BSEB Bihar Board 12th Entrepreneurship Important Questions Short Answer Type Part 4 are the best resource for students which helps in revision.

Bihar Board 12th Entrepreneurship Important Questions Short Answer Type Part 4 in Hindi

प्रश्न 1.
बिचौलिए अथवा मध्यस्थ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
एक वितरण प्रणाली में मौलिक उत्पादक, अन्तिम क्रेता एवं कोई भी मध्यस्थ, जैसे थोक एवं फुटकर व्यापारी शामिल होते हैं। मध्यस्थ शब्द का अभिप्राय उन संस्थाओं एवं व्यक्तियों से सम्बद्ध है जो प्रणाली के मध्य स्थित, जोकि वस्तु के अधिकार को हस्तांकन/विक्रय बिक्री एजेन्ट अथवा कमीशन एजेन्ट के रूप में हस्तांकन अथवा विक्रय कर सके। माल के स्वामित्व अधिकार को लिए हुए मध्यस्थों को व्यापारी के रूप में विभाजित कर सकते हैं यथा मध्यस्थ एवं एजेन्ट मध्यस्थ। मध्यस्थ पहले स्वामित्व व अधिकार प्राप्त कर उसे आगे अपने तरीके से बिक्री करते हैं। एजेन्ट मध्यस्थ को ऐसा अधिकार प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 2.
अंश क्या है ?
उत्तर:
कम्पनी की पूँजी सम- मूल्य अनेक भागों में बाँटी जाती है, जिन्हें अंश कहते हैं। जे० फारवैल (J. Farwel) के अनुसार, “एक अंश, कम्पनी में अंशधारी की रुचि है जोकि एक मुद्रा राशि में मापा जाता है, प्रथम कम्पनी के दायित्व के रूप में, द्वितीय, उसकी रुचि का सूचक तथा .अंशधारियों के परस्पर सम्बन्ध की शर्तों का सम्मेलन है।” कम्पनी अधिनियम 1956 की धारा 2 (46) अंश को इस प्रकार परिभाषित करती है, “कम्पनी की अंश पूँजी का एक भाग एवं जिसमें स्टॉक भी सम्मिलित है जब तक कि स्टॉक एवं अंशों का अन्तर स्पष्ट अथवा समाविष्ट रखा जाए।”

प्रश्न 3.
ऋण पत्र क्या है ?
उत्तर:
एक कम्पनी दीर्घवित्त, सार्वजनिक उधार लेकर एकत्रित कर सकती है। ऐसे ऋण, ऋण पत्रों के निर्गमन द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। ऋण पत्र, किसी ऋण की स्वीकृति है। थॉमस इवलिन (Thomas Evelyn) के अनुसार, “ऋण पत्र कम्पनी की सार्वमुद्रा के अंतर्गत एक प्रलेख है जो कम्पनी को मूलधन प्रदान करता है तथा उस पर एक निश्चित दर से ब्याज का भुगतान करने का अनुबंध है, जिसे प्रायः कम्पनी का स्थायी या परिवर्तनीय संपत्तियों पर प्रभार (charge) देकर प्राप्त किया जाता है तथा जो कम्पनी को दिए गए ऋण की स्वीकृति है।”ऋण पत्र का धारक कम्पनी का ऋणदाता होता है। ऋण पत्रों पर निश्चित दर पर ब्याज देने की व्यवस्था होती है। ऐसा ब्याज कम्पनी के लाभों पर एक भार होता है। जब ऋण पत्र सुरक्षित होता है, तब अन्य ऋणदाताओं की तुलना में उसे भुगतान प्राप्ति की प्राथमिकता भी प्राप्त है।”

प्रश्न 4.
उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने हेतु अर्द्ध-वैधानिक अधिकारियों जैसे जिला परिषद् (District Forum) राज्य एवं राष्ट्रीय कमीशन के गठन का प्रावधान करता है। इसका उद्देश्य है माल के विक्रेता से उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना। उपभोक्ता को सुरक्षा नशीले व खतरनाक वस्तुओं की आपूर्ति से हानि की सुरक्षा का अधिकार, माल की कीमत, किस्म की सूचना प्राप्त करने का अधिकार, प्रतिस्पर्धी कीमत पर विविध वस्तु पर पहुँच का अधिकार, अनुचित व्यापार व्यवहारों के विरुद्ध निवारण का अधिकार एवं उपभोक्ता शिक्षण का अधिकारों के प्रावधान है।

प्रश्न 5.
व्यावासायिक संवृद्धि की प्रकृति एवं आशय बतावें।
उत्तर:
संवृद्धि उपक्रम के बाजार में बने रहने तथा सफलता का प्रतीक है। यह उर्द्धगामी क्रमिक विकास है जो क्रियाओं के प्रारंभिक स्तर से प्रारंभ होता है।

व्यवसाय की संवृद्धि का आशय है-

  • फर्म की बेहतर ख्याति
  • बाजार के अंश में सुधार
  • पर्याप्त लाभदायकता
  • उपभोक्ता का विश्वास
  • व्यवसाय का विस्तार तथा उत्पाद विविधीकरण
  • प्रतिस्पर्धा का सामना करने की क्षमता
  • इकाई का दीर्घकालीन जीवन

संवृद्धि प्रदर्शित (इंगित) होता है-

  • परिचालन के स्तर में सुधार द्वारा
  • संसाधनों के बेहतर उपयोग द्वारा
  • उत्पादन की बढ़ती मात्र द्वारा
  • नई वस्तुओं व सेवाओं में वृद्धि से
  • नये बाजारों में प्रवेश से
  • लाभदायकता तथा उत्पादकता से
  • कार्य निष्पादन में प्रबन्धकीय कुशलता से।

प्रश्न 6.
व्यावसायिक प्रबंध में समविच्छेद-बिन्दु (B. E. P.) का क्या महत्व है?
उत्तर:
सम-विच्छेद बिन्दु उत्पादन एवं विक्रय का वह स्तर या बिन्दु है जहाँ पर व्यवसाय को न लाभ होता है न हानि होती है। अर्थात इस बिन्दु पर शून्य लाभ व शून्य हानि की स्थिति रहती है। यह वह बिन्दु है जहाँ लागत एवं आगम बराबर होते हैं।
(Cost = Revenue )

सम-विच्छेद बिन्दु के निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. यह उत्पादन की न्यूनतम मात्रा निर्धारित करने में सहायता करता है।
  2. यह बिक्री की न्यूनतम मात्रा के निर्धारण में सहायता करता है।
  3. यह उत्पादन में कमी या वृद्धि का व्यवस्था के लाभ पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान लगाने में पथ-प्रदर्शक का कार्य करता है।
  4. यह विश्लेषण यह जानने में उपयोगी है कि किस उत्पादन से आय का अधिक अर्जन हो रहा है।
  5. वांछित लाभ की गणना में यह सहायक है।
  6. यह निर्णय प्रक्रिया को आसान बनाता है और निर्णय में शीघ्रता लाता है।
  7. यह वस्तु व सेवाओं के संशोधित विक्रय मूल्य के निर्धारण में सहायता करता है।

प्रश्न 7.
एक व्यवसाय में कार्यशील पूँजी की मुख्य आवश्यकताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
पूँजी व्यवसाय के परिचालन का आधार है।
पूँजी को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

  • स्थायी पूँजी
  • कार्यशील पूँजी

कार्यशील पूँजी की आवश्यकता व्यवसाय की निम्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करती है-

  • कच्चे माल तथा उपभोग वस्तुओं के क्रय के लिए।
  • अर्द्ध निर्माणी चरण के कार्य को पूरा करने के लिए।
  • निर्मित वस्तुओं को पूरा करने के लिए. ताकि वे विक्रय के लिए उपलब्धा हो सके।
  • दिन-प्रतिदिन के कार्यों की लागत या खर्चे को पूरा करने के लिए जैसे- मजदूरी, बिजली खर्च, बिजली बिल, टेलीफोन , डाक, किराया तथा अन्य आकस्मिकताओं को पूरा करने के लिए।
  • व्यवसाय की शोधन क्षमता को बनाये रखने के लिए।

प्रश्न 8.
बाजार वातावरण का अर्थ लिखें।
उत्तर:
बाजार वातावरण का अर्थ (Meaning of Market Environment)- वस्तुतः विपणन के कार्य एक निश्चित वातावरण में सम्पादित होते हैं। विपणन कार्य का निष्पादन करते समय विपणन वातावरण की सही-सही जानकारी आवश्यक होती है। विपणन मिश्रण भी एक निश्चित वातावरण में ही संभव होता है। विपणन वातावरण के सभी घटकों द्वारा भी विपणन प्रबन्ध को नियंत्रित करना संभव नहीं होता है।

विपणन वातावरण सूक्ष्म अध्ययन करने के बाद ही विपणन की व्यूह-रचना तैयार की जानी चाहिए। विपणन क्रिया को प्रभावित करने वाले मुख्यतः दो घटक होते हैं-नियन्त्रणीय घटक एवं अनियन्त्रणीय घटक, जो व्यवसाय को प्रभावित करते हैं। विपणन विभाग को चाहिए कि इन घटकों की सीमा में रहकर ही कार्य-निष्पादन करे।

प्रश्न 9.
बाजार मूल्यांकन क्या है ? बाजार मूल्यांकन करते समय एक उद्यमी को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर:
वस्तुत: बाजार में उन वस्तुओं को प्रस्तुत किया जाता है जिनकी माँग ग्राहक करते है। किन्तु यह निर्धारित करना कि ग्राहक क्या चाहते हैं, एक जटिल काम है। बाजार में विविध प्रकार के ग्राहक होते हैं। उनकी पृष्ठभूमि शिक्षा, आय, चाहत, पसन्द आदि के सम्बन्ध में अलग-अलग होती है। ये विजातीय ग्राहक उपक्रम के निकट एवं दूरस्थ में होते हैं जिसके परिणामस्वरूप उनकी माँगें भी भिन्न-भिन्न होती हैं। किसी भी उत्पादक के लिए असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है कि इन विविध प्रकार के ग्राहकों के लिए विविध कोटि की वस्तुओं का उत्पादन करें। अतः एक उद्यमी को यह तय कर लेना चाहिए कि किस कोटि के ग्राहकों के लिए वह वस्तुओं का उत्पादन करना चाहता है। इस बात का निर्धारण कर लेने के बाद सम्बन्धित समूह के ग्राहकों की माँग का अनुमान लगाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में माँग-पूर्वानुमान से उद्यमियों को काफी मदद मिलती है।

बाजार मूल्यांकन करते समय एक उद्यमी को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए-
1. माँग (Demand)- उत्पाद की पहचान कर लेने के बाद माँग का अनुमान लगा लेना चाहिए । माँग का अनुमान लगाते समय बाजार के आकार तथा उस क्षेत्र को ध्यान में रखना चाहिए जहाँ वस्तुएँ अथवा सेवाएँ बेचनी हैं। उदाहरणतः वस्तुओं को स्थानीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बेचना। इतना ही नहीं, यह भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा कि लक्षित उपभोक्ता कौन है ? उनकी पसन्द कैसी है ? रुचि कैसी है ? आदि।

2. पूर्ति एवं प्रतिस्पर्धा की प्रकृति (Supply and Nature of Competition)- बाजार मूल्यांकन करते समय साहसी द्वारा वस्तुओं की बाजार में पूर्ति एवं प्रतिस्पर्धा सम्बन्धी बातों का अध्ययन कर लेना चाहिए। जब किसी उत्पाद की माँग किसी मौसम विशेष से होती है तो उसका उत्पादन भी अनियमित ही करना चाहिए। वस्तुओं की पूर्ति करने वालों के बीच में प्रतिस्पर्धा भी होती है, अतः एक उद्यमी को प्रतिस्पर्धियों की उत्पादन क्षमता, पूर्ति बढ़ाने की क्षमता, वित्तीय स्थिति का ज्ञान तथा उनकी ख्याति का सही-सही अध्ययन कर लेना चाहिए। .

3. उत्पाद की लागत एवं कीमत(Cost and Price of the Product)- उत्पाद की पहचान करते समय उसकी लागत पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि किसी वस्तु की कीमत उसकी लागत पर ही निर्भर करती है। वस्तु की कीमत बाजार के ही अनुरूप निर्धारित की जानी चाहिए अन्यथा उद्यमी को किसी भी अन्य परिस्थिति में क्षति ही होगी।

4. परियोजना का नवीनीकरण तथा परिवर्तन(Project Innovation and Change)- बाजार आकलन के लिए योजना का नवीनीकरण एवं नवीन परिवर्तनों का अध्ययन आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त उन्हें तकनीकी लाभों को भली-भाँति समझ लेना चाहिए क्योंकि इनका प्रभाव वस्तु की गुणवत्ता, लागत तथा बिक्री मूल्य पर पड़ता है।

प्रश्न 10.
उद्यमिता क्या है ?
उत्तर:
उद्यमिता एक प्रक्रिया है-

  • निवेश एवं उत्पादन अवसर के पहचान करने की,
  • व्यावसायिक क्रियाकलापों के संगठन की,
  • संसाधनों जैसे श्रम, पूँजी, सामग्री तथा प्रबन्धन को गतिशील बनाने की,
  • सामाजिक निर्णय लेने की।

प्रश्न 11.
उपक्रम का प्रवर्तन अथवा विन्यास का वर्णन करें।
उत्तर:
एक उद्यमी वह है जो अपनी कल्पना को कार्यरूप में परिणत करे और वह कार्यरूप व्यावसायिक उपक्रम के प्रवर्तन से सम्बन्धित हो। एक उद्यमी व्यावसायिक अवसरों को ढूँढता है, इसके भविष्य का विश्लेषण करता है, व्यावसायिक विचार का सृजन करता है एवं संसाधनों जैसे-श्रम, मशीन, सामग्री, एवं प्रबन्धकीय कौशल आदि में गतिशीलता उत्पन्न कर नये उपक्रम की स्थापना करता है। अतः एक उद्यमी से प्रवर्तक के रूप में कार्य करने की आशा की जाती है। एक नये उपक्रम की स्थापना के सम्बन्ध में उसे साहसिक निर्णय लेने होते हैं। प्रवर्तक के प्रारम्भिक कार्य के अभाव में नये उपक्रमों के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।

जी० डब्ल्यू० गेस्टनबर्ग के अनुसार, “प्रवर्तन नये व्यवसाय के अवसरों की खोज के रूप में परिभाषित किया जा सकता है और उसके बाद कोष, सम्पत्ति एवं प्रबन्धकीय क्षमता को संगठित कर व्यवसाय में प्रयुक्त करना ताकि उनसे लाभार्जन हो सके।” इस प्रकार प्रवर्तक का आशय व्यवसाय अथवा उत्पाद के विचार का सृजन करना, व्यावसायिक अवसरों की खोज करना, जाँच-पड़ताल, एकत्रीकरण, वित्तीय व्यवस्था एवं उपक्रम को एक गतिमान संस्था के रूप में प्रस्तुत करना आदि से है।

प्रश्न 12.
परियोजना के चरणों का वर्णन करें।
उत्तर:
एक परियोजना विभिन्न चरणों से होकर गुजरती है। हालाँकि यह जरूरी नहीं है कि एकं परियोजना निम्नांकित चरणों से होकर गुजरे। परियोजना के प्रमुख चरणों को नीचे बताया गया है-

1. संकल्पना चरण (Conception Phase)- परियोजना से संबंधित विचारों का सृजन इस चरण में किया जाता है। परियोजनाओं की पहचान के पश्चात् उन्हें प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्थित किया जाता है। प्राथमिकता के आधार पर ही परियोजनाओं का चुनाव एवं विकास किया जाता है।

2. परिभाषा चरण (Definition Phase)- दूसरे चरण में प्रारम्भिक विश्लेषण किया जाना चाहिए। इस विश्लेषण में मार्केटिंग, तकनीकी, वित्तीय तथा आर्थिक पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। इस विश्लेषण का उद्देश्य यह जानना होता है कि वित्तीय संस्थाओं तथा विनियोगकर्ताओं के लिए परियोजना कितनी आकर्षक है। इसके बाद परियोजनाओं की व्यवहार्यता जानने के लिए साध्यता अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन से गहन विश्लेषण के बाद एक अच्छी परियोजना तैयार की जा सकती है। इसके परिणाम को साध्यता प्रतिवेदन के रूप में रखा जाता है। परिभाषा चरण के बाद परियोजना कार्यान्वयन हेतु तैयार हो जाती है, परन्तु कार्यान्वयन से पहले कुछ योजना बनायी जाती है।

3. योजना एवं संगठन का चरण (Planning and Organising Phase)- इस चरण में परियोजना से संबंधित विभिन्न पहलुओं जैसे आधारभूत संरचना, अभियांत्रिकी अभिकल्पना, नित्यक्रम, बजट, वित्त आदि से सम्बन्धित एक विस्तृत योजना बनायी जानी चाहिए। परियोजना की , संरचना का सृजन इस प्रकार से करना चाहिए ताकि वह संगठन, मानव शक्ति, तकनीक, प्रक्रिया आदि से संबंधित हो तथा परियोजना प्रबंधक इसको आसानी से लागू कर सके।

4. क्रियान्वयन चरण (Implementation Phase)- इस चरण में विस्तृत अभियांत्रिकी, उपकरण, मशीनरी, सामग्री एवं निर्माण ठेके के संबंध में आदेश दिए जाते हैं। इसके पश्चात् दीवानी एवं अन्य निर्माण कार्य किया जाता है। इसके अलावा प्लांट का पूर्व परीक्षण तथा परीक्षण जाँच किया जाता है। अतः कार्यान्वयन चरण सबसे महत्त्वपूर्ण चरण है जिस दौरान परियोजना को आकार . मिलता है तथा उसे अस्तित्त्व में लाया जाता है।

5. अंतिम चरण (Clean-up Phase)- इस चरण में परियोजना की आधारभूत संरचना को खोल दिया जाता है तथा मशीनों को संचालक श्रमिकों के हवाले कर दिया जाता है। अर्थात् उत्पादन प्रारम्भ करने की तैयारी की जाती है। उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि परियोजना के मुख्यतः तीन चरण होते हैं, क्योंकि योजना एवं संगठन चरण तथा अंतिम चरण, क्रियान्वयन चरण के ही भाग हैं।

प्रश्न 13.
परियोजना प्रबन्ध क्या है ?
उत्तर:
आधुनिक समय में परियोजना प्रबन्ध एक जटिल एवं तेजी से विकसित होने वाली धारणा एवं व्यवहार है। परियोजना प्रबन्ध को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है “परियोजना प्रबन्ध दिए गए समय एवं लागत में निश्चित परिणामों को प्राप्त करने के लिए प्रारम्भ से अंत तक योजना एवं निर्देशन की एक प्रक्रिया है।” इसलिए परियोजना प्रबन्ध आधुनिक समय की माँग है। अपने प्रस्तावित विनियोग से अच्छे परिणामों को प्राप्त करने के लिए उद्यमी को एक प्रभावशाली परियोजना प्रबन्ध का अनुसरण करना चाहिए। वास्तविकता में विनियोग की कुशलता दोनों समय एवं लागत व्यवहार के प्रभावशाली प्रबन्ध पर निर्भर करती है। किसी भी उद्यम की सफलता उसमें किए गए विनियोग से सफलतापूर्वक लाभों को बढ़ाने की क्षमता पर निर्भर करती है।

प्रश्न 14.
परियोजना पर्यावरण के आयामों का वर्णन करें।
उत्तर:
एक उद्यमी को उपयुक्त अवसरों की पहचान करने की जरूरत होती है। विभिन्न आयामों जैसे उत्पाद सेवा, तकनीक, उपकरण, उत्पादन का स्तर, बाजार, स्थान आदि के लिए. लोगों के विचार अलग-अलग होते हैं। उद्यमी के लिए इन आयामों के बीच चुनाव करना एक कठिन कार्य है। परियोजन विनियोगों के अवसरों की पहचान में अपने व्यवसाय के वातावरण को समझना एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। पर्यावरण के विभिन्न आयाम निम्नलिखित हैं-

  • व्यावसायिक वातावरण
  • औद्योगिक नीति
  • औद्योगिक विकास का नियम
  • विदेशी विनियोग के लिए नियमों का ढाँचा
  • औद्योगिक विकास के संवर्धन हेतु उठाए गए कदम
  • उदारीकरण एवं नई आर्थिक नीति आदि।

प्रश्न 15.
व्यवसाय नियोजन के उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
व्यवसाय नियोजन योजनाबद्ध एवं लचीला होना चाहिए ताकि आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन लाया जा सके। यह तभी संभव है जब प्रबन्धक व्यवसाय नियोजन तैयार करते समय दल के अन्य सदस्यों से विचार-विमर्श कर ले। व्यवसाय नियोजन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • कार्य का संचालन करने के लिए आधार की व्यवस्था करना तथा योजना में प्रत्येक भाग लेने वाले के बीच उत्तरदायित्व का निर्धारण करना।
  • नियोजन तैयार करने वाले दल के सदस्यों के बीच सम्प्रेषण एवं समन्वयन की व्यवस्था करना।
  • परियोजना में भाग लेने वालों को आगे (भविष्य) देखने के लिए प्रेरित करना।
  • परियोजना में भाग लेने वालों को शीघ्र कार्य-निष्पादन के लिए जागरूक करना जिससे नियोजन का कार्य समय पर पूरा किया जा सके।
  • परियोजना को लागू करने में उत्पन्न होने वाली अनिश्चितता को दूर करना।
  • संचालन की दक्षता में सधार लाना।
  • परियोजना के सम्बन्ध में आवश्यक सूचना प्रदान करना।
  • उद्देश्यों को समझने की समुचित व्यवस्था करना।
  • कार्य की देख-रेख एवं नियंत्रित करने का आधार तैयार करना आदि।

प्रश्न 16.
प्रबन्धकीय दक्षता का वर्णन करें।
उत्तर:
उपक्रम की सफलता में प्रबन्ध की अहम भूमिका होती है। वस्तुतः प्रबन्धकीय दक्षता के आभाव में परियोजना की सारी साध्यता शून्य हो जाती है। इसके विपरीत आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर परियोजना भी प्रबन्धकीय दक्षता की स्थिति में सफल हो सकती है। अतः किसी परियोजना का मूल्यांकन एवं विश्लेषण करते समय प्रबन्धकीय दक्षता को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है कि प्रबन्धकीय दक्षता के अभाव में बहुत सारे उद्योग-धंधे बीमार हो गये और कुछ तो बंद हो गये और अन्त बंद होने के कगार पर खड़े हो गये। यह स्थिति विशेषकर लघु-उद्योगों के सम्बन्ध में अधिक देखने को मिलती है।

प्रबन्धकीय दक्षता के अन्तर्गत केवल प्रवर्तकों की दक्षता का मूल्यांकन करना शामिल नहीं होता बल्कि महत्त्वपूर्ण कर्मचारियों, प्रशिक्षण व्यवस्था एवं पारिश्रमिक भुगतान की पद्धति आदि भी शामिल होते हैं।

प्रश्न 17.
स्थिर पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर:
अलग-अलग उपक्रमों में स्थिर पूँजी की आवश्यकता अलग-अलग होती है। स्थिर पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले विभिन्न तत्त्व हैं जो निम्नलिखित हैं-

1. व्यवसाय के प्रकार (Type of Business)- व्यवसाय का आकार एवं प्रकृति पर निर्भर करता है कि कितनी स्थिर पूँजी की आवश्यकता होगी। निर्माणी संस्थाओं में स्थिर पूँजी की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें भूमि, भवन, मशीन, औजार, फर्नीचर आदि क्रय करने होते हैं। इसी प्रकार सामाजिक उपयोगिता की संस्थाएँ जैसे-रेलवे, बिजली विभाग, जल आपूर्ति संस्थाओं में अधिक स्थिर पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें स्थिर सम्पत्तियों पर अधिक विनियोग करना होता है। दूसरी ओर व्यापारिक संस्थाओं में चल सम्पत्तियों पर अधिक विनियोग करने की आवश्यकता होती है। इनमें कार्यशील पूँजी की अधिक आवश्यकता होती है।

2. व्यवसाय का आकार (Size of the Business)- व्यवसाय के आकार से भी स्थिर पूँजी प्रभावित होती है। बड़े व्यवसाय गृहों में बड़ी-बड़ी मशीनों की आवश्यकता होती है जिनके क्रय पर अधिक स्थिर पूँजी की आवश्यकता होती है।

3. उत्पादन तकनीक (Technique of Production)- स्थिर पूँजी की आवश्यकता संस्था द्वारा अपनायी गयी उत्पादन तकनीक पर निर्भर करती है। जिन संस्थाओं में गहन-पूँजी तकनीक अपनायी जाती है वहाँ स्थिर पूँजी की आवश्यकता अधिक होती है। इसके विपरीत जिन संस्थाओं में गहन-श्रम तकनीक अपनायी जाती है वहाँ स्थिर पूँजी की आवश्यकता कम होती है।

4. अपनायी गयी क्रियाएँ (Activities Undertaken)- संस्था द्वारा अपनायी गई क्रियाओं पर भी स्थिर पूँजी की आवश्यकता निर्भर करती है। यदि उत्पादन एवं वितरण दोनों प्रकार की क्रियाएँ अपनायी जाती हैं तो स्थिर पूँजी की आवश्यकता अधिक होगी। इसके विपरीत यदि केवल निर्माण अथवा व्यापारिक क्रियाओं का ही निष्पादन किया जाता है तो स्थिर पूँजी की आवश्यकता कम होगी।

प्रश्न 18.
कोष के प्रवाह का अर्थ एवं अवधारणा का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रवाह का आशय बहाव से है जिसके अन्तर्गत अन्तर्ग्रवाह एवं बाह्य प्रवाह दोनों शामिल होते हैं। कोष प्रवाह का आशय एक निश्चित अवधि में कोष में होने वाले अन्तर से है। कोष का प्रवाह तब माना जाता है जब लेन-देन के पूर्व के कोष में अन्तर हो जाये। यह परिवर्तन धनात्मक अथवा ऋणात्मक कुछ भी हो सकता है, अर्थात् कार्यशील पूँजी से कमी अथवा वृद्धि को कोष प्रवाह कहा जाता है। कार्यशील पूँजी को प्रभावित करने वाले लेन-देन कोष के स्रोत अथवा उपयोग के रूप में कार्य करते हैं।

व्यवसाय में विभिन्न लेन-देन किये जाते हैं। उनमें से कुछ कोष को बढ़ाते हैं तथा कुछ घटाते हैं तथा कुछ कोष पर कोई प्रभाव नहीं डालते हैं। यदि कोई लेन-देन कोष में वृद्धि करता है तो इसे कोष का स्रोत कहेंगे। उदाहरण के लिए व्यवसाय में पूर्व से विद्यमान कोष 25,000 रु० का है एवं बाद में 5,000 रु० का अंश निर्गमित होता है तो अब कुल 30,000 रु० (25,000+ 5000) को हो जायेगा। यहाँ अंश के निर्गमन से प्राप्त 5,000 रु० को स्रोत माना जाएगा। यदि लेन-देन से कोष में कमी होती है तो इसे कोष का प्रयोग कहेंगे।

उदाहरण के लिए पूर्व का कोष 25,000 रु० है एवं बाद में 5,000 रु० का उपस्कर खरीदा गया जिसके परिणामस्वरूप अब कोष 20,000 रु० (25,000 – 5,000) हो जायेगा। यहाँ उपस्कर के क्रय पर लगे धन,5.000 रु० को कोष का प्रयोग कहा जायेगा। यदि लेन-देन के परिणामस्वरूप कोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तो इसे गैर-कोष लेन-देन कहेंगे। उदाहरण के लिए पूर्व का कोष 25,000 रु० है एवं बाद में 5,000 रु० की स्थायी सम्पत्ति अंशों के निर्गमन द्वारा क्रय किया जाता है तो कोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा अर्थात् 25,000 रु० (25,000 + 0) ही रहेगा क्योंकि लेन-देन के दोनों पक्ष (नाम एवं जमा) गैर-चालू (Non-current) प्रकृति के हैं।

प्रश्न 19.
सम-विच्छेद विश्लेषण के लाभों का विश्लेषण करें।
उत्तर:
सम-विच्छेद विश्लेषण विभिन्न प्रबन्धकीय समस्याओं के हल में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है-

  • निर्माणी, प्रशासनिक, सामान्य, विक्रय एवं वितरण आदि व्ययों का नियन्त्रण।
  • एक नए उत्पाद की प्रवर्तनात्मक सम्भावना का मूल्यांकन करना।
  • मूल्य परिवर्तन का लाभ एवं सम-विच्छेद बिन्दु पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वानुमान करना।
  • मजदूरी दर में परिवर्तन का लाभ एवं सम-विच्छेद बिन्दु पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वानुमान करना।
  • प्लाण्ट के आकार एवं प्रविधि में परिवर्तन का लाभ एवं सम-विच्छेद बिन्दु पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वानुमान करना।
  • विक्रय मार्ग में परिवर्तन का लाभ एवं सम-विच्छेद बिन्दु पर पड़ने वाले प्रभावों का पूर्वानुमान करना।
  • संचालन एवं वित्तीय उत्तोलक का परीक्षण करना।
  • दो या दो से अधिक उपक्रमों की लाभदायकता की तुलना करना।
  • करारोपण के लाभ पर प्रभावों का विश्लेषण करना।
  • व्यवसाय के संचालन, मितव्ययिता पर संचालन, संगठन एवं भवन संरचना के प्रभावों का विश्लेषण करना।
  • कौन-सा उत्पाद सर्वाधिक लाभप्रद तथा कौन-सा सबसे कम लाभप्रद होगा ?
  • क्या किसी वस्तु की बिक्री या किसी संयंत्र या परिचालन बंद कर दिया जाए ?
  • क्या फर्म को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाए आदि।

प्रश्न 20.
उत्पादन तकनीकों के विभिन्न प्रकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वुड वार्ड (Wood ward) के अनुसार उत्पादन तकनीक के निम्नांकित वर्ग हैं-
1. इकाई एवं अल्प बैच प्रौद्योगिकी (Unit or small Batch Technology)- प्रौद्योगिकी के इस वर्ग के अन्तर्गत वस्तुएँ ग्राहक (माँग) आयामों के अनुसार उत्पादित की जाती हैं अथवा चतुर तकनीक विशेषज्ञों द्वारा अल्प मात्राओं में निर्मित की जाती हैं। ऐसी तकनीक का प्रयोग करने वाले संगठनों में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लि० (Hindustan Aeronatics Ltd.) जो भारत सरकार के लिए हैलीकॉप्टर बनाता है तथा डीजल लोकोमोटिव वर्कस, जो भारतीय रेलवे तथा अन्य देशों की रेल व्यवस्था हेतु डीजल इंजन बनाता है।

2. विस्तृत उत्पादन एवं बड़ी बैच प्रौद्योगिकी (Mass Production and Large Batch Technology)- इस प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत उत्पादन बड़ी मात्रा में किया जाता है। ऐसा जटिल तकनीक मारुति उद्योग लि० अथवा सुजुकी मोटर कार कम्पनी द्वारा स्वचालित वाहन बनाने के लिए इस तकनीक का प्रयोग किया जाता है।

3. निरंतर प्रवाह प्रक्रिया प्रौद्योगिकी (Continuous Flow Process Technology)- प्रौद्योगिकी के इस वर्ग में उत्पाद एक निरन्तर रूपान्तरण प्रक्रिया में से होकर गुजरता है। यह प्रौद्योगिकी अधिक जटिल है तथा प्रक्रिया निर्माणी दवाइयों जैसे रसायन अथवा शुद्धीकरण कम्पनियों द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 21.
प्रबन्ध के क्षेत्रों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रबन्ध के क्षेत्र को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
1. प्रबन्ध की विषय सामग्री (Subject Matter of Management)- इसके अन्तर्गत प्रबन्ध के विभिन्न कार्य आते हैं जैसे नियोजन, संगठन, कार्मिकता, निर्देशन एवं नियंत्रण जिनकी चर्चा पाठ में आगे की गई है।
2. प्रबन्ध का कार्यक्षेत्र (Functional Area of Management)- इस पक्ष के अन्तर्गत, प्रबन्ध के अन्तर्गत निम्नांकित कार्य क्षेत्र आते हैं-

  • वित्तीय प्रबन्ध (Financial Management)- इसमें व्यवसाय के वित्तीय पहलू सम्मिलित हैं जैसे लागत नियंत्रण, बजट नियंत्रण, प्रबन्धकीय लेखांकन आदि।
  • कार्मिक प्रबन्ध (Personnel Management)- इसमें एक उद्यम के कार्मिकों के विभिन्न पक्ष सम्मिलित हैं जैसे भर्ती, प्रशिक्षण, पदोन्नति, पदोचित, पदमुक्ति, औद्योगिक सम्बन्ध, सामाजिक सुरक्षा, श्रम कल्याण आदि।
  • उत्पादन प्रबन्ध (Production Management)- इसमें उत्पादन सम्बन्धी पहलू आते हैं जैसे उत्पादन नियोजन, नियंत्रण, किस्म नियंत्रण आदि।
  • कार्यालय प्रबन्ध (Office Management)- इसमें कार्यालय रूपरेखा, कार्मिकता, यन्त्र रूपरेखा आदि।
  • विपणन प्रबन्ध (Marketing Management)- व्यवसाय द्वारा उत्पादित उत्पाद के विपणन पक्षों से सम्बद्ध हो इसमें कीमत निर्धारण, वितरण प्रणालियाँ (Channels), विपणन अनुसंधान, विक्रय सम्वर्द्धन एवं विज्ञापन आदि आते हैं।
  • रख-रखाव प्रबन्ध (Maintenance Management)- इसका सम्बन्ध व्यवसाय की सम्पत्ति, प्लान्ट, मशीनरी एवं फर्नीचर के रख-रखाव एवं समुचित व्यवस्था से है।

प्रश्न 22.
वातावरण का सूक्ष्म अध्ययन किन कारणों से करना आवश्यक है ?
उत्तर:
कुछ ऐसे कारण हैं जिनके चलते वातावरण का सूक्ष्म अध्ययन करना आवश्यक है। ये कारण हैं-

  • संसाधनों का प्रभावशाली प्रक्षेप
  • वातावरण का लगातार अध्ययन
  • व्यूह रचना बनाने में सहायक
  • खतरों और अवसरों की पहचान
  • प्रबंधकों के लिए सहायक
  • भविष्य का अवलोकन करने में सहायक इत्यादि।

प्रश्न 23.
प्रबन्ध के उद्देश्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
साधनों का उचित उपयोग (Proper Utilisation of Management)- प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य व्यवसाय के विभिन्न साधनों का मितव्ययी ढंग से उपयोग करना है। व्यक्तियों, सामग्री, मशीनरी एवं मुद्रा के सही उपयोग द्वारा समुचित अर्जित लाभों से विभिन्न पक्षों को सन्तुष्ट करना प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य होता है। स्वामी प्रबन्ध से अधिक प्रत्याय की अपेक्षा करते हैं जबकि कर्मचारी, ग्राहक तथा जनता प्रबन्ध से अच्छे व्यवहार की आशा करते हैं। यह सभी हित तभी सन्तुष्ट होंगे जबकि व्यवसाय के भौतिक साधनों का सही उपयोग किया जाये।

2. सम्पादन सुधार (Improving Performance)- प्रबन्ध का लक्ष्य उत्पादन के प्रत्येक घटक का सम्पादन सुधारना है। वातावरण इतना विशुद्ध होना चाहिये कि श्रमिक अपनी अधिकतम क्षमता समर्पित करें। उत्पादन घटकों का समुचित लक्ष्य निर्धारण द्वारा उनका सम्पादन सुधारा जा सकता है।

3. श्रेष्ठतम चातुर्य मंथन (Mobilizing Best Talent)- प्रबन्ध को विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्तियों को इस प्रकार लगाना चाहिए जिससे श्रेष्ठतम परिणाम प्राप्त हों। विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञों की नियुक्ति उत्पादन घटकों की कुशलता बढ़ायेगी; इसके श्रेष्ठ वातावरण निर्माण करने की आवश्यकता है ताकि अच्छे लोगों को उद्यम विशेष से जुड़ने की प्रेरणा मिले। श्रेष्ठ वेतन, उचित सुविधाएँ, भावी विकास सम्भावनाएँ अधिक व्यक्तियों को व्यवसाय में जुड़ने को आकर्षित करेगा!

4. भविष्य हेतु नियोजन (Planning for Future)- प्रबन्ध का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य योजना तैयार करना है। किसी भी प्रबन्ध को वर्तमान कार्य से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए यदि वह कल की नहीं सोचता। भावी योजनाएँ यह तय करें कि आगे क्या करना है। भावी सम्पादन वर्तमान के नियोजन पर निर्भर करता है। अतः भविष्य के प्रति नियोजन किसी भी व्यावसायिक संस्था के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 24.
बाजार क्या है ?
उत्तर:
बाजार वह स्थान है जहाँ वस्तुओं के क्रेता एवं विक्रेता मुद्रा के बदले अपने उत्पादों का क्रय-विक्रय करने हेतु एकत्रित होते हैं। प्रत्येक व्यवसाय लोगों को कोई वस्तु अथवा सेवा बेचता है। परन्तु, प्रत्येक ग्राहक आपकी अथवा प्रतिद्वंदी की सेवाएँ क्रय नहीं करेगा। सक्षम ग्राहकों को निम्न तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

  • व्यक्ति जो उत्पाद अथवा सेवाएँ चाहते हैं,
  • व्यक्ति जो सेवाओं अथवा उत्पादों को क्रय करने योग्य हैं एवं
  • व्यक्ति जो सेवाएँ अथवा उत्पादों को क्रय करने के इच्छुक हैं।

उपरोक्त कथन निम्न प्रकार से समझाए जा सकते हैं-
Bihar Board 12th Entrepreneurship Important Questions Short Answer Type Part 4, 1
लोगों का प्रत्येक वर्ग अनेक व्यक्तियों से जुड़ा हुआ होता है। परन्तु, बाजार केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा घिरा होता है जो आपके द्वारा प्रस्तुत उत्पाद अथवा सेवाओं को क्रय करने के इच्छुक एवं सक्षम हैं।

प्रश्न 25.
माँग पूर्वानुमान अथवा बाजार माँग क्या है ?
उत्तर:
इसके पूर्व कि हम माँग पूर्वानुमान की चर्चा करें, हमें माँग का अर्थ समझना चाहिए।
माँग (Demand)- माँग का साधारण एवं सरलत्तम अर्थ है, ग्राहकों को वस्तु अथवा सेवाएँ क्रय करने की स्वीकृति एवं सामर्थ्य। अन्य शब्दों में, जब ग्राहक वस्तु अथवा सेवाएँ क्रय करने के योग्य होते हैं, हम कह सकते हैं कि उत्पाद अथवा सेवा की माँग उपलब्ध है।

फीलिप कोटहर (Philip Kottler) द्वारा, ‘बाजार माँग’ को इस प्रकार परिभाषित किया गया है, “बाजार माँग उत्पाद की वह कुल मात्रा है जो कि किसी एक ग्राहक वर्ग द्वारा एक भौगोलिक क्षेत्र, एक निश्चित समय में एक निश्चित विपणन वातावरण एवं एक निश्चित विपणन कार्यक्रम के अन्तर्गत क्रय की जाएँ।” ‘बाजार माँग’ को माँग पूर्वानुमान भी कहते हैं।

प्रश्न 26.
माँग पूर्वानुमान की विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
माँग पूर्वानुमान की प्रमुख निम्न विधियाँ हैं-
1. सर्वेक्षण विधि (Survey Method)- यह किसी उत्पाद की भावी माँग अनुमानित करने की विस्तृत प्रयुक्त विधि है। यह विधि सम्भावी ग्राहकों, दुकानदारों एवं बाजार का इस विषय पर जान रखने वाले लोगों से प्राप्त सचनाओं के एकत्रण से है। सर्वेक्षण के अन्तर्गत सचनादाताओं की संख्या कम होने पर सूचना (अल्प संख्या की तुलना में) समस्त लोगों से एकत्र की जाती है। यदि सूचनादाता अधिक हों तो एक प्रतिनिधि संख्या से ही सर्वेक्षण अथवा साक्षात्कार द्वारा सूचना एकत्र कर ली जाती है। बाद वाली विधि ‘न्यादर्श सर्वेक्षण विधि’ कहलाती है।

2. सांख्यिकीय विधि (Statistical Method)- कुछेक सांख्यिकीय विधियाँ भी हैं जैसे “समय श्रेणी विश्लेषण” एवं प्रतीपगमन विश्लेषण (Regression analysis) विधियाँ जो उत्पाद की भावी-माँग का अनुमान लगाने में प्रयोग की जाती हैं। समय श्रेणी विश्लेषण उस समय प्रयोग किया जाता है जब उत्पाद की भावी माँग ज्ञात करने सम्बन्धी माँग के ऐतिहासिक आँकड़े उपलब्ध हों। प्रतीपगमन विश्लेषण का प्रयोग ऐसी अवस्था में किया जाता है जब आय एवं माँग में एक निश्चितं सम्बन्ध प्रस्तुत हो।

अग्रणी सूचक विधि (Leading Indicator Method)- यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि कुछ सूचक अन्य की तुलना में ऊपर अथवा नीचे हर्कत करते हैं। उनकी हलचल के अवलोकन द्वारा, वह घटना जो अनुसरण करे, उससे पूर्व निश्चित किया जाता है। ऐसी हलचल का एक उदाहरण बादलों का वर्षा द्वारा घटित होना है। इसी प्रकार, सरकार द्वारा ऑटोमोबाइल उत्पादन में वृद्धि करना, आटो पूर्जी, डीजल अथवा पेट्रोल की माँग में वृद्धि का सूचक है।

प्रश्न 27.
मध्यस्थ के प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
मध्यस्थ कई प्रकार के होते हैं
1. व्यापारिक मध्यस्थ (Merchant Middlemen)- यह व्यापारी थोक विक्रेता एवं फुटकर व्यापारी है जो माल का स्वामित्व अधिकार प्राप्त कर, माल को पिछले स्तर से वितरण व्यवस्था में अगली प्रणाली तक पहुँचाते हैं। साधारणतः वह अपनी सेवाओं के लिए लाभ एवं बोनस प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं। उल्लेखनीय है कि यह व्यापारी माल की सुपुर्दगी लेकर उसे क्रय/विक्रय करते हैं एवं जोखिम वहन करते हैं और उनके श्रम की कीमत उन्हें लाभ प्राप्त होते हैं। व्यापारिक मध्यस्थों के उदाहरण हैं। दुकानदार (dealer), थोक व्यापारी (wholesaler) एवं फुटकर प्रणाली (retailer) हैं।

2. एजेन्ट मध्यस्थ (Agent Middlemen)- यह मध्यस्थ निर्माता को सम्भावी ग्राहकों की पहचान करवाते हैं। वे माल/सेवा का अधिकार प्राप्त नहीं करते और न ही निर्माता के जोखिम। ऐसे मध्यस्थों में (विदेशी व्यापार से जुड़े/माल छुड़ाने/भिजवाने वाले एजेन्ट), ब्रेकर, जॉबर्स, फैक्टर्स, नीलामकर्ता, कमीशन एजेन्ट एवं विक्रय अभिकर्ता आदि आते हैं। अन्य शब्दों में, बिना वस्तु या सेवाओं के अधिकार लिए, निर्माताओं से वस्तुओं एवं सेवाओं को प्रयोगकर्ताओं को प्रस्तुत करने का कार्य करने वाले एजेन्ट मध्यस्थ कहलाते हैं। वास्तव में, वे निर्माताओं की ओर से कार्य करते हैं, कमीशन के लिए काम करते हैं तथा विपणन एवं खर्च आदि प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

3. सुविधा प्रदाता (Facilitator)- यह वह स्वतन्त्र प्रतिनिधि है जो वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्माता से उपभोक्ता तक माल ग्राहकों को भिजवाने में सहायक सिद्ध होता है। ऐसी ऐजन्सी में यातायात, बैंक एवं बीमा कम्पनियाँ, कोरियर सेवाएँ, पोस्ट ऑफिस, गोदाम आदि सम्मिलित हैं। वह अपनी सेवा फीस चार्ज करता है जैसे भाड़ा व्यय, कमीशन, किराया आदि। परन्तु वे निर्माता की ओर से किसी भी बातचीत प्रक्रिया में शामिल नहीं होते और न ही उन्हें वस्तुओं का स्वामित्व अधिकार ही प्राप्त होता है।

प्रश्न 28.
विक्रय संवर्द्धन को विभिन्न परेभाषा दें।
उत्तर:
विक्रय संवर्द्धन से अभिप्राय किसी ऐसी क्रिया, जोकि बिक्री बढ़ाने एवं ग्राहक के लिए माल का मूल्य बढ़ा सके। मूल्य सृजन, थोक अथवा खुदरा व्यापारियों को मात्रा बट्टा देकर उनका लाभ बढ़ाता है। अतः विक्रय संवर्द्धन विशिष्ट क्रय को प्रत्यक्ष रूप से उत्साहित करता है। यदि उद्यमी थोक विक्रेताओं के माध्यम से बढ़ावा देता है तो उद्यमी को उसके लिए विक्रय संवर्द्धन के प्रयास करने चाहिए, जिसके लिए उसे उपयुक्त वितरण प्रणाली का चयन करना पड़ता है।

विक्रय संवर्द्धन की परिभाषाएँ (Definitions of Sale Promotion)- अनेक लेखकों ने विक्रय संवर्द्धन की इस प्रकार परिभाषाएँ दी हैं-

  1. विलयम जे० स्टाटन (William J. Stanton) के अनुसार, “विक्रय संवर्द्धन सूचना, सुझाव एवं प्रभावित करने का एक अभ्यास है।”
  2. फिलीप कोटलर के अनुसार, “संवर्द्धन के अन्तर्गत विपणन मिश्रण के सभी यन्त्रों से है जिनका प्रमुख उद्देश्य विश्वास प्रेषण है।”
  3. अमरीकन विपणन परिषद् के शब्दों में, “व्यक्तिगत विक्रय, विज्ञापन एवं प्रसारण को छोड़ सभी विपणन क्रियाओं तथा प्रस्तुति-शो एवं प्रदर्शनी एवं अन्य विक्रय प्रयास जो साधारणतया न किए जाएँ जिनका उद्देश्य उपभोक्ता क्रय, एवं दुकानदार प्रभाविकता को बढ़ावा देना हो, को विक्रय संवर्द्धन कहते हैं।”

उपरोक्त परिभाषाएँ संक्षिप्त करती हैं कि विक्रय एवं संवर्द्धन मे सभी क्रियाएँ (विज्ञापन, व्यक्तिगत बिक्री एवं प्रसारण को छोड़) सम्मिलित हैं जिनका उद्देश्य बिक्री मात्रा बढ़ाना हो। विक्रय संवर्द्धन के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं-

  • विक्रय संवर्द्धन में विज्ञापन, व्यक्तिगत विक्रय एवं प्रसारण सम्मिलित नहीं हैं।
  • विक्रय संवर्द्धन क्रियाएँ नियमित क्रियाएँ नहीं हैं। यह बिल्कुल क्षणिक हैं और विशेष अवसरों जैसे, प्रदर्शन, निशुल्क नमूने आदि के द्वारा सम्पन्न की जाती हैं।
  • यह विज्ञापन एवं व्यक्तिगत विक्रय को अधिक प्रभावी बनाती है।
  • विक्रय संवर्द्धन, दुकानदारों, वितरकों एवं उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित करता है।

प्रश्न 29.
उद्यमिता की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर:
उद्यमिता में निम्नलिखित सन्निहित हैं-

  • वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की प्रक्रिया
  • एक व्यावसायिक इकाई का निर्माण
  • संघटन, प्रेरणा, पहल एवं नेतृत्व
  • जोखिमों को स्वीकार करने के लिए निर्णय लेना
  • लाभ अर्जन करने के लिए वृद्धि एवं कौशल का उपयोग करना।

प्रश्न 30.
विक्रय संवर्द्धन के उद्देश्यों को लिखें।
उत्तर:
विक्रय संवर्द्धन क्रियाओं के प्रमुख उद्देश्य निम्नांकित हैं-

  • किसी उत्पाद अथवा सेवा के सम्बन्ध में पूछताछ सृजित करना,
  • निशुल्क सैम्पल एवं अतिरिक्त समान देकर उत्पाद प्रयास सुनिश्चित करना,
  • प्रोत्साहन, कूपन, विशेष बिक्री सुझाव द्वारा ब्राण्ड वफादरी (Brand loyalty) विकसित करना,
  • नये ग्राहकों को फुटकर कूपन एवं प्रीमियम देकर उत्तेजित करना,
  • फुटकर व्यापारियों को अधिक स्टॉक रखने के लिए उन्हें अधिक रियायतें देकर प्रेरित करना,
  • व्यापारियों को, बिक्री मुकाबलों, विशेष कैश एवं व्यापारिक बट्टे आदि के माध्यम से संवर्धी सहायता देना,
  • फुटकर व्यापारियों को माल के आगम-निर्णयों को बढ़ावा देना,
  • उत्पादों को सशक्त बनाना एवं उनकी उपयोगिता बढ़ाना,
  • प्रतिद्वंद्वी क्रियाओं को विकसित करना एवं नये माल प्रस्तुत करने से पूर्व, स्टॉक बिक्री अभियान (Clearance Stock Sale) चलाना एवं
  • बिक्री को उत्साहित करना।

प्रश्न 31.
विज्ञापन क्या है ? इसकी विभिन्न परिभाषा दें।
उत्तर:
विज्ञापन किसी पहचानयुक्त प्रवर्तक द्वारा विचारों, माल अथवा सेवाओं की गैर-व्यक्ति प्रस्तुतीकरण अथवा संवर्द्धनात्मक स्वरूप है। विज्ञापन, उपभोक्ताओं को प्रस्तुत उत्पाद एवं प्रस्तुत सेवाओं के सम्बन्ध में तथा वस्तु निर्माता के विषय में भी तथ्य विज्ञापित करता है। इस प्रकार विज्ञापन सूचना को प्रसारित करता है। प्रस्तुत संदेश को विज्ञापन कहा जाता है। आजकल के विपणन. में विज्ञापन व्यावसायिक विपणन क्रियाओं का अभिन्न अंग है। विज्ञापन के बिना आधुनिक संसार में किसी व्यवसाय की कल्पना करना असम्भव है। हालाँकि विज्ञापन का स्वरूप व्यवसाय के अनुरूप भिन्न होता है।

अनेक विद्वानों द्वारा विज्ञापन को इस प्रकार परिभाषित किया गया है-

  1. हीलर के अनुसार (Wheller), “विज्ञापन, विचारों, वस्तुओं अथवा सेवाओं का गैर वैयक्तिक प्रदत्त स्वरूप है, ताकि लोग अधिक क्रय करें।”
  2. रिकर्ड बिस्कर्क (Ricard Buskirk) के अनुसार, “विज्ञापन, एक पहचाने हुए प्रवर्तक द्वारा, विचारों, वस्तुओं अथवा सेवाओं के शुल्क सहित प्रस्तुति का स्वरूप है।”
  3. सी० एल० बोलिंग (C.L. Bolling) के अनुसार, “विज्ञापन किसी वस्तु अथवा सेवा की माँग सृजित करने की कला के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं की विवेचना करने पर विज्ञापन की निम्नांकित विशेषताएँ उजागर होती हैं-

  • यह वस्तुओं एवं सेवाओं अथवा विचारों की एक व्यक्तियों के समूह के प्रति गैर वैयक्तिक प्रस्तुति है।
  • यह सभी व्यक्तियों के लिए कई संदेश लिये हैं।
  • संदेश वस्तु अथवा सेवाओं आदि की किस्म एवं उपयोगिता का होता है।
  • विज्ञापन सशुल्क एवं उत्तरदायी होता है।
  • विज्ञापन के पीछे विज्ञापक के इरादे के अनुसार आचरण करने के लिए प्रतिबद्ध करना है।

प्रश्न 32.
जीव विज्ञान और वातावरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जीव विज्ञान एवं वातावरण के बीच गहरा सम्बन्ध है। इसी प्रकार, उद्योग धन्धों से भी वातावरण काफी सीमा तक प्रभावित होता है। उत्पादन प्रक्रिया से वातावरण की स्थिति उत्पन्न होती है। यह प्रदूषण विभिन्न प्रारूपों में हो सकता है जैसे-शोरगुल के रूप में, धुएँ के रूप में एवं दुर्गन्ध के रूप में। कुछ उपक्रम जीव-विज्ञान के दृष्टिकोण से घातक स्थिति उत्पन्न करने वाले होते हैं। कुछ अन्य कारण भी हैं, जैसे-जंगल का कटाव, अत्यधिक मोटरगाड़ी के प्रयोग का प्रचलन आदि जो मनुष्य एवं जानवरों के लिए घातक साबित हो रहे हैं।

अतः साहसी को इस दैत्य रूपी प्रदूषण के प्रति अपने दायित्व को स्वीकार करना चाहिए तथा प्रदूषण पर नियन्त्रण रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहिए क्योंकि प्रदूषण मनुष्य के स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित करता है। प्रदूषण के घातक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए साहसी को पूर्ण अनुशासित दायरे में रहते हुए ही अपने कार्य का निष्पादन करना चाहिए तथा वातावरण को स्वच्छ एवं अप्रदूषित रखने का हर सम्भव प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 33.
क्या उद्यमी जन्मजात होते हैं ? अपने विचार दीजिए।
उत्तर:
उद्यमी जन्मजात नहीं हैं। वे पर्यावरणीय घटकों के बीच विकसित होते हैं। एक उद्यमी में सृजनशीलता, नवप्रवर्तन, जोखिम उठाने की योग्यता, पहल करने की क्षमता, दृढ़ता, विश्वास एवं प्रतिबद्धता आदि जैसे तत्व धीरे-धीरे विकसित होते हैं और पर्यावरणीय घटक पर निर्भर करते हैं। उद्यमी शब्द उन लोगों के लिए होता है जो नये विचार उत्पादित करते हैं और अपनी स्वतंत्र पहल करके समाज को अतिरिक्त मूल्य प्रदान करते हैं। उनकी दृष्टि मिशन की ओर उन्मुख होती है। वे रचनात्मक परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

प्रश्न 34.
उद्यमी की नई एवं पुरानी अवधारणा क्या है ?
उत्तर:
पुरानी अवधारणा में उद्यमी को एक आर्थिक मनुष्य कहा जाता था जो हमेशा अपने लाभ को अधिकतम करने का प्रयत्न खोज करता है।

नई अवधारणा के अन्तर्गत उद्यमी उपक्रमों को संगठित करता है, पूँजी की व्यवस्था, अवसरों की खोज, नव प्रवर्तन, श्रम और सामग्री को एकत्रित करना कार्यों को देखना व संगठित करना, प्रबन्ध का चयन करना आदि कार्य करते हैं। एक उद्यमी के लिए केवल लाभ प्राप्त की अवधारणाएँ शिथिल पड़ गई हैं। एक उद्यमी सामाजिक राष्ट्रीय उत्तरदायित्व को भी निभाता है।

प्रश्न 35.
विपणन क्या है ?
उत्तर:
विपणन में सभी क्रियाएँ या कार्यकलाप शामिल हैं जो उत्पादन के पूर्व से लेकर विक्रय पश्चात सेवा तक के होते हैं। विपणन उत्पादक तथा उपभोक्ता के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी है।

इसके दो उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  • व्यावसायिक लाभों को अधिकतम करना।
  • ग्राहकों को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करना।

विपणन ग्राहकों की आवश्यकताओं एवं इच्छाओं के अनुसार वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की योजना बनाता है। विपणन लोगों की जीवन स्तर में सुधार लाने का प्रयास करता है। विपणन माँग और पूर्ति में संतुलन बनाये रखता है। विपणन अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करता है। जाहिर है. कि यह ग्राहकों के कल्याण पर ध्यान देता है।

प्रश्न 36.
प्रबन्ध जन्मजात प्रतिभा है या अर्जित प्रतिभा ?
उत्तर:
प्रबंध में व्यावहारिक ज्ञान, निपुणता, रचनात्मक उद्देश्य एवं अभ्यास द्वारा विषय जैसे प्रमुख तत्व समाहित रहते हैं। अतः प्रबंध एक ऐसा ज्ञान है जो अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के आधार पर व्यवस्थित होता है। प्रबंध निर्णय लेते समय अपने अनुभव को आधार बनाता है। दूसरे लोगों के अनुभव और सीमाओं पर विचार करके लागू करता है। कार्य का आरंभ करने से पहले नियोजन करता है और उसके कारण परिणाम पर विचार करता है। अत: हम कह सकते हैं कि प्रबंध अर्जित प्रतिभा है।

प्रश्न 37.
उद्यमिता की परिभाषा दें एवं इसके दो विशेषताओं को बताएँ।
उत्तर:
उद्यमिता एक प्रक्रिया है-

  • निवेश एवं उत्पादन अवसर के पहचान करने की
  • व्यावसायिक क्रियाकलापों के संगठन की
  • साधनों जैसे श्रम, पूँजी, सामग्री तथा प्रबंधन को गतिशील बनाने की
  • सामाजिक निर्णय लेने की।

उद्यमिता की दो विशेषताएँ निम्न हैं-

  • जोखिम उठाने की योग्यता
  • नये कार्यों की सोच।

प्रश्न 38.
व्यावसायिक अवसर शब्द से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
व्यावसायिक अवसर उद्यमी को किसी निश्चित परियोजना में विनियोग के लिए प्रोत्साहित करता है। एक उद्यमी व्यावसायिक अवसर द्वारा योजना को मूर्त रूप देने का प्रयास करता है। विभिन्न संभावनाओं का विश्लेषण कर उद्यमी. सर्वाधिक जोखिम वाली संभावनाओं का चयन करता है। व्यावसायिक संभावना व्यावसायिक अवसर तब कहलाती है जब वह व्यावसायिक दृष्टि से लाभप्रद एवं संभव हो। व्यावसायिक संभावनाओं को व्यावसायिक अवसर में बदलने के लिए उद्यमी को दो बातों का ख्याल रखना पड़ता है-

  1. अनुकूल बाजार माँग या बाजार में उपलब्ध आपूर्ति पर माँग का आधिक्य।
  2. विनियोग पर प्रत्याय सामान्य प्रत्याय दर एवं जोखिम प्रीमियम की दर के योग के बराबर होता है।

प्रश्न 39.
प्रबन्ध की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
प्रबन्ध की परिभाषा (Definition of Management)- प्रबन्ध के विभिन्न लेखकों ने प्रबन्ध शब्द को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। सम्बोधन के आधार पर प्रबन्ध की कुछ एक परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

  1. मेरी पार्कर फॉलैट्टज (Mary Parker Follett) के अनुसार, “प्रबन्ध अन्य व्यक्तियों से काम लेने की कला है।”
  2. फ्रेड्रिक विन्सेला टेयलर (Frederick Winston Taylor) के अनुसार, “प्रबन्ध सर्वप्रथम यह ज्ञात करना कि आप व्यक्तियों से क्या (कार्य) करवाना चाहते हैं तथा पुनः यह निश्चित करना कि वे इसे किस प्रकार सस्ते एवं श्रेष्ठतम तरीके से करें।”
  3. पीटर एफ० डुक्कर (Peter F. Drucker) के अनुसार, “प्रबन्ध एक बहुआयामी अंग है जो एक व्यवसाय-प्रबन्धक, श्रमिकों एवं कार्य की व्यवस्था करता है।”
  4. जार्ज आर० टैरी (George R. Terry) के अनुसार, “प्रबन्ध एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसके द्वारा नियोजन, संगठन, क्रिया-संचालन, कार्य नियंत्रण किया जाए तथा व्यक्तियों एवं साधनों द्वारा निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति को सुनिश्चित किया जाए।”
  5. हैरोल्ड कूज (Haroald Kohz) के अनुसार, “व्यक्तियों के जरिये एवं उनके द्वारा औपचारिक वर्गों के रूप में, कार्य सम्पन्न करने की कला है।”

इन परिभाषाओं के अवलोकन के पश्चात्, प्रबन्ध को अन्यों द्वारा कार्य सम्पन्न कराने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, यह विभिन्न कार्यों के निष्पादन तथा नियोजन, संगठन, समन्वयन, नेतृत्व एवं व्यावसायिक परिचालनों को इस प्रकार सम्पन्न करने की प्रक्रिया है ताकि व्यावसायिक फर्म के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। इसके अन्तर्गत वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित हैं जो व्यावसायिक नियोजन से लेकर इसके वास्तविक संपादन तक व्यापक हो।

प्रश्न 40.
अवसर एवं उद्यमी के क्या संबंध है ?
उत्तर:
अवसर का अर्थ होता है किसी नयी व्यावसायिक परिस्थिति के अनुसार कुछ नया करना। अवसर की पहचान करना और उसके अनुसार कुछ नया काम ,करना उद्यमी के लिए लाभदायक होता है। साहसिक अवसर की पहचान करते हुए उद्यमी नव-सृजन की क्रियाओं को करता है और किसी नये उद्यम या उद्योग की स्थापना करता है। अवसर की पहचान करके काम करने से उद्यमी को अधिक लाभ होता है। अतः स्पष्ट है कि अवसर और उद्यमी का पारस्परिक संबंध है।

प्रश्न 41.
पर्यावरण के सूक्ष्म परीक्षण के किन्हीं तीन उद्देश्यों को बतायें।
उत्तर:
पर्यावरण के सूक्ष्म परीक्षण के तीन मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • उन्नत वित्तीय निष्पादन हेतु संसाधनों का प्रभावपूर्ण उपयोग प्राप्त करना।
  • व्यवसाय के क्षेत्रों एवं अवसरों की पहचान करना।
  • उपभोक्ता के व्यवहार बाजार प्रतिस्पर्धा, सरकार की नीति इत्यादि में निरंतर होने वाले परिवर्तनों पर पैनी निगाह रखना।

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