Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 6 कार्य, ऊर्जा और शक्ति

Bihar Board Class 11 Physics कार्य, ऊर्जा और शक्ति Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 6.1
किसी वस्तु पर किसी बल द्वारा किए गए कार्य का चिह्न समझना महत्वपूर्ण है। सावधानीपूर्वक बताइए कि निम्नलिखित राशियाँ धनात्मक हैं या ऋणात्मक:

  1. किसी व्यक्ति द्वारा किसी कुएँ में से रस्सी से बँधी बाल्टी को रस्सी द्वारा बाहर निकालने में किया गया कार्य।
  2. उपर्युक्त स्थिति में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य।
  3. किसी आनत तल पर फिसलती हुई किसी वस्तु पर घर्षण द्वारा किया गया कार्य।
  4. किसी खुरदरे क्षैतिज तल पर एकसमान वेग से गतिमान किसी वस्तु पर लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य।
  5. किसी दोलायमान लोलक को विरामावस्था में लाने के लिए वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य।

उत्तर:

  1. चूँकि रस्सी का विस्थापन तथा मनुष्य द्वारा लगाया गया बल दोनों ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर दिष्ट हैं। अत: कार्य धनात्मक होगा।
  2. चूँकि गुरुत्वीय बल व बाल्टी का विस्थापन विपरीत दिशा में है। अतः गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।
  3. चूँकि घर्षण बल व बाल्टी का विस्थापन विपरीत दिशा में है। अतः घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।
  4. चूँकि वस्तु पर लगाया गया बल, वस्तु की गति की दिशा में है। अतः कृतं कार्य धनात्मक होगा।
  5. चूँकि वायु का प्रतिरोधी बल सदैव गति के विपरीत दिशा में है अत: कार्य ऋणात्मक होगा।

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प्रश्न 6.2
2 kg द्रव्यमान की कोई वस्तु जो आरंभ में विरामावस्था में है, 7N के किसी क्षैतिज बल के प्रभाव से एक मेज पर गति करती है। मेज का गतिज-घर्षण गुणांक 0.1 है। निम्नलिखित का परिकलन कीजिए और अपने परिणामों की व्याख्या कीजिए।
(a) लगाए गए बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(b) घर्षण द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(c) वस्तु पर कुल बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य।
(d) वस्तु की गतिज ऊर्जा में 10 s में परिवर्तन।
उत्तर:
दिया है:
बल, F = 7 न्यूटन,
m = 2 किग्रा, µ = 0, µk = 0.1
चूँकि गति क्षैतिज मेज पर हो रही है।
अतः घर्षण बल, µkR = µk mg
= 0.1 × 2 × 10 = 2 न्यूटन
अतः पिण्ड पर गति की दिशा में नेट बल,
F1 = F – µkN
= 7 – 2 = 5 न्यूटन
सूत्र F1 = ma से,
त्वरण,
a = \(\frac{F_{1}}{m}\) = \(\frac{5}{2}\)
= 2.5 मीटर/सेकण्ड2
अतः 10 सेकण्ड में चली दूरी,
सूत्र S = ut + \(\frac{1}{2}\) at2 से,
S = 0 × 10 + 1 × 2.5 × 102
= 125 मीटर

(a) आरोपित बल द्वारा 10 सेकण्ड में किया गया कार्य,
W1 = F.S cos 0°
= 7 × 125
= 875 जूल

(b) घर्षण बल द्वारा 10 सेकण्ड में किया गया कार्य,
W2 = -(µkR).S
= -2 × 25
= -250 जूल
चूँकि विस्थापन घर्षण बल के विरुद्ध है। इसी कारण यह कार्य ऋणात्मक है।

(c) सम्पूर्ण बल द्वारा कृत कार्य,
W = सम्पूर्ण बल × कुल विस्थापन
= 5 × 125
= 625 न्यूटन

(d) कार्य ऊर्जा प्रमेय से,
गतिज ऊर्जा में परिवर्तन,
∆K = सम्पूर्ण बल द्वारा किया गया कार्य
= 625 न्यूटन।
यहाँ गतिज ऊर्जा में कुल परिवर्तन बाह्य बल द्वारा किए गए कार्य से कम है। इसका कारण यह है कि बाह्य बल द्वारा किए गए कार्य का कुछ भाग घर्षण प्रभाव को समाप्त करने में कम होता है।

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प्रश्न 6.3
चित्र में कुछ एकविमीय स्थितिज ऊर्जा-फलनों के उदाहरण दिए गए हैं। कण की कुल ऊर्जा कोटि-अक्ष पर क्रॉस द्वारा निर्देशित की गई है। प्रत्येक स्थिति में, कोई ऐसे क्षेत्र बताइए, यदि कोई हैं तो जिनमें दी गई ऊर्जा के लिए, कण को नहीं पाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, कण की कुल न्यूनतम ऊर्जा भी निर्देशित कीजिए। कुछ ऐसे भौतिक सन्दर्भो के विषय में सोचिए जिनके लिए ये स्थितिज ऊर्जा आकृतियाँ प्रासंगिक हों।
उत्तर:
∵ KE + P.E. = E (constant)
∴ K.E. = E – P.E.

(a) इस ग्राफ में x < a के लिए स्थितिज ऊर्जा वक्र, दूरी अक्ष
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के साथ सम्पाती (P.E. = 0) जबकि x > a के लिए स्थितिज ऊर्जा कुल ऊर्जा से अधिक है; अतः गतिज ऊर्जा ऋणात्मक हो जाएगी जो कि असम्भव है।
अतः कण x > a क्षेत्र में नहीं पाया जा सकता।

(b) इस ग्राफ से स्पष्ट है कि प्रत्येक स्थान पर P.E. > E
अतः गतिज ऊर्जा ऋणात्मक होगी जो कि असम्भव है; अतः कण को कहीं भी नहीं पाया जा सकता।

(c) 0 < x < a तथा b < x क्षेत्रों में P.E. > E
अतः गतिज ऊर्जा ऋणात्मक होगी; अतः कण को इन क्षेत्रों में नहीं पाया जा सकता।

(d) –\(\frac{b}{2}\) < x < \(\frac{a}{2}\) तथा < x < \(\frac{b}{2}\) क्षेत्रों में P.E. > E;
अतः गतिज ऊर्जा ऋणात्मक होगी इसलिए कण इन क्षेत्रों में नहीं पाया जा सकता।

प्रश्न 6.4
रेखीय सरल आवर्त गति कर रहे किसी कण का स्थितिज ऊर्जा फलन V(x) = kx2/2 है, जहाँ k दोलक का बल नियतांक है। k = 0.5 Nm-1 के लिए V(x) व x के मध्य ग्राफ चित्र में दिखाया गया है। यह दिखाइए कि इस विभव के अंतर्गत गतिमान कुल 1J ऊर्जा वाले कण को अवश्य ही ‘वापिस आना’ चाहिए जब यह x = ± 2 m पर पहुँचता है।
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उत्तर:
हम जानते हैं कि,
E = KE + PE
∴ E = \(\frac{1}{2}\) mv2 + \(\frac{1}{2}\) kx2 [∵ PE = v(x) = \(\frac{k x^{2}}{2}\)]
कण उस स्थिति x = xm से लौटना शुरू करेगा जबकि कण की गतिज ऊर्जा शून्य होगी।
इस प्रकार, \(\frac{1}{2}\) mv2 = 0 तथा x = xm पर,
E = \(\frac{1}{2}\) kx2m
दिए है: E = 1 जूल व k = 0.5 न्यूटन/मीटर
∴ 1 = \(\frac{1}{2}\) × 0.5 × x2m
या \(x_{m}^{2}\) = \(\frac{2}{0.5}\) = 4
∴ xm = ± 2 मीटर
इस प्रकार कण x = ± 2 मीटर पर पहुँचने पर ही वहाँ से वापस लौटना प्रारम्भ करता है।

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प्रश्न 6.5
निम्नलिखित का उत्तर दीजिए:
(a) किसी रॉकेट का बाह्य आवरण उड़ान के दौरान घर्षण के कारण जल जाता है। जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा किसके व्यय पर प्राप्त की गई-रॉकेट या वातावरण?
(b) धूमकेतु सूर्य के चारों ओर बहुत ही दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में घूमते हैं। साधारणतया धूमकेतु पर सूर्य का गुरुत्वीय बल धूमकेतु के लंबवत् नहीं होता है। फिर भी धूमकेतु की संपूर्ण कक्षा में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है। क्यों?
(c) पृथ्वी के चारों ओर बहुत ही क्षीण वायुमण्डल में घूमते हुए किसी कृत्रिम उपग्रह की ऊर्जा धीरे-धीरे वायुमण्डलीय प्रतिरोध (चाहे यह कितना ही कम क्यों न हो) के विरुद्ध क्षय के कारण कम होती जाती है फिर भी जैसे-जैसे कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के समीप आता है तो उसकी चाल में लगातार वृद्धि क्यों होती है?
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(d) चित्र (i) में एक व्यक्ति अपने हाथों में 15 kg का कोई द्रव्यमान लेकर 2 m चलता है। चित्र (ii) में वह उतनी ही दूरी अपने पीछे रस्सी को खींचते हुए चलता है। रस्सी घिरनी पर चढ़ी हुई है और उसके दूसरे सिरे पर 15 kg का द्रव्यमान लटका हुआ है। परिकलन कीजिए कि किस स्थिति में किया गया कार्य अधिक है?
उत्तर:
(a) बाहरी आवरण के जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा रॉकेट की यान्त्रिक ऊर्जा से प्राप्त होती है।

(b) धूमकेतु पर सूर्य द्वारा लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल एक संरक्षी बल है। संरक्षी बल के द्वारा बन्द पथ में गति करने वाले पिण्ड पर किया गया नेट कार्य शून्य होता है। इस प्रकार धूमकेतु की सम्पूर्ण कक्षा में सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होगा।

(c) जैसे – 2 उपग्रह पृथ्वी के समीप आता है वैसे – 2 उसकी गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कम होती है। ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार गतिज ऊर्जा में वृद्धि होती रहती है। अतः उसकी चाल बढ़ती जाती है। कुल ऊर्जा का कुछ भाग घर्षण बल के विरुद्ध कार्य करने में खर्च हो जाता है।

(d) चित्र (i) में स्थिति में, व्यक्ति द्रव्यमान को उठाए रखने के लिए भार के विरुद्ध ऊपर की ओर बल लगाता है जबकि उसका विस्थापन क्षैतिज दिशा में है (i.e., θ = 90)
अतः मनुष्य द्वारा किया गया कार्य,
W = Fs cos 90° = 0
चित्र (ii) स्थिति में, घिरनी मनुष्य द्वारा लगाए गए क्षैतिज बल की दिशा को ऊर्ध्वाधर कर देती है व द्रव्यमान का विस्थापन भी ऊपर की ओर है (i. e., θ = 0°)
अत: मनुष्य द्वारा किया गया कार्य,
W = mgh cos 0°
= 15 × 20 × 1
= 300 जूल।

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प्रश्न 6.6
सही विकल्प को रेखांकित कीजिए:

  1. जब कोई संरक्षी बल किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य करता है तो वस्तु की स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है/घटती है/अपरिवर्ती रहती है।
  2. किसी वस्तु द्वारा घर्षण के विरुद्ध किए गए कार्य का परिणाम हमेशा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा में क्षय होता है।
  3. किसी बहुकण निकाय के कुल संवेग-परिवर्तन की दर निकाय के बाह्य बल/आंतरिक बलों के जोड़ के अनुक्रमानुपाती होती है।
  4. किन्हीं दो पिंडों के अप्रत्यास्थ संघट्ट में वे राशियाँ, जो संघट्ट के बाद नहीं बदलती हैं; निकाय की कुल गतिज ऊर्जा/कुल रेखीय संवेग/कुल ऊर्जा हैं।

उत्तर:

  1. घटती है, चूँकि संरक्षी बल के विरुद्ध किया गया कार्य ही स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है।
  2. गतिज ऊर्जा, चूँकि घर्षण के विरुद्ध कार्य तभी होता है जबकि गति हो रही है।
  3. बाह्य बल, चूँकि बहुकण निकाय में, आन्तरिक बलों का परिणामी शून्य होता है एवम् आन्तरिक बल संवेग परिवर्तन के लिए उत्तरदायी नहीं होते हैं।
  4. कुल रेखीय संवेग तथा कुल ऊर्जा भी जबकि दो पिंडों का निकास वियुक्त है।

प्रश्न 6.7
बतलाइए कि निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य। अपने उत्तर के लिए कारण भी दीजिए।

  1. किन्हीं दो पिंडों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, प्रत्येक पिंड का संवेग व ऊर्जा संरक्षित रहती है।
  2. किसी पिंड पर चाहे कोई भी आंतरिक व बाह्य बल क्यों न लग रहा हो, निकाय की कुल ऊर्जा सर्वदा संरक्षित रहती है।
  3. प्रकृति में प्रत्येक बल के लिए किसी बंद लूप में, किसी पिंड की गति में किया गया कार्य शून्य होता है।
  4. किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट में, किसी निकाय की अंतिम गतिज ऊर्जा, आरंभिक गतिज ऊर्जा से हमेशा कम होती है।

उत्तर:

  1. असत्य
  2. सत्य
  3. असत्य
  4. सत्य।

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प्रश्न 6.8
निम्नलिखित का उत्तर ध्यानपूर्वक, कारण सहित दीजिए:

  1. किन्हीं दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, क्या गेंदों के संघट्ट की अल्पावधि में (जब वे संपर्क में होती है) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है?
  2. दो गेंदों के किसी प्रत्यास्थ संघट्ट की लघु अवधि में क्या कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है?
  3. किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट के लिए प्रश्न (a) व (b) के लिए आपके उत्तर क्या हैं?
  4. यदि दो बिलियर्ड-गेंदों की स्थितिज ऊर्जा केवल उनके केंद्रों के मध्य, पृथक्करण-दूरी पर निर्भर करती है तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा या अप्रत्यास्थ? (ध्यान दीजिए कि यहाँ हम संघट्ट के दौरान बल के संगत स्थितिज ऊर्जा की बात कर रहे हैं, ना कि गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा की)

उत्तर:

  1. नहीं, चूँकि संघट्ट काल के दौरान गेंद सम्पीडित हो जाती है। अतः गतिज ऊर्जा, गेंदों की स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।
  2. हाँ, संवेग संरक्षित रहता है।
  3. हाँ, दोनों उत्तर उपर्युक्त ही रहेंगे।
  4. चूँकि स्थितिज ऊर्जा केन्द्रों के मध्य दूरी पर निर्भर करती है इसका तात्पर्य यह है कि संघट्ट काल में पिंडों के मध्य लगने वाला संरक्षी बल है। अतः ऊर्जा संरक्षित रहेगी। अतः प्रत्यास्थ संघट्ट होगा।

प्रश्न 6.9
कोई पिंड जो विरामावस्था में है, अचर त्वरण से एकविमीय गति करता है। इसको किसी समय पर दी गई शक्ति अनुक्रमानुपाती है –

  1. t1/2
  2. t
  3. t3/2
  4. t2

उत्तर:
a = नियत, µ = 0
∴ बल = ma, अचर होगा तथा = at होगा। ]
∴ शक्ति P = Fv = ma.at = ma2t
∴ P ∝ t
अतः विकल्प (ii) सत्य है।

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प्रश्न 6.10
एक पिंड अचर शक्ति के स्त्रोत के प्रभाव में एक ही दिशा में गतिमान है। इसका t समय में विस्थापन, अनुक्रमानुपाती है –

  1. t1/2
  2. t
  3. t3/2
  4. t2

उत्तर:
शक्ति P = Fv अचर है।
∴ P = (ma)
v = m.\(\frac{dv}{dt}\).v
या \(\frac{vdv}{dt}\) = \(\frac{p}{m}\)
या vdv = \(\frac{p}{m}\).dt
समाकलन करने पर, \(\frac{v^{2}}{2}\) = \(\frac{pt}{m}\) + c1
प्रारम्भ में, t = 0 पर v = 0
∴ a = 0
∴ \(\frac{v^{2}}{2}\) = \(\frac{p}{m}\).t
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समाकलन करने पर,
प्रारम्भ में, t = 0 पर s = 0
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अतः विकल्प (iii) सही है।

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प्रश्न 6.11
किसी पिंड पर नियत बल लगाकर उसे किसी निर्देशांक प्रणाली के अनुसार z – अक्ष के अनुदिश गति करने के लिए बाध्य किया गया है जो इस प्रकार है।
F = (-\(\hat { i } \) + 2\(\hat { j } \) + 3\(\hat { k } \))N
जहाँ \(\hat { i } \), \(\hat { j } \), \(\hat { k } \) क्रमशः x – , y – एवं z – अक्ष के अनुदिश एकांक सदिश हैं। इस वस्तु को 7 – अक्ष के अनुदिश 4m की दूरी तक गति कराने के लिए आरोपित बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
उत्तर:
दिया है:
\(\vec { F } \) = –\(\hat { i } \) + 2\(\hat { j } \) + 3\(\hat { k } \) न्यूटन
चूँकि विस्थापन z – अक्ष के अनुदिश है।
अतः \(\vec { s } \) = 4\(\hat { i } \) मीटर
∴ बल द्वारा किया गया कार्य, W = \(\bar{F}\). \(\hat { S } \)
= (-\(\hat { i } \) + 2\(\hat { j } \) + 3\(\hat { k } \).(4\(\hat { k } \))
= 12 जूल [∵\(\hat { j } \).\(\hat { k } \) = 0 व \(\hat { k } \).\(\hat { k } \) = 1 इत्यादि]

प्रश्न 6.12
किसी अंतरिक्ष किरण प्रयोग में एक इलेक्ट्रॉन और एक प्रोटॉन का संसूचन होता है जिसमें पहले कण की गतिज ऊर्जा 10 kev है और दूसरे कण की गतिज ऊर्जा 100 keV है। इनमें कौन-सा तीव्रगामी है, इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन? इनकी चालों का अनुपात ज्ञात कीजिए। (इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान = 9.11 × 10-31 kg, प्रोटॉन का द्रव्यमान = 1.67 × 10-27 kg, 1ev = 1.60 × 10-19 J)
उत्तर:
दिया है:
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान me = 9.11 × 10-31 किग्रा,
प्रोटॉन का द्रव्यमान mp = 1.67 × 10-27 किग्रा,
1eV = 1.6 × 10-19 जूल
प्रोटॉन की गतिज ऊर्जा,
Kp = 100 KeV = 105eV
= 105 × 1.6 × 10-19J
इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा
Ke = 10 keV = 104 eV
= 104 × 1.6 × 10-19J
माना कि प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन की चाल क्रमशः vp, व ve हैं।
सूत्र गतिज ऊर्जा, K = \(\frac{1}{2}\) mv2 से,
प्रोटॉन की गतिज ऊर्जा,
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इसी प्रकार,
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चूँकि ve > vp
अर्थात् इलेक्ट्रॉन तीव्रगामी है।
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प्रश्न 6.13
2 mm त्रिज्या की वर्षा की कोई बूंद 500 m की ऊँचाई से पृथ्वी पर गिरती है। यह अपनी आरंभिक ऊँचाई के आधे हिस्से तक (वायु के श्यान प्रतिरोध के कारण) घटते त्वरण के साथ गिरती है और अपनी अधिकतम (सीमान्त) चाल प्राप्त कर लेती है, और उसके बाद एकसमान चाल से गति करती है। वर्षा की बूंद पर उसकी यात्रा के पहले व दूसरे अर्ध भागों में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा? यदि बूंद की चाल पृथ्वी तक पहुँचने पर 10 ms-1 हो तो संपूर्ण यात्रा में प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
उत्तर:
दिया है:
वर्षा की बूंद की त्रिज्या, r = 2 मिमी
= 2 × 10-3 मीटर,
प्रारम्भिक ऊँचाईं, h = 500 मीटर
प्रारम्भिक चाल, u = 0
पृथ्वी तल पर बूंद की चाल, v = 10 मीटर/सेकण्ड
त्वरण, g = 9.8 मीटर/सेकण्ड2
जल का घनत्व ρ = 103 किग्रा प्रति मीटर3
बूंद का द्रव्यमान, m = (\(\frac{4}{3}\) πr3) × (ρ)
= \(\frac{4}{3}\) × \(\frac{22}{7}\) × (2 × 10-3)3 × 103
= 3.35 × 10-5 किग्रा
बूंद पर गुरुत्वीय बल,
F1 = mg = 3.35 × 10-5 × 9.8
= 3.28 × 10-4 न्यूटन
यात्रा के दोनों अर्धभाग समान हैं।
∴ h1 = h2 = \(\frac{h}{2}\) = 250 मीटर
यात्रा के इन भागों में गुरुत्वीय बल द्वारा कृत कार्य,
W1 = W2 = mgh1
= (3.28 × 10-4) × 250 = 0.082 जूल

वर्षा की बूँद की गतिज ऊर्जा में कुल वृद्धि,
∆K = K2 – K1
= \(\frac{1}{2}\) mv2 – \(\frac{1}{2}\) mu2
= \(\frac{1}{2}\) × 3.35 × 10-5 × (10)2 – 0
= 0.001 जूल

गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कुल कार्य,
Wg = W1 + W2
= 0.082 + 0.082
= 0.164 जूल

माना प्रतिरोधी बल द्वारा कुल कृत कार्य ωr है।
∴ नेट कार्य, W = Wg + Wr = ∆K (कार्य ऊर्जा प्रमेय से)
∴ ωr = ∆K – Wg
= 0.001 – 0.0164
= – 0.163 जूल

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प्रश्न 6.14
किसी गैस-पात्र में कोई अणु 200 ms-1 की चाल से अभिलंब के साथ 30° का कोण बनाता हुआ क्षैतिज दीवार से टकराकर पुनः उसी चाल से वापस लौट जाता है। क्या इस संघट्ट में संवेग संरक्षित है? यह संघट्ट प्रत्यास्थ है या अप्रत्यास्थ?
उत्तर:
दिया है:
θ = 30°, u = 200 मीटर प्रति सेकण्ड दीवार से संघट्ट के बाद चाल,
v = u = 200 मीटर प्रति सेकण्ड
चूँकि प्रत्येक संघट्ट में भी संवेग संरक्षित रहता है। अतः इस संघट्ट में भी संवेग संरक्षित रहता है।
माना अणु का द्रव्यमान m है।
अतः दीवार से टकराते समय निकाय की गतिज ऊर्जा,
K1 = \(\frac{1}{2}\) mu2 = \(\frac{1}{2}\) m (200)2 जूल
एवम् संघट्ट के बाद गतिज ऊर्जा,
K2 = \(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\) m (200)2 जूल
∴ K1 = K2
अतः यह एक प्रत्यास्थ संघट्ट है।

प्रश्न 6.15
किसी भवन के भूतल पर लगा कोई पंप 30 m3 आयतन की पानी की टंकी को 15 मिनट में भर देता है। यदि टंकी पृथ्वी तल से 40 m ऊपर हो और पंप की दक्षता 30% हो तो पंप द्वारा कितनी विद्युत शक्ति का उपयोग किया गया?
उत्तर:
दिया है:
टंकी की ऊँचाई, h = 40 मीटर
टंकी का आयतन, V = 30 मीटर3
लगा समय, t = 15 मिनट = 15 × 60 सेकण्ड, पम्प की दक्षता, η = 30%
जल का घनत्व, ρ = 103 किग्रा प्रति मीटर3
उठाए गए जल का द्रव्यमान,
m = V × ρ = 30 × 103
= 3 × 104 किग्रा
पम्प द्वारा टंकी भरने में खर्च की गई शक्ति,
P0 = \(\frac{W}{t}\) = \(\frac{mgh}{t}\)
= \(\frac{3 \times 10^{4} \times 9.8 \times 40}{1.5 \times 60}\) = 13066 वॉट
माना पम्प द्वारा उपयोग की गई शक्ति P1 है।
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= 43553 वॉट
= 43.55 किलो वॉट।

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प्रश्न 6.16
दो समरूपी बॉल बियरिंग एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं और किसी घर्षणरहित मेज पर विरामावस्था में हैं। इनके साथ समान द्रव्यमान का कोई दूसरा बाल बियरिंग, जो आरंभ में V चाल से गतिमान है, सम्मुख संघट्ट करता है। यदि संघट्ट प्रत्यास्थ है तो संघट्ट के पश्चात् निम्नलिखित (चित्र) में कौन-सा परिणाम संभव है?
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उत्तर:
माना प्रत्येक बॉल बियरिंग का द्रव्यमान m है।
अतः संघट्ट से पूर्व निकाय की गतिज ऊर्जा,
K1 = \(\frac{1}{2}\) mv2 + 0 + 0 = \(\frac{1}{2}\)mv2
प्रथम स्थिति में, संघट्ट के पश्चात् निकाय की गतिज ऊर्जा,
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अतः K1 > K2
द्वितीय स्थिति में, संघट्ट के पश्चात् निकाय की कुल ऊर्जा,
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अतः K1 = K2
तृतीय स्थिति में, संघट्ट के पश्चात् निकाय की गतिज ऊर्जा,
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प्रश्नानुसार संघट्ट प्रत्यास्थ है। अतः निकाय की गतिज ऊर्जा संरक्षित रहेगी। चूँकि केवल द्वितीय स्थिति में ही गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है अर्थात् केवल यही परिणाम सम्भव होगा।

प्रश्न 6.17
किसी लोलक के गोलक A को, जो ऊर्ध्वाधर से 30° का कोण बनाता है, छोड़े जाने पर मेज पर, विरामावस्था में रखे दूसरे गोलक B से टकराता है जैसा कि चित्र में प्रदर्शित है। ज्ञात कीजिए कि संघट्ट के पश्चात् गोलक A कितना ऊँचा उठता है? गोलकों के आकारों की उपेक्षा कीजिए और मान लीजिए कि संघट्ट प्रत्यास्थ है।
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उत्तर:
दोनों गोलक समरूप हैं तथा संघट्ट प्रत्यास्थ है; अतः संघट्ट के दौरान लटका हुआ गोलक अपना सम्पूर्ण संवेग नीचे रखे गोलक को दे देता है और जरा भी ऊपर नहीं उठता।

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प्रश्न 6.18
किसी लोलक के गोलक को क्षैतिज अवस्था से छोड़ा गया है। यदि लोलक की लंबाई 1.5 m है तो निम्नतम बिंदु पर, आने पर गोलक की चाल क्या होगी? यह दिया गया है कि इसकी आरंभिक ऊर्जा का 5% अंश वायु प्रतिरोध के विरुद्ध क्षय हो जाता है।
उत्तर:
निम्नतम बिन्दु P पर, लोलक में केवल स्थितिज ऊर्जा है। बिन्दु B पर, लोलक में केवल गतिज ऊर्जा है। इका अर्थ है कि जब लोलक P से Q पर पहुँचता है, तब स्थितिज ऊर्जा, गतिज ऊर्जा में परिवर्तित होती है।
अतः बिन्दु Q पर KE = PE
लेकिन 5% स्थितिज ऊर्जा, वायु प्रतिरोध के विरुद्ध क्षय हो जाती है।
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∴ Q पर गतिज ऊर्जा
= P पर स्थितिज ऊर्जा का 95% …… (1)
माना लोलक का द्रव्यमान = m
बिन्दु Q पर लोलक की चाल = v
तथा बिन्दु P की 0 के सापेक्ष ऊँचाई = h = 1.5 मीटर
∴ समी० (1) से,
\(\frac{1}{2}\)mv2 = \(\frac{95}{100}\) × mgh
अथवा
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= 5.29 मीटर/सेकण्ड
v = 5.3 मीटर।

प्रश्न 6.19
300 kg द्रव्यमान की कोई ट्राली, 25 kg रेत का बोरा लिए हुए किसी घर्षणरहित पथ पर 27 kmh-1 की एकसमान चाल से गतिमान है। कुछ समय पश्चात् बोरे में किसी छिद्र से रेत 0.05 kg s-1 की दर से निकलकर ट्राली के फर्श पर रिसने लगती है। रेत का बोरा खाली होने के पश्चात् ट्रॉली की चाल क्या होगी?
उत्तर:
चूँकि वेग एक समान है व ट्रॉली व रेत का बोरा एक ही निकाय के अंग हैं जिस पर कोई बाह्य बल नहीं लगा है अत: निकाय का रेखीय संवेग नियत रहेगा भले ही निकाय में किसी भी तरह का आन्तरिक परिवर्तन क्यों न हो जाए। इस प्रकार ट्रॉली की चाल 27 किमी प्रति घण्टा ही बनी रहेगी।

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प्रश्न 6.20
0.5 kg द्रव्यमान का एक कण y = ax3/2 वेग से सरल रेखीय गति करता है जहाँ a = 5 m-1/2s-1 है। x = 0 से x = 2m तक इसके विस्थापन में कुल बल द्वारा किया गया कार्य कितना होगा?
उत्तर:
दिया है:
m = 0.5 किग्रा
v = ax3/2
a = 5m-1/2 प्रति सेकण्ड
माना वस्तु पर F बल से a’ त्वरण उत्पन्न होता है।
∴ F = ma’ = \(\frac{mdv}{dt}\)
माना वस्तु को dx दूरी विस्थापित करने पर किया गया कार्य dw है।
∴ dw = F.dx = m\(\frac{dv}{dt}\).dx
= m.dv. \(\frac{dx}{dt}\) = mvdv ……………. (1)
माना वस्तु को x = 0 से x = 2 मीटर तक चलाने में किया गया कुल कार्य W है।
∴ समी० (1) से,
W = ∫dw = ∫mvdv
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= 50 जूल

प्रश्न 6.21
किसी पवनचक्की के ब्लेड, क्षेत्रफल A के वृत्त जितना क्षेत्रफल प्रसर्प करते हैं।
(a) यदि हवा वेग से वृत्त के लंबवत् दिशा में बहती है तो t समय में इससे गुजरने वाली वायु का द्रव्यमान क्या होगा?
(b) वायु की गतिज ऊर्जा क्या होगी?
(c) मान लीजिए कि पवनचक्की हवा की 25% ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित कर देती है यदि A = 30 m2, और v = 36 kmh-1 और वायु का घनत्व 1.2 kgm-3 है तो उत्पन्न विद्युत शक्ति का परिकलन कीजिए।
उत्तर:
दिया है:
वायु का घनत्व, ρ = 1.2 किग्रा प्रति मीटर3,
वायु का वेग, v = 36 किमी/घण्टा
= 36 × \(\frac{5}{8}\) = 10 मीटर/सेकण्ड
= 30 मीटर2, समय, t = ?

(a) t समय में वृत्त से प्रवाहित वायु का आयतन,
V = A × vt
वृत्त से प्रवाहित वायु का द्रव्यमान,
m = vp = Avtρ

(b) इस वायु की गतिज ऊर्जा,
K = \(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\) (Avtρ) v3
= \(\frac{1}{2}\)ρAv2t

(c) इस समय में पवन चक्की द्वारा उत्पन्न विद्युत ऊर्जा,
E = वायु की गतिज ऊर्जा का 25%
= (\(\frac{1}{2}\) Aρv3t) × \(\frac{25}{100}\) = \(\frac{1}{8}\) Aρv3t
अत: इस ऊर्जा द्वारा उत्पन्न विद्युत शक्ति,
P = \(\frac{E}{t}\)
= \(\frac{1}{8}\) Aρv3
= \(\frac{1}{8}\) × 30 × 1.2 × 103
= 4.5 विलोवॉट

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प्रश्न 6.22
कोई व्यक्ति वजन कम करने के लिए 10 kg द्रव्यमान को 0.5 m की ऊँचाई तक 1000 बार उठाता है। मान लीजिए कि प्रत्येक बार द्रव्यमान को नीचे लाने में खोई हुई ऊर्जा क्षयित हो जाती है।
(a) वह गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध कितना कार्य करता है?
(b) यदि वसा 3.8 × 107 J ऊर्जा प्रति किलोग्राम आपूर्ति करता हो जो कि 20% दक्षता की दर से यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है तो वह कितनी वसा खर्च कर डालेगा?
उत्तर:
दिया है:
m = 10 किग्रा,
h = 0.5 मीटर
द्रव्यमान को उठाया गया, n = 1000 बार
(a) 10 किग्रा के द्रव्यमान को 1000 बार उठाने में किया गया कार्य,
W = n × mgh
= 1000 × 10 × 9.8 × 0.5
= 49000
= 49 किलो जूल

(b) 1 किग्रा वसा द्वारा प्रदत्त यान्त्रिक ऊर्जा
= 3.8 × 107 जूल का 20%
= 3.8 × 107 × \(\frac{20}{100}\)
= \(\frac{3.8}{5}\) × 107 जूल
इसलिए (\(\frac{3.8}{5}\) × 107) जूल ऊर्जा मिलती है = 1 किग्रा वसा से,
∴ 1 जूल ऊर्जा मिलती है = \(\frac{5}{3.8 \times 10^{7}}\) किग्रा वसा से
∴ 49000 जूल ऊर्जा मिलती है,
= \(\frac{5}{3.8 \times 10^{7}}\) × 49000 किग्रा वसा से
= 6.45 × 10-3 किग्रा वसा से

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प्रश्न 6.23
कोई परिवार 8 kW विद्युत-शक्ति का उपभोग करता है।
(a) किसी क्षैतिज सतह पर सीधे आपतित होने वाली सौर ऊर्जा की औसत दर 200 Wm-2 है। यदि इस ऊर्जा का 20% भाग लाभदायक विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरित किया जा सकता है तो 8 KW की विद्युत आपूर्ति के लिए कितने क्षेत्रफल की आवश्यकता होगी?
(b) इस क्षेत्रफल की तुलना किसी विशिष्ट भवन की छत के क्षेत्रफल से कीजिए।
उत्तर:
दिया है:
उपभोग की गई विद्युत शक्ति = 8 KW
(a) सौर ऊर्जा की औसत दर = 200 वॉट/मीटर2
उपयोगी विद्युत ऊर्जा में रूपान्तरण दर = 20%
8 किलो वॉट के लिए आवश्यक क्षे० = ?
प्रति वर्ग मीटर क्षेत्रफल से प्राप्त उपयोगी विद्युत शक्ति
= 200 वॉट का 20%
= 200 × \(\frac{20}{100}\) = 40 वॉट
इसलिए 40 वॉट उपभोगी शक्ति प्राप्त होती है = 1 मी2 क्षेत्रफल से।
∴ 1 वॉट उपभोगी शक्ति प्राप्त होती है
= \(\frac{1}{40}\) क्षेत्रफल से
∴ 8 kw उपभोगी शक्ति प्राप्त होती है
= \(\frac{1}{40}\) × 8 × 1000 क्षेत्रफल से।
= 200 मीटर2 क्षेत्रफल से।

(b) इस क्षेत्रफल की तुलना जटिल घर की छत से करने के लिए माना छत की भुजा a है।
∴ छत का क्षेत्रफल = a × a2
a2 = 200
a = \(\sqrt{200}\) = 14.14 मीटर
= 14 मीटर
अर्थात् आवश्यक क्षेत्रफल 14 मीटर × 14 मीटर आकार के भवन की छत के क्षेत्रफल के समतुल्य है।

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अतिरिक्त अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 6.24
0.012 kg द्रव्यमान की कोई गोली 70 ms-1 की क्षैतिज चाल से चलते हुए 0.4 kg द्रव्यमान के लकड़ी के गुटके से टकराकर गुटके के सापेक्ष तुरंत ही विरामावस्था में आ जाती है। गुटके को छत से पतली तारों द्वारा लटकाया गया है। परिकलन कीजिए कि गुटका किस ऊँचाई तक ऊपर उठता है? गुटके में पैदा हुई ऊष्मा की मात्रा का भी अनुमान लगाइए।
उत्तर:
दिया है:
गोली का द्रव्यमान, m = 0.012 किग्रा,
गोली की प्रा० चाल, u = 70 मीटर/सेकण्ड
गोली की अन्तिम चाल v = 0
लकड़ी के गुटके का द्रव्यमान, m = 0.4 किग्रा
लकडी के गटके की प्रा० चाल, u1 = 0
माना कि संघट्ट के बाद गोली तथा गुटके की अन्तिम चाल v मीटर/सेकण्ड है।
संवेग संरक्षण के नियमानुसार,
संघट्ट से पूर्व गोली तथा गुटके का संवेग = संघट्ट के पश्चात् दोनों का अन्तिम संवेग।
∴ mu + mu1 = (m + m)v
∴ 0.012 × 70 + 0.4 × 0
= (0.012 + 0.4) y
∴ v = \(\frac{0.012×70}{0.412}\) = 2.04 मीटर/सेकण्ड
माना गुटका संघट्ट के बाद h ऊँचाई तक ऊपर उठता है।
∴ संघट्ट से पूर्व गुटके व गोली की KE में कमी = संघट्ट के बाद गुटके व गोली की P.E. में वृद्धि
∴ \(\frac{1}{2}\) (m + m) v2 = (m + m) gh
∴ h = \(\frac{v^{2}}{2 g}\) = \(\frac{2.04×2.04}{2×9.8}\)
= 0.212 मीटर
= 21.2 सेमी
गोली धंसने से उत्पन्न हुई ऊष्मा
= \(\frac{1}{2}\) mu2 – \(\frac{1}{2}\) (m + m) v2
= \(\frac{1}{2}\) × 0.012 × 702 – \(\frac{1}{2}\) × 0.412 × 2.042
= 28.54 जूल

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प्रश्न 6.25
दो घर्षण रहित आनत पथ, जिनमें से एक की ढाल अधिक है और दूसरे की ढाल कम है, बिंदु पर मिलते हैं। बिंदु A से प्रत्येक पथ पर एक-एक पत्थर को विरामावस्था से नीचे सरकाया जाता है (चित्र)। क्या ये पत्थर एक ही समय पर नीचे पहुँचेंगे? क्या वे वहाँ एक ही चाल से पहुँचेंगे? व्याख्या कीजिए। यदि θ1 = 30°, θ2 = 60° और h = 10m दिया है, तो दोनों पत्थरों की चाल एवं उनके द्वारा नीचे पहुँचने में लिए गए समय क्या हैं?
उत्तर:
AB तथा AC क्रमश: θ1, व θ2, पर झुके दो समतल तल हैं। दोनों पत्थर एक ही समय नीचे नहीं आएंगे।
व्याख्या: माना इन तलों पर इन पत्थरों के भार क्रमश: m1g
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व m2g हैं। m1g तथा m2g के वियोजित घटक चित्र के अनुसार होंगे।
माना पहले व दूसरे पत्थर में उत्पन्न त्वरण क्रमशः a1 व a2 हैं। तब
या ma1 = m1g sin θ1
a1 = g sin θ1
इसी प्रकार, a2 = g sin θ2
∴ a2 = g sin θ2
∴ a2 > a1 i.e., a1 = sin 30° = \(\frac{g}{2}\)
तथा a2 = g sin 60° = \(\frac{g \sqrt{3}}{2}\)
v = u + at v = ar
या t = \(\frac{v}{a}\) ………. (1)
यहाँ
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अर्थात् दूसरा पत्थर कम समय लेगा व पहले पत्थर पर | जल्दी नीचे पहुँचेगा।

हाँ, दानों पत्थर एक साथ नीचे पहुँचेंगे।
व्याख्या: बिन्दु A पर तल की ऊँचाई, h = 10 मीटर है।
माना दोनों पत्थर, क्रमश: v1 व v2 वेग से नीचे पहुंचते हैं।
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
चोटी पर स्थितिज ऊर्जा में क्षय = नीचे गतिज ऊर्जा में वृद्धि
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प्रश्न 6.26
किसी रुक्ष आनत तल पर रखा हुआ 1 kg द्रव्यमान का गुटका किसी 100 Nm-1 स्प्रिंग नियतांक वाले स्प्रिंग से दिए गए चित्र के अनुसार जुड़ा है। गुटके को स्प्रिंग की बिना खिंची स्थिति में, विरामावस्था से छोड़ा जाता है। गुटका विरामावस्था में आने से पहले आनत तल पर 10 cm नीचे खिसक जाता है। गुटके और आनत तल के मध्य घर्षण गुणांक ज्ञात कीजिए। मान लीजिए कि स्प्रिंग का द्रव्यमान उपेक्षणीय है और घिरनी घर्षणरहित है।
उत्तर:
दिया है:
गुटके का द्रव्यमान, m = 1 किग्रा
स्प्रिंग नियतांक, K = 100 न्यूटन/मीटर,
g = 10 मीटर/सेकण्ड2
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माना गुटके को छोड़ने पर विस्थापन,
x = 10 सेमी = 0.1 मीटर
झुकाव, θ = 37°
∴ sin 37° = 0.6018 व cos 37° = 0.7996
माना नीचे की ओर x दूरी चलने में किया गया कार्य है।
∴ W = (mg sin θ – u mg cosθ)x …………. (1)
लेकिन स्प्रिंग में यह कार्य स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित रहेगा।
∴ PE = \(\frac{1}{2}\) Kx2 ……. (2)
समी० (1) व (2) से,
\(\frac{1}{2}\) Kx2 = mg (sinθ – µcos θ).x
= µmg cosθ = – \(\frac{1}{2}\) kx = mg sinθ
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= 0.125

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प्रश्न 6.27
0.3 kg द्रव्यमान का कोई बोल्ट 7 ms-1 की एकसमान चाल से नीचे आ रही किसी लिफ्ट की छत से गिरता है। यह लिफ्ट के फर्श से टकराता है (लिफ्ट की लंबाई = 3 m) और वापस नहीं लौटता है। टक्कर द्वारा कितनी ऊष्मा उत्पन्न हुई? यदि लिफ्ट स्थिर होती तो क्या आपका उत्तर इससे भिन्न होता?
उत्तर:
दिया है: बोल्ट का द्रव्यमान, m = -0.3 किग्रा
लिफ्ट की लम्बाई, h = 3 मीटर
छत पर बोल्ट की स्थितिज ऊर्जा, v = mgh
= 0.3 × 9.8 × 3
= 8.82 जूल
चूँकि बोल्ट लिफ्ट के फर्श से टकराकर बिल्कुल भी ऊपर नहीं उठता है, इसका तात्पर्य है कि फर्श से टकराने पर बोल्ट की सम्पूर्ण स्थितिज ऊर्जा, ऊष्मा में बदल जाती है। अत: बोल्ट के फर्श से टकराने पर उत्पन्न ऊष्मा 8.82 जूल है। लिफ्ट के स्थिर होने पर, यह एक जड़त्वीय निर्देश तन्त्र होता है। चूँकि गुरुत्वीय त्वरण का मान सभी स्थानों पर एक समान होता है अर्थात् हमारा उत्तर समान होगा।

प्रश्न 6.28
200 kg द्रव्यमान की कोई ट्रॉली किसी घर्षणरहित पथ पर 36 km h-1 की एकसमान चाल से गतिमान है। 20 kg द्रव्यमान का कोई बच्चा ट्रॉली के एक सिरे से दूसरे सिरे तक (10 m दूर) ट्रॉली के सापेक्ष 4 ms-1 की चाल से ट्रॉली की गति की विपरीत दिशा में दौड़ता है और ट्रॉली से बाहर कूद जाता है। ट्रॉली की अंतिम चाल क्या है? बच्चे के दौड़ना आरंभ करने के समय से ट्रॉली ने कितनी दूरी तय की?
उत्तर:
दिया है:
ट्रॉली का द्रव्यमान, m1 = 200 किग्रा, ट्रॉली की चाल u = 36 किमी प्रति घण्टा
= 36 × \(\frac{5}{18}\) = 10 मी/से
बच्चे का द्रव्यमान m2 = 20 किग्रा
बच्चे की ट्रॉली के सापेक्ष चाल, v2 = 4 मीटर/सेकण्ड
माना ट्रॉली की अन्तिम चाल v1 है
∴ बच्चे के दौड़ना प्रारम्भ करने से पूर्व निकाय का संवेग,
Pi = (m1 + m2) u1
= (200 + 20) × 10 = 2200 किग्रा मीटर/सेकण्ड
बच्चे के ट्रॉली से कूदते समय निकाय का संवेग,
P1 = m1 v1 + m2 (v1 – v2)
= 200v1 + 20 (v1 – 4)
= 220v1 – 80
परन्तु संवेग संरक्षण के नियमानुसार, Pi = Pf
2200 = 220v1 – 80
या 220v1 = 2280
∴ v1 = \(\frac{2280}{220}\) = 10.36 मीटर/सेकण्ड
ट्रॉली में 10 मीटर की दूरी चलने में बच्चे द्वारा लिया गया समय,
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= \(\frac{10}{4}\) = 2.5 सेकण्ड
माना इस समय में ट्राली द्वारा चली गई दूरी x है।
∴ x = v × t = 10.36 × 2.5
= 25.9 मीटर।

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प्रश्न 6.29
चित्र में दिए गए स्थितिज ऊर्जा वक्रों में से कौन-सा वक्र सम्भवतः दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट का वर्णन नहीं करेगा? यहाँr गेंदों के केन्द्रों के मध्य की दूरी है और प्रत्येक गेंद का अर्धव्यास R है।
उत्तर:
जब गेंदें संघट्ट करेंगी और एक – दूसरे को संपीडित करेंगी तो उनके केन्द्रों के बीच की दूरी 7, 2R से घटती जाएगी और इनकी स्थितिज ऊर्जा बढ़ती जाएगी। प्रत्यानयन काल में गेंदें अपने आकार को वापस पाने की क्रिया में एक-दूसरे से दूर हटेंगी तो उनकी स्थितिज ऊर्जा घटेगी और प्रारम्भिक आकार पूर्णतः प्राप्त कर लेने पर (r = 2R) स्थितिज ऊर्जा शून्य हो जाएगी।
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केवल ग्राफ (V) की ही उपर्युक्त व्याख्या हो सकती है; अतः अन्य ग्राफों में से कोई भी बिलियर्ड गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट को प्रदर्शित नहीं करता है।

प्रश्न 6.30
विरामावस्था में किसी मुक्त न्यूट्रॉन के क्षय पर विचार कीजिए –
n → p + e
प्रदर्शित कीजिए कि इस प्रकार के द्विपिंड क्षय से नियत ऊर्जा का कोई इलेक्ट्रॉन अवश्य उत्सर्जित होना चाहिए, और इसलिए यह किसी न्यूट्रॉन या किसी नाभिक के β – क्षय में प्रेक्षित सतत ऊर्जा वितरण का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता (चित्र)।
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[नोट: इस अभ्यास का हल उन कई तर्कों में से एक है जिन्हें डब्ल्यू पॉली द्वारा क्षय के क्षय उत्पादों में किसी तीसरे कण के अस्तित्व का पूर्वानुमान करने के लिए दिया गया था। यह कण न्यूट्रिनो के नाम से जाना जाता है। अब हम जानते हैं कि यह निजी प्रचक्रण 1/2 (जैसे e, p तथा n) का कोई कण है। लेकिन यह उदासीन है या द्रव्यमानरहित या (इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान की तुलना में) इसका द्रव्यमान अत्यधिक कम है और जो द्रव्य के साथ दुर्बलता से परस्पर क्रिया करता है। न्यूट्रॉन की उचित क्षय-प्रक्रिया इस प्रकार है:
n → p + e + v]
उत्तर:
माना न्यूट्रॉन के प्रोट्रॉन तथा इलेक्ट्रॉन में क्षय होने पर अवनमन (disintegration) द्रव्यमान ∆m है।
उत्सर्जित ऊर्जा, E = ∆mc2
परन्तु ∆m = न्यूट्रॉन का द्रव्यमान – (प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान)
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पाजिट्रॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान के समान परन्तु आवेश इलेक्ट्रॉन का विपरीत होता है। जब इलेक्ट्रॉन तथा पाजिट्रॉन एक दूसरे के समीप आते हैं तो वे एक दूसरे को समाप्त कर देते हैं। इसके द्रव्यमान आइन्सटीन के समीकरण के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार प्राप्त ऊर्जा गामा किरणों के रूप में उत्सर्जित होती है जो कि निम्नवत् है –
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Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 1 भौतिक जगत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Physics भौतिक जगत Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.1
विज्ञान की प्रकृति से संबंधित कुछ अत्यंत पारंगत प्रकथन आज तक के महानतम वैज्ञानिकों में से एक अल्बर्ट आइंस्टाइन द्वारा प्रदान किए गए हैं। आपके विचार से आइंस्टाइन का उस समय क्या तात्पर्य था, जब उन्होंने कहा था “संसार के बारे में सबसे अधिक अबोधगम्य विषय यह है कि यह बोधगम्य है’?
उत्तर:
ब्रह्माण्ड अत्यन्त जटिल है एवं इसमें होने वाली घटनाएँ भी बहुत जटिल हैं लेकिन विज्ञान के अनेक नियम ऐसे हैं जो इन सभी घटनाओं की व्याख्या पूर्णत: करते हैं। अतः जब प्रथम बार कोई घटना देखते या सुनते हैं तब वह अबोधगम्य होती है लेकिन जब हम उस घटना से जुड़े सिद्धान्त नियम इत्यादि का गहन विश्लेषण करते हैं तो वह घटना हमारे लिए बोधगम्य हो जाती है।

इस प्रकार भौतिक जगत से जुड़े प्रत्येक तथ्य की सुस्पष्ट व्याख्या विज्ञान विषय में उपलब्ध है। जब कभी भी हम किसी तथ्य से जुड़े वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जानना चाहते हैं तो हम उसे जान लेते हैं। इसी कारण जटिलतम परिघटना भी हमारे लिए आश्चर्यजनक नहीं होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आइंसटाइन का कथन तर्क संगत है।

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प्रश्न 1.2
“प्रत्येक महान भौतिक सिद्धान्त अपसिद्धांत से आरंभ होकर धर्मसिद्धांत के रूप में समाप्त होता है”। इस तीक्ष्ण टिप्पणी की वैधता के लिए विज्ञान के इतिहास से कुछ उदाहरण लिखिए।
उत्तर:
अपसिद्धान्त ऐसे तथ्य हैं जो स्थापित नहीं होते हैं जबकि धर्म सिद्धान्त से अर्थ स्थापित विचार हैं जिन पर सामान्यत: कोई प्रश्न नहीं उठता है। जैसे-प्रकाश-वैद्युत नियम प्रारम्भ में एक अपसिद्धान्त के रूप में आया था लेकिन अन्तत: यह एक धर्म सिद्धान्त के रूप में परिवर्तित हो गया था।

प्रश्न 1.3
“संभव की कला ही राजनीति है”। इसी प्रकार “समाधान की कला ही विज्ञान है”। विज्ञान की प्रकृति तथा व्यवहार पर इस सुन्दर सूक्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सभी राजनीतिज्ञ, चाहे वे दुनिया के किसी भी भाग से सम्बन्धित हों, हमेशा कुछ भी कहने को तैयार रहते हैं। राजनीतिज्ञों के अनुसार, प्रत्येक कार्य, घटना इत्यादि सभी कुछ सम्भव है एवम् इसके पीछे जो कारण है वह सिर्फ उनके शब्दों का जाल होता है। इसी कला से वे जनता में अपनी प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। अर्थात् राजनीति सम्भव की कला है। जो कार्य किसी भी तरह होना सम्भव न हो उसे भी राजनीतिज्ञ अपनी बात के माध्यम से सम्भव बना सकते हैं।

हालांकि विज्ञान में ऐसा नहीं होता है। विज्ञान में प्रश्न का तार्किक उत्तर उपलब्ध है जिसकी जाँच बार-बार की जा सकती है। उदाहरण के लिए विज्ञान कहता है कि प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है, तो इसका कारण एवम् इसकी जाँच हम कभी भी और कितनी ही बार कर सकते हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक अध्ययन के बाद असम्भव एवम् जटिल प्रक्रियाओं को भी बोधगम्य कर सकते हैं। अर्थात् हम कह सकते हैं कि विज्ञान समाधान की कला है जबकि राजनीति सम्भव की कला है।

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प्रश्न 1.4
यद्यपि अब भारत में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का विस्तृत आधार है तथा यह तीव्रता से फैल भी रहा है, परन्तु फिर भी इसे विज्ञान के क्षेत्र में विश्व नेता बनने की अपनी क्षमता को कार्यान्वित करने में काफी दूरी तय करनी है। ऐसे कुछ महत्वपूर्ण कारक लिखिए जो आपके विचार से भारत में विज्ञान के विकास में बाधक रहे हैं?
उत्तर:
भारत में विज्ञान के विकास में बाधा उत्पन्न करने वाले कुछ महत्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं –

  1. हमारे देश में वैज्ञानिकों को लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए शैक्षणिक स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं है।
  2. विदेशों में वैज्ञानिकों, इन्जीनियों, डॉक्टर्स इत्यादि का देशान्तर भ्रमण, क्योंकि विदेशों में उन्हें उत्कृष्ट सुविधाएँ, वेतन इत्यादि प्राप्त हो जाते हैं जबकि हमारे देश में इन सुविधाओं एवम् उच्च वेतन का प्राप्त करना आज भी सम्भव नहीं है।
  3. हमारे देश में अनुसन्धान एवम् तकनीक के प्रबन्धन में प्रशासनिक हस्तक्षेप की अधिकता भी विज्ञान के विकास में बाधा है।
  4. हमारे देश में अनुसन्धानकर्ताओं एवम् उद्यमियों के मध्य सामंजस्य स्थापित नहीं है।

प्रश्न 1.5
किसी भी भौतिक विज्ञानी ने इलेक्ट्रॉन के कभी भी दर्शन नहीं किए हैं। परन्तु फिर भी सभी भौतिक विज्ञानियों का इलेक्ट्रॉन के अस्तित्व में विश्वास है। कोई बुद्धिमान परन्तु अंधविश्वासी व्यक्ति इसी तुल्यरूपता को इस तर्क के साथ आगे बढ़ाता है कि यद्यपि किसी ने ‘देखा’ नहीं है परन्तु ‘भूतों’ का अस्तित्व है। आप इस तर्क का खंडन किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
किसी भी भौतिक विज्ञानियों ने इलेक्ट्रॉन के कभी दर्शन नहीं किए हैं, परन्तु फिर भी सभी भौतिक विज्ञानियों का इलेक्ट्रॉन के अस्तित्व में विश्वास है। इसका मुख्य कारण है कि इस कण के अस्तित्व के पक्ष में बहुत-से प्रमाण उपलब्ध हैं; जैसे विद्युत धारा का प्रवाह, अणुओं की विभिन्न आकृतियों एवम् आकारों का होना, विभिन्न रासायनिक यौगिकों में ध्रुवणता होना, क्षम का होना इत्यादि। जबकि भूतों का कोई भी भौतिक प्रभाव नहीं होता है, जिसे प्रायोगिक रूप से सत्यापित कर सके। अतः हम कह सकते हैं कि इन दोनों की पारस्परिक तुलना एक निरर्थक कार्य है।

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प्रश्न 1.6
जापान के एक विशेष समुद्र तटीय क्षेत्र में पाए जाने वाले केकड़े के कवचों (खोल) में से अधिकांश समुरई के अनुश्रुत चेहरे से मिलते जुलते प्रतीत होते हैं। नीचे इस प्रेक्षित तथ्य की दो व्याख्याएँ दी गई हैं। इनमें से आपको कौन-सा वैज्ञानिक स्पष्टीकरण लगता है?

1. कई शताब्दियों पूर्व किसी भयानक समुद्री दुर्घटना में एक युवा समुरई डूब गया। उसकी बहादुरी के लिए श्रद्धांजलि के रूप में प्रकृति ने अबोधगम्य ढंगों द्वारा उसके चेहरे को केकड़े के कवचों पर अंकित करके उसे उस क्षेत्र में अमर बना दिया।

2. समुद्री दुर्घटना के पश्चात् उस क्षेत्र के मछुआरे अपने मृत नेता के सम्मान में सद्भावना प्रदर्शन के लिए उस हर केकड़े के कवच को जिसकी आकृति संयोगवश समुरई से मिलती-जुलती प्रतीत होती थी, उसे वापस समुद्र में फेंक देते थे। परिणामस्वरूप केकड़े के कवचों की इस प्रकार की विशेष आकृतियाँ अधिक समय तक विद्यमान रहीं और इसीलिए कालान्तर में इसी आकृति का आनुवंशत: जनन हुआ।

यह कृत्रिम वरण द्वारा विकास का एक उदाहरण है। (नोट : यह रोचक उदाहरण कार्ल सागन की पुस्तक “दि कॉस्मॉस” से लिया गया है। यह इस तथ्य पर प्रकाश डालता है कि प्रायः विलक्षण तथा अबोधगम्य तथ्य जो प्रथम दृष्टि में अलौकिक प्रतीत होते हैं वास्तव में साधारण वैज्ञानिक व्याख्याओं द्वारा स्पष्ट होने योग्य बन जाते हैं। इसी प्रकार के अन्य उदाहरणों पर विचार कीजिए)
उत्तर:

  1. दिए गये प्रश्न में दोनों कथनों में से कथन है।
  2. प्रेक्षित तथ्य का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देने में पर्याप्त रूप में समर्थ है।

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प्रश्न 1.7
दो शताब्दियों से भी अधिक समय पूर्व इंग्लैण्ड तथा पश्चिमी यूरोप में जो औद्योगिक क्रांति हुई थी उसकी चिंगारी का कारण कुछ प्रमुख वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक उपलब्धियाँ थीं। ये उपलब्धियाँ क्या थीं?
उत्तर:
सन् 1750 से अर्थात् औद्योगिक क्रान्ति से पूर्व, कुछ सरल यन्त्र एवं मशीनें ही प्रचलन में थीं, जिनके कार्य करने की दर काफी कम एवम् उत्पादित माल का स्तर काफी खराब था लेकिन औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप कुछ नवीन मशीनों का विकास हुआ जिनके द्वारा उत्पादन लागत में कमी आई एवम् वैमार माल की उत्कृष्टता में उन्नति हुई।
औद्योगिक क्रान्ति की प्रमुख वैज्ञानिक एवम् प्रौद्योगिकीय उपलब्धियाँ निम्नवत् हैं –

  1. स्पिनिंग गेनी (Spinning Genny): सन् 1764 में हारग्रीव्ज ने इस मशीन का आविष्कार किया। इससे कटाई-कार्य में तेजी आई।
  2. भाप इंजन (Steam Engine): सन् 1769 में जेम्सवॉट ने इसका आविष्कार किया। इसकी सहायता से औद्योगिक इकाइयों को देश के भीतरी भागों में समुद्री किनारों से दूर स्थान प्राप्त हो सका था।
  3. पावरलूम (Powerloom): सन् 1785 में कार्ल-राइट ने इसका आविष्कार किया। यह माप शक्ति चालित मशीन है। इसे चलाकर कपड़ों की बुनाई का कार्य किया जाता था।
  4. विस्फोटक पदार्थ की खोज से ना सिर्फ आर्मी में सहायता मिली बल्कि इससे खनिज विस्फोट में भी सहायता मिली है।

प्रश्न 1.8
प्रायः यह कहा जाता है कि संसार अब दूसरी औद्योगिकी क्रांति के दौर से गुजर रहा है, जो समाज में पहली क्रांति की भाँति आमूल परिवर्तन ला देगी। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के उन प्रमुख समकालीन क्षेत्रों की सूची बनाइए जो इस क्रांति के लिए उत्तरदायी हैं।
उत्तर:
विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के उन प्रमुख समकालीन क्षेत्रों की सूची निम्नवत् है जो इस क्रांति के लिए उत्तरदायी हैं, जो समाज में पहली क्रांति की भाँति आकूल परिवर्तन ला देगी –

  1. जैव प्रौद्योगिकी
  2. सुपर कम्प्यूटर
  3. सूचना प्रौद्योगिकी
  4. विद्युत दुर्बल बल के सिद्धान्त का विकास
  5. प्रकाशिक तन्तु।

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प्रश्न 1.9
बाईसवीं शताब्दी के विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पर अपनी निराधार कल्पनाओं को आधार मानकर लगभग 1000 शब्दों में कोई कथा लिखिए।
उत्तर:
माना कि एक हवाई जहाज 500 प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारे की ओर गतिमान है। माना यह हवाई जहाज विद्युत मोटर जिसमें अतिचालक तार लगा है, में संचित धारा से चलता है। ब्रह्माण्ड में, माना कि एक क्षेत्र ऐसा है जहाँ इतना अधिक ताप है, जिस कारण मोटर के विद्युत तारों का अतिचालक गुण नष्ट हो जाता है। इस स्थिति में, एक अन्य हवाई जहाज जिसमें द्रव्य तथा अद्रव्य भरा है, पहले हवाई जहाज को चलाता है जिस कारण यह तारे की ओर गतिमान रहता है।

प्रश्न 1.10
‘विज्ञान के व्यवहार’ पर अपने ‘नैतिक दृष्टिकोणों’ को रचने का प्रयास कीजिए। कल्पना कीजिए कि आप स्वयं किसी संयोगवश ऐसी खोज में लगे हैं जो शैक्षिक दृष्टि से सेचक है परन्तु उसके परिणाम निश्चित रूप से मानव समाज के लिए भयंकर होने के अतिरिक्त कुछ नहीं होंगे। फिर भी यदि ऐसा है तो आप इस दुविधा के हल के लिए क्या करेंगे?
उत्तर:
प्रत्येक वैज्ञानिक खोज, प्रकृति के रहस्यों को प्रदर्शित करती है एवम् इन रहस्यों के सत्य को समाज के सामने रखता है। सत्य एक सापेक्षिक पद है। सत्य का प्रदर्शन इस प्रकार होना चाहिए कि कोई भी खोज जो मानव समाज के नैतिक मूल्यों को हानि पहुँचा सकती हो, उसे एकदम रोक देना चाहिए। जैव-प्रौद्योगिकी मानव-कल्याण हेतु बहुत उपयोगी है लेकिन जीवित प्राणियों की क्लोनिंग नीति-असंगत है। इस अनुसंधान को आगे बढ़ाने से पूर्व हमें समाज के सामने यह तथ्य रखना चाहिए कि क्या यह अनुसन्धान जारी रखना मानव के लिए भयंकर तो नहीं है। यदि ऐसा है तो अनुसन्धान को एकदम से रोक देना चाहिए।

इसके अलावा कोई खोज आज भयंकर हो लेकिन भविष्य में यह लाभप्रद सिद्ध हो सकती है। इसके लिए, सबसे पहले यह जरूरी है कि वैज्ञानिक खोज के गलत प्रयोग के सम्बन्ध में लोक विचार लेने चाहिए। यह सार्थक कदम किसी वैज्ञानिक खोज के गलत प्रयोग को रोक सकता है। अतः उन वैज्ञानिक खोजों जो समाज के नैतिक मूल्यों के लिए भयंकर साबित हो सकती हैं, को समाज की अच्छाई के लिए रोक देना चाहिए।

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प्रश्न 1.11
किसी भी ज्ञान की भाँति विज्ञान का उपयोग भी, उपयोग करने वाले पर निर्भर करते हुए, अच्छा अथवा बुरा हो सकता है। नीचे विज्ञान के कुछ अनुप्रयोग दिए गए हैं। विशेषकर कौन-सा अनुप्रयोग अच्छा है, बुरा है अथवा ऐसा है कि जिसे स्पष्ट रूप से वर्गबद्ध नहीं किया जा सकता। इसके बारे में अपने दृष्टिकोणों को सूचीबद्ध कीजिए –

  1. आम जनता को चेचक के टीके लगाकर इस रोग को दबाना और अन्ततः इस रोग से जनता को मुक्ति दिलाना। (भारत में इसे पहले ही प्रतिपादित किया जा चुका है।)
  2. निरक्षरता का विनाश करने तथा समाचारों एवं धारणाओं के जनसंचार के लिए टेलीविजन।
  3. जन्म से पूर्व लिंग-निर्धारण।
  4. कार्यदक्षता में वृद्धि के लिए कम्प्यूटर।
  5. पृथ्वी के परितः कक्षाओं में मानव-निर्मित उपग्रहों की स्थापना।
  6. नाभिकीय शस्त्रों का विकास।
  7. रासायनिक तथा जैव-युद्ध की नवीन तथा शक्तिशाली तकनीकों का विकास।
  8. पीने के लिए जल का शोधन।
  9. प्लास्टिक शल्य क्रिया।
  10. क्लोनिंग।

उत्तर:

  1. अच्छा
  2. अच्छा
  3. बुरा
  4. अच्छा
  5. अच्छा
  6. बुरा
  7. बुरा
  8. अच्छा
  9. अच्छा
  10. इसे स्पष्ट रूप से वर्गबद्ध नहीं किया जा सकता।

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प्रश्न 1.12
भारत में गणित, खगोलिकी, भाषा विज्ञान, तर्क तथा नैतिकता में महान विद्वत्ता की एक लंबी एवं अटूट परम्परा रही है। फिर भी इसके साथ एवं समान्तर, हमारे समाज में बहत-से अंधविश्वासी तथा रूढ़िवादी दृष्टिकोण व परम्पराएँ फली-फूली हैं और दुर्भाग्यवश ऐसा अभी भी हो रहा है और बहुत-से शिक्षित लोगों में व्याप्त हैं। इन दृष्टिकोणों का विरोध करने के लिए अपनी रणनीति बनाने में आप अपने विज्ञान के ज्ञान का उपयोग किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
हमारे देश में समाज में व्याप्त अन्धविश्वासी एवम् रूढ़िवादी दृष्टिकोण व परम्पराएँ दूर करने के लिए रणनीति बनाने में विज्ञान के ज्ञान का उपयोग निम्नवत् रूप में किया जा सकता है –
(a) स्थानीय स्तर पर जनता को आपसी बातचीत, सभाओं, क्लबों इत्यादि के माध्यम से गलत एवम् असत्य विश्वासों को दूर करने के लिए जानकारियों का प्रचार करना लाभदायक होगा।

(b) छात्रों को दी जाने वाली विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम में दैनिक जीवन से जुड़े अनुभवों की स्पष्ट व्याख्या देने वाली पाठ्य सामग्री का समावेश अति आवश्यक है अर्थात् शिक्षा की दैनिक जीवन में व्यक्त विभिन्न घटनाओं की व्याख्या देने में समर्थ होना चाहिए। इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य तर्कसंगत हो जाएगा एवम् वह भविष्य में भी लाभदायक सिद्ध होगी।

(c) इन्जीनियर्स, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, एवम् डॉक्टर्स इत्यादि द्वारा विभिन्न परिघटनाओं के सही-सही कारणों एवम् अन्धविश्वासों व गलत धारणाओं को समाप्त करने के लिए प्रदान की गई जानकारियों के अलग-अलग कार्यक्रमों द्वारा शहरी व ग्रामीण जनता के सामने प्रस्तुत करना लाभदायक होगा।

(d) समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन, इण्टरनेट इत्यादि माध्यमों द्वारा लोगों में व्याप्त अपूर्ण ज्ञान, भ्रान्तियों, रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास इत्यादि को समाप्त करने में किया जाना एक हितकारी प्रयास है। इस कार्य के लिए विभिन्न कार्यक्रमों जैसेनाटकों, क्विज, विचार-गोष्ठियों, वर्कशॉप, समर स्कूल, विन्टर-स्कूल आदि का आयोजन कर संकेत दें।

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प्रश्न 1.13
यद्यपि भारत में स्त्री तथा पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त हैं, फिर भी बहुत-से लोग महिलाओं की स्वाभाविक प्रकृति, क्षमता, बुद्धिमत्ता के बारे में अवैज्ञानिक विचार रखते हैं तथा व्यवहार में उन्हें गौण महत्व तथा भूमिका देते हैं। वैज्ञानिक तर्कों तथा विज्ञान एवं अन्य क्षेत्रों में महान महिलाओं का उदाहरण देकर इन विचारों को धराशायी करिए, तथा अपने को स्वयं, तथा दूसरों को भी समझाइए कि समान अवसर दिए जाने पर महिलाएँ पुरुषों के समकक्ष होती हैं।
उत्तर:
प्राकृतिक रूप से स्त्री तथा पुरुषों में कुछ अन्तर अवश्य होते हैं। परन्तु जिम्मेदारी निभाने, कार्य करने, बुद्धिमत्ता तथा सोच समझने में स्त्री व पुरुष में कोई अन्तर नहीं होता है। जन्म से पूर्व एवम् जन्म के पश्चात् आहार के पोषक तत्वों का एक बड़ा भाग मानव मस्तिष्क के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करता है। यह मस्तिष्क स्त्री अथवा पुरुष किसी का भी हो सकता है। जब हम स्त्रियों के प्राचीन इतिहास एवम् वर्तमान स्थिति का अध्ययन करें तो हम देखते हैं कि स्त्रियों की स्थिति हमेशा से ही सम्मानजनक .रही है एवम् उन्होंने अनेक उत्कृष्ट कार्य किए हैं। ये स्त्रियाँ हर कार्य करने में सक्षम हैं एवम् किसी भी रूप में पुरुषों से कम नहीं है।

जब कभी भी स्त्रियों को अवसर मिलता है चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। महर्षि अत्रि की पत्नी सती अनुसूइया, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी कर्मवती, नूरजहाँ, मैडम क्यूरी, सरोजिनी नायडू, कल्पना चावला, प्रिंसेज डायना, मार्गेट थ्रेचर, इन्दिरा गाँधी, श्रीमती भण्डानाइके, श्रीमती चन्द्रिका कुमार तुंगे, बछेन्द्री पाल इत्यादि अनेक नाम स्त्रियों के स्वर्णिम इतिहास का उल्लेख करते हैं।

आजकल सानिया मिर्जा का नाम भी शीर्षस्थ स्थान पर है। इसका तात्पर्य है कि इन स्त्रियों को अवसर मिलने पर, इन्होंने अपनी अपूर्व क्षमता का परिचय दिया। आज हमारे देश में रक्षा सेवाओं के द्वार भी स्त्रियों के लिए खुले हुए हैं। इस क्षेत्र में भी स्त्रियों ने अपनी कार्यदक्षता सिद्ध की है। अतः हम कह सकते हैं कि समान अवसर दिए जाने पर महिलाएँ भी पुरुषों के समकक्ष परिणाम देती हैं।

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प्रश्न 1.14
“भौतिकी के समीकरणों में सुन्दरता होना उनका प्रयोगों के साथ सहमत होने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।” यह मत महान ब्रिटिश वैज्ञानिक पी० ए० एम० डिरैक का था। इस दृष्टिकोण की समीक्षा कीजिए। इस पुस्तक में ऐसे संबंधों तथा समीकरणों को खोजिए जो आपको सुन्दर लगते हैं।
उत्तर:
डिरैक के कथन में कोई विसंगति नहीं है। भौतिकी में एक समीकरण जो प्रयोगों के साथ सहमत है, उसे निश्चित ही सरल एवम् बोधगम्य होना चाहिए। यही उसकी सुन्दरता की कसौटी है। इसका तात्पर्य है कि जो समीकरण सरल एवम् समझने योग्य होगी, वह सुन्दर मानी जाएगी। जैसे आइन्सटीन की द्रव्यमान ऊर्जा समतुल्यता समीकरण E = mc2, द्रव्यमान के ऊर्जा तथा ऊर्जा के द्रव्यमान में स्थानान्तरण को समझाती है। यह समीकरण सरल एवम् समझने योग्य है। अर्थात् यह एक सुन्दर समीकरण है।

प्रश्न 1.15
यद्यपि उपरोक्त प्रकथन विवादास्पद हो सकता है, परन्तु अधिकांश भौतिक विज्ञानियों का यह मत है कि भौतिकी के महान नियम एक ही साथ सरल एवं सुन्दर होते हैं। डिरैक के अतिरिक्त जिन सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानियों ने ऐसा अनुभव किया, उनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं : आइंस्टाइन, बोर, हाइसेनबर्ग, चन्द्रशेखर तथा फाइनमैन। आपसे अनुरोध है कि आप भौतिकी के इन विद्वानों तथा अन्य महानायकों द्वारा रचित सामान्य पुस्तकों एवं लेखों तक पहुँचने के लिए विशेष प्रयास अवश्य करें। (इस पुस्तक के अंत में दी गई ग्रंथ-सूची देखिए)। इनके लेख सचमुच प्रेरक हैं।
उत्तर:
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प्रश्न 1.16
विज्ञान की पाठ्य पुस्तकें आपके मन में यह गलत धारणा उत्पन्न कर सकती हैं कि विज्ञान पढ़ना शुष्क तथा. पूर्णत: अत्यंत गंभीर हैं एवं वैज्ञानिक भुलक्कड़, अंतर्मुखी, कभी न हँसने वाले अथवा खीसे निकालने वाले व्यक्ति होते हैं। विज्ञान तथा वैज्ञानिकों का यह चित्रण पूर्णतः आधारहीन है। अन्य समुदाय के मनुष्यों की भाँति वैज्ञानिक भी विनोदी होते हैं तथा बहुत-से वैज्ञानिकों ने तो अपने वैज्ञानिक कार्यों को गंभीरता से पूरा करते हुए अत्यंत विनोदी प्रकृति तथा साहसिक कार्य करके अपना जीवन व्यतीत किया है। गैमो तथा फाइनमैन इसी शैली के दो भौतिक विज्ञानी हैं। ग्रंथ सूची में इनके द्वारा रचित पुस्तकों को पढ़ने में आपको आनन्द प्राप्त होगा।
उत्तर:
गैमो एवं फाइन द्वारा रचित पुस्तक निम्नलिखित हैं –

  • गैमो द्वारा रचित ‘Mr Tompkins in paperback : Cambridge Universing Press (1987)”
  • फाइनमैन द्वारा रचित “Surely you are joing : Mr. Reynman, Bantan Books (1986)”

उपरोक्त पुस्तकों के पढ़ने पर ज्ञात होता है कि वैज्ञानिक भी अन्य मनुष्यों की भाँति ही विनोदी होते हैं। इनके अलावा सी० वी० रमन, होमी जे० भाभा, भी विनोदी स्वभाव के भौतिकवादी रहे हैं। हमारे देश के कुछ नेता जैसे – मुरली मनोहर जोशी, वी० पी० सिंह इत्यादि भी भौतिकविद् रहे हैं।

Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 15 तरंगें

Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 15 तरंगें Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Physics तरंगें Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उतर

प्रश्न 15.1
2.50 kg द्रव्यमान की 20 cm लंबी तानित डोरी पर 200 N बल का तनाव है। यदि इस डोरी के एक सिरे को अनुप्रस्थ झटका दिया जाए तो उत्पन्न विक्षोभ कितने समय में दूसरे सिरे तक पहुँचेगा?
उत्तर:
दिया है:
तनाव T = 200 N, डोरी की लम्बाई, l – 20 मी,
डोरी का द्रव्यमान M = 2.50 kg
∴ डोरी का द्रव्यमान प्रति एकांक लम्बाई
m = \(\frac{M}{l}\) = \(\frac{2.50}{20.0}\) = 0.125 kg m-1
हम जानते हैं कि अनुप्रस्थ तरंगों का वेग,
v = \(\sqrt{\frac{T}{m}}\) = \(\sqrt{\frac{200}{0.125}}\) = 40 ms-1
माना अनुप्रस्थ तरंगों द्वारा एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने में लिया गया समय t है।
∴ सूत्र t = डोरी की ल०/डोरी का वेग,
∴ t = \(\frac{1}{v}\) = \(\frac{20}{40}\) = 0.5 s

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प्रश्न 15.2
300 m ऊँची मीनार के शीर्ष से गिराया गया पत्थर मीनार के आधार पर बने तालाब के पानी से टकराता है। यदि वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 है तो पत्थर के टकराने की ध्वनि मीनार के शीर्ष पर पत्थर गिराने के कितनी देर बाद सुनाई देगी? (g = 9.8 ms-2)
उत्तर:
दिया है:
पत्थर का प्रारम्भिक वेग u = 0
त्वरण a = g = 9.8 मीटर/से०2
मीनार की ऊँचाई h = 300 m,
वायु में ध्वनि की चाल v = 340 ms-1
माना t1 = पत्थर द्वारा गिरने में लिया गया समय
व t2 = ध्वनि द्वारा मीनार के आधार से शीर्ष तक पहुँचने में लिया गया समय
माना t = शीर्ष पर ध्वनि सुनाई देने का समय है।
अतः t = t1 + t2 …………….. (i)
गति के समी० से
s = ut + \(\frac{1}{2}\) at2
दिया है: s = h, u = 0, a = g, t = t1
∴ h = 0 + \(\frac{1}{2}\) gt12
या t1 = \(\sqrt{\frac{2h}{g}}\)
या t1 = \(\sqrt{\frac{2 \times 300}{9.8}}\) = 7.82 s …………………. (ii)
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∴ समी० (i), (ii) व (iii) से,
t = 7.82 + 0.88 = 8.7s

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प्रश्न 15.3
12.0 m लंबे स्टील के तार का द्रव्यमान 2.10 kg है। तार में तनाव कितना होना चाहिए ताकि उस तार पर किसी अनुप्रस्थ तरंग की चाल 20°C पर शुष्क वायु में ध्वनि की चाल (343 ms-1) के बराबर हो।
उत्तर:
दिया है:
l = 12 मीटर, M = 2.10 किग्रा
माना कि तार में तनाव = T
तथा तार की द्रव्यमान प्रति एकांक लम्बाई m है।
∴ m = \(\frac{M_{s}}{l}\) = \(\frac{2.10}{12}\)
= 0.175 किग्रा प्रति मीटर
तार में अनुप्रस्थ तरंग की चाल = 20°C
शुष्क वायु में ध्वनि की चाल = 343 मीटर/सेकण्ड
हम जानते हैं कि तार में अनुप्रस्थ तरंग की चाल
v = \(\sqrt{\frac{T}{m}}\)
या v2 = \(\frac{T}{m}\)
∴ T = mv2 = 0.175 × (343)2
= 20588.6 किग्रा मीटर/सेकण्डर
= 2.06 × 104 न्यूटन।

प्रश्न 15.4
सूत्र v = \(\sqrt{\frac{\gamma P}{\rho}}\) का उपयोग करके स्पष्ट कीजिए कि वायु में ध्वनि की चाल क्यों –
(a) दाब पर निर्भर नहीं करती
(b) ताप के साथ बढ़ जाती है, तथा
(c) आर्द्रता के साथ बढ़ जाती है?
उत्तर:
(a) वायु में ध्वनि की चाल पर दाब का प्रभाव-वायु में ध्वनि की चाल सूत्र v = \(\sqrt{\frac{v P}{d}}\) से प्रतीत होता है कि दाब P के बदलने पर ध्वनि की चाल (y) का मान भी बदल जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है। माना कि परमताप T पर किसी गैस के 1 ग्राम-अणु द्रव्यमान का आयतन V व दाब P है। माना कि गैस का अणुभार तथा घनत्व क्रमश: M व d है।
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∴ गैस का आयतन, PV = RT से
\(\frac{pm}{d}\) = RT
या \(\frac{P}{d}\) = \(\frac{RT}{m}\) = (ताप के नियत होने पर)
अतः ताप (T) के नियत रहने पर, यदि दाब P का मान बदलेगा तब उसके साथ घनत्व (d) का मान भी बदलेगा लेकिन P/d का मान नियत रहेगा। इससे ध्वनि की चाल का मान समान रहेगा।
अतः वायु या गैस का ताप नियत रहे तो ध्वनि की चाल पर दाब परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

(b) वायु में ध्वनि की चाल पर ताप का प्रभाव – किसी गैस के लिए P/d का मान गैस के ताप पर निर्भर करता है। किसी गैस को गर्म करने पर,
(i) ताप बढ़ने पर यदि गैस फैलने के लिए स्वतन्त्र है, तो उसका घनत्व कम हो जाता है। जिससे P/d का मान बढ़ेगा।
(ii) यदि गैस किसी.बर्तन में बंद है तो उसका घनत्व (d) वही रहेगा लेकिन दाब बढ़ जायेगा जिससे P/d का मान बढ़ेगा।
अर्थात गैस का ताप बढ़ने पर उसमें ध्वनि की चाल बढ़ती है। जब किसी गैस के एक ग्राम अणु, घनत्व व आयतन क्रमश: M, d व v है तब V = \(\frac{m}{d}\)
यदि गैस का दाब P व परमताप T हो तो गैस समीकरण PV = RT से,
\(\frac{PM}{d}\) = RT
या \(\frac{P}{m}\) = \(\frac{RT}{m}\)
∴ गैस में ध्वनि की चाल v = \(\sqrt{\frac{V P}{d}}\)
= \(\sqrt{\frac{\gamma R T}{M}}\)
अतः किसी गैस में ध्वनि की चाल उसके परमताप के वर्गमूल के समानुपाती होती है।
∴ v ∝ \(\sqrt{T}\)

(c) वायु में ध्वनि की चाल पर आवृत्ति का प्रभाव – आर्द्र वायु का घनत्व शुष्क वायु के घनत्व की तुलना में कम होता है। अतः आर्द्र वायु में ध्वनि की चाल शुष्क वायु की तुलना में बढ़ जाती है।

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प्रश्न 15.5
आपने यह सीखा है कि एक विमा में कोई प्रगामी तरंग फलन y = f(x,t) द्वारा निरूपित की जाती है जिसमें x तथा t को x – vt अथवा x + vt अर्थात् y = f(x ± vt) संयोजन में प्रकट होना चाहिए। क्या इसका प्रतिलोम भी सत्य है? नीचे दिए गए y के प्रत्येक फलन का परीक्षण करके यह बताइए कि वह किसी प्रगामी तरंग को निरूपित कर सकता है:
(a) (x – vt)2
(b) log (x + vt) x0
(c) 1/(x + vt)
उत्तर:
इसका विलोम असत्य है। चूंकि किसी प्रगामी तरंग के स्वीकार करने योग्य फलन के लिए एक प्रत्यक्ष आवश्यकता यह है कि यह हर समय व हर स्थान पर परिमित होनी चाहिए। दिए गए फलनों में से सिर्फ फलन (c) ही इस प्रतिबन्ध को सन्तुष्ट करता है। शेष फलन सम्भवतया किसी प्रगामी तरंग को व्यक्त नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 15.6
कोई चमगादड़ वायु में 1000 kHz आवृत्ति की पराश्रव्य ध्वनि उत्सर्जित करता है। यदि यह ध्वनि जल के पृष्ठ से टकराती है, तो (a) परावर्तित ध्वनि तथा (b) पारगमित ध्वनि की तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए। वायु तथा जल में ध्वनि की चाल क्रमशः 340 ms-1 तथा 1486 ms-1 है।
उत्तर:
दिया है:
v = 1000 kHz =106 Hz
वायु में ध्वनि की चाल v1 = 340 ms-1
व जल में ध्वनि की चाल v2 = 1486 ms-1
सूत्र, λ = \(\frac{v}{v}\) से

(a) परावर्तित ध्वनि की तरंगदैर्ध्य
λ1 = \(\frac{v_{1}}{v}=\frac{340}{10^{6}}\)
= 0.34 मिमी

(b) जल में तरंग की तरंगदैर्ध्य
λ2 = \(\frac{v_{2}}{v}=\frac{1486}{10^{6}}\)
= 0.149 सेमी।

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प्रश्न 15.7
किसी अस्पताल में ऊतकों में ट्यूमरों का पता लगाने के लिए पराश्रव्य स्कैनर का प्रयोग किया जाता है। उस ऊतक में ध्वनि की तरंगदैर्ध्य कितनी है जिसमें ध्वनि की चाल 1.7 kms-1 है? स्कैनर की प्रचालन आवृत्ति 4.2 MHz है।
उत्तर:
दिया है:
आवृत्ति v = 4.2 MHz = 4.2 × 106 Hz
चाल v = 1.7 kms-1
= 1700 मीटर/सेकण्ड
सूत्र तरंगदैर्ध्य λ = \(\frac{v}{v}\) से,
ध्वनि की तरंगदैर्ध्य,
λ = \(\frac{1700}{4.2 \times 10^{6}}\)
= 0.405 मिमी।

प्रश्न 15.8
किसी डोरी पर कोई अनुप्रस्थ गुणावृत्ति तरंग का वर्णन
y(x, t) = 3.0 sin (36t + 0.018x + π/4)
द्वारा किया जाता है। यहाँ x तथा y सेंटीमीटर में तथा t सेकण्ड में है।x की धनात्मक दिशा बाएँ से दाएँ है।
(a) क्या यह प्रगामी तरंग है अथवा अप्रगामी? यदि यह प्रगामी तरंग है तो इसकी चाल तथा संचरण की दिशा क्या है?
(b) इसका आयाम तथा आवृत्ति क्या है?
(c) उद्गम के समय इसकी आरंभिक कला क्या है?
(d) इस तरंग में दो क्रमागत शिखरों के बीच की न्यूनतम दूरी क्या है?
उत्तर:
दी हुई अनुप्रस्थ गुणावृत्ति तरंग का समीकरण है –
y(x, t) = 3.0 sin (36t + 0.018x + \(\frac{π}{4}\)) ………………….. (iv)
संचरित तरंग का सामान्य समीकरण निम्न है –
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(a) समी० (i) व (ii) की तुलना करने पर स्पष्ट है कि समी० (i) संचरित तरंग को व्यक्त करती है।
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समी० (iii) तथा (iv) की गुणा करने पर,
2πvλ = \(\frac{2 \pi \times 26}{0.018}\)
vλ = – 2000
v = – 2000 cms-1 = -20 ms-1
जहाँ v = vλ तरंग का वेग है। यहाँ ऋणात्मक चिह्न प्रदर्शित करता है कि तरंग बाएँ से दायीं ओर चलती है।
∴ वेग = 20 s-1

(b) A = 3.0 cm = 3.0 × 10-2 m
\(\frac{2π}{T}\) = 36
v = \(\frac{36}{2π}\) = \(\frac{36}{2×3.14}\) = 5.73 Hz

(c) प्रारम्भिक कला ϕ = \(\frac{π}{4}\) Frad

(d) तरंग में दो गर्मों के बीच न्यूनतम दूरी = तरंगदैर्ध्य
= λ = \(\frac{2π}{0.018}\)
= \(\frac{2×3.14}{0.018}\) = 348.9 cm
= 3.489 m
3.49 m = 3.5 m

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प्रश्न 15.9
प्रश्न 15.8 में वर्णित तरंग के लिए x = 0 cm, 2 cm तथा 4 cm के लिए विस्थापन (y) और समय (1) के बीच ग्राफ आलेखित कीजिए। इन ग्राफों की आकृति क्या है? आयाम, आवृत्ति अथवा कला में से किन पहलुओं में प्रगामी तरंग में दोलनी गति एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर भिन्न है?
उत्तर:
दी हुई तरंग समीकरण है –
y (x, t) = 3.0 sin (36t + 0.018x + \(\frac{π}{4}\)) ………….. (i)
माना x = 0, 2 व 4 सेमी के लिए तरंग के विस्थापन क्रमशः y1, y2 व y3 हैं।
∴ y1 = (0, t) = 3.0 sin (36t + \(\frac{π}{4}\)) …………….. (ii)
y2 (2, t) = 3.0 sin (36t + 0.036 + \(\frac{π}{4}\)) ……………………. (iii)
तथा y3 (4, t) = 3.0 sin (36t + 0.072 + \(\frac{π}{4}\)) ………………….. (iv)
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समी० (ii), (iii) व (iv) से स्पष्ट है कि ये वक्र ज्यावक्रीय हैं। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। तरंग संचरण में दोलनी गति, एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक केवल कला में भिन्न है, जैसा कि क्रमशः (ii), (iii) व (iv) से दिखाया गया है। इन तरंगों के आयाम व आवृत्ति क्रमश: 3 सेमी० व \(\frac{36}{2π}\) s-1 समान हैं।

प्रश्न 15.10
प्रगामी गुणावृत्ति तरंग
y (x, t) = 2.0 cos 2π (10t – 0.0080x + 0.35)
जिसमें x तथा y को m में तथा कोs में लिया गया है, के लिए उन दो दोलनी बिन्दुओं के बीच कलांतर कितना है जिनके बीच की दूरी है –
(a) 4m
(b) 0.5 m
(c) λ/2
(d) \(\frac{3λ}{4}\)
उत्तर:
दी हुई प्रगामी गुणावृत्ति तरंग का समीकरण निम्न है –
y(x, t) = 2.0 cos 2π (10t – 0.0080x + 0.35) ……………… (i)
अतः संचरित गुणावृत्ति तरंग की सामान्य समीकरण निम्न है –
y(x, t) = A cos \(\left[\frac{2 \pi}{T} t-\frac{2 \pi}{\lambda} x+\phi_{0}\right]\) ………………….. (ii)
समी० (i) व (ii) की तुलना से
\(\frac{2π}{λ}\) = 2π × 0.0080 cm-1 …………………. (iii)
\(\frac{2π}{T}\) = 2π × 10
ϕ0 = 0.35
हम जानते हैं कि कलान्तर = \(\frac{2π}{λ}\) × पथान्तर ……………..(iv)

(a) पथान्तर = 4m = 400m, (iv) से,
समी० (iv) से, कलान्तर = \(\frac{2π}{λ}\) × 400
= 2π × 0.0080 × 40 [समी० (iii) से]
= 6.41π rad

(b) पथान्तर = 0.5 m = 50 cm पर
कलान्तर = 2π × 0.0080 × 50
= 0.8π rad

(c) पथान्तर = \(\frac{π}{2}\) पर,
कलान्तर = \(\frac{2π}{λ}\) × \(\frac{λ}{2}\) = π radian पर

(d) पथान्तर = \(\frac{3λ}{4}\) पर,
कलान्तर = \(\frac{2π}{λ}\) × \(\frac{3λ}{4}\)
= \(\frac{3π}{2}\) rad = (π + \(\frac{π}{2}\))
∴ cos (π + θ) = – cos θ
प्रभावी कलान्तर = \(\frac{π}{2}\)

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प्रश्न 15.11
दोनों सिरों पर परिबद्ध किसी तानित डोरी पर अनुप्रस्थ विस्थापन को इस प्रकार व्यक्त किया गया है –
y (x, t) = 0.06 sin (\(\frac{2π}{3}\) x) cos (120 πt)
जिसमें x तथा y को m तथाt को s में लिया गया है। इसमें डोरी की लम्बाई 1.5 m है जिसकी संहति 3.0 × 10-2 kg है। निम्नलिखित का उत्तर दीजिए:
(a) यह फलन प्रगामी तरंग अथवा अप्रगामी तरंग में से किसे निरूपित करता है?
(b) इसकी व्याख्या विपरीत दिशाओं में गमन करती दो तरंगों के अध्यारोपण के रूप में करते हुए प्रत्येक तरंग की तरंगदैर्ध्य, आवृत्ति तथा चाल ज्ञात कीजिए।
(c) डोरी में तनाव ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया हुआ फलन है –
y (x, t) = 0.06 sin (\(\frac{2πx}{3}\)) cos (120 πt) …………….. (i)
संचरित तरंग को निम्न रूप में व्यक्त कर सकते हैं –
y (x, t) = A sin \(\frac{2π}{λ}\) (vt – x) ………………. (ii)
तथा प्रगामी तरंग निम्न रूप में व्यक्त कर सकते हैं –
y (x, t) = -2A sin (\(\frac{2πx}{λ}\)) cos (\(\frac{2πvt}{λ}\)) …………….. (iii)

(a) चूँकि दिया गया फलन प्रगामी तरंग की भाँति है। अतः दिया गया फलन प्रगामी तरंग को व्यक्त करता है।
(b) हम जानते हैं कि यदि तरंग
y1 = A sin \(\frac{2π}{λ}\) (vt + x)
x – अक्ष की धनात्मक दिशा में संचरित होती है, तो यह तरंग निम्न परावर्तित तरंग द्वारा अध्यारोपित होती है।
y2 = -A sin \(\frac{2π}{λ}\) (vt + x)
अतः अध्यारोपण सिद्धांत से, y = y1 + y2
= – 2A sin (\(\frac{2π}{λ}\) x) cos (\(\frac{2π}{λ}\) vt) ……………………. (iii)
समीकरण (i) तथा (ii) की तुलना करने पर,
= \(\frac{2π}{λ}\) = \(\frac{2π}{3}\) 0r λ = 3 m
\(\frac{2π}{λ}\) v = 120π
या v = 60λ = 60 × 3 = 180 ms-1
∴ आवृत्ति v = \(\frac{v}{λ}\) = \(\frac{180}{3}\) = 60 Hz
अनुप्रस्थ तरंग का वेग
v = \(\sqrt{\frac{T}{m}}\) or v2 = \(\frac{T}{m}\)
∴ T = v2 × m ………………… (iv)
दिया है:
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(c) माना डोरी में तनाव T है।
∴ समीकरण (iv) व (v) से,
T = (180)2 × (2 × 10-2)
= 32400 × 2 × 10-2
= 648 N

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प्रश्न 15.12
(i) प्रश्न 15.11 में वर्णित डोरी पर तरंग के लिए बताइए कि क्या डोरी के सभी बिन्दु समान (a) आवृत्ति, (b) कला, (c) आयाम से कंपन करते हैं? अपने उत्तरों को स्पष्ट कीजिए।
(ii) एक सिरे से 0.375 m दूर के बिन्दु का आयाम कितना हैं।
उत्ता:
(a) डोरी के समस्त बिन्दु समान आवृत्ति से कंपन करते हैं।
(b) चूंकि λ = 3 मीटर व डोरी की लम्बाई, l = 1.5 मीटर = \(\frac{1}{2}\)
अर्थात् डोरी को दोनों सिरों पर निस्पंद व मध्य में एक प्रस्पंद बनेगा।
चूँकि अप्रगामी तरंगों में दो क्रमागत निस्पंदों के मध्य के सभी बिन्दु समान कला में कम्पन करते हैं। अतः डोरी के सभी बिन्दु समान कला में कम्पन करेंगे।

(c) दी गई समीकरण निम्न है –
y (x, t) = 0.06 sin (\(\frac{2π}{3}\) x)
इस समीकरण का आयाम,
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प्रश्न 15.13
नीचे किसी प्रत्यास्थ तरंग (अनुप्रस्थ अथवा अनुदैर्ध्य) के विस्थापन को निरूपित करने वाले x तथा t के फलन दिए गए हैं। यह बताइए कि इनमें से कौन (i) प्रगामी तरंग को, (ii) अप्रगामी तरंग को, (iii) इनमें से किसी भी तरंग को निरूपित नहीं करता है –

  1. y = 2 cos (3x) sin 10t
  2. y = 2\(\sqrt{x-vt}\)
  3. y = 3 sin (5x – 0.5t)+4 cos (5x – 0.5t)
  4. y = cos x sin t + cos 2x sin 2t

उत्तर:

  1. महत्व फलन अप्रगामी तरंग को व्यक्त करता है।
  2. किसी भी तरंग के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं है।
  3. प्रगामी गुणावृत्ति तरंग को प्रदर्शित करता है।
  4. दो प्रगामी तरंगों के अध्यारोपण प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 15.14
दो दृढ़ टेकों के बीच तानित तार अपनी मूल विधा में 45 H2 आवृत्ति से कंपन करता है। इस तार का द्रव्यमान 3.5 × 10-2 kg तथा रैखिक द्रव्यमान घनत्व 4.0 × 10-2 kg m-1 है।
(a) तार पर अनुप्रस्थ तरंग की चाल क्या है, तथा
(b) तार में तनाव कितना है?
उत्तर:
दिया है:
m = 3.5 × 10-2 kg
रैखिक द्रव्यमान घनत्व µ = 4 × 10-2 kg m-1
सूत्र µ = \(\frac{m}{l}\) से,
तार की लम्बाई l = \(\frac{m}{µ}\)
= \(\frac{3.5 \times 10^{-2}}{4 \times 10^{-2}}\) = \(\frac{7}{8}\) मीटर
माना तार में उत्पन्न तरंग की तरंगदैर्ध्य λ है।
चूँकि तार मूल विधा में कम्पन कर रहा है। अतः \(\frac{λ}{2}\) = l
∴ λ = 2l = \(\frac{7}{4}\) मीटर
सूत्र v = vλ से,
तार में तरंग की चाल
v = 45 × \(\frac{7}{4}\) = 79 ms-1
माना कि तार का तनाव t है।
∴ v = \(\sqrt{\frac{T}{\mu}}\)
∴ T = v2µ = (79)2 × 10-2
= 248 न्यूटन

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प्रश्न 15.15
एक सिरे पर खुली तथा दूसरे सिरे पर चलायमान पिस्टन लगी 1 m लंबी नलिका, किसी नियत आवृत्ति के स्त्रोत (340 Hz आवृत्ति का स्वरित्र द्विभुज) के साथ, जब नलिका में वायु कॉलम 25.5 cm अथवा 79.3 cm होता है तब अनुनाद दर्शाती है। प्रयोगशाला के ताप पर वायु में ध्वनि की चाल का आंकलन कीजिए। कोर-प्रभाव को नगण्य मान सकते हैं।
उत्तर:
नलिका में पिस्टन लगाने से यह बंद आर्गन नलिका की भाँति व्यवहार करेगा। माना बंद नलिका में nवें तथा (n + 1) वें कम्पन के लिए अनुनादित वायु स्तम्भों की लम्बाइयाँ l1 व l2 हैं।
∴ l1 = 25.5 सेमी
l2 = 79.3 सेमी
माना ध्वनि तरंग का वेग v है। अतः इन कम्पनों के लिए आवृत्ति v1 व v2 निम्नवत् होगी –
v1 = (2n – 1) \(\frac{v}{4 l_{1}}\) ……………… (i)
तथा v2 = [2(n + 1) – 1] \(\frac{v}{4 l_{2}}\) ……………………. (ii)
दोनों विधाओं में 340 Hz की आवृत्ति से अनुनाद होगा।
∴ v1 = v2 = 340
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या 3(2n – 1) = 2n +1
या 6n – 3 = 2n + 1
या 6n – 2n = 3 + 1
4n = 4
∴ n = 1
समी० (2n – 1) \(\frac{v}{4 l_{2}}\) = 340 में n = 1 रखने पर
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या v = 340 × 4 × 25.5
या v = 340 × 102
= 34680 cms-1
= 346.8 ms-1
= 347 ms-1

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प्रश्न 15.16
100 cm लंबी स्टील-छड़ अपने मध्य बिन्दु पर परिबद्ध है। इसके अनुदैर्ध्य कंपनों की मूल आवृत्ति 2.53 kHz है। स्टील में ध्वनि की चाल क्या है?
उत्तर:
चूँकि छड़ मध्य बिन्दु पर परिबद्ध है अतः यहाँ एक निस्पंद (A) तथा मूल विधा के लिए सिरों पर दो प्रस्पंद बनेंगे। अतः छड़ की मूल लम्बाई निम्नवत् होगी –
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l = \(\frac{λ}{2}\) 0r λ = 2l
जहाँ l = छड़ की लम्बाई
तथा λ = तरंग की तरंगदैर्ध्य
दिया है
l = 13100 cm, v = 2.53 kHz = 2.53 × 103 Hz
∴ λ = 2 × 100 = 200 cm
माना स्टील में ध्वनि का वेग v है।
अत: v = vλ
= 2.53 × 103 × 200
= 506 × 103 cms-1
= 5.06 × 103 ms-1
∴ v = 5.06 kms-1

प्रश्न 15.17
20 cm लंबाई के पाइप का एक सिरा बंद है। 430 Hz आवृत्ति के स्त्रोत द्वारा इस पाइप की कौन-सी गुणावृत्ति विधा अनुनाद द्वारा उत्तेजित की जाती है? यदि इस पाइप के दोनों सिरे खुले हों, तो भी क्या यह स्त्रोत इस पाइप के साथ अनुनाद करेगा? वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 है।
उत्तर:
दिया है:
l = 20 cm = 0.2 m, v = 340 ms-1
उत्तेजित स्त्रोत की आवृत्ति vn = 430 Hz
हम जानते हैं कि बंद नली के कम्पनों की आवृत्ति निम्न होती है –
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अत: आर्गन नली प्रथम सन्नादी या दोलन की मूल आवृत्ति में है।
खुली नली में, कम्पन की nवीं विधा की आवृत्ति –
V’n = n \(\frac{v}{2l}\)
जहाँ मूल विधा में लम्बाई l = \(\frac{λ}{2}\) or λ = 2l
या 430 = \(\frac{n×340}{2×0.2}\)
या n = \(\frac{430×0.4}{340}\) = \(\frac{172}{340}\) = 0.5
चूँकि n एक पूर्णांक है। अतः n = 0.5 सम्भव नहीं है। अतः समान स्त्रोत खुली नली में अनुनादित नहीं होगा।

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प्रश्न 15.18
सितार की दो डोरियाँ A तथा B एक साथ ‘गा’ स्वर बजा रही हैं तथा थोड़ी-सी बेसुरी होने के कारण 6 Hz आवृत्ति के विस्पंद उत्पन्न कर रही हैं। डोरी A का तनाव कुछ घटाने पर विस्पंद की आवृत्ति घटकर 3 Hz रह जाती है। यदि A की मूल आवृत्ति 324Hz है तो B की आवृत्ति क्या है?
उत्तर:
हम जानते हैं कि –
आवृत्ति ∝ Bihar Board Class 11 Physics Chapter 15 तरंगें
अतः डोरी में तनाव कम होने से इसकी आवृत्ति भी घटती है।
माना A की वास्तविक आवृत्ति VA व B की VB है।
∴ VA – VB = 6 Hz
परन्तु VA = 324 Hz
∴ VB = 324 – 6
= 318 Hz
A में तनाव कम करने पर,
∆v = 3 Hz
A की आवृत्ति = 324 – 3 = 321 Hz
∴ B की आवृत्ति = 318 Hz

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प्रश्न 15.19
स्पष्ट कीजिए क्यों (अथवा कैसे)?
(a) किसी ध्वनि तरंग में विस्थापन निस्पंद दाब प्रस्पंद होता है और विस्थापन प्रस्पंद दाब निस्पंद होता है।
(b) आँख न होने पर भी चमगादड़ अवरोधकों की दूरी, ‘दिशा, प्रकृति तथा आकार सुनिश्चित कर लेते हैं।
(c) वायलिन तथा सितार के स्वरों की आवृत्तियाँ समान होने पर भी हम दोनों से उत्पन्न स्वरों में भेद कर लेते हैं।
(d) ठोस अनुदैर्ध्य तथा अनुप्रस्थ दोनों प्रकार की तरंगों का पोषण कर सकते हैं जबकि गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें ही संचरित हो सकती हैं, तथा
(e) परिक्षेपी माध्यम में संचरण के समय स्पंद की आकृति विकृत हो जाती है।
उत्तर:
(a) ध्वनि तरंगों में जहाँ माध्यम के कणों का विस्थापन न्यूनतम होता है वहाँ कण अत्यधिक पास-पास होते हैं। अतः वहाँ दाब अधिकतम होता है। (i.e., दाब प्रस्पंद बनता है) एवं जहाँ विस्थापन महत्तम होता है वहाँ कण दूर-दूर होते हैं, अतः वहाँ दाब न्यूनतम होता है (i.e., दाब निस्पंद बनता है।)

(b) चमगादड़ उच्च आवृत्ति की पराश्रव्य तरंगें उत्सर्जित करती है। ये तरंगें अवरोधकों से टकराकर वापस लौटती हैं तो चमगादड़ इन्हें अवशोषित कर लेते हैं। परावर्तित तरंगों की आवृत्ति व तीव्रता की प्रेषित तरंगों से तुलना करके चमगादड़ अवरोधकों की दूरी, प्रकृति, दिशा व आकार सुनिश्चित कर लेते हैं।

(c) प्रत्येक स्वर में एक मूल स्वरक के साथ कुछ अधिस्वरक भी उत्पन्न होते हैं। परन्तु वायलिन व सितार से उत्पन्न स्वरों में मूल स्वरकों की आवृत्तियाँ समान रहती हैं लेकिन उनके साथ उत्पन्न होने वाले अधिस्वरकों की संख्या, आवृत्तियों व अपेक्षिक तीव्रताओं में भिन्नता होती है। इसी भिन्नता के आधार पर इन्हें विभेद किया जाता है।

(d) ठोसों में आयतन प्रत्यास्थता के साथ-साथ अपरूपण प्रत्यास्थता भी पाई जाती है। अतः ठोसों में दोनों प्रकार की तरंगें संचरित होती हैं। जबकि गैसों में केवल आयतन प्रत्यास्थता ही पाई जाती है। अतः गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें ही संचरित हो पाती हैं।

(e) प्रत्येक ध्वनि स्पंद कई विभिन्न तरंगदैर्ध्य की तरंगों का मिश्रण होता है। जब यह स्पंद परिक्षेपी माध्यम में प्रवेश करता है तब ये तरंगें अलग-अलग वेगों से गतिमान रहती हैं। अतः स्पंद की आकृति विकृत हो जाती है।

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प्रश्न 15.20
रेलवे स्टेशन के बाह्य सिग्नल पर खड़ी कोई रेलगाड़ी शांत वायु में 400 Hz आवृत्ति की सीटी बजाती है।
(i) प्लेटफॉर्म पर खड़े प्रेक्षक के लिए सीटी की आवृत्ति क्या होगी जबकि रेलगाड़ी –
(a) 10 ms-1 चाल से प्लेटफॉर्म की ओर गतिशील है, तथा
(b) 10 ms-1 चाल से प्लेटफॉर्म से दूर जा रही है?
(ii) दोनों ही प्रकरणों में ध्वनि की चाल क्या है? शांत वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 लीजिए।
उत्तर:
दिया है:
v = 400 Hz, vt = 10 ms-1
शांत वायु में ध्वनि की चाल
v = 340 ms-1
(i) (a) जब रेलगाड़ी (ध्वनि स्त्रोत) स्थिर प्रेक्षक की ओर गतिमान है, तब प्रेक्षक द्वारा सुनी गई ध्वनि की आवृत्ति,
v’ = v \(\left(\frac{v}{v-v_{t}}\right)\)
= 400 (\(\frac{340}{340-10}\))
= 412 Hz

(b) जब रेलगाड़ी स्थिर प्रेक्षक से दूर जा रही है तब प्रेक्षक द्वारा सुनी गई ध्वनि की आवृत्ति,
v’ = v \(\left(\frac{v}{v+v_{t}}\right)\)
= 400 (\(\frac{340}{340+10}\)) = 389 Hz

(ii) दोनों स्थितियों में ध्वनि की चाल (340 ms-1) समान है।

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प्रश्न 15.21
स्टेशन यार्ड में खड़ी कोई रेलगाड़ी शांत वायु में 400 Hz आवृत्ति की सीटी बजा रही है। तभी 10 ms-1 की चाल से यार्ड से स्टेशन की ओर वायु बहने लगती है। स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े किसी प्रेक्षक के लिए ध्वनि की आवृत्ति, तरंगदैर्ध्य तथा चाल क्या है? क्या यह स्थिति तथ्यतः उस स्थिति के समरूप है जिसमें वायु शांत हो तथा प्रेक्षक 10 ms-1 चाल से यार्ड की ओर दौड़ रहा हो? शांत वायु में ध्वनि की चाल 340 ms-1 ले सकते हैं।
उत्तर:
दिया है:
v = 400 Hz
वायु की प्रेक्षक की ओर चाल vw = 10 ms-1
शांत वायु में ध्वनि की चाल vw = 340 ms-1
चूँकि रेलगाड़ी व प्रेक्षक दोनों स्थिर हैं। अतः V0 = 0 व v’s = 0
अतः प्रेक्षक द्वारा सुनी गई ध्वनि की आवृत्ति
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चूँकि वायु प्रेक्षक की ओर चलती है।
अतः प्रेक्षक के लिए वायु की चाल
= vs + vw = 350 ms-1
प्रेक्षक के लिए सीटी की आवृत्ति = 400 Hz
∴ ध्वनि की तरंगदैर्ध्य λ’ = \(\frac{v_{t}+v_{s}}{v^{\prime}}\)
= \(\frac{340+10}{400}\) = \(\frac{7}{8}\) Hz = 0.875 m

Bihar Board Class 11 Physics तरंगें Additional Important Questions and Answers

अतिरिक्त अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 15.22
किसी डोरी पर कोई प्रगामी गुणावृत्ति तरंग इस प्रकार व्यक्त की गई है –
y (x, t) = 7.5 sin (0.0050x + 12t + π/4)
(a) x =1cm तथा t=1s पर किसी बिन्दु का विस्थापन तथा दोलन की चाल ज्ञात कीजिए। क्या यह चाल तरंग संचरण की चाल के बराबर है?
(b) डोरी के उन बिन्दुओं की अवस्थिति ज्ञात कीजिए जिनका अनुप्रस्थ विस्थापन तथा चाल उतनी ही है जितनी x = 1cm पर स्थित बिन्दु की समय t = 15, 5s तथा 11s पर है।
उत्तर:
दिया है:
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(a) समीकरण (i) की तुलना संचरित तरंग के सामान्य समीकरण से करने पर
y = a sin [\(\frac{2π}{λ}\) (vt + x) + \(\frac{π}{4}\)] we get
v = velocity of wave,
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बिन्दु के दोलन का वेग
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x = 1 सेमी° पर  t = 1 सेकण्ड
v = 90 cos (0.05 × 1 + 1.12 × 1 + 0.789)
= 90 cos 732.83° = 90 cos 12.83°
= 90 × 0.9571 cms-1 = 87.76 cms-1
= 88 cms-1
परन्तु तरंग संचरण का वेग 24 मीटर/सेकण्ड है।
स्पष्ट है कि बिन्दु का दोलन वेग तरंग संचरण के वेग के समान नहीं है।
∴ नहीं, यह वेग तरंग संचरण के वेग (24 मीटर/से०) के समान नहीं है।

(b) दी हुई समीकरण है,
y (x, t) = 7.5 sin (0.005x + 12t + \(\frac{π}{4}\))
इस समीकरण की तुलना समीकरण,
y = A sin (ωt + kx + ϕ) से करने पर,
∴ k = 0.005 रेडियन 1 सेमी०
∴λ = \(\frac{2π}{k}\)
= \(\frac{2×3.14}{0.005}\) = 12.57 मीटर
तरंग में सभी बिन्दुओं का समान अनुप्रस्थ विस्थापन होता है। यह विस्थापन λ, 2λ, 3λ, ……… इत्यादि होता है। अतः 12.57 मीटर, 25.14 मीटर, 37.71 मीटर इत्यादि दूरी पर स्थित बिन्दु x = 1 सेमी से समान विस्थापन पर होंगे। अतः सभी बिन्दुओं जिनका विस्थापन nλ है। जहाँ n = ±1, +2, ±3, ±4, …………… है, x =1 सेमी से 12.57 मोटर, 25.14 मीटर ………….. दूरी हैं।

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प्रश्न 15.23
ध्वनि का कोई सीमित स्पंद (उदाहरणार्थ सीटी की पिप) माध्यम में भेजा जाता है।
(a) क्या इस स्पंद की कोई निश्चित –
(i) आवृत्ति
(ii) तरंगदैर्ध्य
(iii) संचरण की चाल है?
(b) यदि स्पन्द दर 1 स्पंद प्रति 20 सेकण्ड है अर्थात् सीटी प्रत्येक 20 s के पश्चात् सेकंड के कुछ अंश के लिए बजती है, तो सीटी द्वारा उत्पन्न स्वर की आवृत्ति (1/20) Hz अथवा 0.05 Hz है?
उत्तर:
(a) नहीं, इस स्पंद की कोई निश्चित आवृत्ति या तरंगदैर्ध्य नहीं होती है। स्पन्द के संचरण की चाल निश्चित होती है, जो माध्यम में ध्वनि की चाल के समान है।
(b) नहीं, स्पंद की आवृत्ति (\(\frac{1}{20}\)) Hz
या 0.05 Hz नहीं है।

प्रश्न 15.24
8.0 × 10-3 kg m-1 रैखिक द्रव्यमान घनत्व की किसी लंबी डोरी का एक सिरा 256 Hz आवृत्ति के विद्युत चालित स्वरित्र द्विभुज से जुड़ा है। डोरी का दूसरा सिरा किसी स्थिर घिरनी के ऊपर गुजरता हुआ किसी तुला के पलड़े से बँधा है जिस पर 90 kg के बाट लटके हैं। घिरनी वाला सिरा सारी आवक ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है जिसके कारण इस सिरे से परावर्तित तरंगों का आयाम नगण्य होता है। t = 0 पर डोरी के बाएँ सिरे (द्विभुज वाले सिरे) x = 0 पर अनुप्रस्थ विस्थापन शून्य है (y = 0) तथा वह y की धनात्मक दिशा के अनुदिश गतिशील है। तरंग का आयाम 5.0 cm है। डोरी पर इस तरंग का वर्णन करने वाले अनुप्रस्थ विस्थापन y को x तथा t के फलन के रूप में लिखिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि तरंग वेग –
v = \(\sqrt{\frac{T}{m}}\) ………………… (i)
पलड़े में द्रव्यमान = M = 90 kg
दिया है: T = Mg = 90 × 9.8 = 882.0 N
रेखीय द्रव्यमान घनत्व m = 8 × 10-3 kg m-1
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धनात्मक x – दिशा में विस्थापन वाली संचारित तरंग का समीकरण
y = A sin (wt – kx) ……………………. (ii)
जहाँ ω = 2πv तथा
A = 5.0 cm = 0.05 m, v = 256 Hz.
∴ω = 2π × 256 s-1
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समी० (ii) में ω1A तथा k के मान रखने पर,
y = 0.05 sin (1.6 × 103t – 4.84)

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प्रश्न 15.25
किसी पनडुब्बी से आबद्ध कोई ‘सोनार’ निकाय 40.0 KHz आवृत्ति पर प्रचालन करता है। कोई शत्रु-पनडुब्बी 360 km h-1 चाल से इस सोनार की ओर गति करती है। पनडुब्बी से परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति क्या है? जल में ध्वनि की चाल 1450 ms-1 लीजिए।
उत्तर:
दिया है:
जल में ध्वनि की चाल v = 1450 ms-1
शत्रु पनडुब्बी की चाल v1 = 1360 km h-1
= 360 × \(\frac{5}{18}\) = 100 ms-1
सोनार द्वारा प्रेषित तरंग की आवृत्ति
ω = 40 kHz
माना शत्रु पनडुब्बी द्वारा ग्रहण आवृत्ति v1 है।
स्पष्ट है : श्रोता का वेग v0 = v1 = 100 ms-1
Bihar Board Class 11 Physics Chapter 15 तरंगें
शत्रु पनडुब्बी इस आवृत्ति की तरंगों को परावर्तित करती है। माना सोनार द्वारा ग्रहण आवृत्ति n2 है।
इस स्थिति में, स्त्रोत सोनार की ओर vs = 100 ms-1 के वेग से गति करता है।
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प्रश्न 15.26
भूकम्प पृथ्वी के भीतर तरंगें उत्पन्न करते हैं। गैसों के विपरीत, पृथ्वी अनुप्रस्थ (S) तथा अनुदैर्ध्य (P) दोनों प्रकार की तरंगों की अनुभूति कर सकती है। S तरंगों की प्रतिरूपी चाल लगभग 4.0 kms-1 तथा P तरंगों की प्रतिरूपी चाल लगभग 8.0 kms-1 है। कोई भूकंप-लेखी किसी भूकंप की P तथा S तरंगों को रिकॉर्ड करता है। पहली P तरंग पहली S तरंग की तुलना में 4 मिनट पहले पहुँचती है। यह मानते हुए कि तरंगें सरल रेखा में गमन करती हैं यह ज्ञात कीजिए कि भूकंप घटित होने वाले स्थान की दूरी क्या है?
उत्तर:
दिया है:
S तरंगों की चाल
v1 = 4 kms-1
= 4 × 60
= 240 km/min
P तरंगों की चाल v2 = 8 kms-1
= 480 km/min
अत: S तरंगों का भूकंप लेखी तक पहुँचने में लगा समय
t1 = \(\frac{x}{u_{1}}\) = \(\frac{n}{240}\) व P तरंगों का भूकंप लेखी तक पहुँचने में लगा समय
t2 = \(\frac{x}{u_{2}}\) = \(\frac{x}{480}\) मिनट
अतः t1 = t2
प्रश्नानुसार P तरंगें, Q तरंगों से भूकंप लेखी तक 4 मिनट पहले पहुँचती हैं।
∴ t2 – t1 = 4 मिनट
2t2 – t2 = 4
∴ t2 = 4 मिनट
∴ दूरी x = 480 × t2
= 480 × 4
= 1920 km

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प्रश्न 15.27
कोई चमगादड़ किसी गुफा में फड़फड़ाते हुए पराश्रव्य ध्वनि उत्पन्न करते हुए उड़ रहा है। मान लीजिए चमगादड़ द्वारा उत्सर्जित पराश्रव्य ध्वनि की आवृत्ति 40 Hz है। किसी दीवार की ओर सीधा तीव्र झपट्टा मारते समय चमगादड़ की चाल ध्वनि की चाल की 0.03 गुनी है। चमगादड़ द्वारा सुनी गई दीवार से परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति क्या है?
उत्तर:
दिया है:
उत्सर्जित तरंग की आवृत्ति v = 40 kHz
माना ध्वनि की चाल = v
चमगादड़ की चाल v1 = 0.03v
माना दीवार द्वारा ग्रहण की गई तरंग की आगामी आवृत्ति v1 है।
इस स्थिति में श्रोता की ओर गतिमान है तथा श्रोता स्थिर है।
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= 41.24 kHz
v1 = 41.24 KHz आवृत्ति की तरंगें दीवारसे टकराकर चमगादड़ की ओर वापस लौटती हैं।
माना चमगादड़ द्वारा ग्रहण की गई तरंगो की आवृत्ति v2 इस स्थिति में, श्रोता, स्थिर स्त्रोत की ओर गतिमान है।
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= 42.47kHz
इस प्रकार चमगादड़ द्वारा ग्रहण की गई परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति 42.47 kHz है।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 22 रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण

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Bihar Board Class 11 Biology रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित की परिभाषा लिखिए –
(अ) बहिःस्त्रावी ग्रन्थियाँ
(ब) अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ
(स) हॉर्मोन।
उत्तर:
(अ) बहिःस्रावी ग्रन्थियाँ (Exocrine Glands):
ये सँकरी नलिकाओं के द्वारा सम्बन्धित भागों से जुड़ी रहती हैं। इन ग्रन्थियों से स्रावित तरल नलिकाओं द्वारा सम्बन्धित सतह पर मुक्त होता है। इन्हें वाहिनीयुक्त (ducted glands) भी कहते हैं; जैसे-लार ग्रन्थियाँ, आहारनाल की विभिन्न पाचक ग्रन्थियाँ, त्वचा की तैल ग्रन्थियाँ, पसीने की ग्रन्थि (sweat gland), यकृति आदि।

(ब) अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Gland):
ये सम्बन्धित्त एपिथीलियम से पृथक् हो जाने के कारण नलिकाविहीन (ductless) कहलाती हैं। इनसे स्रावित रसायनों को हॉर्मोन्स कहते हैं। इनका वितरण रक्त या ऊतक तरल द्वारा होता है। इन ग्रन्थियों में रक्त-कोशिकाओं का घना जाल फैला रहता. है; जैसे-थाइरॉइड, पैराथाइरॉइड, अधिवृक्क, पीयूष, पीनियल तथा थाइमस ग्रन्थियाँ आदि। .

(स) हॉर्मोन (Hormone):
बैलिस एवं स्टारलिंग (Bayliss and Starling; 1903 – 1905) के अनुसार ये ऐसे सक्रिय सन्देशवाहक रसायन होते हैं जो बाह्य या अन्त:उद्दीपन के कारण शरीर के किसी भाग की अन्तःस्रावी कोशिकाओं द्वारा स्रावित होकर रक्त में पहुँचकर शरीर में संचारित होते हैं और इसकी सूक्ष्म मात्रा शरीर की लक्ष्य कोशिकाओं की कार्यिकी को प्रभावित करती है।

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प्रश्न 2.
हमारे शरीर में पाई जाने वाली अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों की स्थिति चित्र बनाकर प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की स्थिति
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चित्र – मानव शरीर में विभिन्न अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की स्थिति: (A) पुरुष तथा (B) स्त्री में

प्रश्न 3.
निम्नलिखित के द्वारा स्रावित हॉर्मोन का नाम लिखिए –
(अ) हाइपोथैलेमस
(ब) पीयूष ग्रन्थि
(स) थाइरॉइड ग्रन्थि
(द) पैराथायरॉइड ग्रन्थि
(य) अधिवृक्क ग्रन्थि
(र) अग्न्याशय
(ल) वृषण
(व) अण्डाशय
(श) थाइमस
(स) एट्रियम
(ष) वृक्क
(ह) जठर-आंत्रीय पथ।
उत्तर:
(अ) हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) से तन्त्रि हॉर्मोन्स (neurohormones) स्रावित करती है। ये दो प्रकार के होते हैं –
(i) मोचक हॉर्मोन (releasing hormones) (ii) निरोधी हॉर्मोन्स (inhibitory hormones)।

(ब) पीयूष ग्रन्थि (Pituitary Hormones):
इसके अग्रभाग से वृद्धि हॉर्मोन (growth hormones, GH), प्रोलैक्टिन (prolactin) या मैमोट्रोपिन हॉर्मोन, थाइरॉइड प्रेरक हॉर्मोन (thyroid stimulating hormons, TSH), एड्रिनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हॉर्मोन (adrenocorticotropic homrone, ACTH), ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (luteinizing hormone, LH) और पुटिका प्रेरक हॉर्मोन (follicle stimulating hormone, FSH) तथा पश्च भाग से वैसोप्रेसिन (vasopressin) तथा ऑक्सिटोसिन (oxytocin) एवं मध्य भाग से मिलैनोसाइट प्रेरक हॉर्मोन (melanocyte stimulating hormone, MSH)।

(स) थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid Gland):
इससे टेट्राआयोडोथायरोनीन ((tetraiodo-thyronine) (T4) तथा ट्राइआयोडोथायरोनीन (triodothyronine, T3) स्रावित होता है।

(द) पैराथाइरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid Gland):
इससे पैराथॉर्मोन (parathormone) स्रावित होता है।

(य) अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal Gland):
इसके वल्कुट भाग से ऐड्रीनोकॉटकोएड्स (adrenocorticoids) तथा मध्यांश (medulla) से एपिनेफ्रीन (epinephrine) तथा नॉरएपिनेफ्रीन (nor-epinephrine) स्रावित होता है।

(र) अग्न्याशय (pancreas):
की लैंगरहैन्स द्वीपिकाओं (islets of Langerhans) से इन्सुलिन (insulin) तथा ग्लूकैगॉन (glucagon) हॉर्मोन स्रावित होते हैं।

(ल) वृषण (Testes):
इससे एन्ड्रोजेन्स (androgens); जैसे-टेस्टोस्टेरॉन (testosterone) सावित होता है।

(व) अण्डाशय (Ovary):
इससे एस्ट्रोजेन्स (estrogens) तथा प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) हॉर्मोन स्रावित होते हैं।

(श) थाइमस (Thymus):
ग्रन्थि-इससे थाइमोसिन (thymosin) हॉर्मोन स्रावित होता है।

(स) एट्रियम (Atrium):
इससे एट्रियल नेटियुरेटिक कारक (ANF) स्रावित होता है।

(ष) वृक्क (Kidney):
इससे एरिथोपोइटिन (erythropoietin) हॉर्मोन स्रावित होता है।

(ह) जठर-आंत्रीय पथ (Gastrointestinal Tract):
इससे गैस्ट्रिन (gastrin), सीक्रेटिन (secretin) कोलिसिस्टोकाइनिन (cholecystokinin) तथा जठर अवरोधी पेप्टाइड (gastric inhibitory peptide) हॉर्मोन स्रावित होते हैं।

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प्रश्न 4.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए –
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उत्तर:
(अ) हाइपोथैलेमस
(ब) थाइरॉइड ग्रन्थि
(स) अधिवृक्क वल्कुट
(द) वृषण अथवा अण्डाशय
(य) त्वचा की रंग कोशिकाएँ (मिलैनोफोर्स)।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित हॉर्मोन के कार्यों के बारे में टिप्पणी लिखिए –
(अ) पैराथाइरॉइड हॉर्मोन (पी० टी० एच०)
(ब) थाइरॉइड हॉर्मोन
(स) थाइमोसिन
(द) एन्ड्रोजेन
(य) एस्ट्रोजेन
(र) इन्सुलिन एवं ग्लूकैगॉन।
उत्तर:
(अ) पैराथायरॉइड हॉर्मोन (Parathyroid Hormone):
यह कैल्सियम के अवशोषण तथा फॉस्फेट के उत्सर्जन को बढ़ाता है। अस्थि एवं दाँतों के विकास में सहायता करता है और पेशियों को क्रियाशील रखता है।

(ब) थाइरॉइड हॉर्मोन (Thyroid Hormones):

1. ये ऑक्सीकारक उपापचय (oxidative metabolism) को प्रेरित करके कोशिकाओं में ऊर्जा उत्पादन और उपापचय दर को बढ़ाते हैं और जीवन की रफ्तार को बनाए रखते हैं। ये हृदय स्पन्दन दर, प्रोटीन संश्लेषण,
O2 एवं ग्लूकोस की खपत आदि को बढ़ाते हैं।

2. थायरॉक्सिन कायान्तरण (metamorphosis) के लिए आवश्यक होता है।

3. ये शीत रुधिर वाले जन्तुओं में त्वक्पतन (moulting) को नियन्त्रित करते हैं।

(स) थाइमोसिन (Thymosin):
यह T – लिम्फोसाइट्स के प्रचुरोद्भवन (proliferation) एवं विभेदीकरण द्वारा शरीर की सुरक्षा करता है। ये जीवाणुओं के प्रतिजन (antigens) को नष्ट करने के लिए प्रतिरक्षी का निर्माण करती है।

(द) एन्ड्रोजेन (Androgens):
इन्हें पौरुष-विकास हॉर्मोन (masculinization hormones) कहते हैं। ये यहायक जनन ग्रन्थियों के विकास को प्रेरित करते हैं। इनके प्रभाव से नर लैंगिक लक्षणों; जैसे-दाढ़ी-मूंछ का उगना, आवाज का भारी होना, अस्थियों का मजबूत होना, पेशियों और शरीर की सुडौलता, कन्धों का फैलाव आदि लक्षणों का विकास होता है।

(य) एस्ट्रोजेन (Estrogens):
इनके कारण स्त्रियों में यौवनारम्भ (puberty) होता है। मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है। स्तनों, दुग्ध ग्रन्थियों, गर्भाशय, योननि, लैबिया (labia) भगशिश्न (clitoris) आदि का विकास होता है। इस हॉर्मोन को नारी विकास (feminizing) हॉर्मोन कहते हैं।

(र) इन्सुलिन एवं ग्लूकैगॉन (Insulin and Glucagon):
ये कार्बोहाइड्रेट उपापचय का नियमन करते हैं। इन्सुलिन आवश्यकता से अधिक शर्करा को ग्लाइकोजन में बदलता है। इस क्रिया को ग्लाइकोजेनेसिस (glycogenesis) कहते हैं। ग्लाइकोजन शर्करा में संचित हो जाती है। रक्त में ग्लूकोस की मात्रा के कम होने पर ग्लूकैगॉन हॉर्मोन संचित ग्लाइकोजन को ग्लूकोस में बदल देता है। इसे ग्लाइकोजेनोलिसिस (glycogenolysis) कहते हैं।

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प्रश्न 6.
निम्न के उदाहरण दीजिए –
(अ) हाइपरग्लाइसीमिक हॉर्मोन एवं हाइपोग्लाइसीमिक हॉर्मोन
(ब) हाइपरकैल्सीमिक हॉर्मोन
(स) गोनेडोट्रॉपिक हॉर्मोन
(द) प्रोजेस्टेरॉनल हॉर्मोन
(य) रक्तदाब निम्नकारी हॉर्मोन
(र) एन्ड्रोजेन एवं एस्ट्रोजेन।
उत्तर:
(अ) हाईपरग्लाइसीमिक हॉर्मोनः जैसेग्लूकैगॉन (glucagon) एवं ग्लूकोकॉर्टिकोएड्स (glucocarticoids)

हाइपोग्लाइसीमिक हॉर्मोन; जैसे:
इन्सुलिन (insulin) एवं ग्लूकोकॉर्टिकॉएड्स।

(ब) हाइपरकैल्सीमिक हॉर्मोन; जैसे – पैराथॉर्मोन (Parathormone)।

(स) गोनेडोट्रॉफिक हॉर्मोन; जैसे – ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (LH), पुटिका प्रेरक हॉर्मोन (FSH)।

(द) प्रोजेस्टेरॉनल हॉर्मोन; जैसे – प्रोजोस्टेरॉन (progesterone) हॉर्मोन।

(य) रक्तदाब निम्नकारी हॉर्मोन; जैसे – पेप्टाइड हॉर्मोन या (atrial natriuretic factor, ANF)।

(र) एन्ड्रोजेन (androgens); जैसे-टेस्टोस्टेरॉन (testosterone)

एवं एस्ट्रोजेन (Estrogens); pewmes:
एस्ट्रोन (estrone), एस्ट्रिओल (estriole)।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित विकार किस हॉर्मोन की कमी के कारण होते हैं –
(अ) डायबिटीज
(ब) गॉइटर
(स) क्रिटिनिज्म
उत्तर:
(अ) डायबिटीज-यह इन्सुलिन की कमी से होता है।
(ब) ग्वाइटर-यह थायरॉक्सिन की कमी से होता है।
(स) क्रिटिनिज्म-यह थायरॉक्सिन की कमी से होता है।

प्रश्न 8.
एफ० एस० एच० की कार्य-विधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एफ० एस० एच० की कार्य-विधि (Action Mechanism of FSH):
यह पुरुषों में वृषणों की शुक्रजनन नलिकाओं (seminiferous tubules) की वृद्धि तथा शुक्राणुजनन (spermatogenesis) को प्रेरित करता है। स्त्रियों में यह अण्डाशय की ग्रैफियन पुटिकाओं (Graafian follicles) की वृद्धि और विकास तथा अण्डजनन (oogenesis)) को प्रेरित करता है। यह मादा हॉर्मोन एस्ट्रोजेन (estrogen) के स्रावण को प्रेरित करता है।

ऋणात्मक पुनर्निवेशन नियन्त्रण में स्त्रियों में यह प्रमुख हॉर्मोन एस्ट्रोजन (estropgen) तथा पुरुषों में प्रमुख नर हॉर्मोन टेस्टोस्टेरॉन (testosterone) FSH के स्रावण का अवरोध करते हैं। स्त्रियों में 40 वर्ष की आयु के बाद अण्डाशयों पर FSH का प्रभाव बहुत कम हो जाता है; अत: मासिक धर्म, अण्डजनन तथा मादा हॉर्मोन स्रावण आदि समाप्त होने लगते हैं। इस स्थिति को रजोनिवृत्ति कहते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित के जोड़े बनाइए –
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उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 7.1
एक समान द्रव्यमान घनत्व के निम्नलिखित पिंडों में प्रत्येक के द्रव्यमान केंद्र की अवस्थिति लिखिए:
(a) गोला
(b) सिलिंडर
(c) छल्ला तथा
(d) घन। क्या किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र आवश्यक रूप से उस पिंड के भीतर स्थित होता है?
उत्तर:
(a) गोला
(b) सिलिंडर
(c) छल्ला व
(d) घन, चारों का द्रव्यमान केन्द्र उनका ज्यामितीय केन्द्र होता है। नहीं, जहाँ कोई पदार्थ नहीं है। जैसे वलय, खोखले सिलिंडर व खोखले गोले में द्रव्यमान केन्द्र पिंड के बाहर भी हो सकता है।

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प्रश्न 7.2
HCL अणु में दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच पृथकन लगभग 1.27 Å (1Å = 10-10 m) है। इस अणु के द्रव्यमान केंद्र की लगभग अवस्थिति ज्ञात कीजिए।यह ज्ञात है कि क्लोरीन का परमाणु हाइड्रोजन के परमाणु की तुलना में 35.5 गुना भारी होता है तथा किसी परमाणु का समस्त द्रव्यमान उसके नाभिक पर केंद्रित होता है।
उत्तर:
माना द्रव्यमान केन्द्र H परमाणु से x दूरी पर है। माना हाइड्रोजन परमाणु का द्रव्यमान, m1 = m
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तथा क्लोरीन परमाणु का द्रव्यमान m2 = 35.5 m
माना द्रव्यमान केन्द्र (मूलबिन्दु) के सापेक्ष H व Cl \(\vec{r}_{1}\) व \(\vec{r}_{2}\) दूरी पर है।
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या m1\(\vec{r}_{1}\) + m2\(\vec{r}_{2}\) = 0 यहाँ
\(\vec{r}_{1}\) = – x\(\hat { i } \) व \(\vec{r}_{2}\) = (1.27 – x)\(\hat { i } \)
∴ m(-x\(\hat { i } \)) + 35.5m (1.27 – x) \(\hat { i } \) = 0
∴ m(-x\(\hat { i } \)) + 35.5m (1.27 – x)\(\hat { i } \) = 0
∴ x = \(\frac{35.5×1.27}{36.5}\)
= 1.235 = 1.2 Å
अर्थात् द्रव्यमान केन्द्र H – परमाणु से 1.24 Å की दूरी पर Cl परमाणु की ओर है।

प्रश्न 7.3
कोई बच्चा किसी चिकने क्षैतिज फर्श पर एकसमान चाल v से गतिमान किसी लंबी ट्राली के एक सिरे पर बैठा है। यदि बच्चा खड़ा होकर ट्राली पर किसी भी प्रकार से दौड़ने लगता है, तब निकाय (ट्राली + बच्चा) के द्रव्यमान केंद्र की चाल क्या है?
उत्तर:
प्रश्नानुसार, ट्राली एक चिकने क्षैतिज फर्श पर गति कर रही है। इसलिए फर्श के चिकना होने के कारण निकाय पर क्षैतिज दिशा में कोई बाह्य बल नहीं लगता है। परन्तु जब बच्चा दौड़ता है तब बच्चे द्वारा ट्राली पर व ट्राली द्वारा बच्चे पर लगाए गए दोनों ही बल आन्तरिक बल होते हैं।
∴ \(\vec{F}\)ext = 0
संवेग संरक्षण के नियमानुसार M\(\vec{V}\)cm = नियतांक
∴ \(\vec{V}\)cm = नियतांक
अतः द्रव्यमान केन्द्र की स्थित चाल होगी।

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प्रश्न 7.4
दर्शाइये कि a एवं b के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल a × b के परिमाण का आधा है।
उत्तर:
माना ∆AOB की संलग्न भुजाओं के सदिश \(\vec{a}\) व \(\vec{b}\)
∴ \(\vec{O}\)A – \(\vec{b}\), \(\vec{O}\)B + \(\vec{a}\) या OA = b, OB = a
माना \(\bar{a}\) तथा \(\bar{b}\) के बीच कोण θ है।

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तथा माना त्रिभुज की ऊँचाई h है।
∴ h = AC
समकोण ∆OCA में,
sin θ = \(\frac{AC}{OA}\)
या AC = OA sin θ
या h = b sin θ …………… (i)
हम जानते हैं कि त्रिभुज AOB का क्षेत्रफल
= \(\frac{1}{2}\) × आधार × ऊँचाई
= \(\frac{1}{2}\) × OB × AC = \(\frac{1}{2}\) × a × h
= \(\frac{1}{2}\) × a × b sin θ
= \(\frac{1}{2}\) ab sin θ ………………. (ii)
पुनः सदिश गुणन के नियम से
\(\vec{a}\) × \(\vec{b}\) = ab sin θ \(\hat { n } \)
या |\(\vec{a}\) × \(\vec{b}\)| = |ab sin θ \(\hat { n } \)]
= ab sin θ [∵|\(\hat { n } \)| = 1] …………….. (iii)
∆AOB का क्षेत्रफल
= \(\frac{1}{2}\) |\(\vec{a}\) × \(\vec{b}\)|
= \(\frac{1}{2}\) \(\vec{a}\) × \(\vec{b}\) का परिमाण।

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प्रश्न 7.5
दर्शाइये कि a (bx c) का परिमाण तीन सदिशों a, b एवं c से बने समान्तर षट्फलक के आयतन के बराबर है।
उत्तर:
माना OABCDEFG एक समान्तर षट्फलक है जिसकी भुजाएँ क्रमश: OA, OC व OE हैं।
माना कि \(\vec{O}\)A = \(\vec{b}\), \(\vec{O}\)C = व \(\vec{O}\)E = \(\vec{a}\)
यहाँ \(\bar{a}\) व समान्तर चतुर्भुज OABC की संलग्न भुजाएँ हैं।
∴ \(\vec{S}\) = \(\vec{b}\) × \(\vec{c}\) = s\(\hat { n } \)
जहाँ \(\hat { n } \), \(\vec{S}\) के अनुदिश एकांक सदिश है जो कि भुजाओं \(\vec{b}\) व \(\vec{c}\) कोण तल के लम्बवत् है, व S तल OABC का क्षेत्रफल है। माना \(\vec{a}\), \(\vec{s}\) से θ कोण पर है।
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∴ \(\vec{a}\) (\(\vec{b}\) × \(\vec{c}\)) = \(\vec{a}\).\(\vec{s}\) = \(\vec{a}\).\(\hat { n } \)S
= a cos θ.S
= hS ……….. (i)
जहाँ h = a cos θ = \(\vec{a}\) के शीर्ष द्वारा समचतुर्भुज OABC पर डाला गया लम्ब EE’ \(\bar{a}\) की ऊँचाई।
पुनः माना V = समषट्फलक OABC = DEFG का आयतन है।
∴ V = तल OABC का क्षेत्रफल × OABC तल पर E से अभिलम्ब
= S × h
समी० (i) व (ii) से,
v = \(\vec{a}\).(\(\vec{b}\) × \(\vec{c}\)) इति सिद्धम्

प्रश्न 7.6
एक कण, जिसके स्थिति सदिश r के x, y, z अक्षों के अनुदिश अवयव क्रमशःx, y, हैं,और रेखीय संवेग सदिश P के अवयव px, Py, Pz हैं, के कोणीय संवेग 1 के अक्षों के अनुदिश अवयव ज्ञात कीजिए। दर्शाइये, कि यदि कण केवल x – y तल में ही गतिमान हो तो कोणीय संवेग का केवल z – अवयव ही होता है।
उत्तर:
माना OX, OY तथा OZ तीन परस्पर लम्बवत् अक्ष हैं। माना x – y तल में स्थिति सदिश \(\vec{O}\)P = \(\vec{r}\) एक बिन्दु P है।
माना रेखीय संवेग \(\vec{P}\) का \(\hat{r}\) से कोण θ है व कोणीय संवेग \(\vec{L}\)। है।
∴ \(\vec{L}\) = \(\hat{r}\) × \(\hat{p}\) …………….. (i)
यह एक संवेग राशि है जिसकी दिशा दाएँ हाथ के नियम से दी जा सकती है। चूँकि \(\hat{r}\) व \(\hat{p}\) तल OXY में हैं।
अतः
\(\vec{r}\) = x\(\hat{i}\) + y\(\hat{j}\) + z\(\hat{k}\)
तथा \(\vec{p}\) = px\(\hat{i}\) + py\(\hat{j}\) + pz\(\hat{k}\) ………….. (ii)
∴ समी० (i) व (ii) से,
\(\vec{L}\) = (x\(\hat{i}\) + y\(\hat{j}\) + z\(\hat{k}\)) × (px\(\hat{i}\) + py\(\hat{j}\) + pz\(\hat{k}\))
Bihar Board Class 11 Physics Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
तुलना करने पर,
Lx = yPz – zpy
Ly = zPx – xPz
Lz = xpy – ypx …….. (iii)
समी० (iii) से, x, y व z – अक्षों के अनुदिश \(\vec{z}\) के अभीष्ट घटक प्राप्त होते हैं।

(b) हम जानते हैं कि xy – तल में गतिमान कण पर लगने वाला बलाघूर्ण
iz = xFy – yFz ………….. (i)
जहाँ \(\hat{i}\)z = xy तल में गतिमान गण z अक्ष के अनुदिश लगने वाले बलाघूर्ण का घटक है।
माना xy – \(\vec{v}\) तल में वेग से गतिमान कण का द्रव्यमान = m
इस वेग के vx, व vy घटक क्रमश: x व y – दिशा में हैं। न्यूटन के गति के दूसरे समी० से,
Fx = \(\frac{d}{dt}\) (Px) = \(\frac{d}{dt}\) (mvx) = m\(\frac{d v_{x}}{d t}\)
तथा Fy = \(\frac{d}{dt}\)(Py) = m.\(\frac{d v_{y}}{d t}\) …………….. (ii)
∴ समी० (i) व (ii) से,
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∴ समी० (iii) व (iv) से,
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∴ समी० (v) व (vi) से,
Bihar Board Class 11 Physics Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
अतः समीकरण (vii) से यह निष्कर्ष निकलता है, कि xy – तल में गतिमान कण का कोणीय वेग (\(\vec{L}\)) का केवल एक घटक अर्थात् z – अक्ष के अनुदिश है।

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प्रश्न 7.7
दो कण जिनमें से प्रत्येक का द्रव्यमान m एवं चाल v है d दूरी पर, समान्तर रेखाओं के अनुदिश, विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं। दर्शाइये कि इस द्विकण निकाय का सदिश कोणीय संवेग समान रहता है, चाहे हम जिस बिन्दु के परितः कोणीय संवेग लें।
उत्तर:
माना दूरी पर दो समान्तर रेखाओं के अनुदिश गतिमान प्रत्येक कण का द्रव्यमान m है।
माना v प्रत्येक कण विपरीत दिशा में चाल है।
माना कि क्षण t व कण P1 व P2, बिन्दुओं O पर हैं। अब इन दोनों कणों द्वारा बनाए गए निकाय का किसी बिन्दु O के परितः कोणीय संवेग ज्ञात करते हैं। माना प्रत्येक कण का कोणीय संवेग \(\vec{L}\)1 व \(\vec{L}\)2 है।
∴ \(\vec{L}\)1 = \(\vec{r}\)1 × m\(\vec{v}\)
माना कि निकाय का कोणीय संवेग \(\vec{L}\) है।
∴ \(\vec{L}\) = \(\vec{L}\)1 – \(\vec{L}\)2
= \(\vec{r}\)1 × m\(\vec{v}\) – \(\vec{r}\)2 × m\(\vec{v}\)
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अथवा |\(\vec{L}\)| = |\(\vec{L}\)1| – |\(\vec{L}\)2||
= mvr1 sin θ1 – mvr2 sin θ2 ……………. (i)
जहाँ θ1 व θ2, क्रमश: \(\vec{r}\)1, \(\vec{v}\) व \(\vec{r}\)2(-\(\vec{v}\)) के बीच कोण हैं। (चित्र) चूँकि कण की स्थिति समय के सापेक्ष परिवर्तित होती है।
अतः \(\vec{v}\) की दिशा समान रेखा में होगी तथा OM = r1 sin θ1 – r2 sin θ2 = d ……………. (ii)
समी० (i) व (ii) से,
L = mvd
\(\vec{L}\) की दिशा भी \(\vec{r}\) व \(\vec{v}\) के तल के लम्बवत् होती है। जोकि कागज के तल में होगी। यह दिशा समय के साथ अपरिवर्तित रहती है। अर्थात् \(\vec{L}\) परिमाण व दिशा में समान रहता है। अतः यह संरक्षित रहता है।

प्रश्न 7.8
W भार की एक असमांग छड़ को, उपेक्षणीय भार वाली दो डोरियों से चित्र में दर्शाये अनुसार लटका कर विरामावस्था में रखा गया है। डोरियों द्वारा ऊर्ध्वाधर से बने कोण क्रमशः 36.9° एवं 53.1° हैं। छड़ 2 m लम्बाई की है। छड़ के बाएँ सिरे से इसके गुरुत्व केन्द्र की दूरी d ज्ञात कीजिए।
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उत्तर:
माना एक समान छड़ AB का भार W2 है। यह छड़ दो डोरियों OA व O’B से लटकायी गई है। ऊर्ध्वाधर से OA छड़ से 36.9° व O’B छड़ से 53.1° कोण पर है।
<OAA’ = 90° – 36.9°
= 53.1°
इसी प्रकार, <O’ BB’ = 36.9°
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AB – 2M, AC = d मीटर
माना डोरी OA व O’B में तनाव क्रमशः T1 व T2 है। यहाँ वियोजित घटक चित्रानुसार होंगे।
चूँकि छड़ विराम में है, अत: A’B’ अक्ष के अनुदिश व लम्बवत् लगने वाले बलों का सदिश योग शून्य है। अतः
– T1 cos 53.1° + T2 cos 36.9° = 0 ……………. (i)
तथा T1 sin 53.1° + T2 sin 36.9° – W = 0 ………………. (ii)
A के परित: बलाघूर्ण लेने पर व बलाघूर्णों के योग का शून्य रखने पर –
– (T2 sin 36.9°) × 2 + Wd = 0
या T2 = \(\frac{Wd}{2 sin 36.9°}\) …………… (iii)
∴ समी० (ii) व (iii) से,
T1 sin 53.1° = W – T2 36.9°
= W – \(\frac{Wd}{2}\)
∴ T1 = \(\frac{Wd}{sin 53.1°}\) (1 – \(\frac{d}{2}\)) …………….. (iv)
∴ समी० (i), (iii) व (iv) से,
T1 cos 53.1° = T2 cos36.9°
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या 0.5d + 0.8870d = 1
या d = \(\frac{1}{1.3870}\)d = 1
या d = \(\frac{1}{1.3870}\) = 0.721
m = 72.1 सेमी

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प्रश्न 7.9
एक कार का भाग 1800 kg है। इसकी अगली और पिछली धुरियों के बीच की दूरी 1.8 m है। इसका गुरुत्व केन्द्र, अगली धुरी से 1.05 m पीछे है। समतल धरती द्वारा इसके प्रत्येक अगले और पिछले पहियों पर लगने वाले बल की गणना कीजिए।
उत्तर:
माना आगे के पहिए का द्रव्यमान = m ग्राम
∴ (900 – m) kg = प्रत्येक पहिए का द्रव्यमान
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∴ m × 1.05 =(900 – m) × 0.75
या 1.8m = 900 × 0.75
या m = 375 kg
∴ 900 – m = 525 kg
आगे के प्रत्येक पहिये का भार,
W1 = mg = 375 × 9.8
= 3675 न्यूटन
पीछे के प्रत्येक पहिये का भार,
W2 = 525 × 9.8
= 5145 न्यूटन
पृथ्वी द्वारा पहिये पर आरोपित बल = पृथ्वी की प्रतिक्रिया
W2 = 3675 न्यूटन
इसी प्रकार, प्रत्येक पीछे के पहिये पर पृथ्वी द्वारा आरोपित बल = पृथ्वी की प्रतिक्रिया
W2 = 5145 न्यूटन

प्रश्न 7.10
(a) किसी गोले का, इसके किसी व्यास के परितः जड़त्व आघूर्ण 2MR2/5है, जहाँ M गोले का द्रव्यमान एवं R इसकी त्रिज्या है। गोले पर खींची गई स्पर्श रेखा के परितः इसका जड़त्व आघूर्ण ज्ञात कीजिए। (b) M द्रव्यमान एवं R त्रिज्या वाली किसी डिस्क का इसके किसी व्यास के परितः जड़त्व आघूर्ण MR2/4 है। डिस्क के लम्बवत् इसकी कोर से गुजरने वाली अक्ष के परितः इस चकती का जड़त्व आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
(a) माना व्यास AB के परित: R त्रिज्या के गोले का जड़त्व आघूर्ण IAB है। जबकि गोले का द्रव्यमान m है।
∴ IAB = \(\frac{2}{5}\) MR2
माना गोले के व्यास AB के समान्तर स्पर्शी CD है।
∴ समान्तर x – अक्षों की प्रमेय से,
स्पर्श रेखा के परितः गोले का जड़त्व आघूर्ण
ICD = IAB + MR2
= \(\frac{2}{5}\) MR2 + MR2
= \(\frac{7}{5}\) MR2
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(b) माना M द्रव्यमान तथा R त्रिज्या के गोले के दो कास AB व CD हैं। माना चकती के लम्बवत् इसके द्रव्यमान केन्द्र O से गुजरने वाली अक्ष EF है। चकती के लम्बवत् अक्ष DG है जोकि चकती की परिधि पर स्थित बिन्दु D से गुजरती है। अर्थात् DG, EF के समान्तर है। माना चकती का EF अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण IEF है।
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∴ लम्बवत् अक्षों की प्रमेय से,
IEE = IAB + ICD
= \(\frac{1}{2} M R^{2}\) + MR2 = \(\frac{3}{2} M R^{2}\)

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प्रश्न 7.11
समान द्रव्यमान और त्रिज्या के एक खोखले बेलन और एक ठोस गोले पर समान परिमाण के बल आघूर्ण लगाये गये हैं। बेलन अपनी सामान्य सममित अक्ष के परितः घूम सकता है और गोला अपने केन्द्र से गुजरने वाली किसी अक्ष के परितः एक दिये गये समय के बाद दोनों में कौन अधिक कोणीय चाल प्राप्त कर लेगा?
उत्तर:
माना खोखले बेलन व ठोस गोले के द्रव्यमान व त्रिज्या क्रमश: M व R हैं।
माना खोखले बेलन का सममित के परित: जड़त्व आघूर्ण L1 है तथा ठोस गोले का केन्द्र के परितः जड़त्व आघूर्ण I2 है।
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माना प्रत्येक पर लगाया गया बलाघूर्ण \(\hat { i } \) है। माना α1 व α2, क्रमश: बेलन व गोले पर कोणीय त्वरण हैं।
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माना ω1, व ω2 किसी क्षण t पर बेलन व गोले की कोणीय चाल है।
∴ ω1 = ω0 + α1t ………….. (iv)
व ω2 = ω0 + α2t
= ω0 + 2.5 α1t
समी० (iv) व (v) से
ω2 > ω1 अर्थात् गोले की कोणीय चाल बेलन से अधिक होगी।

प्रश्न 7.12
20 kg द्रव्यमान का कोई ठोस सिलिंडर अपने अक्ष के परितः 100 rad s-1 की कोणीय चाल से घूर्णन कर रहा है। सिलिंडर की त्रिज्या 0.25 m है। सिलिंडर के घूर्णन से संबद्ध गतिज ऊर्जा क्या है? सिलिंडर का अपने अक्ष के परितः कोणीय संवेग का परिमाण क्या है?
उत्तर:
दिया है:
m = 20 किग्रा
R = 0.25 मीटर
ω = 100 रेडियन प्रति सेकण्ड
माना बेलन की अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण I है
तब I = \(\frac{1}{2} M R^{2}\)
= \(\frac{1}{2}\) × 20 × (0.25)2
= 0.625 किग्रा-मीटर2
∴ घूर्णन करते बेलन की गतिज ऊर्जा
K.E. = \(\frac{1}{2}\) Iω2
= \(\frac{1}{2}\) × 0.625 × (100)2
= \(\frac{1}{2}\) × 0.625 × \(\frac{10^{4}}{10^{3}}\) =3125 JKE
हम जानते हैं कि,
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= 62.5 JS

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प्रश्न 7.13
(a) कोई बच्चा किसी घूर्णिका (घूर्णीमंच) पर अपनी दोनों भुजाओं को बाहर की ओर फैलाकर खड़ा है। घूर्णिका को 40 rev/min की कोणीय चाल से घूर्णन कराया जाता है। यदि बच्चा अपने हाथों को वापस सिकोड़ कर अपना जड़त्व आघूर्ण अपने प्रारंभिक जड़त्व आघूर्ण का 2/5 गुना कर लेता है, तो इस स्थिति में उसकी कोणीय चाल क्या होगी? यह मानिए कि घूर्णिका की घूर्णन गति घर्षणरहित है।
(b) यह दर्शाइए कि बच्चे की घूर्णन की नयी गतिज ऊर्जा उसकी आरंभिक घूर्णन की गतिज ऊर्जा से अधिक है। आप गतिज ऊर्जा में हुई इस वृद्धि की व्याख्या किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
(a) माना बच्चे का प्रारम्भिक व अन्तिम जड़त्व आघूर्ण क्रमशः I1 व I2 है।
अतः
∴ I2 = \(\frac{2}{5}\) I1 दिया है।
v1 = 40 rev/min = \(\frac{40}{60}\) rev/min
v2 = ?
∴ ω1 = 2πv1
= \(\frac{2π×40}{60}\) rads-1
= \(\frac{4}{5}\) π रेडियन प्रति सेकण्ड
माना बच्चे को बाहर की ओर हाथ फैलाकर व सिकोड़कर घूर्णीय चाल क्रमश: ω1, व ω2 है।
रेखीय संवेग संरक्षण के नियम से,
I1ω1 = I2ω2
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∴ घूर्णन आवृत्ति v2
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= 100 चक्र प्रति मिनट
∴ v2 = 100 चक्र प्रति मिनट

(b) घूर्णन की प्रा० गतिज ऊर्जा
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स्पष्ट है कि हाथ सिकोड़कर बच्चे की घूर्णन गतिज ऊर्जा, घूर्णन की प्रा० गतिज ऊर्जा से \(\frac{5}{2}\) गुना अधिक है। अन्तिम स्थिति में गतिज ऊर्जा में वृद्धि, बच्चे की आन्तरिक ऊर्जा के कारण होती है।

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प्रश्न 7.14
3 kg द्रव्यमान तथा 40 cm त्रिज्या के किसी खोखले सिलिंडर पर कोई नगण्य द्रव्यमान की रस्सी लपेटी गई है। यदि रस्सी को 30 Nबल से खींचा जाए तो सिलिंडर का कोणीय त्वरण क्या होगा? रस्सी का रैखिक त्वरण क्या है? यह मानिए कि इस प्रकरण में कोई फिसलन नहीं है।
उत्तर:
दिया है:
बेलन का द्रव्यमान,
M = 3 kg
बेलन की त्रिज्या R = 0.4 m
स्पर्शरेखीय बल F = 30 N
a = ?
α = ?
माना खोखले बेलन का अक्ष के परितः जड़त्व घूर्णन है।
अतः I = MR2
= 3(0.4)2
= 0.48 kg m2
माना बेलन पर आरोपित बलाघूर्णन t है।
अतः τ = FR = 30 × 0.4 = 12 Nm
∴ α = \(\frac{τ}{1}\) = \(\frac{12}{0.48}\) = 25 rad-2
α = Rα = 0.4 × 25

प्रश्न 7.15
किसी घूर्णक (रोटर) की 200 rads-1 की एकसमान कोणीय चाल बनाए रखने के लिए एक इंजन द्वारा 180 Nm का बल आघूर्ण प्रेषित करना आवश्यक होता है। इंजन के लिए आवश्यक शक्ति ज्ञात कीजिए। (नोट : घर्षण की अनुपस्थिति में एकसमान कोणीय वेग होने में यह समाविष्ट है कि बल का आघूर्ण शून्य है। व्यवहार में लगाए गए बल आघूर्ण की आवश्यकता घर्षणी बल आघूर्ण को निरस्त करने के लिए होती है।) यह मानिए कि इंजन की दक्षता 100% है।
उत्तर:
दिया है:
ω = 200 रेडियन प्रति सेकण्ड
τ = 180 न्यूटन मीटर
P = ?
सम्बन्ध P = τw से,
P = 180 × 200
= 36000 वॉट
= 36 किलो वॉट

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प्रश्न 7.16
R त्रिज्या वाली समांग डिस्क से R/2 त्रिज्या का एक वृत्ताकार भाग काट कर निकाल दिया गया है। इस प्रकार बने वृत्ताकार सुराख का केन्द्र मूल डिस्क के केन्द्र से R/2 दूरी पर है। अवशिष्ट डिस्क के गुरुत्व केन्द्र की स्थिति ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रारम्भिक चकती की त्रिज्या = R
काटकर अलग की गई चकती की त्रिज्या = \(\frac{R}{2}\)
माना A व a चकतियों के क्षे० हैं।
अतः A = πR2
तथा a = π(\(\frac{R}{2}\))2 = \(\frac{\pi R^{2}}{4}\)
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यहाँ O प्रारम्भिक चकती का केन्द्र है।
तथा O1 अलग किए गए गोल भाग का केन्द्र है।
व O2 बचे हुए भाग का केन्द्र है।
p = डिस्क का प्रति एकांक क्षेत्रफल द्रव्यमान है।
माना m1 व m वास्तविक चकती व अलग किए गए चकती के द्रव्यमान है।
अतः m1 = ρA = πR2ρ
तथा m = ρa = \(\frac{\pi R^{2}}{4}\)ρ
माना शेष बचे भाग का द्रव्यमान m है।
अतः m2 = m1 – m
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माना मूल बिन्दु O है।
माना Rcm बचे भाग का द्रव्यमान केन्द्र है।
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ऋणात्मक चिह्न यह व्यक्त करता है कि बचे भाग का द्रव्यमान केन्द्र O से बाईं ओर है जोकि कटे भाग के केन्द्र के विपरीत ओर है।

प्रश्न 7.17
एक मीटर छड़ के केन्द्र के नीचे क्षुर – धार रखने पर वह इस पर संतुलित हो जाती है जब दो सिक्के, जिनमें प्रत्येक का द्रव्यमान 5g है, 12.0 cm के चिह्न पर एक के ऊपर एक रखे जाते हैं तो छड़ 45.0 cm चिह्न पर संतुलित हो जाती है। मीटर छड़ का द्रव्यमान क्या है?
उत्तर:
माना m ग्राम = द्रव्यमान/छड़ की ल० सेमी
माना m मीटर का कुल द्रव्यमान व m = 100 ग्राम है।
जब मीटर केन्द्र पर सन्तुलित होता है, तब प्रत्येक भाग का द्रव्यमान = 50 मी/ग्राम
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माना 12 सेमी चिह्न पर रखे दो सिक्कों का द्रव्यमान m2 है।
m2 = 5 × 2 = 10 ग्राम
द्रव्यमान केन्द्र = 45 सेमी के चिह्न पर (बिन्दु A)
चूँकि छड़ी सन्तुलन में है। अतः बिन्दु A के परित: अलग-अलग द्रव्यमानों का आघूर्ण समान है।
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या (3025 – 1089 – 936)
m = 330 × 2 = 660
या 1000m = 660
या m = 0.66 ग्राम
M = 100m = 100 × 0.66 = 66 ग्राम

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प्रश्न 7.18
एक ठोस गोला, भिन्न नति के दो आनत तलों पर एक ही ऊँचाई से लुढ़कने दिया जाता है।
(a) क्या वह दोनों बार समान चाल से तली में पहुँचेगा?
(b) क्या उसको एक तल पर लुढ़कने में दूसरे से अधिक समय लगेगा?
(c) यदि हाँ, तो किस पर और क्यों?
उत्तर:
माना तल – 1 पर निम्न बिन्दु से शिखर तक चली दूरी व झुकाव क्रमशः l2 व θ1 है।
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तथा तल – 2 पर निम्न बिन्दु से शिखर तक चली दूरी व झुकाव क्रमश: l2 व θ2 है।
स्पष्ट है कि θ1 > θ2
∴ sin θ1 > sin θ2
या \(\frac{\sin \theta_{1}}{\sin \theta_{2}}>1\) > 1 …………….. (i)
प्रत्येक झुके तल की ऊँचाई,
λ = 14 l1 sinθ 1 = l2 sin θ2 (a) है।
तल के शिखर पर, गोले में केवल स्थितिज ऊर्जा होगी। i.e., PE = mgh
जहाँ m = गोले का द्रव्यमान है।
जब गोला शिखर से निम्न बिन्दु तक लुढ़कता है, तो स्थितिज ऊर्जा, रैखिक गतिज ऊर्जा (\(\frac{1}{2}\) Iω2) में परिवर्तित हो जाती है। जहाँ I गोले का जड़त्वाघूर्ण है। माना तल के निम्न बिन्दु पर रेखीय वेग v व कोणीय चाल के ω है।
माना v1 व v2 क्रमशः दोनों तलों (1 व 2) पर निम्न बिन्दु पर रेखीय वेग है।
अत:
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जहाँ K घूर्णन त्रिज्या है।
समी० (ii) व (iii) से स्पष्ट है कि प्रत्येक स्थिति में गोला निम्न बिन्दु पर समान वेग से लौटता है।

(b) हाँ, यह तल – 1 पर तल – 2 से अधिक समय लेगा। यह समय कम झुकाव वाले तल के लिए अधिक होगा।
व्याख्या: माना तल – 1 व तल – 2 पर फिसलने में लिया गया समय क्रमशः t1 व t2 है।
ठोस गोले के लिए,
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हम जानते हैं कि, झुके तल पर वस्तु का त्वरण निम्न है –
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जहाँ θ = झुकाव
माना झुके तल – 1 व 2 पर गोले के त्वरण क्रमशः a1 व a2 है।
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पुनः माना तल 1 व 2 पर फिसलने का समय क्रमश: t1 व t2 2 है। अतः
सूत्र S = ut + \(\frac{1}{2}\)at2 से,
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समी० (iv) को भाग देने पर
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समी० (vi) व (vii) से,
\(\frac{t_{1}}{t_{2}}\) < 1 t1 < t2
समय t, झुकाव कोण θ पर निर्भर करता है। अतः झुकाव कोण जितना कम होगा, गोला लुढ़कने में उतना ही अधिक समय लेगा।

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प्रश्न 7.19
2 m त्रिज्या के एक वलय (छल्ले) का भार 100 kg है। यह एक क्षैतिज फर्श पर इस प्रकार लोटनिक गति करता है कि इसके द्रव्यमान केन्द्र की चाल 20 cm/s हो। इसको रोकने के लिए कितना कार्य करना होगा?
उत्तर:
दिया है:
r = 2 मीटर
m = 100 किग्रा
द्रव्यमान केन्द्र का वेग,
y = 20 cms-1
= 0.20 मीटर/सेकण्ड
रोकने में व्यय कार्य = ?
माना वलय का कोणीय वेग ω है।
अतः ω = \(\frac{v}{r}\) = \(\frac{0.20}{2}\) = 0.10 सेकण्ड/से०
माना वलय का केन्द्र से गुजरती व तल के लम्बवत् अक्ष के परितः जड़त्वाघूर्णन I है।
1 = mr2
= 100 × (2)2
= 400 kgm2
वलय की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा =वलय की घूर्णन गतिज ऊर्जा + वलय की रेखीय गतिज ऊर्जा
या
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= 2 + 2 + 4J
∴ कार्य ऊर्जा प्रमेय से,
रोकने में व्यय कार्य = वलय की सम्पूर्ण KE
= 4 जूल

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प्रश्न 7.20
ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान 5.30 × 10-26 kg है तथा इसके केन्द्र से होकर गुजरने वाली और इसके दोनों परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के लम्बवत् अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण 1.94 × 10-46 kg m2 है। मान लीजिए कि गैस के ऐसे अणु की औसत चाल 500 m/s है और इसके घूर्णन की गतिज ऊर्जा, स्थानान्तरण की गतिज ऊर्जा की दो तिहाई है। अणु का औसत कोणीय वेग ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है:
ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान
m = 5.30 × 10-26 किग्रा
ऑक्सीजन अणु का जड़त्वाघूर्णन
I = 1.94 × 10-46 किग्रा – मीटर
अणु का मध्य वेग v = 500 ms-1
औसत कोणीय चाल = ?
प्रश्नानुसार, घूर्णन की गतिज ऊर्जा,
\(\frac{2}{3}\) × रैखिक गतिज ऊर्जा KE
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प्रश्न 7.21
एक बेलन 30° कोण बनाते आनत तल पर लुढ़कता हुआ ऊपर चढ़ता है। आनत तल की तली में बेलन के द्रव्यमान केन्द्र की चाल 5 m/s है।
(a) आनत तल पर बेलन कितना ऊपर जायेगा?
(b) वापस तली तक लौट आने में इसे कितना समय लगेगा?
उत्तर:
दिया है:
θ = 30°
तलों में बेलन के द्रव्यमान केन्द्र की चाल, u = 5 मीटर/सेकण्ड

(a) आनत तल पर लुढ़कते बेलन का त्वरण = -a
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माना बेलन ठोस है, तब K2 = \(\frac{R^{2}}{2}\)
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माना तल पर चली दूरी S है।
∴ v = 0
सूत्र v2 = u2 = 2as से,

(b) माना तली तक आने में बेलन को T समय लगता है।
∴ T = 2t जहाँ t आने या जाने का समय है।
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s = 3.83 मीटर
दिया है:
प्रा० वेग = 0
∴ सूत्र s = ut + \(\frac{1}{2}\) at2 से,
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प्रश्न 7.22
जैसा चित्र में दिखाया गया है, एक खड़ी होने वाली सीढ़ी के दो पक्षों BA और CA की लम्बाई 1.6 m है और इनको A पर कब्जा लगा कर जोड़ा गया है। इन्हें ठीक बीच में 0.5 m लम्बी रस्सी DE द्वारा बाँधा गया है। सीढ़ी BA के अनुदिश B से 1.2 m की दूरी पर स्थित बिन्दु F से 40 kg का एक भार लटकाया गया है। यह मानते हुए कि फर्श घर्षण रहित है और सीढ़ी का भार उपेक्षणीय है, रस्सी में तनाव और सीढ़ी पर फर्श द्वारा लगाया गया बल ज्ञात कीजिए। (g = 9.8 m/s2 लीजिए) (संकेत : सीढ़ी के दोनों ओर के संतुलन पर अलगअलग विचार कीजिए)
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उत्तर:
दिया है:
AB = AC = 1.6 मीटर
DE = 0.5 मीटर
AD = DB = AE = EC = \(\frac{1.6}{2}\) = 0.8 मीटर
BF = 1.2 मीटर
AF = 0.4 मीटर
माना रस्सी में तनाव = T
फर्श द्वारा सीढ़ी पर बिन्दु B व C पर आरोपित बल
= N’B NC = ?
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W = 40 kg wt = 40 × 9.8 N = 392 N
माना = A’ = DE का मध्य बिन्दु
∴ DA’ = \(\frac{5}{2}\) = 25 m
DF’ = 125 m चित्र में स्पष्ट है कि
NB = Nc = W = 392 N ………… (i)
माना सीढ़ी AB व AC अलग-अलग सन्तुलन में है। A के परितः विभिन्न बलों का आघूर्ण लेने पर
NB × BC’ = W × DF’ + T × AA’ (AB सीढ़ी के लिए)
या NB × AB cos θ
= W × 0.125 + T × 0.8 sin θ ……………. (ii)

इसी सीढ़ी AC के लिए,
या NC × CC’ = T × AA’
या NC × AC cos θ = T × 0.8 sin θ ……………… (iii)

∆DEF’ में,
cos θ = \(\frac{DF’}{DF}\) = \(\frac{0.125}{0.4}\)
= 0.3125 = cos θ 72.8°
∴ θ = 72.8′
∴ sin θ = 0.9553
tan θ = 3.2305
∴ समी० (ii) व (iv) से,
NB × 0.6 × 0.135 = 0.392 × 0.125 + T × 0.8 × 0.9553
या 0.5 NB = 0.764 + 49 …………… (v)
इसी प्रकार,
NC + 1.6 × 0.3125 = T × 0.8 × 0.9553
या 0.5NC = 0.764T
समी० (v) व (vi) से,
NC + 1.6 × 0.3125 = T × 0.8 x 0.9553
या 0.5NC = 0.764T …………… (vi)
समी० (v) व (vi) से,
0.5NB = 0.5NC + 49
या \(\frac{1}{2}\) (NB – NC) = 49
या NB – NC = 98 ………….. (vii)
समी० (i) व (vii) को जोड़ने पर,
2NB = 392 + 98 = 450
∴ NB = 225 N
∴ NC = NB – 98
= 225 – 98 = 147 N ……. (viii)
∴ समी० (vi) व (viii) से,
0.5 × \(\frac{147}{0.764}\) = 96.2 N

Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति

प्रश्न 7.23
कोई व्यक्ति एक घूमते हुए प्लेटफॉर्म पर खड़ा है। उसने अपनी दोनों बाहें फैला रखी हैं और उनमें से प्रत्येक में 5 kg भार पकड़ रखा है। प्लेटफॉर्म का कोणीय चाल 30 rev/min है। फिर वह व्यक्ति बाहों को अपने शरीर के पास ले आता है जिससे घूर्णन अक्ष से प्रत्येक भार की दूरी 90 cm से बदल कर 20 cm हो जाती है। प्लेटफॉर्म सहित व्यक्ति के जड़त्व आघूर्ण का मान 7.6 kg m2 ले सकते हैं।
(a) उसका नया कोणीय वेग क्या है? (घर्षण की उपेक्षा कीजिए)
(b) क्या इस प्रक्रिया में गतिज ऊर्जा संरक्षित होती है? यदि नहीं, तो इसमें परिवर्तन का स्त्रोत क्या है?
उत्तर:
दिया है:
प्रत्येक हाथ में द्रव्यमान = 5 किग्रा
r1 = 90 cm = 0.90 मीटर
r2 = 20 cm = 0.20 मीटर
आदमी तथा प्लेटफॉर्म का जड़त्व आघूर्ण,
1 = 7.6 kgm2
माना r1 व r2 दूरी पर जड़त्वाघूर्ण क्रमशः I’1 व I’2 है।
तब सूत्र I = mr2 से,
I’1 = 2m × \(r_{\mathrm{1}}^{2}\)
= 2 × 5 × (0.2)2
= 8.1 kgm2
I’2 = 2m × \(r_{\mathrm{2}}^{2}\)
= 2 × 5 × (0.2)2
= 0.4 kgm2
माना r1 व r2 दूरी पर निकाय (व्यक्ति + भार + प्लेटफॉर्म) का जड़त्वाघूर्ण क्रमशः
I1 व I है।
तब –
I1 = I’1 + I = 8.1 + 7.6 = 15.7 kgm2 तथा
I2 = I’2I
= 0.4 + 7.6 = 8.0 kgm2
v1 = 30 rpm = \(\frac{30}{60}\) = \(\frac{1}{2}\) ps
ω1 = 2πv1 = 2π × \(\frac{1}{2}\) = π rads-1
माना r2 दूरी पर नवीन कोणीय चाल ω2 है।
∴ कोणीय संवेग संरक्षण के नियम से,
या I1ω1 = I2ω2
15.7 × π = 8 × ω2
या ω2 = 15.7 \(\frac{π}{8}\)
= 1.9625 π rads-1
∴ कोणीय आवृत्ति v2 निम्न है –
v2 = \(\frac{\omega_{2}}{2 \pi}\) = \(\frac{1.9625}{2π}\) × π rps
= \(\frac{1.9625}{2}\) × 60 rpm
= 58.875 rpm
= 58.9 rpm
= 59 rpm
नहीं, यहाँ गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं होगी? चूँकि घूर्णनी गति में कोणीय संवेग संरक्षित रहता है। अत: यह आवश्यक नहीं है कि घूर्णनी गतिज ऊर्जा भी संरक्षित रहे जिसे निम्न रूप में समझाया जा सकता है –
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अर्थात् I के घटने पर घूर्णनी KE बढ़ती है। KE में यह परिवर्तन (i.e., वृद्धि) वस्तु के जड़त्वाचूर्ण को कम करने में व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य के व्यय होने के कारण होता है।

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प्रश्न 7.24
10g द्रव्यमान और 500 m/s चाल वाली बन्दूक की गोली एक दरवाजे के ठीक केन्द्र में टकराकर उसमें अंत:स्थापित हो जाती है। दरवाजा 1.0 m चौड़ा है और इसका द्रव्यमान 12 kg है। इसके एक सिरे पर कब्जे लगे हैं और यह इनसे गुजरती एक ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः लगभग बिना घर्षण के घूम सकता है। गोली के दरवाजे में अंत:स्थापन के ठीक बाद इसका कोणीय वेग ज्ञात कीजिए। (संकेत : एक सिरे से गुजरती ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः दरवाजे का जड़त्व-आघूर्ण ML2/3 है)
उत्तर:
दिया है:
गोली का द्रव्यमान
m = 10g = 0.01
किग्रा गोली का वेग v = 500 मीटर/से०
दरवाजे की चौ० b = 1.0 मीटर
दरवाजे का द्र० M = 12 किग्रा
कोणीय चाल = ?
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
\(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\) Iω2
माना कब्जे वाली भुजा के परितः जड़त्वाघूर्ण है।
∴ I = \(\frac{1}{3}\) (M + m) (\(\frac{b}{2}\))2
(∵ द्रव्यमान केन्द्र से दूरी = \(\frac{b}{2}\) तथा गोली दरवाजे में है।)
\(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{3}\) (M + m) (\(\frac{b}{2}\))2
\(\frac{1}{2}\) mv2 = \(\frac{1}{2}\) × \(\frac{1}{3}\) (M + m) \(\frac{b^{2}}{4}\) ω2
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= 49.98 रेडियन/सेकण्ड

प्रश्न 7.25
दो चक्रिकाएँ जिनके अपने-अपने अक्षों (चक्रिका के अभिलंबवत् तथा चक्रिका के केंद्र से गुजरने वाले) के परितः जड़त्व आघूर्ण I1 तथा I2 हैं और जो तथा ω1 तथा ω2 कोणीय चालों से घूर्णन कर रही है, को उनके घूर्णन अक्ष संपाती करके आमने-सामने लाया जाता है?
(a) इस दो चक्रिका निकाय की कोणीय चाल क्या है?
(b) यह दर्शाइए कि इस संयोजित निकाय की गतिज ऊर्जा दोनों चक्रिकाओं की आरंभिक गतिज ऊर्जाओं के योग से कम है। ऊर्जा में हुई इस हानि की आप कैसे व्याख्या करेंगे? ω1 ≠ ω2 लीजिए।
उत्तर:
माना I1 व I2 जड़त्व आघूर्ण वाली चकतियों की कोणीय चाल क्रमशः ω1 व ω2 है। सम्पर्क में लाने पर दोनों चकतियों के निकाय का जड़त्व आघूर्ण I1 + I2 होगा।
माना ω = पूरे निकाय की कोणीय चाल है।

(a) ∵ दोनों चकतियों के कुल प्रा० कोणीय संवेग,
L1 = I1 ω1 + I2ω2
संयुक्त निकाय का कुल अन्तिम कोणीय संवेग,
L2 = L1
या (I1 + I2)ω = I1ω1 + I2ω1
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(b) दोनों चकतियों की प्रा० गतिज ऊर्जा
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संयुक्त निकाय की अन्तिम KE.
E2 = \(\frac{1}{2}\) (I1 + I22 ………….. (iii)
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समी० (i) व (ii) से,
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जोकि धनात्मक राशि है।
अतः E1 – E2 > 0 या E1 > E2
या E2 > E1 अर्थात् पूरे निकाय की घूर्णनी गतिज ऊर्जा दोनों चकतियों की प्रारम्भिक ऊर्जाओं के योग से कम है। अतः दो चकतियों को सम्पर्क में लाने पर, गतिज ऊर्जा में कमी आती है। यह कमी दोनों चक्रिकाओं की सम्पर्कित सतहों के बीच घर्षण के बल के कारण होती है।

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प्रश्न 7.26
(a) लम्बवत् अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें। संकेत (x, y) तल के लम्बवत् मूल बिन्दु से गुजरती अक्ष से किसी बिन्दु x – y की दूरी का वर्ग (x2 + y2) है
(b) समांतर अक्षों के प्रमेय की उपपत्ति करें(संकेत : यदि द्रव्यमान केन्द्र को मूल बिन्दु ले लिया जाये तो Σmiri = 0)
उत्तर:
(a) समकोणिक (लम्ब) अक्षों की प्रमेयकिसी समतल पटल को उसके तल में ली गई दो परस्पर लम्बवत् अक्षों OX तथा OY के परित: जड़त्व आघूर्णों का योग इन अक्षों के कटान बिन्दु O में को जाने वाली तथा पटल के तल के लम्बवत् अक्ष OZ के परित: जड़त्व आघूर्ण के बराबर होता है। पटल का अक्ष OZ के परितः जड़त्व आघूर्ण Iz = Iz + Iy
जहाँ Iz तथा Iy पटल का क्रमश: अक्ष OX तथा OY के परितः जड़त्व आघूर्ण है।

सिद्ध करना:
माना एक पटल है जिसके तल में दो परस्पर लम्बवत् अक्षं OX तथा OY ली गई हैं अक्ष OZ पटल के तल के अभिलम्बवत् है तथा OX व OY के कटान बिन्दु०से गुजरती है। माना अक्ष OZ से r दूरी पर m द्रव्यमान का एक कण P है। इस कण का अक्ष OZ के परितः जड़त्व आघूर्ण mr2 होगा। अतः पूरे पटल का अक्ष OZ के परित: जड़त्व आघूर्ण
Iz = Σmr2
लेकिन r2 = x2 + y2
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जहाँ x व y कण भी क्रमश: अक्षों OY व OX से दूरियाँ हैं।
∴ I2 = Σm(x2 + y2)
= Σmx2 + Σmy2
लेकिन Ix = Σmx2 तथा Iy = Σmy2
अतः Ix = Iz + Iy

(b) समान्तर अक्षों की प्रमेय-किसी पिंड का किसी अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण (I) उस पिंड के द्रव्यमान केन्द्र में को जाने वाली समान्तर अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण (Icm) तथा पिंड के द्रव्यमान व दोनों अक्षों के बीच की लम्बवत् दूरी के वर्ग के गुणनफल के योग के बराबर होता है।
I = Icm + Ma2
जहाँ M पिंड का द्रव्यमान है तथा a दोनों अक्षों के बीच लम्बवत् दूरी है।

सिद्ध करना:
माना एक समतल पटल है जिसका द्रव्यमान केन्द्र C है। माना पटल का पटल के तल में स्थित अक्ष AB के परितः जड़त्व आघूर्ण I है तथा इसके द्रव्यमान केन्द्र C से गुजरने वाली समान्तर अक्ष EF के परितः जड़त्व आघूर्ण Icm है। माना AB तथा EF अक्षों के बीच लम्बवत् दूरी a है। माना EF अक्ष से दूरी पर m द्रव्यमान का एक कण P है। P की AB से दूरी (r + a) होगी। P का AB के परितः जड़त्व आघूर्ण m(r + a)2 होगा। अतः पूरे पटल का AB अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण
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I = Σm(r + a)2
= Σm(r2 + a2 + 2ar)
I = Σmr2 + Σma2 + 2aΣmr
अथवा I = Σmr2 + a2Σ + 2aΣmr
लेकिन Icm = Σmr2
तथा a2Σm = a2M
तथा Σmr = 0 क्योंकि किसी पटल के समस्त कणों का पटल के द्रव्यमान केन्द्र में से गुजरने वाली अक्ष के परित: आघूर्णों का योग शून्य होता है। अतः
I = Icm + Ma2

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प्रश्न 7.27
सत्र v2 = \(\frac{2 g h}{\left(1+k^{2} / R^{2}\right)}\) को गतिकीय दृष्टि (अर्थात् बलों तथा बल आघूर्णों के विचार) से व्युत्पन्न कीजिए। जहाँ v लोटनिक गति करते पिंड (वलय, डिस्क, बेलन या गोला) का आनत तल की तली में वेग है। आनत तल पर h वह ऊँचाई है जहाँ से पिंड गति प्रारंभ करता है। सममित अक्ष के परितः पिंड की घूर्णन त्रिज्या है और R पिंड की त्रिज्या है।
उत्तर:
माना M व R क्रमश: गोलीय पिंड के द्रव्यमान व त्रिज्या है, यह एक ऐसे आनत तल पर A बिन्दु पर रखा गया है जिसका क्षैतिज से झुकाव θ है। इस पिंड में A बिन्दु पर पूर्णतः स्थितिज ऊर्जा होगी।
∴ E = mgh …….. (i)
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जब यह पिंड तल पर फिसलना प्रारम्भ करता है, पिंड द्रव्यमान केन्द्र से गुजरने वाली अक्ष (i.e., c) से गुजरता है जो कि तल के समान्तर है। इसके भार व भार के घटक के कारण घूर्णनी गति नहीं होती है कि इसकी क्रिया रेखा C से गुजरती है। इस प्रकार पिंड पर लगने वाला सम्पूर्ण बलाघूर्ण शून्य होगा। घर्षण बलाघूर्ण अर्थात् घूर्णन के कारण बल लगता है।
∴ τ = FR ………….. (ii)
घूर्णन करते पिंड की सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा (E) में रैखिक गतिज ऊर्जा (Kt व घूर्णनी गतिज ऊर्जा (Kr) होती है।
i.e., E = Kt + Kr
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तथा v = Rω = घूर्णन करते पिंड का रैखिक वेग
जहाँ जे कोणीय ω वेग है।
पिंड का जड़त्व आघूर्ण, I = \(\frac{1}{2}\) mK2 जहाँ K = घूर्णन त्रिज्या।
माना पृष्ठ सतह खुरदरी है तथा पिंड बिना फिसले ही घूर्णन करता है। बिन्दु B पर, पिंड में दोनों रैखिक व घूर्णनी गतिज ऊर्जाएँ होती हैं। बिन्दु B पर सम्पूर्ण ऊर्जा समी० (iii) के अनुसार होगी।
ऊर्जा संरक्षण के नियम से,
बिन्दु A पर स्थितिज ऊर्जा = बिन्दु B पर सम्पूर्ण गतिज ऊर्जा
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प्रश्न 7.28
अपने अक्ष पर ω0 कोणीय चाल से घूर्णन करने वाली किसी चक्रिका को धीरे से (स्थानान्तरीय धक्का दिए बिना) किसी पूर्णतः घर्षणरहित मेज पर रखा जाता है। चक्रिका की त्रिज्या R है। चित्र में दर्शाई चक्रिका के बिन्दुओं A, B तथा C पर रैखिक वेग क्या हैं? क्या यह चक्रिका चित्र में दर्शाई दिशा में लोटनिक गति करेगी?
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उत्तर:
चक्रिका व मेज के मध्य घर्षण बल शून्य है। इस कारण चक्रिका लोटनिक गति नहीं कर पाएगी व मेज के एक ही बिन्दु B के सम्पर्क में रहते हुए अपनी अक्ष के परित: घूर्णनी गति करती रहेगी।
दिया है:
बिन्दु A की अक्ष से दूरी R है।
अतः बिन्दु A पर रैखिक वेग,
VA = Rω0 (तीर की दिशा में)
तथा बिन्दु B पर रैखिक वेग,
VA = Rω0 (तीर की विपरीत दिशा में)
चूँकि बिन्दु C की अक्ष से दूरी \(\frac{R}{2}\) है
अतः बिन्दु C पर रैखिक वेग vc = \(\frac{R}{2}\) (क्षैतिजत: बाईं ओर से दाईं ओर को)
अर्थात् चक्रिका लोटनिक गति नहीं करेगी।

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प्रश्न 7.29
स्पष्ट कीजिए कि चित्र (प्रश्न 7.28) में अंकित दिशा में चक्रिका की लोटनिक गति के लिए घर्षण होना आवश्यक क्यों है?
(a) B पर घर्षण बल की दिशा तथा परिशुद्ध लुढ़कन आरंभ होने से पूर्व घर्षणी बल आघूर्ण की दिशा क्या है?
(b) परिशुद्ध लोटनिक गति आरंभ होने के पश्चात् घर्षण बल क्या है?
उत्तर:
(a) बिन्दु B पर घर्षण बल B के वेग का विरोध करता है। अतः घर्षण बल तीर की दिशा में होगा। घर्षण बल आघूर्ण के कार्य करने की दिशा इस प्रकार है कि वह कोणीय गति का विरोध करता है। ω0 व τ दोनों ही कागज के पृष्ठ के अभिलम्बवत् कार्य करते हैं। इनमें ω0 कागज के पृष्ठ के अंतर्मुखी व र कागज के पृष्ठ के बहिर्मुखी है।
(b) घर्षण बल सम्पर्क – बिन्दु B के वेग को कम कर देता है। जब यह वेग शून्य होता है तो चक्रिका की लोटन गति आदर्श सुनिश्चित हो जाती है। एक बार ऐसा हो जाने पर घर्षण बल का मान शून्य हो जाता है।

प्रश्न 7.30
10 cm त्रिज्या की कोई ठोस चक्रिका तथा इतनी ही त्रिज्या का कोई छल्ला किसी क्षैतिज मेज पर एक ही क्षण 10π rads-1 की कोणीय चाल से रखे जाते हैं। इनमें से कौन पहले लोटनिक गति आरंभ कर देगा। गतिज घर्षण गुणांक µk = 0.2
उत्तर:
दिया है:
छल्ले तथा ठोस चक्रिका की त्रिज्या,
R = 10 सेमी – 0.1 मीटर
µk = 0.2
छल्ले का जड़त्व आघूर्ण = MR2 …………… (i)
ठोस चक्रिका का जड़त्व आघूर्ण = \(\frac{1}{2}\)mR2 …………….. (ii)
प्रा० कोणीय वेग = ω0 = 10π रेडियन/सेकण्ड
घर्षण बल के कारण गति होती है तथा घर्षण के कारण द्रव्यमान केन्द्र त्वरित होता है। छल्ला शून्य प्रारम्भिक वेग से चलता है। प्रारम्भिक कोणीय वेग ω0 में मन्दन घर्षण बलाघूर्ण के कारण होता है।
हम जानते हैं कि F = µkN = ma
या µkmg = ma
या a = µkg ……………. (iii)
तथा बलाघूर्ण τ = -Iα
= FR = µkmgR ……………. (iv)
जहाँ R = चकती या वलय की त्रिज्या
ऋणात्मक चिह्न प्रदर्शित करता है कि मन्दन बलाघूर्ण है।
यहाँ u = 0
∴ v = u + at से
v = at or a = \(\frac{v}{t}\)
समी० (iii) से a = µkg
या \(\frac{v}{t}\) = µkg
या v = µkgt (छल्ले के लिए)
तथा = µkgt’ (चकती के लिए) …………….. (v)
समी० (iv) से
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माना छल्ले की t समय व चकती की t’ समय बाद कोणीय वेग
∴ सम्बन्ध ω = ω0 + αt से,
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एकदम फिसलने की शर्त लगाने पर (i.e., V = Rω), छल्ले के लिए
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तथा चकती के लिए,
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अतः समी० (xii) व (xiii) से स्पष्ट है कि t’ < t अर्थात् चकती पहले फिसलना प्रारम्भ करेगी।

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प्रश्न 7.31
10 kg द्रव्यमान तथा 15 cm त्रिज्या का कोई सिलिंडर किसी 30° झुकाव के समतल पर परिशुद्धतः लोटनिक गति कर रहा है। स्थैतिक घर्षण गुणांक µs = 0.25
(a) सिलिंडर पर कितना घर्षण बल कार्यरत है?
(b) लोटन की अवधि में घर्षण के विरुद्ध कितना कार्य किया जाता है?
(c) यदि समतल के झुकाव में वृद्धि कर दी जाए तो के किस मान पर सिलिंडर परिशुद्धतः लोटनिक गति करने की बजाय फिसलना आरंभ कर देगा?
उत्तर:
दिया है:
m = 10 kg, R = 0.15 m, θ = 30°, µk = 0.25
(a) बेलन पर लगने वाला घर्षण बल –
F = \(\frac{1}{3}\) mg sin θ
= \(\frac{1}{3}\) × 10 × 9.8 × sin 30° = 16.3 न्यूटन

(b) चूँकि परिशुद्ध लोटनिक गति में, सम्पर्क बिन्दु पर कोई सरकन गति नहीं है। इसलिए घर्षण बल के विरुद्ध कृत कार्य, W = 0 है।

(c) लोटनिक गति के लिए,
\(\frac{F}{R}\) = \(\frac{1}{3}\) tan θ ≤ µs
∴ tan θ = 3µs
= 3 × 0.25 = 0.75
∴ θ = tan-1(0.75)
= 37°

प्रश्न 7.32
नीचे दिए गए प्रत्येक प्रकथन को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा कारण सहित उत्तर दीजिए कि इनमें से कौन-सा सत्य है और कौन-सा असत्य है –

  1. लोटनिक गति करते समय घर्षण बल उसी दिशा में कार्यरत होता है जिस दिशा में पिंड का द्रव्यमान केंद्र गति करता है।
  2. लोटनिक गति करते समय संपर्क बिंदु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
  3. लोटनिक गति करते समय संपर्क बिन्दु का तात्क्षणिक त्वरण शून्य होता है।
  4. परिशुद्ध लोटनिक गति के लिए घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
  5. किसी पूर्णतः घर्षणरहित आनत समतल पर नीचे की ओर गति करते पहिए की गति फिसलन गति (लोटनिक गति नहीं) होगी।

उत्तर:

  1. सत्य, चूँकि स्थानान्तरीय गति घर्षण बल के कारण ही उत्पन्न होती है। इसी बल के कारण पिंड का द्रव्यमान आगे की ओर बढ़ता है।
  2. सत्य, चूँकि लोटनिक गति, सम्पर्क बिन्दु पर सी गति के समाप्त होने पर प्रारम्भ होती है। इस प्रकार परिशुद्ध लोटनिक गति में सम्पर्क बिन्दु की तात्क्षणिक चाल शून्य होती है।
  3. असत्य चूँकि घूर्णन गति के कारण, सम्पर्क बिन्दु की गति में अभिकेन्द्र त्वरण अवश्य ही विद्यमान होता है।
  4. सत्य चूँकि परिशुद्ध लोटनिक गति में सम्पर्क बिन्दु पर कोई सरकन नहीं होता है। इस कारण घर्षण बल के विरुद्ध किया गया कार्य शून्य होता है।
  5. सत्य, घर्षण के न होने पर आनत तल पर छोड़े गए पहिए का आनत तल के साथ सम्पर्क बिन्दु विरामावस्था में नहीं रहेगा बल्कि पहिए के भार के अधीन माना तल के अनुदिश फिसलता जाएगा। इस कारण यह गति लोटनिक न होकर विशुद्ध सरकन गति होगी।

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प्रश्न 7.33
कणों के किसी निकाय की गति को इसके द्रव्यमान केन्द्र की गति और द्रव्यमान केन्द्र के परितः गति में अलग-अलग करके विचार करना।
दर्शाइये कि –
(a) P = p’i + miV
जहाँ pi (mi द्रव्यमान वाले) i – वें कण का संवेग है, और P’i = miv’i। ध्यान दें कि द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष i – वें कण का वेग है। द्रव्यमान केन्द्र की परिभाषा का उपयोग करके यह भी सिद्ध कीजिए कि Σp’i = 0
(b) K = K’ + \(\frac{1}{2}\) MV2
K कणों के निकाय की कुल गति ऊर्जा, K’ = निकाय की कुल गतिज ऊर्जा जबकि कणों की गतिज ऊर्जा द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष ली जाये। MV2/2 संपूर्ण निकाय के (अर्थात् निकाय के द्रव्यमान केन्द्र के) स्थानान्तरण की गतिज ऊर्जा है। इस परिणाम का उपयोग भाग 7.14 में किया गया है।

(c) L = Σ + R × MV
जहाँ L’ = r’i × P’i द्रव्यमान के परितः निकाय का कोणीय संवेग है जिसकी गणना में वेग द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष मापे गये हैं। याद कीजिए r’i = ri – R; शेष सभी चिह्न अध्याय में प्रयुक्त विभिन्न राशियों के मानक चिह्न हैं। ध्यान दें कि L’ द्रव्यमान केन्द्र के परितः निकाय का कोणीय संवेग एवं MR × V इसके द्रव्यमान केन्द्र का कोणीय संवेग है।

(d) \(\frac{dL’}{dt}\) = Σr’i × \(\frac{dp’}{dt}\)
यह भी दर्शाइये कि
\(\frac{dL’}{dt}\) = τ’ext
(जहाँ τ’ext द्रव्यमान केन्द्र के परितः निकाय पर लगने वाले सभी बाह्य बल आघूर्ण हैं।)
[संकेत : द्रव्यमान केन्द्र की परिभाषा एवं न्यूटन के गति के तृतीय नियम का उपयोग कीजिए। यह मान लीजिए कि किन्हीं दो कणों के बीच के आन्तरिक बल उनको मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कार्य करते हैं।]
उत्तर:
(a) माना कि m1m2 … mn, दृढ़ पिंड की रचना करने वाले कणों के द्रव्यमान हैं तथा मूल बिन्दु O (0, 0) के सापेक्ष इन कणों के स्थिति सदिश क्रमश:
\(\vec{r}_{1}\), \(\vec{r}_{2}\) …………. \(\vec{r}_{n}\) हैं।
माना कि मूल बिन्दु के सापेक्ष द्रव्यमान केन्द्र (G) की स्थिति सदिश \(\vec{R}\) व द्रव्यमान केन्द्र के सापेक्ष अलग-अलग कणों की
स्थिति क्रमश: \(\vec{r}_{1}\), \(\vec{r}_{2}\) ………………. \(\vec{r}_{n}\) हैं।
Bihar Board Class 11 Physics Chapter 7 कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
t के सापेक्ष दोनों ओर का अवकलन करने पर,
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(d) माना कि कणों के निकाय पर बलाघूर्ण लगाया जाता है।
माना कि कण के लिए \(\vec{L}\) के घटक Lx, Ly व Lz क्रमशः x, y, z व : अक्षों के अनुदिश हैं। माना कि px, py व pz इसके रैखिक संवेग के घटक हैं।
Lz = xpy – yPx
Lx = ypz – zpy
Ly = zpx – xpz
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किसी कण के कोणीय संवेग की परिवर्तन दर,
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माना निकाय का सम्पूर्ण कोणीय संवेग \(\vec{L}\) है।
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हम जानते हैं कि निकाय पर लगने पर सम्पूर्ण बाह्य बलाघूर्ण τ’ext है। अतः
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[∵ बाह्य बल सदैव युग्म में होता है व निरस्त करते हैं।]
∴ समी० (i) व (ii) से,
\(\frac{d \vec{L}_{i}}{d t}\) = τ’ext

Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 12 ऊष्मागतिकी

Bihar Board Class 11 Physics Solutions Chapter 12 ऊष्मागतिकी Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Physics ऊष्मागतिकी Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 12.1
कोई गीजर 3.0 लीटर प्रति मिनट की दर से बहते हुए जल को 27°C से 77°C तक गर्म करता है। यदि गीजर का परिचालन गैस बर्नर द्वारा किया जाए तो ईंधन के व्यय की क्या दर होगी? बर्नर के ईंधन की दहन-ऊष्मा 4.0 × 104 Jg-1 है?
उत्तर:
दिया है:
ताप में वृद्धि
∆T = (77 – 27)°C
= 50°C
\(S_{\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}}\) = 4.2 × 103 Jkg-1°C-1
ईंधन की दहन ऊष्मा
HC = 4 × 104 Jg-1
प्रति मिनट प्रवाहित जल का द्रव्यमान, m = 3 ली
= 3 किग्रा (∴ 1 ली० = 1kg)
जल द्वारा गर्म होने के लिए ली गई ऊष्मा,
θ = ms ∆T
माना ईंधन के जलने की दर m’ प्रति मिनट है। ……………. (i)
अतः ईंधन द्वारा 1 मिनट में दी गई ऊष्मा
θ = m’HC
ईंधन द्वारा प्रति मिनट दी गई ऊष्मा = प्रति मिनट ली गई ऊष्मा।
∴ m’HC = ms ∆T
∴ m’ = \(\frac{m s \Delta T}{H_{\mathrm{C}}}\)
= \(\frac{3 \times 4.2 \times 10^{3} \times 50}{4 \times 10^{4}}\)
= 15.75 g
= 16 gm
अतः ईंधन 16 gm / मिनट की दर से जलता है।

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प्रश्न 12.2
स्थिर दाब पर 2.0 × 10-2 kg नाइट्रोजन (कमरे के ताप पर) के ताप में 45°C वृद्धि करने के लिए कितनी ऊष्मा की आपूर्ति की जानी चाहिए? (N2) का अणुभार 28; R = 8.3 Jmol-1 K-1)।
उत्तर:
दिया है:
N2 का अणु भार = 28
गैस का द्रव्यमान, m = 2 × 10-2 किग्रा
ताप वृद्धि T = 45°C
R = 8.3 जूल प्रति मोल प्रति K
आवश्यक ऊष्मा θ = ?
दी गई गैस द्रव्यमान में, ग्राम मोलों की संख्या,
µ = \(\frac{m}{2gm}\) = \(\frac{20}{8}\) = 0.714
R = 8.3 mol-1K-1
माना नियत दाब पर गैस की मोलर विशिष्ट ऊष्मा Cp है।
Cp = \(\frac{7}{2}\) R = \(\frac{20}{8}\) × 8.3 J mol-1 K
दी गई ऊष्मा Q = ?
सूत्र Q = nCp ∆θ से,
Q = nCp ∆θ
= 0.714 × \(\frac{7}{2}\) × 8.3 × 45 J
= 933.75 J
= 934 J

प्रश्न 12.3
व्याख्या कीजिए कि ऐसा क्यों होता है?
(a) भिन्न – भिन्न तापों T1 व T2 के दो पिण्डों को यदि ऊष्मीय संपर्क में लाया जाए तो यह आवश्यक नहीं कि उनका अंतिम ताप (T1 + T2)/2 ही हो।
(b) रासायनिक या नाभिकीय संयंत्रों में शीतलक (अर्थात् द्रव जो संयंत्र के भिन्न-भिन्न भागों को अधिक गर्म होने से रोकता है) की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होनी चाहिए।
(c) कार को चलाते-चलाते उसके टायरों में वायुदाब बढ़ जाता है।
(d) किसी बंदरगाह के समीप के शहर की जलवायु, समान अक्षांश के किसी रेगिस्तानी शहर की जलवायु से अधिक शीतोष्ण होती है।
उत्तर:
(a) इसका कारण यह है कि अन्तिम ताप वस्तुओं को अलग-अलग तापों के अतिरिक्त उनकी. ऊष्मा धारिताओं पर भी निर्भर करता है।
(b) चूँकि शीतलक संयन्त्र से अभिक्रिया जनित ऊष्मा को हटाता है अतः शीतलक की विशिष्ट ऊष्मा धारिता अधिक होनी चाहिए ताकि कम ताप-वृद्धि के लिए अधिक ऊष्मा शोषित कर सके।
(c) कार को चलाते-चलाते, सड़क के साथ घर्षण के कारण टायर का ताप बढ़ता है। इस कारण टायर में भरी हवा का दाब बढ़ जाता है।
(d) बन्दरगाह के समीप के शहरों की आपेक्षिक आर्द्रता समान अक्षांश के रेगिस्तानी शहर की तुलना में अधिक रहती है। इस कारण बन्दरगाह के समीप शहर की जलवायु रेगिस्तानी शहर की अपेक्षा शीतोष्ण बनी रहती है।

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प्रश्न 12.4
गतिशील पिस्टन लगे किसी सिलिंडर में मानक ताप व दाब पर 3 मोल हाइड्रोजन भरी है। सिलिंडर की दीवारें ऊष्मारोधी पदार्थ की बनी हैं तथा पिस्टन को उस पर बालू की परत लगाकर ऊष्मारोधी बनाया गया है। यदि गैस को उसके आरंभिक आयतन के आधे आयतन तक संपीडित किया जाए तो गैस का दाब कितना बढ़ेगा?
उत्तर:
माना V1 = x
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द्विपरमाणुक गैस का हाइड्रोजन के लिए
γ = \(\frac{7}{5}\) = 1.4
चूँकि ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता है, अतः प्रक्रम ऊष्मारोधी है।
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प्रश्न 12.5
रुद्धोष्म विधि द्वारा किसी गैस की अवस्था परिवर्तन करते समय उसकी एक साम्यावस्था A से दूसरी साम्यावस्था B तक ले जाने में निकाय पर 22.3J कार्य किया जाता है। यदि गैस को दूसरी प्रक्रिया द्वारा अवस्थाA से अवस्था B में लाने में निकाय द्वारा अवशोषित नेट ऊष्मा 9.35 cal है तो बाद के प्रकरण में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य कितना है?
उत्तर:
दिया है:
dw = 22.3J …………….. (i)
ऊष्मागतिकी के.प्रथम नियम से
∴ dQ = dU + dw’ ……………… (ii)
ऊष्मारोधी प्रक्रम के लिए dU = 0
∴ dQ = 0 + dw’ or dw’ = dQ
= 9.35 × 4.19J
दिया है:
dp = 9.35 cal (1 cal = 4.19J) …………….. (iii)
∴ समी (ii) व (iii) से,
dw’ = 9.35 × 4.19 J
= 38.97 J
माना निकाय पर कृत कार्य W’ है।
W’ = dw’ – dW
= 38.97 – 22.3
= 16.67
= 16.7J

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प्रश्न 12.6
समान धारिता वाले दो सिलिंडर A तथा B एक-दूसरे से स्टॉपकॉक के द्वारा जुड़े हैं। A में मानक ताप व दाब पर गैस भरी है जबकि B पूर्णतः निर्वातित है। स्टॉपकॉक यकायक खोल दी जाती है। निम्नलिखित का उत्तर दीजिए:
(a) सिलिंडर A तथा B में अंतिम दाब क्या होगा?
(b) गैस की आंतरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
(c) गैस के ताप में क्या परिवर्तन होगा?
(d) क्या निकाय की माध्यमिक अवस्थाएँ (अंतिम साम्यावस्था प्राप्त करने के पूर्व) इसके P – V – T पृष्ठ पर होंगी?
उत्तर:
(a) दिया है:
मानक दाब = P1 = 1 atm, V1 = V
P2 = ? तथा V2 = 2V
चूँकि सिलिंडर B निर्वातित है अतः स्टॉपकॉक खोलने पर गैस का निर्वात में मुक्त प्रसार होगा। अतः गैस न तो कोई कार्य करेगी और न ही ऊष्मा का आदान-प्रदान होगा। अर्थात् गैस की आन्तरिक ऊर्जा व ताप स्थिर रहेंगे। पुनः बॉयल के नियम से,
P1V1 = P2V2
∴ P2 = \(\frac{P_{1} V_{1}}{V_{2}}\) = \(\frac{1×V}{2v}\) = 0.5 atm

(b) चूँकि ω = 0 व θ = 0
∴ ∆V = 0
अर्थात् गैस की आन्तरिक ऊर्जा अपरिवर्तित रहेगी।

(c) चूँकि आन्तरिक ऊर्जा अपरिवर्तित रहती है। अतः गैस का ताप भी अपरिवर्तित रहेगा।

(d) चूँकि गैस का मुक्त प्रसार हुआ है। इस कारण माध्यमिक अवस्थाएँ साम्य अवस्थाएँ नहीं हैं। अतः ये अवस्थाएँ दाब-आयतन-ताप पृष्ठ पर नहीं होगी।

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प्रश्न 12.7
एक वाष्प इंजन अपने बॉयलर से प्रति मिनट 3.6 × 109 J ऊर्जा प्रदान करता है जो प्रति मिनट 5.4 × 108 J कार्य देता है। इंजन की दक्षता कितनी है? प्रति मिनट कितनी ऊष्मा अपशिष्ट होगी?
उत्तर:
दिया है:
प्रति मिनट बॉयलर द्वारा अवशोषित ऊष्मा
= Q1 = 3.6 × 109 J
भाप इंजन द्वारा प्रति मिनट कृत कार्य
= 5.4 × 108 J
प्रति मिनट व्यय/उत्सर्जित ऊष्मा = Q2 = ?
इंजन की प्रतिशत दक्षता n% = ?
हम जानते हैं कि n% = \(\frac{W}{Q_{1}} \times 100\)
∴n% = \(\frac{5.4 \times 10^{8} \mathrm{J}}{3.6 \times 10^{9} \mathrm{J}}\) × 100
= \(\frac{3}{20}\) × 100 = 15%
सूत्र, Q1 = W + Q2 से,
Q2 = Q1 – W
= 36 × 108 – 5.4 × 108
= 30.6 × 108 J/min
= 30.6 × 109 J/min
= 3.1 × 109 J/min

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प्रश्न 12.8
एक हीटर किसी निकाय को 100 W की दर से ऊष्मा प्रदान करता है। यदि निकाय 75 Js-1 की दर से कार्य करता है, तो आंतरिक ऊर्जा की वृद्धि किस दर से होगी?
उत्तर:
दिया है:
θ = 100 W = 100 Js-1
W = 75 Js-1
∴ ∆V = θ – W
= 100 – 75
= 25 Js-1
अत: निकाय की आन्तरिक ऊर्जा वृद्धि दर 25 Js-1 है।

प्रश्न 12.9
किसी ऊष्मागतिकीय निकाय को मूल अवस्था से मध्यवर्ती अवस्था तक (चित्र) में दर्शाये अनुसार एक रेखीय प्रक्रम द्वारा ले जाया गया है। एक समदाबी प्रक्रम द्वारा इसके आयतन को E से F तक ले जाकर मूल मान तक कम कर देते हैं। गैस द्वारा D से E तथा वहाँ से F तक कुल किए गये कार्य का आंकलन कीजिए।
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उत्तर:
माना गैस D से E व E से F तक कृत कार्य = W
अतः W = W1 + W2
मानां W1 = D से E तक प्रसार में कृत कार्य
= DEHGD का क्षेत्रफल = ADEF का क्षे० + आयत EHGF का क्षे० …………….. (ii)
दिया है:
EF = 5 – 2 = 3 litre = 3 × 10-3 m3
DF = 600 – 300 = 300 Nm-2
FG = 300 – 0 = 300 Nm2
GH = 5 – 2 = 3 × 10-3 m3
∴ समीकरण (ii) से,
∴W1 = [\(\frac{1}{2}\) × 3 × 10-3 × 300 + 3 × 10-3 × 300] J ……………. (iii)
माना E से F (संपीडन) तक कृत कार्य = W2 = EHGF का
= – FG × GH
= -(300 – 0) × (5 – 2) × 10-3
= – 300 × 3 × 10-3 J ……………….. (iv)
∴ समी० (i) (iii) व (iv) से,
W = \(\frac{1}{2}\) × 3 × 10-3 × 300 + 3 × 10-3
= 3 × 103 × 150 J = 450 × 10-3 J
= 0.450 J

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प्रश्न 12.10
खाद्य पदार्थ को एक प्रशीतक के अंदर रखने पर उसे 9°C पर बनाए रखता है। यदि कमरे का ताप 36°C है तो प्रशीतक के निष्पादन गुणांक का आंकलन कीजिए।
उत्तर:
दिया है:
T1 = 273 + 36 = 309 K
T2 = 9°C = 282 K
β = ?
सूत्र β = \(\frac{T_{2}}{T_{1}-T_{2}}\) से
β = \(\frac{283}{309-282}\) = \(\frac{282}{7}\) = 10.4

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 18 शरीर द्रव तथा परिसंचरण

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 18 शरीर द्रव तथा परिसंचरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology शरीर द्रव तथा परिसंचरण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
रक्त के संगठित पदार्थों के अवयवों का वर्णन करें तथा प्रत्येक अवयव के एक प्रमुख कार्य के बारे में लिखें।
उत्तर:
इसके अन्तर्गत रुधिर (blood) तथा लसीका (lymph) आते हैं। इसका तरल मैट्रिक्स प्लाज्मा (plasma) कहलाता है। प्लाज्मा में तन्तुओं का अभाव होता है। प्लाज्मा में पाई जाने वाली कोशिकाओं को रुधिराणु (corpuscles) कहते हैं। तरल ऊतक सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर वाहिनियों (vessels) और केशिकाओं (capillaries) में बहता रहता है। कोशिकाएँ या रुधिराणु स्वयं प्लाज्मा का स्राव नहीं करती हैं।

रुधिर (Blood):
रुधिर जल से थोड़ा अधिक श्यान (viscous), हल्का क्षारीय (pH 7.3 से 7.4 के बीच) तथा स्वाद में थोड़ा नमकीन होता है। एक स्वस्थ मनुष्य में रक्त शरीर के कुल भार का 7% से 8% होता है। रुधिर की औसत मात्रा 5 लीटर होती है। रुधिर के दो मुख्य घटक (components) होते है –

  1. प्लाज्मा (Plasma)
  2. रुधिर कोशिकाएँ (Blood Corpuscles)

1. प्लाज्मा (Plasma):
यह हल्के पीले रंग का, हल्का क्षारीय एवं निर्जीव तरल है। यह रुधिर का लगभग 55% भाग बनाता है। प्लाज्मा में 90% जल होता है। 8 से 9% कार्बनिक पदार्थ होते हैं तथा लगभग 1% अकार्बनिक पदार्थ होते हैं।

(क) कार्बनिक पदार्थ (Organic Substances):
रक्त प्लाज्मा में लगभग 7% प्रोटीन होती है। प्रोटीन्स मुख्यत: Trafita (albumin), migfra (globulin), utentiam (prothrombin) तथा फाइब्रिनोजन (fibrinogen) होती है। इनके अतिरिक्त हॉर्मोन्स, विटामिन्स, श्वसन गैसें, हिपैरिन (heparin), यूरिया अमोनिया, ग्लूकोस, ऐमीनो अम्ल, वसा अम्ल, ग्लिसरॉल प्रतिरक्षी (antibodies) आदि होते हैं। प्लाज्मा प्रोटीन रुधिर का परासरणी दाब (osmotic pressure) बनाए रखने में सहायक है। कुछ प्रोटीन्स प्रतिरक्षी की भाँति कार्य करती है। प्रोथ्रोम्बिन तथा फाइब्रिनोजन रुधिर स्कन्दन (blood clotting) में सहायता करते हैं। हिपैरिन प्रतिस्कंदक (anticoagulant) है।

(ख) अकार्बनिक पदार्थ (Inorganic Substances):
अकार्बनिक पदार्थों में सोडियम, कैल्सियम, ,मैग्नीशियम तथा पोटैशियम के फॉस्फेट, बाइकार्बोनेट, सल्फेट तथा क्लोराइड्स आदि पाए जाते हैं।

2. रुधिर कणिकाएँ या रुधिराणु (Blood Cells or Blood Corpuscles):
ये रुधिर का 45% भाग बनाते हैं। रुधिराणु तीन प्रकार के होते हैं। इनमें लगभग 99% लाल रुधिराणु हैं। शेष श्वेत रुधिराणु तथा रुधिर प्लेटलेट्स होते हैं।

(क) लाल रुधिराणु (Red Blood Corpuscles or Erythrocytes):
मेंढक के रक्त में इनकी संख्या 4.5 लाख से 5.5 लाख प्रति घन मिनी होती है। मनुष्य में इनकी संख्या 54 लाख प्रति घन मिमी होती है। स्तनियों के रुधिराणु केन्द्रकरहित, गोल तथा उभयावतल (biconcave) होते हैं।

इनमें लौहयुक्त यौगिक हीमोग्लोबिन पाया जाता है। ये ऑक्सीजन परिवहन का कार्य करते हैं। अन्य कशेरुकियों में लाल रुधिराणु अण्डाकार तथा केन्द्रकयुक्त होते हैं। लाल रुधिराणु ऑक्सीजन वाहक (oxygen carrier) का कार्य करते हैं। इसका हीमोग्लोबिन (haemoglobin) ऑक्सीजन को ऑक्सीहीमोग्लोबिन (oxyhaemoglobin) के रूप में ऊतकों तक पहुँचाता है।

(ख) श्वेत रुधिराणु या ल्यूकोसाइट्स (leucocytes) इनकी संख्या 6000-8000 प्रतिघन मिमी होती है। ये केन्द्रकयुक्त, अमीबा के आकार की तथा रंगहीन होती है। श्वेत रुधिराणु मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं –

  • कणिकामय (Granulocytes)
  • कणिकारहित (Agranulocytes)

1. कणिकामय (Granulocytes):
केन्द्रक की संरचना के आधार पर ये तीन प्रकार की होती हैं –

(अ) बेसोफिल्स (Basophils):
इनका केन्द्रक बड़ा तथा 2.3 पालियों में बँटा दिखाई देता है।

(ब) इओसिनोफिल्स (Eosinophils):
इनका केन्द्रक दो स्पष्ट पिण्डों से बँटा होता है। दोनों भाग परस्पर तन्तु से जुड़े होते हैं। ये एलर्जी (allergy), प्रतिरक्षण (immunity) एवं अति संवेदनशीलता में महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं।

(स) न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils):
इनका केन्द्रक 2 से 5 भागों में बँटा होता है। ये सूत्र द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। ये भक्षकाणु (phagocytosis) द्वारा रोगाणुओं का भक्षण करते हैं।

2. एग्रैन्यूलोसाइट्स (Agranulocytes):
इनका कोशिकाद्रव्य कणिकारहित होता है। इनका केन्द्रक अपेक्षाकृत बड़ा व घोड़े की नाल के आकार का (horse – shoe shaped) होता है। ये दो प्रकार की होती हैं –

(अ) लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes):
ये छोटे आकार के श्वेत रुधिराणु हैं। इनका कार्य प्रतिरक्षी (antibodies) का निर्माण करके शरीर की सुरक्षा करना है।

(ब) मोनोसाइट्स (Monocytes):
ये बड़े आकार की कोशिकाएं हैं, जो भक्षकाणु क्रिया (phagocytosis) द्वारा शरीर की सुरक्षा करती हैं।
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चित्र – मनुष्य की रुधिर कोशिकाएँ

कार्य (Functions):
श्वेत रुधिराणु रोगाणुओं एवं हानिकारक पदार्थों से शरीर की सुरक्षा करते हैं।

(ग) रुधिर बिम्बाणु या रुधिर प्लेटलेट्स (Blood Platelets or Thrombocytes):
इनकी संख्या 2 लाख से 5 लाखं प्रति घन मिमी होती है। ये उभयोत्तल (biconvex), तश्तरीनुमा होते हैं। ये रुधिर स्कंदन में सहायक होते हैं। स्तनधारियों के अतिरिक्त अन्य कशेरुकियों में रुधिर प्लेटलेट्स के स्थान पर स्पिंडल कोशिकाएँ (spindle cells) पाई जाती हैं। इनमें केन्द्रक पाया जाता है।

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प्रश्न 2.
प्लाज्मा (प्लैज्मा) प्रोटीन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
रक्त प्लाज्मा में घुलनशील, सरल, गोलाकार प्रोटीन्स पाई जाती है। इनका महत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. ये रक्त के परासरणी दाब को बनाये रखती हैं।
  2. प्रतिरक्षी प्रोटीन्स (ग्लोबुलिन्स प्रतिरक्षी) शरीर को संक्रमण बचाती हैं।
  3. फाइब्रिनोजन प्रोटीन्स तथा प्रोथ्रोम्बिन प्रोटीन्स रक्त का थक्का बनाने में सहायक होती हैं।
  4. कुछ प्रोटीन्स एन्जाइम्स की तरह कार्य करती हैं।
  5. अनेक प्रोटीन्स रक्त के pH मान को बनाए रखती हैं।

प्रश्न 3.
स्तम्भ I का स्तम्भ II से मिलान कीजिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 4.
रक्त को एक संयोजी ऊतक क्यों मानते हैं?
उत्तर:
रक्तः संयोजी ऊतक (Blood : Connective Tissue):
रक्त तथा लसीका तरल संयोजी ऊतक कहलाते हैं। इसका पूरे शरीर में परिसंचरण होता रहता है। इसे निम्नलिखित कारणों से तरल संयोजी ऊतक माना जाता है –

  1. इनमें आधारभूत पदार्थ मैट्रिक्स तरल प्लाज्मा होता है।
  2. प्लाज्मा में तन्तु नहीं पाए जाते।
  3. प्लाज्मा में रुधिराणु पाए जाते हैं।
  4. रुधिराणु प्लाज्मा का स्रावण नहीं करते।

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प्रश्न 5.
लसिका एवं रुधिर में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
रक्त तथा लसिका में अन्तर:
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प्रश्न 6.
दोहरे परिसंचरण से क्या तात्पर्य है? इसकी क्या महत्ता है?
उत्तर:
पक्षी और स्तनियों में शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त-पृथक् रहता है। हृदय का बांया भाग पल्मोनरी हृदय तथा दायां भाग सिस्टेमिक हृदय कहलाता है। इनमें क्रमशः शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त प्रवाहित होता है। शरीर के किसी भाग से रक्त को पुनः उसी भाग में पहुँचने के लिए दो बार हृदय से होकर गुजरना होता है।

इस प्रकार का परिसंचरण दोहरा रक्त परिसंचरण कहलाता शुद्ध और अशुद्ध रक्त के पृथक् रहने से इसका परिसंचरण अधिक प्रभावशाली रहता है और O2 वितरण प्रभावी होता है। इस प्रकार दोहरे परिसंरण में कहीं भी शुद्ध व अशुद्ध रुधिर का मिश्रण न होने के कारण परिसंचरण अधिक प्रभावशाली (efficient) रहता है। इसके अतिरिक्त दो अलग-अलग बन्द कक्ष के कारण रुधिर प्रवाह के लिए अधिक दाब उत्पन्न होता है।

प्रश्न 7.
भेद स्पष्ट कीजिए –
(क) रक्त एवं लसीका
(ब) खुला तथा बन्द परिसंचरण तन्त्र
(ग) प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन
(घ) P तरंग तथा T तरंग।
उत्तर:
(क) प्रश्न संख्या 5 का उत्तर देखिए।
(ख) खुले रक्त परिसंचरण तथा बन्द रक्त परिसंचरण में अन्तर:
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(ग) प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन में भेद (Difference between Systole and Diastole):
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(घ) P तरंग तथा T तरंग में भेद (Difference between P-wave and T-wave):
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प्रश्न 8.
कशेरुकी के हृदयों में विकासीय परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
कशेरुकी प्राणियों में हृदय का निर्माण भ्रूण के मध्य स्तर (mesoderm) से होता है। भ्रूण अवस्था में आद्यान्त्र (archenteron) के नीचे आधारीय आन्त्र योजनी (mesentry) में दो अनुदैर्ध्य अन्तःस्तरी नलिकाएँ (endothelia canals) परस्पर मिलकर हृदय का निर्माण करती हैं। हृदय एक पेशीय थैलीनुमा रचना होती है। यह शरीर से रक्त एकत्र करके धमनियों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में पम्प करता है। कशेरुकी प्राणियों में हृदय निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

(क) एककोष्ठीय हृदय (Single chambered Heart):
सरलतम हृदय सिफैलोकॉर्डेटा (cephalochordates) जन्तुओं में पाया जाता है। ग्रसनी के नीचे स्थित अधरीय एऑर्टा पेशीय होकर रक्त को पम्प करने का कार्य करता है। इसे एककोष्ठीय हृदय मानते हैं।

(ख) द्विकोष्ठीय हृदय (Two chambered Heart):
मछलियों में द्विकोष्ठीय हृदय होता है। यह अनॉक्सीजनित रक्त को गिल्स (gills) में पम्प कर देता है। गिल्स ने यह रक्त ऑक्सीजनित होकर शरीर में वितरित हो जाता है। इसमें धमनीकाण्ड एवं शिराकोटर सहायक कोष्ठ तथा अलिन्द एवं निलय वास्तविक कोष्ठ होते हैं, इस प्रकार के हृदय को शिरीय हृदय (venous heart) कहते हैं।
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चित्र – कशेरुकियों में हृदय का विकास

(ग) तीन कोष्ठीय हृदय (Three chambered Heart):
उभयचर (amphibians) में तीन कोष्ठीय हृदय पाया जाता है। इसमें दो अलिन्द तथा एक निलय होता है। शिराकोटर (sinus venosus) दाहिने अलिन्द के पृष्ठ तल पर खुलता है। बाएँ अलिन्द में शुद्ध तथा दाहिने अलिन्द में अशुद्ध रक्त रहता है। निलय पेशीय होता है। वान्डरवॉल तथा फॉक्सन के अनुसार उभयचरों में मिश्रित रक्त वितरित होता है। इसमें रुधिर संचरण एक परिपथ (single circuit) वाला होता है।

(घ) चारकोष्ठीय हृदय (Four chambered Heart):
अधिकांश सरीसृपों में दो अलिन्द तथा दो अपूर्ण रूप से विभाजित निलय पाए जाते हैं। मगरमच्छ के हृदय में दो अलिन्द तथा दो निलय होते हैं। पक्षी तथा स्तनी जन्तुओं में दो अलिन्द तथा दो निलय होते हैं। बाएँ अलिन्द तथा बाएँ निलय में शुद्ध रक्त भरा होता है।

इसे दैहिक चाप द्वारा शरीर में पम्प कर दिया जाता है। दाएँ अलिन्द में शरीर के विभिन्न भागों से अशुद्ध रक्त एकत्र होता है। यह दाएँ निलय से शुद्ध होने के लिए फेफड़ों में भेज दिया जाता है। इस प्रकार हृदय का बायाँ भाग पल्मोनरी हृदय (pulmonary heart) तथा दायाँ भाग सिस्टेमिक हृदय (systemic heart) कहलाता है। इन प्राणियों में दोहरा परिसंचरण होता है। इसमें रक्त के मिश्रित होने की सम्भावना नहीं होती।

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प्रश्न 9.
हम अपने हृदय को पेशीजनक (मायोजेनिक) क्यों कहते हैं?
उत्तर:
हृदय की भित्ति हद पेशियों (cardiac muscles) से बनी होती है। हृद पेशियाँ रचना में रेखित पेशियों के समान होती है, लेकिन कार्य में अरेखित पेशियों के समान अनैच्छिक होती है। हृदय पेशियाँ मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र, स्वयं बिना थके, बिना रुके, एक निश्चित दर (मनुष्य में 72 बार प्रति मिनट) और एक निश्चित लय (rhythm) से जीवनभर संकुचित और शिथिल होती रहती है। प्रत्येक हृदय स्पन्दन में संकुचन की प्रेरणा, प्रेरणा-संवहनीय पेशी के तन्तुओं ‘S-A node’ से प्रारम्भ होती है।

S-A node से संकुचन प्रेरणा स्व:उत्प्रेरण द्वारा उत्पन्न होकर A-V node तथा हिस के समूह (bundle of His) से होकर पुरकिन्जे तन्तुओं द्वारा अलिन्दं और निलयों में फैलती है। हृदय पेशियों में संकुचन के लिए तन्त्रिकीय प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। पेशियों में संकुचन पेशियों के कारण होते हैं अर्थात् संकुचन पेशीजनक (Myogenic) होते हैं। यदि हृदय में जाने वाली तन्त्रिकाओं को काट दें तो भी हृदय अपनी निश्चित दर से धड़कता रहता है। तन्त्रिकीय प्रेरणाएँ हृदय की गति की दर को प्रभावित करती हैं। हृदय पेशियों के तन्तुओं में उर्जा उत्पादन हेतु प्रचुर मात्रा में माइटोकॉन्ड्रिया पाए जाते हैं।

प्रश्न 10.
शिरा अलिन्द पर्व (कोटरालिन्द गाँठ SAN) को हृदय का गति प्रेरक (पेस मेकर) क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
शिरा अलिन्द पर्व (कोटरालिन्द गाँठ SAN):
दाएँ अलिन्द की भित्ति के अग्र महाशिरा छिद्र के समीप शिरा अलिन्द घुण्डी (Sino Atrial Node, SAN) स्थित होती है। इसे गति प्रेरक (pace maker) भी कहते हैं। इससे स्पंदन संकुचन प्रेरणा स्वत: उत्पन्न होती है।

इसके तन्तुओं में 55 से 60 मिलीवोल्ट का विश्राम विभव (resting potential) होता है, जबकि हृदय पेशियों में यह 85 से 95 मिली वोल्ट और हृदय में फैले विशिष्ट चालक तन्तुओं में -90 से -100 मिलीवोल्ट होता है। शिरा अलिन्द पर्व (SAN) से सोडियम आयनों के लीक होने से हृदय स्पंदन प्रारम्भ होता है। शिरा अलिन्द पर्व की लयबद्ध उत्तेजना प्रित मिनट 72 स्पंदनों की एक सामान्य विराम दर पर जीवन पर्यन्त चलती रहती है।

प्रश्न 11.
अलिन्द निलय गाँठ (AVN) तथा अलिन्द निलय बण्डल (AVB) का हृदय के कार्य में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अलिन्द निलय गाँठ (Auriculo ventricular Node):
शिरा अलिन्द पर्व के तन्तु अन्त में अपने चारों ओर के अलिन्द पेशी तन्तुओं के साथ मिलकर शिरा अलिन्द पर्व तथा अलिन्द निलय गाँठ (VAN) के बीच एक अन्तरापर्वीय पथ का निर्माण करते हैं।

अलिन्द निलय गाँठ अन्तराअलिन्द पट के दाहिने भाग में हृद कोटर (कोरोनरी साइनस) के छिद्र के निकट होती है। अलिन्द निलय गाँठ के पेशीय तन्तु अलिन्द निलय बण्डल (bundle of His or Atrio Ventricular Bundle, AVB) से मिलकर निलय में दाएँ-बाएँ बँट जाते हैं।

इनसे पुरकिन्जे तन्तुओं (Purkinje fibres) का निर्माण होता है। शिरा अलिन्द पर्व (SAN) में उत्पन्न संकुचन एवं शिथिलन के उद्दीपन अलिन्द निलय गाँठ (AVN) तथा अलिन्द निलय बण्डल (AVB) या हिस का बण्डल (Bundle of His) से होते हुए निलय में स्थित पुरकिन्जे तन्तुओं में पहुंचते हैं। इसके फलस्वरूप हृदय के अलिन्द तथा निलय में क्रमशः संकुचन एवं शिथिलन होता रहता है। हृदय शरीर के विभिन्न भागों से रक्त को एकत्र करके पुनः पम्प करता रहता है।

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प्रश्न 12.
हृद चक्र तथा हृद निकास को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
हृद चक्र (Cardiac Cycle):
एक हृदय स्पन्दन के आरम्भ से दूसरे स्पन्दन के आरम्भ होने के बीच के घटनाक्रम को हृद चक्र (cardiac cycle) कहते हैं। इस क्रिया में दोनों अलिन्दों तथा दोनों निलयों का प्रकुंचन एवं अनुशिथिलन सम्मिलित होता है। हृदय स्पन्दन एक मिनट में 72 बार होता है। अतः एक हृदय चक्र का समय 0.8 सेकण्ड होता है।

हृद निकास (Cardiac Output):
हृदय प्रत्येक हृद चक्र में लगभग 70 मिली रक्त पम्प करता है, इसे प्रवाह आयतन (stroke volume) कहते हैं। प्रवाह आयतन को हृदय दर से गुणा करने पर जो मात्रा आती है, उसे हृद निकास (cardiac output) कहते हैं।

हृद निकास = हृदय दर × प्रवाह आयतन
अतः हृद निकास प्रत्येक निलय द्वारा रक्त की मात्रा को प्रति मिनट बाहर निकालने की क्षमता है जो स्वस्थ मनुष्य में लगभग 5 लीटर होती है। खिलाड़ियों का हृद निकास सामान्य मनुष्य से अधिक होता है।

प्रश्न 13.
हृदय ध्वनियों की व्याख्या करें।
उत्तर:
हृदय की ध्वनियाँ (Heart Sounds):
दाएँ एवं बाएँ निलयों में आकुंचन एकसाथ होता है, इसके फलस्वरूप त्रिवलनी (tricuspid) तथा द्विवलनी (bicuspid) कपाट एक तीव्र ध्वनि ‘लब’ (lubb) के साथ बन्द होते हैं। निलयों में आकुंचन दबाव के कारण रक्त दोनों धमनी चापों में पम्प हो जाता है।

आकुंचन के समाप्त हो जाने पर ज्यों ही रक्त धमनी चापों से निलय की ओर गिरता है तो धमनी चापों के आधार पर स्थित अर्द्धचन्द्राकार कपाट अपेक्षाकृत हल्की ध्वनि ‘डप’ (dup) के साथ बन्द हो जाते हैं। हृदय की इन्हीं ध्वनि “लब’ एवं ‘डप’ को स्टेथोस्कोप (stethoscope) से सुनकर हृदय सम्बन्धी रोगों का निदान किया जाता है।

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प्रश्न 14.
एक मानक ईसीजी को दर्शाइए तथा उसके विभिन्न खण्डों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्युत हृद लेखन (Electrocardiography):
विद्युत हृद लेख (ECG) एक तरंगित आलेख होता है, इसमें एक सीधी रेखा से तीन स्थानों पर तरंगे उठी दिखाई देती है – P लहर, QRS सम्मिश्र (QRS Complex) तथा T तरंग (T – wave)। P तरंग ऊपर की ओर उठी एक छोटी-सी लहर होती है। 0.1 सेकण्ड के आलिन्दीय संकुचन (atrial systole) को दर्शाती है। इसके समाप्त होने के लगभग 0.1 सेकण्ड बाद QRS सम्मिश्र की लहर प्रारम्भ होती है।

ये तीन तरंगे होती हैं – नीचे की ओर Q तरंग, इससे उठी बड़ी R तरंग तथा इससे जुड़ी नीचे की ओर छोटी तरंग। QRS सम्मिश्र निलयी संकुचन के 0.3 सेकण्ड का सूचक होता है। फिर निलयी संकुचन की अन्तिम अवस्था प्रावस्था और इनके क्रमिक प्रसारण के प्रारम्भ की सूचक T तरंग होती है। ECG में प्रदर्शित तरंगों तथा उनके मध्यावकाशों के तरीके का अध्ययन करके हृदय की दशा का ज्ञान होता है।

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चित्र – कार्डियक चक्र – (A) सामान्य ह्रदय स्पन्दन (B) एवं (C) थ्रोम्बोसिस अवस्था का प्रदर्शन

इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) प्राप्त करने के लिए, हृदय के समीपवर्ती क्षेत्र में विशिष्ट स्थानों पर इलेक्ट्रोड्स लगा दिए जाएँ तो हृदय संकुचन के समय जो विद्युत विभव शिरा अलिन्द गाँठ (S – A node) से उत्पन्न होकर विशिष्ट संवाही पेशी तन्तुओं (special conducting muscular fiber) से गुजर कर हृदय के मध्य सतर की पेशियों के संकुचन को प्रेरित करता है, इसे नापा जा सकता है। इसे नापने के लिए जिस यन्त्र का प्रयोग किया जाता है, उसे विद्युत हृद लेखी (electro cardiograph) कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय

Bihar Board Class 11 Biology श्वसन और गैसों का विनिमय Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
जैव क्षमता की परिभाषा दीजिए और इसका महत्त्व बताइए।
उत्तर:
जैव क्षमता (Vital Capacity, VC):
अन्तः श्वास आरक्षित वायु (Inspiratory Reserve Air Volume, IRV), प्रवाही वायु (Tidal Air Volume, TV) तथा उच्छ्वास आरक्षित वायु (Expiratory Reserve Air Volume, ERV) का योग (IRV + TV + ERV – 3000 + 500 + 1100 = 4600 मिली) फेफड़ों की जैव क्षमता होती है।

यह वायु की वह कुल मात्रा होती है जिसे हम पहले पूरी चेष्टा द्वारा फेफड़ों में भरकर पूरी चेष्टा द्वारा शरीर से बाहर निकाल सकते हैं। जिस व्यक्ति की जैव क्षमता जितनी अधिक होती है, उसे शरीर की जैविक क्रियाओं के लिए अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

खिलाड़ियों, पर्वतारोही, तैराक आदि की जैव क्षमता अधिक होती है। युवक की जैव क्षमता प्रौढ़ की अपेक्षा अधिक होती है। पुरुषों की जैव क्षमता स्त्रियों की अपेक्षा अधिक होती है। उनकी कार्य क्षमता को प्रभावित करती है।

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प्रश्न 2.
सामान्य निःश्वसन के उपरान्त फेफड़ों में शेष वायु के आयतन को बताएँ।
उत्तर:
सामान्य श्वसन के उपरान्त फेफड़ों में शेष वायु को कार्यात्मक अवशेष सामर्थ्य (Functional Residual Capacity FRC) कहते हैं। यह निःश्वसन (Expiration) आरक्षित वायु (Expiratory Reserve Air Volume, ERV) तथा अवशेष वायु (Residual Air Volume, RV) के योग के बराबर होती है।
FRC = ERV + RV
= 1100 + 1200
मिली = 2300 मिली

प्रश्न 3.
गैसों का विसरण केवल कूपकीय क्षेत्र में होता है, श्वसन तन्त्र के किसी अन्य भाग में नहीं, क्यों?
उत्तर:
गैसीय विनिमय (Gaseous Exchange):
मनुष्य के फेफड़ों में लगभक 30 करोड़ वायु कोष्ठक या कृपिकाएँ (alveoli) होते हैं। इनकी पतली भित्ती में रक्त कोशिकाओं का घना जाल फैला होता है। श्वासनल (trachea), garhit (bronchus), parafa (bronchiole), opfu chat नलिकाओं (alveolar duct) आदि में रक्त कोशिकाओं का जाल फैला हुआ नहीं होता। इनकी भित्ति मोटी होती है।

अतः कूपिकाओं (alveoli) को छोड़कर अन्य श्वसन भागों में गैसीय विनिमय नहीं होता। सामान्यतया ग्रहण की गई 500 मिली प्रवाही वायु में से लगभग 350 मिली कूपिकाओं में पहुँचती है, शेष श्वास मार्ग में ही रह जाती है।

वायु कोष्ठकों की भित्ति तथा रक्त कोशिकाओं की भित्ति मिलकर श्वसन कला (respiratory membrane) बनाती है। इससे O2 तथा CO2 का विनिमय सुगमता से हो जाता है। गैसीय विनिमय सामान्य विसरण द्वारा होता है। इसमें गैसें उच्च आंशिक दबाव से कम आंशिक दबाव की ओर विसरित होती हैं।
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चित्र – वायुकोष्ठक (कूपिका) में गैसीय विनिमय

वायुकोष्ठकों में O2 का आँशिक दबाव 100 – 104 mm Hg और CO2 का आंशिक दबाव 40 mm Hg होता है। फेफड़ों में रक्त कोशिकाओं में आए अशुद्ध रुधिर में O2 का आंशिक दबाव 40 mm Hg और CO2 का आंशिक दबाव 45-46 mm Hg होता है।

ऑक्सीजन वायुकोष्ठकों की वायु से विसरित होकर रक्त में जाती है और रक्त से CO2 विसरित होकर वायुकोष्ठकों की वायु में जाती है। इस प्रकार वायुकोष्ठकों से रक्त ले जाने वाली रक्त कोशिकाओं में रक्त ऑक्सीजनयुक्त (oxygenated) होता है। फेफड़ों से निष्कासित वायु में O2 लगभग 15.7% और CO2 लगभग 3.6% होती है।

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प्रश्न 4.
CO2 के परिवहन (ट्रांसपोर्ट) की मुख्य क्रियाविधि क्या है? व्याख्या करें।
उत्तर:
कार्बन डाइऑक्साइड का रुधिर द्वारा परिवहन (Transportation of Carbon Dioxide by Blood):
ऊतकों में संचित खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड विसरण द्वारा रुधिर केशिकाओं में चली जाती है।
रुधिर केशिकाओं द्वारा इसका परिवहन श्वसनांगों तक निम्नलिखित तीन प्रकार से होता है –

1. प्लाज्मा में घुलकर (Dissolved in Plasma):
लगभग 7% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन प्लाज्मा में घुलकर कार्बोनिक अम्ल (H2C03) के रूप में होता है।

2. बाइकार्बोनेट्स के रूप में (In the form of Bicarbonates):
लगभग 70% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन बाइकार्बोनेट्स के रूप में होता है। प्लाज्मा के अन्दर कार्बोनिक अम्ल का निर्माण धीमी गति से होता है। अत: कार्बन डाइऑक्साइड का अधिकांश भाग (93%) लाल रुधिराणुओं में विसरित हो जाता है।

इसमें से 70% कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बोनिक अम्ल व अन्त में बाइकार्बोनेट्स का निर्माण हो जाता है। लाल रुधिराणुओं में कार्बोनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम की उपस्थिति में कार्बोनिक अम्ल का निर्माण होता है।
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प्लाज्मा में, कार्बोनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम अनुपस्थित होता है; अतः प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट कम मात्रा में बनता है। बाइकार्बोनेट आयन (\(\mathrm{HCO}_{3}^{-}\)) लाल रुधिराणुओं के पोटैशियम आयन (K+) तथा प्लाज्मा के सोडियम आयन (Na+) से क्रिया करके क्रमशः पोटैशियम तथा सोडियम बाइकार्बोनेट बनाता है।
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क्लोराइड शिफ्ट या हैम्बर्गर परिघटना (Chloride Shift or Hambergur Phenomenon):
सामान्य pH तथा विद्युत तटस्थता (electric neutrality) बनाए रखने के लिए जितने बाइकार्बोनेट आयन रुधिर कणिकाओं से प्लाज्मा में आते हैं, उतने ही क्लोराइड आयन (Cl) रुधिर कणिकाओं में जाकर उसकी पूर्ति करते हैं।

इस क्रिया के फलस्वरूप प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट तथा लाल रुधिर कणिकाओं में क्लोराइड आयनों का जमाव हो जाता है। इस क्रिया को क्लोराइड शिफ्ट (chloride shift) कहते हैं। श्वसन तल पर प्रक्रियाएँ विपरीत दिशा में होती हैं जिससे CO2 मुक्त होकर वायुमण्डल में चली जाती है।

3. कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन के रूप में (In the form of Carboxyhaemoglobin):
कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग 23% भाग लाल रुधिर कणिकाओं के हीमोग्लोबिन से मिलकर अस्थायी यौगिक बनाता है –
हीमोग्लोबिन + CO2 → कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन

सोडियम तथा पोटैशियम के बाइकार्बोनेट्स तथा कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन आदि पदार्थों से युक्त रुधिर अशुद्ध होता है। यह रुधिर ऊतकों और अंगों से शिराओं द्वारा हृदय में पहुँचता है। हृदय से यह रुधिर फुफ्फुस धमनियों द्वारा फेफड़ों में शुद्ध होने के लिए जाता है।

फेफड़ों में ऑक्सीजन को अधिक मात्रा होने के कारण रुधिर की हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन, हीमोग्लोबिन की अपेक्षा अधिक अम्लीय होता है। ऑक्सीहीमोग्लोबिन के अम्लीय होने के कारण श्वसन सतह पर कार्बोनेट्स तथा कार्बोनिक अम्ल का विखण्डन (decomposition) होता है –
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कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन तथा प्लाज्मा प्रोटीन के रूप में बने अस्थायी यौगिक भी ऑक्सीजन से संयोजित होकर कार्बन डाइऑक्साइड को मुक्त कर देते हैं –

(घ) कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन → हीमोग्लोबिन + CO2
उपर्युक्त प्रकार से मुक्त हुई कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर कोशिकाओं तथा फेफड़ों की पतली दीवार से विसरित होकर फेफड़ों में पहुँचती है जहाँ से यह उच्छ्वास द्वारा बाहर निकाल दी जाती है।

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प्रश्न 5.
कूपिका वायु की तुलना में वायुमण्डलीय वायु में pO2 तथा pCO2 कितनी होगी? मिलान कीजिए।

  1. pO2 न्यून, pCO2 उच्च
  2. pO2 उच्च, pCO2 न्यू
  3. pO2 उच्च, pCO2 उच्च
  4. pO2 न्यून, pCO2 न्यून

उत्तर:
2. pO2 उच्च, pCO2 न्यून।

Proof:
(वायुमण्डलीय वायु में O2 का आंशिक दाब 159 तथा CO2 का आंशिक दाब 0.3 होता है, जबकि कूपिका वायु में O2 का आंशिक दाब 104 तथा CO2 का दाब 40 होता है।)

प्रश्न 6.
सामान्य स्थिति में अन्तः श्वसन प्रक्रिया की व्याख्या करें।
उत्तर:
सामान्य श्वासोच्छ्वास (breathing) या श्वासन अनैच्छिक होता है। इसमें पसलियों की गति की भूमिका 25% और डायफ्राम की भूमिका 75% होती है।
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चित्र – श्वासोच्छ्वास की क्रियाविधि –
(A) अन्तःश्वास
(B) उच्छ्वास

अन्तःश्वास या प्रश्वसन (Inspiration):
सामान्य स्थिति में अन्त:श्वास में गुम्बदनुमा डायफ्राम पेशियों में संकुचन के कारण चपटा सा हो जाता है। डायफ्राम की गति के साथ बाह्य अन्तराशुक पेशियों (external intercostal muscles)में संकुचन से पसलियाँ सीधी होकर ग्रीवा की तथा बाहर की तरफ खिंचती है। इससे उरोस्थि (sternum) ऊपर और आगे की ओर उठ जाती है। इन गतियों के कारण वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है और फेफड़े फूल जाते हैं।

वक्ष गुहा और फेफड़ों में वृद्धि के कारण वायुकोष्ठकों या कूपिकाओं (alveoli) में वायुदाब लगभग 1 से 3 mm Hg कम हो जाता है। इसकी पूर्ति के लिए वायुमण्डलीय वायु श्वास मार्ग से कूपिकाओं में पहुँच जाती है। इस क्रिया की अन्तःश्वास कहते हैं, इसके द्वारा मनुष्य (अन्य स्तनी) वायु ग्रहण करते हैं।

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प्रश्न 7.
श्वसन का नियमन कैसे होता है?
उत्तर:
श्वसन का नियमन (Regulation of Respiration):
मस्तिष्क के मेड्युला (medulla) एवं पोन्स वैरोलाइ (Pons varolii) में स्थित श्वास केन्द्र (respiratory centre) पसलियों तथा डायफ्राम से सम्बन्धित पेशियों की क्रिया का नियमन करके श्वासोच्छ्वास (breathing) या श्वसन (respiration) का नियमन करता है। श्वास क्रिया तन्त्रिकीय नियन्त्रण में होती है। यही कारण है कि हम अधिक देर तक श्वास नहीं रोक पाते हैं।

फेफड़ों की भित्ति में ‘स्ट्रेच संवेदांग’ (stretch receptors) होते हैं। फेफड़ों के आवश्यकता से अधिक फूल जाने पर वे संवेदाग पुनर्निवेशन नियन्त्रण (feedback control) के अन्तर्गत निःश्वसन को तुरन्त रोकने के लिए हेरिंग ब्रुएर रिफ्लेक्स चाप (Hering-Bruer Reflex Arch) की स्थापना करके श्वास केन्द्र को उद्दीपित करते हैं, जिससे श्वास दर बढ़ जाती है। यह नियन्त्रण प्रतिवर्ती क्रिया के अन्तर्गत होता है।

शरीर के अन्त:वातावरण में CO2 की सान्द्रता के कम या अधिक हो जाने से श्वास केन्द्र स्थिर उद्दीपित होकर श्वास दर को बढ़ाता या घटाता है। O2 की अधिकता कैरोटिको सिस्टैमिक चाप (Carotico systemic arch) में उपस्थित सूक्ष्म रासायनिक संवेदांगों को प्रभावित करती है। ये संवेदाग श्वास केन्द्र को प्रेरित करके श्वास दर को घटा या बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 8.
pCO2 का ऑक्सीजन के परिवहन में क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
गैसों के मिश्रण में किसी विशेष गैस की दाब में भागीदारी को आंशिक दाब कहते हैं। इसे ‘p’ से प्रदर्शित करते हैं। O2 तथा CO2 के लिए इसे क्रमशः pO2, तथा pCO2 से दर्शाते हैं। निम्नांकित तालिका में प्रदर्शित आँकड़े स्पष्ट रूप से कूपिकाओं से रक्त और रक्त से ऊतक में O2 के लिए सान्द्रता प्रवणता का संकेत दर्शाते हैं। इसी प्रकार CO2 के लिए विपरीत दिशा में प्रवणता दर्शाई गई हैं, अर्थात् ऊतकों से रक्त और रक्त से कूपिकाओं की तरफ।

तालिका – वातावरण की तुलना में विसरण में सम्मिलित विभिन्न भागों पर O2 तथा CO2 का आंशिक दबाव
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वायु कूपिकाओं से जो ऑक्सीकृत रक्त ऊतकों में पहुँचता है उसमें आंशिक दबाव pO2 95 mm Hg तथा pCO2 40mm Hg होता है। ऊतकों में O2, तथा CO2, का आंशिक दबाव क्रमश: 40 mm Hg और 45-46 mm Hg होता है। ऊतक तथा रक्त कोशिकाओं में पाए जाने वाली O2 और CO2 की सान्द्रता प्रवणता या आंशिक दबाव में अन्तर होने के कारण रक्त कोशिकाओं से O2 ऊतकों में और CO2 ऊतकों से रक्त कोशिकाओं में विसरित हो जाती है।

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प्रश्न 9.
पहाड़ पर चढ़ने वाले व्यक्ति की श्वसन प्रक्रिया में क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पहाड़ पर ऊँचाई चढ़ने के साथ-साथ वायु में O2 का आंशिक दाब कम हो जाता है, अतः मैदान की अपेक्षा ऊँचाई पर श्वासोच्छ्वास क्रिया अधिक तीव्र गति से होगी। इसके निम्नलिखित कारण होते हैं –

1. रुधिर में घुली हुई ऑक्सीजन का आंशिक दाब कम हो जाता है। O2 रक्त में सुगमता से विसरित होती है। अतः शरीर में ऑक्सीजन परिसंचरण कम हो जाता है। इसके फलस्वरूप सिरदर्द तथा उल्टी (वमन) का आभास होता है।

2. अधिक ऊँचाई पर वायु में ऑक्सीजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, अतः वायु से अधिक O2 प्राप्त करने के लिए श्वासोच्छ्वास क्रिया तीव्र हो जाती है।

3. कुछ दिनों तक ऊँचाई पर रहने से रुधिर में लाल रुधिराणुओं की संख्या बढ़ जाती है और श्वास क्रिया सामान्य हो जाती है।

प्रश्न 10.
कीटों में श्वासन क्रियाविधि कैसी होती है?
उत्तर:
कीटों में श्वास क्रियाविधि (Breathing in Insects):
कीटों में श्वसन हेतु ट्रैकिया (trachea) पाए जाते हैं। कीटों के शरीर में ट्रैकिया का जाल फैला होता है। ट्रैकिया पारदर्शी, शाखामय, चमकीली, नलिकाएँ होती है।

ये श्वास रन्धों (spiracles) द्वारा वायुमण्डल से सम्बन्धित रहती हैं। श्वास रन्ध्र छोटे वेश्म (atrium) में खुलते हैं। श्वास रन्ध्रों पर रोमाभ सदृश शूक तथा कपाट पाए जाते हैं। कुछ श्वास रन्ध्र सदैव खुले रहते हैं। शेष अन्तःश्वसन (inspiration) के समय खुलते हैं और उच्छ्व सन (expiration) के समय बन्द रहते हैं।

ट्रैकियल वेश्म (atrium) से शाखाएँ निकलकर एक पृष्ठ तथा अधर तल पर ट्रैकिया का जाल बना लेती हैं। ट्रैकिया से निकलने वाली ट्रैकिओल्स (tracheoles) ऊतक या कोशिकाओं तक पहुँचती है। कीटों में गैसों का विनिमय बहुत ही प्रभावशाली होता है और O2, सीधे कोशिकाओं तक पहुँचती है। इसी कारण – कीट सर्वाधिक क्रियाशील होते हैं।
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चित्र – कीट में ट्रैकिया जाल

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प्रश्न 11.
ऑक्सीजन वियोजन वक्र की परिभाषा दीजिए। क्या आप इसकी सिग्माभ आकृति का कोई कारण बता सकते हैं?
उत्तर:
ऑक्सीजन वियोजन वक्र (Oxygen Dissociation Curve):
हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता ऑक्सीजन के आंशिक दबाव (partial pressure) अर्थात् pO2 पर निर्भर करती है। हीमोग्लोबिन की वह प्रतिशत मात्रा जो ऑक्सीजन ग्रहण करती है, इसकी प्रतिशत संतृप्ति (percentage saturation of haemoglobin) कहलाती है।

जैसे –
फेफड़ों में रक्त के ऑक्सीजनीकृत होने पर O2, का आंशिक दबाव pO2, लगभग 97 mm Hg होता है। इस pO2, पर हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति लगभग 98% होती है। ऊतकों से वापस आने वाले रक्त में O2 का आंशिक दबाव pO2 लगभग 40 mm Hg होता है। इस पर pO2 पर हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति लगभग 75% होती है। pO2 तथा हीमोग्लोबिन की प्रतिशत संतृप्ति के सम्बन्ध को ग्राफ पर अंकित करने पर एक सिग्माभ वक्र (sigmoid curve) प्राप्त होता है। इसे ऑक्सीजन वियोजन वक्र कहते हैं।

ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र पर शरीर ताप एवं रक्त के pH का प्रभाव पड़ता है। ताप के बढ़ने पर pH के कम होने पर यह वक्र दाहिनी ओर खिसकता है। इसके विपरीत ताप के कम होने पर या pH के अधिक होने से ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन वक्र बाई ओर खिसकता है।
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चित्र – ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन वियोजन वक्र का ग्राफीय चित्रण

रक्त में CO2 की मात्रा बढ़ने या इसका pH घटने (H+ आयन की संख्या बढ़ने से) पर O2 के प्रति हीमोग्लोबिन की आकर्षण शक्ति कम हो जाती है। इसी को बोहर प्रभाव (Bohr effect) कहते हैं। यह क्रिया ऊतकों में होती है। इस प्रकार बोहर प्रभाव का योगदान हीमोग्लोबिन को फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन के परिवहन को प्रोत्साहित करता है।

फेफड़ों में हीमोग्लोबिन को O2 मिलते ही CO2 के प्रति इसका आकर्षण कम हो जाता है और कार्बोमिनोहीमोग्लोबिन CO2 त्यागकर सामान्य हीमोग्लोबिन बन जाता है। अम्लीय हीमोग्लोबिन H+ आयन मुक्त करता है जो बाइकार्बोनेट (\(\mathrm{HCO}_{3}^{-}\)) से मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। यह शीघ्र ही CO2 तथा H2O में टूटकर CO2 को मुक्त कर देता है। इसे हैल्डेन प्रभाव (Haldane effect) कहते हैं। हैल्डेन प्रभाव फेफड़ों में CO2 के बहिष्कार को और ऊतकों में O2 के बहिष्कार को प्रेरित करता है।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 17 श्वसन और गैसों का विनिमय

प्रश्न 12.
क्या आपने अव-ऑक्सीयता (हाइपोक्सिया) (न्यून ऑक्सीजन) के बारे में सुना है? इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करें व साथियों के बीच चर्चा करें।
उत्तर:
अव-ऑक्सीयता (Hypoxia):
इस स्थिति का सम्बन्ध शरीर की कोशिकाओं/ऊतकों में ऑक्सीजन के आंशिक दबाव में कमी से होता है। यह ऑक्सीजन की कम आपूर्ति के कारण होता है। वायुमण्डल में पहाड़ों पर 8000 फुट से अधिक ऊँचाई पर वायु में O2 का दबाव कम हो जाता है।

इससे सिरदर्द, वमन, चक्कर आना, मानसिक थकान, श्वांस लेने में कठिनाई आदि लक्षण प्रदर्शित होते हैं। इसे कृत्रिम हाइपोक्सिया (artificial hypoxia) कहते हैं। यह रोग प्राय: पर्वतारोहियों को हो जाता है। शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण रक्त की ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता प्रभावित होती है। इसे एनीमिया हाइपोक्सिया (anaemia hypoxia) कहते हैं।

प्रश्न 13.
निम्न के बीच अन्तर करें –
(क) IRV (आई० आर० वी०) और ERV (इ० आर० वी)
(ख) अन्तःश्वसन क्षमता (IC) और निःश्वसन क्षमता (EC)
(ग) जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता।
उत्तर:
(क) IRV (आई० आर० वी०) तथा ERV (इ० आर० वी०) में अन्तर (Difference between IRV & ERV):
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(ख) अन्तःश्वसन क्षमता और निःश्वसन क्षमता में अन्तर (Difference between Inspiratory Capacity and Expiratory Capacity):
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(ग) जैव क्षमता तथा फेफड़ों की कुल धारिता में अन्तर (Difference between Vital Capacity and Total Lung Capacity):
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प्रश्न 14.
ज्वारीय (प्रवाही) आयतन क्या है? एक स्वस्थ मनुष्य के लिए एक घण्टे के ज्वारीय आयतन (लगभग मात्रा) को आंकलिक कीजिए।
उत्तर:
ज्वारीय (प्रवाही) आयतन (Tidal Volume):
सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य जो वायु का आयतन ग्रहण करता है और निष्कासित करता है, ज्वारीय (प्रवाही) आयतन कहते हैं। सामान्यतया इसकी मात्रा 500 मिली होती है।

एक घण्टे में ग्रहण की गई वायु का आयतन –
सामान्यतया मनुष्य एक मिनट में 12-16 बार श्वास लेता और निष्कासित करता है तो एक घण्टे में ग्रहण की गई ज्वारीय (प्रवाही) वायु का आयतन
= श्वास दर × प्रवाही वायु का आयतन × 60
= 12 × 500 × 60 = 360000 मिली प्रति घण्टा या
16 × 500 × 60 = 480000 मिली प्रति घण्टा

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषणन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 16 पाचन एवं अवशोषण

Bihar Board Class 11 Biology पाचन एवं अवशोषण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से सही उत्तर छाँटे –
(क) आमाशय रस में होता है
(अ) पेप्सिन, लाइपेज और रेनिन
(ब) ट्रिप्सिन, लाइपेज और रेनिन
(स) ट्रिप्सिन, पेप्सिन और लाइपेज
(द) ट्रिप्सिन, पेप्सिन, लाइपेज और रेनिन।
उत्तर:
(अ) पेप्सिन, लाइपेज और रेनिन।

(ख) सक्कस एण्टेरिकस (succus entericus) नाम दिया गया है –
(अ) क्षुदान्त्र (ileum) और बड़ी आँत के सन्धि स्थल के लिए
(ब) आंत्रिक रस के लिए
(स) आहारनाल में सूजन के लिए
(द) परिशेषिका (appendix) के लिए।
उत्तर:
(ब) आंत्रिक रस के लिए।

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प्रश्न 2.
स्तम्भ I का स्तम्भ II से मिलान करिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 3.
संक्षेप में उत्तर दें –
(क) अंकुर (villi) छोटी आंत में होते हैं, आमाशय में क्यों नहीं?
(ख) पेप्सिनोजेन अपने सक्रिय रूप में कैसे परिवर्तित होता है?
(ग) आहारनाल की दीवार के मूल स्तर क्या हैं?
(घ) वसा के पाचन में पित्त कैसे मदद करता है?
उत्तर:
(क) आँत की भीतरी सतह म्यूकोसा (mucosa) में अनेक वलय (folds) तथा रसांकुर (villi) पाए जाते हैं। ये अंगुली सदृश रचनाएँ होती हैं। म्यूकोसा की कोशिकाओं की सतह पर ब्रुश बार्डर की तरह अनेक सूक्ष्म रसांकुर (microvilli) होते हैं।

इससे आँत की अवशोषण सतह में 600 गुना वृद्धि हो जाती है। ये पचे हुए भोजन का अवशोषण करते हैं। आमाशय में भोजन का पाचन पूरा नहीं होता। इस कारण इसमें रसांकुर (villi) तथा सूक्ष्म रसांकुर (microvilli) नहीं पाए जाते।

(ख) पेप्सिनोजेन (pepsinogen) जठर रस के HCl की उपस्थिति में सक्रिय पेप्सिन में बदल जाता है।

(ग) आहारनाल की भित्ति (दीवार) निम्नलिखित चार – स्तरों से बनी होती है –

(i) सिरोसा (Serosa):
यह सबसे बाहरी तन्तुमय आवरण होता है।
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चित्र – आँत की अनुप्रस्थ काट का रेखीय निरूपण

(ii) मस्कुलेरिस (पेशीस्तर-muscularis):
यह दो प्रकार की पेशियों से बना होता है – बाहरी अनुदैर्ध्य पेशी स्तर तथा भीतरी वर्तुल पेशी स्तर। आमाशय में तिरछी पेशियों का एक अतिरिक्त स्तर और पाया जाता है।

(iii) सबम्यूकोसा (Submucosa):
इसका निर्माण ढीले संयोजी ऊतक (loose connective tissue) से होता है। इसमें रक्त वाहिनियाँ, लसीका वाहिनियाँ, तन्त्रिकाएँ तथा आँत में बूनर्स ग्रन्थियाँ (Brunner’s glands) पाई जाती हैं।

(iv) म्यूकोसा (Mucosa):
इसमें शाखामय रसांकुर (villi) पाए जाते हैं। इसकी कोशिकाएँ ग्रन्थिल स्रावी तथा अवशोषी होती हैं आँत की म्यूकोसा की कोशिकाएँ पचे हुए भोज्य पदार्थों का अवशोषण करती हैं।

(घ) पित्त (Bile) के कार्बनिक लवण:
ये वसा का इमल्सीकरण (Emulsification) करते हैं। इमल्सीकृत वसा का पाचन लाइपेज एन्जाइम द्वारा सुगमता से हो जाता है। लाइपेज इल्सीकृत वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल में बदलता है।

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प्रश्न 4.
प्रोटीन के पाचन में अग्न्याशयी रस की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
अग्न्याशयी रस की प्रोटीन पाचन में भूमिका (Role of Pancreatic Juice in Protein Digestion):

अग्न्याशयी रस (Pancreatic Juice):
यह क्षारीय होता है। इसमें लगभग 98% पानी, शेष लवण तथा अनेक प्रकार के एन्जाइम्स पाए जाते हैं। इसका pH मान 7.5-8.3 होता है। इसे पूर्ण पाचक रस कहते हैं; क्योंकि इसमें कार्बोहाइट्रेट, वसा तथा प्रोटीन को पचाने वाले एन्जाइम्स पाए जाते हैं। प्रोटीन पाचक एन्जाइम्स निम्नलिखित होते हैं –

ट्रिप्सिन तथा क्राइमोट्रिप्सिन (Trypsin and Chymotrypsin):
ये निष्क्रिय ट्रिप्सिनोजन तथा क्राइमोट्रिप्सिनोजन के रूप में स्रावित होते हैं। ये आन्त्रीय रसं एवं एण्टेरोकाइनेज एन्जाइम के कारण सक्रिया अवस्था में बदल जाते हैं। ये प्रोटीन का पाचन करके मध्यक्रम की प्रोटीन्स तथा ऐमीनो अम्ल बनाते हैं।
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प्रश्न 5.
आमाशय में प्रोटीन के पाचन की क्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
आमाशय में प्रोटीन का पाचन (Digestion of Protein in Stomach):
आमाशय की जठर ग्रन्थियों से जठर रस स्रावित होता है। यह अम्लीय (pH 0.9 – 3.5) होता है। इसमें 99% जल, 0.5% HCl तथा शेष एन्जाइम्स होते हैं। इसमें प्रोपेप्सिन, प्रोरेनिन तथा गैस्ट्रिक लाइपेज एन्जाइम होते हैं। प्रोपेप्सिन तथा प्रोरेनिन एन्जाइम HCl की उपस्थिति में सक्रिय पेप्सिन (pepsin) तथा रेनिन (rennin) में बदल जाते हैं। ये प्रोटीन तथा केसीन (दूध प्रोटीन) का पाचन करते हैं।
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प्रश्न 6.
मनुष्य का दन्त-सूत्र बताइए।
उत्तर:
मनुष्य का दन्त सूत्र (Dental Formula of Man):
वयस्क व्यक्ति \(\frac{2123}{2123}\) × 2 = 32
बच्चों में दुग्ध दन्त \(\frac{2102}{2102}\) × 2 = 20
वयस्क व्यक्ति में 8 कृन्तक, 4 रदनक, 8 अग्रचर्वणक तथा 12 चर्वणक अर्थात् कुल 32 दाँत होते हैं। बच्चों में दुग्ध दाँतों की संख्या 20 होती है। इनमें 8 कृन्तक, 4 रदनक तथा 8 चवर्णक होते हैं।

प्रश्न 7.
पित्त रस में कोई पाचक एन्जाइम नहीं होते, फिर भी यह पाचन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं; क्यों?
उत्तर:
पित्त (Bile) पित्त का स्रावण यकृत से होता है। इसमें कोई एन्जाइम नहीं होता। इसमें अकार्बनिक तथा कार्बनिक लवण, पित्त वर्णक, कोलेस्टेरॉल, लेसीथिन आदि होते हैं।

  1. यह आमाशय से आई अम्लीय लुगदी (chyme) को पतली क्षारीय काइल (chyle) में बदलता है जिससे अग्न्याशयी एन्जाइम भोजन का पाचन कर सकें।
  2. यह वसा का इमल्सीकरण (emulsification) करता है। इमल्सीकृत वसा का लाइपेज एन्जाइम द्वारा सुगमता से पाचन हो जाता है।
  3. कार्बनिक लवण वसा के पाचन में सहायता करते हैं।
  4. हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके भोजन को सड़ने से बचाता है।

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प्रश्न 8.
पाचन में काइमोट्रिप्सिन की भूमिका वर्णित करें। जिस ग्रन्थि से यह स्रावित होता है, इसी श्रेणी के दो अन्य एन्जाइम कौन-से हैं?
उत्तर:
काइमोट्रिप्सिन (Chymotrypsin):
अग्न्याशय से स्त्रावित प्रोटीन पाचक एन्जाइम है। यह निष्क्रिय अवस्था काइमोट्रिप्सिनोजन (chymotrypsinogen) के रूप में स्रावित होता है। यह आन्त्रीय रस में उपस्थित एण्टेरोकाइनेज (enterokinase) एन्जाइम की उपस्थिति में सक्रिय काइमोट्रिप्सिन में बदलता है। यह प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड तथा पेप्टोन (polypeptides and peptones) में बदलता है।
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अग्न्याशय से स्रावित अन्य प्रोटीन पाचक एन्जाइम निम्नलिखित है –

  1. ट्रिप्सिनोजन (Trypsinogen)
  2. कार्बोक्सिपेप्टिडेज (Carboxypeptidase)

प्रश्न 9.
पॉलीसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड का पाचन कैसे होता है?
उत्तर:
पॉली तथा डाइसैकेराइड्स का पाचन (Digestion of Poly and Disaccherides) कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन मुखगुहा से ही प्रारम्भ हो जाता है। भोजन में लार मिलती है। लार का pH मान 6.8 होता है। यह भोजनका चिकना तथा निगलने योग्य बनाती है। लार में टायलिन (ptyalin) एन्जाइम होता है। यह स्टार्च (पॉलीसैकेराइड) को डाइसैकेराइड (माल्टोस) में बदलता है।
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आमाशय में कार्बोहाइड्रेट का पाचन नहीं होता। अग्न्याशय रस में ऐमाइलेज (amylase) एन्जाइम होता है। यह स्टार्च या पॉलीसैकेराइड्स को डाइसैकेराइड्स में बदलता है। स्टार्च (पॉलीसैकेराइड्स) + जल
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क्षुदान्त्र (छोटी आँत) में आंत्रीय रस में पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट पाचक एन्जाइम्स के निम्नलिखित प्रकार इसके पाचन में सहायक होते हैं –
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प्रश्न 10.
यदि आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का स्त्राव नहीं होगा तो क्या होगा?
उत्तर:
आमाशय की जठर ग्रन्थियों की ऑक्सिन्टिक (oxyntic) कोशिकाओं से HCI स्रावित होता है। यह आमाशय में भोजन को सड़ने से बचाता है और जठर ग्रन्थि से स्रावित निष्क्रिय एन्जाइम्स को सक्रिय करता है। HCI के अभाव में निम्नलिखित क्रियाएँ होंगी –

  1. भोजन का माध्यम अम्लीय न होने से जठर रस के एन्जाइम निष्प्रभावी रहेंगे। पेप्सिनोजन (pepsinogen) तथा प्रोरेनिन (prorennin) निष्क्रिय बने रहेंगे। प्रोटीन्स का पाचन नहीं होगा।
  2. भोजन के साथ आए जीवाणु आदि नष्ट नहीं होंगे, इससे भोजन सड़ जाएगा।
  3. भोजन में उपस्थित कैल्सियमयुक्त कठोर भागों (जैसे-अस्थियों) का पाचन नहीं होगा।
  4. टायलिन द्वारा कार्बोहाइड्रेट्स का पाचन होता रहेगा।
  5. भोजन में उपस्थित न्यूक्लीक अम्लों का विघटन नहीं होगा।

प्रश्न 11.
आपके द्वारा खाए गए मक्खन का पाचन और उसका शरीर में अवशोषण कैसे होता है? विस्तार से वर्णन करें
उत्तर:
मक्खन इमल्सीकृत वसा है। इसका पाचन आमाशय में प्रारम्भ हो जाता है। कुछ मात्रा में वसा का पाचन गैस्ट्रिक लाइपेज (gastric lipase) द्वारा वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में हो जाता है। अग्न्याशय तथा आँत में लाइपेज एन्जाइम द्वारा वसा का पाचन होताहै। इसके फलस्वरूप अन्ततः वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में हो जाता है।
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इनका अवशोषण क्षुदान्त्र में लसीका कोशिकाओं द्वारा होता है। अवशोषित वसीय अम्ल ग्लिसरॉल तथा फॉस्फेट परस्पर मिलकर वसा के बिन्दुक मिसेल (micelles) या काइलोमाइक्रोन्स (chylomicrons) बनाते हैं। लसीका वाहिनियाँ अन्ततः रक्तवाहिनियों से मिल जाती हैं। इसके फलस्वरूप मिसेल या काइलोमाइक्रोन्स रक्त में पहुँच जाती है।

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प्रश्न 12.
आहारनाल के विभिन्न भागों में प्रोटीन के पाचन के मुख्य चरणों का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
प्रोटीन का पाचन (Digestion of Protein):
1. आमाशय में (In Stomach):
आमाशय के जठर रस में प्रोटीन पाचक विकर निष्क्रिय पेप्सिनोजन तथा प्रोरेनिन होते हैं। ये HCl की उपस्थिति में सक्रिय पेप्सिन तथा रेनिन में बदल जाते हैं।
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2. ग्रहणी में (In Duodenum):
अग्न्याशय रस में ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। इन्हें क्रमश: ट्रिप्सिनोजन तथा काइमोट्रिप्सिनोजन कहते हैं। यह आंत्रीय रस में उपस्थित एण्टेरोकाइनेज की उपस्थिति में सक्रिय अथवा में बदल जाते हैं।
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3. आँत (क्षुद्रान्त्र) में (In ileum):
आन्त्रीय रस में इरेप्सिन (erepsin) एन्जाइम्स का समूह होता है। इसमें ऐमीनोपेप्टिडेज (aminopeptidase) ट्राइपेप्टिडेज (tripeptidase) तथा डाइपेप्टिडेज (dipeptidase) होते हैं। ये क्रमशः पॉली, ट्राइ और डाइपेप्टाइड्स को ऐमीनो अम्लों में तोड़ देते हैं। प्रोटीन के पूर्ण पाचन के फलस्वरूप सरल घुलनशील ऐमीनो अम्ल प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 13.
गर्तदन्ती (thecodont) और द्विबारदन्ती (diphyodont) शब्दों की व्याख्या करें।
उत्तर:
1. गर्तदन्ती (Thecodont):
प्रत्येक दाँत जबड़े की हड्डी के गड्ढे (socket) में स्थित होता है। गड्ढे में दाँत घने तन्तुओं से बने स्नायु और मसूड़े (gum) द्वारा सधा रहता है। ऐसे दाँतों को गर्तदन्ती कहते हैं।

2. द्विबारदन्ती (Diphyodont):
मनुष्य सहित अधिकांश स्तनियों में दाँत जीवन में दो बार निकलते हैं। पहले अस्थायी दुग्ध दाँत (milk teeth) निकलते हैं। इनके गिरने पर स्थायी (permanent) दाँत निकलते हैं। इस प्रकार के दाँतों को द्विबारदन्ती कहते हैं।

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प्रश्न 14.
विभिन्न प्रकार के दाँतों का नाम और एक वयस्क मनुष्य में दाँतों की संख्या बताएँ।
उत्तर:
मनुष्य (स्तनियों) में चार प्रकार के दाँत पाए जाते हैं –

  1. कृन्तक (Incisors): ये भोजन को काटने और कुरतने का कार्य करते हैं।
  2. रदनक (Canines): ये भोजन को चीरने-फाड़ने का कार्य करते हैं।
  3. अग्रचर्वणक (Premolars): ये भोजन को चबाने-पीसने का कार्य करते हैं।
  4. चर्वणक (Molars): ये भोजन को चबाने-पीसने का कार्य करते हैं। वयस्क में 8 कृन्तक, 4 रदनक, 8 अग्रचर्वणक तथा 12 चर्वणक पाए जाते हैं। वयस्क मनुष्य का दन्त सूत्र निम्नांकित प्रकार है –
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प्रश्न 15.
यकृत के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
यकृत के कार्य (Functions of Liver):
यकृत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं –

  • यकृत में पित्त रस स्रावित होता है। इसमें अकार्बनिक तथा कार्बनिक लवण; जैसे – सोडियम क्लोराइड, सोडियम बाइकार्बोनेट, सोडियम ग्लाइकोकोलेट, सोडियम टॉरोकोलेट आदि। ये कोलेस्टेरॉल (choloesterol) को घुलनशील बनाए रखते हैं।
  • पित्तरस में हीमोग्लोबिन (haemoglobin) के विखण्डन से बने पित्त वर्णक (bile pigments) पाए जाते हैं; जैसे – बिलिरुबिन (bilirubin) तथा बिलिवर्डिन (biliverdin) यकृत कोशिकाएँ रुधिर से जब बिलिरुबिन को ग्रहण नहीं कर पाते तो यह शरीर में एकत्र होने लगता है इससे पीलिया (jaundice) रोग हो जाता है।
  • पित्त रस आन्त्रीय क्रमाकुंचन गतियों को बढ़ाता है ताकि पाचक रस काइम में भली प्रकार मिल जाएँ।
  • पित्त रस काइम के अम्लीय प्रभाव को समाप्त करके काइल (Chyle) को क्षारीय बनाता है जिससे अग्न्याशयी तथा आन्त्रीय रसों की भोजन पर प्रतिक्रिया हो सकें।
  • पित्त लवण काइम के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करके काइम को सड़ने से बचाते हैं।
  • पित्त रस के कार्बनिक लवण वसाओं के धरातल तनाव (surface tension) को कम करके इन्हें सूक्ष्म बिन्दुकों में तोड़ देते हैं। ये जल के साथ मिलकर इमल्सन या पायस बना लेते हैं। इस क्रिया को इमल्सीकरण (emulsification) कहते हैं।
  • पित्त लवणों के कारण वसा पाचक एन्जाइम सक्रिय होते हैं।
  • वसा में घुलनशील विटामिनों (A, D, E एवं K) के अवशोषण के लिए पित्त लवण आवश्यक होते हैं।
  • पित्त के द्वारा विषाक्त पदार्थ, अनावश्यक कोलेस्टेरॉल आदि का परित्याग किया जाता है।
  • यकृत में विषैले पदार्थों का विषहरण (detoxification) होता है।
  • यकृत में मृत लाल रुधिराणुओं का विघटन होता है।
  • यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है।
  • यकृत कोशिकाएँ हिपैरिन (heparin) का स्रावण करती हैं। यह रक्त वाहिनियों में रक्त का थक्का बनने से रोकता है।
  • यकृत में प्लाज्मा प्रोटीन्स; जैसे-ऐल्बुमिन, ग्लोबुलिन, प्रोट्रॉम्बिन, फाइब्रिनोजन आदि का संश्लेषण होता है। फाइब्रिनोजन (fibrinogen) रक्त का थक्का बनने में सहायक होता है।
  • यकृत आवश्यकता से अधिक ग्लूकोस को ग्लाइकोजन में बदल कर संचित करता है।
  • आवश्यकता पड़ने पर यकृत प्रोटीन्स व वसा से ग्लूकोस का निर्माण करता है।
  • यकृत कोशिकाएँ विटामिन A, D, लौह, ताँबा आदि का संचय करती हैं।
  • यकृत की कुफ्फर कोशिकाएँ जीवाणु तथा हानिकारक पदार्थों का भक्षण करके शरीर की सुरक्षा करती हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 14 पादप में श्वसन

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 14 पादप में श्वसन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology पादप में श्वसन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
इनमें अन्तर करिए –
(अ) साँस (श्वसन) और दहन
(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र
(स) ऑक्सी श्वसन तथा किण्वन।
उत्तर:
(अ) श्वसन और दहन में अन्तर | (Difference between Respiration & Combustion):
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(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र में अन्तर (Difference between Glycolysis and Kreb’s Cycle):
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(स) श्वसन तथा किण्वन में अन्तर (Difference between Respiration and Fermentation):
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प्रश्न 2.
श्वसनीय क्रियाधार क्या है? सर्वाधिक साधारण क्रियाधार का नाम बताइए।
उत्तर:
श्वसनीय क्रियाधार (Respiratory Substrates):
श्वसन क्रिया के अन्तर्गत जिन कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त होती है, उन्हें श्वसनी क्रियाधार (respiratory substrates) कहते हैं। प्रायः कार्बोहाइड्रेट्स के ऑक्सीकरण से ऊर्जा मुक्त होती है।

कुछ पौधों में विशेष परिस्थितियों में प्रोटीन, वसा, कार्बनिक अम्लों के ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त होती है। कार्बनिक पदार्थों से ऊर्जा, विभिन्न चरणों में मुक्त होती है। ये क्रियाएँ एन्जाइम्स द्वारा नियन्त्रित होती है। सर्वाधिक साधारण श्वसनी क्रियाधार ग्लूकोस (C6H12O6) होता है।

प्रश्न 3.
ग्लाइकोलिसिस को रेखा द्वारा बनाइये।
उत्तर:
ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis):
इंसे EMP पथ भी कहते हैं। यह कोशिका द्रव्य में सम्पन्न होता है। इसमें ऑक्सीजन का उपयोग नहीं होता अत: ऑक्सीश्वसन और अनॉक्सीश्वसन दोनों में यह क्रिया होती है। इस क्रिया के अन्त में एक ग्लूकोस अणु से 2 पाइरुविक अम्ल अणु प्राप्त होते हैं।

4 ATP अणु प्राप्त होते हैं, 2 खर्च हो जाते हैं। हाइड्रोजनग्राही NAD हाइड्रोजन आयन्स (2H+) को ग्रहण करके NAD.2H बनाते हैं। हाइड्रोजन ग्राही से हाइड्रोजन आयन्स स्थानान्तरण के फलस्वरूप 8 ATP अणु प्राप्त होते हैं। इस प्रकार कुल 8 ATP अणुओं की प्राप्ति होती है।
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चित्र – ग्लाइकोलिसिस

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प्रश्न 4.
ऑक्सीश्वसन के मुख्य चरण कौन-कौन से हैं? यह कहाँ सम्पन्न होती है?
उत्तर:
ऑक्सीश्वसन के मुख्य चरण:
जीवित कोशिका में ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोस (कार्बनिक पदार्थ) के जैव-रासायनिक ऑक्सीकरण को ऑक्सीश्वसन कहते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत रासायनिक ऊर्जा गतिज ऊर्जा के रूप में ATP में संचित हो जाती है। C6H12O6 + 6O2 → 6CO2↑+ 6H2O + 673 k cal.

ऑक्सीश्वसन निम्नलिखित चरणों में पूर्ण होता है –

(क) ग्लाइकोलिसिस अथवा ई० एम० पी० मार्ग (Glycolysis or E.M.P. Pathway):
यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। इसमें ग्लूकोस के आंशिक ऑक्सीकरण के फलस्वरूप पाइरुविक अम्ल के दो अणु प्राप्त होते हैं। ग्लाइकोलिसिस प्रक्रिया में कुल 8 ATP अणु प्राप्त होते हैं।

(ख) ऐसीटिल कोएन्जाइम-A का निर्माण (Formation of Acetyle CoA):
यह माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होती है। कोशिकाद्रव्य (सायटोसोल) में उत्पन्न पाइरुविक अम्ल माइटोकॉण्ड्रिया में प्रवेश करके NAD+ और कोएन्जाइम – A से संयुक्त होकर पाइरुविक अम्ल का ऑक्सीकीय CO2 वियोजन (oxidative decarboxylation) होता है। इस क्रिया में CO 2 का एक अणु मुक्त होता है और NAD.2H बनता है और अन्त में ऐसीटिल कोएन्जाइम – A बनता है।
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ऐसीटिल कोएन्जाइम – A + CO2 + NaD.2H

(ग) क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Krebs Cycle or Tricarboxylic Acid Cycle):
यह पूर्ण क्रिया माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होती है। क्रेब्स चक्र के एन्जाइम्स मैट्रिक्स में पाए जाते हैं। ऐसीटिल कोएन्जाइम-A माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में उपस्थित ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल से क्रिया करके 6-कार्बन यौगिक सिट्रिक अम्ल बनाता है।

सिट्रिक अम्ल का क्रमिक निम्नीकरण होता है और अन्त: में पुनः ऑक्सेलोऐसीटिक अम्ल प्राप्त हो जाता है। केब्स चक्र में 2 अणु CO2 के मुक्त होते हैं। चार स्थानों पर 2H+ मुक्त होते हैं जिन्हें हाइड्रोजनग्राही NAD या FAD ग्रहण करते हैं। क्रेब्स चक्र में 24 ATP अणु ETS द्वारा प्राप्त होते हैं।

ऐसीटिल कोएन्जाइम –
A + H2O + 3NAD + FAD + ADP + iP → 2CO2 + 3NAD.2H + FAD.2H + ATP + कोएन्जाइम – A

(घ) इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र (Electron Transport System):
यह माइटोकॉण्ड्रिया की भीतरी सतह पर स्थित F1 कण या ऑक्सीसोम्स पर सम्पन्न होता है। क्रेब्स चक्र की ऑक्सीकरण क्रिया में डिहाइड्रोजिनेस (dehydrogenase) एन्जाइम विभिन्न पदार्थों से हाइड्रोजन तथा इलेक्ट्रॉन के जोड़े – मुक्त कराते हैं। हाइड्रोजन तथा इलेक्ट्रॉन कुछ मध्यस्थ संवाहकों के द्वारा होते हुए ऑक्सीजन से मिलकर जल का निर्माण करते हैं। हाइड्रोजन परमाणुओं के एक इलेक्ट्रॉनग्राही से दूसरे इलेक्ट्रॉनग्राही पर स्थानान्तरित होते समय ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है।

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प्रश्न 5.
क्रेब्स चक्र का समग्र रेखाचित्र बनाइए।
उत्तर:
केब्स चक्र या दाइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र (Krebs Cycle or Tricarboxylic Acid Cycle):
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चित्र – क्रेब्स चक्र माइटोकॉन्ड्रिया में घटित होने वाली प्रक्रिया है। इनमें अनेक एन्जाइम तथा इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र (ETS) की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र (Electron Transport System):
ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र के विभिन्न पदों में अपघटन के फलस्वरूप उत्पन्न हुई ऊर्जा के अधिकांश भाग का परिवहन हाइड्रोजनग्राही करते हैं; जैसे-NAD, NADP, FAD आदि। ये 2H’ (हाइड्रोजन आयन) के साथ मिलकर अपचयित (reduce) हो जाते हैं। इन्हें वापस ऑक्सीकृत (oxidise) करने के लिए विशेष तन्त्र इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र (ETS = Electron Transport System) की आवश्यकता होती है।

यह तन्त्र, इलेक्ट्रॉन्स (e) को एक के बाद एक ग्रहण करते हैं तथा उन पर उपस्थित ऊर्जा स्तर (energy level) को कम करते हैं। इस कार्य का मुख्य उद्देश्य कुछ ऊर्जा को निर्मुक्त करना है। यही निर्मुक्त ऊर्जा ATP (adenosine triphosphate) में संगृहीत हो जाती है।

इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र एक श्रृंखलाबद्ध क्रम के रूप में होता है जिसमें कई सायटोक्रोम एन्जाइम्स (cytochrome enzymes) होते हैं। इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र के एन्जाइम माइटोकॉन्ड्रिया की अन्तःकला (inner membrane) में श्रृंखलाबद्ध क्रम से लगे रहते हैं। सायटोक्रोम्स लौह तत्व के परमाणु वाले वर्णक हैं, जो इलेक्ट्रॉन मुक्त कर ऑक्सीकृत (oxidised) हो जाते हैं –
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साइटोक्रोम्स की इस श्रृंखला में प्रारम्भिक साइटोक्रोम ‘बी’ (cytochrome ‘b’ = cyt ‘b’ Fe3+ उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन (e) को ग्रहण करता है तथा अपचयित हो जाता है। इलेक्ट्रॉन का स्थानान्तरण हाइड्रोजन आयन्स से होता है, जो पदार्थ से NAD या NADP के द्वारा लाए गए थे। बाद में ये FAD को दे दिए गए थे और यहाँ से स्वतन्त्र कर दिए गए।

इलेक्ट्रॉन्स के Cyt ‘b’ Fe+++ पर स्थानान्तरण में सम्भवत: सह-एन्जाइम ‘क्यू’ (Co-enzyme ‘Q’ = Co Q’ = ubiquinone) सहयोग करता है। इस प्रारम्भिक सायटोक्रोम के बाद श्रृंखला में कई और सायटोक्रोम रहते हैं। ये क्रमशः इलेक्ट्रॉन को अपने से पहले वाले सायटोक्रोम से ग्रहण करते हैं तथा अपने से अगले सायटोक्रोम को स्थानान्तरित कर देते हैं।

श्रृंखला के अन्तिम सायटोक्रोम से दो इलेक्ट्रॉन्स, ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर उसे सक्रिय कर देते हैं। अब यह .ऑक्सीजन परमाणु उपलब्ध दो हाइड्रोजन आयन्स के साथ जुड़कर जल का एक अणु (H2O) बना लेता है। श्वसनन से सम्बन्धित सह सायटोक्रोम तन्त्र माइटोक्रॉन्ड्रिया की अन्तःकला (inner membrane) में स्थित होता है।

ए० टी० पी० का संश्लेषण (Synthesis of ATP):
श्वसन क्रिया दो क्रियाओं ग्लाइकोलिसिस (glycolysis) तथा क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) में पूर्ण होती है। इन क्रियाओं के अन्त में कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल बनते हैं। – ग्लाइकोलिसिस में 4 अणु ATP बनते हैं, दो अणु काम में आ जाते हैं। अतः केवल दो ATP अणुओं का लाभ होता है।

ग्लाइकोलिसिस तथा क्रेब्स चक्र में मुक्त 2H+ (हाइड्रोजन आयन) को NAD, NADP या FAD ग्रहण करते हैं। इनसे मुक्त परमाणु हाइड्रोजन अणु हाइड्रोजन में बदलकर ऑक्सीजन के साथ मिलकर जल बनाते हैं।

इस क्रिया में मुक्त 2e (इलेक्ट्रॉन) इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र (ETS) में पहुंचकर धीरे-धीरे अपना ऊर्जा स्तर (energy level) कम करते हैं। इस प्रकार निष्कासित ऊर्जा ADP को ATP में बदलने के काम आती है। इस प्रकार प्रत्येक जोड़े 2H+ से तीन ATP अणु बनते हैं। FAD पर स्थित 2H<sup+ से केवल दो ATP अणु ही बनते हैं। इस प्रकार –
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चित्र – वे अभिक्रियाएँ जिनमें H+ निकलते हैं तथा इनके इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण तन्त्र (ETS) में जाने के कारण ATP अणु बनते हैं। क्रेब्स चक्र तथा उससे पूर्व की क्रियाओं में कुल 38 ATP अणु बनते हैं।

ग्लाइकोलिसिस से लेकर पूर्ण ऑक्सीकरण होने तक कुल ATP अणुओं की संख्या निम्नलिखित हो जाती है –

(a) ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रियाओं में (कुल चार अणु बनते हैं तथा दो प्रयुक्त हो जाते हैं)। = 2 ATP

(b) ग्लाइकोलिसिस में ही बने दो NAD. H, (ETS में जाने के बाद) = 6 ATP

(c) क्रेब्स चक्र के पूर्व पाइरुविक अम्ल से ऐसीटिल को-एन्जाइम ‘ए’ बनते समय NAD.H2 बनने तथा ETS में जाने के बाद (दो अणु पाइरुविक अम्ल से दो NAD.H2) बनते = 6 ATP

(d) क्रेब्स चक्रं में बने 3NADH2 के ETS में जाने पर [दो बार यही चक्र पूरा होने पर ध्यान रहे, दो ऐसीटिल को-एन्जाइम ‘ए’ (acetyl Co ‘A’) अर्थात् एक ग्लूकोस के अणु से दो क्रेब्स चक्र में 6NADH2, की प्राप्ति होती है। ATP के 9 अणु बनाते है।
9 × 2 = 18 ATP

(e) क्रेब्स चक्र में ही FAD.H2 से (ETS में जाने पर) दो अणु ATP बनते हैं (इस प्रकार, एक पूरे ग्लूकोस अणु से चार अणु ATP बनते हैं।)
= 2 × 2 = 4ATP

(f) क्रेब्स चक्र में ही सक्सीनिक अम्ल (succinic acid) बनते समय जी० टी० पी० (GTP = (guanosine triphosphate) का निर्माण होता है जो बाद में एक ADP को ATP में बदल देता है।
= 1 × 2 = 2ATP
इस प्रकार कुल योग = 38 ATP

ग्लिसरॉल फॉस्फेट शटर (Glycerol Phosphate Shuttle) की कार्य क्षमता कम होती है। इसमें दो अणु NADH2 जो ग्लाइकोलिसिस में बनते हैं, उनसे कभी-कभी 6 ATP के स्थान पर 4 ATP की ही प्राप्ति होती है। ये NADH2 माइटोकॉन्ड्रिया के बाहर जीवद्रव्य में बनते हैं।

NADH2 का अणु माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर प्रवेश नहीं कर पाता, यह अपने H+ माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर भेजता है मस्तिष्क तथा पेशियों की कोशिकाओं में प्रत्येक NADH2 के H+ के भीतर प्रवेश में 1 ATP अणु खर्च हो जाता है; अतः अन्त में कुल 36 ATP अणुओं की प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 7.
निम्न के मध्य अन्तर कीजिए –
(अ) ऑक्सीश्वसन तथा अनॉक्सीश्वसन
(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा किण्वन
(स) ग्लाइकोलिसिस तथा सिट्रिक अम्ल चक्र।
उत्तर:
(अ) ऑक्सीश्वसन तथा अनॉक्सीश्वसन में अन्तर (Differences between Aerobic and Anaerobic Respiration):
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(ब) ग्लाइकोलिसिस तथा किण्वन में अन्तर (Difference between Glycolysis and Fermentation):
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(स) ग्लाइकोलिसिस तथा सिट्रिक अम्ल चक्र में अन्तर (Difference between Glycolysis and Citric Acid Cycle):
क्रेब्स चक्र या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल चक्र को सिट्रिक अम्ल चक्र (Citric Acid Cycle) कहते हैं। |
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प्रश्न 8.
शुद्ध ए० टी० पी० के अणुओं की प्राप्ति की गणना के दौरान आप क्या कल्पनाएँ करते हैं?
उत्तर:
ए० टी० पी० अणुओं की प्राप्ति की कल्पनाएँ (Assumptions of Formation of ATP Molecules):

  1. यह एक क्रमिक, सुव्यवस्थित क्रियात्मक मार्ग है जिसमें एक क्रियाधार से दूसरे क्रियाधार का निर्माण होता है जिसमें ग्लाइकोलिसिस से शुरू होकर क्रेब्स चक्र तथा इलेक्ट्रॉन परिवहन तन्त्र (ETS) एक के बाद एक आती है।
  2. ग्लाइकोलिसिस में संश्लेषित NAD माइटोकॉन्ड्रिया में आता है, जहाँ उसका फॉस्फोरिलीकरण होता है।
  3. श्वसन मार्ग के कोई भी मध्यवर्ती दूसरे यौगिक के निर्माण के उपयोग में नहीं आते हैं।
  4. श्वसन में केवल ग्लूकोस का उपयोग होता है। कोई दूसरा वैकल्पिक क्रियाधार श्वसन मार्ग के किसी भी मध्यवर्ती चरण में प्रवेश नहीं करता है।

वास्तव में सभी मार्ग (पथ) एक साथ कार्य करते हैं। पथ में क्रियाधार आवश्कतानुसार अन्दर-बाहर आते-जाते रहते हैं। आवश्यकतानुसार ATP का उपयोग हो सकता है। एन्जाइम की क्रिया की दर विभिन्न कारकों द्वारा नियन्त्रित होती है। श्वसन जीवन के लिए एक उपयोगी क्रिया है। सजीव तन्त्र में ऊर्जा का संग्रहण तथा निष्कर्षण होता रहता है।

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प्रश्न 9.
“श्वसन पथ एक ऐम्फीबोलिक पथ होता है।” इसकी चर्चा कीजिए।
उत्तर:
श्वसन पथ एक ऐम्फीबोलिक पथ (Respiratory Pathway is an Amphibolic Pathway):
श्वसन क्रिया के लिए ग्लूकोस एक सामान्य क्रियाधार (substrate) है। इसे कोशिकीय ईंधन (cellular fuel) भी कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट श्वसन क्रिया में प्रयोग किए जाने से पूर्व ग्लूकोस में बदल दिए जाते हैं। अन्य क्रियाधार श्वसन पथ में प्रयुक्त होने से पूर्व विघटित होकर ऐसे पदार्थों में बदले जाते हैं, जिनका उपयोग किया जा सके; जैसे-वसा पहले ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल में विघटित होती है।

वसीय अम्ल ऐसीटाइल कोएन्जाइम बनकर श्वसन मार्ग में प्रवेश करता है। ग्लिसरॉल फॉस्फोग्लिसरेल्डिहाइड (PGAL) में बदलकर श्वसन मार्ग में प्रवेश करता है। प्रोटीन्स विघटित होकर ऐमीनो अम्ल बनाती है। ऐमीनो अम्ल विऐमीनीकरण (deamination) के पश्चात् क्रेब्स चक्र के विभिन्न चरणों में प्रवेश करता है।
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चित्र : श्वसन मध्यस्थता के दौरान विभिन्न कार्बनिक अणुओं के विखण्डन को दर्शाने वाला उपापचय मार्ग क्रम एवं परस्पर सम्बन्धों का प्रदर्शन।

इसी प्रकार जब वसा अम्ल का संश्लेषण होता है तो श्वसन मार्ग से ऐसीटाइल कोएन्जाइम अलग हो जाता है। अतः वसा अम्ल के संश्लेषण और विखण्डन के दौरान श्वसनीय मार्ग का उपयोग होता है। इसी प्रकार के संश्लेषण व विखण्डन के दौरान भी श्वसनीय मार्ग का उपयोग होता है। इस प्रकार श्वसनी पथ में अपचय (catabolic) तथा उपचय (anabolic) दोनों क्रियाएँ होती हैं। इसी कारण श्वसनी (पथ) को ऐम्फीबोलिक पथ (amphibolic pathway) कहना अधिक उपयुक्त है न कि अपचय।

प्रश्न 10.
साँस (श्वसन) गुणांक को परिभाषित कीजिए, वसा के लिए इसका क्या मान है?
उत्तर:
साँस (श्वसन) गुणांक (Respiratory Quotient, R.Q.):
एक दिए गए समय, ताप व दाब पर श्वसन क्रिया में निष्कासित CO2 व अवशोषित O2 के अनुपात को श्वसन (साँस) गुणांक या भागफल (R.Q.) कहते हैं। श्वसन पदार्थों के अनुसार श्वसन गुणांक भिन्न-भिन्न होता है।
श्वसन गुणांक (R.Q.)
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वसा (fats) का श्वसन गुणांक एक से कम होता है। वसीय पदार्थों के उपयोग से निष्कासित CO2 की मात्रा अवशोषित O2 की मात्रा से कम होती है। वसा का R.Q. लगभग 0.7 होता है।
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प्रश्न 11.
ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण क्या है?
उत्तर:
ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण (Oxidative Phosphorylation):
ऑक्सीश्वसन क्रिया के विभिन्न चरणों में मुक्त हाइड्रोजन आयन्स (2H+) को हाइड्रोजनग्राही NAD या FAD ग्रहण करके अपचयित होकर NAD.2H या FAD.2H बनाता है।
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चित्र – माइटोकॉन्ड्रिया में ATP संश्लेषण का चित्रात्मक प्रदर्शन।
प्रत्येक NAD.2H अणु से दो इलेक्ट्रॉन (2e) तथा दो हाइड्रोजन परमाणुओं (2H+) के निकलकर ऑक्सीजन तक पहुँचने के क्रम में तीन और FAD.2H से दो ATP अणुओं का संश्लेषण होता है।

ETS के अन्तर्गत इलेक्ट्रॉन परिवहन के फलस्वरूप मुक्त ऊर्जा ADP + Pi ATP क्रिया द्वारा ATP में संचित हो जाती है। प्रत्येक ATP अणु बनने में प्राणियों में 7.3 kcal और पौधों में 10-12 kcal ऊर्जा संचय होती है। यह क्रिया फॉस्फोरिलीकरण (phosphorylation) कहलाती है, क्योंकि श्वसन क्रिया में यह क्रिया O2, की उपस्थिति में होती है; अतः इसे ऑक्सीकारी फॉस्फोरिलीकरण (oxidative phosphorylation) कहते हैं।

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प्रश्न 12.
साँस के प्रत्येक चरण में मुक्त होने वाली ऊर्जा का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  • कोशिका में जैव रासायनिक ऑक्सीकरण के दौरान श्वसनी क्रियाधार में संचित सम्पूर्ण रासायनिक ऊर्जा एकसाथ मुक्त नहीं होता, जैसा की दहन प्रक्रिया में होता है। यह एन्जाइम्स द्वारा नियन्त्रित चरणबद्ध धीमी अभिक्रियाओं के रूप में मुक्त होती है। मुक्त रासायनिक ऊर्जा गतिज ऊर्जा के रूप में ATP में संचित हो जाती है।
  • श्वसन प्रक्रिया में मुक्त ऊर्जा सीधे उपयोग में नहीं आती। श्वसन प्रक्रिया में मुक्त ऊर्जाका उपयोग ATP संश्लेषण में होता है।
  • ATP ऊर्जा मुद्रा का कार्य करता है। कोशिका की समस्त जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा ATP के टूटने से प्राप्त होती है।
  • विभिन्न जटिल कार्बनिक पदार्थों के संश्लेषण में भी ATP से मुक्त ऊर्जा उपयोग में आती है।
  • कोशिकाओं में खनिज लवणों के आवागमन में प्रयुक्त ऊर्जा ATP से ही प्राप्त होती है।

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Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 20 गमन एवं संचलन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology गमन एवं संचलन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
कंकाल पेशी के एक सार्कोमियर का चित्र बनाइए और विभिन्न भागों को चिन्हित कीजिए।
उत्तर:
कंकाल पेशी के सार्कोमियर की संरचना (Structure of a Sarcomere of Skeletal Muscle):
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चित्र – (A) विश्रामावस्था में एक सार्कोमियर (पेशी तन्तुक)
(B) इसका एक पेशीखण्ड (विश्राम अवस्था में)
(C) संकुचित पेशीखण्ड।

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प्रश्न 2.
पेशी संकुचन के सी तन्तु सिद्धान्त को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
हक्सले (Huxley, 1954)ने रेखित पेशी तन्तुओं का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा अध्ययन करके इनमें उपस्थित एक्टिन तथा मायोसिन छड़ों (actin and myosin filaments) का विशिष्ट विन्यास देखा। इस विन्यास को देखते हुए इन्होंने पेशी तन्तु संकुचन का सी तन्तु या छड़ विसर्पण सिद्धान्त (sliding filament theory) दिया।

रेखित पेशियों के संकुचन की कार्य-विधि | (Mechanism of Contraction of Striated Muscles):
रेखित पेशियों में संकुचन तन्त्रिका उद्दीपन के फलस्वरूप होता है। एक्टिन छड़े मायोसिन छड़ों के ऊपर फिसलकर इनके भीतर (सार्कोमियर के केन्द्र की ओर) प्रवेश कर जाती हैं, जिससे पेशी तन्तु में संकुचन हो जाता है।

पेशी संकुचन की सी तन्तु या छड़ विसर्पण सिद्धान्त (Sliding Filament Theory of Muscle Contraction):
सामान्य अवस्था में सार्कोमियर (sarcomere) में ATP तथा मैग्नीशियम आयन होते हैं; कैल्सियम आयन भी सूक्ष्म मात्रा में होते हैं। एक्टिन छड़े ट्रोपोमायोसिन (tropomyosin) के साथ इस प्रकार जुड़ी रहती हैं कि ये मायोसिन छड़ों के साथ नहीं जुड़ सकतीं।

जब पेशी तन्तु को तन्त्रिका आवेग द्वारा ऐशहोल्ड उद्दीपन (threshold stimulus) प्राप्त होता है, तब पेशी तन्तु के अन्तर्द्रव्यीय जाल (ER) से Ca++ (कैल्सियम आयन) सार्कोमियर में मुक्त हो जाते हैं। ये कैल्सियम आयन ट्रोपोमायोसिन के साथ संयुक्त (bind) हो जाते हैं और एक्टिन छड़ें (actin filaments) स्वतन्त्र हो जाती हैं।

इसी समय ATP के जल विघटन (hydrolysis) के फलस्वरूप ऊर्जा मुक्त होती है। इस ऊर्जा की उपस्थिति में एक्टिन तथा मायोसिन सक्रियहो जाते हैं और नए सेतु बन्धों (across bridges) की रचना होती है। इसके फलस्वरूप एक्टिन छड़ें मायोसिन छड़ों के ऊपर फिसलकर सार्कोमियर के केन्द्र की ओर चली जाती है। एक्टिन तथा मायोसिन मिलकर एक्टोमायोसिन (actomyosin) की रचना करते हैं। इस प्रक्रिया में पेशी तन्तु की लम्बाई कम हो जाती है अर्थात् संकुचन हो जाता है।

जब उद्दीपन समाप्त हो जाता है, तब सक्रिय पम्पिग द्वारा कैल्सियम आयनों को अन्तर्द्रव्यीय जाल में पम्प कर दिया जाता है। ट्रोपोमायोसिन स्वतन्त्र हो जाता है, इससे एक्टिन व मायोसिन के बीच के सेतु बन्ध टूट जाते हैं। एक्टिन फिर ट्रोपोमायोसिन के साथ संयुक्त (bind) हो जाता है। पेशी तन्तु वापस अपनी पुरानी लम्बाई में लौट आता है, मृत्यु के पश्चात् ATP के न बनने के कारण Ca++ वापस सार्कोप्लाज्मिक जाल में नहीं जा सकते। अतः पेशियाँ सिकुड़ी रह जाती हैं और शरीर अकड़ा रह जाता हैं।

ऊर्जा आपूर्ति (Energy supply):
पेशी संकुचन के लिए ऊर्जा की आपूर्ति ATP द्वारा होती है। पेशियों में ATP का निर्माण ग्लाइकोजन के अपचय (catabolism) के फलस्वरूप होता है। पेशी सन्तुलन के समय ATP के जल विघटन (hydrolysis) से ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
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पेशियों में एक और उच्च ऊर्जा यौगिक उपस्थित होता है, जिसे क्रिएटिन फॉस्फेट (creatine phosphate – PCr) कहते हैं। इसका प्रयोग भी ATP निर्माण में होता है।
ADP + PCr → ATP + Cr
विश्रामावस्था में ATP द्वारा फिर से क्रिएटिन फॉस्फेट का निर्माण हो जाता है।
ATP + Cr → PCr + ADP
इस प्रकार पेशी में क्रिएटिन फॉस्फेट का भण्डार बना रहता है, जो आवश्यकता पड़ने पर ATP प्रदान कर सकता है।

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प्रश्न 3.
पेशी संकुचन के प्रमुख चरणों का वर्णन करें।
उत्तर:
पेशी संकुचन के प्रमुख चरण (Main Steps of Muscle Contractions):
पेशीसंकुचन को सी तन्तु या छड़ विर्सपण सिद्धान्त (sliding filament theory) द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। इसके अनुसार पेशीय रेशों का संकुचन पतले तन्तुओं के मोटे तन्तुओं के ऊपर सरकने से होता है। पेशी को उद्दीपन पहुँचाने वाली तन्त्रिका को तन्त्रिका न्यास (innervation) कहते हैं।

तन्त्रिका और पेशी तन्तु के मध्य सन्धि को तन्त्रिका-पेशी संधि स्थान (neuromuscular junction) कहते हैं। जब केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र से तन्त्रिका आवेग तन्त्रिका पेशी संधि स्थान तक पहुँचता है, तब रासायनिक पदार्थ ऐसीटिलकोलीन (acetylcholine) मुक्त होकर पेशी संकुचन के लिए पेशी तन्तु में आवेग पहुँचाता है।

पेशी की झिल्ली धुवित (polarised) अवस्था में होती है। इसकी बाह्य सतह पर +ve तथा भीतरी सतह पर -ve आवेश होता है। ऐसीटिलकोलीन द्वारा पेशी झिल्ली का निधुवण (depolarization) होता है। क्रियात्मक विभव (action potential) स्थापित करने के लिए पेशी झिल्ली Na+ के लिए अत्यधिक पारगम्य हो जाती है। लगभग तीन सेकण्डबाद पेशी तन्तु में संकुचन होता है। पेशी संकुचन एक्टिन छड़ की सी गति के कारण होता है।

एक्टिन छड़े मायोसिन छड़ें की H – पंक्ति या Z – जोन की ओर खिसकती है। मायोसिन छड़ के स्पर (spur) के सेतु बन्धन (cross bridges) के बनने या टूटने से यह क्रिया होती है। सार्कोमियर का पेशीखण्ड छोटा हो जाता है, लेकिन मोटी और पतली छड़ों की लम्बाई नहीं बदलती। सी गतियाँ सेतु बन्धन द्वारा होती है। ‘A’ बैण्ड की लम्बाई ज्यों-की-त्यों रहती है, ‘I’ बैण्ड की लम्बाई कम हो जाती है।

ADP और फॉस्फेट मुक्त करके मायोसिन विश्राम अवस्था में आ जाता है। एक नए ATP के बँधने से सेतु बन्धन टूटते हैं। मायोसिन शीर्ष ATP को अपघटित करके पेशी के संकुचन की क्रिया को दोहराते हैं। तन्त्रिका आवेग के समाप्त हो जाने पर सार्कोरप्लाज्म द्वारा Ca++ के अवशोषण से एक्टिन पुन: ढक जाते हैं। इसके फलस्वरूप ‘Z’ रेखाएँ अपने मूल स्थान पर वापस आ जाती हैं। अतः पेशी में शिथिलन हो जाता है।
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चित्र – सेतु बन्धन के बनने और टूटने की अवस्थाएँ।

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प्रश्न 4.
‘सही’ या ‘गलत’ लिखें –
(क) एक्टिन पतले तन्तु में स्थित होता है।
(ख) रेखित पेशी रेशे का H – क्षेत्र मोटे और पतले, दोनों तन्तुओं को प्रदर्शित करता है।
(ग) मानव कंकाल में 206 अस्थियाँ होती हैं।
(घ) मनुष्य में 11 जोड़ी पसलियाँ होती हैं।
(ङ) उरोस्थि शरीर के अधर भाग में स्थित होती है।
उत्तर:
(क) सही
(ख) सही
(ग) सही
(घ) गलत
(ङ) सही।

प्रश्न 5.
इनके बीच अन्तर बताइए –
(क) एक्टिन और मायोसिन
(ख) लाल और श्वेत पेशियाँ
(ग) अंस और श्रोणिमेखला।
उत्तर:
(क) एक्टिन और मायोसिन में अन्तर (Difference between Actin and Myosin):
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(ख) लाल तथा श्वेत पेशियों में अन्तर (Difference between Red and White muscle fibres):
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(ग) अंस तथा श्रोणिमेखला में अन्तर (Difference between Pectoral and Peivic girdle):
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प्रश्न 6.
स्तम्भ I का स्तम्भ II से मिलान करें –
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उत्तर:
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प्रश्न 7.
मानव शरीर की कोशिकाओं द्वारा प्रदर्शित विभिन्न गतियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
मानव शरीर की कोशिकाओं में मुख्यत: निम्नलिखित तीन प्रकार की गतियाँ होती हैं –

1. अमीबीय या कूटपादी गति (Amoeboid or Pseudopodial Movement):
मानव शरीर में पाई जाने वाली श्वेत रुधिराणु (Leucocytes) एवं महाभक्षकाणु (macrophages) कोशिकाएँ कूटपाद द्वारा अमीबा की भाँति गति करती हैं।

2. पक्ष्माभी गति (Ciliary movement):
स्तनियों (मानव) में शुक्रवाहिनियों, अण्डवाहिनियों, श्वास नाल में पक्ष्माभ (cilia) पाए जाते हैं। इनकी गति से शुकवाहिनियों में शुक्राणु और अण्डवाहिनियों में अण्डाणु का परिवहन होता है। श्वासनाल के पक्ष्माभ श्लेष्मा को बाहर की ओर धकेलते हैं।

3. पेशीय गति (Muscular Movement):
हमारे उपांगों (अग्रपाद, पश्चपाद), जबड़ों, जिह्वा, नेत्रपेशियों, आहारनाल हृदय आदि में पेशीय गति होती है। पेशीय गति में कंकाल, पेशियाँ तथा तन्त्रिकाएँ सम्मिलित होती हैं।

  1. नेत्र गोलक: नेत्र कोटर में अरेखित पेशियों द्वारा गति करता है। आइरिस तथा सिलियरी काय (iris and ciliary body) पेशियाँ नेत्र में जाने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करती हैं।
  2. हृदय की हृदपेशियाँ तथा रक्त वाहिनियों की अरेखित पेशियाँ रक्त परिसंचरण में सहायक होती हैं।
  3. डायफ्राम तथा पसलियों के मध्य स्थित अरेखित पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन के फलस्वरूप श्वास क्रिया (breathing) सम्पन्न होती है।
  4. आहारनाल की पेशियों में क्रमाकुंचन गतियों के कारण भोजन आगे खिसकता है। भोजन की लुगदी (chyme) बनती है।
  5. कंकालीय पेशियाँ (skeletal muscles) कंकाल से जुड़ी होती हैं। प्रचलन एवं अंगों की गति से ये सीधे सम्बन्धित होती है। कंकाल या रेखित पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन के कारण प्रचलन गति होती है।

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प्रश्न 8.
आप किस प्रकार से एक कंकाल पेशी और हृद पेशी में विभेद करेंगे?
उत्तर:
कंकाल (रेखित) पेशी और हृद पेशी में अन्तर (Difference between Skeletal or Striped and Cardiac Muscles):
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प्रश्न 9.
निम्नलिखित जोड़ों के प्रकार बताएँ:
(क) एटलस/अक्ष (एक्सिस)
(ख) अँगूठे के कार्पल/मेटाकार्पल
(ग) फैलेंजेज के बीच
(घ) फीमर/ऐसीटाबुलम
(ङ) कपालीय अस्थियों के बीच
(च) श्रेणिमेखला की प्यूबिक अस्थियों के बीच।
उत्तर:
(क) उपास्थीय जोड़ (cartilagenous joint)।
(ख) सैडल जोड़ (saddle joint)।
(ग) कब्जा जोड़ (Hinge joint)।
(घ) कन्दुक खल्लिका संधि (ball and socket joint)।
(ङ) अचल (fixed) या रेशीय जोड़ (fibrous joint)।
(च) अपूर्ण संधि (imperfect joint)।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 20 गमन एवं संचलन

प्रश्न 10.
रिक्त स्थानों में उचित शब्दों को भरिए –
(क) सभी स्तनधारियों में (कुछ को छोड़कर) ………… ग्रीवा कशेरुक होते हैं।
(ख) प्रत्येक मानव पाद में फैलेंजेज की संख्या ………. हैं।
(ग) मायोफाइब्रिल के पतले तन्तुओं में 2 ‘F’ एक्टिन और दो अन्य दूसरे प्रोटीन, जैसे …………. और …………. होते हैं।
(घ) पेशी रेशे में कैल्सियम ……….. में भण्डारित रहता हैं।
(ङ) …………. और …………. पसलियों की जोड़ियों को प्लावी पसलियाँ कहते हैं।
(च) मनुष्य का कपाल ………… अस्थियों से बना होता है।
उत्तर:
(क) सात।
(ख) 14 फैलेंजेज।
(ग) ट्रोपोनिन (troponin), ट्रोपोमायोसिन (tropomyosin)।
(घ) सार्कोप्लाज्मिक जालक (sarcoplasmic reticulum)।
(ङ) 11 वीं, 12 वीं।
(च) 8