Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 1 जीव जगत

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 1 जीव जगत Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 1 जीव जगत

Bihar Board Class 11 Biology जीव जगत Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
जीवों को वर्गीकृत क्यों करते हैं?
उत्तर:
विश्व में कई मिलियन पौधे तथा प्राणी हैं, जो आकृति, आकार तथा रंग आदि में भिन्न होते हैं। अब तक लगभग 1.7-1.8 मिलियन स्पीशीज ज्ञात हो सकी हैं। इसे हम जैविक विविधता (biological diversity) कहते हैं। विविधता का लैटिन भाषा में तात्पर्य प्रकार (variety) से है। अभी भी ऐसे अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पर पाए जाने वाले प्राणी तथा पौधे अज्ञात हैं।

जैसे-जैसे हम नए और पुराने क्षेत्रों में खोज करते हैं, नए-नए जीवों का पता लगता रहता है। जैविक विविधता जैव विकास (evolution) तथा अनुकूलनता का प्रमाण है। विश्व में पाए जाने वाले सभी जीवों का अध्ययन करना असम्भव है, इसीलिए वर्गीकरण की आवश्यकता पड़ती है। वर्गीकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें दृश्य गुणों के आधार पर _सुविधाजनक वर्ग में जीवधारियों को वर्गीकृत किया जाता है।

वर्गीकरण के मानक समय और आवश्यकता के अनुरूप बदलते रहे हैं। वर्गीकरण के कारण ही एक वर्ग के किसी एक जीव का अध्ययन कर लेने से उस वर्ग के अन्य सभी जीवों के सामान्य लक्षणों का ज्ञान हो जाता है। वर्गीकरण से विकास क्रम का ज्ञान होता है। वर्गीकरण से ही ज्ञात होता है कि पहले जलीय जीवों का उद्भव हुआ और उनसे बाद में उभयचर तथा उनसे स्थलीय जीवों का विकास हुआ है। वर्गीकरण के फलस्वरूप जीवधारियों के विकासीय सम्बन्धों का ज्ञान होता है।

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प्रश्न 2.
वर्गीकरण प्रणाली को बार-बार क्यों बदलते हैं?
उत्तर:
आदिकाल से ही मानव जीवों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयत्न करता रहा है। आदिकाल में मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं; जैसे-भोजन, वस्त्र, आश्रय के आधार पर जीवों को वर्गीकृत करता था। मनुष्य ने जन्तुओं को घातक-अघातक, भक्ष्य-अभक्ष्य, लाभदायक-हानिकारक आदि अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया। आयुर्वेद आचार्य चरक ने लगभग 200 प्रकार के जन्तुओं और 340 प्रकार के पौधों का उल्लेख उनके महत्त्व के आधार पर किया। अरस्तू ने पौधों को शाक (herb), झाड़ी (shrub) तथा वृक्ष (tree) में वर्गीकृत किया।

प्रारम्भ में जीवधारियों का कृत्रिम वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया; जैसे –

1. आकार व आकृति के आधार पर पौधों को शाक, झाड़ी तथा वृक्ष में वर्गीकृत किया गया।

2. जीवन-अवधि के आधार पर पौधों को एकवर्षी, द्विवर्षी तथा बहुवर्षी में वर्गीकृत किया गया।

3. आवास के आधार पर जीवों को जलीय, स्थलीय, वायवीय में वर्गीकृत किया गया। उपर्युक्त कृत्रिम वर्गीकरण से कोई स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती और न ही किसी वर्ग के सदस्यों के बीच प्राकृतिक सम्बन्धों का ज्ञान होता है; जैसे-कीट, पक्षी और चमगादड़ को पंखों के आधार पर उड़ने वाले प्राणियों के समूह में वर्गीकृत कर दिया गया, लेकिन इनमें परस्पर सम्बन्ध प्रदर्शित नहीं होता।

इसके पश्चात् जीवों का वर्गीकरण उनकी प्राकृतिक संरचना, कार्यिकी, स्वभाव, व्यवहार तथा परिवर्धन में समानताओं और विभिन्नताओं के आधार पर किया गया। इसे प्राकृतिक वर्गीकरण कहते हैं। आधुनिक वर्गीकरण जीरों के जातिवृत्त सम्बन्धों पर आधारित हैं; क्योंकि मनुष्य जैव विविधता और जीवधारियों के पारस्परिक सम्बन्धों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।

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प्रश्न 3.
जिन लोगों से आप प्रायः मिलते रहते हैं, आप उनको किस आधार पर वर्गीकृत करना पसन्द करेंगे? (संकेत-ड्रेस, मातृभाषा, प्रदेश जिसमें वे रहते हैं, आर्थिक स्तर आदि)।
उत्तर:
जीवधारियों को उनकी समानता एवं भिन्नता के आधार पर विभिन्न समूहों एवं वर्गों में रखना ही वर्गिकी (systematics) है। जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर जीवधारियों को वर्गीकृत किया जाता है। इसके लिए जीवधारी के लक्षणों का ज्ञात होना अति आवश्यक है। लक्षणों की समानता और भिन्नता के आधार पर किसी जीवधारी को पहचाना जा सकता है।

अगर व्यक्तियों को ड्रेस, मातृभाषा, प्रदेश, आर्थिक स्तर आदि के आधार पर वर्गीकृत करना पड़े तो प्रदेश के आधार पर उसे वर्गीकृत करना अधिक उपयुक्त होगा; क्योंकि प्रदेश के भौगोलिक वातावरण, वहाँ की भाषा का व्यक्ति-विशेष पर प्रभाव पड़ता है; ड्रेस तो प्रदेश की जलवायु के अनुसार बदल जाती है। एक ही स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों का आर्थिक स्तर भी भिन्न-भिन्न होता है।

प्रश्न 4.
व्यष्टि तथा समष्टि की पहचान से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
व्यष्टि (Individual) तथा समष्टि (Population):
व्यष्टि तथा समष्टि की पहचान से हमें जीवधारी के वैज्ञानिक नाम तथा उसकी विशेषताओं (characters) का ज्ञान होता है। जीवधारियों के आकार, रंग, आवास, कोशिकीय संगठन, शरीर क्रियात्मक तथा आकारिकीय लक्षणों के आधार पर जीवों की व्याख्या की जाती है।

व्यष्टि या जाति जीवधारियों के उस समूह को कहते हैं जो प्रकृति में परस्पर जनन करके प्रजनन योग्य सन्तान उत्पन्न करते हैं। एक ही जाति के सदस्य जब अलग-अलग भौगोलिक वातावरण में रहते हैं तो उनके रंग, रूप तथा आकार में भिन्नता आ जाती है, इस समूह को समष्टि या आबादी (Population) कहते हैं। समष्टि में जीवों की संख्या अस्थिर रहती है अर्थात् यह अधिक या कम हो सकती है।

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प्रश्न 5.
आम का वैज्ञानिक नाम निम्नलिखित है। इसमें से कौन-सा सही है? मेंजीफेरा इंडिका (Mangiferra indica) मेंजीफेरा इंडिका (Mangiferra indica)
उत्तर:
आम का वैज्ञानिक नाम मेंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica) है।

प्रश्न 6.
टैक्सॉन की परिभाषा लिखिए। विभिन्न पदानुक्रम स्तर पर टैक्सा के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
टैक्सॉन (Taxon):
वर्गीकरण में अनेक पदानुक्रम सोपान होते हैं, जिसका प्रत्येक संवर्ग एक सोपान को प्रदर्शित करता है। इसे वर्गिकी संवर्ग या टैक्सॉन (taxon) कहते हैं। वर्गीकरण अध्ययन में विभिन्न स्तर के वर्गक या टैक्सॉन निम्न हैं –
जाति (species), वंश (genus), कुल (family), गण (order), वर्ग (class), संघ (phylum), जगत (kingdom)

उदाहरण:
आलू, टमाटर, बैंगन अलग-अलग जातियाँ हैं किन्तु इन सभी को एक वंश सोलेनम के अन्तर्गत रखते हैं क्योंकि इनमें अनेक समानताएँ पाई जाती हैं। सोलेनम, पिटूनिआ, धतूरा अलग-अलग वंश है किन्तु इन सभी को जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर एक ही कुल सोलेनेसी के अन्तर्गत रखते है।

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प्रश्न 7.
क्या आप वर्गिकी संवर्ग का सही क्रम पहचान सकते हैं?
(अ) जाति (स्पीशीज) → गण (आर्डर) → संघ (फाइलम) → जगत (किंगडम)
(ब) वंश (जीनस) → जाति → गण → जगत (स) जाति → वंश → गण → संघ
उत्तर:
सही वर्गिकी संवर्ग है –
(स) जाति → वंश → गण → संघ।

प्रश्न 8.
जाति शब्द के सभी मानवीय वर्तमान कालिक अर्थों को एकत्र कीजिए। क्या आप अपने शिक्षक से उच्चकोटि के पौधों, प्राणियों तथा बैक्टीरिया की स्पीशीज का अर्थ जानने के लिए चर्चा कर सकते हैं?
उत्तर:
जाति (Species):
जॉन रे (John Ray) ने सर्वप्रथम किसी एक प्रकार के जीवधारी के लिए जाति या स्पीशीज शब्द का प्रयोग किया। जाति वर्गीकरण की मूल इकाई है। पुरानी धारणा के अनुसार जाति एक स्थायी इकाई है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार जाति एक गतिशील तथा परिवर्तनशील इकाई है, जिसमें वातावरण के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं। ये परिवर्तन लाखों-करोड़ों वर्षों में एक नई जाति का निर्माण करते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकृति में जितनी भी जातियाँ हैं वे सभी आदिकाल में पाई जाने वाली जातियों से विकसित हुई हैं।

मेयर (1942) के अनुसार, “जाति जीवधारियों का वह समूह है जो परस्पर जनन करके प्रजनन योग्य सन्तानें उत्पन्न कर सकें।” एक जाति के सदस्यों को अन्य जाति के सदस्यों से आकारिकीय लक्षणों के आधार पर एक-दूसरे से पृथक कर सकते हैं। उच्च श्रेणी के पौधों, प्राणियों तथा बैक्टीरिया की जातियाँ आकारिकीय लक्षणों; जैसे – कोशिका संरचना, शारीरिक संगठन, पोषण प्राप्त करने की विधि, पर्यावरणीय जीवन-शैली तथा जातिवृत्तीय सम्बन्धों के आधार पर भिन्न होती है। पादप स्वपोषी एवं उत्पादक कहलाते हैं। प्राणी परपोषी एवं उपभोक्ता होते हैं। बैक्टीरिया प्रायः परपोषी एवं अपघटक होते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित शब्दों को समझिए तथा परिभाषित कीजिए –

  1. संघ
  2. वर्ग
  3. कुल
  4. गण
  5. वंश।

उत्तर:
1. संघ:
यह विभिन्न सम्बन्धित वर्गों का समूह है जिसमें कुल गुण समान होते हैं। जैसे-पिसीज, एम्फीबिया, रेप्टीलिया, एवीज तथा मैमेलिया वर्ग के सदस्यों को संघ काटा में रखते हैं क्योंकि इन सभी में पृष्ठ रज्जु युक्त खोखला तन्त्रिका तन्त्र, ग्रसनीय गिल दरारें पायी जाती हैं।

2. वर्ग:
यह अनेक सम्बन्धित गणों का समूह है। जैसे – मैमेलिया वर्ग में सिटेसिया, काइरोप्टेरा, कार्नीवोरा तथा प्राइमेटा गण आते हैं। सिटेसिया में समुद्री स्तनी, काइरोप्टेरा में उड़ने वाले स्तनी, कार्नीवोरा में मांसाहारी स्तनी तथा प्राइमेटा में बुद्धिमान स्तनी आते हैं। इन सभी के शरीर पर बाल, बाह्य कर्ण तथा स्तनग्रन्थियाँ पाई जाती हैं।

3. कुल:
इसके अन्तर्गत सम्बन्धित वंश आते हैं। जैसे – सोलेनेसी कुल में सोलेनम, पिटूनिआ तथा धतूरा रखते हैं।

4. गण:
यह समान लक्षण वाले कुलों का समूह है। जैसे-कार्नीवोरा गण के अन्तर्गत फेलिडि तथा कैनसीडी कुलों को रखा गया है।

5. वंश:
बहुत सी जातियों के समूह को वंश कहते हैं। इनके कुछ लक्षण समान तथा अन्य लक्षण भिन्न होते हैं। जैसे-शेर, चीता तथा तेंदुआ अलग जातियाँ हैं किन्तु ये सभी एक ही वंश पेंथेरा के अन्तर्गत आते हैं।

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प्रश्न 10.
जीव के वर्गीकरण तथा पहचान में कुंजी किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
वर्गीकरण तथा पहचान में जो लक्षण वर्गिकी में सहायक होते हैं उन्हें वर्गीकरण की कुंजी (key of classification) कहते हैं। यह अज्ञात जीवधारी की पहचान में सहायक होती है। यह तुलनात्मक लक्षणों पर आधारित होती है। वर्गीकरण संवर्ग के प्रत्येक टैक्सॉन (taxon); जैसे-जाति, वंश, कुल, गण, वर्ग, संघ के लिए अलग-अलग कुंजी (key) का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
पौधों तथा प्राणियों के उचित उदाहरण देते हुए वर्गिकी पदानुक्रम का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
वर्गिकी पदानुक्रम-वर्गीकरण में अनेक पदानुक्रम सोपान होते हैं, जिसका प्रत्येक संवर्ग एक सोपान को प्रदर्शित करता है। इसे वर्गिकी संवर्ग या टैक्सॉन (taxon) कहते हैं। इसमें विभिन्न टैक्सा उच्चतम से निम्नतम श्रेणी में निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते हैं। वर्गीकरण की आधारभूत इकाई जाति है तथा उच्चतम इकाई जगत है। जीवों को विभिन्न टैक्सा में रखने के लिए मूलभूत आवश्यक व्यष्टि अथवा उस टैक्सा के गुणों का ज्ञान होना आवश्यक है। इसके द्वारा समान प्रकार के जीवों तथा अन्य प्रकार के जीवों में समानता तथा विभिन्नता को पहचानते हैं।

आरोही क्रम में पदानुक्रम वर्गिकी संवर्ग को निम्न प्रकार प्रदर्शित करते हैं –
जाति (species) → वंश (genus) → कुल (family) → गण (order) → वर्ग (class) → संघ (phylum) → जगत (kingdom)।

उदाहरण:
शेर (Panthera leo), चीता (Panthera tigris), तेंदुआ (Panthera pardus) अलग-अलग जाति के सदस्य हैं किन्तु ये सभी एक ही वंश (genus) पेंथेरा के अन्तर्गत आते हैं। बिल्ली का वंश फेलिस इनसे भिन्न है। लेकिन इन दोनों को ही एक ही कुल फेलिडि में रखते हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 14 पर्यावरणीय रसायन

Bihar Board Class 11 Chemistry पर्यावरणीय रसायन Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 14.1
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरणीय रसायन शास्त्र, विज्ञान की वह शाखा है, जो पर्यावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों से सम्बन्धित है। इसमें हमारे चारों ओर का वातावरण सम्मिलित होता है; जैसे-वायु, जल, मिट्टी, जंगल, सूर्य का प्रकाश आदि।

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प्रश्न 14.2
क्षोभमण्डलीय प्रदूषण को लगभग 100 शब्दों में समझाइए।
उत्तर:
क्षोभमण्डलीय प्रदूषण वायुमण्डल का सबसे निचला क्षेत्र, जिसमें मनुष्य तथा अन्य प्राणि रहती हैं, क्षोभमण्डल कहलाता है। यह समुद्र-तल से 10 किमी की ऊँचाई तक होता है। क्षोभमण्डल धूलकणों से युक्त क्षेत्र होता है जिसमें वायु, अधिक जलवाष्प तथा बादल उपस्थित होते हैं। इस क्षेत्र में वायु का तीव्र प्रवाह एवं बादलों का निर्माण होता है। वस्तुतः वायु में उपस्थित अवांछनीय ठोस अथवा गैस कणों के कारण क्षोभमण्डलीय प्रदूषण होता है। क्षोभमण्डल में मुख्यतः निम्नलिखित गैसीय तथा कणिकीय प्रदूषक उपस्थित होते हैं –

(क) गैसीय वायुप्रदूषक:
ये सल्फर, नाइट्रोजन तथा कार्बन के ऑक्साइड, हाइड्रोजन, सल्फर, हाइड्रोकार्बन, ओजोन तथा अन्य ऑक्सीकारक हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम आदि) के दहन के परिणामस्वरूप सल्फर के ऑक्साइड (मुख्यत: सल्फर ऑक्साइड SO2) उत्पन्न होते हैं। SO2 की सूक्षम सान्द्रता मनुष्य में विभिन्न श्वसन-रोगों (जैसे-अस्थमा, श्वसनी शोथ, ऐम्फाइसीमा आदि) का कारण होती है। इसके कारण आँखों में जलन होती है तथा आँखें लाल हो जाती हैं। SO2 की उच्च सान्द्रता फूलों की कलियों में कड़ापन उत्पन्न करती है।

जिससे ये पौधों से शीघ्र गिर जाती है। यातायात तथा सघन स्थानों पर उत्पन्न तीक्ष्ण लाल धूम्र नाट्रोजन ऑक्साइड के कारण होता है। NO2 की अधिक सान्द्रता होने पर पौधों की पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा प्रकाश-संश्लेषण की दर कम हो जाती है। कार्बन मोनोक्साइड भी एक प्राणघातक गैस है। इसके स्त्रोत मोटरवाहनों से निकला धुआँ तथा कोयला, ईंधन-लकड़ी, पेट्रोल का अपूर्ण दहन हैं इसकी 1300 ppn सान्द्रता आधे घण्टे में प्राणघातक हो जाती हैं। इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड की वायुमण्डल में बढ़ी हुई मात्रा भूमण्डलीय तापवृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

(ख) कणिकीय प्रदूषक:
कणिकीय पदार्थ वायु में निलम्बित सूक्ष्म ठोस कण अथवा द्रवीय बूंद होते हैं। यह मोटरवाहनों के उत्सर्जन, अग्नि के धूम्र, धूल कण तथा उद्योगों की राख होते हैं। वायुमण्डल में कणिकाएँ जीवित तथा अजीवित दोनो ‘प्रकार की हो सकती हैं। जीवित कणिकाओं में जीवाणु, कवक, फफूंद, शैवाल आदि सम्मिलित हैं।

हवा में पाए जाने वाले कुछ कवक मनुष्य में एनर्जी उत्पन्न करते हैं। ये पौधों के रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं। कणिकीय प्रदूषकों का प्रभाव मुख्यतया उनके कणों के आकार पर निर्भर करता है। हवा में ले जाए जाने वाले कण; जैसे-धूल, धूम, कोहरा आदि मानवीय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। 5 माइक्रोम से बड़े कणिक प्रदूषक नासिका द्वार में जमा हो जाते हैं, जबकि लगभग 1.0 माइक्रोन के कण फेफड़ों में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।

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प्रश्न 14.3
कार्बन डाइ-ऑक्साइड की अपेक्षा कार्बन मोनोक्साइड अधिक खतरनाक क्यों है? समझाइए।
उत्तर:
कार्बन डाइ-ऑक्साइड की अपेक्षा कार्बन मोनोक्साइड अधिक खतरनाक है; क्योंकि यह श्वसित किए जाने पर हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन की अपेक्षा अधिक प्रबलता से संयुक्त हो जाती है तथा कॉर्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है, जो ऑक्सीजन-हीमोग्लोबिन से लगभग 300 गुना अधिक स्थायी संकुल है।

जब रक्त में कोर्बोक्सीहीमोग्लोबिन की मात्रा 3.4% तक पहुँच जाती है, तब रक्त में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता काफी कम हो जाती है। ऑक्सीजन की इस न्यूनता से सिरदर्द, नेत्रदृष्टि की क्षीणत, तंत्रकीय आवेश में न्यूनतम हृदयवाहिका में तन्त्र अव्यवस्था आदि की विसंगतियाँ हो जाती हैं। कार्बन मोनोक्साइड की 1300 ppm सान्द्रता आधे घण्टे में प्राणघातक हो जाती है। दूसरी ओर, कार्बन डाइ-ऑक्साइड का हानिकारक प्रभाव केवल यह है कि इसकी वायुमण्डल में बढ़ी हुई मात्रा भूमण्डलीय तापवृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 14.4
ग्रीनहाउस-प्रभाव के लिए कौन-सी गैसें उत्तरदायी हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
ग्रीनहाउस-प्रभाव के लिए कार्बन डाइ-ऑक्साइड, मेथेन, ओजोन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन यौगिक आदि उत्तरदायी हैं। ये गैसें वायुमण्डल में विकिरित सौर-ऊर्जा की कुछ मात्रा ग्रहण करके भूमण्डल का ताप बढ़ा देती हैं।

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प्रश्न 14.5
अम्लवर्षा मूर्तियों तथा स्मारकों को कैसे दुष्प्रभावित करती हैं?
उत्तर:
अम्लवर्षा में वायुमण्डल से पृथ्वी-सतह पर अम्ल निक्षेपित हो जाती है। अम्लीय प्रकृति के नाइट्रोजन एवं सल्फर के ऑक्साइड वायुमण्डल में ठोस कणों के साथ हवा में बहकर या तो ठोस रूप में अथवा जल में द्रव रूप में कुहासे से या हिम की भाँति निक्षेपित होते हैं। नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड ऑक्सीकरण के पश्चात् जल के साथ अभिक्रिया कर अम्लवर्षा में प्रमुख योगदान देते हैं, क्योंकि प्रदूषित वायु में सामान्यतया कणिकीय द्रव्य उपस्थित होते हैं, जो ऑक्सीकरण को उत्प्रेरित करते हैं।

2SO2 (g) + O2 (g) + 2H2O (l) → 2H2SO4 (aq)
4NO2 (g) + O2 (g) + 2H2O (l) → 4HNO3 (aq)

अम्लवर्षा पत्थर एवं धातुओं से बनी संरचनाओं; जैसेमूर्तियों तथा स्मारकों को नष्ट करती है। जोकि संगमरमर (CaCO3) से निम्नलिखित अभिक्रिया करती है –
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प्रश्न 14.6
धूम कुहरा क्या है? सामान्य धूम कुहरा प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
धूम कोहरा-‘धूम-कोहरा’ शब्द ‘धूम’ एवं “कोहरे’ से मिलकर बना है। अतः जब धूम, कोहरे के साथ मिल जाता है तब यह धूम-कोहरा कहलाता है। विश्व के अनेक शहरों में प्रदूषण इसका आम उदाहरण है। धूम कोहरे दो प्रकार के होते है –

1. सामान्य धूम कोहरा:
यह ठण्डी नम जलवायु में होता है तथा धूम, कोहरे एवं सल्फर डाइऑक्साइड का मिश्रण होता है। रासायनिक रूप से यह एक अपचायक मिश्रण है। अतः इसे ‘अपचायक धूम-कोहरा’ भी कहते हैं।

2. प्रकाश रासायनिक धूम कोहरा:
उष्ण, शुष्क एवं साफ धूपमयी जलवायु में होता है। यह स्वचालित वाहनों तथा कारखानों से निकलने वाले नाइट्रोजन के ऑक्साइडों तथा हाइड्रोकार्बनों पर सूर्यप्रकाश की क्रिया के कारण उत्पन्न होता है। प्रकाश रासायनिक धूम कोहरे की रासायनिक प्रकृति ऑक्सीकारक है। चूंकि इसमें ऑक्सीकारक अभिकर्मकों की सान्द्रता उच्च रहती है; अतः इसे ‘ऑक्सीकारक धूम कोहरा’ कहते हैं।

प्रश्न 14.7
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के निर्माण के दौरान होने वाली अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के निर्माण के दौरान होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नवत् हैं –
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ओजोन एक जहरीली गैस है। NO2 तथा O3 दोनों ही प्रबल ऑक्सीकारक हैं। इस कारण प्रदूषित वायु में उपस्थित अदहित हाइड्रोकार्बनों के साथ अभिक्रिया करके कई रसायनों जैसे-फार्मेल्डिहाइड, एक्रोलीन एवं परॉक्सी ऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) का निर्माण करते हैं।
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प्रश्न 14.8
प्रकाश रासायनिक धूम कुहरे के दुष्परिणाम क्या हैं? इन्हें कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है?
उत्तर:
प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के दुष्परिणामप्रकाश रासायनिक धूम कोहरे के सामान्य घटक ओजोन, नाइट्रिक ऑक्साइड, सक्रोलीन, फॉर्मेल्डिहाइड एवं परॉक्सीऐसीटिल नाइट्रेट (PAN) हैं। प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के कारण गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं। ओजोन एवं नाइट्रिक ऑक्साइड नाक एवं गले में जलन पैदा करते हैं।

इनकी उच्च सान्द्रता से सरदर्द, छाती में दर्द, गले का शुष्क होना, खाँसी एवं श्वास अवरोध हो सकता है। प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरा रबर में दरार उत्पन्न करता है एवं पौधों पर हानिकारक प्रभाव डालता है। यह धातुओं, पत्थरों; भवन-निर्माण के पदार्थों एवं रंगी हुई सतहों (painted surfaces) का क्षय भी करता है।

प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के नियंत्रण के उपायप्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे को नियन्त्रित या कम करने के लिए कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यदि हम प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरे के प्राथमिक पूर्वगामी; जैसे – NO2, एवं हाइड्रोकार्बन को नियन्त्रित कर लें, तो द्वितीयक पूर्वगामी; जैसेओजोन एवं PAN तथा प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरा स्वतः ही कम हो जाएगा।

सामान्यतया स्वचालित वाहनों में उत्प्रेरित परिवर्तक उपयोग में लाए जाते हैं, जो वायुमण्डल में नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन को रोकते हैं। कुछ पौधों (जैसे-पाइनस, जुनीठर्स, क्वेरकस, पायरस तथा विटिस), जो नाइट्रोजन ऑक्साइड का उपापचय कर सकते हैं, का रोपण इस सन्दर्भ में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 14.9
क्षोभमण्डल पर ओजोन परत के क्षय में होने वाली अभिक्रिया कौन-सी है?
उत्तर:
ओजोन परत में अवक्षय का मुख्य कारण क्षोभमण्डल से क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) यौगिकों का उत्सर्जन है। CFC वायुमण्डल की अन्य गैसों से मिश्रित होकर सीधे समतापमण्डल में पहुँच जाते हैं। समतापमण्डल में ये शक्तिशाली विकिरणों द्वारा अपघटित होकर क्लोरीन मुक्त मूलक उत्सर्जित करते हैं।
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क्लोरीन मुक्त मूलक तब समतापमण्डलीय ओजोन से अभिक्रिया करके क्लोरीन मोनोक्साइड मूलक तथा आण्विक ऑक्सीजन बनाते हैं।
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क्लोरीन मोनोक्साइड मूलक परमाण्वीय ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके अधिक क्लोरीन मूलक उत्पन्न करता है।
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प्रश्न 14.10
ओजोन छिद्र से आप क्या समझते हैं? इसके परिणाम क्या हैं?
उत्तर:
ओजोन-छिद्र:
सन् 1980 में वायुमण्डलीय वैज्ञानिकों ने अटार्कटिका पर कार्य करते हुए दक्षिणी ध्रुव के ऊपर ओजोन परत के क्षय जिसे सामान्य रूप से ‘ओजोन-छिद्र’ कहते हैं, के बारे में बताया। यह पाया गया कि ओजोन छिद्र के लिए परिस्थितियों का एक विशेष समूह उत्तरदायी था। गर्मियों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड परमाणुओं [अभिक्रिया (i)] एवं क्लोरीन परमाणुओं [अभिक्रिया (ii)] से अभिक्रिया करके क्लोरीन सिंक बनाते हैं, जो ओजोन-क्षय को अत्यधिक सीमा तक रोकता है।

जबकि सर्दी के मौसम में विशेष प्रकार के बादल, जिन्हें ‘ध्रुवीय समतापमण्डलीय बादल’ कहा जाता है, अंटार्कटिका के ऊपर बनते हैं। ये बादल एक प्रकार की सतह प्रदान करते हैं, जिस पर बना हुआ क्लोरीन नाइट्रेट [अभिक्रिया (i)] जलयोजित होकर हाइपोक्लोरस अम्ल बनाता है। [अभिक्रिया (iii)] अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन क्लोराइड से भी अभिक्रिया करके यह आण्विक क्लोरीन देता है।

ClO(g) + NO2 (g) → ClONO2 (g) … (i)
Cl (g) + CH4 (g) → CH3 (g) + HCl (g) … (ii)
ClONO2 (g) + H2O (g) → HOCl(g) + HNO3 (g) … (iii)
ClONO2 (g) + HCl(g) → Cl2 (g) + HNO3 (g) … (iv)

वसन्त में अंटार्कटिका पर जब सूर्य का प्रकाश लौटता है, तब । सूर्य की गर्मी बादलों को विखण्डित कर देती है एवं HOCl तथा Cl2 सूर्य के प्रकाश से अपघटित हो जाते हैं [अभिक्रिया तथा vi]
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इस प्रकार उत्पन्न क्लोरीन मूलक, ओजोन-क्षय के लिए श्रृंखला अभिक्रिया प्रारम्भ कर देते हैं। ओजोन छिद्र के परिणाम (Results of Ozone hole) ओजोन परत के साथ अधिकाधिक पराबैंगनी विकिरण क्षोभमण्डल में छनित होते हैं। पराबैंगनी विकिरण से त्वचा का जीर्णन, मोतियाबिन्द, सनबर्न, त्वचा-कैन्सर, कई पादपप्लवकों की मृत्यु, मत्स्य उत्पाद की क्षाति आदि होते हैं।

यह भी देखा गया है कि पौधों के प्रोटीन पराबैंगनी विकिरणों से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे कोशिकाओं का हानिकारक उत्परिवर्तन होता है। इससे पत्तियों के रंध्र से जल का वाष्पीकरण भी बढ़ जाता है, जिससे मिट्टी की नमी कम हो जाती है। बढ़े हुए पराबैंगनी विकिरण रंगों एवं रेशों की भी हानि पहुँचाते हैं, जिससे रंग जल्दी हल्के हो जाते हैं।

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प्रश्न 14.11
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या हैं? समझाइए।
उत्तर:
जल-प्रदूषण के मुख्य कारण:

1. रोगजनक:
सबसे अधिक गम्भीर जल-प्रदूषक रोगों के कारकों को ‘रोगजनक’ कहा जाता है। रोगजनकों में जीवाणु एवं अन्य जीव हैं, जो घरेलू सीवेज एवं पशु-अपशिष्ट द्वारा जल में प्रवेश करते हैं। मानव-अपशिष्ट एशरिकिआ कोली, स्ट्रेप्टोकॉकस फेकेलिस आदि जीवाणु होते है, जो जठरांत्र बीमारियों के कारण होते हैं।

2. कार्बनिक अपशिष्ट:
अन्य मुख्य जल-प्रदूषण कार्बनिक पदार्थ; जैसे-पत्तियाँ, घास, कूडा-करकट आदि हैं। ये जल को प्रदूषित करते हैं। जल में पादप-प्लवकों की अधिक बढ़ोत्तरी भी जल-प्रदूषण का एक कारण है।

प्रश्न 14.12
क्या आपने अपने क्षेत्र में जल-प्रदूषण देखा है? इसे नियन्त्रित करने के कौन-से उपाय हैं?
उत्तर:
हाँ, हमारे क्षेत्र में जल प्रदूषित है। जल के प्रदूषित होने की जाँच भी हम स्वयं ही कर सकते हैं। इसके लिए हम स्थानीय जल-स्त्रोतों का निरीक्षण कर सकते हैं। जैसे कि नदी, झील, हौद, तालाब आदि का पानी अप्रदूषित या आंशिक प्रदूषित या सामान्य प्रदूषित अथवा बुरी तरह प्रदूषित है। जल को देखकर या उसकी pH जाँचकर इसे देखा जा सकता है। निकट के शहरी या औद्योगिक स्थल, जहाँ से प्रदूषण उत्पन्न होता है, के नाम का प्रलेख करके इसकी सूचना सरकार द्वारा प्रदूषण-मापन के लिए गठित ‘प्रदूषण नियन्त्र बोर्ड’ कार्यालय को दी जा सकती है तथा समुचित कार्यवाही सुनिश्चित की जा सकती है।

हम इसे मीडिया को भी बता सकते हैं। जल प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए हमें नदी, तालाब, जलधारा या जलाशय में घेरलू अथवा औद्योगिक अपशिष्ट को सीधे नहीं डालना चाहिए। बगीचों में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट का प्रयोग करना चाहिए। डी०डी०टी०, मैलाथिऑन आदि कीटनाशी के प्रयोग से बचना चाहिए तथा यथासम्भव नीम की सूखी पत्तियों का प्रयोग कीटनाशी के रूप में करना चाहिए। घरेलू पानी टंकी में पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) के कुछ क्रिस्टल अथवा ब्लीचिंग पाउडर की थोड़ी मात्रा डालनी चाहिए।

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प्रश्न 14.13
आप अपने ‘जीव रसायनी ऑक्सीजन आवश्यकता’ (BOD) से क्या समझते हैं?
उत्तर:
जल के एक नमूने के निश्चित आयतन में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ को विखण्डित करने के लिए जीवाणु द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन को जैव – रासायनिक ऑक्सीजन माँग (BOD) कहा जाता है। अत: जल में BOD की मात्रा कार्बनिक पदार्थ को जैवीय रूप में विखण्डित करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा होगी। स्वच्छ जल की BOD का मान 5ppm से कम होता है जबकि अत्यधिक प्रदूषित में यह 17 ppm या इससे अधिक होता है।

प्रश्न 14.14
क्या आपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है? आप भूमि-प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए क्या प्रयास करेंगे?
उत्तर:
हाँ, हमने अपने आस-पास के क्षेत्र में भूमि-प्रदूषण देखा है।

भूमि प्रदूषण की रोकथाम के उपाय
मृदा प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय है –

  1. फसलों पर विषैले कीटनाशकों का छिड़काव सावधानीपूर्व करना चाहिए।
  2. डी० डी० टी० का प्रयोग बहुत अधिक न करें।
  3. सिंचाई तथा उर्वरकों का प्रयोग करने के पूर्व मिट्टी और जल का परीक्षण करा लेना चाहिए।
  4. रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर कम्पोस्ट तथा हरी खाद को वरीयता देनी चाहिए।
  5. खेतों में जल के निकास की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
  6. क्षारीय भूमि को वैज्ञानिक ढंग से शोधित किया जाना चाहिए। जिप्सम, सिंचाई तथा रासायनिक खादों का प्रयोग करके क्षारीय मिट्टी को उर्वर बनाया जा सकता है।
  7. मिट्टी के कटाव को रोकने के उपाय किए जाने चाहिए।
  8. खेतों के किनारे (मेंडों पर) तथा ढालू भूमि पर वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 14.15
पीडकनाशी तथा शाकनाशी से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
पीडकनाशी (Pesticides):
पीडकनाशी मूल रूप से संश्लेषित रसायन होते हैं। इनका प्रयोग फसलों को हानिकारक कीटों तथा कई रोगों से बचाने हेतु किया जाता है। ऐल्ड्रीन, डाइऐल्ड्रीन, बी०एच०सी० आदि पीडकनाशी के कुछ उदाहरण हैं। ये कार्बनिक जीव-विष जल में अविलेय तथा अजैवनिम्नीकरणीय होते हैं। ये उच्च प्रभाव वाले जीव-विषय भोजन श्रृंखला द्वारा निम्नपोषी स्तर से उच्चपोषी स्तर तक स्थानान्तरित होते हैं। समय के साथ-साथ उच्च प्राणियों में जीव-विषों की सान्द्रता इस स्तर तक बढ़ जाती है कि उपापचयी तथा शरीर क्रियात्मक अव्यवस्था का कारण बन जाते हैं।

शाकनाशी (Herbicides):
वे रसायन जो खरपतवार (weeds) का नाश करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं, शाकनाशी कहलाते हैं। सोडियम क्लोरेट (NaClO3) सोडियम आर्सिनेट (Na3AsO3) आदि शाकनाशी के उदाहरण हैं। अधिकांश शाकनाशी स्तनधारियों के लिए विषैले होते हैं, परन्तु ये कार्ब-क्लोराइड्स के समोन स्थायी नहीं होते तथा कुछ ही माह में अपघटित हो जाते हैं। मानव में जन्मजात कमियों का कारण कुछ शाकनाशी हैं। यह पाया गया है कि मक्का के खेत, जिनमें शाकनाशी का छिड़काव किया गया हो, कीटों के आक्रमण तथा पादप रोगों के प्रति उन खेतों से अधिक सुग्राही होते हैं, जिनकी निराई हाथों से की जाती है।

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प्रश्न 14.16
हरित रसायन से आप क्या समझते हैं? यह वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
हरित रसायन यह सर्वविदित है कि हमारे देश ने 20वीं सदी के अन्त तक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपयोग तथा कृषि की उन्नत विधियों का प्रयोग करके अच्छी किस्म के बीजों, सिंचाई आदि से खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है। परन्तु मृदा के अधिक शोषण एवं उर्वरकों तथा कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से मृदा, जल एवं वायु की गुणवत्ता घटी है। इस समस्या का समाधान विकास के प्रारम्भ हो चुके प्रक्रम को रोकना नहीं अपितु उन विधियों को खोजना है, जो वातावरण के असन्तुलन रोक सके। रसायन विज्ञान तथा अन्य विज्ञानों के उन सिद्धान्तों का ज्ञान, जिससे पर्यावरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके, ‘हरित रसायन’ कहलाता है।

हरित रसायन उत्पाद का वह प्रक्रम है, जो पर्यावरण में न्यूनतम प्रदूषण या असन्तुलन लाता है। इसके आधार पर यदि एक-प्रक्रम में उत्पन्न होने वाले सह-उत्पादों को यदि लाभदायक रूप से उपयोग नहीं किया गया है तो वे पर्यावरण प्रदूषण के कारक होते हैं। ऐसे प्रक्रम न सिर्फ पर्यावरणीय दृष्टि से हानिकारक हैं अपितु महँगे भी हैं।

विकास कार्यों के साथ-साथ वर्तमान ज्ञान का रासायनिक हानि को कम करने के लिए उपयोग में लाना ही हरित रसायन का आधार है। एक रासायनिक अभिक्रिया की सीमा, ताप, दाब उत्प्रेरक के उपयोग आदि भौतिक मापदण्ड पर निर्भर करती हैं। हरित रसायन के सिद्धान्तों के अनुसार यदि एक रासायनिक अभिक्रिया में अभिकारक एक पर्यावरण अनुकूल माध्यम में पूर्णत: पर्यावरण अनुकूल उत्पादों में परिवर्तित हो जाए, तो पर्यावरण में कोई रासायनिक प्रदूषक नहीं होगा।

संश्लेषण के दौरान प्रारम्भिक पदार्थ का चयन करते समय हमें सावधानी रखनी चाहिए, जिससे जब भी वह अन्तिम उत्पाद परिवर्तित हो तो अपविष्ट उत्पन्न ही न हो। यह संश्लेषण के दौरान अनुकूल परिस्थितियों को प्राप्त करके किया जाता है। जल की उच्च विशिष्ट ऊष्मा तथा कम वाष्पशीलता के कारण इसे संश्लेषित अभिक्रियाओं के माध्यम के रूप में प्रयुक्त किया जाना वांछित है। जल सस्ता अज्वलनशील तथा अकैंसरजन्य प्रभाव वाला माध्यम है। हरित रसायन के उपयोग से वातावरणीय प्रदूषण को रोकने में किए जाने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयासों का वर्णन निम्नलिखित है –

1. कपड़ों की निर्जल धुलाई में-टेट्राक्लोरोएथीन [Cl2C = CCl2] का उपयोग प्रारम्भ में निर्जल धुलाई के लिए विलायक के रूप में किया जाता था। यह यौगिक भू-जल को प्रदूषित कर देता है। यह एक सम्भावित कैंसरजन्य भी है।

धुलाई की प्रक्रिया में, इस यौगिक का द्रव कार्बन डाइ-ऑक्साइड एवं उपयुक्त उपमार्जक द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। हैलोजेनीकृत 1 लायक का द्रवित CO2 से प्रतिस्थापन भू-जल के लिए कम ह निकारक है। आजकल हाइड्रोजन परॉक्साइड का उपयोग लॉण्ड्री में कपड़ों के विरंजन के लिए किया जाता है, जिससे परिणाम तो अच्छे नि कलते ही हैं, जल का भी कम उपयोग होता है।

2. पेपर का विरंजन:
पूर्व में पेपर के विरंजन के लिए क्लोरीन गेस उपयोग में आती थी। आजकल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन परॉक्साइड, जो विरंजन क्रिया की दर को बढ़ाता है, उपयोग में लाया जाता है।

3. रसायनों का संश्लेषण:
औद्योगिक स्तर पर एथीन का ऑक्सीकरण आयनिक उत्प्रेरकों एवं जलीय माध्यम की उपस्थिति में करवाया जाए, तो लगभग 90% ऐथेनॉल प्राप्त होता है –
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इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हरित रसायन एक कम लागत उपागम है, जो कम पदार्थ, ऊर्जा-उपभोग एवं अपविष्ट जनन से सम्बन्धित है।

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प्रश्न 14.17
क्या होता, जब भू-वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसें नहीं होती? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जब भू-वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसें न होती तो पृथ्वी का ताप घट जाता है। इससे पौधे प्रकाश-संश्लेषण नहीं कर पाते। इससे पौधों की अनुपस्थिति में मानव-जीवन सम्भव नहीं होता।

प्रश्न 14.18
एक झील में अचानक असंख्य मृत मछलियाँ तैरती हई मिलीं। इसमें कोई विषाक्त पदार्थ नहीं था, परन्तु बहुतायत में पादप्लवक पाए गए। मछलियों के मरने का कारण बताइए।
उत्तर:
जल प्रदूषक कार्बनिक पदार्थ; जैसे-पत्तियाँ, घास, कूड़ा-करकट आदि हैं। इनकी उपस्थिति में पादपप्लवक विकसित हो जाते हैं। ये जल में घुलित ऑक्सीजन की अत्यधिक मात्रा का उपभोग कर लेते हैं जो जलीय जीवों; जैसे-मछली के जीवन हेतु अत्यन्त आवश्यक होती है। यदि जल में घुली ऑक्सीजन की सान्द्रता 6 पीपीएम से नीचे हो जाए, तो मछलियों का विकास रुक जाता है।

जल में ऑक्सीजन या तो वातावरण या कई जलीय पौधों द्वारा दिन में प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रम से पहुँचती है। रात में प्रकाश-संश्लेषण रुक जाता है परन्तु पौधे श्वसन करते हैं, जिससे जल में घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। घुलित ऑक्सीजन सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा कार्बनिक यौगिकों के ऑक्सीकरण में भी उपयोग में ली जाती है। इस प्रकार पादपप्लवकों तथा अन्य कारणों से जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाने के कारण मछलियाँ मृत पाई गईं।

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प्रश्न 14.19
घरेलू अपशिष्ट किस प्रकार खाद के रूप में काम आ सकते हैं?
उत्तर:
घरेलू अपशिष्ट में जैवनिम्नीकरण तथा अजैवनिम्नीकरण, दोनों घटकों का समावेश होता है। अपशिष्ट में से दोनों घटक को छाँटकर पृथक् कर लेते हैं। जैव अनिम्नीकरण पदार्थों जैसे – प्लास्टिक, काँच, धातु, छीलन आदि को पुनर्चक्रण के लिए भेज दिया जाता है। जैवनिम्नीकरण अपशिष्टों को खुले मैदानों में मिट्टी में दबा दिया जाता है। जैवनिम्नीकरण अपशिष्ट में कार्बनिक द्रव्य होते हैं, जो कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 14.20
आपने अपने कृषि-क्षेत्र अथवा उद्यान में कम्पोस्ट खाद के लिए गड्डे बना रखे हैं। उत्तम कम्पोस्ट बनाने के लिए इस प्रक्रिया की व्याख्या दुर्गंध, मक्खियों तथा अपविष्टों के चक्रीकरण के सन्दर्भ में कीजिए।
उत्तर:
यदि अपशिष्ट को कम्पोस्ट में परिवर्तित न किया जाए तो वह नालियों में चला जाएगा। इसमें से कुछ मवेशियों द्वारा खा लिया जाता है। कम्पोस्ट खाद बनाने की प्रक्रिया दुर्गन्धपूर्ण होती है। इस पर मक्खियाँ उड़ती रहती हैं, परन्तु इसे दुर्गन्ध तथा मक्खियों से बचाने के लिए मिट्टी से ढक दिया जाता है। अपशिष्ट के कम्पोस्ट खाद में परिवर्तन के पश्चात् इस पर डाली गई मिट्टी को हटा दिया जाता है तथा कम्पोस्ट खाद प्राप्त कर ली जाती है। यह खाद पौधों के लिए अत्यन्त उपयोगी होती है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 13 हाइड्रोकार्बन्स

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 13 हाइड्रोकार्बन्स Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry हाइड्रोकार्बन्स Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 13.1
मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
मेथेन का क्लोरीनीकरण मुक्त मूलक क्रियाविधि द्वारा किया जाता है। मेथिल मूलक श्रृंखला समापन पद के योग एथेन में परिवर्तित हो जाता है।
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प्रश्न 13.2
निम्नलिखित यौगिकों के I. U. P. A. C नाम लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 13.3
निम्नलिखित योगकों, जिनमें द्विआबन्ध तथा त्रिआबन्ध की संख्या दर्शाई गई है, के सभी सम्भावित स्थिति समावयवों के संरचना सूत्र एवं I. U. P.A. C नाम दीजिए –
(क) C4H8 (एक त्रिआबन्ध)
(ख) C5H8 (एक त्रिआबन्ध)
उत्तर:
(क) C4H8 (एक द्विआबन्ध)
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(ख) C5H8 (एक त्रिआबन्ध)
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प्रश्न 13.4
निम्नलिखित यौगिको के ओजोनीअपघटन के पश्चात् बनने वाले उत्पादों के नाम लिखिए –

  1. पेन्ट-2-ईन
  2. 3, 4-डाइमेथिल-हेप्ट-3-ईन
  3. 2-एथिल ब्यूट-1-ईन
  4. 1-फेनिल ब्यूट-1-ईन

उत्तर:
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प्रश्न 13.5
एक ऐल्कीन ‘A’ के ओजोनी अपघटन से पेन्टेन-3-ओन तथा एथेनॉल का मिश्रण प्राप्त होता है। ‘A’ का I. U. P. A. C नाम तथा संरचना दीजिए।
उत्तर:
ऐल्कीन ‘A’ 3 – एथिल पेन्ट – 2 – ईन है। इसकी संरचना तथा होने वाली ओजोनी अपघटन अभिक्रिया निम्नलिखित है –
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प्रश्न 13.6
एक ऐल्केन A में तीन C – C आठ C – H सिग्मा आबन्ध तथा एक C – C पाई आबन्ध हैं। A ओजोनी अपघटन से दो अणु ऐल्डिहाइड, जिनका मोलर द्रव्यमान 44 है, देता है। A का आई०यू०पी०ए०सी० का नाम लिखिए।
उत्तर:
44 मोलर द्रव्यमान वाला ऐल्डिहाइड (ओजोन अपघटन का उत्पाद) CH3CHO है। चूँकि ऐल्कीन ‘A’ एक ही ऐल्डिाइड के दो अणु बनाता है, अत: ऐल्कीन का संरचना सूत्र निम्नवत् हैं –
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प्रश्न 13.7
एक ऐल्कीन, जिसके ओजोनी अपघटन से प्रोपेनल तथा पेन्टेन-3-ओन प्राप्त होते हैं, का संरचनात्मक सूत्र क्या है?
उत्तर:
ऐल्कीन का नाम 3-एथिल हेक्स-3-ईन है। जिसका संरचनात्मक सूत्र तथा ओजोनी अपघटन अभिक्रिया निम्नवत् है –
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प्रश्न 13.8
निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रिया लिखिए –

  1. ब्यूटेन
  2. पेन्टीन
  3. हेक्साइन
  4. टॉलूईन

उत्तर:
1. ब्यूटेन:
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2. पेन्टीन:
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3. हेक्साइन:
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4. टॉलूईन:
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प्रश्न 13.9
हेक्स-2-ईन की समपक्ष (सिस) तथा विपक्ष (ट्रांस) संरचनाएँ बनाइए। इनमें से कौन-से समावयव का क्वथनांक उच्च होता है और क्यों?
उत्तर:
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समपक्ष (सिम)-हेक्स-2-ईन का क्वथनांक उच्च होता है; अतः इसमें उच्च द्विध्रुव-आघूर्ण होता है। अतः इसमें वान्डर-वाल्स आकर्षण बल अधिक होता है।

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प्रश्न 13.10
बेन्जीन में तीन द्वि-आबन्ध होते हैं, फिर भी यह अत्यधिक स्थायी है, क्यों?
उत्तर:
बेन्जीन विभिन्न अनुनादी संरचनाओं का संकर है। केकुले द्वारा दो मुख्य संरचनाएँ (क) तथा (ख) दी गईं। अनुनाद संरचना को षट्भुजीय संरचना में वृत्त या बिन्दु-वृत्त द्वारा (ग) में प्रदर्शित किया गया है।
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वृत्त, बेन्जी वलय के छह कार्बन परमाणु पर विस्थानीकृत (delocalised) छह इलेक्ट्रॉनों को दर्शाता है। अनुनाद के कारण द्विबन्धों को प्रदर्शित करने वाले इलेक्ट्रॉनों की कार्बन परमाणुओं के मध्य उपस्थिति निश्चित नहीं होती, जैसा कि साधारण ऐल्कीनों में होता है। ये एक बड़े क्षेत्र में वितरित रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप आवेश-घनत्व घटता है। इसके अतिरिक्त अनुनादी संकर की ऊर्जा भी घटती है। बेन्जीन की अनुनादी ऊर्जा, जो सम्मिलित संरचनाओं की ऊर्जा तथा अनुनादी संकर की ऊर्जा का अन्तर होती है, का मान 150kJmol-1 पाया गया है। यह दहन की ऊष्मा तथा हाइड्रोजनीकरण की ऊष्मा के उपलब्ध आँकड़ों से पुन: निश्चित होता है। अत: बेन्जीन तथा ऐरीन परिवार के अन्य सदस्य स्थायी यौगिकों की भाँति व्यवहार करते हैं तथा योगात्मक अभिक्रियाओं के स्थान पर प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में भाग लेते हैं।

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प्रश्न 13.11
किसी निकाय द्वारा ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्ते क्या हैं?
उत्तर:
सामान्यतः एक यौगिक ऐरोमैटिक कहलाता है, जबकि वह निम्नलिखित शर्तों का पालन करता है –

  1. यौगिक आवश्यक रूप से चक्रीय होना चाहिए तथा वलय में एक या अधिक द्विबन्ध होने चाहिए।
  2. असंतृप्तता के विपरीत, जैसा कि आण्विक सूत्र से सिद्ध होता है, इन्हें संतृप्त यौगिकों की भाँति व्यवहार करना चाहिए अर्थात् इन्हें योगात्मक अभिक्रियाओं का विरोध करना चाहिए तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में भाग लेना चाहिए।
  3. यौगिक अनुनाद प्रदर्शित करने में सक्षम होना चाहिए।
  4. ऐरोमैटिकता प्रदर्शित करने के लिए सबसे आवश्यक शर्त यह है कि यौगिक को हकल के नियम का अनुसरण करना चाहिए। इसके अनुसार यदि एक चक्रीय यौगिक के पास (4n + 2) π – इलेक्ट्रॉन हों तो वह ऐरोमैटिक यौगिक की भाँति व्यवहार करेगा। यहाँ n = 0, 1, 2, 3 ….. आदि हो सकते हैं।

प्रश्न 13.12
इनमें से कौन से निकाय ऐरोमैटिक नहीं हैं? कारण स्पष्ट कीजिए –
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उत्तर:

  1. इसमें (4n+2) π – इलेक्ट्रॉन हैं अर्थात् 6-2 इलेक्ट्रॉन हैं जो कि विस्थानीकृत नहीं हैं। अतः यह ऐरोमैटिक नहीं
  2. इसमें 4-1 इलेक्ट्रॉन हैं। जिससे हकल के नियम का पालन नहीं होता है। अतः यह ऐरोमैटिक नहीं है।
  3. इसमें 8-7 इलेक्ट्रॉन हैं जिससे हकल के नियम का पालन नहीं होता है। अतः यह ऐरोमैटिक नहीं है।

प्रश्न 13.13
बेन्जीन को निम्नलिखित में कैसे परिवर्तित करेंगे –

  1. P – नाइट्रोनोमोबेन्जीन
  2. m – नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
  3. p – नाइट्रोटॉलूईन
  4. ऐसीटोफीनोन

उत्तर:
1. बेन्जीन से p – नाइट्रोनोमोबेन्जीन:
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2. बेन्जीन से p – नाइट्रोटॉलूईन:
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3. बेन्जीन से p – नाइट्रोबोमोबेन्जीन:
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4. बेन्जीन से ऐसीटोफीनोन:
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प्रश्न 13.14
ऐल्केन H3C – CH2 – C(CH3)2 – CH2 – CH(CH3)2 में 1,2° तथा 3°कार्बन परमाणुओं की पहचान कीजिए तथा प्रत्येक कार्बन से आबन्धित कुल हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या भी बताइए।
उत्तर:
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  1. एक हाइड्रोजन परमाणु से जुड़ा 3° कार्बन परमाणु होता
  2. दो हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा 2° कार्बन परमाणु होता है।
  3. तीन हाइड्रोजन परमाणुओं से जुड़ा 1° कार्बन परमाणु होता है।

प्रश्न 13.15
क्वथनांक पर ऐल्केन की श्रृंखला के शाखन का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
ऐल्केनों के क्वथनांकों में आण्विक द्रव्यमान में वृद्धि के साथ नियत वृद्धि होती है। यह इस तथ्य पर आधारित है कि आण्विक आकार अथवा अणु का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ने के साथ-साथ उनमें अन्तराण्विक वान्डरवाल्स बल बढ़ते हैं। शाखित श्रृंखलाओं की संख्या के बढ़ने के साथ-साथ अणु की आकृति लगभग गोल हो जाती है, जिससे गोलाकार अणुओं में कम आपसी सम्पर्क स्थल दुर्बल अन्तराण्विक बल होते हैं।

इसलिए इनके क्वथनांक कम होते हैं। उदाहरणार्थ-पेन्टेन के तीन समावयव ऐल्केनों (पेन्टेन, 2 – मेथिल ब्यूटेन तथा 2, 2 – डाइमेथिल प्रोपेन) के क्वथनांकों को देखने से यह पता चलता है कि पेन्टेन में पाँच कार्बन परमणुओं की एक सतत श्रृंखला का उच्च क्वथनांक (309.1K) है, जबकि 2, 2 – डाइमेथिल प्रोपेन 282.5K पर उबलती है।

प्रश्न 13.16
प्रोपीन पर HBr के संकलन से 2 – ब्रोमोप्रोपेन बनता है, जबकि बेंजॉयल परॉक्साइड की उपस्थिति में यह अभिक्रिया 1 – ब्रोमोप्रोन देती है। क्रियाविधि की सहायता से इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रथम स्थिति:
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इस स्थिति में क्रियाविधि निम्नानुसार दर्शाई जा सकती है –
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द्वितीय स्थिति –
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प्रश्न 13.17
1, 2 – डाइमेथिलबेन्जीन (o – जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप निर्मित उत्पादों को लिखिए। यह परिणाम बेन्जीन की केकुले संरचना की पुष्टि किस प्रकार करता है?
उत्तर:
1, 2 डाइमेथिल बेन्जीन (o – जाइलीन) के ओजोनी अपघटन के फलस्वरूप ब्यूटेन – 2,3 – डाइऑन तथा एथेन डाइ-अल (ग्लाइआक्सिल) बनते हैं।
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ये सभी उत्पाद वलय में तभी सम्भव होते हैं यदि एकान्तर क्रम में तीन द्विबन्ध हों। ओजोनी अपघटन के उत्पाद केकुल संरचना की पुष्टि करते हैं।

प्रश्न 13.18
बेन्जीन, हैक्सेन तथा एथाइन को घटतें हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।
उत्तर:
अम्लीय व्यवहार का घटता क्रम –
एथाइन > बेन्जीन > n – हेक्सेन
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एथाइन में, ‘C’ sp – संकरित है जो सर्वाधिक विद्युत-ऋणी होता है, यह इलेक्ट्रॉनों के साझे युग्म को अपनी ओर आकर्षित करता है तथा सरलतापूर्वक H+ मुक्त कर देता है। बेन्जीन में, प्रत्येक ‘C’ sp2 संकरित है अर्थात् कम विद्युत-ऋणी है, यह कम सरलता से H+ मुक्त करता है। हेक्सेन में, प्रत्येक ‘c sp3 संकरित है अर्थात् न्यूनतम विद्युत-ऋणी है, यह सरलता से H+ मुक्त नहीं करता। इसलिए सबसे कम अम्लीय व्यवहार दर्शाता है।

प्रश्न 13.19
बेम्जीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ सरलतापूर्वक क्यों प्रदर्शित करती हैं, जबकि उसमें नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
उत्तर:
बेन्जीन में द्विआबन्ध व्यक्त करने वाले तीन π – इलेक्ट्रॉनों के युग्मों की उपस्थिति के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च होता है। यद्यपि इलेक्ट्रॉन-घनत्व अनुनाद के कारण बहुत अधिक विस्थानीकृत हो जाता है, परन्तु फिर भी इलेक्ट्रॉनस्नेही इस पर सरलता से आक्रमण करके इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि बेन्जीन नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन प्रदर्शित नहीं करता; क्योंकि नाभिकस्नेही कम इलेक्ट्रॉन घनत्व केन्द्र पर आक्रमण को प्राथमिकता देते हैं।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 13 हाइड्रोकार्बन्स

प्रश्न 13.20
आप निम्नलिखित यौगिकों को बेन्जीन में कैसे परिवर्तित करेंगे?

  1. एथाइन
  2. एथीन
  3. हेक्सेन

उत्तर:
1. एथाठन से बेन्जीन:
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2. एथीन से बेन्जीन:
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3. हेक्सेन से बेन्जीन:
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 13 हाइड्रोकार्बन्स

प्रश्न 13.21
उन सभी एल्कीनों की संरचनाएँ लिखिए, जो हाइड्रोजेनीकरण करने पर 2 – मेथिल ब्यूटेन देती हैं।
उत्तर:
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प्रश्न 13.22
निम्नलिखित यौगिकों को उनकी इलेक्ट्रॉनस्नेही (E+) के प्रति घटती आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए –
(क) क्लोरोबेन्जीन, 2, 4 – डाइनाइट्रोक्लोरो-बेन्जीन, p – नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन
(ख) टॉलूईन, P – H3C – C6H4 – NO2, P-O2N – C6H4 – NO2
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन की ओर क्रियाशीलता का घटता क्रम निम्नवत् है –
(क) क्लोरोबेंजीन > p – नाइट्रोक्लोरोबेन्जीन > 2,4 – डाइनाइट्रोक्लोरो बेन्जीन
(ख) टॉलूईन > p – नाइट्रोटॉलूईन > p – डाइनाइट्रो-बेन्जीन

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प्रश्न 13.23
बेन्जीन, m – डाइनाइट्रोबेंजीन तथा टालूईन में से किसका नाइटीकरण आसानी से होता है और क्यों?
उत्तर:
चूँकि – CH3 समूह इलेक्ट्रॉन विमुक्तन समूह होता है, अत: टालूईन का नाइट्रीकरण आसानी से हो जाता है। – CH3 समूह में +I प्रभाव होता है जो कि वलय को सक्रिय कर देता है।

प्रश्न 13.24
बेन्जीन के एथिलीकरण में निर्जल AlCl3 के स्थान पर कोई दूसरा लूईस अम्ल सुझाइए।
उत्तर:
निर्जल AlCl3 के स्थान पर फेरिक क्लोराइड अन्य लुईस अम्ल है, को प्रयोग कर सकते हैं। यह इलेक्ट्रॉन स्नेही (C2H5+) उत्पन्न करने में सहायक है।

प्रश्न 13.25
क्या कारण है कि वुर्ट्स अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशद्ध ऐल्केन बनाने के लिए प्रयुक्त नहीं की जाती? एक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वु अभिक्रिया से विषम संख्या कार्बन परमाणु वाले विशुद्ध ऐल्केन बनाने के लिए दो भिन्न हैलोऐल्केनों की आवश्यकता होती है, इनमें से एक विषम संख्या तथा दूसरा सम संख्या कार्बन परमाणु होना चाहिए। उदाहरणार्थ-ब्रोमोएथेन तथा 1-ब्रोमोप्रोपेन अभिक्रिया के परिणामस्वरूप पेन्टेन देते हैं।
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परन्तु सहउत्पाद भी बनेंगे जबकि अभिक्रिया में भाग ले रहे सदस्य पृथक् रूप में भी अभिक्रिया करेंगे। उदाहरणार्थ-ब्रोमोएथेन, ब्यूटेन देता है तथा 1 – ब्रोमोप्रोपेन हेक्सेन देता है।
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अत: ब्यूटेन, पेन्टेन तथा हेक्सेन का मिश्रण प्राप्त होगा। इस मिश्रण से प्रत्येक घटक को पृथक् करना अत्यधिक कठिन कार्य होगा।

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प्रश्न 1.
शैवाल के.वर्गीकरण का क्या आधार है?
उत्तर:
शैवालों को मुख्य रूप से प्रकाश संश्लेषी वर्णक, संचित भोज्य पदार्थ, कोशिका भित्ति की संरचना तथा कशाभ की उपस्थिति, अनुपस्थिति एवं संख्या के आधार पर वर्गीकृत करते हैं।

ह्वीटेकर वर्गीकरण के अनुसार शैवालों को तीन प्रमुख भागों में बाँटते हैं – क्लोरोफाइसी (chlorophyceae), फिओफाइसी (phaeophyceae) तथा रोडोफाइसी (rhodophyceae) तालिका शोवाल के दिवसों तथा उनके प्रमुख अभिलक्षण (Divison of Alagae and their Main Characteristics)
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प्रश्न 2.
लिवरवर्ट, मॉस, फर्न, जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म के जीवन चक्र में कहाँ और कब निम्नीकरण विभाजन होता है?
उत्तर:
1. लिवरवर्ट (Liverwort):
बीजाणुउद्भिद् के सम्पुट (capsule) में बीजाणु मातृ कोशिकाओं में बीजाणु (spores) बनते समय।

2. मॉस (Moss):
बीजाणुउद्भिद् के सम्पुट में बीजाणु बनते समय बीजाणु मातृ कोशिकाओं में निम्नीकरण (meiosis) विभाजन होता है।

3. फर्न (Fern):
बीजाणुधानी में बीजाणु मातृ कोशिकाओं में निम्नीकरण होता है।

4. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms):
लघु बीजाणुधानी में परागकण बनते समय लघु-बीजाणु मातृ कोशिका में निम्नीकरण उपस्थिति, अनुपस्थिति एवं संख्या के आधार पर वर्गीकृत करते हैं। ह्वीटेकर वर्गीकरण के अनुसार शैवालों को तीन प्रमुख भागों में बाँटते हैं – क्लोरोफाइसी (chlorophyceae), फिओफाइसी (phaeophyceae) तथा रोडोफाइसी (rhodophyceae) विभाजन होता है।

बीजाण्ड (ovule) के बीजाण्डकाय (nucellus) की गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में निम्नीकरण विभाजन होता है। इससे गुरुबीजाणु बनते हैं। एक गुरुबीजाणु वृद्धि करके मादा युग्मकोद्भिद् अथवा भ्रूणपोष बनाता है।

5. एन्जियोस्पर्म (Angiosperms):
परागकोष की पराग मात कोशिकाओं (pollen mother cells) में निम्नीकरण विभाजन होता है। इससे परागकण अथवा लघुबीजाणु बनते हैं। बीजाण्डकाय की गुरुबीजाणु मातृ कोशिका निम्नीकरण विभाजन द्वारा विभाजित होकर चार अगुणित गुरुबीजाणु बनाती है। अगुणित बीजाणु भ्रूणकोष का निर्माण करता है।

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प्रश्न 3.
पौधे के तीन वर्गों के नाम लिखो, जिनमें स्त्रीधानी होती है। इनमें से किसी एक के जीवन-चक्र का संक्षिप्त वर्णन करो।
उत्तर:
ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा तथा जिम्नोस्पर्म वर्ग के पौधों में स्त्रीधानी पाई जाती है।
मॉस (ब्रायोफाइट पादप) का जीवन-चक्र (Life Cycle of Moss – A Bryophyte):

इसकी प्रमुख अवस्था युग्मकोभिद् (gametophyte) होती है। युग्मकोद्भिद् की दो अवस्थाएँ पाई जाती हैं –

(क) शाखामय, हरे, तन्तुरूपी, प्रोटोनीमा (protonema) का निर्माण अगुणित बीजाणुओं के अंकुरण से होता है। इस पर अनेक कलिकाएँ विकसित होती हैं जो वृद्धि करके पत्तीमय अवस्था का निर्माण करती है।

(ख) पत्तीमय अवस्था पर नर तथा मादा जननांग समूह के रूप में बनते हैं। नर जननांग को पुंधानी (antheridium) तथा मादा जननांग को स्त्रीधानी (archegonium) कहते हैं। पुंधानी में द्विकशाभिक घुमणु (antherozoids) तथा स्त्रीधानी में अण्डाणु (ovum) बनता है। निषेचन जल की उपस्थिति में होता है। घुमणु तथा अण्डाणु संलयन के फलस्वरूप द्विगुणित युग्मनज (oospore) बनाते हैं। युग्मनज से वृद्धि तथा विभाजन द्वारा द्विगुणित बीजाणुउद्भिद् (sporophyte) का निर्माण होता है। यह युग्मकोद्भिद् पर अपूर्ण परजीवी होता है। बीजाणुउद्भिद् के तीन भाग होते हैं –

  1. पाद (foot)
  2. सीटा (seta) तथा
  3. सम्पुट (capsule)

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चित्र – फ्यूनेरिया (मॉस) के जीवन-चक्र का रेखाचित्र

सम्पुट के बीजाणुकोष्ठ में स्थित द्विगुणित बीजाणु मातृ कोशिकाओं से अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित बीजाणु (spores) बनते हैं। सम्पुट के स्फुटन से बीजाणु मुक्त हो जाते हैं। बीजाणुओं का प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर बीजाणु अंकुरित होकर तन्तुरूपी, स्वपोषी प्रोटीनीस (protenema) बनाते हैं।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित की सूत्रगुणता बताओ –

  1. मॉस के प्रथम तन्तुक कोशिका
  2. द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक
  3. मॉस की पत्तियों की कोशिका
  4. फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ
  5. मार्केन्शिया की जेमा कोशिका
  6. एकबीजपत्री की मैरिस्टेम कोशिका
  7. लिवरवर्ट के अण्डाशय
  8. फर्न के युग्मनज।

उत्तर:

  1. माँस के प्रथम तन्तुक कोशिका-अगुणित (x) होती है।
  2. द्विबीजपत्री के प्राथमिक भ्रूणपोष का केन्द्रक-त्रिगुणित (3x) होता है।
  3. मॉस की पत्तियों की कोशिका-अगुणित (x) होती है।
  4. फर्न के प्रोथैलस की कोशिकाएँ-अगुणित (x) होती है।
  5. मार्केन्शिया की जेमा कोशिका-अगुणित (x) होती
  6. एक बीजपत्री की मैरिस्टेम कोशिका-द्विगुणित (2x) होती है।
  7. लिवरवर्ट का अण्डाशय–द्विगुणित (2x) होता है।
  8. फर्न का युग्मनज-द्विगुणित (2x) होता है।

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प्रश्न 5.
शैवाल तथा जिम्नोस्पर्म के आर्थिक महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शैवाल का आर्थिक महत्त्व (Economic importance of Algae):

1. भोजन के रूप में (Algae as Food):
पृथ्वी पर होने वाले प्रकाश संश्लेषण का 50% शैवालों द्वारा होता है। शैवाल कार्बोहाइड्रेट, खनिज तथा विटामिन्स से भरपूर होते हैं। पोरफाइरा (Porphyra), एलेरिया (Alaria), अल्वा (Ulva), सारगासम Sargassum), लेमिनेरिया (Laminaria) आदि खाद्य पदार्थ के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।

क्लोरेला (Chlorella) में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन्स तथा विटामिन्स पाए जाते हैं। इसे भविष्य के भोजन के रूप में पहचाना जा रहा है। इससे हमारी बढ़ती जनसंख्या की खाद्य समस्या के हल होने की पूरी सम्भावना है।

2. शैवाल व्यवसाय में (Algae in Industry):

(i) डायटम के जीवाश्म/मृत शरीर डायटोमेशियस मृदा (diatomaceous earth or Kiselghur) बनाते हैं। यह मृदा 1500°C ताप सहन कर लेती है। इसका उद्योगों में विविध प्रकार से उपयोग किया जाता है; जैसे-धातु प्रलेप, वार्निश, पॉलिश, टूथपेस्ट, ऊष्मारोधी सतह आदि।

(ii) कोन्ड्रस (Chondrus), यूक्यिमा (Eucheuma) आदि शैवालों से केरागीनिन (carrageenin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग श्रृंगार-प्रसाधनों, शैम्पू आदि बनाने में किया जाता है।

(iii) एलेरिया (Alaria), लेमिनेरिया (Laminaria) आदि से एल्जिन (algin) प्राप्त होता है। इसका उपयोग अज्वलनशील फिल्मों, कृत्रिम रेशों आदि के निर्माण में किया जाता है। यह शल्य चिकित्सा के समय रक्त प्रवाह रोकने में प्रयोग किया जाता है।

(iv) अनेक समुद्री शैवालों से आयोडीन, ब्रोमीन आदि प्राप्त की जाती है।

(v) क्लोरेला से प्रतिजैविक (antibiotic) क्लोरीन (chlorellin) प्राप्त होती है। यह जीवाणुओं को नष्ट करती है। कारा (Chara) तथा नाइटेला (Nitella) शैवालों की उपस्थिति से जलाशय के मच्छर नष्ट होते हैं; अतः ये मलेरिया उन्मूलन में सहायक होते हैं।

(vi) लाल शैवालों से एगार-एगार (agar-agar) प्राप्त होता है, इसका उपयोग कृत्रिम संवर्धन के लिए किया जाता है।

जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Gymnosperm):

1. सजावट के लिए (Ornamental Plants):
साइकस, पाइनस, एरोकेरिया (Araucaria), गिंगो (Ginkgo), थूजा (Thuja), क्रिप्टोमेरिया (Cryptomeria) आदि पौधों का उपयोग सजावट के लिए किया जाता है।

2. भोज्य पदार्थों के लिए (Plants of Food Value):
साइकस, जैमिया से साबूदाना (sago) प्राप्त होता है। चिलगोजा (Pinus gerardiana) के बीज खाए जाते हैं। नीटम (Gnetum), गिंगो (Ginkgo) व साइकस के बीजों को भोजन के रूप में प्रयोग किया जाता है।

3. फर्नीचर के लिए लकड़ी:
चीड़ (Pinus), देवदार (Cedrus), कैल (Pinus wallichiana), फर (Abies) से प्राप्त लकड़ी का उपयोग फर्नीचर तथा इमारती लकड़ी के रूप में किया जाता है।

4. औषधियाँ (Medicines):
साइकस के बीज, छाल व गुरुबीजाणुपर्ण को पीसकर पुल्टिस बनाई जाती है। टेक्सस ब्रेवफोलिया (Tarus brevfolia) से टेक्साल औषधि प्राप्त होती है जिसका उपयोग कैन्सर में किया जाता है। थूजा (Thuja) की पत्तियों को उबालकर बुखार, खाँसी, गठिया रोग निदान के लिए प्रयोग किया जाता है।

5. एबीस बालसेमिया (Abies balsamea) से कनाडा बालसम जूनिपेरस (Juniperus) से सिडारवुड ऑयल (cedar wood oil), पाइनस से तारपीन का तेल प्राप्त होता है।

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प्रश्न 6.
जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म दोनों में बीज होते हैं, फिर भी उनका वर्गीकरण अलग-अलग क्यों है?
उत्तर:
जिम्नोस्पर्म में बीजाण्ड अण्डाशय भित्ति से ढका नहीं होता है जबकि एन्जियोस्पर्म में बीजाण्ड ढका होता है।

प्रश्न 7.
विषमबीजाणुता क्या है? इसकी सार्थकता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। इसके दो उदाहरण दो।
उत्तर:
विषमबीजाणुता (Heterospory)-टेरिडोफाइटा वर्ग के पौधों में बीजाणुओं का निर्माण बीजाणुधानियों में होता है। कुछ जातियों में समबीजाणुता (homospory) पाई जाती है। कुछ जातियों में विषमबीजाणुता पाई जाती है। इसमें दो प्रकार के बीजाणु बनते हैं, इन्हें लघुबीजाणु (microspoeres) तथा गुरुबीजाणु (megaspores) कहते हैं। लघुबीजाणु का निर्माण लघुबीजाणुधानी. (microporangia) में तथा गुरुबीजाणु का निर्माण गुरुबीजाणुधानी (megasporangia) में होता है।

लघु तथा गुरुबीजाणु वृद्धि तथा विभाजन द्वारा क्रमशः नरयुग्मकोद्भिद् तथा मादा युग्मकोद्भिद का निर्माण करते हैं। मादा युग्मकोद्भिद् कुछ समय तक मातृ बीजाणुउद्भिद् पादप पर लगा रहता है।

निषेचन के फलस्वरूप युग्मनज (zygote) का निर्माण तथा नवोद्भिद् पादप (young embryo) मादा युग्मकोद्भिद् से ही भोजन प्राप्त होता है। अतः यह बीज-निर्माण प्रक्रिया में जैव विकास को प्रदर्शित करता है। विषमबीजाणुता सिलैजिनेला (Selaginella), साल्वीनिया (Salvinia) नामक टेरिडोफाइट्स में पाई जाती है। इसके अतिरिक्त जिम्नोस्पर्म तथा एन्जियोस्पर्म भी विषमबीजाणुता को प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 8.
उदाहरण सहित निम्नलिखित शब्दावली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए –

  1. प्रथम तन्तु
  2. पुंधानी
  3. स्त्रीधानी
  4. द्विगुणितक
  5. बीजाणुपर्ण
  6. समयुग्मकी।

उत्तर:
1. प्रथम तन्तु (Protonema):
यह मॉस के युग्मकोद्भिद् की प्रथम अवस्था है। बीजाणु अंकुरित होकर शाखामय, तन्तुरूपी, हरे रंग स्वपोषी प्रथम तन्तु बनाते हैं। इन पर कलिकाएँ विकसित होती हैं। कलिकाएँ पत्तीमय अवस्था (leaf stage) में विकसित हो जाती हैं।

2. पुंधानी (Antheridium):
ब्रायोफाइट तथा टेरिडोफाइट्स में नर जननांग पुंधानी (antheridium) में होते हैं। ये युग्मकोद्भिद् पर विकसित होती हैं। ये नाशपाती के आकार की या गोलाकार संरचनाएं होती हैं। इनके चारों ओर एकस्तरीय चोलक स्तर (jacket layer) होता है। पुमणु मातृ कोशिकाओं से पुमणु (antherozoids) बनते हैं। पुमणु नर युग्मक होते हैं। मॉस के पुमणु द्विकशाभिक तथा फर्न के पुमणु बहुकशाभिक होते हैं।

3. स्त्रीधानी (Archegonium):
यह ब्रायोफाइट्स ‘तथा टेरिडोफाइट्स में पाई जाने वाली मादा जननांग है। ये फ्लास्क रूपी होती है। इनका आधारीय चौड़ा भाग अण्डधानी (venter) तथा ऊपरी सँकरा भाग ग्रीवा (neck) कहलाता है। अण्डधानी में एक अण्डाणु (ovum or egg cell) बनती है। स्त्रीधानियाँ युग्मकोद्भिद् पर विकसित होती हैं।

4. द्विगुणितक (Diplontic):
जब बीजाणुउद्भिद् पीढ़ी स्वतन्त्र, प्रभावी तथा प्रकाशसंश्लेषी होती है, तब इससे अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा बीजाणु बनते हैं। अगुणित बीजाणु युग्मकोद्भिद् पीढ़ी का निर्माण करते हैं तथा युग्मक बनाते हैं। नर तथा मादा युग्मक मिलकर युग्मनज बनाते हैं। युग्मनज से बीजाणुउद्भिद् पीढ़ी का पुनः निर्माण होता है। इस प्रकार के जीवन-चक्र को द्विगुणित (diplontic) कहते हैं; जैसे जिम्नोस्पर्म, एन्जियोस्पर्म में।

5. बीजाणुपर्ण (Sporophyll):
बीजाणुउद्भिद् अवस्था; जैसे – फर्न में; वास्तविक जड़, तना और पत्तियों में विभेदित होती है। परिपक्व पत्तियों पर बीजाणुओं का निर्माण बीजाणुधानी में होता है। बीजाणुधानी के समूह सोराई (sori) कहलाते हैं। बीजाणुओं का निर्माण करने वाली इन पत्तियों को बीजाणुपर्ण (sporophyll) कहते हैं। जिम्नोस्पर्म में लघु तथा गुरु बीजाणुपर्ण क्रमशः नर शंकु तथा मादा शंकु (cone or strobila) बनाते हैं।

6. समयुग्मकी (Isogamy):
आकृति तथा आकार में समान युग्मकों के संलयन को समयुग्मकी संलयन (isogamous syngamy or fertilization) कहते हैं।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में अन्तर कीजिए –

  1. लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल
  2. लिवरवर्ट तथा मॉस
  3. विषणबीजाणुक तथा समबीजाणुक टेरिडोफाइट
  4. युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन

उत्तर:
1. लाल शैवाल तथा भूरे शैवाल में अन्तर (Difference between Red Algae and Brown Algae):
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2. लिवरवर्ट तथा मॉस अन्तर (Difference between Liverwort and Moss)
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3. विषणबीजाणुक तथा समबीजाणुक टेरिडोफाइट अन्तर (Difference between Heterosporous and Homosporous Pteridophytes)
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4. युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन अन्तर (Difference between Syngamy and Triple fusion)
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प्रश्न 10.
एकबीजपत्री को द्विबीजपत्री से किस प्रकार विभेदित करोगे?
उत्तर:
एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में भिन्नता (Difference between Monocot and Dicot Angiosperms)
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प्रश्न 11.
स्तम्भ I में दिए गए पादपों का स्तम्भ II में दिए गए वर्गों से मिलान करो –
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उत्तर:
(अ) (iii), (ब) (iv), (स) (ii), (द) (i)

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प्रश्न 12.
जिम्नोस्पर्मस के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिम्नोस्पर्मस के महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण –

  1. इनको सामान्यतया नग्न बीजी पौधे कहते हैं। ये मुख्यतया मरूदभिदी, काष्ठीय, बहुवर्षी होते हैं।
  2. इनमें सामान्य मूसला जड़ पायी जाती है। कुछ पौधों में प्रवाल जड़े भी पायी जाती हैं।
  3. पत्तियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं –
    • शल्क पर्ण तथा
    • वास्तविक पर्ण।
  4. रन्ध्र पत्तियों की निचली सतह पर गड्ढों में धंसे हुए होते है।
  5. पत्तियाँ प्राय: संकरी, सुई सदृश्य होती हैं। इन पर उपचर्म का मोटा आवरण होता है।
  6. संवहन ऊतक जाइलम में वाहिकाओं (vasseles) तथा फ्लोएम में सहकोशिकाओं (companion cells) का अभाव होता है।
  7. पौधे विषमबीजाणुक होते हैं।
  8. पुष्प शंकु (cone) कहलाते हैं। ये एकलिंगी होते हैं। नर शंकु का निर्माण लघुबीजाणु पर्णो से तथा मादा शंकु का निर्माण गुरु बीजाणु पर्तों से होता है।
  9. वायु परागण होता है।
  10. भ्रूणपोष अगुणित होता है। यह निषेचन से पहले बनता
  11. प्राय: बहुभ्रूणता (Polyembryony) पाई जाती है।
  12. बीजाण्ड नग्न होता है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 6 ऊष्मागतिकी

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 6.1
सही उत्तर चुनिए –
ऊष्मागतिकी अवस्था फलन एक राशि है –

  1. जो ऊष्मा-परिवर्तनों के लिए प्रयुक्त होती है
  2. जिसका मान पथ पर निर्भर नहीं करता है
  3. जो दाब-आयतन कार्य की गणना करने में प्रयुक्त होती है
  4. जिसका मान केवल ताप पर निर्भर करता है

उत्तर:
2. जिसका मान पथ पर निर्भर नहीं करता है

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प्रश्न 6.2
एक प्रक्रम के रूद्धोष्म परिस्थितियों में होने के लिए –

  1. ∆T = 0
  2. ∆p = 0
  3. q = 0
  4. w = 0

उत्तर:
3. q = 0

प्रश्न 6.3
सभी तत्वों की एन्थैल्पी उनकी सन्दर्भ-अवस्था में होती है –

  1. इकाई
  2. शून्य
  3. < 0
  4. सभी तत्वों के लिए भिन्न होती है।

उत्तर:
2. शून्य

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प्रश्न 6.4
मेथेन के दहन के लिए ∆UΘ का मान – X kJ mol-1 है। इसके लिए ∆HΘ का मान होगा –

  1. = ∆UΘ
  2. > ∆UΘ
  3. < ∆UΘ
  4. = 0

उत्तर:
3. < ∆UΘ

प्रश्न 6.5
मेथेन, ग्रेफाइट एवं डाइहाइड्रोजन के लिए 298 K पर दहन एन्थैल्पी के मान क्रमशः -890.3 kJ mol-1, -393.5kJ mol-1 एवं -285.8kJ mol-1 हैं। CH4 (g) की विरचन एन्थैल्पी क्या होगी?

  1. – 74.8kJ mol-1
  2. – 52.27kJ mol-1
  3. + 74.8kJ mol-1
  4. + 52.26kJ mol-1

उत्तर:
1. – 74.8kJmol-1

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प्रश्न 6.6
एक अभिक्रिया A + B → C + D + q के लिए एन्ट्रॉपी परिवर्तन धनात्मक पाया गया। यह अभिक्रिया सम्भव होगी –

  1. उच्च ताप पर
  2. केवल निम्न ताप पर
  3. किसी भी ताप पर नहीं
  4. किसी भी ताप पर

उत्तर:
4. किसी भी ताप पर

प्रश्न 6.7
एक प्रक्रम में निकाय द्वारा 701J ऊष्मा अवशोषित होती है एवं 394J कार्य किया जाता है। इस प्रक्रम में आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
उत्तर:
प्रश्नानुसार, निकाय द्वारा कृत कार्य (W) = -394J
तथा अवशोषित ऊष्मा (q) = 701J
अतः आन्तरिक ऊर्जा में परिवर्तन (∆U) = q + w
= 701 + (-394)
= 3307J

प्रश्न 6.8
एक बम कैलोरीमीटर में NH2 CN(S) की अभिक्रिया डाइऑक्सीजन के साथ की गई एवं ∆U का मान – 742.7kJ mol-1 पाया गया (298K पर)। इस अभिक्रिया के लिए 298K पर एन्थैल्पी परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
NH2 CN(g) + \(\frac{3}{2}\)O2 (g) → N2 (g) → H2O(l)
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
∆U = -742.7 kJ mol-1
∆ng = 2 – \(\frac{3}{2}\) = +\(\frac{1}{2}\)
R = 8.314 × 10-3 kJ k-1 mol-1
तथा T = 298K
जब सम्बन्ध ∆H = ∆U + ∆ng RT से
∆H = (-742.7kJ mol-1) + (1/2) × (8.314 × 10-3 kJ k-1 mol-1) × (298K)
= -741.46 kJmol-1

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प्रश्न 6.9
60.0g ऐलुमिनियम का ताप 35°C से 55°C करने के लिए कितने kJ ऊष्मा की आवश्यकता होगी? AI की मोलर ऊष्माधारिता 24-1Jmol K-1 है।
उत्तर:
ऐलुमिनियम का द्रव्यमान = 60.0g
ताप में वृद्धि = 55°C – 35°C
= 20° C = 293K
AI की मोलर ऊष्मा – धारिता = 24Jmol-1K-1
AI की विशिष्ट ऊष्मा-धारिता = \(\frac{24}{27}\) Jg-1K-1
आवश्यक ऊष्मा q = C × m × ∆T
= (\(\frac{24}{27}\) Jg-1K-1) × (60.0g) (293 K)
= 15626.67J
= 15.627kJ

प्रश्न 6.10
10.0°C पर 1 मोल जल की बर्फ – 10°C पर जमाने पर एन्थैल्पी-परिवर्तन की गणना कीजिए।
fusH = 6.03 kJ mol-10°C पर
Cp[H2(l)] = 75.3J mol-1K-1
Cp[HpO(s)] = 36.8J mol-1K-1
उत्तर:
परिवर्तन को निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है –
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हेस नियम के अनुसार,
∆H = ∆H1 + ∆H2 + ∆H3
∆H1 = Cp [H2 O(l) × ∆T
= 75.3 Jmol-1K-1(10k)
= 753 Jmol-1
∆H2 (ठोसीकरण ) = -603 kJmol-1
(चिह परिवर्तता) =  -603 kJmol-1
∆H3 = Cp [H2O(s)] × ∆T
= 36.8 Jmol-1K-1(-10k)
= 36.8 Jmol-1
∴ ∆H = (753 – 5030 – 368)Jmol-1
= -5645 Jmol-1
= 5.645 Jmol-1

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प्रश्न 6.11
CO2 की दहन एन्थैल्पी – 393.5kJ mol-1 है। कार्बन एवं ऑक्सीजन से 35.2gCO2 बनने पर उत्सर्जित ऊष्मा की गणना कीजिए।
उत्तर:
C तथा O2 का दहन समीकरण निम्नवत् है –
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∵ 44g CO2 के निर्माण में मुक्त हुई ऊष्मा = 393.5kJ
∴ 35.2g CO2 के निर्माण में मुक्त ऊष्मा होगी
= \(\frac{393.5KJ×(35.2g)}{(44g)}\)
= 314.8kJ

प्रश्न 6.12
CO(g), CO2(g), N2O(g) एवं N2O4(g) की विरचन एन्थैल्पी क्रमशः -110, -393, 81 एवं 9.7kJ mol-1 हैं अभिक्रिया N2O4(g) + 3CO(g) → N2O(g) + 3CO2(g) के लिए ∆rH का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
अभिक्रिया एन्यैल्पी
(∆rH) = [81 + 3(-393)] – [9.7 + 3(-110)]
= (81 – 1179) – (9.7 – 330)
= 777.7kJ mol-1

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प्रश्न 6.13
N2 (g) + 3H2 (g) → 2NH3 (g) ∆rHΘ = -92.4kJ mol-1 NH3 गैस की मानक विरचन एन्थैल्पी क्या है?
उत्तर:
NH3 गैस की मान विरचन एन्थैल्पी
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प्रश्न 6.14
निम्नलिखित आँकड़ों से CH3OH(l) की मानक विरचन एन्थैल्पी ज्ञात कीजिए –
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उत्तर:
CH3OH(l) की मानक विचरन एंथैल्पी निम्नलिखित से ज्ञात कर सकते हैं –
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समीकरण (iii) को 2 से गुणा करके समीकरण (ii) में जोड़ने पर
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प्रश्न 6.15
CCl4(g) → c(g) + 4Cl(g) अभिक्रिया के लिए एन्थैल्पी-परिवर्तन ज्ञात कीजिए एवं CCl4 में C – Cl की आबन्ध एन्यल्पी की गणना कीजिए –
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उत्तर:
दिये हुए रासायनिक समीकरण के अनुसार,
CCl4(g) → c(g) + 4Cl(g)
CCl4 में चार C – Cl आबन्धों के टूटने के लिए आवश्यक ऊष्मीक ऊर्जा
= \(\frac{1}{4}\) × ∆H
अब अभिक्रिया CCl4(g) → C(g) + 4Cl(g) के लिए आबन्ध एंथैल्पी
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= 30.5 – (715.0 + 4 × 242)kJmol-1
= (30.5 – 1683)kJmol-1
= -165.5 kJmol-1

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प्रश्न 6.16
एक विलगित निकाय के लए ∆U = 0, इसके लिए ∆S क्या होगा?
उत्तर:
चूँकि विलगित निकाय में यदि दो गैसों को मिश्रित किया जाये तो ∆U = 0 तथा एण्ट्रापी बढ़ती है, अत: ∆S शून्य से अधिक होगा।

प्रश्न 6.17
298K पर अभिक्रिया 2A + B → C के लिए ∆H = 400 kJ mol-1 एवं ∆S = 0.2 kJK mol-1 ∆H एवं ∆S को ताप-विस्तार में स्थिर मानते हुए बताइए कि किस ताप पर अभिक्रिया स्वतः होगी?
उत्तर:
दी गई अभिक्रिया 2A + B → C
प्रश्नानुसार
∆H = 400kJmol-1 तथा ∆S = 0.2kJmol-1
∆G = ∆H – T∆S
0 = 400 – 0.2 × T (∵∆G = 0, साम्यावस्था पर)
या 0.27 = 400
T = 400 = 2000K
या T = \(\frac{400}{0.2}\) = 2000k
अत: ताप 2000K से अधिक पर अभिक्रिया स्वतः होगी।

प्रश्न 6.18
अभिक्रिया 2Cl(g) → Cl2(g) के लिए ∆H एवं ∆S के चिन्ह क्या होंगे?
उत्तर:
चूँकि अभिक्रिया में आबन्धों का निर्माण होता है, अतः यह ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है। Cl परमाणु के दो मोलों की एण्ट्रापी Cl2 अणु के एक मोल से अधिक होती है। अत: ∆H तथा ∆S दोनों के चिन्ह ऋणात्मक होंगे।

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प्रश्न 6.19
अभिक्रिया 2A(g) + B(g) → 2D(g) के लिए \({ \triangle U }^{ Θ }_{ 298 }\) एवं ∆SΘ = -44.1JK-1 अभिक्रिया के लिए की गणना कीजिए और बताइए कि क्या अभिक्रिया स्वतः प्रवर्तित हो सकती है?
उत्तर:
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चूँकि ∆GΘ धनात्मक है; अतः अभिक्रिया की प्रकृति स्वतः प्रवर्तित नहीं होगी।

प्रश्न 6.20
300K पर एक अभिक्रिया के लिए साम्य स्थिारांक 10 है। ∆GΘ का मान क्या होगा? (R = 8.314JK-1mol-1)
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
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प्रश्न 6.21
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के आधार पर NO(g) तथा NO2(g) के ऊष्मागतिकी स्थायित्व पर टिप्पणी कीजिए –
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उत्तर:
चूँकि ∆rHΘ धनात्मक है, अत: NO2 ऊष्मागतिक रूप से अस्थाई है।
चूंकि NO का NO2 में ∆rHΘ ऋणात्मक है, अत: NO2 ऊष्मागतिक रूप से अस्थाई है।

प्रश्न 6.22
जब 1.00 mol H2O(l) को मानक परिस्थितियों में विरचित किया जाता है, तब परिवेश के एन्ट्रॉपी-परिवर्तन की गणना कीजिए –
(∆rHΘ = -286.KJ mol-1)
उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 5 द्रव्य की अवस्थाएँ

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 5 द्रव्य की अवस्थाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 5 द्रव्य की अवस्थाएँ

Bihar Board Class 11 Chemistry द्रव्य की अवस्थाएँ Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 5.1
30°C तथा 1 bar दाब पर वायु के 500 dm3 आयतन को 200 dm3 तक संपीडित करने के लिए कितने न्यूनतम दाब की आवश्यकता होगी?
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
P1 = 1 bar
P2 = ?
V1 = 500 dm
V2 = 200 dm3
∵ ताप स्थिर है;
∴ बॉयल के नियम से
P1V1 = P2V2
या P2 = \(\frac{P_{1} V_{1}}{V_{2}}\)
P2 = \(\frac{(1 b a r) \times\left(50 d m^{3}\right)}{\left(20 d m^{3}\right)}\)
= 2.5 bar

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प्रश्न 5.2
35°C ताप तथा 1.2 bar दाब पर 120 mL धारिता वाले पात्र में गैस की निश्चित मात्रा भरी है। यदि 35°C पर गैस को 180 mL धारिता वाले फ्लास्क में स्थानान्तरित किया जाता है तो गैस का क्या दाब होगा?
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
P1 = 1.2 bar P2 = ?
V1 = 120mL V2 = 180mL
∵ ताप स्थिर है
∴ बॉयल के नियम से
P1V1 = P2V2
या P2 = \(\frac{(1.2 \mathrm{bar}) \times(120 \mathrm{mL})}{(180 \mathrm{mL})}\)
= 0.8 bar

प्रश्न 5.3
अवस्था-समीकरण का उपयोग करते हुए स्पष्ट कीजिए कि दिये गये ताप पर गैस का घनत्व गैस के दाब के समानुपाती होता है।
उत्तर:
गैस समीकरण PV = nRT से
P = \(\frac{nRT}{V}\) …………. (i)
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समीकरण (ii) से n का मान (i) में रखने पर
P = \(\frac{mRT}{MV}\) ………….. (iii)
हम जानते हैं कि घनत्व (d) = \(\frac{m}{V}\)
या P = \(\frac{dRT}{M}\)
या d ∝ P
अत: दिये हुए ताप पर गैस का घनत्व गैस दाब के समानुपाती होता है।

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प्रश्न 5.4
0°C पर तथा 2 bar दाब पर किसी गैस के ऑक्साइड का घनत्व 5 bar दाब पर डाइनाइट्रोजन के घनत्व के समान है तो ऑक्साइड का अणु-भार क्या है?
उत्तर:
गैस का घनत्वं (d) = \(\frac{PM}{RT}\)
यहाँ गैसों के लिए R तथा T स्थिरांक हैं।
नाइट्रोजन के लिए, P = 5bar, M = 28g mol-1
∴ dN2 = \(\frac{PM}{RT}\)
= \(\frac{(5 \mathrm{bar}) \times\left(28 \mathrm{g} \mathrm{mol}^{-1}\right)}{R \times T}\)
गैसीय ऑक्साइड के लिए, P = 2 bar; M = ?

प्रश्नानुसार,

प्रश्न 5.5
27°C पर 1g आदर्श गैस का दाब 2 bar है। जब समान ताप एवं दाब पर इसमें 2g आदर्श गैस मिलाई जाती है तो दाब 3 bar हो जाता है। इन गैसों के अणु-भार में सम्बन्ध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
माना दोनों गैसों A तथा B के मोलर द्रव्यमान क्रमश: MA तथा MB हैं। दिए गए आँकड़ों के अनुसार,

अब,
गैस A का दाब (PA) = 2 bar
गैस A तथा B का दाब (PA + PB) = 3bar
PB = (3 – 2) = 1bar
आदर्श गेस समीकरण के अनुसार,
PAV = nA RT
PBV = nB RT
∴ \(\frac{P_{A}}{P_{B}}=\frac{n_{A}}{n_{B}}\)
या \(\frac{n_{A}}{n_{B}}\) = \(\frac{(2 bar)}{(1 bar)}\) = \(\frac{2}{1}\) …………… (ii)
समीकरण (i) तथा (ii) से,
\(\frac{M_{B}}{2 M_{A}}\) = \(\frac{2}{1}\) या MB = 4MLA

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प्रश्न 5.6
नाली साफ करने वाले ड्रेनेक्स में सूक्ष्म मात्रा में एल्यूमीनियम होता है। यह कॉस्टिक सोडा से क्रिया पर डाइहाड्रोजन गैस देता है। यदि 1 bar तथा 20°C ताप पर 0.15g एल्यूमीनियम अभिक्रिया करेगा तो निर्गमित डाइहाइड्रोजन का आयतन क्या होगा?
उत्तर:
अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण निम्नलिखित

प्रश्न 5.7
यदि 27°C पर 9dm3 धारिता वाले फ्लास्क में 3.2g मेथेन तथा 4.4g कार्बन डाइ-ऑक्साइड का मिश्रण हो तो इसका दाब क्या होगा?
उत्तर:
मेथेन (CH4) के मोलों की संख्या

= 0.2mol

कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2) के मोलों की संख्या

= 0.1mol
pCH4 = \(\frac{n_{1} R T}{V}\)

अतः गैसीय मिश्रण का कुल दाब
(P) = pCH4 + pCO4
= (5.543 × 104 Pa) + (2.771 × 104Pa)
= 8.314 × 104 Pa

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प्रश्न 5.8
27°C ताप पर जब 1L के फ्लास्क में 0.7 bar पर 2.0 L डाइऑक्सीजन तथा 0.8 bar पर 0.5L डाइहाइड्रोजन को भरा जाता है तो गैसीय मिश्रण का दाब क्या होगा?
उत्तर:
डाइऑक्सीजन (O2) के लिए,

गैस समीकरण के अनुसार,
PV = nRT
या P = \(\frac{nRT}{V}\) = (\(\frac{1.8 bar L}{RT}\)) × \(\frac{RT}{(lL)}\)
= 1.8 bar

प्रश्न 5.9
यदि 27°C ताप तथा 2 bar दाब पर एक गैस का घनत्व 5.46g/dm3 तो STP पर इसका घनत्व क्या होगा?
उत्तर:

प्रश्न 5.10
यदि 546°C तथा 0.1 bar दाब पर 34.05 mL फॉस्फोरस वाष्प का भार 0.0625 g है तो फॉस्फोरस का मोलर द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर:
आदर्श गैस समीकरण के अनुसार,
PV = nRT
या PV = \(\frac{WRT}{M}\)
या M = \(\frac{WRT}{PV}\)
दिए गए आँकड़े-
फॉस्फोरस वाष्पों का द्रव्यमान (W) = 0.0625g
वाष्पों का आयतन (V) = 34.05 mL = 34.05 × 10-3L
वाष्पों का दाब (P) = 0.1bar
गैस स्थिरांक (R) = 0.083 bar LK-1 mol-1
ताप (T) = 546 + 273 = 819K
उपर्युक्त समीकरण में मान रखने पर,

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प्रश्न 5.11
एक विद्यार्थी 27°C पर गोल पेंदे के फ्लास्क में अभिक्रिया-मिश्रण डालना भूल गया तथा उस फ्लास्क को ज्वाला पर रख दिया। कुछ समय पश्चात् उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने उत्तापमापी की सहायता से फ्लास्क का ताप 477°C पाया। आप बताइए कि वायु का कितना भाग फ्लास्क से बाहर निकला?
उत्तर:
चूँकि विद्यार्थी प्रयोगशाला में कार्य कर रहा था, इसलिए दाब में कोई परिवर्तन नहीं है। अतः चार्ल्स का नियम लागू होगा।
दिए गए आंकड़े हैं –
V1 = VL (माना) V2 = ?
T1 = 27 + 273 = 300K
T2 = 477 + 273 = 750K
∴ \(V_{2}=\frac{V_{1} T_{2}}{T_{1}}\)
= \(\frac{(VL)×(750K)}{(300K)}\) = 2.5V
अतः बाहर निकलने वाली वायु का आयतन
= 2.5V – V = 1.5V
बाहर निकलने वाली वायु का भाग = \(\frac{1.5V}{2.5V}\) = \(\frac{3}{5}\)

प्रश्न 5.12
3.32 bar पर 5 dm3 आयतन घेरने वाली 4.0 mol गैस के ताप की गणना कीजिए। (R = 0.83 bar dm3 K-1 mol-1)
उत्तर:
प्रश्नानुसार, गैस के मोलों की संख्या (n)= 4.0 मोल
गैस का दाब (P) = 3.32bar, गैस का आयतन (V) = 5dm3 तथा R = 0.083 bar dm3 K-1 mol-1
अब गैस समीकरण
PV = nRT से
T = \(\frac{PV}{nR}\)
= \(\frac{3.32 \mathrm{bar} \times 5 \mathrm{dm}^{3}}{4.0 \mathrm{mol} \times 0.083 \mathrm{bardm}^{3} \mathrm{K}^{-1} \mathrm{mol}^{-1}}\)
= 50K

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प्रश्न 5.13
1.4g डाइ-नाइट्रोजन गैस में उपस्थित कुल इलेक्ट्रॉनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर:
डाइनाइट्रोजन (N2) का आणविक द्रव्यमान = 28g
∵ 28g N2 में अणुओं की संख्या = 6.022 × 1023
∴ 1.4g N2 में अणुओं की संख्या
= \(\frac{6.022 \times 10^{23} \times 1.4 \mathrm{g}}{28 \mathrm{g}}\)
= 3.0 × 1022
∵ N2 का परमाणु क्रमांक = 7
∴ N2 के एक अणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
= 2 × 7 = 14
अत: N2 के 3.011 × 1022 अणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 14 × 3.011 × 1022
= 4.215 × 1022

प्रश्न 5.14
यदि एक सेकण्ड में 10 × 1010 गेहूँ के दाने वितरित किये जायें तो आवोगाद्रो-संख्या के बराबर दाने वितरित करने में कितना समय लगेगा?
उत्तर:
∵ 101o दानों का वितरित करने में लगा समय = 1s
∴ 6.022 × 1022 दानों को वितरित करने में समय लगेगा

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प्रश्न 5.15
27°C ताप पर 1dm3 आयतन वाले फ्लास्क में 8g डाइ-ऑक्सीजन तथा 4g डाइ-हाइड्रोजन के मिश्रण का कुल दाब कितना होगा?
उत्तर:
डाइ-ऑक्सीजन (O2) के मोलों की संख्या = (n1)

अतः गैसीय मिश्रण का कुल दाब = PO2 + PH2
= 6.225 + 49.8
= 56.025 bar

प्रश्न 5.16
गुब्बारे के भार तथा विस्थापित वायु के भार के अन्तर को ‘पेलोड’ कहते हैं। यदि 27°C पर 10 m त्रिज्या वाले गुब्बारे में 1.66 bar पर 100 kg हीलियम भरी जाये तो पेलोड की गणना कीजिए। (वायु का घनत्व = 1.2 kg m-3 तथा R = 0.083 bar dm3 K-1 mol-1)
उत्तर:
∵ गुब्बारे की त्रिज्या (Ω) = 10m
∴ गुब्बारे का आयतन = \(\frac{4}{3}\) πΩ3
= \(\frac{4}{3}\) × \(\frac{22}{7}\) × (10m)3
= 4190.5m3
तथा विस्थापित वायु का द्रव्यमान
= वायु का आयतन × वायु का घनत्व
= 4190.5m3 × 1.2kg m-3
= 5028.6kg
पुनः चूंकि
P = 1.66bar, V = 4190.5 × 103 dm3
R = 0.083 bardm3 K-1 mol-1
T = 27 + 273 = 300 K
आदर्श गैस समीकरण
PV = nRT से
हीलियम (He) के मोलों की संख्या (n) = \(\frac{PV}{RT}\)
\(\frac{1.66 \mathrm{bar} \times 4190 \times 10^{3} \mathrm{dm}^{3}}{0.083 \mathrm{bar} \mathrm{dm}^{3} \mathrm{K}^{-1} \mathrm{mol}^{-1} \times 300 \mathrm{K}}\)
= 1117.48 × 103g = 1117.48kg
तथा भरे हुए गुब्बारे का द्रव्यमान
= 100 + 1117.48
= 1217.48kg
He का द्रव्यमान = He के मोल × मोलर द्रव्यमान
= 279.37 × 10 mol × 4g mol-1
= 1117.48 × 103 × 4gmol-1
= 1117.48 × 103g = 1217.48kg
अतः पेलोड = विस्थापित वायु का द्रव्यामान – भरे हुए गुब्बारे का द्रव्यमान
= 5028.6 – 1217.48
= 3811.12 kg

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प्रश्न 5.17
31.1°C और 1 bar दाब पर 8.8 ग्राम CO2, द्वारा घेरे गये आयतन की गणना कीजिए। (R = 0.083 bar LK-1 mol-1)
उत्तर:
प्रश्नानुसार
CO2 का दाब (P) = 1bar, ताप (T) = 273 + 31.1
= 304.1°K तथा R = 0.083 bar Lmol-1

= \(\frac{(8.8 g)}{\left(44 g m o l^{-1}\right)}\)
= 0.2 mol
अब गैस समीकरण से
PV = nRT
V = \(\frac{nRT}{p}\)

= 5.048L

प्रश्न 5.18
समान दाब पर किसी गैस के 2.9g द्रव्यमान का 95°C तथा 0.184g डाइहाइड्रोजन का 17°C पर आयतन समान है। बताइए कि गैस का मोलर द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर:
माना गैस का मोलर द्रव्यमान M है तो

= \(\frac{2.9g}{M}\)
तथा डाइहाइड्रोजन (H2) के मोलों की संख्या

गैस का ताप (T2) = 95 + 273 = 368°K
तथा H2 का ताप (T2) = 17 + 273 = 290°K
आदर्श गैस समीकरण से,
PV = nRT
∵ दोनों गैसों के लिए P, V तथा R स्थिरांक हैं।

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प्रश्न 5.19
1 bar दाब पर डाइहाइड्रोजन तथा डाइऑक्सीजन के मिश्रण में 20% डाइहाइड्रोजन (भार से) रखा जाता है तो डाइहाइड्रोजन का आंशिक दाब क्या होगा?
उत्तर:
यदि मिश्रण में H2 का द्रव्यमान 20g हो तो O2 का द्रव्यमान 80g होगा।
मिश्रण में H2 के मोलों की संख्या

∵ गैसीय मिश्रण का कुल दाब (P) = 1bar
अतः डाइहाइड्रोजन (H2) का आंशिक दाब

प्रश्न 5.20
\(\frac{p V^{2} T^{2}}{n}\) राशि के लिए S. I इकाई क्या होगी?
उत्तर:

प्रश्न 5.21
चार्ल्स के नियम के आधार पर समझाइए कि न्यूनतम सम्भव ताप – 273°C होता है।
उत्तर:
273°C (या OK) ताप, परम शून्य ताप कहलाता है। इस ताप से नीचे कोई पदार्थ गैस अवस्था में नहीं रह सकता तथा यह द्रव अवस्था प्राप्त कर लेता है। इसका तात्पर्य यह है कि चार्ल्स का नियम केवल -273°C ताप तक ही लागू किया जा सकता है, चूंकि इस ताप से नीचे पदार्थ गैस अवस्था में नहीं होता अर्थात् न्यूनतम सम्भव ताप -273°C होता है।

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प्रश्न 5.22
कार्बन डाइऑक्साइड तथा मेथेन का क्रान्तिक ताप क्रमशः 31.1°C एवं – 81.9°C है। इनमें से किसमें प्रबल अन्तर-आण्विक बल है तथा क्यों?
उत्तर:
क्रान्तिक तापों के दिए गए मान यह दर्शाते हैं कि कार्बन डाइऑक्साइड के अणुओं में आकर्षण बल अधिक है। वास्तव में दोनों गैसें अध्रुवी हैं, परन्तु कार्बन डाइऑक्साइड के अणुओं में वाण्डरवाल्स आकर्षण बल अधिक होता है; क्योंकि इसका आण्विक आकार बड़ा है।

प्रश्न 5.23
वाण्डरवाल्स प्राचल की भौतिक सार्थकता को समझाइए।
उत्तर:
1. वाण्डरवाल्स प्राचल ‘a’:
इसका मान गैस के अणुओं में विद्यमान आकर्षण बलों के परिमाण की माप होता है। अत: a का मान अधिक होने का तात्पर्य, अन्तर-आण्विक – आकर्षण बलों का अधिक होना है।

2. वाण्डरवाल्स प्राचल ‘b’:
इसका मान गैस-अणुओं के प्रभावी आकार की माप है। इसका मान गैस-अणुओं के वास्तविक आयतन का चार गुना होता है। यह अपवर्जित आयतन कहलाता है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 7 साम्यावस्था

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 7 साम्यावस्था Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 7.1
एक द्रव्य को सीलबन्द पात्र में निश्चित ताप पर इसके वाष्प के साथ साम्य में रखा जाता है। पात्र का आयतन अचानक बढ़ा दिया जाता है।
(क) वाष्य-दाब परिवर्तन का प्रारम्भिक परिणाम क्या होगा?
(ख) प्रारम्भ में वाष्पन एवं संघनन की दर कैसे बदलती
(ग) क्या होगा, जबकि साम्य पुनः अन्तिम रूप से स्थापित हो जाएगा, तब अन्तिम वाष्प दाब क्या होगा?
उत्तर:
(क) चूँकि इस स्थिति में वाष्पों की समान मात्रा अधिक स्थान पर वितरित होती है, अत: पात्र का आयतन बढ़ाने पर वाष्प दाब प्रारम्भिक रूप से घटेगा।
(ख) पात्र के आयतन की वृद्धि से प्रारम्भ में वाष्पन की दर घटेगी क्योंकि अधिक स्थान मिलेगा।
(ग) जब अग्रगामी तथा पश्चगामी प्रक्रमों की दर समान होती है तो अन्त में साम्य पुनः स्थापित हो जाता है। चूंकि यह ताप पर निर्भर करता है, अत: वाष्पदाब अपरिवर्तित रहेगा।

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प्रश्न 7.2
निम्न साम्य के लिए K2 क्या होगा, यदि साम्य पर प्रत्येक पदार्थ की सांद्रताएँ हैं –
[SO2] = 0.60M, [O2] = 0.82 M एवं [SO3] = 1.90M
2SO2(g) + O2(g) ⇄ 2SO3
उत्तर:
दी हुई अभिक्रिया,
2SO2(g) + O2(g) ⇄ 2SO3
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प्रश्न 7.3
एक निश्चित ताप एवं कुल दाब 105 Pa पर आयोडीन वाष्प में आयतनानुसार 40% आयोडीन परमाणु होते हैं।
साम्य के लिए Kp की गणना कीजिए।
उत्तर:
एक निश्चित ताप एवं कुल दाब = 105 Pa
आयोडीन परिमाणों (I2) आंशिक दाब = \(\frac { 40\times 10^{ 5 } }{ 100 } \)
= 0.4 × 105
आयोडीन परिमाणों (I) आंशिक दाब = \(\frac{60}{100}\) × 105
= 0.6 × 105 Pa
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प्रश्न 7.4
निम्मलिखित में से प्रत्येक अभिक्रिया के लिए Kc समान्य स्थिरांक का व्यंकजक लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 7.5
Kp के मान की गणना निम्नलिखित प्रकार में से प्रत्येक साम्य के लिए Kc का मान ज्ञात कीजिए।

  1. 2NOCl (g) ⇄ 2NO(g) + Cl2(g); Kp = 1.8 × 10-1 at 500k
  2. CaCO3(s) ⇄ CaO(s) + CO2(g); Kp = 167 at 1073 K

उत्तर:
Kp तथा Kc परस्पर संबंदित होते है –
Kp = Kc(RT)∆n
Kc के मान की गणना निम्मनलिखित प्रकार की जी सकती है –
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प्रश्न 7.6
साम्य NO(g) + O3 (g) ⇄ NO2 (g) + O2(g) के लिए 1000 K पर Kc = 6.3 × 1014 है। साम्य में अग्र एवं प्रतीप दोनों अभिक्रियाएँ प्राथमिक रूप से द्विअणुक हैं। प्रतीप अभिक्रिया के लिए Kc क्या है?
उत्तर:
प्रतीप अभिक्रिया के लिए,
Kc = \(\frac { 1 }{ K_{ c } } \)
= \(\frac { 1 }{ 6.34\times 10^{ 14 } } \) = 1.59 × 10-15

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प्रश्न 7.7
साम्य स्थिारांक का व्यंजक लिखते समय समझाइए कि शुद्ध द्रवों एवं ठोसों को उपेक्षित क्यों किया जा सकता है?
उत्तर:
साम्य स्थिरांक का व्यंजक लिखते समय, अभिक्रिया में प्रयुक्त स्पीशीज की मोलर सान्द्रताएँ ली जाती हैं। हम जानते हैं कि किसी पदार्थ की मोलर सान्द्रता उसके प्रति इकाई आयतन में मोलों की संख्या को व्यक्त करती है। अर्थात्
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चूँकि द्रव्यमान/आयतन, पदार्थ का घनत्व व्यक्त करता है; अतः पदार्थ की मोलर सान्द्रता उसके घनत्व के समानुपाती होती हैं।
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हम जानते हैं कि घनत्व एक गहन गुण (Intensive property) है तथा पदार्थ के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। इसके अतिरिक्त एक शुद्ध पदार्थ (ठोस या द्रव) की मोलर सान्द्रता के मान सदैव समान रहते हैं तथा इन्हें साम्य स्थिरांक का मान लिखते समय उपेक्षित किया जा सकता है। यद्यपि गैसीय अवस्था या जलीय विलयन में, पदार्थों के लिए, दिए गए आयतन में उनकी मात्रा परिवर्तनीय हो सकती है तथा उनकी मोलर सान्द्रता स्थिर नहीं रहती जिससे साम्य स्थिरांक के लिए व्यंजक लिखते समय इसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 7.8
N2 एवं O2- के मध्य निम्नलिखित अभिक्रिया होती है –
2N2 (g) + O2(g) ⇄ 2N2O(g)
यदि एक 10L के पात्र में 0.482 mol N2 एवं 0.933 mol O2 रखे जाएँ तथा एकताप, जिस पर N2O बनने दिया जाए तो साम्य मिश्रण का संघटन ज्ञात कीजिए Kc = 2.0 × 10-37
उत्तर:
माना N2(g) के xmol अभिक्रिया में भाग लेते हैं। अभिक्रिया के अनुसार, O2 के \(\frac{x}{2}\) mol अभिक्रिया करके N2O(g) के \(\frac{x}{2}\) mol बनाएँगे। इन स्पीशीज की अभिक्रिया से पहले तथा समय बिन्दु पर प्रति लीटर मोलर सान्द्रता है –
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साम्य स्थिरांक का मान (2.0 × 10 -37) अत्यन्त कम है।
इसका अर्थ है कि अभिकारकों की केवल कुछ मात्रा ही अभिकृत हुई है। इसलिए x अत्यन्त कम होगा तथा अभिकारकों के सम्बन्ध में इसे उपेक्षणीय माना जा सकता है।
रासायनिक साम्य का नियम लागू करने पर,
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अतः साम्य मिश्रण में
N2 की मोलर सान्द्रता = 0.0482 mol L-1
O2 की मोलर सान्द्रता = 0.0933 mol L-1
N2O की मोलर सान्द्रता = 6.58 × 10-21 mol L-1

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प्रश्न 7.9
निम्नलिखित अभिक्रिया के अनुसार नाइट्रिक ऑक्साइड Br2 से अभिक्रिया का नाइट्रोसिल ब्रोमाइड बनाती है –
2NO (g) + Br2(g) ⇄ 2NOBr (g)
जब स्थिर ताप पर एक बन्द पात्र में 0.087 mol NO एवं 0.0437 mol Br2 मिश्रित किए जाते हैं, तब 0.0518 mol NOBr प्राप्त होती है। NO एवं Br2 की साम्य मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
अभिक्रिया के लिए सन्तुलित रासायनिक समीकरण निम्नवत् है –
2NO(g) + Br2(g) ⇄ 2NOBr (g)
समीकरण के अनुसार, NO(g) के 2mol, Br2(g) के 1mol से अभिक्रिया करके, 2mol NOBr (g) बनाते हैं। साम्य-मिश्रण के संघटन की गणना निम्नवत् की जा सकती है –
साम्य पर निर्मित NOBr (g) के मोलों की संख्या = 0.0518mol (दिया है)
अभिक्रिया में भाग लेने वाले NO(g) के मोलों की संख्या = 0.0518mol साम्यावस्था पर NO(g) के शेष मोलों की संख्या
= 0.087 – 0.0518
= 0.0352 mol
अभिक्रिया में भाग लेने वाले Br2(g) के मोलों की संख्या
= \(\frac{1}{2}\) × 0.0518
= 0.0259
साम्यावस्था पर Br2(g) के शेष मोलों की संख्या
= 0.437 – 0.0259
= 0.0178 mol
विभिन्न स्पीशीज की प्रारम्भिक मोलर सान्द्रताएँ तथा साम्य मोलर सान्द्रताएँ निम्नवत् व्यक्त की जा सकती है –
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प्रश्न 7.10
साम्य 2SO2 (g) + O2 (g) = 2SO3 (g) के लिए 450K पर Kp = 2.0 × 1010 bar है। इस ताप पर Kc का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
Kp तथा Kc में सम्बन्ध निम्नवत् है –
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प्रश्न 7.11
HI(g) का एक नमूना 0.2 atm दाब पर एक फ्लास्क में रखा जाता है। साम्य पर HI(g) का आंशिक दाब 0.04 atm है। यहाँ दिये गये साम्य के लिए Kp का मान क्या होगा?
2HI(g) ⇄ H2g + I2(g)
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
PHI = 0.04 atm, PH2 = 0.08atm, PI2 = 0.08atm
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प्रश्न 7.12
500K ताप पर एक 20 L पात्र में N2 के 1.57 mol, H2 के 1.92 mol एवं NH3 के 8.13 mol का मिश्रण लिया जाता है। अभिक्रिया N2 (g) + 3H2(g) ⇄ 2NH3 (g) के लिए Kc × 102 का मान 1.7 × 102 है। क्या अभिक्रिया-मिश्रण साम्य में है? यदि नहीं तो नेट अभिक्रिया की दिशा क्या होगी?
उत्तर:
दी हुई अभिक्रिया
N2 (g) + 3H2(g) ⇄ 2NH3 (g)
प्रश्नानुसार,
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चूँकि Q > Kc अत: अभिक्रिया विपरीत दिशा में होगी।

प्रश्न 7.13
एक गैस अभिक्रिया के लिए –
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इस व्यंजक के लिए संतुलित रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त व्यंजक के लिए संतुलित रासायनिक समीकरण निम्नवत् है –
4NO(g) + 6H2O(g) → 4NH3(g) + 5O2(g)

प्रश्न 7.14
H2O का एक मोल एवं CO का एक मोल 725K ताप पर 10L के पात्र में लिए जाते हैं। साम्य पर 40% जल (भारात्मक) CO के साथ निम्नलिखित समीकरण के अनुसार अभिक्रिया करता है –
H2O(g) + CO(g) ⇄ H2 (g) + CO2(g)
अभिक्रिया के लिए साम्य स्थिारांक की गणना कीजिए।
उत्तर:
वास्तविक रूप से उपस्थित जल के मोलों की संख्या = 1 mol
तथा अभिकृत जल से प्रतिशत = 40%
अभिकृत जल के मोलों की संख्या = \(\frac{1×40}{100}\) = 0.4mol
शेष जल के मोलों की संख्या = (1.0 – 0.4) = 0.6mol
अतः अभिक्रिया के आरम्भ में तथा साम्यावस्था पर अभिकारकों तथा उत्पादों की मोलर सान्द्रता प्रति लीटर निम्नवत् है –
H2O(g) + CO(g) = H2(g) + CO2(g)
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= 0.44

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प्रश्न 7.15
700 K ताप पर अभिक्रिया H2(g) + I2(g) ⇄ 2HI(g) के लिये साम्य स्थिरांक 54.8 है। यदि हमने शुरू में HI(g) लिया हो, 700K ताप साम्य स्थापित हो तथा साम्य पर 0.5 mol L-1 HI(g) उपस्थित हो, तो साम्य पर H2(g) एवं I2(g) की सान्द्रताएँ क्या होंगी?
उत्तर:
माना H2(g) तथा I2(g) की साम्यावस्था पर सान्द्रता xmol L-1 है; तब
अभिक्रिया,
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अतः साम्यावस्था पर [H2(g)] = 0.068mol L-1
तथा [I2 (g)] = 0.068 mol L-1

प्रश्न 7.16
ICI, जिसकी सान्द्रता प्रारम्भ में 0.78 M है, को यदि साम्य पर आने दिया जाए तो प्रत्येक की साम्य पर सान्द्रताएँ क्या होंगी?
2ICI(g) ⇄ I2(g) + Cl2(g); Kc = 0.14
उत्तर:
दी हुई हुई अभिक्रिया
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प्रश्न 7.17
नीचे दर्शाए गए साम्य में 899K पर Kp का मान 0.04atm है। C2H6 की साम्य पर सान्द्रता क्या होगी यदि 4.0 atm दाब पर C2H6 को एक फ्लास्क में रखा गया है एवं साम्यावस्था पर आने दिया जाता है?
उत्तर:
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अत: C2H6 की साम्य पर सान्द्रता = 4 – a
= 4 – 0.78
= 3.22

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प्रश्न 7.18
एथेनॉल एवं ऐसीटिक अम्ल की अभिक्रिया से एथिल ऐसीटेट बनाया जाता है एवं साम्य को इस प्रकार दर्शाया जा सकता है –
CH3COOH (l) + C2H5OH (l) = CH3COOC2H5 (l) + H2O (l)

  1. इस अभिक्रिया के लिए सान्द्रता अनुपात (अभिक्रिया-भागफल) Qc लिखिए (टिप्पणी; यहाँ पर जल आधिक्य में नहीं है एवं विलायक भी नहीं है)
  2. यदि 293 K पर 1.00 mol ऐसीटिक अम्ल एवं 0.18 mol एथेनॉल प्रारम्भ में लिए जाएँ तो अन्तिम साम्य मिश्रण में 0.171 mol एथिल ऐसीटेट है। साम्य स्थिरांक की गाना पीना।
  3. 0.5 mol एथेनॉल एवं 1.0 mol ऐसीटिक अम्ल से प्रारम्भ करते हुए 293K ताप पर कुछ समय पश्चात् एथिल ऐसीटेट के 0.214 mol पाए गए तो क्या साम्य स्थापित हो गया?

उत्तर:
1. अभिक्रिया के लिए सान्द्रता अनुपात ‘Qc‘ है –
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रासायनिक साम्यावस्था नियम लागू करने पर,
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चूँकि Qc का मान Kc से कम है (Qc < Kc); अत: साम्यावस्था प्राप्त नहीं होगी। परन्तु अभिकारक अभिक्रिया में भाग लेने तथा उत्पाद बनाएँगे।

प्रश्न 7.19
437K ताप पर निर्वात में PCl5, का एक नमूना एक फ्लास्क में लिया गया। साम्य स्थापित होने पर PCl5, की सान्द्रता 0.5 × 10-1 mol L-1
पाई गई, यदि Kc का मान 8.3 × 10-3 है तो साम्य पर PCl3 एवं Cl2 की सान्द्रताएँ क्या होंगी?
PCl5(g) ⇄ PCl3 (g) + Cl2 (g)
उत्तर:
माना PCl5 की मोलर सान्द्रता प्रति लीटर = x mol
साम्यावस्था पर, PCl5 की मोलर सान्द्रता = 0.05 molL-1
∴ PCl5 के वियोजित मोल = (x – 0.05)mol L-1
PCl3 के प्राप्त मोल = (x – 0.05)mol L-1
Cl2 के प्राप्त मोल = (x – 0.05)mol L-1
अभिक्रिया से पहले तथा साम्य बिन्दु पर अभिकारकों तथा उत्पादों की मोलर सान्द्रता प्रति लीटर निम्नवत् है –
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साम्य स्थिरांक (Kc) = 8.3 × 10-2 = 0.0083
रासायनिक साम्य का नियम लागू करने पर,
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साम्य बिन्दु पर PCl3 की मोलर सान्द्रता = (0.07 – 0.05) = 0.02 mol L-1
साम्य बिन्दु पर Cl2 की मोलर सान्द्रता = (0.07 – 0.05) = 0.02 mol L-1

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प्रश्न 7.20
लौह अयस्क से स्टील बनाते समय जो अभिक्रिया होती है, वह आयरन (II) ऑक्साइड का कार्बन मोनोक्साइड के द्वारा अपचयन है एवं इससे धात्विक लौह एवं CO2, मिलते हैं।
Feo(s) + CO(g) ⇄ Fe(s) + CO2 (g); Kp = 0.265 atm (1050 K एवं CO2 के साम्य पर आंशिक दाब क्या होंगे, यदि उनके प्रारम्भिक आंशिक दाब हैं –
PCO = 1.4atm एवं PCO2 = 0.80 atm
उत्तर:
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चूंकि Qp, Kp से अधिक है; अत: अभिक्रिया पश्चगामी दिशा में अग्रसरित होगी अर्थात् CO2, का दाब घटेगा तथा CO का दाब बढ़ेगा। जिससे साम्यावस्था प्राप्त हो सके। अत: यदि CO2, के दाब में होने वाली कमी p है तो CO के दाब में वृद्धि p होगी।
साम्यावस्था पर,
PCO2 = (0.80 – p)atm
PCO = (1.4 + p)atm
KP = \(\frac { P_{ CO_{ 2 } } }{ P_{ CO } } \)
⇒ 0.265 = \(\frac{0.80-p}{1.4+p}\)
या 0.265 (1.4 + p) = 0.80 – p
0.371 + 0.265 p = 0.80 – p
1.265 p = 0.429
p = \(\frac{0.429}{1.265}\) = 30.339atm
अतः साम्यावस्था पर,
PCO = 1.4 + 0.339 = 1.739 atm
PCO2 = 0.80 – 0.3393
= 0.461 atm

प्रश्न 7.21
अभिक्रिया N2 (g) + 3H2 (g) ⇄ 2NH3 (g) के लिए (500 K पर)साम्य स्थिरांक Kc = 0.061 है। एक विशेष समय पर मिश्रण का संघटन इस प्रकार है – 3.0 mol L-1 N2, 2.0 mol L-1H2 एवं 0.5 mol L-1NH3 क्या अभिक्रिया साम्य में है? यदि नहीं, तो साम्य स्थापित करने के लिए अभिक्रिया किस दिशा में अग्रसर होगी?
उत्तर:
दी गई अभिक्रिया है –
N2 (g) + 3H2 (g) ⇄ 2NH3 (g)
प्रश्नानुसार,
[N2] = 3.0mol L-1
[H2] = 2.0mol L-1
[NH3] = 0.5mol L-1
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चूँकि Qc का मान Kc के मान (0.061) से कम है; अतः अभिक्रिया साम्यावस्था में नहीं है। यह तब अग्रगामी दिशा में होगी जब तक कि Qc का मान Kc के समान न हो जाए।

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प्रश्न 7.22
ब्रोमीन मोनोक्लोराइड BrCl विघटित होकर ब्रोमीन एवं क्लोरीन देता है तथा साम्य स्थापित होता है –
2BrCl (g) ⇄ Br2 (g) + Cl2 (g)
इसके लिए 500K पर Kc = 32 है। यदि प्रारम्भ में BrCl की सान्द्रता 3.3 × 10-3 mol L-1 हो साम्य पर मिश्रण में इसकी सान्द्रता क्या होगी?
उत्तर:
माना साम्यावस्था प्राप्त करने के लिए BrCl के xmol वियोजित होते हैं। विभिन्न स्पीशीज की अंक तथा साम्य बिन्दु पर मोलर सान्द्रताएँ निम्नवत् प्रदर्शित की जा सकती है –
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रासायनिक साम्यावस्था नियम से,
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साम्य बिन्दु पर BrCl की मोलर सान्द्रता
= 3.3 × 10-3 – 3.0 × 10-3
= 3.0 × 10-4 mol L-1

प्रश्न 7.23
1127K एवं 1atm दाब पर CO तथा CO2, के गैसीय मिश्रण में साम्यावस्था पर ठोस कार्बन में 90.55% (भारात्मक) CO है।
C(s) + CO2 (g) ⇄ 2CO(g)
उपरोक्त ताप पर अभिक्रिया के लिए Kc के मान की गणना कीजिए।
उत्तर:
अभिक्रिया के लिए Kp की गणना –
माना गैसीय मिश्रण का कुल द्रव्यमान = 100 g
मिश्रण में CO का द्रव्यमान = 90.55g
मिश्रण में CO2, का द्रव्यमान = (100 – 90.55) = 9.45g
CO के मोलों की संख्या = \(\frac{90.55 \mathrm{g}}{28 \mathrm{g} \mathrm{mol}^{-1}}\) = 3.234 mol
CO2 मोलों की संख्या = \(\frac{90.55 g}{44 g m o l^{-1}}\) = 2.058 mol
मिश्रण में CO का आंशिक दाब,
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मिश्रण में CO2, का आंशिक दाब,
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अभिक्रिया के लिए Kc की गणना –
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प्रश्न 7.24
298K पर NO एवं O2 से NO2 बनती है –
NO (g) + O2 (g) ⇄ NO2 (g)
अभिक्रिया के लिए (क) ∆GΘ एवं (ख) साम्य स्थिरांक की गणना कीजिए –
fGΘ (NO2) = 52.0 kJ/mol
fGΘ (NO) = 87.0 KJ/mol
fGΘ (O2) = oKJ/mol
उत्तर:
1. ∆GΘ = ∆fGΘ (NO2)
-[∆fGΘ (NO) + ∆fGΘ (1/2 O2)]
= 52.0 – (87.0 + 0)
∴ ∆GΘ = -35KJ mol-1

2. हम जानते हैं कि
∆GΘ = -2.303RT log Kc
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∴ Kc = Antilog 6.314 = 1.36 × 106

प्रश्न 7.25
निम्नलिखित में से प्रत्येक साम्य में जब आयतन बढ़ाकर दाब कम किया जाता है, तब बताइए कि अभिक्रिया के उत्पादों के मोलों की संख्या बढ़ती है या घटती है यह समान रहती है?
(क) PCl5 (g) ⇄ PCl3 (g) + Cl2 (g)
(ख) CaO(s) + CO2 (g) ⇄ CaCO3 (s)
(ग) 3Fe(s) + 4H2O (g) ⇄ Fe3O4(s) + 4H2 (g)
उत्तर:
(क) दाब में कमी अग्रगामी अभिक्रिया को बढ़ायेगी और उत्पादों के मोलों की संख्या में वृद्धि होगी।
(ख) दाब की कमी से पश्चगामी अभिक्रिया बढ़ेगी और उत्पादों के मोलों की संख्या घटेगी।
(ग) चूँकि साम्य स्थिरांक पर दाब का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, अतः उत्पादों के मोलों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

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प्रश्न 7.26
निम्नलिखित में से दाब बढ़ाने पर कौन-कौन सी अभिक्रियाएँ प्रभावित होंगी? यह भी बताएं कि दाब परिवर्तन करने पर अभिक्रिया अग्र या प्रतीप दिशा में गतिमान होगी?
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उत्तर:

  1. मोलों की संख्या में अन्तर, ∆n = 1 + 1 – 1 – 1 दाब में वृद्धि पश्चगामी अभिक्रिया का समर्थन करेगी, चूंकि पश्चगामी दिशा में गैसीय घटकों के मोलों की संख्या प्रति इकाई आयतन (अर्थात् दाब) में कमी हो रही है।
  2. मोलों की संख्या में अन्तर, ∆n = (1 + 2) – (1 + 2) = 0 दाब में वृद्धि साम्यावस्था को प्रभावित नहीं करती, चूँकि अभिक्रिया के परिणामस्वरूप मोलों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है।
  3. मोलों की संख्या में अन्तर, ∆n = 2 – 1 = 1, दाब में वृद्धि पश्चगामी अभिक्रिया का समर्थन करेगी, चूंकि पश्चगामी दिशा में गैसीय घटकों के मोलों की संख्य प्रति इकाई आयतन (अर्थात् दाब) में कमी हो रही है।
  4. मोलों की संख्या में अन्तर, ∆n = 1 – (2 + 1) = -2, दाब में वृद्धि अग्रगामी अभिक्रिया का समर्थन करेगी, चूंकि अग्रगामी दिशा में गैसीय घटकों के मोलों की संख्या प्रति इकाई आयतन (अर्थात् दाब) में कमी हो रही है।
  5. मोलों की संख्या में अन्तर, ∆n = 1; दाब में वृद्धि पश् चगामी अभिक्रिया का समर्थन करेगी, कि पश्चगामी दिशा में गैसीय घटकों के मोलों की संख्या प्रति इकाई आयतन (अर्थात् दाब) में कमी हो रही है।
  6. मोलों की संख्या में अन्तर,
    ∆n = (4 + 6) – (4 + 5) = 1

दाब में वृद्धि पश्चगामी अभिक्रिया का समर्थन करेगी, चूँकि पश्चगामी दिशा में गैसीय घटकों के मोलों की संख्या प्रति इकाई आयतन (अर्थात् दाब) में कमी हो रही है।

प्रश्न 7.27
निम्नलिखित अभिक्रिया के लिए 1024K पर साम्य स्थिरांक 1.6 × 105 है।
H2 (g) + Br2 (g) ⇄ 2HBr (8)
यदि HBr के 10.0 bar सीलयुक्त पात्र में डाले जाएँ तो सभी गैसों के 1024K पर साम्य दाब ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
kp की गणना –
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गैसों के आंशिक दाब की गणना –
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प्रश्न 7.28
निम्नलिखित ऊष्माशोषी अभिक्रिया के अनुसार ऑक्सीकरण द्वारा डाइहाड्रोजन गैस प्राकृतिक गैस से प्राप्त की जाती है –
CH4 (g) + H2O (g) ⇄ CO(g) + 3H2(g)
(क) उपरोक्त अभिक्रिया के लिए Kp का व्यंजक लिखिए।
(ख) Kp एवं अभिक्रिया मिश्रण का साम्य पर संघटन किस प्रकार प्रभावित होगा, यदि?

  1. दाब बढ़ा दिया जाए।
  2. ताप बढ़ा दिया जाए।
  3. उत्प्रेरक प्रयुक्त किया जाए।

उत्तर:
(क) दी हुई अभिक्रिया के लिए Kp का व्यंजक,
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(ख)

  • चूँकि दाब बढ़ाने से मोलों की संख्या प्रति इकाई आयतन बढ़ेगी, अतः दाब बढ़ाने से साम्यावस्था पश्चगामी अर्थात् बाईं ओर स्थानान्तरित होगी जिससे अभिकारकों का सान्द्रण बढ़ेगा और Kp का मान घटेगा।
  • चूंकि वह ऊष्माशोपी अभिक्रिया है, अत: ला-शातेलिए नियम ताप बढ़ाने से अग्रगामी अभिक्रिया बढ़ेगी। अत: साम्यावस्था अग्रगामी अर्थात् दाईं ओर की स्थानान्तरित होगी, जिससे Kp का मान घट जायेगा।
  • चूंकि उत्प्रेरक अग्रगामी तथा पश्चगामी दोनों अभिक्रियाओं को समान रूप से प्रभावित करता है, अतः इसकी उपस्थिति से साम्यावस्था अपरिवर्तित रहेगी।

प्रश्न 7.29
साम्य 2H2 (g) + Co(g) ⇄ CH3OH (g) पर प्रभाव बताइए –
(क) H2 मिलाने पर
(ख) CH3OH मिलाने पर
(ग) CO हटाने पर
(घ) CH3OH हटाने पर।
उत्तर:
(क) साम्यावस्था अग्रगामी दिशा में स्थानान्तरित हो जाएगी।
(ख) साम्यावस्था पश्चगामी दिशा में स्थानान्तरित हो जाएगी।
(ग) साम्यावस्था पश्चगामी दिशा में स्थानान्तरित हो जाएगी।
(घ) साम्यावस्था अग्रगामी दिशा में स्थानान्तरित हो जाएगी।

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प्रश्न 7.30
473K पर फॉस्फोरस पेटाक्लोराइड PCl5 के विघटन के लिए Kc का मान 8.3 × 10-3 है। यदि विघटन इस प्रकार दर्शाया जाए तो
PCl5 (g) ⇄ PCl3 (g) + C2 (g) ∆rHΘ = 124.0kJ mol-1
(क) अभिक्रिया के लिए Kc का व्यंजक लिखिए।
(ख) प्रतीप अभिक्रिया के लिए समान ताप पर K. का मान क्या होगा?
(ग) यदि

  • और अधिक PCl5 मिलाया जाए,
  • दाब बढ़ाया जाए तथा
  • ताप बढ़ाया जाए तो Kc पर क्या प्रभाव होगा?

उत्तर:
(क) Kc के लिए व्यंजक
= \(\frac{\left[\mathrm{PCl}_{3}(g)\right]\left[\mathrm{Cl}_{2}(g)\right]}{\left[\mathrm{PCl}_{5}(g)\right]}\)

(ख) प्रतीप अभिक्रिया के लिए समान ताप पर Kc का मान
Kc = \(\frac{\left[\mathrm{PCl}_{5}(g)\right]}{\left[\mathrm{PCl}_{3}(g)\right]\left[\mathrm{Cl}_{2}(g)\right]}\)

(ग)

  • चूँकि ताप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, अतः PCl5, और मिलाने पर Kc का मान वहीं रहेगा।
  • दाब बढ़ाने से अभिक्रिया कम आयतन की दिशा में अग्रसर होगी अर्थात् अभिक्रिया पश्चगामी दिशा में विस्थापित हो जायेगी जिससे Kc का मान घटेगा।
  • चूँकि अभिक्रिया ऊष्माशोषी है, अत: ताप बढ़ाने पर अग्रगामी अभिक्रिया की ओर होगी। अतः Kc बढ़ जायेगा।

प्रश्न 7.31
हाबर विधि में प्रयुक्त हाइड्रोजन को प्राकृतिक गैस से प्राप्त मेथेन को उच्च ताप की भाप से क्रिया कर बनाया जाता है। दो पदों वाली अभिक्रिया में प्रथम पद में CO एवं H2, बनती हैं। दूसरे पद में प्रथम पद में बनने वाली CO और अधिक भाप से अभिक्रिया करती है।
CO (g) + H2O (g) ⇄ CO2 (g) + H2 (g) यदि 400°C पर अभिक्रिया पात्र में CO एवं भाप का सममोलर मिश्रण इस प्रकार लिया जाए कि PCO = PH2 = 4.0 bar, H2 का साम्यावस्था पर आंशिक दाब क्या होगा? 400°C पर Kp = 10.1
उत्तर:
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अतः साम्यावस्था पर H2 का आंशिक दाब = 3.04 bar

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प्रश्न 7.32
बताइए कि निम्नलिखित में से किस अभिक्रिया में अभिकारकों एवं उत्पादों की सान्द्रता सुप्रेक्ष्य होगी –
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उत्तर:
(क) चूँकि Kc का मान बहुत कम है, अतः साम्यावस्था पर अभिकारकों की मात्रा बहुत अधिक है।
(ख) चूँकि Kc का मान अत्यधिक है, अतः साम्यावस्था . पर उत्पादों की मात्रा बहुत अधिक निकट है अर्थात् अभिक्रिया पूर्णता के निकट है।
(ग) चूँकि Kc का मान एक से अधिक है, अतः अभिकारकों की मात्रा उत्पादों की मात्रा से कम होगी जिससे अभिक्रिया में अभिकारकों तथा उत्पादों की सान्द्रता सुप्रेक्ष्य होगी।

प्रश्न 7.33
25°C पर अभिक्रिया 3O2 (g) = 2O3 (g) के लिए Kc का मान 2.0 × 10-50 है। यदि वायु में 25°C ताप पर O2 की साम्यावस्था सान्द्रता 1.6 × 10-2 है तो O3 की सान्द्रता क्या होगी?
उत्तर:
अभिक्रिया
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प्रश्न 7.34
CO(g) + 3H2 (g) ⇄ CH4 (g) + H2O (g) अभिक्रिया एक लीटर फ्लास्क में 1300 K पर साम्यावस्था में है। इसमें CO के 0.3 mol, H2 के 0.01 mol, H2O के 0.02 mol एवं CH4 की अज्ञात मात्रा है। दिये गये ताप पर अभिक्रिया के लिए Kc का मान 3.90 है। मिश्रण में CH4 की मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
अभिक्रिया
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प्रश्न 7.35
संयुग्मी अम्ल-क्षार युग्म का क्या अर्थ है? निम्नलिखित स्पीशीज के लिए संयुग्मी अम्ल/क्षार बताइए –
HNO2, CN, HCIO4, F, OH, \(\mathbf{CO}_{3}^{2-}\) एवं S2- क्षार है।
उत्तर:
ऐसे अम्ल तथा क्षार के युग्मों को जो क्रमशः एक प्रोटॉन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में परस्पर भिन्न होते हैं, संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म कहते हैं। दिये हुए स्पीशीज में HNO2, CN, HCIO4, F, OH, \(\mathbf{CO}_{3}^{2-}\) एवं S2- क्षार है।
इनके क्रमशः संगत संयुग्मी अम्ल/क्षार निम्नवत् है –
संयुग्मी क्षार – NH2 ClO4
संयुग्मी अम्ल – HCN, HF, H2O, \(\mathbf{HCO}_{3}^{-}\), HS

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प्रश्न 7.36
निम्नलिखित में से कौन-से लूईस अम्ल हैं?
H2O, BF3, H+ एवं \(\mathbf{N H}_{4}^{+}\)
उत्तर:
उपर्युक्त में से BF3, H+ लूईस अम्ल हैं।

प्रश्न 7.37
निम्नलिखित ब्रान्स्टेड अम्लों के लिए संयुग्मी क्षारकों के सूत्र लिखिए –
HF, H2SO4 एवं \(\mathbf{HCO}_{3}^{-}\)
उत्तर:
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प्रश्न 7.38
ब्रान्स्टेड क्षारकों \(\mathbf{NH}_{2}^{-}\), NH3 तथा HCOO के संयुग्मी अम्ल लिखिए –
उत्तर:
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प्रश्न 7.39
स्पीशीज. H2O, \(\mathbf{HCO}_{3}^{-}\), \(\mathbf{HSO}_{4}^{-}\) तथा NH3 ब्रान्स्टेड अम्ल तथा क्षारक दोनों की भांति व्यवहार करते हैं। प्रत्येक के संयुग्मी अम्ल तथा क्षारक बताइए।
उत्तर:
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प्रश्न 7.40
निम्नलिखित स्पीशीज को लूईस अम्ल तथा क्षारक में वर्गीकृत कीजिए तथा बताइए कि ये किस प्रकार लूईस अम्ल-क्षारक के समान कार्य करते हैं –
(क) OH
(ख) F
(ग) H+
(घ) BCl3
उत्तर:
(क) चूँकि यह एक इलेक्ट्रॉन-युग्मदाता है, अतः यह लूईस क्षारक है।
(ख) चूँकि यह एक असहभागित इलेक्ट्रॉन-युग्म-दान कर सकता है, अतः यह लूईस क्षारक है।
(ग) चूंकि यह एक इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करने की क्षमता रखता है, अतः यह लूईस अम्ल है।
(घ) चूंकि यह एक इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करने की क्षमता रखता है, अत: यह लूईस अम्ल है।

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प्रश्न 7.41
एक मृदु पेय के नमूने में हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता 3.8 × 10-3M है। उसकी pH परिकलित कीजिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि
pH = -log[H+]
= – log 3.8 × 10-3
= 2.4202

प्रश्न 7.42
सिरके के एक नमूने की pH 3.76 है। इसमें हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
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[H+] = [H’ ] = 1.74 × 10-4 M

प्रश्न 7.43
HF, HCOOH तथा HCN का 298K पर आयनन स्थिरांक क्रमशः 6.8 × 10-4 1.8 × 10-4 तथा 4.8 × 10-9 है। इनके संगत संयुग्मी क्षारकों के आयनन स्थिरांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
हम जानते हैं कि –
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प्रश्न 7.44
फीनोल का आयनन स्थिरांक 1.0 × 10-10 है। 0.05 M फीनोल के विलयन में फीनोलेट आयन की सान्द्रता तथा 0.01M सोडियम फीनेट विलयन में उसके आयनन की मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रथम स्थिति:
माना फीनोल के Cmol जल में घुलकर विलयन बनाते हैं तथा फीनोल के वियोजन की मात्रा a है। साम्य बिन्दु पर विभिन्न स्पीशीज की सान्द्रता इस प्रकार होगी –
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द्वितीय स्थिति:
जब फीनोल (PhOH) को 0.01M सोडियम फीनेट विलयन में मिलाया जाता है, तब आयनन निम्नांकित प्रकार प्रदर्शित किया जा सकता है –
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सोडियम फीनेट के आयनन के कारण PhO की सान्द्रता (पूर्ण आयनन) = 0.01M
माना PhOH से PhO आयनों की सान्द्रता = xM
∴ PhO आयनों की कुल सान्द्रता अर्थात् [PhO] = 0.01 + x ~ 0.01M (x अत्यन्त कम होने के कारण नगण्य है)
अनायनित PhOH की सान्द्रता = 0.05 – x = 0.05M
PhOH के लिए आयनन स्थिरांक –
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प्रश्न 7.45
H2S का प्रथम आयनन स्थिरांक 9.1 × 10-8 है। इसके 0.1M विलयन में HS आयनों की सान्द्रता की गणना कीजिए तथा बताइए कि यदि इसमें 0.1M HCl भी उपस्थित हो तो सान्द्रता किस प्रकार प्रभावित होगी? यदि H2S का द्वितीय वियोजन स्थिरांक 1.2 × 10-13 हो तो सल्फाइड S2- आयनों की दोनों स्थितियों में सान्द्रता की गणना कीजिए।
उत्तर:
प्रथम स्थिति:
0.1M H2S विलयन में [HS] की गणना:
माना H2S के वियोजन की मात्रा = a
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ओस्टवाल्ड तनुता नियम के अनुसार,
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द्वितीया स्थिति – 0.1M HCl विलयन में [HS] की सान्द्रता:
जब 0.1M HCI विलयन में H,S विलयन मिलाया जाता है, तब वियोजन निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है –
H2S ⇄ H+ + HS; HCl → H+ + Cl
HCl (प्रबल अम्ल) के वियोजन के कारण [H+] = 0.1M
माना H2S (दुर्बल अम्ल) के वियोजन के कारण [H+] = xM
H+ आयनों की कुल सान्द्रता अर्थात्
[H+] = 0.1 + x ~ 0.1M (x आत्यन्त कम होने के कारण उपेक्षणीय है)
विलयन में [HS] = xM
अवियोजित H2S की सान्द्रता
= [H2S] = 0.1 – x ~ 0.1M
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तृतीय स्थिति – 0.1M HCl की अनुपस्थिति में [S2-] की गणना:
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सम्पूर्ण अभिक्रिया के लिए Ka की गणना हेतु दोनों समीकरणों से,
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चतुर्थ स्थिति:
0.1M HCI की उपस्थिति में [S2-] की गणना:
माना H2S के वियोजन के कारण [S2] = zM
H2S का वियोजन निम्नवत् दर्शाया जा सकता है –
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H+ आयनों की कुल सान्द्रता [H+] = 0.1 + 2z = 0.1M
विलयन में [S2-] = z
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प्रश्न 7.46
ऐसीटिक अम्ल का आयनन स्थिरांक 1.74 × 10-5 है। इसके 0.05 M विलयन में वियोजन की मात्रा, ऐसीटेट आयन सान्द्रता तथा pH का परिकलन कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
Ka = 1.74 × 10-5
a = ?
c = 0.05M
[CH3COO] = ? pH = ?
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प्रश्न 7.47
0.01M कार्बनिक अम्ल [HA] के विलयम की PH, 4.15 है। इसके ऋणायन की सान्द्रता, अम्ल का आयनन स्थिरांक तथा PKa मान परिकलित कीजिए।
उत्तर:
ऋणायन की सान्द्रता ज्ञात करना –
pH = 4.15
c = 0.01
pH = -log[H3O+] = 4.15
log [H,3O+] = -4.15 + 1-1 = \(\bar { 5 } \).85
[H3O+] = Antilog (\(\bar { 5 } \).85)
= 7.08 × 10-5
[ऋणायन] = [ H3O+] = 7.08 × 10-5 M
अम्ल का आयनन स्थिरांक ज्ञात करना
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चूँकि a अत्यन्त कम है; अतः 0.01 – 0.01a = 0.01
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प्रश्न 7.48
पूर्ण वियोजन मानते हुए निम्नलिखित विलयनों के pH ज्ञात कीजिए –
(क) 0.003 M HCI
(ख) 0.005 M NaOH
(ग) 0.002 M HBr
(घ) 0.002 M KOH
उत्तर:
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प्रश्न 7.49
निम्नलिखित विलयनों के pH ज्ञात कीजिए –
(क) 2g TIOH को जल में घोलकर 2L विलपन बनाया जाए।
(ख) 0.3g Ca(OH)2 को जल में घोलकर 500 mL विलयन बनाया जाए।
(ग) 0.3g NaOH को जल में घोलकर 200 mL -विलयन बनाया जाए।
(घ)13.6M HCl के 1mL को जल से तनुकरण करके कुल आयतन 1L किया जाए।
उत्तर:
(क) 2L विलयन में 2g TIOH का pH का मान –
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(ख) 500 mLविलयन में 0.3gCa(OH)2 का pH मान –
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(ग) 200 mL विलयन में 0.3g NaOH का pH मान –
NaOH विलयन की मोलरता
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(घ) 13.6M HCI विलयन के 1mL को 12 तक तनु करने पर PH मान –
तनु विलयन की मोलरता निम्नवत् ज्ञात की जा सकती है –
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प्रश्न 7.50
ब्रोमोऐसीटिक अम्ल की आयनन की मात्रा 0.132 है। 0.1M अम्ल की pH तथा pKa का मान ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
ब्रोमोऐसीटिक अम्ल की आयनन की मात्रा (α) = 0.132
तथा अम्ल की सान्द्रता = 0.1M
∴ [H+] = c × a
= 0.1 × 0.132
= 0.0132M
तथा PH = – log[H+]
= – log 0.0132
= – log (1.32 × 10-2) = 1.88
अब
pKa = -log Ka
= -log(2.01 × 10-3) = 2.70

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प्रश्न 7.51
0.005 M कोडीन (C18H21NO3) विलयन का pH 9.95 है। इसका आयनन स्थिरांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
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प्रश्न 7.52
0.001M ऐनिलीन विलयन का pH क्या है? ऐनिलीन का आयनन स्थिरांक सारणी 7.7 से ले सकते हैं। है। इसके संयुग्मी अम्ल का आयनन स्थिरांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 7.53
यदि 0.05 M ऐसीटिक अम्ल के PKa का मान 4.74 है तो आयनन की मात्रा कीजिए। यदि इसे (अ) 0.01M (ब) 0.1M HCI विलयन में डाला जाए तो वियोजन की मात्रा किस प्रकार प्रभावित होती है?
उत्तर:
हम जानते हैं कि
pKa = -log ka
4.74 = -log Ka
log Ka = -4.74 + 1-1
log Ka = 5.26
Ka = Antilog (5.26)
= 1.8 × 10-5
अब, Ka = ca2
या a = \(\sqrt{\frac{K_{a}}{c}}\) = \(\sqrt{\frac{\left(1.8 \times 10^{-5}\right)}{0.05}}\)
= \(\sqrt{3.6 \times 10^{-4}}\)
= 1.92 × 10-2 = 0.019
= 1.9%

(अ) 0.01M HCl विलयन में डालने पर,
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(ब) 0.1M HCI विलयन में डालने पर, उपर्युक्त की भाँति,
x = \(\frac{0.05 \times 1.8 \times 10^{-5}}{0.1}\)
= 9.0 × 10-6M
a = \(\frac{x}{c}\) = \(\frac{9 \times 10^{-6}}{0.05}\)
= 1.8 × 10-4
स्पष्ट है कि इस स्थिति में वियोजन की मात्रा 0.01M HCl से 10 गुना कम हो जाती है।

प्रश्न 7.54
डाइमेथिल ऐमीन का आयनन स्थिरांक 5.4 × 10-4 है। इसके 0.02 M विलयन की आयनन की मात्रा की गणना कीजिए। यदि यह विलयन NaOH प्रति 0.1M हो तो डाइमेथिल ऐमीन का प्रतिशत आयनन क्या होगा?
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
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यह NaOH की अनुपस्थिति में वियोजन की मात्रा 0.164 से अत्यन्त कम है।

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प्रश्न 7.55
निम्नलिखित जैविक द्रवों, जिनमें PH दी गई है, की हाइड्रोजन आयन सान्द्रता परिकलित कीजिए –
(क) मानव पेशीय द्रव, 6.83
(ख) मानव उदर द्रव, 1.2
(ग) मानव रुधिर, 7.38
(घ) मानव लार, 6.4
उत्तर:
(क) प्रश्नानुसार, PH = 6.83
∵\(\log \frac{1}{\left[H^{+}\right]}\)
या \(\log \frac{1}{\left[H^{+}\right]}\) = 6.83
\(\frac{1}{\left[\mathrm{H}^{+}\right]}\) = Antilog 6.83
या [H+] = Antilog (-6.83)
= 1.48 × 10-7

(ख) मानव उदर द्रव [H+] सांद्रता
∵ PH = 1.2
∴ \(\log \frac{1}{\left[H^{+}\right]}\) = Antilog (1.2)
या [H+] = Antilog (-1.2)
= 6.309 × 10-2 M

(ग) मानव रुधिर [H+] सांद्रता
∵ PH = 3.8
∴\(\log \frac{1}{\left[H^{+}\right]}\) = 7.38
या \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (7.38)
या [H+] = Antilog (-7.38)
= 4.168 × 10-8

(घ) मानव लार का [H+]
∵ PH = 6.4
∴ \(\log \frac{1}{\left[H^{+}\right]}\) = 6.4
या \(\log \frac{1}{\left[H^{+}\right]}\) = Antilog (6.4)
या [H+] = Antilog (-6.4)
= 3.981 × 10– 7

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प्रश्न 7.56
दूध, कॉफी, टमाटर रस, नींबू रस तथा अण्डे की सफेदी के pH का मान क्रमशः 6.8, 5.0, 4.2, 2.2 तथा 7.8 है। प्रत्येक के संगत H+ आयन की सान्द्रता ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
(क) दूध की [H+]
pH = 6.8 या log \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = 6.8
\(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (6.8)
या [H+] = Antilog (-6.8)
= 1.585 × 10– 7

(ख) मानव उदर द्रव [H+]
pH = 1.2 या log \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = 5.0
\(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (5.0)
या [H+] = Antilog (-5.0)
= 1.0 × 10– 5 M

(ग) मानव रुधिर की [H+]
pH = 7.38 या log \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = 4.2
\(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (4.2)
या [H+] = Antilog (-4.2)
= 6.309 × 10– 5 M

(घ) मानव लार का [H+]
pH = 2.2 या log \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = 2.2
\(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (2.2)
या \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (-2.2)
= 6.309 × 10– 3 M

(डं) अण्डे की सफेदी की [H+]
PH = 7.8 या log \(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = 7.8
\(\left[\frac{1}{\mathrm{H}^{+}}\right]\) = Antilog (7.8)
या [H+] = Antilog (-7.8)
= 1.585 × 10– 8 M

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प्रश्न 7.57
298K पर 0.561g, KOH जल में घोलने पर प्राप्त 200 mL विलयन की PH, पौटेशियम, हाइड्रोजन तथा हाइड्रॉक्सिल आयनों की सान्द्रताएँ ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
विलयन की मोलर सान्द्रता
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क्योंकि KOH एक प्रबल विद्युत-अपघट्य है, यह जलीय विलयन में पूर्णतया वियोजित हो जाता है –
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[K+] = 0.05M = 5.0 × 10– 2M
[OH] = 0.05M = 5 × 10– 2M
विलयन के pH की गणना निम्नलिखित प्रकार की जा सकती है –
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= 12.70

प्रश्न 7.58
298K पर Sr (OH)2 विलयन की विलेयता 19.23 g/L है। स्ट्रांशियम तथा हाइड्रॉक्सिल आयन की सान्द्रता तथा विलयन की pH ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
विलयन की मोलरता
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प्रश्न 7.59
प्रोपेनोइक अम्ल का आयनन स्थिरांक 1.32 है। 0.05 × 10– 5M अम्ल विलयन के आयनन की मात्रा तथा pH ज्ञात कीजिए। यदि विलयन में 0.01M HCl मिलाया जाए तो आयनन की मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रोपेनोइक अम्ल की आयनन की मात्रा (a) ज्ञात करना –
ओस्टवाल्ड तनुता नियम के अनुसार,
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विलयन के pH की गणना –
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0.01M HCl विलयन में प्रोपेनोइक अम्ल के आयनन की मात्रा का परिकलन –
CH3CH2COOH ⇄ CH3CH2COO + H+
HCl की उपस्थिति में CH3CH2COOH का आयतन कम होगा। यदि c, अम्ल की प्रारम्भिक होती है तथा साम्यावस्था पर वियोजित मात्रा x है, तब
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प्रश्न 7.60
यदि साइनिक अम्ल (HCNO) के 0.1M विलयन की PH, 2. 34 हो तो अम्ल के आयनन स्थिरांक तथा आयनन की मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
विलयन में आयनन की मात्रा का परिकलन –
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अम्ल के आयनन स्थिरांक का परिकलन –
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प्रश्न 7.61
यदि नाइट्रस अम्ल का आयनन स्थिरांक 4.5 × 10– 4 है तो 0.04M सोडियम नाइट्राइट वियलन की pH तथा जलयोजन की मात्रा ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
सोडियम नाइट्राइट (NaNO2), प्रबल क्षार (NaOH) तथा दुर्बल अम्ल (HNO2) का एक लवण है।
प्रश्नानुसार,
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जलीय विलयन में NaNO2 का जलयोजन निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं –
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प्रश्न 7.62
यदि पिरीडिनीयम हाइड्रोजन क्लोराइड के 0.02M विलयन का pH3.44 है तो पिरीडीन का आयनन स्थिरांक ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
पिरीडिनीयम हाइड्रोजन क्लोराइड (C6H5N+HCl) प्रबल अम्ल तथा दुर्बल क्षारक का लवण है। विलयन का pH निम्नवत् है –
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प्रश्न 7.63
निम्नलिखित लवणों के जलीय विलयनों के उदासीन, अम्लीय तथा क्षारीय होने की प्रागुक्ति कीजिए –
NaCl, KBr, NaCN, NH4 NO3, NaNO2, तथा KF
उत्तर:
उदासीन:
NaCl, KBr

क्षारीय:
NaCN, NaNO2, KF

अम्लीय:
NH4NO3

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प्रश्न 7.64
क्लोरोऐसीटिक अम्ल का आयनन स्थिरांक 1.35 × 10– 3 है। 0.1M अम्ल तथा इसके 0.1M सोडियम लवण की pH ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
0.1M क्लोरोऐसीटिक अम्ल विलयन के pH की गणना
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0.01M अम्ल के सोडियम लवण के pH की गणना –
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प्रश्न 7.65
310 K पर जल का आयनिक गुणनफल 2.7 × 10– 14 है। इसी तापक्रम पर उदासीन जल की pH ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, चूँकि जल उदासीन है;
[H3O+] = [OH]
हम जानते हैं कि
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प्रश्न 7.66
निम्नलिखित मिश्रणों की pH परिकलित कीजिए –
(क) 0.2 M Ca(OH)2 का 10 mL + 0.1M HCI का 25 mL
(ख) 0.01M H2SO4 का 10 mL + 0.01M Ca(OH)2 at 10 mL
(ग) 0.1M H2SO4 का 10 mL + 0.1M KOH का 10 mL
उत्तर:
(क) 0.2M Ca(OH)2 के 10 mL तथा 0.1M HCI के 25 mL के विलयन का pH –
मिश्रित करने पर, Ca(OH)2 विलयन की मोलरता –
= \(\frac{(0.2M)×(10mL)}{(35 mL)}\) = 0.057M
विलयन में [OH] = 2 × 0.057M = 0.114M
मिश्रित करने पर, HCl विलयन की मोलरता
= \(\frac{(0.2M)×(10mL)}{(35 mL)}\) = 0.071M
विलयन में [H+] = 0.071M
उदासीनीकरण के पश्चात् विलयन में
[OH] = (0.114 – 0.071)
= 0.043M
POH = – log [OH]
= -log (4.3 × 10-2)
= 1.367 ~ 1.37
pH = 14 – pOH
= 14 – 1.37
= 12.63

(ख) 0.01M H2SO4 के 10 mL तथा 0.01M Ca(OH)2 10 mL as factera at pH –
मिश्रित करने पर, H2SO4 विलयन की मोलरता
= \(\frac{(0.01M×10mL)}{(20mL)}\)
= 0.005M
विलयन में [H+] = 0.005 × 2 = 0.01M
मिश्रित करने पर, Ca(OH)2 विलयन की मोलरता
= \(\frac{(0.01M×10mL)}{(20mL)}\)
= 0.005M
विलयन में [OH] = 0.005 × 2 = 0.01M
चूँकि विलयन में [H+] तथा [OH] समान है; अत: यह उदासीन प्रवृत्ति का है।
∴ विलयन का pH = 7

(ग) 0.1M H2SO4 के 10 mL तथा 0.1M KOH के 10 mL के विलयन का pH –
मिश्रित करने पर, H2SO4 विलयन की मोलरता
= \(\frac{(0.01M×10mL)}{(20mL)}\) = 0.05 M
विलयन में [H+] = 0.05 M × 2 = 0.05 M
मिश्रित करने पर, KOH विलयन की मोलरता
= \(\frac{(0.01M×10mL)}{(20mL)}\) = 0.05M
विलयन में [OH] = 0.05 M
उदासीनीकरण के पश्चात् विलयन में
[H+] = 0.1 – 0.05 = 0.05M
pH = -log [H+] = -log (5 × 10-2)
= 1.301

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 7 साम्यावस्था

प्रश्न 7.67
सिल्वर क्रोमेट, बेरियम क्रोमेट, फेरिक हाइड्रॉक्साइड, लेड क्लोराइड तथा मयूरस आयोडाइड विलयन की सारणी 7.9 में दिए गए विलेयता गुणनफल स्थिरांक की सहायता से विलेयता ज्ञात कीजिए तथा प्रत्येक आयन की मोलरता भी ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
1. सिल्वर क्रोमेट (Ag2CrO4) के लिए –
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2. बेरियम क्रोमेट (BaCrO4) के लिए – बेरियम क्रोमेट जल में निम्नानुसार वियोजित होता है –
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3. फेरिक हाइड्रॉक्साइड [Fe(OH)3] विलयन के लिए – फेरिक हाइड्रॉक्साइड जल में निम्नानुसार वियोजित होता है –
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4. लेड क्लोराइड (PbCl2) विलयन के लिएलेड क्लारोइड जल में निम्नानुसार वियोजित होता है –
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माना लवण की जल में विलेयता = s
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5. मयूरस आयोडाइड (Hg2I2) विलयन के लिए मयूंरस आयोडाइड जल में निम्नानुसार वियोजित होता है –
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प्रश्न 7.68
Ag2CrO4 तथा AgBr का विलेयता गुणनफल स्थिरांक क्रमशः 1.1 × 10-12 तथा 5.0 × 10-13 है। उनके संतृप्त विलयन की मोलरता का अनुपात ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
Ag2CrO4 विलयन की मोलर विलेयता (मोलरता) ज्ञात करना:
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AgBr विलयन की मोलर विलेयता (मोलरता) ज्ञात करना: AgBr के वियोजित होने की अभिक्रिया का रासायनिक समीकरण निम्नवत् है –
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अतः संतृप्त विलयनों की मोलरताओं के अनुपात
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प्रश्न 7.69
यदि 0.002 M सान्द्रता वाले सोडियम आयोडेट तथा क्यूप्रिक क्लोरेट विलयन के समान आयतन को मिलाया जाए तो क्या कॉपर आयोडेट का अवक्षेपण होगा? (कॉपर आयोडेट के लिए Ksp = 7.4 × 10-8)
उत्तर:
कॉपर आयोडेट का विलेयता साम्य निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता है –
Cu(IO3)2 ⇄ Cu2+ (aq) + 2IO3 (aq)
Cu2+ (aq), कॉपर क्लोरेट विलयन से तथा IO3(aq) आयन सोडियम आयोडेट विलयन से प्राप्त होंगे।
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बँकि विलयनों के समान आयतनों को मिलाया जाता है, – इसलिए Cu2+(aq) तथा IO3(aq) आयनों की विलयन में मिलाने के पश्चात् सान्द्रता कम होकर आधी रह जाएगी अर्थात् (\(\frac{0.02M}{2}\) = 0.001M)
आयनिक गुणनफल = [Cu2+][IO3]2
= (0.001) × (0.001)2
= 1.0 × 10-9
Cu(IO3)2 का Ksp का मान = 7.4 × 10-8 (दिया है)
चूँकि आयनिक गुणनफल, Ksp से कम है; अतः (Cu(IO3)2, अवक्षेपित नहीं होगा।

प्रश्न 7.70
बेन्जोइक अम्ल का आयनन स्थिरांक 6.46 × 10-5 तथा सिल्वर बेन्जोएट का Ksp 2.5 × 10-13 है। 3.19 pH वाले बफर विलयन में सिल्वर बेन्जोएट जल की तुलना में कितना गुना विलेय होगा?
उत्तर:
जल में सिल्वर बेन्जोएट की विलयेता की गणना
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3.19 वाले बफर में सिल्वर बेन्जोएट की विलेयता की गणना:
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बेन्जोइक अम्ल के लिए,
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पुनः माना बफर में सिल्वर बेन्जोएट की विलेयता y molL-1 है। तब
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अत: बफर तथा जल में सिल्वर बेन्जोएट की विलेयताओं का गुणनफल
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प्रश्न 7.71
फेरस सल्फेट तथा सोडियम सल्फाइड के सममोलर विलयनों की अधिकतम सान्द्रता बताइए जब उनके समान आयतन मिलाने पर आयरन सल्फाइड अवक्षेपित न हो। (आयरन सल्फाइड के लिए Ksp = 6.3 × 10-18)।
उत्तर:
माना FeSO4 तथा Na2S दोनों विलयनों की सान्द्रताएँ (मिलाने से पहले) xmol L-1 या XM हैं। चूंकि विलयनों के समान आयतन मिलाए जाते हैं; अतः मिलाने पर विलयन तथा आयनों की सान्द्रताएँ घटकर आधी अर्थात् \(\frac{x}{2}\) रह जाती हैं। Fes के लिए, विलेयता गुणनफल (Ksp) = 6.3 × 10-18 (दिया है)
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दोनों विलयनों की अधिकतम साद्रताएँ 5.02 × 10-9M हैं।

प्रश्न 7.72
1 ग्राम कैल्सियम सल्फेट को घोलने के लिए कम से कम कितने आयतन जल की आवश्यकता होगी? (कैल्सियम सल्फेट के लिए Ksp) = 9.1 × 10-6)।
उत्तर:
कैल्सियम सल्फेट का वियोजन निम्नवत् होता है –
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प्रश्न 7.73
0.1M HCI में हाइड्रोजन सल्फाइड से संतृप्त विलयन की सान्द्रता 1.0 × 10-19 M है। यदि इस विलयन का 10 mL निम्नलिखित 0.04M विलयन के 5 mL में डाला जाए तो किन विलयनों से अवक्षेप प्राप्त होगा?
FeSO4, MnCl2, ZnCl2, CdCl2.
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
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धातु आयनों [M2+] की सान्द्रता
= 5 × 0.04 × 10-3 mol L-1
= 2 × 10-4 mol L-1
M1V1 = M2V2
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चूँकि Zns का Ksp 2.0 × 10-23 है तो आयनिक गुणनफल से अधिक है; अत: यह अवक्षेपित नहीं होगा। F का Kp, 6.3 × 10-18 है, Cds का Ksp, 2.5 × 10-13 तथा CdS का Ksp 8.0 × 10-27 है। चूंकि CdS का Ksp आयनिक गुणनफल से कम है, इसलिए CaCl2 में अवक्षेपण हो जाएगा।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 3.1
आवर्त सारणी में व्यवस्था का भौतिक आधार क्या है?
उत्तर:
आवर्त सारणी में व्यवस्था का भौतिक आधार समान गुणधर्म वाले तत्त्वों को एक साथ एक ही वर्ग में रखना है। किसी वर्ग के तत्वों के परमाणुओं के संयोगी कोश विन्यास समान होते हैं। क्योंकि तत्त्वों के गुणधर्म उनके संयोजी कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर निर्भर होते हैं।

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प्रश्न 3.2
मेण्डेलीफ ने किस महत्त्वपूर्ण गुणधर्म को अपनी आवर्त सारणी में तत्वों के वर्गीकरण का आधार बनाया? क्या वे उस पर दृढ़ रह पाए?
उत्तर:
मेण्डेलीफ ने तत्वों के वर्गीकरण के लिए उनके परमाणु भारों को आधार बनाया। मेण्डेलीफ के आवर्त नियम के अनुसार, “तत्वों के गुणधर्म (भौतिक एवं रासायनिक गुण) उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं।” परन्तु मेण्डेलीफ के वर्गीकरण का यह आधार दोषपूर्ण पाया गया; अत: मेण्डेलीफ इस आधार पर दृढ़ नहीं रह पाए।

प्रश्न 3.3
मेण्डलीफ के आवर्त नियम और आधुनिक आवर्त नियम में मौलिक अन्तर क्या है?
उत्तर:
मेण्डलीफ के आवर्त नियम के अनुसार तत्त्वों पर परमाणु भार आवर्तिता का आधार है जबकि आधुनिक आवर्त नियम के अनुसार तत्त्वों का परमाणु क्रमांक आवर्तिता का मुख्य आधार है।

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प्रश्न 3.4
क्वांटम संख्याओं के आधार पर यह सिद्ध कीजिए कि आवर्त सारणी के छठवें आवर्त में 32 तत्त्व होने चाहिएँ।
उत्तर:
आवर्त सारणी छठवें आवर्त छठवें कोश के अनुरूप होता है जिसमें उपस्थित कक्षक 6s, 4f, 5p तथा 6d होते हैं। इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या जो इन उपकोशों में हो सकती है –

निम्नवत् होगी –
2 + 14 + 6 + 10 = 32
चूँकि किसी आवर्त में तत्त्वों की संख्या कोशों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के अनुरूप होती है, अतः छठवें आवर्त में अधिकतम 32 तत्त्व को सकते हैं।

प्रश्न 3.5
आवर्त और वर्ग के पदों में यह बताइए कि Z = 14 कहाँ स्थित होगा?
उत्तर:
Z = 14 वाला तत्त्व तीसरे आवर्त और 14वें वर्ग में स्थित होगा।

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प्रश्न 3.6
उस तत्त्व का परमाणु क्रमांक लिखिए, जो आवर्त सारणी में तीसरे आवर्त और 17 वें वर्ग में स्थित होता है।
उत्तर:
इस तत्त्व का परमाणु क्रमांक (Z)17 है।

प्रश्न 3.7
कौन-से तत्त्व का नाम निम्नलिखित द्वारा दिया गया है –

  1. लॉरेन्स बर्कले प्रयोगशाला द्वारा
  2. सीबोर्ग समूह द्वारा।

उत्तर:

  1. लॉरेन्शियम (Lr) जिसका परमाणु क्रमांक 103
  2. सीबर्गियम (Sg) जिसका परमाणु क्रमांक 106 है।

प्रश्न 3.8
एकही वर्ग में उपस्थित तत्त्वों के भौतिक और रासायनिक गुण धर्म समान क्यों होते हैं?
उत्तर:
किसी वर्ग में तत्त्वों के समान इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होते हैं और परमाणवीय आकारों में भिन्नता होती है जो बढ़ने के लिए प्रवृत्त होते हैं। अत: एक ही वर्ग में उपस्थित तत्त्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुण समान होते हैं।

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प्रश्न 3.9
‘परमाणु त्रिज्या’ और ‘आयनिक त्रिज्या’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
परमाणु त्रिज्या-सह-संयोजक अणुओं में किसी तत्त्व के दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी के आधे भाग को परमाणु त्रिज्या या परमाणु आकार कहते हैं।
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परमाणु त्रिज्या को A से प्रदर्शित किया जाता है।

आयनिक त्रिज्या:
किसी आयन के नाभिक और उस बिन्दु तक की दूरी जहाँ तक नाभिक इलेक्ट्रॉन मेघ को आकर्षित करता है, आयनिक त्रिज्या कहलाती है।

प्रश्न 3.10
किसी वर्ग या आवर्त में परमाणु त्रिज्या किस प्रकार परिवर्तित होती है? इस परिवर्तन की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
आवर्त में परमाणु त्रिज्या बायें ओर से दायें ओर घटती है क्योंकि इलेक्ट्रॉन समान कोश में इलेक्ट्रॉन भरे जाते हैं और कोई नया कोश नहीं बनता है। किसी वर्ग में परमाणु त्रिज्या ऊपर से नीचे की ओर बढ़ती है जोकि इलेक्ट्रॉनों की कोश संख्या में वृद्धि तथा आवरणी प्रभाव के वृद्धि के कारण होता है।

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प्रश्न 3.11
समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज से आप क्या समझते हैं? एक ऐसी स्पीशीज का नाम लिखिए, जो निम्नलिखित परमाणुओं या आयनों के साथ समइलेक्ट्रॉनिक होगी –

  1. \(\bar { F } \)
  2. Ar
  3. Mg2+
  4. Rb+

उत्तर:
समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज-ऐसी स्पीशीज जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान हो, समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज कहलाती है। दी गई स्पीशीज के संगत समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज निम्नवत् है –

  1. Na+
  2. Ar
  3. Na+
  4. Sr2+

प्रश्न 3.12
निम्नलिखित स्पीशीज पर विचार कीजिए –
N3-, O2-, F, Na+, Mg2+, Al3+
(क) इनमें क्या समानता है?
(ख) इन्हें आयनिक त्रिज्या के बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर:
(क) इन सभी की समइलेक्ट्रॉनिक प्रकृति है और इनमें से प्रत्येक का परमाणु क्रमांक 10 है।
(ख) आयनिक त्रिज्याओं का बढ़ता क्रम निम्नवत् है –
Al3+< Mg2+< NO+< F< O2-< N3-

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प्रश्न 3.13.
धनायन अपने जनक परमाणुओं से छोटे क्यों होते हैं और ऋणायनों की त्रिज्या उनके जनक परमाणुओं की त्रिज्या से अधिक क्यों होती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
धनायन अपने जनक परमाणु से छोटा होता है क्योंकि जब परमाणु से इलेक्ट्रॉन त्याग दिये जाते हैं तो धनायन बनते हैं। जब यह समान नाभिकीय आवेश शेष इलेक्ट्रॉनों पर कार्य करता है जिससे प्रभावी नाभिकीय आवेश में वृद्धि हो जाती है, जिससे धनायन के आकार में कमी आ जाती है। ऋणायन में अपने जनक परमाणु से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉनों के मध्य प्रतिकर्षण बढ़ जाता है और प्रभावी नाभिकीय आवेश में कमी आ जाती है। इसके अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन-मेघ नाभिक द्वारा बंधा होता है अतः इनकी त्रिज्यायें जनक परमाणुओं से अधिक होती हैं।

प्रश्न 3.14.
आयनन एन्थैल्पी और इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी को परिभाषित करने में विलगित गैसीय परमाणु तथा ‘आद्य अवस्था’ पदों की सार्थकता क्या है?
उत्तर:
1. विलगित गैसीय परमाणु की सार्थकता-जब कोई परमाणु गैसीय अवस्था में विलगित होता है तो इसकी इलेक्ट्रॉन त्यागने और इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति असीमित होती है। अतः इनकी आयनन एन्थैल्पी तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के मान अन्य परमाणुओं की उपस्थिति में प्रभावित नहीं होते हैं। जब परमाणु द्रव या ठोस या द्रव अवस्था में हो तो इन्हें व्यक्त करना असम्भव है।

2. आद्य अवस्था की सार्थकता-इससे यह तात्पर्य है कि जब कोई विशेष परमाणु और इससे सम्बन्धित इलेक्ट्रॉन न्यूनतम ऊर्जा अवस्था में होते हैं तो इससे परमाणु की सामान्य ऊर्जा प्रदर्शित होती है। आयनन एन्थैलपी और इलेक्ट्रॉन ग्रहण एथैल्पी दोनों को प्रायः परमाणु की आद्य अथवा उत्तेजित अवस्थाओं के सापेक्ष व्यक्त किया जाता है?

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प्रश्न 3.15
हाइड्रोजन परमाणु में आद्य अवस्था में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा -2.18 × 10-18 J है। परमाणविक हाइड्रोजन की आयनन एंथैल्पी J mol-1 के पदों में परिकलित कीजिए।
[संकेत-उत्तर प्राप्त करने के लिये मोल संकल्पना का उपयोग कीजिए।]
उत्तर:
∵ आयनन एंथैल्पी 1 मोल परमाणुओं के लिए है।
∴ 1 मोल परमाणुओं की आद्य अवस्था ऊर्जा
= Eआद्य अवस्था
= -2.18 × 10-18 J × 6.022 × 1023
= -1.312 × 106 J
अत: आयनन एंथैल्पी = Eα – Eआद्य अवस्था
= -(-1.312 × 106 J)
= 1.312 × 106 J

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प्रश्न 3.16
द्वितीय आवर्त के तत्वों में वास्तविक आयनन एन्थैली का क्रम इस प्रकार है –
1. Li < B < Be < C < O < N < F < Ne
व्याख्या कीजिए कि (i) Be की ∆i, H, B से अधिक क्यों –

2. 0 की A,H,N और F से कम क्यों है?
उत्तर:
1. Be तथा B के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नांकित प्रकार हैं –
4Be = 2, 2 या 1s2, 2s2
5B = 2, 3 या 1s2, 2s2 2p1
बोरॉन (B) में, इसके एक 2p कक्षक में एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है। बेरिलियम (Be) में युग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले पूर्ण-पूरित 1s तथा 2s कक्षक हैं। जब हम एक ही मुख्य क्वाण्टम ऊर्जा स्तर पर विचार करते हैं तो s – इलेक्ट्रॉन p – इलेक्ट्रॉन की तुलना में नाभिक की ओर अधिक आकर्षित होता है। बेरिलियम में बाह्यतम इलेक्ट्रॉन, जो अलग किया जाएगा, वह s – इलेक्ट्रॉन होगा, जबकि बोरॉन में बाह्यतम इलेक्ट्रॉन (जो अलग किया जाएगा) p – इलेक्ट्रॉन होगा।

उल्लेखनीय है कि नाभिक की ओर 2s – इलेक्ट्रॉन का भेदन (penetration) 2p – इलेक्ट्रॉन की तुलना में अधिक होता है। इस प्रकार बोरॉन का 2p – इलेक्ट्रॉन बेरिलियम के 2s – इलेक्ट्रॉन की तुलना में आन्तरिक क्रोड इलेक्ट्रॉनों द्वारा अधिक परिक्षित होता है। चूँकि बेरिलियम के 2s – इलेक्ट्रॉन की तुलना में बोरॉन का 2p-इलेक्ट्रॉन अधिक सरलता से पृथक् हो जाता है; अत: बेरिलियम की तुलना में बोरॉन की प्रथम आयनन एन्थैल्पी (∆i, H) का मान कम होगा।

2. नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार हैं –
7N = 2, 5 या 1s2, 2s2, \({ 2p }_{ x }^{ 1 }\) \({ 2p }_{ y }^{ 1 }\) \({ 2p }_{ z }^{ 1 }\)
8O = 2, 6 या 1s2, 2s2, \({ 2p }_{ x }^{ 2 }\) \({ 2p }_{ y }^{ 1 }\) \({ 2p }_{ z }^{ 1 }\)

स्पष्ट है कि नाइट्रोजन में तीनों बाह्यतम 2p – इलेक्ट्रॉन विभिन्न p – कक्षकों में वितरित हैं (हुण्ड का नियम), जबकि ऑक्सीजन के चारों 2p – इलेक्ट्रॉनों में से दो 2p – इलेक्ट्रॉन एक ही 2p – ऑर्बिटल में हैं; फलतः इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बढ़ जाता है। फलस्वरूप नाइट्रोजन के तीनों 2p – इलेक्ट्रॉनों में से एक इलेक्ट्रॉन पृथक् करने की तुलना में ऑक्सीजन के चारों 2p – इलेक्ट्रॉनों में से चौथे इलेक्ट्रॉन को पृथक् करना सरल हो जाता है; अतः O की प्रथम आयनन एन्थैली (∆i, H) का मान N से कम होता है। यही स्पष्टीकरण F के लिए भी दिया जा सकता है।

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प्रश्न 3.17
आप इस तथ्य की व्याख्या किस प्रकार करेंगे कि सोडियम की प्रथम आयनन एन्यैल्पी मैग्नीशियमम की प्रथमं आयनन एन्थैल्पी से कम है, किन्तु इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक है?
उत्तर:
सोडियम (Na) तथा मैग्नीशियम (Mg) के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न प्रकार हैं –
11Na = 2, 8, 1 या 1s2, 2s2, 2p6, 3s1
12Mg = 2, 8, 2 या 1s2, 2s2, 2p6, 3s2

उपर्युक्त इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों से स्पष्ट है कि Mg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पूर्ण-पूरित 3s कक्षक की उपस्थिति के कारण स्थायी है जिससे इलेक्ट्रॉन निकालना, Na के 3s कक्षक से इलेक्ट्रॉन निकालने की तुलना में, कठिन है; अतः सोडियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी से कम है। परन्तु सोडियम की द्वितीय आयनन एन्थैलपी मैग्नीशियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है।

इसका कारण यह है कि सोडियम से एक 3s – कक्षक इलेक्ट्रॉन निकलने के पश्चात् यह एक अस्थायी विन्यास 1s2, 2s2, 2p6, प्राप्त कर लेता है, जबकि मैग्नीशियम से इलेक्ट्रॉन निकलने के पश्चात् यह एक अस्थायी विन्यास 1s2, 2s2, 2p6, 3s1, प्राप्त करता है। फलतः मैग्नीशियम से 3s – कक्षक इलेक्ट्रॉन निकालना, सोडियम से इलेक्ट्रॉन निकालने की तुलना में सरल हो जाता है। परिणामस्वरूप सोडियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है।

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प्रश्न 3.18
मुख्य समूह तत्वों में आयनन एन्थैल्पी के किसी समूह में नीचे की ओर कम होने के कौन-से कारक हैं?
उत्तर:
मुख्य समूह तत्वों में आयनन एन्थैल्पी के किसी समूह में नीचे की ओर कम होने के विभिन्न कारक निम्नलिखित है –

  1. समूह में नीचे जाने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है।
  2. समूह में नीचे जाने पर प्रत्येक तत्व में नए कोश जुड़ जाने के कारण परमाणु आकार बढ़ जाते हैं।
  3. समूह में नीचे जाने पर आन्तरिक इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है। इससे बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों पर आवरण-प्रभाव घट जाता है।

परमाणु आकार में वृद्धि तथा आवरण-प्रभाव का संयुक्त प्रभाव नाभिकीय आवेश में वृद्धि के प्रभाव से अधिक हो जाता है। ये प्रभाव इस प्रकार कार्य करते हैं कि नाभिक तथा बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों के मध्य आकर्षण बल कम हो जाता है। परिणामस्वरूप समूह में नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी कम हो जाती है।

प्रश्न 3.19
वर्ग 13 के तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मान (kJ mol-1) में इस प्रकार हैं –
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सामान्य से इस विचलन की प्रवृत्ति की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
B से A1 तक प्रथम आयनन एन्थैलपी (∆iH1) के मान कम होना A1 परमाणु के बड़े आकार के कारण स्वाभाविक है, परन्तु तत्व Ga में दस 3d – इलेक्ट्रॉन इसके 3d – उपकोश में उपस्थित हैं जो ऽ – तथा p – इलेक्ट्रॉनों के समान आवरित नहीं होते; अतः प्रभावी नाभिकीय आवेश में होने वाली अस्वाभाविक वृद्धि के परिणामः प्रथम आयनन एन्थैलपी का मान बढ़ जाता है।

यही स्पष्टीकरण 1n से T1 तक किया जा सकता है। T1 में अत्यन्त क्षीण आवरण प्रभाव के साथ चौदह 4f इलेक्ट्रॉन हैं। इसके परिणामस्वरूप भी प्रभावी नाभिकीय आवेश में अस्वाभाविक वृद्धि प्रथम आयनन एन्थैल्पी के मान को बढ़ा देती है।

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प्रश्न 3.20
तत्वों के निम्नलिखित युग्मों में किस तत्व की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होगी?

  1. O या F
  2. F या Cl

उत्तर:
1. F की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैलपी अधिक ऋणात्मक होगी। तत्व, जब इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं, तब ऊर्जा निर्मुक्त होती है। ऐसी अवस्था में इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी ऋणात्मक होगी। F तत्व (या 17 वें वर्ग के सभी हैलोजेन तत्व) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान अधिक ऋणात्मक (-328kJ mol-1) होने का कारण यह है कि मात्र एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके यह स्थायी उत्कृष्ट गैस का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त कर लेता है, जबकि ऑक्सीजन (1s2, 2s2, 2p4) में ऐसा नहीं है (∆eg H = -141kJ mol-1); अत: F की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है।

2. C1 की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होगी। चूँकि फ्लुओरीन परमाणु आकार में छोटा होता है; अतः F परमाणु का इलेक्ट्रॉन – आवेश घनत्व उच्च होता है तथा जुड़ने वाले इलेक्ट्रॉन प्रबल इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं। परिणामस्वरूप, जब F परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन जुड़ता है तो ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा अवशोषित होती है तथा ऋणायन के बनने के दौरान निर्मुक्त कुल ऊर्जा में कमी आ जाती है।

यदि इलेक्ट्रॉन को अपेक्षाकृत बड़े p – कक्षक (C1 की स्थिति में 3p-कक्षक) से जोड़ा जाता है तो इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण अत्यन्त कम हो जाता है तथा इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का उच्च मान प्रेक्षित होता है; अतः फ्लुओरीन की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान क्लोरीन की अपेक्षा कम होता है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 3 तत्त्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता

प्रश्न 3.21
आप क्या सोचते हैं कि O की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी प्रथम इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के समान धनात्मक, अधिक ऋणात्मक या कम ऋणात्मक होगी? अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
ऑक्सीजन की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैलपी धनात्मक होगी (∆egH = 780kJmol-1) ऑक्सीजन परमाणु का आकार छोटा होता है तथा इसका नाभिकीय आवेश उच्च होता है। उच्च आवेश-घनत्व के कारण यह सरलता से इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर लेता है तथा ऊर्जा निर्मुक्त होती है। इस प्रकार प्राप्त O(g) समान आवेशों के मध्य स्थिर-विद्युत प्रतिकर्षण के कारण सरलता से इलेक्ट्रॉन ग्रहण नहीं करता; अत: द्वितीय इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन को O(g) में प्रवेश कराने हेतु कुछ ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।

प्रतिकर्षण समाप्त करने के लिए आवश्यकता यह ऊर्जा, इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने में निर्मुक्त ऊर्जा से अधिक हो जाती है। फलतः कुल ऊर्जा अवशोषित होती है। उपर्युक्त व्याख्या से यह स्पष्ट होता है कि ऑक्सीजन की प्रथम इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी ऋणात्मक तथा द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी धनात्मक होती है।

प्रश्न 3.22
इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी और इलेक्ट्रॉन ऋणात्मकता में क्या मूल अन्तर हैं?
उत्तर:
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प्रश्न 3.23
सभी नाइट्रोजन यौगिकों में N की विद्युत ऋणात्मकता पॉलिंग पैमाने पर 3.0 है। आप इस कथन पर अपनी क्या प्रतिक्रिया देंगे?
उत्तर:
पॉलिंग पैमाने पर नाइट्रोजन की विद्युत ऋणात्मकता 3.0 है जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह पूर्णतया विद्युत ऋणात्मक अतः इसके छोटे आकार और उत्कृष्ट गैस का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए 3 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है। यह सभी यौगिकों में नाइट्रोजन की विद्युत ऋणात्मकता 3 होती है मान्य नहीं है। यह किसी विशेष यौगिक में इसकी संकरण अवस्था पर निर्भर है। s – लक्षण जितना अधिक होगा, उतना ही तत्त्व की विद्युत ऋणात्मकता अधिक होगी।

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प्रश्न 3.24
उस सिद्धान्त का वर्णन कीजिए, जो परमाणु की त्रिज्या से सम्बन्धित होता है –

  1. जब वह इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है।
  2. जब वह इलेक्ट्रॉन का त्याग करता है।

उत्तर:
1. जब परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है, तब ऋणायन बनता है। परमाणु के ऋणायन में परिवर्तन के दौरान एक या अधिक इलेक्ट्रॉन परमाणु के संयोजी कोश से जुड़ जाते हैं। नाभिकीय आवेश परमाणु के समान ही रहता है। संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या में वृद्धि, इलेक्ट्रॉनों द्वारा परस्परीय परिरक्षण की अधिकता के कारण, प्रभावी नाभिकीय आवेश को कम कर देती है। परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन-मेघ विस्तृत हो जाता है अर्थात् आयनिक त्रिज्या बढ़ जाती है।

2. जब परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का त्याग करता है, तब धनायन बनता है। इस प्रकार प्राप्त धनायन सदैव अपने जनक परमाणु से आकार में छोटा होता है। ऐसा निम्नलिखित कारणों से हो सकता है –

(a) संयोजी कोश के विलोपन द्वारा (By elimination of valence shell):
कुछ स्थितियों में, इलेक्ट्रॉन त्यागने पर संयोजी कोश का पूर्णतया विलोपन हो जाता है। बाह्यतम कोश विलुप्त होने के कारण धनायन के आकार में कमी आ जाती है।

(b) प्रभावी नाभिकीय आवेश में वृद्धि के द्वारा (By increase in effective nuclear charge):
धनायन में, इलेक्ट्रॉनों की संख्या जनक परमाणु से कम होती है। कुल नाभिकीय आवेश समान रहता है। यह प्रभावी नाभिकीय आवेश को बढ़ा देता है। परिणामस्वरूप, इलेक्ट्रॉन नाभिक से अधिक दृढ़ता से जुड़े रहते हैं जिससे इनके आकार में कमी आ जाती है।

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प्रश्न 3.25
किसी तत्त्व के दो समस्थानिकों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी समान होगी या भिन्न? आप क्या मानते हैं? अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
चूँकि तत्त्व की आयनन एन्थैल्पी, इसके नाभिकीय आवेश के परिमाण तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से सम्बन्धित है और तत्त्व के समस्थानिकों का नाभिकीय आवेश व इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है। अतः इन दो समस्थानिकों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी भी समान होगी।

प्रश्न 3.26
धातुओं तथा अधातुओं में मुख्य अन्तर क्या है।
उत्तर:
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प्रश्न 3.27
आवर्त सारणी का उपयोग करते हुए निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
(क) उस तत्त्व का नाम बताइए, जिसके बाह्य उप-कोश में पाँच इलेक्ट्रॉन उपस्थित हों।
(ख) उस तत्त्व का नाम बताइए, जिसकी प्रवृत्ति दो इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की हो।
(ग) उस तत्त्व का नाम बताइए, जिसकी प्रवृत्ति दो इलेक्ट्रॉनों को प्राप्त करने की हो।
(घ) उस वर्ग का नाम बताइए, जिसमें सामान्य ताप पर धातु, अधातु, द्रव और गैस उपस्थित हों।
उत्तर:
(क) ये तत्त्व नाइट्रोजन परिवार (वर्ग 15) N, P, As, Sb, Bi से सम्बन्धित हैं। इन तत्त्वों के बाह्य कोश में पाँच इलेक्ट्रॉन होते हैं।

(ख) ये तत्त्व समूह 2 तथा क्षारीय मृदा परिवार से सम्बन्धित हैं। इस परिवार में Be, Mg, Ca, Sr, Ba तत्त्व सम्मिलित हैं। इन तत्त्वों की प्रवृत्ति दो इलेक्ट्रॉन त्यागने की है।

(ग) ये तत्त्व ऑक्सीजन परिवार से सम्बन्धित हैं और इस परिवार में O, S, Se, Te तत्त्व सम्मिलित हैं। इन तत्त्वों की प्रवृत्ति 2 इलेक्ट्रॉन त्यागने की है।

(घ) वर्ग 13 है।

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प्रश्न 3.28
प्रथम वर्ग के तत्त्वों के लिए अभिक्रियाशीलता का बढ़ता हुआ क्रम इस प्रकार है –
Li < Na < K < Rb < Cs; जबकि वर्ग 17 के तत्त्वों में क्रम F > CI > Br > 1 है। इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रथम वर्ग के तत्त्वों की अभिक्रियाशीलता इनके परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के त्यागने के कारण है जो कि आयतन एन्थैल्पी से सम्बन्धित है। चूँकि आयनन एन्थैल्पी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर घटती है, अतः धातुओं की अभिक्रियाशीलता बढ़ती वर्ग 17 (हैलोजेनों) की अभिक्रियाशीलता इलेक्ट्रॉनों के ग्रहण करने की प्रवृत्ति से सम्बन्धित है। चूंकि ये दोनों वर्ग में नीचे जाने पर घटते हैं, अत: अभिक्रियाशीलता भी घटती है।

प्रश्न 3.29
-s-, p-, d – और f – ब्लॉक के तत्त्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
उत्तर:
s – ब्लॉक के तत्त्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns1-2 होता है।
p – ब्लॉक के तत्त्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2 np1-6 होता है। ब्लॉक के तत्त्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-1)d1-10 ns1-2 होता है।
f – ब्लॉक के तत्त्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (n-2) f1-14 (n-1)d1 ns2 होता है।

प्रश्न 3.30
तत्त्व, जिसका बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नलिखित हैं, का स्थान आवर्त सारणी में बताइए –

  1. ns2 np4, जिसके लिए n = 3 है।
  2. (n-1)d2 ns2, जब n = 4 है तथा
  3. (n-2) f7 (n-1)d1 ns2, जब n = 6 है।

उत्तर:

  1. यह तत्त्व तीसरे आवर्त में तथा वर्ग 16 में स्थित है।
  2. यह तत्त्व चौथे आवर्त तथा वर्ग 4 में स्थित है।
  3. यह तत्त्व छठे आवर्त और वर्ग 3 में स्थित है।

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प्रश्न 3.31
कुछ तत्वों की प्रथम ∆iH1 और द्वितीय ∆iH2 आयनन एन्थैल्पी (kJ mol-1 में) और इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी (∆eg H) (kJ mol-1 में) निम्नलिखित है –
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ऊपर दिए गए तत्वों में से कौन – सी –
(क) सबसे कम अभिक्रियाशील धातु है?
(ख) सबसे अधिक अभिक्रियाशील धातु है?
(ग) सबसे अधिक अभिक्रियाशील अधातु है?
(घ) सबसे कम अभिक्रियाशील अधातु है?
(ङ) ऐसी धातु है, जो स्थायी द्विअंगी हैलाइड (binary halide), जिनका सूत्र MX2 (X = हैलोजेन ) है, बनाता है।
(च) ऐसी धातु, जो मुख्यतः MX (X = हैलोजेन) वाले स्थायी सहसंयोजी हैलाइड बनाती है।
उत्तर:
(क) तत्व V की आयनन एन्थैलपी उच्चतम है; अत: यह सबसे कम अभिक्रियाशील धातु है।

(ख) न्यूनतम प्रथम आयनन एन्थैल्पी वाले तत्व सरलता से इलेक्ट्रॉन त्याग देते हैं, इसलिए ये अधिक अभिक्रियाशील होते हैं। तत्व II की प्रथम आयनन एन्थैल्पी न्यूनतम है; अत: यह सबसे अधिक अभिक्रियाशील धातु है।

(ग) अधातुओं की आयनन एन्थैल्पी उच्च होती हैं (उत्कृष्ट गैसों से कम)। अत: तत्व III सबसे अधिक अभिक्रियाशील अधातु है।

(घ) तत्व IV सबसे कम अभिक्रियाशील अधातु हैं।

(ङ) धातुओं की आयनन सबसे एन्थैल्पी अपेक्षाकृत कम होती हैं। वर्ग 2 के तत्वों की प्रथम आयनन एन्थैल्पी वर्ग 1 के तत्वों की तुलना में उच्च होती हैं। चूँकि तत्व M, सूत्र MX2, का एक स्थायी द्विअंगी हैलाइड बनाता है; अत: M को आवर्त सारणी के वर्ग 2 से सम्बन्धित होना चाहिए। वर्ग 2 के तत्वों के लिए प्रथम एवं द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का योग इनके समीपवर्ती तत्वों की तुलना में कम होता है। इससे स्पष्ट है कि तत्व VI ही वह धातु है जो सूत्र MX2 के द्विअंगी हैलाइड को बनाने की क्षमता रखती है।

(च) धातु, जो मुख्यत: MX (X = हैलोजेन) वाले स्थायी सहसंयोजक हैलाइड बनाती है, तत्व । है चूँकि वर्ग 1 में तत्वों के छोटे आकारों के कारण आयनन एन्थैल्पी उच्च होती है।

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प्रश्न 3.32
तत्त्वों के निम्नलिखित युग्मों के संयोजन से बने स्थाई द्विअंगी यौगिकों के सूत्रों की प्रगुक्ति कीजिए –
(क) लीथियम और ऑक्सीजन
(ख) मैग्नीशियम और नाईट्रोजन
(ग) एल्यूमीनियम और आयोडीन
(घ) सिलिकॉन और ऑक्सीजन
(ङ) फॉस्फोरस और फ्लुओरीन
(च) 71 वाँ तत्त्व और फ्लु ओरीन
उत्तर:
(क) Li2O
(ख) Mg3N2
(ग) All3
(घ) SiO2
(ङ) PF6
(च) LuF2

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प्रश्न 3.33
आधुनिक आवर्त सारणी में आवर्त निम्नलिखित में से किसको व्यक्त करता है?
(क) परमाणु संख्या
(ख) परमाणु द्रव्यमान
(ग) मुख्य क्वांटम संख्या
(घ) द्विगंशी क्वांटम संख्या
उत्तर:
(ग) मुख्य क्वांटम संख्या।

प्रश्न 3.34
आधुनिक आवर्त सारणी के लिए निम्नलिखित के संदर्भ में कौन-सा कथन सही नहीं है?
(क) p – ब्लॉक में 6 स्तम्भ हैं, क्योंकि p – कोश के सभी कक्षक भरने के लिए अधिकतम 6 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है।
(ख) d – ब्लॉक में 8 स्तम्भ हैं, क्योंकि d – उपकोश के कक्षक भरने के लिए अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है।
(ग) प्रत्येक ब्लॉक में स्तम्भों की संख्या उस उपकोश में भरे जा सकने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है।
(घ) तत्त्व के इलेक्ट्रॉन विन्यास को भरते समय अन्तिम भरे जाने वाले इलेक्ट्रॉन का उपकोश उसके द्विगंशी क्वांटम संख्या को प्रदर्शित करता है।
उत्तर:
(ख) यह कथन सही नहीं है क्योंकि d – ब्लॉक में 10 स्तम्भ हैं और d – ब्लॉक के कक्षक भरने के लिए अधिकतम 10 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.35
ऐसा कारक, जो संयोजकता इलेक्ट्रॉन को प्रभावित करता है, उस तत्त्व की रासायनिक प्रवृत्ति भी प्रभावित करता है। निम्नलिखित में से कौन-सा कारक संयोजकता कोश को प्रभावित नहीं करता?
(क) संयोजक मुख्य क्वांटम संख्या (n)
(ख) नाभिकीय आवेश (Z)
(ग) नाभिकीय द्रव्यमान
(घ) क्रोड इलेक्ट्रॉनों की संख्या
उत्तर:
(ग) नाभिकीय द्रव्यमान

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प्रश्न 3.36
समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज F, Ne और Na+ का आकार इनमें से किससे प्रभावित होता है?
(क) नाभिकीय आवेश (Z)
(ख) मुख्य क्वांटम संख्या (n)
(ग) बाह्य कक्षकों में इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन अन्योन्य क्रिया
(घ) ऊपर दिये गये कारणों में से कोई भी नहीं, क्योंकि उनका आकार समान है।
उत्तर:
(क) नाभिकीय आवेश (Z)।

प्रश्न 3.37
आयनन एंथैल्पी के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य गलत है?
(क) प्रत्येक उत्तरोत्तर इलेक्ट्रॉन से आयनन एंथैल्पी बढ़ती है।
(ख) क्रोड उत्कृष्ट गैस के विन्यास से जब इलेक्ट्रॉन को निकाला जाता है तब आयनन एंथेल्पी का मान अत्यधिक होता है। .
(ग) आयनन एंथैल्पी के मान में अत्यधिक तीव्र वृद्धि संयोजकता इलेक्ट्रॉनों के विलोपन को व्यक्त करता है।
(घ) कम n मान वाले कक्षकों में अधिक n मान वाले कक्षकों की तुलना में इलेक्ट्रॉनों को आसानी से निकाला जा सकता है।
उत्तर:
(घ) असत्य है।

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प्रश्न 3.38
B, AI, Mg, K तत्त्वों के लिए धात्विक अभिलक्षण का सही क्रम इनमें कौन-सा है?
(क) b > Al > Mg > K
(ख) Al > Mg > B > K
(ग) Mg > AL > K > B
(घ) K > Mg > AI > B
उत्तर:
सही क्रम निम्नवत् है –
(घ) K > Mg > Al > B

प्रश्न 3.39
तत्त्वों B, C, N, F और Si के लिए अधातु अभिलक्षण का इनमें से सही क्रम कौन-सा है?
(क) B > C > Si > N > F
(ख) Si > C > B > N > F
(ग) F > N > C > B > Si
(घ) F > N > C > Si > B
उत्तर:
सही क्रम निम्नवत् है –
(ग) F > N > C > B > Si

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प्रश्न 3.40
तत्त्वों F, CI, O और N तथा ऑक्सीकरण गुणधर्मों के आधार पर उनकी रासायनिक अभिक्रियाशीलता का क्रम निम्नलिखित में से कौन-से तत्त्वों में है?
(क) F > CI > O > N
(ख) F > O > CI > N
(ग) CI > F > O > N
(घ) O > F > N > CI
उत्तर:
सही क्रम निम्नवत् है –
(ख) F > O > Cl > N

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 4 रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 4 रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Chemistry रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 4.1
रासायनिक आबन्ध के बनने की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘द्रव्य’ एक या विभिन्न प्रकार के तत्वों से मिलकर बना होता है। सामान्य स्थितियों में उत्कृष्ट गैसों के अतिरिक्त कोई अन्य तत्व एक स्वतन्त्र परमाणु के रूप में विद्यमान नहीं होता है। परमाणुओं के समूह विशिष्ट गुणों वाली स्पीशीज के रूप में विद्यमान होते हैं। परमाणुओं के ऐस समूह को ‘अणु’ कहते हैं। प्रत्यक्ष रूप में कोई बल अणुओ के घटक परमाणुओं को आपस में पकड़े रहता है। वस्तुतः रासायनिक आबन्ध को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –

“विभिन्न रासायनिक स्पीशीज में उनके अनेक घटकों (परमाणुओं, आयनों इत्यादि) को संलग्न रखने वाले आकर्षण बल को ‘रासायनिक आबन्ध’ कहते हैं।”

कॉसेल:
लूईस अवधारणा के अनुसार परमाणुओं का संयोजन अर्थात् रासायनिक आबन्ध बनना संयोजी इलेक्ट्रॉनों के एक परमाणु से दूसरे परमाणु पर स्थानान्तरण के द्वारा अथवा संयोजी इलेक्ट्रॉनों के सहभाजन के द्वारा होता है। इस प्रक्रिया में परमाणु अपने संयोजकता कोश में अष्टक प्राप्त करते हैं। जैसे – सोडियम क्लोराइड अणु में सोडियम परमाणु अपना एक संयोजी इलेक्ट्रॉन त्याग देता है तथा इस इलेक्ट्रॉन को क्लोरीन परमाणु ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण के द्वारा दोनों परमाणु अपने-अपने संयोजकता कोश में अष्टक प्राप्त कर लेते हैं तथा दोनों के मध्य एक रासायनिक आबन्ध (विद्युतसंयोजी आबन्ध) स्थापित हो जाता है।

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प्रश्न 4.2
निम्नलिखित तत्त्वों के परमाणुओं के लईस बिन्दु प्रतीक लिखिए –
Mg, Na, B, O, N, Br
उत्तर:
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प्रश्न 4.3
निम्नलिखित परमाणुओं तथा आयनों के लूईस बिन्दु प्रतीक लिखिए –
S और S2-, Al तथा Al3+, H और H
उत्तर:
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प्रश्न 4.4
निम्नलिखित अणुओं तथा आयनों की लूईस संरचनाएँ लिखिए –
H2S, SiCl4, BeF2, CO32-, HCOOH
उत्तर:
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प्रश्न 4.5
अष्टक नियम को परिभाषित कीजिए तथा इस नियम के महत्त्व और सीमाओं को लिखिए।
उत्तर:
अष्टक नियम (Octet Rule):
वर्ग 18 में उपस्थित अक्रिय गैसों अथवा उत्कृष्ट गैस तत्वों को शून्य वर्ग के तत्व भी कहा जाता है। इसका अर्थ है कि इनकी संयोजकता शून्य है अर्थात् इनके परमाणु स्वतन्त्र अवस्था में पाए जा सकते हैं। उत्कृष्ट गैस तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्नांकित सारणी में दिए गए हैं –
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प्रथम सदस्य हीलियम, जिसके संयोजी कोश में केवल दो इलेक्ट्रॉन हैं, के अतिरिक्त शेष सदयों के संयोजी कोश में आठ इलेक्ट्रॉन हैं। सन् 1916 में जी०एन० लूईस तथा कॉसेल ने ज्ञात किया कि उत्कृष्ट गैस तत्वों का स्थायित्व इनके संयोजी कोशों में आठ इलेक्ट्रॉनों (हीलियम को छोड़कर) अथवा पूर्ण अष्टक के उपस्थिति के कारण होता है। इनके अनुसार. अन्य तत्वों के परमाणुओं के बाह्य कोश में आठ से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं; अत: ये तत्व अपना आदर्श स्थायी रूप प्राप्त करने के प्रयत्न में रासायनिक संयोजनों में भाग लेते हैं जिससे वे इलेक्ट्रॉनों के आदान-प्रदान द्वारा अपने समीपवर्ती अक्रिय गैस के समान इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ग्रहण कर सकें। इसे अष्टक नियम कहते हैं।

वास्तव में इलेक्ट्रॉनों द्वारा रासायनिक आबन्धों के बनने की व्याख्या के लिए कई प्रयास किए गए, परन्तु कॉसेल तथा लूईस स्वतन्त्र रूप से सन्तोषजनक व्याख्या देने में सफल हुए। उन्होंने सर्वप्रथम संयोजकता की तर्क-संगत व्याख्या की। यह व्याख्या उपर्युक्त दी गई उत्कृष्ट गैसों की अक्रियकता पर आधारित थी। लूईस परमाणुओं को एक धन-आवेशित अष्टि (नाभिक तथा आन्तरिक इलेक्ट्रॉन युक्त) तथा बाह्य कक्षकों के रूप में निरूपित किया गया। बाह्य कक्षकों में अधिकतम आठ इलेक्ट्रॉन समाहित हो सकते हैं। उसने यह माना कि ये आठों इलेक्ट्रॉन घन के आठ कोनों पर उपस्थित हैं, जो केन्द्रीय अष्टि को चारों ओर से घेरे रहते हैं।

इस प्रकार सोडियम के बाह्य कोश में उपस्थित एकल इलेक्ट्रॉन घन के एक कोने पर स्थित रहता है, जबकि उत्कृष्ट गैसों में घन के आठों कोनों पर एक-एक इलेक्ट्रॉन उपस्थित रहते हैं। लूईस ने यह अभिगृहीत दिया कि परमाणु परस्पर रासायनिक आबन्ध द्वारा संयुक्त होकर अपने स्थायी अष्टक को प्राप्त करते हैं। उदाहरण के लिए-सोडियम एवं क्लोरीन में सोडियम अपने एक इलेक्ट्रॉन को क्लोरीन को सरलतापूर्वक देकर अपना स्थायी अष्टक प्राप्त करता है तथा क्लोरीन एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर अपना स्थायी अष्टक निर्मित करता है, अर्थात् सोडियम (Na+) तथा क्लोरीन (Cl) आयन बनते हैं।
Na → Na+ + e
Cl + e → Cl
Na+ + Cl → Nacl Na+ Cl

इस प्रकार कॉसेल तथा लूईस ने परमाणुओं के बीच रासायनिक संयोजन के एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त को विकसित किया। इसे ‘रासायनिक आबन्धन का इलेक्ट्रॉनिकी सिद्धान्त’ कहा जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार –
“परमाणुओं का संयोजन संयोजक इलेक्ट्रॉनों के एक परमाणु से दूसरे परमाणु पर स्थानान्तरण के द्वारा अथवा संयोजक इलेक्ट्रॉनों के सहभाजन (sharing) के द्वारा होता हैं।” इस प्रक्रिया में परमाणु अपन संयोजकता कोश में अष्टक प्राप्त करते हैं।

अष्टक नियम महत्त्व (Significance of Octet Rule)
अष्टक नियम अत्यन्त उपयोगी है। इसका महत्त्व निम्नवर्णित है –

  1. अधिकांश अणु अष्टक नियम का अनुसारण करके ही निर्मित होते हैं; जैसे – O2, N2, Cl2, Br2, आदि।
  2. अधिकांश कार्बनिक यौगिकों की संरचनाओं को समझने में अष्टक नियम का अत्यधिक महत्त्व है।
  3. इसके मुख्य रूप से आवर्त सारणी के द्वितीय आवर्त के तत्वों पर लागू किया जा सकता है।

अष्टक नियम कि सीमाएं (Limitations of Octet Rule):
यद्यपि अष्टक नियम अत्यन्त उपयोगी है, परन्तु यह सदैव लागू नहीं किया जा सकता अर्थात् यह सार्वत्रिक (universal) नहीं है। अष्टक नियम के तीन प्रमुख अपवाद निम्नलिखित है –

1. केन्द्रीय परमाणु का अपूर्ण अष्टक (Incomplete octet of central atom):
कुछ यौगिकों में केन्द्रीय परमाणु के चारों ओर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या आठ से कम होती है। यह मुख्यतः उन तत्वों के यौगिकों में होता है जिनमें संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या चार से कम होती है। उदाहरण के लिए –
LiCl, BeH2, तथा BCl2, के बनने में –
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Li, Be तथा B के संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या क्रमशः 1,2 तथा 3 हैं। इस प्रकार के अन्य उदाहरण AlCl3, तथा BF3 हैं।

2. विषम इलेक्ट्रॉन अणु (Odd electron molecule):
उन अणुओं, जिनमें इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या विषम (odd) होती है; जैसे – नाइट्रिक ऑक्साइड (NO2) तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) में सभी परमाणु अष्टक नियम का पालन नहीं कर पाते।
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3. प्रसारित अष्टक (Expanded octet):
आवर्त सारणी के तीसरे तथा इससे आगे के आवर्ती के तत्वों में आबन्धन के लिए 3s तथा 3p – कक्षकों के अतिरिक्त 3d – कक्षक भी उपलब्ध होते हैं। इन तत्वों के उनके यौगिकों के केन्द्रीय परमाणु के चारों ओर आठ से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसे प्रसारित अष्टक (expanded octet) कहते हैं। स्पष्ट है कि इन यौगिकों पर अष्टक नियम लागू नहीं होता है। ऐसे यौगिकों के कुछ उदाहरण हैं –
PF5, SF6, H2 SO4 तथा कई उपसहसंयोजक यौगिक।
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प्रश्न 4.6
आयनिक आबन्ध बनाने के लिए अनुकूल कारकों को लिखिए।
उत्तर:
आयनिक आबन्ध बनाने के लिए निम्नलिखित कारक (Favourable Factors for Ionic Bond Formation)

आयनिक आबन्ध बनाने के लिए निम्नलिखित कारक अनुकूल होते हैं –

1. आयनन एन्थैली (lonization enthalpy):
धनात्मक आयन या धनायन के बनने में किसी एक परमाणु को इलेक्ट्रॉनों का त्याग करना पड़ता है जिसके लिए आयनन एन्थैल्पी की आवश्यकता होती है। हम जानते हैं कि आयनन एन्थैल्पी ऊर्जा की वह मात्रा है जो किसी विलगित . गैसीय परमाणु से बाह्यतम इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक होती है; अत: आयनन एन्थैल्पी की जितनी कम आवश्यकता होगी, धनायन का निर्माण उतना ही सरल होगा। s – ब्लॉक में उपस्थित क्षार धातुएँ एवं क्षारीय मृदा धातुएँ सामान्यत: धनायन बनाती हैं; क्योंकि इनकी आयनन एन्थैल्पी अपेक्षाकृत कम होती हैं।

2. इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी (Electron gain enthalpy):
धनायनों के निर्माण में मुक्त हुए इलेक्ट्रॉन, आयनिक बन्ध के निर्माण में भाग ले रहे अन्य परमाणु द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं। परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी पर निर्भर करती है। किसी विलगित गैसीय परमाणु द्वारा एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन बनने में जितनी ऊर्जा विमुक्त होती है, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी कहलाती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के अधिक ऋणात्मक होने पर ऋणायन का निर्माण सरल होगा। वर्ग 17 में – उपस्थित हैलोजेनों की ऋणायन बनाने की प्रवृत्ति सर्वाधिक होती है; क्योंकि इनकी इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अत्यन्त उच्च ऋणात्मक होती है। ऑक्सीजन परिवार (वर्ग 16) के सदस्यों में भी ऋणायन बनाने की प्रवृत्ति होती है, परन्तु अधिक सरलता से यह सम्भव नहीं होता; क्योंकि ऊर्जा की आवश्यकता द्विसंयोजी ऋणायन (O2-) बनाने के लिए होती है।

3. जालक ऊर्जा या एन्थैल्पी (Lattice energy or enthalpy):
आयनिक यौगिक क्रिस्टलीय ठोसों के रूप में होते हैं तथा आयनिक यौगिक के क्रिस्टलों में धनायन तथा ऋणायन त्रिविमीय रूप में नियमित रूप से व्यवस्थित रहते हैं। चूँकि आयन आवेशित स्पीशीज हैं; अत: आयनों के आकर्षण में विमुक्त ऊर्जा जालक ऊर्जा या एन्थैल्पी कहलाती है। इसे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है –
“विपरीत आवेश वाले आयनों के संयोजन द्वारा जब क्रिस्टलीय ठोस का एक मोल प्राप्त होता है, तब विमुक्त ऊर्जा जालक ऊर्जा या एन्थैल्पी कहलाती है।”

इसे ‘U’ द्वारा व्यक्त किया जाता है।
A+ (g) + B (g) → A+ B (s) + जालक ऊर्जा (U)
इस प्रकार स्पष्ट है कि जालक ऊर्जा का परिमाण अधिक होने पर आयनिक बन्ध अथवा आयनिक यौगिक का स्थायित्व अधिक होगा। निष्कर्षतः यदि जालक ऊर्जा का परिमाण तथा ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी आवश्यक आयनन एन्थैल्पी की तुलना में अधिक होंगे, तब एक स्थायी रासायनिक बन्ध प्राप्त होगा। इनके कम होने पर बन्ध का विरचन नहीं होगा।

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प्रश्न 4.7
निम्नलिखित अणुओं की आकृति की व्याख्या वी०एस०ई०पी०आर० सिद्धान्त के अनुरूप कीजिए –
BeCl2, BCl3, SiCl4, AsF5, H2S, PH3
उत्तर:
BeCl2:
दो आबन्धी युग्मों के कारण रेखीय है।

BCl3:
तीन आबन्धी युग्मों के कारण समतलीय है।

SiCl4:
चार आबन्धी युग्मों के कारण चतुष्फलकीय है।

AsF5:
पाँच आबन्धी युग्मों के कारण त्रिकोणीय द्विपिरामिडी है।

H2S:
दो आबन्धी युग्मी और दो एकाकी युग्मों के कारण बंकित अणु है।

PH3:
तीन आबन्धी युग्मों तथा एकाकी युग्म के कारण पिरामिडी है।

प्रश्न 4.8
यद्यपि NH3 तथा H2O दोनों अणुओं की ज्यामिति विकृत चतुष्फलकीय होती है, तथापि जल में आबन्ध कोण अमोनिया की अपेक्षा कम होता है। विवेचना कीजिए।
उत्तर:
NH3 अणु में नाइट्रोजन परमाणु पर एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म, जबकि H2O अणु में ऑक्सीजन परमाणु पर दो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हैं। VSEPR सिद्धान्त के अनुसार, हम जानते हैं कि इलेक्ट्रॉन युग्मों के बीच प्रतिकर्षण अन्योन्यक्रियाएँ निम्नालिखित क्रम में घटती हैं –

एकाकी युग्म-एकाकी युग्म > एकाकी युग्म-आबन्धी युग्म> आबन्धी युग्म-आबन्धी युग्म
या lp – lp > lp – bp > bp – bp

ऑक्सीजन परमाणु के पास अधिक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म होने के कारण H2O में O-H आबन्ध-युग्म, NH3 में N – H आबन्ध युग्मों की अपेक्षा निकट होते हैं; अत: NH3 में आबन्ध कोण (107°) H2O के आबन्ध कोण (104.5107°) से अधिक होता है।

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प्रश्न 4.9
आबन्ध प्रबलता को आबन्ध कोटि के रूप में आप किस प्रकार व्यक्त करेंगे?
उत्तर:
यदि आबन्ध विघटन एन्थैल्पी अधिक है तो आबन्ध प्रबल अधिक होगा और आबन्ध कोटि के बढ़ने से आबन्ध एन्थैल्पी बढ़ती है। अतः आबन्ध कोटि के बढ़ने से आबन्ध प्रबलता बढ़ती है। जैसे – O2, की आबन्ध कोटि 2 है और इसकी आबन्ध एन्थैल्पी 498KI mol-1 हैं और N, की आबन्ध कोटि 3 है तथा इसकी आबन्ध एन्थैल्पी 945KJmol-1 है। स्पष्ट है इनमें N2, की आबन्ध प्रबलता अधिक है।

प्रश्न 4.10
आबन्ध लम्बाई की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
किसी अणु में आबंधित परमाणुओं के नाभिकों के बीच साम्यावस्था दूरी को आबंध लम्बाई कहते हैं। इसके मान पिकाटोमीटर (pm) में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रश्न 4.11
\(\mathrm{CO}_{3}^{2-}\) आयन के संदर्भ में अनुनाद के विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
लूईस संरचना कार्बोनेट आयन के लिए अपर्याप्त है क्योंकि इसके अनुसार तीन कार्बन-ऑक्सीजन आबंधों की लम्बाई भिन्न होनी चाहिए जबकि प्रयोगों के अनुसार कोर्बोनेट आयन के तीन कार्बन-ऑक्सीजन आबन्धों की लम्बाई समान होती है। अतः \(\mathrm{CO}_{3}^{2-}\) आयन की वास्तविक संरचना को निम्न तीन संरचनाओं के अनुसार संकर के रूप में दिखाया जा सकता है –
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प्रश्न 4.12
नीचे दी गई संरचनाओं (1 तथा 2) द्वारा H3, PO3, को प्रदर्शित किया जा सकता है। क्या ये दो संरचनाएँ H3, PO3 के अनुनाद संकट के विहित (केनॉनीकल) रूप माने जा सकते हैं। यदि नहीं तो उसका कारण बताइए।
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उत्तर:
संरचनाएँ (1) तथा (2) अनुनादी संरचनाएँ नहीं है क्योंकि H नाभिकों में से एक ही स्थिति भिन्न है और आबन्धी एवं अनाबन्धी युग्मों की संख्या भिन्न है।

प्रश्न 4.13
SO3, NO2, तथा \(\mathrm{NO}_{3}^{-}\), की अनुनादसंरचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
SO3 की अनुनाद संरचनाएँ
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NO2 की अनुनाद संरचनाएँ
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\(\mathrm{NO}_{3}^{-}\) की अनुनाद संरचनाएँ
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प्रश्न 4.14
निम्नलिखित परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण द्वारा धनायनों तथा ऋणायनों में विरचन को लुईस बिन्दु-प्रतीकों की सहायता से दर्शाइए –
(क) K तथा S
(ख) Ca तथा O
(ग) A तथा N
उत्तर:
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प्रश्न 4.15
हालाँकि CO2, तथा H2O दोनों त्रिपरमाणुक अणु हैं, परन्तु H2O अणु की आकृति बंकित होती है, जबकि CO2 की रैखिक आकृति होती है। द्विध्रुव आघूर्ण के आधार पर इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
H2O अणु – H2O अणु का द्विध्रुव आघूर्ण 1.84D होता है। H2O अणु में दो OH आबन्ध होते हैं। ये O – H आबन्ध ध्रुवी होते हैं तथा इनका द्विध्रुव आघूर्ण 1.5D होता है। चूँकि जल-अणु में परिणामी द्विध्रुव होता है; अत: दोनों OH – द्विध्रुव एक सरल रेखा में नहीं होंगे तथा एक-दूसरे को समाप्त नहीं करेंगे। इस प्रकार H2O अणु की रैखिक संरचना नहीं होती। H2O अणु में O – H आबन्ध परस्पर एक निश्चित कोण –
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पर स्थित होते हैं अर्थात् H2O अणु की कोणीय संरचना होती है।

CO2 अणु – CO2, अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। CO, अणु में दो CO = O आबन्ध होते हैं। प्रत्येक C = O आबन्ध एक ध्रुवी आबन्ध है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक आबन्ध में द्विध्रुव आघूर्ण होता है। चूंकि CO2, अणु का परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है; अतः दोनों आबन्ध द्विध्रुव अर्थात् दोनों आबन्ध एक-दूसरे के विपरीत होने चाहिए अर्थात् दोनों आबन्ध एक-दूसरे से 180° पर स्थित होने चाहिए। इस प्रकार स्पष्ट है कि CO2 अणु की संरचना रैखिक होती है।
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प्रश्न 4.16
द्विध्रुव आघूर्ण के महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग बताइए।
उत्तर:
द्विध्रुव आघूर्ण के महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग (Important Applications of Dipole Moment):
विधुव-आधूर्ण के कुछ महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं –

1. अणुओं की प्रकृति ज्ञात करना (Predicting the nature of the molecules):
एक निश्चित द्विध्रुव आघूर्ण वाले अणु प्रकृति में ध्रुवी होते हैं, जबकि शून्य द्विध्रुव आघूर्ण वाले अणु अध्रुवी होते हैं। अत: BeF2 (µ = OD) अध्रुवी है, जबकि H2O (µ = 1.84 D) ध्रुवी होता है।

2. अणुओं की प्रकृति ज्ञात करना (Predicting the inolecular structure of the molecules):
हम जानते हैं कि परमाणुक गैसें; जैसे-अक्रिय गैसों आदि का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है, अर्थात् ये अध्रुवी हैं, परन्तु द्वि-परमाणुक अणु ध्रुवीय तथा अध्रुवीय होते हैं; जैसे – H2, O2 आदि अध्रुवी है (µ = 0) तथा CO ध्रुवीय है। इन अणुओं की संरचना भी रैखिक होती है।

त्रिपरमाणुक अणु भी ध्रुवीय तथा अध्रुवीय होते हैं। CO2, CS2 आदि अध्रुवी होते हैं; क्योंकि इनके लिए µ = 0 होते हैं; अत: इन अणुओं की संरचना रैखिक होती है जिनको निम्नांकित प्रकार से प्रदर्शित कर सकते हैं –
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जल अणु ध्रुवी है, क्योंकि µ = 1. 84 D होता है; अतः इसकी संरचना रैखिक नहीं हो सकती है। इसकी कोणीय संरचना होती है तथा प्रत्येक O-H बन्ध के मध्य 10405 का कोण होता है। इसी प्रकार H2S व SO2, की भी कोणीय संरचनाएँ हैं; क्योंकि इनके लिए µ के मान क्रमश: 0.90D व 1.71D हैं। चार परमाणुकता वाले अणु भी ध्रुवीय तथा अध्रुवीय होते हैं। BCl3, अणु के लिए µ = 0 होता है अर्थात् अध्रुवीय होता है। अतः इसकी संरचना समद्विबाहु त्रिभुज के समान होती है।

3. आबन्धों की धुवणता ज्ञात करना (Determining the polarity of the bonds):
सहसंयोजी आबन्धयुक्त यौगिक मं आयनिक गुण या ध्रुवणता उस बन्ध के निर्माण में प्रयुक्त तत्वों के परमाणुओं की विद्युत-ऋणात्मकता पर निर्भर करता है। इस प्रकार,
आबन्ध की ध्रुवणता ∝ आबन्ध के परमाणुओं की विद्युत-ऋणात्मकता में अन्तर
तथा द्विध्रुव आघूर्ण ∝ आबन्ध के परमाणुओं की विद्युत-ऋणात्मकता में अन्तर
∴ आबन्ध की ध्रुवणता ∝ द्विध्रुव आघूर्ण (4)

उदाहरणार्थ:
HF, HCI, HBr व HI के द्विध्रुव आघूर्ण क्रमश: 1.94D, 1.03 D, 0.68D व 0.34 D हैं; क्योंकि इनमें हैलोजेन की विद्युत-ऋणात्मकता का क्रम F > CI > Br > I है। अतः आबन्धों में विद्युत-ऋणात्मकता अन्तर H – F > H – CI > H – Br > H – I है। इससे प्रकट होता है कि इन आबन्धों की ध्रुवणता फ्लुओरीन से आयोडीन की ओर चलने से घटती है।

4. आबन्धों में आयनिक प्रतिशतता ज्ञात करना (Determining the ionic percentage of the bonds):
द्विध्रुव आघूर्ण मान, ध्रुवी आबन्धों की आयनिक प्रतिशतता ज्ञात करने में सहायता प्रदान करते हैं। यह प्रेक्षित द्विध्रुव आघूर्ण अथवा प्रायोगिक रूप से निर्धारित द्विध्रुव आघूर्ण से सम्पूर्ण इलेक्ट्रॉनस्थानान्तरण के द्विध्रुव आघूर्ण (सैद्धान्तिक) का अनुपात होता हैं।

उदाहरणार्थ:
HCl अणु का प्रेक्षित द्विध्रुव आघूर्ण 1.04 D है। यदि H-CI आबन्ध में इलेक्ट्रॉन युग्म एक ओर हो तो इसका द्विध्रुव आघूर्ण (सैद्धान्तिक) q × d के सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है। का मान 4.808 × 10-10 esu तथा H व Cl के मध्य बन्ध-लम्बाई 1.266 × 10-8 cm पाई गई है।
∴ सैद्धान्तिक µ = 4.808 × 10-10 × 1.266 × 10-8 esu cm = 6.079D
∴ आबन्ध की आयनिक प्रतिशतता
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= \(\frac{1.04D}{6.079D}\) × 100 = 17.1%
अत: H व Cl के बीच सहसंयोजक आबन्ध 17.1% विद्युत संयोजक है अर्थात् आयनिक है।

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प्रश्न 4.17
विद्युत-ऋणात्मकता को परिभाषित कीजिए। यह इलेक्ट्रॉन बन्धुता से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
विद्युत-ऋणात्मकता:
किसी यौगिक में किसी परमाणु की अपनी ओर इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने की प्रवृत्ति को उसकी विद्युत-ऋणात्मकता कहते हैं।
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प्रश्न 4.18
धुवीय सहसंयोजी आबन्ध से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ध्रुवीय सहसंयोजी यौगिक (Polar covalent compound):
बहुत-से अणुओं में एक परमाणु दूसरे परमाणु से अधिक ऋण-विद्युतीय होता है तो इसकी प्रवृत्ति सहसंयोजी बन्ध के इलेक्ट्रॉन युग्म को अपनी ओर खींचने की होती है, इसलिए वह इलेक्ट्रॉन युग्म सही रूप से अणु के केन्द्र में नहीं रहता है, बल्कि अधिक ऋण विद्युती तत्व के परमाणु की ओर आकर्षित रहता है। इस कारण एक परमाणु पर धन आवेश (जिसकी ऋण-विद्युतीयता कम है) तथा दूसरे परमाणु पर ऋण आवेश (जिसकी ऋण-विद्युतीयता अधिक होती है) उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार प्राप्त अणु ध्रुवीय सहसंयोजी यौगिक कहलाता है और उसमें उत्पन्न बन्ध ध्रुवीय सहसंयोजी आबन्ध कहलाता है।
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चित्र: HCI का अणु।

उदाहरण:
HCI अणु का बनना:
क्लोरीन की विद्युत ऋणात्मकता हाइड्रोजन की अपेक्षा अधिक है; अत: साझे का इलेक्ट्रॉन युग्म Cl परमाणु के अत्यन्त निकट होता है। फलस्वरूप H पर घन आवेश तथा Cl पर ऋण आवेश आ जाता है तथा HCl ध्रुवी यौगिक की भाँति कार्य करने लगता है; अतः यह ध्रुवीय सहसंयोजी यौगिक का उदाहरण है।

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प्रश्न 4.19
निम्नलिखित अणुओं को आबंधों की बढ़ती आयनिक प्रकृति के क्रम में लिखिए –
LiF, K2O, N2, SO2, तथा CIF3
उत्तर:
दिये गये अणुओं में आबन्धों की बढ़ती आयनिक प्रकृति का क्रम निम्नवत् है –
N2 < SO2 < CIF3 < K2O < LiF

प्रश्न 4.20
CH3COOH की नीचे दी गई ढाँचा-संरचना सही है, परन्तु कुछ आबन्ध त्रुटिपूर्ण दर्शाए गये हैं। ऐसीटिक अम्ल की सही लूईस-संरचना लिखिए –
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उत्तर:
ऐसीटिक अम्ल की सही लूईस-संरचना निम्नवत्
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प्रश्न 4.21
चतुष्फलकीय ज्यामिति के अलावा CH4 अणु की एक और सम्भव ज्यामिति वर्ग-समतली है, जिसमें हाइड्रोजन के चार परमाणु एक वर्ग के चार कोनों पर होते हैं। व्याख्या कीजिए कि CH4 की अणु वर्ग-समतली नहीं होता है।
उत्तर:
CH4 की चतुष्फलकीय तथा वर्ग-समतलीय संरचनाएँ निम्न प्रकार से हैं –
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VSEPR सिद्धान्त के अनुसार, सहसंयोजी अणु में केन्द्रीय परमाणु पर साझित इलेक्ट्रॉन युग्मों को इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि उनमें प्रतिकर्षण बल न्यूनतम रहे। वर्ग समतलीय ज्यामिति में आबन्ध कोण 90° होता है जबकि चतुष्फलकीय ज्यामिति में आबन्ध कोण 1099 28′ होता है। चूंकि चतुष्फलकीय ज्यामिति में इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण, वर्ग समतलीय ज्यामिति की अपेक्षा कम है, अतः मेथेन को वर्ग-समतलीय संरचना द्वारा प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 4.22
यद्यपि Be – H आबन्ध ध्रुवीय है, तथापि BeH2 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
BeH2, बन्धकोण 180° वाला रेखीय (H-Be-H) अणु है। यद्यपि Be – H (Be और H परमाणुओं के मध्य विद्युत ऋणात्मकता के अन्तर के आधर पर) आबन्ध अध्रुवी हैं तथापि बन्धध्रुवणताएँ एक-दूसरे को समाप्त कर देती हैं। अतः अणु का परिणामी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है।

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प्रश्न 4.23
NH3 तथा NF3 में किस अणु का द्विध्रुव-आघूर्ण अधिक है और क्यों?
उत्तर:
NH3 तथा NF3 अणुओं की पिरामिडी आकृति होती है। NH3 (3.0 – 2.1 = 0.9) तथा NF3 4.0 – 3.0 = 1 अणुओं विद्युत ऋणात्मकता का अन्तर भी लगभग समान है, परन्तु NH3 (1.46 D) का द्विध्रुव आघूर्ण NF3 (0.24 D) से अधिक है। इसकी व्याख्या द्विध्रुव आघूर्णों की दिशा में अन्तर के आधार पर की जा सकती है। NH3 में तीन N – H बन्धों के द्विध्रुव आघूर्ण एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म की दिशा समान होती है जबकि NF3 में तीन N – F बन्धों के द्विध्रुव आघूर्ण एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म विपरीत दिशा में होते हैं।
अत: NH3 में द्विध्रुव आघूर्ण NF3 से अधिक होता है।
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प्रश्न 4.24
परमाणु कक्षकों के संकरण से आप क्या समझते हैं। sp, sp2 तथा sp3 संकर कक्षकों की आकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संकरण (Hybridisation):
CH4, NH3, H2O जैसे बहुपरमाणुक अणुओं की विशिष्ट ज्यामितीय आकृतियों को स्पष्ट करने के लिए पॉलिंग ने परमाणु कक्षकों के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। पॉलिंग के अनुसार परमाणु कक्षक संयोजित होकर समतुल्य कक्षकों का समूह बनाते हैं। इन कक्षकों को संकर कक्षक कहते हैं। आबन्ध विरचन में परमाणु शुद्ध कक्षकों के स्थान पर संकरित कक्षकों का प्रयोग करते हैं। इस परिघटना को हम संकरण कहते हैं। इसे निम्नवत् परिभाषित किया जा सकता हैं –

“लगभग समान ऊर्जा वाले कक्षकों के आपस में मिलकर ऊर्जा के पुनर्वितरण द्वारा समान ऊर्जा तथा आकार वाले कक्षकों को बनाने की प्रक्रिया को संकरण कहते हैं।”
उदाहरणार्थ:
कार्बन का एक 2s कक्षक तथा तीन 2p कक्षक संकरण द्वारा चार नाए sp3 संकर कक्षक बनाते हैं।

sp, sp2 तथा sp3 संकर कक्षकों की आकृति
(Shapes of sp, sp2 and sp3 hybrid orbitals)

sp, sp2 तथा sp3 संकर कक्षकों की आकृति का वर्णन निम्नलिखित है –

1. sp संकर कक्षक (sp-hybridised orbitals):
sp संकरण में परमाणु की संयोजकता कोश के s -उपकोश का एक कक्षक तथा p – उपकोश का एक कक्षक मिलकर समान आकृति एवं तुल्य ऊर्जा के sp संकरित कक्षक बनाते हैं। ये कक्षक आकृति में 180° के कोण पर अभिविन्यसित होते हैं।
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2. sp2 संकर कक्षक (sp2 – hybridised orbitals):
sp2 संकरण में परमाणु की संयोजकता कोश के s – उपकोश का एक कक्षक तथा p – उपकोश के दो कक्षक संयोजित होकर समान आकृति एवं तुल्य ऊर्जा के sp2 संकर कक्षक बनाते हैं। ये sp2
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संकर कक्षक एक तल में स्थित होते हैं तथा एक समबाहु त्रिभुज के कोनों पर एवं 120° कोण पर निर्देशित रहते हैं।

3. sp3 संकर कक्षक (sp3 – hybridised orbitals) sp3 संकरण में परमाणु की संयोजकता कोश के s – उपकोश का एक कक्षक तथा p – उपकोश के तीन कक्षक संयोजित होकर समान आकृति एवं तुल्य ऊर्जा के चार sp3 संकर कक्षक बनाते हैं। ये चारों sp3 संकर कक्षक एक चतुष्फलक के चारों कोनों पर निर्देशित रहते हैं।
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प्रश्न 4.25
निम्नलिखित अभिक्रिया में AI परमाणु की संकरण अवस्था में परिवर्तन (यदि होता है तो) को समझाइए –
AlCl3 + Cl → \(\mathrm{Alcl}_{4}^{-}\)
उत्तर:
AlCl3 में केन्द्रीय परमाणु Alsp2 संकरित है जबकि \(\mathrm{Alcl}_{4}^{-}\) आयन में Alsp3 संकरित है।
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प्रश्न 4.26
क्या निम्नलिखित अभिक्रिया के फलस्वरूप B तथा N परमाणुओं की संकरण-अवस्था में परिवर्तन होता हैं।
BF3 + NH3 → F3B•NH3
उत्तर:
BF3 में B परमाणु sp2 संकरित होता है और NH3 में N परमाणु sp3 संकरित होता है। BF3, NH3, के संयोजन से योगात्मक यौगिक बनाता है जिससे यह NH3, से एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर लेता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि B परमाणु संकरण sp2 से sp3 में परिवर्तित कर देते हैं। अत: N परमाणु के संकरण में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 4.27
C2H4 तथा C2H2 अणुओं में कार्बन परमाणुओं के बीच क्रमशः द्वि-आबन्ध तथा त्रि-आबन्ध के निर्माण को चित्र द्वारा स्पष्ट कीजिए। उत्तर:
1. C2H4
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चित्र: C2H4 में कार्बन परमाणुओं के मध्य द्वि-आबन्ध का बनना

2. C2H2
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प्रश्न 4.28
निम्नलिखित अणुओं में सिग्मा (σ) तथा पाई (π) आबंधों की कुल संख्या कितनी है?
(क) C2H2
(ख) C2H4
उत्तर:
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प्रश्न 4.29
X – अक्ष को अन्तर्नाभिकीय अक्ष मानते हुए बताइए कि निम्नालिखित में कौन-से कक्षक सिग्मा (σ) आबन्ध नहीं बनाएँगे और क्यों?
(क) 1s तथा 1s
(ख) 1s तथा 2px
(ग) 2Py तथा 2py
(घ) 1s तथा 2s
उत्तर:
आबन्ध अक्षीय अतिव्यापन द्वारा बनते हैं तथा निम्नलिखित स्थितियों में बनता है –
(क) 1s तथा 1s
(ख) 1s तथा 2px और
(घ) 1s तथा 2s1

प्रश्न 4.30
निम्नलिखित अणुओं में कार्बन परमाणु कौन-से संकर कक्षक प्रयुक्त करते हैं?
(क) CH3 – CH3
(ख) CH3 – CH = CH2
(ग) CH3 – CH2 – OH
(घ) CH3CHO
(ङ) CH3COOH
उत्तर:
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प्रश्न 4.31
इलेक्ट्रॉनों के आबन्धी युग्म तथा एकांकी युग्म से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आबन्धी युग्म:
ऐसा इलेक्ट्रॉन युग्म जो बन्ध निर्माण में प्रयुक्त होता है, आबन्धी युग्म कहलाता है।

एकाकी युग्म:
ऐसा इलेक्ट्रॉन युग्म जो बन्ध निर्माण में प्रयुक्त नहीं होते, एकाकी-युग्म कहलाते हैं।

उदाहरण:
NH3 में तीन आबन्धी युग्म तथा एक एकाकी युग्म होता है। इन्हें निम्न प्रकार से दर्शाया गया है –
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प्रश्न 4.32
सिग्मा तथा पाई आबंध में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
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प्रश्न 4.33
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त के आधार पर H2 अणु के विरचन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त को सर्वप्रथम हाइटलर तथा लंडन (Heitler and London) ने सन् 1927 में प्रस्तुत किया था, जिसका विकास, पॉलिंग (Pauling) तथा अन्य वैज्ञानिकों ने बाद में किया। इस सिद्धान्त का विवेचन परमाणु कक्षकों, तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों, परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन और संकरण तथा विचरण (variation) एवं अध्यारोपण (superposition) के सिद्धान्तों के ज्ञात पर आधारित है। इस सिद्धान्त के आधार पर

H2, अणु के विरचन की व्याख्या निम्नवत् की जा सकती है –
H(g) + H(g) →H2(g) + 433Kjmol-1

यह प्रदर्शित करता है कि हाइड्रोजन अणु की ऊर्जा हाइड्रोजन परमाणुओं की तुलना में कम है। सामान्यत: जब कभी परमाणु ‘संयोजित होकर अणु बनाते हैं, तब ऊर्जा में अवश्य ही कमी आती है जो स्थायित्व को बढ़ा देती है। माना हाइड्रोजन के दो परमाणु A व B जिनके नाभिक क्रमश: NA व NB हैं तथा उनमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों को eA और eB द्वारा दर्शाया गया है, एक-दूसरे की ओर बढ़ते हैं। जब ये दो परमाणु एक-दूसरे से अत्यधिक दूरी पर होते हैं, तब उनके बीच कोई अन्योन्यक्रिया नहीं होती। ज्यों-ज्यों दोनों परमाणु एक-दूसरे से समीप आते-जाते हैं, त्यों-त्यों उनके बीच आकर्षण तथा प्रतिकर्षण बल उत्पन्न होते जाते हैं।

आकर्षण बल निम्नलिखित में उत्पन्न होते हैं –

  1. एक परमाणु के नाभिक तथा उसके इलेक्ट्रॉनों के बीच NA – eA, NB – eB
  2. एक परमाणु के नाभिक तथा दूसरे परमाणु के इलेक्ट्रॉनों के बीच NA – NB – eA

इसी प्रकार प्रतिकर्षणबल निम्नलिखित में उत्पन्न होते –

  1. दो परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों के बीच eA – eB तथा
  2. दो परमाणुओं के नाभिकों के बीच NA – NB

आकर्षण बल दोनों परमाणुओं को एक-दूसरे के पास लाते हैं, जबकि प्रतिकर्षण बल उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं (चित्र में)।
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चित्र: H2, अणु के विरचन में आकर्षण तथा प्रतिकर्षण बल।

प्रायोगिक तौर पर यह पाया गया है कि नए आकर्षण बलों का मान नए प्रतिकर्षण बलों के मान से अधिक होता है। इसके परिणामस्वरूप दोनों परमाणु एक-दूसरे के समीप आते हैं तथा उनकी स्थितिज ऊर्जा कम हो जाती है। अन्ततः ऐसी स्थिति आ जाती है कि नेट आकर्षण बल प्रतिकर्षण बल के बराबर हो जाता है और निकाय की ऊर्जा न्यून स्तर पर पहुँच जाती है। इस अवस्था में हाइड्रोजन के परमाणु ‘आबन्धित’ कहलाते हैं और एक स्थायी अणु बनाते हैं जिसकी आबन्ध-लम्बाई 74 pm होती है।
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चित्र: H2 अणु के विरचन के लिए H परमाणुओं के बीच अन्तरानाभिक दूरी के सापेक्ष स्थितिज ऊर्जा का आरेख, आरेख में न्यूनतम ऊर्जा स्थिति H2 की सर्वाधिक स्थायी अवस्था दर्शाती है।

चूँकि हाइड्रोजन के दो परमाणुओं के बीच आबन्ध बनने पर ऊर्जा मुक्त होती है, इसलिए हाइड्रोजन अणु दो पृथक् परमाणुओं की अपेक्षा अधिक स्थायी होता है। इस प्रकार मुक्त ऊर्जा आबन्ध एन्थैल्पी’ कहलाती है। यह चित्र में दिए गए आरेख के संगत होती है। विलोमत: H2, के एक मोल अणुओं के वियोजन के लिए 433kJ ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसे आबन्ध वियोजन ऊर्जा कहा जाता है।
H2(g) + 433kJmol-1 → H(g) + H(g)

प्रश्न 4.34
परमाणु कक्षकों के रेखिक संयोग से आणविक कक्षक बनाने के लिये आवश्यक शर्तों को लिखिए।
उत्तर:
परमाणु कक्षकों के रैखिक संयोग से आणविक कक्षकों के निर्माण के लिये निम्नलिखित शर्ते अनिवार्य हैं –

1. संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों की ऊर्जा समान या लगभग समान होनी चाहिए:
इससे यह तात्पर्य है कि एक Is कक्षक दूसरे 1s कक्षक से संयोग कर सकता है जबकि 2s कक्षक से नहीं क्योंकि 25 कक्षक की ऊर्जा 1s कक्षक की ऊर्जा से अधिक होती है। ऐसा सत्य नहीं है कि परमाणु भिन्न प्रकार के हों।

2. संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों की आणविक अक्ष के परितः समान सममिति होनी चाहिए:
परिपाटी के अनुसार Z – कक्ष को आणविक अक्ष मानते हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि समान या लगभग समान ऊर्जा वाले परमाणु कक्षक केवल तभी संयोग करते हैं जब उनकी सममिति समान हो अन्यथा नहीं। जैसे – 2pz परमाणु कक्षक दूसरे परमाणु के 2pz कक्षक से संयोग करेगा। जबकि 2px या 2py कक्षकों से नहीं क्योंकि उनकी सममितियाँ समान नहीं हैं।

3. संयोग करने वाले परमाणु कक्षकों को अधिकतम अतिव्यापन करना चाहिए:
जितना अधिक अतिव्यापन होगा, आणविक कक्षकों के नाभिकों के बीच इलेक्ट्रॉन घनत्व उतना अधिक होगा।

प्रश्न 4.35
आणविक कक्षक सिद्धान्त के आधार पर समझाइए कि Be2 अणु का अस्तित्व क्यों नहीं होता?
उत्तर:
Be का परमाणु क्रमांक 4 है। इससे यह तात्पर्य है Be2 के आणविक कक्षक में 8 इलेक्ट्रॉन भरे जायेंगे। इसका विन्यास है –
KK (σ2s)2 (σ2s2)2
आबन्ध कोटि = \(\frac{1}{2}\) = (2 – 2) = 0
चूँकि आबन्ध कोटि शून्य है, अत: Be2 का अस्तित्व नहीं होता है।

प्रश्न 4.36
निम्नलिखित स्पीशीज के आपेक्षिक स्थायित्व की तुलना कीजिए तथा उनके चुम्बकीय गुण इंगित कीजिए –
O2, \(\mathrm{O}_{2}^{+}\), \(\mathrm{O}_{2}^{-}\) (सुपर ऑक्साइड) तथा \(\mathrm{O}_{2}^{2-}\) (पराऑक्साइड)
उत्तर:
दी गई स्पीशीज की आबन्ध कोटि निम्नवत् है –
O2(2.0), \(\mathrm{O}_{2}^{+}\) (2.5), \(\mathrm{O}_{2}^{-}\) (1.5), \(\mathrm{O}_{2}^{-}\) (1.0) इनके स्थायित्व का क्रम निम्नवत् हैं –
\(\mathrm{O}_{2}^{+}\), > O2 > \(\mathrm{O}_{2}^{-}\) > \(\mathrm{O}_{2}^{2-}\)

इनके चुम्बकीय गुण इस प्रकार होंगे –
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प्रश्न 4.37
कक्षकों के निरूपण में उपयुक्त धन (+) तथा ऋण (-) चिह्नों का क्या महत्व है?
उत्तर:
जब संयोजित होने वाले परमाणु कक्षों की पॉलियों के समान चिह्न (+ तथा + या – तथा -) हों तो आबन्धी कक्षक बनते इसके विपरीत जब संयोजित परमाणुओं के कक्षकों के चिह्न असमान (+ तथा -) हों, तो प्रतिआबन्धी आणविक कक्षक बनते है।

प्रश्न 4.38
PCl5 अणु में संकरण का वर्णन कीजिए। इसमें अक्षीय आबन्ध विषुवतीय आबन्धों की अपेक्षा अधिक लम्बे क्यों होते हैं?
उत्तर:
PCl5 अणु में sp3 d – संकरण (sp3 d – hybridisation in PCl5 Molecule)
फॉस्फोरस परमाणु (Z = 15) की तलस्थ अवस्था इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को नीचे दर्शाया गया है। फॉस्फोरस की आबन्ध निर्माण परिस्थितियों में 3s कक्षक से एक इलेक्ट्रॉन अयुग्मित होकर रिक्त 3dz2 कक्षक में प्रोन्नत हो जाता है। इस प्रकार फॉस्फोरस की उत्तेजित अवस्था के विन्यास को इस प्रकार दर्शाया जा सकता है –
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पाँच क्लोरीन परमाणुओं द्वारा प्रदत्त इलेक्ट्रॉनों युग्मों द्वारा भरे गए sp3 d – संकरित कक्षक

इस प्रकार पाँच कक्षक (एक s, तीन p तथा एक d कक्षक) संकरण के लिए उपलब्ध होते हैं। इनके संकरण द्वारा पाँच sp3d संकर कक्षक प्राप्त होते हैं जो त्रिकोणीय द्वि-पिरामिड के पाँच कोनों की और उन्मुख होते हैं, जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
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चित्र: PCl5 अणु की त्रिकोणीय द्वि-पिरामिडी ज्यामिति।

यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि त्रिकोणीय द्वि-पिरामिडी ज्यामिति में सभी आबन्ध कोण बराबर नहीं होते हैं PCl5, में फॉस्फोरस के पाँच sp3d संकर कक्षक क्लोरी परमाणुओं के अर्द्ध-पूरित कक्षकों में अतिव्यापन द्वारा पाँच P-Cl सिग्माआबन्ध बनाते हैं। इनमें से तीन P-Cl आबन्ध एक तल में होते हैं तथा परस्पर 120° का कोण बनाते हैं।

इन्हें ‘विषुवतीय आबन्ध’ (equatorial) कहते हैं अन्य दो P-Cl आबन्ध क्रमशः विषुवतीय तल के ऊपर और नीचे होते हैं तथा तल से 90° का कोण बनाते हैं। इन्हें अक्षीय आबन्ध (axial) कहते हैं। चूँकि अक्षीय आबन्ध इलेक्ट्रॉन युग्मों में विषुवतीय आबन्धी-युग्मों से अधिक प्रतिकर्षण अन्योन्यक्रियाएँ होती हैं; अतः ये आबन्ध विषुवतीय आबन्धों से लम्बाई में कुछ अधिक तथा प्रबलता में कुछ कम होते हैं। इसके परिणामस्वरूप PCl, अत्यधिक क्रियाशील होता है।

प्रश्न 4.39
हाइड्रोजन आबन्ध की परिभाषा दीजिए। यह वाण्डरवाल्स बलों की अपेक्षा प्रबल होते हैं या दुर्बल?
उत्तर:
हाइड्रोजन आबन्ध को उस आकर्षण बल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो एक अणु के हाइड्रोजन को दूसरे अणु के विद्युत-ऋणात्मक परमाणु (F, O या N) से बाँधता यह वाण्डरवाल्स बलों की अपेक्षा दुर्बल होते हैं।

प्रश्न 4.40
आबन्ध कोटि से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में आबन्ध कोटि का परिकलन कीजिए –
N2, O2, \(\mathrm{O}_{2}^{+}\), तथा \(\mathrm{O}_{2}^{-}\)
उत्तर:
आबन्ध कोटि-किसी अणु या आयन में दो परमाणुओं के बीच की संख्या को आबन्ध कोटि कहते हैं।
आबन्ध कोटि = \(\frac{1}{2}\)(Nb – Na)
यह आबन्धी आणविक कक्षकों तथा प्रति आबन्धी आणविक कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के अन्तर के आधे के बराबर होती है।
आबन्ध कोटि = \(\frac{1}{2}\)(Nb – Na)
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Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 8 निरपेक्ष न्याय

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 8 निरपेक्ष न्याय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 8 निरपेक्ष न्याय

Bihar Board Class 11 Philosophy निरपेक्ष न्याय Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
EA एक यथार्थ योग है –
(क) दो आकारों में
(ख) केवल एक आकार में
(ग) सभी आकारों में
(घ) किसी आकार में नहीं
उत्तर:
(ग) सभी आकारों में

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प्रश्न 2.
“सभी दवाएँ उपयोगी हैं, सेव उपयोगी है, इसलिए सेव दवा है।” इस न्याय में –
(क) अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष है
(ख) अनुचित प्रक्रिया दोष है
(ग) चतुष्पदी दोष है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष है

प्रश्न 3.
कोई एक आधार वाक्य अवश्य निषेधात्मक होगा –
(क) प्रथम आकार में
(ख) द्वितीय आकार में
(ग) तृतीय आकार में
(घ) चतुर्थ आकार में
उत्तर:
(ख) द्वितीय आकार में

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प्रश्न 4.
यदि कोई पद निष्कर्ष में व्याप्त हो और आधार वाक्य में नहीं, तो दोष होगा –
(क) अव्याप्त मध्यम पद का
(ख) अनुचित तरीके का
(ग) चतुष्पदी पद का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) अनुचित तरीके का

प्रश्न 5.
FERIO एक सही योग है –
(क) प्रथम आकार में
(ख) द्वितीयक आकार में
(ग) चतुर्थ आकार में
(घ) तृतीय आकार में
उत्तर:
(क) प्रथम आकार में

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प्रश्न 6.
बारबारा मूड (BARBARA Mood) हैं –
(क) द्वितीय आकार का
(ख) प्रथम आकार का
(ग) तृतीय आकार का
(घ) चतुर्थ आकार का
उत्तर:
(ख) प्रथम आकार का

प्रश्न 7.
न्याय (Syllolism) का अन्य नाम है –
(क) अनुमान
(ख) मध्याश्रित अनुमान
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्रथम आकार का

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प्रश्न 8.
निरपेक्ष न्याय (Categorical Syllogism) के पद होते हैं –
(क) वृहत् पद
(ख) लघु पद
(ग) मध्यवर्ती पद
(घ) ऊपर का सभी
उत्तर:
(घ) ऊपर का सभी

प्रश्न 9.
निष्कर्ष का उद्देश्य क्या कहलाता है?
(क) लघुपद
(ख) वृहत् पद
(ग) मध्यवर्तीय पद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) लघुपद

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प्रश्न 10.
निष्कर्ष का विधेय कहलाता है –
(क) वृहत् पद
(ख) लघुपद
(ग) मध्यवर्ती पद
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) वृहत् पद

प्रश्न 11.
न्याय के सामान्य नियमों की संख्या –
(क) 10
(ख) 16
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(क) 10

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प्रश्न 12.
यदि किसी न्याय का वृहत् वाक्य अंशव्यापी हो और लघुवाक्य निषेधात्मक हो तो वैध्य निष्कर्ष नहीं होगा। यह न्याय का कौन-सा नियम है?
(क) 10 वाँ
(ख) प्रथम
(ग) 7 वाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) 10 वाँ

प्रश्न 13.
“प्रत्येक न्याय में तीन और सिर्फ तीन पदों का प्रयोग होना चाहिए।” यह न्याय का कौन-सा नियम कहलाता है?
(क) प्रथम
(ख) द्वितीय
(ग) दसवीं
(घ) आठवीं
उत्तर:
(क) प्रथम

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प्रश्न 14.
कोई अनुमान न्याय होता है यदि इसमें –
(क) दो पद होते हैं
(ख) तीन पद होते हैं
(ग) चार पद होते हैं
(घ) पाँच पद होते हैं
उत्तर:
(ख) तीन पद होते हैं

प्रश्न 15.
अंशव्यापी वृहत् वाक्य (Particular Major Premise) एवं निषेधात्मक लघुवाक्य (Negative Minor Premise) से होता है –
(क) भावात्मक निष्कर्ष
(ख) निषेधात्मक निष्कर्ष
(ग) कोई निष्कर्ष नहीं
(घ) अंशव्यापी निष्कर्ष
उत्तर:
(ग) कोई निष्कर्ष नहीं

Bihar Board Class 11 Philosophy निरपेक्ष न्याय Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘BARBARA’ न्याय के किस आकार का वैध योग है?
उत्तर:
BARBARA न्याय के प्रथम आकार का वैध योग है।

प्रश्न 2.
न्याय का दसवाँ सामान्य नियम क्या है?
उत्तर:
न्याय का दसवाँ सामान्य नियम है – “यदि किसी न्याय का वृहत् वाक्य अंशव्यापी हो और लघुवाक्य निषेधात्मक हो तो वैध निष्कर्ष नहीं होगा।”

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प्रश्न 3.
न्याय के सामान्य नियम की संख्या कितनी है?
उत्तर:
न्याय के सामान्य नियमों की संख्या 10 (दस) है।

प्रश्न 4.
न्याय का प्रथम सामान्य नियम क्या है?
उत्तर:
न्याय का प्रथम सामान्य नियम यह है कि ‘प्रत्येक न्याय में तीन और सिर्फ तीन पदों का प्रयोग होना चाहिए।’

प्रश्न 5.
निरपेक्ष-न्याय में कितने पद होते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक न्याय में केवल तीन ही पद होते हैं। वे हैं-वृहत् पद, लघु पद एवं मध्यवर्ती पद।

प्रश्न 6.
लधु पद किसे कहते हैं?
उत्तर:
निष्कर्ष के उद्देश्य को लघु पद कहते हैं।

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प्रश्न 7.
वृहत् पद किसे कहते हैं?
उत्तर:
निष्कर्ष के विधेय को वृहत् पद कहते हैं।

प्रश्न 8.
मध्यवर्ती पद किसे कहते हैं?
उत्तर:
जो पद दोनों आधार वाक्य में होते हैं लेकिन निष्कर्ष में नहीं उसे मध्यवर्ती पद कहते हैं।

प्रश्न 9.
वृहत् वाक्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में वृहत् पद होता है उसे वृहत् वाक्य कहते हैं।

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प्रश्न 10.
न्याय किसे कहते हैं? अथवा, न्याय की परिभाषा दें।
उत्तर:
न्याय मध्याश्रित अनुमान का वह रूप है जिसमें दो आधार वाक्यों से निष्कर्ष निकाला जाता है। जैसे –
आधार – सभी मनुष्य मरणशील हैं।
वाक्य – मोहन मनुष्य है।
निष्कर्ष – ∴ मोहन मरणशील है।

प्रश्न 11.
न्याय का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर:
न्याय को ही हम मध्याश्रित अनुमान कहते हैं।

प्रश्न 12.
न्याय में कितने वाक्य होते हैं?
उत्तर:
न्याय में तीन वाक्य होते हैं। इसे हम वृहत् वाक्य, लघुवाक्य एवं निष्कर्ष कहते हैं।

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प्रश्न 13.
लघु वाक्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में लघु पद होता है उसे वृहत् वाक्य कहते हैं।

प्रश्न 14.
एक उदाहरण द्वारा वृहत् वाक्य, लघु वाक्य एवं निष्कर्ष को दिखावें।
उत्तर:
All men are mortal – Major Premise
Mohan is man – Minor Premise
Mohan is mortal – Conclusion

प्रश्न 15.
न्याय के प्रथम नियम के उल्लंघन से कौन-सा दोष उत्पन्न होता है?
उत्तर:
न्याय के प्रथम नियम के उल्लंघन से चतुष्पद दोष उत्पन्न होते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सिद्ध करें कि अगर किसी अनुमान का वृहद्वाक्य अंशव्यापी हो तथा लघुवाक्य निषेधात्मक हो तो उससे कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता।
उत्तर:
यदि अनुमान का लघुवाक्य निषेधात्मक है, तो वृहद्वाक्य अवश्य ही भावात्मक होगा। प्रश्न में दिया हुआ है कि वृहद्वाक्य अंशव्यापी है। अतः, वृहद्वाक्य हुआ अंशव्यापी भावात्मक (particular affirmative) अर्थात् I। लघुवाक्य निषेधात्मक है, अतः वह E होगा, O नहीं हो सकता, क्योंकि वृहद्वाक्य I है। दो अंशव्यापी वाक्यों से निष्कर्ष नहीं निकलता है।

प्रश्न का तात्पर्य है कि IE से निगमन नहीं निकलता हैं लघुवाक्य निषेधात्मक है, अतः निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा। निष्कर्ष के निषेधात्मक होने से वृहद्पद निष्कर्ष में व्याप्त हो जाता है, जो वृहद्वाक्य I में अव्याप्त है; क्योंकि I के उद्देश्य और विधेय दोनों अव्याप्त रहते हैं। अतः, अनुचित वृहद्पद (illicit major) का दोष हो जाता है। अतः, हम देखते हैं कि जब अनुमान का वृहद्वाक्य अंशव्यापी तथा लघुवाक्य निषेधात्मक होता है तब निष्कर्ष नहीं निकलता है।

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प्रश्न 2.
सिद्ध करें कि कोई भी पद निगमन में व्याप्त नहीं हो सकता जो असाधारणवाक्य में अव्याप्त है।
उत्तर:
निगमन तर्कशास्त्र का वह महत्त्वपूर्ण लक्षण है कि निगमन कभी भी अपने आधारवाक्य से अधिक व्यापक नहीं हो सकता, अर्थात् निगमन आधारवाक्य से कम व्यापक रहता है। अतः, अगर हम किसी पद को, जो आधारवाक्य में व्याप्त है, निगमन में व्याप्त कर देते हैं तो इसका अर्थ होगा कि निगमन (या निष्कर्ष) आधारवाक्य से अधिक व्याप्त हो जाएगा। परन्तु, ऐसा हम नहीं कर सकते। यह निगमन तर्कशास्त्र के मौलिक नियम के विरुद्ध होगा।

अतः, यदि आधारवाक्यों में कोई पद अव्याप्त है तो उसके निगमन में व्याप्त नहीं कर सकते। यदि हम ऐसा करते हैं तो अनुमान प्रक्रिया में अनुचित (illicit process) का दोष उत्पन्न हो जाता है। निगमन में दो पद हैं-वृहद्पद आर लघुपद, जो आधार वाक्यों में भी है। अतः, यदि हम वृहद्पद को निगमन में व्याप्त करते हैं जब वह वृहद्वाक्य में अव्याप्त रहता है तब अनुचित वृहद्पद का दोष (the fallacy of illicit major) होता है। इसी प्रकार, जब लघुपद को निगमन में व्याप्त करते हैं जबकि वह लघुवाक्य में अव्याप्त रहता है तब उसे अनुचित लघुपद का दोष (The fallacy of illicit minor) कहते हैं।

उदाहरण:
All students are rich – A
No leaders are students – E
∴ No leaders are rich – E

इसमें अनुचित वृहद्पद का दोष है।

दूसरा उदाहरण:
All teachers are poor – A
Some boys are teachers – A
∴ All boys are poor – A

इसमें अनुचित लघुपद का दोष है।

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प्रश्न 3.
सिद्ध करें कि अनुमान से मध्यवर्ती पद को कम-से-कम एक बार व्याप्त होना आवश्यक है।
उत्तर:
मध्यवर्ती पद का अनुमान में बहुत महत्त्व है। मध्यवर्ती पद का कार्य है वृहद्पद तथा लघुपद में संबंध स्थापित करना। वृहद्वाक्य में मध्यवर्ती पद का संबंध वृहद्पद से रहता है तथा लघुवाक्य में लघुपद से। अब मध्यवर्ती पद कम-से-कम एक बार भी व्याप्त नहीं है तो इसका अर्थ होगा कि वृहद्पद का संबंध मध्यवर्ती पद से किसी एक अंश से तथा लघुपद का संबंध मध्यवर्ती पद के किसी दूसरे अंश से है। ऐसी हालत में हम वृहद्पद तथा लघुपद में संबंध स्थापित नहीं कर सकते।
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व्याप्त का अर्थ होता है निश्चित। अव्याप्त का अर्थ होता है। अनिश्चित। अगर मध्यवर्ती पद व्याप्त नहीं है, अर्थात् अव्याप्त है तो इसका अर्थ है कि मध्यवर्ती पद अनुमान में अनिश्चित है। जब मध्यवर्ती। पद अनिश्चित है तब वह लघुपद और वृहद्पद में किस प्रकार संबंध M स्थापित कर सकता है? मध्यवर्ती पद तो ठीक घटक या अगुआ की तरह है जो लड़का और लड़की के पक्ष में संबंध स्थापित करता है। अगर अगुआ ही अनिश्चित है तो वह किस प्रकार दो पक्षों को आपस में मिलाएगा?

अतः, मध्यवर्ती पद का कम-से-कम एक बार भी व्याप्त होना आवश्यक है। अगर वह व्याप्त नहीं है तो संबंध स्थापित नहीं हो सकता। एक सांकेतिक उदाहरण लेकर देखें कि अगर मध्यवर्ती पद अव्याप्त है तो संबंध स्थापित नहीं होता है, जैसे All P is M. AllS is M. यहाँ मध्यवर्ती पद M दोनों में अव्याप्त है। इस अनुमान को चित्र द्वारा प्रमाणित करते हैं। चित्र में हम देखते हैं कि M के ऊपरी हिस्से से संबंध है P का तथा M के निचले हिस्से से संबंध है S का। अब Pऔर S के बीच संबंध नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों का संबंध मध्यवर्ती पद के दो हिस्सों से है। अतः, मध्यवर्ती पद का कम-से-कम एक बार व्याप्त होना आवश्यक है।

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प्रश्न 4.
सिद्ध करें कि यदि दोनों आधार वाक्यों में एक निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष अवश्य ही निषेधात्मक होगा।
उत्तर:
यदि दो आधार वाक्यों में एक निषेधात्मक है तो दूसरा अवश्य ही भावात्मक होगा; क्योंकि दो निषेधात्मक वाक्यों से निष्कर्ष नहीं निकलता है। अब यदि अनुमान में कोई आधार वाक्य निषेधात्मक है तो इसका अर्थ है कि उस वाक्य में मध्यवर्ती पद के साथ वृहद्पद या लघुपद किसी एक का संबंध नहीं है। दूसरा वाक्य भावात्मक है, तो इसका अर्थ है कि मध्यवर्ती पद के साथ किसी एक वृहद्पद या लघुपद का संबंध है।

मध्यवर्ती पद का संबंध एक से है तो इससे हम यही निष्कर्ष निकालेंगे कि वृहद्पद और लघुपद दोनों में निषेधात्मक संबंध है। एक उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाएगा – मोहन और सोहन में संबंध है, सोहन और यदु में संबंध नहीं है। अतः, मोहन और यदु के बीच संबंध नहीं है। अतः, दो आधारवाक्यों में एक आधारवाक्य निषेधात्मक होता है तो निष्कर्ष अवश्य निषेधात्मक ही होगा। इस नियम का प्रतिलोम भी सत्य है। अगर निष्कर्ष होगा तो एक आधारवाक्य अवश्य ही निषेधात्मक होगा।

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प्रश्न 5.
सिद्ध करें कि प्रत्येक न्याय में तीन और केवल तीन पद होते हैं।
उत्तर:
यदि तर्क के लिए मान लें कि न्याय में तीन पद नहीं हैं तो ये पद तीन से कम अर्थात् दो या तीन से अधिक हो सकते हैं। यदि किसी अनुमान में तीन से कम अर्थात् दो पद हैं तो यह न्याय न होकर साक्षात् अनुमान हो जाता है। यदि इसमें चार पद हों तो न्याय में ‘चतुष्पदीय दोष’ (fallacy of four terms) हो जाता है।

किसी भी न्याय में तीन पद होते हैं-वृहत्पद (major term), लघुपद (minor term) तथा मध्यवर्ती पद (middle term)। मध्यवर्ती पद एक माध्यम का कार्य करता है जिसके द्वारा वृहत्पद तथा लघुपद के बीच संबंध स्थापित किया जाता है। इसलिए तीन से कम पदों से न्याय नहीं बन सकता। चार पद यदि एक-दूसरे से पृथक् हों तो फिर दो पदों में संबंध स्थापित नहीं होगा। चार पद रहने से न्याय में दोष उत्पन्न हो जाता है, जिसे ‘चतुष्पदीय दोष’ कहते हैं। यह दोष तीन प्रकार से उत्पन्न हो सकता है –

(a) जब. मध्वर्ती पद द्वयर्थक (ambiguous middle) हो
(b) जब वृहत्पद द्वयर्थक (ambiguous major) हो, और
(c) जब लघुपद द्वयर्थक (ambiguous minor) हो।

उदाहरण (क):
All pages are Indian.
All books are made of pages.
∴ All books are Indian.

इस अनुमान में चार पद हैं। यहाँ ‘pages’ मध्यवर्ती पद है, जिसके दो अर्थ हैं – वृहद्वाक्य में इसका अर्थ ‘नौकर’ है तथा लघुवाक्य में इसका अर्थ ‘पन्ना’ है। इसलिए यहाँ चतुष्पदीय दोष हो जाता है। यह दोष मध्यवर्ती पद के दो अर्थों के कारण हुआ है।

(ख) धोबी की पत्नी स्त्री नहीं है।
धोबिन धोबी की पत्नी है।
∴ धोबिन स्त्री नहीं है।

इस अनुमान में वृहद्पद (स्त्री) दो अर्थों में प्रयुक्त है। वृहद्वाक्य में ‘स्त्री’ का अर्थ ‘iron’ है तथा निष्कर्ष में इसका अर्थ ‘औरत’ है। इसीलिए, इसमें चतुष्पदीय दोष उत्पन्न हो गया है।

(ग) अस्त्र वीरों का सहायक है।
तीर (वाण) एक अस्त्र है।
∴ तीर (नदी का किनारा) वीरों का सहायक है।

यहाँ लघुपद (तीर) द्वयर्थक है। लघुवाक्य में ‘तीर’ का अर्थ ‘वाण’ है तथा निष्कर्ष में इसका अर्थ ‘नदी का किनारा’ है। इसीलिए इस न्याय में चतुष्पदीय दोष उत्पन्न हो जाता है। अतः सिद्ध होता है कि न्याय में केवल तीन पद होते हैं, न उससे कम न उससे अधिक।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 8 निरपेक्ष न्याय

प्रश्न 6.
सिद्ध करें कि प्रत्येक न्याय में केवल तीन वाक्य होते हैं।
उत्तर:
प्रत्येक न्याय में केवल तीन वाक्य होते हैं, यही सिद्ध करना है। मान लें कि न्याय में तीन वाक्य नहीं हैं तो इसमें या तो तीन से कम अर्थात् दो वाक्य होंगे या तीन से अधिक वाक्य होंगे। यदि इसमें तीन से कम अर्थात् दो वाक्य हैं तो यह अनुमान साक्षात् अनुमान होगा, न कि न्याय या मध्याश्रित अनुमान। अतः, तीन से कम वाक्य नहीं होंगे। अब यदि इसमें तीन से अधिक वाक्य हैं तो यह एक न्याय न होकर कई न्यायों का समूह होगा। इसलिए न्याय में तीन से अधिक वाक्य नहीं होंगे। अतः यह प्रमाणित होता है कि न्याय में केवल तीन वाक्य होते हैं।

प्रश्न 7.
सिद्ध करें कि यदि दोनों आधार वाक्य-निषेधात्मक हों तो उनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।
उत्तर:
किसी भी न्याय में मध्यवर्ती पद का कार्य वृहद्पद तथा लघुपद के बीच संबंध स्थापित करना है। वृहद्वाक्य तथा लघुवाक्य के निषेधात्मक होने का अर्थ है कि मध्यवर्ती पद वृहद्पद से पृथक् है और यह लघुपद से भी पृथक् है। ऐसी स्थिति में यह वृहद्पद तथा लघुपद के बीच संबंध स्थापित करने में असमर्थ है। अतः दोनों आधारवाक्य निषेधात्मक होने से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। यही सिद्ध करना था।

प्रश्न 8.
सिद्ध करें कि यदि दोनों आधार वाक्य अंशव्यापी हों तो उनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।
उत्तर:
अंशव्यापी वाक्य दो हैं ‘I’ तथा ‘O’। यदि न्याय के दोनों आधारवाक्य अंशव्यापी हों, तो चार संयोग (combinations) बन सकते हैं – II, IO, OI, OO. इन चारों संयोगों में किसी से भी सही निष्कर्ष नहीं निकल सकता। इसे हम यों सिद्ध कर सकते हैं –
‘II’ आधारवाक्यों में कोई पद व्याप्त नहीं है। अतः, इनसे बने न्याय में अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। इसलिए II से सही निष्कर्ष नहीं निकल सकता।

IO तथा OI – इन योगों में एक आधारवाक्य निषेधात्मक है, इसलिए इनके निष्कर्ष निषेधात्मक होंगे तथा इनमें विधेय अर्थात् वृहद्पद व्याप्त होंगे। इन आधारवाक्यों में केवल एक ही पद व्याप्त हो सकता है। वृहद्पद के निष्कर्ष में व्याप्त होने के कारण इसे वृहद्वाक्य में व्याप्त करना आवश्यक है। ‘IO’ योग में वृहद्वाक्य ‘I’ है जिसका कोई भी पद व्याप्त नहीं है। अतः, इसमें अनुचित वृहद्पद का दोष हो जाता है। ‘OI’ योग में वृहद्वाक्य ‘O’ है, जिसका विधेय व्याप्त है।

वृहद्पद को इसका विधेय बना देने से यह दोष तो नहीं होता, परंतु मध्यवर्ती पद अव्याप्त रह जाता है और यहाँ अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता हैं अतः, ‘IO’ तथा ‘O’ से निष्कर्ष नहीं निकल सकता। OO – यहाँ दोनों आधारवाक्य निषेधात्मक है। अतः, इनसे कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता। इस योग में दो निषेधात्मक आधारवाक्यों का दोष (fallacy of two negatives) हो जाता है। अतः, उपर्युक्त विवेचन से सिद्ध होता है कि दो अंशव्यापी आधारवाक्यों से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित की जाँच करें।
1. The virtuous alone are happy. He virtuous. Therefore he is happy
उत्तर:
L.F – All happy persons are virtuous – A
He virtuous – A
∴ He is happy – A
यह शुद्ध निरपेक्ष न्याय का उदाहरण है। इसके दोनों आधारवाक्य भावात्मक हैं और मध्यपद दोनों आधारवाक्य में विधेय की जगह पर रहने से अव्याप्त है और न्याय के तीसरे नियम के अनुसार सही निष्कर्ष निकालने के लिए न्याय के दोनों आधारवाक्य में मध्यपद को कम-से-कम एक बार अवश्य ही व्याप्त होना चाहिए, जो इस न्याय में नहीं है। अतः, यह दोषपूर्ण है और इसमें ‘अव्याप्त मध्यपद-दोष’ (Fallacy of Undistributed Middle) है।

2. All students are men. Therefore all men are students.
उत्तर:
L.F. – All students are men. – A
∴ All men are students. – A

यह साक्षात् अनुमान का उदाहरण है। यहाँ A का आवर्तन A में किया गया है जिसके कारण आवर्तन के तीसरे नियम (जो पद आधारवाक्य में व्याप्त नहीं है उसे निष्कर्ष में भी व्याप्त नहीं होना चाहिए) का उल्लंघन हुआ है। आधारवाक्य में ‘men’ अव्याप्त है, परंतु निष्कर्ष में A वाक्य का उद्देश्य होने से व्याप्त हो गया है। अतः, यह गलत आवर्तन का दोष है।

3. Ritu is the teacher of Rupu. Rupu is the teacher of Rupesh. Therefore.. Ritu is the teacher of Rupesh.
उत्तर:
L.F. – Rupu is the teacher of Rupesh. – A
Ritu is the teacher of Rupu. – A
∴ Ritu is the teacher of Rupesh. – A

यह मध्याश्रित अनुमान का उदाहरण है। इस न्याय में तीन पद के बदले चार पद का व्यवहार किया गया है, इसलिए यह न्याय दोषपूर्ण है और इस दोष को ‘चतुष्पद दोष’ (Fallacy of Four Terms) कहते हैं। ये चार पद हैं –

  • Rupu
  • The teacher of Rupesh
  • Ritu तथा
  • The teacher of Rupu.

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प्रश्न 10.
अनुचित लघुपद दोष क्या है?
उत्तर:
अनुचित लघुपद का दोष-यह दोष न्याय में तब होता है, जब लघुपद लघुवाक्य में अव्याप्त हों, किन्तु निष्कर्ष में व्याप्त हो। जैसे –
A. All good men are kind.
A. All kind persons are poor persons.
A. ∴ All poor persons are good men.
यहाँ लघुपद (poor persons) लघुवाक्य में ‘A’ का विधेय होने के कारण अव्याप्त है, किन्तु निष्कर्ष में ‘A’ का उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः, यहाँ अनुचित लघुपद का दोष है।

प्रश्न 11.
न्याय के योग पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
योग (Mood) न्याय का वह रूप है जो न्याय के तर्कवाक्यों (आधार का निष्कर्ष) से अथवा आधारवाक्यों से निर्धारित होता है। परिणाम और गुण के अनुसार चार आदर्श तर्कवाक्य होते हैं – ‘A’, ‘E’, ‘I’ और ‘O’। योग के इन्हीं चारों वाक्यों में किन्हीं तीन का सामंजस्य होता है और इनमें किन्हीं तीन तर्कवाक्यों के सम्मिश्रण को न्याय का योग कहते हैं। चारों आकारों के कुल उन्नीस योग यथार्थ माने जाते हैं।

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प्रश्न 12.
न्याय के आकारों पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
न्याय का आकार मध्यवर्ती पद के आधारवाक्यों में स्थान के आधार पर निर्धारित होता है। मध्यवर्ती पद वृहद्वाक्य और लघुवाक्य में उद्देश्य और विधेय के स्थान पर रह सकता है। इस प्रकार, न्याय के चार प्रकार के आकार होते हैं-प्रथम आकार, द्वितीय आकार, तृतीय आकार तथा चतुर्थ आकार।

प्रथम आकार के वृहद्वाक्य में मध्यवर्ती पद उद्देश्य के स्थान पर रहता है और लधुवाक्य में विधेय के स्थान पर रहता है। द्वितीय आकार में मध्यवर्ती पद दोनों आधारवाक्यों में विधेय के स्थान पर रहता है। तृतीय आकार में मध्यवर्ती पद दोनों आधारवाक्यों में उद्देश्य के स्थान पर रहता है। चतुर्थ आकार में मध्यवर्तीय पद वृहद्वाक्य में विधेय के स्थान पर तथा लघुवाक्य में उद्देश्य के स्थान पर रहता है।

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यहाँ ‘M’ मध्यवर्ती पद, ‘P’ वृहद्पद तथा ‘S’ लघुपद है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
मध्याश्रित अनुमान या न्याय क्या है? इसके लक्षण का उल्लेख करते हुए इसका विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
तर्कशास्त्र के महान् विद्वान अरस्तू के अनुसार मध्याश्रित अनुमान न्याय हैं इसमें दो आधार वाक्यों से निष्कर्ष की प्राप्ति होती है। इन दो आधार वाक्यों के बीच एक मध्यवर्ती पद होता है जिसके सहारे ही निष्कर्ष निकाला जाता है। इस मध्याश्रित अनुमान को अरस्तू ने “न्याय” (Syllogism) की संज्ञा दी है। इसकी परिभाषा में कहा गया है –

“A syllogism is a form of mediate deducive inference, in which the con clusion is drawn from premises, taken jointly.” अर्थात् न्याय निगमनात्मक अनुमान का वह रूप है जिसमें दो आधार वाक्यों के सम्मिलन से निष्कर्ष निकाला जाता है, यथा –

All men are mortal – premise
Ram is a man.
∴ Ram is mortal – conclusion

न्याय के लक्षण (Characteristics of Syllogism):
उपर्युक्त परिभाषा के आधार पर न्याय के निम्नलिखित लक्षणों का बोध होता है।

1. न्याय का निष्कर्ष दो आधार वाक्यों के सहारे निकाला जाता है, यथा –
सभी मनुष्य मरणशील हैं,
राम मनुष्य है
∴ राम मरणशील है।
चूँकि इसमें दो आधार वाक्य होते हैं इसलिए इसे मध्याश्रित अनुमान (Mediate Inference) कहते हैं।

2. वह निगमनात्मक अनुमान है इसलिए इसका निष्कर्ष आधार वाक्य से अधिक व्यापक नहीं हो सकता है। We cannot go beyond the data.

3. आधार वाक्य की सत्यता मान ली जाती है। आधार की सत्यता को शक की दृष्टि से नहीं देखना है बल्कि यह देखना है कि आधार वाक्य से नियमानुकूल निष्कर्ष निकलता है या नहीं। अनुमान का रूप सही होना चाहिए। विषय से हमें यहाँ मतलब नहीं है। क्योंकि इसमें Formal truth से ही संबंध है। यथा –

All men are gods.
Ram is a man.
∴ Ram is a god.
इस व्यापकता का रूप एकदम सही है। यदि दोनों आधार वाक्य सत्य मान लिया जाए तो निष्कर्ष भी सत्य मानना है।

न्याय का विश्लेषण (Analysis of syllogism):
बनावट की दृष्टि से न्याय का विश्लेषण निम्नलिखित ढंग से कर सकते हैं।

  • All men are mortal – Premise
  • Ram is a man – Premise II
  • Ram is mortal – conclusion.

यहाँ तीन वाक्य है और प्रत्येक वाक्य में दो पर्दे हैं, उद्देश्य और विधेय (subject and predicate) इसलिए 3 × 2 = 6 पर होनी चाहिए। लेकिन इसमें तीन ही पद की मान्यता दी गई है। क्योंकि प्रत्येक पद दो बार आये हैं। ये तीन पद हैं – (a) लघु पद (Minor term) इसमें conclusion के subject को Minor term (लघु पद) कहते हैं। यह पद बीच वाला वाक्य के subject के स्थान पर भी है (Ram)। इसे वृहत् पद Major term निष्कर्ष के विधेय predicate का वृहत् पद (Major term) कहते हैं और यह प्रथम आधार पर वाक्य का विधेय से भी है – (Mortal)।

मध्यवर्ती पद (Middle term):
जो पद दोनों आधार वाक्यों में होता है लेकिन निष्कर्ष में नहीं उसे मध्यवर्ती पद कहते हैं। यहाँ Man ही middle term है। इस तरह सांकेतिक भाषा में minor term को S, Major term को P तथा Middle term को M कहते हैं। इसमें M ही S and P के बीच संबंध स्थापित कराता है। जैसे – All men are mortal में Man को Mortal से संबंधित किया गया है। इसके दूसरे आधारवाक्य में Ram is a man में राम को Man से संबंधित किया गया है। इसलिए एक ही पद Man से Ram and mortal दोनों संबंधित होने के कारण वे आपस में भी संबंधित हो जाएँगे अर्थात् Ram is mortal होगा।

न्याय में तीन Propositions होते हैं, जैसे –

  • All men are rich.
  • Ram is man.
  • Ram is rich.

इसमें पहले वाक्य को वृहत् वाक्य Major premise कहते हैं, क्योंकि इसमें Major term आया है – Rich और दूसरे वाक्य को लघु वाक्य Minor premise कहते हैं क्योंकि इसमें Minor term आया है – (Ram) और तीसरे वाक्य को निष्कर्ष (conclusion) कहते हैं, जैसे –
∴ Ram is rich तीसरा वाक्य है। इस तरह Syllogism में Major Premise, Minor Premise and conclusion होते हैं। जैसे –
All men are rich – Major premise
Ram is a man – Minor premise
∴ Ram is rich – conclusion.

Major premise में दो Middle term and Major term (M.P.) Minor premise में भी दो पद हैं Minor term and middle term (S-M) तथा conclusion में भी दो पद हैं Minor term and Major term (S-P).

इस तरह Syllogism की रूप-रेखा इस प्रकार बनती है:
Major premise (M-P) Minor premise (S-M), conclusion (S-P)

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प्रश्न 2.
न्याय के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
न्याय के प्रकार (Kinds of syllogism):
न्याय दो प्रकार के होते हैं –
(a) शुद्ध (Pure) और
(b) मिश्रित (Mixed)

(a) जिस न्याय में तीनों वाक्य एक ही तरह के होते हैं, उसे शुद्ध न्याय कहते हैं। अर्थात् तीनों categorical हों या तीनों Hypothetical हों या तीनों disjunctive हों, जैसे –
All men are mortal.
Ram is a man.
∴ Ram is mortal. ये तीनों वाक्य categorical हैं।

लेकिन जिस न्याय के तीनों वाक्य एक तरह के नहीं होते हैं, उसे मिश्रित न्याय कहते हैं। . यह mixed syllogism भी तीन तरह के हैं।

  • हेत्वाश्रित निरपेक्ष न्याय
  • वैकल्पिक निरपेक्ष न्याय
  • द्विविधा

इसमें शुद्ध न्याय जिसके तीनों वाक्य categorical propositions होते हैं। यह न्याय तभी सही valid माना जाएगा जब कि वह नियमों का पालन करता हो। अतः इसे न्याय के सामान्य नियम (general syllogism Rules) कहते हैं, जो निम्नलिखित दस हैं।

1. नियम:
Every syllogism must have three and only three terms अर्थात् प्रत्येक न्याय में तीन और केवल तीन पदों का प्रयोग होना चाहिये। जैसा कि हम जानते हैं कि Major term, Minor and Middle term तीन पद होते हैं।

इस नियम के उल्लंघन करने से चतुष्पद दोष (Fallacy of four term) हो जाते हैं। यह दोष तब होता है जब Middle term के दो अर्थ होते हैं, जैसे –

धोबी की पत्नी स्त्री (Iron) नहीं है।
धोबिन धोबी की पत्नी है।
∴ धोबिन स्त्री (औरत) नहीं है।

अस्त्र वीरों का सहारा है।
तीर (वाण) एक अस्त्र है।
∴ तीर (नदी का किनारा) वीरों का सहारा है।

इसमें स्त्री वृहत् पद में कपड़ा iron का अर्थ और निष्कर्ष में स्त्री औरत का अर्थ रखता है। इस तरह तीर लघु पद में दो अर्थ रखता है। इसे चतुष्पद का दोष या द्वयअर्थक का दोष Fallacy of ambiguous or Fallacy of four terms कहते हैं। इस तरह हर न्याय में हर हालत में तीन ही पद होना चाहिए। कम या अधिक नहीं।

2. नियम:
Every syllogism must have three and only three propositions. अर्थात् प्रत्येक न्याय में तीन और केवल तीन वाक्य होने चाहिए। न्याय में तीन ही पद होते हैं इन तीनों पदों में आपस में केवल तीन प्रकार के ही संबंध हैं इसलिए केवल तीन ही तर्क वाक्य बनने की गुंजाइश होती है।

  • मध्य पद का जब वृहत् पद से संबंध स्थापित करते हैं तो वृहत् वाक्य बनता है।
  • मध्य पद का संबंध जब लघु पद से बनता है तब लघु वाक्य बनता है।
  • वृहत् पद तथा लघु पद के आपसी संबंध से निष्कर्ष वाक्य की प्राप्ति होती है, जैसे-सभी जीव ईश्वर की संतान हैं।

सभी मनुष्य जीव हैं।
∴ सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं।

3. नियम:
Middle term must be distributed at least once. अर्थात् मध्य पद को कम-से-कम एक बार अवश्य होना चाहिए। निष्कर्ष के लिए यह आवश्यक है कि Middle term को कम-से-कम एक बार पूरे रूप से S या P के संबंध हो आंशिक रूप से नहीं। यदि Middle term पूर्ण रूप से एक बार भी आ जाता है अर्थात् व्याप्त हो जाता है तो S या P का पूर्ण रूप से M से संबंध होता है। उस हालत में दूसरे को यदि इसके अर्थ में भी संबंध होता है तो उस अर्थ में S और P संबंधित हो जाते हैं जिससे निष्कर्ष संभव हो जाता है। इसलिए मध्यवर्ती पद को कम-से-कम एक बार व्याप्त होना आवश्यक है।

इस नियम का उल्लंघन:
यदि मध्यवर्ती पद को दोनों आधार वाक्यों में एक बार भी व्याप्त नहीं करते हैं तो इस नियम के उल्लंघन होने से अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष (Fallacy of undistributed middle) हो जाता है, जैसे –
Some of the unemployed are, idle – I
∴ He is idle – A.
∴ He is unemployed – A.

यहाँ iddle middle term है जो एक बार भी व्याप्त नहीं है क्योंकि पहले में यह I का तथा दूसरे में A का विधेय है जो अपने विधेय को व्याप्त नहीं करते हैं। अतः इस अनुमान में अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष है। Fallacy of undistributed term. इस तरह I must get the concession, because I am a student and only stu dents get the concession को जब Syllogism में लाते हैं तो इस प्रकार L.F. –
L.F. All who get concession are students. – A
I am a student. – A
∴ I am such who must get the concession. – A

यहाँ दोनों आधार वाक्यों में student ही middle term है जो व्याप्त नहीं है। अतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष है।
हिन्दी में –

(i) सत्यवादी मनुष्य सुखी हैं – A
सभी धनी व्यक्ति सुखी हैं – A
∴ सभी धनी व्यक्ति सत्यवादी हैं – A

(ii) सोहन का पिता मनुष्य है – A
मोहन का पिता मनुष्य है – A
∴ मोहन का पिता सोहन के पिता हैं – A

इन दोनों उदाहरणों में मध्यवर्ती पद सुखी पहले में तथा दूसरे में मनुष्य पद अव्याप्त है, अतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है।

4. नियम:
No term should be distributed in the conclusion which is not distributed in the premise. अर्थात् निष्कर्ष में उस पद को व्याप्त नहीं करना चाहिए जो आधार वाक्य में व्याप्त नहीं है। यह तो साधारण नियम है कि निष्कर्ष आधार वाक्य से अधिक व्यापक नहीं होना चाहिए। अव्याप्त का अर्थ है “कुछ” और व्याप्त का अर्थ है “पूरा”। इसलिए आधार के अव्याप्त पद को निष्कर्ष में व्याप्त नहीं कर सकते हैं। इस नियम के उल्लंघन करने पर दो तरह के दोष हो जाते हैं –

(i) अनुचित वृहत् पद का दोष तथा अनुचित लघु पद का दोष।

(ii) निष्कर्ष में लघु पद तथा वृहत् पद रहते हैं। अतः यह सिद्ध है कि जब लघु पद आधार वाक्य में अव्याप्त हो और निष्कर्ष में व्याप्त हो तो अनुचित लघुपद दोष (Fallacy of illicit minor) हो जाता है और जब वृहत् पद अपने आधार वाक्य में अव्याप्त हो और निष्कर्ष में व्याप्त तब अनुचित वृहत् पद-दोष (Fallacy of illicit major) हो जाता है, जैसे – You are not what, I am a man, therefore you are not a man.

L.F A I/am a man – Major premise
E You/are not/I – Minor premise
∴ You/are not a man – conclusion

यहाँ ‘A man’ major term है। क्योंकि यही निष्कर्ष का Predicate है जो विधेय होने के कारण व्याप्त है परन्तु विधेय होने के कारण आधार वाक्य में यह अव्याप्त है। इस तरह आधार का अव्याप्त Major term निष्कर्ष में आकार व्याप्त हो गया है। इसलिए इसमें अनुचित वृहत् पद-(Fallacy of illicit major term) का दोष है।

(iii) इसी तरह आधार में minor term के व्याप्त नहीं रहने पर यदि निष्कर्ष में उसे व्याप्त कर लिया जाता है तो उत्पन्न दोष को अनुचित लघुपद का दोष (Fallacy of illicit minor) कहा जाता है। जैसे – No tale bearer is trusted and therefore no great talker is to be trusted for all tale bearer are great talkers. इसे L.F. बनाकर Syllogism का रूप देने पर –

E No tale bearer is to be trusted.
A – All tale-bearers are great talkers.
∴ E No great talkers are to be trusted.

यहाँ minor term ‘great talkers’ आधार वाक्य ‘A’ का विधेय होने के कारण अव्याप्त है जो निष्कर्ष में E का उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः अनुचित लघुपद का दोष (Fallacy of illicit minor) का दोष हो जाता है।

(i) All P is M
Some S is not P.
∴ No Sis P

(ii) Some S is P.
No Sis M.
∴ No Sis P.

हाँ पहले वाक्य में Fallacy of illicit minor है तथा दूसरे में Fallacy of illicit manor है।

5. नियम:
If both the premise be negative no conclusion follows. अर्थात् यदि दोनों आधार वाक्य निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष नहीं निकलता है। यहाँ हम देखते हैं कि निषेधात्मक वाक्यों में A उद्देश्य और विधेय में मेल नहीं होता है, जैसे-गुलाब लाल नहीं है तो यह निषेधात्मक वाक्य है। इसका अर्थ है कि गुलाब और लाली में मेल नहीं है। इसी तरह यदि दोनों आधार वाक्य निषेधात्मक हैं तो मध्यवर्ती पद को न तो वृहद् पद से मेल होगा न लघु पद से।

इस हालत में मध्यवर्ती पद में मध्यस्थ का काम नहीं कर सकता। इस हालत में दोनों निषेधात्मक वाक्य रहने से निष्कर्ष संभव नहीं है। इस नियम के उल्लंघन करने पर उत्पन्न दोष को निषेधात्मक आधार वाक्यों का दोष (Fallacy of negative premise) कहते हैं। जैसे –

गणेश कार्तिक का भाई नहीं है।
कार्तिक का भाई कृष्णा का दुश्मन नहीं है।
∴ कृष्णा का दुश्मन गणेश नहीं है।

यह न्याय गलत है। क्योंकि यहाँ उभय निषेध दोष (Fallacy of two negative premises) है।
इसी तरह ENo M is P.
E No S is M.
कोई शुद्ध निष्कर्ष नहीं होगा।

6. नियम:
If one premise be negative the conclusion must be negative. अर्थात् यदि कोई एक आधार वाक्य निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष अवश्य निषेधात्मक होगा।

प्रमाण:
यदि एक आधार वाक्य निषेधात्मक होगा तो दूसरा अवश्य ही भावात्मक होगा। क्योंकि नियम (5) के अनुसार दोनों आधार वाक्य निषेधात्मक नहीं हो सकते हैं। इसका अर्थ है कि मध्यवर्ती पद को लघुपद और वृहत् पद में से एक के साथ मेल है और दूसरे के साथ मेल नहीं है तो निष्कर्ष निषेधात्मक होगा क्योंकि निषेधात्मक वाक्य में ही दो पदों के बीच मेल का अभाव बताया जाता है। इस नियम का प्रतिकूल भी सत्य है कि यदि निष्कर्ष ही निषेधात्मक हो तो एक आधार वाक्य अवश्य ही निषेधात्मक होगा।

प्रमाण:
यदि निष्कर्ष निषेधात्मक है तो एक आधार वाक्य अवश्य ही निषेधात्मक होगा क्योंकि दोनों आधार वाक्य भावात्मक भी नहीं हो सकते हैं और दोनों निषेधात्मक भी नहीं। हर हालत में एक वाक्यं निषेधात्मक होने पर ही निष्कर्ष निषेधात्मक होगा, यथा –
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7. नियम:
(If both premises are affirmative the conclusion must be affir mative) अर्थात् यदि दोनों आधार वाक्य भावात्मक हों तो निष्कर्ष अवश्य भावात्मक होगा।

प्रमाण:
दोनों आधार वाक्य भावात्मक हैं तो इसका अर्थ है कि S और P दोनों को M से मेल है। इसी तरह उन दोनों के बीच भी मेल अवश्य होगा क्योंकि एक ही वस्तु से यदि दो चीजें मेल रखती हैं तो उनमें भी आपस में मेल होता है। अतः यदि S का M से मेल है और P को M से मेल है तो स्पष्ट है कि S और P में मेल है। अर्थात् निष्कर्ष अवश्य ही भावात्मक होगा। इस नियम का प्रतिकूल भी सत्य है कि यदि निष्कर्ष ही भावात्मक रहता है।

तो दोनों आधार वाक्य अवश्य ही भावात्मक होते हैं (If the conclusion be affirmative both the premises must be affirmative) न्याय में यदि दोनों आधार वाक्य स्वीकारात्मक हो तो इसका अर्थ है कि मध्य पद का लघु पद एवं वृहत् पद दोनों से भावात्मक संबंध है। तब निष्कर्ष भी भावात्मक नहीं होगा। इसी तरह जब निष्कर्ष भावात्मक है तो दोनों के दोनों आधार वाक्य निषेधात्मक नहीं हो सकते हैं और ऐसा भी नहीं हो सकता है कि एक भावात्मक और दूसरा निषेधात्मक। अतः हर हालत में यदि निष्कर्ष भावात्मक है तो दोनों ही आधार वाक्य अवश्य ही भावात्मक है।

8. नियम:
If both the premises be particular no conclusion can be inferred. अर्थात् यदि दोनों आधार अंशव्यापी हो तो उससे कोई उचित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।

प्रमाण:
अंशव्यापी वाक्य दो हैं I and O। यदि दोनों आधार वाक्य अंशव्यापी हों तो निम्नलिखित योग बनेगा।
I – I, 0 – 0, 0 – I
अब यदि प्रमाणित कर दिया जाए कि इन दोनों में से किसी से सही निष्कर्ष नहीं निकलेगा तो नियम सिद्ध हो जाएगा।

(i) I – I
M.P. I Major Premise
M.S. I Minor Premise
यदि इसमें दोनों आधार वाक्य I है तो मध्य पद से एक बार भी व्याप्त होने का मौका नहीं मिलता है। क्योंकि I वाक्य अपने उद्देश्य और विधेय को व्याप्त नहीं कर पाता है। इसलिए इसमें अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। इसलिए सही निष्कर्ष नहीं है।

(ii) O – O
‘O’ Major premise
‘O’ Minor premise.
यहाँ दोनों आधार वाक्य negative हैं इसलिए negative premise का दोष हो जाता है। इसलिए सही निष्कर्ष नहीं होता है।

(iii) I – O
MP I Major premises
MS ‘O’ minor premise
S conclusion

यहाँ एक आधार वाक्य negative ‘O’ है। इसलिए नियमानुसार निष्कर्ष भी negative में होगा। ऐसा होने से उसका विधेय पद P जो कि major term है, व्याप्त हो जाता है। इसलिए नियमानुसार उसे आधार में भी व्याप्त होना चाहिए। इसलिये Major premise में P को व्याप्त करना चाहिए। लेकिन Major premise I है जो किसी पद को व्याप्त नहीं कर पाता है। अर्थात् आधार वाक्य में P व्याप्त नहीं हो पाता है। अतः आधार का अव्याप्त major term निष्कर्ष में आकर व्याप्त हो जाता है। जिससे अनुचित वृहत्पद का दोष हो जाता है। इसलिए इस योग में भी सही निष्कर्ष नहीं निकलता है।

(iv) O – I
MP – O Major premise
MSI – Minor premise
S P – Conclusion.

यहाँ भी निष्कर्ष negative ही होगा क्योंकि एक आधार वाक्य negative है, इसलिए निष्कर्ष में Major term P में विधेय की जगह पर है, अवश्य व्याप्त हो जाएगा। Major premise ‘O’ वाक्य है जिसका विधेय व्याप्त रहता है। इसलिए P को वहाँ विधेय की जगह पर रखना होगा। फलतः मध्य पद उद्देश्य की जगह पर चला जायेगा। जहाँ ‘O’ वाक्य का उद्देश्य होने के कारण अव्याप्त रह जाएगा। इस तरह major term में middle term व्याप्त नहीं हो पाता है।

Minor premise में व्याप्त नहीं हो सकता है। क्योंकि ‘I’ वाक्य है इस तरह मध्य पद को एक बार भी व्याप्त होने का मौका नहीं मिल पाता है। अतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। इसलिए इस योग से भी सही निष्कर्ष नहीं निकल सकता है। इस तरह यदि दोनों आधार वाक्य अंशव्यापी हो तो कोई न कोई दोष उत्पन्न हो जाता है। अतः निष्कर्ष नहीं हो सकता है।

9. नियम:
If one of the premises be particular, the conclusion must be particular. अर्थात् यदि एक आधार वाक्य अंशव्यापी हो तो निष्कर्ष अवश्य अंशव्यापी होगा। निष्कर्ष में जब एक आधार वाक्य अंशव्यापी है तो दूसरा अवश्य ही पूर्णव्यापी होगा। अतः पूर्णव्यापी और अंशव्यापी की मिलावट से निम्नलिखित संयोग हो सकता है – A – I. I – A, A – O, O – A, E – I, I – E, E – O and O – E। इन संयोगों में E – O तथा O – E के संयोग से कोई भी निष्कर्ष नहीं निकलेगा क्योंकि ये दोनों निषेधात्मक वाक्य हैं और दो निषेधात्मक वाक्य से जो निष्कर्ष निकलता है उसे Fallacy of two negatives कहते हैं।

A – I तथा I – A संयोग-जब आधार वाक्य में एक ‘A’ तथा दूसरा ‘I’ हो तो सिर्फ एक ही पद व्यापक होगा और वह है ‘A’ का उद्देश्य। अव्याप्त मध्य पद दोष से बचने के लिए इस व्याप्त पद को मध्य पद मानना पड़ेगा। आधार वाक्य में एक भी पद व्याप्त नहीं रह जाता है। लघुपद जो निष्कर्ष का उद्देश्य है उसे भी निष्कर्ष में अव्याप्त ही रखना पड़ेगा। क्योंकि यह लघु पद आधार वाक्य में व्याप्त नहीं हैं। अतः A – I तथा I – A के संयोग से निष्कर्ष तो अंशव्यापी ही होगा। A – O तथा O – A का संयोग-आधार वाक्य में यदि एक A हो और दूसरा 0 तो दोनों वाक्यों में दो पद व्याप्त होंगे-A का उद्देश्य तथा ‘O’ का विधेय।

अतः अव्याप्त मध्य पद-दोष से बचने के लिए इन दो व्याप्त पदों में एक को मध्य पद का स्थान देना होगा। अब एक व्याप्त पद बच जाएगा। इस व्याप्त पद को वृहत् पद बनाना होगा क्योंकि यह वृहत् पद निष्कर्ष में व्याप्त हो जाएगा तथा निष्कर्ष निषेधात्मक होगा और निषेधात्मक वाक्य में विधेय व्याप्त होता है। अब आधार वाक्यों में लघुपद अव्याप्त रह जाएगा। अतः अनुचित लघुपद-दोष से बचने के लिए लघुपद को निष्कर्ष में अव्याप्त रखने के लिए निष्कर्ष से अंशव्यापी वाक्य बनाना पड़ेगा। अतः A – O तथा O – A के संयोग से निष्कर्ष वाक्य अंशव्यापी वाक्य होगा।

E – I तथा I – E का संयोग-आधार वाक्यों में यदि एक वाक्य ‘E’ और दूसरा I हो तो दोनों आधार वाक्यों में दो पद व्याप्त होंगे। E – I तथा I – E और वह का उद्देश्य और विधेय होगा। इन दो व्याप्त पदों में एक को मध्य पद मानना होगा। ऐसा करने से अव्याप्त पद का दोष नहीं होगा। एक वाक्य निषेधात्मक है। इसलिए निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा। निष्कर्ष के निषेधात्मक होने से उसका विधेय वृहत् पद व्याप्त होगा।

अतः अनुचित वृहत् पद के दोष से बचने के लिए आधार वाक्य में जो पद रह जाता है, उसे वृहत् पद ही मानना होगा। अब आधार वाक्यों में लघु पद अव्याप्त रह जाता है। अनुचित लघु पंद दोष से बचने के लिए इस लघु पद को निष्कर्ष में भी अव्याप्त रखना होगा और ऐसा तभी संभव है जब निष्कर्ष को अंशव्यापी माना जाए। अतः £1 तथा 1 – 4 के संयोग से भी निष्कर्ष अंशव्यापी वाक्य ही होगा। अतः सभी संयोगों की परीक्षा के बाद निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आधार वाक्य में यदि एक पूर्णव्यापी और दूसरा अंशव्यापी हो तो निष्कर्ष भी अंशव्यापी ही होगा।

10. नियम:
From particular major and negative minor no conclusion follows अर्थात्. वृहत् वाक्य यदि अंशव्यापी हो और लघु वाक्य निषेधात्मक हो तो कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है।

प्रमाण:
यदि Major premise अंशव्यापी हो और minor premise निषेधात्मक हो तो सिद्ध करना है कि सही निष्कर्ष नहीं होगा। चूँकि लघु वाक्य निषेधात्मक है, इसलिए वृहत् वाक्य अवश्य ही भावात्मक होगा। नियम 5 के अनुसार यहाँ पहले से अंशव्यापी दिया हुआ है। इसलिए यह वाक्य होगा। वृहत् वाक्य के I होने के नाते वृहत् पद ‘P’ यहाँ अव्याप्त रह जायेगा।

लेकिन लघु वाक्य के निषेधात्मक होने के कारण निष्कर्ष अवश्य निषेधात्मक होगा। नियम 6 के अनुसार इसका विधेय अर्थात् वृहत् पद ‘P’ व्याप्त हो जाएगा। इस तरह आधार वाक्य का अव्याप्त वृहत् पद पर निष्कर्ष में आकर व्याप्त हो जाएगा जिस कारण से fallacy of illicit major का दोष हो जाएगा। इसलिए यदि वृहत् वाक्य अंशव्यापी हो और लघु वाक्य निषेधात्मक हो तो सही निष्कर्ष नहीं होगा।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 8 निरपेक्ष न्याय

प्रश्न 3.
न्याय के आकार की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
न्याय के आकार (Figure of Syllogism):
Syllogism का आकार उसके middle term के स्थान पर निर्भर करता है। वह दोनों आधारों में चार तरह से स्थान ग्रहण कर सकता है। इसलिए syllogism के आकार (Figures) चार तरह के होते हैं।

1. प्रथम आकार (First Figure):
मध्यवर्ती पद (Middle term) major premise में उद्देश्य के स्थान पर और Minor premise में विधेय के स्थान पर होता है, यथा –
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2. द्वितीय आकार (Second Figure):
इस आकार में दोनों आधार वाक्यों में मध्यवर्ती पद विधेय के स्थान पर रहता है। जैसे –
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3. तृतीय आकार (Third Figure):
इस आकार में दोनों आधार वाक्यों में मध्यवर्ती पद उद्देश्य के स्थान पर होता है। जैसे –
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4. चतुर्थ आकार (Fourth Figure):
चतुर्थ आकार में मध्यवर्ती पद वृहत् वाक्य के स्थान पर और लघु वाक्य में उद्देश्य के स्थान पर होता है। जैसे –
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न्याय के योग (Moods of syllogism):
किसी भी syllogism का moods उसके वाक्यों पर निर्भर करता है। इसलिए mood भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। Syllogism कितने प्रकार के हो सकते हैं। इनमें कितने सही और कितने गलत हैं।

इस पर विचार करना है। सबसे पहले ही वाक्य से प्रारम्भ करते हैं। यदि A वाक्य को एक आधार वाक्य मान लिया जाए तो दूसरा आधार वाक्य इसके साथ A या ६या I या 0 हो सकता है। इसलिए निम्नलिखित योग होगा – AO,AE, AI,AO इस तरह EIO को भी एक आधर वाक्य लेकर निम्नलिखित 16 योग होंगे।
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इसमें केवल आधार वाक्यों का विचार किया जाए तो उपर्युक्त 16 योग (moods) होंगे और यदि निष्कर्ष का भी विचार किया जाए तो उपर्युक्त में चार moods बनेंगे। जैसे –
AAA – AAE, AAI, AAO इस तरह 16 × 4 = 64 योग बन जाते हैं। ये सभी 64 एक ही आकार में होंगे और चारों आकार में सब 64 × 4 = 256 योग (moods) होंगे। अर्थात् 256 प्रकार के syllogism चारों आकार में होंगे। लेकिन जाँच के दरम्यान केवल 19 (उन्नीस) ही सही हैं और अन्य सभी गलत हैं। अतः 19 को छोड़कर अन्य किसी रूप में अनुमान करने पर वह गलत हो जायेगा।

सही योगों का विचार (Valid moods)
आधार वाक्यों में जो 16 योग देखा गया है उनमें OO, OI, II, EE, EP, OE ये सब नहीं हो सकते हैं क्योंकि ये दोनों अंशव्यापी तथा निषेधात्मक भी हैं। शेष आठ योगों पर विचार किया जाए।

1. AA (Barbara):
यहाँ दोनों आधार वाक्य भावात्मक हैं इसलिए निष्कर्ष भी भावात्मक ही होगा। यहाँ मध्यवर्ती पद वृहत् वाक्य में उद्देश्य की जगह पर व्याप्त है इससे अव्याप्त मध्यवर्ती पर का दोष नहीं होता है फिर P अव्याप्त ही रह जाता है जिससे illicit major का दोष भी नहीं होता है।

इस तरह AA से Aनिष्कर्ष निकालने पर प्रथम आकार में कोई दोष नहीं होता है। अतः यहाँ AAA Valid mood है। इसे Barbara कहते हैं। इस नाम में जितने vowels हैं वे ही योग हैं। इसमें पहला vowel है वह minor premise है और तीसरा vowel है, वह निष्कर्ष है।
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Barbara का निष्कर्ष A में होता है, A के बदले I भी निष्कर्ष लिया जा सकता है और ऐसा करने से कोई दोष नहीं होता है। इसलिए AAA योग के बदले AAE लिया जा सकता है। इस हालत में योग का मान Barbara होगा।

2.
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यहाँ एक वाक्य निषेधात्मक है इसलिए निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा। इसलिए P निष्कर्ष में व्याप्त हो जाएगा। जबकि वह A में अव्याप्त है। अतः अनुचित वृहत् पद का दोष हो जाता है। अतः AE से कोई निष्कर्ष प्रथम आकार में नहीं हो सकता है।

3.
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यहाँ दोनों आधार वाक्य भावात्मक है। इसमें एक अंशव्यापी भी है, अतः निष्कर्ष भावात्मक के साथ-ही-साथ अंशव्यापी I में निष्कर्ष होगा। ऐसा करने पर middle term, major premise में व्याप्त है। आधार में S और P व्याप्त नहीं है इसलिए निष्कर्ष में भी व्याप्त नहीं होंगे। अतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद, अनुचित वृहत् पद या अनुचित लघु पद का दोष नहीं होते हैं। अतः IA जिसे Darii कहते हैं, सही योग है।

4.
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यहाँ एक आधार वाक्य निषेधात्मक है इसलिए निष्कर्ष भी निषेधात्मक होंगे तब Pव्याप्त हो जाएगा जबकि A में वह अव्याप्त है। इसमें Illicit major का दोष हो जाता हैं अतः AO से सही निष्कर्ष प्रथम आकार में नहीं बनता है।

5.
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यहाँ P आधार वाक्य E है जो निषेधात्मक है इसमें P व्याप्त भी है। अतः अनुचित वृहत् पद तथा अव्याप्त मध्य पद का दोष नहीं हो पाता है। इस पर यदि निष्कर्ष E वाक्य रखें तो कोई हानि नहीं है। इस तरह EAE प्रथम आकार में सही योग है। इसे celarent कहते हैं।

6. El – Ferio
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आधार वाक्य में निषेधात्मक है। इसलिए निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा। इससे अनुचित वृहत् पद तथा अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष नहीं बनता है क्योंकि P और M दोनों वृहत् वाक्य में व्याप्त हैं। इसलिए निष्कर्ष लेने पर कोई दोष नहीं है। अतः £ IO प्रथम आकार में सही योग है। इसे Ferio कहते हैं।

7. IA – Invalid
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यहाँ पर अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। क्योंकि मध्यवर्ती Pमें I का उद्देश्य है और लघु पद में A का विधेय है जहाँ इसे व्याप्त होने का मौका नहीं मिलता है। अतः प्रथम आकार में IA से सही निष्कर्ष नहीं हो सकता है।

8. OA – Invalid
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यहाँ भी MO का उद्देश्य और A का विधेय होने के कारण अव्याप्त है। इसलिए अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। अतः 0A से प्रथम आकार में सही निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। इस तरह प्रथम आकार में चार ही Valid moods होते हैं – Barbara (बर्बारा), celarent (सिलारेन्ट), Darii (डराई), Ferio (फेरियो)।

द्वितीय आकार (Second Figure)
इस द्वितीय आकार में उपर्युक्त आठों योगों को देखना है। इस आकार में मध्यवर्ती पद दोनों आधार वाक्यों में विधेय की जगह होता है।
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यहाँ पर मध्यवर्ती पद दोनों आकार वाक्यों में विधेय के स्थान पर है। इसलिए अव्याप्त रह जाता है जिसके कारण अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। इस तरह AA का प्रथम आकार में सही योग नहीं बन पाता है।
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यहाँ पर एक आधार वाक्य निषेधात्मक होने के कारण निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा और Pनिष्कर्ष में व्याप्त हो जाएगा जबकि वह A वाक्य में भी व्याप्त है। अतः अनुचित वृहत् है। अतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष नहीं है। इस तरह E निष्कर्ष होने से कोई दोष नहीं होता है। अतः AEE द्वितीय आकार में सही योग है। इसे Camestres कहते हैं।

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यहाँ M एक बार भी व्याप्त नहीं होता है। अतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। अतः AI से,
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यहाँ निष्कर्ष निषेधात्मक होगा इसलिए P व्याप्त हो जाएगा जो आधार वाक्य में भी व्याप्त है। इसलिए अनुचित वृहत् पद का दोष नहीं होगा। साथ-ही-साथ अव्याप्त मध्यवर्ती पद का भी दोष नहीं होगा क्योंकि मध्यवर्ती पद लघु वाक्य में व्याप्त है। इस तरह O निष्कर्ष यदि लिया जाता है तो कोई दोष नहीं होता है। अतः AOO द्वितीय आकार का सही योग है, जिसे baroco कहते हैं।
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यहाँ भी आधार वाक्य निषेधात्मक है जिसके कारण निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा और P व्याप्त रहेगा जो कि E के उद्देश्य के कारण व्याप्त है। अतः अनुचित वृहत् पद तथा अव्याप्त मध्यवर्ती पद से कोई दोष नहीं लग पाता है। लघु वाक्य में लघु पद S के उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः इस निष्कर्ष में व्याप्त करने से कोई हानि नहीं होती है। इस तरह यदि ६निष्कर्ष लिया जाए तो कोई गलती नहीं होगी। अतः EAE द्वितीय आकार का सही होगा है। इसे cesare कहते हैं।
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यहाँ भी आधार वाक्य निषेधात्मक होने के कारण निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा। इसलिए P निष्कर्ष में व्याप्त हो जाता है जो आधार में £ के उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः अनुचित वृहत् पद तथा अव्याप्त मध्यवर्ती पद का कोई भी दोष नहीं बन पाता है। अतः ‘O’ के निष्कर्ष होने से यहाँ कोई दोष नहीं होता है। अतः ESO द्वितीय आकार का सही योग है।
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यहाँ अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। क्योंकि दोनों आधार वाक्यों में मध्यवर्ती पद भावात्मक वाक्यों का विधेय है जो अव्याप्त है। अतः सही योग नहीं बन पाता है।
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इसमें आधार वाक्य के निषेधात्मक होने के कारण निष्कर्ष भी निषेधात्मक ही होगा जिसमें ‘P’ विधेय के स्थान पर होने से व्याप्त हो जाएगा। लेकिन आधार वाक्य में वृहत् पद ‘O’ वाक्य के उद्देश्य होने के कारण व्याप्त नहीं है। इस तरह आधार का अव्याप्त वृहत् पद निष्कर्ष में व्याप्त हो जाता है। जिसके चलते अनुचित वृहत् पद का दोष हो जाता है। अतः OA का योग नहीं बनता है। इस तरह द्वितीय आकार में भी चार ही valid moods होते हैं Baroco (बैरोको), Festino (फेस्टीनो), Camestres (केमेस्ट्रीज), Cesare (सिसारे)।

तृतीय आकार (Third Figure):
इन उपर्युक्त आठों योगों को तृतीय आकार में देखना है। इस आकार में मध्यवर्ती पद दोनों आधार वाक्यों में उद्देश्य के स्थान पर रहता है।
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यहाँ पर दोनों आधार वाक्य भावात्मक है। इसलिए निष्कर्ष भी भावात्मक ही होगा और दोनों में M व्याप्त भी है। किन्तु वृहत् और लघु पद में व्याप्त नहीं है। इसलिये निष्कर्ष में इसे व्याप्त नहीं करना होगा। इस तरह निष्कर्ष I वाक्य होगा, ऐसा करने से कोई दोष नहीं होता है। इस तरह AAI तृतीय आकार का सही योग हैं इसे Darapti कहते हैं।

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यहाँ दोनों वाक्यों के भावात्मक होने से निष्कर्ष भी भावात्मक ही होगा। ‘M’ वृहत् वाक्य में व्याप्त हैं जिससे अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष भी नहीं होता है। इसी तरह I निष्कर्ष निकालने से कोई दोष नहीं होता है। इसलिए All तृतीय आकार का सही योग है जिसे Datisi कहते हैं।

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यहाँ पर अनुचित वृहत् पद का दोष है क्योंकि एक आधार वाक्य के निषेधात्मक होने से निष्कर्ष भी निषेधात्मक हो जाता है, जिसमें P व्याप्त हो जाएगा जो आधार में ‘A’ के विधेय होने के कारण अव्याप्त है। इस तरह अव्याप्त वृहत् पद निष्कर्ष में आकार व्याप्त हो जाता है।

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यहाँ M दो बार व्याप्त है। निष्कर्ष निषेधात्मक होगा और निष्कर्ष में P व्याप्त रहेगा। आधार में भी P व्याप्त है। क्योंकि यह £ का विधेय है। अतः इससे अनुचित वृहत् पद का दोष नहीं बनता है। लघु वाक्य में S व्याप्त नहीं है। इसलिए निष्कर्ष में भी इसे व्याप्त नहीं करेंगे। फलतः निष्कर्ष ‘O’ वाक्य होगा और इससे कोई दोष भी नहीं होता है। अतः EA से तृतीय आकार का सही योग है। इसे Felapton कहते हैं।
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यहाँ पर M वृहत् वाक्य में व्याप्त है और निष्कर्ष के निषेधात्मक होने से यदि P व्याप्त है तो वह वृहत् वाक्य में भी व्याप्त होगा। अतः इससे अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष या अनुचित वृहत् पद का दोष नहीं बन पाता है। आधार में S व्याप्त नहीं है। इसलिए निष्कर्ष में भी यह अव्याप्त ही रहेगा। फलतः निष्कर्ष ‘O’ वाक्य ही होगा जिसमें कोई दोष भी नहीं है। इस तरह ‘EIO’ तृतीय आकार का सही योग है, जिसे Ferison कहते हैं।

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यहाँ M लघु वाक्य में ‘A’ वाक्य के उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। आधार में S और P व्याप्त नहीं है। इसलिए इस निष्कर्ष में भी व्याप्त नहीं करेंगे। निष्कर्ष के उद्देश्य विधेय व्याप्त नहीं होने के कारण यह अवश्य ही I वाक्य होगा। ऐसा करने से कोई दोष भी नहीं होता है। अतः IAI तृतीय आकार में सही योग है। इसे Disamis कहते हैं।
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यहाँ भी एक आधार वाक्य निषेधात्मक है। इसलिए निष्कर्ष भी निषेधात्मक ही होगा। फलतः इसका P व्याप्त हो जाएगा जो आधार में ‘O’ के विधेय होने के कारण व्याप्त है। इससे अनुचित वृहत् पद का दोष या अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष नहीं बन पाता है।

आधार में S व्याप्त नहीं है। अतः इसे निष्कर्ष में व्याप्त नहीं करेंगे। इसलिए निष्कर्ष ‘O’ वाक्य होगा। इस तरह OAO तृतीय आकार का सही योग है, जिसे Bocardo कहते हैं। इस तरह तृतीय आकार में छ: सही valid moods होते हैं – Darāpti (डाराप्टी), Datisi (डाटीसी), Disamis (डीसामीस), Felapton (फेलाप्टन), Ferison (फेरीसन), Bacardo (बोकार्डो)।

चतुर्थ आकार (Fourth Figure):
अब चतुर्थ आकार में इन आठ योगों को देखना है। चतुर्थ आकार में Middle term वृहत् वाक्य में विधेय की जगह पर तथा लघु वाक्य में उद्देश्य की जगह पर रहता है।
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यहाँ दोनों आधार वाक्य भावात्मक हैं इसलिए निष्कर्ष भी भावात्मक ही होगा। लघु वाक्य में उद्देश्य के स्थान पर व्याप्त है, किन्तु लघु पद विधेय के स्थान पर होने के कारण व्याप्त नहीं है। इसलिए निष्कर्ष में इसे व्याप्त नहीं करेंगे। फलतः निष्कर्ष I वाक्य होगा। AAI चतुर्थ आकार का valid mood है, जिसे Bramantip कहते हैं।
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यहाँ निष्कर्ष निषेधात्मक होगा। क्योंकि एक आधार वाक्य निषेधात्मक. ही है। P निष्कर्ष में यार हो जाएगा जो आधार में भी (A’) के उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः इससे अनुचित वृहत् पद का दोष या अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष नहीं बन पाता है। M लघु वाक्य के उद्देश्य होने से व्याप्त है। इसलिए E निष्कर्ष लेने से कोई दोष नहीं होता है। अत AEE चतुर्थ आकार का सही योग है, जिसे camenes कहते हैं।

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यहाँ अव्याप्त मध्य पद का दोष है क्योंकि M एक आधार में A का विधेय है और दूसरे आधार में I का उद्देश्य है।Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 8 निरपेक्ष न्याय

यहाँ पर भी अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष है। M यहाँ पर ‘A’ का विधेय है और का उद्देश्य होने के कारण अव्याप्त है।Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 8 निरपेक्ष न्याय

यहाँ पर M दोनों आधार वाक्यों में व्याप्त है। इससे अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष नहीं लगता है। एक आधार वाक्य निषेधात्मक है। अतः निष्कर्ष भी निषेधात्मक ही होगा। निष्कर्ष में P व्याप्त हो जाता है तो आधार में भी E के उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः इससे अनुचित वृहत् पद का दोष भी नहीं हो पाता है। आधार में S व्याप्त भी नहीं है। इसलिए निष्कर्ष में ‘O’ वाक्य होगा और इससे कई दोष नहीं होता है। इसलिए EAO चतुर्थ आकार का सही योग है, जिसे Fesapo कहते हैं।
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यहाँ M में व्याप्त है। एक वाक्य निषेधात्मक है। फलतः निष्कर्ष भी निषेधात्मक ही होगा और ऐसा करने से P व्याप्त हो जाता है। जो आधार वाक्य में भी व्याप्त है। अतः इससे अव्यापत मध्यवर्ती पद का दोष या अनुचित वृहत् पद का दोष नहीं बन पाता है। आधार में S अव्याप्त है। इसलिए इसे निष्कर्ष में भी अव्याप्त ही रखेगा। अतः निष्कर्ष ‘O’ वाक्य होगा और कोई दोष भी नहीं होगा। अतः EIO चतुर्थ आकार का सही योग है, जिसे Fresison कहते हैं।
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दोनों आधार वाक्य भावात्मक है। इसलिए निष्कर्ष भी भावात्मक ही होगा। यहाँ M लघु वाक्य में A का उद्देश्य होने के कारण व्याप्त है। अतः यहाँ अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष नहीं होता है। आधार S और P व्याप्त नहीं है। इसलिए इस निष्कर्ष को भी व्याप्त नहीं करेंगे। अतः निष्कर्ष I वाक्य होगा। इस तरह IAI चतुर्थ आकार का सही योग है। जिसे Dimaris कहते हैं।
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यहाँ एक आधार वाक्य निषेधात्मक है। अतः निष्कर्ष भी निषेधात्मक ही होगा। इससे निष्कर्ष का P व्याप्त हो जाएगा लेकिन आधार वाक्य में यह ‘O’ वाक्य का उद्देश्य है। जिसके कारण अव्याप्त है। अतः आधार का अव्याप्त वृहत् पद में निष्कर्ष में आकर व्याप्त हो जाता है। अतः यहाँ अनुचित वृहत् पद का दोष हो जाता है। इस तरह चतुर्थ आकार में पाँच valid moods हैं – Bramantip (ब्रामांटीप), Camenes (केमिनिस), Fesapo (फेसापो), Fresison (फेसीसन), Dimaris (डीमारिस)।

इस तरह से 19 moods valid हैं।
First figure-Barbara, Celarent, Darii, Ferio-4
Second Figure-Baraco, Festino, Camestres, Cesare-4
Third Figure-Darapti, Ditisi, Disamis, Felepton, Bocardo, Ferison-6
Fourth Figure-Bramantip, Camenes, Dimaris, Fesapo, Fresison-5

नोट:
इन योगों के जितने नाम हैं उनके vowels से syllogism के वाक्य देखना हे इसमें पहला vowel है major premise, दूसरा vowel है minor premise और तीसरा vowel है conclusion

जैसे:
Celarent में major premise E है, minor premise A है और conclusion £ है। इसी तरह सबों को देखना होगा।

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प्रश्न 4.
न्याय के आकार के विशेष नियमों की जाँच करें।
उत्तर:
Syllogism के जो दस नियम बताये गये हैं वे सामान्य नियम हैं (Second rules)। वे सभी आकार के लिए सत्य होते हैं। इसके अलावा प्रत्येक आकार के भी कुछ नियम हैं, जिन्हें विशेष नियम कहा जाता है।

प्रथम आकार के विशेष नियम:

1. The major premise must be universal
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अर्थात् वृहत् वाक्य को अवश्य ही पूर्णव्यापी होना चाहिए।

प्रमाण:
मान लिया कि प्रथम आकार में major premise universal नहीं है तो यह वाक्य particular होगा। इसके अंशव्यापी होने से इसका उद्देश्य जो मध्यवर्ती पद है, अव्याप्त रह जाता है। इसलिए मध्यवर्ती पद वृहत् वाक्य में अव्याप्त रह जाता है। जब कि मध्यवर्ती पद को नियमानुसार कम-से-कम एक बार अवश्य ही व्याप्त होना है जो कि हम लघु वाक्य में ही कर सकते हैं। लघु वाक्य में यह विधेय के स्थान पर है। इसलिए इसे व्याप्त करने के लिए लघु वाक्य को अभावात्मक बनाना पड़ेगा।

तभी विधेय व्याप्त हो सकता है। जब लघु वाक्य में भावात्मक वाक्य है तो वृहत् वाक्य भावात्मक होना चाहिए। क्योंकि दो negative आधार पर कोई निष्कर्ष ही नहीं निकलेगा। इस तरह वृहत् पद भावात्मक और लघु वाक्य अभावात्मक हो जाते हैं। निष्कर्ष अभावात्मक होने से P व्याप्त हो जाता है। अतः वृहत् पद व्याप्त हो जाता है। लेकिन वृहत् वाक्य में वह अव्याप्त है। अतः इससे अनुचित बृहतू पद का दोष होता है। इसलिये प्रथम आकार में syllogism के सही होने के लिए major premise must be universal और यही सिद्ध करना था।

2. The minor premise mut be affirmative. लघु वाक्य को अवश्य भावात्मक होना चाहिए।
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प्रमाण:
मान लिया कि प्रथम आकार में minor premise भावात्मक नहीं है तो यह अभावात्मक होगा। लघु वाक्य के अभावात्मक होने से वृहत् भावात्मक हो जाता है और निष्कर्ष अभावात्मक हो जाता है क्योंकि दोनों आधार वाक्य अभावात्मक होने से वृहत् पद (P) जो इसके विधेय के स्थान पर है व्याप्त हो जाता है। क्योंकि वृहत् वाक्य के भावात्मक होने से वृहद् पद (P) इसके विधेय के स्थान पर है अव्याप्त रहता है। इस तरह आधार का अव्याप्त वृहत् पद निष्कर्ष में आकर व्याप्त हो जाता है जो अनुचित है। इसे अनुचित वृहत् पद का दोष कहते हैं। इसलिए प्रथम आकार में सही syllogism के लिए minor premise को भावात्मक रखना ही पड़ेगा और यही सिद्ध करना था।

द्वितीय आकार के विशेष नियम की जाँच –

1. The major premise must be universal. वृहत् वाक्य को अवश्य पूर्णव्यापी होना चाहिए।

प्रमाण:
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मान लिया कि द्वितीय आकार में वृहत् वाक्य पूर्णव्यापी नहीं है, तो यह अवश्य ही अंशव्यापी है। अंशव्यापी होने से वृहत् पद P जो इसके उद्देश्य की जगह पर है व्याप्त नहीं होता है। इस तरह निष्कर्ष का विधेय अव्याप्त रह जाता है। निष्कर्ष भावात्मक हो जाने से दोनों आधार वाक्य भावात्मक हो जाते हैं और मध्यवर्ती पद एक बार भी व्याप्त नहीं हो पाता है क्योंकि यह विधेय के स्थान पर है। अतः इसमें अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। अतः द्वितीय आकार के syllogism को सही होना है तो major premise अवश्य ही universal होगा और यही सिद्ध होना चाहिए।

2. One of the premises must be negative. अर्थात् आधार वाक्यों में से, एक को अवश्य निषेधात्मक होना चाहिए।

प्रमाण:
यदि आधार वाक्य में से एक वाक्य अभावात्मक द्वितीय आकार में नहीं है तो वे दोनों आधार वाक्य भावात्मक हैं। इस हालत में मध्यवर्ती पद दोनों जगह भावात्मक वाक्य का विधेय होने के कारण अव्याप्त रह जाता है। फलस्वरूप अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाता है। इसलिए यदि द्वितीय आकार में syllogism का सही होना है तो एक आधार वाक्य अवश्य निषेधात्मक होगा। दूसरा प्रमाण, द्वितीय आकार में मध्यवर्ती पद दोनों आधार वाक्यों में विधेय की जगह पर होता है। जबकि नियम है कि मध्यवर्ती पद को कम-से-कम एक बार अवश्य ही व्याप्त होना चाहिए। इसलिए यहाँ आधार में मध्यवर्ती पद को व्याप्त करने के लिए विधेय को व्याप्त करना होगा जो अभावात्मक वाक्य में ही संभव है। इसलिए एक आधार वाक्य अवश्य ही अभावात्मक होगा और यही सिद्ध करना था।

3. The conclusion must be negative निष्कर्ष को अवश्य निषेधात्मक होना चाहिए।

प्रमाण:
यदि द्वितीय आकार में निष्कर्ष अभावात्मक न होकर भावात्मक है तब दोनों आधार वाक्य भी भावात्मक ही होगा। ऐसा होने से मध्यवर्ती पद का एक बार भी व्याप्त नहीं होने का मौका मिलता है। फलतः अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष हो जाएगा। अतः इस दोष से बचने के लिए द्वितीय आकार में निष्कर्ष का अभावात्मक होना जरूरी है और यही सिद्ध करना था।

तृतीय आकार के विशेष नियम की जाँच:

1. The minor premise must be affirmative in the third figure लघु वाक्य को तृतीय आकार में अवश्य ही भावात्मक होना चाहिए।

प्रमाण:
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 8 निरपेक्ष न्याय

मानलिया कि तृतीय आकार में लघुवाक्य भावात्मक नहीं है तो वह negative है। ऐसा होने से वृहत् वाक्य अवश्य ही भावात्मक होगा और निष्कर्ष अभावात्मक होगा। निष्कर्ष के अभावात्मक होने से वृहत् पद P जो इसके विधेय स्थान पर है व्याप्त नहीं हो पाता है। इस तरह आधार का अव्याप्त वृहत् पद निष्कर्ष में आकर व्याप्त हो जाता है, जिससे illicit major का दोष हो जाता है। इसलिए तृतीय आकार में syllogism को सही होने के लिए minor premise must be affirmative यही सिद्ध करना था।

2. The conclusion must be particular in the third figure. निष्कर्ष को तृतीय आकार में अवश्य ही अंशव्यापी होना चाहिए।

प्रमाण:
मान लिया कि तृतीय आकार में यदि निष्कर्ष अंशव्यापी नहीं है तो यह पूर्णव्यापी होगा। ऐसा होने से S जो लघु पद के उद्देश्य के स्थान पर है व्याप्त हो जाता है। निष्कर्ष में minor term का व्याप्त होने से यह minor premise में भी अवश्य व्याप्त होगा। क्योंकि जब तक कोई पद आधार में व्याप्त नहीं होता है तब तक उसको निष्कर्ष में व्याप्त नहीं कर सकते हैं। चूँकि S आधार में व्याप्त है। अतः लघु वाक्य को अवश्य अभावात्मक वाक्य होना होगा क्योंकि यहाँ minor terms विधेय के स्थान पर है।

लघु वाक्य के अभावात्मक होने से वृहत् वाक्य भावात्मक और निष्कर्ष निषेधात्मक हो जाता है। ऐसा होने से P जो विधेय के स्थान पर व्याप्त हो जाता है, यही major term (P) major premise के भावात्मक होने से और इसके विधेय के स्थान पर होने से अव्याप्त रहता है। इस तरह आधार अव्याप्त हो जाता है, जिससे अनुचित वृहत् पद का दोष हो जाता है। इसलिए तृतीय आकार में syllogism को सही होने के लिए निष्कर्ष को must be particular और यही सिद्ध करना था।

चतुर्थ आकार के विशेष नियम की जाँच –

1. If the major premise be affirmative the minor must be universal in the fourth figure. चतुर्थ आकार में यदि वृहत् वाक्य भावात्मक होता है तो लघु वाक्य अवश्य पूर्णव्यपी होगा।

प्रमाण:
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 8 निरपेक्ष न्याय

चतुर्थ आकार के वृहत् वाक्य में M विधेय के स्थान पर रहता है। दिया हुआ है कि वृहत् वाक्य भावात्मक है। इसलिए M को वृहत् वाक्य में व्याप्त होने का मौका नहीं मिलता है। क्योंकि भावात्मक वाक्य अपने विधेय पद को व्याप्त नहीं करता है। जबकि ‘M’ को कम-से-कम एक बार अवश्य व्याप्त होना चाहिए जो लघु वाक्य में ही संभव है। चतुर्थ आकार के लघु वाक्य में ‘M’ उद्देश्य के स्थान पर रहता है। इसलिए ‘M’ को यहाँ. व्याप्त करने के लिए minor premise को must be universal होना है क्योंकि पूर्णव्यापी वाक्य जो अपने उद्देश्य पद को व्याप्त करता है। इसलिए चतुर्थ आकार में यदि वृहत् वाक्य भावात्मक है तो लघु वाक्य पूर्णव्यापी वाक्य होगा। यही सिद्ध करना था।

2. If the minor premise be affirmative the conclusion must be particular in the fourth figure यदि लघु वाक्य भावात्मक है तो निष्कर्ष अवश्य ही अंशव्यापी वाक्य चतुर्थ आकार में होगा।

प्रमाण:
दिया हुआ है कि चतुर्थ आकार में लघु वाक्य भावात्मक वाक्य है। हमें प्रमाणित करना है कि इस परिस्थिति में निष्कर्ष अवश्य ही अंशव्यापी होगा। चतुर्थ आकार में minor premise में minor terms (S) विधेय के स्थान पर होता है।

3. दो आधार वाक्यों में यदि कोई भी निषेधात्मक होगा तो वृहत् वाक्य अवश्य ही पूर्णव्यापी होगा। (If either of the premises the negative, the major premise must be universal)
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 8 निरपेक्ष न्याय

प्रमाण:
चतुर्थ आकार में मध्यपद वृहत् वाक्य में विधेय और लघु वाक्य में उद्देश्य रहता यदि आधार वाक्यों में कोई भी निषेधात्मक होगा तो नियमानुसार निष्कर्ष भी निषेधात्मक होगा। निष्कर्ष के निषेधात्मक होने से उसका विधेय पद (जो वृहत् पद होता है) व्याप्त होगा। अतः अनुचित वृहत् पद-दोष (fallacy of illicit major) से बचने के लिए वृहत् पद को वृहत् वाक्य में भी व्याप्त करना होगा।

वृहत् पद वृहत् वाक्य का उद्देश्य है और किसी भी वाक्य का उद्देश्य तभी व्याप्त होगा, जब उस वाक्य को पूर्णव्यापी माना जाए। अतः वृहत् पद को व्याप्त करने के लिए वृहत् वाक्य को पूर्णव्यापी मानना होगा। इस प्रकार, चतुर्थ आकार में जब एक भी आधारवाक्य निषेधात्मक होता है, तो वृहत् वाक्य पूर्णव्यापी होता है।

4. ‘O’ cannot be a premise in the fourth figure. चतुर्थ आकार में कोई भी – आधार वाक्य ‘O’ नहीं हो सकता है।
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 8 निरपेक्ष न्याय

प्रमाण:
चतुर्थ आकार में वृहत् वाक्य ‘0’ नहीं होगा। यदि वृहत् वाक्य ‘O’ चतुर्थ आकार में होगा तो लघु वाक्य भावात्मक होगा क्योंकि दो अभावात्मक वाक्य से निष्कर्ष नहीं निकलता है और जब एक आधार वाक्य अभावात्मक है तो निष्कर्ष भी अभावात्मक ही होगा। ऐसा होने से उसका P विधेय पद व्याप्त हो जाएगा जबकि वह अंशव्यापी होने की वजह से अव्याप्त है। फिर इससे अनुचित वृहत् पद का दोष हो जाएगा। अतः वृहत् पद ‘O’ वाक्य नहीं हो सकता है।

इस तरह चतुर्थ आकार में लघु वाक्य भी ‘O’ नहीं हो सकता है। चतुर्थ आकार में यदि लघु वाक्य ‘O’ माना जाए तो वृहत् वाक्य भावात्मक होगा और पूर्णव्यापी होगा। इससे अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष (Fallacy of undistributed) हो जाएगा। क्योंकि मध्य पद एक बार भी व्याप्त नहीं हो सकता है। इसमें अंशव्यापी वाक्य का उद्देश्य भी अव्याप्त ही रह जाता है। अतः हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि चतुर्थ आकार में लघु वाक्य का ‘O’ नहीं हो सकता है। इस तरह चतुर्थ आकार में कोई भी आधार वाक्य ‘O’ नहीं हो सकता है। इस तरह चतुर्थ आकार में कोई भी आधार वाक्य ‘O’ वाक्य नहीं होगा।

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प्रश्न 5.
प्रत्येक आकार में एक-एक सही न्याय बनाएँ जिसका निष्कर्ष हो कुछ लड़के तेज नहीं है और उन योगों के नाम बताएँ।
उत्तर:
L.E. – Some boys are not intelligent – O
दिया हुआ वाक्य ‘O’ है, जो निष्कर्ष है।
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प्रश्न 6.
‘भारतीय साधारणतः धर्मनिरपेक्ष है।’ इसे प्रमाणित करने के लिए प्रत्येक आकार में एक-एक वैध न्याय की रचना करें।
उत्तर:
L.F-I. Some Indians are secular यही निष्कर्ष है।
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प्रश्न 7.
‘सभी हंस उजले नहीं है’ इस निष्कर्ष वाक्य को प्रमाणित करने के लिए प्रत्येक आकार में एक सही न्याय की रचना करें तथा उन सभी योगों का नाम लिखें।
उत्तर:
L.F. – Some swans are not white. – O
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प्रश्न 8.
निम्नांकित की जाँच कीजिए।
(a) None but student of Logic can answer this question. Since he is a student of Logic, he must answer this question.
(b) A is the servant of B. B is the servant of C. Therefore, A is the servant of C.
(c) Most of the unemployed are idle. He is idle. Therefore, he is unem – , ployed.
(d) Ram is not rich for he is not fashionable and only the rich are fashion able.
उत्तर:
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प्रश्न 9.
निम्नांकित की जाँच करें।
(क) सोहन अवश्य ईमानदार होगा क्योंकि वह बुद्धिमान है और सिर्फ बुद्धिमान ही ईमानदार होते हैं।
(ख) सिर्फ धनी लोग ही सुखी है। जॉन सुखी नहीं है। इसलिए जॉन धनी नहीं है।
(ग) राम श्याम का मित्र है और श्याम मोहन का मित्र है। इसलिए, राम मोहन का मित्र है।
उत्तर:
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यह न्याय दोषपूर्ण है। इसमें अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष है क्योंकि मध्यवर्ती पद (बुद्धिमान) दोनों ही आधार वाक्यों में अव्याप्त है।

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इस न्याय में अनुचित वृहद् पद का दोष है। वृहद् पद (धनी) निष्कर्ष में व्याप्त है, किंतु वृहद् वाक्य में ‘A’ का विधेय होने के कारण अव्याप्त है।

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यह न्याय दोषपूर्ण है। इसमें चतुष्पदीय दोष है।
चार पद ये हैं –

  • श्याम
  • मोहन का मित्र
  • राम और
  • श्याम का मित्र।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित की जाँच करें।
(a) राम ने श्याम को पराजित किया, श्याम ने मोहन को पराजित किया, इसलिए राम ने मोहन को पराजित किया। (Ram defeated Shyam; Shyam defeated Mohan; therefore, Ram defeated Mohan)
(b) सिर्फ तर्कशास्त्र के छात्र ही इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं; आप इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं क्योंकि आप तर्कशास्त्र के छात्र हैं। (Students of Logic alone can answer this question; you can answer this question because you are a stu dent of Logic)
(c) हरि ईमानदार नहीं है क्योंकि वह सुखी नहीं है और केवल ईमानदार ही सुखी होते (Hari is not honest because he is not happy and only the honest are happy)
उत्तर:
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इस न्याय में चतुष्पद दोष (Fallacy of four terms) है। यहाँ चार पद ये हैं –

  • Shyam
  • such that defeated Mohan
  • Ram, और
  • such that defeated Shyam. अतः, यह न्याय दोषपूर्ण है।

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इस न्याय में अव्याप्त मध्यवर्ती पद का दोष (Fallacy of Undistributed Middle) है। यहाँ मध्यवर्ती पद (student of Logic) दोनों आधार वाक्यों में ‘A’ का विधेय होने के कारण अव्याप्त है। अतः, न्याय दोषपूर्ण है।

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इस न्याय में अनुचित वृहद् पद का दोष (Fallacy of Illicit Major) है। वृहद् पद (honest) वृहद् वाक्य में अव्याप्त है, किन्तु निष्कर्ष में व्याप्त है। इसलिए, इस न्याय में उपर्युक्त दोष उत्पन्न हो गया है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ

Bihar Board Class 11 Chemistry रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.1
निम्नलिखित के लिए आणविक/मोलर द्रव्यमान का परिकलन कीजिए –

  1. H2O
  2. CO2
  3. CH4

उत्तर:
1. H2O का आणविक द्रव्यमान = 2 × (हाइड्रोजन का परमाणु द्रव्यमान) + ऑक्सीजन का परमाणु द्रव्यमान
= 2(1.008u) + (16.00u)
= 2.016u+16.00u
= 18.16u
= 18.2u

2. CO2 का आणविक द्रव्यमान
= 1 × कार्बन का परमाणु द्रव्यमान + 2 (ऑक्सीजन का परमाणु द्रव्यमान)
= 12.011u + 2(16.00u)
= 12.011u + 32.00u = 44.011u

3. CH4 आणविक द्रव्यमान
= 12.011u + 4(1.008u)
= 12.011u + 4.032u
=16.043u

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प्रश्न 1.2
सोडियम सल्फेट (Na2SO4) में उपस्थित विभिन्न तत्त्वों के द्रव्यमान प्रतिशत का परिकलन कीजिए।
उत्तर:
Na2SO4 का परमाणु द्रव्यमान
= 2 (सोडियम का परमाणु द्रव्यमान) + 5 का परमाणु द्रव्यमान + 4 (ऑक्सीजन का परमाणु द्रव्यमान)
= 2 × 23 + 32 + 4 × 16
= 142u

Na की प्रतिशतता
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= \(\frac{46}{142}\) × 100 = 32.39%

s की प्रतिशता
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= \(\frac{32}{146}\) × 100 = 22.54%

O की प्रतिशतता
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= \(\frac{64}{142}\) × 100 = 45.07

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प्रश्न 1.3
आयरन के उस ऑक्साइड का मूलानुपाती सूत्र ज्ञात कीजिए, जिसमें द्रव्यमान द्वारा 69.9% आयरन और 30.1% आक्सीजन है।
उत्तर:
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∴ मूलानुपाती सूत्र Fe2O3

प्रश्न 1.4
प्राप्त कार्बन डाइ-ऑक्साइड की मात्रा का परिकलन कीजिए, जब

  1. 1 मोल कार्बन को हवा में जलाया जाता है और
  2. 1 मोल कार्बन को 16g ऑक्सीजन में जलाया जाता है।

उत्तर:
1. हवा में कार्बन को जलाने पर निम्नलिखित रासायनिक समीकरण प्राप्त होता है –
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जब 1 मोल कार्बन को हवा में जलाया जाता है, तो उत्पन्न कार्बन डाइ-ऑक्साइड = 1मोल = 44g

2. जब 1 मोल कार्बन को 16g ऑक्सीजन में जलाया जाता है तो 1 मोल कार्बन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन = 1मोल = 32g

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प्रश्न 1.5
सोडियम ऐसीटेट (CH3COONa) का 500 ml, 0.375 मोलर जलीय विलयन बनाने के लिए उसके कितने द्रव्यमान की आवश्यकता होगी? सोडियम ऐसीटेट का मोलर द्रव्यमान 82.0245g mol-1 है।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, CH3 COONa का मोलर द्रव्यमान = 82.0245g mol-1
विलयन का आयतन = 500ml = 0.5L
विलयन की मोलरता = 0.375M = 0.375mol L-1
हम जानते हैं कि विलयन की मोलरता
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∴ द्रव्यमान = 0.375 × 0.5 × 82.0245
= 15.376g

प्रश्न 1.6
सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के उस प्रतिदर्श का मोल प्रतिलीटर में सान्द्रता का परिकलन कीजिए जिसमें उसका द्रव्यमान प्रतिशत 69% हो और जिसका घनत्व 1.41gmL-1 है।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
विलयन का घनत्व = 1.41g mL-1
तथा द्रव्यमान = 100g
Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधा
= \(\frac{100}{1.41}\) = 70.92 ml
= 70.92/1000L
मोल प्रति लीटर में सान्द्रता से तात्पर्य मोलरता से है।
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प्रश्न 1.7
100g कॉपर सल्फेट (CusO4) से कितना कॉपर प्राप्त किया जा सकता है?
उत्तर:
कॉपर सल्फेट का आणविक द्रव्यमान
= 63.6 + 32 + 4 × 16
= 159.6u
CuSO4 का ग्राम आणविक द्रव्यमान = 159.6g
∵ 159.6g CuSO4 देगा = 63.6g Cu
∴ 100g CuSO4 देगा = \(\frac{63.6}{159.6}\) × 100
= 59.85g

प्रश्न 1.8
आयरन के ऑक्साइड का आण्विक सूत्र ज्ञात कीजिए जिसमें आयरन तथा ऑक्सीजन का द्रव्यमान प्रतिशत क्रमशः 69.9g तथा 30.1g है।
उत्तर:
अभ्यास प्रश्न संख्या:
1.3 की भाँति हल करने पर,
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मूलानुपाती सूत्र = Fe2O3
आण्विक सूत्रा = Fe2O2 (चूँकि कोई सरल गुणक नहीं है)

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प्रश्न 1.9
निम्नलिखित आँकड़ों के आधार पर क्लोरीन के औसत परमाणु द्रव्यमान का परिकलन कीजिए –
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उत्तर:
क्लोरीन का औसत परमाणु द्रव्यमान
= (0.757 × 34,9689)g + (24.23 × 36.9659)g
= (26.49 + 8.96)g
= 35.45 g

प्रश्न 1.10
एथेन (C2H6) के तीन मोलों में निम्नलिखित का परिकलन कीजिए –

  1. कार्बन परमाणुओं के मोलों की संख्या
  2. हाइड्रोजन परमाणुओं के मोलों की संख्या
  3. एथेन के अणुओं की संख्या।

उत्तर:
1. ∵ एथेन (C2H6) के 1 मोल में कार्बन परमाणुओं के मोलों की संख्या = 2 × 3 = 6 मोल

2. ∵ C2H6 के 1 मोल में हाइड्रोजन परमाणुओं की मोल संख्या = 6
∴ C2H6 के तीन मोलों में हाइड्रोजन परमाणुओं की मोल संख्या = 3 × 6 = 18 मोल

3. ∵ 1 मोल C2H6 में अणुओं की संख्या = 6.022 × 1023
∴ 3 मोल C2H6 में अणुओं की संख्या = 3 × 6.022 × 1023
= 1.81 × 1024 अणु

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प्रश्न 1.11
यदि 20g चीनी (C12H22O11) को जल की पर्याप्त मात्रा में घोलने पर उस का आयतन 2L हो जाये, तो चीनी के इस विलयन की सान्द्रता क्या होगी।
उत्तर:
चीनी (C12H22O11) का मोलर द्रव्यमान
= 12 × 12 + 22 × 1 + 11 × 16
= 324u
mol L-1 में विलयन की सान्द्रता
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= \(\frac{20}{32×2}\) = 0.03mol L-1

प्रश्न 1.12
यदि मेथेनॉल का घनत्व 0.793kg L-1 हो, तो इसके 0.25 M के 2.5 L विलयन को बनाने के लिए कितने आयतन की आवश्यकता होगी?
उत्तर:
मेथेनॉल (CH3OH) का मोलर द्रव्यमान
= 12 + 4 × 1 + 16 × 1
= 32g mol-1
प्रश्नानुसार,
विलयन का आयतन = 25 L
विलयन की मोलरता = 0.25M = 0.25mol L-1
∵ विलयन की मोलरता
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या 0.25 mol L-1
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या CH3 OH का द्रव्यमान
= 0.25mol L-1 × 32g mol-1 × 2.5L
= 20g
∵ CH3 OH का द्रव्यमान = 20g = 0.02kg
तथा घनत्व = 0.793kg L-1
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= 0.025 L

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प्रश्न 1.13
दाब को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले बल के रूप में परिभाषित किया जाता है। दाब का SI मात्रक पास्कल नीचे दिया गया है –
1Pa = 1Nm-2
यदि समुद्र तल पर हवा का द्रव्यमान 1034gcm-2 हो, तो पास्कल में दाब का परिकलन कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार.
द्रव्यमान (m) = 1034g = 1.034kg
∵ बल = द्रव्यमान × त्वरण
= m × a
= 1.034 × 934 = 10.13N
तथा क्षेत्रफल = 1cm2
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प्रश्न 1.14
द्रव्यमान का SI मात्रक क्या है? इसे किस प्रकार परिभाषित किया जाता है?
उत्तर:
द्रव्यमान का SI मात्रक किलोग्राम है।

परिभाषा:
सेवरेस (पेरिस के निकट) में 0°C पर रखे Pt – Ir (प्लैटिनम-इरीडियम) मिश्र धातु की एक विशेष छड़ का द्रव्यमान 1 मानक किलोग्राम माना गया है।

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प्रश्न 1.15
निम्नलिखित पूर्व-लग्नों को उनके गुणांकों के साथ मिलाइए –
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उत्तर:
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प्रश्न 1.16
सार्थक अंकों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सार्थक अंक-ऐसे अंकों की संख्या जिनसे किसी राशि को निश्चित रूप से व्यक्त किया जाये, सार्थक अंक कहलाते हैं।

प्रश्न 1.17
पेयजल के नमूने में क्लोरोफार्म, जो कैन्सरजन्य है, से अत्यधिक संदूषित पाया गया। संदूषण का स्तर 15 ppm (द्रव्यमान के रूप में) था।

  1. इसे द्रव्यमान प्रतिशतता में दर्शाइए।
  2. जल के नमूने में क्लोरोफार्म की मोललता ज्ञात कीजिए।

उत्तर:
1. ∵ संदूषण का स्तर = 1.5 ppm
∴ 15g क्लोरोफार्म (CHCl3) उपस्थित है = नमूने के 106g में –
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= 15 × 10-4

2. CHCl3 का मोलर द्रव्यमान = 12 + 1 + 3 × 35.5
= 119.5g mol-1
क्लोरोफार्म की मोललता क्लोरोफार्म का द्रव्यमान/
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प्रश्न 1.18
निम्नलिखित को वैज्ञानिक संकेतन में लिखिए –

  1. 0.0048
  2. 234,000
  3. 8008
  4. 500.0
  5. 6.0012

उत्तर:

  1. 4.8 × 103
  2. 2.34 × 105
  3. 8.008 × 103
  4. 5.000 × 102
  5. 6.0012 × 100

प्रश्न 1.19
निम्नलिखित में सार्थक अंकों की संख्या बताइए –

  1. 0.0025
  2. 208
  3. 5005
  4. 126,000
  5. 500.00
  6. 2.0034

उत्तर:

  1. 2
  2. 3
  3. 4
  4. 3
  5. 6
  6. 5

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प्रश्न 1.20
निम्नलिखित को तीन सार्थक अंकों तक निकटित कीजिए –

  1. 34.216
  2. 10.4107
  3. 0.04597
  4. 2808

उत्तर:

  1. 34.2
  2. 10.4
  3. 0.046
  4. 2810

प्रश्न 1.21
(क) जब डाइनाइट्रोजन और डाइ – ऑक्सजीन अभिक्रिया द्वारा भिन्न यौगिक बनाती हैं, तो निम्नलिखित आँकड़े प्राप्त होते हैं –
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ये प्रायोगिक आँकड़े रासायनिक संयोजन के किस नियम के अनुरूप हैं? बताइए।

(ख) निम्नलिखित में रिक्त स्थान को भरिए –

  • 1km = ……………. mm = …………… pm
  • 1mg = ……………. kg = ……………. ng
  • 1mL = ……………. L= ……………. dm3

हल:
(क) डाइनाइट्रोजन के 14 भाग को स्थिर करने पर ऑक्सीजन के ऑक्साइडों में क्रमशः द्रव्यमान 16, 32, 16, 40 है जो कि परस्पर एक सरल अनुपात 2 : 4 : 2 : 5 है। अतः ये ऑकड़े गुणित अनुपात के अनुरूप हैं।

(ख)

  • 1km = 106 mm = 105pm
  • 1mg = 10-6 kg = 103 ng
  • 1mL = 10-3 L = 10-3 dm3

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प्रश्न 1.22
यदि प्रकाश का वेग 3.00×108 ms-1 हो, तो 2.00 ns में प्रकाश कितनी दूरी तय करेगा?
उत्तर:
∵ 1 सेकण्ड = 10-9 ns
∴ प्रकाश 1ns दूरी करता है = 3.00 × 108 × 10-9 m
= 3 × 10-1
∴ प्रकाश 2ns में दूरी तय करेगा = 3 × 10-1 × 2m
= 6 × 10-1m
= 0.6m

प्रश्न 1.23.
किसी अभिक्रिया A + B2 → AB2, में निम्नलिखित अभिक्रिया मिश्रणों में सीमांत अभिकर्मक (यदि कोई हो, तो) ज्ञात कीजिए –

  1. A के 300 परमाणु + B के 200 अणु
  2. 2 मोल A + 3 मोल B
  3. A के 100 परमाणु + B के 100 अणु
  4. A के 5 मोल + B के 2.5 मोल
  5. A के 2.5 मोल + B के 5 मोल

उत्तर:
1.
Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधा
∵ A का 1 परमाणु, B के 1 अणु 1 से क्रिया करता है
∴ A के 300 परामणु, B के 300 अणुओं से क्रिया करेंगे।
किन्तु अभिक्रिया में उपलब्ध B2 के अणुओं की संख्या = 200 अणु
अत: B2 सीमान्त अभिकर्मक है।

2. ∵ A का 1 मोल, B के 2 मोल से क्रिया करता है।
∴ A का 1.5 मोल, B के 3 मोल से क्रिया करेगा।
किन्तु अभिक्रिया में वास्तविक उपलब्ध A के मोलों की संख्या = 2
अत: A सीमान्त अभिकर्मक है।

3. ∵ A के 100 परमाणु, B के 100 परमाणुओं से क्रिया करते हैं। अतः यह कोई सीमान्त अभिकर्मक नहीं है।

4. ∵ A का 1 मोल, B के 2 मोल से क्रिया करता है।
∴ A के 5 मोल, B के 10 मोल से क्रिया करेंगे।
किन्तु B के वास्तविक उपलब्ध मोलों की संख्या = 2.5
अत: B सीमान्त अभिकर्मक है।

5. ∵ A का 1 मोल, B के 2 मोलों से क्रिया करता है
∴ A के 2.5 मोल B के 5 मोलों से किया करेंगे।
अतः यहाँ कोई सीमान्त अभिकर्मक नहीं है।

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प्रश्न 1.24.
डाइनाइट्रोजन और डाइहाइड्रोजन निम्नलिखित रासायनिक समीकरण के अनुसार अमोनिया बनाती हैं –
N2 (g) + 3H2 (g) → 2NH3 (g)

  1. यदि 2.00 × 103g डाइनाइट्रोजन 1.00 × 103g डाइहाइड्रोजन के साथ अभिक्रिया करती हैं, तो प्राप्त अमोनिया के द्रव्यमान का परिकलन कीजिए।
  2. क्या दोनों में से कोई अभिक्रियक शेष बचेगा?
  3. यदि हाँ, तो कौन-सा? उसका द्रव्यमान क्या होगा?

उत्तर:
दी गई रासायनिक अभिक्रिया का समीकरण –
Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधा

1. ∵ 28gN2, 6gH2 की अभिक्रिया से प्राप्त NH3(g) = 34g
∴ 2.00 × 103g N2, 1.00 × 103gH2 की अभिक्रिया से NH3 (g) प्राप्त होगी
= \(\frac{34}{28}\) × 2.0 × 103
= 2428.5g NH3

2. हाँ, हाइड्रोजन शेष बचेगी।

3. ∵ 28 gN2, 6g H2 से क्रिया से NH3, बनती है = 34g
∴ 2.00 × 103g N2, 1.00 × 103g H2 से क्रिया NH3 बनेगी।
\(\frac { 2\times 10^{ 3 }\times 6 }{ 28 } \) = 428.5 g
उपलब्ध H2 का द्रव्यमान = 1.00 × 103 g
अत: शेष H2 का द्रव्यमान = 1000 – 428.5
= 571.5g

प्रश्न 1.25.
0.5 mol Na2CO3, और 0.50M Na2CO3, में क्या अन्तर है?
उत्तर:
0.50 ml Na2CO3 सान्द्रता mol में व्यक्त होता है तथा 0.50M Na2CO3., सान्द्रता mol e/L में व्यक्त होता है।

प्रश्न 1.26
यदि डाइ-हाइड्रोजन गैस के 10 आयतन डाइ-ऑक्सीजन गैस के 5 आयतनों के साथ अभिक्रिया करें तो जलवाष्य के कितने आयतन प्राप्त होंगे?
उत्तर:
रासायनिक समीकरण निम्नलिखित हैं –

∴ 10 आयतन डाइ-हाइड्रोजन गैस के 5 आयतन डाइ-ऑक्सीजन से अभिक्रिया के 10 आयतन जलवाष्प के प्राप्त होंगे।
16g ऑक्सीजन का उपलब्ध द्रव्यमान = \(\frac{1}{2}\) मोल
अत: उत्पन्न CO2 का द्रव्यमान = \(\frac{1}{2}\) मोल
= \(\frac{1}{2}\) × 44 = 22g

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प्रश्न 1.27
निम्नलिखित को मूल मात्रकों में परिवर्तित कीजिए –

  1. 28.7 pm
  2. 15.15 pm
  3. 25365 mg

उत्तर:
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प्रश्न 1.28
निम्नलिखित में से किसमें परमाणुओं की संख्या सबसे अधिक होगी?

  1. 1gAu(s)
  2. 1gNa (s)
  3. 1gLi(s)
  4. 1gCl2(g)

उत्तर:
1. ∵ 197g Au में परमाणुओं की संख्या
= 6.022 × 1023
∴ 1g Au में परमाणुओं की संख्या = \(\frac { 6.022\times 10^{ 23 } }{ 197 } \)
= 3.06 × 1021 परमाणु

2. ∵ 23g Na में परमाणुओं की संख्या
= 6.022 × 1023
∴ 1g Na में परमाणुओं की संख्या = \(\frac { 6.022\times 10^{ 23 } }{ 23 } \)
= 2.62 × 1022 परमाणु

3. ∵ 6.9g Li में परमाणुओं की संख्या
= 6.022 × 1022
∴ lg Li में परमाणुओं की संख्या
= \(\frac { 6.022\times 10^{ 23 } }{ 6.09 } \)
= 8.73 × 1022 परमाणु

4. ∵ 71g Cl2 में परमाणुओं की संख्या
= 6.022 × 1023
∴ lg Cl2 में परमाणुओं की संख्या = \(\frac { 6.022\times 10^{ 23 } }{ 71 } \)
= 1.7 × 1021 परमाणु

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प्रश्न 1.29
ऐथनॉल के ऐसे जलीय विलयन की मोलरता ज्ञात कीजिए, जिसमें ऐथनॉल का मोल-अंश 0.040 है। (मान लें कि जल का घनत्व 1 है।)
उत्तर:
यदि n A तथा n B क्रमशः जल और ऐथनॉल के मोलों की संख्या हो, तो –
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अतः ऐथनॉल के जलीय विलयन की मोललता
= 2.31m

प्रश्न 1.30
एक 12C कार्बन परमाणु का ग्राम (g) में द्रव्यमान क्या होगा?
उत्तर:
कार्बन का मोलर द्रव्यमान = 12.011g mol-1
∵ 1mol में कार्बन परमाणुओं की संख्या = 6.022 × 1023 mol-1
∴ एक 12C कार्बन परमाणु का द्रव्यमान
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= \(\frac { 12.011 }{ 6.022\times 10^{ 23 } } \)
= 1.99452 × 1023g

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प्रश्न 1.31
निम्नलिखित परिकलनों के उत्तर में कितने सार्थक अंक होने चाहिए –

  1. Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधा
  2. 5 × 5.364
  3. 0.0125 + 0.7864 + 0.0215

उत्तर:

  1. 3
  2. 4
  3. 4

अतः 1gLi में परमाणु की संख्या सबसे अधिक होगी।

प्रश्न 1.32
प्रकृति में उपलब्ध आर्गन के मोलर द्रव्यमान की गणना के लिए निम्नलिखित तालिका में दिये गए आँकड़ों का उपयोग कीजिए –
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उत्तर:
आर्गन का मोलर द्रव्यमान औसत मोलर द्रव्यमान होगा जिसकी गणना निम्न प्रकार की जा सकती है –
∴ आर्गन का मोलर द्रव्यमान
0.337 × 35.9655 + 0.063 × 37.96272
= \(\frac { +99.6\times 39.9624 }{ 0.337+0.063+99.600 } \)
= \(\frac{3994.76775}{100}\)
= 39.948 mol-1

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प्रश्न 1.33
निम्नलिखित में से प्रत्येक में परमाणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए –

  1. 52 मोल Ar
  2. 52u He
  3. 52g He

उत्तर:
1. ∵ 1mol He में परमाणुओं की संख्या
= 6.022 × 1023
∴ 52mol He में परमाणुओं की संख्या
= 6.022 × 1023 × 52
= 3.13 × 1025 परमाणु

2. ∵ 4u द्रव्यमान He में परमाणु संख्या = 1
∴ 52u द्रव्यमान He में परमाणु संख्या = \(\frac{4}{52}\)
= 13 परमाणु

3. ∵ 4g He में परमाणुओं की संख्या = 6.022 × 1023
∴ 52g He में परमाणुओं की संख्या
= \(\frac { 6.022\times 10^{ 23 }\times 52 }{ 4 } \)
= 7.83 × 1024

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प्रश्न 1.34
एक वेल्डिंग ईंधन गैस में केवल कार्बन और हाइड्रोजन उपस्थित हैं। इसके नमूने की कुछ मात्रा ऑक्सीजन से जलाने पर 3.38 ग्राम कार्बन डाइ-ऑक्साइड, 0.690 ग्राम जल के अतिरिक्त और कोई उत्पाद नहीं बनाती। इस गैस के 10.0L(STP पर मापित) आयतन का भार 11.69 ग्राम पाया गया। इसके –

  1. मूलानुपाती सूत्र
  2. अणु, द्रव्यमान
  3. अणुसूत्र की गणना कीजिए

उत्तर:
ईंधन गैस में कार्बन तथा हाइड्रोजन के द्रव्यमान की गणना निम्न प्रकार से की जा सकती है –
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1. ईंधन गैस के मूलानुपाती सूत्र की गणना –
Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 1 रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधा
ईंधन गैस का मूलानुपाती सूत्र = CH

2. गैस के आणविक द्रव्यमान की गणना –
∵ 10.0L गैस का S.T.P. पर आणविक द्रव्यमान
= 11.69g

∴ 22.4L गैस का S.T.P. पर आणविक द्रव्यमान
\(\frac{11.69}{10.0}\) × 22.4
अतः ईंधन गैस का आणविक द्रव्यमान = 26.18g = 26u

3. गैस के आण्विक सूत्र की गणना –
मूलानुपाती सूत्र-द्रव्यमान = 12 + 1 = 13u
आण्विक द्रव्यमान = 26u
रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ
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= \(\frac{26}{13}\) = 2
अत: ईंधन का आण्विक सूत्र C2H2 तथा नाम ऐसीटिलीन है।

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प्रश्न 1.35
CaCO3, जलीय HCI के साथ निम्नलिखित अभिक्रिया कर CaCl2, और CO2, बनाता है –
CaCO3(s) + 2HCI(g) → CaCl2(aq) + CO2(g) + H2O(l)
0.75 MHCI के 25 mL के साथ पूर्णतः अभिक्रिया करने के लिए CaCO3 की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी
उत्तर:
HC1 विलयन की मोलरता = 0.75M = 0.75 mol L-1
तथा HCl का आयतन = 25 mL = \(\frac{25}{1000}\) = 0.025L
HCl विलयन की मोलरता
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या HCl का द्रव्यमान = 0.75 × 36.5 × 0.025
= 0.684g

अभिक्रिया
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∵ 73g HCI आवश्यक है = 100g CaCO3 के लिए
∴ 0.648g HCl आवश्यक होगा = \(\frac{100g}{73g}\) × 0.684g
= 0.94g
अतः पूर्णत: अभिक्रिया के लिए आवश्यक CaCO3
= 0.94g

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प्रश्न 1.36
प्रयोगशाला में क्लोरीन का विरचन मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) को जलीय HCI विलयन के साथ अभिक्रिया द्वारा निम्नलिखित समीकरण के अनुसार किया जाता है –
HCI (aq) + MnO2(s) → 2H2O(l) + MnCl2(aq) + Cl2(g)
5.0g मैगनीज डाइऑक्साइड के साथ HCI के कितने ग्राम अभिक्रिया करेंगे?
उत्तर:
अभिक्रिया की रासायनिक समीकरण निम्नवत् है –
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87g MnO2 अभिक्रिया करता है = 146g HCl से
5.0g MnO2 अभिक्रिया करेगा = \(\frac{146}{87}\) × 5
= 8.39 g HCl