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Bihar Board 12th Business Studies Important Questions Long Answer Type Part 4 in Hindi

प्रश्न 1.
नई आर्थिक नीति की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अप्रैल, 1991 की नई आर्थिक नीति की मुख्य विशेषता अर्थव्यवस्था का उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) एवं वैश्वीकरण (Globalisation) करना है।

(1) उदारीकरण (Liberalisation)-
उदारीकरण का अर्थ (Meaning of Liberalisation)- उदारीकरण से आशय व्यवसाय तथा उद्योग पर लगे प्रतिबन्धों को न्यूनतम करना ताकि अनावश्यक प्रतिबन्धों को समाप्त किया जा सके। उदारीकरण के द्वारा देश में ऐसा आर्थिक पर्यावरण स्थापित करने के प्रयास किये जाते हैं जिससे देश के व्यवसाय व उद्योग स्वतन्त्र रूप में विकसित हो सकें तथा उन्हें कार्य करने में किसी प्रकार की बाधाओं का सामना न करना पड़े। वास्तव में, उदारीकरण से हमारा अभिप्राय, “सरकार द्वारा लगाये गये प्रत्यक्ष या भौतिक नियन्त्रणों से अर्थव्यवस्था की मुक्ति है।” (Liberalisation of the economy means to free it from direct or physical controls imposed by the government.)

उदारीकरण के प्रमुख उपाय (Main Measures of Liberalisation)-
उदारीकरण के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-

  • वस्तुओं एवं सेवाओं के आवागमन पर लगी बाधाओं को हटाना;
  • लाइसेंसिंग प्रणाली को न्यूनतम तथा सरल बनाना;
  • नवीन उद्योगों की स्थापना की स्वतन्त्रता देना;
  • इन्सपेक्टर राज्य को समाप्त करना अथवा न्यूनतम करना;
  • वस्तुओं की कीमत का निर्धारण उत्पादकों/निर्माताओं द्वारा किया जाना;
  • आयात नीति को सरल बनाना:
  • उत्पादों के वितरण पर लगी रोकों को हटाना;
  • स्कन्ध विपणि क्रियाओं को नियमित करना एवं
  • सरकारी नियन्त्रणों के स्थान पर बाजार शक्तियों को प्रोत्साहित करना।

उदारीकरण का व्यवसाय तथा उद्योग पर प्रभाव (Impact of Liberalisation on Business and Industry)- उदारीकरण के व्यवसाय तथा उद्योग पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े हैं-
1. औद्योगिक लाइसेंसिंग तथा पंजीकरण की समाप्ति (Abolition of Industrial Licencing and Registration)- उदारीकरण नीति के अन्तर्गत उद्योगों के पंजीकरण की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया है। इसी प्रकार 6 उद्योगों को छोड़कर शेष सभी उद्योगों को लाइसेंसिंग से मुक्त कर दिया गया है। ये उद्योग हैं- (i) रक्षा उपकरण, (ii) शराब, (iii) सिगरेट, (iv) औद्योगिक विस्फोटक, (v) खतरनाक रसायन तथा (vi) औषधियाँ।

2. लघु उद्योगों की निवेश सीमा में वृद्धि (Increase in the Investment Limit of Small Industries)- लघु उद्योगों की निवेश सीमा 1 करोड़ रु० कर दी गई है तथा अति लघु उद्योगों की निवेश सीमा बढ़ाकर 25 लाख रु० कर दी गई है।

3. एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक कानून से रियायतें (Concessions in M.R.T.P. Act)- एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक कानून के अन्तर्गत आने वाले 22 उद्योगों को लाइसेंस से मुक्ति प्रदान कर दी गई है और इस कानून के अन्तर्गत आने वाली कम्पनियों में पूँजी वाली कम्पनियाँ ही अब इस कानून के अन्तर्गत आ सकेंगी।

4. टेक्नोलॉजी आयात से मुक्ति (Freedom from Import Technology)- उदारीकरण नीति के अन्तर्गत उच्चतम प्राथमिकता वाले उद्योगों को विदेशों से टेक्नोलॉजी का आयात करने के लिए सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

5. उद्योगों के विस्तार की स्वतन्त्रता (Freedom of Expansion of Industries)- उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत विद्यमान उद्योगों को विस्तार के लिए सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

6. पूँजीगत माल के आयात की स्वतन्त्रता (Freedom to Import Capital Goods)- उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत विद्यमान्: ज्योग को अपना विस्तार तथा आधुनिकीकरण करने के लिए विदेशों से पूँजीगत माल (जैसे-मशीनें) आयात करने के लिए सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।

7. ब्याज दरों का स्वतन्त्र निर्धारण (Free Determination of Interest Rates)- उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत अब अनुसूचित बैंकों को ब्याज दर निर्धारण की स्वतन्त्रता प्रदान की गई है।

8. शत-प्रतिशत निर्यात-उन्मुखी औद्योगिक इकाइयों को छुटे (Exemptions to 100% Export oriented Industrial Units)- उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत अपने उत्पादन का सम्पूर्ण भाग निर्यात करने वाली औद्योगिक इकाइयों को भारी छूटें प्रदान की गई हैं।

(II) निजीकरण (Privatisation)-
निजीकरण से आशय (Meaning of Privatisation)- सरल शब्दों में, निजीकरण से आशय ऐसी औद्योगिक इकाइयों को निजी क्षेत्र में हस्तांतरित किये जाने से है जो अभी तक सरकारी स्वामित्व एवं नियन्त्रण में थी। निजीकरण वह सामान्य प्रक्रिया है जिसके द्वारा निजी क्षेत्र किसी सरकारी उद्यम का मालिक बन जाता है या उसका प्रबन्ध करता है (Privatisation is the general process of involving the private sector in the ownership or operation of a state owned enterprise.) निजीकरण की आवश्यकता मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के अकुशल होने के कारण महसूस की गई। भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उपक्रम घाटा उठा रहे थे। इस कारण निजीकरण की जरूरत महसूस की गई क्योंकि निजीकरण के फलस्वरूप अर्थव्यवस्था की कुशलता में वृद्धि होगी, प्रतियोगिता बढ़ेगी एवं उत्पादन की गुणवत्ता तथा विविधता में वृद्धि होगी। जिसका विशेष रूप से, उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगी।

निजीकरण का व्यवसाय तथा उद्योग पर प्रभाव (Impact of Privatisation on Business and Industry)- सन् 1991 की नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत निजीकरण की नीति का अनुकरण करने से इसके व्यवसाय तथा उद्योग पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े हैं-

1. विनिवेश की नीति (Disinvestment Policy)- सार्वजनिक क्षेत्र के जो उद्योग घाटे में चल रहे थे, उनमें सरकार विनिवेश की नीति का अनुकरण कर रही है अर्थात् सरकार इन उद्योगों में अपनी हिस्सेदारी को कम कर रही है। इसके परिणामस्वरूप 31 मार्च, 2004 तक सरकार 43,176 करोड़ रुपये के सार्वजनिक कम्पनियों के शेयर निजी क्षेत्र को बेच चुकी थी। इनमें Maruti Udyog Ltd., Gail, IBP, DCIL, ONGC आदि प्रमुख सरकारी कम्पनियाँ हैं जिनमें विनिवेश की प्रक्रिया लागू की गई है।

2. निजी क्षेत्र के निवेश में वृद्धि (Increase in Private Sector Investment)- भारत के व्यावसायिक एवं औद्योगिक क्षेत्र में आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत निजीकरण की प्रक्रिया अपनाने के कारण निजी क्षेत्र के कुल निवेश में तेजी से वृद्धि हुई है। निजी क्षेत्र में कुल निवेश 45% से बढ़कर 55% हो गया है।

3. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का संकुचित होना (Contraction of Public Sector Units)- एक समय था, विशेषकर द्वितीय पंचवर्षीय योजना में, जब सरकार सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योगों की स्थापना एवं विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही थी किन्तु सन् 1991 की नवीन आर्थिक नीति के अन्तर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के संकुचन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घटकर 4 रह गई है अर्थात् निम्नलिखित चार सार्वजनिक क्षेत्रों- (i) परमाणु ऊर्जा, (ii) सैनिक साज-सामान, (iii) रेल परिवहन तथा (iv) परमाणु धातुओं का खनन को छोड़कर शेष औद्योगिक क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए खोल दिये गये हैं।

4. निजी क्षेत्र के उद्योगों के विकास एवं विस्तार को प्रोत्साहन (Incentive to clopment and Expansion to Private Sector Industries)- सन 1991 की नवीन आर्थिक नीति के अन्तर्गत सरकार निजी क्षेत्र के उद्योगों के विकास एवं विस्तार के लिए हर सम्भव प्रोत्साहन प्रदान कर रही है।

5. ऋणों की अंशों में परिवर्तनीयता आवश्यक नहीं (Conversion of Loans into Shares not necessary)- सन् 1991 की नवीन आर्थिक नीति के अन्तर्गत अब ऋणों की अंशों में परिवर्तनीयता आवश्यक नहीं है।

(III) agaicharut (Globalisation)-
वैश्वीकरण का अर्थ (Meaning of Globalisation)- वैश्वीकरण में सम्पूर्ण विश्व को एक बाजार का रूप प्रदान किया जाता है। वैश्वकरण से आशय विश्व अर्थव्यवस्था में आये खुलेपन, बढ़ती हुई अन्तर्निर्भरता (पारस्परिक निर्भरता) तथा आर्थिक एकीकरण के फैलाव से है। इसके अन्तर्गत विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है तथा व्यवसाय देश की सीमाओं को पार करके विश्वव्यापी रूप धारण कर लेता है। वैश्वीकरण के द्वारा ऐसे प्रयास किये जाते हैं कि विश्व के सभी देश व्यवसाय एवं उद्योग के क्षेत्र में एक-दूसरे के साथ सहयोग एवं समन्वय स्थापित करें। वास्तव में, “वैश्वीकरण से अभिप्राय विश्व अर्थव्यवस्था में आये खुलेपन, बढ़ती हुई परस्पर आर्थिक निर्भरता एवं आर्थिक एकीकरण के फैलाव से है।” (Globalisation may be described as a process associated with increasing openness, growing economic interdependence and depending economic integration in the world economy.)

वैश्वीकरण की विशेषताएँ (Characteristics of Globalisation)- वैश्वीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत किया जाता है अर्थात् आर्थिक क्रियाओं का राष्ट्रीय सीमा से आगे विस्तार किया जाता है;
  2. वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीकी तथा श्रम सम्बन्धी अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों का एकीकरण हो जाता है अर्थात् इनके आवागमन पर सभी प्रकार की रुकावटें हटा ली जाती हैं;
  3. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का विस्तार होता है; एवं
  4. सरकार की राष्ट्रीय मैक्रो आर्थिक नीतियों (National Macro Economic Policies) का क्षेत्र कम हो जाता है।

वैश्वीकरण का व्यवसाय तथा उद्योग पर प्रभाव (Impact of Globalisation on Business and Industry)- भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया जुलाई 1991 की आर्थिक नीति के अन्तर्गत प्रारम्भ हुई है। इसके व्यवसाय तथा उद्योग पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े हैं

1. व्यवसाय का वैश्वीकरण (Globalisation of Business)- जुलाई 1991 की नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत व्यवसाय पर सरकारी नियन्त्रण को कम किया गया है तथा आयात-निर्यात से सम्बन्धित उदारवादी नीति अपनायी गई है-

  • आयात शुल्क में पर्याप्त कमी की गई है।
  • भारतीय रुपये का अवमूल्यन किया गया है ताकि रुपये की वास्तविक विनिमय दर निर्धारित हो सके।
  • शत-प्रतिशत निर्यात-उन्मुखी उद्योगों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है;
  • आयात-निर्यात प्रतिबन्धों को कम किया गया है;
  • चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता लागू की गई है;
  • लगभग 2,000 भारतीय कम्पनियों ने 15,09,000 प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिए हैं जोकि उच्च गुणवत्ता की गारण्टी है। इससे निर्यात को प्रोत्साहन मिला है;
  • निर्यात को प्रोत्साहन देने की प्रक्रिया को सरल बना दिया गया है तथा
  • उद्योगों के विकास एवं आधुनिकीकरण के लिए विदेशी आधुनिक टेक्नोलॉजी के आयात को छूट दे दी गई है।

2. निवेश का वैश्वीकरण (Globalisation of Investment)- सन् 1991 की नवीन आर्थिक नीति के अन्तर्गत विदेशी निवेश पर लगे कई प्रतिबन्ध हटा लिए गए हैं तथा उन्हें आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार से रियायतें दी गई हैं। इस क्षेत्र में उठाए गए प्रमुख कदम निम्नलिखित हैं-

  • विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के लिए द्वार खोल दिए गए हैं;
  • अमेरिकन ऋण बाजार में भारतीय निगम सक्रिय हो रहे हैं;
  • यदि विदेशी कम्पनियाँ भारत में स्थापित संयुक्त उपक्रमों में पूर्ण स्वामित्व प्राप्त करना चाहती हैं अथवा पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनियाँ (Subsidiaries) स्थापित करना चाहती हैं तो इसके लिए उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की गई हैं;
  • फेरा अधिनियम में संशोधन करके फेरा कम्पनियों को कई सुविधाएँ दी गई हैं;
  • अनिवासी भारतीय के लिए अंशों के हस्तांतरण पर लगे प्रतिबन्धों को समाप्त कर दिया गया है;
  • बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत में निर्यातोन्मुखी इकाइयों की स्थापना के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ एवं रियायतें प्रदान की गई हैं;
  • विदेशी निवेश की स्वीकृति के लिए एकल खिड़की (Single Window) योजना लागू की गई है। अब विदेशी निवेश की स्वीकृति एक ही स्थान से प्राप्त हो जाएगी। निवेशकों को भारत में व्याप्त लालफीताशाही का शिकार नहीं होना पड़ेगा;
  • अनिवार्य भारतीय उद्योगों को निर्यात इकाइयों की स्थापना, अस्पतालों, होटलों आदि में शत-प्रतिशत निवेश की अनुमति प्रदान कर दी गई है।
  • विदेशियों को आधारभूत सुविधाओं, जैसे-बिजली, सड़क, संचार आदि में निवेश के लिए विभिन्न प्रकार की रियायतें एवं सुविधाएँ प्रदान की गई हैं;
  • सन् 1991 की आर्थिक नीति के परिणामस्वरूप भारत में विदेशी निवेशों की निरन्तर वृद्धि हो रही है एवं
  • अनिवासी भारतीयों को जनवरी, 2005 तक दोहरी नागरिकता प्रदान करने की घोषणा की गई है।

3. पूँजी का वैश्वीकरण (Globalisation of Capital)- सन् 1991 की आर्थिक नीति के परिणामस्वरूप भारत में पूँजी का तीव्र गति से वैश्वीकरण हो रहा है। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाये गये हैं-

  • भारत में विदेशी पूँजी का तेजी से आगमन हो रहा है;
  • भारत में विदेशी विनिमय कोषों में निरन्तर वृद्धि हो रही है। सन् 1990-91 में विदेशी विनिमय कोष मात्र 4,388 करोड़ रु० थे जो सन् 2003-04 में बढ़कर 113 बिलियन अमरीकन डॉलर हो गए; एवं
  • विदेशी पूँजी विनियोग की सीमा 40% से बढ़ाकर 49% कर दी गई।

प्रश्न 2.
विकेन्द्रीयकरण के अर्थ, परिभाषा एवं उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विकेन्द्रीयकरण का अर्थ- विकेन्द्रीयकरण का आशय उत्तरदायित्व को टालने अथवा बदलने से नहीं, अपितु इसका आशय निर्णय सम्बन्धी अधिकार प्रबन्ध के निम्न स्तरों को सौंपने से है। इसको यह भी नहीं समझना चाहिए कि उच्च प्रबन्ध अपने सभी अधिकार त्याग देता है। अपितु वह महत्त्वपूर्ण मामलों पर स्वयं निर्णय लेता है। विकेन्द्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों में स्वायत्तता तथा उत्तरदायित्व की भावना जागृत करने के लिए उन्हें निर्णय सम्बन्धी अधिकार प्रदान करने से है।

1. ऐलन के शब्दों में, “विकेन्द्रीयकरण का तात्पर्य समस्त संगठन में, व्यवस्थित ढंग से, निर्णय सम्बन्धी अधिकारों को अधीन व्यक्तियों को सौंपने से है।”

उक्त परिभाषा के अनुसार विकेन्द्रीयकरण में कुछ अधिकारों का उच्च स्तर पर आरक्षण माना है जैसे नियोजन, संगठन, निर्देशन व नियन्त्रण के अधिकार का भारार्पण उस सीमा तक किया जाता है। जहाँ तक इन्हें क्रियान्वित किया जाना हो।

2. हेनरी फेयोल के शब्दों में, “अधीनस्थ कर्मचारियों की भूमिका के महत्त्व में वृद्धि करने के लिए जो भी कदम उठाये जाते हैं, वे सब विकेन्द्रीयकरण के अन्तर्गत आते हैं, इनमें कमी करने का हर उपाय केन्द्रीयकरण है।”

उपरोक्त परिभाषा में फेयोल ने ऐसे समस्त कार्यों की जो अधीनस्थ कर्मचारियों के महत्त्व को बढ़ाते हैं, विकेन्द्रीयकरण में शामिल किया है।

3. कून्ट्ज ओ’डोनेल के शब्दों में, “अधिकारों का विकेन्द्रीयकरण अधिकार सौंपने की प्रक्रिया का प्रथम पहलू है और जिस सीमा तक अधिकार नहीं सौंपे जाते उनका केन्द्रीयकरण होता है।”

4. कीथ डेविस (Kcith Davis) के अनुसार, “संगठन की छोटी से छोटी इकाई तक, जहाँ तक व्यावहारिक हो, अधिकार एवं दायित्व का वितरण विकेन्द्रीयकरण कहलाता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के अध्ययन के उपरांत इसकी निम्न विशेषताएँ दृष्टिगोचर होता है-

  • विकेन्द्रीयकरण संस्था में अधीनस्थों की भूमिका के महत्त्व को बढ़ाता है;
  • विकेन्द्रीयकरण में निर्णय लेने की क्रिया में समस्त कर्मचारियों का योगदान रहता है;
  • विकेन्द्रीयकरण निम्नतम स्तर तक अधिकारों के अंतरण का प्रयास है;
  • विकेन्द्रीयकरण अधीनस्थ कर्मचारियों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करता है; एवं
  • विकेन्द्रीयकरण उच्च प्रबन्ध वर्ग के कार्य भार में कमी करता है।

विकेन्द्रीयकरण के उद्देश्य (Objects of Decentralisation)- विकेन्द्रीयकरण का अन्तर्गत सभी कार्यकारी संभाग अपने आप में स्वतंत्र होते हैं एवं प्रत्येक सम्भागीय अधिकारी अपने स्वतंत्र निर्णय लेता है। विकेन्द्रीयकरण की तकनीक का प्रयोग निम्न उद्देश्यों (Objects) के लिए किया जाता है-

  • कार्यभार में कमी लाने के लिए;
  • प्रबन्धकीय प्रतिभा को विकसित करने के लिए;
  • निर्णय में होने वाले, विलम्ब को समाप्त करने के लिए;
  • प्रजातान्त्रिक प्रणाली का विकास करने के लिए;
  • कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए;
  • निम्न स्तरीय प्रबन्धों को प्रेरणा देने के लिए;
  • विभिन्न क्रियाओं में समन्वय स्थापित करने के लिए; एवं
  • प्रबन्धकों में आपसी तालमेल स्थापित करने के लिए।

निष्कर्ष-विकेन्द्रीयकरण प्रबन्ध का दर्शन (Philosophy) है और यह प्रबन्ध के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है।

प्रश्न 3.
प्रशिक्षण के विभिन्न तरीकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के अनेक ढंग हैं। प्रत्येक ढंग की अपनी विशेषतायें, लाभ एवं हानियाँ हैं। कोई भी एक ढंग सभी संगठनों के लिए उपयोगी नहीं हो सकता। अतः प्रत्येक संगठन को अपनी जरूरत, कर्मचारियों के प्रकार, कार्य की प्रकृति, कार्य की उपयोगिता, प्रशिक्षण की आवश्यकता इत्यादि को ध्यान में रखकर प्रशिक्षण की पद्धति अथवा पद्धतियों का चुनाव करना होता है। उद्योगों में प्रयोग होने वाली प्रशिक्षण पद्धतियों का अध्ययन निम्न दो प्रकार से किया जा सकता है-

कार्य पर प्रशिक्षण (Training on the job)- कर्मचारियों को कार्य पर प्रशिक्षण देने का उद्देश्य उन्हें कार्यों की वास्तविक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं से कम-से-कम समय में परिचित कराना है। जब कर्मचारी कार्यों पर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं तो वे समस्त क्रियाओं को स्वयं देखते हैं और उन्हीं क्रियाओं के द्वारा सीखते हैं। इससे प्रशिक्षण के समय में पर्याप्त कमी आती है। इस विधि की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पर्यवेक्षक कितने अनुभवी व योग्य हैं एवं उनकी प्रशिक्षण देने में कितनी रुचि है। इसी सन्दर्भ में जे.बैटी (J. Betty) ने कहा है कि, “कार्य पर प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षित प्रशिक्षक की जरूरत होती है, नहीं तो एक अयोग्य प्रशिक्षक अनेक अयोग्य सन्तान पैदा कर देगा।” (On-the-job training, for its success needs a properly trained instructor. Otherwise an inefficient instructor can produce a number of inefficient off-springs.)

कार्य पर प्रशिक्षण की प्रमुख विधियाँ (Main Methods of on-the-Job Training)-
1. कार्य बदली प्रशिक्षण (Job Rotation Training)- इस विधि का उद्देश्य एक प्रबन्धक को संस्था के सभी विभागों की जानकारी प्रदान करना है। प्रबन्धक को पहले एक विभाग (जैसे-उत्पादन विभाग) में नियुक्त किया जाता है और जब वह इस विभाग के बारे में सभी सम्बन्धित जानकारियों प्राप्त कर लेता है तो उसे किसी दूसरे विभाग (जैसे-विपणन विभाग) में भेज दिया जाता है और इसके बाद अन्य विभागों में। इस प्रशिक्षण प्रणाली का मुख्य उद्देश्य संस्था में ऐसे प्रबन्धकों को उपलब्ध कराना है जो विपरीत परिस्थितियों में किसी भी विभाग को संभाल सके।

2. नवसिखिया प्रशिक्षण एवं कार्यक्रम (Apprenticeship Training or Programme)- यह विधि प्रायः कर्मचारियों को विशिष्ट कौशल सिखलाने के लिए काम में लायी जाती है। इसके अन्तर्गत अलग-अलग कक्षाओं में अध्ययन होता है और जॉब पर भी वास्तविक कार्य करवाया जाता है। कक्षाओं में विशिष्ट ज्ञान रखने वाले विशेषज्ञ सैद्धान्तिक अध्ययन करवाते हैं तथा फैक्ट्री में सुपरवाइजर अपनी देख-रेख में उनसे वास्तविक कार्य करवाते हैं। इस प्रकार उन्हें जॉब का अनुभव तथा ज्ञान दोनों प्रदान किये जाते हैं। इस तरह के प्रशिक्षण की अवधि प्रायः लम्बी होती है।

3. प्रकोष्ठशाला प्रशिक्षण (Vestibule Training)- यद्यपि यह प्रशिक्षण कारखाने में न देकर कारखाने से बाहर एक विशेष प्रशिक्षण केन्द्र पर दिया जाता है। लेकिन इसकी यह विशेषता है कि प्रशिक्षण केन्द्र का वातावरण कारखाने जैसा ही होता है जिससे कर्मचारियों को जब वे कारखाने में काम पर आते हैं किसी प्रकार की घबराहट नहीं होती जिससे उनकी कार्यकुशलता अधिक बढ़ जाती है।

4. संयुक्त प्रशिक्षण योजना (Internship Training)- प्रबन्धकों को सैद्धान्तिक ज्ञान शिक्षण संस्थाओं से प्राप्त होता है जबकि कार्य का व्यावहारिक ज्ञान उन्हें व्यावसायिक संस्थाओं में कुशल विशेषज्ञों के माध्यम से प्रदान किया जाता है। यह पद्धति प्रबन्धकों को उनके पेशे की बारीकियों व पेचीदगियों से परिचित कराती है।

कार्य से दूर प्रशिक्षण (Off the Job Training)- इस विधि के अन्तर्गत श्रमिक को एक विनिर्दिष्ट अवधि के लिए कार्य-स्थल से दूर प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रकार का प्रशिक्षण विशेष गोष्ठियाँ, विश्वविद्यालयों अथवा प्रबन्ध संस्थाओं में, संगोष्ठियाँ आयोजित करके अथवा समस्याओं का अध्ययन करके अथवा संयुक्त प्रशिक्षण योजनाओं के माध्यम से दिया जाता है। इस प्रशिक्षण के दौरान सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों प्रकार की जानकारी दी जाती है। इसकी मुख्य विधियाँ निम्नलिखित हैं-

  • सम्मेलन पद्धति (Conference Method);
  • भूमिका करना (Role Playing);
  • विशेष व्याख्यान एवं चर्चा (Special Lecture and Discussion);
  • समस्या अध्ययन (Case Study);
  • विश्वविद्यालयों एवं प्रबन्ध संस्थाओं में प्रशिक्षण (Training in the Management Institutes and Universities); एवं
  • संगोष्ठी (Seminar)।

प्रश्न 4.
उद्यमिता को एक पेशा के रूप में चुनने के लिये लोगों को क्या अभिप्रेरित करता है ?
उत्तर:
उद्यमिता को एक पेशा के रूप में चुनने के लिये निम्नलिखित घटक लोगों को अभिप्रेरित करता है-

  1. स्वतंत्र, आत्म-विश्वास एवं कुछ अपना करने का विचार
  2. अपनी खोज एवं इच्छा को कार्य रूप देने की पद्धति।
  3. स्वयं के यथार्थकरण की आवश्यकता
  4. प्रतिस्पर्धा की स्थिति में व्यक्तिगत अभिलाषा।
  5. उच्च स्तर की दक्षता।

दूसरे शब्दों में, उद्यमिता की अभिप्रेरणा चार मुख्य आवश्यकताओं का मिश्रण है-

  • कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता- स्वयं के विकास के लिये कुछ कठिन कार्य करना जो दूसरे से भिन्न हो, स्वयं को प्रोजेक्ट करना, आत्म-सम्मान का बढ़ाना, अपनी योग्यता का प्रयोग करना आदि।
  • शक्ति की आवश्यकता- दूसरे को प्रभावित करने की तमन्ना ताकि निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति की जा सके।
  • विद्यमानता की आवश्यकता- विद्यमानता एवं परिपाटी के अनुकूल कार्य करने की इच्छा, पारिवारिक व्यवसाय को चलाने की इच्छा।
  • स्वायत्तता की आवश्यकता- स्वतंत्रता की इच्छा, निष्पादन के लिये स्वयं का अधिकार, व्यक्तिगत योग्यता का पूर्ण प्रयोग, अपने कार्यक्रम को चुनने का निर्णय आदि।

अभिप्रेरणा के अभाव में, योग्य व्यक्ति भी उद्यमिता को प्रारंभ नहीं कर सकता है।

प्रश्न 5.
प्रबन्ध कला है या विज्ञान अथवा दोनों स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध विज्ञान एवं कला दोनों है (Management is both Science and Art)- प्रबन्ध विज्ञान है अथवा कला यह निश्चित करने से पूर्व प्रबन्ध का विज्ञान के रूप में तथा कला के रूप में अलग-अलग अध्ययन कर लेना नितान्त जरूरी है। इस अध्ययन के उपरांत ही यह कहा जा सकता है कि प्रबन्ध विज्ञान है अथवा कला अथवा दोनों :

प्रबन्ध कला के रूप में (Management as an Art)- प्रबन्ध को सामान्यतया कला समझा जाता है क्योंकि कला का अर्थ किसी कार्य को करने अथवा किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ज्ञान एवं कुशलता का उपयोग करता है। वास्तव में कला सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप प्रदान करने की विधि है। जार्ज टेरी का कथन है कि “चातुर्य के प्रयोग से इच्छित परिणाम प्राप्त करना ही कला है।”

कला ठोस परिणामों को प्राप्त करने का एक तरीका है। कलाकार की सफलता उसके कार्य के परिणामों से आँकी जाती है। अतः प्रबन्ध को कला की संज्ञा देना गलत नहीं है क्योंकिः

  1. प्रबन्ध का महत्त्व इस बात में है कि उससे व्यवसाय की कुशलता कितनी बढ़ती है न कि इस बात में कि प्रबन्धक को प्रबन्ध शास्त्र का कितना ज्ञान है;
  2. प्रबन्ध का उद्देश्य किसी उपक्रम में सार्थक परिणाम प्राप्त करना है;
  3. प्रबन्ध में व्यवसाय के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ज्ञान एवं कुशलता का उपयोग निहित होता है एवं
  4. प्रबन्ध की कुशलता में उसके दैनिक अनुभव और अभ्यास से वृद्धि होती है।

कून्टज ने प्रबन्ध को कला माना है और लिखा है कि-

  • प्रबन्ध औपचारिक रूप से संगठित समूहों में व्यक्तियों के द्वारा तथा उन के साथ कार्य कराने की कला है;
  • प्रबन्ध ऐसे वातावरण के निर्माण की कला है जिसमें लोगों को व्यक्तिगत रूप से कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त होती है और सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पारस्परिक सहयोग की भावना को प्रोत्साहन मिलता है;
  • प्रबन्ध ऐसी कला है जो कार्य के निष्पादन में आने वाली कठिनाइयों को दूर करती है एवं
  • प्रबन्ध ऐसी कला है जो लक्ष्यों तक प्रभावशाली ढंग से पहुँचने की कुशलता को अनुकूलतम बनाती है।

प्रबन्ध विज्ञान के रूप में (Management as a science)- व्यवस्थित ज्ञान, जो किन्हीं सिद्धांतों पर आधारित हो, विज्ञान कहलाता है अर्थात् विज्ञान ज्ञान का वह रूप है जिसमें अवलोकन तथा प्रयोगों द्वारा कुछ सिद्धांत निर्धारित किये जाते हैं। विज्ञान को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-वास्तविक विज्ञान और नीति प्रधान विज्ञान। वास्तविक विज्ञान के अन्तर्गत हम केवल वास्तविक अथवा वर्तमान अवस्था का ही अध्ययन करते हैं, जबकि नीति प्रधान विज्ञान के अन्तर्गत हम आदर्श भी निर्धारित करते हैं। व्यावसायिक प्रबन्ध भी निश्चित सिद्धांतों पर आधारित सुव्यवस्थित ज्ञान का भंडार है। विद्वानों ने अपने अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर समय-समय पर व्यवसाय सम्बन्धी अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है जो प्रबन्ध को विज्ञान की कोटि में रखने के लिए पर्याप्त हैं। उदाहरणार्थ- वैज्ञानिक प्रबन्ध, विवेकीकरण, विज्ञापन व बिक्री कला के सिद्धांत आदि ।

कीन्स के अनुसार, “विज्ञान ज्ञान की वह शाखा है जो प्रस्तुत स्थिति का अध्ययन करते हुए कार्य और कारण में सम्बन्ध स्थापित करती है और आदर्श उपस्थित करती है।” विज्ञान का मुख्य कार्य कारण परिणाम सम्बन्ध का अध्ययन करके उससे लाभदायक निष्कर्ष निकालना होता है। अतः प्रबन्ध एक ऐसा ज्ञान है जो अनुसन्धान एवं परीक्षण के आधार पर व्यवस्थित होता है। प्रबन्धक निर्णय लेते समय अपने अनुभव को ही आधार बनाता है। दूसरे लोगों के अनुभव और सीमाओं पर विचार करके लागू करता है। कार्य को प्रारम्भ करने से पहले नियोजन करता है और उसके कारण तथा परिणाम पर विचार करता है।

प्रबन्ध विज्ञान और कला के रूप में (Management is both art as well as science)- उपरोक्त अध्ययन करने के उपरांत हम कह सकते हैं कि प्रबन्ध कला और विज्ञान दोनों है। प्रबन्ध में कला की सभी विशेषताए जैसे व्यक्तिगत कुशलता (personal skill), व्यावहारिक ज्ञान (practical knowledge), सार्थक परिणाम प्राप्त धारणा (concrete result-oriented approach), अभ्यास द्वारा विकास (development through practice) एवं रचनात्मक शक्ति (creative power) विद्यमान है। इसी आधार पर प्रबन्ध को कला स्वीकार कर लिया गया है।

दूसरी ओर, प्रबन्ध में विज्ञान की भी सभी विशेषताएँ जैसे-व्यवस्थित ज्ञान का समूह (systematised body of knowledge), तथ्यों के संग्रह (collection of facts), विश्लेषण (analysis) एवं प्रयोगों पर आधारित (based on experiments), सार्वभौमिक उपयोग (universal application), कारण एवं परिणाम सम्बन्ध (cause and effect relationship), परिणामों की वैधता की जाँच (verification of result) एवं पूर्वानुमान (prediction) इत्यादि विद्यमान हैं, इसीलिए प्रबन्ध को विज्ञान कहा जा सकता है।

परन्तु इसे भौतिक (Physics) एवं रसायन शास्त्र (Chemistry) की श्रेणी का विज्ञान नहीं कहा जा सकता। इसे एक व्यावहारिक विज्ञान (applied science) अथवा अयथार्थ विज्ञान (inexact science or soft science) कहना अधिक उचित होगा। वास्तव में इसके वैज्ञानिक एवं कलात्मक रूपों को अलग नहीं किया जा सकता। सैद्धांतिक ज्ञान व्यावहारिक ज्ञान के बिना अधूरा है तथा व्यावहारिक ज्ञान के बिना सैद्धांतिक ज्ञान का उपयोग नहीं हो सकता अर्थात् एक कुशल प्रबन्धक को प्रबन्ध का ज्ञान और अनुभव दोनों परमावश्यक है।

प्रश्न 6.
केन्द्रीयकरण तथा विकेन्द्रीयकरण के बीच अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
केन्द्रीयकरण :

  • केन्द्रीयकरण में सारे निर्णय उच्च अधिकारी स्वयं ही लेते हैं, वह अपने अधीनस्थों के ऊपर सिर्फ आदेश रखते हैं।
  • केन्द्रीयकरण उच्च अधिकारियों के भार में कमी नहीं करता।
  • केन्द्रीयकरण लालफीताशाही के जन्म देता है।
  • इसमें निर्णयों को विविधता नहीं मिल पाती।
  • केन्द्रीयकरण अधीनस्थयों की प्रेरणा या उनके मनोबल में वृद्धि नहीं करता।
  • केन्द्रीयकरण में निर्णयों का भार एक ही अधिकारी पर होने के कारण कभी-कभी निर्णयों में विलम्ब होता है।
  • इसमें उच्च अधिकारियों के निर्णयों को अधीनस्थों को मानना ही होता है। वह अपने विचार प्रस्तुत नहीं करते।
  • केन्द्रीयकरण प्रबन्ध में एकरूपता देता है।
  • केन्द्रीयकरण में निर्णय लेने के अधिकार का केन्द्रीकरण होने के कारण नीतियों में समानता पायी जाती है।

विकेन्द्रीकरण :

  • विकेन्द्रीकरण में अधीनस्थों के कुछ मामलों में उनके स्तर पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जाती है।
  • इसके माध्यम से उच्च अधिकारियों के कार्यभार में पर्याप्त कमी हो जाती है। वे छोटे-मोटे कार्यों में अपना ध्यान न उलझाकर, महत्वपूर्ण निर्णयों की ओर बढ़ते हैं।
  • चूँकि विकेन्द्रीयकरण में क्रिया के निकटतम ही निर्णय लेने का अधिकार प्रदान किया जाता है, अतः लालफीताशाही नहीं पनपती।
  • इसमें अलग-अलग क्रियाओं के लिए अधिक अध्यक्षों की नियुक्ति के कारण निर्णयों की विविधता मिलती है।
  • विकेन्द्रित व्यवस्था अधीनस्थ कर्मचारियों को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार देकर उन्हें अधिक उत्तरदायी बनाया जा सकता है।
  • विकेन्द्रीयकरण में प्रत्येक अध्यक्ष अपने स्तर पर शीघ्र निर्णय ले सकता है।
  • विकेन्द्रीयकरण में अधीनस्थों द्वारा अपने-अपने विचार प्रस्तुत करते समय समन्वय का अभाव होने पर उनके मध्य मतभेद हो सकते हैं।
  • विकेन्द्रीयकरण में एकरूपता का अभाव पाया जाता है।
  • विकेन्द्रीयकरण के कारण कभी-कभी उपक्रम की नीतियों में इतनी अधिक भिन्नता आ जाती है कि उपक्रम का भविष्य खतरे में पड़ जाता है।

प्रश्न 7.
प्रशिक्षण से आप क्या समझते हैं? यह शिक्षा से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
प्रशिक्षण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी विशिष्ट कार्य को करने की किसी व्यक्ति की योग्यता निपुणता तथा कुशलता में वृद्धि की जाती है। प्रशिक्षण के द्वारा कर्मचारी को न केवल कार्य के प्रति सामान्य ज्ञान प्राप्त होता है अपितु उसकी सौंपे गये कार्य के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। पहल करने की क्षमता, वर्तमान उत्पादन प्रणालियों में सुधार करने की योग्यता तथा उत्पादन की किस्म में सुधार करने की दशा में मार्गदर्शन मिलता है। प्रशिक्षण का उद्देश्य कृत्य की आवश्यकताओं तथा कर्मचारी की वर्तमान क्षमता के अंतर को पाटना है।

प्रशिक्षण एक श्रेष्ठ प्रबंध प्रणाली का मूल मंत्र है। यह समस्याओं के समाधान का साधन है। “जिस प्रकार स्वास्थ्य को बनाने के लिए विटामिन की गोलियाँ लाभदायक होती हैं, ठीक उसी प्रकार मानव-शक्ति समस्याओं के निराकरण के लिए प्रशिक्षण लाभदायक होती हैं,” एक सतत् पूर्ण व्यवस्थित, नियोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के महत्त्व के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-

  • उत्पादन तथा उत्पादकता दोनों में वृद्धि- प्रशिक्षण से कर्मचारियों की योग्यता, चातुर्यता तथा कुशलता में वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन तथा उत्पादकता दोनों में वृद्धि होती है।
  • मनोबल में वृद्धि- प्रशिक्षण से कर्मचारियों में उत्तरदायित्वों की भावना जाग्रत होती है, कार्य के प्रति संतुष्टि होती है, आय में वृद्धि होती है कार्यकुशलता में वृद्धि होती है तथा कार्य-सुरक्षा में वृद्धि होती है जिनके परिणामस्वरूप उनके मनोबल में वृद्धि होती है।
  • कार्य की श्रेष्ठ किस्म- औपचारिक प्रशिक्षण में कर्मचारियों के कार्य करने की श्रेष्ठतम विधि सिखलायी जाती है जिसके परिणाम स्वरूप कार्य की किस्म में सुधार होता है।

प्रश्न 8.
प्रबन्ध के उद्देश्यों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
प्रबन्ध कुछ उद्देश्यों को पूरा करने के लिये कार्य करता है। उद्देश्य किसी भी क्रिया के अपेक्षित परिणाम होते हैं। इन्हें व्यवसाय के मूल प्रयोजन से प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी संगठन के भिन्न-भिन्न उद्देश्य होते हैं तथा प्रबन्ध को इन सभी उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से एवं दक्षता से प्राप्त करना होता है। उद्देश्यों को संगठनात्मक उद्देश्य (Organisational objectives), सामाजिक उद्देश्य (Social objectives) एवं व्यक्तिगत उद्देश्यों (Personal objectives) में वर्गीकृत किया जा सकता है-

1. संगठनात्मक उद्देश्य (Organisational objectives)-संगठनात्मक उद्देश्यों से हमारा अर्थ सम्पूर्ण संगठन के लिये निर्धारित किये जाने वाले उद्देश्यों से है। इन उद्देश्यों का निर्धारण करते समय प्रबन्ध द्वारा व्यवसाय में हित रखने वाले सभी पक्षों जैसे-स्वामी (Owner), कर्मचारी (Employee), ग्राहक (Customer), सरकार (Govt.) आदि से है। व्यवसाय में अपना हित रखने वाले विभिन्न पक्षकारों को लाभ पहुँचाने के लिये समस्त उपलब्ध संसाधनों, मानवीय व भौतिक, का अनुकूलतम (Optimum) उपयोग को सम्भव बनाया जाता है। इससे व्यवसाय के आर्थिक उद्देश्यों जैसे-जीवित रहना (Survival), लाभ (Profit) एवं विकास (Growth) की भी पूर्ति होती है।

(a) जीवित रहना (Survival)- प्रत्येक व्यवसाय का आधारभूत उद्देश्य अपने आपको लम्बे समय तक बनाये रखना होता है। अतः प्रबन्ध को विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं से सम्बन्धित सकारात्मक निर्णय लेकर यह सनिश्चित करना चाहिए कि व्यवसाय लम्बे समय तक जीवित रहे ।

(b) लाभ (Profit)- व्यवसाय के जोखिमों का सामना करने तथा व्यावसायिक क्रियाओं के सफलतापूर्वक संचालन में लाभ की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः प्रबन्ध द्वारा यह सुनिश्चत किया जाना चाहिए कि व्यवसाय पर्याप्त लाभ अर्जित करे।

(c) विकास (Growth)- प्रत्येक व्यवसाय यह चाहता है कि वह पर्याप्त विकास करे। प्रबन्ध को चाहिए कि वह यह सुनिश्चित करे कि व्यवसाय पर्याप्त विकास करे। विकास को बिक्री, कर्मचारियों की संख्या, पूँजी विनियोग, उत्पादों की संख्या आदि द्वारा मापा जा सकता है। यदि इन सब में वृद्धि हो रही है तो यह माना जायेगा कि व्यवसाय विकास के पथ पर अग्रसर है।

2. सामाजिक उद्देश्य (Social objectives)- प्रबन्ध के सामाजिक उद्देश्य से हमारा अभिप्राय प्रबन्धकीय क्रियाओं के दौरान सामाजिक हित का ध्यान रखे जाने से है। संगठन चाहे व्यावसायिक है अथवा गैर-व्यावसायिक, समाज के अंग होने के कारण उसे कुछ सामाजिक दायित्वों को पूरा करना होता है। इसका अर्थ है समाज के विभिन्न अंगों के लिये आर्थिक मूल्यों की रचना करना। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये प्रबन्ध स्वास्थ्य (Health), सुरक्षा (Safety), पर्यावरण (Environment) रोजगार के अवसरों की उपलब्धि (Employment opportunities) एवं मूल्य नियन्त्रण (Price control) इत्यादि को सुनिश्चित करने का वायदा करते हैं। प्रबन्ध के प्रमुख सामाजिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • पर्यावरण प्रदूषण को रोकना (Prevent environment pollution)
  • रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना (Availability of sufficient employment opportunities)
  • जीवन स्तर के सुधार में योगदान देना (Contribution in raising standard of living)
  • शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं में अपना योगदान देना (Contribute towards health and education)
  • गुणवत्ता को बनाये रखना (Quality control)
  • मिलावट को रोकना (Prevent adulteration)
  • असभ्य विज्ञापनों का सहारा न लेना (Not to indulge in vulgar advertisement)

3. व्यक्तिगत उद्देश्य (Individual objectives)- प्रबन्ध के व्यक्तिगत उद्देश्यों से हमारा अभिप्राय कर्मचारियों के सन्दर्भ में निश्चित किये जाने वाले उद्देश्यों से है। कर्मचारी कम्पनी के विवेकशील एवं संवेदनशील संसाधन होते हैं अतः इनकी भावनाओं की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। कर्मचारियों की सन्तुष्टि होने पर संस्था दिन-दूनी रात-चौगुनी उन्नति करने लगती है। व्यक्तिगत उद्देश्यों का निर्धारण करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि संगठनात्मक व व्यक्तिगत उद्देश्यों में टकराव की स्थिति पैदा न हो। उदाहरण के लिए यदि संगठनात्मक उद्देश्य अधिक लाभ अर्जित करना है व व्यक्तिगत उद्देश्य न्यूनतम वेतन देना है तो इनमें टकराव होना स्वाभाविक है। अतः इन दोनों उद्देश्यों में सन्तुलन स्थापित किया जाना चाहिए। कर्मचारियों के प्रति प्रबन्ध के प्रमुख उद्देश्य निम्न हो सकते हैं-

  • कर्मचारियों को उचित पारिश्रमिक देना (Adquate reward to employees);
  • स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराना (To provide healthy atmosphere);
  • प्रबन्ध में हिस्सा प्रदान करना (Worker participation in management);
  • लाभ में हिस्सा प्रदान करना (Provide participation in profit);
  • नौकरी में सुरक्षा प्रदान करना (Safety in service);
  • प्रशिक्षण की व्यवस्था करना (Arrangement of training) एवं
  • पदोन्नति व विकास के अवसर उपलब्ध करना (Opportunity for promotion and development).

प्रश्न 9.
संदेशवाहन के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सम्बन्धों के आधार पर संदेशवाहन के साधनों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

औपचारिक संदेशवाहन (Formal Communication)-
अर्थ (Meaning)- विचारों का वह आदान-प्रदान जो अधिकार और दायित्व के औपचारिक ढाँचे पर आधारित हो इस प्रकार के सम्प्रेषण में उच्च स्तर के अधिकारी कोई भी संदेश या सूचना निचले अधिकारियों को लम्बवत् सीढ़ी को ध्यान में रखते हुए, ऊपर से नीचे की ओर आगे भेजते हैं। दूसरे शब्दों में उच्च प्रबन्धक यह संदेश अपने अधीनस्थ अधिकारियों को देते हैं, अधीनस्थ अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों को। सूचना के प्रवाह का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक भेजी जाने वाली सूचना इसको प्राप्त करने वाले अधिकारी तक न पहुँच जाए। इसी प्रकारं निचले स्तर के कर्मचारियों की प्रार्थनाएँ शिकायतें तथा रिपोर्ट भी इसी लम्बवत् सीढ़ी के अनुसार नीचे से ऊपर तक भेजनी होती है।

औपचारिक संदेशवाहन के प्रकार (Types of Formal Communication)-
1. लम्बवत् सन्देशवाहन(Vertical Communication)- एक व्यावसायिक संस्था के संगठन में संदेश प्रवाह उच्च अधिकारियों से अधीनस्थों की ओर, अधीनस्थों से उच्च अधिकारियों की ओर तथा एक ही स्तर के दो कर्मचारियों के मध्य हो सकता है। सन्देशवाहन के इन रूपों की व्याख्या इस प्रकार है

(क) नीचे की ओर संदेशवाहन (Downward Communication)- वह संदेशवाहन जिस में संस्था के संगठन में सन्देश ऊपर से नीचे की ओर यानी संस्था के उच्चाधिकारियों से उनके अधीनस्थों की ओर चलती है, नीचे की ओर का संदेशवाहन कहलाता है। इस तरह प्रत्येक संदेश जो बोर्ड ऑफ डायरेक्टर से मुख्य प्रबन्धक को, मुख्य से सहायक प्रबन्धकों को, सहायक प्रबन्धकों से सुपरवाइजरों को तथा सुपरवाईजरों से श्रमिकों को होता है। नीचे की ओर संदेशवाहन के अन्तर्गत आता है। आदेश, निर्देश, जॉब शीट, मैनुअल, समाचार बुलैटिन, पोस्टर आदि नीचे की ओर संदेशवाहन के मुख्य साधन हैं।

(ख) ऊपर की ओर संदेशवाहन (Upward Communication)- वह संदेशवाहन जो एक संस्था के संगठन में नीचे से ऊपर यानी अधीनस्थों से उनके उच्चाधिकारियों की ओर चलता है, ऊपर की ओर संदेशवाहन कहलाता है। इस अर्थ मे कोई भी संदेशवाहक जो श्रमिकों से फोरमैन को, फोरमैन से सुपरवाईजर को, सुपरवाईजर से सहायक प्रबन्धकों को, सहायक प्रबन्धकों से मुख्य प्रबन्धकों यानी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर को होता है। ऊपर की ओर के संदेशवाहन के अन्तर्गत आते हैं। सुझाव शिकायतें, समस्यायें, कार्य, रिपोर्ट, सर्वे सूचनायें आदि इस तरह के संदेशवाहन के मुख्य उदाहरण हैं।

2. समतल संदेशवाहन (Horizontal Communication)- वह संदेशवाहन जो एक प्रबन्धक के दो अधीनस्थों के मध्य यांनी संस्था के एक स्तर या पद पर कार्य कर रहे कर्मचारियों के मध्य हो समतल संदेशवाहन कहलाता है इस तरह प्रत्येक संदेशवाहन जो दो सहायक प्रबन्धकों के मध्य, दो फोरमैन या सुपरवाईजर के मध्य, दो क्लर्क या श्रमिकों के मध्य होता है। समतल संदेशवाहन के अन्तर्गत आता है। यह सन्देशवाहन मुख्यतः समूह मीटिंग के माध्यम से होता है। तथा इसके लिए संस्था में विभिन्न स्तर पर समितियों की व्यवस्था होती है। समान समस्याओं को सुलाझने एक-दूसरे के अनुभव का लाभ उठाने या किसी समस्या को सुलझाने में उनकी सहायता लेने के लिए समान स्तर के अधिकारीगण एक जगह बैठकर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।

औपचारिक संदेशवाहन जाल (Formal Communication Network)- जिस व्यवस्था में औपचारिक संदेशवाहन होता है उसे औपचारिक संदेशवाहन जाल कहते हैं। औपचारिक संदेशवाहन चाहे लम्बवत् (Vertical) हो अथवा समतल (llorizontal) यह अनेक प्रकार से हो सकता है।

  1. इकहरी श्रृंखला सन्देशवाहन (Single Chain Communication)- इकहरी श्रृंखला संदेशवाहन का अर्थ पर्यवेक्षक (Superior) तथा अधीनस्थ (Subordinate) के मध्य होने वाले संदेशवाहन से है। एक संगठन में सभी लोग ऊपर से नीचे एक अधिकार शृंखला (Scalar Chain) में बँधे होते हैं।
  2. चक्रीय सन्देशवाहन (Circular Communication)- इस संदेशवाहन में एक अधिकारी के सभी अधीनस्थ उसके माध्यम से एक-दूसरे से बातचीत करते हैं। अधिकारी एक पहिए के केन्द्र (हब) के रूप में कार्य करता है।
  3. घूमता हुआ सन्देशवाहन (Circular Communication)- इस संदेशवाहन समूह के विभिन्न सदस्यों के मध्य होता है। समूह का प्रत्येक सदस्य अपने निकटतम दो सहयोगियों से संदेशवाहन कर सकता है। इसमें संदेशवाहन की गति धीमी होती है।
  4. मुक्त प्रवाह सन्देशवाहन (Free Flow Communication)- यह संदेशवाहन भी एक समूह के विभिन्न सदस्यों के मध्य होता है। इसकी विशेषता यह है कि समूह का प्रत्येक सदस्य शेष सभी से सीधी बात कर सकता है। इसमें संदेशवाहन तीव्र गति से होता है।
  5. अधोमुखी ‘वी’ सन्देशवाहन (Inverted ‘V’ Communication)- इस संदेशवाहन के अन्तर्गत अधीनस्थ को अपने अधिकारी को संदेश तीव्र गति से प्रेषित होते हैं।

अनौपचारिक संदेशवाहन (Informal Communication)- संदेशवाहन को इस विधि का प्रयोग दो समान स्तर के कर्मचारी और अधिकारियों के बीच होता है। संस्था की ओर से इसकी कोई व्यवस्था नहीं होती। यह प्रायः प्रत्यक्ष एवं मौखिक ही होता है। जैसे केवल अपना सिर हिलाकर की स्वीकृति दे देना क्योंकि यह पारस्परिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों पर ही निर्भर होता है। संदेश का लिखित होना आवश्यक नहीं है, और यह भी हो सकता है कि इसमें कुछ बोलने की आवश्यकता न पड़े और केवल सिर या हाथ हिलाने से ही काम निकल जाए।

उदाहरणार्थ, टाइपिस्ट द्वारा किसी अधिकारी के निजी सहायक को कोई टाईप किया हुआ आलेख अनुमोदनार्थ प्रस्तुत किया जाए और व्यस्तता के कारण निजी सहायक इसका अनुमोदक केवल गर्दन हिलाकर संदेशवाहन या अन्य प्रकार की कोई मुद्रा बनाकर सूचित कर देता है तो इसे हम अनौपचारिक संदेशवाहन कहेंगे। अनौपचारिक संदेश शब्दों के बिना उच्चारण किए शारीरिक अंगों के परिचालन मात्र से भी प्रेषित किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
नियंत्रण की परिभाषा दीजिए एवं इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नियन्त्रण को प्रबन्ध विशेषज्ञों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएँ अग्रलिखित हैं-
1. राबर्ट एन्थोनी के अनुसार, “नियन्त्रण एक ऐसी प्रक्रिया है, जो प्रबन्धकों को इस प्रकार का आश्वासन दिलाती है कि संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए साधनों की उपलब्धि एवं उपयोग प्रभावशाली रूप में तथा कुशलता से की जा रही है।”

2. ई० एफ० एल बेच के अनुसार, “नियन्त्रण वर्तमान निष्पादन की योजनाओं में समाविष्ट पूर्व निर्धारित प्रमाप से तुलना है ताकि पर्याप्त प्रगति तथा सन्तोषजनक निष्पादन को सुनिश्चित किया जा सके तथा इन योजनाओं को कार्यान्वित करने से प्राप्त अनुभव को भावी सम्भावित क्रियाओं के लिए मार्गदर्शन के लिए रखना है।”

3. कून्टज व ओ’डोनेल के अनुसार, “नियन्त्रण का प्रबन्धकीय कार्य अधीन कर्मचारियों द्वारा किए गए कार्यों का माप तथा उनमें आवश्यक सुधार करना होता है जिससे कि इस बात का निश्चय हो सके कि उपक्रम तथा उनके प्राप्त करने के लिए योजनाओं को कार्यान्वित किया जा रहा है या नहीं।”

4. हैनरी फेयोल के शब्दों में, “नियन्त्रण का आशय यह जाँच करने से है कि क्या प्रत्येक कार्य अपनाई गई योजनाओं, दिए गए निर्देशों तथा निर्धारित नियमों के अनुसार हो रहा है या नहीं। इसके उद्देश्य (कार्य की) कमजोरियों तथा त्रुटियों का पता लगाना है, जिन्हें यथासम्भव सुधारा जा सके और (भविष्य में) उनकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। नियन्त्रण हर बात, वस्तुओं, व्यक्तियों तथा क्रियाओं पर लागू होता है।”

नियन्त्रण की आवश्यकता व महत्त्व (Need and Importance of Control)- व्यावसायिक प्रबन्ध का एकमात्र उद्देश्य व्यावसायिक लक्ष्य की प्राप्ति है। इसकी प्राप्ति महत्त्वाकांक्षी योजनाओं में नहीं अपितु उसके समुचित रूप से क्रियान्वित करने में है। कार्य का केवल पूरा होना ही पर्याप्त नहीं बल्कि वास्तविक प्रगति इच्छित और प्रमापित मानदण्डों के अनुरूप होनी चाहिए यदि ऐसा न हो तो विचलन के कारणों का पता लगा कर आवश्यक सुधारात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए। इस प्रकार व्यावसायिक लक्ष्य की प्राप्ति कार्य के उचित, नियमित और अव्यवस्थित नियन्त्रण में है। वास्तव में नियन्त्रण ही प्रबन्ध का सार और उसका निर्दिष्ट लक्ष्य है।

नियन्त्रण का महत्त्व निम्न बातों से प्रकट हो जाता है-
1. नियन्त्रण समन्वय स्थापित करने में सहायता प्रदान करता है (Controlling helps the task of Co-ordination)- समन्वय, नियन्त्रण की सहायता से सुगम बन जाता है। पूर्व निर्धारित लक्ष्यों, उद्देश्यों व प्रमापों की सहायता से नियन्त्रण समस्त संगठन को एक समन्वित रूप से काम करते हुए उन लक्ष्यों की प्राप्ति की दशा में अग्रसर करता है। नियन्त्रण के इस बिन्दु को जार्ज टैरी (George R. Terry) ने इस प्रकार दर्शाया है, “नियन्त्रण क्रियाओं को योजनाओं के अनुसार सम्पन्न होने में सहयोग देता है और यह निश्चित करता है कि उनकी दिशा ठीक है तथा विभिन्न घटकों में उचित अन्तर्सम्बन्ध बना हुआ है ताकि समन्वय की प्राप्ति हो सके।”

2. नियन्त्रण भारार्पण तथा विकेन्द्रीयकरण में सहायता करता है (Controlling helps the process of delegation and decentralisation of authority)- नियन्त्रण की आधुनिक प्रणालियों ने उच्च प्रबन्धकों को बिना नियन्त्रण खोये हुए विकेन्द्रीयकरण की सीमा को बढ़ाने में सहायता प्रदान की है। यही कारण है कि नियन्त्रण को भारार्पण तथा विकेन्द्रीयकरण की प्रक्रिया में सहयोग देने वाला कार्य माना गया है। नियन्त्रण के माध्यम से उच्चाधिकारी अपने अधिकारों का भारार्पण अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को करते हुए भी नियन्त्रण-सूत्र को अपने हाथ में बनाये रखते हैं। अतएव अधिकारों का भारार्पण या विकेन्द्रीयकरण तभी सम्भव हो पाता है जबकि नियन्त्रण की उचित व्यवस्था हो।

3. नियन्त्रण कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाता है (Controlling enhances employee’s morale)- डाल्टन ई० मैकफरलेण्ड (Dalton E. McFarland) लिखते हैं कि “कर्मचारी उस स्थिति को पसन्द नहीं करते जोकि नियन्त्रण न हो? ऐसा होने पर वे यह अनुमान नहीं लगा सकते कि उनके प्रति क्या होगा? वे लाभकारी बनने के बदले स्वेच्छाचारी के शिकार बन जाते हैं।”अतः नियन्त्रण न होने पर कर्मचारियों का मनोबल बनाये रखने के लिए आवश्यक होता है।

4. नियन्त्रण निर्णय लेने में सहयोग देता है (Controlling facilitates decision making)- नियन्त्रण उचित प्रबन्ध को निर्णय लेने में महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है। व्यवहार में लिए जाने वाले अधिशासी निर्णय प्राथमिक तौर पर ‘नियन्त्रण निर्णय’ ही होते हैं। (Executive decisions are considered to be primarily control decisions.) अर्थात् व्यवहार में देखा जाए तो उच्च प्रबन्ध द्वारा लिए गए निर्णय ही नियन्त्रण का रूप होता है। अतः नियन्त्रण व निर्णयन में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है इसलिए उचित निर्णय लेने के लिए नियन्त्रण व्यवस्था प्रभावशाली होनी चाहिए।

5. नियन्त्रण अभिप्रेरणा का साधन है (Controlling is a means of motivation)- नियन्त्रण से यह पता लग जाता है कि कौन-सा कर्मचारी कुशल है और कौन-सा अकुशल, कौन-सा अच्छा कार्य करता है और कौन काम से जी चुराता है। अतएव कुशल कर्मचारियों की प्रशंसा करके उन्हें अभिप्रेरित किया जा सकता है तथा अकुशल या काम से जी चुराने वाले कर्मचारियों को दण्ड देकर उन्हें कुशलतापूर्वक काम करने के लिए अभिप्रेरित किया जा सकता है।

6. नियोजन योजनाओं व लक्ष्यों की व्यावहारिकता का परीक्षण करता है (Controlling tests the feasibility of plans and objectives)- संस्था की बनाई गई योजनाओं का व्यावहारिक नियन्त्रण द्वारा स्पष्ट प्रकट होता है। अनावश्यक तौर पर ऊँचे लक्ष्यों अथवा अव्यावहारिकता नीतियों व निर्देशों का शीघ्र ज्ञान हो जाता है। आवश्यक होने पर लक्ष्य पुनरीक्षित कर दिये जाते हैं और निष्पादन सुनिश्चित हो जाता है।

7.नियन्त्रण भावी योजनाओं का मार्गदर्शन करता है (Controlling is guide for future plans)- वर्तमान योजनाओं को लागू करने से प्राप्त अनुभवों व परिणामों का विवरण रखा जाता है जो भावी योजनाओं व क्रियाओं का पथ-प्रदर्शन करता है। साथ ही वर्तमान नियोजन की त्रुटियों को दूर करने तथा योजना की प्रभावशीलता को बनाये रखने के लिए भी नियन्त्रण आवश्यक है।

8. नियन्त्रण अवांछित क्रियाओं पर रोक लगाता है (Controlling checks the various undesirable activities)- एक प्रभावशाली नियन्त्रण व्यवस्था किसी भी संस्था में पाई जाने वाली अवांछित क्रियाओं जैसे चोरी, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, कार्य में देरी आदि पर रोक लगाती है तथा अनुशासन को बनाये रखती है।

9.नियन्त्रण प्रबन्ध के अन्य कार्यों को लागू करने में सहायता करता है (Controlling helps carrying out other functions of management)- नियन्त्रण नियोजन तथा संगठन की परख करता है। यह नियोजन के दोषों को बताता है जिसके फलस्वरूप संगठन, निर्देशन, नियुक्तियों आदि में पाई जाने वाली दुर्बलताओं तथा सीमाओं को ज्ञात किया जा सकता है। नियन्त्रण संदेशवाहन को भी दृढ़ करता है और प्रबन्ध की सम्पूर्ण प्रक्रिया को सफल बनाता है।

10. नियन्त्रण का अन्य क्षेत्रों में महत्त्व (Importance of Controlling in other fields)- (i) व्यापार के बढ़ते हुए आकार तथा इसमें बढ़ती हुई जटिलताओं ने भी नियन्त्रण के महत्त्व को और बढ़ा दिया है; (ii) नियन्त्रण जोखिम से सुरक्षा प्रदान करने का एक महत्त्वपूर्ण बीमा है; (iii) नियन्त्रण लागत में कमी लाता है; एवं (iv) नियन्त्रण संस्था द्वारा बनाई गई तथा बेची जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की किस्म को प्रमापित करता है।

प्रश्न 11.
संदेशवाहन से आप क्या समझते हैं ? इसकी प्रक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
संदेशवाहन (Communication) शब्द लैटिन भाषा के Cummunis शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है- Common। किसी विचार या तथ्य को कुछ व्यक्तियों में सामान्य (Common) बना देता है। इस प्रकार संदेशवाहन का अर्थ विचारों तथा सूचनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक इस तरह पहुँचाना है कि वह उन्हें जान सके तथा समझ सके। इस तरह संदेशवाहन एक द्विमार्गीय (Two way) प्रक्रिया है तथा इसके लिए आवश्यक है कि यह संबंधित व्यक्तियों तक उसी अर्थ में पहुँच सके जिस अर्थ में संदेशवाहनकर्ता ने उन विचारों का हस्तांतरण किया है। इस रूप में यदि हमने कुछ बोला या लिखा है तथा पढ़ने या सुनने वाला उसे प्राप्त नहीं करता या प्राप्त करने पर उससे वह अर्थ नहीं लेता जो उसका वास्तविक अर्थ है, तब इसे संदेशवाहन नहीं कहा जा सकता है।

परिभाषायें (Definitions)- प्रसिद्ध प्रबन्ध विद्वानों द्वारा संदेशवाहन की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी गई हैं-

  1. हडसन (Hudson) के अनुसार, “संप्रेषण का अर्थ संदेश को एक व्यक्ति से दूसरे. व्यक्ति तक पहुँचाना है।”
  2. न्यूमैन व समर (Newmen and Summer) के शब्दों में, “संदेशवाहन दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच तथ्यों, विचारों, राय एवं भावनाओं का आदान-प्रदान है।”

सन्देशवाहन की प्रक्रिया (Process of communication)- संदेशवाहन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें विचारों एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान विभिन्न व्यक्तियों के मध्य निरंतर चलता रहता है। यह एक चक्रीय प्रक्रिया है। इसमें एक के बाद एक कई तत्त्व अथवा चरण (Elements or Steps) होते हैं। इसे निम्न विचार-बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-

1. प्रेषक (Sender)- जो व्यक्ति संदेश भेजता है, वह संदेश प्रेषक कहलाता है। यह संदेशवाहन प्रक्रिया का सूत्रधार होता है।

2. विचार (Ideas)- संदेश प्रेषक का विचार ही संदेशवाहन की विषय-वस्तु है। इसके अंतर्गत धारणा, सम्मति, भावनाएँ, विचार, दृष्टिकोण, अनुभव, सुझाव, आदेश-निर्देश आदि को सम्मिलित किया जाता है।

3. लिपिबद्धकरण (Encoding)- संदेश या सूचना की विषय-वस्तु अदृश्य होती है। अतः उसको स्वरूप प्रदान करने के लिए उसे लिपिबद्ध किया जाता है। इसे लिपिबद्ध करने के लिए शब्दों, चित्रों, संकेतों का उपयोग किया जा सकता है।

4. माध्यम (Media)- संदेश या सूचना को लिपिबद्ध करने के बाद संदेश का माध्यम या साधन निर्धारित किया जाता है। संदेश तथा संदेश की लिपि माध्यम के चुनाव को प्रभावित करती है। अतः माध्यम का चुनाव करते समय संदेश या संदेश की लिपि को ध्यान में रखा जाता है। सुविधा एवं आवश्यकता के अनुसार लिखित, मौखिक, सांकेतिक दृश्य-श्रव्य आदि में से किसी भी माध्यम का चुनाव किया जा सकता है।

5. संदेश प्राप्तकर्ता (Receiver)- संदेश एवं माध्यम का निर्धारण होने के पश्चात् संदेश प्राप्तकर्ता का नम्बर आता है। यह वह व्यक्ति होता है जिसके लिए संदेश भेजा जाता है। संदेश प्राप्तकर्ता संदेशवाहन प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण अंग होता है।

6. व्याख्या करना (Interpreting or Decoding)- जब संदेश प्राप्तकर्ता को संदेश प्राप्त हो जाता है तो वह उसकी व्याख्या करता है। वह शब्दों, संकेतों, चित्रों आदि का अर्थ लगाता है और उनके समझने का प्रयास करता है। संदेशवाहन की सफलता इस बात पर ही निर्भर करती है कि प्राप्तकर्ता संदेशों की किस प्रकार व्याख्या करता है।

7. प्रतिपुष्टि (Feedback)- संदेशवाहन प्रक्रिया प्रतिपुष्टि के बिना अधूरी रहती है। संदेशवाहनं प्रक्रिया तब पूरी होती है जबकि संदेश प्रेषक को यह जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् संदेशवाहन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

प्रश्न 12.
एक अच्छे नेता के गुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
एक अच्छे नेता के निम्नलिखित गुण होना आवश्यक है-
(i) शारीरिक विशेषताएँ- शारीरिक विशेषताएँ, जैसे कद, वजन, स्वास्थ्य आदि लोगों को आकर्षित करते हैं। ये गुण एक नेता को मेहनतपूर्वक कार्य करने में सहायता करते हैं।

(ii) सत्यनिष्ठा/ईमानदारी- एक अच्छे नेता में उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा तथा ईमानदारी होना आवश्यक है। उसे पूरी निष्ठा के साथ कार्य करना चाहिए।

(iii) ज्ञान- एक अच्छे नेता में आवश्यक ज्ञान तथा कौशल अवश्य होने चाहिए जिससे वह अपने अधीनस्थों को सही रूप से आदेश दे सकते हैं।

(iv) स्फूर्ति तथा सहनशीलता स्फूर्ति का अर्थ है- चैतन्यता अथवा सफलता सहनशीलता का अर्थ है। कठिनाइयों के समय धैर्य से काम लेना। एक अच्छे नेता में इन दोनों गुणों का होना परम आवश्यक है। इसका कारण यह है कि दोनों गुणों के होने से संकट की स्थिति में वह हिम्मत नहीं हारता है अपितु निरंतर प्रयास करता रहता है।

(v) व्यक्तिगत आकर्षण- शक्ति-व्यक्तिगत आकर्षण शक्ति वह शक्ति है जो स्वतः ही अन्य व्यक्तियों के विश्वास एवं आदर को आकर्षित करती है। यह गुण धारिता का वह भाग होता है जो कुछ तो जन्मजात जैसे-भावनाएँ, स्वभाव आदि होता है और कुछ प्राप्त (जैसे-अच्छा शिष्टाचार आचरण आदि) किया जा सकता है।

(vi) उत्साह, साहस और लगन- व्यवसाय में तरह-तरह के उतार-चढ़ाव रहते हैं, जिनका सामना करने के लिए एक नेता में उत्साह, साहस और लगन का होना परमावश्यक है।

(vii) चातुर्य-चातुर्य एक ऐसी चैतन्यशील मानसिक सतर्कता है जो इस विषय में सतर्क रहती है कि दूसरों से व्यवहार करते समय आक्षेपों से बचने के लिए क्या करना अथवा कहना अधिक उपयुक्त होगा। कुछ लोग, इसका अर्थ धोखा, असत्यता एवं विश्वासघात से लगाते हैं जो कि सर्वथा गलत है। एक अच्छे को दूसरे व्यक्तियों से व्यवहार करते समय चातुर्य से काम लेना चाहिए।

इन प्रमुख गुणों के अतिरिक्त एक अच्छे नेता में आदर्श चरित्र होना भी आवश्यक है।

प्रश्न 13.
अंश एवं ऋण-पत्र में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अंश एवं ऋणपत्र में निम्नलिखित अंतर है-
अंश:

  1. एक अंश स्वामित्व पूँजी का एक भाग है।
  2. अंशधारियों को उनके अंशों पर लाभांश दिया जाता है।
  3. लाभांश दर विभाजन लाभों एवं निदेशक मण्डल की नीति पर निर्भर करता है।
  4. अंशधारियों को वोटिंग अधिकार होता है एवं उनका कम्पनी प्रबंध पर नियंत्रण होता है, क्योंकि वे कम्पनी के स्वामी होते हैं।

ऋण-पत्र:

  1. ऋणपत्र एक ऋण की स्वीकृति है।
  2. ऋणपत्रों पर ऋणधारियों को ब्याज दिया जाता है।
  3. ऋणपत्रों पर एक निश्चित दर पर ब्याज दिया जाता है।
  4. ऋण-पत्र कम्पनी के ऋणदाता होते हैं। इनका कम्पनी के प्रबंध में कोई हाथ नहीं होता है।

प्रश्न 14.
भर्ती के आन्तरिक स्रोतों का वर्णन करें।
अथवा, भर्ती के आन्तरिक क्षेत्रों का वर्णन करें।
उत्तर:
कर्मचारी भर्ती प्रक्रिया का दूसरा चरण भर्ती स्रोतों की पहचान करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसी पर सम्पूर्ण भर्ती प्रक्रिया की सफलता निर्भर करती है। क्योंकि यदि प्रबन्धक भर्ती स्रोतों की पहचान नहीं कर पाएगा तो योग्य कर्मचारियों को चुनाव नहीं हो सकेगा। परिणामतः संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करने में कठिनाई आएगी। व्यावसायिक संस्थाओं में कर्मचारियों को प्राप्त करने के लिए प्रायः दो प्रकार के साधनों को उपयोग में लाया जाता है-

आन्तरिक स्रोत (Internal Sources)- आन्तरिक स्रोत का अभिप्राय संस्था में रिक्त उच्च तथा मध्य स्तर के पदों को उससे नीचे पदों पर आसीन कर्मचारियों की पदोन्नति के द्वारा या समान पदों पर कु-समायोजित कर्मचारियों या फालतू (Surplus) घोषित किए जाने वाले कर्मचारियों की बदली करके भरना है। इस प्रकार इनके तीन स्रोत शामिल हैं- (i) निम्न स्तर पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों की पदोन्नति करना, (ii) कु-समायोजित कर्मचारियों (maladjusted employees) का स्थानान्तरण करना, एवं (iii) किसी अन्य विभाग में फालतू या अतिरिक्त घोषित या अघोषित किए जाने वाले कर्मचारी (Surplus employee) का स्थानान्तरण करना।

(i) अतिरिक्त घोषित कर्मचारी का स्थानान्तरण (Transfer of Surplus Employee)- कभी-कभी एक संस्था में किसी विशिष्ट काम की कमी या काम की प्रणाली में परिवर्तन के कारण कुछ विभागों में कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो जाती है, और कई अन्य विभागों में बढ़ जाती है। फलस्वरूप कर्मचारी प्रबन्धक यह प्रयत्न करते हैं कि उन विभागों से जहाँ कर्मचारी अतिरिक्त घोषित कर दिए जाते हैं. इन कर्मचारियों के विवरण इकटठे करके यह देखा जाए कि इन्हें कौन-से-ऐसे विभागों में खपाया जा सकता है। जहाँ और ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत है। रिक्त पद और अतिरिक्त घोषित कर्मचारी की योग्यता का मेल हो जाने पर, रिक्त पद इस स्थानांतरण के द्वारा भी भरा जा सकता है, कर्मचारियों की इस प्रकार के भर्ती करने के निम्नलिखित लाभ हैं-

  • अतिशीघ्र तथा सुविधा से चुनाव;
  • कर्मचारियों में अधिक उत्साह की भावना;
  • अतिरिक्त घोषित कर्मचारी को निकालने के दुखद निर्णय से बचाव; एवं
  • औद्योगिक सम्बन्धों में सुधार।

(ii) पदोन्नति के द्वारा रिक्त स्थान भरना (Filling the Vacancy by Promotion)- इस प्रणाली की तीन विशेषताएँ हैं-सर्वप्रथम पदोन्नति के द्वारा रिक्त स्थानों को भरने की प्रणाली केवल उच्च या मध्य स्तर के पदों को भरने के लिए प्रयोग की जाती है। द्वितीय, उच्च पदों पर पदोन्नति सामान्यतः एक श्रृंखला (chain) को जन्म देती है। क्योंकि एक उच्च पद को पदोन्नति से भरने पर उससे नीचे का पद खाली हो जाता है। तृतीय, पदोन्नति से उच्च स्थान भरने पर संस्था में कर्मचारियों की आवश्यकता खत्म नहीं होती बल्कि इस आवश्यकता का स्तर तथा स्वरूप बदल जाता है।

(iii) कर्मचारियों का अस्थायी अलगाव (Lay-off of workers)- इससे हमारा अर्थ है नियोक्ता के प्रयास से कर्मचारियों को कुछ समय के लिए नियोक्ता से दूर कर देना। अस्थायी अलगाव का कारण प्रायः काम की कमी होती है। नियोक्ता व कर्मचारी के मध्य इस बात की पूर्ण सहमति हो जाती है कि जब भी काम उपलब्ध होगा, इसी कर्मचारी को प्राथमिकता दी जाएगी। इस प्रकार हटाए गए कर्मचारी को काम पर पुनः रख कर उसकी भर्ती की जा सकती है।

प्रश्न 15.
कार्यशील पूँजी की आवश्यकता को निर्धारित करने वाले तत्वों का वर्णन
अथवा, कार्यशील पूँजी की आवश्यकता आप कैसे निर्धारित करेंगे ?
उत्तर:
कार्यशील पूँजी की आवश्यकता का निर्धारण इस प्रकार हो सकता है-
1. क्रियाओं का स्तर- कार्यशील पूँजी एवं क्रियाओं के स्तर में सीधा सम्बन्ध होता है। अर्थात् बड़े आकार की संस्थाओं में अधिक व छोटे आकार की संस्थाओं में कम कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

2. व्यावसायिक चक्र- व्यावसायिक चक्र के विभिन्न चरणों से कार्यशील पूँजी की आवश्यकता प्रभावित होती है। तेजी काल में माँग बढ़ने से उत्पादन व बिक्री में वृद्धि होती है। इसलिए अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, मंदीकाल में माँग घटने से उत्पादन व बिक्री दोनों कम होते हैं। अतः इस स्थिति में कम कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

3. उत्पादन चक्र- उत्पादन चक्र का अभिप्राय कच्चे माल को तैयार माल में परिवर्तित करने में लगने वाले समय से है। यह अवधि जितनी लम्बी होगी उतने ही अधिक समय के लिए पूँजी कच्चे माल व अर्द्ध निर्मित माल में फंसी रहेगी। अत: अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत, जहाँ उत्पादन चक्र की अवधि बहुत कम है वहाँ कम कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

4. उधार उपलब्ध कराना- जो संस्थायें अधिक बिक्री नकद करती है उन्हें कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, जो संस्थायें अधिक बिक्री उधार करती है उन्हें अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।

5. उधार सुविधा की प्राप्ति- यदि कच्चा माल एवं अन्य सामग्री उधार पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है तो कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत यदि ये चीजें उधार पर उपलब्ध न हों तो शीघ्र भुगतान करने के लिए अधिक कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

6. क्रय तथा विक्रय की शर्ते- क्रय तथा विक्रय की शर्तों का भी कार्यशील पूँजी की मात्रा पर प्रभाव पड़ता है। यदि व्यावसायिक इकाई कच्चा माल और अन्य सेवाएँ उधार प्राप्त करती हैं और निर्मित माल नकद बेचती है तो उसे कम मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यावसायिक इकाई नकद कच्चा माल खरीदती है और उधार माल का विक्रय करती है तो उसे अधिक मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. व्यवसाय की मौसमी प्रकृति- अनेक कम्पनियों का व्यापार वर्ष के किसी मौसम विशेष में अधिक होता है। उस मौसम में इन कम्पनियों को अधिक मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी।

8. व्यवसाय के विकास की सामान्य दर- व्यवसाय आरम्भ करने के बाद कुछ वर्षों में उसका धीरे-धीरे विकास होने लगता है। विकास के साथ-साथ कार्यशील पूँजी की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है। व्यवसाय के विकास की दर एवं कार्यशील पूँजी में वृद्धि की मात्रा में पूर्ण सामंजस्य होना चाहिए अन्यथा पूँजी की कमी के कारण विकास रुक जायेगा। प्रायः सामान्य विकास का वित्त पोषण लाभ के पुनर्वियोग के द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 16.
उत्पाद की परिभाषा दें एवं इसका महत्त्व बताइए।
उत्तर:
सामान्यतः उत्पादन का अर्थ किसी भौतिक चीज से किया जाता है। जैसे-मोबाइल फोन, पुस्तक, कलम आदि। लेकिन विपणन की दृष्टि से उत्पाद का अभिप्राय प्रत्येक उस चीज से है जिससे क्रेता की किसी आवश्यकता की संतुष्टि होती है। अर्थात् उत्पाद के अंतर्गत भौतिक चीजों के साथ-साथ सेवाओं (जैसे-बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) को नहीं बल्कि दूसरों के विचारों तथा सूचनाएँ भी उत्पाद की श्रेणी में आते हैं।

उत्पादन से निम्न तीन प्रकार की संतष्टि प्राप्त होती है-

  • कार्यात्मक संतुष्टि- कमीज पहनकर शरीर को ढंकना कार्यात्मक संतुष्टि है।
  • मनोवैज्ञानिक संतुष्टि- कमीज पहनकर अधिक विश्वस्त एवं चुस्त लगना मनोवैज्ञानिक संतुष्टि है।
  • सामाजिक संतुष्टि- कमीज पहनकर एक विशेष समूह से मान्यता प्राप्तकरना सामाजिक संतुष्टि है।

उत्पाद को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है-उपभोक्ता उत्पाद तथा औद्योगिक उत्पाद।

उपभोक्ता उत्पाद से अभिप्राय ऐसे उत्पाद से है जो अंतिम उपभोक्ताओं द्वारा अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट करने हेतु खरीदे जाते हैं। जैसे-शर्ट, छड़ी, साबुन आदि। यह उपभोक्ता की आवश्यकता की पूर्ति कर उसे संतुष्टि प्रदान करता है।

औद्योगिक उत्पाद उन्हें कहते हैं जो उपभोक्ता उत्पादों को निर्मित करने के लिए कच्चे माल के रूप में क्रय किए जाते हैं जैसे चमड़ा, लोहा, कोयला, मशीनरी आदि। सेवाओं की उपलब्धता भी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि में उत्पाद की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न 17.
उत्पादों तथा समाज के लिए विज्ञापन के लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विज्ञापन उपभोक्ताओं तथा अन्य किसी विशेष उत्पादक को उत्पाद की विशेषताएँ तथा अन्य संबंधित तथ्य बताकर उन्हें उस उत्पाद को क्रय करने के लिए प्रेरित करने का साधन है।

विज्ञापन से उत्पादकों को लाभ :

  • नवनिर्मित वस्तुओं की मांग में वृद्धि करना- निर्माता अपनी नई वस्तु या विज्ञापन करके अपनी वस्तु की माँग उत्पन्न कर सकते हैं।
  • वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि- विज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य वस्तु की माँग में वृद्धि करना है। विज्ञापन के द्वारा वस्तु के नए ग्राहक बनते हैं। परिणामस्वरूप बिक्री बढ़ती है।
  • माँग में स्थायित्व (Stability in Demand)- विज्ञापन वस्तुओं की मौसमी माँग के परिवर्तन को न्यूनतम करके पूरे वर्ष माँग को बनाए रखता है जैसे-बिजली के पंखे गर्मियों में तो बिकते ही हैं लेकिन सर्दियों में भी पंखों की माँग भारी छूट के विज्ञापन के कारण बनी रहती है।
  • शीघ्र बिक्री तथा कम स्टॉक- विज्ञापन से बाजार में वस्तु की माँग होती है और वस्तु की बिक्री में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप वस्तु का स्टॉक अधिक समय के लिए नहीं रखना पड़ता।
  • प्रतिस्पर्धा का अंत- विज्ञापन के माध्यम से वस्तु की माँग बाजार में स्थायी बनायी जा सकती है। यदि कोई हमारी वस्तु का प्रतिस्पर्धा है तो भी उसकी दाल नहीं गलेगी क्योंकि हम अपनी वस्तु की उपयोगिता को विज्ञापन के द्वारा ग्राहकों को समझा सकते हैं।
  • कम लागत- बड़े पैमाने पर उत्पादन करके उत्पादन लागत और वितरण लागत दोनों में कमी की जा सकती है क्योंकि विज्ञापन से माँग में वृद्धि होती है और बढ़ी हुई माँग की पूर्ति बड़े पैमाने के उत्पादन से ही संभव है।
  • संस्था की ख्याति में वृद्धि- विज्ञापन से संस्था तथा उसके द्वारा उत्पादित वस्तु लोकप्रिय हो जाती है। यही नहीं, ऐसी संस्था अपने सहायक उत्पादन को बेचने में भी सफल हो जाती है।
  • कर्मचारियों को प्रेरणा- विज्ञापन से जब वस्तु की माँग में वृद्धि होती है तो संस्था में काम करने वाले कर्मचारियों में भी गर्व की भावना आती है।
  • उपभोक्ताओं के समय में बचत- विज्ञापन की सहायता से कम समय में उचित मूल्य पर सही वस्तु उपभोक्ता को मिल जाती है।

विज्ञापन से समाज को लाभ-

  • आजीविका का साधन-विज्ञापन के धंधे में असंख्य व्यक्ति लगे हुए हैं जो कि इस धंधे से रोजी पाते हैं।
  • आशावादी समाज का निर्माण-विज्ञापन समाज के प्रगतिशील व्यक्तियों को काम में लगाए रहने की प्रेरणा देता रहता है क्योंकि विज्ञाप्ति वस्तु को खरीदने के लिए अधिक धन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 18.
उपभोक्ता के किन्हीं छः अधिकारों का वर्णन करें।
अथवा, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार उपभोक्ता के अधिकार क्या हैं ? लिखिए।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 उपभोक्ता के निम्नलिखित अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है-

  1. मूल आवश्यकताएँ- इसके अन्तर्गत न केवल जीने के लिए बल्कि सभ्य जीवन के लिए सभी आवश्यकताओं की पूर्ति आती है। ये आवश्यकताएँ हैं भोजन, मकान, कपड़ा, बिजली, पानी, शिक्षा और चिकित्सा आदि।
  2. जागरूकता- इस अधिकार के अन्तर्गत चयन के लिए आपको विक्रेताओं द्वारा सही जानकारी देना।
  3. चयन- उपभोक्ताओं को सही चयन करने के लिए उचित गुणवत्ता और अधिक कीमत वाली कई वस्तुओं को दिखाना ताकि वे उनमें से उपयुक्त वस्तु खरीद सकें।
  4. सुनवाई- इसके अन्तर्गत उपभोक्ता को अपने विचार निर्माताओं के समक्ष रखने का अधिकार है। उपभोक्ता की समस्याओं से निर्माताओं को वस्तु-निर्माण में उसकी गुणवत्ता बढ़ाने में सहायता मिलती है।
  5. स्वस्थ वातावरण- इससे जीवन और प्रकृति में सामंजस्य स्थापित करके जीवन स्तर ऊँचा किया जा सकता।
  6. उपभोक्ता शिक्षण- सही चयन के लिए वस्तु/सामग्री और सेवाओं को उचित जानकारी व ज्ञान का अधिकार उपभोक्ता को मिलना चाहिए।
  7. क्षतिपूर्ति (Redressal)- इसका अर्थ है कि यदि उचित सामान प्राप्त न हुआ हो तो उसका उचित परिशोधन या मुआवजा मिलने का अधिकार। जिस भी उपभोक्ता के साथ अन्याय हुआ हो वह अधिकारी के पास जाकर उचित क्षतिपूर्ति ले सकता है।

प्रश्न 19.
एक उद्यमी के मुख्य कार्य क्या है ?
उत्तर:
उद्यमी के कार्यों से सम्बद्ध उपलब्ध साहित्य यह स्पष्ट नहीं करता है कि उद्यमी के क्या कार्य हैं। शास्त्रीय (Classical) अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उद्यमी व्यवसाय का पूँजी प्रदान कर उसके स्वामी होते हैं। उन्होंने पूँजीपति तथा उद्यमी में अन्तर स्पष्ट नहीं किया। परन्तु आधुनिक निगम में स्वामित्व, प्रबन्ध/नियंत्रण से भिन्न होता है, जबकि संचालक मण्डल के कुछ लोग नगन्य जोखिम उठाये, बहुत-सा मुआवजा प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं, भले ही अंशधारियों को कोई लाभांश न मिले। अतः वृद्धाकार लोक कम्पनी में शास्त्रीय सिद्धान्त उपयुक्त नहीं समझे जाते।

आधुनिक लेखों द्वारा एक उद्यमी निम्नांकित कार्यों को संचालित करता है-
1. नवकरण (Innovation)- उद्यमी शब्द नवकरण से जुड़ा हुआ है जिसका अर्थ है नवीन कार्यों को करना। शुम्पीटर के अनुसार, उद्यमी का प्रमुख कार्य नव-सृजन है, अर्थात् नये उत्पादों का उत्पादन, नये बाजारों का सृजन, उत्पादन की नई विधियों का विकास, कच्चे माल के नवीन आपूर्ति प्रवाहों का अन्वेषण तथा नवीन संगठनात्मक ढाँचे का निर्माण करना है।

नवकरण अन्वेषण तथा आविष्कार से भिन्न है। अन्वेषण हमें ज्ञान प्रदान करता है जबकि नवकरण हमें ज्ञान का उपयोग नवीन वस्तुओं के उत्पादन हेतु करता है। नवकरण शोध पर आधारित नहीं है-नवकरण पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो सकता है। प्रायः नवकरण शोध पर आधारित नहीं होते। नवकरण अन्वेषण से भी भिन्न है। अन्वेषण का अर्थ नवीन विचारों, वस्तुओं तथा नई विधियों की खोज है जबकि नवकरण, अन्वेषित नयी वस्तुओं के उत्पादों पर अन्वेषित खोजों के प्रयोग द्वारा उन्हें बाजार में बेचना है। यह भी सही नहीं है कि केवल बड़ी फर्मे ही नव-सृजन करती हैं। तथ्य स्पष्ट करते हैं कि लघु एवं मध्यम आकार फर्मे अपनी गहन लोचकता द्वारा तकनीकी विकास को समृद्ध बना सकती है।

2.जोखिम वहन (Risk Bearing)- अपूर्वानुमानित संदिग्धताओं, जैसे उपभोक्ता रुचि, उत्पादन तकनीक, राजकीय नीतियों में परिवर्तनों तथा नए अन्वेषणों के कारण उद्यमी को हानियाँ उठानी पड़ती हैं। उद्यमी को जहाँ पुरस्कार एवं प्रचुर लाभ प्राप्त होते हैं, हानियों को भी वहन करना पड़ता है। वह अन्वेषणों, उपक्रम तथा विस्तार आदि में होने वाले जोखिमों को सहन करता है। जे० बी० से० (J. B. Say) व अन्य ने उद्यमी द्वारा जोखिम वहन करने को उसका विशिष्ट कार्य माना है।

3. संगठन एवं प्रबन्धन (Organisation and Management)- अल्फ्रेड मार्शल ने ठीक ही कहा है, “उद्यमी का मुख्य कार्य उपक्रम का संगठन एवं प्रबन्धन है।” उसे वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रकृति आदि का निर्णय करना होता है जिसका वह उत्पादन करे। इस हेतु वह उत्पादन के विभिन्न घटकों को जुटाता है। उद्यमी ही संसार में अलग-अलग उपलब्ध भूमि, श्रम तथा पूँजी को इकट्ठा कर उन्हें उत्पादन में लगाता है। वह मूल रूप से एक निर्णायक है। हानियों को न्यूनतम करने के लिए, वह साधनों का उपयोग बड़े विवेकपूर्ण ढंग से करता है, आवश्यकतानुसार वह व्यवसाय के आकार, स्थिति, उत्पादन तकनीकों आदि में संशोधन करता है। वह प्रबन्धकीय कार्य जैसे उत्पादन नीतियों का निर्माण, बिक्री, संगठन एवं कार्मिक प्रबन्धन आदि को वहन करता है।

4. प्रबन्धकीय कार्य (Managerial Functions)- उद्यमी द्वारा दैनिक कार्यक्रम में अनेक प्रबन्ध कीय कार्य करने पड़ते हैं। उसे पहले से ही भावी कार्यों का नियोजन करना, आवश्यक संगठनात्मक क्रियाएँ जुटाना, कर्मचारियों के बीच समन्वय व संदेशवाहन व्यवस्था करना तथा अन्त में व्यावसायिक गतिविधियों पर नियंत्रण आदि करने होते हैं।

5. मार्गदर्शन (Leadership)- उद्यमी को अपने कर्मचारियों एवं अधिकारियों का मार्गदर्शन करना होता है ताकि वे उसे सहयोग प्रदान करें। उपक्रम के मार्गदर्शक के रूप में उसे अन्य कर्मचारियों के सम्मुख कार्य निष्ठा, समर्पण एवं अनुशासन के आदर्श प्रस्तुत कर उन्हें प्रेरित करता है।

6. वित्तीय व्यवस्था करना (Arranging Finance)- उद्यमी को व्यापार आरम्भ करने तथा नये अवसरों के रहते व्यवसाय के विस्तार करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है, जिसे अनेक बार वह निजी साधनों से नहीं जुटा पाता। ऐसी स्थिति में वह बैंक तथा विकासशील संस्थाओं, साधारण जनता से अंश एवं ऋणपत्रों के निर्गमन द्वारा धन एकत्रित करता है। न्यूनतम लागत पर वित्तीय व्यवस्था करने के लिए इसे अच्छा वित्त प्रबन्धक होना आवश्यक है।

7.सामरिक प्रबन्ध (Strategic Management)- यह उद्यमी का मुख्य कार्य है। अपने प्रतिद्वन्द्वी से आगे बढ़ने के उद्देश्य से उसे व्यूह रचना तैयार करनी होती है जिसके अन्तर्गत प्रस्तुत व्यावसायिक वातावरण एवं अपनी शक्तियों एवं कमियों के दृष्टिगत आवश्यक कूटनीतियाँ तैयार करनी होती हैं। कई बार, वह अपने अधिकारियों तथा कर्मचारियों को अपनी भावी सोच से अवगत करवाता है ताकि वे इस सम्बन्ध में व्यूह रचनाएँ तैयार करें।

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