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Bihar Board 12th Business Studies Important Questions Long Answer Type Part 3 in Hindi

प्रश्न 1.
विपणन का क्या महत्त्व है ? विपणन एवं विक्रय में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
विपणन का महत्व – आधुनिक व्यावसायिक जगत में विपणन का विशिष्ट महत्व है। वास्तव में सम्पूर्ण उत्पादन का अंतिम ध्येय विक्रय होता है। विक्रय ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विभिन्न आवश्यक एवं महत्वपूर्ण वस्तुएँ उपभोक्ताओं तक पहुँचायी जाती है और दूसरी ओर व्यावसायिक संस्था अपनी वस्तुएँ उपभोक्ता में वितरण करने का कार्य सम्पन्न करती है आज किसी भी व्यापार की अंतिम सफलता उनकी विक्रय योग्यता पर निर्भर करती है। वर्तमान तीव्र प्रतिस्पर्धा के युग में विक्रय प्रबंध उच्च कोटि का होना अत्यन्त आवश्यक है।

पीटर एफ ड्रकर के अनुसार, “एक व्यावसायिक उपक्रम के दो आधारभूत कार्य हैं-प्रथम विपणन एवं द्वितीय नवाचार। इन दोनों कार्यों के मिश्रण से ही व्यावसायिक उपक्रम किसी भी बदलती हुई परिस्थिति का सामना कर सकता है।

आधुनिक गला-काट प्रतिस्पर्धा के दौर में ग्राहकों को आकर्षित करना, ग्राहकों की रूचि व पसंद पर पैनी नजर रखना एक कठिन कार्य है-इस समस्या को सुलझाने की दृष्टि से विक्रय कला एवं विक्रय प्रवर्तन का सहारा लिया जाता है। नये ग्राहक खोजने की समस्या, वर्तमान ग्राहक को अपने ही पास रखने की समस्या संस्था के उत्पादों के प्रति ग्राहकों में रूचि उत्पन्न करने की समस्या, विक्रय लागत पर नियंत्रण रखने की समस्या आदि अनेक ऐसी समस्याएँ हैं। जो विक्रय प्रबंधक को हल करनी पड़ती है।

विपणन और विक्रय में अंतर – विपणन और विक्रय में निम्नलिखित अंतर है-
Bihar Board 12th Business Studies Important Questions Long Answer Type Part 3, 1

प्रश्न 2.
“स्कन्ध विपणि किसी भी देश की समृद्धि का मापक तत्त्व हैं।” समझायें।
उत्तर:
आधुनिक युग में स्कंध विपणि किसी भी देश के पूँजी बाजार की एक महत्वपूर्ण अंग मानी जाती है। यह देश के पूँजी प्रवाह के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य करती है। इसके संचालन पर ही छोटी-छोटी बचतों का विनियोजन में प्रवाह संभव हो पाता है। यही कारण है कि स्कन्ध विपणियों को किसी देश की औद्योगिक प्रगति का दर्पण तथा आर्थिक विकास का मापक यंत्र माना जाता है। ये विपणियाँ अपने-अपने कार्य कलापों द्वारा किसी देश की राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक दशाओं को भी प्रतिबिंबित करता है।

स्कन्ध विपणि का उद्गम संयुक्त पूँजी कंपनियों की स्थापना के बाद हुआ है। विश्व की सर्वप्रथम स्कन्ध विपणि की स्थापना 1775 में लंदन में हुई। भारत में प्रथम स्कन्ध विपणि की स्थापना 1887 में बम्बई में हुई।

स्कन्ध विपणि से आशय ऐसे संगठित बाजार से है जहाँ अंशों, ऋण पत्रों सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय होता है।

स्कन्ध विपणि के महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं-

  • प्रतिभूतियों हेतु संगठित तैयार एवं निरंतर विपणन सुविधाएँ प्रदान करना।
  • पूँजी को तरलता और गतिशीलता प्रदान करना।
  • प्रतिभूतियों का उचित मूल्यांकन करना।
  • पूँजी निर्माण में सहायक।
  • बचत को गतिशीलता प्रदान करना।

स्कन्ध विपणियाँ केवल व्यापारिक व्यवहारों की प्रमुख प्रदर्शनकर्ता ही नहीं अपितु वे मापदण्ड हैं जो व्यापारिक वातावरण की सामान्य दशा को दर्शाती है यही कारण है कि उनको पूँजी का गढ़ व मूल्यों का मंदिर कहा जाता है। पूँजीवादी देशों में उसकी महत्तता और अधिक बढ़ जाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्कन्ध विपणि किसी भी देश की समृद्धि का मापक तत्व है।

प्रश्न 3.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत उपभोक्ता के शिकायत को कम करने के यंत्र उपलब्ध हैं, वर्णन करें।
उत्तर:
उपभोक्ता के शिकायत को कम करने के लिये उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम त्रि-स्तरीय यंत्र प्रदान करता है-
1. जिला संघ- यह एक संस्था है जिसमें राज्य सरकार द्वारा नियुक्ति किये गये दो सदस्य एवं एक अध्यक्ष होते हैं। वस्तु एवं सेवा के मूल्य से संबंधित वैसी शिकायत जिसका मूल्य 20 लाख रुपये से अधिक न हो जिला संघ में जमा किये जाते हैं। जिला संघ शिकायत दर्ज किये गये व्यक्ति को सूचना भेजता है, उसकी दलील को सुनता है और फिर आदेश पारित करता है।

2. राज्य कमीशन- वस्तु एवं सेवा जिसका मूल्य 2 लाख से अधिक एवं एक करोड़ से कम हो, की शिकायत राज्य कमीशन में किया जाता है राज्य कमीशन जिनके विरुद्ध शिकायत दर्ज की गई, उन्हें नोटिस भेजता है, उनकी दलील सुनता है एवं पुनः आदेश पारित करता है, यदि जरूरत पड़ी तो वह लेबोरेटरी जाँच के लिये भी वस्तु या सैम्पल को भेजता है।

3. नेशनल कमीशन- भारत सरकार द्वारा सदस्यों की नियुक्ति की जाती है। वस्तु एवं सेवा का मूख्य क्षतिपूर्ति एवं ब्याज सहित यदि एक करोड़ से अधिक होता है तो उसकी शिकायत राष्ट्रीय कमीशन में की जाती है। शिकायत संबंधित व्यक्ति को भेज दी जाती हैं। उनकी दलील सुनी जाती है और फिर आदेश पारित किया जाता है। जरूरत पड़ने पर वस्तु एवं सैम्पल को लेबोरेटरी जाँच के लिये भेजा जा सकता है।

उपभोक्ता को संरक्षण प्रदान करने के लिये विभिन्न प्रकार के यंत्र उपलब्ध हैं। इसमें जिला संघ, राज्य कमीशन एवं नेशनल कमीशन प्रमुख हैं।

प्रश्न 4.
प्रबंध के मुख्य कार्य क्या हैं ?
उत्तर:
प्रबंध एक संगठित क्रियाकलाप है। इसमें अनेक निर्णय सम्मिलित हैं। यह संगठन के उद्देश्य को प्राप्त करने की एक प्रक्रिया है।
प्रबंध के विभिन्न कार्यों को पाँच भागों में बाँटा गया है-
1.नियोजन – पूर्व में ही निर्धारित. करना कि क्या करना है, कितना करना है, कैसे करना है, कब करना है और क्यों करना है। यह उद्देश्य को निर्धारित करने की एक प्रक्रिया है। यह भविष्य की अनिश्चितता को अधिक योग्य तरीके से सामना करने की तत्परता है।

2. संगठन – प्रत्येक कार्य निष्पादन की आवश्यकता है-

  • कार्य का वितरण।
  • कर्तव्य का विभाजन।
  • संसाधनों का वितरण।
  • अधिकारों का विभाजन।

यह प्रयास संगठन के उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद करता है। नियोजन के क्रियान्वयन के लिये यह आवश्यक संबंधों की संरचना है।

3. स्टाफिंग – प्रबंध का अन्य महत्वपूर्ण कार्य, सही व्यक्ति को सही काम पर लगाना है। यह मानवीय संसाधनों से संबंधित है और इसके अन्तर्गत चुनाव, नियुक्ति, स्थानान्तरण, पोस्टींग एवं प्रशिक्षण सम्मिलित है।

4. निर्देशन – यह नतृत्व की प्रक्रिया है। यह कर्मचारियों को प्रेरित एवं प्रभावित करने का तरीका है ताकि वे अधिक प्रभावी तरीके से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सके। यह कर्मचारियों से सर्वोत्तम क्षमता प्राप्त करने का एक प्रयास है।

5. नियंत्रण-इसके अन्तर्गत सम्मिलित हैं-

  • निष्पादन के प्रभाव का निर्धारण।
  • वास्तविक निष्पादन की जाँच।
  • वास्तविक प्रतिफल की तुलना पूर्व निर्धारित प्रतिफल/प्रभाव से करना।
  • विचलन को कम करने के लिये सुधारात्मक प्रयास करना।

नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार के संसाधन के दुरुपयोग को रोकना है, संगठन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये उसके उत्पादकता को बढ़ाना है।

प्रबंध के उपर्युक्त सभी कार्य एक-दूसरे से संबंधित हैं एवं एक-दूसरे पर आश्रित है क्योंकि … प्रबंध एक एकीकृत क्रियाविधि है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित का वैज्ञानिक प्रबंध में क्या संबंध है ?
(a) पद्धति अध्ययन (Method Study) (b) गति अध्ययन (Motion Study) (c) समय अध्ययन (Time Study) (d) थकान अध्ययन (Fatigue Study)।
उत्तर:
बेकर के द्वारा विकसित किये गये ये चार अध्ययन वैज्ञानिक प्रबंध के महत्वपूर्ण तकनीक है-
(a) पद्धति अध्ययन-पद्धति अध्ययन कार्य करने के उपयुक्त तरीके को ढूँढने का प्रयास – है। यह प्रक्रिया कच्चे सामग्री को प्राप्त करने से प्रारम्भ होकर तैयार माल को उपभोक्ता के हाथों पहुचाने तक चलता है। यह उत्पादन के लागत को कम करता है और संतुष्टि के स्तर को बढ़ाता है।

(b) गति अध्ययन-गति अध्ययन एक कार्य को करने में लगने वाले अनावश्यक समय को कम करता है ताकि समय और शक्ति को बचाया जा सके।

(c) समय अध्ययन-समय अध्ययन एक कार्य को करने में लगने वाले प्रमाप समय का निर्धारण करता है। कार्य को पूरा करने के लिये यह प्रमाप कार्य और संभावित समय के बीच संतुलन स्थापित करता है।

(d) थकान अध्ययन-यह कर्मचारियों के शारीरिक एवं मानसिक थकान को कम करता है। आराम का उचित समय प्रदान कर यह लोगों के कार्य करने के क्षमता का संरक्षण करता है।

जैसा कि विज्ञान अध्ययन की प्रक्रिया है, उसी प्रकार वैज्ञानिक प्रबंध के सिद्धान्त भी विभिन्न प्रकार के अध्ययन का प्रयोग है ताकि संगठन में उत्पादन के स्तर को बढ़ाया जा सके।

प्रश्न 6.
व्यवसाय के दृष्टिकोण से उपभोक्ता संरक्षण के महत्व का वर्णन करें।
उत्तर:
किसी भी आर्थिक स्वरूप में उपभोक्ता संरक्षण आवश्यक है, अन्यथा उत्पादन का सम्पूर्ण उद्देश्य ही असफल हो जायगा इसका अर्थ-

  • उपभोक्ता को अपने अधिकार और कर्त्तव्य के प्रति सचेत करना।
  • सही तरीके से उसके शिकायत को कम करना।
  • संयुक्त और एकीकृत कार्य के लिये उपभोक्ता संघ बनाना।

यह मुख्यतः उपभोक्ता शोषण के विरुद्ध लड़ाई है। व्यवसाय और उपभोक्ता दोनों के दृष्टिकोण से उपभोक्ता संरक्षण महत्वपूर्ण है।

व्यवसाय के दृष्टिकोण से उपभोक्ता संरक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं-

  • व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करना है जो ख्याति, लाभ, बाजार में हिस्सेदारी, जीवन और वृद्धि का आधार है। जबतक व्यवसायी उपभोक्ता के इच्छा और आवश्यकता को संतुष्ट करने में सफल नहीं होता तब तक उनका सहयोग प्राप्त नहीं कर सकता है।
  • दीर्घकालिन अधिकतम लाभ की प्राप्ति उपभोक्ता संतुष्टि के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि इससे विक्रय की पुनरावृत्ति होती है और ग्राहक का आधार बढ़ता है।
  • व्यवसाय समाज के द्वारा पूर्ति किये गये साधनों का प्रयोग करता है। अब इसका दायित्व है कि वे वस्तु और सेवा के द्वारा लोगों के विश्वास को प्राप्त करें और उसके शिकायत को कम करें।
  • उपभोक्ता समाज का एक महत्वपूर्ण अंश है। और व्यवसाय का यह दायित्व है कि वह इस वर्ग को प्रभावी सेवा प्रदान करें। केवल इसी माध्यम से विक्रय में विस्तार और लाभ में वृद्धि हो सकती है जिसके लिये उपभोक्ता के हितों का पर्याप्त संरक्षण आवश्यक है।
  • व्यवसाय का यह नैतिक दायित्व भी है कि वह साफ-सुथरा व्यवसाय का संचालन करें। उपभोक्ता के हितों का शोषण, मिथ्या विज्ञापन, गलत उत्पादन, अधिक मूल्य, जमाखोरी, एवं मिलावट का परित्याग करें।
  • व्यवसाय में सरकारी हस्तक्षेप को समाप्त करने के लिये, व्यावसायिक संगठन को स्वयं ही उपभोक्ता के हितों की रक्षा करनी चाहिए। तभी जाकर स्वयं व्यावसायिक इकाई के ख्याति की रक्षा हो सकती है।

उपभोक्ता संरक्षण, इसलिये समान रूप से व्यवसाय और उपभोक्ता दोनों के लिये महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 7.
पूँजी बाजार और मुद्रा बाजार में अन्तर बतावें।
उत्तर:
पूँजी बाजार और मुद्रा बाजार में अन्तर निम्नलिखित चार्ट के द्वारा दर्शाया जा सकता है-
Bihar Board 12th Business Studies Important Questions Long Answer Type Part 3, 2

प्रश्न 8.
प्रबंध के आधारभूत विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रबंध के आधारभूत विशेषतायें निम्नलिखित हैं-
1. उद्देश्य-उन्मुखी प्रक्रिया – यह संगठन के निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति के प्रयास को समूह में बाँधता है।
2. विस्तृत क्रियाकलाप – प्रत्येक जगह प्रत्येक प्रकार के संगठन के लिय यह समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
3. विभिन्न-परिमाण से संबंधित क्रियाकलाप-

  • नियोजन, निर्णय, बजट, दायित्व और अधिकार द्वारा निष्पादन प्रबंध का कार्य।
  • समूह के सदस्य की हैसियत से लोगों के आवश्यकता और आचरण के कारण निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति के लिय मानवीय संसाधनों का अभिप्रेरणा।
  • उपभोग के लिए वस्तु और सेवा का नियोजित उत्पादन का संचालनीय परिवर्तन।

4. कार्यों का समेकित नियोजन, संगठन, निर्देशन, स्टाफिंग एवं नियंत्रण की एक क्रमबद्ध प्रक्रिया।
5. व्यक्तियों का सामूहिक प्रयास जो उनके इच्छा और आवश्यकता के अनुकूल है, लेकिन एक निर्देश में कार्य करने को बाध्य होता है।
6. आशा और आवश्यकताओं के अनुकूल बदलते परिवेश में समायोजित करते हुए एक गतिशील कार्य है।
7. अभौतिक शक्तियों जो पृथक रूप से भौतिक स्वरूप में दिखाई नहीं देते हैं लेकिन संगठन की शांति, श्रम-संतुष्टि एवं नियोजित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कार्य करता है।

यह मुख्यतः उपर्युक्त आधारभूत विशेषताओं के कारण जीवंतता एवं वृद्धि की आवश्यक प्रक्रिया समझी जाती है।

प्रश्न 9.
प्रबंध में समन्वय के महत्व एवं प्रकृति क्या है ?
उत्तर:
समन्वय सामान्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न कार्यों को एक साथ जोड़ने की एक प्रक्रिया है। यह संतुलित प्रयास हैं-

  • समूह के सदस्यों को कार्यों के सही वितरण का निर्धारण।
  • यह देखना की कार्य स्वस्थ वातावरण में सम्पादित किये गये हैं।

सामान्य उद्देश्य के लिए समन्वय क्रिया की एकता है समन्वय की प्रकृति में सम्मिलित हैं-

  • समूह प्रयास का एकीकरण।
  • संगठन के उद्देश्य की प्राप्ति।
  • नियोजन और कार्यान्वयन की निरंतरता।
  • विभिन्न विभाग, कार्यदल और क्रिया के मध्य मधुर संबंध।
  • संगठन के प्रत्येक स्तर पर दायित्व।
  • कर्मचारियों की संतुष्टि के लिए सहयोगी क्रिया का संचालन।

समन्वय का महत्व इसके विभिन्न विभागों एवं व्यक्तियों के प्रयासों को जोड़ने के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जो एक-दूसरे पर पूर्णतः आश्रित हैं। यह समामेलन का एक आवश्यक दृष्टिकोण है, प्रबंध की सफलता में समन्वय का योगदान मुख्यतः तीन क्षेत्रों में है-

  • व्यक्तिगत एवं संगठन के उद्देश्य के लिए उच्चतम कार्य क्षमता का समायोजन।
  • संचालन, उद्देश्य एवं नीति से संबंधित विभागीय, क्षेत्रीय (Divisional) विवाद को कम करना।
  • स्वतंत्र व्यक्ति के द्वारा विशेषज्ञों के विचार, हित या दृष्टिकोण में मतभेद का समामेलन।

मधुर संबंध को स्थापित करने, समूह प्रयास को प्रेरित करने, संगठन के उद्देश्य की रक्षा करने, संचालनीय कार्य क्षमता प्राप्त करने, विवाद को कम करने, विभिन्न दृष्टिकोणों को समामेलित करने के कारण ही समन्वय, प्रबंध का मूल तत्व समझा जाता है।

प्रश्न 10.
संवर्धन मिश्रण के तत्व के रूप में विक्रय संवर्धन की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
उच्च प्रतिस्पर्धी बाजार में विक्रय संवर्धन एक महत्वपूर्ण क्रियाकलाप हैं। विक्रय संवर्धन ग्राहकों के क्रय निर्णय का प्रोत्साहन या प्रलोभन है, यह ग्राहकों से तुरन्त वस्तु एवं सेवा को क्रय करवाने का एक प्रयास है और इस तरह अपना विक्रयं बढ़ाना है। विक्रय संवर्धन के लिये नगद कटौती, विक्रय प्रतियोगिता, मुफ्त पारितोषिक, मुफ्त सैम्पल आदि पद्धति प्रयोग की जाती है, यह पद्धति अल्पकालीन विक्रय वृद्धि के लिये प्रयोग की जाती है, विक्रय संवर्धन तीन मुख्य योगदान के कारण विपणन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

  • मूल्य आकर्षण – प्रलोभन के प्रयोग के द्वारा विक्रय संवर्धन लोगों को वस्तु एवं सेवा के प्रति ध्यान आकर्षित करता है।
  • मूल्य उपयोगिता – जब नये उत्पाद बाजार में आते हैं तो विक्रय संवंर्धन ग्राहकों को पुराने उत्पाद के बदले नये उत्पाद खरीदने को बाध्य करते हैं ताकि उनके इच्छा और आवश्यकता को संतुष्ट किया जा सके।
  • मिश्रण-मूल्य – विक्रय संवर्धन, व्यक्तिगत विक्रय एवं विज्ञापन की सहायता से सम्पूर्ण विक्रय पद्धति को प्रभावित करता है। विक्रय संवर्द्धन, इसलिए, एक संगठन में संवर्द्धन मिश्रण के तत्व के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

प्रश्न 11.
वित्तीय प्रबंध को परिभाषित करें एवं इसके उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
वित्तीय प्रबंध का संबंध व्यवसाय की वित्त व्यवस्थाओं से है जो उसके कुशल संचालक एवं उद्देश्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त करने के लिए की जाती है। वित्तीय प्रबंध निम्न दो शब्दों का समूह है-‘वित्तीय’ और ‘प्रबंध’। वित्तीय का आशय वित्त संबंधी है और प्रबंध का आशय किसी कार्य की कुशल व्यवस्था करने से है। यह कहा जा सकता है कि वित्त व्यवसाय का जीवन रक्त है। किसी व्यवसाय की स्थापना उसके लिए आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था करने जैसे- भूमि, भवन, कच्चा-माल, प्लाण्ट, मशीनरी, फर्नीचर आदि सामान्य व्ययों का भुगतान करने तथा उसके संवर्धन के लिए पर्याप्त वित्त की आवश्यकता होती है। यह कार्य वित्तीय प्रबंध द्वारा संपन्न होता है।

वित्तीय प्रबंध के उद्देश्य (Objectives of Financial Management) – वित्तीय प्रबंध का मूल उद्देश्य व्यवसाय के स्वामियों का अधिकतम हित करना है। इसके उद्देश्यों को हम निम्न शीर्षक से स्पष्ट कर सकते हैं।
1. लाभों को अधिकतम करना- इस उद्देश्य के अनुसार लाभ अर्जित करना प्रत्येक व्यवसाय का प्राथमिक उद्देश्य है। क्योंकि अधिकतम लाभ करके ही व्यवसाय के स्वामियों का अधिकतम हित किया जा सकता है।

2. संपदा को अधिकतम करना- वित्तीय प्रबंध का मुख्य उद्देश्य व्यवसाय के अंशधारियों अथवा स्वामियों की संपदा को अधिकतम करना है। इसके लिए आवश्यक है कि अंश बाजार में उनके अंशों के मूल्य में वृद्धि हो। उनके अंशों के मूल्य में जितनी अधिक वृद्धि होगी अंशधारियों की संपदा में उतनी ही अधिक वृद्धि होगी।

3. अन्य उद्देश्य- उपर्युक्त दोनों उद्देश्यों के अलावे वित्तीय प्रबंध के निम्न उद्देश्य भी होते हैं-

  • न्यूनतम लागत पर पर्याप्त कोषों को प्राप्त करना एवं उनकी नियमित पूर्ति बनाये रखना है।
  • कोषों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • कोषों का अनुकूलतम उपयोग।
  • वित्तीय नियंत्रण।
  • पर्याप्त प्रत्याय सुनिश्चित करना।

प्रश्न 12.
विपणन मिश्रण से आप क्या समझते हैं। इसके तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विपणन मिश्रण का अभिप्राय विभिनन विपणन क्रियाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए बनाई गई नीतियों के योग से है। जैसे-उत्पाद की किस्म के संबंध में कंपनी की नीति हो सकती है कि तीन किस्म का माल तैयार किया जाएगा। उत्तम किस्म, मध्यम किस्म एवं निम्न किस्म इस नीति का उद्देश्य सभी प्रकार के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करना हो सकता है।

विपणन मिश्रण के तत्व निम्नलिखित है-
(i) उत्पादन मिश्रण – उत्पादन मिश्रण का अभिप्राय उत्पाद के संबंध में लिए जाने वाले निर्णयों के योग से है। ये निर्णय मुख्यतः नामकरण, पैकेजिंग, लेवलिंग, रंग, डिजाइन, प्रकार, आकार, विक्रय के बाद सेवा, वस्तु के भार आदि के संबंध में होते हैं, ये निर्णय ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

(ii) मल्य मिश्रण – मूल्य मिश्रण का अर्थ उन सभी निर्णयों से है जो किसी वस्तु अथवा सेवा के मूल्य निर्धारण से संबंधित होते हैं। मूल्य मिश्रण के अंतर्गत वस्तु अथवा सेवा का मूल्य निर्धारण के अतिरिक्त उधार विक्रय, छूट आदि से संबंधित निर्णय भी सम्मिलित होते हैं।

(iii) संवर्द्धन मिश्रण – संवर्द्धन मिश्रण का अभिप्राय व्यवसाय द्वारा उपभोक्ताओं को उत्पाद के बारे में सूचित करने एवं प्रेरित करने के लिए अपनाई जानेवाली विधियों के योग से है। यह कार्य कंपनी विज्ञापन व्यक्तिगत विक्रय, विक्रय-संवर्द्धन एवं प्रचार विधियों के माध्यम से करती है।

(iv) स्थान मिश्रण – स्थान मिश्रण का अभिप्राय उन सभी निर्णयों के योग से है जो उत्पाद को उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध करवाने हेतु लिए जाते हैं। यदि उत्पाद ठीक समय पर, ठीक मात्रा में व ठीक स्थान पर उपलब्ध न हो तो उपभोक्ता उसे क्रय नहीं कर पाएँगे। अतः विपणन क्रियाओं को सार्थक बनाने के लिए स्थान मिश्रण अति आवश्यक है।

प्रश्न 13.
“विज्ञापन पर किया गया व्यय बर्बादी है।” क्या आप इस बात से सहमत हैं ? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए।
उत्तर:
विज्ञापन पर किया गया व्यय बर्बादी है। हम इस कथन से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं।

विज्ञापन पर किया गया व्यय बर्बादी नहीं, बल्कि विनियोग है। यह निम्नलिखित विचार-बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट हो जाता है-

गलाकाट प्रतियोगिता के युग में आज विज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। विज्ञापन उपभोक्ताओं को प्रभावित करके उत्पाद (Product) या सेवा का विक्रय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। इससे बड़े पैमाने के उत्पादन की मितव्ययताएँ प्राप्त होती हैं। उपभोक्ताओं को सस्ती एवं प्रमाणित वस्तु प्राप्त होती है। इस प्रकार विज्ञापन वस्तु की माँग उत्पन्न करता है। इसी कारण यह कथन सत्य है कि, “विज्ञापन पर किया गया व्यय विनियोग होता है, व्यय नहीं।” कुछ विद्वानों ने कहा कि विज्ञापन से केवल उत्पादन लाभान्वित होते हैं। उनका यह विचार सत्य नहीं है क्योंकि विज्ञापन से थोक व्यापारी, फुटकर व्यापारी, उपभोक्ता तथा समाज सभी लोग को लाभ होता है, विज्ञापन इनके लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उत्पादक के लिए विज्ञापन से इन सभी को होने वाले लाभों का वर्णन निम्नलिखित है-

I. उत्पादकों को लाभ (Advantages of Producers)-

  • नवनिर्मित वस्तुओं की मांग में वृद्धि करना – निर्माता अपनी नई वस्तुओं का विज्ञापन करके अपनी वस्तु की माँग उत्पन्न कर सकते हैं।
  • वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि – विज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य वस्तु की माँग में वृद्धि करना है। विज्ञापन के द्वारा वस्तु के नए ग्राहक बनते हैं। परिणामस्वरूप बिक्री बढ़ती है।
  • माँग में स्थायित्व (Stability in Demand) – विज्ञापन वस्तुओं की मौसमी माँग के परिवर्तन को न्यूनतम करके पूरे वर्ष माँग को बनाए रखता है जैसे-बिजली के पंखे गर्मियों में तो बिकते ही हैं, लेकिन सर्दियों में भी पंखों की मांग भारी छूट के विज्ञापन के कारण बनी रहती है।
  • शीघ्र बिक्री तथा कम स्टॉक – विज्ञापन से बाजार में वस्तु की माँग होती है और वस्तु की बिक्री में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप वस्तु का स्टॉक अधिक समय के लिए नहीं रखना पड़ता।
  • प्रतिस्पर्धा का अंत – विज्ञापन के माध्यम से वस्तु की माँग बाजार में स्थायी बनायी जा सकती है। यदि कोई हमारी वस्तु का प्रतिस्पर्धा है भी तो उसकी दाल नहीं गलेगी क्योंकि हम अपनी वस्तु की उपयोगिता को विज्ञापन के द्वारा ग्राहकों को समझा सकते हैं।
  • कम लागत – बड़े पैमाने पर उत्पादन करके उत्पादन लागत और वितरण लागत दोनों में कमी की जा सकती है, क्योंकि विज्ञापन से माँग में वृद्धि होती है और बढ़ी हुई माँग की पूर्ति बड़े पैमाने के उत्पादन से ही संभव है।
  • संस्था की ख्याति में वृद्धि – विज्ञापन से संस्था तथा उसके द्वारा उत्पादित वस्तु लोकप्रिय हो जाती है। यही नहीं, ऐसी संस्था अपने सहायक उत्पादन को बेचने में भी सफल हो जाती है।
  • कर्मचारियों को प्रेरणा – विज्ञापन से जब वस्तु की माँग में वृद्धि होती है तो संस्था में काम करने वाले कर्मचारियों में भी गर्व की भावना आती है।
  • उपभोक्ताओं के समय से बचत – विज्ञापन की सहायता से कम समय में उचित मूल्य पर सही वस्तु उपभोक्ता को मिल जाती है।

II. मध्यस्थों को लाभ (Advantages of Middlemen)-

  • समाचार-पत्रों की आर्थिक सहायता-समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं को भारी विज्ञापन कराने से बहुत अधिक आय होती होती है, परिणामस्वरूप कम लागत पर पत्र-पत्रिकाएँ जनता को मिल जाती हैं। समाचार-पत्रों की कुल आय के भाग में से 75% आय का भाग विज्ञापनों से मिलता है।
  • विक्रेताओं की सहायता करता है-विज्ञापन वस्तु की माँग का सृजन (Create) करता है यानी विक्रेताओं द्वारा प्रस्तुत की गई अधिक बिक्री के लिए बिक्री की पृष्ठभूमि बनाता है।
  • अच्छे मध्यस्थों की प्राप्ति-विज्ञापन के द्वारा अच्छे मध्यस्थों और कर्मचारियों को प्राप्त किया जा सकता है।
  • उत्पादकों से सम्पर्क-विज्ञापन के द्वारा मध्यस्थ और उत्पादकों के बीच सम्पर्क होता है। इस प्रकार विज्ञापन एक कड़ी का काम उत्पादक और मध्यस्थ के बीच करता है।

III. उपभोक्ताओं का लाभ (Advantages of Consumers)-

  • नव-निर्मित वस्तुओं की जानकारी-विज्ञापन के माध्यम से उपभोक्ताओं को नई-नई वस्तुओं के बारे में जानकारी मिलती है। जैसे- Vespa XE – 170, कोन्टेसा कार आदि।
  • क्रय में सुगमता- विज्ञापन के द्वारा वस्तु के संबंध में उपभोक्ता को पहले से ही सम्पूर्ण ज्ञान होता है। इससे उसको वस्तु खरीदने में सुगमता हो जाती है।
  • अच्छी किस्म की वस्तुओं की प्राप्ति- विज्ञापन से वस्तुओं के प्रति जनता का विश्वास जम जाता. है। इसलिए उत्पादक जनता के उस विश्वास को समाप्त नहीं करना चाहता है और अच्छी किस्म की वस्तओं ही बाजार में देता है।
  • ज्ञान में वृद्धि- विज्ञापन ग्राहकों को नित नई वस्तुओं के उपयोग के विषय में जानकारी देता है जिससे उपभोक्ताओं के ज्ञान में वृद्धि होती है।

IV. समाज को लाभ (Advantages to Society)-

  • आजीविका का साधन- विज्ञापन के धन्धे में असंख्य व्यक्ति लगे हुए हैं जोकि इस धन्धे से रोजी पाते हैं।
  • आशावादी समाज का निर्माण- विज्ञापन समाज के प्रगतिशील व्यक्तियों को काम में । लगाए रहने की प्रेरणा देता रहता है क्योंकि विज्ञापित वस्तु को खरीदने के लिए अधिक धन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 14.
प्रबन्ध के सिद्धान्तों की आवश्यकता तथा महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध के समस्त सिद्धान्त लोचपूर्ण हैं न कि अकाट्य एवं स्थिर। इन सिद्धान्तों का प्रयोग करते समय प्रबन्धकों को बदलती हुई परिस्थितियों एवं दशाओं पर समुचित ध्यान देना चाहिए और उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ही प्रयोग करना चाहिए। जिस प्रकार प्रबन्धकीय सिद्धान्तों की उपेक्षा कर्त्तव्य के समुचित सम्पादन में बाधक बनती है उसी प्रकार इनका अविवेकपूर्ण प्रयोग हानिप्रद सिद्ध होता है। प्रबन्ध के सिद्धान्तों के लोचपूर्ण होने का आशय यह भी है कि सिद्धान्तों की कोई अन्तिम सूची नहीं है। प्रबन्धशास्त्र का विज्ञान के रूप में विकास अल्पकालीन है यथा इसके सिद्धान्त अभी परिवर्तन की स्थिति में हैं न कि परिपक्वता की स्थिति में। यह विकास दिन पर दिन अधिक व्यापक होता जा रहा है। पुराने सिद्धान्त अनुभव की कसौटी पर कसे जा रहे हैं और नये-नये सिद्धान्तों का विकास हो रहा है। ये सिद्धान्त अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं और प्रबन्धकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होंगे जैसा कि निम्न तथ्यों से स्पष्ट है-

जार्ज टैरी के शब्दों में, “एक प्रबन्धक के लिए प्रबन्ध के सिद्धान्तों का उतना ही महत्व है जितना कि सिविल इन्जीनियर के लिए स्ट्रेन्थ सारणी का।”

1. प्रबन्धकों को उपयोगी ज्ञान उपलब्ध कराना (Provides Useful Insights to Managers)- प्रबन्धकीय सिद्धान्त प्रबन्धकों के लिए दिशा निर्देश के रूप में कार्य करते हैं। ये सिद्धान्त विभिन्न प्रबन्धकीय स्थितियों के अन्तर्गत प्रबन्धकों के ज्ञान, योग्यता.एवं समझ को बढ़ाते हैं। इन सिद्धान्तों के परिणाम प्रबन्धकों को उनकी गलतियों से सीखने में सहायता करते हैं तथा प्रबन्धकों को सही समय पर सही निर्णय लेने में अपना मार्ग दर्शन देते हैं।

2. संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग तथा प्रभावी प्रशासन (Optimum Utilisation of Resources and Effective Administration)- प्रत्येक संगठन में भौतिक व मानवीय संसाधनों का प्रयोग होता है। प्रबन्ध का काम कुछ और नहीं वरन् संसाधनों के अपव्यय को रोकना एवं इनका अनुकूलतम उपयोग (Optimum Use) करना है। ऐसा तभी सम्भव है जब एक प्रबन्धक प्रबन्ध के सिद्धान्तों को व्यवहार में लाये। उदाहरण के लिए आदेश की एकता (Unity of Command), श्रम का विभाजन (Division of Labour), अधिकार एवं उत्तरदायित्व (Authority and Responsibility), सोपान श्रृंखला (Scalar Chain) इत्यादि सिद्धान्तों का यदि पालन किया जायेगा तो कम-से-कम लागत पर अधिकतम लाभ प्राप्त हो सकेगा। सिद्धान्तों की सहायता से प्रबन्धक अपने निर्णयों एवं कार्यों में कारण एवं परिणाम के सम्बन्ध का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। प्रभावी प्रशासन के लिये प्रबधकीय व्यवहार आवश्यक है ताकि प्रबन्धकीय अधिकारों का सुविधानुसार उपयोग किया जा सके।

3. वैज्ञानिक निर्णय (Scientific Decisions)-निर्णय, निर्धारित उद्देश्यों के रूप में विचारणीय एवं न्यायोचित तथ्यों पर आधारित होने चाहिए। वे समयानुकूल (Timely), वास्तविक एवं मापन तथा मूल्यांकन (Measurement and Evaluation) के योग्य होने चाहिए। प्रबन्ध के सिद्धान्त विचारपूर्ण निर्णय लेने में सहायक होने चाहिए। वे आँख मूंद कर विश्वास करने पर नहीं वरन् तर्क . (Logic) पर आधारित होने चाहिए। प्रबन्ध के जिन निर्णयों को सिद्धान्तों के आधार पर लिया जाता है, वह व्यक्तिगत द्वेष भावना एवं पक्षपात से मुक्त होने चाहिए। वे परिस्थिति के तर्कसंगत मूल्यांकन पर आधारित होने चाहिए।

4. बदलती पर्यावरण की आवश्यकताओं को पूरा करना (Meeting Changing Environmental Requirement)- सिद्धान्त यद्यपि सामान्य दिशा निर्देश प्रकृति के होते हैं, तथापि इनमें परिवर्तन होता रहता है, जिससे यह प्रबन्धकों की पर्यावरण पर बदलती आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होते हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्त लोचपूर्ण होते हैं, जो गतिशील व्यावसायिक पर्यावरण के अनुरूप ढाले जा सकते हैं। उदाहरण के लिये प्रबन्ध के सिद्धान्त श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण को बढ़ावा देते हैं। आधुनिक समय में यह सिद्धान्त सभी प्रकार के व्यवसायों पर लागू होते हैं।

5. सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करना (Fulfilling Social Responsibility)- प्रबन्ध के सिद्धान्त, प्रबन्धों की कार्य-कुशलता में वृद्धि करके उनके सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने में सहायता प्रदान करते हैं। अधिक कुशल प्रबन्धक अच्छी किस्म की वस्तुयें, उचित मूल्य पर हर समय उपलब्ध करा सकते हैं। उदाहरण के लिए, उचित पारिश्रमिक का सिद्धान्त (Principle of Fair Remuneration), कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक देने की वकालत करके प्रबन्ध के कर्मचारियों के प्रति उत्तरदायित्व को पूरा करने में सहायता करता है।

6. प्रबन्ध प्रशिक्षण, शिक्षण एवं शोध (Management Training Education and Research)- प्रबन्ध के सिद्धान्त प्रबन्धकों के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान में वृद्धि करके उन्हें शिक्षण एवं प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहे हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्त वैज्ञानिक निर्णय और तर्क सम्बन्धी सोच पर जोर देते हैं। परिणामस्वरूप ये सिद्धान्त प्रबन्धकीय अध्ययन में अनुसन्धान और विकास करने के लिए आधार के रूप में कार्य करते हैं। ये सिद्धान्त अनुसन्धान कार्य करने के लिए व्यवस्थित ज्ञान-निकाय एवं अधिक-से-अधिक ज्ञान का सजन करने के लिए नये विचार. कल्पना और अनुसन्धान एवं विकास के लिये आधार प्रदान करते हैं। प्रबन्ध के सिद्धान्तों के फलस्वरूप प्रबन्धकों के दृष्टिकोण में आए परिवर्तन का लाभ उठाने के लिए अनेक बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने शोध एवं विकास (Research and Development) विभाग स्थापित किये हैं।

प्रश्न 15.
फेयोल द्वारा प्रतिपादित सामान्य प्रबन्ध के सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रांस के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री हेनरी फेयोल (Henry Fayol) प्रबन्ध के क्षेत्र में क्रियात्मक दृष्टिकोण के प्रतिपादक थे। उनकी मान्यता थी कि औद्योगिक संस्थाओं के प्रबन्धों को प्रबन्ध के कुछ आधारभूत सिद्धान्तों का ज्ञान होना आवश्यक है। उन्होंने अनुभव किया कि बिना सिद्धान्तों के प्रबन्ध का अध्ययन सम्भव नहीं। फेयोल ने अपनी पुस्तक ‘सामान्य एवं औद्योगिक प्रबन्ध’ में प्रबन्ध के 14 सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया था जो निम्न हैं-

1. कार्य विभाजन (Division of Work)- यह विशिष्टीकरण का सिद्धान्त है। फेयोल कार्य-कुशलता के लिए विशिष्टीकरण को आवश्यक मानते हैं। इसके अनुसार कार्य विभाजन का नियम केवल कार्यशाला स्तर (Workshop Level) पर ही लागू करना पर्याप्त नहीं अपितु इसे सभी कार्यों चाहे वे प्रबन्ध सम्बन्धी हों अथवा तकनीकी पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

2. अधिकार और उत्तरदायित्व (Authority and Responsibility)- अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं। मैनेजर का अधिकार व्यक्तिगत रूप से और अधिकारी के रूप में और हो सकता है। बिना अधिकार के उत्तरदायित्व व्यक्ति को प्रभावहीन बना देते हैं, ठीक इसी प्रकार बिना उत्तरदायित्व के अधिकार उचित नहीं है। फेयोल के शब्दों में, “अधिकारों का परिणाम ही उत्तरदायित्व है। यह अधिकार का स्वाभाविक परिणाम और आवश्यक रूप से अधिकार का ही दूसरा पहलू है तथा जब भी अधिकारों का प्रयोग किया जाता है, उत्तरदायित्व का जन्म स्वतः ही हो जाता है।”

3. अनशासन (Discipline)- प्रबन्ध की सफलता के लिए संगठन में अनुशासन बनाये रखना नितान्त जरूरी होता है। अनुशासन से जहाँ हमारा अभिप्राय नियमों के प्रति आस्था व उनके पालन से है। किसी भी संस्था या संगठन में अनुशासन बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि वहाँ उच्चकोटि के निरीक्षक नियुक्त किये जाएँ। आदेशों या नियमों का उल्लंघन करने वालों को उचित दण्ड की व्यवस्था हो।

4. आदेश की एकात्मकता (Unity of Command)- कर्मचारी को एक ही अधिकारी से आदेश मिलने चाहिए यदि एक से अधिक अधिकारियों से आदेश मिलेंगे तो उनका ठीक से पालन नहीं हो सकेगा। फेयोल के अनुसार, “किसी संगठन में कर्मचारियों के कुशलतापूर्वक कार्यों के लिये आदेश की एकता का होना जरूरी है।” अन्य शब्दों में, प्रत्येक कर्मचारी का केवल एक ही अधिकारी होना चाहिए, अन्यथा अधिकार तथा आदेशों में घपला तथा मतभेद (Conflict and Confusion) उत्पन्न हो जाएगा।

5. निर्देश की एकात्मकता (Unity of Direction)- किसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये की जाने वाली सभी क्रियाओं का संचालन एवं निर्देशन एक ही व्यक्ति के द्वारा किया जाना चाहिए तथा उन सबके लिए एक ही योजना बनायी जानी चाहिए। एक समूह के लिए एक ही अधिकारी होना चाहिए। फेयोल के अनुसार, “निर्देश की एकात्मकता से अभिप्राय व्यक्तियों के समूह को, जिसका उद्देश्य एक समान हो, एक ही मस्तिष्क से एक ही योजना का निर्माण करना है।”

6.सामूहिक हितों के लिए व्यक्तिगत हितों का समर्पण (Sub-ordination of Individual Interest to General Interest)- संस्था के हितों के लिये व्यक्तिगत हितों का समर्पण संस्था के हित में होता है। प्रबन्धक को यथासम्भव सामान्य हित एवं व्यक्तिगत हित में समन्वय (Coordination) स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। यदि किसी समय दोनों हितों में संघर्ष उत्पन्न हो जाये तो सामान्य हित के लिए व्यक्तिगत हित की बलि चढ़ा देनी चाहिए।

7.कर्मचारियों का पारिश्रमिक (Remuneration of Personnel)- प्रबन्धक का यह एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है कि कर्मचारियों को उनके द्वारा किये गये कार्य के लिए उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। यदि कर्मचारियों को वेतन के सम्बन्ध में सन्तोष होगा तो उत्पादकता बढ़ेगी। लाभ में हिस्सा (Share in Profit), श्रम-कल्याण योजनायें (Labour Welfare Schemes) तथा अन्य प्रेरणादायक योजनाओं (Incentives) को लागू करना चाहिए।

8. केन्द्रीयकरण व विकेन्द्रीयकरण (Centralisation and Decentralisation)- यद्यपि फेयोल (Fayol) ने अधिकारों के केन्द्रीयकरण शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया, तथापि केन्द्रीयकरण का सिद्धान्त किसी संस्था में अधिकारों के केन्द्रीयकरण अथवा विकेन्द्रीयकरण की मात्रा की ओर इंगित करता है। उद्देश्य सही हो तो साधनों का उचित व सही प्रयोग हो सकता है। संस्था के प्रबन्ध में किस सीमा तक अधिकारों का केन्द्रीयकरण (Centralisation) अथवा विकेन्द्रीयकरण (Decentralisation) होना चाहिए, यह संस्था की निजी परिस्थितियों, कार्य की प्रकृति आदि पर निर्भर होता है। पूर्ण केन्द्रीयकरण अथवा पूर्ण विकेन्द्रीकरण कभी भी सम्भव नहीं होता।

9. सोपान शृंखला (Scalar Chain)- उच्चाधिकारियों से अधिकार नीचे की तरफ जाना चाहिए। प्रत्येक सम्वाद को एक निश्चित रास्ते से गुजरना चाहिए। अधीनस्थों को भी अपने विवेक से कार्य करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इस सिद्धान्त के अनुसार, अधिकारों एवं सन्देशवाहन की एक सोपानिक श्रृंखला होती है जो उच्चतम अधिकारी से निम्न स्तर के अधीनस्थ तक सीधी रेखा में चलती है। इस शृंखला अथवा अधिकारों की रेखा (Line of Authority) के अन्तर्गत प्रत्येक सन्देशवाहन ऊपर से नीचे वे नीचे से ऊपर एक निर्धारित व्यवस्था के अनुसार चलता है। उदाहरणार्थ, यदि एक अधिकार रेखा में A, B, C, D, E, पाँच व्यक्ति हैं और सन्देश A से E को पहुँचाना है तो यह सन्देश पहले A से B को, B से C को, C से D को तथा अन्त में D से E को पहुँचाया जाएगा। ध्यान रहे किसी भी पद या सीढ़ी के बीच में अनदेखा नहीं किया जाएगा। फेयोल ने सोपान शृंखला के सिद्धान्त को निम्न दोहरी सीढ़ी द्वारा स्पष्ट किया है-
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10. व्यवस्था का सिद्धान्त (Principle of Order)- हर चीज के लिए उपयुक्त स्थान का चुनाव होना चाहिए। जगह साफ-सुथरी होनी चाहिए जो जितना जिम्मेदार अधिकारी होगा जगह उतनी ही साफ-सुथरी होगी। हर कर्मचारी के लिए एक निश्चित स्थान हो। सही आदमी सही जगह पर हो। उचित व्यक्ति का चुनाव किया जाना चाहिए, जितनी आवश्यकता हो उतने ही कर्मचारियों का चुनाव किया जाना चाहिए। फेयोल के शब्दों में, प्रत्येक उपक्रम में दो अलग-अलग व्यवस्थाएँ होनी चाहिए। जैसे-भौतिक साधनों के लिए भौतिक व्यवस्था तथा मानवीय साधनों के लिए सामाजिक व्यवस्था। भौतिक साधनों की व्यवस्थित करने का अर्थ है कि हर वस्तु के लिए एक उचित स्थान होना चाहिए एवं हर वस्तु अपने उचित स्थान पर ही होनी चाहिए।

इसी प्रकार मानवीय साधनों को व्यवस्थित करने का अर्थ है कि हर व्यक्ति के लिए एक स्थान होना चाहिए एवं हर व्यक्ति अपने निश्चित स्थान पर ही होना चाहिए। फेयोल के शब्दों में, प्रत्येक उपक्रम में दो अलग-अलग व्यवस्थायें होनी चाहिए। जैसे-भौतिक साधनों के लिए भौतिक व्यवस्था तथा मानवीय साधनों के लिए सामाजिक व्यवस्था। भौतिक साधनों को व्यवस्थित करने का अर्थ है कि हर वस्तु के लिए एक उचित स्थान होना चाहिए एवं हर वस्तु अपने उचित स्थान पर ही होनी चाहिए। इसी प्रकार मानवीय साधनों को व्यवस्थित करने का अर्थ है कि हर व्यक्ति के लिए एक स्थान होना चाहिए एवं हर व्यक्ति अपने निश्चित स्थान पर होना चाहिए।

11.समता का सिद्धान्त (Principle of Equity)- कर्मचारियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। कर्मचारियों की निष्ठा एवं स्वाभाविकता खरीदी नहीं जा सकती यह तो उनके साथ समान एवं न्यायोचित व्यवहार के द्वारा सम्भव है। उसे समस्त कर्मचारियों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। व्यवसाय के लिए पक्षपात अत्यधिक हानिकारक होता है। अधिकारियों को व्यवहार में आवश्यकता से अधिक कठोर नहीं होना चाहिए। कूण्टज एवं ओ’ डौनेल के अनुसार, “प्रबन्धक न्याय एवं दया द्वारा कर्मचारियों के साथ व्यवहार करके उनकी वफ. पी और स्नेह प्राप्त कर सकता है।”

12. कर्मचारियों के कार्यकाल में स्थायित्व (Stability of Tenure of Personel)- कर्मचारियों को कार्य समझने के लिए समय दिया जाना चाहिए। उनके कार्यकाल में स्थायित्व होना अपेक्षित होता है। कर्मचारियों को बार-बार बदलना ठीक नहीं। एक साधारण कर्मचारी बार-बार आने-जाने वाले कुशल कर्मचारी से अच्छा है। फेयोल ने इस बात पर अधिक बल दिया कि जहाँ तक सम्भव हो सके कर्मचारियों के कार्यकाल में स्थायित्व होना चाहिए जिससे वे निश्चित होकर तत्परतापूर्वक कार्य कर सकें।

13. पहल करने की क्षमता (Principle of Initiative)- फेयोल ने इस सिद्धान्त के प्रतिपादन द्वारा प्रबन्धकों से अनुरोध किया है कि वे अपने झूठे आत्म-सम्मान की भावना को त्याग दें तथा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को काम करने की पहल करने दें। इससे व्यापार की शक्ति बढ़ती है। प्रबन्धकों को चाहिए कि वे कर्मचारियों को अधिक से अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराएँ जिससे कर्मचारियों का हौसला बढ़ सके और प्रबन्धकों का काम भी आसान हो सके।

14. सहयोग की भावना (Esprit Decorps)- काम में जुट जाने की भावना का होना आवश्यक है। अपने व्यवसाय की इज्जत के लिए कार्य करना चाहिए। फेयोल ने मिलकर कार्य करने पर बहुत जोर दिया है। अतएव जब तक कर्मचारी मिलकर एक टोली के रूप में कार्य नहीं करेंगे तब तक सफलता संदिग्ध बनी रहेगी। फेयोल ने सहयोग की भावना के दो शत्रुओं के विरुद्ध सावधान रहने के लिए कहा है (i) फूट डालो और राज्य करो (Divide and Rule) और (ii) लिखित सम्प्रेषण का दुरुपयोग (Misuse of Written Communication)। फर्म के लिए अपने कर्मचारियों में फूट डालना खतरनाक होता है। बल्कि उन्हें एक सम्बद्ध और अत्यन्त अंतः क्रियाशील कार्य-समूह के रूप में जोड़ देना चाहिए। लिखित सम्प्रेषण पर अधिक भरोसा करने से भी दलगत भावना विछिन्न हो जाती है। लिखित सम्प्रेषण जहाँ जरूरी है, के साथ-साथ मौखिक सम्प्रेषण भी सदैव होना चाहिए, आमने-सामने के सम्बन्ध से उन्नति, स्पष्टता और समरसता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 16.
वैज्ञानिक प्रबन्ध की परिभाषाएँ दीजिए एवं इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एफ० डब्ल्यू० टेलर (F. W. Taylor), जो वैज्ञानिक प्रबन्ध के जन्मदाता माने जाते हैं .और कुछ विद्वान वैज्ञानिक प्रबन्ध को टेलरवाद (Taylorism) की संज्ञा देते हैं, अर्थात् वैज्ञानिक प्रबन्ध ही टेलरवाद है, ने अपने परीक्षणों (Tests) एवं प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि यदि श्रमिकों से पूर्व योजना के अनुसार काम लिया जाए, उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाए, काम करने की विधि में सुधार किया जाए, उन्हें हल्के और आधुनिक उपकरण (Tools) दिए जाए तो उनकी कार्यक्षमता पहले से काफी बढ़ जाएगी। इस प्रकार टेलर के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप श्रमिकों से क्या काम करवाना चाहते हैं और फिर यह देखना कि वे उसको सर्वोत्तम तरीके से व मितव्ययिता के साथ पूरा करें।”

वैज्ञानिक प्रबन्ध के अर्थ को और अधिक स्पष्ट करते हुए टेलर किसी दूसरे स्थान पर लिखते हैं: “वैज्ञानिक प्रबन्ध, अपने मूल रूप में, एक ऐसा दर्शन है जो प्रबन्ध के चार निहित सिद्धांतों के संयोग का परिणाम है: प्रथम, एक यथार्थ विज्ञान का विकास; द्वितीय, श्रमिक का वैज्ञानिक रीति से चुनाव; तृतीय, उसका वैज्ञानिक प्रशिक्षण तथा विकास; चतुर्थ, प्रबन्ध और कर्मचारियों के बीच निकटतम मैत्रीपूर्ण सहयोग।” सरल शब्दों में वैज्ञानिक प्रबन्ध का अर्थ प्रबन्ध कार्य में रूढ़िवादी पद्धति (Rule of Thumb Method) भूल सुधार प्रणाली (Irial and Error Method) के स्थान पर तर्क संगत व्यवहार करना।

अन्य परिभाषाएँ (Other Definitions)-
1. पीटर एफ० डुकर के शब्दों में, “वैज्ञानिक प्रबन्ध कार्य का संगठित अध्ययन कार्य का अनेक तत्त्वों में विश्लेषण तथा श्रमिक द्वारा किए गए प्रत्येक तत्व (कार्य) में क्रमबद्ध सुधार करना है।”

2. डाइमर के शब्दों में, “वैज्ञानिक प्रबन्ध से आशय प्रबन्ध के क्षेत्र में दशाओं, पद्धतियों, विधियों, सम्बन्धों एवं परिणामों से सम्बन्धित ज्ञान को प्राप्त कर एवं व्यवस्थित कर उपयोग के लिए उनको एक संगठित सिद्धान्त के रूप से विकसित करना है।”

3. एच० एफ० परसन के शब्दों में वैज्ञानिक प्रबन्ध संगठन और पद्धति के उद्देश्यपूर्ण सामूहिक प्रयासों तथा मूल की प्रक्रिया से निश्चित की गई परम्परागत नीतियों की अपेक्षा अन्वेषण तथा विश्लेषण की वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा निश्चित किए गए सिद्धांतों और नियमों पर आश्रित रहता है।”

4. लारेन्स ए० एप्पल के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध दिन प्रतिदिन के अंगूठे के नियम या तीर नहीं तो तुक्का ही सही की धारणा की अपेक्षा प्रबन्ध के उत्तरदायित्वों के निष्पादन की एक चेतनापूर्ण व व्यवस्थित मानवीय धारणा है।”

वैज्ञानिक प्रबन्ध के मुख्य लक्षण अथवा विशेषताएँ- उपरोक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वैज्ञानिक प्रबन्ध के निम्न मुख्य लक्षण (Features) हैं-

  • एक निश्चित योजना (A Definite Plan)- निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक प्रबन्ध के अन्तर्गत प्रबन्धकों को एक निश्चित योजना बनानी पड़ती है तथा उसी के अनुसार कार्य करना होता है।
  • एक निश्चित लक्ष्य (A Definite Objective)- प्रत्येक प्रबन्धक के सामने किसी कार्य को करने से पूर्व कोई न कोई निश्चित लक्ष्य अवश्य होना चाहिए जिसे सामने रखकर वह कार्य का संचालन कर सके।
  • नियमों का समूह (A Set of Rules)- योजना को सफल बनाने के लिए कुछ नियमों का समूह अर्थात् नियमावली का निर्माण किया जाता है।
  • मितव्ययिता (Economy)- वैज्ञानिक प्रबन्ध का मूल आधार मितव्ययिता है। अतः मितव्ययिता प्राप्त करने के लिए उत्पादन के सभी अनावश्यक तत्त्वों को समाप्त किया जाता है तथा न्यूनतम व्यय पर अधिकतम उत्पादन किया जाता है।
  • वैज्ञानिक विश्लेषण एवं प्रयोग (Scientific Analysis and Experiment)- प्रबन्धक अपनी सम्पूर्ण योजना के प्रत्येक अंग का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है। फिर उससे सम्बन्धित आवश्यक प्रयोग भी करता है। ऐसा करने से प्रबन्धक को यह ज्ञात हो जाता है कि उसकी योजना कहाँ तक उपयोगी सिद्ध होगी।
  • कार्यक्षमता में वृद्धि (Increase in Efficiency)- वैज्ञानिक प्रबन्ध क्रिया एवं प्रक्रिया में प्रत्येक कर्मचारी व श्रमिक की कार्य-क्षमता में वृद्धि करने का प्रयास किया जाता है।
  • नियमों के पालन में दृढ़ता (Strict Observance of Rules)- वैज्ञानिक प्रबन्ध में जो भी नियम बनाए जाते हैं उनका दृढ़ता से पालन करना होता है। नियमों में अनावश्यक परिवर्तन कदापि नहीं किए जाते।
  • उत्तरदायित्व की सीमा (Extent of Responsibility)- प्रत्येक कर्मचारी के उत्तरदायित्व निश्चित व सीमित होते हैं। इसलिए उत्पादन क्रियाओं और प्रक्रियाओं के आधार पर किया जाता है।
  • सामयिक प्रयोग (Timely Study)- उद्योगों में समय परिवर्तन के साथ-साथ अनेक समस्याएँ आती हैं जिनका हल प्रयोगों द्वारा निकाला जाता है। इस प्रकार वैज्ञानिक प्रबन्ध में सामयिक प्रयोग का विशेष महत्त्व है।
  • सहयोग (Co-operation)- कुशल प्रबन्धक के लिए यह आवश्यक है कि कर्मचारियों में मेल-मिलाप हो, प्रबन्धकों तथा कर्मचारियों में सहयोग हो। वैज्ञानिक प्रबन्ध में सहयोग की भावना का मिलना आवश्यक है।