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Bihar Board 12th Entrepreneurship Important Questions Long Answer Type Part 5 in Hindi

प्रश्न 1.
दीर्घकालीन तथा लघुकालीन वित्तीय स्रोत क्या है ?
उत्तर:
व्यवसाय में दीर्घकालीन कोषों की आवश्यकता सामान्यतः इसकी स्थिर पूँजी प्रकृति की होती है। दीर्घकालीन पूँजी प्राप्त करने के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं-

  • अंश- अंश कम्पनी दीर्घकालीन एवं स्थायी वित्त प्राप्त करने के लिए समता एवं पूर्वाधिकार अंशों का निर्गमन कर सकती है।
  • ऋण पत्र- एक कंपनी वित्तीय साधनों को बढ़ाने के लिए ऋणपत्रों को जारी कर सकती है। ऋण पत्रों पर ब्याज की दर निश्चित हो सकती है। उसका शोधन एक निश्चित तिथि पर किया जा सकता है।
  • ऋण- व्यावसायिक संस्था बैंक या विशिष्ट संस्थाओं से ऋण प्राप्त कर सकती है। ऋण की स्वीकृति की शर्त दो हो सकती है और स्वीकृति ऋण का सवितरण समय-समय पर किया जा सकता है।
  • प्राप्त लाभों का पुनर्विनियोग- यह अर्थ प्रबंधन का आंतरिक स्रोत है। बहुत-सी संस्थाएँ अपने व्यवसाय के वित्त की व्यवस्था के लिए अविकसित लाभ संचय आदि का पूँजी के रूप में प्रयोग कर लेती है। उसे लाभों का पुनर्वियोग कहा जाता है।

अल्पकालीन वित्त के स्रोत- व्यावसायिक वित्त के अल्पकालीन साधनों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

  1. बैंक साधन तथा
  2. गैर बैंक साधन।

1. बैंक साधन (Bank Sources)-

  • सुरक्षित ऋण
  • बैंक अधिविकर्ष
  • असुरक्षित ऋण
  • बिलों पर कटौती

2. गैर बैंक साधन (Non-Bank Sources)-

  • व्यापारिक ऋण
  • खुला खाता
  • जन निक्षेप
  • बकाया दायित्व
  • कम समय के ऋण
  • प्रतिज्ञा पत्र एवं हुंडी।

प्रश्न 2.
एक सफल उद्यमी की विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
एक सफल उद्यमी की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • जोखिम वहनकर्ता
  • व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह
  • नवीन उपक्रम की स्थापना
  • साधन प्रदान करनेवाला
  • अवसरों का विदोहन
  • कार्य ही लक्ष्य एवं संतुष्टि
  • नव प्रवर्तनकर्ता
  • आशावादी दृष्टिकोण
  • गतिशील प्रतिनिधि
  • स्वतंत्रता प्रेमी
  • उच्च उपलब्धियाँ
  • पेशेवर प्रकृति
  • नेतृत्वकर्ता
  • कार्य में पूर्ण समर्पित
  • अनुसंधान पर बल।

प्रश्न 3.
कार्यशील पूँजी की आवश्यकता आप कैसे निर्धारित करेंगे ?
उत्तर:
कार्यशील पूँजी की आवश्यकता का निर्धारण इस प्रकार हो सकता है-
1. क्रियाओं का स्तर- कार्यशील पूँजी एवं क्रियाओं के स्तर में सीधा सम्बन्ध होता है। अर्थात् बड़े आकार की संस्थाओं में अधिक व छोटे आकार की संस्थाओं में कम कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

2. व्यावसायिक चक्र- व्यावसायिक चक्र के विभिन्न चरणों से कार्यशील पूँजी की आवश्यकता प्रभावित होती है। तेजी काल में माँग बढ़ने से उत्पादन व बिक्री में वृद्धि होती है। इसलिए अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, मंदीकाल में माँग घटने से उत्पादन व बिक्री दोनों कम होते हैं। अतः इस स्थिति में कम कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

3. उत्पादन चक्र- उत्पादन चक्र का अभिप्राय कच्चे माल को तैयार माल में परिवर्तित करने में लगने वाले समय से है। यह अवधि जितनी लम्बी होगी उतने ही अधिक समय के लिए पूँजी कच्चे माल व अर्द्ध निर्मित माल में फंसी रहेगी। अतः अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत, जहाँ उत्पादन चक्र की अवधि बहुत कम है वहाँ कम कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

4. उधार उपलब्ध कराना- जो संस्थायें अधिक बिक्री नकद करती हैं उन्हें कम कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, जो संस्थायें अधिक बिक्री उधार करती हैं उन्हें अधिक कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।

5. उधार सुविधा की प्राप्ति- यदि कच्चा माल एवं अन्य सामग्री उधार पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है तो कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी। इसके विपरीत यदि ये चीजें उधार पर. उपलब्ध न हों तो शीघ्र भुगतान करने के लिए अधिक कार्यशील पूँजी की जरूरत होती है।

6. क्रय तथा विक्रय की शर्ते- क्रय तथा विक्रय की शर्तों का भी कार्यशील पूँजी की मात्रा पर प्रभाव पड़ता है। यदि व्यावसायिक इकाई कच्चा माल और अन्य सेवाएँ उधार प्राप्त करती हैं और निर्मित माल नकद बेचती है तो उसे कम मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यावसायिक इकाई नकद कच्चा माल खरीदती है और उधार माल का विक्रय करती है तो उसे अधिक मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. व्यवसाय की मौसमी प्रकृति- अनेक कम्पनियों का व्यापार वर्ष के किसी मौसम विशेष में अधिक होता है। उस मौसम में इन कम्पनियों को अधिक मात्रा में कार्यशील पूँजी की आवश्यकता होगी।

8. व्यवसाय के विकास की सामान्य दर- व्यवसाय आरम्भ करने के बाद कुछ वर्षों में उसका धीरे-धीरे विकास होने लगता है। विकास के साथ-साथ कार्यशील पूँजी की आवश्यकता भी बढ़ती जाती है। व्यवसाय के विकास की दर एवं कार्यशील पूँजी में वृद्धि की मात्रा में पूर्ण सामंजस्य होना चाहिए अन्यथा पूँजी की कमी के कारण विकास रुक जायेगा। प्रायः सामान्य विकास का वित्त पोषण लाभ के पुनर्वियोग के द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 4.
सम-विच्छेद बिन्दु क्या है ? यह कैसे ज्ञात किया जाता है ?
उत्तर:
बिक्री का वह बिन्दु जहाँ व्यवसाय को न लाभ हो न हानि, ‘सम-विच्छेद बिन्दु’ कहलाता है। यहाँ विक्रय मूल्य कुल लागत के बराबर होता है। कुल लागत में स्थायी (Fixed) तथा परिवर्तनशील (Variable) दोनों शामिल होते हैं। उद्यमी कोई भी बिक्री करते समय इस बिन्दु का ध्यान रखता है क्योंकि इस बिन्दु से अधिक बिक्री लाभ प्रदान करेगी और इससे नीचे की बिक्री से हानि होगी।

एक रेखाचित्र की सहायता से यह ज्ञात हो जाता है कि बिक्री के किस स्तर पर साहसी को कितना लाभ या हानि होगी ?

स्पष्ट है कि उत्पादन चाहे 3,000 इकाई हो या 15,000 इकाई हो, स्थिर लागत 3,000 रु० ही रहेगी। बिक्री रेखा शून्य से आरम्भ होती है जबकि लागत रेखा 3,000 रु० से शुरू होती है क्योंकि बिक्री कुछ नहीं भी हो तो स्थायी लागत 3,000 रु० रहेगी ही। अब ये दोनों रेखाएँ एक-दूसरे को जिस बिन्दु पर काटती हैं, वह ‘सम-विच्छेद बिन्दु’ कहलाता है। इससे अधिक बिक्री लाभ तथा कम बिक्री हानि का द्योतक है।

प्रश्न 5.
विपणन तथा विक्रय में अंतर बताइये।
उत्तर:
विपणन तथा विक्रय में अंतर निम्नलिखित है-
Bihar Board 12th Entrepreneurship Important Questions Long Answer Type Part 5, 1

प्रश्न 6.
एक साहसी के लिए पर्यावरण का अध्ययन करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
विभिन्न अध्ययनों ने सिद्ध किया है जिन संगठनों ने वातावरण का विश्लेषण किया है उन्हें अधिक वित्तीय लाभ प्राप्त हुए हैं। बिना विश्लेषण किये कभी-कभी कम्पनी को बार-बार अपनी व्यूह रचना बदलनी पड़ सकती है और संगठन को वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। निम्न दृष्टिकोण के साहसी के लिए पर्यावरण अध्ययन आवश्यक है-

(i) संसाधनों का प्रभावशाली उपयोग (Best or Effective Use of Utilisation of Resources)- किसी व्यवसाय की सफलता की कुंजी उसके वित्तीय साधनों का प्रभावपूर्ण ढंग से व्यय होने पर निर्भर करता है। कम्पनी की सफलता तथा असफलता को वातावरण के खतरे और अवसरों के माध्यम से विश्लेषण करना चाहिए ऐसा न करने पर कम्पनियों को हानियों का सामना करना पड़ सकता है।

(ii) वातावरण का लगातार अध्ययन/विश्लेषण (Constant Monitoring of the Environment)- वातावरण विश्लेषण के अध्ययन से वातावरण में क्या कुछ हो रहा है, का ज्ञान हो जाता है। वातावरण विश्लेषण के अभाव में उपभोक्ताओं की रुचि और पसंद का ज्ञान नहीं होगा, प्रतियोगिता का ज्ञान नहीं होगा, आधुनिक तथा नये आविष्कारों का ज्ञान नहीं होगा तथा नयी व्यापार नीतियों का ज्ञान नहीं होगा। इस सब पर नियंत्रण के लिए व्यवसाय वातावरण का गहन विश्लेषण आवश्यक होता है।

(iii) व्यूह रचना बनाने में सहायक (Useful to Strategy Formulation)- वातावरण विश्लेषण के द्वारा विविधीकरण तथा विकास (Diversification of Growth) और व्यवसाय में आने वाली समस्याओं का हल संभव हो सकता है। उदाहरण के लिए, रिलायन्स तथा हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड ने विविधीकरण के द्वारा काफी प्रगति की है, apple computer, USA में काफी लोकप्रिय है। भारतवर्ष में नहीं, कॉलगेट को जापान के बाजारों में पसंद नहीं किया जाता है। साहसी को अपने उत्पाद की बाजारों में पसंद को पूरा ध्यान रखना चाहिए और अधिक व्यापक विपणन व्यूह रचना बनानी चाहिए।

(iv) खतरों आर अवसरों की पहचान (Identification of Threats and Opportunities)- वातावरण विश्लेषण से साहसी को व्यापार में आने वाले खतरे और सुनहरे अवसरों का ज्ञान प्राप्त होता रहता है। उचित परख के बाद उन्हें ठीक करने के लिए उचित व्यूह रचना बनाकर आने वाले खतरों का उचित हल पहले ही ढूँढ लेना चाहिए।

(v) प्रबंधकों को सहायक (Useful to Managers)- प्रबंधकों ने वातावरण विश्लेषण से काफी उपयोगी सामग्री प्राप्त की है। जिन संगठनों ने वातावरण विश्लेषण किया है और जिन्होंने ऐसा नहीं किया है उनकी कार्यक्षमता और लाभदायकता में काफी अन्तर पाया गया है।

(vi) भविष्य का अवलोकन (Prediction of Future)- भविष्य का अवलोकन करना प्रबंध का महत्त्वपूर्ण कार्य बन गया है। भविष्य के सजग प्रबंधकों को काफी सचेत होना चाहिए। उन्हें केवल समस्याओं का हल ही नहीं ढूँढना चाहिए वरन् प्रयत्न करना चाहिए कि समस्याओं का जन्म ही नहीं हो। इस प्रबंधक वातावरण अध्ययन करके अपने प्रबंधकीय उत्तरदायित्वों को भली-भाँति पूरा कर सकते हैं।

प्रश्न 7.
उपक्रम स्थापना का क्रियान्वयन आप कैसे करेंगे?
उत्तर:
स्थायी पंजीकरण होने के बाद एक उपक्रम स्थापना का क्रियान्वयन करने के लिए हमें विभिन्न विचार बिन्दुओं पर ध्यान रखना चाहिए, जो निम्नलिखित हैं-
(i) स्थान व्यवस्थित करना- उपक्रम जिस स्थान पर स्थापित होनी है, वहाँ उन सारी सुविधाओं को व्यवस्थित कर लेना चाहिए जो उपक्रम के लिए आवश्यक है। जैसे-इस स्थान तक पहुँचने के लिए आवागमन की व्यवस्था, बिजली, पानी आदि की व्यवस्था कर लेनी होगी।

(ii) भवन निर्माण- उपक्रम के लिए कभी-कभी औद्योगिक क्षेत्र में सरकार द्वारा ही स्थापना एवं भवन प्रदान किया जाता है जिसके लिए किराया लिया जाता है। यदि ऐसा नहीं है तो निजी एजेंसी से भी अपनी आवश्यकतानसार जगह और भवन भाडे पर लिया जा सकता है। यह भी संभव नहीं हो तो जमीन खरीद कर स्वयं भवन का निर्माण किया जा सकता है। उत्पादन की प्रक्रिया, उपकरण एवं संयंत्र की आवश्यकतानुसार भवन का निर्माण किया जाना चाहिए। भवन निर्माण भविष्य में विस्तार को ध्यान में रखकर करना हितकर होगा।

(iii) मशीन एवं यंत्र की स्थापना- मशीन एवं यंत्र की खरीद सावधानीपूर्वक करनी चाहिए और आरम्भ में इसकी स्थापना विक्रेता कम्पनी की देखरेख में ही की जानी चाहिए ताकि उपक्रम के कर्मचारी इसे देख-समझ सकें फिर इसके संचालन तक उक्त कम्पनी के प्रतिनिधि को रोके रखना चाहिए जिससे कि किसी भी गड़बड़ी को तुरन्त ठीक किया जा सके। यदि किसी मशीन की प्रकृति ऐसी है कि उसे वातानुकूल अवस्था में रखना अनिवार्य है तो इसके लिए वातानुकूल भवन का निर्माण किया जाना चाहिए।

(iv) जाँच उत्पादन- संयंत्र स्थापित हो जाने के बाद थोड़े कच्चे माल से उत्पादन की प्रक्रिया आरम्भ कर देनी चाहिए और देखना चाहिए कि इसमें क्या कमीबेशी रह गयी है। ऐसा कर लेने से तैयार उत्पादन को बाजार में भेजने से पहले उसकी जाँच हो जाती है। यदि कोई सुधारात्मक उपाय की आवश्यकता हुई तो यह भी संभव हो पाता है।

(v) पैकिंग एवं वितरण व्यवस्था- जाँच उत्पादन के बाद साहसी देखता है कि सब कुछ ठीक-ठाक है तो विधिवत सामान्य उत्पादन प्रक्रिया चालू कर दी जाती है। इस तैयार उत्पाद की पैकिंग व्यवस्था ठीक से करके इसके वितरण की कार्यवाही की जाती है। इसके लिए पहले से सुनिश्चित मार्ग अपनाए जाते हैं। माल किसी थोक व्यापारी के हाथ सौंपना है। एजेंट को सौंपना है या खुदरा व्यापारी को या स्वयं सीधे उपभोक्ता तक पहुँचाना है। इन बातों का निर्णय साहसी अपनी सुविधानुसार पहले से ही कर लेता है।

(vi) बाजार में प्रवेश- पैकिंग और वितरण व्यवस्था दुरुस्त कर लेने के बाद अब साहसी का उत्पाद बाजार में दाखिला ले सकता है। जहाँ उसकी अपनी परीक्षा होती है। साहसी अपने उत्पादन के प्रति बाजार की प्रतिक्रिया पर हमेशा चौकसी बनाए रखता है तथा तुरन्त अपनी उत्पादन प्रक्रिया में बाजार के निर्देशानुसार परिवर्तन लाता है।

सब कुछ ठीक रहने पर साहसी स्थायी पंजीकरण हेतु जिला उद्योग विभाग (District Industries Department) को आवेदन देता है और तब साहसी का यह उपक्रम औद्योगिक समाज का एक सम्मानित सदस्य बनकर अस्तित्व में आ जाता है। इस तरह औद्योगिक जगत में उपक्रम-रूपी बच्चा जन्म लेकर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और अपनी पहचान विशिष्ट रूप में बनाकर साहसी को सम्मान दिलाता है।

प्रश्न 8.
विपणन से क्या आशय है ? विक्रय प्रबंधक के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विपणन का अर्थ- जिस प्रक्रिया से माल उपभोक्ता तक पहुँचता है, उसे विपणन कहा जाता है। यह वैसी प्रणाली है जिससे व्यापार की गतिविधियाँ आपस में चलती हैं और योजना, मूल्य, बिक्री में वृद्धि और माल के वितरण को उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जाता है। वास्तव में, विपणन के आधार पर माल की क्रय-विक्रय की सारी क्रियाएँ पूरी की जाती हैं।

विपणन में विक्रय प्रबंधक अपना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विक्रय प्रबंधक विपणन की गतिविधियों पर हमेशा नजर रखता है और वह विक्रय संवर्द्धन में अपना महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। विक्रय प्रबंधक के चार कार्य इस प्रकार हैं-
(i) विक्रय का संवर्द्धन- विक्रय का संवर्द्धन करना एक विक्रय प्रबंधक का महत्त्वपूर्ण कार्य है। वह उत्पादित माल को विज्ञापन तथा प्रचार द्वारा अधिक-से-अधिक क्रय कराने का कार्य करता है।

(ii) प्रतियोगिता को खत्म करना- एक विक्रय प्रबंध प्रतियोगिता को खत्म करने का भी कार्य करता है। वह अपने उत्पाद को वर्तमान बाजार में सर्वश्रेष्ठ बनाने का कार्य करता है जिसके साथ ही प्रतियोगिता का अन्त हो जाता है। परिणामस्वरूप उत्पाद की अधिकाधिक बिक्री होती है।

(iii) उत्पाद का विज्ञापन कराना- एक विक्रय प्रबंधक अपने उत्पादन का विज्ञापन कराता है जिससे उसके उत्पाद के बिक्री में बढ़ोत्तरी होती है। वह एक साधारण उत्पाद को भी विज्ञापन द्वारा असाधारण बना देता है। परिणामस्वरूप उसकी तथा संस्था का नाम होता है।

(iv) अपने अधीनस्थों पर नियंत्रण स्थापित करना- एक विक्रय प्रबंधक अपने अधीनस्थों को सही निर्देश देता है। अधीनस्थों पर नियंत्रण स्थापित करता है और उनको सही दिशा-निर्देश देता है। ताकि उत्पाद का अधिक-से-अधिक विक्रय हो। जहाँ कहीं भी कुछ कमी है, उसको पूरा करने का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 9.
विपणन अवधारणा तथा इसके उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विपणन बाजार का अभिन्न अंग है। बाजार वह स्थान है जहाँ विक्रेता एवं क्रेता अनेक उत्पादों को मुद्रा (इसके विपरीत भी) के बदले विनिमय करने हेतु एकत्रित होते हैं। उत्पादन विपणन से पूर्ण किया जाता है। परिवर्तित व्यावसायिक वातावरण के अनुसार उत्पादन भी समय- समय पर परिवर्तित होता है। तद्नुसार, विपणन की विचारधारा में भी समय-समय पर परिवर्तन हुए हैं। इन विचारधाराओं को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) परम्परागत विचारधारा (Traditional Concept)- यह विचार पहले उत्पादन स्तर से जुड़ा है जबकि बाजार में निर्मित वस्तुओं की साधारणतः कमी रहती थी तब विपणन का प्रमुख कार्य, वस्तुओं को ग्राहकों तथा व्यापक रूप में सहनीय कीमतों पर उपलब्ध कराना था। विपणन विचार भी तदनुसार था। निम्न परिभाषाओं से विपणन की विचारधारा को स्पष्ट किया जा सकता है-

कानवर्स, ह्यून्जी एवं मिचल (Converse, Huggy and Mitchell) के अनुसार, “विपणन के अंतर्गत उत्पादन से उपभोग तक की सभी क्रियाएँ सम्मिलित हैं।”

अमरीकन एकाउंटिंग एसोसिएशन (American Accounting Association) के अनुसार, “उन व्यावसायिक गतिविधियों के आचरण को जिनके द्वारा उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक माल एवं सेवाओं का प्रत्यक्ष प्रवाह होता है, विपणन कहा जाता है।”
अत: विपणन की परम्परागत विचारधारा उत्पाद उन्मुख है।

(ii) आधुनिक विचारधारा (Modern Concept)- समय बीतने पर औद्योगिक गतिविधि में उत्तेजना आने के साथ-साथ उत्पादों की विविधता, किस्म एवं मात्रा में भी वृद्धि हुई है। इसने ग्राहक को अधिक विवेकशील एवं चयनकर्ता बना दिया। अब ग्राहक वह सब कुछ जो इसे उत्पादक प्रस्तुत करें, क्रय करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने ऐसे उत्पादों एवं सेवाओं का क्रय करना आरंभ कर दिया जो मात्रा, कीमत, संतुष्टि, दीर्घायु, सौन्दर्य आदि में उसके लिए लाभकारी हों। ऐसे ग्राहक के लाभ मूर्त अथवा अमूर्त हो सकते हैं। इसलिए, उत्पादकों ने वह सभी कुछ उत्पादन करना आरम्भ किया जो ग्राहक चाहते हैं। इस प्रकार, एक नयी वैज्ञानिक सोच का जन्म हुआ। न: सोच के अन्तर्गत उन वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन एवं प्रस्तुति करना आवश्यक हो गया जो कि उपभोक्ता की माँग के अनुरूप हो। इसे ‘विपणन उन्मुखी’ कहा जाता है। इस आधुनिक विपणन विचार को निम्नांकित परिभाषाओं से समझा जा सकता है-

स्टैण्टेन (Stanton) के अनुसार, “विपणन व्यवस्था के अंतर्गत सभी व्यावसायिक क्रियाएँ सम्मिलित हैं जो माँग–पूर्ति वाली वस्तुओं एवं सेवाओं के नियोजन, कीमत, संवर्द्धन एवं वर्तमान प्रभावी उपभोक्ताओं को वितरित की जाएँ।”

कोटलर (Kotler) के अनुसार, “विपणन एक सामाजिक एवं प्रबंधकीय प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति एवं सूमूह प्राप्त करते हैं, जो वह चाहते हैं और जो वस्तुओं एवं सेवाओं के परस्पर विनिमय से सम्बद्ध है।”

अब हम दोनों विचारधाराओं में अन्तर स्पष्ट कर सकते हैं। परम्परागत विचार विपणन उत्पादकों अर्थात् विक्रेताओं की आवश्यकता पर बल देता है। इसके विपरीत, आधुनिक विचार उपभोक्ता की ज़रूरतों से प्रतिबद्ध है।

विपणन अवधारणा के उद्देश्य- विपणन अवधारणा के परम्परागत विचारधारा और आधुनिक विचारधारा के अध्ययन से इसके उद्देश्य स्पष्ट हो जाते हैं। विपणन अवधारणा के उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  • वस्तुओं की खरीद-बिक्री करना।
  • उपभोक्ता को संतुष्ट करना, जैसे-गारंटी देना, मरम्मत की सुविधा, पसंद न आने पर बदलने की सुविधा देना आदि।
  • अधिक-से-अधिक लाभ अर्जित करना।
  • उपभोक्ता संतुष्टि और उपभोक्ता कल्याण पर ध्यान देना।
  • उपभोक्ताओं की इच्छाओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।
  • उपभोक्ता कल्याण और सामाजिक दायित्व को ध्यान में रखना।
  • लोगों के रहन-सहन के स्तर में सुधार करना।

प्रश्न 10.
कुल लागत में किन-किन तत्त्वों का समावेश होता है ?
उत्तर:
कुल लागत में निम्नलिखित तत्त्वों का समावेश होता है-
I. मुख्य लागत- किसी भी वस्तु के उत्पादन में मुख्य रूप से दो खर्चे आते हैं-एक कच्चमाल और दूसरा श्रम। इन दोनों का योगफल मुख्य लागत कहलाती है।
1. कच्चामाल- वस्तु के उत्पादन में कच्चेमाल को पक्के माल में बदला जाता है या इसके स्वरूप में परिवर्तन किया जाता है। यह कच्चामाल भी दो तरह का होता है

  • प्रत्यक्ष- प्रत्यक्ष कच्चामाल वह है जो स्पष्ट तौर पर उसी उत्पाद के लिए उपयोग में लाया जाता है। जैसे फर्नीचर के लिए लकड़ी, कपड़े के लिए कपास, चीनी के गन्ना आदि।
  • अप्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष कच्चामाल वह है जो पूर्ण रूप से इस उत्पाद में प्रयुक्त नहीं होता । बल्कि इसका कुछ हिस्सा ही उसमें लगता है, जैसे-फर्नीचर में कीलें, पॉलिश, फेवीकॉल आदि।

2. श्रम- कच्चेमाल को पक्के माल में बदलने के लिए श्रम की आवश्यकता होती है। यह श्रम भी दो तरह का होता है-

  • प्रत्यक्ष- माल तैयार करने में जो श्रम सीधे स्पष्ट रूप से उसी माल पर लग रहा है, उसे प्रत्यक्ष श्रम कहते हैं। फर्नीचर तैयार करने में लगा हुआ कारीगर प्रत्यक्ष श्रम है।
  • अप्रत्यक्ष- कुछ श्रम ऐसा है जो सीधे तौर पर इस उत्पाद पर ही नहीं लगता बल्कि इसका थोड़ा अंश ही इस पर लगता है। जैसे – सुपरवाइजर, प्रबंधक आदि अप्रत्यक्ष श्रम है।

II. कारखाना लागत- कच्चामाल श्रम की सहायता से कारखानों में विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरते हुए पक्के माल में बदलता है। इस स्तर पर अर्थात् कारखाने में जो भी खर्च होता है, उसे ‘कारखाना उपरिव्यय’ कहा जाता है। इसे जब मुख्य लागत में जोड़ दिया जाता है तो यह ‘कारखाना लागत’ कहलाता है। यह खर्च भी दो तरह का होता है।

  • स्थायी- कारखाने का वह खर्च जो उत्पादन हो या नहीं हो, लगेगा ही उसे स्थायी कारखाना लागत कहा जाता है, जैसे-फैक्ट्री का किराया, बिजली, रख-रखाव खर्च आदि।
  • परिवर्तनशील- वह खर्च जो उत्पादन बढ़ने से बढ़े और घटने से घटे परिवर्तनशील कारखाना लागत कहलाती है। जैसे-ह्रास, ईंधन, शक्ति आदि।

III. उत्पादन लागत- कारखाना लागत में कार्यालय का खर्च जोड देने पर इसका योगफ उत्पादन लागत कहलाता है। माल को उत्पादित करने तक की यह लागत होती है। यह भी दो भागों में विभक्त होती है-

  • स्थायी- वैसा कार्यालय व्यय जो उत्पादन के घटने-बढ़ने से अप्रभावित रहे, उसे स्थायी कार्यालय व्यय कहा जाता है।
  • परिवर्तनशील- उत्पादन के परिवर्तन होने से कार्यालय व्यय भी परिवर्तन हो जाए तो ऐसे व्यय को परिवर्तनशील कार्यालय व्यय कहा जाता है।

IV. माल विक्रय लागत- माल उत्पादित हो जाने के बाद अब इसे बेचने की तैयारी की जाती है। इसे बेचने में भी अनेक खर्च जैसे-विज्ञापन, विक्रेता का वेतन, कमीशन, गोदाम, पैकिंग, बीमा आदि आते हैं जिन्हें ‘विक्रय एवं वितरण उपरिव्यय’ कहा जाता है। जब उत्पादन लागत में इस खर्च को जोड़ दिया जाता है तो यह ‘कुल माल विक्रय लागत’ कहलाता है। यह भी दो भागों में विभक्त होता है।

  • स्थायी- कुछ विक्रय व्यय बिल्कुल स्थिर होते हैं, जैसे-विक्रेता का वेतन, गोदाम किराया आदि।
  • परिवर्तनशील- ऐसे विक्रय व्यय बिक्री की मात्रा के साथ बढ़ते-घटते रहते हैं, जैसे-विक्रेता का कमीशन, पैकिंग खर्च आदि।
    इन समस्त लागतों के योग को कुल लागत कहते हैं।

प्रश्न 11.
एक सफल उपक्रम की आवश्यक शर्तों की विवेचना करें।
उत्तर:
एक सफल उपक्रम की निम्नलिखित आवश्यक शर्त इस प्रकार हैं-
(i) सुपरिभाषित संस्थागत लक्ष्य- एक उद्यमी को चाहिए कि वह उद्देश्य को परिभाषित करें जिसे प्राप्त करने हेतु व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना की गयी है। इसके अतिरिक्त उत्पाद की प्रकृति, इकाई के आकार को ध्यान में रखते हुए क्रियात्मक क्षेत्र भी निर्धारण होना चाहिए।

(ii) प्रभावपूर्ण नियोजन- एक उद्यमी को चाहिए कि वह विभिन्न क्रियाओं के सम्बन्ध में वांछित नियोजन कर ले। यह प्रक्रिया व्यावसायिक पूर्वानुमान से नियंत्रित होती है। नियोजन में उद्देश्य, नीतियों, कार्यक्रम, बजट आदि शामिल किये जाते हैं।

(iii) प्रभावपूर्ण संगठन प्रणाली- यह किसी संस्था की संरचना तैयार करता है जिसके अन्तर्गत श्रमिक व प्रबंधक अपने कार्यों का प्रबंधन करते हैं। यह कार्य के संचालन में समंवय करता है तथा व्यावसायिक उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होता है।

(iv) वित्तीय संसाधन- उद्यमी को चाहिए कि वह एक प्रभावशाली वित्त कार्य का प्रबंध विकसित करें जैसे विनियोग निर्णय, वित्तीय निर्णय, लाभांश निर्णय ऐसे होने चाहिए जो संस्था के उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायक हो सके।

(v) पेशेवर प्रबंध- यह उपक्रम के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है।

(vi) विपणन- ग्राहकों एवं उपक्रमों के बीच अच्छा सम्बन्ध फर्म के लिए दीर्घकाल में अत्यन्त लाभप्रद शामिल होता है। अतः विपणन व्यूह रचना ग्राहक आधारित होना चाहिए। उद्यमी को चाहिए कि उत्पाद की किस्म एवं ब्राण्ड के अनुसार वितरण मार्ग निर्धारित करें जिससे उत्पाद में ग्राहकों का विश्वास बढ़े।

(vii) नव-प्रवर्तन- एक उद्यमी परिवर्तन का प्रतिनिधि होता है। लगातार शोध-कार्य विकास क्रियाओं के आधार पर संस्था में नवप्रवर्तन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। नवप्रवर्तन बाजार में पूर्णता की स्थिति सृजित करता है जिससे बिक्री एवं लाभ दोनों बढ़ते हैं।

प्रश्न 12.
समायोजन की परिभाषा दें। इसकी क्या विशेषताएं है ?
उत्तर:
नियोजन प्रबंध का वह कार्य है जिसमें लक्ष्यों का निर्धारण करना तथा इसे प्राप्त करने के लिए की जाने वाली क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है। इसके अंतर्गत यह निश्चित किया जाता है कि क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है तथा किसके द्वारा करना है, इन सभी प्रश्नों के बारे में निर्णय लेना ही नियोजन है।

कण्ट्ज एवं ओ’ डोनेल के अनुसार’ “क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है और किसके द्वारा करना है, का पूर्व निर्धारण करना ही नियोजन है।”(Planning is deciding in advance what to do, how to do it, when to do it and who is to do it.)

नियोजन की प्रमुख तीन विशेषताएँ इस प्रकार है-
(i) प्रबंध का प्राथमिक कार्य- नियोजन प्रबंध का प्रथम कार्य है और अन्य सभी कार्य, जैसे- संगठन, नियुक्तियाँ, अग्रणीयता एवं नियंत्रण आदि इसके बाद ही किए जाते हैं। नियोजन के अभाव में प्रबंध का कोई भी कार्य पूरा नहीं किया जा सकता है।

(ii) नियोजन पूर्वानुमान लगाना है- नियोजन प्रक्रिया में भविष्य को ध्यान में रखा जाता है या नियोजन के अंतर्गत एकत्रित तथ्यों के आधार पर भविष्य के बारे में पूर्वानुमान लगाकर उचित निर्णय लिया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पूर्वानुमान नियोजन का सार है।

(iii) नियोजन एक निरंतर प्रक्रिया है- नियोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जो संस्था के प्रारंभ होने के साथ ही प्रारंभ होती है और संस्था के समाप्त होने पर समाप्त अर्थात् जब तक कोई संस्था चलती रहती है नियोजन प्रक्रिया भी लगातार चलती रहती है।

प्रश्न 13.
“विज्ञापन पर किया गया खर्च विनियोग है, अपव्यय नहीं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
“विज्ञापन पर किया गया व्यय बेकार नहीं जाता, एक विनियोग है।” (The money spent on advertising is not ivasteful, an investment.)- गलाकाट प्रतियोगिता के युग में आज विज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। विज्ञापन उपभोक्ताओं को प्रभावित करके उत्पाद (Product) या सेवा का विक्रय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इससे बड़े पैमाने के उत्पादन को मितव्ययताएँ प्राप्त होती हैं। उपभोक्ताओं को सस्ती एवं प्रमापित वस्तु प्राप्त होती है। इस प्रकार विज्ञापन वस्तु की माँग उत्पन्न करता है। इसी कारण यह कथन सत्य है कि “विज्ञापन पर किया गया व्यय विनियोग होता है, व्यय नहीं।” कुछ विद्वानों ने कहा है कि विज्ञापन से केवल उत्पादन लाभान्वित होते हैं। उनका यह विचार सत्य नहीं है क्योंकि विज्ञापन से थोक व्यापारी, फुटकर व्यापारी, उपभोक्ता तथा समाज सभी को लाभ होता है, विज्ञापन इनके लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उत्पादक के लिए। विज्ञापन से इन सभी को होने वाले लाभों का वर्णन निम्नलिखित है-

I. उत्पादकों को लाभ (Advantages of Products) :

  • नवनिर्मित वस्तुओं की माँग में वृद्धि करना-निर्माता अपनी नई वस्तु या विज्ञापन करके अपनी वस्तु की माँग उत्पन्न कर सकते हैं।
  • वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि- विज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य वस्तु की माँग में वृद्धि करना है। विज्ञापन के द्वारा वस्तु के नए ग्राहक बनते हैं। परिणामस्वरूप बिक्री बढ़ती है।
  • मांग में स्थायित्व (Stability in Demand)- विज्ञापन वस्तुओं की मौसमी माँग के परिवर्तन को न्यूनतम करके पूरे वर्ष माँग को बनाए रखता है जैसे-बिजली के पंखे गर्मियों में तो बिकते ही हैं लेकिन सर्दियों में भी पंखों की माँग भारी छूट के विज्ञापन के कारण बनी रहती है।
  • शीघ्र बिक्री तथा कम स्टॉक-विज्ञापन से बाजार में वस्तु की माँग होती है और वस्तु की बिक्री में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप वस्तु का स्टॉक अधिक समय के लिए नहीं रखना पड़ता।
  • प्रतिस्पर्धा का अंत- विज्ञापन के माध्यम से वस्तु की माँग बाजार में स्थायी बनायी जा सकती है। यदि कोई हमारी वस्तु का प्रतिस्पर्धा है भी तो उसकी दाल नहीं गलेगी क्योंकि हम अपनी वस्तु की उपयोगिता को विज्ञापन के द्वारा ग्राहकों को समझा सकते हैं।
  • कम लागत- बड़े पैमाने पर उत्पादन करके उत्पादन लागत और वितरण लागत दोनों में कमी की जा सकती है क्योंकि विज्ञापन से माँग में वृद्धि होती है और बढ़ी हुई माँग की पूर्ति बड़े पैमाने के उत्पादन से ही संभव है।
  • संस्था की ख्याति में वृद्धि- विज्ञापन से संस्था तथा उसके द्वारा उत्पादित वस्तु लोकप्रिय हो जाती है। यही नहीं, ऐसी संस्था अपने सहायक उत्पादन को बेचने में भी सफल हो जाती है।
  • कर्मचारियों को प्रेरणा- विज्ञापन से जब वस्तु की माँग में वृद्धि होती है तो संस्था में काम करने वाले कर्मचारियों में भी गर्व की भावना आती है।
  • उपभोक्ताओं के समय में बचत- विज्ञापन की सहायता से कम समय में उचित मूल्य पर सही वस्तु उपभोक्ता को मिल जाती है।

II. मध्यस्थों को लाभ (Advantages of Middlemen) :

  • समाचार-पत्रों की आर्थिक सहायता- समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं को भारी विज्ञापन कराने से बहुत अधिक आय होती है, परिणामस्वरूप कम लागत पर पत्र-पत्रिकाएँ जनता को मिल जाती हैं। समाचार-पत्रों की कुल आय के भाग में से 75% आय का भाग विज्ञापनों से मिलता है।
  • विक्रेताओं की सहायता करता है- विज्ञापन वस्तु की माँग का सृजन (Crcate) करता है यानी विक्रेताओं द्वारा वस्तु की अधिक बिक्री के लिए बिक्री की पृष्ठभूमि बनाता है।
  • अच्छे मध्यस्थों की प्राप्ति-विज्ञापन के द्वारा अच्छे मध्यस्थों और कर्मचारियों को प्राप्त किया जा सकता है।
  • उत्पादकों से सम्पर्क-विज्ञापन के द्वारा मध्यस्थ और उत्पादकों के बीच सम्पर्क होता है। इस प्रकार विज्ञापन एक कड़ी का काम उत्पादक और मध्यस्थ के बीच करता है।

III. उपभोक्ताओं को लाभ (Advantages to Consumers)-

  • नव-निर्मित वस्तुओं की जानकारी-विज्ञापन के माध्यम से उपभोक्ताओं को नई-नई वस्तुओं के बारे में जानकारी मिलती है। जैसे– Vespa XE-170, कोन्टेसा कार आदि।
  • क्रय में सुगमता-विज्ञापन के द्वारा वस्तु के संबंध में उपभोक्ता को पहले से ही सम्पूर्ण ज्ञान होता है। इससे उसको वस्तु खरीदने में सुगमता हो जाती है।
  • अच्छी किस्म की वस्तुओं की प्राप्ति-विज्ञापन से वस्तु के प्रति जनता का विश्वास जम जाता है। इसलिए उत्पादक जनता के उस विश्वास को समाप्त नहीं करना चाहता है और अच्छी किस्म की वस्तुएँ ही बाजार में देता है।
  • ज्ञान में वृद्धि-विज्ञापन ग्राहकों को नित नई वस्तुओं के उपयोगों के विषय में जानकारी देता है जिससे उपभोक्ताओं के ज्ञान में वृद्धि होती है।

IV. समाज को लाभ (Advantages to society)-

  • आजीविका का साधन-विज्ञापन के धंधे में असंख्य व्यक्ति लगे हुए है जो कि इस धंधे से रोजी पाते हैं।
  • आशावादी समाज का निर्माण-विज्ञापन समाज के प्रगतिशील व्यक्तियों को काम में लगाए रहने की प्रेरणा देता रहता है क्योंकि विज्ञापित वस्तु को खरीदने के लिए अधिक धन की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 14.
प्रबंध को परिभाषित करें। इसके कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रबन्ध की परिभाषा देना यदि असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। विद्वानों ने प्रबन्ध को भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है। अतः इसकी सर्वमान्य परिभाषा कोई नहीं है। इस सम्बन्ध में ई. एफ. एल. ब्रेच तो प्रबन्ध की परिभाषा ही महसूस नहीं करते। उनका मानना है कि महत्त्व प्रबन्ध का है न कि उसकी परिभाषा का। प्रबन्ध की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

1. स्टेनले वेन्स (Stanley Vance) के शब्दों में, “प्रबन्ध केवल निर्णय लेने एवं मानवीय क्रियाओं पर नियंत्रण रखने की विधि है जिससे पूर्व निश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सके।”

स्टेनले वेन्स द्वारा दी गई परिभाषा की व्याख्या- उपरोक्त परिभाषा की व्याख्या पर प्रबन्ध के संबंध में निम्न तीन बातें स्पष्ट होती हैं- (i) प्रबन्ध निर्णय लेने की एक विधि है (ii) प्रबन्ध मानवीय क्रियाओं पर नियंत्रण रखने की विधि है एवं (iii) प्रबन्धकीय क्रियाएँ निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं।

2. कून्ट्ज तथा ओ’ डोनेल (Koontz and O’ Donnell) के शब्दों में “प्रबन्ध का कार्य अन्य व्यक्तियों द्वारा उनके साथ मिलकर काम करना है।”

कून्ट्ज की परिभाषा का यदि विश्लेषण किया जाए तो उससे निम्न बातें सामने आती हैं- (i) प्रबन्ध एक कला है, (ii) प्रबन्ध का उद्देश्य कार्य को पूर्ण कराना है एवं (iii) प्रबन्ध का कार्य दूसरे व्यक्तियों के साथ मिलकर कार्य करना व उनसे कार्य लेना है।

वास्तव में प्रबन्ध के सभी कार्य स्वयं कार्य करने व दूसरों से कार्य कराने से ही संबंधित होते हैं। यद्यपि प्रबन्ध के सभी कार्य स्वयं करने व दूसरों से कार्य कराने से ही संबंधित होते हैं। यद्यपि प्रबन्ध की उपरोक्त विचारधारा में कुछ दोष भी है। जैसे-(i) प्रबन्ध केवल कला ही नहीं हैं; (ii) प्रबन्ध केवल कर्मचारियों का ही प्रबन्ध नहीं है एवं (iii) प्रबन्ध जोर-जबरदस्ती करना नहीं है।

3. प्रो० जॉन एफ० मी के अनुसार, “प्रबन्ध से तात्पर्य न्यूनतम प्रयास के द्वारा अधिकतम परिणाम प्राप्त करने की कला से है, जिससे नियोक्ता एवं कर्मचारी दोनों के लिए अधिकतम समृद्धि तथा जन-समाज के लिए सर्वश्रेष्ठ सेवा संभव हो सके।”

यह परिभाषा प्रबन्धकों के सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर संकेत करती है। अधिकांश विद्वानों ने प्रबन्ध की परिभाषा इस प्रकार दी है

4. प्रो० जॉर्ज आर० टेरी (George R. Terry) के अनुसार, “प्रबन्ध एक पृथक् प्रक्रिया है जिसमें नियोजन, संगठन, क्रियान्वयन तथा नियंत्रण को सम्मिलित किया जाता है तथा इनका निष्पादन व्यक्तियों एवं साधनों के उपयोग द्वारा उद्देश्यों को निर्धारित एवं प्राप्त करने के लिए किया जाता है।”

उपरोक्त परिभाषा से प्रबन्ध के निम्न लक्षण स्पष्ट होते हैं- (i) प्रबन्ध एक पृथक प्रक्रिया है; (ii) प्रबन्ध के अंतर्गत नियोजन, संगठन, क्रियान्वयन एवं नियंत्रण को शामिल किया जाता है; (iii) इसमें व्यक्तियों व साधनों का उपयोग किया जाता है एवं (iv) प्रबन्ध का उपयोग उद्देश्यों को निर्धारित व प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

5. पीटर एफ ड्रकर (Peter F. Drucker) के अनुसार, “प्रबन्ध एक बहुउद्देशीय तन्त्र है जो व्यवसाय का प्रबन्ध करता है तथा प्रबन्धकों का प्रबन्ध करता है और कार्य वालों एवं कार्य का प्रबन्ध करता है।”

प्रबंध एक संगठित क्रियाकलाप है। इसमें अनेक निर्णय सम्मिलित हैं। यह संगठन के उद्देश्य को प्राप्त करने की एक प्रक्रिया है। प्रबंध के विभिन्न कार्यों को पाँच भागों में बाँटा गया है-
1. नियोजन- पूर्व में ही निर्धारित करना कि क्या करना है, कितना करना है, कैसे करना है, कब करना है और क्यों करना है। यह उद्देश्य को निर्धारित करने की एक प्रक्रिया है। यह भविष्य की अनिश्चितता को अधिक योग्य तरीके से सामना करने की तत्परता है।

2. संगठन-प्रत्येक कार्य निष्पादन की आवश्यकता है-

  • कार्य का वितरण।
  • कर्तव्य का विभाजन।
  • संसाधनों का वितरण।
  • अधिकारों का विभाजन।

यह प्रयास संगठन के उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद करता है। नियोजन के क्रियान्वयन के लिये यह आवश्यक संबंधों की संरचना है।

3. स्टाफींग- प्रबंध का अन्य महत्वपूर्ण कार्य सही व्यक्ति को सही काम पर लगाना है। यह मानवीय संसाधनों से संबंधित है और इसके अन्तर्गत चुनाव, नियुक्ति, स्थानान्तरण, पोस्टिंग एवं प्रशिक्षण मम्मिलित है।

4. निर्देशन- यह नेतृत्व की प्रक्रिया है। यह कर्मचारियों को प्रेरित एवं प्रभावित करने का तरीका है ताकि वे अधिक प्रभावी तरीके से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकें। यह कर्मचारियों से सर्वोत्तम क्षमता प्राप्त करने का एक प्रयास है।

5. नियंत्रण- इसके अन्तर्गत सम्मिलित हैं-

  • निष्पादन के प्रभाव का निर्धारण
  • वास्तविक निष्पादन की जाँच।
  • वास्तविक प्रतिफल की तुलना पूर्व निर्धारित प्रतिफल/प्रभाव से करना।
  • विचलन को करने के लिये सुधारात्मक प्रयास करना।

नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार के संसाधन के दुरुपयोग को रोकना है, संगठन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये उसके उत्पादकता को बढ़ाना है।

प्रबंध के उपर्युक्त सभी कार्य एक-दूसरे से संबंधित हैं एवं एक-दूसरे पर आश्रित हैं क्योंकि प्रबंध एक एकीकृत क्रियाविधि है।

प्रश्न 15.
उत्पाद तथा उत्पाद मिश्रण किसे कहते हैं ? उत्पाद के आयाम कौन-कौन से
उत्तर:
सामान्यतः उत्पादन का अर्थ किसी भौतिक चीज से किया जाता है। जैसे-मोबाइल फोन, पुस्तक, कलम आदि। लेकिन विपणन की दृष्टि से उत्पाद का अभिप्राय प्रत्येक उस चीज से है जिससे क्रेता की किसी आवश्यकता की संतष्टि होती है। अर्थात उत्पाद के अन्तर्गत भौतिक चीजों के साथ-साथ सेवाओं (जैसे-बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) को नहीं बल्कि दूसरों के विचारों तथा सूचनाएँ भी उत्पाद की श्रेणी में आते हैं।

उत्पाद मिश्रण का अर्थ उत्पाद आयामों से लगाया जाता है। विभिन्न उत्पाद आयामों का मिश्रित प्रयोग करते हए जब किसी वस्तु का उत्पादन किया जाता है तो इसे उत्पाद मिश्रण कहते हैं।

उत्पाद के विभिन्न आयाम होते हैं जो इस प्रकार हैं-

  • उत्पाद पंक्ति
  • उत्पाद आकार
  • उत्पाद माँग
  • उत्पाद विस्तार
  • उत्पाद भार
  • उत्पाद किस्म एवं प्रमाप
  • उत्पाद ब्राण्ड
  • उत्पाद गहराई
  • उत्पाद लेवलिंग/ ट्रेडमार्क
  • उत्पाद पैकेजिंग
  • उत्पाद विकास
  • उत्पाद परीक्षण
  • विक्रय उपरान्त सेवाएँ।

प्रश्न 16.
ब्राण्ड से क्या आशय है ? एक अच्छे ब्राण्ड की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
ब्राण्ड एक शब्द, नाम, चिह्न, डिजाइन या इनके सहयोग से बना हुआ एक सम्मिश्रण है। उत्पादकों अथवा निर्माताओं द्वारा अपने उत्पाद की पहचान के लिए जिन व्यापारिक चिह्नों का उपयोग किया जाता है, वह ब्राण्ड कहलाता है।

एक अच्छे ब्राण्ड के निम्नलिखित विशेषताएँ होती है-
(i) यह विशिष्ट होना चाहिए- बाजार में अधिक-से-अधिक काम किए गए नाम और अधिक उपयोग किए गए प्रतीकों से भरा होता है। एक अद्वितीय और विशिष्ट प्रतीक केवल याद रखना आसान नहीं है बल्कि एक विशिष्ट सुविधा भी है “नॉर्थस्टार” जूते का एक अलग नाम है।

(ii) यह सचक होना चाहिए- एक अच्छी तरह से चुना नाम या प्रतीक गुणवत्ता के सूचक होना चाहिए या श्रेष्ठता या एक महान व्यक्तित्व के साथ जुड़ा हो सकता है। यात्रियों के लिए वीआईपी क्लासिक नाम एक अलग वर्ग के लोगों के लिए श्रेष्ठता गुणवत्ता का सूचक है।

(iii) यह उचित होना चाहिए- कई उत्पादों उपभोक्ताओं के दिमाग में एक विशिष्ट रहस्य से घिरे हैं। सावधानी एक सेनेटरी तौलिया एक उपयुक्त ब्रांड नाम है।

(iv) यह याद रखना आसान होना चाहिए- इसे पढ़ना उच्चारण करना और याद रखना आसान होना चाहिए। ह्वील, सर्फ, गोल्ड स्पॉट ऐसे ब्राण्ड नाम के उदाहरण हैं।

(v) यह नए उत्पादों के लिए अनकलनीय होना चाहिए- वीडियोकॉन टीवी और मोबाइल के लिए अच्छा ब्राण्ड नाम है लेकिन जब यह रेफ्रिजेरेटर और वाशिग मशीन तक बढ़ाया जाता है तो कुछ बिक्री अपील खो जाती है। हॉटलाइन गैस स्टोव के लिए अच्छा नाम था, लेकिन निश्चित रूप से टीवी के लिए उपयुक्त नाम नहीं है।

प्रश्न 17.
किसी वस्तु या सेवा का चुनाव करते समय साहसी को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर:
किसी वस्तु या सेवा का चुनाव करते समय साहसी को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-
(i) बाजार का निर्धारण- उत्पाद का चुनाव करने से पूर्व बाजार का निर्धारण कर लेना चाहिए। उक्त उत्पाद का बाजार स्थानीय होगा या राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय होगा। साहसी को नये उत्पाद लाते समय बाजार सर्वेक्षण कराकर इस बात की तसल्ली चाहिए कि उस उत्पाद की माँग बाजार में विद्यमान है। बाजार सर्वेक्षण के अन्तर्गत माँग, पूर्ति, वस्तु की लागत एवं मूल्य, प्रतियोगिता, नये परिवर्तन की संभावना विज्ञापन एवं प्रचार परं प्रभाव आदि बातों का अध्ययन किया जाता है।

(ii) व्यावहारिकता- साहसी को उत्पाद की वास्तविक जीवन में उपयोगिता पर विचार करना चाहिए। यदि वह उत्पाद पहले से ही बाजार में विद्यमान है और साहसी उसका नया परिवर्तित रूप लाने के बारे में सोच रहा है तो उसे देखना चाहिए कि उस रूप की व्यावहारिकता वर्तमान समय में कितनी होगी।

(iii) उत्पादन लागत- किसी वस्तु के उत्पादन करने से पूर्व साहसी को उत्पाद की प्रति इकाई लागत का आकलन करना चाहिए ताकि उपभोक्ता की जेब के अनुकूल हो। अधिक ऊँची कीमत होने की स्थिति में उत्पाद की माँग सीमित होगी।

(iv) प्रतियोगिता- वर्तमान युग प्रतियोगिता का युग है। ऐसी स्थिति में यदि इसे इन प्रतियोगियों से लोहा लेते हुए आगे बढ़ना है तो ऐसे उत्पाद का चुनाव करना होगा जो बाकी प्रतियोगियों की तुलना में बेहतर किस्म और कम दाम का हो।

(v) कच्चे माल की पर्याप्तता एवं सतत् उपलब्धता- उत्पाद का चुनाव करते समय साहसी को यह देखना चाहिए कि उसके उत्पाद के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल निबांध रूप से मिलता रहेगा या नहीं।

(vi) तकनीकी पहलू- कच्चे माल के प्रति आश्वस्त हो जाने के बाद साहसी को यह देखना चाहिए कि उसके उत्पाद के लिए किसी मशीन, यंत्र, उपकरण एवं तकनीकी आदि की आवश्यकता होगी। यह कितने में और कहाँ से उपलब्ध हो सकेगा। उसे चलाने के लिए किस स्तर के प्रशिक्षित कर्मचारी की आवश्यकता होगी। उन कर्मचारियों की उपलब्धता आसानी से हो सकेगा अथवा नहीं। अतः उत्पाद के चुनाव में तकनीकी पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए।

(vii) लाभ की संभावना- साहसी को अपने उत्पाद की वार्षिक बिक्री और उस पर होने वाले लाभ का अनुभव पहले कर लेने के बाद ही उत्पाद का चुनाव करना चाहिए।

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