Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Psychology Chapter 1 मनोविज्ञान क्या है?

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 1 मनोविज्ञान क्या है? Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 1 मनोविज्ञान क्या है?

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान क्या है? Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
व्यवहार क्या है? प्रकट एवं अप्रकट व्यवहार का उदहारण दीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण की विभिन्न घटनाओं से उत्पन्न स्थितियों के प्रभाव में मानव मन उद्दीपक (S) और अनुक्रिया (R) में संतुलन बनाये रखने के लिए अपनी प्रकृति तथा प्रवृति के अनुसार जैसा आचरण करता है, उसे संलग्न स्थितियों के प्रति व्यवहार (behaviours) माना जाता है। हमारे मानसिक निर्णय का कार्यकारी परिणाम हमारा व्यवहार माना जाता है। व्यवहार व्यक्ति एवं उसके वातावरण का उत्पाद है। अर्थात् B=f (P.E.)। व्यवहार सामान्य अथवा जटिल, अल्पकालिक या दीर्घकालिक, लाभकारी या हानिकारक किसी भी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। कुछ व्यवहार प्रकट होते हैं तो कुछ अप्रकट ।

प्रकट व्यवहार के उदाहरण –

  1. मालिक को सामने पाकर नौकर का सतर्क और सभ्य आचरण करना।
  2. साँप या बाघ को देखते ही उपने को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने के लिए यथासंभव तेजी से भागना।
  3. जेब में डाले हुए हाथ को पकड़ लिये जाने पर पॉकेटमार तथा यात्री के मुखमुद्रा तथा क्रियाओं में आने वाला अन्तर।

अप्रकट व्यवहार के उदहारण –

  1. परीक्षार्थी के परीक्षाभवन में बैठ जाने पर कठिन प्रश्नों की आशंका में किया जाने वाला आचरण।
  2. शतरंज, ताश या कैरमबोर्ड खेलते समय की जाने वाली आगामी चाल के प्रति चिंतित होना।
  3. मित्र के घर मिलने वाल स्वागत, भोजन तथा आमंत्रण की सुखद याद करना।

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प्रश्न 2.
आप वैज्ञानिकामनोविज्ञान को मनोविज्ञान विद्या शाखा की प्रसिद्ध धारणाओं से कैसे अलग करेंगे?
उत्तर:
वैज्ञानिक मनोविज्ञान अनुसंधान एवं अनुप्रयोग की दिशा प्रयोग करने वाले कथ्य पर पूर्णतः आधारित होते हैं। अनुसंधान में व्यवहार और मानसिक घटनाओं की समझ, व्याख्या एवं दोष मुक्त बनाने की क्षमता होती है। यह मात्र कोरी कल्पना पर आधारित नहीं होती है। इसके अन्तर्गत अनेक प्रयोग किये जाते हैं। प्रयोगिक कार्यों से प्राप्त निष्कर्षों को मानव-हित में उपयोग में लाते हैं। सर्वप्रथम प्रयोगों की अभिकल्पना की जाती है।

प्रयोगों को संपादित करते है। अर्थात् प्रयोगों के वृहत्तर आयाम के मनोवैज्ञानिक गोचरों का नियंत्रिण दिशा में अध्ययन किया जाता है जिसका प्रधान उद्देश्य व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं के सामान्य सिद्धातों का विकास करना होता है। प्रयोगिक मनोविज्ञान प्रत्यक्षण, अधिगम, स्मृति, चिंतन एवं अभिप्रेरण आदि प्रक्रियाओं से जुड़ी रहती है। वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक के लिए निम्नांकित कथ्य सार्थक प्रतित होते हैं –

  • मनोविज्ञान व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं के सिद्धांतों का विकास करने का प्रयास करता है।
  • मानव व्यवहार व्यक्तियों एवं वातावरण के लक्षणों का एक प्रकार्य है।
  • मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग द्वारा मानव व्यवहार को नियंत्रित एवं परिवर्तित किया जा सकता है।
  • मानव व्यवहार उत्पन्न किया जा सकता है।
  • मानव व्यवहार की समझ से संस्कृति निर्मित होती है।

यही कारण है कि मनोविज्ञान की सार्थकता को बढ़ाने के लिए तंत्रिका विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, जीवन विज्ञान, आयुर्विज्ञान तथा कम्प्यूटर विज्ञान की सहायता ली जाती है। मनोविज्ञान की सभी विद्या एवं शाखाओं में मानव हित को ध्यान में रखा गया है, किन्तु वैज्ञानिक मनोविज्ञान की तरह यह सर्वमान्य नही होता है। दशा और समय के बदलने से निर्धारित मूल्यों एवं समझदारियों में भी अन्तर आ जाता है।

इसमें विशिष्ट अनुसंधान, कौशल एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। समाज-सेवा हो या मन की उत्सुकता, मानवीय उलझन हो या किसी प्रकार कि समस्या; एक निदान उपयोगी नहीं होता। गरीब-अमीर, शांति-क्रांति, मिलन-वियोग, बरसात-गर्मी जैसे परिवर्तन धारणाओं में अन्तर उत्पन्न कर देते हैं। साधारण-सा उदाहरण है एक मित्र का कही दूर चला जाना। नया मित्र मिल जाने पर ‘दृष्टि ओझल मन ओझल’ का सिद्धांत सही लगता है जबकि नये मित्र के अभाव में मान लिया जाता है कि ‘दूरी से हृदय में प्रेम और प्रगाढ़ होता है।

अर्थात् मनोविज्ञान की विभिन्न विद्या शाखाओं की प्रसिद्ध धारणाओं का विज्ञान अंधकार में तीर चलाने जैसा प्रतीत होता है। मनोविज्ञान द्वारा उत्पादित वैज्ञानिक ज्ञान सामान्य बोझ के प्रायः विरुद्ध होता है। परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्र प्रश्न-पत्र को ही बदनाम कर संतोष कर लेते हैं जबकि उन्हें जानना चाहिए कि –

  • पलायन के बदले प्रयास करते रहना चाहिए।
  • असफलता का कारण प्रयास की कमी होती है।
  • अच्छा अभ्यास ही अच्छा निष्पादन का कारण बनता है।

अर्थात् एक सामाजिक-सांस्कृतिक के संदर्भ में मानव व्यवहार के लिए मनोविज्ञान अपने ज्ञान को मानव विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज कार्य विज्ञान, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र के साथ भी मिलकर बाँटता है। आजकल वास्तविकता की अच्छी समझ के लिए बहु/अंतर्विषयक पहल की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इससे विद्या शाखाओं में आपसी सहयोग का उदय हुआ है। मनोविज्ञान की रुचि सामाजिक विज्ञानों में परस्पर रूप से व्याप्त है। ऐसे प्रयासों से फलदायी अनुसंधानों एवं उनुप्रयोगों को बढ़ावा मिलता है। मनोविज्ञान अनेक समस्याओं के समाधान में भी समर्थ सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान के विकास का संक्षिप्त रूप प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन दर्शनशास्त्र के मनोवैज्ञानिक सार्थकता से जुड़ी सूचनाओं से मनोविज्ञान का उद्भव हुआ।

1. संरचनावादी (1879):
मन के अवयवों अथवा निर्माण की इकाइयों का विश्लेषण करने की इच्छा से विलियम वुण्ट ने लिपजिंग, जर्मनी में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला स्थापित किया।

2. प्रकार्यवादी (1890):
एक अमेरीकी मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने कैम्ब्रिज, मेसाचुसेट्स में इसका प्रयोगशाला स्थापित किया। उन्होंने मानव मन के अध्ययन के लिए प्रकार्यवादी उपागम का विकास किया। इन्होंने ‘प्रिंसपल ऑफ साइकोलॉजी’ प्रकाशित की। इसी अवधि में जॉन डीवी ने मानव के कार्य करने की पद्धति पर अपना विचार प्रकट किया। सन् 1895 में मनोविज्ञान की एक व्यवस्था के रूप में प्रकार्यवाद की स्थापना हुई। सन् 1990 में सिगमंड फ्रायड ने मनोविश्लेषणवाद का विकास किया।

3. व्यवहारवाद (1910):
जॉन वाटसन ने मानव मन एवं चेतना को अध्ययन का आधार बनाया।

4. 1916 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान का प्रथम विभाग खुला।

5. स्किनर ने व्यवहारवाद का अनुप्रयोग किया।

6. सिगमंड फ्रायड ने मानव व्यवहार को अचेतन इच्छाओं एवं द्वन्द्वों का गतिशील प्रदर्शन बताया। इन्होंने मनोविश्लेषण को एक पद्धति के रूप में स्थापित किया।

7. मानवतावादी परिदृश्य:
कार्ल रोजर्स तथा अब्राहम मैस्लो ने बताया कि व्यवहारवाद, वातावरण की दशाओं से निर्धारित व्यवहार पर बल देता है।

8. संज्ञानात्मक परिदृश्य (1920):
जर्मनी में गेस्टाल्ट मनोविज्ञान का उदय हुआ। चिंतन, समझ, प्रत्यक्षण, स्मरण करना, समस्या सामाधान तथा अनेक मानसिक प्रक्रियाओं के द्वारा संज्ञानात्मक परिदृश्य प्रस्तुत किया।

9. निर्मितवाद:
मानव मन के विकास का निर्मितपरक सिद्धांत के द्वारा पियाजे (piaget) ने. मानव मन की सक्रिय रचना की खोज की। रूस के एक अन्य मनोविज्ञानिक व्यगाट्स्की (Vygotsky) ने बताया कि मानव का विकास सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है। मन एक संयुक्त सांस्कृतिक निर्मित है तथा वयस्कों एवं बच्चों की अंतः क्रिया के परिणामस्वरूप विकसित हो पाता है।

इसके अतिरिक्त सन् 1978 में निर्णयन पर हर्बर्ट साइमन के द्वारा कार्य किया गया। सन् 2002 में डेनियल बहनेमन द्वारा मानव निर्णयन पर शोध किया गया। सन् 2005 में थामस शेलिंग ने आर्थिक व्यवहार में सहयोग एवं द्वन्द्व की समझ में खेल सिद्धान्त का अनुप्रयोग किया।

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प्रश्न 4.
वे कौन-सी समस्याएं होती हैं जिनके मनोवैज्ञानिकों का अन्य विद्या शाखा के लोगों के साथ सहयोग लाभप्रद हो सकता है? किन्हीं दो समस्याओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोविज्ञान, व्यवहार, अनुभव एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। मनोविज्ञान की जड़ें दर्शनशास्त्र में हाती हैं। मनोविज्ञान केवलं मानव व्यवहार के विषय में सैद्धान्तिक ज्ञान का विकास ही नहीं करता है बल्कि यह विभिन्न स्तरों पर समस्याओं का समाधान भी करती है। मानव व्यवहार को समझने तथा मानव जीवन से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए मनोविज्ञान कई विद्या शाखाओं से जुड़ी होती है। निम्नांकित

विद्या शाखाएँ ऐसी हैं जो मनोविज्ञान की सार्थकता को सुपरिणामी बनाने में समर्थ होते हैं इसी श्रेणी के रुझान के कारण मनोविज्ञान में अंतर्विषयक उपागम का उदय हुआ।

1. दर्शनशास्त्र:
मन का स्वरूप, अभिप्रेरण, संवेग आदि के आधार पर ज्ञान की विधि तथा मानव स्वभाव के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन।

2. अनुर्विज्ञान:
स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन की आवश्यकता होती है।

3. अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान एवं समाजशास्त्र:
आर्थिक व्यवहार, उपभोक्ताओं की भावुकताओं एवं आवश्यकताओं का अध्ययन, अर्थशास्त्र के माध्यम से सरल हो जाता है। शक्ति एवं प्रभुक्त के उपयोग, मतदान, मानसिक आचरणों, सामाजिक-सांस्कृतिक अवधारणाओं से जुड़ी समस्याओं आदि का समाधान राजनीति विज्ञान एवं समाजशास्त्र से संभव होता है।

4. कम्प्यूटर विज्ञान:
मानव स्वभाव पर आधारित संज्ञानात्मक विज्ञान का उपयोग करके संवेद एवं अनुभूति को जाना जा सकता है।

5. विधि एवं अपराधशास्त्र:
अभियुक्त की पहचान, सजा का निर्धारण, गवाहों की मानसिकता, पश्चाताप का महत्व आदि को समझने के लिए मनोविज्ञान को विधि एवं अपराधशास्त्र की मदद लेनी होती है।

6. जनसंचार:
मानवीय घटनाओं के अभिप्रेरकों एवं संवेगों का ज्ञान जनसंचार के माध्यम से सरल हो जाता है।

7. संगीत एवं ललितकला:
कार्य निष्पादन तथा संगीत चिकित्सा आदि मानव हित में व्याधि निवारक माने जाते हैं।

8. वास्तुकला एवं अभियांत्रिकी:
भौतिक एवं मानसिक संतुष्टि, सौंदर्यशास्त्रीय विवेचन, सुरक्षा एवं अच्छी आदतों के संरक्षण में सहायता मिलती है। इसी प्रकार –

9. शिक्षा।

10. मनोरोग विज्ञान।

11. शिक्षा आदि से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए मनोवैज्ञानिकों को अन्य विद्या शाखा के लोगों के साथ सहयोग लाभप्रद होता है। जीवन की समस्याओं के निदान में मनोविज्ञान के विभव को अधिक-अधिक महत्व दिया जा रहा है। इस संबंध में संचार सधानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। विद्यालयों, चिकित्सालयों, उद्योगों, काराग़ारों, व्यावसायिक संगठनों तथा निजी अभ्यास में मनोवैज्ञानिक परामर्श से काफी हायता मिलती है।

दूसरों के लिए समाज-सेवा प्रदान करने में विद्या शाखाओं की सहयोग सार्थक प्रतीत होती है। अर्थात् मनोविज्ञान मात्र एक विषय के रूप में हमारे मन की उत्सुकताओं को ही नहीं संतुष्ट करता है बल्कि यह अनेक प्रकार की समस्याओं का समाधान भी करता है। शिक्षा, स्वास्थ, पर्यावरण, समाजिक न्याय, महिला विकास, अंर्तसमूह संबंध आदि समस्याओं का समाधान यह किसी अन्य विद्या शाखा के सहयोग से करता है।

प्रश्न 5.
अंतर कीजिए (अ) मनोवैज्ञानिक एवं मनोरोग विज्ञानी तथा (ब) परामर्शदाता एवं नैदानिक मनोवैज्ञानिक में।
उत्तर:
(अ) मनोवैज्ञानिक एव मनोरोग विज्ञानी में अन्तर-मनोवैज्ञानिक लोगों के अनुभवों का अध्ययन करके उत्पन्न समस्याओं का निदान ढूँढता है। मनोवैज्ञानिक व्यवहार एवं अनुभव की व्याख्या से ऐसी अभिनतियों को अनेक तरीकों से कम करने का प्रयास करते हैं। आत्म परावर्तन, व्यक्तिपरकता, वैज्ञानिक विशलेषण आदि को समझ का आधार माना जाता है। मनोवैज्ञानिकों ने अधिगम, स्मृति, अवधान, प्रत्यक्षण, अभिप्रेरणा एवं संवेग आदि के सिद्धान्तों को विकसित किया है तथा सार्थक प्रगति की है। मनोवैज्ञानिक गोचरों के विषय में सिद्धांत विकसित करता है।

मनोवैज्ञानिक व्यक्तिगत समस्याओं एवं जीवन-वृति योजना के विषय में अपनी सलाह देते हैं। मनोवैज्ञानिक जैविक, शिक्षा, क्रीड़ा, औद्योगिक, विद्यालय आदि से संबंधित अनुसंधान और अनुप्रयोग का अध्ययन कर प्राप्त परिणाम से मानव हित में कार्य करता है। मनोवैज्ञानिक कारणपरक प्रतिरूपों को खोजते हैं।

मनोरोग विज्ञानी-मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रमों कारणों, उपचारों तथा उनसे बचाव का अध्ययन करते हैं। मनोरोग विज्ञानी के पास चिकित्सा विज्ञान की उपाधि होती है जो मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रम के निदान हेतु वर्षों का विशष्ट प्रशिक्षण प्राप्त किए हुए होते है। मनोरोग विज्ञानी ही दवाइयों का सूझाव दे सकता है तथा विद्युत आघात उपचार प्रदान कर सकता है।

(ब) परामर्शदाता एवं नैदानिक मनोवैज्ञातिक में अन्तर-समाज सेवा प्रदान करने में मनोवैज्ञान के विविध सिद्धांतों की जानकारी रखनेवाले विभिन्न परिस्थितियों से उत्पन्न समस्याओं के सफल निदान हेतु अपने अनुभव के आधार पर परामर्श देते हैं। विद्यालयों, चिकित्सालयों, उद्योगों, कारागारों, व्यावसायिक संगठनों, सैन्य प्रतिष्ठानों तथा प्राइवेट प्रैक्टिस में परामर्शदाता के रूप में जहाँ वे लोगों को अपने क्षेत्र में समस्याओं के समाधान में सहायता करते हैं।

परामर्शदाता मात्र सलाह देता है न कि स्वयं निदान मे जुट जाता है। परामर्श पाने वाले परामर्शदाता के परामर्श के प्रति सकारात्मक तथा संतुलित समझ से रक्षात्मक व्यवहार करते हैं। अर्थात् परामर्शदाता मात्र सलाहकार होता है वह किसी को बाध्य नहीं करता है।

दूसरी ओर नैदानिक मनोविज्ञानिक व्यवहारिक समस्या वाले रोगियों की सहायता करने में विशिष्टता रखते हैं। नैदानिक मनोवैज्ञानिक अनेक मानसिक व्यतिक्रमों तथा दुश्चिता, भय या कार्यस्थल के दबावों के लिए चिकित्सा प्रदान करते हैं। रोगियों की दशाओं का अध्ययन के लिए ये उनका साक्षात्कार करते हैं। उपचार, पुनर्वास, जीविकोपार्जन आदि क्षेत्रों में ये मनोवैज्ञानिक विधियों का उपयोग करते हैं। नैदानिक मनोवैज्ञानिक दवाइयों का सुझाव, विद्युत आघात उपचार आदि में हाथ बँटना नहीं चहाता है।

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प्रश्न 6.
दैनंदिन जीवन के कुछ क्षेत्रों का वर्णन कीजिए जहाँ मनोविज्ञान की समझ को अभ्यास रूप में लाया जा सके।
उत्तर:
मनोविज्ञान का ज्ञान, हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में बहुत ही उपयोगी है तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक दुष्टि से भी लाभप्रद है। मनोविज्ञान मात्र किसी एक विषय के रूप में हमारे मन की उत्सुकताओं को ही नहीं संतुष्ट करता है बल्कि यह एक ऐसा विषय है जो अनेक प्रकार की समस्याओं का समाधान करता है।

(क) व्यक्तिगत क्षेत्र में किसी युवा लकड़ी का अपने शराबी पिता से सामना करने हेतु मनोविज्ञान की समझ उपयोगी होती है। इसी प्रकार किसी माँ का अपने समस्याग्रस्त बच्चों के दिल में आशा और हिम्मत की भावना जगाने में मनोविज्ञान के सिद्धांत का प्रयोग किया जाना चाहिए।

(ख) पारिवारिक पृष्ठभूमि में:
परिवार के सभी सदस्यों के किसी परिवारिक समस्या के समाधान हेतु विचार-विमर्श के क्रम में उत्पन्न उलझन को संवाद एवं अंत:क्रिया की कमी का अभास कराकर खुशनुमा स्थिति उत्पन्न करने में मनोविज्ञान की सहायता ली जा सकती है।

(ग) समुदायिक परिवेश में आतंकवादी समूह को अनैतिक कार्यों के प्रति घृणा उत्पन्न करना, सामाजिक रूप से एकांतिक होने से बचने की प्रेरणा देना मनोविज्ञान के ज्ञान से संभव हो सकता है।

(घ) राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय विमाओं वाली समस्या:
शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामाजिक न्याय, महिला विकास, अंतर्समूह संबंध, सीमा युद्ध, खेल प्रतियोगिता जैसी स्थितियों के कारण उत्पन्न विवाद या समस्याओं को सुलझाने में मनोवैज्ञानिक पद्धति सुपरिणामी सिद्ध होती है। इस श्रेणी की समस्याओं के कारण अस्वस्थ चिंतन, अपने प्रति ऋणात्मक प्रवृत्ति तथा व्यवहार की आवांछित शैली आदि का पाया जाना है। इनका समाधान राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक सुधार तथा वैयक्तिक स्तर पर हस्तक्षेप आदि में अन्तर लाकर संभव होता है।

(ड.) जीवन की समस्याओं का निदान:
मनोवैज्ञानिक लोगों के गुणात्मक रूप से अच्छे जीवन के लिए हस्तक्षेपी कार्यक्रमों की अभिकल्पना एवं संचालन में सक्रिय भूमिका का निर्वहन करते हैं। समाजिक परिवर्तन तथा विकास, जनसंख्या विस्फोट, गरीबी का अभिशाप, सुनामी लहर का कहर, हिंसा, लूटपाट, बलात्कार, असंख्य समस्याओं से ग्रसित मानव को मनोविज्ञान का ज्ञान ही सही रास्ता बता सकता है।

(च) समाज-सेवा:
दूसरों के लिए समाज सेवा प्रदान करने की प्रेरणा तथा साधन या सिद्धांत मनोविज्ञान के ज्ञान से ही संभव हो पाता है। मनोविज्ञान के सिद्धांत एवं विधियों की सही जानकारी से ही हम दूसरों के दुख का कारण और निदान पा सकते हैं । रक्षात्मक व्यवहार, सर्वप्रिय आदतें, ‘बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय’ का सुविचार सकारात्मक कार्य प्रणाली, संतुलित समझ आदि मनोविज्ञान की ही देन है।

प्रश्न 7.
पर्यावरण के अनुकूल मित्रवत व्यावहार को किस प्रकार उस क्षेत्र में ज्ञान द्वारा बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
तापमान, आर्द्रता, प्रदूषण तथा प्राकृतिक आपदा पर्यावरण एवं मानव के लिए अहितकारी स्थिति उत्पन्न कर देते हैं। इस दुष्प्रभाव के कारण के रूप में उत्सर्ग प्रबन्धन, जनसंख्या “विस्फोट, ऊर्जा संरक्षण, वन-विनाश, प्राकृतिक संसाधनों का अनुपयोगी दोहन तथा समुदायिक संसाधनों का उपयोग आदि जुड़े हैं जो मानव व्यवहार के प्रकार्य होते हैं।

पर्यावरण अनुकूल मित्रवत व्यवहार को बढ़ाने के लिए मनोवैज्ञानिक अनुसंधान का सार्थक अध्ययन करना उपयोगी होता है। ज्ञान है कि –

  1. मनोवैज्ञानिक व्यतिक्रमों के निदान एवं बचाव से संबंधित होते हैं। संसार में हमारी अंत:क्रियाएँ एवं अनुभव एक व्यवस्था के रूप में गतिमान होकर संगठित होते हैं जो विविध प्रकार की मानसिक प्रक्रियाओं के घटित होने के लिए उत्तरदायी होते हैं।
  2. मानव समुदाय मे क्यों और कैसे समुदायों में लोग एक-दूसरे की कठिनाई के समय सहायता करते हैं तथा त्याग करते हैं।
  3. यदि हम किसी कार्यकर्ता से चाहते हैं कि अपने विगत कार्य से अच्छा कार्य करे तो उसे उत्साहित करना होता है।
  4. फ्रायड ने मानव व्यवहार को अचेतन इच्छाओं एवं द्वन्द्वों का गतिशील प्रदर्शन बताया। मनोविशलेषण को उन्होंने एक पद्धति के रूप में स्थापित किया।
  5. मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की सहायता से लोगों को समस्याओं के प्रति दक्षतापूर्वक सामना करने योग्य बनाया है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि मानव अर्जित ज्ञान भाईचारा, सहिष्णुता, विनम्रता, सहभागिता आदि का पाठ पढ़ाकर पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण लाकर बेरोजगारी, आंतकवाद, असंतोष, शिक्षा भुखमरी आदि दोषों पर काबू पाया जा सकता है। मनोविज्ञान के रूप में अनुसंसाधन, अनुप्रयोग, प्रकार्यवाद, व्यवहारवाद, बुद्धि परीक्षण, मानववादी सिद्धांत निर्णयन, आर्थिक संतुलन आदि का समुचित अध्ययन के पश्चात् कोई भी मानव पर्यावरण के स्वभाव और महत्व को समझने लगेगा तथा पर्यावरण को अपनी जीवन-शैली के अनुकूल बनाये रखने में समर्थ हो जायगा।

प्राकृतिक आपदा को यदि आधार माना जाय तो मानव की कराह को सांत्वना, सहयोग, साधना एवं सहकार्यिता के द्वारा कम किया जा सकता है। किसी भी क्षेत्र में मानवीय व्यवहार के माध्यम से पर्यावरण को संतुलित बनाये रखना संभव होता है।

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प्रश्न 8.
अपराध जैसी महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्या का समाधान खोजने में सहायता करने के लिए आपे अनुसार मनोविज्ञान की कौन-सी शाखा सबसे उपयुक्त है। क्षेत्र की पहचान कीजिए एवं उस क्षेत्र के कार्य करने वाले मनोवैज्ञानिकों के सरोकारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनोविज्ञान की प्रत्येक शाखा का सीधा संबंध मानवीय क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ है। मनोविज्ञान प्रत्येक क्षेत्र में मानवीय समस्याओं की खोज करता है तथा उनके निदान का उपाय बतलाता है। अपराध जैसी महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्या का समाधान की खोज में सहायता करने के लिए विकासात्मक मनोविज्ञान का अध्ययन एवं उपयोग सर्वाधिक उपयुक्त है। विकासात्मक मनोविज्ञान सम्पूर्ण मानव-जीवन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करता है।

भौतिक, समाजिक एवं मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों का अध्ययन करके कारण, परणिाम और सरल निदान की खोज करता है। जो हम हैं वह कैसे हुआ ? बच्चों एवं किशोरों के विकास के साथ-साथ यह वयस्कों एवं काल-प्रभावक विषय में उपयोगी सूचना देता है। वे जैविक समाजिक सांस्कृतिक तथा पर्यावरणीय कारकों जो मनोवैज्ञानिक विशेषताओं (बुद्धि, संज्ञान, संवेग, मिजाज, नैतिकता एवं सामाजिक संबंध) को प्रभावित करते है। यह मनुष्य की संवृद्धि एवं विकास के लिए अन्य शाखाओं से मिलकर कार्य करता है।

विधि एवं अपराधशास्त्र से जुड़कर विकासात्मक मनोविज्ञान अपराध का स्वरूप, अपराधी की छवि, अधिवक्ता का कर्तव्य, गवाहों की प्राथमिकता, न्याय अथवा दंड का आधार से संबधित विभिन्न कारकों की खोज करके अपराध नियंत्रण में सहयोग करता है। दुर्घटना, शीतयुद्ध, गली की लड़ाई, हत्या, बलात्कार, झूठ, पश्चाताप, उम्रकैद, फाँसी, आर्थिक दण्ड, अवहेलना, बहिष्कार जैसी विधियों के द्वारा अपराध को नष्ट करने का सहास जुटाता है। विधी व्यवस्था एवं अपराध नियंत्रण से जुड़े निम्नांकित प्रश्नों के सही उत्तर बतलाने का सफल प्रयास करता है –

  1. अपराध क्यों और कैसे किया गया?
  2. गवाही में कितनी सत्यता है?
  3. जूरी के निर्णयों पर किसका अंकुश है?
  4. क्या उपराधी अपनी करनी पर पछता रहा है?
  5. क्या दिया गया निर्णय या दंड अपराधी की प्रवृति को बदल पायेगा?

अपराध नियंत्रण से जुड़ी सभी संभावनाओं की खोज करने तथा भविष्य में उसके विनाश की स्थिति उत्पन्न करने में मनोवैज्ञानिक अनुसंधान काफी उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology मनोविज्ञान क्या है? Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अनुभव किससे प्रभावित होता है?
उत्तर:
अनुभव, अनुभवकर्ता की आंतरिक एवं बाह्य दशाओं से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 2.
व्यवहार की विशिष्टताएँ क्या हैं?
उत्तर:
व्यवहार क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के प्रति किया गया आचरण होता है जो सामान्य अथवा जटिल, लघुकालिक या दीर्घकालिक तथा प्रकट या अप्रकट कुछ भी हो सकता है।

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला कब और कहाँ स्थापित किया गया था?
उत्तर:
सन् 1879 में विलहम वुण्ट ने लिपजिंग, जर्मनी में प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला स्थापित किया था।

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प्रश्न 4.
मनोविज्ञान क्या है?
उत्तर:
मनोविज्ञान एक विशिष्ट विद्या शाखा है जो प्राकृतिक विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान के रूप में मानवीय व्यवहारों को नियंत्रित रखता है।

प्रश्न 5.
मानसिक प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
मानवीय चेतना के रूप मे अनुभव करने वाल व्यक्ति के द्वारा प्राप्त आंतरिक ज्ञान का अनुप्रयोग मानसिक क्रिया मानी जाती है।

प्रश्न 6.
मानसिक क्रियाओं के घटित होने के लिए कौन उत्तदायी है?
उत्तर:
संसार में हमारी अंतःक्रियाएँ एवं अनुभव एक व्यवस्था के रूप में गतिमान होकर संगठित होते हैं जो विविध प्रकार की मानसिक प्रक्रियाओं के घटित होने के लिए उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 7.
व्यवहारवाद से संबंधित पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
जॉन. बी. वाटसन ने व्यवहारवाद पुस्तक लिखी जिससे व्यवहारवाद की नींव पड़ी।

प्रश्न 8.
किन-किन मनोवैज्ञानिकों को नोबल पुरस्कार मिला?
उत्तर:

  1. कोनराड लारेंज-1973
  2. हर्ट साइमन-1978
  3. डेविड ह्यूवल-1981
  4. रोजर स्पेरी-1981
  5. डेनियल कहनेमन-2002
  6. थॉमस शेलिंग-2005

प्रश्न 9.
गेस्टाल्ट मनोविज्ञान का उदय कब और कहाँ हुआ?
उत्तर:
सन् 1920 में जर्मनी में गेस्टाल्ट मनोविज्ञान का उदय हुआ।

प्रश्न 10.
सिगमंड फ्रायड ने किस वाद का विकास किया?
उत्तर:
सिगमंड फ्रायड ने मनोविश्लेषवाद का विकास सन् 1900 में किया।

प्रश्न 11.
NAOP से क्या बोध होता है?
उत्तर:
NAOP = नेशनल एकेडमी ऑफ साइकोलॉजी इसकी स्थापना सन् 1989 में भारत में हुई।

प्रश्न 12.
NBRC क्या है? इसकी स्थापना कब, क्यों और कहाँ की गई?
उत्तर:
NBRC = नेशनल ब्रेन रिसर्च सेन्टर । इसकी स्थापना गुड़गाँव, हरियाणा में सन् 1997 में कि गई जहाँ मनोरोग की जाँच एवं चिकित्सा की जाती है।

प्रश्न 13.
राँची में हास्पीटल फॉर मेंटल डिजीजिज की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
सन् 1962 में राँची में हॉस्पीटल फॉर मेंटल डिजीजिज की स्थापना की गई थी।

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प्रश्न 14.
मस्तिष्क विच्छेदन अनुसंधान के लिए किसे और कब नोबल पुरस्कार दिया गया था।
उत्तर:
सन् 1981 में रोजर स्पेरी को मस्तिष्क विच्छेदन अनुसंधान के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

प्रश्न 15.
क्या मन को मस्तिष्क के समान माना जा सकता है?
उत्तर:
मन मस्तिष्क के बिना नहीं रह सकता है, फिर भी मन एक पृथक सत्ता है।

प्रश्न 16.
मानसिक प्रतिमा से क्या समझते है?
उत्तर:
किसी व्यक्ति द्वारा अतार्किक भय को मिटाने हेतु निरन्तर अभ्यास करने के फलस्वरूप रोग प्रतिरोधक तंत्र को सशक्त करने में मन की भूमिका पर बल देती है।

प्रश्न 17.
मानव व्यवहार के लिए कोई मानक सिद्धांत होते हैं यानहीं?
उत्तर:
अच्छा कार्यफल पाने के लिए उत्साहित करना या दंड देना सर्वमान्य सिद्धांत नहीं है।

प्रश्न 18.
दो समान्य बोध धारणाएँ बतायें जो सदा सत्य नहीं होते?
उत्तर:

  1. पुरुष महिलाओं से अधिक बुद्धिमान होते हैं।
  2. पुरुषों की तुलना में महिलाएँ अधिक दुर्घटना करती हैं।

प्रश्न 19.
मनोवैज्ञानिकों को ज्योतिषयों, तांत्रिकों एवं हस्तरेखा विशारदों जैसा क्यों नही माना जाता है?
उत्तर:
क्योंकि मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों पर आधारित बातों का व्यवस्थित अध्ययन करके मानव व्यवहार एवं अन्य मनोवैज्ञानिक गोचरों के विषय में सिद्धांत विकसित करता है।

प्रश्न 20.
प्रकार्यवादी उपागम का विकास क्यों और किसने किया?
उत्तर:
एक अमेरीकी मनोवैज्ञानिक विलियम जैम्स ने मानव मन को अध्ययन के लिए प्रकार्यवादी उपागम का विकास किया।

प्रश्न 21.
व्यवहारवाद से आप क्या समझते है?
उत्तर:
संरचनावाद की प्रतिक्रियास्वरूप विकसित नई धारा को व्यवहारवाद कहा जाता है जो मानव स्वभाव को इंगित करता है।

प्रश्न 22.
भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कब प्रारंभ हुआ?
उत्तर:
भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कोलकत्ता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में सन् 1915 में प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 23.
भारत में प्रथम मनोविज्ञान विभाग का प्रारम्भ कब हुआ?
उत्तर:
कोलकत्ता विश्वविद्यालय ने सन् 1916 में प्रथम मनोविज्ञान तथा 1938 में अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान विभाग प्रारंभ किया गया।

प्रश्न 24.
डॉ. एन. एन. सेन गुप्ता की क्या देन थी?
उत्तर:
प्रोफेसर बोस ने ‘इंडियन साइकोएलिटिकल एसोसिएशन’ की स्थापना 1922 में की थी। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय एवं पटना विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के अध्ययन एवं अनुसंधान के प्रारम्भिक केन्द्र आरंभ किया।

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प्रश्न 25.
दुर्गानन्द सिन्हा की प्रसिद्धि का कारण बतायें।
उत्तर:
श्री सिन्हा ने भारत में सामाजिक विज्ञान के रूप में चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा है। सन् 1986 में इनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई थी। भारत में मनोविज्ञान का
अनुप्रयोग अनेक व्यवसायिक क्षेत्रों में किया जाने लगा।

प्रश्न 26.
मनोविज्ञान की पाँच प्रमुख शाखाओं के नाम बतायें।
उत्तर:

  1. संज्ञानात्मक मनोविज्ञान
  2. जैविक मनोविज्ञान
  3. विकासात्मक मनाविज्ञान
  4. सामाजिक मनोविज्ञान
  5. पर्यावरणीय मनोविज्ञान

प्रश्न 27.
मनोविज्ञान के अनुसंधान एवं अनुप्रयोग को दिशा प्रदान करने वाले पाँच कथ्य लिखें।
उत्तर:

  1. मानव व्यवहार व्यक्तियों एवं वातारण के लक्षणों का एक प्रकार्य है।
  2. मानव व्यवहार उत्पन्न किया जा सकता है।
  3. मानव व्यवहार की समझ संस्कृति निर्मित होती है।
  4. मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग द्वारा मानव व्यवहार को नियंत्रित एवं परिवर्तित किया जा सकता है।
  5. मनोविज्ञान व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाओं के सिद्धान्तों का विकास करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 28.
निम्नांकित नाम के साथ संबंधित प्रकाशन का नाम दें।
उत्तर:

  1. विलियम जेम्स
  2. जॉन वी. वाटसन
  3. सन. एम. सेनगुप्ता
  4. कार्ल रोजर्स
  5. वी. एफ. स्किनर
  6. अब्राहम मैस्लो

प्रश्न 29.
मानवतावादी परिदृश्य ने मानव स्वभाव को कैसा बताया?
उत्तर:
मानवतावादी परिदृश्य ने मानव स्वाभव को एक धनात्मक विचार बताया जिसके अनुसार व्यवहावाद, वातारण की दशाओं से निर्धारित व्यवहार पर बल देता है।

प्रश्न 30.
संज्ञानात्मक परिदृश्य को स्पष्ट करें।
उत्तर:
गेस्टाल्ट उपागम के विविध पक्ष तथा संरचनावाद के पक्ष संयुक्त होकर संज्ञानात्मक परिदृश्य का विकास करते हैं जो इस बात पर केन्द्रित होते हैं कि हम दुनिया को कैसे जानते हैं।

प्रश्न 31.
निर्मितावाद किसे कहते हैं?
उत्तर:
मन की सक्रिय रचना तथा मानव मन के विकास से संबंधित विचारधारा को निर्मितावाद कहते हैं।

प्रश्न 32.
मनोविज्ञान से जुड़ी पाँच विद्या शाखाओं का उल्लेख करें।
उत्तर:

  1. दर्शनशास्त्र
  2. अर्थशास्त्र
  3. आयुर्विज्ञान
  4. कम्प्यूटर विज्ञान तथा
  5. जन-संचार

प्रश्न 33.
उपबोधन मनोवैज्ञानिक क्या करते हैं?
उत्तर:
एक उपबोधन मनोवैज्ञानिक व्यावसायिक पुनर्वास कार्यक्रमों अथवा व्यावसायिक चयन में सहायता करते हैं। ये पब्लिक एजेन्सियों के लिए कार्य करते हैं जिसमें मानसिक स्वास्थ केन्द्र, चिकित्सालय, विद्यालय आदि जुड़े होते हैं।

प्रश्न 34.
मनोवैज्ञानिकों के महत्त्वपूर्ण कार्य क्या हैं?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक लोगों के गुणात्मक रूप से अच्छे जीवन के लिए हस्तक्षेपी कार्यक्रमों की अभिकल्पना एवं संचारलन में सक्रिय भूमिका का निर्वहन करते हैं।

प्रश्न 35.
मनोवैज्ञानिक किन क्षेत्रों में परामर्शदाता के रूप में कार्य करते हैं?
उत्तर:
विद्यालयों, चिकित्सालयों उद्योगों, कारागारों, व्यावसायिक संगठनों, सैन्य प्रतिष्ठानों तथा प्राइवेट प्रैक्टिस में परामर्शदाता के रूप में समस्या समाधान के लिए सरल युक्ति बताते हैं।

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प्रश्न 36.
वह कौन-सा कार्य है जिसे मनोरोग विज्ञानी कर सकते हैं, किन्तु नैदानिक। मनोरोग वैज्ञानिक नहीं कर सकते हैं?
उत्तर:
मनोरोग विज्ञानी दवाइयों का सुझाव दे सकता है तथा विधुत आघात उपचार प्रदान कर सकता है जबकि नैदानिक मनोवैज्ञानिक ऐसा नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न 37.
विद्यालय मनोविज्ञान का महत्व बतायें।
उत्तर:
बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक एवं सांवेगिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करके मनोविज्ञान के ज्ञान का स्कूल परिवेश में अनुप्रयोग करते हैं।

प्रश्न 38.
क्रीड़ा मनोविज्ञान का प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर:
क्रीड़ा मनोविज्ञान क्रीड़ा निष्पादन का अभिप्रेरण स्तर बढ़ाकर मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों द्वारा सुधार लाने का प्रयास करता है।

प्रश्न 39.
मनोविज्ञान की पाँच उद्भुत शाखाएँ कौन-कौन हैं?
उत्तर:

  1. वैमानिकी
  2. सैन्य
  3. महिल
  4. राजनैतिक तथा
  5. सामुदायिक मनोविज्ञान

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सिद्ध करें कि मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान के रूप में अपनाया जाने लगा है।
उत्तर:
मनोविज्ञान मनुष्यों को समाजिक प्राणी मानते हुए उसके व्यवहार का अध्ययन उसके सामाजिक-सांस्कृति संदर्भो में करना चाहता है। मनोविज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है जो व्यक्तियों एवं समुदायों पर उनके सामाजिक सांस्कृतिक एवं भौतिक वातारण के संदर्भ में ध्यान केन्द्रित करता है। जटिल सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशाओं में रहने वाले व्यक्तियों के स्वाभाव, अनुभव एवं मानसिक प्रक्रियाओं के कुछ असमानता, कुछ नियमितता एवं व्यवहार में अंतर पाना स्वाभाविक है।

मनोवैज्ञानिक भाँति-भाँति के लोगों में दया, सहयोग, घृणा, त्याग, दान जैसी प्रवृति, को देखता परखता है। मनोविज्ञान अपने प्रमुख लक्षण के रूप में जानना चहता है कि क्यों और कैसे समुदायों में लोग एक-दूसरे की कठिनाई के समय सहायता करते हैं तथा त्याग करते हैं। मनोविज्ञान समाज की सोच के विपरीत रुख पर भी ध्यान देता है जिसमें लोग समान परीस्थितियों में असामाजिक हो जाता है तथा विपदा में लुटने तथा शोषण करने में संलग्न हो जाते हैं। अर्थात् मनोविज्ञान मानव व्यवहार एवं अनुभव का अध्ययन उनके समाज तथा संस्कृति को ध्यान में रखते हुए पुरी करता है। समाज की संरचना, प्रथाएँ, लक्षणों, कुप्रथाओं, परम्परागत नियमों आदि का अध्ययन करके उन्नत समाज की कामना करता है।

प्रश्न 2.
प्रश्नावली सर्वेक्षण का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
प्रश्नावली सूचना प्राप्त करने की सबसे प्रचलित अल्प-लागत वाली विधि है इसमें पूर्व-निर्धारित प्रश्नों का समुच्चय होता है। प्रतिक्रिया दात तो प्रश्न को पढ़ता है और कागज पर उत्तर देता है इसमें दो प्रकार के प्रश्न होते है।

  1. मुक्त-मुक्त प्रश्न में प्रतिक्रिया द्वारा कुछ भी उत्तर दे सकता है जो वह ठीक समझता है।
  2. अमुक्त-इसके प्रश्न तथा उसके उत्तर दिये रहते हैं तथा प्रतिक्रियादाता को सही उत्तर चुनना पड़ता है।
  3. प्रश्नावली का उपयोग पृष्ठभूमी संबंधी एवं जनांकिकीय सूचना, अभिवृति एवं मत व्यक्ति की प्रत्याशाओं एवं आकांक्षाओं की जानकारी
  4. के लिए किया जाता है कभी-कभी सर्वेक्षण डाक द्वारा प्रश्नावाली भेजकर भी किया जाता है।

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प्रश्न 3.
मन एवं व्यवहार की समझ की व्याख्या करें।
उत्तर:
मन एवं व्यवहार की समझ लिए तंत्रिका वैज्ञानिक तथा भौतिकविदों की खोज, प्रयोग एवं उदाहरण, खोज एवं निष्कर्ष का समुचित अध्ययन आवश्यक है। भावपरक तंत्रिका विज्ञान के अनुसार मन एवं व्यवहार में सम्बंध है। यह भी सत्य कि मन मस्तिष्क के बिना नहीं रह सकता, फिर भी मन एक पृथक सत्ता है। धनात्मक चाक्षुषीय तकनीकों तथा धनात्मक संवेगों की अनुभूतियों द्वारा शारीरिक प्रक्रियाओं में सार्थक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसा पाया गया है किसी दुर्घटना में एक व्यक्ति मस्तिष्क के किसी भाग की क्षतिग्रस्तता का शिकार हुआ था, परन्तु उसका मन बिल्कुल सही था। बाँह खो देने वाला व्यक्ति सामने रखी वस्तु को उठा लेने के प्रयास में बाँह को हिलाने लगता है।

उसके व्यवहार में कोई मौलिक अन्तर नहीं देखा जाता हैं। मस्तिष्क अघात में प्रभावित व्यक्ति अभिभावकों को बिना पहचाने पाखंडी तक कह डालता है। आर्निश नामक मनोवैज्ञानिक ने मानसिक प्रतिमा उदय के माध्यम से रोगियों को गलत सूचना देकर उसे आराम पहुँचाने में सफल हुआ। मनोविज्ञान अब मन और व्यवहार की सही समझ पाकर रोग प्रतिरोधक तंत्र को सशक्त बनाने में सफल हो रहे हैं । अर्थात् मन और व्यवहार को मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा बदला जा सकता है। परिस्थितियों में अंतर लाकर मनुष्य के मन को बिगाड़ना या संभालना संभव है जिसके कारण उसके व्यवहार में भी अन्तर आ जाता है।

प्रश्न 4.
मनोविज्ञान विद्या शाखा की प्रसिद्ध धारणाएँ क्या हैं?
उत्तर:
मनोविज्ञान को ज्योतिषियों, तांत्रिकों एवं हस्तरेखा विशारदों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि मनोवैज्ञानिक प्रदत्तों पर आधारित सूचनाओं का व्यवस्थित अध्ययन करने के बाद ही मानव व्यवहार एवं अन्य मनोवैज्ञानिक गोचरों के विषय में सिद्धांत विकसित करता है। मनोवैज्ञानिक का मानना है कि मानव व्यवहार की समान्य बोध आधारित व्याख्याएँ अंधकार में तीर चलाने जैसी होती है। उदाहरणार्थ, निम्नांकित समझ सही और गलत दोनों हो सकती हैं

  • उत्साहित करने पर कार्यकर्ता अधिक काम करता है।
  • छड़ी प्रयोग द्वारा आलसी को सक्रिय बनाया जा सकता है।
  • घनिष्ठ मित्र के दूर चले जाने पर मित्र पछताता है।

मनोवैज्ञानिक ड्वेक की खोज के अनुसार मनोविज्ञान द्वारा उत्पादित वैज्ञानिक ज्ञान सामान्य , बोध के प्रायः विरुद्ध होता है। उन्होंने असफल छात्रों को समझाने का प्रयास किया था –

  • पलायन के बदले प्रयास की कमी मानी जाती है।
  • असफलता का कारण प्रयास में कमी मानी जाती है।
  • अच्छा अभ्यास करते रहने से अच्छा निष्पादन बढ़ाया जा सकता है।

इस प्रकार मनोविज्ञान विद्या शाखा की प्रसिद्ध धारणाएँ निम्न रूप में संकलित किया जा सकता है –

  • मानव व्यवहार से संबंधित व्यक्तिपरक सिद्धान्त होते हैं।
  • मनोविज्ञान एक विज्ञान के रूप में व्यवहार के स्वरूप को देखता है जिसका पूर्व कथन किया जा सके न कि घटित होने के पश्चात की गई व्याख्या का ।
  • मानव व्यवहार की समान्य बोध पर अधारित व्याख्याएँ अंधकार में तीर चलाने जैसी हैं जिसकी व्याख्या करना सहज नहीं होता है।
  • मनोविज्ञान द्वारा उत्पादित वैज्ञानिक ज्ञान सामान्य बोध के प्रायः विरुद्ध होता है।
  • सत्य प्रतीत होने वाली सामान्य बोध धारणाएँ गलत भी हो सकती हैं।
  • मनोवैज्ञानिक सत्य सूचनाओं के आधार पर कोई निर्णय लेता है।

प्रश्न 5.
गेस्टाल्ट मनोविज्ञान क्या है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक वुण्ट के संरचनावाद के विरुद्ध अपनायी जाने वाली नयी धारा गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के रूप में प्रचलित हुआ । इसके अनुसार जब हम दुनिया को देखते हैं तो हमारा प्रत्यक्षित अनुभव प्रत्यक्षण के अवयवों के समस्त भोग से अधिक होता है। अनुभव समग्रतावादी होता है। गेस्टाल्ट मनोविज्ञान का प्रमुख आधार मन के अवयवों की अवहेलना करते हुए प्रत्याक्षित अनुभवों के संगठन पर अधिक ध्यान देना है। उदाहरणार्थ, बल्बों की रोशनी को देखकर प्रकाश की गति का अनुभव होना अथवा चलचित्र देखने के क्रम में स्थिर चित्र को गतिमान मान लेते हैं।

प्रश्न 6.
समसामयिक मनोविज्ञान का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
समसामयिक मनोविज्ञान बहुआयामी छवि के साथ लोकप्रिय हो चुका है। इसमें तरह-तरह के विचारों एवं सिद्धांतों के संग्रह एवं अनुप्रयोग की रुचि पाई जाती है। इसको कई उपागमों अथवा बहुविध विचारों द्वारा पहचाना जाता है। यह विभिन्न स्तरों पर व्यवहार की व्याख्या करके लोगो को अपनी कमी महसूस करने की प्रवृति जगाता है। इससे जुड़े मानवतावादी उपागम में यह क्षमता होती है कि मानव अपने कार्यों की पद्धति और परिणाम को सरलताप से समझ लेता है। प्रत्येक उपागम मानव प्रकार्य की जटिलताओं में अन्तदृष्टि प्रदान करता है। मनोवैज्ञानिक प्रकार्यों के लिए संज्ञानात्मक उपागम चिंतन प्रक्रियाओं को केन्द्रीय महत्व को मानता है।

प्रश्न 7.
अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
सभी मनोविज्ञान अनुप्रयोग का विभव रखते हैं तथा स्वभाव से अनुप्रयुक्त होते हैं। अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान हमें वह संदर्भ देता है जिनमें अनुसंधान से प्राप्त सिद्धान्तों एवं नियमों को सार्थक ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है। बहुत-से क्षेत्र जो पिछले दशकों में अनुसंधान केन्द्रित माने जाते थे, वे भी धीरे-धीरे अनुप्रयुक्त केन्द्रित होने लगे हैं। अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान को मूल मनोविज्ञान भी माना जा सकता है। अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान के महत्वपूर्ण घटक निम्नांकित हैं।

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प्रश्न 8.
सामुदायिक मनोविज्ञान की उपयोगिता बनायें।
उत्तर:
सामुदायिक मनोविज्ञान की उपयोगिता समाज में उत्पन्न विभिन्न समस्याओं को सुलझाना है। मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना इसका प्रधान लक्ष्य है। मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित चिकित्सालयों, संस्थानों, सरकारी नीतियों का अध्ययन कर उचित परामर्श एवं सहायता प्रदान करना इनका प्रमुख कार्य है। ये औषधि, पुनर्वास, मनोचिकित्सा आदि से संबंधित कार्यकारी योजना बनाकर समाज हित के कार्य करते है। वयोवृद्धों अथवा विकलांगो की सहायता के लिए भवन, साधन से जुड़े कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान करना इनकी प्रधान रुचि होती है। समुदाय आधारित समस्या अथवा प्रथाओं का अध्ययन करते हुए पुनर्वास जैसे लाभकारी कार्य करके समाज को लाभ पहुंचाते हैं।

प्रश्न 9.
समाज मनोविज्ञान की परिभाषा दें।
उत्तर:
समाज मनोविज्ञान-मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत व्यक्ति के व्यवहार तथा अनुभूति का अध्ययन सामाजिक परिस्थिति में किया जाता है। समाज मनोविज्ञान को एक ओर शुद्ध मनोविज्ञान (Pure Psychology) तथा दूसरी ओर व्यवहारिक मनोविज्ञान माना जाता है। शुद्ध मनोविज्ञान में प्रयोगात्मक अध्ययन किये जाते हैं और प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर सिद्धांत नियम बनाये जाते हैं । व्यवहारिक मनोविज्ञान में शुद्ध मनोविज्ञान के नियमों का उपयोग भिन्न-भिन्न व्यवहारिक समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। समाज मनोविज्ञान इन दोनों प्रकार के कार्यों को करता है। मनुष्य समाज में रहता है और कई रूपों में व्यवहार करता है।

एक ही मनुष्य कहीं आर्थिक मनुष्य के रूप में कहीं सामाजिक मनुष्य के रूपों में तो कहीं राजनैतिक मनुष्य के रूप में देखा जाता है। समाज मनोविज्ञान का संबंध सामाजिक मनुष्य से है। समाज में मनुष्य किस प्रकार दूसरे मनुष्य से प्रभावित होता है और अपने विचार से दूसरे के व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करता है, इसका अध्ययन समाज मनोविज्ञान करता है। एक शुद्ध मनोविज्ञान के रूप में समाज-मनोविज्ञान व्यक्ति के समाजिक परिस्थिति में होनेवाले व्यवहारों का अध्ययन करता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के सिद्धान्तों तथा नियमों का निमार्ण करता है।

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान की परिभाषा से जुड़े तीन प्रमुख पदों-(क) मानसिक प्रक्रियाएँ (ख) अनुभव और (ग) व्यवहार को स्पष्टतः समझाइये।
उत्तर:
(क) मानसिक प्रक्रियाएँ:
प्रक्रियाएँ सोच एवं चेतना के निकट का पद है। किसी समस्या का समाधान करने के क्रम में हम मानसिक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। मानसिक प्रक्रियाओं को मस्तिष्क की क्रियाओं से थोड़ा भिन्न माना गया है। ये दोनों एक-दूसरे पर आश्रित होते हैं। मस्तिष्क की क्रियाओं के स्तर पर मानसिक प्रक्रियाएँ परिलक्षित होती हैं। संसार में हमारी अंतः क्रियाएँ एवं अनुभव एक व्यवस्था के रूप में गतिमान होकर संगठित होते हुए तथा मिलकर मानसिक प्रक्रियाओं को सक्रिय बनाता है। हमारे अनुभव एवं मानसिक प्रक्रियाओं की चेतना कोशिकीय अथवा मस्तिष्क की क्रियाओं से बहुत अधिक होती है। मन और मस्तिष्क की क्रियाएँ दोनो मानसिक प्रक्रियाओं के निकट का पद है।

हमारा मन कैसे कार्य करता है? हम मानसिक क्षमताओं के अनुप्रयोग में कैसे सुधार ला सकते हैं? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर पाने के क्रम में मानसिक प्रक्रियाओं के उपयोग की आवश्यकता होती है जिसके लिए मनोविज्ञानिक स्मरण करने, सीखने, जानने प्रत्यक्षण करने एवं अनेक अनुभूतियों में हम रुचि लेने लगते हैं। मानसिक प्रक्रिया हमारे अनुभव संबंधित आंतरिक प्रक्रिया होती है। जब हम किसी बात को जानने या उसका स्मरण करने के लिए चिंतन करते हैं तो समस्या के समाधान हेतु हम मानसिक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं।

(ख) अनुभव:
पर्यावरण के प्रभाव में पड़कर काई व्यक्ति कैसा महसूस करता है यह उसका अनुभव माना जाता है। अनुभव स्वाभव से आत्मपरक होते हैं जो हमारी चेतना में रचा-बसा रहता है। अनुभव के स्वरूप को आंतरिक एवं बाह्य दशाओं के जटिल परिदृश्य का विश्लेषण करके समझा जा सकता है। अनुभव, अनुभवकर्ता के लिए आंतरिक होता है। अपने मित्र से मिलने की खुशी में कोई व्यक्ति वाहन के भीड़ से उत्पन्न गर्मी या कठिनाई को खुशी-खुशी झेल लेता है। नशीले पदार्थ से होने वाली समस्या क्षति का ज्ञान रखनेवाला व्यक्ति भी नशा करके खुश दिखाई देता है।

जब कोई योगी ध्यानावस्थित होता है तो वह चेतना के एक भिन्न धरातल पर पहुँचता है। भूख और कष्ट सहन के बाद भी उसे परमात्मा से कुछ पाने की खुशी मिलती है। रोमांस करते समय भी धनात्मक अनुभूतियों की प्रभाव अलग-अलग व्यक्ति को तरह-तरह के

अनुभव का आभास दिलाता है। घटा छा जाने पर कोई मस्काता है तो कोई नाचता है। सर्कस के झूला पर लटकने वाले व्यक्ति को संशय की दशा में रहने पर भी दर्शक मचलता है। अर्थात् असुविधा, सुविधा, खुशी-गम, हँसना-रोना सब अनुभवकर्ता की भवना, दशा स्थिति और स्वार्थ पर निर्भर करता है, जो उसका अनुभव माना जाता है। चोर की भरपूर पिटाई होते समय उसे कैसा महसूस होता है, यह चोर का अपना अनुभव माना जाता है । व्यक्तिपरकता मानव अनुभव का महत्त्वपूर्ण अंग है।

(ग) व्यवहार:
अनुक्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं के बीच पड़ा व्यक्ति कैसा आचरण करता है, यह उसका व्यवहार माना जाता है। काँटा चुभने पर पैर झटक लेने अथवा मुँह से आह की ध्वनि निकालना, उसका व्यवहार माना जा सकता है। परीक्षा में हृदय का धड़कना, अपनी ओर पत्थर का टुकड़ा आता देखकर पलकें बन्द कर लेना, धूप में बाहर निकलने पर माता-पिता के रोके जाने पर बच्चों का चेहरा तमतमा उठना आदि अलग-अलग व्यवहार के लक्षण प्रतित होते हैं । व्यवहार प्रकट या अप्रकट, सामान्य या जटिल, लघुकालीन या दीर्घकालीन कुछ भी हो सकता है। भय, क्रोध, मचलना, इठलाना, पछाताना, रोना, हँसना आदि व्यवहार के प्रत्यक्ष दर्शन माने जाते हैं।

व्यवहार के उद्दीपक (S) एवं अनुक्रिया (B) के मध्य साहचर्य के रूप में अध्ययन किया जो सकता है। उद्दीपक एक अनुक्रिया दोनों आंतरिक अथवा बाहम कुछ भी हो सकते हैं । मित्र के द्वारा पुस्तक लेकर नहीं लौटने पर आप मित्र के लिए कैसा व्यवहार प्रकट करते हैं। यह आपकी दशा पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 11.
प्रेक्षण से क्या तात्पर्य है इसके गुण-दोषों को संक्षेप मे वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेक्षण का साधारण अर्थ है किसी व्यवहार या घटना को देखना किसी घटना को देखकर क्रमबद्ध रुप से उसका वर्णन कहलाता है।

गुण:

  1. यह विधि वस्तुनिष्ठ तथा अवैयक्तिक होता है।
  2. इसका प्रयोग बच्चे, बूढ़े, पशु, पक्षी सभी पर किया जा सकता है।
  3. इस विधि द्वारा संख्यात्मक परिणाम प्राप्त होता है।
  4. इसमें एक साथ कई व्यक्तियों का अध्ययन संभव है।
  5. इस विधि में पुनरावृति की विशेषता है।

दोष:

  1. इस विधि में श्रम एवं समय का व्यय होता है।
  2. प्रेक्षक के पूर्वाग्रह के कारण, गलती का डर रहता है।
  3. प्रयोगशाला की नित्रित परिस्थिति नहीं होने के कारण निष्कर्ष प्रभावित होता है।

प्रश्न 12.
मनोविज्ञान, एक बहुत पुरानी ज्ञान विद्या शाखा है फिर भी यह एक आधुनिक विज्ञान माना जाता है। क्यों?
उत्तर:
मनोविज्ञान व्यवहार, अनुभव एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने में सक्षम है। आत्म-परिवर्तन एवं आत्मज्ञान की भूमिका को मानव व्यवहार एवं अनुभव की व्याख्या करने वाला कारक माना जाता है। मनोविज्ञान, मानवीय दशाओं का अध्ययन करता है। मानवीय प्रक्रियाओं को वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ बनाकर उनका विश्लेषण करना मनोविज्ञान का प्रधान लक्षण है।

मनोविज्ञान को आधुनिक विज्ञान मानने का प्रथम कारण सन् 1879 में जर्मनी में प्रथम प्रयोगशाला की स्थापना हुई जहाँ मानवीय व्यवहार से संबंधित तरह-तरह के प्रयोग किये जाते हैं। अब मनोविज्ञान के छात्रों को स्नातक विज्ञान की उपाधियाँ मिलने लगी है।

मस्तिष्क प्रतिभा तकनीक (S.M.R.I. तथा E.C.G.) से मस्तिष्क की क्रियाओं का अध्ययन करना, सूचना तकनीक के क्षेत्र में, मानव कम्प्यूटर अत:क्रिया तथा कृत्रिम बुद्धि का विकास संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं में मनोवैज्ञानिक ज्ञान के बिना संभव नहीं हो सकता है। इसी कारण अनेक मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक तथ्यों के अध्ययन में भौतिक एवं जैविक विज्ञान की विधियों का उपयोग किये जाने लगा है।

अब तो सांस्कृतिक विज्ञान को भी मनोविज्ञान के साथ रखा जाने लगा है। अनुसंधानकर्ता का लक्ष्य कारण-प्रभाव संबंध को समझकर व्यवहारपरक गोचरों की व्याख्या अत:क्रिया के रूप में करने की होती है। अंत:क्रिया व्यक्ति एवं उसके सामाजिक-सांस्कृति संदर्भो में घटित होती रहती है। अर्थात् मनोविज्ञान की दो समांतर धाराएँ मान्य हैं –

  1. एक विद्या शाखा के रूप में जो सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करता है तथा
  2. एक आधुनिक विज्ञान के रूप में जो सांस्कृतिक विज्ञान तथा मस्तिष्क प्रतिभा के तकनीक पर आधारित होती है।

प्रश्न 13.
मनोविज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान मानने का कारण स्पष्ट करें।
उत्तर:
आधुनिक मनोविज्ञान का विकास वैज्ञानिक विधियों के अनुप्रयोग से हुआ है। देकार्त (Descartes) से प्रभावित तथा बाद में भौतिकी में हुए विकास से मनोविज्ञान में परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक प्रतिरूप का अनुसरण होने लगा। मनोवैज्ञानिकों ने अब अधिगम, स्मृति, अवधान, प्रत्यक्षण, अभिप्रेरण एवं संवेग आदि के सिद्धांतों को विज्ञान की तरह विकसित किया है। किसी गोचर की व्याखा हेतु सिद्धांत उपलब्ध होने पर वैज्ञानिक उन्नति हो सकती है।

वैज्ञानिक निगमन की परिकल्पना, परिकल्पना का परीक्षण, परिणामों अथवा निष्कर्षों की पहचान आदि वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग अब मनोविज्ञान में भी होने लगा है। विकासात्मक उपागम, जो जैव विज्ञान का एक प्रमुख अंग है, का उपयोग लगाव तथा आक्रोश जैसे विविध मनोविज्ञानिक गोचरों की व्याख्या करने में उपयोगी माना जाने लगा है। लक्ष्य और क्रमिक विधियों के कारण मनोविज्ञान को अब प्राकृतिक विज्ञान माना जाने लगा है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
दैनिक जीवन में मनोविज्ञान की उपयोगिता स्पष्ट करें।
उत्तर:
दैनिक जीवन में मनोविज्ञान की उपयोगिता-मनोविज्ञान ऐसा विषय है जो हमारे दैनिक जीवन की अनेक समस्या का समाधान करता है ये समस्याएँ व्यक्तिगत या पारिवारिक और बड़े समूह या राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय विमा वाली होती है शिक्षा, स्वास्थ, पर्यावरण आदि समस्या का समाधान राजनैतिक, आर्थिक पर हस्तक्षेप में परिवर्तन लाकर किए जाते हैं इनमें अधिकांश समस्या मनोविज्ञान होती है जिसका उदय हमारे अस्वस्थ चिंतन लोगों के प्रति अवांछित मनोवृति तथा व्यवहार की आवांछित शैली के कारण होता है।

बहुत से मनोविज्ञानिक लोगों के गुणात्मक रूप से अच्छे जीवन के लिए हस्तक्षेपी कार्यक्रम के संचालन में सक्रिय भूमिका का निर्वाहन करते हैं ये विविध परिस्थिति जैसे- विद्यालय, उद्योगों, सैन्य प्रतिष्ठान में परामर्शदाता के रूप में लोगों की समस्या का सामाधान करते हैं। मनोविज्ञान जनसंख्या, गरीबी, पर्यावरणीय गिरावट से संबंधित समस्या का भी समाधान करता है। मनोविज्ञान का ज्ञान हमारे व्यक्तिगत रूप से प्रतिदिन की समस्या का समाधान करता है हमें अपने विषय में सकारात्मक तथा संतुलित समझ रखनी चाहिए। मनोविज्ञान सिद्धांतों का उपयोग कर हम अपने अधिगम एवं स्मृति में सुधार कर अध्ययन की अच्छी आदत विकसित कर सकते हैं, इस प्रकार मनोविज्ञान का ज्ञान, हमारे दिन प्रतिदिन के जीवन मे बहुत उपयोगी है तथा व्यक्तिगत एवं सामाजिक दृष्टि से भी लाभप्रद है।

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान की आधुनिक परिभाषा दें। तथा उसकी व्याख्या करें।
उत्तर:
मनोविज्ञान की आधुनिक परिभाषा-मनोविज्ञान की परिभाषा समयानुसार बदलती रही है। दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना परंतु सार्थक परिणाम की प्राप्ति हो पाने से मनोविज्ञान की विषय वस्तु मन को रखा गया अर्थात् मनोविज्ञान को मन का विज्ञान माना गया। 1879 ई० में उण्ट ने मनोविज्ञान की परिभाषा इस प्रकार दी “मनोविज्ञान चेतन अनुभूति का विज्ञान है।” लेकिन 1912 में वाटसन ने उण्ट द्वारा दी गयी परिभाषा को अस्वीकारा। उन्होंने चेतन अनुभूति के स्थान पर प्राणी व्यवहार को विषय वस्तु माना।

वाटसन के अनुसार मनोविज्ञान की परिभाषा लोकप्रिय हुई। कुछ समय पश्चात् बैरोन ने मनोविज्ञान की परिभाषा इस प्रकार दी है-‘मनोविज्ञान व्यवहार तथा संज्ञात्मक प्रक्रियाओं का विज्ञान है।’ यह परिभाषा सर्वाधिक संतोषजनक एवं आधुनिक साबित हुई। – इसकी व्याख्या-बैरोन द्वारा दी गयी परिभाषा के विश्लेषण से कुछ प्रमुख तथ्य स्पष्ट हुई जो इस प्रकार है

  1. मनोविज्ञान एक विज्ञान है। जैसे-समर्थक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान तथा व्यवहार परक विज्ञान।
  2. मनोविज्ञान प्राणी के व्यवहार का अध्ययन करता है। यह सूक्ष्म एवं वृद्ध प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन करता है।
  3. मनोविज्ञान प्राणी के संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने वाला विज्ञान है अर्थात् सीखना, प्रत्यक्षीकरण अवधान, स्मरण, वृद्धि,चिंतन व्यक्तित्व आदि का अध्ययन करता है।
  4. मनोविज्ञान विषयगत विधि द्वारा प्राणि के संज्ञानात्मक व्यवहार एवं विदित प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है।
  5. मनोविज्ञान में प्राणी के व्यवहारों का अध्ययन अन्तनिरिक्षण विधि, प्रेक्षण विधि, प्रयोगात्मक आदि द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 3.
‘भारत में मनोविज्ञान का विकास’ से संबंधित एक संक्षिप्त निबंध लिखे। अथवा, भारत में मनोविज्ञान का स्तर क्या था और क्या है?
उत्तर:
मनोविज्ञान की जड़े दर्शनशास्त्र में होती हैं। भारतीय दार्शनिक परम्मरा के अनुसार मानसिक प्रक्रियाओं तथा मानव चेतन स्व, मन-शरीर के अनेक पहलू का अध्ययन सुलभ है। अनेक मानसिक प्रकार्य (संज्ञान, प्रत्यक्षण, भ्रम, अवधान, तर्कक आदि) भारतीय दर्शन के सिद्धांत से पूर्णतः आच्छादित हैं। दुर्भाग्य से भारतीय दर्शनिक परम्परा का सीधा प्रभाव आधुनिक मनोविज्ञान के विकास को उपलब्ध नहीं हो सका । भारतीय मनोविज्ञान का विकास पर पाश्चात्य मनोविज्ञान का प्रभुत्व माना गया । कई प्रयास किये जा रहे हैं जससे भारतीय मनोविज्ञान को स्वतंत्र अस्तित्व बताने का अवसर मिले।

भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कोलकत्ता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में 1915 में हुआ । यहाँ प्रयोगिक मनोविज्ञान के लिए प्रयोगशाला स्थापित किए गए, नया पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया। सन् 1916 मे प्रथम मनोविज्ञान विभाग तथा 1938 में अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान विभाग प्रारम्भ किया गया। डॉ. एन. एन. सेनगुप्ता अपने ज्ञान और प्रशिक्षण के कारण मनोविज्ञान के विकास में योगदान दिया। सन् 1922 में प्रोफेसर बोस ने ‘इंडियन साइकोएनेलिटिकल एसोसिएशन’ की स्थापना की। मैसूर और पटना में अनुसंधान केन्द्र प्रारम्भ किया। करीब 70 विश्वविद्यालय (उत्कल, भुवनेश्वर, इलाहाबाद, आदि) में मनोविज्ञान के पाठ्यक्रम चलाए गए।

प्रारम्भ में मनोविज्ञान भारत में एक सशक्त विद्या शाखा के रूप में विकसित हुआ। मनोविज्ञान अध्यापन, अनुसंधान तथा अनुप्रयोग के अनेक केन्द्र स्थापित किए गए। महान मनोविज्ञानिक दुर्गानन्द सिन्हा की पुस्तक ‘साइकोलॉजी इन ए वर्थ वर्ल्ड कम्पनी : दि इंडियन एक्सपीरियन्स’ सन् 1986 में प्रकाशित हुई । इस पुस्तक मे श्री सिन्हा ने भारत में सामाजिक विज्ञान के रूप में चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा है।

उनकी पुस्तक के अनुसार स्वंतत्रता प्राप्ति तक भारतीय मनोविज्ञान पूर्णतः पाश्चात्य देशों पर आश्रित रहा । सन् 1960 के बाद भारतीय मनोवैज्ञानिक स्वतंत्र अस्तित्व बनाने का प्रयास करने लगे। 1970 के अंतिम समय में देशज मनोविज्ञान का उदय हुआ। 1970 से अब तक मनोविज्ञान का विकास तेजी से हो रहा है। प्राचीन ग्रन्थों से मिली सूचनाओं के अधार पर मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की रचना की जाने लगी। आज भारतीय मनोविज्ञान को सम्पूर्ण विश्व में एक अलग अस्तित्व के रूप में जाना जाने लगा। कठिन प्रयास से सार्थक परिणाम मिलने लगा। अब भारतीय मनोविज्ञान का अनुप्रयोग व्यवसाय, शिक्षा, बाल विकास, पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में होने लगा है। सूचना प्रौद्योगिकी भारतीय मनोविज्ञान की सहायता लेने लगा है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 1 मनोविज्ञान क्या है?

प्रश्न 4.
दुर्गानन्द सिन्हा ने किन चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा है?
उत्तर:
पहला चरण – स्वतंत्रता प्राप्ति तक प्रयोगात्मक, मनोविश्लेषात्मक एवं मनोविज्ञानिक परीक्षण अनुसंधान पर आधारित तथ्यों के कारण पाश्चात्य देशों का मनोविज्ञान में विकास का लक्षण देखा गया।

दूसरा चरण – सन् 1960 तक भारतीय मनोविज्ञान में कई प्रमुख शाखाओं का उदय हुआ जिसमें पाश्चात्य मनोविज्ञान को भारतीय मनोविज्ञान के साथ जोड़कर परिणामी सिद्धांत निकाले गये।

तीसरा चरण – 1960 के बाद भारतीय समाज के लिए समस्या केन्द्रित अनुसंधानों द्वारा मानव हित के कार्य किया गया। इस समय भारतीय मनोवैज्ञानिक अपने सामाजिक संदर्भ में पाश्चात्य मनोविज्ञान पर अतिशय निर्भता का अनुभव किया जसे वे नहीं चाहते थे।

चौथा चरण – सन् 1970 के अंतिम समय में देशज मनोविज्ञान का उदय हुआ। सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से सार्थक ढाँचे को आधार मानकर मनोवैज्ञानिक समझ को बढ़ावा दिया जाने लगा। फलतः पारम्परिक भारतीय मनोविज्ञान पर आधारित उपागर्मों का विकास हुआ जो हमने प्राचीन ग्रन्थों एवं धर्मग्रन्थों से लिए थे।

आज नए अनुसंधान अध्ययन, जिसमें तंत्रिका-जैविक तथा स्वास्थ्य विज्ञान के अन्तरापृष्ठीय स्वरूप समाविष्ट हैं, किए जा रहे हैं।

प्रश्न 5.
कार्यरत मनोवैज्ञानिक से क्या अभिप्राय है? इनके पाँच प्रमुख क्षेत्रों की चर्चा करें।
उत्तर:
कार्यरत मनोविज्ञानिक से वैसे मनोवैज्ञानिकों का बोध होता है जो मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों की सहायता से लोगों को जीन से जुड़ी समस्याओं का दक्षतापूर्वक सामना करने के योग्य बनाने के लिए संवाद संचरण तथा आवश्यक प्रशिक्षण देने का काम करते हैं। कार्यरत मनोवैज्ञानिक के पाँच प्रमुख क्षेत्र हैं –

  1. नैदानिक
  2. उपबोधन
  3. सामुदायिक
  4. विद्यालय तथा
  5. संगठनात्मक

1. नैदानिक मनोवैज्ञानिक – इस श्रेणी के मनोवैज्ञानिक मानसिक व्यतिक्रमों तथा दुश्चिता, भय या कार्यस्थल के दबावों के लिए चिकित्सा प्रदान करने है । इसका काम रोगियों का साक्षात्कार और परीक्षण करके लाभकारी उपचार की व्यवस्था करना होता है। ये उपचार के साथ-साथ पुनर्वास एवं नौकरी पाने में भी सहायता करते हैं।

2. उपबोधन मनोवैज्ञानिक – इस श्रेणी के मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरणात्मक एवं संवेगात्मक समस्याओं को उलझाने में अपना योगदान देते हैं। इसका प्रमुख कार्य क्षेत्र व्यावसायिक पुनर्वास कार्यक्रमों का सफल संचालन होता है। ये मानसिक स्वास्थ्य केन्द्र, चिकित्सालय, विद्यालय आदि के लिए विकासात्मक कार्य करते हैं।

3. सामुदायिक मनोवैज्ञानिक – इस श्रेणी के मनोवैज्ञानिक समुदायिक मानसिक स्वास्थ पर अधिक ध्यान देते हैं। औषधि पुनर्वास कार्यक्रम का संचालन, अशक्त (वृद्धा अथवा विकलांग) लोगों के लिए सार्थक कार्य करते हैं।

4. विद्यालय मनोवैज्ञानिक  -इस श्रेणी के मनोवैज्ञानिक शैक्षिक व्यवस्था में कार्य करते हैं। परीक्षण और प्रशिक्षण के द्वारा ये छात्रों की समस्या को सुलझाते हैं। विद्यालय के लिए नीति निर्धारण, अभिभावक, अध्यापक तथा प्रशंसकों के बीच संवाद-संचरण द्वारा शैक्षिक प्रगति की योजना बनाते हैं।

5. संगठनात्मक मनोवैज्ञानिक – इस श्रेणी के मनोवैज्ञानिक किसी भी संगठन में अधिकारियों एवं कर्मचारियों के हित में सहायता प्रदान करते हैं। उचित परामर्श एवं सेवा के माध्यम से ये संबंधीत लोगों की दक्षता, कौशल, प्रबंधन आदि को उपयोगी स्तर तक बढ़ाने में सक्रिय भूमिका अदा करते हैं । मानव संसाधन विकास तथा संगठनात्मक विकास एवं परिवर्तन प्रबंधन कार्यक्रमों में विशिष्टता के साथ जुड़े होते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बिहार में सर्वप्रथम मनोविज्ञान का विभाग कहाँ खोला गया था?
(a) नालंदा
(b) दरभंगा
(c) पटना
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(a) नालंदा

प्रश्न 2.
मनोविज्ञान का सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला कब खोला गया था?
(a) 1879 ई० में
(b) 1885 ई० में
(c) 1890 ई० में
(d) 1900 ई० में
उत्तर:
(a) 1879 ई० में

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प्रश्न 3.
मनोविश्लेषणवाद का उदय कब हुआ?
(a) 1879 ई० में
(b) 1890 ई० में
(c) 1900 ई० में
(d) 1905 ई० में
उत्तर:
(c) 1900 ई० में

प्रश्न 4.
व्यवहारवादी सम्प्रदाय का प्रतिपादन किसने किया?
(a) वरदाईमर
(b) वुण्ट
(c) विलियम जेम्स
(d) वाटसन
उत्तर:
(b) वुण्ट

प्रश्न 5.
गेस्टाल्टवाद की स्थापना किसने की थी?
(a) मेक्सवदाईमर
(b) वुण्ट
(c) फ्रायड
(d) कोहलर
उत्तर:
(a) मेक्सवदाईमर

प्रश्न 6.
भारत में मनोविज्ञान का प्रथम विभाग कब आरंभ किया गया?
(a) 1879 ई० में
(b) 1885 ई० में
(c) 1900 ई० में
(d) 1924 ई० में
उत्तर:
(c) 1900 ई० में

प्रश्न 7.
मनोविज्ञान किस विषय से निःसृत है?
(a) इतिहास
(b) भूगोल
(c) समाजशास्त्र
(d) दर्शनशास्त्र
उत्तर:
(c) समाजशास्त्र

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प्रश्न 8.
भारत में मनोविज्ञान का आधुनिक काल का प्रारंभ कब से माना जाता है?
(a) 1879 ई० में
(b)1885 ई० में
(c) 1900 ई० में
(d) 1915 ई० में
उत्तर:
(d) 1915 ई० में

प्रश्न 9.
आधुनिक मनोविज्ञान के पिता हैं ……………………
(a) फ्रायड
(b) विल्हम वुण्ट
(c) विलियम जेम्स
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(b) विल्हम वुण्ट

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

Bihar Board Class 11 Sociology भारतीय समाजशास्त्री Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

प्रश्न 1.
गोत्र बहिर्विवाह से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
गोत्र का ब्राह्मणों तथा बाद में गैर-ब्राह्मणों द्वारा पूर्णतया बहिर्विवाह इकाई समझा गया। मूल धारणा यह है कि गोत्र के सभी सदस्य एक-दूसरे से संबंधित होते हैं। उनमें रक्त संबंध होता है अर्थात कोई ऋषि या संत उनका सामान्य पूर्वज होता है। इसी कारण, एक ही गोत्र के सदस्यों के बीच विवाह को अनुचित समझा जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में ब्रिटिश शासन से कौन-से तीन प्रकार के परिवर्तन हुए?
उत्तर:
भारत में ब्रिटिश शासन से निम्नलिखित तीन प्रकार के परिवर्तन हुए –

  • कानूनी तथा संस्थागत परिवर्तन, जिनसे सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता के अधिकार प्रदान किए गए।
  • प्रौद्योगिकीय परिवर्तन
  • व्यावसायिक परिवर्तन

प्रश्न 3.
कुछ मानवशास्त्रियों तथा ब्रिटिश प्रशासकों ने जनजातियों को अलग कर देने की नीति की वकालत क्यों की?
उत्तर:
कुछ मानवशास्त्रियों तथा ब्रिटिश प्रशासकों द्वारा जनजातियों को अलग कर देने की नीति की वकालत निम्नलिखित कारणों से की गई –

  • जनजातियों के लोग गैर-जनजातियों व हिंदुओं से भिन्न हैं।
  • जनजातियों के लोग हिंदुओं के विपरित जीवनवादी हैं।
  • जनजाति के लोग हिंदुओं के विपरीत जीवनवाद हैं।
  • जनजातीय लोगों के हिन्दुओं से संपर्क होने के कारण उनकी संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था को हानि हुई। गैर-जनजातियों के लोगों ने चालाकी तथा शोषण से उनकी (जनजाति के लोगों की) भूमि तथा अन्य स्रोतों पर कब्जा कर लिया।

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प्रश्न 4.
घुर्ये का भारतीय जनजातियों के हिंदूकरण की प्रक्रिया का विवरण दीजिए।
उत्तर:
घुर्ये ने भारत के जनजातियों के हिंदूकरण में निम्नलिखित तथ्यों का विवरण दिया है –

  • कुछ जनजातियों का हिंदू समाज में एकीकरण हो चुका है।
  • कुछ जनजातियाँ एकीकरण की दिशा में अग्रसर हो रही हैं।

प्रश्न 5.
घुर्ये ने जनजातियों के किस भाग को ‘हिंदू समाज का अपूर्ण एकीकृत वर्ग’ कहा है?
उत्तर:
भारत की कुछ जनजातियाँ जो पहाड़ों अथवा घने जंगलों में रह रही है, अभी तक हिंदू समाज के संपर्क में नहीं आयी हैं। जी.एस.घुर्ये ने इन जनजातियों हिन्दू समाज को ‘अपूर्ण एकीकृत वर्ग’ कहा है।

प्रश्न 6.
जनजातियों के द्वारा हिंदू सामजिक व्यवस्था को क्यों अपनाया गया?
उत्तर:
जनजातियों ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था को आर्थिक उद्देश्यों के कारण अपनाया हिंदू धर्म को अपनाने के पश्चात् जनजाति के लोग अल्पविकसित हस्तशिल्प की संकीर्ण सीमाओं से बाहर आ सके। इसके पश्चात् उन्होंने विशेषीकृत व्यवसायों को अपनाया। इन व्यवसायों की समाज में अत्यधिक मांग थी। जनजातियों ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था अपनाने का दूसरा कारण जनजातीय निवासों तथा रीतियों के हेतु जाति व्यवस्था की उदारता था।

प्रश्न 7.
इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी की नींव किसने और कब डाली?
उत्तर:
गोविंद सदाशिव घुयें ने 1952 में इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी की नींव डाली।

प्रश्न 8.
घुर्ये ने जाति तथा नातेदारी के तुलनात्मक अध्ययन में किन दो बिंदुओं को महत्त्वपूर्ण बताया है?
उत्तर:
भारत में पायी जाने वाली नातेदारी व जातीय संजाल की व्यवस्था अन्य समाजों में भी पायी जाती है। जाति तथा नातेदारी ने भूतकाल में एकीकरण का कार्य किया है। भारतीय समाज का उद्विकास विभिन्न प्रजातीय तथा नृजातीय समूहों के एकीकरण पर आधारित था।

प्रश्न 9.
घुर्ये ने जाति व्यवस्था में पाए जाने वाले किन छः संरचनात्मक लक्षणों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
जी.एन.घुर्ये ने जाति व्यवस्था में पाए जाने वाले निम्नलिखित छः संरचनात्मक लक्षणों का उल्लेख किया है –

  • खंडात्मक विभाजन
  • अनुक्रम या संस्तरण अथवा पदानुक्रम
  • शुद्धता तथा अशुद्धता के सिद्धांत
  • नागरिक तथा धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विभिन्न विभागों के विशेषाधिकार
  • व्यवसाय चुनने संबंधी प्रतिबंध
  • वैवाहिक प्रतिबंध

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प्रश्न 10.
अंनतकृष्ण अययर एवं शरतचंद्र रॉय ने सामजिक मानवविज्ञान के अध्ययन का अभ्यास कैसे किया?
उत्तर:
अंनतकृष्ण अययर प्रारंभ में केवल एक लिपिक थे। बाद में आप अध्यापक हो गए। सन् 1902 में कोचीन राज्य में एक नृजातीय सर्वे कर कार्य अपकों सौंपा गया और आप मानवशास्त्री हो गए। इसी प्रकार ही शरत्चंद्र रॉय कानूनविद् थे। अपने ‘उरावं’ जनजाति पर कुछ शोध किया और आप मानवशास्त्री हो गए।

प्रश्न 11.
जाति-व्यवस्था में विवाह बंधन पर चार पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर:

  • जाति व्यवस्था में अंतजार्तीय विवाहों पर प्रतिबंध था।
  • जातियों में अंतः विवाह का प्रचलन था।
  • प्रत्येक जाति छोटे-छोटे उपसमूहों अथवा उपजातियों में विभाजित थी।
  • घूर्ये अंतः विवाह को जाति प्रथा में प्रमुख कारक मानते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों के बारे में घुर्ये के विचार लिखिए?
उत्तर:
ग्रामीण तथा नगरीय क्षेत्रों के बारे में घुर्य के विचार का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) घुर्ये ने नगरों तथा महानगरों के विकास के बारे में निराशवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया है। नगरों से पुरुषों तथा स्त्रियों की चारित्रिक विशेषताओं को समाप्त नहीं किया है।

(ii) घूर्य के अनुसार विशाल नगर उच्च शिक्षा, शोध, न्यायपालिका, स्वास्थ सेवाएँ तथा प्रिंट मीडिया व मनोरंजन आदि अंततोगत्वा सांस्कृतक वृद्धि करते हैं। नगर का प्रमुख कार्य सांस्कृतिक एकरात्मकता की भूमिका का निर्वाह करना है।

(iii) घूर्ये नगरीकरण के पक्के समर्थक थे। घुर्य के अनुसार नगर नियोजन को निम्नलिखित समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान देना चाहिए –

  • पीने की पानी की समस्या
  • मानवीय भीड़-भाड़
  • वाहनों की भीड़-भाड़
  • सार्वजनिक वाहनों के नियम
  • मुम्बई जैसे महानगरों में रेल परिवहन की कमी
  • मृदा का अपरदन
  • ध्वनि प्रदूषण
  • अंधाधुंध पेड़ों की कटाई तथा
  • पैदल यात्रियों की दुर्दशा

(iv) घूर्ये जीवनपर्यत ग्रामीण – नगरीयता के विचारों का समथन करते रहे। उनका मत था कि नगरीय जीवन के लाभों के साथ-साथ प्राकृति की हरीतिमा का भी लाभ उठाना चाहिए। भारत में नगरीकरण केवल औद्योगीकरण के कारण नहीं है। नगर तथा महानगर अपने नजदीकी स्थानों के लिए सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में भी कार्य करते हैं।

(v) घूर्य के अनुसार ब्रिटीश शासन के दौरान ग्रामों तथा नगरीय केन्द्रों के बीच पाए जाने वाले संबंधों की उपेक्षा की गई।

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प्रश्न 2.
जाति तथा नातेदारी के विषय में गोविंद सदाशिव धूर्ये के विचार लिखिए?
उत्तर:
जाति तथा नातेदारी के बारे में जी.एस.घूर्य के विचारों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) घुर्ये ने अपनी पुस्तक Caste and Race in India 1932 में ऐतिहासिक मानवशास्त्रीय तथा समाजशास्त्रीय उपागमों को कुशलतापूर्वक संयुक्त किया है घूर्य जाति की ऐतिहासिक उत्पति तथा उसके भौगोलिक प्रसार से संबंधित थे। उन्होंने जाति के तत्कालीन लक्षणों पर ब्रिटिश शासन के प्रभावों को प्रभावों को भी समझने का प्रयास किया है।

(ii) घूर्ये ने अपनी पुस्तक में बाद के संस्करण में भारत की आजादी के बाद जाति व्यवस्था में आने वाले परिवर्तनों का उल्लेख किया है। .

(iii) एक तार्किक विचारक के रूप में वे जाति व्यवस्था का घोर विरोध करते थे। उनका ‘अनुमान था कि नगरीय पर्यावरण तथा आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों से जाति बंधन कमजोर हो जाएँगे। लेकिन उन्होंने पाया कि जातिनिष्ठा तथा जातिय चेतना का रूपांतरण नृजातिय समूहों मं हो रहा है।

(iv) घूर्ये का मत है कि जाति अंत: विवाह तथा बहिर्विवाह के माध्यम से नातेदारी से संबंधित है।

प्रश्न 3.
घूर्य के अनुसार धर्म के महत्व को समझाइए?
उत्तर:
जी.एस.घूर्ये न धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों के अध्ययन में मौलिक योगदान प्रदान किया है। समाज में धर्म की भूमिका का विशद् वर्णन उन्होंने निम्नलिखित पुस्तकों में किया है –

  • Indian Sadhus (1953)
  • Gods and Men (1962)
  • Religious Consciousnes (1965)
  • Indian Accultrtion (1977)
  • Vedic India (1979)
  • The legacy of Ramayana (1979)

घुर्ये ने संस्कृति के पाँच आधार बताए हैं –

  • धार्मिक चेतना
  • अंत: करण
  • न्याय
  • ज्ञान प्राप्ति हेतु निर्बाध अनुसरण
  • सहनशीलता।

घूर्ये ने अपनी पुस्तक Indian sadhus में महान वेंदातिंक दार्शनिक शंकराचार्य तथा दूसरे धार्मिक आचार्य द्वारा चलाए गए अनेक धार्मिक पंथों तथा केंद्रों का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है। घूर्ये ने भारत में त्याग की विरोधाभासी प्रकृति को प्रस्तुत किया है। शंकराचार्य के समय से ही हिंदू समाज का कम या अधिक रूप में साधुओं द्वारा मार्गदर्शन किया गया है। ये साधु-एकांतवासी नहीं हैं। उनमें से ज्यादातर साधुमठासी होते हैं। भारत में। मठों का संगठन हिन्दूवाद तथा बोद्धवाद के कारण है।

भारत में साधुओं द्वारा धार्मिक विवादों में मध्यस्थता भी की जाती है। उनके द्वारा धार्मिक ग्रंथों तथा पवित्र ज्ञान को संरक्षण दिय गया है। इसके अतिरिक्त, साधुओं द्वारा विदेशी आक्रमणों के समय धर्म की रक्षा की गई है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जाति व राजनीति पर घूर्य के विचार लिखिए?
उत्तर:
जाति तथा राजनीति के संबंध में जी.एस.घूर्य के विचारों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) प्रसिद्ध समाजशास्त्री जी.एस.घूर्ये ने जातिनिष्ठा अथवा जातीय लगाव के प्रति सावधानी बरतने की बात कही है। जातिनिष्ठा तथा जातीय लगाव दोनों ही भारत की एकता के लिए संभावित खतरे हैं।

(ii) यद्यपि ब्रिटिश शासन के दौरान किए गए परिवर्तनों से जाति-व्यस्था के कार्य कुछ सीमा तक प्रभावित तो हुए तथापि उनका पूर्णरूपेण उन्मूलन नहीं हो सक। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान निम्नलिखित तीन प्रकार के परिवर्तन आए –

  • कानूनी तथा संस्थागत परिवर्तन
  • प्रौद्योगिकी परिवर्तन तथा
  • व्यावसायिक परिवर्तन

(iii) घूर्ये का यह स्पष्ट मत है कि भारत में ब्रिटिश शासक जाति व्यवस्था के समाजिक तथा आर्थिक आधारों को समाप्त करने में कभी भी गम्भीर नहीं रहे। उनके द्वारा छुआछूत को समाप्त करने का भी प्रयत्न नहीं किया गया।

(iv) परतंत्र भारत में निम्नलिखित समीकरण पाए गए हैं –

  • जातिय समितियों को अधिकता
  • जातिय पत्रिकाओं की संख्या में वृद्धि
  • जाति पर आधारित न्यासों में वृद्धि
  • नातेदारी ने जातिय चेतना के विचारों को प्रोत्साहित किया।

उपरोक्त वर्णित चारों कारक वास्तविक सामुदायिक तथा राष्ट्रीय भावना के विकास में बाधा उतपन्न करते हैं।

(vi) जी.एस.घूर्ये को इस बात की चिंता थी कि राजनैतिक नेता प्राप्त करने तथा उस काम रखने के लिए जातीय संवेदना का शोषण करेंगे। इस संदर्भ में धूर्य की चिंता निरर्थक नहीं थी। घूर्य ने राजनीति क्षेत्र तथा नौकरियो में वंचित वर्ग के आरक्षण के आंदोलन की भावना की प्रशंसा की। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अछूत जातियों को विशेष शैक्षिक सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। उनका मत था कि शिक्षा ही उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकती है।

प्रश्न 2.
जनजातियों पर घूर्ये के विचार दीजिए।
उत्तर:
जनजातियों के विषय में घूर्य के विचार का निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत अध्ययन, किया जा सकता है। भारत की जनसंख्या में जनजातियाँ एक महत्त्वपूर्ण भाग है। घूर्ये ने इस बात पर चिंता प्रकट की थी कि कुछ मानवशास्त्री तथा ब्रिटिश प्रशासक जनजातियों को पृथक् कर देने की नीति के हिमायती थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि हर कीमत पर जनजातियों की विशष्टि पहचान बनायी रखी जानी चाहिए। उन्होंने इस संबंध मे निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए

  • जनजातिय गैर-जनजाति या हिंदुओं से पृथक् है।
  • जनजातिय लोग देश के मूल निवासी हैं।
  • जनजातिय लोग हिंदुओं के विपरीत जीववादी हैं।
  • जनजातियं लोग भाषा के आधार पर भी हिंदुओं से अलग हैं।
  • गैर-जनजातिय लोगों के संपर्क में आने से जनजातीय लोगों की संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ है।
  • गैर-जनजातियों लोगों की चालाकी तथा शोषण के कारण जनजातिय लोगो की जमीन तथा अन्य संसाधन समाप्त हो गए।

जी.एस.घूर्य ने उपरोक्त बिंदुओं का ऐतिहासिक आंकड़ों तथा उदाहरणों द्वारा तत्कालीन स्थिति के संदर्भ में विरोधी किया है। जी.एस.घूर्य ने भरतीय जनजातियों के हिंदूकरण की प्रक्रिया का उल्लेख किया है। उनका मत है कि कुछ जनजातियों का हिंदू समाज में एकीकरण हो चुका है तथा कुछ जनजातियाँ एकीकरण की दशा में अग्रसर हो रही है। घूर्ये का मत है कि कुछ जनजातियाँ पहाड़ों तथा जंगलों में रह रही हैं। ये जनजातियाँ हिंदू समाज से अभी तक अप्रभावित हैं। ऐसी जनजातियों को हिंदू समजा का अपूर्ण एकीकृत वर्ग कहा जाता है।

जी.एस.पूर्वे के अनुसार जनजातियों द्वारा हिंदू सामाजिक व्यवस्था को निम्नलिखित दो करणों से अपनाया गया है प्रथम आर्थिक उद्देश्य था। जनजातियों द्वारा हिंदू धर्म की अपनया गया था अंत: उन्हें अपने अल्पविकसित जनजातिय हस्तशिल्प की सीमाओं से बाहर आने का मार्ग मिल गया। इसके पश्चात् जनजातिय लोगों ने बिशिष्ट प्रकार के उन व्यवसायों को अपनाया जिनकी समाज में मांग थी। द्वितीय कारण जनजातिय विश्वासों तथा रीतियों के संदर्भ में जाति व्यवस्था की उदारता थी।

जी.एस.घूर्ये ने इस बात को स्वीकार किया कि भोले जनजातिय लोग गैर-जनजातियों, हिंदू महाजानों तथा भू-माफियाओं द्वारा शोषित किए गए। घूर्ये का मत है कि इसका मूल कारण ब्रिटीश शाशन को दोषपूर्ण राज्स्व तथा न्याय व नीतियाँ थी। ब्रिटिश सरकार की वन संबंधी नीतियों से जनजातिय लोगों के जीवन को और अधिक कठोर बना दिया। इन दोषपूर्ण नीतियों के कारण न केवल जनजातिय लोगों को कष्ट हुआ वरन् गैर-जनजातिय लोगों को भी अनेक कठिनाइयों का समाना कारना पड़ा। वस्तुतः समाज में प्रखलत व्यवस्था ने जनजातिय लोगों तथा गैर-जनजातिय लोगों को समान रूप से कष्ट पहुँचाया।

प्रश्न 3.
घूर्ये के अनुसार जाति के संरचनात्मक लक्षणों का वर्णन कीजिए?
उत्तर:
घूर्य ने जाति के निम्नलिखित छः संरचनात्मक लक्षणों का उल्लेख किया है –
(i) खंडात्मक विभाजन-जी.एस.घूर्य ने जाति को सामजिक समूहों अथवा खंडो के रूप में समझा है। इनकी सदस्यता का निर्धारण जन्म से होता है। सामाज के खंड विभाजन का अभिप्राय जाति के अनेक खंड में विभाजन है। प्रत्येक खंड का अपना जीवन होता है। प्रत्येक जाति के नियम, विनियम, नैतिकता तथा न्याय के मानदंड होते हैं।

(ii) अनुक्रम अथवा संस्मरण अथवा पदानुक्रम-जाति अथवा इसके खंडों में संस्तरण पाया जाता है। संस्तरण की व्यवस्था में जातियाँ एक-दूसरे के संदर्भ में उच्च अथवा निम्न स्थिति में होती है। सभी जगह संस्तरण की व्यवस्था में ब्राह्मणों की स्थिति उच्च तथा अछूतों की निम्न होती है।

(iii) शुद्धता एवं अशुद्धता के सिद्धांत-जातियों तथा खंडों के बीच पृथकता, शुद्धि तथा अशुद्धि के सिद्धांत पर आधारित है। शुद्ध तथा अशुद्ध के सिद्धांत के अंतर्गत दूसरी जीतियों के . संदर्भ में खान-पान संबंधी नियमों का पालन किया जाता है। आमतौर पर ज्यादातर जातियों को ब्राह्मणों द्वारा पकाए गए कच्चे भोजन को ग्रहण करने पर कोई आपत्ति नहीं होती है। दूसरी और, ऊँची जातियों द्वारा निम्न जातियों द्वारा पकाया गया पक्का खाना, जैसे कचौड़ी आदि ग्रहण किया जाता है।

(iv) नागरिक तथा धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विभिन्न भागों में विशेषाधिकार-समाज में संस्तरण के विभाजन के कारण विभिन्न समूहों को प्रदान किए गए विशेषाधिकारों तथा दायित्वों में असमानता पायी जाती है। व्यवसायों का निर्धारण जाति की प्रकृति के अनुसार होता है। ब्राह्मणों की उच्च स्थिति इन्हीं आधारों पर होती है। निम्न जाति के लोग उच्च जाति के लोगों के रीति-रिवाजों तथा वस्त्र धारण करने आदि की नकल नहीं कर सकते थे। उनके द्वारा ऐसा किया जाना समाज के नियमों के विरुद्ध कार्य समझा जाता था।

(v) व्यवसायों के संबंध में प्रतिबंध-प्रत्येक जाति अथवा जाति समूहों किसी न किसी वंशानुगत व्यवसाय से संबंध होते थे। व्यवसायों का वर्गकरण भी शुद्धता तथा अशुद्धता के सिद्धांत के आधार पर किया जाता था। वर्तमान समय में इस स्थिति में परिवर्तन आया है। लेकिन पुरोहित के कार्य पर अभी भी ब्राह्मणों का अधिकार कायम है।

(vi) वैवाहिक प्रतिबंध-जाति व्यवस्था में अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध था। जातियों में अंतः विवाह का प्रचलन था। घूर्ये अंतः विवाह को जाति प्रथा का प्रमुख कारक मानते हैं।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

प्रश्न 4.
‘जनजातिय समुदायों को कैसे जोड़ा जाय’ इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
उत्तर:
जानजातिय समुदायों से कैसे संबंध स्थापित हो? यह एक गंभीर प्रश्न है। जी.एस. घूर्य ने अपनी पुस्तक ‘द शिड्यूल्ड टाइब्स’ में लिखा है। “अनुसूचित जनजातियों को न तो अदिम कहा जाता है और न आदिवासी न ही उन्हें अपने आप में एक कोटि माना जाता है” यानि पहचान की समस्या गंभीर हैं। जनजातिय समुदायों के साथ संबंध स्थापित करने में निम्न तथ्व भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं

  • भूमि हस्तांतरण तथा शोषण के बिंदुओं को रोका जाए।
  • आर्थिक विकास के अवरोधों को दूर किया जाए।
  • उनके सांस्कृतिक स्वरूप और मूल संस्कृत में कोई परिवर्तन न किया जाए।
  • अशिक्षा की समस्या से दूर किया जाए।
  • ऋणग्रस्तता को समाप्त करने का प्रयास किया जाए।
  • जनजातियों के समग्र विकास के लिए कदम उठाए जाएँ।

इन सभी कार्यों को पूर्ण करने पर निश्चित हो जनजातियों समुदायों से समर्क की समस्या समाम्त हो जाएगी।

प्रश्न 5.
घूर्ये ने भारतीय सामाज की व्याख्या कैसे की?
उत्तर:
घूर्ये ने भारतीय समाज की व्याख्या निम्नलिखित रूप में किये जाते हैं –

  • जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक विशिष्टता है। उन्होंने भारतीय समाज में जातियों के उपजातियों के रूप में विभाजन को स्वीकार किया है।
  • घूर्ये ने भारतीय जनसंख्या को उनकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर प्रायः छः प्रकार के वर्गों में विभाजित किया है- इंडी आर्यन, पूर्वी द्रविड़, पश्चिमी मुण्डा और मंगोलियन।
  • इनके अनुसार हिंदू, जैन, बौद्ध धर्म के कालात्मक स्मारकों में कई समान तत्वों का समावेश है।
  • उनका मत था कि मुस्लिम भवनों में हिंदू कला का केवल अलंकरण के रूप में प्रयोग हुआ है।
  • घूर्य का विचार था कि बहुलवादी प्रकृतियों ने राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में बाधा डाली है और यह भारतीय समाज को टुकड़ों में बाँटे जाने को प्रोत्साहन देती है।

प्रश्न 6.
भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हर्बर्ट रिजले तथा जी.एस.घूर्ये की स्थिति की रूपरेखा दें?
उत्तर:
वास्तव में जाति व्यवस्था भारतीय समाज की अपने एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। जो व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, उसे उसी बना रहना पड़ता है। जाति की सदस्यता जन्म से होती है। जाति-‘कास्ट’ एक अंग्रेजी शब्द है जिसकी उत्पति पुर्तगाली भाषा के –

  • जाति की सदस्यता उन व्यक्तियों तक ही सीमित होती है जो उस जाति के सदस्यों से उत्पन्न हुए हों और इस प्रकार उत्पन्न होने वाले
  • सभी व्यक्ति जाति में आते हैं।
    जिसके सदस्य एक अविच्छिन्न सामाजिक नियम के द्वारा समूह के बाहर विवाह करने से रोक दिए जाते हैं।

प्रो.एच.रिजले के अनुसार, “जाति परिवारों के समूह का एक संकलन है जिसका एक सामान्य नाम है, जो काल्पनिक पुरुष अथवा देवताओं से उत्पन्न होने का दावा करती है। एक वंशानुकूल व्यवसाय करने का दावा करती है और उन लोगों की दृष्टि से सजातीय समुदाय बनाती है जो अपना मत देने योग्य हैं।” प्रो.जी.एस.घूर्ये-प्रो.घूर्य ने जाति की परिभाषा देते हुए कहा है, ‘जाति एक जटिल अवधारणा है।’ इस प्रकार रिजले और घूर्ये दोनों जाति के संबंध में अलग-अलग विचार रखते हैं। प्रजाति से आशय यहाँ नस्ल से है : भारत में आर्य ही इस तथ्य पर एक मत हैं कि प्रजातिय विभिन्नता होते हुए भी भारत में जातिय एकता बनी हुई है।

ध्रुजटी प्रसाद मुखर्जी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
डी.पी. की ‘पुरुष’ की अवधारणा बताइए?
उत्तर:
डी.पी. मुखर्जी ने अपनी ‘परुष’ की अवधारणा में उसे (पुरुष को) समाज तथा व्यक्ति से पृथक् नहीं किया है और न ही वह पुरुष समूह मस्तिष्क के नियंत्रण में है। मुखर्जी के अनुसार ‘पुरुष’ सक्रिय कर्ता के रूप दूसरे व्यक्त्यिों के साथ संबंध स्थापित करता है तथा अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना है। मुखर्जी का मत है कि पुरुष का विकास दूसरे व्यक्तियों के साथ संपर्क से होता है। इस प्रकार, उसका मानव समूहों में अपेक्षाकृत अच्छा स्थान होता है।

प्रश्न 2.
कर्ता की स्थिति स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार कर्ता की स्थिति के अंतर्गत व्यक्ति एक कर्ता के रूप में कार्य करता है। एक स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में जो कि व्यक्ति के अपने लक्ष्यों तथा हितों को प्राप्त करने की मौलिक विशेषताएँ रखता है।

प्रश्न 3.
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार परंपरा के अर्थ को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार परंपरा का मूल ‘वाहक’ है जिसका तात्पर्य संप्रेषण करना है। संस्कृत भाषा में इसका समानार्थक परंपरा है, जिसका तात्पर्य है उत्तराधिकारी अथवा ऐतिहासिक जिसका आधार अथवा जुड़े इतिहास में हैं। मुखर्जी के अनुसार परंपराओं का कोई न कोई स्रोत अवश्य होता है। धार्मिक ग्रंथ अथवा महर्षियों के कथन अथवा ज्ञात या अज्ञात पौराणिक नायक परंपराओं के स्रोत हो सकते हैं।

पंरपराओं के स्रोत कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन इनकी एतिहासिकता को समाज के सभी सदस्यों द्वारा मान्यता प्रदान की जाति है। परंपराओं को उद्धत किया जाता है। उन्हें पुन: याद किया जाता है तथा उनका सम्मान किया जाता है। वस्तुतः परंपराओं की दीर्घकालीन संप्रेषणता से सामजिक संबद्धता तथा सामाजिक एकता कायम रखती है।

प्रश्न 4.
भारत में अंग्रजों द्वारा प्रारंभ की गई नगरीय, आद्योगिक व्यवस्था का प्रभाव बताइए।
उत्तर:
भारत में अंग्रजों द्वारा प्रारंभ की गई नगरीय औद्यौगिक व्यवस्था ने प्राचीन संस्थाओं के ताने-बाने को समाप्त कर दिया। इसके द्वारा अनेक परंपरागत जाजियों एवं वर्गों का विघटन हो गया। इन परिवर्तनों के काण एक नयी प्रकार का सामजिक अनुकूलन तथा समायोजन हुआ। इन नए परिवर्तनों के द्वारा भारत नगरीय केंद्रों में शिक्षित मध्यवर्ग समाज का मुख्य बिंदु बनकर सामने आया।

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प्रश्न 5.
डी.पी.मुकर्जी के अनुसार भारत आधुनिकता के मार्ग पर किस प्रकार अग्रसर हो सकता है?
उत्तर:
डी.पी.मुकर्जी के अनुसार भारत अपनी परंपराओं से अनुकूलन तभी कर सकता है जब मध्यवर्गीय व्यक्ति अपना संपर्क आम जनता के पुनः स्थापित करें । मुखर्जी कहते हैं कि इस प्रक्रिया में उन्हें न तो अनावश्यक रूप से क्षमायाचना करनी चाहिए और न ही अपनी परंपराओं के विषय में बढ़-चढ़कर अथवा आत्मश्लाघा करनी चाहिए। उन्हें परंपराओं की जीवंतता को कायम रखना चहिए जिसमें आधुनिकता द्वारा आवश्यक परिवर्तनों के साथ समायोजन हो सके। इस प्रकार व्यक्तिवाद एवं समाजिकता के बीच संतुलन कायम रह सकेगा। इस नए अनुभव से भारत तथा विश्व दोनों ही लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

प्रश्न 6.
सामजशास्त्र के क्षेत्र में डी.पी.मुकर्जी का महानतम योगदान बताइए?
उत्तर:
प्रसिद्ध भारतीय सामजशास्त्री डी.पी.मुकर्जी के विचार वर्तमान सामाजिक पररिस्थितियों में पूर्णत: उचित है। मुकर्जी का समाजशास्त्र के क्षेत्र में महानतम योगदान परंपराओं की भूमिकाओं का सैद्धांतिक निरूपण है। डी.पी.मुकर्जी का स्पष्ट मत था कि भारतीय सामाजिक यर्थाथता की समुचित समीक्षा इसकी संस्कृति तथा सामाजिक क्रियाओं, विशिष्ट परंपराओं, विशिष्ट प्रतीकों, विशिष्ट मानकों के संदर्भ में की जा सकती है।

प्रश्न 7.
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताइए?
उत्तर:
जाति जन्म पर आधारित ऐसा समूह है जो अपने सदस्यों को खान-पान, विवाह, व्यवसाय और सामजिक संपर्क के संबंध में कुछ प्रतिबंध मानने को निर्देशित करता है।

प्रश्न 8.
‘जीवंत परंपरा’ से डी.पी.मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाज शास्त्रीयों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
उत्तर:
प्रो.ए.आर. देसाई ने समाजशास्त्र में भारतीय समाज को लेकर अनेक अध्ययन किये। उन्होंने पाया कि स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से रूपांतर की स्थिति उत्पन्न हुई है। भारत की जनता क रहन-सहन के परंपरागत स्तर में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया।

आधुनिकता के नाम पर कुछ लोगों ने परंपराओं को त्यागने का साहस तो किया पर वे भी कहीं न कहीं उसमें लिप्त रहे। भारतीय समाजशात्रियों के विषय में भी श्री देसाई के विचार यही हैं कि वे अपने अध्ययनों में भारतीय परंपराओं के प्रति जकड़े हुए हैं इससे ऊपर उठकर विचार श्रृंखला मीमांसा नही बन पाती है।

प्रश्न 9.
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार भारतीय समाजशास्त्रियों के मूलभूत उद्देश्य क्या होने चाहिए?
उत्तर:
डी.पी.मुखजी के अनुसार सामाजिक सामजशास्त्रियों को केवल सामजशास्त्री की सीमा तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। भारतीय सामजशास्त्रियों को लोकाचारों, जनरीतियों, रीति-रिवाजों तथा परंपराओं में भागदारी करने के साथ-साथ समाजिक व्यवस्था के अर्थ का समझन का भी प्रयास करना चाहिए।

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प्रश्न 10.
डी.पी. मुखर्जी के अनुसार भारतीय समाजशास्त्रियों को किन दो उपागमों के संश्लेषण का प्रयास करना होगा?
उत्तर:
डी.पी. मुखर्जी के अनुसार भारतीय समाजशास्त्रियों को निम्नलिखित दो उपागमों के संश्लेषण का प्रयास करना होगा
(i) समाजशास्त्री के द्वारा तुलनात्मक उपागम को अपनाना होगा। एक यही तुलनात्मक उपागम उन विशेषताओं को प्रकाश में लाएगा जिनकी भरतीय समाज अन्य समाजों के साथ भागीदारी करता है। इस उद्देश्य को प्राप्ति हेतु समाजशास्त्री परंपरा का अर्थ समझने का लक्ष्य रखेगे। वे इसके मूल्यों तथ्य प्रतीकों का सावधानीपूवर्क परीक्षण भी करेंगे।

(ii) भारतीय समाजशास्त्री संघर्ष तथा परस्पर विरोधी शक्तियों के संश्लेषण को समझने के लिए द्वंद्वात्मक उपागम का अवलंबन करेंगे।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय समाजशास्त्रियों का समजशास्त्री होना ही पूर्ण नहीं है, उन्हें पहले भारतीय होना चाहिए।” डी.पी. के इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
डी.पी.मुकर्जी ने भारतीय समाज के अपने सामजशास्त्रीय विश्लेषण में यह तथ्य पूर्णरूपेण स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय समाजशास्त्र के व्यापक अध्ययन हेतु विभिन्न उपागमों की आवश्यकता है। डी.पी. का स्पष्ट मत है कि भारतीय सामजिक व्यवस्था के अध्ययन हेतु एक पृथक उपागम की आवश्यकता है। यही कारण है कि डी.पी. मुकर्जी का मत है कि भारतीय समाजशास्त्रियों को केवल सामाजशास्त्री होना ही काफी नहीं है, उन्हें भारतीय भी होना चाहिए।

डी.पी. का मत है कि भारतीय समाजशास्त्रियों को भारतीय समाजशास्त्रियों को केवल सामाजशास्त्री होना ही काफी नहीं है, उन्हें भारतीय भी होना चाहिए। भारतीय समाजशास्त्रियों को निम्नलिखित दो उपगामों के संश्लेषण का प्रयास करना चहिए। प्रथम भारतीय समाजशास्त्री तुलनात्मक उमगम को अपनाएँगे। वास्तविक तुलनात्मक उपागम उन सभी विशेषताओं को स्पष्ट करेगी जो भारतीय समाज अन्य समाजों के साथ बाँटेगा। इसके साथ-साथ इसकी परंपराओं की विशेषताओं को भी बाँटेगी।

इसी दृष्टिकोण से, समाजशास्त्री परंपरा का अर्थ समझने का प्रयास करेंगे। उनके द्वारा प्रतीकों तथा मूल्यों का सावधानी पूवर्क परीक्षण किया जाएगा। द्वितीय भारतीय समाजशास्त्रीय विरोधी शक्तियों के संघर्ष तथा संश्लेषण के संरक्षण तथा परिवर्तन का समझने के लिए द्वंद्वात्मक उपागम का अवलंबन करेंगे।

प्रश्न 2.
पश्चिमी सामाजिक विज्ञान के संबंध में डी.पी.मुकर्जी के क्या विचार थे?
उत्तर:
पश्चिमी सामाजिक विज्ञान क विषय में डी.पी.मुकर्जी के विचारों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) डी.पी.मुकर्ज पश्चिमी सामाजिक विज्ञानों के प्रत्यक्षवाद के पक्ष में नहीं थे। मुखर्जी का मत है कि पश्चिमी सामजिक विज्ञान ने व्यक्तियों का जैविकीय या मनोवैज्ञानिक इकाइयों तक सीमित कर दिया है. पश्चिमी देशों की औद्योगिकी संस्कृति ने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित कर्ता बना दिया है।

(ii) डी.पी.का मत है कि व्यक्तिवाद अथवा व्यक्तियों की भूमिकाओं तथा अधिकारों को मान्यता प्रदान करके प्रत्यक्षवाद के मनुष्य को उसके सामाजिक आधार से पृथक् कर दिया है।

(iii) डी.पी. का मत है कि ‘हमारी मनुष्य की अवधारणा ‘पुरुष’ की है व्यक्ति की नहीं।’ मुखर्जी के अनुसार व्यक्ति शब्द हमारे धार्मिक ग्रंथो अथवा महर्षियों के कथनों में बहुत कम पाया जाता है। ‘पुरुष’ का विकास उसके अन्य व्यक्तियों के साथ सहयोग से तथा अपने समूह के सदस्यों के मूल्यों तथा भागीदरी से होता है।

(iv) डी.पी. क अनुसार भारत की समाजिक व्यवस्था मूलरूप स समूह, संप्रदा अथवा जाति कार्य का मानक अनुस्थापना है। यही कारण है कि आम भारतीय द्वारा नैराश्य का अनुभव नहीं किया जाता है। इस संदर्भ में डी.पी. हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों तथा बौद्धों में कोई विभेद नहीं है।

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प्रश्न 3.
परंपराओं की गतिशीलता किसे कहते हैं?
उत्तर:
डी.पी.मुकर्जी के अनुसार परंपरा का तात्पर्य संप्रेषण से है प्रत्येक सामजिक परंपरा का कोई न कोई उद्गम अवश्य होता है। समाज के सभी सदस्यों द्वारा परंपराओं की ऐतिहासिकता को मान्यता प्रदान की जाती है। परंपरा के द्वारा प्रायः यथास्थिति को कायम रखा जाता है। परंपरा का रूढ़िवादी होना आवश्यक नहीं है। डी.पी. का मत है कि परंपरओं में परिवर्तन होता रहता है।

भारतीय परंपराओं में तीन सिद्धांतो को मान्यता प्रदान की गई है –

  • श्रुती
  • समृति तथा
  • अनुभव

विभिन्न संप्रदायों या पंथो संत-संस्थापकों के व्यक्तिगत अनुभवों से सामूहिक अनुभव की उत्पत्ति होती है, जिससे प्रचलित सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था में परिवर्तन होता है। प्रेम या प्यार तथा सहजता का अनुभव या स्वतः स्फूर्त जो इन संतों तथा अनेक अनुयायिकों में पायी जाती है वह सूफी संतों में भी देखने को मिलती है। परंपरागत व्यवस्था द्वारा विरोधी आवाजों को भी सामायोजित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप, सुविधाहीन विभिन्न समूहों की वर्ग चेतना ने जातिय व्यवस्था को जबर्दस्त चुनौती दी है।

प्रश्न 4.
डी.पी.मुखर्जी के अनुसार सामाजिक वास्तविकता का अर्थ है?
उत्तर:
सामाजिक वास्तविकता के संबंध में डी.पी.मुकर्जी के विचारों का अध्ययन निम्नखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) सामाजिक वास्तविकता के अनेक तथा विभिन्न पहलू हैं तथा इसकी अपनी परंपरा तथा भविष्य है।

(ii) सामाजिक वास्तविकता को समझने के लिए विभिन्न पहलू की अंत:क्रियाओंक की प्रकृति को व्यापक तथा संक्षिप्त रूप में देखना होगा। इसके साथ-साथ परंपराओं तथा शक्तियों के अंत: संबंधों को भी भली भाँति समझना होगा। किसी विषय विशेष में संकुचित विशेषीकरण इस तथ्य का समझने में सहायक नहीं है।

(iii) डी.पी.मुखर्जी के अनुसार इस दिशा में सामजशास्त्र अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। उनका स्पष्ट मत है कि किसी अन्य सामाजिक विज्ञान की भाँति समाजशास्त्र का अपना फर्श तथा छत है। मुखर्जी का मत है कि समाजशास्त्र का फर्श अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति धरातल में संबद्ध है तथा इसकी छत ऊपर से खुली हुई है।

(iv) डी.पी. मुखर्जी का. मत है कि समाजशास्त्र हमारी जीवन तथा सामाजिक वास्तविकता : का एकीकृतं दृष्टिकोण रखने में सहायता करता है। यही कारण है कि डी.पी.मुखर्जी ने सामाजिक जीवन के विस्तृत चित्र का संक्षिप्त दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि डी.पी. ने सामाजिक विज्ञनों के संश्लेषण पर निरंतर जोर दिया है। समाजशास्त्र एक समाजिक विज्ञान के रूप में विभिन्न विषयों के संश्लेषण में महत्त्वपूर्ण प्रयास कर सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये बदलाव के ढाँचे की कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
भारतीय संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में विषमताओं के होते हुए भी मौलिक एकता की भावना इसे संसार की अन्य संस्कृतियों से अलग रखती है। अर्थात् समुद्र के उत्तर में हिमालय के दक्षिण में जो देश है वह भारत नाम का खंड है। वहाँ के लोग भारत की संतान कहलाते हैं। भारत एक विशाल देश है। उत्तर में हिमालय पर्वत दक्षिण में तीन ओर समुंद्र हैं। इसकी भौगालिक विशेषता इसे संसार के अन्य देशों से अलग रखती है।

भारत की भौगोलिक एकता को खण्डित करने का सहास आज तक कोई शक्ति नहीं कर सकी। सांस्कृतिक एकता-भारत के विभिन्न वर्गों ने मिलकर एक ऐसी विशिष्ट और अनोखी संस्कृति को जन्म दिया है जो शेष संसार में सर्वथा भिन्न है। भारतीय संस्कृति संसार में उच्च। स्थान रखती है। भारतीय संस्कृति में एकता का आधार राजनीतिक या भौगोलिक न होकर सांस्कृतिक रहा है।

भाषागत एकता-भारत में प्रचीन काल से ही द्रविड़, आर्य, कोल, ईरानी, यूनानी हुण, शक, अरब, पठान, मंगोल, डच, फेंच, अंग्रेज आदि जातियाँ आती रही है। इन लोगों ने यहाँ की भाषा और संस्कृति को एक सीमा तक अपनाया। अधिकांश भरतीय भाषाओं पर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। भारत में मुसलमानों के आगमन के पश्चात् उर्दू भाषा का जन्म हुआ। बंगला, तमिल, तेलगु भाषा पर भी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता पड़ता है। भारत में प्राचीन काल से ही अनेक भाषाओं का जन्म हआ किंत उनमें किसी प्रकार का भी टकराव देखने का नही मिला।

धार्मिक एकता-भारत में विभिन्न धर्मों के मानने वाले निवास करते हैं। प्रत्येक धर्म के अपने विश्वास, रीति-रिवाज, उपासाना और पूजन विधियाँ हैं। हिंदू धर्म में ही आर्य समाजी, सनातन धर्मी, शैव, वैष्णव, नानक पंथी, कबीर पंथी आदि विभिन्न सम्प्रदान हैं, पंरतु विभिन्न मत-मतान्तरों के होते हुए भी भारत में धार्मिक एकता बनी हुई है। संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया। सभी धर्मों क पवित्र ग्रंथो का आदर किया जाता हैं।

राजनीतिक एकता-भारत में समय-समय पर अनेक शासन प्रणालियों का प्रचलन रहा है। कि स्वतंत्रता के पश्चात् प्रजातंत्रिक शासन प्रणाली अस्तित्व में आई। अनेक राजनीतिक दल और विचारधाराओं का उदय हुआ किंतु सभी दल भारत की राजनीतिक एकता को सर्वोपरि समझते हैं। सामाजिक-आर्थिक एकता-भारत में विभिन्न धर्मों और विश्वासों को मानने वाले लोग रहते हैं। उनकी परम्पराओं और रीति-रिवाजों में अंतर है परंतु उनके परस्पर संबंधों में उदारता और भाईचारे की भावना वद्यमान है। मानव कल्याण और लोकहित की भावाना से प्ररेणा लेकर संस्कृति की एकता को सुरक्षित बनाए रखा गया है। आर्थिक विषमता के होते हुए भी आत्मसंतोष की भावना विद्यमान है।

उपयुक्त सभी विशेषताएँ भारतीय संस्कृति तथा समाज की है जबकि किसी भी समाज में परिवर्तन होता है तो उसके कुछ निर्धारित प्रारूप होते हैं यथा-समाज में हिंदी में हिंदी भाषा के स्थान पर अंग्रेजी का वर्चस्व यह प्रतिरूप समाज की भाषायी एकता को प्रभावित करता है। इसी प्रकार अन्य तत्व भी परिवर्तन के प्रारूप को प्रभावित करते हैं।

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प्रश्न 2.
परंपरा तथा आधुनिकता के विषय में डी.पी.मुखर्जी के क्या विचार थे?
उत्तर:
परंपरा तथा आधुनिकता के विषय में डी.पी.मुखर्जी के विचार –
(i) परंपरा का अर्थ-प्रसिद्ध भारतीय समाजशास्त्रीय डी.पी.मुखर्जी के अनुसार परंपरा का तात्पर्य संप्रेषण से है। प्रत्येक परंपरा का कोई न कोई उदगम स्रोत धार्मिक ग्रंथ तथा महर्षियों के कथन हो सकते हैं। परंपराओं के स्रोत कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन इनकी ऐतिहासिकता को प्राय: सभी व्यक्तियों द्वारा मान्यता प्रदान की जाती है। परंपराओं को उद्धत, पुनःस्मरण किय जाता है तथा उनका सम्मान किया जाता है।

(ii) भारतीय परंपराओं की शक्ति-डी.पी.मुखर्जी के अनुसार भारतीय परंपराओं की वास्तविक शक्ति उसके मूल्यों का पारदर्शिता में पाई जाती है। इसकी उत्पति स्त्रियों तथा पुरुषों की अतीत की घटनाओं से संबद्ध जीवन पद्धतियों तथा भावनाओं से होती है, इनमें से कुछ मूल्य अच्छे तथा कुछ बुरे हैं। सोचने वाली बात यह है कि. तकनीक, प्रजातंत्र, नगरीकरण तथा नौकरशाही के नियम आदि विदेशी तत्वों मे उपयोगिता को भारतीय परंपरा में स्वीकार किया गया।

(iii) आधुनिक भारतीय संस्कृति एक आश्चर्यजनक सम्मिश्रण-डी.पी. का यह स्पष्ट मत है कि पश्चिमी संस्कृति तथा भारतीय परंपराओं में समायोजन निश्चित रूप से होगा। डी. पी.आगे कहते हैं कि भारतीय संस्कृति किसी भी दशा में समाप्त नहीं होगी। भारतीय संस्कृति की ननीयता, समायोजन तथा अनूकूलन इसके अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे। भारतीय संस्कृति ने जनजातिय संस्कृति को आत्मसात किया है, इसके साथ-साथ इसने अनेक आंतरिक विरोधों को भी अपने साथ मिलाया है। यही कारण है कि आधुनिक भारतीय संस्कृति एक आश्चर्य मिश्रण कहलाती है।

(iv) परंपरा व आधुनिकता मे द्वंद्व की स्थिति-डी.पी.का पूर्ण व्यक्ति या संतुलित व्यक्तित्व का अर्थ है –

  • नैतिक उत्साह, सौंदर्यात्मक तथा बौद्धिक समझदारी का मिश्रण है।
  • इतिहास एवं तार्किकता का ज्ञान। उपरोक्त कारणों से ही पंरपरा तथा आधुनिक में द्वंद्व की स्थिति बन जाती है।

(v) भारतीय परंपरा का पश्चात्य संस्कृति से सामना-डी.पी.का मत है कि भारतीय संस्कृति का पाश्चात्य संस्कृति से सामाना होने पर सांस्कृतिक अंत:विरोधों की शक्तियों को मुक्त किया जा सकता है। इस नए मध्य वर्ग को जन्म दिया है। डी.पी. के अनुसार संघर्ष तथा संशलेषण की प्रक्रिया को भारतीय समाज की वर्ग-संरचना को सुरक्षित रखने वाली शक्त्यिों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

प्रश्न 3.
डी.पी.मुखर्जी ने नए मध्यम वर्ग की अवधारणा की व्याख्या किस प्रकार की है?
उत्तर:
डी.पी.मुखर्जी ने नए मध्यम वर्ग को व्याख्या के संबंध में निम्नलिखित बिंदुओं पर बल दिया है –
(i) नगरीय-औद्योगिक व्यवस्था-डी.पी. मुखर्जी के अनुसार अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रारंभ की गई नगरीय-औद्योगिक व्यवस्था न पुराने ताने-बाने को लगभग समाप्त कर दिया । नगरीय-सामज में नया सामाजिक अनुकूलन तथा समायोजन प्रारंभ हुआ। इस नए सामाजिक ताने-बाने में नगरों में शिक्षित मध्यम वर्ग समाज का मख्य बिंद बन गया।

(ii) शिक्षित मध्यम वर्ग आधुनिक सामाजिक शक्ति के ज्ञान को नियंत्रित करता है-शिक्षित मध्यम वर्ग द्वारा सामाजिक शक्ति के ज्ञान को नियंत्रित किया जाता है। इसका तात्पर्य है कि पश्चिमी देशों द्वारा प्रदत विज्ञान, तकनीक, प्रजातंत्र तथा ऐतिहासिक विकास की भावना भारत में नगरीय समाज में विज्ञान तथा तकनीकी से संबंधित समस्त विशेषताओं तथा मध्ययम वर्ग की सेवाओं के उपयोग की बात कही गई है। डी.पी. का मत है कि मुख्य समास्या इस मध्यम वर्ग के पश्चिमी विचारों तथा जीवनशैली का पूर्णरूपेण अनुकरण करना है।

यही कारण है कि इस तथ्य को प्रसन्नता अथवा तिरस्कार कहा जाए कि हमारे समाज का माध्यम वर्ग भारतीय . वास्तविकताओं तथा संस्कृति से पूर्णतया अनभिज्ञ बना रहता है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते है कि भारतीय मध्य वर्ग पश्चिमी सभयता से अधिक निकट है जबकि भारती संस्कृति तथा विचारों से उसका अलगाव जारी है।

यद्यपि मध्यम वर्ग भारतीय परंपराओं से संबंद्ध नहीं है तथापि परंपराओं मे प्रतिरोध तथा . सीखने की अत्यधिक शक्ति पायी जाती है। यह परंपराएँ मानव के भौगोलिक तथा जनकीय प्रतिमानों के आधार पर भौतिक समायोजन तथा जैविकीय आवेगा के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। इस संबंध में भारत के संदर्भ में कहा जा सकता है कि यहाँ नगर-नियोजन तथा परिवार नियोजन के कार्यक्रमों परंपराओं से इतना अधिक संबंधित हैं कि नगर-नियोजन तथा समाज सुधारक इनकी अनदेखी नहीं कर सकते है।

यदि वे ऐसा करते हैं तो समस्त नियोजन तथा सुधार कार्य खतरे में पड़ जाएंगे। इस विश्लेषण के संदर्भ में कहा जा सकता है कि नगर-नियोजन भारत का मध्यम वर्ग आधुनिक भारत के निर्माण में आम जनता के नेतृत्व की स्थिति में नहीं है। मध्य वर्ग का विचार क्षेत्र परिश्मी सभयता से संबंधित रहने के कारण यह स्वदेशी परंपराओं से पृथक् हो गया है। यही कारण है कि मध्यम वर्ग का जनता से संपर्क टूट गया है।

(iii) भारत पंरपराओं से अनुकूलन करके आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है-डी.पी.मुखर्जी का मत है कि यदि मध्यम वर्ग आम-जनता से अपना संमक पुनः स्थापित करता है तो भारत परंपराओं से अनुकूलन करके आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। भारतीयों को अपनी परंपराओं के संदर्भ में न तो क्षमा याचना करने की आवश्यकता है और न ही आत्मश्यलाघा की आवश्यकता है।

उन्हें परंपराओं की जीवतंता को नियंत्रित करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए जिसे आधुनिकता द्वारा आवश्यक परिवर्तनों के साथ समायोजन कर सके। इस प्रकार व्यक्तिवाद तथा सामाजिकता में संतुलन कायम होगा। इस नूतन अनुभवों से भारत तथा विश्व लाभान्वित हो सकेंगे।

अक्षय रमनलाल देसाई – (1915-1994)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रो. देसाई के अनुसार ‘भूमि सुधारों’ में असफलता के कारण थे?
उत्तर:
प्रो. देसाई के अनुसार भूमि सुधार में असफलता के निम्न कारण थे –

  • राजनीतिक संकल्प शक्ति का अभाव।
  • प्रशासनिक संगठन : नीति निर्वाह के अपर्याप्त कारण।
  • कानूनी बाधाएँ।
  • सही एवं अद्यतन अभिलेखों का अभाव।
  • भूमि सुधार को अब तक आर्थिक विकास की मुख्य धारा से अलग करके देखना।

प्रश्न 2.
प्रो. देसाई की दो प्रमुख कृतियों का उल्लेख किजिए?
उत्तर:
श्री देसाई की दो प्रमुख कृतियाँ हैं –

  • Social Background of Indian Nationalism
  • State and Society in Indian

प्रश्न 3.
कल्याणकारी राज्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्रो.ए.आर. देसाई के अनुसार स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना की गई। कल्याणकारी राज्य में लोकतांत्रिक समाजवाद के चिंतन को प्रस्तुत किया गया। प्रो. देसाई के असार भारत में कल्याणकारी राज्य पूँजीवादी संरचना का मुखौटा है। कल्याणकारी राज्य में बुर्जआ वर्ग के हितों की रक्षा की जा रही है। इस प्रकार प्रो. देसाई ने कल्याणकारी राज्य को जन सामान्य के संघर्ष के क्षेत्र में एक सुनियाजित अवरोध के रूप में सामने रखा है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ए. आर. देसाई ने भारतीय समाजशास्त्रियों की आलोचना किस प्रकार की?
उत्तर:
प्रोफेसर ए. आर. देसाई ने संयुक्त राज्य अमेरिका तथा इंगलैंड से उधार ली गई अवधारणाओं तथा पद्धतियों के आधार पर भारतीय समाजशास्त्रियों के द्वारा सामाजिक-आर्थिक प्रघटनाओं के विशलेषण करने की प्रवृति की कड़ी आलोचना की थी। श्री देसाई के अनुसार भारत में सामाजशास्त्र मुख्यतया उधार ली हुई अवधारणाओं और पद्धतियों का अनुशासन है।

और यह उधार पश्चिमी देशों विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैंड के परम प्रतिष्ठत केंद्रों से लिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि परम प्रतिष्ठित मॉडलों का पीछा करते हुए छद्म बुद्धि व्यापार के दलदल में आत्मलाप है। प्रो.ए.आर. देसाई ने बौद्धिक चेतना एवं विश्लेषण के एक नवीन क्षितिज का सृजन किया। समाजशास्त्रीय विचारों की श्रृंखला को एक नई उष्मा प्रदान की। स्पष्ट है कि जनसाधारण के संघर्ष से समाजशास्त्र के विकास में प्रो. देसाई का योगदान अतुलनीय है।

प्रश्न 2.
देसाई की सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा क्या है?
उत्तर:
प्रो.ए.आर. देसाई ने सार्वजनिक क्षेत्र की अवधारणा को स्पष्ट किया है। वास्तव में अनेक देशों में पूँजीवादी संरचना क विकल्प के रूप में सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा रही है। जब सरकारी तथा अर्द्धसरकारी स्तर पर उत्पादन के विभिन्न साधनों एवं संगठनों पर नियंत्रण किया जाता है, उसका राष्ट्रीयकरण किया जाता है तो उसमें सार्वजनिक क्षेत्रों का एक स्वरूप निर्मित हा जाता है। जैसे भारत में 1970 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

प्रिवीपर्स को समाप्त कर दिया गया। इस प्रकार देश में सार्वजनिक क्षेत्र को महत्त्व देने का प्रयास किया गया। प्रो.ए.आर. देसाई ने अपनी पुस्तक Indian’s path of Development Amarxist Apporach में सार्वजनिक क्षेत्रों का मूल्यांकन किया है। श्री देसाई के अनुसार भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का संतुलित विकास नहीं हुआ है। इस कारण पूंजीपतियों को निरंतर प्रश्रय प्राप्त होता रहता है।

प्रश्न 3.
ए. आर देसाई के समाजशास्त्रीय योगदानों को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
डॉ. योगेन्द्र सिंह ने तुलनात्मक विश्लेषणों के आधार पर प्रो.ए.आर देसाई के समाजशास्त्रीय योगदान का मूल्यांकन किया है। योगेन्द्र सिंह ने निम्न बिंदुओं के आधार पर प्रो. देसाई के महत्त्व को स्पष्ट किया है।

(i) प्रो. योगेन्द्र सिंह के अनुसार सामाजिक अध्ययनों के मार्क्सवादी प्रतिमानों का विकास विशेषकर युवा समाजशास्त्रियों में देखा जाता है। 1950 के दशक में यह दृष्टिकोण अस्तित्व में था लेकिन वह इतना नहीं था उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डी.पी.मुखर्जी ने सामाजिक विश्लेषणों में मार्क्सवादी दृष्टिकोण के स्थान पर शास्त्रीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी थी इस दृष्टिकोण में भारतीय आदर्शों और परंपराओं के साथ द्वंद्वात्मक को तर्क संलग्न किया गया था।

(ii) अपने आरंभिक अध्ययनों में समाजशास्त्रीय रामकृष्ण मुखर्जी ने मार्क्सवादी परंपराओं की बहुत-सी श्रेणीयों और संचालनों का उपयोग किया। लेकिन कालान्तर में, समाजशास्त्र में मार्क्सवादी पद्धतियों को 1950 के दशक की पीढ़ी के समाजशास्त्रियों के मध्य अकेले ए.आर. देसाई ने ही सामजशास्त्र में समान रूप से प्रचारित और प्रयुक्त किया था।

(iii) भारतीय समाजशास्त्र के जिज्ञासात्मक विषय की जड़े व्यापक दृष्टिकोण से मुख्यतः संरचनात्मक, प्रकार्यात्मक अथवा कुछ अर्थों में संरचनात्मकता और ऐतिहासिक संरचनात्मक प्रतिमानों में पाई जाती थीं। यह भारतीय समाजशास्त्र पर ब्रिटिश और अमेरिकी समाजशास्त्री परंपराओं के प्रभाव को स्पष्ट करता है। 1970 और 1980 के दशक के मध्य ये परंपराएँ पाई जाती थीं। इस प्रकार प्रो, योगेन्द्र सिंह न ए.आर. देसाई की सामजशास्त्रीय दृष्टि का तुलनात्मक विश्लेषण किया है।

प्रश्न 4.
ए.आर. देसाई का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
भारतीय सामाजशास्त्रीय अक्षय रमनलाल देसाई का जन्म सन् 1915 में हुआ था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा, बड़ौदा, सूरत तत्पश्चात् मुम्बई में संपन्न हुई। आप ऐसे पहले भारतीय समाजशास्त्री थे जो सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल के औपचारिक सदस्य थे। आप जीवन । भर मार्क्सवादी रहे। आप मार्क्सवादी राजनीति में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।

श्री देसाई के पिता मध्यवर्गी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाल व्यक्ति थे और बड़ौदा राज्य के लोक सेवक थे। वे एक अच्छे उपन्यासकार भी थे। वे समाजवाद, भारतीय राष्ट्रवाद और गाँधी जी की विभिन्न गतिविधियों में रुचि रखते थे। श्री देसाई की माता का देहांत जल्दी हो गया था। श्री देसाई ने अपने पिता के साथ प्रवसन का जीवन अधिक व्यतीत किया, क्योंकि उनके पिता का स्थानांतरण निरंतर होता रहता था।

श्री देसाई का 1948 में पी. एच. डी. की उपाधि मिली। आपकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।

  • Social Background of Indian Nationalism
  • Peasant Struggles in India
  • Agraian Struggles in India
  • State and Society In India

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रो. ए. आर देसाई के समाजशास्त्रीय विचारों को संक्षेप मे लिखिए?
उत्तर:
प्रो. ए. आर देसाई अपने आप में एक विशिष्ट भारतीय समाजशास्त्री हैं जो सीधे तौर पर एक राजनैतिक पार्टी से जुड़े थे और उसके लिए कार्य करते थे। भारतीय समाजशास्त्र में प्रो. देसाई का अवदान अविस्मरणीय है। प्रो. देसाई ने जन-संघर्ष तथा विक्षोभ के वैचारिक आयाम को भारतीय समाजशास्त्र की चिंतन परिधि में एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया एक चेतना संपन्न विचारक के रूप में उन्होंने विश्व की प्रमुख घटनाओं तथा मुद्दों का गंभीर अध्ययन किया।

उन्होंने भारतीय सामजिक संरचना मं पाए जाने वाले शोषण तथा सामाजिक मतांतरों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। सामाजिक-आर्थिक ऐसी राजनीतिक प्रघटनाओं के विश्लेषण में प्रोफेसर ए.आर. देसाई ने उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों एवं स्रोतों को प्रयुक्त किया। पूँजीवाद आर्थिक संरचना तथा श्वेत वसन राजनीतिक व्यवस्था के नकाब को उतारकर रख दिया। भारतीय समाजशास्त्र के विस्तृत आयाम पर प्रोफेसर देसाई ने अध्ययन एवं अनुसंधान को एक सर्वथा नवीन दिशा एवं दृष्टि प्रदान की। परिवार, नातेदारी, जाति, विवाह, धर्म तथा संघर्ष के समाजशास्त्र को मार्क्सवादी दृष्टिकोण के आधार पर एक नवीन ऊर्जा तथा एक नवीन उष्मा प्रदान की। प्रोफेसर ए. आर. देसाई ने लिखा है।

“सामाजिक विज्ञान के अभ्यासियों को गंभीर बौद्धिक तथा नैतिक धर्म संकट का सामना करना पड़ेगा या तो वे देश के शासक के तरीकों को सही सिद्ध करते हए अपने लिए सुरक्षा और सम्मान का इंतजाम करें, या हिम्मत बाँधकर और नतीजों का सामना करने के लिए तैयार होकर ऐसा नजरिया अपनाएँ जो विकास के पूंजीवाद रास्ते को अपनानी वाली सरकार के नेतृत्व में काम करती शक्तियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए दुख भोगते लोगों के लिए उपयोगी ज्ञान को प्रजनित करें तथा उसका प्रचार-प्रसार करें। उनका संघर्ष पूंजीवादी रास्ते के परिणामों के असर को दूर करने के लिए और उनके विपरित विकास के गैर-पूँजीवादी रास्ते के लिए स्थितियाँ तैयार करने के लिए होगा।

इससे भारत में काम काजी लोगों की विशाल संख्या की उत्पादत क्षमता मुक्त हो जाएगी और सम्मान वितरण संभव होगा।” प्रोफेसर ए.आर. देसाई ने पूँजीवादी आर्थिक संरचना, साम्राज्यवाद एवं दमनकारी शक्तियों के विरुद्ध सामजशास्त्रीय चिंतन परिधि के आधार पर विचार प्रकट किए। उन्होनें साभजशास्त्रीय अध्ययन तथा अनुसंधान को जनसंघर्ष के साथ जोड़ा तथा जन-विक्षोभ के विविध आयामों को वैज्ञानिक दृष्टि दी। उन्होनें स्वतंत्र भारत में परिवर्तन तथा विकास की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की।

साथ ही पंचवर्षीय योजनाओं, कृषि समस्याओं, विकास कार्यक्रमों, ग्रामीण संरचनाओं एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का गहन एवं गंभीर विश्लेषण किया उनके अनुसार स्वतंत्र भारत में रज्य की प्रकृति तथा समाज के प्रकार के विश्लेषण में बौद्धिक जगत से जुड़े लोग असफल रहे हैं तथा विद्वानों द्वारा निरंतर जन-संघर्ष के केन्द्रीय बिंदु की उपेक्षा की गई। उन्होंने जन-अहसमति, कल्याणकारी राज्य, भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व, भरतीय राष्ट्रवाद, संक्रमण स्थिति में भारतीय ग्रामीण समुदाय तथा महात्मा गाँधी के सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांतों का आलोचनात्मक परीक्षण किया। उन्होंने अपने विचार तथा चिंतनों के आधार पर सत्ता एवं व्यवस्था का पोषण नहीं किया।

काल्याणकारी राजय के नाम पर पूंजीवादी आर्थिक संरचना के संपोषण की प्रवृति का उन्होंने खलासा किया। एक विद्रोही समाजशास्त्री के रूप में. एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी चिंतक के रूप में तथा जन-असहमति एवं जन संघर्ष के मुद्दों से जुड़े एक प्रखर समाजशास्त्री के रूप में प्रोफेसर ए.आर. देसाई का नाम विचारों की दुनिया में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने भारत में राजनीति तथा विकास के विविध आयामों के लिए सामजशास्त्रियों को उत्प्रेरित किया। उन्होंने कल्याणकारी राज्य, संसदीय लोकतंत्र, राजनीति तथा विकास के अध्ययन हेतु ऐतिहासिक भौतिकवाद के आधार पर भारत में राज्य तथा समाज का विश्लेषण किया। साथ ही, समाजशास्त्रीय नजरिये की एक नई उत्तेजना प्रदान की। सामजशास्त्रीय अध्ययन को बहस का विषय बनाया।

क्या मौजूदा समाजशास्त्रीय अध्ययन पिछड़ापन, गरीबी तथा असमानता के समाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है, क्या भरतीय समाज में तेजी से हो रहे रूपांतरणों की केन्द्रीय प्रवृति को रेखांकित करने में मौजूदा समाजशास्त्रीय अन्वेषण सक्षम है? क्या गरीबों के हक में हस्तक्षेप करने की ताकत सामज शास्त्र में पैदा की जा सकी है? प्रोफेसर देसाई ने स्पष्ट किया कि भारतीय परिदृश्य में समाजशास्त्रीय विश्लेषणों तथा उपागमों पर प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
कल्याणकारी राज्य क्या है? ए. आर देसाई इसके द्वारा किए गए दावों की आलोचना क्यों करते हैं?
उत्तर:
प्रो. देसाई अपनी कृति State and Society in India के कल्याणकारी राज्य की अवधारणा प्रस्तुत की है लोक-कल्याणकारी राज्य किसी अहस्तक्षेपी राज्य से भिन्न है। राज्य का अस्तक्षेपी रूप तो केवल एसे कार्य सम्पादित करता है जो पुलिस कार्य कहलाते हैं, जैस-सुरक्षा कानून व्यवस्था? सम्पत्ति का संरक्षण तथा अनुबंधों का प्रयर्तन । इसके अतिरिक्त अस्तक्षेपी राज्य व्यक्ति के अन्य कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करता जबकि लोक-कल्याणकारी राज्य उपरोक्त कार्यों के साथ-साथ जन स्वास्थ का भी ध्यान रखता है। वे ऐसी बुनियादी सुविधाएँ भी सुलभ कराता है, जिससे लोगों में राज्य के मामलों का प्रभावी भागीदारी निभाने के लिए आवश्यक न्युनतम शिक्षा का लाभ अवश्य पहुँचे।

इसके अतिरिक्त लोक-कल्याणकारी राज्य तो अनिवार्यात: नागरिकों को काम का अधिकार, निश्चित निर्वाह आय का अधिकार तथा आश्रय पाने का अधिकार सुलभ कराना होता है। बेरोजगारों के निर्वाह भत्ता देना भी ऐसा ही राज्य का दायित्व है। सभी को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए लोक कल्याणकारी राज्य मानव अधिकारों में आस्था रखता है। वह आवश्यक रूप से मानव जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता लेकिन आर्थिकता, निर्धनता, बीमारी तथा अन्य सामाजिक बुराईयों को दूर करने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार अहस्तक्षेपी राज्य एक नकारात्मक राज्य हैं जो सुरक्षात्मक (पुलिस कार्य) करता है, जबकि लोक कल्याणकारी सकारात्मक राज्य हैं जो विकास कार्य करता है।

मैसूर नरसिहाचार श्रीनिवास – (1916 – 1999)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
श्री.एम.एन. श्री निवास के समाजशास्त्रीय योगदान को दर्शाने वाले दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:
समाजशास्त्री पी.सी. जोशी ने लिखा है कि एम.एन.श्री निवास ने मनुवाद का विरोध किय तथा बड़ौदा विश्वविद्यालय क प्रमुख शिक्षाविद् प्रो.के.टी.शाह के इस प्रास्तव को ठुकरा दिया कि समाजशास्त्र मनु के धर्मशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है। एम.एन.श्री निवास ने 1996 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘इंडियन सोसाइटी’ श्रू पर्सनल राइटिंग्स में यह स्पष्ट किया कि समाजशास्त्र के अंतर्गत सामाजिक प्रघटनाओं के विश्लेषण हेतु वैज्ञानिक पद्धति आवश्यक है।

एम.एन. श्रीनिवास ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय विद्याशास्त्र तथा समाजशास्त्र को पर्यायवाची शब्द के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। भारतीय विद्याशास्त्र तथा समाजशास्त्र में बहुत अंतर है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि समाजशास्त्रीय परिदृश्य में भारतीय विद्याशास्त्र को समाजशास्त्र के रूप में गहण करने की दोषपूर्ण प्रवृति रही है। एम.एन. श्री निवास ने यह भी स्पष्ट किया है कि सामजशास्त्रीय अध्ययन एवं अनुसंधान हेतु समाजशास्त्रियों को आम जनता के बीच जाना ही होगा। इस प्रकार उन्होंने क्षेत्रीय शोध कार्य के महत्व को रखांकित किया। पुस्तकों, अभिलेखों, पुरात्वों तथा अन्य संबंधित सामग्रियों का उपयोग द्वितीयक स्रोत के रूप में किया जा सकता है।

सामाजिक वास्तविक्ता एवं सामाजिक प्रघटनाओं के अध्ययन के लिए सुदूर नगरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अध्ययन के आधार पर ही प्रामाणीक तथ्यों का विश्लेषण वैज्ञानिक औचित्य एवं वस्तुनिष्ठ पद्धतियों के आधार पर संभव है । इस प्रकार उन्होंने पुस्तकीय परिपेक्ष्य को विशेष महत्त्व प्रदान नहीं किया।

प्रश्न 2.
एम. एन. श्रीनिवास की प्रमुख कृतियाँ कौन सी हैं?
उत्तर:

  • ‘रिलीजन एंड सोसाइटी अमंग दि कुर्गस ऑफ साउथ इंडिया’ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, लंदन, 1952 ।
  • ‘मेथड इन सोशल एंथ्रोपॉलोजी’ यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो प्रेस, शिकागो, संपादित, 19581 ।
  • सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया’ लॉस एंजिलल्स कैलीफोर्निया, 1996 ।
  • ‘कास्ट इन मॉडर्न इंडिया एंड अदर एशज’ मुम्बई एलाइड पब्लिशर्स, 1962 ।
  • ‘द रिमेम्बर्ड विलेज’, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1976 ।
  • ‘द डोमिनेण्ट कास्ट एंड अदर एशेज’ आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1987 ।
  • द कोहेसिव रोड ऑफ.संस्कृताइजेशन’ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1989 ।
  • ऑन लिविंग इन ए रिवोल्यूशन एंड अदर एशेज’, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1992 1
  • इंडयन सोसाइटी श्रू पर्सलन राइटिंग्स’, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 19961 ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पाश्चात्यीकरण की अवधारणा की व्याख्या कीजिए?
उत्तर:
सामजशास्त्री डॉ. श्री निवास के पश्चिमीकरण की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया है। पश्चिमीकरण के संदर्भ में उनका विचार है कि “पश्चिमीकरण शब्द अग्रेजों के शासन काल के 150 वर्षों से अधिक के परिणामस्वरूप भारतीय समाज व संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों को व्यक्त करता है और इस शब्द में प्रौद्योगिकी संस्थाओं, विचारधारा, मूल्यों आदि के विभिन्न स्तरों में घटित होने वाले परिवर्तनों का समावेश रहता है।”

पश्चिमीकरण का तात्पर्य देश में उस भौतिक सामाजिक जीवन का विकास होता है जिसके अंकुर पश्चिमी धरती पर प्रकट हुए और पश्चिमी व यूरोपीय शक्तियों के विस्तार के साथ-साथ विश्व के विभिन्न कोनों में अविराम गति से बढ़ता गया। पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण भी कहते हैं लेकिन अनेक समस्याएँ होते हुए भी पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण के निए पश्चात्य सभ्यता और संस्कृति से संपर्क होना आवश्यक है। पश्चिमीकरण एक तटस्थ प्रक्रिया है।

इसमें किसी संस्कृति के अच्छे या बुरे होने का अभास नहीं होता। भारत में पश्चिमीकरण के फलस्वरूप जाति प्रथा में पाये जाने वाले ऊँच-निच के भेद समाप्त हो रहे हैं। नगरीकरण ने जाति प्रथा पर सिधा प्रहार किया हैं। यातायात के साधनों के विकसित होने से, अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से सभी जातियों का रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज आदि एक जैसे हो गये है। महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार आ रहा है। भारतीय महिलाओ पर पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा है। विवाह की संस्था में अब लचीलापन देखने को मिलता है । विवाह पद्धति में परिवर्तन आ रहे हैं बाल विवाह का बहिष्कार बढ़ रहा है। अन्तर्जातीय विवाह नगरों में बढ़ रहे है। संयुक्त परिवार प्रथा का पालन भी देखने को मिल रहा है। रीति-रिवाजों और खान-पान भी पश्चिमीकरण से प्रभावित हुआ है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्रीय शोध के लिए गांव को एक विषय के रूप में लेने पर एम.एन. श्री निवास तथा लुई ड्यूमों ने इसके पक्ष में क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर:
लई ड्यूमों और एम.एन. श्री निवास दोनों ही भारतीय समाजशास्त्री हैं। दोनों ने ही अनेक विषयों पर समाजशास्त्रीय अन्वेषण किया है। दोनों ने ही ‘ग्राम’ पर भी अपने विचार प्रकट किए है। ‘ग्राम’ को समाजशास्त्रीय अन्वेषण का विषय बनाने के संदर्भ में दोनों ने निम्न तर्क प्रस्तुत किए है: ग्रामीण जीवन कृषि पर आधारति है कृषि एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें सारा ग्राम कृषि समुदाय एक-दूसरे पर निर्भर करता है। सभी लोग फसलों की बुआई, कटाई आदि में एक-दूसरे।

का सहयोग करते हैं। ग्रामीण जीवन में सरलता और मितव्ययता एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ग्रामों में अपराध और पथभ्रष्ट व्यवहार जैसे चोरी, हत्या, दुराचार आदि बहुत कम होते हैं क्योंकि ग्रामीण में बहुत सहयोग होता है। वे भगवान से भय खाते हैं और परम्परावादी होते हैं ग्रामीण लोग नगरों की चकाचौंध और माह से कम प्रभावित होते हैं और साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। उनके व्यवहार और कार्यकलाप गाँव की प्रथा, रूढ़ि, जनरीतियों आदि से संचालित होते हैं। उनकी इसी सहजता के कारण वे समाजशास्त्री अन्वेषण में बहुत सहयोग देते हैं।

प्रश्न 3.
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
समाजशास्त्री एम.एन. श्री निवास के अनुसार, “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विज जाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज, धर्मकांड, विचारधारा और जीवन पद्धति को बदलता संस्कृतिकरण में नए विचारों और मूल्यों को ग्रहण किया जाता है। निम्न जातियाँ अपनी स्थिति को ऊपर उठाने के लिए ब्राह्माणों के तौर तरीकों को अपनाती हैं और अपवित्र समझे जाने वाले मांस मंदिरा के सेवन को त्याग देती हैं। इन कार्यों से ये निम्न जातियाँ स्थानीय अनुक्रम में ऊँचे स्थान की अधिकारी हो गई है। इस प्रकार संस्कृतिकरण नये और उत्तम विचार, आदर्श मूलय, आदत तथा कर्मकांडों को अपनी जीवन स्थित को ऊँचा और परिमार्जित बनाने की क्रिया. है।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में स्थिति में अपरिवर्तित होता है। इसमें संरचनात्मक परिवर्तन नहीं होता है। इसमें संरचनात्मक परिवर्तन नही होता। जाति व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती। सस्कृतिकरण की प्रक्रिया जातियों में ही नहीं बल्कि जनजातियों और अन्य समूहों में भी पाई जाती है। भरतीय ग्रामीण समुदायों में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में प्रभुजाति की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वे संस्कृतिकरण करने वाली जातियों के लिए संदर्भ भूमिका का कार्य करती है।

यदि किसी क्षेत्र में ब्रह्मणों प्रभु जाति है तो वह ब्राह्मणवादी विशेषताओं को फैला देगा। जब निचली जातियाँ ऊँची जातियों के विशिष्ट चरित्र को अपनाने लगती हैं तो उनका कड़ा विरोध होता है। कभी-कभी ग्रामों में इसके लिए झगड़े भी हो जाते हैं। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया बहुत पहले से चली आ रही है। इसके लिए ब्राह्मणों का वैधीकरण आवश्यक था।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 भारतीय समाजशास्त्री

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाज के स्तरीकरण में जाति का आधार स्पष्ट कीजिए?
उत्तर:
जाति एक ऐसे पदसोपानीकृत संबंध को बताती है जिसमें व्यक्ति जन्म लेते है तथा जिसमें व्यक्ति का स्थान, अधिकार का स्थान, अधिकार तथा कर्तव्य का निर्धारण होता है। व्यक्तिगत उपलब्धियाँ तथा गुण व्यक्ति की जाति में परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। जाति व्यवस्था वस्तुतः हिंदू सामजिक संगठन का आधार हैं।

प्रसिद्ध फ्रांसीसी समाजशास्त्री लुई ड्यूमों ने अपनी पुस्तक होमा हाइरारकीकस में जाति व्यवस्था का प्रमुख आधार शुद्धता तथा अशुद्धता की अवधारणा होता है । ड्यूमों ने पदसोपानक्रम को जाति व्यवस्था की विशेषता माना है।

प्रारंभ मे हिंदू समाज चार वर्गों में विभाजित था :

  • ब्राह्मण
  • क्षत्रिय
  • वैश्य तथा
  • शूद्र

शुद्धता तथा अशुद्धता के मापदंड पर ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च तथ शुद्र का निम्न होता है। वर्ण व्यवस्था मे पदानुक्रम क्षत्रियों का द्वितीय तथा वैश्य का तृतीय स्थान होता है। एम.एन.श्री निवास के अनुसार जिस प्रकार जाति व्यवस्था की इकाई कार्य करती है, उस संदर्भ में वह जाति है, वर्ण नहीं है हालांकि, जाति-व्यवस्था के लक्षणों को वर्ण व्यवस्था से ही लिया गया है लेकिन वर्तमान संदर्भ में जाति प्रारूप अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। एम.एन. श्रीनिवास ने जाति की परिभाषा करते हुए कहा है कि:

  • जाति वंशानुगत होती है।
  • जाति अंतः विवाही होती है।
  • जाति आमतौर पर स्थानीय समूह होती है।

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 नागरिकता

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 नागरिकता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 6 नागरिकता

Bihar Board Class 11 Political Science नागरिकता Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
राजनीतिक समुदाय की पूर्ण और समान सदस्यता के रूप में नागरिकता में अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। समकालीन लोकतान्त्रिक राज्य में नागरिक किन अधिकारों के उपभोग की अपेक्षा कर सकते हैं? नागरिकों के राज्य और अन्य नागरिकों के प्रति क्या दायित्व है?
उत्तर:
एक समय था जब सुविधाएँ, अधिकार और महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व समाज के सीमित वर्ग के उन लोगों को दिए गए थे, जो इसके योग्य समझे जाते थे। इसका आधार जाति, आनुवंशिकता और सामाजिक, आर्थिक स्तर था। समाज के अन्य लोग अधिकार और आभार के अयोग्य समझे जाते थे। समाज पूर्ण रूप से पूरक होता था। अब सम्पूर्ण पर्यावरण में बदलाव आ गया है और कोई भी बढ़ती हुई गतिशीलता और आवागमन के साधनों के कारण समाज स्थिर नहीं है।

ऐसी स्थिति में नागरिकता के विचार का अर्थ बदल जाता है। अब नागरिकता अपने अर्थ, क्षेत्र और विस्तार की दृष्टि से विस्तृत अर्थ में स्वीकार किया जाता है। यह अनेक लोगों को नागरिकता प्रदान करती है, जिसमें जाति, रंग, सामाजिक-आर्थिक स्तर का ध्यान नहीं रखा जाता। इसमें अधिकारों और आभार के साथ राजनीतिक समुदाय को पूर्ण एवं समान सदस्यता दी जाती है। आधुनिक उदार प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाओं में टी. एच. मार्शल (T. H. Marshal) के फार्मूला के अनुसार नागरिकों को अधिकार एवं कर्त्तव्य प्रदान किए गए हैं।

मार्शल ने तीन प्रकार के अधिकारों का उल्लेख किया है –

  1. नागरिक अधिकार
  2. राजनीतिक अधिकार
  3. सामाजिक अधिकार

1. नागरिक अधिकार:
ये अधिकार व्यक्ति के जीवन और स्वतन्त्रता से सम्बन्धित हैं।

2. राजनीतिक अधिकार:
ये अधिकार व्यक्ति को राजनीतिक प्रक्रिया और सरकार के कार्यों में शामिल होने की प्रेरणा देता है।

3. सामाजिक अधिकार:
ये अधिकार व्यक्ति के शैक्षिक उपलब्धि और रोजगार से सम्बन्धित हैं।

राज्य और सभी राजनीतिक समुदाय नागरिकों से कुछ कर्तव्यों एवं आभार की आशा करते हैं, जो सरकार के प्रजातान्त्रिक ढाँचे में शामिल हैं। यह कानून और व्यवस्था, नैतिकता, राष्ट्रीय सेवा और संस्कृति, ऐतिहासिक स्मारक और सामुदायिक समरसता का सुदृढ़ीकरण का संरक्षण आदि है।

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प्रश्न 2.
सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए तो जा सकते हैं लेकिन हो सकता है कि वे इन अधिकारों का प्रयोग समानता से न कर सकें। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अधिकांश समाज अधिक्रमिक व्यवस्था में संगठित हैं, जो लोगों की योग्यताओं और क्षमताओं पर आधारित होता है। यह उनके सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरण और मौलिक आवश्यकताओं और सुविधाओं की दृष्टि से भिन्न हो सकते हैं। नागरिकता के परिवर्तित और विस्तृत अवधारणा के अर्थ में और राजनीति के प्रजातान्त्रिक ढाँचे के दृष्टि से अधिक से अधिक लोगों को नागरिक के रूप में राज्य के गतिविधियों में शामिल किया जाता है।

नागरिक रूप में वे अनेक अधिकार कर्त्तव्य और सम्बन्धित नैतिक बन्धन के लिए अधिकृत हैं। सार्वजनिक नागरिकता में लोगों की सहभागिता और संलग्नता महत्त्वपूर्ण है। सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर दिए जा सकते हैं परन्तु यह सामान्य प्रक्रिया नहीं है।

लोगों की विभिन्न समुदायों की विभिन्न आवश्यकताओं, समस्याएँ, योग्यताएँ और समताएँ हो सकती हैं, क्योंकि उनके सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दशाएँ अलग होती हैं। विभिन्न समुदाय के नागरिकों के अधिकार दूसरे समुदाय के नागरिकों के अधिकारों के विरोधाभासी हो सकते हैं। समान अधिकार का तात्पर्य निश्चित नीति विभिन्न समुदायों के लिए नहीं होता।

लोगों को अधिक से अधिक समान बनाने के लिए लोगों के विभिन्न आवश्यकताओं और माँगों को भी ध्यान में रखना चाहिए। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जा सकते हैं परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि सभी नागरिक इनका उपभोग समान रूप से कर सकते हैं। भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समान मौलिक अधिकार प्रदान किए हैं परन्तु समाज के कुछ ही वर्ग अपनी क्षमताओं और योग्यताओं से इसका उपभोग करते हैं।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 6 नागरिकता

प्रश्न 3.
भारत में नागरिक अधिकारों के लिए हाल के वर्षों में किए गए किन्हीं दो संघर्षों पर टिप्पणी लिखिए। इन संघर्षों में किन अधिकारों की माँग की गई थी?
उत्तर:
हाल के वर्षों में अनेक ऐसे संघर्ष नागरिकों के अधिकारों के उपभोग के लिए हुए हैं, जिनका उद्देश्य लोगों की आवश्यकताओं में परिवर्तन करना है। ये संघर्ष निम्नलिखित हैं –

  1. महिलाओं के आन्दोलन
  2. दलितों के आन्दोलन

1. महिलाओं के आन्दोलन:
यद्यपि भारत 15 अगस्त, 1947 ई. को आजाद हो गया था तथापि अधिकांश महिलाएँ अन्याय और भेदभाव की शिकार और आश्रित हैं। उन्हें पुरुष की अपेक्षा निम्न माना जाता है और किसी भी कार्य के योग्य नहीं समझा जाता है। ग्रामीण महिलाओं में चेतना आ गयी है और अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को पहचानने लगी हैं।

फलस्वरूप महिला आन्दोलन का जन्म हुआ। इस आन्दोलन ने जनता और सरकार का ध्यान आकृष्ट किया, जिससे सरकार की नीतियाँ महिलाओं के पक्ष में बनायी गईं। अब महिलाओं के आन्दोलन के फलस्वरूप महिलाओं ने राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रवेश कर लिया है। महिलाओं को शक्तिशाली बनाने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए घोषणा हुई है। भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग का निर्माण महिलाओं की उन्नति और उनकी सुरक्षा के लिए किया गया है।

दलित आन्दोलन:
दलित आन्दोलन शोषित वर्ग का एक अन्य आन्दोलन है। भारतीय समाज में इस वर्ग को दबाया गया था। यह आन्दोलन स्वतन्त्रता से पूर्व और बाद में भी हुआ। इस वर्ग का लम्बे समय तक शोषण किया गया और वे अन्याय के शिकार रहे। अनेक सामाजिक सुधारकों ने आन्दोलन शुरू किए, जिसने पूरे दृश्य को बदल दिया। सरकार ने दलितों की दशा सुधारने के लिए कई कदम उठाए।

उनके लिए सरकारी नौकरियों में, शिक्षा और चुनावों में उनके लिए सीट आरक्षित किया। इसके अलावा विधान सभा और सांसद के सीटों में भी इन्हें शामिल किया गया और आज समाज के अंग बन गयी हैं। समाज, राजनीति और प्रशासन में उनकी स्थिति
महत्त्वपूर्ण हो गयी है।

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प्रश्न 4.
शरणार्थियों की समस्याएँ क्या हैं? वैश्विक नागरिकता की अवधारणा किस प्रकार उनकी सहायता कर सकती है?
उत्तर:
शरणार्थी वे लोग होते हैं, जो राज्यविहीन होते हैं और दूसरे राज्य में निवास करने के लिए प्रयास करते हैं और अपनी बस्ती की खोज में रहते हैं। ये शरणार्थी (Refugees) या तो युद्ध के कारण अथवा राष्ट्रीय संकट जैसे-अकाल, बाढ़ आदि से राज्यरहित हो जाते हैं। समान्यतः लोग पड़ोसी देशों में शरणार्थी बन जाते हैं।

शरणार्थियों को अनेक प्रकार के सामाजिक, आर्थिक और मानवतावादी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि कोई राज्य उन्हें अपने यहाँ रखने के तैयार नहीं होता, वे अपने घर भी वापस नहीं जा सकते, क्योंकि वे प्रारम्भ से निवास रहित होते हैं। वे निवासरहित, राज्यरहित और अनिश्चितता में होते हैं। इसलिए कैम्प में गैर-कानूनी प्रवजन कर्ता के रूप में रहने के लिए विवश होते हैं।

बहुधा कानूनी तौर पर कार्य नहीं कर सकते हैं और बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकते। उनके बच्चों का भविष्य अनिश्चित होता है। वे किसी सम्पत्ति को भी अपना नहीं सकते। उनकी समस्या इतनी गम्भीर है कि संयुक्त राष्ट्र (UNE) ने इनकी सहायता के लिए एक उच्च आयोग (High Commission) नियुक्त किया है। 1947 ई. में भारत विभाजन के समय हजारों लोग शरणार्थी बन गए। सभी शरणार्थियों को कोई भी राज्य अपने अन्दर समन्जित नहीं कर सकता। वस्तुतः इस समस्या का सामना केवल शरणार्थी ही नहीं कर रहे हैं अपितु सम्पूर्ण विश्व समुदाय इससे जूझ रही है।

वैश्विक नागरिकता का विचार निश्चित रूप से इस समस्या को हल कर सकता है चाहे यह पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से हो। संचार के नये साधन जैसे इंटरनेट, दूरदर्शन और सेलफोन ने वैश्विक नागरिकता को पर्याप्त ग्रहणीय और अनुकूल बनाया है। वैश्विक नागरिकता के समर्थक तर्क देते हैं कि यद्यपि एक विश्व, समुदाय और वैश्विक समाज आज भी विद्यमान नहीं है, परन्तु लोग राष्ट्रीय सीमा के बाहर के लोगों से जुड़े हुए हैं। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के लोग विश्व के किसी भी भाग के प्राकृतिक आपदा के समय एक साथ हो जाते हैं। यह वैश्विक विचार को मजबूत करते हैं, जो आगे चलकर शरणार्थियों की समस्या को हल कर सकते हैं।

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प्रश्न 5.
देश के अन्दर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लोगों के अप्रवासन का आमतौर पर स्थानीय लोग विरोध करते हैं। प्रवासी लोग अर्थव्यवस्था में क्या योगदान दे सकते हैं?
उत्तर:
प्रवास की प्रक्रिया और फलस्वरूप शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से अनेक समस्या उत्पन्न होती है, जिसकी प्रतिक्रिया स्थानीय लोगों में दिखाई देती है। स्थानीय लोग इन्हें अपना प्रतिद्वन्दी मानते हैं और इस प्रकार दोनों का विभाजन भीतरी और बाहरी (insiders & outsiders) के रूप में हो जाता है। बाहरी लोगों को अपने जीवन में खतरा दिखाई देता है।

इसी प्रकार की प्रवृतियाँ शहरी क्षेत्रों और यहाँ तक कि विभिन्न देशों में दिखाई देती हैं। फिलीस्तीनी लोग अब तक भी व्यवस्थित नहीं हैं। इसी प्रकार का विवाद श्रीलंका में है। स्थानीय लोग हरेक प्रकार का प्रयास बाहरी लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए करते हैं। इस समस्या से जुड़े अनेक प्रकार के नारे भी प्रचलित हो गए हैं जैसे-मुम्बई, मुंबई वालों की है, हरियाणा, हरियाणवी के लिए है। उत्तर-दक्षिण का भी विवाद है। इस सन्दर्भ में भूमि-पुत्र का सिद्धान्त भी विकसित हुआ है।

भीतरी लोगों और बाहरी लोगों, स्थानीय और शरणार्थियों के मध्य विवाद के कारण सभी लोगों को पूर्ण और समान सदस्यता देने की आवश्यकता महसूस हुई है। इससे सम्बन्धित अनेक संघर्ष उत्तर-पूर्व राज्यों, मुम्बई और पंजाब में हुए हैं। देश की विभिन्न भागों में बिहार के लोग रोजगार की खोज में प्रवास किए हैं। ऐसे स्थानों पर उनके स्थानीय लोगों के मध्य संघर्ष हुए हैं। लोगों का राज्य के एक भाग से दूसरे भाग में रोजगार की खोज में प्रवास करना नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों पक्ष है।

प्रवास करने वाली के उस स्थान पर बाहरी एवं भीतरी लोगों में विभाजित हैं। उन्हें रोजगार एवं नागरिक सुविधाएँ जैसे–शिक्षा, स्वास्थ्य, जल और विद्युत्त के लिए धमकाया जाता है परन्तु सकारात्मक पहलू भी है। ऐसे प्रवासी लोग सामान्यतः कठोर परिश्रम करते हैं और उस राज्य की अर्थव्यवस्था में उपयोगी योगदान देते हैं, जहाँ वे बाहरी कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हैं। वे वहाँ मजदूर, श्रमिक और विशेषज्ञ कारीगर के रूप में कार्य करते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल के अकुशल श्रमिक हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और पंजाब में काम करके अपनी जीविका चला रहे हैं, उनको अपने राज्य में रोजगार उपलब्ध नहीं हैं।

यहाँ तक कुछ लोग जीविका के लिए विदेश जाते हैं। कुशल श्रमिकों के लिए देश के विभिन्न भागों में बाजार विकसित हुए हैं। आई. टी. (प्रोफेशनल) अर्थात् कम्प्यूटर इंजीनियर बंगलोर में अच्छा कार्य कर रहे हैं, केरल की नसें देश के विभिन्न भागों में कार्य कर रही हैं। वे उपयोगी और कीमती सेवा मानव जाति की अपने राज्य की चिन्ता किए बिना कर रहीं हैं। मुम्बई में भवन और रोड के विकास में शिक्षित और अशिक्षित लोग कार्य कर रहे हैं। वे अपने लिए और अपने देश के लिए कार्य कर रहे हैं। हमारे देश के आवागमन का अधिकार संविधान से मिला हुआ है, जो अत्यन्त उपयोगी, सिद्ध हुआ है।

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प्रश्न 6.
भारत जैसे समान नागरिकता देने वाले देशों में भी लोकतान्त्रिक नागरिकता का एक पूर्ण स्थापित तथ्य नहीं वरन एक परियोजना है। नागरिकता से जुड़े उन मुद्दे की चर्चा कीजिए, जो आजकल भारत में उठाए जा रहे हैं?
उत्तर:
नागरिकता की आदर्श परिभाषा राजनैतिक समुदाय की पूर्ण एवं समान सदस्यता है। यह परिभाषा एक लोकतान्त्रिक राजनीतिक समुदाय में अधिकाधिक ऐच्छिक है। यह सन्तोष की बात है कि लोकतान्त्रिक नागरिकता अथवा पूर्ण और समान सदस्यता अधिक जागरुकता के साथ विश्व के अधिकांश देशों में हैं। हालाँकि इसकी अधिकांश पृष्ठभूमि अभी व्यवहार में नहीं है।

पूर्ण एवं समान नागरिकता के उद्देश्य को प्राप्त करना अभी दूर ही है। इसलिए यह ठीक ही कहा जाता है कि लोकतान्त्रिक नागरिकता का विचार अभी पूर्ण तथ्य की अपेक्षा एक परियोजना है। यहाँ तक कि लोकतान्त्रिक राजनीतिक समुदाय यथा भारत में भी अभी एक प्रयोग के रूप में है। भारत ने 59 वर्ष से अधिक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को निभाया है, जो वयस्क मताधिकार और लोगों की सहभागिता पर आधारित है।

भारतीय संविधान में आवश्यक लोकतान्त्रिक और समाविष्ट नागरिकता को अपनाया गया है। भारत में नागरिकता जन्म से, निवास से, पंजीकरण से और प्राकृतिकरण से प्राप्त की जा सकती है। नागरिकों के अधिकार एवं आभार को संविधान में उल्लेखित किया गया है। यह भी वर्णन है कि राज्य को नागरिकों के विरुद्ध भेदभाव नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार के समाविष्ट अधिकार ऐच्छिक अधिकार को जन्म नहीं देते। महिला आन्दोलन और दलित आन्दोलन धनी और गरीब में गलतफहमी पैदा कर रहे हैं। ये सामाजिक समूह के पूरक या प्रभावी स्थिति को प्रकट करते हैं। सामाजिक परिवर्तन के रूप में नये मुद्दे निरन्तर उठाए जा रहे हैं और समूहों के द्वारा नई माँगें की जा रही है। वे अपने को तटस्थ मानने लगते हैं और समाज के मुख्य धारा से हटा दिए जाते हैं। प्रजातान्त्रिक राज्य में इन मांगों को सामाजिक एकता के लिए ध्यान में रखना चाहिए।

Bihar Board Class 11 Political Science नागरिकता Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
श्री अनिल अभी-अभी एक व्यस्त कारोबारी दौरे से लौटकर आए थे। अगले दिन उसका कार्यालय चुनाव के कारण बन्द था। उन्होंने पूरा दिन फिल्म देखने और सोने में बिताया। श्री अनिल रवैये में क्या गड़बड़ हैं? (Mr. Anil had just come from a busy business tour The next day the office was closed because of elections. He spent the whole day watching a film and sleeping. What is wrong with Mr. Anil’s attitude?)
उत्तर:
उदासीनता अर्थात् गलत रवैये (Wrong attitude) का पनपना या नागरिकता के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोण।

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प्रश्न 2.
पचास शब्दों के बीच भेद कीजिए। (Answer in about 50 words)
1. निम्नलिखित के बीच भेद कीजिए (Distinguish between)
(क) नागरिक और बाहरी व्यक्ति।
(ख) जन्मजात और देशीयकृत नागरिकता।
उत्तर:
(क) नागरिक और बाहरी व्यक्ति के भेद-नागरिक वह व्यक्ति है, जो किसी देश या राज्य का सदस्य होता है, वह उसके प्रति निष्ठावान होता है। वह नागरिक तथा राजनीतिक अधिकारों का उपयोग करता है। वह देश के शासन संचालन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेता है। बाहरी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य राज्य (देश) में अस्थाई रूप में निवास किया जाता है। वह नागरिकों की भाँति राजनीतिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकता और न ही देश के शासन (Administration) में भाग ले सकता है।

(ख) जन्मजात और देशीयकृत नागरिकता में भेद-जन्मजात नागरिक वह कहलाता है, जो किसी देश में पैदा या उसके माता-पिता उस देश के नागरिक होते हैं। देशीयकृत नागरिक वह होता है, जो किसी अन्य देश की नागरिकता कुछ आवश्यक शर्तों को पूर्ण करके प्राप्त करता है।

2. गोआ के लोग भारत के नागरिक कैसे बने? (How did the people of Goa become Indian citizens?)
उत्तर:
गोआ सन् 1961 ई. में पुर्तगाल से स्वतन्त्र होकर भारत का हिस्सा बन गया। अतः गोआवासी, भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अन्तर्गत भारतीय बन गए।

3. यदि कोई व्यक्ति अपने देश से कई वर्षों तक बाहर रहे, तो क्या होगा? (What would happen if a person stayed away from his/her country for many years?)
उत्तर:
उस व्यक्ति को दीर्घकालीन अनुपस्थिति के कारण उसे अपने देश की नागरिकता खोनी पड़ेगी।

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प्रश्न 3.
नागरिकता से क्या अभिप्राय है? (What is ineant by citizenship?)
उत्तर:
नागरिकता (Citizenship):
नागरिकता नागरिक की वह विशेषता अथवा गुण है, जिसके कारण उसे राज्य से राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं वह राज्य का नागरिक कहलाता है।

प्रश्न 4.
नागरिक व विदेशी में क्या अन्तर है? (What is the difference between a citizen and a foreigner?)
उत्तर:
नागरिक तथा विदेशी में निम्नलिखित अन्तर हैं –

  1. नागरिक उस राज्य का स्थायी निवासी होता है और विदेशी दूसरे राज्य का होता है।
  2. दोनों के अधिकारों में भी भिन्नता होती है। नागरिकों को राजनीतिक व सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं, विदेशियों को नहीं।
  3. अपने राज्य के प्रति वफादारी रखना नागरिक का कर्तव्य है परन्तु विदेशी अपने राज्य (जिसका वह नागरिक है) के प्रति वफादार होता है।
  4. युद्ध के समय विदेशियों को राज्य की सीमा से बाहर जाने के लिए कहा जा सकता है परन्तु नागरिकों को नहीं।
  5. नागरिक अपने राज्य की दीवानी तथा फौजदारी न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अधीन होता है, जबकि विदेशी अस्थायी से निवास वाले राज्य के दीवानी, फौजदारी न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अधीन होता है।

प्रश्न 5.
नागरिकता अधिनियम, 1955 का निम्नलिखित में से किससे सम्बन्ध है? (Which of the following does the Citizenship Act of 1955 deal with?)
(क) नागरिक की परिभाषा
(ख) बाहरी व्यक्ति की परिभाषा
(ग) बाहरी व्यक्तियों के अधिकार
(घ) नागरिकता की प्राप्ति तथा समाप्ति
उत्तर:
(घ) नागरिकता की प्राप्ति तथा समाप्ति

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन भारत में बाहरी व्यक्ति हैं?
(From the option give below, choose which of the following are aliens in India?)

  1. रीता जो भारत में जन्मे अपने पिता और फ्रांसीसी माँ के साथ रहती है।
  2. जानकी जो भारत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए मारीशस से आई है।
  3. श्री विलियम बेकर जो आस्ट्रेलिया के उच्चायोग में विदेश सेवा के अधिकारी हैं।
  4. लखनऊ का रहने वाला एक लड़का खालिद आमीर, अमरिका में पढ़ाई कर रहा है।

उत्तर:
(2) – (3)

प्रश्न 7.
भारत की नागरिकता ग्रहण करने के गलत विकल्प को चुनिए। (Select the incorrect option of acquiring Indian citizenship)
(क) कोई एक भारतीय भाषा बोल सकता/सकती है।
(ख) कम से कम पाँच वर्ष तक भारत में रह चुका/चुकी है।
(ग) जिस देश का/की वह है, वहाँ की नागरिकता छोड़ चुका/चुकी है।
(घ) अच्छा वेतन अर्जित करने में सक्षम है।
उत्तर:
(घ) अच्छा वेतन अर्जित करने में सक्षम है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए। (Answer the following questions)
1. फिलिप टेलर का जन्म नई दिल्ली में हुआ था, उसके पिता एक अमेरिकी हैं, जो नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में काम करते हैं। फिलिप किस देश का नागरिक होगा?
(Phillip Taylor was born in New Delhi. His fater is an American working at the American Embassy in New Delhi Which country’s citizenship would Philip have?)
उत्तर:
फिलिप के पास भारतीय या अमरिकी नागरिकता में से कोई एक चुनने का विकल्प है।

1. भारत के श्रीरामदीन को मलेशिया की न्यायपालिका में मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया गया है। क्या वे देशीकृत नागरिक बन सकते हैं। (Mr. Ram Deen of Indian has been appointed as a Magistrate in the Malay sian Judiciary. Can he become a naturalized citizen of the country?)
उत्तर:
हाँ, यदि किसी विदेशी को किसी सरकारी पद पर नियुक्त किया जाता है, तो वह उस देश की नागरिकता ग्रहण कर सकता है, जहाँ का वह लोकसेवक बना है।

2. पाकिस्तान का एक भाग, पूर्वी पाकिस्तान, 1971 ई. में मुक्त होकर स्वतन्त्र देश, बंगलादेश बन गया। भूतपूर्व पूर्वी पाकिस्तानियों की नागरिकता पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? (In 1971, East Pakistan, a part of Pakistan, was liberated and became an independent country Bangladesh. How did this affect the citizenship of the former East Pakistanis?)
उत्तर:
उन्होंने बंगलादेश की नागरिकता ग्रहण कर ली।

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से किसे अपनी भारतीय नागरिकता छोड़नी पड़ेगी? (Which of the following would have to surrender their Indian citizen ship?)
(क) ज्योत्सना सिंह, जिसे आस्ट्रेलिया में अध्ययन के लिए शोधवृत्ति मिली है।
(ख) जग्ग, जिसे डकैती डालते हुए पकड़ा गया।
(ग) राधिका, जो छुट्टियाँ मनाने स्वीडेन गई है।
(घ) सिद्धार्थ मेहता, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति का सलाहकार नियुक्त किया गया है।
उत्तर:
(घ) सिद्धार्थ मेहता, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति का सलाहकार नियुक्त किया गया है।

प्रश्न 10.
सही विकल्प चुनिए। (Choose the correct option) अर्थहीन प्रथाओं और अन्धविश्वासों को दूर किया जा सकता है। Meaningless social customs and superstitions can be removed by –
(क) अधिक शहरीकरण से
(ख) अधिक व्यक्तियों को रोजगार देने से
(ग) गरीबी दूर करके
(घ) शिक्षा के प्रसार से
उत्तर:
(घ) शिक्षा के प्रसार से

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक आदर्श नागरिक के गुणों का वर्णन कीजिए। (Describe the merits of a good citizen)
उत्तर:
1. सुशिक्षित (Educated):
सुशिक्षित होना आदर्श नागरिक के लिए परमावश्यक है। शिक्षा के अभाव में वह अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों को नहीं समझ सकता। अतः प्रजातन्त्र की सफलता के लिए अच्छे नागरिकों का सुशिक्षित होना आवश्यक है।

2. स्वस्थ (Healthy):
एक आदर्श नागरिक का स्वस्थ होना आवश्यक है। स्वस्थ नागरिक ही देश व समाज की भली-भाँति सेवा कर सकता है।

3. मताधिकार का उचित प्रयोग (Proper use of vote):
आदर्श नागरिक अपने मताधिकार का सही प्रयोग कर सकता है और अपना मूल्यवान वोट योग्य, शिक्षित, नि:स्वार्थ एवं देशभक्त को दे सकता है।

4. अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान (Awaknes about theirrights and duties):
एक आदर्श नागरिक अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का प्रयोग ठीक से करता है।

5. देशभक्त (Patriot):
एक आदर्श नागरिक को देशभक्त होना चाहिए। देश के प्रति स्वाभाविक अनुराग होना चाहिए।

6. परिश्रमी (Hardworkers):
एक अच्छे नागरिक को परिश्रमी एवं फुर्तीला होना चाहिए, जिससे वह सफलतापूर्वक सामाजिक कार्य कर सके।

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प्रश्न 2.
आधुनिक राज्य अपने नागरिकों को कौन-कौन से राजनैतिक अधिकार प्रदान करते हैं? (Which type of political rights are given to the citizens by the Modern States?)
उत्तर:
आधुनिक युग में अधिकतर देश प्रजातन्त्रीय हैं। ये देश अपने नागरिकों को बहुत से राजनीतिक अधिकार प्रदान करते हैं। उनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं –

1. मतदान का अधिकार (Right to Vote):
जिन देशों में प्रजातन्त्रात्मक शासन की स्थापना की जाती है, उनमें वहाँ के वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार प्रदान किया जाता है। इस अधिकार के अनुसार लोग समय-समय पर होने वाले चुनावों के द्वारा अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं। जनता के प्रतिनिधि ही सरकार का निर्माण करते हैं और शासन चलाते हैं।

2. चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Contest Election):
प्रजातन्त्रीय शासन में, प्रत्येक व्यक्ति जो यह समझता है कि उसके सहयोगी उसे अपना प्रतिनिधि चुनना चाहते हैं, उसे निर्वाचन में खड़ा होने का अधिकार है। निर्वाचित होने के बाद व्यक्ति नागरिकों के प्रतिनिधि के रूप में सरकार का निर्माण करते हैं।

3. सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार (Right to hold public office):
आधुनिक युग में नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के सरकारी नौकरियाँ पाने का अधिकार है।

4. कानून के समक्ष समानता का अधिकार (Right to equality before Law):
आधुनिक राज्यों में नागरिकों को कानून के सम्मुख समानता का अधिकार प्रदान किया जाता है।

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प्रश्न 3.
किसी राज्य की नागरिकता के लिए आवश्यक शर्ते क्या हैं? (What are the essential conditions for the citizenship of a state?)
उत्तर:
नागरिकता के लिए चार चीजों की आवश्यकता होती है –
1. राज्य की सदस्यता-वर्तमान में प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी राज्य का सदस्य अवश्य होता है। राज्य की सदस्यता ही व्यक्ति को उस राज्य की नागरिकता दिलाती है और वह उक्त समाज का अंग बन जाता है।

2. राज्य के प्रति भक्ति-राज्य के प्रति भक्ति होना अत्यन्त आवश्यक है। 1999 ई. में जब पाकिस्तान के कारगिल में सैनिकों ने घुसपैठ की तो सारे भारत में विरोध के बदले की भावना उत्पन्न हुई तथा जनवरी 2001 ई. में गुजरात में जब भूकम्प से जान व माल को नुकसान हुआ, तो भारतीयों में सहयोग की भावना उत्पन्न हुई। यह समाज के प्रति भक्ति का अच्छा उदाहरण है।

3. नागरिक, राजनीतिक तथा सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति-किसी राज्य का नागरिक किसी व्यक्ति को उसी दशा में कहा जा सकता है, जबकि उसे राज्य की ओर से नागरिक, राजनीतिक तथा सामाजिक अधिकार प्राप्त हों। प्रारम्भ से आज तक किसी न किसी रूप में राज्य ने अपने नागरिकों को ये अधिकार प्रदान किए हैं।

4. कर्तव्य-पालन-राजनीतिक तथा सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति के बदले में नागरिक में कर्तव्य पालन की भावना होना आवश्यक है। नागरिक को चाहिए कि वह राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों को अवश्य पूरा करे तथा राज्य की सुरक्षा, उन्नति एवं विकास में सभी प्रकार का सहयोग प्रदान करें।

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प्रश्न 4.
नागरिकता ग्रहण करने के कौन-कौन से तरीके हैं? (What are the different ways of acquiring citizenship?)
उत्तर:
नागरिकता ग्रहण करने के तरीके निम्नलिखित हैं –

  1. विवाह-कोई विदेशी स्त्री भारतीय पुरुष से विवाह करने के बाद भारत की नागरिकता ग्रहण कर सकती है। जापान में नागरिकता कानून भिन्न हैं। यदि कोई जापानी स्त्री भारतीय या किसी अन्य राष्ट्र के पुरुष से विवाह करती है, तो वह व्यक्ति जापान की नागरिकता ग्रहण कर सकता है।
  2. सरकारी पद पर कर्मचारी या अधिकारी के रूप में नियुक्ति-यदि किसी विदेशी को किसी सरकारी पद पर नियुक्त किया जाता है, तो वह उस देश की नागरिकता ग्रहण कर सकता/सकती है, जहाँ का वह लोक सेवक बना/बनी है।
  3. अचल संपत्ति की खरीद या क्रय करके-कुछ देशों में यदि किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति जैसे घर या जमीन खरीदने का अनुमति है, तो वह नागरिकता भी ग्रहण कर सकता/सकती है।
  4. भूमि का अधिग्रहण-यदि किसी देश की भूमि अन्य देशों के द्वारा अधिग्रहीत कर ली जाती है, तो उस क्षेत्र के सभी निवासी उस देश के नागरिक बन जाते हैं।

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प्रश्न 5.
किसी नागरिक की नागरिकता कैसे समाप्त हो सकती है? (How can a citizen lose her/his citizenship?)
उत्तर:

  1. देशद्रोह या निरन्तर विद्रोही गतिविधियाँ-यदि कोई नागरिक देश के साथ गद्दारी करते हुए संविधान का अनादर करे तथा देश की शान्ति और व्यवस्था को लगातार भंग करे तो उसे देश की नागरिकता से वंचित किया जा सकता है।
  2. किसी भू-भाग के पृथक होने पर-यदि देश का कोई हिस्सा किसी समझौते या संधि द्वारा अलग हो जाए, तो वहाँ के सभी नागरिक दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त करेंगे, व उन्हें पहले देश की नागरिकता छोड़नी होगी।
  3. विदेशी में सरकारी अधिकारी के रूप में नियुक्त-जब कोई व्यक्ति किसी विदेशी सरकार की सेवा में पद ग्रहण करता है, तो उसकी मूल नागरिकता समाप्त हो सकती है।
  4. विदेश सेना, नौसेना या वायुसेना में सेवा-रक्षा सेवाएँ किसी देश के संवेदनशील अंग होते हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश की रक्षा सेवाओं में पद ग्रहण करता है, तो उसकी मूल नागरिकता समाप्त हो सकती है।
  5. विदेशी से विवाह-यह नागरिकता समाप्त होने के सबसे प्रचलित कारणों में से एक है। यदि कोई भारतीय स्त्री किसी विदेशी से विवाह करती है, तो वह भारतीय नागरिकता छोड़कर अपने पति के देश की नागरिकता ग्रहण कर सकती है।
  6. विदेश में स्थायी निवास-यदि कोई भारतीय किसी अन्य देश में जाकर रहने लगे, तब वह अपने देश की नागरिकता खो देता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक नागरिक के तीन प्रमुख कर्त्तव्यों की व्याख्या करें। (Explain three primary duties of a citizen)
उत्तर:
कर्त्तव्य का अर्थ (Meaning of Duty):
साधारण शब्दों में किसी काम को करने या न करने के दायित्वों को कर्तव्य कहते हैं। कर्त्तव्य सकारात्मक या नकारात्मक कार्य है, जो व्यक्ति को दूसरों के लिए करना पड़ता है, चाहे उसकी इच्छा उस कार्य को करने की हो या न हो। संक्षेप में, कर्त्तव्य कुछ ऐसी निश्चित और अवश्य किए जाने वाले कार्यों को कहते हैं, जो कि सभ्य समाज और राज्य में रहते हुए व्यक्ति को प्राप्त किए गए अधिकारों के बदले में करने पड़ते हैं।

नागरिकों के कानूनी कर्तव्य (Legal Duties of the Citizens):
ऐसे कर्तव्य जिनको करने के लिए प्रत्येक नागरिक बाध्य होता है, कानूनी कर्त्तव्य कहलाते हैं, जो व्यक्ति कानूनी कर्तव्यों का पालन नहीं करता, राज्य उन्हें दण्ड दे सकता है। देश के प्रति वफादार रहना, सैनिक सेवा कर देना इत्यादि नागरिकों के कानूनी कर्त्तव्यों की श्रेणी में आते हैं।

1. राज्य के प्रति वफादारी (Loyalty towards the State):
राज्य प्रत्येक नागरिक को अनेक प्रकार के अधिकार प्रदान करता है व कई प्रकार की सुख-सुविधाएँ भी प्रदान करता है। राज्य अपने नागरिकों की बाहरी आक्रमणों से तथा प्राकृतिक विपत्तियों से भी रक्षा करता है और उनके विकास के लिए प्रयत्नशील रहता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति से राज्य के प्रति निष्ठा व भक्ति की आशा की जाती है। प्रत्येक नागरिक का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह देशद्रोह न करे और देश पर आए संकट के समय अपना तन-मन-धन न्यौछावर करने को तैयार रहे।

2. कानूनों का पालन करना (Obedience of Laws):
कानून-पालन की भावना से राज्यों में शान्ति व व्यवस्था व्यवस्थित हो सकती है। आजकल के प्रजातान्त्रिक देशों में कानूनों का निर्माण जनता के प्रतिनिधि करते हैं। जिस देश में नागरिकों की प्रकृति कानूनों का उल्लंघन करने की होती है, उस देश में शान्ति व व्यवस्था विद्यमान नहीं रहती। अतः कानूनों का पालन करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है।

3. टैक्स देना (Payment of taxes):
सरकार को अपने कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है। सरकार धन की प्राप्ति कर लगाकर करती है। अत: नागरिकों का यह कानूनी कर्त्तव्य है कि वे अपने हिस्से के करों को ईमानदारी से चुकाएँ। करों को ईमानदारी से न चुकाने पर राज्य द्वारा दण्ड भी दिया जा सकता है।

4. राजनीतिक अधिकारों का उचित प्रयोग करना (Proper use of the Political Rights):
प्रजातन्त्रीय शासन में नागरिकों को बहुत से राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। उनमें से प्रमुख हैं-मत देने का अधिकार, निर्वाचित होने का अधिकार व सरकारी नौकरी प्राप्त करने का अधिकार। प्रत्येक अधिकार का यह कानूनी कर्त्तव्य है कि वह अपने मत का सदुपयोग करे और किसी अच्छे उम्मीदवार को ही देश का शासन चलाने के लिए अपना प्रतिनिधि चुने। इसके साथ-साथ अपने निर्वाचित होने के अधिकार का भी ईमानदारी से प्रयोग करे।

5. सैनिक सेवा में भाग लेना (To take in defence service):
नागरिकों का यह भी कर्तव्य है कि आवश्यकता पड़ने पर देश की सुरक्षा हेतु सेना में भर्ती हो।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 6 नागरिकता

प्रश्न 2.
लोकतन्त्र में नागरिक की भूमिका की व्याख्या कीजिए। (Explain the role of a citizen in a democracy)
उत्तर:
लोकतन्त्र में नागरिक की भूमिका –
1. लोकतन्त्र लोगों की, लागों द्वारा तथा लोगों के लिए कार्य करने वाली सरकार है। आजकल राज्यों का आकार (जनसंख्या तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से) बहुत बड़ा है। नागरिक समय-समय पर मतदान में भाग लेकर, चुनाव लड़कर या अपने दल गठन करने एवं चुनाव के बाद उसके कार्यों में रुचि लेकर एवं सहयोग देकर अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं।

2. अपने कर्तव्यों का पालन करके तथा दायित्वों का निर्वाह करके-लोकतन्त्र में हर नागरिक अपने कार्यों तथा दायित्वों की जिम्मेदारी निष्ठा से निभा कर लोकतन्त्रीय सरकार में योगदान देते हैं या अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं।

3. अनुशासनबद्धता का पालन एवं सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करके-नागरिक लोकतन्त्र की सफलता के लिए शान्ति तथा अनुशासन को जरूरी मानते हैं। वे कानून को अपने हाथ में नहीं लेते तथा अपने विचारों को समाचार-पत्रों, टेलीविजन, रेडियो, सभाओं, प्रदर्शनों द्वारा अभिव्यक्त करते हैं। वे सार्वजनिक सम्पत्ति तथा राष्ट्रीय विरासत की रक्षा में भाग लेते हैं।

4. शिक्षा प्राप्त करना तथा संकीर्ण भावनाओं में न बहना-लोकतन्त्र में नागरिक शिक्षा प्राप्त करके तथा ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया को जीवन भर जारी रखते हैं तथा सदैव ही स्वयं को तंग दृष्टिकोण जैसे-जातिवाद, साम्प्रदायिकता, संकीर्ण भाषायी नजरिया, क्षेत्रवाद से बचा कर रखते हैं, क्योंकि वे मानते और जानते हैं कि संकीर्ण भावनाएँ लोकतन्त्र की सफलता की राह में बहुत ही शक्तिशाली अवरोधक (Hindrances) हैं।

5. कर भुगतान तथा उच्च नैतिक मूल्यों को बनाए रखना-लोकतन्त्र में नागरिक प्रायः ईमानदारी के साथ नियमित रूप से कर चुकाते हैं। अपने कर्तव्यों को वे निष्ठापूर्वक रहकर निभाते हैं। वे उच्च नैतिक चरित्र का पालन करते हैं। हर सार्वजनिक गतिविधि की जानकारी रखते हैं। बुरे कानूनों का शान्तिपूर्ण उपायों से विरोध करते हैं। वे देशभक्त होते हैं तथा अपने देश को अपने निजी स्वार्थों से.ऊपर रखते हैं।

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प्रश्न 3.
‘नागरिक’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए। भारतीय संविधान नागरिकों के बारे में क्या कहता है? भारत की नागरिकता ग्रहण करने की पाँच पद्धतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(क) नागरिक शब्द का अर्थ-नागरिक वह व्यक्ति है, जो किसी राज्य का सदस्य होता है, वह देश के प्रति निष्ठावान होता है, उसे नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं और वह देश के शासन में भागीदारी करता है।

(ख) भारत का संविधान एवं नागरिक-भारत का संविधान कहता है कि निम्नलिखित व्यक्ति संविधान लागू होने के साथ ही भारत का नागरिक बन जाता है –

  • भारत के क्षेत्र में जन्मा कोई भी व्यक्ति।
  • भारत में निवास कर रहा व्यक्ति या जिसके माता-पिता का जन्म भारत में हुआ हो।
  • कोई व्यक्ति जिसके माता-पिता भारत में नहीं जन्मे किन्तु वे संविधान लागू होने के कम से कम पाँच वर्ष पहले से भारत में रह रहे हों।

(ग) भारत की नागरिकता ग्रहण करने की पाँच पद्धतियाँ निम्न हैं –

  • जन्म के आधार पर नागरिकता-भारत में जन्मा हर व्यक्ति जन्म से भारत का नागरिक होगा।
  • वंशानुगत आधार पर नागरिकता-किसी व्यक्ति का जन्म भारत के बाहर हुआ है पर यदि उसके पिता उसके जन्म के समय भारत के नागरिक हैं, तो वह वंशानुगत आधार पर भारत का नागरिक होगा या होगी।
  • पंजीकरण द्वारा नागरिकता-व्यक्तियों के कुछ वर्ग जिन्हें भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं है, निर्धारित अधिकारियों के समक्ष पंजीकरण करवा कर इसे ग्रहण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए भारत के किसी नागरिक से विवाहित कोई स्त्री अपना पंजीकरण करवा कर भारतीय नागरिकता ग्रहण कर सकती है।
  • देशीयकरणं के आधार पर नागरिकता-कोई विदेशी व्यक्ति भारत सरकार को देशीयकरण के लिए आवेदन करके भारत की नागरिकता ग्रहण कर सकता है। देशीयकरण का अर्थ है कुछ शर्तों का पालन करके किसी देश की नागरिकता लेना।
  • क्षेत्र के समावेशन के आधार पर नागरिकता-यदि कोई क्षेत्र भारत का भाग बन जाता है, तो भारत सरकार उस क्षेत्र के लोगों को नागरिकता दे देगी।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
नागरिकता निर्धारण का एक कौन-सा तरीका सही नहीं है?
(क) रक्त सम्बन्ध
(ख) जन्मस्थान
(ग) द्वैद्य सिद्धान्त
(घ) पारिवारिक सम्बन्ध
उत्तर:
(घ) पारिवारिक सम्बन्ध

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Sociology समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक विज्ञान में विशेषकर समाजशास्त्र जैसे विषय में ‘वस्तुनिष्ठता’ के अधिक जटिल होने का क्या कारण है?
उत्तर:
प्रतिदिन की बोलचाल की भाषा में ‘वस्तुनिष्ठता’ का आशय पूर्वाग्रह रहित, तटस्थ या केवल तथ्यों पर आधारित होता है। किसी भी वस्तु के बारे में वस्तुनिष्ठ होने के लिए, हमें वस्तु के बारे में अपनी भावनाओं या प्रवृत्तियों को अनदेखा करना चाहिए। सामाजिक विज्ञान और समाजशास्त्र में वस्तुनिष्ठता की अधिक जटिलता का कारण ‘व्यक्तिपरकता’ है। इसमें व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहता है और परिणाम स्पष्ट नहीं आते हैं।

प्रश्न 2.
सर्वेक्षण का अर्थ बताइए।
उत्तर:
सर्वेक्षण विधि का अर्थ : सर्वेक्षण विधि का प्रयोग सामाजिक विज्ञानों में गणनात्मक अध्ययन के लिए किया जाता है। अध्ययनकर्ता के द्वारा अध्ययन की समस्या के अनुसार व्यक्तियों से सुनियोजित एवं क्रमबद्ध रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं । मोर्स के अनुसार, “संक्षेप में, सर्वेक्षण किसी सामाजिक स्थिति या समस्या अथवा जनसंख्या के परिभाषित उद्देश्यों के लिए वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित रूप से विश्लेषण की एक पद्धति है।”

सर्वेक्षण पद्धति की निम्नलिखित चार प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं –

  • सर्वेक्षण का नियोजन
  • आँकड़ों का एकत्रीकरण
  • आँकड़ों का विश्लेषण तथा विवेचन
  • आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण।

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प्रश्न 3.
वैज्ञानिक पद्धति का प्रश्न विशेषताः समाजशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
अन्य सभी वैज्ञानिक विषयों की तरह समाजशास्र में भी पद्धतियाँ प्रक्रियाएँ महत्पूर्ण हैं जिसके द्वारा ज्ञान एकत्रित होता है। अंतिम विश्लेषण में सभी समाजशास्त्री एक आम आदमी से अलग होने का दावा कर सकते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि वे कितना जानते हैं या वे क्या जानते हैं, परन्तु इसका कारण है कि वे किस ज्ञान को प्राप्त करते हैं? यही एक कारण है कि समाजशास्र में वैज्ञानिक पद्धति का विशेष महत्व है।

प्रश्न 4.
सहभागी प्रेक्षण के दौरान समाजशास्त्री और नृजाति विज्ञानी क्या करते हैं?
उत्तर:
सहभागी प्रेक्षण विधि के अंतर्गत समाजशास्त्री और नृजाति विज्ञान अनुसंधानकर्ता स्वयं भूमिका का संपादन करता है अथवा वह अध्ययन की स्थिति में स्वयं हिस्सा लेता है। प्रतिभागी प्रेक्षण आँकड़े एकत्र करने की एक प्रविधि है। इसमें समाजशास्त्री और नृवंश विधानशास्री अध्ययन किए जाने वाले व्यक्तियों के व्यवहारों को बिना प्रभावित किए उनकी गतिविधियों में भाग लेता है । चूँकि इसमें अनुसंधाकर्ता स्वयं भाग लेता है अत: इसके निष्कर्ष में इसके (अनुसंधानकर्ता संवेगात्मक रूप से संबंद्ध होने का भय बना रहता है।

प्रश्न 5.
“प्रतिबिंबता’ का क्या तात्पर्य है तथा समाजशास्त्र में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
‘प्रतिबिंबता का तात्पर्य है-एक अनुसंधानकर्ता की वह क्षमता जिसमें वह स्वयं को अवलोकन और विश्लेषण करता है। समाजशास्त्र में अनुसंधानकर्ता प्रतिबिंबित होने के पश्चात् पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नहीं रहता जिस कारण परिणाम सदैव सटीक आते हैं।

प्रश्न 6.
असहभागी अवलोकन का अर्थ बताइए।
उत्तर:
असहभागी अवलोकन का अर्थ-असहभागी अवलोकन के अंतर्गत अवलोकनकर्ता जिस समूह का अध्ययन करता है, वह उससे पृथक् अथवा असम्बद्ध रहता है। समूह के लोगों को साधारणतया इस बात की जानकारी नहीं होती है कि उनका अवलोकन किया जा रहा है हमेरस्ले तथा अकिंसन के अनुसार, “इस अपरिचित स्थिति को अनुसंधानकर्ता केवल देखकर तथा सुनकर ही समझ पाता है तथा इसी से (देखकर, सुनकर) वह उस समूह की संरचना तथा संस्कृति को भी समझता है। असहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता अवलोकित व्यक्तियों की गतिविधियों में भागीदारी अथवा हस्तक्षेप नहीं करता है।

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प्रश्न 7.
प्रविधियों की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विशेषताएँ बताइये।
उत्तर:
प्रविधियों की परिभाषा-समाज विज्ञानों में वास्तविक तथ्यों तथा संरचनाओं के एकत्रीकरण हेतु कुछ विशेष तरीकों का प्रयोग करना पड़ता है, इन्हें प्रविधि कहा जाता है। मोजर के अनुसार, “प्रविधियाँ एक समाज वैज्ञानिक के लिए वे मान्य तथा सुव्यवस्थित तरीके होते हैं, जिन्हें वह अपने अध्ययन में संबंधित विश्वसनीय तथ्यों को प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाता है।”

प्रविधियों की विशेषताएँ –

  • प्रविधियों के द्वारा संबंधित वस्तुपरक तथा विश्वसनीय तथ्यों को वैज्ञानिक तरीके से एकत्रित किया जाता है।
  • प्रविधियों का चुनाव अनुसंधान की प्रकृति के अनुसार किया जाता है।
  • प्रविधियों का प्रयोग तर्कसंगत तरीके से किया जाता है।

प्रश्न 8.
निदर्शन सर्वेक्षण अथवा प्रतिदर्श का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
निदर्शन सर्वेक्षण अथवा प्रतिदर्श का अर्थ-निदर्शन सर्वेक्षण अथवा प्रतिदर्श के अंतर्गत अध्ययन किए जाने वाले समस्त व्यक्तियों से प्रश्न नहीं पूछे जाते हैं। इसके अंतर्गत जिन इकाइयों का अध्ययन किया जाता है, उनका चयन समग्र से सावधानीपवूक किया जाता है। चयन में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि निदर्शन सर्वेक्षण में सम्मिलित समस्त व्यक्ति जनसमुदाय की विशेषताओं के प्रतिनिधि हों।

उदाहरण के लिए जब हम दाल पकाते हैं तो एक अथवा दो दानों की जाँच करके यह बता देते हैं कि दाल पक गई अथवा नहीं। इस प्रकार एक या दो पके दाल के दोन संपूर्ण पकी दाल के प्रतिनिधि बन जाते हैं। निदर्शन सर्वेक्षण का प्रयोग वर्तमान समय से सभी सामाजिक विज्ञानों में हो रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल सेम्पल सर्वे विकास योजनाओं का अध्ययन निदर्शन सर्वेक्षण द्वारा करता है।

प्रश्न 9.
एक प्रविधि के रूप में अवलोकन की सीमाएँ बताइए।
उत्तर:
एक प्रविधि के रूप में अवलोकन की निम्नलिखित सीमाएँ हैं –

  • किसी घटना विशेष के बारे में पूर्वानुमान काफी कठिन कार्य है।
  • किसी घटना विशेष की अवधि के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं होती है।।
  • अवलोकन प्रविधि के माध्यम से एकत्रित सामग्री को परिमाणीकत नहीं किया जा सकता है।
  • अवलोकन प्रविधि अपेक्षाकृत एक व्ययपूर्ण प्रविधि है।
  • अवलोकन की प्रविधि में विश्वसनीयता तथा वैधता की समस्याएँ आती है।

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प्रश्न 10.
प्रश्नावली प्रविधि के मुख्य लाभ बताइए।
उत्तर:
प्रश्नावली प्रविधि के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है।

  • प्रश्नावली प्रविधि अपेक्षाकृत कम खर्चीली है।
  • प्रश्नावली प्रविधि के द्वारा प्रशासकीय समय की भी बचत होती है।
  • प्रश्नावलियाँ एक ही समय में डाक द्वारा सूचनादाताओं के पास भेजी जा सकती हैं।
  • प्रश्नावली प्रविधि की सहायता से एक विस्तृत क्षेत्र से सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती हैं।

लुंडबर्ग के अनुसार, “मूल रूप से, प्रश्नावली प्रेरणाओं का एक समूह है, जिसके प्रति शिक्षित व्यक्ति उत्तेजित किए जाते हैं तथा इन उत्तेजनाओं के अंतर्गत वे अपने व्यवहार का वर्णन करते हैं।”

प्रश्न 11.
प्रश्नावली प्रविधि का अर्थ तथा प्रकार बताइए।
उत्तर:
(i) प्रश्नावली प्रविधि का अर्थ – प्रश्नावली प्रविधि के अंतर्गत क्रमब तरीके से प्रश्न पूछे जाते हैं तथा आवश्यक आकड़े एकत्रित किए जाते हैं। इस प्रकार क्रमबद्ध तरीके से तैयार किए गए प्रश्नों के सूचीक्रम को प्रश्नावली अथवा साक्षात्कार तालिका कहते हैं। जे0 डी0 पोप के अनुसार, “एक प्रश्नावली को प्रश्नों के समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” सूचनादाता को बिना एक अनुसंधानकर्ता या प्रगणक की व्यक्तिगत सहायता के उत्तर देना होता है। साधारणतया, प्रशनावली डाक द्वारा भेजी जाती है, लेकिन इसे व्यक्तियों को बाँटा भी जा सकता है। प्रत्येक स्थिति में यह सूचना प्रदान करने वाले द्वारा भरकर भेजी जाती है।

(ii) प्रश्नावली के प्रकार : प्रश्नावली के प्रमुख निम्नलिखित है।

  • स्तरीय प्रश्नावली
  • खुली अथवा अप्रतिबंधित प्रश्नावली
  • बंद अथवा प्रतिबंधित प्रश्नावली
  • चित्रित प्रश्नावली तथा
  • मिश्रित प्रश्नावली

प्रश्न 12.
वैज्ञानिक पद्धति क्या है?
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति उस पद्धति को कहते हैं जिसमें अध्ययनकर्ता निष्पक्ष ढंग से किसी विषय समस्या या घटना का वर्णन करता है। वैज्ञानिक पद्धति तथ्यों का व्यवस्थित अवलोकन, वर्गीकरण तथा व्याख्या करता है। इतना ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक पद्धति एक सामूहिक शब्द है जो अनेक प्रक्रियाओं को व्यक्त करता है तथा जिनकी सहायता से विज्ञान का निर्माण होता है। वैज्ञानिक पद्धति के अन्तर्गत व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त किया जाता है। अतः वैज्ञानिक पद्धति का अर्थ ज्ञान के विशिष्ट संचय से है।

प्रश्न 13.
सामाजिक सर्वेक्षण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सामाजिक सर्वेक्षण समाजिक अनुसंधान की एक विधि है। सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करता है। कोई भी शोधकर्ता किसी क्षेत्र में जाकर किसी समस्या से संबंधित तथ्यों का संकलन करता है, उसे सामाजिक सर्वेक्षण कहते हैं।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण बताइए।
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं –

  1. समस्या का निर्धारण – वैज्ञानिक पद्धति के अंतर्गत सर्वप्रथम समस्या का निर्धारण किया जाता है। समस्या से संबंधित सामान्य अवधारणाओं में परिभाषा देनी पड़ती है।
  2. अनुसंधान की रूपरेखा का नियोजन करना – वैज्ञानिक पद्धति के दूसरे चरण के अंतर्गत क्रमबद्ध तरीके से आँकड़ों का संकलन, विश्लेषण तथा मूल्यांकन किया जाता है।
  3. क्षेत्र कार्य – आँकड़ों का एकत्रीकरण पूर्व निर्धारित योजना के अंतर्गत किया जाता है।
  4. आँकड़ों का विश्लेषण करना – समाज वैज्ञानिकों द्वारा सावधानीपूर्वक आँकड़ों को संहिताबद्ध किया जाता है। इसके पश्चात् इसका वर्गीकरण तथा सारणीबद्ध करते हैं।
  5. निष्कर्ष निकालना – अनसंधानकर्ता द्वारा आँकड़ों का क्रमबद्ध अंकलन करने के पश्चात् परिणामों का सामान्यीकरण किया जाता है। इस प्रकार, निष्कर्ष निकाल जाते हैं।
  6. निष्कर्षों का पुनः सत्यापन भी किया जाता है।

प्रश्न 2.
वैज्ञानिक अवलोकन की दशाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • वैज्ञानिक अवलोकन में भी अन्य विज्ञानों की भाँति आँकड़े इंद्रिजन्य अवलोकन के माध्यम से एकत्रित किए जाते हैं।
  • अवलोकन जैसा कि हम जाते हैं कि एक प्रविधि है, जो सामाजिक प्रघटना की प्रत्यक्ष जानकारी को संभव बनाती है।
  • अवलोकन प्रविधिं तुलनात्मक रूप से अच्छी जानकारी तथा विश्वसनीयता निश्चित करती है।
  • अवलोकन शब्द का प्रयोग यहाँ तथा दूसरे स्थानों पर उन समस्त स्वरूपों के लिए किया जाता है, जिनके विषय में हमें जानकारी होती है तथा जो हमारी इंद्रियों पर प्रभाव डालते हैं।
  • हमें यह प्रत्युत्तर तथा एक आँकड़े में अंतर करना चाहिए। एक प्रत्युत्तर किया का प्रकटीकरण है। एक आँकड़ा प्रत्युत्तर के अभिलेखन का उत्पाद है।
    (a) विश्वसनीयता तथा अंतर-व्यक्तिनिष्ठता।
    (b) विश्सनीयता तथा अंतर-व्यक्तिनिष्ठा को अवलोकन प्रक्रिया के दो तत्वों के साथ कार्य करना पड़ता है जिन्हें बोध तथा अभिलेखन कहते हैं।

गालतुंग ने दो सिद्धान्त दिए हैं –

  • अंतर – व्यक्तिनिष्ठा तथा विश्वसनीयता का सिद्धान्त-एक ही अवलोकनकर्ता द्वारा एक ही प्रत्युत्तर का जब बार-बार अवलोकन किया जाता है तो समान आँकड़े प्राप्त होंगे।
  • अंतर – वस्तुनिष्ठता का सिद्धान्त-जब एक ही प्रत्युत्तर को विभिन्न अवलोकनकर्ताओं द्वारा बार-बार दोहराया जाता है तो समान आँकड़े प्राप्त होंगे।

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर वैधता के सिद्धान्त का उल्लेख किया जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार एक अवलोकन वैध है, जब अवलोकनकर्ता वही अवलोकित रहता है जो वह चाहता है। इस प्रकार वैधता प्रकट तथा प्रच्छन्न संबंधों को स्पष्ट रूप से देखते हैं वैधता के सिद्धान्त के अंतर्गत आँकड़ों को इस प्रकार एकत्रित किया जाता है कि उसके आधार पर उपयुक्त अनुमान प्राप्त किए जा सकें। इन निष्कर्ष द्वारा प्रकट स्तर तथा प्रच्छन्न स्तर के अंतर को स्पष्ट किया जाता है।

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प्रश्न 3.
अवलोकन की परिभाषा दीजिए। इसके लक्षण बताइए।
उत्तर:
(i) अवलोकन की परिभाषा – अवलोकन वस्तुत: वैज्ञानिक पद्धति की मूल प्रविधि है। वैज्ञानिक अवलोकन के माध्यम से ऐसे तथ्यात्मक प्रमाणों को एकत्रित किया जाता है, जिन्हें सत्यापित किया जा सके । वैज्ञानिक अवलोकन के लिए निम्नलिखित चरणों का अनुसरण आवश्यक है –

  • यथार्थता
  • सुस्पष्टता अथवा शुद्धता
  • क्रमबद्धता
  • प्रतिवेदन

मोजर के अनुसार, “अवलोकन को स्पष्ट रूप से वैज्ञानिक अन्वेषण की शास्त्रीय पद्धति कहा जा सकता है।………….वास्तविक रूप में अवलोकन में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आँखों का अधिक प्रयोग होता है। पी० वी० यंग के अनुसार, “अवलोकन नेत्रों द्वारा एक विचारपूर्वक अध्ययन है-जिस सामूहिक व्यवहार तथा जटिल सामाजिक संस्थाओं तथा साथ ही साथ संपूर्णता वाली पृथक इकाइयों के अन्वेक्षण हेतु प्रणाली में उपयोग किया जाता है।”

(ii) अवलोकन के प्रमुख लक्षण : ब्लैक तथा चैपियन ने अवलोकन के निम्नलिखित प्रमुख लक्षण बताए हैं –

  • मानव व्यवहार का अवलोकन किया जाता है।
  • अवलोकन के जरिए उन महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है जिनसे सहभागियों का सामाजिक व्यवहार प्रभावित होता है।
  • जिस व्यक्ति का अवलोकन किया जाता है उसके विषय में वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
  • सामाजिक जीवन की आधार सामग्री जो नियमित थी बार-बार अवलोकित की जाती है, कि परिभाषित की जा सकती है तथा दूसरे अध्ययनों की तुलना में इसे काम में लाया जा सकता है।
  • अवलोकन प्रविधि के माध्यम से अवलोकनकर्ता पर कुद नियंत्रण रखा जाता है। हालाँकि, जिन व्यक्तियों तथा वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है, उन पर अवलोकन प्रविधि कोई नियंत्रण नहीं रखती है।
  • अवलोकन पद्धति उपकल्पनाओं से मुक्त अन्वेषण पर केन्द्रित होती है।
  • अवलोकन प्रविधि स्वतंत्र चर के साथ किसी भी प्रकार के फेर-बदल से बचती है।
  • भिलेखन चयनित नहीं होता है।

प्रश्न 4.
सहभागी अवलोकन से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
सहभागी अवलोकन का अर्थ – सहभागी अवलोकन के अंतर्गत अवलोकनकर्ता के अध्ययन की स्थिति में स्वयं भाग लिया जाता है। सहभागी अवलोकन में अवलोकनकर्ता के द्वारा भूमिका का संपादन स्वयं किया जाता है।

सहभागी अवलोकन तीन प्रकार का होता है –

  • सहभागी अवलोकनकर्ता के रूप में – अवलोकन का यह स्वरूप छिपा हुआ नहीं होता है। अवलोकनर्ता की भूमिका संपादन न होकर केवल अवलोकर्ता ही होता है।
  • अवलोकनकर्ता सहभागी के रूप में – अवलोकनकर्ता संबंधित व्यक्ति से मिलकर कुछ प्रश्न पूछता है । इसके साथ-साथ वह परिस्थिति का अवलोकन भी करता है। इस प्रविधि के अंतर्गत अवलोकनकर्ता अवलोकन करता है तथा वह उत्तरदाता का सहभागी बन जाता है।
  • अवलोकनकर्ता एक अवलोकनकर्ता के रूप में – अवलोकन की इस प्रविधि के अंतर्गत अवलोकनकर्ता परिस्थिति का अवलोकन करता है, लेकिन जिन व्यक्तियों का वह अवलोकन करता है उन्हें इस विषय में कोई जानकारी नहीं होती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ

प्रश्न 5.
प्रश्नावली की संचार और वैधता की समस्या का विवेचना कीजिए।
उत्तर:
(i) प्रश्नावली के संचार की समस्या –

  • यद्यपि प्रश्नावली की विषयवस्तु अध्ययन के उद्देश्या से नियंत्रित होती है तथापि सर्वेक्षण में संचार की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
  • प्रश्नों की भाषा स्पष्ट, संक्षिप्त तथा सरल होना चाहिए जिससे उत्तरदाताओं को उन्हें समझने में आसानी हो।

(ii) प्रश्नावली की वैधता की समस्या –

  • प्रश्नों की संरचना इस प्रकार की जानी चाहिए जिससे अनुसंधानकर्ता को इच्छित सूचना मिल जाए।
  • प्रश्नों के उत्तर के विषय में वास्तविक समस्या उस समय उत्पन्न होती है जब उत्तरदाता सही तथ्यों की जानकारी देता है लेकिन अनुसंधानकर्ता उन उत्तरों की विश्वसनीयता तथा तथ्यात्मकता के विषय में आश्वस्त नहीं हो पाता है।
  • वैधता की समस्या उस समय उतपन्न हो जाती है तब उत्तरदाता का कथन तकनीकी रूप से सत्य होता है, लेकिन वास्तव में यह कथन असत्य होता है।
  • उत्तरदाताओं के उत्तरों की वैधता के सत्यापन हेतु वैकल्पिक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

प्रश्न 6.
पद्धति तथा प्रविधि में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पद्धति तथा प्रविधि में निम्नलिखित अन्तर हैपद्धति प्रविधि –
Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र अनुसंधान पद्धतियाँ 1

प्रश्न 7.
एक पद्धति के रूप में सहभागी प्रेक्षण की क्या-क्या खूबियाँ और कमियाँ हैं?
उत्तर:
खूबियाँ –

  • यह छिपा हुआ प्रेक्षण नहीं होता है।
  • अनुसंधानकर्ता समुदाय में अवलोकनकर्ता के रूप में प्रवेश करता है।
  • सीधे व्यक्ति से संपर्क होता है।
  • उत्तरदाता भी सहभागी बन जाता है।

कमियाँ –

  • इससे प्राप्त निष्कर्षों का सामान्यीकरण नहीं हो सकता।
  • यह अधिक समय लेने वाली खर्चीली पद्धति है।
  • निष्कर्षों में वास्तुनिष्ठता की कमी आ जाती है।

प्रश्न 8.
सर्वेक्षण और वैयक्तिक अध्ययन में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
सर्वेक्षण तथा वैयक्तिक अध्ययन में निम्नलिखित अंतर हैं –
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प्रश्न 9.
सामाजिक अनुसंधान क्या है?
उत्तर:
अनुसंधान का अर्थ है अन्वेषण या शोध या खोज से हैं। जब कोई भी अनुसंधान सामाजिक जीवन सामाजिक घटनाओं अथवा सामाजिक जटिलताओं से संबद्ध होता है तब उसे सामाजिक अनुसंधान कहा जाता है । सामाजिक अनुसंधान में सर्वप्रथम किसी व्यवहार समस्या या घटना से संबंधित मूल-भूत तथ्यों का अवलोकन किया जाता है ताकि उसकी सामान्य प्रकृति को भली-भाँति समझा जा सके।

सामाजिक अनुसंधान में यर्थाथताओं की वैज्ञानिक विधि द्वारा खोज पर विशेष बल दिया जाता है। सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य तार्किक एवं क्रमांक पद्धतियों के द्वारा नवीन तथ्यों की खोज अथवा पुराने तथ्यों की परीक्षा और सत्यापन, उनके क्रमों, पारस्परिक संबंधों, कार्य-कारण की व्याख्या एवं उन्हें संचालित करनेवाले स्वभाविक नियमों का विश्लेषण करना है।

प्रश्न 10.
अवलोकन की सीमाएँ या कमियाँ बताइए।
उत्तर:
अवलोकन की कमियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. मानव व्यवहार का अवलोकन करते समय अवलोकनकर्ता की प्राथमिकताओं तथा पक्षपातों के कारण अवलोकन में वस्तुनिष्ठता की कमी आ सकती है। इस प्रकार के निष्कर्ष वैज्ञानिक अवलोकन की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
  2. कोई सामाजिक प्रघटना कितनी अवधि तक घटेगी, इसका पूर्वानुमान करने में व्यवहारिक कठिनाइयाँ आती हैं।
  3. अवलोकनकर्ता के मूल्यों, आदर्शों, अभिरुचियों तथा पूर्व निर्धारित दृष्टिकोणों तथा विश्वासों का प्रभाव अवलोकन की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
  4. अवलोकन की प्रविधि में विश्वसनीयता तथा वैधता की समस्याएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।
  5. अवलोकनकर्ता का प्रशिक्षित होना आवश्यक हैं, लेकिन प्रायः प्रशिक्षित अवलोकनकर्ता भी निरपेक्षा रूप से अवलोकन प्रविधि का प्रयोग नहीं कर पाते हैं।’
  6. कभी-कभी अवलोकनकर्ता द्वारा दिए गए निष्कर्षों का पुनः सत्यापन करने पर निष्कर्षों में विभिन्नता आ जाती है।
  7. अवलोकन प्रविधि द्वारा प्राप्त निष्कर्षों में वस्तुनिष्ठता तथा निश्चितता का अभाव हो सकता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रश्नावली और साक्षात्कार अनुसूची को परिभाषित करते हुए उनमें अंतर बताइए।
उत्तर:
(i) प्रश्नावली की परिभाषा – प्रश्नावली का प्रयोग किसी विशेष स्थिति अथवा समस्या के बारे में महत्वपूर्ण आधार सामग्री प्राप्त करने के लिए किया जाता है। जे0 डी0 पोप के अनुसार, “एक प्रश्नावली को प्रश्नों के समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” सूचनादाता को बिना एक अनुसंधानकर्ता या प्रगणक की व्यक्तिगत सहायता के उत्तर देना होता है लेकिन इसे व्यक्तियों में बाँटा भी जा सकता है। प्रत्येक स्थिति में यह सूचना प्रदान करने वाले द्वारा भरकार भेजी जाती है।

(ii) साक्षात्कार अनुसूची की परिभाषा – संरचित प्रश्नों या समूह जिनके उत्तर स्वयं साक्षात्कारकर्ता द्वारा अभिलेखित किए जाते हैं, साक्षात्कार अनूसूची कहलाती है।
प्रश्नावली तथा साक्षात्कार सूची में अंतर –
Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र अनुसंधान पद्धतियाँ

प्रश्न 2.
सर्वेक्षण पद्धति की कुछ कमजोरियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अन्य अनुसंधान पद्धतियों की तरह से सर्वेक्षणों की भी अपनी कमजोरियाँ होती हैं। यद्यपि इसमें व्यापक विस्तार की संभावना होती है तथा यह विस्तार की गहनता के आधार पर प्राप्त किया जाता है। सामान्यतया एक बड़े सर्वेक्षण के भाग के रूप में उत्तरदाताओं से गहन सूचना प्राप्त करना संभव नहीं होता। उत्तरदाताओं की संख्या अधिक होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति पर व्यय किया जाने वाला समय सीमित होता है। साथ ही अन्वेषकों की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या द्वारा सर्वेक्षण प्रश्नावलियाँ उत्तरदाता को उपलब्ध कराई जाती हैं। इससे यह सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है कि जटिल प्रश्नों या जिन प्रश्नों के लिए विस्तृत सूचना चाहिए, उन्हें उत्तरदाताओं से ठीक एक ही तरीके से पूछा जाएगा।

प्रश्न पूछने या उत्तर रिकार्ड करने के तरीके में अन्तरहोने पर सर्वेक्षण में त्रुटियाँ आ सकती हैं। यही कारण है कि किसी भी सर्वेक्षण के लिए प्रश्नावली (कभी-कभी इन्हें सर्वेक्षण का उपकरण भी कहा जाता है) की रूपरेखा सावधानीपूर्वक तैयार करनी चाहिए क्योंकि इसका प्रयोग अनुसंधानकर्ता के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों द्वारा किया जायेगा, अतः इसके प्रयोग के दौरान इसमें त्रुटि को दूर करने या संशोधित करने की थोड़ी-बहुत संभावना रहती है। अन्वेषक तथा उत्तरदाता के बीच किसी प्रकार के दीर्घकालिक संबंध नहीं होते अतः कोई आपसी पहचान या विश्वास नहीं होता। किसी भी सर्वेक्षण में पूछे गए प्रश्न ऐसे होने चाहिए जो कि अजनवियों के मध्य पूछे जा सकते हों तथा उनका उत्तर दिया जा सकता हो।

कोई भी निजी या संवेदनशील प्रश्न पूछा जा सकता या अगर पूछा भी जाता है तो इसका उत्तर सच्चाईपूर्वक देने के स्थान पर ‘सावधानीपूर्वक’ दिया जाता है। इस प्रकार की समस्याओं को कभी-कभी ‘गैर-प्रतिदर्शा त्रुटियाँ’ कहा जाता है अर्थात् ऐसी त्रुटियाँ जो प्रतिदर्श की प्रक्रिया के कारण न हों अपितु अनुसंधान रूपरेखा में कभी या त्रुटि के कारण हों। दुर्भाग्यवश इनमें से कुछ त्रुटियों का पता लगाना तथा इनसे बचना कठिन होता है । इस कारण से सर्वेक्षण में गलती होना तथा जनसंख्या की विशेषताओं के बारे में भ्रामक या गलत अनुमान लगाना संभव होता है।

अंत में, किसी भी सर्वेक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीमा यह है कि इसे सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए इन्हें कठोर संरचित प्रश्नावली पर आधारित होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त प्रश्नावली की. रूपरेखा चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, इसकी सफलता अंत में अन्वेषकों तथा उत्तरदाताओं की अंतःक्रिया की प्रकृति पर और विशेष रूप से उत्तरदाता की सद्भावना तथा सहयोग पर निर्भर करती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 5 समाजशास्त्र : अनुसंधान पद्धतियाँ

प्रश्न 3.
वस्तुनिष्ठता परिणाम को प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्री को किस प्रकार की कठिनाइयों और प्रयत्नों से गुजरना पड़ता है।
उत्तर:
किसी भी वस्तु के बारे में वस्तुनिष्ठ होने के लिए अथवा वास्तविक परिणाम को प्राप्त करने के लिए हमें वस्तु के अपनी भावनाओं या प्रवृत्तियों को अनदेखा करना चाहिए। दूसरी तरफ ‘व्यक्तिपरकता’ से छुटकारा पाना होगा। व्यक्तिपरकता से आशय है कुछ ऐसा जो व्यक्तिगत मूल्यों तथा मान्यताओं पर आधारित हो । सभी विज्ञानों से वस्तुनिष्ठ होने व केवल तथ्यों पर आधारित पूर्वाग्रह रहित ज्ञान उपलब्ध कराने की आशा की जाती है, परन्तु प्राकृतिक विद्वानों की तुलना में समाज विज्ञान में ऐसा करना बहुत कठिन है।

जब कोई भू-वैज्ञानिक चट्टानों का अध्ययन करता है या वनस्पतिशास्त्री पौधों का अध्ययन करता है तो वे सावधान रहते हैं कि उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या मान्यताएँ उनके काम को प्रभावित न कर पाएँ । उन्हें सही तथ्यों को ही प्रस्तुत करना चाहिए। उदाहरण के लिए, उन्हें अपने अनुसंधान कार्य के परिणामों पर किसी विशेष वैज्ञानिक सिद्धान्त या सिद्धांतवादी के प्रति अपनी पसंद का प्रभाव नहीं पड़ने देना चाहिए। हालांकि भू-वैज्ञानिक तथा वनस्पतिशास्त्री स्वयं उस संसार का हिस्सा नहीं होते जिनका वे अध्ययन करते हैं, चट्टानों या पौधों की प्राकृतिक दुनिया इसे विपरीत समाज वैज्ञानिक जिस संसार में रहते हैं, उसका ही अध्ययन करते हैं जो मानव संबंधों की सामाजिक दुनिया है। इससे समाजशास्त्र जैसे सामाजिक विज्ञान में वस्तुनिष्ठता की विशेष समस्या उत्पन्न होती है।

सर्वप्रथम पर्वाग्रह की स्पष्ट समस्या है कि क्योंकि समाजशास्त्री भी समाज के सदस्य हैं. उनकी भी लोगों की तरह से सामान्य पसंद तथा नापसंद होती है। पारिवारिक संबंधों का अध्ययन करने वाला समाजशास्त्री भी स्वयं किसी परिवार का सदस्य होगा और उसके अनुभव का इस पर प्रभाव हो सकता है। यहाँ तक कि समाजशास्त्री को अपने अध्ययनशील समूह के साथ कोई प्रत्यक्ष या व्यक्तिगत अनुभव न होने पर भी उसके अपने सामाजिक संदर्भो के मूल्यों तथा पूर्वाग्रहों का प्रभाव होने का संभावना रहती है। उदाहरणार्थ अपने से अलग किसी जाति या धार्मिक समुदाय का अध्ययन करते समय समाजशास्त्री उस समुदाय की कुछ प्रवृतियों से प्रभावित हो सकता है जो कि उसे अतीत या वर्तमान के सामाजिक वातावरण में प्रचलित हैं।

समाजशास्त्री इनसे किस प्रकार बचते हैं ? –
इसकी प्रथम पद्धति अनुसंधान के विषय के बारे में अपनी भावनाओं तथा विचारों की कठोरता से लगातार जाँचना है। अधिकांशतः समाजशास्त्री अपने कार्य के लिए किसी बाहरी व्यक्ति के दृष्टिकोण को ग्रहण करने का प्रयास करते हैं। वे अपने आपको तथा अपने अनुसंधान कार्य को दूसरे की आँखों से देखने का प्रयास करते हैं। इस तकनीक को ‘स्ववाचक’ या कभी-कभी ‘आत्मवाचक’ कहते हैं। समाजशास्त्री निरंतर अपनी प्रवृत्तियों तथा मतों की स्वयं जाँच करते रहते हैं। वह अन्य व्यक्तियों के मतों को सावधानीपूर्वक अपनाते रहते हैं, विशेष रूप से उनके बारे में जो उनके अनुसंधान का विषय होते हैं।

आत्मवाचक का एक व्यावहारिक पक्ष है किसी व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कार्य का सावधानीपूर्वक दस्तावेजीकरण करना। अनुसंधान पद्धतियों में श्रेष्ठता के दावे का एक हिस्सा सभी विधियों के दस्तावेजीकरण तथा साक्ष्य के सभी स्रोतों के औपचारिक संदर्भ में निहित है जो यह सुनिश्चित करता है कि हमारे द्वारा किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने हेतु किए गए उपायों को अन्य अपना सकते हैं तथा वे स्वयं देख सकते हैं, हम सही हैं या नहीं। इससे हमें अपनी सोच या तर्क की दिशा को परखने या पुनः परखने में भी सहायता मिलती है। तथापि समाजशास्त्री आत्मवाचक होने का कितना भी प्रयास करें, अवचेतन पूर्वाग्रह की संभावना सदा रहती है। इस संभावना से निपटने के लिए समाजशास्त्री अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के उन लक्षणों को स्पष्ट रूप से उल्लिखित करते हैं जो कि अनुसंधान के विषय पर संभावित पूर्वाग्रह के स्रोत के रूप में प्रासांगिक हो सकते हैं। यह पाठकों के पूर्वाग्रह की संभावना से सचेत करता है तथा अनसंधान अध्ययन को पढते समय यह उन्हें मानसिक रूप से इसकी ‘क्षतिपूर्ति करने के लिए तैयार करता है।

समाजशास्र में वस्तुनिष्ठता के साथ एक अन्य स्थिति यह है कि सामाजिक विश्व में ‘सत्य’ के अनेक रूप होते हैं। वस्तुएँ विभिन्न लाभ के बिन्दुओं से अलग-अलग दिखाई देती हैं तथा इसी कारण से सामाजिक विश्व में सच्चाई के अनेक प्रतिस्पर्धी रूप या व्याख्याएँ शामिल हैं। उदाहणार्थ, ‘सही’ कीमत के बारे में एक दुकानदार तथा एक ग्राहक के अलग-अलग विचार हो सकते हैं, एक युवा व्यक्ति के लिए ‘अच्छे भोजन’ या इसी तरह से अन्य विषयों के बारे में अलग-अलग विचार हो सकते हैं।

कोई भी ऐसा सरल तरीका नहीं है जिससे किसी विशेष व्याख्या के अन्य या सही हो के बारे में निर्णय लिया जा सके एवं प्राय: इन शर्तों के तहत सोचना भी लाभप्रद नहीं होता । वास्तव में समाजशास्र इस तरीके से जाँचने का प्रयास भी नहीं करता क्योंकि इसकी वास्तविक रुचि इसमें होती है कि लोग क्या सोचते हैं तथा वे जो सोचते हैं वैसा क्यों सोचते हैं।

एक अन्य कठिनाई स्वयं समाज विज्ञान में उपस्थित बहुविध मतों से उत्पन्न होती है। समाज विज्ञान की तरह समाजशास्त्र भी एक ‘बहु-निर्देशात्मक’ विज्ञान है इसका अर्थ है कि इस विषय में प्रतिस्पर्धी तथा परस्पर विरोधी विचारों वाले विद्यमान हैं। इन सबसे समाजशास्त्र में वस्तुनिष्ठ एक बहुत कठिन तथा जटिल वस्तु बन जाती है। वास्तव में, वस्तुनिष्ठता की प्राचीन धारणा को व्यापक तौर पर एक प्राचीन दृष्टिकोण माना जाता है। समाज वैज्ञानिक अब विश्वास नहीं करते कि ‘वस्तुनिष्ठता एवं अरुचि’ की पारंपरिक धारणा, समाज विज्ञान में प्राप्त की जा सकती है।

वास्तव में ऐसे आदर्श भ्रामक हो सकते हैं। इसका यह आशय नहीं है कि समाजशास्त्र के माध्यम से कोई लाभप्रद ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता या वास्तविक एक व्यर्थ धारणा है। इसका तात्पर्य है कि वस्तुनिष्ठता को पहले से प्राप्त अंतिम परिणाम के स्थान पर लक्ष्य प्राप्ति हेतु निरंतर चलती रहने वाले प्रक्रिया के रूप में लिया न जाना चाहिए।

प्रश्न 4.
सर्वेक्षण पद्धति के आधारभूत तत्त्व क्या हैं ? इस पद्धति का प्रमुख लाभ क्या है?
उत्तर:
सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग सामाजिक विज्ञान में गणनात्मक अध्ययन के लिए किया जाता है। अध्यनकर्ता के द्वारा अध्ययन की समस्या के अनुसार व्यक्तियों से सुनियोजित एवं क्रमबद्ध रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं। सर्वेक्षण पद्धति के निम्नलिखित चार आधारभूत तत्व हैं –

  • सर्वेक्षण का नियोजन
  • आँकड़ों का एकत्रीकरण
  • आँकड़ों का विश्लेषण तथा विवेचन
  • आँकड़ों का प्रस्तुतिकरण

सर्वेक्षण पद्धति के लाभ –

  • सामान्यतः सर्वेक्षण का अध्ययन क्षेत्र विशाल होता है।
  • सर्वेक्षण की अवधि कम होती है।
  • सर्वेक्षण प्रविधियाँ विशाल होती हैं।
  • सर्वेक्षण में सामाजिक प्रघटना को विस्तृत आकार में देखा जाता है।
  • सर्वेक्षण में अन्वेषक अपनी समस्या के अनुसार व्यक्तियों से सुनियोजित तथा क्रमबद्ध प्रश्न पूछता है तथा उनका अभिलेख करता है।
  • सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों तथा निष्कर्षों का सामान्यीकरण हो सकता है।
  • सर्वेक्षण प्रणाली में निदर्शन सर्वेक्षण अथवा प्रतिदर्श संभव है।

प्रश्न 5.
प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन के कुछ आधार बताएँ।
उत्तर:
प्रतिदर्श प्रतिनिधित्व चयन की प्रक्रिया दो मुख्य सिद्धान्तों पर आधारित है –
पहला सिद्धान्त यह है कि जनसंख्या में सभी महत्वपूर्ण उपसमूहों को पहचाना जाए और प्रतिदर्श में उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाए। अधिकतर बड़ी जनसंख्याएँ एक समान नहीं होती, उनमें भी स्पष्ट उप-श्रेणियाँ होती हैं। इसे समाजीकरण कहा जाता है। उदाहरणार्थ जब भारत की जनसंख्या के बारे में बात करते हैं तो हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह जनसंख्या शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बँटी हुई है जो कि एक-दूसरे से काफी हद तक अलग है। कभी भी एक राज्य की ग्रामीण जनसंख्या पर विचार करते समय हमें ध्यान रखना होगा कि यह जनसंख्या विभिन्न आकार वाले गाँवों में रहती है।

इसी तरह से किसी एक गाँव की जनसंख्या भी वर्ग, जाति लिंग, आयु, धर्म या अन्य मापदंडों के आधार पर स्तरीकृत हो सकती है। सारांश में स्तरीकरण की संकल्पना हमें बताती है कि प्रतिदर्श का प्रतिनिधित्व दी गई जनसंख्या के सभी संबद्ध स्तरों की विशेषताओं को दर्शाने की सक्षमता पर निर्भर है। किस प्रकार के प्रतिदर्शों को प्रासंगिक माना जाए यह अनुसंधान के अध्ययन के विशिष्ट उद्देश्यों पर निर्भर है। उदाहरणार्थ धर्म के प्रति प्रवृत्तियों के बारे में अध्ययन करते समय यह महत्वपूर्ण हो सकता है कि सभी धर्मों के सदस्यों . को शामिल किया जाए। मजदूर संसाधनों के प्रति प्रवृत्तियों पर अनुसंधान करते समय कामगारों, प्रबंधकों तथा उद्योगपतियों एवं अन्य को शामिल करना चाहिए।

प्रतिदर्श चयन का दूसरा सिद्धांत है वास्तविक इकाई अर्थात् व्यक्ति या गाँव या घर का चयन पूर्णतया अवसर आधारित होना चाहिए। इसे यादृच्छीकरण कहा जाता है जोकि स्वयं संभावित की संकल्पना पर आधारित है। आपने अपने पाठ्यक्रम में संभावित के बारे में पढ़ा होगा। संभावित का आशय घटना के घटित होने के अवसरों तथा विषमताओं से है। उदाहरण के लिए, जब हम सिक्का उछालते हैं तो यह चित की ओर पड़ता है या फिर पट की ओर । सामान्य सिक्कों में चित या पट आने का अवसर या संभावित लगभग एक समान अर्थात् प्रत्येक की 50 प्रतिशत दिखाई देती है। वास्तव में जब आप सिक्का उछालते हैं दोनों में से कौन-सी घटना होनी है अर्थात् चित्त आता है या पट, यह पूरी तरह से अवसर पर निर्भर करता है। इस प्रकार की घटनाओं को यादृच्छिक घटनाएँ कहा जाता है।

हम एक प्रतिदर्श को चुनने में समान आँकड़े का उपयोग करते हैं। हम सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि प्रतिदर्श में चयन किए गए व्यक्ति या घर या गाँव पूर्णतः अवसर द्वारा चयनित हों, किसी अन्य तरह से नहीं। अतः प्रतिदर्श में चयन होना किस्मत की बात है, जैसे कि लॉटरी जीतना। यह तभी हो सकता है जब यह सच हो कि प्रतिदर्श एक प्रतिनिधित्व प्रतिदर्श होगा। यदि कोई सर्वेक्षण दल अपने में केवल उन्हीं गाँवों का चयन करता है जो मुख्य सड़क के निकट हों तो यह प्रतिदर्श यादृच्छिक या संयोगवश न होकर पूर्वाग्रहित होंगे। इसी तरह से यदि हम अधिकतर के मध्यवर्ग के परिवारों को या अपने जानकर परिवरों का चयन करते हैं तो प्रतिदर्श पुनः पूर्वाग्रहित होंगे।

यह बात है कि जनसंख्या से संबंधित स्तरों का पता लगाने के बाद प्रतिदर्श घरों या उत्तरदाताओं का वास्तविक चयन पूर्णतया संयोग के आधार पर होना चाहिए । इसे विभिन्न तरीकों से सुनिश्चित किया जा सकता है। इसे प्राप्त करने के लिए विभिन्न तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। इनमें सामान्य रूप से (लॉटरी) निकालना, पांसे फेंकना, इस उद्देश्यों हेतु विशेष रूप से बनाई गई प्रतिदर्श नंबर प्लेटों का प्रयोग आदि।

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प्रश्न 6.
प्रश्नावली से आप क्या समझते हैं ? एक प्रश्नावली की विशेषताएँ, प्रकार, गुण तथा दोष बताइए।
उत्तर:
प्रश्नावली का अर्थ तथा परिभाषा-प्रश्नावली प्रविधि के अंतर्गत क्रमबद्ध तरीके से प्रश्न पूछे जाते हैं तथा आवश्यक आँकड़े एकत्रित किए जाते हैं। इस प्रकार क्रमबद्ध तरीके से तैयार किए जा सकते हैं।” इसे साधारणतया, प्रश्नावली अथवा साक्षात्कार तालिका कहते हैं। जे० डी० पोप के अनुसार, “एक प्रश्नावली को प्रश्नों के समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” साधारणतया, प्रश्नावली डाक द्वारा भेजी जाती है, लेकिन इसे व्यक्तियों को बाँटा भी जा सकता है।

प्रत्येक स्थिति में यह सूचना प्रदान करने वाले द्वारा भरकर भेजी जाती है। लुंडबर्ग के अनुसार, “मूलरूप में, प्रश्नावली प्रेरणाओं का एक समूह है जिसके प्रति शिक्षित व्यक्ति उत्तेजित किए जाते हैं तथा वे इन उत्तेतनाओं के अंतर्गत अपने व्यवहार का वर्णन करते हैं।

प्रश्नावली प्रविधि की विशेषताएँ –

  • प्रश्नावली प्रविधि के द्वारा विशाल क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
  • किसी स्थिति विशेष अथवा समस्या के विषय में प्रश्नावली विधि के माध्यम से महत्वपूर्ण आधारभूत सामग्री प्राप्त की जा सकती है।
  • सूचनादाता अनुसंधानकर्ता के समक्ष आए बिना प्रश्नों का उत्तर देता है।
  • प्रश्नावली प्रविधि में वैज्ञानिक अन्वेषण की अन्य पद्धति की अपेक्षा कम खर्च होती है।
  • प्रश्नावली प्रविधि के माध्यम से जटिल प्रश्नों तथा समस्याओं के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्नावली के प्रकार : प्रश्नावली के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित है –

  • स्तरीयय प्रश्नावली,
  • खुली प्रश्नावली तथा
  • बंद प्रश्नावली

1. स्तरीय प्रश्नावली –

  • स्तरीय प्रश्नावली के अंतर्गत निश्चित, ठोस तथा पूर्व-विचारित प्रश्न होते हैं।
  • पेक्षाकृत जटिल प्रश्नों के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने हेतु कुछ अतिरिक्त प्रश्न भी होते हैं।
  • सभी उत्तरदाताओं को समान क्रम में संगठित प्रश्न दिए जाते हैं।
  • स्तरीय प्रश्नावली के उत्तरों की तुलना सुगमतापूर्वक की जा सकती है।
  • स्तरीय प्रश्नावली का प्रयोग आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, प्रशासनिक आदि विषयों तथा घटनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने हेतु किया जाता है।

2. खुली प्रश्नावली –

  • खुली प्रश्नावली के अंतर्गत वैकल्पिक उत्तर नहीं होते हैं।
  • खुली प्रश्नावली में प्रश्नों को इस प्रकार संचित किया जाता है, जिससे उत्तरदाता प्रश्नों का उत्तर खुले रूप से दे सकें।
  • खुली प्रश्नावली के अंतर्गत विषयों को उठाया जाता है, लेकिन सूचनादाता के लिए वैकल्पिक उत्तरों का प्रावधान नहीं होता है।
  • खुली प्रश्नावली की प्रकृति नमनीय होती है, जिसके कारण अनुसंधानकर्ता को पर्याप्त सूचना मिल जाती है।
  • खुली प्रश्नावली के उत्तर अनुसंधान के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं।

3. बंद प्रश्नावली –

  • बंद प्रश्नावली में उत्तर सीमाबद्ध होते हैं।
  • बंद प्रश्नावली में एक प्रश्न के कई वैकल्पिक उत्तर भी दिए जाते हैं।
  • अनेक बार प्रश्न के बार ही संभावित उत्तरों का उल्लेख कर दिया जाता है।
  • आमतौर पर तीन वैकल्पिक उत्तर दिए जाते हैं।
  • बंद प्रश्नावली के निष्कर्ष भ्रमरहित, स्पष्ट तथा तुलनात्मक होते हैं।

प्रश्नावली प्रविधि के गुण –

  • प्रश्नावली प्रविधि द्वारा कम समय में एक विस्तृत क्षेत्र से सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती है।
  • प्रश्नावली प्रविधि में खर्चा कम आता है।
  • प्रश्नावली एक ही समय में डाक सभी सूचनादाताओं के पास भेजी जा सकती हैं।
  • प्रश्नावली एक ही समय में डाक द्वारा सभी सूचनादाताओं के पास भेजी जा सकती है।
  • प्रश्नावली में दिए गए प्रश्नों का उत्तर सूचनदाता बिना किसी दबाव के देते हैं।

प्रश्नावली प्रविधि के दोष –

  • प्रश्नावली प्रविधि में व्यक्ति के दृष्टिकोण का कोई अधिक महत्व नहीं होता है।
  • प्रश्नावली प्रविधि में भौतिक अभिव्यक्ति को कोई महत्व प्रदान नहीं किया जाता है।
  • प्रश्नावली प्रविधि के माध्यम से प्राप्त निष्कर्षों में विश्वासनीयता तथा सत्यता का अभाव पाया जाता है।
  • सूचनादाता प्रश्नों का उत्तर देते समय तथ्यों को दिखा सकता है।
  • प्रश्नावली प्रविधि अशिक्षित लोगों के लिए उपयागी नहीं होती है।

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प्रश्न 7.
सामाजिक अनुसंधान एवं सामाजिक सर्वेक्षण में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
सामाजिक अनुसंधान एवं सामाजिक सर्वेक्षण को प्रायः एक ही मान लिया जाता है। क्योंकि सामाजिक सर्वेक्षण, सामाजिक अनुसंधान की ही एक विधि है फिर भी दोनों में प्रर्याप्त अंतर है। यद्यपि दोनों ही विज्ञान सामाजिक घटनाओं का ही अध्ययन करता है। दोनों में नवीन तथ्यों की खोज करने का प्रयत्न किया जाता है। इतना ही नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार और उसाकी यर्थाथता को जानने का प्रयत्न किया जाता है ताकि सामाजिक जीवन पर अधिक नियंत्रण पाया जा सके तथापि सामाजिक अनुसंधान एवं सामाजिक सर्वेक्षण में अन्तर पाया जाता है, जो निम्न है –

  • सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक तथ्यों और घटनाओं का अध्ययन करने में उपकल्पना की आवश्यकता नहीं पड़ती। जबकि सामाजिक अनुसंधान का प्रारंभ ही किसी उपकल्पना का परीक्षण करने हेतु किया जाता है।
  • सामाजिक सर्वेक्षण का संबंध किसी एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र अथवा एक समुदाय में निवास करने वाले लोगें से होता है जबकि सामाजिक अनुसंधान का संबंध अमूर्त समस्याओं से होता है।
  • सामाजिक सर्वेक्षण का प्रमुख उद्देश्य समाज सुधार एवं समाज कल्याण से है जबकि सामाजिक अनुसंधान का उद्देश्य इससे अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • सामाजिक अनुसंधान का संबंध प्रत्येक प्रकार की सामाजिक घटना संबंधों एवं व्यवहारों से है जबकि सामाजिक सर्वेक्षण सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करता है।
  • सामाजिक सर्वेक्षण का संबंध तात्कालिक समस्याओं, आवश्यकताओं के नियंत्रण से है जबकि सामाजिक अनुसंधान सामाजिक समस्याओं के शीघ्र निवारण से संबंध नहीं रखता है।

प्रश्न 8.
अनुसंधान पद्धति के रूप में साक्षात्कार के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
साक्षात्कार-एक साक्षात्कार मूलत: अनुसंधानकर्ता तथा उत्तरदाता के बीच निर्देशित बातचीत होती है, हालांकि इसके साथ कुछ तकनीकी पक्ष जुड़े होते हैं। प्रारूप की सरलता भ्रामक हो सकती है क्योंकि एक अच्छा साक्षात्कारकर्ता बनने के लिए व्यापक अनुभव तथा कौशल होना जरूरी है। साक्षात्कार. सर्वेक्षण में प्रयोग की गई संरचित प्रश्नावली तथा सहभागी अवलोकन पद्धति की तरह पूर्णरूप से खुली अंत:क्रियाओं के बीच स्थान रखते हैं।

इसका सबसे बड़ा लाभ प्रारूप का अत्यधिक लचीलापन है । प्रश्नों को पुनः निर्मित किया जा सकता है या अलग ढंग से बताया जा सकता है; बातचीत में हुई प्रगति (या प्रगति कम होने पर) के अनुसार विषयों या प्रश्नों का क्रम बदला जा सकता है; जिन विषयों पर अच्छी सामग्री मिल रही हो, उन्हें विस्तारित किया जा सकता है या किसी अन्य अवसर पर बाद में जानने हेतु स्थगित किया जा सकता है और यह . सब स्वयं साक्षात्कार के दौरान किया जा सकता है। । दूसरी तरफ साक्षात्कार विधि के रूप में साक्षात्कार से संबंधित लाभों के साथ अनेक हानियाँ भी हैं।

इसका यह लचीलापन उत्तरदाता की मनोदशा बदल जाने के कारण या फिर साक्षात्कार करने वाले की एकाग्रता में त्रुटि होने के कारण साक्षात्कार को कमजोर बना देता है । इस प्रकार यह एक अविश्वसनीय तथा अस्थिर प्रारूप है जो जब कार्य करता है तो बहुत अच्छा करता है तथा जब असफल होता है तो बहुत बुरी तरह से होता है। साक्षात्कार लेने की अनेक शैलियाँ हैं तथा इससे संबंधित विचार तथा अनुभव लाभों के अनुसार बदलते रहते हैं। कुछ व्यक्ति अत्यंत असंगठित प्रारूप को प्राथमिकता देते हैं जिसमें वास्तविक प्रश्नों के स्थान पर विषय की जाँच सूची ही होती है। अन्य व्यक्ति इसके संगठित रूप से वरीयता देते हैं जिसमें सभी उत्तरदाताओं से विशेष प्रश्न पूछे जाते हैं। परिस्थितियों तथा वरीयताओं के अनुसार साक्षात्कार को रिकार्ड करने के तरीके भी अलग-अलग हैं जिनमें वास्तविक विडियो या ऑडियो रिकार्ड करना, साक्षात्कार के दौरान विस्तृत नोट तैयार करना या स्मरण शक्ति पर निर्भर करना और साक्षात्कार समाप्त होने पर इसे लिखना शामिल है।

रिकार्ड करने वाले या इसी प्रकार के अन्य उपकरणों का बार-बार प्रयोग करने से उत्तरदाता असमान्य महसूस करता है तथा इससे बातचीत में काफी हद तक औपचारिकता आ जाती है। दूसरी तरफ जब रिकार्ड करने की अन्य कम व्यापक विधियों का प्रयोग किया जाता है तो कभी-कभी महत्त्वपूर्ण सूचना छूट जाती है या रिकार्ड नहीं हो पाती है। कभी-कभी साक्षात्कार के समय भौतिक या सामाजिक परिस्थितियाँ भी रिकार्ड के माध्यम को निर्धारित करती हैं। बाद में प्रकाशन के लिए साक्षात्कार को लिखने या अनुसंधान रिपोर्ट के हिस्से के रूप में लिखने का तरीका भी भिन्न हो सकता है। कुछ अनुसंधानकर्ता प्रतिलिपि को संपादित करना तथा इसे ‘स्पष्ट’ नियमित वर्णनात्मक रूप से प्रस्तुत करना पसंद करते हैं; जबकि दूसरे मूल वार्तालाप को यथासंभव वैसा ही बनाए रखना चाहते हैं तथा इसके लिए वे हरसंभव प्रयास करते हैं।

साक्षात्कार को प्रायः अन्य पद्धतियों के साथ अनुरूप के रूप में विशेषता सहभागी अवलोकन तथा सर्वेक्षणों के साथ प्रयुक्त किया जाता है। ‘महत्वपूर्ण सूचनादाता’ (सहभागिता अवलोकन अध्ययन का मुख्य सूचनादाता) के साथ लंबी बातचीत से प्रायः संकेन्द्रित जानकारी प्राप्त हाती है जो साथ में लगाई गई सामग्री प्रदान करती है, स्पष्ट करती है तथा इसी तरह से गहन साक्षात्कारो द्वारा सर्वेक्षण के निष्कर्षों को गहनता तथा व्यापकता प्राप्त होती है। हालांकि एक पद्धति के रूप में साक्षात्कार व्यक्तिगत पहुँच पर और उत्तरदाता तथा अनुसंधानकर्ता के आपसी संबंधों या आपसी विश्वास पर निर्भर होता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
“मूल रूप से, प्रश्नावली प्रेरणओं का एक समूह है, जिसके प्रति शिक्षित व्यक्ति उत्तेजित किए जाते हैं तथा इन उत्तेजनाओं के अन्तर्गत वे अपने व्यवहार का वर्णन करते हैं।” यह कथन है …………………….
(अ) मोजर
(ब) लुंडबर्ग
(स) मोर्स
(द) पी० वी० यंग
उत्तर:
(ब) लुंडबर्ग

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प्रश्न 2.
“अवलोकन नेत्रों द्वारा एक विचारपूर्वक अध्ययन है-जैसे सामूहिक व्यवहार तथा जटिल सामाजिक संस्थाओं तथा साथ ही साथ संपूर्णता वाली पृथक् इकाइयों के अन्वेक्षण हेतु प्रणाली के रूप में उपयोग किया जाता है।” यह कथन है ……………………
(अ) मेजर
(ब) लुंडबर्ग
(स) मोर्स
(द) पी० वी० यंग
उत्तर:
(द) पी० वी० यंग

प्रश्न 3.
“एक प्रश्नावली के प्रश्नों के समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सूचनादाता को बिना अनुसंधानकर्ता या प्रगणक की व्यक्तिगत सहायता के उत्तर देना होता है।साधारणतया प्रश्नावली डाक द्वारा भेजी जाती है, लेकिन इसे व्यक्तियों को बाँटा भी जा सकता है। प्रत्येक स्थिति में यह सूचना प्रदान करने वाले द्वारा भरकर भेजी जाती है।” यह कथन है ………………….
(अ) मोजर
(ब) लुंडबर्ग
(स) मोर्स
(द) पी० वी० यंग
उत्तर:
(स) मोर्स

प्रश्न 4.
“प्रविधियाँ एक समाज वैज्ञानिक के लिये वे मान्य तथा सुव्यवस्थित तरीके होते हैं, जिन्हें वह अपने अध्ययन से संबंधित विश्वसनीय तथ्यों (Reliable facts) को प्राप्त करने हेतु प्रयोग में लाता है।” यह कथन है …………………….
(अ) मोज
(ब) लुंडबर्ग
(स) मोर्स
(द) पी० वी० यंग
उत्तर:
(अ) मोजर

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प्रश्न 5.
“सर्वेक्षण किसी सामाजिक स्थिति या समस्या अथवा जनसंख्या के परिभाषित उद्देश्यों के लिए वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित रूप से अवश्लेषण की एक पद्धति है।” यह कथन …………………….
(अ) मोज़र
(स) मोर्स
(ब) लुंडबर्ग
(द) पी० वी० यंग
उत्तर:
(स) मोर्स

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions  Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

Bihar Board Class 11 Political Science भारतीय संविधान में अधिकार Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन मौलिक अधिकारों का सबसे सटीक वर्णन है?
(क) किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार।
(ख) कानून द्वारा नागरिक को प्रदत्त समस्त अधिकार।
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त तथा सुरक्षित समस्त अधिकार।
(घ) संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जिन पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।
उत्तर:
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त तथा सुरक्षित समस्त अधिकार।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 2 भारतीय संविधान में अधिकार

प्रश्न 2.
निम्नलिखित प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि वह सही है या गलत –

  1. अधिकार-पत्र में किसी देश की जनता को हासिल अधिकारों का वर्णन रहता है।
  2. अधिकार-पत्र स्वतन्त्रता की रक्षा करता है।
  3. विश्व के हर देश में अधिकार-पत्र होता है।

उत्तर:

  1. सही
  2. सही
  3. गलत

प्रश्न 3.
निम्नलिखित स्थितियों को पढ़ें। प्रत्येक स्थिति के बारे में बताएं कि किस मौलिक अधिकार का उपयोग या उल्लंघन हो रहा है और कैसे?
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज्यादा है-नौकरी में तरक्की दी गई, लेकिन उनकी ऐसी महिला-सहकर्मियों को दंडित किया गया, जिनका वजन बढ़ गया था।
(ख) एक निर्देशक एक डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म बनाता है, जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है।
(ग) एक बड़े बाँध के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकलते हैं।
(घ) आन्ध्र-सोसायटी आन्ध्रप्रदेश के बाहर तेलगू माध्यम में विद्यालय चलाती है।
उत्तर:
(क) नेशनल एयरलाइन्स के अधिक भारी पुरुष कर्मचारी को प्रोन्नति दी जाती है। परन्तु उनके साथी महिला कर्मचारी जो अधिक भारी हो जाती हैं, को प्रोन्नति नहीं दी जाती वरन उनको पेनेलाइज्ड किया जाता है। इस दशा में समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता से या समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। अनुच्छेद 15 (i) में कहा गया है कि राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

अनुच्छेद 16 (i) के अनुसार राज्य के अधीन किसी नियोजन या नियुक्ति से सम्बन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी। अनुच्छेद 16 (ii) के अनुसार राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के सम्बन्ध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा। परन्तु उपरोक्त घटना में लिंग के आधार पर भेदभाव किया गया है। अत: महिला कर्मचारियों को लिंग भेद के कारण प्रोमोशन नहीं दिया गया। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

(ख) इस घटना में एक निर्देशक के द्वारा डॉक्यूमेन्ट्री फिल्म बनाकर सरकार की नीतियों की आलोचना की गयी है। अनुच्छेद 19 (i) के अनुसार व्यक्ति को (सभी नागरिकों को) विचार, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार प्राप्त है।

(ग) इस घटना में क्योंकि बड़े बाँध के निर्माण को लेकर विस्थापित व्यक्तियों द्वारा पुनः स्थापित करने की माँग को लेकर रैली का आयोजन किया गया। यहाँ पर अनुच्छेद 19 (ii) में दिए गए शान्तिपूर्वक सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता के अधिकार का प्रयोग हुआ है।

(घ) इस घटना में अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार प्राप्त है। उसी के आधार पर आन्ध्र सोसायटी, आन्ध्रप्रदेश के बाहर तेलगू भाषा का विद्यालय चलाती है। यहाँ अल्पसंख्यकों के अधिकार का प्रयोग हुआ है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में कौन सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या है?
(क) शैक्षिक-संस्था खोलने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के ही बच्चे इस संस्थान में पढ़ाई कर सकते हैं।
(ख) सरकारी विद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अल्पसंख्यक-वर्ग के बच्चों को उनकी संस्कृति और धर्म-विश्वासों से परिचित कराया जाए।
(ग) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।
(घ) भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक यह माँग कर सकते हैं कि उनके बच्चे उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक-संस्थाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्थान में नहीं पढ़ेंगे।
उत्तर:
उपरोक्त चारों कथनों में से (ग) भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने बच्चों को शिक्षा देने के लिए और अपनी व संस्कृति की रक्षा के लिए स्कूल खोलने का अधिकार है। यह कथन सत्य है, क्योंकि यही संस्कृति और शैक्षणिक अधिकार की सही अभिव्यक्ति है। अनुच्छेद 29 (i) के अनुसार अल्पसंख्यक वर्गों के हितों के संरक्षण हेतु भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को जिनकी अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना प्रशासन का अधिकार होगा।

प्रश्न 5.
इनमें कौन-मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और क्यों?
(अ) न्यूनतम देय मजदूरी नहीं देना।
(ब) किसी पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाना।
(स) 9 बजे रात के बाद लाउड-स्पीकर बजाने पर रोक लगाना।
(द) भाषण तैयार करना।
उत्तर:
भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। प्रारम्भ में 7 मूल अधिकार दिए गए थे किन्तु 44वें संविधान द्वारा सम्पत्ति का अधिकार समाप्त कर दिया गया। दिसम्बर 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा 6 – 14 वर्ष आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का मूल अधिकार प्रदान किया गया है। अत: मूल अधिकारों की संख्या पुन: 7 हो गयी है। उपरोक्त प्रश्न में 4 घटनाएँ दी गयी हैं। इनमें से पहली घटना न्यूनतम मजदूरी न देना ‘शोषण के विरुद्ध अधिकार’ का उल्लंघन माना जाएगा।

परन्तु अन्य तीन घटनाओं में मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता, क्योंकि किसी पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाने से उस पुस्तक के लेखक के विचार, अभिव्यक्ति पर यद्यपि प्रतिबन्ध तो है। परन्तु समाज के किसी वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुँचाने पर किसी पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। इसी प्रकार तीसरी घटना में रात्रि 9 बजे के बाद लाउडस्पीकर पर प्रतिबन्ध भी समाज के हित में लगाया जाता है। भाषण देना तो विचार अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार की पूर्ति ही है। अत: उपरोक्त घटनाओं में से प्रथम घटना जिसमें न्यूनतम मजदूरी नहीं दी गयी, में उस श्रमिक के ‘शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार’ का उल्लंघन हुआ है।

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प्रश्न 6.
गरीबों के बीच काम कर रहे एक कार्यकर्ता का कहना है कि गरीबों को मौलिक अधिकारों की जरूरत नहीं है। उनके लिए जरूरी यह है कि नीति निर्देशक सिद्धान्तों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बना दिया जाय। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर:
मैं इस कथन से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि नागरिकों के लिए मौलिक अधिकार नीति निर्देशक तत्त्वों से अधिक जरूरी है. दूसरे नीति निर्देशक तत्त्वों को बाध्यकारी (न्यायसंगत) नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि हमारे पास सभी को नीति निर्देशक तत्त्वों में दी गयी सुविधाओं को देने के लिए पर्याप्त श्रोत नहीं है।

प्रश्न 7.
अनेक रिपोर्टों से पता चलता है कि जो जातियाँ पहले झाडू देने के काम में लगी थीं, उन्हें मजबूरन यही काम करना पड़ रहा है, जो लोग अधिकार-पद पर बैठे हैं, वे इन्हें कोई और काम नहीं देते। इनके बच्चों को पढ़ाई-लिखाई करने पर हतोत्साहित किया जाता है। इस उदाहरण में किस मौलिक-अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।
उत्तर:
इस उदाहरण में निम्न मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है –

1. स्वतन्त्रता का अधिकार:
जब उन व्यक्तियों को हमेशा उसी व्यवसाय को अपनाने को बाध्य किया गया हो तो उनके स्वतन्त्रता अधिकार का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार संविधान ने सभी नागरिकों को वृत्ति, उपजीविका, व्यापार अथवा व्यवसाय की स्वतन्त्रता प्रदान की है। यह स्वतन्त्रता उनको नहीं दी जा रही है। अत: उनके स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है।

2. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार:
उपरोक्त घटना में उन व्यक्तियों के संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार का भी उल्लंघन हुआ है। अनुच्छेद 29 के उपखंड (2) के अनुसार राज्य द्वारा घोषित वा राज्यनिधि से सहायता प्राप्त किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के भी आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा।

3. समानता का अधिकार:
उपरोक्त घटना में समानता के अधिकार का भी उल्लंघन होता है। अनुच्छेद 14 के अनुसार भारत के राज्य क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान समझा जाएगा। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करता है।

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प्रश्न 8.
एक मानवाधिकार-समूह ने अपनी याचिका में अदालत का ध्यान देश में मौजूद भूखमरी की स्थिति की तरफ खींचा। भारतीय खाद्य-निगम के गोदामों में 5 करोड़ टन से ज्यादा अनाज भरा हुआ था। शोध से पता चलता है कि अधिकांश राशन-कार्डधारी यह नहीं जानते कि उचित-मूल्य की दुकानों से कितनी मात्रा में वे अनाज खरीद सकते हैं। मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत से निवेदन किया कि वह सरकार को सार्वजनिक-वितरण-प्रणाली में सुधार करने का आदेश दे।
(अ) इस मामले में कौन-कौन से अधिकार शामिल हैं? ये अधिकार आपस में किस तरह जुड़े हैं?
(ब) क्या ये अधिकार जीने के अधिकार का एक अंग हैं?
उत्तर:
(अ) उक्त उदाहरण के अन्तर्गत संवैधानिक उपचारों का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार तथा स्वतन्त्रता का अधिकार लिप्त है। ये अधिकार आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। भूख से मरने के कारण जीने के अधिकार का उल्लंघन हुआ। गोदामों में पाँच करोड़ टन अनाज होते हुए भी सरकार ने वितरण व्यवस्था ठीक नहीं की और मानव अधिकार समूह द्वारा कोर्ट से प्रार्थना की गयी कि सरकार को पब्लिक वितरण व्यवस्था सुधारने के लिए आदेश दिया जाए अर्थात् संवैधानिक उपचारों का अधिकार सम्मिलित है।

(ब) ये अधिकार यद्यपि सभी अलग-अलग मूल अधिकार हैं। परन्तु ये इस मामले में जीव के अधिकार के भाग बने हुए हैं।

प्रश्न 9.
इस अध्याय में उद्धृत सोमनाथ लाहिड़ी द्वारा संविधान-सभा में दिए गए वक्तव्य को पढ़ें। क्या आप उनके कथन से सहमत हैं? यदि हाँ तो इसकी पुष्टि में कुछ उदाहरण दें। यदि नहीं तो उनके कथन के विरुद्ध तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर:
सोमनाथ लाहिड़ी का संविधान सभा में दिया गया कथन इस प्रकार है – “मैं समझता हूँ कि इसमें ये अनेक मौलिक अधिकारों को एक सिपाही के दृष्टिकोण से बनाया गया है। … आप देखेंगे कि काफी कम अधिकार दिए गए हैं और प्रत्येक अधिकार के बाद एक उपबन्ध जोड़ा गया है। लगभग प्रत्येक अनुच्छेद के बाद एक उपबन्ध है, जो इन अधिकारों को वापस ले लेता है। … मौलिक अधिकारों की हमारी क्या अवधारणा होनी चाहिए? … हम उस प्रत्येक अधिकार को संविधान में पाना चाहते हैं, जो हमारी जनता चाहती है।”

इस कथन से यह तात्पर्य निकलता है कि हमारे संविधान में मौलिक अधिकार दिए ही कम हैं, बहुत सी ऐसी बातों को छोड़ दिया गया है, जो मौलिक अधिकारों में शामिल होनी चाहिए थीं। जैसे काम करने का अधिकार, निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार, आवास का अधिकार, सूचना प्राप्त करने का अधिकार आदि। दूसरी आलोचना इस कथन से पता चलती है कि प्रत्येक मौलिक अधिकारों के साथ अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए गए हैं, जिससे यह समझना कठिन हो जाता है कि व्यक्ति को मौलिक अधिकारों से क्या मिला? आलोचकों का मत है कि भारतीय संविधान एक हाथ से अधिकार देता है, तो दूसरे हाथ से उन्हें छीन लेता है।

तीसरी महत्त्वपूर्ण बात उक्त कथन से प्रकट होती है कि हमारे संविधान में मौलिक अधिकार पुलिस के सिपाही के दृष्टिकोण से दिए गए हैं। इसका यह अर्थ है कि प्रत्येक अधिकार पर प्रतिबन्ध लगा दिए गए हैं। हरिविष्णु कामथ ने भी संविधान सभा में कहा था कि “इस व्यवस्था द्वारा तानाशाही राज्य और पुलिस राज्य की स्थापना कर रहे हैं।”

इसी प्रकार सरदार हुकमसिंह ने कहा था “यदि हम इन स्वतन्त्रताओं को व्यवस्थापिका की इच्छा पर ही छोड़ देते हैं, जो कि एक राजनीतिक दल के अलावा कुछ नहीं है, तो इन स्वतन्त्रताओं के अस्तित्व में भी सन्देह हो जाएगा।” संविधान में मौलिक अधिकारों पर जो प्रतिबन्ध लगे हैं जैसे विचार अभिव्यक्ति पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि किसी की भावना को ठेस न पहुँचे। बिना शस्त्र सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता के अधिकार पर कभी यह प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है कि इससे साम्प्रदायिक दंगा भड़कने की आशंका है। इस प्रकार मौलिक अधिकारों की उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है।

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प्रश्न 10.
आपके अनुसार कौन-सा मौलिक अधिकार सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को संक्षेप में लिखें और तर्क देकर समझायें कि यह क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में दिया गया अन्तिम अधिकार संवैधानिक उपचारों का अधिकार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह अधिकार है कि अगर संविधान में दिये गये अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो तो यह अधिकार नागरिकों को न्यायालय में जाने का अधिकार देता है। न्यायालय केस के आधार पर आवश्यक आदेश जारी करता है, जिससे उस अधिकार की रक्षा की जाती है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भी इस अधिकार को संविधान का हृदय व आत्मा (Heart and Soul) कहा है।

Bihar Board Class 11 Political Science भारतीय संविधान में अधिकार Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अधिकारों से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अधिकार:
व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो, अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार बन जाती हैं, भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परन्तु उसे अधिकार ही माना जाएगा क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बेन तथा पीटर्स ने अधिकार की परिभाषा देते हुए कहा है, “अधिकारो की स्थापना एक। सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहे कानून पर आधारित हो या परम्परा पर।” अस्टिन के अनुसार, “अधिकार एक व्यक्ति की वह सामर्थ्य है, जिससे वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता है।” लास्की के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं पर सकता।”

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प्रश्न 2.
मौलिक अधिकारों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मौलिक अधिकार-किसी देश के नागरिकों को लोकतन्त्रिक शासन व्यवस्था में जिन अनेक व्यक्तियों की प्राप्ति होती है, उनमें से कुछ प्रमुख अधिकार, जिनके बिना व्यक्ति अपनी उन्नति व विकास नहीं कर सकता, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। जैसे-जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, स्वतन्त्रता का अधिकार, शिक्षा व संस्कृति का अधिकार इत्यादि। जिन कारणों से इन अधिकारों को मौलिक कहा जाता है, वे हैं –

  1. ये व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए अत्यावश्यक है।
  2. देश के संविधान में इन अधिकारों का वर्णन किया गया है। कोई सरकार स्वेच्छा से इनमें परिवर्तन नहीं कर सकती।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
ब्रिटिश शासन में जनता के अधिकारों का हनन हुआ जिस कारण भारतीय समाज पिछड़ता गया। इस कारण संविधान निर्माताओं ने मौलिक अधिकारों को संवैधानिक प्रावधानों के द्वारा सुरक्षित बना दिया। संविधान में दिए गए इन अधिकारों का बहुत महत्त्व है। इन अधिकारों के द्वारा व्यक्ति के जीवन, सम्पत्ति और स्वतन्त्रता की रक्षा होती है। ये अधिकार शासन को निरन्कुश होने से रोकते हैं, तथा नागरिकों को आत्म-विकास का अवसर देते हैं। मूल अधिकार देश की एकता बनाए रखने में सहायक होते हैं।

प्रश्न 4.
नागरिकों के दो धार्मिक अधिकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. धार्मिक विश्वास का अधिकार-कोई भी मनुष्य अपनी इच्छानुसार धार्मिक विश्वास रख सकता है। धर्म उसका व्यक्तिगत मामला है। अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार है।
  2. धार्मिक प्रचार का अधिकार-प्रत्येक धर्म के मानने वालों को अपने धर्म का प्रचार करने का समान अधिकार प्राप्त है। धर्म-प्रचारक अपने धर्म के प्रचार के लिए शान्तिपy सम्मेलन कर सकते हैं।

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प्रश्न 5.
नागरिक के किन्हीं दो राजनीतिक अधिकारों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक अधिकार –

  1. चुनाव में उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने का अधिकार।
  2. चुनाव में मत देने का अधिकार।
  3. रातनीतिक पद प्राप्त करने का अधिकार।
  4. कानून के समक्ष समानता का अधिकार।

प्रश्न 6.
भारत में स्त्रियों के कल्याण से सम्बन्धित कोई दो निर्देशक सिद्धान्त लिखें।
उत्तर:

  1. महिला और पुरुष दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाए।
  2. स्त्रियों व बच्चों का शोषण न किया जाए। महिला और पुरुष कामगारों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो।
  3. पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो।

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प्रश्न 7.
राज्य के दो नीति निर्देशक सिद्धान्त लिखें जो भारत में बाल कल्याण से सम्बन्धित हैं।
उत्तर:
भारत में बाल कल्याण से सम्बन्धित राज्य के दो नीति निर्देशक तत्व निम्नलिखित हैं –

  1. बालकों को स्वतन्त्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएँ और बालकों व अल्पवय व्यक्तियों की शोषण तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।
  2. राज्य इस संविधान के प्रारम्भ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबन्ध करने का प्रयास करेगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘प्रतिषेध लेख’ तथा ‘अधिकार पृच्छा’ पर टिप्पणी लिखिये।
उत्तर:
मौलिक अधिकारों से किसी को वंचित न किया जाए इस हेत संविधान ने मौलिक अधिकारों की रक्षा का भार सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को सौंपा है। ये न्यायालय बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध लेख, अधिकार पृच्छा तथा उत्प्रेषण लेख या आदेश जारी करते हैं। इनमें से प्रतिबन्ध लेख तथा अधिकार पृच्छा का वर्णन निम्नलिखित है –

1. प्रतिषेध लेख:
प्रतिषेध का अर्थ है ‘मना करना’। जब कोई अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जा रहा हो या कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध जा रहा हो तो उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय उस अधीनस्थ न्यायालय को ऐसा करने पर प्रतिषेध (मना) कर सकता है। इसके लिए सम्बन्धित उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय को इस प्रतिषेध लेख द्वारा उचित कार्यवाही करने के लिए आदेश दे सकता है।

2. अधिकार पृच्छा:
इसका अर्थ है ‘किस अधिकार से?’ यदि किसी व्यक्ति ने कानून के विरुद्ध किसी पद पर अधिकार प्राप्त कर रखा है, तो उच्च न्यायालय उसे ऐसा करने से रोक सकता है। जैसे केन्द्रीय लोकसेवा आयोग के सदस्य की आयु की सीमा 65 वर्ष है। यदि कोई व्यक्ति इस आयु के पश्चात् भी सदस्य बना हुआ है, तो उच्चतम न्यायालय उससे यह पूछ सकता है, कि किस कानून के अन्तर्गत उसने ऐसा किया है, और उसे अधिकार है, कि,आवश्यक समझने पर वह उस व्यक्ति को पदमुक्त करने का आदेश दे सकता है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए –
(क) गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध संरक्षण।
(ख) अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा।
(ग) बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख।
(घ) परमादेश।
उत्तर:
(क) गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध संरक्षण:
अनुच्छेद 22 के अनुसार जब कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया जाता है, तो यथाशीघ्र इसकी गिरफ्तारी का कारण बताया जाना आवश्यक है। गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायाधीश के सम्मुख पेश किया जाना चाहिए। गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी रुचि का वकील करने या वकील से परामर्श लेने का अधिकार है।

(ख) अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा:
अनुच्छेद 39 अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने तथा उनका प्रबन्ध करने की स्वतन्त्रता देता है। यदि राज्य किसी ऐसी शिक्षण संस्थाओं का आधिपत्य ग्रहण करता है, जिसकी स्थापना अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा हुई हो तो उतना मुआवजा देना अनिवार्य होगा जिससे अल्पसंख्यक के अधिकार समाप्त अथवा सीमित न हों।

(ग) बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख:
लैटिन भाषा के इस शब्द का अर्थ है, कि ‘शरीर को हमारे सम्मुख प्रस्तुत करो।’ इसके द्वारा न्यायालय को अधिकार प्राप्त होता है, कि वह बन्दी बनाए गए किसी व्यक्ति को अपने समक्ष उपस्थित करने का आदेश दे सके यदि बन्दी बनाया गया व्यक्ति यह अनुभव करता है, कि उसे गैरकानूनी अथवा अवैध रूप से बन्दी बनाया गया है, तो वह स्वयं अथवा उसका कोई साथी उच्च या सर्वोच्च न्यायालय में आवेदन पत्र दे सकता है, कि बन्दी बनाए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष उपस्थित किया जाए।

(घ) परमादेश:
लैटिन भाषा के इस शब्द का अर्थ है, ‘हम आज्ञा देते हैं। जब कोई व्यक्ति या संस्था अपने कर्त्तव्य की पूर्ति न करे तो न्यायालय उसे अपने कर्त्तव्य पालन के लिए परमादेश द्वारा आदेश दे सकता है। जैसे कोई विश्वविद्यालय अपने किसी सफल विद्यार्थी को डिग्री न दे अथवा कोई संस्था अपने कर्मचारी को बिना समुचित कारण बताए नौकरी से निकाल दे और न्यायालय के निर्णय के बाद भी उसे पुनः नियुक्त न करे। ऐसी अवस्था में उच्च तथा सर्वोच्च न्यायालय परमादेश के द्वारा इन संस्थाओं को कर्तव्य पालन करने के लिए आदेश दे सकती है।

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प्रश्न 3.
किन्हीं दो मौलिक अधिकारों का उल्लेख करें, जो संविधान अल्पसंख्यकों को देता है।
उत्तर:
किसी देश के नागरिकों को लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था में जिन अधिकारों की प्राप्ति होती है, उनमें से कुछ प्रमुख अधिकार, जिनके बिना व्यक्ति अपनी उन्नति व विकास नहीं कर सकता, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। जैसे-जीवन का अधिकार, समानता का अधिकार, स्वतन्त्रता का अधिकार, शिक्षा व संस्कृति का अधिकार इत्यादि। भारतीय संविधान द्वारा भारत के सभी नागरिकों को छः प्रकार के मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, उनमें से दो मौलिक अधिकार जो अल्पसंख्यकों को दिए गए हैं, निम्नलिखित हैं –

  1. संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को योग्यता होने पर बिना किसी भेदभाव के नौकरी के लिए समान अवसर प्रदान किए गए हैं, परन्तु अल्पसंख्यकों अथवा पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में कुछ स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।
  2. अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार होगा। उसका प्रबन्धन वे स्वयं कर सकेंगें, राज्य उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।

प्रश्न 4.
मौलिक अधिकारों तथा निर्देशक तत्वों में कोई दो अन्तर बताएँ।
उत्तर:
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों तथा नीति-निर्देशक सिद्धान्तों को एक महत्त्वपूर्ण अंग मानकर इसकी व्याख्या की गई है, ताकि इनके द्वारा प्रत्येक अपना विकास कर सकें और सभी को सामाजिक और आर्थिक न्याय मिल सके। यद्यपि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, किन्तु फिर भी दोनों में भिन्न अन्तर हैं –

1. मौलिक अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्राप्त है, लेकिन निर्देशक सिद्धान्त को नहीं-संविधान द्वारा मौलिक अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है, अर्थात् यदि सरकार किसी कानून या प्रशासनिक आदेश द्वारा नागरिकों के अधिकार पर आक्षेप करती है तो, नागरिक सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय से न्याय की माँग कर सकता है। इन न्यायालयों का कर्तव्य है, कि वे अधिकारों की रक्षा करें परन्तु निर्देशक सिद्धान्तों को इस प्रकार का कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है।

2. नीति निर्देशक सिद्धान्त राज्य से संबन्धित हैं, लेकिन मौलिक अधिकार नागरिकों से-मौलिक अधिकार नागरिकों को प्राप्त हैं और इनका सम्बन्ध नागरिकों से है, किन्तु नीति निर्देशक सिद्धान्त राज्य से सम्बन्धित हैं। इनका पालन करना राज्य का काम है। मौलिक अधिकार संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान की गई सुविधाएँ हैं, जब कि निर्देशक सिद्धान्तों के द्वारा सरकार को जनता के कल्याण के कार्य करने के लिए निर्देश दिए गए हैं।

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प्रश्न 5.
संविधान के 42 वीं संशोधन द्वारा जोड़े गए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
42 वीं संविधान संशोधन द्वारा नीति निर्देशक तत्वों का विस्तार किया गया जो निम्नलिखित है –

  1. राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार करेगा कि बच्चों को स्वस्थ, स्वतन्त्र और प्रतिष्ठापूर्ण वातावरण में अपने विकास के लिए अवसर और सुविधाएँ प्राप्त हों।
  2. राज्य ऐसी कानून प्रणाली के प्रचलन की व्यवस्था करेगा जो समाज में अवसर के आधार पर न्याय का विकास करे। राज्य उपयुक्त कानून या अन्य ढंग से आर्थिक दृष्टि से कमजोर व्यक्तियों के लिए मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था करने का प्रयत्न करंगा।
  3. राज्य उपयुक्त कानून द्वारा या अन्य उपायों से श्रमिकों को उद्योगों के प्रबन्धन में भागीदार बनाने के लिए कदम उठाएगा।
  4. राज्य पर्यावरण की सुरक्षा और विकास तथा देश के वन और वन्य जीवों को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा।

प्रश्न 6.
शिक्षा और संस्कृति से सम्बन्धित कौन से अधिकार भारतीय नागरिकों को प्रदान किए गए हैं?
उत्तर:
संस्कृति तथा शिक्षा-सम्बन्धी अधिकार- भारतीय संविधान की धारा 29 व 30 में इन अधिकारों का वर्णन है। इन अधिकारों को संविधान में स्थान देकर अल्पसंख्यकों के लिए नया युग आरम्भ किया गया है।

  1. भारत के नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है।
  2. धर्म, वंश, जाति, भाषा अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर किसी भी नागरिक को किसी राजकीय संस्था या राजकीय सहायता प्राप्त संस्था में प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
  3. अल्पसंख्यकों को अपनी इच्छानुसार स्कूल, कॉलेज खोलने का अधिकार होगा। इस प्रकार की संस्थाओं को अनुदान देने में राज्य कोई भेदभाव नहीं करेगा।

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प्रश्न 7.
अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना से आप क्या समझते हैं? राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धान्तों में इसे किस प्रकार व्यक्त किया गया है?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का अर्थ है, कि भिन्न देशों के बीच सहयोग व सद्भावना का वातावरण बना रहे। इससे अभिप्राय यह भी है, कि भिन्न देश एक-दूसरे के साथ मित्र की भाँति व्यवहार करे। निर्देशक सिद्धान्तों में अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना को और अधिक दृढ़ करने के लिए संविधान की धारा 51 में निम्न प्रावधान का मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है –

  1. सदस्य देश अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन करें।
  2. आपसी झगड़ों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास करें। अन्तर्राष्ट्रीय विवाद को मध्यस्थता द्वारा सुलझाने की व्यवस्था को राज्य प्रोत्साहन दे।
  3. आपसी सहयोग को बढ़ाने के लिए एक दूसरे के साथ हरेक प्रकार के सहयोग का आदान-प्रदान करें।
  4. सह-अस्तित्व की भावना पर बल दें। राज्य विभिन्न राज्यों के बीच न्याय और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना के लिए प्रयत्न करे।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों व अन्तर्राष्ट्रीय संधियों के प्रति राज्य सरकार आदर की भावना बढ़ाने की कोशिश करे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत प्रदत्त छः स्वतन्त्रताओं का मूल्यांकन करें। इनकी रक्षा किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
नागरिक स्वतन्त्रता:
अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को सात स्वतन्त्रताएँ दी गई थीं जिनमें से 44 वें संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अर्जन स्वतन्त्रता को निकाल दिया गया है। शेष छः स्वतन्त्रताएँ निम्नलिखित हैं –

1. भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को भाषण, लेख, चलचित्र अथवा अन्य किसी माध्यम से अपने विचार को प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। 44 वें संशोधन द्वारा संविधान में एक नया अनुच्छेद 361 – A जोड़ा गया है, जिसके अन्तर्गत समाचार पत्रों को संसद, विधानमण्डलों की कार्यवाही प्रकाशित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होगी परन्तु राज्य को अधिकार है कि देश की अखंडता, सुरक्षा, शान्ति, नैतिकता, न्यायालयों के सम्मान और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए इन अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है।

2. शान्तिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के सभा:
सम्मेलन करने की स्वन्तत्रता-नागरिकों को शान्तिपूर्वक एकत्र होकर सभा करने की स्वन्तत्रता है, परन्तु सुरक्षा और शान्ति की दृष्टि से इस अधिकार पर भी उचित प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

3. संस्था या संघ बनाने की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को संस्था व संघ बनाने की पूर्ण स्वतन्त्रता है, परन्तु उसका उद्देश्य सुरक्षा व शान्ति को खतरा पहुँचाना न हो।

4. भ्रमण की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को देश की सीमाओं के भीतर घूमने-फिरने की पूर्ण स्वतन्त्रता है, परन्तु सार्वजनिक हितों तथा जनजातियों की रक्षा के लिए राज्य इस स्वतन्त्रता पर रोक लगा सकता है।

5. देश के किसी भाग में निवास करने और बसने की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को देश के किसी भाग में निवास करने और बसने की पूर्ण स्वतन्त्रता है, परन्तु सार्वजनिक हित और जनजाति, संस्कृति की रक्षा के लिए इस अधिकार पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

6. व्यवसाय अपनाने की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को अपना कोई भी व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता दी गई है, पर सार्वजनिक हित में इस पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। सितम्बर 1989 में एक विवाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि “पटरियों और गली-कूचों में बैठकर या फेरी लगाकर व्यापार करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, पर उसके लिए किसी भी जगह पर स्थायी रूप से बैठने या जम जाने का कोई भी बुनियादी हक उन्हें नहीं है।”

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प्रश्न 2.
राज्य-नीति के निर्देशक सिद्धान्तों को व्यवहारिक रूप देने के लिए भारत सरकार तथा भारत के राज्यों की सरकारों ने क्या किया?
उत्तर:
भारत में केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों ने 1950 ई. से लेकर अब तक निर्देशक सिद्धान्तों को लागू करने के लिए बहुत से प्रयत्न किए हैं। उनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं –

  1. भारत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, कबीलों और अन्य पिछड़े हुए वर्गों को बहुत सी सुविधाएँ प्रदान की गयी हैं। जैसे-संसद और राज्य विधान मण्डलों में इनके लिए सीटें सुरक्षित रखी गयी हैं। इन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्राप्त है।
  2. भारत के प्रायः सभी राज्यों में प्राथमिक शिक्षा निःशुल्क तथा अनिवार्य है। कुछ राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा व केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली में तो माध्यमिक स्तर तक शिक्षा निःशुल्क है।
  3. संसद द्वारा कानून बनाकर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए है। अब स्त्रियों को समान कार्य के लिए पुरुषों के समान वेतन दिया जाता है।
  4. महिला कल्याण के लिए सरकार द्वारा प्रसूति गृह खोले गए हैं, और वेश्यावृत्ति को कानूनन समाप्त किया जा रहा है।
  5. केन्द्र में व भारत के अधिकांश राज्यों में न्यायापालिका को कार्यपालिका से मुक्त रखा गया है।
  6. भारत में कई राज्यों ने नशाबन्दी के लिए प्रयास किए हैं। इन राज्यों में शराब बनाने, बेचने, खरीदने पर पाबन्दी लगा दी गयी है।
  7. समाजवाद के उद्देश्य की पूर्ति के लिए बड़े-बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है। भूतपूर्व राजाओं के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए हैं।
  8. भारत के प्राचीन स्मारकों की रक्षा के लिए भारतीय संसद द्वारा कई कानून बनाए गए हैं, और कार्यपालिका ने उन कानूनों को लागू किया है।
  9. कृषि की उन्नति के लिए सिंचाई योजनाएँ, ट्रैक्टर, उन्नत किस्म के बीज, किसानों को ऋणी सुविधाएँ आदि प्रदान की गयी हैं।
  10. पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया है। पंचायतों को अधिक शक्तियाँ भी दी गई हैं।
  11. विदेश नीति को पंचशील के सिद्धान्तों पर आधारित किया है। अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के लिए भारत ने सदा ही संयुक्त राष्ट्र जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को सहयोग प्रदान किया है।

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प्रश्न 3.
संवैधानिक उपचारों का अधिकार से क्या तात्पर्य है? इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (धारा 32 व 36 ):
इस अधिकार के अनुसार प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार दिया गया है, कि यदि उसे प्राप्त मौलिक अधिकारों में आक्षेप किया जाए या छीना जाए, चाहे वह सरकार की ओर से ही क्यों न हो, वह सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय से न्याय की माँग कर सकता है। मूल अधिकारों की रक्षा के लिए ये न्यायालय भिन्न प्रकार के निर्देश, आदेश या लेख जारी कर सकते हैं –

1. बंदी प्रत्यक्षीकरण:
इसके अन्तर्गत न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त होता है, कि वह बन्दी बनाए गए किसी व्यक्ति को अपने सामने उपस्थित करने का आदेश दे सके ताकि इस बात की जाँच की जा सके कि उसे गैर-कानूनी तौर पर बन्दी नहीं बनाया गया। निर्दोष साबित होने पर उसे तुरन्त छोड़ दिया जाता है।

2. परमादेश:
लैटिन भाषा के इस शब्द का अर्थ है, हम आज्ञा देते हैं। जब किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा अपना कर्त्तव्य पालन न किए जाने की दशा में परमादेश जारी किया जाता है, तो परमादेश जारी होने पर उसे अपना कर्त्तव्य पालन करने का आदेश दिया जाता है।

3. प्रतिषेध:
प्रतिषेध द्वारा किसी अधिकारी या न्यायालय को ऐसा करने से रोका जाता है, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो।

4. अधिकार पृच्छा:
गैरकानूनी एवं अनुचित तरीके से किसी व्यक्ति द्वारा किसी सरकारी, अर्धसरकारी या निर्वाचित पद को सम्भालने का प्रयत्न जारी करने की स्थिति में सर्वोच्च या उच्च अधिकार पृच्छा जारी करके उसे रोक सकता है। संवैधानिक उपचारों के अधिकार की महत्ता-भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को जो मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, उनका तब तक कोई महत्त्व नहीं जब तक कि संविधान उनकी सुरक्षा की व्यवस्था न करे।

संविधान में संवैधानिक उपचारों के अधिकार द्वारा मौलिक अधिकारों की सुरक्षा दी गई है। इन उपचारों का उल्लेख संविधान के 32 और 226 अनुच्छेदों, में किया गया है। इस अधिकार द्वारा संविधान मौलिक अधिकारों के लिए प्रभावी कार्यविधियाँ प्रतिपादित करता है। इस अधिकार के बिना मौलिक अधिकार खोखले वायदे साबित होते हैं। संविधान के 32 और 226 अनुच्छेदों द्वारा नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा का उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्य के उच्च न्यायालयों को सौंपा गया है। यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो वह उन न्यायालयों में प्रार्थना पत्र देकर अपने अधिकार की रक्षा कर सकता है।

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प्रश्न 4.
आपके अनुसार कौन-सा मौलिक अधिकार सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को लिखें और तर्क देकर बताएँ कि यह क्यो महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
मौलिक अधिकार जो भारतीय संविधान में दिए गए थे, उनकी संख्या प्रारम्भ में 7 थी। 44 वें संशोधन द्वारा 1979 में सम्पत्ति का अधिकार समाप्त कर दिया गया और इनकी संख्या 6 हो गयी। परन्तु 86 वें संशोधन द्वारा प्राथमिक शिक्षा का अधिकार भी मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया । इस प्रकार पुनः इसकी संख्या 7 हो गई। भारतीय संविधान द्वारा छः
अधिकारों की सूची निम्न प्रकार है –

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार
  3. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
  4. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  5. संस्कृति एवं शिक्षा का अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

इन सभी अधिकारों की उपयोगिता तभी सम्भव है, जबकि इन सभी अधिकारों को भारतीय संविधान में सुरक्षा की गारंटी मिले। यह गारंटी संविधान में संवैधानिक उपचारों के अधिकार द्वारा दी गई है। इन उपचारों का उल्लेख संविधान के 32 और 226 अनुच्छेदों में किया गया है। अधिकार के बिना अन्य मौलिक अधिकारों के लिए प्रभावी कार्यविधियाँ प्रतिपादित करता है। इस अधिकार के बिना अन्य मौलिक अधिकार खोखले वायदे साबित होते हैं।

संविधान के द्वारा नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा का उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्य के उच्च न्यायालयों को सौंपा गया है। यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो वह न्यायालयों में प्रार्थना पत्र (application) देकर अपने अधिकार की रक्षा कर सकता है। न्यायालय इस हेतु बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा तथा उत्प्रेषण लेख जारी कर सकता है। इस अधिकार के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है, कि न्यायालय ऐसे मामलों में तुरन्त कार्यवाही करता है, ताकि एक क्षण के लिए भी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो सके। संक्षेप में संवैधानिक उपचारों का अधिकार सर्वश्रेष्ठ मौलिक अधिकार है।

प्रश्न 5.
‘राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग’ पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत के संविधान में मूल अधिकारों का प्रावधान होते हुए भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एमनेस्टी इण्टरनेशनल तथा कुछ अन्य मानव अधिकार समर्थकों द्वारा यह कहा जा रहा था कि राज्य के पुलिस बल, अर्धसैनिक बल, सेना और जेल अधिकारियों द्वारा व्यक्ति के अधिकारों का हनन किया जाता है। अतः इस प्रसंग में पहले तो सितम्बर 1993 में राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया गया उसके बाद दिसम्बर 1993 में “मानव अधिकार अयोग व न्यायालय’ गठन सम्बन्धी विधेयक पारित किया गया। यह आयोग भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत अधिकारों तथा अन्तर्राष्ट्रीय प्रसविदाओं से मान्यता प्राप्त अधिकारों के हनन की स्थिति में सरकारी कर्मचारियों की उपेक्षा की शिकायतों पर विचार करता है।

आयोग को केवल जाँच करने व सिफारिश करने का अधिकार है। इस आयोग में 8 सदस्य होते हैं। आयोग की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश करते हैं। आयोग के अन्य सदस्यों में सर्वोच्च न्यायालय का एक वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, दो प्रतिष्ठित व्यक्ति जिन्हें मानवी अधिकारों के विषय में ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो, अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष, अनुसूचित जाति व जनजाति का अध्यक्ष तथा महिला आयोग का अध्यक्ष शामिल होंगे। आयोग को सशस्त्र बलों या अन्य सैनिक बलों के सम्बन्ध में जाँच करने का अधिकार नहीं है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को मानव अधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं की स्वतन्त्र रूप से जाँच करने का अधिकार है। आयोग अपने जाँच कार्य में ‘एमनेस्टी इण्टरनेशनल’ अथवा अन्य किसी अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सी की सहायता भी ले सकता है। आयोग को यह भी अधिकार है, कि वह मानवीय अधिकारों की रक्षा की दृष्टि से, विद्यमान कानूनों में संशोधन के लिए शासन को सुझाव दे सके। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 1994 ई. के प्रारम्भिक दिनों से ही अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया। टाडा कानून की समाप्ति और बाल श्रम का निषेध करने के बारे में इस आयोग का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

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प्रश्न 6.
भारतीय संविधान में दी गई विभिन्न मूल स्वतन्त्रताओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत के संविधान में अनुच्छेद 19 से 22 तक विभिन्न स्वतन्त्रताओं का वर्णन किया गया है। अनुच्छेद 19 में नागरिक स्वतन्त्राओं का वर्णन दिया है।

1. नागरिक स्वतन्त्रताएँ:
अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को सात स्वतन्त्रताएँ दी गई थीं, जिनमें से 44वें संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अर्जन सम्बन्धी स्वतन्त्रता को निकाल दिया गया है। शेष छः स्वतन्त्रताएँ हैं –

(क) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को भाषण, लेख, चलचित्र अथवा अन्य किसी माध्यम से अपने विचारों को प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। 44 वें संशोधन द्वार संविधान में एक नया अनुच्छेद 361 A जोड़ा गया जिसके अन्तर्गत समाचार-पत्रों को संसद, विधानमण्डलों की कार्यवाही प्रकाशित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता होगी परन्तु. राज्य को अधिकार है कि देश की अखन्डता, सुरक्षा, शान्ति, नैतिकता, न्यायालयों के सम्मान और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए इन अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध लगा सकता है।

(ख) शान्तिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के सभा:
सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता-नागरिकों को शान्तिपूर्ण एकत्र होने की स्वतन्त्रता है, परन्तु सुरक्षा और शान्ति की दृष्टि से इस अधिकार पर भी उचित प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

(ग) संस्था या संघ बनाना:
नागरिकों को संस्था व संघ बनाने की पूर्ण स्वतन्त्रता है, परन्तु सार्वजानिक हितों तथा जनजातियों की रक्षा के लिए इस स्वतन्त्रता पर रोक लगाया जा सकता है।

(घ) देश के किसी भाग में निवास करने और बसने की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को देश में कहीं भी बसने की स्वतन्त्रता दी गई है, सार्वजानिक हित में इस पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

(ङ) व्यवसाय अपनाने की स्वतन्त्रता:
नागरिकों को अपना कोई भी व्यवसाय करने की स्वतन्त्रता दी गई है पर सार्वजानिक हित में इस पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। दूसरे, किसी भी व्यवसाय के लिए कुछ व्यावसायिक योग्यताएँ निर्धारित की जा सकता हैं। तीसरे राज्य को स्वयं या किसी सरकारी कम्पनी द्वारा किसी भी व्यापार या धन्धे को अपने हाथों में लेने का अधिकार है।

2. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता:
अनुच्छेद 20, 21, 22 में ये स्वतन्त्रताएँ दी गई हैं। अनुच्छेद 20 के अनुसार –
(क) किसी भी व्यक्ति को किसी ऐसे कानून का उल्लंघन करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो अपराध करते समय लागू न हो।
(ख) किसी व्यक्ति को उससे अधिक दण्ड नहीं दिया जा सकता जो उस कानून के लिए उल्लंघन करते समय निश्चित हो।
(ग) किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक न तो मुकद्दमा चलाया जा सकता है, और न ही दोबारा दण्डित किया जा सकता है।
(घ) किसी भी व्यक्ति को अपने विरुद्ध किसी अपराध में गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 में जीवन तथा निजी स्वतन्त्रता की रक्षा की व्यवस्था की गई है। किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य किसी तरीके से जीवन अथवा निजी स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 20 तथा 21 में प्राप्त अधिकारों को आपात स्थिति में भी निलम्बित नहीं किया जा सकता।

3. बन्दीकरण व नजरबन्दी से रक्षा:
अनुच्छेद 22 के अन्तर्गत –
(क) बन्दी बनाये गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी का कारण शीघ्र बताया जाएगा।
(ख) बन्दी व्यक्ति को अपनी इच्छा से वकील से सलाह लेने का अधिकार होगा।
(ग) बन्दी बनाए गए व्यक्ति को 24 घंटे के अन्दर न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।

44 वें संशोधन के अनुसार नजरबन्दी का मामला दो महीने के भीतर सलाहकार मण्डल के पास जाना आवश्यक है। सलाहकार मण्डल का गठन उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाएगा।

आलोचना:
उपरोक्त स्वतन्त्रताओं की निम्न आधार पर आलोचना की जाती है –

  1. नागरिकों की स्वतन्त्रताओं पर अनेक सीमाएँ लगा दी गई हैं। ये स्वतन्त्रताएँ यदि एक हाथ से दी गई हैं तो दूसरे हाथ से छीन ली गई हैं।
  2. सीमाएँ अत्यधिक व्यापक होने के कारण अस्पष्टता से ग्रसित हो जाती है। परिणामस्वरूप विधायिका व न्यायापालिका में टकराव की संभावना बनी रहती है।
  3. निवारक नजरबन्दी का अधिकार राज्य को प्राप्त है, जिसके कारण शान्तिकाल में भी जीवन तथा निजी स्वतन्त्रता का अधिकार अर्थहीन हो जाता है।
  4. न्यायाधीश मुखर्जी के शब्दों में, “जहाँ तक मुझे मालूम है, संसार के किसी भी देश में निवारक मिरोध को संविधान का अटूट भाग नहीं बनाया गया हैं, जैसे भारत में किया गया है। यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है।”

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प्रश्न 7.
भारतीय संविधान में दिए गए समानता के अधिकार की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
समानता का अधिकार-समानता का अधिकार का वर्णन अनुच्छेद 14 से 18 तक दिया गया है।

1. कानून के समक्ष समानता:
संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है – “राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता अथवा कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। “कानून के समक्ष समानता का तात्पर्य यह है, कि एक जैसे लोगों के साथ एक सा व्यवहार किया जाए।”

2. भेदभाव की मनाही:
अनुच्छेद 15 दो बातें स्पष्ट करता है। प्रथम “राज्य केवल धर्म, वंश, जाति, लिंग व जन्म स्थान या इनमें से किसी एक आधार पर कोई नागरिक दुकानों, भोजनालयों, मनोरंजन की जगहों, तालाबों और कुओं का प्रयोग करने से वंचित नहीं किया जा सकेगा। परन्तु महिलाओं और बच्चों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की जा सकती हैं। अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए राज्य विशेष प्रकार की व्यवस्था कर सकता है।

3. अवसरों की समानता:
अनुच्छेद 16 के अनुसार सरकारी नियुक्तियों के लिए सभी नागरिकों को समान अवसर दिए जाएंगे। कोई भी नागरिक धर्म, वंश, जाति, जन्मस्थान या निवास स्थान के आधार पर सरकारी नियुक्तियों के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। इस अनुच्छेद 16 के कुछ अपवाद भी दिए गए हैं –

(क) कुछ विशेष पदों के लिए निवास स्थान सम्बन्धी शर्ते आवश्यक मानी जा सकती हैं।
(ख) पीछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में स्थान आरक्षित किए जा सकते हैं।
(ग) यह व्यवस्था. की जा सकेगी कि धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्थाओं के पदाधिकारी किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय के ही हों।

अगस्त, 1990 ई. में भारत सरकार ने, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए समुदायों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। यह घोषणा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए की गई थी। राज्य स्तर पर तो आरक्षण पिछले कई दशकों से चला आ रहा है, पर केन्द्र के अधीन नौकरियों में आरक्षण की घोषणा पहली बार की गई।

4. अस्पृश्यता की समाप्ति:
अस्पृश्यता अथवा छुआछूत का अन्त अनुच्छेद 17 में कर दिया गया है, और किसी भी रूप में छुआछूत को बरतने की मनाही की गई है। 1976 ई. में संसद ने कैद और जुर्माने की व्यवस्था को और कठोर बना दिया। छुआछूत बरतने या उसका प्रचार करने के अपराध में तीसरी बार या उससे अधिक बार दोषी पाये जाने वाले व्यक्तियों को दो साल की सजा और एक हजार जुर्माना किया जाएगा।

पहली बार किए गए अपराध के लिए कम से कम एक महीने की कैद और एक सौ रुपया जुर्माने की व्यवस्था की गई है। कानून में यह भी कहा गया है, कि छुआछूत के अन्तर्गत दोषी पाया गया व्यक्ति सजा की तारीख से छः वर्षों तक संसद और राज्य विधानमण्डल का चुनाव नहीं लड़ सकता।

5. उपाधियों की समाप्ति:
अनुच्छेद 18 के अनुसार –

  • राज्य सेना या शिक्षा सम्बन्धी सम्मान के सिवाय कोई ओर उपधि प्रदान नहीं करेगा।
  • भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।
  • कोई व्यक्ति जो भारत का नागरिक नहीं है, राज्य के अधीन लागू या विश्वास के किसी पद को धारण करते हुए किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।
  • राज्य के अधीन लाभ या विश्वास का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य के या उसके अधीन संस्थान से किसी रूप में कोई भेंट उपलब्धि या पद राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।

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प्रश्न 8.
भारतीय संविधान में वर्णित शोषण के विरुद्ध अधिकार का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
शोषण के विरुद्ध का उद्देश्य है समाज के निर्बल वर्ग को शक्तिशाली वर्ग के अन्याय से बचाना। इस मौलिक अधिकार के अन्तर्गत निम्नलिखित व्यवस्थाएँ दी गई है –

1. मानव के क्रय-विक्रय तथा शोषण पर प्रतिबन्ध:
अनुच्छेद 23 के अनुसार मानव तथा किसी भी व्यक्ति से बेगार लेना गैरकानूनी घोषित किया गया है, परन्तु इस अधिकार का यह अपवाद है कि राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा लागू कर सकता है। उदाहरण के लिए अनिवार्य सैन्य कानून के अन्तर्गत लोग सेना में भर्ती किए जा सकते हैं । शोषण की मनाही के बावजूद पिछड़े वर्गों के लोग, जनजातियाँ, महिलाएँ और बन्धक मजदूर आज भी शोषण के शिकार हैं।

2. कारखानों आदि में बच्चों को काम करने की मनाही:
अनुच्छेद 24 के अनुसार चौदह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को फैक्ट्री या खान में नहीं लगाया जाएगा और न किसी अन्य जोखिम के काम पर लगाया जाएगा। ऐसा करना अब एक दण्डनीय अपराध है। यह व्यवस्था इसलिए की गई है, ताकि उनके स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। भारत में मध्यकाल में जमींदार, राजा और नवाब तथा अन्य लोग अपने अधीनस्थ लोगों से बेगार लेते थे।

अपना निजी कार्य कराकर उनको बदले में कुछ नहीं देते थे। इसके विपरीत ग्रामों में स्त्रियों, दासों व बालकों के क्रय-विक्रय की कुरीति प्रचलन में थी। स्वतन्त्र हो जाने के बाद भी समाज के दुर्बल वर्ग का सर्वत्र शोषण होता रहा है। भारत के संविधान में दी गई उपरोक्त व्यवस्थाओं से शोषण कुछ रुका है। इस प्रकार बालकों व उपेक्षित वर्ग के शोषण या बेगार पर प्रतिबन्ध लगा है।

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प्रश्न 9.
राज्य के नीति निर्देशक तत्व एवं मौलिक अधिकारों में अन्तर स्पष्ट करें और यह भी स्पष्ट करें की सरकार निर्देशक तत्वों को उपेक्षा कर सकती है।
उत्तर:
मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व दोनों ही भारतीय लोकतंत्र की आधारभूत संरचना है। फिर भी दोनों में मौलिक अन्तर है, जो निम्नलिखित है –

  1. मौलिक अधिकार नकारात्मक प्रकृति का है। ये राज्य को कुछ कार्य करने से रोकती है। जबकि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्त सकारात्मक प्रकृति के हैं। ये राज्य को कुछ कार्य करने के लिए निर्देश है।
  2. मौलिक अधिकार का उद्देश्य भारत में राजनीतिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है, जबकि नीति निर्देशक सिद्धान्तों का मुख्य उद्देश्य आर्थिक लोकतन्त्र एवं लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।
  3. मौलिक अधिकार की प्रकृति कानूनी है। अर्थात् मौलिक अधिकार के उल्लंघन होने पर न्यायालय में जा सकते हैं। जबकि नीति निर्देशक तत्व की प्रकृति राजनीतिक है । लागू नहीं होने पर न्यायालय में नहीं जा सकते हैं। अर्थात् यह न्याय-योग्य नहीं है।
  4. मौलिक अधिकार अधिक स्पष्ट और निश्चित है, जबकि निर्देशक सिद्धान्त अस्पष्ट और अनिश्चित है। इस तरह स्पष्ट है, कि मौलिक अधिकार और निर्देशक तत्व में व्यापक अन्तर है।
  5. जहाँ तक सरकार द्वारा निर्देशक तत्वों की उपेक्षा का प्रश्न है, इसमें उत्तर में कहा जा सकता है। कि निर्देशक तत्वों का संवैधानिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टि से काफी महत्त्व है, इसलिए इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती है।

नीति निर्देशक तत्व का मुख्य उद्देश्य लोक कल्याणकारी राज्य और आर्थिक लोकतन्त्र एवं सामाजिक न्याय की स्थापना करना है। यह हमारे पूर्वजों एवं महापुरुषों का सपना है, इसके पीछे जनमत की शक्ति है। इसलिए सरकार इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान स्वीकृत हुआ था –
(क) 30 जनवरी, 1948
(ख) 26 नवंबर, 1949
(ग) 15 अगस्त, 1947
(घ) 26 जनवरी, 1950
उत्तर:
(ख) 26 नवंबर, 1949

प्रश्न 2.
‘संविधान की आत्मा’ की संज्ञा दी गई है?
(क) अनुच्छेद 14 को
(ख) अनुच्छेद 19 को
(ग) अनुच्छेद 21 को
(घ) अनुच्छेद 32 को
उत्तर:
(घ) अनुच्छेद 32 को

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प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में राज्यों को ग्राम पंचायतों की स्थापना का निर्देश दिया गया है?
(क) अनुच्छेद 38
(ख) अनुच्छेद 39
(ग) अनुच्छेद 40
(घ) अनुच्छेद 44
उत्तर:
(ग) अनुच्छेद 40

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे? Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

Bihar Board Class 11 Political Science संविधान : क्यों और कैसे? Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है, कि सत्ता में अच्छे लोग आएँ।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर:
(ग) यह सुनिश्चित करता है, कि सत्ता में अच्छे लोग आएँ।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की दलील है, कि संविधान की प्रमाणिकता संसद से ज्यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है, कि संसद कैसे बनायी जाय और इसे कौन-कौन सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर:
(ग) संविधान ही यह बताता है, कि संसद कैसे बनायी जाये और इसे कौन-कौन सी शक्तियाँ प्राप्त हो सकेगी।

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प्रश्न 3.
बताएँ संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत?
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज है।
(ख) संविधान सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में होता है, और उसकी जरूरत ऐसे ही देशों में होती है।
(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज है, और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।
उत्तर:
(क) सही
(ख) गलत
(ग) गलत
(घ) सही

प्रश्न 4.
बताएँ कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सही है, या नहीं। अपने उत्तर का कारण बताएँ।
(क) संविधान सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।
(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।
(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है, क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।
उत्तर:
(क) हमारी संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गए थे, पर उसे अधिक से अधिक प्रतिनिधियात्मक बनाने की कोशिश की गयी थी विभाजन के बाद संविधान सभा में कांग्रेस का वर्चस्व था। कांग्रेस में सभी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व था। अतः यह कहना असत्य होगा कि संविधान सभा भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

(ख) यह बात भी असत्य है, कि संविधान सभा के सदस्य एकमत थे, और उन्हें कोई बड़े निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं थी। वास्तव में संविधान का केवल एक ही ऐसा प्रावधान है, जो बिना किसी वाद-विवाद के पारित हुआ कि मताधिकार किसे प्राप्त हो। इसके अतिरिक्त प्रत्येक विषय पर गंभीर विचार-विमर्श और वाद-विवाद हुए।

(ग) यह कहना गलत है, कि भारतीय संविधान मौलिक नहीं है, क्योंकि इसका अधिकांश भाग विश्व के अन्य देशों के संविधानों से लिया गया है। वास्तव में हमारे संविधान निर्माताओं ने आत्य संवैधानिक परम्पराओं से कुछ ग्रहण करने में परहेज नहीं किया। दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से कुछ सीखने में संकोच भी नहीं किया। परन्तु उन विचारों को लेना कोई अनुकरण की मानसिकता नहीं थी, वरन संविधान के प्रत्येक प्रावधान को भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप ग्रहण कर उन्हें अपना बना लिया गया। भारत का संविधान एक विशाल दस्तावेज है। इसकी मौलिकता पर कोई प्रश्न नहीं लगाया जा सकता।

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प्रश्न 5.
भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। इनके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तिओं का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केन्द्र है।
उत्तर:
(क) संविधान का निर्माण उस संविधान सभा ने किया जो विश्वसनीय नेताओं से बनी थी। इस सभी नेताओं ने न केवल राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया था, वरन वे भारतीय समाज के सभी अंगों, सभी जातियों या समुदायों अथवा सभी धर्मों का प्रतिनिधित्व करते थे। भारतीय जनता का इनमें पूर्ण विश्वास था, और राष्ट्रीय आन्दोलन में उठने वाली सभी माँगों का संविधान बनाते समय ध्यान रखा गया। संविधान सभा के सदस्यों ने पूरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार-विमर्श किया।

(ख) संविधान ने शक्तियों का वितरण भी इस प्रकार किया कि जिससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपना-अपना कार्य समुचित रूप से कर सकें। कार्य वितरण के समय नियंत्रण एवं सन्तुलन के सिद्धान्त को भी महत्त्व दिया गया। कोई एक सरकारी अंग अन्य दूसरे अंगों पर हावी नहीं हो सकता। कार्यपालिका के कार्यों पर संसद नियंत्रण रखती है। न्यायिक पुनरावलोकन द्वारा संसद अथवा मंत्रिमंडल के कार्यों की समीक्षा की जा सकती है। संविधान ने सुनिश्चित किया कि किसी एक समूह के लिए संविधान को नष्ट करना आसान न हो।

(ग) संविधान लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप बनाया गया। संविधान न्यायपूर्ण है। भारत के संविधान में न्याय के बुनियादी सिद्धान्तों का विशेष ध्यान रखा गया। लोगों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें। जनता के उत्थान के लिए राज्य नीति निर्देशक सिद्धान्त, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, वयस्क मताधिकार, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के हितों का विशेष ध्यान रखने के विभिन्न प्रावधान संविधान में दिए गए हैं। इस प्रकार संविधान जनता की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप ही बनाया गया है।

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प्रश्न 6.
किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण क्यों जरूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो, तो क्या होगा?
उत्तर:
किसी भी देश के संविधान में विभिन्न संस्थाओं की शक्तियों का सीमांकन करना अत्यन्त आवश्यक होता है। जब कोई एक समूह या संस्था अपनी शक्तियों को बढ़ा लेती है, तो वह पूरे संविधान को नष्ट कर सकती है। इस समस्या के बचाव के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है, कि संविधान में शक्तियों का सीमांकन विभिन्न संस्थाओं में इस प्रकार किया जाए कि कोई भी समूह या संस्था संविधान को नष्ट न कर सके। संविधान को इस प्रकार बनाया जाए आर्थात् संविधान की रूपरेखा इस प्रकार से तैयार की जाए कि शक्तियों को ऐसी चतुराई से बाँट दिया जाए कि कोई एक संस्था एकाधिकार प्राप्त न कर सके।

ऐसा करने के लिए शक्तियों का विभाजन विभिन्न संस्थाओं में किया जाए। उदाहरणार्थ, भारतीय संविधान में शक्तियों का विभाजन कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के मध्य तथा कुछ स्वतन्त्र संवैधानिक निकायों जैसे निर्वाचन आयोग आदि में किया जाता है। केन्द्र और राज्यों के बीच भी शक्तियों का सीमांकन किया जाता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है, कि यदि कोई एक संस्था संविधान को नष्ट करना चाहे तो अन्य संस्थाएँ उसके अतिक्रमण को रोक सकती हैं। भारतीय संविधान में अवरोध व सन्तुलन का सिद्धान्त भी इसीलिए अपनाया गया है।

जब विधायिका अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करती है तो न्यायापलिका को यह अधिकार है, कि वह उसके द्वारा निर्मित विधान को असंवैधानिका घोषित कर सकती है। कार्यपालिका की शक्तियों को असीम बनने से रोकने के लिए विधायिका को उस पर विभिन्न प्रकार से अंकुश लगाने का अधिकार है। वह प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव लाकर, अविश्वास प्रस्ताव आदि के द्वारा कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों का सीमांकन संविधान द्वारा पहले से ही किया है, और ये सभी संस्थाएँ अपने-अपने कार्यक्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से कार्य करती हैं परन्तु अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकतीं।

दूसरी संस्थाएँ उनके अतिक्रमण को नियंत्रित कर लेती हैं। यदि संविधान में इन शक्तियों का बँटवारा या सीमांकन विभिन्न संस्थाओं में नहीं किया जाता तो कोई एक संस्था या सरकार कोई एक अंग अपनी शक्तियों को बढ़ा लेता और वह संविधान को नष्ट कर सकता था, तथा निरंकुशता पूर्ण शासन करने लगता जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है।

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प्रश्न 7.
शासकों की सीमा का निर्धारण संविधान के लिए क्यों जरूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है, जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे।
उत्तर:
संविधान का एक प्रमुख कार्य यह भी है, कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किए जाने वाले कानूनों पर कुछ सीमाएँ लगाए। ये सीमाएँ इस रूप में मौलिक होती हैं, कि सरकार कभी उनका उल्लंघन नहीं कर सकती। संसद नागरिकों के लिए कानून बनाती है, कार्यपालिका कानूनों के प्रारूप तैयार करती है, और कई बार मंत्रिमंडल के सदस्य अथवा संसद ही इस प्रकार के कानून बनाने का प्रयास करें जिससे नागरिकों की स्वतन्त्रता समाप्त हो जाए तो इसे रोकने के लिए संसद की शक्तियों पर नियंत्रण लगाना अत्यन्त आवश्यक है।

भारतीय संविधान में संशोधान करने के लिए संसद को न्यायपालिका द्वारा निषेध कर दिया गया है, कि संसद संविधान के बुनियादी ढाँचे में परिवर्तन नहीं कर सकती अथवा वह संविधान के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकती। संविधान सरकार की शक्तियों को कई प्रकार से सीमित करता है। संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्टीकरण किया गया है, जिनका उल्लंघन कोई भी सरकार नहीं कर सकती। नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना किसी कारण के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह सरकार की शक्तियों के ऊपर एक बन्धन या सीमा कहलाती है। प्रत्येक नागरिक को अपनी इच्छानुसार अपना व्यवसाय चुनने का अधिकार है।

इस पर सरकार कोई प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती। नागरिकों को जो स्वतन्त्रताएँ मूलतः प्राप्त है जैसे-भाषण की स्वतन्त्रता अन्तरात्मा की अवाज पर काम करने का अधिकार या संगठन बनाने की स्वतन्त्रता या देश के किसी भी भाग में भ्रमण करने की स्वतन्त्रता आदि पर सरकार सामान्य परिस्थिति में प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती।

कोई भी सरकार स्वयं भी किसी से बेगार नहीं ले सकती और न ही किसी व्यक्ति को इस बात की छूट दे सकती कि वह दूसरे व्यक्तियों का शोषण करें, उन्हें बन्धुआ मजदूर बनाए आदि। इस प्रकार के कर्त्तव्यों पर सीमाएँ लगायी जाती हैं। दुनिया का कोई भी संविधान अपने नागरिकों को शक्तिविहीन नहीं कर सकता। हाँ तानाशाह शासक अवश्य संविधान को नष्ट कर देते हैं, और वे नागरिकों की स्वतन्त्रताओं का हनन करने की कोशिश करते हैं, यद्यपि संविधान में नागरिकों को सुविधाएँ प्रदान की जाती है।

प्रश्न 8.
जब जापान का संविधान बना तब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना संभव नहीं था, जो अमेरिको सेना की पसंद न हो। क्या आपको लगता है, कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर:
जापान का संविधान ऐसे समय में निर्मित हुआ था, जब वह अमेरिका की सेना की नियंत्रण में था। अतः जापान के संविधान का कोई भी प्रावधान अमेरिका की सरकार की आकांक्षाओं के विरुद्ध नहीं था। यह सब इस कारण से होता है, क्योंकि अधिकतर देशों में संविधान वह लिखित दस्तावेज होता है, जिसमें राज्य के विषय में कई प्रावधान होते हैं, जो यह बताते हैं, कि राज्य किन सिद्धान्तों का पालन करेगा।

राज्य की सरकार किस विचारधारा पर आधारित नियमों एवं सिद्धान्तों के द्वारा शासन चलाएगी। जब किसी राज्य पर दूसरे राज्य का आधिपत्य हो जाता है, तो उस राज्य के संविधान में शासकों की इच्छओं के विपरीत कोई प्रावधान नहीं रखे जा सकते। अतः यह स्वाभाविक ही है, कि जापान के संविधान में अमेरिकी शासकों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया।

भारत के संविधान को बनाते समय ऐसी कोई बात नहीं थी। भारत ने लोकतन्त्रीय शासन को अपनाया तथा अपने राष्ट्रीय आन्दोलन के समय सामने आने वाली समस्याओं के निराकरण का भी ध्यान रखा। अनेक देशों में संविधान निष्प्रभावी होते हैं, क्योंकि वे सैनिक शासकों या ऐसे नेताओं के द्वारा बनाये जाते हैं, जो लोकप्रिय नहीं होते और जिसके पास लोगों को अपने साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं होती।

यद्यपि भारतीय संविधान को औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने दिसम्बर 1946 ई. और नवम्बर 1949 ई. के मध्य बनाया। पर, ऐसा करने में उसने राष्ट्रीय आन्दोलन के लम्बे इतिहास से काफी प्रेरणा ली, जिसमें समाज में सभी वर्गों को एक साथ लेकर चलने की विलक्षण क्षमता थी। संविधान को भारी वैधता मिली क्योंकि उसे ऐसे लोगों द्वारा बनाया गया जिनकी अत्यधिक सामजिक विश्वसनीयता थी। संविधान का अन्तिम प्रारूप उस समय की राष्ट्रीय व्यापक आम सहमति को व्यक्त करता है।

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प्रश्न 9.
रजत ने अपने शिक्षक से पूछा-‘संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज है, और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है, कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बताएँ की मैं इस दस्तावेज की बातों का पालन क्यों करूँ?’ अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर:
यदि मैं रजत का शिक्षक होता तो उसके प्रश्न का उत्तर निम्न प्रकार से देता-भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है, कि यह कठोर तथा लचीला दोनों का मिश्रण है। संविधान अनेक धाराओं के साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। संशोधन की यह प्रक्रिया संविधान को लचीला बना देती है। कुछ विषय ऐसे भी हैं, जिनमें संशोधन की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। इन धाराओं में संशोधन करने के लिए संसद के स्पष्ट बहुमत तथा उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संशोधन किया जा सकता है। कुछ अनुच्छेद ऐसे भी हैं, जिनमें संशोधन करने के लिए कम से कम आधे राज्यों के विधानमण्डलों से अनुमोदन कराना आवश्यक है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि 50 वर्षों के बाद भी भारतीय संविधान कोई बीते दिनों की पुस्तक नहीं कही जा सकती क्योंकि यह एक ऐसा संविधान है, जिसमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सकता है, परन्तु उसके अधिकांश प्रावधान इस प्रकार के हैं जो कभी भी पुराने नहीं पड़ सकते। संविधान का मूल ढाँचा तो सदैव ही एक जैसा रहेगा उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता। अतः यह कहना त्रुटिपूर्ण होगा कि भारतीय संविधान 50 वर्षों के बाद बीते दिनों की पुस्तक बनकर रह गयी है।

इसमें अभी तक लगभग 93 संशोधन हो चुके हैं। इस संविधान का निर्माण जिस संविधान सभा के द्वारा किया गया उसमें लगभग 82 प्रतिशत प्रतिनिधि कांग्रेस के सदस्य थे, और इसमें भारत के सभी घटकों, सभी धर्मों, सभी विचारधाराओं तथा सभी जाति एवं जनजातियों व पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधि भी शामिल थे। ये सभी व्यक्ति बड़े योग्य एवं अनुभवी थे। अत: संविधान को इस प्रकार से तैयार किया गया जिससे की वह समय के साथ-साथ सभी चुनौतियों का सामना करता रहेगा।

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प्रश्न 10.
संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष दिए –
(अ) हरबंस-भारतीय संविधान में एक लोकतान्त्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।
(ब) नेहा-संविधान में स्वतन्त्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है। चूंकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।
(स) नाजिमा-संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया। क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बताएँ।
उत्तर:
तीनों व्यक्तियों के इस संवाद में यह दर्शाने की कोशिश की गयी है, कि हमारे संविधान के क्रियाकलाप लाभप्रद हैं, अथवा नहीं। अपने प्रथम अनुभव के आधार पर हरबंश का मानना है, कि भारतीय संविधान हमें एक लोकतन्त्रात्मक सरकार का आधारभूत ढाँचा देने में सफल रहा है। परन्तु दुसरे वक्ता के रूप में नेहा का विश्वास है, कि संविधान में समानता, स्वतन्त्रता एवं बन्धुता के आश्वासन दिए जाने के बावजूद उनको पुरा नहीं किया गया है। ऐसा न होने के कारण संविधान असफल हो रहा है। नाजिमा का कथन कुछ इस प्रकार है, कि यह संविधान नहीं है, जिसने हमें असफल किया है, वरन ये हम हैं जिन्होंने संविधान को ही असफल कर दिया।

हम जानते हैं, कि भारतीय संविधान का निर्माण एक ऐसी संविधान सभा द्वारा किया गया जिसके सदस्य बड़े योग्य तथा राजनीतिक रूप से बड़े अनुभवी व्यक्ति थे। उन्होंने एक ऐसा संविधान तैयार किया जो भारत के नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने का साधन हो और भारत के विभिन्नताओं के लोगों को सर्वमान्य हो। अतः सभी वर्गों के कल्याण एवं उसकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संविधान में लोकतन्त्रीय शासन को स्थापित किया गया। संविधान में शासन के विभिन्न अंगों के सम्बन्धों का भी वर्णन किया गया।

व्यक्ति की स्वतन्त्रता को कायम रखने के लिए मौलिक अधिकार, न्यायालय की स्वतन्त्रता, विधि की शासन आदि को अपनाया गया। भारत में लोकतन्त्र की नींव रखी गयी और इसे शक्तिशाली बनाने के हरसम्भव प्रयास किए गए। भारत के संविधान की प्रस्तावना में ही यह भी दर्शाया गया है, कि संविधान का उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान करना है, जिससे भारतीय नागरिक अपने को स्वतन्त्र महसूस करें। यह प्रयास किया गया कि संविधान में भारतीय शासन को आदर्श लोकतन्त्रात्मक शासन के रूप में सिद्धान्ततः स्वीकार किया जाए। परन्तु व्यवहार में भारतीय लोकतन्त्र विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक बुराईयों से पीड़ित हो रहा है।

नेहा के विश्वास के अनुसार संविधान में अनेक वायदों को लिया गया। नागरिकों को स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुता एवं धार्मिक उपासना जैसे अधिकारों से सुसज्जित किया गया है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। नागरिकों की स्वतन्त्रता पर सरकार विशेष अवसरों पर प्रतिबन्ध लगा सकती है। समानता का अधिकार हमारे समाज मे अभी भी पूरी तरह से सफल नहीं हुआ। समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुता समाज में कायम नहीं हो पायी अतः संविधान असफल रहा है। आज भी चुनाव के समय धन एवं बाहुबलियों का सहारा लिया जाता है। लोगों की भावनाओं को भड़काकर वोट माँगे जाते हैं, और बाद में उनके हितों की अनदेखी होती रहती है।

नाजिमा को यह विश्वास है, कि संविधान ने हमें असफल नहीं किया वरन हमने ही संविधान को फेल कर दिया है। संविधान के मूल ढाँचे से भी हम छेड़छाड़ करने लगते हैं। संविधान में सबं कुछ लिखा हुआ होते हुए भी हमारी सरकारों ने ईमानदारी से नागरिकों को काम करने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार या एक ही प्रकार के कार्य के लिए स्त्री तथा पुरुष दोनों को समान वेतन आदि कार्यों को पूर्ण नहीं किया। अत: यह संविधान नहीं है, जिसने हमें असफल किया है, वरन यह हम हैं, जिन्होंने संविधान को असफल किया है। परन्तु नाजिमा का यह कथन पूर्णतया सत्य नहीं है। हमारा संविधान तो काफी आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। भले ही भारत में अभी भी 26 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं, परन्तु पहले की अपेक्षा ‘उसमें कमी तो हो रही है। 2020 तक भारत को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के प्रयास हो रहे हैं, तो यह संविधान की सफलता ही तो है।

Bihar Board Class 11 Political Science संविधान : क्यों और कैसे? Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत के संविधान में किन विषयों में संशोधन करने के लिए साधारण प्रक्रिया अपनायी जाती है?
उत्तर:
भारत का संविधान लचीला भी है, कठोर भी अर्थात् लचीले और कठोर का समन्वय है। कुछ प्रावधानों में संशोधन करने की प्रक्रिया केवल साधारण विधेयक पारित करने की प्रक्रिया के सामन ही है। जैसे –

  1. राज्यों के नाम में परिवर्तन करना।
  2. राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करना।
  3. राज्यों में विधान परिषद् की स्थापना या समाप्ति, आदि।

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प्रश्न 2.
भारतीय संविधान के कोई चार एकात्मक लक्षण बताइए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के चार एकात्मक लक्षण निम्नलिखित हैं –

  1. शक्तिशाली केन्द्र: संविधान निर्माता संघात्मक शासन की कमजोरियों से अवगत थे। अतः उन्होंने भारत में शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर तो कानून बनाता ही है, वह विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकता है।
  2. आपातकालीन शक्तियाँ: राष्ट्रपति के द्वारा आपातकाल की घोषणा करने पर भारत संघीय शासन का रूप ले लेते।
  3. राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, और वे विशेष परिस्थितियों में केन्द्र के एजेन्ट के रूप में कार्य करते हैं।
  4. भारत में इकहरी नागरिकता है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में कौन सा सर्वाधिक उपयुक्त कारण हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता हो कि संविधान संसद की अपेक्षा सर्वोच्च है?

  1. संविधान संसद से पहले अस्तित्व में आया।
  2. संविधान निर्माता संसद सदस्यों से अधिक महत्त्वपूर्ण नेता थे।
  3. संविधान तय करता है, कि संसद का निर्माण कैसे हो तथा उसकी शक्तियाँ क्या हों।
  4. संविधान संसद द्वारा संशोधन नहीं किया जा सकता।

उत्तर:
संविधान संसद से सर्वोच्च है, क्योंकि संविधान ही तय करता है, कि संसद का निर्माण कैसे हो तथा उसकी शक्तियाँ क्या होंगी।

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प्रश्न 4.
संविधान में प्रस्तावना की आवश्यकता पर एक टिप्पणी लिखो। अथवा, संविधान की प्रस्तावना का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
प्रत्येक देश की मूल विधि का अपना विशेष दर्शन होता है। दर्शन को समझे बिना संविधान समझना कठिन होता है, और इस विशेष दर्शन का वर्णन ‘प्रस्तावना’ में किया जाता है। हमारे देश के संविधान का मूल दर्शन हमें संविधान की प्रस्तावना में मिलता है। संविधान में प्रस्तावना की आवश्यकता इसलिए है, ताकि संविधान के लक्ष्यों, उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन किया जा सके। सरकार के मार्गदर्शक सिद्धान्तों का वर्णन भी प्रस्तावना में ही किया जाता है।

इसके अतिरिक्त संविधान का आरम्भ एक प्रस्तावना से करना एक संवैधानिक प्रथा बन गई है। 1789 ई. के संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान, 1874 ई. के स्विट्जरलैंड के संविधान, 1937 ई. के आयरलैंड के संविधान, 1946 ई. के जापान के संविधान, 1949 ई. के तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी के संविधान, 1954 ई. के समाजवादी चीन के संविधान और 1973 ई. के बंग्लादेश के संविधान का आरम्भ प्रस्तावना से होता है। अतः भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान का आरम्भ भी प्रस्तावना से किया।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय प्रदान करने की बात कही गयी है।
  2. प्रस्तावना में कहा गया है, की भारतीय जनता को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता होगी।
  3. प्रस्तावना में प्रतिष्ठा व अवसर की समानता की बात कही गई है।
  4. प्रस्तावना में बन्धुत्व की कल्पना की गई है।
  5. प्रस्तावना में राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।

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प्रश्न 6.
भारतीय संविधान के दो स्त्रोतों से लिए गए प्रावधानों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत का संविधान 1935 ई. के भारत शासन अधिनियम तथा विभिन्न देशों के संविधानों से प्रभावित संविधान है। इसके विभिन्न स्रोतों में से दो स्रोतें निम्नलिखित हैं –

  1. ब्रिटेन का संविधान
  2. अमेरिका का संविधान

ब्रिटेन के संविधान का प्रभाव तत्कालीन भारतीय नेताओं पर था, और होना भी स्वाभाविक था। इस संविधान से हमने संसदीय शासन प्रणाली, विधि प्रक्रिया, विधायिका के अध्यक्ष का पद, इकहरी नागरिकता और न्यायपालिका के ढाँचे का प्रावधान भारतीय संविधान में लिए हैं। अमेरिका के संविधान से संविधान की सर्वोच्चता, संघीय व्यवस्था, न्यायिक पुनरावलोकन, निर्वाचित राज्याध्यक्ष, राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने की प्रक्रिया, संविधान संशोधन में राज्यों की विधायिकाओं द्वारा अनुमोदन आदि प्रमुख प्रावधान लिए गए हैं।

प्रश्न 7.
संसदीय शासन प्रणाली की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनायी गयी है। संसदात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका का अध्यक्ष नाममात्र का होता है। वास्तविक शक्तियाँ मंत्रिपरिषद् के पास होती हैं। मंत्रिपरिषद् का निर्माण व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। प्रधानमंत्री निम्न सदन के बहुमत दल का नेता होता है। मंत्रियों को सामूहिक उत्तरदायित्व होता है। भारत में इसी प्रकार की शासन व्यवस्था है।

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प्रश्न 8.
इकहरी नागरिकता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इकहरी नागरिकता का अर्थ है, कि किसी राज्य में व्यक्तियों को केवल एक ही नागरिकता प्राप्त होती है। संघात्मक शासन वाले राज्यों में सामान्यतः दोहरी नागरिकता होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में व्यक्ति अमेरिका का नागरिक होने के साथ-साथ अपने उस राज्य का भी नागरिक होता है, जिसका वह निवासी है। भारत में संघात्मक शासन होते हुए भी यहाँ पर नागरिकों को इकहरी नागरिकता ही प्राप्त है।

प्रश्न 9.
क्या संविधान संशोधनों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?
उत्तर:
भारत के संविधान में 42वीं संशोधन करके यह व्यवस्था बना दी गयी है, कि संविधान संशोधन को किसी भी न्यायालय में किसी आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकेगी परन्तु मिनर्वा मिल केस (1980 ई.) में उच्चतम न्यायलय ने संविधान की इस धारा को अवैध घोषित कर दिया। इसका अभिप्राय यह है, कि न्यायलय को संविधान की जाँच करने की शक्ति प्राप्त है।

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प्रश्न 10.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो –
(क) पंथ निरपेक्ष राज्य
(ख) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
(ग) भारतीय संविधान के स्वतंत्र अधिकरण
उत्तर:
(क) पंथ निरपेक्ष राज्य:
जिन राज्यों में किसी धर्म विशेष को राज्य का धर्म स्वीकार न करके सभी धर्मों को समान समझा जाए तथा राज्य के नागरिक अपनी इच्छानुसार अपने धर्म का पालन कर सकें उसे पंथ-निरपेक्ष राज्य कहते हैं।

(ख) सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार:
राज्य के द्वारा जब एक निश्चित आयु (वयस्क होने की आयु, भारत में यह 18 वर्ष है) पूरी करने वाले अपने सभी नागरिकों को जाति, रंग, नस्ल, लिंग, शिक्षा तथा आय के भेदभाव के बिना मताधिकार दिया जाता है तो इसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहते हैं।

(ग) भारतीय संविधान के स्वतन्त्र अभिकरण:
भारतीय संविधान में निम्नलिखित स्वतन्त्र अभिकरण दिए गए हैं –

  • निर्वाचन आयोग
  • नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक
  • संघ लोक सेवा आयोग
  • राज्य लोक सेवा आयोग आदि

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प्रश्न 11.
राजनैतिक और आर्थिक न्याय से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में राजनीतिक और आर्थिक न्याय का वर्णन निम्नलिखित सन्दर्भ में किया गया है –

  1. राजनैतिक न्याय-राजनैतिक न्याय का अर्थ है, कि सभी व्यक्तियों को धर्म, जाति, रंग आदि भेदभाव के बिना समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त हों। सभी नागरिकों को समान मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।
  2. आर्थिक न्याय-आर्थिक न्याय से अभिप्राय है, कि प्रत्येक को अपनी आजीविका कमाने के समान अवसर प्राप्त हों तथा कार्य के लिए उचित वेतन प्राप्त हो।

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना से क्या तात्पर्य है? प्रस्तावना में लिखे गए प्रमुख आदर्श कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
हमारे देश के संविधान का मूल दर्शन हमें संविधान की प्रस्तावना में मिलता है। संविधान की प्रस्तावना में संविधान के लक्ष्यों, उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन किया गया है। भारत सरकार व राज्य सरकारों के मार्गदर्शक सिद्धान्तों का वर्णन भी प्रस्तावना में ही किया गया है। प्रस्तावना ही हमें यह बतलाती है, कि भारत में सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य की स्थापना की गई है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मुख्य आदर्श हैं, कि भारत प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान की कोई तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की तीन विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय संविधान लिखित तथा विश्व का विशालतम संविधान है।
  2. संविधान के द्वारा भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार और कर्त्तव्यों का वर्णन किया गया है।
  3. भारतीय संविधार कठोर और लचीले संविधानों का मिश्रण है।

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प्रश्न 14.
संविधान सभा के किन्हीं आठ सदस्यों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संविधान सभा के मुख्य सदस्य थे –

  1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
  2. डॉ. भीमराव अम्बेडकर
  3. पण्डित जवाहरलाल नेहरू
  4. सरदार वल्लभ भाई पटेल
  5. मौलाना अबुल कलाम आजाद
  6. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी
  7. सरदार बलदेव सिंह
  8. श्रीमती सरोजनी नायडू

प्रश्न 15.
संविधान सभा द्वारा संविधान कब पारित किया गया तथा कब इसे लागू किया गया?
उत्तर:
संविधान सभा द्वारा संविधान को 26 नवम्बर, 1949 को पारित किया गया तथा इसे 26 जनवरी, 1950 ई. को लागू किया गया।

प्रश्न 16.
राजनीतिक समानता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राजनीतिक समानता भारतीय संविधान की एक प्रमुख विशेषता है। राजनीतिक समानता का अर्थ है, कि देश की राजनीतिक क्रिया-कलापों में सभी को बिना किसी भेदभाव के भाग लेने का अधिकार एवं सभी को वोट देने का अधिकार।

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प्रश्न 17.
भारतीय संविधान का जन्म या निर्धारण करने वाली संविधान सभा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
संविधान सभा में जनसंख्या के आधार पर प्रान्तों से 296 और देशी रियासतों से 93 प्रतिनिधियों की व्यवस्था की गई। प्रान्तों के प्रतिनिधियों को प्रान्तों की व्यवस्थापिका के निचले सदन से अप्रत्यक्ष रूप से चुना गया। इन्हें तीन श्रेणियों-सामान्य, मुस्लिम, और सिक्ख, में जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया। रियासतों के प्रतिनिधियों के चुनाव का प्रश्न आपसी समझौते के आधार पर तय होना था।

प्रश्न 18.
संविधान सभा में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विशिष्ट स्थान कैसे थे?
उत्तर:
संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अपना सभापति तथा डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को प्रारूप समिति का सभापति बनाया।

प्रश्न 19.
किसी देश के लिए संविधान का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
किसी भी देश के लिए संविधान बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। इसलिए संविधान को सरकार की शक्ति तथा सत्ता का स्रोत कहा जाता है। संविधान में यह वर्णित है, कि सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियाँ क्या हैं, तथा वे क्या कर सकती हैं। ऐसा करने का उद्देश्य यह होता है, कि सरकार के विभिन्न अंगों में तनाव उत्पन्न न हो। संविधान के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं –

  1. सरकार के विभिन्न अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों का व्याख्या करना।
  2. सरकार और नागरिकों के सम्बन्धों का वर्णन करना। संविधान की सबसे अधिक उपयोगिता यह है, कि वह सरकार द्वारा सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है। इसलिए संविधान देश में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रलेख है।

प्रश्न 20.
संविधान का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संविधान किसी देश के शासन की रीढ़ है। शासन के नियमों का समूह, उसके आधारभूत सिद्धान्तों का संग्रह संविधान कहलाता है। शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए संविधान की रचना की जाती है। इस कार्य में देश की तत्कालीन परिस्थितियों और संविधान निर्माताओं के आदर्शों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

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प्रश्न 21.
लिखित संविधान किसे कहते हैं?
उत्तर:
लिखित संविधान उस संविधान सभा द्वारा पारित होता है, जो इसी उद्देश्य के लिए बुलाई जाती है। भारत का संविधान लिखित है। 1946 में एक संविधान सभा की रचना की गई जिसने इस संविधान का निर्माण किया।

प्रश्न 22.
भारतीय संविधान की अद्वितीय विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
भारत के संविधान की अद्वितीय विशेषताएँ –

  1. भारत का संविधान एकात्मक और संघात्मक दोनों का मिश्रण है।
  2. भारत के संविधान में यद्यपि संसदात्मक शासन को अपनाया गया है, परन्तु इसमें अध्यक्षात्मक शासन के भी तत्व पाये जाते हैं।
  3. भारत एक संघात्मक राज्य है, परन्तु यहाँ इकहरी नागरिकता है।
  4. भारत के संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार एवं मूल स्वतन्त्रताएँ प्रदान की गई हैं, परन्तु राष्ट्रीय हित में उन पर प्रतिबन्ध भी लगाए जा सकते हैं। आपात स्थिति में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा निलम्बित किया जा सकता है।
  5. भारत का संविधान भारतीय जनता द्वारा निर्मित है। एक संविधान सभा का निर्माण किया गया जो प्रान्तीय विधान सभाओं द्वारा परोक्ष रूप से निर्वाचित की गयी।
  6. देश की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है।
  7. भारत को संविधान द्वारा एक गणराज्य घोषित किया गया है।
  8. संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्व दिए गए हैं।
  9. संघीय तथा राज्य विधानमण्डलों के अधिनियमों और कार्यपालिका के क्रियाकलापों की न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है।
  10. भारतीय संविधान कठोर तथा लचीला दोनों का मिश्रण है।

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प्रश्न 23.
भारतीय संविधान का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
भारतीय संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया। 9 दिसम्बर, 1946 ई. को संविधान सभा बुलाई गई। डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा इसके अस्थायी अध्यक्ष थे। 11 दिसम्बर, 1946 ई. को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। संविधान सभा के 2 वर्ष 11 मास और 18 दिन के अथक प्रयास द्वारा 26 नवम्बर 1949 ई. को भारत का संविधान सम्पूर्ण हुआ और ऐतिहासिक दिवस 26 जनवरी, 1950 ई. से इसे लागू किया गया।

प्रश्न 24.
भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 ई. को क्यों लागू किया गया?
उत्तर:
भारत का संविधान 26 नवम्बर, 1949 ई. को बनकर तैयार हो गया था, परन्तु उसे 2 महीने बाद 26 जनवरी, 1950 ई. को लागू किया गया। इसका एक कारण यह था कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के 31 दिसम्बर, 1929 ई. के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग का प्रस्ताव पारित कराया था और 26 जनवरी, 1930 ई. का दिन सारे भारत में ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाया गया था। इसके बाद प्रतिवर्ष 26 जनवरी को इसी रूप में मनाया जाने लगा। इसी पवित्र दिवस की यादगार को ताजा रखने के लिए संविधान सभा ने संविधान को 26 जनवरी, 1950 ई. से लागू किया।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना लिखें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना प्रकार है –
“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी धर्म निरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष) शुक्ल सप्तमी संवत् 2006 वि. को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मसमर्पित करते है।”

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प्रश्न 2.
“न्यायिक पुनरावलोकन” के सिद्धान्त से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
न्यायिक पुनरावलोकन-संविधान ने भारत में संघीय व्यवस्था की स्थापना की है। ऐसी व्यवस्था में न्यायपालिका को संविधान के रक्षक के रूप में स्थापित किया जाता है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ है, न्यायपालिका विधानमण्डलों (संसद तथा राज्यों के विधानमण्डल) द्वारा बनाए गए कानून संविधान की दृष्टि से पुनरावलोकन कर सकती है, कि सम्बन्धित विधायिका ने वह कानून संविधान के अनुसार बनाया है या नहीं। यदि न्यायपालिका की दृष्टि में विधायिका द्वारा पारित कोई कानून संविधान की धाराओं के विपरीत है, तो वह उसे निरस्त या रद्द घोषित कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों ने अपने इस अधिकार का काफी प्रयोग किया है। न्यायपालिका का मानना है, कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, परन्तु संविधान के मूलभूत ढाँचे को नहीं बदल सकती।

प्रश्न 3.
भारतीय संविधान की संघात्मक विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान के द्वारा भारत में संघात्मक शासन की स्थापना की गई है, या एकात्मक की, इसके बारे में विद्वानों के विचारों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे पूर्णतया संघात्मक मार मानते हैं, तो कुछ उसे इसे अर्द्ध-संघात्मक तथा कुछ विचारक ऐसे भी हैं, जो इसे एकात्मक शासन के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री के. सी. बीहर के अनुसार, “भारत एकात्मक राज्य है, जिसमें संघीय विशेषताएँ नाममात्र की हैं, न कि यह एक संघात्मक राज्य है, जिसमें कुछ एकात्मक ‘विशेषताएँ हैं।” डी. डी. बसु के अनुसार, “भारतीय संविधान न तो पूर्णतया संघात्मक है, और न ही पूर्णतया एकात्मक, यह दोनों का मिश्रण है।

भारतीय संविधान की संघात्मक विशेषताएँ:

1. लिखित संविधान-भारत में एक लिखित संविधान है। इसमें संघात्मक शासन की व्यवस्था विभिन्न इकाईयों (राज्यों) के समझौते द्वारा की जाती है। इसीलिए यहाँ भी संविधान सभा ने अमेरिका, रूस या जापान की तरह एक लिखित: संविधान तैयार किया है।

2. कठोर संविधान-भारत का संविधान लिखित होने के साथ-साथ कठोर भी है। इसमें संशोधन करने की विधि आसान नहीं है। संविधान के महत्त्वपूर्ण विषयों में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत एवं कुल सदस्यों का बहुमत तथा कम से कम आधे राज्यों के विधान मण्डलों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

3. शक्तियों का विभाजन-भारतीय संविधान के अनुसार संघ तथा राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा किया गया है। दोनों के अधिकारों को –

  • संघ सूची
  • राज्य सूची और
  • समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है।
  1. संघ सूची में 97 विषय है। इन विषयों पर संसद को कानून का अधिकार है।
  2. राज्य सूची में 66 विषय हैं, जिन पर राज्य की विधायिकाओं को कानून बनाने का अधिकार है।
  3. समवर्ती सूची में 47 विषय हैं। इस पर केन्द्र तथा राज्य विधान मण्डल दोनों का अधिकार है, परन्तु टकराव की स्थिति में केन्द्र की संसद द्वारा निर्मित कानून लागू होगा।
  4. न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित की गई है।
  5. द्विसदनीय व्यवस्थापिक है। निम्न सदन लोक सभा तथा उच्च सदन राज्य सभा है।

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प्रश्न 4.
भारतीय संविधान संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायपालिका की सर्वोच्चता के बीच से गुजरता है। बताइए, कैसे?
उत्तर:
भारतीय संविधान में ब्रिटेन की तरह संसदीय प्रभुता तथा अमेरिका की तरह न्यायिक सर्वोच्चता इन दोनों के बीच का मार्ग अपनाकर दोनों में समन्वय स्थापित किया गया है। ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है। उसके द्वारा पारित कानूनों को न तो सम्राट वीटो कर सकता है, और न न्यायालय उन्हें अवैध घोषित कर सकता है। उधर अमेरिका में संविधान की व्याख्या और विधियों की संवैधानिकता के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है।

भारतीय संविधान में ब्रिटिश संविधान की भाँति संघात्मक व्यवस्था के आदर्श को अपनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षण तथा व्याख्या करने का अधिकार भी दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय उन विधियों को अवैध घोषित कर सकता है, जो संविधान के विरुद्ध. हों। संसद को भी यह अधिकार है, कि आवश्यकता पड़ने पर विशिष्ट बहुमत के आधार पर संविधान में संशोधन कर सकती है। इस प्रकार भारतीय संविधान अद्भुत ढंग से संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायालय की सर्वोच्चता के बीच का मार्ग अपनाता है।

प्रश्न 5.
भारतीय नागरिकों के कोई पाँच मौलिक कर्त्तव्य लिखें।
उत्तर:
भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह –

  1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्श, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।
  2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
  3. भारत की प्रभुसत्ता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
  4. देश की रक्षा करे और आहान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता और भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो।

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प्रश्न 6.
संविधान सभा में ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ किसने प्रस्तुत किया? इसके मुख्य उपबन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव:
संविधान सभा के समक्ष 13 दिसम्बर, 1946 ई. को पं. जवाहर लाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस उद्देश्य प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि “संविधान सभा भारत के लिए एक ऐसा संविधान बनाने का दृढ़ निश्चय करती है जिसमें –
(क) भारत के सभी निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त हो, विचार, भाषण, अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतन्त्रता हो, अवसर और कानून के समक्ष समानता हो और भाईचारा हो,

(ख) अल्पसंख्यक वर्गों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था हो।” 22 जनवरी, 1947 ई. को संविधान सभा ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। पं. जवाहर लाल नेहरू के अनुसार उद्देश्य प्रस्ताव एक घोषणा है, एक दृढ़ निश्चय है, एक शपथ है, एक वचन है, और हम सबका एक आदर्श के लिए समर्पण है। उद्देश्य प्रस्ताव के इन आदर्श को कुछ संशोधित करके संविधान की प्रस्तावना में स्वीकार किया गया है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना लिखकर इसके मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। अथवा, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त निम्नलिखित शब्दों के क्या अर्थ हैं?
(क) न्याय
(ख) स्वतन्त्रता
(ग) समानता
(घ) बन्धुता
(ड.) एकता व अखण्डता।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का विवेचन निम्नलिखित शब्दों में किया गया है-संविधान धर्मनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य बनाने तथा इसके सब नागरिकों को …… ।

न्याय:
सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक।

स्वतन्त्रता:
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म पूजा की।

समानता:
प्रतिष्ठा, और अवसर की और उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता, सुनिश्चित करने वाली, बन्धुत्व की भावना बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर, 1949 को इसे अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना के उद्देश्य –

1. न्याय-सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक:
प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय प्रदान करने की बात कही गयी है। सामाजिक न्याय से अर्थ लिया गया है, कि भारतीय समाज में ऐसी स्थिति पैदा की जाए जिसके अनुसार व्यक्ति-व्यक्ति में भेदभाव न हो, ऊँच-नीच की भावना न हो तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हों। आर्थिक न्याय से तात्पर्य लोगों को अपने व्यक्तित्व के विकास के पूर्ण अवसर प्राप्त हों।

आर्थिक न्याय से तात्पर्य उस स्थिति से है, जिसमें देश के धन का यथासम्भव समान बँटवारा हो, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यतानुसार धनोपार्जन के साधन उपलब्ध हों तथा किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का आर्थिक शोषण करने का अधिकार प्राप्त न हो। राजनैतिक न्याय के अनुसार देश के नागरिकों को अपने देश की शासन व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार हो। बात को ध्यान में रखते हुए भारत में वयस्क मताधिकार प्रणाली की व्यवस्था की गयी है।

2. स्वतन्त्रता-विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म तथा उपासना की:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि “भारतीय जनता को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता होगी।” जिससे भारतीय नागरिकों को व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के अवसर प्राप्त होंगे। संविधान की धारा 25 से 28 तक में भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता का मौलिक अधिकार भी प्रदान किया गया है।

3. समानता-प्रतिष्ठा व अवसर की:
संविधान की धारा 14 के अनुसार नागरिकों को कानूनी समानता प्रदान की गयी तथा धारा 15 के अनुसार सामाजिक समानता की व्यवस्था की गयी है। धारा 16 के अनुसार सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है। धारा 18 के आनुसार शिक्षा तथा सैनिक उपाधियों के अतिरिक्त सब प्रकार की उपाधियाँ समाप्त कर दी गयी हैं। प्रस्तावना में इन सबका उल्लेख किया गया है।

4. बन्धुता:
बन्धुत का अर्थ भाईचारे और नागरिकों की समानता से है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति के घोषण पत्र में और फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकारों की घोषणा में किया गया था। भारत के इतिहास में बन्धुता की भावना के विकास का विशेष महत्त्व है। संविधान की प्रस्तावना में जिस बन्धुत्व की कल्पना की गयी है, उसे अनुछेद 17 व 18 में छुआछूत को समाप्त करके, उपाधियाँ प्राप्त करने पर प्रतिबन्ध लगाकर और अनेक सामाजिक बुराईयों को दूर करके भारतीय समाज में स्थापित किया गया है।

5. राष्ट्र की एकता व अखण्डता:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के अनुसार अखण्डता शब्द को जोड़कर भारत में विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी है। इसके द्वारा इस भावना का विकास किया गया है, कि भारत के सभी लोग पूरे देश को अपनी मातृभूमि समझें और इसके विघटन की भावना को मन में न लाएँ।

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प्रश्न 2.
उद्देश्य प्रस्ताव से आप क्या समझते हैं? उद्देश्य प्रस्ताव के मुख्य बिन्दुओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उद्देश्य प्रस्ताव भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार है। इसे पं. जवाहर लाल नेहरू ने 13 दिसम्बर, 1946 ई. को संविधान सभा में प्रस्तुत किया था। इस उद्देश्य प्रस्ताव को रखकर पं. जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा का मार्ग प्रशस्त किया। इसके द्वारा भावी संविधान की मौलिक रूपरेखा व सिद्धान्तों की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की।

वास्तव में उद्देश्य प्रस्ताव भारतीय स्वाधीनता का घोषण पत्र था। पं. नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव को रखते हुए कहा कि, इस प्रस्ताव के माध्यम से हम देशों की करोड़ों जनता को जो हमारी और निहार रही है, तथा समूचे विश्व को यह बताना चाहते हैं कि हम क्या करेंगे और हमारा लक्ष्य क्या है, और हमें किधर जाना है। प्रस्ताव होते हुए भी यह प्रस्ताव से कहीं अधिक है। यह एक घोषणा है, दृढ़ निश्चय है, प्रतिज्ञा है, और हमारे ऊपर दायित्व है। 22 जनवरी, 1947 ई. को संविधान सभा ने इसे स्वीकार कर लिया।

उद्देश्य प्रस्ताव के प्रमुख बिन्दु –

  1. भारत एक स्वतन्त्र, संप्रभु गणराज्य है।
  2. भारत पूर्व ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों, देशी रियासतों और ब्रिटिश क्षेत्रों तथा देशी रियासतों के बाहर के ऐसे क्षेत्रों जो हमारे संघ का अंग बनना चाहते हैं, का एक संघ होगा।
  3. संघ की इकाइयाँ स्वायत्त होंगी और उन सभी शक्तियों का प्रयोग और कार्यों का सम्पादन करेंगी जो संघीय सरकार को नहीं दी गयी।
  4. सम्प्रभु और स्वतन्त्र भारत तथा इसके संविधान की समस्त शक्तियाँ और सत्ता का स्रोत जनता है।
  5. भारत के सभा लोगों को समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, कानून के समक्ष प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा कानून और नैतिकता की सीमाओं के रहते हुए, भाषण, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्य करने की मौलिक स्वतन्त्रता की गारण्टी और सुरक्षा दी जाएगी।
  6. अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातियों, दलित व अन्य पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा दी जाएगी।
  7. गणराज्य की क्षेत्रीय अखण्डता तथा जल, थल और आकाश में इसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा सभ्य राष्ट्रों के कानून और न्याय के अनुसार की जाएगी।
  8. विश्व शन्ति और मानव कल्याण के विकास के लिए देश स्वेच्छापूर्वक और पूर्ण योगदान करेगा।

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प्रश्न 3.
भारतीय संविधान के प्रमुख स्रोत बताइए। इनमें से किन्हीं दो स्रोतों की पहचान कीजिए और संक्षेप में बताइए कि इन स्रोतों से कौन-कौन से प्रावधान लिए गए हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान के मुख्य स्त्रोत-भारतीय संविधान निर्माताओं ने विश्व के अनेक देशों के संविधनों का गहन अध्ययन कर उनसे भारत के लिए उपयोगी तत्वों को बिना हिचक अपनाया। इस कारण कुछ लोगों ने भारतीय संविधान को उधार ली गयी वस्तुओं का संकलन मात्र भी कहा है। भारतीय संविधान के मुख्य स्रोत इस प्रकार हैं –

  1. 1935 का भारत सरकार अधिनियम
  2. ब्रिटिश संविधान
  3. संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान
  4. आयरलैण्ड का संविधान
  5. कनाडा का संविधान
  6. आस्ट्रेलिया का संविधान
  7. वीमर संविधान
  8. जापान का संविधान
  9. नेहरू रिपोर्ट का प्रभाव

प्रमुख स्त्रोत और उनसे लिए गए प्रावधान –

1. ब्रिटेन का संविधान:
संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश संविधान से निम्नलिखित प्रावधान लिए है –

  • सम्पूर्ण संसदीय व्यवस्था। संवैधानिक अध्यक्ष की धारणा एवं प्रधानमंत्री का पद
  • द्विसदनात्मक संसद
  • संसदीय सम्प्रभुता की धारणा
  • संसद के प्रथम सदन की प्रमुखता
  • विधि का शासन, अभिसमय, विशेषाधिकारों की धारणा
  • लोकसभा के स्पीकर का पद
  • विधि निर्माण प्रक्रिया

2. संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान:
भारतीय संविधान पर अमेरिका के संविधान की व्याख्या की शक्ति, उपराष्ट्रपति का पद तथा कार्य एवं संविधान संशोधन विधि, संविधान का लिखितं स्वरूप, संघीय, धारणा, सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना तथा निर्वाचन राष्ट्रपति के पद का विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय संविधान –
(क) संसदीय सर्वोच्चता पर जोर देता है।
(ख) न्यायिक सर्वोच्चता पर जोर देता है।
(ग) संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक सर्वोच्चता के मध्यम मार्ग का अनुसरण करता है।
(घ) इनमें से किसी पर जोर नहीं देता है।
उत्तर:
(ग) संसदीय सर्वोच्चता और न्यायिक सर्वोच्चता के मध्यम मार्ग का अनुसरण करता है।

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प्रश्न 2.
विकसित संविधान का श्रेष्ठ उदाहरण है –
(क) भारत
(ख) अमेरिका
(ग) इंग्लैंड
(घ) रूस
उत्तर:
(ख) अमेरिका

प्रश्न 3.
“भारतीय संविधान वकीलों का स्वर्ग है।” किसने कहा था –
(क) मौरिस जोंस
(ख) ऑस्टिन
(ग) जेनिंग्स
(घ) वीनर
उत्तर:
(ग) जेनिंग्स

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प्रश्न 4.
संविधान की अवधारणा सर्वप्रथम कहाँ उत्पन्न हुई?
(क) ब्रिटेन
(ख) भारत
(ग) चीन
(घ) अमेरिका
उत्तर:
(क) ब्रिटेन

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान स्वीकृत हुआ था –
(क) 30 जनवरी, 1948
(ख) 26 जनवरी, 1949
(ग) 15 अगस्त, 1947
(घ) 26 जनवरी, 1950
उत्तर:
(घ) 26 जनवरी, 1950

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प्रश्न 6.
‘संविधान की आत्मा’ की संज्ञा दी गई है?
(क) अनुच्छेद 14 को
(ख) अनुच्छेद 19 को
(ग) अनुच्छेद 21 को
(घ) अनुच्छेद 32 को
उत्तर:
(घ) अनुच्छेद 32 को

प्रश्न 7.
भारत के मूल संविधान में कितने अनुच्छेद हैं?
(क) 400
(ख) 395
(ग) 390
(घ) 385
उत्तर:
(ख) 395

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 1 संविधान : क्यों और कैसे?

प्रश्न 8.
संविधान का संरक्षक किसे बनाया गया है?
(क) सर्वोच्च न्यायालय को
(ख) लोकसभा को
(ग) राज्य सभा को
(घ) उपराष्ट्रपति को
उत्तर:
(क) सर्वोच्च न्यायालय को

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 10 विकास

Bihar Board Class 11 Political Science विकास Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
आप ‘विकास’ से क्या समझते हैं? क्या ‘विकास’ की प्रचलित परिभाषा से समाज के सभी वर्गों को लाभ होता है?
उत्तर:
विकास की संकल्पना का एक विस्तृत अर्थ है परन्तु इसका प्रयोग सीमित दृष्टि से किया जाता है। यह समाज के परिवर्तन, उन्नति, वृद्धि और पर्याप्त अग्रसर होने से है। विस्तृत दृष्टिकोण में इस शब्द का अर्थ (विकास की संकल्पना) सुधार, उन्नति, सुखी और अच्छे जीवन के लिए आकांक्षा के विचार से है। विकास का उद्देश्य समाज के उन सपनों पर आधारित है, जो इच्छित और सुनियोजित जीवन के लिए जरूरी है। इसलिए विकास विभिन्न उपायों की प्रक्रिया है, जो समाज के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्प्रेषण से लिया जाता है। यह इस प्रकार ग्रहण किया जाता है कि विकास का लाभ और उन्नति प्रत्येक को प्राप्त हो सके।

लुसियन पाये ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द आस्पेकट्स आफ डेवेलपमेन्ट’ (The Aspects of Development) में विकास को एक आधुनिक समाज के निर्माण में उपलब्ध साधनों के न्यायपूर्ण सदुपयोग के रूप में परिभाषित किया है। उसने विकास को अनेक पहलुओं जैसे पर्यावरणीय परिवर्तन राज्य के निर्माण के रूप में विकास, राष्ट्र के निर्माण के रूप में विकास, आधुनिकीकरण के रूप में विकास, गतिशीलता के रूप में विकास, सांस्कृतिक प्रसाद के रूप में विकास और समाज के आधुनिकीकरण के मशीनीकरण के विकास की व्याख्या की। इसका अन्तिम उद्देश्य सभी समान्य व्यक्तियों के अन्दर वृद्धि और उन्नति को लाना है। इसका लक्ष्य समाज के सभी वर्गों के सभी व्यक्तियों का सुनिश्चित रूप से जीवन बदलना है।

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प्रश्न 2.
जिस तरह का विकास अधिकतर देशों में अपनाया जा रहा है उससे पड़ने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वस्तुतः विश्व के विभिन्न भागों में विकास की अवधारणा को विभिन्न प्रकार से समझा गया है, इसलिए इसे उसी ढंग से लागू किया जाता है। परन्तु इससे इच्छित परिणाम पर्याप्त वित्तीय लागत के बावजूद नहीं प्राप्त हुए हैं और उन देशों पर पर्याप्त ऋण हो गया है। विकास के सामाजिक लागत और पर्यायवरणीय लागत दो प्रकारों का विवरण निम्नलिखित है –

(क) विकास की सामाजिक लागतें (Social Costs of Development):
विकास की सामाजिक लागत निम्नलिखित कारणों से है –

  • अनेक लोग अपने घर और स्थानीय आवास से विकास के कार्यों जैसे बाँध के निर्माण और औद्योगिक इकाई की स्थापना के कारण स्थानान्तरित हो जाते हैं।
  • जीविका की हानि।
  • परम्परागत व्यवसाय का स्थानान्तरण होना।
  • शहरी और ग्रामीण गरीबी में वृद्धि।
  • जीवन के नये ढंग और नई संस्कृति की ग्राह्यता।
  • परम्परागत कौशल की हानि।
  • विषमताओं और असमानताओं में वृद्धि। इसका विशिष्ट उदाहरण ‘नर्मदा बचाओं आन्दोलन’ है, जो सरदार सरोबर बाँध के विरुद्ध नर्मदा नदी पर चलाया जा रहा है।

(ख) विकास का पर्यावरणीय लागत (Environmental costs of Development):
विकास की आज की विधि पर्यावरणीय लागत की है। इसको निम्नलिखित क्षेत्रों में समझा जा सकता है –

  • यह एक बड़ी जनसंख्या को प्रभावित कर रहा है। इसने बड़े पैमाने पर प्रदूषण पैदा किया है।
  • इससे पारिस्थितिक सन्तुलन में गड़बड़ी आई है।
  • इससे वैश्विक चेतावनी मिली है।
  • हरे भरे क्षेत्र कम होते जा रहे हैं।
  • इसके कारण ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया है।
  • प्राकृतिक संकट यथा-बाढ़ और सुनामी का जन्म।

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प्रश्न 3.
विकास की प्रक्रिया ने किन नए अधिकारों के दावों का जन्म दिया है?
उत्तर:
लोकतान्त्रिक सहभागिता के रूप में नई माँगें-समाज और राजनीति के लोकतान्त्रिक ढाँचे में और आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति अपना अच्छा जीवन व्यतीत करना चाहता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति निर्णय, निर्माण प्रक्रिया, किास के लक्ष्यों के निर्धारण और इसके कार्यान्वयन की प्रणाली में शामिल होना पसन्द करता है। ऐसा सहभागिता के उद्देश्य और शक्तिशाली होने के लिए किया जाता है। विकास और लोकतन्त्र सामान्य हित को अनुभव करने से सम्बन्धित है।

लोकतान्त्रिक राजनीतिक उद्देश्य सामान्य हित के लोगों के अधिकार को प्राप्त करने से है। यह संसाधनों के अधिकतम सदुपयोग द्वारा विकास की प्रक्रिया और सामान्य लोगों को विकास का लाभ लेने से सम्भव है। लोकतान्त्रिक समाजों में लोगों की सहभागिता के अधिकार की प्रशंसा की गई है और इस पर जोर दिया गया है। इस प्रकार की सहभागिता की एक विधि यह बताई जाती है कि स्थानीय क्षेत्रों में विकास की परियोजनाओं के विषय में निर्णय निर्माण संस्था को लेना चाहिए।

इसीलिए अधिकतर संसाधन जो स्थानीय निकायों के हैं, बढ़ाये जा रहे हैं। भारतीय संविधान का 73 वाँ और 74 वाँ संशोधन इस दिशा में किए गए प्रयास हैं। इन संशोधनों के द्वारा सभी वर्ग के लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित करने के लिए प्रयास हो रहे हैं। इसके साथ यह कार्य कमजोर वर्ग जैसे महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए भी किया जा रहा है, जिससे वे विकासगत परियोजनाओं को प्रेरित कर सकें। नीतियों का नियोजन और सूत्रीकरण लोगों को अपनी आवश्यकताओं के लिए संसाधनों के निर्धारण का आदेश देता है। इसलिए विकास के मॉडल को शामिल करने की आवश्यकता है, जो कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लोकतान्त्रिक आधुनिक समाज के उद्देश्यों की सेवा कर सकता है।

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प्रश्न 4.
विकास के बारे में निर्णय सामान्य हित को बढ़ावा देने के लिए किए जाएँ, यह सुनिश्चित करने में अन्य प्रकार की सरकार की अपेक्षा लोकतान्त्रिक व्यवस्था के क्या लाभ हैं?
उत्तर:
लोकतन्त्र ऐसी सरकार है, जो लोगों की है, लोगों के लिए है और लोगों द्वारा निर्मित होती है। इसका तात्पर्य यह है कि लोकतान्त्रिक सरकार केवल लोगों से सम्बन्धित है और सभी अधिकार लोगों के साथ है। यह तानाशाही के विपरीत है, जिसमें सम्पूर्ण शक्ति एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के हाथ में होती है और जहाँ लोगों को निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं होता। इसलिए लोकतान्त्रिक सरकार अन्य सरकारों की अपेक्षा अधिक लाभदायक होती है। विशेष रूप से जनता के हित के मामले में लोकतान्त्रिक सरकार मुख्य रूप से लोगों की रुचियों, अधिकारों और कल्याण से अधिक सम्बन्धित होती हैं।
प्रजातन्त्र निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित होता है –

  1. यह समानता पर आधारित होता है।
  2. यह न्याय पर आधारित होता है।
  3. यह जनता के अधिकारों को प्रेरित करता है।
  4. यह लोगों की स्वतन्त्रता को बढ़ावा देता है।
  5. यह भाई-चारे का बढ़ाता है।
  6. यह एक विस्तृत संविधान उपलब्ध कराता है।
  7. यह वाद-विवाद, बातचीत पर आधारित होता है।
  8. यह अधिकारों के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है।
  9. सर्वाधिक अधिकार लोगों के पास होते हैं।
  10. प्रजातन्त्र में लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार होता है।

उपरोक्त सभी विशिष्ट लक्षण किसी अन्य राजनीतिक व्यवस्था में नहीं मिलते। यही कारण है कि लोगों के हित के लिए लोकतन्त्र को अन्य व्यवस्थाओं की अपेक्षा सबसे अच्छी व्यवस्था माना जाता है। प्रजातान्त्रिक संस्कृति विकासगत प्रक्रिया के प्रसार को बढ़ावा देता है। इसमें व्यक्ति और राष्ट्र के सभी पहलुओं का समावेश होता है।

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प्रश्न 5.
विकास से होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय क्षति के प्रति सरकार को जवाबदेह बनवाने में लोकप्रिय संघर्ष और आन्दोलन कितने सफल रहे हैं?
उत्तर:
अनेक राज्यों की सरकारों और यहाँ तक कि केन्द्रीय सरकार ने विकास के नाम पर विभिन्न क्षेत्रों में अनेक महत्त्वकांक्षी परियोजनाएं शुरू की हैं। परन्तु इन परियोजनाओं का अपना ही सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्य है। स्थानीय लोगों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में इन परियोजनाओं के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया है। उदाहरण के लिए मेधापाटेकर और सुन्दरलाल बहुगुणा के आन्दोलन इन परियोजनाओं के खिलाफ चल रहे हैं, फलस्वरूप वे मुद्दे राजनीतिक बन गए हैं। हाल के वर्षों में सरकार की कुछ नई विवासस्पद परियोजनाएँ शुरू हुई हैं। इनमें से एक परियोजना एस.ई.जेड. (Creation of Special Economic Jone) है, जो किसानों के आक्रोश का शिकार है। इसका विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा राजनीतिकरण किया गया है।

स्थानीय लोगों ने इन्हें विकासगत क्रियाओं के रूप में नये भविष्य को स्वीकार नहीं किया है। उनके प्रभाव को सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनाया है। इस प्रकार के आन्दोलनों में ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ सरदार सरोवर बाँध के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण आन्दोलन रहा है। इस बाँध का निर्माण नर्मदा नदी पर विद्युत्त उत्पादन के लिये किया गया है। इसके अलावा एक बड़े क्षेत्र की सिंचाई करने में सहायता मिलेगी और सौराष्ट्र तथा कच्छ क्षेत्र के लोगों को पेय जल मिल सकेगा। परन्तु इसके विरोधी इस योजना से सहमत नहीं हैं और मेघा पाटेकर के नेतृत्व में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आन्दोलन शुरू कर दिया है। इस प्रकार के आन्दोलनों ने निश्चित रूप से सरकार को सभी मुद्दों पर विचार करने के लिए विवश कर दिया है।

Bihar Board Class 11 Political Science विकास Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘समतावादी समाज’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। Write short note on ‘Equalized Society’
उत्तर:
समतावादी समाज (Equalized Society):
जी.डी.एच. कोल के अनुसार समाजवाद भाईचारे की व्यवस्था पर बल देता है, जो वर्ग, जाति व वर्ग-विषयक भेदों को नकारती है, उनका खण्डन करती है। समाजवादी समाज में राजनीतिक शक्ति का उद्देश्य समाज का कल्याण होता है। समानता और स्वतन्त्रता पर बल दिया जाता है। सबको आजीविका कमाने के समान अवसर दिए जाते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति को न्यूनतम जीवन-स्तर की गारन्टी दी जाती है। इसमें यह मान्यता है कि समानता के बिना वास्तविक स्वतन्त्रता सम्भव नहीं हो सकती। बिना स्वतन्त्रता के सुरक्षा सम्भव नहीं है।

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प्रश्न 2.
समाजवादी समाज का क्या अर्थ है? (What is meant by Socialist Society?)
उत्तर:
श्री जयप्रकाश नारायण के अनुसार समाजवादी समाज एक ऐसा वर्गहीन समाज होता है, जिसमें व्यक्तिगत सम्पत्ति के लिए मजदूरों का शोषण नहीं होता, जिसमें समस्त सम्पत्ति राष्ट्र की होती है, जिसमें किसी को बिना किए कुछ नहीं मिलता, जहाँ आय की अधिक असमानताएँ नहीं होती, जिसमें मनुष्य जीवन की उन्नति योजनानुसार की जाती है और जिसमें सब सबके लिए जीवित रहते हैं। इस प्रकार के समाज में आर्थिक शक्ति कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रित नहीं होने दी जाती।

प्रश्न 3.
लोकतान्त्रिक समाजवाद से क्या अभिप्राय है? (What is meant by Democratic Socialism?) अथवा, लोकतान्त्रिक समाजवाद पर टिप्पणी लिखो। (Write a short note on Democratic Socialism)
उत्तर:
लोकतन्त्रीय समाजवाद उसे कहते हैं, जहाँ समाजवाद के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसा और क्रान्ति को छोड़कर लोकतान्त्रिक साधनों का प्रयोग किया जाता है। इसमें राज्य को व्यक्तिवादी तथा उदारवादियों की भाँति आवश्यक बुराई नहीं माना जाता और न ही अराजकतावादियों की भाँति अनावश्यक बुराई माना जाता है। वे तो राज्य को शुभ मानते हैं और इसका उपयोग जन-कल्याण में करना चाहते हैं। उनका लोकतन्त्र में पूर्ण विश्वास होता है।

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प्रश्न 4.
विकासवादी समाजवाद किसे कहते हैं? (What is Evolutionary Socialism?)
उत्तर:
लोकतन्त्रीय समाजवाद को ही विकासवादी समाजवाद कहते हैं। लोकतन्त्रीय देश कार्ल मार्क्स के विचारों से तो प्रभावित थे किन्तु ये देश अपना लोकतन्त्रीय स्वरूप समाप्त नहीं करना चाहते थे। इनके विचार में पूँजीवादी व्यवस्था में भी समानता की अधिक क्षमता विद्यमान है। वे सर्वहारा की तानाशाही में विश्वास नहीं करते थे। विकासवादी समाजवाद सभी नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक अधिकारों और न्याय की उपलब्धि कराता है। इनके विचार में राज्य एक कल्याणकारी संस्था है। लोकतान्त्रिक समाज का मूलमंत्र क्रमिक विकास है।

प्रश्न 5.
समाजवाद के पक्ष में कोई चार तर्क दीजिए। (Give any four arguments in favour of Socialism)
उत्तर:
समाजवाद के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Socialism):

  1. समाजवाद न्याय का समर्थक है। व्यापार व उद्योग-धंधों का राष्ट्रीयकरण करके यह सभी व्यक्तियों को समान उन्नति का अवसर उपलब्ध कराता है।
  2. बिना समाजवाद के प्रजातन्त्र अर्थहीन है। जब तक आर्थिक प्रजातन्त्र की स्थापना नहीं होती, राजनैतिक प्रजातन्त्र सम्भव नहीं हो सकती।
  3. समाजवादी व्यवस्था अधिक वैज्ञानिक है।
  4. समाजवादी आर्थिक अपव्यय को रोकता है, क्योंकि इसमें उत्पादन के लिए प्रतियोगिता का नहीं, सहयोग का सिद्धान्त अपनाया जाता है।

प्रश्न 6.
‘समाजवाद का उदय पूँजीवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ।’ इस कथन पर टिप्पणी लिखो। (“’Socialism emerged as a reaction of Capitalism.” Comment)
उत्तर:
समाजवाद वास्तव में “पूँजीवाद व आर्थिक असमानता” के विरोध में विकसित हुआ। यूरोप में आद्योगिक विकास ने श्रमिकों के जीवन को नरक बना दिया था। पूँजीवादी उनका शोषण कर रहे थे। अहस्तक्षेप की नीति के कारण श्रमिकों की दशा बिगड़ने लगी। कुछ विचारशील लोगों का ध्यान उनकी दुर्दशा की ओर गया और पूँजीवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई। व्यक्ति के स्थान पर समाज को महत्त्व दिया जाने लगा।

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प्रश्न 7.
मुक्त उद्यम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मुक्त उद्यम (Free enterprise):
बाजार अर्थव्यवस्था मुक्त उद्यम पर आधारित है। इसमें उद्योगपति को उद्योग प्रारम्भ करने, उनकी वृद्धि करने, उनमें पूँजी निवेश करने आदि की पूरी छूट होगी। इस कार्य के लिए उन्हें सरकार से किसी प्रकार के लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी। सरकार केवल कुछ उद्योगों को अपने पास रखती है। इनमें भी वह निजी उद्यमियों से सहयोग प्राप्त कर सकती है।

प्रश्न 8.
मुक्त व्यापार से क्या आशय है? (What did you mean by free trade?)
उत्तर:
मुक्त व्यापार (Free Trade):
बाजार अर्थव्यवस्था मुक्त व्यापार पर आधारित होती है। इसकी मान्यता है कि विश्व को एक बाजार समझा जाए और उसमें सभी देशों को मुक्त रूप से व्यापार करने की सुविधा हो अर्थात् विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले आयात व निर्यात करों से व्यापार प्रतिबन्धित न हो। सामान्यतः सभी देशों में सरकारें अपने उद्योगों को संरक्षण देने के लिए तथा अपने आय के स्रोत के रूप में करों का प्रावधान करती है। बाजार अर्थव्यवस्था ऐसे करों को उदारीकरण के विरुद्ध मानती है, क्योंकि इनसे कीमतों में माँग व पूर्ति द्वारा अवरोध उत्पन्न होता है।

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प्रश्न 9.
विकास क्या है? (What is development?)
उत्तर:
वर्तमान के भौतिकवादी युग में विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास से ही लगाया जाता है, जबकि भारत के सन्दर्भ में यह भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही रहा है।

प्रश्न 10.
तृतीय विश्व क्या है। (What is third world?)
उत्तर:
भौतिक विकास की दिशा में प्रयत्नशील देशों को अनेक नामों से पुकारा जाता है, जैसे-विकासशील देश, उभरते हुए राष्ट्र, तृतीय विश्व के देश आदि।

प्रश्न 11.
विकास के तीन उद्देश्य लिखिए। (Write three objectives of development)
उत्तर:

  1. दरिद्रों के न्यूनतम जीवन को जीवन स्तर तक (Minimum Living Standard) लाना।
  2. बेरोजगारी की समस्या को दूर करना।
  3. विकास प्रक्रिया को लोकतान्त्रिक पद्धति से चलाना।

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प्रश्न 12.
समाजवाद की परिभाषा दीजिए और इसका अर्थ समझाइए। (Define Socialism and discuss meaning)
उत्तर:
समाजवाद की परिभाषा-समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती। विभिन्न विचारकों ने इसकी परिभाषा भिन्न-भिन्न प्रकार से दी है –
1. हमफ्री के शब्दों में, “समाजवाद एक सामाजिक व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत जीवन के साधनों पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व होता है और पूरा समाज सामान्य जन-कल्याण के उद्देश्य से विकास और प्रयोग करता है।”

2. राबर्ट के अनुसार, “समाजवाद के कार्यक्रम की माँग है कि सम्पत्ति तथा उत्पादन के अन्य साधन जनता की सामूहिक सम्पत्ति हो और उसका प्रयोग भी जनता के द्वारा जनता के लिए ही किया जाए।” इस प्रकार समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है, जो समानता पर आधारित है और जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण समाज का हित है। यह विचारधारा देश की सम्पत्ति तथा उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व को समाप्त करके उस पर सम्पूर्ण समाज का नियन्त्रण चाहती है।

प्रश्न 13.
समाजवाद के दो मूल सिद्धान्त बताइए। (Mention two basic principles of Socialism)
उत्तर:
समाजवाद के दो मूल सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

1. पूँजीवाद का विरोध (Opposition of Capitalism):
समाजवाद पूँजीवाद का विरोध करता है। समाज के हित को अधिक महत्त्व देता है। उत्पादन तथा वितरण के सभी साधनों पर समाज का नियन्त्रण होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजवाद के किन्हीं दो गुणों का उल्लेख कीजिए। (Mention any two merits of Socialism)
उत्तर:
समाजवाद के गुण (Merits of Socialism):

1. समाजवाद आर्थिक समानता पर बल देता है (Socialism consists of Economic Equality):
समाजवादी चाहते हैं कि सभी को रोजगार के अवसर सुलभ हो, राष्ट्रीय सम्पत्ति का उचित बँटवारा हो और सभी को विकास का उचित अवसर मिले। समाजवाद में प्रत्येक व्यक्ति को श्रम करना आवश्यक है। उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व रहता है और इन साधनों का सार्वजनिक हित के लिए उपयोग किया जाता है।

2. समाजवाद अधिक प्रजातन्त्रीय है (Socialism is more democratic):
विद्वानों का कहना है कि बिना समाजवाद के प्रजातन्त्र अस्वाभाविक और अर्थहीन है। वास्तव में समाजवाद प्रजातन्त्र का पूरक हैं। यह राज्य के लोकतांत्रिक स्वरूप में विश्वास रखता है। यह मताधिकार का विस्तार करके संसद में बहुमत प्राप्त दल को सरकार बनाने का अधिकार देने के पक्ष में है। अतः जनता का हित साधन होता रहता है।

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प्रश्न 2.
समाजवाद के दो प्रमुख दोष बताइए। (What are the two main shortcomings of Socialism?)
उत्तर:
समाजवाद के दोष (Short comings of Socialism)

1. कार्य करने की प्रेरणा का अन्त हो जाता है (No incentives to work):
समाजवाद में क्योंकि सभी कार्य सरकार की इच्छा पर निर्भर होते हैं। अत: व्यक्ति को उनके बारे में सोचने, उनकी योजना बनाने, उनमें पहल करने आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। व्यक्ति एक मशीन बनकर रह जाता है और उसकी कार्य करने की प्रेरणा का अन्त हो जाता है।

2. सरकार सभी उद्योग-धंधों का भली प्रकार प्रबन्ध नहीं कर सकती है (All that is managed by the State is not well managed):
समाजवादी व्यवस्था में राज्य का कार्यक्षेत्र बहुत बढ़ जाता है। बहुत अधिक कार्यों के भार से कई बुराईयाँ पैदा हो जाती हैं। सरकार के लिए सभी उद्योग-धंधों का संचालन करना आसान नहीं है। प्रबन्धन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारण भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रमों की हालत खराब हुई है।

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प्रश्न 3.
विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के क्या लाभ होते हैं? (What are the advantages of decentralised economy)
उत्तर:
जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया तथा रॉजर गॉरोड़ी ने अर्थव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण पर अत्यधिक बल दिया है। केन्द्रीयकृत नियोजन आर्थिक विकास की एक ऐसी एकरूपी व्यवस्था निर्मित करता है, जो वैयक्तिक आकांक्षाओं की स्थानीय विविधता पर पूरा ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाती। उत्पादन के बारे में निर्णय का अधिकार एक स्थान पर केन्द्रित न करके यह अधिक लाभदायक होगा। यदि उसे कई केन्द्रों में विभाजित् कर दिया जाए और प्रत्येक केन्द्र अपने क्षेत्र के लोगों की आवश्यकताओं तथा उपलब्ध साधनों को सामने रखकर निर्णय करें। केन्द्रीयकृत अर्थव्यवस्था में वास्तविक शक्ति नौकरशाही के हाथों में चली जाती है, जनता के हाथों में नहीं। आज लोकतन्त्र का युग है और अर्थव्यवस्था का विकेन्द्रीकरण उसका आधार है।

प्रश्न 4.
पूँजीवाद के उदय और विकास के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में समाजवाद का उदय हुआ था। इस कथन की समीक्षा कीजिए। (Socialism emerged as a reaction to the rise and development of capitalism Discuss)
उत्तर:
समाजवाद वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध एक आन्दोलन है। यह पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था को समाप्त करके, उत्पादन तथा विवरण के साधनों पर समाज के नियन्त्रण का समर्थक है, जिसमें आर्थिक समानता की स्थापना हो। समाजवाद का उदय पूँजीवाद के उदय और विकास के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप प्रकट हुआ था। अहस्तक्षेप (Leissezfaire) के सिद्धान्त ने समाज में गम्भीर संकट पैदा कर दिया था। स्वतन्त्र प्रतियोगिता के कारण विसंगतियाँ प्रकट होने लगी थीं।

आर्थिक शक्ति का केन्द्र होने के कारण अमीर और गरीब का भेद बढ़ता जा रहा था। अधिकांश लोगों की जरूरी आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो रही थी। उद्योगपति पूँजी के बल पर अपने हित साधन में ही लगे हुए थे। इस कारण समाज में अव्यवस्था फैलने लगी और समाज पर जंगल का कानून लागू होने का डर लोगों को सताने लगा था। इस प्रकार स्वयं पूँजीवाद ने उद्यमियों की स्वतन्त्रता को परिसीमित किया है। धीरे-धीरे समाजवाद विकसित होने लगा। व्यक्ति के स्थान पर समाज के कल्याण की बात आई और व्यापार व उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता अनुभव की गई। इस प्रकार पूँजीवाद के उदय और विकास के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप समाजवाद का अभ्युदय हुआ।

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प्रश्न 5.
संसदीय समाजवाद से आप क्या समझते हैं? (What do you mean by Parliamentry Socialism?)
उत्तर:
समाजवाद के विभिन्न रूप हैं। इनमें से कुछ हिंसा के माध्यम से समाजवाद लाना चाहते हैं। जैसे-साम्यवाद, मार्क्सवाद तथा श्रमिक संघवाद दूसरी ओर विकासवादी समाजवादी हिंसा के माध्यम से समाजवाद स्थापित न करके धीरे-धीरे जन जागरण के माध्यम से समाजवाद स्थापित करना चाहते हैं। संसदीय समाजवाद इन्हीं में एक है।

संसदीय समाजवाद इंग्लैंड के मजदूर दल (Labour Party) की देन है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि समाजवाद की स्थापना के लिए संसदीय पद्धति के मार्ग को अपनाता है। इसका संविधान उपायों में अटल विश्वास रखता है। संसदीय पद्धति के माध्यम से यह न केवल मजदूरों बल्कि अन्य कमजोर वर्गों की मांगों को पूरा करने में विश्वास रखता है। यह समाजवादी पुनर्निर्माण के लिए भी आश्वस्त है। यह दृष्टिकोण मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के स्थान पर मानव बन्धुत्व में आस्था प्रकट करता है और सभी वर्गों को संतुष्ट करने की बात कहता है।

प्रश्न 6.
विकास के उदारवादी लोकतान्त्रिक मॉडल का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विकास के उदारवादी लोकतान्त्रिक मॉडल का अर्थ-पश्चिम के विकसित राष्ट्रों में उदारवादी लोकतन्त्र एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति है उदारवादी विचारधारा व्यक्ति को समाज की तुलना में उच्च नैतिक मूल्य प्रदान करती है। उदारवादी लोकतन्त्र में श्रमिकों को पर्याप्त पारिश्रमिक सम्मानपूर्ण जीवन, निजी संपत्ति के अधिकार अर्थव्यवस्था पर बाजारवाद का प्रभाव उत्पादन एवं वितरण के साधनों निजी शक्तियों द्वारा नियन्त्रण, बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी असमानता की स्थिति में राज्य द्वारा लोकतान्त्रिक भावना के अनुरूप है।

प्रश्न 7.
मानव विकास के चार तत्त्वों का उल्लेख करें।
उत्तर:
मानव विकास का अर्थ है व्यक्ति के विकास के लिए बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करना। मानव विकास के चार तत्त्व हैं – साक्षरता, शैक्षिक स्तर, आयु-सम्भाविता और मातृ मृत्युदर। मानव विकास के इन चार तत्त्वों के अलावे भी अनेक तत्त्व हैं। जैसे-भोजन, वस्त्र एवं आवास जिसको प्राप्त करने का प्रयास प्रत्येक राज्य करता है।

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प्रश्न 8.
स्थायी या सतत् विकास किसे कहते हैं? (What is sustainable development?)
उत्तर:
स्थायी विकास के लिए पर्यावरण तन्त्र और औद्योगिक तन्त्र के मध्य सही सम्बन्ध तथा संयोजन की आवश्यकता है। विकास के नाम पर औद्योगीकरण ने पर्यावरण को दूषित किया है। विकास के लिए आर्थिक रूप और नीतियों का निर्धारण होना चाहिए। मनुष्य के लिए पर्यावरण प्रदूषण को रोकते हुए विकास के कार्यक्रम किए जाने चाहिए। अधिक प्रभावी देशों में जीवन शैली के साथ-साथ जीव-जन्तु और मानव को पर्यावरण प्रदूषण से बचाए रखने का प्रयास होना चाहिए। पर्यावरण को विकास नीतियों के साथ प्रबन्ध के स्तर पर जोड़ दिया जाना चाहिए। वास्तव में पर्यावरण और विकास नीति एक दूसरे के पूरक हैं। स्थायी विकास तभी सम्भव है।

प्रश्न 9.
“विकास का आधार प्राकृतिक दोहन होना चाहिए न कि शोषण।” (The base of development is natural utilisation not the exploitation. Explain)
उत्तर:
भौतिकवादी जगत की मान्यता है कि विश्व में जो भी कुछ है वह उसके उपयोग के लिए है और जितना अधिक उपयोग किया जा सकता है उतना ही भौतिक सुख प्राप्त किया जा सकता है। इसी कारण पश्चिम के लोग प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर शोषण कर रहे हैं। वह भूल जाते हैं कि ईश्वर ने विश्व में मानव, पशुओं; कीट, पतंग, प्रकृति की प्रत्येक वस्तु आदि सभी का सन्तुलन स्थापित किया है। मानव जाति से प्रकृति का उतना ही उपयोग करने की आशा की जाती है जितनी उसकी आवश्यकता है।

अधिकतम उपभोग की प्रकृति देने की शक्ति को कम कर देता है। अधिकतम उपयोग से प्रकृति का विनाश होता है और उसके कारण मानव को अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। वर्तमान में हम इसका अनुभव कर रहे हैं। एक ओर प्रकृति की सम्पदा समाप्त हो रही है और दूसरी ओर प्राकृतिक प्रकोपों से मानव भयभीत है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि प्रकृति की देन की शक्ति बनाए रखने तथा प्राकृतिक प्रकोपों से बचने के लिए प्रकृति का शोषण न करके उसका मात्र दोहन किया जाए। विकास के लक्ष्य निर्धारण का यह महत्त्वपूर्ण आधार है।

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प्रश्न 10.
कल्याणकारी राज्य की कोई विशेषताएँ बताइए। (Mention two features of a welfare state)
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य की विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

  1. कल्याणकारी राज्य का तात्पर्य उस राज्य से है, जो जन-कल्याण को ध्यान में रखकर अपनी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का निर्धारण करता है। यह समाज के कमजोर वर्गों की सेवाएँ तथा वस्तुएँ सुलभ कराने का सामाजिक दायित्व स्वयं वहन करता है। इसका कार्यक्रम काफी विकसित होता है।
  2. कल्याणकारी राज्य की संरचना स्वायत्तता पर आधारित होती है। यह सामाजिक न्याय तथा समानता के प्रति समर्पित होता है।
  3. कल्याणकारी राज्य सामान्य इच्छा का समर्थक है। यह जाति, वर्ण, साम्प्रदायिक विचारों तथा मान्यताओं से ऊपर उठने की क्षमता रखता है।

प्रश्न 11.
श्रेणी समाजवाद पर टिप्पणी लिखिए। (Write a short not on Guild Socialism)
उत्तर:
श्रेणी समाजवाद, समाजवाद का अंग्रेजी संस्करण है। इस विचारधारा का जन्म इंग्लैंड में हुआ। श्रेणी समाजवाद का उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें वेतन प्रणाली का उन्मूलन कर उद्योगों में मजदूरों की स्वायत्त सरकार की स्थापना की जाएगी, जो राष्ट्रीय श्रेणी संघों द्वारा एक प्रजातन्त्रात्मक प्रणाली पर चलती हुई समाज के अन्य व्यवहारिक संघों के साथ मिलकर कार्य करेगी। श्रेणी समाजवादी की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. उत्पादन के साधनों पर मजदूरों का नियन्त्रण होना चाहिए।
  2. यह एक मध्यममार्गी विचारधारा है, न तो यह पूरी सत्ता मजदूरों के हाथ में देना चाहता है और न ही सम्पूर्ण सत्ता उत्पादकों को देने के पक्ष में है।
  3. श्रेणी समाजवाद पूँजीवादी व्यवस्था का घोर विरोध करता है।
  4. श्रेणी समाजवाद प्रजातन्त्र और प्रादेशिक प्रतिनिधित्व की निन्दा करता है।
  5. श्रेणी समाजवाद व्यावसायिक प्रतिनिधित्व चाहता है।
  6. श्रेणी समाजवाद सत्ता के विकेन्द्रीकरण का समर्थक है।

वास्तव में समाज में किसी कार्य विशेष को उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से सम्पन्न करने के लिए संगठित और परस्पर निर्भर व्यक्तियों का एक स्वायत्त समुदाय ही श्रेणी है। इन श्रेणियों का उद्देश्य समस्त राज्य की सेवा करना है। प्रत्येक स्तर पर श्रेणी के सदस्य अपनी श्रेणी के संचालन के लिए अधिकारियों और समितियों आदि का चुनाव करेंगे और ऊपर की श्रेणियों के सदस्य नीचे की श्रेणियों द्वारा निर्वाचित और उनके प्रति उत्तरदायी होंगे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बाजार अर्थव्यवस्था के गुण-दोष संक्षेप में लिखें। (Write merits and demerits of market economy)
उत्तर:
I. गुण (Merits):
बाजार अर्थव्यवस्था के गुणों को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –

  • तकनीक का सुदृढ़ विकास-वस्तु की गुणवत्ता बढ़ाने तथा बड़े पैमाने पर उत्पादन के दृष्टिकोण के कारण उद्योगों में नई-नई तकनीकी के अनुसन्धानों की व्यवस्था की जाती है, जिससे देश में तकनीकी का विकास होता है।
  • उपभोक्ता की पसन्द-यह अर्थव्यवस्था ग्राहक या उपभोक्ता की पसन्द पर अधिक ध्यान देती है। अतः बाजार में ग्राहक को मनपसन्द सन्तुलित कीमत पर वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती हैं।
  • उत्तम वस्तु का उत्पादन-इस अर्थव्यवस्था में प्रत्येक उत्पादक दूसरे उत्पादकों की तुलना में अधिक उत्तम वस्तु का उत्पादन करना चाहता है, जिससे बाजार में उसकी माल की माँग बढ़े।
  • लोकतान्त्रिक पद्धति पर आधारित-बाजार अर्थव्यवस्था पूरी तरह लोकतान्त्रिक है। प्रत्येक व्यापारी व उद्योगपति को बिना बन्धनों के विकास करने के अवसर प्राप्त होते हैं।
  • कीमतों में सन्तुलन-कीमतों में सन्तुलन इस व्यवस्था का सर्वोत्तम गुण है। कोई भी उत्पादक मनचाही कीमत नहीं रख सकता। अन्य उत्पादों की कीमतों में सन्तुलन बनाए रखने योग्य कीमतें निर्धारित की जाती है।
  • आय में वृद्धि-बाजार की अर्थव्यवस्था में भाग लेने के कारण व्यापार व उद्योग की वृद्धि से सरकार को करों के रूप में धन प्राप्त होता है। सरकार यह धन समाज सेवा व समाज सुरक्षा के कार्यों पर व्यय कर सकती है।
  • निजी क्षेत्र का उपयोग-यह व्यवस्था निजी क्षेत्र में विद्यमान प्रतिभा व साधनों को देश के लिए उपयोग को सम्भव बनाती है। स्वार्थ के जुड़ जाने से समाज का उद्यमी वर्ग देश की समृद्धि में हाथ बँटाता है।

II. हानियाँ (Demerits):
बाजार अर्थव्यवस्था का एक रूप यह भी है, जो अधिक भयावह है। इस व्यवस्था की हानियों को निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है –

  • उदारीकरण का दुष्परिणाम-बाजार अर्थव्यवस्था उदारीकरण की नीति पर आधारित होती है। इसमें विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने विशाल स्रोतों के माध्यम से नवोदित राष्ट्रों से अधिक लाभ कमाने के लिए आती है। उदारीकरण विकसित देशों के हितों का सन्वर्धन करता है, क्योंकि इन देशों के भारी मात्रा में उत्पाद को नवोदित राष्ट्रों की विशाल जनसंख्या का बाजार प्राप्त हो जाता है।
  • विदेशी मुद्रा भी प्राप्त नहीं होती-नवोदित राष्ट्र विदेशी मुद्रा के लालच में जिन कम्पनियों को आमन्त्रित करते हैं, वे कम्पनियाँ कम से कम मुद्रा का नवोदित राष्ट्रों को लाभ होने देती हैं। वे अधिकांश अपने उन्हीं देशों में जाकर आकर्षक भाव पर जनता से प्राप्त करके अपना कारोबार करती है।
  • निजी लाभ की प्राप्ति-बाजार अर्थव्यवस्था के मूल में निजी लाभ की प्राप्ति करना पाया जाता है। उद्योगपति ऐसे उद्योगों में रुचि लेते हैं, जिनमें लाभ की सम्भावनाएँ अधिक हों। वे ऐसी वस्तुओं का उत्पादन कभी नहीं करना चाहेंगे, जो कम लाभ दे और समाज के दुर्बल वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति करें।
  • तकनीक का आयात नहीं हो सकता-नवोदित राष्ट्र विदेशी आधुनिक तकनीक के आयात के लिए तत्पर रहते हैं। इसी कारण वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आमन्त्रित भी करते हैं, किन्तु ये कम्पनियाँ पाश्चात्य देशों में पुरानी पड़ गई तकनीक को हस्तान्तरित करती हैं और उसी पर आधारित मशीनरी का निर्यात करती हैं।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 10 विकास

प्रश्न 2.
विकास के प्रमुख उद्देश्यों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए। (Explain in brief the main objectives of development)
उत्तर:
विकास के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते समय सामान्यतः विकासशील देशों का गरीब वर्ग ही दृष्टि में आता है, किन्तु वास्तव में पश्चिम के धनी देशों की स्थिति भी इस दृष्टि से कुछ अच्छी नहीं है। वहाँ भी व्यक्तिवादी पूँजीवादी व्यवस्था ने एक बड़े वर्ग को आर्थिक दृष्टि से निर्धन बनाया है। वहाँ के प्रत्येक देश में एक अथवा अधिक उपेक्षित वर्ग देखने को मिल जाएंगे, जिनके पास देश का समृद्धि का कुछ भी अंश नहीं पहुँच पाता है और वहाँ की समृद्धि की तुलना में ये वर्ग स्वयं को गरीब पाते हैं। अतः विकास के उद्देश्यों पर विचार करते समय विकसित देशों के इन वर्गों का भी अध्ययन करना समीचीन होगा।

पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि में विश्व के सभी देशों के सामान्य लोग अब आवश्यक वस्तुओं के साथ-साथ विलास की वस्तुओं का भी उपयोग करने लगे हैं। अर्थात् वर्तमान में आर्थिक दृष्टि से दुर्बल व सबल वर्गों की अवधारणा अब अदृश्य होती जा रही है। वास्तव में इन पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि पश्चिम के धनी समाजों तक सीमित है। उन्होंने विकासशील देशों के आर्थिक दृष्टि से दरिद्र लोगों को अपने अध्ययन का केन्द्र बनाया ही नहीं है। विकास के उद्देश्यों को निर्धारित करते समय विश्व के निर्धन लोगों को आधार बनाना आवश्यक है। इन उद्देश्यों का निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया जा सकता है –

1. अन्त्योदय (Development of the last Man):
हम कह सकते हैं कि विकास का कार्य कहाँ से प्रारम्भ किया जाना उचित है। वास्तव में विकास के महत्त्व को तभी समझा जा सकता है, जबकि समाज का निर्धन व्यक्ति विकास की योजना का लाभ प्राप्त कर सके। अतः विकास का लक्ष्य अन्त्योदय होना चाहिए। यदि लक्ष्य अन्त्योदय नहीं रखा गया, तो समाज का विकास तो होगा, किन्तु विकास का लाभ धनी व सामान्य निर्धन वर्ग को ही प्राप्त होगा। अत्यन्त निर्धन तथा निर्धन समाज के अन्त के व्यक्ति की विकास में कोई भागीदारी सम्भव नहीं होगी।

2. जीवन का न्यूनतम स्तर (Minimum Living Standard):
विकास का पहला उद्देश्य दरिद्र लोगों को जीवन के ऐसे न्यूनतम स्तर की प्राप्ति करना चाहिए, जिसमें न केवल नितान्त आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हो बल्कि उनके सुखा सुविधा की भी व्यवस्था हो सके। उन्हें व सामान्य परिस्थितियाँ प्राप्त हों, जिनमें उनकी प्रतिभा के विकास के अवसर विद्यमान हों तथा उनकी कार्यकुशलता को बढ़ाया जा सके।

3. Michalot Here for art facire (Development through Democratic Method):
यह उचित है कि अधिनायकवादी देशों में विकास की गति तीव्र होती है और अधिनायक विकास की जो दिशा निश्चित करता है, उसी दिशा में विकास होता है। भय व आतंक के कारण विकास में किसी प्रकार का अवरोध नहीं होता, किन्तु ऐसे देशों में जन सहयोग के अभाव में न विकास के लाभ का सही वितरण हो पाता है और न ही ऐसे विकास में जनता की रुचि जागृत होतो है।

साम्यवादी देशों के विकास की स्थिति से विश्व भली-भाँति परिचित है कि वहाँ विकास के प्रतिमानों का कितना बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार हुआ, जबकि वास्तविकता इसके सर्वथा विरुद्ध थी। लोकतन्त्र में विकास जनसहयोग से होता है, यह विकास खुला तथा जन हिताय होता है। किसी विशिष्ट वर्ग के लिए किए जाने वाले विकास का लोकतान्त्रिक पद्धति में विरोध होता है।

4. बेरोजगारी की समस्या का हल (Solution of the Problem of Unemployment):
पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर मशीनों की सहायता से उत्पादन किया जाता है। इस कारण जिन देशों में जनसंख्या अधिक है वहाँ बेरोजगारी की समस्या का गम्भीर रूप प्रकट हुआ है।

अब तो स्थिति यह है कि पूँजीवादी समृद्ध देशों में, जिनमें अमेरिका व इंग्लैंड भी सम्मिलित हैं, बेरोजगारी की समस्या विकट रूप में सामने आ रही है। यद्यपि कुछ देशों ने अपने बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ते प्रारम्भ किया है, किन्तु यह समस्या का निदान नहीं है। भारत में भी कुछ राज्य बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं। विकास के लक्ष्यों का निर्धारण करते समय बेरोजगारी दूर करने के लक्ष्य को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक देश अर्थव्यवस्था के स्कम का निर्धारण अपने यहाँ के साधनों की प्राप्ति को ध्यान में रखकर करें।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विकास सम्बन्धी मॉडलों का प्रभाव निम्न में से सबसे ज्यादा किस पर पड़ा?
(क) पर्यावरण एवं समाज पर
(ख) व्यक्ति एवं कृषि पर
(ग) मानव एवं सभ्यता पर
(घ) शिक्षा एवं संस्कृति पर
उत्तर:
(क) पर्यावरण एवं समाज पर

प्रश्न 2.
जून 1992 में पर्यावरण और विकास विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया –
(क) जेनेवा
(ख) रियो द जेनेरो
(ग) टोकियो
(घ) न्यूयार्क
उत्तर:
(ख) रियो द जेनेरो

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 10 विकास

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्रसंघ की विश्व जल विकास सम्बन्धी प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ –
(क) मई 2007
(ख) अप्रैल 2006
(ग) मार्च 2006
(घ) फरवरी 2005
उत्तर:
(क) मई 2007

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 9 शांति

Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 9 शांति Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Political Science Solutions Chapter 9 शांति

Bihar Board Class 11 Political Science शांति Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
क्या आप जानते हैं कि एक शांतिपूर्ण दुनिया की ओर बदलाव के लिए लोगों के सोचने के तरीके में बदलाव जरूरी है? क्या मस्तिष्क शान्ति को बढावा दें सकता है? और, क्या मानव मस्तिष्क पर केन्द्रित रहना शांति स्थापना के लिए पर्याप्त है?
उत्तर:
यह सही कहा जाता है कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है बल्कि व्यक्ति की सोच ऐसा बताती है। इसलिए यह सोचने का ढंग ही है जिससे तनाव या शान्ति होती है। यह सोच ही किसी कार्य का कारण बनती है। सोच आत्मा की उपज है और आत्मा आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों से उत्पन्न और प्रभावित होती है। अंततः वातावरण में यदि सुधार और संशोधन किया जाए तो स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण हो सकता है जिससे सकारात्मक सोच उत्पन्न हो सकती है। व्यक्ति के व्यवहार के निर्माण में मस्तिष्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। शान्ति से सम्बन्धित सभी अध्ययन आत्मा, मस्तिष्क और व्यक्ति के व्यवहार की आवश्यकता को मंडित किया है।

गौतम बुद्ध ने बताया, “सभी गलत कार्य मस्तिष्क से उत्पन्न होते हैं। यदि मस्तिष्क को परिवर्तित कर दिया जाए तो गलत कार्य को खत्म किया जा सकता है।” दार्शनिक रूप से ये दोनों काम हुए है अर्थात् अच्छाई और बुराई, हिंसा और अहिंसा, तनाव और शान्ति। पूर्ण शान्ति या अशान्ति या हिंसा परिवर्तनीय है। ऐसे में जरूरत है कि आत्मा और व्यक्ति का व्यवहार इस प्रकार बनाया जाय, सामाजिक, आर्थिक वातावरण को वह रूप दिया जाए कि यह शान्ति के लिए तैयार हो जाए।

विश्व दो पराकाष्ठा की स्थिति में जीवित नहीं रह सकता। वस्तुतः सामान्य वातावरण के साथ सामान्य जीवन की ही आवश्यकता होती है। केवल कुछ दार्शनिकों ने सामाजिक पराकाष्ठा के विषय में सोचा या बात की। हिंसा को रोका और नियंत्रित किया जाना चाहिए जिससे अच्छा व्यवहार और अच्छा वातावरण लाया जा सके। यदि वातावरण अच्छा है तो इससे मस्तिष्क अच्छा होगा जिससे अच्छा व्यवहार उत्पन्न होगा और अंततः शान्ति स्थापित होगी।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 9 शांति

प्रश्न 2.
राज्य को अपने नागरिकों के जीवन और अधिकारों की रक्षा अवश्य ही करनी चाहिए। हालाँकि कई बार राज्य के कार्य इसके कुछ नागरिकों के खिलाफ हिंसा के स्रोत होते हैं। कुछ उदाहरणों की मदद से इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
यदि हम राज्य की प्रकृति और उत्पत्ति के इतिहास में झांके तो राज्य के विषय में विभिन्न कालों में विभिन्न विचाराकों द्वारा विभिन्न अवधारणाएँ दी गई हैं। मूलरूप से अरस्तू. राज्य को एक कल्याणकारी संस्था मानता था। सामाजिक विचारक राज्य के कानून और सम्पत्ति को कायम रखने और लोगों के जीवन तथा सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए मानते थे।

आधुनिक राज्य को भी कानून और व्यवस्था बनाये रखने वाला और आवश्यक कार्य के रूप मे जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा करना माना जाता है। इसके अलावा उसके वैकल्पिक कार्य, विकास करना और कल्याण करना है। राज्य एक प्रभुता संपन्न संस्था है जिसे लोगों की भलाई में निर्णय लेने, कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए आदेश जारी करने और लोगों के जीवन की रक्षा करने का पूर्ण अधिकार और उसका अंतिम उत्तरदायित्व भी है।

अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए राज्य कोई भी आवश्यक कार्य या निर्णय ले सकता है जिसे राज्य आवश्यक समझता है। कभी-कभी राज्य के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह गलत लोगों, आक्रमणकारी ओर कानून तोड़ने वालों की हिंसात्मक कार्यवाही रोकने के लिए दण्ड दे। यह माना जाता है कि अपराधियों के विरुद्ध गलत कार्यों के लिए राज्य कठोर कदम उठाए परन्तु यह वैधानिक नियमों और न्याय की. सीमा में होना चाहिए। जब राज्य नियमों का उल्लंघन करता है तो यह राज्य का अतिक्रमण कहलाता है। आधुनिक शब्दावली में यह राज्य का आतंकवाद कहलाता है। पुलिस और सेना को विभिन्न। कार्यों को करना पड़ता है जिससे कानून और व्यवस्था कायम किया जा सके।

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प्रश्न 3.
शान्ति को सर्वोत्तम रूप में तभी पाया जा सकता है जब स्वतंत्रता, समानता और न्याय कायम हो। क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
उत्तर:
यह सही है कि शान्ति के आवश्यक अवयव-स्वतंत्रता, समानता और न्याय हैं। इतिहास में इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि जब सभी स्वतंत्रता, समानता और न्याय का लोप हुआ है वहाँ शान्ति भी लुप्त हो जाती है। असमानता, अन्याय गुलामी से तनाव और संघर्ष उत्पन्न होता है जिससे स्वाभाविक रूप से आशान्त वातावरण उत्पन्न हो जाता है। परम्परागत जाति प्रथा धार्मिक शासन पर आधारित थी जिससे कुछ समूह के लोग अस्पृश्य घोषित कर दिए जाते थे और उनका सामाजिक बहिष्कार होता था और उन्हें निकृष्ट प्रकार का माना जाता था। यह गंभीर समस्या असमानताओं, अन्याय और परतंत्रता पर आधरित था। इन असमानताओं से अंततः तनाव और संघर्ष पैदा होता था। जिससे शान्ति की उपेक्षा होती थी।

इसी प्रकार महिलाएँ पुरुष प्रधानता की शिकार थीं। उससे संबधित अनेक बुराईयों का बोलबाला था जो महिलाओं के विरुद्ध व्यवस्थित अधीनता और भेदभाव उत्पन्न करती थी। महिलाओं का बुरी तरह शोषण होता था और उनकी स्वतंत्रता, न्याय और समानता की उपेक्षा की जाती थी।

उपनिवेशवाद एक अत्यन्त बुरी विचारधारा थी जिसमें लम्बी और प्रत्यक्ष गुलामी शोषण और अन्याय भरा पड़ा था। फलस्वरूप अनेक विद्रोह हुए और शान्ति भंग हुई। इसी प्रकार जातीयता और सम्प्रदायवाद से भी अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हुई और इससे सम्पूर्ण जातीय समूह या समुदाय दमन का शिकार हुआ। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सम्पन्नता का आधार समानता, न्याय और स्वतंत्रता है। यदि इनमें किसी को लुप्त कर दिया जाए तो शान्ति को खतरा उत्पन्न हो सकता है।

प्रश्न 4.
हिंसा के माध्यम से दूरगामी न्यायोचित उद्देश्यों को नहीं पाया जा सकता। आप इस कथन के बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर:
यह कथन सर्वथा सत्य है। हिंसा हमें पत्राचार की ओर ले जाती है अंततः उद्देश्य से दूर ले जाती है। यह सहिष्णुता और अहिंसा है जो न्याय को प्राप्त करने में सहायता करती है। कभी-कभी यह भी कहा जाता है कि हिंसा कुछ उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता करती है। हिंसा कुछ परिस्थितियों में आवश्यक हो जाती है। परन्तु यह स्थाई लक्षण. नहीं है। हिंसा से स्थायी शान्ति नहीं प्राप्त की जा सकती। केवल अहिंसा के द्वारा स्थायी शान्ति आ सकती है। यही कारण है कि अहिंसा के समर्थक शान्ति को एक सर्वोच्च मूल्य मानते हैं। वे हिंसा के विरुद्ध अन्याय में भी नैतिक मार्ग को अपनाते हैं। वे हिंसात्मक आन्दोलनों के विरोध की वकालत करते हैं। परन्तु प्रेम और सहनशीलता के प्रयोग को बढ़ावा देते हैं। वे हृदय परिवर्तन के द्वारा हिंसा को रोकना चाहते हैं। वे हिंसा को अन्तिम साधन मानते हैं।

Bihar Board Class 11th Political Science Solutions Chapter 9 शांति

प्रश्न 5.
विश्व में शान्ति स्थापना के जिन दृष्टिकोणों की अध्याय मे चर्चा की गई है उनके बीच क्या अंतर है?
उत्तर:
शान्ति को कायम रखने और उसके अनुभवीकरण (Realisation) के लिए अनेक उपागम किए गए हैं। इनमें तीन मुख्य उपागम निम्नलिखित हैं –
1. प्रथम उपागम:
यह राज्य पर जोर देता है और उसकी पवित्रता का सम्मान करता है। जीवन के तथ्य के रूप मे लोगों में प्रतियोगिता होती है। इसका संबन्ध प्रतियोगिता के उचित प्रबन्धन एवं शान्ति के लिये उचित संतुलन स्थापित करना है।

2. द्वितीय उपगम:
द्वितीय उपागम अति लूट वाले राज्य पर ध्यान केद्रित करता है। परन्तु सामाजिक आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

3. तृतीय उपागम:
इसमें इतिहास के बीते कालों पर विचार किया जाता है । यह शांति के सुनिश्चितता के रूप में समुदाय पर विचार करता है।

Bihar Board Class 11 Political Science शांति Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
उस विश्व संस्था का नाम बताइए जिसका इस्तेमाल भारत विश्व शान्ति को बढ़ावा देने के लिए करता रहा है। (Name the institution by which India promote world peaces)
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ.)।

प्रश्न 2.
शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद कौन सा देश विश्व में शक्तिशाली रूप में उभरा? (Which country emerged as powerful after the end of cold war?)
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका।

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प्रश्न 3.
उस संस्था का नाम लिखिए जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति बनाए रखने के लिए दंड की व्यवस्था करती है। (Name the organ of the UN that punished a country who violate the world peace)
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद्।

प्रश्न 4.
अंतर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना कैसे की जा सकती है? (In which manner the world peace established?)
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना सहयोग, समानता तथा स्वतन्त्रता के आधार पर की जा सकती है।

प्रश्न 5.
शान्ति क्या है? (Define peace)
उत्तर:
साधारण शब्दों में शान्ति का अर्थ है “युद्ध रहित अवस्था”। युद्ध या किसी अप्रिय स्थिति की आशंका को शान्ति नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 6.
एक दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता के सम्मान से आप क्या समझते हैं? (What do you know about regional integrity of each other?)
उत्तर:
प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक अस्तित्व होता है जिसे दूसरे राष्ट्रों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। इस शर्त की पूर्ति शान्ति स्थापना के लए आवश्यक है।

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प्रश्न 7.
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व क्या है? (What is peaceful co-existance?)
उत्तर:
‘जियो और जीने दो’ का वाक्य शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व है जिसमें युद्ध का कोई स्थान – नहीं है।

प्रश्न 8.
युद्ध की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कोई दो कारण बताइए। (why are the wars necessary? Explain any two causes)
उत्तर:

  1. आत्मरक्षा के लिए
  2. शान्तिवार्ता असफल होने पर।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या शान्ति बनाए रखने के लिए हिंसा की आवश्यकता है? (Are violence is necessary for peace?)
उत्तर:
इस मत को मानने वाले राजनीतिज्ञों का मानना है कि विश्व में शान्ति बनाए रखने के लिए हिंसा की आवश्यकता होती है। अन्तर्राष्ट्रीय कानून ने सभी राज्यों को अन्य राज्य के आक्रमण के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार दिया है। इस अधिकार के अंतर्गत हर राज्य हर समय अपनी आत्मरक्षा करने के लिए तैयार रह सकता है। सभी राष्ट्रों को सशक्त आक्रमण के विरुद्ध व्यक्तिगत अथवा सामूहिक आत्मरक्षा का अधिकार है। सशक्त आक्रमण को रोकने के लिए किसी भी राष्ट्र को चाहे वह कमजोर हो अथवा सबल, हिंसा का सहारा लेना ही पड़ता है।

व्यवहार में आत्म-संरक्षण में की जा रही कार्यवाही की कोई सीमा नहीं होती। परन्तु आत्मरक्षा का अधिकार किसी राज्य को भी मिलता है जब उस पर सशस्त्र बलों द्वारा आक्रमण किया गया हो और किसी भी राष्ट्र को अपनी आत्मरक्षा करने के लिए आक्रामक राष्ट्र से अधिक शस्त्रों को एकत्र करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में आक्रामक राष्ट्र की शक्ति का अनुमान लगाना कठिन है और क्या वह राज्य आक्रामक राज्य बन सकता है, की भविष्यवाणी करना कठिन है। इसलिए हर हालत में हर राज्य को हर दूसरे राज्य के विरुद्ध आत्मरक्षा के लिए अधिक-से-अधिक हिंसा के लिए तैयार रहना होगा जिससे शान्ति स्थापना संभव हो।

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प्रश्न 2.
युद्ध करना अब न्यायसंगत होता है? (In which circumstances the war is justiflable?)
उत्तर:
विवादों के शान्तिपूर्ण तरीकों से निपटारा न होन के कारण ही युद्ध की परिस्थिति उत्पन्न होती है। युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को निपटाने का अन्तिम साधन मात्र है। युद्ध शस्त्र चलों के प्रयोग के माध्यम से हिंसात्मक संघर्ष है। आक्रमण अथवा युद्ध किन अवस्थाओं में न्यायसंगत होते हैं, यह प्रश्न आज भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना पूर्व में था। युद्ध के न्यायसंगत होने के कई तर्क दिए जाते हैं। जैसा कि पहला तर्क यह दिया जाता है कि शान्ति वार्ताओं के असफल होने के कारण युद्ध जरूरी हो जाता है। कुछ मामलों में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधानों के अंतर्गत राज्य द्वारा बल का प्रयोग विधिपूर्ण है व न्यायसंगत है।

1. आत्मरक्षा (Self Defence):
“आत्मरक्षा में बल प्रयोग करने के लिए राज्य के अधिकारों को बहुत पहले से ही अन्तर्राष्ट्रीय विधि से मान्यता दी गई है।” ग्रोशियस के अनुसार जीवन, स्वतंत्रता व सम्पत्ति की रक्षा तथा सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा का अधिकार सहज प्रकृति पर आधरित है। इस आत्मरक्षा के लिए राज्यों को युद्ध करने का पूरा अधिकार है।

2. चार्टर पर हस्ताक्षरित सदस्यों के दुश्मन (Enemy of the Signatories of the charter):
अनुच्छेद 10 संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर) के तहत संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों के विरुद्ध युद्ध अवैध नहीं होगा।

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प्रश्न 3.
हम कैसे कह सकते हैं कि भारत का शान्ति का दृष्टिकोण व्यापक है? (India’s veiw of peace is comprehensive. How?)
उत्तर:
1. भारत की विदेश नीति का दुष्टिकोण (नजरिया) व्यापक है। भारत की विदेश नीति विश्व-शान्ति के लिए लगातार प्रयासरत है। भारत अन्य देशों की अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर सकारात्मक भूमिका निभाता रहा है। देश की विदेश नीति के उद्देश्य और सिद्धान्त हैं-हर तरह का साम्राज्यवाद (Imperialism) का विरोध करना तथा सभी देशों को उपनिवेशी मामलों से स्वतंत्रता रंग-भेद नीति का बहिष्कार, भुखमरी तथा बीमारी को जड़ से उखाड़ना, सभी देशों के साथ मित्रता का संबन्ध स्थापित करना व संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य संगठनों और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी की भूमिका निभाना।

2. भारत की शान्ति नीति का दृष्टिकोण नकारात्मक या युद्ध विरोधी नहीं है, किन्तु हम यह मानते हैं कि युद्ध के कारणों को समाप्त किए बिना विश्व में चिरकालीन स्थायी शान्ति की स्थापना नहीं की जा सकती। भारत चाहता है सभी देश अपने अनावश्यक विनाशकारी हथियारों का विनाश कर दें तथा सभी राष्ट्र स्वेच्छा से निः शस्त्रीकरण संबंधी संधियों पर सच्चे मन से हस्ताक्षर कर दें।

प्रश्न 4.
शीत युद्ध को कम करने में भारत के योगदान का परिक्षण कीजिए। (Examine India’s role in reducing the cold war)
उत्तर:
1. दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व दो प्रमुख गुटों में बंटने लगा। एक गुट पश्चिमी देशों (शक्तियों) का था जिसका नेता संयुक्त राज्य अमेरिका था तो दुसरा गुट साम्यवादी देशों का था जिसका नेता पूर्व सोवियत संघ था।

2. पश्चिम के देश एक-दूसरे के साथ उचित और मैत्रिपूर्ण संबन्ध बनाने के इच्छुक थे। शीतकाल के इस वातावरण में भारत का आग्रह बातचीत के लिए था। हमारे नेताओं ने दोनों गुटों के मतभेदों को वाकयुद्ध तथा हथियारों का इस्तेमाल किए बिना स्वतंत्र तथा सीधी बातचीत के द्वारा सुलझाने का प्रयास किया। भारत ने एक अद्भुत नीति की खोज की, जिसे बाद में गुटनिरपेक्षता की नीति के नाम से जाना गया। इस नीति का अर्थ तटस्थता नहीं है (तटस्थता का अर्थ है कि दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच युद्ध के दौरान समान दूरी बनाए रखना) इसका अर्थ है अन्तर्राष्ट्रीय विषयों से संबंधित सभी मामलों पर स्वतंत्रतापूर्वक निडर होकर निर्णय लेना।

3. इस नीति में सैनिक मुकाबले को प्रोत्साहन देने की अपेक्षा सभी शान्तिपूर्ण तरीकों को अपनाया गया। इस नीति की लोकप्रियता का यह लाभ मिला कि नए स्वतंत्र राष्ट्रों ने शीत युद्ध के दो गुटों का सदस्य बनने की अपेक्षा गुटनिरपेक्ष नीति को अपनाने को प्राथमिकता दी। इस प्रकार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन 1960 ई. मे जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो और मिस्र के नासिर के नेतृत्व में शुरू हुआ। इस आन्दोलन का स्वागत विश्व शान्ति की स्थापना करने वाले सबसे बड़े आन्दोलन के रूप में किया गया। भारत शीत युद्ध के प्रतिद्वंद्वियों को स्वतंत्र तथा नए स्वतंत्र देशों के बीच तनाव पैदा नहीं करने देना चाहता था। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा तथा विकास के लिए प्रतिस्पर्धियों में शीत युद्ध समाप्त करने की वकालत की।

प्रश्न 5.
शांति के खोज के विभिन्न उपाय क्या हैं?
उत्तर:
शान्ति के खोज के विभिन्न उपाय:
शान्तिवादियों की यह मान्यता है कि हिंसा किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। शान्तिवादी और व्यवहारिक राजनीतिक शान्ति स्थापना के सम्बन्ध में अनेक उपायों का सुझाव देते हैं – सर्वप्रथम वे शान्ति संतुलन स्थापित करने का सुझाव देते हैं, जबकि प्रमुख राष्ट्रों का सैनिक और राजनीतिक शक्ति समान हो तो शान्ति की संभावना अधिक होती है दुसरे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से भी शान्ति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। तीसरे वैश्विक शासन भी इसका आधार बन सकता है और चौथे संयुक्त राष्टसंघ विश्व में शान्ति स्थापित करने की जिससे शान्ति के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके।

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प्रश्न 6.
क्या हथियार वैश्विक शान्ति को बढ़ावा देते हैं?
उत्तर:
नाभिकीय शक्ति से लैस देश परमाणु बम की विनाशलीला को स्वीकार करते हैं। लेकिन यह तर्क भी देते हैं कि इससे शान्ति स्थापना का उद्देश्य पुरा हो सकता है यानि महाविनाशकारी संभावना उसे शान्ति स्थापना के लिए प्रेरित करता है। वर्तमान परमाणु संपन्न राष्ट्र अमेरिका, फ्रांस, चीन, रूस नाभकीय युद्ध से बचना चाहते हैं। यह माना जाने लगा है कि परमाणु नामक राक्षस ने ही विश्व में शान्ति स्थापित की है। लेकिन यह अस्थायी एवं संदिग्ध है क्योंकि तानाशाही प्रकृति के लोगों के पास परमाणु शक्ति आ जाय तो शान्ति नहीं बल्कि विनाश होगा।

प्रश्न 7.
शान्ति एवं हिंसा में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर:
समय और परिस्थिति के अनुसार शांति और हिंसा एक दूसरे से सम्बन्धित है। कभी-कभी शांति लाने के लिए हिंसा अपरिहार्य हो जाती है। उदाहारणस्वरूप-हिंसा का सहारा लेना पड़ता है। ऐसी स्थिति में हिंसा उचित और न्यायपूर्ण है। अनेक.ऐसे उदाहरण हैं जब शान्ति के लिए हिंसा का प्रयोग किया गया। 1960 में मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में काले लोगों के साथ भेद-भाव के विरुद्ध हिंसक संघर्ष किया। 1991 में निरंकुश सोवियत व्यवस्था का विघटन। यही कारण है जिसके चलते शान्तिवादी किसी न्यायपूर्ण संघर्ष में भी हिंसा के इस्तेमाल के विरुद्ध नैतिक रूप से खड़े होते हैं तथा शोषकों का दिल-दिमाग जीतने के लिए प्रेम और सत्य की बात करते हैं।

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प्रश्न 8.
शान्ति क्या है? किन दो तरीकों से विश्व मे शान्ति स्थापित की जा सकती है? (What is peace? In which two methods the world peace established?)
उत्तर:
सरल शब्दों में शान्ति से आशय है “युद्ध रहित अवस्था”। शान्ति एक ऐसी अवस्था है जिसमें सभी लोग एक साथ मिलकर रहते हैं तथा एक-दूसरे को सहयोग प्रदान करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी शान्ति का यही अर्थ निकालता है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्ति से आशय है विश्व के सभी राष्ट्र-राज्य एक-दूसरे की सत्ता व स्वतन्त्रता का सम्मान करें तथा आपसी सहयोग को बढ़ावा दें जिससे समानता का अस्तित्व बना रहे। इसी सिद्धान्त को दूसरे शब्दों में ‘जियो और जीने दो’ (Live and Let Live) के नाम से जाना जाता है। सह-अस्तित्व के आधार पर जीने की कला व राष्ट्रों के आपस में होने वाले कार्यकलापों के द्वारा शान्ति को स्थापित किया जाता है।

विश्व में शान्ति-स्थापना के अनेक तरीके हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप से वर्णित किया सकता है –

1. दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता व प्रभुसत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान (Mutual respect for each other’s territorial integrity):
विश्व में शान्ति स्थापित करने का सर्वप्रथम सिद्धान्त है कि विश्व के प्रत्येक राष्ट्र-राज्य का कर्तव्य है कि वह अपनी अखण्डता व प्रभुसत्ता को उस राज्य के लिए आवश्यक समझे। प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक अस्तित्व होता है जिसे दूसरे राष्ट्रों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। इस शर्त की पूर्ति शान्ति स्थापना के लिए अत्यन्त आवश्यक है। किसी भी राज्य को दूसरे राज्यों कि विरुद्ध अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

2. आक्रमण न करना (Non-Aggression):
एक दूसरे के प्रति क्षेत्रीय अखण्डता व प्रभुसत्ता के प्रति पारस्परिक सम्मान की दशा में संभव है जब एक राष्ट्र-राज्य स्वयं जीवित रहने के साथ-साथ दूसरे राष्ट्रों को भी जीवित रहने व विकसित होने का अवसर प्रदान करे। किसी भी राज्य को यह अधिकार बिल्कुल नहीं दिया जा सकता कि वह स्वयं की क्षेत्रीय सीमा का विस्तार करने के लिए अन्य राज्यों पर आक्रमण करे अथवा जोर-जबरदस्ती द्वारा अन्य राज्य की भूमि को हड़प ले।

एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेना एक सभ्य देश का कार्य नहीं है। ऐसा व्यवहार सम्पूर्ण विश्व के शान्तिपूर्ण माहौल में बाधा पहुँचाता है। राज्यों के मध्य मतभेद अवश्य होते हैं परन्तु ऐसे मतभेदों को शान्तिपूर्ण तराकों से ही निपटारा करना चाहिए, हिंसात्मक रूप से नहीं। यह सभ्य समाज व राज्य की मुख्य निशानी है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या शस्त्रों की होड़ से विश्व शान्ति स्थापित हो सकती है चर्चा कीजिए। (Is the armament is helpful in World peace. Discuss)
उत्तर”
क्या शस्त्रीकरण वैश्विक शान्ति को जन्म दे सकता है? (Can armament Promote Global peace):
इस प्रश्न को लेकर कि क्या शस्त्रीकरण द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित की जा सकती है अथवा नहीं, राजनीतिक दार्शनिकों के मतों में मतभेद है। कुछ लोगों का मानना है कि शान्ति स्थापित हो सकती है क्योंकि शस्त्रीकरण, आक्रमणकारी राज्य के मन में भय उत्पन्न कर देगा और वह युद्ध नहीं करेगा या किसी भी प्रकार से शान्ति भंग नहीं करेगा। परन्तु इस धारणा को अन्य दार्शनिक ठीक नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि अन्तर्राष्ट्रीय अशान्ति का कारण ही शस्त्रीकरण है।

शस्त्रीकरण न केवल युद्ध के कारणों को प्रभावित करता है वरन् अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए भी खतरा है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी नि:शास्त्रीकरण (Disarmament) की ओर जोर दिया है। शीत युद्ध (Cold War) में पैदा हुए डर के माहौल को कोई भी आज तक भूल नहीं पाया है। अनेक बार ऐसा सोचा जाता है कि शान्ति स्थापित करने के लिए युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए या शस्त्रीकरण करना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि संभी राष्ट्र अपनी सैनिक शक्ति को अधिक बढ़ाएँ। परन्तु ऐसा करने से विश्व में तनाव बना रहेगा और प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के साथ मैत्री सम्बन्ध जोड़ने के स्थान पर एक-दूसरे को डराने व धमकाए. रखने का माहौल तैयार कर लेगा।

इससे शान्ति, विश्वास व प्रेम के स्थान पर भय, डर, अविश्वास आदि का वातावरण उत्पन्न होगा। शान्ति बनाए रखने का पहला कार्य यदि कुछ हो सकता है तो वह है नि:शस्त्रीकरण (disarmament) न कि शस्त्रीकरण। वास्तविक अर्थों में देखा जाए तो शस्त्रीकरण साधन है, साध्य नहीं। साध्य मनुष्य के निजी स्वार्थ से उत्पन्न क्लेश व कलह है। मनुष्य अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिए दूसरे को अपने वशीभूत करना चाहता है। इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए हथियारों को जन्म देता है और युद्धों का अकस्मात् स्वरूप होने के कारण अस्त्र-शस्त्रों के होते हुए युद्धों को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। युद्ध की समाप्ति के लिए निःशस्त्रीकरण को व्यापक पैमाने में प्रेरित करना होगा। विश्व में लोगों को शान्ति का पाठ पढ़ाना होगा तभी वैश्विक शान्ति सम्भव है।

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प्रश्न 2.
विश्व शांति को बढ़ावा देने की दिशा में भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत तथा संयुक्त राष्ट्र (India $ UN):
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों को भारतीय संविधान में भी स्थान दिया गया है तथा भारत शुरू से इसका सदस्य रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्तिशाली बनाना और उसके कार्यों में सहयोग देना भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धान्त रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा किए गए शान्ति प्रयासों में भारत ने हर प्रकार से सहायता प्रदान की है। भारत कई बार सुरक्षा परिषद् (संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंग) का सदस्य रहा है। 1952 ई० में भारत की श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित साधारण सभा की अध्यक्षा चुनी गई थीं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य के रूप में भारत ने हमेशा दूसरे देशों के साथ झगड़ों का निपटारा शान्तिपूर्वक करने का प्रयत्न किया है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत का कश्मीर मामले पर पाकिस्तान से झगड़ा हुआ। भारत ने इस झगड़े का हल करने के लिए इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ के पास भेजा। सन् 1962 ई. में चीन ने सीमा विवाद को लेकर भारत पर अचानक ही आक्रमण कर दिया और नेफा तथा लद्दाख के बहुत बड़े क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।

भारत ने शान्तिपूर्ण ढंग से इस समस्या का समाधान करने का भरसक प्रयत्न किया। 1965 ई. में पाकिस्तान ने भारत पर फिर आक्रमण कर दिया, परन्तु भारत ने इसका मुंहतोड़ जवाब दिया और पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित किया। अन्त में तत्कालीन सोवियत संघ के माध्यम से दोनों देशों में ताशकन्द समझौता हुआ जिसके परिणामस्वरूप भारत ने पाकिस्तान के जीते हुए क्षेत्र उसे वापस लौटा दिए। इसके बाद भी भारत पाकिस्तान में युद्ध हुआ और पाकिस्तान की पराजय हुई परन्तु भारत ने विश्व में शान्ति बनाए रखने के लिए उससे संधि की।

संयुक्त राष्ट्र ने नि:शस्त्रीकरण के प्रश्न को अधिक महत्त्व दिया है तथा इस समस्या को हल करने के लिए बहुत ही प्रयास किए हैं। भारत ने इस समस्या का समाधान करने के लिए हमेशा संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता की है क्योंकि भारत को यह विश्वास है कि पूर्ण निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही संसार में शान्ति की स्थापना हो सकती है। सातवें गुट-निरपेक्ष शिखर को सम्बोधित करते हुए श्रीमती गाँधी ने कहा था-विकास, स्वतन्त्रता, निःशस्त्रीकरण और शान्ति परस्पर एक दूसरे से सम्बन्धित हैं।

एक नाभिकीय विमानवाहक पर जो खर्च होता है वह 53 देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पादन से अधिक है। नाग ने अपना फन फैला दिया है। समूची मानव जाति भयाक्रांत है और भयभीत निगाहों से इस झूठी आशा के साथ देख रही है कि उसे काटेगी नहीं। इस समय विश्व में बहुत से सैनिक गुट बना रहे हैं। जैसे-नाटो, सैन्टो आदि। भारत का हमेशा यह विचार है कि ये सैनिक गुट विश्व शान्ति मे बाधक हैं। अतः भारत ने इस सैनिक गुटों की केवल आलोचना ही नहीं की अपितु इनका पूरी तरह से विरोध भी किया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनने के लिए भारत ने विश्व के प्रत्येक देश को कहा है भारत ने चीन, बांग्लादेश, हंगरी, श्रीलंका, आयरलैंड और रूमानिया आदि देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत की सक्रियता का प्रमाण यह है कि श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित को महासभा की अध्यक्ष चुना गया। इसके अतिरिक्त मौलाना आजाद यूनेस्को के प्रधान बने, श्रीमती अमृतकौर विश्व स्वास्थ्य संघ की अध्यक्षा बनीं।

डॉ. राधाकृष्णन आर्थिक व सामाजिक परिषद् के अध्यक्ष बनाए गए। भारत को 1950 ई० में सुरक्षा परषिद् का अस्थायी सदस्य चुना गया। अब तक भारत सुरक्षा परिषद् का 6 बार अस्थायी सदस्य रह चुका है। डॉ. नागेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। विश्व शान्ति की स्थापना के सम्बन्ध में भारत का मत है कि जब तक संसार के सभी देशों का प्रतिनिधित्व संयुक्त राष्ट्र संघ में नहीं होगा वह प्रभावशाली कदम नहीं उठा सकता।

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प्रश्न 3.
शान्ति से क्या आशय है? किन तरीकों से विश्व में शान्ति बनाए रखी जा सकती है? (What is peace? Which methods the World peace established?)
उत्तर:
शान्ति क्या है? (What is peace?):
“युद्ध रहित अवस्था” को शन्ति कहा जाता है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें सभी लोग मिल-जुल कर रहते हैं तथा एक-दूसरे को सहयोग देते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शान्ति का तात्पर्य है विश्व के सभी राष्ट्र-राज्य एक-दूसरे की सत्ता व स्वतन्त्रता का सम्मान करें तथा पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा दें ताकि समानता का अस्तित्व बना रहे। सह-अस्तित्व के आधार पर जीने की कला व राष्ट्रों के आपस में होने वाले क्रिया-कलापों के द्वारा शान्ति स्थापित की जा सकती है। विश्व में शान्ति-स्थापना के अनेक तरीके हैं जिन्हें निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है –

1. एक दुसरे की क्षेत्रीय अखण्डता बनाए रखना:
विश्व में शान्ति स्थापित करने का सबसे पहला सिद्धान्त है कि विश्व के प्रत्येक राष्ट्र-राज्य का कर्तव्य हो कि वह जिस प्रकार अपनी अखण्डता व प्रभुसत्ता को आवश्यक समझता है उसी प्रकार दूसरे राष्ट्रों की अखण्डता व प्रभुसत्ता को उस राज्य के लिए आवश्यक समझे। हर राष्ट्र का अपना एक अस्तित्व होता है जिसे दूसरे राष्ट्रों द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। इस शर्त की पूर्ति शान्ति स्थापनों के लिए अति आवश्यक है। किसी भी राज्य को दूसरे राज्य के विरुद्ध अपनी शक्ति का दुरुपयोग या उसको अनावश्यक लाभ नहीं उठाना चाहिए।

2. अन्य देश पर आक्रमण न करना:
एक-दूसरे देश के प्रति अखण्डता व प्रभुसत्ता के प्रति पारस्परिक सम्मान तभी सम्भव है जब एक राष्ट्र-राज्य स्वयं जीवित रहने के साथ-साथ दूसरे राष्ट्रों को भी जीवित रहने व विकसित होने का अवसर प्रदान करे। किसी भी राज्य को यह अधिकार कतई नहीं दिया जा सकता कि वह स्वयं क्षेत्रीय सीमा का विस्तार करने के लिए दूसरे राज्यों पर आक्रमण करे अथवा जोर-जबर्दस्ती द्वारा उस राज्य की भूमि को हथिया ले। एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करके अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेना एक सभ्य देश की निशानी नहीं है। ऐसा व्यवहार पूरे विश्व के शान्तिपूर्ण माहौल में बाधा पहुँचाता है। राज्यों के मध्य मतभेद अवश्य होते हैं परन्तु ऐसे मतभेदों का शान्तिपूर्ण तरीकों से ही निपटारा करना चाहिए, हिंसात्मक रूप से नहीं। यही सभ्य समाज व राज्य की मुख्य निशानी है।

3. एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना:
शान्ति स्थापना के लिए स्वतन्त्र राष्ट्रों का उत्तरदायित्व न केवल अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध आक्रमण करने से है परन्तु उनका यह भी दायित्व है कि वे अन्य राष्ट्र-राज्यों के आन्तरिक गतिविधियों में बिल्कुल भी दखल न दें। निर्बल राष्ट्रों की भी अपनी प्रभुसत्ता व अखण्डता होती है और अन्य राष्ट्रों का यह दायित्व बन जाता है कि वे उन्हें सम्मानित करें। प्रायः यह देखा गया है कि अपने-अपने गुटों की शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से बड़े शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर और निर्बल राष्ट्रों को आर्थिक सहायता देकर उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं। वियतनाम, कोरिया आदि देशों को शक्तिशाली देशों ने आर्थिक सहायता देकर आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है। इस कारण से न केवल अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व्यवस्था को खतरा उत्पन्न होता है अपितु साम्राज्यवाद के फैसले को भी बल मिलता है। इसी कारण राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में अन्य राष्ट्र हस्तक्षेप न करे।

4. समानता तथा पारस्परिक लाभ:
जब तक राष्ट्र, चाहे वह दुर्बल हो अथवा सबल, जब वह दूसरे राज्यों पर आक्रमण नहीं करता है और हर प्रकार के मतभेदों को, अन्तिम रूप से शान्तिपूर्ण तरीकों से सुलझाने का प्रयत्न करता है तो इसका तात्पर्य है कि वह सब राष्ट्रों को समान समझता है। इस व्यवहार से अन्य सभी राष्ट्रों के मध्य समानता का वातावरण उत्पन्न होता है और सभी एक-दूसरे को सहयोग देकर विकास करने का अवसर मिलता है।

5. शान्तिमय सह-अस्तित्व:
सह-अस्तित्व के होने की सम्भावना केवल शान्तिपूर्ण वातावरण पर निर्भर है। अनेक राजनीतिक दार्शनिकों का मानना है कि शान्ति और व्यवस्था स्थापित करने के लिए युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए परन्तु यह वक्तव्य केवल सभी राष्ट्रों को हथियारों के निर्माण व होड़ करने के लिए प्रेरित करेगा। ऐसी स्थिति में शान्ति तो होगी परन्तु इस शान्ति का आधार भय और शंका होगा, एक-दूसरे राज्य के प्रति विश्वास और मैत्री का नहीं। ऐसी स्थिति में सभी राष्ट्र अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाएँगे।

ऐसा करने से ऊपरी तौर से शान्ति तो होगी परन्तु भीतर-ही-भीतर विश्व में तनाव की स्थिति होगी जो किसी भी समय विस्फोटक रूप धारण कर सकती है। मनुष्य युग-युगांतर तक अनेक युद्धों को देख चुका है। अब युद्ध का स्वरूप इतना भयानक हो चुका है कि झेलने, की हिम्मत व सामर्थ्य सभी में नहीं है। इसलिए आज सभी राष्ट्र निःशस्त्रीकरण (disarmament) चाहते हैं। यही नीति उत्तम है। इसी राह पर चलकर हम अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को स्थापित कर सकेंगे जो सह-अस्तित्व व विकास के लिए अतिआवश्यक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मूवमेंट फॉर सखाइवल ऑफ ओगोनी पीपल (ओगोनी लोगों के अस्तित्व के लिए आन्दोलन) 1990 नामक आन्दोलन किसने चलाया?
(क) नेल्सन मंडेला
(ख) आँग-सान सू की
(ग) केन सारो वीवा
(घ) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(ग) केन सारो वीवा

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प्रश्न 2.
2005 का गाँधी शान्ति पुरस्कार दिया गया –
(क) रोबर्ट मुंगावे
(ख) आर्चविशप डेसमंड टूटू
(ग) फिडेल
(घ) नेलसन मंडेला
उत्तर:
(ख) आर्चविशप डेसमंड टूटू

प्रश्न 3.
शीत युद्ध का प्रारंभ कब हुआ –
(क) 1945
(ख) 1960
(ग) 1978
(घ) 1980
उत्तर:
(क) 1945

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

Bihar Board Class 11 Sociology संस्कृति तथा समाजीकरण Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  • संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों के अंतर्गत अंधविश्वास, वैज्ञानिक तथ्य, मिथक, कला तथा धर्म शामिल हैं।
  • विचार संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों की ओर संकेत करते हैं। इसके अन्तर्गत विश्वासों तथा ज्ञान को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 2.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयाम का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत अपेक्षाओं, नियमों तथा प्रतिमानात्मक पद्धतियों को सम्मिलित किया जाता है।
  • संस्कृति के प्रतिमानित आयामों के द्वारा व्यक्तियों की अंत:क्रिया की पुनरावृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता है।
  • प्रतिमानों को जनरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है तथा इनके द्वारा व्यवहार को निर्देशित किया जाता है।

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प्रश्न 3.
संस्कृति के भौतिक आयाम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत कुछ वस्तुएँ जैसे कि कपड़ा, आवास, उपकरण, आभूषण, रेडियो तथा संगीत के वाद्य-यंत्र आदि आते हैं।
  • भौतिक संस्कृति में उन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है जो भौतिक वस्तुएँ हैं तथा जिनका समाज के सदस्यों द्वारा उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 4.
सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा सांस्कृतिक विलंबना से आप समझते हैं?
उत्तर:
सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा संस्कृतिक विलंबना की अवधारणा का विवरण प्रसिद्ध समाजशास्त्री आगबर्न द्वारा किया गया है। आगबर्न के अनुसार भौतिक संस्कृति जैसे तकनीकी इत्यादि का विकास तथा परिवर्तन तेजी से होता है। दूसरी तरफ, अभौतिक संस्कृति चिंतन के प्रतिमानित तरीकों, भावनाओं तथा प्रतिक्रियाओं, प्रमुख रूप से प्रतीकों द्वारा अर्जित तथा हस्तांतरित, मानव व समूह द्वारा विशिष्ट उपलब्धियों के निर्माण करने वाले तथा व्यक्ति के कौशल का साकार स्वरूप है। संस्कृति के आवश्यक तत्वों में जिसमें परंपरागत जैसे ऐतिहासिक परिणाम तथा श्रेष्ठताएँ एवं विचार मुख्य हैं, उसमें विशेष रूप से उससे जुड़े हुए मूल्यों से निर्मित होती है।

संस्कृति के तीन आयाम बताए गए हैं –

  • संज्ञात्मक आयाम
  • प्रतिमानात्मक आयाम तथा
  • भौतिक आयाम

आगबर्न ने अनुसार संस्कृति के दोनों पहलू अर्थात् भौतिक तथा अभौतिक व्यक्तित्व के निर्माण पर प्रभाव डालती हैं। आगबर्न द्वारा सांस्कृतिक पिछड़ेपन अथवा विलंबना की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।

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प्रश्न 5.
प्रौद्योगिकी क्या है?
अथवा
प्रौद्योगिकी से आप क्या समझते हैं? वे अलग-अलग समाजों में भिन्न-भिन्न क्यों होती है?
उत्तर:
प्रौद्योगिकी का तात्पर्य तकनीकी मानदंडों अथवा तकनीक से होता है। वैचारिक तर्ज पर प्रौद्योगिकी समाज की संस्कृति का समन्वित भाग होती है। प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी मानदंड अलग-अलग समाजों में पृथक्-पृथक पाए जाते हैं। समाजों में विभेदीकरण उनके द्वारा प्राप्त की गई प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है।

प्रश्न 6.
सामाजिक विज्ञान में संस्कृति की समझ, दैनिक प्रयोग के शब्द “संस्कृति” से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
जिस प्रकार सामाजिक विज्ञान में हमें किसी स्थान का पता लगाने के लिए मानचित्र की आवश्यकता होती है उसी प्रकार समाज में व्यवहार करने के लिए हमें संस्कृति की आवश्यकता पड़ती है। संस्कृति एक सामान्य समझ है जिसे समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से सीखा तथा विकसित किया जाता है।

प्रश्न 7.
संस्कृति शब्द की उत्पत्ति तथा अर्थ बताइए।
उत्तर:
संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा में ‘कोलरे’ शब्द से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘जमीन जोतना’ अथवा ‘खेती करना’ है। यंग तथा मैक के अनुसार, “संस्कृति सीखा हुआ तथा भागीदारी का व्यवहार है।” संस्कृति किसी एक व्यक्ति का विशेष व्यवहार नहीं होता है। संस्कृति वह व्यवहार है जिसे व्यक्ति सामाजिक अन्त:क्रिया के माध्यम से समूह में सहभागिता के कारण प्राप्त करता है।

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प्रश्न 8.
संस्कृति के मुख्य तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
संस्कृति के मुख्य तत्त्व हैं –

  • व्यक्तियों द्वारा समाज के सदस्य के रूप में ग्रहण की गई आदतें तथा अक्षमताएँ।
  • भाषा तथा उपकरण बनाने की विधियाँ।
  • ज्ञान, विश्वास, प्रथा, कला, कानून तथा नैतिकता।

रौबर्ट बियरस्टेड ने अपनी पुस्तक ‘The Social Order’ में संस्कृति के तीन तत्व बताए हैं –

  • विचार
  • प्रतिमान
  • पदार्थ

प्रश्न 9.
संस्कृति के तीन मुख्य आयाम बताइए।
उत्तर:
संस्कृति के तीन मुख्य आयाम निम्नलिखित हैं –

  1. संज्ञानात्मक आयाम – संज्ञान अथवा ज्ञान की प्रक्रिया में सभी व्यक्ति अपनी भागीदारी करते हैं। इसमें धर्म, अंधविश्वास, वैज्ञानिक तथ्य, कलाएँ तथा मिथक शामिल किए जाते हैं।
  2. प्रतिमानात्मक आयाम – समाजशास्त्र के प्रतिमानात्मक आयामों के अन्तर्गत सोचने के बजाए कार्य करने के तरीकों को उल्लेख किया जाता है । इसके अन्तर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा प्रतिमानात्मक पद्धतियों को सम्मिलित किया जाता है।
  3. भौतिक आयाम – संस्कृत के भौतिक आयामों के अंतर्गत आवास, औजार, कपड़ा, आभूषण तथा संगीत के उपकरण आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

प्रश्न 10.
संस्कृति के दो प्रमुख भाग कौन-से हैं?
उत्तर:
संस्कृति के दो प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं –

  1. भौतिक संस्कृति – इसके अंतर्गत मूर्त, पार्थिक तथा पदार्थगत संस्कृति को सम्मिलित किया जाता है। संस्कृति का यह पक्ष मनुष्यों द्वारा निर्मित वस्तुगत पदर्थगत होता है। प्रौद्योगिकी, कला, उपकरण तथा वस्त्र आदि इसमें सम्मिलित किए जाते हैं।
  2. अभौतिक संस्कृति – इसे अंतर्गत विचार, ज्ञान, कला, परंपरा तथा विश्वास को सम्मिलित किया जाता है। यह अमूर्त तथा अपदार्थगत पक्ष है।

प्रश्न 11.
संस्कृति की अवधारणा के मुख्य चिंतकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति की अवधारणा की व्याख्या करने वाले चिंताकों निम्नलिखित दो श्रेणियों में बाँटा गया है :

(i) मानवशास्त्री व्याख्या के अनुसार संस्कृति के अध्ययन के माध्यम से व्यक्ति तथा उसमें विभिन्न व्यवहारों को समझा जा सकता है। मानवशास्त्रियों द्वारा संस्कृति की अवधारणा तथा आदिम समुदायों के संदर्भ में संस्कृति के विभिन्न प्रतिरूपों का अध्ययन किया गया है। प्रमुख मानवशास्त्री-चिंतक हैं –

  • टालयर
  • आर. बेनडिक्स
  • लिंटन
  • मैलिनोवस्की
  • क्रोबर

(ii) कुछ समाजशास्त्रियों के द्वारा संस्कृति को समाज के एक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। तथा इन चिंतकों के अनुसार समाज एक व्यापक अवधारणा है तथा जिसका संबंध व्यक्ति तथा समूह के अंतर्संबंध से है। संस्कृति का तात्पर्य प्रतिमानात्मक व्यवस्था, मूल्यों तथा व्यवहारों से है।

इस विचारधारा के चिंतक प्रमुख समाजशास्त्री हैं –

  • समनर
  • दुर्खाइम
  • मैक्स वैबर
  • सोरोकिन
  • पारसंस

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प्रश्न 12.
संस्कृति के चार प्रमुख लक्षण बताइए।
उत्तर:
संस्कृति के चार प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –

  • संस्कृति अर्जित व्यवहार है जिसे सीखा जाता है।
  • संस्कृति परिवर्तनशील, गतिशील तथा सापेक्षिक है।
  • संस्कृति संरचित होती है, इसका निर्माण चिंतन के प्रतिमानों, अनुभवों तथा व्यवहारों से होता है।
  • संस्कृति को विभिन्न पहलुओं में विभाजित किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘स्व’ व्यक्तित्व का केन्द्र है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति अपने बचपन से ही भूमिका की संरचना को सीखता तथा आत्मसात करता है। व्यक्ति के ‘स्व’ का विकास इसी प्रकार होता है। कूले, फ्रायड, मीड तथा पारसंस जैसे विद्वानों का मत है कि ‘स्व’ का विकास व्यक्ति की ग्रहणशीलता तथा समूह द्वारा शिशु के अपने प्रतिमानों के अनुरूप ढालने के प्रयत्नों का मिला-जुला स्वरूप है। ‘स्व’ का अर्थ मैं तथा मुझसे से है लेकिन ‘स्व’ की अवधारणा का विकास बच्चे के मन में स्वाभाविक वृद्धि की प्रक्रिया के कारण नहीं होता है।

वस्तुतः ‘स्व’ की अवधारणा दूसरे व्यक्तियों से संपर्क के कारण ही विभाजित होती है। ‘स्व’ के विकास में भाषा का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है तथा भाषा समाज की देन होती है। सी. एच. कुले का मत है कि ‘स्व’ एक सामाजिक सत्य है जिसका विकास प्राथमिक समूह तथा सामाजिक अंत:क्रिया की भूमिका के कारण होता है।

प्रश्न 2.
‘समाजीकरण के साथ सीखने की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से संबद्ध है।’ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सीखने की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति कुछ बातों को स्वयं सीख जाता है। उदाहरण के लिए, माता के स्तन से दुग्धपान करना, चलना तथा परिवार में माता-पिता तथा अन्य सदस्यों को पहचानना। सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है तथा व्यक्ति की समझ तथा ज्ञान में लगातार विकास होता रहता है। इस प्रकार, समाजीकरण सीखने की ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्यक्ति सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप वांछित व्यवहारों को सीख जाता है।

सीखने की उत्प्रेरक दशाएँ जिसके कारण बच्चा सीखता है –

  • व्यक्ति की स्वयं की आवश्यकताएँ
  • नई बातों के प्रति उत्सुकता तथा सीखने की प्रवृत्ति
  • पुरस्कार तथा दंड
  • नई परिस्थितियों में समायोजन

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 3.
समाजीकरण के विभिन्न स्तर बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री गिडिंग्स ने समाजीकरण के दो स्तर बताए हैं –

  • प्राथमिक समाजीकरण तथा
  • द्वितीयक समाजीकरण

1. प्राथमिक समाजीकरण शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था में होता है। यह समाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक बिन्दु है क्योंकि बच्चा मूलभूत व्यवहार प्रतिमान इसी स्तर पर सीखता है। प्राथमिक समाजीकरण के तीन उप स्तर हैं –

  • मौखिक अवस्था
  • शैशवावस्था तथा
  • किशोरावस्था।

परिवार प्राथमिक समाजीकरण का सशक्त माध्यम है।

2. द्वितीयक समाजीकरण के अंतर्गत व्यक्ति व्यवसाय तथा जीविका के साधनों की खोज में प्राथमिक समूहों के अलावा अन्य समूहों से अपने मूल्यों, प्रतिमानों, आदर्शों, व्यवहारों तथा सांस्कृतिक मानदंडों को ग्रहण करता है। समाजशास्त्री ऐसे समूहों को संदर्भ समूह कहते हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री रॉबर्ट के. मर्टन इस सामाजिक प्रघटना को सदस्यता समूह के स्थान पर असदस्यता समूह की ओर अभिमुखता कहते हैं।

प्रश्न 4.
“व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा निर्णायक होती है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति के समाजीकरण में परिवार की भूमिका –

  • परिवार व्यक्ति के समाजीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा निर्णायक भूमिका निभाता है। परिवार समाज की मूलभूत तथा प्राथमिक इकाई है जो समाज का पूर्ण तथा समेकित प्रतिनिधित्व करती है।
  • बच्चा परिवार में विभिन्न भूमिकाओं तथा प्रतिस्थतियों से अपना तादात्म्य स्थापित करता है।
  • बच्चा शैशवावस्था से तीन वर्ष की अवस्था तक परिवार तक ही सीमित रहता है।

परिवार मे ही वह भाषा, चलना, बोलना तथा परिवार के सदस्यों के बारे में जानता है। यह समाजीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण है। किंबाल यंग के अनुसार, “समाज के अंतर्गत समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सबसे महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता एवं पिता ही साधारणतया अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं।” किंबाल यंग ने आगे कहा है कि, “परिवार की स्थिति के अंतर्गत मौलिक अंत:क्रियात्मक साँचा बच्चे तथा माता का है।”

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प्रश्न 5.
फ्रायड द्वारा व्यक्तित्व की किन तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं का वर्णन किया गया है?
उत्तर:
सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व के निर्माण की तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं का उल्लेख किया है –

  1. इड
  2. अहं तथा
  3. पराअहं

इड में व्यक्ति की सभी अनुवांशिक तथा मूल प्रवृत्तियों का मनोवैज्ञानिक पहलू सम्मिलित होता है। इड सुख के सिद्धांत पर आधारित होता है। अहं वास्तविकता के सिद्धांत पर आधारित होता है। अहं व्यक्ति की क्रिया को निर्देशित करता है। पराअहं व्यक्तित्व के विकास की तीसरी अवस्था है। पराअहं व्यक्तित्व का नैतिक पहलू है तथा यह आदर्श के सिद्धांत से निर्देशित होता है। इसके द्वारा समाज के आदर्श प्रतिमानों तथा मूल्यों का प्रतिनिधित्व किया जाता है।

प्रश्न 6.
अनुकरण पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अनुकरण का अर्थ – अनुकरण सीखने की एक प्रक्रिया है। बच्चों द्वारा दूसरों के व्यवहार का अनुकरण उस स्थिति में किया जाता है, जब उन्हें पुरस्कार मिलता है। कुछ विद्वानों को मत है कि चेतनावस्था अथवा अचेतनावस्था में किए जाने वाले समस्त कार्य अनुकरण के अंतर्गत आते हैं। अनुकरण की परिभाषा-थाउलस के अनुसार, “अनुकरण एक प्रतिक्रिया है जिसके लिए उत्तेजक दूसरे को उसी प्रकार की प्रतिक्रिया का ज्ञान है।”

मैक्डूगल के अनुसार, “अनुकरण केवल एक मनुष्य द्वारा उन क्रियाओं, जो दूसरे के शरीर संबंधी व्यवहार से संबंधित हैं, की नकल करने पर लागू होता है।” मीड के अनुसार, “अनुकरण दूसरों के व्यवहारों या कार्यों को जान-बूझकर अपनाने को कहते हैं।”

अनुकरण का वर्गीकरण-गिंसबर्ग के अनुकरण को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया है –

  • प्राणिशास्त्रीय अनुकरण
  • भाव-चालक अनुकरण तथा
  • विवेकशील अथवा सप्रयोजन अनुकरण।

प्रश्न 7.
अभौतिक संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अभौतिक संस्कृति से तात्पर्य है –

  • अभौतिक संस्कृति का स्वरूप आंतरिक तथा अमूर्त होता है।
  • अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत संज्ञानात्मक प्रतिमान आयामों तथा व्यक्तियों द्वारा रचित अमूर्त वस्तुओं को शामिल किया जाता है।
  • अभौतिक संस्कृति में विचार, भावनाएँ, ज्ञान, कला, प्रथा, विश्वास तथा कानून आदि को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में, विचारों तथा भावनाओं के स्तर पर संस्कृति अमूर्त होती है।
  • व्यक्ति द्वारा समाज के सदस्य के रूप में सीखे तथा विकसित किए गए प्रतीक तथा संचार माध्यम भी संस्कृति में सम्मिलित किए जाते हैं।

भाषा, वर्णमाला, धार्मिक चिह्न जैसे चाँद, सूरज, क्रास तथा स्वास्तिक आदि ऐसे प्रतीक चिह्न जिनके पीछे एक अर्थ छिपा होता है। इस प्रकार संस्कृति को उसके अर्थ के रूप में ही समझा जा सकता है।

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प्रश्न 8.
भौतिक संस्कृति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भौतिक संस्कृति का तात्पर्य इस प्रकार है –

  1. समाज के सदस्यों के रूप में व्यक्ति जिन वस्तुओं पर अधिकार रखता है वह भौतिक संस्कृति कहलाती है।
  2. भौतिक संस्कृति मानव-निर्मित, वस्तुपरक तथा मूर्त होती है।
  3. कुछ विद्वानों ने संस्कृति के पदार्थगत तथा भौतिक पक्ष पर अधिक बल दिया है।
  4. आदिम समय से लेकर वर्तमान समय तक व्यक्तियों द्वारा निर्मित उपकरण, गृह निर्माण की पद्धति, वस्त्र, संचार तथा यातायात के साधन, आभूषण आदि भौतिक वस्तुएँ हैं । इन भौतिक वस्तुओं को समाज के सदस्य ग्रहण करते हैं तथा उनका उपयोग करते हैं।
  5. इस प्रकार व्यक्तियों द्वारा उचित मूर्त वस्तुओं को भौतिक संस्कृति कहा जाता है। पदार्थ चूँकि अत्यधिक स्पष्ट होता है इसलिए संस्कृति को समझने का सरल स्वरूप है।
  6. जब किसी पुरातत्त्वशास्त्री द्वारा किसी प्राचीन नगर अथवा स्थान की खुदाई की जाती है तो उसे अनेक प्रकार के टेराकोटा, शिल्पकृतियाँ, रंगदार भूरे बर्तन तथा सिक्के इत्यादि मिलते हैं।
  7. वास्तव में ये सभी वस्तुएँ प्राचीन भौतिक संस्कृति के अवशेष कहे जाते हैं। इन वस्तुओं को ‘सांस्कृतिक पदार्थ’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 9.
संस्कृति को समाज से किस प्रकार भिन्न किया जा सकता है?
उत्तर:
संस्कृति तथा समाज दो पृथक् – पृथक् अवधारणाएँ हो सकती हैं, लेकिन उनके बीच पाए जाने वाला संबंध इस अवधारणात्मक पर्दे को खत्म कर देता है। अध्ययन की सुविधा के लिए संस्कृति तथा समाज के संबंधों का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के तहत किया जा सकता है –

  1. समाज तथा संस्कृति दोनों ही व्यक्तियों के बीच पारस्परिक अंत:क्रिया का परिणाम है।
  2. मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।” हॉबेल के अनुसार, “सांस्कृतिक मनुष्य मस्तिष्क में उत्पन्न हुई है।”
  3. संस्कृति तथा समाज एक – दूसरे के पूरक हैं। कोई भी समाज संस्कृति के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता है, ठीक इसी प्रकार संस्कृति भी समाज के बिना सार्थक नहीं हो सकती है।
  4. समाज संस्कृति के हस्तांतरण, गतिशीलता, परिवर्तन, विकास तथा सामंजस्य के लिए सामाजिक वातावरण प्रस्तुत करता है।
  5. दूसरी तरफ, संस्कृति के विकास के बिना सामाजिक परिवेश शून्य हो जाता है।
  6. संस्कृति समाजीकरण की प्रक्रिया का मुख्य तत्व है। जन्म के समय बालक का स्वरूप प्राणिशास्त्रीय होता है।
  7. संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमान ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
  8. संस्कृति सीखे हुए प्रतिमानों का कुल योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुण का नतीजा नहीं है।
  9. संस्कृति वस्तुतः सामाजिक व्यवस्था का आधार होती है लेकिन समाज की अनुपस्थिति में सांस्कृतिक विकास सामाजिक निर्वात में नहीं हो सकता।
  10. इस प्रकार समाज तथा संस्कृति एक-दूसरे के पूरक होने के साथ अपरिहार्य भी हैं। एक की अनुपस्थिति में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है।

प्रश्न 10.
“क्या संस्कृति उच्च और निम्न हो सकती है?” समझाइए।
उत्तर:
समाजशास्त्री रूप से जैसा कि हरस्कोविट्स का मत है, “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है।” प्रत्येक व्यक्ति समाज में रहकर व्यवहार के प्रतिमानों को सीखता रहता है। सीखने की यह प्रक्रिया सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से शिशुकाल से ही शुरू हो जाती है। प्रत्येक समाज की संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमान भिन्न होते हैं जो उसे दूसरे समाज से पृथक करते हैं। संस्कृति एक व्यापक तथा विस्तृत अवधारणा है जैसा कि टायलर ने लिखा है कि संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है “जिसके अन्तर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा एवं सभी प्रकार की क्षमताएँ तथा आदतें, जो मनुष्य समाज के सदस्यों के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

टायलर की परिभाषा से स्पष्ट है कि प्रत्येक संस्कृति ज्ञान, विज्ञान, कला, विश्वास तथा क्षमताओं आदि के आधार पर पृथक् होती है। इस प्रकार संस्कृति की भिन्नता ही अलग-अलग सांस्कृतिक क्षेत्र बना देती है। संस्कृतियों की उपलब्धियाँ भौतिक तथा अभौतिक सांस्कृतिक क्षेत्रों में उनकी प्रगति से आंकी जाती है। कुछ संस्कृतियों का भौतिक पक्ष अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील हो सकता है। विभिन्न संस्कृतियों के बीच परस्पर आदान-प्रदान सदैव चलता रहता है। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के प्रतिमानों को ग्रहण करती है लेकिन कोई भी संस्कृति अपने मूल्यों का पूर्ण लुप्तिकरण

नहीं चाहती है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान पश्चिमी संस्कृति को भारतीय संस्कृति पर थोपने का प्रयास किया गया, लेकिन इसका विरोध किया गया। इस प्रकार, साधारणतया एक संस्कृति दूसरी संस्कृति के भौतिक पक्ष को तो ग्रहण कर लेती है, लेकिन अभौतिक पक्ष के संदर्भ में ऐसा नहीं होता है । संस्कृति की संरचना चिंतन के प्रतिमानों, अनुभवों तथा व्यवहारों के माध्यम से होती है। चूँकि इन सभी तत्वों में भिन्नता पायी जाती है अतः विभिन्न संस्कृतियों में भिन्नतां स्वाभाविक है।

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प्रश्न 11.
सांस्कृतिक विलंबन की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक विलम्बन की अवधारणा-प्रसिद्ध समाजशास्त्री विलियम एफ ऑगबर्न द्वारा सांस्कृतिक विलंबन की अवधारणा का विकास किया गया है। समाज का आकार छोटा होने पर परिवर्तन की गति धीमी होती है तथा समाज में एकता पायी जाती है। ऐसी स्थिति में समाज में सामाजिक संतुलन पाया जाता है। दूसरी तरफ समाज में परिवर्तन की गति तीव्र होने पर सांस्कृतिक विलंबन तथा प्रतिमानहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऑगबन का मत है कि समय के संदर्भ में संस्कृति में सदैव परिवर्तन जारी रहता है। जैसा कि हम जानते हैं कि संस्कृति के दो पक्ष होते हैं –

  • भौतिक पक्ष तथा
  • अभौतिक पक्ष।

संस्कृति के भौतिक पक्षों अर्थात् उत्पादन, तकनीक, उपकरण तथा यातायात एवं संचार के साधनों में तेजी से परिवर्तन होता है। जबकि, संस्कृति के अभौतिक पक्षों अर्थात् जनरीतियों, प्रथाओं, विचारों तथा विश्वासों आदि में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत बहुत धीमी होती है।

संस्कृति के दोनों पक्षों अर्थात् भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तन यदि साथ-साथ नहीं हो रहे हैं अथवा संस्कृति के जिस पक्ष में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत धीमी है, तो तनाव तथा दबाव उत्पन्न होता है। इसके फलस्वरूप सांस्कृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।

संस्कृति के दोनों पक्षों के एकीकरण तथा पुनः सामंजस्य के स्तर तक पहुँचने में समय लगता है। ऑगबन ने इस स्थिति को सांस्कृतिक विलंबन का नाम दिया है। सांस्कृतिक विलंबन की स्थिति को एक उदाहरण से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। ब्रिटिश शासन के दौरान अनेक भारतीयों ने अंग्रेजी शिक्षा तथा वेशभूषा को तो स्वीकार किया, लेकिन वे अपनी सामाजिक प्रथाओं तथा जाति व्यवस्था से पृथक् नहीं हो सके । कभी-कभी ऐसा भी होताा है कि तीव्र गति से परिवर्तन होने की स्थिति में पुराने सांस्कृतिक प्रतिमान तो प्रभावहीन हो जाते हैं, लेकिन उनके स्थान पर नए सामाजिक प्रतिमान विकसित नहीं हो पाते हैं। ऐसी स्थिति में प्रतिमानहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रश्न 12.
हम कैसे दर्शा सकते हैं कि संस्कृति के विभिन्न आयाम मिलकर समग्र बनाते हैं?
उत्तर:
संस्कृति के तीन आयाम प्रचलित हैं –

  1. संज्ञानात्मक – इसका संदर्भ हमारे द्वारा देखे या सुने गए को व्यवहार में लाकर उसे अर्थ प्रदान करने की प्रक्रिया से है। जैसे अपने मोबाइल फोन की घंटी को पहचानना किसी नेता के कार्टून की पहचान करना।
  2. मानकीय – इसका संबंध आचरण के नियमों से है। जैसे अन्य व्यक्तियों के पत्रों को न खोलना, निधन पर कर्मकांडों का निष्पादन।
  3. भौतिक – इसमें भौतिक साधनों के प्रयोग से संभव कोई भी क्रियाकलाप शामिल है। भौतिक पदार्थों में उपकरण या यंत्र भी शामिल हैं। जैसे इंटरनेट चेटिंग, जमीन पर अल्पना बनाने के लिए चावल के आटे का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न 13.
संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रतिमानात्मक आयामों का अर्थ –

  1. संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।
  2. प्रतिमानात्मक आयाम संस्कृति के दूसरे बड़े तत्त्व के रूप में जाने जाते हैं।
  3. संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों द्वारा व्यक्तियों के बीच अंत:क्रिया की पुनरावृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाता है। पूर्वानुमानों का इसमें आलोचनात्मक महत्त्व होता है।
  4. प्रतिमानों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है। प्रतिमान जनरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किए जा सकते हैं।
  5. प्रतिमान की अवधारणा के अंतर्गत चिंतन के बजाए कार्य करने के तरीकों को अधिक महत्त्व प्रदान किया जाता है।
  6. आचरण में प्रतिमानों की उपस्थिति निहित होती है जबकि व्यवहार, आवेग अथवा प्रत्युत्तर हो सकता है।
  7. व्यक्ति के आचरण को मान्यता समाज द्वारा निर्धारित प्रतिमानों से ही प्राप्त होती है।
  8. प्रतिमान सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं। इस प्रकार प्रतिमान तथा मूल्य संस्कृति को समझने हेतु एक केन्द्रीय अवधारणा है।

प्रश्न 14.
समाजीकरण क्या है?
उत्तर:
समाजीकरण का अर्थ – व्यक्तियों द्वारा सामाजिक संपर्कों के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को ही समाजीकरण कहा जाता है। समाजीकरण की प्रक्रिया से ही प्राणी सामाजिक प्राणी बनता है।

समाजीकरण की परिभाषा – रोज तथा ग्लेजर के अनुसार, “समाजीकरण समाज तथा संस्कृति के विश्वासों, मूल्यों तथा प्रतिमानों एवं सामाजिक भूमिकाओं को सीखने की प्रक्रिया है।” गुडे के अनुसार, “समाजीकरण के अंतर्गत वे समस्त प्रक्रियाएँ आती हैं जिनसे कोई बचपन से वृद्धावस्था तक अपने सामाजिक कौशल, भूमिका, प्रतिमान, मूल्य तथा व्यक्तित्व के प्रति रूप ग्रहण करता है।”

ऑगबर्न के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिससे कि व्यक्ति समूह के आदर्श नियमों के अनुसार व्यवहार करना सीखता है।” एच. टी. मजूमदार के अनुसार, “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मूल प्रकृति मानव प्रकृति में बदल जाती है तथा पुरुष व्यक्ति बन जाता है।” जॉनसन के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रकार का सीखना है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने के योग्य बनाता है।” उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि समाजीकरण मानवीय शिशु के जैविकीय प्राणी रूप से सामाजिक मनुष्य में रूपांतरण है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका-परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। परिवार समाज का दर्पण है। इसके अंतर्गत समाज में पाए जाने वाले सभी आदर्श, मूल्य, प्रस्थितियाँ, व्यवहार प्रतिमान तथा भूमिकाएँ पायी जाती हैं। यही कारण है कि परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया का सशक्त तथा प्राथमिक माध्यम है।

समाजीकरण सीखने की प्रक्रिया है तथा इसके जरिए समाज की विशेषताओं तथा तत्त्वों को ग्रहण किया जाता है। मेकाइवर के अनुसार, “समाजीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सामाजिक प्राणी एक-दूसरे के साथ अपने व्यापक तथा घनिष्ठ संबंध स्थापित करते हैं जिसमें वे एक-दूसरे से अधिकाधिक बँध जाते हैं तथा एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों की भावना का विकास करते हैं, जिसमें वे अपने एवं दूसरों के व्यक्तित्व को अधिक अच्छी तरह समझने लगते हैं तथा जिसमें वे निकट एवं अधिक साहचर्य की जटिल संरचना का निर्माण करते हैं।”

परिवार समाजीकरण के सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में परिवार समाज का प्राथमिक समूह है। परिवार के सभी सदस्यों की अपनी-अपनी प्रस्थितियाँ तथा भूमिकाएँ होती हैं। उदाहरण के लिए, माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह निर्धारित मापदंडों के अनुरूप करते हैं। बच्चा परिवार के आदर्शों, मूल्यों तथा प्रतिमानों को आत्मसात् करता है तथा उनके साथ अपना तादात्म्य कायम करता है। इस प्रकार परिवार बच्चे के समाजीकरण की प्रक्रिया की नर्सरी है, जहाँ से बच्चा समाजीकरण की प्रक्रिया से निकलकर समाज में अनुकूलन करना सीखत है।

जॉनसन के अनुसार, “परिवार विशेष रूप से इस प्रकार संगठित रहता है जो समाजीकरण को संभव बनाता है।” किंबाल यंग के अनुसार, “पारिवारिक स्थिति के अंतर्गत मौलिक अंत: क्रियात्मक साँचा बच्चे तथा माता का है।” किंबाल यंग ने आगे कहा है कि “समाज के अंतर्गत, समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सबसे महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता एवं पिता की साधारतया अत्यधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। अपने जन्म से लेकर तीन वर्ष तक बालक प्रायः परिवार से बाहर कोई संबंध नहीं रखता है। परिवार के सदस्यों के मूल्यों, प्रतिमानों तथा व्यवहारों आदि का बच्चे के समाजीकरण पर काफी अधिक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, जो माता-पिता परिवार में बच्चों को सशक्त सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार प्रदान करते हैं, उन परिवारों में समाजीकरण की प्रक्रिया निर्दोष। रूप से चलती रहती है।

दूसरी तरफ, जिन परिवारों में बच्चों को संतुलित सामाजिक तथा सांस्कृतिक आधार नहीं मिल पाता, वहाँ समाजीकरण की प्रक्रिया में बाधा पड़ जाती है। प्रत्येक परिवार अपने बच्चों को समाज के मूल्यों तथा प्रतिमानों के अनुरूप ढालने का प्रयास करता है।

किंबल यंग – के अनुसार सांस्कृतिक अनुकूलन परिवार में ही होता है। किंबाल यंग ने इस बारे में लिखा है कि “यह इस प्रकार से माना गया है जिसमें परिवार के सदस्य और विशेष रूप से माता पिता एक दिए हुए समाज के मौलिक सांस्कृतिक प्रतिमानों का परिचय बच्चे को देते हैं।

अंततः हम कह सकते हैं कि परिवार समाजीकरण की प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण तथा निर्णायक मा

प्रश्न 2.
संस्कृति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
संस्कृति का शाब्दिक अर्थ-संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘कोलरे’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है कृषि कार्य अथवा जमीन जोतना।

(i) संस्कृति का सामान्य अर्थ – मनुष्यों की समस्त कृतियाँ तथा सीखे हुए व्यवहार संस्कृति के अंतर्गत सम्मिलित किए जाते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते रहते हैं। प्रत्येक समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति होती है जो उसे दूसरे समाजों से पृथक् कर देती है। कोई भी व्यवहार जिसे व्यक्ति समाज से प्राप्त करता है अथवा जो समूह में सहभागिता के कारण व्यक्ति की आदत का हिस्सा बना जाता है, उसे सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है। अतः संस्कृति व्यक्ति द्वारा सीखने अथवा विकसित होने की वह प्रक्रिया है जो सामाजिक अंत:क्रिया के साथ-साथ चलती है।

(ii) संस्कृति की परिभाषा – विभिन्न मानवशास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों तो ने संस्कृति की अवधारणा को अलग-अलग प्रकार से परिभाषित किया है यंग तथा मैक के अनुसार, “संस्कृति सीखा हुआ तथा भागीदारी का व्यवहार है।” हॉबेल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है।” हकोविट्स के अनुसार, “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है।” टायलर के अनुसार, “संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा सभी तरह की क्षमताएँ एवं आदतें जो वयक्ति समाज के एक सदस्य के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

राल्फ लिंटन के अनुसार, “संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है, यह विचारों तथा आदतों का संग्रह है, जिन्हें व्यक्ति सीखते हैं, भागीदारी करते हैं तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तांरित करते हैं।”

क्लाइड क्लूखोन – के अनुसार, “संस्कृति व्यक्तियों के समग्र जीवन का एक तरीका है।” संस्कृति की उपरोक्त परिभाषाओं से निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती है –

  • संस्कृति की उत्पत्ति व्यक्ति के मस्तिष्क से हुई है।
  • संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुणों का परिणाम नहीं है।
  • संस्कृति का हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को होता है।
  • संस्कृति मनुष्य की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।
  • संस्कृति गतिशील तथा परिवर्तनशील होती है।

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प्रश्न 3.
संस्कृति की अवधारणा का उद्भव कैसे हुआ?
उत्तर:
(i) संस्कृति का अर्थ – संस्कृति के अंतर्गत व्यक्तियों की समस्त कृतियाँ तथा सीखे हुए व्यवहार को सम्मिलित किया जाता है। यंग तथा मैक के अनुसार, “संस्कृति सीखा हुआ और भागीदारी का व्यवहार है।” व्यवहार का तात्पर्य विचार, भावना तथा बाह्य क्रियाओं से है। जहाँ तक किसी भी व्यवहार का संस्कृति का हिस्सा बनने का सवाल है, यह भी होता है जबकि ज्यादातर समूह के सदस्यों की उसमें भागीदारी हो।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति का विशेष व्यवहार संस्कृति नहीं हो सकता है। वास्तव में, जिस व्यवहार को व्यक्ति समाज से प्राप्त करता है या जो समूह में सहभागिता के कारण व्यक्ति की आदत का हिस्सा बन जाता है, उसे सीखा हुआ व्यवहार कहा जाता है।

अत: कहा जा सकता है कि संस्कृति व्यक्ति द्वारा सीखने तथा विकसित करने की वह प्रक्रिया है जो सामाजिक अंत:क्रिया के साथ-साथ चलती है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री टायलर के अनुसार, “संस्कृति एक ऐसी जटिल संपूर्णता है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा समाज के एक सदस्य के रूप में मनुष्य द्वारा प्राप्त अन्य क्षमताएँ तथा आदतें शामिल की जाती हैं। हॉबेल ने भी कहा है कि “संस्कृति सीखे हुए व्यवहारों या प्रतिमानों का कुल योग है।”

हरस्कोविट्स के अनुसार, “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ “राग है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर संस्कृति के निम्नलिखित प्रमुख तत्व हैं –

  • व्यक्ति द्वारा समाज के सदस्य के रूप में धारण की गई आदतें तथा क्षमताएँ।
  • भाषा तथ उपकरण बनाने के तरीके।
  • विश्वास, ज्ञान, कला, नैतिकता, प्रथा तथा कानून।
  • सांस्कृतिक प्रतिमान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होते हैं।
  • संस्कृति सदैव गतिशील तथा परिवर्तनशील होती है।

(ii) संस्कृति का शाब्दिक अर्थ – संस्कृति शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के कोलरे शब्द से हुई है जिसका तात्पर्य कृषि कार्य करना अथवा जमीन जोतना है। 18वीं तथा 19वीं सदियों में संस्कृति शब्द व्यक्तियों के परिमार्जन के लिए प्रयोग होने लगा। इसी कारण राल्फ लिंटन ने कहा है कि “संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है। इसमें व्यक्ति विचारों तथा व्यवहारों को सीखता है, एक-दूसरे सधे ग्रहण करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तारित करता है।”

(iii) भौतिक तथा अभौतिक संस्कृति – भौतिक संस्कृति का स्वरूप मूर्त होता है। इसके अन्तर्गत उपकरण, प्रौद्योगिकी, उद्योग तथा यातायात एवं संचार को सम्मिलित किया जाता है अभौतिक संस्कृति का स्वरूप अमूर्त होता है। इसके अंतर्गत विश्वास, ज्ञान विचार, कला, प्रथा तथा कानून आदि सम्मिलित किए जाते हैं।

(iv) संस्कृति के प्रमुख आयाम – संस्कृति के निम्नलिखित तीन प्रमुख आयाम हैं –

  • संज्ञानात्मक आयाम-संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों के अंतर्गत अंधविश्वासों, वैज्ञानिक तथ्यों, धर्म तथा कलाओं को सम्मिलित किया जाता है।
  • प्रतिमानात्मक आयाम-संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा मानकीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।
  • भौतिक आयाम-संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत मौलिक दशाओं का उल्लेख किया जाता है। इसमें आवास, कपड़ा, उपकरण, आभूषण, यातायात तथा संचार के साधनों को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 4.
संस्कृति की विशेषताओं की सूची दीजिए।
उत्तर:
हरस्कोविट्स का मत है कि “संस्कृति मानव व्यवहार का सीखा हुआ भाग है।” सी.एस.कून ने कहा है कि “संस्कृति उन विधियों का कुल योग है, जिनमें मनुष्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सीखने के कारण रहता है।”

संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(i) संस्कृति व्यक्तियों की कृति है-संस्कृति का निर्माण, विकास तथा गति व्यक्तियों के बीच सांस्कृतिक अंत:क्रिया के जरिए होती है। होबेल के अनुसार, “संस्कृति व्यक्ति के मस्तिष्क में उत्पन्न हुई है।” व्यक्तियों में संस्कृति का निर्माण करने तथा उसे ग्रहण करने की क्षमता होती है। यही कारण है कि कोत तथा क्रोबर ने व्यक्ति को अतिप्राणी कहा है।

(ii) संस्कृति सीखा हुआ व्यवहार-संस्कृति को व्यक्तियों द्वारा सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग कहा जाता है । व्यक्ति सांस्कृतिक प्रतिमानों के विभिन्न स्वरूपों को समाज में रहकर ही सीखता है। हॉबेल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों को योग है जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो प्राणिशास्त्रीय पैतृक गुण का परिणाम नहीं है।”

(iii) संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है-संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण सतत् रूप से चलता रहता है । सी. एस. कून के अनुसार, “संस्कृति उन विधियों का कुल योग है, जिनमें व्यक्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सीखने के कारण रहता है।”

(iv) संस्कृति व्यक्तियों की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है-संस्कृति मनुष्य की सामाजिक तथा प्राणिशास्त्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। मेलिनवॉस्की ने मानव आवश्यकताओं को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बाँटा है

  • प्राथमिक अथवा मौलिक आवश्यकताएँ – भोजन तथा मैथुन आदि मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। ये मनुष्य के सामाजिक तथा प्राणिशास्त्रीय अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।
  • द्वितीयक आवश्यकताएँ – द्वितीयक आवश्यकताओं में उन सभी कार्यों तथा प्रविधियों को सम्मिलित किया जाता है जो मनुष्य के जीवन के सुगम संचालन हेतु आवश्यक हैं। तृतीयक आवश्यकताएँ-तृतीयक आवश्यकताओं के अंतर्गत शिक्षा, धर्म, राजनीति तथा आर्थिक संस्थाएँ, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी आदि आते हैं।

(v) भाषा संस्कृति का मुख्य वाहक है- भाषा के माध्यम से ही संस्कृति तथा सांस्कृतिक प्रतिमानों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण होता रहता है । इस प्रकार, भाषा संचित ज्ञान को हस्तांतरित करने का मुख्य वाहक है।

(vi) संस्कृति की प्रकृति गतिशील होती है-संस्कृति कभी भी स्थिर नहीं होती है। यह सदैव गतिशील रहती है। यह गति कम या अधिक हो सकती है। जैसा कि हम जानते हैं कि भौतिक संस्कृति तथा अभौतिक संस्कृति गतियों में अंतर आने से सांस्कृतिक विलंबन की स्थिति हो जाती हैं।

(vii) संस्कृति सदैव आदर्शात्मक होती है-संस्कृति व्यक्ति के समक्ष समूह के आदर्श तथ्य प्रस्तुत करती है। ये आदर्श तथा प्रतिमान ही मनुष्य के व्यक्तित्व के प्रमुख तत्व होते हैं। संस्कृति प्रत्येक परिस्थिति के लिए मानव व्यवहार के आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करती है।

(viii) सामाजिक व्यवस्था का प्रमुख आधार-संस्कृति सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक संरचना तथा सामाजिक व्यवस्था का निर्माण तथा विकास करती है। इस प्रकार, संस्कृति सामाजिक व्यवस्था का आधार है।

हरकोविट्स ने संस्कृति के निम्नलिखित लक्षण बताए हैं –

  • संस्कृति एक सीखा हुआ तथा अर्जित व्यवहार है।
  • संस्कृति मानव अनुभवों के प्राणिशास्त्रीय पर्यावरण संबंधी मनोवैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक तत्वों से प्राप्त होती है।
  • संस्कृति संरचित होती है। इसके अंतर्गत चिंतन, भावनाओं तथा व्यवहारों के संगठित प्रतिमान सम्मिलित होते हैं।
  • संस्कृति को पहलुओं में विभाजित किया जाता है।
  • संस्कृति गतिशील होती है।
  • संस्कृति परिवर्तनशील तथा सापेक्षिक होती है।
  • संस्कृति के द्वारा नियमितताओं को प्रदर्शित किया जाता है जो कि विज्ञान की पद्धतियों के द्वारा इसके विश्लेषण की अनुमति देता है।
  • संस्कृति एक यंत्र है जिसमें व्यक्ति सामंजस्य तथा संपूर्ण समायोजन द्वारा रचनात्मक अनुभवों को प्राप्त करता है।

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प्रश्न 5.
समाजीकरण की प्रक्रिया में व्यक्ति के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाजीकरण की प्रक्रिया तथा व्यक्ति का विकास –

(i) समाजीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति समाज के आदर्शों, प्रतिमानों, मूल्यों तथा व्यवहारों को सीखता है। जॉनसन के अनुसार, “समाजीकरण एक सोखता है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने योग्य बनाता है।”

(ii) समाजीकरण प्रत्येक समाज में पाया जाता है। इस प्रक्रिया के द्वारा प्राणी न केवल सामाजिक मनुष्य बनता है वरन् मानव भी बनता है।

(iii) जन्म के समय मनुष्य पशु के समान होता है। समाज में ही मनुष्य का समाजीकरण होता है। प्रसिद्ध विद्वान् अरस्तू के अनुसार, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैक्डूगल ने सामूहिकता की मूल प्रवृत्ति का उल्लेख किया है।

(iv) यदि व्यक्ति को जन्म के समय सामाजिक परिवेश नहीं मिल पाता है तो वह सामाजिक मानव नहीं बन पाता है।

इस संबंध में निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं –

(i) कमला तथा अमला – 1920 ई. में बंगाल में पादरी जे. सिंह को भेड़ियों के पास से दो बच्चे मिले। कमला की आयु 8 वर्ष थी तथा अमला की 12 वर्ष थी । ये बच्चे भेड़ियों के समान ही रहते थे तथा खाते थे। दिन के समय ये बच्चे अधिक चलते-फिरते नहीं थे, जबकि रात के समय घूमते थे। सामाजिक परिवेश में पालन-पोषण के बाद इनके व्यवहार तथा मूल प्रवृत्तियों में परिवर्तन आया । अमला की मृत्यु 15 महीने बाद हो गई । कमला 512 साल तक लगातार सीखने के बाद भी ठीक से नहीं चल पाता थी। दौड़ने के समय हाथों का प्रयोग करती थी। वह केवल 45 शब्द ही सीख पायी। 17 वर्ष की आयु में उसकी भी मृत्यु हो गयी।

(ii) अवेरान का जंगली बालक-फ्रांस के अवेरान जंगल में एक बालक मिला था । वह जानवरों की तरह खाता था तथा उन्हीं की तरह हरकतें करता था। फ्रांस के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पिनेल ने इस बालक को जड़बुद्धि कहकर छोड़ दिया। 11 वर्ष की आयु में भी यह बालक 1 साल के बालक की क्षमताएँ रखता था।

ईतार्द ने पिनेल – के विश्लेषण को स्वीकार नहीं किया। उसने कहा कि यदि यह बालक जड़बुद्धि होता तो जंगल की विषम परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाता । ईतार्द ने उसे पाला । धीरे-धीरे वह बालक समाजीकरण की धारा में बहने लगा। वह गर्मी तथा सर्दी में अंतर करने लगा । यद्यपि वह बोलना तो नहीं सीख सका तथापि प्रसन्नता तथा क्रोध के उद्वेगों को प्रकट करने लगा।

सांकेतिक भाषा का प्रयोग करने लगा। उदाहरण के लिए, यदि वह बालक दूध चाहता था तो दूध का बर्तन आगे कर देता था। ईतार्द ने The Wild Boy of Aveyron ने लिखा है कि “विक्टर ने एक जंगली से यह सीखा कि किस प्रकार मानव समाज में रहना चाहिए तथा साधारण इच्छाओं को किस प्रकार एक लिखित भाषा में अभिव्यक्त करें, लेकिन उसने अन्य समान आयु के बालकों से कभी योग्यता की बारबरी नहीं की। बचपन में मानव समाज के अभाव ने बालक में इतनी अधिक रुकावटें उत्पन्न कर दी कि अत्यधिक प्रयत्नों के बावजूद भी बहुत कम परिणाम निकले।

इसके अतिरिक्त, अन्ना तथा ईजावेल के उदाहरण भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि जन्म के समय मनुष्य केवल एक पशु होता है, समाज ही उसे मानव बनाता है। समाज में अंत:क्रिया द्वारा ही सामाजिक गुणों, व्यवहारों, आदर्शों, प्रतिमानों तथा मूल्यों को सीखता है। गिटलर के अनुसार, “सामाजिक जीव बनने के लिए, मनुष्य को आदतें, विश्वासों, ज्ञान, अभिवृत्तियों तथा स्थायी भावों जैसे उच्च जैविक लक्षणों को प्राप्त करना चाहिए, जो उसमें अन्य व्यक्तियों की संगति से विकसित होते हैं तथा जिनमें ये गुण पाए जाते हैं।”

अंत में कहा जा सकता है कि बचपन से लेकर मृत्यु मनुष्य तक समाज से कुछ न कुछ सीखता रहता है। समाज के मूल्यों, आदर्शों, प्रतिमानों के साथ तादात्म्य ही समाजीकरण कहलाता है।

समाजीकरण के मुख्य चरण – समाजीकरण की क्रिया के निम्नलिखित चरण व्यक्ति के विकास में सहायक हैं –

(i) शिशु का समाजीकरण – शैशवावस्था में समाजीकरण की प्रक्रिया परिवार में होती है। बच्चा अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों से सामाजिक अंत:क्रिया करता है । परिवार में ही वह भाषा, चलना-फिरना तथा खाना-पीना सीखता है। यह समाजीकरण की प्रक्रिया का प्रथम चरण है।

(ii) बालक का समाजीकरण – समाजीकरण के द्वितीय चरण में बालक पड़ोस, मित्रमंडली, विद्यालय, अध्यापकों तथ सहपाठियों के संपर्क में आता है। उसकी सामाजिक अंत:क्रिया का क्षेत्र व्यापक हो जाता है।

(iii) किशोरावस्था में समाजीकरण – समाजीकरण का यह तीसरा चरण है । इस अवस्था में समाजीकरण परिवेश से अत्यधिक प्रभावित होता है। नगरीय, ग्रामीण तथा जनजातीय इलाकों में समाजीकरण के अभिकर्ता पृथक्-पृथक होते हैं।

(iv) वयस्क समाजीकरण-समाजीकरण की प्रक्रिया के इस चरण में समाजीकरण में आयाम तथा अभिकर्ता बदल जाते हैं। समाजीकरण का दायरा अत्यधिक व्यापक हो जाता है। व्यक्ति भविष्य की विभिन्न भूमिकाओं की तैयारी वर्तमान में ही करने लगता है। इस प्रकार के समाजीकरण को पूर्वपेक्षित समाजीकरण कहते हैं।

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प्रश्न 6.
समाजीकरण के विभिन्न अभिकरणों अथवा संस्थाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
समाज समाजीकरण की प्रक्रिया को संभव बनाता है। इस संबंध में किंबाल यंग ने उचित ही कहा है, “समाज के अंतर्गत, समाजीकरण के विभिन्न माध्यमों में परिवार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार के अंतर्गत माता तथा पिता ही साधारणतया अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं।” समाजीकरण के अन्य माध्यमों में पड़ोस, संबंधी, प्राथमिक समूह के सदस्य, साथ ही साथ द्वितीयक समूह बाद की सदस्यता में आते हैं।”

समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण निम्नलिखित हैं –

(i) परिवार – परिवार समाजीकरण का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अभिकरण है। परिवार समाज के आदर्शों, मूल्यों, प्रतिमानों तथा व्यवहारों का प्रतिनिधित्व करता है। समाजीकरण की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका अत्यधिक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक है। जॉनसन के अनुसार, “परिवार विशेष रूप से इस प्रकार संगठित रहता है जो समाजीकरण को संभव बनाता है।”

परिवार की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का बच्चों के विकास पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। किंबाल यंग के अनुसार,” जिसमें परिवार के सदस्य तथा विशेष रूप से माता तथा पिता एक दिए हुए समाज के मौलिक सांस्कृतिक नियमों से बच्चे को परिचय दिलाते हैं।”

(ii) समान आयु समूह – समान आयु समूह समाजीकरण का प्राथमिक तथा सशक्त अभिकरण है। बच्चा परिवार से बाहर अपनी आयु के बच्चों के साथ अंत:क्रिया करता है वह अन्य बच्चों के साथ खेलता है तथा पारस्परिकता के नए आयाम सीखता है।

(iii) पड़ोस – पड़ोस भी समाजीकरण का सशक्त माध्यम है। बच्चे पड़ोस में रहने वाले व्यक्तियों के संपर्क में आकर अनेक बातें सीखते हैं।

(iv) नातेदारी समूह – नातेदारी समूह भी समाजीकरण के महत्वपूर्ण अभिकरण हैं। नातेदारी समूहों में बच्चे समाजीकरण की अनेक बातें सीखते हैं।

(v) शिक्षा संस्थाएँ – शिक्षण संस्थाएँ समाजीकरण का द्वितीयक तथा औपचारिक माध्यम हैं । बच्चा स्कूल में अपने सहपाठियों तथा अध्यापकों के संपर्क में आकर अनेक बातें सीखता है।

(vi) अन्य द्वितीयक समूह – प्राथमिक समूहों के अलावा द्वितीयक समूह भी समाजीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। द्वितीयक समूहों के अंतर्गत राजनीतिक दल, जाति, सांस्कृतिक समूह, वर्ग, भाषा समूह, धार्मिक समूह तथा व्यावसायिक समूह आदि आते हैं।

प्रश्न 7.
संस्कृति के मुख्य अंग कौन से हैं ?
उत्तर:
सल्फ लिंटन के अनुसार, “संस्कृति समाज के सदस्यों के जीवन का तरीका है। इसमें व्यक्ति विचारों तथा व्यवहारों को सीखता है, एक-दूसरे से ग्रहण करता है तथा एक पीढ़ी से दूसरी को हस्तारित करता है।”

संस्कृति के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं –

  • संज्ञानात्मक आयाम
  • प्रतिमानात्मक आयाम
  • भौतिक आयाम

1. संज्ञानात्मक आयाम –
(a) संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम के अंतर्गत अंधविश्वास, वैज्ञानिक तथ्य, मिथक, कला तथा धर्म सम्मिलित हैं।

(b) संज्ञानात्मक आयाम संस्कृति के एक महत्वपूर्ण तत्व हैं जो चिंतन की पद्धतियों को प्रतिबिंबित करते हैं। विचारों के द्वारा संस्कृति के संज्ञानात्मक आयाम को स्पष्ट किया जाता है जिसमें ज्ञान तथा विश्वास सम्मिलित होते हैं। विचार समाज में रहने वाले व्यक्तियों की बौद्धिक धरोहर होते हैं । शिक्षित समाज में विचारों को पुस्तकों तथा दस्तावेजों के रूप में अभिलेखित कर लिया जाता है।

(c) दूसरी तरफ अशिक्षित समाज में विचारों का निर्माण लोकरीतियों तथा जनजातीय दंत कथाओं से होता है। इस प्रकार विचार संस्कृति का प्रथम मुख्य तत्व है।

(d) जहाँ तक संज्ञान की प्रक्रिया का सवाल है, इसके निर्माण में सभी लोग भागीदारी करते हैं, सभी लोग चिंतन करते हैं, अनुभव करते हैं पहचानते हैं तथा अतीत की वस्तुओं का स्मरण करते हैं व उन्हें वास्तविक तथा काल्पनिक भविष्य के बारे में प्रक्षेपित करते हैं। संज्ञान एक सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्तियों को समझने के योग्य बनाती है तथा उन्हें उनके वातावरण से संबद्ध करती है।

(e) संस्कृति द्वारा सांस्कृतिक विश्वासों को व्यापक आधार पर स्वीकार किया जाता है। कुछ विश्वास, आदतें तथा परम्पराएँ सत्ता की अपील पर माने जाते हैं लेकिन वास्तविक रूप से ये असत्य होते हैं। दूसरी तरफ, जो आदतें तथा परंपराएँ अन्य अधिकारिक स्रोतों पर आधारित होती हैं तथा जिन्हें आलोचनात्मक अवलोकन द्वारा प्रमाणित किया जाता है, उन्हें सत्य-स्वीकार किया जाता है।

2. प्रतिमानात्मक आयाम –
(a) संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों के अंतर्गत नियमों, अपेक्षाओं तथा मानवीकृत कार्यविधियों को सम्मिलित किया जाता है।

(b) प्रतिमानात्मक आयाम संस्कृति के दूसरे बड़े तत्व के रूप में जाने जाते हैं। संस्कृति के प्रतिमानात्मक आयामों द्वारा व्यक्तियों के बीच अंतःक्रिया को प्रोत्साहित किया जाता है। पूर्वानुमानों का इसमें आलोचनात्मक महत्त्व होता है।

(c) प्रतिमानों के द्वारा व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित किया जाता है। प्रतिमान जनरीतियों, रूढ़ियों, प्रथाओं तथा कानून के रूप में वर्गीकृत किए जा सकते हैं। प्रतिमान की अवधारणा के अंतर्गत चिंतन बजाए कार्य करने के तरीकों को अधिक महत्व प्रदान किया जाता है।

(d) आचरण में प्रतिमानों की उपस्थिति निहित होती है जबकि व्यवहार, आवेग अथवा प्रत्युत्तर हो सकता है। व्यक्ति का आचरण मान्य समाज द्वारा निर्धारित प्रतिमानों से ही प्राप्त होती है। प्रतिमान सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य हैं । इस प्रकार, प्रतिमान तथा मूल्य संस्कृति को समझने हेतु एक केन्द्रीय अवधरणा है।

3. भौतिक आयाम –
(a) संस्कृति के भौतिक आयामों के अंतर्गत कुछ वस्तुएँ जैसे कि कपड़ा, आवास, उपकरण, आभूषण, रेडियो तथा संगीत वाद्ययंत्र आदि आते हैं।

(b) भौतिक आयामों में उन वस्तुओं को सम्मिलित किया जाता है, जिन्हें समाज के सदस्यों द्वारा ग्रहण किया जाता है अथवा जिन्हें वे उपयोग में लाते हैं।

(c) व्यक्तियों द्वारा रचित मूर्त वस्तुओं को भौतिक संस्कृति कहते हैं । पदार्थ अत्यधिक स्पष्ट होने के कारण संस्कृति को जानने का सरलतम स्वरूप है।

(d) भौतिक संस्कृति के साथ अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत संस्कृति के संज्ञानात्मक आयामों तथा प्रतिमानात्मक आयामों को सम्मिलित किया जाता है । भौतिक संस्कृति तक अभौतिक संस्कृति के तत्वों में घनिष्ठ संबंध होता है।

प्रश्न 8.
उन दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों। क्या नृजातीय बनना कठिन नहीं है ?
उत्तर:
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क्या नृजातीय बनाना कठिन नहीं है –
जब संस्कृतियाँ एक-दूसरे के संपर्क में आई तभी नृजातीयता की उत्पति हुई। नृजातीयता से आशय अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग करने से है। इसका अर्थ है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों को मानदंड या मानक के रूप में प्रदर्शित किया गया था उन्हें अन्य संस्कृतियों की आस्थाओं तथा मूल्यों से श्रेष्ठ माना जाता है। इस दृष्टि से नृजातीय बनाना कठिन है।

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प्रश्न 9.
समाजीकरण के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।
अथवा
फ्रायड के समाजीकरण की तीन अवस्थाएँ क्या हैं?
उत्तर:
समाजीकरण के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं –

(i) कले का “आत्मदर्पण” का सिद्धात – प्रसिद्ध समाजशास्त्री चार्ल्स एच. कूले ने अपनी पुस्तक ‘Human Nature and the Social Order’ में ‘आत्मदर्पण’ की अवधारणा को उल्लेख किया है। कले के अनसार स्व का विकास व्यक्तित्व तथा समाजीकरण के विकास का सर्वाधिव महत्वपूर्ण प्रश्न है । कूले के अनुसार स्व के विकास तथा व्यक्तित्व निर्माण में निम्नलिखित तीन तत्व महत्वपूर्ण हैं –

  • अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में हमारे स्वरूप तथा आकृति की कल्पना।
  • स्वयं की कल्पना में वह जैसा दिखाई पड़ता है, उस पर वह स्वयं के विषय में क्या निर्णय करता है।
  • गौरव तथा ग्लानि से युक्त आत्मबोध।

कूले का मत है कि ‘स्व’ अथवा ‘मैं’ की अवधारणा का विकास दूसरे व्यक्तियों के संपर्क में आने से ही होता है। इस प्रकार, ‘स्व’ का विचार सामाजिक उत्पाद है, जिसे सामाजिक स्व भी कहते हैं। कूले का मत है कि स्व का विकास समाज में होता है। यह अन्य व्यक्तियों के साथ पारम्परिक अंतःक्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है। नवजात शिशु का अपना कोई ‘स्व’ नहीं होता है। उसकी अपने विषय में उसी समय रुचि जागृत होती है जब वह सचेत होता है।

यदि समाज में बालक के व्यवहार का व्यक्तियों द्वारा प्रशंसा की जाती है तो वह गर्व का अनुभव करता है। दूसरी तरफ, यदि उसके व्यवहार की आलोचना की जाती है तो ग्लानि का अनुभव करता है। बालक के व्यवहार की निरंतर प्रशंसा होने पर उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न होता है तथा बाह्यमुखी व्यक्तित्व का विकास होता है। दूसरी तरफ, निरंतर आलोचना होने की स्थिति में बालक हतोत्साहित हो जाता है तथा अंतर्मुखी व्यक्तित्व का विकास होता है।

समाज में व्यक्ति के विचार, मनोवृत्तियाँ, मूल्य, आदर्श, प्रतिमान तथा आदतें उसके निकट रहने वाले व्यक्तियों के विचारों तथा मनोवृत्तियाँ पर आधारित होते हैं तथा बालक का समाजीकरण इन्हीं कारकों पर निर्भर करता है। कूले का मत है कि प्राथमिक समूह जैसे परिवार, मित्र, समूह तथा पड़ोस आदि समाजीकरण में निर्णायक तथा प्रभावी भूमिका निभाते हैं। प्राथमिक समूहों में आमने-सामने के अनौपचारिक संबंध होते हैं। कूले का मत है कि स्व के विकास में यही जानना आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति किस तरह सोचते हैं तथा क्या निर्णय देते हैं, वरन् स्वयं को दूसरे व्यक्तियों के निर्णय के दर्पण में देखना भी आवश्यक है।

(ii) मीड की भूमिका ग्रहण का सिद्धांत – मीड का मत है कि ‘स्व’ की धारणा का अस्तित्व एवं विकास अन्य व्यक्तियों की भूमिका ग्रहण करने पर निर्भर करता है। दूसरों से भूमिका ग्रहण करने का तात्पर्य है कि हम अन्य व्यक्तियों के विचार तथा भावनाओं को स्वीकार करते हैं। उदाहरण के लिए इस श्रृंखला में सर्वप्रथम माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य तथा फिर मित्र व अध्यापक आदि आते हैं।

मीड का विचार है कि व्यक्तियों की अंतः क्रिया का आधार प्रतीक होते हैं। प्रतीक निर्मित होते हैं एवं वस्तु अथवा घटक की आंतरिक प्रकृति से इनका कोई संबंध नहीं होता है। मानव अंत:क्रिया के लिए प्रतीक अपरिहार्य हैं। अत: हम कह सकते हैं कि समाज के अस्तित्व के लिए प्रतीक आवश्यक हैं। मानव समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रतीक भाषा है। इसलिए, प्रतीकों में समाज के सदस्यों द्वारा भाग लिया जाता है। मीड ने इस प्रक्रिया को भूमिका ग्रहण कहा है।

समाज में भूमिका ग्रहण की प्रक्रिया बच्चे के जन्म से ही आरंभ हो जाती है। आरंभ में बच्चों के द्वारा माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिकाओं में तादात्म्य स्थापित किया जाता है । मीड इस प्रकार के तादात्म्य को विशिष्ट अन्य का नाम देता है। बच्चे के विकास के साथ-साथ उसका तादात्म्य सामान्यीकृत अन्य के साथ हो जाता है। जब तक बच्चा दूसरों के साथ तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाता या अन्यों की भूमिकाओं को समझ नहीं पाता है वह केवल ‘मैं’ होता है, लेकिन जब बच्चे का सामान्यीकृत अन्य की भूमिकाओं से तादात्म्य हो जाता है तो उसका मैं ‘मुझ’ बदल जाता है। मैं का मुझ में परिवर्तन बच्चे के समाजीकरण के विषय में बताता है।

जॉर्ज हरबर्ट मीड का मत है कि व्यक्ति तथा समाज को पृथक नहीं किया जा सकता है। समाज ही व्यक्ति को एक मानव प्राणी के रूप में परिवर्तित करता है। व्यक्ति द्वारा पहले सामाजिक पर्यावरण की रचना की जाती है, इसके बाद वह उसी से आकृति प्राप्त करता है। समाज में अन्य व्यक्तियों के साथ अंत:क्रिया से व्यक्ति के स्व का विकास होता है। अंत: क्रिया के लिए संचार आवश्यक है। संचार का आधार प्रतीक होते हैं, जिन्हें व्यक्तियों द्वारा परस्पर समझा जाता है।

(iii) फ्रायड का विश्लेषणात्मक सिद्धांत – फ्रायड ने समाजीकरण के सिद्धांत में कहा है कि व्यक्तियों का निर्माण व्यक्ति में पायी जाने वाली जैविकीय, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक क्षमताओं के मध्य होने वाली क्रियाओं का परिणाम होता है। फ्रायड का मत है कि बच्चे में व्यक्तित्व का प्रमुख भाग 5 वर्ष की आयु तक विकसित हो जाता है। व्यक्ति के शेष जीवन काल में इसी व्यक्तियों का विस्तार होता है।

  • चेतन
  • अवचेतन तथा
  • अचेतन

मानव मस्तिष्क का चेतन क्षेत्र उसे जीवन की वर्तमान घटना तथा क्रियाओं से संबद्ध होता है। मस्तिष्क के अचेतन क्षेत्र में निकट भूत की घटनाओं तथा अनुभवों के एकत्रीकरण होता है। मस्तिष्क के अवचेतन क्षेत्र में भूतकाल की घटनाओं के अनुभव होते हैं। मानव मस्तिष्क में एकत्रित अनुभव व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अनुभव किसी न किसी रूप में प्रकट होने का प्रयास करते रहते हैं।

फ्रायड व्यक्तियों के निर्माण में निम्नलिखित तीन उपकल्पनात्मक अवस्थाओं को महत्त्वपूर्ण मानते हैं –

  • इड
  • अहं
  • पराअहं

उपरोक्त वर्णित अवस्थाएँ परस्पर अंतःक्रिया करती हैं तथा इससे मानव व्यवहार का जन्म होता है। फ्रायड में इड को वास्तविक मानसिक यथार्थ माना है। इसके अंतर्गत व्यति की मनोवैज्ञानिक, आनुवंशिकी तथा मूल प्रवृत्ति सम्मिलित होती है। यह सुख के सिद्धांत पर कार्य करता है। तथा व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक ऊर्जा का भंडार है। इड समाज के नियमों, मूल्यों तथा आदर्शों से दूर रहता है। इसका मूल उद्देश्य किसी भी तरह से अपनी जरूरतों की पूर्ति करना है। भले ही यह पूर्ति कल्पना या स्वप्न में हो, लेकिन मात्र कल्पना से तो जरूरत पूरी होने का तनाव कम हो सकता। उदाहरण के लिए, पानी की कल्पना प्यास शांत नहीं कर सकती।

इसके बाद, द्वितीय मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का निर्माण होता है। इसे अहं कहते हैं। अहं का प्रकार्य वास्तविक सिद्धांत पर आधारित होता है। जहाँ तक इड तथा अहं में अंतर का प्रश्न है; इड मस्तिष्क के विषयक यथार्थ को जानता है, जबकि अहं वस्तगत यथार्थ तथा विषयक यथार्थ में अंतर करता है। अहं की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि मूर्त साधनों पर निर्भर करता है। व्यक्ति की विभिन्न जरूरतें केवल काल्पनिक साधनों से पूर्ण नहीं हो सकतीं। अहं इस बात का भी विश्लेषण करता है कि समाज के लिए क्या उचित या क्या अनचिंत है? अहं इड के लक्ष्यों में रुकावट नहीं डालता वरन उन्हें संगठित रूप में आगे बढ़ाता है।

व्यक्तित्व की तृतीय अवस्था पराअहं है। यह मानव व्यक्तित्व का नैतिक पहलू है, जो आदर्शवाद के सिद्धांत से निर्देशित होता है। पराअहं समाज में उन मूल्यों, आदर्शों तथा प्रतिमानों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें बच्चे ने समाजीकरण की प्रक्रिया के समय आत्मसात् कर लिया है। पराअहं का मुख्य उद्देश्य इस बात का निर्णय करना है कि मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिन साधनों को चुना गया है वे समाज द्वारा स्थापित प्रतिमानों के अनुसार उचित हैं अथवा अनुचित । पराअहं के मुख्य कार्य की उन तीव्र इच्छाओं पर नियंत्रण लगाना है, जो समाज द्वारा स्वीकृत नहीं है।

इड, अहं तथा पराअहं क्रमशः जैविकीय, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक कारक हैं, जो वस्तुतः एक-दूसरे को संतुलित करने का कार्य करते हैं। इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण तथा विकास होता है। अहं के अव्यवस्थित होने पर व्यक्तित्व का विकास अव्यवस्थित हो सकता है। इस प्रकार की स्थिति में इड अहं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है तो व्यक्तित्व के अनैतिक तथा आपराधिक होने की संभावना बढ़ जाती है।

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प्रश्न 10.
क्या विश्वव्यापीकरण को आप आधुनिकता से जोड़ते हैं ? नृजातीयता का प्रेक्षण करें तथा उदाहरण दें।
उत्तर:
विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया वात्सव में आधुनिकीकरण की ही प्रक्रिया है। विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया में अन्य देशों से जो संस्कृति आयात की गई है उसने आधुनिकता को बढ़ावा दिया है। नृजातीय जब संस्कृतियाँ एक-दूसरे के संपर्क में आईं, तभी नृजातीयता की उत्पत्ति हुई। नृजातीयमा से आशय अपने सांस्कृतिक मूल्यों का अन्य संस्कृतियों के लोगों के व्यवहार तथा आस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग करने से है। इसका अर्थ है कि जिन सांस्कृतिक मूल्यों को मानदंड या मानक के रूप में प्रदर्शित किया गया था उन्हें अन्य संस्कृतियों की आस्थाओं तथा मूल्यों से श्रेष्ठ माना जाता है।

नृजातीय तुलनाओं में निहित सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना उपनिवेशवाद की स्थितियों में स्पष्ट दिखाई देती है। थॉमस बाबींटोम मेकॉले के ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत की शिक्षा (1835 ई.) के प्रसिद्ध विवरण में नृजातीयता का दृष्टांत दिया है जब वे कहते हैं, “हमें इस समय ऐ ऐसे वर्ग का निर्माण अवश्य करना चाहिए जो हमारे तथा हमारे द्वारा शासित लाखों लोगों के बची द्विभाषियों का काय करे, व्यक्तियों का ऐसा वर्ग जो खून तथा रंग में भारतीय हो परंतु रुचि में, विचार में, नैतिकता तथा प्रतिभा में अंग्रेज हो।”

नृजातीयता विश्वबंधुता के विपरीत है जोकि अंतर के कारण अन्य संस्कृतियों को महत्त्व देती है। विश्वबंधुता में कोई भी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के मूल्यों तथा आस्थाओं का मूल्यांकन अपने मूल्य तथा आस्थाओं के अनुसार नहीं करता । यह विभिन्न सांस्कृतिक प्रवृत्तियों की मानता तथा उन्हें अपने अंदर समायोजित करता है तथा एक-दूसरे की संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिए सांस्कृतिक विनिमय व लेन-देन को बढ़ावा देता है । विदेशी शब्दों को अपनी शब्दावली में लगातार शामिल करके अंग्रेजी भाषा अंतर्राष्ट्रीय संप्रेषण का मुख्य साधन बनकर उभरी है। पुनः हिन्दी फिल्मों के संगीत की लोकप्रियता को पाश्चात्य पॉप संगीत तथा साथ ही भारतीय लोकगीत की विभिन्न परंपराओं तथा भंगड़ा और गजल जैसे अर्द्धशास्त्रीय संगीत से ली गई देन का परिणाम मान सकते हैं।

एक आधुनिक समाज सांस्कृतिक विभिन्नता का प्रशंसक होता है तथा बाहर से पड़ने वाले सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करता परंतु ऐसे सभी प्रभावों को सदैव इस प्रकार शामिल किया जाता है कि ये देशीय संस्कृति के तत्वों के साथ मिल सकें । विदेशी शब्दों को शामिल करने के बावजूद अंग्रेजी अलग भाषा नहीं बन पाई और न ही हिन्दी फिल्मों के संगीत ने अन्य जगहों से उधार लेने के बावजूद अपना स्वरूप खोया। विविध शैलियों, रूपों, श्रव्यों तथा शिल्पों को शामिल करने से विश्वव्यापी संस्कृति को पहचान प्राप्त होती है। आज सार्वभौमिक विश्व में, जहाँ संचार के आधुनिक साधनों से संस्कृतियों के बीच अंतर कम हो रहे हैं, एक विश्वव्यापी दृष्टि व्यक्ति को अपनी संस्कृति को विभिन्न प्रभावों द्वारा सशक्त करने की स्वतंत्रता देती है।

प्रश्न 11.
आपके अनुसार आपकी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण क्या है ? यह पहले अलग कैसे था? आप इसके चारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर:
हमारी पीढ़ी के लिए समाजीकरण का सबसे प्रभावी अभिकरण विद्यालय है। विद्यालय एक सामान्य प्रक्रिया है, जहाँ पढ़ाए जाने वाले विषयों की एक निश्चित पाठ्यचर्या होती है। विद्यालय समाजीकरण के प्रमुख अभिकरण होते हैं। कुछ समाजशास्त्रियों के अनुसार औपचारिक पाठ्यक्रम के साथ-साथ बच्चों को सिखाने के लिए कुछ अप्रत्यक्ष पाठ्यक्रम भी होता है।

भारत तथा दक्षिणी अफ्रीका में कुछ ऐसे विद्यालय हैं जहाँ लड़कों की अपेक्षा लड़कियों से अपने कमरे साफ करने की आशा की जाती है। कुछ विद्यालयों में, इसके समाधान के लिए प्रयास किए जाते हैं जिससे तहत लड़के तथा लड़कियों से ऐसे काम करने को कहा जाता है जिनके बारे में सामान्यता उनसे आशा नहीं की जाती है। पहले शिक्षा का अधिक महत्व नहीं था इसलिए यह वर्तमान से हटकर था।

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प्रश्न 12.
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए दो विभिन्न उपागमों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए विभिन्न उपागमों का प्रयोग किया जाता है। उनमें से दो प्रमुख हैं –

(i) ऐतिहासिक उपागम – किसी भी विषय के सही ज्ञान के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सहारा लेना ही पड़ता है। इतिहास में मानवजाति की घटनाओं का भंडार छिपा है। संस्कृति की उत्पत्ति, विकास तथा वर्तमान स्वरूप के विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहास के पन्नों को उलटना ही पड़ेगा। यह बात निर्विवाद है कि किसी भी संस्कृति का निर्माण एक साथ एक ही समय में नहीं हुआ है, इसलिए संस्कृति के परिवर्तनों की जानकारी के अध्ययन के लिए ऐतिहासिक उपागम की आवश्यकता पड़ती है।

(ii) दार्शनिक उपागम – सांस्कृतिक परिवर्तनों के अध्ययन के लिए दार्शनिक उपागम पर भी जोर दिया जाता है। कुछ समाजशास्त्री सांस्कृतिक परिवर्तनों को दार्शनिक दृष्टि से भी स्पष्ट का लेते हैं। इस कारण इस उपागम की महत्ता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सामाजिक अनुसंधन की समस्या निम्नलिखित से कौन-सा है?
(अ) वस्तुनिष्ठता
(ब) चक्रीय
(स) रेखीय
(द) पाराबोलिक
उत्तर:
(द) पाराबोलिक

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में असत्य कथन छाँटिये ………………………
(अ) सामाजिक सर्वेक्षण में सामाजिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है
(ब) सामाजिक सर्वेक्षण का निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है
(स) सामाजिक सर्वेक्षण एक वैज्ञानिक पद्धति है
(द) सामाजिक सर्वेक्षण सदैव व्यक्तिगत रूप से किया जाता है
उत्तर:
(द) सामाजिक सर्वेक्षण सदैव व्यक्तिगत रूप से किया जाता है

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 3.
जन्म द्वारा प्रदत्त प्रस्थिति कहलाती है ……………………..
(अ) वर्ण
(ब) संघ
(स) जाति
(द) समूह
उत्तर:
(स) जाति

प्रश्न 4.
समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा हम सीखते हैं ………………………..
(अ) समाज का सदस्य बनना
(ब) राजनीतिक दल का सदस्य बनना
(स) धार्मिक संस्था का सदस्य बनना
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(अ) समाज का सदस्य बनना

प्रश्न 5.
सामान्यतया विस्तृत दल द्वारा किये जानेवाले अनुसंधान हैं ……………………….
(अ) साक्षात्कार
(ब) अनुसूची
(स) सर्वेक्षण
(द) प्रश्नावली
उत्तर:
(द) प्रश्नावली

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 6.
असहभागी अवलोकन में अनुसंधानकर्ता की स्थिति होती है ……………………..
(अ) समूह में शामिल होना
(ब) समूह में शामिल नहीं होना
(स) समूह के साथ अंत:क्रिया करना
(द) समूह से संबंध स्थापित करना
उत्तर:
(द) समूह से संबंध स्थापित करना

प्रश्न 7.
खुली प्रश्नावली में उत्तरदाता अपने उत्तर देने में होता है ……………………….
(अ) बंधा हुआ
(ब) चयन हेतु बाध्य
(स) सीमित
(द) स्वतंत्र
उत्तर:
(द) स्वतंत्र

प्रश्न 8.
समाजीकरण के अभिकरण हैं …………………………
(अ) परिवार
(ब) स्कूल
(स) जाति
(द) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(द) उपरोक्त सभी

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 4 संस्कृति तथा समाजीकरण

प्रश्न 9.
नगरीय समुदाय में जनसंख्या घनत्व पाया जाता है ……………………….
(अ) काफी
(ब) कम
(स) साधारण
(द) विरल
उत्तर:
(अ) काफी

प्रश्न 10.
सहभागी अवलोकन के द्वारा अनुसंधान किया जाता है ………………………
(अ) एक समूह का
(ब) एक पुरुष का
(स) एक महिला का
(द) पशुओं के समूह का
उत्तर:
(अ) एक समूह का

प्रश्न 11.
बंद प्रश्नावली में उत्तरदाता को उत्तर देने की होती है ……………………….
(अ) स्वतंत्रता
(ब) सीमाएँ
(स) छूट
(द) विकल्पों की स्वतंत्रता
उत्तर:
(ब) सीमाएँ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Sociology समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
लंबवत गतिशीलता किसे कहते हैं?
उत्तर:
लंबवत गतिशीलता में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में परिवर्तन उच्च अथवा निम्न श्रेणी में हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि एक लिपिक अपने ही कार्यालय या दूसरे कार्यालय में पदोन्नति पर जाता है तो उसे लंबवत गतिशीलता कहा जाएगा।

प्रश्न 2.
अंतरपीढ़ी गतिशीलता का अर्थ बताइए?
उत्तर:
अंतरपीढ़ी गतिशीलता सामाजिक-आर्थिक सोपान पर आधारित गतिशीलता है। अंतरपीढ़ी गतिशीलता परिवार में पृथक् पीढ़ी वाले सदस्यों द्वारा अनुभव की जाती है। उदाहरण के लिए किसी लिपिक के पुत्र का आई.ए.एस. अधिकारी बन जाना अंतरपीढ़ी गतिशीलता का उदाहरण है। दोनों पीढ़ियाँ अलग-अलग हैं तथा दोनों में व्यावसायिक भिन्नता है।

प्रश्न 3.
कार्ल मार्क्स द्वारा किया गया समाज का विभाजन बताइए?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने समाज को निम्नलिखित दो भागें में बाँटा है:

  • जिनके पास है या बुर्जुआ वर्ग।
  • जिनके पास नहीं है या प्रोलीटेरिएट्स।

जिनके पास है उन्हें उत्पादन के साधनों का स्वामी कहा जाता है। जिनके पास नहीं है, उन्हें मजदूर कहा जाता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न आधार बताइए।
उत्तर:
सामाजिक स्तरीकरण के विभिन्न आधार निम्नलिखित हैं:

  • दासता
  • एस्टेट्स
  • वर्ग
  • सत्ता
  • जाति
  • सजातीयता

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 5.
सामाजिक जीवन में सत्ता एक प्रमुख संसाधन किस प्रकार है?
उत्तर:
सामाजिक जीवन में सत्ता एक प्रमुख संसाधन निम्नलिखित प्रकार से है:

  • संयोग जो एक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को समूहों को मिलाता है।
  • जिन्हें सामुदायिक गतिविधियों में अनुभव किया जाता है।
  • सत्ता का प्रयोग दूसरों के विरोध के लिए भी किया जाता है।

प्रश्न 6.
परंपरागत भारत में सामाजिक असमानता का प्रमुख आधार बताइए।
उत्तर:
परंपरागत भारत में सामाजिक असमानता का प्रमुख आधार जाति है।

प्रश्न 7.
भारतीय समाज में पायी जाने वाली वर्णाश्रम व्यवस्था बताइए।
उत्तर:
भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार भारतीय समाज निम्नलिखित चार वर्गों में बाँटा गया है:

  • ब्राह्मण (पुरोहित या विद्वान)
  • क्षत्रिय शासक तथा योद्धा
  • वैश्य व्यापारी
  • शूद्र (कृषक, मजदूर तथा सेवक)

प्रश्न 8.
सजातीयता का शाब्दिक अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सजातीयता शब्द ग्रीक भाष के शब्द एथनिकोस से लिया गया है, जो कि एथनोस का विशेषण है एथनोस का तत्पर्य एक जन समुदाय अथवा राष्ट्र से है। अपने समकालीन रूप में सजातीयता की अवधारणा उस समूह के लिए प्रयोग की जाती है जिसमें कुछ अंशों में सामंजस्य तथा एकता पायी जाती हो । इस प्रकार, सजातीयता का अर्थ सामूहिकता से है।

प्रश्न 9.
बहुसंख्यक तथा अल्पसंख्यक समूहों का समाजशास्त्रीय अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र में बहुसंख्यक समूह को सत्ता के अधिकार तथा प्रयोग से परिभाषित किया जाता है तथा अल्पसंख्यक समूह में इन दोनों का अभाव होता है।

प्रश्न 10.
समाज में असमानता पाए जाने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
समाज में असमानता पाए जाने का मुख्य कारण उपलब्ध संसाधनों, जैसे-भूमि, धन-संपत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा आदि का समान वितरण न होना है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 11.
सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
टॉलकॉट पारसंस के अनुसार, “सामाजिक स्तरीकरण से अभिप्राय किसी सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तियों का ऊँचे तथा नीचे के पदासोपानक्रम में विभाजन है।”

प्रश्न 12.
स्तरीकरण शब्द या शाब्दिक अर्थ बताइए।
उत्तर:
अंग्रेजी भाषा में स्ट्रैटिफिकेशन (स्तरीकरण) शब्द भूगर्भशास्त्र से लिया गया है। स्ट्रैटिफिकेशन का मूल शब्द स्ट्रैटन है। स्ट्रैटन का तात्पर्य भूमि की परतों से है। भूगर्भशास्त्रियों द्वारा भूमि की विभिन्न परतों का अध्ययन जिस प्रकार किया जाता है, उसी प्रकार समाजशास्त्र में समाज की विभिन्न परतों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 13.
सामाजिक विभेदीकरण सामाजिक स्तरीकरण में कैसे परिवर्तित हो जाता है?
उत्तर:
सामाजिक विभेदीकरण सामाजिक स्तरीकरण में निम्नलिखित स्थितियों में परिवर्तित हो जाता है:

  • स्थितियों की विभिन्न श्रेणियों तथा मूल्यांकन के द्वारा।
  • किसी को पुरस्कार देना अथवा न देना।

प्रश्न 14.
स्तरीकरण व्यवस्था को किस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर:
स्तरीकरण व्यवस्था को निम्नलिखित दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • मुक्त स्तरीकरण-स्तरीकरण की इस अवस्था में लचीलापन पाया जाता है।
  • बंद स्तरीकरण-स्तरीकरण की इस अवस्था में दृढ़ता तथा कठो जाती है।

प्रश्न 15.
सामानान्तर गतिशीलता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समानान्तर गतिशीलता में एक व्यक्ति की स्थिति में तो परिवर्तन होता है, लेकिन उसकी श्रेणी पहले जैसा रहती है। उदाहरण के लिए यदि एक लिपिक का स्थानान्तरण एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में होता है, लेकिन उसकी श्रेणी में परिवर्तन नहीं होता है तो इसे समानान्तर श्रेणी कहते हैं।

प्रश्न 16.
सामाजिक संरचना शब्द को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पारसंस के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर संबंधित संस्थाओं, अभिकरणों, सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समूह में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण, किए गए पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमबद्धता को कहते हैं।”

प्रश्न 17.
प्रस्थिति शब्द की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
ऑग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार “एक व्यक्ति की प्रस्थिति, उसका समूह में स्थान तथा दूसरों के संबंध में उसका क्रम है।”

प्रश्न 18.
सामाजिक संरचना के स्तर बताते हुए उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक समाज की संरचना में निम्नलिखित दो स्तर पाये जाते हैं:

  • सूक्ष्म स्तर, यथा किसी विशिष्ट समुदाय अथवा गाँव का अध्ययन।
  • वृहद स्तर, यथा संपूर्ण सामाजिक संरचना जैसे कि भारतीय समाज का अध्ययन।

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प्रश्न 19.
सामाजिक संरचना शब्द का प्रयोग समाजशास्त्र में सर्वप्रथम किस विद्वान के द्वारा किया गया?
उत्तर:
समाजशास्त्र में सामाजिक संरचना शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ब्रिटिश विद्वान हारबर्ट स्पेंसर के द्वारा किया गया था.। उनके द्वारा समाज तथा जीवित प्राणी में समानता देखी गयी थी।

प्रश्न 20.
संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण के सिद्धांत कां मुख्य प्रवर्तक कौन था? इस दृष्टिकोण की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
ब्रिटिश मानवशास्त्री रैडक्लिफ ब्राउन संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण का प्रमुख प्रवर्तक था। इस दृष्टिकोण की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

व्यक्ति सामाजिक संरचना की एक इकाई है।

  • सभी समाजों में संरचनात्मक लक्षण पाए जाते हैं।

प्रश्न 21.
उन मूलभूत प्रकार्यों को बताइए जो समाज की निरंतता तथा उसे बनाए रखने हेतु आवश्यक हैं।
उत्तर:
निम्नलिखित मूल प्रकार्य समाज की निरंतरता तथा उसे बनाए रखने के लिए आवश्यक है –

  • नए सदस्यों की भर्ती।
  • समाजीकरण।
  • वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन तथा वितरण।
  • व्यवस्था की सुरक्षा।

प्रश्न 22.
सामाजिक प्रक्रिया की परिभाषा दीजिए। अथवा, सामाजिक प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हार्टन तथा हंट के अनुसार “सामाजिक प्रक्रिया सामाजिक जीवन में सामान्यतः पाए जाने वाले व्यवहारों की पुनरावृत्ति अन्त:क्रिया है।”

प्रश्न 23.
सामाजिक अन्तःक्रिया का अर्थ बताइए।
उत्तर:
व्यक्ति विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से समाज में अनेक व्यक्तियों के साथ संबद्ध होता है तथा समाज के दूसरे सदस्य भी उसके साथ क्रियात्मक संबंध रखते हैं। इसी प्रक्रिया को अन्त:क्रिया कहा जाता है। इस प्रकार अन्त:क्रिया किसी भी विशिष्ट समाज के सामाजिक पर्यावरण में होने वाली प्रक्रिया है। अन्तःक्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।”

प्रश्न 24.
सामाजिक प्रक्रियाओं के विभिनन स्वरूप बताइए। अथवा, सहयोगात्मक . तथा असहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रियाएँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
समाज में निम्नलिखित दो प्रकार की सामाजिक प्रक्रियाएँ पायी जाती हैं –

(i) सहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रियाएँ –

  • सहयोग
  • समायोजन
  • समन्वयन
  • अनुकूलन
  • एकीकरण
  • सात्मीकरण

(ii) असहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रियाएँ –

  • प्रतियोगिता
  • संघर्ष
  • अंतर्विरोध

प्रश्न 25.
सहयोगात्मक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में सहयोग की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
ग्रीन के अनुसार, “सहयोग दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा कोई कार्य करने या सामान्य रूप से इच्छित किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किया जाने वाला निरंतर एवं सामूहिक प्रयास है।” एल्ड्रिज तथा मैरिल के अनुसार, “सहयोग सामाजिक अन्त:क्रिया का वह स्वरूप है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति एक सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में एक साथ मिलकर कार्य करते हैं।”

प्रश्न 26.
संघर्ष की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
हॉर्टन तथा हंट के अनुसार, “संघर्ष वह प्रक्रिया है जिसमें प्रतिस्पर्धियों को कमजोर बनाकर या उन्हें प्रतियोगिता से हटाकर स्वयं पुरस्कार मा लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।” ए.डब्लू. ग्रीन के अनुसार, “संघर्ष किसी अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की इच्छा का जान-बूझकर विरोध करने, उसे रोकने अथवा उसे बलपूर्वक कराने से संबंधित प्रयत्न है।”

प्रश्न 27.
संघर्ष के विघटनकारी प्रभाव बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री हॉटर्न तथा हंट ने संघर्ष के निम्नलिखित विघनटकारी प्रभाव बताए हैं –

  • संघर्ष पारस्परिक कटुता बढ़ाता है।
  • संघर्ष हिंसा तथा विनाश पैदा करता है।
  • संघर्ष के द्वारा सहयोग के रास्ते में बाधा उत्पन्न की जाती है।
  • संघर्ष द्वारा सदस्यों का ध्यान समूह के लक्ष्यों से हटा दिया जाता है।

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प्रश्न 28.
संघर्ष के समन्वयकारी प्रभाव बताइए।
उत्तर:
हॉर्टन तथा हंट ने संघर्ष के निम्नलिखित समन्वयकारी प्रभाव बताए हैं –

  • संघर्ष के द्वारा विवाद स्पष्ट किए जाते हैं।
  • संघर्ष समूह की एकता से वृद्धि करता है।
  • संघर्ष के माध्यम से दूसरे समूहों के साथ संधियाँ की जाती हैं।
  • संघर्ष में समूहों को अपने सदस्यों के हितों के प्रति जागरूक बनाया जाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पुरस्कारों का वर्गीकरण समाज में किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
स्तरीकरण के विभाजन में पुरस्कारों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बाँटा गया है –

  1. धन-धन अथवा संपत्ति किसी व्यक्ति या परिवार की कुल आर्थिक पूँजी है, जिसमें आय व्यक्तिगत संपत्ति तथा संपत्ति से होने वाली आय सम्मिलित हैं।
  2. शक्ति-शक्ति के माध्यम से व्यक्ति अथवा समूह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति दूसरों के विरोध के बावजूद करते हैं।
  3. मनोवैज्ञानिक संतुष्टि-मनोवैज्ञानिक संतुष्टि एक अभौतिक संसाधन है। किसी कार्य के द्वारा व्यक्ति को आनंद तथा सम्मान मिलता है। समाज समुचित कार्य के लिए व्यक्ति को पुरस्कृत करता है।

प्रश्न 2.
कुछ समाजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण को अपरिहार्य क्यों मानते हैं?
उत्तर:
समाजशास्त्री सामाजिक स्तरीकरण के निम्नलिखित कारणों को अपरिहार्य मानते हैं। –

  1. मानव समाज में असमानता प्रारम्भ से ही पायी जाती है। असमानता पाए जाने का प्रमुख कारण यह है कि समाज में भूमि, धन, संपत्ति, शक्ति तथा प्रतिष्ठा जैसे संसाधनों का वितरण समान नहीं होता है।
  2. विद्वानों का मत है कि यदि समाज के समस्त सदस्यों को समानता का दर्जा दे भी दिया जाए तो कुछ समय पश्चात उस समाज के व्यक्तियों में असमानता आ जाएगी। इस प्रकार समाज में असमानता एक सामाजिक तथ्य है।
  3. गम्पलाविज तथा ओपेनहीमार आदि समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण की शुरूआत एक समूह द्वारा दूसरे पर हुई।
  4. जीतने वाला समूह अपने को उच्च तथा श्रेष्ठ श्रेणी को समझने लगा। सीसल नाथ का विचार है कि “जब तक जीवन का शांतिपूर्ण क्रम चलता रहा, तब तक कोई तीव्र तथा स्थायी श्रेणी-विभाजन प्रकट नहीं हुआ।”
  5. प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस का मत है कि सामाजिक अवचेतना अचेतन रूप से अपनायी जाती है। इसके माध्यम से विभिन्न समाज यह बात कहते हैं कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्तियों को नियुक्त किया गया है। इस प्रकार प्रत्येक समाज में सामाजिक स्तरीकरण अपरिहार्य है।

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प्रश्न 3.
प्रदत्त व अर्जित प्रस्थिति में अंतर बताइए। उचित उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर:
(i) प्रदत्त प्रस्थिति – प्रदत्त प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जो किसी व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर या आयु, लिंग, वंश जाति तथा विवाह आदि के आधार पर प्राप्त होता है। लेपियर के अनुसार, “वह स्थिति जो एक व्यक्ति के जन्म पर या उसके कुछ ही क्षण बाद अभिगेपित होती है, विस्तृत रूप में निश्चित करती है कि उसका समाजीकरण कौन-सी दिशा ‘लेगा-अपनी संस्कृति के अनुसार-पुंल्लिग-स्त्रीलिंग निम्न या उच्च वर्ग के व्यक्ति के रूप में उसका पोषण किया जा सकेगा।

वह कम या अधिक प्रभावशाली रूप में अपनी उस स्थिति से समाजीकृत होगा जो उस पर अभिरोपित है।” प्रदत्त प्ररिस्थति का निर्धारण सामाजिक व्यवस्था के मानकों द्वारा निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उच्च जाति में जन्म के द्वारा किसी व्यक्ति को समाज में जो प्रस्थिति प्राप्त होती है वह उसकी प्रदत्त प्रस्थिति है। इसी प्रकार एक धनी परिवार में जन्म लेने वाले बालक से भिन्न होती है।

(ii) अर्जित प्रस्थिति – अर्जित प्रस्थिति वह सामाजिक पद है जिसे व्यक्ति अपने निजी प्रयासों से प्राप्त करता है। लेपियर के अनुसार “अर्जित प्रस्थिति वह स्थिति है, जो साधारणतः लेकिन अनिवार्यतः नहीं, किसी व्यक्तिगत सफलता के लिए इस अनुमान पर पुरस्तकार स्वरूप स्वीकृत होती है कि जो सेवाएँ अपने भूत में की हैं वे सब भविष्य में जारी रहेंगी।” उदाहरण के लिए कोई भी व्यक्ति अपने निजी प्रयासों के आधार पर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर या अधिकारी बन सकता है।

प्रश्न 4.
क्या सहयोग हमेशा स्वैच्छिक अथवा बलात् होता है? यदि बलात् है, तो क्या मंजूरी प्राप्त होती है मानदंडों की शक्ति के कारण सहयोग करना पड़ता है? उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर:
सहयोग एक निरंतर चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया है। एक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में सहयोग प्रत्येक समाज में पाया जाता है। सहयोग कुछ स्तरों पर तो स्वैच्छिक होता है। इस स्वैच्छिक सहयोग के आधार पर रक्त संबंध, भावनाएँ तथा पारस्परिक उत्तरदायित्व होते हैं। इस सहयोग में व्यक्तियों में स्वार्थ भिन्नता नहीं पायी जाती है। उद्देश्यों तथा साधनों में समानता पाई जाती है। उदहारण के लिए, स्वैच्छिक सहयोग परिवार में पाया जाता है। इस प्रकार के सहयोग की प्रकृति वैयक्तिक होती है। इस प्रकार के सहयोग के लिए बाध्य नहीं किया जाता।

सहयोग का एक अन्य रूप है-व्यक्ति अन्य समूहों के साथ अपने स्वार्थों तथा उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सहयोग करता है। इसमें स्वीकृति भी होती है, नियमों की शक्ति भी। व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों को उसी सीमा तक सहयाग दिया जाता है जितना उसके स्वार्थों की पूर्ति के
लिए आवश्यक है। आधुनिक समाजों में श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण की प्रक्रियाएँ इसी का उदाहरण है। इसके अलावा ट्रेड यूनियनों, उद्योगों, कार्यालयों में ऐसा ही सहयोग मिलता है।

प्रश्न 5.
कृषि तथा उद्योग के संदर्भ में सहयोग के विभिन्न कार्यों की आवश्यकता की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सहयोग शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के दो शब्दों ‘को’ तथा ऑपेरारी से हुई है। ‘को’ का अर्थ है साथ-साथ तथा ऑपरेरी का अर्थ है कार्य। अपने साधारण अर्थ में सहयोग का तात्पर्य समान हितों की पूर्ति हेतु एक साथ मिलकर कार्य करना है । इमाईल दुखाईम की सावयवी एकता की अवधारणा तथा कार्ल मार्क्स के प्रायः विभाजन की अवधारणा भी ‘सहयोग’ पर आधारित है।

कृषि के संदर्भ में सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता पड़ती है। एक परिवार जो कृषि कार्य में संलग्न है, उसके सभी सदस्य कृषि के कार्यों में सहयोग करते हैं : खेत जोतने, बीज बोने, सिंचाई करने, फसल पकने तक उसकी रखवाली करने, फसल काटने आदि सभी कार्यों में बिना सहयोग के कार्य संपन्न होने में कठिनाई होती है। परिवारिक सदस्यों के सहयोग से ये कार्य शीघ्र संपन्न हो जाते हैं।

इसी प्रकार औद्योगिक कार्यों के संदर्भ में भी सहयोग की आवश्यकता तो देखा जा सकता है। एक रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री तथा एक कार निर्माण फैक्ट्री में बिना कुशल/अकुशल श्रमिकों के बीच सहयोग के उत्पादन कार्य नहीं हो सकता है। कार्ल मार्क्स ने इसलिए कहा है-“बिना सहयोग के मानव जीवन पशु जीवन के समान है।”

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प्रश्न 6.
लिंग के आधार पर स्तरीकरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
लिंग के आधार पर भी सामाजिक संस्तरण किया जाता है। इसके अंतर्गत पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग में अंतर किया जाता है। लिंग की भूमिकाएँ अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, लेकिन लिंग पर आधारित स्तरीकरण सार्वभौमिक होता है। उदाहरण के लिए पितृसत्तात्मक समाजों में पुरुषों के कार्यों को स्त्रियों की अपेक्षा अधिक महत्व प्रदान किया जाता है। समाज में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचनाओं पर पुरुषों का दबदबा कायम रहता है।

लिंग की समानता के समर्थक शिक्षा, सार्वजनिक अधिकारों में भागीदारी तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए स्त्रियों को समर्थ बनाए जाने की हिमायती हैं। वर्तमान समय में लिंग पर आधारित असमानताओं को हटाने की बात अधिक जोरदार तरीके से उठायी जा रही है। महिला आंदोलन के कारण लिंग पर आधारित भेदभावों को हटाने का सतत प्रयास किया जा रहा है। वर्तमान समय में लिंग भेद की अवधारणा जैविक भिन्नता के अलग हो गई है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार भिन्नता भूमिकाओं तथा संबंधों के संदर्भ में देखी जानी चाहिए।

प्रश्न 7.
स्तरीकरण की खुली बंद व्यवस्था अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्तरीकरण की खुली तथा बंद व्यवस्था में निम्नलिखित अंतर है –
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प्रश्न 8.
ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहाँ प्रतियोगिता नहीं है। क्या यह संभव है? अगर नहीं तो क्यों?
उत्तर:
समाज में प्रतियोगिता एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने समाज में प्रतियोगिता के महत्व को स्वीकार किया है। प्रतियोगिता किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्राप्न की जाती है। यथा विद्यालय की कक्षा में छात्रों में सर्वप्रथम स्थान पाने के लिए प्रतियोगिता की स्थिति उत्पन्न होती है। हॉकी की दो टीमों के बीच में प्रतियोगिता का अनुभव किया जा सकता है। दो उत्पादकों में प्रतियोगिता का स्वरूप अनुभव किया जा सकता है। हर्टन एवं हंट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पुरस्कार को प्रतिद्वंदियों से प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रतियोगिता है।

प्रतियोगिता का क्षेत्र व्यापक होता है। किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों अथवा समूहों के बीच प्रतियोगिता एक स्वरूप बनता है। स्पष्ट है कि ऐसे समाज की कल्पना असंभव है जहाँ प्रतियोगिता न हो। इसका कारण है कि प्रतियोगिता से जुड़े व्यक्तियों में अपने उद्देश्यों के प्रति समर्पण की भावना पैदा होती है। लोग अपनी गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। जैसे उत्पादकों के बीच में तीव्र प्रतियोगिता की स्थिति बनी रहती है। प्रत्येक उत्पादक अधिक से अधिक उपभोक्ताओं को उपहार प्रदान कर तथा विक्रेताओं को अधिक लाभांश देकर बाजार में सबसे आगे निकलना चाहता है। प्रतियोगिता सबसे आगे निकलने की प्रक्रिया है। प्रतियोगिता के बिना समाज अधूरा है।

प्रश्न 9.
संघर्ष से किस प्रकार सामाजिक विघटन होता है? समझाइए।
उत्तर:
संघर्ष द्वारा सामाजिक एकता के ताने-बाने को खंडित किया जाता है। एक प्रक्रिया के रूप में संघर्ष वस्तुतः सहयोग का प्रविवाद है । गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “संघर्ष वह सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अथवा समूह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अपने विरोधी को हिंसा या हिंसा के भय द्वारा प्रत्यक्ष आह्वान देकर करते हैं” बीसंज तथा बीसंज ने इस संबंध में लिखा है कि “फिर भी अधिक संघर्ष विनाशकारी होता है तथा जितनी समस्याओं को सुलझाता है उससे कहीं अधिक समस्याओं को जन्म देता है।”

वैयक्तिक स्तर पर विघटन-वैयक्तिक स्तर पर पृथक्-पृथक् स्वभाव, दृष्टिकोण, मूल्य, आदर्श तथा हित होने के कारण कोई भी दो व्यक्ति परस्पर समायोजित नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण उनके बीच संघर्ष होता है, इससे व्यक्तियों का सामाजिक विकास बाधित होता है। सामूहिक स्तर पर विघटन-सामूहिक स्तर पर संघर्ष दो समूहों अथवा समाजों के बीच होता है।

सामूहिक संघर्ष के निम्नलिखित उदाहरण है –

  • प्रजातीय संघर्ष
  • सांप्रदायिक संघर्ष
  • धार्मिक संघर्ष
  • मजदूर-मालिक संघर्ष
  • देश के बीच संघर्ष तथा
  • राजनीतिक दलों में संघर्ष

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
क्या आप भारतीय समाज के संघर्ष के विभिन्न उदाहरण ढूंढ सकते हैं? प्रत्येक उदाहरण में वे कौन से कारण थे जिसने संघर्ष को जन्म दिया? चर्चा कीजिए?
उत्तर:
‘संघर्ष विश्व के सभी समाजों में पाया जाता है। ग्रीन के अनुसार, “संघर्ष जान-बूझकर किया गया वह प्रयत्न है जो किसी भी इच्छा का विरोध करके उसके आड़े आने या उसे दबाने के लिए किया जाता है।” गिलिन और गिलिन के अनुसार, “संघर्ष वह सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति या समूह अपने विरोधी के प्रति प्रत्यक्षतः हिंसात्मक तरीके अपनाकर या उसे हिंसात्मक तरीका अपनाने की धमकी देकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहते हैं।”

इस प्रकार अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हिंसात्मक तरीके अपनाकर दूसरे के इच्छाओं का दमन करना संघर्ष कहलाता है। भारतीय समाज में भी अनेक प्रकार के संघर्ष विद्यमान हैं जिनमें प्रमुख हैं-जाति एवं वर्ग, जनजातीय संघर्ष, लिंग, नृजातीयता, धर्म, सांप्रदायिकता से जुड़े संघर्ष।

प्रमुख संघर्षों की चर्चा निम्नवत है –
(i) जातीय संघर्ष – समाजशास्त्री एच.ची. वेल्स का कहना है कि मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों के आधार पर समाज का स्तरीकरण करने से समाज का विकास तीव्र गति से होता है। प्राचीनकाल में भारतीय समाज ने स्वयं को स्थित तथा शक्तिशाली बनाने के लिए अपने सदस्यों को उनकी योग्यता, पटुता तथा शक्ति के अनुसार चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र में बांट दिया । यही प्राचीन वर्णों को चार अलग-अलग सामाजिक कार्य सौंप दिए गए। धीरे-धीरे यह असमानता ऊँच-नीच की भावनाओं का आधार बन गई और समाज में संघर्ष उत्पन्न हो गया। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन् ने इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय वर्ण-व्यवस्था में यद्यपि वंशानुगत क्षमताओं का महत्व तो था, तथापि यह व्यवस्था मुख्य रूप से गुण तथा कर्म सिद्धांतों पर आधारित थी।

पौराणिक काल के बाद कर्म सिगन्त का स्थान जन्म सिद्धांत ने ले लिया और वर्ण-व्यवस्था जाति-व्यवस्था के स्वरूप में परिवर्तित हो गई जाति-व्यवस्था में सामाजिक असमानता का स्वरूप हो गया। ब्राह्मण सबसे उच्च तथा पवित्र माने गए; तो क्षत्रिय का स्थान द्वितीय माना गया, वैश्य का स्थान तीसरा तथा शूद्र का स्थान चौथा माना गया। एक वर्ण में फिर अनेक जातियाँ, उप-जातियों बनी, उनमें उच्चता और निम्नता की सीढ़ियाँ बनती चली गई, इनका आधार जन्म था, इसलिए इस व्यवस्था में दृढ़ता और रूढ़िवादिता आती चली गई, इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में स्तरीकरण के सिद्धांत के अन्तर्गत जाति व्यवस्था का जन्म हुआ।

इस जाति-व्यवस्था के आधार पर भारतीय समाज में विभिन्न प्रकार की सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक असमानताएँ उत्पन्न होती चली गई। अनेक समाजशास्त्रियों का कहना है कि भारतीय समाज में जाति-प्रथा के कारण जो सामाजिक असमानता, भेद-भाव तथा छुआछूत की भावना दिखाई देती है, ऐसे भेदभाव की भावना संसार के अन्य किसी समाज में देखने को नहीं मिलती है जिसने जातिगत संघर्ष को जन्म दिया। इस संघर्ष को जातिवाद नाम दिया गया।

निराकरण-जातिवाद विभिन्न संघर्षों को जन्म देता है। इसके निराकरण के लिए डॉ. जी. एस. घुरिये ने सुझाव दिया था कि अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। समाजशास्त्री पी.एच.प्रभु की मान्यता डालकर जातिवाद को दूर किया जा सकता है। डॉ. राव ने वैकल्पिक समूहों के निर्माण में जातिवाद को समाप्त करने के लिए कहा है। कुछ समाजशास्त्रियों ने जातिवाद से छूट पाने केलिए आर्थिक विकास को अत्यन्त आवश्यक माना है। सरकार ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों, अछूतों की निर्योग्यताओं को समाप्त कर उच्च जातियों के समकक्ष लाने का प्रयत्न किया है जिसके लिए अस्पृष्ठता अधिनियम, 1995 पारित किया गया और इस असमानता को दूर करने में सरकार ने सफलता भी प्राप्त की है।

(ii) नृजातीय संघर्ष – समाजशास्त्रियों ने प्रजातीय दृष्टि से भारत को विभिन्न प्रजातियों का ‘द्रवणपात्र’ और प्रजातियों का अजायबघर की संज्ञा दी है। भारत में संसार की तीनों प्रमुख प्रजातियाँ श्वेत प्रजाति, पीत प्रजाति एवं काली प्रजाति और अनेक उपशाखायें निवास करती हैं। उत्तर भारत में आर्य प्रजातीय भिन्नता होने पर भी भारत में अमेरिका और अफ्रीका की भांति प्रजातीय संघर्ष और दंगे-फसाद नहीं हुए हैं, बल्कि उनमें पारस्परिक सद्भाव एवं सहयोग ही रहा है।

छिटपुट घटनाएँ होना साधारण बात है। भारत में विभिन्न प्रजातियों का मिश्रण भी हुआ है। स्पष्ट है कि भारत में प्रजातिवादी संघर्ष की समस्या नहीं पायी जाती है। भारतीय समाज प्रारंभ से ही मानता रहा है कि भारत में प्रजातिवाद एक अवैज्ञानिक अवधारणा है। भारत की भौगोलिक विशेषताओं एवं आजीविका के प्रचुर साधन विभिन्न प्रजातीय समूहों के लिए प्रारंभ से ही आकर्षण का केन्द्र बन रहे हैं।

(iii) जनजातीय संघर्ष – वर्तमान में सम्पूर्ण जनजातीय भारत संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस संक्रमण के दौरान जनजातियों में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं। इन समस्याओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग जनजातियों में भिन्न-भिन्न हैं। कुछ जनजातियों में जनसंख्या की वृद्धि हो रही है, जैसे-भील और गोंड में तो कुछ जनजातियों में, जैसे-टोडा एवं कोरबा में जनसंख्या घट रही है।

कई जनजातियाँ नगरीय संस्कृति के संपर्क में आई हैं जिसके फलस्वरूप उनकी मूल संस्कृति में कई परिवर्तन हुए हैं। उनमें दिशाहिनता एवं सांस्कृतिक छिन्न-भिन्नता उत्पन्न हुई है और मानसिक असंतोष में वृद्धि हुई है। ब्रिटिश काल में जनजातिय लोगों के संपर्क ईसाई मिशनरियों और राज्य कर्मचारियों के साथ बढ़े। परिणामस्वरूप उन्हें कुछ लाभ तो प्राप्त हुए, किन्तु इनसे उनके जीवन में विघटन भी प्रारंभ हो गया।

जनजातीय लोगों के संपर्क ईसाई मिशनरियों और राज्य कर्मचारियों के साथ बढे। परिणामस्वरूप उन्हें कुछ लाभ तो प्राप्त हुए, किन्तु जनजातियों के निवास क्षेत्र में व्यापारी और ठेकेदार लोग पहुँच गए। उन्होंने जनजातीय लोगों का खूब आर्थिक शोषण किया और कम मजदूरी पर उनसे अधिक श्रम लेने लगे सूदखोरों ने इन लोगों की जमीनें कम दामों में खरीद ली और अपने घर में वे परायों की तरह कृषि मजदूर के रूप में काम करने लगे।

कभी-कभी इनसे बेगारी भी ली जाने लगी। ठेकेदारों एवं व्यापारियों ने कहीं-कहीं जनजातीय स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध भी स्थापित किये जिसके परिणामस्वरूप अनेक जनजातीय लोग गुप्त रोगों से पीड़ित हो गए। इस संपर्क के फलस्वरूप जनजातियों में वेश्यावृत्ति पनपी। ईसाई मिशनरियों ने जनजातीय धर्म के स्थान पर ईसाई धर्म को स्थापित कर आदिवासियों को अपने पड़ोसी समुदाय से अलग कर दिया।

इससे आदिवासियों में धार्मिक और सामाजिक एकता का सकंट पैदा हो गया, सांस्कृतिक और राजनीतिक समस्याएँ खड़ी हुईं, उनमें पृथकता की भावना पनपी और वे पृथक् राज्य की मांग करने लगे। इसके लिए संघर्ष प्रारंभ हुआ। इस संघर्ष के कारण उत्तरांचल, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे नवीन राज्यों का गठन हुआ।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 2.
सामाजिक संरचना किसे कहते हैं? इसके विभिन्न तत्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक संरचना का अर्थ-सामाजिक संरचना का तात्पर्य उन विभिन्न पद्धतियों से है जिनके अंतर्गत सामूहिक नियमों, भूमिकाओं तथा कार्यों के साथ एक स्थिर प्रतिमान संगठित होता है। प्रमाजिक संरचना अदृश्य होती है, लेकिन यह हमारे कार्यों के स्वरूप को स्पष्ट करती है। सामाजिक संरचना के निम्नलिखित तत्व हमारे कार्यों का निर्देशन करते हैं –

  • सामाजिक प्रस्थितियाँ
  • सामाजिक भूमिकाएँ
  • सामाजिक मानक
  • सामाजिक मूल्य

सामाजिक संरचना की तुलना एक भवन से की जा सकती है। एक भवन के अंतर्गत निम्नलिखित तीन तत्व पाए जाते हैं –

  • भवन निर्माण सामग्री जैसे-ईंटें, गामा, बीम तथा स्तंभ।
  • इन सभी को एक निश्चित क्रम में जोड़ा जाता है तथा एक-दूसरे से मिलाकर रखा जाता है।
  • भवन सामग्री के इन सब तत्वों को मिलाकर भवन का एक इकाई के रूप में निर्माण किया जाता है।

उपरोक्त वर्णित विशेषताओं का प्रयोग सामाजिक संरचना का वर्णन करने में किया जा सकता है। एक समाज की संरचना का निर्माण निम्नलिखित तत्वों से मिलकर बनता है –

  • स्त्री, पुरुष, वयस्क तथा बच्चे, अनेक व्यावहारिक तथा धार्मिक समूह आदि।
  • समाज के विभिन्न अंगों में अंतःसंबंध जैसे जैसे पति-पत्नी के बीच संबंध, माता-पिता तथा उनके बीच संबंध तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संबंध।
  • समाज के सभी अंग मिला दिए जाते हैं ताकि वे एक इकाई के रूप में कार्य कर सकें।

सामाजिक संरचना की परिभाषा –
(i) गिन्सबर्ग के अनुसार, सामाजिक संरचना के अध्ययन का संबंध सामाजिक संगठन के प्रमुख स्वरूपों, यथा समूहों, समितियों तथा संस्थाओं के प्रकारों तथा इनके संकुल जो समाजों के निर्माण करते हैं, से है। सामाजिक संरचना के विस्तृत वर्णन में तुलनात्मक संस्थाओं के समग्र क्षेत्र का अध्ययन समाहित है।”

(ii) रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार “सामाजिक संरचना के घटक मानव प्राणी हैं, स्वयं संरचना तो व्यक्तियों को क्रमबद्धता है, जिनके संबंध संस्थात्मक रूप से परिभाषित एवं नियमित हैं।

(iii) टॉलकॉट पारसंस के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर संबंधित संस्थाओं, अभिकरणों और सामाजिक प्रतिमानों तथा साथ ही समूह में प्रत्येक सदस्य द्वारा ग्रहण किए गए पदों तथा कार्यों की विशिष्ट क्रमबद्धता को कहते हैं।”

(iv) जॉनसन के अनुसार “किसी भी वस्तु की संरचना उसके अंगों में पाये जाने वाले अपेक्षाकृत स्थायी अंतःसंबंधों को कहते हैं। इसके अलावे, अंग शब्द स्तंभ स्थिरता की कुछ मात्रा का बोध कराता है। सामाजिक व्यवस्था व्यक्तियों के अंत:संबंधित कार्यों से निर्मित होती है, इसलिए इसकी संरचना की खोज इन कार्यों में नियमितता या पुरावृत्ति की कुछ मात्रा में की जाती है।”

(v) कर्ल मानहीम के अनुसार, “सामाजिक संरचना परस्पर क्रिया करती हुई सामाजिक शक्तियों का जाल है, जिसमें अवलोकन तथा चिंतन की विश्वप्रणालियों को जन्म होता है।

(vi) रॉबर्ट के. मर्टन ने संरचना पर प्रतिमानहीनता के संदर्भ में विचार किया है। मर्टन के अनुसार सामाजिक संरचना के निम्नलिखित दो तत्व अत्यकि महत्वपूर्ण हैं

  • सांस्कृतिक लक्ष्य तथा
  • संस्थागत प्रतिमान।

सांस्कृतिक तत्व के अंतर्गत वे लक्ष्य तथा उद्देश्य आते हैं जो संस्कृति द्वारा स्वीकृत होते हैं। इसके अलावा, समाज के अनेक सदस्यों में से प्राय:सभी सदस्य उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। संस्थागत प्रतिमान के अंतर्गत लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संस्कृति द्वारा स्वीकृत साधनों/प्रतिमानों को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में सांस्कृतिक लक्ष्यों तथा संस्थागत प्रतिमानों के बीच पाया जाने वाला संतुलन ही सामाजिक संरचना है। मर्टन के विचार में इसके बीच संतुलन की स्थिति भंग होने पर समाज में प्रतिमामहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सामाजिक संरचना की प्रमुख विशेषताएँ –

  • प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था के दो पक्ष होते हैं –
    (a) संरचनात्मक पक्ष तथा
    (b) प्रकार्यात्मक पक्ष
  • मानव आवश्यकताएँ सामाजिक संरचना का मूल आधार हैं।
  • समुदाय, समूह, समिति तथा संगठन सामाजिक संरचना के मुख्य भाग हैं।
  • समुदाय संरचना की प्रकृति मूल्यपरक होती है।
  • सामाजिक संरचना के इस पक्ष के अंतर्गत प्रथाएँ, जनरीतियों, मूल्यों, सांस्कृतिक मापदंडों तथा कानूनों के द्वारा संबद्ध होते हैं।
  • सामाजिक संरचना के विभिन्न भागों जैसे समुदाय, समिति, समूह तथा संगठन आदि परस्पर प्रथाओं, जनरीतियों तथा कानूनों द्वारा संबद्ध होते हैं।
  • इन सभी भागों के अपने प्रकार्य हैं। इन प्रकार्यों का निर्धारण सामाजिक प्रतिमानों तथा मूल्यों के द्वारा होता है।

सामाजिक संरचना के प्रमुख तत्व-सामाजिक संरचना के प्रमुख तत्व निम्नलिखित हैं –

(i) आदर्शात्मक व्यवस्था – आदर्शात्मक व्यवस्था समाज के सम्मुख कुछ आदर्शों तथा मूल्यों को प्रस्तुत करती है। इन आदर्शों तथा मूल्यों के अनुसार संस्थाओं तथा समितियों को अंतः संबंति किया जाता है। व्यक्तियों द्वारा समाज स्वीकृत आदर्शों तथा मूल्यों के अनुसार अपनी भूमिकाओं को निभाया जाता है।

(ii) पद व्यवस्था – पद व्यवस्था द्वारा व्यक्तियों की प्रस्थितियों तथा भूमिकाओं का निर्धारण किया जाता है।

(iii) अनुज्ञा व्यवस्था – प्रत्येक समाज में आदर्शों तथ मूल्यों को समुचित तरीके से लागू करने के लिए अनुज्ञा व्यवस्था होती है। वास्तव में सामाजिक संरचना के विभिन्न अंगों का समन्वय सामाजिक आदर्शों तथा मूल्यों को पालन करने पर निर्भर करता है।

(iv) पूर्वानुमानित अनुक्रिया व्यवस्था – पूर्वानुमानित अनुक्रिया व्यवस्था सामाजिक संरचना, स्तरीकरण एवं समाज में सामाजिक प्रक्रियाएँ लोगों से सामाजिक व्यवस्था में भागीदारी की मांग करती है। इसके द्वारा सामाजिक संरचना को गति मिलती है।

(v) क्रिया व्यवस्था – क्रिया व्यवस्था के द्वारा सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को पूर्ण किया जाता है। वह सामाजिक संरचना को आवश्यक गति भी प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
किसी समाज की उत्तरजीविता के लिए विभिन्न प्रकार्यों की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
प्रकार्य वस्तुतः किसी भी समाज की उत्तरजीविका तथा निरंतरता के लिए आवश्यक है। किसी भी संरचना का विशिष्ट कार्य ही उसका प्रकार्य कहलाता है। प्रकार्यों में अंतिनिर्भरता पायी जाती है। प्रकार्य समाज को बनाए रखने तथा उसमें स्थिरता तथा निरंतरता के लिए आवश्यक है। प्रकार्यों की सफलता तथा असफलता का प्रभाव समाज के अन्य संगठनों के प्रकार्यों को प्रभावित करता है। किसी भी समाज की उत्तरजीविका तथा निरंतरता के लिए निम्नलिखित प्रकार्य आवश्कय हैं

(i) सदस्यों की भर्ती – सभी समाजों में प्रजनन नए सदस्यों की भर्ती का मूल स्रोत है। हालांकि अप्रवास तथा नए क्षेत्रों को मिलाकर भी नए सदस्यों को भर्ती की जा सकती है।

(ii) समाजीकरण – ऑग्बर्न के अनुसार, “समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिससे कि व्यक्ति समूह के आदर्श नियमों के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है।” सामाजिक व्यवस्था मुख्य रूप से समाजीकरण पर आधारित होती है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा एक जैविक मनुष्य एक सामाजिक प्राणी में बदल जाता है। समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही व्यक्ति सामाजिक मूल्यों, मानकों, नियमों तथा कुशलताओं को सीखता है। समाजीकरण की प्रक्रिया के दो माम निम्नलिखित हैं

  • अनौपचारिक माध्यम-जैसे-परिवार, मित्र समूह तथा पड़ोस।
  • औपचारिक साधन-जैसे-विद्यालय तथा अन्य संस्थाएँ।

समाजीकरण की प्रक्रिया निरतर रूप से जीवन-पर्यन्त चलती रहती है।

(iii) वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन एवं वितरण-समाज की उत्तरजीविता तथा निरंतरता हेतु समाज के सदस्यों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक है। आर्थिक आवश्यकताओं के अंतर्गत वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन ही पर्याप्त नहीं है वरन् उनका क्रमबद्ध तरीके से सूक्ष्म वितरण भी आवश्यक है। सभी समाजों में मानकों तथा मूल्यों का समुचित विकास किया जाता है, जिससे वस्तुओं तथा सेवाओं का उपयुक्त निर्धारण हो सके। उत्पादन के अनुपयुक्त वितरण से समाज में भ्रांति तथा अराजकता उत्पन्न हो सकती है।

(iv) व्यवस्था का संरक्षण-व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए सभी समाजों में नियमों की कोई न कोई व्यवस्था अपनायी जाती है। समाज को नष्ट होने से बचाने के लिए उसका संरक्षण जरूरी है। व्यवस्था का संरक्षण औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों के माध्यम से किया जाता है। अनौपचारिक साधनों के अंतर्गत रूढ़ियों, लोकाचार, मानक तथा दबाव समूह आदि आते हैं लेकिन आधुनिक समाजों में व्यवस्थरा के संरक्षण हेतु औपचारिक साधन कानून व न्यायालय हैं।

प्रश्न 4.
संरचना, प्रकार्य व व्यवस्था के संबंधों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संरचना, प्रकार्य तथा व्यवस्था के बीच संबंध-संरचना तथा प्रकार्य सामाजिक व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। यही कारण है कि सामाजिक संरचना की तुलना मानव शरीर या भवन से की जाती है। जिस प्रकार शरीर तथा भवन में अनेक भाग होते हैं, उसी प्रकार सामाजिक संरचना का निर्माण अनेक तत्वों से मिलाकर होता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री स्पेंसर समाज को एक व्यवस्था के रूप में वर्णित करते हैं। एक व्यवस्था के रूप में समाज अपने विभिन्न अंगों के पारस्परिक संबंधों से मिलकर निर्मित होता है।

अपनी धारणा को और अधिक स्पष्ट करने के लिए स्पैंसर समाज की तुलना मानव शरीर से करते हैं। जिस तरह मानव शरीर के विभिन्न अंगों का समुच्चय शरीर है, उसी प्रकार संगठनों, संस्थाओं तथा समूहों के रूप में समाज के अनेक अंग हैं। उनके पारस्परिक संबंधों तथा मिले-जुले स्वरूप को ही सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। स्पेंसर समाज को एक प्रणाली के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन अपनी व्याख्या में उन्होंने व्यवस्था तथा संरचना में अंतर किया है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री पैरेटो व्यवस्था की व्याख्या समाज के विभिन्न अंगों के अंत:संबंधों के रूप में करते हैं। दूसरी तरफ, टालकाट पारसंस ने सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा को तार्किक रूप से परिभाषित किया है। पारसंस के अनुसार, “एक सामाजिक व्यवस्था एक ऐसे परिस्थिति में जिसका कि कम से कम एक भौतिक या पर्यावरण संबंधी पक्ष हो, अपनी आवश्यकताओं की आदर्श पूर्ति से प्रवृति से प्रेरित होने वाले अनेक व्यक्तिगत कर्ताओं की परस्पर अंत:क्रियाओं के फलस्वरूप होती है तथा इन अंत:क्रियाओं में संलग्न व्यक्तियों का पारस्परिक संबंध तथा उनकी स्थितियों के साथ संबंध को सांस्कृतिक रूप से संरचित तथा स्वीकृत प्रतीकों की एक व्यवस्था द्वारा परिभाषित तथा मध्यस्थित किया जाता है।”

संक्षेप में पारसंस ने कहा है कि “सामाजिक व्यवस्था अनिवार्य रूप में अंतः क्रियात्मक संबंधों का जाल है।” – शरीर के संरचनात्मक अध्ययन में शरीर के विभिन्न अंगों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन किया जाता है। हाथ, पैर, आँख, नाक, कान आदि अलग-अलग रहकर शरीर का निर्माण नहीं करते हैं। वस्तुतः इनका मिला-जुला स्वरूप ही शरीर है। उसी प्रकार एक भवन में छत, दरवाजे, दीवारें तथा खिड़कियाँ आदि होते हैं लेकिन अकेली छत, खिड़की या दीवार भवन नहीं हो सकती।

विभिन्न संस्थाएँ, समूह तथा संगठन ही मिलकर सामाजिक संरचना का निर्माण करते हैं। सामाजिक संरचना एक गतिशीलता वास्तविककता है। सामाजिक संरचना बदलती हुई परिस्थतियों से अनुकूलन की क्षमता रखती है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न कार्यों को करते हैं, ठीक उसी प्रकार सामाजिक संरचना के विभिन्न अंग भी विभिन्न आवश्यकताओं तथा प्रकार्यों को पूरा करते हैं।

प्रकार्य का तात्पर्य समाज को निर्मित करने वाले विभिन्न अंगों या इकाईयों के कार्यों से है। प्रकार्य सामूहिक मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक होते हैं रेडिक्लिफ ब्राउन का मत है कि प्रकार्यों द्वारा ही संपूर्ण समाज का अस्तित्व बना रहा है। पैरेटो ने कहा है कि समाज संतुलन की एक व्यवस्था है और इसका प्रत्येक अंग एक-दूसरे पर निर्भर है।

एक अंग में होने वाला परिवर्तन दूसरे अंग को प्रभावित करता है। इसी प्रकार एक भाग जब तक अपने कार्यों का निष्पादन उचित प्रकार से करता रहता है, तब तक संतुलन की स्थिति बनी रहती है तथा सामाजिक व्यवस्था निर्बाध रूप से चलती रहती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 5.
समाज के लिए संरचना व प्रकार्य के महत्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाज के लिए संरचना का महत्व-सामाजित संरचना का तात्पर्य उन विभिन्न पद्धतियों से है जिसके अंतर्गत सामाजिक संरचना के तत्व हमारे कार्यों के साथ एक स्थिर प्रतिमान संगठित होता है। सामाजिक संरचना के तत्व हमारे कार्यों को निर्देशित करते हैं। सामाजिक संरचना के निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण हैं –

  • सामाजिक प्रस्थितियाँ
  • सामाजिक भूमिकाएँ
  • सामाजिक मानक
  • सामाजिक मूल्य तथा
  • आवश्यकताएँ

व्यक्तियों की सामाजिक जीवन में अनेक आवश्यकताएँ होती हैं। इन आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रक्रिया में व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से अंत:क्रिया तथा अंत:संबंध विकसित करता है। इसी संदर्भ में व्यक्ति अनेक भूमिकाओं का संपादन करता है। उदाहरण के लिए परिवार में एक व्यक्ति5 पिता, पुत्र पति तथा भाई आदि की भूमिका निभाता है। भूमिकाओं की इस बहुलता को भूमिकाकुलक कहते हैं। व्यक्तियों की आवश्यकताओं, भूमिकाओं, प्रतिस्थतियों, मानकों तथा मूल्यों के अनुसार सामाजिक प्रणाली की संरचना तथा उप-संरचना में विभेदीकरण तथा विविधता पापी जाती है।

उदाहरण के लिए विवाह की संस्था से संबद्ध पति, पत्नी तथा बच्चों की जो भूमिका तथा प्रस्थिति है, उसी के परिणामस्वरूप परिवार तथा नातेदारी जैसे संबंधों की संरचनात्मक तत्वों का समूहीकरण कहा है। अतः समाज के लिए संरचना का महत्व अत्यधिक है। यह समाज के लिए विकास के लिए अपरिहार्य है। संरचना के माध्यम से समाज के मानकों तथा मूल्यों का विकास होता है।

समाज के लिए प्रकार्यों का महत्व – रॉबर्ट के. मर्टन के अनुसार, “प्रकार्य वे अवलोकित परिणाम हैं जो सामाजिक व्यवस्था से अनुकूलन व सामंजस्य को बढ़ाते हैं।” रैडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “किसी सामाजिक इकाई का प्रकार्य उस इकाई द्वारा किए जाने वाला वह योगदान है जिसे वह सामाजिक व्यवस्था की क्रियाशीलता हेतु सामाजिक जीवन को प्रदान करता है।”

हैरी.एम. जानसन एक विशेष प्रकार का उपसमूह, एक कार्य, एक सामाजिक मान्यता अथवा एक सांस्कृतिक मूल्य का योगदान प्रकार्य कहलाता है, जबकि वह एक सामाजिक व्यवस्था अथवा उपव्यवस्था की एक अथवा अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे।”

उपरोक्त वर्णित परिभाषाओं के आधार पर समाज के लिए प्रकार्यों का महत्व निम्नलिखित है –

  • सामाजिक प्रकार्यों द्वारा सामाजिक व्यवस्था तथा सामाजिक संगठन को बनाए रखने में सहायता मिलती है।
  • प्रकार्यों का तार्प्य समाज को बनाने वाले विभिन्न अंगों या कार्यों से होता है।
  • समाज के विभिन्न अंगों तथा संस्थाओं के प्रकार्य अलग-अलग होते हैं लेकिन उनके बीच पारस्परिक संबंध पाया जाता है। इन्हें प्रकार्यात्मक कहते हैं।
  • प्रकार्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सहायक होते हैं।
  • प्रकार्य सकारात्मक सामाजिक अवधारण है इनके द्वारा समाज में मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
  • प्रकार्य समाज के अस्तित्व के लिए अपरिहार्य हैं।
  • प्रकार्यों के साथ-साथ समाज में अकार्य भी पाये जाते हैं।

मार्टन के अनुसार, “अकार्य निरीक्षण द्वारा स्पष्ट होने वाले परिणाम हैं जो सामाजिक व्यवस्था के अनुकूलन अथवा अभियोजन को कम कर देते हैं।” अकार्य एक नकारात्मक अवधारणा है जिनसे समाज में विघटन उत्पन्न होता है।

प्रकार्य किसी भी समाज की निरंतरता को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य करते हैं –

  • नए सदस्यों की भर्ती-इसका मूल स्रोत प्रजनन है।
  • समाजीकरण-समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा जैविक मनुष्य का एक सामाजिक प्राणी में बदल जाता है।
  • वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन वितरण-समाज को बनाए रखने के लिए. वस्तुओं और सेवाओं का उचित उत्पादन तथा वितरण आवश्यक है।
  • व्यवस्था का संरक्षण-प्रत्येक समाज में सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण हेतु औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों को अपनाया जाता है।
  • आधुनिक समाजों में कानून तथा न्यायालय जैसे औपचारिक साधनों का महत्व बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 6.
प्रतियोगिता की विस्तृत व्याख्या दीजिए।
उत्तर:
हार्टन तथा हंट के अनुसार, “किसी भी पुरस्कार को प्रतिद्वंदीयों से प्राप्त करने की प्रक्रिया ही प्रतियोगिता है” सदरलैंड, वुडवर्ड तथा मैक्सवैल के अनुसार, “प्रतियोगिता कुछ व्यक्तियों तथा समूहों के बीच उन संतुष्टियों को प्राप्त करने के लिए होने वाला अवैयक्तिक, अचेतन तथा निरंतन संघर्ष है, जिनकी पूर्ति सीमित होने के कारण उन्हें सभी व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकते।”

मसर तथा वारंडरर ने प्रतियोगिता का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से दिया है –

  • विशुद्ध एवं सीमित प्रतियोगिता
  • निरपेक्ष प्रतियोगिता एवं सापेक्ष प्रतियोगिता
  • वैयक्तिक एवं अवैयक्तिक प्रतियोगिता
  • सृजनात्मक एवं असृजनात्मक प्रतियोगिता

1. विशुद्ध एवं सीमित प्रतियोगिता – सैद्धांतिक तौर पर प्रतियोगिता का स्वरूप विशुद्ध हो सकता है। इसका तात्पर्य है कि प्रतियोगिता बिना सांस्कृतिक बंधनों के भी हो सकती है। विशुद्ध प्रतियोगिता आदर्श प्रतियोगिता होती है। दूसरी तरफ, जब प्रतियोगिता में सहयोग आ जाता है तथा व्यक्ति नियमों के अनुसार प्रतियोगिता में भाग लेते हैं, यह सीमित प्रतियोगिता कहलाती है।

2. निरपेक्ष प्रतियोगिता एवं सापेक्ष प्रतियोगिता – अनेक बार व्यक्ति अथवा समूह द्वारा सीमित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतियोगिता की जाती है। सफल व्यक्ति द्वारा ही उस सीमित लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए हमारे देश में एक ही व्यक्ति उप-राष्ट्रपति के चुनाव में विजय प्राप्त कर सकता है। पराजित व्यक्ति को उस पद का लाभ नहीं मिलता है। उसे निरपेक्ष प्रतियोगिता कहते हैं।

दूसरी ओर, जब व्यक्तियों द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठा, शक्ति तथा धन आदि को प्राप्त करने के लिए प्रयास किया जात है तथा वे अपने प्रयास में सफलता प्राप्त करते हैं लेकिन वह यह आशा नहीं करते हैं कि उनके प्रतियोगितों के पास प्रतिष्ठा, शक्ति तथा धन आदि में से कुछ भी न हो । इन समस्त प्राप्तियों का अनुपाल कम या अधिक हो सकता है। इसे सापेक्ष प्रतियोगिता कहा जाता है।

3. वैयक्तिक एवं अवैयक्तिक प्रतियोगिता – कभी-कभी दो व्यक्तियों के मध्य प्रतियोगिता होती है। दोनों व्यक्ति एक-दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से अन्तः क्रिया करते हैं। इस प्रतियोगिता में एक व्यक्ति अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी एक पद को प्राप्त करने के लिए जब अनेक व्यक्तियों द्वारा प्रयास किया जाता है तो उसे वैयक्तिक प्रतियोगिता कहते हैं।

अवैयक्तिक प्रतियोगिता विशालकाय व्यावहारिक प्रतिष्ठानों के मध्य देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए कार तथा टी.वी. बनाने वाली कंपनियों के बीच अपने-अपने उत्पादों को बाजार में बेचने के लिए अवैयक्तिक प्रतियोगिता पायी जाती है लेकिन इन कंपनियों के कर्मचारियों के बीच वैयक्तिक अन्त:क्रिया के रूप में प्रतियोगिता नहीं पायी जाती है।

4. सृजनात्मक एवं असृजनात्मक प्रतियोगिता – जिस प्रतियोगिता से विकास को बल मिलता है उसे सृजनात्मक प्रतियोगिता कहा जाता है। उसके विपरीत जिस प्रतियोगिता से विकास के कार्य में बाधा पहुँचती है, उसे असृजनात्मक प्रतियोगिता कहते हैं।

प्रश्न 7.
सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
सदरलैण्ड तथा मैक्सवेल के अनुसार, “सामाजिक स्तरीकरण अन्त:क्रिया तथा विभेदीकरण की प्रक्रिया है, जिसके आधार पर कुछ व्यक्तियों का स्थानक्रम अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा उच्च होती है।”
असमानता का तथ्य सामाजिक स्तरीकरण में अन्तर्निहित होता है।

सामाजिक स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • समाज में शक्ति, प्रतिष्ठा, संसाधनों, पुरस्कारों तथा सुविधाओं का असमान वितरण पाया जाता है।
  • विभेदीकृत वितरणात्मक प्रक्रियाओं के आधार पर समाज में सामाजिक श्रेणियों तथा मूहों का निर्माण होता है।
  • किसी भी समाज की सामाजिक संरचना में श्रेणियों अथवा स्तरों के पदासोपानक्रम का निर्धारण शक्ति, प्रतिष्ठा तथा विशेषाधिकारों के आधार पर होता है।
  • समाज में पायी जाने वाली श्रेणियों तथा स्तरों के बीच अन्तःक्रिया तथा पारस्परिक संबंध उच्चता व निम्नता की अवधारणा पर आधारित होते हैं।
  • किसी भी समाज में श्रेणियों तथा स्तरों के पारस्परिक संबंधों में क्रमबद्ध सामाजिक असमानता पायी जाती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण की प्रक्रिया में श्रेणियों तथा स्तरों की संरचना में प्रत्येक समाज तथा काल में परिवर्तन होते हैं।
  • सामाजिक स्तरीकरण एवं सार्वभौमिक प्रक्रिया है। सामाजिक असमानता इसका मूल आधार है।
  • सामाजिक संरचना तथा स्तरीकरण में अत्यधिक निकटता पायी जाती है।
  • भूमिका तथा प्रस्थिति सामाजिक संस्तरण का मूल आधार है।
  • सामाजिक गतिशीलता तथा संस्तरण एक-दूसरे से संबंधित हैं।

प्रश्न 8.
संघर्ष को किस प्रकार कम किया जा सकता है? इस विषय पर उदाहरण सहित निबंध लिखिए।
उत्तर:
संघर्ष को कम करने के संबंध में हम अंतरपीढ़ी संघर्ष पर विचार-विमर्श कर भलीभाँति समझ सकते हैं – समाज सैदव बना रहता है, लेकिन पीढ़ियाँ निरंतर आती-जाती रहती है। पुरानी पीढ़ी का स्थान नवीन पीढ़ी ग्रहण करती रहती है। यह समाज में निरंतर चलने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। जन्म, मरण प्राकृतिक घटनाएँ हैं। पुरानी पीढ़ी अनुभवों की दृष्टि से सुदृढ़ होती है।

वह परम्पराओं, प्रथाओं एवं रूढ़ियों से प्रायः बंधी होती है। पुरानी पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से जो विरासत में प्राप्त किया है, वह उनकी धरोहर होती है और वे उस धरोहर को आगामी पीढ़ी को हस्तान्तरित करना चाहते हैं। सामान्यतः ऐसा देखा गया है कि नवीन पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों का आदर करती है और उनकी आज्ञाओं का पालन करती आई है, लेकिन आधुनिक युग में कुछ ऐसी शक्तियाँ कार्य कर रही हैं कि पीढ़ियों के मध्य दूरी बढ़ती जा रही है।

नवीन पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के लोगों का दकियानूस, कम ज्ञापन रखने वाले, परम्परावादी, अंधविश्वासी और रूढ़िवादी समझती है। इसके मुख्य कारण हैं-बढ़ती हुई शिक्षा, विज्ञान का प्रभाव आदि। आधुनिकता के नाम पर नवीन पीढ़ी परम्पराओं का विरोध करती है और पुरानी पीढ़ी जो कि परम्पराओं को बनाये रखने को प्राथमिकमा देती है, उससे उनका संघर्ष होना स्वाभावित हो जाता है। इसे ही अंतर पीढ़ी संघर्ष कहते हैं।

पीढ़ियों के मध्य दूरी से आशय है कि दोनों के विचारों, आस्थाओं, कार्य करने तरीकों और जीवन-पद्धति में अंतर। एक और पुरानी पीढ़ी तो परम्पराओं से बंधकर, पूर्वजों की संस्कृति को आगे और बढ़ाते हुए, सोच-समझकर धैयपूर्वक किसी कार्य को सम्पन्न करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर, नई पीढ़ी अर्थात् युवाओं में स्फूर्ति एवं जोश होता है। वे नवीनता ही हाड़ में आगे निकलना चाहते हैं, अत: वे परम्पराओं की अवहेलना करने में संकोच नहीं करते हैं।

उननके कार्य करने का तरीका भी पुरानी पीढ़ी से भिन्न होता है। ये किसी भी कार्य का अधिक-सोचे-बिना, अधैर्यता से तथा शीघ्र करना चाहते हैं। वास्तप में दोनों पीढ़ियों को एक-दूसरे में दोष व कमियाँ दिखाई देती हैं, फलस्वरूप वे अपने विचारों एवं कार्यप्रणाली में समन्वय एवं ताल-मेल नहीं बैठा पाते, जिसका परिणाम आपसी सम्बन्धी में तनाव, कटुता एवं कभी-कभी संघर्ष भी हो जाता है। कभी-कभी परिवार में इसके गम्भीर प्ररणाम भी दिखाई देते हैं।

वैसे तो पीढ़ियों के मध्य यह दूसरी समाज में सदैव विद्यमान रही है, क्योंकि आज जिन विचारों, वस्तुओं, मूल्यों, भावनाओं आदि को हम नवीनता कहते हैं, अगली पीढ़ी के लिए वे ही तथ्य परम्परा के रूप में परिणत हो जाते हैं। समाज हमेशा अदलता रहता है और उसी के साथ-साथ परम्परा एवं आधुनिकता भी बदलती रहती है। पुरानी पीढ़ी सदैव परम्परा के पक्ष में रहती है और नवीन पीढ़ी आधुनिकता के।

अतः यह स्वाभाविक है कि पीढ़ियों के मध्य दूरी तक न कुछ अंशें में सदैव विद्यमान रहीत है, लेकिन साथ-साथ यह भी कहा जा सकता है कि दोनों पीढ़ियों के व्यक्ति साझेदारी से काम लें और एक-दूसरे के विचारों, भावनाओं तथा समय की मांग को समझें तो यह दूरी निश्चित रूप से कम हो सकती है। शिक्षा के विकास के साथ-साथ भी यह दूरी कम होनी-ऐसा निश्तिच रूप से कहा जा सकता है?

अंतर-पीढ़ी संघर्ष विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है, ये क्षेत्र प्रमुख रूप से निम्नलिखित हैं –

(i) अंतर-पीढ़ी प्रजातीय संघर्ष – जब दो या दो से अधिक प्रजातियाँ एक ही स्थान पर एक साथ निवास करने लगती हैं और उसमें एक-दूसरे की शारीरिक विशेषताओं के प्रति चेतना उत्पन्न हो जाती है तब प्रजातीय संघर्ष की उत्पत्ति होती है। प्रायः अमेरिका में नीग्रो और श्वेत प्रजाति और अफ्रीका में श्वेत एवं वहाँ के मूल निवासियों तथा भारतीयों के बीच संघर्ष चला करता है। इन प्रजातियों में संघर्ष का कारण शारीरिक विभिन्नताओं के अतिरिक्त एवं सांस्कृतिक विभिन्नताएँ भी हैं ये विभिन्नताएँ प्रजातीय संघर्ष को बढ़ावा देती हैं।

श्वेत प्रजाति नीग्रो लोगों को अपने से निम्न समझती है और उनसे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक विभेद बनाए रखने का प्रयास करती है। दूसरी और नीग्रो श्वेत या गोरे लोगों के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाते हैं और अपने अधिकारों की मांग करते हैं। ऐसा करने में कई नीग्रो को जीवन से हाथ धो लेना पड़ता है। इस प्रकार प्रजातीय भेद के कारण ही पुरानी एवं नवीन पीढ़ी में अंतर-पीढ़ी संघर्ष पाया जाता है।

(ii) अंतर-पीढ़ी वर्ग संघर्ष – प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी आधार पर वर्ग व्यवस्था पाई जाती है। प्रायः वर्गों का विभाजन आर्थिक आधार पर किया जाता है। इस आधार पर प्रत्येक। समाज में प्रायः तीन वर्ग पाए जाते हैं-उच्च, मध्यम तथा निम्न । इसके मध्य भी अंतर-पीढ़ी संघर्ष पाया जाता है। ‘साम्यवाद’ के समर्थक केवल दो वर्गों का समर्थन करते हैं मजदूर वर्ग तथा पूँजीवादी वर्ग। इन वर्गों में आपस में संघर्ष चलता रहता है। पूँजीवादी वर्ग मजदूरों को नाममात्र की मजदूरी देकर उनका शोषण करते हैं।

मजदूर वर्ग श्रम-संगठन बनाकर इस शोषण के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में इस प्रकार का संघर्ष चलता ही रहता है। साम्यवादी इस संघर्ष को मिटाने के लिए पूँजीपति का जड़ से विनाश करना चाहते हैं।

(iii) अंतर-पीढ़ी जातीय संघर्ष – जातीय आधार पर पुरानी पीढ़ी के बीच संघर्षों का उल्लेख विभिन्न समाजशास्त्रियों ने किया है। प्राचीन समय में कुछ जातियों द्वारा निम्न जातियों का शोषण किया जाता था, जबकि आज की पीढ़ी ने शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई है तथा विभिन्न जातिों के बीच संघर्ष भी देखा जा सकता है। आरक्षण के कारण पुरानी और नई पीढ़ी में भी संघर्ष उत्पन्न हुआ है, हिंसक कार्य-जनित गतिविधियाँ हो रही हैं तथा उच्च और निम्न जातियों में इस बात को लेकर तनाव एवं संघर्ष पाया जाता है।

(iv) अंतर-पीढ़ी धार्मिक संघर्ष – भारत एक विशाल देश है, जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध आदि अनेक धर्मों के अनुयायी निवास करते हैं। भारत में जब से अंग्रेज व मुसलमानों का आगमन हुआ है, तब से धार्मिक संघर्ष की समस्या उत्पन्न हुई है, जिसे सांप्रदायिकता के नाम से जाना जाता है। विभिन्न धर्मों के अलग-अलग आध्यात्मिक सिद्धांत पूजा-पाठ के तरीके, आचार-व्यवस्था, कर्मकाण्ड आदि होते हैं।

मानवता के अनुसार जो व्यक्ति किसी धर्म को मानता है तो उसे उस धर्म के नियमों व आचार-व्यवहार को अपनाने व उनका पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए, किन्तु तब एक धर्मावलम्बी अपने धर्म को श्रेष्ठ व दूसरे धर्म को हीन घोषित करने की चेष्टा कर अपने धर्म के अनुयायियों को दूसरे धर्म के अनुयायियों के विरुद्ध भड़काने का कार्य करता है, तो धार्मिक संघर्ष या साम्प्रदायिकता की समस्या उत्पन्न होती है। भारत में धार्मिक संघर्ष हिन्दू एवं मुसलमानों में ही नहीं, वरन् अन्य धर्मावनलंबियों; जैसे-शिया एवं सुन्नियों, जैनियों, निरंकारियों एवं अकालियों, बौद्धों और ईसाईयों में भी हुए हैं, किन्तु उनकी संख्या बहुत कम है।

(v) अंतर-पीढ़ी राजनैतिक संघर्ष – दो राष्ट्र के माध्यम या एक ही राष्ट्र के विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच भी अंतर-पीढ़ी संघर्ष पाया जाता है। अंतर पीढ़ी राजनैतिक संघर्ष दो भागों में बाँटा जा सकता है

(a) अन्तर्देशीय संघर्ष – प्रजातंत्रीय देशों में विचारों की अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। जनता अपने विचारों के अनुकूल सरकार बनाने के लिए दो या दो से अधिक राजनैतिक दलों को विकसित कर लेती है। प्रायः इन राजनैतिक दलों के नेता तथा सक्रिय समर्थक राज्यसत्ता पर अधिकार करने के उद्देश्य से चुनाव, संसद या विधानसभाओं की बैठक आदि के समय एक-दूसरे से संघर्ष कर बैठते हैं। कभी-कभी चुनाव के समय संघर्ष का रूप इतना विकराल हो जाता हैं कि कई लोगों की हत्याएँ तक हो जाती हैं । राष्ट्र के अंदर ‘क्रांति’ का जन्म होना राजनैतिक संघर्ष का सबसे बड़ा स्वरूप है।

(b) अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष – जब से विज्ञान की प्रगति के परिणामस्वरूप विभिन्न राष्ट्रों में सम्पर्क स्थापित हुआ, तब से अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष भी प्रारम्भ हो गया है। प्रायः देखा जाता है कि जिन राष्ट्रों के बीच किसी बात पर वैमनस्य हो जाता है, तो उन राष्ट्रों की जनता तथा सरकार एक-दूसरे राष्ट्र की जनता तथा सरकार से घृणा तथा वैमनस्य करने लगती है। कभी-कभी घृणा तथा वैमनस्य का रूप इतना उग्र हो जाता है कि उनकी अभिव्यक्ति ‘युद्ध’ के रूप में होने लगती है। युद्ध अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष का सबसे भयंकर रूप है।

संघर्ष को कम करने के उपाय – किसी भी संघर्ष को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए :
(i) पुरानी पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह नयी पीढ़ी की आकांक्षाओं व आवश्यकताओं को महसूस करे और नये युग के अनुकूल अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करे।

(ii) पुरानी पीढ़ी को चाहिए कि वह नयी पीढ़ी से सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करे, सद्परामर्श दे और उनके मार्ग में रूढ़ि या प्रथा सम्बन्धी कोई बाधा उपस्थिति न करे। यदि नवीन पीढ़ी के कुछ कार्य उसे पसंद आयें, तो वह उनकी भरपूर प्रशंसा भी करे।

(iii) युवा कल्याण सम्बन्धी नवीन नीतियों का निर्माण करते समय सरकार को युवकों से बातचीत आवश्य करनी चाहिए। बातचीत से समझौते का मार्ग प्रशस्त होगा तथा युवक कम-से-कम गलतफहमी के शिकार नहीं होंगे।

(iv) नवीन पीढ़ी को यह महसूस अवश्य होना चाहिए कि सरकार द्वारा उनके संबंध में जो नीति बनाई जा रही हैं, वह उनके लिए कल्याणकारी है यदि नीतियाँ बनाते समय सरकार युवकों के दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित हो जाये तो फिर युवकों में अंतर-पीढ़ी संघर्ष जन्म ही न लेगा।

(v) नवीन पीढ़ी का समाजीकरण इस प्रकार से किया जाए कि वे समानता एवं राष्ट्रीय विकास के मूल्यों के प्रति आस्था को रख सकें। इससे दोनों पीढ़ियों में संघर्ष के स्थान पर सहयोग उत्पन्न होगा।

(vi) जाति, वर्ण, धर्म, प्रजाति आदि क्षेत्रों में पुरानी पीढ़ी के विचारों का सम्मान करना चाहिए तथा उनके चरित्र निर्माण की प्रक्रिया में मार्गदर्शन करना चाहिए। नई पीढ़ी को भी चाहिए कि वह पुरानी पीढ़ी के मार्गदर्शन को स्वीकार करे।

(vii) शिक्षा में नैतिक मूल्यों व अध्यात्मवाद की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाये। नवीन युवा पीढ़ी में यह समझ विकसित होनी चाहिए कि जीवन में धन साधन है, साध्य नहीं तथा धन कमाने हेतु अनुचित व अनैतिक साधनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

(viii) सभी राजनैतिक दलों का यह कर्तव्य है कि वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नवीन। युवा पीढ़ी का अपने हित में शोषण न करें।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 9.
समाज के स्तरीकरण में जाति का आधार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जाति एक ऐसे पदसोपानीकृति संबंध को बताती है जिसमें व्यक्ति जन्म लेता है तथा जिसमें व्यक्ति का स्थान, अधिकार तथा कर्तव्य का निर्धारण होता है। व्यक्तिगत उपलब्धियाँ तथा गुण व्यक्ति की जाति में परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। जाति व्यवस्था वस्तुतः हिंदु सामाजिक संगठन का आधार है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी समाजशास्त्री लुई ड्यूमो ने अपनी पुस्तक होमो हाइराकीकस में जाति व्यवस्था का मुख्य आधार शुद्धता तथा अशुद्धता की अवधारणा बताया है। ड्यूमो ने पदसोपानक्रम को जाति-व्यवस्था की विशेषता माना है।

प्रारम्भ में हिंदू समाज निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित था –

  • ब्राह्मण
  • क्षत्रिय
  • वैश्य
  • शूद्र

शुद्धता तथा अशुद्धता के मापदंड पर ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च तथा शूद्र का निम्न होता है। वर्ण व्यवस्था में पदानुक्रम के अनुसार क्षत्रियों का द्वितीय तथा वैश्य का तृतीय स्थान होता है। एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार जिस प्रकार जाति व्यवस्था की इकाई कार्य करती है, उस संदर्भ में वह जाति है, वर्ग नहीं है। हालांकि, जाति-व्यवस्था के लक्षणों को वर्ण व्यवस्था से ही लिया गया है लेकिन वर्तमान संदर्भ में जाति प्रारूप अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

एम.एन. श्रीनिवास ने जाति की परिभाषा करते हुए कहा है, कि –

  • जाति वंशानुगत होती है।
  • जाति अंत:विवाही होती है।
  • जाति आमतौर पर स्थानीय समूह होती है।
  • जाति परंपरागत व्यवस्था से संबद्ध होती है।
  • जाति की स्थानीय पदसोपानक्रम में एक विशिष्ट स्थिति होती है।
  • अतर्जातीय खान-पान पर प्रतिबंध होता है।
  • जातियों में परस्पर संबंध शुद्धता तथा अशुद्धता के नियमों पर आधारित होते हैं।

जातीय संस्तरण को कर्म तथा धर्म के विचार पर विभाजित किया जाता है। कर्म का विचार एक हिंदू को सिखाता है कि वह अपने पिछले जन्म के लिए गए कर्मों के आधार पर एक जाति-विशेष के जन्म लेने का अधिकारी है। कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि व्यक्ति ने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए हैं तो उसे पुस्कारस्वरूप उच्च वर्ग में जन्म मिलता है। इसके विपरीत, उसे कर्मों के आधार पर ही दंड स्वरूप नीची जाति में जन्म मिलता है । यदि व्यक्ति अपने जाति के अनुसार व्यवहार करता है तो उसका जन्म ऊँची जाति में तय हो जाता है। यही कारण है कि परंपरागत भारतीय समाज में जाति संस्तरण की व्यवस्था में लंबवत गतिशीलता अत्यधिक कठिन है।

एम.एन. श्रीनिवास ने जाति-व्यवस्था की नमनीयता अथवा लचीलेपन को संस्कृतीकरण कहा है। संस्कृतीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत निम्न जाति, जनजाति अथवा अन्य समूहों के सदस्य अपने रीति-रिवाजों, विश्वासों, विचारधारा तथा जीवन-शैली में उच्च जाति का अनुसरण करके ऊपर की ओर गतिशीलता कर सकते हैं। श्रीनिवास ने 1960 में अनुभव किया कि भारत में जातीय चेतना तथा जातीय संगठन की भावना बढ़ रही है। वर्तमान समय में जाति राजनीतिक तथा आर्थिक सत्ता प्राप्त करने के सशक्त संसाधन बनती जा रही है।

स्वतंत्रता के पश्चात् बनाए गए कानूनों तथा शिक्षा के प्रकार के कारण जाति संरचना में परिवर्तन हुए हैं । अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लिए शिक्षा तथा रोजगार के विशेष प्रावधान किए गए हैं। इन सबका प्रभाव सामाजिक सरंचना तथा स्तरीकरण पर स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है।

प्रश्न 10.
वर्ग को सामाजिक स्तरीकरण का आधार क्यों माना गया है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
वर्ग सामाजिक स्तरीकरण का आधार स्वीकार करने के महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  • वर्ग एक विस्तारित सामाजिक समूह है जो समान आर्थिक स्रोतों में भागीदार होते हैं।
  • वर्गों की सामाजिक प्रस्थिति का निर्धारण संपत्ति, धन, निजी उपलब्धि तथा व्यक्तिगत क्षमताओं से होता है। वर्ग के आधार प्रतिस्पर्धा तथा व्यक्तिगत क्षमता होता है।
  • समाजवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत वर्ग व्यवस्था को प्रायः अर्जित प्रस्थिति तथा मुक्त स्तरीकरण के साथ संबद्ध किया जाता है।
  • वर्तमान समय की पूँजीवादी औद्योगिक संरचना में वर्ग प्रमुख समूह है।
  • एक वर्ग के व्यक्तियों में समान आर्थिक हित तथा वर्ग चेतना पायी जाती है।

वर्ग व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • वर्ग वास्तव में समूह होते हैं लेकिन उनकी कानूनी मान्यता होती है।
  • वर्ग की सदस्यता विरासत में प्राप्त नहीं होती है।
  • वर्गों के मध्य सुपरिभाषित सीमाएँ नहीं पायी जाती हैं।
  • वर्गों की सदस्यता आमतौर पर अर्जित होती है।
  • वर्ग व्यवस्था अवैयक्तिक संबंधों द्वारा संचालित होती है।

समाजशास्त्री टी.बी. बोटमोर तथा एंथोनी गिडस ने आधुनिक विश्व में निम्नलिखित चार प्रकार के वर्गों का उल्लेख किया है –

  • उच्च वर्ग
  • मध्य वर्ग
  • श्रमिक वर्ग
  • कृषक वर्ग

प्रसिद्ध विद्वान कार्ल मार्क्स के अनुसार, पूँजीवाद औद्योगिक व्यवस्था में निम्नलिखित दो वर्ग पाए जाते हैं –

  • पूँजीपति वर्ग
  • श्रमिक वर्ग

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर की सामाजिक असमानता की अवधारणा मार्क्स की अवधारणा से निम्नलिखित रूप में पृथक है –

  • मार्क्स ने समाज में दो मुख्य वर्गों का उल्लेख किया है। वैबर का मत है कि समाज में दो से अधिक वर्ग पाये जाते हैं।
  • मार्क्स ने वर्गों के बीच पारस्परिक संबंधों को अत्यधिक महत्व दिया है। वैबर वर्गों के पारस्परिक संबंधों के बारे में अत्यधिक संदेह व्यक्त करता है
  • मार्क्स ने सामाजिक असमानता के आर्थिक पहलू को ही अत्यधिक महत्व दिया है।

वैबर ने असमानता के लिए उत्तरदायी अनेक कारण बताए हैं –

  • धन
  • शक्ति
  • प्रतिष्ठा तथा सम्मान

मैक्स वैबर ने वर्ग को व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या के रूप में परिभाषित किया है जिनके पास समान संसाधन होने के कारण समान जीवन संयोग पाये जाते हैं। मैक्स वैबर ने वर्ग के अलावा स्तरीकरण के दो मूल पहलू बताए हैं –

  • प्रस्थिति
  • शक्ति

प्रश्न 11.
संघर्ष से सामाजिक एकीकरण कैसे संभव होता है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
संघर्ष न केवल विघटनकारी प्रवृति है, वरन यह सामाजिक एकीकरण भी उत्पन्न करती है। के. डेविस के अनुसार, “इसलिए आंतरिक एकता तथा बाह्य संघर्ष एक ही ढाल के दो पहलू हैं।” पार्क तथा बर्गेस के अनुसार, “संघर्ष अति तीव्र उद्वेग तथा अत्यधिक शक्तिशाली उत्तेजना को जागृत कर देता है तथा ध्यान व प्रयत्न को एकाग्रचित कर देता है।” संघर्ष द्वारा निम्नलिखित प्रकार से एकीकरण की स्थिति भी उत्पन्न की जाती है

(i) संघर्ष सामाजिक परिवर्तनों को जन्म देता है-संघर्ष सामाजिक परिवर्तनों को जन्म देता है। इस प्रकार संघर्ष तथा परिवर्तन सामाजिक प्रक्रिया के मध्य सेतु का कार्य करते हैं। संघर्ष के परिणाम सदैव नकारात्मक नहीं होते हैं, वे कभी-कभी सकारात्मक भी होते हैं। इस संबंध में कोसर ने कहा कि “ढीले संचरित समूहों तथा खुले समाजों में संघर्ष तनावों को कम कर स्थिरता तथा एकता की भूमिका निभाता है।”

(ii) अत्यधिक संघर्ष विघटन के कारणों को समाप्त करने का कार्य करते हैं तथा समाज में पुनः एकता स्थापित करते हैं-विरोधी द्वारा तात्कालिक एकता की अभिव्यक्ति सामाजिक व्यवस्था में असंतोष को समाप्त करके सामाजिक संबंधों में दोबारा समांजस्य कायम करने में सहायक होती है। अतः संघर्ष द्वारा समाज में विघटन के कारणों को समाप्त करके पुनः एकता कायम की जाती है।

(iii) बाह्य संघर्ष से समूह में एकीकरण स्थापित होता है-बाह्य संघर्षों में लिप्त समूहों में एकता उत्पन्न होती है। अंतर समूह संघर्षों द्वारा अंत:समूहों में वैमनस्य तथा शिकायतें कम करने में सहायता की जाती है। बाह्य संघर्षों द्वारा समूह के अंदर सदस्यों को निष्ठापूर्वक सहयोग हेतु बाध्य किया जाता है। सिमेल का मत है कि बाह्य संघर्षों से समूह में एकीकारण स्थापित होता है।

(iv) संघर्ष रचनात्मक व सकारात्मक लक्ष्यों की पूर्ति करता है-प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिमेल संघर्ष को समाज के निर्माण तथा विकास के लिए आवश्यक मानते हैं। उनका मत है कि संघर्ष रहित समरस समूह का अस्तित्व असंभव तथा अयथार्थवादी है। सिमेल का कहना है कि संघर्ष एक प्रकार से सामाजिक एकता प्राप्त करने की पद्धति है।

संघर्ष के द्वारा समाज में फैला हुआ विरोध समाप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए परिवार तथा दंपतियों के मध्य आंतरिक वैमनस्य, विरोध तथा बाहरी विवाद उन्हें परस्पर संबद्ध रखते हैं। सिमेल कहते हैं कि संघर्ष द्वारा अपने आप नई सामाजिक संरचना का सृजन नहीं किया जाता है। वस्तुतः संघर्ष समाज की एकता बढ़ाने वाले विभिन्न कारकों के साथ मिलकर नहीं, सामाजिक संरचना को जन्म देता है।

कोसर का मानना है कि संघर्ष खुले समाजों में तनाव के समाधान द्वारा सामाजिक स्थिरता को मजबूत बनाता है। व्यक्ति तथा समूह संघर्ष के दौरान परस्पर संबंध विकसित करते हैं । राल्फ डाहरण डार्फ का मत है कि सामाजिक संघर्ष द्वारा समाज की वास्तविक स्थिति का प्रकटीकरण किया जाता है। बाह्य संघर्ष के समय सभी समूहों में सहयोग के लिए मित्रता की मनोवृति पायी जाती है, लेकिन शांति काल में यह भावना अनुपस्थिति रहती है। संघर्ष द्वारा समूह में चेतना तथा संगठन उत्पन्न किया जाता है। ग्रीन के अनुसार, “युद्ध सामूहिक चेतना तथा सामूहिक समानता को बढ़ाता है।”

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मजूमदार ने संघर्ष के निम्नलिखित सकारात्मक प्रकार्य बताए हैं –

  • संघर्ष द्वारा अंत:समूह के मनोबल को सुदृढ़ किया जाता है उसकी शक्ति में वृद्धि की जाती है।
  • संघर्ष के द्वारा मूल्य-प्रणालियों की परिभाषा दोबारा हो।
  • संकटों के निवारण हेतु संघर्ष अहिंसात्मक साधनों की खोज के प्रेरित कर सकता है।
  • संघर्षरत पक्षों की सापेक्ष प्रस्थिति में परिवर्तन लाया जा सकता है।
  • संघर्ष के द्वारा नई सहमति की उत्पत्ति हो सकती है।

हार्टन तथा हंट के अनुसार संघर्ष द्वारा विवाद स्पष्ट किए जाते हैं। समूह की एकता में वृद्धि कर सदस्यों के हितों के प्रति चेतना उत्पन्न की जाती है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 1 समाज में सामाजिक संरचना, स्तरीकरण और सामाजिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 12.
सामाजिक स्तरीकरण में सजातीयता का आधार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सजातीयता का शाब्दिक अर्थ-सजातीयता शब्द ग्रीक भाषा के शब्द ‘एथनिकोस’ से लिया है, जो कि ‘एथनोस’ का विशेषण है। ‘एथनोस’ का तात्पर्य एक जनसमुदाय अथवा राष्ट्र से है। अपने समकालीन रूप में सजातीयता की अवधारणा उस समूह के लिए प्रयोग की जाती है जिसमें कुछ अंशों में सामंजस्य तथा एकता पायी जाती हो।

इस प्रकार, सजातीयता का अर्थ समूहिकता से है। सजातीयता की परिभाषा-सजातीयता की अवधारणा उस समूह के लिए प्रयुक्त की जाती है जिसमें सामंजस्य तथा आपसी भाईचारा पाया जाता है तथा जिसमें सदस्य अपने समान उद्गम तथा समान हित को स्वीकारते हैं। इस प्रकार, सजातीयता का तात्पर्य सामूहिकता से है।

एंथोनी गिडिंस के अनुसार –

  • सजातीय समूह के सदस्य समाज में स्वयं को एक अलग सांस्कृतिक समूह के रूप में देखते हैं।
  • अन्य व्यक्तियों को इस पृथकता का अनुभव होता है।

सजातीय समूह वस्तुतः एकता की भावना, पारस्परिक जागरुकता, समान उद्भव एवं हितों के कारण अस्तित्व में आते हैं। ए. शेर्मरहोर्न के अनुसार एक सजातीय समूह में एक व्यापक समाज में सामूहिकता है जिनका एक वास्तविक तथा काल्पनिक पूर्वज तथा समान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है।

सजातीय समूह वस्तुतः नातेदारी, गोत्र व्यवस्था, धार्मिक समूह तथा भाषा समूह से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। शिबूतनी ओर क्वान के सजातीय समूह की पहचान हेतु एक अतिरिक्त तत्व का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, “सजातीय समूह के अंतर्गत वे व्यक्ति आते हैं जिनका एक वास्तविक अथवा काल्पनिक पूर्वज होता है तथा उनमें सह-अस्तित्व की भावना पायी जाती है।”

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Sociology सामाजिक संस्थाओं को समझना Additional Important Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विवाह संस्था की उत्पत्ति के महत्त्वपूर्ण कारण बताइए।
उत्तर:
विवाह संस्था की उत्पत्ति के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं –

  • यौन संतुष्टि-यह जैविक आवश्यकता है।
  • संतानों का वैधानीकरण-यह सामाजिक आवश्यकता है।
  • आर्थिक सहयोग करना-यह आर्थिक आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
विवाह की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:

  • हैरी एम. जॉनसन के अनुसार, “विवाह एक ऐसा स्थायी संबंध है जिससे एक पुरुष और एक स्त्री समुदाय को बिना नुकसान पहुँचाए संतानोत्पत्ति की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होता है।”
  • आर. एच. लॉबी के अनुसार, “विवाह स्पष्टतः स्वीकृत उस संबंध संगठनों को प्रकट कता है जो यौन संबंधी संतुष्टि के उपरांत भी स्थिर रहता है तथा पारिवारिक जीवन की आधारशिला बनाता है।”

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प्रश्न 3.
विवाह संस्था के कोई दो उद्देश्य बताइए।
उत्तर:

  • विवाह संस्था का मूल उद्देश्य यौन-संबंधों को सामाजिक प्रतिमानों के अनुरूप नियमित करना है। विवाह के माध्यम से परिवार अस्तित्व में आता है।
  • विवाह दो विपरीत लिंग के व्यक्तियों को यौन संबंध रखने की स्वीकृति देता है तथा। उनसे प्राप्त संतान को सामाजिक वैधता प्रदान करता है।

प्रश्न 4.
ज्ञात करें कि आपके समाज में विवाह के कौन-कौन से नियमों का पालन किया जाता है? कक्षा में अन्य विद्यार्थियों द्वारा किए गए प्रेक्षणों से अपने प्रेक्षणों की तुलना करें तथा चर्चा करें।
उत्तर:
हमारे समाज में विवाह के अनेक रूप हैं। इन रूपों को विवाह करने वाले साथियों ‘ की संख्या और कौन किससे विवाह कर सकता है, को नियंत्रित किए जाने वाले नियमों के आधार पर पहचाना जा सकता है। वैधानिक रूप से विवाह करने वाले साथियों की संख्या के संदर्भ में विवाह के दो रूप पाए जाते हैं-एकल विवाह तथा बहु-विवाह। एकल विवाह प्रथा एक व्यक्ति को एक समय में एक ही साथी तक सीमित रखती है। इस व्यवस्था में पुरुष केवल एक पत्नी और स्त्री केवल एक पति रख सकती है। यहाँ तक कि जहाँ बहु विवाह की अनुमति है वहाँ भी एक विवाह ही ज्यादा प्रचलित है। व्यावहारिक कार्य-विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 5.
सजातीय विवाह के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
पजातीय विवाह वैवाहिक साथी अर्थात् पति-पत्नी के चुनाव के संबंध में कुछ प्रतिबंध लगाता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति प ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11 – 53 को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ता है। हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” इस प्रकार, सजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति अपनी जाति, धर्म अथवा प्रजाति में ही विवाह कर सकता है। जाति तथा धार्मिक समुदाय भी अंत:विवाही होते हैं।

प्रश्न 6.
विजातीय विवाह के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
विजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह तथा नातेदारी से बाहर विवाह करना पड़ता है। समुदाय के द्वारा अपने सदस्यों पर कुछ विशेष व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। विजातीय विवाह के नियम सभी समुदाय में पाए जाते हैं। हिंदू विवाह में गोत्र तथा सपिण्ड विजातीय विवाह होते हैं। चीन में जिन व्यक्तियों के उपनाम एक ही होते हैं उनके बीच विवाह नहीं हो सकता।

प्रश्न 7.
गोत्र तथा सपिण्ड से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(i) गोत्र – गोत्र से तात्पर्य एक परिवार के ऐसे समूह से होता है जिनके सदस्य अपने वंश की उत्पत्ति एक काल्पनिक पूर्वज से मानते हैं। इस प्रकार हिंदू समाज में गोत्र विवाह वर्जित है।

(ii) सपिण्ड-हिंदू समाज में सपिण्ड विवाह भी वर्जित माना गया है। मिताक्षरा के अनुसार सपिंड उन व्यक्तियों को कहते हैं जिनके द्वारा किसी पूर्वज के शरीर के कणों को अपने शरीर में रखा जाता है। गौतम तथा वरिष्ठ जैसे सूत्रकारों का मत है कि पिता की साथ तथा माता की पाँच पीढ़ियों में विवाह नहीं करना चाहिए।

हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत पिता की पाँच तथा माता की तीन पीढ़ियों तथा विवाह वर्जित कर दिया गया है । इस प्रकार, इन सदस्यों के बीच भी वैवाहिक संबंध वर्जित है।

प्रश्न 8.
निकटाभिगमन निषेध का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:

  • निकटाभिगमन निषेध लगभग सभी समाजों में विजातीय विवाह का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नियम है।
  • सम्पूर्ण विश्व में माता-पुत्र, पिता-पुत्री तथा भाई-बहन के बीच विवाह संबंध निषेध होते हैं।
  • इस प्रकार, प्राथमिक नातेदारों के बीच यौन-संबंधों पर प्रतिबंध को निकटाभिगमन निषेध कहा जाता है। निकटाभिगमन निषेध के नियम का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को दंडित किया जाता है।

प्रश्न 9.
निकटाभिगमन निषेध के कारण बताइए।
उत्तर:
विजातीय विवाह के नियमों को स्वतंत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाने के लिए लागू किया जाता है। किंग्सले डेविस के अनुसार, निकटाभिगमन निषेध के द्वारा वैवाहिक संबंधों तथा संवेदनाओं को केवल विवाहित जोड़ों तक ही सीमित करता है। इस प्रकार पिता-पुत्री, भाई-बहन तथा माता-पुत्र के संबंधों को वैवाहिक परिधि से बाहर रखा जाता है। अतः नातेदारी संगठन में आने वाली तमाम भ्रामक स्थितियों को समाप्त कर दिया जाता है। इस प्रकार परिवार संगठन बना रहता है।

निकटाभिगमन निषेध के निम्नलिखित वैज्ञानिक कारण हैं

  • सुजनन विज्ञान की दृष्टि से निकट नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंधों के कारण निषेधात्मक अंत:स्नातिक परिणामों की संभावना बनी रहती है।
  • निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध होने से संतान मंदबुद्धि वाली होती है।

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प्रश्न 10.
विवाह जैविकीय आवश्यकता को सामाजिक वैधता प्रदान करता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यौन संबंध व्यक्ति की मूल जैविकीय आवश्यकताओं में से एक है। सामान्य जीवन के लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों की कामेच्छा सामाजिक मानदंडों के अनुरूप पूरी होती रहे। विवाह के माध्यम से मनुष्य की केवल जैविकीय आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, वरन् मनोवैज्ञानिक संतुष्टि भी होती है।

प्रश्न 11.
बच्चों के वैधानीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. सभ्य समाज में विवाह की संस्था के माध्यम से जहाँ एक तरफ सहवास को नियमित करना आवश्यक समझा जाता है
  2. वहीं दूसरी तरफ पति-पत्नी को आवश्यक समझा जाता है, वहीं दूसरी तरफ पति-पत्नी के संबंधों से उत्पन्न बच्चों को सामाजिक वैधता प्रदान करना भी आवश्यक समझा जाता है।
  3. समाज को निरंतरता प्रदान करने हेतु माता-पिता की यह वैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों की समुचित देखभाल करें।

प्रश्न 12.
आर्थिक सहयोग विवाह संस्था का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार्य है । स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  1. विवाह संस्था का उद्देश्य मात्र यौन संतुष्टि की जैविकीय आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं है वरन् आर्थिक सहयोग भी इसका एक मुख्य उद्देश्य है।
  2. अर्थव्यवस्था के उत्तरोत्तर विकास, श्रम विभाजन तथा व्यावसायिक भिन्नता के कारण व्यक्तियों के बीच आर्थिक सहयोग की आवश्यकता निरंतर बढ़ती चली जाती है।

प्रश्न 13.
विवाह संस्था के संदर्भ में मार्गन के उद्विकासीय सिद्धांत का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विवाह संस्था के संबंध में लेविस मार्गन का उद्विकासीय सिद्धांत प्रारंभिक जनरीतियों तथा सामाजिक प्रचलनों पर आधारित है। मार्गन का मत है कि व्यक्तियों के समूह के सबसे प्रारंभिक स्वरूप में यौन-संबंधों की प्रकृति पूर्णरूपेण नियंत्रण मुक्त थी। मार्गन का मत है कि मानव समाज का विकास निम्न अवस्था से उच्च अवस्था की ओर होता है।

मार्गन ने विवाह के उद्विकास के विभिन्न चरण बताए हैं –

  • प्रारंभिक काल्पनिक यौन साम्यवादी समाज
  • समूह विवाह
  • बहु विवाह तथा
  • एक विवाह

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प्रश्न 14.
परिवार की संरचना के मुख्य तत्त्व क्या हैं?
उत्तर:
परिवार की संरचना के मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं –
(i) वैवाहिक संबंध –

  • एक सामाजिक संस्था के रूप में परिवार की उत्पत्ति विपरीत लिंगियों के वैवाहिक संबंधों से प्रारम्भ होती है।
  • यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक परिवार एक जैविकीय समूह हो। कभी-कभी बच्चों को गोद भी लिया जाता है।

(ii) रक्त-संबंध – परिवार के सदस्य संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया से परस्पर जुड़े होते हैं। जिस परिवार में व्यक्ति स्वयं जन्म लेता है उसे जन्म का परिवार कहा जाता है। दूसरी तरफ, जिस परिवार में उसके स्वयं के बच्चे होते हैं उसे प्रजनन का परिवार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
परिवार के दो प्रमुख सामाजिक कार्य बताइए।
उत्तर:
समाज की केंद्रीय इकाई के रूप में परिवार के दो प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नलिखित हैं –
(i) समाजीकरण – जन्म लेते बच्चा परिवार का स्वाभाविक सदस्य बन जाता है। परिवार में – ही अंत:क्रिया के माध्यम से सामाजिकता का पाठ सीखता है। समाज के स्थापित आदर्शों, प्रतिमानों तथा स्वीकृत व्यवहारों को बच्चा परिवार में ही सीखता है। इस प्रकार परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है। बर्गेस तथा लॉक के अनुसार, “परिवार बालक पर सांस्कृतिक प्रभाव डालने वाली मौलिक समिति है तथा पारिवारिक परंपरा बालक को उसके प्रति प्रारंभिक व्यवहार, प्रतिमान व आचरण का स्तर प्रदान करती है।”

(ii) सामाजिक नियंत्रण – परिवार एक प्राथमिक समूह है। परिवार सामाजिक नियंत्रण के स्वैच्छिक प्रतिमान विकसित करता है। व्यक्ति इन प्रतिमानों का स्वाभाविक रूप से अनुपालन करते हैं। इस प्रकार परिवार सामाजिक नियंत्रण की स्थायी संस्था है जो अनौपचारिक साधनों के द्वारा सामाजिक नियंत्रण की प्रक्रिया को जारी रखती है।

प्रश्न 16.
परिवार के दो प्रमुख आर्थिक कार्य बताइए।
उत्तर:

  • सामाजिक संरचना की एक महत्त्वपूर्ण तथा मूलभूत प्राथमिक इकाई के रूप में परिवार अनेक आर्थिक कार्य भी करता है। परिवार
  • अपने सदस्यों के लिए रोटी, कपड़ा तथा मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
  • प्राचीन काल से आज तक परिवार आर्थिक क्रियाओं का केंद्र रहा है।
  • परिवार के सदस्य अपनी विभिन्न आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति परिवार में ही करते हैं।

प्रश्न 17.
विस्तृत परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
यदि एकाकी या संयुक्त परिवार के सदस्यों के अलावा कोई नातेदार परिवार का हिस्सा बनता है तो उसे विस्तृत परिवार कहते हैं। विस्तृत परिवार में एकाकी नातेदारों के अतिरिक्त दूर के रक्त संबंधी हो सकते हैं या साथ रहने वाले नातेदार और भी अधिक दूर के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, सास-ससुर का अपने दामाद के परिवार में रहना।

प्रश्न 18.
मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
बैचोपन तथा मार्गन जैसे समाजशास्त्रियों का मत है कि परिवार का प्रथम स्वरूप मातृक था। मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • मातृवंशीय परिवार में वंशावली माता के माध्यम से चलती है।
  • परिवार में मुख्य सत्ता तथा निर्णय करने का अधिकार माता के पास होती है।
  • बच्चों की देखभल पत्नी के रिश्तेदारों के घर में होती है। इस प्रकार ये परिवार मातृस्थानीय होते हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के नायर परिवार मातृस्थानीय हैं।
  • संपत्ति का उत्तराधिकार स्त्रियों के पास होता है। मेघालय में खासी जनजाति में मातृ-सत्तात्मक परिवार पाए जाते हैं।

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प्रश्न 19.
विवाह के दो सामान्य स्वरूप कौन से हैं? एकल विवाह के संबंध में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
विवाह के दो स्वरूप हैं –

  • एकल विवाह तथा
  • बहु विवाह

एकल विवाह एक ऐसा वैवाहिक संबंध है जिसमें एक समय में एक पुरुष केवल एक ही स्त्री से विवाह कर सकता है। एकल विवाह के अन्तर्गत पति-पत्नी किसी एक की मृत्यु होने या विवाह-विच्छेद के बाद ही दुबारा विवाह कर सकते हैं। पिडिंगटन के अनुसार, “एकल विवाह, विवाह का वह स्वरूप है जिसमें कोई भी व्यक्ति एक समय में एक व्यक्ति से अधिक के साथ विवाह नहीं कर सकता है।” । हिन्दू समाज में एक विवाह को प्रमुखता प्रदान की जाती है। मैलिनोवस्की के अनुसार, “एक पत्नीत्व विवाह का एकमात्र उचित प्रकार है, रहा है तथा रहेगा।”

प्रश्न 20.
बहु-विवाह के संबंध को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहु-विवाह विवाह का वह संगठन है जिसके अंतर्गत एक पुरुष का दो या दो से अधिक स्त्रियों या एक स्त्री का दो या दो से अधिक पुरुषों अथवा सामूहिक रूप से अनेक पुरुषों के बीच वैवाहिक संबंध होते हैं। बलसारा के अनुसार, “विवाह का वह प्रकार जिसमें सदस्यों की बहुलता पायी जाती है बहु-विवाह कहा जाता है।”

बहु-विवाह के निम्नलिखित चार स्वरूप हैं –

  • बहुपति विवाह
  • बहुपत्नी विवाह
  • द्विपत्नी विवाह
  • समूह विवाह

प्रश्न 21.
बहुपति विवाह के संबंध में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहुपति विवाह के निम्नलिखि दो स्वरूप पाए जाते हैं –

  • भ्रातृत्व बहुपति विवाह तथा
  • गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह

भ्रातृत्व बहुपति विवाह के अंतर्गत स्त्री सभी भाइयों की पत्नी समझी जाती है। सभी भाई संतान के पिता होते हैं।
गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह के अंतर्गत एक स्त्री के कई पति होते हैं, लेकिन वे आपस में भाई नहीं होते हैं। गैर-भ्रातृत्व बहुपति विवाह में पतियों में से किसी एक को धार्मिक संस्कार के जरिए बच्चे का सामाजिक पिता माना जाता है।

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प्रश्न 22.
परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
परिवार की रचना ऐसे व्यक्तियों से होती है जिनमें नातेदारों के संबंध पाए जाते हैं। क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता और उनकी संतोनों के बीच पायी जाती है।” मेकावर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो यौन संबंधों पर आधारित है और जो इतना छोटा तथा स्थायी है कि उसमें बच्चों की उत्पत्ति तथा पालन-पोषण हो सके।”

प्रश्न 23.
भारतीय परिवार के विशेष संदर्भ में परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
भारतीय परिवार अपेक्षाकृत अधिक जटिल सामजिक संरचना है जिनमें आमतौर पर दो या तीन पीढ़ियाँ निवास करती हैं। इन्हें संयुक्त परिवार भी कहते हैं। डॉ. इरावती कर्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो सामान्यतः एक भवन में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के स्वामी होते हैं तथा जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं तथा जो किसी-न-किसी प्रकार एक-दूसरे के रक्त संबंधी हैं।”

प्रश्न 24.
परिवार की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. परिवार व्यक्तियों की केवल सामूहिकता नहीं है। परिवार के व्यक्ति एक-दूसरे से परस्पर जैविकीय, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से जुड़े होते हैं।
  2. परिवार एक सार्वभौम सामाजिक प्रघटना है। यह समाज की मूल इकाई है तथा इसमें सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध पाया जाता है।

प्रश्न 25.
“समाज के अस्तित्व हेतु नियंत्रण की व्यवस्था आवश्यक है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नियंत्रण तथा नियमों के अभाव में समाज में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जिसके कारण संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था ही अस्त-व्यस्त हो जाएगी। नियंत्रण के साधन प्रत्येक समाज में किसी-न-किसी रूप में अवश्य ही पाए जाते हैं। आधुनिक जटिल समाज में नियंत्रण के औपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावी होते हैं लेकिन अनौपचारिक साधनों का महत्त्व भी काफी अधिक होता है। आदिम समाज में परिवार, समुदाय तथा नातेदारी आदि संस्थाएँ सामाजिक नियंत्रण का कार्य करती हैं। आधुनिक जटिल समाजों में नियंत्रण के अनौपचारिक साधनों की अपेक्षा औपचारिक साधन अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

प्रश्न 26.
सत्ता की परिभाषा दीजिए सत्ता के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर:
सत्ता की परिभाषा –

  • सी. राइट मिल्स के अनुसार, “सत्ता का तात्पर्य निर्णय लेने के अधिकार तथा दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को अपनी इच्छानुसार तथा
  • संबंधित व्यक्तियों की इच्छा के विरुद्ध प्रभावित करने की क्षमता से है।
  • रॉस का मत है कि सत्ता का तात्पर्य प्रतिष्ठा से है। प्रतिष्ठित वर्ग के पास सत्ता भी होती है।

सत्ता के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  • प्रतिष्ठा
  • प्रसिद्धि
  • प्रभाव
  • क्षमता
  • ज्ञान
  • प्रभुता
  • नेतृत्व
  • शक्ति

प्रश्न 27.
शक्ति तथा सत्ता में मुख्य अंतर बताइए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वैबर ने शक्ति तथा सत्ता में अंतर बताया है। वैबर के अनुसार यदि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर उसकी इच्छा के विरुद्ध अपना प्रभाव स्थापित करता है तो इस प्रभाव को शक्ति कहते हैं। दूसरी तरफ, सत्ता वह प्रभाव है जिसे उन व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार किया जाता है जिनके प्रति इसका प्रयोग होता है। इस प्रकार, सत्ता एक वैधानिक शक्ति है। अतः हम सत्ता को सामाजिक रूप से प्रभाव कह सकते हैं। जब शक्ति को वैधता प्रदान कर दी जाती है तो यह सत्ता का स्वरूप धारण कर लेती है तथा व्यक्ति इसे स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार कर लेता है।

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प्रश्न 28.
पारम्परिक सत्ता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पारंपरिक सत्ता को व्यक्तियों द्वारा आदतन स्वीकार किया जाता है। व्यक्तियों द्वारा किसी की शक्ति को केवल इस कारण से स्वीकार किया जाता है कि उनसे पहले के व्यक्तियों ने भी उसे स्वीकार किया था अतः सत्ता का अनुपालन एक परंपरा बन जाता है। परंपरागत सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा अतार्किक होती है।

पारंपरिक सत्ता के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं –

  • जनजाति का मुखिया
  • मध्यकाल के राजा तथा सामंत
  • परंपरागत पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया आदि।

प्रश्न 29.
करिश्माई सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
करिश्माई सत्ता से युक्त व्यक्ति में असाधारण प्रतिभा, नेतृत्व का जादुई गुण तथा निर्णय लेने की क्षमता पायी जाती है। जनता द्वारा ऐसे व्यक्ति का सम्मान किया जाता तथा उसमें विश्वास प्रकट किया जाता है। यही कारण है कि व्यक्तियों द्वारा करिश्माई सत्ता के आदेशों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है। करिश्माई सत्ता की प्रकृति व्यक्तिगत तथा तार्किक होती है। अब्राहम लिंकन, महात्मा गाँधी आदि करिश्माई व्यक्तित्व से युक्त थे।

प्रश्न 30.
पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  • पितृवंशीय परिवार में पत्नी विवाह के पश्चात् पति के घर में रहने जाती है।
  • पितृवंशीय परिवार में पिता परिवार का मुखिया तथा संपत्ति का सर्वोच्च स्वामी होता है।
  • परिवार की वंशावली पिता के माध्यम से चलती है।
  • पितृवंशीय परिवार पितृस्थानीय होते हैं।

प्रश्न 31.
बहुपत्नी परिवार के विषय में दो बिन्दु दीजिए।
उत्तर:

  • बहुपत्नी परिवार में एक व्यक्ति एक समय में एक से अधिक पत्नियाँ रखता है।
  • अनेक जनजातियों में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

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प्रश्न 32.
बहुपति परिवार के विषय में संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
बहुपति परिवार में एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं। बहुपति परिवार दो प्रकार के होते हैं –
(i) भ्राता बहुपति परिवार – भ्राता बहुपति परिवार में स्त्री के सभी पति आपस में भाई होते हैं। वेस्टर मार्क के अनुसार, “जब एक लड़का किसी स्त्री से शादी कर लेता है तो वह लड़की प्रायः उस समय उसके अन्य सब भाइयों की पत्नी बन जाती है तथा उसी प्रकार बाद में पैदा होने वाला भाई भी बड़े भाईयों के अधिकारों में भागीदार माना जाता है।”
हमारे देश में भ्राता बहुपति परिवार खासी तथा टोडा जनजाति में पाये जाते हैं।

(ii) अभ्राता बहुपति परिवार – अभ्राता बहुपति परिवार में स्त्री के अनेक पति परस्पर भ्राता न होकर अनेक गोत्रों के व्यक्ति होते हैं जो एक-दूसरे से अपरिचित होते हैं। नायर जनजाति में इस प्रकार के परिवार पाए जाते हैं।

प्रश्न 33.
नातेदारी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। नातेदारी के प्रकार बताइए।
उत्तर:
नातेदारी का अर्थ-नातेदारी रक्त तथा विवाह का ऐसा बंधन है जो व्यक्तियों को एक समूह से बाँधता है। इस, प्रकार नातेदारी व्यवस्था किसी परिवार के सदस्यों के आपसी संबंधों तथा इन सदस्यों से जुड़े दूसरे परिवारों के सदस्यों के आपसी संबंधों को संगठित और वर्गीकृत करने की केवल एक प्रणाली है। मुरडाक के अनुसार, “यह मात्र संबंधों की ऐसी रचना है जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे से जटिल आंतरिक बंधन एवं शाखाकृत बंधनों द्वारा जुड़े होते हैं।”

नातेदारी के प्रकार –

  • वैवाहिक नातेदारी-जब किसी पुरुष द्वारा किसी कन्या से विवाह किया जाता है तो उसका संबंध न केवल कन्या से होता है वरन् कन्या के परिवार के अनेक सदस्यों से भी स्थापित हो जाता है।
  • समरक्तीय नातेदारी-समरक्तीय नातेदारी का संबंध रक्त के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए माता-पिता तथा बच्चों के बीच समरक्तीय संबंध होते हैं।

प्रश्न 34.
राजनीतिक संस्थाएँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक समाज में नियंत्रण – उन्मुख नियम तथा संगठन व इन नियमों से संबंधित संगठनात्मक शक्तियाँ पायी जाती हैं, इन्हें ही राजनीतिक संस्थाएँ कहा जाता है।

प्रश्न 35.
धर्म के संबंध में ई. बी. टायलर के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए। अथवा, ‘आत्मवाद’ के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ई. बी. टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमिटिव कल्चर में धर्म की उत्पत्ति के विषय में आत्मवाद के सिद्धांत का वर्णन किया है। आत्मवाद के सिद्धांत के अनुसार धर्म की उत्पत्ति आत्मा की धारणा से हुई है। मृत्यु के तथ्यों तथा स्वप्नों की प्रघटना से आदिम लोगों के मन में विचार की उत्पत्ति हुई कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का देहांतरण होता है। निद्रा के समय इन देहारित आत्माओं द्वारा शरीर का आत्माओं से अर्संबंध स्थापित होता है। वास्तव में, स्वप्न को इसी अन्तःक्रिया की अभिव्यक्ति कहा जाता है।

प्रश्न 36.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में जे. जी. फ्रेजर के विचार बताइए।
उत्तर:
फ्रेजर ने अपनी पुस्तक गोल्डन बो में धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत का उल्लेख किया है। उसने धर्म की उत्पत्ति के बारे में एक नए सिद्धांत ‘जादू से धर्म की संक्रांति’ का प्रतिपादन किया है। फ्रेजर का विचार है कि जादू धर्म से पहले का स्तर है। फ्रेजर के अनुसार, “जादू प्रकृति पर बलपूर्वक नियंत्रण का प्रयास है।”

जादू का संबंध कार्य तथा कारण से है। कार्य तथा कारण की असफलता के कारण ही धर्म की उत्पत्ति हुई है। आदिम लोगों के द्वारा शुरू में जादू के माध्यम से शक्तियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया, लेकिन नियंत्रण में असफल हो जाने के बाद उन्हें किसी अलौकिक शक्ति की सत्ता का अहसास हुआ।

फ्रेजर मानव विचारधारा के विकास की निम्नलिखित अवस्थाएँ बताते हैं –

  • जादुई अवस्था
  • धार्मिक अवस्था तथा
  • वैज्ञानिक अवस्था

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प्रश्न 37.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में मैक्समूलर के सिद्धांत को संक्षेप में लिखिए। अथवा, धर्म की उत्पत्ति के विषय में प्रकृतिवाद के सिद्धांत को लिखिए।
उत्तर:
धर्म की उत्पत्ति के विषय में मैक्समूलर के सिद्धांत को प्रकृतिवाद के नाम से जाना जाता है। मैक्समूलर के सिद्धांत का आधार आदिम मानव की बौद्धिक भूल है। मैक्समूलर का मत है कि आदिम मानव को प्रथम चरण में प्रकृति अत्यधिक भयपूर्ण तथा विस्मयकारी प्रतीत हुई । मूलर का मत है कि प्रकृति भय तथा विस्मय का एक विस्तृत क्षेत्र था। इसी ने प्रारम्भ से ही धार्मिक विचारों तथा भाषा के लिए मनोवेग प्रदान किया। इसी अनंत संवेदना से धर्म की उत्पत्ति हुई।

प्रश्न 38.
धर्म की उत्पत्ति के विषय में दुर्खाइम के सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने अपनी पुस्तक में धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की। दुर्खाइम के अनुसार सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। प्रत्येक समाज में पवित्र वस्तुओं को श्रेष्ठ समझा जाता है तथा उन्हें संरक्षित किया जाता है जबकि साधारण वस्तुओं को निषिद्ध किया जाता है।

दुर्खाइम के अनुसार धर्म का संबंध पवित्र वस्तुओं से होता है तथा धर्म के समाजशास्त्र में साहिकता पर जो दिया जाता है। दुर्खाइम के सिद्धांत में धर्म उपयोगिता को प्रकार्यात्मक ढंग से स्पष्ट किया गया है। दुर्खाइम के अनुसार टोटमवाद धर्म का आदिम स्वरूप था।

प्रश्न 39.
विवेकपूर्ण वैधानिक समाजों में सत्ता का स्वरूप बताइए। अथवा, विवेकपूर्ण वैधानिक सत्ता के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:

  • आधुनिक औद्योगिक समाजों में सत्ता का स्वरूप वैधानिक तथा तार्किक होता है।
  • वैधानिक तथा तार्किक सत्ता औपचारिक होती है तथा इसके विशेषाधिकार सीमित तथा कानून द्वारा सुपरिभाषित होते हैं।
  • वैधानिक-तार्किक सत्ता का समावेश व्यक्ति विशेष में निहित न होकर उसके पद तथा प्रस्थिति में निहित होता है।
  • वैधानिक-तार्किक सत्ता की प्रकृति अवैयक्तिक तथा तार्किक होती है।
  • आधुनिक औद्योगिक समाज में नौकरशाही को वैधानिक तार्किक सत्ता का उपयुक्त उदाहरण समझा जाता है।

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प्रश्न 40.
राज्य की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
राज्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक संस्था है। मैक्स वैबर के अनुसार, “राज्य एक ऐसा संघ है जिसके पास हिंसा के वैध प्रयोग का एकाधिकार होता है तथा जिसे अन्य किसी प्रकार से परिभाषित नहीं किया जा सकता है।” आगबर्न के अनुसार, “राज्य एक ऐसा संगठन है जो निश्चित भू-प्रदेश पर सर्वोच्च सरकार द्वारा शासन करता है।”

प्रश्न 41.
राज्य के प्रमुख तत्त्व बताइए।
उत्तर:
राज्य के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं –
जनसंख्या – जनसंख्या के अभाव में राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। शासन-व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए जनसंख्या एक आवश्यक तत्त्व है।

निश्चित भू – प्रदेश-राज्य के लिए सुपरिभाषित भू-प्रदेश होना अनिवार्य है। इलियट के अनुसार, “अपनी सीमाओं में सब व्यक्तियों के ऊपर सर्वोच्चता अथवा प्रदेशीय प्रभुसत्ता तथा बाह्य नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता आधुनिक राज्य जीवन का मूल नियम है।”

संप्रभुता-संप्रभुता का तात्पर्य है कि सरकार के पास एक निश्चित भू-प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने की सर्वोच्च शक्ति होती है। लॉस्की के अनुसार, “संप्रभुता का तत्व ही राज्य को अन्य संघों से पृथक कर देता है।”

सरकार-राज्य के कार्यों के संचालन तथा नियंत्रण हेतु सरकार का होना अपरिहार्य है। सरकार के अभाव में राज्य की कल्पना निरर्थक है। सरकार का स्वरूप अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न हो सकता है।

प्रश्न 42.
धर्म की परिभाषा लिखें। धर्म की आधारभूत विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
टायलर के अनुसार, “धर्म एक अलौकिक सत्ता में विश्वास है।” दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म विश्वासों की एकबद्धता है तथा इसमें पवित्र वस्तुओं से संबंधित क्रियाएँ होती हैं।”

धर्म की आधारभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • धर्म अलौकिक शक्तियों में विश्वास है।
  • धर्म अंततः समस्याओं के बारे में विचार प्रकट करता है तथा यह मोक्ष की विधि है।
  • प्रत्येक धर्म में कुछ विशिष्ट अनुष्ठान पाए जाते हैं।
  • प्रत्येक धर्म में स्वर्ग-नरक तथा पवित्र-अपवित्र की धारणा विद्यमान होती है।

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प्रश्न 43.
शिक्षा के मूल उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
शिक्षा के मूल उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  • शिक्षा व्यक्ति का समाज से एकीकरण करती है।
  • शिक्षा समूह में परिवर्तन की सकारात्मक प्रक्रिया है।
  • शिक्षा पर्यावरण से समायोजन की प्रक्रिया है।
  • शिक्षा व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि करती है।

प्रश्न 44.
शिक्षा की पद्धतियों के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा की दो प्रमुख पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं :
(i) अनौपचारिक शिक्षा – अनौपचारिक शिक्षा एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अनौपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम, उद्देश्य तथा पद्धति आदि नहीं होते हैं । अनौपचारिक शिक्षा की प्रक्रिया अचेतन रूप से चलती रहती है। परिवार, मित्रमण्डली, पड़ोस सामाजिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ अनौपचारिक शिक्षा के प्रमुख अभिकरण हैं।

(ii) औपचारिक शिक्षा-औपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम, पद्धतियों के माध्यम से शिक्षा दी जाती है । औपचारिक शिक्षा चेतन रूप से चलती है। इसके द्वारा अनौपचारिक शिक्षा की कमियों को पूरा किया जाता है। विद्यालय, पुस्तकालय, विचार गोष्ठी तथा संग्रहालय आदि. इसके साधन हैं।

प्रश्न 45.
औपचारिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
औपचारिक शिक्षा की निम्नलिखित विशषताएँ हैं –

  • औपचारिक शिक्षा का स्वरूप संस्थागत होता है।
  • औपचारिक शिक्षा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा मान्यताप्राप्त विद्यालयों के द्वारा दी जाती है।
  • औपचारिक शिक्षा प्रशिक्षित अध्यापकों के द्वारा दी जाती है।
  • औपचारिक शिक्षा में पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए एक निश्चित अवधि होती है। पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् विद्यार्थी को परीक्षा
  • में उत्तीर्ण होना पड़ता है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद विद्यार्थी को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

प्रश्न 46.
आधुनिक शिक्षा के प्रमुख प्रकार्यों को बताइए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा के प्रमुख प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • सामाजिकरण
  • ज्ञान तथा सूचना का संप्रेषण
  • व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास
  • मानवीय संसाधनों का समुचित तथा संतुलित विकास
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा नवीन मूल्यों का विकास।

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प्रश्न 47.
पूर्व-औद्योगिक समाजों में शिक्षा की विषय-वस्तु क्या थी?
उत्तर:
पूर्व-औद्योगिक समाजों में शिक्षा की विषय-वस्तु सीमित थी। विद्यालयों की संख्या बहुत कम थी। शिक्षा की विषय-वस्तु में सम्मिलित किए जाने वाले मुख्य विषय थे-धर्म, दर्शन . अध्यात्म तथा नीतिशास्त्र आदि।

प्रश्न 48.
आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु तर्कपूर्ण, क्रमिक तथा वैज्ञानिक है।
  • विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु सहगामी तथा पाठ्येत्तर क्रियाओं को प्राथमिकता दी जाती है। पाठ्यक्रम में समानता, स्वतंत्रता,
  • अंतराष्ट्रीय बंधुत्व तथा मानवाधिकार के विचारों को महत्त्व दिया जाता है। आधुनिक शिक्षा की विषय-वस्तु परिवर्तनोन्मुखी है।
  • शिक्षा के क्षेत्र में चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में नए आयाम तथा अवधारणाएँ विकसित किए जा रहे हैं।

प्रश्न 49.
हिंदू धर्म की सामान्य विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हिन्दू धर्म की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • हिन्दू धर्म विश्व के महान धर्मों में सर्वाधिक प्राचीन है। यह धर्म लगभग 6 हजार वर्ष प्राचीन है।
  • हिन्दू धर्म बहुदेववादी है अर्थात् इसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।
  • हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म के चक्र को माना जाता है।
  • जन्म तथा मृत्यु के चक्र को माना जाता है।

प्रश्न 50.
धार्मिक अनुष्ठान का अर्थ बताइए।
उत्तर:
डेविस के अनुसार, “धार्मिक अनुष्ठान धर्म का गतिशील पक्ष है।” धार्मिक अनुष्ठान को अधिप्राकृतिक तथा पवित्र वस्तुओं के संदर्भ में व्यक्तियों के व्यवहार से संबंधित माना जाता है। धार्मिक अनुष्ठान उपकरणात्मक क्रिया है जिसमें लक्ष्य प्रेरित होती है। धार्मिक अनुष्ठान किसी निश्चित लक्ष्य अथवा कामनाओं को प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं। धार्मिक व्यवहार में विशेष वस्त्र धारण करना उपवास करना, नृत्य तथा भिक्षा आदि को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न 51.
पंथ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पंथ का अर्थ-पंथ की उत्पत्ति आमतौर पर पुराने स्थापित धर्मों के विरुद्ध प्रतिवाद के रूप में होती है। पंथ द्वारा प्रचलित धार्मिक आस्थाओं, नियमों तथा विश्वासों से हटकर एक नई मानसिक स्थिति का विकास किया जाता है। पंथ की उत्पत्ति सामाजिक असंतोष में पायी। जाती है। पंथ की सदस्यता ऐच्छिक होती है। पंथ में परंपरागत धर्म के सिद्धांतों को अस्वीकार किया जाता है। पंथ में पंथ की शिक्षाओं का अनुकरण करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है।

हिंदू धर्म में अनेक पंथ पाए जाते हैं, जैसे-नाथ पंथ, कबीर पंथ, नानक पंथ, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन तथा राधा स्वामी आदि। ईसाई धर्म में भी पंथ पाए जाते हैं : जैसे मेथेडिस्ट तथा बैपटिस्ट।

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प्रश्न 52.
धार्मिक संप्रदाय की परिभाषा कीजिए।
उत्तर:
धार्मिक संप्रदाय : धार्मिक संप्रदाय एक धार्मिक संगठन है। इनकी उत्पत्ति किसी नेता विशेष की विचारधारा. तथा चिंतन से होती है। ऐसी विशिष्ट विचारधरा वाले नेता का अनुसरण उन लोगों के द्वारा किया जाता है, जिनकी विचारधारा समान होती है। एक धार्मिक संप्रदाय के लोग विशिष्ट देवी-देवताओं में विश्वास रखते हैं। एक व्यक्ति के द्वारा एक धार्मिक संप्रदाय का अनुसरण करने केथ-साथः किसी अन्य धर्म के सिद्धांतों में भी आस्था रखी जा सकती है. उदाहरण के लिए हमारे देश में बय गुरुदेव तथाः साई बाबा आदि धार्मिक संप्रदाय मणका कल्ट हैं।

प्रश्न 53.
शिक्षा की सीमान दीजिए।
उत्तर:
मा हिम के अनुसार, यस्क मोदी उस ऐसे व्यक्तियों पर डाला नाका जीवनपोत चलती रहती है.जया जॉन के प्रत्येक अनुभव से इसकी वृद्धि होती है।

प्रश्न 54.
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। शिक्षा के द्वारा व्यक्तियों में. तर्कपूर्ण, कैज्ञानिक तथा गतिशील दृष्टिकोण का विकास किया जाता है। शिक्षा द्वारा व्यक्तियों के रूढ़िवादी; अतार्किक तथा जड़ विचारों को परिमार्जन किया जाता है।

शिक्षा समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में आवश्यक परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। शिक्षा मनुष्यों में सामाजिक चेतना का संचार करती है। इस संदर्भ में स्त्री शिक्षा का काफी महत्त्व है। शिक्षा के द्वारा लाए गए परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन व्यक्तियों के अर्जित गुणों को महत्त्व प्रदान करना है। शिक्षा के द्वारा समाज में समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व की भावना का विकास करके सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को एक नयी तथा व्यापक दिशा प्रदान की जाती है।

प्रश्न 55.
विकासशील देशों के संदर्भ में आधुनिक शिक्षा के सम्मुख चुनौतियाँ बताइए।
उत्तर:
विकासशील देशों के संदर्भ में आधुनिक शिक्षा के सम्मुख दो चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं – शिक्षा का लोकतंत्रीकरण करना-इसके अंतर्गत अशिक्षित लोगों को शिक्षित करके साक्षरता की दर में वृद्धि करने का प्रयास किया जाता है। लोगों के जीवन स्तर में सुधर करना ताकि वे शिक्षा की ओर स्वाभाविक रुचि दिखा सकें। स्त्री शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा के लिए विशेष प्रयास करना । सीमित साधनों का यथोचित तथा अधिकतम उपयोग करना।

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प्रश्न 56.
शिक्षा के सांगठनिक ढाँचे अथवा संरचना के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं तथा प्रत्येक स्तर का एक निश्चित सांगठनिक ढाँचा है -\
(i) प्रारंभिक स्तर-इसके निम्नलिखित दो स्तर होते हैं –

  • प्राथमिक स्तर-कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर-कक्षा 6 से 8 तक।

(ii) माध्यमिक स्तर –

  • माध्यमिक स्तर-कक्षा 9 से 10 तक।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर-कक्षा 11 से 12 तक।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर-इसके अंतर्गत विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 57.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा का महत्व बताइए।
उत्तर:
लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुख्य आदर्श हैं –

  • समानता
  • स्वतंत्रता
  • बंधुत्व

शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों में लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश किया जाता है। शिक्षा व्यक्तियों को उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों के बारे में समुचित ज्ञान कराती है। शिक्षित व्यक्तियों में राजनीतिक चेतना का स्तर अपेक्षाकृत अधिक होता है। यही कारण है कि प्रत्येक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने के लिए शिक्षा के सार्वभौमीकरण का गंभीर प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 58.
शिक्षा के प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
समाजशास्त्र के प्रकार्यवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत समाज पर शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। समाजवादी दुर्खाइम के अनुसार, “समाज उसी स्थिति में जीवित रह सकता है जब समाज के सदस्यों में पर्याप्त अंशों में समरूपंता हो। शिक्षा के द्वारा उस समरूपता को स्थायी बनाया जाता है तथा संवर्धित किया जाता है।

समाज में व्यक्ति निश्चित नियमों के अनुसार अंतःक्रिया करते हैं। टालकॉट पारसंस के अनुसार विद्यालय के द्वारा नवयुवकों का समाज के मूलभूत मूल्यों के साथ समाजीकरण किया जाता है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री डेविस तथा मूर ने भी समाज में शिक्षा की प्रकार्यवादी भूमिका को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है।

प्रश्न 59.
शिक्षा के मार्क्सवादी दृष्टिकोण के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा व्यवस्था के मूल्यों तथा सिद्धांतों का निर्धारण समाज की वर्ग स्थापना के द्वारा किया जाता है। समाज में अभिजात वर्ग शिक्षा व्यवस्था के सिद्धांतों तथा स्वरूपों पर अपना प्राधिकार रखता है।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार अभिजात वर्ग द्वारा शिक्षा के सिद्धांतों तथा संरचना का निर्धारण अपने हितों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। शिक्षा के अंतर्गत केवल उन्हीं कौशलों का विकास किया जाता है जो अभिजात वर्ग के हितों की पूर्ति करते हों।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विजातीय विवाह से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विजातीय विवाह का अर्थ-विजातीय विवाह के अन्तर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह के बाहर विवाह करना पड़ता है। यद्यपि हिंदू समाज में जाति के अंदर विवाह करने का प्रावधान है, तथापि अपने गोत्र, प्रवर तथा सपिंड में विवाह करने का निषेध है। प्रत्येक समाज में सदस्यों पर कुछ विशेष व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध है।

के. डेविस के अनुसार परिवारिक व्यभिचार वर्जन इसलिए मौजूद है, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा परिवारिक संरचना का एक भाग है। जॉर्ज मूरडॉक के अनुसार, “लैंगिक प्रतियोगिता तथा ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है। माता-पिता तथा बच्चों के मध्य सहोदरों के बीच यौन ईर्ष्या का अभाव परिवार को एक सहकारी सामाजिक समूह के रूप में मजबूत करता है, इसकी समाज संबंधी सेवाओं की कुशलता में वृद्धि करता है तथा समाज को पूर्ण रूप से शक्तिशाली बनाता है।

इस प्रकार, विजातीय विवाह के अंतर्गत एक जाति के सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी ही जाति के अंतर्गत विवाह करें, लेकिन साथ-साथ अपने निकट रक्त संबंधियों, परिवार के सदस्यों, अपने गोत्र, पिंड तथा प्रवर के मध्य विवाह न करें।

विजातीय विवाह के स्वरूप-भारत में बहिर्विवाह के निम्नलिखित रूप पाए जाते हैं
(i) गोत्र विजातीय विवाह-गोत्र का संबंध प्रायः परिवार के किसी आदिकालीन पुरुष से होता है। जिन व्यक्तियों का आदि पुरुष एक होता है, भाई-बहन समझा जाता है। दूसरे शब्दों : में हम कह सकते है कि एक गोत्र के व्यक्तियों का खून समान होता है। अतः एक ही गोत्र के व्यक्तियों में विवाह निषेध समझा जाता है।

(ii) प्रवर विजातीय विवाह-प्रवर शब्द का तात्पर्य आह्वान करना है। यज्ञ के समय – पुरोहितों द्वारा चुने गए ऋषियों के नाम ही प्रवर हैं। चूँकि यजमान द्वारा पुरोहितों को यश के लिए
आमंत्रित किया जाता है, अतः यजमान तथा पुरोहितों के प्रवर एक समझे जाने के कारण उनके बीच वैवाहिक संबंध नहीं हो सकते थे।

(iii) पिंड विजातीय विवाह-हिंदू धर्म के अनुसार पिंड का तात्पर्य है सामान्य पूर्वज । जो व्यक्ति एक ही पियर को पिंड अथवा श्राद्ध अर्पित करते हैं, उन्हें परस्पर सपिंड कहा जाता है। वशिष्ट तथा गौतम के अनुसार पिता की सात पीढ़ियों तथा माता की पांच पीढ़ियों में विवाह निषेध। हिन्दू विवाह अधिनियम में पीढ़ियों के क्रमशः पाँच तथा तीन कर दिया गया है।

विजातीय विवाह के लाभ –

  • विजातीय विवाह प्राणिशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित है। इससे संतान बलवान तथा बुद्धिमान पैदा होती है।
  • समनर तथा कैलर ने विजातीय विवाह को प्रगतिवादी कहा है।
  • विजातीय विवाह के विभिन्न संस्कृतियों का संपर्क होता है।
  • विजातीय विवाह से हानियाँ –
  • विवाह का क्षेत्र अत्यधिक सीमित हो जाता है।
  • बाल विवाह तथा दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 2.
विजातीय विवाह क्यों प्रचलित है?
उत्तर:
विजातीय विवाह के अंतर्गत एक जाति के सदस्यों से यह आशा की जाती है कि वे अपनी ही जाति के अंतर्गत विवाह करें, लेकिन इनके साथ-साथ अपने निकट रक्त संबंधियों, परिवार के सदस्यों, अपने गोत्र, पिंड तथा प्रवर के मध्य विवाह न करें।

विजातीय विवाह के नियम प्रचलित होने के निम्नलिखित कारण हैं –

  • विजातीय विवाह प्राणिशास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित माना गया है। इसके कारण संतान हृष्ट-पुष्ट होती है।
  • समनर तथा कैलर ने विजातीय विवाह को प्रगतिवादी माना है।
  • विजातीय विवाह में निकट के रक्त संबंधियों में वैवाहिक संबंधों में पर प्रतिबंध लगाया जाता है । के. डेविस के अनुसार, “पारिवारिक व्यभिचार वर्जन इसलिए मौजूद है, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा पारिवारिक संरचना का एक भाग है।”
  • जॉर्ज मूरडॉक ने इस संबंध में उचित ही कहा है, “लैंगिक प्रतियोगिता तथा ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है।
  • माता-पिता तथा बच्चों के मध्य तथा सहोदरों के बीच यौन इस प्रकार, विजातीय विवाह परिवार को एक संस्था के रूप में बनाए रखता है।
  • सभी समाजों में किसी-न-किसी रूप में विजातीय विवाह के नियमों का पालन किया जाता है।
  • हिंदू विवाह में सगोत्र, प्रवर तथा सपिंड विजातीय विवाह होते हैं।
  • विजातीय विवाह सामाजिक संबंधों में समरसता तथा स्थायीपन बनाए रखता है। इसके कारण नातेदारी संगठन में आने वाली भ्रामक स्थितियाँ समाप्त हो जाती हैं।
  • सुजन विज्ञान की दृष्टि से निकट के नातेदारों के बीच वैवाहिक संबंध होने से जो संतानें उत्पन्न होती हैं, वे सामान्यतः मंद बुद्धि वाली होती हैं।

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प्रश्न 3.
विवाह के नियम तथा प्रतिमान समझाइए।
उत्तर:
विवाह के नियम तथा प्रतिमान निम्नलिखित हैं –
(i) अंत: या सजातीय विवाह के नियम-अंतः विवाह के नियम के अंतर्गत एक व्यक्ति आमतौर पर अपनी प्रजाति, जाति तथा धर्म के ही विवाह कर सकता है। फोलसम के शब्दों में, “अंतः विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी ही जाति यः समूह में विवाह करना पड़ेगा हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों में विवाह की अनुमति। नहीं होती है।” भारत में जाति एक अंत:विवाही समूह है। इसका तात्पर्य है कि कोई भी पुरुष अथवा स्त्री अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता।

(ii) बहिर्विवाह या विजातीय विवाह के नियम –

  • बहिर्विवाह के नियम के अंतर्गत ऐसे विवाहों को रोका जाता है जिनमें आपस में रक्त का संबंध अथवा नजदीकी संबंध हो।
  • हिन्दू विवाह में सगोत्र तथा सपिंड विजातीय समूह होते हैं। गोत्र परिवारों का एक समूह हैं जो अपनी उत्पत्ति की समानता काल्पनिक पूर्वज से स्वीकारते हैं।

(iii) निकटाभिगमन निषेध –

  • निकटाभिगमन निषेध का तात्पर्य है कि प्राथमिक नातेदारों के बीच यौन-संबंधों पर प्रतिबंध।
  • निकटाभिगमन निषेध लगभग सभी समाजों में विजातीय विवाहों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नियम है।
  • विश्व के किसी समाज में माता-पुत्र, भाई-बहन, पिता-पुत्री के बीच संबंध नहीं पाए जाते हैं।

प्रश्न 4.
विवाह संबंधों तथा रक्त संबंधों में भेद कीजिए।
उत्तर:
विवाह संबंध तथा रक्त संबंध दोनों ही सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। दोनों ही प्रकार से संबंधों में निम्नलिखित भेद हैं –
(i) वैवाहिक संबंध-परिवार का प्रारंभ विपरीत लिंगियों के वैवाहिक संबंधों से प्रारम्भ होता है। मेकाइवर तथा पेज के अनुसार, “परिवार वह समूह है जो लिंग संबंध पर आधारित है तथा काफी छोटा व इतना स्थायी है कि बच्चों की उत्पत्ति और पालन-पोषण करने योग्य है।” क्लेयर के अनुसार, “परिवार से हम संबंधों की वह व्यवस्था समझते हैं जो माता-पिता और उनकी संतानों के बीच पायी जाती है।”

जहाँ तक परिवार की संरचना का प्रश्न है परिवार में पति-पत्नी संतान के बिना भी हो सकते हैं, लेकिन परिवार संस्था के रूप में फिर भी रहता है। हालांकि, यह आंशिक परिवार कहलाएगा। इस प्रकार प्रत्येक परिवार के लिए एक जैविकीय समूह होना जरूरी नहीं है। कभी-कभी पति-पत्नी बच्चों को गोद लेते हैं। ये गोद लिए बच्चे भी परिवार के सदस्य होते हैं। इस प्रकार, परिवार में केवल दांपत्य संबंध ही पाए जा सकते हैं।

(ii) रक्त संबंध-परिवार के सदस्य एक-दूसरे से प्रजनन की प्रक्रिया के माध्यम से परस्पर संबद्ध होते हैं। इस प्रकार, जैविकीय अंतर्संबंध रक्त संबंध है जिन्हें सामाजिक दृष्टिकोण से नातेदारी कहा जाता है। अतः परिवार एक नातेदारी समूह कहलाता है। प्रत्येक नातेदारी व्यवस्था में रक्त संबंध तथा निकटता के संबंध पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, पिता तथा पुत्र के संबंध रक्त पर आधारित हैं। नातेदारी संबंधों द्वारा विवाह के नियमों का निर्धारण होता है। नातेदारी संबंधों में परिवर्तन होता रहता है, हालांकि, परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है।

प्रश्न 5.
औद्योगीकरण ने नातेदारी व्यवस्था को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर:
समाज लोगों में सामाजिक संबंधों का विकास परिवार, विवाह तथा समान वंश परंपरा के कारण होता है। वास्तव में संबंध तथा संबोधन ही नातेदारी के आधार हैं। उदाहरण के लिए पितामह, पिता, माता, भाई, बहन, चाचा ताऊ आदि संबोधन सामाजिक संबंधों की स्थापना करते हैं। रेडक्लिफ ब्राउन के अनुसार, “नातेदारी प्रथा वह व्यवस्था है जो व्यक्तियों को व्यवस्थित सामाजिक जीवन में परस्पर संहयोग करने की प्रेरणा देती है।”

चार्ल्स विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आ जाते हैं जो कि अनुमानित तथा वास्तविक, वंशावली संबंधों पर आधारित हैं।”

औद्योगीकरण का नातेदारी व्यवस्था पर प्रभाव :

  • औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण ग्रामीण जनता रोजगार की तलाश में नगरों की ओर पलायन करती है।
  • औद्योगीकरण के कारण प्राथमिक संबंध कमजोर हो जाते हैं तथा द्वितीयक संबंध महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
  • औद्योगीकरण के कारण आर्थिक संबंधों का विकास होता है जिससे सामाजिक संबंध के स्वरूप में परिवर्तन होने लगता है।
  • औद्योगीकरण के कारण नगरीकरण की प्रक्रिया में तेजी आती है। सामाजिक संबंधों तथा सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होने लगता है।
  • औद्योगीकरणं के कारण नए प्रकार के सामाजिक संबंध विकसित होने लगते हैं तथा नातेदारी व्यवस्था कमजोर हाने लगती है।
  • औद्योगीकरण के कारण सामाजिक अलगाव, मापदंडहीनता तथा व्यक्ति में केंद्रित जीवन पद्धति का विकास होने लगता है। इसके कारण संबंधों का महत्त्व बढ़ता चला जाता है।

अंततः हम कह सकते हैं कि औद्योगीकरण की प्रक्रिया के कारण नातेदारी संबंध दिन-प्रतिदिन कम महत्त्वपूर्ण होते जाते हैं। द्वितीयक तथा तृतीयक संबंधों को बढ़ता हुआ विस्तार प्राथमिक – संबंधों के दायरे को सीमित कर देता है।

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प्रश्न 6.
नातेदारी के. प्रकार बत्ताइए।
उत्तर:
नातेदारी के प्रकार – नातेदारी को तकनिकी रूप से विभिन्न प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है । मोरंगन द्वारा नातेदारी शब्दावली को निम्नलिखित दो श्रेणियों में बाँटा गया है –

  • वर्गीकृत प्रणाली तथा
  • वर्णनात्मक प्रणाली।

1. वर्गीकृत प्रणाली – वर्गीकृत प्रणाली के अन्तर्गत विभिन्न संबंधियों को एक ही श्रेणी में शामिल किय जाता है। इनके लिए समान शब्द प्रयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए अंकल शब्द एक वर्गीकृत शब्द है जिसका इस्तेमाल मंचा, जाऊ मांथा फूका, मौमा आदि रिश्तेदारों के लिए किया जाता है। अक्ल को प्रति कक्ति, वेश्यू गया सची कपकच मामलों की श्रेणी मो इंगित करता है। इस प्रणाली में एक शब्द दो व्यक्तियों के मध्य निश्चित सबंध का का करता है।

2. वर्णनात्मक प्रणाली – उदाहरण के लिए, माता तथा पिता वर्णनात्मक शब्द है. इसी प्रकार हिंदी भाषा के चाचा, मामा, मौसा, साऊ, साला, अंजा, नंदोई, भाभी, भतीजा सादि वर्णनात्मक शब्द है, जो एक ही मातेदार को निर्दिष्ट करते हैं। निष्कर्षः किसी एक नातेदारी शब्दावली अर्थात् वर्गीकृत प्रणाली या वर्णनात्मक प्रणाली का प्रयोग विशुद्ध रूप से नहीं किया जाता है। दोनों ही प्रणालियाँ मिले-जुले रूप में प्रचलित हैं।

प्रश्न 7.
सजातीय विवाह से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति अपने समूह के अंदर ही विवाह कर सकता है। सजातीय विवाह में बाह्य के सदस्यों के साथ विवाह निषेध होता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है जिसके अनुसार एक व्यक्ति को अपनी ही जातीय समूह में विवाह करना पड़ेगा हालांकि निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” वस्तुतः सजातीय विवाह तथा विजातीय विवाह सापेक्ष शब्द हैं। एक दृष्टिकोण से जो सजातीय विवाह है, वह दूसरे दृष्टिकोण से विजातीय विवाह है। हमारे देश में जाति एक सजातीय विवाह समूह है अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर के पुरुष अथवा स्त्री से विवाह नहीं कर सकता। जाति की तरह धार्मिक समुदाय भी सजातीय विवाह समूह होता है। इसका तात्पर्य है कि कोई भी व्यक्ति अपने धर्म वाले पुरुष या स्त्री से ही विवाह कर सकता है।

सजातीय विवाह के कारण –

  • समूह की सजातीयता को बनाए रखना
  • समूह के संख्याबल को बनाए रखना
  • समूह की रक्त शुद्धता को बनाए रखना
  • समूह में एकता की भावमा को बनाए रखना
  • धर्म की पृथकता के कारण।

सजातीय विवाह के प्रकार –

  • विभागीय अथवा जनजातीय सजातीय विवाह – इस प्रकार के सजातीय विवाह के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपनी जनजाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • जाति सजातीय विवाह – इस प्रकार के विवाह में व्यक्ति अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • उपजाति सजातीय विवाह – इस प्रकार के सजातीय में विवाह उप-जातियों तक सीमित है। डॉ. एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, “जाति से मेरा तात्पर्य वेदों के अनुसार जातियों से नहीं है, वरन् उपजाति से है जो अंत:विवाह की वास्तविक इकाई है।”
  • प्रजाति सजातीय विवाह – सजातीय विवाह के इस प्रकार के अनुसार एक राष्ट्र के व्यक्ति ही परस्पर विवाह कर सकते हैं।

सजातीय विवाह के गुण –

  • समूह में एकता की भावना कायम रहती है
  • समूह के व्यावसायिक रहस्य कायम रहते हैं।

सजातीय विवाह के दोष –

  • राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक
  • जीवन साथी के चुनाव ‘का क्षेत्र सीमित हो जाता है
  • आधुनिक युग में इस सिद्धांत की जरूरत नहीं है।

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प्रश्न 8.
एकाकी परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
(i) एकाकी परिवार का अर्थ-एकाकी परिवार व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जिसमें पति, पत्नी तथा उनके अविवाहित बच्चे सम्मिलित होते हैं। एकाकी परिवार सबसे छोटी इकाई है। एकाकी परिवार में निम्नलिखित नातेदारी संबंध होते हैं-पति-पत्नी, पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्री, भाई-बहन, बहन-बहन तथा भाई-भाई।

(ii) पूरित एकाकी परिवार-पूरित एकाकी परिवार में एकाकी. परिवार के सदस्यों के अलावा पति की विधवा माता या विधुर पिता या उसके अविवाहित भाई तथा बहन सम्मिलित होते हैं।
प ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11969

(iii) एकाकी परिवार के उदय के कारण –

  • नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की सामाजिक व आर्थिक प्रवृत्तियों के कारण लोग नगरों में आकर बसने लगते हैं।
  • नगरों में स्थानाभाव के कारण संयुक्त परिवार साधारणतया एक साथ नहीं रह पाते हैं।
  • आधुनिक विचारों तथा सभ्यता के कारण एकाकी परिवार लगातार महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं। डॉ. आर. के. मुकर्जी के अनुसार, “इस प्रकार संयुक्त परिवार एक महत्त्वपूर्ण विशेषता खो रहा है।” संयुक्त परिवार द्वारा सम्पादित किए जाने वाले अनेक कार्य अन्य
  • सामाजिक तथा आर्थिक संस्थाओं द्वारा किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए बीमा, पेंशन, छोटे बच्चों की देखभाल के लिए केंद्र आदि।
  • जैसे-जैसे गाँवों में कृषि कार्यों का यंत्रीकरण हो रहा है तथा कृषि में लोगों की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती जा रही है, वैसे-वैसे गाँवों में भी एकाकी परिवार की प्रवृत्ति का उदय हो रहा है।

(iv) एकाकी परिवार के गुण –

  • परिवार के सदस्यों में पारस्परिक घनिष्ठता
  • परिवार के सदस्यों में आर्थिक समायोजन
  • परिवार में सदस्यों को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा
  • व्यक्तित्व के विकास में सहायक
  • स्त्री का सम्मानपूर्ण दर्जा
  • बच्चों की अच्छी देख-भाल

(v) एकाकी परिवार के दोष –

  • बच्चों का समुचित पालन-पोषण नहीं हो पाता
  • आपत्तियों का सामना करने में कठिनाई
  • सुरक्षा की भावना का अभाव
  • वृद्धावस्था में सुरक्षा का अभाव

प्रश्न 9.
कौन-सा देश वास्तविक रूप से लोकतंत्र नहीं है और क्यों?
उत्तर:
यद्यपि समकालीन विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था एक प्रतिनिधि राजनीतिक व्यवस्था है तथापि विश्व के अनेक देशों में अभी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं पायी जाती है। विश्व के कुछ देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था क्यों नहीं पायी जाती है इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले लोकतंत्र का अर्थ समझ लेना आवश्यक है।

लोकतंत्र एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जिसमें आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक विषमताओं को समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। लोकतांत्रिक सरकार बहुमत के सिद्धांत पर आधारित होती है। सरकार द्वारा निर्णय पारस्परिक सहनशीलता तथा सहमति के आधार पर लिए जाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को भी अपनी पृथक् पहचान बनाए रखने की गारंटी दी जाती है।
देश जो कि वास्तविक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हैं-विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जो लोकतांत्रिक होने की बात तो कहते हैं, लेकिन उनकी शासन व्यवस्था सत्तावादी है, जैसे-पाकिस्तान, अमेरिका, रूस, ईरान आदि। इन देशों में जनता की इच्छाओं तथा भावनाओं का सम्मान नहीं किया जाता है।

सत्तावादी सरकारें जनहित के बजाए स्वहित में विश्वास करती हैं। जनता को राजनीतिक अधिकार भी प्रदान नहीं किए जाते हैं। लोकतंत्र के सार्वभौम आदर्शों, जैसे–स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व का सत्तावादी सरकारों में कोई स्थान नहीं है। – सत्तावादी सरकारें मानवाधिकारों की अवहेलना भी करती हैं। इन देशों में सरकार विरोधियों का दमन किया जाता है। उदाहरण के लिए म्यांमार (बर्मा) तथा सिंगापुर इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
ज्ञात करें की व्यापक संदर्भ में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन होने से परिवार में सदस्यता, आवासीय प्रतिमान और यहाँ तक कि पारस्परिक संपर्क का सरीका परिवर्तित होता है, उदाहरण के लिए प्रवास।
उत्तर:
हमारे दैनिक जीवन में प्रायः हम परिवार को अन्य क्षेत्रों जैसे आर्थिक या राजनीतिक से भिन्न और अलग देखते हैं। फिर भी हम देखगें कि परिवार, गृह, उसकी संरचना और मानक, शेष समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। एक अच्छा उदाहरण जर्मन एकीकरण के अज्ञात परिणामों का है। सन् 1990 ई. के दशक में एकीकरण के बाद जर्मनी में विवाह प्रणाली में तेजी से गिरावट आई क्योंकि नए जर्मन राज्य ने एकीकरण से पूर्व परिवारों को प्राप्त संरक्षण और कल्याण की सभी योजनाएँ रद्द कर दी थीं।

आर्थिक असुरक्षा की बढ़ती भावना के कारण लोग विवाह से इंकार करने लगे। परिवार के निर्माण पर प्रश्न चिह्न लग गया। इसे अनजाने परिणाम के रूप में भी जाना जा सकता है। इस प्रकार बड़ी आर्थिक प्रक्रियाओं के कारण परिवार और नातेदारी परिवर्तित और रूपांतरित होते रहते हैं लेकिन परिवर्तन की दिशा सभी देशों और क्षेत्रों में हमेशा एक समान नहीं हो सकती। हालांकि इस परिवर्तन का यह अर्थ नहीं है कि पिछले नियम और संरचना पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, क्योंकि परिवर्तन और निरंतरता सहवर्ती होते हैं।

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प्रश्न 11.
आधुनिक राज्य की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
आधुनिक राज्य केवल नियंत्रणकारी संस्था नहीं है। आधुनिक युग में राज्य के कार्यों तथा उत्तरदायित्वों में अत्यधिक वृद्धि हुई है। कल्याणकारी राज्य की कल्पना ने राज्य के कार्यों में अत्यधिक वृद्धि की है। संक्षेप में आधुनिक राज्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(i) राज्य सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का मुख्य आधार-आधुनिक समय में राज्य सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों का मुख्य आधार है। राज्य के द्वारा उन समस्त परिस्थितियों का निर्माण करने का प्रयत्न किया जाता है, जिनसे व्यक्तियों को आर्थिक व सामाजिक न्याय प्राप्त हो सके।

(ii) कल्याणकारी राज्य-आधुनिक राज्य कल्याणकारी होते हैं। इसका तात्पर्य है कि राज्य व्यक्तियों के सर्वांगीण विकास हेतु निरंतर प्रयास करेगा। कल्याणकारी राज्य जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्तियों के कल्याण की बात करता है।

(iii) नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करना-आधुनिक राज्य द्वारा नागरिकों के समुचित तथा सर्वागीण विकास हेतु मौलिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं। हमारे देश में नागरिकों को छः मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

(iv) नियंत्रण तथा संतुलन का सिद्धांत-आधुनिक राज्य में कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक् रखा जाता है। इसके अलावा सरकार के तीनों अंगों (कार्यपालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका) के संदर्भ में नियंत्रण तथा संतुलन का सिद्धांत अपनाया जाता है। सरकार के तीनों अंगों को एक-दूसरे के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता आधुनिक
राज्य की विशिष्ट विशेषता है।

प्रश्न 12.
शक्ति और राज्य पर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शक्ति-व्यक्ति द्वारा सामाजिक जीवन में कुछ कार्य स्वेच्छा से किए जाते हैं तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। शक्ति वस्तुतः सत्ता अनुभवात्मक पहलू है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाए जाते हैं। वैधानिक शक्ति राजनीतिक संस्थाओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है। रास्य-जैसा कि एन्डर्सन तथा पार्कर ने कहा है कि “राज्य समाज में वह निकाय है जिसे किसी भू-प्रदेश की सीमा में दमनात्मक नियंत्रण के प्रयोग का अधिकार प्राप्त है।”

राज्य वास्तव में शक्ति का वैधानिक प्रयोग करने का अधिकार रखता है। समाजशास्त्र के शब्दकोष में फेयरचाइल्ड ने “राज्य को ऐसा निकाय, समाज का स्वरूप अथवा उसकी संस्था बतलाया है जिसे बल प्रयोग करने तथा दमनात्मक नियंत्रण प्रयुक्त करने का अधिकार है।” उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शक्ति तथा राज्य एक दूसरे से संबंधित हैं। राज्य ही वैधानिक रूप से शक्ति के प्रयोग का अधिकारी है। राज्य व्यक्ति तथा समाज के हितों की सुरक्षा हेतु शक्ति का प्रयोग करता है।

प्रश्न 13.
आधुनिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चे का सर्वांगीण विकास करना है। श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण के इस युग में शिक्षा व्यक्तियों के कौशल में वृद्धि करती है तथा उन्हें समाज का उपयोगी सदस्य बनाती है। जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “शिक्षा से एक एकीकृत मनुष्य का विकास करने की आशा की जाती है तथा इसके द्वारा समाज में उपयोगी कार्य करने के लिए नवयुवक तैयार किए जाते हैं जिससे वे सामूहिक जीवन में भागीदारी कर सकें।”

(i) आधुनिक शिक्षा के मुख्य उद्देश्य – आधुनिक शिक्षा की मुख्य विशेषताओं के विश्लेषण हेतु शिक्षा के उद्देश्यों तथा प्रकार्यों का अध्ययन आवश्यक है।

(a) सुकरात, अरस्तू तथा बेकन आदि दार्शनिकों के अनुसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है। अपने व्यापक अर्थ में ज्ञान का तात्पर्य है मानसिक विकास ज्ञान के समुचित विकास से व्यक्ति उचित तथा अनुचित में अंतर कर सकता है।

(b) शिक्षा द्वारा व्यक्तियों का सांस्कृतिक विकास किया जाता है। संस्कृति द्वारा बालक की जन्मजात प्रवृत्तियों का परिमार्जन किया जाता है । संस्कृति द्वारा ही व्यक्ति पर्यावरण से समायोजन सीखता है।

(c) शिक्षा द्वारा चरित्र निर्माण किया जाता है। जॉन डीवी के अनुसार, “विद्यालयी शिक्षा तथा अनुशासन का एक व्यापक उद्देश्य नागरिकों में लोकतंत्रात्मक आदर्शों तथा मूल्यों का विकास करना है, जिससे वे आदर्श नागरिक बन सकें।

(ii) आधुनिक समाज में शिक्षा के प्रकार्य-आधुनिक समाज में शिक्षा के मुख्य प्रकार्य निम्नलिखित हैं –

  • संतुलित सामाजिकरण
  • श्रम एवं सूचना का प्रसारण
  • व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तथा चरित्र निर्मा
  • मानव संसाधनों का समुचित विकास
  • प्रभावशाली सामाजिक नियंत्रण
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा मूल्यों का विकास
  • सांस्कृतिक आधार पर निर्माण

आधुनिक शिक्षा ज्ञान के नए आयामों तथा अवधारणाओं का अवलंबन करती हुई विशेषीकरण की ओर निरंतर अग्रसर हो रही है।

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प्रश्न 14.
धर्म पर दुर्खाइम की समाजशास्त्रीय दृष्टि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने धर्म की उत्पत्ति के सभी पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या निम्नलिखित तरीके से प्रस्तुत की
(i) दुर्खाइम का मत है कि धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों ने आदिम मनुष्य को दार्शनिक बना दिया जबकि, आदिम मानव के विचार तथा सामाजिक जीवन अत्यंत सरल थे।

(ii) दुर्खाइम का मत है कि धर्म के सभी पूर्ववर्ती सिद्धांतों में मनोवैज्ञानिक पहलू पर अधिक जोर दिया गया जबकि धर्म की भावना पूर्णरूपेण सामाजिक है।

(iii) दुर्खाइम के अनुसार सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। पवित्र वस्तुएँ विशेष तथा श्रेष्ठ समझी जाती हैं तथा उन्हें संरक्षित व पृथक् रखा जाता है जबकि साधारण वस्तुएँ निषिद्ध समझी जाती हैं तथा उन्हें पवित्र वस्तुओं से दूर रखा जाता है।

(iv) दुर्खाइम टोटमवाद को धर्म का अत्यंत आदित स्वरूप मानते हैं। दुर्खाइम का मत है कि टोटम की उत्पत्ति समूह से हुई है। दुर्खाइम पवित्र तथा अपवित्र, देवी-देवता, स्वर्ग-नरक तथा । टोटम को समूह का सामूहिक प्रतिनिधान मानते हैं। समूह जीवन से संबंधित होने के कारण टोटम को पवित्र समझा जाता है। व्यक्तियों द्वारा टोटम का सम्मान इसलिए किया जाता है क्योंकि वे सामाजिक मूल्यों का सम्मान करते हैं।

इस प्रकार, टोटम के द्वारा सामूहिक चेतना का सम्मान किया जाता है। व्यक्तियों की धर्म में निष्ठा सामूहिक एकता को अधिक मजबूत करती है। समारोह तथा अनुष्ठान लोगों को समुदाय में बंधने का काम करते हैं। दुर्खाइम ने धर्म के समाजशास्त्र में सामूहिकता पर अधिक जोर दिया है। धार्मिक अनुष्ठान तथा उत्सव व्यक्तियों के बीच सामाजिकता की भावना उत्पन्न करते हैं।

(v) अनेक समाजशास्त्रियों द्वारा दुर्खाइम के धर्म के सिद्धांत की आलोचना इसमें अंतर्निहित दार्शनिकता के आधार पर की गई है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैलिनॉस्की तथा रेडक्लिफ ब्राउन ने कहा है कि धर्म सामाजिक समरसता बनाए रखता है तथा व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 15.
धर्म की सामाजिक भूमिका के विषय में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
अथवा
“संगठित धर्म का समाज तथा व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है।” इस कथन पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
धर्म की सामाजिक भूमिका का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –
(i) व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान-संगठित धर्म का व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। धर्म के द्वारा व्यक्ति की आध्यात्मिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है। धर्म के द्वारा वैचारिक स्तर पर सृजन-विनाश, जन्म तथा मृत्यु, सामाजिक तथा वैयक्तिक आदर्शों, लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्यों को व्यापक दर्शन प्रदान किया जाता है।

(ii) सामाजिकरण नियंत्रण का सशक्त साधन-प्रसिद्ध समाजशास्त्री पारसंस के अनुसार धर्म के मूल्य-प्रतिमान समाजीकरण तथा सामाजिक नियंत्रण में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं । धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ही व्यक्ति वांछनीय तथा अवांछनीय क्रियाओं में अंतर करना सीखते हैं। दुर्खाइम के अनुसार सामाजिक उत्सवों, कर्मकांडों तथा संस्कारों के माध्यम से धर्म के द्वारा सामाजिक सुदृढ़ता को मजबूत बनाया जाता है।

(iii) सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना-संगठित धर्म के द्वारा सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने तथा सामाजिक नियंत्रण को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी जाती है। अपने व्यापक तथा व्यावहारिक संदभ्र में धर्म के द्वारा व्यक्ति और समूह के दृष्टिकोण को नियंत्रित किया जाता है। प्रथाएँ तथा परंपराएँ धर्म के नियंत्रणकारी साधन बन जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप ही सामाजिक व्यवस्था का विकास होता है।

(iv) नैतिकता को बढ़ाता है-धर्म के द्वारा समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाया जाता है। नैतिकता के माध्यम से समूह के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सकारात्मक प्रेरणा मिलती है। धर्म नैतिकता को दिशा तथा निर्देशन प्रदान करता है।

प्रश्न 16.
सामाजिक संरचना किस तरह से आधुनिक शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करती है?
उत्तर:
सामाजिक संरचना निम्नलिखित तरीके से आधुनिक शिक्षा की प्रकृति को प्रभावित करती है –
(i) सामाजिक संरचना के द्वारा शिक्षा के स्वरूप तथा दिशा का निर्धारण किया जाता है। शिक्षा समाज की उप-व्यवस्था है। प्रत्येक समाज की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएँ, इतिहास, मूल्य तथा परंपराएँ होती हैं, इन सबका स्वरूप समाज की विरासत कहलाता है। प्रत्येक समाज अपनी विरासत को न केवल जीवित रखना चाहता है वरन् उसका हस्तांतरण अगली पीढ़ी को भी करना चाहता है।

सामाजिक संरचना का प्रभाव शिक्षा का अवश्य पड़ता है। उदाहरण के लिए, भारतीय संस्कृति के परंपरागत स्वरूप का प्रभाव आधुनिक शिक्षा पर साफ-साफ दिखाई देता है। आधुनिक शिक्षा द्वारा विद्यालयों में छात्रों को भारत के इतिहास तथा संस्कृति के ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विषयों जैसे-विज्ञान, पर्यावरण, तकनीकी ज्ञान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती है।

(ii) सामाजिक संरचना की आर्थिक आवश्यकताएँ के अनुसार शिक्षा प्रणाली का विकास होता है। प्राचीन तथा मध्यकाल में समाज में धर्म का प्रभाव अत्यधिक था अतः शिक्षा भी धार्मिक आवश्यकताओं के अनुरूप थी। आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था ने सामाजिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन कर दिए अतः शिक्षा के स्वरूप का निर्धारण भी इस प्रकार किया गया है कि वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था की उत्पादन पद्धति तथा आवश्यकताओं को पूर्ण कर सके।

(iii) किसी देश में पायी जाने वाली राजनीतिक व्यवस्था शिक्षा की प्रकृति को निर्धारित करती है। समाज की प्रभावशाली राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव शिक्षा के उद्देश्यों तथा मूल्यों पर साफ-साफ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए एक लोकतांत्रिक समाज में शिक्षा का मौलिक’ उद्देश्य निम्नलिखित तत्त्वों से निर्धारित होता है

  • समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व
  • पंथ-निरपेक्षता
  • आदर्श नागरिकों का निर्माण
  • राष्ट्रीय एकीकरण की भावना का विकास

लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत लोकतांत्रिक मूल्यों तथा उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाता है। शिक्षा के प्रसार से आर्थिक तथा सामाजिक असमानता भी उत्तरोत्तर कम होती चली जाती है।

(iv) सामाजिक संरचना के अनुरूप ही पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाता है। लोकतांत्रिक, साम्यवादी तथा तानाशाही राजनीतिक व्यवस्थाओं में शिक्षा के मूल उद्देश्य तथा मूल्य पृथक-पृथक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में समानता, स्वतंत्रता तथा पंथ-निरपेक्षता शिक्षा के मूल उद्देश्य वर्गविहीन तथा राज्यविहीन समाज की स्थापना है।

(v) कोई भी शिक्षा व्यवस्था सामाजिक संरचना की प्रकृति के प्रतिकूल नहीं जा सकती है। शिक्षा के माध्यम से छात्रों को सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय परंपराओं से परिचित कराया जाता है। सरकार द्वारा शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय लक्ष्यों की जानकारी दी जाती है तथा नागरिकों को इन लक्ष्यों के प्रति सचेत किया जाता है।

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प्रश्न 17.
समाज में शिक्षा की भूमिका पर प्रकार्यवादी समाजशास्त्रियों के विचारों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
प्रकार्यवादी समाजवादी समाजशास्त्रियों द्वारा समाज पर शिक्षा के सकारात्मक प्रभाव को स्वीकार किया जाता है। एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “समाज तब तक जीवित रह सकता है जब तक समाज के सदस्यों में पर्याप्त अंशों में समरूपता पाई जाती है। शिक्षा के द्वारा समरूपता को स्थायी बनाया जाता है तथा संवर्धित किया जाता है।”

दुर्खाइम का मत है कि जटिल औद्योगिक समाजों में शिक्षा के द्वारा उन महत्त्वपूर्ण कार्यों को किया जाता है जो परिवार या मित्र समूह नहीं कर सकते हैं। परिवार तथा मित्र समूह में व्यक्ति अपने संबंधियों अथवा मित्रों से पारस्परिक अंतःक्रिया करते हैं जबकि दूसरी तरफ, समाज में व्यक्ति को ऐसे लोगों से भी अंत:क्रिया करनी पड़ती है जो न उसका संबंधी होता है और न ही मित्र। विद्यालय में विद्यार्थी इस तरह के अपरिचितों से अंत:क्रिया करता है तथा सीखता एवं सहयोग करता है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री टालकॉट पारसन्स के अनुसार विद्यालय के द्वारा नवयुवकों का समाज के मूलभूत नियमों का सम्मान करने की शिक्षा के साथ-साथ औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप होने वाली परिस्थितियों तथा दशाओं में आए परिवर्तनों से समायोजन करना भी सिखाया जाता है।

समाज में शिक्षा की प्रकार्यवादी भूमिका को किंग्सले डेविस तथा विल्वर्ट मूर द्वारा भी महत्त्व प्रदान किया गया है। इन दोनों समाजशास्त्रियों का मत है कि सामाजिक स्तरीकरण एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत समाज में व्यक्तियों के पदों का निर्धारण उनकी योग्यतानुसार किया जाता है। शिक्षा व्यवस्था समाज में व्यक्तियों के पदों का उनकी योग्यतानुसार निर्धारण करती है ताकि योग्य व्यक्ति महत्त्वपूर्ण पद पा सकें।

प्रश्न 18.
उदाहरणों सहित अनौपचारिक तथा औपचारिक शिक्षा के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(i) अनौपचारिक शिक्षा का अर् थ- अनौपचारिक शिक्षा के अंतर्गत बालक परिवार, पड़ोस तथा मित्रमंडली में भाषा, परंपरा, प्रथा, लोकगीत तथा संगीत आदि के माध्यम से सीखता है। – अनौपचारिक शिक्षा संस्थागत नहीं होती है। परिवार में ही वर्णमाला, गणित, लेखन, पठनपाठन का संप्रेषण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक होता रहता है। अनौपचारिक शिक्षा अनवरत जीवनपर्यंत चलती रहती है।

(ii) औपचारिक शिक्षा का अर्थ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत बालक को पूर्व नियोजित पाठ्यक्रम, उद्देश्यों तथा शिक्षा पद्धतियों के द्वारा विद्यालय में अध्यापकों द्वारा प्रदान किया जाता है। औपचारिक शिक्षा में पाठ्यक्रम को पूर्ण करने की निश्चित अवधि होती है। निश्चित अवधि में पाठ्यक्रम की समाप्ति के पश्चात् विद्यार्थियों को परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् विद्यार्थियों को परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात्। विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
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प्रश्न 19.
भारत में संयुक्त परिवार की प्रणाली को बनाए रखने वाले मूल कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित मूल कारक उत्तरदायी हैं –
(i) अर्थव्यवस्था का कृषि पर आधारित होना – भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था संयुक्त परिवार प्रणाली को प्रमुख रूप से बनाए रखने में उत्तरदायी है। आज भी देश की लगभग 70 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी हुई हैं।

(ii) पितृपूजा की परंपरा – हिन्दू समुदाय में प्राचीन काल से ही पितृपूजा अथवा पूर्वजों की पूजा की परंपरा प्रचलित रही है। परिवार के सदस्य संयुक्त रूप से अपने पितरों की पूजा करते हैं।

(iii) धर्म – प्राचीन काल से ही धर्म भारतीय सामाजिक संगठन का मूल आधार रहा है। सामान्य देवी-देवताओं की अराधना तथा अनेक धार्मिक कार्यों को संयुक्त रूप से करने की परंपरा ने संयुक्त परिवार प्रणाली को सशक्त आधार प्रदान किया है।

राधा विनोद पाल के शब्दों में, “धार्मिक विधियों का प्रारंभिक रूप मृत व्यक्तियों की पूजा थी। वंशजों का यह कर्त्तव्य था कि वे उस पूजा को जारी रखें। इसलिए इससे पूर्णरूपेण न सही आंशिक रूप से परिवार के संरक्षण को सर्वत्र अत्यधिक महत्त्व मिला। परिवार के सदस्यों के पितरों के प्रति धर्मपालन के कुछ कर्त्तव्य होते थे। वे उन कर्तव्यों से पारिवारिक भूमि और यज्ञ-वेदी से जुड़े रहते थे। जैसे यज्ञ-वेदी भूमि से संयुक्त रहती थी, उसी प्रकार परिवार भूमि के साथ बंधा रहता था।”

प्रश्न 20.
शक्ति से आप क्या समझते हैं? शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक बताइए।
अथवा
शक्ति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
शक्ति की परिभाषा – व्यक्ति सामाजिक जीवन में कुछ कार्यों को स्वेच्छा से करता है तथा कुछ कार्यों को करने के लिए बाध्य होता है। शक्ति की अवधारणा में भौतिक तथा दबावात्मक पहलू पाये जाते हैं। शक्ति, सत्ता का अनुभावात्मक तथा भौतिक पहलू होता है । शक्ति के कारण ही संपूर्ण समाज तथा उसके सदस्य सत्ता के निर्णयों को बाध्यता अथवा दबाव के कारण स्वीकार करते हैं।

शक्ति के कारक – शक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं –

  • सामाजिक प्रस्थिति
  • सामाजिक प्रतिष्ठा
  • सामाजिक ख्याति
  • शारीरिक भौतिक शक्ति
  • शिक्षा, ज्ञान तथा योग्यता

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प्रश्न 21.
परिवर्तन के उपकरण के रूप में शिक्षा की भूमिका क्या है? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का मुख्य उपकरण है। शैक्षिक मूल्य तथा संरचनाएँ सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में उत्प्रेरक का काम करती हैं। परिवर्तन के उपकरण के रूप में शिक्षा की भूमिका का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –

(i) सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचना में परिवर्तन – शिक्षा सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचनाओं में परिवर्तन का प्रमुख उपकरण है। आधुनिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों के कट्टर, रूढ़िवादी तथा अवैज्ञानिक विचारों को आधुनिक, तार्किक तथा गतिशील विचारों में परिवर्तित किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारतीय समाज में परिवार तथा जाति-व्यवस्था में आने वाले परिवर्तनों का मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा का प्रसार है।

(ii) सामाजिक चेतना में वृद्धि करना – आधुनिक शिक्षा सामाजिक चेतना में वृद्धि करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। व्यक्तियों को उनके अधिकारों तथा भूमिकाओं के विषय में जानकारी शिक्षा के माध्यम से दी जा रही है। शिक्षा के द्वारा स्त्री-पुरुष की समानता को मुख्य लक्ष्य बनाया गया है। इसके परिणामस्वरूप स्त्रियों को पुरुषों के समान राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था का तो आधार ही सामाजिक तथा आर्थिक समानता है। लिंग भेद समस्या को काफी हद तक कम किया गया है। आज शिक्षित महिलाएं राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण तथा गतिशील भूमिका निभा रही हैं।

(iii) सामाजिक परिवर्तन के नए आयाम – शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन के नए आयाम विकसित किए जा रहे हैं। परंपरागत भारतीय समाज में व्यवसायों का निर्धारण भी जाति के आधार पर होता था। इस प्रकार, अंतर्जातीय संबंधों प्रकृति की असमानता तथा शोषणकारी होती थी।

आधुनिक शिक्षा ने समानता तथा स्वतंत्रता को वैचारिकी का मुख्य लक्ष्य बनाया। स्वतंत्र भारत के संविधान में भी समानता, स्वतंत्रता तथा धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों की सूची में सम्मिलित करके इस बात का स्पष्ट संकेत दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को जाति, वंश, लिंग, धर्म तथा रंग आदि में भेदभाव के बिना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्रियाओं में प्रगति के समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।

(iv) शिक्षा का सार्वभौमीकरण – शिक्षा के सार्वभौमीकरण ने सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन किए हैं। साक्षरता की बढ़ती हुई दर ने सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में चेतना के नए आयाम स्थापित किए हैं। स्त्रियों में साक्षरता की बढ़ती हुई दर ने सामाजिक संरचना को गतिशील बनाया है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य समानता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व के आधार एक शोषण रहित समाज की स्थापना करना है। तार्किक तथा वैज्ञानिक विचारों के प्रसार ने परंपरागत अवैज्ञानिक तथा अतार्किक शृंखलाओं को काफी हद तक कम कर दिया है। परिवर्तन के एक उपकरण के रूप में शिक्षा व्यक्तियों को उनकी अर्जित योग्यताओं के आधार पर सामाजिक स्तर प्रदान कराने में अनवरत रूप से प्रयासरत है।

प्रश्न 22.
सामाजिक संस्थाएँ परस्पर किस प्रकार व्यवहार करती हैं? विवेचना कीजिए। एक उच्च कक्षा के विद्यार्थी के रूप में स्वयं से प्रारम्भ करते हुए, दो विविध प्रकार की सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन कीजिए। क्या वे आप पर नियंत्रण रखती हैं या आप इन संस्थाओं के नियंत्रण में रहते हैं?
उत्तर:
समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक संस्थएँ हैं, जैसे-परिवार, विद्यालय, चर्च आदि ये सभी परस्पर मिलकर कार्य करती हैं। बालक सर्वप्रथम परिवार में शिक्षा ग्रहण करता है। तत्पश्चात् वह विद्यालय जाता है, जहाँ वह विधिवत् शिक्षा ग्रहण करता है। इस प्रकार परिवार व विद्यालय नामक संस्थाएँ आपस में व्यवहार करती हैं।

समाज में अनेक संस्थाएँ व्यक्ति पर नियंत्रण का भी काम करती हैं-जैसे कानून, कानून व्यक्ति की उद्देयता पर नियंत्रण करता है। हम संस्थाओं के नियंत्रण में स्वेच्छा से रहते हैं। क्योंकि सामाजिक बंधन इसके लिए प्रेरित करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आधुनिक औपचारिक शिक्षा पद्धति के संगठन और पाठ्यक्रम संबंधी विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक औपचारिक शिक्षा पद्धति के संगठन तथा पाठ्यक्रम संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) औपचारिक शिक्षा का अर्थ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत पूर्व निर्धारित उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा अध्यापन पद्धतियों के माध्यम से समयबद्ध कार्यक्रम के आधार पर विद्यालय में शिक्षक द्वारा ज्ञान प्राप्त कराया जाता है। नियमित तथा स्वीकृत विद्यालयों में निश्चित अवधि में पाठ्यक्रम की समाप्ति के बाद परीक्षा का आयोजन किया जाता है। परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने के बाद विद्यार्थियों को प्रमाण-पत्र दिया जाता है।

औपचारिक शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • संगठनिक संरचना
  • निश्चित तथा स्पष्ट पाठ्यक्रम
  • निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ

(ii) संगठनिक संरचना-शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं –
(a) प्रारम्भिक स्तर – प्रारम्भिक शिक्ष के निम्नलिखित दो स्तर होते हैं –

  • प्राथमिक स्तरः कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर : कक्षा 6 से 8 तक।

हमारे देश में प्रारंभिक स्तर की शिक्षा को बालक साधारणतया 14 वर्ष तक की आयु तक प्राप्त कर लेते हैं। भारत सरकार द्वारा इस स्तर की शिक्षा को नि:शुल्क तथा अनिवार्य बना दिया गया है।

(ii) माध्यमिक स्तर – माध्यमिक शिक्षा के अंतर्गत कक्षा 9 तथा 10 की शिक्षा को सम्मिलित किया जाता है। कक्षा 11 तथा 12 की शिक्षा को उच्चतर माध्यमिक स्तर अथवा इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा में सम्मिलित किया जाता है।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर – उच्चतर माध्यमिक स्तर अथवा इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा के पश्चात् विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा प्रारंभ होती है। इस स्तर पर विद्यार्थी उच्चस्तरीय तथा विशेषीकृत अध्ययन करते हैं।

(iv) निश्चित तथा स्पष्ट पाठ्यक्रम – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत शिक्षा के प्रत्येक स्तर अर्थात् प्रारंभिक स्तर, माध्यमिक स्तर तथा विश्वविद्यालय स्तर के लिए पृथक-पृथक पाठ्यक्रम विकसित किया जाता है।

माध्यमिक शिक्षा आयोग – (1952-53 ई.) ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है कि “पाठ्यक्रम का तात्पर्य विद्यालय में पढ़ाए जाने वाले पारस्परिक विषयों से नहीं है, इसके अंतर्गत उन अनुभवों को पूर्णरूपेण सम्मिलित किया जाता है जिन्हें विद्यार्थी विद्यालय की अनेक गतिविधियों के माध्यम से प्राप्त करता है। ये गतिविधियाँ विद्यालय, कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, कार्यशाला, खेल का मैदान और अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के बीच अनौपचारिक संपर्क द्वारा चलती रहती है। इस प्रकार, विद्यालय का पूरा जीवन (गतिविधियाँ) ही पाठ्यक्रम बन जाता है जो कि विद्यार्थियों के जीवन को प्रत्येक बिंदु पर छू सकता है तथा एक संतुलित व्यक्तित्व के विकास में सहायता करता है।

मुनरो के अनुसार, “पाठ्यक्रम में वे समस्त गतिविधियाँ सम्मिलित होती हैं जिन्हें विद्यालय द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपयोग में लाया जाता है।” लैटिन भाषा में पाठ्यक्रम का तात्पर्य है ‘रेस कोर्स’ अथवा दौड़ का मैदान। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि पाठ्यक्रम रूपी मार्ग पर दौड़कर बच्चा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करता है। पाठ्यक्रम संरचना के मुख्य आधार प्रारंभिक, माध्यमिक तथा विश्वविद्यालय स्तर पर श्रेणीबद्ध क्रम के अंतर्गत बदलते रहते हैं।

ये मुख्य आधार निम्नलिखित हैं –

  • दार्शनिक आधार
  • मनोवैज्ञानिक आधार
  • समाजशास्त्रीय आधार
  • वैज्ञानिक आधार

(v) निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ – औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत निश्चित नियम तथा व्यवस्थाएँ होती हैं। विद्यार्थियों को किसी भी पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु न्यूनतम योग्यता का निर्धारण किया जाता है। विद्यार्थियों को शिक्षा संस्थाओं के नियमों का पालन करना पड़ता है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 2.
अधिकारों के प्रकारों की विवेचना कीजिए। उनका समाज में क्या अस्तित्व है ? वे आपके जीवन को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
अधिकार की परिभाषा-व्यक्ति की उन माँगों को, जिन्हें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो तथा राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त हो अधिकार कहते हैं। कभी-कभी असंरक्षित माँगें भी अधिकार बन जाती हैं भले ही उन्हें कानून का संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। उदाहरण के लिए काम पाने का अधिकार राज्य ने भले ही स्वीकार न किया हो परंतु उसे अधिकार ही माना जाएगा क्योंकि काम के बिना कोई भी व्यक्ति अपना सर्वोच्च विकास नहीं कर सकता।

बेन तथा पीटर्स ने अधिकार की परिभाषा करते हुए कहा है, “अधिकारों की स्थापना एक सुस्थापित नियम द्वारा होती है। वह नियम चाहते कानून पर आधारित हो या परंपरा पर।” ऑस्टिन के अनुसार, “अधिकार एक व्यक्ति का वह सामर्थ्य है जिसमें वह किसी दूसरे से कोई काम करा सकता हो या दूसरे को कोई काम करने से रोक सकता है।” लास्की के अनुसार, “अधिकार सामान्य जीवन की वह परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन को पूर्ण नहीं कर सकता।”

अधिकारों के प्रकार –
(i) नैतिक अधिकार – नैतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति की भावना पर आधारित हैं । माता-पिता का यह नैतिक अधिकार है,कि बुढ़ापे की अवस्था में उनकी संतान उनकी सहायता करे । इन अधिकारों के पीछे कोई सत्ता नहीं होती अर्थात् यदि पुत्र अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा न करे तो उसको कानून के अनुसार दंडित नहीं किया जा सकता केवल समाज उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखता।

(ii) वैधानिक अधिकार – जो अधिकार राज्य द्वारा हम पर लागू किए जाते हैं और उनका उल्लंघन करने पर व्यक्ति को कानून के अनुसार दंडित किया जाता है। ये अधिकार निम्नलिखित हैं

(a) मौलिक अधिकार-वे वैधानिक अधिकार जो संविधान द्वारा उस राज्य के नागरिकों को दिए जाते हैं, मौलिक अधिकार कहलाते हैं। देश का संविधान मौलिक कानून होता है। उसमें मिलने वाले अधिकार भी मौलिक होते हैं। ये अधिकार व्यक्ति के विकास में बहुत उपयोगी होते हैं –

  • समानता का अधिकार
  • स्वतंत्रता का अधिकार
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार, सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधी अधिकार
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार ये सभी अधिकार मौलिक अधिकार हैं।

(b) राजनीतिक अधिकार – चुनाव में भाग लेना, मतदान का अधिकार, उम्मीदवार बनने का अधिकार तथा सरकारी पद ग्रहण करना, सरकार की आलोचना, राजनीतिक दल बनाना आदि राजनीतिक अधिकारों के श्रेणी में आते हैं।

(c) सामाजिक या नागरिक अधिकार-जीवन का अधिकार, भाषण एवं अभिव्यक्ति का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, समुदाय बनाने का अधिकार, आवागमन का अधिकार आदि इन श्रेणी में आते हैं।

(d) आर्थिक अधिकार-काम करने का अधिकार, अवकाश का अधिकार तथा आर्थिक सुरक्षा का अधिकार आर्थिक अधिकार की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 3.
कार्य पर एक निबंध लिखिए। कार्यों की विद्यमान श्रेणी और ये किस तरह बदलती हैं, दोनों पर ध्यान केंद्रित करें?
उत्तर:
बच्चे अक्सर कल्पना करते हैं कि जब बड़े होंगे तो किस प्रकार कौन-सा कार्य करेंगे। यह कार्य वास्तव में ‘रोजगार’ होता है। यह ‘कार्य’ सरल का सर्वाधिक अर्थ है। वास्तव में, यह.एक अत्यधिक सरल विचार है। अनेक प्रकार के कार्य वेतन सहित रोजगार के विचार की पुष्टि नहीं करते। जैसे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में किए जाने वाले अधिकांश कार्य प्रत्यक्षतः किसी औपचारिक रोजगार आँकड़ों में नहीं गिने जाते हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से आशय है नियमित रोजगार के क्षेत्र से हटकर किया जाने वाला कार्य-ब्यवहार। इसमें कभी-कभी किए गए कार्य अथवा सेवा के बदले नकद भुगतान किया जाता है। लेकिन प्रायः इसमें वस्तुओं अथवा सेवाओं का आदान-प्रदान भी किया जाता है।

हम कार्य को शारीरिक और मानसिक परिश्श्रमों के द्वारा किए जाने वाले ऐसे स्वैतनिक या अवैतनिक कार्यों के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिनका उद्देश्य मानव की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करना है।

कार्य के आधुनिक रूप और श्रम विभाजन-प्राचीन समाज में अधिकतर लोग खेतों में कृषि कार्य करते थे अथवा पशुओं की देखभाल करते थे। औद्योगिक रूप से विकसित समाज में जनसंख्या का बहुत छोटा भाग कृषि कार्यों में लगा हुआ है और अब कृषि का भी औद्योगीकरण हो गया है। कृषि कार्य मानव द्वारा करने की अपेक्षा अधिकांशतः मशीनों द्वारा किया जाने लगा है। भारत जैसे देश में आज भी अधिकतर आबादी ग्रामीण और कृषि कार्यों में अथवा अन्य ग्राम आधारित व्यवसायों में संलग्न है। भारत में और भी कई प्रवृत्तियाँ हैं उदाहरण के लिए सेवा क्षेत्र का विस्तार। आधुनिक समाज में अर्थव्यवस्था की एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है, श्रम का जटिल विभाजन।

कार्य असंख्य विभिन्न व्यवसायों में विभक्त हो गया है जिनमें लोग विशेषज्ञ हैं। पारंपरिक समाज में गैर-कृषि कार्य को शिल्प की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। शिल्प लंबे प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जाता था और सामान्यतः श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक सभी कार्य करता था। आधुनिक समाज में भी कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा है औद्योगीकरण से पूर्व, अधिकतर कार्य घर पर किए जाते थे और कार्य पूरा करने में परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से उसमें हाथ बँटाते थे। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास, जैसे बिजली और कोयले से मशीन संचालन से घर पर भी कार्य अलग-अलग होने लगे। पूँजीपति, उद्योगपतियों के उद्योग व औद्योगिक विकास का केंद्र बिंदु बन गए।

उद्योगों में नौकरी करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित थे और इस कार्य के बदले उन्हें वेतन प्राप्त होता था। प्रबंधक कार्यों का निरीक्षण किया करता था क्योंकि उनका उद्देश्य श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाना और अनुशासन बनाए रखना था।

आधुनिक समाज की एक मुख्य विशेषता है आर्थिक अन्योन्याश्रियता का असीमित विस्तार। हम सभी अत्यधिक रूप से श्रमिकों पर निर्भर करते हैं जो हमारे जीवन को बनाए रखने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए संपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधुनिक समाजों में अधिकतर लो अपने भोजन व रहने के मकान का या अपनी उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं।

कार्य का रूपांतरण – औद्योगिक प्रक्रियाएँ उन सरंल प्रक्रियाओं में विभाजित हो गई जिनका सही समय निर्धारण, संगठन और निगरानी संभव है। थोक उत्पादन के लिए थोक बाजारों की आवश्यकता होती है। साथ ही उत्पादन की प्रक्रिया में कई नवपरिवर्तन हुए। संभवतया इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्वचलित उत्पादन की कड़ियों (मूविंग असेंबली लाइन) का निर्माण था। आधुनिक औद्योगिक उत्पादन के लिए कीमती उपकरणों और निगरानी व्यवस्थाओं के माध्यम से कर्मचारियों की निरंतर निगरानी करना आवश्यक है।

विगत कई दशकों से ‘उदार उत्पादन’ और ‘कार्य के विकेंद्रीकरण’ की ओर झुकाव हुआ ‘ है। यह तर्क दिया जाता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में व्यवसाय और देशों के मध्य प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हो रही है इसलिए व्यवसाय के लिए बदलती बाजार अवस्थाओं के अनुकूल उत्पादन को व्यवस्थित करना आवश्यक हो गया है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र धर्म का अध्ययन करता है. कैसे?
उत्तर:
धर्म काफी लंबे समय से अध्ययन और चिंतन का विषय रहा है। समाज के बारे में सामाजिक निष्कर्ष धार्मिक चिंतनों से अलग हटकर है। धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन धर्म के धार्मिक या ईश्वरमीमांसीय अध्ययन से कई तरह से भिन्न है।

धर्म समाज में वास्तव में कैसे कार्य करता है और अन्य संस्थाओं के साथ इसका क्या संबंध है, के बारे में यह आनुभाविक अध्ययन करता है।
यह तुलनात्मक पद्धति का उपयोग करता है।
यह समाज और संस्कृति के अन्य पक्षों के संबंध में धार्मिक विश्वासों, रिवाजों और संस्थाओं की जाँच करता है।

अनुभविक पद्धति का अर्थ है कि समाजशास्त्री धार्मिक प्रघटनाओं के लिए निर्णायक उपागम को नहीं अपनाना। यहाँ तुलनात्मक पद्धति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक अर्थ में सभी समाजों को एक-दूसरे के समान स्तर पर रखती है। यह बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के अध्ययन में सहायता करती है। समाजशास्त्री दृष्टिकोण का अर्थ है कि धार्मिक जीवन को केवल घरेलू जीवन, आर्थिक जीवन और राजनीतिक जीवन के साथ संबंद्ध करके ही बोधगम्य बनाया जा सकता है।

धर्म सभी ज्ञात समाजों में विद्यमान है हालांकि धार्मिक विश्वास और रिवाज एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में परिवर्तित होते रहते हैं। सभी धर्मों की समान विशेषताएँ हैं –

  • प्रतीकों का समुच्चय, श्रद्धा या सम्मान की भावनाएँ
  • कर्मकांड या अनुष्ठान
  • विश्वासकर्ताओं का एक समुदाय।

धर्म के साथ संबंद्ध कर्मकांड विविध प्रकार के होते हैं । कर्मकांडीय कार्यों में प्रार्थना करना, भजन गाना, प्रभु का गुणगान करना, विशेष प्रकार का भोजन करना या ऐसा भोजन नहीं करना समाहित होते हैं। कुछ दिनों का उपवास रखना और इसी प्रकार के अन्य कार्यों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। चूँकि कर्मकांडीय धार्मिक प्रतिकों से संबद्ध होते हैं अतः इन्हें प्रायः आदतों

और सामान्य जीवन प्रक्रियाओं से एकदम भिन्न रूप में देखा जाता है। दैवीय सम्मान में मोमबत्ती या दीया जलाने का महत्त्व सामान्यतया कमरे में रोशनी करने से एकदम भिन्न होता है । धार्मिक कर्मकांड प्रायः व्यक्तियों द्वारा अपने दैनिक जीवन में किए जाते हैं लेकिन सभी धर्मों में विश्वासाकर्ताओं द्वारा सामूहिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं । सामान्यतः ये नियमित अनुष्ठान विशेष संस्थानों-चर्चों, मस्जिदों, मंदिरों, तीर्थों में आयोजित किए जाते हैं।

विश्वभर में धर्म एक पवित्र क्षेत्र है। इस बात पर विचार करें कि विभिन्न धर्मों के सदस्य पवित्र क्षेत्र में प्रवेश करने के पूर्व क्या करते हैं। उदाहरण के लिए, सिर को ढंकते हैं या नहीं ढकते, जूते उतारते हैं या विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करते हैं आदि। इन सबमें जो बात समान है वह श्रद्धा की भावना, पवित्र स्थानों या स्थितियों की पहचान और प्रति सम्मान की भावना।

एमिल दुर्खाइम का अनुसरण करने वाले धर्म के समाजशास्त्री उस पवित्र क्षेत्र को समझने में रुचि रखते हैं जो प्रत्येक समाज में सांसारिक चीजों से भिन्न होता है। अधिकतर मामलों में पवित्रता में अलौकिकता का तत्त्व होता है। अधिकांशतः किसी वक्ष या मंदिर की पवित्रता के साथ यह विश्वास जुड़ा होता है कि इसके पीछे कोई अलौकिक शक्ति है, इसलिए यह पवित्र है। फिर भी यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आरंभ में बौद्ध और कंफ्यूशियसवाद में अलौकिकता की कोई संकल्पना नहीं थी लेकिन जिन व्यक्तियों और चीजों को वे पवित्र मानते थे उनके लिए उनमें पूर्णरूपेण श्रद्धा थी।

धर्म का समाजशास्त्रीय अध्ययन करते हुए प्रश्न उत्पन्न होता है कि धर्म का अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ क्या संबंध है। धर्म का शक्ति और राजनीति के साथ बहुत निकट का संबंध रहा है। उदाहरण के लिए, इतिहास में समय-समय पर सामाजिक परिवर्तन के लिए धार्मिक आंदोलन हुए हैं, जैसे विभिन्न जाति-विरोधी आंदोलन अथवा लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन। धर्म किसी व्यक्ति के निजी विश्वास का मामला ही नहीं है अपितु इसका सार्वजनिक स्वरूप भी होता है और धर्म को इसी सार्वजनिक स्वरूप के कारण ही यह समाज के अन्य संस्थाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण होता है।

समाजशास्त्र शक्ति को व्यापक संदर्भ में देखता है। अतः राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र के बीच संबंध को जानना समाजशास्त्रीय हित में है। प्राचीन समाजशास्त्रियों को विश्वास था कि जैसे-जैसे समाज आधुनिक होता जाएगा धर्म का जीवन के अन्य क्षेत्रों पर प्रभाव कम होता जाएगा । धर्म निरपेक्षता की अवधारण इस प्रक्रिया का वर्णन करती है। समकालीन घटनाएँ समाज के विभिन्न पक्षों में धर्म की दृढ़ भूमिका की जानकारी देती हैं।

समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1864-1920 ई.) के महत्त्वपूर्ण कार्य दर्शाते हैं कि किस तरह समाजशास्त्र सामाजिक और आर्थिक व्यवहार के न्य पक्षों के साथ धर्म के संबंधों को देखता है । वेबर का तर्क है कि कैल्विनवाद (प्रोटेस्टेंट इसाई धर्म की एक शाखा) आर्थिक संगठन की पद्धति के रूप में पूँजीवाद के उद्भव और विकास को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है। कैल्विनवादियों का मत था कि विश्व की रचना भगवान की महिमा के लिए हुई। इसका अभिप्राय है कि संसार में किया गया कोई भी कार्य उसके गौरव के लिए किया जाता है, यहाँ तक कि सांसारिक कार्य को भी पूजा कार्य बना दिया गया। हालांकि इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कैल्विनवादी भाग्य की अवधारणा में विश्वास करते थे जिसका अर्थ है कि कौन स्वर्ग में जाएगा

और कौन नर्क में, यह पूर्व से ही निश्चित था। चूँकि यह ज्ञात नहीं हो सकता था कि किसे स्वर्ग मिलेगा और किसे नर्क, लोग इस संसार में अपने कार्य में भगवान की इच्छा के संकेत देखने लगे। इस प्रकार व्यक्ति चाहे जो भी व्यवसाय करता हो यदि वह अपने व्यवसाय में दृढ़ और सफल है तो उसे भगवान की प्रसन्नता का संकेत माना जाता था। अर्जित किया गया धन सांसारिक उपभोग में लगाने के लिए नहीं था अपितु कैल्विनवाद का सिद्धांत मितव्ययता से रहने का था।

धर्म का अलग क्षेत्र के रूप में अध्ययन नहीं किया जा सकता। सामाजिक शक्तियाँ हमेशा और अनिवार्यतः धार्मिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक बहस, आर्थिक स्थितियाँ और लिंग संबंधी मानक हमेशा धार्मिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत धार्मिक मानक सामाजिक समझ को प्रभावित और कभी-कभी निर्धारित भी करते हैं। विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है। इसलिए समाजशास्त्रीय रूप से यह पूछना भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि मानव आबादी के इतने बड़े हिस्से का धर्म से क्या संबंध है। धर्म समाज का महत्त्वपूर्ण भाग है और अन्य भागों से अनिवार्यतः संबद्ध है। समाजशास्त्र या समाजशास्त्रियों का कार्य इन विभिन्न अंत:संबंधों को उजागर करना है। धार्मिक प्रतीक एवं कर्मकांड अक्सर समाज की भौतिक और कलात्मक संस्कृति से जुड़े होते हैं।

प्रश्न 5.
सामाजिक संस्था के रूप में विद्यालय पर एक निबंध लिखिए। अपनी पढ़ाई और वैयक्तिक प्रेक्षणों, दोनों का इसमें प्रयोग कीजिए।
उत्तर:
विद्यालय एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। परिवार से निकलकर बच्चा विद्यालय के अपरिचित वातावरण में पहुँचता है, जहाँ वह धीरे-धीरे सामंजस्य बिठाकर शिक्षा की कई . सीढ़ियों को पार करता है। हमारे विद्यालय का नाम सर्वोदय विद्यालय है। इसका भवन पक्का है। इसमें 25 कमरे हैं। सभी कमरों में खिड़कियाँ एवं रोशनदान हैं। विद्यालय में एक बड़ा हॉल है जहाँ सामूहिक बैठकें होती हैं । सांस्कृतिक कार्यक्रम भी यहीं आयोजित होते हैं।

सभी कक्षाओं में बिजली के पंखे लगे हुए हैं। प्रत्येक कक्षा में एक अलमारी .बनी है। इसमें चॉक, डस्टर एवं उपस्थित रजिस्टर रखा जाता है। हमारे विद्यालय में बहुत अच्छे ढंग से पढ़ाई-लिखाई होती है। यहाँ लगभग 600 छात्र-छात्राएँ हैं। इनमें से लगभग आधी छात्राएँ हैं। हमारे विद्यालय में ग्यारह शिक्षक एवं सात शिक्षिकाएँ हैं। हमारी प्रधानाध्यापिका का नाम श्रीमती सुधा जैन है। सभी अध्यापक अनुशासन प्रिय एवं कार्यकुशल हैं। हमारी समाजशास्त्र की कक्षा डॉ. अमित राज लेते हैं। वे समाजशास्त्र विषय को ऐसे पढ़ाते हैं कि वह शीघ्र ही समझ में आ जाता है।

हमारा विद्यालय एक आदर्श विद्यालय है। यहाँ पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ खेल-कूद की भी अच्छी व्यवस्था है। विद्यार्थियों को समय-समय पर खेल-कूद, शारीरिक शिक्षा एवं योग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। विद्यालय में हर वर्ष मार्च महीने में वार्षिक खेल प्रतियोगिता का आयोजन होता है। बच्चे विद्यालय के मैदान में प्रतिदिन तरह-तरह के खेल खेलते हैं। हमारे खेल शिक्षक हमें नए-नए खेल खेलना सिखाते हैं।

पुस्तकालय का बड़ महत्त्व है। इसलिए हमारे विद्यालय में एक छोटा पुस्तकालय खोला गया है। यहाँ विभिन्न विषयों की पुस्तकों के अलावा कहानियों, नाटकों एवं बाल-कविताओं की पुस्तकें उपलब्ध हैं। पुस्तकालय में बैठकर विभिन्न प्रकार की पुस्तकों का अध्ययन किया जा सकता है।

हमारे विद्यालय में पेय जल एवं शौचालय का अच्छा प्रबंध है। विद्यालय में एक कैंटीन है। यहाँ शिक्षक एवं विद्यार्थी मध्यावकाश के समय जलपान करते हैं। विद्यालय के आँगन में कई सुंदर एवं हरे-भरे पड़े हैं। छोटे बच्चों के लिए यहाँ झूले हुए हैं।

हमारा विद्यालय हर दृष्टिकोण से अच्छा है। हमारे विद्यालय का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत आता है। यहाँ सभी प्रकार की सुविधाएँ हैं। इन सुविधाओं के कारण हमारा विद्यालय पूरे शहर में प्रसिद्ध है। हमारे विद्यालय में दूर-दराज के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। हमारे विद्यालय में निर्धन एवं बेसहारा बच्चों को निःशुल्क किताबें तथा वर्दी दी जाती हैं। मुझे अपने विद्यालय पर गर्व है।

Bihar Board Class 11 Sociology Solutions Chapter 3 सामाजिक संस्थाओं को समझना

प्रश्न 6.
विवाह की परिभाषा कीजिए और इसका.सामाजिक महत्त्व बताए।
उत्तर:
विवाह मानव समाज की एक मौलिक, प्राचीन तथा अनिवार्य संस्था है। प्रत्येक समाज में विपरीत लिंगियों के मध्य यौन संबंध स्थापित करने के कुछ नियम होते हैं, इन्हीं नियमों के पुंज को विवाह संस्था कहा जाता है। विवाह के माध्यम से केवल यौन संबंधों का निर्धारण नहीं होता, वरन् पति-पत्नी के कुछ अधिकार तथा कर्त्तव्य भी निर्धारित हो जाते हैं।

विवाह की परिभाषाएँ-हैरी एम. जॉनसन के अनुसार, “विवाह एक ऐसा स्थायी संबंध है जिससे एक पुरुष तथा एक स्त्री को समुदाय की स्थिति को क्षति पहुँचाये बिना संतोनोत्पत्ति की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है।” कॉलिन्स डिक्शनरी ऑफ सोश्योलोजी के अनुसार, “विवाह एक वयस्क पुरुष तथा एक वयस्क स्त्री के मध्य सामाजिक रूप से स्वीकृत तथा कभी-कभी कानूनी रूप से वैध मिलन है।”

ई. ए. हॉबल के अनुसार, “विवाह सामाजिक नियमों का एक पुंज है जो कि विवाहित युग्म के पारस्परिक, उसके रक्त संबंधियों के, उनके बच्चों के तथा समाज के प्रति संबंधों को नियंत्रित तथा परिभाषित करता है। वेस्टर मार्क के अनुसार, “विवाह एक या अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है जो प्रथा अथवा कानून द्वारा स्वीकृत होता है जिसमें संगठन में आने वाले दोनों पक्षों तथा उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकार एवं कर्तव्यों का समावेश होता है।”

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “विवाह एक प्रजनन मूलक परिवार के स्थापना की समाज स्वीकृत विधि है।” आर. एच. लॉवी के अनुसार, “विवाह उन स्पष्ट स्वीकृत संगठनों को प्रकट करता है जो लिंग संबंधी संतुष्टि के उपरांत भी स्थिर रहता है एवं पारिवारिक जीवन की आधारशिला का निर्माण करता है।”

बील्स तथा हॉइजर के अनुसार, “विवाह प्रत्येक मानव समाज में जिससे हम परिचित हैं, एक जटिल सांस्कृतिक प्रघटना है जिसमें कि पूर्णतया प्राणिशास्त्रीय यौन संबंधों का निर्वाह होता है, किन्तु इसके अतिरिक्त बच्चों तथा गृहस्थी का पालन-पोषण तथा परिवार पर लादी गई सांस्कृतिक आवश्यकताएँ आदि सामाजिक क्रियाएँ भी होती हैं।” हार्टन तथा हंट के अनुसार, “विवाह एक स्वीकृत सामाजिक प्रणाली है, जिसके अनुसार दो या दो से अधिक व्यक्ति परिवार की स्थापना करते हैं।” मेलीनोवस्की के अनुसार, “विवाह बच्चों की उत्पत्ति तथा देखभाल हेतु समझौता है।” ई. आर. ग्रोब्ज के अनुसार, “विवाह साथी बनकर रहने की सार्वजनिक स्वीकृति तथा कानूनी पंजीकरण है।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि विवाह एक सामाजिक संस्था है जो कि –

  • एक या अधिक पुरुषों का एक या अधिक स्त्रियों के साथ लिंग संबंधों को परिभाषित करता है।
  • पति-पत्नी तथा बच्चों के अधिकारों तथा कर्तव्यों को निर्धारित करता है।

वैवाहित संस्था की उन्नति में निम्नलिखित कारण महत्त्वपूर्ण हैं –

  • यौन संतुष्टि अर्थात् जैविकीय आवश्यकता
  • संतानों का वैधानिक अर्थात् सामाजिक आवश्यकता

विवाह के प्रकार-समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विवाह के निम्नलिखित स्वरूप हैं –
(i) एक विवाह –

  • जोड़ा विवाह
  • मोनोजिनी
  • अस्थायी एक विवाह

(ii) बहु-विवाह –

  • द्विपत्नी विवाह
  • बहुपत्नी विवाह
  • असीमित
  • सशर्त

(iii) बहुपति विवाह –

  • भ्राता संबंधी
  • अभ्राता संबंधी।

(iv) रक्त संबंधी विवाह –

  • देवर अथवा भाभी विवाह
  • कनिष्ठ देवर विवाह
  • ज्येष्ठ देवर विवाह
  • अनुमानतः देवर विवाह

(v) साली विवाह –

  • सीमित
  • एक साथ

विवाह का सामाजिक महत्त्व –

  • एक सामाजिक संस्था के रूप में विवाह सामाजिक ताने-बाने को एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है।
  • प्रसिद्ध समाजशास्त्री जी. पी. मुरडॉक के अनुसार विवाह नियमित यौन संबंध तथा आर्थिक सहयो का केंद्र बिंदु है।
  • विवाह के माध्यम से मनुष्य के जैविकीय संबंधों का नियमन हो जाता है।
  • विवाह के माध्यम से बच्चों के प्रजनन को वैधता प्रदान की जाती है तथा इसके द्वारा परिवार की संरचना होती है। परिवार समाजीकरण की प्रथम पाठशाला है।
  • विवाह के माध्यम से समाज नियमबद्ध यौन संतुष्टि की अनुमति प्रदान करता है। इस प्रकार विवाह समाज में संगठन तथा सामाजिक नियमन की स्थायी संस्था है।

प्रश्न 7
सजातीय विवाह और विजातीय विवाह के नियमों से आपका क्या तात्पर्य है? उपयुक्त उदाहरणों के साथ अपने उत्तर को समझाइए।
उत्तर:
प्रत्येक समाज में जीवन साथी के चुनाव के बारे में कुछ प्रतिबंध लगाए जाते हैं। सजातीय विवाह तथा विजातीय विवाह इसी प्रकार के नियम हैं।
(i) सजातीय विवाह – सजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति अपने समूह के अंदर ही विवाह कर सकता है। सजातीय विवाह में बाह्य समूह के सदस्यों के साथ विवाह निषेध होता है। फोलसम के अनुसार, “सजातीय विवाह वह नियम है, जिसके अनुसार व्यक्ति को अपनी जाति या समूह में विवाह करना पड़ेगा। हालांकि, निकट के रक्त संबंधियों से विवाह की अनुमति नहीं होती है।” सजातीय विवाह के अंतर्गत जीवन-साथी के चुनाव पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं

  • सामान्यतः एक व्यक्ति अपनी जाति, धर्म तथा प्रजाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • हमारे देश में जाति एक अंत:विवाह समूह है, अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के। बाहर के पुरुष या स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता है।
  • जाति की तरह धार्मिक समुदाय भी सजातीय विवाह होता है, अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपने धर्म के बाहर के पुरुष या स्त्री से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता।
  • सजातीय विवाह द्वारा दो रेखाओं के बीच विवाह करने की अनुमति प्रदान की जाती है।
  • सजातीय विवाह के द्वारा ऐसी सीमाओं का निर्धारण किया जाता है जिनके द्वारा व्यक्ति को किसी समूह विशेष से बाहर तथा किसी समूह के अंदर विवाह करना पड़ता है।

सजातीय विवाह के निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट करते हैं कि व्यक्ति के विवाह करने की सीमाएँ क्या हैं –

  • विभागीय तथा जनजातीय सजातीय विवाह-इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपने विभाग तथा जनजाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • वर्ग सजातीय विवाह-प्रत्येक व्यक्ति का विवाह उसके वर्ग अथवा श्रेणी के अंतर्गत ही होना चाहिए।
  • जाति-सजातीय विवाह-इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता है।
  • उपजाति सजातीय विवाह-हमारे देश में विवाह की सीमा उप-जाति तक सीमित हो जाती है।
  • प्रजाति सजातीय विवाह-प्रजाति सजातीय विवाह के अंतर्गत अपनी प्रजाति के अंतर्गत ही विवाह किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय सजातीय विवाह-इस प्रकार के सजातीय विवाह के अंतर्गत एक राष्ट्र के व्यक्ति परस्पर विवाह कर सकते हैं।

(ii) विजातीय विवाह – विजातीय विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति को अपने समूह से बाहर ही विवाह करना पड़ता है। विजातीय विवाह के नियम निम्नलिखित हैं
(a) अनेक ऐसे नातेदार तथा समूह होते हैं, जिनके साथ व्यक्ति को वैवाहिक संबंध कायम करने की अनुमति नहीं दी जाती है।

(b) प्रत्येक समुदाय अपने सदस्यों पर कुछ व्यक्तियों से वैवाहिक संबंध कायम करने पर प्रतिबंध लगाता है।

(c) निकट के नातेदारों से वैवाहिक संबंध नहीं कायम किए जा सकते हैं। डेविस के अनुसार पारिवारिक व्यभिचार-वर्जन इसलिए विद्यमान हैं, क्योंकि वे अनिवार्य हैं तथा पारिवारिक संरचना का एक भाग है। इनके अभाव में परिवार की संरचना तथा प्रकार्यात्मक कुशलता समाप्त हो जाएगी।

(d) नजदीकी संबंधों में विवाह की अनुमति देने पर संपूर्ण सामाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। यही कारण है कि प्रत्येक समाज में पारिवारिक व्यभिचार पर वर्जनाएँ लगायी जाती हैं। उदाहरण के लिए भाई-बहन, पिता-पुत्री, माता-पुत्र के बीच वैवाहिक संबंधों पर प्रत्येक समाज में प्रतिबंध लगाए जाते हैं। ज़ार्ज मुरडॉक के अनुसार, “लैंगिक प्रतियोगिता एवं ईर्ष्या से बढ़कर संघर्ष का कोई अन्य रूप अधिक घातक नहीं है। माता-पिता तथा सहोदरों के बीच यौन ईर्ष्या का अभाव परिवार को एक सहकारी सामाजिक समूह के रूप में मजबूत करता है, इसकी समाज संबंधी सेवाओं की कुशलता में वृद्धि करता है तथा समाज को पूर्णरूप से शक्तिशाली बनाता है।”

(iii) विजातीय विवाह के निम्नलिखित प्रकार भारत में प्रचलित हैं –
(a) गोत्र विजातीय विवाह – हिंदुओं में ऐसा विश्वास किया जाता है कि एक ही गोत्र के व्यक्तियों में एक सा खून पाया जाता है, अतः उनके बीच सजातीय विवाह प्रतिबंधित हैं।

(b) प्रवर विजातीय विवाह – प्रवर शब्द का तात्पर्य हाह्वान करना है। यज्ञ के समय पुरोहितों द्वारा चुने गए ऋषियों का नाम ही प्रवर है। चूँकि यजमान द्वारा पुराहितों को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया जाता था; अतः यजमान तथा पुराहितों के प्रवर एक समझे जाने के कारण उनके बीच वैवाहित संबंध नहीं हो सकते।

(c) पिंड विजातीय विवाह – हिन्दू धर्म के अनुसार पिंड का तात्पर्य है सामान्य पूर्वज। जो व्यक्ति एक ही पितर को पिंड अथवा श्राद्ध अर्पित करते हैं. परस्पर सपिंड कहा जाता है। वशिष्ठ तथा गौतम के अनुसार पिडा को संत पौडियों तथा माता की. पाँच पीड़ियों में विवाह निषेध है। हिंदू विवाह अधिनिया में इन पीढ़ियों में विवाह को क्रमशः पाच तथा बैन कर दिया गया है। सवसीय विवाह तथा विजातीय विवाह सापेक्ष याद हैं। इसका हात्पर्य है कि बोका विवाह एक प्रम में अपनाने की सिक्योकि जान माह के कर दिया। सर्वाधिक महत्वपूर्ण नियम है।

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प्रश्न 8.
परिवार को परिभाषित-जिए। परिवार की मूलभूत विशेषताएँ बंबा हैं?
उत्तर:
परिवार-परिकार शब्द अंग्रेजी भाषा के फैली. शब्द का रूपांतर हैं, जिसकी उत्पत्रि लैटिन भाषा के पुलस’ शब्द से हुई है। इसका अर्थ है नौकर रोमन काननू में मुलस’ शब्द । स्वामियों, दासों, नौकरों व अन्य संबंधित व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता था।

कार्य असंख्य विभिन्न व्यवसायों में विभक्त हो गया है जिनमें लोग विशेषज्ञ हैं। पारंपरिक समाज में गैर-कृषि कार्य को शिल्प की दक्षता के साथ जोड़ा जाता था। शिल्प लंबे प्रशिक्षण के माध्यम से सीखा जाता था और सामान्यतः श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक सभी कार्य करता था। आधुनिक समाज में भी कार्य की स्थिति में परिवर्तन देखा है औद्योगीकरण से पूर्व, अधिकतर कार्य घर पर किए जाते थे और कार्य पूरा करने में परिवार के सभी सदस्य सामूहिक रूप से उसमें हाथ बँटाते थे। औद्योगिक प्रौद्योगिकी में विकास, जैसे बिजली और कोयले से मशीन संचालन से घर पर भी कार्य अलग-अलग होने लगे। पूँजीपति, उद्योगपतियों के उद्योग व औद्योगिक विकास का केंद्र बिंदु बन गए।

उद्योगों में नौकरी करने वाले लोग विशिष्ट कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित थे और इस कार्य के बदले उन्हें वेतन प्राप्त होता था। प्रबंधक कार्यों का निरीक्षण किया करता था क्योंकि उनका उद्देश्य श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाना और अनुशासन बनाए रखना था।

आधुनिक समाज की एक मुख्य विशेषता है आर्थिक अन्योन्याश्रियता का असीमित विस्तार। हम सभी अत्यधिक रूप से श्रमिकों पर निर्भर करते हैं जो हमारे जीवन को बनाए रखने वाले उत्पादों और सेवाओं के लिए संपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आधुनिक समाजों में अधिकतर लो अपने भोजन व रहने के मकान का या अपनी उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं।

प्रश्न 9.
परिवार के सामाजिक कार्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:एक
संस्था तथा समिति के रूप में समाज के रूप में समाज में परिवार काप केंद्रीय स्थान है। परिवार समाज का सूक्ष्म स्वरूप है। सामाजिक संगठन की इकाई के रूप में परिवार का अत्यधिक महत्त्व है। आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “किसी भी संस्कृति में परिवार के महत्त्व का मूल्यांकन करने के लिए यह मालूम करना जरूरी है कि उसके क्या कार्य हैं तथा किस सीमा तक उन्हें पूर्ण किया जा सकता है।” एक संस्था तथा समिति के रूप में परिवार के विविध कार्य हैं।

इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “किसी भी संस्था के विविध कार्य होते हैं। संभवतः सभी संस्थाओं में परिवार अत्यंत विविध कार्यों वाली संस्था है।” डेविस ने अपनी पुस्तक ह्यूमन सोसायटी तथा डब्लू जे. मूर ने अपनी पुस्तक फैमली में परिवार के निम्नलिखित सामाजिक कार्य बताए हैं

(i) प्रजनन कार्य – समाज का अस्तित्व व्यक्तियों से होता है। परिवार में कुछ विशेष व्यक्तियों के बीच यौन संबंध स्थापित करके वह कार्य पूरा किया जाता है। इस प्रकार परिवार व्यक्तियों की यौन आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ समाज को स्थायित्व भी प्रदान करता है।

(ii) परिवार के सदस्यों की देखभाल करना – नवजात शिशुओं का समुचित पालन-पोषण परिवार में ही होता है। गर्भवती स्त्री की देखभाल तथा बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य
परिवार में ही किया जाता है।

प्रश्न 10.
परिवार की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
परिवार व्यक्तियों की केवल सामूहिकता नहीं है। परिवार में व्यक्ति जैविकीय, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से परस्पर अंतर्संबंधित होते हैं । परिवार की मूलभूम विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) सार्वभौमिकता-एक सामाजिक संगठन के रूप में परिवार सार्वभौमिक है। एकं संस्था के रूप में परिवार प्रत्येक समाज में पाया जाता है।

(ii) सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध-परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध पाए जाते हैं। भावनात्मक संबंध त्याग, वात्सल्य तथा पारस्परिक प्रेम पर आधारित होते हैं। भावनात्मक संबंध रूपी सेतु परिवार के सदस्यों को परस्पर अंतर्संबंधित रखता है।

(iii) सीमित आकार-परिवार का आकार सीमित होता है। वर्तमान समय में परिवार में साधारणतया पिता, पत्नी तथा उनकी वैध संतानें सम्मिलित किए जाते हैं। नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रियाओं ने भी परिवार के आकार को सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, भारत में पाए जाने वाले नगरीय परिवारों को एकाकी परिवार नहीं कहा जा सकता है। डॉ. एम. एन. श्रीवास्तव का मत है कि भारत में संयुक्त परिवार टूट नहीं रहे हैं वरन् उनके स्वरूप में परिवर्तन आ रहा है।

(iv) समाज की मूल इकाई के रूप में-परिवार सामाजिक संगठन की मूल इकाई है। परिवार के अंतर्गत ही सामाजिक मूल्यों, आदर्शों तथा प्रतिमानों का विकास होता है। परिवार में . प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं। इस प्रकार, सामाजिक संरचना में परिवार की केंद्रीय स्थिति होती है।

(v) संस्कारों की प्राथमिक पाठशाला-व्यक्ति परिवार में ही सामाजिक तथा सांस्कृतिक संस्कार सीखते हैं। संस्कारों का यह क्रम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनवरत रूप से चलता रहता है। संस्कारों का प्रभाव व्यक्तियों पर अमिट रहता है।

(vi) सदस्यों का पारस्परिक उत्तरदायित्व – एक प्राथमि पूह के रूप में परिवार के सदस्यों के बीच घनिष्ठ तथा आमने-सामने के अनौपचारिक पाए जाते हैं।

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प्रश्न 11.
परिवार के विभिन्न स्वरूपों की विशेषताएँ बताइए
उत्तर:
एक सार्वभौमिक संस्था के रूप में परिवार मानव समाज को मौलिक इकाई है लेकिन विश्व के सभी समाजों में इसका स्वरूप एकसमान नहीं। सामाजिक परिस्थिति तथा सांस्कृतिक भिन्नता के कारण परिवार के अनेक स्वरूप पाए जाते हैं।

वर्तमान समय में परिवार के दो प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं –

  • एकाकी परिवार तथा
  • संयुक्त परिवार

परिवार के अन्य स्वरूप इसके अतिरिक्त, परिवार के निम्नलिखित स्वरूप भी अनेक समाजों तथा जनतातीय समाजों में पाए जाते हैं –

  • विस्तृत परिवार
  • मातृवंशीय तथा मातृस्थानीय परिवार
  • पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय परिवार
  • बहुपत्नी परिवार
  • बहुपति परिवार

(i) एकाकी परिवार-एकाकी परिवार वास्तव में परिवार का सबसे छोटा स्वरूप है। इसमें पति-पत्नी तथा उनके वैध एवं अविवाहित बच्चे होते हैं । एकाकी परिवार में निम्नलिखित नातेदारी संबंध पाए जाते हैं –

  • पति-पत्नी
  • पिता-पुत्र
  • पिता-पुत्री
  • माता-पुत्र
  • माता-पुत्री
  • भाई-भाई
  • भाई-बहन

पूरित एकाकी परिवार भी पाए जाते हैं। इन परिवारों में पति की विधवा माता या विधुर पिता या उसके छोटे अविवाहित भाई-बहन होते हैं।

(ii) संयुक्त परिवार – संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। अति प्राचीन काल से ही संयुक्त परिवारों का अस्तित्व भारतीय समाज में रहा है। डॉ. इरावती कर्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों के समूह है जो सामान्यतः एक भवन में रहते हैं, जो एक रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के स्वामी होते हैं, जो सामान्य पूजा में भाग लेते हैं और जो किसी न किसी प्रकार एक-दूसरे के रक्त संबंधी हैं।”

आई. पी. देसाई के अनुसार, “हम ऐसे परिवार को संयुक्त परिवार कहते हैं, जिसमें पीढ़ी की गहराई की अपेक्षा अधिक लंबाई पायी जाती है और जिसके सदस्य परस्पर संपत्ति, आय तथा पारस्परिक अधिकारों व दायित्वों के आधार पर संबंधित होते हैं।” यद्यपि औद्योगीकरण, नगरीकरण, कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ह्रास, पश्चिम के प्रभाव तथा नवीन सामाजिक विधानों ने संयुक्त परिवार को काफी क्षीण कर दिया है तथापि एक परिवर्तित रूप में उनका अस्तित्व भारतीय समाज में आज भी विद्यमान है।

डॉ. एम. एन. श्रीनिवास का मत है कि भारत में संयुक्त परिवार विघटित नहीं हो रहे हैं अपितु उनके स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है। डॉ. के. एम. कपाड़िया के अनुसार, “अभी तक संयुक्त परिवार ने काफी कष्टमय समय को पार किया है फिर भी उसका भविष्य खराब नहीं है।”

परिवार के अन्य स्वरूप –
(i) विस्तृत परिवार-विस्तृत परिवार के अन्तर्गत एकाकी नातेदारों के अतिरिक्त दूर के रक्त संबंधी भी हो सकते हैं, उदाहरण के लिए सास-ससुर तथा दामाद का. एक साथ रहना। इस प्रकार एकांकी या संयुक्त परिवार के सदस्यों के अलावा कोई अन्य नातेदार परिवार का हिस्सा बनता है तो उसे संयुक्त परिवार कहते हैं।

(ii) मातृवंशीय एवं मातृस्थानीय परिवार-मातृवंशीय परिवार के अंतर्गत पति अपनी पत्नी के साथ पत्नी की माँ अर्थात् अपनी सास के घर में रहता है। मातृवंशीय परिवार में वंशावली माँ के पक्ष में पायी
जाती है तथा परिवार में निर्णय करने की सत्ता भी माँ के पास ही होती है। माँ ही परिवार की मुखिया होती है। हालांकि, इस प्रकार के परिवार अधिक प्रचलन में नहीं हैं। दक्षिण भारत के नायर परिवार तथा मेघालय की खासी जनजाति के लोग ‘मातृसत्तात्मक परिवारों में निवास करते हैं।

(iii) पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय परिवार-विश्व के. लगभग सभी समाजों में पितृवंशीय तथा पितृस्थानीय परिवार पाए जाते हैं। इन परिवारों में वंशावली पिता के पक्ष में पायी जाती है। इन परिवारों में विवाह के बाद पत्नी पति के घर रहती है। परिवार का मुखिया पिता होता है तथा परिवार की सत्ता उसी के पास होती है।

(iv) बहुपत्नी परिवार-बहुपत्नी परिवार में एक व्यक्ति एक समय में एक से अधिक पत्नियाँ . रखता है। इस प्रकार के परिवार अनेक जनजातियों में पाए जाते हैं।

(v) बहुपति परिवार-बहुपति परिवार के अंतर्गत एक स्त्री के एक समय में एक से अधिक पति होते हैं। इन परिवार की संरचना भ्रातृत्व बहुपति विवाह से होती हैं। भारत में इस प्रकार के परिवार खासी तथा टोडा जनजातियों में पाए जाते हैं।

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प्रश्न 12.
नातेदारी में आप क्या समझते हैं? सामाजिक जीवन में इसके महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जैसा कि हम जानते हैं कि परिवार घनिष्ठ संबंधियों से बना एक संस्था है। परिवार के सदस्यों के बीच परस्पर रक्त अथवा वैवाहिक संबंध पाए जाते हैं। इन बंधनों द्वारा संबद्ध व्यक्तियों को हो नातेदार कहा जाता है लेकिन नावेदारी संबंधों का क्षेत्र परिवार तक ही सीमितन होकरें व्यापक है। वैवाहिक संखों के जरिए एक परिवार के सदस्य दूसरे परिवार के सदस्यों उपरोक्त विवेचन को पर महम कह सकते कि गावर पाक्ति है, हो सका।

बाने नोटर मुरडाक के अनुसार, “यहा (मात्र सम की एक वना है। बिसमें व्यक्ति एक-दूसरे से इंटिलं आंतरिक तथा शाखाकृत अपनी द्वारा संबंध होते हैं। डक्लिफ बाउन के अनुसार, “जावेदारी प्रथा वह व्यवस्था है जो व्यक्तियों को

व्यवस्थित सामाजिक जीवन में परस्पर सहयोग करने की प्रेरणा देती है।
वास्तव में, रैडक्लिफ ब्राउन नातेदारी व्यवस्था को सामाजिक संरचना के एक अंग के रूप स्वीकार करते हैं।
चार्ल्स विनिक के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आ जाते हैं जो कि अनुमानित तथा वास्तविक, वंशावली संबंधों पर आधारित हैं।

नातेदारी संबंधों के बदलते आयाम –

  • नातेदारी संबंध जनजातीय समाजों तथा ग्रामीण समुदायों में काफी प्रबल तथा विस्तृत होते हैं।
  • औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा प्रौद्योगिक विकास के कारण नातेदारी संबंधों की प्रगाढ़ता में कमी आयी है।
  • प्राथमिक समूहों के स्थान पर द्वितीयक समूहों के बढ़ते महत्त्व के कारण भी नातेदारी संबंध न केवल शिथिल हुए हैं, वरन् उनका परिवार भी कम हुआ है।

नातेदारी के प्रकार –

  • वैवाहिक नातेदारी तथा
  • रक्त संबंधी नातेदारी।

1. वैवाहिक नातेदारी – वैवाहिक नातेदारी संबंधों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति किसी स्त्री से विवाह करता है तो उसका संबंध न केवल उस स्त्री से स्थापित हो जाता है वरन् स्त्री के परिवार के अन्य सदस्यों से भी उसका संबंध स्थापित हो जाता है। इस प्रकार विवाह के पश्चात् कोई व्यक्ति न केवल पति बनता है, अपितु वह बहनोई तथा दामाद भी बन जाता है। इसी प्रकार कोई स्त्री विवाह के पश्चात् न केवल पत्नी बनती अपितु पुत्रवधू, चाची, भाभी, जेठानी, देवरानी तथा मामी आदि बन जाती है।

2. रक्त संबंधी नातेदारी – रक्त संबंधी नातेदारी के अंतर्गत रक्त अथवा सामूहिक वंशावली से जुड़े व्यक्ति आते हैं। वैवाहिक नातेदारी में संबंधों का आधार विवाह होता है जबकि रक्त संबंधी नातेदारी में संबंध रक्त के आधार पर होते हैं । उदाहरण के लिए, माता-पिता व उनके बच्चों तथा सहादारों के बीच रक्त संबंध पाए जाते हैं। रक्त संबंध वास्तविक तथा काल्पनिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, गोद लिए हुए बच्चे की पहचान वास्तविक पुत्र की भाँति होती है।

नातेदारी के विभिन्न आधार-हैरी एम. जॉनसन के द्वारा नातेदारी के निम्नलिखित आधार बनाए गए हैं –

  • लिंग-बहन तथा भाई शब्द रक्त संबंधियों के लिंग को बताते हैं।
  • पीढ़ी-पिता तथा पुत्र के द्वारा जहाँ एक तरफ दो पीढ़ियों की ओर संकेत करते हैं, दूसरी तरफ वे रक्त संबंधी भी हैं।
  • निकटता-दामाद तथा फूफा से निकटता के आधार पर संबंध होते हैं, लेकिन ये संबंध रक्त पर आधारित नहीं होते हैं।
  • विभाजन-सभी नातेदारी संबंधे को साधारणतया दो शाखाओं में बाँटा जाता है उदाहरण के लिए पितामह तथा नाना, भतीजी आदि ।
  • पहली शाखा का संबंध पिता के जन्म वाले परिवार से होता है तथा दूसरी शाखा का संबंध माता के जन्म लेने वाले परिवार से होता है।
  • श्रृंखला सूत्र-उपरोक्त वर्णित विभाजन का संबंध संबंधियों की निकटता के साथ है। इन संबंध की श्रृंखला का आधार निकटता अथवा रक्त संबंध है।

नातेदारी का सामाजिक जीवन में महत्त्व –

  • सामाजिक संरचना में नातेदारी संबंधों का विशेष महत्त्व है। यह परिवारिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
  • परिवार में व्यक्तियों की प्रस्थितियों के अनुसार निश्चित अधिकार तथा उत्तरदायित्व होते हैं।
  • नातेदार एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए होते हैं तथा एक-दूसरे की सहायता अन्य संस्थाओं या व्यक्तियों की अपेक्षा अत्यधिक तत्परता से करते हैं।

प्रश्न 13.
नातेदारी संबंधों की विभिन्न श्रेणियों की.सोदाहरण व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
निकटता अथवा दूरी के आधार पर नातेदारों में विभिन्न श्रेणियाँ पायी जाती हैं। एक व्यक्ति के नातेदारों में कुछ अत्यधिक निकट, कुछ निकट तथा कुछ अपेक्षाकृत कम निकट होते हैं। इसी प्रकार कुछ नातेदारों से दूर तथा कुछ से बहुत दूर के संबंध होते हैं । निकटता अथवा दूरी के आधार पर नातेदारों को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता है

(i) प्राथमिक नातेदारी-एक ही परिवार से संबंधित व्यक्तियों को प्राथमिक नातेदार कहा जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक एकाकी परिवार में आठ प्राथमिक नातेदार हो सकते हैं। डॉ. दुबे ने भी इसी मत का समर्थन किया है। ये आठ नातेदार निम्नलिखित हो सकते हैं –

  • पति-पत्नी
  • पिता-पुत्र
  • माता-पुत्री
  • पिता-पुत्री
  • माता-पुत्र
  • छोटे-बड़े भाई
  • छोटी-बड़ी बहनें
  • भाई-बहन

(ii) द्वितीयक नातेदारी – एक व्यक्ति के प्राथमिक नातेदारों में से प्रत्येक नातेदार के प्राथमिक नातेदार के अथवा संबंधी होते हैं। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि वे प्राथमिक संबंधी न होकर हमारे प्राथमिक संबंधियों के संबंधी होते हैं। इसी प्रकार, वे हमारे द्वितीयक संबंधी कहलाते हैं। उदाहरण के लिए चाचा (पिता या भाई) तथा बहनोई (बहन का पति), द्वितीयक अथवा गौण संबंधी हैं। ठीक इसी प्रकार, पिता-पुत्र का प्राथमिक संबंधी है जबकि चाचा अर्थात् पिता का भाई पिता का प्राथमिक संबंधी है। इस प्रकार चाचा अर्थात् पिता का भाई द्वितीयक संबंधी कहलाता है। ठीक इसी प्रकार बहन भाई की प्राथमिक संबंधी है, लेकिन बहनोई भाई का द्वितीयक संबंधी है।

(iii) तृतीयक नातेदारी – तृतीयक नातेदार प्राथमिक संबंधी के द्वितीयक संबंधी तथा द्वितीयक संबंधी के प्राथमिक संबंधी होते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि हमारे प्राथमिक नातेदार के द्वितीयक अथवा गौण नातेदार हमारे तृतीयक नातेदार कहलाएंगे। उदाहरण के लिए, साले की पत्नी जिसे ‘सलाहज’ कहते हैं, तृतीयक नातेदार हैं, क्योंकि साला मेंरा द्वितीयक नातेदार है। एक अन्य उदाहरण के द्वारा भी तृतीयक नातेदारी को स्पष्ट किया जा सकता है-किसी व्यक्ति के भाई के भाई का साला उसका तृतीयक नातेदार होगा, क्योंकि भाई मेरा प्राथमिक नातेदार है तथा उसका साला मेरे भाई का द्वितीयक नातेदार है।

वे समस्त संबंधी जो तृतीयक नातेदारों से भी दूर होते हैं, उन्हें मुरडाक ने दूरस्थ नातेदार का नाम दिया है। मुरडाक ने किसी व्यक्ति के द्वितीयक नातेदारों की संख्या 33 तथा तृतीयक नातेदारों की संख्या 151 बताई है। व्यावहारिक तौर पर तृतीयक श्रेणी के नातेदारों के बीच आमतौर पर सामाजिक अंत:क्रिया पायी जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक श्रेणी के

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प्रश्न 14.
धर्म को परिभाषित कीजिए। धर्म की आधारभूत विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
धर्म एक सावभौमिक तथा मूलभूत सामाजिक प्रघटना है। प्रत्येक समाज में धर्म अवश्य विद्यमान रहा है। धर्म मंदव के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण आयाम है। एक संस्था के रूप में धर्म सामाजिक संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। धर्म एक अद्भत तथा अलौकिक शक्ति है।

धर्म की परिभाषाएँ –

  • ई. बी. टायलर के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास है।
  • होबेल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है, जिसमें आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित हैं।
  • एमिल दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की वह समग्र व्यवस्था है जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संयुक्त करती है।”
  • आग्बर्न तथा निमकॉफ के अनुसार, “धर्म अतिमानवीय शक्तियों के प्रति अभिवृत्तियाँ हैं।”
  • फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मैं मनुष्य ने श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना समझता हूँ जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वे प्रकृति तथा मानव जीवन को मार्ग दिखलाती हैं और नियंत्रित करती हैं।”
  • सपीर के अनुसार, “धर्म जीवन की परेशानियों तथा उनके खतरों से परे अध्यात्मिक शांति के मार्ग की खोज करने में मनुष्य का सतत् प्रयास है।”
  • मैलिनावस्की के अनुसार, “धर्म क्रिया का एक तरीका है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म एक समाजशास्त्री प्रघटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।

धर्म की आधारभूत विशेषताएँ – धर्म की आधाभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास है।
  • धर्म से संबंधित वस्तुएँ, प्राणी तथा स्थान पवित्र माने जाते हैं एवं उनके प्रति सम्मान तथा भय-मिश्रित व्यवहार किया जाता है।
  • जो भौतिक वस्तुएँ धार्मिक व्यवहारों में पायी जाती हैं, वे प्रत्येक संस्कृति में पृथक्-पृथक् हो सकती हैं।
  • प्रत्येक धर्म में विशिष्ट अनुष्ठान जैसे-क्रीड़ा, नृत्य, गायन, उपवास तथा विशिष्ट भोजन आदि सम्मिलित होते हैं।
  • आमतौर पर धार्मिक अनुष्ठान एकांत में किए जाते हैं, लेकिन कभी-कभी इनका आयोजन सामूहिक रूप से भी किया जाता है। “
  • प्रत्येक धर्म में एक विशिष्ट पूजा पद्धति पायी जाती है।
  • प्रत्येक धर्म में स्वर्ग-नरक तथा पवित्र-अववित्र की अवधारणा पायी जाती है।
  • धर्म अवलोकण से परे तथा विज्ञानोपरि है।
  • धर्म का आधार विश्वास तथा आस्था है, तर्क से इसका संबंध नहीं है।
  • धर्म अनुभवोपरि है।

प्रश्न 15.
धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांतों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
समाजशास्त्रीय तथा मानवशास्त्रियों के अनुसार आधुनिक संगठित धर्मों के विकास का प्रमुख कारण आदिम मानव का भय तथा असुरक्षा की भावना, कर्मकांड तथा उपासना पद्धति आदि हैं। धर्म का उत्पत्ति सिद्धांत आमतौर पर उद्विकासीय है। इन सिद्धांतों के द्वारा समाज में धर्म और संस्था के विकास के क्रमिक स्तरों का वर्णन किया जाता है। टायलर तथा स्पेंसर का मत है कि धर्म की उत्पत्ति आदिम मनुष्य के जीवन में आत्मा की अवधारणा के कारण हुई। धर्म की उत्पत्ति के विषय में प्रमुख समाजशास्त्रियों के विचार निम्नलिखित हैं :

(i) आत्मवाद का सिद्धांत-ई. बी. टायलर ने अपनी पुस्तक प्रिमिटिव कल्चर में धर्म की उत्पत्ति के सिद्धांत का उल्लेख किया है। आत्मवाद के सिद्धांत के अनुसार आदिम मनुष्य के मस्तिष्क में आत्मा के अस्तित्व का विचार मृत्यु तथा जन्म से संबंधित उसकी कल्पना से आया। टायलर का मत है कि आदिम मनुष्य का यकीन था कि मनुष्य शरीर में आत्मा का है जो निद्रार की हालत में बाहर चली जाती है। आदिम मनुष्य के अनुसार जब आत्मा शरीर में वापस लौटकर नहीं आती है तो उसे मृत्यु की स्थिति कहते हैं। यही कारण था कि आदिम मनुष्य अपने निकट संबंधियों के मृत शरीरें का इस उम्मीद में रखता था कि मुमकिन है कि उसकी आत्मा वापस लौटकर आ जाए।

आदिम मनुष्य के मन में मृत्यु की वास्तविकता तथा स्वप्न की प्रघटना से इस विचार की उत्पत्ति हुई कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का देहांतरण होता है। आदिम मनुष्य का यह भी विश्वास था कि यदि उसके पूर्वजों की आत्मा असंतुष्ट तथा दु:खी है तो वह भी दुःखी रहेगा। यही कारण है कि आदिम मनुष्य द्वारा पूर्वजों की आत्मा की संतुष्टि हेतु अनेक कमकांडों तथा अनुष्ठानों की उत्पत्ति हुई। इस संबंध में डॉ. मजूमदार तथा मदान ने कहा है कि “आदिमवासियों का संपूर्ण धार्मिक जीवन एक निश्चित, अज्ञेय, अवैयक्तिक, अलौकिक शक्ति में विश्वास से उत्पन्न हुआ है, जो सभी सजीव तथा निर्जीव वस्तुओं में रहती है जो विश्व में विद्यमान है।”

(ii) प्रकृतिवाद का सिद्धांत – फ्रेजर ने अपनी पुस्तक में धर्म की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया है। फ्रेजर का मत है कि आदिम मनुष्य सदैव प्रकृति से संघर्ष करता रहा। इस संघर्ष में कभी आदिम मनुष्य सफल हो जाता था तो कभी असफल। प्रकृति को नियंत्रित करने के लिए आदिम मनुष्य ने अनेक मंत्रों तथा विधियों का विकास किया। फ्रेजर इन्हें जादू कहते हैं। फ्रेजर का मत है कि जादू, धर्म से पहले का स्तर है।

आदिम मनुष्य ने पहले जादू के द्वारा प्रकृति की शक्तियों पर नियंत्रण का प्रयास किया, लेकिन इस प्रयास में असफलता के बाद उसने अलौकिक शक्ति की सत्ता को पहचाना। फ्रेजर के अनुसार, “जादू प्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक क्रम को प्रभावित करता है तथा विज्ञान के इस मौलिक विश्वींस में भाग लेता है कि यह क्रम पूर्ण तथा स्थिर है किन्तु धर्म एक भिन्न कल्पित वस्तु पर आधारित है अर्थात् मानव से उच्च शक्ति का अस्तित्व जिस पर ऐसा विश्वास किया जाता है कि वह मानव जीवन तथा प्रकृति की घटनाओं को निर्देशित तथा नियंत्रित करती है।

विश्वास का यह स्तर जो जादू में विश्वास के परे है, उस समय आता है जब मनुष्य जादू के व्यवहारों की असारता को महसूस करता है तथा इसके मुकाबले उन शक्तियों का सहारा लेता है जो यह विश्वास करता है, कारण तथा कार्य के साधारण क्रम को अपने आदेश के माध्यम से परिवर्तित कर सकता है।” फ्रेजर के सिद्धांत को जादू से धर्म की संक्रांति भी कहा जाता है। उसने मानव विचारधारा की निम्नलिखित तीन अवस्थाएँ बतायी हैं –

  • जादुई अवस्था
  • धार्मिक अवस्था
  • वैज्ञानिक अवस्था

फ्रेजर के अनुसार प्रकृति से संघर्ष करते समय पराजित होने की स्थिति में आदिम मनुष्य प्रकृति को प्रसन्न करने के लिए उसकी (प्रकृति की) पूजा करता था। इस प्रकार, आदिम मनुष्य द्वारा प्रकृति की पूजा से ही धर्म की उत्पत्ति हुई। पिडिंगटन के अनुसार, “आदिम कालीन धर्म का स्रोत वह (जेम्स फ्रेजर) उचित परिणामों को प्रभावित करने के लिए जादू की असफलता में पाता है। वह विश्वास करता है कि जादू, संपर्क के सिद्धांतों का अनुचित प्रयोग है, जो उचित रूप से प्रयोग में लोने पर विज्ञान की ओर ले जाता है।”

(ii) धर्म का समाजशास्त्रीय सिद्धांत – प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम ने अपनी पुस्तक में धर्म के पूर्ववर्ती सिद्धांतों को निरस्त करके धर्म की समाजशास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत की हैं। दुर्खाइम का मत है कि सभी समाजों में पवित्र तथा साधारण वस्तुओं में अंतर किया जाता है। सभी समाजों में पवित्र वस्तुओं को श्रेष्ठ समझा जाता है तथा उन्हें संरक्षित किया जाता है जबकि साधारण वस्तुओं को निषिद्ध किया जाता है।

दुर्खाइम ‘टोटमवाद’ को धर्म का आदिम स्वरूप मानते हैं। दुर्खाइम के अनुसार टोटम तथा सभी धार्मिक विचारों की उत्पत्ति सामाजिक समूह से हुई है। इस प्रकार, देवी-देवता, उचित-अनुचित तथा स्वर्ग-नरक टोटम समूह के सामूहिक प्रतिनिधान हैं। सामूहिक जीवन का प्रतीक होने के कारण टोटम को पवित्र समझा जाता है। व्यक्तियों द्वारा टोटम का सम्मान किया जाता है, क्योंकि वे सामाजिक मूल्यों का सम्मान करते हैं। इस प्रकार, टोटम सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। समारोह तथा अनुष्ठान समुदाय के लोगों को एक साथ बाँधने का काम करते हैं। धर्म में व्यक्तियों की आस्था समूह एकता को सुदृढ़ करती है।

दुर्खाइम का मत है जन्म, मृत्यु तथा विवाह आदि के समय अनेक नयी सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है। सामूहिक समारोह तथा अनुष्ठान प्रभावित व्यक्तियों को नई परिस्थितियों से समायोजन करने में सहयोगी होते हैं। अनेक विद्वानों ने दुर्खाइम के सिद्धांत में अंतर्निहित दार्शनिकता के कारण इसकी आलोचना भी की है।

प्रश्न 16.
आधुनिक समाज में धर्म का क्या स्वरूप है?
उत्तर:
आधुनिक समाज में धर्म के स्वरूप को समझने से पहले आवश्यक है कि धर्म के अर्थ तथा इसकी मूलभूत विशेषताओं पर प्रकार डाला जाए। हॉबल के अनुसार, “धर्म अलौकिक शक्ति में विश्वास पर आधारित है, जिसके अंतर्गत आत्मवाद तथा मानववाद सम्मिलित होते हैं।” दुर्खाइम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा आचरणों की वह व्यवस्था है, जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय में संयुक्त करती है।”

मेकाइवर के अनुसार, “धर्म, जैसा कि हम समझते आये हैं, से केवल मनुष्य के बीच का संबंध ही नहीं, एक उच्चतर शक्ति के प्रति मनुष्य का संबंध भी सूचित होता है।” मैलिनोवस्की के अनुसार, “धर्म, क्रिया का एक तरीका है, साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था है तथा समाजशास्त्रीय प्रघटना के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी है।”

  • धर्म अलौकिक शक्ति अथवा समाजोपरि उच्चतर शक्ति में विश्वास है।
  • धर्म से संबंधित प्राणी, वस्तुओं तथा स्थान को पवित्र माना जाता है तथा उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है।
  • धर्म से संबंधित विश्वास उद्वेगपूर्ण तथा भावात्मक होते हैं।

आधुनिक समय में औद्योगीकरण, नगरीकरण तथा लौकिकीकरण, वैज्ञानिक विचारों तथा तर्कपूर्ण चिंतन के कारण धर्म के स्वरूप में कुछ परिवर्तन आए हैं –

  • परंपरागत समाजों में धर्म जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता था। आधुनिक समाजों में धर्म का प्रभाव क्षेत्र कुछ सीमित हुआ है।
  • परंपरागत समाज में धार्मिक आस्था तथा विश्वास अत्यधिक सुदृढ़ होते थे तथा विभिन्न अनुष्ठानों का पालन संपूर्ण धार्मिक पद्धतियों के द्वारा किया जाता था।
  • आधुनिक समाजों में धार्मिक विश्वास तथा आस्था का सम्मान होना आवश्यक नहीं है। धर्म में विश्वास रखते हुए भी कुछ व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठानों का संपादन अनवार्य नहीं समझते हैं।
  • प्राचीन काल तथा मध्यकाल में धर्म तथा राज्य आमतौर पर अविभाज्य थे। आधुनिक राज्य आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष हैं। धर्म तथा. राज्य की गतिविधियों के क्षेत्र अलग-अलग हैं।

आधुनिक समय में धर्म में निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ तेजी से विकसित हो रही है –

  • धर्म रूढ़ियों, परंपराओं तथा अनुष्ठानों आदि का महत्त्व कम हो रहा है।
  • धर्म में मानवतावाद की प्रवृत्ति का उदय हो रहा है।
  • धर्म में लौकिकीकरण तथा तर्कबाद की प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं।
  • धार्मिक क्रियाओं, पद्धतियों तथा अनुष्ठानों का संक्षिप्तीकरण हो रहा है।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि नवीन धार्मिक मान्यताओं, विचारधाराओं तथा प्रवृत्तियों ने धर्म के प्रभाव को कुछ सीमित किया है लेकिन वैज्ञानिक खोजों के कारण मानवजाति के संपूर्ण विनाश के भय ने तथा आते-भौतिकवादी प्रवृत्तियों के नकारात्मक परिणामों ने व्यक्तियों का रुझान आध्यात्मिक शांति तथा धर्म की ओर पुनः आकर्षित किया है। धार्मिक असहिष्णुता, संकीर्णता तथा धार्मिक कट्टरता ने राष्ट्रीय स्तर पर तनाव भी उत्पन्न किया है।

प्रश्न 17.
धर्म और संस्कृति के संबंधों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि धर्म संस्कृति का अभिन्न अंग है तथापि यह संस्कृति के अधिकांश तत्त्वों को प्रभावित करने की स्वायत्त शक्ति रखता है। यह व्यक्तियों की संपूर्ण जीवन पद्धति को प्रभावित करता है। धर्म के अंतर्गत अभौतिक तथा भौतिक दोनों ही सांस्कृतिक तत्त्व सम्मिलित होते हैं। धर्म के अभौतिक पक्षों में रहस्मयी सर्वोच्च शक्ति, आत्मा का देहांतरण तथा पवित्र और उपवित्र की धारण सम्मिलित होती है। धर्म के भौतिक पक्ष में धार्मिक क्रियाएँ तथा अनुष्ठान सम्मिलित होते हैं।

हॉबल के अनुसार, “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है।” टालयर ने संस्कृति की व्यापक परिभाषा देते हुए लिखा है कि “संस्कृति वह संश्लिष्ट अभियोजना है जिसके अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, कला, नैतिकता, कानून, प्रथा तथा सभी तरह की क्षमताएं तथा आदतें जो . व्यक्ति समाज के एक सदस्य के नाते प्राप्त करता है, आती हैं।”

धर्म का संस्कृति पर प्रभाव – धर्म संस्कृति के अनेक तत्त्वों को प्रभावित करता है । सभी धर्मों में आस्था, अलौकिक शक्ति में विश्वास, ईश्वर की पूजा तथा पवित्र व अपवित्र जैसे सामान्य तत्त्व पाए जाते हैं।

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प्रश्न 18.
धर्म के अकार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म के सकारात्मक पहलू के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी हैं। धर्म रूढ़िवादी प्रवृत्ति के कारण प्रगति की धारा में अवरोध उत्पन्न करता है। धर्म के लिए निम्नलिखित अकार्य किए जाते हैं –
(i) धर्म परंपरागत सामाजिक रूढ़ियों को मान्यता देता है, जिससे प्रगतिवादी विचारों का विकास नहीं हो पाता है।

(ii) धर्म मनुष्य को भाग्यवादी बना देता है। व्यक्ति संसार को मिथ्या समझने लगता है। भाग्यवादी होने के कारण व्यक्ति परिश्रम नहीं करते हैं। यही कारण है कि प्रसिद्ध साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने धर्म को जनता की अफीम कहा है।

(iii) भाग्यवादिता के कारण व्यक्ति कार्य तथा कारण में संबंधस स्थापित नहीं कर पाते हैं। ब्लैकमार तथा गिलिन के अनुसार, “धर्म की कट्टरता तथा हठधर्मिता ने बार-बार सत्य की में बाधा पहुंचाई है तथा जिज्ञासु व्यक्तियों को तथ्यों के अन्वेषण करने से रोका है। इसने विज्ञान की प्रगति को अवरुद्ध किया। विद्वानों तथा स्वतंत्र खोज में धर्म ने हस्तक्षेप किया तथा आम जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का दमन किया।

(iv) धर्म तर्क तथा विज्ञान का विरोध करता है। हैरी एल्मर बार्स के अनुसार, “जबकि रूढ़िवादी धर्म एवं आधुनिक विज्ञान के मध्य परस्पर विरोधी संघर्ष है…..।” यही कारण है कि म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) समाजशास्त्र वर्ग-11999 कोपरनिकस तथा गैलीलियो को अपनी खोजों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। गैलीलियों को धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध अपनी बात कहने के कारण फाँसी दी गई। धार्मिक मान्यताओं के चलते डार्विन तथा हक्सले की खोजों को मिथ्या सिद्ध करने का प्रसार किया गया।

(v) धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता, हठधर्मिता तथा अलगाव के कारण समाज में विघटनकारी शक्तियों के ताने-बाने ने अत्यधिक हानि पहुँचाई है। धार्मिक उन्माद मनुष्य को तर्कशून्य बना देता है।

प्रश्न 19.
शिक्षा की परिभाषा दीजिए। शिक्षा के सांगठनिक स्वरूप का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
शिक्षा मनुष्य को जैविक प्राणी से सामाजिक प्राणी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार, शिक्षा के माध्यम से पुरानी पीढ़ी द्वारा अपने ज्ञान को नयी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है । प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्खाइम का मत है कि “शिक्षा का ऐसा प्रभाव है जिसका उपयोग पुरानी पीढ़ी उस पीढ़ी पर करती है जो अभी वयस्क जीवन के लिए तैयार नहीं है।” शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में उन शारीरिक बौद्धिक तथ नैतिक दशाओं को विकसित एवं जागृत करना है जिसकी अपेक्षा उससे संपूर्ण समाज तथा तात्कालिक सामाजिक पर्यावरण द्वारा की जाती है

शिक्षा की परिभाषा –
पैस्टालॉली के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरस तथा प्रगतिशील विकास है।” एस. एस. मैकेंजी के अनुसार, “अपने व्यापक अर्थ में, यह (शिक्षा) एक प्रक्रिया है जो जीवन-पर्यंत चलती रहती है तथा जीवन के प्रत्येक अनुभव से वृद्धि होती है।” बोगार्डस के अनुसार, “सांस्कृतिक विरासत तथा जीवन के अर्थ को ग्रहण करना ही शिक्षा है।” महात्मा गाँधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन तथा आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है।”

स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य में पहले से ही विद्यमान संपूर्णता का प्रकटीकरण है।” अमेरिका के सेकेंड्री स्कूल पुनर्गठन आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार, “शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान, रुचियों, आदर्शों, आदतों तथा शक्तियों का विकास करना है जिससे उसे अपना स्थान मिलेगा तथा वह उस स्थान का प्रयोग स्वयं तथा समाज को बनाने में श्रेष्ठ उद्देश्य हेतु करेगा।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शिक्षा द्वारा बालक की जन्मजात शक्तियों का पूर्ण विकास किया जाता है। शिक्षा द्वारा बालक को वास्तविक जीवन के लिए तैयार किया जाता है . शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तिव का सर्वांगीण विकास करना है।

शिक्षा के मुख्य उद्देश्य –

  • ज्ञान
  • सांस्कृतिक विकास
  • चरित्र निर्माण
  • शारीरिव विकास
  • आत्म-अभिव्यक्ति
  • अवकाश का सदुपयोग।

शिक्षा का सांगठनिक स्वरूप – शिक्षा के निम्नलिखित तीन स्तर हैं तथा प्रत्येक स्तर का / एक सांगठनिक ढांचा है –
(i) प्रारंभिक स्तर-प्रारंभिक स्तर के निम्नलिखित दो स्तर है –

  • प्राथमिक स्तर-कक्षा 1 से 5 तक।
  • उच्च प्राथमिक स्तर-कक्षा 6 से 8 तक।

(ii) माध्यमिक स्तर-माध्यमिक स्तर के निम्नलिखित दो स्तर हैं –

  • माध्यमिक स्तर-कक्षा 9 से 10 तक।
  • उच्चतर माध्यमिक स्तर-कक्षा 11 से 12 तक।

(iii) विश्वविद्यालय स्तर – इसके अंतर्गत विद्यार्थी उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं।

प्रश्न 20.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 ई. की प्रमुख विशेषताएं क्या थीं?
उत्तर:
1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्ष के राष्ट्रीय मूल्यों तथा आदर्शों का उल्लेख किया गया है। इस नीति के अंतर्गत समस्त देश के लिए एक समान शैक्षिक ढाँचे को स्वीकृत किया गया है तथा ज्यादातर राज्यों में 10+2+3 शिक्षा प्रणाली अपनाई गई है। 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निम्नलिखित उद्देश्यों पर विशेष बल दिया गया है:

(i) एक गतिशील तथा सुसंगठित राष्ट्र के निर्माण हेतु शिक्षा के माध्यम से भारतीयों में ज्ञान, उद्देश्य की भावना और विश्वास का प्रसार करना।

(ii) शिक्षा का नियोजन इस प्रकार करना है कि वह सामाजिक तथा राजनीतिक विकास, गतिविधियों में वृद्धि, कल्याणकारी गतिविधियाँ, लोकतांत्रिक व्यवस्था, बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा सौंदर्यगत विकास में सहायक सिद्ध हो सके।

(iii) देश में राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति पर बल दिया गया जिसका तात्पर्य था कि एक निश्चित स्तर तक सभी विद्यार्थियों को चाहे किसी भी जाति, वंश, स्थिति या लिंग के हों, गुणात्मक शिक्षा प्राप्त हो।

(iv) राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड को प्रस्तावित किया गया जिसमें इस आवश्यकता पर बल दिया गया कि एक प्राथमिक विद्यालय में कम से कम –

  • दो बड़े कमरे हों तथा जो प्रत्येक मौसम में प्रयोग में लाए जा सकें।
  • आवश्यक खिलौने तथा खेल का समान हों।
  • श्यामपट्ट हों।
  • मानचित्र, चार्ट तथा अन्य अध्ययन का समान हो।

(v) राष्ट्रीय नीति में समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा के समान अवसर प्रदान करने पर बल दिया गया। स्त्रियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षाणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा भारतीय समाज के अल्पसंख्यकों से शैक्षणिक अवसरों की समानता का वायदा किया गया।

(vi) नीति में शिक्षा प्रणाली को इस प्रकार पुनर्गठित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया जिससे संविधान में वर्णित भारतीय जनता की आकांक्षाओं के अनुसार एक ऐसे समाज का निर्माण किया जा सके जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय तथा अवसरों की समानता पर आधारित हो।

(vii) शिक्षा के माध्यम से वैज्ञानिक, नैतिक तथा विवेकपूर्ण सामाजिक मूल्यों में वृद्धि पर बल दिया गया।

(viii) नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास, मूल्यबोध, राष्ट्रीय एकीकरण, सांप्रदायिक तथा जातिगत विभाजन के खतरों तथा भारत की मिली-जुली संस्कृति से परिचित कराना।

(ix) व्यावसायिक शिक्षा का प्रबंध करना जिससे विद्यार्थी हाथ से काम करने के महत्त्व को समझ सके।

(x) छात्रों में अतीत तथा वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में जागरुकता उत्पन्न करना जिससे कि उनमें अपनी क्षमताओं के प्रति विश्वास हो, राष्ट्र की उपलब्धियों के प्रति गौरव की अनूभूति हो। 1992 ई. से 1986 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा की समीक्षा की गई तथा कहा गया कि इस नीति के पुनर्गठन की आवश्यकता नहीं है। 1992 ई. की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में “ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड” को उच्च प्राथमिक स्तर तक बढ़ाने की योजना बनाई गई तथा प्रत्येक विद्यालय में कम-से-कम तीन कमरों का प्रावधान किया गया।

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प्रश्न 21.
शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
विभिन्न दार्शनिकों, समाज-सुधारकों तथा शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा के विभिन्न उद्देश्य बताए हैं। प्रसित्र समाजशास्त्री गिलीन तथा गिलीन ने शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं –

  • भाषा लिखने, बोलने एवं व्याकरण तथा गणित का ज्ञान देना।
  • जटिल संस्कृति को समझने हेतु ज्ञान देना।
  • बच्चे में सामाजिक अनुकूलन की क्षमता पैदा करना।
  • आर्थिक अनुकूलन की ट्रेनिंग देना।
  • सांस्कृतिक सुधार एवं वृद्धि में सहायता प्रदान करना।

पं. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार, “शिक्षा द्वारा मानव का एकीकृत विकास किया जाता है तथा नवयुवकों को समाज के लिए तैयार किया जाता है तथा नवयुवकों को समाज के लिए उपयोगी कार्य करने तथा सामूहिक जीवन में भाग लेने के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन जब समाज में दिन-प्रतिदिन परिवर्तन हो रहे हों, यह जानना काफी कठिन है कि नवयुवकों को किस प्रकार तैरूार किया जाए तथा क्या लक्ष्य हों।”

प्रत्येक समाज के अपने मूल्य, आदर्श, संस्कृति, परंपराएं, विरासत तथा विचारधाराएँ होती हैं तथा शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण भी इन्हीं के अनुसार होता है। शिक्षा के कुछ उद्देश्य तो सार्वभौम होते हैं तथा कुछ उद्देश्य स्थानीय आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों के अनुसार होते हैं।

शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
(i) ज्ञान प्रदान करना-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य ज्ञान प्रदान करना है इसका तात्पर्य है बालक का मानसिक विकास करना। अपने व्यापक अर्थ में ज्ञान प्रदान करने का तार्य है कि मानसिक शक्तियों जैसे चिंतन, तर्क निर्णय आदि का समुचित तथा संतुलित विकास करना। वस्तुतः ज्ञान मानसिक विकास के लिए होता है न कि ज्ञान-ज्ञान के लिए।

(ii) सांस्कृतिक विकास-कुछ शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि शिक्षा का उद्देश्य सांस्कृतिक विकास करना अर्थात् व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाना है। महात्मा गाँधी के अनुसार, “संस्कृत प्रारंभिक वस्तु का आधार है। यह आपके व्यवहार के छोटे-से-छोटे हिस्से में परिलक्षित होनी चाहिए।”

(iii) चरित्र निर्माण-शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण है। चरित्र का तात्पर्य है कि व्यक्ति में आंतरिक स्थायित्व तथा शक्ति का समुचित विकास हो। व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों का समुचित सामाजिकरण ही शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा के विभिन्न नैतिक गुणों जैसे प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, बलिदान तथा सामाजिक सेवा आदि का सशक्त माध्यम है।

(iv) सर्वांगीण विकास-शिक्षा का उद्देश्य बालक का मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक विकास करना है। महात्मा गाँधी के अनुसार, “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक के शरीर, मन तथा आत्मा में निहित सर्वोत्तम गुणों के सर्वांगीण विकास से है।”

(v) सामाजिक अनुकूलन की क्षमता विकसित करना-शिक्षा के माध्यम से बालक सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करना सीखता है। लैंडिस के अनुसार, “चूँकि शिक्षा आरंभ से ही कार्य करना प्रारंभ कर देती है तथा यह अभिवृत्तियों व मूल्यों को अत्यधिक प्रभावित करती है, अतः यह सामाजिक नियंत्रण के अन्य प्रकारों की तुलना में अधिक सफल होती है।”

(vi) आत्म-अभिव्यक्ति-आत्म-अभिव्यक्ति का तात्पर्य है कि बालक का विकास स्वतंत्र रूप से उसकी रुचियों, प्रवृत्तियों तथा क्षमताओं के अनुरूप होना चाहिए। आत्म-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सामाजिक नियंत्रण के मापदंडों के दायरे में होनी चाहिए।

(vii) आत्म अनुभूति-शिक्षा का उद्देश्य बालक में ऐसी भावनाओं का विकास करना है जिससे वह उच्च नैतिक गुणों तथा आध्यात्मिक विचारों को प्राप्त कर सके। आत्म-अनुभूति का तात्पर्य है कि प्रकृति तथा मनुष्य को समझना एवं उनके मध्य अंतर्संबंध स्थापित करना। एक प्रजातांत्रिक देश में शिक्षा के उद्देश्य-कोठारी आयोग के द्वारा शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य बताए गए हैं –

  • उत्पादकता में वृद्धि करन
  • सामाजिक तथा राष्ट्रीय एकता का विकास करना
  • लोकतंत्र को सुदृढीकरण करना
  • राष्ट्र का आधुनिकीकरण करना
  • सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का विकास

प्रश्न 22.
क्या शिक्षा का निजीकरण होना चाहिए? अपने विचार दीजिए।
उत्तर:
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के सर्वांगीण विकास हेतु विकासोन्मुखी शिक्षा नीति अपरिहार्य है। शिक्षा का सार्वभौम उद्देश्य व्यक्तित्व तथा चरित्र का संतुलित विकास करना है जिससे सामाजिक विकास की धारा निर्वाध रूप से चलती रहे।

विकासशील देशों के सामने दो चुनौतियाँ प्रमुख हैं –

  • साक्षरता में वृद्धि करना
  • सर्वशिक्षा अभियान

सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष की आयु से सभी बच्चों को सन् 2010 ई. तक प्रारंभिक शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा का सार्वभौमीकरण किया जाए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद में 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य तथा निःशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट कहा गया है कि –
(i) एक निश्चित स्तर तक सभी विद्यार्थियों को चाहे वे किसी भी जाति, वंश, स्थिति और लिंग के हों, गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए।

(ii) समाज के वंचित वर्ग को शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए। स्त्रियों, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा भारतीय समाज के असंख्यकों से शैक्षिक अवसरों की समानता का वायदा किया गया।

शिक्षा के उद्देश्यों के संदर्भ में हमारा मूल प्रश्न यह है कि शिक्षा के निजीकरण द्वारा इन उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है अथवा नहीं –

(i) शिक्षा के निजीकरण के अंतर्गत शिक्षण संस्थाओं का प्रबंधन तथा प्रशासन निजी संस्थाओं अथवा व्यक्तिगत उद्यमियों के नियंत्रण में होगा।

(ii) विचारणीय प्रश्न यह है कि निजीकरण के माध्यम से शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है ?

(iii) समाज के कमजोर वर्गों, स्त्रियों, अनुसूचित जाति, ग्राम्य समुदायों, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की शिक्षा हेतु प्रयास की दिशा क्या होगी जबकि शिक्षा बाजार के लाभ-हानि के सिद्धांत पर संचालित की जाएगी।

(iv) भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक असमानता है निजीकरण से यह असमानता और बढ़ेगी। अनेक समाज-सुधारक तथा शिक्षाशास्त्री वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर अभिजात्य होने का आरोप लगाते हैं। यदि ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा का निजीकरण कर दिया गया तो शिक्षा संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बन जाएगी।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि हमारे देश की परिस्थितियों में शिक्षा के निजीकरण का परिणाम होगा –

  • शिक्षा के सार्वभौमिकरण की प्रक्रिया में बाधा आएगी।
  • कमजोर, वर्गों, जनजातीय तथा सुदूर पहाड़ी इलाकों तथा ग्राम्य समुदायों में शिक्षा का प्रसार अवरुद्ध हो जाएगा।
  • शिक्षा संपन्न वर्ग का विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी।
  • देश के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विकास में असंतुलन उत्पन्न हो जाएगा।
  • राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न होगी।

अंततः हम कह सकते हैं कि हमारे देश में शिक्षा का पूर्ण निजीकरण शिक्षा की प्रक्रिया को जनसाधारण से दूर कर देगा। भारत एक कल्याणकारी राज्य है, अतः सरकार का पुनीत कर्त्तव्य है शिक्षा के माध्यम से ज्ञान रूपी प्रकाश जन-जन तक पहुँचाए ।

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प्रश्न 23.
समाज में धर्म के संगठन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सभी धर्मों में कोई-न-कोई संगठनात्मक स्वरूप अवश्य पाया जाता है। धार्मिक संगठनों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है
(i) सदस्यता की प्रकृति –

  • अनिवार्य तथा
  • ऐच्छिक

(ii) धार्मिक समूहों का अन्य धार्मिक समूहों के प्रति दृष्टिकोण-एक धार्मिक समूह का दृष्टिकोण दूसरे धार्मिक समूह के प्रति दो प्रकार का हो सकता है –

  • उदार तथा
  • अनुदार

(iii) धर्मांतरण –

  • धर्मोतरण की आज्ञा तथा
  • धर्मांतरण का न होना।

(iv) धार्मिक समूह के संगठन की प्रकृति –

  • नमनीय तथा
  • अनमनीय

(v) पुरोहितों की भूमिक –

  • साधारण सदस्यों के हितों के लिए पुरोहितों की आवश्यकता।
  • साधारण सदस्यों के हितों के लिए पुराहितों की आवश्यकता न होना।

धार्मिक समूहों में संगठन की दृष्टि से रोमन कैथोलिक चर्च सबसे अधिक संगठित धार्मिक समूह है –

  • संपूर्ण विश्व के रोमन कैथोलिक चर्च का प्रधान पोप है, जो वेटिकन सिटी (रोम) में रहता है।
  • रोमन कैथोलिक चर्च में विश्व स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक पदसोपानक्रम पाया जाता है।
  • इसमें नौकरशाही जैसी संरचना पायी जाती है।

ईसाई धर्म में दो प्रमुख पंथ हैं –

  • कैथोलिक तथा
  • प्रोटेस्टेंट

पंथ की सदस्यता ऐच्छिक होती है तथा ये साधारणतया स्वयंसेवी समूह के रूप में कार्य करते हैं। पंथ पारस्परिक भाईचारी, समान उद्देश्य तथा समानता की भावना पर आधारित होते हैं। अन्य धार्मिक समूहों के प्रति असहिष्णुता के बावजूद पंथों का आंतरिक संगठन आमतौर पर लोकतांत्रिक होता है।

(ii) धार्मिक संप्रदाय – धार्मिक संप्रदाय अवयव कल्ट का निर्माण किसी विशिष्ट व्यक्ति की विचारधारा तथा चिंतन के परिणामस्वरूप होता है। समान विचार रखने वाले व्यक्तियों द्वारा इसका अनुसरण किया जाता है। कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक संप्रदाय के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए किसी अन्य धर्म में आस्था रख सकता है। पंथ की तुलना में संप्रदाय का आकार छोटा है तथा इसका जीवन भी कम होता है। वर्तमान समय में भारत में साईं बाबा तथा जयगुरुदेव आदि धार्मिक संप्रदाय हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
समुदाय को परिभाषित करनेवाला आवश्यक कारक है …………………..
(अ) सामान्य प्रथाएँ
(ब) सामान्य भाषा
(स) सामान्य धर्म
(द) सामान्य मात्रा
उत्तर:
(द) सामान्य मात्रा

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन समिति का उदाहरण नहीं है?
(अ) कॉलेज का छात्रावास
(ब) केन्द्रीय लोक सेवा आयोग
(स) गुप्त मतदान प्रणाली।
(द) भारतीय क्रिकेट टीम
उत्तर:
(ब) केन्द्रीय लोक सेवा आयोग

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प्रश्न 3.
संघ के सदस्यों के बीच संबंध होते हैं ……………………..
(अ) बाहरी और स्थायी
(ब) भतरी और अस्थायी
(स) अन्तः संबंध एवं अस्थायी
(द) अन्तः संबंध तथा स्थायी
उत्तर:
(स) अन्तः संबंध एवं अस्थायी

प्रश्न 4.
खर्चे और बचत की आदतें बनती है …………………….
(अ) सांस्कृतिक रूप से
(ब) लघु अस्थायी अन्त:क्रिया से
(स) दार्शनिक रूप से
(द) मनोवैज्ञानिक रूप से
उत्तर:
(स) दार्शनिक रूप से

प्रश्न 5.
सामाजिक संस्था ‘नैसर्गिक’ है तो वह है …………………….
(अ) वर्ग
(ब) परिवार
(स) राजनैतिक दल
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(स) राजनैतिक दल

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र में संस्था के रूप में परिभाषित है?
(अ) समुदाय
(ब) विवाह
(स) समाज
(द) व्यक्ति
उत्तर:
(स) समाज

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प्रश्न 7.
भारत में अल्पायु समूह में लड़कियों का मृत्युदर लड़कों से ज्यादा है …………………..
(अ) ज्यादा
(ब) कम है
(स) निश्चित अनुपात में है
(द) अनिश्चित अनुपात में है
उत्तर:
(स) समाज

प्रश्न 8.
किस परिवार शास्त्री का मानना है? परिवार पति, पत्नी का बच्चों सहित अथवा बिना बच्चों का एक संघ है ………………….
(अ) मेकाइवर
(ब) एण्डरसन
(स) ऑगबर्न एवं निमकॉफ
(द) किंग्सले
उत्तर:
(अ) मेकाइवर

प्रश्न 9.
ऐसा परिवार जो स्त्री अथवा माता के विकास स्थान पर बसता है उसे क्या कहते हैं?
(अ) मातृ स्थानीय
(ब) मातृवंशीय
(स) मातृसत्तात्मक
(द) पितृस्थानीय
उत्तर:
(अ) मातृ स्थानीय

प्रश्न 10.
विवाह के रूप में होते हैं …………………..
(अ) दो
(ब) तीन
(स) पाँच
(द) इनमें कोई नहीं
उत्तर:
(अ) दो

प्रश्न 11.
समाजशास्त्री एम. एम. साह का कथन है कि स्वतंत्रता के बाद संयुक्त परिवार में …………………
(अ) निरंतर कमी हुई है
(ब) रूक-रूक वृद्धि हुई है
(स) रूक-रूक कर कमी हुई
(द) निरंतर वृद्धि हुई है
उत्तर:
(द) निरंतर वृद्धि हुई है

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प्रश्न 12.
निम्न में कौन-सा समाज नहीं है ………………
(अ) आर्यसमाज
(ब) ब्रह्म समाज
(स) प्रार्थना समाज
(द) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 13.
संस्था की अवधारणा किसने दिया था?
(अ) हेर्वटस्पेंसर
(ब) कॉर्ल मार्क्स
(स) मैक्स वेबर
(द) वीरकान्त
उत्तर:
(अ) हेर्वटस्पेंसर

प्रश्न 14.
मॉर्गन के अनुसार पविार की प्रथम अवस्था की ………………….
(अ) पुनालुअन परिवार
(ब) एक विवाही परिवार
(स) समरक्त परिवार
(द) सिण्डस्मियन परिवार
उत्तर:
(स) समरक्त परिवार