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Bihar Board 12th Geography Important Questions Long Answer Type Part 4

प्रश्न 1.
भारत के संभावित जल संसाधनों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत उन गिने-चुने देशों में से एक है जहाँ भूमि और जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। भारत में जल के तीन स्रोत हैं वर्षा, पृष्ठीय जल तथा भूमिगत जल।

वर्षा (Rainfall) – वर्षा जल का मूल स्रोत है। भारत में औसतन 118 सेमी. वर्षा होती है। वर्षा का कुछ जल तो धरातल पर बहता हुआ नदियों का रूप ले लेता है तथा कुछ भूमि सोख लेती है जो भूमिगत जल कहलाता है।

पृष्ठीय जल (Surface Water) – जल का यह महत्त्वपूर्ण स्रोत बहने वाली नदियों, झीलों, तालाबों और दूसरे जलाशयों के रूप में मिलता है। भारत में नदियों का औसत वार्षिक प्रवाह 1869 अरब घन मीटर है। कुल पृष्ठीय जल का लगभग 60% भाग सिंधु गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों से होकर बहता है। भारत की सभी नदियों में बहने वाली जल की मात्रा संसार की सभी नदियों में बहने वाली जल की मात्रा का 6% है।

भूमिगत जल (Ground Water) – एक अनुमान के अनुसार भारत में कुल भौम जल क्षमता 433.9 अरब घन मीटर है। भारत के उत्तरी मैदान में भौम जल के विकास की संभावनायें अधिक उपलब्ध हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में ही भौमगत जल की क्षमता 19% है। प्रायद्वीपीय भारत में कम है। जम्मू-कश्मीर में 1.07% तथा पंजाब में 98.34% है। भारत में जिन राज्यों में घट-बढ़ अधिक होती है तथा पृष्ठीय जल की कमी है उन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भौम जल विकास किया गया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, गुजरात इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 2.
भारत में सिंचाई की आवश्यकता है। क्यों ?
उत्तर:
जल का प्रमुख उपयोग सिंचाई के लिए होता है। भारत एक उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश है इसलिए यहाँ सिंचाई की अधिक माँग है। सिंचाई की बढ़ती माँग के कारण निम्नलिखित हैं-
(i) वर्षा का असमान वितरण (Uneven Distribution of Rainfall) – देश में संपूर्ण वर्ष वर्षा का अभाव बना रहता है। अधिकांश वर्षा, वर्षा ऋतु में होती है। इसलिए शुष्क अवधि में सुनिश्चित सिंचाई सुविधा के बिना कृषि कार्य संभव नहीं है।

(ii) मानसून जलवायु (Monsoon Climate) – भारत की जलवायु मानसूनी है। यहाँ वर्षा केवल तीन से चार महीने तक होती है, शेष समय शुष्क रहता है। इसलिए सिंचाई की आवश्यकता होती है।

(iii) वर्षा बहुत परिवर्तनशील है (Variable Rainfall) – वर्षा ऋतु में पर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सिंचाई की आवश्यकता होती है क्योंकि वर्षा की मात्रा प्रति वर्ष निश्चित नहीं है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा की भिन्नता बहुत अधिक है। इसलिए वर्षा के दिनों में कभी कहीं सूखा होता है तो कभी कहीं। सिंचाई के बिना भारतीय कृषि मानसून का जुआ बनकर रह जाता है।

(iv) वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainty of rainfall) – कंवल वर्षा का आगमन और पश्चगमन ही अनिश्चित नहीं है अपितु इसकी निरन्तरता और गहनता भी अनिश्चित है। इस उतार-चढ़ाव में कृषि को केवल सिंचाई से ही सुरक्षा मिलती है।

(v) कुछ फसलों के लिए जल की अधिक आवश्यकता (Water is More Needed for Few Crops) – चावल, गन्ना, जुट आदि फसलों को अपेक्षाकृत अधिक पानी की आवश्यकता होती है जो सिंचाई द्वारा ही पूरी की जाती है।

(vi) अधिक उपज देने वाले फसलें (Crops Giving More Yield) – ऐसी फसलें जो अधिक उपज देती हैं उनसे उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए निरन्तर पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए विकसित सिंचाई वाले क्षेत्र में हरित क्रान्ति का सबसे अधिक प्रभाव रहा।

(vii) लम्बा वर्धनकाल (Long Growing Season) – भारत में वर्धन काल पूरे वर्ष रहता है। अतः सिंचाई की सुविधा मिलने पर बहुफसली खेती संभव है।

(viii) खाद्यान्न तथा कृषि कच्चे माल की बढ़ती माँग (Increasing Demand of Food Grains and Raw Material) – सिंचित क्षेत्र में असिंचित क्षेत्र की तुलना में उत्पादन तथा उत्पादकता अधिक होती है। देश में बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है तथा उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है।

प्रश्न 3.
जल-संभर प्रबन्धन क्या है ? क्या आप सोचते हैं कि यह सतत पोषणीय विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है ?
उत्तर:
जल विभाजक प्रबन्धन से तात्पर्य मुख्य रूप से सतह और भूमिगत जल संसाधनों की सफल व्यवस्था से है। इसके अंतर्गत बहते जल को रोकना और विभिन्न विधियों जैसे पुनर्भरण कुओं आदि के द्वारा भूमिगत जल का संचयन और पुनर्भरण शामिल है। जल विभाजक व्यवस्था का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और समाज के बीच सन्तुलन लाना है। जल विभाजक व्यवस्था की सफलता मुख्य रूप से सम्प्रदाय के सहयोग पर निर्भर करती है।

यह व्यवस्था सतत पोषणीय विकास में सहयोग कर सकता है। जल प्रबन्धन के कार्यक्रम कई राज्यों में चल रहे हैं। जैसे-नीरू नीरू-कार्यक्रम आंध्र प्रदेश में तथा राजस्थान में अलवर में लोगों के सहयोग से यह व्यवस्था चल रही है। तमिलनाडु में घरों में जल संग्रहण संरचना को बनाना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
अन्तर स्पष्ट करें – (i) पृष्ठीय जल तथा भौम जल (ii) हिमालय की नदियाँ तथा प्रायद्वीपीय नदियाँ (iii) निर्मित सिंचाई क्षमता तथा उपयोग में लाई गई क्षमता (iv) प्रमुख तथा लघु सिंचाई परियोजना।
उत्तर:
(i) पृष्ठीय जल (Surface Water)-

  • यह जल ताल-तलैया, नदियों-सरिताओं और जलाशयों में पाया जाता है।
  • नदियाँ पृष्ठीय जल का प्रमुख स्रोत हैं।
  • नदियों में प्रवाहित औसत वार्षिक प्रवाह 1869 अरब घन मीटर है।
  • कुल पृष्ठीय जल का 60% भाग सिंधु-गंगा, ब्रह्मपुत्र नदियों में से होकर बहता है।
  • भारत में हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदी तंत्रों में भरपूर पृष्ठीय जल संसाधन उपलब्ध है।

भौम जल (Ground Water)-

  • वर्षा के जल का कुछ भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है जिसे भौम जल कहते हैं। भारत में भौम जल क्षमता लगभग़ 433.9 अरब घन मीटर है।
  • भारत के उत्तरी विशाल मैदान में भौम जल के विकास की संभावनाएँ अधिक हैं।
  • प्रायद्वीपीय भारत में भौम जल की संभावनाएँ कम हैं।
  • देश में भौम जल का वितरण असमान है।
  • भारत के उत्तरी मैदान में पंजाब से लेकर ब्रह्मपुत्र घाटी तक भौम जल के विशाल भंडार हैं।

(ii) हिमालय की नदियाँ (Himalayan Rivers)-

  • हिमालय की नदियों का बेसिन तथा जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़ा है।
  • हिमालय की नदियाँ विशाल गार्ज से होकर बहती हैं।
  • हिमालय की नदियों के दो जल स्रोत हैं-वर्षा तथा हिम।
  • इन नदियों के मार्ग में कम बाधायें आती हैं।
  • इन नदियों में बाढ़ अधिक आती है।

प्रायद्वीपीय नदियाँ (Peninsular Rivers)-

  • प्रायद्वीपीय नदियों का बेसिन तथा जल ग्रहण क्षेत्र काफी छोटा है।
  • प्रायद्वीपीय नदियाँ उथली घाटियों से होकर बहती हैं।
  • इन नदियों का जल स्रोत केवल वर्षा है। इसलिए शुष्क ऋतुओं में प्रायः ये सूख जाती हैं।
  • प्रायद्वीपीय नदियों के मार्ग में बाधायें अधिक हैं। ये पथरीली चट्टानों से होकर बहती हैं।
  • इन नदियों में बाढ़ की संभावनाएँ कम होती हैं।

(iii) निर्मित सिंचाई क्षमता (Irrigation Potential Created) – स्वतंत्रता के पश्चात् सिंचाई की क्षमता में काफी वृद्धि हुई है। 1999-2000 में कुल सिंचित क्षेत्र 8.47 करोड़ हेक्टेयर था।

उपयोग में लाई गई क्षमता (Irrigation Potential Utilised) – देश में सिंचाई की कुल उपयोग में लाई गई क्षमता 2.26 करोड़ हेक्टेयर थी।

(iv) प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ (Major Irrigation Projects) – उत्तरी विशाल मैदानों में प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ हैं, ऊपरी वारी दोआब नहर, दोआब सरहिन्द, इन्दिरा गाँधी तथा पश्चिमी यमुना नहर।

उत्तर प्रदेश में गंगा की ऊपरी, मध्य तथा निचली नहरें। दक्षिणी भारत की नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा परियोजना तथा कृष्णा-गोदावरी डेल्टा प्रदेश की नहरें।

लघु सिंचाई परियोजनाएँ(Minor Irrigation Projects) – उत्तर भारत की लघु परियोजनाओं में पूर्वी यमुना नहर, शारदा नहर, राम गंगा नहर, मयूराक्षी आदि दक्षिण भारत में मैटूर बाँध, पालार, वोगाई आदि परियोजनाएँ हैं।

प्रश्न 5.
भारत में जल विद्युत पर एक निबन्ध लिखें।
उत्तर:
विद्युत मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और अनूठे आविष्कार का नाम है। विद्युत कोयला और बहते जल से बनाई जाती हैं जल विद्युत ही सबसे सस्ती है। इसके निर्माण के लिये प्राकृतिक जल प्रपात सुविधाजनक ही है। जल प्रपात के लिये निरन्तर जल प्रवाह आवश्यक है।

जल विद्युत निगम की स्थापना जल विद्युत उत्पादन के लिये की गई। इसके द्वारा अब तक आठ परियोजना पूर्ण कर ली हैं। ये परियोजनायें हैं-चमेरा और वैरा सिडल (हिमाचल प्रदेश), लोकतक (मणीपुर), उडी आर सलाल (जम्मू कश्मीर), टनकपुर (उत्तरांचल) आदि। दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं में निगम का लक्ष्य 4357 मैगावाट विद्युत उत्पादन का है। भारत में जल विद्युत का उत्पादन दक्षिणी पठार पर अधिक है।

प्रमुख केन्द्र हैं-

  • कर्नाटक – शिव समुद्रम, महात्मा गाँधी जल विद्युत केन्द्र। यहाँ 72000 किलोवाट क्षमता वाला बिजली घर स्थित है। शरावती जल विद्युत केन्द्र और शिमशा परियोजना है।
  • तमिलनाडु – मैटूर योजना, पापकारा, पापानासम तथा कुन्डा परियोजना है। महाराष्ट्र-राटा जल विद्युत केन्द्र, कोयना योजना, कवर दरा।
  • उत्तर प्रदेश – गंगा नहर पर 12 स्थानों पर जल विद्युत केन्द्र बनाये गये हैं- इनमें 23800 कि.वा. विद्युत तैयार की जाती है।
  • पंजाब – भाखड़ा नांगल परियोजना में 1050 मैगावाट जल विद्युत तैयार की जाती है। व्यास परियोजना में विद्युत तैयार की जाती है।

इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में विद्युत उत्पन्न की जाती है।

प्रश्न 6.
भारत के लौह एवं इस्पात उद्योग के विकास एवं वितरण का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में लौह अयस्क के प्रचुर संसाधन है, यहां एशिया के विशालतम लौह अयस्क आरक्षित है। हमारे देश में लौह अयस्क के दो प्रमुख प्रकार हेमेटाइट एवं मैग्नेटाइट पाये जाते हैं।

भारत में लोहा पिघलाने और ढालने तथा इस्पात तैयार करने का कार्य अत्यंत प्राचीन काल से किया जा रहा है। बिहार एवं मध्य प्रदेश में अगरिया एवं गाडी लोहारिया जाति यह कार्य करती थी किन्तु पश्चिमी देशों में आधुनिक ढंग के कारखाने स्थापित हो जाने के कारण भारतीय कुटीर उद्योग को बड़ा धक्का पहुँचा और भारत निर्यातक से आयातक देश बन गया। सर्वप्रथम भारत में लौह-इस्पात की स्थापना सन् 1874 में पश्चिम बंगाल के कुल्टी में बाराकर लौह कम्पनी की हुई थी। इसके बाद कालांतर में 1907 में झारखण्ड में सांकची नामक स्थान पर भारत के प्रसिद्ध व्यवसायी श्री जमशेदजी टाटा द्वारा टाटा लौह-इस्पात कंपनी की स्थापना की गयी।

हमारे देश में 2004 – 05 में लौह अयस्क के आरक्षित भंडार लगभग 200 करोड़ टन थे, जिसका 95 प्रतिशत भाग उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा तथा तमिलनाडु राज्यों में स्थित है। उड़ीसा में लौह अयस्क सुन्दरगढ़, मयूरगंज की पहाड़ियों में पाया जाता है। झारखण्ड के सिंहभूम जिला तथा छत्तीसगढ़ के दुर्ग, दान्तेवाड़ा एवं वैलाडिला लौह अयस्क का मुख्य क्षेत्र है। कर्नाटक के बेलारी जिले में महाराष्ट्र के चन्द्रपुर एवं तमिलनाडु के सलेम क्षेत्रों में लौह अयस्क की प्राप्ति होती है।

भारत के विभिन्न राज्यों में लौह-अयस्क का उत्पादन निम्न है-
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प्रश्न 7.
भारत में मैंगनीज, अयस्क और बॉक्साइट के उपयोग और वितरण का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
बॉक्साइट (Bauxite) उपयोग (Uses) – बॉक्साइट का ऐलुमिनियम धातु बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है। वायुयान निर्माण, बिजली के उपकरण तथा तार एवं भवन निर्माण में भी उपयोग में आता है।

वितरण (Distribution) – उड़ीसा के कालाहांडी, संबलपुर, रायगढ़ और कोरापुट में बॉकसाइट के भंडार पाये जाते हैं।

आन्ध्र प्रदेश में – विशाखापटनम, विजयनगर तथा श्रीकाकुलम जिले में बॉक्साइट के निक्षेप हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ का बस्तर और बिलासपुर जिला, मध्य प्रदेश में मैकाल पहाड़ियाँ।

गुजरात – जामनगर, साबरकांठा, खेड़ा, कच्छ और सूरत तथा महाराष्ट्र में थाणे, कोलाबा, कोल्हापुर आदि जिले।

मैगनीज (Manganese)-उपयोग (Uses) – मैंगनीज का सबसे अधिक उपयोग इस्पात की चादर बनाने के लिये किया जाता है जो युद्ध के टैंक निर्माण में प्रयोग की जाती है। इसके अतिरिक्त चीनी मिट्टी के बर्तन, बिजली का सामान, कांच ब्लीचिंग पाउडर, दवायें, शुष्क बैटरी, सोने के आभूषणों पर मीना करने के लिये, वार्निश तथा रसायन उद्योगों में मैंगनीज का उपयोग होता है। इसे बहुउपयोगी खनिज भी कहते हैं।

वितरण (Distribution) – मैंगनीज सबसे अधिक उड़ीसा में मिलता है। इसके बाद कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गोआ का स्थान है। इसके अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में भी मैंगनीज पाया जाता है।
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प्रश्न 8.
भारत में पेट्रोलियम के उत्पादन एवं वितरण का वर्णन करें।
उत्तर:
पेट्रोलियम एक ऐसा अकार्बनिक तरल पदार्थ है, जो अवसादी चट्टानों की विशेष संरचनाओं में पाया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत के लगभग 14 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र में तेल भंडार हैं, जिसमें सबसे विशाल असम तेल क्षेत्र है। भारत के इयोसीन एवं मायोसीन काल की अवसादी चट्टानों में पेट्रोलियम के भंडार है। सर्वप्रथम असम के डिगबोई में इसका पता चला था। उसके बाद द्वितीय और तृतीय पंचवर्षीय योजनाकालों में भारत के विभिन्न भागों में तेल की खोज तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोजन द्वारा की गयी। रूस विशेषज्ञों के अनुसार भारत में लगभग 6 अरब टन के बड़े-बड़े तेल भंडार हैं। अनुमान है कि महाद्वीपीय मग्नतट के लगभग 3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में परतदार चट्टानें पेट्रोलियम से भरी हैं।

1951 ई में देश में पेट्रोलियम का कुल उत्पादन 205 लाख टन था जो 2001 ई० में बढ़कर 320 लाख टन हो गया।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद पेट्रोलियम के उत्पादन में 50 गुणा से भी अधिक वृद्धि हुई है।
भारत में पेट्रोलियम के तीन मुख्य उत्पादन क्षेत्र हैं –

  • असम तेल क्षेत्र।
  • गुजरात तेल क्षेत्र।
  • मुम्बई हाई तेल क्षेत्र।

इसके अलावा गोदावरी और काबेरी नदी के बेसिनों में तथा बंगाल की खाड़ी के मग्नतट पर भी तेल मिले हैं। बिहार के उत्तरी मैदान भाग में भी तेल की खोज का कार्य जारी है। इन क्षेत्रों से प्राप्त कच्चे तेल का परिष्करण तटीय भागों, बाजार क्षेत्र तथा उत्पादन केन्द्रों के निकट स्थापित कुल 14 तेल शोधनशालाओं में किया जाता है।

प्रश्न 9.
भारत में चीनी मिलों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के निकट स्थापित किये जाने के लिए उत्तरदायी तीन कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
चीनी मिलों के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में स्थापित होने के लिये अग्रलिखित तीन कारक उत्तरदायी हैं-
1. कच्चा माल (Raw Material) – गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में मिलों के स्थापित होने का प्रमुख कारण गन्ने की निरन्तर आपूर्ति है। आपूर्ति टूट जाने से मिल को पुनः आरम्भ करने में बहुत व्यय तथा समय लगता है। इसलिये निरन्तर आपूर्ति आवश्यक है।

2. यातायात के साधन (Means of Transport) – गन्ना मैदानी क्षेत्रों में उत्पन्न किया जाता है। मैदानी क्षेत्रों में परिवहन के साधन रेल मार्ग तथा सड़क मार्ग उपलब्ध हैं। लेकिन अधिकतर गन्ने की दुलाई बैलगाड़ी अथवा ट्रैक्टर द्वारा की जाती है और ये साधन अधिक से अधिक 10 या 15 किलोमीटर तक ही सीमित होते हैं। इसलिये चीनी मिलों का गन्ना क्षेत्रों में स्थापित होना आवश्यक है।

3. बाजार की समीपता (Nearness of Market) – चीनी की खपत के लिए बाजार की समीपता आवश्यक है जो इन क्षेत्रों में जनसंख्या से अधिक होने से मिल जाती है। इसके अतिरिक्त चीनी को रेल मार्ग अथवा सड़क मार्ग द्वारा समीप वाले बाजारों को भेज दिया जाता है।

प्रश्न 10.
आप उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से क्या समझते हैं ? उन्होंने भारत के औद्योगिक विकास में किस प्रकार से सहायता की है ?
उत्तर:
उदारीकरण (Liberalisation) – उदारीकरण आर्थिक विकास की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के स्थान पर निजी क्षेत्र में उद्योगों को चलाने पर बल दिया जाता है तथा उन सब नियमों और प्रतिबन्धों से छूट दी जाती है जिससे पहले निजी क्षेत्र के विकास में रुकावट आती है।

निजीकरण (Privatisation) – निजीकरण से अभिप्राय है कि सरकार द्वारा लगाये गये उद्योगों को निजी क्षेत्र में स्थापित किया जाये। इससे सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्व कम होगा।

वैश्वीकरण (Globalisation) – वैश्वीकरण से अभिप्राय है कि देश की अर्थव्यवस्था को संसार की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करने की प्रक्रिया से है। इसके अधीन आयात पर प्रतिबन्ध तथा आयात शुल्क में कमी की गई। इस प्रक्रिया में एक देश के पूँजी संसाधनों के साथ-साथ वस्तुएँ और सेवायें, श्रमिक तथा अन्य संसाधन दूसरे में स्वतंत्रतापूर्वक आ जा सकते हैं।

इन प्रक्रियाओं ने देश के औद्योगिक विकास में बड़ी सहायता की है-

  • विदेशी पूँजी का सीधा निवेश किया जा सकता है।
  • व्यापारिक प्रतिबन्ध समाप्त हो जाते हैं जिससे देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आने में सुविधा होती है।
  • भारतीय कम्पनियों को विदेशी कम्पनी के साथ प्रवेश करने का अवसर मिलता है।
  • उदारीकरण कार्य से आयात किया जा सकता है आदि।

प्रश्न 11.
उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं ? भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण के प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
उदारीकरण का अभिप्राय अर्थव्यवस्था के नियंत्रणवाले प्रावधानों को शिथिल करना है। इसे अनियंत्रण की नीति भी कहा जाता है। उदारीकरण के अंतर्गत सरकारी नियंत्रण को कम करना, लाइसेंस की समाप्ति, उद्योगपत्तियों को अधिक स्वतंत्रता देना, बाजार की शक्तियों के स्वतंत्र क्रियाकलाप को प्रश्रय देना शामिल है।

जबकि निजीकरण का अर्थ बाजार की शक्तियों को मजबूत करते हुए निजी क्षेत्र को अधिक महत्त्व प्रदान करना है तथा वैश्वीकरण का तात्पर्य देश की अर्थव्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना है।

वैश्वीकरण के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूँजी का प्रवाह बढ़ा है। साथ ही तकनीकी प्रवाह के कारण उत्पादन बढ़ने से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि आयी है, जिसका सीधा असर लोगों के रहन-सहन पर पड़ा है। मक्त आकाश नीति की घोषणा से भारतीय निर्यातकों को प्रतियोगितापूर्ण बनाया गया है।

वैश्वीकरण के प्रभाव से उपभोक्ताओं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वस्तुएँ उपलब्ध हैं किन्तु भारत के छोटे एवं कुटीर उद्योग प्रतिस्पर्धा में पीछे रहने के कारण दिनोंदिन खत्म होते जा रहे हैं। औसत रूप में वैश्वीकरण के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की गति तीव्र हुई है।

प्रश्न 12.
सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम और कृषि-जलवायु नियोजन पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें। ये कार्यक्रम देश में शुष्क भूमि कृषि विकास में कैसे सहायता करते हैं ?
उत्तर:
प्रादेशिक विषमताओं को घटाने के लिये तैयार कार्यक्रमों में सुखाप्रवण क्षेत्रों के लिये भी ऐसे कार्यक्रम तैयार किये जिनके द्वारा उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आय में वृद्धि हो और रोजगार के अवसर प्राप्त हों। यह कार्यक्रम शुष्क भूमि कृषि में निम्न प्रकार से सहायक हो सकता है।

  • जिन सूखाप्रवण क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन अपर्याप्त है वहाँ गरीबी को कम करने में रोजगार देकर ये सहायक हो सकते हैं।
  • अभावग्रस्त लोगों के लिये काम के अवसर निकाले जा सकते हैं।

कृषि जलवायुविक नियोजन(Agro-climate Planning) – भारत के योजना आयोग में कृषि सम्बन्धित विकास के लिये कृषि क्षेत्र के कार्यक्रम बनाये गये। सातवीं योजना के मध्यवर्ती मूल्यांकन ने कृषि प्रबन्धन और जल नियोजन की सक्षमता पर बल दिया तथा बीज की नई नीति पर बल दिया। इसने सुझाव दिया कि किसी प्रदेश की कृषि सम्भाव्यता उसके प्रादेशिक कृषि जलवायुविक दशाओं के अनुसार हो सकता है। इस सम्बन्ध में 1988 में विशेष खाद्यान्न उत्पादन कार्यक्रम आरम्भ किया गया। यह देश के 169 जिलों में लागू किया गया। इसके पश्चात् कृषि के विकास के लिए अन्य कार्यक्रम प्रारम्भ किये गये इन्हें कृषि जलवायुविक कार्यक्रम कहते हैं।

इस कार्यक्रम से भी शुष्क भूमि कृषि में सहायता मिली। विभिन्न प्रदेशों में फसल और गैर फसल आधारित विकास हुआ। टिकाऊ कृषि विकास के लिये जल उपयोग और भूमि विकास तैयार किये गये।

प्रश्न 13.
भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के क्या उद्देश्य थे ?
उत्तर:
भारत में पंचवर्षीय योजनाओं के निम्नलिखित उद्देश्य थे
1. राष्ट्रीय आय में वृद्धि तथा आर्थिक विकास (Increase in national income and economic development) – भारत की प्रत्येक योजना का उद्देश्य राष्ट्रीय आय में वृद्धि और आर्थिक विकास में वृद्धि करना है। ये वृद्धि देश के आर्थिक विकास में सहायक होती है।

2. जीवन स्तर में वृद्धि(Increase in standard of living) – पंचवर्षीय योजनाओं का दूसरा उद्देश्य लोगों की आर्थिक संपन्नता में वृद्धि करके जीवन स्तर को ऊँचा उठाना है। जीवन स्तर में वृद्धि अनेक बातों पर निर्भर करती है। जैसे प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय, कीमत स्थिरता, आय का समान वितरण आदि।

3. आर्थिक असमानताओं को घटाना (To reduce economic inequalities) – प्रत्येक पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रदेशों और समाज के विभिन्न वर्गों में असमानताओं को कम करना है। आर्थिक असमानताएँ देश में अन्याय व शोषण को बढ़ाती हैं जिससे धनी अधिक धनी व निर्धन अधिक निर्धन होता जाता है। इस असमानता को समाप्त करने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं में बहुत से कार्य किए गए हैं।

4. सर्वांगीण विकास (Comprehensive development) – पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य देश का सर्वांगीण विकास करना है परन्तु प्रत्येक योजना में इन क्षेत्रों के विकास को एक समान महत्त्व नहीं दिया है। पहली योजना में कृषि को, दूसरी में उद्योग को तथा पाँचवीं में दोनों को महत्त्व दिया गया है। छठी, सातवीं, आठवीं योजना में बिजली व ऊर्जा के विकास को अधिक महत्व दिया गया।

5. क्षेत्रीय विकास (Regional development) – भारत के विभिन्न भाग आर्थिक दृष्टि से समान रूप से विकसित नहीं हैं। पंजाब, गोआ, हरियाणा आदि कुछ राज्य अपेक्षाकृत विकसित हैं लेकिन बिहार, उड़ीसा, मेघालय जैसे राज्य अविकसित रह गए हैं।

6. आर्थिक स्थिरता (Economic stability) – आर्थिक विकास की गति को बनाए रखने के लिए आर्थिक स्थिरता का उद्देश्य प्राप्त करना आवश्यक होता है। भारत की प्रत्येक पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य देश में आर्थिक स्थिरता को कायम रखना रहा है।

7. आत्मनिर्भरता तथा स्वपोषित सतत् विकास (Self sufficiency and self sustained growth) – पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य देश के कृषि, उद्योग आदि क्षेत्रों को उत्पादन के सम्बन्ध में उपलब्ध साधनों के अनुसार आत्मनिर्भर बनाना है। योजनाओं का उद्देश्य बचत व निवेश की दर को बढ़ाकर स्वयं स्फूर्ति की अवस्था प्राप्त करना है।

8. सार्वजनिक न्याय (Social justice) – भारत की प्रत्येक योजना का उद्देश्य सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना है। आठवीं योजना का मुख्य उद्देश्य ‘गरीबी हटाओ’ था। इसके लिए न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम को अपनाया गया था। देश में 26% जनसंख्या निर्धनता रेखा से नीचे है।

9. रोजगार में वृद्धि (Increase in Employment) – योजनाओं का मुख्य उद्देश्य मानव शक्ति का उचित उपयोग तथा रोजगार में वृद्धि करना है। नौवीं-दसवीं, योजनाओं में रोजगार के अवसर जुटाने पर बल दिया गया है।

10. निवेश व बचत में वृद्धि (Increasing saving and investment) – योजनाओं का उद्देश्य राष्ट्रीय आय में बचत व निवेश के अनुपात को बढ़ावा देना है। इसके फलस्वरूप देश की उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 14.
भारत में परिवहन के प्रमुख साधन कौन-कौन से हैं ? इनके विकास को प्रभावित करनेवाले कारकों की विवेचना करें।
उत्तर:
भारत में परिवहन के प्रमुख साधन रेलमार्ग सड़क मार्ग, जलमार्ग और वायुमार्ग हैं। इनमें रेलमार्ग तथा सड़क मार्ग प्रमुख साधन हैं। इनके विकास को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं-
1. आर्थिक कारक (Economic Factors) – परिवहन साधनों के विकास में आर्थिक स्थिति को देखा जाता है। उन्हीं क्षेत्रों में इनका विकास किया जाता है जहाँ आर्थिक क्रियाएँ विकसित रही हैं और वह क्षेत्र समृद्ध है।

2. भौगोलिक कारक (Geographical Factors) – भारत के उत्तरी मैदानों में रेल तथा सड़क मार्गों का जाल बिछा हुआ है। इस प्रदेश में समतल भूमि, सघन जनसंख्या, समृद्ध कृषि और विकसित उद्योग तथा बड़े-बड़े नगर हैं।

3. राजनैतिक कारक (Political Factors) – अंग्रेजी शासन में रेलों को प्रमुख नगरों से ही जोड़ा गया था लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात् देश में रेलों और सड़कों का विकास हुआ।

प्रश्न 15.
भारत में रेलमार्ग के विकास का विस्तृत वर्णन करें तथा उनका महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
भारतीय रेल 1853 में आरम्भ की गई जो मुम्बई से थाणे तक चली। यह भारत सरकार का सबसे बड़ा प्रक्रम है। भारतीय रेल जाल की कुल लम्बाई 63221 किलोमीटर है। भारतीय रेलवे प्रबन्धन 16 क्षेत्रों में विभाजित है। भारतीय रेल द्वारा ढोई जानेवाली मुख्य वस्तुयें हैं जो निम्न तालिका से प्रदर्शित की गई है-

वस्तुयें 1970 – 71 2004 – 05
कोयला 47.9 251-75
इस्पात का कच्चा माल 16.1 43.65
लौह अयस्क 9.8 26.6
सीमेन्ट 11 49.3
खाद्यान्न 15.1 44.3
रासायनिक खाद 4.7 23.7
पेट्रोल 8.9 32
अन्य 48.2 71.4

रेल मार्गों में 16272 किलोमीटर का विद्युतीकरण कर दिया गया है। भारतीय रेलमार्ग पर प्रतिदिन 12670 रेलगाड़ियाँ दौड़ती हैं।

भाप के इंजनों के स्थान पर विद्युत इंजन दौड़ने लगे हैं जिससे प्रदूषण नहीं होता। पर्यावरण स्वच्छ रहता है।

मैट्रो रेल का प्रारम्भ हो गया है जो कोलकाता दिल्ली में चलाई जा रही है। मैट्रो के द्वारा सी.एन.जी. बसें चलाई जा रही हैं जो पर्यावरण हितैषी परिवहन है।

प्रश्न 16.
भारत के आर्थिक विकास में सड़कों की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत के आर्थिक विकास में सड़कों, का बड़ा योगदान है। लगभग 85% यात्री तथा 70% माल सड़कों द्वारा ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाया जाता है।

सड़क परिवहन का ग्रामीण क्षेत्र में छोटे स्थानों को जोड़ने में बहुत महत्त्व है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आ गया है। गाँव बड़े नगरों से जुड़ गये हैं। सड़कों के प्रबन्धन के अनुसार उनको राष्ट्रीय महामार्ग तथा राज्य महामार्ग में प्रमुख रूप से विभाजित किया है।

कुल परिवहन के क्षेत्र में सड़क मार्गों की भागीदारी में निरन्तर प्रगति हो रही है। इसका मुख्य चरण सड़क परिवहन का लचीला होना तथा दुर्गम क्षेत्रों में भी निर्माण संभव होता है। सड़कों की भागीदारी 1993-94 तक 1500 अरब यात्री किलोमीटर थी जो रेलों के अनुपात में चार गुणा अधिक था। अब यात्रियों की संख्या तथा माल ढुलाई भी कई गुना बढ़ गई है।

प्रश्न 17.
भारत में सड़कों का घनत्व में प्रादेशिक भिन्नता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रति 100 वर्ग किमी. क्षेत्र के अनुपात में सड़क मार्ग की लम्बाई को सड़क मार्ग का घनत्व कहते हैं। सड़कों के प्रादेशिक घनत्व में बहुत अन्तर है। सड़कों का सबसे अधिक घनत्व केरल, गोआ, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उड़ीसा और पंजाब में पाया जाता है। 60 से 100 किमी. सड़क मार्ग के औसत घनत्व वाले राज्य असम, नागालैण्ड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश और हरियाणा हैं। गुजरात, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मणिपुर में सड़कों का घनत्व 40 से 60 किमी. प्रति 100 वर्ग किमी. है। राजस्थान, मेघालय, मिजोरम और सिक्किम में सड़कों का घनत्व 20 से 40 किमी. तक है। सबसे कम घनत्व वाले राज्य अरुणाचल प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर हैं।

प्रश्न 18.
जनसंचार में रेडियो और टेलीविजन के महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जनसंचार के साधनों में रेडियो और टेलीविजन का महत्त्व अधिक है। ये जनसंचार के प्रमुख साधन हैं-
रेडियो (Radio) – भारत में आकाशवाणी से प्रसारण 1927 में मुम्बई और कोलकाता से शुरू हुआ। रेडियो का मुख्य उपयोग जनता का मनोरंजन, शिक्षा और उन तक महत्त्वपूर्ण जानकारी पहुँचाना है। मनोरंजन के अतिरिक्त खेती-बाड़ी, स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण सम्बन्धी कार्यक्रमों का भी प्रसारण किया जाता है। आकाशवाणी का विदेश सेवा विभाग अपने विविध प्रकार के कार्यक्रमों के द्वारा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर भारतीय दृष्टिकोण को विशेष महत्त्व देकर प्रसारित करता है।

टेलीविजन (Television) – दूरदर्शन भारत का राष्ट्रीय टेलीविजन है। दूरदर्शन का पहला कार्यक्रम 15 सितम्बर, 1959 को प्रसारित किया गया था। दूरदर्शन तीन स्तरों वाली राष्ट्रीय, प्रादेशिक, स्थानीय-बुनियादी कार्यक्रम प्रसारण सेवा है। दूरदर्शन अपने दर्शकों को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के अनेक कार्यक्रम सीधे प्रसारण द्वारा दिखाता है।

प्रश्न 19.
आधुनिक जीवन में उपग्रह और कम्प्यूटर के उपयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उपग्रह (Satellites) – कृत्रिम उपग्रहों के विकास और उपयोग के द्वारा संसार और भारत के संचार तंत्र में एक क्रांति आ गई है। आकृति और उद्देश्यों के आधार पर भारत की उपग्रह प्रणाली को दो वर्गों में रखा गया है-

  1. भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली,
  2. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह प्रणाली।

इन्सेट दूरसंचार, मौसम विज्ञान संबंधी प्रेक्षण और उसके विविध आँकड़ों के एकत्रीकरण तथा कार्यान्वयन के लिए एक बहुउद्देशीय प्रणाली है। ये उपग्रह अनेक आँकड़े एकत्र करते हैं तथा विभिन्न उपयोगों के स्थलीय स्टेशनों को उनका प्रसारण करते हैं।

कम्प्यूटर (Computer) – कम्प्यूटर का अनेक प्रकार से उपयोग किया जाता है। यह चार प्रकार के कार्य करता है-

  1. निवेश के रूप में आँकड़ों को स्वीकार करता है।
  2. यह आँकड़ों का भंडारण करता है। स्मृति में संरक्षित रखता है।
  3. यह अभीष्ट सूचना के लिए निर्देशानुसार आँकड़ों का प्रसंस्करण करता है।
  4. यह सूचना को निर्गम के रूप में संचालित करता है। अपनी विभिन्न क्षमताओं के कारण कम्प्यूटर का विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक उपयोग किया जाता है। शिक्षा के ज्ञान के प्रसार में कम्प्यूटर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रश्न 20.
भारत में रेलों के वितरण प्रतिरूप का विवरण दीजिए।
उत्तर:
भारतीय रेलों के वितरण प्रतिरूप में भिन्नताएँ पाई जाती हैं। किन्हीं प्रदेशों में रेल जाल अधिक घना है तो कहीं कम। पर्वतीय, पठारी, मैदानी भागों में भिन्न-भिन्न है।

  1. मैदानी भाग (Plains) – समतल भूमि होने के कारण मैदानों में रेल पटरियाँ बिछाना सरल है तथा कृषि और औद्योगिक विकास के कारण रेल जाल सघन है।
  2. उत्तरी-पूर्वी भाग (Northern-Eastern Region) – भारत के इस भाग में रेल जाल विरल है। इस क्षेत्र में अधिक वर्षा के कारण घने वन हैं। इसके अतिरिक्त यह भाग पहाड़ी है इसलिए रेल पटरियाँ बिछाना कठिन है।
  3. पूर्वी तटीय मैदान तथा पश्चिमी तटीय मैदान (East CoastalPlain and West Coastal Plain) – इन भागों में भी रेलजाल अधिक सघन नहीं है क्योंकि समतल भूमि और कृषि तथा उद्योगों के लिए अनुकूल आर्थिक परिस्थितियाँ नहीं हैं।
  4. राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र (Desert Regions of Rajasthan) – यहाँ रेल जाल अत्यधिक विरल है। पश्चिमी राजस्थान की मरुभूमि रेल जाल बिछाने के लिए अनुकूल नहीं है।
  5. हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में भी रेल जाल विरल है। यह पहाड़ी उच्चावच तथा ऊबड़खाबड़ भूमि रेल पटरियाँ बिछाने के अनुकूल नहीं है। इन क्षेत्रों में आर्थिक विकास भी भिन्न स्तर का है।

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