Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भारत-स्थिति

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भारत-स्थिति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भारत-स्थिति

Bihar Board Class 11 Geography भारत-स्थिति Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भारत-स्थिति

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत के विस्तार के संबंध कौन-सा कथन सही है …………………….
(क) 8°41’N-35°5’N
(ख) 8°4’N-35°6’N
(ग) 8°41’N-37°5’N
(घ) 6°45″N-35°6’N
उत्तर:
(ग) 8°41’N-37°5’N

प्रश्न 2.
भारत के साथ किस देश की स्थल सीमा सबसे लम्बी है …………………….
(क) बंग्लादेश
(ख) पाकिस्तान
(ग) चीन
(घ) म्यांमार
उत्तर:
(ख) पाकिस्तान

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प्रश्न 3.
कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से अधिक बड़ा है ………………………
(क) चीन
(ख) फ्रांस
(ग) मिस्र
(घ) ईरान
उत्तर:
(क) चीन

प्रश्न 4.
निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?
(क) 69°30’E
(ख) 75°30’E
(ग) 82°30’E
(घ) 90° 30’E
उत्तर:
(ग) 82°30’E

प्रश्न 5.
यदि आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किसको आर-पार नहीं करेंगे?
(क) यमुना
(ख) सिंधु
(ग) ब्रह्मपुत्र
(घ) गंगा
उत्तर:
(ख) सिंधु

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प्रश्न 6.
क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में भारत का स्थान है।
(क) तीसरा
(ख) चौथा
(ग) पांचवाँ
(घ) सातवाँ
उत्तर:
(घ) सातवाँ

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ, तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
उत्तर:
हाँ, भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है क्योंकि देशांतर रेखाओं के मानों से स्पष्ट होता है कि इनमें लगभग 30 डिग्री का अंतर है जो हमारे देश के सबसे पूर्वी व सबसे पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर पैदा करता है। कुछ ऐसे देश हैं जिनमें अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशांतर रेखाएँ हैं। उदाहरण : संयुक्त राज्य अमेरिका में छह समय कटिबंध हैं।

हाँ, सूक्ष्म अवलोकन करने से पता चलता है कि प्रत्येक राज्य के जिलों की संख्या का उस राज्य के क्षेत्रफल से गहरा सम्बन्ध है। जिन राज्यों का क्षेत्रफल अधिक है उन राज्यों की संख्या अधिक है। जिन राज्यों का क्षेत्रफल कम है उन राज्यों के जिलों की संख्या कम है। उदाहरणतया मध्य प्रदेश का क्षेत्रफल अधिक होने के कारण वहाँ पर जिलों की संख्या अधिक है। जबकि मेघालय, गोवा आदि का क्षेत्रफल कम होने के कारण उन राज्यों में जिलों की संख्या कम है।

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प्रश्न 2.
उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, त्रिपुरा, राजस्थान तथा जम्मू और कश्मीर में से कौन-सा राज्य सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला और कौन-सा न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है ?
उत्तर:
पश्चिम बंगाल राज्य सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है जबकि अरुणाचल प्रदेश सबसे कम घनत्व वाला राज्य है।

प्रश्न 3.
राज्य के क्षेत्रफल व जिलों की संख्या के बीच संबंध को ढूँढ़िए।
उत्तर:
राज्यों के क्षेत्रफल व जिलों की संख्या का संबंध –

  1. भौतिक कारकों जैसे भू – आकार, जलवायु तथा मृदा
  2. सामाजिक – आर्थिक कारक जैस राजनैतिक कारक, आर्थिक (प्राकृतिक) संसाधनों की उपलब्धताओं से है।

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प्रश्न 4.
तटीय सीमाओं से संलग्न राज्यों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, उड़ीसा, त्रिपुरा, पं० बंगाल।

प्रश्न 5.
पश्चिम से पूर्व की ओर स्थलीय सीमा वाले राज्यों का क्रम तैयार कीजिए।
उत्तर:
राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तरीसगढ़, बिहार, झारखंड ।

(ग) परिशिष्ट – II पर आधारित क्रियाकलाप (इस अभ्यास को समझने व विद्यार्थियों से करवाने में अध्यापक सहायता कर सकते हैं।)

प्रश्न 1.
उन केंद्र शासित क्षेत्रों की सूची बनाइए जिनकी स्थिति तटवर्ती है।
उत्तर:
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप दमन व दीव दादरा व नगर हवेली पांडिचेरी।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रफल दिल्ली तथा अंडमान व निकोबार द्वीप समूह के क्षेत्रफल और जनसंख्या में अंतर की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की जनसंख्या 13,850,507 है और इसका क्षेत्रफल 1,483 वर्ग किमी है। जबकि अंडमान व निकोबार केंद्र शासित प्रदेश की जनसंख्या 356,152 है और इसका क्षेत्रफल 8,243 वर्ग किमी है। अंडमान व निकोबार का क्षेत्रफल अधिक होते हुए भी वहाँ की जनसंख्या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली से काफी कम लगभग 30 गुणा कम है। ये अंतर आर्थिक, राजनैतिक तथा भौगोलिक कारणें से है।

प्रश्न 3.
एक ग्राफ पेपर पर दंड आरेख द्वारा केंद्र शासित क्षेत्रों के क्षेत्रफल व जनसंख्या को आलेखित कीजिए।
उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Geography भारत-स्थिति Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कौन-सा महासागरीय मार्ग भारत को यूरोप से जोड़ता है?
उत्तर:
स्वेज नहर मार्ग।

प्रश्न 2.
भारत का सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल) कौन-सा है?
उत्तर:
राजस्थान।

प्रश्न 3.
भारत का सबसे छोटा राज्य कौन-सा है?
उत्तर:
गोआ।

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प्रश्न 4.
भारत में सबसे छोटे केन्द्र शासित प्रदेश का नाम लिखें।
उत्तर:
लक्षद्वीप।

प्रश्न 5.
कौन-सा राज्य पांच राज्यों से घिरा हुआ है?
उत्तर:
मध्य प्रदेश।

प्रश्न 6.
भारत में कितने तटीय राज्य हैं?
उत्तर:
नौ राज्य तटीय राज्य हैं-गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोआ, केरल, तमिलनाडु, आंध प्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिमी बंगाल।

प्रश्न 7.
अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल कितने द्वीप हैं?
उत्तर:
204

प्रश्न 8.
लक्षद्वीप में कुल कितने द्वीप हैं?
उत्तर:
36

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प्रश्न 9.
मूंगे के द्वीपों के समूह का नाम बताएँ।
उत्तर:
लक्षद्वीप।

प्रश्न 10.
भारत की वास्तविक शक्ति क्या है?
उत्तर:
अनेकता में एकता।

प्रश्न 11.
भारत का कुल कितना क्षेत्रफल है?
उत्तर:
36,67,263 किलोमीटर।

प्रश्न 12.
भारत के किस राज्य से कर्क रेखा तथा प्रमाणिक रेखाएँ अधिक दूरी तय करती हैं?
उत्तर:
मध्य प्रदेश।

प्रश्न 13.
कौन-सी स्ट्रीट भारत को श्रीलंका से अलग करती है?
उत्तर:
पार्क स्ट्रीट।

प्रश्न 14.
भारत की तट रेखा की कुल लम्बाई लिखो।
उत्तर:
75166.6 किलोमीटर।

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प्रश्न 15.
कर्क रेखा द्वारा भारत में निर्मित दो प्रदेशों के नाम लिखो।
उत्तर:
उष्ण कटिबन्ध तथा शीतोष्ण कटिबन्ध।

प्रश्न 16.
कौन-सी अक्षांश रेखा भारत के गुजरती है?
उत्तर:
कर्क रेखा (23\(\frac { 1 }{ 2 }\)°उत्तर)।

प्रश्न 17.
जनसंख्या के आधार पर भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर:
दूसरा।

प्रश्न 18.
कौन-सी अक्षांश रेखाएं भारत की उत्तरी तथा दक्षिणी विस्तार बनाती हैं?
उत्तर:
37° उत्तर तथा 8° उत्तर।

प्रश्न 19.
भारत के पूर्वी तथा पश्चिमी सिरे में कितना समय लगता है?
उत्तर:
2 घंटे।

प्रश्न 20.
उस राज्य का नाम बताए जिसकी सबसे लम्बी तट रेखा है?
उत्तर:
गुजरांत।

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प्रश्न 21.
अण्डमान तथा निकोबार द्वीपों का कैसे निर्माण हुआ है?
उत्तर:
जलमग्न पहाड़ियों के शिखरों के कारण।

प्रश्न 22.
‘हिन्द महासागर के पूर्वी तथा पश्चिमी भाग में सागरों के नाम लिखो।
उत्तर:
अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी।

प्रश्न 23.
हिन्द महासागर के साथ कौन-से महाद्वीप हैं?
उत्तर:
अफ्रीका, एशिया ऑस्ट्रेलिया, अण्टार्कटिका।

प्रश्न 24.
‘संसार की छत’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
पामीर को।

प्रश्न 25.
किसके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा?
उत्तर:
राजा दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर।

प्रश्न 26.
क्षेत्रफल के आधार पर भारत का विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर:
सातवां।

प्रश्न 27.
किस राज्य को Land of Dawn कहते हैं?
उत्तर:
अरुणाचल प्रदेश।

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प्रश्न 28.
भारत तथा चीन के मध्य सीमा का नाम लिखो।
उत्तर:
मैक्मोहन लाइन।

प्रश्न 29.
भारत में कर्क रेखा पर स्थित दो शहरों के नाम लिखो।
उत्तर:
अहमदाबाद तथा जबलपुर।

प्रश्न 30.
भारत के मध्य से कौन-सी अक्षांश रेखा गुजरती है?
उत्तर:
कर्क रेखा।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय उपमहाद्वीप के हिमालय पर्वत को पार करने वाले चार दरों के नाम बताएँ।
उत्तर:
भारत के उत्तर में हिमालय एक पर्वतीय दीवार के रूप में आवागमन साधनों के लिए एक रूकावट है। फिर इस पर्वत को पार करने के लिए कई दरें लाभदायक हैं, जैसे –

  • सतलुज गार्ज से शिपकी ला दर्रा (भारत-तिब्बत सड़क मार्ग)
  • काराकोरम दर्रे से कश्मीर लेहमार्ग।
  • सिक्किम में नाथूला दर्रा।
  • सिक्किम में जैल्पला दर्रा (ल्हासा-कालिम्पोंग मार्ग)।

प्रश्न 2.
उत्तर:पश्चिम भारत में स्थित दरें तथा इनका महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
विदेशी उत्तर:पश्चिम में स्थित खैबर और बोलन दरों से होकर ही भारत में प्रवेश कर सकते थे। खैबर, हिन्दुकुश पर्वत में सफेद कोह के निकट तथा बोलन, सुलेमान और किरथर पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित है। पहले तो मध्य और पश्चिम एशिया की जन-जातियों इन्हीं मार्गों द्वारा भारत में आई और बाद में सिकंदर, अफगानी तथा फारसी फौजों ने भी इन्हीं भागों का अनुसारण किया । व्यापार के लिए भारत पश्चिम एशिया, पूर्व-अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया से समुद्री मार्गों द्वारा जुड़ा था।

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प्रश्न 3.
क्षेत्रफल के आधार पर संसार के देशों में भारत की स्थिति क्या है?
उत्तर:
क्षेत्रफल के आधार पर भारत संसार में सातवां बड़ा देश है। भारत से अधिक क्षेत्रफल वाले छः देश रूस, ब्राजील कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया हैं। भारत का क्षेत्रफल रूस को छोड़ कर पूरे यूरोप के बराबर है। यह इंग्लैण्ड से 13 गुणा तथा जापान से 9 गुणा बड़ा है, परन्तु रूस भारत से 7 गुणा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका से तीन गुणा बड़ा है। भारत का पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर:दक्षिण विस्तार पृथ्वी की परिधि का लगभग 12 है।

प्रश्न 4.
उप-महाद्वीप किसे कहते हैं? इसकी व्याख्या दक्षिण एशिया की हिमालय पर्वत श्रेणी के दक्षिण स्थित देशों के सदर्भ में कीजिए।
उत्तर:
उप-महाद्वीप एक विशाल स्वतन्त्र भौगोलिक इकाई को कहा जाता है। यह स्थल खण्ड मुख्य महाद्वीप से स्पष्ट रूप से अलग होता है। इस विशालता के कारण इस भू-भाग में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्वरूपों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। भू’भाग की सीमाएँ विभिन्न स्थलाकृतियों द्वारा बनाई जाती हैं जो इसे सीमावर्ती प्रदेश से पृथक् करती हैं। भारत एक महान देश है।

इसे प्रायः भारतीय उप-महाद्वीप (Indian Sub-continent) कहा जाता है। हिमालय पर्वत की प्राकृतिक सीमा भारतीय उप-महाद्वीप को एक परिबद्ध चरित्र देकर विलगता प्रदान करती है। यह भौगोलिक इकाई इस भूखण्ड को एशिया महाद्वीप से अलग करती है। इसमें पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा मालदीप देश स्थित हैं। इन्हें सार्क (SAARC) देश भी कहते है।

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प्रश्न 5.
जब अरुणाचल में सूर्योदय हो चुका होता है सब सौराष्ट्र में रात होती है। कारण बताएँ। अथवा, भारत के सबसे पूर्वी भाग अरुणाचल प्रदेश और सबसे पश्चिमी भाग गुजरात के स्थानीय समय में दो घण्टे का अन्तर क्यों है? अथवा, भारत का देशान्तरीय विस्तार हमें किस प्रकार प्रभावित करता है?
उत्तर:
भारत पूर्व पश्चिम की ओर लगभग तीन हजार किलोमीटर की दूरी में फैला हुआ है। इसका सबसे पश्चिमी सीमा बिन्दु सौराष्ट्र में हैं, जबकि पूर्वी सीमा बिन्दु अरुणाचल प्रदेश में है। इस प्रकार भारत का पूर्व-पश्चिम विस्तार 30° है । सूर्य को 1° देशान्तर पार करने के लिए 4 मिनट का समय लगता है। इसलिए 30° देशान्तर के लिए (30 x 4 = 120) मिनट या दो घण्टे का समय लगेगा। अरुणाचल प्रदेश पूर्व में है।

यह भाग सूर्य के सामने अंत में आता है, इसलिए वहाँ सूर्योदय बाद में अर्थात् दो घण्टे देर से होता है तो सौराष्ट्र में रात होती हैं। इसलिए अरुणाचल प्रदेश में सूर्य उदय हो चुका होता है तो सौराष्ट्र में रात होती है। इसलिए अरुणाचल को ‘सूर्योदय का प्रदेश’ (Land of Dawn) भी कहते हैं। इस तथ्य से भारत की विशालता का ज्ञान होता है परन्तु आधुनिक जेट युग में दूरियाँ अपना महत्त्व खो चुकी हैं। आप श्रीनगर में नाश्ता करके दोपहर के खाने पर तिरुवनन्तपुरम पहुंच सकते हैं। जामनगरी और गुवाहाटी के मध्य की यात्रा उतना ही समय लेगी जितनी देर में आप एक भारतीय फिल्म देखते हैं।

प्रश्न 6.
भारत के दक्षिण में स्थित महासागर को ‘हिन्द महासागर’ क्यों कहा जाता है? हिन्द महासागर भारत को किन देशों से जोड़ता है?
उत्तर:
हिन्द महासागर सचमुच ‘हिन्द’ (भारत) का महासागर है। यह संसार में एकमात्र महासागर है जिसका नाम किसी देश के नाम के कारण है। भारत की तट रेखा हिन्द महासागर के अधिकतर भाग को घेरती है। इस क्षेत्र में भारत जैसे महत्त्वपूर्ण देश का प्रभाव है। प्राचीनकाल में इस क्षेत्र में भारत ही सब से उन्नत देश था। इस महत्त्व के कारण ही इसे हिन्द महासागर कहा जाता है। हिन्द महासागर भारत को पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण पश्चिमी एशिया, यूरोप तथा उत्तरीय अमेरिका से स्वेज मार्ग द्वारा जोड़ता है। पूर्व में यह चीन, जापान तथा इण्डोनेशिया से जुड़ा हुआ है।

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प्रश्न 7.
भारत के विस्तार का वर्णन करें। भारत के निकटवर्ती 6 पड़ोसी देश तथा तुलनात्मक रूप से कुछ दूर के 6 पड़ोसी देश बताएँ । भारतीय भूखण्ड का कौन-सा भाग इण्डोनेशिया के निकटतम है ?
उत्तर:
क्षेत्रफल के आधार पर भारत संसार का सातवां बड़ा देश है। इसका अक्षांशीय विस्तार 80-4° से 37°-6′ उत्तर तक है। इसका देशान्तरीय विस्तार 68°-7′ से 970-25′ पूर्वी तक है। भारत का उत्तर से दक्षिण दूरी 3214 किमी है। भारत की पश्चिम-पूर्व दूरी 2933 कि०मी० है। इन्दिरा प्वाईंट (निकोबार द्वीप) भारत का दक्षिण छोर है। भारत के छ: निकटवर्ती पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल म्यांमार, चीन, श्रीलंका तथा बांग्लादेश हैं। भारत के तुलनात्मक रूप से कुछ दूर के छ: पड़ोसी देश अफगानिस्तान, ईरान, रूस, मलेशिया, इण्डोनेशिया तथा थाईलैण्ड हैं। निकोबार द्वीप इण्डोनेशिया के निकट है।

प्रश्न 8.
मैक्मोहन रेखा किसे कहते हैं ? इसका क्या महत्त्व है? इसका निर्धारण किस सिद्धान्त पर किया गया है?
उत्तर:
मैक्मोहन रेखा भारत तथा चीन के मध्य सीमा रेखा है। यह सीमा रेखा हिमालय रेखा के साथ-साथ कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई है। इस सीमा के पार चीन के सिक्यांग तथा तिब्बत पठार स्थित हैं। इसके उत्तर:पूर्वी भाग में मयन्मार (बर्मा), चीन एवं भारत आपस में मिलते हैं। यह सीमा रेखा अधिकांशतः प्राकृतिक है तथा ऐतिहासिक रूप से निर्धारित है। हिमालय पर्वत हमारी उत्तरी सीमा का प्रहरी है। उच्च हिमालय के शिखर भारत तथा चीनको अलग-अलग करते हैं। ये शिखर एक जल विभाजक के रूस में फैल हुए है तथा चीन सीम रेखा को प्राकृतिक रूप देते हैं।

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प्रश्न 9.
उन राज्यों और संघीय प्रदेशों के नाम बताइए जिनकी सीमा बांग्लादेश से मिलती है। अथवा, भारत की स्थल सीमाओं का वर्णन करें। भारत के कौन-से राज्य सीमावर्ती देशों के साथ लगते हैं?
उत्तर:

  1. बांग्लादेश के साथ स्थल सीमा-भारत तथा बांग्लादेश के मध्य पूर्व में एक स्थलीय सीमा है। बांग्लादेश के पूर्व में असम, मेघालय, त्रिपुरा राज्य तथा मिजोरम प्रदेश की सीमाएँ हैं। बांग्लादेश के पश्चिम में पश्चिमी बंगाल राज्य की सीमा है।
  2. पाकिस्तान के साथ स्थल सीमा-भारत तथा पाकिस्तान के बीच कश्मीर से लेकर खाड़ी कच्छ तक एक स्थलीय सीमा है। इस सीमा के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान तथा गुजरात राज्यों की सीमाएँ मिलती हैं
  3. नेपाल के साथ स्थल सीमा-भारत के उत्तर में हिमालय पर्वतों में स्थित नेपाल देश है। इन देश के बीच यह एक प्राकृतिक सीमा है। इस सीमा के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, उत्तारंचल, बिहार, पश्चिमी बंगाल तथा सिक्कम राज्यों की सीमाएँ मिलती हैं।
  4. म्यंमार के साथ स्थल सीमा-हिमालय पर्वत की पूर्वी शाखाएँ भारत-वर्मा सीमा बनाती हैं। यह एक प्राकृतिक स्थलीय सीमा है। इस सीमा के साथ-साथ नागालैण्ड, मणिपुर राज्य, अरुणाचल और मिजोरम प्रदेश की सीमाएँ बनाते हैं।
  5. पामीर गांठ के शीर्ष के साथ देश-भारत की उत्तरी सीमा के शीर्ष (पामीर गांठ) पर पाँच देशों की सीमाएँ आपस में मिलती है। इस मिलन बिन्दु पर भारत, चीन, तजाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान की सीमाएँ मिलती हैं। पामीर गांठ को ‘संसार की छत’ (Roof of the world) कहते हैं।

प्रश्न 10.
भारत का प्रायद्वीपीय आकार किस प्रकार लाभदायक है? तीन उदारहण देकर स्पष्ट करें। अथवा, भारत की प्रायद्वीपीय स्थिति के तीन प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
भारतीय प्रायद्वीप त्रिभुजाकार है। इससे भारत के तीन पड़ोसी सागरों तक (बंगाल की खाड़, अरब सागर, हिन्द महासागर) पहुँचना बहुत सुगम है। इस आकार के कारण मालबार तट तथा कोरोमण्डल तट पर मत्स्य क्षेत्रों को विकास हुआ है। दोनों तटों पर कई प्राकृतिक बंदरगाहों जैसे-विशाखापट्टनम्, चेन्नई, कोचीन, मुम्बई आदि का विकास हुआ है जहाँ से अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री मार्ग गुजरते हैं।

प्रश्न 11.
‘भारत न तो दानव है और न बौना’ इस कथन की व्याख्या कीजिए। अथवा, “भारत न तो संसार का सबसे बड़ा देश है और न ही सबसे छोटा।” उदाहरण सहित व्याख्या करो।
उत्तर:
भारत एक विशाल देश है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवाँ स्थान है। भारत पृथ्वी के धरातल के लगभग 22% क्षेत्रफल में फैला हुआ है फिर भी कई देशों का आकार भारत से बड़ा है। रूस भारत से लगभग सात गुना बड़ा है। भारत इंग्लैंड से 13 गुना तथा जापान से नौ गुणा बड़ा है। इस प्रकार क्षेत्रफल के आधार पर भारत न बहुत बड़ा और न ही बहुत छोटा देश है । इसलिए यह कथन कि “भारत न तो दानव है और न ही बौना” (“India is neither againt nor a niomv.”)

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प्रश्न 12.
“भारत को हिन्द महासागर में सर्वाधिक केन्द्रीय स्थिति प्राप्त है।” यह कथन कहाँ तक सही है ?
उत्तर:
हिन्द महासागर का विस्तार 40° पूर्व से 120° पूर्व देशान्त तक है। भारत का दक्षिणी सिरा कन्याकुमारी लगभग 80° पूर्वी देशान्त पर स्थित है। इस प्रकार भारत को हिन्द महासागर में केन्द्रीय स्थिति प्राप्त है। भारतीय प्रायद्वीप अरब सागर तथा खाड़ी बंगाल के मध्य में स्थित है। हिन्द महासागर में किसी भी देश की तट रेखा भारतीय तट रेखा जितनी लम्बी नहीं है। सभी समुद्री मार्ग भारत के तट को छू कर गुजरते हैं। भारत पूर्व तथा पश्चिम दोनों दिशाओं में स्थित देशों के मध्य में स्थित है। इसलिए भारत को हिन्द महासागर में सर्वाधिक केन्द्रीय स्थिति प्राप्त है। भारत हिन्द महासागर में है। अत: हिन्द महासागर वास्तव में “हिन्द महासागर” है।

प्रश्न 13.
भारत में वन जीवन अभ्यारण्य तथा राष्ट्रीय उद्यान में अंतर बताएँ।
उत्तर:
वन्य जीवन अभ्यारण्य तथा राष्ट्रीय उद्यान में निम्नलिखित अंतर हैं जो सुक्ष्म हैं –
1. वन्यजीव अभ्यारण्य – भारत में कुल 482 वन्यजीव अभ्यारण्य हैं, जिसका कुल क्षे० 1,15,40,000 हेक्टेयर हैं। देश के प्रमुख वन्य जीव अभ्यारणों में चन्द्रप्रभा, दाचीगाम, पेरियार
आदि के नाम हैं। अभ्यारणों में मानवीय क्रियाकलापों की अनुमति होती हैं। अनुमति वगैर इनमें शिकार करना मना होता है, लेकिन चराई और गो-पशुओं का आना-जाना नियमित होता है।

2. राष्ट्रीय उद्यान – राष्ट्रीय उद्यान एक या अनेक परितंत्रों व्यापक वृहत क्षेत्र होता है ।यह क्षेत्र मानव के शक्ति और अधिग्रहण द्वारा भी अभी तक परिवर्तित नहीं हुआ है। विशिष्ट वैज्ञानिक शिक्षा और मनोरंजन हेतु इसके पेड़ पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियों भू-आकृतिक स्थलों और आवासों को संरक्षित किया गया है। राष्ट्रीय उद्यानों में शिकार और चारण पूर्णतया वर्जित होते हैं। भारत के कुल 40,60,600 हेक्टेयर भूमि में राष्ट्रीय उद्यान स्थित है। इनमें काजीरंगा, मानस, कान्हा दुधवा आदि प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान है।

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प्रश्न 14.
पूर्वी दुनिया में भारत के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पूर्वी दुनिया में भारत की स्थिति – भारत पश्चिमी एशिया तथा पूर्वी एशिया के मध्य में स्थित है। अफ्रिका, औद्योगिक दृष्टि से विकसित यूरोप तथा तेल-सम्पन्न पश्चिमी एशिया को दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों, चीन विकसित उद्योग वाले जापान, आस्ट्रेलिया तथा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के पश्चिमी तट जोड़ने वाले महासागरीय जल-मार्ग भारत से होकर गुजरते हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया, पश्चिमी एशिया तथा अफ्रीका के पूर्वी तटवर्ती पड़ोसी देशों के साथ विदेशी सम्बधों में सागर की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। दक्षिण-पूर्वी एशिया में भारतीय और चीन संस्कृति का संगम हुआ है।

इन दोनों संस्कृतियों ने स्थानीय संस्कृति के साथ मिलकर एक नई मिली-जुली संस्कृति को जन्म दिया है, जो हिन्द चीन जैसे शब्दों में प्रतिबिंबित हुई है। इसके बाद इस्लाम, ईसाई धर्म और यूरोपवासियों के आवागमन से यह प्रदेश और समृद्ध हो गया। इससे यहाँ की संस्कृति में विविधता के नए रंग भर गए हैं जो आज दक्षिण-पूर्वी एशिया में झलकते हैं। जिन देशों में भारतीय संस्कृति की छाप आज भी स्पष्ट है उनमें लाओस, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, मलेशिया और इंडोनशिया उल्लेखनीय हैं। इन्डोनेशिया के द्वीपों के नाम जैसे सुमात्रा, जावा और बाली भारतीय प्रभाव के स्पष्ट उदाहरण हैं। थाईलैंड (पुराना नाम स्याम) और कंबोडिया की स्थिति भी समान ही है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“भारत की सीमाएँ अधिकांशत : प्राकृतिक हैं और वे ऐतिहासिक रूप से निर्धारित हैं।” उदाहरण सहित स्पष्ट करो।
उत्तर:
भारतीय सभ्यता बहुत प्राचीन है। इसकी सीमाएँ ऐतिहासिक हैं तथा अधिकांशतः प्राकृतिक हैं।

  1. हिन्द माहासागर भारत की दक्षिणी सीमा बनाता है। समुद्र के पार हमारा निकटतम पड़ोसी देश श्रीलंका है जिसे पाक जलडमरू मध्य भारत से अलग करता है।
    इण्डोनेशिया निकोबार द्वीप के दक्षिण में अलग-अलग स्थित है।
  2. भारत की पूर्वी सीमा पर बंगाल की खाड़ी के पास बांग्लादेश, मलेशिया, मयन्मार, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, वियतनाम तथा लाओस स्थित हैं। यह सीमा घने जंगलों तथा पूर्वांचल की पहाड़ियों द्वारा बनी हुई है।
  3. पश्चिम की ओर अरब सागर से परे ईराक, ईरान, अरब, मिस्र, सूडान, इथोपिया, केनिया आदि देश स्थित हैं।
  4. भारत की उत्तरी सीमा पर हिमालय पर्वत की एक अखण्ड दीवार के परे तिब्बत, चीन सिक्यिांग, बेसिन तजाकिस्तान तथा अफगानिस्तान स्थिति हैं। मैक्मोहन रेखा भारत तथा चीन के मध्य एक प्राकृतिक सीमा है।
  5. भारत की उत्तरी सीमा पर नेपाल तथा भूटान स्थित हैं।
  6. हमारी पश्चिमी सीमा पाकिस्तान से लगती है। यह देश ऐतिहासिक रूप से प्राचीन सभ्यता के समय से भारत का सहभागी रहा है। पाँच नदियों का देश (पंजाब) तथा राजस्थान मरूभूमि एवं सिंधु (पाकिस्तान) ऐतिहासिक रूप से समकालीन प्रदेश है।

इससे स्पष्ट है कि भारत की सीमाएँ अधिकांशत : प्राकृतिक है तथा तथा ऐतिहासिक रूप से निर्धारित हैं।

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प्रश्न 2.
क्या भारत को एक उप-महाद्वीप कहा जा सकता है?
उत्तर:
भारत : एक उप-महाद्वीप (India: ASub-Continent) – भारत एक विशाल देश है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्व में सातवां स्थान है। भारत से अधिक क्षेत्रफल वाले छः देश रूस, ब्राजील, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया है : भारत पृथ्वी के धरातल के लगभग 2.2% क्षेत्रफल में फैला है फिर भी कई देशों का आकार भारत से बड़ा है। रूस भारत से लगभग सात गुना तथा संयुक्त राज्य अमेरिका लगभग तीन गुना बड़ा है। इस प्रकार क्षेत्रफल के आधार पर भारत न बहुत बड़ा और न ही बहुत छोटा देश है। इसलिए यह कथन सही है कि भारत न तो “दानव है और न ही बौना” (India is neither aGaint nor a Pigmy.) उप-महाद्वीप एक विशाल स्वतन्त्र भौगोलिक इकाई को कहा जाता है। यह स्थल खण्ड मुख्य महाद्वीप से स्पष्ट रूप से अलग होता है। इस विशालता के कारण इस भू-भाग में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समरूपों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं।

भू-भाग की सीमाएँ विभिन्न स्थलाकृतियों द्वारा बनाई जाती है जो इसे सीमावर्ती प्रदेश से पृथक् करती हैं भारत एक महान् देश है। इसे प्रायः भारतीय उप-महाद्वीप (Indian Sub-continent) भी कहा जाता है। डॉo केंसी के अनुसार भारत को यूरोप की भांति एक महाद्वीप कहलाने का अधिकार है। प्रायः ये कथन विशाल क्षेत्रफल तथा जनसंख्या के आधार पर कहे जाते हैं । ग्लोब पर एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में एक विशाल स्थलखण्ड के रूप में भारतीय उप-महाद्वीप दिखाई देता है। इसे उप-महाद्वीप कहे जाने के कई कारण हैं –

1. प्राकतिक सीमाएँ – भारत की प्राकृतिक सीमाएं इसे एक बिलगता का स्वरूप प्रदान करती हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में घने वन तथा पश्चिम में थार मरूस्थल इसे मुख्य महाद्वीप से पृथक् करके उप-महाद्वीप का स्वरूप प्रदान करते हैं।

2. परिबद्ध चरित्र – भारत चारों ओर से एशिया के मुख्य क्षेत्रों से घिरा है। इसे विशाल पर्वतों ने हजारों किलोमीटर तक अखंडता रूप से घेर कर परिबद्ध (Enclosed) चरित्र दे दिया है। इस पर्वतीय घेरे के कारण यह एशिया के अन्य क्षेत्रों से व्यावहारिक रूप से अलग-अलग है।

3. क्षेत्रफल तथा जनसंख्या – क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत संसार का सातवां बड़ा देश है। यह देश भू-मण्डल के एक बड़े भाग में फैला हुआ है। चीन को छोड़कर यह संसार के सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। यहाँ के लोगों की शारीरिक बनावट, रहन-सहन तथा संस्कृति संसार के दुसरे प्रदेशों से भिन्न है ।

4. विविधता में एकता – भारत विभिन्नताओं का देश है, फिर भी भारतीय सभ्यता में एक विशिष्ट एकरूपता विद्यमान है। इस आधार पर कई लेखकों ने इस भू-भाग को एक उप-महाद्वीप की संज्ञा दी है।

5. जलवायु – जलवायु के आधार पर सम्पूर्ण देश में उष्ण मानूसनी जलवायु पाई जाती है। इस भू-भाग पर मानसून पवनें स्वतन्त्र रूप में उत्पन्न होती हैं। मानसून पवनों का पूर्ण रूप इसी उप-महाद्वीप पर मिलता है। सम्पूर्ण देश में ऋतुओं का एक जैसा क्रम पाया जाता है। ये पवनें इसे एशिया महाद्वीप में पृथक् प्रकार की जलवायु प्रदान करके उप-महाद्वीप का स्वरूप प्रदान करने में सहायक हैं।

6. प्राकृतिक संसाधन – भारत में प्रकृतिक साधनों की प्रचुरता है। सारे देश की आर्थिकता कृषि पर आधारित है। ये साधन किसी महाद्वीप में मिलने वाले साधनों की तुलना में कम नहीं हैं। इन विशेषताओं के आधार पर भारत को एक उप-महाद्वीप कहना सही है।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 8 आधारिक संरचना 

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 8 आधारिक संरचना  Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 8 आधारिक संरचना

Bihar Board Class 11 Economics आधारिक संरचना Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आधरिक संरचना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आधारिक संरचनाओं से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं और सेवा से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं। ये आधारिक संरचनायें औद्योगिक. तथा कृषि उत्पाद, घरेलू तथा विदेशी व्यापार में सहायक सेवायें प्रदान करती हैं। इन सेवाओं में सड़क रेलवे, बन्दरगाह, हवाई अड्डे, बाँध (Dams), पावर स्टेशन तेल तथा गैस की पाइपलान की सुविधायें, पाठशाला, कॉलेज स्वास्थ्य सेवायें, बैंक बीमा तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं की सेवायें शामिल हैं।

ये संरचनायें देश के विकास में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं। इन संरचनाओं के विकसित होने से देश की अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्र जैसे कृषि, उद्योग, व्यापार आदि का विकास संभव नहीं है। आधरिक सरंचनायें अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती हैं।
आधारिक संरचनाएँ दो प्रकार की होती हैं –

  1. आर्थिक संरचनाएँ तथा
  2. सामाजिक संरचनाएँ। ऊर्जा, यातयात, संचार आदि आर्थिक संरचनाएं हैं जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सामाजिक आधारिक संरचनाएँ हैं।

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प्रश्न 2.
आधारिक संरचना को विभाजित करने वाले दो वर्गों की व्याख्या कीजिए? दोनों एक-दूसरे पर कैसे निर्भर करते हैं?
उत्तर:
आधारिक संरचनाओं का वर्गीकरण (Classification of infrastructures) आधारित संरचनायें दो श्रेणियों में वर्गीकृत हैं –
1. आर्थिक आधारिक संरचनाएँ (Economic Infrastructure):
आर्थिक आधारिक संरचना से अभिप्राय उस पूँजी स्टॉक से है. जो उत्पादन प्रणाली को प्रत्यक्ष सेवायें प्रदान करती है। जैसे-रेलवे, सड़क, टेलीफोन आदि।

2. सामाजिक आधारिक संरचनाएँ (Social Infrastructure):
सामाजिक आधारिक संरचना से अभिप्राय उस पूँजी स्टॉक से है जो उत्पादकों को अप्रत्यक्ष रूप से सेवायें प्रदान करती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सामाजिक आधारिक संरचनायें हैं। आर्थिक आधारिक व सामाजिक आधारिक संरचनाओं का आपसी संबंध (Interrelaton between Economic and Social Infrastructure)-आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं का आपस में काफी संबंध है।

इसे निम्न तथ्यों से समझा जा सकता है –

1. एक-दूसरे की पूरक (Supplementary to each other) सामाजिक तथा आधारित संरचनायें एक दूसरे की पूरक हैं। एक शिक्षित तथा स्वस्थ्य व्यक्ति की ऊर्जा यातयात तथा संचार के साधनों का उचित उपयोग कर सकता है। यदि देश की जनसंख्या अशिक्षित तथा अस्वस्थ्य है तो वह आर्थिक आधारिक संरचनाओं का समुचित उपयोग नहीं कर सकती। इसी प्रकार शिक्षा तथा स्वास्थ्य का ऊँचा स्तर विकसित आर्थिक आधारिक संरचनाओं के अभाव में अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं होगा। भारत में शिक्षित बेरोजगारी का मुख्य कारण आर्थिक आधारिक संरचनाओं का अभाव है।

2. एक दूसरे को विकसित करने में सहायक (Helpful in developing each other):
आर्थिक आधारिक संरचना सामाजिक आर्थिक संरचना को विकसित करती है। उदाहरण के लिये संचार और परिवहन की सुविधायें जितनी अधिक होंगी शिक्षा का उतना ही अधिक विस्तार हो सकेगा। सामाजिक आधारिक संरचना भी आर्थिक आधारिक संरचनाओं को विकसित करती हैं।

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प्रश्न 3.
आधारिक संरचना उत्पादन का संवर्द्धन कैसे करती है?
उत्तर:
आधारिक संरचना औद्योगिक व कृषि उत्पादन, घरेलू व विदेशी व्यापार और वाणिज्य के प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग उपलब्ध कराती हैं। इन सेवाओं में सड़क, बन्दगाह, हवाई अड्डे, बाँध, बिजलीघर, तेल, और गैस पाइप लाइन, सुविधाएँ स्कूल-कॉलेज आदि आते हैं। इनमें से कुछ सुविधाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव उत्पाद व्यवस्था की कार्य-प्रणाली पर पड़ता है।

जबकि कुछ अन्य अर्थव्यवस्था के सामाजिक क्षेत्रकों के निर्माण में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करते है। आधारिक संरचना ऐसी सहयोगी प्रणाली है जिस पर एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता कार्य प्रणाली पर निर्भर करती है। आधुनिक कृषि भी बीजों कीटनाशक दवाइयों और खाद के लिए बड़े पैमाने पर परिवहन के साधनों पर निर्भर करती है। इसके लिए यह आधुनिक सड़कों, रेल और जहाजी सुविधाओं का उपयोग करती है।

2001 की जनगणना के आंकड़े यह बताते हैं कि ग्रामीण भारत में केवल 56% परिवारों में बिजली की सुविधा है जबकि 43% परिवारों में आज भी मिट्टी के तेल का उपयोग होता है। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 90% परिवार खाना बनाने में जैव ईंधन का प्रयोग करते हैं, केवल। 24% ग्रामीण परिवारों में लोगों को नल का पानी उपलब्ध है। लगभग 76% लोग कुँओं, टैंकों तालाबों, झरनों, नदियों, नहरों आदि जल स्रोतों के खुले स्रोतों से पानी पीते हैं।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह पता चलता है कि वर्ष 1996 तक ग्रामीण इलाकों में केवल 6 प्रतिशत लोगों को सफाई की सुविधाएँ प्राप्त थीं। संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के साधनों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं। अपर्याप्त आधारिक संरचना से स्वास्थ्य पर अनेक प्रकार से बुरा असर पड़ सकता है।

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प्रश्न 4.
किसी देश के आर्थिक विकास में आधरिक संरचना योगदान करती है। क्या आप सहमत हैं?
उत्तर:
हाँ हम इस कथन से सहमत हैं।

प्रश्न 5.
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की क्या स्थिति है?
उत्तर:
भारत ग्रामीण आधारिक संरचना की स्थिति शोचनीय है। हमारी बहुसंख्य आबादी. ग्रामीणों क्षेत्रों में निवास करती है। विश्व में अत्यधिक तकनीकी उन्नति की बावजूद ग्रामीण महिलाएँ अपनी ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु फसल का बचा-खुचा, गोबर और जलाऊ लकड़ी जैसे जैव ईंधन का आज भी उपयोग करती हैं। जल और अन्य आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विद्युत उन्हें दूर-दूर तक जाना पड़ता है।

प्रश्न 6.
ऊर्जा का महत्त्व क्या है? ऊर्जा के व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक स्रोतों में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
ऊर्जा का महत्त्व (Importance of Energy):
ऊर्जा का सबसे दृष्टिगोचर रूप बिजली है। किसी देश के आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाली आधारिक संरचना में बिजली अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

ऊर्जा के व्यावसायिक और गैर:
व्यावसायिक स्रोतों में अन्तर (Difference between Commercial and Non-Commerical Sources of Energy):
ऊर्जा के व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक स्रोत होते हैं। व्यावसायिक स्रोतों में कोयला, पेट्रोल और बिजली आते हैं क्योंकि इन्हें खरीदा और बेचा जाता है।

भारत में उपयोग किए जाने वाले समस्त ऊर्जा स्रोतों में इसका भाग 50% से ऊपर है। ऊर्जा के गैर-व्यावसायिक स्रोतों में जलाऊ लकड़ी, कृषि का कूड़ा-कचरा (Waste) और गोबर आते हैं। ये गैर-व्यावसायिक है क्योंकि ये हमें प्रकृति या जंगलों से मिलते है। प्रायः ऊर्जा के व्यावसायिक स्रोत (पन-बिजली को छोड़कर) समाप्त हो जाते हैं, जबकि गैर-व्यावसायिक स्रोत पुनः नवीनीकरण किया जा सकता है।

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प्रश्न 7.
विद्युत उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर:
विद्युत उत्पादन के तीन आधारभूत साधन हैं –

  1. कोयला
  2. पानी
  3. आणविक (Nuclear)

प्रश्न 8.
संचारण और वितरण हानि से आप क्या समझते हैं? उन्हें कैस कम किया जा सकता है?
उत्तर:
संचारण हानि:
विद्युत वितरण का संचारण तारों द्वारा किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने में जो ऊर्जा नष्ट होती है यह संचारण है। इसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग का दूर कर सकते हैं।

वितरण हानि:
विद्युत की व्यवस्था अच्छी नहीं है। अनेक स्थानों पर विद्युत चोरी हो रही है। यह वितरण हानि है। इसे नवीन विद्युत का प्रयोग करके दूर कर सकते हैं।

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प्रश्न 9.
ऊर्जा के विभिन्न गैर-व्यवसायिक स्रोत कौन से हैं?
उत्तर:
जलाऊ लकड़ी, कृषि का कूड़ा-कचरा, सूखा गोबर आदि ऊर्जा के विभिन्न गैर-व्यवसायिक स्रोत हैं।

प्रश्न 10.
इस कथन को सही सिद्ध कीजिए कि ऊर्जा के पुनः नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है?
उत्तर:
निरन्तर विकास और जनसंख्या वृद्धि से भारत में ऊर्जा की माँग तीव्र हो रही है। वह माँग वर्तमान में उत्पन्न की जा रही ऊर्जा से बहुत अधिक है। ऊर्जा के पुनः नवीनीकरण स्रोतों से बिजली के अतिरिक्त पूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। पुनः नवीनीकृत ऊर्जा स्रोतों पर अधिक से अधिक निर्भरता से सामाजिक और पर्यावरणीय लाभ प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 11.
पिछले वर्षों के दौरान ऊर्जा के उपभोग प्रतिमानों में कैसे परिवर्तन आया है?
उत्तर:
ऊर्जा की उपभोग प्रवृत्ति में परिवर्तन (Changes in Consumption pattern of energy):

नीचे तालिका में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न वर्षों में ऊर्जा के उपभोग को दर्शाया गया है –
विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा का उपभोग (प्रतिशत में) (Consumption of energy in various sectors-in Percentage):
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स्रोत:
नवीं पचवर्षीय योजना, अयोग, भारतीय सरकार नई दिल्ली।
(Source : Ninth Five Year Plan, Planning Commission, Government of India New Delhi)

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प्रश्न 12.
ऊर्जा के उपभोग और आर्थिक संवृद्धि की दरें कैसे परस्पर सम्बन्धित हैं?
उत्तर:
ऊर्जा के उपभोग और आर्थिक संवृद्धि में सम्बन्ध (Relation between Consumption of Energy and Economic Growth):
ऊर्जा का सबसे दृष्टिगोचर रूप जिसे प्रायः आधुनिक सभ्यता की प्रगति का द्योतक माना जाता है, में बिजली आती है। किसी देश के आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाली आधारित संरचना में बिजली अत्यंत महत्त्वपूर्ण – है। प्रायः बिजली की माँग की अभिवृद्धि दर सकल घरेलू उत्पाद दर से ऊँची होती है। अध्ययनों से पता चलता है कि 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष सकल घरेलू उत्पाद प्राप्त करने के लिए बिजली की पूर्ति में अभिवृद्धि का प्रतिवर्ष दर लगभग 12 प्रतिशत होना चाहिए।

प्रश्न 13.
भारत में विद्युत क्षेत्रक को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?
उत्तर:
भारत में बिजली क्षेत्र को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है –

1. बिजली का अपर्याप्त उत्पादन (Indequate Generation of Electricity):
भारत में बिजली का उत्पादन अपर्याप्त है। सन् 2001 में बिजली का उत्पादन 49,960 किलोवाट घण्टे हुआ था जबकि बिजली माँग 50,227 करोड़ यूनिट थी। इसके अतिरिक्त भारत में हर वर्ष 1,00,000 मेगावाट बिजली अतिरिक्त चाहिए जबकि भारत केवल प्रतिवर्ष 20,000 मेगावाट बिजली अधिक पैदा करने में समर्थ है।

2. उत्पादन क्षमता का क्रम प्रयोग (Less Capacity Utilisation):
भारत में ताप बिजली घरों का उत्पादन क्षमता का कम प्रयोग हो पाता है।

3. बिजली बोर्ड के घाटे (Loss of Electricity Boards):
भारत में बिजली का उत्पादन तथा वितरण पर सरकार का लगभग एकाधिकार है। बिजली का वितरण राज्य के बिजली बोर्ड (SEBs) द्वारा किया जाता है। इस समय लगभग सभी बिजली बोर्ड घाटा उठा रहे हैं। उनके पास इतना धन भी नहीं है कि बिजली खरीदकर भुगतान कर सकें। बिजली बोडौँ को 500 बिलियन से अधिक घाटा हुआ है। इन बोडों के घाटे में कई कारण हैं –

  • बिजली की चोरी
  • बिजली के वितरण के दौरान बिजली की हानि
  • कृषि, सिंचाई तथा लघु उद्योगों को रियासतीदर पर बिजली की आपूर्ति करना आदि

4. साधारण जनता में असन्तोष (Public Unrest):
बिजली की अधिक दर तथा देश के विभिन्न भागों में बिजली की कटौती से साधारण जनता में भारी असन्तोष है।

5. कच्चे माल तथा कोयले की कमी (Shortage of raw material and coal supplies):
ताप विद्युत यन्त्र जो भारत में अधिकांश मात्रा में बिजली पैदा करते हैं, उन्हें कच्चे. माल तथा कोयले की कमी का सामना करना पड़ता है।

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प्रश्न 14.
भारत में ऊर्जा संकट से निपटने के लिए किए गए सुधारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सुधार (Reforms):
भारत में ऊर्जा संकट को निपटने के लिए निम्नलिखित कार्य किए जा रहे हैं –

  1. विद्युत में आर्थिक एवं सार्वजनिक निवेश किया जा रहा है।
  2. बेहतर अनुसंधान तथा विकास के उपाय अपनाए जा रहे हैं।
  3. तकनीकी खोज की जा रही है।
  4. ऊर्जा के पुनः नवीनकृत स्रोत से बिजली की अतिरिक्त पूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।
  5. व्यापक स्तर पर बिजली उत्पादन के लिए निजी क्षेत्र को आगे लाया जा रहा है।

प्रश्न 15.
हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य की मुख्य विशेषताएँ (Main Features of the Health of Indians):
हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारत में विश्व की कुल जनसंख्या की लगभग 17% संख्या निवास करती है, लेकिन इस देश पर विश्व के कुल रोगियों का 20% बोझ है।
  2. भारत के जी.डी.बी. के आधे से अधिक हिस्से के अन्तर्गत अतिसार, मलेरिया और क्षय रोग जैसी संक्रामक बीमारियाँ आती हैं।
  3. प्रत्येक वर्ष 5 लाख बच्चे जल संक्रमित रोगों से मर जाते हैं।
  4. एड्स का खतरा भी छाया हुआ है।
  5. कुपोषण और टीके की दवा की अपर्याप्त पूर्ति के कारण प्रत्येक वर्ष 22 करोड़ बच्चे मौत का शिकार होते हैं।
  6. वर्तमानमें 20% से भी कम जनसंख्या जन-सुविधाओं का उपयोग करती है।
  7. भारत में  केवल 38% प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में डॉक्टरों की वाछित संख्या उपलब्ध है और केवल 30% प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में दवाइयों का पर्याप्त भंडार है।

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प्रश्न 16.
रोग वैश्विक मार (GBD) क्या है?
उत्तर:
रोगों का विश्वव्यापी भार एक संकेतक (Indicator) है जिसके द्वारा निपुण व्यक्ति इस बात का अनुमान लगाते हैं कि एक विशेष बीमारी से कितने लोग मरे और कितने लोग बीमारी के कारण अपंगता की अवस्था में कितने वर्ष तक जिये।

प्रश्न 17.
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ क्या हैं?
उत्तर:
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ –

  1. हाल के समय में सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्रक अपने कर्त्तव्य को निर्वाह में बहुत अधिक सफल नहीं हुआ है।
  2. भारत में स्वास्थ्य क्षेत्रक में निजी क्षेत्र ने बहुत प्रगति की है, परन्तु निजी क्षेत्र के चिकित्सालय निर्धन व्यक्तियों की पहुंच से बाहर हैं।
  3. चिकित्सा की भारतीय प्रणाली में शैक्षिक मानवीकरण या अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए किसी प्रकार की रूपरेखा बनाने हेतु कुछ नहीं किया गया।
  4. भारत में स्वास्थ्य में व्यय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 3 प्रतिशत है। यह अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम है।
  5. भारत में विश्व के कुल जनसंख्या की लगभगल 17% संख्या निवास करती है, लेकिन इस देश पर विश्व के कुल रोगों का 20% बोझ है।

प्रश्न 18.
महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता का विषय क्यों बन गया है?
उत्तर:
भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग महिलाओं का है। निम्नलिखित कारणों से उनका स्वास्थ्य गहरी चिन्ता का विषय बन गया है –

  1. भ्रूण हत्याओं की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
  2. 1991 ई० की जनसंख्या के अनुसार शिशु लिंग का अनुपात 945 से 2001 में 927 हो गया है।
  3. 15 वर्ष से कम लगभग 3,00,000 लड़कियाँ न केवल विवाहित हैं, अपितु कम से कम एक बच्चे की माँ हैं।
  4. 15 से 49 आयु वर्ग के समूह में विवाहित महिलाओं में 50% से अधिक रक्ताभाव और रक्तहीन से ग्रसित हैं। यह बीमारी लौह न्यूनता के कारण होती है जिसके परिणामस्वरूप की संभावना बढ़ जाती है। रक्तहीन भारतीय महिलाओं की अवस्थ्यता और मौत का एक बड़ा कारण है।

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प्रश्न 19.
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ बताएँ। राज्य द्वारा रोगों पर नियन्त्रण के लिए उठाए गए प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बताएं।
उत्तर:
सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) सार्वजनिक स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि नागरिकों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए सरकार उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करें। सार्वजनिक अस्पतालों में डाक्टर, नर्स और अन्य अर्द्ध-चिकित्साकर्मी, बड़े अस्पताल में आवश्यक उपकरण और दवाइयों की व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी है। कोई भी नागरिक चिकित्सा सुविधा, अरोग्यकारी और निवारक प्राप्ति से वंचित न रहे क्योंकि वह उसकी कीमत अदा नहीं कर सकता पर पूर्णतः प्रतिबंध है।

प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम-रोगों पर नियन्त्रण के राज्य में निम्नलिखित प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम आरम्भ आए हैं –

  1. गत वर्षों में भारत ने विभिन्न स्तरों पर एक व्यापाक स्वास्थ्य पर आधारिक संरचना और जनशक्ति को विकसित किया है।
  2. गाँव के स्तर पर सरकार ने अनेक प्रकार के अस्पतालों की व्यवस्था की है।
  3. स्वास्थ्य सेवाओं की संख्या में महत्त्वपूर्ण विस्तार हुआ है। इस विस्तार का वर्णन नीचे तालिका में किया गया है –

स्वास्थ्य संरचनात्मक: सेवाएँ: 1951-2000:
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प्रश्न 20.
भारतीय चिकित्सा की छह प्रणालियों की सूची बनाइए।
उत्तर:

  1. आयर्वेद
  2. योग
  3. यूनानी
  4. सिद्ध
  5. होम्योपैथी
  6. प्राकृतिक चिकित्सा

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प्रश्न 21.
हम स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर:
स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रम की प्रभावशीलता निम्न ढंग से बढ़ाई जा सकती है –

  1. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ विकेन्द्रित की जाएँ।
  2. स्वास्थ्य और सफाई के प्रति जागरूकता उत्पन्न की जाए।
  3. कार्यकुशल व्यवस्थायें प्रदान की जाये।
  4. सफाई के प्रति जागरूकता उत्पन्न करन के लिए दूरसंचार और प्रौद्योगिक क्षेत्रों की सहायता की जानी चाहिए।
  5. स्वास्थ्य सेवा सभी को समान रूप से पहुँचानी चाहिए।
  6. प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर अधिक बल दिया जाना चाहिए।

Bihar Board Class 11 Economics आधारिक संरचना Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधारिक संरचनायें कितने प्रकार की होती हैं? उनके नाम लिखें।
उत्तर:
आधारिक संरचनायें दो प्रकार की होती हैं –

  1. सामाजिक, आधास्कि संरचनायें तथा
  2. आर्थिक आधारित संरचनायें

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प्रश्न 2.
आर्थिक संरचनाओं से अभिप्राय उस सहायक ढाँचे से है जो कि कृषि, औद्योगिक एवं व्यापारिक क्षेत्र को विभिन्न प्रकार से एक देश के आर्थिक विकास में योगदान देती हैं?
उत्तर:
आर्थिक संरचनाओं से अभिप्राय उस सहायक ढांचे से है जो कि कृषि, औद्योगिक। एवं व्यापार क्षेत्र को विभिन्न प्रकार की सेवायें प्रदान करता है।

प्रश्न 3.
आधारिक संरचनाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आधारिक संरचनाओं से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा संस्थाओं से है जो अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के विकास और संचालन में सहायक हैं।

प्रश्न 4.
पंजाब तथा हरियाणा कृषि क्रियाओं में अधिक आगे क्यों हैं?
उत्तर:
पंजाब तथा हरियाणा कृषि क्रियाओं में अधिक आगे इसलिये हैं क्योंकि वहाँ पर सिंचाई की सुविधाएँ अच्छी है।

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प्रश्न 5.
बंगलौर शहर अन्य शहरों से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
बंगलौर शहर अन्य शहरों से भिन्न है। वहाँ पर विश्वभर की संचार सुविधायें हैं जिनके कारण वहाँ कई बहुराष्ट्रीय (Multinational) कम्पनियाँ कार्यरत हैं।

प्रश्न 6.
आधारिक संरचनाओं के विकास में निजी क्षेत्र तथा सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान क्यों आवश्यक समझते हैं?
उत्तर:
क्योंकि आधारिक संरचनाओं में सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश अपर्याप्त है। अतः इन संरचनाओं के विकास में निजी क्षेत्र का योगदान आवश्यक है।

प्रश्न 7.
भारत में समय से पूर्व मृत्यु (Premature death) के क्या कारण हैं?
उत्तर:
भारत में समय से पूर्व मृत्यु के कारण हैं –

  1. अशिक्षा
  2. अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही
  3. लड़कियों का कम उम्र में विवाहित होना तथा माँ बनाना
  4. अपौष्टिक भोजन
  5. गर्भपात
  6. बीमारियों का शिकार होना

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प्रश्न 8.
आधारिक संरचनाएँ किस प्रकार से एक देश के आर्थिक विकास में योगदान देती हैं?
उत्तर:
उत्पादन के कारकों की उत्पादकता में वृद्धि करके तथा लोगों की गुणवत्ता में सुधार लाकार आर्थिक संरचनायें एक देश के आर्थिक सुधार में योगदान देती हैं।

प्रश्न 9.
आर्थिक संरचनाओं में प्रमुखतः किन-किन को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
आर्थिक संरचनाओं में प्रमुखतः

  1. परिवहन तथा संचार
  2. ऊर्जा एवं सिंचाई
  3. मौद्रिक एवं वित्तीय संस्थाओं को शामिल किया जाता है

प्रश्न 10.
सामाजिक आधारिक संरचना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सामाजिक आधारिक संरचना से अभिप्राय उस पूँजी स्टॉक से है जो उत्पादकों को अप्रत्यक्ष रूप से सेवायें प्रदान करती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें आदि सामाजिक आधारिक संरचनाओं के उदारहण हैं।

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प्रश्न 11.
ऊर्जा के गैर-वाणिज्यिक स्त्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
ईंधन, लकड़ी, पशु-शक्ति, गोबर आदि ऊर्जा के गैर-वाणिज्यिक स्रोत हैं।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के परम्परागत वाणिज्यिक स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
ऊर्जा के परम्परागत वाणिज्यिक स्रोत कोयला, लिग्नाइट, कच्चा पेट्रोलियम, जल विद्युत हैं।

प्रश्न 13.
ऊर्जा के गैर-परम्परागत वाणिज्यिक स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
ऊर्जा के गैर-परम्परात वाणिज्यिक स्रोत बायो-ऊर्जा तथा वायु शक्ति हैं।

प्रश्न 14.
2001 की जनगणना के अनुसार ग्रामीण भारत में कितने प्रतिशत परिवारों को रोशनी के लिये बिजली का कनेक्शन (Connection) मिला हुआ है?
उत्तर:
केवल 56% परिवारों को।

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प्रश्न 15.
विदेशी भारत में काफी संख्या में इलाज कराने आ रहे हैं। इसके क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
विदेशी भारत में काफी संख्या में इलाज कराने आ रहे हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

  1. हम आधुनिक तकनीकी का प्रयोग करते हैं।
  2. भारत के डॉक्टरा काफी विशेषज्ञ हैं।
  3. भारत में इलाज कराने का खर्च तुलनात्मक रूप से कम है।

प्रश्न 16.
किन्हीं तीन बड़ी संख्याओं के नाम लिखें जो न केवल गुणवत्तापूर्ण चित्किसा की शिक्षा देती हैं, अपितु अनुसंधान भी करती हैं तथा विशिष्ट स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करती हैं।
उत्तर:

  1. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (All India Institute of Medical Science New Delhi)
  2. पी. जी. आई (Post Graduate Insitute,Chandigrah Co.)
  3. अखिल भारतीय स्वच्छता एवं जन स्वास्थ्य संस्थान (All India Institute of Hygiene and Public Health, Kolkata)

प्रश्न 17.
बायो ऊर्जा किसे कहते हैं?
उत्तर:
बायो ऊर्जा उस ऊर्जा को कहते हैं जो सदैव पदार्थों या जैव सामग्री से प्राप्त होती है। यह दो प्रकार की होती है –

  1. बायोगैस, तथा
  2. बायोमास

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प्रश्न 18.
बायोगैस क्या है?
उत्तर:
बायोगैस ऊर्जा का वह स्रोत है जो गोबर गैस संयत्र (Plants) में डालकर उत्पन्न की जाती है। ये संयत्र गैस उत्पन्न करने के साथ-साथ गोबर को खाद में बदल देते हैं। बायोगैस का प्रयोग खाना पकाने, ताप उत्पन्न करने, प्रकाश तथा बिजली पैदा करने के काम में किया जा सकता है।

प्रश्न 19.
बायोमास क्या है?
उत्तर:
बायोमास ऊर्जा का वह स्रोत है जो पेड़-पौधे द्वारा ऊर्जा का उत्पादन करता है। बायोमास कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य ऊर्जा उत्पादन के लिये वृक्षारोपण को बढ़ावा देना जरूरी है ताकि गैस पर आधारित तकनीकी के द्वारा बिजली उत्पादन के लिये ईंधन और पशुओं के लिये चारा उत्पन्न हो सके।

प्रश्न 20.
भारत में बिजली उत्पादन एवं वितरण की तीन चुनौतियाँ कौन सी हैं?
उत्तर:
बिजली उत्पादन की तीन चुनौतियाँ (Three challenges of Power production and distribution in India):

  1. उत्पादन क्षमता का कम प्रयोग
  2. बिजली बोर्ड के घाटे तथा
  3. बिजली का उपर्याप्त उत्पादन

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प्रश्न 21.
परम्परागत रूप से भारत में आधारिक संरचनाओं के विकास की जिम्मेदारी किसकी रही है?
उत्तर:
परम्परागत रूप से भारत में आधारिक संरचनाओं के विकास की जिम्मेदारी सरकार की रही है।

प्रश्न 22.
अब आधारिक संरचनाओं में निजी क्षेत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका क्यों निभा रहा है?
उत्तर:
क्योंकि आधारिक संरचनाओं में भारत का निवेश अपर्याप्त रहा है।

प्रश्न 23.
विद्युत उत्पादन के कोई तीन स्रोत लिखिए।
उत्तर:
विद्युत उत्पादन के तीन स्रोत हैं –

  1. सौर ऊर्जा
  2. पवन ऊर्जा, तथा
  3. ज्वार ऊर्जा

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत में पिछले 50 वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य आधारिक संरचना विस्तार पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य आधारिक संरचना में विस्तार (Expansion in public Health Infrastructure):

  1. अस्पतालों तथा डिस्पेंन्सरी की संख्या में वृद्धि (Increase in the number of Hospital and Dispensaries): 1951 में अस्पतालों तथा डिस्पेन्सरी की संख्या 9300 थी जो बढ़कर 2000 में 43,300 हो गई।
  2. बिस्तरों में वृद्धि (Increase in beds): 1950 में अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या 1.2 मिलियन थी जो कि बढ़कर 2000 में 7.2 मिलियन हो गई।
  3. नों की संख्या में वृद्धि (Increae in nurses): 1951-2000 की अवधि में नौं की संख्या 0.18 लाख से बढ़कर 8.7 लाख हो गई।
  4. एलोपैथिक डाक्टरों की संख्या में वृद्धि: 1951 में डाक्टरों की संख्या 0.62 लाख थी जो बढ़कर 2000 में 5 लाख हो गई।
  5. बीमारियों का उन्मूलन (Eradication of diseases): पिछले पचास वर्षों में चेचक आदि बीमारियों का पूर्णतया उल्मूलन किया जा चुका है। पोलियों आदि बीमारियों पर पूर्ण नियन्त्रण. करने का प्रयास जारी है।

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प्रश्न 2.
वर्तमान समय में स्वास्थ्य आधारिक संरचना में निजी क्षेत्र क्या भूमिका निभा रहे हैं?
उत्तर:
स्वास्थ्य आधारिक संरचनाओं में निजी क्षेत्र की भूमिका (Role of Private setor in the Public Infrastructure):
वर्तमान समय में स्वास्थ्य आधारिक संरचनाओं में निजी क्षेत्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

  1. भारत में जितने भी अस्पताल हैं उनमें 70% अस्पताल निजी क्षेत्र में है।
  2. कुल अस्पतालों में जितने बिस्तर हैं उनके 40% बिस्तरे निजी अस्पतालों में पाये जाते हैं।
  3. लगभग 40% डिस्पेंसरियाँ निजी क्षेत्र में पाई जाती हैं।
  4. निजी क्षेत्र डिस्पेंसरियाँ 80% बाह्य रोगियों तथा 46% डिस्पेंसरियों में दाखिल रोगियों का इलाज किया जाता है।
  5. निजी क्षेत्र चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण, चिकित्सा तकनीकी आदि में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

प्रश्न 3.
भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य (Indian women’s health):
भारत की जनसंख्या में लगभग 50% महिलायें हैं। पुरुषों की तुलना में वे शिक्षा क्षेत्र, आर्थिक क्रियाओं में भागीदारी तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की प्राप्ति में पीछे हैं। लिंग अनुपात में निरन्तर कमी आ रही है। 1951 मे लिंग

अनुपात 945 था जो कम होकर। 1991 में 927 हो गया। भारत में लगभग 15 वर्ष से कम आयु वाली 3,00,000 लड़कियों न केवल विवाहित हैं अपितु कम से कम एक बच्चे की। माँ हैं। 15-49 वर्ष की विवाहित स्त्रियों में कम-से-कम 50% स्त्रियाँ एनीमिया की शिकार हैं। गर्भपात के कारण भी काफी महिलायें मृत्यु का ग्रास बनती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में महिलाओं के लिये स्वास्थ्य सुविधायें अपर्याप्त हैं। उनके स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

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प्रश्न 4.
निजी पूँजीपति किन कारणों से आधारिक संरचनाओं में निवेश करने की रुचि नहीं रखते?
उत्तर:
आधारिक संरचनाओं में निम्न कारणों से निजी पूंजीपति रुचि नहीं रखते –

  1. भारी एकमुश्त राशि की आवश्यकता होती है।
  2. सरकार इन पर नियन्त्रण बनाये रखती है।
  3. प्रतिफल कम और धीमे होते हैं।
  4. इस क्षेत्र द्वारा प्रदत्त सेवायें प्रमुख रूप से सार्वजनिक वस्तुओं के स्वरूप की होती हैं।

प्रश्न 5.
भारत की आधारिक संरचनाओं के सम्मुख क्या चुनौतियाँ हैं?
उत्तर:
चुनौतियाँ (Challenges):

  1. हमारी अर्थव्यवस्था की. आवश्यकताओं की तुलना में आधारिक संरचनायें अपर्याप्त हैं।
  2. आधारिक संरचना की उपलब्धियों के लाभ मुख्यतः समाज के उच्च व सम्पन्न वर्ग के लोगों को प्राप्त हुए हैं। कमजोर लोग इसके लाभों से वंचित रहे हैं।
  3. आधारिक संरचना का देश के बड़े शहरों व महानगरों में केन्द्रीयकरण हो गया है।

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प्रश्न 6.
भारतीय गाँवों में आधारिक संरचनाओं की सुविधाओं की क्या हालत है?
उत्तर:
भारतीय गाँवों में आधारिक संरचना की सुविधायें बहुत ही कम हैं। गाँव की महिलाएँ अब भी चूल्हा जलाने के लिये घास-फूस, गोबर तथा जलाने की लकड़ी का प्रयोग करती हैं। 2001 की जनगणना से हमें पता चलता है कि केवल 56% घरों को प्रकाश करने के लिये बिजली का कनेक्शन (Connection) मिला हुआ है और 43 प्रतिशत घर अब भी मिट्टी तेल का प्रयोग करते हैं। नलके का पानी केवल 24% लोगों को प्राप्त है।

प्रश्न 7.
ऊर्जा के व्यावसायिक तथ गैर-व्यावसायिक प्रयोग में क्या अन्तर है?
उत्तर:
ऊर्जा के व्यावसायिक प्रयोग से अभिप्राय है ऊर्जा का उत्पादक क्रियाओं जैसे उद्योगों, कृषि, रेलवे, व्यावसायिक क्रियाओं में प्रयोग किया जाता है। इसके विपरीतं ऊर्जा के गैर-व्यावसायिक प्रयोग से अभिप्राय है ऊर्जा का प्रयोग घरेलू कार्यों जैसे खाना बनाने, घरेलू यन्त्रों को चलाने, रोशनी आदि के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 8.
भारत में बिजली के मुख्य स्रोतों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में बिजली के मुख्य स्रोत (Main sources of Electricity in India) भारत में बिजली के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं –

  1. ताप शक्ति (Thermal power): यह कोयले द्वारा प्राप्त की जाती है।
  2. जल शक्ति (Hydro Electricity): यह नदी के पानी द्वारा प्राप्त की जाती है।
  3. अणु शक्ति (Atomic Power): इसका उत्पादन अणु पावर स्टेशन द्वारा किया जाता है। भारत में परमाणु ऊर्जा का पहला स्टेशन मुंबई के निकट तारापुर में स्थापित किया गया था।

प्रश्न 9.
ऊर्जा के परम्परागत तथा ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोतों में कोई तीन अंतर बतातें।
उत्तर:
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत (Conventional sources of energy):

  1. इन स्रोतों का उपयोग मनुष्य बहुत पहले से कर रहा है।
  2. ये सभी स्रोत (जल विद्युत को छोड़कर) समाप्त होने वाले हैं।
  3. इन स्रोतों से ऊर्जा का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।

ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत (Non-Conventional sources of energy):

  1. इसका उपयोग हाल ही शुरू हुआ है।
  2. ये सभी स्रोत समाप्त नहीं होने वाले हैं।
  3. इन स्रोतों से ऊर्जा का निर्माण छोटे पैमाने पर किया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
बिजली बोर्डों के घाटे के कारण लिखें। इस घाटे को दूर करने के लिये सरकार क्या कर रही है?
उत्तर:
घाटे के कारण (Causes of Losses of Electricity Board):

  1. बिजली की चोरी।
  2. बिजली के वितरण के दौरान बिजली की हानि।
  3. कृषि, सिंचाई तथा लघु उद्योगों को रियायती दर पर या कम दर पर बिजली की आपूर्ति।
  4. बिजली बोर्ड में व्याप्त भ्रष्टाचार। बिजली बोर्ड के इस हानि को कम करने के लिये सरकार बिजली के वितरण तथा उत्पादन निजी क्षेत्र तथा विदेशी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
परम्परागत तथा गैर-परम्परागत ऊर्जा के स्रोतों में क्या अंतर है?
उत्तर:
ऊर्जा के परंपरागत स्रोत (Conventional Sources of Energy):

  1. ये वे स्रोत हैं जिनका उपयोग मनुष्य बहुत पहले से कर रहा है।
  2. परम्परागत ऊर्जा के स्रोत हैं-कोयला, परमाणु ऊर्जा, खनिज-तेल या जल-विद्युत।
  3. ऊर्जा के सभी परंपरागत स्रोत (जल विद्युत को छोड़कर) समाप्त होने वाले हैं।
  4. ये प्रदूषण फैलाते हैं।
  5. ये खर्चीले हैं।
  6. इनसे ऊर्जा का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जा सकता है।

ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत (Non-conventional Sources of Energy):

  1. ये वे स्रोत हैं जिनका उपयोग हाल ही में शुरू हुआ है।
  2. गैर-परम्परागत ऊर्जा के स्रोत हैं-पवन, सूर्य, ज्वारीय ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, गोबर गैस आदि।
  3. ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत असमाप्त होने वाले हैं।
  4. ये प्रदूषण मुक्त हैं।
  5. ये कम खर्चीलें हैं।
  6. इनसे ऊर्जा का निर्माण स्थानीय (छोटे) पैमाने पर किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
भारत में गैर-परम्परागत ऊर्जा के मुख्य स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर:
इनका वर्णन निम्नलिखित ढंग से किया जा सकता है –
1. बायो ऊर्जा (Bio Energy):
बायो ऊर्जा वह ऊर्जा है जो जीव या जैव सामग्री (Organism of Organic Matter) से प्राप्त होती है।

2. बेहतर चूल्हे (Improved Chulhas):
दिसम्बर, 1983 ई० में राष्ट्रीय बेहतर चूल्हा कार्यक्रम शुरू किया गया। यह अनुमान है कि बेहतर चूल्हा प्रतिदिन 700 ग्राम तक लकड़ी की बचत करता है। देश में 1999 तक लगभग 300 लाख बेहतर चूल्हे प्रयोग में लाए गए हैं। इसे हर वर्ष 100 लाख टन से अधिक जलाऊ लकड़ी की बचत होने के साथ-साथ स्त्रियों की बेगार कम होगी, उनका स्वास्थ्य सुधरेगां व वनों के कटाव पर रोक लगेगी।

3. सौर ऊर्जा (Solar Energy):
सौर ऊर्जा से अभिप्राय ऊर्जा के उस स्रोत से है जो सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा का उत्पादन करता है।

4. शहरी कचरे से ऊर्जा (Energy fromUrban Wastes):
शहरी मैले व गन्दगी को भी ऊर्जा उत्पादन के लिए प्रयोग किया जा रहा है। दिल्ली में तिमारपुर के पास शहर के ठोस पदार्थों के रूप में कूड़े-कचरे से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए 3.75 मेगावाट क्षमता के बिजली संयत्र की स्थापना की गई है।

5. वायु या पवन ऊर्जा विकास कार्यक्रम (Wind Energy Development Programme):
इस कार्यक्रम के अन्तर्गत वायु का प्रयोग करके ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है। भारत में वायु ऊर्जा की क्षमता 20,000 मेगावाट आंकी गई है। अब तक केवल 1,025 मेगावाट क्षमता स्थापित की जा सकी है। वायु ऊर्जा मे जर्मनी, अमेरिका तथा डेनमार्क के बाद भारत का चौथा स्थान है।

6. ऊर्जा ग्राम (Urja Gram):
ऊर्जा ग्राम कार्यक्रम से अभिप्राय उस कार्यक्रम से है जिसके अन्तर्गत गांवों की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं को स्थानीय रूप से उपलब्ध उन साधनों के इस्तेमाल से पूरा किया जाता है जिनका हर बार नवीकरण (Renewari) किया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
विकास में आधारिक संरचनाओं के महत्त्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के विकास के लिये एक उपयुक्त एवं विकसित आधारिक संरचना का होना आवश्यक हैं, जैसा कि निम्नलिखित बातों से स्पष्ट है –

1. तीव्र आर्थिक विकास (Repid Economic Development):
आर्थिक आधारिक संरचना जितनी विकसित होगी, देश का आर्थिक विकास में उतनी ही तेजी से होता है। जहाँ एक ओर शिक्षण और शोध से नयी तकनीकों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है, वहाँ दूसरी ओर कृषि और उद्योग क्षेत्र में इसका उपयोग करने के लिए ऊर्जा, सिंचाई यातयात, संचार व वित्तीय संस्थाओं का विद्यमान होना आवश्यक है।

2. श्रम की आपूर्ति (Supply of Labour):
श्रम की कुशलता में वृद्धि करने के लिए श्रम की गतिशीलता अति आवश्यक है। यह गतिशीलता परिवहन एवं संचार के साधने द्वारा ही प्रदान की जाती है।

3. वित्तं की उपलब्धता (Availability of Finance):
आर्थिक विकास के विभिन्न कार्यक्रमों को लागू करने के लिए वित्त की आवश्यकता होती है, जिसकी आपूर्ति मौद्रिक एवं वित्तीय संस्थाओं द्वारा ही प्रदान की जाती है।

4. संसाधनों का उपयोग (Utilisation of Resources):
भूमि पर खेती के लिए नहरों आदि के माध्यम से सिंचाई के साधनों का विकास जरूरी है। अनाज को मण्डी तक ले जाने के लिए यातायात के साधन जरूरी हैं। कृषि की विभिन्न आगतों को खरीदने के लिये वित्तीय ‘संस्थानों का विकास जरूरी है। इसी प्रकार, उद्योगों द्वारा यातायात के साधनों का विकास जरूरी है। मशीनों को चलाने के लिए ऊर्जा के साधनों का होना आवश्यक है।’

5. बजार का विस्तार (Extension of Market):
यातायात और संचार के साधन बाजार के आकार के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संचार माध्यमों से वस्तुओं का व्यापक प्रचार किया जा सकता है तथा बाजार मूल्यों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकती है। यातयात के कुशल साधनों की सहायता से शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं को भी सुदूर स्थित बाजारों तक ले जाया सकता है।

6. श्रम की कार्य-कुशलता में वृद्धि (Increase in Efficiency of labour):
शिक्षा, प्रशिक्षण एवं स्वास्थ्य सेवाओं के कारण श्रम की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

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प्रश्न 4.
भारत में निम्नस्तरीय स्वास्थ्य के क्या कारण हैं?
उत्तर:
भारत में निम्नस्तरीय स्वास्थ्य के कारण (Causes of Poor Health in India):
भारत में निम्न स्वास्थ्य स्तर के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

1. अस्वास्थ्यकारक परिस्थितियाँ (Unsanitary Conditions):
भारत का निर्धन वर्ग अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहता हैं। वे उस वातावरण में रहते हैं जहाँ पर पीने के लिये सुरक्षित पानी नहीं मिलता, जहाँ सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है, जहाँ पर मल-मूत्र के निकास का कोई प्रबन्ध नहीं है तथा जहाँ महामारियों ने अपना अड्डा बना लिया है।

2. आवास (Housing):
भारत में काफी जनसंख्या झुग्गियों तथा तंग बस्तियों में रहती हैं। निर्धनों के मकान प्राय: कच्चे होते हैं। उनमें वायु तथा प्रकाशन की कोई व्यवस्था नहीं होती। क छोटी कमरे में कई-कई लोग रहते हैं। इस तरह अधिकांश निर्धन अस्वास्थ्यकर घरों में रहते हैं।

3. पौष्टिकहीनता (Mainutrition):
भारत में खाद्यान्न का अभाव है। खाद्यान्न भी पौष्टिकहीन हैं। इनके फलस्वरूप अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें उत्पन्न होती हैं। ये समस्यायें बच्चों के लिये विशेष रूप से गंभीर रूप धारण कर लेती हैं। माँ बनने वाली स्त्रियों में पौष्टिकहीनता अधिक पाई जाती है जो स्त्री तथा भावी सन्तान के लिये हानिकारक होती है। पौष्टिकहीनता की स्थिति में संक्रामक रोग शीघ्र फैलाते हैं।

4. ऊँची जन्म दर तथा जनसंख्या में तीव्र दर से वृद्धि (High birth rate and fast growth of population):
देश में जन्म दर बहुत ऊँची है जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा सकता है। लोग गंदी बस्तियों में जहाँ बहुत भीड़भाड़ होती है, रहते हैं। इन गंदी बस्तियों में महामारियाँ बहुत जल्दी फैलती हैं और लोग उनके शिकार बनते हैं। अतः ऊँची जन्म दर और तेज गति से बढ़ती जनसंख्या स्वास्थ्य को निम्न स्तर पर ले जाती है।

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प्रश्न 5.
आधारिक संरचना क्षेत्र के निजीकरण एवं व्यावसायीकरण की आवश्यकता किन कारणों से होती है?
उत्तर:
आवश्यकता (Need):
आधारिक संरचना क्षेत्र के निजीकरण एवं व्यावसायीकरण की आवश्यकता निम्न कारणों से होती है –

1. निवेश के लिये बड़ी राशि की आवश्यकता (Massive investment needs):
आधारिक संरचना क्षेत्र के विकास के लिये काफी मात्रा में निवेश करना पड़ता है। सरकारी खजाने में इतनी बड़ी राशि की व्यवस्था नहीं की जा सकती।

2. सार्वजनिक क्षेत्र में प्रबंधकीय योग्यता का अभाव (Lock of managerial ability in public sector):
आधारिक संरचना क्षेत्र के व्यवस्थित विकास के लिये यह आवश्यक है कि उपलब्ध संसाधनों को विधिवत् तरीकों से जुटाया जाय। उन संसाधनों का विभिन्न उपक्षेत्रों में आवंटन किया जाय, तथा उनके प्रभावी उपयोग के लिये उचित निगरानी सुनिश्चित की जाय। यह तभी हो सकता है जबकि प्रबन्धक कुशल, योग्य, दूरदर्शी ईमानदारी, नीतिवान, निष्ठावान, अनुभवी हों। इस प्रकार के प्रबन्धक की सार्वजनिक क्षेत्र में तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। स होता है।

3. विश्वव्यापीकरण (Globalisation):
विश्वव्यापीकरण के कारण भी आधारिक संरचना क्षेत्र में निजीकरण की आवश्यकता उत्पन्न हो गई है।

4. विश्व पूँजी बाजारों की नवीन गति (New Dynamics in World Capital):
पहले की तुलना में वर्तमान में पूंजी की राशि एक देश से दूसरे देश की ओर प्रवाहित हो रही है। इस पूंजी का एक बड़ा भाग आधारिक संरचना क्षेत्र की ओर भी प्रवाहित हो सकता है।

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प्रश्न 6.
आपका सामाजिक आधारिक संरचना से क्या तात्पर्य है तथा आप आर्थिक आधारिक संरचना से इसका अन्तर कैसे करेंगे?
उत्तर:
सामाजिक आधारिक संरचना से अभिप्राय उस आधारिक संरचना से है जो आर्थिक क्रियाओं का अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण प्रणाली को बाहर से अपना योगदान देती है। शिक्षा, प्रशिक्षण तथा शोध (Research), स्वास्थ्य, आवास आदि सामाजिक आधारिक संरचनायें हैं। सामाजिक आधारिक संरचना के फलस्वरूप लोगों की उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है। वे अधिक कुशलतापूर्वक उत्पादन कर पाते हैं।

सामाजिक आधारिक संरचनाओं तथा आर्थिक आधारिक संरचनाओं में अन्तर (Difference between social infrastructure and Economic Infrastructure):

सामाजिक आधारिक संरचनायें (Social Infrastructure):

  1. ये संरचनायें अर्थव्यस्था को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
  2. ये आर्थिक संरचनाओं के आधार हैं।
  3. इन संरचनाओं का उद्देश्य मानव तथा उसके वातावरण को सुधारना है।
  4. ये संरचनाओं प्रबन्धक, इंजीनियर आदि उपलब्ध कराती हैं।
  5. शिक्षा, प्रशिक्षण तथा शोध स्वास्थ्य आवास आदि सामाजिक संरचनाओं के घटक हैं।

आर्थिक आधारिक संरचनाएँ (Economic infrastructure):

  1. ये संरचनाएँ अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
  2. ये सामाजिक संरचनाओं को विकसित करती हैं।
  3. ये संरचनायें कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि लाने वाला वातावरण तैयार करती हैं।
  4. ये संरचनाएँ व्यापार तथा उद्योग की बाधाओं को दूर करती हैं।
  5. परिवहन, संचार ऊर्जा, मौद्रिक, तथा वित्तीय संस्थायें इन आर्थिक संरचनाओं के घटक हैं।

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प्रश्न 7.
जन स्वास्थ्य का अर्थ बताइए। बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए सकरार ने हाल के वर्षों में क्या उपाय किए हैं? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
जन स्वास्थ्य का अर्थ (Meaning of Public Health):
जन स्वास्थ्य से अभिप्राय साधारण व्यक्तियों का पूर्ण रूप से भौतिक, मानसिक और सामाजिक रूप से ठीक होना है। रुग्ण्ता खराब स्वास्थ्य की स्थिति है। सार्वजनिक स्वास्थ्य कई कारकों पर निर्भर करता है जैसे लोगों स्वच्छ वातावरण में रहें, पौष्टिक भोजन का सेवन करें, स्वच्छ पानी का प्रयोग करें। बच्चे बाल्यावस्था में न मरें, बच्चों के बीमार होने पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त हों। इसके अतिरिक्त बच्चों के खेलने तथा सीखने का सुअवसर प्रदान किया जाए न कि उन पर काम करने का दबाव डाला जाए।

वयस्कों को स्वास्थ रहने के लिए स्वच्छ वातावरण होना चाहिए, उन्हें पौष्टिक भोजन और हवादार आश्रय प्राप्त होना चाहिए। बीमार होने पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान होनी चाहिए। वयस्कों को काम करने का सुअवसर मिलना चाहिए ताकि वे अपना काम करें। भारत में जनन स्वास्थ्य की दिशा में कई उपाय अपनाए गए थे जिनके परिणामस्वरूप हमारे जीवन के स्तर में काफी सुधार हुआ है।

बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा हाल ही में अपनाए गए उपाय (Measures adopted by the Govt in the recentyears to control diseases):

सरकार ने हाल के वर्षों में बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं –

  1. बच्चों को विभिन्न बीमारियों के लिए टीकाकरण करवाकर सुरक्षित रखा गया है। परिवार कल्याण विभाग सामूहिक कार्यक्रम के अन्तर्गत सभी बच्चों को डिप्थीरिया, टेटनस, पोलियो, अंधापन आदि से बचाने का प्रयास कर रही है।
  2. भारत सरकार ने चेचक का उन्मूलन कर दिया है।
  3. हैजे से मरनेवाले लोगों की संख्या कम करने के लिए प्रयत्न किए गए हैं। हैजे के रोगी की संख्या जो 10 हजार होती थी अब कम होकर एक हजार रह गयी।
  4. भारत सरकार ने राष्ट्रीय मलेरिया विरोधी कार्यक्रय भी आरंभ किया है। जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को मलेरिया, कालाजार, मष्तिष्क ज्वर तथा फाइलेरिया से रक्षा करना है।
  5. भारत सरकार ने राष्ट्रीय कुष्ठ रोग निवारण कार्यक्रम भी आरम्भ किया है। यह कार्यक्रम पाँच लाख लोगों की रक्षा करता है।
  6. इसके अतिरिक्त सरकार ने राष्ट्रीय तपेदिक नियन्त्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय घेघा नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय अंधापन निवारण कार्यक्रम भी आरंभ किए हैं।
  7. एस० टी० डी०; एच० आई० वी० संक्रमण तथा एड्स के निवारण तथा उपचार के लिए सरकार ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की स्थापना की है। यह संगठन मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है।
  8. पिछले 15 वर्षों में साफ पीने के पानी के क्षेत्र में भी काफी सुधार किया गया है।
  9. इसके अतिक्ति सरकार ने कई प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, स्वास्थ्य उपकेन्द्र और समुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र खोले हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शताब्दी के अन्त में भारत में साक्षर अनुपात था –
(a) 116
(b) 2/3
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 2/3

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प्रश्न 2.
वर्ष 2001 में भारत में साक्षरों की संख्या हो गई है –
(a) 57 करोड़
(b) 75 करोड़
(c) 50 करोड़
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 57 करोड़

प्रश्न 3.
भारतवर्ष में शिक्षा पर कुल व्यय सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत है –
(a) 4 प्रतिशत
(b) 4 प्रतिशत से ज्यादा
(c) 4 प्रतिशत से कम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 4 प्रतिशत से कम

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प्रश्न 4.
हमारे देश में शिक्षा प्रणाली लागू है –
(a) 10 + 2 + 2
(b) 10 + 2 + 3
(c) 11 + 3
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 10 + 2 + 3

प्रश्न 5.
भारत में वर्तमान जीवन प्रत्याशा है –
(a) 65 वर्ष
(b) 70 वर्ष
(c) 60 वर्ष
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 65 वर्ष

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प्रश्न 6.
भारत में स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर कुल योजना का खर्च होता है –
(a) 3 प्रतिशत
(b) 7 प्रतिशत
(c) 4.5 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 3 प्रतिशत

प्रश्न 7.
एड्स की रोकथाम का कार्यक्रम है –
(a) राष्ट्रीय स्तर का
(b) राज्य स्तर का
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) राष्ट्रीय स्तर का

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प्रश्न 8.
नौवीं योजना में शिक्षा पर व्यय का प्रतिशत है –
(a) 7 प्रतिशत
(b) 2.7 प्रतिशत
(c) 6 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 6 प्रतिशत

प्रश्न 9.
वर्ष 2000 में भारत में बच्चों की मृत्यु दर थी –
(a) 52
(b) 22
(c) 70
(d) 32
उत्तर:
(b) 22

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प्रश्न 10.
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के द्वारा छठा अखिल भारतीय शैक्षिक सर्वेक्षण कराया गया था –
(a) 1986 में
(b) 1993 में
(c) 2000 में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 1993 में

प्रश्न 11.
राकेश मोहन समिति का संबंध है –
(a) भारतीय रेलवे
(b) भारतीय भू-परिवहन व्यवस्था
(c) भारतीय नौ परिवहन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) भारतीय रेलवे

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 8 आधारिक संरचना

प्रश्न 12.
वर्ष 1991 में पूर्ण विद्युतीकृत राज्यों की संख्या थी –
(a) 8
(b) 13
(c) 22
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 13

प्रश्न 13.
भारत में अंतर्राष्ट्रीय सेवाएं प्रदान करती है –
(a) एयर इंडिया
(b) इंडियन एयर लाइन्स
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) एयर इंडिया

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प्रश्न 14.
भारत में अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्टों की संख्या है –
(a) 28
(b) 92
(c) 5
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 5

प्रश्न 15.
भारत में एयरपोर्ट प्राधिकरण के अंतर्गत एयरपोर्टों की संख्या है –
(a) 28
(b) 92
(c) 15
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 92

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे

Bihar Board Class 11 Economics रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
श्रमिक किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्रमिक उस व्यक्ति को कहते हैं जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न है और राष्ट्रीय उत्पादन में योगदान कर रहा है।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे

प्रश्न 2.
श्रमिक जनसंख्या अनुपात की परिभाषा दें?
उत्तर:
श्रमिक जनसंख्या अनुपात से अभिप्राय एक निश्चित जनसंख्या में कितने व्यक्ति रोजगार परक हैं से है। श्रमिक जनसंख्या अनुपात की गणना करने के लिए हम देश के सभी श्रमिकों की संख्या को देश की जनसंख्या से भाग कर उसे 100 से गुणा करते हैं।

प्रश्न 3.
क्या ये भी श्रमिक हैं – एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर, एक जुआरी। क्यों?
उत्तर:
एक भिखारी, एक चोर, एक तस्कर तथा एक जुआरी श्रमिक नहीं हैं क्योंकि वे आर्थिक क्रियाओं में संलग्न नहीं हैं और वे राष्ट्रीय उत्पादन में योगदान नहीं करते।

प्रश्न 4.
इस समूह में कौन असंगत लगता है
(क) नई की दुकान का मालिक
(ख) एक मोची
(ग) मदर डेयरी का कोषपाल
(घ) ट्यूशन पढ़ाने वाला शिक्षक
(ङ) परिवहन कंपनी का संचालक
(च) निर्माण मजदूर
उत्तर:
(ग) मदर डेयरी का कोषपाल असंगत है क्योंकि यह नौकरी कर रहा है। शेष सभी स्वरोजगारी हैं।

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प्रश्न 5.
नये उभरते रोजगार मुख्यतः ……….. क्षेत्र में ही मिल रहे हैं।
उत्तर:
नये उभरते रोजगार मुख्यत सेवा क्षेत्रक में ही मिल रहे हैं।

प्रश्न 6.
चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान ………… को क्षेत्रक कहा जाता हैं।
उत्तर:
चार व्यक्तियों को मजदूरी पर काम देने वाले प्रतिष्ठान को अनौपचारिक क्षेत्रक कहा जाता है।

प्रश्न 7.
राज स्कूल जाता है। पर जब वह स्कूल में नहीं होता, तो प्रायः अपने खेत में काम करता दिखाई देता है। क्या आप उसे श्रमिक मानेंगे? क्यों?
उत्तर:
नहीं क्योंकि इसके योगदान से देश को लाभ नहीं प्राप्त हो रहा।

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प्रश्न 8.
शहरी महिलाओं की अपेक्षा अधिक ग्रामीण महिलाएँ काम करती दिखाई देती हैं। क्यों?
उत्तर:
क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में अधिक आय कमाने के सीमित साधन हैं। अतः अधिक आय कमाने के लिये और घर का खर्च चलाने के लिये पुरुषों के साथ महिलायें भी काम करती हैं।

प्रश्न 9.
मीना एक गृहिणी है। घर के कामों के साथ-साथ वह अपने पति के कपड़े की दुकान में भी हाथ बँटाती है। क्या उसे एक श्रमिक माना जा सकता है? क्यों?
उत्तर:
उसे श्रमिक माना जा सकता है क्योंकि वह आर्थिक क्रियाओं में भी संलग्न है और वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न होते हैं, श्रमिक कहलाते हैं।

प्रश्न 10.
यहाँ किसे असंगत माना जाएगा –
(क) किसी अन्य के अधीन रिक्शा चलाने वाला
(ख) राज मिस्त्री
(ग) किसी मैकेनिक की दुकान पर काम करने वाला श्रमिक
(घ) जूते पालिश करने वाला लड़का
उत्तर:
जूते पालिश करने वाला लड़का।

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प्रश्न 11.
निम्न सारणी में सन् 1972-73 में भारत के श्रम बल का वितरण दिखाया गया है। इसे ध्यान से पढ़कर श्रम बल के वितरण के स्वरूप के कारण बताइए। ध्यान रहे ये आँकड़े 30 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 1
उत्तर:
तालिका से पता चलता है कि आज से तीस वर्ष पहले भारत में श्रम बल का आकार 23.3 करोड़ आँका गया था क्योंकि देश के अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते थे, इसलिए ग्रामीण श्रम बल का अनुपात भी शहरी श्रम बल से कहीं अधिक है। ग्रामीण श्रम बल 19.4 करोड़ जबकि शहरी श्रम बल 39 करोड़, 23.3 करोड़ श्रमिकों में लगभग 83% श्रमिक ग्रामीण है।

भारत में श्रम शक्ति में पुरुषों की बहुलता है। श्रम बल में लगभग 64% पुरुष तथा .शेष महिलायें थी। ग्रामीण क्षेत्र में महिला श्रमिक शहरी क्षेत्र में महिला श्रमिकों से अधिक थी। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएँ खाना बनाने, पानी लाने, ईंधन बीनने के साथ-साथ खेतों में भी काम करती है। उन्हें नकद या अनाज के रूप में मजदूरी मिलती हैं।

प्रश्न 12.
इस सारणी में 1999-2000 ई. में भारत की जनसंख्या और श्रमिक जनानुपात दिखाया गया है। क्या आप भारत के (शहरी और सकल) श्रमबल का अनुमान लगा सकते हैं?
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 2
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 3

प्रश्न 13.
शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतन भोगी कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक क्यों होते हैं?
उत्तर:
शहरों में कार्यालय, अस्पताल, पाठशालायें तथा कारखाने गाँवों की अपेक्षा अधिक हैं। इन संस्थानों में नियमित वेतनभोगी काम करते हैं। इन संस्थाओं में नौकरी प्राप्त करने के लिये शिक्षित तथा निपुण होना आवश्यक है। गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिक प्रशिक्षित, योग्य तथा निपुण व्यक्ति रहते हैं, अतः गाँवों की अपेक्षा शहरों में नियमित वेतनभोगी कर्मचारी अधिक हैं।

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प्रश्न 14.
नियमिति वेतनभोगी कर्मचारियों में महिलाएँ कम क्यों हैं?
उत्तर:
महिलाओं को घरेलू काम करने पड़ते हैं। अधिकांश महिलायें पुरुषों की अपेक्षा कम शिक्षित, कम योग्य और कम निपुण होती हैं। नियमित वेतनभोगी रोजगार के लिये निपुणता, साक्षरता का स्तर आदि उच्च होना चाहिये। अत: नियमित वेतनभोगी रोजगार में महिलायें कम पाई जाती हैं।

प्रश्न 15.
भारत में श्रमबल के क्षेत्रवार वितरण की हाल की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करें।
उत्तर:
निम्नलिखित तालिका की सहायता से हम भारत में कार्य शक्ति की क्षेत्रीय वितरण की नई प्रवृत्ति की विवेचना करेंगे –
भारत में कार्यशक्ति का क्षेत्रीय वितरण (प्रतिशत में) –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 4

ऊपरी की तालिका से हमें पता चलता है कि रोजगार कृषि क्षेत्र से गैर-कृषि क्षेत्र की और बढ़ रहा है। 1972-73 ई. में कार्यशक्ति का 74% भाग प्राथमिक (कृषि) क्षेत्र में संलग्न था। यह अनुपात 1999-2000 ई. में गिरकर. 60 प्रतिशत हो गया। द्वितीयक क्षेत्र तथा सेवा क्षेत्र (गैर-कृषि क्षेत्रों) में कार्यशक्ति का अनुपात बढ़ गया। द्वितीयक क्षेत्र में यह अनुपात 11% से बढ़कर 16% हो गया है जबकि सेवाक्षेत्र में यह 15% से बढ़कर 24% हो गया है।

महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक संख्या में काम में लगे हुए होते हैं। शहरी क्षेत्र में यह अंतर बहुत अधिक पाया जाता है। तालिका से हमें पता चलता है कि 39 मिलियन लोगों में से केवल 7 मिलियन (केवल 18%) महिलायें काम करती हैं, जबकि 32 मिलियन (82%) पुरुष काम पर लगे हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्र में 194 मिलियन कर्मचारियों में से 69 मिलियन (अर्थात् 36%) महिलायें आर्थिक क्रियाओं में संलग्न हैं, जबकि 64% पुरुष काम पर लगे हुए हैं।

इसका, कारण यह है कि जब पुरुष अधिक आय कमाते हैं तब परिवार महिलाओं को काम करने के लिए हतोत्साहित करते हैं। शहरों में अधिक कमाने के अवसर अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। शहरों में काम करने वाले पुरुषों की आय से उनके परिवार का गुजारा चल जाता है। अतः शहरों में कम महिलायें नौकरी करती हैं। इसके विपरीत गाँवों में कम आय से परिवार का पालन-पोषण ठीक प्रकार से नहीं होता। अतः घर का गुजारा चलाने के लिये पुरुषों के साथ महिलायें काम पर जाती हैं।

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प्रश्न 16.
1970 से अब तक विभिन्न उद्योगों में श्रमबल के वितरण में शायद ही कोई परिवर्तन आया। टिप्पणी करें।
उत्तर:
यह बात पूर्णतः सत्य नहीं है कि भारत में 1970 की तुलना में कार्यशक्ति के क्षेत्रीय वितरण में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। 1970 में कार्य शक्ति का लगभग 74% भाग प्राथमिक क्षेत्र में संलग्न था जो घटकर 1999-2000 में लगभग 60% हो गया। द्वितीयक क्षेत्र में कार्यशक्ति का 11% भाग 1970 में संलग्न था जो बढ़कर 1999-2000 में लगभग 16% हो गया। इसी तरह सेवा क्षेत्र में कार्यशक्ति का अनुपात 15% से बढ़कर 24% हो गया है।

प्रश्न 17.
क्या आपको लगता है पिछले 50 वर्षों में भारत में रोजगार के सृजन में भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुरूप वृद्धि हुई है? कैसे?
उत्तर:
1960-2000 ई. की अवधि में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में धनात्मक वृद्धि हुई और यह रोजगार वृद्धि से ऊँची थी। परंतु सकल घरेलू उत्पाद में हमेशा घटती-बढ़ती रही। इस समयावधि में रोजगार स्थिर रूप से 2 प्रतिशत बढ़ता रहा। 1990 ई. के पश्चात् भारत में रोजगार में संवृद्धि घटने लगी और रोजगार संवृद्धि के उस स्तर पर पहुँच गया जो कि नियोजन की प्रारंभिक अवस्था में था। इन्हीं वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद में सवृद्धि तथा रोजगार संवृद्धि में काफी अंतर आ गया।

इसका अभिप्राय यह हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था रोजगार के सृजन के बिना भी अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन कर सकती है। विद्वान इस घटना को नौकरी के बिना संवृद्धि (Jobless growth) कहते हैं। रोजगार तथा सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि की प्रवृत्ति के कार्य शक्ति के विभिन्न वर्गों को काफी प्रभावित किया।

1972-73 में 74.3% लोग प्राथमिक क्षेत्र में थे। 1999-2000 में यह प्रतिशत घटकर 60.4 प्रतिशत हो गया। द्वितीयक क्षेत्र में कर्मचारियों का प्रतिशत 10.9% (1972-73) से बढ़कर 15.8% (1999-2000) हो गया। इसी प्रकार सेवा में कर्मचारियों का प्रतिशत 14.8% (1972 73) से बढ़कर 23.8% हो गया यह तथ्य निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 5
रोजगार संवृद्धि तथा सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि की प्रवृत्ति ने रोजगार की प्रस्थिति (Status) पर भी प्रभाव डाला जिसे नीचे की तालिका में दर्शाया गया है।

Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 6
इस तालिका से हमें यह भी पता चलता है कि शहर में काम करने वाले लोगों की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या से कम है। शहर में 23.3 करोड़ लोगों में से केवल 39 करोड़ लोग (लगभग 16.74) कार्य करते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 233 करोड़ लोगों में से 194 करोड़ लोग (लगभग 83.26) काम करते हैं।

दूसरे शब्दों में ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत लोगों का केवल पाँचवाँ भाग शहरी क्षेत्र में कार्यरत है। इसका कारण यह है कि गाँवों में ऊँची आय के सीमित संसाधन हैं और पेट पालने के लिये परिवार के अधिकांश सदस्य कार्य करते हैं। प्रायः गाँव के लोग पाठशालाओं, कॉलेजों और अन्य प्रशिक्षित संस्थाओं में नहीं जाते और यदि जाते भी हैं तो वे किसी कारणवश बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं और काम पर लग जाते हैं। इसके विपरीत शहरी क्षेत्र में अधिकांश लोग विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में अध्ययन करते हैं।

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प्रश्न 18.
क्या औपचारिक क्षेत्र में ही रोजगार सृजन आवश्यक है? अनौपचारिक में नहीं? कारण बताइए।
उत्तर:
अनौपचारिक क्षेत्र की अपेक्षा में कर्मचारियों को औपचारिक क्षेत्र में निम्नलिखित कारणों से रोजगार अर्जित करना आवश्यक है –

  1. अनौपचारिक क्षेत्र में कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा के लाभ मिलते हैं – जैसे मातृत्व लाभ, प्रोविडेन्ट. फण्ड, ग्रेच्यूटी (Gratuity), पेंशन आदि।
  2. औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की अपेक्षा अच्छा वेतन मिलता है।
  3. औपचारिक क्षेत्र पर श्रमिक कानून लागू होते हैं।
  4. औपचारिक क्षेत्र में ट्रेड यूनियन (Trade Unions) होती हैं जो कर्मचारियों के हित में मालिकों के साथ मजदूरी तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा उपायों के लिये सौदेबाजी करती है।
  5. औपचारिक क्षेत्र में कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित होती है।
  6. औपचारिक क्षेत्र में कर्मचारियों के लिए आवास की व्यवस्था की जाती है।
  7. औपचारिक क्षेत्र में कर्मचारियों की कार्यकुशलता तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है।
  8. औपचारिक क्षेत्र में लेन-देन का पूरा लेखा-जोखा रखा जाता है। गबन, हेराफेरी आदि की संभावना कम होती है।
  9. औपचारिक क्षेत्र से राज्य तथा केन्द्र सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।
  10. औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों का जीवन स्तर ऊँचा होता है।

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प्रश्न 19.
विक्टर को दिन में केवल दो घंटे काम मिल पाता है। बाकी सारे समय वह काम की तलाश में रहता है। क्या वह बेरोजगार है? क्यों विक्टर जैसे लोग क्या काम करते होंगे?
उत्तर:
विक्टर प्रति दो घंटे का काम करता है अतः वह रोजगार है परंतु पूर्ण रोजगार नहीं। वह अल्परोजगार है। विक्टर जैसे लड़के निम्न प्रकार के कार्य कर रहे होंगे –

  1. धनी व्यक्तियों की कार, स्कूटर साफ कर रहे होंगे।
  2. सुबह हो घंटे समाचार पत्र बाँट रहे होंगे।
  3. दूध के डिपो पर काम कर रहे होंगे।
  4. दूध के डिपो से दूध लाकर गलियों में बेच रहे होंगे।
  5. कबाड़ी का काम कर रहे होंगे।
  6. धर्मार्थ औषधोलय में रोगियों की पर्ची बनाने का काम कर रहे होंगे।
  7. घरों से लंच बॉक्स इकट्ठे करके कार्यस्थल पर पहुँच रहे होंगे।

प्रश्न 20.
क्या आप गाँव में रह रहे हैं? यदि आपको ग्राम-पंचायत को सलाह देने को कहा जाए तो आप गाँव की उन्नति के लिए किस प्रकार के क्रियाकलाप का सुझाव देंगे, जिससे रोजगार सृजन हो।
उत्तर:
ग्राम पंचायत को ग्राम सुधार के लिये निम्नलिखित क्रियायें अपनाने के लिये कहूँगा। इन क्रियाओं से रोजगार का सृजन भी होगा –

  1. कच्ची सड़कें बनवाना।
  2. गाँव की सफाई करवाना।
  3. नलियों आदि की सफाई करवाना।
  4. कुँओं की सफाई करवाना।
  5. शाम को प्रौढ़ शिक्षा का प्रबंध करना।
  6. पढ़ाई में कमजोर बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था करना।
  7. गाँव में खेलकूद क्लब का निर्माण करना। क्लब के सदस्यों को क्रिकेट, हॉकी आदि के उपकरणों की व्यवस्था करना।
  8. तालाब बनवाना तथा उसकी नियमित रूप से सफाई करवाना।

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प्रश्न 21.
अनियत. दिहाड़ी मजदूर कौन होते हैं?
उत्तर:
अनियत दिहाड़ी मजदूर वे होते हैं जिन्हें किसी व्यक्ति या उद्यम से नियमित रूप से काम नहीं मिलता। ये मजदूर शहरों में निर्माण कार्य में लगे होते हैं। गाँव में ये अन्य लोगों के खेतों में काम करते हैं।

प्रश्न 22.
आपको यह कैसे पता चलेगा कि कोई व्यक्ति अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहा है?
उत्तर:
यह जानने के लिये कि एक कर्मचारी अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहा है या नहीं, हम यह पता लगाएँ कि जिस उद्यम में वह काम कर रहा है वहाँ पर कितने सवैतनिक कर्मचारी हैं। यदि कर्मचारियों की संख्या 10 से कम है तो वह कर्मचारी अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहा है।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विदेशों से शुद्ध आय कब ऋणात्मक होती है?
उत्तर:
विदेशों से शुद्ध साधन आय उस समय ऋणात्मक होती है जब निर्यात से प्राप्त राशि से आयात के भुगतान की राशि कम होती है।

प्रश्न 2.
सकल राष्ट्रीय उत्पाद क्या है?
उत्तर:
सकल राष्ट्रीय उत्पाद, सकल घरेलू उत्पाद तथा विदेशों से शुद्ध आय का योगफल है।

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प्रश्न 3.
एक देश का सकल घरेलू उत्पाद 10,000 करोड़ रुपये और विदेशों से साधन आय 100 करोड़ है। उस देश का सकल राष्ट्रीय उत्पाद कितना होगा?
उत्तर:
सकल राष्ट्रीय उत्पाद = सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से शुद्ध आय = 10,000 + 100 = 10,000 करोड़ रुपये

प्रश्न 4.
सकल घरेलू उत्पाद क्या है?
उत्तर:
देश में एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं का मौद्रिक मूल्य सकल घरेलू उत्पाद कहलाता है।

प्रश्न 5.
विदेशी व्यापार में शुद्ध आय किसे कहते हैं?
उत्तर:
विदेशी व्यापार में शुद्ध आय से अभिप्राय विदेशी व्यापार द्वारा प्राप्ति तथा भुगतान के अंतर को व्यापार से शुद्ध आय कहते हैं। यह धनात्मक भी हो सकता है, ऋणात्मक भी और शून्य भी। इसे विदेशों का शुद्ध आय भी कहते हैं।

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प्रश्न 6.
विदेशों से शुद्ध साधन आय कब शून्य होती है?
उत्तर:
विदेशों से शुद्ध साधन आय तब शून्य होती है जब निर्यात से प्राप्त होने वाली आय आयात पर किये गये भुगतान की राशि के बराबर होती है।

प्रश्न 7.
विदेशों से शुद्ध आय कब धनात्मक होती है?
उत्तर:
विदेशों से शुद्ध आय उस समय धनात्मक होती है जब निर्यात से प्राप्त राशि आयात के भुगतान की राशि से अधिक होती है।

प्रश्न 8.
1999-2000 ई. में भारत में कितनी कार्यशक्ति थी?
उत्तर:
1999-2000 ई में भारत के पास 400 मिलियन कार्य बल था।

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प्रश्न 9.
कार्यरत जनसंख्या अनुपात से हमें किस बात का पता चलता है?
उत्तर:
कार्यरत जनसंख्या अनुपात से हमें पता चलता है कि 100 व्यक्तियों में कितने व्यक्ति रोजगार में हैं।

प्रश्न 10.
कार्यरत जनसंख्या अनुपात क्या है?
उत्तर:
कार्यरत जनसंख्या अनुपात एक संकेतक (Indication) है जिसका प्रयोग एक देश की रोजगार स्थिति की विवेचना के लिये किया जाता है।

प्रश्न 11.
‘क’ देश का कार्यरत अनुपात 50 है जबकि “ख’ देश का कार्यरत अनुपात 40 है। किस देश में अधिक लोग रोजगार में लगे हुए हैं?
उत्तर:
‘क’ देश में अधिक कर्मचारी रोजगार में लगे हुए हैं।

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प्रश्न 12.
एक देश की जनसंख्या 28.52 करोड़ है और उस देश में कार्यरत जनसंख्या अनुपात 33.7 है। बताइये कितने लोग कार्य पर लगे हुए हैं?
उत्तर:
कार्य पर लगे कर्मचारी = \(\frac{33.7}{100}\) = 9.61 करोड़

प्रश्न 13.
एक देश में 9.61 करोड़ लोग काम पर लगे हुए हैं और देश की कुल जनसंख्या, 28.52 करोड़ है। कार्यरत जनसंख्या का अनुपात बतायें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 7

प्रश्न 14.
किसी देश का सकल राष्ट्रीय उत्पाद तथा विदेशों से शुद्ध आय क्रमशः 10,100 करोड़ रुपये तथा 100 करोड़ रुपये है। उस देश का सकल घरेलू उत्पाद ज्ञात करें।
उत्तर:
सकल राष्ट्रीय उत्पाद = सकल राष्ट्रीय उत्पाद – विदेशों से साधन आय
10,100 – 100 = 10,000 करोड़ रुपये।

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प्रश्न 15.
एक देश का सकल घरेलू उत्पाद 9,000 करोड़ रुपये है और उसकी विदेशों से शुद्ध आय (-) 10 करोड़ रुपये है। उस देश का सकल राष्ट्रीय उत्पाद क्या होगा?
उत्तर:
सकल राष्ट्रीय उत्पाद = सकल घरेलू उत्पाद + विदेशों से शुद्ध आय
= 9,000 + (-10) = 9,000 – 10
= 8990 करोड़ रुपये।

प्रश्न 16.
आर्थिक क्रियायें किसे कहते हैं?
उत्तर:
आर्थिक क्रियायें उन क्रियाओं को कहते हैं जो सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देती हैं।

प्रश्न 17.
कर्मचारी किसे कहते हैं?
उत्तर:
कर्मचारी उन व्यक्तियों को कहते हैं जो आर्थिक क्रियायें करते हैं।

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प्रश्न 18.
रोजगार में किन व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है?
उत्तर:
रोजगार में उन व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है जो आर्थिक क्रियाओं में संलग्न हैं।

प्रश्न 19.
महिलाएँ घरों में काम करती हैं, खाना बनाती हैं, पानी तथा जलाने की लकड़ियाँ लाती हैं। वे खेतों में भी काम करती हैं, खाना बनाती हैं, फिर भी उनको कर्मचारियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता क्यों?
उत्तर:
क्योंकि उनको उनके काम के बदले मुद्रा या खाद्यान्न के रूप में मजदूरी नहीं दी जाती है।

प्रश्न 20.
ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में एक साल में कितने दिनों के लिये रोजगार की गारंटी है?
उत्तर:
एक वर्ष में 100 दिनों के लिये रोजगार की गारंटी है।

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प्रश्न 21.
ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना 2 फरवरी 2006 ई. को कितने जिलों में शुरू किया गया है?
उत्तर:
200 जिलों में।

प्रश्न 22.
क्या एक भिखारी कर्मचारी है?
उत्तर:
भिखारी कर्मचारी नहीं है क्योंकि भिक्षा माँगना आर्थिक क्रिया नहीं है और न ही भिक्षा से प्राप्त राशि से देश के विकास में कोई वृद्धि होती है।

प्रश्न 23.
एक देश में कार्यरत जनसंख्या अनुपात 33.7 है और उस देश में 9.61 करोड़ व्यक्ति काम पर लगे हुए हैं। उस देश की जनसंख्या ज्ञात करें।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 8

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प्रश्न 24.
अनिश्चित रोजगार पाने वाले व्यक्ति को चुनिये।

  1. रिक्शा स्वामी के अधीन काम करने वाला रिक्शा चालक।
  2. राज मिस्त्री।
  3. दुकान पर काम करने वाला मैकेनिक।
  4. जूते पालिश करने वाला लड़का।

उत्तर:
2. राज मिस्त्री।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन से कर्मचारी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं?

  1. एक होटल में काम करने वाला व्यक्ति जिसने सात कर्मचारी नौकरी पर रखे हुए हैं और तीन कर्मचारी परिवार के सदस्य हैं।
  2. एक निजी पाठशाला जिसमें 20 वैतनिक अध्यापक हैं।
  3. एक पुलिस कांस्टेबल।
  4. सरकारी अस्पताल में नर्स।
  5. साइकिल-रिक्शा चलाने वाला।
  6. एक टेक्सटाइल दुकान का स्वामी।
  7. एक बस कंपनी का स्वामी जिसके पास 10 बसें हैं और 20 ड्राइवर, कंडक्टर तथा अन्य कर्मचारी हैं।
  8. एक वकील।

उत्तर:
निम्नलिखित कर्मचारी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं –

  1. एक होटल में कार्य करने वाला व्यक्ति जिसमें सात वैतनिक कर्मचारी और तीन परिवार के सदस्य कार्य करते हैं।
  2. साइकिल रिक्शा चलाने वाला।
  3. एक टैक्सटाइल दुकान का स्वामी।

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प्रश्न 2.
राष्ट्रीय उत्पाद क्या है? ऐसी कोई पाँच क्रियाएँ बताइये लो राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देती हैं।
उत्तर:
एक राष्ट्र के द्वारा एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं के मौद्रिक मूल्य को राष्ट्रीय उत्पाद कहते हैं। दूसरे शब्दों में एक वर्ष में एक देश की घरेलू सीमा में उत्पादित अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य को घरेलू उत्पाद कहते हैं। इस घरेलू उत्पाद में विदेशों से अर्जित शुद्ध आय को जोड़ने से राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त होता है। अध्यापक द्वारा स्कूल में पढ़ाना, नर्स द्वारा अस्पताल में रोगी की सेवा करना, एक कर्मचारी का बैंक में काम करना, एक श्रमिक का एक कारखाने में काम करना, एक दुकानदार द्वारा अपनी दुकान पर ग्राहकों को वस्तुएँ बेचना आदि क्रियायें राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देती हैं।

प्रश्न 3.
भारत में महिलाओं की तुलना में पुरुष अधिक काम करने वाले पाये जाते हैं, क्यों?
उत्तर:
प्रायः देखा गया है कि यदि पुरुष अधिक आय कमा रहे हैं तब परिवार महिला सदस्यों के नौकरी करने के लिये हतोत्साहित करते हैं। इसके अतिरिक्त भारत में कई ऐसे समुदाय हैं जो महिलाओं से नौकरी करवाने के घोर विरोधी हैं। उस समुदाय के लोग भूखे मर जायेंगे, परंतु महिलाओं के कमाई को हाथ नहीं लगायेंगे। इसके अतिरिक्त महिलायें पुरुषों की अपेक्षा कम शिक्षित होती है और नौकरी प्राप्त करने की उनमें योग्यता नहीं होती। इन सब कारणों से वे पुरुषों की अपेक्षा कम काम में लगी हुई हैं।

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प्रश्न 4.
स्वनियोजित, नियमित वेतन पाने वाले कर्मचारी तथा दैनिक मजदूरी वाले श्रमिकों के लिये क्रमशः
(a) (b) तथा
(c) लिखें

  1. एक सैलून (Saloon) का स्वामी।।
  2. चावल की मिल में काम करने वाला कर्मचारी जिसे दैनिक आधार पर भुगतान किया जाता है परंतु वह नियमित रूप से नौकरी में है।
  3. भारतीय स्टेट बैंक में कैशियर।
  4. राज्य सरकार के कार्यालय में दैनिक मजदूरी पर काम करने वाला टाइपिस्ट जिसे मासिक भुगतान दिया जाता है।
  5. एक जुलाहा।
  6. थोक सब्जी की दुकान पर माल लादने वाला कर्मचारी।
  7. ठंडे पेय पदार्थ की दुकान का स्वामी जो पेप्सी, कोका-कोला तथा मिरिण्डा बेचता है।
  8. एक निजी चिकित्सालय में 5 साल से निरंतर काम करने वाली नर्स जिसे महीने के महीने वेतन दिया जाता है।

उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 9

प्रश्न 5.
आर्थिक क्रियाओं को कितनी औद्योगिक श्रेणियों में बाँट सकते हैं? इनमें से कौन-सी औद्योगिक श्रेणी प्राथमिक क्षेत्र में सम्मिलित की जाती हैं।
उत्तर:
आर्थिक क्रियाओं को निम्नलिखित औद्योगिक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. कृषि
  2. खनन तथा उत्खनन
  3. विनिर्माण
  4. विद्युत, गैस तथा पानी की आपूर्ति
  5. निर्माण
  6. व्यापार
  7. परिवहन व भण्डारण तथा
  8. सेवायें

प्राथमिक क्षेत्र में कृषि, खनन और उत्खनन उद्योग शामिल किये जाते हैं।

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प्रश्न 6.
द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्र के उपक्षेत्र लिखें।
उत्तर:
द्वितीयक क्षेत्र के उपक्षेत्र:

  1. विनिर्माण
  2. विद्युत, गैस तथा जल आपूर्ति
  3. निर्माण

तृतीयक क्षेत्र के उपक्षेत्र –

  1. व्यापार
  2. परिवहन तथा भण्डारण
  3. सेवायें

प्रश्न 7.
निम्नलिखित उपक्षेत्र किन क्षेत्रों में शामिल किये जाते हैं?

  1. सेवायें
  2. कृषि
  3. निर्माण
  4. विनिर्माण तथा
  5. व्यापार

उत्तर:
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 10

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित क्षेत्रों के दो-दो उपक्षेत्र लिखें प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीय क्षेत्र, तृतीयक क्षेत्र।
उत्तर:
1. प्राथमिक क्षेत्र –

  • कृषि
  • खनन तथ उत्खनन

2. द्वितीयक क्षेत्र –

  • निर्माण
  • विनिर्माण

3. तृतीयक क्षेत्र –

  • सेवा
  • व्यापार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न तालिका 1972-73 वर्ष के लिये भारत वर्ष में कार्यबल (Work Force) के वितरण को दर्शाती है। इसका विश्लेषण करें और इस प्रकार के कार्य बल के वितरण की प्रकृति का कारण बतायें। आप देखेंगे कि यह आँकड़े 35 वर्ष पहले भारत के हैं।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 11
उत्तर:
ऊपर की तालिका से हमें पता चलता है कि 1972-73 ई. में भारत में कार्य बल 233 मिलियन था जिसमें 157 मिलियन पुरुष हैं तथा 76 मिलियन महिलायें थी। महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से आधी थी। इसका कारण यह था कि भारत में अधिकांश शहरी महिलायें नौकरी नहीं करतीं। उनका अधिकांश समय घरेलू कार्य करने में व्यतीत होता है, इसके अतिरिक्त वे कार्यालयों तथा बैंकों में कार्य करने की योग्यता नहीं रखती।

इसके अतिरिक्त भारत में कुछ ऐसे समुदाय हैं जो अपनी लड़कियों या पत्नियों से नौकरी नहीं करवाते। कुछ लोग पाठशालाओं, कॉलेजों में जाते हैं, परंतु उनमें से अधिकांश विद्यार्थी किसी कारणवश बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं तथा कार्य शक्ति में शामिल हो जाते हैं। जहाँ तक महिलाओं के काम करने का प्रश्न है, उसके बारे में हम कह सकते हैं कि गाँव। में काम करने वाली महिलाओं का प्रतिशल शहर में काम करने वाली महिलाओं से अधिक है। इसका कारण प्रश्न एक (दीर्घ उत्तरीय) के उत्तर में दे दिया गया है।

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प्रश्न 2.
1972-73 की तुलना में भारत में कर्मचारियों की प्रास्थिति (Status) में बहुत अधिक परिवर्तन हुआ है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
निम्नलिखित तालिका की सहायता से हम 1972-73 की तुलना में भारत में कर्मचारियों की प्रास्थिति (Status) में होने वाले परिवर्तन की विवेचना करेंगे।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 12
ऊपर दी गई तालिका से हमें पता चलता है कि कार्यशक्ति में स्वनियोजितों का प्रतिशत 1972-73 में 61.4 था जो घटकर 1999-2000 में 52.6 हो गया। जहाँ तक वेतनभोगी कर्मचारियों का संबंध है इनमें बहुत कम प्रतिशत परिवर्तन आया था। 1972-73 में कार्यशक्ति का 15.4% भाग नियमित वेतनभोगी रोजगार में था जबकि 1999-2000 में यह 14.6% हो गया। वेतनभोगी रोजगार में लगी कार्यशक्ति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया परंतु दैनिक मजदूरी श्रमिकों का प्रतिशत 23.2 (1972-73) से बढ़कर 1999-2000 में 32.8% हो गया।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित तालिका भारत में 1993-94 की कार्यरत जनसंख्या अनुपात को दर्शाती है। तालिका का विश्लेषण करें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 13
उत्तर:
तालिका से हमें पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में 100 में से 44.4 लोग आर्थिक क्रियाओं में संलग्न हैं जबकि शहरी क्षेत्र में 34.7% अर्थात् 100 में से 35 लोग काम करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में शहरी क्षेत्र की अपेक्ष कार्यरत जनसंख्या दर के ऊंचा होने के निम्नलिखित कारण हैं –

  1. गाँवों में उच्च आय कमाने के साधन सीमित हैं। फलस्वरूप अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये परिवार के अधिकांश लोग काम करने जाते हैं।
  2. ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश जनसंख्या स्कूलों और कालेजों में नहीं जाती। जो बच्चे स्कूल जाते हैं, वे बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं और कार्य में लग जाते हैं। अतः ग्रामीण क्षेत्र में शहरी क्षेत्र की अपेक्षा अधिक लोग काम पर जाते हैं।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित तालिका 1972-73 तथा 1999-2000 वर्ष के लिए पुरुषों के रोजगार की प्रवृत्ति को दर्शाती है। विश्लेषण करें और इन परिवर्तनों के उचित कारण बतायें।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 14
उत्तर:
तालिका से हमें निम्नलिखित बातों का पता चलता है –

1. स्वनियोजित कर्मचारी:
1972-73 में 100 में से लगभग 61 लोग स्वनियोजित थे अर्थात् अपना काम-धन्धा स्वयं चलाते थे। वे स्वयं ही स्वामी थे और स्वयं ही कर्मचारी थे। वे अपनी सेवायें किसी को किराये पर नहीं देते थे। इनका
प्रतिशत अब कम होकर 51.3% हो गया है। इसका मुख्य कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि है। स्वनियोजित व्यक्तियों की संख्या तो बढ़ रही है परंतु वह उस दर से नहीं बढ़ रही है जिस दर से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है।

2. नियमित वेतनभोगी कर्मचारी (Regular Salaried Employees):
नियमित वेतनभोगी कर्मचारी का 1972-73 में 18.7 प्रतिशत था। 1999-2000 में इनका प्रतिशत भी गिरकर 17.8 प्रतिशत हो गया। इसका मुख्य कारण जनसंख्या का तेजी से बढ़ना और रोजगार के अवसरों में बहुत ही धीमी गति से वृद्धि थी।

3. दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले कर्मचारी (Casual Wage labourers):
1972-73 में दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले कर्मचारी 19.7 प्रतिशत थे। इनका प्रतिशत बढ़कर 1999-2000 में 30.9 प्रतिशत हो गया है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

  • जनसंख्या का तीव्र गति से बढ़ाना।
  • स्वनियोजित कर्मचारियों के प्रतिशत में कमी आना।
  • नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों के प्रतिशत में कमी आना।
  • एक वकील।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आपकी स्थिति एक श्रमिक की है, यदि आपको 1 वर्ष की अवधि में –
(a) 183 दिन से कम काम मिलता है।
(b) 183 दिन से अधिक काम मिलता है।
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 183 दिन से अधिक काम मिलता है।

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प्रश्न 2.
श्रम बल भागीदारी दर का सूत्र है –
(a)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 15
(b)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 16
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 7 रोजगार-संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे img 15

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय प्रतिवर्ष सर्वेक्षण के आँकड़ों का आधार है –
(a) प्रतिचयन
(b) संगणना
(c)(a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रतिचयन

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प्रश्न 4.
अर्थव्यवस्था में 15 से कम तथा 60 से ऊपर की आयु वाले लोग कहलाते हैं –
(a) उत्पादक
(b) उपभोक्ता
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) उपभोक्ता

प्रश्न 5.
विश्वव्यापी मंदी के समय इंग्लैंड तथा अमेरिका में बेरोजगारी दर हो गई थी –
(a) 20 प्रतिशत
(b) 40 प्रतिशत
(c) 30 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 20 प्रतिशत

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प्रश्न 6.
आर्थिक मंदी के दौरान संभाव्य उत्पादन में कमी उत्पन्न हो गई थी –
(a) 20 प्रतिशत
(b) 40 प्रतिशत
(c) 30 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 40 प्रतिशत

प्रश्न 7.
भारत में प्रच्छन्न बेरोजगारी पाई जाती है –
(a) कृषि में
(b) पारिवारिक व्यवसायों में
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) (a) और (b) दोनों

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प्रश्न 8.
महिलाओं के कार्यों को –
(a) काम की श्रेणी में रखा जाता है
(b) काम की श्रेणी में नहीं रखा जाता
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) काम की श्रेणी में रखा जाता है

प्रश्न 9.
भारत में 1999-00 में बेरोजगारी का आकार था –
(a) 0.39 करोड़
(b) 1.24 करोड़
(c) 0.80 करोड़
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 0.80 करोड़

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प्रश्न 10.
भारत में 1999-00 में 1972-73 की तुलना में बेरोजगारी के आकार में बढ़ोतरी हुई –
(a) दो गुनी
(b) तीन गुनी
(c) चार गुनी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दो गुनी

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 16 जैव विविधता एवं संरक्षण

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 16 जैव विविधता एवं संरक्षण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography जैव विविधता एवं संरक्षण Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 16 जैव विविधता एवं संरक्षण

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जैव-विविधता का संरक्षण निम्न में किसके लिए महत्वपूर्ण है …………………
(क) जन्तु
(ख) पौधे
(ग) पौधे और प्राणी
(घ) सभी जीवधारी
उत्तर:
(घ) सभी जीवधारी

प्रश्न 2.
असुरक्षित प्रजातियाँ कौन-सी हैं ………………….
(क) जो दूसरों को असुरक्षा दें
(ख) बाध व शेर
(ग) जिनकी संख्या अत्याधिक हों
(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है
उत्तर:
(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

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प्रश्न 3.
राष्ट्रीय पार्क (National Parks) और अभ्यारण (Sanctuaries) किस उद्देश्य के लिए नाए गए हैं …………………
(क) मन जन
(ख) पालतू जीवों के लिए
(ग) शिकार के लिए
(घ) संरक्षण के लिए
उत्तर:
(घ) संरक्षण के लिए

प्रश्न 4.
जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र हैं ………………..
(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र
(ख) शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र
(ग) ध्रुवीय क्षेत्र
(घ) महासागरीय क्षेत्र
उत्तर:
(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

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प्रश्न 5.
निम्न में से किस देश में अर्थ सम्मेलन (Earth summit) हुआ था ………………..
(क) यू. के. (U.K.)
(ख) ब्राजील
(ग) मैक्सिको
(घ) चीन
उत्तर:
(ख) ब्राजील

प्रश्न 6.
प्रोजेक्ट टाईगर निम्नलिखित में से किस उद्देश्य से शुरू किया गया है।
(क) बाघ मारने के लिये
(ख) बाघ को शिकार से बचाने हेतु
(ग) बाघ को चिड़ियाघर में डालने हेतु
(घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु
उत्तर:
(घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

प्रश्न 7.
प्रोजेक्ट एलिफेन्ट (Project Elephent) किस वर्ष लागू किया गया?
(क) 1992
(ख) 1993
(ग) 1994
(घ) 1995
उत्तर:
(क) 1992

प्रश्न 8.
होमो-सेपियन (Homo-Speiens) प्रजाति किस से संबंधित है?
(क) पौधे
(ख) शाकाहारी जीव
(ग) मांशहारी जीव
(घ) मानव
उत्तर:
(घ) मानव

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प्रश्न 9.
जैव विविधता का समृद्ध क्षेत्र है ……………….
(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र
(ख) ध्रुवीय क्षेत्र
(ग) शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र
(घ) महासागरीय क्षेत्र
उत्तर:
(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 1.
जैव-विविधता क्या है?
उत्तर:
किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। इसका संबंध पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से है उनकी आनुवंशिकी और उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र से है। जैव-विविधता सजीव सम्पदा है। यह विकास के लाखों वर्षों के इतिहास का परिणाम है।

प्रश्न 2.
जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?
उत्तर:
जैव-विविधता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है –

  1. आनुवांशिक विविधता (Genetic diversity)
  2. प्रजातीय विविधता (Species diversity) तथा
  3. पारितंत्रीय विविधता (Ecosysten diversity)

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प्रश्न 3.
हॉट-स्पॉट (Hot spots) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ऐसे क्षेत्र’ जो अधिक संकट में हैं, उनमें संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) ने जैव-विविधता हॉट-स्पॉट (Hot spots) क्षेत्र के रूप में निर्धारित किया गया है। हॉट-स्पॉट उनकी वनस्पति के आधार पर परिभाषित किये गए हैं।

प्रश्न 4.
मानव जाति के लिए जंतुओं के महत्त्व का वर्णन संक्षेप में करें।
उत्तर:
जैव-विविधता ने मानव संस्कृति के विकास में बहुत योगदान दिया है और इसी प्रकार, मानव समुदायों ने भी आनुवंशिक, प्रजातीय व पारिस्थितिक स्तरों पर प्राकृतिक विविधता को बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया है। जैव-विविधता के चार प्रमुख योगदान हैं-पारिस्थितिक (Ecological), आर्थिक (Economic), नैतिक (Ethical) और वैज्ञानिक (Scientific)।

प्रश्न 5.
विदेशज प्रजातियों (Exotic species) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वे प्रजातियाँ जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन उस तंत्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें ‘विदेशज प्रजातियाँ’ कहा जाता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
प्रकृति को बनाए रखने में जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करें
उत्तर:
पारितंत्र में विभिन्न प्रजातियाँ कोई न कोई क्रिया करती हैं। पारितत्र में कोई भी प्रजाति बिना कारण न तो विकसित हो सकती हैं और न ही बनी रह सकती हैं। अर्थात् प्रत्येक जीव अपनी जरूरत पूरा करने के साथ-साथ दूसरे जीवों के पनपने में भी सहायक होता है। जीव व प्रजातियाँ ऊर्जा ग्रहण कर उसका संग्रहण करती हैं, कार्बनिक पदार्थ उत्पन्न एवं विघटित करती हैं और पारितंत्र में जल या पोषक तत्त्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायक होती हैं। इसके अतिरिक्त प्रजातियाँ वायुमंडलीय गैस को स्थिर करती हैं और जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।

ये पारितंत्री क्रियायें मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। पारितंत्र में जितनी अधिक विविधता होगी प्रजातियों के प्रतिकल स्थितियों में भी रहने की सम्भावना और उनकी उत्पादकता भी उतनी ही अधिक होगी। प्रजातियों की क्षति से तंत्र के बने रहने की क्षमता भी कम हो जाएगी। अधिक आनुवंशिक विविधता वाली प्रजातियों की तरह अधिक जैव-विविधता वाले पारितंत्रों में पर्यावरण के बदलावों में सहन करने की अधिक सक्षमता होती है। दूसरे शब्दों में जिस पारितंत्र में जितनी प्रकार की प्रजातियाँ होंगी, वह पारितंत्र उतना ही अधिक स्थाई होगा।

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प्रश्न 2.
जैव-विविधता के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।
उत्तर:
पिछले कुछ दशकों से जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग अधिक होने लगा है। इससे संसार के विभिन्न भागों में प्रजातियों तथा उनके आवास स्थानों में तेजी से कमी हुई है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र जो विश्व के क्षेत्र का मात्र एक चौथाई (25%) भाग है, यहाँ संसार का तीन चौथाई (75%) जनसंख्या रहती है। अधिक जनसंख्या की जरूरत को पूरा करने के लिए संसाधनों का अत्यधिक दोहन और वनोन्मूलन अत्यधिक हुआ है। उष्ण कटिबंधीय वर्षा वाले वनों में पृथ्वी की लगभग 50% प्रजातियाँ पाई जाती हैं और प्राकृतिक आवासों का विनाश पूरे जैवमंडल के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है।

प्राकृतिक आपदाएँ जैसे-भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी उद्गार, दावानल, सूखा आदि पृथ्वी पर पाई जाने वाली प्राणिजात और वनस्पतिजात को हानि पहुँचाते हैं और परिणामस्वरूप संबंधित प्रभावित प्रदेशों की जैव-विविधता में बदलाव आता है। कीटनाशक और अन्य प्रदूषक जैसे-हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) और विषैली भारी धातु संवेदनशील और कमजोर प्रजातियों को नष्ट कर देते हैं। विदेशज, प्रजातियों के आगमान से भी पारितंत्र को कई बार क्षति पहुँची है। शिकार के कारण भी कुछ प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर आ गई हैं।

विश्व संरक्षण कार्य योजना में जैव-विविधता संरक्षण के निम्न तरीके सुझाए गए हैं –

  • संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।
  • प्रजातियों को विलुप्ति से बचाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
  • खाद्यान्नों की किस्में, चारे संबंधी पौधों की किस्में, इमारती पेड़ों, पशुधन, जन्तु व उनकी वन्य प्रजातियों की किस्मों को संरक्षित करनी चाहिए।
  • प्रत्येक देश को वन्य जीवों के आवास को रेखांकित कर उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहिए।
  • प्रजातियों के पलने-बढ़ने तथा विकसित होने के स्थान सुरक्षित व संरक्षित हों।
  • वन्य जीवों व पौधों का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुरूप हो।

Bihar Board Class 11 जैव विविधता एवं संरक्षण Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पर्यावरण के प्रदूषण का किन तत्त्वों पर प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
वायु, जल, मृदा।

प्रश्न 2.
इस समय विश्व के कितने प्रतिशत ज्ञात पशु तथा पौधे विलोपन के कागार पर खड़े हैं?
उत्तर:
2% पशु तथा 8% पौधे।

प्रश्न 3.
जल की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव का क्या कारण है?
उत्तर:
अम्लीय वर्षा, सिंचाई तथा उर्वरकों का प्रवाह।

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प्रश्न 4.
भारत में धार्मिक अनुष्ठानों में कितने पौधों की प्रजातियाँ प्रयोग की जाती हैं?
उत्तर:
100 (सौ)।

प्रश्न 5.
‘प्रोजेक्ट टाइगर’ कब शुरू किया गया?
उत्तर:
1973 ई. में।

प्रश्न 6.
पृथ्वी शिखर कब और कहाँ हुआ?
उत्तर:
1992 में रीयो डी जेनेरो (ब्राजील) में।

प्रश्न 7.
वाइल्ड लाइफ एक्ट कब बनाया गया?
उत्तर:
सन् 1972 में।

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प्रश्न 8.
जैव विविधता का आधार क्या है?
उत्तर:
अपक्षयण।

प्रश्न 9.
अधिक प्रजातीय विविधता वाले क्षेत्रों को क्या कहते हैं?
उत्तर:
हॉट-स्पॉट (Hot-Spot)।

प्रश्न 10.
प्रजातियों की क्षति का क्या प्रभाव है?
उत्तर:
पारितंत्र की क्षमता का कम होना।

प्रश्न 11.
कृषि जैव विविधता क्या है?
उत्तर:
फसलों की विविधता।

प्रश्न 12.
मानव को भोजन प्रदान करने वाले दो साधन बताएँ।
उत्तर:
पौधे तथा जीव-जंतु।

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प्रश्न 13.
हरित क्रांति में किन तत्त्वों का योगदान है?
उत्तर:
बीजों की नयी किस्में, कीटनाशक दवाइयाँ तथा उर्वरक।

प्रश्न 14.
प्रजातीय विविधता किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी प्रजाति के शारीरिक लक्षणों को।

प्रश्न 15.
कुछ प्रजातियों के सामाप्त होने का क्या कारण है?
उत्तर:
बढ़ती जनसंख्या के लिए संसाधनों की अधिक मांग के कारण।

प्रश्न 16.
प्लीस्टोसिन युग कब था?
उत्तर:
लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व।

प्रश्न 17.
अनाज के भंडार की वृद्धि का क्या कारण है?
उत्तर:
कृषि का यंत्रीकरण।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रजातियों के संरक्षण के दो पहलू बताएँ।
उत्तर:

  1. मानव को पर्यावरण-मैत्री सम्बन्धी पद्धतियों का प्रयोग करना चाहिए।
  2. विकास के लिए सजत् पोषणीय गतिविधियाँ अपनाई जाए।
  3. स्थानीय समुदायों की इसमें भागीदारी हो।

प्रश्न 2.
महाविविधिता केन्द्र से क्या अभिप्राय है? विश्व के महत्त्वपूर्ण महाविविधता केन्द्र बताएँ।
उत्तर:
जिन देशों में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में अधिक प्रजातीय विविधता पाई जाती हैं, उन्हें महाविविधिता केन्द्र कहते हैं। विश्व में 12 ऐसे देश हैं-मैक्सिको, कोलम्बिया, इक्वेडोर, पेरू, ब्राजील, जायरे, मेडागास्कर, चीन, भारत, मलेशिया, इण्डोनेशिया तथा आस्ट्रेलिया।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 16 जैव विविधता एवं संरक्षण

प्रश्न 3.
मानव के लिए पौधे किस प्रकार महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
पौधे मनुष्य को कई प्रकार की फसलें, प्रोटीन देते हैं यह जनसंख्या के पोषण के लिए एक प्राकृतिक साधन हैं।

प्रश्न 4.
जैविक विविधता का संरक्षण क्या है?
उत्तर:
जैविक विविधता का संरक्षण एक ऐसी योजना है जिसका लक्ष्य विकास की निरंतरता को बनाये रखना है। विभिन्न प्रजातियों को कायम रखने के लिए, विकसित करने तथा उनके जीवन कोष को बनाये रखना जो भविष्य में लाभदायक हो।

प्रश्न 5.
जैव विविधता का इतिहास बताएं। किस कटिबंध में जैव विविधता अधिक है?
उत्तर:
आज जो जैव विविधता हम देखते हैं, वह 25 से 35 अरब वर्षों के विकास का परिणाम है। मानव जीवन के प्रारम्भ होने से पहले, पृथ्वी पर जैव विविधता किसी भी अन्य काल से अधिक थी। मानव के आने से जैव विविधता में तेजी से कमी आने लगी, क्योंकि किसी एक या अन्य प्रजाति की आवश्यकता से अधिक उपभोग होने के कारण, वह लुप्त होने लगी।

अनुमान के अनुसार, संसार में कुल प्रजातियों की संख्या 20 लाख से 10 करोड़ तक, लेकिन एक करोड़ ही इसका सही अनुमान है। नयी प्रजातियों की खोज लगातार जारी है और उनमें से अधिकांश का वर्गीकरण भी नहीं हुआ है। (एक अनुमान के अनुसार दक्षिण अमेरिका की ताजे पानी की लगभग 40 प्रतिशत मछलियों का वर्गीकरण नहीं हुआ।) उष्ण कटिबंधीय वनों में जैव-विविधता की अधिकता है।

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प्रश्न 6.
स्पष्ट कीजिए किस प्रकार अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता हेतु उत्तरदायी है?
उत्तर:
पृथ्वी पर जैव विविधता मुख्यतः वनों पर आधारित होता है और वन अपक्षयी प्रवाह की गहराई पर आधारित है। अपक्षय प्रक्रिया शैलों को तोड़कर आवरण प्रस्तर एवं मृदा निर्माण हेतु मार्ग प्रशस्त करती हैं और अपरदन एवं वृहत संचालन में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है जो जैव विविधता हेतु उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 7.
परितंत्र में प्रजातियों की भूमिका बताएँ।
उत्तर:

  1. जीव व प्रजातियाँ ऊर्जा ग्रहण करती हैं।
  2. ये कार्बनिक पदार्थ उत्पन्न करती हैं।
  3. ये जल व पोषण चक्र बनाने में सहायक है।
  4. वायुमण्डलीय गैसों को स्थिर करती हैं।

प्रश्न 8.
जैव विविधता के क्या कारण हैं?
उत्तर:
जैव विविधता का आधार अपक्षयण है। सौर ऊर्जा और जल ही अपक्षयण में विविधता और जैव विविधता का मुख्य कारण है । वे क्षेत्र जहाँ ऊर्जा व जल की उपलब्धता अधिक है, वहीं पर जैव विविधता भी व्यापक स्तर पर है।

प्रश्न 9.
जैव विविधता सतत् विकास का तंत्र है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
जैव विविधता सजीव सम्पदा है। यह विकास के लाखों वर्षों के ऐतिहासिक घटनाओं का परिणाम है। प्रजातियों के दृष्टिकोण से और अकेले जीवधारी के दृष्टिकोण से जैव-विविधता सतत् विकास का तंत्र है। पृथ्वी पर किसी प्रजाति की औसत आयु 10 से 40 लाख वर्ष होने का अनुमान है। ऐसा भी माना जाता है कि लगभग 99 प्रतिशत प्रजातियाँ जो कभी पृथ्वी पर रहती थीं, आज लुप्त हो चुकी हैं। पृथ्वी पर जैव विविधत एक जैसी नहीं है। जैव-विविधता उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में अधिक होती है। जैस-जैसे हम ध्रुवीय प्रदेशों की तरफ बढ़ते हैं, प्रजातियों की विविधता तो कम होती जाती है, लेकिन जीवधारियों की संख्या अधिक होती जाती है।

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प्रश्न 10.
पौधों और जीवों को संरक्षण के आधार पर विभिन्न प्रजातियों में बांटें।
उत्तर:
प्राकृतिक संसाधनों व पर्यावरण संरक्षण को अन्तर्राष्ट्रीय संस्था (IUCN) ने संकटापन्न पौधों व जीवों की प्रजाजियों को उनके संरक्षण के उद्देश्य से तीन वर्गों में विभाजित किया है

1. संकटापन्न प्रजातियाँ (Endangered species) – इसमें वे सभी प्रजातियाँ सम्मिलित हैं, जिनके लुप्त हो जाने का खतरा है। अन्तर्राष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) विश्व की सभी संकटापन्न प्रजातियों के बारे में (Redlist) रेड लिस्ट के नाम से सूचना प्रकाशित करता है।

2. कमजोर प्रजातियाँ (Vulnerable species) – इसमें वे प्रजातियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें यदि संरक्षित नहीं किया गया या उनके विलुप्त होने में सहयोगी कारक यदि जारी रहे तो निकट भविष्य में उनके विलुप्त होने का खतरा है। इनकी संख्या अत्यधिक कम होने के कारण, इनका जीवित रहना सुनिश्चित नहीं है।

3. दुर्लभ प्रजातियाँ (Rare species) – संसार में इन प्रजातियों की संख्या बहुत कम है। ये प्रजातियाँ कुछ ही स्थानों पर सीमित हैं या बड़े क्षेत्र में बिखरी हुई हैं।

प्रश्न 11.
जैव विविधता की हानि के चार कारण बताएँ।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक आपदाएँ
  2. कीटनाशक
  3. विदेशज प्रजातियाँ
  4. अवैध शिकार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जैव विविधता के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करो। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।
उत्तर:
जैव विविधता की हानि (Loss of bodiversity) – पिछले कुछ दशकों से, जनसंख्या वृद्धि के कारण, प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग अधिक होने लगा है। इससे संसार के विभिन्न भागों में प्रजातियों तथा उनके आवास स्थानों में तेजी से कमी हुई है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र, जो विश्व के कुछ क्षेत्र का मात्र एक चौथाई भाग है, यहाँ संसार की तीन चौथाई जनसंख्या रहती है। अधिक जनसंख्या की जरूरत को पूरा करने के लिए संसाधनों का अत्यधिक दोहन और वनोन्मूलन अत्यधिक हुआ है। उष्णकटिबंधीय वर्षा वाले वनों में पृथ्वी की लगभग 50 प्रतिशत प्रजातियाँ पाई जाती हैं और प्राकृतिक आवासों का विनाश पूरे जैवमण्डल के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है।

1. प्राकृतिक आपदाएँ – प्रकृतिक आपदाएँ जैसे भूकंप, बाढ़, ज्वालामुखी, उदार, दावानल, सूखा आदि पृथ्वी पर पाई जाने वाली प्राणिजात और वनस्पतिजात को क्षति पहुँचाते हैं और परिणामसवरूप सम्बन्धित प्रभावित प्रदेशों की जैव विविधता में बदलाव आता है।

2. कीटनाशक – कीटनाशक और अन्य, जैसे-हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) और विषैली भारी धातु (Toxic heavy metals) संवेदनशील और कमजोर प्रजातियों को नष्ट कर देते हैं।

3. विदेशज प्रजातियाँ – वे प्रजातियाँ, जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन उस तंत्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें ‘विदेशज प्रजातियाँ’ (Exotic species) कहा जाता है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब विदेशज प्रजातियों के आगमन से पारितंत्र में प्राकृतिक या मूल जैव समुदाय को व्यापक नुकसान हुआ है।

4. अवैध शिकार – पिछले कुछ दशकों के दौरान, कुछ जन्तुओं जैसे-बाघ, चीता, हाथी, गैंडा, मगरपच्छ, मिंक और पक्षियों का, उनके सींग, सैंड व खालों के लिए निर्दयतापूर्वक अवैध शिकार किया जा रहा है। इसके फलस्वरूप कुछ प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर आ गई हैं।

जैव-विविधता का संरक्षण (Conservation of bodiverisity) – मानव के अस्तित्व के लिए जैव-विविधता अति आवश्यक है। जीवन का हर रूप एक-दूसरे पर इतना निर्भर है कि किसी एक प्रजाति पर संकट आने से दूसरों में असन्तुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। यदि पौधों और प्राणियों की प्रजातियाँ संकटापन्न होती हैं, तो इससे पर्यावरण में गिरावट उत्पन्न होती है, और अन्ततोगत्वा मनुष्य का अपना अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है।

आज यह अति अनिवार्य है कि मानव को पर्यावरण-मैत्री सम्बन्धी पद्धतियों के प्रति जागरूक किया जाए और विकास की ऐसी व्यावहारिक गतिविधियाँ अपनाई जाएँ, जो स्थायी (Sustaniable) हों। इस तथ्य के प्रति भी जागरूकता बढ़ रही है कि संरक्षण तभी संभव और दीर्घकालिक होगा, जब स्थानीय समुदायों व प्रत्येक व्यक्ति की इसमें भागीदारी होगी।

इसके लिए स्थानीय स्तर पर संस्थागत संरचनाओं का विकास आवश्यक है। केवल प्रजातियों का संरक्षण और आवास स्थान की सुरक्षा ही अहम समस्या नहीं है, बल्कि संरक्षण की प्रक्रिया को जारी रखना भी उतना ही जरूरी है। सन् 1992 में ब्राजील के रियो-डी-जेनेरो (Rio-de-Janeiro) में हुए जैव विविधता के सम्मेलन (Earth summit) में लिए गए संकल्पों का भारत अन्य 155 देशों सहित हस्ताक्षरी है। विश्व संरक्षण कार्य योजना में जैव-विविधता संरक्षण के निम्न तरीके सुझाए गए हैं –

  • संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयास करना चाहिए।
  • प्रजातियों को विलुप्ति से बचाने के लिए उचित योजनाएँ प्रबंधन अपेक्षित हैं।
  • खाद्यान्नों की किस्में, चारे सम्बन्धी पौधों की किस्में, इमारती पेड़, पशुधन, जन्तु व उनकी वन्य प्रजातियों की किस्मों को संरक्षित करना चाहिए।
  • प्रत्येक देश को वन्य जीवों के आवास को रेखांकित कर उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहिए।
  • प्रजातियों के पलने-बढ़ने तथा विकसित होने के स्थान सुरक्षित व संरक्षित हों।
  • वन्य जीवों व पौधों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुरूप हो।

भारत सरकार ने प्राकृतिक सीमाओं के भीतर विभिन्न प्रकार की प्रजातियों को बचाने, संरक्षित करने और विस्तार करने के लिए, वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 (Wild life protection act, 1972), पास किया है, जिसके अन्तर्गत राष्ट्रीय पार्क (National parks), अभ्यारण्य (Sancuaries) स्थापित किये गए तथा जैव संरक्षित क्षेत्र (Biosphere reserves) घोषित किये गए। वे देश, जो उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है, उनमें संसार की सर्वाधिक प्रजातीय विविधता पाई जाती है। उन्हें ‘महा विविधता केन्द्र’ (Mega diversity centers) कहा जाता है। इन देशों की संख्या 12 है और उनके नाम हैं : मैक्सिको, कोलम्बिया, इक्वेडोर, पेरू, ब्राजील, जायरे, मेडागास्कर, चीन, भारत, मलेशिया, इण्डोनेशिया और आस्ट्रेलिया।

इन देशों में समृद्ध महा-विविधता के केन्द्र स्थित हैं। ऐसे क्षेत्र, जो अधिक संकट में हैं, उनमें संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) ने जैव विविधता हॉट-स्पॉट (Hotspots) क्षेत्र के रूप में निर्धारित किया है। हॉट-स्पॉट उनकी वनस्पति के आधार पर परिभाषित किये गए हैं। पादप महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ये ही किसी पारितंत्र की प्राथमिक उत्पादकता को निर्धारित करते हैं। यह भी देखा गया है कि ज्यादातर हॉट-स्पॉट रहने वाले भोजन, जलाने के लिए लकड़ी, कृषि भूमि और इमारती लकड़ी आदि के लिए वहाँ पाई जाने वाली प्रजाति समृद्ध पारितंत्रों पर ही निर्भर है।

उदाहरण के लिए मेडागास्कर में, जहाँ 85 प्रतिशत पौधे व प्राणी संसार में अन्यत्र कहीं भी नहीं पाए जाते वहाँ के रहने वाले संसार के सर्वाधिक गरीबों में से एक है और वे जीवित खेती के लिए. जंगलों को काटकर और (Slash and burn) पायी गयी कृषि भूमि पर निर्भर हैं। अन्य हॉट-स्पॉट, जो समृद्ध देशों में पाए जाते हैं, वहाँ कुछ अन्य प्रकार की समस्याएँ हैं। हवाई द्वीप जहाँ विशेष प्रकार की पादप व जन्तु प्रजातियाँ मिलती हैं, वह विदेशज प्रजातियों के आगमन और भूमि विकास के कारण असुरक्षित हैं।

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प्रश्न 2.
जैव विविधता का विभिन्न स्तरों पर वर्णन करें।
उत्तर:
जैव-विविधता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है –

  • आनुवांशिक विविधता (Genetic diversity)
  • प्रजातीय विविधता (Species diversity) तथा
  • पारितंत्रीय fafquc (Ecosystem diversity)

1. आनुवांशिक जैव विविधता (Genetic biodiversity) – जीवन निर्माण के लिए जीन (Gene) एक मूलभूत इकाई है। किसी प्रजाति में जीन की विविधता ही आनुवांशिक जैव-विविधता है। समान भौतिक लक्षणों वाले जीवों के समूह को प्रजाति कहते हैं। मानव आनुवांशिक रूप से “हेमोसेपियन’ (Homosapiens) प्रजाति से सम्बन्धित है जिससे कद, रंग और अलग दिखावट जैसे शारीरिक लक्षणों में काफी भिन्नता है। इसका कारण आनुवांशिक विविधता है। विभिन्न प्रजातियों के विकास के फलने-फूलने के लिए आनुवंशिक विविधता अत्यधिक अनिवार्य है।

2. प्रजातीय विविधता (Species diversity) – यह प्रजातीयों की अनेकरूपता को बताती है। यह किसी निर्धारित क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या से सम्बन्धित है। प्रजातियों की विविधता, उनकी समृद्धि, प्रकार तथा बहुलता से आँकी जा सकती है। कुछ क्षेत्रों में प्रजातियों की संख्या अधिक होती है और कुछ में कम । जिन क्षेत्रों में प्रजातीय विविधता अधिक होती है, उन्हें विविधता के हॉट-स्पॉट (Hot spots) कहते हैं।

3. पारितंत्रीय विविधता (Ecosystem diversity) – आपने पिछले अध्याय में पारितंत्रों के प्रकारों में व्यापक भिन्नता और प्रत्येक प्रकार के पारितंत्रों में होने वाली पारितंत्रीय प्रक्रियाएँ तथा आवास स्थानों की भिन्नता ही पारितंत्रीय विविधता बनाते हैं। पारितंत्रीय विविधता का परिसीमन करना मुश्किल और जटिल है, क्योंकि समुदायों (प्रजातियों का समूह) और पारितंत्र की सीमाएँ निश्चित नहीं हैं।

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प्रश्न 3.
प्रकृति को बनाए रखने में जैव विविधता की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
1. जैव विविधता का महत्व (Importance of biodiversity) – जैव विविधता ने मानव संस्कृति के विकास में बहुत योगदान दिया है और इसी प्रकार मानव समुदायों ने भी आनुवांशिक, प्रजातीय व पारिस्थितिक स्तरों पर प्राकृतिक विविधता को बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया है। जैव विविधता के चार प्रमुख योगदान हैं –

  • पारिस्थितिक (Ecological)
  • आर्थिक (Economic)
  • नैतिक (Ethical)
  • वैज्ञानिक (Scientific)

2. जैव विविधता की पारिस्थितिकीय भूमिका (Ecologicalrole of biodiversity) – पारितंत्र में विभिन्न प्रजातियाँ कोई न कोई क्रिया करती हैं। पारितंत्र में कोई भी प्रजाति बिना कारणन तो विकसित हो सकती हैं और न ही बनी रह सकती हैं। अर्थात्, प्रत्येक जीव अपनी जरूरत पूरा करने के साथ-साथ दूसरे जीवों के पनपने में भी सहायक होता है।

  • जीव व प्रजातियाँ ऊर्जा ग्रहण कर उसका संग्रहण करती हैं।
  • कार्बनिक पदार्थ उत्पन्न एवं विघटित करती हैं।
  • पारितंत्र में जल व पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में सहायक होती हैं।
  • इसके अतिरिक्त प्रजातियाँ वायुमण्डलीय गैस को स्थिर करती हैं।
  • जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं।

ये पारितंत्रीय क्रियाएँ मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण क्रियाएँ हैं। पारितंत्र में जितनी अधिक विविधता होगी प्रजातियों के प्रतिकूल स्थितियों में भी रहने की सम्भावना और उनकी उत्पादकता भी उतनी ही अधिक होगी । प्रजातियों की क्षति से तंत्र के बने रहने की क्षमता भी कम हो जाएगी। अधिक आनुवांशिक विविधता वाली प्रजातियों की तरह अधिक जैव-विविधता वाले पारितंत्र में पर्यावरण के बदलावों को सहन करने की अधिक सक्षमता होती है। दूसरे शब्दों में, जिस पारितंत्र में जितनी प्रकार की प्रजातियाँ होंगी, वह पारितंत्र उतना ही अधिक स्थायी होगा। .

3. जैव-विविधता की आर्थिक भूमिका (Ecological role of biodiversity) – सभी मनुष्यों के लिए दैनिक जीवन में विविधता एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। जैव विविधता का एक महत्त्वपूर्ण भाग ‘फसलों की विविधता’ (Crop diversity) है, जिसे कृषि जैव विविधता भी कहा जाता है। जैव विविधता को संसाधनों के उन भण्डारों के रूप में भी समझा जा सकता है, जिनकी उपयोगिता भोज्य पदार्थ, औषधियाँ और सौन्दर्य प्रसाधन आदि बनाने में है।

जैव संसाधनों की ये परिकल्पना जैव विविधता के विनाश के लिए उत्तरदायी हैं। साथ ही यह संसाधनों के विभाजन और बँटवारे को लेकर उत्पन्न नये मत्स्य और दवा संसाधन आदि हैं। कुछ ऐसे प्रमुख आर्थिक महत्त्व के उत्पाद हैं, जो मानव को जैव विविधता के फलस्वरूप उपलब्ध होते हैं।

4. जैव-विविधता की वैज्ञानिक भूमिका (Scientific role of biodiversity) – जैव विविधता इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्येक प्रजाति हमें यह संकेत दे सकती है कि जीवन का आरम्भ कैसे हुआ और यह भविष्य में कैसे विकसित होगा। जीवन कैसे चलता है और पारितंत्र, जिसमें हम भी एक प्रजाति हैं, उसे बनायें रखने में प्रत्येक प्रजाति की क्या भूमिका है, इन्हें हम जैव विविधता से समझ सकते हैं। हम सभी को यह तथ्य समझना चाहिए कि हम स्वयं जियें और दूसरी प्रजातियों को भी जीने दें।

5. जैव विविधता की नैतिक भूमिका (Ethical role of biodiversity) – यह समझना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हमारे साथ सभी प्रजातियों को जीवित रहने का अधिकार है। अत: कई प्रजातियों को स्वेच्छा से विलुप्त करना नैतिक रूप से गलत है। जैव विविधता का स्तर अन्य जीवित प्रजातियों के साथ हमारे सम्बन्ध का एक अच्छा पैमाना है। वास्तव में, जैव विविधता की अवधारणा कई मानव संस्कृतियों का अभिन्न अंग है।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 6 ग्रामीण विकास

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 6 ग्रामीण विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 6 ग्रामीण विकास

Bihar Board Class 11 Economics ग्रामीण विकास Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों को स्पष्ट करें।
उत्तर:
ग्रामीण विकास का अर्थ-ग्रामीण विकास मूलतः
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर ध्यान केन्द्रित करने पर बल देता है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं। ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्न –

  1. साक्षरता और कौशल का विकास
  2. स्वास्थ्य
  3. उत्पादक संसाधनों का विकास
  4. आधारिक संरचना का विकास
  5. कृषि अनुसंधान का विस्तार और सूचना प्रसार की सुविधाएँ तथा
  6. निर्धनता निवारण और समाज के कमजोर वर्गों की जीवन दशाओं में महत्त्वपूर्ण सुधार के विशेष उपाय

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प्रश्न 2.
ग्रामीण विकास में साख के महत्त्व की चर्चा करें।
उत्तर:
ग्रामीण विकास में साख का महत्त्व (Importance of Credit in Rural Growth):
कृषि वित्त, कृषि विकास कार्यक्रमों का एक मुख्य आधार है क्योंकि पर्याप्त वित्त के अभाव में कृषि वित्त कार्यक्रमों की सफलता सम्भव नहीं। कृषकों को निम्नलिखित उत्पादक तथा अनुत्पादक कार्यों के लिए ऋणों की आवश्यकता होती है।

1. उत्पादक क्रियाएँ (Productive Activities):
कृषकों को बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयों, कृषि यंत्र आदि क्रय करने के लिए, भूमि सुधार करना, सिंचाई की व्यवस्था करना आदि कार्यों के लिए ऋण की आवश्यकता होती है। इन ऋणों से देश में कृषि विकास को प्रोत्साहन मिला है।

2. अनुत्पादक क्रियाएँ (Unproductive Activities):
किसान को अपने पारिवारिक निर्वाह खर्च और शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए ऋण का सहारा लेना पड़ता है।

प्रश्न 3.
गरीबों की ऋण आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अति लघु साख व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
अति लघु साख व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक सदस्य को न्यूनतम अंशदान देना पड़ता है। न्यूनतम अंशदानों से एकत्रित राशि में से जरूरतमंद सदस्यों को ऋण दिया जाता है। उस ऋण की राशि छोटी-छोटी आसान किश्तों में लौटाई जाती है। ब्याज की दर भी उचित रखी जाती है। यह व्यवस्था सदस्यों में मितव्ययिता की भावना पैदा करती है। इसमें ऋण लेने वालों का शोषण नहीं होता। मार्च 2003 ई. के अन्त तक लगभग 7 लाख लोग ऋण प्रदान करने वाले सहायता समूह के रूप में देश के अनेक भागों में कार्य कर रहे हैं।

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प्रश्न 4.
सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयासों की व्याख्या करें।
उत्तर:
सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों में विकास के लिए कई प्रयास किए गए हैं। उनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं –

1. बाजार का नियमन (Regularising the Market):
व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन की दशाओं का निर्माण करने के लिए बाजार का नियमन किया गया। इस नीति से कृषक और उपभोक्ता दोनों ही वर्ग लाभान्वित हुए हैं।

2. भौतिक आधारिक संरचनाओं का प्रावधान (Provision of Physical Infra structures):
सड़कों, रेलमार्गों, भण्डार गृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाइयों के रूप में भौतिक संरचनाओं का प्रावधान किया गया है।

3. उचित मूल्य दिलवाना (Fair prices):
सरकार ने किसानों को सरकारी विपणन द्वारा अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ कराने की व्यवस्था की है।

4. नीति साधन:

  • 24 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन कीमत सुनिश्चित की। गई है।
  • भारतीय खाद्य निगम द्वारा गेहू तथा चावलों के सुरक्षित भण्डार का रख-रखाव किया जाता है।
  • राशन की दुकान के माध्यम से चीनी तथा गेहूँ का वितरण।

प्रश्न 5.
आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
विगत वर्षों से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। भारत में परम्परागत कृषि पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर आधारित है। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण आवश्यक है।

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प्रश्न 6.
भारत में ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
उत्तर:
भारत में ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का मूल्यांकन-बैंकिंग व्यवस्था के त्वरित विकास का ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि उत्पादन, आय और रोजगार पर सकारात्मक प्रभाव रहा है। विशेष रूप से हरित क्रांति के बाद से किसानों को साख सेवायें और सुविधायें देने तथा उनकी उत्पादन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेक प्रकार के ऋण देने में इन्हीं ने सहायता दी है। अब तो अकाल बीते युग की बात हो गई है।

हम खाद्य सुरक्षा की उस मंजिल पर पहुँच चुके हैं कि हमारे सुरक्षित भण्डार भी बहुत पर्याप्त माने जा रहे हैं किन्तु अभी भी हमारी बैंकिंग व्यवस्था उचित नहीं बन पाई है। इसका प्रमुख कारण है। औपचारिक साख संस्थाओं का चिरकालिक निम्न निष्पादन और किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर किश्तों का नहीं चुना पाना। कृषि ऋणों की वसूली नहीं हो पाने की समस्या बहुत गंभीर है। अनेक अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि लगभग 50 प्रतिशत व्यतिकामी इच्छित व्यतिकामी हैं। ये व्यक्ति ग्रामीण बैंक व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए एक गंभीर खतरा बन चुके हैं जिसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है।

अत: सुधारों के बाद से बैंकिंग क्षेत्र के प्रसार एवं उन्नति में कमी हुई है। स्थिति में सुधार लाने के लिए बैंकों को अपनी कार्य-प्रणाली में बदलाव लाने की आवश्यकता है ताकि वे केवल ऋणदाता और ऋण लेने के बीच एक सेतु का काम करें। उन्हें किसानों को बताना कि वे अपने वित्तीय स्रोतों का कुशलतम प्रयोग कर सकें।

प्रश्न 7.
कृषि विपणन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि विपणन से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिससे देश में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रह, भण्डारण, प्रसंस्करण, परिवहन, बैंकिंग वर्गीकरण और वितरण आदि किया जाता है।

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प्रश्न 8.
कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताएँ?
उत्तर:
कृषि विपणन प्रक्रिया में कुछ बाधाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. तौल में हेरा-फेरी होना।
  2. किसानों को बाजार में कृषि उत्पादों के प्रचलित भावों का पता न होना।
  3. माल रखने के लिए अच्छी भण्डारण सुविधाएँ न होना।
  4. कृषि उत्पादन का क्षतिग्रस्त होना।

प्रश्न 9.
कृषि विपणन के कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों की उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर:
यदि किसान स्वयं ही उपभोक्ता को अपना उत्पादन बेच सके तो उसे उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत का अपेक्षाकृत अधिक अंश प्राप्त होगा। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कृषक बाजार इसी प्रकार से विकसित हो रहे हैं। इस प्रकार से विकसित हो रहे वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं –

  1. आंध्र प्रदेश की रायचूबाज फल मंडी।
  2. तमिलनाडु की उझावर मंडी।
  3. पुणे की हाड़पसार मंडी।

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प्रश्न 10.
स्वर्णिम क्रांति की व्याख्या करें।
उत्तर:
स्वर्णिम क्रांति:
1991-2003 ई. की अवधि को ‘स्वर्णिम क्रांति’ के आरम्भ का काल मानते हैं। इसी अवधि में बागवानी में सुनियोजित निवेश बहुत ही अधिक उत्पादक सिद्ध हुआ और इस क्षेत्र के एक धारणीय वैकल्पिक रोजगार का रूप धारण किया। भारत आम, केला, नारियल, काजू जैसे फलों और अनेक मसालों के उत्पादन में तो आज विश्व का अग्रणी देश माना जाता है। कुल मिलाकर फल, सब्जियों के उत्पादन में हमारा दूसरा स्थान है। बागवानी में लगे बहुत से कृषकों की आर्थिक दशा में काफी सुधार हुआ है। ये उद्योग अब अनेक वंचित लोगों के लिए भी आजीविका को बेहतर बनाने में सहायक हुए हैं।

प्रश्न 11.
सरकार द्वारा कृषि सुधार के लिए अपनाए गए धार उपायों की व्याख्या करें?
उत्तर:
कृषि विपणन के विभिन्न पहलुओं को सुधारने के लिए किए गए चार प्रमुख उपाय निम्न थे –
1. बाजार का नियमन:
पहला कदम व्यवस्थित एवं पारदर्शी विपणन की दिशाओं का निर्माण करने के लिए बाजार का नियमन करना था। इस नीति से कृषक और उपभोक्ता, दोनों ही वर्ग लाभान्वित हुए हैं। हालाँकि, लगभग 27,000 ग्रामीण क्षेत्रों में अनियत मंडियों को विकसित किए जाने की आवश्यकता है, जिससे ग्राम्य क्षेत्रों को मंडियों की वास्तविक क्षमताओं का लाभ उठा पाना संभव हो सके।

2. भौतिक आधारित संरचनाओं का विकास:
दूसरा महत्त्वपूर्ण उपाय सड़कों, रेलमार्गों, भंडारगृहों, गोदामों, शीतगृहों और प्रसंस्करण इकाइयों के रूप में भौतिक आधारित संरचनाओं का प्रावधान किया जाना था। किन्तु, अभी तक वर्तमान आधारित सुविधाएं बढ़ती माँग को देखते हुए अपर्याप्त सिद्ध हुई हैं, जिनहें सुधारने की आवश्यकता है।

3. उत्पादों का उचित मूल्य:
तीसरे उपाय में सरकारी विपणन द्वारा किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य सुलभ कराना है। गुजरात राज्य तथा देश के अन्य कई भागों में दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों ने ग्रामीण अंचलों के सामाजिक तथा आर्थिक परिदृश्य का कायाकल्प कर दिया है। किन्तु, अभी भी कुछ स्थानों पर सहकारिता आंदोलन में कुछ कमियाँ दिखाई देती हैं। इनके कारण हैं-सभी कृषकों को सहकारिताओं में शामिल नहीं कर पाना, विपणन और प्रसंस्करण सहकारी समितियों के मध्य संबंध सूत्रों का न होना और अकुशल वित्तीय प्रबंधन।

4. नीतिगत साधनों की उपलब्धता:
चौथे उपाय के अन्तर्गत वे साधन हैं-जैसे –

  • कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन कीमत सुनिश्चित करना
  • भारतीय खाद्य निगम द्वारा गेहूँ और चावल के सुरक्षित भंडार का रख-रखाव और
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन व्यवस्था) के माध्यम से खाद्यान्नों और चीनी का वितरण। इन साधनों का ध्येय क्रमशः किसानों को उपज के उचित दाम दिलाना तथा गरीबों को सहायिकी युक्त (Subsidised) कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध कराना है।
  • यद्यपि सरकार के इन सभी प्रयासों के बाद भी आज तक कृषि मंडियों पर निजी व्यापारियों (साहूकारों, ग्रामीण राजनीतिज्ञ सामंतों, बड़े व्यापारियों तथा और किसानों) का वर्चस्व बना हुआ है।
  • सरकारी संस्थाएँ और सहकारिताएँ सकल कृषि उत्पादन के मात्र 10 प्रतिशत अंश के आदान-प्रदान में सफल हो पा रही हैं-शेष सभी भी निजी व्यापारियों के हाथो में ही हैं।

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प्रश्न 12.
ग्रामीण विविधीकरण में गैर कृषि रोजगार का महत्त्व समझाइये?
उत्तर:
आज ग्रामीण क्षेत्रों को अनेक प्रकार के उत्पादक कार्यों की ओर उन्मुख कर वहाँ। एक नए उत्साह और स्फूर्ति का संचार करना आवश्यक हो गया है। यही ग्रामीण विविधीकरण है। ये कार्य हो सकते हैं-डेरी उद्योग, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, फल-सब्जी उत्पादन और ग्रामीण उत्पादन केन्द्रों व शहरी बाजारों (विदेशी निर्यात बाजारों सहित) के वोन संपर्क सूत्रों की रचना। इस प्रकार, कृषि उत्पादन में लगे निवेश पर अधिक प्रतिलाभ अर्जित करना संभव हो पाएगा। यही नहीं, आधारिक संरचना जैसे, साख एवं विपणन, कृषक-हित-नातियाँ तथा कृषक समुदायों एवं राज्य कृषि विभागों के मध्य निरंतर संवाद और समीक्षा इस क्षेत्र को पूर्ण क्षमता को प्राप्त करने में सहायक हैं।

आज हम पर्यावरण और ग्रामीण विकास को दो अलग-अलग विषय मान कर व्यवहार नहीं कर सकते। नई पर्यावरण-मित्र प्रौद्योगिकी विकल्पों के अविष्कार या प्राप्ति की भी आवश्यकता है, जिससे विभिन्न परिस्थितियों का सामना होने पर भी हम धारणीय विकास की दिशा में अग्रसर हो पाएँ। इन विकल्पों में से प्रत्येक ग्राम्य समुदाय अपनी स्थानीय परिसिथतियों के अनुरूप चयन कर सकता है। अतः हमारा पहला काम तो सभी उपलब्ध विधियों में से सर्वश्रेष्ठ की पहचान कर उसे चुनना ही होगा। ताकि इसे ‘व्यावहारिक प्रशिक्षण’ प्रक्रिया को और गति प्रदान की जा सके।

प्रश्न 13.
विविधीकरण के स्रोत में से पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्त्व पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
विविधीकरण के स्रोत (Source of Diversification):
विविधीकरण के कई स्रोत हैं। उनमें मुख्य पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी हैं। इन तीनों स्रोतों के महत्त्व का नीचे वर्णन किया गया है।

1. पशुपालन (Animal Husbandary):
छोटे और सीमांत किसानों, कृषि मजदूरों और अन्य ग्रामीण निर्धनों की एक बड़ी संख्या लाभप्रद रोजगार प्राप्त करने के लिए पशुधन पर निर्भर है। पशुपालन देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह क्षेत्र ऊन, खालें और चमड़ों जैसे जन-उपयोग के अनेक उत्पादों की व्यवस्था करता है। छोटे व सीमांत किसानों और भूमिहीन श्रमिकों को बेहतर पशुधन उत्पादन के माध्यम से धारणीय रोजगार विकल्प का स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। पशुपालन में गाय, भैंस, बत्तख, मुर्गियों आदि का पालन निहित है।

पशुपालन से परिवार की आय में स्थिरता आती है। साथ ही खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण आदि की व्यवस्था भी परिवार की अन्य खाद्य उत्पादक कृषक गतिविधियों में अवरोध के बिना प्राप्त हो जाती है। आज का पशुपालन क्षेत्रक देश के 7 करोड़ छोटे व सीमांत किसानों और भूमिहीन श्रमिकों को आजीविका कमाने के वैकल्पिक साधन सुलभ करा रहा है।

2. मत्स्य पालन (Fishing):
मत्स्य उद्योग को देश की खाद्यान्न पूर्ति, पोषक तत्त्व, रोजगार के अवसर तथा निर्यात आय में वृद्धि करने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस उद्योग में देश ने गौरवशाली वृद्धि की है। भारत में मत्स्य उत्पादन सकल घरेलू उत्पाद का 1.4. प्रतिशत है।

3. बागवानी (Gardening):
इसे उद्यान विज्ञान भी कहते हैं। बागवानी उद्योग के अंतर्गत फल, सब्जियाँ, रेशेदार फसलें, औषधीय तथा सुगन्धित पौधे, मसाले, चाय, कॉफी इत्यादि उत्पाद आते हैं। ये उत्पाद रोजगार के साथ-साथ भोजन और पोषण उपलब्ध कराने में बहुत बड़ा योगदान दे रहे हैं। इनसे हमें विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। बागवानी में सुनियोजित निवेश बहुत ही उत्पादक सिद्ध हुआ और इस क्षेत्रक ने एक धारणीय वैकल्पिक रोजगार का रूप धारण कर लिया है।

बागवानी में लगे लगभग सभी कृषकों की आर्थिक दशा में काफी सुधार हुआ है। ये उद्योग अनेक वंचित वर्गों के लिए भी आजीविका को श्रेष्ठ बनाने में सहायक हो गए हैं। अनुमानतः इस समय देश की 19 प्रतिशत श्रम शक्ति को इस क्षेत्र से रोजगार मिल रहा है।

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प्रश्न 14.
‘सूचना प्रौद्योगिकी’ धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
हम जानते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। अब 21 वीं सदी में देश में खाद्य सुरक्षा और धारणीय विकास में सूचना प्रौद्योगिकी के निर्णायक योगदान के विषय में सर्वसम्मति बन चुकी है। इस सम्मति का कारण है. कि, अब सूचनाओं और उपयुक्त सॉफ्टवेयर का. प्रयोग कर सरकार सहज ही खाद्य असुरक्षा की आशंका वाले क्षेत्रों का समय रहते पूर्वानुमान लगा सकती है। इस प्रकार समाज ऐसी विपत्तियों की संभावनाओं को कम या पूरी तरह से समाप्त करने में भी सफल हो सका है। कृषि क्षेत्र में तो इसे विशेष योगदान हो सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी द्वारा उदीयमान तकनीकों, कीमतों, मौसम तथा विभिन्न फसलों के लिए मृदा की दशाओं की उपयुक्तता की जानकारी का प्रसारण किया जा सकता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि सूचना प्रौद्योगिकी ने एक ज्ञान आधारित अर्थतंत्र का सूत्रपात कर दिया है-जो औद्योगिक क्रांति से हजार गुना अधिक शक्तिशाली है। स्वयं में सूचना प्रौद्योगिकी कुछ भी नहीं बदल सकी, किन्तु यह जानमानस में बसी सृजनात्मक संभाव्यता और उनके ज्ञान संचय के यंत्र के रूप में कार्य कर सकती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च स्तर पर रोजगार के अवसरों को उत्पन्न करने की संभाव्यता भी है। भारत के अनेक भागों में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग ग्रामीण विकास के लिए हो रहा है।

प्रश्न 15.
जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
उत्तर:
जैविक कृषि-जैविक कृषि खेती करने की वह पद्धति है जो पर्यावरणीय संतुलन को पुनः स्थापित करके उसका संरक्षण और संवर्धन करती है। जैविक कृषि तथा धारणीय विकास-रसायनिक आगतों से उत्पादित खाद्य की तुलना में जैविक विधि से उत्पादित भोज्य पदार्थों में पोषण तत्त्व अधिक होते हैं। अतः जैविक कृषि हमें अधिक स्वास्थ्यकर भोजन उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त जैविक कृषि में श्रम आगतों का प्रयोग परम्परागत कृषि की अपेक्षा अधिक होता है। अत: भारत जैसे देशों में यह अधिक आकर्षण होगा। इसके अतिरिक्त ये उत्पाद विषाक्त रसायनों से मुक्त तथा पर्यावरण की दृष्टि से धारणीय विधियों द्वारा उत्पादित होते हैं। इस तरह जैविक कृषि धारणीय विकास को बढ़ावा देती है।

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प्रश्न 16.
जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर:
जैविक कृषि के निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. जैविक कृषि में प्रयोग किए जाने वाले आगत सस्ते होते हैं और इसी कारण इन पर निवेश से प्रतिफल अधिक होते हैं।
  2. जैविक कृषि उत्पादों की काफी माँग विश्व के अन्य देशों में है। अतः इनके निर्यात से भी काफी अच्छी आय हो सकती है।
  3. रासायनिक आगतों से उत्पादित खाद्य की तुलना में जैविक विधि से उत्पादित भोज्य पदार्थों में पोषण तत्त्व भी अधिक होते हैं। अत: जैविक कृषि हमें अधिक स्वास्थ्यकर भोजन उपलब्ध करवाती है।
  4. जैविक कृषि में श्रम आगतों का प्रयोग परम्परागत कृषि की अपेक्षा अधिक होता है। अतः भारत जैसे देश में यह अधिक आकर्षक होगी।

जैविक कृषि की सीमाएँ:
जैविक कृषि की मुख्य सीमाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. जैविक कृषि संवर्धन के लिए उपयुक्त नीतियों का अभाव है।
  2. जैविक कृषि के उत्पादों के विपणन की समस्या है।
  3. प्रारंभिक वर्षों में जैविक कृषि की उत्पादकता रासायनिक कृषि से कम रहती है। अतः बहुत बड़े स्तर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए इसे अपनाना कठिन होगा।
  4. जैविक उत्पादों को रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा शीघ्र खराब होने की भी संभावना रहती है।
  5. बे-मौसमी फसलों का जैविक. कृषि में उत्पादन बहुत सीमित होता है।

प्रश्न 17.
जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को आरम्भिक वर्ष में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर:
जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को आरम्भिक वर्ष में निम्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है –

  1. प्रारम्भिक वर्षों में जैविक कृषि की उत्पादकता रसायनिक कृषि से कम रहती है।
  2. जैविक उत्पादों के रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा शीघ्र खराब होने की संभावना रहती है।
  3. बेमौसमी फसलों का जैविक कृषि उत्पादन बहुत सीमित होता है।

Bihar Board Class 11 Economics ग्रामीण विकास Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन कारणों से ग्रामीण विकास में बाधाएँ आ रही हैं?
उत्तर:
अपर्याप्त आधारिक संरचना, उद्योग तथा सेवा क्षेत्रक में वैकल्पिक रोजगार के अवसरों के अभाव और अनियत रोजगार में वृद्धि आदि के कारण ग्रामीण विकास में बाधायें आ रही हैं।

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प्रश्न 2.
धारणीय विकास से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धारणीय विकास से अभिप्राय विकास की उस प्रक्रिया से है जो भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरी करने की योग्यता के बिना कोई हानि पहुँचाये वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

प्रश्न 3.
कृषि साख से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि साख से अभिप्राय है-कृषि के लिए खाद, बीज, ट्रैक्टर, हल आदि खरीदने, पारिवारिक खर्चे और शादी, मृत्यु तथा धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कृषकों द्वारा ऋण लेना।

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प्रश्न 4.
कृषि साख के मुख्य साधन लिखें।
उत्तर:
कृषि साख के मुख्य साधन हैं –

  1. साहूकार
  2. सहकारी साख समितियाँ
  3. व्यावसायिक बैंक
  4. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
  5. भूमि विकास बैंक

प्रश्न 5.
नाबार्ड का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
नाबार्ड का पूरा नाम राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (National Bank for Agricultural and Rural Development) है।

प्रश्न 6.
नाबार्ड की स्थापना कब की गई थी?
उत्तर:
नाबार्ड की स्थापना 1982 ई. में की गई थी।

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प्रश्न 7.
एस. एच. जी. का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
एस. एच. जी. का पूरा नाम स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) है।

प्रश्न 8.
2003 ई. के अन्त तक कितने साख प्रदान करने वाले स्वयं सहायता समूह भारत में कितने भागों में काम कर रहे थे?
उत्तर:
लगभग 7 लाख।

प्रश्न 9.
हमारी ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था अभी तक उचित नहीं बन पाई है। इसके कारण लिखें।
उत्तर:
निम्न कारणों से हमारी ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था अभी तक उचित नहीं बन पाई है –

  1. औपचारिक साख संस्थाओं का चिरकालिक निम्न निष्पादन।
  2. किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर किश्तों को नहीं चुका पाना।

प्रश्न 10.
कृषि विपणन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिससे देश भर में उत्पादित कृषि पदार्थों का संग्रह, भण्डारण, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकिंग वर्गीकरण और वितरण आदि किया जाता है।

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प्रश्न 11.
कितने कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन कीमत सुनिश्चित की गई है?
उत्तर:
24 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन कीमत सुनिश्चित की गई है।

प्रश्न 12.
भारतीय खाद्य निगम किन-किन खाद्यान्नों के सुरक्षित भण्डारण का रख-रखाव करता है?
उत्तर:
भारतीय खाद्य निगम गेहूँ और चावल के सुरक्षित भण्डारण का रख-रखाव करता है।

प्रश्न 13.
नीतिगत साधनों का क्या ध्येय है?
उत्तर:
नीतिगत साधनों का ध्येय किसानों को उचित दाम दिलाना तथा गरीबों को सस्ते कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध करवाना है।

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प्रश्न 14.
सरकार के अनेक प्रयत्नों के बाद भी आज तक कृषि मंडियों पर किन लोगों का वर्चस्व बना हुआ है?
उत्तर:
सरकार के अनेक प्रयत्नों के बाद भी आज तक कृषि मंडियों पर निजी व्यापारियों (साहूकारों, ग्रामीण राजनीतिज्ञ, सामंतों, बड़े व्यापारियों तथा अमीर किसानों) का वर्चस्व बना हुआ है।

प्रश्न 15.
सरकारी संस्थाएँ तथा सहकारिताएँ सकल कृषि उत्पादन के कितने प्रतिशत अंश के आदान-प्रदान में सफल हो पाई हैं?
उत्तर:
सरकारी संस्थाएँ तथा सहकारिताएँ सकल कृषि उत्पादन के मात्र 10 प्रतिशत अंश के आदान-प्रदान में सफल हो पाई हैं।

प्रश्न 16.
कृषि उत्पाद के वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के कुछ उदाहरण दें।
उत्तर:
पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में अपनी मंडी, पुणे की हड़पसार मंडी, आन्ध्र प्रदेश की रायचूनाज.नामक फल-सब्जी मंडियों तथा तमिलनाडु की उझावर मंडी के कृषक बाजार कृषि उत्पाद वैकल्पिक क्रय-विक्रय माध्यम के कुछ उदाहरण हैं।

प्रश्न 17.
विविधीकरण के दो पहलू लिखें।
उत्तर:
विविधीकरण के दो पहलू हैं –

  1. फसलों के उत्पादन के विविधीकरण से सम्बन्धित
  2. श्रम शक्ति को खेती से हटाकर अन्य सम्बन्धित कार्यों तथा गैर-कृषि क्षेत्रक में लगाना

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प्रश्न 18.
विविधीकरण के लाभ लिखें।
उत्तर:

  1. विविधीकरण द्वारा खेती के आधार पर आजीविका कमाने में जोखिम को कम करता है।
  2. यह ग्रामीण जन समुदाय को उत्पादक और वैकल्पिक धारणीय आजीविका का अवसर उपलब्ध करता है।

प्रश्न 19.
भारत का अधिक भाग कृषि में किस ऋतु की फसल से जुड़ा रहता है?
उत्तर:
भारत में अधिक भाग खरीफ की फसल से जुड़ा रहता है।

प्रश्न 20.
भारत की बढ़ती हुई श्रम-शक्ति के लिए अन्य गैर-कृषि कार्यों में वैकल्पिक रोजगार की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
क्योंकि कृषि क्षेत्र पर पहले से ही बहुत बोझ है।

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प्रश्न 21.
गैर कृषि अर्थतंत्र के गतिशील उपघटक लिखें।
उत्तर:
कृषि प्रसंस्करण उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, चर्म उद्योग, तथा पटसन उद्योग।

प्रश्न 22.
पशुपालन में कौन-कौन सी प्रजातियाँ हैं?
उत्तर:
पशुपालन में गाय, भैंस, बकरियाँ, मुर्गी-बत्तख आदि बहुतायत में पाई जाने वाली प्रजातियाँ हैं।

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प्रश्न 23.
पशुपालन के लाभ लिखें।
उत्तर:
लाभ:

  1. पशुपालन से परिवार की आय में स्थिरता आती है।
  2. इससे खाद्य सुरक्षा, परिवहन, ईंधन, पोषण आदि की व्यवस्था भी परिवार की अन्य खाद्य उत्पादक (कृषि गतिविधियों में अवरोध के बिना) प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न 24.
आज पशुपालन क्षेत्रक देश के कितने छोटे या सीमांत किसानों और भूमिहीन श्रमिकों को आजीविका कमाने का वैकल्पिक साधन सुलभ करा रहा है?
उत्तर:
आज पशुपालन क्षेत्र देश के 7 करोड़ छोटे व सीमांत किसानों और भूमिहीन श्रमिकों को आजीविका कमाने का वैकल्पिक साधन सुलभ करा रहा है।

प्रश्न 25.
पशुपालन में सबसे बड़ा अंश किसका है और कितना है?
उत्तर:
पशुपालन में सबसे बड़ा अंश मुर्गीपालन का है। यह अंश 42 प्रतिशत है।

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प्रश्न 26.
ऑप्रोशन फ्लड क्या है?
उत्तर:
ऑप्रेशन फ्लड विश्व का सबसे बड़ा एकीकृत डेयरी विकास कार्यक्रम है।

प्रश्न 27.
1960-2002 की अवधि में देश में दुग्ध उत्पादन कितना बढ़ा है?
उत्तर:
1960-2002 की अवधि में देश में दुग्ध उत्पादन चार गुणा से अधिक बढ़ा है।

प्रश्न 28.
ऑप्रेशन फ्लड का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
ऑप्रेशन फ्लड का मुख्य उद्देश्य डेयरी सहकारी समितियों को संगठित करके ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों और शहरी उपभोक्ताओं के बीच कड़ी स्थापित करना है।

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प्रश्न 29.
ऑप्रेशन फ्लड के अन्तर्गत क्या-क्या क्रियाएँ की जाती हैं?
उत्तर:
ऑप्रेशन फ्लड के अन्तर्गत सभी किसान अपना विक्रय योग्य दुग्ध एकत्रित करके उसकी गुणवत्ता के अनुसार प्रसंस्करण करते हैं और फिर उसे शहरी केन्द्रों में सहकारिता के माध्यम से बेचा जाता है।

प्रश्न 30.
आजकल देश के समस्त उद्योग का कितना प्रतिशत अंश अंतर्वर्ती क्षेत्रों से प्राप्त होता है?
उत्तर:
49 प्रतिशत।

प्रश्न 31.
आजकल देश के समस्त मत्स्य उत्पादन का कितना प्रतिशत अंश महासागरीय क्षेत्रों से प्राप्त हो रहा है?
उत्तर:
51 प्रतिशत।

प्रश्न 32.
मत्स्य उत्पादन सकल घरेलू उत्पाद का कितना प्रतिशत है?
उत्तर:
1.4 प्रतिशत।

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प्रश्न 33.
सागरीय उत्पादों में प्रमुख राग्य कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सागरीय उत्पादों में प्रमुख राज्य केरल, गुजराज, महाराष्ट्र और तमिलनाडु हैं।

प्रश्न 34.
मछुआरों की मुख्य समस्याएँ लिखें।
उत्तर:
मछुआरों की प्रमुख समस्याएँ इस प्रकार हैं –

  1. सामाजिक, आर्थिक स्तर का नीचा होना
  2. निम्न रोजगार
  3. प्रति व्यक्ति निम्न आय
  4. अन्य कार्यों की ओर श्रम के प्रवाह का अभाव
  5. उच्च निरक्षरता दर तथा
  6. गंभीर ऋणग्रस्तता

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प्रश्न 35.
भारत में विभिन्न प्रकार के बागान उत्पाद लिखें।
उत्तर:
फल, सब्जियाँ, रेशेदार फसलें, औषधीय तथा सुगन्धित पौधे, मसाले, चाय कॉफी के उत्पादन में बगान उत्पादन का बहुत बड़ा योगदान है।

प्रश्न 36.
बागवानी का महत्त्व लिखें।
उत्तर:
बागवानी रोजगार का अवसर प्रदान करती है। यह भोजन और पोषण उपलब्ध कराने में योगदान देती है।

प्रश्न 37.
किस अवधि को स्वर्णिम क्रांति के आरम्भ का काल माना जाता है?
उत्तर:
1991-2003 ई. की अवधि को ‘स्वर्णिम क्रांति’ के आरम्भ का काल माना जाता है।

प्रश्न 38.
भारत किन फलों के उत्पादन में आजीविका का अग्रणी देश माना जाता है?
उत्तर:
भारत आम, केला, नारियल, काजू जैसे फलों के उत्पादन में आज विश्व का अग्रणी देश माना जाता है।

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प्रश्न 39.
फल, सब्जियों के उत्पादन में हमारा विश्व में कौन-सा स्थान है?
उत्तर:
फल, सब्जियों के उत्पादन में हमारा विश्व में दूसरा स्थान है।

प्रश्न 40.
बागवानी को बढ़ावा देने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर:
बागवानी को बढ़ावा देने के लिए बिजली, शीतगृह व्यवस्था, विवणन माध्यमों का विकास, लघु स्तरीय प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और प्रौद्योगिकी की उन्नयन और प्रसार के लिए आधारिक संरचनाओं में निवेश किया जाना चाहिए।

प्रश्न 41.
ग्रामीण विकास क्या है?
उत्तर:
ग्रामीण विकास से अभिप्राय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन घटकों के विकास पर बल देना है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सर्वांगीण विकास में पिछड़ गए हैं।

प्रश्न 42.
ग्रामीण विकास के लिए हमें क्या-क्या करना चाहिए? (कोई दो बिन्दु लिखें)।
उत्तर:
ग्रामीण विकास के लिए हमें अनाजों, फलों, सब्जियों के उत्पादन में लगे कृषक समुदायों को उत्पादकता बढ़ाने में विशेष सहायता देनी होगी। गैर कृषि उत्पादक क्रियाकलापों जैसे खाद्य-प्रसंस्करण, स्वास्थ्य सुविधाओं को अधिक उपलब्ध करवाना होगा।

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प्रश्न 43.
1990 ई. के दशक में कृषि की संवृद्धि दर घटकर कितनी रह गई थी?
उत्तर:
1990 ई. के दशक में कृषि की संवृद्धि दर घटकर 2.3% रह गई थी।

प्रश्न 44.
1990 ई. के दशक में कृषि की संवृद्धि दर में कमी का कारण लिखें।
उत्तर:
1991 ई. के बाद सार्वजनिक निवेश में आई गिरावट के कारण 1990 ई. के दशक में कृषि की संवृद्धि दर में कमी आई।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति के लिए महात्मा गाँधी ने कौन-सा विचार दिया था?
उत्तर:
गाँधी के अनुसार केवल कुछ शहरी उद्योग केन्द्रों का विस्तार करना अर्थव्यवस्था की प्रगति नहीं है इसके लिए मुख्य रूप से गाँवों को विकसित करना होगा। आजादी प्राप्ति के वक्त भारत की तीन चौथाई से भी अधिक जनसंख्या गाँवों में रहती थी और आजीविका निर्वहन के लिए कृषि पर निर्भर थी। गाँधी ने गाँव व कृषि के महत्त्व को ध्यान में रखकर गाँव की आर्थिक संवृद्धि को ही अर्थव्यवस्था की कस्तविक संवृद्धि माना।

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प्रश्न 2.
भारत में कृषि क्षेत्र की संवृद्धि घटने के क्या कारण थे?
उत्तर:
भारत में कृषि क्षेत्र की संवृद्धि घटने के कारण –

  1. सार्वजनिक निवेश में गिरावट।
  2. अपर्याप्त आधारिक संरचना।
  3. विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों में वैकल्पिक अवसरों की कमी।
  4. रोजगार के मामले में अस्थायित्व बढ़ना।

प्रश्न 3.
ग्रामीण भारत के लिए जरूरी बातों की सूची बताएँ।
उत्तर:

  1. साख प्रणाली।
  2. विपणन/बाजार व्यवस्था।
  3. कृषि क्षेत्र में विविधता।
  4. धारणीय आर्थिक विकास।

प्रश्न 4.
निर्धन महिलाओं के बैंक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
1995 थ्रिफ्ट एण्ड क्रेडिट सोसायटी की स्थापना की गई थी। यह निर्धन महिलाओं की लघु बचतों को प्रोत्साहित करने की शुरूआत थी। इसका प्रमुख उद्देश्य लघु बचतों को बढ़ना था। इसे ‘कुटुम्ब श्री’ के नाम से भी जाना जाता है। यह निर्धनता उन्मूलन के लिए सामुदायिक आधार पर महिलाओं द्वारा संचालित कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम सर्वप्रथम केरल में आरम्भ किया गया था। थ्रिफ्ट एंड क्रेडिट सोसायटी ने लगभग एक करोड़ रुपये की बचतों को एकत्रित किया। औपचारिक रूप से साख सृजन करने के लिए एशिया में थ्रिफ्ट एण्ड क्रेडिट सोसायटी सर्वाधिक हैं।

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प्रश्न 5.
हमारी ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की खामियाँ लिखिए।
उत्तर:

  1. हमारे ग्रामीण बैंकों द्वारा सृजन की गई साख निम्न स्तर पर है।
  2. किसानों द्वारा समय पर किस्त अदा न करना।
  3. व्यावसायिक एवं अन्य औपचारिक वित्तीय संस्थाएँ लोगों को बचत करने एवं ऋण किस्तों को जमा कराने के लिए प्रोत्साहन न दे सकी।
  4. जानबूझ कर ऋण. की वापसी न करना।
  5. आर्थिक सुधारों से ग्रामीण बैंकिंग प्रणाली को धक्का लगा।

प्रश्न 6.
गाँव में बैंकिंग व्यवस्था के सुचारु रूप से संचालन हेतु उपाय सुझाइए।
उत्तर:

  1. बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं को अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए।
  2. किसानों एवं मजदूरों का प्रोत्साहित किया जाए ताकि वे औपचारिक साख का प्रयोग करने की आदत डालें।
  3. किसानों को अधिशेष आय बैंकों में जमा कराने एवं समय पर ऋण की किस्त चुकाने के लिए प्रेरित किया जाए।
  4. ग्रामीण लोगों को ज्यादा से ज्यादा ऋण किस्त समय पर चुकाने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके से तैयार किया जाए।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 6 ग्रामीण विकास

प्रश्न 7.
ग्रामीण बाजार को सुधारने के क्या उपाय हो सकते हैं?
उत्तर:
सरकारी हस्तक्षेप के साथ ग्रामीण बाजार व्यवस्था एक लम्बी यात्रा तय कर चुकी है। आर्थिक सुधार 1991 लागू होने के बाद ग्रामीण बाजार व्यवस्था को वैश्वीकरण के माध्यम से अनेक विकल्प प्राप्त हो गए हैं। आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कृषि क्षेत्र के लिए अच्छा काम कर रही हैं। इसलिए इस बाजार व्यवस्था को ठीक करने के लिए निम्नलिखित उपायों का अनुकरण करना चाहिए –

  1. माप-तौल उपकरण एवं बटे उपयुक्त होने चाहिए।
  2. गाँवों को नगरों एवं शहरों से जोड़ने के लिए पर्याप्त आधारिक संरचना का विकास किया जाना चाहिए।
  3. भण्डारण एवं शीत भण्डार की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  4. किसानों को जागरूक बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 8.
ग्रामीण विकास में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
आर्थिक सुधारों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश के हरेक भाग एवं क्षेत्र में अपना कारोबार फैलाने के अवसर प्रदान कर दिए हैं। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ग्रामीण बाजार की ओर अग्रसित हो रही हैं। वे निम्न प्रकार से किसानों के हित में कार्य कर रही हैं:

  1. वे किसानों से अनुबंध कर रही हैं।
  2. वे वांछनीय गुणवत्ता वाले फल, सब्जियों, अनाजों आदि का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को प्रेरित कर रही हैं।
  3. वे किसानों को बीज एवं अन्य कृषि आगतों को उपलब्ध कराती हैं।
  4. वे कृषि फसलों के लिए पूर्व निर्धारित कीमत की पेशकश करती हैं।

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प्रश्न 9.
तमिलनाडु में कृषि क्षेत्र में महिलाओं’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
तमिलनाडु में कृषि क्षेत्र में महिलाओं को संक्षेप में TANWA भी कहते हैं। यह एक कार्य योजना है जिसके अन्तर्गत महिलाओं को कृषि क्षेत्र नई एवं विकसित कृषि तकनीकों की जानकारी प्रदान की जाती है। यह कार्य योजना महिलाओं को कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने एवं परिवार की आय बढ़ाने के लिए प्रभावपूर्ण सहभागिता के लिए प्रेरित करती है।

प्रशिक्षित महिलाओं का समूह त्रिचनापल्ली में एक फार्म चलाता है। वे वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन करती हैं और एक अच्छी खासी आय अर्जित करती हैं। कुछ अन्य महिला समूह ‘सूक्ष्म बचत योजना, के माध्यम से साख सृजन के कार्य में संलग्न हैं। बचत द्वारा एकत्रित वित्त को लघु एवं कुटीर उद्योगों को साख प्रदान करते हेतु ऋण दिया जाता है। उदाहरण के लिए, मशरूम का उत्पादन, साबुन विनिर्माण, गुड़िया विनिर्माण आदि के विनिमय करके आय अर्जित करती हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पशुपालन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पशुपालन वह व्यवस्था है जिसमें पालतू पशुओं का पोषण एवं देखभाल की जाती है। भारत में फसलों एवं पशुपालन की मिश्रित व्यवस्था पुराने समय से ही विद्यमान है। पशुपालन ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए बहुत उपयोगी क्रियाकलाप है। इससे लोगों की आय में स्थायित्व, भोजन, सुरक्षा, परिवहन, ईंधन एवं पोषण सभी प्राप्त होते हैं। पशुपालन से कृषि क्रियाओं में भी हस्तक्षेप नहीं होता है। 70 मिलियन से भी अधिक सीमांत किसान कृषि मजदूर, पशुपालन के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं।

इस क्षेत्र में महिलाओं की अच्छी खासी तादाद कार्यरत है। भारत में मवेशियों की संख्या बहुत अधिक है। पशुपालन में मत्स्य पालन की भागीदारी सर्वाधिक है। कई दशकों से भारतीय डेरी उद्योग अच्छा कार्य कर रहा है। 1960 2002 के मध्य के चार दशकों में दूध का उत्पादन चार गुना बढ़ गया है। डेरी उद्योग (Operation flood) 1966 के उपरांत फला-फूला है।

घनत्व के आधार पर किसान अपना दूध जमा करवाते हैं और सहकारिता के माध्यम से उसका विक्रय शहरों व नगरों में किया जाता है। इस व्यवस्था से दूध का उचित मूल्य एवं आय स्थायित्व प्राप्त होता है। दूध सहकारिता के क्षेत्र में गुजरात भारत का सबसे सफल राज्य है। इस क्षेत्र में विविधता लाने के लिए मांस, अण्डे, ऊन आदि का उत्पादन भी बढ़ रहा है।

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प्रश्न 2.
भारत में बागवानी का संक्षिप्त ब्यौरा दीजिए।
उत्तर:
बागवानी के लिए वातावरण, मिट्टी की बनावट एवं प्रकार की विविधता के कारण कई फायदे हैं। फल, सब्जियाँ, फूल, औषधीय पौधे, सजावटी पौधे, मसाले व पेड़ बागवानी के अन्तर्गत उगाए जाते हैं। इन फसलों का उत्पादन करने से रोजगार, आय एवं पोषण उन लोगों के प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है जो बागवानी से जुड़े हुए हैं।

1991-2003 के दौरान इस क्षेत्र में किया गया निवेश अत्यधिक उत्पादक एवं स्थायी रोजगार का जरिया बन गया था। सुनहरी क्रांति के माध्यम से भारत आम, केला, नारियल, एवं विभिन्न किस्मों के मसालों के उत्पादन में विश्व नेता बनने की राह पर चल पड़ा था। दुनिया में भारत का फल एवं सब्जी उत्पादन में दूसरा स्थान है। फूल उत्पादन, नर्सरी देखभाल, उन्नत किस्म के बीजों का उत्पादन, टिशू कल्चर आदि क्रियाकलाप ऊँची आय एवं रोजगार प्रदान कर रहे हैं। भारत के कुल कार्य बल का 19 प्र.श. भाग इस कार्य में रोजगार प्राप्त कर रहा है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –

  1. प्रत्येक गाँव-एक ज्ञान का केन्द्र।
  2. महाराष्ट्र में जैविक आधार पर सूत उत्पादन।

उत्तर:
1. प्रत्येक गाँव-एक ज्ञान का केन्द्र:
1995 में ‘जमशेद जी टाटा राष्ट्रीय वरचुअल एकेडेमी’ की स्थापना ग्रामीण विकास के लिए की गई थी। यह एकेडेमी एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउन्डेशन ने श्री रतन टाटा ट्रस्ट मुम्बई के समर्थन से स्थापित की थी। इस संस्थान ने गाँव की जानकारी रखने वाले लाखों लोगों को चिहित किया और उन्हें संस्थान का फैलो बनाकर नामांकन किया।

इस कार्यक्रम में न्यूनतम कीमत पर इनफो-किओस्क (INFO KIOSK) प्रदान किया जाता है और प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका मालिक अनेक सेवाएं प्रदान करके अच्छी खासी आय कमा लेता है। भारत सरकार इस कार्यक्रम को वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है। INFO KIOSK में P.C. के साथ इंटरनेट; वीडियो फोटो कैमरा लगा होता है।

2. महाराष्ट्र में जैविक आधार पर कपास (सूत) उत्पादन:
कपास के उत्पादन में कीटनाशक दवाइयों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। 1995 में किशन मेहता ने जैविक आधार पर कपास उत्पादन का विचार प्रदान किया या बिना कीटनाशक रसायनों के कपास का उत्पादन केन्द्रीय कपास अनुसंधान केन्द्र के निदेशक महोदय ने श्री महता के विचार का समर्थन किया।

130 किसानों को ‘इंटरनेशनल फैडरेशन ऑफ एग्रीकल्चर मूवमेन्टस स्टैण्डर्डस्’ के अनुसार जैविक आधार पर कपास उगाने के लिए मजबूर किया गया। दि जर्मन एक्रेडिटिड एजेंसी (AGRECO) ने उत्पाद की जाँच करके बताया कि उत्पादन उच्च गुणवत्ता वाला है। श्री मेहता के अनुसार जैविक कृषि पूरे भारत में छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए लाभदायक होगी।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कौन-सी फसल के लिए रासायनिक कीटनाशकों का सर्वाधिक प्रयोग होता है –
(a) कपास
(b) गेहूँ
(c) चावल
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कपास

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प्रश्न 2.
सीमांत किसानों की जोत का औसत आकार है –
(a) 2 हेक्टेयर
(b) 5 हेक्टेयर
(c) 0.8 हेक्टेयर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 0.8 हेक्टेयर

प्रश्न 3.
जैविक कृषि उत्पादों का मूल्य सामान्य कृषि उत्पादों से लगभग ज्यादा होता है –
(a) 20-200 प्र.श.
(b) 10-100 प्र.श.
(c) 10-150 प्र.श.
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 10-100 प्र.श.

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प्रश्न 4.
एम. एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउन्डेशन स्थित है –
(a) दिल्ली
(b) मुम्बई
(c) चेन्नई
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) चेन्नई

प्रश्न 5.
श्री रल टाटा ट्रस्ट स्थित है –
(a) पटना
(b) बंगलोोर
(c) बंगलौर
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) बंगलोोर

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प्रश्न 6.
ऑप्रेशन फ्लड का संबंध है –
(a) दूध उत्पादन
(b) चावल उत्पादन
(c) तेल उत्पादन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) दूध उत्पादन

प्रश्न 7.
ऑप्रेशन गोल्डन रेवोल्यूशन (सुनहरी क्रांति) संबंधित है –
(a) मत्स्य पालन
(b) डेरी फॉर्मिंग
(c) बागवानी
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) बागवानी

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प्रश्न 8.
मत्स्य पालन में कितने प्र.श. कार्य बल महिला वर्ग है –
(a) 60 प्र.श.
(b) 40 प्र.श.
(c) 50 प्र.श.
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 60 प्र.श.

प्रश्न 9.
अन्तर्राष्ट्रीय मत्स्य बाजार में महिला कार्य बल का प्र.श. है –
(a) 60 प्र.श.
(b) 40 प्र.श.
(c) 50 प्र.श.
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 40 प्र.श.

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प्रश्न 10.
भारत के सकल घरेलू उत्पादन में मत्स्य उद्योग का कितना योगदान है –
(a) 1.4 प्र.श
(b) 2 प्र.श.
(c) 1.1 प्र.श..
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 1.4 प्र.श

प्रश्न 11.
भारत में लगभग मवेशियों की संख्या है –
(a) 287 मिलियन
(b) 90 मिलियन
(c) 170 मिलियन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 287 मिलियन

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प्रश्न 12.
गतिशील उपक्षेत्र में शामिल है –
(a) कृषि परिशोधन उद्योग
(b) बागवानी
(c) मत्स्य पालन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) कृषि परिशोधन उद्योग

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 5 भारत में मानव पूँजी का निर्माण

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 5 भारत में मानव पूँजी का निर्माण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 5 भारत में मानव पूँजी का निर्माण

Bihar Board Class 11 Economics भारत में मानव पूँजी का निर्माण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मानव पूँजी के स्रोत लिखें।
उत्तर:
मानव पूँजी के स्रोत हैं –

  1. शिक्षा में निवेश
  2. स्वास्थ्य में निवेश
  3. कार्य पर प्रशिक्षण में निवेश
  4. देशांतर में निवेश, तथा
  5. सूचना में निवेश

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प्रश्न 2.
किसी देश की शैक्षिक उपलब्धियों के दो सूचक क्या होंगे?
उत्तर:
किसी देश की शैक्षिक उपलब्धियों के दो सूचक हैं –

  1. अपेक्षाकृत अधिक आय अर्जित करना तथा
  2. आर्थिक समृद्धि में अधिक योगदान

प्रश्न 3.
भारत में शैक्षिक उपलब्धियों के क्षेत्र में क्षेत्रीय विषमताएँ क्यों दिखाई दे रही हैं?
उत्तर:
शैक्षिक उपलब्धियों के क्षेत्र में क्षेत्रीय विषमताओं के अनेक कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं-भौगोलिक कारक, दूसरे क्षेत्रीय सरकारों की शिक्षा में अलग-अलग नीतियाँ है।

प्रश्न 4.
मानव पूँजी निर्माण और मानव विकास के भेद को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मानव पूँजी की अवधारणा शिक्षा और स्वास्थ्य को श्रम की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम मानती है। इसके विपरीत मानव विकास इस विचार पर आधारित है कि शिक्षा और स्वास्थ्य मानव कल्याण के अभिन्न अंग हैं, क्योंकि जब लोगों में पढ़ने-लिखने तथा सुदीर्घ स्वस्थ जीवन यापन की क्षमता आती है, तभी वह ऐसे अन्य कार्य चयन करने में सक्षम हो पाते हैं जिन्हें वे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। मानव पूँजी मानव को किसी साध्य की प्राप्ति का साधन मानता है। यह साध्य उत्पादकता की वृद्धि है।

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प्रश्न 5.
मानव पूँजी की तुलना में मानव विकास किस प्रकार अधिक व्यापक है?
उत्तर:
मानव पूँजी तथा मानव विकास दोनों पारिभाषित शब्द मिलते-जुलते भले ही प्रतीत होते हैं परंतु मानव पूँजी की तुलना में मानव विकास अधिक व्यापक है। मानव पूँजी तो शिक्षा और स्वास्थ्य को श्रम उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम मानती है, जबकि मानव विकास शिक्षा और स्वास्थ्य को मानव कल्याण का अभिन्न अंग मानता है। मानव पूँजी मानव को किसी साध्य की प्राप्ति का साधन मानती है।

यह साध्य उत्पादकता में वृद्धि का है। मानव पूँजी विचार के अनुसार शिक्षा और स्वास्थ्य पर किया गया निवेश अनुत्पादक है, अगर उससे वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्गत में वृद्धि न हो। इसके विपरीत मानव विकास के परिप्रेक्ष्य में मानव स्वयं साध्य भी है। भले ही शिक्षा, स्वास्थ्य आदि पर निवेश से श्रम की उत्पादकता में सुधार न हो किन्तु इसके माध्यम से मानव कल्याण का संवर्धन तो होना ही चाहिए।

प्रश्न 6.
मानव पूँजी निर्माण में किन कारकों का योगदान रहता है?
उत्तर:
मानव पूंजी निर्माण में शिक्षा, स्वास्थ्य प्रशिक्षण आदि कारकों का योगदान रहता है।

प्रश्न 7.
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले दो सरकारी संगठनों के नाम बताइए।
उत्तर:
शिक्षा क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले दो सरकारी संगठन हैं –

  1. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् तथा
  2. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

स्वास्थ्य क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले दो सरकारी संगठन हैं –

  1. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् तथा
  2. राज्य स्तरों पर स्वास्थ्य मंत्रालय

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प्रश्न 8.
शिक्षा को किसी राष्ट्र के विकास का एक महत्त्वपूर्ण आगत माना जाता है। क्यों?
उत्तर:
शिक्षा को किसी राष्ट्र के विकास का एक महत्त्वपूर्ण आगत निम्नलिखित कारणों से माना जाता है –

  1. शिक्षा कार्यक्षेत्र में कुशलता को बढ़ाती है।
  2. शिक्षा श्रम एवं कौशल में वृद्धि लाती है।
  3. शिक्षा व्यक्ति को अधिक आय सृजन के योग्य बनाती है।
  4. शिक्षा लोगों को उच्चतम सामाजिक स्थिति और गौरव प्रदान करती है।
  5. शिक्षा किसी व्यक्ति को अपने जीवन में बेहतर विकल्पों का चयन कर पाने के योग्य बनाती है।
  6. शिक्षा श्रम शक्ति की उपलब्धता के साथ-साथ नई प्रौद्योगिकी को अपनाने में भी सहायक होती है।
  7. शिक्षा, विकास प्रक्रिया को तेज करती है।

प्रश्न 9.
पूँजी निर्माण के निम्नलिखित स्रोतों पर चर्चा कीजिए –

  1. स्वास्थ्य आधारित संरचना
  2. प्रवसन पर व्यय

उत्तर:
1. स्वास्थ्य आधारित संरचना:
स्वास्थ्य को किसी व्यक्ति के साथ-साथ देश के विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण आगत माना जाता है। स्वास्थ्य पर व्यय मानव पूंजी के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। स्वास्थ्य व्यय के विभिन्न रूप हैं –

  • टीकाकरण
  • चिकित्सीय आयुर्विज्ञान (बीमारियों के क्रम में उसकी चिकित्सा)
  • सामाजिक आयुर्विज्ञान (स्वास्थ्य सम्बन्धी साक्षरता या ज्ञान का प्रसार)
  • स्वच्छ पेय जल का प्रावधान आदि

स्वास्थ्य तथा पोषण से मनुष्य की शारीरिक शक्तियों का विकास होता है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध केवल रोग निवारण से नहीं अपितु इससे कहीं अधिक है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध शारीरिक एवं मानसिक सुख एवं कल्याण में है। एक स्वस्थ व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से पूर्णतया कार्य करने योग्य होता है। एक स्वस्थ रोगी पुरुष की अपेक्षा अच्छा काम कर सकता है। एक रोगी कार्यकर्ता जिसके पास चिकित्सा सुविधायें नहीं हैं, कई दिन काम पर नहीं आ सकता और परिणामस्वरूप उत्पादन में कमी आयेगी। अतः स्वास्थ्य मानव पूँजी का एक आवश्यक साधन है।

2. प्रवजन पर व्यय (Expenditure on Migration):
प्रवजन से अभिप्राय नौकरी की तलाश में या अधिक आय प्राप्त करने के लिए अथवा व्यावसायिक अवसर अधिक होने के कारण एक स्थान (देश) से दूसरे स्थान (देश) जाना। यह प्रवजन आन्तरिक भी हो सकता है और बाह्य भी। देश के एक भाग से देश के दूसरे भाग में नौकरी आदि की तलाश आदि के लिए जाने को आन्तरिक प्रवजन कहते हैं। भारत में गाँवों नौकरी प्राप्त करने के लिए काफी संख्या में लोग निरंतर शहरों में आ रहे हैं।

विदेशी प्रवजन उसे कहते हैं जब एक देश के लोग (भारतीय) नौकरी प्राप्त करने के लिए दूसरे देश जाते हैं। इन दोनों प्रकार के प्रवजन में परिवहन व्यय आता है। जिस देश में भारतीय जाते हैं, वहाँ पर रहने की लागत अधिक होती है। अपरिचित, सामाजिक तथा सांस्कृतिक ढाँचे में रहने के कारण मानसिक लागत आती है परंतु विदेशों में बढ़ी हुई आय इन लागतों से अधिक होती है। अतः प्रवजन पर व्यय भी मानव पूँजी निर्माण का एक स्रोत है।

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प्रश्न 10.
मानव संसाधनों को प्रभावी प्रयोग के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा पर व्यय सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता का निरूपण करें।
उत्तर:
जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता-मानव संसाधनों का अपने प्रयोग करने के लिए शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर खर्च करना पड़ता है परंतु शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर आने वाले व्यय की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। सूचनाओं से हमें पता चलता है कि कौन-कौन सी शैक्षणिक संस्थायें हमें निपुणता प्रदान करती हैं जिससे हमें नौकरी मिल सके और निपुणता को प्राप्त करने के लिए हमें कितना व्यय करना पड़ेगा। मानव पूंजी में निवेश करने तथा प्राप्त मानव पूँजी स्टॉक को कुशलतापूर्वक प्रयोग करने के बारे में निर्णय लेने के लिए सूचनाएँ आवश्यक हैं।

प्रश्न 11.
मानव पूंजी में निवेश आर्थिक संवृद्धि में किस प्रकार सहायक होता है?
उत्तर:
मानव पूँजी में निवेश (शिक्षा तथा स्वास्थ्य आदि के रूप में) आर्थिक संवृद्धि लाता है। शिक्षा व्यक्ति के श्रम-कौशल में वृद्धि करती है। उसकी अर्जन शक्ति में वृद्धि करती है। आर्थिक शक्ति में वृद्धि होने से उसकी आय में वृद्धि होती है। उसकी आय में वृद्धि होने से देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है। जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक संवृद्धि होती है। शिक्षित व्यक्ति का राष्ट्रीय आय में योगदान अशिक्षित व्यक्ति की अपेक्षा अधिक होता है।

इस प्रकार एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक समय तक बिना बाधा के श्रम की पूर्ति कर सकता है। स्वास्थ्य और पोषण से मनुष्य की शारीरिक क्षमताओं का विकास होता है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध केवल रोग निवारण से नहीं अपितु इससे अधिक है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध शारीरिक एवं मानसिक सुख और कल्याण से है। स्वास्थ्य व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से पूर्णतया काम करने योग्य होता है।

वह रोगी पुरुष की अपेक्षा अच्छा काम कर सकता है और अधिक आय का अर्जन कर सकता है। प्रशिक्षण से भी श्रमिक की कार्यकुशलता तथा उत्पादकता में वृद्धि होती है। प्रवजन तथा सूचना प्राप्त करने पर भी मनुष्य अधिक आय का अर्जन कर सकता है। परिणामस्वरूप आर्थिक संवृद्धि होती है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मानव पूँजी में निवेश आर्थिक संवृद्धि में सहायक होता है।

इस बात की पुष्टि निम्न सारणी में की गई है –
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रकों में विकास के चुने हुए सूचक –
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प्रश्न 12.
विश्व भर में औसत शैक्षिक स्तर में सुधार के साथ-साथ विषमताओं में कमी की प्रवृत्ति पाई गई है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
यह पूर्णतया सत्य है कि विश्व स्तर पर औसत शैक्षिक स्तर में सुधार आ रहा है। शिक्षा स्तर में सुधार आने के साथ विषमताओं में भी कमी की प्रवृत्ति होती जा रही है।

प्रश्न 13.
किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास में शिक्षा की भूमिका का विश्लेषण करें।
उत्तर:
राष्ट्र के आर्थिक विकास में शिक्षा की भूमिका (Role of education in the economic development of a nation):
राष्ट्र के आर्थिक विकास में शिक्षा की बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षित व्यक्ति आर्थिक विकास की आधारशिला है। शिक्षित व्यक्ति आर्थिक संरचनाओं का समुचित उपयोग कर सकता है। शिक्षा व्यक्तियों की क्षमता का विस्तार करती है। शिक्षा से देश के सभी क्षेत्रों में प्राकृतिक तथा मानव संसाधनों का समुचित प्रयोग करने में सहायता मिलती है। शिक्षा मनुष्य को विवेकशील और तर्कशील बनाती है तथा उसकी सामान्य सूझ-बूझ को विकसित करती है।

शिक्षा से मनुष्य का दृष्टिकोण वैज्ञानिक और औचित्यपूर्ण बनता है जो नई चीजों को समझने और अपनाने में बहुत सहायक होता है। शिक्षा में निवेश मानव पूँजी का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है। शिक्षा अर्जन शक्ति में वृद्धि लाती है। शिक्षित व्यक्ति का समाज में आदर-मान होता है। वह देश पर भार नहीं अपितु देश के आर्थिक विकास में योगदान देने वाला होता है।

प्रश्न 14.
समझाइए कि शिक्षा में निवेश आर्थिक संवृद्धि को किस तरह प्रभावित करता है?
उत्तर:
शिक्षा में निवेश करने से मनुष्य की अर्जन क्षमता में वृद्धि होती है। शिक्षित व्यक्ति विवेकशील तथा तर्कशील होता है। वह अशिक्षित व्यक्ति से अधिक आय कमाता है तथा राष्ट्रीय आय में अशिक्षित व्यक्ति से अधिक योगदान देता है। आर्थिक संवृद्धि देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि से है। शिक्षित व्यक्ति प्राकृतिक संसाधनों का उचित शोषण करके उत्पादन में वृद्धि करने में सहायक होता है।

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प्रश्न 15.
किसी व्यक्ति के लिए कार्य के दौरान प्रशिक्षण क्यों आवश्यक होता है?
उत्तर:
काम पर लगे हुए कर्मचारियों की कुशलता तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए तथा . उत्पादन के नवीनतम उत्पादन विधि से परिचित कराने के लिए उन्हें प्रशिक्षण देना आवश्यक होता है।

प्रश्न 16.
मानव पूँजी और आर्थिक संवृद्धि के बीच सम्बन्ध स्पष्ट करें।
उत्तर:
मानव पूँजी और आर्थिक संवृद्धि में सम्बन्ध-मानव पूँजी और आर्थिक संवृद्धि के बीच काफी घनिष्ठ सम्बन्ध है । ये दोनों एक-दूसरे को सहारा देते हैं। शिक्षित व्यक्ति का श्रम कौशल अशिक्षित की अपेक्षा अधिक होता है। इसी कारण वह अपेक्षाकृत अधिक आय अर्जित कर पाता है। आर्थिक संवृद्धि का अर्थ देश की वास्तविक आर्थिक आय में वृद्धि से होता है तो फिर स्वाभाविक ही है कि किसी शिक्षित व्यक्ति का योगदान अशिक्षित व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक होगा।

एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक समय तक बिना बाधा के श्रम की पूर्ति कर सकता है। मानव पूँजी तथा आर्थिक संवृद्धि के बीच कारण प्रभाव सम्बन्ध का स्पष्ट निरुपण कठिन होता है, परंतु निम्न सारणी में देख सकते हैं कि वे दोनों क्षेत्र में साथ-साथ संवृद्ध हुए हैं। संभवतः प्रत्येक क्षेत्र की संवृद्धि से दूसरे क्षेत्र की संवृद्धि को संहारा दिया है।

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प्रश्न 17.
भारत में स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन की आवश्यकता पर चर्चा करें।
उत्तर:
भारत में स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता निम्न कारणों से है –

  1. स्त्री शिक्षा नारी को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करती है।
  2. स्त्री शिक्षा नारी के सामाजिक स्तर में सुधार लाती है।
  3. स्त्री शिक्षा प्रजनन दर पर अनुकूल प्रभाव डालती है।
  4. इससे बच्चों तथा स्त्रियों के स्वास्थ्य देखभाल पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
  5. स्त्री शिक्षा से साक्षरता दर में वृद्धि होगी।

कहा जाता है कि ‘यदि तुम एक व्यक्ति को पढ़ाते हो तो केवल एक व्यक्ति को पढ़ाते हो। इसके विपरीत ‘यदि तुम एक लड़की को पढ़ाते हो तो तुम एक परिवार का पढ़ाते हो।’

प्रश्न 18.
शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्रों में सरकार के विविध प्रकार के हस्तक्षेपों के पक्ष में तक दीजिए।
उत्तर:
संतुलित अहार की उपलब्धता, बेहतर आवास सुविधाएँ, स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित पर्यावरण, बीमारियों पर नियंत्रण से भारत के लोग स्वस्थ हो सकते हैं। अच्छे स्वास्थ्य से मानवीय संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि होती है। सामान्यतः एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क रहता है। एक स्वस्थ व्यक्ति, अस्वस्थ की तुलना में ज्यादा कुशल हो सकता है।

शिक्षा के उचित प्रबंध से ज्यादा लोग प्राकृतिक संसाधनों के बारे में ज्यादा जान सकते हैं एवं उनका ज्यादा उपयोग कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर निवेश मानव पूँजी के अच्छे स्रोत हैं। इस निवेश से उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है। अतः इन क्षेत्रों पर सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक है।
सरकार निम्न प्रकार से शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं पर नियंत्रण कर सकती है:

  1. निजी क्षेत्र की एकाधिकारात्मक प्रवृत्ति को रोकने के लिए।
  2. निजी क्षेत्र द्वारा लोगों के शोषण को रोकने के लिए।
  3. गरीबी रेखा से नीचे निवास करने वाले लोगों को स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाएँ उपलब्ध कराने हेतु।
  4. सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को मुफ्त शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने हेतु।

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प्रश्न 19.
भारत में मानव पूँजी निर्माण की मुख्य समस्याएँ क्या हैं?
उत्तर:
भारत में मानव पूँजी निर्माण की मुख्य समस्याएँ –

  1. शिक्षा के सभी स्तरों पर (प्राथमिक शिक्षा, उच्चतर शिक्षा तथा तृतीयक शैक्षिक संस्थायें) व्यय बहुत कम है। अत: शिक्षा के स्तरों पर व्यय में वृद्धि करनी चाहिए।
  2. राज्यों में होने वाले प्रति व्यक्ति शिक्षा व्यय में काफी अंतर है। जहाँ लक्षद्वीप में इसका उच्च स्तर 3,440 रुपये है, वहीं बिहार में यह मात्र 386 रुपये है। इस प्रकार की विषमताओं के कारण ही विभिन्न राज्यों में शिक्षा के अवसरों और शैक्षिक उपलब्धियों के स्तर में बहुत भारी अंतर हो जाता है।
  3. शिक्षा व्यय बहुत ही अपर्याप्त है।

प्रश्न 20.
क्या आपके विचार में सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में लिए जाने वाले शुल्कों की संरचना निर्धारित करनी चाहिए। यदि हाँ, तो क्यों?
उत्तर:
सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों के लिए जाने वाले शुल्कों की संरचना निर्धारित करनी चाहिए। वर्तमान में प्रत्येक संस्थान का शुल्क अलग-अलग है, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों के लोग अधिक शुल्क वाले संस्थानों का लाभ नहीं उठा पाते। शुल्क निर्धारण से यह असमानता समाप्त हो जाएगी और प्रत्येक नागरिक को इसका लाभ मिलेगा।

Bihar Board Class 11 Economics भारत में मानव पूँजी का निर्माण Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संस्थाओं का पूरा नाम लिखें –

  1. NCERT
  2. UGC
  3. AICTE

उत्तर:

  1. NCERT का पूरा नाम: National Council of Educational Research and Training.
  2. UGC का पूरा नाम: University Grants Commission
  3. AICTE का पूरा नाम: All India Council for Technical Education.

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प्रश्न 2.
भारत में सेवा क्षेत्र का कौन नियमन करते हैं?
उत्तर:
भारत में –

  1. संघ तथा राज्य स्तर पर स्वास्थ्य मंत्रालय
  2. स्वास्थ्य विभाग तथा
  3. विभिन्न संस्थायें सेवा क्षेत्र का नियमन करती हैं

प्रश्न 3.
शहरीकरण के प्रभाव लिखें।
उत्तर:
प्रभाव (Effect):

  1. शहरों में बढ़ती भीड़
  2. आधारिक संरचना एवं सार्वजनिक सेवाओं की ओर कमी
  3. शहरी जीवन गुणात्मक दृष्टि से निरंतर बिगड़ रहा है
  4. शहरी बेरोजगारी में वृद्धि

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प्रश्न 4.
‘पुट्टा निष्कासन’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अकुशल तथा अर्द्धकुशल श्रमिकों का काम की तलाश में विकसित देशों में जाना तथा वहाँ स्थायी रूप से निवास करने की प्रक्रिया को ‘पुट्ठा निष्कासन’ कहते हैं।

प्रश्न 5.
‘मस्तिष्क मिष्कासन’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
उच्च शिक्षित तथा तकनीकी योग्यता से लैस व्यक्तियों का विकसित देशों में काम की तलाश में जाना तथा वहीं पर स्थायी रूप से रहना ‘मस्तिष्क निष्कासन’ कहलाता है।

प्रश्न 6.
कंपनियाँ पूँजीगत वस्तुओं में निवेश क्यों करती हैं?
उत्तर:
भविष्य में अपनी आय बढ़ाने के लिये कंपनियाँ पूँजीगत वस्तुओं में निवेश करती हैं।

प्रश्न 7.
भारत में शिक्षा क्षेत्र की कौन-सी संस्थाएँ नियमन करती हैं?
उत्तर:
भारत में शिक्षा क्षेत्र का निम्नलिखित संस्थायें नियमन (Regulate) करती हैं –

  1. केन्द्र तथा राज्य स्तर पर शिक्षा मंत्रालय
  2. शिक्षा विभाग तथा
  3. अन्य संगठन जैसे एन.सी.ई.आर.टी. (NCERT), यू.जी.सी. (UGC), तथा ए.आई.सी. टी.ई. (AICTE)

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प्रश्न 8.
शिक्षा के महत्त्व को दर्शाने वाले कोई तीन बिन्दु लिखें।
उत्तर:

  1. शिक्षा मनुष्य को विवेकशील और तर्कशील बनाती है।
  2. शिक्षा से मनुष्य की सामान्य सूझ-बूझ विकसित होती है।
  3. शिक्षा से मनुष्य का दृष्टिकोण वैज्ञानिक बनता है।

प्रश्न 9.
प्रवसन या देशांतर से क्या अभिप्राय है? यह कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
प्रवसन या प्रवास से अभिप्राय है लोगों का देश के अंतर एक स्थान से दूसरे स्थान तथा एक देश से दूसरे देश में बसना। यह दो प्रकार का होता है –

  1. आन्तरिक प्रवास तथा
  2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास

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प्रश्न 10.
संविधान के कौन से संशोधन ने 6-14 वर्ष समूह के बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान किया?
उत्तर:
संविधान के 86वें संशोधन में 6-14 समूह के बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है।

प्रश्न 11.
वर्तमान सरकार ने आगामी वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद का कितना प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने का मन बनाया है?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत।

प्रश्न 12.
2004-2005 ई. के केंद्रीय बजट में भारत सरकार ने शिक्षा कर (Educationcess) से कितनी राशि आय के रूप में प्राप्त करने का अनुमान लगाया है और यह राशि किस मद पर खर्च की जानी थी?
उत्तर:
2004-2005 के केंद्रीय बजट में भारत सरकार ने शिक्षा कर से 4000-5000 करोड़ की राशि आय के रूप में प्राप्त करने का अनुमान लगाया और यह राशि प्रारम्भिक शिक्षा मद पर खर्च की जानी थी।

प्रश्न 13.
सकल घरेलू उत्पाद शिक्षा व्यय का प्रतिशत क्या दर्शाया है?
उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद शिक्षा व्यय का प्रतिशत यह दर्शाता है कि हमारे देश में हमारी आय का कितना प्रतिशत भाग शिक्षा के विकास पर खर्च किया जा रहा है।

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प्रश्न 14.
1952-2000 ई. की समयावधि में सकल घरेलू उत्पाद का कितना प्रतिशत शिक्षा व्यय बढ़ गया?
उत्तर:
1952-2000 ई. को समयावधि में सकल घरेलू उत्पाद का शिक्षा व्यय का प्रतिशत 0-64 से बढ़कर 4.2 हो गया।

प्रश्न 15.
शिक्षा पर कुल व्यय का बड़ा भाग किस प्रकार की शिक्षा (प्राथमिक, उच्च, उच्चतम) पर खर्च किया जाता है?
उत्तर:
प्राथमिक शिक्षा पर।

प्रश्न 16.
आन्तरिक प्रवजन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आन्तरिक प्रवास से अभिप्राय है देश के अंदर एक स्थान से दूसरे स्थान पर बसना।

प्रश्न 17.
हमारे देश में स्कूल स्तर पर शिक्षा क्रम को बीच में अधुरा छोड़ने वाले छात्रों की संख्या बहुत अधिक है। इसके दो दुष्प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  1. इससे बाल श्रम को बढ़ावा मिलता है।
  2. मानव पूँजी को हानि होती है।

प्रश्न 18.
भारत में 1990 ई. में पुरुषों की प्रौढ़ शिक्षा दर कितनी थी और 2000 ई. में यह कितनी हो गई?
उत्तर:
भारत में 1990 ई. में पुरुषों (15 से ऊपर) की प्रौढ़ शिक्षा दर पुरुषों की 61.9 प्रतिशत थी जो कि बढ़कर 2000 ई. में 68.4 हो गई।

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प्रश्न 19.
एक देश की शिक्षा में उपलब्धि किन-किन रूपों द्वारा मापी जा सकती है?
उत्तर:

  1. प्रौढ़ साक्षरता स्तर
  2. प्राथमिक शिक्षा की पूरी पढ़ाई, तथा
  3. युवा साक्षरता दर

प्रश्न 20.
भारत सरकार ने शिक्षा प्रसार के लिये कई कदम उठाये हैं। उनमें से कोई दो उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. उच्च शिक्षा के लिए काफी धनराशि की व्यवस्था तथा
  2. उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के लिये ऋण कार्यक्रम बनाये गये हैं

प्रश्न 21.
2004-05 ई. के केन्द्रीय बजट में भारत सरकार ने सभी संघीय करों पर कितना प्रतिशत शिक्षा शुल्क लगाया है और इससे कितनी राशि प्राप्त होने का अनुमान लगाया गया है?
उत्तर:
दो प्रतिशत 1 अनुमान लगाया गया है कि शिक्षा शुल्क से 4000-5000 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे।

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प्रश्न 22.
मानव संसाधनों से और अधिक मानव पूंजी उत्पन्न करने के लिये हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर:
मानव संसाधन से और अधिक मानव पूंजी उत्पन्न करने के लिये हमें मानव पूँजी में निवेश करना चाहिए।

प्रश्न 23.
कौन व्यक्ति अच्छा कार्य कर सकता है एक रोगी पुरुष या एक स्वस्थ व्यक्ति?
उत्तर:
एक स्वस्थ व्यक्ति।

प्रश्न 24.
काम से अनुपस्थित रहने पर उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है दूसरे शब्दों में उत्पादन में हानि होती है।

प्रश्न 25.
निरोधात्मक दवाइयों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निरोधात्मक दवाइयों से अभिप्राय उन दवाइयों से है जिनके सेवन से रोग पर रोक लगती है। जैसे-टीकाकरण।

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प्रश्न 26.
रोगहर दवाइयों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रोगहर दवाइयों से अभिप्राय उन दवाइयों से है जो रोग का निवारण करने के लिये रोगी को दी जाती है।

प्रश्न 27.
सामाजिक दवाइयों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सामाजिक दवाइयों से अभिप्राय है-स्वास्थ्य साक्षरता का प्रसार करना।

प्रश्न 28.
केरल की साक्षरता दर बताइए।
उत्तर:
केरल की साक्षरता दर लगभग शत-प्रतिशत है।

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प्रश्न 29.
भौतिक पूँजी और मानवीय पूँजी में एक अंतर लिखें।
उत्तर:
भौतिक पूँजी दृश्य है और यह अन्य वस्तुओं की तरह बाजार में सरलता से बेची जा सकती है, परंतु मानवीय पूँजी अदृश्य है। इसे बाजार में नहीं बेचा जा सकता केवल इसकी सेवाओं को ही बेचा जा सकता है।

प्रश्न 30.
किस प्रकार की पूँजी (भौतिक पूँजी या मानवीय पूँजी) को अपने स्वामी से पृथक किया जा सकता है?
उत्तर:
भौतिक पूँजी को अपने स्वामी से पृथक किया जा सकता है।

प्रश्न 31.
विभिन्न देशों में कौन सी पूँजी (भौतिक पूँजी या मानवीय पूँजी) पूर्णतः गतिशील है?
उत्तर:
भौतिक पूँजी।

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प्रश्न 32.
शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शिक्षा से अभिप्राय है-दिमाग, ज्ञान का भण्डारण करना और इसके बारे में बातें तथा वाद-विवाद द्वारा इसका सम्प्रेषण करना।

प्रश्न 33.
क्या मनुष्य केवल शिक्षा से सहारे जीवित रह सकता है?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 34.
मनुष्य शिक्षा पर खर्च क्यों करता है?
उत्तर:
मनुष्य शिक्षा पर खर्च इसलिये करता है क्योंकि शिक्षा उसे अधिक अर्जन करने के लिये समर्थ बनाती है और समाज में उसका सामाजिक स्तर ऊपर उठाती है।

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प्रश्न 35.
अर्थशास्त्रियों ने एक राष्ट्र में शैक्षणिक अवसरों के विस्तार पर क्यों बल दिया है?
उत्तर:
क्योंकि शिक्षित समाज निरक्षर समाज की अपेक्षा विकास की अच्छी सुविधायें प्रदान करता है।

प्रश्न 36.
स्वास्थ्य में निवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्वास्थ्य में निवेश से अभिप्राय है-निरोधात्मक दवाइयों, रोगहर तथा सामाजिक दवाइयों, शुद्ध पेयजल तथा सफाई की व्यवस्था पर होने वाले व्यय।

प्रश्न 37.
स्वास्थ्य में निवेश क्यों किया जाता है?
उत्तर:
श्रमिकों को स्वस्थ रखने और उनको दीर्घ काल के लिये काम करने के योग्य बनाने के लिये स्वास्थ्य में निवेश किया जाता है।

प्रश्न 38.
स्वास्थ्य पर निवेश (व्यय) को मानव पूँजी निर्माण का स्रोत क्यों माना जाता है।
उत्तर:
क्योंकि स्वास्थ्य पर व्यय स्वस्थ श्रम शक्ति की पूर्ति में वृद्धि करता है।

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प्रश्न 39.
प्रशिक्षण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्रशिक्षण का अर्थ है किसी विशिष्ट काम को करने के लिये कुशलता और ज्ञान देना। इससे काम की कुशलता बढ़ती है।

प्रश्न 40.
प्रशिक्षण से संगठन को होने वाले कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:

  1. प्रशिक्षण से उत्पादन में वृद्धि होती है।
  2. प्रशिक्षण से प्रचालन में मितव्ययिता आती है।

प्रश्न 41.
कार्य-स्थल पर प्रशिक्षण (On the job training) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कार्यस्थल पर प्रशिक्षण से अभिप्राय है, कार्यरत श्रमिकों को पर्यवेक्षक द्वारा कार्यस्थल पर ही प्रशिक्षण देना। दूसरे शब्दों में प्रशिक्षण की इस पद्धति के अन्तर्गत श्रमिक काम को वास्तविक परिवेश में सीखता है। यह पद्धति प्रचालन कर्मचारियों की सबसे प्रभावी पद्धति है।

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प्रश्न 42.
कार्यस्थल पर प्रशिक्षण व्यय किस प्रकार मानव पूँजी निर्माण का एक स्रोत है?
उत्तर:
क्योंकि प्रशिक्षित श्रमिकों से उत्पादकता में वृद्धि हो जाती है और इस बढ़ी हुई उत्पादकता से होने वाले लाभ प्रशिक्षण पर होने वाले व्यय से अधिक होते हैं।

प्रश्न 43.
स्वस्थ रहने से क्या लाभ हैं?
उत्तर:
स्वस्थ रहने से मनुष्य की कार्यकुशलता तथा उत्पादकता में वृद्धि होती है। एक स्वस्थ व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से पूर्णतया कार्य करने योग्य होता है।

प्रश्न 44.
मानव पूँजी निर्माण किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानव संसाधनों में निवेश की क्रिया को मानव पूँजी निर्माण कहते हैं।

प्रश्न 45.
शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शिक्षा से अभिप्राय ज्ञान प्राप्त करना, ज्ञान को पुस्तकों में लिखना, ज्ञान का वार्तालाप, संगीत तथा वाद विवाद द्वारा प्रसारण करना।

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प्रश्न 46.
लोग शिक्षा पर पैसा क्यों खर्च करते हैं? एक कारण लिखें।
उत्तर:
लोग शिक्षा पर पैसा इसलिये खर्च करते हैं क्योंकि उन्हें इस बात की आशा होती है कि शिक्षा से उनमें निपुणता आ जायेगी और वे अपेक्षाकृत अधिक धन कमा सकेंगे।

प्रश्न 47.
शिक्षा से हम अधिक धन कमा सकते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा से हमें और भी कई लाभ प्राप्त होते हैं। कोई ऐसा लाभ बतायें।
उत्तर:
शिक्षा से समाज में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती है।

प्रश्न 48.
एक देश में मानव संसाधनों के दो प्रमुख स्रोत लिखें।
उत्तर:

  1. शिक्षा तथा
  2. स्वास्थ्य

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प्रश्न 49.
मानव संसाधनों के विकास से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानव संसाधनों के विकास का अभिप्राय है लोगों का जीवन अच्छा और सुरक्षित हो तथा मानसिक और भौतिक प्रतिभाओं का पूर्ण विकास हो।

प्रश्न 50.
मानव संसाधनों के विकास के लिये क्या आवश्यक है?
उत्तर:
मानव संसाधनों के विकास के लिये भोजन, पोषण, शिक्षा, प्रशिक्षण, जल-आपूर्ति आदि में सुधार आवश्यक है।

प्रश्न 51.
मानव संसाधनों से और अधिक मानव पूँजी उत्पन्न करने के लिये हमें किसमें निवेश करने की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
मानव संसाधनों से और अधिक मानव पूँजी उत्पन्न करने के लिये हमें मानव पूँजी में निवेश करने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 52.
शिक्षा मानव को किसमें परिवर्तित करती है?
उत्तर:
शिक्षा मानव को मानव पूँजी में परिवर्तित करती है।

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प्रश्न 53.
लक्षद्वीप तथा बिहार में प्रति व्यक्ति शिक्षा व्यय कितना है?
उत्तर:
लक्षद्वीप तथा बिहार में प्रति व्यक्ति शिक्षा व्यय क्रमशः 3440 रुपये तथा 386 रुपये है।

प्रश्न 54.
शिक्षा आयोग 1964-66 ई. ने शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का कितना प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी?
उत्तर:
शिक्षा आयोग 1964-66 ई. ने शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 6 प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी।

प्रश्न 55.
‘मानवीय पूँजी आर्थिक संवृद्धि लाती है’ यह सिद्ध करने के लिये अनुभव सिद्ध प्रमाण (Empirical Evidence) क्यों अस्पष्ट है? कारण लिखें।
उत्तर:
मापने के समस्याओं के कारण अनुभव सिद्ध प्रमाण अस्पष्ट है। उदाहरण के लिये स्कूल में बिताये गये वर्ष, अध्यापक-शिष्य अनुपात तथा नामांकन दर (Enrolmentation) शिक्षा की गुणवत्ता को नहीं दर्शा सकते। इसी प्रकार मुद्रा जीवन प्रत्याशा और मृत्यु दर एक देश के लोगों के वास्तविक स्वास्थ्य स्तर को नहीं दर्शा सकते।

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प्रश्न 56.
तृतीय स्तरीय शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तृतीय स्तरीय शिक्षा से अभिप्राय कॉलेज, विश्वविद्यालय तथा तकनीकी शिक्षा के स्तर से है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानव विकास हेतु शिक्षा क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
निम्न कारणों से शिक्षा मानव विकास के लिये अनिवार्य है –

  1. शिक्षा से मनुष्य का स्र्वांगीण विकास होता है।
  2. शिक्षा से मनुष्य निपुण कार्यकर्ता बन जाता है तथा अशिक्षित कार्यकर्ता से अधिक वेतन लेता है।
  3. शिक्षा से मनुष्य का सामाजिक स्तर बढ़ जाता है और उसकी समाज में प्रतिष्ठा होती है।
  4. शिक्षा प्राप्त करने से मनुष्य शराब पीना, जुआ खेलना आदि बुरी आदतों से बच जाता है।
  5. शिक्षा व्यक्ति को एक अच्छा नागरिक बनाने में सहायता करती है।

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प्रश्न 2.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में कौन-कौन सी गतिविधियाँ आती हैं?
उत्तर:
स्वास्थ्य के क्षेत्र में निम्नलिखित गतिविधियाँ आती हैं –

  1. जनसंख्या दवाइयों पर नियंत्रण
  2. नशीली दवाइयों पर नियंत्रण
  3. खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकना
  4. स्वास्थ्य हेतु मुख्य संक्रामक तथा गैर-संक्रामक रोगों का पूरी तरह से प्रतिरक्षण तथा निवारण

प्रश्न 3.
भौतिक तथा मानवीय पूँजी में अंतर बतावें।
उत्तर:
भौतिक तथा मानवीय पूँजी में अंतर –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 5 भारत में मानव पूँजी का निर्माण img 2

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विश्व में भारत का मानव विकास सूचकांक क्या है?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) विभिन्न देशों के लिए मानव विकास सूचकांकों का संकलन करता है। इसके लिए विश्वसनीय आँकड़े सुलभता से प्राप्त हो जाते हैं। विभिन्न मानव विकास रिपोर्ट में उपलब्ध राष्ट्रों में भारत की स्थिति नीचे दी गई सारणी से स्पष्ट है –
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 5 भारत में मानव पूँजी का निर्माण img 3

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 5 भारत में मानव पूँजी का निर्माण

प्रश्न 2.
मानव पूँजी और मानव विकास में अंतर बतावें।
उत्तर:
मानव पूँजी और मानव विकास में अंतर (Difference between Human Capital and Human Development):
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प्रश्न 3.
मानवीय पूँजी के विभिन्न स्रोत कौन-कौन से हैं? समझाइये।
उत्तर:
मानवीय पूँजी के विभिन्न स्रोत इस प्रकार हैं –

1. शिक्षा में निवेश (Investment in education):
शिक्षा में निवेश मानवीय पूँजी का एक स्रोत माना जाता है। शिक्षा मनुष्य को विवेकशील तथा तर्कशील बनाती है तथा उसकी सामान्य सूझ को विकसित करती है। शिक्षा से मनुष्य का दृष्टिकोण वैज्ञानिक और औचित्यपूर्ण बनता है जो नई चीजों को समझने और अपनाने में सहायक होता है। शिक्षा से अर्जन-क्षमता बढ़ती है। इससे समाज में सामाजिक स्तर ऊँचा होता है और लोगों को शिक्षित होने का गौरव प्राप्त होता है।

2. स्वास्थ्य में निवेश (Investment in Health):
शिक्षा और प्रशिक्षण से मनुष्य की मानसिक प्रतिभाओं का विकास होता है परंतु स्वास्थ्य और पोषण से मनुष्य की शारीरिक क्षमताओं का विकास होता है। स्वास्थ्य का संबंध केवल रोग निवारण से नहीं, अपितु इससे कहीं अधिक है। स्वास्थ्य का संबंध शारीरिक एवं मानसिक सुख एवं कल्याण से है। एक स्वस्थ व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से पूर्णतया कार्य करने योग्य होता है।

हम जानते हैं कि एक स्वस्थ मनुष्य रोगी पुरुष की अपेक्षा अच्छा काम कर सकता है। एक रोगी कार्यकर्ता जिसके पास चिकित्सा सुविधाएँ नहीं हैं कई दिन काम पर नहीं आ सकता परिणामस्वरूप उत्पादन में कमी आयेगी। यदि वह कार्यकर्ता या सरकार उसकी बीमारी को ठीक करने पर व्यय करती है तब वह शीघ्र ही कार्य करने योग्य हो जायेगा।

अतः स्वास्थ्य मानव पूंजी निर्माण का एक आवश्यक साधन है। स्वास्थ्य व्यय के मुख्य घटक हैं-टीकाकरण, रोग ठीक करने वाली दवाइयाँ, शुद्ध जल की व्यवस्था और वे सब प्रकार के व्यय जो श्रमिकों को स्वस्थ रखने के लिये तथा लंबे समय तक काम करने के योग्य बनाने के लिए किये जाते हैं। स्वास्थ्य व्यय, स्वस्थ श्रम शक्ति की पूर्ति को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ाते हैं। अत: स्वास्थ्य पर व्यय (निवेश) मानव पूंजी निर्माण का एक साधन है।

3. कार्य प्रशिक्षण पर व्यय (Expenditure on the job traning to labourers):
कार्य स्थल पर प्रशिक्षण में अभिप्राय श्रमिकों को उसके आसन्न पर्यवेक्षक द्वारा कार्यस्थल पर ही प्रशिक्षण देना है। दूसरे शब्दों में प्रशिक्षण की इस विधि के अन्तर्गत श्रमिक काम को वास्तविक परिवेश में सीखता है। यह प्रशिक्षिण दो प्रकार से दिया जा सकता है –

  1. अपने कारखने में ही तथा
  2. कारखाने से परे अन्य स्थानों पर। दोनों ही स्थितियों में कर्मचारी का मालिक ही व्यय करता है। बाद में मालिक इस व्यय को कर्मचारी की उत्पादकता से होने वाले अतिरिक्त लाभ से पूरा कर लेता है।

4. प्रवजन पर व्यय (Expenditure on Migration):
प्रवजन से अभिप्राय नौकरी की तलाश में, अधिक आय को प्राप्त करने के लिए या व्यावसायिक अवसर अधिक होने के कारण एक स्थान (देश) से दूसरे स्थान (देश) जाना । यह देशान्तरण आन्तरिक भी हो सकता है और विदेशी भी। देश के एक भाग से देश के दूसरे भाग में नौकरी की तलाश आदि के लिये जाने को आन्तरिक देशांतर कहते हैं। भारत में गाँव से लोग नौकरी प्राप्त करने के लिये काफी संख्या में निरंतर आ रहे हैं।

विदेशी प्रवसन उस देशांतर को कहते हैं जब एक देश के लोग (भारतीय) नौकरी प्राप्त करने के लिये दूसरे देश में जाते हैं। इन दोनों प्रकार के देशांतर में परिवहन व्यय आता है। जिस देश में भारतीय जाते हैं, वहाँ पर रहने की लागत अधिक होती है। अपरिचित सामाजिक तथा सांस्कृतिक ढाँचे में रहने के कारण मानसिक लागत आती है। परंतु विदेशों में बढ़ी हुई आय इन लागतों से अधिक होती है। अतः प्रवजन (migration) पर व्यय भी मानव पूँजी निर्माण का एक स्रोत (source) है।

5. सूचना प्राप्त करने पर व्यय (Expenditure incurred on getting education):
जिस प्रकार लोग शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं उसी प्रकार के श्रम बाजार तथा अन्य बाजारों के बारे में सूचना प्राप्त करने के लिये भी व्यय करते हैं। सूचनाओं से हमें पता चलता है कि विभिन्न नौकरियों पर क्या-क्या वेतन मिलता है। इससे हमें यह भी पता चलता है कि. कौन-सी शैक्षणिक संस्थायें हमें निपुणता प्रदान करती हैं जिससे हमें नौकरी मिल सके और उस निपुणता को प्राप्त करने में हमें कितना व्यय करना पड़ेगा।

मानव पूंजी में निवेश करने तथा प्राप्त मानव पूँजी स्टॉक का कुशलतापूर्वक प्रयोग करने के बारे में निर्णय लेने के लिये ये सूचनायें आवयश्क हैं। अतः श्रम बाजार तथा अन्य बाजार के बारे में सूचना लेने के लिये किये गये खर्चे भी मानव पूँजी निर्माण का एक स्रोत हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
शताब्दी के अन्त में भारत में साक्षर अनुपात था –
(a) 1/6
(b) 2/3
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 2/3

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प्रश्न 2.
वर्ष 2001 में भारत में साक्षरों की संख्या हो गई है –
(a) 57 करोड़
(b) 75 करोड़
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 57 करोड़

प्रश्न 3.
भारतवर्ष में शिक्षा पर कुल व्यय सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत है –
(a) 4 प्रतिशत
(b) 4 प्रतिशत से ज्यादा
(c) 4 प्रतिशत से कम
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 4 प्रतिशत से कम

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प्रश्न 4.
हमारे देश में शिक्षा प्रणाली लागू है –
(a) 10 + 2 + 2
(b) 10 + 2 + 3
(c) 11 + 3
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 10 + 2 + 3

प्रश्न 5.
भारत में वर्तमान जीवन प्रत्याशा है –
(a) 65 वर्ष
(b) 70 वर्ष
(c) 60 वर्ष
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 65 वर्ष

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प्रश्न 6.
ग्रामीण क्षेत्र में जिला स्तर पर स्वास्थ्य की देखभाल करता है –
(a) स्वास्थ्य उपकेन्द्र
(b) स्वास्थ्य केन्द्र
(c) सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र

प्रश्न 7.
ओरल पोलियो टीका दिया जाता है –
(a) पोलियो
(b) डिफथेरिया
(c) अधापन रोकथाम के लिए
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) पोलियो

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प्रश्न 8.
वर्ष 1994 भारत में प्लेग फैला था –
(a) दिल्ली में
(b) सूरत में
(c) भोपाल में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) सूरत में

प्रश्न 9.
भारत में चेचक उन्मूलन का वर्ष है –
(a) 1967
(b) 1977
(c) 1987
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 1977

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प्रश्न 10.
1991 में भारत में आवासों की कुल कमी है –
(a) 38 लाख
(b) 31 लाख
(c) 8 लाख
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 38 लाख

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता

Bihar Board Class 11 Economics निर्धनता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निर्धनता की परिभाषा दें।
उत्तर:
निर्धनता को न्यूनतम उपभोग आवश्कताओं को पूरा करने में असर्मथता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, निर्धनता से अभिप्राय जीवन, स्वास्थ तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की प्राप्ति की असमर्थता है।

प्रश्न 2.
काम के बदले अनाज कार्यक्रम का क्या अर्थ है?
उत्तर:
काम के बदले अनाज कार्यक्रम का अर्थ उस कार्यक्रम से है जिसके अन्तर्गत श्रमिकों को काम के बदले नकदी न देने के स्थान पर एक निश्चित मात्रा में अनाज देना है।

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प्रश्न 3.
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार का एक-एक उदाहरण दें?
उत्तर:
ग्रामीण स्वरोजगार का एक उदाहरण-मुर्गीपालन । शहरी स्वरोजगार का एक उदाहरण-फोटोस्टेट की दुकान।

प्रश्न 4.
आय अर्जित करने वाली परिसम्पत्तियों के सृजन से निर्धनता की समस्या का सामाधान किस प्रकार हो सकता है?
उत्तर:
आय अर्जित करने वाली परिसम्पत्तियों के सृजन से रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। रोजगार मिलने से निर्धनता की समस्या का सामाधान किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
भारत सरकार द्वारा निर्धनता पर त्रि-आयामी प्रहार की संपेक्ष में व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत सरकार ने निर्धनता निवारण के लिए त्रि-आयामी नीति अपनाई। इस त्रि-आयामी निति का वर्णन आगे किया गया है –

1. संवृद्धि आधारित निति-यह नीति इस आशा पर आधारित है कि आर्थिक संवृद्धि के अर्थत् सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय की तीव्र वृद्धि के पूर्वार्द्ध प्रभाव समाज के सभी वर्गों तक पहुँच जायेंगे।

1950 से 1960 ई० के दशक के पूर्वार्द्ध में हमारी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य यही था। यह माना जा रहा था कि तीव्र गति दर औद्योगिक विकास और चुने हुए क्षेत्रों में हरित क्रांति के माध्यम से कृषि का पूर्ण कायकल्प निश्चित ही समाज के अधिक पिछड़े वर्गों को लाभान्वित करेगा परन्तु यह रणनीति निर्धनता उन्मूलन में सफल नहीं रही।

2. जनसंख्या की वृद्धि क परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय में बहुत ही कमी आई। कृषि तथा उद्योग क्षेत्रों में स्वांगीण वद्धि अधिक प्रभावशाली नहीं रही। धनी तथा निर्धन के बीच की खाई और भी बढ़ गई। आर्थिक संवृद्धि के लाभ निर्धनों तक नहीं पहुँच पाये।

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प्रश्न 6.
सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं के सहायतार्थं कौन से कार्यक्रम अपनाये हैं?
उत्तर:
सरकार बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं को निर्वाह के लिए पेंशन देती है।

प्रश्न 7.
क्या निर्धनता और बेरोजगारी के बीच कोई सम्बन्ध है? समझाए?
उत्तर:
निर्धनता से अभिप्राय है जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्रप्ति की आयोग्ता। निर्धनता के कारणों में बेरोजगारी को भी सम्मिलित करते है। बेरोजगारी वह स्थिति है जब श्रमिक प्रचलित मजदूरी पर काम करना चाहते हैं लेकिन काम नहीं मिलता है। जब देश की श्रम शक्ति बेरोजगारी के कारण बेकार रहती है, ते आय एवं क्रय शक्ति का स्तर गिर जाता है। जिससे निर्धनता बढ़िती है। इस विवरण से स्पष्ट है कि निर्धनता और बेरोजगारी में संबंध है।

प्रश्न 8.
सापेक्ष और निरपेक्ष निर्धनता में क्या अन्तर है?
उत्तर:
सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों तथा दूसरे देशों की तुलता में पाई जाने वाली निर्धनता है। जबकि निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता की माप से है।

प्रश्न 9.
मान लिजिए आप एक निर्धन परिवार से हैं और छोटी सी दुकान खोलने के लिए सरकारी सहायता प्राप्त करना चाहते हैं। आप किस योजना के अन्तर्गत आवेदन देंगे और क्यों?
उत्तर:
मैं निर्धन परिवार से हूँ और मैंने 10वीं कक्षा उत्तीर्ण कर रखी है। मैं छोटी से दुकान खोलने के लिए शिक्षित बेरोजगार ऋण के लिए आवेदन करँगा। क्योंकि शासन की ओर से इस पर 25% सब्सिडी (सहायिकी) प्राप्त होगी।

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प्रश्न 10.
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अन्तर स्पष्ट करें। क्या यह कहना सही होगा कि निर्धनता अनुपात प्रवृति का प्रयोग करें।
उत्तर:
ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अन्तर (Difference between Rural unemployment and Urban unemployment):
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी एवं अल्प बेरोजगारी एक साथ विद्यमान होती हैं और उनके बीच स्पष्ट विभेद करना सम्भव नहीं होता। ग्रामीण क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि से भूमि पर जनसंख्या का भार बढ़ जाता है। भूमि पर जनसंख्या बढ़ने पर कृषकों की संख्या बढ़ जाती है। जिसके कारण प्रच्छन्न बेरोजगारी की मात्रा में वृद्धि होती है। यहाँ पर शहरी क्षेत्रों की तरह खुली बेरोजगारी नहीं पाई जाती। यहाँ पर मौसमी बेरोजगारी भी पाई जाती है।

इसके विपरीत शहरी क्षेत्र में खुली बेरोजगारी पाई जाती है। शहरों में अशिक्षितों की अपेक्षा शिक्षित बेरोजगारों की संख्या अधिक होती है। इसका कारण यह है कि जितनी संख्या में लोग शिक्षा प्राप्त करते है, उतनी मात्रा में सेवा क्षेत्र का विस्तार नहीं हो पाता। इसलिए मध्यम वर्ग में शिक्षित बेरोजगार की समस्या गम्भीर रूप धारण करती जा रही है। संपेक्ष में हम कह सकते हैं कि भारत में ग्रामीण क्षेत्र में प्रमुख रूप से अल्प रोजगार, मौसमी बेरोजगारी तथा प्रच्छन्न बेरोजगारी पायी जाती है जबकि शहरी क्षेत्र में खुली बेरोजगारी पाई जाती है।
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 4 निर्धनता img 1

निर्धनता का गाँवों से शहर में आना:
इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्रामीण क्षेत्रों की निर्धनता अब शहरों की ओर भी आ गई है। जनसंख्या में वृद्धि होने के कारण कृषकों की आर्थिक दशा प्रतिदिन बिगड़ती जाती हैं। जिसके कारण बड़ी जनसंख्या की यह गतिशीलता शहरी आकर्षण का परिणाम नहीं अपितु ग्राम में रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध न होने के कारण इन्हें गाँवों से शहर की ओर धकेल दिया। परिणाम स्वरूप निर्धनता गाँव शहर की ओर बढ़ी। इस बात की पृष्टि अग्रलिखित तालिका से की जा सकती है –

गरीबी अनुपात
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 4 निर्धनता img 2
स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2004-2005 ई०।

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प्रश्न 11.
भारत के कुछ राज्यों में निर्धनता रेखा के नीचे की जनसंख्या का प्रयोग करके सापेक्ष निर्धनता की आवश्यकता स्पष्ट करें।
उत्तर:
नीचे चार्ट में निर्धनता की राज्य स्तरीय प्रवुतियाँ दिखाई गई हैं।
भारत में निर्धनता की प्रवृत्तियाँ 1973 – 2000
निर्धनों की संख्या (मिलियन)
Bihar Board Class 11 Economics Chapter - 4 निर्धनता img 3
चित्र से स्पष्ट है कि भारत में 70% निर्धन केवल पाँच राज्यों में सीमित हैं। ये राज्य हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा। 1973-74 में तो इन राज्यों की आधी से अधिक जनसंख्या निर्धनता रेखा से निचे रह गये थे। यद्यपि इन राज्यों में भी निर्धनता का अनुपात कम हुआ है, परन्तु अन्य राज्यो के अपेक्षा उनकी सफलता न के बराबर है। यदि गुजरात को देखें तो वहाँ 1973-2000 के बीच निर्धनता रेखा से नीचे का अनुपात 48% से कम होकर 15% रह गया है। इस अवधि (1973-2000) में पश्चिमी बंगाल की सफलता भी महत्त्वपूर्ण रही सफलता मिली है।

प्रश्न 12.
मान लिजिए कि आप किसी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव से निर्धनता निवारण के कुछ प्रस्ताव दीजिए।
उत्तर:
गाँव से निर्धनता निवारण के प्रस्ताव-गाँव में निर्धनता के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं –

  1. भूमि का विकास किया जाय।
  2. खेती में श्रम-प्रधान विधियों का अधिक उपयोग किया जाए।
  3. पशु-धन का विस्तार किया जाए।
  4. कृषि का विविधीकरण किया जाए।
  5. शिक्षा, आवास, स्वास्थ सेवाएँ आदि का विकास किया जाए।
  6. कृषिजन्य उद्योगों का विकास किया जाए।

Bihar Board Class 11 Economics निर्धनता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निर्धनता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निर्धनता से अभिप्राय है जीवन, स्वास्थ तथा कार्य कुशलता के लिए न्यूनतम उपयोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता।

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प्रश्न 2.
न्यूनतम मानवीय आवयश्कताओं में किन-किन को शामिल किया जाता है?
उत्तर:
न्यूनतम मानवीय आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम मानवीय आवश्यकतायें शामिल होती है।

प्रश्न 3.
न्यूनतम मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से मनुष्य पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
न्यूनतम मानवीय आवश्कताओं को पूरा न होने से मनुष्य को कष्ट होता है। उसके स्वास्थ तथा भविष्य में निर्धनता से छुटकारा पाना कठिन हो जाता है।

प्रश्न 4.
निर्धनता शब्द का प्रयोग किन दो अर्थों में किया जाता है?
उत्तर:
निर्धनता शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है –

  1. सापेक्ष निर्धनता (Relative – povert) तथा
  2. निरपेक्ष निर्धनता (Absolute proverty)।

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प्रश्न 5.
सापेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय विभिन्न वर्गों, प्रदेशों की तुलना में पाई जाने वाली निर्धनता है। सापेक्ष निर्धनता में हम आय के वितरण पर विचार करते हैं। जिस देश या वर्ग के लोगों का जीवन निर्वाह स्तर नीचा होता है उन्हें उच्च निर्वाह स्तर के लोगों की तुलना में सापेक्ष रूप से निर्धन माना जायेगी।

प्रश्न 6.
निरपेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय किसी देश की आर्थिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए निर्धनता की माप से है। वह सामान्य जीवन की आवश्यकतायें जुटाने के लिये संसाधनों के अभाव को इंगित करता है।

प्रश्न 7.
अधिकांश देशों में किस आधार पर निर्धनता का अनुमान लगाने का प्रत्यन किया जाता है?
उत्तर:
अधिकांश देशों में प्रति व्यक्ति उपभोग की जाने वाली न्यूनतम कैलोरी की मात्रा या इनके उपभोग क लिये आवश्यक प्रति व्यय के आधार पर निर्धनता का अनुमान लगाने का प्रयत्न किया जाता है।

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प्रश्न 8.
भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए किस धारणा का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
भारत में निरपेक्ष निर्धनता का अनुमान लगाने के लिए निर्धनता रेखा की धारणा का प्रयोग किया जाता है। निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोग निर्धन कहलाते हैं।

प्रश्न 9.
निर्धनता रेखा किसे कहते हैं?
उत्तर:
निर्धनता रेखा से अभिप्राय उस रेखा से है जो प्रतिव्यक्ति औसत मासिक व्यय को प्रकट करती है जिसके द्वारा लोग अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की संतुष्टि कर सकें। इस रेखा के नीचे लोगों की निर्धन माना जाता है।

प्रश्न 10.
भारत में किस आधार पर निर्धनता रेखा को परिभाषित किया गया है?
उत्तर:
भारत में न्यूनतम दैनिक कैलोरी की मात्रा के आधार पर निर्धनता रेखा को परिभाषित किया गया है।

प्रश्न 11.
भारत के कितने लोग निर्धनता रेखा से नीचे रह रहे हैं?
उत्तर:
भारत में वर्तमान में लगभग 22 प्रतिशत लोग निर्धनता रेख से नीचे रह रहे हैं।

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प्रश्न 12.
भारत के किस राज्य में निर्धनता रेखा से नीचे जनसंख्या का प्रतिशत सबसे कम है?
उत्तर:
पंजाब राज्य में।

प्रश्न 13.
उन राज्यों के नाम बनायें, जहाँ लगभग रेखा से नीचे जनसंख्या का प्रतिशत सबसे कम है?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल तथा उड़ीसा में लगभग 70% लोग निर्धनता रेखा से नीचे रहते हैं।

प्रश्न 14.
1999-2000 में किन दो राज्यों के लोग निर्धनता रेखा के पास पाये गये?
उत्तर:
बिहार और उड़ीसा राज्य में।

प्रश्न 15.
1973 में गुजरात में कितने प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा के नीचे रहते थे?
उत्तर:
1973 में गुजरात में 48% लोग निर्धनता रेखा के नीचे रहते थे।

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प्रश्न 16.
1973-2000 में निर्धनता रेखा के नीचे रहने वाले लोगों में कितना प्रतिशत की कमी आई?
उत्तर:
15%

प्रश्न 17.
शहरी क्षेत्र में निर्धारित कैलोरी की मात्रा बतायें जिसके आधार पर निर्धन जनसंख्या का प्रतिशत किया जाता है।
उत्तर:
2100 कैलोरी।

प्रश्न 18.
ग्रामीण क्षेत्र में निर्धारित कैलोरी की मात्रा बताइये जिसके आधार पर निर्धन जनसंख्या का प्रतिशत निर्धारित किया जाता है।
उत्तर:
2400 कैलोरी।

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प्रश्न 19.
भारत में दो निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रमों के नाम बताइये।
उत्तर:

  1. जवाहर रोजगार योजना, तथा
  2. एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम

प्रश्न 20.
भारत में फैली भंयकर गरीबी के संकेत लिखें।
उत्तर:
भारत में फैली भंयकर गरीबी के संकेत हैं-शहरों में बढ़ती झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों का उमड़ता जमघट, पटरियों और नालों को अपना शयन कक्ष समझने वाला बढ़ता वर्ग, धूल, कीचड़ और गन्दी नालियों में खेलता बचपन।

प्रश्न 21.
किस व्यक्ति का निर्धन व्यक्ति कहते है?
उत्तर:
उस व्यक्ति को निर्धन व्यक्ति कहते हैं, जो जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्य के लिये न्यूनतम उपयोग आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ होता है।

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प्रश्न 22.
अप्रैल 1989 में किन दो कार्यक्रम ‘जवाहर रोजगार योजना’ आरम्भ किया गया?
उत्तर:
अप्रैल 1989 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP) और ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारन्टी कार्यक्रम (RLEGP) को मिलकर एक नया कार्यक्रम, “जवाहर रोजगार योजना” आरंभ किया गया।

प्रश्न 23.
निर्धनता उन्मूलन के निम्नलिखित उपक्रम कब आरंभ किये गये?
उत्तर:

  1. 15 अगस्त 1983
  2. अगस्त 1983 तथा
  3. अप्रैल 1989

प्रश्न 24.
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में 100 दिन का रोजगार कब कानूनी अधिकार बना?
उत्तर:
राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र में 100 दिन का रोजगार 2 फरवरी 2006 ई. को कानूनी अधिकार बना।

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प्रश्न 25.
योजना आयोग ने किस आधार पर निर्धनता रेखा को परिभाषित किया है?
उत्तर:
भारत के योजना आयोग ने कैलारी-पान के अधार पर गरीबी रेखा को परिभाषित किया है।

प्रश्न 26.
शहरी क्षेत्र मे कौन निरन्तर (लगातार) निर्धनता बनाये हुए हैं?
उत्तर:
शहरी क्षेत्र में ठेला चलाने वाले, गली में एक तरफ बैठने वाले मोची, भिखारी, फूलों का हार बनाने वाली स्त्रियाँ, सिर पर टोकरी रखकर सामान बेचने वाले, कचरा आदि बुनने वाले शहरों क्षेत्रों में लगातार निर्धनता बनाये हुए हैं।

प्रश्न 27.
1999-2000 ई. में ग्रमीण क्षेत्र तथा शहरी क्षेत्र के लिये निर्धनता रेखा कैसे परिभाषित की गई थी?
उत्तर:
1999-2000 ई. में ग्रामीण क्षेत्र के लिये निर्धनता प्रति व्यक्ति 325 रुपये मासिक उपभोग तथा शहरी क्षेत्र के लिये प्रति व्यक्ति 454 रुपये मासिक उपभोग के रूप में परिभाषित की गई थी।

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प्रश्न 28.
शहरी क्षेत्र में पांच सदस्य वाले एक परिवार का मासिक उपभोग व्यय 2000 रुपये है। क्या यह परिवार निर्धनता रेखा के नीचे रह रहा है?
उत्तर:
हाँ; यह परिवार निर्धनता रेखा के नीचे रह रहा है क्योंकि यहाँ पर प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 400 रुपये है जो 454 रुपये से कम है।

प्रश्न 29.
निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम किस पंचवर्षीय योजना से आरम्भ किया गया था?
उत्तर:
निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम तृतीय पंचवर्षीय योजना से आरम्भ किया गया था।

प्रश्न 30.
प्रधानमंत्री रोजगार (PMRY) का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
प्रधानमंत्री रोजगार, योजना का उद्देश्य ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र के निम्न आय परिवार के शिक्षित बेरोजगारों को आर्थिक सहायता देना था ताकि वे अपना छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू कर सके।

प्रश्न 31.
स्वर्ण जयन्ती रोजगार योजना (SJSRY) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
स्वर्ण जयन्ती रोजगार योजना का मुख्य उद्देश्य है शहरी क्षेत्र में रहने वाले बेरोजगारों के लिये स्वरोजगार (Self employment) तथा मजदूरी के बदले रोजगार (Wage employment) देने की व्यवस्था करना।

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प्रश्न 32.
ग्रामीण रोजगार उत्पन्न कार्यक्रम (REGP) का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
आर० ई० पी० का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में स्वरोगार के लिये अवसर उत्पन्न करना है।

प्रश्न 33.
स्वरोजगार कार्यक्रम के तीन उदाहरण है?
उत्तर:

  1. स्वर्ण जयन्ती रोजगार (SISRY)
  2. प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY) तथा
  3. ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (REGP)

प्रश्न 34.
स्वरोजगार योजना के अन्तर्गत 1990 से पूर्व वित्तीय सहायता किनको प्रदान की जाती थी?
उत्तर:
स्वरोजगार योजना के अन्तर्गत 1990 से पूर्व वित्तीय सहायता व्यक्तियों या व्यक्तिगत परिवारों को दी जाती थी।

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प्रश्न 35.
भारत में निर्धनता की कोई दो विशेषतायें लिखें।
उत्तर:

  1.  शहरी क्षेत्र में निर्धनता मुख्यत: ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता का परिणाम है।
  2. भारत में निर्धनता की मात्रा भिन्न-भिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न पाई जाती है।

प्रश्न 36.
कोई दो शहरी निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रधानमंत्री रोजगार योजना
  2. स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना

प्रश्न 37.
बेरोजगारी किस प्रकार निर्धनता से संबंधित है?
उत्तर:
निर्धनता के कारण काम करने वाले व्यक्ति पर आश्रितों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति उपभोग में कमी आ जाती है जो कि निर्धनता को इंगित करती है।

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प्रश्न 38.
वृद्धि लोगों तथा निर्धन महिलाओं की सहायता के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा कौन-सा कार्यक्रम आरंभ किया गया?
उत्तर:
वृद्ध लोगों तथा निर्धन महिलाओं की सहायता के लिये केन्द्रीय सरकार ने समाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme) आरम्भ किया।

प्रश्न 39.
देश में निर्धनता उन्मूलन के लिए सरकार ने अब तक कौन-कौन सी विधियाँ अपनाई?
उत्तर:
देश में निर्धनता उन्मूलन के लिये सरकार ने अब तक तीन विधियाँ अपनाई –

  1. आर्थिक विकास
  2. निर्धनता उन्मूलन कायक्रम तथा
  3. न्यूतम आवश्यकता कार्यक्रम

प्रश्न 40.
न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं (जैसे स्वास्थ्य सेवायें, पेयजल, विधुत, शिक्षा आदि) को उपलब्ध करवाना था। वह कार्यक्रम पांचवीं योजना के अन्तर्गत आरम्भ किया गया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आजकल किसान आत्महत्यायें क्यों कर रहे हैं?
उत्तर:
किसान अपने परिवार की आवश्यकताओं तथा भूमि जोतने के लिये महाजनों, साहूकारों तथा बैंको आदि (प्रायः किसान महाजनों से उधार लेते हैं क्योंकि बैंको की अपेक्षा उनसे ऋण लेना आसान होता है) से ऋण लेते हैं परन्तु वे ऋण वापस करने में असमर्थ होते हैं। साहूकरों से लिये गये ऋणों पर ब्याज की दर बहुत अधिक होती है। ऋण की राशि प्रतिदिन बढ़ती जाती है। किसान इन ऋणों को वापस देने में असमर्थ होते हैं। उनकी फसल बहुत कम होती है। वे फसलों की उचित कीमत भी नहीं प्राप्त कर पाते। प्राकृति विपदाओं से उनकी हालत और भी खराब हो जाती है। फलस्वरूप व अपने मानसिक संतुलन खो बैठता हैं और आत्महत्या कर लेते हैं।

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प्रश्न 2.
निर्धनता को दूर करने के लिए छः सुझाव दीजिए।
उत्तर:
निर्धनता को दूर करने के लिए कोई छः सुझाव (Six suggestions for the removel of proverty):

  1. निर्धनता को दूर करने के लिए सम्पति तथा आय के असमान वितरण को कम किया जाता चाहिए।
  2. लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास के लिये उपयुक्त सुविधाओं की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  3. सरकार को सभी को न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये खाद्यान्न, मकान, शिक्षा स्वास्थ, यातायात आदि की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
  4. जिन परिवारों में कोई रोजगार प्राप्त व्यक्ति नहीं है, उनके लिए समाजिक सहायता कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए।
  5. स्वरोजगार संबंधी कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  6. निर्धनता को दूर करने के लिए जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारे निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम इच्छित परिणाम क्यों न प्राप्त कर सके? कारण लिखें।
उत्तर:
इच्छित परिणाम लाने में असफल के कारण (Causes of not achieving desirable results):

  1. दरस्थ क्षेत्रों की अवहेलना की गई।
  2. जिला अधिकारिक तथा बैंक प्रबंधकों में असहयोग की प्रवृति।
  3. अधिकांश सरकारी अधिकारियों का भ्रष्ट होना।
  4. निर्धनता के अ. की तुलना में इन कार्यक्रमों पर आवाटित संसाधनों की राशि अपर्याप्त थी।
  5. भूमि तथा अन्य सापतियों का असमान वितरण।
  6. कार्यक्रम से होने वाले लाभ निर्धनों को न मिलना।
  7. संसाधनों का अनुशलता से प्रयोग किया जाना।
  8. सरकारी अधिकारियों का पूर्णतः प्रशिक्षित न होना।
  9. स्थानीय लोगों का दवाव।

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प्रश्न 4.
मान लो शहरी क्षेत्र में निर्धनता रेखा प्रतिमास प्रति व्यक्ति 454 रूपये है। शहर में रहने वाले एक 10 सदस्यीय परिवार को सब साधनों से कुल मासिक आय 75,000 रुपये है। बतायें कि वह परिवार निर्धन रेखा के नीचे है या ऊपर?
उत्तर:
10 सदस्यों की मासिक आय – 75,000 रुपये
1 सदस्य की मासिक आय = 75,000/10 = 7,500
यह आय निर्धनता रेखा प्रतिमाह प्रति व्यक्ति आय से अधिक है। अत: यह दस सदस्यीय परिवार निर्धनता रेखा से ऊपर है।

प्रश्न 5.
निर्धनों के बच्चे दीर्घायु क्यों नहीं होते हैं?
उत्तर:
निर्धनों के बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिलता। उन्हें सुरक्षित पेय जल उपलब्ध नहीं होता। प्रायः एक समय का खाना उपलब्ध होता है। गर्भवती स्त्रियों की ठीक प्रकार से देखभाल नहीं हो पाती। अत: नवजात शिशु अस्वस्थ तथा कमजोर होता है। इलाज करवाने तथा दवाइयाँ खरीदने के लिये उसके पास पैसे नहीं होते। उन्हें घातक रोग लग जाते हैं जो उनकी जल्दी मृत्यु का कारण बनते हैं। अतः निर्धनों के बच्चे दीर्घायु नहीं होते।

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प्रश्न 6.
अधिसूचित जिलों के परिवार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अर्न्तगत किन अधिकारों का उपभोग कर सकते हैं?
उत्तर:
अधिसूचित जिलों के परिवार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं –

  1. रोजगार की मांग करने का अधिकार।
  2. अनुरोध करने के 15 दिन के भीतर रोजगारी भत्ता पाने का अधिकार।
  3. अगर 15 दिन के अन्दर रोजगार न मिले तो बेरोजगार भत्ता पाने का अधिकार।
  4. राज्य में लागू मजदूरी की वैधानिक दर से मजदूरी पाने का अधिकार।
  5. कार्यस्थल पर नीचे का पानी, बच्चों के लिये आश्रम, प्राथमिक चिकित्सा जैसी सुविधायें। प्राप्त करने का अधिकार।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की विशेषताएँ (Features of National Rural Employment Guarantee Act):

  1. यह अधिनियम केवल एक कार्यक्रम ही नहीं अपितु एक कानून है जिसके अन्तर्गत रोजगार हासिल करने की कानूनी गारंटी दी गई है।
  2. इसके नियोजन तथा क्रियान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूनिका होगी।
  3. इसमें संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, सामाजिक लेखा परिक्षा और लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जायेगी।
  4. शिकायत निवारण प्रणाली की भी व्यवस्था की जायेगी।
  5. इसका लाभ उठाने वालों में से एक-तिहाई महिलाएँ होगी।
  6. अधिसूचित क्षेत्रों में अकुशल मजदूरों का कार्य करने का इच्छुक कोई भी व्यक्ति रोजगार के लिए ग्रामसभा में पंजीकरण हेतु आवेदन कर सकता है। इसके बाद उसे जॉब कार्ड Jokatest card) दे दिया जायेगा।
  7. जॉब कार्ड एक कानूनी दस्तावेज है जिसमें पंजीकृत व्यक्ति इस अधिनियम के अन्तर्गत रोजगार के लिये आवेदन करने का हकदार हो जाता है।
  8. पंजीकरण वर्ष भर खुला रहेगा।
  9. रोजगार आवेदक के घर से पाँच किलोमीटर के दायरे में दिया जायेगा। ऐसा संभव न होने पर अतिरिक्त मजदूरी दी जायेगी।

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प्रश्न 2.
भारत में निर्धनता के मुख्य कारण समझाइये।
उत्तर:
योजना आयोग्य ने भारत में बेरोजगारी, अल्प रोजगार और कमजोर साधन के आधार को गरीबी का प्रमुख कारण माना है –

  1. आर्थिक कारक (Economic Factors)
  2. सामाजिक कारक (social Factors)
  3. राजनैतिक कारक (Political Factors)

1. आर्थिक कारक (Economic Factors):

बेरोजगारी (Unemployment):
भारत में गरीबी का प्रमुख कारण देश में भीषण बेरोजगारी की समस्या है। इस समय देश में करीब 6. कारोड़ लोग बेरोजगार हैं।

जनसंख्या में तेजी से वृद्धि (Rapid) Growth in Population):
भारत में जनसंख्या का आकार न केवल बड़ा है, अपितु इसमें होने वाली वृद्धि होने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय एवं व्यक्ति आय एवं उपभोग स्तर में कोई खास वृद्धि नहीं हो रही है।

आय का असमान वितरण (Unequal Distribution of Income):
भारत में आय के असमान वितरण को गरीबी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

उत्पादन में कम वृद्धि (Lass increase in Production):
देश में योजना काल के दौरान कृषि व उद्योग क्षेत्रों में उत्पादन में जितनी वृद्धि होनी चाहिए थी, उतानी नहीं हुई। इसका प्रमुख कारण है भारत में पुरानी और घटियाँ उत्पादने विधियों का प्रयोग किया जाना।

कीमत स्तर पर वृद्धि (Rise in Price Levle):
भारत में कीमत स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही है। 1950-51 ई० से 1996-97 ई० तक की अवधि में सामान्य कीमत में 16 गुना वृद्धि हुई है। अतः क्रयशक्ति घट जाने से बहुत से लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये हैं।

कृषि का पिछड़ापन (liackwardness of Agriculture):
भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि प्रधान रही है लेकिन भारतीय कृषि की दशा अत्यन्न शोचनीय है। भारत में कृषि के पिछड़ेपन के कारण प्रति हेक्टेयर एवं प्रतिव्यक्ति उत्पादकता विश्व के विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम है। ऐसी स्थिति में किसानों का गरीब होना स्वाभाविक है।

2. सामाजिक कारक (Social Factors):
भारत में समाजिक ढांचा भी गरीब के लिए जिम्मेदार है। व्यापक निरक्षरता, अज्ञानता, भाग्यवाद, अन्धविश्वास आदि ने देश के आर्थिक विकास में बाधाएं उत्पन्न की है। लोग परिश्रम की बजाय भाग्य में अधिक विश्वास रखते हैं। समाजिक रीति-रिवाजों के कारण वे विवाह, मृत्युभोज आदि पर कई बार अपनी समार्थ्य से बाहर व्यय कर देते हैं।

3. राजनैतिक कारक (Political Factors):
भारत में लंबे समय तक अंग्रेजों का गुलाम रहा। अंग्रेजों ने अपने शासन काल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का खूब जमकर शोषण किया और इसके परम्परागत विश्व-विख्यात उद्योगों को पूर्णत: नष्ट कर दिया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भातीय अर्थव्यवस्था अत्यन्त निर्धन एवं पिछड़ी हुई दशा में थी जिससे अभी तक हम संभल नहीं पाए हैं।

Bihar Board Class 11th Economics Solutions Chapter 4 निर्धनता

प्रश्न 3.
जवाहर रोजगार योजना पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
28 अप्रैल, 1989 ई० को जवाहर रोजगार योजना आरंभ की गई है। इस योजना का लक्ष्य प्रत्येक निर्धन. ग्रामीण परिवार के कम से कम एक सदस्य को उसके घर के नजदीक कार्यस्थल पर प्रति वर्ष 50 से लेकर 100 दिनों तक रोजगार देना है। योजना की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. यह योजना केन्द्र प्रायोजित है जिसे राज्य सरकार द्वारा कार्यन्वित किया जाता है।
  2. जवाहर रोजगार योजना का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी तथा अल्प रोजगार वाले पुरूषों तथा महिलाओं के लिए अतिरिक्त लाभकारी रोजगार सृजन करना है।
  3. योजना पर होने वाल व्यय को केन्द्र तथा राज्यों द्वारा 80 व 20 के अनुपात में वहन किया जाता है।
  4. जवाहर रोजगार योजना के अन्तर्गत गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले लोग लक्षित समूह माने गए हैं।
  5. योजना के अन्तर्गत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मुक्त बन्धुआ मजदूरों को प्राथमिकता दी जाती है।
  6. रोजगार के 30 प्रतिशत अवसरों को महिलाओं के लिए आरक्षित रखा गया है।

प्रश्न 4.
गरीबी निवारण कार्यक्रमों को लागू करने की क्या आवश्यकता थी? इन्हे पहल क्यों नहीं आरम्भ किया?
उत्तर:
प्रारंभिक योजना काल में यह समझा गया था कि विकास के लाभ बेहतर मजदूरी, बेहतर रोजगार के अवसर, बेहतर उत्पादकता तथा अधिक उत्पादन के रूप में छनकर नीचे तक (percolate down) जाते हैं। ऐसा माना गया है कि 10% जनसंख्या (जो उत्पादक माध्यमों द्वारा अर्थव्यवस्था से सुसंबद्ध नहीं) के लिये विशेष प्रयासों की आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए खाद्यान्नों जैसी आवश्यक वस्तुओं को आर्थिक सहायता दी गई।

विलासिता उपभोग मदों की वस्तुओं पर ऊँची दरों पर कर लगाये गए। दूसरे शब्दों में पुनः वितरण की दशा में काफी प्रयास किये गये। साठ के दशक के मध्य तक यह स्पष्ट हो गया कि विकास तथा पुनः वितरण की दिशा में उठाने गये उपायों के परिणाम सीमित रहेंगे यदि कुछ व्यावसायिक स्तरों और सामाजिक वर्गों की सहायता करने के लिए कुछ विशेष संपूरक कार्यक्रम शुरू न किये गये। अतः गरीबी निवारण कार्यक्रमों को लागू किया गया।

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प्रश्न 5.
भारत में गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार ने कौन-कौन से कदम उठाए हैं? उनका संपेक्ष में वितरण दें।
उत्तर:
सरकार ने पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत निर्धनता को दूर करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित उपाय अपनाए हैं –
1. लघु तथा कुटीर उद्योग (Small and cottage Industries):
सरकार ने निर्धनता तथा बेरोजगारी को कम करने के लिए लघु तथा कुटीर उद्योगों के विकास के लिये विशेष प्रयत्न किये हैं। स्वयं रोजगार योजना (Self Employment Scheme) को प्रोत्साहन देने के लिए काफी धन व्यय किया जा रहा है।

2. जवाहर ग्राम समृद्धि (Jawahar-Gram Samridhi Yojana):
अप्रैल, 1999 से जवाहर रोजगार योजना के स्थान पर एक अन्य व्यापक योजना जवाहर ग्राम समृद्धि योजना आरंभ की गई है। इसके अन्तर्गत गाँवों में गरीबों को निरंतर रोजगार प्रदान करने के लिए स्थायी परिसम्पत्तियों तथा बुनियादी ढाचे का निमार्ण किया जायेगा। यह योजना ग्राम पंचायतों द्वारा लागू की जाती है।

3. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (Minimum Needs Programme):
पांचवी योजना में निर्धन लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम लागू किया गया है। वे हैं-प्रारंभिक शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, ग्रामीण स्वास्थ, ग्रामीण सड़कें आदि।

4. नेहरू रोजगार योजना (Nheru Employment Scheme):
श्री जवाहर लाल नेहरू का जन्म शताब्दी के अवसर पर सरकार ने शहरी क्षेत्र के निर्धन लोगों को रोजगार दिलाने के लिए नेहरू रोजगार योजना आरंभ की थी। इसके अन्तर्गत शहरी क्षेत्र के बेरोजगार व्यक्तियों को
रोजगार दिलाने की व्यवस्था की जाती है।

5. बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम (Twenty Point Programme):
आम जनता को खुशहाल बनाने तथा गरीबी के बंधन से मुक्त कराने के लिए नया बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम 1982 ई० से शुरू किया गया। इसकी प्रस्तावना में कहा गया, “निर्धनता के विरूद्ध सेघर्ष हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। 20 सूत्रीय कार्यक्रम योजना की वह तेज धार है जो निर्धनता को काट देगी।” संशोधित कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य गरीबी को दूर करना, उत्पादकता को बढ़ना, आय की असमानताओं में कमी और समाजिक एवं आर्थिक असमानताओं का निवारण कर जीवन स्तर – में वृद्धि लाना है।

6. प्रधानमंत्री रोजगार योजना (Prime Minister Rozgar yojana):
यह योजना शिक्षत बेरोजगारों युवाओं को रोजगार देने के लिए बनाई गई है। इस योजना के अन्तर्गत 1999 तक 9.7 लाख लोगों को रोजगार दिया गया।

7. रोजगार बीमा योजना (Employment Assurance Scheme):
यह योजना 1994 में आरंभ की गई। यह योजना सभी ग्रामीण खण्डों में लागू की जा रही है, जहाँ संशोधित सार्वजनिक वितरण प्रणाली प्रचलित है। इस योजना का लक्ष्य रोजगार को तलाश करने वाले ग्रामीण इलाकों में गरीब लोगों को विशेष रूप से कृषि संबंधी कार्य में मंदी वाले मौसम में रोजगार प्रदान करना है।

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प्रश्न 6.
स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना-पूर्व में चल रही छ: योजनाओं का विलय करके:

  1. समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRCP)
  2. स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण (ट्राइसेस)
  3. ग्रामीण महिला एवं बालोत्थान योजना
  4. दस लाख कूप निर्माण योजना (MWS)
  5. उन्नत टूल किट योजना (SITRA)
  6. गंगा कल्याण योजना 1 अप्रैल, 1999 से आरम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य सहायता प्राप्त गरीब परिवारों (स्वरोजगारी) को बैंक ऋण एवं सरकारी सब्सिडी के माध्यम से स्व-सहायता समूहों में संगठित करके गरीबी रेखा से ऊपर लाना है।

विशेषताएं (Features):
इस योजना की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित हैं –

  1. इस योजना (SGSY) का मुख्य उद्देश्य गाँवों के गरीब लोगों को स्वरोजगार के अवसर प्रदान कने के लिए लघु उद्योगों को बढ़ावा देना है।
  2. इस योजना के अंतर्गत गांवों में भारी संख्या में छोटे-छोटे लघु उद्योगों को बढ़ावा देना है।
  3. यह योजना छोटे उद्यमों का एक सम्पूर्ण कार्यक्रम है। इसके अन्तर्गत स्वरोजगार से संबंधित निम्नलिखित कार्यक्रम शामिल किये गये हैं –
    • ग्रामीण गरीबों को आत्मनिर्भर समूहों में संगठित करके उनकी क्षमता का निमार्ण करना।
    • इस कार्यक्रम के अन्तर्गत आने वाले लोगों को अपना उद्यम स्थापित करने के लिये बैंको से ऋण तथा सरकारी सहायता दी जायेगी।
    • इस योजना पर खर्च किया जाने वाला धन केन्द्रीय तथा राज्य सरकारें 75 : 25 के अनुपात में बाँटेंगी।
    • यहाँ योजना जिला ग्रामीण विकास एजेन्सियों द्वारा पंचायत समितियों के माध्यम से लागू क जायेगी।

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प्रश्न 7.
निर्धन परिवारों की कुछ विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
निर्धन परिवारों की विशेषताएँ (Characteristics ofpoor familles):
निर्धन परिवारों से अभिप्राय उन परिवारों से है जो जीवन, स्वास्थ्य तथा कार्य कुशलता के लिये न्यूनतम आवश्यकताओं को प्राप्त करने में असमर्थ हो। इन न्यूनतम आवश्यकताओं में भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम मानवीय आवश्यकताएं शामिल होती हैं। इन मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ती न होने से मनुष्य को पीड़ा होती है। स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता में हानि होती है। निर्धन परिवारों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. मकान (House):
निर्धन परिवारों के मकान प्रायः कच्चे होते हैं। इन घरों की दीवारें पकी हुई मिट्टी की बनी होती हैं और छते घास-फूस की बनी होती हैं। कई निर्धन परिवरों को यह भी नसीब नहीं होता। वे सांझी जमीन पर रहते हैं। बहुत अधिक निर्धन परिवारों के पास जमीन भी नहीं होती है।

2. सम्पत्ति (Assets):
निर्धन परिवारों क पास बहुत ही कम सम्पत्ति होती है। कई बार निर्धन परिवारों के पास तो रहने के लिये भी जमीन नहीं होती। वे प्रायः भूमिहीन होते हैं। उनकी आय इतनी कम होती है कि वे उस आय से अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर सकते। सबसे अधिक निर्धन परिवार तो भूख से मरते हैं। निर्धन व्यक्तियों को स्थायी रूप से रोजगार नहीं मिलता। उन्हें गैर-कृषि क्षेत्र में भी काम नहीं मिलता।

3. स्वास्थ (Health):
निर्धन परिवार प्रायः रोगों से घिरे होते हैं। दवाइयां लेने के लिये उनके पास पैसे नही होते। पौष्टीक भोजन खरीद नहीं सकते। निर्धन परिवारों में गैर-पौष्टिकता बहुत ही अधिक होती है। बुरा स्वास्थ्य, अपंगता तथा भयंकर बीमारियां उन्हें शरीरिक रूप से कमजोर बनाती हैं। इससे उनमें कार्य करने की शक्ति कम हो जाती है।

4. ऋणग्रस्त (Indebtness):
अल्प आय के कारण वे अपनी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते। वे इलाज कराने और खाद्य पदार्थ खरीदने के लिये साहूकारों (Moneylenders) से ऋण लेते हैं। वे सिर से पैर तक कर्ज में डूबे रहते हैं। एक बार ऋण लेने पर वे साहूकार के जाल में फंस जाते हैं।

5. शिक्षा (Education):
निर्धन परिवार के सदस्य अशिक्षित होते हैं। उन्होंने स्कूल का मुँह तक नहीं देखा। निर्धन परिवार के सदस्य बचपन से ही धन-अर्जन के लिये छोटा-मोटा काम करना आरंभ कर देते हैं। उनमें साक्षरता तथा निपुणता का अभाव होता है। वे अन्धविश्वासी, अज्ञानी तथा भाग्य में विश्वास रखने वाले होते हैं।

6. बड़ा परिवार (Big Families):
निर्धन परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होती है। वे छोटे परिवार के महत्त्व को नहीं समझते। निर्धन परिवारों में आश्रित सदस्यों की संख्या अधिक होती है। इन आश्रित सदस्यों में छोटे बच्चे, बूढ़े तथा बीमार लोग होते हैं।

7. सुविधाओं का अभाव (Lock of facilities):
निर्धन परिवरों में विधुत नहीं होती। वे खाना बनाने के लिये लकड़ी तथा गोबर का प्रयोग करते है। उन्हें पीने के लिए सुरक्षित पानी उपलब्ध नही होता।

8. अधिकतम लिंग भिन्नता (Extreme Gender Inequality):
निर्धनों परिवारों में लड़कों तथा लडकीयों में बहुत अन्तर समझा जाता है। स्कूल भेजने मे लड़कियों की अपेक्षा लड़को को अधिक महत्त्व दिया जाता है। परिवार में निर्णय लेने में पुरुषों का अधिक हाथ होता है। लड़कियों तथा औरतों के स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता।

9. अन्य विशेषताएँ (Other features):
अधिकांश निर्धन परिवारों को मत देने का अधिकार नहीं होता। वे शक्ति हीन तथा मूक होते है। वे सेवाओं तथा संसाधनों को उपलब्ध कराने में सरकार को प्रभावित करने में समर्थ नहीं होते। सरकार तक उनकी पहुँच नगण्य होती है। निर्धन व्यक्तियों का उनके मालिकों द्वारा शोषण किया जाता है।

निर्धनता के संदर्भ में Shaheen Rafi the Damian Killen लिखते हैं – “निर्धनता भूख है, निर्धनता रोग की अवस्था में डॉक्टर के पास जाने की असमर्थता है।”

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प्रश्न 8.
निर्धनता रेखा को कैसे निर्धारित किया जाता है?
उत्तर:
निर्धनता रेखा का निर्धारण (Determinationof Poverty Line):
निर्धनता दो आधार पर मापा जा सकता है –
1. पूर्ण रूप से तथा

2. सापेक्षिक रूप से। निर्धनता पूर्ण रूप से मापने के लिए पहले निश्चित किया जाता है कि एक व्यक्ति को कम से कम आवश्यकता कितने पदार्थों की है। दूसरा अनुमान यह लगाया जाता है कि उतने पैसे कितने व्यक्तियों के पास नहीं हैं। ऐसे सभी व्यक्ति निर्धनता रेखा के अन्तर्गत आते हैं, जिनके पास उपभोग की आवश्यक वस्तुओं को जुटाने के लिये साधन नहीं है।

3. भारत में निर्धारित न्यूनतम कैलोरी की मात्रा के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि कोई व्यक्ति निर्धन है या नहीं। वह व्यक्ति जिसके पास इतनी राशि उपलब्ध नहीं है जिससे वह उतनी वस्तुएं खरीद सके जिसके उपभोग करने पर. उसकी निर्धारित न्यूनतम कैलोरी की मात्रा उपलब्ध हो निर्धन कहलाता है। अथवा निर्धनता रेखा के नीचे आता है।

4. योजना आयोग ने निर्धनता रेखा के लिए वर्तमान अधार के अनुसार प्रति व्यक्ति के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 2400 कैलोरी प्रतिदिन और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलारी प्रतिदिन की मात्रा निर्धारित की है। 1999-2000 ई० में ग्रामीण क्षेत्र के लिए प्रतिमाह 328 रुपया के उपभोग तथा शहरी क्षेत्र के लिए प्रतिमाह 454 रुपये के उपभोग को निर्धारित रेखा के रूप में परिभाषित किया गया है।

5. मान लिजिए कि राम का परिवार शहर में रहता है। उसके 5 सदस्यों के परिवार का मासिक उपभोग व्यय 2000 रुपये हैं। ऐसी अवस्था में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 400 रुपये हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि राम का परिवार निर्धनता रेखा के नीचे रहता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नीति/योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए गरीबी रेखा का निर्धारण होना चाहिए –
(a) बहुत ऊँचा
(b) बहुत नीचा
(c) न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा

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प्रश्न 2.
भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण करने के लिए प्रयोग किया जाता है –
(a) आय को
(b) उपभोग को
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) उपभोग को

प्रश्न 3.
भारत में ग्रामीण लोगों के लिए आवश्यक कैलोरी मान है –
(a) 2400
(b) 2100
(c) 2500
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 2400

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प्रश्न 4.
शहरी भारतीयों के लिए आवश्यक औसत कैलोरी मान है –
(a) 2400
(b) 2100
(c) 2500
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 2100

प्रश्न 5.
1999-00 में ग्रामीण गरीबी का प्रतिशत था –
(a) 27.1
(b) 27.6
(c) 26.1
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 27.1

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प्रश्न 6.
1999-00 में भारत में गरीबी का स्तर था –
(a) 27.1
(b) 27.6
(c) 26.1
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 26.1

प्रश्न 7.
भारत वर्ष में विकास प्रखण्डों की संख्या है –
(a) 4000
(b) 5000
(c) 6000
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 4000

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प्रश्न 8.
समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम शरू किया गया –
(a) 1983 में
(b) 1980 में
(c) 1989 में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 1980 में

प्रश्न 9.
मजदूरी रोजगार कार्यक्रम एवं मजदूरी रोजगार योजना एकीकरण किया गया –
(a) 1983 में
(b) 1980 में
(c) 1989 में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) 1989 में

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प्रश्न 10.
मजदूरी रोजगार कार्यक्रम एवं मजदूरी रोजगार योजना एकीकरण करके नाम रखा गया –
(a) जवाहर रोजगार
(b) ग्रामीण समृद्धि योजना
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जवाहर रोजगार

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी पर जीवन Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं …………….
(क) केवल पौधे
(ख) केवल प्राणी
(ग) सभी जैव व अजैव जीव
(घ) सभी जीवित जीव
उत्तर:
(ग) सभी जैव व अजैव जीव

प्रश्न 2.
उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं …………….
(क) प्रेचरी
(ख) आयरन ऑक्साइड
(ग) सवाना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) सवाना

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प्रश्न 3.
चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है ……………..
(क) आयरन कार्बोनेट
(ख) आयरन ऑक्सइड
(ग) आयरन नाइट्राइट
(घ) आयरन सल्फेट
उत्तर:
(घ) आयरन सल्फेट

प्रश्न 4.
प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है ………………
(क) प्रोटीन
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) एमिनोएसिड
(घ) विटामिन्स
उत्तर:
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जीवधारियों के आपस में व उनका भौतिक पर्यावरण के अंतर्सम्बन्धों का वैज्ञानिक अध्ययन ही पारिस्थितिकी है। पारिस्थितिकी ही प्रमुख रूप से जीवधारियों के जन्म, विकास, वितरण, प्रवृत्ति व उनके लिए प्रतिकूल अवस्थाओं में भी जीवित रहने से सम्बन्धित है, तथा भूमि, जल और वायु में क्रियाशील ऊर्जा प्रवाह और पोषण श्रृंखला का भी अध्ययन पारिस्थितिकी है।

प्रश्न 2.
पारितंत्र (Ecological System) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएँ।
उत्तर:
किसी विशेष क्षेत्र में किसी विशेष समूह के जीवधारियों का भूमि, जल अथवा वायु (अजैविक तत्त्वों) में ऐसा अंतर्सम्बन्ध जिसमें ऊर्जा प्रवाह व पोषण श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से समायोजित हों, उसे पारितंत्र (Ecological System) कहा जाता है। प्रमुख पारितंत्र दो प्रकार के हैं-स्थलीय (Terrestrial) पारितंत्र व जलीय (aquatic) पारितंत्र। वन, घास, क्षेत्र, मरुस्थलीय और टुण्ड्रा (Tundra) संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र हैं।

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प्रश्न 3.
खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य श्रृंखला का एक उदाहरण देते हुए उसके अनेक स्तर बताएं?
उत्तर:
प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ताओं के भोजन बनते हैं। द्वितीयक उपभोक्ता फिर तृतीयक उपभोक्ताओं के द्वारा खाए जाते हैं। यह खाद्य क्रम और इस क्रम से एक स्तर से दूसरे स्तर पर ऊर्जा प्रवाह ही खाद्य शृंखला (food chain) कहलाती है। चराई खाद्य श्रृंखला पौधों (उत्पादक) से शुरू होकर मांसाहारी (तृतीयक उपभोक्ता) तक जाती है, जिसमें शाकाहारी मध्यम स्तर पर हैं। हर स्तर पर ऊर्जा का हास होता है जिसमें श्वसन, उत्सर्जन व विघटन प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। खाद्य श्रृंखला में तीन से पांच स्तर होते हैं और हर स्तर पर ऊर्जा कम होती है।

उदाहरण –

  • घास → हिरण → शेर।
  • घास → कीट → मेढ़क → पक्षी।

प्रश्न 4.
खाद्य जाल (food wed) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएँ।
उत्तर:
खाद्य श्रृंखलाएँ पृथक अनुक्रम पर होकर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। प्रजातियों के इस प्रकार जुड़े होने को खाद्य जाल (food web) कहा जाता है। उदाहरणार्थ-एक चूहा जो अन्न पर निर्भर है, वह अनेक द्वितीयक उपभोक्ताओं का भोजन है और तृतीयक मांसाहारी अनेक द्वितीयक जीवों से अपने भोजन की पूर्ति करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक माँसाहारी जीव एक से अधिक प्रकार के शिकार पर निर्भर हैं।

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प्रश्न 5.
बायोम (Biome) क्या है?
उत्तर:
किसी भौगोलिक क्षेत्र में समस्त पारिस्थितिक तंत्र एक साथ मिलकर एक और भी बड़ी इकाई का निर्माण करते हैं जिसको बायोम (Biome) कहते हैं। उदाहरण के लिए मरुस्थली बायोम या वन बायोम में कोई तालाब,
झील, घास का मैदान या वन भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 1.
संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थिति तथा विस्तार – सदाबहार वर्षा वन बायोम पादप तथा प्राणियों के विकास तथा वृद्धि के लिए अनुकूलतम दशायें प्रदान करता है क्योंकि इसमें वर्ष भर उच्च वर्षा तथा तापमान रहता है। इसी कारण से इसे अनुकूलतम बायोम (Opotimum biome) कहते हैं। इस बायोम का सामान्यतः विस्तार 10° . तथा 10° द. अक्षाशों के मध्य स्थित है।

प्रश्न 2.
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeo-chemical cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है, वर्णन करें?
उत्तर:
सूर्य ऊर्जा का मूल स्रोत है जिस पर सम्पूर्ण जीवन निर्भर है। यही ऊर्जा जैवमंडल में प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा जीवन प्रक्रिया आरम्भ करती है, जो हरे पौधे के लिए भोजन व ऊर्जा का मुख्य आधार है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन व कार्बनिक यौगिक में परिवर्तित हो जाती है। धरती पर पहुंचने वाले सूर्यातप का बहुत छोटा भाग (केवल 0.1 प्रतिशत) प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया में काम आता है इसका आधे से अधिक भाग पौंधे की श्वसन-विसर्जन क्रिया में और शेष भाग अस्थाई रूप से पौधे के अन्य भागों में संचित हो जाता है।

विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 करोड़ वर्षों में वायुमंडल व जलमंडल की संरचना में रासायनिक घटकों का संतुलन लगभग एक जैसा अर्थात् बदलाव रहित रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह संतुलन पौधे व प्राणी ऊतकों से होने वाली चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। यह चक्र जीवों द्वारा रासायनिक तत्त्वों के अवशोषण से आरम्भ होता है और उनके वायु, जल व मिट्टी में विघटन से पुनः आरम्भ होता है। ये चक्र मुख्यत: सौर ताप से संचालित होते हैं।

जैवमंडल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच ये कहे जाते हैं। जैव भू-रासायनिक चक्र के दो प्रकार हैं-एक गैसीय (gaseous cycle) और दूसरा तलछटी चक्र (Sedimentary cycle)। गैसीय चक्र में पदार्थ का मुख्य भंडार/स्रोत वायुमंडल व महासागर हैं। तलछटी चक्र के प्रमुख भंडार पृथ्वी की भूपर्पटी पर पाई जाने वाली मिट्टी तलछट व अन्य चट्टानें हैं।

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प्रश्न 3.
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर:
किसी पारितंत्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक संतुलन है। यह तभी संभव है जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे  क्रमशः परिवर्तन भी हो, लेकिन ऐसा प्राकृतिक अनुक्रमण (natural succession) के द्वारा । ही होता है। इसे पारितंत्र मे हर प्रजाति की संख्या के एक स्थाई संतुलन के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है।

यह संतुलन निश्चित प्रजातियों में प्रतिस्पर्धा व आपसी सहयोग से होता है। कुछ प्रजातियों के जिंदा रहने के संघर्ष से भी पर्यावरण संतुलन प्राप्त किया जाता है। संतुलन इस बात पर भी निर्भर करता है कि कुछ प्रजातियाँ अपने भोजन व जीवित रहने के लिए दूसरी प्रजातियों पर निर्भर रहती हैं इसके उदाहरण विशाल घास के मैदानों में मिलते हैं जहाँ शाकाहारी जंतु अधिक संख्या में होते हैं। दूसरी तरफ मांसाहारी कम संख्या में होते हैं तथा शाकाहारियों के शिकार पर निर्भर होते हैं, अत: इनकी संख्या नियंत्रित रहती है।

पारिस्थितिक असंतुलन के कारण हैं-नई प्रजातियों का आगमन, प्राकृतिक विपदाएँ और मानव जनित कारक भी हैं। मनुष्य के हस्तक्षेप से पादप समुदाय का संतुलन प्रभावित होता है जो अन्तोगत्वा पूरे पारितंत्र के संतुलन को प्रभावित करता है। इस असंतुलन से कई अन्य द्वितीयक अनुक्रमण आते हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर जनसंख्या दबाव से भी पारिस्थितिक बहुत प्रभावित हुई है। इसने पर्यावरण के वास्तविक रूप को लगभग नष्ट कर दिया है और सामान्य पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव डाला है। पर्यावरण असंतुलन से ही प्राकृतिक आपदाएँ जैसे-बाढ़, भूकंप, बीमारियाँ और कई जलवायु सम्बन्धी परिवर्तन होते हैं।

विशेष आवास स्थानों में पौधों व प्राणी समुदायों में घने अंतर्सम्बन्ध पाए जाते हैं। निश्चित स्थानों पर जीवों में विविधता वहाँ के पर्यावरणीय कारकों का संकेतक है। इन कारकों का समुचित ज्ञान व समझ ही पारितंत्र व संरक्षण के बचाव के प्रमुख आधार हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
प्रत्येक बायोम की प्रमुख विशेषताओं को बताते हुए विश्व के मानचित्र पर विभिन्न बायोम के वितरण दर्शाइए।
उत्तर:
सवाना बायोम –
जलवायु – सवाना बायोम की जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ हैं-स्पष्ट शुष्क तथा आई ऋतुएँ, वर्ष भर ऊँचा तापमान तथा अधिक सूर्यातप। औसत वार्षिक वर्षा 500 से 2000 मिलीमीटर के बीच होती है तथा किसी भी महीने में तापमान 20° सेंटीग्रेड से नीचे नहीं जा पाता है। आईता तथा तापमान के आधार पर तीन ऋतुएँ होती हैं (मोटे तौर पर दो ही ऋतुएँ होती हैं परंतु तापमान के आधार पर शुष्क ऋतु को गर्म एवं शीत दो उपभागों में विभक्त कर लिया जाता है)। शीत शुष्क ऋतु-दिन का तापमान ऊँचा रहता है, 26°से 32° सेण्टीग्रेड। रात्रि में यह कम होकर 21°सेण्टीग्रेड हो जाता है।

उष्ण शुष्क ऋत-सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं. सूर्यातप अधिकाधिक प्राप्त होने के कारण तापमान 32° से 38° सेण्टीग्रेड के बीच रहता है तथा उष्णतर ऋतु-सम्पूर्ण वार्षिक वर्षा का 80 से 90 प्रतिशत स्तर वर्षाकाल में ही प्राप्त होता है। ज्ञातव्य है कि भूमण्डल के विभिन्न सवाना प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में पर्याप्त अंतर होता है, जो धरातलीय बनावट तथा भूमध्यरेखा से दूरी के कारण होता है। यथा-ब्राजील के सवाना प्रदेश (इसे स्थानीय भाषा में Cerrado कहते हैं, इस प्रदेश का उच्चावच सागरतल से 1300 मीटर के बीच है) में औसत वार्षिक तापमान 20 से 26° सेण्टीग्रेड तथा औसत वार्षिक वर्षा 750 से 2000 मिलीमीटर (एण्डीज के पास) तक होती है जिसका 90 प्रतिशत भाग 7(उत्तरी भाग में) से 11 (दक्षिणी भाग में) महीनों वाली आई तथा शुष्क ऋतु में प्राप्त होता है।

औसत वार्षिक तापमान 22° सेण्टीग्रेड तथा अधिकतम तापमान 32° सेण्टीग्रेड होता है परंत मासिक अंतर 2 सेण्टीग्रेड से। कम होता है। इसके विपरीत भारतीय सवाना में अधिकतम तापमान (मई तथा जून में) 45° से 48° सेण्टीग्रेड एवं न्यूनतम तापमान (जनवरी में) 5° सेण्टीग्रेड या उससे भी कम हो जाता है, औसत वार्षिक वर्षा 1500 मिलीमीटर से भी कम होती है तथा इसका 80 से 90 प्रतिशत भाग 15 जून से 15 सितम्बर के मध्य प्राप्त हो जाता है।

बनस्पति समुदाय-सवाना बायोम में घासों का बाहुल्य होता है। घासें तथा अन्य शाकीय पौधे (herbaceous plants) वनस्पति समुदाय के लम्बवत् स्तरीकरण के सबसे नीचले स्तर (धरातलीय स्तर) का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरा (मध्यवर्ती) स्तर झाड़ियों का तीसरा (सबसे ऊपरी स्तर) वृक्षों का होता है। सवाना बायोम में घासें सर्वप्रधान होती है जिनकी बनावट स्थूल (coarse) तथा कड़ी होती हैं। इनकी पत्तियाँ चपटी होती हैं तथा इनकी (घासों की) ऊँचाई 80 सेण्टीमीटर तक या उससे अधिक होती है।

घासों में सर्वप्रथम तथा सर्वोच्च हाथी घास (elephant grass) होती है जिसकी ऊंचाई 5 मीटर तक होती है। इनका आकार गुच्छेदार होता है। ज्ञातव्य है कि समस्त धरातल घासों के सतत आवरण से ढका नहीं होता है, अपितु बीच-बीच में नग्न धरातल भी होता है। इन घासों की पत्तियों की बनावट (चपटी तथा बड़े आकार की) ऐसी होती है कि इनसे वाष्पोत्सर्जन (transpiration) शुष्क तथा तर सभी ऋतुओं में तीव्र गति से होता है, अतः शल्क मौसम में ये अपनी पत्तियाँ गिरा देती हैं तथा घास आवरण खुला तथा विरल हो जाता है, परंतु आई मौसम के आते ही इनमें पुनः हरी पत्तियाँ तेजी से निकल आती हैं तथा वे पुनः हरी-भरी हो जाती हैं। इन घासों की जड़ें बारीक शाखाओं एवं प्रतिशाखाओं के घने जाल वाली होती हैं। जो लगभग 2.5 मीटर की गहराई तक मिट्टियों में प्रविष्ट हो जाती है।

वृक्षों का स्वभाव जल की सुलभता पर निर्भर करता है कुछ ऐसी विशिष्ट प्रजातियाँ होती हैं जिनकी संरचना इस प्रकार की होती हैं कि शुष्क मौसम में पत्तियों द्वारा होने वाला सदाबहार स्वभाव को बनाये रहती हैं। कुछ वृक्षों की प्रजातियों में स्टोमैट को बंद करके शुष्क मौसम में जल संचित करने के गुण नहीं होते हैं। ऐसे वृक्षों की पत्तियाँ शुष्क मौसम में गिर जाती हैं तथा ये वृक्ष पर्णपाती वृक्षों की श्रेणी में आते हैं। वृक्षों की जड़ें सवाना प्रदेश के शुष्क एवं तर मौसमों के मुताबिक होती हैं, अर्थात् ये इतनी लम्बी होती हैं कि शुष्क मौसम में भौम जल स्तर (ground water table) से जल प्राप्त कर सकें। सामान्य रूप में इनकी जड़ें 5 से 20 मीटर की गहराई तक धरातल में प्रविष्ट होती हैं। H. Watter (1971) ने कुछ झाड़ियों को (tamrix SPP) 50 मीटर लम्बी जड़ों का उल्लेख किया है।

शुष्क मौसम में तथा अग्निकांड के बाद ये वृक्ष अपनी इन लम्बी जड़ों से नीचे से जल ऊपर खींचते हैं तथा अपना अस्तित्व बनाये रहते हैं। कुछ वृक्षों की जड़ें कन्द (turbes) वाली होती हैं। वृक्षों की सामान्य ऊँचाई 15 मीटर तक होती है। तनों से छोटी-छोटी शाखाएँ निकलती हैं तथा छाल एक सेण्टीमीटर तक मोटी है। ज्ञातव्य है कि वृक्षों की प्रजातियाँ बहुत कम होती हैं। कभी-कभी तो किसी क्षेत्र में केवल एक ही प्रजाति का प्रभुत्व होता है यथा तंजानिया से सेनेगल तक baobah प्रजाति तथा सूडान एवं आयबरी कोस्ट के सवाना में ताड़ का ही प्रभुत्व पाया जाता है।

क्षेत्र विशेष में घासों तथा वृक्षों के अनुपात के आधार पर सवाना बायोम को निम्न प्रकारों में विभक्त करते हैं –

1. वन सवाना (Woodland Savanna) – यहाँ वृक्षों तथा झाड़ियों का प्रभुत्व होता है जिनके द्वारा ऊपरी वितान (upper canopy) अत्यन्त सघन हो जाता है परंतु वांछित सूर्य प्रकाश धरातल तक पहुँच जाता है जिस कारण धरातल पर शाकीय पादपों (herbaceous plants) का निचला स्तर पूर्णतया विकसित हो जाता है। उपरिनिवासी पादपों (epiphytes) का प्रायः अभाव होता है।

2. वृक्ष सवाना (Tree Savanna) – उस समय विकसित होता है जब धरातल पर घासों का प्राधान्य होता है तथा वृक्ष दूर-दूर बिखरे होते हैं।

3. झाड़ी सवाना (ShrubSavanna) – इसमें धरातल पर घासों का बाहुल्य होता है, वृक्षों का सर्वथा अभाव होता है तथा छोटी-छोटी झाड़ियाँ होती हैं।

4. घास सवाना (Grass Savanna) – इसका विकास वहाँ होता है जहाँ वृक्ष तथा झाड़ियाँ अनुपस्थित होती हैं तथा घासों का घना किन्तु लगातार आवरण विस्तृत क्षेत्रों पर विकसित होता है।

सभी सवाना बायोम की एक उभय विशेषता यह है कि इन्हें समय-समय पर जलाया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि जैविक पदार्थ नष्ट हो जाता हैं तथा जन्तुओं की जनसंख्या घटती जाती है। ज्ञातव्य है कि बार-बार आग लगाये जाने के कारण यहाँ के पादपों में कुछ ऐसी विशेषतायें विकसित हो गई है कि कछ अग्नि प्रतिरोधी (fire resistant) प्रजातियों का विकास हो गया है (यथा Imperata spp, एक प्रकार की घास)।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन
ज्ञातव्य है कि सवाना बायोम में विस्तृत घास क्षेत्र एवं वृक्षों की कम संख्या के कारण जन्तुओं में गतिशीलता अधिक होती है। इसी कारण से यहाँ पर वृहदाकार स्तनधारी जन्तु (हाथी, जिराफ, गैण्डा आदि) तथा पक्षी (Courses, bustards, game birds, ostriches, gazelles आदि) तथा बिना उड़ने वाले पक्षी (emu) आदि पाये जाते हैं।

सवाना बायोम में वनस्पति की संरचना तथा उसमें मौसमी परिवर्तन एवं बिना रीढ वाले प्राणियों में पूर्ण सह-सम्बन्ध पाया जाता है। रीढविहीन प्राणियों में कीटों (यथा-मक्खियाँ-flies (diptera), टिड्डी grasshoppers, दीमक – termitesisopteres, any Shymenoptera, springtails) तथा संधिपाद प्राणियों (जोड़ों से निर्मित पैर वाले arthropods यथा मकड़ा, बिच्छू आदि) की असंख्य जनसंख्या पायी जाती है।

उदाहरण के लिए ऊँची घास वाले पश्चिमी अफ्रीका के गायना सवाना प्रदेश में oligochaete worms, spiders तथा insects का घनत्व शुष्क मौसम में प्रति 300 वर्ग मीटर क्षेत्र में 50,000 से 60,000 तथा आई मौसम में 1,00,000 पाया जाता है। वर्षा काल में लघु प्राणियों (यथा springtails, ants earwigs, cockroaches, small crickets, carabid bettles आदि) तथा शुष्क मौसम में बड़े जीवों (रीढ़विहीन, यथा locusts, grasshoper, mantids तथा circkets) की प्रधानता रहती है।

उल्लेखनीय है कि सवाना बायोम में प्राणियों (रौढ़वाले तथा रीढविहीन, लघ्वाकार कीट से लेकर वृहदाकार हाथी तक) की अत्यधिक जनसंख्या के बावजूद उनमें आहार के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा नहीं होती है क्योंकि इस बायोम की वनस्पतियों के मुताबिक शाकाहारी प्राणियों के आहार ग्रहण की आदतों में विशिष्टतायें पायी जाती है। उदाहरणार्थ-जिराफ वृक्षों की पत्तियों पर निर्भर करता है, जेबरा ऊँची घासों के ऊपरी भाग एवं झाड़ियों को खाता है, wildbeest मध्यम ऊँचाई की घासों को चरता है तथा gazells (हिरण परिवार) सबसे छोटी घासों का सेवन करता है।

स्पष्ट है कि सवाना बायोम में चराई अनुक्रम (grazing siccession) का पूर्ण विकास हुआ है। खुरवाले जन्तुओं (ungulates) की मौसमी गतिशीलता में भी पर्याप्त अंतर होता है। इस विभिन्न मौसमी गतिशीलता के कारण भी आहार के लिए तगड़ा संघर्ष नहीं हो पाता है। मौसमी गतिशीलता के स्वभाव के आधार पर G.Morel (1968) ने खुरवाले जानवरों को निम्न 5 श्रेणियों में विभक्त किया है

  • मौसमी भ्रमण रहित जन्तु – giraffe, grant’s gazelle, hartebeest
  • शुष्क मौसम में आंशिक भ्रमण करने वाले जन्तु – impala.
  • वर्षा काल में आंशिक भ्रमण करने वाले जन्तु – watrhog. dikdik, water buck, rhino.
  • शुष्क मौसम में प्रवास करने वाले जन्तु – buffalo, zebra, wildbesst, cland, elephant.
  • मार्गीय प्रवासी (passage migrants) जन्तु – भैंसा, जेबरा तथा हाथी।

सवाना प्रदेश में आये दिन वनस्पतियों को जलाने से वहाँ के प्राणियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इस क्रिया (burming) के कारण प्राणियों के प्रकार तथा उनकी संख्या में निरंतर हास हो रहा है।

प्राणी समुदाय – उल्लेखनीय है कि विश्व के विभिन्न महाद्वीपों के सवाना बायोम के विभिन्न क्षेत्रों में प्राणियों में विषमता पायी जाती है क्योंकि इन भौगोलिक क्षेत्रों का अलग-अलग रूपों में विकास हुआ है तथा इनमें मानव प्रभाव का चरण तथा उसकी तीव्रता विभिन्न रही है। सवाना प्रदेश में आई एवं शुष्क ऋतुओं की पर्यावरण सम्बन्धी दशाओं में परिवर्तन के कारण वनस्पति आवरण में अंतरण होता है जिस कारण आहार की बहुलता (आई ऋतु में) तथा अल्पता (शुष्क ऋतु में) होती है।

इसके बावजूद कुछ प्रकार के जन्तुओं की संख्या अन्य बायोम प्रकारों से बहुत अधिक मिलती है। अफ्रीकी सवाना में चरने वाले बड़े जन्तओं की सबसे अधिक किस्में पायी जाती हैं। जेब्रा antelope, wildbeast, जिराफ, हिप्पोपोटामस तथा हाथियों के बड़े-बड़े झण्ड पाये जाते हैं। इसके विपरीत अमेरिकी तथा आस्ट्रेलियाई सवाना में पक्षियों को छोड़कर उक्त प्राणी कम संख्या में पाये जाते हैं। आस्ट्रेलिया में Marsupials (पेट के बाह्य भाग में बनी थैली में बच्चों को रखने वाले जन्तुओं का वंश यथा-कंगारू) का प्रभुत्व है। इनकी 50 प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

इनमें बड़े आकार वाले लाल कंगारू (Macropus rufus, 1.5 मीटर ऊँचे) से लेकर लघु आकार वाली wallaby (M. browni, 30 सेंटीमीटर ऊँचे) प्रजातियाँ होती हैं। दक्षिणी अमेरिकी सवाना में चरने वाले दीर्घ जन्तुओं में deer तथा guanaco प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ पर tucans, parrots, nightjars, kingfishers, doves finches, parakets तथा wood peckers (कठफोड़वा) भारी संख्या में मिलते हैं।

रूम-सागरीय बायोम – रूम-सागरीय बायोम का विस्तार दोनों गोलाद्धों में महाद्वीप के पश्चिमी भाग में 30 से 40° अक्षांशों के बीच पाया जाता है। इस बायोम के अन्तर्गत रूम सागर के किनारे फैले यूरोपीय भाग, उत्तरी अमेरिका में कैलिफोर्निया, उ.प. अफ्रीका का रूमसागरीय तटवर्ती भाग, द. अमेरिका में मध्य में चिली, द. अफ्रीका का सुदूर द.प. भाग तथा द.प. आस्ट्रेलिया के तटवर्ती भाग आते हैं। इस प्रदेश की जलवायु की प्रमुख विशेषता है-गर्म शुष्क ग्रीष्मकाल तथा शीत आई शरद् काल।

शरद् तथा बसंत कालीन वर्षा के जल द्वारा मिट्टियों की नमी बढ़ जाती है तथा बसंतकाल में वनस्पतियों में अधिकतम वृद्धि होती है। ग्रीष्मकाल में तापमान बढ़ने तथा वर्षा के अभाव में जल की न्यूनता के कारण वनस्पतियों की वृद्धि का स्थगन हो जाता है। यद्यपि रूमसागरीय प्रदेश विभिन्न महाद्वीपों में काफी बिखरे हैं तथापि इनकी वनस्पति तथा बायोम संरचना में पर्याप्त समानता होती है। इस बायोम की वनस्पतियों की संरचना इस तरह की होती है कि वे ग्रीष्मकालीन शुष्कता को सहन कर सकें। पत्तियाँ मोटी तथा कठोर होती हैं (sclerophyllous) तथा तनों की छाल मोटी होती है।

पादप समुदाय में वृक्ष तथा झाड़ियाँ प्रमुख होती हैं। अधिकांश पादप सदाबहार होते हैं। झाड़ियों के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय नाम हैं यथा-यूरोपीय भाग में maquis of machia कैलिफोर्निया में chaparral द. अफ्रीका में fynbos या fynbosch कई वृक्षों की पत्तियों में शुष्कानुकूलित संरचना (Xeromorphic structure) होती है यथा मोटी बाह्य त्वचा, ग्रन्थिल रोयें, बंद रंध्र आदि। कुछ वृक्षों (यथा mastic tree) शुष्क काल में अपने रंधों (stomata) को बंद करके वाष्पोत्सर्जन (transpiration) (artemisia) न्यूनतम कर देते हैं। कुछ पत्तियों का आकार छोटा होता है (यथा chamise) ताकि कम से कम वाष्पोत्सर्जन हो सके। कुछ वृक्षों की पत्तियाँ काँटे जैसी होती हैं।

कुछ पौधों के विस्तृत जड़ तंत्र होते हैं (यथा almond), कुछ पौधों की गहरी मूसली जड़ (trap root) होती है जो शैलों की संधियों में भी प्रविष्ट हो जाती हैं कुछ पौधों की जड़ें भूमि के ऊपर भी विस्तृत होती हैं तथा नीचे गहराई तक भी प्रविष्ट होती हैं (यथा chamise) कुछ पौधों में कन्द (bulb तथा tubers) होते हैं। ये पौधे रंग-बिरंगे फूल वाले होते हैं। वसंत काल में ये खिलते हैं तथा रंग-बिरंगे दृश्य प्रस्तुत करते हैं। ग्रीष्मकाल में ये प्रसुप्तावस्था में होते हैं परंतु कन्दों (bulns) से आई शीतकाल के प्रारम्भ होते ही नये कल्ले निकल आते हैं (यथा hyaxinthus, crocus, lilium, orchis आदि)।

यूरोपियन रूमसागरीय बायोम में वनस्पति समुदाय में तीन लम्बवत् स्तर पाये जाते हैं। ऊपरी स्तर का प्रमुख वृक्ष ओक है जिसके दो वर्ग हैं-सदाबहार ओक तथा पर्णपाती ओक। ओक की कई प्रजातियां पायी जाती हैं। ऊँचाई के साथ वृक्षों का क्रम बदलता जाता है, सबसे नीचे सदाबहार ओक, बढ़ती ऊँचाई के साथ क्रमशः पर्णपाती ओक, बीच, पाइन तथा फर का क्रम पाया जाता है। दूसरा स्तर झाड़ियों का होता है जिसमें सर्वप्रमुख mquis या macchia है। इसका आवरण इतना घना होता है कि यह अप्रवेश्य हो जाता है। इसकी ऊँचाई 2 मीटर या उससे अधिक होती है। प्रमुख प्रजातियाँ हैं- arbutus, pistacia, phamnus, ceratonio आदि । इनसे गोंद, रेजिन, टैनिन, रंग आदि प्राप्त किये जाते हैं।

लगातार पशुचारण, जलाने तथा कटाई द्वारा maquis का रूपांतरण garrigue (स्थानीय नाम) में हो गया है। Garrigue का भी मानव द्वारा विदोहन होने पर उसका रूप बदल गया है जिसे batha कहते हैं। सबसे निचले स्तर में शाकीय पौधों का आवरण होता है।

उत्तरी अमेरिका (कैलिफोर्निया) बायोम – में वनस्पति समुदाय में सर्वप्रमुख वृक्ष ओक (विभिन्न प्रजातियाँ) तथा चैपरेल झाड़ियाँ हैं। ओक की ऊँचाई 6 से 23 मीटर तक होती है, तना छोटा होता है तथा फैला हुआ मुकुट (crowns) होता है। निचला स्तर घासों का होता है। कम उर्वर तथा हल्की मिट्टी वाले भागों में चैपरेल की घनी झाड़ियों का विकास होता है। यह यूरोपिय maquis का समकक्षी होता है। इसी तरह बौनी झाड़ियों बाथा (यूरोपिय) की तरह यहाँ पर सेज झाडियाँ होती हैं। दक्षिणी अमेरिका के चिली में कैलिफोर्निया के समान ही वनस्पतियाँ पायी जाती हैं। चिली में कैलिफोर्निया के चैपरेल के समान झाड़ी को मैटोरेल कहते हैं।

उपर्युक्त रूमसागरीय क्षेत्रों के बायोम में शकाहारी स्तनधारी जन्तुओं में mule deer, browsers, (कैलिफोर्निया), guanacos (चिली) आदि प्रमुख हैं। रोडेण्ट्स के कई परिवार पाये जाते हैं। जिनमें खरगोश की कई प्रजातियाँ प्रमुख होती हैं। भक्षक जन्तुओं में coyote (खरगोश का प्रमुख भक्षक), liards, snakes प्रमुख हैं तथा raptorial birds में kites, falcons तथा hawks का प्रमुख स्थान है।

शीतोष्ण घास प्रदेश बायोम (TemperateGrassland Blome)-शीतोष्ण घास प्रदेश का विस्तार उत्तरी गोलार्द्ध में महाद्वीपों के आन्तरिक भागों (उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी तथा यूरेशिया का स्टेपी प्रदेश) में पाया जाता है, जहाँ महाद्वीपीय जलवायु (ग्रीष्मकाल तथा शीतकालीन दशाओं में अत्यधिक अंतर होता है) का विकास हुआ है तथा शुष्कता का साम्राज्य रहता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इसका विस्तार दक्षिण अमेरिका में अर्जेन्टाइना तथा युरूग्वे (पम्पाज), दक्षिण अफ्रीका के उच्च पर्वतीय भाग (वेल्ड), आस्ट्रेलिया के दक्षिण उत्तरी गोलार्ड के शीतोष्ण घास मैदानों में महाद्वीपीय जलवायु की प्रधानता होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में महाद्वीपीय का प्रभाव कम होता है। अधिकांश भागों में सर्वाधिक वर्षा ग्रीष्म काल में होती है। इन सभी क्षेत्रों में घासें सर्वप्रमुख वनस्पति समुदाय होती हैं जो चरम समुदाय (climax community) की द्योतक हैं। इनमें सर्वप्रमुख सदाबहार घासें होती हैं। शाकीय पौधे (herbaceous plants) वृक्ष तथा झाड़ियाँ गौण होती हैं।

ज्ञातव्य है कि अधिकांश घास मैदान मानव क्रिया-कलापों का प्रतिफल हैं। प्रत्येक क्षेत्र में वनस्पति प्रकार, मृदा तथा जलवायु में तथा पादप समुदाय एवं प्राणी समुदाय में पूर्ण सहसम्बन्ध पाया जाता है। घासों का ऊपरी वितान (canopy) उनकी पत्तियों का होता है। पुष्पी कल्ले लघु समय तक ही रहते हैं। पुष्पों में पंखुड़ियों नहीं होती हैं। उनका परागण (pollination) हवा द्वारा होता है। बीजों का हवा द्वारा शीघ्र विसरण (dispersal) हो जाता है। ज्ञातव्य है कि घास मैदान के सभी प्रदेशों के अधिकांश भागों में मौलिक घास आवरण को साफ कर दिया गया है तथा उनमें खाद्यान्नों की खेती की जाती है। ये प्रदेश विश्व के प्रमुख अन्न भण्डार तथा दुग्ध व्यवसाय के क्रोडस्थल हैं।

1. यूरोपीय भाग – में इस घास प्रदेश को स्टेपी बायोम कहते हैं जिसका सर्वाधिक विकास रूस में हुआ है। इसी रूसी स्टेपी का विस्तार पूर्वी यूरोप से प. साइबेरिया तक विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तर में शीतोष्ण कोणधारी वनों तथा द.पू. में शुष्क प्रदेशीय बायोम के मध्य स्टेपी बायोम स्थित है। उत्तरी शीतोष्ण कोणधारी वनों तथा दक्षिण से शुद्ध घास बहुल स्टेपी बायोम के मध्य वन स्टेपी की संक्रमण मेखला (transitionalzone) पायी जाती है। इस तरह बन स्टेपीज तथा घास स्टेपीज रूस के समस्त क्षेत्रफल के 12 प्रतिशत भाग पर फैले हैं।

वन स्टेपीज के यूरोपीय भाग में ओक, लाइम, एल्म तथा मैपिल वृक्षों की बहुलता है जबकि प. साइबेरिया में बर्च, आस्पेन तथा विलो वृक्षों का मिश्रण प्रधान है, इन वन स्टेपीज के मध्य छिटपुट रूप में fescues तथा feather grasses (sita Koeleria) के वंशों वाले क्षेत्र पाये जाते हैं जिन्हें मीडोस्टेपीज (meadowsteppes) कहते हैं। वन स्टेपीज में 500 से 600 मिलीमीटर तक वार्षिक वर्षा होती है जबकि घास स्टेपीज का विकास 400 से 500 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा वाले भागों में हुआ है। उत्तर से दक्षिण दिशा में जलवायु, वनस्पति तथा मृदा में क्रमिक परिवर्तन होता जाता है। सबसे उत्तर में चरनोज्म मिट्टियों के साथ घास स्टेपीज की स्थिति है।

दक्षिण की ओर जाने पर शुष्कता बढ़ती है अतः अर्द्धशुष्क स्टेपीज तथा चेस्टनट मृदा पायी जाती है और दक्षिण जाने पर अर्द्ध-शुष्क तथा शुष्क रेगिस्तान प्रारम्भ हो जाता है। उत्तर से दक्षिण वनस्पतियों का निम्नांकित अनुक्रम पाया जाता है –

  • वन स्टेपीज (इसका वर्णन ऊपर किया गया है)
  • मीडो स्टेपीज में टर्फ वाली घासों की प्रजातियाँ (Stipa तथा Fescue) तथा कई प्रकार के पुष्पी शाकीय पौधे (यथा trifolum तथा कई प्रकार के daisy) पाये जाते हैं
  • घास स्टेपीज में घास की प्रमुख किस्में Stipa की गुच्छे वाली प्रजातियाँ हैं तथा शुष्कानुकूलित झाड़ियों की Artemisa प्रजातियाँ प्रमुख हैं तथा
  • गहरे रंग की चेस्टनट मिट्टियों के साथ शुष्कानुकूलित झाड़ियाँ (artemisia प्रजाति) पायी जाती हैं।

2. उत्तरी अमेरिकी प्रेयरी का विकास संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा के पश्चिम में रॉकीज पर्वत तथा पूर्व में शीतोष्ण पर्णपाती वनों के मध्य विस्तृत क्षेत्रों में हुआ है। वार्षिक वर्षा पूर्व (1050 मिलीमीटर) से पश्चिम (400 मीलोमीटर से कम) घटती जाती है। इस प्रेयरी प्रदेश में घासों की ऊँचाई में पूर्व से पश्चिम (क्रमशः उच्च घास, मध्यम घास तथा छोटी घास) श्रेणीकरण (ordering) पाया जाता है।

(i) उच्च घास प्रेयरी की मेखला सबसे पूर्व में पायी जाती है। प्रमुख घास प्रजाति bluestem होती है जिसकी ऊंचाई 1.5 से 2.4 मीटर होती है। इन घासों के मध्य में स्थान-स्थान पर ओक तथा हिकरी वृक्षों के झुरमुट पाये जाते हैं।

(ii) मिन प्रेयरी का सर्वाधिक विकास संयुक्त राज्य अमेरिका के वृहद मैदान में हुआ है। वास्तव में मिश्र प्रेयरी का विस्तार उच्च घास प्रेयरी की पश्चिम में उत्तर (कनाडा से प्रारम्भ होकर) दक्षिण (टक्साज तक) विस्तृत चौड़ी पट्टी में पाया जाता है जिसमें मध्यम तथा कम ऊँचाई की घासें पायी जाती हैं (ऊँचाई 0.6 से 1.2 मीटर तक)। प्रमुख प्रजातियाँ हैं Stippa commata (नुकीली घासें-डोरा जैसी), sand dropseed (sporobolus cryptandrus), westem wheat grass (agropyron smithii), jungegrass, blugrama तथा buffalo grass, तथा

(iii) लघु घास प्रेयरी का विस्तार Great Plains के पश्चिमी भाग पर पाया जाता है। घासों की ऊँचाई 60 सेण्टीमीटर से कम होती है।

3. दक्षिणी अमेरिकी पम्पाज – का सर्वाधिक विस्तार अर्जेन्चाइना (समस्त क्षेत्रफल के 12 प्रतिशत भाग पर) में हुआ है। अमेरिकी प्रेयरीज तथा यूरोपीय स्टेपीज की तुलना में पम्पाज अधिक आई हैं। पूर्व में वार्षिक वर्षा 900 मिलीमीटर तथा पश्चिमी एवं द.पू. में 450 मिलीमीटर तक होती है। आर्द्र पम्पाज का विस्तार पूर्वी भाग में पाया जाता है जहाँ लम्बी एवं ऊँची घासें पायी जाती हैं।

पश्चिम की ओर जाने पर शुष्कता बढ़ती जाती है अतः घासें छोटी पायी जाती हैं। इस पश्चिमी भाग को अर्द्ध आर्द्र पम्पाज कहते हैं। पम्पाज में कई वंश (genera) तथा प्रजातियों (species) की घासें पायी जाती हैं यथा-Birza, Bromus, Panicum, Paspaluim Lolium आदि । इनमें कई स्तर (layers) पाये जाते हैं। मनुष्य ने इस क्षेत्र में दलहनी जाति के lucene पौधों का रोपण किया जाता है। अधिकांश पम्पाज को साफ करके गेहूं के खेतों में बदल दिया गया है।

4. अफ्रीकी वेल्ड (veld) – का विस्तार दक्षिणी अफ्रीका में 1500 से 2000 मीटर ऊंचाई वाले पठार के पूर्वी भाग में दक्षिण ट्रान्सवाल, Orange Free State तथा लिसोथी के कुछ भागों पर पाया जाता है। ज्ञातव्य है कि इस पठार के 1500 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले भागों पर वर्षा की अनिश्चितता, शुष्कता की अधिकता, रात्रि में पाला की प्रचंडता तथा शरद काल में दैनिक तापान्तर की अधिकता के कारण वृक्षों का उगना तथा विकसित होना सम्भव नहीं हो पाता है, अत: चरम घास समुदाय का विकास हुआ है। उल्लेखनीय है कि धरातलीय बनावट, मृदा ऊंचाई तथा जलवायु में भिन्नता के कारण घासों की संरचना में पर्याप्त अंतर पाया जाता है, अतः वेल्ड घास बायोम को कई उपभागों में विभक्त किया गया है –

(i) थेमाडा वेल्ड – 1500 से 1750 मीटर की ऊँचाई पर विकसित हुआ है जहाँ औसत वर्षा 650 से 750 मिलीमीटर तक होती है। Black turf soils पर विकसित होने वाले प्रमुख घास Redgrass (Themeda triandra) है। अन्य घास प्रकारों में ristida Eragrostis तथा Hyparrhenia प्रमुख हैं

(ii) अल्पाइन वेल्ड का विकास 2000 से 2500 मीटर ऊंचाई वाले भागों (Darkensberg पर्वत पर) पर हुआ है जिसमें Themeda के साथ Festuca तथा Bromus घासें पायी जाती हैं। यहाँ के प्राणी जीवन को मनुष्य ने बड़े पैमाने पर प्रभावित तथा परिमार्जित किया है। प्रारम्भ में game, antelopes, zebras (शाकाहारी) तथा शेर, लकड़बाग्घा, हायना, सियार (सभी मांसाहारी) के बड़े झुण्ड पाये जाते थे परंतु मानव द्वारा अनवरत हनन के कारण अब ये ,अदृश्य हो गये हैं। बिलकारी शाकाहारी प्राणियों में springhare, gerbil आदि अब भी भारी संख्या में पाये जाते हैं। मांसाहारी बिलकारी प्राणियों में mangooses या meerkats प्रमुख हैं।

5. आस्ट्रेलियाई शीतोष्ण घास प्रदेश का विस्तार आस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी भाग तथा उत्तरी तस्मानिया में पाया जाता है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि शरद काल उत्तरी गोलार्द्ध के शीतोष्ण घास क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म होता है तथा घासों तथा साथ-साथ युकेलिप्टस वृक्ष भी पाये जाते हैं। दक्षिणी सागर तटीय भाग से (1524 मिलीमीटर) उत्तर जाने पर (635 मिलीमीटर) औसत वार्षिक वर्षा घटती जाती है अत: यहाँ पर घास क्षेत्रों के तीन उपप्रदेश विकसित हुए हैं।

(i) शीतोष्ण लम्बी घास वाला क्षेत्र-इसका विस्तार न्यूसाउथवेल्स के पूर्वी तटीय भाग से विक्टोरिया तथा पूर्वी तस्मानिया तक है। घासों में Poa tussock तथा Themeda australis (इसे कंगारू घास कहते हैं क्योंकि यह कंगारू को सर्वाधिक प्रिय होती है) तथा Danthonia pallida अधिक व्यापक है।

(ii) शीतोष्ण लम्बी घास वाले क्षेत्र का विकास प्रथम के समानान्तर किन्तु आन्तरिक भागों में हुआ है। यहाँ Danthonia तथा Stipa वंश की छोटी प्रजातियों का विकास हुआ है।

(iii) शुष्कानुकूलित (xerophytic) घास वाला क्षेत्र और अधिक आन्तरिक भाग में विकसित हुआ है। प्रारम्भ में आस्ट्रेलियाई शीतोष्ण घासों का विकास यहाँ के देशज जन्तुओं (यथा कंगारू) के चरने के स्वभाव के आधार पर हुआ था परंतु भेड़ों के आगमन (मानव द्वारा) बाहर से लाकर लगाये जाने वाले पौधों (यथा clover) तथा घासों (यथा-bromus, hardeum तथा ryegrass) के कारण घासों की कई मौलिक प्रजातियाँ या तो समाप्त हो गई हैं या कमजोर पड़ गई हैं।

स्नतधारी जन्तुओं में कंगारू यहाँ का सबसे बड़ा देशज जन्तु है। बड़े कंगारूओं की यहाँ पर तीन किस्में पायी जाती हैं –

  • लाल कंगारू
  • भूरे कंगारू तथा
  • wallaroos

जब से यूरोपीय खरगोशों को यहाँ पर लाया गया (लगभग एक सौ वर्ष पूर्व) तब से इनकी संख्या इतनी बढ़ी है कि अब ये सर्वप्रमुख जन्तु हो गये हैं। बाद में इनकी संख्या की बाढ़ को रोकने के लिए परभक्षी लोमड़ी को लाया गया परंतु इसका कोई खास प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ है। उड़ानविहीन Emu पक्षी यहाँ के विशिष्ट प्राणी हैं।

6. न्यूजीलैण्ड शीतोष्ण घास क्षेत्र – का विकास मौलिक रूप में दक्षिणी द्वीप के पूर्वी भाग तथा उत्तरी द्वीप के मध्यवर्ती भाग में हुआ था। जिसमें गुच्छेदार घासों का सर्वाधिक विकास हुआ था परंतु विगत सौ वर्षों में मानव ने इन्हें पूर्णतया बदल दिया है। इस समय घासों की दो प्रमुख किस्में पायी जाती हैं –

(i) short tussock grasses (प्रमुख प्रजातियाँ-festuca तथा poa) 0.5 मीटर ऊँची होती हैं तथा पीले-भूरे रंग की होती हैं

(ii) tall tussock grasses-उच्च भागों पायी जाती हैं (प्रमुख प्रजाति-Chiomechloa)। इस बायोम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शाकाहारी स्तनधारी जन्तुओं का पूर्णतया अभाव है (क्योंकि यह द्वीप सदा से अन्य स्थलीय भागों से अलग रहा है)। प्रारम्भ में यहाँ पर दैत्याकार उड़ानरहित moss पक्षियों का निवास था परंतु नवागन्तुक मानव द्वारा इनका शिकार इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि अब ये विलुप्त हो गये हैं।

शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम-इसे टैगा वन बायोम भी कहते हैं। यह बायोम शीतोष्ण बायोमों का सबसे उत्तरी बायोम (दक्षिण गोलार्द्ध में नहीं पाया जाता है) जिसे टैगा बायोम भी कहते हैं। इसका विस्तार उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया में शीत महाद्वीपीय अथवा उपध्रुवीय जलवायु प्रदेशों में पाया जाता है। कोणधारी वृक्ष, वनस्पतियाँ में सबसे प्रभावशाली हैं। इनके चार प्रमुख वंश (genera) यथा-spruce (picea), pine (Pinus), fir (Abies) तथा larch (Larix) वनस्पति समुदाय की अधिकांश संरचना करते हैं। इन कोणधारी वृक्षों के साथ शीतोष्ण पर्णपाती कठोर लकड़ी वाले वृक्षों के वंश भी (alder-Almus, birch-Betula, popular-populus) आपस में समिश्र रूप में पाये जाते हैं।

ज्ञातव्य है कि इन शीतोष्ण पर्णपाती वृक्षों का विकास मौलिक कोंणधारी वृक्षों के अग्नि के कारण नष्ट होने तथा मानव द्वारा काटे जाने के कारण द्वितीयक अनुक्रम (secondary succession) के रूप में हुआ है। इस बायोम में सबसे अधिक मुलायम लकड़ी प्राप्त होती है जिसका सभी बायोमों के वृक्षों से सर्वाधिक आर्थिक महत्त्व होता है यहाँ की जलवायु की प्रमुख विशेषतायें हैं –

  • अति शीत लम्बी शीत ऋतु (कम से कम 6 महीनों का औसत तापमान शून्य अंश सेण्टीग्रेड से कम होता है)
  • शरद् काल में हिमपात
  • धरातलीय नमी के जम जाने के कारण परमाफ्रास्ट सतह का निर्माण
  • लघु अवधि वाला गर्म ग्रीष्मकाल
  • वनस्पति के वृद्धि काल का समय 50 (उत्तरी सीमा पर) से 100 दिन (दक्षिणी सीमा पर)
  • वार्षिक वर्षा में अत्यधिक क्षेत्रीय विषमता (500 से 2000 मिलीमीटर, तरल जल तथा ठोस हिम दोनों को मिलाकर) तथा
  • अत्याधिक वार्षिक तापीय विषमता (ग्रीष्मकाल में 25° सेण्टीग्रेड से शरदकाल में (-)40° सेण्टीग्रेड तक)

यहाँ की वनस्पतियों में आवृत्तिबीजी कोणधारी (gymnosperm conifers) वृक्ष सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। पत्तियाँ सुई के समान नुकीली होती हैं ताकि शरद काल में मिट्टियों के हिमीकरण के समय वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कम हो सके। अधिकांश वृक्ष सदाबहार होते हैं। बीज शंकु के आकार की खोल में बंद रहते हैं। दनों के निचले भाग में न्यूनतम वानस्पतिक आवरण होता है। जलवायु, उच्चावच तथा मिट्टियों में विभिन्नता के साथ वृक्षों के आकार, बनावट तथा शाखाओं के प्रारूप एवं वृक्षों की प्रजातियों में पर्याप्त क्षेत्रीय विषमताएँ होती हैं। अधिकांश वृक्षों की ऊँचाई 12 से 21 मीटर के बीच होती है परंतु पर्वतीय भागों पर इनकी ऊँचाई 100 मीटर तक हो जाती है। जहाँ पर मानव द्वारा वनों की कटाई अधिक हुई है वहाँ पर शीतोष्ण पर्णपाती वनों का द्वितीय अनुक्रम विकसित हुआ है।

(i) उत्तरी अमेरिकी कोणधारी वन बायोम – का विस्तार कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में पाया जाता है। निम्न स्थलीय कोणधारी वनों का क्षेत्र उत्तर में आर्कटिक वृक्ष रेखा (वह रेखा जिसके उत्तर क्षैतिज रूप में तथा ऊपर लम्बवत् रूप में, शरद् काल इतना लम्बा होता है कि वृक्ष का उगना तथा बढ़ना सम्भव नहीं हो पाता है) अर्थात् वृक्ष रहित टुण्ड बायोम की दक्षिणी सीमा से प्रारंभ होकर दक्षिण में शीतोष्ण पर्णपाती वनों की उत्तरी सीमा के मध्य विस्तृत क्षेत्रों में पाया जाता है। सबसे उत्तर में लार्च तथा स्यूस के झुरमुट पाये जाते हैं। इनके दक्षिण में खुले कोणधारी वनों का विकास हुआ है। इनमें black spurce तथा white spruce बिखरे रूपों में पाये जाते हैं।

वनावरण विरल होता है। धरातल पर झाड़ियों, माँस तथा लाइकेन (lichens) का घना आवरण विकसित हुआ है। इस मण्डल में विशुद्ध कोणधारी वनों का अति घना आवरण पाया जाता है जिसमें white spruce, black spruce तथा blasam fir का प्रभुत्व होता है। ज्ञातव्य है कि इस कोणधारी वन बायोम के उक्त तीनों मण्डलों में वृक्ष प्रकारों तथा मृदा प्रकारों में पूर्ण सह संबंध पाया जाता है यथा-उर्वर तथा उत्तम प्रवाह वाली मिट्टियों में white spruce तथा blsam fie, रेतीली मिट्टियों में Jack pines, निचले परंतु छिछले गतॊ में दलदलों का विकास हुआ है जिनके किनारों पर black spruce के समूह विकसित होते हैं।

(ii) यूरेशिया के शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम – का विस्तार पश्चिमी में उत्तरी स्कॉटलैण्ड से प्रारम्भ होकर स्कैडिनेविया तथा यूरोपीय रूस से होता हुआ पूर्व में साइबेरिया के पूर्वी भाग तक पाया जाता है। इसका सर्वाधिक विकास साइबेरिया में उत्तर से दक्षिण 1600 किमी. चौड़ी मेखला में (जो पश्चिम से पूर्व में फैली है) हुआ है। उत्तरी अमेरिका की भांति ही इसमें भी उत्तर से दक्षिण तीन मण्डलों (ऊपर इसका उल्लेख किया जा चुका है) का विकास हुआ है। यूरोपीय शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम में वनस्पतियों के प्रकार तथा वितरण हिमानी मिट्टियों (प्लीस्टोसीन हिमानीकरण के समय जनित) के असमान वितरण से पूर्णतया प्रभावित हुए हैं। रेतीली मिट्टियों में पाइन तथा चिकनी मिट्टी तथा दुमट मिट्टियों से स्यूस वृक्षों का विकास हुआ है।

इनके बीच में स्थित झीलों के किनारों पर एल्डर, बर्च तथा विलो का विस्तार पाया जाता है। स्कैण्डिनेविया के समस्त क्षेत्रफल के 50 प्रतिशत भाग पर शीतोष्ण कोंणधारी वन बायोम का विस्तार पाया जाता है। यहाँ पर प्रमुख प्रजातियाँ हैं-Scots pine, Norway spurce तथा birch एशियाई भाग (साइबेरिया) में प्रमुख प्रजातियाँ हैं-फर, स्यूस, पाइन, लार्च तथा मध्य साइबरिया में, जो सबसे सर्द भाग है, कोणधारी वृक्षों के स्थान पर शीतोष्ण पर्णपाती वनों (बर्च तथा लघु लार्च) का विकास हुआ है।

शीतोष्ण कोणधारी वनों में वनस्पतियों का आदर्श स्तरीकरण नहीं पाया जाता है। घने तथा बंद वनों में धरातलीय आवरण न्यूनतम होता है परंतु खुले वनों में कुछ शाकीय पादपों, बौनी झाड़ियों तथा मॉसेस का विरल आवरण, धरातल पर पाया जाता है । इस वन बायोम की पॉडजॉल विशिष्ट मृदा होती है। इसका निर्माण भूमि तल पर पत्तियों, वृक्षों के गिरे तनों के टूटे भाग, वृक्षों, फलों के शंकु तथा वृक्षों के छालों के वियोजक जीवों द्वारा वियोजन, ह्यूमस के निर्माण, जल द्वारा अपक्षालन (leaching या eluviation) आदि द्वारा होता है।

इसका रंग काला या गहरा भूरा होता है। ऊपरी आवरण, जो मृदा के A सतह (A horizon) के ऊपर होता है, में जैविक पदार्थों का बाहुल्य होता है। A मंडल में जल के साथ जैविक पदार्थों का अपक्षालन द्वारा नीचे गमन होता है। अत: यह मण्डल अपक्षालन मण्डल (leaching horizon) कहा जाता है। B मंडल विनिक्षेपण मण्डल (illuviation horizon) होता है जिसमें लोहा तथा एल्यूमिनियम के यौगिक, क्ले तथा घमस तत्वों का जमाव होता है। इसका रंग नारंगी भूरा होता है।C मंडल में आधारभूत शैल आंशिक रूप से अपक्षयित होती है। सबसे निचला D मंडल में आधारभूत शैल का बना होता है।

टैगा या शीतोष्ण कोणधारी बायोम के प्राथमिक उपभोक्ता प्राणियों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है –

  • वृक्षों के रस चूसने वाली प्रजातियाँ यथा (aphids) तथा
  • घास चरने तथा वृक्षों की कोपलों को खाने वाली प्रजातियाँ।

इन प्राणियों की आहार ग्रहण करने वाली प्रक्रियाओं से वनस्पतियों पर कुप्रभाव पड़ता है। वृक्षों से रस चूस लेने से वृक्षों में तरल पदार्थों के संचार में व्यवधान हो जाता है तथा विपत्रता (defoliation, पत्तियों का गिरना) द्वारा पत्तियों के कम हो जाने से प्रकाश संश्लेषण में कमी हो जाती है। नयी कोपलों के भक्षण के कारण भी नयी . शाखाओं तथा टहनियों एवं पत्तियों की वृद्धि कम हो जाती है। कुछ प्राणी पुष्पों तथा फलों को खा जाते हैं तथा भक्षण के समय अधिकांश को काटकर नीचे गिरा देते हैं जिस कारण पौधों की पुनर्जनन क्षमता घट जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान कुछ पौधे समाप्त हो जाते हैं तथा कुछ संख्या में कम हो जाते हैं, जिस कारण पादप समुदाय का संघटन ही बदल जाता है।

वन बायोम को प्रभावित करने की मात्रा के आधार पर इस बायोम के प्राणियों को तीन वर्गों में विभक्त किया जाता है –

  • सर्वप्रभावी (dominant)
  • प्रभावी (influents) तथा
  •  गौण प्रभावी (minor influents)।

सर्वप्रभावी पौधों को प्रत्यक्ष रूप से इतना प्रभावित करते हैं कि पादप समुदाय का संघटन ही बदल जाता है। इस श्रेणी के प्रमुख प्राणी बड़े आकार वाले शाकाहारी जन्तु होते हैं यथा-moose I प्रभावी प्राणियों में रीढ़वाले बड़े मांसाहारी प्राणी आते हैं (मनुष्य भी इस श्रेणी में आता है)। गौण प्रभावी प्राणी ज्यादातर बिना रीढ़ वाले मांसाहारी प्राणी तथा परजीवी प्राणी होते हैं। शाकाहारी बड़े जन्तुओं में caribou तथा moose प्रमुख होते हैं। कीटों की कई प्रजातियाँ भी सर्वप्रभावी प्राणियों की श्रेणी में आती हैं क्योंकि ये वृक्षों का विपत्रण द्वारा उनकी छालों तथा जड़ों का भक्षण करके, तनों तथा शाखाओं में छेद करके नुकसान पहुँचाते हैं। इस तरह के कीटों में larch sawfly, pine sawfly, spruce budworms आदि प्रमुख हैं।

Black fly परिवार के कीट कई स्तनधारी प्राणियों तथा पक्षियों के शरीर से खून चूसते हैं। प्रभावी प्राणियों में बड़े आकार वाले परभक्षी (predators) मांसाहारी जन्तु होते हैं यथा timber wolf, lynx गलितमांसभक्षी (scavengers) जन्तुओं में bears तथा wolverines (Gulo gulo) प्रमुख है। गौणप्रभावी प्राणियों में स्तनधारी जन्तु तथा पक्षी आते हैं-यथा-spruce grouse (उत्तर अमेरिका में), caparcaillic (यूरेशिया में) शंक्वाकारा पत्तियों को खाते हैं: red squirrels (बीजों का भक्षण करते हैं), crosbil आदि । इस तरह के प्राणियों का भक्षण करने वाले (predators) जन्तुओं में गिलहरियों को खाने वाले pine marten छोटे पक्षियों का शिकार करने वाले cwls तथा hawks प्रमुख हैं।

शरद तथा ग्रीष्म काल में कई प्राणियों का मौसमी प्रवास होता है। यहाँ की जलवायु तथा प्राणियों की संरचना में सह-सम्बन्ध पाया जाता है अर्थात् प्राणियों के शरीरों की संरचना इस तरह की होती है कि वे शीतकाल की कठोरता को सहन कर सकें। अधिकांश प्राणी मोटी खाल, घने तथा लम्बे बाल वाले होते हैं। इन्हें समूरदार जानवर (fur animals) कहते हैं (यथा mink, marten तथा beaver)। जैसे-जैसे दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते जाते हैं जन्तुओं का आकार बढ़ेता जाता है ताकि वे अति शीत दशाओं को सहन कर सकें।

मौसमी परिवर्तन के साथ आहार की आपूर्ति की समस्या भी होती है। शीतकाल में जबकि धरातलीय मिट्टियाँ जम जाती हैं तथा धरातल पर हिमाच्छादन हो जाता है तो धरातलीय लघु पादपों का आवरण बर्फ के नीचे ढंक जाता है तथा प्राणियों के लिए आहार संकट हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ प्राणी शीतनिद्रा (hibermation) में चले जाते हैं अर्थात् भूमि के नीचे चुपचाप निष्क्रिय पड़े रहते हैं। कुछ छोटे rodents बर्फ की परत के नीचे हो जाते हैं परंतु बर्फ से ढंकी झाडियों तथा मॉसेस से अपना आहार ग्रहण करते रहते हैं। कुछ प्राणी (यथा beavers) जाड़े के लिए पहले से ही आहार का संग्रह कर लेते हैं।

टण्डा बायोम – टुण्ड्रा का शाब्दिक अर्थ होता है बंजर भूमि (barren ground)। इस बायोम में वर्ष भर सूर्यातप तथा सूर्य प्रकाश का अभाव रहता है जिस कारण वानस्पतिक विकास न्यूनतम होता है। वृक्षों का सर्वथा अभाव रहता है। कम से कम आठ महीनों तक
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन
(A = निम्न टुण्ड्रा, B = मध्य टुण्ड्रा, C = उच्च टुण्ड्रा तथा D = वृक्ष टुण्ड्रा)
धरातल पूर्णतया हिमाच्छादित रहता है। तापमान हिमांक से नीचे रहता है। तेज बर्फानी हवायें चलती हैं। वनस्पति विकास का समय 50 दिन से भी कम होता है। मृदा सदा हिमीकृत अवस्था में होती है। इस तरह के सदा हिमीकृत धरातल को परमाफ्रास्ट कहते हैं।

आर्कटिक टुण्ड्रा का विस्तार उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया के उत्तर में स्थायी ध्रुवीय हिमावरण तथा दक्षिण में शीतोष्ण कोणधारी वन बायोम की उत्तरी सीमा के मध्य पाया जाता है जिसके अन्तर्गत अलास्का, कनाडा का सुदूर उत्तरी अंचल, यूरोपीय रूस तथा साइबेरिया के उत्तरी भाग आते हैं। इनके अलावा आर्कटिक द्वीपों पर भी इस बायोम का विस्तार हुआ है। आर्कटिक टुण्डा में वार्षिक वर्षा 400 मिलीमीटर से कम होती है। टुण्डा बायोम को दो प्रकारों में विभक्त किया जाता है-आर्कटिक टुण्डा बायोम तथा अल्पाइन टुण्ड्रा बायोम (यह उच्च पर्वतों पर पाया जाता है, इसकी स्थिति उष्ण कटिबंध से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय पर्वतों पर वृक्ष रेखा के ऊपर होती है)। यहाँ पर केवल आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम का ही उल्लेख किया जा रहा है।

वृक्ष रेखा के उत्तर जाने पर जलवायु की बढ़ती कठोरता के साथ वनस्पतियों में भी तेजी से परिवर्तन होता जाता है। अतः आर्कटिक टुण्ड्रा को दक्षिणी सीमा से उत्तरी सीमा तक तीन मण्डलों में विभक्त करते हैं (दक्षिण से उत्तर की ओर) निम्न आर्कटिक टुण्डा, मध्य आर्कटिक टुण्ड्रा तथा उच्च आर्कटिक टुण्डा (ज्ञातव्य है कि निम्न, मध्य तथा उच्च, अक्षांशों के मान के प्रतीक हैं)। चित्र 15.5 में कनाडा के आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम के विभिन्न मण्डलों को प्रदर्शित किया गया है।

निम्न टुण्डा आर्कटिक टुण्डा का सबसे दक्षिणी मण्डल होता है जिसके अन्तर्गत उत्तरी कनाडा का अधिक भाग, उत्तरी अलास्का, कनाडा के द्वीपों (बैंक्स द्वीप, विक्टोरिया द्वीप, बैफिन द्वीप) के दक्षिणी भाग, दक्षिण ग्रीनलैण्ड, साइबेरियन प्रायद्वीप आदि सम्मिलित किये जाते हैं। उच्च टुण्ड्रा के अन्तर्गत कनाडा के द्वीपमण्डल (archipelago) के उत्तर में स्थित द्वीपों (यथा क्वीन एलिजाबेथ समूह के द्वीप) को सम्मिलित किया जाता है। इसमें वनस्पति छिटपुट रूप में पायी जाती है जिसमें mosses, lichens तथा कठोर शाकीय झाड़ियाँ (यथा avens saxifirages आदि) पायी जाती हैं। वृक्षों का सर्वथा अभाव पाया जाता है। मध्य टुण्डा का विस्तार उक्त दो मण्डलों के मध्य पाया जाता है।

टुण्ड्रा बायोम में भी मृदा में नमी की स्थिति तथा वनस्पति के बीच पूर्ण सहसम्बन्ध पाया जाता है। लिथोसोल (पूर्ण प्रवाह युक्त मिट्टी जिसमें आधार शैल पतली होती है) में lichens तथा mosses का शुष्क समुदाय (xeric community) विकसित होता है; बॉग मृदा में sedges तथा mosses का विस्तार पाया जाता है।

आर्कटिक टुण्ड्रा में शीत की कठोरता तथा सूर्य प्रकाश के अभाव के कारण समस्त विश्व की कुल पादप प्रजातियों की मात्र 3 प्रतिशत पादप प्रजातियाँ ही विकसित हो पायी हैं। यहाँ की वनस्पतियाँ शीतानुकूलित (cryophytes) होती हैं अर्थात् इनमें अतिशीत दशाओं को सहन करने की सामर्थ्य होती है। N.Pollumin (1959) के अनुसार आर्कटिक टुण्ड्रा में शीतानुकूलित पदार्थों के 66 परिवार पाये जाते हैं। उत्तर की ओर जाने पर शौत की कठोरता बढ़ती जाती है तथा पादप प्रजातियों की संख्या भी कम होती जाती है। अधिकांश पादप अनुच्छेदार होते हैं तथा ऊँचाई 5 से 8 सेंटीमीटर तक होती है। ये जमीन से चिपके रहते हैं क्योंकि धरातल का तापमान ऊपर स्थित वायु के ताप से अपेक्षाकृत अधिक होता है।

झाड़ियाँ प्रायः उन भागों में विकसित होती हैं जहाँ पर हिम का ढेर उन्हें तेज चलने वाली बर्फानी हवाओं से बचा सके । इसमें आर्कटिक विलो प्रमुख हैं। इनके तने तथा पत्तियाँ मृदा स्तर के ऊपर कुछ सेण्टीमीटर तक होती हैं। इनकी वृद्धि दर अत्यंत मन्द होती है परंतु इनकी आयु बहुत अधिक होती है (150 से 300 वर्ष पुराने पादपों के उदाहरण मिले हैं)। सदाबहार पुष्पी पादपों का विकास धरातल के गद्दे के रूप में होता है। इनमें प्रमुख है-माँस कैम्पियन । टुण्ड्रा के छ पादप प्रजातियों में गूदेदार पत्तियाँ होती हैं। Saxifirage प्रजाति के कुछ पादपों का विकास गुच्छों के रूप में होता है जबकि कुछ चटाई की तरह भूमि पर क्षैतिज रूप में फैलते हैं (यथा-Dryas octopetala)

आर्कटिक टुण्ड्रा के पादपों का विकास काल लघु ग्रीष्मकाल (50 दिन तक) होता है। जिस समय इनके अवयवों का विकास, फूलों का खिलना, परागण, बीजों का बनना, उनका पकना तथा अन्ततः विसरण आदि सभी क्रियायें सम्पादित होती हैं।

आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम के प्राणियों को दो प्रमुख वर्गों में रखा जा सकता है –

  • स्थायी निवासी (residents) तथा
  • प्रवासी (migrants)

शीतकाल में अधिकांश प्राणी टुण्डा छोड़कर दक्षिणी भागों में प्रवास कर जाते हैं। स्पष्ट है कि प्राणियों में मात्र वे ही शरद् काल में यहाँ टिक पाते हैं जिनकी विशिष्ट शारीरिक संरचना कठोर शीत से बचाव करने में समर्थ होती है। इस तरह स्थायी प्राणियों के शरीर के बाह्य भाग में फर या पंखों का घना आवरण होता है जो इनके लिए लिहाफ (रजाई) का कार्य करते हैं। Musk ox (ovibus muschatus) स्थूल शरीर वाला शाकाहारी जन्तु होता है जिसको शरीर पर कोमल ऊन का बना आवरण होता है तथा मोटे बाल बाहर निकले रहते हैं।

ये बाल इतने लम्बे होते हैं कि इस जन्तु के खड़ा होने पर भूमि को छू जाते हैं। ऊन तथा बालों का यह घना आवरण सर्दी तथा नमी के लिए अप्रवेश्य होता है, अतः यह जन्तु कठोर शीत से अपना बचाव कर लेता है। ग्रीष्मकाल के आते ही यह आवरण गिर जाता है तथा जन्तु फटेहाल दिखाई पड़ता है। आर्कटिक लोमड़ के शरीर पर फर का दुहरा आवरण होता है जिस कारण वह -50° सेण्टीग्रेड तक तापमान को सहन कर लेता है एवं कठोर शीतकाल में लेमिंग तथा खरगोशों का शिकार करने में व्यस्त रहता है। स्थायी पक्षियों में घने पंख होते हैं (यथा-Ptarmigan पक्षी) । छोटे पक्षी अपने रोयेदार पंखों को फुलाकर तथा फड़फड़ाकर शीत से अपनी रक्षा करते हैं।

कुछ स्थायी प्राणी वर्ष के विभिन्न मौसमों में अपना रंग बदल देते हैं। Ptarmigan पक्षी अपने पंखों का रंग साल में तीन बार बदलता है। आर्कटिक लोमड़ तथा Stoat (mustela erminea) का रंग ग्रीष्मकाल में भूरा होता है तथा शरद् काल में श्वेत हो जाता है। कुछ स्तनधारी जन्तुओं (यथा-रीक्ष तथा कैरिबू) के पैर का निचला भाग (जिस पर रोयें नहीं होते हैं) इस तरह का बना होता है कि उससे होकर शरीर की ऊष्मा बाहर न निकल सके (insulated feet) छोटे आकार वाले rodents, lemmings, shrews तथा volces बर्फ में बिल बनाकर रहते हैं ताकि भक्षकों से बच सकें।

आर्कटिक टुण्ड्रा के अधिकांश जन्तु प्रवासी (migrants) होते हैं। जब शरद् काल प्रारम्भ होता है तो ये दक्षिण की ओर वन वाले भागों में भ्रमण कर जाते हैं तथा ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होते ही अपने मूल स्थान में वापस लौट आते हैं। सबसे पहले प्रवास करने तथा पुनः वापस आने वाले प्राणियों में पक्षी प्रमुख होते हैं। (water, fowl, ducks, swans तथा geese की कई प्रजातियाँ)। कुछ पक्षी वसंतकाल में आगमन के समय दक्षिणी भाग से अपने वास्य क्षेत्र में वापस आने से पहले ही जोड़े खा लेते हैं (लैंगिक सम्पर्क)। कुछ पक्षी अपने उसी घोंसले में वापस आ जाते हैं जिन्हें वे शीतकाल के समय छोड़ जाते हैं।

चूँकि ग्रीष्मकाल छोटा होता है और इसी लघु समय के अन्तर्गत घोंसला बनाना, सहवास (सम्भोग) करना, अण्डे देना, उनको जनना तथा नवजात शिशुओं को चारा चुगाना आदि सभी कार्य सम्पादित करना होता है अत: इनके जोड़ों (नर तथा मादा) का प्रेमालाप लघु समय तक ही सीमित रहता है। कुछ पक्षी प्रवास के समय अत्यधिक दूरी तक जाते हैं। इनमें सर्वप्रमुख हैं-आर्कटिक टर्न (Sterna paradisaea)।

ये ग्रीष्मकाल में अपने मूल आर्कटिक टुण्डा वास्य क्षेत्र में प्रवाप करती हैं तथा शीतकाल के प्रारम्भ होते ही अपना स्थान छोड़कर दक्षिणी गोलार्द्ध में अण्टार्कटिका तक पहुंच जाती हैं (इस समय दक्षिण गोलाई में ग्रीष्मकाल होता है)। स्पष्ट है कि आर्कटिक टर्न एक ही वर्ष में दो बार ग्रीष्मकाल तक लाभ उठोती है। कीटों में mosquitoes, midges, blackflies आदि प्रमुख हैं। ग्रीष्मकाल में छोटे-छोटे जलीय भण्डारों, दलदलों तथा नदियों में इनके लार्वा का अपार समूह विकसित हो जाता है जो पक्षियों का प्रमुख आहार है।

भ्रमणशील तथा प्रवासी बड़े जन्तुओं में रेण्डियर तथा कैरिबू सर्वप्रमुख हैं। ये शीतकाल में शीतोष्ण कोणधारी वनों में रहते हैं तथा इसी समय नर तथा मादा में सहवास होता है परंतु बच्चों का जनन ज्यादातर ग्रीष्मकाल में टुण्ड्रा प्रदेश में होता है । ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होते ही caribou भारी झुण्डों में उत्तर की ओर चल पड़ते हैं तथा सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करके टुण्डा आवास में पहुंचते हैं तथा मादा caribou यहाँ बच्चे जनती हैं।

शरद् काल के आगमन होते ही इनके झुण्ड पुनः दक्षिण की ओर चल पड़ते हैं। स्पष्ट है कि यह प्रवास आहार की प्राप्यता तथा अप्राप्यता के फलस्वरूप होता है। इनके सामूहिक भ्रमण के समय रीछों का इन पर आक्रमण होता है तथा लंगड़े, कमजोर तथा कुछ गर्भवती मादा कैरिबू को रौछ पकड़ लेते हैं तथा खा जाते हैं। ग्रीष्मकाल में टुण्ड्रा बायोम में कॅरिबू पर मच्छरों तथा खून चूसने वाले कीटों का भी भयानक आक्रमण होता रहता है। इनसे बचने के लिए ये बार-बार जल में शरण लेते हैं।

अति लघु वृद्धि काल (growing period), न्यूनतम सूर्यातप तथा सूर्य प्रकाश, मिट्टियों में पोषक तत्त्वों (यथा नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस) का अभाव, अविकसित मृदा, मृदा में नमी का अभाव, हिमीकृत धरातल परमाक्रास्ट) आदि के कारण इस आर्कटिक टुण्ड्रा बायोम में न्यूनतम प्राथमिक उत्पादकता होती है। V.D. Alexandrova (1970) के आकलन के अनुसार उच्च आर्कटिक तथा निम्न आर्कटिक टुण्ड्रा में प्राथमिक उत्पादकता (Primary productivity केवल वनस्पतियों की) क्रमशः 142 ग्राम तथा 228 ग्राम (शुष्क भार) प्रति वर्ग मीटर प्रतिवर्ष है। स्पष्ट है कि इस कम उत्पादकता के कारण शाकाहारी जन्तुओं के भोजन की आपूर्ति नहीं हो पाती है, अतः ये मौसमी प्रवास करते हैं।

सागरीय बायोम – सागरीय बायोम की कुछ ऐसी विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं (जो प्राय: स्थलीय बायोम में नहीं होती है) जो यहाँ के जीव समुदायों (पादप तथा प्राणी दोनों) को प्रभावित करती हैं। महासागरीय जल का तापमान 0° से 30° सेण्टीग्रेड के बीच रहता है। सागरीय जल ‘में घुले पोषक लवण तत्त्वों की अधिकता होती है। सागरीय बायोग में जीवन तथा आहार श्रृंखला एवं आहार जाल, सूर्य प्रकाश, जल, कार्बन डाइऑक्साइड, ऑक्सीजन की सुलभता पर आधारित होता है। ये सभी कारक मुख्य रूप से सागर की ऊपरी सतह में ही आदर्श स्थिति में सुलभ होते हैं।

प्रकाश नीचे जाने पर कम होता जाता है तथा 200 मीटर से अधिक गहराई पर जाने पर पूर्णतया समाप्त हो जाता है। इसी ऊपरी सतह (प्रकाशित मण्डल-photiczone) में प्राथमिक उत्पादक पौधे (हरे पौधे, फाइटोप्लैंकटन प्रकाश संश्लेषण द्वारा आहार पैदा करते हैं) तथा प्राथमिक उपभोक्ता जूप्लैंक्टन भी इसी मण्डल में रहते हैं तथा फाइटोप्लैंकटन का सेवन करते हैं। अधिक गहराई में रहने वाले प्राणी अवसादों पर निर्भर करते हैं।

सागरीय बायोम प्रकार – सूर्व प्रकाश, पोषक तत्त्वों, कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन की सुलभता के आधार पर सागरीय भागों में विभिन्न प्रकार के आवासों (वास्य क्षेत्र) का निर्माण होता है जिनमें विभिन्न प्रकार के पादप तथा प्राणी समुदाय रहते हैं। मुख्य रूप से सागरीय बायोम को दो प्रमुख विभागों में अलग करते हैं –

  • पेलैजिक बायोम तथा
  • नितलीय बायोम (benthic biome)

गहराई तक पादप जीवन के आधार पर पलैजिक बायोम को दो उपभोगों में अलग किय जाता है –

  • तट तल बायोम (fertic biome), यह महाद्वीपीय मग्न तटों का भांग होता है जिसमें जल की गहराई 200 मीटर तक होती है) तथा
  • खुला सागर बायोम।

प्रकाश के दृष्टिकोण से सागरीय बायोम को दो प्रमुख भागों में विभक्त करते हैं –

  • प्रकाशित बायोम (euphotic या photic biome) तथा
  • अप्रकाशित बायोम (aphotic biome)।

महाद्वीपीय मग्न तट का समस्त लम्बवत् भाग प्रकाशित होता है। यदि सागरीय बायोम के दो विभागों (पेलैजिक तथा बेन्थिक) को ध्यान में रखा जाये तो सागरीय बायोम के निम्न उपविभाग हो सकते हैं।

A. पेलैजिक बायोम – सागर तल से सागर तली तक का समस्त जलीय भाग। इसके निम्न उपभोग होते हैं –

  • प्रकाशित बायोम या ऊपरी पेलैजिक बायोम-गहराई 200 मीटर तक। महाद्वीपीय मग्न तट भी इसी श्रेणी में आता है। इस समस्त मण्डल में सूर्य प्रकाश पहुँता है परंतु ऊपर से नीचे जाने पर उसकी मात्रा तथा तीव्रता घटती जाती है।
  • अप्रकाशित मण्डल या बायोम-इसकी गहराई 200 मीटर से नीचे की ओर सागरतली तक होती है जो विभिन्न महासागरों एवं सागरों में अलग-अलग होती है। इसमें निम्न गौण मण्डल होते हैं अधिक तथा पूर्ण अन्धेरा होता है। मात्र जीवप्रदीप्त प्रकाश (bioluminescence) ही होता है।
  • अति गहरे पेलैजिक मण्डल-गहराई 6000 मीटर तक होती है।

B. सागरतलीय बायोम (Benthic biome) – इसमें सागरतलीय भाग को सम्मिलित करते हैं। इसके तीन उप-विभाग होते हैं – बेलांचली मण्डल (Littoral zone) –

  • इसके अन्तर्गत सागर तट तथा किनारे का वह भाग आता है जो उच्च ज्वार तथा निम्न ज्वार तल के बीच होता है।
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    चित्र : सागरीय बायोम के प्रकार (जे. डब्लू. हेजपेथ, 1957 के अनुसार)
  • उपवेलांचली मण्डल (Sub-littoral zone) – इसके अन्तर्गत महाद्वीपीय मग्न तट में जल के नीचे स्थित स्थलीय (तलीय भाग) भाग आता है।
  • गहरे तलीय मण्डल (Deep sea benthic zone) – इसके तीन उपमण्डल होते हैं
    (i) Archinenthal zone – महाद्वीपीय मग्न तट से 1000 मीटर की गहराई पर स्थित तलीय भाग।
    (ii)Abyssal benthic zome – 100 मीटर से 6000 मीटर तक गहराई पर स्थित तलीय भाग।
    (iii) Hadal zone – 6000 से 7000 मीटर तक गहराई पर स्थित तलीय भाग। यह मुख्य रूप से महासागरीय गहरी खाइयों की तली को प्रदर्शित करता है।

C. सागरीय जीवों (पादपों तथा जन्तु दोनों) को उनके आवास के आधार पर तीनों कोटियों में विभक्त किया जाता है।

  • प्लैंकटन – ये प्रकाशित मण्डल में जल में उतारन वाले सूक्ष्मस्तरीय पादप तथा जन्तु होते हैं।
  • नेक्टन – इसके अन्तर्गत बड़े आकार वाले तथा शक्तिशाली तैरने वाले जन्तु आते हैं (मछलियाँ आदि) जो सागर के प्रत्येक मण्डल में घूमते रहते हैं।
  • बेन्चस – इसके अन्तर्गत उन पादपों तथा जन्तुओं को सम्मिलित करते हैं जो सागर तली पर रहते हैं।

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प्रश्न 2.
आपके स्कूल प्रांगण में पाए जाने वाले पेड़, झाड़ी व सदाबहार पौधों पर एक संक्षिप्त लेख लिखें और लगभग आधे दिन यह पर्यवेक्षण करें कि किस प्रकार के पक्षी इस वाटिका में आते हैं। क्या आप इन पक्षियों की विविधता का भी उल्लेख कर सकते हैं।
उत्तर:
इस परियोजना कार्य को अपने अध्यापकों की सहायता से स्वयं करें। मदद के लिए परियोजना कार्य (i) देखें।

Bihar Board Class 11 पृथ्वी पर जीवन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘कृषि पारिस्थितिकी’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कृषि फसलों तथा पर्यावरण के मध्य संबंध को कृषि पारिस्थितिकी कहते हैं। फसलों के प्रकार जलवायु, ऋतु तथा किसान के चुनाव पर निर्भर हैं।

प्रश्न 2.
अप्रकाशी क्षेत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
महासागरों में 2000 मीटर की गहराई तक स्थित जल क्षेत्र कम प्रकाश पाता है. जो प्रकाश संश्लेषण के लिए अपर्याप्त है। इस क्षेत्र को अप्रकाशी क्षेत्र कहते हैं।

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प्रश्न 3.
हरे पौधे को उत्पादक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
सभी जीव भोजन निर्वाह के लिए भोजन ऊर्जा तथा पदार्थ दोनों की ही आपूर्ति करता है। हरे भरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बोहाइड्रेट पैदा करते हैं तथा प्रोटीन और वसा का संश्लेषण करते हैं। इसलिए इन्हें उत्पादक कहा जाता है।

प्रश्न 4.
प्रथम उपभोक्ता किसे कहते हैं?
उत्तर:
शाकाहारी घटक मुख्य रूप से अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते हैं, प्रथम उपभोक्ता कहलाते हैं।

प्रश्न 5.
जैवमंडल के अजैविक घटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अजैविक घटक मुख्य रूप से जलवायु तथा मृदीय कारक हैं। जलवायु कारकों में तापमान, आर्द्रता, वर्षा तथा हिमपात को शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 6.
पारिस्थितिक की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पर्यावरण तथा जीवों के बीच पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्रकाश संश्लेषण की परिभाषा दें।
उत्तर:
पौधों द्वारा प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल को कार्बोहाइड्रेट में बदलने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं।

प्रश्न 8.
पारिस्थितिक तंत्र के घटकों के दो वर्ग बताएँ।
उत्तर:
प्रारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य वर्ग हैं –

  1. जैव (Organic)
  2. अजैव (Inorganic)

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प्रश्न 9.
कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानव द्वारा कृत तंत्र को पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं। मानव ने अन्य जीवों की तुलना में पर्यावरण को अत्यधिक बदला है। इस परिवर्तन के कारण ही इसे कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं।

प्रश्न 10.
‘सुपोषी झील’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उथली झीलें, जो जैविक उत्पादों के संचय में समृद्ध हैं, सुपोषी झीलें कहलाती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
महासागरों का जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
महासागर जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालते हैं –

  1. महासागर धरातल, तापमान तथा आर्द्रता पर प्रभाव डालते हैं।
  2. महासागर सौर ऊर्जा का संचय करते हैं।
  3. मालसागरों में ऊर्जा के अवशोषण और निष्कर्षण की विशाल क्षमता है।
  4. समुद्र तट पर तापांतर बहुत कम होता है।
  5. महासागरीय धाराएँ तटीय क्षेत्रों के तापमान को कम करने में मदद करती हैं।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक पर्यावरण तथा मानवीय (कृत्रिम) पर्यावरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पर्यावरण के दो प्रकार हैं –

  • प्राकृतिक पर्यावरण
  • कृत्रिम पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण से अभिप्राय प्राकृतिक तत्त्वों से है। जैसे-भूमि, वायु, वनस्पति, जल, मिट्टी आदि। इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर वातावरण के ऐसे तत्त्व उत्पन्न होते हैं जो मानवीय जीवन पर प्रभाव डालते हैं। पर्यावरण वास्तव में एक ही है, परंतु जब मानव इस दृश्य में प्रवेश करता है तो वह इस पर्यावरण को अपनी इच्छा से प्रभावित करता है। पर्यावरण को मानवीय पर्यावरण कहा जाता है। इसमें जनसंख्या, परिवहन, बस्तियाँ आदि सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 3.
मरुस्थलीय बायोम पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मरुस्थलों की विशेषता अत्यधिक कम वर्षा का होना तथा उच्च वाष्पन है। कम वर्षा के कारण वर्षा से प्राप्त जल भी पौधों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचता। दिन अत्यधिक गर्म और रात ठंडी होती है। तापमान का मौसमी उतार-चढ़ाव काफी होता है। मरुस्थलों में पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तु कम होते हैं। विभिन्न प्रकार के एकॉशया, कैक्टस, यूफोर्बियाज तथा अन्य गूदेदार वनस्पति मरुस्थल में मिलते हैं। इस बायोम में पाए जाने वाले मुख्य जीव हैं-चीटियाँ, टिड्डियाँ, ततैये, बिच्छ, मकड़ी, छिपकली, रटल साँप तथा अनेक कीटभक्षी पक्षी जैसे-बतासी और अबाबील, बटेर, बत्तख, मरु चूहे, खरगोश, लोमड़ी, गीदड़ तथा विभिन्न प्रकार की बिल्लियाँ ।

प्रश्न 4.
जलीय पारिस्थितिक तंत्र, स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जलीय पारिस्थितिक तंत्र खुले महासागरों से लेकर छोटे-छोटे जलाशयों तक है तथा इनमें खारापन, गहराई तथा तापमान के उतार-चढ़ाव को दशाएँ पाई जाती हैं । समुद्री तथा अलवण जलीय पर्यावरण में भी अनेक पारिस्थितिक तंत्र हैं, जिनकी सीमाएँ अतिव्यापी हैं। जलीय पर्यावरण के साथ जीवों के अनुकूलन में अंशों तथा विविधता की दृष्टि से काफी अंतर होता है। कुछ प्राणी पूरी तरह जल में रहते हैं; जैसे-मछलियाँ कुछ प्राणी जल तथा स्थल दोनों पर रहते हैं। अजैविक कारकों की दृष्टि से जलीय पारिस्थितिक तंत्र तथा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र काफी भिन्न हैं। यहाँ रहने वाले समुदायों में भारी अंतर है।

प्रश्न 5.
महासागरीय द्रोणियों में किस प्रकार का पर्यावरण पाया जाता है?
उत्तर:
महासागरीय ट्रोणियों में प्रमुख तीन पर्यावरणों की पहचान की गई है –

  1. वेलांचली क्षेत्र – तट से महाद्वीपीय शेल्फ के किनारे तक की समुद्री सतह।
  2. नितलस्थ क्षेत्र – महाद्वीपीय ढाल तथा अप्रकाशी एवं वितलीय क्षेत्र तक विस्तृत समुद्री सतह।
  3. वेलापवर्ती क्षेत्र – इसमें महासागरीय द्रोणी का जल शामिल है।

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प्रश्न 6.
प्लवक क्या होते हैं?
उत्तर:
पल्वक वे तैरते हुए जीव हैं जिनके पास स्वयं गतिशील होने का कोई साधन नहीं होता। ये जलधाराओं के साथ गति करते हैं। ये सक्ष्म आकार के जीव होते हैं। ये दो प्रकार को होते हैं-पादप प्लवक तथा प्राणी प्लवक । ये नदी तथा सरिताओं में पाए जाते हैं। पादप प्लवक स्वपोषी जीव होते हैं। डायटम प्लवक वर्ग के पौधे हैं। ये सूक्ष्म होते हैं। ये उप-आर्कटिक तथा अंटार्कटिक क्षेत्र के ठंडे जल में तेजी से पनपते हैं।

प्रश्न 7.
प्राकतिक वातावरण तथा मानवीय वातावरण में क्या अंतर है?
उत्तर:
वातावरण के दो प्रकार हैं –

  • प्राकृतिक वातावरण
  • मानवीय वातावरण

प्राकृतिक वातावरण से तात्पर्य प्राकृतिक तत्त्वों से है। जैसे-भूमि, वायु, वनस्पति, जल, मिट्टी आदि । इन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पर वातावरण के ऐसे तत्त्व उत्पन्न होते हैं जो मानवीय जीवन पर प्रभाव डालते हैं। वातावरण यथार्थ में एक ही है, परंतु जब मानव इस दृश्य में प्रविष्ट होता है तो वह इस वातावरण को अपनी इच्छा से प्रभावित करता है। इस वातावरण को मानवीय वातावरण कहा जाता है। इसमें जनसंख्या, परिवहन, बस्तियाँ, धर्म आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 8.
पारिस्थितिक तंत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रकृति के विभिन्न संघटक जीवन तथा विकास के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। स्थलाकृतियाँ, वनस्पति तथा जीव-जन्तु एक-दूसरे से मिलकर एक वातावरण का निर्माण करते हैं, जिसे पारिस्थितिक तंत्र कहते हैं। यह वातावरण पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में ऊर्जा उत्पन्न करने में सहायक होता है जो जीवों के विकास में सहायता करता है। इस प्रकार स्थलाकृतियों, वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में एक चक्र पाया जाता है जिससे हमें पृथ्वी के जैविक पहलू को समझने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 9.
पारिस्थितिकी संतुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक संघटकों में एक जीवन चक्र होता है। पहले वे उत्पन्न होते हैं, विकसित होकर प्रौढ़ावस्था में पहुँचते हैं तथा फिर समाप्त हो जाते हैं। यह चक्र एक लम्बे समय में समाप्त होता है। जीव-जन्तु, वनस्पति, पौधे आदि विकसित होकर एक अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था में सभी जीवों की जल, भोजन, वायु आदि आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। जैव संख्या तथा वातावरण के बीच एक संतुलन स्थापित हो जाता है। इस अवस्था को पारिस्थितिकी संतुलन कहते हैं। इस अवस्था के पश्चात् इन संघटकों में कोई परिवर्तन नहीं होता।

प्रश्न 10.
पारिस्थितिक समर्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला में एक स्तर से दूसरे स्तर तक ऊर्जा के रूपान्तरण के प्रतिशत को पारिस्थितिक समर्था कहते हैं। खाद्य श्रृंखला में चार प्रकार के स्तर पाए जाते हैं। सर्वप्रथम स्तर में आधार स्तर पर प्राथमिक पौष्टिक होते हैं। द्वितीय स्तर पर शाकाहारी होते हैं। तृतीय स्तर पर मांसाहारी तथा चतुर्थ स्तर पर अन्य मांसाहारी होते हैं। इनमें 5% से 20% तक ऊर्जा का रूपांतरण होता है। इसका तात्पर्य यह है कि शाकाहारी निचले स्तर से केवल 10% ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 11.
प्रकृति का संतुलन कैसे बना रहता है?
उत्तर:
प्रकृति का संतुलन-प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए भोजन की उपलब्धता मुख्य कारक है। यह संतुलन गतिशील है और इसमें उतार-चढ़ाव कुछ सीमाओं के भीतर होता रहता है। कोई भी जीव पृथक् न रहकर अपने ही जीवों की संगत में रहता है। इसका पारिस्थितिक क्षेत्र जैविक पर्यावरण की अनुकूलता पर निर्भर करता है। जैविक पर्यावरण विभिन्न प्रकार की प्रजातियों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं की उपज है।

पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक संघटकों में एक जीवन चक्र होता है। पहले वे उत्पन्न होते हैं, विकसित होकर प्रौढ़ावस्था में पहुंचते हैं तथा फिर समाप्त हो जाते हैं। जीव-जन्तु, वनस्पति, पौधे आदि विकसित होकर एक अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था में सभी जीवों की जल, भोजन, वायु आदि आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। जीव तथा प्रकृति के बीच एक संतुलन हो जाता है। इस अवस्था को पारिस्थितिकी संतुलन या प्रकृति-संतुलन कहते हैं।

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प्रश्न 12.
जैव मंडल में ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है?
उत्तर:
जैवमंडल में ऊर्जा प्रवाह-प्रकृति में ऊर्जा प्रकाश संश्लेषित जीवों के माध्यम से प्रवेश करती है और एक जीव से दूसरे जीव को भोजन के रूप में दी जाती है। वे जीव जो सूर्य के प्रकाश का ट्रैप करते हैं, उत्पादक कहलाते हैं। ट्रेप की गई ऊर्जा का कुछ भाग प्राथमिक उपभोक्ताओं द्वारा लिया जाता है। पशु पेड़-पौधों से अधिक सक्रिय होने के कारण ऊर्जा के अधिकतर भाग को अन्य घटक द्वारा उपयोग किए जाने से पहले ही कर लेते हैं। ऊर्जा स्थानांतरण में खाद्य श्रृंखला से ऊर्जा का कुछ भाग लुप्त हो जाता है।

इस प्रकार ऊर्जा की मात्रा एक स्तर से अगले स्तर पर स्थानांतरित होने पर घटती जाती है। मृत जीवों का अपघटन रासायनिक ऊर्जा का विमोचन करता है। अन्त में समस्त और ऊर्जा, जो उत्पादकों के माध्यम से जैविक संसार में प्रवेश करती है अजैविक संसार को प्रकाश के रूप में नहीं बल्कि उष्मा के रूप में वापस कर दी जाती है।
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प्रश्न 13.
पारिस्थितिक तंत्रों की क्या-क्या सीमाएँ हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिक तंत्रों की सीमाएँ-पारिस्थितिक तंत्र में निवेश एवं उत्पादन का अध्ययन इसकी सीमाओं को आर-पार किया जा सकता है तथा सुविधा के लिए इसे पृथक् अस्तित्व में देखा जाता है। पारिस्थितिक तंत्र की सीमाएँ अस्पष्ट तथा अतिव्यापी हैं। ऊर्जा तथा पदार्थों का एक पारिस्थिक तंत्र से दूसरे पारिस्थितिक तंत्र में संचलन होता रहता है। यह संचलन नजदीक अथवा दूर के पारिस्थितिक तंत्र से हो सकता है। ऊर्जा एवं पदार्थों का संचलन, जैविक, जलावायविक अथवा भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

हिमालय क्षेत्र से भारी मात्रा में मृदा गंगा, यमुना तथा बह्मपुत्र जैसी नदियों द्वारा अपने डेल्टाओं में लाई जाती हैं। साइबेरिया से सारस भारत (भरतपुर) प्रवास करते हैं। गहरे महासागरीय अवसाद में उत्पन्न हुआ फास्फोरस शैवाल-क्रस्टेशियाई-जलकाक खाद्य श्रृंखला द्वारा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र की ओर परिवहित किया जा सकता है। पृथ्वी पर उपस्थित हजारों पारिस्थितिक तंत्र आपस में जुड़े हुए हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखें –

  • तुंगता के अनुसार बायोम
  • मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र
  • मितपोषणी झीलें
  • पारिस्थितिक तंत्रों की सीमाएँ

उत्तर:
1. तुंगता के अनुसार बायोम – टुण्ड्रा बायोम की शृंखला हिमालय (एशिया), एंडीज (अमेरिका) तथा रॉकीज (उत्तरी अमेरिका) जैसी पर्वत श्रेणियों के ढालों पर भी देखी जा सकती हैं। इस पर्वत श्रेणियों पर बायोम प्रकार में धीमा परिवर्तन अक्षांश के स्थान पर ऊँचाई का अनुसरण करता है। इन बायोमों के निर्धारण में तापमान तथा वर्षण की दर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारक हैं। उष्णकटिबंधीय पर्वतों में पेड़-पौधों के समुदाय तथा इनकी दशाएँ पर्वत के आधार से हिमरेखा तक इस प्रकार हैं-उष्णकटिबंधीय वन (भारत में तराई क्षेत्र); पर्णपाती वन; शंकुधारी वन तथा टुण्डा बनस्पति।

2. मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र – मानव ने पर्यावरण को इतना अधिक बदला है कि इसे मानवकृत पारिस्थितिक तंत्र कहा जाता है। पौधों एवं जीव-जन्तुओं सहित गाँव एवं शहर फलोद्यान एवं बागान, उद्यान एवं पार्क आदि मानवकृत स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र हैं। बड़े बाँध और जलाशय, झीलें, नहरें, छोटे मत्स्य तालाब और जल जीवशाला मानवकृत जलीय पारिस्थितिक तंत्र के उदाहरण हैं। जैविक समुदाय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संशोधन आग का प्रयोग, पौधों के उगने तथा पशुओं के पालने से आया है। कृषि ही समस्त मानव सभ्यता की जड़ है और यही सभ्यता का पोषण भी करती है। मानव ने वनों तथा घास भूमियों के विशाल क्षेत्रों को चुने हुए पौधों, जैसे अनाज, दालें, तिलहन तथा चारा, पैदा करने के लिए शस्य भूमि में बदल दिया है।

मानवकृत सभी पारिस्थितिक तंत्र, जिसमें कृषि पारिस्थितिक तंत्र सम्मिलित हैं, काफी सरल एवं अत्यधिक सक्षम हैं। इनमें प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की विविधता का अभाव है। एक ही प्रकार की फसल जलाभाव, बाढ़, बीमारियों, नाशक जीवों अथवा भूमि पर रहने वाले कीटों द्वारा पूरी तरह नष्ट हो सकती हैं।

3. मितपोषणी झीलें – झील एवं तालाब प्रत्येक बायोम में मिलते हैं। ये अलवणीय जलाशय हैं। अपेक्षाकृत उथली झीलें जैविक उत्पादों के संचय में समृद्ध हैं, इन्हें सपोषी झीलें कहते हैं। गहरी झीलें जिनके दोनों किनारों के ढाल तीव्र तथा पथरीले हों, परिसंचरित पोषण असे फॉस्फेट में निर्धन होते हैं। इन्हें मितपोषणी झीलें कहते हैं। इन झीलों के भौतिक कारक अवस्थिति, ऊँचाई और आस-पास के बायोम पर निर्भर करते हैं। कुछ झीलें खारे जल वाली होती हैं, जैसे राजस्थान की सांभर झील। अलवणीय तालाबों में स्वपोषी सूक्ष्म पादपप्लवक भी पाए जाते हैं।

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प्रश्न 2.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता एवं द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता
  2. जैविक तथा अजैविक कारक
  3. खाद्य शृंखला तथा खाद्य जाल।

उत्तर:
1. प्रथम श्रेणी का उपभोक्ता एवं द्वितीय श्रेणी का उपभोक्ता में अंतर –
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2. जैविक तथा अजैविक कारक –
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3. खाद्य शृंखला तथा खाद्य जाल।
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प्रश्न 3.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. स्थलीय तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्र
  2. समुद्री तथा अलवणीय जल पर्यावरण
  3. टैगा तथा टुंड्रा।

उत्तर:
1. स्थलीय तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्र में अंतर –
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2. समुद्री तथा अलवणीय जल पर्यावरण –
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3. टैगा तथा टुंड्रा –
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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography महासागरीय जल संचलन Text Book Questions and Answers

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(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे गति किससे संबंधित है ……………..
(क) ज्वार
(ख) तरंग
(ग) धाराएँ
(घ) ऊपर में से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) धाराएँ

प्रश्न 2.
वृहत् ज्वार आने का क्या कारण है?
(क) सूर्य और चन्द्रमा का पृथ्वी एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल
(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक-दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल
(ग) तटरेखा का दंतुरित होना
(घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) सूर्य और चन्द्रमा द्वारा एक-दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल

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प्रश्न 3.
पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अपसौर
(ख) उपसौर
(ग) उपभू
(घ) अपभू
उत्तर:
(ग) उपभू

प्रश्न 4.
पृथ्वी और चन्द्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(क) अक्टूबर
(ख) जुलाई
(ग) सितम्बर
(घ) जनवरी
उत्तर:
(घ) जनवरी

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
तरंगें क्या हैं?
उत्तर:
तरंगें वास्तव में ऊर्जा हैं । तरंगों में जल का कण छोटे वृत्ताकार रूप में गति करते हैं। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं।

प्रश्न 2.
महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?
उत्तर:
वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती हैं। बड़ी तरंगें खुले महासागरों में पायी जाती हैं। तरंगें जैसे ही आगे की ओर बढ़ती हैं बड़ी होती जाती हैं तथा वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं।

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प्रश्न 3.
ज्वारभाटा क्या है?
उत्तर:
चन्द्रमा एवं सूर्य के आकर्षण के कारण दिन में एक बार या दो बार समुद्र तल का नियतकालिक उठने या गिरने को ज्वारभाटा कहा जाता है।

प्रश्न 4.
ज्वारभाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
चन्द्रमा के गुरुवाकर्षण के कारण तथा कुछ हद तक सूर्य के गुरुत्वाकर्षण द्वारा ज्वार भाटाओं की उत्पति होती है। दूसरा कारक, अपकेंद्रीय बल है जो कि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर दो महत्वपूर्ण ज्वारभाटाओं को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं। चन्द्रमा की तरफ वाले पृथ्वी के भाग पर, एक ज्वारभाटा उत्पन्न होता है जब विपरीत भाग पर चन्द्रमा का गुरुत्वीय आकर्षण उसकी दूरी के कारण कम होता है तब अपकेंद्रीय बल दूसरी तरफ ज्वार उत्पन्न करता है।

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प्रश्न 5.
ज्वारभाटा नौकासंचालन से कैसे संबंधित हैं?
उत्तर:
ज्वारभाटा नौकासंचालकों व मछुआरों को उनके कार्य संबंधी योजनाओं में मदद करती . है। नौकासंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्त्व है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलधाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं ? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
जलधाराएँ अधिक तापमान वाले क्षेत्रों से कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर तथा इसके विपरीत कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर बहती हैं। जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं तो ये उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उन्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती हैं।

उदाहरणार्थ, गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह जो उत्तर की ओर यूरोप के पश्चिमी तट की ओर बहती है। यह ब्रिटेन और नार्वे के तट पर शीत ऋतु में भी वैर्फ नहीं जमने देती। जलधाराओं का जलवायु पर प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है। जब आप समान अक्षांशों पर स्थित ब्रिटिश द्वीप समूह की शीत ऋतु की तुलना कनाडा के उत्तरी पूर्वी तट की शीत ऋतु से करते हैं। कनाडा का उत्तरी-पूर्वी तट लेब्राडोर की ठंडी धारा के प्रभाव में आ जाता है। इसलिए यह शीत ऋतु में बर्फ से ढका रहता है।

प्रश्न 2.
जलधाराएं कैसे उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
महासागरों में धाराओं की उत्पत्ति कई कारकों के सम्मिलित प्रयास के फलस्वरूप संभव होती है। इनमें से कुछ कारक महासागरीय जल की विभिन्न विशेषताओं से संबंधित हैं कुछ कारक पृथ्वी की परिभ्रमण क्रिया तथा उसके गुरुत्वाकर्षण बल से संबंधित हैं तथा कुछ बाह्य। कारक हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे कारक भी हैं जो धाराओं में परिवर्तन लाते हैं। इन्हें रूप परिवर्तन कारक (modifying factors) कहते हैं।

1. पृथ्वी के परिभ्रमण से संबंधित कारक – पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में अपनी अक्षरेखा के सहारे परिक्रमा करती है। इस गति के कारण जल स्थल का साथ नहीं दे पाता है, जिस कारण वह पीछे छूट जाता है, परिणामस्वरूप जल में पूर्व से पश्चिम दिशा में गति उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार विषुवत् रेखीय धाराओं की उत्पत्ति होती है कभी-कभी कुछ जल पृथ्वी की परिभ्रमण दिशा की ओर भी अग्रसर हो जाता है। जिस कारण प्रति विषुवत् रेखीय धारा की उत्पत्ति होती है।

2. सागर से संबंधित कारक – सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिस कारण धाराओं की उत्पत्ति होती है।

3. बाह्य सागरीय कारक – महासागरीय जल पर वायुमण्डलीय दशाओं का पर्याप्त प्रभाव होता है। इनमें वायुमण्डलीय दबाव तथा उनमें भिन्नता, वायु दिशा, वर्षा वाष्पीकरण आदि धाराओं की उत्पत्ति में सहायक होते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
एक ग्लोब या मानचित्र लें, जिसमें महासागरीय धाराएँ दर्शाई गई हैं, यह भी बताएँ कि क्यों कुछ जलधाराएँ गर्म हैं व अन्य ठंडी। इसके साथ ही यह भी बताएं कि निश्चित स्थानों पर यह क्यों विक्षेपित होती है। कारणों का विवेचन करें।
उत्तर:
महासागरीय धाराओं को तापमान के आधार पर गर्म व ठंडी जलधाराओं में वर्गीकृत किया जाता है।
1. ठण्डी जलधाराएँ ठण्डे जल को गर्म जल क्षेत्रों में लाती हैं। ये महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर बहती हैं (ऐसी दोनों गोलाद्धों में निम्न व मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में होता है) और उत्तरी गोलार्द्ध के उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में यह जलधाराएँ महाद्वीपों के पूर्वी तट पर बहती हैं।

2. गर्म जलधाराएँ गर्म जल को ठण्डे जल क्षेत्रों में पहुँचाती हैं और प्रायः महाद्वीपों के पूर्वी तटों पर बहती हैं (दोनों गोलाद्धों के निम्न व मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में)। उत्तरी गोलार्द्ध में ये जलधाराएँ महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर (उच्च अक्षांशीय) क्षेत्रों में बहती हैं।

पानी के घनत्व में अंतर महासागरीय जलधाराओं की ऊर्ध्वाधर गति को प्रभावित करता है। ठंडा जल गर्म जल की अपेक्षा अधिक सघन होता है। सघन जल नीचे बैठता है जबकि हल्के जल की प्रवृत्ति ऊपर उठने की होती है। ठंडे जल वाली महासागरीय धाराएँ तब उत्पन्न होती हैं जब ध्रुवों के पास वाले जल नीचे एवं धीरे-धीरे विषुवत् रेखा की ओर गति करते हैं। गर्म जलधाराएँ विषुवत् रेखा से सतह के साथ होते हुए ध्रुवों की ओर जाती है और ठंडे जल का स्थान लेती हैं।

प्रमुख महासागरीय धाराएँ प्रचलित पवनों और कोरियोलिस प्रभाव से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। निम्न अक्षांशों से बहने वाली गर्म जलधाराएँ कोरिलोसिस प्रभाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में अपने बाईं तरफ और दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने दाईं तरफ मुड़ जाती है (देखें चित्र)।
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प्रश्न 2.
किसी तालाब के पास जाएँ तथा तरंगों की गति का अवलोकन करें एक पत्थर फेंकें एवं देखें की तरंगें कैसे उत्पन्न होती हैं। एक तरंग का चित्र बनाएँ एवं इसकी लम्बाई, दूरी तथा आयाम को मापें तथा अपनी कापी में इसे लिखें।
उत्तर:
इस परियोजना कार्य को स्वयं करें।

Bihar Board Class 11 महासागरीय जल संचलन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘उद्घावन’ क्या है?
उत्तर:
अत्यधिक विक्षुब्ध जल की परत के रूप में जब तरंग स्थल की ओर संचलित होती है, तब इसे उद्धावन कहते हैं।

प्रश्न 2.
जल में सूर्य का प्रकाश कितनी गहराई तक प्रवेश कर सकता है?
उत्तर:
जल में सूर्य का प्रकाश 900 मीटर की गहराई तक प्रवेश कर सकता है, पर केवल 100 मीटर की गहराई तक इतना प्रकाश रहता है, जिसका उपयोग पेड़-पौधे कर सकें।

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प्रश्न 3.
सागरीय जल के तापमान का वार्षिक अंतर किन घटकों पर निर्भर करता है?
उत्तर:

  1. विभिन्न गहराइयों में तापमान विभिन्नता
  2. ताप चालन का प्रभाष
  3. संवहनी धाराओं का प्रभाव
  4. जलराशियों का पार्श्व विस्थापन

प्रश्न 4.
महासागरीय जल के कौन-से गुण समुद्री जन्तुओं और वनस्पतियों को प्रभाटि करते हैं?
उत्तर:

  1. जल का तापमान
  2. जल का घनत्व
  3. जल की लवणत
  4. जल र संचरण

प्रश्न 5.
उन कारकों के नाम बताइए, जो महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति को निर्याः करते हैं।
उत्तर:
समुद्री धाराओं की उत्पत्ति को नियंत्रित करने वाली महत्त्वपूर्ण क्रियाविधि हैं –

  1. समुद्री धरातल पर पवनों का कर्षण तथा
  2. जल घनत्व में अंतर से उत्पन्न असा

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प्रश्न 6.
महासागरीय धाराएं किसे कहते हैं?
उत्तर:
जल की एक राशि का एक निश्चित दिशा में लम्बी दूरी तक सामान्य संच • महासागरीय धारा कहलाता है। ये चौड़ी प्रवाह प्रणाली से लेकर छोटी प्रवाह प्रणाली तक हं

प्रश्न 7.
थर्मोक्लाइन धाराएं किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जल के घनत्व में अंतर के कारण जो धाराएँ उत्पन्न होती हैं उन्हें थर्माक्लाइन धार कहते हैं।

प्रश्न 8.
गल्फ स्ट्रीम का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पलोरिडा अंतरीप से हटेरास अंतरीए की ओर बहने वाली धारा फ्लोरिडा ध कहलाती है। हटेरास अंतरीप के पश्चात् इसे गल्फ स्ट्रीम कहते हैं।

प्रश्न 9.
तरंग-आवर्त काल किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी निश्चित बिन्दु से गुजरने वाले दो क्रमिक तरंगों के बीच के समय को तरंग-आवर्त काल कहते हैं।

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प्रश्न 10.
‘भग्नोमि’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
एक क्रांतिक बिन्दु पर आकर तरंग रूप खंडित होकर विक्षुब्य जल समूह में बदल जता है, जिसे भग्नोर्मि कहते हैं।

प्रश्न 11.
तरंग का वेग कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
तरंग वेग निम्न विधि से निश्चित किया जा सकता है –
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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भग्ना॑मि तथा उद्घावन किस प्रकार बनती है?
उत्तर:
जब कोई तीव्र ढाल वाली तरंग तट की ओर बढ़ती है और इसे तट के उथले जल से गुजरना पड़ता है, तो इसके शृंग की ऊँचाई शीघ्रता से बढ़ती है और तरंग का अग्रढाल अत्यधिक तीव्र हो जाता है। एक क्रांतिक बिन्दु पर आकार तरंग रूप में खंडित होकर विक्षुब्ध जल समूह में बदल जाता है, जिसे भग्नोर्मि कहते हैं। भानोमि के पश्चात् तरंग अत्यधिक विक्षुब्ध जल की परत के रूप में वह स्थल की ओर संचलित होती है, जिसे उद्धावन कहते हैं।

प्रश्न 2.
स्वेल और सर्फ में क्या अंतर है?
उत्तर:
स्वेल –

  • खुले सागर में नियमित तरंगों को स्वेल कहा जाता है।
  • तट के समीप इन तरंगों की ऊँचाई बढ़ जाती है।

सर्फ –

  • तटीय क्षेत्रों में टूटती हुई तरंगों को सर्फ कहते हैं।
  • तट के समीप ये तरंगें शोर मचाती हुई तट पर प्रहार करती हैं।

प्रश्न 3.
ज्वारीय भित्ति किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब ज्वारीय तरंगें किसी खाड़ी अथवा नदी के मुहाने में प्रवेश करती हैं तो ज्वारीय भंग नदी के ऊपरी भाग की ओर तेजी से बढ़ती हुई एक खड़ी दीवार की भाँति दिखाई देती हैं, जिसे ज्वारीय भित्ति कहते हैं। जब ज्वार उठता है तो पानी की एक धारा नदी घाटी में प्रवेश करती है। यह लहर नदी के जल को विपरीत दिशा में बहाने का प्रयास करती है। ज्वारीय लहर की ऊँचाई बढ़ जाती है तथा पानी का बहाव उलट जाता है। हुगली नदी में ज्वारीय भित्ति के कारण छोटी नावों को बहुत हानि पहुँचती है। ज्वारीय भित्ति मानव की अनेक प्रकार से सहायता करती है।

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प्रश्न 4.
पवन निर्मित तरंगों के विभिन्न प्रकार बताएं।
उत्तर:
तरंगें पवन के संपर्क से सागरीय जल के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे की गति से उत्पन्न होती हैं। पवन द्वारा तरंगें तीन प्रकार की होती हैं –

  • सी (sea)
  • स्वेल (swell)
  • सर्फ (surf)

विभिन्न दिशाओं तथा गतियों से उत्पन्न तरंगों को ‘सी’ कहते हैं। जब ये तरंगें नियमित रूप से एक निश्चित गति तथा दिशा से आगे बढ़ती हैं तो इसे स्वेल कहते हैं। समुद्र तट पर शोर करती है, टूटती हुई तरंगों को सर्फ कहते हैं। जब ये तरंगें समुद्र तट पर वेग से दौड़ती हैं, तो इन्हें स्वाश (swash) कहते हैं । समुद्र की ओर वापस लौटती हुई. तरंगों को बैक वाश कहते हैं।

प्रश्न 5.
ज्वारभाटा किसे कहते हैं? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
ज्वारभाटा समुद्र की एक गति है। समुद्र जल नियमित रूप से प्रतिदिन दो बार उठता है तथा दो बार नीचे उतरता है। समुद्र जल के इस नियमित उतार तथा चढ़ाव को ज्वारभाटा कहते हैं। पानी के ऊपर उठने की क्रिया को ज्वार तथा पानी के नीचे उतरने की क्रिया को भाटा कहते हैं।

  • प्रत्येक स्थान पर ज्वार तथा भाटा की ऊँचाई भिन्न-भिन्न होती है।
  • प्रत्येक स्थान पर ज्वार या भाटा की अवधि भिन्न-भिन्न होती है।
  • समुद्र जल लगभग 6 घंटे और 13 मिनट तक ऊपर चढ़ता है और इतनी देर तक नीचे उतरता है।
  • ज्वारभाटा एक स्थान पर नित्य ही एक समय पर नहीं आता।

प्रश्न 6.
समुद्री जल की विसंगति तथा समविसंगतीय रेखा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
महासागर महान ऊष्मा भंडार का काम करते हैं। किसी स्थान के औसत तापमान तथा उस स्थान के अक्षांश के औसत तापमान के बीच के अंतर को ऊष्मीय-विसंगति कहते हैं। गर्मजल धाराओं के कारण धनात्मक तथा शीतल जलधाराओं के कारण ऋणात्मक विसंगति उत्पन्न होती है।

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प्रश्न 7.
महासागरीय जलधाराओं की मुख्य विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
महासागरीय जलधाराओं की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. जलधाराएँ निरंतर एक निश्चित दिशा में प्रवाह करती हैं।
  2. निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराओं को गर्म जलधाराएँ कहते हैं।
  3. उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर बहने वाली धाराओं को ठंडी जलधाराएँ कहते हैं।
  4. उत्तरी गोलार्द्ध की जलधाराएं अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध की जल-धाराएँ अपने बाई ओर मुड़ जाती हैं।
  5. निम्न अक्षांशों में पूर्वी तटों पर गर्म जलधाराएँ तथा पश्चिमी तटों पर ठंडी जल धाराएँ बहती हैं।
  6. उच्च अक्षांशों में पश्चिमी तटों पर गर्म जलधाराएँ और पूर्वी तटों पर ठंडी जल धाराएँ बहती हैं।

प्रश्न 8.
साउथैम्पटन (इंग्लैंड) के तट पर प्रतिदिन चार बार ज्वार क्यों आते हैं?
उत्तर:
सामान्यतः दिन में दो बार ज्वार आता है। परंतु साउथैम्पटन (इंग्लैंड के दक्षिणी तट) पर ज्वार प्रतिदिन चार बार आते हैं। यह प्रदेश इंगलिश चैनल द्वारा उत्तरी सागर तथा अन्ध महासागर को जोड़ता है। दो बार ज्वार अन्ध महासागर की ओर से आते हैं तथा दो बार उत्तरी सागर की ओर से आते हैं।

प्रश्न 9.
हुगली नदी में नौका संचालन के लिए ज्वार-भाटा का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
ऊँचे ज्वार आने पर नदियों के मुहाने पर जल अधिक गहरा हो जाता है। इस प्रकार बड़े-बड़े जलयान नदी में कई मील भीतर तक प्रवेश कर जाते हैं। कोलकाता हुगली नदी के किनारे समुद्र तट से 120 किमी दूर स्थित है, परंतु हुगली नदी में आने-जाने वाले ज्वार के कारण ही जलयान कोलकाता तक पहुँच पाते हैं। ज्वारीय तरंगें नदियों के जल स्तर को ऊपर उठा देती हैं, जिससे जलयान आंतरिक पतनों तक पहुंच जाते हैं।

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प्रश्न 10.
समुद्री तरंगों की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
तरंगें जल में दोलनी-गतियाँ हैं। समुद्री तरंगों की उत्पत्ति की क्रियाविधि पर यह विश्वास किया जाता है कि ये तरंगें जलीय घरातल पर पवनों के घर्षण के कारण बनती हैं। तरंगों की ऊँचाई तीन कारकों पर निर्भर करती हैं –

पवन वेग
किसी दिशा विशेष से पवन के बहने की अवधि तथा
जलीय घरातल का विस्तार क्षेत्र, जिस पर पवन चलती है।

जहाँ जल गहरा होता है, वहाँ पवन का वेग अधिक होता है तथा उसके बहने की अवधि भी लम्बी होती है। ऐसी परिस्थिति में उच्च तरंग का निर्माण होता है। पवन वेग 160 किमी प्रति घंटा हो और यह पवन 1,600 किमी विशाल समुद्री क्षेत्र में लगातार 50 घंटे तक चले तो 15 मीटर ऊंची तरंगों की उत्पत्ति हो सकती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ज्वार विलम्ब से क्यों आते हैं? किसी स्थान पर नित्य चारभाटा एक ही समय पर नहीं आता, क्यों?
उत्तर:
चन्द्रमा पृथ्वी के इर्द-गिर्द 29 दिन में पूरा चक्कर लगाता है। चन्द्रमा पृथ्वी के चक्कर का 29वाँ भाग हर रोज आगे बढ़ जाता है। इसलिए किसी स्थान को चन्द्रमा के सामने दोबारा आने में 24 घंटे से कुछ अधिक ही समय लगता है।
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दूसरे शब्दों में प्रत्येक 24 घंटों के पश्चात् चन्द्रमा अपनी पहली स्थिति से लगभग 13° आगे चला जाता है, इसलिए किसी स्थान को चन्द्रमा के ठीक सामने आने में 12.5×4-50 मिनट अधिक लग जाते हैं।
क्योंकि दिन में दो बार ज्वार आता है इसलिए प्रतिदिन ज्वार 25 मिनट देरी के अंतर से अनुभव किया जाता है। पूरे 12 घंटे के बाद पानी का चढ़ाव देखने में नहीं आता; परंतु ज्वार 12 घंटे 25 मिनट बाद आता है। 6 घंटे 13 मिनट तक जल चढ़ाव पर रहता है और पश्चात् 6 घंटे 13 मिनट तक जल उतरता रहता है। ज्वार के उतार-चढ़ाव का यह क्रम बराबर चलता रहता है।

प्रश्न 2.
प्रशांत महासागर की धाराओं का वर्णन करें। इस महासागर के आस-पास के प्रदेशों पर इन धाराओं के प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
प्रशांत महासागर की धाराएँ-प्रशांत महासागर में धाराओं का क्रम अंघमहासागर के. समान ही है। अधिक विस्तार तथा तट रेखा के कारण कुछ भिन्नता है। मुख्य धाराएँ निम्नलिखित हैं –
1. उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा – यह गर्म पानी की धारा है जो मध्य अमेरिका के तट से चीन सागर तक बहती है। यह धारा व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पूर्वी-पश्चिमी दिशा में भूमध्य रेखा के समानान्तर बहती है।

2. क्यूरोसिवो धारा – चीन सागर में फिलीपाइन द्वीप समूह के निकट पानी एकत्र होने से इस गर्म धारा का जन्म होता है। क्यूरोसिवो धारा चीन के तट के सहारे जापान तक पहुँच जाती है। दक्षिणी द्वीप से टकराकर इसकी दो शाखाएँ हो जाती हैं। बाहरी शाखा पूर्वी तट पर खुले सागर में बहती है जिसे क्यूरोसिवो धारा कहते है। भीतरी शाखा पूर्वी तट पर खुले सागर में पश्चिमी तट पर बहती है जिसे सुशीमा धारा कहते हैं। इस धारा का रंग गहरा नीला होता है। जापानी लोग इसे काली धारा भी कहते हैं।

3. उत्तरी प्रशांत डिफ्ट – क्यूरोसिवो धारा जल 40° उत्तर अक्षांश को पार करके पूर्व की ओर मुड़ जाता है। इसे उत्तरी प्रशांत ड्रिफ्ट कहते हैं।

4. कैलोफोर्निया की धारा – यह एक ठंडी धारा है जो कैलीफोर्निया के तट के साथ-साथ भूमध्य रेखा की ओर बहती है। इसके प्रभाव से इस तट की जलवायु कठोर व शुष्क हो जाती है।

5. क्यूराइल की धारा – यह एक ठंडी जल धारा है जो बैरिंग जलडमरूमध्य से साइबेरिया के पूर्वी तट के सहारे जापान के पूर्वी तट तक पहुंच जाती है, इसे ओयाशियो धारा भी कहते हैं।

6. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा – यह एक शक्तिशाली गर्म धारा है, जो भूमध्य रेखा, के दक्षिण में बहती है। यह धारा व्यापारिक पवनों के प्रभाव से दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट से पश्चिम की ओर आस्ट्रेलिया के न्यूगिनी तक जाती है।

7. विपरीत भूमध्य रेखीय धारा – यह एक गर्म जलधारा है, जो भूमध्य रेखा के साथ-साथ शांत हवा की पेटी में पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती है। यह उत्तरी तथा दक्षिणी भूमध्य रेखीय धाराओं की विपरीत दिशा में बहती है।

8. पूर्वी आस्ट्रेलिया धारा – फिजी द्वीप के निकट से आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट तक बहने वाली इस गर्म धारा को न्यू साउथ वेल्थ धारा भी कहते हैं। यह धारा न्यूजीलैंड द्वीप को घेर लेती है।

9. अंटार्कटिक ड्रिफ्ट-यह अत्यंत ठंडे जल की धारा है जो अंटार्कटिक महाद्वीप के इर्द-गिर्द बहती है। दक्षिणी प्रशांत महासागर में पश्चिमी पवनों के प्रभाव से यह धारा पूर्वी । आस्ट्रेलिया से चिल्ली देश के तट तक बहती है।
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10. पेरू की धारा-यह ठंडी जलधारा को लेकर पेरू तक बहती है। यह धारा ऐटाकामा मरुस्थल की जलवायु को कठोर तथा शुष्क बना देती है।

प्रश्न 3.
दीर्घ ज्वार तथा लघु ज्वार में अंतर बताओ। ज्वार प्रतिदिन 50 मिनट विलम्ब से क्यों आते हैं?
उत्तर:
दीर्घ ज्वार – सबसे ऊँचे ज्वार को दीर्घ ज्वार कहते हैं। यह स्थिति अमावस तथा पूर्णमासी के दिन होती है।

कारण – इस स्थिति में सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी एक सीध में होते हैं। सूर्य तथा चन्द्रमा की संयुक्त आकर्षण शक्ति बढ़ जाने से ज्वार शक्ति बढ़ जाती है। सूर्य तथा चन्द्रमा के कारण ज्वार उत्पन्न हो जाते हैं। इन दिनों ज्वार अधिकतम ऊँचा तथा भाटा कम से कम नीचा होता है। दीर्घ ज्वार प्रायः साधारण ज्वार की अपेक्षा 20% अधिक ऊँचा होता है।
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लघु ज्वार – अमावस के सात दिन पश्चात् या पूर्णमासी के सात दिन पश्चात् ज्वार की ऊँचाई अन्य दिनों की अपेक्षा नीची रह जाती है। इसे लघु ज्वार कहते हैं। इस स्थिति को शुक्ल और कृष्ण पक्ष की अष्टमी कहते हैं जब आधा चाँद होता है।
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कारण – इस स्थिति में सूर्य तथा चन्द्रमा पृथी से समकोण स्थिति पर होते हैं। सूर्य तथा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति विपरीत दिशाओं में कार्य करती है। सूर्य व चन्द्रमा के ज्वार तथा भाटा एक-दूसरे को घटाते हैं। इन दिनों उच्च ज्वार कम ऊँचा तथा भाटा कम नीचा होता है। लघु ज्वार प्रायः साधारण ज्वार की अपेक्षा 20% कम ऊँचा होता है।

प्रश्न 4.
संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए –

  • हिन्द महासागर की धाराएँ
  • ज्वारभाटा की उत्पत्ति

उत्तर:
1. हिन्द महासागर की धाराएँ – इन धाराओं का परिसंचरण प्रशांत तथा अटलांटिक महासागर की धाराओं के परिसंचरण से भिन्न है। हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में धाराओं का परिसंचरण प्रतिरूप मानसून के ऋतुनिष्ठ परिवर्तन का अनुसरण करता हुआ अपनी दिशा बदल लेता है। यहाँ शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु में धाराओं का उत्क्रमण दिखाई देता है। हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में धाराओं का परिसंचरण प्रतिरूप अन्य दक्षिणी महासागरों के समान ही है, जो दिशा के दृष्टिकोण से घड़ी की सुइयों के प्रतिकूल है।

महासागर के उत्तरी भाग में जल का परिसंचरण गर्मियों में घड़ी की सुइयों के अनुकूल होता है। दक्षिणी विषुवतीय धारा पश्चिम की ओर संचलन करती है। अफ्रीका के तट के पास यह दो भागों में बँट जाती है। इसका बड़ा भाग दक्षिण की ओर मोजांबिक तथा आगुलहास धाराओं के रूप में पूर्व की ओर मुड़कर पश्चिमी पवन अपवाह के रूप में बहता है। आस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट के साथ यह आस्ट्रेलियन धारा के रूप में दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है और फिर दक्षिणी विषुवत् धारा से मिल जाती है। सर्दियों में उत्तरी-पूर्वी मानसून धारा विषुवत् रेखा के दक्षिण विरुद्ध धारा के रूप में पूर्व की ओर बहती है।
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2. ज्वारभाटा की उत्पत्ति – ज्वारभाटा सागरों तथा महासागरों के जल स्तर में आवर्ती उतार-चढ़ाव है, जो सूर्य और चन्द्रमा के विभेदी आकर्षण के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। दिन में दो बार, लगभग प्रति 12 घंटे 26 मिनट के बाद समुद्र तल ऊपर उठता है तथा दो बार नीचे गिरता है। समुद्र तल के ऊपर उठने को ज्वार तथा नीचे गिरने को भाटा कहते हैं।

ज्वारभाटा की उत्पत्ति का मूल कारण चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति है। सर्वप्रथम न्यूटन ने यह बताया कि सूर्य, चन्द्रमा तथा ज्वारभाटा का आपस में कुछ संबंध है। चन्द्रमा अपने आकर्षण बल के कारण पृथ्वी के जल को आकर्षित करता है। स्थल भाग कठोर होता है, इस कारण खिंच नहीं पाता परंतु जल भाग तरल होने के कारण ऊपर उठ जाता है। यह जल चन्द्रमा की ओर उठता है। वहाँ पर आसपास का जल सिमटकर उठ जाता है जिसे उच्च ज्वार कहते हैं। जिस स्थान पर जलराशि कम रह जाती है वहाँ जल अपने तल से नीचे गिर जाता है, उसे लघु ज्वार कहते हैं।

पृथ्वी की दैनिक गति के कारण प्रत्येक स्थान पर दिन-रात में दो बार ज्वार आता है। एक ही समय में पृथ्वी तल पर दो बार ज्वार उत्पन्न होते हैं। जब ठीक चन्द्रमा के सामने तथा दूसरा उससे विपरीत वाले स्थान पर जल ऊपर उठता है, इसे सीधा ज्वार कहते हैं। विपरीत भाग में अपकेंद्रीय बल के कारण जल ऊपर उठता है तथा
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उच्च ज्वार उत्पन्न होता है इसे अप्रत्यक्ष ज्वार कहते हैं। इस प्रकार पृथ्वी के एक ओर ज्वार आकर्षण शक्ति की अधिकता के कारण और दूसरी ओर अपकेन्द्रीय शक्ति की अधिकता के कारण उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 5.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. ठण्डी एवं गर्म महासागरीय धाराएँ
  2. उच्च ज्वार एवं लघु ज्वार
  3. उद्घावन एवं पश्चधावन

उत्तर:
1. ठण्डी एवं गर्म महासागरीय धाराएँ में अंतर –
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2. उच्च ज्वार एवं लघु ज्वार
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3. उद्घावन एवं पश्चधावन
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प्रश्न 6.
महासागरीय धाराओं का वेग कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
तरंग का ऊपरी भाग शीर्ष तथा निम्न भाग गर्त कहलाता है। दो क्रमिक शृंगों अथवा गर्तों के मध्य की दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं। किसी निश्चित बिन्दु से गुजरने वाले दो क्रमिक तरंगों के बीच के समय को तरंग आवर्त काल कहते हैं। संचलन करती हुई तरंग का वेग निम्न विधि से निश्चित किया जा सकता है
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तरंग आवर्त काल 160 किमी प्रति घंटा हो तो यह पवन 1,600 किमी विशाल समुद्री क्षेत्र में लगातार 50 घंटे तक चले तो 15 मीटर ऊँची तरंगों की उत्पत्ति हो सकती है। शक्तिशाली तूफानों के समय तरंगों की ऊँचाई बढ़ जाती है। 12 से 15 मीटर तक ऊँची तरंगों का वेग 30 से 100 मीटर प्रति घंटा होता है तथा इनकी तरंगदैर्ध्य 60 से 120 मीटर के मध्य होती है।

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प्रश्न 7.
यदि महासागरीय धाराएं न होती, तो विश्व का क्या हुआ होता? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय धाराएँ मानव जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती हैं। धाराओं का यह प्रभाव कई प्रकार से होता है –

  1. जिन तटों पर गर्म या ठंडी धाराएं चलती हैं वहाँ की जलवायु क्रमशः गर्म या ठंडी हो जाती है।
  2. गर्म धारा के प्रभाव से तटीय प्रदेशों का तापक्रम ऊँचा हो जाता है तथा जलवायु सम हो जाती है। ठंडी धारा के कारण शीतकाल में
  3. तापक्रम बहुत नीचा हो जाता है और वायु विषम व कठोर हो जाती है।
  4. गर्म धाराओं के समीप के प्रदेशों में अधिक वर्षा होती है, परंतु ठंडी धाराओं के समीप के प्रदेशों में कम वर्षा होती है।
  5. गर्म व ठंडी धाराओं के मिलने पर धुंध व कोहरा उत्पन्न होता है।
  6. गर्म व ठंडी धाराओं के मिलने से गर्म वायु बड़े वेग से ऊपर उठती है तथा तीव्र तूफानी चक्रवात को जन्म देती है।
  7. गर्म धाराओं के प्रभाव से सर्दियों में बर्फ नहीं जमती तो बन्दरगाह व्यापार के लिए वर्ष भर खुले रहते हैं, परंतु ठंडी धारा के समीप का
  8. तट महीनों बर्फ से जमा रहता है। ठंडी धाराएँ व्यापार में बाधक हो जाती हैं।
  9. धाराएँ जल मार्गों का निर्धारण करती हैं। ठंडे सागरों के साथ बहकर आने वाली हिमशिलाएँ जहाजों को बहुत हानि पहुंचाती हैं। इनसे
  10. मार्ग बचाकर समुद्री मार्ग निर्धारित किए जाते हैं।
  11. प्राचीन काल में धाराओं का जहाजों की गति पर प्रभाव पड़ता था। धाराओं की अनुकूल दिशा में चलने से जहाज की गति बढ़ जाती थी
  12. परंतु विपरीत दिशा में चलने से उनकी गति मंद पड़ जाती थी।
  13. धाराओं के कारण समुद्र जल स्वच्छ, शुद्ध तथा गतिशील रहता है।
  14. धाराएँ समुद्री जीवन का प्राण है। ये अपने साथ बहुत-सी गली-सड़ी वस्तुएँ बहाकर, लाती हैं। ये पदार्थ मछलियों के भोजन का आधार हैं।

ऊपर लिखित बातों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि धाराएँ न होती तो प्रकृति ही अस्त-व्यस्त हो जाती । समुद्री प्राणियों का जीवन असंभव हो जाता है। जलवायु व्यापार, तापक्रम तथा मानव जीवन पर विपरीत प्रभाव होता और सारे विश्व का अस्तित्व ही बदल जाता। इसलिए धाराएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा

Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Economics Solutions Chapter 3 उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा

Bihar Board Class 11 Economics उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत में आर्थिक सुधार क्यों आरम्भ किए गए?
उत्तर:
निरन्तर बढ़ती हुई कीमतों, बढ़ते हुए बजटीय घाटे, घटती हुई विनिमय दर, बढ़ते हुए व्यापार घाटे और भुगतान संकट, देश का ऋण जाल में फंसना आदि कुछ ऐसे कारण थे जिनके कारण भारत में आर्थिक सुधार आरम्भ किए गए।

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प्रश्न 2.
विश्व व्यापार संगठन के कितने सदस्य देश हैं?
उत्तर:
वर्तमान समय में विश्व व्यापार संगठन के 133 सदस्य देश हैं।

प्रश्न 3.
नई आर्थिक नीति की घोषणा कब की गई?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति की घोषणा जुलाई 1991 में की गई।

प्रश्न 4.
रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों पर किस प्रकार नियंत्रण रखता है?
उत्तर:
रिजर्व बैंक विभिन्न नियमों तथा कसौटियो के माध्यम से व्यावसायिक बैंकों के कार्यों का नियमन करता है। रिजर्व बैंक ही तय करता है कि कोई बैंक अपने पास कितनी मुद्रा जमा रख सकता है। विभिन्न क्षेत्रकों को उधार देने की प्रकृति को यही तय करता है।

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प्रश्न 5.
रुपयों के अवमूल्यन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब किसी विशेष उद्देश्य से दूसरे देश की मुद्रा की तुलना में एक देश की मुद्रा की विनिमय दर घटाकर उसके मूल्य को कम कर दिया जाता है तो इस प्रक्रिया को अवमूल्यन कहते हैं। अवमूल्य में मुद्रा का बाह्य मूल्य कम होता है किन्तु अवमूल्यन के बाद मुद्रा का आन्तरिक मूल्य कम नहीं होता है।

प्रश्न 6.
इसमें भेद करें।

  1. युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय (Strategic and Minority sale)
  2. द्वितीयक और बहुपक्षीय व्यापार (Bilateral and Multilateral trade)
  3. प्रशुल्क एवं प्रशुल्क अवरोधक (Tariff and Non tariffs barriers)

उत्तर:
1. युक्तियुक्त और अल्पांश विक्रय में अंतर:
कोई कंपनी जब अपने सभी अंश। (शेयरों) का विक्रय किसी अन्य कंपनी को हस्तांतरित करती है तो यह युक्तियुक्त विक्रय है जबकि कंपनी अपने अंशों (शेयरों) को बाजार में जनता के लिए विक्रय करती है तो यह अल्पांश विक्रय कहलाता है।

2. द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार में अंतर:
दो पक्षों के बीच में होने वाले व्यापारों को द्विपक्षीय व्यापार कहते हैं। इसके विपरीत दो से अधिक देशों के बीच में होने वाले व्यापार को बहुपक्षीय व्यापार कहते हैं।

3. प्रशुल्क एवं अप्रशुल्क अवरोधकों में अंतर:
शुल्क के द्वारा आयात तथा निर्यात का अवरोध प्रशुल्क अवरोध कहलाता है जबकि कोटा तथा अन्य कारणों से आयात तथा निर्यात का अवरोध गैर-शुल्क अवरोध कहलाता है।

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प्रश्न 7.
प्रशुल्क (Tariffs) क्यों लगाये जाते हैं?
उत्तर:
घरेलू उद्योग को विदेशी उद्योगों से संरक्षण देने के लिये प्रशुल्क लगाये जाते हैं।

प्रश्न 8.
परिमाणात्मक प्रतिबंधों का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
पमिाणात्मक प्रतिबंधों से अभिप्राय निश्चित मात्रा से अधिक वस्तुओं तथा सेवाओं का आयात न होना।

प्रश्न 9.
लाभ काम रहे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर देना चाहिए?
उत्तर:
लाभ कमा रहे सार्वजनिक उपक्रमों से होने वाले लाभों से वंचित हो जायेगी। इससे समाजवाद की भावना को आघात लगेगा। सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम में कार्यरत कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

प्रश्न 10.
क्या आपके विचार से बाह्य प्रापण भारत के लिए अच्छा है? विकसित देशों में इसका विरोध क्यों हो रहा है?
उत्तर:
हाँ, सेवाओं का बाह्य प्रापण से भारत को रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। दूसरे देशों का पैसा भारत में आ रहा है और भारतीय लोग कम दाम पर दूसरे देशों को दक्षतापूर्ण सेवायें प्रदान कर रहे हैं।

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प्रश्न 11.
भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ विशेष अनुकूल परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण यह विश्व का बाह्य केन्द्र बन रहा है। अनुकूलन परिस्थितियाँ क्या हैं?
उत्तर:
गुण (Advantage):
भारतीय दूसरों को सेवा बाँटने में कुशल हैं। वे सही ढंग से तथा ये कम कीमत पर दूसरों को सेवाएं प्रदान कर सकते हैं। भारत में कुशल कर्मचारी काफी मात्रा में हैं।

प्रश्न 12.
क्या भारत सरकार की नवरल नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में सहायक रही हैं? कैसे?
उत्तर:
भारत सरकार की नवरत्न नीति सार्वजनिक उपक्रमों के निष्पादन को सुधारने में काफी सहायक रही है। विद्वानों का कहना है कि नवरत्नों के प्रसार को बढ़ावा देकर इन्हें विश्वस्तरीय। निकाय बनाने के स्थान पर सरकार ने विनिवेश द्वारा आशिक रूप से इनका निजीकरण किया हे और उन्हें वित्तीय बाजार से स्वयं संसाधन जुटाने और विश्व बाजारों में अपना विस्तार करने के योग्य बनाया है।

प्रश्न 13.
सेवा क्षेत्रक के तीब्र विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सेवा क्षेत्रक उदारीकरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ एकदम नवीन क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत अनेक व्यवसायों को सम्मिलित कर लिया गया है जिन्हें सेवा क्षेत्र नाम दिया गया है। जैसे कोरियर सर्विस आदि। सेवा क्षेत्र के तीव्र विकास के लिए उत्तरदायी कारणों में प्रमुख हैं संचार व यातायात की सुविधाएँ, बैंकिंग की आधुनिक सुविधाएँ व सरकार की उदारवादी नीति।

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प्रश्न 14.
सुधार प्रक्रिया तथा कृषि क्षेत्रक दुष्प्रभावित हुआ लागत है। क्यों?
उत्तर:
सुधार कार्यों से कृषि को कोई लाभ नहीं हो पाया है जिससे कृषि की संवृद्धि दर कम होती जा रही है। सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्रक काफी दुष्प्रभावित हुआ है। यह निम्नलिखित तत्त्वों तथा तथ्यों से स्पष्ट है –

1. सार्वजनिक व्यय में कमी:
सुधार अवधि में कृषि क्षेत्रक में सार्वजनिक व्यय विशेषकर आधारिक संरचना (सिंचाई, बिजली, सड़क निर्माण, बाजार सम्पर्क तथा शीघ्र प्रसार) पर व्यय में काफी कमी आई है। इससे कृषि क्षेत्रक काफी दुष्प्रभावित हुआ है।

2. उर्वरक सहायिकी की समाप्ति:
सुधार काल में उर्वरक सहायिकों को समाप्त कर दिया गया। इससे उत्पादन लागतों में वृद्धि हुई। इसका छोटे और सीमांत किसानों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा।

3. विदेशी स्पर्धा का सामना:
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के कारण कृषि उत्तम में आयात शुल्क की कटौती की गई। न्यूनतम समर्थन मूल्यों को समाप्त कर दिया गया: अतिरिक्त इन पदार्थों के आयात पर परिमाणात्मक प्रबंध हटाए गए । इन सबके कारण भारत के किसानों को विदेशी स्पर्धा का सामना करना पड़ा जिसका उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

4. खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि:
उत्पादन व्यवस्था निर्यातोन्मुखी हुई। आन्तरिक उपभोग की खाद्यान्न फसलों के स्थान पर निर्यात के लिए नकदी फसलों पर बल दिया गया। इससे देश में खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि हुई।

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प्रश्न 15.
सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के क्या कारण रहे हैं?
उत्तर:
सुधार काल में औद्योगिक क्षेत्रक के निराशाजनक निष्पादन के अग्रलिखित कारण रहे हैं –

1. वैश्वीकरण के कारण विकासशील देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित देशों की। वस्तुओं और पूँजी प्रवाहों को प्राप्त करने के लिए खोल देने के लिए बाध्य हैं और उन्होंने अपने उद्योगों का आयातित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा का खतरा मोल ले लिया। सस्ते आयातों ने घरेलू वस्तुओं की मांग को प्रतिस्थापित कर दिया है।

2. बिजली की कटौती के कारण बिजली सहित आधारित संरचनाओं की पूर्ति पर्याप्त ही बनी रही। इससे औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन में कमी आई।

3. भारत ने वस्त्र परिधान आदि के व्यापार से सभी कोटा आदि के प्रतिबंध हटा दिए थे, पर अभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत और चीन से सभी कोटा प्रतिबंध नहीं हटाये हैं। फलस्वरूप भारत को विद्यमान उच्च अप्रशुल्क अवरोधकों के कारण अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में प्रवेश के उपयुक्त अवसर भी नहीं मिल पा रहे।

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प्रश्न 16.
सामाजिक न्याय और जन कल्याण के परिप्रेक्ष्य में भारत के आर्थिक सुधारों पर चर्चा करें।
उत्तर:
भारत के आर्थिक सुधार भारत में आर्थिक सुधार के परिणामस्वरूप आर्थिक विकास की दर में वृद्धि हुई। औद्योगिक क्षेत्र की प्रतियोगिता में भी वृद्धि हुई। कीमत वृद्धि पर नियंत्रण हुआ। लघु उद्योगों का भी विकास हुआ। सुधारकाल की अवधि में कुल मिलाकर संवृद्धि दरों में कमी आई है, किन्तु सेवा क्षेत्रक की संवृद्धि दर में सुधार हुआ। इसी समय कृषि और उद्योगों की संवृद्धि दर में अच्छा सुधार हुआ है। दसवीं पंचवर्षीय योजना में सकल घरेलू उत्पाद दर के 8% लक्ष्य रखा गया है।

अर्थव्यवस्था के खुलने से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा विदेशी विनिमय रिजर्व में तेजी से वृद्धि हुई है। अब भारत वाहन कल-पुर्जे, इंजीनियरिंग उत्पादों, सूचना प्रौद्योगिकी उत्पादों और वस्त्रादि का एक सफल निर्यातक के रूप में विश्व बाजार में जम गया है। बढ़ती कीमतों पर भी नियंत्रण रखा गया है। यद्यपि सकल घरेलू उत्पाद में संवृद्धि हुई है परंतु फिर भी भी रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन न हो सका। आर्थिक सुधारों से कृषि काफी प्रभावित हुई है। औद्योगिक क्षेत्र मैं संवृद्धि दर में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई है। सार्वजनिक उपक्रमों के बेचने से सरकार को बहुत घाटा उठाना पड़ा है। सुधारों से उच्च वर्ग की आमदनी में वृद्धि हुई है। आय तथा सम्पत्ति के। असमान वितरण में वृद्धि हुई है।

Bihar Board Class 11 Economics उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण-एक समीक्षा Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विनिवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विनिवेश से अभिप्राय है सरकारी उपक्रमों की पूंजी के एक भाग को निजी पूंजीपतियों को बेचना।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैश्वीकरण से अभिप्राय है घरेलू अर्थव्यवस्था का शेष संसार के साथ एकीकरण । अथवा समन्वय करना जिससे विभिन्न अर्थव्यवस्थाएँ एक दूसरे के साथ जुड़ जाएँ।

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प्रश्न 3.
आर्थिक सुधारों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आर्थिक सुधारों से अभिप्राय है वर्तमान आर्थिक नीतियों एवं व्यवस्था में सुधार लाना तथा उनमें आवश्यक अदल-बदल करना ताकि अर्थव्यवस्था के निर्धारित लक्ष्यों का सरलता से प्राप्त किया जा सके।

प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इसे विदेशी पूंजी निवेश भी कहते हैं। इसमें विदेशी कम्पनियों, फर्मों और व्यक्तियों से लिए गए ऋण आते हैं। इस निवेश का उद्देश्य लाभ कमान होता है। यह निवेश उन कार्यों में किया जाता है जिनमें अधिक से अधिक लाभ प्राप्त होने की सम्भावना हो। बहुराष्ट्रीय नियम अल्पविकसित देशों में अपनी शाखा और कार्यालय खोलते हैं। इसमें ऋण वापस करने जैसी समस्याएं नहीं होती।

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प्रश्न 5.
नई आर्थिक नीति की घोषणा कब की गई?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति की घोषणा जुलाई 1991 में की गई।

प्रश्न 6.
आर्थिक उदारीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आर्थिक उदारीकरण से अभिप्राय है कि सभी व्यक्तियों को अपने आवश्यकतानुसार निजी आर्थिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता।

प्रश्न 7.
निजीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निजीकरण से अभिप्राय है कि आर्थिक प्रणाली से निजी उपक्रम एवं पूंजी की भूमिका निरन्तर बढ़ती जाएगी और समान अनुपात में सरकार की भूमिका कम हो जायेगी।

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प्रश्न 8.
विराष्ट्रीयकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विराष्ट्रीयकरण से अभिप्राय है कि सरकारी उपक्रमों की पूंजी का स्वामित्व निजी पूँजीपतियों को सौंपना।

प्रश्न 9.
नई आर्थिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति से अभिप्राय है जुलाई 1999 के बाद में किये विभिन्न आर्थिक सुधारों से है जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में प्रतियोगी वातारण पैदा करके उत्पादकता और कुशलता में वृद्धि करना है।

प्रश्न 10.
नई आर्थिक नीति बनाने की क्यों आवश्यकता पड़ी?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति बनाने की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से हुई –

  1. राजकोषीय घाटे में वृद्धि।
  2. प्रतिकूल भुगतान संतुलन मे वृद्धि।
  3. विदेशी भण्डारों में कमी।
  4. कीमातों में वृद्धि।
  5. सार्वजनिक क्षेत्रों में उद्यमों की असफलता।

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प्रश्न 11.
आर्थिक सुधार (नई आर्थिक नीति) के मुख्य तत्व लिखें।
उत्तर:
आर्थिक सुधार के मुख्य तत्व तीन हैं –

  1. उदारीकरण
  2. निजीकरण तथा
  3. विश्वव्यापीकरण

प्रश्न 12.
व्यापार निति सुधार 1991 के क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
व्यापर नीति सुधार 1991 के उद्देश्य थे –

  1. आयात तथा निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबन्धों को शीघ्र अति शीघ्र हटना
  2. प्रशुल्क दरों में कमी लाना तथा
  3. आयात के लिए लाईसेंस प्रक्रिया को समाप्त करना

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प्रश्न 13.
क्या श्रम को स्वतंत्र रूप से प्रवास होने की अनुमति दी जानी चाहिए?
उत्तर:
नहीं श्रम को स्वंतत्र रूप से प्रवास की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

प्रश्न 14.
प्रशुल्क (Traiff) एवं अप्रशुल्क अवरोधक में भेद करें?
उत्तर:
शुल्क के द्वारा आयात तथा निर्यात का अवरोध प्रशुल्क अवरोध कहलता है जबकि कोआ तथा अन्य कारणों से आयात तथा निर्यात को अवरोध गैर-शुल्क अवरोध कहलता है।

प्रश्न 15.
भारत ने आयत पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध क्यों लगा रखा था (नई आर्थिक नीति से पहले)?
उत्तर:
घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए भारत ने आयात पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध विकास से बहुत कम हुआ।

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प्रश्न 16.
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के लिये कई उपाय। अपनाये गये थे। उनमें से कोई तीन उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. लाइसेंस तथा पंजीकरण की समाप्ति।
  2. एकाधिकार कानून में छूट।
  3. पूंजीगत पदार्थों के आयत की छुट आदि।

प्रश्न 17.
आंशिक परिवर्तनशीलता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आशिक परिवर्तनशीलता से अभिप्राय है कुछ विदेशी सौदा के लिए बाजार द्वारा निर्धारित कीमत पर विदेशी मुद्रा जैसे डॉलर या पौण्ड को बाजार में खरीदना या बेचना।

प्रश्न 18.
स्वतन्त्र परिवर्तनशीलता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आंशिक परिवर्तनशीलता से अभिप्राय है कुछ विदेशी सौदों के लिये बाजार द्वारा निर्धारित कीमत पर विदेशी मुद्रा जैसे डॉलर या पौण्ड को बाजार से खरीदना या बेचना।

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प्रश्न 19.
विश्व व्यापक, संगठन की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विश्व व्यापक संगठन की स्थापना 1915 में हुई।

प्रश्न 20.
विश्व व्यापक संगठन का प्रधान कार्यालय कहाँ है?
उत्तर:
विश्व व्यापक संगठन का प्रधान कार्यालय जेनेवा में है।

प्रश्न 21.
भारत का केन्द्रीय बैंक कौन सा है?
उत्तर:
भारत का केन्द्रीय बैंक भारतीय रिर्जव बैंक (Reserve Bank of India) है।

प्रश्न 22.
ब्रिटेन के केन्द्रीय बैंक को किसे नाम से पुकारा जाता है?
उत्तर:
ब्रिटेन के केन्द्रीय बैंक को बैंक ऑफ इंग्लैण्ड के नाम से पुकारा जाता है।

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प्रश्न 23.
1999 से पूर्व की आर्थिक नीतियों के प्रमुख उद्देश्य लिखे?
उत्तर:
1999 से पूर्व की आर्थिक नीतियों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे –

  1. ऊँची संवृद्धि दर।
  2. राष्ट्रीय स्वावलंबन।
  3. पूर्ण रोजगार।
  4. आय की असमानताओं में कमी।

प्रश्न 24.
स्थिर विनिमय दर क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थिर विनिमय दर से अभिप्रय उस विनिमय दर से है जो किसी देश के केन्द्र बैंक के द्वारा निश्चित की जाती है।

प्रश्न 25.
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक वर्ष की अवधि में किसी देश के द्वारा विदेशों को किये जाने वाले मौद्रिक भुगतानों और उनसे ली जाने वाली मौद्रिक प्राप्तियों के अंतर को भुगतान शेष कहते हैं। भुगतान शेष का रिकार्ड द्विअंकन प्रणाली के आधार पर रखा जाता है।

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प्रश्न 26.
विदेशी पूँजी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विदेशी पूँजी से अभिप्राय अन्य देशों के निवासियों द्वारा एक देश में वित्त के रूप में पूँजी लगाना है। अल्पविकसित देशों में विदेशी पूंजी निवेश आधुनिक प्रौद्योगिकी लाती है और निवेश की कमी को पूरा करती है।

प्रश्न 27.
स्थिर विदेशी विनिमय दर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब किसी देश की मुद्रा की अन्य देशों की मुद्राओं से विनिमय दरें उस देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा निश्चित की जाती है तो उसे स्थिर विदेशी विनिमय दर कहते हैं। 1991 तक भारत में विदेशी विनिमय दरें रिजर्व बैंक द्वारा निश्चित की जाती थीं। रिजर्व बैंक द्वारा निश्चित की गई विनिमय दरों को स्थिर विनिमय दर कहते हैं। रिजर्व बैंक ने कई बार स्थिर विनिमय दरों में परिवर्तन किया है।

प्रश्न 28.
वैश्वीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वैश्वीकरण से अभिप्राय है विश्व के विभिन्न देशों में आपसी लेन-देन की मात्रा बढ़ाना जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के साथ जुड़ जायें, परस्पर आर्थिक निर्भरता तथा आर्थिक एकीकरण में फैलाव आए।

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प्रश्न 29.
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में सरकार का विनिवेश से क्या अभिप्राय है? सरकार इन उद्योगों का विनिवेश क्यों कर रही है?
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में सरकार के विनिवेश में अभिप्राय है कि सरकार उद्योगों को निजी क्षेत्र की बेच रही है। परिणामस्वरूप इन उद्यमों का स्वामित्व तथा प्रबंध सरकार के स्थान पर निजी क्षेत्र का हो जायेगा। इन उद्योगों में सरकार के विनिवेश का कारण है कि ये उद्योग घाटे में चल रहे हैं।

प्रश्न 30.
निजीकरण करने के लिए सरकार द्वारा अपनाये गये उपायों से कोई एक उपाय लिखें।
उत्तर:
आर्थिक सुधारों में निजीकरण के लिये किये गये उपायों में से एक उपाय सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन है। भारत के आर्थिक विकास में आरम्भ से ही सार्वजनिक क्षेत्र को प्रमुख स्थान दिया गया था। परंतु नये आर्थिक सुधारों में सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से कम करके 4 कर दी गई है।

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प्रश्न 31.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत किये गये राजकोषीय सुधारों के कोई तीन बिन्दु लिखें।
उत्तर:

  1. कर प्रणाली को अधिक वैज्ञानिक तथा युक्तिपूर्ण बना दिया गया है।
  2. आर्थिक सहायता को कम कर दिया गया है।
  3. विदेशी कंपनियों के लाभ को कम कर दिया गया है।

प्रश्न 32.
ई. बिजनेस का क्या अर्थ है?
उत्तर:
ई. बिजनेस (E-Business) का अर्थ इंटरनेट पर व्यवसाय चलाना है। इसमें न केवल क्रय-विक्रय अपितु ग्राहकों को सेवायें प्रदान व व्यावसायिक साझेदार के साथ सहयोग करना भी शामिल है।

प्रश्न 33.
ई. कॉमर्स की मुख्य धारा के कितने क्षेत्र हैं? इसके नाम लिखें।
उत्तर:
ई कॉमर्स की मुख्यधारा के तीन क्षेत्र हैं –

  1. इलेक्ट्रॉनिक मार्केट (Electronic Market)
  2. इलेक्ट्रॉनिक डाटा इंटचेंज (Electronic Data Interchange)
  3. इंटरनेट कॉमर्स (Internet Commerce).

प्रश्न 34.
ई. कॉमर्स से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ई. कॉमर्स (E-Commerce) से अभिप्राय उन सभी व्यावसायिक लेन-देन से है जो इलेक्ट्रानिक प्रोसेसिंग (Electronic Processing) एवम् आँकड़ों के प्रेषण (Transmission) के माध्यम से पूरे किये जाते हैं।

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प्रश्न 35.
टाटा टी (Tata-tea) ने 2000 में किस कंपनी का अधिग्रहण किया और कितने में?
उत्तर:
भारत की टाटा स्टील ने 2000 में सिंगापुर की नाट स्टील कंपनी को 1245 करोड़ रुपये में खरीदा था।

प्रश्न 36.
टाटा मोटर्स कंपनी ने डेवूड की दक्षिणी कोरिया में स्थित भारी वाणिज्यिक वाहन इकाई कितने में खरीदी?
उत्तर:
टाटा कंपनी ने 2000 में 1870 करोड़ रुपये में अमेरिका की टेटली का अधिग्रहण किया था।

प्रश्न 37.
2004 में भारत की किस कंपनी ने सिंगापुर की नाट स्टील (Nat Steel) कंपनी को 1245 करोड़ में रुपये में खरीदा था।
उत्तर:
टाटा टी ने।

प्रश्न 38.
निजीकरण के क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
निजीकरण से अभिप्राय निजी क्षेत्र द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का पूर्ण रूप से स्वामित्व प्राप्त करना तथा उनका प्रबंध करना।

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प्रश्न 39.
निजीकरण के पक्ष में कोई दो तर्क दें?
उत्तर:

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उद्यम घाटे में पड़े हैं।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश उद्यम अकार्यकुशल (Incfficient) हैं।

प्रश्न 40.
व्यापार शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
व्यापार शेष से अभिप्राय वस्तुओं के निर्यात तथा आयात के मूल्यों का अंतर है।

प्रश्न 41.
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भुगतान शेष एक ऐसा खाता अथवा विवरण है जिसमें सभी विदेशी प्राप्तियों एवम् भुगतानों को दर्शाया जाता है। इसमें अदृश्य सभी मदों को दर्शाया जाता है।

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प्रश्न 42.
भारत में दूसरे विश्व युद्ध से पूर्व भुगतान शेष कैसा था?
उत्तर:
भारत में दूसरे विश्व युद्ध से पूर्व भुगतान शेष संतुलित था।

प्रश्न 43.
1991 के अन्त में भारत में विदेशी मुद्रा के का भण्डार कितना था?
उत्तर:
1991 के अन्त में भारत में विदेशी मुद्रा के भण्डार केवल दो सप्ताह के आयात के लिये पर्याप्त था।

प्रश्न 44.
द्विपक्षीय (Bilateral) तथा बहुपक्षीय में क्या अन्तर है?
उत्तर:
दो देशों क बीच होने वाले व्यापार को द्विपक्षीय व्यापार कहते हैं जबकि दो से अधिक देशों के बीच में होने वाले व्यापार को बहुपक्षीय व्यापार कहते हैं।

प्रश्न 45.
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् और विशेष रूप से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से भारत का भुगतान शेष कैसा है?
उत्तर:
प्रतिकूल।

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प्रश्न 46.
विनिवेश के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
विनिवेश के उद्देश्य हैं –

  1. वित्तीय अनुशासन में सुधार लाना तथा
  2. आधुनिकीकरण की सुविधायें प्रदान करना

प्रश्न 47.
राजकोषीय नीति या आर्थिक सुधारों के विपक्ष में कोई दो बिन्दु दें।
उत्तर:
विनिवेश के उद्देश्य हैं –

  1. नई आर्थिक निति में कृषि को काम महत्व दिया गया है।
  2. इसमें उद्योगों के निजीकरण को बहुत ही अधिक महत्व दिया गया है।

प्रश्न 48.
उदारीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उदारीकरण से अभिप्राय है सरकार द्वारा लगाये गये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भौतिक नियंत्रणों (औद्योगिक लाइसेसिंग व्यवस्था, आयात लाइसेंस, विदेशी मुद्रा नियन्त्रण आदि) से उद्योगों को मुक्त करना। उदारीकरण में निजी उद्यमियों को उपने निर्णय स्वयं लेने की सवतंत्रता दी जाती है।

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प्रश्न 49.
विश्व व्यापार संगठन क्या है? इससे क्या अपेक्षा की जाती है?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन एक स्वैच्छिक संठन है। इस संगठन की सदस्यता आवश्यक नहीं है। कोई भी देश इस संगठन का सदस्य बन सकता है। इस संगठन से यह आशा की जाती है कि वह विभिन्न देशों के व्यापार में स्वतंत्र रूप से प्रोत्साहन दे।

प्रश्न 50.
नई आर्थिक निति का प्रमुख उद्देश्य क्या है? इसके तीन आधार स्तम्भ लिखें।
उत्तर:
नई आर्थिक. निति का प्रमुख उद्देश्य उत्पादन इकाईयों की उत्पादन क्षमता में सुधार लाना है। इसके तीन आधार स्तम्भ निम्नलिखित हैं –

  1. उदारीकरण
  2. निजीकरण
  3. विश्वव्यापीकरण (वैश्वीकरण)

प्रश्न 51.
स्वालम्बन की दिशा में किन बातों पर जोर दिया गया है? दो बातें लिखें।
उत्तर:
स्वालम्बन की दिशा में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया हैं –

  1. विज्ञान तथा तकनीक के प्रयोग में वृद्धि।
  2. देश के पिछड़े क्षेत्रों का विकाश।

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प्रश्न 52.
उदारीकरण का विदेशी निवेश अन्तःप्रवाह पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
उदारीकरण से विदेशी निवेश अन्तःप्रवाह में बहुत वृद्धि हुई।

प्रश्न 53.
संस्थागत निवेशकों में मुख्य कौन हैं?
उत्तर:

  1. मर्चेट बैंकर्स (Merchant Bankers) म्युचुअल फण्डस (Mutual Funds) तथा
  2. पेंशन फण्डस (Pension Funds) संस्थागत निवेशक हैं

प्रश्न 54.
दूसरे युद्ध के दौरान भारत का भुगतान शेष अनुकूल क्यों रहा?
उत्तर:
क्योंकि युद्ध के समय भारतीय वस्तुओं की मांग अधिक रही और आयात बहुत कम हो गये।

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प्रश्न 55.
कोरियर सेवाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कोरियर सेवाओं (Courier Services) से अभिप्राय उन सेवाओं से है जिनके अन्तर्गत पत्रों, प्रपत्रों एवम् छोटे पार्सलों की सुपुर्दगी एक स्थान से दूसरे स्थान तक की जाती है।

प्रश्न 56.
कोर क्षेत्र (Core Sector) किसे कहते हैं?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था का वह क्षेत्र कोर क्षेत्र कहलाता है जिसमें आधारभूत संरचना वाले उद्योग जैसे-पेट्रोलियम, मशीनरी, लोहा-इस्पात आदि सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 57.
विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) कब से लागू कर दिया गया है? इसने किस कानून का स्थान लिया था?
उत्तर:
विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) 1 जून 2000 से लागू कर दिया गया है। इसने विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम (FEMA) का स्थान लिया है।

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प्रश्न 58.
आयात प्रतिस्थापन तथा निर्यात संवर्द्धन में अंतर बतायें।
उत्तर:
आयात प्रतिस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं के स्थान पर उनका कोई निकट स्थापन (Close substitute) देश में ही उत्पादित किया जाता है। इसके विपरीत निर्यात संवर्द्धन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें निर्यात वृद्धि के लिये पुराने निर्यातकर्ताओं को तथा नवीन व्यक्तियों को निर्यात में वृद्धि करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है।

प्रश्न 59.
पूँजीगत खातों में दिखाई जाने वाली कोई तीन मदें लिखें।
उत्तर:

  1. निजी प्राप्तियाँ तथा निजी भुगतान
  2. सरकारी प्राप्तियाँ तथा भुगतान तथा
  3. विदेशी ऋणों के मूलधन व ब्याज का भुगतान लेना व देना

प्रश्न 60.
भुगतान संतुलन के चालू खाते में दिखाई जाने वाली कोई तीन मदें लिखें।
उत्तर:

  1. वस्तुओं का आयात तथा निर्यात
  2. अमौद्रिक स्वर्ण का लेन-देन तथा
  3. एकपक्षीय हस्तान्तरण जैसे-दान

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प्रश्न 61.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) किस प्रकार वाणिज्यिक बैंकों पर नियंत्रण रखता है।
उत्तर:
भारतीय रिजर्व बैंक गतिरोधक (Obstructive Authority) अधिकारी के तौर पर वाणिज्यि बैंकों पर नियंत्रण रखता है।

प्रश्न 62.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का सबसे प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर:
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का सबसे प्रमुख कार्य बैंकिंग क्षेत्र का अनुकूलतम नियमन (Facilitating Regulating) करना है।

प्रश्न 63.
बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को कैसे बढ़ावा दिया गया?
उत्तर:
निजी क्षेत्र में बैंकों की स्थापना करने की अनुमति के द्वारा बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया।

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प्रश्न 64.
भारत में निर्धन खाद्य उपभोक्ता कौन है?
उत्तर:
भारत में निर्धन खाद्य उपभोक्ता हैं-ग्रामीण क्षेत्र में भूमिहीन श्रमिक तथा छोटे किसान व शहरी क्षेत्र में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी।

प्रश्न 65.
कृषि उपज के समर्थित मूल्य से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कृषि उपज के समर्थित मूल्य से अभिप्राय किसानों को उनकी उपज की न्यूनतम मूल्य की गारंटी देना।

प्रश्न 66.
देश में खाद्यान्नों की घरेलू कीमतों में वृद्धि का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
देश में घरेलू बाजार के समर्थित मूल्य से अभिप्राय किसानों के उपज में न्यूनतम मूल्य वृद्धि है।

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प्रश्न 67.
अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के लिए भारत सरकार के कई कदम उठाये थे। उनमें कोई दो उपाय लिखें।
उत्तर:

  1. औद्योगिक लाइसेंसिंग तथा पंजीकरण की समाप्ति (Abolition Industrial Licensing and Registration) तथा
  2. एकाधिकारी कानून से छूट

प्रश्न 68.
निजीकरण के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र की सरकारी कंपनियों को निजी कंपनियों में कितने तरीकों से बदला जा सकता है?
उत्तर:
दो तरीकों से –

  1. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के स्वामित्व तथा प्रबंध से सरकार का हट जाना।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का पूर्ण विक्रय करना।

प्रश्न 69.
भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे तीन उपक्रमों के नाम लिखें जिन्हें नवरल कहा जाता है।
उत्तर:

  1. एन. टी. पी. सी. (NTPC), सेल (SAIL) तथा
  2. गेल (GAIL)

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प्रश्न 70.
भारत में निजीकरण के लिये कौन से उपाय अपनाये गये? कोई तीन बताएँ।
उत्तर:

  1. सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में सरकार का विनिवेश
  3. सार्वजनिक उद्यमों के अंशों की बिक्री

प्रश्न 71.
मर्चेट बैंकिंग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मर्चेट बैंकिंग (Merchant Banking) से अभिप्राय औद्योगिक तथा व्यापारिक संस्थाओं को विशिष्ट प्रकार की सेवायें उपलब्ध करना।

प्रश्न 72.
म्युचुअल फण्ड (Mutual Fund) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
म्युचुअल फण्ड ऐसी निधि है जो पारस्परिक सहयोग से बनाई जाती है।

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प्रश्न 73.
अवमूल्यन तथा मूल्य ह्रास में अंतर बतायें।
उत्तर:
जब सरकार देश में निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से जानबूझ कर स्वयं अपने देश की मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्रा में कम कर देती है तब उसे अवमूल्यन कहा जाता है। परंतु जब बाजार की माँग एवम् पूर्ति शक्तियों के प्रभाव से एक देश की मुद्रा का मूल्य बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के विदेशी मुद्रा में कम हो जाता है, तब उसे मूल्य ह्रास कहा जाता है।

प्रश्न 74.
नई आर्थिक नीति में निजीकरण को क्यों अधिक महत्व दिया गया है?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति में निजीकरण को अधिक महत्व देने का मुख्य कारण यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र अधिक कार्यकुशल है। उसकी कुशल उत्पादकता तथा लाभदायकता में हमारे लिए जरूरी है।

प्रश्न 75.
मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मौद्रिक नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो मुद्रापूर्ति, ब्याज तथा विनिमय दर से सम्बन्धित है।

प्रश्न 76.
1991 की आर्थिक नीति को U-Turn की संज्ञा क्यों दी जाती है?
उत्तर:
सन् 1991 की आर्थिक नीति को U-Turn इसलिये कहते हैं कि 1991 के बाद अपनाई गई आर्थिक नीति पहले से अपनाई गई नीतियों के बिल्कुल उल्टी है।

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प्रश्न 77.
अमेरिका के केन्द्रीय बैंक का क्या नाम है?
उत्तर:
अमेरिका के केन्द्रीय बैंक का नाम फेडरल रिजर्व सिस्टम (Federal Reserve System) है।

प्रश्न 78.
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण का काम कब आरम्भ हुआ?
उत्तर:
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण का कार्य 1991-92 में आरम्भ हुआ।

प्रश्न 79.
उद्योगों में सरकार विनिवेश कर रही है। इस कथन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस कथन का यह अभिप्राय है कि सरकार उद्योगों को निजी क्षेत्र को बेच रहा है।

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प्रश्न 80.
रुपये के अवमूल्यन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रुपये के अवमूल्सल के अभिप्राय है रुपये के विनिमय दर में कमी लाना । रुपया के अवमूल्यन में विदेशी मुद्रा महंगी हो जाती है अथवा एक रुपये के बदले में विदेशी मुद्रा की राशि कम हो जाती है।

प्रश्न 81.
राजकोषीय सुधारों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राजकोषीय सुधारों से अभिप्राय सरकार की आय में वृद्धि करना तथा व्यय को इस प्रकार करना है जिससे उत्पादन तथा आर्थिक कल्याण पर बुरा प्रभाव नहीं पड़े।

प्रश्न 82.
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क (Central Excise Duties) के स्थान पर अब कौन-सा कर लगाया गया है?
उत्तर:
केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के स्थान पर अब केन्द्रीय मूल्य वृद्धि कर (CENVAT) लगाया गया है।

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प्रश्न 83.
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत निजीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत निजीकरण का अर्थ है सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों में से अधिक से अधिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिये खोलना। यह वह सामान्य प्रक्रिया है जिसके द्वारा निजी क्षेत्र किसी सरकारी उद्यम का मालिक बन जाता है या उसका प्रबंध करता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चालू खाते तथा पूँजीगत खाते में अंतर बताएँ।
उत्तर:
चालू खाते तथा पूँजीगत खाते में अंतर (Difference between Current Accountant Capital Account):
चालू खाते में वस्तुओं के आयात् एवम् निर्यात, अमौद्रिक स्वर्ण का लेनदेन, परिवहन, बैंकिंग, बीमा, तकनीकी, सेवाएँ तथा पर्यटन आदि से प्राप्त एवम् देय राशि तथा एकपक्षीय हस्तान्तरण जैसे दान आदि मदों को दिखाया जाता है जबकि पूँजीगत खाते में सभी पूँजीगत लेनदेनों को दिखाया जाता है। जैसे –

  1. निजी प्राप्तियाँ एवं भुगतान
  2. सरकारी प्राप्तियाँ तथा सरकारी भुगतान
  3. विदेशी ऋणों के मूलधन व ब्याज का लेन-देन
  4. शुद्ध भूल त्रुटियाँ आदि मदें

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प्रश्न 2.
भुगतान संतुलन तथा व्यापार संतुलन में अंतर बताएँ।
उत्तर:
भुगतान संतुलन तथा व्यापार संतुलन में अंतर –
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प्रश्न 3.
आयात अभ्यांश (Import Quoto) किसे कहते हैं? आयात अभ्यांश के उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
आयात अभ्यांश (Import Quoto):
आयात अभ्यांश का अभिप्राय वस्तु की उस निश्चित मात्रा अथवा मूल्य से है जिनका समय की एक निश्चित अवधि में देश में आयात किया जा सकता है। इस प्रकार आयात अभ्याश में आयात की मात्रा का पहले से निर्धारण कर दिया जाता है और उसमें कुछ वृद्धि नहीं की जा सकती।

आयात अभ्यांश के उद्देश्य (Objective of Import Quota):

  1. घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करना।
  2. आयातों का प्रभावशाली नियमन।
  3. भुगतान शेष के असंतुलन को दूर करना।
  4. आयातों के अन्तः प्रभाव को सीमित करके घरेलू कीमतों में स्थिरता लाना।

प्रश्न 4.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत कौन से वित्तीय सुधार किये गये थे?
उत्तर:
वित्तीय सुधारों से अभिप्राय देश की मौद्रिक तथा बैंकिंग नीतियों में सुधार करने से है। नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत निम्नलिखित वित्तीय सुधार के किये गये –

  1. तरलता अनुपात में कमी कर दी गई।
  2. बैंकों को ब्याज की दरों का निर्धारण करने की स्वतंत्रता दी गई।
  3. बैंकिंग प्रणाली की पुनः रचना की गई। नये निजी बैंकों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया गया।
  4. अलग-अलग बैंकों के अधिकारियों की भर्ती के लिये स्वतंत्रता दी गई।

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प्रश्न 5.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत करों में कौन-कौन से सुधार किये गये?
उत्तर:
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत करों में सुधार (Tax Reforms under New Economic Policy):
नई आर्थिक नीति में करों में निम्नलिखित सुधार किये गये –

  1. आयकर की दरों में लगातार कमी की गई।
  2. 1990-91 से निगम कर की दर जो पहले बहुत ऊँची थी, को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।
  3. अप्रत्यक्ष करों में सुधार लाये गये।
  4. केन्द्रीय उत्पादक शुल्क के स्थान पर केन्द्रीय मूल संवृद्धि कर (Central value Added Tax-CNVAT) लगाया गया।
  5. राज्य स्तर पर भी वैट (VAT) को लागू कर दिया गया है।

प्रश्न 6.
सुधार नीति के अन्तर्गत औद्योगिक क्षेत्र में सुधार लिखें?
उत्तर:
नई सुधार नीति के अन्तर्गत औद्योगिक क्षेत्र में सुधार (Industrial Sector Reforms):
नई सुधार नीति के अन्तर्गत औद्योगिक क्षेत्र में निम्नलिखित सुधार किये गये –

  1. औद्योगिक लाइसेंस लेने की अनिवार्यता वाले उद्योगों की संख्या 18 से घटा कर तीन कर दी गई।
  2. एकाधिकारात्मक एवम् प्रतिबंधात्मक व्यापार अधिनियम के अन्तर्गत लगाय गये सभी प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया गया।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के लिये सुरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से कम करके 8 कर दी गई।
  4. निर्यात और व्यापारिक गृहों तथा बड़े व्यापारिक घरानों को बड़ी मात्रा में आयात की अनुमति दी गई। व्यापारिक गृहों को अब 51% विदेशी पूँजी लगाने की अनुमति दी गई।

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प्रश्न 7.
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना कब की गई थी? इसका मुख्य कार्यालय कहाँ है? इसके उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) यह एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इसकी स्थापना 1995 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य देशों द्वारा आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिये की गई थी। यह अन्तर्राष्ट्रीय संगठन गेट का उत्तराधिकारी है। यह गेट की अस्थायी प्रकृति के विपरीत स्थायी संगठन है। इसका मुख्य कार्यलय जेनेवा में स्थित है।

विश्व व्यापार संगठन के उद्देश्य (Objectives of WTO):

  1. वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन एवम् व्यापार को बढ़ावा देना।
  2. विश्व संसाधनों का अनुकूलतम प्रयोग करना।
  3. जीवन स्तर में वृद्धि करना।
  4. पर्यावरण का संरक्षण एवं सुरक्षा करना।

प्रश्न 8.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत व्यापार और निवेश नीति के सुधार लिखें।
उत्तर:
नई आर्थिक नीति के अंतर्गत व्यापार और निवेश से सम्बन्धित नीति में निम्नलिखित सुधार किये गये –

  1. संवेदनशील उद्योग को छोड़कर बाकी सभी उद्योगों पर आयात लाइसेसिंग समाप्त कर दिया गया।
  2. अप्रैल 2001 से निर्मित उपभोक्ता वस्तुओं तथा कृषि उत्पादों के आयात पर प्रतिबंधों को हटा दिया गया।
  3. भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर निर्यात कर समाप्त कर दिये गए।
  4. FEMA 1973 को समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर विदेशी विनिमय प्रबंध अधिनियम (Foreign Exchange Management Act-FEMA)-लागू किया गया।

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प्रश्न 9.
अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिये नई नीतियाँ अपनाई गईं। उनको समूहों में बाँट सकते हैं? प्रत्येक का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय अर्थव्यवस्था की कुशलता बढ़ाने के लिये अनेक नीतियाँ बनाई गई। इन नीतियों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

  1. स्थिरता प्रयत्न, तथा
  2. संरचनात्मक सुधार प्रयत्न

1. स्थिरता प्रयत्न (Stabilization Measures):
ये अल्पकालीन प्रयत्न हैं। इनका उद्देश्य भुगतान शेष में जो कमियाँ आ गई थी उनको ठीक तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रण में लाना है।

2. संरचनात्मक सुधार प्रयत्न (Structural Reform Measures):
ये दीर्घकालीक प्रयत्न हैं। इनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था की कुशलता में सुधार लाना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न भागों में विद्यमान लोचहीनता को समाप्त करके उसकी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वृद्धि
करना है।

प्रश्न 10.
विनिवेश से क्या अभिप्राय है? इस कार्यक्रम में भारत कहाँ तक सफल रहा है?
उत्तर:
विनिवेश का अर्थ (Meaning of Disinvestment):
विनिवेश से अभिप्राय है सार्वजनिक उद्यमों की सम्पूर्ण अथवा कुछ परिसम्पत्तियों की बिक्री अर्थात् सरकारी उपक्रमों की पूँजी के एक भाग की बिक्री जिसे कि निजी पूँजीपति खरीद सकते हैं। विनिवेश निजीकरण का एक रूप है। विनिवेश के अन्तर्गत सार्वजनिक उद्यमों के कुछ अंशों को निजी कंपनियों को बेचना होता है। कितने प्रतिशत अंश बेचे जायेंगे, यह उपक्रमों की प्रकृति पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 11.
नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण करने के लिये सरकार द्वारा कौन-कौन से कदम उठाये गये हैं? संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण करने के लिये सरकार द्वारा अपनाये गये कदम (Steps taken by the Govt. to Control the riding Prices):

  1. बढ़ते सरकारी खर्चों पर अंकुश लगाया गया।
  2. मुद्रापूर्ति की वृद्धि पर रोक लगाई गई।
  3. सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार किया गया।
  4. उत्पादन उद्यमों की आर्थिक सहायता और बाहरी समर्थन में कटौती करना।
  5. आधारभूत उद्योगों में प्रचलनात्मक कुशलता में सुधार लाना और क्षमता, विस्तार करना।
  6. औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश बाधाओं को कम करना।

प्रश्न 12.
एकाधिकारी एवं प्रतिबंधक व्यवहार अधिनियम के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
MRTP कानून मई 1969 में बनाया गया था और यह जून 1969 से लागू हुआ। इस अधिनियम के अन्तर्गत 1970 में एक MRTO आयोग की स्थापना की गई जिसका प्रमुख कार्य एकाधिकारी एवं प्रबंधक व्यवहारों को नियंत्रित करना था। इस अधिनियम द्वारा आर्थिक शक्ति के केन्द्रीयकरण को रोकना और एकाधिकार और प्रतिबंधक व्यापार व्यवहारों के लिए नियंत्रण लागू करना था। इस अधिनियम में इस बात की स्थापना की गई कि सार्वजनिक हित की दृष्टि से उत्पादन, वितरण और आर्थिक साधनों की आपूर्ति हो सके, कुशलता में वृद्धि की जा सके।

नये उद्यमों के विकास को प्रोत्साहन दिया जा सके और क्षेत्रीय विषमता को कम किया जा सके। भारत में MRTP अधिनियम के लागू होने पर भी आर्थिक शक्ति में निरंतर वृद्धि होती रही है। 1991 की नई औद्योगिक नीति में 100 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा को हटा दिया गया है, तथा अब कोई फर्म जितना भी निवेश करना चाहे, कर सकती है। नये प्रोजेक्ट की स्थापना, विस्तार और अन्य समूहों में मिलना या अन्य फर्म को खरीदने जैसे कार्यों के लिए अब MRTP कमीशन की आवश्यकता नहीं रह गई है।

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प्रश्न 13.
पूरे संसार में निजीकरण की लहर के फैसले के क्या कारण हैं?
उत्तर:
निम्नलिखित कारणों से संसार में निजीकरण की नहर फैल गई है –

  1. यह अनुभव किया गया है कि निजी क्षेत्र के उपक्रमों का तेजी से विकास करने के लिये सरकार के पास निवेश करने के लिये पर्याप्त साधन नहीं है।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्य क्षमता को बढ़ाने के लिये उनका निजीकरण करना चाहिये।

प्रश्न 14.
पारस्परिक कोष पर टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
पास्परिक कोष (Mutual Fund):
पारस्परिक कोष अथवा म्युचुअल फण्ड (Mutual Fund) एक विशेष प्रकार का मध्यस्थ (निवेश संस्था) है जिसे आम जनता की बचत को गतिशील करने के लिए एक ट्रस्ट (Trust) के रूप में स्थापित किया गया है। इसमें विभिन्न योजनाओं के द्वारा जनता के कोष स्थापित किये जाते हैं तथा इन कोषों का मुद्रा बाजार (Money Market) में विभिन्न प्रतिभूतियों (Securities) एवम् अन्य प्रपत्रों में निवेश किया जाता है। यह कोष एक निवेश माध्यम के रूप में कार्य करता है। यह अपेक्षाकृत छोटे निवेशकों को बचतों को एकत्रित करता है और उन्हें विविध प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करता है।

प्रश्न 15.
किन समस्याओं के कारण हमें 1991 में नई आर्थिक नीति अपनानी पड़ी?
उत्तर:
निम्नलिखित समस्याओं के कारण हमें 1991 में नई आर्थिक नीति अपनानी पड़ी –

  1. (i) प्रतिकूल भुगतान संतुलन में वृद्धि।
  2. सरकार के गैर-विकासात्मक खर्चा में वृद्धि होने के कारण राजकोषीय घाटे में वृद्धि।
  3. विदेशी विनिमय मुद्रा भण्डार में कमी।
  4. कीमतों में वृद्धि।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की असफलता।
  6. भारतीय अर्थव्यवस्था में अन्तर्राष्ट्रीय विश्वास का डगमगाना।
  7. नये ऋणों का न मिलना।
  8. अनिवासी भारतीयों के खातों से बड़ी-बड़ी राशियाँ निकाला जाना।

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प्रश्न 16.
सार्वजनिक क्षेत्र के नवरल उपक्रमों के नाम लिखें।
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के नवरल उपक्रम (Navratan enterprises of Public Sector):

  1. स्टील ऑथेरिटी ऑफ इंडिया (SAII)
  2. इण्डियन ऑयल कार्पोरेशन लि. (IOCL)
  3. भारत संचार निगम लिमटेड (BSNL)
  4. हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि. (HPCL)
  5. भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड (BPCL)
  6. ऑयन एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC)
  7. भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लि. (BHEL)
  8. नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC)
  9. इण्डियन पैट्रो कैमिकल्ज कार्पो. (NTPC)
  10. गैस ऑथेरिटी ऑफ इंडिया लि. (GAIL)
  11. महानगर टेलीफोन निगम लि. (MTNL)

प्रश्न 17.
सार्वजनिक उपक्रमों में निजीकरण एवम् विनिवेश प्रक्रिया को किन बिन्दुओं के आधार पर औचित्यपूर्ण कहा जा सकता है?
उत्तर:
औचित्यपूर्ण बिन्दु (Points for Justification) सार्वजनिक उपक्रमों में निजीकरण एवम् विनिवेश प्रक्रिया को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर औचित्यपूर्ण कहा जा सकता है –

  1. निजी क्षेत्र की कुशलता, प्रबंध की क्षमता का सार्वजनिक उपक्रमों में प्रयोग सम्भव।
  2. विनिवेश से प्राप्त धनराशि का प्रयोग अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में कर पाना सम्भव है।
  3. घाटे में चल रही रुग्ण सार्वजनिक इकाइयों को बजट की सहायता में दी जाने वाली वित्तीय सहायता के बोझ से मुक्ति।
  4. सार्वजनिक उपक्रमों में बढ़ती लाल-फीताशाही एवम् सरकारी हस्तक्षेप को नियंत्रित करना सम्भव।
  5. सार्वजनिक क्षेत्र की बीमार (रुग्ण) इकाइयों का पुनः उद्धार सम्भव।
  6. सार्वजनिक उपक्रमों की अल्पशोषित तथा अशोषित उत्पादन क्षमता का पूर्ण विदोहन सम्भव।
  7. निजी क्षेत्र की प्रबंधकीय क्षमता का प्रयोग करके लम्बी परिपक्वता अवधि को घटाना सम्भव।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाह्यस्रोत से क्या अभिप्राय है? सेवाओं के बाह्यकरण के विभिन्न प्रकार समझायें।
उत्तर:
बाह्यस्रोत का अभिप्राय (Meaning of outsourcing):
पिछले दशक से सेवा क्षेत्र में एक नई प्रकार की व्यावसायिक क्रिया का विश्व में प्रादुर्भाव हुआ है। इसे बी. पी. ओ. (Business Process Outsorcing) या बाह्यस्रोत या कॉल सेन्टर (Call Centre) कहते हैं। बाह्यस्रोत से अभिप्राय बाह्य अभिक्रेताओं से व्यवसाय का कार्य करवाना। उदाहरण के लिये एक कंपनी अपने पुराने रिकार्ड को रखने की जिम्मेदारी एक बाह्य एजेन्सी को दे। बाह्यस्रोत की मुख्य विशेषता यह है कि कंपनियाँ नियमित रूप से निष्पादन की जाने वाली क्रियाओं को ठेके पर ले लेती हैं।

सेवाओं के बााकरण के प्रकार (Types of outsourcing):
सेवाओं के बाह्यकरण के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं –

1. वित्तीय सेवाएँ (Financial Services):
वित्तीय सेवा के अन्तर्गत मध्यस्थ अभिकर्ता व्यावसायिक संगठन को वित्त प्राप्त करने के विशेषज्ञों की राय तथा कानून सम्बन्धी जानकारी इत्यादि प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिये जब कोई कंपनी अंश जारी करके या ऋणपत्र जारी करके पूँजी एकत्र करना चाहती है जो उसे कानूनी कार्यवाही करनी पड़ती है। कई बार इस प्रकार के कार्य में काफी समय लग जाता है और अंशपत्र/ऋणपत्र जारी करने के पीछे उद्देश्य भी खत्म हो जाते हैं। अतः अगर यह कार्य की विशेषज्ञों को दे दिया जो इसे कम समय में दक्षता के साथ करे।

2. विज्ञापन सेवाएँ (Advertising Services):
इस प्रकार के मध्यस्थ (Agencies) व्यावसायिक संगठन के द्वारा निर्मित वस्तु एवम् सेवा को उपभोक्ता में लोकप्रिय बनाने के लिये समस्त कार्य करते हैं। ये विज्ञापन प्रति तैयार करते हैं, विज्ञापन माध्यम का चयन करते हैं और वस्तु को उपभोक्ताओं में लोकप्रिय बनाने सम्बन्धी कार्य करते हैं।

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प्रश्न 2.
शुल्क का केसकेडिंग प्रभाव (Casecading effect of the Duties) समझायें। इस प्रभाव से बचने के लिये कौन-सा कर लगाया गया है?
उत्तर:
शुल्क का केसकेडिंग प्रभाव (Casecading effect of the Duties) केसकेडिंग का अर्थ है जल का प्रवाह या जल का बहना। जल शुल्क के केसकेडिंग का अर्थ है शुल्क का बह जाना। उसका व्यर्थ चला जाना । शुल्क केसकेडिंग से कीमतों में भारी वृद्धि होती है क्योंकि प्रत्येक स्तर पर विक्रय कर देना पड़ता है। उदाहरण के लिये पहले कच्चे माल (रुई) की कीमत पर कर लगाया जाता है। जब रुई को कपड़े बनाने वाले व्यक्ति (मध्यवर्ती उत्पादक) को बेचा जाता है। इसके बाद जब कपड़े का निर्माता दर्जी को कपड़ा बेचता है, कपड़े की कीमत पर कर लगाया जाता है। इसके बाद सिलेसिलाये कपड़े (निर्मित माल) पर कर लगाया जाता है।

प्रत्येक स्तर पर दिये गये कर निर्मित माल की कीमत का अंश बन जाते हैं। प्रत्येक स्तर पर पहले दिये गये करों की कोई कटौती नहीं मिलती इसलिये इसे केसकेडिंग प्रभाव (Cascading Effect) कहते हैं। केसकेडिंग प्रभाव के कारण अंतिम उपभोक्ता वस्तुओं में काफी वृद्धि होती है। इस बात को एक उदाहरण देकर समझाया जा सकता है। मान लो एक किसान ने 100 रुपये की रुई कपड़ा बनाने वाले को बेची। विक्रय कर 4 प्रतिशत है। अतः कपड़ा बनाने वाला इसे 104 रुपये में खरीदता है।

अब कपड़ा निर्माता रुई से कपड़ा बनाकर उसे 140 रुपये में दर्जी को बेचता है। माना कपड़े पर विक्रय कर 5 प्रतिशत है। अतः दर्जी उस कपड़े को 147 रुपये में (140 + 7) खरीदता है। अब दर्जी उस कपड़े की कमीज 200 रुपये में बेचता है। कमीज का विक्रय कर 4% है। अतः ग्राहक उस कमीज को 208 रुपये में खरीदेगा। इस तरह विभिन्न चरणों पर दिये गये करों के कारण कमीज की कीमत बहुत अधिक हो जाती है। करों के केसकेडिंग प्रभाव से बचने के लिये अब मूल्यवृद्धि कर-वेट (VAT) की व्यवस्था की गई है।

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प्रश्न 3.
नीचे तालिका में 1993-94 कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर दी गई है। तालिका में दिये गये आँकड़ों को काल श्रेणी आरेख द्वारा दिखायें।
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उत्तर:
सकल घरेलू उत्पाद संवृद्धि प्रतिशत में (GDP gross the on Percentage)
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प्रश्न 4.
1991 की नई आर्थिक नीति में क्या परिवर्तन किये गये?
उत्तर:
सरकार ने आर्थिक संकट को दूर करने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आर्थिक नीति में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों को तीन क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है –

  1. औद्योगिक नीति में परिवर्तन
  2. विदेशी व्यापार नीति में परिवर्तन
  3. राजकोषीय नीति में परिवर्तन

1. औद्योगिक नीति में परिवर्तन (Change in the Industrial Policy):

(a) लाइसेंस प्रणाली की समाप्ति (Abolishing of Licencing System):
ऐसे उद्योग जिनका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है उनको छोड़कर शेष सभी उद्योगों को लाइंसस प्रणाली से मुक्त कर दिया गया है। इससे अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता बढ़ गई है। ऐसी आशा की जाती है कि इससे उद्योगों का विस्तार होगा और उनकी कुशलता बढ़ेगी।

(b) विदेशी निवेश की स्वतंत्रता (Freedom of Foreign Investment):
विदेशी निवेशकों को भारतीय उद्योगों में पैसा लगाने की छूट दे दी गई है। ये अब कुल पूँजी का 51 प्रतिशत पैसा लगा सकते हैं। इससे न केवल विदेशों से वित्त प्राप्त होगा बल्कि नई प्रौद्योगिकी प्रबंधन विधियाँ भी देश में आयेंगी।

(c) सुरक्षित उद्योग निजी क्षेत्र में (Reserve Industries in theprivate hand):
ऐसे उद्योग जिनके विकास का उत्तरदायित्व केवल सरकार पर था, अब उन्हें निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। केवल रक्षा सामग्री या अति आवश्यक उद्योग ही सरकार ने अपने हाथ में रखे हैं।

(d) utaifant et Bra att varaat (Freedom of inporting foreign technique):
इसके अन्तर्गत भारतीय उद्योगों को विदेशों से प्रौद्योगिकी का आयात और इसमें निरंतर सुधार की छूट दी गई है।

(e) बड़े उद्योगों पर से प्रतिबंध समाप्त (Abolition of restriction of heavy Industries):
एकाधिकार प्रवृत्ति को बढ़ते से रोकने के लिए लगाये गये प्रतिबंध हटा लिये गये। बड़े औद्योगिक घरानों को अपना कार्य क्षेत्र विभिन्न दिशाओं में फैलाने की अनुमति दे दी गई।

2. विदेशी. व्यापार और विदेशी विनिमय नीति में परिवर्तन (Change in the foreign trade and foreign exchange policy):

(a) आयात शुल्क में कमी (Reduction in the import duty):
आयात शुल्कों को कम किया गया, जिससे देश के उत्पादों की विदेशी उत्पादों से प्रतियोगिता बढ़ गई क्योंकि अब विदेशी वस्तुएँ पहले की अपेक्षा सस्ती हो गई।

(b) विदेशी विनिमय दर से नियंत्रण हटाना (Removing restriction of foreign exchange rate):
विदेशी विनिमय दर पर नियंत्रण को समाप्त कर दिया गया है। अब विदेशी मुद्रा खुले बाजार की दर पर मिलती है। सरकारी और बाजार दरों में अंतर नहीं रहा। अब आयातक आयात की वास्तविक लागत को ध्यान में रखेंगे। अब विदेशी मुद्रा की कीमत में उतार-चढ़ाव होंगे। ये उतार-चढ़ाव विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति में संतुलन लाएंगे।

3. राजकोषीय नीति में परिवर्तन (Change in the fiscal policy):
राजकोषीय नीति से अभिप्राय सरकार की आय और व्यय नीति से है। इसमें भी काफी परिवर्तन किए गए हैं।

(a) उत्पाद शुल्क में कमी (Decrease in excise duty):
बहुत सी वस्तुओं पर सरकार ने उत्पाद शुल्क को कम कर दिया है। इससे भारतीय उत्पादकों की विदेशी वस्तुओं से प्रतियोगिताओं की स्थिति में सुधार आया है। आयात शुलक में कमी से भारतीय उत्पादकों को विदेशी उत्पादकों से कड़ी प्रतियोगिता करना पड़ रही है।

(b) सरकारी व्यय में कमी (Reduction in public expenditure):
सरकार अपने अनुत्पादक व्यय को कम रही है और निवेश के लिए अधिक राशि जुटा रही है।

(c) प्रत्यक्ष करों की दर में कमी (Reduction in Direct taxes rates):
प्रत्यक्ष करों की दर में धीरे-धीरे कमी की गई ताकि लोग स्वेच्छा से कर दें। आशा की जाती है कि लोग धीरे-धीरे करों की चोरी करना बंद कर देंगे और सरकार की प्राप्ति पहले से अधिक होगी।

(d) सरकारी पूँजी का विक्रय (Disinevest of government capital):
सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि वह अपने कुछ उद्योगों में लगी पूँजी का एक भाग बाजार में बेचेगी। आवश्यकताओं को पूरा करने क लिए साधन जुटाने के लिए ऐसा किया गया है।

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प्रश्न 5.
प्रतीत होता है कि सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्र को कोई लाभ नहीं हुआ है। समझायें।
उत्तर:
सुधार प्रक्रिया से कृषि को लाभ नहीं हुआ है। उल्टे सुधार प्रक्रिया से कृषि क्षेत्र पर बुरा प्रभाव पड़ा है। कृषि क्षेत्र में संवृद्धि दर में कमी आ रही है। भारत में खाद्यान्न के बड़े-बड़े भण्डारण (Stock) के बावजूद 250 मिलियन से अधिक लोग निर्धनता रेखा से नीचे रह रहे हैं। प्रति व्यक्ति खाद्यान्न स्टॉक के लगातार बढ़ने पर भी खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता कम हो रही है तथा पौष्टिक गुणवत्ता में कमी आ रही हैं। खाद्यान्नों की कीमतें बड़ी तेजी से बढ़ रही है। खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि के दो मुख्य कारण हैं –

1. खाद्यान्नों को दी गई आर्थिक सहायता में कमी तथा

2. उन कीमतों में वृद्धि जिन पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्नों की आपूर्ति की जाती थी। खाद्यान्नों के उत्पादकों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कमी आने से उन्होंने खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि कर दी क्योंकि उन्होंने कटौती के भार को उपभोक्ताओं के पास भेज दिया। सरकार खाद्यान्नों के समर्थित मूल्य को इतना ऊँचा रखती है कि सामान्य जनता इन मूल्यों पर खाद्यान्न खरीदने में समर्थ नहीं होती क्योंकि उनकी क्रय-शक्ति काफी नहीं होती।

ऊँची कीमतों से खाद्यान्नों की माँग कम हो जाती है तथा निर्धन उपभोक्ता बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इन निर्धन उपभोक्ताओं में शामिल हैं-ग्रामीण क्षेत्र के भूमिहीन, श्रमिक तथा छोटे किसान और शहरी क्षेत्र के असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी। उधर अधिक समर्थित मूल्य के कारण अधिक उत्पादन के लिये प्रेरित है।

मांग के कम और पूर्ति के अधिक होने पर भारतीय खाद्य निगम (Food Corporation of India) को समर्थित मूल्य पर अधिक खाद्यान्न खरीदना पड़ता है और इस प्रकार खाद्यान्न का स्टॉक बढ़ता है। अतिरिक्त स्टॉक को रखने के लिये सरकार को और अधिक व्यय करना पड़ता है। इस खर्चे को पूरा करने के लिये सरकार को अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। परिणामस्वरूप कृषि में निवेश कम हो जाता है। सिंचाई की सुविधाओं पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कृषि में अनुसंधान तथा विकास का कार्य भी पिछड़ रहा है।

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प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष करों तथा अप्रत्यक्ष करों में भेद करें।
उत्तर:
प्रत्यक्ष करों तथा अप्रत्यक्ष करों में अंतर (Differentite between Direct Taxes and Indirect Taxes) :
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प्रश्न 7.
विकास योजना की प्रारंभिक अवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र में क्यों अधिक महत्व दिया गया था? कारण लिखें। अथवा, विकास योजना की प्रारम्भिक अवस्थाओं में एक बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र बनाना क्यों आवश्यक था? कारण लिखें।
उत्तर:
विकास योजना की प्रारम्भिक अवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्व देने के कारण (Causes of giving more importance to public sector in the intitial stages of development planning):
विकास योजना की प्रारम्भिक अवस्थाओं में सार्वजनिक क्षेत्र को बहुत अधिक महत्व देने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे –

1. विशाल निवेश (Huge Investment):
पूँजीगत उद्योगों की स्थापना करने के लिये विशाल निवेश की आवश्यकता होती है। जिन उद्योगों में विशाल निवेश की आवश्यकता होती है, निजी व्यक्ति विशाल निवेश करने में असमर्थ होते हैं। उन क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना की जाती है।

2. विलम्ब के लाभ (Delay in Profit):
भारी उद्योगों की स्थापना के लिये न केवल विशाल निवेश की आवश्यकता होती है, अपितु उनमें लाभ भी बड़े समय के बाद प्राप्त होते हैं। निजी व्यक्ति उद्योग से जल्दी से जल्दी लाभ प्राप्त करने की आशा करते हैं।

3. राष्ट्रीय हित (National Interest):
राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से युद्ध सामग्री बनाने के उद्योग निजी क्षेत्र में नहीं लगाये जा सकते।

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प्रश्न 8.
व्यावसायिक संचार के विभिन्न साधनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यावसायिक संचार के विभिन्न साधन (Various means of business communcation):
व्यावसायिक संचार के विभिन्न साधन निम्नलिखित हैं –

1. टेलीकॉम (Telecom):
सरकार डाक सेवाओं के द्वारा सूचना तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने की व्यवस्था करती है। परंतु इसमें अत्यधिक समय लगता है। अतः टेलीकॉम की सुविधा ने संचार के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह शीघ्र संदेश भेजने के लिए सबसे सरल, सस्ता और आधुनिक साधन है। इसके द्वारा दोनों पक्ष ऐसे बातचीत कर लेते हैं जैसे आमने-सामने बैठे हों।

टेलीफोन का प्रयोग मामूली सा व्यावहारिक आदमी भी कर सकता है। ग्राहक विदेशी डायलिंग (ISD) की सुविधा का लाभ भी ले सकता है। कुछ समय तक यह सारा व्यवसाय सरकार के हाथ में था परंतु अब सरकार ने काफी हद तक टेलीकम्यूनिकेशन व्यवसाय का निजीकरण कर दिया है जिससे इसकी योग्यता और अधिक बढ़ गई है।

2. फैक्स (Fax):
यह मशीन नक्शे तथा रेखाचित्रों को प्रसारित करने के लिए प्रयोग की जाती है। संदेश देने वाला व्यक्ति सबसे पहले नक्शे को एक कागज पर अंकित कर लेता है। इसके बाद यह कागज मशीन में लगे एक सिलेण्डर के चारों ओर लपेट दिया जाता है। फिर संदेश देने वाला व्यक्ति संदेश प्रसारण का बटन दबा देता है और कुछ ही सेकेण्ड में नक्शे की नकल दूसरे व्यक्ति तक पहुँच जाती है। यह माध्यम बहुत ही कम खर्च व समय में नक्शे, रेखाचित्र, सूचना व सभी आवश्यक चीजों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचा देता है। ये न केवल स्थानीय क्षेत्र में उपयोगी है बल्कि अंतराष्ट्रीय क्षेत्र में भी इसका उपयोग है।

3. इंटरनेट (Internet):
कम्प्यूटर के विकास ने संचार के सभी माध्यमों को पीछे छोड़ दिया है। इसके द्वारा संसार के किसी भी कोने में जाकर सभी प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। इसका आरंभ अमेरिका द्वारा 5 वर्ष पूर्व किया गया था। इसके निर्माण के पीछे उद्देश्य था कि सभी प्रकार की सूचना एक स्थान पर एकत्रित की जा सके और विभिन्न स्थानों पर एक साथ पहुंचाई जा सके। आज कम्प्यूटर क्रांति ने सारे संसार की दूरियों को समेट कर रख दिया है और दूर-दराज के देश ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे बिल्कुल नजदीक हों।

4. ई-मेल (E-Mail):
पुराने समय में सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने में अत्यधिक समय लगता था, परंतु इलेक्ट्रॉनिक मेल (E-Mail) के द्वारा सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान तक तुरंत पहुँचाई जा सकती है। इसमें सूचनाओं का स्वरूप भी नहीं बिगड़ता है। लागत भी कम आती है और दोनों पक्षों की सक्षमता बढ़ती है। इसके द्वारा संसार के किसी भी कोने में कुछ ही. सेकण्ड में महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ पहुँचाई जा सकती हैं और उनकी गोपनीयता भी बनी रहती है।

5. एक्स्ट्रानेट (Extranet):
उत्पादकों, वितरकों तथा उपभोक्ताओं के बीच सम्पर्क रखने के लिए नई पद्धति का विकास किया गया है, जिसे एक्स्ट्रानेट कहते हैं। इसके अंतर्गत उपभोक्ताओं को आने वाली वस्तुओं के विषय में समस्त जानकारी प्राप्त हो जाती है। उत्पादकों को उत्पादन स्तर का पता चलता है और किसी भी स्तर पर होने वाली कठिनाई या कमी को वहीं पर दूर किया जा सकता है।

6. वर्ल्डवाइड वेब (World wide Web):
www पद्धति का विकास अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन को सुविधा प्रदान करने के लिए किया गया है।

7. वायस मेल (Voice Mail):
यह बहुत ही आकर्षक पद्धति है। इसके अंतर्गत कम्प्यूटर द्वारा मशीन को टेलीफोन के साथ जोड़ दिया जाता है जिसे उस टेलीफोन का या संस्था का मालिक वहाँ पर उपस्थित हो या न हो, कोई भी सूचना मिले बिना नहीं रहती चाहे वह महत्त्वपूर्ण हो अथवा नहीं। इस पद्धति में श्रम व लागतों में कमी आती है।

इसके अन्तर्गत संस्था में कार्य करने वाले प्रत्येक कर्मचारी की आने वाली व जाने वाली कॉल पर नजर रखी जा सकती है। इस पद्धति में सूचना को टेलीफोन द्वारा कम्प्यूटर तक पहुँचा दिया जाता है जो इसको अपने अंदर इकट्ठा करके रख लेता है। फिर जिस व्यक्ति के लिए सूचना इकट्ठी की गई है वह इस मशीन में से सूचनाओं को रिट्रिव कर कॉल्स (Calls) का यथानुसार तथा परिस्थितिनुसार जवाब दे सकती है।

8. यूनिफाइड मेसेजिंग सर्विस (Unifited Meassaging Serivce):
इस आकर्षक एवं बहुपयोगी पद्धति के अंतर्गत संचार के विभिन्न साधनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को एक-दूसरे में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे-फैक्स मैसेज (Fax Message) को वायसमेल मेसेज (Voicemail Messaging) में उन लोगों के लिए बदला जा सकता है जिनके पास टेलीफोन है पर फैक्स मशीन नहीं है।

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प्रश्न 9.
प्रशुल्क और अभ्यांश में अंतर बताएँ।
उत्तर:
प्रशुल्क और अभ्यांश में अंतर (Difference between Traiff and Quota):
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प्रश्न 10.
मूल्य वर्धित कर या मूल्य वृद्धि कर (Value added Tax-VAT) क्या है? समझायें। यह विक्रयकर से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
मूल्य वर्धित कर (Value added Tax):
मूल्य वर्धित कर वस्तु विक्रय कर का एक विकल्प है। यह ऐसी कर प्रणाली है जिसके अन्तर्गत कर केवल उत्पादन प्रक्रिया में की गई मूल्य वृद्धि पर ही लगाया जाता है। मूल्य की यह वृद्धि उत्पादक या विक्रेता द्वारा की जाती है। श्री एल. के. झा समिति के अनुसार, “मूल्यवर्धित कर व्यापक रूप से समस्त वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया गया एक कर है जिसमें निर्मित वस्तुओं एवम् शासकीय सेवाओं को पृथक कर दिया जाता है। यह कर प्रत्येक स्तर पर होने वाली व्यवसाय की मूल्य वृद्धि पर जोड़ा जाता है। अत: इसे मूल्य वर्धित कर कहते हैं।”

समीकरण के रूप में:
वर्धित मूल्य = वस्तु का कुल मूल्य – क्रय की गई कच्ची सामग्री एवम् अन्य सामग्री का मूल्य।

अंतर:
विक्रय कर वस्तु के कुल मूल्य पर लगाया जाता है जबकि वेट (VAT) प्रत्येक अवस्था में केवल बढ़े हुए मूल्य पर लगाया जाता है। वस्तु की कुल कीमत पर नहीं अपितु वस्तु में होने वाली वृद्धि पर लगाया जायेगा। इससे ग्राहकों को कुछ आराम (Relief) मिलेगा क्योंकि अब कमीज की कीमत इतनी अधिक होगी जितनी पहले थी। इसे निम्न उदाहरण की सहायता से समझाया गया है –
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नोट –

  1. 100/= पर विक्रय कर 4% = 4 रुपये
  2. 36 रुपये पर विक्रय कर 1.44 रुपये तथा
  3. 58.56 रु. पर विक्रय कर 2.35 रुपये)

ऊपर की तालिका से यह स्पष्ट होता है कि अतिम उपभोक्ता को एक कमीज 203.35 में मिलेगी जो पहली कीमत 200 रुपये से अधिक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतवर्ष में 1991 तक की आर्थिक नीतियाँ थीं –
(a) प्रतिबंधात्मक
(b) उदारवादी
(c) स्वतंत्र
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) प्रतिबंधात्मक

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प्रश्न 2.
1991 के आर्थिक सुधारों को कहते हैं –
(a) पहली पीढ़ी के आर्थिक सुधार
(b) दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधार

प्रश्न 3.
1991 के आर्थिक सुधारों के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकारी क्षेत्र के हिस्से की शेयर-पूँजी कुल-स्टॉक की होनी चाहिए –
(a) 51 प्रतिशत
(b) 49 प्रतिशत
(c) 50 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 51 प्रतिशत

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प्रश्न 4.
भारत में नए आर्थिक सुधारों ने सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में कुल स्टॉक में निजी क्षेत्र की शेयर पूँजी की इजाजत दी –
(a) 51 प्रतिशत
(b) 49 प्रतिशत
(c) 50 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 49 प्रतिशत

प्रश्न 5.
WTO का विस्तार रूप है –
(a) विश्व व्यापार संगठन
(b) विश्व यातायात संगठन
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) विश्व व्यापार संगठन

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प्रश्न 6.
विश्व व्यापार संगठन पूरे विश्व के लिए सिफारिश करता है –
(a) मुक्त व्यापार की
(b) प्रतिबंधात्मक व्यापार की
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) मुक्त व्यापार की

प्रश्न 7.
अस्सी के दशक में वार्षिक वृद्धि दर थी –
(a) 3.5 प्रतिशत
(b) 5.5 प्रतिशत
(c) 4.5 प्रतिशत
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 5.5 प्रतिशत

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प्रश्न 8.
वर्ष 1981-82 में राजस्व घाटा सकल घरेलू उत्पाद का था –
(a) 14
(b) 6
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) 14

प्रश्न 9.
राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति, विनिमय दर नीति व मजदूरी आय नीति में परिवर्तन को कहते हैं –
(a) व्याष्टि आर्थिक उपाय
(b) समष्टि आर्थिक उपाय
(c) (a) और (b) दोनों
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) समष्टि आर्थिक उपाय

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

Bihar Board Class 11 Geography महासागरीय जल Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उस तत्त्व की पहचान करें जो जलीय चक्र का भाग नहीं है ……………..
(क) वाष्पीकरण
(ख) वर्षन
(ग) जलयोजन
(घ) संघनन
उत्तर:
(ग) जलयोजन

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय ढाल की औसत गहराई निम्नलिखित के बीच होती है ……………….
(क) 2-20 मीटर
(ख) 20-200 मीटर
(ग) 200-2,000 मीटर
(घ) 2,000-20,000 मीटर
उत्तर:
(ग) 200-2,000 मीटर

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन की लघु उच्चावच आकृति महासागरों में नहीं पाई जाती है?
(क) समुद्री टीला
(ख) महासागरीय गंभीर
(ग) प्रवाल द्वीप
(घ) निमग्न द्वीप
उत्तर:
(ग) प्रवाल द्वीप

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
(क) हिंद महासागर
(ख) अटलांटिक महासागर
(ग) आर्कटिक महासागर
(घ) प्रशांत महासागर
उत्तर:
(ग) आर्कटिक महासागर

प्रश्न 5.
लवणता को प्रति समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम) की मात्रा से व्यक्त किया जाता है ………………..
(क) 10 ग्राम
(ख) 100 ग्राम
(ग) 1,000 ग्राम
(घ) 10,000 ग्राम
उत्तर:
(ग) 1,000 ग्राम

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
हम पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?
उत्तर:
जल हमारे सौरमंडल का दुर्लभ पदार्थ है। पृथ्वी को छोड़कर और किसी भी ग्रह – पर जल उपलब्ध नहीं है। पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध है। इसलिए पृथ्वी को ‘नीला ग्रह’ (Blue Planet) कहा जाता है।

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय सीमांत क्या होता है?
उत्तर:
महाद्वीपीय सीमा प्रत्येक महादेश का विस्तृत किनारा होता है जो कि अपेक्षाकृत छिछले समुद्रों तथा खाड़ियों का भाग होता है। यह महासागर का सबसे छिछला भाग होता है, जिसकी औसत प्रवणता 1 डिग्री या उससे भी कम होती है। इस सीमा का किनारा बहुत ही खड़े ढाल वाला होता है।

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प्रश्न 3.
विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्तों की सूची बनाइए।
उत्तर:
ये महासागरों के सबसे गहरे भाग होते हैं। अभी तक लगभग 57 गतों को खोजा गया है, जिसमें से 32 प्रशांत महासागर में, 19 अंध महासागर में एवं 6 हिंद महासागर में हैं।

प्रश्न 4.
ताप प्रवणता क्या है?
उत्तर:
महासागर के सतहीय एवं गहरी परतों वाले जल के बीच विभाजक रेखा होती है। विभाजक रेखा के इस क्षेत्र से जहाँ तापमान में तीव्र कमी आती है, उसे ताप प्रवणता कहा जाता है।

प्रश्न 5.
समुद्र में नीचे जाने पर आप ताप की किन परतों का सामना करेंगे? गहराई के साथ तापमान में भिन्नता क्यों आती है?
उत्तर:
महासागरीय जल की सबसे ऊपरी परत का तापमान 20 डिग्री से. से 25 डिग्री से. के बीच होता है। गहराई के बढ़ने के साथ इसके तापमान में तीव्र गिरावट आती है। क्योंकि समुद्रीय जल के कुछ आयतन का लगभग 90% भाग गहरे महासागर में ताप प्रवणता (थर्मोक्लाईन) के नीचे पाया जाता है।
बढ़ता हुआ तापमान = बढ़ती हुई गहराई

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

प्रश्न 6.
समुद्री जल की लवणता क्या है?
उत्तर:
लवणता या खारापन वह शब्द है जिसका व्यवहार समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा को परिभाषित करने में किया जाता है। 1,000 ग्राम (1 किलोग्राम), समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम में) की मात्रा के द्वारा इसकी गणना की जाती है। यह प्रायः प्रति PPT के रूप में व्यक्त की जाती है। खारापन समुद्री जल का महत्त्वपूर्ण गुण है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलीय चक्र के विभिन्न तत्त्व किस प्रकार अंतर-संबंधित हैं?
उत्तर:
जल एक चक्रीय संसाधन है। इसका प्रयोग बार-बार किया जा सकता है। जल एक चक्र के रूप में महासागर से धरातल पर और धरातल से महासागर तक पहुंचता है। जलीय चक्र पृथ्वी की सतह के ऊपर, सतह पर एवं सतह के भीतर जल की गति की व्याख्या करता है। पृथ्वी पर जल का वितरण असमान है। जलीय चक्र जल का वह चक्र है जो पृथ्वी के जलमण्डल से गैस, तरल व ठोस-विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। यह जल के लगातार आदान-प्रदान से भी संबंधित है। यह आदान-प्रदान महासागर, धरातल, वायुमण्डल, अधःस्तल व जीवों के बीच लगातार होता रहता है।

पृथ्वी पर पाए जाने वाले जल का लगभग 71% भाग महासमुद्रों में पाया जाता है। शेष जल हिमानियों, हिमछत्रों, भूमिगत जल, झीलों, आई मृदा, वायुमण्डल सरिताओं और जीवन में ताजा/मीठे जल के रूप में संग्रहित है। चूंकि धरातल पर गिरने वाले जल का लगभग 59 प्रतिशत भाग वाष्पीकरण के द्वारा वायुमण्डल में चला जाता है। शेष भाग धरातल पर बह निकलता है; कुछ भूमि में रिस जाता है और कुछ भाग हिमानी का रूप ले लेता है।

प्रश्न 2.
महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का निरीक्षण कीजिए।
उत्तर:
महासागरीय जल के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक है –
(क) अक्षांश (Latitude) – महासागरों के ऊपरी जल का तापमान विषुवत् रेखा से ध्रुवों की तरफ विकिरण की मात्रा में कमी के कारण घटता जाता है।

(ख) स्थल एवं जल का असमान वितरण (Unequal Distribution of Land and Water) – उत्तरी गोलार्द्ध के महासागर दक्षिणी गोलार्ड के महासागरों की अपेक्षा स्थल के बहुत बड़े भाग से जुड़े होने के कारण अधिक मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते हैं।

(ग) प्रचलित हवाएँ (Prevailing Winds) – स्थलों से महासागरों की तरफ बहने वाली. हवाएँ समुद्र की तरफ से गर्म जल को तट के दूर धकेल देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप नीचे का ठंडा जल ऊपर की ओर आ जाता है। परिणामस्वरूप तापमान में देशांतरीय अंतर आता है। इसके विपरीत, समुद्र से तट की ओर बहने वाली हवाएँ गर्म जल को तट पर जमा कर देती हैं एवं इसके कारण तापमान बढ़ जाता है।

(घ) समुद्री जलधाराएँ (Ocean Currents) – गर्म महासागरीय जलधाराएँ ठंडे क्षेत्रों में तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि ठंडी धाराएँ गर्म समद्री क्षेत्रों के तापमान को घटा देती है। गल्फ स्ट्रीम (गर्म धारा) उत्तरी अमरीका के पूर्वी किनारे तथा यूरोप के पश्चिमी तट के तापमान को बढ़ा देती हैं, जबकि लेब्रोडोर जलधारा (ठंडी धारा) उत्तरी अमेरिका के उत्तर:पूर्वी किनारे के नजदीक के तापमान को कम कर देती है। .

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
विश्व की एटलस की सहायता से महासागरीय नितन के उच्चावच्चों को विश्व के मानचित्र पर दर्शाइए।
उत्तर:
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Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल
A. स्थलजात् निक्षेप
B. टैरोपोड सिंधुपक
C. ग्लोबीजेराइना सिंधुप
D. डायटम सिंधुपंक
E. रेडियोलेरियन सिंधुपंक
F. लाल मृत्तिका R= लाल पंक
G. G= हरी पंक
H. C = प्रवाल बालू एवं पंक

नोट – नीली पंक स्थलजात् निक्षेपों में विस्तृत रूप से तट के साथ-साथ महाद्वीपीय शेल्फ तथा महाद्वीपीय ढाल पर लगभग सभी स्थानों पर मिलती है। अत: मानचित्र पर इसको दर्शाया नहीं गया है।

प्रश्न 2.
एटलस की सहायता से हिन्द महासागर में महासागरीय कटकों के क्षेत्रों को पहचानिए।
उत्तर:
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल
A – सोकोत्रा चैगोस कटक
B – चैगोस कटक
C – सेचलीस कटक
D – चैगोस सेण्ट पाल कटक,
E – अमस्टरडम सेण्ट पाल कटक
F – भारत अण्टार्कटिका कटक
G – करगलेन गासबर्ग कटव
H – मैडागास्कर कटक
I – अटलांटिक-अण्टार्कटिका कटक

Bihar Board Class 11 महासागरीय जल Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वाष्यन-वाष्पोत्सर्जन किसे कहते हैं?
उत्तर:
कुछ जल का वाष्पन एवं अवशोषण पौधों की जड़ों द्वारा किया जाता है, परंतु इसका वाष्पोत्सर्जन पौधों की पत्तियों द्वारा कर दिया जान वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी पर शुद्ध जल की प्राति कहाँ से होती है?
उत्तर:
पृथ्वी पर शुद्ध जल की प्राप्ति का मंडल, नदी तथा झरनों के ताजा जल, समुद्री जल (लवण घुला जल) तथा लवणीय झीलों से संघनित हुई सूक्ष्म बूंदों से होती है।

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प्रश्न 3.
‘थर्मोक्लाइन’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
महासागरीय जल की तापमान संरचना का द्वितीय स्तर थर्मोक्लाइन या ताप प्रवणता कहलाता है। इसकी विशेषता गहराई बढ़ने के साथ तीव्र गति से तापमान का घटना है।

प्रश्न 4.
महासागरीय जल के तापमान को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
तापमान को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-अक्षांश, स्थल एवं जल का असमान वितरण, प्रचलित पवनें, महासागरीय धाराएँ तथा अन्य गौण कारक, जैसे अंत: समुद्री कटक, स्थानीय मौसमी दशाएँ तथा समुद्र
की आकृति एवं आकार।

प्रश्न 5.
रेजिडेंस या आवास काल किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह औसत समय जिसमें एक तत्त्व महासागरीय जल में वहाँ से बाहर निकलने से पहले घुला रहता है, उसे रेजिडेंस अथवा आवास काल कहते हैं।

प्रश्न 6.
कैनियन का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर:
जब जल का प्रवाह महासागरीय शेल्फ को काट देता है तब इससे अंतः समुद्री कैनियन का निर्माण होता है।

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प्रश्न 7.
तट की परिभाषा बताइए।
उत्तर:
तट चौरस सतह वाला ऊँचा क्षेत्र है, जो अपेक्षाकृत कम गहराई होने के कारण मछली पकड़ने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
महासागरीय कटक से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अंतः समुद्री पर्वत श्रृंखला जिसकी लंबाई लगभग 64000 किमी. है। महासागरीय कटक कहलाती है। इसकी खोज 20वीं शताब्दी में की गई।

प्रश्न 9.
महासागरीय खाई क्या होती है?
उत्तर:
महासागर के वे भाग, जो 6000 मी. से अधिक गहरे हैं, महासागरीय खाई कहलाते हैं। ये महासागरों में यत्र-तत्र पाए जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जलमंडल किसे कहते हैं? हिन्द महासागर को आधा महासागर क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी के तल के जल से डूबे हुए भाग को जलमंडल कहते हैं। यह घरातल पर लगभग 361,059,000 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं। जो पृथ्वी के धरातल के कुल क्षेत्र का 71% भाग है। उत्तरी गोलार्द्ध का 61% भाग तथा दक्षिणी गोलार्द्ध का 81% भाग महासागरों से घिरा हुआ है। उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में जल का विस्तार अधिक है, इसलिए इसे वाटर हेमिस्फेयर (Water Hemisphere) कहते हैं।

अन्ध महासागर तथा प्रशांत महासागर उत्तर:दक्षिण में दोनों ओर खुले हैं। ये भूमध्य रेखा के दोनों ओर समान रूप से फैले हुए हैं, परंतु हिन्द महासागर उत्तर की ओर बंद है। एशिया महाद्वीप इसके विस्तार को रोकता है। एक प्रकार से इसका विस्तार अधिकतर दक्षिण की ओर है। इसलिए इसे आधा महासागर कहते हैं।

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प्रश्न 2.
गम्भीर समुद्री उद्रेरव (Submarine Ridges) किसे कहते हैं तथा गम्भीर समुद्री पहाड़ियों (कटकों) का निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर:
महासागरीय तल पर ऊँचे उठे हुए भाग को गम्भीर उद्रेरव कहते हैं। यह प्रायः 60 हजार किलोमीटर लम्बे और 100 किमी चौड़े हो सकते हैं। इनकी विश्वव्यापी स्थिति किसी भूमंडलीय हलचल का संकेत देती है। प्रायः यह महासागरों के मध्य में या धरती पर पाई जाती है। इनकी रचना के कई कारण हैं –

  • दरारों के साथ बेसाल्ट का फैलना।
  • संवाहिक धाराओं द्वारा भूपटल का ऊँचा उठना तथा नीचे फँसना ।

कटकों का निर्माण – गम्भीर समुद्री तल पर कई पहाड़ियों, टीले तथा निमग्न द्वीप पाए जाते हैं। ये प्रायः 300 मीटर तक ऊँचे हैं। इनकी रचना ज्वालामुखी क्रिया तथा भूपटल में विरूपण से होती है। समुद्री टीले और द्वीप प्रशांत महासागर में काफी पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
महासागरीय नितलों पर पाए जाने वाली सबसे अधिक सामान्य आकृतियों के नाम लिखो।
उत्तर:
महासागरीय तली पर महाद्वीपीय मग्नतट, महाद्वीपीय ढाल, महासागरीय मैदान तथा गर्त के अतिरिक्त निम्नलिखित लक्षण पाए जाते हैं –

  1. उद्रेरव (Ridges)
  2. पहाड़ियाँ (Hills)
  3. टीले (Sea mounts)
  4. निमग्न द्वीप (Guyots)
  5. खाइयाँ (Trenches)
  6. 4641 (Canyons)
  7. ware fuferet (Coral reefs)
  8. 1747 (Canyons)

प्रश्न 4.
महासागरीय खाइयों तथा गों को विवर्तनिक उत्पत्ति वाला क्यों समझा जाता है?
उत्तर:
महासागरों में लम्बे, गहरे तथा संकरे खड्डों को महासागरीय गर्त कहा जाता है। इनकी उत्पत्ति भूतल एवं दरारें पड़ने तथा मोड़ पड़ने की हलचल के कारण हुई है। ये अधिकतर उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ भूकंप आते हैं तथा ज्वालामुखी स्थित हों। ये अधिकतर बलित पर्वतों तथा द्वितीय चापों के समानान्तर स्थित होते हैं। इसलिए इनका सम्बन्ध भूगर्मिक हलचलों से है। महासागरीय खाई का भाग 6000 मी. से अधिक गहरा होता है। अधिकांश खाइयाँ प्रशांत महासागर की सीमाओं के समीप स्थित हैं।

प्रश्न 5.
महाद्वीपीय शेल्फ किसे कहते हैं तथा विभिन्न प्रकारों के नाम बताएँ?
उत्तर:
महाद्वीपों के किनारे का विस्तृत क्षेत्र, जिसकी चौड़ाई कुछ किलोमीटर से 300 किमी. तक है, महासागरीय शेल्फ कहलाता है। यह महाद्वीपों के चारों ओर मंद ढाल वाला जलमग्न धरातल है। वास्तव में यह महाद्वीपीय खंड का ही जलमग्न किनारा हैं जो 150 से 200 मीटर तक गहरा होता है। प्रमुख नदियाँ समुद्र में पहुंचने के पश्चात् समुद्री जल से मिलते हुए अपने प्रवाह को महाद्वीपीय शेल्फ पर जारी रखती है। महाद्वीपीय शेल्फ निम्न प्रकार के हैं –

  1. हिमानीकृत शेल्फ
  2. बड़ी नदियों के मुहानों पर शेल्फ
  3. प्रवाल भित्ति शेल्फ
  4. द्रुमाकृतिक घाटियों से युक्त शेल्फ
  5. नवीन वलित पर्वत के पार्श्व शेल्फ

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प्रश्न 6.
महासागरीय नितल की गहराई कैसे मापी जाती है तथा संसार में सबसे गहरा स्थान कौन-सा है?
उत्तर:
महासागरीय नितल की गहराई गम्भीरता मापी यंत्र से मापी जाती है। इस यंत्र से ध्वनि तरंगें महासागरीय नितल को प्रतिध्वनि के रूप में वापस आती हैं। इनकी गति व समय से गहराई ज्ञात की जाती है। संसार में सबसे गहरा स्थान प्रशांत महासागर में गुआम द्वीपमाला के समीप मेरिआना गर्त है। इसकी गहराई 11022 मीटर है। यदि ऐवरेस्ट पर्वत को इस गर्त में डुबो दिया जाए तो इसकी चोटी समुद्री जल से 2 किलोमीटर नीचे रहेगी।

प्रश्न 7.
समुद्री खाई तथा समुद्री कैनियन में अंतर बताओ –
उत्तर:
समुद्री खाई तथा समुद्री कैनियन में अंतर –
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प्रश्न 8.
महासागरों का आर्थिक महत्त्व क्या है? वर्णन करें।
उत्तर:

  1. समुद्री पर्यावरण पौधों तथा पशु जीवन के बहुत समृद्ध स्रोत हैं।
  2. तटीय क्षेत्रों के निवासी मुख्य रूप से अपने निर्वाह तथा व्यापार के लिए समुद्रों पर ही निर्भर करते हैं।
  3. महाद्वीपीय सीमांतों का दोहन खनिज उत्पादन के लिए भी किया जा रहा है।
  4. उथले महाद्वीपीय शेल्फ तथा आंतरिक समुद्र प्लैटिनम, सोने तथा टिन के प्लेसर निक्षेप के लिए जाने जाते हैं।
  5. पेट्रोलियम संसाधनों के लिए भी महाद्वीपीय शेल्फ का दोहन किया जा रहा है।
  6. समुद्री सतह पर मैंगनीज की ग्रंथिकाएँ पाई गई हैं। ये ग्रंथिकाएँ, निकिल, ताँबा तथा कोबाल्ट के स्रोत भी हो सकते हैं।

प्रश्न 9.
प्रति ध्रुवीय स्थिति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धरती पर जल और स्थल का वितरण प्रति ध्रुवीय है। महाद्वीपों और महासागर एक-दूसरे के विपरीत स्थित हैं। यह संयोजन इस प्रकार है कि जल और स्थल एक-दूसरे से एक व्यास के विपरीत कोनों पर (Diametrically opposite) स्थित हैं, जैसे आर्कटिक महासागर अण्टार्कटिक महाद्वीप के विपरीत स्थित है। यूरोप तथा अफ्रीका प्रशांत महासागर के विपरीत स्थित हैं। उत्तरी अमेरिका हिन्द महासागर के विपरीत स्थित है।

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प्रश्न 10.
समुद्री कैनियन की विशेषताओं एवं निर्माण को स्पष्ट करें।
उत्तर:
महासागरीय निमग्न तट तथा ढाल पर तंग, गहरी तथा ‘V’ आकार की घाटियों को कैनियन कहा जाता है। ये घाटियाँ विश्व के सभी तटों पर नदियों के मुहानों पर पाई जाती हैं। जैसे-हडसन, सिन्धु, गंगा, कांगो नदी। यह कैनियन नदी द्वारा अपरदन तथा सागरीय अपरदन से बनी हैं।

कैनियनों के प्रकार (Types of Conyons) – ये घाटियाँ मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं –

  1. वे कैनियन, जो छोटे, गार्ज के रूप में महाद्वीपीय शेल्फ से शुरू होकर ढाल पर काफी गहराई तक विस्तृत होते हैं। जैसे न्यू इंग्लैण्ड तट पर ओशनोग्राफर कैनियन ।
  2. वे कैनियन, जो नदियों के मुहानों से शुरू होकर कंवल शेल्फ तक ही पाए जाते हैं जैसे-मिसीसिपी तथा सिन्धु नदी के कैनियन, हडसन कैनियन ।
  3. वे कैनियन, जो तट व ढाल पर काफी कटे-फटे होते हैं, जैसे दक्षिणी कैलिफोर्निया के तट पर, बेरिंग कैनियन तथा जेम चुंग कैनियन ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पर टिप्पणियों लिखिए –

  1. महाद्वीपीय उत्थान
  2. मध्य महासागरीय कटक
  3. महासागरीय द्रोण
  4. अंतः समुद्री कैनियन

उत्तर:
1. महाद्वीपीय उत्थान – महाद्वीपीय शेल्फ के बाद महाद्वीपीय ढाल स्थित होता है, जो अचानक महाद्वीपीय उत्थान में प्रतिस्थापित हो जाता है, जिसका ढाल पर्याप्त मंद होता है। सामान्यतः महाद्वीपीय उत्थान मध्यम से निम्न उच्चावच का होता है। महासागरीय उत्थान सैकड़ों किलोमीटर चौड़ाई का क्षेत्र है, जिसका धरातल समीप के वितलीय मैदान से सैकड़ों मीटर ऊपर उठा होता है। महासागरीय उत्थान का उच्चावच अल्प से अत्यधिक असम हो सकता है। बरमूडा महासागरीय उत्थान का एक अच्छा उदाहरण है।

2. मध्य महासागरीय कटक – महासागरीय कटक एक अंत:समुद्री पर्वत श्रृंखला है। इसकी लम्बाई लगभग 64,000 किमी. है तथा इसकी खोज बीसवीं शताब्दी में महासागरीय खोजों के दौरान हुई । यह कटक उत्तरी एवं दक्षिणी अटलांटिक महासागरीय द्रोणियों के मध्य से गुजरता हुआ हिंद महासागरीय द्रोण और फिर आस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका के बीच से दक्षिणी प्रशांत द्रोणी में प्रवेश करता है। यह कटक एक पट्टी की भाँति फैला हुआ है। इसकी चौड़ाई 2000 से 2400 किमी है। वितलीय मैदान से यह सीढ़ियों के क्रम में ऊपर उठता है।

3. महासागरीय द्रोणी – महासागरीय द्रोणी महासागरीय सतह का एक विशाल क्षेत्र है जो सामान्यत: 2500 से 6000 मीटर की गहराई तक स्थित होता है। यह महासागरीय क्षेत्रफल के लगभग 76.2 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है। महासागरीय द्रोणी सतह पर तीन प्रकार के लक्षण पाए जाते हैं –

  • वितलीय मैदान एवं पहाड़ियाँ
  • महासागरीय उत्थान
  • समुद्री टीला

वितलीय मैदान गहरे महासागरीय सतह का एक भाग है, जिनकी तली सपाट और ढाल पर्याप्त मंद होता है । यह महाद्वीपीय उत्थान के आधार तल पर स्थित होता है और सभी महासागर द्रोणियों में पाया जाता है। इनकी रचना लम्बे समय तक जमने वाले अवसाद के कारण हुई है। वितलीय पहाड़ियाँ महासागरीय द्रोणी सतह से ऊपर उठी हुई छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं, जिनकी ऊँचाई कुछ मीटर से लेकर सैकड़ों मीटर तक होती है। समुद्री टीला एक शिखर है, जो समुद्र सतह से 1000 मीटर अथवा इससे अधिक ऊँचे होते हैं।

अनेक समुद्री टीलों का ऊपरी भाग आश्चर्यजनक रूप से सपाट तथा अत्यधिक तीव्र ढाल वाला होता है। महासागरीय उत्थान सैकड़ों किलोमीटर चौड़ाई का क्षेत्र है, जिसका धरातल समीप के वितलीय मैदान से सैकड़ों मीटर ऊपर उठा होता है। महासागरीय उत्थान का उच्चावच अल्प से अत्यधिक असम हो सकता है।

4. अंतः समुद्री कैनियन – जल का प्रवाह महाद्वीपीय शेल्फ को काट देता है, जिससे अंतः समुद्री कैनियन का निर्माण होता है। इनकी तुलना स्थलीय धरातल पर बनी गहरी अवनलिकाओं से की जा सकती है। अंतः समुद्री कैनियन महाद्वीपीय शेल्फ एवं ढाल के प्रमुख लक्षण हैं। ये
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खड़ी ढाल वाली गहरी घाटियाँ हैं जो लम्बी अवतल परिच्छेदिका बनाती हैं। कुछ कैनियन देखने में द्रुमाकृतिक होते हैं। महाद्वीपीय सीमाओं की विशेषता कुछ छोटे-छोटे समुद्री लवण, जैसे तट, शेल्फ तथा भित्ति हैं। तट एक चौरस सतह वाला ऊँचा क्षेत्र है, जो अपेक्षाकृत कम गहराई होने के कारण मत्स्य पालन के लिए उपयोग किया जाता है। भित्ति एक जैविक निक्षेप है, जो मृत अथवा जीवित प्रवाल द्वारा बनाया जात है।

प्रश्न 2.
अंटलांटिक महासागरीय सतह का मानचित्र बनाइए और उसमें महासागरीय द्रोणियाँ तथा मध्य अटलांटिक कटक दिखाइए।
उत्तर:
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प्रश्न 3.
हिन्द महासागरीय सतह के उच्चावच का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्द महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। हिंद महासागर के महाद्वीपीय शेल्फ में बड़ा भिन्नता है। यह प्रशांत एवं अटलांटिक महासागर से छोटा है। अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी के सीमांतों पर यह बड़ी विस्तार वाली है। अफ्रीका के पूर्वी तट तथा मैडागास्कर में यह लगभग 640 किमी. चौड़ी है, लेकिन जावा एवं समात्रा के तट के साथ यह संकीर्ण हैं। अंटार्कटिका के उत्तरी तट के पास भी यह संकीर्ण है। हिन्द महासागर में सीमांत सागरों की संख्या कम है। यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण सीमांत सागर, जैसे-मोजाविक चैनल, लाल सागर, ईरान की खाडी, अंडमान सागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी आदि मौजूद हैं।

मध्य हिन्द महासागरीय कटक उत्तर में भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे से दक्षिण में अंटार्कटिका तक फैला है। यह कटक उच्च भूमियों के एक अविच्छिन्न श्रृंखला का निर्माण। करता है। हिन्द महासागर के प्रमुख कटक हैं-सोकोत्राचागोस, मालदीव, चागोस-सेंटपॉल, इंडियन-अंटार्कटिक, मैडागास्कर, अटलांटिक तथा अंटार्कटिका कटक।

मध्य हिन्द महासागरीय कटक तथा अन्य कटक हिन्द महासागर को नेक महासागरीय द्रोणियों में विभक्त करती हैं। इनके नाम हैं-ओमान द्रोणी, अरेबियन द्रोणी, सोमाली द्रोणी, अगुल्हास-नटाल द्रोणी, अटलांटिक-हिन्द-अंटार्कटिक द्रोणी, पूर्वी हिन्द-अंटार्कटिक द्रोणी तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया द्रोणी।

हिन्द महासागर में बहुत कम महासागरीय खाइयाँ हैं। जावा तथ सुंडा खाई (7450 मी.) सबसे गहरी है। हिन्द महासागर के प्रमुख गहरे वितलीय मैदान हैं-सोमाली. श्रीलंका तथा हिन्द वितलीय मैदान । हिन्द महासागर में मैदानों की ऊंचाई 3600 मी से 5400 मी है।

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प्रश्न 4.
अंतर स्पष्ट कीजिए –

  1. महाद्वीपीय शेल्फ एवं महाद्वीपीय ढाल
  2. तट एवं भित्ति
  3. महासागरीय जल के प्रथम एवं तृतीय स्तर
  4. थर्मोक्लाइन एवं हैलोक्लाइन

उत्तर:
1. महाद्वीपीय शेल्फ एवं महाद्वीपीय ढाल में अंतर –
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2. तट एवं भित्ति में अंतर –
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3. महासागरीय जल के प्रथम एवं तृतीय स्तर में अंतर –
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4. थर्मोक्लाइन एवं हैलोक्लाइन में अंतर –
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प्रश्न 5.
अन्ध महासागर की स्थल रूपरेखा के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करो।
उत्तर:
अन्ध महासागर –

विस्तार तथा आकार – यह महासागर पृथ्वी के 1/6 भाग को घेरे हुए है। इसका आकार ‘S’ अक्षर की तरह है। यह महासागर भूमध्य रेखा पर लगभग 2560 किमी चौड़ा है, परंतु दक्षिण में इसकी चौड़ाई 4800 किलोमीटर है।

समुद्रतली – इस महासागर के तटों पर चौड़ा महाद्वीपीय निमग्न तट पाया जाता है। यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के तटों पर इसकी चौड़ाई 400 किलोमीटर है। यहाँ प्रसिद्ध मछली क्षेत्र पाये जाते

उद्रेरव (Ridges) –

  • मध्य एटलांटिक उद्रेरव उत्तर से दक्षिण तक ‘S’ आकार में फैला हुआ है। यह उद्रेरव 14 हजार किलोमीटर लम्बा है, जिसकी
  • ऊंचाई लगभग 4 हजार मीटर है।
  • डालफिन उद्रेरव तथा वेलविस उद्रेरव उत्तरी भाग में।
  • दक्षिण भाग में चेलेंजर उद्रेव।
  • उत्तरी भाग में टेलीग्राफ पठार।

सागरीय बेसिन – अन्ध महासागर में कई छोटे-छोटे बेसिन पाए जाते हैं, जैसे –

  • लेब्रेडोर बेसिन
  • स्पेनिश बेसिन
  • उत्तरी अमेरिकन बेसिन
  • कोपवर्ड बेसिन
  • गिन्नी बेसिन
  • ब्राजील बेसिन

सागरीय गर्न – मोटे तौर पर अन्ध महासागर में गर्त कम हैं। मुख्य गर्त निम्नलिखित हैं –

  • प्यूटोरिको गर्त-जो इस सागर का सबसे गहरा स्थान है तथा 4812 फैदम गहरा है।
  • रोमाशे गर्त-4030 फैदम गहरा है।
  • दक्षिणी सेण्डविच गर्त-जो फाकलैंड द्वीप के निकट 4575 फैदम गहरा है।

तटीय सागर – उत्तरी भाग में कई छोटे सागर पाये जाते हैं, जैसे-बाल्टिक सागर, उत्तरी सागर, हडसन खाड़ी, बेफिन खाड़ी, मेक्सिको तथा कैरेबियन सागर।

द्वीप – इस महासागर में ग्रेट ब्रिटेन तथा न्यू फाउंडलैंड जैसे महाद्वीपीय द्वीप हैं। निमग्न तट पर पश्चिमी द्वीप समूह आइसलैंड आदि द्वीप पाए जाते हैं। मध्य उद्रेव पर ए|स द्वीप, सेन्टहेलना, बरमूदा द्वीप स्थित हैं। अफ्रीका तट पर कई ज्वालामुखी द्वीप केपवर्ड द्वीप तथा कमेरी द्वीप स्थित हैं।

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प्रश्न 6.
महासागरों की तली के उच्चावच के सामान्य लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
महासागरों की गहराई तथा उच्चावच में काफी विभिन्नता है जिसे उच्चतादर्शी वक्र से दिखाया जाता है। बनावट तथा गहराई के अनुसार सागरीय तल को चार भागों में बाँटा जाता है
1. महाद्वीपीय मग्न तट (Continental Shelf) – महाद्वीपों के चारों ओर सागरीय तट का वह भाग जो 150 से 200 मीटर तक गहरा होता है, महाद्वीपीय चबूतरा कहलाता है। वास्तव में यह महाद्वीप का जलमग्न भाग होता है। महाद्वीपीय निमग्न तट का सबसे अधिक विस्तार अन्ध महासागर है। इसकी औसत चौड़ाई 70 किमी तथा गहराई 72 फैदम होती है। आर्कटिक सागर के तट पर इसकर विस्तार 1000 किमी से भी अधिक है। पर्वत श्रेणियों वाले तटों पर संकरे महाद्वीपीय मग्न तट पाए जाते हैं। समुद्र तल के ऊपर उठने से या स्थल भाग के नीचे घुस जाने से निमग्न तट की रचना होती है। ये शेल्फ मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

2. महाद्वीपीय ढाल – महाद्वीपीय निमग्न तट के बाहर का ढाल जो महासागर की ओर तीव्र गति से नीचे उतरता है, महाद्वीपीय ढाल कहलाता है। इसकी गहराई 3600 मीटर तक है। इसका सबसे अधिक विस्तार अंध महासागर में 12.4% क्षेत्र पर है। यह ढाल वास्तव में गहरे समुद्रों तथा महाद्वीपों के स्तर को पृथक् करती है। जहाँ महाद्वीपीय ढाल का अंत होता है वहाँ मन्द ढाल को महाद्वीपीय उत्थान कहते हैं।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

3. महासागरीय मैदान – महाद्वीपीय ढाल के पश्चात् समुद्र में चौड़े तथा समतल क्षेत्र को महासागरीय मैदान कहते हैं। इसकी औसत गहराई 3000 से 6000 मीटर तक है। इसे नितल मैदान भी कहते हैं । इन मैदानों पर कई भू-आकृतियाँ पाई जाती है; जैसे-समुद्री उद्रेरव द्वीप, समुद्री टीले, निमग्न द्वीप आदि। इन मैदानों पर स्थलज तथा उथले जल से उत्पन्न तलछट पाए जाते हैं। नितल मैदान पर जलमग्न कटक पाए जाते हैं, जो महासागरों के मध्य क्षेत्र में हैं। इन कटकों की लम्बाई 75000 किमी. है। ये मन्द ढाल वाले चौड़े पठार के समान हैं।

4. महासागरीय गर्त – ये समुद्र तल पर गहरे खड्डे होते हैं। इनका विस्तार बहुत कम होता है जबकि लम्बे, गहरे तथा संकरे खड्ड को खाई कहते हैं। इनकी औसत गहराई 5500 मीटर है। संसार में सबसे अधिक गहरा गर्त प्रशांत महासागर में है जिसकी गहराई 11022 मीटर है। यह गर्त द्वीपीय चापों के सहारे मिलता है। ये भूकम्पीय तथा ज्वालामुखी क्षेत्रों से संबंधित हैं।

5. अन्य विशेष आकृतियाँ – महासागरों में उच्चावच में विविधता के कारण कई भू-आकृतियाँ जैसे द्वीप, उद्रेव, अटोल, समुद्री कैनियन भी पाई जाती है।