि कहता है कि बहुत दिनों के बाद इस बार गाँव में रहकर रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श का भरपूर सुख लिया। कवि ने कविता के प्रथम छन्द में पकी सुनहली फसल की मुस्कान का सुख भोगने की बात कही है जो नये सुख के अन्तर्गत आता है। अतः रूप है। दूसरे छन्द में गाँव की किशोरियों द्वारा धान कूटने के समय कोकिल कंठ से गीत गाने या मधुर वार्तालाप करने का वर्णन किया है जो श्रवण सुख का विषय है। यही शब्द है। तीसरे छन्द में मौलश्री के ताजा पुष्पों की गंध सूंघने का वर्णन है जो घ्राण सुख का विषय है अतः गन्ध है।

चौथे छन्द में गाँव की चन्दनी-माटी छूने का वर्णन है जो स्पर्श का विषय है। पाँचवें छन्द में तालमखाना खाने और गन्ने का रस चूसने का उल्लेख है जो रस के अन्तर्गत है। यह स्वाद संवेदना का विषय है। इस तरह इस छन्द में पूर्व के पाँच छन्दों में वर्णित विषयों का समाहार हो गया है। पूर्व के पाँच छन्दों में क्रमशः रूप, शब्द, गन्ध, स्पर्श और रस की व्याख्या है और इस छन्द में इन पाँचों – को सूत्र रूप में पिरो कर कहा गया है। इस तरह सूत्र शैली तथ्य-कथन के कारण ये पतियों महत्त्वपूर्ण है। कथावस्तु के आलोक में यह तत्त्व प्रकाश में आया है।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 6 गंगा स्तृति

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 6 गंगा स्तृति Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 6 गंगा स्तृति

Bihar Board Class 7 Hindi गंगा स्तृति Text Book Questions and Answers

पाठ से –

गंगा स्तुति भावार्थ Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 1.
‘गंगा स्तुति’ कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर:
मैथिल कोकिल कवि विद्यापति ।

गंगा स्तुति कविता का भावार्थ Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 2.
गंगा के किनारे को छोड़ते समय कवि के आँखों से आँसू क्यों बह रहे.थे?
उत्तर:
गंगा के किनारे पर रहकर कवि विद्यापति को जो अध्यात्मिक सुख की अनुमति हुई वह अब कवि के लिए वास्तविक सुख था। अब कवि जब गंगा की निकटता को छोड़ रहा है तो उसके आँखों में आँस आ गये।

गंगा स्तुति कविता Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 3.
कवि गंगा से किस अपराध की क्षमा माँगता है?
उत्तर:
कवि स्नान काल में जो अपना पैर गंगा जल में रखा उसे वह अपराध मानता है तथा इसके लिए क्षमा माँगता है।

Ganga Stuti Class 7 Bihar Board Hindi प्रश्न 4.
कविता की निम्नलिखित पंक्तियों को पूरा कीजिए –
उत्तर:
(क) कि करब जप-तप जोग धेयाने।
जनम कृतारथ एकहि सनाने ।

(ख) भनई विद्यापति समदओं तोही।
अन्तकाल जनु विसरहु मोही ॥

पाठ से आगे –

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solution प्रश्न 1.
इस पाट’ शीर्षक “मंगा स्तुति” रखा गया है। क्या आप इस शीर्षक से सहमत है? यदि हाँ तो क्यों और नहीं तो क्यों ?
उत्तर:
इस पाठ का शीर्षक “गंगा स्तुति” रखा गया है। इस शीर्षक से हम पूर्णत: सहमत हैं। क्योंकि कवि विद्यापति अपने इष्ट देवी गंगा से सम्पूर्ण कविता में मात्र प्रार्थना की है।

Ganga Stuti Kavita Bihar Board Class 7 Hindi प्रश्न 2.
गंगा के अतिरिक्त अन्य नदियाँ भी हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं। इन नदियों का हमारे दैनिक जीवन में क्या महत्व है, उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
गंगा के अतिरिक्त अन्य नदियाँ भी हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं क्योंकि इन नदियों का हमारे दैनिक जीवन में बहुत महत्व है।
जैसे – नदियों में हम स्नान करते हैं। नदियों का पानी पीने के काम में भी आता है। नदियों के जल से सिंचाई होती है। नदियों के पानी से बिजली उत्पादन होता है। नदियों के रास्ते से व्यापार भी होता है। नदियों के रास्ते से हम यात्रा भी करते हैं।

व्याकरण –

Bihar Board Solution Class 7 Hindi प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का पर्याय लिखिए
उत्तर:
(क) पाओल – प्राप्त किया; पाया।
(ख) छोड़इत – छोड़ते, त्यागते।
(ग) समदओं – मनाऊँ, विनमऊ
(घ) सननि – स्नान, नहाना।
(ङ) पाय – पाद, चरण, पैर

कुछ करने को –

Bihar Board Class 7 Hindi Book Pdf प्रश्न 1.
गंगा के उद्गम स्थल से उसके समुद्र में मिलने तक की यात्रा के प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
गंगा का उद्गम स्थान हिमालय का गोमुख (गंगोत्री) है वहाँ से चलकर गंगा अनेक ऊँची पर्वतीय एवं वन प्रदेश से गुजरते हुए हरिद्वार में आकर समतल भूमि पर बहने लगती है। रास्ते में वह अनेक नदियों को अपने साथ लेकर तीन रास्ते से चलकर गंगा सागर तक पहुँच जाती है जो गंगा-सागर कहलाता है।

Hindi Class 7 Bihar Board Solution प्रश्न 2.
गंगा के किनारे बसे शहरों की सूची बनाइए। इन शहरों में स्थित कल-कारखानों से गंगा नदी पर किस प्रकार का दुष्प्रभाव पड़ता है। इस पर अपने सहपाठियों से चर्चा कीजिए एवं लिखिए।
उत्तर:
गंगा के दोनों तटों पर अनेक शहर बसे हैं –

जैसे – हरिद्वार, काशी, मुगलसराय, बक्सर, पटना, बरौनी, मुंगेर भागलपुर, कलकत्ता इत्यादि।

इन सभी शहरों में कल-कारखाने हैं जिसके रासायनिक पदार्थ युक्त गंदे जल गंगा में गिर रहे हैं जिससे गंगा में स्थित जलीय जीव पर दुष्प्रभाव तो पड़ ही रहा है साथ-साथ हमारे जीवन पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। हमलोग मलयुक्त विषाक्त गंगा जल का दैनिक जीवन में उपयोग कर रहे हैं जिससे अनेक रोगों का आक्रमण हमारे ऊपर हो रहा है। गन्दगी से गंगा पट रही है परिणामतः गंगा दिन-प्रतिदिन दूषित कमजोर हो रही है। ऐसा भी दिन आ सकता है जब गंगा कूड़े-कर्कटों से भर जायेगी तथा गंगा के जल का दर्शन भी नहीं होगा।

गंगा स्तृति Summary in Hindi

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे॥
छोड़इत निकट नयन बह नीरे।

भावार्थ – हे माता गंगे ! आपके तट पर रहकर मैंने अद्वितीय श्रेष्ठ सुख को प्राप्त किया है। आपकी निकटता को छोड़ते हुए मेरे आँखों से आँसू बह रहे है।

कर जोरी विनमऔं विमल तरंगें,
पुन दरसन होए, पुन मति गंगे।

भावार्थ – हे पवित्र तरंग वाली ! आपको मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि हे पुण्यमयी गंगे! आपका पुनः दर्शन हो।

एक अपराध छेमब मोर जानी।
परसल माय पाय तुअ पानी॥

भावार्थ-हे मातु गंगे-मेरा एक अपराध समझकर क्षमा कर दें। क्योंकि हे माता, आपके पवित्र जल को मैंने अपने पैर से स्पर्श कर दिया है।

कि करब जप-तप जोग द्येयानि ।
जनम कृतारथ एकहि सनाने ॥

भावार्थ-हे मातु गंगे! जब आपके जल में मात्र एक बार स्नान करने – से जन्म सफल हो जाता है तो जप-तप-योग-ध्यान करने की क्या आवश्यकता है।

भनई विद्यापति समदओं तोही।
अन्तकाल जनु विसरहु मोही॥
भावार्थ – हे मातु गंगे ! कवि विद्यापति आपसे प्रार्थना करता है किआप हमें अन्त समय (मृत्युकाल) में नहीं भूलियेगा।
अर्थात् अवश्य दर्शन दीजियेगा।

Bihar Board Class 12 English Book Solutions Poem 9 Snake

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Rainbow English Book Class 12 Solutions Poem 9 Snake

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Bihar Board Class 12 English Snake Text Book Questions and Answers

B. 1.1. Write T for true and F for false statements

(a) It was a hot day when the thirsty snake came to drink water.
(b) The speaker was in a haste to drink water.
(c) The colour of the snake was yellow-black.
(d) The speaker considered himself a second comer to the trough.
Answer:
(a) T (b) T (c) F (d) T.

B.1.2. Answer the following questions briefly 

Snake Question Answer Bihar Board Class 12 Question 1.
Where did the speaker meet the snake?
Answer:
The speaker met the snake near water trough of his house. It had come there to drink water. The speaker had also went there for the same purpose i.e. for drinking water.

Snake Questions And Answers Bihar Board Class 12 Question 2.
Why had it come out of its hole near the trough?
Answer:
It had come out of its hole near the trough to drink water because it was too hot and the snake was thirsty.

Snake Poem Questions And Answers Bihar Board Class 12 Question 3.
Why did the speaker decide to wait?
Answer:
The speaker decided to wait because the snake had come first near the water through and he (speaker) was a second-comer.

B. 2.1. Write T for true and F for false statements

(a) The snake looked at the speaker vaguely.
(b) The day mentioned in the poem is that of June.
(c) There was a superstitious belief in Sicily to kill a black snake.
(d) The speaker was glad playing host to a snake.
(e) The snake departed in an obliged way.
(1) The speaker had a desire to talk to the snake.
Answer:
(a) T (b) F (c) F (d) T (e) F (f) T

B.2.2. Answer the following questions briefly 

Snake Dh Lawrence Questions Bihar Board Class 12 Question 1.
How did the snake drink water?
Answer:
The snake went to the water-trough and put his mouth upon the depth (bottom) of that trough. He sipped (drank slowly) the water with its straight mouth.

Bihar Board Rainbow English Book Class 12 Pdf Download Question 2.
What is the meaning of ‘Sicilian July’ with Etna smoking?
Answer:
‘Sicilian July’ with Etna smoking means extreme heat like the one caused when Etna erupted i.e. it was so hot as the volcano Etna in Sicily.

Bihar Board Class 12 English Book Solution Question 3.
What is the belief prevailing in Sicily about a snake?
Answer:
The belief prevailing in Sicily about a snake was that black snakes are innocent, the gold are venomous. So yellow-brown (golden) snake would be killed.

Class 12th English Book Bihar Board Question 4.
Why did the speaker like the snake?
Answer:
The speaker liked the snake because it looked most innocent. It drank the water peacefully for which it came there.

Rainbow English Book For Class 12 Solutions Question 5.
Do you think he had a conflict in mind?
Answer:
Yes, I think that he had a conflict in mind. He was afraid of it and also thought that it was a guest which came to drink water at his house.

B. 3.1. Write T for true and F for false statements 

(a) The speaker found the slow movement of the snake quite impressive.
(b) The speaker did not like the snake going back to the dark hole.
(c) He threw the pitcher at the snake.
(d) He later regretted having hit it.
(e) He compares it to a sea-bird, albatross.
(f) The snake appeared like a king in exile.
Answer:
(a) T (b) T (c) F (d) T (e) T (f) T.

B.3.2. Answer the following questions briefly

Bihar Board Solution Class 12th English Question 1.
What thing about the snake did appeal him most?
Answer:
It came to the poet’s house to drink water as a guest. It came calmly for the purpose and departed peacefully being satisfied, had appealed him most.

Class 12 English Book Bihar Board Question 2.
Why did he not like it going back to the dark hole?
Answer:
The poet did not like it going back to the dark hole because he was just thinking about the snake that it was just like a guest and as such like a god.

English Book For Class 12 Bihar Board Question 3.
What was his reaction after hitting the snake?
Answer:
He (the speaker) regretted after hitting it (snake). He felt that he had done wrong. How mean, how much uncivilized was his act. By doing so he had committed a sin, was his reaction.

Question 4.
Why did the speaker consider it “a king in exile”?
Answer:
The speaker considered it ‘a king in exile’ because it was peaceful and had done nothing wrong with him. He was his guest as well. Its look was like a king in exite. It did not misuse its power.

C. 1. Long Answer Questions

Question 1.
The speaker was fascinated by the snake. Do you think the time mentioned and the place it belonged to has anything to do with fascination?
Answer:
It was an extremely hot summer’s night. The speaker felt thirsty and as such he came out of his room with a pitcher to take water to drink. He saw a snake near the water trough, who had come from a nearby hole for the same purpose i.e. to drink water, after feeling thirsty. Though it was a yellow-brown fierceful cobra with its eyes shinning but its manners were decent. It sipped the water softly and peacefully with its straight gums from the water-trough. Being pacified it returned back to the black hole of the earth, from where it had come. It vaguely looked at the speaker but did no harm. The speaker was so much enchanted with its action and behaviour that he liked its association for some time. He was so admired that he thought it to be his guest. Further¬more, he was so fascinated that it (snake) looked like a god to him. As such the time and the place of its arrival on the scene bears no importance, but its gentle and sober look and behaviour impressed the speaker.

Question 2.
What does he mean by ‘the voice of my education?’
Answer:
It is privilent that snakes become poisonous. If most of them who are poisonous bite a human being, he will not survive and is bound to die. People become frightened it a snake appears before them. As such they kill the snake. Such type of training to kill the snake is being imparted by elderly persons to youngers. Elderly persons instruct their youngsters to kill the snake as and when they happen to see it. Here voice of my education denotes the same meaning to kill the snake when it appears before you. Here there is a special reference, a special meaning of the above term. In Sicily, where the speaker resides, there is a proverb “the black serpant are innocent and the gold (yellow) are poisonous”. This cobra happens to be brown-yellow and ought to be killed.

Question 3.
There was a conflict in the mind of the poet How did he analyse this conflict?
Answer:
Of course, there was a conflict in the poet’s mind when he met with the cobra. The cobra feeling thirsty in the hot summer night had come to drink water in the out-house of his residence. The poet was in the state of confusion regarding his role at that time and situation Several ideas and feelings engulfed his mind, such as

  • was it cowardise that he did not dare to kill it.
  • was it improper, out of his coriosity not to talk with the snake?
  • was it his humble act or feeling of humanity to feel so honoured (The poet had really felt honoured.)
  • and then he remembered the advice of elderly persons that if he was not afraid he would kill it (snake)
  • and feeling of its being a guest too haunted his mind.
  • and for its (snake’s) humbleness and peaceful behaviour, it (snake) appears to him as uncrowned king in exile.

These were the issues of conflict in his mind.

Question 4.
In what roles did he find the snake and himself ? Describe.
Answer:
He (The poet) found the snake and himself in different roles according to the situation. The snake felt thirsty in the hot summer’s night and came out of the hole beneath the earth and moved towards the water-trough in the out¬house of the poet’s residence. Being thirsty, he also came out of his house with a pitcher and found the snake siping wafer from the water trough there. Poet, being the second person to go there thought it proper to wait. He considered the snake as his guest also, who had come there to drink water. He thought it proper to welcome his guest, at his place. The snake was gentle by behaviour according to the poet. It peacefully left the place after getting satisfied and did not cause any harm to him. So, both of them-the poet and the snake very well performed their roles.

Question. 5.
The snake seemed like a king in exile. What are the qualities that makes the snake so majestic?
Answer:
The snake was very sober and peaceful. It quietly came and satisfied its thirst by sipping water and looked around like a god. The poet was highly impressed with its make and gentle behavior. It caused no damage to the speaker nor it attacked on him. Most cordially it returned back to the black hole, through which it had come from. It did not react to the poet’s hitting its body by a stick. So it (snake) seemed to him like an uncrowned king in exile.

Question 6.
What makes you think that hitting the snake was quite against the sensibility of the speaker?
Answer:
Being panicky the speaker picked up an awkward piece of stick and threw it towards the snake which hit its latter part of the body. He thought that it did not hit it (snake). The part of the body left behind convulsed (suddenly shakened) which indicated that the stick had caused injury to its body that left behind. It was shocking to him. He became felt sorry for his indecent and undesirable act. He thought that he had committed a wrong. It shows that hitting the snake was quite against his sensibility.

Question 7.
What is the sin committed by the speaker that he wanted to expiate?
Answer:
A sort of horror and a sort of protest to see the snake, sipping water by its straight mouth from the water trough, compelled him to hit the snake by a stick (log). But immediately after hitting it (snake), the speaker regretted it. He thought that he had done a vulgar, shameful, and mean act. He felt that by doing this he had committed a sin, which he would not have done. He hated on himself and of such human education to kill a snake. He wanted to accept punishment for such ‘sin’.

Question 8.
Give in short the summary of the poem, “Snake”. [B.M. 2009]
Or, Write a short note on the poem, “Snake”.
Answer:
D. H. Lawrence is a noted poet, novelist, essayist, short story writer and letter-writer. In this poem, the poet describes how one night he felt thirsty and got up to drink water. While he was moving towards the tap he found a snake coming out from the fissure of the earth. The poet was fascinated by the look and movement of the snake. Instead of killing it, he began to watch its movement. It moved towards the tap and drank water. Thereafter it began to return towards the hole. A conflict seized the mind of the poet whether to kill the snake or not. In fact, he began to like it. The poet was confused. Sometimes he considered himself a coward, sometimes prevers and sometimes an honurable being. Finally, when the snake entered partly in the hole the poet killed it with a piece of log. The poet is filled with remorse. He considers this act of his as paltry, vulgar, and mean. He condemns human education that prompted him to kill it. The poet remembers and he thinks that he has done an albatross. To him, the snake was like a king in exile. He regrets that he has missed a chance “With o.ie of the Lords of Life”.

C. 3. Composition

Write a short essay in about 150 words on the following:
(a) Human greed and environmental degradation.
Answer:
All our Si mounding together forms our environment. It is the most essential part of our life. Nowadays the environment has degraded a lot. The most important cause of this degradation is human greed. It has increased the pollution to the extent that the earth has come in danger. We are over¬exploiting our resources. This has resulted in the depletion of resources. Harmful gases are spread all around inviting many diseases. So, human need to get aware to eradicate this problem.

(b) Religion teaches tolerance and humility.
Answer:
Religion is known to give a specific identity to one in the society. There are many religions in the world having their different religious customs and belief. All religions have many good qualities in them. All teach us to walk in the path of honesty, love, and humanity. It teaches us the lesson of tolerance and humility. One who is truly a religious person always respects not only his own religion but also other religions. This forms the basis of social development and prosperity. It improves fraternity and strengthens national unity.

D. Word Study :
D.l. Dictionary Use

Ex. 1. Correct the spelling of the following words:
fishure, streight, flikered, muzed, parvarsity, delibarately, convalsed, wreethed, fassination, uncrouned
Answer:
fishure — fissure streight
flikered — flickered
parvarsity — perversity
convalsed — convulsed
fassination — fascination
streight — straight
muzed — muzzed
delibarately — deliberately
wreethed — writhed
uncrouned — uncrowned

D.2. Word-formation

Read the following lines from the poem carefully:
But suddenly that part of him that was left behind cunvulsed in undignified haste. Like a king in exile, uncrowned in the underworld.
In the above lines ‘undignified’ and ‘uncrowned’ have prefix ‘un—’ which make them ‘negative’ in meaning.
Add prefixes ‘un-‘, in-‘, il—’ir’, ‘dis-‘ to the following words and fill in the blanks to complete the sentences given below:
(i) Pragya could not get good marks in the ‘writing test’ because of her……………….. writing fast.
(ii) Man becomes……………….. because of his action.
(iii) His……………….. behavior is not liked by us.
(iv) You cannot win the case by your………………… arguments.
(v) There are still many…………………. planets and stars in the universe.
(vi) His blunt refusal to come was a sign of………………….
Answer:
(i) disability, (ii) immortal, (iii) irresponsible, (iv) unlogical, (v) unknown, (vi) disrespect.

D. 3. Word-meaning

Ex. 1. Read the poem carefully to find out where the following phrases have been used.
looked at, looked around, drew up, put down. left behind, the thought of
Fill in the blanks with appropriate phrases listed above:
(i) Varsha…………………. her papers on the table and went out.
(ii) We could not a…………… better plan.
(iii) He ran slowly and soon was………………all other runners.
(iv) We…………. the painting in admiration.
(v) The acrobat……………. himself before jumping over the rope.
(vi) The thirsty man……………….. in search of water.
Answer:
(i) put down, (ii) drew up, (iii) left behind by, (iv) looked at, (v) drew up, (vi) looked around.

E. Grammar

Ex. 1. Go through the poem carefully and underline the lines where the following words/nouns have been used:
slackness clearness cowardice perversity
hospitality blackness pettiness humility

Q. Change the above words in adjectives and use them in the following sentences:
(i) Mr. John has very…………… ideas on the success of democracy in India.
(ii) …………..men die several times.
(iii) Films should not glorify sex……………. behaviors.
(iv) The sky suddenly turned………………….
(v) He often perturbs his parents with demands.
(vi) Though he occupies a high post, he is quite
(vii) His……………… approach aggravated the problem.
(viii) Mrs. Juber was quite………………. with her guests.
Answer:
(i) clear, (ii) Coward, (iii) slack, (iv) black, (v) petty, (vi) humble, (vii) perversive, (viii) hospitable.

Comprehension Based Questions with Answers

Q.1. Read the following extracts of the poem, “Snake” and answer the questions that follow: [B.M.2009A]
A snake came to my water-trough:

on a hot day, and I in Pyjamas for the heat,
To drink there.
In the deep, strange scented shade of the great dark,
I came down the steps with my pitcher
And must wait, must stand and wait,
for there he was at the trough before me.

5. The voice of my education said to me He must be killed,
For in a Sicily the black, black snakes are innocent, the gold is venomous.
And the voice in me said if you were a man
You would take a stick and break him now, and finish him off.

Questions:
1. What is Sicillian belief?
2. What does the poet mean by “The voice of education”?
3. What does “The voice of education” tell the poet?
4. Why does the poet not kill the snake?
5. What should have he done if he were a man?
Answers:
1. The Sicilian belief is that a black snake must be killed because it is an evil creature.
2. “The voice of education” means a civilized intellectual approach to life as opened to the instinctive approach where man and nature are one.
3. The voice of education tells the poet to kill the snake them and there. It should not be allowed to move freely in the human world.
4. The poet does not kill the snake, going against the voice of education because he loves it, heart and soul.
5. He should have taken a stick and finished the snake off if he were a man.

2. He reached down from a fissure in the earth-wall in the gloom
And trailed his yellow-brown slackness soft-bellied down,
Over the edge of the stone trough
And rested his throat upon the stone bottom,

3. And where the water had dripped from the tap, in a small clearness,
He sipped with his straight mouth,
Softly drank through his straight gums into his long body, silently.
Someone was before me at my water-trough,
And I, like a second comer, waiting.

4. He lifted his head from his drinking, as cattle do,
And looked at me vaguely, as drinking cattle do,
And flickered his two-forked tongue from his lips and mused a moment,
And stooped and drank a little more,
Being earth-brown, earth-golden from the burning bowels of the earth
On the day of “Sicilian July with Etna smoking.

5. The voice of my education said to me He must be killed,
For in a sicily the black, black snakes are innocent, the gold are venomous.
And voice in me said if you were a man
You would take a stick and break him now, and finish him off.

Questions:
1. What is the Sicillian belief?
2. What does the poet mean by “The voice of education”?
3. What does “The voice of education” tell the poet?
4. Why does the poet not kill the snake?
5. What should have he done if he were a man?
Answers:
1. The Sicilian belief is that a black snake must be killed because it is an evil creature.
2. “The voice of education” means civilized intellectual approach to life as opened to the instinctive approach where man and nature are one.
3. The voice of education tells the poet to kill the snake them and there. It shoul not be allowed to move freely in the human world.
4. The poet does not kill the snake, going against the voice of education because he loves it heart and soul.
5. He should have taken a stick and finished the snake off if he were a man.

6. But must I confess how I liked him,
How glad I was he had come like a guest in quiet, to drink at my water- trough.
And depart peaceful, pacified and thankless,
Into the burning bowels of this earth?

7. Was it cowardice, that I dared not kill him?
Was it perversity, that I longed to talk to him?
Was it humility, to feel so honoured?
I felt so honoured.
And yet those voices
“If you were not afraid, you would kill him”.

8. And truly I was afraid, I was most afraid
But even so, honoured still more
That he should seek my hospitality
From out the dark door or the secret earth,

9. He drank enough
And lifted his head dreamily as one who has drunken,
and flickered his tongue like a forked night on the air, so black,
Seeming to lick his lips,
And looked around like a god, unseeing, into the air,
And slowly turned his head,
And slowly, very slowly, as if thrice adream,
Proceeded to draw his slow length curving round,
And climb again the broken bank of my wall-face,

10. And as he put his head into that dreadful hole,
And as he slowly drew up, snake-easing his shoulders and entered farther,
Deliberately going into the blackness, and slowly drawing himself after.
Overcame me now his back was turned.

11. I looked round, I put down my pitcher,
I picked up a clumsy log
And threw it at the water trough with a clatter.

12. I think it did not hit him,
But suddenly that part of him that was left behind convulsed in. undignified haste.
Writhed like lightning, and was gone into the black hole, the earth lipped fissure in the wall front,
At which, in the intense still noon, I stared with fascination.

13. And immediately I regretted it.
I thought how paltry, how vulgar, what a meant act!
I despised myself and the voices of my accursed human education.

14. And I thought of the albatross,
And I wished he would come back, my snake.

15. For he seemed to me again like L king?
Like a king in exile, uncrowned in the underworld,
Now due to be crowned again.

16. And so, I missed my chance with one of the lords of life.
And I have something to expiate:
Pettiness.

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Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 9 प्रगीत और समाज

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 9 प्रगीत और समाज

 

प्रगीत और समाज वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

प्रगीत और समाज Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
‘प्रगीत’ और समाज, के लेखक हैं
(क) बालकृष्ण भट्ट
(ख) जयप्रकाश नारायण
(ग) नामवर सिंह
(घ) उदय प्रकाश
उत्तर-
(ग)

Prageet Aur Samaj Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
नामवर सिंह किस पत्रिका के संपादक थे?
(क) आलोचना
(ख) समन्वय
(ग) गंगा
(घ) माधुरी
उत्तर-
(क)

Bihar Board 12th Hindi Book Pdf प्रश्न 3.
‘सूर सागर’ क्या है?
(क) प्रबंध काव्य
(ख) गीति काव्य
(ग) चंपू काव्य
(घ) खंड काव्य
उत्तर-
(ग)

Bihar Board Hindi Book Class 12 Pdf Download प्रश्न 4.
कामायनी किनकी महाकृति है?
(क) बच्चन
(ख) श्यामनारायण पाण्डेय
(ग) नागार्जुन
(घ) जयशंकर प्रसाद
उत्तर-
(घ)

Hindi Gadya Sahitya Ka Itihas Class 12 Bihar Board प्रश्न 5.
नामवर सिंह द्वारा लिखित ‘प्रगीत’ और समाज क्या है?
(क) आलोचना
(ख) निबंध
(ग) एकांकी
(घ) आत्मकथा
उत्तर-
(ख)

Digant Hindi Book 12th Class Bihar Board प्रश्न 6.
“राम की शक्तिपूजा” किनका अख्यानक काव्य है?
(क) मोहनलाल महतो ‘वियोगी’
(ख) दिनकर
(ग) बच्चन
(घ) निराला
उत्तर-
(घ)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
नामवर सिंह का जन्म स्थान ……… वाराणसी, उत्तर प्रदेश है।
उत्तर-
जीअनपुर

प्रश्न 2.
नामवर सिंह काशी वि. वि. में अस्थायी ……… थे।
उत्तर-
व्याख्याता

प्रश्न 3.
नामवर सिंह का जन्म स्थान 28 जुलाई ……… हुआ था।
उत्तर-
1927 ई. को

प्रश्न 4.
नामवर सिंह को ‘कविता के नए प्रतिमान’ कृति पर साहित्य …….. पुरस्कार मिला था।
उत्तर-
अकादमी

प्रश्न 5.
नामवर सिंह के पिता जी एक ……….. थे।
उत्तर-
शिक्षक

प्रश्न 6.
नामवर सिंह की माता जी …………. हैं।
उत्तर-
वानेशरी देवी

प्रगीत और समाज अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शेर सिंह का शस्त्र-समर्पण’ किनका आख्यानक काव्य है?
उत्तर-
जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 2.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काव्य सिद्धान्त के आदर्श क्या थे?
उत्तर-
प्रबंध काव्य।

प्रश्न 3.
किस काव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है?
उत्तर-
प्रबंध काव्य।

प्रश्न 4.
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान किनकी कृति है?
उत्तर-
डॉ. त्रिभुवन सिंह।

प्रश्न 5.
नामवर सिंह का जन्म हुआ था।
उत्तर-
28 जुलाई, 1927 ई.।

प्रगीत और समाज पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर-
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य सिद्धान्त के आदर्श प्रबंधकाव्य थे। प्रबंधकाव्य में मानव जीवन का पूर्ण दृश्य होता है। उसमें घटनाओं की सम्बद्ध श्रृंखला और स्वाभाविक क्रम से ठीक-ठीक निर्वाह के साथ हृदय को स्पर्श करने वाले, उसे नावा भावों को रसाफक अनुभव करानेवाले प्रसंग होते हैं। यही नहीं प्रबन्ध काव्य में राष्ट्रीय-प्रेम, जातीय-भावना धर्म-प्रेम या आदर्श जीवन की प्रेरणा देना ही उसका उद्देश्य होता है।

प्रबंधकाव्य की कथा चूँकि यथार्थ जीवन पर आधारित होती है इससे उसमें असम्भव और काल्पनिक कथा का चमत्कार नहीं बल्कि यथार्थ जीवन के विविध पक्षों का स्वाभाविक और औचित्यपूर्ण चित्रण होता है। शुक्ल को ‘सूरसागर’ इसलिए परिसीमित लगा क्योंकि वह गीतिकाव्य है। आधुनिक कविता से उन्हें शिकायत थी कि ‘कला कला के लिए’ की पुकार के कारण यूरोप में प्रगीत मुक्तकों का ही चलन अधिक देखकर यहाँ भी उसी का जमाना यह बताकर कहा जाने लगा कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ पढ़ने की किसी को फुरसत कहाँ जिनमें कुछ दतिवृत भी मिला रहता हो।

इस प्रकार काव्य में जीवन की अनेक परिस्थितियों की ओर ले जानेवाले प्रसंगों या आख्यानों की उद्भावना बंद सी हो गई। इसीलिए ज्योंही प्रसाद की शेरसिंह का शस्त्र-समर्पण, पेथोला की प्रतिध्वनि, प्रलय की छाया तथा कामायनी और निराला की राम की शक्तिपूजा तथा तुलसीदास के आख्यानक काव्य सामने आए तो शुक्ल जी संतोष व्यक्त करते हैं।

शुक्ल के संतोष व्यक्त करने का कारण है कि प्रबंध काव्य में जीवन का पूरा चित्र खींचा जाता है। कवि अपनी पूरी बात को प्रबलता के साथ कह पाता है। यही कारण है कि रामचन्द्र शुक्ल को काव्यों में प्रबंधकाव्य प्रिय लगता है।

प्रश्न 2.
‘कला-कला के लिए’ सिद्धान्त क्या है?
उत्तर-
‘कला-कला के लिए’ सिद्धान्त का अर्थ है कि कला लोगों में कलात्मकता का भाव उत्पन्न करने के लिए है। इसके द्वारा रस एवं माधुर्य की अनुभूति होती है, इसीलिए प्रगीत मुक्तकों (लिरिक्स) की रचना का प्रचलन बढ़ा है। इसके लिए यह भी तर्क दिया जाता है कि अब लंबी कविताओं को पढ़ने तथा सुनने की फुरसत किसी के पास नहीं है। ऐसी कविताएँ जिसमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता है, उबाऊ होती है। विशुद्ध काव्य की सामग्रियाँ ही कविता का आनन्द दे सकती हैं। यह केवल प्रगीत-मुक्तकों से ही संभव है।

प्रश्न 3.
प्रगीत को आप किस रूप परिभाषित करेंगे? इसके बारे में क्या धारणा प्रचलित रही है?
उत्तर-
अपनी वैयक्तिकता और आत्मपरकता के कारण “लिरिक” अथवा “प्रगीत” काव्य की कोटि में आती है। प्रगीतधर्मी कविताएँ न तो सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त समझी जाती हैं, न उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में गीति और मुक्तक के मिश्रण से नूतन भाव भूमि पर जो गीत लिखे जाते हैं उन्हें ही ‘प्रगति’ की संज्ञा दी जाती है। सामान्य समझ के अनुसार प्रगीतधर्मी कविताएँ नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र हैं, यह सामान्य धारणा है। इसके विपरीत अब कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जाने लगा है कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ जिसमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता है, इन्हें पढ़ने तथा सुनने की किसी को फुरसत कहाँ है अर्थात् नहीं है।

प्रश्न 4.
वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अन्तर है?
उत्तर-
वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं में जीवन के समग्र चित्र उपस्थित हो जाते हैं। वस्तुतः मुक्तिबोध की लम्बी रचनाएँ वस्तुपरक हैं परन्तु आत्मसंघर्ष ज्यादा मुखरित है। ये कविताएँ अपने रचना-विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। किसी-किसी में तो नाटकीय रूप के बावजूद काव्यभूमि मुख्यतः प्रगीतभूमि है। कहीं नाटकीय एकालाप मिलता है तो कहीं पूर्णतः शुद्ध प्रगीत, जैसे ‘सहर्ष स्वीकारा है’ अथवा ‘मैं तुमलोगों से दूर हूँ।’ जैसा कि मुक्तिबोध स्वयं लिखते हैं कि निस्संदेह उसमें कथा केवल आभास है नाटकीयता केवल मरीचिका है, वह विशुद्ध आत्मगत काव्य है। जहाँ नाटकीयता, है वहाँ भी “कविता के भीतर की सारी नाटकीयता” वस्तुतः भावों की है। जहाँ नाटकीयता है वहाँ वस्तुतः भावों की गतिमयता है “क्योंकि” वहाँ जीवन-यथार्थ केवल भाव बनकर प्रस्तुत होता है। इस प्रकार यह आत्मपरकता अथवा भावमयता किसी कवि की सीमा नहीं बल्कि शक्ति है जो उसकी प्रत्येक कविता को गति और ऊर्जा प्रदान करती है।।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश्य ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि यहाँ वस्तुगत यथार्थ को अंतर्जगत उस मात्रा में घुला लेता है जितनी उस यथार्थ की ऐन्द्रिय उबुद्धता के लिए आवश्यक है। इस प्रकार एक प्रगीतधर्मी कविता में वस्तुगत यथार्थ अपनी चरम आत्मपरकता के रूप में ही व्यक्त होता है। मुक्तिबोध की आत्मपरक छोटी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता का बोध स्वभावतः होता है।

प्रश्न 5.
हिन्दी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है सोदाहरण स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रगीत वे कविताएँ हैं जिन्हें अक्सर माना जाता है कि ये कविताएँ सीधे-सीधे सामाजिक न होकर अपनी वैयक्तिकता और आत्मपरकता के कारण ‘लिरिक’ अथवा प्रगीत काव्य की कोटि में आती हैं। गीतिकाव्य गीतशैली का नव्यतम विकास है। प्रगीतधर्मी कविताएँ न तो सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त समझी जाती हैं न उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है क्योंकि साम्राज्य समझ के अनुसार वे अंततः नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र हैं।

परन्तु छायावादीकाल में प्रसाद की शेरसिंह का शस्त्रसमर्पण, पेथोला की प्रतिध्वनि, ‘प्रलय की छाया’ तथा ‘कामायनी’ और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ तुलसीदास जैसे आख्यानक काव्य इस मिथक को तोड़ते हुए प्रगीतों की अलग कोटि विकसित करते हैं। आगे मुक्तिबोध, नागार्जुन, समशेर बहादुर सिंह के प्रगीत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ प्रगीत वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं के रूप में हैं जो आत्मपरक हैं। आत्मसंघर्ष से उपजी हैं जिनमें सामाजिक भी निहित है।

ये नई कविता के अन्दर आत्मपरक कविताओं की ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिसकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। परन्तु इनमें जीवन यथार्थ भाव बनकर प्रस्तुत होता है। त्रिलोचन ने वर्णनात्मक कविताओं के बावजूद ज्यादातर सॉनेट और गीत ही लिखे हैं। कहने के लिए तो ये प्रगीत हैं लेकिन जीव जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रगीतों में मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है। अतः प्रगीत का इतिहास समकालीन कवियों का इतिहास कह सकते हैं।

प्रश्न 6.
आधुनिक प्रगीत-काव्य किन अर्थों में भक्ति काव्य से भिन्न एवं गुप्तजी के आदि के प्रबंध काव्य से विशिष्ट है? क्या आप आलोचक से सहमत हैं? अपने विचार
उत्तर-
आधुनिक प्रगीत काव्य में भी प्रबंध काव्य की भाँति जीवन के सारे चित्र खींचे जाते हैं। मुक्तिबोध, प्रसाद, निराला, नागार्जुन शमशेर की लम्बी कविताएँ क्रमशः ब्रह्मराक्षस, पेथोला की प्रतिध्वनि, शेर सिंह का आत्मसमर्पण, तुलसीदास, राम की शक्तिपूजा, अकाल और उसके बाद इत्यादि की कविताएँ उदाहरण हैं। इन कविताओं की खास बात यह है कि मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है और यही बात इनमें कही गयी है। प्रबंधकाव्य की तरह इनमें भी नाटकीयता का समावेश है। साथ ही सामाजिक संघर्ष के बदले आत्मसंघर्ष मुखरित है। परन्तु निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’, तुलसीदास में सामाजिक संघर्ष के साथ आत्मसंघर्ष का मिश्रित रूप है।

आधुनिक युग के प्रगीत काव्यों की मुख्य भाव-भूमि राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष है जो गुप्त के काव्यों में दिखलाई पड़ती है। इनमें भक्तिकाव्य से भिन्न इस रोमांटिक प्रगीतात्मकता के मूल में एक नया व्यक्तिवाद है, जहाँ ‘समाज’ के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है। इन रोमांटिक गीतों में भक्तिकाव्य जैसी तन्मयता नहीं है किन्तु आत्मयता और ऐन्द्रियता कहीं अधिक है। गुप्त का प्रबन्ध काव्य सीधे-सीधे राष्ट्रीय विचारों को रखता है और रोमांटिक प्रगीत उस युग की चेतना को अपनी असामाजिकता में ही अधिक गहराई से वाणी दे रहे थे। इसलिए विशिष्ट है। आलोचक ने जो उदाहरण निराला आदि कवियों की कविताओं को प्रगीत के जो रूप में दिये हैं उदाहरण इनमें सच्चे अर्थों में सामाजिकता छिपी है। अतः लेखक के विचार में सामाजिक संघर्ष के साथ आत्मसंघर्ष भी मायने रखता है। अतः प्रगीत काव्य भक्ति काव्य से अधिक सूक्ष्म रूप में वाणी देता है।।

प्रश्न 7.
“कविता जो कुछ कह रही है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इसके एकाकीपन में मानवता की आवाज सुन सकता है।” इस कथन का आशय स्पष्ट करें। साथ ही किसी उपयुक्त उदाहरण से अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर-
आलोचक की दृष्टि में प्रगीत वैसा काव्य है जिसमें व्यक्ति का एकाकीपन झलके अथवा समाज के विरुद्ध व्यक्ति या समाज से कटा हुआ हो। प्रगीतात्मकता का अर्थ है एकांत संगीत अथवा अकेले कंठ की पुकार। प्रगीत की यह धारणा इतनी बद्धमूल हो गयी है कि आज भी प्रगीत के रूप में प्रायः उसी कविता को स्वीकार किया जाता है जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक है।

परन्तु थियोडोर एडोनों ने कहा है कि व्यक्ति अकेला है यह ठीक है परन्तु उसका आत्मसंघर्ष अकेला नहीं है। उसका आत्मसंघर्ष समाज में प्रतिफलित होता है। यही कारण है कि बच्चन जैसे कवि सरल सपाट निराशा से अलग करते हुए एक गहरी सामाजिक सच्चाई को “जक संघर्ष के सारण इनमें सच्चे अरण निराला आदि व्यक्त करता है। कवि अपने अकेलेपन में समाज के बारे में सोचता है। नई प्रक्रिया द्वारा उसका निर्माण करना चाहता है। यहाँ व्यक्ति बनाम समाज जैसे सरल द्वन्द्व का स्थान समाज के अपने अंतर्विरोधों ने ले लिया है।

व्यक्तिवाद उतना आश्वस्त नहीं रहा बल्कि स्वयं व्यक्ति के अन्दर भी अंत:संघर्ष पैदा हुआ। विद्रोह का स्थान आत्मविडंबना ने ले लिया। यहाँ समाज के उस दबाव को महसूस किया जा सकता है जिसमें अकेले होने की विडंबना के साथ उसका अन्तर्द्वन्द्व उसे सामाजिकता की प्रेरणा देता है और कवि प्रगतिवादी हो जाता है। परिणाम अन्दर से निकलकर बाहर जनता के पास जाना।।

प्रश्न 8.
मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता क्यों है? आलोचक के इस विषय में क्या निष्कर्ष है?
उत्तर-
मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता इसलिए है कि उनकी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता की संभावनाओं का पूरा-पूरा एहसास किसी को न था। नई कविता के अन्दर आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिनकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। इसलिए इन सीमित अर्थभूमिवाली कविताओं के आधार पर निर्मित एकांगी एवं अपर्याप्त काव्य सिद्धान्त के दायरे को तोड़कर एक व्यापक काव्य-सिद्धान्त की स्थापना के लिए मुक्तिबोध की कविताओं का समावेश ऐतिहासिक आवश्यकता थी।

किन्तु इनके बाद भी ऐसी अनेक आत्मपरक प्रगीतधर्मी छोटी कविताएँ बची रहती हैं जो अपनी सामाजिक अर्थवत्ता के कारण उस काव्य सिद्धान्त को व्यापक बनाने में समर्थ हैं। मुक्तिबोध की कविता रचना विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। नाटकीय रूप के बावजूद काव्यभूमि मुख्यतः प्रगीतधर्मी है। इसमें कोई शक नहीं कि उनका समूचा काव्य मूलत: आत्मपरक है। रचना-विन्यास में कहीं पूर्णतः नाट्यधर्मिता है, कहीं नाटकीय एकालाप है, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत भी है। कवि स्वयं उसके बारे में लिखते हैं कि इसमें कथा केवल आभास है, नाटकीयता केवल मरीचिका है, वह विशुद्ध आत्मगत काव्य है। जहाँ नाटकीयता है वहाँ जीवन-यथार्थ भाव बनकर प्रस्तुत होता या बिंब या विचार बनकर।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। इस प्रकार उनकी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता का बोध स्वभावतः संभावनाओं की तलाश करता है जिसके लिए मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार आवश्यक है।

प्रश्न 9.
त्रिलोचन और नागार्जुन के प्रगीतों की विशेषताएँ क्या हैं? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। नामवर सिंह ने त्रिलोचन के सॉनेट, वही त्रिलोचन है वह और नागार्जुन की कविता ‘तन गई रीढ़’ का उल्लेख किया है। ये दोनों रचनाएँ पाठ के आस-पास खंड में दी गई हैं। उन्हें भी पढ़ते हुए अपने विचार दें।
उत्तर-
त्रिलोचन की कविताएँ कहने के लिए प्रगीत हैं लेकिन जीव-जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं वे अन्यत्र दुर्लभ है। किन्तु इन भास्वर चित्रों को अंततः जीवंत बनानेवाला प्रगीत नायक का एक अनूठा व्यक्तित्व है जिसका स्पष्ट चित्र ‘उस जनपद का कवि हूँ। संग्रह के उन आत्मपरक सॉनेटों में मिलता है। इनमें आत्मचित्र वस्तुतः एक प्रगीत-नायक की निर्वैयक्तिक कल्प-सृष्टि है जिनसे नितांत वैयक्तिकता के बीच भी एक प्रतिनिधि चरित्र से परिचय की अनुभूति होती है।

वहीं नागार्जुन की बहिर्मुखी आक्रामक काव्य-प्रतिभा के बीच आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण भी आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार का एक झटके से छिन्न-भिन्न कर देती है फिर चाहे ‘वह तन गई रीढ़’ जैसे प्रेम और ममता की नितांत निजी अनुभूति हो, चाहे जेल के सीखंचों से सिर टिकाए चलने वाला अनुचिंतन और अनुताप नागार्जुन के काव्य-संसार के प्रगीत-नायक का निष्कवच फक्कड़ व्यक्तित्व उनके प्रगीतों को विशिष्ट रंग तो देता ही है, सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है।

कवि त्रिलोचन ‘वही त्रिलोचन है वह’ और नागार्जुन की ‘तन गई रीढ़’ कविता में अपनी वैयक्तिकता में विशिष्ट और सामाजिकता में सामान्य है। यहाँ कवि व्यक्तिवादी न होते हुए भी व्यक्ति-विशिष्ट के प्रति झुका हुआ है। अपने समाज से लड़ते हुए सामाजिक है। दुनियादारी न होते हुए भी इसी दुनिया का है। यह नया प्रगीत उनके नये व्यक्तित्व से ही संभव हो सका है। उनके व्यक्तित्व के साथ निश्चित सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है। इन कविताओं में कवि समाज के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है और व्यक्तिवाद को जन्म देनेवाली औद्योगिक पूँजीवादी समाजव्यवस्था का पुरजोर विरोध करते हैं। कवि की मानसिक स्थिति बदल जाती है। व्यक्ति बनाम समाज जैसे सरल द्वन्द्व का स्थान समाज के अपने अंतर्विरोधों ने ले लिया है। स्वयं व्यक्ति के अंदर के अंत:संघर्ष को दिखलाते हैं।

प्रश्न 10.
मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है। केदारनाथ सिंह की उद्धृत कविता से इस कथन की पुष्टि करें। दिगंत (भाग-1) में प्रस्तुत ‘हिमालय’ कविता के प्रसंग में भी इस कथन पर विचार करें।
उत्तर-
हिन्दी के साहित्य के दौर में कविता में एक नया उभार पैदा होता है जिसमें कवि का अपना आत्मसंघर्ष तो है ही वह सामाजिक संभावनाओं की तलाश भी उसमें करता है। आज का कवि न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच करता है न बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचक। अन्दर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूटा गाड़ने की जिद है और न बाहर व्यवस्था को एक विराट पहाड़ बनाकर आँकने की हवस। वह बाहर से छोटी-से-छोटी, वस्तु घटना आदि पर नजर रखता है और कोशिश करता है कि उसे मुकम्मल अर्थ दिया जाए, छोटी-सी बात को बात में ही बहुत कुछ कह दिया जाय। वह अपने आत्मसंघर्ष की सामाजिक संघर्ष बनाने की चाहत है।

इसका उदाहरण मुक्तिबोध की कविताएँ हैं। नई कविता का आत्मसंघर्ष उनके कवियों का आत्मसंघर्ष है जो बहिसंघर्ष का रूप ले लेता है। एक में प्रगीतात्मकता सीमित हुई नजर आती है तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम उद्घाटित होते हैं। कवि कम ही शब्दों में बहुत कुछ कहता है, जो बात कम शब्द में कही जाती है वह गहरे अर्थ रखती है। कविता का अर्थ करने पर उसके कई स्तर धीरे-धीरे खुलते जाते हैं। केदारनाथ सिंह यहाँ कहना चाहते हैं कि सम्बन्धों में कभी खटास नहीं आनी चाहिए। उसमें हमेशा गर्माहट और उसकी सुन्दरता बनी रहनी चाहिए। ‘हाथ की तरह गर्म और सुन्दर में’ कवि बहुत सारे सपने संजोये हुए हैं और भविष्य की आकांक्षा को मजबूती बनाये रखना चाहता है।।

इन थोड़े से शब्दों में कवि अधिक गहरी चोट करता है। अतः अधिक बोलने से अच्छा कम बोलना है क्योंकि वह ज्यादा प्रभावी होता है।

प्रश्न 11.
हिन्दी की आधुनिक कविता की क्या विशेषताएँ आलोचक ने बताई हैं?
उत्तर-
हिन्दी की आधुनिक कविता में नई प्रगीतात्मकता का उभार देखता है। वह देखता है आज के कवि को न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच है न बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचक। अंदर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूटा गाड़ने की जिद है और न बाहर की व्यवस्था को एक विराट पहाड़ के रूप में आँकने की हवस। बाहर छोटी-से-छोटी घटना स्थिति वस्तु आदि पर नजर है और कोशिश है उसे अर्थ देने की। इसी प्रकार बाहर की प्रतिक्रियास्वरूप अंदर उठनेवाली छोटी-से-छोटी लहर को भी पकड़कर उसे शब्दों में बांध लेने का उत्साह है। एक नए स्तर पर कवि व्यक्तित्व अपने और समाज के बीच के रिश्ते को साधने की कोशिश कर रहा है और इस प्रक्रिया में जो व्यक्तित्व बनता दिखाई दे रहा। है वह निश्चय ही नए ढंग की प्रगीतात्मकता के उभार का संकेत है।

प्रगीत और समाज भाषा की बात

प्रश्न 1.
दिए गए शब्दों से विशेषण बनाइए तीव्रता, समाज, व्यक्ति, आत्मा, प्रसंग, विचार, इतिहास, स्मरण, शर्म, लक्षण, इन्द्रिय।
उत्तर-

  • तीव्रता – तीव्रतम
  • समाज – सामाजिक
  • व्यक्ति – वैयक्तिक
  • आत्मा – आत्मीय
  • प्रसंग – प्रासंगिक
  • विचार – वैचारिक
  • इतिहास – ऐतिहासिक
  • स्मरण – स्मरणीय
  • शर्म – शर्मिला
  • लक्षण – लाक्षणिक
  • इन्द्रिय – ऐन्द्रिय

प्रश्न 2.
नीचे लिखे वाक्यों से अव्ययों और कारक चिह्नों को अलग करें; कारक के चिह्न किस कारक के हैं, यह भी बताएँ।
(क) कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं।
(ख) इस दिशा में पुनर्विवचार के लिए सच पूछिए तो मुझे सबसे पहले प्रेरणा स्वयं मुक्तिबोध के काव्य से ही मिली।
(ग) आज भी प्रगीत के रूप में प्रायः उसी कविता को स्वीकार किया जाता है जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक हो।
(घ) एक में प्रगीतात्मकता सीमित हुई तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम उद्घाटित हुए।
उत्तर-
(क) अव्यय-भी, ही, कि कारक चिह्न-के, की (संबंध कारक), को (सम्प्रदान कारक) (ख) अव्यय-तो, ही कारक चिह्न-में (अधिकरण कारक), के लिए (सम्प्रदान कारक), के (संबंध कारक), से (करण कारक)
(ग) अव्यय-भी, और कारक-के (संबंध कारक), में (अधिकरण कारक), को (संप्रदान कारक)
(घ) अव्यय-तो कारक चिह्न-में (अधिकरण कारक) के (संबंध कारक)

प्रश्न 3.
रचना की दृष्टि से निम्नलिखित वाक्यों की प्रकृति बताएँ एवं संयुक्त वाक्य को सरल वाक्य में बदलें
(क) कविता पर समाज का दबाव तीव्रता से महसूस किया जा रहा है।
(ख) यह परिवर्तन न बहुत बड़ा है न क्रांतिकारी।
(ग) मुक्तिबोध ने सिर्फ लम्बी कविताएँ ही नहीं लिखी हैं।
(घ) आलोचकों की दृष्टि से सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का आरंभ यही है जिसका आधार है समाज के विरुद्ध व्यक्ति।
(ङ) पिछले पाँच छह वर्षों से हिन्दी कविता के वातावरण में फिर कुछ परिवर्तन के लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं।
उत्तर-
(क) मिश्र वाक्य
(ख) संयुक्त वाक्य
(ग) संयुक्त वाक्य
(घ) संयुक्त वाक्य
(ङ) संयुक्त वाक्य।

“प्रगीत’ और समाज लेखक परिचय नामवर सिंह (1927)

जीवन-परिचय-
हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, सन् 1927 को जीअनपुर वाराणसी, उत्तरप्रदेश में हुआ। इनकी माता का नाम वागेश्वरी देवी और पिता का नाम नागर सिंह था जो एक शिक्षक थे। इनकी प्राथमिक शिक्षा आवाजापुर एवं कमलापुर, उत्तप्रदेश के गाँवों में हुई। वहीं इन्होंने हाई स्कूल हीवेट क्षत्रिय स्कूल, बनारस और इंटर उदय प्रताप कॉलेज, बनारस से किया। इसके बाद बी.एच.यू. से क्रमशः सन् 1949 एवं 1951 में बी. ए. और एम.ए. किया। साथ ही बी.एच.यू. से ही सन् 1956 में ‘पृथ्वीराजरासो की भाषा’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1953 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अस्थाई व्याख्याता रहे।

सन् 1959-60 में सागर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। इसके बाद सन् 1960-65 तक बनारस में रहकर स्वतन्त्र लेखन किया। वे ‘जनयुग’ (साप्ताहिक), दिल्ली में सम्पादक और राजकमल प्रकाशन में साहित्य सलाहकार भी रहे। सन् 1967 से ‘आलोचना’ त्रैमासिक के संपादन का कार्य संभाला। सन् 1970 में जोधपुर विश्वविद्यालय, राजस्थान में ही हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए।

इसके बाद सन् 1974 में कुछ समय के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक और सन् 1974 में ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफेसर के पद पर इनकी नियुक्ति हुई। जे.एन.यू. से सन् 1987 में सेवामुक्ति के बाद अगले पाँच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति ! बाद में सन् 1993-96 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। संप्रतिः ‘आलोचना’ त्रैमासिक के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत।।

आलोचना-हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, . छायावाद, पृथ्वीराजरासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, कहानी : नई कहानी, कविता के लिए. प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, वाद-विवाद संवाद।

व्यक्ति व्यंजक ललित निबन्ध-बकलम खुद।। साक्षात्कारों का संग्रह-कहना न होगा।

भाषा-शिल्प की विशेषताएँ-नामवर सिंह जी ने सहित्य के अतिरिक्त भी अनेक विषयों का गहन अध्ययन किया था। साहित्य, भाषाशास्त्र, काव्यशास्त्र, पाश्चात्य आलोचना आदि विषय तो इनकी अभिरुचि के अंग हैं जिस कारण भाषा पर इनकी मजबूत पकड़ है। अपनी सशक्त, भाषा के कारण ही इन्होंने समीक्षा तथा सैद्धान्तिक व्याख्या में भी रचनात्मक साहित्य जैसा लालित्य उत्पन्न कर दिया है।

प्रगीत और समाज पाठ के सारांश

कविता संबंधी सामाजिक प्रश्न-कविता पर समाज का दबाव तीव्रता से महसूस किया जा रहा है। प्रगीत काव्य समाज शास्त्रीय विश्लेषण और सामाजिक व्याख्या के लिए सबसे कठिन चुनौती रखता है। लेकिन प्रगीतधर्मी कविताएँ सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं समझी जाती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी प्रबंधकाव्यों को ही अपना आदर्श माना है। वे प्रगीत मुक्तकों को अधिक पसंद नहीं करते थे, इसीलिए आख्यानक काव्यों की रचना से संतोष व्यक्त करते थे।

मुक्तिबोध की कविताएँ-नई कविता के अंदर आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिसकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। इसलिए . व्यापक काव्य सिद्धान्त की स्थापना के लिए मुक्तिबोध की कविताओं का समावेश आवश्यक था। लेकिन मुक्तिबोध ने केवल लम्बी कविताएँ ही नहीं लिखीं। उनकी अनेक कविताएँ छोटी भी हैं जो कि कम सार्थक नहीं हैं। मुक्तिबोध का समूचा काव्य मूलतः आत्मपरक है। रचना-विन्यास में कहीं वह पूर्णतः नाट्यधर्मी है, कहीं नाटकीय एकालाप है, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत भी है। आत्मपरकता तथा भावमयता मुक्तिबोध की शक्ति है जो उनकी प्रत्येक कविता को गति और ऊर्जा प्रदान करती है।। . आत्मपरक प्रगीत-आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के समान ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। एक प्रगीतधर्मी कविता में वस्तुगत यथार्थ अपनी चरम आत्मपरकता के रूप में ही व्यक्त होता है।

त्रिलोचन तथा नागार्जुन का काव्य-त्रिलोचन में कुछ चरित्र केन्द्रित लम्बी वर्णनात्मक कविताओं के अलावा ज्यादातर छोटे-छोटे गीत ही लिखे हैं। लेकिन जीवन, जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। वहीं नागार्जुन की आक्रामक काव्य प्रतिभा के बीच आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण कम ही आते हैं। लेकिन जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार को एक झटके में छिन्न-भिन्न कर देती है। प्रगीत काव्य के प्रसंग में मुक्तिबोध, त्रिलोचन और नागार्जुन का उल्लेख एक नया प्रगीतधर्मी कवि-व्यक्तित्व है।

विभिन्न कवियों द्वारा प्रगीतों का निर्माण-यद्यपि हमारे साहित्य काव्योत्कर्ष के मानदंड प्रबंधकाव्यों के आधार पर बने हैं। लेकिन यहाँ की कविता का इतिहास मुख्यतः प्रगीत मुक्तकों. का है। कबीर, सूर, मीरा, नानक, रैदास आदि संतों ने प्रायः दोहे तथा गेय पद ही लिखे हैं। विद्यापति को हिन्दी का पहला कवि माना जाए तो हिन्दी कविता का उदय ही गीतों से हुआ है। लोकभाषा को साफ-सुथरी प्रगीतात्मकता का यह उन्मेष भारतीय साहित्य की अभूतपूर्व घटना है।

प्रगीतात्मकता का दूसरा उन्मेष-प्रगीतात्मकता का दूसरा उन्मेष रोमैंटिक उत्थान के साथ हुआ। इस रोमांटिक प्रगीतात्मकता के मूल में एक नया व्यक्तिवाद है, जहाँ समाज के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है। इन रोमैंटिक प्रगीतों में आत्मीयता और ऐन्द्रियता कहीं अधिक है। इस दौरान राष्ट्रीयता संबंधी विचारों को काव्य रूप देनेवाले मैथिलीशरण गुप्त भी हुए। आलोचकों की दृष्टि में सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का आरंभ यही है, जिसका आधार है समाज के विरुद्ध व्यक्ति। इस प्रकार प्रगीतात्मकता का अर्थ हुआ ‘एकांत संगीत’ अथवा ‘अकेले कंठ की पुकार’। लेकिन आगे चलकर स्वयं व्यक्ति के अंदर भी अंत:संघर्ष पैदा हुआ। विद्रोह का स्थान-आत्मविडंबना ने ले लिया और आत्मपरकता कदाचित् बढ़ी।

समाज पर आधारित काव्य-अकेलेपन के बाद कुछ लोगों ने जनता की स्थिति को काव्य – जावार बनाया जिससे कविता नितांत सामाजिक हो गई। इस कारण यह कवित्व से भी वंचित हो गई। फिर कुछ ही समय में नई कविता के अनेक कवियों ने हृदयगत स्थितियों का वर्णन करना शुरू किया। इसके बाद एक दौर ऐसा आया जब अनेक कवि अपने अंदर का दरवाजा तोड़कर एकदम बाहर निकल आए और व्यवस्था के विरोध के जुनून में उन्होंने ढेर सारी ‘सामाजिक’ कविताएँ लिख डाली, लेकिन यह दौर जल्दी ही समाप्त हो गया।

नई प्रगीतात्मकता का उभार-युवा पीढ़ी के कवियों द्वारा कविता के क्षेत्र में कुछ और परिवर्तन हुए। यह एक नई प्रगीतात्मकता का उभार है। आज कवि को अपने अंदर झाँकने या बाहरी यथार्थ का सामना करने में कोई हिचक नहीं है। उसकी नजर हर छोटी-से-छोटी घटना, स्थिति, वस्तु आदि पर है। इसी प्रकार उसमें अपने अंदर उठनेवाली छोटी-से-छोटी लहर को पकड़कर शब्दों में बाँध लेने का उत्साह भी है। कवि अपने और समाज के बीच के रिश्ते को साधने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह रोमैंटिक गीतों को समाप्त करने या वैयक्तिक कविता को बढ़ाने का प्रयास नहीं है। अपितु इन कविताओं से यह बात पुष्ट होती जा रही है कि मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है और कभी-कभी ठंडे स्वर का प्रभाव गर्म होता है। यह एक नए ढंग की प्रगीतात्मकता के उभार का संकेत है।

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 13 शिक्षा

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions गद्य Chapter 13 शिक्षा

 

शिक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

13 Shiksha Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म कब हुआ था?
(क) 12 मई, 1895 ई.
(ख) 10 मई, 1890 ई.
(ग) 7 मई, 1870 ई.
(घ) 5 मई, 1830 ई.
उत्तर-
(क)

Bihar Board Solution Class 12 Hindi प्रश्न 2.
निर्भयता पूर्ण वातावरण निर्माण करने का कार्य कैसा है?
(क) बड़ा कठिन है
(ख) आसान है
(ग) श्रम युक्त है
(घ) बेकार है
उत्तर-
(क)

Class 12 Hindi Chapter 13 Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
आप विद्यालय क्यों जाते हैं?
(क) शिक्षा प्राप्ति के लिए
(ख) नौकरी करने के लिए
(ग) खेल प्रशिक्षण देने के लिए
(घ) पढ़ाने के लिए
उत्तर-
(क)

बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 12 Pdf प्रश्न 4.
साधारणतया सुरक्षा में जीने का क्या अर्थ है?
(क) भय में जीना
(ख) खुशी में जीना
(ग) लोभ में जीना
(घ) लाभ के लिए जीना
उत्तर-
(क)

Bihar Board Hindi Book Class 12 Pdf Download प्रश्न 5.
संपूर्ण विश्व किधर अग्रसर हो रहा है?
(क) नारा की ओर
(ख) विकास की ओर
(ग) निर्माण की ओर
(घ) बोकर बातों की ओर
उत्तर-
(क)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
जे. कृष्णमूर्ति के बचपन का नाम ……… था।
उत्तर-
जिदू कृष्णमूर्ति

प्रश्न 2.
जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 12 मई ……. को हुआ था।
उत्तर-
1895 ई.

प्रश्न 3.
जे. कृष्णमूर्ति का निधन 17 फरवरी ………… को हुआ था।
उत्तर-
1986 ई.

प्रश्न 4.
कृष्णमूर्ति का जन्म स्थान ………….. चितूर (आन्ध्र प्रदेश)में है।
उत्तर-
मदनपल्सी

प्रश्न 5.
नि:संदेह केवल उद्योग या कोई …….. ही जीवन नहीं है?
उत्तर-

प्रश्न 6.
‘जीवन दीन है, जीवन ………. भी।
उत्तर-
अमीर

शिक्षा अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बचपन में कैसे वातावरण में रहना आवश्यक है?
उत्तर-
स्वतंत्र।

प्रश्न 2.
मेधा कहाँ नहीं हो सकती है?
उत्तर-
जहाँ भय हो।

प्रश्न 3.
शिक्षा पाठ के रचयिता कौन हैं?
उत्तर-
जे. कृष्णमूर्ति।

प्रश्न 4.
जे. कृष्णमूर्ति की शिक्षा कृति क्या है?
उत्तर-
संभाषण।

प्रश्न 5.
जे. कृष्णमूर्ति का निधन इनमें से किस स्थान पर हुआ?
उत्तर-
कैलिफोर्निया।

प्रश्न 6.
लीडब्रेटर जे. कृष्णमूर्ति में किसका रूप देखते थे?
उत्तर-
विश्व शिक्षकः।

शिक्षा पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्सर

प्रश्न 1.
शिक्षा का क्या अर्थ है एवं इसके क्या कार्य हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर-
शिक्षा का क्या अर्थ जीवन के सत्य से परिचित होना और संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया को समझने में हमारी मदद करना है। क्योंकि जीवन विलक्षण है, ये पक्षी, ये पूल, ये वैभवशाली वृक्ष, ये आसमान, ये सितारे, ये मत्स्य सब हमारा जीवन है। जीवन दीन है, जीवन अमीर भी। जीवन गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ ईष्याएं, महत्वाकांक्षाएँ वासनाएँ, या सफलताएँ एवं चिन्ताएँ हैं। केवल इतना ही नहीं अपितु इससे कहीं ज्यादा जीवन है। हम कुछ परीक्षाएँ उत्र्तीण कर लेते हैं, हम विवाह कर लेते हैं, बच्चे पैदा कर लेते हैं और इस प्रकार अधिकाधिक यंत्रवत् बन जाते हैं।

हम सदैव जीवन से भयाकुल, चिन्तित और भयभीत बने रहते हैं। शिक्षा इन सबों का निराकरण करती है। भय के कारण मेधा शक्ति कुंठित हो जाती है। शिक्षा इसे दूर करता है। शिक्षा समाज के ढाँचे के अनुकूल बनने में आपकी सहायता करती है या आपको पूर्ण स्वतंत्रता होती है। वह सामाजिक समस्याओं का निराकरण करे शिक्षा का यही कार्य है।

प्रश्न 2.
जीवन क्या है? इसका परिचय लेखक ने किस रूप में दिया है?
उत्तर-
लेखक के अनुसार यह सारी सृष्टि ही जीवन है। जीवन बड़ा अद्भुत है, यह असीम और अगाध है। यह अनंत रहस्यों को लिए हुए है, यह विशाल साम्राज्य है जहाँ हम मानव कर्म करते हैं। लेखक जीवन की क्षुद्रताओं से दुखी होता है। वह कहता है, हम अपने आपको आजीविका के लिए तैयार करते हैं तो हम जीवन का पूरा लक्ष्य से खो देते हैं। यह जीवन विलक्षण है। ये पक्षी, ये फूल, ये वैभवशाली वृक्ष, यह आसमान, ये सितारे, ये सरिताएँ, ये मत्स्य यह सब हमारा जीवन है। जीवन दीन है, जीवन अमीर भी।

जीवन समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक सतत संघर्ष है, जीवन ध्यान है, जीवन धर्म है जीवन गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ है-ईष्याएँ, महत्वाकांक्षाएँ, वासनाएँ, भय सफलताएँ एवं चिन्ताएँ। केवल इतना ही नहीं अपितु इससे कहीं ज्यादा है। हम सदैव जीवन से भयाकुल, चिन्तित और भयभीत बने रहते हैं अतएव इस जीवन को समझने में शिक्षा हमारी मदद करती है। शिक्षा इस विशाल विस्तीर्ण जीवन, गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट को इसके समस्त रहस्यों को, इसकी अद्भुत रमणीयताओं को इसके दुखों और हर्षों को समझने में सहायता करती है।

प्रश्न 3.
बचपन से ही आपको ऐसे वातावरण में रहना अत्यन्त आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो। क्यों?
उत्तर-
बचपन से ही यदि व्यक्ति स्वतंत्र वातावरण में नहीं रहता है तो व्यक्ति में भय का संचार हो जाता है। यह भय मन में ग्रन्थि बनकर घर कर जाता है और व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षा को दबा देता है। हममें से अधिकांश व्यक्ति ज्यों-ज्यों बड़े हो जाते हैं त्यों-त्यों ज्यादा भयभीत होते जाते हैं, हम जीवन से भयभीत रहते हैं, नौकरी के छूटने से, परंपराओं से और इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी, पत्नी या पति क्या कहेंगे, हम मृत्यु से भयभीत रहते हैं। हममें से अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रूप में भयभीत हैं और जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं है।

इसलिए हमें बचपन से ही ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जहाँ भय न हो, जहाँ स्वतंत्रता हो, मनचाहे कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं अपितु एक ऐसी स्वतंत्रता जहाँ आप जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया समझ सकें। हमने जीवन को कितना कुरूप बना दिया है। सचमुच जीवन के इस ऐश्वर्य और इसकी अनंत गहराई और इसके अद्भुत सौन्दर्य की मान्यता तो तभी महसूस करेंगे जब आप सड़े हुए समाज के खिलाफ विद्रोह करेंगे ताकि आप एक मानव की भाँति अपने लिए सत्य की खोज कर सकें।

प्रश्न 4.
जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती। क्यों?
उत्तर-
हम जानते हैं कि बचपन से ही हमारे लिए ऐसे वातावरण में रहना अत्यन्त आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो। हममें से अधिकांश व्यक्ति ज्यों-ज्यों बड़े होते जाते हैं, त्यों-त्यों ज्यादा भयभीत होते जाते हैं, हम जीवन से भयभीत रहते हैं, नौकरी के छूटने से, परंपराओं से और इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी या पत्नी या पति क्या कहेंगे, हम मृत्यु से भयभीत रहते हैं। हममें से अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रूप में भयभीत है और जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं है।

निस्संदेह यह मेधा शक्ति भय के कारण दब जाती है। मेधा शक्ति वह शक्ति है जिससे आप भय और सिद्धान्तों की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता के साथ सोचते हैं ताकि आप अपने लिए सत्य की, वास्तविकता की खोज कर सकें। यदि आप भयभीत हैं तो फिर आप कभी मेधावी नहीं हो सकेंगे। क्योंकि भय मनुष्य को किसी कार्य को करने से रोकता है। वह महत्त्वाकांक्षा फिर चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक, चिन्ता और भय को जन्म देती है। अत: यह ऐसे मन का निर्माण करने में सहायता नहीं कर सकती जो सुस्पष्ट हो, सरल हो, सीधा हो और दूसरे शब्दों में मेधावी हो।

प्रश्न 5.
जीवन में विद्रोह का क्या स्थान है?
उत्तर-
जब कोई व्यक्ति सचमुच जीवन के इस ऐश्वर्य की, इसकी अनंत गहराई और इसके अद्भुत सौन्दर्य की धन्यता महसूस कर लेता है तो जीवन के प्रति तनिक भी कसमसाहट का भाव आता है तो वह विद्रोह कर बैठता है, संगठित धर्म के विरुद्ध, परंपरा के खिलाफ और इस सड़े हुए समाज के खिलाफ ताकि एक मानव की भाँति लिए सत्य की खोज कर सके। जिन्दगी का अर्थ है अपने लिए सत्य की खोज और यह तभी संभव है जब स्वतंत्रता हो, जब आपके अंदर में सतत् क्रान्ति की ज्वाला प्रकाशमान हो। समाज में व्यक्ति सुरक्षित रहना चाहता है और साधारणतया सुरक्षा में जीने का अर्थ है अनुकरण में जीना अर्थात् भय में जीना। भय से मुक्त होने के लिए व्यक्ति को विद्रोह करना पड़ता है अतः जीवन में विद्रोह का महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 6.
व्याख्या करें-यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा है।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ जे. कृष्णमूर्ति द्वारा लिखित संभाषण ‘शिक्षा’ से ली गई है। इसमें संभाषक कहना चाहते हैं हमने ऐसे समाज का निर्माण कर रखा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के विरोध में खड़ा है। चूंकि यह व्यवस्था इतनी जटिल है कि यह शोषक और शोषित वर्ग में बँट गया है। मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण हो रहा है। एक-दूसरे पर वर्चस्व के लिए आपस में होड़ है। यह पूरा विश्व ही अंतहीन युद्धों में जकड़ा हुआ है। इसके मार्गदर्शक राजनीतिज्ञ बने हैं जो सतत् शक्ति की खोज में लगे हैं। यह दुनिया वकीलों, सिपाहियों और सैनिकों की दुनिया है। यह उन महत्त्वाकांक्षी स्त्री-पुरुषों की दुनिया है जो प्रतिष्ठा के पीछे दौड़े जा रहे हैं और इसे पाने के लिए एक-दूसरे के साथ संघर्षरत हैं।

दूसरी ओर अपने-अपने अनुयायियों के साथ संन्यासी और धर्मगुरु हैं जो इस दुनिया में या दूसरी दुनिया में शक्ति और प्रतिष्ठा की चाह कर रहे हैं। यह विश्व ही पूरा पागल है, पूर्णतया भ्रांत। यहाँ एक ओर साम्यवादी पूँजीपति से लड़ रहा है तो दूसरी ओर समाजवादी दोनों का प्रतिरोध कर रहा है। इसीलिए संभाषक कहता। है कि यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए संघर्ष कर रहा है। यह सम्पूर्ण विश्व ही परस्पर विरोधी विश्वासों, विभिन्न वर्गों, जातियों, पृथक्-पृथक् विरोधी राष्ट्रीयताओं और हर प्रकार की मूढ़ता और क्रूरता में छिन्न-भिन्न होता जा रहा है।

और हम उसी दुनिया में रह सकने के लिए शिक्षित किए जा रहे हैं। इसीलिए संभाषक को दुख है कि व्यक्ति निर्भयतापूर्ण वातावरण के बदले सड़े हुए समाज में जीने को विवश है। अतः हमें अविलंब एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा ताकि हम उसमें रहकर अपने लिए सत्य की अविलम्ब एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा ताकि हम उसमें रहकर अपने लिए सत्य की खोज कर सकें, मेधावी बन सकें ताकि हम अपने अंदर सतत् एक गहरी मनोवैज्ञानिक विद्रोह की अवस्था में रह सकें।

प्रश्न 7.
नूतन विश्व का निर्माण कैसे हो सकता है?
उत्तर-
आज सम्पूर्ण विश्व में महत्त्वाकांक्षा तथा प्रतिस्पर्धा के कारण अराजकता फैली हुई है। विश्व के सभी देश पतन की ओर अग्रसर है। इसे रोकना मानव समाज के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती का प्रत्युत्तर पूर्णता से तभी दिया जा सकता है जब हम अभय हों, हम एक हिन्दू या एक साम्यवादी या एक पूँजीपति की भाँति न सोचें अपितु एक समग्र मानव की भाँति इस समस्या का हल खोजने का प्रयत्न करें। हम इस समस्या का हल तब तक नहीं खोज सकते हैं जब तक कि हम स्वयं सम्पूर्ण समाज के खिलाफ क्रान्ति नहीं करते, इस महत्वाकांक्षा के खिलाफ विद्रोह नहीं करते जिस पर सम्पूर्ण मानव समाज आधारित है। जब हम स्वयं महत्वाकांक्षी न हों, परिग्रही न हों एवं अपनी ही सुरक्षा से न चिपके हों, तभी हम इस चुनौती का प्रत्युत्तर दे सकेंगे। तभी हम नूतन विश्व का निर्माण कर सकेंगे।

प्रश्न 8.
क्रान्ति करना. सीखना और प्रेम करना तीनों पृथक-पृथक प्रक्रियाएँ नहीं हैं, कैसे?
उत्तर-
हमें यह मानकर चलना चाहिए कि विश्व में पहले से ही अराजकता फैली है। इसलिए हमारे समाज को अराजक स्थिति से निकालने के लिए समाज में क्रान्ति की आवश्यकता है। तभी हम सुव्यवस्थित समाज का निर्माण कर सकेंगे। यदि हम सचमुच इसका क्षय देखते हैं तो हमारे लिए एक चुनौती है। इस ज्वलन्त समस्या का हल खोजें। इस चुनौती का उत्तर हम किस प्रकार देते हैं यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस ज्वलंत समस्या की खोज में समाज के खिलाफ क्रान्ति करें तभी इस चुनौती का प्रत्युत्तर दे सकेंगे। इस दौरान हम जो भी करते हैं वह वास्तव में अपने पूरे जीवन से सीखते हैं।

तब हमारे लिए न कोई गुरु रह जाता है न मार्गदर्शक। हर वस्तु हमें एक नयी सीख दे जाती है। तब हमारा जीवन स्वयं गुरु हो जाता है और हम सीखते जाते हैं। जिस किसी वस्तु में सीखने के क्रम में गहरी दिलचस्पी रखते हैं उसके संबंध में प्रेम से खोजते हैं। उस समय हमारा सम्पूर्ण मन, सम्पूर्ण सत्ता उसी में रहती है। ठीक इसी भाँति जिस क्षण यह गहराई से महसूस कर लेते हैं कि यदि हम महत्वाकांक्षी नहीं होंगे तो क्या हमारा ह्रास नहीं होगा? यह अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। इस महत्वकांक्षा को पूरा करने के क्रम में क्रान्ति, सीखना, प्रेम सब साथ-साथ चलता है। अत: हम कह सकते हैं कि प्रेम, क्रान्ति और सीखना पृथक, प्रक्रियाएँ नहीं हैं।

शिक्षा भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों का पर्यायवाची लिखें सरिता, वसुधा, मत्स्य, चिड़िया, मनुष्य, नूतन
उत्तर-

  • सरिता – नदी, तरंगिनी
  • वसुधा – धरा, वसुन्धरा
  • मत्स्य – मीन, मछली
  • चिड़िया – खग, परिन्दा, पक्षी
  • मनुष्य – मानव, व्यक्ति
  • नूतन – नया, नवीन

प्रश्न 2.
निम्नलिखित वाक्यों से क्रियापद और सर्वनाम चुनें
(क) आप विद्यालय क्यों जाते हैं?
क्रियापद – जाते हैं।
सर्वनाम – आप

(ख) हम कुछ परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लेते हैं।
क्रियापद – कर लेते हैं।
सर्वनाम – हम

(ग) कोई भी आपको यह नहीं कहता कि आप प्रश्न करें, स्वयं सोचकर देखें कि परमात्मा क्या है?
क्रियापद – कहता कि
सर्वनाम – आप

(घ) तभी आप नूतन विश्व का निर्माण कर सकेंगे।
क्रियापद – कर सकेंगे।
सर्वनाम – आप

(ङ) आप अपने आस-पास देखें और उन व्यक्तियों का निरीक्षण करें।
क्रियापद – देखें, निरीक्षण करें
सर्वनाम – आप

(च) जब आप वास्तव में सीख रहे होते हैं तब पूरा जीवन ही सीखते हैं।
क्रियापद – सीखते हैं।
सर्वनाम – आप

प्रश्न 3.
वाक्य प्रयोग द्वारा लिंग-निर्णय करें परंपरा, प्रयत्न, चुनौती, विश्व, प्रतिष्ठा, शक्ति, जीवन, स्वतंत्रता, शिक्षा, महत्त्वाकांक्षा।
उत्तर-

  • परंपरा (स्त्री.)- हमारी परंपरा बड़ी पुरानी है।
  • प्रयत्न (पु.)-मैं सोने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
  • चुनौती (स्त्री.)-मैं आपकी चुनौती स्वीकार करता हूँ।
  • विश्व (पु.)-यह विश्व अंधविश्वास से भरा है।
  • प्रतिष्ठा (स्त्री.)-मैं आपकी प्रतिष्ठा करता हूँ।
  • शक्ति (पु.)-मोहन की शक्ति क्षीण हो गई।
  • जीवन (पु.)-यह जीवन कष्ट से भरा है।
  • स्वतंत्रता (स्त्री.)-हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता बड़ी मेहनत से मिली है।
  • शिक्षा (स्त्री.)-शिक्षा हमें महान् बनाती है।
  • महत्त्वाकांक्षा (स्त्री.)-उसकी महत्त्वाकांक्षा बड़ी है।

प्रश्न 4.
विपरीतार्थक शब्द लिखें प्रोत्साहन, स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा, संन्यासी, सम्पन्न, भय, समस्या, विद्रोह, सम्मान, परिग्रह
उत्तर-

  • प्रोत्साहन – हतोत्साहन
  • स्वतंत्रता – परतंत्रता
  • प्रतिष्ठा – अप्रतिष्ठा
  • संन्यासी – गृहस्थ
  • संपन्न – विपन्न
  • भय – निर्भय
  • समस्या – निदान
  • विद्रोह – समर्थन
  • सम्मान – अपमान
  • परिग्रह – अपरिग्रह

शिक्षा लेखक परिचय जे. कृष्णमूर्ति (1895-1986)

जीवन-परिचय-
बीसवीं शती के महान भारतीय जीवनद्रष्टा, दार्शनिक, शिक्षामनीषी एवं संत जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 12 मई, 1895 के दिन चित्तूर, आन्ध्रप्रदेश के मदनपल्ली नामक स्थान पर हुआ। इनका पूरा नाम जिदू कृष्णमूर्ति था। इनकी माता का नाम संजीवम्मा तथा पिता का नाम नारायण जिद् था। दस वर्ष की अवस्था में ही इनकी माता का निधन हो गया था। इस कारण इन्हें बचपन में मिलने वाले प्यार से वंचित रहना पड़ा। लेकिन इन्हें बचपन से ही विलक्षण मानसिक अनुभव हो गए थे। अपनी शिक्षा-दीक्षा के उपरान्त इन्होंने कुछ लेखन कार्य भी किया, लेकिन ये मूलतः वक्ता थे।

इन्होंने व्याख्यान भी किए, जिनके विषय शिक्षा, दर्शन एवं अध्यात्म से संबंधित थे। ये परंपरित शिक्षा प्रणाली से असन्तुष्ट थे, इसलिए उस प्रणाली में फेरबदल चाहते थे। किशोरावस्था में इनका संपर्क सी. डब्ल्यू. लीडबेटर एवं एनी बेसेन्ट से हो गया, जिन्होंने इनका संरक्षण भी किया। बाद में ये थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़े। लीडरबेटर तो इनमें ‘विश्व शिक्षक’ का रूप देखते थे। सन् 1938 में ये एतडुअस हक्सले के संपर्क में आए। इन्होंने कई देशों की यात्राएँ भी की। ये मूलतः सार्वभौम तत्त्ववेत्ता और परम स्वाधीन आत्मविद् थे अथवा इन्हें प्राचीन स्वाधीनता ऋषियों की परंपरा की एक आधुनिक कड़ी भी माना जा सकता है। मनुष्य को सच्ची शिक्षा प्रदान करने वाले इस महापुरुष का निधन 17 फरवरी, 1986 के दिन ओजई, कैलिफोर्निया में हुआ।

रचनाएँ : जे. कृष्णमूर्ति की प्रमुख रचनाएँ हैं-द फर्स्ट एंड लास्ट फ्रीडम, द ऑनली रिवॉल्यूशन और कृष्णामूर्तिज नोट बुक आदि। इसके अतिरिक्त उनके व्याख्यानों के कई संग्रह विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हैं।

साहित्यिक विशेषताएं : जे. कृष्णमूर्ति कोई साहित्याकार नहीं थे, बल्कि वे तो एक दार्शनिक, शिक्षामनीषी एवं संत थे। वे प्रायः लिखते नहीं थे, अपित संभाषण करते थे। इनके संभाषणों को ही प्रकाशित किया गया है, जिनसे हमें ज्ञात होता है कि वे भारत के प्राचीन स्वाधीनचेता ऋषियों को परंपरा की एक आधुनिक कड़ी थे।

शिक्षा पाठ के सारांश

जे. कृष्णमूर्ति मानते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य भी यही है। मनुष्य को पूरी तरह भारहीन, स्वतंत्र और प्रज्ञा निर्भर बनाना है। तभी उसमें सच्चा सहयोग, सद्भाव, प्रेम और करुणा सच्चा दायित्व बोध कराती है, हमें गहरा बनाती है। वह हमें सीमाओं और संकीर्णताओं से उबारती है। शिक्षा का ध्येय पेशेवर दक्षता, आजीविका और महज कुछ कर्म, कौशल ही नहीं है। उसका ध्येय हमारा सम्पूर्ण उन्नयन है। कृष्णमूर्ति अपने शिक्षा विषयक प्रयोगधर्मी चिन्तन. में आज की सभी प्रचलित प्रणालियों का भीतर-बाहर से पर्यालोचन करते हैं।

कृष्णमूर्ति प्रायः लिखते नहीं थे। वे बोलते संभाषण करते थे। प्रश्नकर्ताओं को उत्तर देते थे। यह शैली भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में अत्यन्त प्राचीन है। ‘शिक्षा’ नामक संभाषण के जरिए उनके विचारों एवं शिक्षा से लाभ की प्रेरणा मिलती है।

जे. कृष्णमूर्ति मानते हैं कि शिक्षा मनुष्य का उन्नयन करती है। वह जीवन के सत्य, जीवन जीने के तरीके में मदद करती है। इस संदर्भ को देते हुए वे बताते हैं कि शिक्षक हों या विद्यार्थी उन्हें यह पूछना आवश्यक नहीं कि वे क्यों शिक्षित हो रहे हैं। क्योंकि जीवन विलक्षण है। ये पक्षी ये फूल, ये वैभवशाली वृक्ष, ये आसमान, ये सितारे ये सरिताएँ, ये मत्स्य, यह सब हमारा जीवन है। जीवन समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक सतत् संघर्ष है, जीवन ध्यान है जीवन धर्म भी है। जीवन गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ हैं-ईर्ष्याएँ महत्त्वाकांक्षाएँ, वासनाएँ, भय, सफलताएँ चिन्ताएँ।

शिक्षा इन सबका अनावरण करती है। शिक्षा का कार्य है कि वह संपूर्ण जीवन प्रक्रिया को समझने में हमारी सहायता करे, न किस हमें केवल कुछ व्यवसाय या ऊँची नौकरी के योग्य बनाएँ। कृष्णमूर्ति कहते हैं कि हमें बचपन से ही ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जहाँ भय का वास न हो नहीं तो व्यक्ति जीवन भर कुठित हो जाता है। उसकी महत्त्वाकांक्षाएँ दब कर रह जाती है। मेधाशक्ति दब जाती है। मेधा शक्ति के बारे में कहते हैं कि मेधा वह शक्ति है जिससे आप भय और सिद्धान्तों की अनुपस्थिति में आप स्वतंत्रता से सोचते हैं ताकि आप सत्य की, वास्तविकता को अपने लिए खोज कर सकें।

पूरा विश्व इस भय से सहमा हुआ है। चूँकि यह दुनिया वकीलों, सिपाहियों और सैनिकों की दुनिया है। यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है। किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा सम्मान शक्ति व आराम के लिए संघर्ष कर रहा है। अतः निर्विकार रूप से शिक्षा का कार्य यह है कि वह इस अतिरिक्त और बाह्य भय का उच्छेदन करे।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 1 रैदास के पद

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 1 पद्य खण्ड Chapter 1 रैदास के पद Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi Solutions पद्य Chapter 1 रैदास के पद

Bihar Board Class 9 Hindi रैदास के पद Text Book Questions and Answers

रैदास के पद प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 1.
रैदास ईश्वर की कैसी भक्ति करते हैं?
उत्तर-
महाकवि रैदास ईश्वर-भक्ति में आडंबर को तरजीह नहीं देते। वे निर्गुण भक्ति की सार्थकता सिद्ध करते हैं। उनकी दृष्टि में ईश्वर की पूजा-अर्चना के लिए चढाए, जाने वाले फल फल एवं जल निरर्थक हैं। इनका कोई सही प्रयोजन नहीं। ये जूठे एवं गँदले हैं। इसीलिए रैदासजी कर्मकांडी आडंबर से मुक्त निर्मल मन से अन्तर्मन में ही ईश्वर की आराधना करना चाहते हैं। वे अपने हृदय और मस्तिष्क से ईश्वर के सहज और स्वच्छ छवि को ही प्रणम्य करते हैं।

रैदास के पद कक्षा 9 Solution Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 2.
कवि ने ‘अब कैसे छूटै राम राम रट लागी’ क्यों कहा है?
उत्तर-
संत कवि रैदास ईश्वर की भक्ति में स्वयं को भूल जाते हैं। वे कहते हैं कि रामनाम की.रट’ की लत मुझे लग गयी है। अब इससे मुक्ति कहाँ? अब ‘राम’ से संबंध कैसे छूट सकता है। कहने का आशय है कि रैदास का सारा जीवन राममय ही हो गया है। मनसा-वाचा-कर्मणा वे राम की शरण में स्वयं समर्पित कर चुके हैं। इस प्रकार रैदास की भक्ति निष्कलुष एवं निर्मल है।

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solution प्रश्न 3.
कवि ने भगवान और भक्त की तुलना किन-किन चीजों से की
उत्तर-
संत शिरोमणि कवि रैदास स्वयं को भक्त के रूप में भगवान के साथ तुलना करते हुए अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। रैदासजी को रामनाम की रट लग चुकी है। वे भगवान को चंदन, घन, दीपक, मोती, स्वामी के रूप में तुलना करते हुए महिमा गान करते हैं। भक्त के लिए कवि ने पानी, मोर, बाती, धागा एवं दास शब्द का प्रतीक रूप में प्रयोग किया है। इस प्रकार ईश्वर की महिमा एवं भक्त की भक्ति दोनों में समन्वय दिखाते हुए तुलनात्मक प्रयोग द्वारा कविता की रचना की है।

Bihar Board Solution Class 9 Hindi प्रश्न 4.
कवि ने अपने ईश्वर को किन-किन नामों से पुकारा है?
उत्तर-
महाकवि रैदास अपने ईश्वर को चंदन के नाम से, बादल के रूप में, दीपक के नाम से, मोती के नाम से एवं सबसे अंत में स्वामी के नाम से पुकारते हैं यानि भक्ति-भाव प्रकट करते हैं। इन पंक्तियों में रैदास जी निर्मल, निश्छल एवं निराकार भाव से ईश्वर के प्रति समर्पण भाव रखते हुए भक्ति में तल्लीन रहते हैं। दासत्व भाव में सहजता, निष्कलुषता है।

रैदास के पद के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 5.
कविता का केन्द्रीय भाव क्या है?
उत्तर-
महाकवि रैदास जी की दोनों (1, 2) कविताओं में निर्गुण ईश्वर भक्ति की झलक मिलती है। अन्तर्मन में ही ईश्वर भक्ति के प्रति वे अटूट आस्था रखते हैं। आडंबरहीन निर्मल, निष्कलुष भक्ति में वे विश्वास रखते हैं। कवि का हृदय गंगा की तरह पवित्र है। वह प्रतीकात्मक प्रयोगों द्वारा ईश्वर और भक्त के पवित्र संबंधों की सटीक व्याख्या करते हैं। कवि का ईश्वर किसी मंदिर-मस्जिद में नहीं बल्कि उसके अंतस में सदा विद्यमान रहता है। कवि हर हाल, हरकाल में ईश्वर को श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न मानता है। ईश्वर कवि के लिए प्रेरक-तत्व के रूप में कविता में दृष्टिगत होते हैं।

दूसरी कविता में कवि निर्गुण भक्ति की श्रेष्ठता एवं सगुण भक्ति और कर्मकांड की निरर्थकता की ओर सबका ध्यान आकृष्ट करते हैं। बाहरी फल-फूल, जल ये अशुद्ध एवं बेकार चीजें हैं। रैदास जी मन ही मन में ईश्वर भक्ति में रत रहना चाहते हैं। उनका ईश्वर निराकार एवं सहज स्वरूप वाला है। कहीं कोई दिखावटीपन नहीं, राग-भोग की जरूरत नहीं। केवल मनसा-वाचा-कर्मणा निर्मल भक्तिभाव में वे विश्वास करते हैं।

Bihar Board Class 9 Hindi Solutions प्रश्न 6.
“मलयागिरि बेधियो भुअंगा।
विष अमृत दोऊ एकै संगा।” इस पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर-
महाकवि रैदास ने उपरोक्त पंक्तियों में विष-अमृत दोनों एक संग वास करते हैं के भाव को प्रकट करते हुए ईश्वर की महिमा का गुणगान किया है।
कवि का कहना है कि मलयागिरि पर्वत पर चंदन के अनेक वन हैं यानि वहाँ चंदन ही चंदन के वृक्ष दिखायी पड़ते हैं। उस चंदन वृक्ष में अपने अंग को लपटे हुए विषधर सर्प वास करते हैं किन्तु दोनों की प्रकृति और कर्म में कोई अंतर या बाधा नहीं उपस्थित होती, यह ईश्वर की महिमा का ही कमाल है। उसी प्रकार रैदास भी अपने को ईश्वर के आगे तुच्छ ही समझते हैं क्योंकि इनके मन में भी राग-द्वेष रूपी विष भरा हुआ है।

इन पंक्तियों के द्वारा ईश्वर महिमा एवं भक्ति की महत्ता को दर्शाया गया है। जिस प्रकार चंदन के पेड़ से लिपटे हुए विषधर उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते दोनों को साथ-साथ रहने में कोई खतरा नहीं है, इसके पीछे प्रकृति या ईश्वर की ही कृपा है। ठीक उसी प्रकार, रैदास जैसे विष युक्त मनुष्य का भी बिन ईश्वर भक्ति के मुक्ति संभव नहीं।

Bihar Board 9th Class Hindi Book Solution प्रश्न 7.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए
(क) जाकी अंग-अंग बास समानी
(ख) जैसे चितवत चंद चकोरा ।
(ग) थनहर दूध जो बछरू जुठारी
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पंक्तियों में संत कवि रैदास प्रभु की महिमा का गान करते हुए कहते हैं-हे प्रभु! तुम चंदन हो और मैं पानी हूँ। तुम्हारे चंदन रूपी भक्ति के वास से सारा शरीर पवित्र एवं निष्कलुष हो जाता है। जैसे चंदन के महक से सारा वातावरण सुगंधित होकर महक उठता है। सारी प्रकृति सुवासित हो उठती है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भक्ति भी है। ईश्वर भक्ति की सुगंध से मनुष्य का कर्म और जीवन सार्थक बन जाता है यानि मोक्ष को प्राप्त करता है। इस प्रकार ईश्वर भक्ति की महिमा अपरम्पार है। बिनु ईश्वर भक्ति के यह जीवन निरर्थक एवं निष्क्रिय बन जाता है।

(ख) प्रस्तुत पंक्तियों में महाकवि रैदास ने स्वयं को प्रभु के चरणों में रखकर तुलना करते हुए भक्ति भाव को प्रकट करते हैं। कवि कहता है कि हे प्रभो! जैसे चकोर चंद्रमा को अपलक निहारता रहता है ठीक वही हाल मेरा है। मैं भी चकोर की भाँति अपलक आपकी छवि, मन ही मन निरखता हूँ यानि नाम रट करते रहता हूँ। यानि मेरी भक्ति भी चकोर की अपलक सदृश है यानि अभंग है।

(ग) प्रस्तुत पंक्तियों में महाकवि रैदास ने ईश्वर भक्ति की महिमा का गान करते हुए तुलनात्मक चित्रण किया है। कवि कहता है कि जिस प्रकार गाय के थन में मुँह लगाकर बछरु दूध पीता है और थन को जूठा कर देता है फिर भी उसमें शुद्धता है, निर्मलता है। क्योंकि गाय और बछड़े का संबंध आत्मीय संबंध है। राग-द्वेष एवं विवाद रहित संबंध है। माँ-बेटे का संबंध है। ठीक उसी प्रकार भगवान और भक्त का भी संबंध अटूट, पवित्र और राग-द्वेष रहित, विकार रहित रहता है। भक्त भगवान के लिए बछड़े के समान है यानि पुत्र की भाँति है। उसकी अशुद्धता, अज्ञानता या भूलों का ख्याल नहीं किया जाता क्योंकि वह समर्पण भाव से भक्ति रस में डूबा रहता है। इस प्रकार रविदास जी ने भक्त की दैन्यता, सहजता, आत्मनिवेदन, हृदय की निर्मलता के आधार पर सिद्ध करना चाहा है कि ईश्वर भक्ति में लीन भक्त की भूलें क्षम्य है। भक्त के लिए भगवान एवं भगवान के लिए भक्त दोनों की अनिवार्यता महत्वपूर्ण है।

रैदास के पद Question Answers Bihar Board Class 9 Hindi प्रश्न 8.
रैदास अपने स्वामी राम की पूजा में कैसी असमर्थता जाहिर करते हैं?
उत्तर-
भक्तराज रैदास का हृदय पवित्र है, दोषरहित है। ईश्वर भक्ति में सराबोर है। वे भगवान से कहते हैं कि हे राम आपकी पूजा मैं कैसे चढ़ाऊँ? कहने का अर्थ यह है कि रैदास के पास फल-फल जल नहीं है। भक्त सांसारिक राग-भोग की वस्तुओं को जुटा पाने में असमर्थ है। अतः वह राम की पूजा करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हैं। कहने का आशय है कि बाहरी आडंबर में कवि विश्वास नहीं करता। वह शुद्ध मन से निर्गुण पूजा में विश्वास करता है। उसी पवित्रता एवं राग-द्वेष रहित भाव के कारण पूजा सामग्रियों की चर्चा करते हुए अपनी असमर्थता को प्रकट किया है।

Bihar Board Class 9 Hindi Book Pdf  प्रश्न 9.
कवि अपने मन को चकोर के मन की भाँति क्यों कहते हैं?
उत्तर-
महाकवि रैदास ने अपने मन को चकोर के मन के समान कहा है। कहने का आशय है कि जिस प्रकार चकोर अपलक भाव से चाँद को देखा करता है, निहारा करता है ठीक उसी प्रकार रैदास भी अपनी भक्ति में तल्लीन रहते हुए प्रभु श्रीराम के चरणों में मनसा-वाचा कर्मणा समर्पित भाव से लगे रहते हैं। दोनों की प्रकृति एवं कर्तव्यनिष्ठता में समता है। इसी कारण चकोर की दृष्टि चाँद को भी अपलक देखने में लगी रहती है। चकोर के लिए जिस प्रकार चाँद प्रिय है ठीक उसी प्रकार रैदास के लिए राम प्रिय है। यहाँ कवि की कविता का भाव मन की एकाग्रता एवं एकनिष्ठ भक्ति से है।

रैदास के पद प्रश्न उत्तर Class 9 Bihar Board Hindi प्रश्न 10.
रैदास के राम का परिचय दीजिए।
उत्तर-
महाकवि रैदास ने राम का परिचय निर्गुण रूप में दिया है यानि अपनी कविता में उन्होंने आडंबर रहित और निर्मल स्वरूप वाला निराकार श्रीराम के रूप में वर्णन किया है। रैदास के राम चंदन के समान है, आकाश में छाए बादल के समान है, दीपक के समान है, मोती के समान है, वे दास के स्वामी के समान है। महाकवि रैदास ने इन प्रतीकों के माध्यम से राम के करुणामय एवं महिमामय स्वरूप का बखान करते हुए अपनी निर्मल और निष्कलुष अटूट एकनिष्ठ भक्ति का परिचय । दिया है।

रैदास के पद के अर्थ Class 9 Bihar Board Hindi प्रश्न 11.
“मन ही पूजा मन ही धूप।
मन ही सेऊँ सहज सरूप।” का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर-
महाकवि रैदास ने उपरोक्त पंक्तियों में ईश्वर भक्ति की महिमा का बखान किया है। रैदास की दृष्टि में शुद्ध ईश्वर भक्ति तो अन्तर्मन से की जाती है। बाहरी दिखावा या आडंबर के साथ नहीं। रैदास ने मन ही मन ईश्वर के सहज स्वरूप की कल्पना की है। कवि के कहने का आशय यह है कि ईश्वर की पूजा-अर्चना के कर्मकांड में न पड़कर मन ही मन करनी चाहिए। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा ये सबकुछ दिखावा है। रैदास व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही ईश्वर की सच्ची भक्ति मानते थे।

प्रश्न 12.
रैदास की भक्ति भावना का परिचय दीजिए।
उत्तर-
महाकवि रैदास सच्चे ईश्वर के उपासक थे। वे दुनिया के दिखावा या आडंबर में विश्वास नहीं करते थे। मूर्ति पूजा या तीर्थ यात्रा में विश्वास नहीं करते थे। वे आंतरिक मन की शुद्धि पर जोर देते थे। आपसी भाईचारे एवं करुणा, सेवा दया में विश्वास प्रकट करते थे। वे निर्गुण ब्रह्म के पक्षधर थे। उन्होंने निर्गुण राम की महिमा का बखान किया है। वे किसी मंदिर-मस्जिद में जाकर माथा टेकने में विश्वास नहीं करते थे। उनकी ईश्वर भक्ति निराकार थी। मनसा-वाचा-कर्मणा, पवित्र थी। वे कर्तव्यनिष्ठ संत थे। वे कर्म में विश्वास करते थे। उनके व्यवहार एवं विचार में समन्वय था। आचरण दोषरहित था। बे सच्चे मानव सेवक और संत पुरुष थे। उनका प्रभु बाहरी दुनिया में नहीं बसता था बल्कि हर मनुष्य के हृदय में वास करता था। इस प्रकार रैदास की भक्ति निर्मल भक्ति थी।

प्रश्न 13.
पठित पाठ के आधार पर निर्गुण भक्ति की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
संत कवि रैदास ने अपनी कविता में निर्गुण भक्ति की विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। कवि का कहना है कि सांसारिक दिखावटी सामग्रियों के द्वारा ईश्वर की सच्ची पूजा नहीं की जा सकती। ईश्वर न मंदिर में वास करता है न मस्जिद में। ईश्वर न तीर्थ में रहते हैं न मूर्तियों में। ईश्वर हर मनुष्य के शुद्ध हृदय में वास करते हैं। ईश्वर कहीं भी बाहरी दिखावटी दुनिया में नहीं मिलेगा। वह मिलेगा सिर्फ व्यक्ति की शुद्ध आंतरिक भावनाओं में। उसके कर्म में, उसके सद्व्यवहार में। एकनिष्ठ कर्मभक्ति ही सच्ची ईश्वर भक्ति कही जाएगी। फल-फूल, जल के चढ़ावा से वह प्रसन्न भी नहीं होगा। कर्मकांड में भी ईश्वर को बाँधा नहीं जा सकता। ईश्वर तो मन की एकाग्रता और साधना में बैठा है। वह कर्तव्यनिष्ठता के प्रति प्रसन्न होता है। ईश्वर हर जन के अंतस् में वास करता है। यही नहीं वह हर हाल, हर काल में प्रेरक स्वरूप है। वह शद्धमन में वास करते हए मनुष्य का मार्गदर्शन करते रहता है-शर्त है कि हृदय निर्मल और सच्चा हो। इस प्रकार कवि ने निर्गुण भक्ति का बड़े ही स्पष्ट एवं सही रूप में वर्णन करते हुए उसकी महिमा का बखान किया है।

प्रश्न 14.
‘जाकी जोति बरै दिन राती’ को स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियों में संत कवि रैदास ने ईश्वर महिमा का गुणगान किया है। इन पंक्तियों का संबंध अध्यात्म जगत से है।
कवि कहता है कि हे राम। आप दीपक हैं और उस दीपक की बाती मैं हूँ। यानि आप परमात्मा हैं; ईश्वर हैं-उसी का मैं भी एक अंश हूँ। ईश्वर की तुलना यहाँ प्रतीकात्मक प्रयोग ‘ज्योति’ के रूप में किया गया है। कहने का आशय यह है कि ईश्वरीय ज्योति के प्रकाश से ही सारा जगत प्रकाशित है। यह ज्योति अखंड है। यानि सदैव जलनेवाली है। कहने का गूढ़ भाव यह है कि चर-अचर सभी परमात्मा के अंश हैं। उसी के प्रकाश से वे प्रकाशित हैं। यानि जीवंत हैं। बिन प्रभु कृपा के सबकुछ अस्तित्व विहीन है। इन पंक्तियों में गूढार्थ भाव छिपा हुआ है जिसका संबंध प्रकारान्तर से ईश्वर और जीव, प्रकाश और जीवन, ज्योति और प्रकाश से है। यानि सर्वोपरि ईश्वर ही हैं जो निराकार, निर्गुण हैं।

प्रश्न 15.
भक्त कवि ने अपने आराध्य के समक्ष अपने आपको दीनहीन माना है। क्यों?
उत्तर-
महाकवि रैदास ईश्वर के सच्चे भक्त हैं। वे छल-कपट रहित निर्मल भाव से युक्त महामानव हैं। उन्होंने अपनी कविता में प्रभु की भक्ति का गुणगान करते हुए उनके समक्ष स्वयं को दीनहीन माना है। कारण है-रैदास के स्वामी तो भगवान राम ही हैं। उनके सिवा इस जगत में रैदास का कोई अपना नहीं है। रैदास ने अपने सारे पदों में निष्कपट एवं निर्मल भाव से हृदय की बातों को प्रभुचरणों में अर्पित किया है। रैदास का आत्म निवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति किसे नहीं प्रभावित कर लेगी। कवि अपने अंतस में ईश्वर की भक्ति करता है। ‘प्रभुजी तुम चंदन हम पानी’ तुम घन वन हम मोरा, तुम दीपक हम बाती, तुम मोती हम धागा, तुम स्वामी हम दासा आदि पक्तियों के माध्यम से रैदास ने अपनी सहजता, सरलता और स्निग्धता का बेमिशाल परिचय दिया है। ये पक्तियाँ कवि की विनयशीलता, नम्रता, निष्कपटता, ईश्वर के प्रति समर्पण भाव आदि को प्रकट करती हैं। अत: कवि की दीनता, हीनता, विचार की स्पष्टता इन कविताओं में साफ-साफ दिखाई पड़ती है। इस प्रकार कवि की भक्ति शुद्ध भक्ति है। लोभ-मोह से मुक्त भक्ति है।

प्रश्न 16.
‘पूजा अरच न जानूँ तेरी’। कहने के बावजूद कवि अपनी प्रार्थना क्षमा-याचना के रूप में करते हैं। क्यों?
उत्तर-
संतों की प्रकृति ही निर्मल भाव से युक्त होती है। रैदास जी भी भक्त कवि के साथ एक महान संत भी हैं। इनमें कहीं भी ढोंग या बनावटीपन नहीं है। ये आडंबर रहित मानव हैं। ये निश्छल भाव से प्रभु से कहते हैं कि पूजा-अर्चना की विधियाँ नहीं जानता। मैं तंत्र-मंत्र भी नहीं जानता। फूल-फल-जल भी मैं नहीं लाया हूँ। मैं आपके नाम रट की पूजा करता हूँ। कहने का भाव यह है कि कि मेरा मन शुद्ध है, विचार शुद्ध है कर्म शुद्ध है तो फिर दिखावा किस बात का? इसीलिए हे प्रभो। आपकी भक्ति में निश्छल और निष्कलुष भाव से करता हूँ।

आप ही मेरे सर्वस्व हैं। आपके सिवा मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं, कोई अपना नहीं। संत प्रकृति के होने के कारण कवि में कहीं भी घमंड की बू नहीं आती। विवेक और विचार से परिपूर्ण होकर ही कवि ने ईश्वर भक्ति का गुणगान किया है। तब फिर सवाल ही नहीं उठता है-कहीं भी धृष्टता, अशिष्टता दिखाई दे। यही कारण है कि अपने विवेक विचार, कर्म से कवि का संत हृदय निश्छल, निर्मल, निष्कलुष है। कहीं भी दर्प नहीं है। इसी कारण भगवान-भक्ति में क्षमा-याचना के साथ अपने को दीन-हीन रूप में उपस्थित कर प्रभु की महिमा का गुणगान करते हुए शुद्ध भक्ति में लीन रहता है।

नीचे लिखे पद्यांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर नीचे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें।

1. अब कैसे छूटे राम नाम रट लागी।
प्रभुजी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास-समानी।
प्रभुजी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभुजी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभुजी, तुम मोती, हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभुजी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।
(क) पाठ और कवि का नाम लिखें।
(ख) कवि को किसके नाम की रट लगी है? उसके प्रति कवि के मन में उमगी भक्ति का क्या स्वरूप है? यह रट क्यों नहीं छूटती?
(ग) “प्रभुजी, तुम चंदन हम पानी’ कथन से कवि का क्या अभिप्राय
(घ) ‘प्रभुजी, तुम घन वन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।’पद्य-पंक्ति का अर्थ स्पष्ट करें।
(ङ) ‘ऐसी भक्ति करै रैदासा’ कथन से कवि अपनी कैसी भक्ति का – परिचय देता है?
उत्तर-
(क) पाठ-पद, कवि-रैदास

(ख) कवि को भगवान के रूप में ही श्रीराम के नाम की रट लगी है। कवि के मन में श्रीराम के प्रति अपूर्व निष्ठा, श्रद्धा और भक्ति जमी हुई है। अतः, राम नाम की यह रट चाहकर भी छूट नहीं पाती है। यह कवि-मन में उमड़ी बड़ी गहरी रामभक्ति है। यह भक्ति स्थूल तथा छिछली न होकर कवि के मन और हृदय में डूबी गहरी और सूक्ष्म भक्ति-भावना है।

(ग) कवि इस कथन के माध्यम से अपने आराध्य भगवान श्रीराम की श्रेष्ठता और विशेषता का वर्णन कर उनके साथ अपने जुड़े संबंध का परिचय देता है। कवि इस संदर्भ में श्रीराम की तुलना चंदन से और अपनी तुलना सामान्य जल से करता है। चंदन में सुगंधि का विरल गुण और विशेषता होती है। उसका संपर्क पाकर जल भी सुगंधमय हो जाता है। कवि यहाँ यह बताना चाहता है कि प्रभु की भक्ति के संसर्ग से कवि का मन पवित्र और भक्ति की सुगंध से सुवासित होकर धन्यातिधन्य हो गया है। वह दोषरहित और निर्मल हो गया है।

(घ) इस पंक्ति में कवि अपने आराध्य भगवान श्रीराम की तुलना घन और चंद्रमा से तथा अपनी तुलना मोर और चकोर पक्षियों से करता है और ईश्वर से स्थापित अपने शाश्वत संबंध का परिचय देता है। उसका इस संदर्भ में कथन है कि भगवान और उसके बीच वही गहरा संबंध है, जो संबंध आकाश में उमड़ी घटा और मोर तथा चंद्रमा और चकोर में है। मोर को घटा से तथा चकोर को चंद्रमा से जो आह्लाद, प्रसन्नता और जीवन-शक्ति मिलती है, कवि को वही शक्ति सहज रूप से भगवान की भक्ति से प्राप्त होती है।

(ङ) ‘ऐसी भक्ति करै रैदास’ कथन के माध्यम से कवि अपनी दास्य-भक्ति का परिचय देता है। यहाँ कवि ने यह उल्लेख किया है कि उसके आराध्य भगवान श्रीराम उनके लिए स्वामी हैं, मालिक हैं और वह उनका सहज विनीत और विनम्र दास है। एक अच्छे दास के रूप में वह अपने स्वामी रूप भगवान की सेवा और । भक्ति इसी दास-भावना से करता है। यहीं उसके जीवन की सहज सार्थकता है।

2. राम मैं पूजा कहाँ चढ़ाऊँ। फल अरु मूल अनूप न पाऊँ।
थनहर दूध जो बछरु जुठारी। पुहुप भँवर जंल मीन बिगारी॥
मलया गिरि बेधियो भुजंगा। विष-अमृत दोउ एकै संगा॥
मन ही पूजा मन ही धूप। मन ही सेऊँ सहज सरूप॥
पूजा अरचा न जानूँ तेरी। यह रैदास कवन गति मेरी॥
(क) पाठ और कवि के नाम लिखें।
(ख) कवि की नजर में क्या अनूप, अर्थात अनूठे नहीं हैं और क्यों?
(ग) कवि के अनुसार दूध को जूठा तथा फूल और जल को बर्बाद
करनेवाले कौन-कौन हैं और उन्हें किस ढंग से बर्बाद करते हैं?
(घ) “विष-अमृत दोउ एकै संगा।’ पद्य-कथन को स्पष्ट करें।
(ङ) “मन ही पूजा मन ही धूप’ पद्य-कथन से कवि का क्या अभिप्राय है?
(च) “पूजा अरचा न जानूँ तेरी।’ ऐसा कवि क्यों और किस संदर्भ में कहता है?
उत्तर-
(क) पाठ-पद 2, कवि-रैदास

(ख) भक् कवि रैदास की.नजर में भगवान की भक्ति के लिए फल-फूल-मूल आदि साधन अनूप और अनूठे नहीं है। इसका कारण यह है कि ये सभी साधन सहज रूप से पवित्र-निर्मल और उपयुक्त नहीं हैं। वे सभी जूठे-गैंदले और अपवित्र हैं।

(ग) कवि के अनुसार दूध को गाय का बछड़ा जूठा करता है, फूल को भौंरा गंदा करता है और जल की निर्मलता को जल में विचरण करनेवाली मछली बर्बाद करती है। दूध दुहने के समय बछड़ा पहले स्तनपान कर दूध को जूठा कर देता है। भौंरा फूलों से चिपके रहने के कारण फूलों के सौंदर्य को विनष्ट कर देता है और मछली दिन-रात जल में रहकर जल की पवित्रता को विनष्ट कर देती है।

(घ) यहाँ कवि के इस कथन का अभिप्राय यही है कि जहाँ चंदन के वृक्ष या पौधे रहते हैं, वहीं उसमें लिपटे बड़े-बड़े सर्प भी रहते हैं। इस रूप में इस दुनिया में अमृत चंदन के रूप में और विष सर्प के रूप में साथ-साथ मिलते हैं। अमृत यहाँ विष से अछता नहीं मिलता।

(ङ) ‘मन ही पूजा मन ही धूप’ कथन से कवि का यह अभिप्राय है कि ईश्वर की अर्चना और पूजा के बाह्य साधन-धूप, दीप, जल, फूल, कंद-मूल आदि सभी निरर्थक और बेकार हैं। ईश्वर की सही और सच्ची पूजा तो मन के तल पर की जानी चाहिए। पूजा के बाह्य कर्मकांड ढोंग-ढकोसला तथा अंधविश्वास के प्रतीक होते हैं। कवि ईश्वर की सच्ची पूजा मन के ही तल पर करता है। वह ईश्वर के सच्चे स्वरूप का दर्शन पूजा-स्थलों में न कर मन के तल पर ही करता है।

(च) ‘पूजा अरचा न जानूँ तेरी।’-कवि का यह कथन उसकी विनम्रता के भाव का प्रतीक है। वह बाह्य आडंबर के रूप में अपनी ईश्वर-भक्ति को प्रकट कर दुनिया को दिखाना नहीं चाहता और दुनिया की नजहरों में अपने आपको एक बड़े । भक्त के रूप में प्रकट करना नहीं चाहता। वह तो मन के तल पर एक मूक साधक के रूप में अपनी भक्ति साधना में रत रहकर भगवान की भक्ति मे तल्लीन है। एक सगुण भक्त, अर्थात् एक बुनियादी भक्त के रूप में वह भगवान की अर्चना और पूजा करना नहीं जानता है। वह तो मन-ही-मन ईश्वर की पूजा करता और मन के तल पर ही ईश्वर के सहज निर्मल स्वरूप का निर्माण कर अपनी चेतना का उसपर अर्पण करता है। उसकी भक्ति की यही एकमात्र गति है और कोई दूसरी गति नहीं।

Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 1 भारतीय संविधान

Bihar Board Class 8 Social Science Solutions Civics Samajik Aarthik Evam Rajnitik Jeevan Bhag 3 Chapter 1 भारतीय संविधान Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 1 भारतीय संविधान

Bihar Board Class 8 Social Science भारतीय संविधान Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

Bihar Board Class 8 Social Science Solution प्रश्न 1.
आप अपने विद्यालय में जिन नियमों का पालन करते हैं उनकी एक सूची तैयार कीजिए।
उत्तर-

  1. हमें निर्धारित समय पर स्कूल आना होता है।
  2. कक्षा में अध्यापन कार्य के समय बिना शिक्षक की इजाजत लिये बोलना मना होता है।
  3. विद्यालय को हमें गंदा नहीं करना होता है।
  4. अध्यापकों से सम्मानजनक व्यवहार करना होता है।
  5. पंक्ति बनाकर विद्यालय में प्रवेश करते हैं और पंक्ति बनाकर ही बाहर जाते हैं।

(अन्य नियम जो आपके विद्यालय के हैं, आप स्वयं लिखें ।)

Bihar Board Class 8 Civics Solution प्रश्न 2.
आपकी शिक्षिका विद्यालय में किन नियमों का पालन करती हैं उनसे चर्चा कीजिए और सूची तैयार कीजिए।
उत्तर-
संकेत : अपनी शिक्षिका से स्वयं चर्चा करें और सूची तैयार करें।

Bihar Board Class 8 Civics Solutions प्रश्न 3.
जग सोन के बताइए कि आपके विद्यालय के प्रधान अध्यापक को विद्यालय चलाने के लिए किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा?
उत्तर-

  1. विद्यालय में अनुशासन कायम रखना।
  2. अध्यापन कार्य अच्छा हो रहा है कि नहीं, इस पर नजर रखना ।
  3. अध्यापकों की नियमित हाजिरी व उपस्थिति ।
  4. विद्यालय को चलाने के लिए आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखना व इस संबंध में नयी योजनाएँ बनाना ।
  5. विद्यालय की प्रतिष्ठा बनाए रखना व बढ़ाना।
  6. विद्यालय का समाज में सही रूप से प्रचार होता रहे, इसकी व्यवस्था करना।

पाठ 1 भारतीय संविधान Class 8 Question Answer प्रश्न 4.
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 पर अपने वर्ग में अलग-अलग समूह में समूह-चर्चा कीजिए और उसकी मुख्य बातों को चार्ट पेपर पर लिखकर अपनी कक्षा में सजाइए।। इसके लिए पहले आपको कई स्रोत जैसे अखबार, इंटरनेट या अपने शिक्षकों से जानकारी इकट्ठी करनी पड़ेगी।
उत्तर-
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 एक बुनियादी कानून है जिसके आधार पर विद्यालयों के बारे में कई नियम बनाए गए हैं। जैसे-614 वर्ष के लड़के-लड़कियों को किसी भी विद्यालय में प्रवेश देने से मना नहीं किया जा सकता । प्रत्येक 3 कि.मी. के दायरे में कक्षा 8 तक की पढ़ाई हेतु सरकारी स्कूल का होना आवश्यक है। साथ ही, इस अधिनियम के अनुसार

कक्षा 1 से 5 तक के विद्यालयों में छात्र व शिक्षक का अनुपात 30: 1 का होना चाहिए। (अन्य परियोजना कार्य आप स्वयं करें।)

बिहार बोर्ड क्लास 8 सोशल साइंस प्रश्न 5.
दिए गए उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आप नहरवाल इलाके के . लिए कौन-से कानून बनाएँगे?
उत्तर-
नहरवाल इलाके के लोग शांतिपूर्ण ढंग से रहें इसके लिए कुछ बुनियादी नियम बनाने चाहिए। ये वही नियम होंगे जो कि एक सभ्य समाज का होता है। यानी सभी लोग अपने इलाके की सफाई का ख्याल रखेंगे। कूड़ा उचित जगह पर फेकेंगे । यातायात के नियमों का पालन करेंगे। अनावश्यक और देर रात सडकों पर जमावडा नहीं लगाएँगे। स्त्रियों की इज्जत करेंगे। नहरवाल इलाके की एक पंचायत होगी। आपसी मतभेद होने पर लोग अपने फैसले खुद न लेकर, फैसले का काम पंचायत पर छोड़न्दगे। पंचायत उनकी बातें सुन निष्पक्ष न्याय करेगा ।

नागरिक समिति यह ध्यान रखेगी कि लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार काम मिले और उन्हें उचित मेहनताना भी मिले भारतीय संविधान के अनुसार ही नहरवाल इलाके के कानून बनेंगे।

Class 8 Social Science Bihar Board प्रश्न 6.
यह तो हो गई कानुन बनाने की बात, अब यह तय कैसे करेंगे किइन कानूनों को कैसे लागू किया जाये ?
उत्तर-
कानून को लागू करने का काम विधायिका का है। नहरवाल इलाके में कानूनों को लागू करने का काम, इलाके के लोगों द्वारा गठित पंचायत व ‘नागरिक समिति’ को करना होगा। इनके निर्वाचित सदस्यों पर कानून लागू कस्ले को जिम्मेवारी होगी।

Bihar Board Class 8 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 7.
सरला बहन ने मुन्नी को काम पर क्यों नहीं जाने दिया?
उत्तर.-
मन्नी बच्ची है और बच्चों से मजदरी करवाना काननी जम है। फिर, पढ़ना बच्चों का मूलभूत अधिकार है, जो उसे संविधान द्वारा प्रदत्त है। इसीलिए सरला बहन ने मुन्नी को काम पर नहीं जाने दिया।

Bihar Board Solution Class 8 Social Science प्रश्न 8.
अपने घर के बुजुर्गों से चर्चा कीजिए कि क्या उन्होंने कभी ऐसी घटना देखी हैं ?
उत्तर-
मैंने अपने बुजुर्गों से चर्चा की। उन्होंने बताया कि हाँ उन्होंने ऐसी घटना देखी है।

पाठ 1 भारतीय संविधान Class 8 Question Answer In Hindi प्रश्न 9.
आपके विचार में छोटी उम्र में बच्चों को काम पर क्यों नहीं लगान चाहिए?
उत्तर-
पढ़ना छोटी उम्र के बच्चों का मूलभूत अधिकार है। फिर, छोटी उम्र में बच्चों से काम करवाने पर उनके मन में हीन भावना घर कर सकती है। इससे उनका व्यक्तित्व-विकास बाधक होगा । इसलिए छोटी उम्र में बच्चों को काम पर नहीं लगाना चाहिए।

Bihar Board 8th Class Social Science प्रश्न 10.
नीचे दी गई घटनाओं को ध्यान से पढ़ें । शिक्षिका की मदद से यह पता लगाएँ कि इन घटनाओं के शिकार लोगों की भारतीय संविधान कैसे मदद करता है? घटनाएँ

भारतीय संविधान पाठ के प्रश्न उत्तर प्रश्न (i)
दहेज के लिए विवाहिता को जला देना।
उत्तर-
दहेज हत्या करने व दहेज के लिए बहू पर अत्याचार करने वाले लड़केवालों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है जिसमें कठोर कारावास .. व जुर्माना शामिल है .

Bihar Board Class 8 Sst Solution प्रश्न (ii)
10 वर्ष के बच्चे को चाय की दुकान में काम कराना।
उत्तर-
चाय के दुकान मालिक को इसके एवज में जुर्माना भरना पड़ सकता है। साथ ही कुछ समय का कारावास (जेल) भी हो सकता है।

Bihar Board Class 8th Social Science Solution प्रश्न (iii)
बिना कोई कारण बताये 24 घण्टे से अधिक किसी नागरिक को पुलिस चौकी में बंद रखना।
उत्तर-
ऐसे पुलिस कर्मचारी के खिलाफ भारतीय संविधान में कड़ी सजा का प्रावधान है।

Bihar Board Class 8 History Book Solution प्रश्न (iv)
किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान पर जाने के लिये जाति, लिंग या धर्म के नाम पर रोकना।
उत्तर-
भारतीय संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। जो भी व्यक्ति या संस्था उसकी समानता के अधिकार से खिलवाड़ करता है तो उसके लिए संविधान में कड़ी सजा का प्रावधान है।

पाठ 1 भारतीय संविधान Class 8 प्रश्न (v)
सरकार द्वारा किसानों की जमीन को बिना उचित मुआवजा दिए जब्त कर लेना।
उत्तर-
ऐसी दशा में पीड़ित को अदालत में जाकर सरकार के खिलाफ मुकदमा लड़ने का अधिकार भारतीय संविधान हर नागरिक को देता है। उचित मामला होने पर अदालत सरकार को जुर्माना भरने व जब्त जमीन को किसानों को वापस करने का आदेश देती है।

Social Science Class 8 Bihar Board प्रश्न 11.
संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-
किसी देश को चलाने के लिए जिन मूलभूत नियमों एवं कानूनों की जरूरत होती है, उसे ही हम संविधान कहते हैं।

Bihar Board Class 8 Geography Solution प्रश्न 12.
बुनियादी नियम क्या होते हैं ?
उत्तर-
शिक्षा का अधिकार, नागरिकों के स्वास्थ्य, स्वतंत्रता, समानता, अधिकार व कर्तव्य से जुड़े नियमों को बुनियादी नियम कहते हैं।

प्रश्न 13.
किसी भी स्वास्थ्य केन्द्र से पता लगाइए कि सरकार द्वारा लोगों को कौन-कौन-सी बुनियादी सुविधाएँ दी जाती हैं।
उत्तर-
स्वास्थ्य केन्द्र लोगों को चिकित्सा व चिकित्सकीय परामर्श व जाँच, टीकाकरण व दवा वितरण आदि की बुनियादी सुविधाएँ देता है।

प्रश्न 14.
अपने विद्यालय में दी जाने वाली सरकारी सुविधाओं की एक सूची बनाएँ।
उत्तर-

  1. मुफ्त पुस्तक वितरण ।
  2. मुफ्त वर्दी (ड्रेस) वितरण ।
  3. दोपहर में मुफ्त भोजन प्रदान करना ।
  4. छात्रवृत्ति प्रदान करना ।

(अन्य सुविधाओं को, जो आपके विद्यालय में दी जाती हैं, उनकी सूची स्वयं बनाएँ।)

प्रश्न 15.
ऊपर दिए गए चित्रों को देखकर आपकी अंग्रेजी शासन पद्धति के बारे में क्या सोच बनती है?
उत्तर-
पृष्ठ-6 पर दिये गये चित्रों से पता चलता है कि अंग्रेज सरकार हिन्दुस्तान पर बर्बरतापूर्ण कब्जा जमाए हुए थी। उनका शासन भारत को लूटने और दबाकर रखने के इरादों से भरा हुआ था।

प्रश्न 16.
क्या आपको लगता है कि अंग्रेजी हुकूमत ने हम भारतीयों के अधिकारों का हनन किया है ? कैसे?
उत्तर-
जलियाँवाला बाग में संभा हो रही थी। लोग अपने विचार शांतिपूर्ण ढंग से रख रहे थे। जनता को सरकार के खिलाफ अपने विचार व्यक्त करने का मौलिक अधिकार होता है। पर, अंग्रेज सरकार ने हजारों निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाकर उनकी नृशंस हत्या कर दी।

उन्होंने हम भारतीयों के अधिकारों का हनन किया और भी कई प्रकार से करते रहे । अपने स्वार्थ के लिए भारतीय किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराते रहे जो भारतीय किसानों के लिए नुकसानदायक और अंग्रेज सरकार के लिए फायदेमंद था। दरअसल अंग्रेज सरकार अपने फायदे के लिए हम भारतीयों के अधिकारों का लगातार हनन करते रहे थे।

प्रश्न 17.
किस चीज की खेती के लिए किसानों को मजबूर किया जा रहा
था?
उत्तर-
बिहार के पश्चिम चंपारण में अंग्रेजों द्वारा भारतीय किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर किया जाता था।

प्रश्न 18.
अगर हमारा देश आजाद रहता तो क्या इस तरह लोगों को उनकी इच्छाओं के विरुद्ध मजबूर किया जाता? ।
उत्तर
नहीं, यदि हमारा देश आजाद रहता तो हम भारतीयों को हमारी इच्छाओं के विरुद्ध किसी काम के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता था।

प्रश्न 19.
यदि उस समय भारत आजाद होता और उसका अपना संविधान होता, तो क्या इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता था ?
उत्तर-
बिल्कल रोका जा सकता था। यदि उस समय भारत आजाद होता और उसका अपना संविधान होता तो लोग अदालत की शरण में जाकर अपने मूलभूत अधिकारों की रक्षा कर लेते और ऐसी घटनाएँ नहीं होती।

प्रश्न 20.
भारत के संविधान को बनाने के लिए कांग्रेस ने सबसे स्पष्ट मांग कब पेश की?
उत्तर-
1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत के लोगों द्वारा अपना संविधान खुद बनाने की स्पष्ट मांग रखी थी।

प्रश्न 21.
अंग्रेज सरकार भारत के लोगों की स्वतंत्र संविधान सभा की मांग को क्यों नहीं मानना चाहती थी?
उत्तर-
भारत के लोगों की स्वतंत्र संविधान सभा की मांग को मानने पर अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ता क्योंकि विदेशी लोगों द्वारा अपने देश पर शासन कोई देशवासी स्वीकार नहीं करता । इसलिए अंग्रेज सरकार ने यह मांग ठुकरा दी।

प्रश्न 22.
भारत के लोगों ने शुरुआती दौर में क्या-क्या माँगें रखीं ?
उत्तर-
भारत के लोगों ने शुरुआती दौर में इन मांगों को रखा थासार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार, संसदीय एवं उत्तरदायी सरकार एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा ।

प्रश्न 23.
किसी भी देश के संविधान में आम तौर पर किस तरह के मूल्यों को शामिल किया जाता है ?
उत्तर-
किसी भी देश के संविधान में आम तौर पर बुनियादी मूल्यों को । शामिल किया जाता है।

प्रश्न 24.
भारत के संविधान के बुनियादी मूल्य कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
भारत के संविधान के बुनियादी मूल्य अग्रलिखित हैं-लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, न्याय एवं धर्मनिरपेक्षता।

प्रश्न 25.
बच्चे क्यों खुश थे?
उत्तर-
स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन होने से बच्चे खुश थे।

प्रश्न 26.
शिक्षिका ने सभी बच्चों के विचार क्यों लिए?
उत्तर-
शिक्षिका ने सभी बच्चों के विचार इसलिए लिया ताकि उन्हें एहसास हो कि इ सांस्कृतिक आयोजन में सबकी भागीदारी हो रही है।

प्रश्न 27.
कार्यक्रम की योजना यदि शिक्षिका स्वयं बनाती तो क्या होता?
उत्तर-
यदि शिक्षिका कार्यक्रम की योजना स्वयं बनाती तो कई बच्चे दुखी हो जाते कि कार्यक्रम में उनकी कोई भागीदारी नहीं हुई।

प्रश्न 28.
क्या बच्चे अपनी बात को कहने के लिए स्वतंत्र थे ?
उत्तर-
हाँ, बच्चे अपनी बात को कहने के लिए स्वतंत्र थे । शिक्षिका ने उनको अपनी बातें कहने का पूरा मौका दिया था।

प्रश्न 29.
कार्य योजना बनाने में क्या सभी ने अपनी भूमिका निभाई थी?
उत्तर-
हाँ, कार्य योजना बनाने में सभी ने अपनी भूमिका निभाई थी।

प्रश्न 30.
इस अनुभव से आपको लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बारे में क्या समझ आता है ? शिक्षिका से चर्चा कीजिए।
उत्तर-
लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात अभिव्यक्त करने का पूरा-पूरा हक होता है। सरकार बनाने के लिए सभी लोगों को वोट देने का अधिकार होता है।

प्रश्न 31.
स्वयं करें और बताएँ पुस्तक में दी गई संविधान की उद्देशिका को ध्यान से पढ़ें और दिए गए चित्रों को देखकर बताएं कि इनमें संविधान में कौन-सी स्वतंत्रताएँ झलकती हैं।
उत्तर-
पृष्ठ 10 पर दिए गए चित्रों में से प्रथम में अवसर की समता के तहत शिक्षा पाने का स्कूली बच्चियों का अधिकार झलकता है। दूसरे चित्र में धर्म और उपासना की स्वतंत्रता और तीसरे चित्र में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता झलकती है।

प्रश्न 32.
क्या किसी भी लोकतांत्रिक देश में स्वतंत्रता का अधिकार असीमित हो सकता है ? यदि किसी भी व्यक्ति या सरकार के कार्यों से दूसरे के हित को खतरा पहुँचता है तो क्या ऐसी स्वतंत्रता समाज के हित में सीमित की जा सकती है?
उत्तर-
नहीं, किसी भी लोकतांत्रिक देश में स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं हो सकता । व्यक्ति के जिन विचारों से दुसरे वर्ग-सम्प्रदाय को ठेस पहुँचे और उसके जिन विचारों से राष्ट्र की अखंडता को खतरा पहुँचता है उन्हें सीमित किया जा सकता है। इसके लिए उसे दंडित भी किया जा सकता है। किसी भी व्यक्ति या सरकार के कार्यों से यदि दूसरे के हित को खतरा पहुँचता है तो उसे सीमित करने के लिए देश की अदालत अपना दखल देती है।

प्रश्न 33.
संविधान की उद्देशिका को ध्यान से पढ़ें और बताएँ कि संविधान में कौन-कौन-सी समानताओं का उल्लेख किया गया है ?
उत्तर-
हमारे संविधान में नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार- अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने का उल्लेख किया गया है।

प्रश्न 34.
नीचे दिए गए उदाहरणों में कौन-कौन-सी असमानताएँ दिखाई दे रही

प्रश्न (i)
अपहरण के मामले में चार लड़के गिरफ्तार होते हैं। उनमें से श्याम एक धनी परिवार का इकलौता लड़का है । मजिस्ट्रेट सभी को एक ही सजा सुनाता है।
उत्तर-
धनी परिवार के लड़के की इस कांड में मुख्य भूमिका हो सकती है। इसकी जाँच कर उसे अन्य की अपेक्षा अधिक कड़ी सजा मिलनी चाहिए थी। यहाँ आर्थिक असमानता का मामला है।

प्रश्न (ii)
एक गाँव में स्थित मंदिर में कुछ खास समुदाय के लोगों को नहीं जाने दिया जाता।
उत्तर-
यहाँ उस खास समुदाय के धर्म और उपासना की स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित करने की असमानता दिखती है।

प्रश्न (iii)
आपके पड़ोस के स्कूल में आपके छोटे भाई का नामांकन नहीं । किया जाता क्योंकि आपके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।
उत्तर-
इस मामले में आर्थिक असमानता दृष्टिगोचर होती है।

प्रश्न (iv)
किसी निजी नौकरी के लिए आपको इसलिए नहीं लिया जाता क्योंकि आप किसी खास समुदाय के हैं।
उत्तर-
इस मामले में अवसर की समता का व्यक्ति का अधिकार खंडित होता है।

प्रश्न 35.
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बच्चों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति समानता के सिद्धांत के विरुद्ध क्यों नहीं जाती ? अपनी शिक्षिका की सहायता से इस पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
यह समानता के विरुद्ध नहीं है क्योंकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को सदियों से दबाया जाता रहा है। उन्हें छात्रवृत्ति देकर अन्य वर्गों के समकक्ष लाने की कोशिश समानता के सिद्धांत के ही अनुकूल है।

प्रश्न 36.
अपने स्कूल में चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं की जानकारी एकत्र कीजिए। ये योजनाएँ क्या हैं और क्यों चलाई जाती हैं ? समूह .. में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें।

अभ्यास-प्रश्न

प्रश्न 1.
एक नागरिक के रूप में देश के लोगों के लिए संविधान महत्त्वपूर्ण
क्यों है?
उत्तर-
एक नागरिक के रूप में देश के लोगों के लिए संविधान बहुत महत्त्वपूर्ण है । संविधान देश के लोगों के हितों की रक्षा को सुनिश्चित करता है। लोगों के बुनियादी मूल्यों व अधिकारों की रक्षा संविधान द्वारा ही संभव है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता के लिए देश का संविधान व्यक्ति की हर संभव सहायता करता है।

प्रश्न 2.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत के लोगों ने अपना संविधान बनाने की मांग क्यों रखी होगी?
उत्तर-
भारत के लोग अंग्रेजी सरकार के बर्बर और क्रूर शासन से त्रस्त थे। लोगों को न आर्थिक आजादी थी न सामाजिक और न ही राजनैतिक आजादी हासिल थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी नहीं थी। दमनपूर्ण शासन से त्रस्त भारत के लोगों को लगने लगा कि जब तक अपना संविधान देश में “लागू नहीं होगा, तब तक लोगों को बेहतर शासन प्राप्त नहीं होगा। अतः स्वतंत्रता, आंदोलन के दौरान भारत के लोगों ने अपना संविधान बनाने की मांग रखी।

प्रश्न 3.
भारत के संविधान में दिए गए मूल्यों में से आपको कौन-से मूल्य, सबसे महत्त्वपूर्ण लगते हैं और क्यों?
उत्तर-
भारत के संविधान में दिए गए मूल्यों में से मुझे बुनियादी मूल्य सबसे महत्त्वपूर्ण लगते हैं। इन मूल्यों में प्रमुख हैं-लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता । इन मूल्यों का महत्त्व इस तथ्य से पता चलता है कि इन्हें सबसे पहले संविधान के उद्देश्यों में शामिल किया गया था एवं इन्हें संविधान की उद्देशिका में लिखा गया

प्रश्न 4.
संविधान में दिए गए समता और सामाजिक न्याय को लागू करने के लिए सरकार द्वारा जो योजनाएं चलाई जा रही हैं, उन्हें निम्न तालिका में भरिये। समता का मूल्य
Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 1 भारतीय संविधान 1
उत्तर-
Bihar Board Class 8 Social Science Civics Solutions Chapter 1 भारतीय संविधान 2

प्रश्न 5.
नीचे दिए गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए। संविधान सभा की बैठक नई दिल्ली के संविधान सभा भवन में 8.30 बजे शुरू हुई । माननीय डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने सभा की अध्यक्षता की। इस सभा में माननीय सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने विचार प्रस्तुत किये, “समिति में दो विचार-धाराएँ थीं । बड़ी तादाद में विख्यात वकील थे, जो बहुत बारीकी से हर वाक्य, हर शब्द, यहाँ तक की विराम और अल्प विराम की जाँच कर रहे थे। ये दोनों विचारधाराएँ दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से मामले को देखती थीं

एक विचारधारा यह मानती थी कि अधिकारों के इस प्रतिवेदन में जितने अधिक से अधिक संभव हों, अधिकार शामिल करने चाहिए जो अदालत में सीधे लागू किए जा सकें। इन अधिकारों को लेकर कोई भी नागरिक बिना किसी कठिनाई के सीधे अदालत जा सके और अपने अधिकार प्राप्त कर सकें । दूसरी विचारधारा का मत था कि मूल अधिकारों को कुछ ऐसी बहुत अनिवार्य बातों तक सीमित रखा जाना चाहिए जिन्हें आधारभूत माना जा सके।

दोनों विचारधाराओं में काफी बहस हुई और अंत में एक बीच का रास्ता निकाला गया, जिसे एक अच्छा मध्यम मार्ग माना गया। दोनों विचारधाराओं के लोगों ने सिर्फ एक देश के मूल अधिकारों का अध्ययन नहीं किया बल्कि दुनिया के लगभग हर देश के मूल अधिकारों का अध्ययन किया। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि हमें इस प्रतिवेदन में जहाँ तक संभव हो, उन अधिकारों को शामिल करना चाहिए, जिन्हें उचित माना जा सके । इन बातों पर इस सदन में मतभेद हो सकता है, सदन को हर धारा पर

आलोचनात्मक तरीके से विचार करके, विकल्प सुझाने, संशोधन के सुझाव देने और निरस्त करने का अधिकार है।”

प्रश्न-

प्रश्न 1.
संविधान सभा की मूल अधिकारों की समिति में कौन-कौन से विचार प्रमुख रूप से उभर रहे थे?
उत्तर-
संविधान सभा की मूल अधिकारों की समिति में दो विचारधाराएँ प्रमुख रूप से उभर रही थीं। एक विचारधारा यह मानती थी कि अधिकारों के इस प्रतिवेदन में जितने अधिक-से-अधिक संभव हों, अधिकार शामिल करने चाहिए जो अदालत में सीधे लागू किए जा सकें ।

इन अधिकारों को लेकर कोई भी नागरिक बिना किसी कठिनाई के सीधे अदालत जा सके और अपने अधिकार प्राप्त कर सके । दूसरी विचारधारा का मत था कि मूल अधिकारों को कुछ ऐसी बहुत अनिवार्य बातों तक सीमित रखा जाना चाहिए जिन्हें धारभूत माना जा सके।

प्रश्न 2.
आप इनमें से किस विचार के साथ सहमत हैं। और क्यों?
उत्तर-
मैं प्रथम विचार से सहमत हैं क्योंकि यह विचारधारा लोगों को अधिक से अधिक अधिकार देने के पक्षधर हैं जिन्हें अदालत की सुरक्षा भी सीधे-सीधे प्राप्त होगी।

प्रश्न 3.
संविधान सभा में सदस्य किस तरह किसी निर्णय पर पहुँचते थे, गद्यांश के आधार पर अपने शब्दों में लिखिये।
उत्तर-
संविधान सभा के सदस्य काफी बहस कर अंत में किसी मुद्दे पर बीच का रास्ता निकालते थे, जिसे एक अच्छा मध्यम मार्ग माना जा सकता था।

Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 5 बल से ज़ोर आजमाइश

Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 5 बल से ज़ोर आजमाइश Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 5 बल से ज़ोर आजमाइश

Bihar Board Class 8 Science बल से ज़ोर आजमाइश Text Book Questions and Answers

अभ्यास

बल से जोर आजमाइश Bihar Board Class 8 प्रश्न 1.
किसी वस्तु को धक्का देना या खींचना कौन-सी क्रिया है ?
उत्तर-
किसी वस्तु को धक्का देना या खींचना अन्त:क्रिया या अन्योन्य क्रिया है।

Bihar Board Class 8 Science Solution प्रश्न 2.
बल क्या है?
उत्तर-
बल वह भौतिक कारक है जो किसी वस्तु पर लगकर या तो उसके स्थान को परिवर्तित कर देता है या स्थान परिवर्तित करने की चेष्टा करता या, बल एक प्रकार का धक्का या खिंचाव है जिसके कारण वस्तु में गति उत्पन्न होती है। बल का मात्रक न्यूटन है। बल एक सदिश राशि है।

Bihar Board Class 8 Science Solution In Hindi प्रश्न 3.
बल के द्वारा कौन-सी क्रिया की जा सकती है ?
उत्तर-
बल के द्वारा निम्नलिखित क्रिया की जा सकती है।

  1. वस्तु के आकार में परिवर्तन ।
  2. वस्तु के अवस्था में परिवर्तन।
  3. वस्तु के गति की दिशा में परिवर्तन ।
  4. वस्तु के गति में वृद्धि या कमी लायी जा सकती है इत्यादि।

Science बुक बिहार क्लास 8 Solution Bihar Board प्रश्न 4.
वस्तुओं की अन्तःक्रिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
बल दो वस्तुओं के बीच कार्य करता है ये दोनों वस्तुएँ किसी माध्यम या प्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क में रहते हैं। जब किसी एक वस्त द्वारा दुसरे पर बल लगाया जाता है तो दूसरी वस्तु भी पहले पर विपरीत दिशा में बल लगाता है। उसी प्रक्रिया को अन्त:क्रिया कहते हैं। बल लगाने के लिए कम-से-कम दो वस्तुओं में अन्त:क्रिया होनी आवश्यक है। इस प्रकार दो वस्तुओं की अन्त:क्रिया के कारण उनके बीच बल लगता है।

Bihar Board Solution Class 8 Science प्रश्न 5.
एक ऐसा उदाहरण दीजिए जिसमें दो व्यक्तियों द्वारा बल आरोपित किया जा रहा है परन्तु परिणामी बल शून्य होता है।
उत्तर-
डेजी तथा ज्योति प्रभा, संदूक पर समान बल लगा रही है परन्तु विपरीत दिशा में । संदूक पर बैठी शिरोमणी कुमारी तथा संदुक स्थान में कोई परिवर्तन नहीं होता है। यानि दोनों बहन के द्वारा लगाया गया बल का परिणाम शून्य है।

Class 8 Bihar Board Science Solution प्रश्न 6.
रस्साकशी के खेल में दो दलों द्वारा बल किस दिशा में लगाया जाता है ?
उत्तर-
रस्साकशी के खेल में दो दलों द्वारा बल विपरीत दिशा में लगाया जाता है।

Class 8 Science Bihar Board प्रश्न 7.
सम्पर्क, असम्पर्क बल के दो प्रकारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
वैसी स्थिति जिसमें दोनों पिण्ड (वस्तु) प्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क में हो या किसी वस्तु के माध्यम से सम्पर्क में हो तो दोनों वस्तुओं के बीच लगने वाले बल को सम्पर्क बल कहते हैं।

जैसे – कुली के द्वारा उठाया गया वजन, संदूक को धक्का देना, घोड़ा द्वारा गाड़ी खींचना इत्यादि ।

सम्पर्क बल दो प्रकार के होते हैं. पेशीय बल तथा घर्षण बल ।

वैसी स्थिति जिसमें दोनों वस्तुएँ प्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क में न हो और न ही किसी वस्तु के माध्यम से सम्पर्क में हो तो दोनों वस्तुओं के बीच लगने वाले बल को असम्पर्क बल कहते हैं। जैसे – गिरता हुआ वस्तु तथा पृथ्वी के बीच लगने वाले बल।।

चुम्बक तथा लोहा के बीच लगने वाले बल यानि गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बकीय बल इत्यादि असम्पर्क बल के उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 8 Science प्रश्न 8.
गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत बल, घर्षण बल से क्या समझते हैं ?
उत्तर-
ब्रह्मांड में सभी पिंड एक-दूसरे पर अपने द्रव्यमान के कारण बल लगाते हैं जिसे गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं। गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का एक गुण है जिसके द्वारा ये दुसरे पिण्डों को अपनी ओर आकर्षित करती है। पृथ्वी द्वारा लगाया गया आकर्षण बल जिसे गुरुत्व बल कहते हैं।

दो विशिष्ट वस्तुओं को आपस में रगड़ने से आवेशों का स्थानांतरण होता है जिसके कारण दोनों वस्तुएँ आवेशित हो जाती हैं। जिसमें से एक धनावेशित तो दूसरा ऋणावेशित । इस प्रकार इन वस्तुओं में किसी वस्तु को आकर्षित करने की क्षमता आ जाती है जिसे विद्युत् बल कहते हैं। जैसे-कंघा को बाल में रगड़ने से कंघा कागज के टुकड़े को आकर्षित करने लगता है।

जब कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु के सम्पर्क में गति करती है। एक बल उस वस्तु के सम्पर्क सतह पर कार्य करने लगता है। इस बल को घर्षण बल कहते हैं। घर्षण बल हमेशा गति का विरोध करता है। जैसे-पहिया और सड़क के बीच लगने वाले बल, फर्श पर लुढ़कती गेंद इत्यादि।

Bihar Board 8 Class Science Solution प्रश्न 9.
भार क्या है? क्या भार को बल की माप के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है ?
उत्तर-
जिस बल से पृथ्वी किसी वस्तु को अपनी केन्द्र की ओर आकर्षित करती है। वही बल उस वस्तु का भार कहलाता है। गुरुत्व के कारण ही

वस्तुओं में भार होता है। किसी वस्तु का भार हमेशा नीचे की ओर कार्य करता है। भार एक सदिश राशि होता है।

(भार = द्रव्यमान × गुरुत्वीय त्वरण)

हाँ, भार को बल की माप के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।

बिहार बोर्ड क्लास 8 विज्ञान Bihar Board प्रश्न 10.
मिलान कीजिए

Class 8 Science Solution Bihar Board
उत्तर-

  1. (2)
  2. (5)
  3. (4)
  4. (3)
  5. (1)

Bihar Board 8th Class Science प्रश्न 11.
बल की इकाई का नाम बताइए।
उत्तर-
बल की इकाई न्यटन हैं या Bihar Board Class 8 Science Solutions Chapter 5 बल से ज़ोर आजमाइश 2

Bihar Board Class 8th Science Solution प्रश्न 12.
जब गेंद हवा में फेंका जाता है तो इसकी गति में परिवर्तन होता रहता है। ये परिवर्तन किन-किन बलों के द्वारा किए जाते हैं?
उत्तर-
फेंका गया गेंद की गति में परिवर्तन निम्नलिखित बलों के कारण होता है।

  1. घर्षण बल
  2. गुरुत्वाकर्षण बल या भार
  3. आरोपित बल का घटता परिणाम इत्यादि ।

बिहार बोर्ड क्लास 8 साइंस Bihar Board प्रश्न 13.
पेड़ से नीचे गिरते सेब पर कौन-सा बल कार्य करता है?
उत्तर-
गुरुत्वाकर्षण बल।।

Science Class 8 Bihar Board प्रश्न 14.
जब दो वस्तुओं को एक-दूसरे के साथ रगड़ खाता है तो इनकी सतहों के बीच जो बल कार्य करता है वह बल होता है।
उत्तर-
घर्षण बल ।

Bihar Board 8th Class Science Solution प्रश्न 15.
इनमें कौन असम्पर्क बल है?

  1. खिंचाव
  2. धक्का
  3. चुम्बकीय
  4. घर्षण

उत्तर-
3. चुम्बकीय ।

Bihar Board Class 8 Hindi Solutions Chapter 7 ठेस

Bihar Board Class 8 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 3 Chapter 7 ठेस Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 8 Hindi Solutions Chapter 7 ठेस

Bihar Board Class 8 Hindi ठेस Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से

ठेस कहानी का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 8 Hindi प्रश्न 1.
गाँव के किसान सिरचन को क्या समझते थे?
उत्तर:
गाँव के किसान सिरचन को कामचोर, बेकार का आदमी, धीरे-धीरे काम करने वाला नाप-तौलकर काम करने वाला, मुफ्त में मजदूरी. पाने वाला समझते थे।

Gaon Ke Kisan Sirchan Ko Kya Samajhte The Bihar Board प्रश्न 2.
इस कहानी में आये हुए विभिन्न पात्रों के नाम लिखें।
उत्तर:
इस कहानी के नायक सिरचन के साथ-साथ रेणु जी, रेणु जी की माँ, चाची, मँझली भाभी, मानू दीदी इत्यादि पात्र हैं।

ठेस’ कहानी का अंत आपको कैसा लगा अपने विचार लिखिए Bihar Board Class 8 Hindi प्रश्न 3.
सिरचन को पान का बीड़ा किसने दिया था?
उत्तर:
मानू दीदी ने।

ठेस’ कहानी का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 8 Hindi प्रश्न 4.
निम्नलिखित गद्यांशों को कहानी के अनुसार क्रमबद्ध रूप में सजाइए।
उत्तर:

  1. मुझे याद है …………. क्या-क्या लगेगा।
  2. उस बार मेरी सबसे छोटी ………… बिना आएगी मानू तो।
  3. मान फूट-फूट कर …….. देख रहा था।

Bihar Board Class 8 Hindi Solution प्रश्न 5.
निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही (✓) या गलत (✗) का निशान लगाइए।
प्रश्नोत्तर:

  1. सिरचन कामचोर था । (✗)
  2. सिरचन अपने काम में दक्ष था। (✓)
  3. सिरचन बात करने में भी कारीगर था। (✓)
  4. सिरचन वकील था। (✗)

Bihar Board Class 8 Hindi Book Solution प्रश्न 6.
कहानी के किन-किन प्रसंगों से ऐसा प्रतीत होता है कि सिरचन अपने काम को ज्यादा तरजीह देता था उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कहानी के अनेक प्रसंगों से प्रतीत होता है कि सिरचन अपने काम को ज्यादा तरहीज देता था। की रेणु जी के घर मानू दीदी की विदाई के पूर्व शीतलपाटी और चिक बनाने के लिए सिरचन को बुलाया जाता है । वह अपने काम में तन्मय हो गया। अगर उसकी तन्मयता में विघ्न डाले तो वह गेहूँमन साँप की तरह फुफकार उठता और काम छोड़कर चला जाता । फिर वह काम अधूरा ही रह जाता था।

कहानी प्रसंग में दूसरे दिन जब वह अपने काम में लगा तो उसे खाने-पीने की सुधि ही नहीं रही। उसे चुड़ा-गुड़ खाने को मिलता है। वह केवल चुड़ा फाँक रहा है। गुड़ का ठेला या ही अछुता पड़ा है। चुड़ा चबाते समय भी वह अपने काम में तन्मय है। उसे कुछ सुधि नहीं है कि चुड़ा के साथ गुड़ भी खाना है। इससे स्पष्ट है कि वह भोजन की अपेक्षा अपने काम को ज्यादा तरजीह देता था।

Class 8 Hindi Chapter 7 Bihar Board प्रश्न 7.
इस कहानी में कौन-सा पात्र आपको सबसे अच्छा लगा और क्यों ?
उत्तर:
इस कहानी में हमें सबसे अच्छा पात्र सिरचन लगा क्योंकि सिरचन मानवीय गुण से भरा है । वह जिस काम को करता है। प्रेम से करता है। उसकी कारीगरी के कायल दूर-दूर गाँव के लोग थे।

वह स्वाभिमानी और सम्मानप्रिय व्यक्ति है। उसे खाना जो भी मिले वह

अपने काम को तरजीह देता था । किसी की जली-कटी बातें सुनकर या अपने  कारीगरी के प्रति आरोपों को सुनकर वह काम छोड़ देता । जिस काम को छोड़ देता वह काम अधूरा ही रह जाता।

कहानी के अंत में सिरचन की आत्मीय गुण चरम पर दिखता है जब मानू विदाई होकर स्टेशन पर गाड़ी में सवार है । गाड़ी खुलने के समय में सिरचन दौड़ता-हाँफता गट्ठर मानू दीदी को देते हुए कहता है दीदी यह हमारे तरफ से शीतलपाटी, चिक और कुश की आसानी है।

पाठ से आगे

Bihar Board Class 8 Hindi Solution In Hindi प्रश्न 1.
आपकी दृष्टि में सिरधन द्वारा चिक एवं शीतलपाटी स्टेशन पर मानू को देना कहाँ तक उचित था।
उत्तर:
सिरचन के द्वारा स्टेशन पर मानू को विदाई के समय शीतलपाटी, चिक आदि उपहार देना ही उचित था। यदि वह घर पर जाता उपहार देने तो कहानी में सिरचन के आत्मीय गुण में कमी आ जाती । फिर उसे तो गाँव वालों से ठेस लग चुका था । एक सफल कारीगर सिरचन अपनी कला का महत्व देते हुए स्वनिर्मित वस्तुओं को उपहार मानू को स्टेशन पर प्रदान करती है जो उपयुक्त समय था।

किसलय भाग 3 Solutions Bihar Board Class 8 Hindi प्रश्न 2.
काम के बदले थोड़ा-सा अनाज या चंद रुपये देकर क्या किसी मजदूर की मजदूरी का मूल्य चुकाया जा सकता है । इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
मजदूरों को मजदूरी के बदले थोड़ा अनाज या ‘चंद रुपये देकर उसके मजदूरी का मूल्य नहीं चुकाया जा सकता है। क्योंकि किसी मजदूर या कारीगर की कला अमूल्य होती है। फिर अन्न या रुपये से मजदूरी का मूल्य कैसे चुकाया जा सकता है। किसी मजदूर या कारीगर के लिए उसकी मजदूरी का सबसे बड़ा मूल्य है। उसकी कला के प्रति आभार व्यक्त करना, कारीगर का सम्मान करना।

प्रश्न 3.
इस कहानी का अंत किये गये अंत से अलग और क्या हो सकता है? सोचकर लिखिए।
उत्तर:
किसी कहानी का अंत किये गये अंत से अलग हो सकता है। लेकिन “ठेस” शीर्षक कहानी का अंत चरमोत्कर्ष पर जाकर हुआ है क्योंकि सिरचन जो अपनी कारीगरी को पुनः नहीं करने का शपथ लेता है वही सिरचन मानू के घर से विदा हो जाने पर रास्ते में अपना उपहार शीतलपाटी चिक और कुश का आसनी प्रदान कर आत्मीयता का अनोखा परिचय देता है।

जबकि कहानीकार कहानी का अंत वही कर सकता था जहाँ वह शपथ लेता है कि मैं पुन: यह काम नहीं करूंगा। कहानीकार समझ जाता है कि एक कलाकार को “ठेस” लगा है। शीर्षक के आधार पर वही कहानी का अंत किया जा सकता था।

व्याकरण

मुहावरे : ऐसा वाक्यांश, जो सामान्य अर्थ का बोध न कराकर किसी . विलक्षण अर्थ का बोध कराए, मुहावरा कहलाता है । मुहावरे के प्रयोग से भाषा में सरलता, सरसता, चमत्कार और प्रवाह उत्पन्न होते हैं। जैसे-आँख का तारा (बहुत प्यारा) । नमन अपने माता-पिता के आँखों का तारा है।

लोकोक्ति : लोकोक्ति के पीछे कोई कहानी या घटना होती है। उससे निकली बात बाद में लोगों की जुबान पर जब चल निकलती है तो लोकोक्ति हो जाती है। जैसे एक पंथ दो काज (एक काम से दूसरा काम हो जाना)पटना जाने से एक पंथ दो काज होंगे। कवि

सम्मेलन में कविता पाठ भी करेंगे और साथ ही जैविक उद्यान भी देखेंगे। आइए इसके साथ ही कुछ ऐसी बातों को भी जानें, जिससे मुहावरे और लोकोक्तियों की समानताओं और असमानताओं का पता भी चले।

  1. मुहावरों और लोकोक्तियों में पर्यायवाची शब्द नहीं रखे जा सकते । यही कारण है कि इनका अनुवाद संभव नहीं।
  2. लोकोक्ति स्वतंत्र वाक्य होते हैं, जबकि मुहावरे वाक्यांश होते हैं।

प्रश्न 1.
इन मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग करते हुए अर्थ स्पष्ट कीजिए
प्रश्नोत्तर:

  1. कान मत देना – उसके बातों पर कान मत देना।
  2. दम मारना – बीमार व्यक्ति दम मार-मारकर चलता है।
  3. मुँह में लगाम न होना – श्याम के मुँह में लगाम नहीं है।
  4. सिर चढ़ाना – मदन अपने पत्नी को सिर चढ़ा लिया है।

गतिविधि

प्रश्न 1.
स्टेशन पर, सिरचन का पहुँचना एवं वहाँ मानू को सामग्री देने के अंश को पढ़ने के बाद जो चित्र आपके मस्तिष्क में उभरते उसे चित्र बनाकर वर्ग कक्ष में प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2.
स्थानीय स्तर पर शीतलपाटी, चिक, आसनी की तरह कोई अन्य वस्तु प्रचलित हो तो उसे बनाकर वर्गकक्ष में दर्शाइए। ।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

ठेस Summary Hindi

सिरचन गाँव का एक कुशल कारीगर है जिसने मोथे और पटेर की शितलपाठी, बाँस के कमाची से चिक (पर्दा), सात रंग के डोरी से भोढे, पूंज की रस्सी से बना भूसा रखने वाला जाल, कुश की आसनी और ताल (ताड़)

के पत्ते से छतरी बनने में दूर-दराज तक प्रसिद्धि पा लिया है। लोग बड़े शौक …से शितलपाटी और चिक बनवाकर अपने-अपने सगे-सम्बन्धियों के यहाँ भेजते

इतने कुशल कारीगर को लोग कामचोर या बेगार मानकर अन्य काम में – नहीं बुलाते थे। वह कामचोर नहीं था। वह अपने काम को बड़ी ही तन्मयता – से करता था । उसको मनपसंद भोजन और प्रेमभरी वाणी मिल जाता तो उसकी तन्मयता देखते बनती थी। यदि कोई बीच में टोक देता तो उसका काम पड़ा ही रह जाता । हाँ यदि एक बार उसे मनपसंद भोजन या पर्याप्त भोजन नहीं मिलता तो दूसरी बार वह वहाँ नहीं जाता और खोलकर अपनी व्यथा व्यंग भाषा में अवश्य बोल देता।

एक ब्राह्मण पंचानंद चौधरी के घर कम और पसंद के लायक भोजन नहीं मिलने पर सिरचन ने पंचानंद के छोटे बेटे से साफ-साफ कह दिया कि तुम्हारी भाभी नाखून पर तरकारी परोसती है तथा कढ़ी इमली देकर बनाती है जो हमारे जैसे कहार-कुम्हारों को घर वाली बनाती है। तुम्हारी भाभी ने कहाँ सीखा।

रेणु जी की माँ जब कभी सिरचन को बुलाने कहती तो रेणु जी माँ से पूछते थे-भोग क्या-क्या लगेगा । लेकिन सिरचन भोजन से ज्यादा प्रेम भरी वाणी का कायल था।

रेणु जी सिरचन को बुलाते हैं उनकी छोटी बहन की विदाई होने वाली है। दामाद जी ने चिट्ठी लिखकर कहा – बर्तन-वासन मिले या न मिले फैशन वाली तीन जोड़ी चिक और पठेर की शीतल पार्टी अवश्य होना चाहिए। सिरचन आता है । माँ कही-सिरचन तुम्हें घी का खखोरन और चुड़ा पसंद है जिसे मैंने व्यवस्था कर रखा है। इस बार असली मोहर छाप वाली धोती भी दूँगी। ऐसा काम करो कि देखने वाले चकित रह जाएँ।

सिरचन अपना काम प्रारम्भ करता है। रेणु जी की मैंझली भाभी परदे के भीतर से ही बोली-मोहर छाप वाली धोती से बढ़िया काम होता है। ऐसा जानती तो भैया को भी खबर कर देती । सिरचन मँझली भाभी की बात सुनते ही बोल उठा “मोहर छाप वाली धोती के साथ रेशम का कुर्ता भी देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती।”

सिरचन को दूसरे दिन चुड़ा और गुड़ खाने को मिला । सिरचन छुआ तक नहीं। यह देखकर रेणुजी कहते हैं, आज सिर्फ चुड़ा-गुड़।

माँ मँझली भाभी से बुदियाँ देने को कहती है। मैंझली भाभी थोड़ी-सी बुन्दियाँ उसके सुप में डाल देती है जिसे देखकर सिरचन बोल उठा-मंझली बहुरानी क्या अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोलकर देती हैं। यह सुनते ही मँझली भाभी कमरे में जाकर रोने लगती है। …”

चाची ने भी सिरचन को किसी के नैहर-ससुराल की बात नहीं करने की चेतावनी दी। माँ आकर कही-सिरचन अपने काम में लगे रहो, किसी से बतकट्टी करने से क्या फायदा।

मानू (छोटी बहन) जो पान लगा रही थी एक पान सिरचन को देते हुए कही-सिरचन दादा पाँच लोग पाँच रंग के बात बोलेंगे, कान मत दो।

सिरचन मुस्कुराते हुए पान मुँह में रख लिया। चाची सिरचन को पान खाते देख अचरज में पड़ गई सिरचन ने चाची को अवाक देख बोल उठा-चाची जरा अपना बाला गमकौआ जर्दा तो खिलाना, बहुत दिन हो गये। यह सुनते ही चाची उसे खरी-खोटी सुनाते हुए चटोर, मुँहझौसा, वेलगाम, शीलहीन इत्यादि कह दी तथा चाची यह भी कही कि पैसा खर्च करने पर सैंकड़ों चिक मिल जाएँगे इत्यादि।

बस क्या था, मानो सिरचन को ठेस लग गयी। वह काम बंद करते हुए – अपना औजार समेटा और काम छोड़ चला गया। कहानीकार सिरचन को मनाने जाते हैं लेकिन सिरचन नहीं आया । वह

साफ-साफ कह दिया बबुआजी अब नहीं, मोहर वाली धोती लेकर क्या करूंगा, कौन पहनेगा। . शितलपाटी जिस पर वह बैठा है उसके स्वर्गीय पत्नी के हाथ का बना , है। उसे छूकर वह कसम खाता है। यह काम अब नहीं करूंगा। …सिरचन में बड़ी ही आत्मीयता थी इसका उदाहरण तब मिलता है जब मानू की विदाई हो गई स्टेशन पर गाड़ी खुलने वाली है सिरचन दौड़ता हुआ . पीठ पर एक गठर लिए हॉफते हुए गेट खोलने को कहता है ।

मानू दीदी को एक बार देख लँ. यह कहते हुए सिरचन गट्ठर खोलकर कहता है दीदी यह हमारे तरफ से शितलपाठी, चिक और कुश की आसानी है। मानू मोहर ‘ छापवाली धोती के दाम देना चाहती है लेकिन सिरचन जीभ को दाँत तले डालकर हाथ जोड लेता है तथा रुपया नहीं लेता है।

गाड़ी खुल गई । मानू रोने लगी। जब उसके गट्ठर को खोल देखा गया तो उसके कारीगरी और उसके प्रति हुए अमानवीय व्यवहार से रेणु जी हतप्रभ जैसे हो गये।

Bihar Board Class 8 Hindi Solutions Chapter 5 हुंडरू का जलप्रपात

Bihar Board Class 8 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 3 Chapter 5 हुंडरू का जलप्रपात Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 8 Hindi Solutions Chapter 5 हुंडरू का जलप्रपात

Bihar Board Class 8 Hindi हुंडरू का जलप्रपात Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से

Hundru Ka Jalprapat Class 8 Bihar Board प्रश्न 1.
जैसे हुंडरू का झरना वैसा उसका मार्ग।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
हुंडरू का झरना अत्यन्त आकर्षक, मनमोहक और आनन्ददायक – है। उसी प्रकार हुंडरू जाने का मार्ग भी आकर्षक, मनमोहक और आनन्ददायक है। मार्ग में बीहड़ जंगल जिसमें हिंसक जीवों की आवाज के साथ-साथ विविध पक्षियों का कलरव मनमोहक लगता है। हरे-भरे खेतों की हरियाली रास्ते का आनन्द और भी बढ़ा देता है। हुंडरू का जल प्रपात से उत्पन्न धवल झाग मन के सारे विकारों को दूर कर देता है।

Hundru Ka Jalprapat Class 8 Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
हुंडरू का झरना कैसे बना है?
उत्तर:
स्वर्ण-रेखा नदी पहाड़ को पार करने के लिए अनेक भागों में विभक्त हो जाती है। पुनः एक जगह होकर पहाड़ से उतरती है। यह है हुंडरू का झरना जो 243 फीट ऊपर से गिरती है।

Bihar Board Class 8 Hindi Book Solution प्रश्न 3.
“स्वयं झरने से भी ज्यादा खूबसूरत मालूम होता है, झरने से आगे का दृश्य” उस दृश्य की सुन्दरता का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
हुंडरू झरने से भी ज्यादा खुबसूरत मालूम होता है उसके आगे का दृश्य । आगे घाटी है। पहाड़ों के बीच पतली नदी मानो थर्मामीटर का पारा हो। नदी के इर्द-गिर्द पत्थरों का अंवार उस पर झाड़ी। चारों ओर सुन्दरता ही सुन्दरता दिखाई पड़ती है। सम्पूर्ण दृश्य प्राकृतिक है । स्वर्ग जैसा सुख देने वाला हुंडरू के झरने से आगे का दृश्य है।

Hundru Ka Jharna Kaise Bana Bihar Board Class 8 प्रश्न 4.
प्रस्तुत पाठ के आधार पर समझाइए कि किसी यात्रा-वृतांत को रोचक बनाने के लिए किन-किन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए?
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ “हुंडरू का जल प्रपात” यात्रा-वृतांत है। किसी भी यात्रा-वृतांत को रोचक बनाने के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ वहाँ के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति का वर्णन भी अनिवार्य है । जैसा कि “हुंडरू का जलप्रपात” शीर्षक पाठ में लेखक ने वर्णन किया है।

Bihar Board Solution Class 8 Hindi प्रश्न 5.
यहाँ पर एक दृश्य का वर्णन दो प्रकार से किया गया है।
उत्तर:
(क) हुंडरू का पानी कहीं साँप की तरह चक्कर काटता है, कहीं हरिण की तरह छलाँग भरता है और कहीं बाघ की तरह गरजता हुआ नीचे गिरता है।
(ख) हुंडरू का पानी चक्कर काटकर छलाँग भरता हुआ नीचे गिरता इनमें से आपको कौन-सा तरीका अच्छा लग रहा है और क्यों ?

  1. उपरोक्त दो कथनों में मुझे प्रथम कथन का तरीका अच्छा लगता है क्योंकि प्रथम कथन में विशेष्य-विशेषण दोनों का प्रयोग है जबकि दूसरे कथन में विशेषण मात्र प्रयोग हुआ है। .
  2. प्रथम कथन अलंकारपूर्ण है। इसमें उपमा अलंकार का समावेश किया गया है। जैसे – साँप की तरह चक्कर काटना, हिरण की तरह छलांग लगना।

गतिविधि

Bihar Board Class 8 Hindi Solution प्रश्न 1.
बिहार के दर्शनीय स्थानों की सूची बनाइए । प्राकृतिक सम्पदा तथा कृषि को ध्यान में रखते हुए बिहार एवं झारखंड का तुलनात्मक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हमारा बिहार दर्शनीय स्थानों से भरा है। जिसमें-पटना की पटनदेवी, गोलघर, अजायबघर, चिडियाखाना, महावीर मंदिर, अगमकुँआ और गुरुगोविन्द सिंह का जन्म स्थान, इनके अतिरिक्त बक्सर में ताड़का बध स्थान, गोपालगंज में थावे मंदिर सहरसा का चण्डिका स्थान, बेगुसराय का कावर झील, सीतामढ़ी (जनकपुर) में सीता का जन्म स्थान, कुशेश्वर स्थान,

हरिहर : नाथ आदि दर्शनीय स्थल हैं। प्राकृतिक सम्पदा में झारखंड अवश्य आगे है। लेकिन झारखंड में कषि योग्य भूमि की कमी है। कृषि क्षेत्र में हमारे बिहार झारखंड की अपेक्षा आगे है।

बिहार बोर्ड क्लास 8 हिंदी Bihar Board प्रश्न 2.
अपने-अपने गाँव और उसके आस-पास ईख. अरहर. सरसों के लहलहाते फूलों पर मंडराते हुए भौरों को अवश्य देखा होगा। साथ ही आम की मंजरियों पर मकरन्द को चूसते हुए मधुमक्खियों के झुंड एवं आम के पल्लवों के बीच छिपी हई कोयल की कूक भी आपने अवश्य सुनी होगी। इस प्राकृतिक दृश्य को महसूस कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

हुंडरू का जलप्रपात Summary in Hindi

हुंडरू झारखण्ड राज्य के छोटा नागपुर जिले में पड़ता है। राँची से 27 मील की दूरी पर स्थित है-हुंडरू का जलप्रपात । अत्यन्त सुन्दर, मनमोहक यह जलप्रपात है। उसका यात्रा मार्ग भी सुन्दर एवं मनमोहक है।

पहाड़, जंगल, घाटियाँ, नदियों को पार कर हुंडरू के जलप्रपात तक पहुंचा ‘जाता है। आदिवासियों का गीत, पशु-पक्षियों की आवाज से यात्रा आनन्ददायक हो जाता है। हरियाली सम्पन्न वह प्रदेश जादू की तरह मन को मोह लेता है।

कहीं कोयला तो कहीं अबरख के खान मिलते हैं। वहाँ के लोग गरीबऔर सीधे-सादे हैं। हुंडरू का जलप्रपात स्थल शोभा देवलोक जैसा है। 243 फीट ऊँची जगह से गिरता यह प्रपात पहाड़ों को चीरता पत्थर पर जिस समय गिरता है, उसका स्वरूप अत्यन्त आकर्षक दिखता है। पानी गिर-गिरकर 20-20 फीट उछलता है । झरने (प्रपात) से आगे का दृश्य और भी अधिक मोहक है। उससे आगे भी ऊँचे-ऊँचे प्रपात (झरना)

है लेकिन वहाँ तक पहुँचाना कठिन है। – पहाड़ के ऊपर से नीचे पतली-पतली पगडंडी से चलकर घाटी की शोभा

भी वर्णनीय है। सर्पाकार पतली-पतली नदियों के किनारे रंग-बिरंगे पत्थर विभिन्न आकार-प्रकार में लोगों के लिए नयनाभिराम लगता है। हुंडरू की शोभा प्रकृति प्रदत्त है।

वहाँ दुकानों का आभाव हैं। खाने-पीने की चीज नहीं के बराबर मिलते हैं। प्रपात के पास भयंकर ध्वनि दूर से ही लोगों को आकर्षित कर लेता है।

हुंडरू का जलप्रपात दर्शनीय है।