Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

Bihar Board Class 11 Philosophy पद और तर्कवाक्य Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कौन शब्द संयोजक (Copula) है –
(क) होगा
(ख) है
(ग) था
(घ) चाहिए
उत्तर:
(ख) है

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प्रश्न 2.
अंशव्यापी भावात्मक तर्कवाक्य का संकेत है –
(क) A
(ख) E
(ग) I
(घ) O
उत्तर:
(ग) I

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन संयोजक (Couple) है?
(क) है
(ख) हु
(ग) हैं
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 4.
किसने कहा कि “व्यक्तिवाचक नाम अगुणवाचक होते हैं”?
(क) जेवन्सं
(ख) जे. एस. मिल
(ग) पी. के. राय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) जे. एस. मिल

प्रश्न 5.
वे पद जो किसी पदार्थ की वर्तमान अनुपस्थिति का बोध कराते हैं, उन्हें कहा जाता हैं –
(क) निषेधात्मक
(ख) भावात्मक
(ग) विरहात्मक
(घ) संदेहात्मक
उत्तर:
(ग) विरहात्मक

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प्रश्न 6.
किसने कहा कि ‘व्यक्तिवाचक’ नाम गुणवाचक होते हैं?
(क) मिल
(ख) जेवन्स
(ग) पी. के. राय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) जेवन्स

प्रश्न 7.
पद होता है –
(क) सिर्फ उद्देश्य
(ख) सिर्फ विधेय
(ग) उद्देश्य एवं विधेय दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) उद्देश्य एवं विधेय दोनों

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प्रश्न 8.
‘भारत के वर्तमान राष्ट्रपति’ का पद है –
(क) निश्चित
(ख) अनिश्चित
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) निश्चित

प्रश्न 9.
‘जंगल’ (Forest) पद है –
(क) समूहवाचक
(ख) असमूहवाचक
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) समूहवाचक

प्रश्न 10.
भाषा में व्यक्त निर्णय को कहते हैं –
(क) पद
(ख) तर्कवाक्य
(ग) न्याय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) तर्कवाक्य

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प्रश्न 11.
तर्कवाक्य में होते हैं –
(क) उद्देश्य
(ख) विधेय
(ग) संयोजक
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ख) विधेय

प्रश्न 12.
कोई पद व्याप्त (distributed) कहा जाता है, जब –
(क) वह पूर्णवस्तुवाचकता में व्यवहृत होता है
(ख) वह पूर्ण भाववाचकता में व्यवहृत होता है
(ग) वह आंशिक वस्तुवाचकता में व्यवहृत होता है
(घ) वह आंशिक भाववाचकता में व्यवहृत होता है
उत्तर:
(क) वह पूर्णवस्तुवाचकता में व्यवहृत होता है

प्रश्न 13.
तार्किक वाक्य में ‘संयोजक’ (Copula) को होना चाहिए –
(क) भूतकाल में
(ख) वर्तमान काल में
(ग) भविष्यत काल में
(घ) तीनों कालों में
उत्तर:
(ख) वर्तमान काल में

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प्रश्न 14.
परिमाण के दृष्टिकोण से तार्किक वाक्य का वर्गीकरण किया जाता है –
(क) भावात्मक एवं निषेधात्मक में
(ख) पूर्णव्यापी एवं अंशव्यापी में
(ग) उपर्युक्त दोनों में
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) पूर्णव्यापी एवं अंशव्यापी में

प्रश्न 15.
पूर्णव्यापी भावात्मक तर्कवाक्य का संकेत है –
(क) E
(ख) A
(ग) I
(घ) O
उत्तर:
(ख) A

प्रश्न 16.
पूर्ण व्यापी निषेधात्मक तर्कवाक्य का संकेत है –
(क) E
(ख) A
(ग) I
(घ) O
उत्तर:
(क) E

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प्रश्न 17.
‘मनुष्य’ पद में –
(क) सिर्फ गुणवाचकता है
(ख) सिर्फ वस्तुवाचकता है
(ग) वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता है

प्रश्न 18.
पद है –
(क) स्वतः पद अयोग्य शब्द
(ख) पदयोग्य शब्द
(ग) पद अयोग्य शब्द
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) पदयोग्य शब्द

प्रश्न 19.
विपरीतता (Contrary) का सम्बन्ध पाया जाता है –
(क) A तथा E के बीच
(ख) A तथा O के बीच
(ग) E तथा O के बीच
(घ) O तथा A के बीच
उत्तर:
(क) A तथा E के बीच

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प्रश्न 20.
गुण एवं परिणाम के आधार पर तर्कवाक्य कितने प्रकार के होते हैं?
(क) चार
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) एक
उत्तर:
(क) चार

प्रश्न 21.
E का उपाक्षित या उपाश्रयण है –
(क) O
(ख) A
(ग) I
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) O

प्रश्न 22.
E का व्याघाती है –
(क) 1
(ख) A
(ग) 0
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 1

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प्रश्न 23.
‘A’ का व्याघाती है –
(क) O
(ख) E
(ग) I
(घ) सभी
उत्तर:
(क) O

प्रश्न 24.
‘साक्षर एवं निरक्षर’ पदों के बीच कौन-सा विरोध सम्बन्ध है?
(क) व्याघाती
(ख) विपरीत
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) व्याघाती

प्रश्न 25.
‘पशुता’ कैसा पद है?
(क) वस्तुवाचकता
(ख) गुणवाचकता
(ग) दोनों
(घ) पद नहीं है
उत्तर:
(ख) गुणवाचकता

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प्रश्न 26.
‘मनुष्य’ कैसा पद है?
(क) वस्तुवाचकता
(ख) गुणवाचकता
(ग) दोनों (घ) पद नहीं है
उत्तर:
(क) वस्तुवाचकता

प्रश्न 27.
यदि किसी पद की गुणवाचकता बढ़ती है तब उस पद की वस्तुवाचकता –
(क) घटती है
(ख) बढ़ती है
(ग) घटती तथा बढ़ती है
(घ) न तो बढ़ती है और न घटती है
उत्तर:
(क) घटती है

Bihar Board Class 11 Philosophy पद और तर्कवाक्य Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘A’ का व्याघाती कौन है?
उत्तर:
‘A’ का व्याघाती ‘O’ है।

प्रश्न 2.
‘Each man is mortal’ का उपाश्रय क्या होगा?
उत्तर:
L.E – All men are mortal – A.

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प्रश्न 3.
‘E’ का व्याघाती कौन है?
उत्तर:
‘E’ का व्याघाती ‘I’ है।

प्रश्न 4.
अंशव्यापी भावात्मक (1) तर्कवाक्य का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
Some teachers are honest-I.

प्रश्न 5.
‘Every student is intelligent’ का तार्किक रूपान्तर क्या होगा?
उत्तर:
L.E-All students are intelligent-A.

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प्रश्न 6.
तर्कवाक्य कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
तर्कवाक्य चार प्रकार के होते हैं। वे हैं – पूर्णव्यापीभावात्मक
(A) पूर्णव्या। निषेधात्मक
(E) अंशव्यापी भावात्मक
(I) एवं अंशव्यापी निषेधात्मक (O)।

प्रश्न 7.
तर्कवाक्य के संयोजक (Copula) किस काल में होते हैं?
उत्तर:
तर्कवाक्य के संयोजक हमेशा वर्तमानकाल में होते हैं।

प्रश्न 8.
किसी तर्कवाक्य के कितने अंग (Parts) होते हैं?
उत्तर:
किसी भी तर्कवाक्य के तीन अंग होते हैं। वे हैं उद्देश्य (Subject), विधेय (Predicate) एवं संयोजक (Copula)।

प्रश्न 9.
E का उपाश्रय कौन है?
उत्तर:
E का उपाश्रय ‘O’ है।

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प्रश्न 10.
A का विपरीत कौन-सा वाक्य होता है?
उत्तर:
A का विपरीत ‘E’ वाक्य होता है।

प्रश्न 11.
पदों की व्याप्ति (Distribution of terms) की स्मरण रीति क्या है?
उत्तर:
पदों की व्याप्ति का स्मरण हम ‘ASEBINOP’ से करते हैं।

प्रश्न 12.
किसके अनुसार तर्कवाक्य चार प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
गुण एवं परिणाम के आधार पर तर्कवाक्य चार प्रकार के होते हैं।

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प्रश्न 13.
“No men are perfect” कौन-सा तर्कवाक्य है?
उत्तर:
यह पूर्णव्यापी निषेधात्मक तर्कवाक्य (E) है।

प्रश्न 14.
पद की वस्तुवाचकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी पद के कहने से उस पद के अंतर्गत आने वाले जिन व्यक्तियों या वस्तुओं का बोध होता है, उसे ही पद की वस्तुवाचकता कहते हैं। जैसे मनुष्य पद की वस्तुवाचकता सभी मनुष्य हैं।

प्रश्न 15.
किसी पद की गुणवाचकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जिस पद के कहने से उस पद के अंतर्गत आने वाले सभी व्यक्तियों, वस्तुओं पदार्थों के सामान्य एवं सार (essential) गुणों का बोध होता है, उसे ही उस पद की गुणवाचकता कहते हैं। जैसे-‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता ‘पशुता’ एवं ‘विवेकशीलता’ है।

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प्रश्न 16.
विपरीत पद (Contrary terms) क्या है?
उत्तर:
अगर दो पदों के बीच ऐसा सम्बन्ध हो कि एक पद के सत्य होने पर दूसरा अनिवार्य रूप से असत्य हों, लेकिन एक के असत्य होने पर दूसरे पर असत्य होना आवश्यक नहीं हो तो वे पद विपरीत (Contrary terms) कहलाते हैं। जैसे – ‘लाल’ और ‘काला’।

प्रश्न 17.
पद (Term) की परिभाषा दें।
उत्तर:
वे शब्द या शब्द-समूह जो स्वयं किसी तर्कवाक्य का उद्देश्य या विधेय हो सकते हैं या होते हैं, पद कहलाते हैं। जैसे – Ram is an intelligent. इस वाक्य में ‘Ram उद्देश्य तथा ‘intelligent’ विधेय है जिन्हें पद के रूप में जाना जाएगा।

प्रश्न 18.
पद को अंग्रेजी में term कहते हैं Term शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई है?
उत्तर:
“Term” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के terminus शब्द से हुई है जिसका अर्थ है-छोर या किनारा।

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प्रश्न 19.
‘साक्षर’ और ‘निरक्षर’ पदों के बीच कौन-सा विरोध सम्बन्ध है?
उत्तर:
‘साक्षर’ और ‘निरक्षर’ पदों के बीच व्याघाती (Contradictory) विरोध का सम्बन्ध है।

प्रश्न 20.
तर्कवाक्य (Proposition) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब हम भाषा के माध्यम से किसी निर्णय को अभिव्यक्त करते हैं तो वह तर्कवाक्य कहलाता है। जैसे-All men are mortal-A-एक तर्कवाक्य है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विरोध-सम्बन्ध याद करने का क्या तरीका है?
उत्तर:
विरोध का सम्बन्ध याद रखने के लिए सबसे पहले वर्ग के विभिन्न अंगों का नाम रख दिया जाता है। नामकरण करने के पहले इन अंगों पर विचार किया जाता है। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि शरीर का मस्तक ऊपर होता है, पैर नीचे रहता है तथा हाथ बगल में और पेट बीच में रहता है। इसी प्रकार वर्ग का भी नामकरण कर देना चाहिए।

वर्ग के मस्तक का नाम ‘विपरीत’ रखा जाता है तथा नीचे वाली पंक्ति का नाम ‘अनुविपरित’। दोनों बगल की पंक्तियों का नाम ‘उपाश्रित’ तथा बीच अथवा पेट में एक कोने से दूसरे कोने तक का नाम ‘व्याघातक’ रखा जाता है। इसे याद रखने के लिए इस कहावत को नहीं भूलना चाहिए – ‘मनुष्य के पेट में छल-कपट रहता है।’ छल-कपट व्याघातक का प्रतीक होता है। इस प्रकार हम चारों प्रकार के विरोध सम्बन्ध को अच्छी तरह याद रख सकते हैं।

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प्रश्न 2.
तर्क वाक्यों में पदों की व्याप्ति के स्मरण की क्या रीति है?
उत्तर:
पदों की व्याप्ति के स्मरण के लिए अंग्रेजी शब्द ‘ASEBINOP’ को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। इस शब्द में चार जोड़े अक्षर हैं जिसमें प्रत्येक जोड़े का पहला अक्षर तर्कवाक्य का निर्देश करता है और दूसरा अक्षर यह बतलाता है कि इस निर्दिष्ट तर्कवाक्य में कौन-सा पद व्याप्त है। S का अर्थ है Subject, B का अर्थ है ‘Both’, N का अर्थ है ‘Nothing’ तथा P का अर्थ है Predicate होता है। AS + EB + IN + OP में AS का अर्थ हुआ-A तर्कवाक्य में उद्देश्य पद व्याप्त है, EB का अर्थ है – E तर्कवाक्य में both अर्थात् दोनों पद (Subject.and Predicate) व्याप्त होते हैं। इसी तरह IN का अर्थ हुआ कि I पद में Nothing अर्थात् कोई भी पद व्याप्त नहीं है तथा OP का तात्पर्य है – O वाक्य में Predicate (विधेय) पद व्याप्त है।

प्रश्न 3.
A, E, I तथा O वाक्यों का उदाहरण दें।
उत्तर:
‘प्रत्येक छात्र इस काम को कर सकता है’ – A वाक्य का उदाहरण है। इसका तार्किक रूपान्तर होगः-सभी छात्र ऐसे हैं जो इस काम को कर सकते हैं। इसमें इसका उद्देश्य पद छात्र व्याप्त है। बहुत कम मनुष्य चतुर हैं यह I वाक्य का उदाहरण है जिसका तार्किक रूपान्तरण होगा-‘कुछ मनुष्य चतुर है।’ E वाक्य का उदाहरण होगा-‘एक भी आदमी पूर्ण नहीं है’ इसका तार्किक रूपान्तरण होगा-कोई भी मनुष्य पूर्ण नहीं है। “सभी मनुष्य पूर्ण नहीं है यह O वाक्य का उदाहरण है – इसका तार्किक रूपान्तरण होगा ‘कुछ मनुष्य पूर्ण नहीं है। E वाक्य में उद्देश्य और विधेय दोनों पद व्याप्त हैं तथा O वाक्य में विधेय पद व्याप्त है। I वाक्य में कोई भी पद व्याप्त नहीं है।

प्रश्न 4.
क्या ‘उपाश्रित’ तर्कवाक्यों का विरोध है?
उत्तर:
समान उद्देश्य और विधेय वाले वाक्य चाहे गुण में भिन्न हों अथवा परिणाम में, उन दोनों वाक्यों के बीच विरोध सम्बन्ध अवश्य होता है। इस अर्थ में ‘उपाश्रित’ को भी तर्कवाक्यों के विरोध का एक रूप कहा जा सकता है। क्योंकि इसके दो वाक्यों में एक सामान्य वाक्य रहता है तथा दूसरा विशेष वाक्य होता है।

कुछ तार्किकों का मानना है कि चूँकि उपाश्रित में दोनों वाक्य एक ही गुण के होते हैं, इसलिए उन वाक्यों में विरोध-सम्बन्ध नहीं हो सकता। उपाश्रित के दोनों वाक्य सत्य भी होते हैं। विरोध का यदि व्यापक अर्थ लिया जाए और किसी भी प्रकार के विरोध को विरोध माना जाए तो उपाश्रित भी विरोध का एक प्रकार होगा। यदि विरोध के लिए गुणों में अन्तर रहना आवश्यक है तो उपाश्रित को विरोध का प्रकार नहीं माना जाएगा।

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प्रश्न 5.
“विरोध का वर्ग” क्या है?
उत्तर:
तर्कवाक्यों के विरोध-सम्बन्ध के विभिन्न प्रकारों का स्मरण रखने के लिए एक वर्ग का सहारा लिया जाता है, जिसे वर्ग का विरोध कहा जाता है। इस वर्ग के सहारे चारों प्रकार के विरोध सम्बन्ध को व्यक्त किया जा सकता है। विरोध का वर्ग बनाने के लिए ‘A’, ‘E’, ‘I’, ‘O’, ‘U’ अक्षरों का सहारा लिया जाता है।

इन अक्षरों को सही स्थान पर रखने के लिए एक फार्मूले को याद रखना पड़ता है जो इस प्रकार है – ‘बेश-कमी’ तथा ‘हाँ – नहीं’ I विरोध के वर्ग के ऊपर के हिस्से में ‘बेशी वाक्य’ अर्थात् ‘A’ तथा ‘E’ वाक्य रखा जाता है। ये दोनों तर्कवाक्य ‘All’ को सूचित करेंगे। कम वाला वाक्य अर्थात् विशेष वाक्य नीचे लिखा जाएगा। विरोध के वर्ग के नियम की शुद्धता के लिए यह याद रखना पड़ता है कि पहले ‘हाँ’ होता है और उसके बाद ‘नहीं’ होता है। इसका अर्थ हुआ कि विरोध के वर्ग में पहले ‘हाँ’ यानी स्वीकारात्मक वाक्य लिखा जाता है और तब ‘नहीं’ अर्थात् निषेधात्मक वाक्य लिखा जाता है।

प्रश्न 6.
पदसंयोज्य शब्द क्या है?
उत्तर:
पद संयोज्य शब्द वे होते हैं जो स्वतंत्र रूप से किसी तार्किक वाक्य का उद्देश्य या विधेय नहीं बन सकते बल्कि ऐसा होने के लिए वे पदयोग्य शब्दों की सहायता लेते हैं। इस.प्रकार यह कहा जा सकता है कि जब कोई पदयोग्य शब्द पदसंयोज्य से मिल जाता है तभी पदसंयोज्य किसी वाक्य का उद्देश्य और विधेय हो सकता है और तभी वह पद कहला सकता है, जैसे-का, के, पर आदि को जब अन्य पदयोग्य शब्द के साथ मिला देते हैं तब ये वाक्य में उद्देश्य या विधेय के स्थान पर व्यवहृत हो जाते हैं। जैसे-राम का घोड़ा दौड़ रहा है-इस वाक्य में ‘राम का घोड़ा’ उद्देश्य है। यहाँ ‘का’ का प्रयोग ‘राम’ और ‘घोड़ा’ के साथ हुआ है जो पदयोग्य शब्द हैं, अतः ‘का’ उद्देश्य के स्थान में प्रयुक्त है। इसलिए ‘का’ पदसंयोज्य शब्द (Syn-categorematic word) है।

प्रश्न 7.
क्या व्यक्तिवाचक पद गुणवाचक होते हैं?
उत्तर:
व्यक्तिवाचक नाम को व्यक्तिवाचक पद कहते हैं। मिल ने व्यक्ति वाचक पद को गुणवाचक नहीं माना है जबकि जेवन्स ने इसे गुणवाचक माना है। वेल्टन के अनुसार व्यक्तिवाचक पद अगुणवाचक होते हैं। ‘मिल’ ने व्यक्तिवाचक पद को निरर्थक चिह्न मात्र माना है। उनके अनुसार ‘नाम’ से केवल किसी व्यक्तिविशेष को समाज-समूह से अलग किया जा सकता है।

‘मिल’ के अनुसार व्यक्तिवाचक गुणवाचक नहीं होते, क्योंकि एक गरीब पिता भी अपने पुत्र का नाम ‘धनपत’ रखता है, एक अंधी लड़की का नाम ‘मृगनयनी’ हो सकता है लेकिन ‘जेवन्स’ का विचार है कि व्यक्तिवाचक पद या नाम गुणवाचक होते हैं। जैसे-यदि हम मोहन कहते हैं तो इससे एक व्यक्ति का बोध होता है अर्थात् व्यक्तिवाचक पद से वस्तु का मोटा-मोटी परिचय प्राप्त हो जाता है। परन्तु वेल्टन (Welton) का कहना है कि चूँकि व्यक्तिवाचक पद या नाम से किसी भी अन्तर्निहित गुण का बोध नहीं होता इसलिए ये गुणवाचक नहीं होते।

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प्रश्न 8.
भाषा में व्यक्त निर्णय से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
निर्णय जब भाषा में व्यक्त होता है तो उसे तार्किक-वाक्य कहा जाता है। उदाहरण के लिए गुलाब और लाल अलग-अलग प्रत्यय हैं और जब हम इसे एक साथ कर देते हैं तो निर्णय बनता है “गुलाब लाल है।” तार्किक वाक्य के लिए निर्णय का होना आवश्यक है। किसी के बारे में कुछ कहना ही निर्णय है।

जैसे जब हम कहते हैं कि “मोहन बुद्धिमान है” तब इस तर्क वाक्य में मोहन के बारे में बुद्धिमान होना कहा गया हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि मानसिक क्षेत्र में दो प्रत्ययों के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है तो निर्णय भावात्मक होता है और यदि उनके बीच अभावात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है तो अभावात्मक निर्णय होता है। ‘गुलाब लाल है’ तथा ‘गुलाब उजला नहीं है’ क्रमशः भावात्मक और अभावात्मक निर्णय है जो भाषा में व्यक्त हैं।

प्रश्न 9.
‘पदों के विरोध से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
दो पदों के बीच में विरोध तब होता है जब दोनों एक साथ सत्य नहीं होते। जैसे-उजला-काला, जीवित और मृत कोई भी वस्तु एक ही साथ उजली और काली नहीं हो सकती, कोई भी व्यक्ति एक ही साथ जीवित और मृत नहीं हो सकता। पदों के बीच में दो प्रकार के विरोध हो सकते हैं-विपरीत विरोध तथा व्याघातक विरोध। विपरीत विरोध में एक सत्य होगा तो दूसरा असत्य होगा, एक की असत्यता दूसरे को संदेहात्मक बना देती है तथा दोनों के बीच सम्भावना रहती है। कोई वस्तु उजली है तो वह काली नहीं हो सकती। हरी-पीली-कोई वस्तु हरी या पीली एक साथ नहीं है।

धनी-गरीब, कोई व्यक्ति न धनी है और न गरीब ही तब दोनों के बीच तीसरी सम्भावना हो सकती है कि वह मध्यम वर्ग का व्यक्ति है। व्याघातक विरोध में एक ही सत्य दूसरे की असत्यता बताती है, एक की असत्यता दूसरे की सत्यता बताती है, दोनों पद एक साथ न तो सत्य हो सकते हैं, और न असत्य हो सकते हैं तथा दोनों पदों के बीच कोई तीसरा विकल्प नहीं आ सकता। जीवन और मृत्यु पद में यदि पहला सत्य होगा तो दूसरा अवश्य ही असत्य होगा और यदि दूसरा सत्य होगा तो पहला असत्य होगा तथा इन दोनों के बीच कोई तीसरा विकल्प नहीं रहेगा। जीवन और मृत्यु के बीच कोई तीसरी सम्भावना नहीं रहती।

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प्रश्न 10.
साक्षात् वैषम्य सम्बन्ध तथा विषम अनुपात सम्बन्ध में क्या अंतर है?
उत्तर:
दो वस्तुओं में साक्षात् वैषम्य सम्बन्ध तब होता है जब एक में घटती होने से दूसरे भी घटती होती है अथवा एक की बढ़ती होने से दूसरे में भी बढ़ती होती है। जैसे-जब गर्मी घटती है तब थर्मामीटर का पारा घटता है और जब गर्मी बढ़ती है तब इसका पारा बढ़ता है। इस प्रकार ‘गर्मी’ और ‘पारे’ में साक्षात् वैषम्य सम्बन्ध है। परन्तु विषम अनुपात सम्बन्ध में दो वस्तुओं या परिणामों का घटना या बढ़ना विपरीत रीति से होता है। विषम अनुपात सम्बन्ध में जब एक वस्तु बढ़ती है तो दूसरी घटती है और फिर जब एक वस्तु घटती है तो दूसरी वस्तु बढ़ती है।

जैसे-बाजार में किसी वस्तु की कमी हो जाती है तो उसके मूल्य में वृद्धि हो जाती है। लेकिन दही वस्तु जब अधिक मात्रा में प्राप्त होने लगती है तो उसके मूल्य में गिरावट आ जाती है। वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में विषम अनुपात का सम्बन्ध होता है, क्योंकि जब वस्तुवाचकता बढ़ती है तो गुणवाचकता घटती है अथवा गुणवाचकता बढ़ती है तो वस्तुवाचकता घटती है। जब वस्तुवाचकता घटती है तब गुणवाचकता बढ़ती है अथवा गुणवाचकता में कमी होती है तो वस्तुवाचकता में वृद्धि हो जाती है।

प्रश्न 11.
संयोजक उद्देश्य और विधेय के वर्तमान सम्बन्ध को व्यक्त करता है – कैसे?
उत्तर:
संयोजक के काल के सम्बन्ध में कहा गया है यह भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीनों कालों में होना चाहिए, लेकिन यह मत प्रांतिपूर्ण है। वस्तुतः संयोजक उद्देश्य और विधेय के बीच का सम्बन्ध होता है। इसी वर्तमान सम्बन्ध को सत्य या असत्य साबित किया जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान सम्बन्ध व्यक्त करने के लिए वर्तमान काल ही एकमात्र उपयुक्तकाल (tense) है। चूंकि संयोजक उद्देश्य और विधेय के केवल वर्तमान सम्बन्ध को ही व्यक्त करता है, इसलिए इसे वर्तमान काल में ही होना चाहिए।

उदाहरण के लिए ‘राम दशरथ का लड़का था’ वाक्य का तार्किक रूप होगा-राम एक व्यक्ति हैं जो दशरथ का लड़का था। इसमें वाक्य का अर्थ अक्षुण्ण रहता है और संयोजक भी वर्तमान काल में हो जाता है। तार्किक वाक्यों में उद्देश्य और विधेय का सम्बन्ध यदि भूतकाल और भविष्यत्काल से भी हो तो उन्हें वर्तमान अर्थात् राम धनी भीराम धनी और विटा का है कि ‘राम और में व्यक्त किया जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि संयोजक उद्देश्य और विधेय के केवल वर्तमान सम्बन्ध को व्यक्त करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 12.
मिश्रित तर्कवाक्य क्या है?
उत्तर:
जिस तर्क वाक्य में उद्देश्य और विधेय की परिधि में दो निर्णयों को व्यक्त किया जाता है उसे मिश्रित तर्कवाक्य कहा जाता है। जैसे-‘राम धनी और विद्वान है। इस तर्कवाक्य में एक से अधिक निर्णय हैं-अर्थात् राम धनी भी है और विद्वान भी। इसी प्रकार हम यह कह सकते हैं कि ‘राम और श्याम विद्वान है।’ तो इस तार्किक वाक्य में भी दो निर्णय हैं – ये निर्णय हैं-‘राम विद्वान है’ तथा ‘श्याम विद्वान है।’ वाक्य का संयोजक भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों ही होता है। उसी प्रकार मिश्रित वाक्य की भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों होते हैं। जैसे – ‘राम और श्याम धनी हैं’ भावात्मक मिश्रित वाक्य है तथा ‘श्याम न तो परिश्रमी है और न धनी है’ अभावात्मक या निषेधात्मक मिश्रित तर्क वाक्य है।

प्रश्न 13.
वास्तविक तर्कवाक्य क्या है?
उत्तर:
जब किसी तर्क वाक्य के विधेय में ऐसे ज्ञान की वृद्धि हो जाती है जो विधेय में निहित नहीं होता तो ऐसे वाक्य को वास्तविक तर्क वाक्य कहते हैं। जैसे-‘मनुष्य सभ्यता का पुजारी है।’ इस तार्किक वाक्य में ‘सभ्यता का पुजारी’ विधेय है। यह एक ऐसा गुण है जो मनुष्य पद में निहित है। मनुष्य पद का तार्किक विश्लेषण है – विवेकशीलता तथा पशुता।

लेकिन उपर्युक्त तार्किक वाक्य में निहित गुणों के अतिरिक्त एक नये गुण की वृद्धि हुई है। अर्थात् उद्देश्य में अन्तर्भूत गुणों के साथ विधेय में व्यक्त किया हुआ गुण जुड़ गया है। ‘हिमालय एक पर्वत है’ तार्किक वाक्य में ‘हिमालय’ उद्देश्य है जो व्यक्तिवाचक नाम है जिससे किसी गुण का बोध नहीं होता, परन्तु इस वाक्य के विधेय से एक नये गुण का पता चलता है। इसलिए यह तर्कवाक्य वास्तविक तर्कवाक्य है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तार्किक वाक्य और व्याकरण वाक्य में क्या सम्बन्ध है? तर्क वाक्य का वर्गीकरण करें।
उत्तर:
तर्कवाक्य और व्याकरण वाक्य में निम्नलिखित सम्बन्ध हैं –

1. व्याकरण वाक्यों का क्षेत्र तार्किक वाक्यों के क्षेत्र से वृहत् हैं जैसे – राम सुन्दर है। यह तार्किक वाक्य है, किन्तु साथ ही साथ व्याकरण का वाक्य भी है। लेकिन व्याकरण के प्रश्न सूचक, इच्छा सूचक, आज्ञासूचक एवं विस्मय सूचक इत्यादि वाक्य तार्किक वाक्य नहीं है। जैसे क्या राम सुन्दर है?

2. व्याकरण वाक्य के केवल दो अंग हैं –

  • उद्देश्य और
  • विधेय। परन्तु तर्क वाक्य के तीन अंग होते हैं-उद्देश्य, विधेय एवं संयोजक। जबकि संयोजक को व्याकरण के वाक्य में विधेय का ही अंग माना जाता है, जैसे-“Ram is poor”.

3. व्याकरण का वाक्य भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् तीनों कालों में होता है। परन्तु, तर्क, वाक्य केवल वर्तमान काल में होता है।

4. तार्किक वाक्य के सम्बन्ध में सत्य-असत्य का प्रश्न उठता है। जबकि व्याकरण के वाक्य के संबंध में शुद्धि एवं अशुद्धि का प्रश्न उठता है।

5. तार्किक वाक्य केवल निर्णय को व्यक्त करता है परन्तु व्याकरण के वाक्य निर्णय के अलावा हमारी अनुभूतियों को भी व्यक्त करते हैं। जैसे-इच्छा, हर्ष, विषाद, विस्मय, आज्ञा, प्रार्थना आदि।

6. तार्किक वाक्य का परिमाण एवं गुण जानना जरूरी है, परन्तु व्याकरण संबंधी वाक्यों के लिए जरूरी नहीं है।

7. तार्किक वाक्य का रूप सर्वदा स्पष्ट, संक्षिप्त एवं एकार्थक होता है। परन्तु व्याकरण के वाक्य अस्पष्ट, जटिल, विस्तृत एवं अनेकार्थक तथा आलंकारिक होते हैं। व्याकरण संबंधी वाक्यों की शोभा, अलंकार, अनुप्रस्थ, लक्षणा, व्यंजना आदि से बढ़ जाती है किन्तु तार्किक वाक्यों में इनका कोई स्थान नहीं है।

8. तार्किक वाक्य में अभावात्मक चिह को संयोजक का अंग माना जाता है। किन्तु व्याकरण के वाक्य में इन अभावात्मक चिह्नों को विधेय का ही अंग माना जाता है। अंतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “All grammatical sentences are not logical proposition but all logical propositions are grammatical sentences.” अर्थात् व्याकरण के सभी वाक्य तर्क वाक्य नहीं है परन्तु सभी तार्किक वाक्यों को व्याकरण वाक्य कहते हैं।

तर्क वाक्य का वर्गीकरण (Classification of Proposition):
वर्गीकरण के सामान्य, नियमों को ध्यान में रखते हुए तार्किक वाक्यों का वर्गीकरण निम्नलिखित दृष्टिकोण से किया गया है।

1. बनावट की दृष्टि से (According to construction) तर्क वाक्य दो तरह के हैं।
(क) सरल (Simple)
(ख) मिश्रित (Compound)

2. गुण (Quality) के अनुसार तर्क वाक्य दो हैं –
(क) स्वीकारात्मक (Affirmative)
(ख) निषेधात्मक (Negative)

3. परिमाण (Quantity) के अनुसार – तार्किक वाक्य दो तरह के हैं –
(क) सामान्य (universal)
(ख) विशेष (Particular)

4. विधि (Modality) के अनुसार – तर्क वाक्य के तीन भेद हैं –
(क) आवश्यक (Necessary)
(ख) साधारण (Assertory)
(ग) संदेहात्मक (Problematic)

5. अर्थ के अनुसार (Significance) तर्क वाक्य दो तरह के हैं –
(क) शाब्दिक (Verbal)
(ख) वास्तविक (Real)

6. संबंध (Relation) के अनुसार तर्क वाक्य दो तरह के हैं –
(क) निरपेक्ष (Categorical)
(ख) सापेक्ष (Conditional)

1. According to Construction:
बनावट की दृष्टि से तर्क वाक्य दो हैं –

(क) सरल तर्क वाक्य:
तर्क वाक्य में दो ही पद होते हैं। (उद्देश्य और विधेय) जब एक निर्णय को एक ही उद्देश्य तथा एक ही विधेय की परिधि में व्यक्त किया जाता है तब वह सरल तर्क वाक्य कहलाता हैं जैसे कुछ आम मीठे हैं। (Some mangoes are sweet) इसमें एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय पद है कुछ आम-मीठे हैं।

(ख) मिश्रित तर्क वाक्य:
इसमें उद्देश्य और विधेय की परिधि में दो निर्णयों को व्यक्त किया जाता है। जैसे-“राम धनी और विद्वान है।” “राम और मोहन विद्वान हैं।” इन वाक्यों में एक से अधिक निर्णय हैं। अतः यह मिश्रित वाक्य हैं। इसी तरह “हरि न पढ़ता है और न लिखता है।” (Hari neither reads nor writes)

2. गुण (Quality) के अनुसार:
भावात्मक तथा निषेधात्मक (Affirmative and nega tive):
दो प्रकार के तर्क वाक्य हैं –

(क) भावात्मक तर्क वाक्य उसे कहते हैं जिसमें विधेय पद उद्देश्य को स्वीकार करता है। जैसे ‘सभी विद्यार्थी तेज हैं’, ‘कुछ छात्र सज्जन हैं।’ यहाँ सभी विद्यार्थी तथा कुछ छात्र के बारे में तेज और सज्जनता का समर्थन किया गया है।
(ख) निषेधात्मक तर्कवाक्य-इसमें विधेय उद्देश्य को अस्वीकार करता है। जैसे सभी भारतीय धनी नहीं है। कुछ छात्र गरीब नहीं है। यहाँ दोनों विधेय उद्देश्य को अस्वीकार करते हैं। इस तरह के वाक्य में विधेय का निषेध करता है, जैसे-Some Indians are not poor.

3. परिमाण (Quantity) के अनुसार –
(क) सामान्य या पूर्णव्यापी (Universal)
(ख) विशेष या अंशव्यापी (Particular)

इस तरह के वाक्यों के परिमाण व्यक्त करने हेतु तर्कशास्त्र में ‘सब’ तथा ‘कुछ’ शब्दों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में all तथा some.

(क) पूर्णव्यापी तर्कवाक्य:
यह वह तर्क वाक्य है जिसमें विधेय उद्देश्य की सम्पूर्ण वस्तुवाचकता स्वीकार या अस्वीकार (affirm or deny) करता है। जैसे-सभी मनुष्य धनी हैं, कोई भी नेता ‘मनुष्य सही’ नहीं है। (All men are rich. No men are perfect) इन वाक्यों में मनुष्य पद पूर्ण वस्तुवाचकता में व्यवहत हुआ है।

(ख) विशेष या अंशव्यापी तर्क वाक्य (Particular proposition):
इसके विधेय उद्देश्य की वस्तुवाचकता के एक ही अंश को स्वीकार या अस्वीकार करता है। जैसे-कुछ आदमी तेज हैं तथा कुछ आदमी विद्वान नहीं है। (Some men are intelligent and some men are not scholar) इसमें विधेय उद्देश्य की कुछ ही वस्तुवाचकता के बारे में विधान या निषेध (affirm or deny) करता है। इसलिए दोनों वाक्य अंशव्यापी कहे जाते हैं।

4. विधि (Modality) के अनुसार तर्क वाक्य तीन तरह के हैं –
(क) अनिवार्य या आवश्यक (Necessary) तर्कवाक्य:
यह वह तर्क वाक्य है जिसमें उद्देश्य और विधेयं का संबंध उनके स्वभाव में ही निहित रहता है। यह संबंध अनिवार्य तथा सामान्य होता है और सर्वदा के लिए सत्य होता है। जैसे-दो और दो मिलकर चार होते हैं।

(Two plus two must be four):
यहाँ उद्देश्य और विधेय का संबंध अनिवार्य है।

(ख) साधारण (assertory) तर्कवाक्य:
यह वह वाक्य है जिसमें उद्देश्य और विधेय का संबंध हमारी अनुभूति पर आधारित हो। जैसे सभी हंस उजले होते हैं। गुलाब लाल होता है। ये सभी वाक्य साधारण हैं।

(ग) संदेहात्मक तर्कवाक्य (Problematic proposition):
यह वह तर्क वाक्य है जिसमें उद्देश्य और विधेय का संबंध संदेहात्मक अर्थात् यह संबंध कभी सत्य और कभी असत्य भी हो सकता है। जैसे – राम शायद पटना आएगा। वह आ सकता है। वर्षा हो सकती है। (Ram may go to Patna. He may come. It may rain)

5. अर्थ (Significance) के अनुसार तर्क वाक्य के दो भेद हैं।

(क) शाब्दिक (Verbal) तर्कवाक्य:
शाब्दिक तर्क वाक्य उसे कहते हैं जिसमें विधेय उद्देश्य की पूर्ण गुणवाचकता या गुणवाचकता के एक अंश का वर्णन करता है। जैसे सभी मनुष्य विवेकशील पशु हैं। शाब्दिक तर्क वाक्य का विधेय उद्देश्य के संबंध में या तो जाति (genus) होता है या विभेदक (differentia) होता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य जीव हैं’ तथा ‘सभी मनुष्य विवेकशील हैं। ये दोनों वाक्य शाब्दिक तर्क वाक्य हैं। इनमें ‘जीव’ genus हैं तथा ‘विवेकशील’ विभेदक (differentia) है।

(ख) वास्तविक वाक्य (Real proposition):
इसमें विधेय से एक ऐसे ज्ञान की वृद्धि होती है जो उद्देश्य में निहित होता है। जैसे – ‘मनुष्य सभ्यता का पुजारी है’। इनमें विधेय उद्देश्य के संबंध में या तो आकस्मिक गुण (accident) या सहज गुण (property) होता है। जैसे मनुष्य. गीत गाने वाला पशु है। यहाँ विधेय उद्देश्य के संबंध में आकस्मिक गुण के वर्ग में रहता है।

6. सम्बन्ध (Relation) के अनुसार तर्क वाक्य दो तरह के हैं –

(क) निरपेक्ष (Categorical proposition):
जब संबंध किसी शर्त पर निर्भर नहीं करता है तब उस वाक्य को निरपेक्ष कहते हैं। जैसे-‘राम धनी है, सभी कौए काले होते हैं। इन दोनों में भावात्मक संबंध स्थापित किया गया है। यहाँ उद्देश्य और विधेय का संबंध निरपेक्ष है। अर्थात् किसी पर आश्रित नहीं है।

(ख) सापेक्ष तर्क वाक्य (Conditional proposition):
सापेक्ष तर्क वह वाक्य है जिसके उद्देश्य और विधेय पदों का संबंध किसी शर्त पर निर्भर करता है। जैसे यदि तुम आओगे, तो मैं जाऊँगा, राम या तो विद्वान है या धनी। (If you come, I shall go; Ram is either scholar or rich) यहाँ शर्त छिपी हुई है। ये दोनों वाक्य सापेक्ष हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 2.
हेत्वाश्रित और वैकल्पिक तर्कवाक्य क्या है? इनमें क्या अन्तर है?
उत्तर:
हेत्वाश्रित तर्क वाक्य का स्वरूप-सापेक्ष तर्क वाक्य (Conditional proposition) की शर्त्त जब स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दी जाती है तब उसे हेत्वाश्रित तर्क वाक्य कहते हैं। इसमें यदि, अगर, शब्द शुरू में रहते हैं और अंग्रेजी में वाक्य, If, had, when, should’ वगैरह से प्रारम्भ होते हैं। जैसे यदि राम आएगा तो मैं पढूँगा, यदि सूरज है तो प्रकाश है। इस तरह If there is sun, there is light. When the cat is away the rats play about. का अर्थ है-If the cat is away the rats play about इसी तरह –

1. Should I go there, I shall tell him everything. इसका भी अर्थ “If’ है।

2. इस तरह हेत्वाश्रित तर्कवाक्य (Hypothetical proposition) के दो अंग होते हैं। एक वह जिसमें शर्त होती है और दूसरा वह जिसमें फल होता है। शर्त के ऊपर कुछ फल आधारित रहता है। यहाँ शर्त भाग को पूर्ववर्ती (Antecedent) कहते हैं और फल वाले भाग को अनुवर्ती (Consequent) कहते हैं। जैसे –

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसमें If you come शर्त है। इसलिए वाक्य में इस भाग को पूर्ववर्ती कहते हैं। इसी शर्त पर आधारित फल I shall go है इसलिए वाक्य के इस भाग को अनुवर्ती (Consequent) कहते हैं।

3. हेत्वाश्रित वाक्य में शर्त और फल स्पष्ट रूप से व्यक्त रहता है। कौन शर्त है और कौन फल है इसका पता तुरंत चल जाता है। जैसे – If the college is closed, shall go home? इसमें स्पष्ट ही है कि कॉलेज का बन्द होना शर्त है जिसपर आधारित है मेरा घर जाना। ‘मैं घर जाऊँगा’ अनुवर्ती का फल है। इसमें पहले शर्त और बाद में फल रहता है। अतः पहले antecedent तब consequent होता है।

4. हेत्वाश्रित तर्कवाक्य को अर्थ के अनुसार निरपेक्ष तर्क वाक्य में और निरपेक्ष तर्क वाक्य को हेत्वाश्रित तर्कवाक्य में बदला जा सकता है। इसमें रूप का परिवर्तन होता है अर्थ का नहीं। जैसे – सूरज है तो प्रकाश है (If there is sun, there is light) का निरपेक्ष रूप में रूपान्तरण होगा-सूरज होने की सभी अवस्थाएँ प्रकाश होने की सभी अवस्थाएँ हैं।

“All the cases of sun are the cases of light.” इस तरह “यदि सूरज है तो प्रकाश है या सूरज होने की सभी अवस्थाएँ प्रकाश होने की अवस्थाएँ हैं, बात एक ही है। इस तरह सभी धर्मात्माओं का आदर होता है।” “All pious persons are respected” को हेत्वाश्रित रूप में वदल सकते हैं। जैसे- यदि कोई धर्मात्मा है तो उसका आदर होता है।” (If a man is pious, he is respected)

(i) हेत्वाश्रित तर्कवाक्य के गुण का निर्धारण (Determination of quality of hypothetical proposition):
हेत्वाश्रित वाक्य भावात्मक है या निरोधात्मक इस पर तार्किकों के बीच मतभेद है।

कुछ तार्किकों का विचार है कि हेत्वाश्रित वाक्य हमेशा स्वीकारात्मक होते हैं। इसके संबंध में इनका तर्क है कि ऐसे वाक्यों के अनुवर्ती हमेशा पूर्ववर्ती पर निर्भर करते हैं। इसलिए अनुवर्ती के साथ पूर्ववर्ती का भावात्मक संबंध ही रहता है। यदि अनुवर्ती पूर्ववर्ती पर निर्भर नहीं करे तो वह हेत्वाश्रित वाक्य नहीं होगा। अतः हरेक हेत्वाश्रित तर्क वाक्य भावात्मक (affirmative) वाक्य होते हैं, निषेधात्मक नहीं।

आलोचना:
हेत्वाश्रित वाक्य हमेशा भावात्मक होता है निषेधात्मक नहीं ऐसा कहना गलत है। हेत्वाश्रित वाक्य के दो अंग हैं-पूर्ववर्ती और अनुवर्ती (antecedent and consequent)। इन दोनों में प्रमुख अंग अनुवर्ती ही है और जो जहाँ प्रमुख है उसी के अनुसार सभी कार्यवाही होती है। हम जो कुछ भावात्मक या निषेधात्मक कहना चाहते हैं उसकी अभिव्यक्ति अनुवर्ती में ही होती है। अतः हेत्वाश्रित वाक्य भावात्मक और निषेधात्मक दोनों हो सकते हैं। क्योंकि हेत्वाश्रित वाक्य के गुण का निर्धारण अनुवर्ती को देखकर ही होना चाहिए। जैसे-यदि वह आता है, तो मैं नहीं पढूंगा-निषेधात्मक अनुवर्ती यदि वह आता है, तो मैं पढूँगा-भावात्मक अनुवर्ती।

If he comes I shall not go – Negative consequent.
If he comes, I shall go – Affirmative consequent

इसमें पहला निषेधात्मक वाक्य है क्योंकि इसका अनुवर्ती निषेधात्मक है किन्तु दूसरा वाक्य भावात्मक है क्योंकि दूसरा अनुवर्ती भावात्मक है। इसी तरह पूर्ववर्ती के निषेधात्मक रहने पर भी हेत्वाश्रित वाक्य भावात्मक होता है यदि इसका अनुवर्ती भावात्मक हो तो। जैसे-If you do not come, I shall go यहाँ अनुवर्ती भावात्मक है। अतः हम निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हेत्वाश्रित तर्कवाक्य का गुण अनुवर्ती पर निर्भर करता है पूर्ववर्ती पर नहीं। ‘पूर्ववर्ती’ में तो शर्त रहती है वाक्य का असल भाग अनुवर्ती ही है।

(ii) हेत्वाश्रित वाक्य के परिमाण का निर्धारण (Determination of quantity a hypothetical proposition):
हेत्वाश्रित तर्क वाक्य का परिमाण उसके पूर्ववर्ती पर निर्भर करता है। यदि पूर्ववर्ती All (सब) से शुरू होता है तो संपूर्ण वाक्य अंशव्यापी होगा और यदि पूर्ववर्ती अंशव्यापी कुछ (Some) से प्रारंभ होता है तो संपूर्ण वाक्य अंशव्यापी होगा। जैसे –
(a) यदि सभी नागरिक चरित्रवान हो तो देश का भविष्य उज्जल होगा-पूर्णव्यापी वाक्य।
(b) यदि कुछ व्यक्ति मरेंगे तो आबादी कम होगी-अंशव्यापी वाक्य।

(क) In all cases if there is sun, there is light
(ख) In some cases, if a man labours, he succeeds. इस तरह प्रथम वाक्य पूर्णव्यापी है तथा दूसरा वाक्य अंशव्यापी है।

उसी तरह यदि किसी हेत्वाश्रित तर्क वाक्य के पूर्ववर्ती में परिमाण स्पष्टतः नहीं दिया रहता है तो उसे पूर्णव्यापी मानलिया जाता है, जैसे-If A is B; C is D दूसरा अर्थ है कि In all cases If A is B, C is D.
इस तरह हेत्वाश्रित तर्क वाक्य के परिमाण का निर्धारण पूर्ववर्ती के अनुसार तथा गुण का निर्धारण अनुवर्ती के अनुसार किया जाता है। (Quantity is determined by antecedent and quality is determined by con sequent)

2. वैकल्पिक तर्कवाक्य (Disjunctive proposition):
इस तरह के वाक्य ‘या तो’ (Either, or) की परिधि में रहते हैं। जैसे-राम या तो छात्र है या शिक्षक है। इसमें कुछ विकल्प होते हैं जो विकल्प के विधेय के रूप में आते हैं। इसमें शर्त्त अस्पष्ट रहती है।

वैकल्पिक वाक्य में जितने विकल्प होते हैं उनमें से कौन विकल्प (alternative) उद्देश्य के संबंध में सत्य है यह कैसे जाना जा सकता है? इस तरह के वाक्य की शर्त को स्पष्ट करने के लिए उसे हेत्वाश्रित वाक्य में बदलना पड़ता है। जैसे-राम या तो छात्र है या शिक्षक है”। इसे हेत्वाश्रित में इस प्रकार बदल सकते हैं –

  • यदि राम छात्र नहीं है तो वह शिक्षक है।
  • यदि राम शिक्षक नहीं है तो वह छात्र है। इन हेत्वाश्रित वाक्यों से पता चलता है कि कौन शर्त है। इसके लिए वैकल्पिक वाक्य के स्वभाव को समझना पड़ता है।

वैकल्पिक वाक्यों के विकल्पों का स्वभाव (Nature of the alternatives of disjunctive proposition) इस पर दो तार्किकों के मतों का उल्लेख है।

1. यूबरवेग (Ueberweg) का मत है कि वैकल्पिक वाक्य के विकल्प परस्पर बहिष्कारक (Mutually exclusive) होते हैं। अर्थात् यदि एक विकल्प उद्देश्य के संबंध में सत्य है, तो दूसरा असत्य होगा और यदि दूसरा सत्य है तो पहला असत्य होगा। कहने का अर्थ है कि एक विकल्प दूसरे का बहिष्कार करता है। जैसे राम या तो मर गया है या वह जिन्दा है। इसमें दो विकल्प हैं।

2. मर गया है।

3. जिन्दा है। इन दोनों विकल्पों का स्वभाव परस्पर बहिष्कारक है। इसमें एक सत्य है तो दूसरा असत्य। इस वैकल्पिक वाक्य को यदि हेत्वाश्रित वाक्य में बदला जाए तो उसके चार रूप होते हैं। “राम या तो मरा है या जिन्दा है।”

इसके चार हेत्वाश्रित वाक्य होंगे –

  • यदि राम मर गया है तो वह जिन्दा नहीं है।
  • यदि राम जिन्दा है तो वह मरा नहीं है।
  • यदि राम मरा नहीं है तो वह जिन्दा है।
  • यदि राम जिन्दा नहीं है, तो वह मंरा है।

इसका अर्थ यही हुआ कि यदि विकल्प परस्पर बहिष्कार हैं तो वैकल्पिक वाक्य के उद्देश्य के साथ यदि एक विकल्प सत्य है तो दूसरा असत्य और फिर एक असत्य है तो दूसरा सत्य है।

2. मिल (Mill) साहब का मत है कि वैकल्पिक वाक्य के विकल्प परस्पर बहिष्कारक नहीं (Not mutually exclusive) होते हैं। अर्थात् उद्देश्य के साथ एक यदि सत्य है, तो दूसरा असत्य नहीं होकर सत्य भी हो सकता है। विरोधात्मक नहीं होने पर दोनों एक ही उद्देश्य के संबंध में ठीक भी हो सकते हैं।

अतः मिल साहब के अनुसार विकल्पों के स्वभाव को परस्पर बहिष्कार नहीं मानने से वैकल्पिक वाक्य को सिर्फ दो प्रकार से हेत्वाश्रित वाक्य में बदल सकते हैं। जैसे – मोहन या तो विद्वान है या वह धनी है। इसमें “विद्वान तथा धनी”-ये ही दो विकल्प हैं। ये दोनों विकल्प साथ-साथ सत्य भी हो सकते हैं। अर्थात् मोहन विद्वान भी हो सकता है और धनी भी। इस तरह के विकल्पों के केवल दो हेत्वाश्रित वाक्य बनते हैं।”

  • “यदि मोहन विद्वान नहीं है तो वह धनी है।”
  • “यदि मोहन धनी नहीं है, तो वह विद्वान है।”

यहाँ हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि वैकल्पिक वाक्य के विकल्प परस्पर बहिष्कार नहीं हैं तो एक विकल्प की असत्यता पर हम आ सकते हैं, किन्तु किसी एक की सत्यता से दूसरे की असत्यता पर नहीं आ सकते हैं। क्योंकि यहाँ ऐसी भी संभावना रहती है कि दोनों विकल्प साथ ही साथ वैकल्पिक वाक्य के उद्देश्य के साथ सत्य हो जाएँ। अब प्रश्न है कि किसका विचार माना जाए-यूबरवेग का या मिल का? दोनों के विचारों में आंशिक सत्यता है।

यूबरवेग का वैकल्पिक वाक्य चार हेत्वाश्रित वाक्यों के बराबर होता है और मिल का दो हेत्वाश्रित वाक्यों के बराबर होता है, सदा सत्य नहीं है। यदि वैकल्पिक वाक्य वास्तविक व्याघाती पद होते हैं तो उसकी शर्त चार हेत्वाश्रित वाक्यों में व्यक्त होगी। जैसे वह ‘मरणशील है या अमर’-इसके दोनों विकल्प ‘मरणशील’ और ‘अमर’ (Mortal and immor tal) व्याघाती पद हैं। इसलिए यहाँ इस वाक्य की शर्त चार हेत्वाश्रित वाक्यों में व्यक्त होगी।

  • यदि वह मरणशील नहीं है तो वह अमर है।
  • यदि वह अमर नहीं है तो वह मरणशील है।
  • यदि वह मरणशील है तो वह अमर नहीं है।
  • यदि वह अमर है तो वह मरणशील नहीं है।

इसी तरह ‘राम या तो तेज है या धनी है’ का विकल्प (तेज और धनी) व्याघातक पद नहीं है। एक ही व्यक्ति तेज और धनी दोनों हो सकता है। इसलिए दूसरे वाक्य की शर्त दो हेत्वाश्रित में भी व्यक्त होगी। जिसमें एक विकल्प को अस्वीकार कर दूसरे को स्वीकार करेंगे। जैसे-राम या तो तेज है, या धनी है। इसके हेत्वाश्रित वाक्य हैं –

  • यदि राम तेज नहीं है तो वह धनी है।
  • यदि राम धनी नहीं है तो वह तेज है।

इस तरह दोनों के विचार आंशिक रूप से सत्य है।

वैकल्पिक वाक्य का परिमाण (Quantity):
वैकल्पिक तर्क वाक्य भी पूर्णव्यापी और अंशव्यापी (Universal and particular) होते हैं। जैसे –

  • सभी मनुष्य या तो धनी है या गरीब। (पूर्णव्यापी)
  • कुछ छात्र या तो शहर के हैं या देहात के। (अंशव्यापी)
  • All men are either mortal or immortal (Universal)
  • Some men are either rich or poor (Particular)

इस तरह हम देखते हैं कि वैकल्पिक तर्क वाक्यों का परिमाण उनके उद्देश्य पर निर्भर करता

गुण (Quality):
वैकल्पिक वाक्य में उद्देश्य के संबंध में एक विकल्प स्वीकार करना किसी एक विकल्प के निषेध करने पर आधारित है। इस तरह वैकल्पिक वाक्य हमेशा भावात्मक ही होते हैं। यदि कोई न तो और न (Neither … nor) के सहारे वाक्य निर्णय करे तो वह गलत होगा।

वास्तव में Neither … nor संयुक्त वाक्य से दो निषेधात्मक वाक्यों का योग कहते हैं इसे विप्रकृष्ट वाक्य (Remotive compound proposition) कहा जाएगा न कि वैकल्पिक वाक्य। जैसे न तो राम धनी है और न चतुर है। यह वाक्य वैकल्पिक नहीं है। यह Remotive वाक्य हैं। इसमें दो निषेधात्मक वाक्य जुड़े हुए हैं –

  • राम धनी नहीं है।
  • राम चतुर नहीं है। ये दोनों वाक्य निरपेक्ष वाक्य हैं सापेक्ष नहीं है।

हेत्वाश्रित तथा वैकल्पिक वाक्यों में अन्तर (Distinction between hypothetical and disjunctive proposition):
हेत्वाश्रित तथा वैकल्पिक दोनों ही सापेक्ष तर्कवाक्य के दो रूप हैं। दोनों के उद्देश्य और विधेय का संबंध शर्त पर निर्भर करता है। दोनों में निम्नलिखित अन्तर है।

1. हेत्वाश्रित वाक्य की शर्त वाक्य में स्पष्ट रहती है। जैसे – यदि रात होगी तो राम पढ़ेगा? किन्तु वैकल्पिक वाक्य में शर्त अस्पष्ट रहती है। जैसे-राम या तो घर पर है या वह बाजार में

2. हेत्वाश्रित वाक्य “यदि तो” (If, then) की परिधि में रहता है और वैकल्पिक वाक्य या तो-या (either … or) की परिधि में रहता है, जैसे-If Ram comes I shall go. Ram is either poor or intelligent.

3. हेत्वाश्रित वाक्य के दो अंग होते हैं-पूर्ववर्ती तथा अनुवर्ती (consequent and antecedent)। लेकिन वैकल्पिक वाक्य में इस तरह की बातें नहीं हैं।

4. जिस तरह हेत्वाश्रित वाक्य को निरपेक्ष वाक्य में बदला जा सकता है उसी तरह वैकल्पिक वाक्य को पहले हेत्वाश्रित में फिर हेत्वाश्रित को निरपेक्ष वाक्य में बदला जा सकता है अर्थात् हेत्वाश्रित तथा वैकल्पिक दोनों ही प्रकार के वाक्यों को निरपेक्ष रूप दिया जा सकता है।

5. वैकल्पिक वाक्यों में विकल्पों की संख्या निश्चित नहीं है, वे एक से अधिक जरूर होते हैं।

6. हेत्वाश्रित वाक्य का गुण उसके अनुवर्ती पर निर्भर करता है। परन्तु उसका परिमाण उसके पूर्ववर्ती पर निर्भर करता है। किन्तु वैकल्पिक वाक्य निषेधात्मक नहीं होते हैं, ये सदा भावात्मक ही होते हैं। उसी तरह वैकल्पिक वाक्य के परिणाम के संबंध में ऐसा माना जाता है कि ऐसे वाक्य साधारणतः सामान्य (universal) ही हुआ करते हैं। अंशव्यापी वैकल्पिक वाक्य (Particular disjunctive proposition) यदि होता भी है तो उसके तार्किक महत्त्व नहीं होता है।

गुण और परिमाण के अनुसार तर्क वाक्यों का वर्गीकरण (The classification of proposition according to quality and quantity) या तर्कवाक्यों का सरलीकरण (Sim plification of proposition) तर्कशास्त्र में इस प्रकार के वाक्यों को आदर्श (standard) माना गया है। ये A, E, I तथा हैं। इस तरह किसी का विधान करते हैं या निषेध और वह भी अंशव्यापी रूप में या पूर्णव्यापी रूप में। इसलिए हरेक वाक्य का गुण और परिमाण (Quality and quantity) होता है। इस तरह गुण और परिमाण को देखते हुए चार तरह के ही वाक्यों की मान्यता दी गई है।

परिमाण की दृष्टि से –

  • पूर्णव्यापी (Universal)
  • अंशव्यापी (Particular)

गुण (quality) की दृष्टि से –

  • भावात्मक (Affirmative)
  • निषेधात्मक (Negative) इस तरह quantity and quality के दृष्टिकोण के चार तरह के वाक्य हुए –

(a) पूर्णव्यापी भावात्मक (Universal affirmative)
(b) पूर्ण निषेधात्मक (Universal negative)
(c) अंशव्यापी भावात्मक (Particular affirmative)
(d) अंशव्यापी निषेधात्मक (Particular negative)

जैसे-सभी मनुष्य मरणशील हैं – A
कोई भी मनुष्य मरणशील नहीं हैं – E
कुछ मनुष्य मरणशील हैं – I
कुछ मनुष्य मरणशील नहीं है – O

(a) All men are mortal – ‘A’
All S is P

(b) No men are mortal – E
No S is P

(c) Some men are mortal – I
Some S is P

(d) Some men are not mortal – O
Some S is not P

इस तरह तर्कशास्त्र में चार तरह के वाक्य हुए A, E, I, & O.

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 3.
व्याकरण के वाक्यों को तार्किक रूप में लाने की क्या विधि है?
उत्तर:
नियम 1.
यदि किसी वाक्य में सभी, प्रत्येक, कोई, हरेक, अवश्य ही, पूर्णतया, सर्वदा (All, every, any, each; necessarily, absolutely and always) शब्द रहे तो उसका तार्किक रूप Logical firm ‘A’ में होगा।
किन्तु ‘नहीं’ (Sign of negation “not’) शब्द भी रहे तो उसका तार्किक रूप L.E. ‘O’ में होगा यथा –

A. सभी काँग्रेसी ईमानदार हैं।
A. All Congress men are honest.
कोई भी इस कार्य को कर सकता है।

L.F सभी इस कार्य को कर सकता है।
प्रत्येक छात्र तेज है = सभी छात्र तेज है – A
Every student is intelligent.

L.F. – All students are intelligent.-A
हरेक मनुष्य मरणशील है = सभी मनुष्य मरणशील हैं – A
Each man is mortal = All men are mortal – A
दो और दो मिलकर अवश्य ही चार होते हैं = सभी हालतों में दो और दो मिलकर चार होते हैं।

Two plus two are necessarily four = In all cases two plus two are four – ‘A’.

सद्गुणी सर्वदा सुखी रहती है – सभी संतोषी सुखी हैं।
Virtous are always happy. L.F. All virtuous are happy – A
पूर्णतया छात्र ही देशभक्त होते हैं।
L.F. सभी छात्र देश भक्त हैं –
A Absolutely students are honest
L.F.-All students are honest

यदि उपर्युक्त शब्द रहे किन्तु ‘not’ (नहीं) लगा रहे पर तार्किक रूप ‘O’ में होगा। जैसे – सभी चमकनेवाली सोना नहीं है = L.E. कुछ चमकने वाला सोना नहीं है। All that glitters is not gold. L.F.-‘0’Some things that glitter are not gold. इसी तरह each/every, disease is not fatal.

L.F. – ‘O’ Some dieases are not fatal. Books are not always good.
L.F. – Some books are not good.
‘O’Absolutely men are not dishonest.
L.F. – Some books are not good. ‘O’Absolutely men are not dishonest.
L.F. – O’Some men are dishonest.
पूर्णतया मनुष्य ईमानदार नहीं होता है = कुछ मनुष्य ईमानदार नहीं है।

नियम 2.
यदि किसी वाक्य में ‘No, none, never, in no case, not even a single’
(नहीं, कोई नहीं, कभी नहीं, किसी भी परिस्थिति में नहीं, एक भी नहीं) शब्द रहे तो उसका तार्किक रूप ‘O’ में होगा। यथा –
कोई आम पका हुआ नहीं = L.F.’E’
कोई आम पका नहीं है।
No mango is reap = L.F. ‘E’
कोई आम पका नहीं है।
No mango is reap = L.F. ‘E’
कोई आम पका नहीं है।
No mango is reap = L.F. No mango is reap
No man is free from defect?
L.F. No man is such who is free from defect.
बेईमान कभी भी सफल नहीं होता है।
L.F. – कोई बेईमान सफल नहीं है।
Dishonesty never succeeds.
L.F. – No dishonesty is such which succeeds.
Not even a single man is good.
L.F. – No man is good. (E)
None are honest.
L.F. – No persons are honest.
No life is wholly pleasant.

नियम 3.
जिन वाक्यों में कुछ, कभी-कभी, अधिकांश, बहुधा, प्रायः, बहुत कम, सर्वदा शायद, बारम्बार, साधारणतया, बहुत कई, 99 प्रतिशत, मौके, बेमौके, एक को छोड़कर सभी, कुछ एक, कतिपय, धनिक, गरीब, सभी (Some, sometimes, most, many, mostly often, a few, nearly always, perhaps, frequently, generally, several, 99 percent, occa sionally, almost, all but one) आदि शब्द रहे तो इसका L.E-I में होगा। किन्तु Not लगा रहने पर तार्किक रूप ‘O’ में हो जाता है। यथा –
1. कुछ छात्र धनी हैं। Some students are rich.
I कभी – कभी छात्र व्याकुल हो जाते हैं।
L.F.I. कुछ छात्र व्याकुल हो जाते हैं।
अधिकांश भारतीय गरीब हैं।
L.F.I. कुछ भारतीय गरीब हैं।
धंनी व्यक्ति बहुधा कंजूस होते हैं।
L.F.I. कुछ धनी व्यक्ति वे हैं जो कंजूस होते हैं।
प्रायः सर्वदा पापी दंडित होते हैं।
L.F.I. कुछ पापी दंडित होते हैं। बच्चे बारंबार गलती करते हैं।
L.F.I. कुछ बच्चे वारम्बार गलती करते हैं।
L.F.I. बहुत से जानवर हिंसक होते हैं।
L.F.I. कुछ जानवर ऐसे हैं जो हिंसक होते हैं।
सैकड़े निन्यानबे प्रतिशत छात्र तेज हैं।
L.F.I. कुछ छात्र तेज हैं।
छात्र मौके बे मौके सिनेमा चले जाते हैं।
L.F.I. कुछ छात्र सिनेमा जाते हैं।
कभी-कभी आदमी अच्छा भी नहीं होता है।
L.F. ‘O’ कुछ आदमी अच्छे नहीं हैं।
अधिकांश छात्र गरीब नहीं हैं।
L.F. ‘O’ कुछ छात्र गरीव नहीं हैं।
कोई पदाधिकारी योग्य नहीं हैं।
L.F. ‘O’ कुछ पदाधिकारी योग्य नहीं हैं।
बच्चे प्रायः शांत नहीं होते हैं।
L.F. ‘O’ कुछ बच्चे शांत नहीं हैं।
L.F. ‘O’ Some students are not good.
Most students are not poor. Perhaps dogs are not faithful.
L.F. ‘O’ Some dogs are not faithful.
A few men are not good.
L.F. ‘O’ Some men are not good.
Several candidates are not fit. L.F. ‘O’
Some candidates are not fit.
Virtuous are often not happy.
L.F. ‘O’ Some virtuous persons are not happy.
Mangoes are not generally sour.
L.F. ‘O’ Some mangoes are not sour.
White cats with blue eyes are generally deaf.
L.F.I. Some white cats with blue eyes are deaf.
Virtuous persons are often happy.
L.F.I. Some virtious persons are happy.
Certain men are educated.
L.F.I. Some men are educated.

नियम 4.
यदि किसी वाक्य में few, seldom, hardly, scarcely (कुछ शायद ही, अधिकार से, कोई कठिनाई से) शब्द रहे तो उसका तार्किक रूप ‘O’ में होगा, किन्तु यदि Not शब्द भी लगा रहे तो I वाक्य में होगा। जैसे –
बच्चे जिद्दी शायद ही नहीं होते हैं।
कुछ बच्चे जिद्दी नहीं हैं ‘O’ ईश्वर शायद ही भक्ति से नहीं रीझते हैं।
L.F.I. कुछ हालतों में ईश्वर भक्ति से रीझते हैं।
मुश्किल से कोई अंग्रेज काला होता है।
L.F. ‘O’ कुछ अंग्रेज काले नहीं हैं।
अंग्रेजी वाक्य
Few students are rich.
L.F. ‘O’ Some students are not rich.
Persons are seldom found trustworthy.
L.F. ‘O’some persons are not trustworthy.
Any nations is hardly peaceful today.
L.F. ‘O’ Some nations are not peaceful today.
A thief scarcely sleeps at night.
L.F. ‘O’ Some thieves are not such who sleep at night.
Few Indians are not religious.
L.F.I. Some Indians are religious.

नियम 5.
यदि किसी वाक्य में Only, alone, none but ‘No’ One else but (केवल, अकेले, अतिरिक्त, कोई नहीं) शब्द रहे तो उसका L.E. A, E तथा I में बनाया जाता है। ‘A’ में रूपान्तरण करने के लिए उद्देश्य विधेय का स्थानान्तरण कर दिया जाता है।
‘A’ All trustworthy persons are students.
केवल पैसेन्जर गाड़ी यहाँ ठहरती है।
L.F. ‘A’ यहाँ ठहरने वाली सभी गाड़ियाँ पैसेन्जर गाड़ियाँ हैं।
‘E’ में रूपान्तरण करने के लिए उद्देश्य का व्याघाती पद (Contradictory term) तार्किक रूप का उद्देश्य रखा जाता है। जैसे – Only students are trustworthy.
L.F.E. No non-students are trustworthy.
केवल संतोषी व्यक्ति ही सुखी हैं।
L.F. ‘E’ कोई भी संतोषी व्यक्ति सुखी नहीं है।
‘I’ में रूपान्तरण करने के लिए कोई नियम नहीं है।
अर्थात् उद्देश्य विधेय में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होगा। जैसे – Students are alone eligible.
L.F. ‘O’ Some students are eligible.
इसी तरह None but the brave deserves the fair.
L. F –

  • All persons who deserve/the fair are brave – ‘A’
  • No non – brave persons/are such who deserve the fair – ‘E’
  • Some brave persons/are such who deserve the/fair ‘I’

केवल ईमानदार व्यक्ति ही विश्वासपात्र हैं।
L.F.A. सभी विश्वासपात्र व्यक्ति ईमानदार व्यक्ति हैं।
E कोई गैर-ईमानदार व्यक्ति विश्वासपात्र नहीं है।
कुछ ईमानदार व्यक्ति विश्वासपात्र हैं।

नियम 6.
जिस व्याकरण वाक्य में अपवाद सूचक शब्द Except, all but a few, all but, (अतिरिक्त, प्रायः बहुत कम, सभी परन्तु कुछ) हों तो अपवाद निश्चित रहने पर तार्किक रूप ‘A’ में और अपवाद यदि अंशव्यापी हो तो तार्किक रूप में I में होगा अर्थात् अपवाद निश्चित रहने पर पूर्णव्यापी (A) में तथा अनिश्चित रहने पर अंशव्यापी (I) में होगा, जैसे –
All boys except Ram is good.
L.F. ‘A’All boys except Ram is good.
All boys except one is good.
L.F.I. Some boys are good.
All but two were killed.
L.F.I. Some persons are such who were killed.
All but a few could solve this problem.
L.F.I. Some persons are such who could solve this problem.

नियम 7.
जिस व्याकरण के वाक्य का उद्देश्य व्यक्तिवाचक हो अर्थात् निश्चित हो उसका तार्किक रूप ‘A’ में होगा या ‘E’ में गुण के अनुसार। जैसे –
The earth moves round the sun.
L.F.’A’ The earth/is such which moves round the sun.
The moon does not appear during the day.
L.F.E. The moon/is not/such which appears during the day.
You are different from me.
L.F. You are not I ‘E’.
A Greek conquered India.
L.F.I. Some Greeks are persons who conquered India.
A metal is not solid.
L.F. ‘O’ Some metals are not solid.

नियम 8.
प्रश्नवाचक वाक्यों का तार्किक रूप अर्थ के अनुसार होता है। अर्थात् ऐसे वाक्य से कभी निषेधात्मक और कभी भावात्मक (Negation-affirmation) का अर्थ निकलता है। यथा क्या ईश्वर सब कुछ देखने वाले नहीं है?
L.F.A. ईश्वर सब कुछ देखने वाले हैं।
इसी तरह अंग्रेजी वाक्य Am I your servant?
L.F.’E’ I am not your servant.
Am I so mean?
L.F.I. I am not so mean.
Am I not your well wisher?
L.F. ‘A’ I not your well wisher.

नियम 9.
कुछ वाक्य ‘It’ से शुरू होते हैं। इन्हें तार्किक रूप में बदलने पर ‘I’ के स्थान पर उद्देश्य लाया जाता है। जैसे It rains.
L.E. ‘A’ The weather is such which rains.
It is night.
L.F. ‘A’The time is night.

नियम 10.
जिस वाक्य में उद्देश्य की परिभाषा स्पष्ट रूप से नहीं दिया रहता है, उसके तार्किक रूप में परिभाषा से अनुभव के आधार पर स्पष्ट करते हैं। जैसे –
Man is mortal.
L.F. All men are mortal.
‘A’ Indians are.poor.
L.F. Some Indians are poor.
I Birds have two wings.
L.F. All birds are creature having two wings.
‘A’ पंखे घूमते हैं कुछ पंखे घूमते हैं ‘I’ हंस उजले होते हैं कुछ हंस उजले हैं – ‘I’.

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 4.
तर्क वाक्यों के विरोध में आप क्या समझते हैं? इसके विभिन्न भेदों की व्याख्या उदाहरण सहित करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र में चार तरह के आदर्श वाक्य माने गये हैं – A, E, I and O। अब प्रश्न उठता है कि इन चारों वाक्यों में आपसी संबंध किस प्रकार का है। इसमें गुण और परिमाण (Quality and Quantity) को लेकर चार प्रकार के संबंध हैं जिन्हें वाक्यों का विरोध कहा जाता है। यह विरोध दो तर्क वाक्यों के मध्य में रहता है जिनके उद्देश्य और विधेय (Subject and Predicate) समान होते हैं किन्तु अन्तर गुण या परिमाण या दोनों (Quality & Quantity) को लेकर होता है। Prof. B. N. Roy के शब्दों में इसकी परिभाषा इस प्रकार दी गई है –

“Opposition of proposition is the relation between two propositions hav ing the same subject and the same predicate but differing either in quality or in quantity or in both”.

अर्थात् “तर्क वाक्यों के विरोध में दो तर्क वाक्यों के बीच उद्देश्य, विधेय तो एक ही रहते हैं, किन्तु विरोध गुण या परिणाम या दोनों को लेकर रहता है। जैसे –

1. A सभी छात्र धनी हैं –
All students are rich.

‘A’E कोई छात्र धनी नहीं है –
No students are rich –
‘E’ इसमें विरोध तो है जबकि उद्देश्य और विधेय दोनों (A – E) के एक ही हैं किन्तु एक भावात्मक दूसरा निषेधात्मक है अर्थात् गुण संबंधी विरोध है। इसी तरह –

2. A – सभी छात्र धनी हैं –
Some students are rich ‘I’
इसमें भी उद्देश्य और विधेय दोनों के (A – I) एक रहते हुए भी परिमाण को लेकर भेद है।

इसी तरह –

3. A सभी छात्र धनी हैं – All students are rich. AIO कुछ छात्र धनी नहीं हैं – Some students are not rich. ‘O’ वाक्य हैं। इसके भी उद्देश्य और विधेय दोनों के (A – O) एक ही हैं किन्तु विरोध इसमें गुण और परिमाण दोनों को लेकर है, जैसे – एक पूर्णव्यापी और भावात्मक है तो दूसरा अंशव्यापी और निषेधात्मक है।”

विरोध के प्रकार (Kinds of opposition):
इस तरह तर्क वाक्यों के विरोध चार प्रकार के होते हैं जो इस प्रकार हैं –

  • उपाश्रित (Sub – altern) A – I and E – O
  • विपरीत (Contrary) – (A – E)
  • अनुविपरीत (Sub – contrary) – (I – O)
  • व्याघातक (Contradictory) – A – O and E – I

(i) उपाश्रित (Sub – altern):
यह विरोध A – I तथा E – O के बीच होता है। इसमें एक universal तथा दूसरा particular (पूर्णव्यापी तथा अंशव्यापी) होता है। यथा

A सभी मनुष्य मरणशील हैं (All men are mortal) ‘A’। I कुछ मनुष्य मरणशील हैं Some men are mortal ‘I’। E कोई मनुष्य मरणशील नहीं है No men are not mortal ‘E’। O कुछ मनुष्य मरणशील नहीं हैं Some men are not mortal ‘O’।

इन उपर्युक्त वाक्यों के बीच उपाश्रित विरोध संबंध है। इसमें यह ध्यान रखना जरूरी है कि सामान्य वाक्य को उपाश्रय तथा विशेष वाक्य को उपाश्रित कहते हैं। (Universal proposition is called subalternant and particular proposition is called subalternate)

इन उपाश्रित वाक्यों में यदि सामान्य वाक्य सत्य है तो अंशव्यापी वाक्य भी सत्य होगा। किन्तु सामान्य वाक्य असत्य है तो अंशव्यापी वाक्य संदेहात्मक होगा तथा अंशव्यापी असत्य है तो सामान्य वाक्य सत्य होगा। अर्थात् A सत्य है तो I भी सत्य होगा फिर यदि A असत्य है तो I संदेहात्मक होगा। फिर यदि I सत्य है तो A संदेहात्मक होगा और यदि I असत्य है तो A भी असत्य होगा। इसी तरह E तथा O के बीच भी चलेगा।

जैसे – यदि E सत्य है तो O सत्य होगा।
फिर यदि E असत्य है तो O संदेहात्मक होगा।
फिर यदि O सत्य हो तो ‘E’ संदेहात्मक होगा।
और यदि O असत्य है तो E भी असत्य होगा।

यथा –
A All men are mortal.
I Some men are mortal.
E No men are mortal.
O Some men are not mortal.

विरोध के भेदों की व्याख्या –

(i) उपाश्रित (Sub – altern):
उपाश्रित विरोध का सही रूप है क्योंकि A – I तथा E – O के बीच परिमाण को लेकर अन्तर है। एक पूर्णव्यापी है तो दूसरा अंशव्यापी है। दूसरे मत के अनुसार उपाश्रित विरोध का सही रूप नहीं है क्योंकि दोनों वाक्यों का गुण एक ही है, इसलिए विरोध संबंध कहना अनुचित है। दोनों साथ-साथ सत्य होते हैं। पूर्णव्यापी वाक्य में अंशव्यापी वाक्य अन्तर्निहित होता है।

विरोध का अर्थ यदि व्यापक रूप में समझा जाए और किसी भी प्रकार के विरोध को विरोध माना जाए तो उपाश्रित विरोध का सही रूप है। जैसा कहा गया कि एक के सत्य होने से दूसरा भी सत्य होगा लेकिन एक के असत्य होने से दूसरा असत्य न होकर संदेहात्मक हो जाता है। यह तो विरोध का सही रूप ही है।

(ii) विपरीत (Contrary):
यह विरोध दो पूर्णव्यापी वाक्यों के बीच होता है जिसमें एक भावात्मक तथा दूसरा निषेधात्मक होता है अर्थात् यह विपरीत विरोध (A – E) के बीच होता है, जैसे – A सभी मनुष्य धनी हैं –
All men are rich.A.
E कोई मनुष्य धनी नहीं है No men are rich E.
इसमें एक की सत्यता से दूसरे की असत्यता और एक की असत्यता से दूसरा संदेहात्मक है। अर्थात् यदि –
‘A’ सत्य है तो E असत्य है।
और A सत्य है तो ‘E’ असत्य है और E असत्य है तो A संदेहात्मक होगा।

(iii) अनुविपरित (Subcontrary):
यह संबंध दो अंशव्यापी तर्कवाक्यों के बीच होता है अर्थात् I तथा O के बीच। इसमें एक भावात्मक और दूसरा निषेधात्मक वाक्य रहता है, जैसे –
I कुछ मनुष्य धनी है Some men are rich. O
O कुछ मनुष्य धनी नहीं है Some men are not rich.

इसमें यदि एक असत्य है तो दूसरा सत्य है और एक सत्य है तो दूसरा संदेहात्मक होगा। यह विपरीत संबंध का उल्टा है। अर्थात् यदि ‘I’ असत्य है तो ‘O’ सत्य है और यदि ‘I’ सत्य है तो ‘O’ संदेहात्मक होगा। फिर यदि ‘O’ असत्य है तो I’ सत्य है और यदि ‘O’ सत्य है तो ‘I’ संदेहात्मक होगा।

(iv) व्याघातक (Contradictory):
यह वह विरोध है जिनके उद्देश्य और विधेय तो एक ही रहते हैं किन्तु गुण और परिमाण को लेकर भेद रहता है। यह A – 0 तथा E – I के बीच पाया जाता है, जैसे –
A सभी भारतीय गरीब हैं All Indians are poor ‘A’.
O कुछ भारतीय गरीब नहीं है Some Indian are not poor ‘O’
E कोई भारतीय गरीब नहीं हैं No Indian are poor ‘E’
I कुछ भारतीय गरीब हैं Some Indians are poor I’.

इसमें एक Universal affirmative है ‘A’ तो दूसरा Particular negative है ‘O’ तथा इसी तरह Universal Negative है ‘E’ तो Particular affirmative है ‘I’। इसमें यदि ‘A’ सत्य है तो ‘O’ असत्य है और यदि ‘O’ सत्य है तो ‘A’ असत्य है। फिर यदि ‘A’ असत्य है तो ‘O’ सत्य है और यदि ‘O’ असत्य है तो ‘A’ सत्य है। इसी तरह यदि ‘E’ सत्य है तो I असत्य है फिर यदि I सत्य है तो E असत्य है और I असत्य है तो E सत्य है। इस तरह के विरोध का चित्रांकन इस प्रकार है –

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसी तरह इन चार तरह के विरोध वाक्यों में कौन सत्य है तथा कौन असत्य है तथा संदेहात्मक है? इन कठिनाई को दूर करने के लिए निम्नलिखित सारणी का स्मरण रखना चाहिए –

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

नोट:
इसमें बड़ी टी (T) से सत्य प्रारम्भ करें और बड़ा (F) से असत्य प्रारम्भ करें। इसमें बड़ी T या छोटी। का अर्थ सत्य (Truth) से है बड़ा F या छोटा f का अर्थ असत्य (False) से है तथा D का अर्थ संदेहात्मक doubtful से है। जैसे प्रश्न है Draw inference by opposition of proposition from the truth and falsity of the proposition “Men are never kind.”
L.F.E. No men are kind. कोई भी मनुष्य कृपालु नहीं है।
सबसे पहले वाक्य को तार्किक रूप में लाया गया

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

नोट:
यहाँ ‘E’ यदि True है तो A असत्य, I सत्य है तो O असत्य फिर यदि ‘I’ स्वयं False है तो Adoubtful तथा ‘O’ भी doubtful होगा।

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

नोट:
यदि ‘A’ सत्य है तो ‘E’ असत्य, I’ सत्य है तो ‘O’ असत्य होगा। फिर यदि ‘A’। असत्य है तो ‘E’ संदेहात्मक (यहाँ ‘I’ संदेहात्मक होगा A का अनुविपरीत नहीं है।)

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसमें यदि ‘I’ सत्य है तो ‘A’ संदेहात्मक, ‘O’ संदेहात्मक तो ‘E’ असत्य और यदि ‘I’ असत्य है तो ‘A’ असत्य, ‘0’ सत्य तो ‘E’ सत्य होगा। ‘I’ का विपरीत नहीं होता है।

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

इसमें यदि ‘O’ असत्य है तो ‘I’ सत्य है, ‘E’ असत्य तो ‘A’ सत्य होगा। ‘O’ का विपरीत नहीं होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 5.
तर्कवाक्यों में पदों की व्याप्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
व्याप्ति का अर्थ:
यदि किसी पद से उसकी सारी वस्तुवाचकता (Entire denotation) का बोध होता है तो उसे व्याप्त पद (Distributed term) कहते हैं। जैसे – सभी मनुष्य मरणशील हैं (All men are mortal) – इस तर्क वाक्य का उद्देश्य ‘मनुष्य’ (Men) व्याप्त पद है, क्योंकि इससे सारे मनुष्यों का बोध होता है। इसी तरह यदि किसी पद से उसकी सारी वस्तुवाचकता का बोध नहीं होता कुछ ही वस्तुवाचकता का बोध हो तो उसे अव्याप्त (Undistributed) पद कहते हैं, यथा “कुछ मनुष्य बुद्धिमान हैं” (Some men are wise)। इस तरह के अर्थव्यापी वाक्य का उद्देश्य और विधेय (men and wise) दोनों पद अव्याप्त हैं। “A, E, I and O” तर्क वाक्य के उद्देश्य और विधेय में कौन-कौन व्याप्त हैं तथा कौन-कौन अव्याप्त हैं? इस पर विचार करना है।

“A” वाक्य:
“All men are mortal.” – इस वाक्य मे Subject – men तो किन्तु predicate – mortal अव्याप्त है क्योंकि मनुष्य पद से सभी मनुष्य का बोध होता है लेकिन ‘mortal’ शब्द से तो सभी जीव जो मरते जन्म लेते हैं उन सबों का बोध होता है। इसी तरह “All S is P.” से स्पष्ट है कि इसका ‘S’ व्याप्त है क्योंकि इससे सभी ‘S’ का बोध होता है लेकिन ‘P’ अव्याप्त है क्योंकि P सिर्फ S के लिए व्यवहृत हुआ है। यह अन्य के लिए भी व्यवहृत हो सकता है। अतः P से सभी P का बोध नहीं होता है। यहाँ ‘S’ का अर्थ Subject से तथा ‘P’ का अर्थ Predicate से है।

“E” वाक्य:
“No men are Gods.” (कोई मनुष्य देवता नहीं) अर्थात् सभी मनुष्य सभी देवताओं से अलग हैं। इस तरह यहाँ सभी मनुष्यों और सभी देवताओं का बोध होता है। इससे स्पष्ट है कि Men and Gods (उद्देश्य-विधेय) दोनों पद व्याप्त हैं। क्योंकि दोनों से पूरे denotation का बोध होता है। सांकेतिक उदाहरण में भी No Sis P का अर्थ है कि कोई ‘S’, ‘P’ नहीं है यानी सभी ‘S’ सभी ‘P’ से अलग है। अतः E तर्कवाक्य का दोनों पद व्याप्त होते हैं।

I वाक्य:
कुछ छात्रं तेज हैं (Some students are intelligent) इसका उद्देश्य पद छात्र अव्याप्त हैं और विधेय पद तेज भी अव्याप्त है। क्योंकि यहाँ यह पद केवल कुछ छात्रों का बोध कराता है और तेज भी केवल कुछ छात्रों के लिए व्यवहृत हुआ है। जबकि अन्य लोग भी तेज होते हैं। जैसे शिक्षक, वकील, व्यापारी, डॉक्टर आदि। अतः ‘I’ तर्क वाक्य किसी भी पद को व्याप्त नहीं कर पाता है। इसका न तो उद्देश्य व्याप्त है और न इसका विधेय पद ही।

सांकेतिक उदाहरण:
Some S is P स्पष्ट होता है कि ‘S’ से सभी S का बोध नहीं होता है। अतः यह अव्याप्त है। ‘P’ भी केवल ‘S’ के लिए ही व्यवहृत हुआ है, अन्य के लिए नहीं। अतः ‘P’ भी अव्याप्त है। तर्क वाक्य “कुछ छात्र तेज नहीं है” (Some students are not intelligent) इसका उद्देश्य तो अव्याप्त है ही, क्योंकि इससे कुछ ही छात्रों को बोध होता है। लेकिन विधेय पद ‘तेज’ व्याप्त हो जाता हैं इसका अर्थ है कि विश्व में जितने व्यक्ति हैं उनके वृत्त के कुछ छात्र अलग हैं अर्थात् तेज पद से सभी तेज लोगों का बोध होता है। अतः यह पद अव्याप्त है। इस तरह ‘O’ का उद्देश्य अव्याप्त और विधेय व्याप्तं पद होता है।

सांकेतिक उदाहरण:
Some S is not ‘P’. से स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य ‘S’ अव्याप्त है और विधेय P व्याप्त है, क्योंकि इसका साफ अर्थ है कि सभी ‘P’ से कुछ ‘S’ अलग हैं। इस तरह –

A वाक्य में उद्देश्य व्याप्त है किन्तु विधेय अव्याप्त है।
E वाक्य में उद्देश्य और विधेय दोनों व्याप्त हैं।
I वाक्य में उद्देश्य और विधेय दोनों अव्याप्त हैं।
O वाक्य में उद्देश्य अव्याप्त हैं किन्तु विधेय व्याप्त पद है।

इस को अंग्रेजी में कहा गया है –
A distributes subject.
E distributes both (Subject and Predicate)
I distributes none.
O distributes predicate only.
इसे एक सूत्र में कहा गया है।
ASEBINOP अर्थात्
AS, EB, IN, OP
स्पष्ट है कि A को Subject, E को both, I को none और O को Predicate कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों को तार्किक रूप में रूपान्तरित कीजिए तथा तार्किक लक्षणों को निर्धारित कीजिए।
(a) Man is a rational animal मनुष्य मननशील प्राणी है।
(b) White cat with blue eyes are generally deaf.
नीली आँखोंवाली उजली बिल्लियाँ साधारणतया बहरी होती हैं।
(c) Humour is not given to all.
हास्य सभी को नहीं दिया गया है।
(d) A few men are above temptations.
नहीं के बराबर मनुष्य लोभी है।
उत्तर:
(a) L.E-All men are rational animal – A (सभी मनुष्य मननशील प्राणी हैं। – A)

तार्किक लक्षण (Logical character):
यह सरल, निरपेक्ष, भावात्मक, पूर्णव्यापी, अनिवार्य एवं शाब्दिक तर्कवाक्य (Proposition) है।

(b) L.F. – Some White cats with blue eyes are deaf – I.
(कुछ नीली आँखोंवाली उजली बिल्लियाँ बहरी होती हैं – I)

तार्किक लक्षण:
यह सरल, निरपेक्ष, भावात्मक, अंशव्यापी, साधारण (assertory) एवं यथार्थ (real) तर्क वाक्य हैं।

(c) L.F.-Some Men are not given humour – 0.
(कुछ मनुष्यों को हास्य नहीं दिया गया है – O)

तार्किक लक्षण:
यह सरल, निरपेक्ष, निषेधात्मक अंशव्यापी, साधारण और यथार्थ तर्कवाक्य हैं।

(d) L.F.-Some men are above temptation – I.
(कुछ मनुष्य लोभ से परे हैं – I)

तार्किक लक्षण::
यह सरल, निरपेक्ष, भावात्मक अंशव्यापी, साधारण और यथार्थ तर्कवाक्य हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 7.
निम्नलिखित पदों (Terms) के तार्किक लक्षण दें।
मनुष्य, राम, ईमानदारी, अन्धापन, लाल, जंगल, हजारीबाग का जंगल, सभ्यता, भारत का वर्तमान राष्ट्रपति, बिहार के राज्यपाल या बिहार के मुख्यमंत्री, सरकार, धर्म मानवता एवं महाविद्यालय।
उत्तर:
पदों के तार्किक लक्षण (Logical character of Terms):

मनुष्य (Man):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक।

राम (Ram):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, असमूहवाचक, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

ईमानदारी (Honesty):
पदयोग्य एवं एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, असमूहवाचक, निश्चित, भाववाचक, अभावात्मक, स्वतंत्र एवं निःस्वभाववाचक पद।

अन्धापन (Blindness):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, पर्युदासक (Privative), सम्बद्ध (Relative) तथा स्वभाववाचक पद।

लाल (Red):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र तथा स्वभाववाचक पद।

जंगल (Forest):
पदयोग्य एवं एकार्थक शब्द, एक शब्दात्मक, जातिवाचक, समूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

हजारीबाग का जंगल (The Forest of Hazaribagh):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, अनेक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, समूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

सभ्यता (Civilization):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, समूहवाचक, जातिवाचक, अनिश्चित, भाववाचक, भावात्मक, स्वतंत्र एवं स्वभाववाचक पद।

भारत का वर्तमान राष्ट्रपति (The Present President of India):
पदयोग्य एवं एकार्थक शब्द, अनेक शब्दात्मक, व्यक्तिवाचक, असमूहवाचक, निश्चित द्रव्यवाचक, भावात्मक, सापेक्ष एवं स्वभाववाचक पद।

बिहार के राज्यपाल या बिहार के मुख्यमंत्री (The Governor or Bihar of The Chief Minister of Bihar):
पदयोग्य तथा एकार्थक शब्द, अनेकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, द्रव्यवाचक, भावात्मक सापेक्ष एवं स्वभाववाचक पद।

सरकार (Government):
पदयोग्य एवं अनेकार्थक शब्द, एकशब्दात्मक, जातिवाचक, समूहवाचक, अनिश्चित, भाववाचक, भावात्मक, स्वतंत्र तथा स्वभाववाचक पद।

धर्म (Religion):
एकशब्दात्मक, एकार्थक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित, भाववाचक, भावात्मक, निरपेक्ष एवं गुणवाचक।

मानवता (Humanity):
एकार्थक एकशब्दात्मक, जातिवाचक, असमूहवाचक, अनिश्चित वस्तुवाचक, निरपेक्ष, भावात्मक, गुणवाचक।

महाविद्यालय (College):
सरत, एकार्थक, जातिवाचक, समूहवाचक, निश्चित, वस्तुवाचक, भावात्मक, निरपेक्ष और गुणवाचक।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 8.
निम्नलिखित वाक्यों को तार्किक रूप में रूपान्तरण करें तथा उनके गुण और परिमाण को निर्धारित करें।
(a) All good writers are not good speakers.
सभी अच्छे लेखक अच्छे वक्ता नहीं हैं।

(b) The educated alone are fit to vote.
शिक्षित मात्र वोट देने के योग्य हैं।

(c) All but two were killed.
दो को छोड़कर सभी मारे गये।

(d) Am I your servant?
क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ?
उत्तर:
(a) L.F. – Some good writers are not good speaker. – O
तार्किक रूप-कुछ अच्छे लेखक अच्छे वक्ता नहीं हैं। – O

गुण-निषेधात्मक एवं परिमाण:
अंशव्यापी, अतः यह अंशव्यापी निषेधात्मक तर्कवाक्य है जिसे – O वाक्य कहते हैं।

(b) L.F. – All who are fit to vote are educated – A.
तार्किक रूप – सभी जो वोट देने के योग्य हैं शिक्षित हैं। – A

गुण:
भावात्मक एवं परिमाण-पूर्णव्यापी। अतः यह तर्कवाक्य पूर्णव्यापी भावात्मक है जिसे हम ‘A’ तर्कवाक्य से जानते हैं।

(c) L.F. – Some persons are such who were killed – I.

तार्किक रूप:
कुछ लोग ऐसे हैं जो मारे गये – A

गुण:
भावात्मक एवं परिमाण-अंशव्यापी, अतः यह तर्कवाक्य अंशव्यापी भावात्मक है जिसे हम ‘I’ तर्कवाक्य से जानते हैं।

(d) L.F. – I am not your servant – E.
तार्किक रूप-मैं तुम्हारा नौकर नहीं हूँ। – E

गुण:
निषेधात्मक एवं परिमाण पूर्णव्यापी। अतः यह तर्कवाक्य पूर्णव्यापी निषेधात्मक है जिसे हम ‘E’ तर्कवाक्य से जानते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वाक्यों को तार्किक रूप में रूपान्तरित करें तथा उनमें व्याप्त पदों को बताएँ।
(a) All but one have succeeded.
एक को छोड़कर सभी सफल हुए।

(b) Graduates alone are eligible.
स्नातक मात्र वरणीय है।

(c) All honest persons are not wise.
सभी ईमानदार व्यक्ति बुद्धिमान नहीं हैं।

(d) Am I a god?
क्या मैं ईश्वर हूँ?

(e) Logic students are mostly intelligent.
तर्कशास्त्र के छात्र बहुधा तेज होते हैं।

(f) Few men are rich.
नहीं के बराबर मनुष्य धनी होते हैं।

(g) The educated alone are fit to vote.
शिक्षित मात्र वोट के योग्य हैं

(h) Enemy is never reliable.
शत्रु कभी विश्वसनीय नहीं है।

(i) Birds have wings.
पक्षियों के पंख होते हैं।
उत्तर:
(a) L.F. – Some persons are such who have succeeded – I.

तार्किक रूप:
कुछ लोग ऐसे हैं जो सफल हुए हैं – I यह ‘I’ तर्कवाक्य है। इसलिए इसका उद्देश्य पद persons (लोग) और विधेय पद ‘Such who have succeeded’ (जो सफल हुए हैं) कोई भी व्याप्त नहीं है।

(b) L.F. – All eligible persons are graduates – A.

तार्किक रूप:
सभी वरणीय व्यक्ति स्नातक हैं। – A
यह ‘A’ वाक्य है अतः इसके उद्देश्य पर eligible persons (वरणीय व्यक्ति) – व्याप्त (distributed) है।

(c) L.F. – Some persons are not wise – O.

तार्किक रूप:
कुछ ईमानदार व्यक्ति बुद्धिमान नहीं है। – O
यह ‘O’ तर्कवाक्य है। इसलिए इसका विधेय wise (बुद्धिमान) व्याप्त है।

(d) L.F. – I am not a God – E.

तार्किक रूप:
मैं ईश्वर नहीं हूँ। – E
यह ‘E’ तर्कवाक्य है, अतः इसका उद्देश्य I (मैं) एवं विधेय पद God (ईश्वर) दोनों व्याप्त हैं।

(e) L.F. – Some logic students are intelligent – I.

तार्किक रूप:
कुछ तर्कशास्त्र के छात्र तेज हैं – I
यह ‘I’ तर्कवाक्य हैं, अतः इसका उद्देश्य ‘logic students’ (तर्कशास्त्र के छात्र) तथा विधेय intelligent (तेज) दोनों अव्याप्त (undistributed) हैं।

(f) L.F. – Some men are not rich – O.

तार्किक रूप:
कुछ मनुष्य धनी नहीं हैं। – O
यहाँ ‘O’ तर्कवाक्य में उद्देश्य पद ‘men’. (मनुष्य) अव्याप्त तथा विधेय पद ‘rich’ (धनी) – व्याप्त है।

(g) L.F. – All who are fit to vote are educated – A.

तार्किक रूप:
सभी जो वोट देने के योग्य हैं, शिक्षित हैं। – A
यहाँ ‘A’ तर्कवाक्य में उद्देश्य पद ‘who are fit to vote’ (जो वोट देने योग्य हैं) व्याप्त तथा विधेय पद ‘educated’ (शिक्षित)-अव्याप्त हैं।

(h) L.F. – No enemy is reliable – E.

तार्किक रूप:
कोई शत्रु विश्वसनीय नहीं हैं। – E.
इसे ‘E’ तर्कवाक्य में उद्देश्य पद enemy (शत्रु) व्याप्त तथा विधेय पद reliable (विश्वसनीय) भी व्याप्त हैं।

(i) L.F. – All birds are creatures which have wings – A.
तार्किक रूप-सभी पक्षी एक जीव हैं जिसे पंख होते हैं। – A
यह ‘A’ तर्कवाक्य है। अतः इसके उद्देश्य पद bird (पक्षी) व्याप्त है तथा विधेय पद creatures which have wings अव्याप्त हैं।

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प्रश्न 10.
“All swans are not white” इस वाक्य की सत्यता (truth) एवं असत्यता (falsity) से संभव अनुमान निकालें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य
इस तालिका में T या t = true (सत्य), F या f = false (असत्य) तथा d = doubtful (संदेहात्मक) है।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित वाक्यों के विपरीत (Contrary), अनुविपरीत (Subcontrary), उपाश्रित (Sub-altern) एवं व्याघातक (Contradictory) बताएँ।
(a) Each man is mortal
प्रत्येक मनुष्य मरणशील है।

(b) Only intelligent student can answer this question.
केवल तेज विद्यार्थी ही इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।
उत्तर:
(a) L.F. – All men are mortal – A.
इसका, Contrary – No men are mortal – E.
Sub – Contrary – A का
Sub – Contrary नियमानुसार नहीं होता है।
Sub – altern – Some men are mortal – I.
Contradictory – Some men are not mortal – O

(b) L.F. – No non – intelligent students are such who can answer this question – E इसका,

विपरीत:
All non – intelligent students are such who can answer this question – A.

व्याघातक:
Some non – intelligent students are such who can answer this questions – I.

उपाश्रित:
Some non – intelligent students are not such who can answer this questions – O.

अनुविपरीत:
E का अनुविपरीत नियमानुसार संभव नहीं है।

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प्रश्न 12.
वाक्यों के विरोध के आधार पर निम्नलिखित वाक्यों से सभी संभव अनुमान निकालें।
(a) Men are never perfect.
मनुष्य कभी पूर्ण नहीं होते हैं।

(b) Poets are generally poor.
कवि सामान्यतः गरीब होते हैं।
उत्तर:
(a) L.F. – No men are perfect – E.
यदि यह तर्कवाक्य सत्य है तो इसका,

Contrary (विपरीत):
All men are perfect – A – असत्य है।

Subcontrary (उपविपरीत) नियमानुसार संभव नहीं है।

Subalterm (उपाश्रित) Some men are not perfect. – 0 – सत्य है।

Contradictory (व्याघाती):
Some men are perfect – I – असत्य होगा।

(b) L.F. – Some poets are poor – I.
यदि यह तर्कवाक्य सत्य है तो इसका, विपरीत-नियमानुसार संभव नहीं है।
अनुविपरीत – Some poets are poor – O – संदेहात्मक होगा।

उपाश्रयण:
All poets are poor – A – संदेहात्मक होगा।
व्याघाती – No poets are poor – E – असत्य होगा।

प्रश्न 13.
पद से आप क्या समझते हैं? ‘शब्द’ और ‘पद’ में क्या अन्तर हैं?
उत्तर:
तर्कशास्त्र का संबंध अनुमान से है और अनुमान की जड़ में पद है। इन्हीं पदों से तार्किक वाक्य और तार्किक वाक्यों से अनुमान बनता है अर्थात् पद अनुमान की इकाई है, आरम्भ बिन्दु (Starting point) है। पद को अंग्रेजी में Term कहते हैं। यह Term शब्द ग्रीक भाषा के Terminus का छोटा रूप है।

Terminus का अर्थ होता है – अन्त, किनारा या छोर। इसी शब्द के अर्थ के आधार पर ‘पद’ की परिभाषा यह कहकर दी जाती है कि वह शब्द पद है जो वाक्य के छोर पर रहता है। वाक्य में दो छोर होते हैं एक छोर पर उद्देश्य रहता है और दूसरे छोर पर विधेय। जैसे-राम मरणशील है। इसमें राम और मरणशील क्रमशः उद्देश्य और विधेय हैं तथा एक छोर पर राम है और दूसरे छोर पर मरणशील।

अतः पद के संबंध में कहा गया है “Term is a word or combination of words which by itself is capable of being used as subject or predicate of a Logical proposition.” As Ram is mortal. अर्थात जो शब्द या शब्द समूह किसी तार्किक वाक्य में उद्देश्य या विधेय की तरह व्यक्त किया जा सके उसे पद कहते हैं।

जैसे – ‘राम मरणशील है’ इसमें राम एक पद है तथा मरणशील दूसरा पद है। इसके व्याकरण ‘राम’ को उद्देश्य तथा ‘मरणशील’ शब्द को विधेय कहते हैं। लेकिन बहुत से ऐसे भी शब्द हैं जिन्हें हम तार्किक वाक्य में उद्देश्य या विधेय के रूप में प्रयुक्त नहीं कर सकते हैं। इसलिए वे पद नहीं हैं। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सभी शब्द पद नहीं है परन्तु जितने भी पद हैं वे सभी शब्द हैं। तार्किक दृष्टि से शब्द को तीन भेद बताये गये हैं।

1. पदयोग्य (Categorematic):
पदयोग्य शब्द वे शब्द हैं जो स्वतंत्र रूप से किसी तार्किक वाक्य के उद्देश्य या विधेय बन सकते हैं। जैसे राम, पुस्तक, नदी, गाय आदि। किसी भी तार्किक वाक्य का उद्देश्य या विधेय बताया जा सकता है। यथा-राम सुन्दर है। पुस्तक अच्छी है। नदी गहरी है। राम की गाय अच्छी है। अर्थात् ये सभी पदयोग्य शब्द हैं।

2. पदसंयोज्य (Syn-Categorematic):
शब्द-ये वैसे शब्द हैं जो स्वयं किसी तार्किक वाक्य में उद्देश्य या विधेय नहीं बन सकते हैं किन्तु किसी दूसरे पदयोग्य शब्द की सहायता से बन जाते हैं, जैसे-के, का, पर, में, ने इत्यादि शब्द पदयोग्य हैं। जैसे–मोहन का घोड़ा। इसमें मोहन और घोड़ा के बीच ‘का’ प्रयोग किया गया है। उसी तरह अंग्रेजी में At, on. by, since इत्यादि।

3. पदयोग्य (A-categorematic):
ये वे शब्द हैं जो न तो स्वतंत्र रूप से और न किसी पद की सहायता से ही किसी तार्किक वाक्य के उद्देश्य या विधेय के स्थान पर प्रयोग हो सकते हैं। अतः पदयोग्य शब्द पद नहीं है। जैसे – विस्मयादिबोधक शब्द हाय, अरे, हे, अहा आदि शब्द हैं। अतः पदयोग्य शब्द ही शुद्ध रूप से पद हैं। इसके अलावा पदसंयोज्य से भी पद बनाये जा सकते हैं, परन्तु पदयोग्य शब्द ही शुद्ध रूप से पद हैं। इसके अलावा पदसंयोज्य से भी पद बनाये जा सकते हैं, परन्तु पदयोग्य शब्द कभी भी पद नहीं कहे जा सकते हैं। अतः पद का क्षेत्र शब्द के क्षेत्र से संकुचित है।

शब्द और पद में निम्नलिखित अन्तर पाये जाते हैं –

  • सभी पद शब्द हैं किन्तु सभी शब्द पद नहीं है (All terms are words but all words are not terms)
  • पद अनुमान की इकाई है किन्तु शब्द व्याकरण की इकाई है। एक पद में अनेक शब्द भी हो सकते हैं।
  • व्याकरण की दृष्टि से शब्दों को संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि में विभक्त करते हैं, लेकिन तार्किक दृष्टि से शब्दों को पदयोग्य, पदसंयोज्य एवं पदायोग्य में विभक्त किया गया है।
  • पद एवं शब्द दोनों से ही मानसिक क्रियाओं की अभिव्यक्ति होती है। लेकिन पद से मानसिक विचार मात्र ही व्यक्त होते हैं जबकि शब्द के द्वारा मन के अनेकानेक भाव व्यक्त होते हैं। जैसे – विस्मय की भावना को व्यक्त करने के लिए ओह, अरे, हाय, अहा, शब्द पद नहीं कहे जा सकते हैं।
  • सभी पद किसी तार्किक वाक्य के उद्देश्य और विधेय के रूप में व्यक्त होने की क्षमता रखते हैं, परन्तु सभी शब्दों में ऐसी क्षमता नहीं है। पद सार्थक होता है किन्तु शब्द निर्रथक होता है। इस तरह पद और शब्द में तार्किकों ने अंतर किया है।

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प्रश्न 14.
किसी पद की वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता से क्या तात्पर्य है? वे किस प्रकार परस्पर सम्बन्धित है?
उत्तर:
Denotation (वस्तुवाचकता) एवं Connotation (गुणवाचकता) ये दोनों लैटिन भाषा के शब्द हैं। Denotation दो शब्दों से बना है। वे हैं – De जिसका अर्थ है Down और ‘Noto’ जिसका अर्थ है ‘To mark down’ अर्थात् निर्देश करना। इसी प्रकार connotation में ‘con’ जिसका अर्थ है ‘with’ और ‘noto’ जिसका अर्थ है ‘to mark’ अतः connota tion का अर्थ हुआ To mark with अर्थात् सामान्य एवं अनिवार्य गुणों को व्यक्त करना। इस तरह हम देखते हैं कि किसी भी पद में दो बातें व्यक्त करने की शक्ति रहती है। पहली बात यह है कि वह अपने क्षेत्र अर्थात् व्याप्ति को व्यक्त करती है अर्थात् उसकी वस्तुवाचकता कितनी है। दूसरी बात है कि उस पद की गुणवाचकता क्या है।

पदों की वस्तुवाचकता (Denotation of term):
किसी पद के क्षेत्र से हमारा मतलब यह है कि उस पद की व्याप्ति क्या है? पदों के क्षेत्र को ही उसकी वस्तुवाचकता कहते हैं। कहा भी गया है “By the denotation of a term we mean the number of objects to which the term is applicable in the same sense.” अर्थात् वस्तुवाचकता से उन व्यक्तियों का बोध होता है जिनके लिए वह पद समान अर्थ में प्रयोग किया गया है। जैसे जब ‘मनुष्य’, ‘छात्र’, ‘गाय’ पद कहते हैं तो उस पद से सम्पूर्ण मानव जाति, छात्र समुदाय की जाति का बोध होता है। यही मनुष्य, छात्र, गाय, सभी मनुष्यों, सभी छात्रों एवं सभी गायों के लिए समान रूप से प्रयोग किया जाता है। वस्तुवाचकता को विस्तार, परिधि या क्षेत्र (Extension, width or scope) भी कहा जाता है।

पदों की गुणवाचकता (connotation of term):
कोई पद अपने क्षेत्र, विस्तार के साथ ही साथ अपने सर्वश्रेष्ठ एवं अनिवार्य गुणों (Common and essential qualities) को भी बतलाता है। यही common and essential qualities किसी पद की गुणवाचकता कहलाती है। जैसे-‘मनुष्य’ पद पर विचार करते हैं तो इसमें विवेकशीलता एवं पशुता ये दो गुण इस तरह पाये जाते हैं जो मनुष्य के लिए सर्वनिष्ठ तथा अनिवार्य हैं। ये दोनों गुण हो ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता है। इसी से कहा गया है “By the connotation of a term we mean the common essential attributes possessed by all the objects to which the term is applicable in the same sense.” अर्थात् गुणवाचकता द्वारा उन सर्वनिष्ट एवं अनिवार्य गुणों का बोध होता है जो उस पद द्वारा निर्दिष्ट व्यक्तियों में समान रूप से वर्तमान होते हैं। गुणवाचकता को पदत्व, गहराई या सामर्थ्य आदि भी कहते हैं।

वस्तुवाचकता और गुणवाचकता के बीच संबंध (Relation between Denotation and Connotation):
वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता में अन्योन्याश्रय संबंध देखा गया है जिसे Relation of interdependence कहते हैं। अर्थात् दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं। दोनों में दो प्रकार के संबंध पाये जाते हैं।

(क) अन्योन्याश्रय संबंध (Relation of Interdepence)
(ख) प्रतिलोम संबंध (The Inverse Relation)

(क) अन्योन्याश्रय संबंध:
परस्पर निर्भरता के संबंध को अन्योन्याश्रय संबंध कहते हैं। इसका अर्थ है कि वस्तुवाचकता एवं गुणवाचकता एक-दूसरे पर निर्भर करती है। अर्थात् (Denotation depends upon connotation and connotation depends upon Deno tation)

गुणवाचकता सामान्य गुण होती है जिसका पता वर्ग के व्यक्तियों या वस्तुओं के निरीक्षण से ही लग सकता है। वर्ग में व्यक्ति या वस्तु उस पद की वस्तुवाचकता है। पशुता और मरणशीलता मनुष्य के सामान्य एवं आवश्यक गुण हैं। सामान्य का अर्थ ही है कि जो सबों में हों। इस तरह गुणवाचकता का पता लगाने के लिए वस्तुवाचकता पर निर्भर करना पड़ता है। इसी तरह वस्तुवाचकता भी गुणवाचकता पर निर्भर करती है।

यथा, मान लिया कि हम लोगों के सामने एक विचित्र-सा जानवर लाया जाता है, जिसे हम लोग नहीं पहचानते हैं। नहीं पहचानने का अर्थ है कि वह किस पद की वस्तुवाचकता है इसे हम नहीं जानते हैं। इतने में ही देखते हैं कि कुत्ता के सभी सामान्य एवं आवश्यक लक्षण वाला जानवर मौजूद है। हमलोग तुरंत कह देते हैं कि वह कुत्ता है। अर्थात् वह जानवर ‘कुत्ता’ पद की वस्तुवाचता है। इस तरह सामान्य एवं आवश्यक लक्षण यानी गुणवाचकता से वस्तुवाचकता जानी जाती है। इस तरह वस्तुवाचकता भी गुणवाचकता पर निर्भर करती है।

(ख) प्रतिलोम संबंध (The Inverse Relation):
इस संबंध का अर्थ है कि एक के बढ़ने से दूसरा घटता है और एक के घटने से दूसरा बढ़ता है। इसे निम्नलिखित ढंग से व्यक्त कर सकते हैं।

(a) जब वस्तुवाचकता बढ़ती है तो गुणवाचकता घटती है।
(If denotation increases, connotation decreases)

(b) जब वस्तुवाचकता घटती है तो गुणवाचकता बढ़ती है।
(If denotation decreases, connotation increases)

(c) जब गुणवाचकता बढ़ती है तो वस्तुवाचकता घटती है।
(If connotation increases, denotation decreases)

(d) जब गुणवाचकता घटती है तो वस्तुवाचकता बढ़ती है।
(If connotation decreases, denotation increases)

इन चारों की विस्तृत व्याख्या निम्नलिखित हैं –

(a) जब वस्तुवाचकता बढ़ती है तो गुणवाचकता घटती है, जैसे – पद-मनुष्य, वस्तुवाचकता सभी मनुष्य गुणवाचकता – पशुता, विवेकशीलता।

यहाँ मनुष्य पद की वस्तुवाचकता संसार के सभी मनुष्यों से है और गुणवाचकता पशुता + विवेकशीलता है। अब यदि मनुष्य के स्थान पर पशु को कह दिया जाय तो मनुष्य से पशु कह देने पर वस्तुवाचकता होगी पशु समुदाय जो मनुष्य समुदाय से कहीं अधिक है। इसलिए मनुष्य से पशु कह देने पर वस्तुवाचकता बढ़ जाती है। लेकिन पशु का सामान्य एवं आवश्यक गुण सिर्फ पशुता है इसलिए गुणवाचकता से घटकर सिर्फ पशुता रह जाती है। यहाँ वस्तुवाचकता के बढ़ने से गुणवाचकता घटती है।

(b) जब वस्तुवाचकता घटती है तो गुणवाचकता बढ़ती है।
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

यहाँ यदि सभी ‘मनुष्य’ से घटकर सिर्फ ‘विद्वान’ कर दिया जाए तो वस्तुवाचकता घट जाती है। क्योंकि विद्वान मनुष्य की संख्या मनुष्य की संख्या की अपेक्षा बहुत कम है। लेकिन विद्वान मनुष्य के तीन सामान्य आवश्यक गुण होते हैं। मनुष्य होने के नाते पशुता + विवेकशीलता एवं विद्वान होने के नाते विद्वत्ता। इस तरह मनुष्य की गुणवाचकता जहाँ दो ही है (पशुता + विवेकशीलता) वहाँ विद्वान मनुष्य की गुणवाचकता तीन हो जाती है (पशुता + विवेकशीलता + विद्वत्ता) इस तरह वस्तुवाचकता के घटने से गुणवाचकता में वृद्धि हो जाती है। जब गुणवाचकता बढ़ती है तो वस्तुवाचकता घटती है।

(c)
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यहाँ ‘मनुष्य’ पद है जिसमें यदि पशुता और विवेकशीलता में बुद्धिमत्ता जोड़ दी जाती है तो गुणवाचकता बढ़ जाती है। ये तीनों गुण बुद्धिमान मनुष्य के हैं। बुद्धिमान मनुष्यों की संख्या मनुष्यों की संख्या की अपेक्षा बहुत कम है। इस तरह गुणवाचकता के बढ़ने से वस्तुवाचकता घट जाती है।

(d) जब गुणवाचकता घटती है तो वस्तुवाचकता बढ़ती है।

Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 7 पद और तर्कवाक्य

यहाँ मनुष्य पद में पशुता और विवेकशीलता दोनों हैं लेकिन विवेकशीलता घटा देने पर गुणवाचकता घट जाती है। ‘पशुता’ पशुओं की गुणवाचकता है। अतः पशुता से पशुओं का बोध होता है जो मनुष्य की अपेक्षा बहुत अधिक है। अतः गुणवाचकता के घटने से वस्तुवाचकता में वृद्धि होती है।

इस तरह नियम के रूप में यह सिद्ध हो जाता है कि वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में प्रतिलोम संबंध (inverse relation) है।

विपरीत वैषम्य संबंध के अपवाद
विपरीत वैषम्य संबंध सामान्य नियम नहीं है। इसके निम्नलिखित अपवाद भी हैं –

(क) विपरीत वैषम्य का संबंध वैसे पदों में लागू नहीं होता है जिसमें जाति और उपजाति का संबंध नहीं हो। जैसे उजली गाय और काली गाय के बीच यह नियम लागू नहीं होगा। मनुष्य और वृक्ष में भी यह संबंध लागू नहीं होता है। क्योंकि इसमें जाति उपजाति का संबंध नहीं है।

(ख) यदि किसी पद की गुणवाचकता में ऐसा गुणा बढ़ा दिया जाए जो सबों में पाया जाता है तो उस पद की वस्तुवाचकता में कमी नहीं आएगी। यथा ‘मनुष्यता’ की गुणवाचकता में पशुता और विवेकशीलता में ‘मरणशीलता’ जोड़ दी जाए तो इससे मनुष्य की वस्तुवाचकता में कमी नहीं होगी।

(ग) जन्म लेने से करोड़ों लोग साल में बढ़ जाते हैं जिससे मनुष्य की वस्तुवाचकता में वृद्धि हो जाती है। परन्तु इससे मनुष्य पद की गुणवाचकता में कमी नहीं होती है। यहाँ पर भी विपरीत वैषम्य का संबंध लागू नहीं होता है।

आलोचना:
(क) कुछ आलोचकों के अनुसार पद की वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में जो घटना और बढ़ना होता है वह वास्तविक ज्ञान नहीं होता है बल्कि हमारे विचार क्षेत्र में होता है। जैसे – मनुष्य की गुणवाचकता में से किसी गुण को घटा लेते हैं या किसी गुण को जोड़ देते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वास्तव में मनुष्य की गुणवाचकता में वृद्धि या हास होता है। यह बढ़ना और घटना हमारे दिमाग में है।

(ख) विपरीत वैषम्य संबंध में गुणवाचकता का वैज्ञानिक अर्थ नहीं लिया गया है। जिसके घटने और बढ़ने का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता है। ऊपर जिन उदाहरणों में जिन गुणों को घटाया बढ़ाया गया है, वे साधारण गुण हैं न कि गुणवाचकता। अतः गुणवाचकता का वैज्ञानिक अर्थ जोड़ने से गुणवाचकता और वस्तुवाचकता में कमी-बेसी नहीं होगी।

(ग) वस्तुवाचकता और गुणवाचकता में हास किसी गणितीय अनुपात में नहीं होता है। किसी एक गुण को जोड़ने से वस्तुवाचकता में बहुत कमी होती है और किसी एक गुण के जोड़ने से वस्तुवाचकता में थोड़ी कमी होती है। जैसे-मनुष्य की वस्तुवाचकता में कालापन गुण जोड़ने से मनुष्य की वस्तुवाचकता में उतनी कमी नहीं होती जितनी कमी पी-एच. डी. जोड़ने से होती है। काले मनुष्य दुनिया में बहुत है। किन्तु पी-एच.डी बहुत कम हैं।

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प्रश्न 15.
पदों का वर्गीकरण उदाहरण सहित करें।
उत्तर:
पदों का वर्गीकरण तार्किकों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से किया है। इस तरह पदों के वर्गीकरण के समय नौ (9) दृष्टिकोण को अपनाया गया है और उसी के अनुसार पदों का वर्गीकरण भी किया गया है। जैसे – एक ही पद ‘राम’ पदों की बनावट की दृष्टि से सरल है और अर्थ की दृष्टि से एकार्थक है।

1. बनावट (Construction) की दृष्टि से पद दो हैं –
(क) सरल (Simple) (ख) मिश्रित (Composite)

2. अर्थ (Meaning) के अनुसार
(क) एकार्थक (Univocal) (ख) अनेकार्थक. (Equivocal)

3. वचन (Number) के अनुसार
(क) व्यक्तिवाचक (Singular) (ख) जातिवाचक (General)

4. संगठन (Collection) के अनुसार
(क) समूहवाचक (Collective) (ख) असमूहवाचक (Non-Collective)

5. स्थिति (Certainty) के अनुसार
(क) निश्चित (Definite) (ख) अनिश्चित (Indefinite)

6. अस्तित्व (Exitence) के अनुसार
(क) वस्तुवाचकता (Concrete) (ख) भाववाचक (Abstract)

7. स्वभाव (Quality) के अनुसार
(क) भावात्मक (Positive) (ख) अभावात्मक (Negative) (ग) विरहात्मक (Privative)

8. संबंध (Relation) के अनुसार
(क) निरपेक्ष (Absolute) (ख) सापेक्ष (Relative)

9. गुण (Connotation) के अनुसार
(क) गुणवाचक (Connotative) (ख) अगुणवाचक (Non-Connotative)

1. बनावट (Construction) की दृष्टि से पद के दो भेद हैं –

(क) सरल (Simple):
जिस पद में केवल एक ही शब्द होता है उसे सरल पद कहते हैं, जैसे-राम तेज है। इसमें राम और तेज सरल पद है।

(ख) मिश्रित (Composite):
यह वह पद है जो एक से अधिक शब्दों के मिश्रण से बना है, जैसे मगध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति सज्जन हैं। इसमें मगध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति एक ही पद है जिसमें अनेक शब्द (मगध विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति) हैं। अतः यह पद मिश्रित है किन्तु सज्जन पद सरल है। मिश्रित पद पदयोग्य तथा पदसंयोज्य से बना रहता है।

2. अर्थ (Meaning) के अनुसार पद दो हैं –
(क) एकार्थक (Univocal):
जिस पद का एक ही अर्थ होता है, उसे एकार्थक पद कहते हैं, जैस-मनुष्य, पुस्तक, नदी, घोड़ा।

(ख) अनेकार्थक (Equivocal):
जिस पद में एक से अधिक अर्थ का बोध होता है उसे अनेकार्थक पद कहते हैं, जैसे-तीन, कनक, सैंधव, आर्य, Sound, light, foot, head, page वगैरह। तीर का अर्थ वाण और नदी का किनारा होता है, इसी तरह कनक का अर्थ सोना और धतूरा है। Sound (आवाज-ठोस), Light (हल्का-प्रकाश), Page (पृष्ठ-नौकर) आदि से है।

3. वचन (Number):
वचन के अनुसार पद के दो भेद हैं –
(क) व्यक्तिवाचक (Singular):
वह पद जो सिर्फ एक ही वस्तु का बोध कराने के लिए व्यवहृत किया जाए वह व्यक्तिवाचक पद कहलाता है। जैसे-राम, पटना से एक ही का बोध होता है। इसमें नामवाचक शब्द व्यक्तिवाचक पद होते हैं।

(ख) जातिवाचक (General):
जातिवाचक पद वह पद है जो अपने वर्ग के एक से अधिक पदार्थों के लिए व्यवहृत किया जा सके। यथा-पुस्तक, नदी, आम। जातिवाचक पद अपने सम्पूर्ण जाति के लिए बोधक है। परन्तु जब किसी जातिवाचक पद के साथ यह, वह (This, That) जोड़ देते हैं तो वह व्यक्तिवाचक पद बन जाता है। जैसे–पुस्तक जातिवाचक पद है किन्तु यह पुस्तक या वह पुस्तक व्यक्तिवाचक पद हो जाता है। इसी प्रकार कभी-कभी व्यक्तिवाचक नाम भी जातिवाचक के रूप में व्यवहृत किये जाते हैं। यथा “प्रत्येक युग में गाँधी होते हैं”- यहाँ ‘गाँधी’ का अर्थ ‘महापुरुष’ है। अतः यहाँ ‘गाँधी’ जातिवाचक पद है, व्यक्तिवाचक नहीं।

4. संगठन (collection) के अनुसार पद के दो भेद हैं –
(क) समूहवाचक पद (Collective term):
वह पद जिससे किसी समूह या जत्थे का बोध होता है, उसे समूहवाचक पद कहते हैं। जैसे-सेना, क्लास, मेला, सभा, माला, वन आदि। सिपाहियों के समूह के सेना, वृक्षों के समूह से वन तथा फूलों के समूह से माला का बोध होता है।

समूहवाचक पद भी दो तरह के हैं –

  • व्यक्ति समूहवाचक पद (Singular Collective term) तथा
  • जाति समूहवाचक पद (General Collective term)

व्यक्ति समूह वाचक से किसी निश्चित समूह का बोध होता है। जैसे-रामलखन सिंह यादव कॉलेज पुस्तकालय। केवल पुस्तकालय कह देने से जाति समूहवाचक पद बन जाता है, क्योंकि इससे सभी पुस्तकालयों का बोध नहीं होता है। असमूहवाचक पद वह पद है जिससे किसी समूह का बोध न हो, जैसे-राम, हरि, पटना, मनुष्य। चूँकि ये पद वर्ग के अलग-अलग व्यक्तियों एवं वस्तुओं के लिए भी व्यवहृत होते हैं इसलिए इन्हें व्यक्तिवाचक कहा जाता है।

5. स्थिति (Certainty):
स्थिति के अनुसार पद दो माने जाते हैं –

(क) निश्चित पद (Definite term):
यह वह पद है जिसके द्वारा किसी निश्चित वस्तु या व्यक्ति या वर्ग का बोध होता हो। जैसे-राम, पटना, यह मनुष्य, वह पशु। इसके अलावा सामान्य पद जिनसे सम्पूर्ण वर्ग का बोध होता है वे सभी निश्चित पद होते हैं, जैसे-सभी लड़के उत्साही हैं या कोई मनुष्य ईश्वर नहीं है।

(ख) अनिश्चित पद (Indefinite term):
वे पद जिनसे किसी व्यक्ति या वर्ग की निश्चितता नहीं मालूम पड़ती है, अनिश्चित पद कहलाते हैं। जैसे-कुछ लड़के, एक व्यक्ति, कोई आदमी। साधारणतया जातिवाचक पद या सामान्य पद प्रायः अनिश्चित ही हुआ करते हैं, जैसे – मनुष्य, आम, छात्र। इसके साथ-ही-साथ जितने अनन्त पद (Infinite terms) हैं वे सभी अनिश्चित पद हैं। जैसे – नहीं उजला (not white), नहीं लाल (not red) आदि।

6. अस्तित्व (Exitence) के अनुसार पद के दो भेद हैं –

(क) वस्तुवाचकता पद (Concrete term):
कहा गया है कि “A concrete term is the name of a thing” अर्थात् वस्तुवाचकता पद किसी वस्तु के नाम को कहते हैं। प्रत्येक में वस्तुवाचकता और गुणवाचकता प्रायः पाया जाता है। अर्थात् जितने भी विश्लेषण हैं वे सभी वस्तुवाचकता पद ही कहे जाएँगे क्योंकि विशेषणों से सिर्फ गुण का ही बोध नहीं होता है बल्कि वह अमुक वस्तु का भी संकेत करता है जिसमें वह गुण है, जैसे-लाल, पीला, ईमानदार से यह बोध होता है कि व्यक्ति है जो ईमानदार है। इस तरह इन पदों से गुण सहित वस्तु तथा गुणयुक्त व्यक्ति का बोध होता है। अर्थात् पद वस्तुवाचक है।

(ख) भाववाचक पद (Abstract Term):
भाववाचक पद गुणों के संग्रह का नाम है, जैसे-लाली, ईमानदारी, मनुष्यत्व, पीलापन। इन भाववाचक पदों का हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकते हैं। लाली, ईमानदारी, सत्यता को किसी वस्तु या व्यक्ति से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। अतः जिसके अन्त में त्व, ता, पन, आवर, आहट आदि प्रत्यय लगे रहते हैं, उन्हें भाववाचक पद कहते हैं।

भाववाचक पद के भी दो पद हैं –

1. व्यक्ति भाववाचक पद (Singular abstract):
व्यक्ति भाववाचक पद उस पद को कहते हैं जिससे सिर्फ एक गुण का बोध होता है जैसे लाली, ईमानदारी, सफेदी। ये एक ही गुण को बताते हैं – लाली। इस तरह व्यक्ति भाववाचक पद है।

2. जाति भाववाचक पद (General abstract):
जिस पद से बहुत गुणों का बोध हो और वह पद उन गुणों में से प्रत्येक के लिए लागू होता हो उसे व्यक्ति भाववाचक पद कहते हैं, जैसे-रंग, धर्म, सद्गुण। यहाँ रंग से लाल, उजलापन, कालापन, नीलापन, हरापन का बोध होता है। इसी तरह धर्म से हिन्दुत्व, ईसाईत्व, इस्लामियत आदि का। अतः ये जाति भाववाचक पद हैं। भाववाचक पद व्यक्तिवाचक होते हैं या दोनों इसमें मतान्तर है।

भाववाचक पद व्यक्तिवाचक होते हैं या जातिवाचक (Are Abstract terms singu lar or general?):
इस प्रश्न को लेकर तर्कशास्त्रियों में मतभेद है। इस संबंध में चार तरह के विचार पाये जाते हैं –

1. कुछ लोग सभी भाववाचक पद को जातिवाचक मानते हैं। कई गुण बहुत से पदार्थ में पाया जाता है। इसलिए गुणवाचक पद जातिवाचक होते हैं जैसे ‘लाली’ का गुण दुनिया की बहुत-सी वस्तुओं में पाया जाता है। जैसे – कपड़ा, कलम, फूल, सेब आदि में। अतः लाली जातिवाचक पद है। लेकिन ऐसा विचार सर्वमान्य नहीं है। लाली एक गुण है, चाहे वह अनगिनत वस्तुओं में ही क्यों न पायी जाए। अतः ‘लाली’ जाति भाववाचक पद नहीं माना जा सकता है।

2. जेवेन्स जैसे तर्कशास्त्री का कहना है कि सभी भाववाचक व्यक्तिवाचक होते हैं। इनके अनुसार गुण एक ही होता है, परन्तु ये विभिन्न वस्तुओं में पाये जाते हैं। ईमानदारी एक गुण हैं, परन्तु विभिन्न व्यक्तियों में पायी जाती है। किन्तु इनके विचार भी पूर्ण सत्य नहीं है। इन्होंने उन पदों पर विचार ही नहीं किया जो तरह-तरह के गुणों को बतलाते हैं। जैसे-रंग, धर्म आदि। अतः रंग और धर्म को व्यक्तिवाचक पद मानना ठीक नहीं है।

3. कीनिज आदि विद्वानों का तर्क है कि भाववाचक पद के संबंध में व्यक्तिवाचक और जातिवाचक का प्रश्न उठाना ही निरर्थक है। पदों का वर्गीकरण एक सिद्धान्त से व्यक्तिवाचक और जातिवाचक में होता है और दूसरे सिद्धान्त से वस्तुवाचक और भाववाचक में होता है। दोनों वर्गीकरण के विभिन्न सिद्धान्त है। परन्तु यह मत भी युक्तिसंगत नहीं है।

4. मिल साहब का कहना है कि भाववाचक पद के व्यक्तिवाचक और जातिवाचक दोनों भेद होते हैं। जो भाववाचक ऐसे गुण को बतलाते हैं जो प्रकार और मात्रा में एक होते हैं, उन्हें व्यक्तिवाचक पंद कहते हैं, जैसे-सेब की लाली, दूध का उजलापन आदि। लेकिन जो भाववाचक ऐसे गुण को बतलाते हैं, जो या तो तरह-तरह के होते हैं या विभिन्न मात्राओं में होते हैं, उन्हें मिल साहब के अनुसार जाति भाववाचक पद कहते हैं।

रंग जाति-भाववाचक पद है, क्योंकि वह तरह-तरह के रंगों का बोध कराता है। लाली भी जाति भाववाचक पद है क्योंकि लाली में मात्रा का भेद होता है। जैसे गाढ़ा लाल, मध्यम लाल और फीका लाल आदि मात्रा के भेद बतलाते हैं। अतः मात्रा का भेद होने से जाति भाववाचक पद बन जाता है और मात्रा तथा प्रकार का भेद नहीं होने से यह व्यक्तिवाचक हो जाता है।

यही मिल साहब का विचार है। अतः निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि मिल साहब का विचार मात्रा वाला ठीक नहीं है। फिर भी जो पद तरह-तरह के गुणों का संकेत करता है, वह जाति भाववाचक पद होता है तथा रंग, पुष्प, धर्म आदि सभी पद व्यक्तिवाचक पद होते हैं, यथा-लाली, सफेदी, ईमानदारी आदि।

7. स्वभाव (Quality) के अनुसार पद तीन तरह के होते हैं –

(क) भावात्मक (Positive):
भावात्मक पद से किसी वस्तु या गुण के अस्तित्व का बोध होता है, जैसे-राम, गंगा, पटना, सत्यता। ये सभी किसी के व्यक्तित्व का बोध कराते हैं।

(ख) अभावात्मक (Negative):
अभावात्मक पद से किसी वस्तु या गुण के सिर्फ अभाव का बोध होता है। जैसे-अ-मनुष्य (not-man), अ-सुख (not-happy) आदि। प्रायः अभावात्मक ‘पद में निम्नलिखित प्रत्यय या उपसर्ग लगे रहते हैं-अ, हीन, अम्, निस, निर, रहित, शून्य-जैसे अनुपस्थिति, द्रव्यहीन, अस्तित्व, निस्संकोच, निर्लोभ, वृद्धि रहित, ज्ञान-शून्य।

भावात्मक और अभावात्मक पदों के संबंध में एक बात ध्यान देने की है कि कुछ पद ऐसे हैं जो आकार में भावात्मक मालूम पड़ते हैं किन्तु वास्तव में वे अभावात्मक हैं। कुछ पद ऐसे हैं जो देखने में अभावात्मक और यथार्थ में भावात्मक है। जैसे-राम बहरा है (श्रवणहीन)। कमरा खाली (भरा नहीं) है। गणेश अंधा (नेत्रहीन) है। सुदामा दरिद्र (निर्धन) है। इसी प्रकार doubt, capacity, ildeness, ignorance – ये सभी देखने में भावात्मक हैं परन्तु यथार्थ में अभावात्मक पद हैं।

इसी तरह आकार में अभावात्मक किन्तु वास्तव में भावात्मक पद है। जैसे – अधर्म (पाप) नहीं करना चाहिए। अप्रिय (बुरा) कार्य नहीं करना चाहिए। अरुचि (घृणा) है। इसके अलावा साधारणतया दो अभावात्मक अर्थ वाले पदों से भावात्मक अर्थ सूचित होता है। जैसे-वह अन्धा नहीं है। अर्थात् वह देख सकता है। यहाँ अन्धा और नहीं ये दो शब्द अभावात्मक अर्थ सूचित करते हैं और इसका अर्थ भावात्मक हो जाता है।

(ग) विरहात्मक (Privative):
विरहात्मक पद से वर्तमान में उन गुणों के अभाव का बोध होता है जो गुण किसी वस्तु में रह सकता है। जैसे-अंधा, लंगड़ा, गूंगा, बहरा, बाँझ। इस तरह वर्तमान में विरहात्मक.पद से अमुक गुण का अभाव मालूम होता है। परन्तु भविष्य में डॉक्टरी इलाज से उस खाये हुए गुण की पूर्ति हो सकती है। विराहात्मक पद में भावात्मक और अभावात्मक दोनों ही पदों के गुण युक्त देखते हैं।

इस प्रकार भावात्मक और अभावात्मक दोनों अर्थों को संकेत करने की वजह से विरहात्मक पद को भावात्मक और अभावात्मक पदों का केन्द्र बिन्दु कह सकते हैं। विरहात्मक पद से बने हुए भाववाचक पद अभावात्मक पद हो जाते हैं। जैसे-कंधा विरहात्मक पद है किन्तु अंधापन अभावात्मक पद है।

8. संबंध (Relation) की दृष्टि से पद दो तरह के होते हैं –

(क) निरपेक्ष पद (Absolute term):
निरपेक्ष पद जिस पद के गुण का बोध करता है, उस पद में गुण का अपना एक निश्चित अर्थ रहता है, जिस अर्थ को बिना किसी वस्तु की सहायता से ही समझा जा सकता है। अतः निरपेक्ष उस पद को कहते हैं जिनके अर्थ को समझने के लिए अन्य पद की सहायता नहीं लेने पड़े, यथा-पुस्तक, कलम, वृक्ष, पर्वत। ये सभी निरपेक्ष पद हैं।

(ख) सापेक्ष पद (Relative term):
सापेक्ष पद उस पद को कहते हैं जिसके अर्थ को समझने के लिए किसी दूसरे पद की सहायता लेने पड़े। जैसे-पिता का अर्थ तभी स्पष्ट होता है जब हम पुत्र पद की सहायता लेते हैं। पुत्र का ही पिता होता है। अतः पिता एक सापेक्ष पद है। इस तरह सापेक्ष पद जोड़ में होते हैं अर्थात् द्वन्द्व समास के रूप में होते हैं, यथा-पिता-पुत्र, पति-पत्नी, मालिक-नौकर, बड़ा-छोटा, नया-पुराना, पूरब-पश्चिम, स्त्री-पुरुष आदि। इस तरह सापेक्ष पद चार प्रकार के हैं –

  • सम्बन्ध सूचक-पति-पत्नी, भाई-बहन।
  • दिशा सूचक-पूरब-पश्चिम, ऊपर-नीचे।
  • समय सूचक-नया-पुराना, आगे-पीछे।
  • परिमाण सूचक-मोटा-पतला, हल्का-भारी। इसी तरह अभावात्मक पद निरपेक्ष पद ही हैं, जैसे-अ-सुख। इसी तरह विरहात्मक पद अंधा, लंगड़ा, गूंगा आदि सभी सापेक्ष पद हैं।

9. गुण (Connotation) के अनुसार पद दो तरह के हैं –

(क) गुणवाचक (Connotative):
गुणवाचक के संबंध में हो गया है कि “A conno tative term denotes things as well as connotes attributes.” अर्थात् गुणवाचक पद से गुण एवं वस्तु दोनों का बोध होता है। जैसे – मनुष्य। इसमें व्यक्ति के साथ ही साथ पशुता एवं विवेकशीलता दोनों का बोध होता है।

इसमें सामान्य पद उपाधिसूचक, व्यक्तिवाचक संज्ञा, विशेषणबोधक पद, व्यक्तिवाचक नाम जब जातिवाचक अर्थ में प्रयुक्त हों तथा भावात्मक, निषेधात्मक एवं विरहात्मक पद, जो अर्थहीन व्यक्तिवाचक नाम से सूचित नहीं करें, वे सभी गुणवाचक पद ही होते हैं। जैसे-मनुष्य पद, रंग, सदाचार, सूर्य, चक्र, भारत का वर्तमान राष्ट्रपति, काला, पीला, नीला, गाँधी, बुद्ध, नेपोलियन आदि।

(ख) अगुणवाचक (Non-connotative):
इस पद के संबंध में कहा गया है – Anon connotative term either denotes things or connotes attributes but not both. अर्थात् “अगुणवाचक पद वह है जो या तो वस्तु का बोध कराए या केवल गुण का ही बोध कराए, परन्तु दोनों का नहीं। जैसे-वर्गता, उज्जवलता। इनमें सीधे गुण का ही बोध होता है वस्तु का निर्देश नहीं होता।

इसी तरह व्यक्तिवाचक नाम, जैसे-राम, घटना आदि भी अगुणवाचक पद ही होते हैं। “मिल साहब का विचार है कि अगुणवाचक से या तो केवल subject का बोध हो या केवल attribute (गुण) का। किन्तु गुणवाचक पद वस्तु (subject) को निर्देश करने के साथ-साथ उसके गुण (attribute) का भी बोध कराता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 16.
विपरीत और व्याघाती पदों में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
दो पदों के बीच विरोध का संबंध तब होता है जब वे दोनों एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं, जैसे – ‘लाल और काला’। कोई वस्तु एक ही समय लाल और काला नहीं कही जा सकती है। अतः इन दोनों पदों में विरोध है। पदों के बीच विरोध दो प्रकार के होते हैं।

  1. विपरीत विरोध और
  2. व्याघाती विरोध।

जिन दो पदों में विपरीत विरोध होता है उन्हें विपरीत पद (contrary term) और जिनमें व्याघाती विरोध होता है उन्हें व्याघाती पद (contradictory term) कहते हैं।

विपरीत पद के निम्नलिखित लक्षण होते हैं –

(क) एक की सत्यता दूसरे की असत्यता बतलाती है:
विपरीत पदों में यदि एक सत्य होता है तो दूसरा अवश्य असत्य होता है। जैसे किसी वस्तु का लाल कहना सत्य है तो काला कहना असत्य होगा। लाल और काला में यदि एक सत्य है तो दूसरा असत्य है।

(ख) एक की असत्यता दूसरे की संदेहात्मक बतलाती है:
विपरीत पदों में यदि एक असत्य होता है तो दूसरा सत्य हो सकता है या असत्य। एक के असत्य होने से दूसरे के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते हैं। इसलिए दूसरा संदेहात्मक हो जाता है। जैसे लाल और काला में यदि लाल कहना असत्य है तो काला कहना सत्य भी हो सकता है और असत्य भी।

अर्थात् लाल नहीं होने पर कोई वस्तु काली हो सकती है या किसी अन्य रंग की भी हो सकती है। अर्थात् काला संदेहात्मक भी हो सकता है। उसी तरह काला के असत्य होने से ‘लाल’ संदेहात्मक (doubtful) हो जाता है। इस तरह हम देखते हैं कि लाल और काला में एक की असत्यता दूसरे की संदेहात्मकता बतलाती है। इस तरह हम विपरीत पदों में दोनों एक साथ असत्य भी हो सकते हैं परन्तु एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं।

(ग) दोनों पदों के बीच तीसरी संभावना रहती है:
विपरीत पदों के बीच लाल, काला के बीच बहुत से रंग होते हैं, उजला, नीला, बैंगनी आदि। इस तरह ‘लाल और काला’ विपरीत पद (contrary term) हैं क्योंकि विपरीत पदों के तीनों लक्षण उनमें मौजूद हैं –
(क) सत्य-असत्य
(ख) असत्य-संदेहात्मक
(ग) तीसरी संभावना।

2. व्याघाती पद के निम्नलिखित लक्षण होते हैं –

(क) एक की सत्यता दूसरे की असत्यता बतलाती है:
व्याघाती पदों में यदि एक सत्य है तो दूसरा अवश्य ही असत्य होगा, जैसे – ‘लाल और अलाल’ (Red and not red) – इसमें लाल और अलाल दोनों एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं। इसमें यदि लाल कहना सत्य है तो अलाल कहना असत्य होगा और यदि अलाल कहना सत्य है तो लाल कहना असत्य होगा। व्याघाती पद में विपरीत पद एक साथ सत्य नहीं हो सकते हैं।

(ख) एक की असत्यता दूसरे की सत्यता बतलाती है:
व्याघाती पदों में यदि एक असत्य होता है तो दूसरा अवश्य सत्य होता है। जैसे यदि किसी वस्तु को लाल कहना असत्य है तो अलाल कहना सत्य होगा और यदि अलाल असत्य है तो लाल कहना सत्य होगा। व्याघाती पद कभी भी एक साथ असत्य नहीं होते हैं। व्याघाती पद विपरीत पद से भिन्न हो जाते हैं।

(ग) दोनों पदों के बीच तीसरा संभावना नहीं रहती है:
व्याघाती पदों के बीच तीसरी संभावना नहीं रहती है, जैसे लाल और अलाल के बीच कोई तीसरा रंग नहीं बच जाता है। क्योंकि लाल के अलावा जितने रंग हैं वे सभी अलाल के अन्दर आ जाते हैं। फलतः Red and not-red मिलकर रंग के पूरे क्षेत्र को ढक लेते हैं। इस तरह लाल और अलाल व्याघाती पद हैं। क्योंकि व्याघाती पदों के तीनों लक्षणों इनमें मौजूद हैं –

(क) सत्य-असत्य
(ख) असत्य-सत्य
(ग) तीसरी संभावना नहीं।

विपरीत और व्याघाती पदों में तुलना
विपरीत पद (Contrary term)

(क) एक सत्य है तो दूसरा असत्य
(ख) एक असत्य है तो दूसरा संदेहात्मक
(ग) दोनों के बीच तीसरी संभावना होती है, जैसे – तेज – भेंदू, खट्टा – मीठा, युद्ध – शान्ति, Hot-cold.

व्याघाती पद (Contradictory term)
(क) एक सत्य है तो दूसरा असत्य
(ख) एक असत्य है तो दूसरा सत्य
(ग) दोनों के बीच तीसरी संभावना नहीं होती है।
जैसे – जीवित – मृत, श्वेत-अश्वेत, मरणशील-अमर, Perfect-Imperfect.

नोट:
किसी पद का व्याघाती पद बनाने के लिए पद में non, not, ‘न’, ‘अ’ लगा दिया जाता है। जैसे Intelligent का non-intelligent या not-intelligent. श्वेत का अश्वेत आदि।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 17.
क्या व्यक्तिवाचक पद गुणवाचक होते हैं? अथवा, व्यक्तिवाचक नाम गुणवाचक है या अगुणवाचक?
उत्तर:
व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ गुणवाचक हैं या अगुणवाचक इस पर तार्किकों के निम्नलिखित विचार हैं –

1. मिल साहब का विचार है कि व्यक्तिवाचक नाम अगुणवाचक होते हैं। जैसे-राम, मोहन कहने से किसी गुण का बोध नहीं होता है। वे सिर्फ व्यक्ति या वस्तु का निर्देश ही करते हैं। व्यक्तिवाचक नाम पर एक निरर्थक चिह्न है। नाम से समाज में किसी व्यक्ति विशेष को अलग किया जाता है। नाम का सिर्फ इतना ही महत्त्व है। नाम के अनुसार किसी गुण का बोध नहीं होता है। कभी-कभी महादरिद्र भी अपने बच्चे का नाम धनपति रख देते हैं और करोड़पति अपने बच्चे का नाम तिनकौड़ी लाल।

एक अंधी लड़की का नाम भी मृगनयनी होता है। अतः नाम से गुण का बोध नहीं होता है। मिल ने कहा है कि नाम एक निरर्थक चिह्नमात्र है, यह विचार गलत है। कार्वेथ रीड का कहना है कि व्यक्तिवाचक नाम का जो अर्थ होता है यह आकस्मिक होता है और आकस्मिक गुण वास्तव में गुण नहीं है। ‘राम’ शब्द से कोई सामान्य सारगुणों का बोध नहीं होता है। राम किसी मनुष्य का भी नाम हो सकता है। इसी तरह काफे भी व्यक्तिवाचक नाम को अगुणवाचक ही मानते हैं।

2. जेवन्स तथा बोसांके:
जेवन्स साहेब का विचार है कि व्यक्तिवाचक नाम गुणवाचक होते हैं। इनके अनुसार राम पद से गुण का भी बोध हो जाता है। इतना तो अवश्य बोध होता है कि राम एक पुरुष का नाम है। सीता से किसी नारी का बोध होता है। पटना से किसी शहर के नाम का, इससे मोटा-मोटी गुणों का परिचय तो मिल ही जाता है। अतः ये व्यक्तिवाचक पद गुणवाचक होते हैं। ‘सोनपुर’ से यह गुण मालूम होता है कि वह सोन नदी के तट पर बसा हुआ है। यदि नदी सुख जाए या दूर हट जाए तो भी गुण बोध होगा कि सोनपुर किसी समय सोन नदी के तट पर बसा हुआ था। अतः जेवन्स के अनुसार व्यक्तिवाचक नाम गुणवाचक ही है।

बोसांके साहब का कहना है कि व्यक्ति वाचक संज्ञा से उस गुण का बोध होता है जो कि निश्चित एवं असामान्य है। इनके अनुसार व्यक्तिवाचक नाम एक संकेत मात्र है। इसी संकेत से वस्तु-विशेष के सभी गुणों का बोध हो जाता है। हिटलर, गाँधी का नाम सुनते ही उसके सभी गुणों का एक खाका हमारे मस्तिष्क में खींच जाता हैं अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बोसांके के अनुसार व्यक्तिवाचक नाम से गुण का बोध तो होता है किन्तु गुणवाचकता का बोध नहीं होता है।

3. डॉ. पी. के. राय का विचार है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा पहले तो अगुणवाचक हो जाती है। जैसे-जब कोई छात्र सर्वप्रथम कॉलेज में नाम लिखाकर पढ़ने आता है तो शिक्षक और छात्र दोनों एक-दूसरे के गुणों से अपरिचित रहते हैं। छात्र का नाम शिक्षकों के लिए और शिक्षक का नाम छात्र के लिए अगुणवाचक रहते हैं। किन्तु समय बीतने पर दिन-प्रतिदिन के अनुभव के फलस्वरूप वे एक-दूसरे के गुण के बारे में जान जाते हैं और तब वही नाम जो एक-दूसरे के लिए अगुणवाचक था, अब गुणवाचक बन जाता है। इनका विचार भी जेवन्स जैसा ही था।

4. वेल्टन इनका कहना है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा गुणवाचक है या अगुणवाचक इस प्रश्न के निर्णय में कोई कठिनाई नहीं है। यदि दो शब्दों के सहवर्ती गुण तथा अन्तर्निहितगुण पर विचार किया जाए।

(i) सहवर्ती गुण:
यह वह गुण है जिस गुण का वस्तु या व्यक्ति के साथ सिर्फ साहचर्य ही रहता है। वह उस वस्तु या व्यक्ति में अन्तर्निहित नहीं रहता है। जैसे-राम अभी काला कोट एवं फूलपैंट पहने हुए है। यहाँ राम कहने से ‘काला कोट एवं फूलपैंट पहनने का गुण’ स्वतः नहीं व्यक्त होता है। अतः यह गुण राम का सहवर्ती गुण है।

(ii) अन्तर्निहित गुण:
यह वह गुण है जो वस्तु या व्यक्ति के सिर्फ साथ ही नहीं रहता वरन् उस वस्तु या व्यक्ति के आन्तरिक स्वभाव को भी व्यक्त करता है। जैसे-‘मनुष्य’ पद में दो गुण अन्तर्निहित हैं। वे हैं ‘पशुता तथा विवेकशीलता’। यहाँ मनुष्य शब्द पशुता और विवेकशीलता की ओर संकेत करता है। परन्तु राम के लिए काला कोट एवं फूलपैंट पहनने का गुण रहना आवश्यक नहीं है।

इस तरह वेल्टन साहब का कहना है कि वे पद जिसे अन्तर्निहित गुणों का बोध होता है गुणवाचक पद होते हैं और जिनसे केवल सहवर्ती गुणों का बोध होता है वे पद गुणवाचक नहीं होते हैं। इस तरह, वेल्टन के अनुसार व्यक्तिवाचक संज्ञा अगुणवाचक ही सिद्ध होते हैं क्योंकि व्यक्तिवाचक नाम से किसी अन्तर्निहित गुण का बोध नहीं होता है।

यदि कभी किसी गुण का बोध भी होता है तो वह सहवर्ती गुण ही होता है। इस तरह अन्य सभी व्यक्तिवाचक नाम अगुणवाचक है। यहाँ वेल्टन साहब मिल के विचार से सहमत हैं। नोट-इस तरह सभी व्यक्तिवाचक नाम तथा सभी व्यक्ति भाववाचक अगुणवाचक होते हैं। जैसे-राम, हरि, पटना तथा काली सफेदी ईमानदारी। इनसे केवल गुण का बोध होता है, वस्तु का नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 7 पद और तर्कवाक्य

प्रश्न 18.
तार्किक वाक्य क्या है? संयोजक के स्वभाव, गुण और विधि का वर्णन करें।
उत्तर:
तर्कवाक्य अनुमान से बनता है, अनुमान वाक्य पदों से बनता है। परिभाषा-तार्किक वाक्यों की संश्लेषणात्मक परिभाषा – “A proposition is but a judge ment expressed in language” अर्थात् भाषा में व्यक्त निर्णय ही तार्किक वाक्य है। इससे पता चलता है कि तार्किक वाक्य के लिए निर्णय का होना जरूरी है। “किसी के बारे में कुछ कहना ही निर्णय है।” जैसे-राम पढ़ता है। कलम अच्छी है।

सीता बुद्धिमान है। इसमें पढ़ना, अच्छी, बुद्धिमान ये सभी जब तक मानसिक क्षेत्र में रहते हैं तभी तक निर्णय है लेकिन जब बोलकर या लिखकर हम व्यक्त करते हैं तब वे निर्णय नहीं है बल्कि तार्किक वाक्य बन जाते हैं। अतः तार्किक वाक्य स्पष्ट हो जाता है और निर्णय अस्पष्ट रहता है। हम ऐसा भी कह सकते हैं कि तार्किक वाक्य निर्णय का व्यक्त रूप है और निर्णय तार्किक वाक्य का फलक रूप है। “Proposition is nothing but judgement revealed and judgement is nothing but proposition concealed.”

तार्किक वाक्य की विश्लेषणात्मक परिभाषा:
“A proposition is the statement of a certain relation between the two terms.” अर्थात् दो पदों के बीच संबंध के कथन को तार्किक वाक्य कहते हैं। यहाँ तार्किक वाक्य की तीन अंग हो जाते हैं –

  1. उद्देश्य
  2. विधेय
  3. संयोजक। जैसे ‘राम मरणशील है’ इसमें राम उद्देश्य है, मरणशील विधेय है तथा उद्देश्य और विधेय के बीच जो ‘संबंध’ है, भावात्मक है।

Ram is mortal. यहाँ Ram (S) Mortal (P) और is (Copula) है। यह संयोजक एक प्रक्रियापद है जो दो पदों के बीच संबंध व्यक्त करता है। संयोजक वाक्य में कहीं भी रहकर दो पदों के बीच संबंध ही व्यक्त करता है।

संयोजक का स्वभाव:
संयोजक के स्वभाव को निर्धारित करने के समय तीन बातों पर विचार करना जरूरी है।

1. संयोजक का काल (Tense):
कुछ लोगों का विचार है कि संयोजक भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में होना चाहिए, क्योंकि तार्किक वाक्य व्यक्तियों की अनुभूतियों को व्यक्त करता है और ये अनुभूतियाँ भूत, वर्तमान तथा भविष्य से संबंधित हो सकती है।

आलोचना:
यह मत उपयुक्त नहीं है। संयोजक का काम उद्देश्य और विधेय के वर्तमान संबंध को ही व्यक्त करना है तथा इसी वर्तमान संबंध को हम सत्य या असत्य साबित करते हैं। अतः सिद्ध है कि वर्तमान को व्यक्त करने के लिए वर्तमान काल हो। अतः संयोजक को वर्तमान काल में ही होना चाहिए तथा वाक्य के भूत और भविष्यत् कालों से संबंधित विचारों को विधेय का ही अंग मानना चाहिए।

भूत और भविष्य को व्यक्त करनेवालों पदों को वाक्य के विधेय के रूप में व्यक्त कर देने से यह कठिनाई जाती रहती है। जैसे – “राम अयोध्या के राजा थे।” इस वाक्य का तार्किक रूप है राम एक व्यक्ति हैं जो अयोध्या के राजा थे। इस तरह वाक्य का रूप ज्यों का त्यों रह जाता है और संयोजक भी वर्तमान काल में हो जाता है। राम परीक्षा पास कर जाएगा। इसका तार्किक वाक्य होगा ‘राम एक छात्र है जो परीक्षा पास कर जाएगा।’

2. संयोजक का गुण:
संयोजक के गुण का संबंध उसके भावात्मक तथा अभावात्मक दोनों पक्षों से है। तार्किक वाक्यों का संयोजक भावात्मक या अभावात्मक (Positive or negative) है इसमें तार्किकों में मतभेद है। हॉब्स का विचार है कि संयोजक हमेशा भावात्मक ही होना चाहिए। इनका कहना है कि वाक्य में यदि अभावात्मक चिह्न (नहीं not) हो तो भी उसे संयोजक के साथ नहीं मिलाकर विधेय के साथ मिला देना चाहिए।

जैसे राम ईमानदार नहीं है (Ram is not honest) इस वाक्य में अभावात्मक चिह्न ‘नहीं’ (not) को विधेयक के साथ मिला देने पर तार्किक वाक्य का रूप इस प्रकार बन जाता है – राम नहीं ईमानदार है (Ram is not-honest)। यहाँ राम उद्देश्य है तथा ‘नहीं-ईमानदार’ (not-honest) विधेय है, तथा है (is) संयोजक है। इस तरह सभी वाक्य भावात्मक ही होंगे और संयोजक भावात्मक ही होगा।

आलोचना:
यह मत कई कारणों से अमान्य है।

(क) भाव के दो पक्ष होते हैं:
भावात्मक और अभावात्मक। अर्थात् ‘हाँ’ और ‘नहीं’। भाव के ये दोनों पक्ष समान महत्त्व रखते हैं। अतः अभावात्मक चिह्न (नहीं not) को विधेय में मिलाकर अभावात्मक वाक्य को समूल नष्ट कर देना उचित नहीं है। अतः भावात्मक और अभावात्मक दोनों ही रूप में संयोजक को मानना उचित है।

(ख) हॉब्स साहब के विचार को स्वीकार करने से यह अनन्त पद बन जाता है जिसका ज्ञान होना संभव ही नहीं है। जैसे-जब हम कहते हैं कि ‘राम नहीं-ईमानदार है’ तो नहीं-ईमानदार (not-honest) का अर्थ है ईमानदार को छोड़कर सभी चीज। अतः निष्कर्ष है कि संयोजक भावात्मक और अभावात्मक दोनों ही होता है। राम ईमानदार हैभावात्मक तथा राम ईमानदार नहीं है अभावात्मक ये दोनों उचित हैं।

3. संयोजक की विधि (Modality):
उद्देश्य और विधेय के बीच संबंध को व्यक्त करने की विधि तीन प्रकार की होती है।

(क) जब उद्देश्य और विधेय के बीच साधारण संबंध होता है तो ये वाक्य साधारण (Assertory) रह जाते हैं। जैसे-राम धनी है, या राम धनी नहीं है। (Ram is rich or Ram is not rich)
(ख) जब उद्देश्य और विधेय के बीच निश्चयात्मक संबंध होता है तब वह अवश्य ही ‘must be’ से व्यक्त होता है। जैसे-हरेक कार्य का कारण होता है (Every event must have a cause) इसी तरह दो और दो मिलकर चार होते हैं (Two and two must be four) ये वाक्य विधि अनुसार निश्चयात्मक (necessary) हैं।

(ग) फिर इसी तरह उद्देश्य और विधेय का संबंध संदेहात्मक (may be) ‘सकना’ भी होता है। जैसे-राम यह काम कर सकता है – (Ram may do this work)। विधि के अनुसार इस प्रकार के वाक्य संदिग्धवाक्य कहे जाते हैं, जिसे अंग्रेजी में Problematic proposition कहते हैं।

‘अवश्य ही’ तथा ‘सकना’ अंग्रेजी का ‘must be and may be’ दोनों संयोजक के साथ ही मिला दिये जाते हैं और यह सत्य भी है। यहाँ may be and may not be संयोजक में ही गिने जाते हैं। परन्तु यह मत कुछ तार्किकों को मान्य नहीं है क्योंकि इसके अनुसार अनावश्यक परिश्रम ‘बढ़ जाता है। इसलिए विधि चिह्न को संयोजक के साथ रहना चाहिए, क्योंकि संयोजक द्वारा ही उद्देश्य और विधेय का संबंध व्यक्त किया जाता है।

इस तरह संयोजक के स्वभाव के संबंध में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संयोजक हमेशा ‘होगा’ क्रिया का कोई रूप (Any form of verb to be) होना चाहिए। जैसे – (is, is not, am, am not, are, are not) है, नहीं हैं, हूँ, नहीं हूँ, नहीं हैं। इसी तरह may be, may not be and must be, must not be (सकते हैं, नहीं सकते हैं तथा अवश्य ही, अवश्य ही नहीं) को भी संयोजक ही मानना उचित है।

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