Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Bihar Board Class 12 History उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों था?
उत्तर:
ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती था। इसके निम्नलिखित कारण थे-

  1. बंगाल के दिनाजपुर जिले के धनी किसानों को जोतदार कहा जाता था। इनके पास जमीन के बड़े-बड़े रकबे होते थे। कहीं-कहीं तो यह हजारों एकड़ का होता था।
  2. स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर इनका नियंत्रण था। वे क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर शक्ति प्रयोग करते थे।
  3. ये लोग गाँवों में रहते थे और गरीब ग्रामीणों के बड़े वर्ग:पर नियंत्रण रखते थे।
  4. ये किसानों के पक्षधर और लगान बढ़ाए जाने के मुद्दे पर जमींदार के कट्टर विरोधी थे। ये अंग्रेज अधिकारियों के कार्यों पर रोक भी लगाते थे।
  5. ये खुद खेती नहीं करते थे और अपनी जमीन बटाईदारों को खेती करने के लिए दे देते थे। उनसे वे उपज का आधा भाग लेते थे। इस प्रकार ये बिना मेहनत धनवान हो जाते थे।

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प्रश्न 2.
जमींदार लोग अपनी जमींदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखते थे?
उत्तर:
जमींदारों द्वारा अपनी जमींदारियों पर नियंत्रण रखने के उपाय –

  1. राजस्व की अत्यधिक माँग और अपनी भूसम्पदा की नीलामी से जमींदार तंग आ गये थे। इससे बचने के लिए जमींदारों ने नया षड्यंत्र सोच लिया। संपदा की फर्जी बिक्री ऐसी ही एक रणनीति थी।
  2. बर्दमान के राजा ने पहले तो अपनी जमींदारी का कुछ भाग अपनी माँ के नाम कर दिया क्योंकि कंपनी ने यह नियम बनाया था कि स्त्रियों की सम्पत्ति को छीना नहीं जायेगा।
  3. नीलामी की प्रक्रिया में एजेंटों और नौकरों को शामिल किया गया। इस प्रकार संपदा पर जमींदार का अधिकार बना रहता था।
  4. जमींदार कंपनी को राजस्व समय पर नहीं देते थे और इस प्रकार बकाया राजस्व राशि का बोझ बढ़ता गया। जब भूसंपदा का कुछ भाग नीलाम किया गया तो जमींदार के संबंधियों ने ही ऊँची बोली लगाकर खरीद लिया परंतु रकम का भुगतान नहीं किया। यही प्रक्रिया बार-बार चलती रही।
  5. कुछ दिनों के बाद लोगों ने बोली लगाना बंद कर दिया। कंपनी को कम दाम पर जमीन जमींदार को बेचनी पड़ी।
  6. जमींदारों ने नीलामी से बचने के लिए अन्य कई तरकीबें निकालीं। वे संपदा खरीदने वालों को जमीन पर कब्जा नहीं करने देते थे या मार-पीटकर भगा देते थे।

प्रश्न 3.
पहाडिया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई?
उत्तर:

  1. स्थायी कृषि विस्तार के साथ बाहरी लोगों और पहाड़ियों के बीच संघर्ष तेज हो गया था। वे ग्रामवासियों का अनाज और पशु झपटने लगे।
  2. 1770 ई. के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों के प्रति कठोरता की नीति अपनाई और उन पर आक्रमण शुरू कर दिया।
  3. 1780 के दशक के भागलपुर के कलक्टर ऑगस्ट्स क्लीवलैंड ने शांति स्थापना का प्रस्ताव रखकर पहाड़ी मुखियाओं का वार्षिक भत्ता निश्चित किया ताकि वे अपने आदमियों को नियंत्रण में रख सकें। पहाड़िया लोग अंग्रेजों को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे और उनसे घृणा करने लगे।
  4. पहाड़ियों के लिए एक अन्य खतरा इनके क्षेत्रों में संस्थालों का प्रवेश बन गया । जहाँ कुदाल पहाड़ियों की रक्षक थी, वहीं हल संथालों का सुदृढ़ अस्त्र बन गया। अब इन दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।

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प्रश्न 4.
संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?
उत्तर:
संथालों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध-विद्रोह के कारण:

  1. ब्रिटिश अधिकारियों ने संथालों को दामिन-इ-कोह में बसने के लिए निमंत्रण दिया । यहाँ संथालों के गाँवों और जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई। वे व्यापारिक फसलों की खेती करते थे परंतु ब्रिटिश सरकार ने उनकी जमीन पर भारी कर लगा दिया।
  2. 1850 ई. के दशक तक संथाल लोग स्वायत्त शासन चाहते थे परंतु ब्रिटिश सरकार इसके लिए तैयार नहीं की। फलस्वरूप संथालों ने विद्रोह कर दिया।
  3. 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया। इस प्रकार उनका क्षेत्र सीमित कर दिया गया।

प्रश्न 5.
दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?
उत्तर:
दक्कन के रैयत का ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध होने के कारण –
1. जब भारत से इंग्लैण्ड में कपास का निर्यात हो रहा था तो महाराष्ट्र के निर्यात व्यापारी और साहूकार रैयत को खूब ऋण दे रहे थे। अमेरिका में गृहयुद्ध की समाप्ति और वहाँ से इंग्लैण्ड में कपास का निर्यात पुनः होने से ये ऋणदाता ऋण देने में उत्सुक नहीं रहे। यह भी एक कारण था कि दक्कन के रैयत क्रुद्ध हो गये।

2. ऋणदाताओं ने देखा कि भारतीय कपास की माँग घटती जा रही है और कपास की कीमतों में भी गिरावट आ रही है। यही कारण था कि उन्होंने अपना कार्य व्यवहार बंद करने, रैयत की अग्रिम राशियाँ प्रतिबंधित करने और बकाया ऋणों को वापस लेने का निर्णय लिया।

3. 1830 ई. के पश्चात् राजस्व का नया बंदोवस्त लागू किया गया जिसमें भूराजस्व 50 से 100 प्रतिशत बढ़ा दिया गया। इतना भारी लगान देने के लिए रैयतों को ऋण लेना अनिवार्य हो गया परंतु ऋणदाताओं ने ऋण देने से मना कर दिया। रैयत इस बात से अधिक नाराज था कि ऋणदाता वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा है और गाँव की प्रथाओं का उल्लंघन कर रहा है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत सी जमींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गई?
उत्तर:
इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत सी जमींदारियों के नीलाम होने के कारण –
1. 1793 ई. में चार्ल्स कार्नवालिस द्वारा इस्तमरारी बंदोबस्त लागू कर दिया गया। इसके अंतर्गत निश्चित भूराजस्व लम्बे समय के लिए निर्धारित कर दिया गया और इसे निश्चित तिथि पर भुगतान करना होता था। निश्चित भूराजस्व जमा न करने पर जमींदारों की भूमि नीलाम कर दी जाती थी।

2. बंगाल में राजस्व के भुगतान की समस्या बढ़ती जा रही थी जबकि ब्रिटिश अधिकारी यह आशा कर रहे थे कि इस्तमरारी बंदोबस्त लागू होने के पश्चात् यह समस्या हल हो जायेगी। वस्तुतः 1770 ई. के पश्चात् बंगाल में बार-बार अकाल पड़ रहे थे एवं खेती की पैदावार घटती जा रही थी। इसलिए किसान भूराजस्व नहीं दे पा रहे थे। ऐसे में जमींदार भी भूराजस्व देने में असमर्थ हो जाते थे। फिर तो भूमि का नीलाम होना निश्चित था।

3. जमींदारों के अधीन अनेक गाँव यहाँ तक कि 400 गाँव भी होते थे। कई गाँव मिलकर एक जमींदार के अधीन राजस्व सम्पदा बनाते थे। इस संपदा पर कंपनी राजस्व की कुल माँग का निर्धारण करती थी। इसके बाद जमींदार अलग-अलग गाँवों के लिए भूराजस्व निश्चित करता था और वसूल करता था। इस प्रकार यह एक जटिल कार्य था। जब जमींदार निर्धारित राजस्व को समय पर जमा न कर पाता था तो उनकी संपदा (भूमि) का नीलाम कर दिया जाता था।

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प्रश्न 7.
पहाडिया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप में भिन्न थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों और संथालों की आजीविका में अंतर –
1. 18 वीं शताब्दी के परवर्ती दशकों के राजस्व अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पहाड़िया जंगल की उपज से अपनी जीविका चलाते थे और झूमकर खेती किया करते थे। जंगल को साफ करके बनाई गई जमीन पर लोग खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे। कुछ वर्षों तक उस साफ की गई जमीन पर खेती करते थे और फिर उसे परती छोड़कर नये इलाके में चले जाते थे। जमीन की खोई हुई उर्वरता फिर से लौट आए, इसीलिए ऐसा किया जाता था। संथाल लोग स्थायी खेती करते थे। वे परिश्रम से जंगल को साफ करके खेतों की जुताई करते थे। इनकी जमीन चट्टानी थी लेकिन उपजाऊ थी। बुकानन के अनुसार वहाँ तम्बाकू और सरसों की अच्छी खेती होती थी।

2. पहाड़िया लोग गुजारे वाली और खाद्य पदार्थों की खेती अधिक करते थे जबकि संथाल लोग व्यापारिक और नकदी फसलों की खेती करते थे।

3. पहाड़िया लोग जंगल साफ करने और खेती करने के लिए कुदाल का प्रयोग करते थे। वे जंगल काटने के लिए हल का प्रयोग नहीं करते थे और उपद्रवी थे। इसके विपरीत संथाल आदर्श बाशिंदे थे, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि की गहरी जुताई करते थे।

4. जंगलों में पहाड़िया लोग खाने के लिए महुआ के फूल, बेचने के लिए रेशम के कोया और राल और काठ कोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ, एकत्र करते थे। संथाल लोग इस प्रकार का कार्य नहीं करते थे।

5. पहाड़िया लोग प्रायः उन मैदानों पर आक्रमण किया करते थे जहाँ के स्थाई किसान खेती-बाड़ी करते थे। अभाव या अकाल के वर्षों में स्वयं को जीवित रखने के लिए ऐसे आक्रमण किये जाते थे। संथाल लोग इस प्रकार के कार्यों में रुचि नहीं लेते थे।

6. मैदानों में रहने वाले जमींदार पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देकर उनसे शांति खरीदनी पड़ती थी। पहाड़िया लोग व्यापारियों से पथकर लिया करते थे। पथकर लेकर वे व्यापारियों की रक्षा करते थे। संथाल ऐसा कार्य नहीं करते थे।

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प्रश्न 8.
अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर:
अमेरिकी गृहयुद्ध का भारत में समुदाय के जीवन पर प्रभाव –
1. 1860 के दशक से पूर्व ब्रिटेन अमेरिका से कपास आयात करता था जिसके बंद होने की आशंका बनी रहती थी। 1857 में ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य कंपनी की आय बढ़ाने के लिए विश्व के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था। भारत को ऐसा देश समझा गया जो अमेरिका से कपास की आपूर्ति बंद हो जाने की स्थिति में ब्रिटेन को कपास भेज सकता है। भारत से कपास का निर्यात, सस्ते दामों पर ब्रिटेन को होता था। रैयतों को इससे बहुत घाटा उठाना पड़ता था।

2. 1861 में अमेरिकी गृह-युद्ध छिड़ने के कारण कपास में कमी आने लगी और उसका दाम बढ़ने लगा। भारत और अन्य देशों से कपास की आपूर्ति होने लगी। इसके कारण भारतीय रैयतों को कपास का अच्छा दाम मिलने लगा।

3. दक्कन में किसानों को कपास उगाने के लिए खूब ऋण दिया गया । फलस्वरूप दक्कन से कपास के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि हुई।

4. इंग्लैंड में कपास के कुल आयात का 90% भाग भारत से आयात होता था। परंतु कपास की उत्पादन की वृद्धि से भी रैयतों को पर्याप्त लाभ नहीं हुआ। वे कर्ज में दबे रहे।

5. 1865 ई. तक अमेरिका में शांति बहाल होने के साथ ही ब्रिटेन में अमेरिका से कपास पुनः आने लगी। इसके कारण भारतीय कपास के निर्यात में कमी आ गई। महाराष्ट्र में साहूकारों ने कर्ज देना बंद कर दिया और किसानों से ऋणों की वसूली करने लगे। इस प्रकार रैयतों को ऋण मिलना भी बंद हो गया और वे तबाह होने लगे।

प्रश्न 9.
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं?
उत्तर:
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के विषय में आने वाली समस्याएँ:
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में अनेक समस्याएँ आती हैं जो निम्नलिखित हैं –
1. सरकारी स्रोत सरकार के कार्यों से सम्बद्ध होते हैं। किसानों के बारे में इनसे विस्तृत और सही रिपोर्ट नहीं मिलती है।

2. सरकारी स्रोत में उल्लिखित विवरण सरकार के पक्ष में होते हैं। उसमें सरकारी कमियों को नहीं दिखाया जाता था। किसानों के हित की बात की जाती है परंतु अहित के बारे में नहीं लिखा जाता।

3. सरकारी स्रोत घटनाओं के बारे में सरकारी सरोकार और अर्थ प्रतिबिंबित करते हैं। उदाहरण के लिए-दक्कन दंगा आयोग से विशिष्ट रूप से यह जाँच करने के लिए कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग का स्तर विद्रोह का कारण था।

4. संपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद आयोग ने यह सूचित किया था कि सरकारी माँग किसानों के गुस्से की वजह नहीं थी। इसमें पूरा दोष ऋणदाताओं या साहूकारों का ही था, जबकि ऐसा नहीं था। इसमें सरकारी माँग बहुत कुछ उत्तरदायी थी। ब्रिटिश सरकार यह मानने को कभी तैयार नहीं थी कि जनता में असंतोष या क्रोध सरकारी कार्यवाही के कारण उत्पन्न हुआ था।

5. सरकारी रिपोर्ट किसानों के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए उपयोगी है परंतु उन्हें सावधानीपूर्वक पढ़ना पड़ेगा अन्य का तथ्य गलत हो सकते हैं।

6. सरकारी स्रोतों से प्राप्त जानकारी का समाचारपत्रों, गैर सरकारी वृत्तान्तों, विधिक अभिलेखों और यथासंभव मौखिक स्रोतों से संकलित साक्ष्य के साथ मिलान करके उनकी विश्वसनीयता की जाँच करनी पड़ेगी।

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मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
उपमहाद्वीप के बाह्यरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइये कि क्या ऐसा भी कोई इलाका था जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी। ऐसे इलाकों को मानचित्र में भी अंकित कीजिए।
उत्तर:
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परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
फ्रांसिस बुकानन ने पूर्वी भारत के अनेक जिलों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उनमें से एक रिपोर्ट पढ़िए और इस अध्याय में चर्चित विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उस रिपोर्ट में ग्रामीण समाज के बारे में उपलब्ध जानकारी को संकलित कीजिए। यह भी बताइए कि इतिहासकार लोग ऐसी रिपोर्टों का किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं।
उत्तर:
छात्र स्वयं करे।

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प्रश्न 12.
आप जिस क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ के ग्रामीण समुदाय के वृद्धजनों से चर्चा कीजिए और उन खेतों में जाइए जिन्हें वे अब जोतते हैं। यह पता लगाइए कि वे क्या पैदा करते हैं, वे अपनी रोजी-रोटी कैसे कमाते हैं, उनके माता-पिता क्या करते थे, उनके बेटे-बेटियाँ अब क्या करते हैं और पिछले 75 सालों में उनके जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए हैं। अपने निष्कर्षों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class 12 History उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
जमींदार राजस्व क्यों नहीं अदा कर पाते थे?
उत्तर:

  1. सरकार के भूराजस्व की प्रारंभिक मांगें बहुत ऊँची थी, क्योंकि स्थाई बंदोबस्त में कई वर्षों तक एक निश्चित भूराजस्व का अनुबंध किया गया था। कंपनी ने महसूस किया कि आगे चलकर कीमतों में बढ़ोत्तरी होने और खेती का विस्तार होने से आय में वृद्धि होगी परंतु कंपनी उस वृद्धि में अपने हिस्से का दावा नहीं कर सकेगी।
  2. 1793 में कृषि वस्तुओं की दरें नीची थीं। इस कारण रैयत के लिए जमींदारों के ऊँची राजस्व राशि चुकाना मुश्किल था।

प्रश्न 2.
उपनिवेशवाद का क्या अर्थ है ? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:

  1. उपनिवेशवाद वह विचारधारा है जिसमें एक ताकतवर देश दूसरे कमजोर देश पर अधिकार कर लेता है और उनके संसाधनों का मनमाने ढंग से उपयोग करने लगता है।
  2. भारत कभी ब्रिटेन का एक उपनिवेश था। ब्रिटेन के उपनिवेशवाद की वजह से ही भारत गुलाम हुआ और उसके संसाधनों का शोषण हुआ।

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प्रश्न 3.
इस्तमरारी बंदोबस्त कब, किसने और कहाँ लागू किया? इसमें क्या व्यवस्था की गई?
उत्तर:

  1. इस्तमरारी बंदोबस्त 1793 ई. में बंगाल के गवर्नर चार्ल्स कार्नवालिस द्वारा बंगाल प्रान्त में लागू किया गया।
  2. इस बंदोबस्त के अंतर्गत बंगाल की सम्पूर्ण कृषि योग्य भूमि जमींदार को दे दी गई। इस सम्पदा पर निर्धारित भूराजस्व को जमींदार निश्चित समय पर सरकारी खजाने में जमा करते थे अन्यथा उनकी जमीन नीलाम कर दी जाती थी।

प्रश्न 4.
1770 के दशक में बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था क्यों खराब हो गई?
उत्तर:

  1. बंगाल में बार-बार अकाल पड़ रहे थे और खेती की पैदावार घटती जा रही थी।
  2. खेती के विकास के लिए सरकार कोई निवेश नहीं कर रही थी जबकि राजस्व की दर लगातार बढ़ाई जा रही थी।

प्रश्न 5.
जोतदार और मंडल जमींदार से क्यों नहीं डरते थे?
उत्तर:

  1. जोतदार एक धनी रैयत होता था जबकि मंडल गाँव का मुखिया होता था। दोनों जमींदार के अधीन होते थे। वे डरते नहीं थे बल्कि जमींदारों को परेशान देखकर खुश होते थे।
  2. वस्तुत: जमींदार आसानी से उन पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। जमींदार बाकीदारों पर मुकदमा तो चला सकता था मगर न्यायिक प्रक्रिया बहुत लंबी होती थी।

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प्रश्न 6.
ताल्लुकदार कौन थे?
उत्तर:

  1. ताल्लुकदार का शाब्दिक अर्थ है-वह व्यक्ति जिसके साथ ताल्लुक या सम्बन्ध हो। परंतु आगे चलकर ताल्लुक का अर्थ क्षेत्रीय इकाई हो गया। ताल्लुकदार क्षेत्रीय इकाई का स्वामी होता था।
  2. ब्रिटिश सरकार ने इस्तमरारी बंदोबस्त के अधीन बंगाल के राजाओं और ताल्लुकदारों के साथ अनुबंध किया।

प्रश्न 7.
सूर्यास्त कानून क्या है?
उत्तर:

  1. फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व का ठीक समय पर भुगतान जरूरी था। इस कानून के अनुसार निश्चित तिथि को सूर्य डूबने तक भुगतान हो जाना चाहिए।
  2. यदि ऐसा नहीं होता तो जमींदारी को नीलाम किया जा सकता था। इस प्रकार जमींदार को जमीन से हाथ, धोना पड़ता था।

प्रश्न 8.
19 वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में जमींदारों की स्थिति कैसे मजबूत बनी?
उत्तर:

  1. इस अवधि में राजस्व के भुगतान संबंधी नियमों को लचीला बना दिया गया था। इससे गाँवों पर जमींदार की सत्ता और अधिक मजबूत हो गई।
  2. 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में कृषि उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी होने लगी थी।

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प्रश्न 9.
गाँवों में जोतदारों की शक्ति, जमींदारों की ताकत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती थी। क्यों?
उत्तर:

  1. जमींदार शहर में रहते थे और राजस्व की वसूली के लिए गाँवों में अपने अमलों (अधिकारी) को भेजते थे। जोतदार गाँवों में रहते थे और गरीब ग्रामवासियों के एक बड़े वर्ग पर नियंत्रण रखते थे।
  2. जब जमींदार गाँवों में लगान बढ़ाना चाहते थे तो जोतदार इसका विरोध करते थे और अंग्रेज अधिकारियों के कार्यों में बाधा उत्पन्न करने थे। इससे वे अपने साथ के रैयतों में लोकप्रिय थे।

प्रश्न 10.
पहाड़िया लोगों के जीविका के क्या साधन थे?
उत्तर:

  1. राजमहल के जंगलों में रहने वाले पहाड़िया लोग खाने के लिए महुआ के फूल एकत्र करते थे, बेचने के लिए रेशम का कोया, राल और काष्ठ कोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करते थे।
  2. पेड़ों के नीचे जमने वाली घासों पर उनके पशु जीवित रहते थे और ये घासें पशुओं के लिए चरागाह बन जाती थी।

प्रश्न 11.
पहाड़िया लोगों के आवास और स्वभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. वे लोग जंगलों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े थे। वे इमली के पेड़ों के बीच बनी अपनी झोंपड़ियों में रहते थे और आम के पेड़ों के नीचे आराम करते थे।
  2. वे सम्पूर्ण प्रदेशों को अपनी निजी भूमि मानते थे और यह भूमि उनकी पहचान और जीवन का आधार थी। वे शहरी लोगों को अपनी जमीन में घुसने देना नहीं चाहते थे। उनके मुखिया लोग अपने समूह में एकता बनाये रखते थे और अपने झगड़े आपस में ही निपटा लेते थे।

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प्रश्न 12.
संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में कैसे पहुँचे?
उत्तर:

  1. संथाल लोग बंगाल में जमींदारों के लिए नई भूमि तैयार करने और खेती के विस्तार के लिए भाड़े पर काम करते थे। ब्रिटिश उद्यमियों ने इन्हें राजमहल पहाड़ियों में बसने का न्यौता दिया।
  2. अंग्रेज अधिकारी पहाड़ियों के कृषि कार्य से संतुष्ट नहीं थे। संथाल मेहनती थे और जंगल को शीघ्र साफ करके खेत तैयार कर देते थे और खेतों की अच्छी जुताई करते थे।

प्रश्न 13.
पाँचवीं रिपोर्ट क्या है?
उत्तर:

  1. भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी के प्रशासनिक तौर तरीकों तथा क्रियाकलापों व तैयार की गई और ब्रिटिश संसद में पेश की गई रिपोर्ट को पाँचवीं रिपोर्ट कहते हैं। यह रिपोर्ट 1002 पृष्ठों की थी जिसमें 800 से अधिक पृष्ठ परिशिष्टों के थे।
  2. इसमें जमींदारों और रैयतों की अर्जियाँ, भिन्न-भिन्न जिलों के कलेक्टरों की रिपोर्ट, राजस्व विवरणियों से सम्बन्धित सांख्यिकीय तालिकाएँ और अधिकारियों की बंगाल और मद्रास के राजस्व तथा न्यायिक प्रशासन पर लिखित टिप्पणियाँ शामिल की गई थीं।

प्रश्न 14.
पाँचवीं रिपोर्ट की दो कमियाँ बताइये।
उत्तर:

  1. पाँचवीं रिपोर्ट लिखने वाले कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करने का आशय रखते थे। उल्लेखनीय है कि पाँचवीं रिपोर्ट में परम्परागत जमींदारी सत्ता के पतन का वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण है।
  2. जमींदारों द्वारा जमीन खोने का भी अतिरंजित वर्णन किया गया है। जब जमींदारियाँ नीलाम की जाती थी, तो जमींदार नए-नए हथकंडे अपनाकर अपनी जमींदारी को बचा लेते थे और बहुत कम जमीन छीनी जाती थी।

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प्रश्न 15.
महालवाड़ी व्यवस्था के दोष बताइए।
उत्तर:
दोष:
इस भूमि व्यवस्था में निम्नलिखित दोष थे:
1. नम्बरदारों के विशेषाधिकार:
नम्बरदारों व अन्य विशिष्ट लोगों की सरकार तक पहुँच थी क्योंकि ये ही सरकार के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करते थे। इस स्थिति का वे अपने स्वार्थ के लिए दुरुपयोग करते थे। इस व्यवस्था में भी मध्यस्थता करने वाले व्यक्ति विद्यमान रहते थे।

2. छोटे किसानों की दयनीय स्थिति:
गाँवों के बड़े-बड़े जमींदार तथा मान्यता प्राप्त व्यक्ति अपनी स्थिति का लाभ उठाकर छोटे किसानों पर अत्याचार करते थे और उनसे बेगार लेते थे। वे इन किसानों की भूमि को अपने अधिकार में कर लेते थे और अन्ततः बड़े किसानों के नौकर के रूप में काम करने पर मजबूर हो जाते थे। इन कारणों से उनकी स्थिति दयनीय बन गई थी।

प्रश्न 16.
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली क्या है?
उत्तर:

  1. रैयत का अर्थ किसान है। यह प्रणाली कंपनी और रैयत के मध्य लगान संबंधी सीधा इकरारनामा (ठेका) थी। इसके अनुसार समय-समय पर लगान बढ़ाया जा सकता था।
  2. यह राजस्व प्रणाली मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसियों में लागू की गई।

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प्रश्न 17.
किसानों के सूपा आंदोलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  1. किसान व्यापारियों और साहूकारों से चिढ़े हुए थे। उन्होंने पूना जिले के सूपा गाँव में आंदोलन शुरू कर दिया। यहाँ एक मंडी थी जहाँ अनेक व्यापारी और साहूकार रहते थे।
  2. 12 मई, 1875 को आस-पास के ग्रामीण इलाकों के किसान एकत्र हो गये। उन्होंने व्यापारियों और साहूकारों पर आक्रमण कर दिया और उनकी बहियाँ तथा ऋणपत्र जला दिये, उनकी दुकानें लूट ली और कुछ मामलों में तो साहूकारों के घरों में आग भी लगा दी।

प्रश्न 18.
डेविड रिकार्डो कौन था?
उत्तर:

  1. डेविड रिकार्डों इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री था। भारत में ब्रिटिश अधिकारियों ने अपने महाविद्यालयी जीवन में रिकार्डों के विचारों का अध्ययन किया था।
  2. 1820 के दशक में महाराष्ट्र में ब्रिटिश अधिकारियों में बंदोबस्त की शर्त तय करने के लिए रिकार्डो के विचारों का सहारा लिया।

प्रश्न 19.
जमींदारों को कृषकों से लगान (भू-राजस्व) एकत्र करने में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था?
उत्तर:

  1. प्राकृतिक आपदा के कारण किसानों की फसल खराब हो जाने से वे लगान देने में असमर्थ हो जाते थे। कभी-कभी उपज का दाम भी बहुत गिर जाता था।
  2. किसान कभी-कभी स्वयं भी भूराजस्व देने में विलम्ब करते थे जबकि जमींदारों के समय पर लगान जमा करना होता था।

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 20.
दामिन-ए-कोह क्या है?
उत्तर:

  1. 1832 में अंग्रेजों ने राजमहल के पहाड़ी प्रदेश में जमीन के एक बहुत बड़े भाग को सीमित कर दिया और इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया।
  2. यहाँ संथालों को कृषि करने के लिए प्रेरित किया गया। इस भूमि को ‘दामिन-ए-कोह’ नाम दिया गया।

प्रश्न 21.
ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना कब हुई? इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:

  1. ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना 1857 में हुई।
  2. इस संघ का उद्देश्य विश्व के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था जिससे कि इंग्लैण्ड की मैनचेस्टर कॉटन कंपनी का विकास हो सके। उल्लेखनीय है कि भारत को इसके लिए अनुकूल माना गया और प्रोत्साहन के लिए कपास उगाने वाले किसानों को खूब कर्ज दिया गया।

प्रश्न 22.
दक्कन दंगा आयोग क्यों स्थापित किया गया?
उत्तर:

  1. दक्कन में हुए दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए जिस आयोग की स्थापना की गई उसे दक्कन दंगा आयोग कहते हैं।
  2. ब्रिटिश सरकार 1857 के विद्रोह की याद से चिंतित थी। वह नहीं चाहती थी कि भारत में फिर से इसी प्रकार का विद्रोह हो।

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प्रश्न 23.
जमींदारी को नियंत्रित और उनकी आजादी समाप्त करने के लिए अंग्रेजी कंपनी ने क्या कदम उठाये?
उत्तर:

  1. जमींदारों से स्थानीय न्याय तथा स्थानीय पुलिस व्यवस्था का अधिकार छीन लिया गया।
  2. उनकी कचहरियों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के अधीन कर दिया गया।
  3. जमींदारों की सैनिक टुकड़ियों को भंग कर दिया गया।
  4. सीमा शुल्क लेने का अधिकार छीन लिया गया।

प्रश्न 24.
1832 ई. के बाद कृषकों को ऋण लेने के लिए विवश होना पड़ा। क्यों?
उत्तर:

  1. 1832 ई. के बाद कृषि उत्पादों के मूल्यों में तेजी से गिरावट आई और लगभग डेढ़ दशक तक यही स्थिति बनी रही। इसके कारण किसानों की आमदनी घट गई।
  2. 1832-34 के वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रो में अकाल फैल गया। इसमें जन-धन की विपुल हानि हुई। वस्तुतः किसानों के पास खाने को पर्याप्त खाद्यान्न भी न रहा। दूसरी भूराजस्व की बकाया राशि भी बढ़ती जा रही थी। ऐसी स्थिति में ऋण लेने के अलावा किसानों के पास कोई अन्य विकल्प शेष न रहा।

प्रश्न 25.
बटाईदार (बकगादार) कौन थे?
उत्तर:

  1. बटाईदार एक प्रकार के किसान थे जो जोतदारों की जमीन पर खेती करते थे। वे अपने हल का प्रयोग करके फसल उगाते थे।
  2. उपज तैयार होने पर ये लोग उसका आधा भाग जोतदार को देते थे।

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प्रश्न 26.
ग्रामीण जोतदार जमींदारों से अधिक शक्तिशाली क्यों होते थे?
उत्तर:

  1. जोतदार गाँवों में गरीब किसानों के साथ रहते थे। किसानों को उनका समर्थन प्राप्त था, जमींदार शहरों में रहते थे और किसानों पर उनका नियंत्रण नाममात्र के लिए था।
  2. जमींदारों की नीलाम होने वाली जमींदारी प्राय: जोतदार ही खरीदते थे।

प्रश्न 27.
ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ तथा मैनचेस्टर में कॉटन कंपनी की स्थापना कब हुई? इनका क्या उद्देश्य था?
उत्तर:

  1. ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ की स्थापना 1857 में हुई और मैनचेस्टर कॉटन कंपनी 1859 में बनी।
  2. इनका उद्देश्य विश्व के सभी स्थानों पर कपास के उत्पादन को बढ़ावा देने का था।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जोतदारों की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जोतदारों की स्थिति –

  1. बंगाल के दिनाजपुर जिले के किसानों को जोतदार कहा गया है। 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इनके पास बड़े-बड़े रकबे होते थे जो कभी-कभी कई हजार एकड़ तक विस्तृत होते थे।
  2. स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर भी उनका नियंत्रण होता था और इस प्रकार वे उस क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर व्यापक शक्ति का प्रयोग करते थे।
  3. उनकी जमीन का काफी बड़ा भाग बटाईदारों के माध्यम से जोता जाता था और उन्हें उपज का आधा भाग मिलता था।
  4. गाँवों में जोतदारों की शक्ति जमींदारों की ताकत की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली थी। वे गाँवों में रहते थे और ग्रामीणों में काफी लोकप्रिय थे। इसके विपरीत जमींदार शहरों में रहते थे और गाँवों में उनकी धाक नहीं थी।
  5. जोतदार ग्रामीणों को जमींदारों के विरुद्ध भड़काते थे और उन्हें भूराजस्व न देने के लिए प्रेरित करते थे। वे जमींदारों से विल्कुल भी नहीं डरते थे।

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प्रश्न 2.
भारत में इस्तमरारी बंदोबस्त या स्थायी भूमि व्यवस्था किस प्रकार लागू की गई?
उत्तर:
भारत में इस्तमरारी या स्थायी भूमि व्यवस्था-पिट के इण्डिया एक्ट के अनुसार भारत में कंपनी ने राजस्व एकत्र करने की प्रणाली में सुधार करना था। 1786 ई. में कंपनी के. डायरेक्टरों ने कार्नवालिस को लिखा कि वह जमींदारों के साथ पहले 10 वर्ष के लिए एक समझौता करें तथा यह व्यवस्था यदि संतोषजनक सिद्ध हो तो इसे स्थायी बना दिया जाए।

कार्नवालिस ने कोई जल्दबाजी ने की। उसने बंगाल प्रशासन के एक अनुभवी सदस्य सर जान शोर को राजस्व एकत्र करने की व्यवस्था की जाँच करने का कार्य सौंपा। सर जान शोर ने 1789 ई. तक यह जाँच पूरी की तथा 10 वर्ष के लिए भूमि व्यवस्था की सिफारिश की। इसको बाद में स्थायी व्यवस्था बनाने की सिफारिश की गई थी। कार्नवालिस स्वयं इस निर्णय को स्थायी बनाने के पक्ष में था क्योंकि प्रधानमंत्री पिट तथा बोर्ड ऑफ कंट्रोल के प्रधान सदैव कार्नवालिस की पीठ पर थे। सर जॉन शोर की सिफारिशें स्वीकार कर ली गईं तथा 1793 ई. में स्थायी भूमि. व्यवस्था लागू कर दी गई। इससे जमींदार सरकार के समर्थक बन गए।

प्रश्न 3.
कंपनी ने जमींदारों को किस प्रकार नियंत्रित अथवा विनियमित किया?
उत्तर:
कंपनी द्वारा अपनाए गए जमींदारों को नियंत्रित एवं विनियमित करने के उपाय –

  1. यद्यपि कंपनी जमींदारों का आदर करती थी परंतु उन्हें अपने नियंत्रण में रखना चाहती थी। उसने जमींदारों की सैनिक टुकड़ियों को भंग कर दिया सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया और उनकी कचहरियों का निरीक्षण करने के लिए कलेक्टरों की नियुक्ति कर दी।
  2. जमींदारों से न्याय एवं स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली गई।
  3. कलेक्टर कार्यालय की स्थापना करके जमींदारों के अधिकार को पूरी तरह सीमित एवं प्रतिबंधित कर दिया गया।
  4. कहीं-कहीं तो खुलेआम आदेश दिया गया कि राजा तथा उसके अधिकारियों के सम्पूर्ण प्रभाव और प्राधिकार को खत्म कर देने के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली कदम उठाए जाएँ।

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प्रश्न 4.
ब्रिटिश सरकार ने भारत में नई राजस्व प्रणालियाँ क्यों लागू की?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में नई राजस्व प्रणालियाँ लागू करने के कारण –

  1. 1810 ई. के पश्चात् कृषि की कीमत बढ़ गई। इससे उपज के मूल्य में वृद्धि हुई और बंगाल के जमींदारों की आमदनी भी बढ़ गई।
  2. राजस्व की माँग इस्तमरारी बंदोबस्त के अंतर्गत तय की गई थी इसलिए ब्रिटिश सरकार इस बढ़ी हुई आय में अपने हिस्से का कोई दावा नहीं कर सकती थी।
  3. ब्रिटिश सरकार अपने वित्तीय संसाधनों को बढ़ाना चाहती थी। इसलिए उसे. भूराजस्व को अधिक से अधिक बढ़ाने के तरीकों पर विचार करना पड़ा।
  4. नीतियाँ निर्धारित करने वाले अधिकारी इंग्लैंड के जाने-माने अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डों के विचारों से प्रभावित थे। उसके अनुसार भूस्वामी को उस समय लागू औसत लगानों को प्राप्त करने का हक होना चाहिए।

प्रश्न 5.
इंग्लैंड में ईस्ट इण्डिया कंपनी के विरुद्ध किन बातों को लेकर विरोध होता था?
उत्तर:
इंग्लैंड में ईस्ट इण्डिया कंपनी के विरुद्ध विरोध की बातें –

  1. भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी के शासन की स्थापना के साथ इंग्लैंड में उसकी आलोचना होने लगी। अनेक लोग भारत तथा चीन के साथ व्यापार पर ईस्ट इण्डिया कंपनी के एकाधिकार का विरोध करते थे। वस्तुत: कुछ अन्य समूह भी भारत तथा चीन के साथ व्यापार में हिस्सेदार बनना चाहते थे।
  2. लोग उस शाही फरमान को रद्द करने की मांग कर रहे थे जिसके अंतर्गत इस कंपनी को एकाधिकार दिया गया था।
  3. ऐसे निजी व्यापारियों की संख्या बढ़ती जा रही थी जो भारत के साथ व्यापार में रुचि ले रहे थे और ब्रिटेन के उद्योपगति ब्रिटिश विनिर्याताओं के लिए भारत का बाजार खुलवाने के लिए उत्सुक थे।
  4. कंपनी के कुशासन और अव्यवस्थित प्रशासन के विषय में प्राप्त सूचना पर ब्रिटेन में तीव्र प्रतिक्रिया हो रही थी।
  5. अधिकारियों के लोभ-लालच और भ्रष्टाचार की घटनाओं को ब्रिटेन के समाचार-पत्रों में व्यापक रूप से उछाला जा रहा था।

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प्रश्न 6.
बुकानन कौन था? उसकी प्रेक्षण शक्ति का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बुकानन एवं उसकी प्रेक्षण शक्ति –

  1. फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था। भारत आने के बाद बंगाल चिकित्सा सेवा में कार्य किया। उसने लार्ड वेलेज्ली की शल्य चिकित्सा भी की।
  2. बुकानन में अद्भुत प्रेक्षण शक्ति थी। उसने पत्थरों, चट्टानों और वहाँ की भूमि के भिन्न स्तरों तथा परतों को ध्यानपूर्वक देखा और उत्पादन के लिए अध्ययन किया।
  3. उसने व्यापारिक दृष्टि से मूल्यावन पत्थरों तथा खनिजों को खोजने की कोशिश की।
  4. उसने लौह खनिज, अबरक, ग्रेनाइंट तथा साल्ट-पीटर से संबंधित सभी स्थानों का पता लगाया। वह भूमि का प्रेक्षण उसकी उत्पादकता के आधार पर करता था।

प्रश्न 7.
रैयतवाड़ी व्यवस्था के दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
रैयतवाड़ी व्यवस्था के दोष:
1. व्यवस्था स्थायी न होना:
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी यह थी कि यह स्थायी न थी। इसके कारण किसानों की भूमि में रुचि उत्पन्न नहीं की जा सकी। किसानों को यह आशंका रहती थी कि उनका लगान अधिक आंका गया है अत: वे नए समझौते करने के लिए उत्साहित नहीं होते थे।

2. जमीन जब्त किए जाने की व्यवस्था:
रैयतवाड़ी व्यवस्था के अनुसार जब तक किसान अपनी भूमि का मालिक केवल लगान दिए जाने तक रहता था। यदि लगान देने में वह किसी कारणवश असमर्थ हो जाता था तो उसकी भूमि सरकार जब्त कर लेती थी।

3. सरकारी कर्मचारी द्वारा लगान अधिक आंकना:
वैज्ञानिक व्यवस्था होते हुए भी सरकारी कर्मचारी सामान्यतः ऊँची दर से लगान आँकते थे, जिससे किसान का न केवल उत्साह भंग होता था बल्कि लगान चुकाने की एक कठिन समस्या बन जाती थी।

4. लगान वसूल करने वाले कर्मचारियों के अत्याचार:
लगान वसूल करने वाले कंपनी के कर्मचारी किसानों पर घोर अत्याचार करते थे और बड़ी कड़ाई से लगान वसूल करते थे। किसान डर के मारे महाजन से ऊँची दरों पर कर्ज लेकर भी लगान चुकाते थे और भविष्य के लिए सदा कर्जदार बने रहते थे। किसान जमींदारों के चंगुल से निकलकर राज्य के चंगुल में फंस गए लेकिन बाद में सरकार ने स्पष्ट किया कि राजस्व कर नहीं बल्कि लगान है।

5. प्राकृतिक प्रकोपों के समय भी सुविधाओं का अभाव:
सरकार की ओर से कृषि उत्पादन में किसी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं होती थी। उपज बढ़ाने लिए किसान को ही प्रयास करना होता था। प्राकृतिक प्रकोपों-अनावृष्टि अथवा अतिवृष्टि-के समय भी उन्हें किसी प्रकार की राहत नहीं दी जाती थी। इसके विपरीत इन कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें समय पर पूरा लगान देना होता था।

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प्रश्न 8.
ब्रिटिश-शासन की भूराजस्व व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ब्रिटिश-शासन की भू-राजस्व व्यवस्था:
यह तीन प्रकार की थी:
1. स्थाई बंदोबस्त:
लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में बंगाल में स्थाई बंदोबस्त आरम्भ किया। इसके अंतर्गत लगान सदा के लिए निश्चित कर दिया गया और लगान एकत्र करने वालों को जमींदार बना दिया गया।

2. रैयतवाड़ी:
मद्रास और बम्बई प्रेसिडेन्सियों में रैयतवाड़ी बंदोबस्त आरम्भ किया गया। यह कंपनी और रैयत (किसान) के मध्य लगान संबंधी सीधा इकरारनामा (ठेका) था। समय-समय पर लगान बढ़ाया जा सकता था।

3. महालवाड़ी:
इसके अंतर्गत लगान का समझौता कंपनी और गाँव या महाल के मध्य हुआ। यह उत्तर और मध्य भारत में लागू किया गया।

प्रश्न 9.
स्थाई बंदोबस्त के तीन दूरगामी परिणाम बताइये।
उत्तर:
स्थाई बंदोबस्त के दूरगामी परिणाम –

  1. कंपनी की लगान राशि निश्चित हो गई जिससे उसे बजट बनाने में सुविधा हो गई।
  2. इस व्यवस्था के कारण किसानों का शोषण बढ़ गया। जमींदारों को रैयत द्वारा दी जाने वाली लगान की राशि निश्चित की गयी थी तथापि जमींदारों ने किसान से ली जाने वाली लगान की राशि निश्चित नहीं की थी। वे किसानों से मनमानी दर पर राजस्व वसूल करने लगे।
  3. इस बंदोबस्त ने किसानों की दशा बद से बदतर बना डाली। जमींदारों के दलाल किसानों पर और अधिक अत्याचार करते थे।

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प्रश्न 10.
इस्तमरारी बंदोबस्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
1. स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement):
इस व्यवस्था में सबसे ऊँची बोली लगाने वाले व्यक्ति को भू-राजस्व इकट्ठा करने का अधिकार दिया जाता था। इससे न तो रैयत (किसान) और न ही जमींदार, कृषि में सुधार करने का प्रयास करते थे क्योंकि वे जानते थे कि आगे लगान इकट्ठा करने का अधिकार और किसी को मिल सकता है। स्थायी बंदोबस्त की निम्नलिखित विशेषताएँ थीं –

  • जमींदारों और मालगुजारों को भू-स्वामी बना दिया गया।
  • काश्तकारों का दर्जा गिर गया और वे बटाईदार होकर रह रहे थे। जमींदार स्वेच्छा से किसान को भूमि जोतने के लिए देता था अन्यथा किसान हाथ पर हाथ धरे रहता था।
  • भू-राजस्व निश्चित होने के कारण सरकार की आय भी निश्चित हो गई थी।
  • अगर भू-राजस्व समय पर जमा नहीं कराया जाता था तो किसान की भूमि नीलाम कर दी जाती थी या उसे जब्त कर लिया जाता था।

प्रश्न 11.
महालवाड़ी राजस्व व्यवस्था की विशेषतायें बताइये।
उत्तर:
महालवाड़ी राजस्व व्यवस्था की विशेषताएँ:
जिस प्रकार बंगाल में स्थायी भूमि व्यवस्था तथा दक्षिण में रैयतवाड़ी भूमि व्यवस्था लागू थी। उसी प्रकार उत्तर प्रदेश के अधिकांश भागों तथा पंजाब व मध्य प्रदेश आदि क्षेत्रों में महालवाड़ी (ग्रामानुसार) भूमि व्यवस्था प्रारंभ की गई। इस व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

1. लगान का एक निश्चित अवधि के लिए निर्धारण:
इस व्यवस्था में लगान 30 या 20 वर्ष की निश्चित अवधि के लिए निर्धारित किया जाता था और इस अवधि के पश्चात् उसका पुनर्निर्धारण होता था।

2. समझौता सरकार व सम्पूर्ण ग्राम के साथ था:
महालवाड़ी भूमि व्यवस्था के अन्तर्गत समझौता रैयतवाड़ी के अनुसर अलग-अलग किसानों के साथ नहीं, बल्कि सारे गाँव के साथ किया जाता था। इस प्रकार लगान की अदायगी के लिए सारा गाँव सम्मिलित रूप से तथा गाँव का प्रत्येक किसान अलग-अलग, सारे ग्राम के लगान के प्रति उत्तरदायी था।

3. ग्राम के नम्बरदार की विशेष भूमिका:
ग्राम की ओर से सरकार के द्वारा दिए जाने वाले सम्पूर्ण लगान के संबंध में समझौते पर ग्राम का नम्बरदार हस्ताक्षर करता था। उसकी दोनों पक्षों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण स्थिति हो जाती थी।

4. लगान देते रहने तक किसान जमीन का मालिक:
प्रत्येक ग्रामवासी सम्पूर्ण ग्राम द्वारा जाने वाली राशि में अपनी जोत का भाग देता था तथा अन्यों को अपना-अपना भाग देने को प्रोत्साहित करता था, जिससे सम्पूर्ण ग्राम का भाग दिया जा सके। यदि कोई किसान अपना भाग नहीं दे पाता था, तो उसे बेदखल कर दिया जाता था।

5. किसानों की भूमि का ब्यौरा:
सरकारी कर्मचारी ग्राम के नम्बरदार तथा ग्राम पंचायत से परामर्श करके किसानों के लगान निश्चित करते थे। किसानों को उनकी जमीन का अधिकार-पत्र मिले हुए थे। इन पर लगान की राशि अंकित की जाती थी। सम्पूर्ण ग्राम की जमीन के नक्शे में इस बात का विवरण होता था कि किस व्यक्ति के पास कितनी भूमि है तथा उससे कितना लगान प्राप्त होना है।

6. जमीन की उत्पादकता की जानकारी:
चूँकि सरकार को एक निश्चित समय के पश्चात् लगान की राशि निर्धारित करनी होती थी। इस कारण समय-समय पर जमीन की उत्पादकता की जाँच करने का अवसर भी सरकार को प्राप्त हो जाता था। एक बार निर्धारित की गई राशि उस सम्पूर्ण अवधि भर चलती थी।

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प्रश्न 12.
अंग्रेजों ने जमींदारों के साथ समझौता करके और कृषकों के अधिकारों की अवहेलना करके भयंकर भूल की। क्यों?
उत्तर:
अंग्रेजों की भयंकर भूल-अंग्रेजों ने भिन्न:
भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू कर रखी थीं। पूरे साम्राज्य में एक जैसी भू-राजस्व प्रणाली न थी। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में स्थायी बंदोबस्त था परंतु दक्षिणी-पश्चिमी भारत में रैयतवाड़ी प्रथा थी, जबकि उत्तरी भारत के कुछ क्षेत्रों में महालवाड़ी प्रथा थी। इन तीनों प्रथाओं से कंपनी और जमींदारों के हित साधन तो होते थे परंतु किसान शोषण की चक्की में पिसता जाता था। भूमि सुधारों की ओर किसी का भी ध्यान न था। वे अपना काम केवल कर वसूल करना समझते थे।

अंग्रेज अपने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए चाय, जूट, अफीम, कहवा, नील आदि की खेती पर जोर देते थे। जमींदार भी बड़े-बड़े शहरों में सुंदर बंगलों में रहकर क्लिासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। उनके कारिंदे किसानों से बड़ी बेरहमी से कर वसूल करते थे। समय पर कर देने के लिए किसान अपने पशु, घर, गहने आदि गिरवी रख देता या। बेच देता था गाँव का महाजन ऊँची दर पर कर्ज देता था। अकाल आदि प्राकृतिक विपदाओं में भी किसानों को सरकार की ओर से कोई सहायता न मिलती थी। उन्हें सिंचाई जैसी मूल आवश्यकता को पूरा करने में भी सरकार की ओर से कोई सहायता न दी जाती थी।

प्रश्न 13.
स्थायी बंदोबस्त या इस्तमरारी बंदोबस्त से क्या लाभ हुए?
उत्तर:
स्थाई बन्दोबस्त से लाभ (Benefit of Permanent Settlement):

  1. कंपनी को एक निर्धारित समय पर एक निश्चित धन राशि मिल जाती थी।
  2. अंग्रेज वफादार जमींदारों से लाभ कमाते थे और बेईमान जमींदारों की भूमि नीलाम कर देते थे।
  3. कंपनी भू-राजस्व की वसूली से संबंधित बेकार के खर्चों से बच गई।
  4. जमींदारों को भी काफी लाभ पहुँचा, क्योंकि इस व्यवस्था के अनुसार इन्हें सरकारी कोष में एक निश्चित धनराशि ही जमा करवानी पड़ती थी लेकिन वे किसानों से मनमानी धनराशि लेते थे।
  5. भूमि जमींदारों की बपौती बन गई।
  6. जमींदार पूँजीपति बन गये। उनके पास बड़े-बड़े बंगले और विलास सामग्री आ गई।

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प्रश्न 14.
रैयतवाड़ी व्यवस्था क्या थी? उसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव क्या थे?
उत्तर:
रैयतवाड़ी व्यवस्था:
दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत में लागू की गई इस व्यवस्था के अन्तर्गत किसान भू-राजस्व का भुगतान करते रहने तक ही भूमि का स्वामी था। इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना था कि यह वही व्यवस्था है, जो भारत में पहले से प्रचलित थी। बाद में यह व्यवस्था मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसियों में भी लागू कर दी गई। इस व्यवस्था में 20-30 वर्ष बाद संशोधन कर दिया जाता था तथा राजस्व की राशि बढ़ा दी जाती थी। रैयतवाड़ी व्यवस्था में निम्नलिखित ‘त्रुटियाँ थीं –

  • भू-राजस्व 45 से 55 प्रतिशत था, जो बहुत अधिक था।
  • भू-राजस्व बढ़ाने का अधिकार सरकार ने अपने पास रखा था।
  • सूखे अथवा बाढ़ की स्थिति में भी पूरा राजस्व देना पड़ता था। इससे भूमि पर किसान का प्रभुत्व कमजोर पड़ गया।

प्रभाव (Effect):

  • इससे समाज ने असंतोष और आर्थिक विषमता का वातावरण छा गया।
  • सरकारी कर्मचारी किसानों पर अत्याचार करते रहे तथा किसानों का शोषण पहले जैसा ही होता रहा।

प्रश्न 15.
पहाड़िया लोगों के जीवन की मुख्य विशेषतायें बताइए।
उत्तर:
पहाडिया लोगों के जीवन की विशेषतायें –

  1. पहाड़िया लोग पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे।
  2. वे इमली के पेड़ों के नीचे झोपड़ियाँ बनाकर रहते थे और आम की छाया में आराम करते थे।
  3. वे अपने प्रदेश में बाहरी लोगों के प्रवेश पर विरोध करते थे।
  4. उनके मुखिया अपने-अपने समूह में एकता बनाये रखते थे और उनके आपसी लड़ाई-झगड़े निपटाते थे। जनजातियों तथा मैदानी लोगों से लड़ाई छिड़ने पर वे अपने-अपने कबीले का नेतृत्व करते थे।
  5. वे जंगलों में शिकार करते थे और झूम खेती करते थे। जंगल से वे खाद्य पदार्थ, रेशम का कोया तथा लकड़ी भी एकत्र करते थे।

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प्रश्न 16.
जमींदार रैयत (किसान) से भूराजस्व की वसूली कैसे करते थे? उनके लिए भूराजस्व वसूली एक समस्या क्यों थी?
उत्तर:
जमींदारों द्वारा रैयत से भूराजस्व की वसूली –

  1. रैयत से भूराजस्व की वसूली के लिए जमींदार अपने एक अधिकारी को भेजता था जिसको ‘अमला’ कहा जाता था।
  2. राजस्व वसूली में कई परेशानियाँ होती थीं। खराब फसल तथा उपज की निम्न कीमत होने पर रैयत भूराजस्व नहीं देता था।
  3. रैयत भूराजस्व देने में जानबूझकर विलम्ब करता था।
  4. धनी किसान और गाँव का मुखिया किसान को भूराजस्व न देने के लिए बहका देता था। वे जमींदार को परेशान देखकर खुश होते थे।
  5. कभी-कभी वे जमींदार को मिलने वाले भूराजस्व के भुगतान में जानबूझ कर देरी का देते थे।

प्रश्न 17.
दक्कन दंगम आयोग के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
दक्कन दंगा आयोग –

  1. अंग्रेजी सरकार 1857 के विद्रोह के बाद से चितित थी। उसने बम्बई की सरकार पर दबाव डाला कि दंगों के कारणों की छानबीन करने के लिए एक जाँच आयोग की स्थापना की जाए।
  2. उसे विशेष रूप से यह जाँच करने के लिए कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग भी स्तर विद्रोह का कारण था।
  3. इसमें सभी साक्ष्य यह प्रमाणित करने के लिए पेश किये गये थे कि सरकार की राजस्व मांग विद्रोह का कारण नहीं थी।
  4. दक्कन दंगा रिपोर्ट इतिहासकारों को उन दंगों का अध्ययन करने की आधार सामग्री उपलब्ध कराती है।
  5. आयोग ने दंगा पीड़ित जिलों में जाँच पड़ताल कराई। रैयत वर्गों, साहूकारों और चश्मदीद गवाहों के बयान लिए, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में राजस्व की दरों, कीमतों और ब्याज के बारे में आँकड़े एकत्र किये और जिला कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों का संकलन किया।

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प्रश्न 18.
1770-80 में पहाड़ियों के प्रति ब्रिटिश अधिकारियों की नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1770-80 में पहाड़ियों के प्रति ब्रिटिश अधिकारियों की नीति –

  1. 1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों को खत्म कर देने की क्रूर नीति अपना ली और उनका संहार करने लगे।
  2. 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर आगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति अपनायी।
  3. शाति नीति के अंतर्गत पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया गया। बदले में उन्हें अपने आदमियों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी लेनी थी।
  4. मुखियाओं से यह आशा भी की गयी कि वे अपनी बस्तियों में शांति व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने जाति के लोगों को अनुशासन में रखेंगे।
  5. इस नीति के अपनाने से मुखियाओं की शक्ति क्षीण हो गयी और अपने समुदाय में सम्मान कम हो गया। उन्हें अंग्रेजों के अधीनस्थ कर्मचारी के रूप में समझा जाने लगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
ब्रिटिश शासन काल में भारतीय किसानों की दरिद्रता के कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारतीय कृषकों की दरिद्रता के कारण भारतीय किसानों की दरिद्रता को समझने के लिए निम्नलिखित बातों को समझना आवश्यक है –
1. भूमि की नई-नई व्यवस्थाएँ:
बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी पर अधिकार हो जाने के पश्चात् अंग्रेजों ने राजस्व के माध्यम से अधिकाधिक धन प्राप्त करने के उपाय किए। इनमें उनके द्वारा प्रचलित विभिन्न भूमि व्यवस्थाएँ थीं। इन व्यवस्थाओं में नीलामी के द्वारा कई प्रकार के पट्टों पर भूमि दिए जाने की व्यवस्था तथा स्थायी भूमि प्रबंध आदि सम्मिलित थीं। प्रत्येक व्यवस्था में राजस्व वसूल करने वाले नये व्यक्ति होते थे और वे एक बार में किसानों से अधिकाधिक धन वसूल करने का प्रयास करते थे। किसान के सामने समर्पण करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न था। इन व्यवस्थाओं ने भारतीय किसान की स्थिति को दयनीय बना डाला।

2. किसानों में असुरक्षा की भावना:
भूमि की विभिन्न व्यवस्थाओं के कारण भारतीय किसान को सदा भय बना रहता था कि उसकी भूमि उसके पास रहेगी भी या नहीं। नीलामी में किसानों को अपनी भूमि अपने पास रखने के लिए ऊँची बोली लगानी पड़ती थी। कई बार तो यह बोली इतनी ऊँची हो जाती थी कि किसान को राजस्व देना असंभव हो जाता था। स्थायी समझौते के अंतर्गत पुराना पट्टा और किसान को जमीन की गारंटी देने वाला कबूलियत का तरीका बनाए रखा गया किन्तु व्यवहार में जमींदार अपने पट्टेदार को किसी न किसी बहाने से बेदखल करने का अधिकार रखता था। जमींदारों की उसके ऊपर कृपा बनी रहे और उसकी भूमि न छिन जाए, इसके लिए किसान को भारी मूल्य चुकाना पड़ता था।

3. किसानों ने भी भूमि की उपेक्षा की:
असुरक्षा की भावना के कारण किसानों ने भूमि की उपेक्षा की और पैदावार बढ़ाने की ओर ध्यान नहीं दिया। उन्हें भय रहता था कि उनके द्वारा तैयार की गई भूमि को जमींदार कहीं किसी दूसरे किसान को न दे। इससे उपज में कमी हुई और इसका प्रभाव अंततः किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ा। सरकार द्वारा किए गए अस्थायी समझौते से भी किसान को भय रहता था कि अगली बार उसका किराया बढ़ सकता है।

4. जमींदारों ने भरपूर शोषण किया:
स्थायी भूमि प्रबंध में जिन जमींदारों को भूमि प्राप्त हुई उनको शासकों का संरक्षण प्राप्त था। वे इस स्थिति का लाभ उपायों से भी उनका शोषण करने लगे। किसान को भूमि छिन जाने का भय तो था ही, साथ ही शासन के भय के कारण भी उनकी असहाय स्थिति थी और उन्हें जमींदार की दया पर ही जीवन व्यतीत करने को मजबूर होना पड़ा था।

5. खेतों का छोटे:
छोटे भागों में बंट जाना-नगरों में उद्योगों के नष्ट हो जाने के कारण कारीगर ग्रामों में चले गए और इससे कृषि पर बोझ बढ़ गया। किसान की भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गई। जनसंख्या वृद्धि ने खेतों के छोटे होने की प्रक्रिया को और अधिक तेज कर दिया। खेतों के इतने छोटे-छोटे टुकड़े हो गये कि ये जोतें आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी बन गईं। इससे किसानों की दरिद्रता बढ़ना स्वाभाविक ही था।

6. ग्रामोद्योगों का पतन:
अंग्रेजों के आगमन का दुष्परिणाम न केवल नगरों के उद्योगों पर हुआ बल्कि ग्रामों के उद्योग भी धीरे-धीरे नष्ट हो गये। इन उद्योगों के समाप्त होने से ग्रामों में बड़ी संख्या में लोग बेकार हो गए और मजबूरन उन्हें कृषि पर निर्भर होना पड़ा। ये लोग भूमिहीन किसान बन गए और अपने जीविकोपार्जन के लिए किसानों की भूमि पर मजदूरों के रूप में खेती का काम करने लगे। इन भूमिहीन किसानों की दशा और अधिक खराब हो गई।

7. सरकार की उपेक्षा:
कृषकों की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही थी किन्तु विदेशी सरकार ने उनकी दशा सुधारने का कभी प्रयास नहीं किया। वे परम्परागत तरीकों से ही कृषि करते थे। खेती के सुधरे हुए तरीके, नए औजारों का प्रयोग तथा अच्छे बीज व खाद का प्रयोग उन्हें नहीं आता था। सरकार ने इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया। कृषि पर बोझ बढ़ता गया, राजस्व व अन्य उपायों से कृषक का शोषण होता रहा, उपज घटती रही और सरकार की उपेक्षा की बनी रही, परिणामस्वरूप किसान की आर्थिक दशा बहुत बिगड़ गई।

8. साहूकारों द्वारा शोषण:
कृषक की दुर्बल स्थिति का साहूकार ने भी लाभ उठाया। वह साहूकार से कर्ज लिए बिना खेती की व्यवस्था नहीं कर सकता था। आमतौर से साहूकार थोड़े से कर्ज के लिए भी किसान की भूमि अपने पास रख लेते थे। ऊँची ब्याज दर के कारण किसान के लिए ब्याज देना भी कठिन हो जाता था, मूल धन लौटाना तो दूर की बात थी। अन्ततः किसान को अपनी भूमि से हाथ धोना पड़ता था। साहूकारों व महाजनों के इन कार्यों से सरकार भली-भाँति परिचित थी, किन्तु उसने भी किसानों की सहायता का प्रयास नहीं किया।

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प्रश्न 2.
इस्तमरारी बंदोबस्त के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
इस्तमरारी बंदोबस्त के गुण या विशेषताएँ:
1. कंपनी की प्रशासन क्षमता में वृद्धि:
किसानों से मिलने वाली मालगुजारी कंपनी की आमदनी का मुख्य स्रोत थी। कंपनी के योग्यतम् कर्मचारियों को इस राजस्व को एकत्र करने के लिए लगाना पड़ता था। फलस्वरूप दूसरे विभागों का कार्य ठीक से नहीं हो पाता था। इस व्यवस्था के कारण सरकार योग्य व्यक्तियों को अन्य विभागों में लगाने की सुविधा प्राप्त कर पाई। इस प्रकार प्रशासनिक व्यवस्था की क्षमता बढ़ना स्वाभाविक था।

2. कंपनी के व्यय में कमी:
भूमि के बार-बार प्रबंध करने में सरकार का बहुत अधिक धन खर्च होता था। अनेक अतिरिक्त कर्मचारियों और अधिकारियों को इस कार्य में लगाया जाता था और अतिरिक्त भत्ता देना पड़ता था। सरकार इस काम से अलग हो इसलिए उसकी बचत बढ़ गयी।

3. जमींदारों के हितों में वृद्धि:
जमींदारों को कानूनी रूप से भूमि का स्थायी मान लिया गया। उन्हें इस व्यवस्था से सर्वाधिक लाभ हुआ । अब वे भूमि में रुचि लेने लगे तथा उपज को बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे। राज्य का भाग तो निश्चित ही था। अतिरिक्त उपज जमींदारों के हाथ में ही रहनी थी। इसके कारण वे समृद्ध हो गये। इस प्रकार इस व्यवस्था ने उनके हितों में वृद्धि की।

4. किसानों को प्रोत्साहन:
इस व्यवस्था से कृषक वर्ग को बहुत प्रोत्साहन मिला। उन्हें अपने खेत का पट्टा मिल गया था जिस पर भूमि की माप और लगान लिखा होता था। उन्हें तब तक बेदखली का भय नहीं रहता था जब तक कि वे लगान अदा करते रहते थे। इस प्रकार वे लगान देकर मन से खेती करने लगे।

5. उद्योग और व्यापार में उन्नति:
भूमि के स्थायी प्रबंध से व्यापार के क्षेत्र में पर्याप्त उन्नति हुई। इस व्यवस्था से जमींदारों की आमदनी बढ़ गयी। उन्होंने अपने अतिरिक्त धन को उद्योग तथा व्यापार में लगाया। फलस्वरूप बंगाल में अनेक उद्योगों की स्थापना की गयी।

6. बंगाल प्रान्त की समृद्धि:
इस व्यवस्था से बंगाल में कृषि की पर्याप्त उन्नति हुई और कृषि उत्पादन बढ़ गया। बंगाल में खाने-पीने की वस्तुओं की कमी नहीं रही। उद्योग और व्यापार की उन्नति से भी बंगाल में समृद्धि आ गयी।

7. अंग्रेज समर्थक वर्ग का उदय:
राजनैतिक दृष्टि से अंग्रेजों को इस व्यवस्था से बहुत अधिक लाभ हुआ। जमींदार भूमि के स्वामी बन गये थे। इसके फलस्वरूप वे बहुत अधिक धनी हो गये। उन्हें यह सम्मान और सम्पत्ति अंग्रेजों के कारण प्राप्त हुई थी। वे अंग्रेजों के समर्थक और विश्वासपात्र बन गये। अंग्रेजों के राज्य को स्थायी बनाने में जुट गये। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया।

इस्तमरारी बंदोस्बत के दोष:

1. जमींदारों पर विपरीत प्रभाव:
यद्यपि स्थायी व्यवस्था अन्ततः जमींदारों के लिए लाभदायी सिद्ध हुई तथापि इसके उस समय के प्रभाव उनके लिए विनाशकारी सिद्ध हुए। इस व्यवस्था के द्वारा निश्चित भू-राजस्व की दरें बहुत ऊँची थीं। उस समय उपज बहुत कम थी। बहुत से जमींदार धन की अदायगी समय पर न कर सके और राज्य ने उनकी भूमि तथा जायदाद बेचकर यह धन पूरा कर लिया। बहुत से जमींदार अपनी जमींदारी से ही वंचित हो गये। उस समय यह व्यवस्था जमींदारों के हितों के प्रतिकूल सिद्ध हुई।

2. राज्य की भविष्य की आय वृद्धि पर प्रतिबंध:
इस स्थायी व्यवस्था ने राज्य के भावी हितों की अवहेलना कर दी। कुछ समय के पश्चात् भूमि की उपज बढ़ गई क्योंकि जमींदारों ने भूमि में रुचि लेना तथा उपज बढ़ाने के लिए इस पर धन खर्च करना प्रारंभ कर दिया था। सरकार अपने निर्धारित हिस्से से अधिक राजस्व की मांग नहीं कर सकती थी।

3. कृषकों के हितों की उपेक्षा:
कार्नवालिस का उद्देश्य वास्तव में कंपनी की आय को बढ़ाने तथा न्यूनतम खर्च पर अधिकतम लगान वसूल करने का था। उसे किसानों के हितों से कोई सहानुभूति न थी। उनके अधिकारों तथा हितों की अवहेलना करके उन्हें जमींदारों की दया पर छोड़ दिया गया। जमींदार किसानों से मनमाना व्यवहार करने लगे और विभिन्न प्रकार से धन वसूल करने लगे।

4. जमींदारों के कारकूनों द्वारा किसानों पर अत्याचार:
इस व्यवस्था का एक अन्य दोष यह था कि धीरे-धीरे सम्पूर्ण अधिकार जमींदारों के नौकरों के हाथों में आ गए। वास्तव में उपज के बढ़ जाने से जमींदार बहुत धनवान हो गए। अब उन्होंने ग्रामों में रहना बंद कर दिया तथा बड़े-बड़े नगरों में जाकर शाही जीवन व्यतीत करने लगे। उनके कारकून (नौकर) कृषकों पर खूब अत्याचार करते थे।

5. अन्य प्रान्तों पर बोझ:
बंगाल का प्रान्त धीरे-धीरे कम आय देने वाला प्रान्त बन गया जबकि राज्य सरकार का खर्च दिन प्रतिदिन बढ़ रहा था। ऐसी दशा में इस खर्च का भार अन्य प्रान्तों पर डाला गया।

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प्रश्न 3.
ब्रिटिश नीतियों का भारत के किसानों पर क्या असर पड़ा, इसका विवेचन कीजिए। उन कारकों को स्पष्ट कीजिए जिनके कारण ग्रामीण दरिद्रता पैदा हुई तथा भारत में बहुधा अकाल पड़े।
उत्तर:
ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों के कारण किसानों की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गई। कृषि की दशा भी खराब हो गई जिसके कारण किसान निर्धन हो गये। संक्षेप में, कृषि तथा किसानों पर ब्रिटिश शासन के निम्नलिखित प्रभाव पड़े –

1. भूमि का स्वामित्व:
अंग्रेजों से पूर्व भारत में भूमि आजीविका कमाने का साधन थी। इसे न तो खरीदा जा सकता था और न बेचा जा सकता था। भूमि पर कृषि करने वाले, उपज का एक निश्चित भाग भूमि-कर के रूप में सरकार को दे दिया करते थे परंतु अंग्रेजों ने इस आदर्श प्रणाली को समाप्त कर दिया। लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भूमि का स्थायी बंदोबस्त लागू किया। इसके अनुसार भूमि सदा के लिए जमींदारों को दे दी गई। उन्हें सरकारी खजाने में निश्चित कर जमा करना होता था। वे यह जमीन अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को दे सकते थे। इस तरह भूमि पर कृषि करने वालों का दर्जा एक नौकर जैसा हो गया। स्वामी सेवक बन गये और राजस्व की वसूली करने वाले जमींदारों के सेवक स्वामी बन गये।

2. कृषकों का शोषण:
अंग्रेजी शासन के अधीन भूमि की पट्टेदारी की तीन विधियाँ आरम्भ हुई-स्थायी प्रबंध, रैयतवाड़ी प्रबंध तथा महलवाड़ी प्रबंध। इन तीनों विधियों के परिणामस्वरूप किसानों को ऐसे अनेक कष्ट करने पड़े, जिन्हें सुनकर मन दहल जाता है। भूमि का स्वामी अपने-आपको गाँव का भाग नहीं समझता था। उसे अपनी रैयत अथवा खेतिहर किसान से कोई सहानुभूति नहीं थी। वह किसानों को जब चाहे बेदखल कर सकता था। इस नियम का सहारा लेकर वह किसानों से मनचाही रकम ऐंठने लगा। भूमि की सारी अतिरिक्त उपज वह स्वयं हड़प जाते थे और किसानों के पास बस इतना माल रह जाता था जिससे उनके प्राण बचे रह सकें।

रैयतवाड़ी प्रथा के अनुसार किसानों के कष्ट और अधिक बढ़ गए। किसान भूमि के स्वामी तो मान लिए थे, परंतु कर की दर इतनी अधिक थी कि उनके लिए कर अदा करना बड़ा कठिन था। कर जमा कराने के नियम बड़े कठोर तथा अमानवीय थे। निश्चित तिथि को सूर्यास्त होने से पूर्व यदि किसान अपना लगान नहीं चुका पाता था तो उसकी भूमि नीलाम कर दी जाती थी। कर चुकाने के लिए मजबूर किसान साहूकारों से ऋण लिया करते थे। बस, एक बार ऋण लेने पर किसान साहूकार के चंगुल में बुरी रह फंस जाते थे। साहूकार सूद तथा किसानों की निरक्षता का सहारा लेकर उनकी जमीन हड़प लेते थे। किसान से अधिक पैसे ऐंठने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे जाते थे। वास्तव में, वह किसान जो भू-स्वामी हुआ करता था, अंग्रेजी राज्य की छाया में मजदूर बनकर रह गया।

3. कृषि का पिछड़ापन:
अंग्रेजी शासन के अधीन कृषक के साथ-साथ कृषि की दशा भी बिगड़ने लगी। कृषक पर भारी कर लगा दिये गए। जमींदार उससे बड़ी निर्दयता से रकम ऐंठता था। जमींदार स्वयं तो शहरों में रहते थे। उनके मध्यस्थ किसानों की उपज का अधिकतर भाग ले जाते थे। जमींदार की दिलचस्पी पैसा कमाने में थी। वह भूमि सुधारने में विश्वास नहीं रखता था। इधर किसान दिन-प्रतिदिन निर्धन तथा निर्बल होता जा रहा था, अतः वह भूमि में धन तथा श्रम दोनों ही नहीं लगा पा रहा था। उसे एक और हानि हुई। इंग्लैंण्ड का मशीनी माल आ जाने से ग्रामीण उद्योग-धन्धे नष्ट हो गये, अत: खाली समय में वह औद्योगिक गतिविधियों से जो पैसे कमाया करता था, अब बंद हो गया। भूमि के अधिकार सिद्धांत ने उनके जीवन में मुकद्दमेबाजी का नवीन अध्याय आरम्भ किया। मुकद्दमों पर उसका समय तथा धन दोनों ही नष्ट होने लगे और कृषि पिछड़ने लगी। संक्षेप में, अंग्रेजों की भूमि नीति ने कृषक के उत्साह को बड़ी ठेस पहुंचाई जो अन्ततः कृषि के लिए हानिकारक सिद्ध हुई।

किसानों की दरिद्रता के कारण:
ब्रिटिश शासनकाल में किसानों की दशा बड़ी ही शोचनीय थी। उनकी निर्धनता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। उनकी निर्धनता के कारणों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है –

  • ब्रिटिश शासनकाल में जमींदारी प्रथा प्रचलित थी। भूमि के स्वामी बड़े-बड़े जमींदार होते थे। किसानों का वे शोषण करते थे। वे उनसे बेगार भी लेते थे।
  • किसानों के खेती करने के ढंग बहुत पुराने थे। कृषि के लिए अच्छे बीज तथा खाद की कोई व्यवस्था नहीं थी। सिंचाई के उपयुक्त साधन उपलब्ध न होने के कारण किसानों को केवल वर्षा
    पर निर्भर रहना पड़ता था।
  • ब्रिटिश सरकार ने किसानों की दशा सुधारने की ओर कोई ध्यान, नहीं दिया।
  • किसान प्रायः साहूकारों से ऋण लेता था जिस पर उसे भारी ब्याज देना पड़ता था। सरकार की ओर से उन्हें ऋण देने का कोई प्रबंध नहीं था।
  • किसानों को भारी भूमि-कर देना पड़ता था। यह भी इनकी निर्धनता का एक बहुत बड़ा कारण था।

अकाल पड़ने के कारण:
भारत में अंग्रेजी काल में अनेक बार अकाल पड़े जिनमें हजारों लोग मारे गये। भारत में अकाल पड़ने के निम्नलिखित कारण थे –

  • जमींदारी प्रथा आरम्भ होने से कृषकों की भूमि में कोई रुचि न रही। जमींदार भी भूमि को सुधारने के लिए पूँजी लगाने को तैयार नहीं थे। परिणामस्वरूप अन्न का उत्पादन बहुत कम हो गया जो अकाल का कारण बना।
  • अंग्रेज भारत में किसानों को ऐसी फसलें बोने के लिए विवश करते थे जिनसे उन्हें केवल कच्चा माल प्राप्त हो।
  • कंपनी के अनेक कर्मचारी मुनाफाखोरी के लिए अन्न का संग्रह कर लेते थे जिससे अनाज का कृत्रिम अभाव उत्पन्न हो जाता था।
  • यातायात के साधनों का अभाव और सरकारी उदासीनता भी अकाल का कारण बनती थी।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शासन भारत में कब से शुरू हुआ?
(अ) 1757 ई.
(ब) 1857 ई.
(स) 1919 ई.
(द) 1947 ई.
उत्तर:
(अ) 1757 ई.

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प्रश्न 2.
1793 ई. में इस्तमरारी बंदोबस्त किसने लागू किया था?
(अ) लार्ड क्लाइव
(ब) वारेन हेस्टिंग्स
(स) लार्ड कार्नवालिस
(द) लार्ड वैलेजलि
उत्तर:
(स) लार्ड कार्नवालिस

प्रश्न 3.
जमींदार क्या थे?
(अ) भूमि के स्वामी थे
(ब) राजस्व समाहर्ता थे
(स) ग्राम पंचायत के मुखिया थे
(द) किसानों को नियंत्रित करते थे
उत्तर:
(ब) राजस्व समाहर्ता थे

प्रश्न 4.
अंमला कौन था?
(अ) जोतदार का अधिकारी था
(ब) किसानों का स्वामी था
(स) गाँव का प्रभावशाली व्यक्ति था
(द) जमींदार का एक अधिकार था
उत्तर:
(द) जमींदार का एक अधिकार था

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प्रश्न 5.
जोतदार कौन-सा कार्य नहीं करता था?
(अ) जोतदार जमींदार को परेशान करते थे
(ब) वे शहरों में रहते थे
(स) वे गाँवों में रहते थे
(द) रैयतों को एकजुट करके रखते थे
उत्तर:
(ब) वे शहरों में रहते थे

प्रश्न 6.
भू-सम्पदा की नीलामी से बचने के लिए जमींदार कौन-सी तरकीब अपनाते थे?
(अ) जमीन की फर्जी बिक्री करते थे
(ब) जमीन पर खेती नहीं करते थे
(स) जोतदारों से कर्ज लेते थे
(द) जमीन का लगान बढ़ा देते थे
उत्तर:
(अ) जमीन की फर्जी बिक्री करते थे

प्रश्न 7.
पाँचवीं रिपोर्ट कितने पृष्ठों की है ?
(अ) 1000
(ब) 1002
(स) 2002
(द) 3002
उत्तर:
(ब) 1002

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प्रश्न 8.
विलियम होजेज कौन था?
(अ) एक ब्रिटिश कलाकार
(ब) एक ब्रिटिश कवि
(स) एक ब्रिटिश इतिहासकार
(द) एक धर्म प्रचारक
उत्तर:
(अ) एक ब्रिटिश कलाकार

प्रश्न 9.
ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति के लिए पहाड़ियों को क्या देना चाहा?
(अ) सभी किसानों को वार्षिक भत्ता
(ब) जमींदारों को वार्षिक भत्ता
(स) पहाड़िया मुखियाओं को वार्षिक भत्ता
(द) कठोर दंड
उत्तर:
(स) पहाड़िया मुखियाओं को वार्षिक भत्ता

प्रश्न 10.
दामिन-इ-कोर किसका इलाका था?
(अ) बंगाल के जमींदारों
(ब) संथालों
(स) पहाड़ियों
(द) बंगाल के जोतदारों
उत्तर:
(ब) संथालों

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

Bihar Board Class 12 History राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
आरम्भिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?
उत्तर:
आरम्भिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाण तथा हड़प्पा के नगरों से भिन्नता: आरम्भिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाण स्वरूप अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के तथा चित्र मिलते हैं। ये प्रमाण विभिन्न ऐतिहासिक पक्षों के बारे में पूर्ण जानकारी देने में असमर्थ हैं। 1830 सा०यु० में भारतीय अभिलेखों के अध्ययन की कुछ नई महत्त्वपूर्ण विधियाँ अस्तित्त्व में आईं।

ईस्ट इण्डिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप.ने प्राचीन शिलालेखों तथा सिक्कों में प्रयोग की गई ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों को पहली बार पढ़ा। इन अभिलेखों में पियदस्सी अर्थात् अशोक के विषय में वर्णन किया गया था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक भारत के महान् शासकों में से एक था।

यूरोपीय तथा भारतीय इतिहासकार अब विभिन्न भाषाओं में लिखे गए अभिलेखों तथा ग्रंथों की सहायता से उन महत्त्वपूर्ण वंशों के तिथिक्रम में इतिहास का वर्णन करने लगे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया।

इस प्रकार विद्वानों को प्राचीन भारतीय राजनीतिक इतिहास की खोज करने की नई दिशा मिली। इसी के परिणामस्वरूप 20वीं शताब्दी के आरम्भ तक प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास की रूपरेखा सामने आई। इसके बाद विद्वानों ने राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक तथा सामाजिक विकासों के बीच संबंध का पता लगाने की दिशा में कार्य किया। ज्ञात हुआ कि ऐसे संबंध परोक्षतः बने थे।

ये हड़प्पा नगरों के प्रमाणों से आरंभिक ऐतिहासिक नगरों के प्रमाण भिन्न थे। ऐसा इसलिए कि इन पर अंकित लिपि को पढ़ लिया गया है, इसलिए कुछ बातें स्पष्ट हो गयी हैं। हड़प्पा नगरों के प्रमाणों की लिपि पढ़ी नहीं जा सकी है। इसलिए स्पष्ट नहीं है। हड़प्पा से साक्ष्य भी कम ही प्राप्त हुए हैं।

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प्रश्न 2.
महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणे का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण:
1. बौद्ध धर्म और जैन धर्म के ग्रंथों में महाजनपदों या 16 राज्यों के नाम मिलते हैं। इन ग्रंथों में महाजनपदों के नाम आपस में नहीं मिलते फिर भी अवन्ति, वत्स, कोशल, मगध, कुरु तथा पंचाल जैसे महाजनपदों के नामों का कई बार उल्लेख हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये महाजनपद अन्य जनपदों से अधिक शक्तिशाली थे। यह सभी जनपद गंगा-यमुना की घाटियों में स्थित थे।

2.  इन महाजनपदों के इतिहास की पूर्ण जानकारी नहीं मिलती, तथापि इनसे छठी शताब्दी सा०यु०पू० में भारत की राजनीतिक स्थिति के बारे में कुछ अनुमान लगा सकते हैं। उस समय राजनीतिक एकता का अभाव था। इन 16 राज्यों के शासक आपस में लड़ते रहते थे। इन महाजनपदों की राजनीतिक उपलब्धियों के बारे में बहुत कम परंतु उनके शासन प्रबंध के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है।

3. अधिकांश महाजनपदों के मुखिया राजा कहे गए हैं। इन जनपदों में से कई जनपदों को गण तो कई को संघ कहा जाता था। वस्तुत: इन राज्यों में सत्ता अल्प प्रभावशाली तथा शक्तिशाली लोगों के हाथों में केन्द्रित थी। इसको समूह शासन नाम दिया गया है। महावीर तथा बुद्ध दोनों ऐसे गणराज्यों के राजकुमार या युवराज थे। वज्जि संघ-जैसे कुछ राज्यों में, राजा ही संयुक्त रूप में भूमि आदि संसाधनों पर नियंत्रण रखते थे।

4. प्रत्येक महाजनपद की एक राजधानी होती थी और उसके आस-पास दुर्ग बने होते थे। नगरों के विकास, सैन्य प्रबंध तथा उच्च अधिकारियों के वेतन भुगतान हेतु संसाधनों की आवश्यकता होती थी।

5. लगभग छठी शताब्दी सा०यु०पू० के पश्चात् ब्राह्मणों ने संस्कृत भाषा के धर्मशास्त्रों की रचना का कार्य आरम्भ कर दिया था। इन धर्मशास्त्रों में शासकों तथा अन्य सामाजिक वर्गों के लिए नियम लिखे होते थे।

6. ये धर्मशास्त्र कृषकों, व्यापारियों तथा कारीगरों से कर तथा उपहार एकत्रित करने का अधिकार महाजनपद के शासक को देते थे। धन संग्रह करने के लिए पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करने की मनाही नहीं थी। धीरे-धीरे कुछ शक्तिशाली राज्यों ने स्थायी सेनाएँ तथा अधिकारियों की भर्ती कर ली। अन्य शासक अपनी आवश्यकतानुसार किसानों में से ही सैनिकों की भर्ती कर लेते थे।

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प्रश्न 3.
सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं?
उत्तर:
इतिहासकारों द्वारा सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण:
इतिहासकार सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करने के लिए विभिन्न प्रकार के ऐतिहासिक स्रोतों-साहित्य और पुरावस्तुओं का सहारा लेते हैं। पुरातत्त्व की खोज से पूर्व साहित्यिक ग्रन्थों के आधार पर इतिहास लिखा गया था। उदाहरण के लिए-आर्यों के जीवन का इतिहास वैदिक ग्रंथों के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है।

बौद्धकाल और जैनकाल का अनेक विवरण इस काल के ग्रंथों में वर्णित बातों के आधार पर दिया गया है। मौर्यकालीन जनजीवन की बहुत कुछ जानकारी बौद्ध और जैन ग्रंथों से होती है। भारत में समय-समय पर विदेशी यात्रियों का आगमन होता रहा है। उन्होंने अपने यात्रा विवरण में भारत के कई क्षेत्रों का वर्णन किया है।

उदाहरण के लिए-यूनानी यात्री मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में 302 सा०यु०पू० से 298 सा०यु०पू० तक रहा। उसने अपनी पुस्तक इंडिका में भारत के आम लोगों के जीवन का रोचक वर्णन किया है। कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र मौर्यकालीन जनजीवन का इतिहास प्रस्तुत करता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इतिहासकार साहित्य के आधार पर सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करते हैं।

पुरातात्विक साधन यथा-अभिलेख, सिक्के, मूर्तियाँ, स्मारक, भवनावशेष और मनके भी लोगों के जीवन का वर्णन करने में इतिहासकारों की मदद करते हैं। उदाहरण के लिए-कुषाण काल में सोने के सिक्के अधिक मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य लोगों की आर्थिक दशा अच्छी थी। हड़प्पा के स्थलों से बैलगाड़ी के खिलौने मिलना इतिहासकारों के इस उल्लेख का आधार बनता है कि लोग परिवहन के साधन के रूप में बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे।

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प्रश्न 4.
पाण्ड्य सरदार (स्रोत 3) को दी जानेवाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?
उत्तर:
समानताएँ:
दोनों जगह दी गई सामग्रियों में फूल शामिल हैं। दोनों ही जगह दान में फूल दिए गए हैं।

असमानताएँ:
पाण्ड्य सरदारों को दी जाने वाली वस्तुएँ दंगुन गाँव की वस्तुओं से अधिक हैं। इसमें दैनिक जीवन के उपयोग की अधिक वस्तुएँ शामिल हैं। दंगुन गाँव में वस्तुओं की संख्या कम है। यहाँ प्रभावती गुप्त ने सम्पूर्ण गाँव की सम्पत्ति और करारोपण की व्यवस्था को भी दान में दे दिया है।

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प्रश्न 5.
अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।
उत्तर:
अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याएँ –

  1. कई अभिलेखों के अक्षरों को हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया गया है। इसीलिए समय के साथ वे अक्षर घिस भी गये हैं। उन्हें पढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  2. अनेक अभिलेखों के अक्षर लुप्त हो गये हैं। ऐसे अनेक प्रसंगों से माध्यम से जोड़कर पढ़ा जाता है।
  3. अभिलेखों में वर्णित बातों का अर्थ निकालना एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं।
  4. अभिलेख हजारों की संख्या में प्राप्त हुए हैं परंतु उनमें से कुछ के अर्थ ही निकाले जा सके हैं और अधिकतर अभिलेख सुरक्षित भी नहीं हैं।
  5. प्रायः अभिलेखों में उन्हें तैयार करने वाले लोगों का ही उल्लेख होता है। इसलिए अन्य विवरण के लिए प्रत्यक्ष उपायों का सहारा लेना पड़ता है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए। (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.
मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्त्वों के प्रमाण मिलते हैं?
उत्तर:
मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षण एवं अशोक के अभिलेखों के तत्त्व:
1. केन्द्रीय प्रशासन:
केन्द्रीय प्रशासन के मुख्य अंग राजा, मंत्रिपरिषद् तथा उच्च सरकारी अधिकारी आदि थे। राजा सर्वेसर्वा होता था। सारा नागरिक एवं सैनिक प्रशासन उसी की इच्छानुसार चलता था। वह एक शानदार महल में बड़े ठाट-बाट से रहता था परंतु प्रजा की भलाई को भी कभी नहीं भूलता था। राजा को परामर्श देने के लिए एक मंत्री-परिषद् होती थी।

प्रत्येक मंत्री के पास कोई-न-कोई विभाग होता था। राजा तथा मंत्रियों की सहायता के लिए अध्यक्ष, अमात्य, राजुक और प्रादेशिक जैसे अनेक अधिकारी होते थे। नियुक्ति के बाद भी धम्म-महामात्त नाम के अधिकारी उनके कार्यों पर नजर रखते थे। ये सब अधिकारी बड़े चरित्रवान और ईमानदार होते थे।

2. प्रान्तीय प्रशासन:
इतने बड़े राज्य के कार्य को भली प्रकार चलाने के लिए देश को निम्नलिखित चार प्रान्तों में विभक्त किया गया था -(क) मध्य प्रान्त: इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। इस प्रान्त का कार्य राजा स्वयं चलाता था। (ख) उत्तर-पश्चिमी प्रान्त: इसकी राजधानी तक्षशिला थी। (ग) पश्चिमी प्रान्त: इसकी राजधानी उज्जैन थी। (घ) दक्षिणी प्रान्त: इसकी राजधानी स्वर्णगिरि थी।

ये प्रान्त गवर्नरों के अधीन होते थे जो प्रायः राजवंश से सम्बन्ध रखते थे। इन प्रांतीय गवर्नरों तथा अधिकारियों पर कड़ी निगरानी रखी जाती थी। इस कार्य के लिए विशेष गुप्तचर छोड़ रखे थे जो राज्य में होने वाली प्रत्येक घटना की सूचना देते रहते थे। प्रान्त आगे जिलों में विभक्त थे जिनके अधिकारी को ‘स्थानिक’ कहते थे। इसके पश्चात् आजकल की तहसीलों की भांति मए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू चार गाँव से लेकर दस गाँवों के ऊपर ‘गोप’ नामक अधिकारी नियुक्त किए थे। प्रत्येक गाँव का अधिकारी ‘ग्रामिक’ कहलाता था।

3. नगर प्रबंध:
मेगस्थनीज के वृत्तान्त से पता चलता है कि पाटलिपुत्र जैस बड़े नगरों के लिए विशेष नागरिक-प्रबंध की व्यवस्था की गई थी। इस नगर के लिए तीस सदस्यों की एक समिति थी, जो छ: बोड़ों में विभक्त की गई थी। प्रत्येक प्रबंध-बोर्ड में पाँच सदस्य होते थे। ये बोर्ड निम्न ढंग से अपना कार्य करते थे – (क) पहले बोर्ड का कार्य कला-कौशल की देखभाल करना, कारीगरों के वेतन नियत करना तथा दु:ख में उनकी सहायता करना आदि था।

(ख) दूसरे बोर्ड का कार्य विदेशियों की देखभाल करना, उनके लिए सुख सामग्री उपलब्ध कराना तथा उनकी निगरानी रखना आदि था। (ग) तीसरे बोर्ड का कार्य जन्म-मरण का हिसाब रखना था ताकि कर आदि लगाने तथा अन्य प्रबंध करने में सुविधा रहे। (घ) चौथे बोर्ड का कार्य व्यापार का प्रबंध करना, तौल में बाटों तथा माल के पैमाने की जांच-पड़ताल करना और कानून के विरुद्ध चलने वालों को दण्ड देना आदि था। (ड़) छठे बोर्ड का कार्य वस्तुओं की बिक्री पर लगे हुए विक्रय-कर को एकत्र करने का था।

4. आय एवं व्यय:
सरकार की आय का सबसे बड़ा साधन भूमि-कर था। जो प्रायः भूमि की उर्वरता के हिसाब से 1/4 से 1/6 भाग तक लिया जाता था। आय के अन्य साधन-खानों से कर, वनों से आय, सीमा से बाहर जाने वाली वस्तुओं पर कर, जलयानों पर कर और जुर्माना इत्यादि थे। इस प्रकार जो धन इकट्ठा होता था उसे राजा और दरबार, सेना के अधिकारियों के वेतन, अस्पतालों व सड़कों के बनाने, दान देने, सिंचाई के साधनों को सुधारने आदि पर व्यय किया जाता था। इस प्रकार आय और व्यय का ढंग बड़ा सुव्यवस्थित था।

5. न्याय प्रबंध:
मौर्य राजा न्याय की ओर विशेष ध्यान देते थे और स्वयं भी बड़ी लगन से न्याय करते थे। गाँव में पंचायतें न्याय का कार्य करती थीं और नगर में नगर-कचहरियाँ थीं। इनमें नागरिकों तथा अधिकारियों दोनों के मामलों की सुनवाई और न्याय होता था। इन स्थानीय न्यायालयों (Local Courts) की अपील प्रान्तीय न्यायालयों में की जाती थी।

इन प्रान्तीय न्यायालयों के ऊपर एक केन्द्रीय न्यायालय था जो पाटलिपुत्र में स्थित था। प्रान्तों की अपील राजा स्वयं सुना करता था। दण्ड बड़े कठोर थे। जुर्माना करना तथा कोड़े लगाने से लेकर हाथ-पांव आदि काट देना और जघन्य अपराध के लिए प्राण दण्ड देना प्रचलित था। अशोक के समय में दण्ड-व्यवस्था कुछ हल्की कर दी गई थी। न्याय प्रबंध इतना अच्छा था कि चोरी और अन्य अपराध बहुत कम हुआ करते। इस विषय में मेगस्थनीज भी लिखता है कि पारलिपुत्रं, जिसकी जनसंख्या कोई 6,00,000 थी, वहाँ 8 पौंड (लगभग 120 रुपये) से अधिक किसी भी दिन चोरी नहीं होती थी।

6. प्रजा हितकारी कार्य:
मौर्य सम्राटों ने प्रजा के हित को ध्यान में रखकर ही सभी कार्य संपन्न किए। देश को छोटे-छोटे भागों में बांटना, एक सुव्यवस्थित न्याय-प्रणाली चलाना, अधिकारियों को कटोर दण्ड देना, घूसखोर अधिकारियों पर जासूस छोड़ना और लोगों के नैतिक स्तर को ऊँचा करने के लिए धम्म-महामात्त नाम के अधिकारियों की नियुक्ति करना आदि इस बात को स्पष्ट करते हैं कि मौर्य शासकों ने जनहित को सर्वोपरि महत्व दिया। केवल यही नहीं, देश में सिंचाई के लिए तालाब और नहरें बनाई गईं, व्यापार की उन्नति के लिए सड़कें बनाई गई तथा उनके दोनों और छायादार वृक्ष लगाए गए ताकि प्रजा सुख से रह सके।

7. सैनिक प्रबंध:
चन्द्रगुप्त मौर्य के पास एक विशाल सेना थी। इसमें कोई 6,00,000 पैदल; 30,000 घुड़सवार; 9,000 हाथी और 8,000 रथ थे। प्रत्येक हाथी पर प्रायः चार व्यक्ति और रथ पर तीन व्यक्ति हुआ करते थे। इस प्रकार उसकी सेना 7,00,000 के लगभग थी। इस समस्त सेना को नगद वेतन दिया जाता था। केवल उन्हीं व्यक्तियों को सिपाही चुना जाता था जो बड़े वीर व धैर्यवान होते थे। सेना का नेतृत्व राजा स्वयं करता था। इतनी बड़ी सेना के प्रबंध के लिए तीस सदस्यों का एक पृथक् सेना-विभाग था। इस विभाग की छ: समितियाँ थीं जिनके अधिकार में –

  1. सामुद्रिक बेड़े
  2. यातायात
  3. पैदल सेना
  4. घुड़सवार सेना
  5. रथ तथा
  6. हाथियों आदि का प्रबंध होता था।
  7. सारी मौर्य सेना अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी।

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प्रश्न 7.
यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डी.सी. सरकार का वक्तव्य है: भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है: चर्चा कीजिए।
उत्तर:
अभिलेख इतिहास के लिखित साधन हैं और इतिहास की रचना में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अशोक ने अभिलेखों का पर्याप्त विस्तार किया। यह अशोक के जीवन, उसके अशोक के महान् कार्यों और धर्म तथा उपाधियों के बारे में बताते हैं। यह सब स्रोत “देवनाप्रिय” तथा “पियदस्सी” के नाम से अंकित हैं।

इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसका शासन-प्रबंध सहानुभूतिपूर्ण था। अपने चौथे अभिलेख में उसने कहा है कि “जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने बच्चों के लिए एक सुयोग्य परिचारिका का प्रबंध करता है, उसी प्रकार मैं चाहता हूँ कि मेरे अधिकारी भी प्रजा के साथ सद्व्यवहार करें और सुयोग्य हों।” इन्हीं अभिलेखों से अशोक के राज्य विस्तार का पता चलता है। धार और अजमेर में तो चट्टानों पर संस्कृत नाटक तक खुदे मिले हैं। इलाहाबाद का अभिलेख हरिषेण ने लिखा था।

इसमें 33 पंक्तियाँ हैं। यह अभिलेख हमें समुद्रगुप्त की नियुक्ति, उसकी विजयों तथा उसके महान कार्यों के बारे में बताता है। महरौली के लौह स्तंभ में न केवल हमें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के महान कार्यों का वर्णन मिलता है बल्कि यह भी ज्ञात होता है कि उस समय तक धातु कला काफी विकसित हो चुकी थी।

इस प्रकार इतिहास के निर्माण में अभिलेख अत्यन्त सहायक हैं। अभिलेखों के महत्त्व के बारे में स्मिथ (Smith) महोदय का कहना है, “प्रारम्भिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी तक प्राप्त हो सका है वह प्रधानतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है।”

प्रश्न 8.
उत्तर-मौर्यकाल के विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
उत्तर-मौर्यकाल में विकसित राजत्व के विचार:
भारत के दक्षिणी क्षेत्रों में चोल, चेर, और पाण्ड्य जैसी सरदारियों का उदय हुआ। सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था। ये स्थायी और समृद्ध होते थे। इन राज्यों के विषय में तमिल संगम ग्रंथों से जानकारी मिलती है। व्यापार आदि से सरदारों को पर्याप्त आमदनी होती थी। इनमें मध्य एवं पश्चिम भारत के शासक सातवाहन और उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर और पश्चिम में शासन करने वाले मध्य मूल के शक शासक शामिल थे।

प्राचीन भारतीय राजाओं ने अपनी महत्त बढ़ाने के लिए अपना नाम देवी-देवताओं से जोड़ा। इसके अच्छे उदाहरण कुषाण शासक हैं। उन्होंने अपने सिक्कों एवं मूर्तियों के माध्यम से राजधर्म उत्कीर्ण कराए। मथुरा स्थित माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की एक विशाल मूर्ति स्थापित की गई है। ऐसी मूर्तियाँ अन्य कोई स्थानों पर भी दिखाई देती हैं। ऐसा अपनी महत्त बढ़ाने के लिए किया गया। प्रसिद्ध कुषाण शासक कनिष्क ने अपने नाम के आगे ‘देवपुत्र’ जोड़ा था। इस प्रकार राजत्व के विचार का निरंतर विकास हो रहा था।

चौथी शताब्दी के गुप्त सम्राटों के काल में राजत्व की नई विचारधारा पनपी। ये अपने को सम्राट कहते थे और इनके अधीन सामन्त होते थे। ये सम्राट सेना स्थानीय संसाधन के लिए सामंतों पर निर्भर थे। कभी-कभी सामन्त शासक पर भारी पड़ता था और शासक को हटाकर स्वयं सम्राट बन जाता था। गुप्त सम्राटों ने अपने नाम के सिक्के चलवाये, मुद्रायें बनवायी और प्रशस्तियाँ लिखवायीं। उन्होंने महाराजाधिराज जैसी बड़ी-बड़ी उपाधियाँ धारण की। प्रत्यागप्रशस्ति से समुद्रगुप्त के लिए लिखा गया है – “वे देवताओं में कुबेर, वरूण, इन्द्र और यम के तुल्य हैं।”

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प्रश्न 9.
वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?
उत्तर:
कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन:
उत्तर वैदिक काल में लोहे की खोज हो चुकी थी और सर्वप्रथम इसका प्रयोग हल के फाल और तीरों के फलक बनाने में किया गया। इससे कृषि के तौर तरीकों में भारी परिवर्तन हुए। छठी शताब्दी सा.यु.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में हल का प्रयोग बढ़ गया था। जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती थी वहाँ उर्वर भूमि की जुताई लोहे के फाल वाले हलों से की जाने लगी। इसके अलावा गंगा घाटी में धान की रोपाई की वजह से उपज में भारी वृद्धि होने लगी। इससे पहले किसानों को पर्याप्त मेहनत करनी पड़ती थी।

यद्यपि लोहे के फाल वाले हल की वजह से फसलों की उपज बढ़ने लगी लेकिन ऐसे हलों का उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ गिने-चुने भागों तक सीमित था। पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क जमीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग 20 वीं शताब्दी में शुरू हुआ। पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले किसानों ने कुदाल का उपयोग किया क्योंकि ऐसे इलाकों के लिए कुदालों से खुदाई करनी अधिक उपयोगी थी।

इस युग में उपज बढ़ाने के लिए सिंचाई के विभिन्न साधनों का उपयोग किया गया। कृषकों ने कुँओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से भी खेती की सिंचाई की। व्यष्टि स्तर पर प्रत्येक किसान और कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन विकसित किए। व्यक्तिगत रूप से तालाबों, कुँओं और नहरों जैसे सिंचाई साधन प्रायः राजा या प्रभावशाली लोगों ने विकसित किए। उनके इन कामों का उल्लेख आर्यलेखों में है। सुदर्शन झील का उल्लेख कई अभिलेखों में मिलता है।

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प्रश्न 10.
मानचित्र 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्र में अशोक के कोई अभिलेख मिले हैं?
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य में शामिल महाजनपद

  1. गांधार
  2. मगध
  3. काशी
  4. वत्स
  5. अवन्ति।

अशोक के अभिलेख: गांधार के तक्षशिला, काशी में सारनाथ, वत्स में कौशाम्बी आदि से अशोक के अभिलेख मिले हैं।

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
एक महीने के अखबार एकत्रित कीजिए। सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में दिये गये वक्तव्यों को काटकर एकत्रित कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है? संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है? इन वक्तव्यों को कौन जारी रखता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय के चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ गते हैं?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 12.
आज प्रचलित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वर्णन कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class 12 History राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
1830 ई. में प्रिंसेप द्वारा लिपियों के अर्थ निकालने के क्या लाभ हुए?
उत्तर:

  1. इस खोज से आरम्भिक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को एक नई दिशा मिली।
  2. भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनर्रचना के लिए विभिन्न भाषाओं में लिखे अभिलेखों और ग्रंथों का उपयोग किया।

प्रश्न 2.
गण और संघ राज्यों में शासन कैसे चलता था?
उत्तर:

  1. गण और संघ राज्यों में कई लोगों का समूह शासन करता था।
  2. इस समूह का प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता था। भगवान महावीर और भगवान बुद्ध इन्हीं गुणों से संबंधित थे।

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प्रश्न 3.
सा.यु.पु. छठी शताब्दी को परिवर्तनकारी काल क्यों माना जाता है?
उत्तर:

  1. इस काल में आरम्भिक राज्यों एवं नगरों का उदय हुआ। यह लोहे के प्रयोग और सिक्कों के विकास से सम्भव हुआ।
  2. इसी काल में बौद्ध तथा जैन सहित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का विकास हुआ।

प्रश्न 4.
मगध नये-नये धार्मिक आन्दोलनों का केन्द्र क्यों बना?
उत्तर:

  1. उन दिनों मगध राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र था। यहाँ के शासकों द्वारा बौद्ध या जैन धर्म स्वीकार किए जाने की दशा में इन धर्मों के प्रचार-प्रसार की सम्भावना काफी अधिक थी।
  2. सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का मुख्य केन्द्र भी मगध ही था। वहाँ से धर्म प्रचार करके आगे बढ़ना सुगम था। इस कारण मगध धार्मिक आन्दोलनों का केन्द्र बना।

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प्रश्न 5.
धर्मशास्त्र कब लिखे गये? इनका क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. लगभग छठी शताब्दी सा.यु.पू. में धर्मशास्त्र नामक ग्रंथों की रचना शुरू की गई।
  2. इनमें शासक सहित अन्य के लिए नियमों का निर्धारण किया गया और यह अपेक्षा की जाती थी कि शासक क्षत्रिय वर्ण से ही बनाए जाएँ।

प्रश्न 6.
“पंचमार्कड या आहत मुद्रायें’ नामक पद का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
इन मुद्राओं पर कोई-न-कोई चिह्न अंकित होता था। कई बार इन पर शासक की आकृति, उनके वंश चिह्न और कई बार तिथि भी अंकित रहती थी। ऐसी पंचमाड या आहत मुद्रायें इतिहास को जानने में बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है।

प्रश्न 7.
विवेचन करें कि छठी सदी सा.यु. से चौथी सदी तक नगर विकास के कौन-कौन से कारण थे?
उत्तर:

  1. बौद्ध काल में बड़े-बड़े राज्य अस्तित्व में आ चुके थे। उनकी राजधानियों का बड़े-बड़े नगरों के रूप में विकसित होना स्वाभाविक था।
  2. सिक्कों के आविष्कार ने व्यापार को प्रोत्साहन दिया और इस कारण भी अनेक व्यापारिक केन्द्र बड़े-बड़े नगरों में परिणित हो गए। ये नगर प्रायः नदियों के किनारे बसे हुए थे और जल-मार्ग द्वारा दूसरे नगरों से जुड़े हुए थे। इस व्यापार ने भी उन्हें वैभवशाली बनाने में बड़ी सहायता की।
  3. कुछ स्थान औद्योगिक इकाइयों के रूप में भी उभरे और शीघ्र ही बड़े नगरों में तब्दील हो गए थे।

प्रश्न 8.
‘उत्तरी काला पालिशदार अवस्था’ नामक पद स्पष्ट करें।
उत्तर:
एन.बी.पी. फेज या ‘उत्तरी काला पालिशदार अवस्था’ मिट्टी के बर्तन बनाने की उस अवस्था को कहते हैं जब चमकीले पालिशदार बर्तन धनी व्यक्तियों की खाने की मेजों को सजाते थे। ऐसी अवस्था भारत में छठी शताब्दी सा.यु.पू. में थी।

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प्रश्न 9.
‘धम्म’ शब्द का आशय 20-30 शब्दों में स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘धम्म’ सामाजिक व्यवहार के उन नियमों को कहा जाता है जो नैतिकता पर आधारित होते हैं। इन्हें लोकाचार के नियम भी कहा जा सकता है। बड़ों का आदर करना, छोटों से प्यार करना आदि सभी आचार, विचार और व्यवहार के नियम इस कोटि में आते हैं। कलिंग की विजय के पश्चात् अशोक ने ऐसे ही ‘धम्म का प्रचार किया।

प्रश्न 10.
महावीर स्वामी अथवा जैन धर्म की शिक्षाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
महावीर स्वामी ने लोगों को जीवन जीने का सरल मार्ग दिखाया। उनके अनुसार मनुष्य को त्रिरत्न अर्थात् शुद्ध चरित्र, शुद्ध दर्शन और शुद्ध आचरण का पालन करना चाहिए। उन्होंने मोक्ष-प्राप्ति के लिए लोगों को प्रेरित किया। उनका कहना था कि इसके लिए घोर तपस्या का मार्ग ही सर्वोत्तम मार्ग है। उनके अनुसार पशु, वायु, अग्नि तथा वृक्ष सभी वस्तुओं में आत्मा है और इन्हें कष्ट नहीं देना चाहिए।

उन्हें वेद-निहित, अनुष्ठान एवं कर्मकाण्ड, जाति-पाति या यज्ञ तथा बलि में विश्वास नहीं था। उनका विचार था कि अपने अच्छे या बुरे कर्मों के कारण मनुष्य जन्म लेता है और आत्मा को पवित्र रखकर ही वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है। उन्होंने अपने अनुयायियों को बताया कि वे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, चोरी, निन्दा आदि अनैतिक कामों से दूर रहें और सदाचारी बनें।

प्रश्न 11.
लिपि शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर:
वास्तव में ‘लिपि’ और ‘दिपी’ शब्दों का एक ही अर्थ है। अपने शिलालेखों में अशोक ने लिपि का प्रयोग किया जो सम्भवतः ईरानी शब्द ‘दिपि’ से ही लिया गया था। प्राचीन ईरानियों के लिए ‘दिपी’ का जो महत्त्व था वही भारतीयों के लिए ‘लिपि’ का था।

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प्रश्न 12.
कलिंग युद्ध का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
अशोक ने कलिंग (या आधुनिक उड़ीसा) के साथ 261 सा.यु.पू. में एक युद्ध लड़ा। इस युद्ध के बड़े दूरगामी प्रभाव पड़े –

  1. इस युद्ध के विनाश को देखकर अशोक इतना विचलित हुआ कि उसने युद्ध का मार्ग सदा के लिए त्याग दिया और धर्म-विजय का गर्ग अपना लिया।
  2. अशोक अब बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया और इस धर्म का इतने बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया कि यह एक विश्व धर्म बन गया।

प्रश्न 13.
मौर्य वंश के पतन के दो मुख्य कारण लिखें।
उत्तर:

  1. अशोक ने कलिंग के युद्ध के पश्चात् जब बौद्ध धर्म को अपना लिया तो उसकी सारी गतिविधियाँ बंद-सी हो गईं। इस कारण मौर्य साम्राज्य की सीमाएँ अरक्षित हो गई।
  2. विदेशी आक्रमणकारियों ने विशेषकर हिन्द-यूनानियों और हिन्द-पार्थियनों ने, इस कमजोरी का लाभ उठाकर देश पर आक्रमण करने शुरू कर दिये। उनके भयंकर आक्रमण के सामने, सैनिक शक्ति में शिथिल, मौर्य साम्राज्य न टिक पाया।

प्रश्न 14.
सिकंदर भारत पर आक्रमण क्यों करना चाहता था?
उत्तर:

  1. इसका पहला कारण यह दिया जाता है कि सिकंदर एक महान् विजेता था जो भारत को जीत कर अपने नाम को चार चांद लगाना चाहता था।
  2. दूसरा कारण यह बताया जाता है कि वह भारतीय संस्कृति की महानता के विषय में बहुत कुछ सुन चुका था इसलिए वह स्वयं इस तथ्य की सत्यता को भारत आकर परखना चाहता था ।

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प्रश्न 15.
मनुस्मृति में सीमाओं का क्या महत्त्व बताया गया है?
उत्तर:

  1. मनुस्मृति आरम्भिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधिग्रंथ है।
  2. इसके अनुसार राज्य की सीमाओं की अनभिज्ञता से विश्व में विवाद होते हैं। सीमाओं की पहचान के लिए शासक के लिए शासक ने गुप्त निशान जमीन में गाड़कर रखने चाहिए।

प्रश्न 16.
राजगाह का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. राजगाह मगध की राजधानी थी। इस शब्द का शब्दिक अर्थ-‘राजाओं का घर’ है। यह आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम है।
  2. पहाड़ियों के बीच बसा राजगाह एक किलेबंद शहर था। बाद में चौथी शताब्दी सा.यु.पू. में पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया गया।

प्रश्न 17.
दक्षिण के सरदारों के क्या कार्य थे?
उत्तर:

  1. सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था। उसका कार्य विशेष अनुष्ठान का संचालन करना, युद्ध के समय नेतृत्व करना और विवादों को सुलझाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाना आदि था।
  2. वह अपने अधीन एक लोगों से भेंट लेता था और अपने समर्थकों में प्राप्त भेंट का वितरण करता था। सामान्य रूप से एक सरदार के अधीन-कोई स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते थे।

प्रश्न 18.
यूनानी यात्री मेगस्थनीज द्वारा वर्णित सैन्य-प्रबंध के लिए जिम्मेदार छः उपसमितियों के कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. नौसेना का संचालन करना।
  2. यातायात और खानपान व्यवस्था संभालना।
  3. पैदल सैनिकों का प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और युद्ध में संचालन करना।
  4. अश्वारोहियों का संचालन।
  5. स्थारोहियों का संचालन।
  6. हाथियों की सेना (गज-सेना) का संचालन।

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प्रश्न 19.
समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है। क्यों?
उत्तर:
भारत का नेपोलियन समुद्रगुप्त-समुद्रगुप्त ने मगध राज्य को शक्तिशाली बनाया तथा छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर देश में राजनैतिक एकता की स्थापना की।

समुद्रगुप्त को महान् सैनिक सफलताओं के कारण डॉ. वी.ए. स्मिथ ने उसे ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है। नेपोलियन ने लगभग सारे यूरोप को जीता था और समुद्रगुप्त ने भी सारे भारत को जीता था। भारत में कोई भी शासक उसकी सत्ता को चुनौती देने वाला न था।

प्रश्न 20.
मेगस्थनीज कौन था?
उत्तर:

  1. मेगस्थनीज यूनानी राजदूत था और चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था।
  2. उसने अपनी यात्रा का विवरण अपने ग्रंथ ‘इण्डिका’ में किया। इस ग्रंथ से चन्द्रगुप्त मौर्य और उसकी समकालीन शासन-व्यवस्था के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है।

प्रश्न 21.
श्रेणी के क्या कार्य थे?
उत्तर:
प्रत्येक श्रेणी (गिल्ड) एक व्यवसायिक संगठन थी। यह जन-साधारण से धन लेती और ऋण देती थी। मंदिर, बाग, विश्राम गृह आदि भी यही श्रेणी लोगों के लिए बनवाती थी। वह सदस्यों की सुरक्षा भी करती थी।

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प्रश्न 22.
गुप्त वंश की जानकारी के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर:
इलाहाबाद और सांची के अभिलेख, भूमि अनुदान संबंधी दस्तावेज, सिक्के और फाह्यान एवं कालीदास की साहित्यिक कृतियाँ।

प्रश्न 23.
इलाहाबाद या प्रयाग-स्तम्भ अभिलेख का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
इलाहाबाद या प्रयाग का स्तम्भ अभिलेख गुप्तकाल का एक महान् ऐतिहासिक स्रोत है। इस अकेले स्रोत पर बहुत कुछ समुद्रगुप्त की महानता निर्भर करती है। इस अभिलेख की 33 लाइनें हैं जो संस्कृत भाषा में हैं। इस लेख के रचयिता समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण थे जिसने अपने आश्रयदाता की विजयों और सैनिक पराक्रमों का वर्णन किया है।

प्रश्न 24.
दिल्ली के लौह-स्तम्भ अभिलेख का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
दिल्ली में कुतुबमीनार के पास लौह-स्तम्भ पर किसी चन्द्र नामक राजा का अभिलेख खुदा हुआ मिला है। यह अभिलेख अब चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से जोड़ा जाता है। इस अभिलेख से पता चलता है कि चन्द्र ने पश्चिमोत्तर दिशा और बंगाल में निरंतर विजयें प्राप्त की और अपने वंश की कीर्ति को चार-चाँद लगा दिये।

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प्रश्न 25.
समूह शासन या ओलीगार्की का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. जहाँ सत्ता, पुरुषों के एक समूह के साथ में रहती है समूह शासन कहलाता है। गणराज्यों में इसी प्रकार की शासन व्यवस्था थी।
  2. यह प्राचीन भारत का प्रजातांत्रिक शासन था और शासन के सभी कार्य सर्वसहमति से कराए जाते थे।

प्रश्न 26.
सरदारी प्रथा क्या है?
उत्तर:

  1. सरदारी प्रथा चोल, चेर और पाण्ड्य राज्यों में प्रचलित थी। सरदार एक शक्तिशाली व्यक्ति होता था जिसका पद वंशानुगत भी हो सकता था और नहीं भी।
  2. सरदार के कार्यों में विशेष अनुष्ठान संपन्न करना/करवाना, युद्ध के समय नेतृत्व करना और विवादों को सुलझाने में मध्यस्थता की भूमिका निभानी आदि शामिल हैं।

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प्रश्न 27.
‘धम्म’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:

  1. अनेक विद्वानों ने ‘धम्म’ का अर्थ अशोक के धर्म से लगाया है। अशोक ने अपने अभिलेखों के माध्यम से ‘धम्म का प्रचार किया।
  2. धम्म’ में बड़ों के प्रति आदर, सन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार तथा दूसरे के धर्मों और परम्पराओं का आदर करना शामिल है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
महाजनपदों का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
महाजनपदों का महत्त्व-प्राचीन भारतीय इतिहास में उपर्युक्त महाजनपदों का उत्थान अपना विशेष महत्त्व रखता है। सर्वप्रथम, इन महाजनपदों में राजतंत्रों के साथ-साथ गणतंत्रों का भी उत्थान हुआ। यहाँ का प्रमुख प्रबंधक प्रजातंत्रीय सिद्धांतों के अनुसार लोगों द्वारा चुना जाता था। राजतंत्र वाले महाजनपदों की शासन प्रणाली को देखने पर यह ज्ञात होता है कि वहाँ पर तानाशाह नहीं थे।

शासक प्रजा-सेवक होते थे और प्रजा की भलाई के कार्यों में लीन रहते थे। तीसरा महत्त्व यह था कि विभिन्न राजतंत्र और गणतंत्र धीरे-धीरे आपस में मिलते जा रहे थे और भारत एक अखंड राजनीतिक इकाई का रूप धारण करता जा रहा था। मगध शासकों ने विभिन्न राजनीतिक इकाइयों को जीतकर एक शक्तिशाली साम्राज्य की नींव रखी। इस तरह उन्होंने भारत को एक अखंड राजनीतिक इकाई का स्वरूप दिया।

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प्रश्न 2.
मगध साम्राज्य के शक्तिशाली होने के क्या कारण थे?
उत्तर:
मगध साम्राज्य के शक्तिशाली होने के निम्न कारण थे –
1. महत्त्वाकांक्षी शासक:
साम्राज्य विस्तार की अपनी महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए तत्कालीन शासकों ने विभिन्न ढंग अपनाये। बिम्बिसार ने पड़ोसी प्रदेशों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके अपनी सीमाओं को सुरक्षित कर लिया।

अजातशत्रु ने वैशाली और कोशल को अपनी शक्ति के बल पर हथिया लिया। महापद्मनन्द ने कोशल और कलिंग को हड़प लिया। साम, दाम, दण्ड, भेद सभी तरह की नीतियों का सहारा लेकर मगध का उत्थान किया गया।

2. प्राकृतिक सम्पदा:
मगध राज्य के प्राकृतिक साधन बड़े विशाल थे। मगध में लोहे. की खान प्रचुर मात्रा में रहने के कारण हथियार, उद्योग-धंधे, कृषि सम्बन्धी राज्य का विकास करना आसान हो गया।

3. अनुकूल स्थान पर राजधानी:
मगध की, एक ओर तो पहाड़ियों से घिरी राजधानी राजगृह थी, तो दूसरी ओर गंगा, गंडक और सोन के संगम पर स्थित राजधानी पाटलिपुत्र थी। इन तक आक्रमणकारी आसानी से नहीं पहुंच पाता था। प्राकृतिक सुरक्षा से परिपूर्ण ये राजधानियाँ भी मगध साम्राज्य के उत्थान का एक बड़ा कारण सिद्ध हुईं।

4. सैनिक शक्ति:
मगध की सेना में हाथी, घोड़े एवं रथ थे। हाथियों द्वारा शत्रु सेना के घोड़े रौंद दिए जाते थे जिसके कारण उनमें भगदड़ मच जाती थी। किलों के विशाल दरवाजों को तोड़ने में भी हाथियों की सहायता ली जाती थी। रथों और घोड़ों का उचित प्रयोग काफी लाभकारी सिद्ध होता था।

5. उपजाऊ भूमि:
गंगा के आसपास स्थित होने के कारण मगध राज्य में उपजाऊ भूमि की कमी नहीं थी। अत; देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में कृषि का बड़ा सहयोग था। इससे राज्य में समृद्धि की लहर दौड़ गई।

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प्रश्न 3.
सा.यु.पू. छठी शताब्दी में वत्स राज्य के उत्थान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वत्स राज्य-इस राज्य में आधुनिक इलाहाबाद के आसपास के प्रदेश शामिल थे। यह राज्य बड़ा वैभवशाली और सम्पन्न था। इसकी राजधानी कौशाम्बी में थी। यह नगर यमुना नदी के तट पर एक प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र था। बुद्ध के समय इस राज्य पर उदयन नामक शासक शासन करता था। उसे मगध के शासक अजातशत्रु और अवन्ति के राजा प्रद्योत से युद्ध करने पड़े।

उदयन ने मगध के राजा से विवाह-सम्बन्ध कायम किए। अवन्ति के शासक प्रद्योत ने इस पर आक्रमण किया किन्तु वह असफल रहा और उसे अपनी लड़की का विवाह उदयन ई करना पड़ा। शुरू में उदयन बौद्ध धर्म का विरोधी था परंतु बाद में उसने इस धर्म को अपना कर राज्य-धर्म घोषित किया। उदयन के उत्तराधिकारी दुर्बल शासक होने के कारण यह राज्य उसकी मृत्यु के पश्चात् अवन्ति राज्य में विलीन हो गया।

प्रश्न 4.
बौद्ध युग में आर्थिक उन्नति के क्या कारण थे?
उत्तर:
बौद्ध युग में आर्थिक उन्नति के कारण –

  1. बौद्ध युग में वाराणसी, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र, कपिलवस्तु, अयोध्या, तक्षशिला तथा वैशाली जैसे नगरों का विकास होने के कारण न्यापार की उन्नति हुई।
  2. उस काल में धातु के सिक्के चलाये गये।
  3. उस काल में स्थल तथा जल दोनों मार्गों से व्यापार होता था। लंका, वर्मा, जावा, सुमात्रा और मलाया आदि देशों के साथ जलमार्ग से व्यापार होता था।
  4. विभिन्न व्यवसाय वाले शिल्पकारों ने अपने आपको विभिन्न संधों में संगठित कर लिया था।
  5. कृषि-योग्य भूमि की कुल आय का 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था।
  6. धान के अलावा जौ, दालें, ज्वार, गन्ना, बाजरा तथा कपास की फसलें भी उगायी जाती थीं।

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प्रश्न 5.
बुद्ध के समय मुख्य गणराज्यों की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुख्य गणराज्यों की दशा:
बुद्ध कालीन मुख्य गणराज्यों में कपिलवस्तु के शाक्य, पावा और कुशीनगर के मल्ल, वैशाली के लिच्छवि आदि विशेषकर प्रसिद्ध थे। इन राज्यों के राजनीतिक इतिहास के विषय में काफी कम जानकारी मिली है। शाक्य लोगों का राज्य हिमालय की तराई में नेपाल और भारत की सीमा के आस-पास स्थित था।

महात्मा बुद्ध भी इसी वंश के थे। ये लोग काफी समय से प्रजातंत्र के सिद्धांतों के अनुसार राज्य करते रहे। अन्त में कोशल के शासक विरुद्ध के समय इस राज्य को कोशल साम्राज्य में मिला लिया गया। मल्ल लोगों की दो शाखाएँ थीं-एक पावा के स्थान से (जहाँ महावीर स्वामी की मृत्यु हुई थी) और दूसरी कुशीनगर के स्थान से (जहाँ महात्मा बुद्ध का देहांत हुआ था) राज्य करती थी। अन्त में मल्ल लोगों का साम्राज्य अजातशत्रु के समय मगध राज्य में मिला लिया गया।

प्रश्न 6.
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जैन धर्म और बौद्ध धर्म में अंतर:
1. प्रचार संगठन में अन्तर:
बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जो संगठन बनाया गया, वह जैन धर्म के संगठन से कहीं अधिक अच्छा था। मठों में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं का काम सुव्यवस्थित होता था। वे प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमा करते थे।

प्रचार की व्यवस्था ठीक न होने के कारण जैन धर्म बहुत फैल न सका जबकि बौद्ध धर्म आज भी संसार के बड़े धर्मों में गिना जाता है। जैन धर्म के भिक्षु अपने कार्य में इतने चतुर नहीं थे और न उनका धर्म बौद्ध धर्म की भाँति एक प्रचारक धर्म था।

2. वेष-भूषा में अंतर:
जैनमत वालों के दो बड़े अंग हैं-श्वेताम्बर (Svetambaras) जो श्वेत रंग के कपड़े पहनते हैं और दिगम्बर (Digambaras) जो बिल्कुल नग्न रहते हैं। इनका नग्न रहना अध्यात्मिक उन्नति में एक बड़ी बाधा रही। बौद्ध मत के भिक्षु नग्न नहीं रहते।

3. विभिन्न धार्मिक ग्रन्थ:
बौद्धों के अपने अलग धर्म ग्रन्थ हैं, जिन्हें वे त्रिपिटक अथवा तीन टोकरियाँ (Triptakas or Three Baskets) कहते हैं, जबकि जैनियों का धर्म ग्रंथ अंग (Angas) कहलाता है।

4. भिन्न पूज्य व्यक्ति:
बौद्धों के पूज्य व्यक्ति बोधिसत्व (Bodhisattvas) हैं परंतु जैनियों के उपास्य व्यक्ति 24 तीर्थंकर (Trithankaras) हैं।

5. मोक्ष के विभिन्न साधन:
जीवन में मानसिक शांति पाने के लिए बौद्धमत वाले बुद्ध के बताए हुए अष्टमार्ग पर चलते हैं जबकि जैनमत वाले अपने त्रिरत्नों का अनुपालन करते हैं।

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प्रश्न 7.
अशोक के धर्म (धम्म) के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अशोक ने अपनी जनता के नैतिक उत्थान के लिए लोगों के सामने कुछ नैतिक नियम रखे। इन्हीं नियमों के समूह को धम्म कहा जाता है। अशोक द्वारा प्रतिपादित धम्म के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित थे –

  1. अशोक का मुख्य सिद्धांत था-बड़ों का आदर। उसके अनुसार शिष्यों को अपने गुरुजनों का मान करना चाहिए। सभी को ऋषियों, ब्राह्मणों तथा वृद्ध पुरुषों का आदर करना चाहिए।
  2. इस धम्म के अनुसार बड़जें को परिवार के सदस्यों, सम्बन्धियों, सेवकों, निर्धनों तथा दासों के साथ अच्छा और नम्र व्यवहार करना चाहिए।
  3. प्रत्येक मनुष्य को अपने बुरे कर्मों को फल अपने अगले जन्म में भुगतान पड़ता है। मनुष्य ने हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए।
  4. अहिंसा अशोक धम्म का मूल मंत्र है। इसके अनुसार किसी भी जीव को मन, वचन तथा कर्म से कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए।
  5. सभी मनुष्यों को समय-समय पर अपने कृत कार्यों का विश्लेषण करना चाहिए।
  6. ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार और झूठ पाप है। मनुष्य को इन पापों से दूर रहना चाहिए।

प्रश्न 8.
अजातशत्रु की विजयों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अजातशत्रु (Ajatsatru,495 to 462 B.C.E.):
अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अजातशत्रु मगध के सिंहासन पर 395 सा०यु०पू० के लगभग बैठा। उसने बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार लगभग 32 वर्ष अर्थात् 462 सा०यु०पू० तक राज्य किया। अजातशत्रु एक बड़ा सफल तथा महत्त्वाकांक्षी राजा था जिसने राज्य का विस्तार करने में कोई कसर न छोड़ी।

1. अजातशत्रु की विजयें:
सबसे पहले अजातशत्रु को कोशल के राजा प्रसेनजित (Prasenjit) के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करनी पड़ी। प्रसेनजित ने काशी प्रदेश पहले मगध के शासक बिम्बिसार (अजातशत्रु के पिता) को दिया था लेकिन बिम्बिसार की मृत्यु के पश्चात् उसको पुनः अपने राज्य में मिला लिया था। युद्ध का मुख्य कारण यही बना।

इस युद्ध में कोशल के शासक प्रसेनजित की पराजय हुई, परंतु अजातशत्रु ने इस शत्रुता को एक सफल कूटनीतिज्ञ की भाँति मित्रता में बदल लिया। प्रसेनजित ने अपनी पुत्री का विवाह अजातशत्रु से कर दिया और अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त काशी का प्रदेश भी उसे दहेज में दे दिया। इस प्रकार अपने पिता की भाँति अजातशत्रु ने भी विवाह सम्बन्धों से अपनी शक्ति को बहुत बढ़ाया।

2. अजातशत्रु की सबसे बड़ी विजय लिच्छवियों (Lichchhavis) के लगभग 36 राज्यों के संघ को जीतने की थी। इस कार्य को पूरा करने में लगभग 16 वर्ष (484 से 468 सा०यु०पू० तक) लग गए। इस संघ को पराजित करना कोई सरल कार्य नहीं था, क्योंकि एक तो वे लड़ाके और दृढ़ स्वभाव के थे और दूसरा उनमें बड़ी एकता थी।

अजातशत्रु इन सब कठिनाइयों को अच्छी प्रकार जानता था। उसने बड़ी सावधानी से युद्ध की तैयारी की। सबसे पहले उसने विश्वसनीय मंत्री वस्सकरा (Vassakara) को लिच्छिवि लोगों में फूट डालने के लिए भेज दिया जो अपने कार्य में तीन वर्ष पश्चात् सफल हुआ और इस प्रकार उन लोगों की एकता जाती रही। दूसरे, अजातशत्रु ने लिच्छिवि प्रदेश के पास गंगा नदी के तट पर पाटलिपुत्र के नए नगर की नींव रखी ताकि उन लोगों पर सुगमता से आक्रमण किया जा सके।

तीसरे, मगध-शासक ने इस युद्ध में कई नये ढंग के अच्छे अस्त्रों का प्रयोग किया। इस प्रकार अजातशत्रु अपने उद्देश्य में सफल हुआ। लिच्छिवि लोगों के सारे-के-सारे प्रदेश को मगध राज्य में मिला लिया गया। अजातशत्रु का यश इस विजय से चारों और फैल गया। अवन्ति का सुप्रसिद्ध शासक प्रद्योत अजातशत्रु की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर ईर्ष्या करने लगा, परंतु वह अजातशत्रु के विरुद्ध कुछ भी करने में असमर्थ था, क्योंकि अजातशत्रु अब बहुत शक्तिशाली हो चुका था। इस प्रकार अपनी विजयों से अजातशत्रु ने ममध राज्य की सीमाओं का बहुत विस्तार किया।

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प्रश्न 9.
शिलाओं पर उत्कीर्ण अशोक के राज्यादेशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शिलाओं पर उत्कीर्ण राज्यादेश:
शिलाओं पर उत्कीर्ण राज्यादेश चार प्रकार के मिले हैं –

(क) इनमें सबसे प्रसिद्ध शिला-राज्यादेश हैं जो शाहवाजगढ़ी (पेशावर जिला), मनसेरा (जिला हजारा), गिरनार (काठियावाड़), मासकी (मैसूर), दौली तथा जुगादा (कलिंग प्रदेश), कालसी (जिला देहरादून) आदि स्थानों पर मिले हैं। इनमें अशोक की धर्म-यात्राओं, अहिंसा नीति, धर्म के नियमों, धर्म-महामान्यों की नियुक्ति जैसे विषयों पर लिखा गया है।

(ख) दूसरे प्रकार के शिलालेख दो लघु राज्यादेशें (The Two Minor Rock Edicts) के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये संसराम (पूर्वी बंगाल), रूपनाथ (मध्य प्रदेश), बैरात (राजस्थान) इत्यादि अनेक स्थानों पर पाए गए हैं। इनमें अशोक ने बौद्ध धर्म पर अपनी निष्ठा (विश्वास) प्रकट की है।

(ग) तीसरे प्रकार के दो शिला लेख कलिंग राज्यादेश (Two Kalinga Edicts) कहलाते हैं। क्योंकि ये दोनों कलिंग प्रदेश (दौली और जोगादा आदि) में पाए गए हैं। इनमें अशोक के प्रान्तीय राज्य-प्रबंध का वर्णन है।

(घ) चौथे प्रकार का लेख भाबरू राज्यादेश (The Bhabru Edicts) के नाम से प्रसिद्ध है। यह राजस्थान में स्थित एक शिला पर अंकित है। इस लेख में अशोक ने भिक्षुओं के नियमों की विवेचना की है।

प्रश्न 10.
मौर्य काल में भाषा और लिपि के क्षेत्र में क्या प्रगति हुई है?
उत्तर:
मौर्य काल में शिक्षित वर्ग की भाषा संस्कृत और आम-बोलचाल की भाषा पाली थी। अशोक ने पाली भाषा को राजभाषा बना दिया और अपने शिलालेखों में भी इसका प्रयोग किया। इन कारणों से इस भाषा का भी इस काल में बड़ा विकास हुआ। इस काल में दो लिपियों का प्रयोग होता था-ब्राह्मी लिपि और खरोष्टी लिपि। खरोष्टी लिपि का प्रयोग अशोक ने उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त के शिलालेखों में किया । यह लिपि दायें से बायें लिखी जाती थी।

इस काल में अनेक उत्तम ग्रन्थों की रचना हुई। चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री चाणक्य ने संस्कृत भाषा में राजनीति के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की। इसमें उसने राजनीति एवं शासन-सम्बन्धी सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। इसकी तुलना मैक्यावली (Micheavelli) के ग्रन्थ ‘प्रिन्स’ (Prince) के साथ की जाती है।

वात्सायन ने ‘कामसूत्र’ की रचना की इसी युग में की थी। इसी युग में गृहसूत्र, धर्मसूत्र और वेदांगों की रचना हुई-ऐसा विद्वानों का मत है। इस काल में संस्कृत व्याकरण पर पाणिनी ने ‘अष्टाध्यायी’ नामक ग्रंथ लिखा। अन्य दो और पतञ्जलि उत्तर-मौर्य युग में हुए।

मौर्यकाल में बौद्ध और जैन साहित्य का भी काफी विकास हुआ। अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरा बौद्ध सम्मेलन आयोजित कराया। इसी काल में बौद्ध धर्म के त्रिपिटिक ग्रंथों का संकलन किया गया। प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् तिस्स ने ‘कथावथु’ नामक ग्रंथ की रचना भी इसी काल में की। जैन साहित्य का भी काफी विकास हुआ। प्रसिद्ध जैन विद्वान-भद्रबाहु तथा प्रभव ने ग्रंथों की रचना की।

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प्रश्न 11.
मौर्य साम्राज्य के महत्त्व का आकलन कीजिए।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य का महत्त्व –

  1. भारतीय इतिहास ही नहीं, विश्व इतिहास में मौर्य साम्राज्य का बहुत अधिक महत्त्व है। ब्रिटिश काल में भारत एक औपनिवेशिक देश था। ऐसे में मौर्य साम्राज्य इतिहासकारों के लिए उत्साहवर्धक था। भारत में महाजनपद रूप से गणतंत्र पद्धति का यह पहला साम्राज्य था।
  2. मौर्यकालीन पुरातत्त्व और मूर्तियों ने सिद्ध कर दिया है कि चौथी-तीसरी सदी सा०यु०पू० में भारत में एक साम्राज्य मौजूद था।
  3. अशोक के अभिलेख अन्य देशों से भिन्न थे। इनमें संदेश लिखे थे।
  4. अशोक एक चक्रवर्ती सम्राट था। इससे राष्ट्रवादी नेताओं को बहुत प्रेरणा मिली।
  5. मौर्य साम्राज्य में कुछ कमियाँ रहने के कारण यह साम्राज्य मात्र 150 वर्ष तक ही चल पाया और इसका विस्तार भी सम्पूर्ण उपमहाद्वीप में नहीं था।

प्रश्न 12.
पाण्ड्य चेर और चोल राज्य के अन्तर्गत वाणिज्य केन्द्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तीनों ओर समुद्र से घिरा होने के कारण पाण्ड्य, चेर और चोल जैसे सुदूर, दक्षिणी राज्यों के शासकों का शुरू से ही सामुद्रिक गतिविधियों के प्रति बड़ा अनुराग रहा। उनकी आय का एक बड़ा साधन व्यापार से होने वाली आय थी।

यह व्यापार उत्तर के मगध साम्राज्य और रोमन साम्राज्य के बीच होता था। चेर, चोल और पाण्ड्य राजाओं के काल में कई स्थान वाणिज्य केन्द्रों के रूप में उभर कर सामने आये। विशेषकर चोल राज्य में स्थित उरैयुर (Uraiyur), पुहार या कावेरीपट्टनम (Puhar or Kaveripattanam), पाण्ड्य राज्य में स्थित मदुरै (Madurai), तथा चेर राज्य में स्थित मुजिरी (Muzairis) (ट्रांगनोर) महत्त्वपूर्ण वाणिज्य-केन्द्र था।

ऐसे वाणिज्य-केन्द्र गर्म मसालों, विशेषकर काली मिर्च तथा सूती कपड़े, मलमल और रेशम के ऊपर तरह-तरह की नक्काशीदार बुनाई के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। ये प्रसिद्ध वाणिज्य-केन्द्र दोनों उत्तर और रोमन साम्राज्य से अपने व्यापारिक सम्बन्धों के कारण बड़े समृद्ध बन गये। रोमन साम्राज्य का बहुत सा सोना, अनेक भारतीय वस्तुओं के बदले भारत आने लगा। इसके परिणामस्वरूप दक्षिणी राज्य उत्तरोत्तर धनी बनते चले गये।

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प्रश्न 13.
भारत पर सिकंदर के आक्रमण का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1. भारत में थोड़ा समय ठहरना:
सिकंदर भारत में केवल 19 महीने रहा और यह सारा समय उसने लगभग लड़ने में व्यतीत किया। लड़ाई के वातावरण में भारतवासी यूनानियों को और यूनानी भारतवासियों को अच्छी प्रकार न समझ सके। ऐसी अवस्था में भारत पर यूनानी सभ्यता का प्रभाव पड़ना लगभग असंभव था।

2. केवल सीमावर्ती आक्रमण:
सिकंदर भारत के आन्तरिक भागों तक नहीं जा सका। उसका आक्रमण सीमा पर की गई डकैती जैसा था। इस प्रकार सिकंदर के आक्रमण का कोई विशेष प्रभाव पड़ने की सम्भावना बहुत कम थी।

3. मौर्य वंश के उदय में सहायक:
सिकंदर के आक्रमण से पंजाब की रियासतें एवं लड़ाकू जातियाँ अब इतनी दुर्बल हो गई कि चन्द्रगुप्त मौर्य उन्हें आसानी से पराजित कर पाया। यदि ऐसा न होता तो चन्द्रगुप्त को उन्नति करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता क्योंकि अनेक राजाओं से लड़ना पड़ता।

4. भारतीय एकता के कार्य में सहायता:
रियासतों तथा लड़ाकू जातियों को सिकंदर द्वारा कुचले जाने का एक अन्य प्रभाव यह भी हुआ कि भारतीय एकता की स्थापना करने तथा एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने में काफी आसानी रही।

5. यूरोपीय देशों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध:
सिकंदर के आक्रमण ने पूर्व और पश्चिम राज्यों के मध्य सम्पर्क बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। अब लोगों को चार मार्गों का पता चल गया जिनसे भारतीय व्यापारी, कारीगर तथा धर्म प्रचारक अन्य देशों को गए और अन्य देशों के लोग भारत आए। इस प्रकार भारत और यूरोप के व्यापारिक सम्बन्ध भी पहले से अब काफी अच्छे हो गए।

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प्रश्न 14.
गुप्तकालीन कला, साहित्य और विज्ञान का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुप्तकालीन कला, साहित्य और विज्ञान:
गुप्त सम्राट कला, साहित्य और विज्ञान के पोषक थे। कला के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी प्रशंसनीय उपलब्धियाँ रही हैं। वास्तुकला के क्षेत्र में उन्होंने अनेक मंदिरों एवं भवनों का निर्माण करवाया। मथुरा का शिव मंदिर और देवगढ़ इसी काल में बनाया गया।

गुप्तकाल में निर्मित अजन्ता की गुफायें विश्व प्रसिद्ध हैं। गुप्तकालीन मठ तथा स्तूप भी भवन निर्माण कला के उत्तम उदाहरण हैं। इसी के साथ मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला और मुद्राकला आदि की भी खूब उन्नति हुई। प्रस्तर मूर्तियों में बुद्ध, बोधिसत्व, विष्णु, शिव और सूर्य आदि की मूर्तियाँ कलात्मकता की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं।

गुप्तकाल में साहित्य की भी खूब उन्नति हुई। गुप्तकालीन कालिदास के ग्रन्थ-अभिज्ञान शाकुन्तलम् मेघदूत और कुमारसम्भव, विशाखादत्त का देवीचन्द्रगुप्तम्। भास का स्वप्नवासवदत्ता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। गुप्तकाल में लिखे गये सभी नाटक सुखान्त हैं।

विज्ञान और गणित के क्षेत्र में गुप्तकाल की उपलब्धियाँ महान् हैं। दशमलव पद्धति का जन्म इसी काल में हुआ। आर्यभट्ट उस काल का एक ज्योतिषी एवं गणितज्ञ था। उसने पता लगाया कि पृथ्वी गोल है तथा अपनी धूरी पर सूर्य के चारों ओर घुमती है।

प्रसिद्ध ज्योतिषी वराहमिहिर ने (वृहद्संहिता) और योगमाया जैसे अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखे। आयुर्वेद के क्षेत्र में नागार्जुन ने रसायनशास्त्र की रचना की। गुप्तकाल में धातु कर्म काफी विकसित था। नालन्दा से प्राप्त बुद्ध की तांबे की मूर्तियाँ अत्यन्त आकर्षक हैं। दिल्ली में महरौली स्थित लोहे का स्तम्भ भी धातुकला एवं इंजीनियरिंग का एक आकर्षक नमूना है। इस प्रकार गुप्तकाल में कला, साहित्य एवं विज्ञान की अभूतपूर्व उन्नति हुई।

प्रश्न 15.
गुप्तकालीन सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुप्तकालीन भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ:
गुप्तकाल में ब्राह्मणों का महत्त्व बढ़ गया था। उन्हें राजाओं से पर्याप्त भूमि अनुदान प्राप्त हुआ। वर्ण-संकर के कारण अनेक जातियों और उपजातियों का जन्म हुआ।

विदेशियों को क्षत्रिय वर्ण में रखा गया। भूमि अनुदान द्वारा पिछड़े लोग उच्च वर्ण और कबायली निम्नवर्ग में शामिल हो गये। शूद्रों में ‘चाण्डाल’ नामक नई अछूत जाति बनी। उन्हें नगर से बाहर रहना पड़ता। गुप्तकाल में स्त्रियों की दशा पतनोन्मुखी थी। वे उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सकती थीं। बाल-विवाह का प्रचलन था और स्त्रियों का अधिकार केवल स्त्री-धन (वस्त्र और आभूषण) तक सीमित जाति बनी थी। उच्च वर्ण के लोग सभी प्रकार से सुखी थे।

आर्थिक जीवन:
गुप्तकाल का आर्थिक जीवन सुखी और सम्पन्न था। गुप्त शासकों ने सर्वाधिक स्वर्ण-मुद्रायें जारी की। इस काल में तांबे की बहुत कम मुद्रायें मिलती हैं। भारत का रेशम व्यापार बंद हो गया था। इस काल में कृषि की उन्नति हुई परंतु किसानों से बड़े पैमाने पर पेगार लिया जाता था। अनेक क्षेत्रों में परती भूमि का उपयोग किया गया। आंतरिक व्यापार विकसित था।

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प्रश्न 16.
‘पेरिप्लस ऑफ एरीथ्रियन सी’ का लेखक कौन है? उसने व्यापार के विषय में क्या लिखा है?
उत्तर:
पेरिप्लस ऑफ एरीशियन सी:

  1. पेरिप्लस ऑफ एरीथियन सी का लेखक एक यूनानी समुद्री यात्री था।
  2. उसने समुद्र द्वारा होने वाले विदेशी व्यापार दर्शाने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की सूची तैयार की थी।
  3. वह यह दिखाना चाहता था कि भारत से काली मिर्च तथा दाल-चीनी जैसे गर्म मसाले निर्यात किये जाते थे।
  4. इनके बदले में पुखराज, मूंगे तथा हीरे जैसी बहुमूल्य वस्तुओं का आयात किया जाता था।

प्रश्न 17.
भारत के राजनैतिक इतिहास के निर्माण में जेम्स प्रिसेंप का क्या योगदान है?
उत्तर:
जेम्स प्रिसेंप का योगदान –

  1. जेम्स प्रिसेंप ईस्ट इण्डिया कंपनी के एक अधिकारी थे। उन्होंने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। इन लिपियों का प्रयोग प्रारम्भिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है।
  2. उन्होंने यह जानकारी प्राप्त की कि अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी अर्थात् सुन्दर मुख – आकृति वाले राजा का नाम लिखा है। कुछ अभिलेखों में राजा का नाम अशोक भी लिखा था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक सर्वाधिक लोकप्रिय शासकों में से एक था।
  3. प्रिसेंप की इस खोज से आरम्भिक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नई दिशा मिली, क्योंकि भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले प्रमुख राजवंशों की पुनर्रचना के लिए विभिन्न भाषाओं में उत्कीर्ण अभिलेखों और ग्रंथों का उपयोग किया।
  4. इस प्रकार 20वीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों तक उपमहाद्वीप के राजनैतिक इतिहास का ढाँचा तैयार हो गया।

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प्रश्न 18.
छठी शताब्दी सा.यु.पू. के गणराज्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर:
छठी शताब्दी सा.यु.पू. के गणराज्य:
1. छठी शताब्दी सायु०पू० में निम्नलिखित गणराज्य थे:

  • (क) कुशीनारा के मल्ल
  • (ख) पावा के मल्ल
  • (ग) कपिलवस्तु के शाक्य
  • (घ) रामग्राम के कोलिय
  • (झ) वैशाली के लिच्छवि।

2. इन राज्यों की शासन पद्धति राजतंत्रीय राज्यों (महाजनपदों) से भिन्न थी। इनमें कोई राजा नहीं होता था। शासन सत्ता लोगों द्वारा चुने गये किसी मुखिया के हाथ में होती रहती। इनका पद पैतृक नहीं था।

3. सरकार का सारा कार्य चुने गए सदस्य आपसी परामर्श से करते थे।

4. छठी शताब्दी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गणराज्य वज्जियों का था। यह राज्य आठ गणों का एक संघ था जिनमें से लिच्छवी गण बहुत ही महत्त्वपूर्ण था।

प्रश्न 19.
अशोक को ‘महान्’ क्यों कहा जाता है? अथवा, अशोक का इतिहास में क्या स्थान है?
उत्तर:
इतिहास में अशोक का स्थान –

  1. अशोक न केवल भारत का अपितु विश्व का भी एक महान् सम्राट माना जाता है। उसमें मनुष्यता कूट-कूट कर भरी थी और उसने प्रजा तथा मानव सेवा के लिए हर उपाय किये। बह लोगों को धार्मिक तथा नैतिक उपदेश देने में जुट गया। संसार में शायद ही किसी सम्राट ने ऐसा किया हो।
  2. अशोक एक विशाल साम्राज्य का राजा था। उसका साम्राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक विस्तृत था।
  3. अशोक ने बौद्ध धर्म को विश्व के लगभग सभी देशों में फैला दिया। एक छोटे से धर्म को विश्व धर्म बना देने वाले व्यक्ति को महान् कहना उचित ही है।
  4. अशोक एक सहनशील सम्राट था और सभी धर्मों का आदर करता था।
  5. अशोक अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान समझता था। राज्य की ओर से अनाथों तथा विधवाओं को विशेष सुविधा दी जाती थी। उसने पशुओं की रक्षा के लिए भी अस्पताल खुलवाये।

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प्रश्न 20.
चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन प्रबंध की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन प्रबंध –

  1. केन्द्रीय शासन का मुखिया स्वयं सम्राट होता था। उसकी शक्तियाँ असीम थी। उसकी सहायता के लिए कई मंत्री होते थे।
  2. सम्पूर्ण मौर्य साम्राज्य चार प्रान्तों में विभाजित था प्रांत के मुखिया को कुमार कहते थे। वह प्रायः राज घराने का ही कोई व्यक्ति होता था।
  3. नगरों का शासन नगराध्यक्ष के हाथ में होता था। बड़े-बड़े नगरों के प्रबंध के लिए 30-30 सदस्यों की परिषदें थीं।
  4. प्रत्येक परिषद् पाँच-पाँच सदस्यों के छः बोर्डों में विभाजित थी। गाँवों का शासन पंचायतों के हाथ में था।
  5. न्याय के लिए दीवानी और फौजदारी अदालतें थीं। प्रजा के हित की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था।
  6. चन्द्रगुप्त मौर्य का सैनिक संगठन भी उच्च कोटि का था। सेना में 6 लाख पैदल, 36 हजार घुड़सवार 9 हजार हाथी और 8 हजार रथ शामिल थे।

प्रश्न 21.
अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कौन-कौन से कार्य किये?
उत्तर:
अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए किये ये कार्य:

  1. कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया और प्रचार के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया।
  2. उसने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करने के साथ ही उनका भी पालन किया। ये सिद्धांत जनता के कल्याण से सम्बन्धित थे।
  3. उसने बौद्ध धर्म के नियमों को स्तभों, शिलाओं तथा गुफाओं पर खुदवाया । ये नियम आम बोलचाल की भाषा में खुदवाये थे, ताकि साधारण लोग भी इन्हें पढ़ सकें।
  4. बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अनेक स्तूप और बिहार बनवाये जो बौद्ध धर्म के प्रचार केन्द्र बन गये। स्तूप महात्मा बुद्ध की याद दिलाते थे जबकि बिहार में बौद्ध अनुयायी निवास करते थे तथा बौद्ध शिक्षा ग्रहण करते थे।
  5. वह विहारों और बौद्ध भिक्षुओं की सहायता भी करता था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
बौद्धयुगीन व्यापार एवं वाणिज्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बौद्धयुगीन व्यापार एवं वाणिज्य:

व्यावसायिक संघ और श्रेणियाँ:
इस काल की एक मुख्य विशेषता यह भी थी कि भिन्न-भिन्न व्यवसाय करने वालों या शिल्पकारों ने अपने-आपको विभिन्न संघ में संगठित कर रखा था। एक ही धंधा करने वालों का प्रायः अपना अलग शिल्प-संघ या श्रेणी होती थी। बौद्ध साहित्य में इस प्रकार की अनेक श्रेणियों के उल्लेख मिलते हैं।

प्रत्येक श्रेणी का अपना अलग अध्यक्ष होता था जो ‘प्रमुख’, ‘ज्येष्ठक’ या ‘श्रेष्ठिन’ के नाम से पुकारा जाता था। इस अध्यक्ष का समाज में बड़ा सम्मान था। विभिन्न व्यावसायिक संघ या श्रेणियाँ अपने सदस्यों के पारस्परिक झगड़ों को निपटाती थी और उनके माल के निर्माण और क्रय-विक्रय में सहायता देती थी।

व्यापार और वाणिज्य:
उस समय व्यापार जल और थल दोनों मार्गों से होता था। अपने सामान की बिक्री के लिए व्यापारियों ने बड़े-बड़े बाजार बना रखे थे। कुछ व्यापारी अपना सामान बैलगाड़ी, ऊँटों अथवा घोड़ों की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी ले जाते थे। ऐसे व्यापारी चोर-डाकुओं से बचने के लिए प्रायः कारवाँ (Caravan) के रूप में चलते थे। कई बार कुछ राज्य कारवाँ के साथ सशस्त्र सैनिक भी भेज देते थे।

बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि उन दिनों भारत के व्यापारिक संबंध लंका, वर्मा, जावा, सुमात्र, मलाया, अरब और कई पाश्चात्य देशों से भी थे। भारत से जिन वस्तुओं का निर्यात होता था उनमें-सूती, ऊनी तथा रेशमी वस्त्र, कंबल, कालीन, औषधियाँ, इत्र, तेल, हाथी-दाँत का सामान, मोती, रत्न आदि वस्तुएँ विशेष उल्लेखनीय हैं। उस समय के प्रसिद्ध बन्दगाह-भृगुकच्छ (आधुनिक भडोंच), सुपारक (आधुनिक सुपारा) और ताम्रलिप्ति (पश्चिम बंगाल में स्थित तामलुक) आदि थे।

शिल्पकारों की भांति व्यापारियों ने भी अपने-आपको व्यापारिक संघों में संगठित कर रखा था। प्रायः सबसे धनी व्यापारी अध्यक्ष पद को ग्रहण करता था और उसे ‘श्रेष्ठिन’ या ‘सेठी’ कहा जाता था।

सिक्कों का आरम्भ:
वैदिक युग में लेन-देन में प्रायः चीजों का आदान-प्रदान ही होता था परंतु बौद्धकाल में मौद्रिक विनिमय ने स्थान ले लिया था। उस समय की कुछ प्रमुख मुद्राओं के नाम बौद्ध साहित्य में इस प्रकार दिये गये हैं-काकणिक, माषक, अर्द्धमाषक, पद, अर्द्धपद, कहापण (कर्षापण) तथा अर्द्धकर्षाण आदि।

ये सिक्के ताँबे और चाँदी आदि के होते थे। सोने के सिक्के भी थे जिन्हें निक्ख (या निष्क) और सुवण्ण (या सुवर्ण) कहा जाता था। इस समय ब्याज पर धन देने की प्रथा भी चल पड़ी थी और हुण्डियों तथा ऋण-पत्रों का प्रयोग भी होने लगा था।

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प्रश्न 2.
अशोक के राज्यादेशों और शिलालेखों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अशोक के राज्यादेशों और शिलालेखों का महत्त्व:
अशोक के शिलालेख और राज्यादेश इतिहासकारों के लिए अमूल्य वस्तु हैं क्योंकि उनसे उसके विषय में बहुत सी बातों का पता चलता है। संभव है कि इन लेखों के बिना हमें अशोक के बारे में बहुत कम मालूम होता।

इनके विषय में ठीक ही कहा गया है, ये अभिलेखों के अनोखे संग्रह ही हैं जो अशोक की आन्तरिक भावनाओं और आदर्शों को हमारे सामने ला देते हैं और सदियों के बारे में भी सम्राट के लगभग वही शब्द हमारे कानों में गूंजने लगते है।” इन राज्यादेशों से हमें निम्नलिखित आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं:

1. अशोक का राज्य विस्तार:
अशोक के बहुत-से लेख सीमांत प्रदेशों से मिले हैं। इनसे उसके साम्राज्य में सम्मिलित प्रदेशों और उनकी सीमाओं की जानकारी मिलती है।

2. अशोक का व्यक्तिगत धर्म:
इन्हीं लेखों से हमें यह भी पता चलता है कि अशोक का धर्म क्या था? अशोक का पशुओं का वध रोकना, महात्मा बुद्ध से सम्बन्धित सभी स्थानों की यात्रा करना, अन्य देशों में धर्म प्रचारक भेजना और एक धर्म रक्षक की भाँति भिक्षुओं के लिए नियम बनाना आदि सब बातों का हमें इन्हीं राज्यादेशों से पता चलता है।

3. अशोक का विश्व धर्म:
इसके अतिरिक्त इन्हीं लेखों से उस धर्म का पता चलता है, जिसे अशोक संसार के सामने रखना चाहता था। बड़ों का आदर करना चाहिए, छोटों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए, सत्य बोलना चाहिए, दान देना चाहिए आदि गुणों का हमें इन राज्योदेशों से पता चलता है जो अशोक के प्रचारित धम्म के मुख्य सिद्धांत थे।

4. अशोक के राजत्व के आदर्श:
अशोक के शिलालेखों या राज्यादेशों से उसके राजत्व के आदर्श का भी पता चलता है। अशोक का आदर्श लोगों पर शासन करना नहीं वरन् उनकी सेवा करना तथा उनमें नैतिकता का संचार करना था।

अशोक ने किस प्रकार एक पिता की भाति अपनी प्रजा पर राज्य किया, किस प्रकार उनके लिए कुएँ बनवाए, सरायं बनवाईं, छायादार वृक्ष लगवायें, अस्पताल बनवाये, अधिकारियों को लोक सेवा का पाठ पढ़ाया, आदि सब बातों का ज्ञान हमें इन्हीं राज्यादेशों से ही होता है।

5. अशोक का चरित्र:
अशोक के चरित्र पर भी इन शिलालेखों से पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इन लेखों से हमें पता चलता है कि किस प्रकार वह हर समय लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहता था और उनके लिए केवल इस लोक में ही नहीं वरन् परलोक में भी सुख-समृद्धि की कामना करता था।

6. मौर्य कला:
ये राज्यादेश बड़ी-बड़ी शिलाओं, स्तम्भों तथा गुफाओं पर खुदे हुए थे। इतने बड़े और भारी स्तम्भों को इतनी दूर किस प्रकार ले जाया गया होगा-यह आज भी आश्चर्य में डाल देने वाली बात है। पत्थरों को काटकर बनाए गए भिन्न-भिन्न पशु-पक्षी आज भी अपनी चमक बरकरार रखे हुए हैं।

7. शिक्षा प्रचार:
सारे देश में पाए गए ये राज्यादेश सर्व साधारण के पढ़ने के लिए थे। इन्हें देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अशोक के समय लोग काफी पढ़े-लिखे होंगे और शिक्षा का प्रचार भी काफी हुआ होगा।

8. प्रचलित भाषा:
ये लेख संस्कृत भाषा में न होकर प्राकृत (लोगों की बोल-चाल की भाषा) में हैं। इनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन दिनों प्राकृत भाषा ही जन-साधारण की भाषा रही होगी।

9. अशोक का अन्य देशों से सम्बन्ध:
अशोक का अन्य देशों के साथ बड़ा मैत्रीपूर्ण व्यवहार था, इसका ज्ञान भी हमें राज्यादेशों से ही मिलता है।

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प्रश्न 3.
मेगस्थनीज ने भारत के विषय में क्या लिखा है?
उत्तर:
मेगस्थनीज का विवरण:
मेगस्थनीज एक यूनानी इतिहासकार था जो यूनानी शासक सेल्यूकस की ओर से चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा गया था। वह कोई पाँच वर्ष (302 साव्यु०पू० से 298 सान्यु०पू० तक) भारत में रहा।

उसने भारत का वृत्तान्त अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘इण्डिका’ (Indica) में लिखा है। इस पुस्तक का विशेष ऐतिहासिक महत्त्व है। इससे तीसरी शताब्दी सा०यु०पू० की राजनीतिक एवं सामाजिक अवस्थाओं के सम्बन्ध में बड़ी जानकारी प्राप्त होती है।

1 राजा के विषय में:
मेगस्थनीज ने राजा के विषय में बहुत-कुछ लिखा है। वह लिखता है कि राजा बड़ी शान से रहता था और उसका राजमहल अपने ढंग का एक अद्वितीय सुन्दर महल था। राजा महल के एक कमरे में दो रातें इकट्ठी नहीं बिताता था। वह बहुत कम लोगों से मिलता-जुलता था और केवल निम्नलिखित चार कार्यों के लिए महल छोड़ता था:

  • (क) युद्ध में जाने के लिए
  • (ख) न्याय करने के लिए
  • (ग) यज्ञ या हवन के लिए तथा
  • (घ) शिकार अथवा भ्रमण के लिए।

राजा की देख-रेख के लिए गुप्तचर नियुक्त थे। इन गुप्तचरों में स्त्रियाँ अधिक थी। राजा अपने प्रधानमंत्री चाणक्य (कौटिल्य) का बहुत आदर करता था, जो महल के पास ही एक झोपड़ी में रहता था।

2. सैनिक संगठन के विषय में:
चन्द्रगुप्त की एक बड़ी विशाल सेना थी जिसकी संख्या लगभग सात लाख थी। जिसमें 6,00,000 पैदल; 30,000 घुड़सवार; 9,000 हाथी और लगभग 8,000 रथ थे। हर एक रथ में 3 व्यक्ति होते थे। मेगस्थनीज लिखता है कि समस्त सेना की व्यवस्था तीस सदस्यों की एक प्रथक् समिति करती थी। सेना-विभाग के छ: उप-विभाग थे। इनके अधिकार में –

  • पैदल सेना
  • घुड़सवार सेना
  • जल-सेना
  • रथ
  • हाथी और
  • सामग्री पहुँचाने का प्रबंध था।

3. सिविल प्रशासन के विषय में:
सिविल प्रबंध के विषय में भी मेगस्थनीज ने बहुत-कुछ लिखा है। वह लिखता है कि राजा निरंकुश था और उसके अधिकार असीमित थे। राजा ने सब प्रकार की सूचनायें प्राप्त करने के लिए अपने गुप्तचर छोड़ रखे थे। प्रजा पर कई प्रकार के कर लगाए गए थे। आय का सबसे बड़ा साधन भूमि-कर था जो कुल उपज का पाँचवा भाग होता था।

बिक्री की चीजों के आवोगमन और सरकारी नौकाओं पर बैठकर नदी पार करने पर भी कर लगाए गए थे। प्रजा की भलाई की और भी विशेष ध्यान दिया जाता था । जल-सिंचाई के लिए नहरें और यात्रा के लिए सड़कें बनी हुई थीं। सड़कों पर यात्रियों की सुविधा के लिये मील के पत्थर लगे हुए थे। इन सड़कों पर जाने वाले यात्रियों की रक्षा का पूरा-पूरा प्रबंध था और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सरायें बनी हुई थीं। सड़कों पर दोनों ओर छायादार वृक्ष भी लगे हुए थे। इन सब कारणों से व्यापार का अभूतपूर्व विस्तार हुआ।

मेगस्थनीज ने लिखा है कि कानून बड़े कठोर थे और छोटे-छोटे अपराधों के लिए भी हाथ-पाँव काट दिए जाते थे। देश में न्यायालय भी थे। राजा न्याय करने के लिए उत्सुक रहता था। सारा देश प्रान्तों में बंटा हुआ था और उन प्रान्तों पर योग्य अधिकारी नियुक्त थे। ये देश में शान्ति व्यवस्था बनाए रखते थे। मेगस्थनीज लिखता है कि प्रान्त, जिलों में बंटे हुए थे और प्रत्येक जिले में कई गाँव होते थे। गाँव के मुखिया को गोप (Gope) कहते थे।

4. पाटलिपुत्र के नगर-प्रशासन के विषय में:
मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी के विषय में बहुत-कुछ लिखा है। उसके अनुसार यह नगर गंगा और सोन नदियों के संगम पर बसा हुआ था और बड़ा शोभनीय था। इस नगर के चारों ओर लकड़ी की एक चौड़ी दीवार थी, जो कि एक गहरी खाई से घिरी हुई थी। इसमें सदा पानी भरा रहता था।

राजमहल सुन्दरता और सजधज में अद्वितीय था। इसमें सुन्दर बाग और फल-फूलों वाले वृक्ष थे तथा सब प्रकार के मनोरंजन के साधन थे। इस नगर के प्रबंध के लिए तीस सदस्यों की एक समिति थी। समिति छ: उप-समितियों में बँटी हुई थी जिनके अधिकार में कला-कोशल, विदेशियों की देख-भाल, जनसंख्या की गिनती, व्यापार, बिकने वाली वस्तुएँ और कर वसूली का प्रबंध इत्यादि था।

5. भारतीय समाज के विषय में:
मेगस्थनीज लिखता है कि समाज सात वर्गों में विभक्त था –

  • (क) दार्शनिकों का राज्य में बड़ा नाम था।
  • (ख) परिषद्-सदस्य राजा को सलाह देते थे और राज्य के कार्य में उसकी सहायता करते थे।
  • (ग) तीसरी श्रेणी सैनिकों की थी। वे लड़ाई के समय युद्धरत रहते थे, अन्यथा आराम करते थे।
  • (घ) चौथी श्रेणी अन्य छोटे-छोटे अधिकारियों की थी, जो राज्य-प्रबंध में राजा और गवर्नरों की सहायता करते थे।
  • (ड) पाँचवीं श्रेणी कृषकों की थी जिनका कार्य देश के लिए अनाज पैदा करना था।
  • (च) छठी श्रेणी व्यापारियों तथा शिल्पकारों की थी। ये देश के व्यापार की ओर ध्यान देते थे।
  • (छ) सातवीं श्रेणी गड़रियों आदि की थी। ये भेड़-बकरी इत्यादि चराकर तथा शिकार करके अपना जीवन-निर्वाह करते थे।

मेगस्थनीज ने लिखा है कि लोग सत्यावादी थे। चोरी आदि की घटनायें बहुत कम होती थीं। लोग एक-दूसरे पर विश्वास रखते थे और मुकदमेबाजी बहुत कम थी। ब्राह्मणों का समाज में विशेष स्थान था और सब उनका आदर करते थे। प्रजा बड़ी प्रसन्न थी और देश बड़ा उपजाऊ तथा समृद्ध था। लोग सादा जीवन व्यतीत करते थे और घरों में ताला आदि नहीं लगाते थे। दास-प्रथा को लोग नहीं जानते थे। वह यह भी लिखता है कि यहाँ के लोगों के खाने का कोई समय नहीं था और वे हर वक्त खाते रहते थे।

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प्रश्न 4.
मौर्यकालीन कला-कौशल का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
मौर्यकालीन कला:
1. भवन-निर्माण-कला (Architecture): मौर्य शासकों ने जो भवन बनवाए उन्हें देखकर विदेशी यात्री भी चकित रह गए। ये भवन अधिकतर लकड़ी के थे, इसलिए मौर्यकालीन शिल्प-कला की सुन्दरता के कोई विशेष नमूने हम नहीं देख पाए हैं। यूनानी लेखकों से पता चलता है कि मौर्य शासकों द्वारा बनाए गये राजमहल अपनी सुन्दरता के लिए सारे संसार में प्रसिद्ध थे।

केवल यही नहीं, चीनी यात्री फाह्यान (Fahien) का भी यही कहना है कि, “अशोक का राजमहल इतना सुन्दर तथा शानदार था कि उसे मनुष्यों ने नहीं बल्कि देवताओं ने बनवाया होगा।” इन राजमहलों के अतिरिक्त मौर्य शासकों ने अपने साम्राज्य को कई हजार स्तूपों (Stupas) से सजाया। ये स्तूप ईंटों अथवा पत्थरों द्वारा बनाए हुए गुम्बद के आकार के थे। इनकी गोलाई नीचे से ऊपर की ओर कम होती जाती थी। इन सब स्तूपों में साँची स्तूप (Sanchi Stupa) और भरहुत स्तूप (Bharhut Stupa) विशेष उल्लेखनीय हैं।

2. वास्तुकला (Sculpture):
मौर्य काल में पत्थर को तराश कर सुन्दर-सुन्दर स्तम्भ, पशु-पक्षी, मूर्तियाँ, गुफाएँ आदि बनाने की कला से जितनी उन्नति की, भारतीय इतिहास के शायद ही किसी काल में इतनी हुई हो। मौर्यकालीन कला के सर्वोत्कृष्ट नमूने अशोक के स्तम्भ हैं। ये स्तम्भ 50 से 60 फुट ऊँचे हैं और इनका वजन 50 टन है। आश्चर्य की बात है कि इतने लम्बे-चौड़े और भारी स्तम्भ एक ही टुकड़े से काटकर कैसे बनाए गए होंगे। यद्यपि ये स्तम्भ इतने भारी हैं फिर भी इन्हें सुनार के आभूषणें सी सफाई तथा सुन्दरता से बनाया गया है। प्रत्येक स्तम्भ के सिरे पर एक अलग शीर्ष (Capital) बनाया गया है।

इन शीर्षों पर बने हुए पशु-पक्षियों के चिह्न अपनी सुन्दरता में बेजोड़ हैं। सारनाथ (Sarnath) के स्तम्भ का तीन शेरों वाला शीर्ष मौर्य काल की उन्नति का जीता-जागता नमूना है। इसको आधुनिक भारतीय मुद्रा में भी अपनाया गया है। मौर्यकालीन वास्तुकला का एक अन्य नमूना ठोस चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ हैं। पत्थरों को काटकर गुफाएँ बनाना कितना कठिन कार्य है परंतु मौर्य काल में इसका बड़ी कुशलता के साथ किया गया।

3. पालिश करने की कला (Art of Polishing):
मौर्य काल में कठोर पत्थर को साफ करके पालिश करने की कला इतनी उन्नत थी कि आज के युग में ऐसा कर पाना संभव नहीं है। गया के पास गुफाओं की दीवारों पर इस प्रकार की पालिश की गई है कि वे शीशे के समान चमकती हैं। दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्थित अशोक की लाट पर इतनी चमकदार पालिश है कि अंग्रेज पादरी हेबर (Bishop Haber) जैसे बहुत-से लोगों को अनेक बार यह भ्रम हुआ कि यह स्तम्भ पत्थर का है अथवा धातु से ढालकर बनाया गया है।

4. स्थापत्य कला (Art of Engineering):
अशोक के काल में पहाड़ों के बड़े-बड़े – टुकड़े काटे गये, संभाले गये और तराश कर ऐसे स्तम्भों के रूप में लाये गए, जिनमें प्रत्येक का वजन लगभग 50 टन और ऊँचाई 50 फुट थी। पत्थरों के ये बड़े-बड़े टुकड़े सम्भवतः चुनार (Chunar) की पहाड़ियों से काटे गये थे। आज भी वहाँ ऐसे अच्छे पत्थर मिलते हैं। ये स्तम्भ हमें दूर-दूर के स्थानों में मिलते हैं। इन्हें इतनी दूर तक किस प्रकार ले जाया गया होगा यह एक आश्चर्य में डाल देने वाली बात है।

इस कठिनाई का ज्ञान हमें एक उदाहरण से आसानी से लग म ए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) सकता है। 1356 में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने अम्बाला जिले में स्थित तोपरा नामक स्थान से एक स्तम्भ दिल्ली लाना चाहा। कहते हैं कि इसको लाने में 8,400 मनुष्य लगे और 42 पहिए वाले छकड़े का प्रयोग किया गया। इस प्रकार एक पहिये को खींचने के लिए लगभग 200 व्यक्ति लगाए गए थे। इससे ज्ञात होता है कि अशोक के समय में स्थापत्य कला ने कितनी उन्नति की।

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प्रश्न 5.
अशोक के धम्म का क्या अर्थ है? उसकी प्रमुख विशेषतायें बताइए। इसका अशोक की साम्राज्य नीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
‘धम्म’ का अर्ध:
अशोक ने अपने ‘धम्म’ के कारण विश्वभर में ख्याति प्राप्त कर ली थी। वस्तुतः कलिंग युद्ध के पश्चात् अशोक ने अपने जीवन का उद्देश्य मनुष्य सहित जीव मात्र का कल्याण करना बना लिया था। उसका विश्वास था कि उच्च कोटि के नैतिक जीवन के बिना कोई व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता। उसने लोगों के जीवन की नैतिकता सुनिश्चित करने के लिए ही ‘धम्म’ का महान् बीड़ा उठाया। कुछ इतिहासकारों का विश्वास है कि अशोक का धर्म बौद्ध धर्म पर आधारित था, क्योंकि वह अहिंसा में विश्वास रखता था।

डा. आर. जी. भण्डारकर के अनुसार, “अशोक का धर्म, धर्म-निरपेक्ष बौद्ध धर्म के अतिरिक्त कुछ नहीं था।” डॉ. एन. के. शास्त्री ने भी ऐसा ही कुछ कहा है, “अशोक ने बौद्ध धर्म को एक शुष्क बौद्ध ज्ञान की खोज के स्थान पर एक आकर्षक, भावात्मक एवं लोकप्रिय धर्म में परिवर्तित कर दिया।

“यह अलग बात है कि ऐसी धारणाएँ सही प्रतीत नहीं होती। बौद्ध धर्म में चार आर्य सत्यों एवं अष्टमार्ग का उल्लेख है परंतु अशोक के धम्म में इसका कोई जिक्र नहीं है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अशोक का धर्म वैदिक धर्म पर आधारित था, क्योंकि अशोक स्वर्ग में विश्वास रखता था परंतु इस विचार को नहीं माना जा सकता, क्योंकि अशोक का विश्वास रीति-रिवाजों तथा बलि आदि प्रथा में नहीं था।

अशोक के धम्म का उल्लेख उसके अभिलेखों में बार-बार आता है। इनका अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि धम्म वस्तुतः नैतिक जीवन व्यतीत करने के नियमों का संग्रह था । यह प्रत्येक धर्म में मिलता है और प्रत्येक धर्म इस पर आधारित है। यह कोई नया धर्म नहीं था । डा. राधा कुमुद मुकर्जी (R.K. Mookerjee) ने लिखा है

“His origniality lay not in idea of Dhamma but in the practical measures for its adoption by the people.”

अशोक के धम्म की विशेषतायें:
अशोक के धम्म के उपर्युक्त सिद्धांत का अध्ययन करने पर वह निष्कर्ष निकलता है कि इसकी कुछ खास विशेषतायें थीं जिसके कारण यह इतनी शीघ्रता से देश-विदेश में फैल गया और जनता में इस सीमा तक लोकप्रिय हो गया । इस धम्म की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित थीं

1. नैतिकता:
अशोक के धम्म की सबसे बड़ी विशेषता इसका नैतिकता पर आधारित होना है। इसीलिए इस धर्म को नैतिकता का नियम अथवा पवित्रता का नियम (Law of Piety) कहा जाता है। वस्तुतः अशोक का धम्म कोई विशेष धर्म न होकर नैतिकता के सिद्धांतों का एक संग्रह था। अर्थात् उसका धर्म मानवता का धर्म था जिसे कोई भी मनुष्य प्रत्येक देश तथा प्रत्येक काल में अपने जीवन को कल्याणमय बनाने के लिए अपना सकता था। इस प्रकार सभी नैतिक गुणों का समावेश होने के कारण ही उसका धर्म इतनी शीघ्रता से सारे संसार में लोकप्रिय हो गया।

2. सहनशीलता:
अशोक के धम्म की दूसरी महान् विशेषता इसकी सहिष्णुता थी। स्वयं बौद्ध धर्म का अटल भक्त होते हुए भी अशोक ने कभी भी अपने धम्म को दूसरों पर लादने को कोशिश नहीं की और न कभी दूसरे धर्मों को हेय दृष्टि से देखा। अपने धर्म के साथ-साथ वह दूसरे धर्मों को भी सम्मान देता था। उसके इस गुण ने लोगों पर अत्यन्त गहरा प्रभाव डाला और लोगों ने बड़ी तत्परता से उसके पवित्रता के नियमों को अपना लिया।

3. सार्वभौमिकता:
अशोक के धम्म की दूसरी बड़ी विशेषता इसके सार्वभौमिक होने की थी। यह धम्म एक संकीर्ण सम्प्रदाय न होकर मानवता का धर्म था जिसे प्रत्येक व्यक्ति नि:संकोच अपना सकता था।

डॉ. आर. के. मुकर्जी के अनुसार, ‘अशोक ने अपने धर्म में उन सिद्धांतों का समावेश किया जो सर्वमान्य हैं और जिन्हें सारी मानव जाति पर लागू किया जा सकता है। उसका धर्म न केवल बौद्ध धर्म था बल्कि सभी धर्मों का सार अथवा निचोड़ था जिसे कोई देश अथवा जाति किसी भी समय अपना सकती थी।

इस प्रकार नैतिकता, सहिष्णुता और सार्वभौमिकता के कारण ही अशोक का धर्म न केवल भारत अपितु नेपाल, सीरिया और लंका आदि देशों में भी लोकप्रिय हो पाया।

अशोक के धम्म का उसकी साम्राज्य नीति पर प्रभाव:

  • (क) अशोक ने किसी नवीन धर्म का प्रतिपादन नहीं किया। उसका धम्म उच्च नैतिक आदर्शों का संग्रह मात्र था। वह धार्मिक मतभेदों का अन्त करके सभी धर्मों में समन्वय तथा एकता लाना चाहता था।
  • (ख) अशोक के उच्च धार्मिक आदर्शों एवं सिद्धांतों ने उसे जन-कल्याण के कार्यों की ओर प्रेरित किया।
  • (ग) अशोक ने दिग्विजय के स्थान पर धर्म-विजय को अपनी साम्राज्य नीति का आधार बनाया।
  • (घ) अशोक की प्रबल धार्मिक भावना तथा धर्म-प्रचार के कारण उसके साम्राज्य में अपराधों की संख्या कम हो गयी।
  • (ड) अशोक ने अपनी साम्राज्य नीति में अहिंसा, सहनशीलता और आपसी मेल-जोल को स्थान दिया।
  • (च) इससे प्रजा में राजभक्ति को बढ़ावा मिला।

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प्रश्न 6.
मौर्य साम्राज्य के पतन के कौन-कौन से कारण थे? इसमें अशोक कहाँ तक उत्तरदायी था?
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण:
अशोक मौर्य वंश का सबसे महान् शासक था किन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् कोई पचास वर्ष (322-185 सा०यु०पू०) में ही इतना बड़ा साम्राज्य नष्ट-भ्रष्ट हो गया। इसे जानने के लिए हम सब बड़े उत्सुक हो जाते हैं कि इस साम्राज्य का इतना शीघ्र पतन होने के क्या कारण थे ? इन कारणों का उल्लेख निम्नवत किया जा सकता है –

1. कमजोर उत्तराधिकारी:
चन्द्रगुप्त मौर्य तथा अशोक जैसे शासकों में इतनी सामर्थ्य तथा बुद्धि नहीं थी कि एक विशाल साम्राज्य को सम्भाल सकें। अशोक के उत्तराधिकारी दशरथ, सम्प्रति और बृहद्रथ बहुत कमजोर थे। वे शासन की बागडोर संभाल न सके और ऐसे में मौर्य साम्राज्य का पतन होना स्वाभाविक ही था।

2. उत्तराधिकार व्यवस्था का अभाव:
मौर्य साम्राज्य में उत्तराधिकारी को नियुक्त करने का कोई विशेष नियम न था। कहा जाता है कि अशोक के उत्तराधिकारी कुणाल को उसकी सौतेली माता द्वारा अन्धा करवा दिया गया। इस प्रकार राजकुमारों के आपसी झगड़ों और उनमें बहु-विवाह की प्रथा ने राजमहल को षड्यंत्रों का अड्डा बना दिया। ऐसे वातावरण में मौर्य साम्राज्य का पतन अवश्यम्भावी ही था।

3. आन्तरिक विद्रोह:
आन्तरिक विद्रोहों ने भी मौर्यों के पतन में बड़ा भारी भाग लिया । अशोक की मृत्यु के पश्चात् कमजोर उत्तराधिकारी राज्य करने लगे जिसका दूर-दूर के राज्यों के गवर्नरों ने भी पूरा लाभ उठाया। कंधार प्रान्त में वीरसेन और कश्मीर में जुलक स्वतंत्र हो गए। डॉ. त्रिपाठी (Dr. Tripathi) के अनुसार, “इन विद्रोहों ने शासकों की शक्ति क्षीण कर दी और जब तूफान फट पड़ा तो वे उसके साथ ही बह गए।”

4. विदेशों में राजदूतों का न होना:
प्राचीन शासन-व्यवस्था में विदेशी विभाग प्रायः नहीं होता था और विदेशों में दूत आदि भी नहीं भेजे जाते थे। इसके कारण पड़ोसी देशों की आंतरिक स्थिति और योजना का कोई संकेत नहीं मिल पाता था। किसी बात का पता उस समय चलता था जब शत्रु सिर पर आ जाता था। यह कमी भी मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण बनी।

5. विदेशी आक्रमण:
मौर्य साम्राज्य को पतन की ओर जाते देख कर बाहर के आक्रमणकारियों ने भी भारत की ओर अपने कदम बढ़ाए। उन्होंने बार-बार भारत पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए और देश को बहुत हानि पहुँचाई। हिन्द-यूनानियों तथा हिन्द-पार्धियनों के आक्रमणों ने मौर्य साम्राज्य को बड़ा धक्का पहुँचाया।

6. धन की कमी:
अशोक के उत्तराधिकारी कुछ काल तक अपने-आप को आन्तरिक विद्रोहों तथा विदेशी आक्रमणों से बचाते रहे परंतु धीरे-धीरे उनकी आर्थिक दशा खराब होती गई। धन की कमी और उसके अनुचित प्रयोग के कारण मौर्य वंश के अंतिम राजा साम्राज्य के लगातार बढ़ते दायित्वों को न सँभाल पाए।

अशोक का उत्तरदायित्व:
अनेक राजवंशों की भाँति अन्त में मौर्य वंश का भी अनेक कारणों से पतन होना आवश्यक था। इस पतन में अशोक का बड़ा उत्तरदायित्व था जो निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है:

1. सैनिक शक्ति की कमी:
मौर्य साम्राज्य के पतन का सबसे बड़ा कारण सैनिक शक्ति का क्षीण होना था। कलिंग विजय के पश्चात् अशोक ने अन्य देशों को जीतना छोड़ दिया। इससे सैन्य-शक्ति को बड़ा धक्का लगा। जब सिपाहियों के लिए लड़ने का कोई काम न रहा, तो वे युद्ध कला को भूलने लगे और अशोक के राज्यकाल के चालीस वर्षों में वे बिल्कुल नकारा तथा आलसी हो गए। अशोक के पश्चात् दूरस्थ प्रदेशों में विद्रोह होने लगे तो ऐसे सैनिक उनको दबाने में असमर्थ रहे।

2. ब्राह्मणों की तीव्र प्रतिक्रिया:
श्री पी.एच. शास्त्री का कहना है कि मौर्य वंश के पतन का मुख्य कारण अशोक की ब्राह्मण-विरोधी नीति थी। बौद्ध धर्म को अपना लेने तथा राजकोष से केवल बौद्ध भिक्षुओं की सहायता करने से ब्राह्मणों की दशा खराब हो गई और समाज में उनका सम्मान घटने लगा।

अशोक से पहले प्रतिष्ठा प्राप्त इस वर्ग के लोग मौर्य शासकों तथा उनकी नीति के घोर विरोधी हो गए और अन्त में एक ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र (Pushyamitra) ने ही मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ का वध करके इस वंश को समाप्त कर दिया।

3. मौर्य साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार:
उन दिनों आवागमन के साधन बहुत सीमित थे। हिमालय से लेकर सुदूर दक्षिण तक और बंगाल से हिन्दूकुश पर्वत तक फैले हुए इस विशाल साम्राज्य को परिवहन साधनों के अभाव में बनाए रखना कठिन हो गया था। चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक जैसे शक्तिशाली सम्राटों के लिए ऐसा करना किसी सीमा तक संभव था परंतु बृहद्रथ जैसे कमजोर भला इतने बड़े साम्राज्य को कब तक अपने अधीन रख सकते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अभिलेखों की निम्नलिखित में कौन सीमा नहीं है?
(अ) अभिलेख देश के कुछ ही भागों में मिलते हैं।
(ब) कुछ अभिलेखों के अक्षर हल्के हैं।
(स) कुछ अभिलेखों के अक्षर लुप्त हो गये हैं।
(द) अभिलेख के तथ्य का अर्थ निकालना कठिन है।
उत्तर:
(अ) अभिलेख देश के कुछ ही भागों में मिलते हैं।

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प्रश्न 2.
भारत में सबसे अधिक अभिलेख किसके मिले हैं?
(अ) अशोक
(ब) समुद्रगुप्त
(स) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
(द) कनिष्क
उत्तर:
(अ) अशोक

प्रश्न 3.
जेम्स प्रिंसेप ने अशोककालीन ब्राह्मी लिपि का अर्थ कब निकाला?
(अ) 1738 ई०
(ब) 1838 ई०
(स) 1938 ई०
(द) 1947 ई०
उत्तर:
(ब) 1838 ई०

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प्रश्न 4.
आह्त सिक्कों को किसने जारी किया?
(अ) राजा ने
(ब) व्यापारियों ने
(स) नागरिकों ने
(द) उपर्युक्त सभी ने
उत्तर:
(द) उपर्युक्त सभी ने

प्रश्न 5.
उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र के साथ क्या नहीं मिला है?
(अ) मोबाइल
(ब) सोने की वस्तुएँ
(स) चाँदी की वस्तुएँ
(द) उपकरण
उत्तर:
(अ) मोबाइल

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प्रश्न 6.
प्रभावती गुप्त कौन थी?
(अ) समुद्रगुप्त की पुत्री
(ब) चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री
(स) कुमारगुप्त की पुत्री
(द) स्कन्दगुप्त की पुत्री
उत्तर:
(ब) चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री

प्रश्न 7.
राजा के आतंक से तंग आकार लोग क्या करते थे?
(अ) घर में अपने को बंद करते थे।
(ब) राजा को मार देते थे।
(स) घर को छोड़कर जंगल में भाग जाते थे।
(द) आत्महत्या कर लेते थे।
उत्तर:
(स) घर को छोड़कर जंगल में भाग जाते थे।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन सामन्तों से संबंधित नहीं था?
(अ) राजा से वेतन लेते थे।
(ब) अपना निर्वाह स्थानीय संसाधनों से करते थे।
(स) भूमि पर नियंत्रण रखते थे।
(द) शासकों का आदर करते थे।
उत्तर:
(अ) राजा से वेतन लेते थे।

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प्रश्न 9.
अशोक ने साम्राज्य को अखंड करने के लिए क्या किया?
(अ) शक्तिशाली सेना का निर्माण किया।
(ब) उसने धम्म का प्रचार किया।
(स) सीमा रक्षकों की नियुक्ति की।
(द) सीमा पर तार लगवायें।
उत्तर:
(ब) उसने धम्म का प्रचार किया।

प्रश्न 10.
प्राचीन भारत के एक ऐसे क्षेत्र का नाम बताइए जहाँ राज्य और नगर सघन रूप से बसे थे –
(अ) दक्षिण भारत
(ब) उत्तर-पश्चिमोत्तर प्रान्त
(स) पूर्वी भारत
(द) पश्चिम भारत
उत्तर:
(स) पूर्वी भारत

प्रश्न 11.
प्राचीनतम् अभिलेख किस भाषा में लिखे गये?
(अ) प्राकृत
(ब) संस्कृत
(स) यूनानी
(द) हिन्दी
उत्तर:
(अ) प्राकृत

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प्रश्न 12.
संघ या गणराज्यों में किसका शासन था?
(अ) राजा
(ब) लोगों के समूह का
(स) मंत्रियों का
(द) किसी का नहीं
उत्तर:
(ब) लोगों के समूह का

प्रश्न 13.
सबसे पहले पाटलिपुत्र (पटना) राजधानी कब बनी?
(अ) छठी शताब्दी सा०यु०पू० में
(ब) पाँचवी शताब्दी सा०यु०पू० में
(स) चौथी शताब्दी सा०यु०पू० में
(द) दूसरी शताब्दी साव्यु०पू० में
उत्तर:
(स) चौथी शताब्दी सा०यु०पू० में

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प्रश्न 14.
वह प्रथम सम्राट कौन था जिसने पत्थरों और स्तम्भों पर प्रजा और अधिकारियों के लिए सन्देश खुदवाये?
(अ) अशोक
(ब) कनिष्क
(स) चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
(द) हर्षवर्धन
उत्तर:
(अ) अशोक

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास

Bihar Board Class 12 History विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
क्या उपनिषदों में दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
उपनिषदों में दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे। उपनिषदों में दार्शनिकों के विचार हैं कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की सम्भावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहते हैं।

ऐसा विचार व्यक्त किया जाता है कि पूर्व जन्म के कर्मों से पुनर्जन्म निर्धारित होता है। नियतिवादी या भौतिकवादी लोग विश्वास करते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के कर्मों का निर्धारण उसके जन्म से पहले हो जाता है।

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प्रश्न 2.
जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं का संक्षेप में लिखिए। उत्तर-जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षायें:
1. मोक्ष प्राप्ति:
आत्मा को कर्म बंधन से मुक्त करने को मुक्ति या निर्वाण कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार मोक्ष अर्थात् निर्वाण पाना प्रत्येक मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है। निर्वाण पाने के तीन साधन-सम्यक् विश्वास, सम्यक ज्ञान और सम्यक् चरित्र हैं। जैनी इन्हें त्रिरत्न कहते हैं।

2. अहिंसा:
जैन धर्म में अहिंसा पर सबसे अधिक बल दिया गया है। अहिंसा का अभिप्राय है-किसी जीवधारी को कष्ट न देना। जैनी पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों को भी जीव मानते हैं। उनके अनुसार व्यक्ति को किसी भी जीव (मानव, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे आदि) को मन, वाणी या कर्म से दुःख नहीं देना चाहिए। यही कारण है कि जैनी नंगे पाँव चलते हैं, पानी छानकर पीते हैं तथा मुँह पर पट्टी बाँधते हैं ताकि कोई जीव-हत्या न हो जाए।

3. घोर तपस्या और आत्म-त्याग:
जैनी घोर तपस्या तथा शरीर को अधिक कष्ट देने में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि भूखे रहकर प्राण त्यागने से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है।

4. ईश्वर में अविश्वास:
जैनी ईश्वर के अस्तित्त्व को नहीं मानते हैं और ईश्वर की अपेक्षा तीर्थंकरों की पूजा करते हैं।

5. जाति-प्रथा में अविश्वास:
जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इस धर्म में विश्वास रखने वाले समान हैं।

6. वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में अविश्वास:
जैन धर्म के अनुसार वेद ईश्वरीय ज्ञान नहीं और संस्कृत पवित्र भाषा नहीं है।

7. यज्ञ और बलि आदि में अविश्वास:
जैनी यज्ञ-हवन को मोक्ष पाने के लिए आवश्यक नहीं समझते। वे पशु-बलि का भी विरोध करते हैं।

8. पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत में विश्वास:
जैनी इस बात में विश्वास रखते हैं कि अच्छे जन्म का कारण बनते हैं और बुरे कर्म बुरे जन्म का। इसलिए व्यक्ति को अच्छा जन्म पाने के लिए अच्छे कर्म करने चाहिए।

9. उच्च नैतिक जीवन:
महावीर स्वामी ने अपने अनुयायियों को चोरी-चुगली, लोभ, क्रोध आदि से दूर रहकर सदाचारी बनने का उपदेश दिया। महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन धर्म श्वेताम्बर और दिगम्बर नाम के दो सम्प्रदायों में बाँट गया। श्वेताम्बर सफेद वस्त्र पहनते हैं, जबकि दिगम्बर नंगे रहते हैं।

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प्रश्न 3.
सांची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए। अथवा, “सांची के स्तूप के अवशेषों के संरक्षण में भोपाल की बेगमों ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।” प्रमाणित कीजिए।
उत्तर:
सांची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका –

  1. भोपाल के शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम का सांची स्तूप के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए आर्थिक अनुदान दिया।
  2. जॉन मार्शल द्वारा सांची के स्तूप पर लिखे गए विस्तृत ग्रंथ के प्रकाशन में सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया। यही कारण था कि जॉन मार्शल ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथों को सुल्तानजहाँ को समर्पित किया।
  3. सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए भी अनुदान दिया।
  4. भोपाल की बेगमों के प्रयास से सांची का स्तूप सुरक्षित रहा और किसी अन्य के हाथ में नहीं जा सका।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए:
महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।

  1. (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
  2. (ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?
  3. (ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती है?
  4. (घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थी?
  5. (ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?

उत्तर:

  1. (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख हुविष्क (कुषाण शासक) के शासन काल के आधार पर निश्चित की। यह अभिलेख हुविष्क के शासन के तैंतीसवें वर्ष अर्थात् 138 सा०यु० में उत्कीर्ण किया गया।
  2. (ख) धनवती ने बोधिसत्त की मूर्ति बौद्ध धर्म और बुद्ध के सम्मान में स्थापित की।
  3. (ग) धनवती अपनी मौसी बुद्धमिता और अपने माता-पिता का नाम लेती है।
  4. (घ) धनवती को त्रिपिटक का ज्ञान था।
  5. (ङ) उसने यह पाठ बुद्धमिता से सीखा था।

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प्रश्न 5.
आपके अनुसार स्त्री-पुरुषा संघ में क्यों जाते थे?
उत्तर:
स्त्री-पुरुष के संघ में शामिल होने के निम्नलिखित कारण थे –

  1. वे बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित थे।
  2. वे बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करना चाहते थे।
  3. कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बन गई थी।
  4. वे थेरी बनना चाहते थे अर्थात् निर्वाण प्राप्त करना चाहते थे।
  5. वे प्रचलित धार्मिक प्रथा (वैदिक धर्म) से खुश नहीं थे और उसे समाप्त करना चाहते थे।

निम्नलिखित पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए। (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.
सांची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
उत्तर:
सांची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान का योगदान –
1. बौद्ध साहित्य के जातकों में अनेक कहानियाँ दी गई हैं। सांची की मूर्तियों को इनसे जोड़ा जाता है। उदाहरणार्थ-सांची की मूर्तिकला में ऐसा दृश्य है जो वेसान्तर जातक से मिलता है। इसमें एक दानी राजकुमार अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंपकर जंगल में चला जाता है।

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2. सांची की मूर्तिकला को समझने के लिए इतिहासकारों को बुद्ध के चरित्र लेखन से भी सहायता मिलती है। बौद्ध चरित्र लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर उनकी उपस्थिति प्रतीकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए रिक्त स्थान से।

3. बुद्ध के ध्यान की दशा तथा स्तूप परिनिर्वाण के प्रतीक बन गये। चक्र का भी प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है। यह बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक था।

4. सांची की मूर्तिकला को समझने के लिए इतिहासकारों को लोक परम्परा को समझना पड़ता है। सांची में एक जैसी अनेक मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। इनका सीधा संबंध बौद्ध धर्म से नहीं है। कुछ सुन्दर स्त्रियाँ जो तोरणद्वारों के किनारे एक पेड़ पकड़कर झूल रही हैं। इसे शालभंजिका की मूर्ति कहा जाता है। यह उर्वराशक्ति की प्रतीक है।

5. सांची के स्तूप में कई स्थानों पर हाथी, घोड़े, बंदर और गाय, बैल आदि उत्कीर्ण हैं। संभवतः ये मूर्तियाँ मनुष्य के गुणों की प्रतीक हैं। उदाहरणार्थ की मूर्ति शक्ति का प्रतीक है।

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प्रश्न 7.
चित्र 4.2 और 4.3 में सांची से लिए एक दो परिदृश्य दिए गए हैं आपको इनमें क्या नजर आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन-से ग्रामीण और कौन-से शहरी परिदृश्य हैं?

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Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें सांस्कृतिक विकास img 3

उत्तर:
चित्र 4.2 में कुछ स्त्रियों को आभूषण धारण किये हुए दिखाया गया है। इस चित्र की बायीं ओर दो झोपड़ियाँ हैं। इनके दरवाजे पर स्त्रियाँ बैठी हुई हैं। इसमें कुछ जानवरों यथा-हिरण, भैंस और घास-फूस की आकृतियाँ हैं। इसमें कुछ योद्धाओं के चित्र हैं जो धनुष-बाण धारण किये हैं और इसके बायीं ओर एक पेड़ है। इसके नीचे सम्भवतः तालाब है जिसमें भैंसे नहा रही हैं। कुछ फर्न और शैवाल भी दिखाये गये हैं। इसके नीचे रेलिंग है। निश्चित रूप से यह ग्रामीण परिदृश्य है।

चित्र 4.3 में सुन्दर पक्के स्तम्भ हैं जिसके ऊपर विभिन्न जानवर यथा-घोड़े, हाथी, शेर आदि दिखाये गये हैं। सम्भवतः यह एक हाल है जिसमें नृत्य संगीत का कार्यक्रम चल रहा है और नगरवासी एकत्रित हैं। नीचे भी वही दृश्य है परंतु भवन के झरोखे भी दिखाई दे रहे हैं। यह निश्चित रूप से शहरी परिदृश्य है।

प्रश्न 8.
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला का विकास: वैष्णववाद वह मत है जिसमें भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। विष्णुवाद के अनुयायी विष्णु को सर्वोच्च मानते हैं तथा हरि के नाम से पुकारते हैं। उनकी बड़ी श्रद्धा से पूजा करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि विष्णु ने भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न रूपों में इस धरती पर अवतार लिये। यह अवतार कभी मानव तथा कभी पशु के रूप में प्रकट होते थे। भगवान विष्णु विश्व को संकट से मुक्त कराने के लिए धरती पर बार-बार जन्म लेते हैं। इन अवतारों की संख्या दस है:

  1. मत्स्य
  2. कूर्म
  3. वराह
  4. नरसिंह
  5. वामन
  6. परशुराम
  7. राम
  8. कृष्ण
  9. बुद्ध
  10. कल्कि।

विष्णु की भक्ति से सम्पूर्ण मानव जाति को सुख प्राप्त होता है। विष्णु के कई अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया है। दूसरे देवताओं की भी मूर्तियों बनाई गईं। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था। लेकिन उन्हें कई बार मनुष्य के रूप में दिखाया गया है।

शैववाद में शिव और पार्वती की पूजा की जाती है। लगता है शैववाद सैन्धव सभ्यता से आरंभ हो गया था। वहाँ से अनेक शिवलिंग मिले हैं। शैववाद का उदय ऋग्वेद में दिये गये रुद्र के विचार से हुआ है। शिवजी को नृत्य का देवता अथवा नटराज भी कहते हैं।

शैव मत के अनुयायी शिव व पार्वती को महादेव और महादेवी कहते हैं। पार्वती सुन्दरता तथा नम्रता की देवी है। उसकी दुर्गा अथवा काली के रूप में भी पूजा की जाती है। कुछ शिवभक्त शिव के प्रतीक लोहे के त्रिशूल हाथ में उठाये रखते हैं। अन्य शिवभक्त शिवजी की लिंग के रूप में पूजा करते हैं।

उत्तरी भारत में शिवजी की कई अन्य रूपों में पूजा की जाती है जैसे कि रूद्र, नानीरुद्र, नंदीश, हर, नरेन्द्र, महाकाल, भैरव आदि । आरंभिक शैववाद को पशुपति संप्रदाय कहा जाता था । अर्थात् उन्हें पशुओं का देवता माना जाता था। शिव को बाद में स्वामी अथवा पति माना जाता था इन्हें जीवों को मुक्ति प्रदाता समझा जाता था।

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 9.
स्तूप क्यों और कैसे बनाये जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्तूप निर्माण के कारण:
स्तूप एक पवित्र स्थान माना जाता है क्योंकि इन स्थानों पर महात्मा बुद्ध की अस्थियाँ या उससे सम्बन्धित वस्तुएँ दबायी गई हैं। टीलेनुमा इन स्तूपों की बुद्ध तथा बौद्धधर्म के प्रतीक मानकर पूजा की जाती थी।

अशोकावदान से ज्ञात होता है कि अशोक ने सभी प्रसिद्ध नगरों में स्तूप बनाने का आदेश दिया था। भरहुत, सांची सारनाथ के स्तूप सा०यु०पू० द्वितीय शताब्दी तक बन गये थे।

स्तूप निर्माण की विधि:
इन स्तूपों का निर्माण दान द्वारा किया गया था। दान देने वालों में राजा, शिल्पकार और व्यापारी आदि शामिल थे। इसमें कुछ पुरुष, महिलायें, भिक्षुक और भिक्षुणियाँ भी शामिल थीं। आरंभ में स्तूप अर्द्धगोलाकार रूप में जमाई गई मिट्टी के बनाए जाते थे।

इसे अंड भी कहने थे। आगे चलकर इसमें अनेक वस्तुएँ जुड़ गईं। यह चौकोर और गोल आकारों का मिश्रित रू; बना। अंड के ऊपर छज्जे जैसी आकृति या हर्मिक बनने लगी थी। इसको देवताओं का निवा: माना जाता था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे। स्तूप के चारों ओर वेदिका होती थी। सांची और भरहुत के स्तूपों में तोरणद्वार और वेदिकायें हैं। ये बांस या लकड़ी के घेरे होते थे। इसी प्रकार की कुछ अन्य संरचनायें कुछ दूसरे स्तूपों में मिलती हैं।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइये जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइये।
उत्तर:

Bihar Board Class 12 History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और ईमारतें सांस्कृतिक विकास img 4

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परम्पराओं में से क्या कोई परम्परा आपके अड़ोस-पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 12.
इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परम्पराओं से जुड़े अलग-अलग काल और इलाकों की कम से पाँच मूर्तियों और चित्रों की तस्वीरें इकट्ठी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

Bihar Board Class 12 History विचारक, विश्वास और ईमारतें : सांस्कृतिक विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
साण्युपू0 600 से सायु० 600 तक सांस्कृतिक विकास जानने के कौन-कौन से स्रोत हैं?
उत्तर:

  1. साहित्यिक स्रोतों में बौद्ध, जैन और ब्राह्मणों ग्रंथों से जानकारी मिलती है।
  2. पुरातात्विक साधनों में इमारतों, अभिलेखों एवं सांची के स्तूप से विशेष जानकारी मिलती है।

प्रश्न 2.
सांची कहाँ स्थित है?
उत्तर:

  1. यह भोपाल से 20 मील पर उत्तर-पूर्व की ओर पहाड़ी की तलहटी में स्थित एक गाँव है।
  2. यहाँ प्राचीन अवशेषों की भरमार है जिसमें बौद्धकालीन तोरणद्वार और पत्थर की मूर्तियाँ मिलती हैं।

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प्रश्न 3.
सायु०पू० प्रथम शताब्दी को विश्व में युगांतरकारी काल क्यों माना जाता है?
उत्तर:

  1. इस युग में ईरान में जरथुस्ट, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और भारत में महावीर, बुद्ध और अन्य चिंतकों का जन्म हुआ।
  2. उन्होंने जीवन के रहस्यों, जनता और विश्व व्यवस्था के संबंध को समझने का प्रयास किया।

प्रश्न 4.
सांची स्तूप के अवशेषों को यूरोपीय लोगों से कैसे बचाया जा सका?
उत्तर:
शाहजहाँ बेगम के अथक प्रयासों से।

प्रश्न 5.
निर्वाण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बौद्ध साहित्य में निर्वाण का अर्थ जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना है। यह हमेशा मनुष्य के सत्कार्यों से संभव होता है।

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प्रश्न 6.
तीर्थंकर का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. जैन धर्म के संस्थापक महावीर से पहले के 23 धर्म गुरुओं या आचार्यों को तीर्थंकर कहते हैं। महावीर स्वामी को 24 वाँ तीर्थंकर माना जाता है।
  2. जैन लोग तीर्थंकरों की पूजा करते हैं। ये जैनों के लिए हिन्दुओं के देवताओं के समान थे।

प्रश्न 7.
उपनिषदों में किस प्रकार के विचार मिलते हैं?
उत्तर:

  1. उपनिषद् के विचारों से प्रकट होता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के इच्छुक थे।
  2. लोग ऐसा उपाय या मार्ग पाने के इच्छुक थे जो उन्हें परम यथार्थ की प्रकृति को समझ सके और उसको अभिव्यक्त करने की योग्यता दे सके।
  3. यज्ञों के महत्त्व के बारे में भी विचार मिलते हैं।

प्रश्न 8.
त्रिपिटक का क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. विनय पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था।
  2. सुत्तपिटक में बुद्ध की शिक्षायें हैं।
  3. अभिधम्म में दर्शन से जुड़े विषय है।

प्रश्न 9.
सुत्तपिटक के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के पश्चात् उसके तत्त्व कहाँ मिल जाते हैं?
उत्तर:
इसके अनुसार मृत्यु पश्चात् मनुष्य के शरीर का मिट्टी वाला अंश पृथ्वी में, जल वाला हिस्सा जल में, गर्मी वाला अंश आग में तथा सांस का अंश वायु में वापस मिल जाता है। इसी तरह इन्द्रियाँ भी अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है।

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प्रश्न 10.
श्वेताम्बर का क्या अर्थ है?
उत्तर:

  1. जैन धर्म का वह सम्प्रदाय जो श्वेत वस्त्र धाण करता था उसे श्वेताम्बर कहा गया।
  2. इस सम्प्रदाय के अनुयायी प्रायः उत्तर भारत में थे।

प्रश्न 11.
सुत्तपिटक के अनुसार मालिकों को सेवकों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए।
उत्तर:
मालिक को अपने नौकरों और कर्मचारियों की पाँच प्रकार से देखभाल करनी चाहिए

  1. उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें काम देकर।
  2. उन्हें भोजन और मजदूरी देकर।
  3. बीमार पड़ने पर उनकी परिचर्या करके।
  4. उनके साथ सुस्वाद भोजन बांटकर।
  5. समय-समय पर उन्हें अवकाश देकर।

प्रश्न 12.
मध्यम मार्ग का क्या आशय है?
उत्तर:
मध्यम मार्ग का अर्थ है-विलासिता और कठोर तपस्या दोनों मार्गों से हटकर सहज जीवन बिताना।

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प्रश्न 13.
अष्टांगिक मार्ग क्या है?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध द्वारा निर्वाण प्राप्त करने के लिए जिस मार्ग को अपनाने के लिए कहा गया उसे अष्टांगिक मार्ग कहा जाता है। इस मार्ग के आठ अंग निम्नलिखित हैं –

  1. सम्यक् दृष्टि
  2. सम्यक् वचन
  3. सम्यक् जीविका
  4. सम्यक् स्मृति
  5. सम्यक् संकल्प
  6. सम्यक् कर्म
  7. सम्यक् व्यायाम
  8. सम्यक् समाधि।

प्रश्न 14.
हीनयान सम्प्रदाय के बारे में क्या जानते हैं?
उत्तर:

  1. हीनयान सम्प्रदाय के लोग बौद्ध धर्म के प्राचीन स्वरूप को मानते हैं। वे कट्टरपंथी हैं तथा बौद्ध धर्म के कठोर नियमों का पालन करने पर जोर देते हैं।
  2. उनके विचार से अष्टांगिक मार्ग अपनाकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 15.
वज्रयान का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सातवीं शताब्दी में बौद्ध विहार विलासिता के केन्द्र बन गये। अब वहाँ वे सभी कार्य किये जाने लगे जिनपर बुद्ध ने प्रतिबंध लगाया था। बौद्ध धर्म के इस नये स्वरूप को वज्रयान कहा गया।

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प्रश्न 16.
सांची के स्तूप में जानवरों की आकृतियों क्यों उत्कीर्ण हैं?
उत्तर:
मनुष्यों के गुणों का प्रतीक मानकर ही वहाँ जानवरों की आकृतियाँ उत्कीर्ण की गई हैं। उदाहरणार्थ-हाथी की आकृति शक्ति और ज्ञान की प्रतीक है।

प्रश्न 17.
अजन्ता के चित्रों की प्रमुख विशेषतायें बताइए।
उत्तर:

  1. अजंता के चित्र जातकों की कथायें दिखाते हैं। इनमें राजदरबार का जीवन, शोभा यात्रायें, काम करते हुए स्त्री-पुरुष और त्यौहार मनाने के चित्र दिखाए गए हैं।
  2. कलाकारों ने त्रिविम रूप देने के लिए आभाथेद तकनीक का प्रयोग किया । कुछ चित्र बिल्कुल स्वाभाविक और सजीव लगते हैं।

प्रश्न 18.
गजलक्ष्मी क्या है?
उत्तर:

  1. सांची की मूर्तियों में कमल दल और हाथियों के बीच महिला की मूर्ति उत्कीर्ण है। ये हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं।
  2. अनेक इतिहासकार उन्हें एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं। गजलक्ष्मी सौभाग्य लाने वाली देवी थी जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है।

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प्रश्न 19.
थेरीगाथा क्या है?
उत्तर:

  1. यह एक अद्वितीय बौद्ध ग्रंथ है जो सुत्तपिटक का हिस्सा है। इसमें भिक्षुणियों द्वारा रचित छंदों का संकलन किया गया है।
  2. इससे महिलाओं के सामाजिक और अध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है।

प्रश्न 20.
चैत्य किसे कहते हैं?
उत्तर:

  1. शवदाह के पश्चात् शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिये जाते थे।
  2. अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले ही चैत्य माने गये।

प्रश्न 21.
चार बौद्ध स्थल कहाँ-कहाँ स्थित हैं?
उत्तर:

  1. लुम्बिनी: यहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था। यह स्थल नेपाल में है।
  2. बोधगया: यहाँ उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया। यह स्थान बिहार में है।
  3. सारनाथ: यह स्थान वाराणसी, उत्तर प्रदेश में है। यहाँ बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था।
  4. कुशीनगर: यह स्थान देवरिया, उत्तर प्रदेश में है। यहाँ बुद्ध ने परिनिर्वाण प्राप्त किया था।

प्रश्न 22.
अमरावती के स्तूप की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  1. अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था।
  2. इसमें ऊँचे-ऊँचे तोरणद्वार तथा सुंदर मूर्तिया थीं।

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प्रश्न 23.
बोधिसत्व की अवधारणा क्या है?
उत्तर:

  1. बोधिसत्व को एक दयावान जीव माना गया जो सत्कर्मों से पुण्य कमाते थे।
  2. इस पुण्य का प्रयोग वे निर्वाण प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि दूसरों की सहायता करने के लिए करते थे।

प्रश्न 24.
सांची क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:

  1. सांची का स्तूप प्राचीन भारत की स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। पहाड़ी पर स्थित यह स्तूप एक मुकुट सा दिखाई देता है।
  2. सांची के स्तूप से बौद्ध धर्म का इतिहास लिखने हेतु पर्याप्त जानकारियाँ मिली। सांची बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

प्रश्न 25.
नियतवादी और भौतिकवादी किस प्रकार भिन्न थे?
उत्तर:

  1. नियतवादी आजविक परम्परा के थे। उनके अनुसार जीवन में सब कुछ पूर्व निर्धारित है। इसे बदला नहीं जा सकता।
  2. भौतिकवादी उपदेशक लोकायत परम्परा के थे। वे दान-दक्षिणा, चढ़ावा आदि देने को खोखला झूठ और मूों का सिद्धांत मानते थे। वे जीवन का भरपूर आनन्द लेने में विश्वास रखते थे।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वैदिक-काल की यज्ञ-परम्परा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वैदिक-काल की यज्ञ परम्परा:

  1. सा०यु०पू० 1500 से सा०यु०पू० 1000 तक वैदिक परम्परा का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता हैं। यह एक प्राचीन परम्परा थी।
  2. यज्ञों के समय वैदिक देवताओं अग्नि, इन्द्र और सोम आदि का उच्चारण किया जाता था। ऋग्वेद इनका संग्रह है।
  3. इन यज्ञों के माध्यम से लोग मवेशी, पुत्र प्राप्ति, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि पाने के लिए प्रार्थना करते थे।
  4. प्रारंभ में यज्ञ सामूहिक रूप से किये जाते थे। उत्तर वैदिक-काल (1000 साव्यु०पू० से 500 सा०यु०पू०)। कुछ यज्ञ गृहस्थियों द्वारा किये जाते थे।
  5. राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे। इनके अनुष्ठान के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।

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प्रश्न 2.
भारतीय जीवन पर जैन धर्म के क्या प्रभाव पड़े? अथवा, जैन धर्म का कला तथा स्थापत्य के विकास में योगदान बताइए।
उत्तर:
भारतीय जीवन पर जैन धर्म के महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। जैन धर्म ने जाति-प्रथा का खण्डन किया। इस कारण देश में जाति-प्रथा के बंधन शिथिल पड़ गए। इस मत के सरल सिद्धांतों की लोकप्रियता को देखकर ब्राह्मणों ने पशु-बलि, कर्मकांड तथा अन्य कुरीतियों का त्याग कर दिया। अब वैदिक धर्म एक बार फिर से सरल रूप धारण करने लगा। जैन धर्म में अहिंसा पर बल दिया गया था।

इस सिद्धांत को अपना कर लोगों ने मांस खाना छोड़ दिया और वे शाकाहारी बन गए। जैनियों ने अपने तीर्थंकरों की स्मृति में विशाल मंदिर तथा मठ बनवाए। दिलवाड़ा का जैन मंदिर, आबू पर्वत का जैन मंदिर, एलोरा की गुफाएँ तथा खजुराहों के जैन मंदिर कला के सर्वोत्तम नमूने हैं। इस धर्म के कारण कन्नड़, हिन्दी, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के साहित्य ने भी बड़ी उन्नति की।

प्रश्न 3.
बौद्ध ग्रंथ किस प्रकार तैयार और संरक्षित किये जाते थे?
उत्तर:
बौद्ध ग्रंथ की तैयारी और संरक्षण –

  1. महात्मा बुद्ध चर्चा और बातचीत करते हुए मौखिक शिक्षा देते थे। पुरुष, महिलायें और संभवत: बच्चे इन प्रवचनों को सुनते थे और इन पर चर्चा करते थे।
  2. बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में नहीं लिखा गया। उनके उपदेश चर्चा के रूप में ही सुरक्षित थे।
  3. बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् पाँचवी-चौथी शताब्दी सा०यु०पू० में उनके शिष्यों ने वरिष्ठ श्रमणों की वैशाली में एक सभा बुलाई। वहाँ पर उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया।
  4. इन संग्रहों को त्रिपिटक कहा जाता था। प्रारंभ में उन्हें मौखिक रूप से संप्रेषित किया जाता था। बाद में लिखकर विषय और लम्बाई के अनुसार वर्गीकरण किया गया।

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प्रश्न 4.
सामान्य युग पूर्व छठी शताब्दी में नये धार्मिक सम्प्रदायों का उदय होने के कारण बताइये।
उत्तर:

  1. हिन्दू धर्म में कर्मकाण्डों की प्रधानता: ब्राह्मणों तथा पुरोहितों द्वारा अपनी स्वार्थ-सिद्धि के कारण हिंदू धर्म में जटिलता बढ़ गई। साधारण व्यक्ति इस कर्मकाण्डी व्यवस्था को बोझ समझने लगा। पशु बलि के कारण धर्म की पवित्रता समाप्त हो गई।
  2. संस्कृत भाषा का दुरुह होना: वैदिक धर्म की भाषा संस्कृत होने के कारण धर्म साधारण व्यक्ति की समझ से परे हो गया। धर्म के सिद्धांतों को प्रत्येक व्यक्ति अपनी दिन-प्रतिदिन की भाषा में समझना चाहते थे। बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के प्रवर्तकों द्वारा जन-भाषा में धार्मिक उपदेश दिये गये।
  3. नवीन कृषि-व्यवस्था: कृषि के विस्तार के कारण बैलों तथा अन्य पशुओं की माँग बढ़ने लगी। हिंदू धर्म में बलि के कारण इन पशुओं का अभाव होता जा रहा था। जैन तथा बौद्ध धर्म द्वारा अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया।
  4. दोषपूर्ण वर्ण-व्यवस्था: जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म के उद्भव का एक महत्त्वपूर्ण कारण दोषपूर्ण वर्ण-व्यवस्था थी। वर्ण-व्यवस्था के कठोर नियमों के अन्तर्गत शूद्रों को समस्त प्रकार के मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया गया।

प्रश्न 5.
हीनयान और महायान में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
हीनयान और महायान में अंतर:
1. मूर्ति पूजा:
महायान धर्म वाले बुद्ध को देवता मानने लगे, जबकि हीनयान वाले बुद्ध को केवल महान् मनुष्य ही समझते थे और बुद्ध की मूर्तियाँ बनाने के पक्ष में नहीं थे। महायान धर्मावलम्बियों ने इसके विपरीत उनकी पत्थर की मूर्तियाँ बनानी आरंभ कर दी।

2. तर्क के स्थान पर विश्वास:
हीनयान मत वाले व्यक्तिगत प्रयत्न और अच्छे कर्मों पर जोर देते थे। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है, “जब देवता भी बुरे कर्मों के फल से नहीं बच सकते तो देवताओं की पूजा करने से क्या लाभ ?” परंतु महायान वाले विश्वास और पूजा पर अधिक जोर देते थे, इसलिए उन्होंने बुद्ध की पूजा करनी आरंभ कर दी। इस प्रकार तर्क का स्थान विश्वास ने ले लिया।

3. पाली भाषा के स्थान पर संस्कृत:
महायान सम्प्रदाय की बहुत सी पुस्तकें संस्कृत भाषा में लिखी गईं, जबकि हीनयान सम्प्रदाय वालों की सभी पुस्तकें पाली भाषा में हैं।

4. बौद्ध भिक्षुओं की उपासना:
महायान धर्म में न केवल बुद्ध को भगवान मानकर उनकी उपासना आरंभ हो गई अपनी उपासना और पवित्रता के कारण प्रसिद्धि पाने वाले भिक्षुओं की उपासना भी की जाने लगी और उनकी मूर्तियाँ बनाकर बौद्ध मंदिरों में रखी जाने लगीं।

5. निर्वाण की अपेक्षा स्वर्ग:
महायान मत वालों ने भी अब जन-साधारण के सामने स्वर्ग: को अपनी अंतिम मंजिल बताया। यह परिवर्तन जन-साधारण को आकर्षित करने के लिए किया गया था। वास्तव में बौद्ध धर्म वाले यह अनुभव कर रहे थे कि हिन्दू धर्म उनसे अधिक प्रचारित है, इसलिए उन्होंने ऐसे ढोंग रचने आरंभ किये।

6. प्रार्थना तथा भेंट:
महात्मा बुद्ध ने प्रार्थना और बलि की आवश्यकता पर बल नहीं दिया था। परंतु महायानी बौद्धों ने महात्मा बुद्ध को भगवान मानकर उनकी प्रार्थना आरंभ कर दी । फल–फूल की भेंट भी दी जाने लगी। इस प्रकार बौद्ध धर्म में भी हिन्दू धर्म के तत्वों का समावेश होने लगा। बुद्ध को अवतार समझा जाने लगा।

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प्रश्न 6.
बौद्ध धर्म में परिवर्तन की घटना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
बौद्ध धर्म में परिवर्तन की घटना : महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् कुछ समय तक भिक्षुओं ने बड़ा पवित्र जीवन व्यतीत किया, जिसके कारण वे लोगों में बड़े प्रिय हो गये थे। धीरे-धीरे उन्होंने संघ के नियमों की अवहेलना करनी आरंभ कर दी।

भिक्षुओं को ऐसा प्रतीत होने लगा कि उनके लिए बुद्ध के बनाए हुए नियमों पर चलना कठिन हो गया है। इससे बौद्ध। धर्म के अनुयायियों में मतभेद पैदा होने लगे। धीरे-धीरे मतभेद इतने बढ़ गए कि पहली शताब्दी सा०यु० में बौद्ध धर्म दो भागों में बँट गया –

  1. हीनयान मत वाले पुराने धर्म को, जिसकी नींव बुद्ध ने रखी थी, और
  2. महायान वाले धर्म के परिष्कृत स्वरूप को मानते थे। इस घटना को बौद्ध धर्म में परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 7.
बौद्ध धर्म ने धार्मिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर:
धार्मिक जीवन पर प्रभाव:

  1. बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने हिन्दू धर्म की बुराइयों को लोगों के सामने रखा। इससे हिन्दू-धर्म का स्वरूप सुधरने लगा।
  2. बौद्ध लोगों ने जाति-पाँति और ऊँच-नीच का विरोध करके धार्मिक एकता की भावना को बढ़ाया।
  3. महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ बनती देखकर हिन्दुओं ने भी अपने देवताओं की मूर्तियाँ बनानी शुरू कर दी। इससे मूर्तिकला ने निखार पाया।
  4. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० वी० ए० स्मिथ (Dr. V.A. Smith) के अनुसार हिन्दू धर्म और बौद्ध मत वालों के बीच विविध परिचर्चाओं एवं गोष्ठियों ने भक्ति के विभिन्न सम्प्रदायों को जन्म दिया और भक्ति-भावना बढ़ने लगी।

प्रश्न 8.
बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के क्या कारण थे?
उत्तर-बौद्ध धर्म की लोकप्रियता के कारण:
1. बौद्ध धर्म में संघ का योगदान:
धर्म का प्रचार करने के लिए इस धर्म में संघों की स्थापना की गई। इनमें पढ़ने तथा पढ़ाने का काम होता था, प्रचार करने के कार्यक्रम बनाए जाते थे और बुरे तथा अपवित्र भिक्षुओं को दण्ड दिया जाता था। इन संघों के माध्यम से प्रचार का काम सुव्यवस्थित ढंग से होता रहा और बौद्ध धर्म लगातार उन्नति करता रहा।

2. समय के साथ परिवर्तन:
बहुत से हिन्दू लोग बौद्ध धर्म की सरलता और सिद्धांतों से आकर्षित होकर इस धर्म में आ गये परंतु उनके लिए राम, कृष्ण, इन्द्र आदि. की पूजा छोड़ना बहुत कठिन था। बौद्ध धर्म ने यह देखकर धीरे-धीरे हिन्दू धर्म की कुछ ऐसी बातें अपना ली जिन्हें जन-साधारण के लिए छोड़ना बहुत कठिन था। बौद्ध धर्म की महायान शाखा में रहकर लोग हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करते हुए भी महात्मा बुद्ध की शिक्षा पर चल सकते थे। इस प्रकार बौद्ध धर्म और भी लोकप्रिय हो गया।

3. बौद्ध धर्म में विश्वविद्यालय:
इसके अतिरिक्त बौद्ध धर्म के प्रचार में तक्षशिला विश्वविद्यालय, गया के महाबोधि विश्वविद्यालय तथा नालंदा विश्वविद्यालय ने विशेष योगदान दिया। इन विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्र भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। वे बुद्ध धर्म के तत्वों से प्रभावित हुए और वापस लौटने के बाद उन्होंने अपने-अपने देशों में भी बौद्ध धर्म का प्रचार किया।

4. राज्य संरक्षण:
बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में राजकीय संरक्षण का विशेष हाथ रहा । अशोक, कनिष्क, हर्षवर्धन जैसे अनेक राजाओं ने बौद्ध धर्म को अपनाया तथा इसको राज्यधर्म घोषित करके उसके प्रचार के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दी। भिक्षुओं की राजकोष से सहायता की गई और उन्हें हर प्रकार की सुविधाएँ दी गईं।

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प्रश्न 9.
बौद्ध धर्म का सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
बौद्ध धर्म पर सामाजिक जीवन का प्रभाव: बौद्ध धर्म ने भारतीय समाज को अनेक प्रकार से प्रभावित किया:

  1. बौद्ध मत वालों ने जाति-प्रथा का घोर विरोध किया और सब लोगों को बराबरी का स्थान दिया। इस प्रकार धीरे-धीरे जाति-प्रथा की दृढ़ता दूर होती गई। लोगों में भेदभाव घटने से भाईचारा बढ़ा और जिससे भारतीय समाज एकता के सूत्र में बँधा।
  2. बौद्ध धर्म को छोड़कर वापस हिन्दू धर्म में आने पर लोगों ने अपनी नई जातियाँ बना ली।
  3. लोगों में मांस खाने की प्रवृत्ति कम हो गई और वे मांसाहारी से शाकाहारी बन गए।
  4. किसी जीव-जन्तु को दु:ख न देने की अहिंसा भावना से समाज को एक नई अन्तर्दृष्टि और शक्ति प्रदान की।

प्रश्न 10.
बुद्ध के अनुयायियों में कौन-कौन से वर्ग शामिल थे?
उत्तर:
बौद्ध अनुयायियों के वर्ग:

  1. अनुयायियों में कुछ ऐसे भिक्षु थे जो धम्म के शिक्षक या श्रमण बन गये। उनका जीवन सादा होता था और शिक्षा धर्म अपनाकर जीवन-यापन करने लगे।
  2. बुद्ध के प्रिय शिष्य आनन्द ने महिलाओं को भी बौद्ध धर्म में शामिल कराया। आगे चलकर कई महिलायें धम्म की उपदेशिकाएँ और कुछ थेरी भी बनीं। थेरी ऐसी महिलायें थीं जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया था।
  3. अन्य वर्ग क्रमशः राजा, धनवान, गृहपति और सामान्यजन, कर्मकार, दास तथा शिल्पी थे।

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प्रश्न 11.
गांधार कला के विषय में एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।
उत्तर:
गांधार कला:
1. प्रारंभ कला:
गांधार शैली भारतीय कला के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। सम्भवतः गांधार कला का आविर्भाव द्वितीय शताब्दी सा०यु०पू० तक हो चुका था। कनिष्क के शासनकाल में गांधार कला अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुँच गयी थी। गांधार कला के प्रमुख केन्द्र थे-तक्षशिला तथा पुरुषपुर आदि। यह यूनानी तथा भारतीय शैली का समन्वय है।

2. विषय:
गांधार कला की विषय-वस्तु भारतीय है लेकिन इसकी तकनीक यूनानी है। यूनानी शिल्पकारों तथा कलाकारों के धार्मिक विचारों के आधार पर यूनानी रूप तथा वेशभूषा में भगवान बुद्ध की प्रतिमायें निर्मित हैं।

3. विभिन्न नाम:
यूनानी प्रभाव के कारण गांधार कला को इण्डो-ग्रीक, इण्डो-बैक्ट्रियन, इण्डो-हैलेमिक, इण्डो-रोमन, ग्रीको-रोमन तथा ग्रीको-बुद्धिस्ट कला के नाम से भी पुकारा जाता है लेकिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इसे गांधार कला ही कहा जाता है।

4. विशेषताएँ:

  • (क) गांधार कला की विषय-वस्तु भारतीय तथा तकनीक यूनानी है।
  • (ख) गांधार कला में निर्मित मूर्तियाँ साधारतणया स्लेटी पत्थर की हैं।
  • (ग) भगवान् बुद्ध के बाल (hair) यूनानी तथा रोम की शैली में बनाये गये।
  • (घ) मूर्तियों से दर्शित शरीर के अंगों को ध्यानपूर्वक बनाया गया है। मूर्तियों में मोटे तथा सिलवटदार वस्त्र दर्शाए गये हैं।
  • (ड) गांधार शैली में धातु कला तथा अध्यात्म कला का अभाव है।
  • (च) गांधार शैली में बुद्ध यूनान के अपोलो देवता के समान लगते हैं। यह सम्भवतः यूनानी प्रभाव के कारण है।

प्रश्न 12.
बौद्ध धर्म की सांस्कृतिक क्षेत्र में क्या देन है?
उत्तर:
सांस्कृतिक प्रभाव या सांस्कृतिक क्षेत्र में देन:
बौद्ध धर्म ने शिक्षा एवं कला के क्षेत्र में भी अपना अप्रतिम योगदान दिया –
1. बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर ही अशोक, हर्ष और कनिष्क जैसे राजाओं ने सारे देश को सुन्दर विहारों, स्तूपों, मठों, मूर्तियों और स्तम्भों आदि से सजा दिया था। अशोक के बनाये हुए स्तम्भ आज भी अपनी कल्पना के लिए अद्वितीय है। कनिष्क के शासन काल में गांधार कला ने बड़ी उन्नति की। इस काल के बने हुए नमूने, विशेषकर बुद्ध की मूर्तियाँ, अपने सौन्दर्य में अद्वितीय हैं।

2. साहित्य के क्षेत्र में भी बौद्ध धर्म की हजारों पुस्तकें जन-साधारण की भाषा ‘प्राकृत’ में लिखी गईं। इस प्रकार जन-साधारण की भाषा में कए गोल्डेन सीरिज पासपोर्ट टू (उच्च माध्यमिक) एक नए साहित्य का विकास हुआ। ये साहित्यिक पुस्तकें ऐसी निधि हैं जिसके लिए भारत को अब तक बड़ा गर्व हैहै।

3. बौद्ध धर्म के प्रचारक अन्य देशों में धर्म-प्रचार करने के लिए गए। उनके साथ-साथ भारतीय संस्कृति भी अन्य देशों में फैल गई और भारत का उन देशों के साथ व्यापार सम्पर्क बढ़ने लगा। इस प्रकार आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में भी बौद्ध धर्म की बड़ी देन है।

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प्रश्न 13.
गुप्तकालीन कलाओं पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गुप्तकालीन कला:
1. वास्तुकता:
गुप्त-काल सृजन और विकास का युग था। एक ओर वास्तुकला की पूर्ववर्ती कला शैली का चरमोत्कर्ष और दूसरी ओर मंदिर वास्तुकता का विकास भी इसी काल में हुआ।

2. गुफा वास्तुकला:
इसका उत्कर्ष अजन्ता की गुफाओं में देखने को मिलता है।

3. मंदिर-निर्माण कला:
फाह्यान के लेखों से पता चलता है कि बड़े-बड़े नगरों में अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ। इनमें देवगढ़ का पाषाण निर्मित मंदिर और भितरगांव का मंदिर अद्भुत मूर्ति कला के लिए प्रसिद्ध है। भूमर का शिव मंदिर और खोह का एकमुखी शिवलिंग भी प्रसिद्ध है। सारनाथ का धुमेख स्तूप और नालंदा का बौद्ध मंदिर भी इसी काल में बने।

4. मूर्तिकला:
सारनाथ और मथुरा केन्द्र थे। बुद्ध की मूर्तियों के साथ-साथ अब शिव, विष्णु, कार्तिकेय, सूर्य आदि की मूर्तियाँ भी बनाई जाने लगीं। यह कला गांधार और कुषाणकाल की कलाओं से भी अधिक उन्नत थी।

प्रश्न 14.
भारतीय कला में मथुरा कला का क्या योगदान है?
उत्तर:
मथुरा कला का योगदान:
मथुरा की मूर्तिकला का आरंभ पहली शताब्दी सा०यु० में हुआ। इस शैली की मूर्तियाँ इतनी अधिक लोकप्रिय हुईं कि उन्हें तक्षशिला, मध्य एशिया, उत्तरी-पश्चिमी प्रदेश, सरस्वती और सारनाथ आदि प्रदेशों को भेजा गया और भारत के सभी मंदिरों में इन्हें लगाया गया।

मथुरा में मूर्तियाँ लाल रेत के पत्थरों से बनाई जाती थी और उन पर पॉलिश की जाती थी। मथुरा के नागराटे नामक स्थान पर कनिष्क की बिना सिर की मूर्ति और खड़ी हुई लाटें, बुद्ध की कई मूर्तियाँ और यक्ष और यक्षी की मूर्तियाँ इसी कला में बनाई गई हैं। आरंभिक काल में इस स्कूल पर शायद जैन धर्म का प्रभाव पड़ा था। मथुरा के दस्तकारों ने बहुत-सी ऐसी मूर्तियाँ बनायी हैं जिनमें तीर्थंकर पांव पर पांव रखकर ज्ञान-मुद्रा में दिखाए गए हैं।

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प्रश्न 15.
सांची क्यों बच गया जबकि अमरावती नष्ट हो गया?
उत्तर:
सांची स्थल के बचने और अमरावती के नष्ट होने के कारण:
1. अमरावती के स्तूप की खोज साँची-स्तूप से थोड़ा पहले (1796) हो चुकी थी। तब तक विद्वान इस बात के महत्त्व को नहीं समझ पाये थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना महत्त्वपूर्ण होता है।

2. अमरावती स्तूप के पत्थरों को उठाकर दूसरी जगह ले जाया गया। यही नहीं वहाँ की मूर्तियों को भी संग्रहालयों में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके कारण स्तूप का महत्त्वपूर्ण अवशेष दूसरे स्थानों पर चला गया।

3. सांची की खोज 1818 सा०यु० में हुई। इसके तीन तोरणद्वार खड़े थे और चौथा वहीं पर गिरा हुआ था। टीला भी अच्छी हालत में था। इस स्तूप के तोरणद्वारों को पेरिस या लंदन भेजने की योजना बनाई गई लेकिन राजकीय संरक्षण के कारण अंग्रेजों को इसके स्थान पर प्लास्टिक की प्रतिमूर्तियाँ दे दी गई थी।

प्रश्न 16.
बौद्ध संघ की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
बौद्ध संघ की प्रमुख विशेषतायें:

  1. इसके सदस्य भिक्षु होते थे क्योंकि वे भिक्षा माँगकर जीविका चलाते थे।
  2. आरम्भ में बौद्ध संघ में केवल पुरुष शामिल होते थे, परंतु बाद में महिलाओं को भी अनुमति दे दी गयी। बुद्ध की सौतेली माँ महाप्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश पाने वाली पहली भिक्षुणी थी। संघ में कई महिलायें धम्म की उपदेशिकायें बन गईं। आगे चलकर वे थेरी बनीं जिसका अर्थ ऐसी महिलाओं से है जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया है।
  3. यद्यपि बौद्ध संघ के सदस्य विभिन्न सामाजिक वर्गों के थे परंतु सभी का दर्जा समान माना जाता था।
  4. संघ की संचालन पद्धति गणों और संघों की परम्परा पर आधारित थी। लोग बातचीत द्वारा किसी बात पर एकमत होने का प्रयास करते थे। यदि सहमति से किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन हो जाता था तो मतदान द्वारा निर्णय लिया जाता था।

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प्रश्न 17.
बौद्ध परम्परा में महायान की उत्पत्ति कैसे हुई?
उत्तर:
बौद्ध परम्परा में महायान की उत्पत्ति:
कनिष्क के काल से बौद्ध परम्परा में परिवर्तन दिखाई देने लगता है। पहली शताब्दी सा०यु० के पूर्व बुद्ध को एक मानव माना जाता था और परिनिर्वाण के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व दिया जाता था। परंतु धीरे-धीरे इसमें परिवर्तन आने लगा। बहुत से बौद्ध अनुयायी बुद्ध को देवता मानने लगे और मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा करने लगे। यहीं से महायान परम्परा की शुरूआत हुई।

महायान धर्म में न केवल बुद्ध को भगवान का पद दिया गया बल्कि उनकी उपासना में आरम्भ हो गयी। बौद्ध भिक्षुओं की उपासना भी की जाने लगी और उनकी मूर्तियाँ बनाकर बौद्ध मंदिरों में रखी जाने लगीं। महायान के लोग जन-साधारण के सामने स्वर्ग को अपनी अंतिम मंजिल बताते थे। यह धर्म में एक बड़ा परिवर्तन था और जन-साधारण को आकर्षित करने के लिए किया गया था। बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म से अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए वे हिन्दू देवताओं की भांति बुद्ध की पूजा भी करने लगे।

प्रश्न 18.
जैन धर्म ने भारतीय समाज को कहाँ तक प्रभावित किया?
उत्तर:
जैन धर्म का भारतीय समाज का प्रभाव:

  1. जैन धर्म ने जाति-प्रथा का खंडन किया। फलस्वरूप देश में जाति-प्रथा के बंधन शिथिल पड़ गए।
  2. जैन धर्म के सिद्धांतों से प्रभावित होकर ब्राह्मणों ने पशुबलि, कर्मकांड तथा अन्य कुरीतियों का त्याग कर दिया और वैदिक धर्म एक बार पुनः सरल रूप धारण करने लगा।
  3. जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांत ने लोगों को शाकाहारी बनने की प्रेरणा दी। इस प्रकार जानवरों की हत्या कम हो गयी।
  4. जैनियों ने अपने तीर्थंकरों की याद में विशाल मंदिर तथा मठ बनवाये अर्थात् स्थापत्य और मूर्तिकला का विकास हुआ। दिलवाड़ा का जैन मंदिर, एलोरा की गुफायें तथा खजुराहो के जैन मंदिर इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

प्रश्न 19.
भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी सायु०पू० को महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
उत्तर:
भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी सा०यु०पू० का महत्त्व:

  1. इस काल में अनेक राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिवर्तन हुए। भारत में सा०यु०पू० छठी शाताब्दी में 16 महाजनपदों का उदय हुआ।
  2. वैदिक कर्मकाण्डों का प्रभाव धीरे-धीरे घटने लगा। उपनिषदों का महत्त्व बढ़ने से चिंतन का महत्त्व बढ़ने लगा। लोगों का ध्यान मोक्ष प्राप्ति के नये साधन ढूँढ़ने की ओर आकर्षित हुआ। इसके फलस्वरूप समाज में नये दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन हुआ।
  3. नई दार्शनिक विचारधारा के फलस्वरूप समाज में नये सामाजिक-धार्मिक सम्प्रदायों का अभ्युदय हुआ। इनकी संख्या लगभग 62 थी। इन्होंने जैन सम्प्रदाय तथा बौद्ध सम्प्रदाय के विचारों पर सबसे अधिक प्रभाव डाला। इससे भारतीय समाज में भारी बदलाव आया।
  4. बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने आत्मसंयम तथा तपस्या पर बल दिया । ये विचार उपनिषदों में प्रतिपादित विचारों से मिलते-जुलते थे। इससे उपनिषदों की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

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प्रश्न 20.
भारत में बौद्ध धर्म के सामाजिक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में बौद्ध धर्म के सामाजिक प्रभाव:

  1. बौद्ध धर्म के प्रभाव से लोग सदाचारी बन गये और झूठ बोलना, चोरी करना तथा निन्दा करना जैसे दोषों की निवृत्ति हुई।
  2. बौद्ध धर्म ने राजनीति को भी जन-कल्याणकारी स्वरूप दिया। अशोक जैसे शासकों ने युद्ध का परित्याग कर दिया और जनकल्याण के कार्यों में लग गए।
  3. बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने जीवों को मारना और मांस खाना बंद कर दिया।
  4. बौद्ध धर्म ने साहित्य का विकास भी किया। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं और उनके जीवन से सम्बन्धित अनेक ग्रंथ लिखे गए त्रिपिटक, जातक ग्रंथ आदि इसके उदाहरण है।
  5. बौद्ध धर्म ने स्थापत्य और मूर्ति कला को भी बढ़ावा दिया। अनेक स्तूपों, मठों और विहारों का निर्माण किया गया।

प्रश्न 21.
बुद्ध की प्रथम संसार-यात्रा से उनका जीवन कैसे बदल गया? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बुद्ध एक दिन भ्रमण के लिए बाहर गये जहाँ उन्होंने निम्न दृश्य देखे जिससे उनका जीवन बदल गया:

  1. उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति देखा जिसके शरीर पर झुरियाँ पड़ी थीं।
  2. एक बीमार व्यक्ति शारीरिक कष्ट से कराह रहा था।
  3. कुछ लोग एक लाश लेकर उसके अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे और रो रहे थे। इन दृश्यों को देखकर बुद्ध का मन विचलित हो गया और उन्हें अनुभूति हुई कि शरीर का क्षय और अंत निश्चित है।
  4. उन्होंने एक गृहत्यागी सन्यासी को देखा जो बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से निर्भय था और उसने शांति प्राप्त कर ली थी। इन घटना से उन्होंने सन्यास का रास्ता अपनाने का निश्चय किया।

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प्रश्न 22.
बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म में क्या अंतर था।
उत्तर:
बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म में अंतर:

  1. हिन्दू धर्म सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास करता है जबकि बौद्ध धर्म ईश्वर के प्रति मौन है।
  2. बौद्ध धर्म अहिंसा पर बल देता है और माँस भक्षण के विरुद्ध है लेकिन हिन्दू धर्म अहिंसा पर अधिक जोर नहीं देता। इसमें पशु एवं नरबलि के प्रावधान भी है।
  3. मोक्ष प्राप्त करने के लिए हिन्दू यज्ञ, बलि और कर्मकाण्ड को आवश्यक मानते हैं परंतु बौद्ध धर्म इसे नहीं मानता।
  4. बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म की भाँति जातीय भेदभाव, ब्राह्मणों और सस्कृत के महत्त्व को नहीं मानता।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
गुप्तकालीन कला का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुप्तकालीन कला:
(I) वास्तुकला:
इस काल में वास्तुकला या भवन निर्माण कला की विशेष उन्नति हुई। इस क्षेत्र में गुप्तों के शासन ने एक नए युग को प्रारंभ किया। इस काल के भवन निःसन्देह अद्भुत और शानदार हैं। गुप्तकाल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ जिनमें निम्नलिखित प्रसिद्ध हैं –

  • (क) जबलपुर जिले के तिगवा नामक स्थान में विष्णु-मंदिर।
  • (ख) बोध-गया तथा सांची के बौद्ध मंदिर।
  • (ग) देवगढ़ का दशावतार मंदिर।
  • (घ) नागोद राज्य में भुमरा का शिव मंदिर।
  • (ड़) आसाम के दरंग जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर दह परबतिया नामक स्थान में एक मंदिर मिला है जो काफी टूट-फूट गया है परंतु स्थापत्य कला की दृष्टि से यह मंदिर बहुत श्रेष्ठ है। (च) नागोद राज्य के खोह नामक स्थान में एक शिव मंदिर मिला है।
  • (छ) अजयगढ़ राज्य में नचना-कूथर नामक स्थान पर पार्वती का मंदिर।

इन मंदिरों के अतिरिक्त कुछ ईंटों के बने हुए मंदिर भी थे। झांसी का देवगढ़ मंदिर तथा कानपुर के मंदिर उत्कृष्ट स्थापत्य कला के नमूने हैं। इसके अतिरिक्त गुप्त काल की भवन निर्माण कला में अलंकृत स्तम्भों का एक विशेष स्थान है।

(II) मूर्तिकला:
गुप्तकाल में मूर्तिकला का भी चरम विकास हुआ। इस काल की मूर्तिकला की विशेषता शारीरिक सुन्दरता की ओर अधिक ध्यान न देकर भावों को प्रकट करने में है। इस काल की मूर्तिकला पूर्ण रूप से भारतीय है। इस प्रकार मूर्तिकला विदेशी प्रभाव से सर्वथा स्वतंत्र हो गई।

कुषाण काल से पहले जो कलापूर्ण कृतियाँ थीं उनमें केवल भाव ही प्रकट किए जाते थे। कुषाण काल में शारीरिक सुन्दरता पर अधिक ध्यान दिया जाता था परंतु गुप्तकाल में कुषाण युग तथा इससे पूर्वकाल की कलाकृतियों को सुन्दर समन्वय कर दिया गया।

इस काल की मूर्तियाँ भाव-प्रेषण को वरीयता देती हैं। बुद्ध की मूर्तियाँ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति, प्रशांत मुस्कराहट तथा गम्भीर विचारपूर्ण मुद्रा भारतीय मूर्तिकला से अद्भुत निखार पाती है।

इस काल में गौतम बुद्ध की प्रतिमाओं के साथ ही ब्राह्मणों ने भी अपने देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण किया। इस काल में विष्णु, शिव, ब्रह्मा, सूर्य तथा देवताओं आदि की मूर्तियाँ । बनाई गईं।

(III) चित्रकारी:
गुप्तकालीन चित्रकला अद्वितीय थी। इसकी चित्रकारी के नमूने हमें अजन्ता और बाघ की कन्दराओं से मिले हैं। ये चित्र हमारे सामने उस काल के जीवन का सजीव चित्र उपस्थित करते हैं। यद्यपि चित्रों का उद्देश्य तथागत के जीवन की घटनाओं का वर्णन करना है परंतु यह लोक जीवन से अलग नहीं है। अजन्ता के चित्रकार प्रकृति के साथ बड़ा प्रेम रखते थे। उन्होंने फलते हुए वृक्ष तथा विचरते हुए पशुओं के सजीव चित्र खींचे हैं।

ग्रिफिन्ज और फर्गुसन ने गुफा नं. XVI में दिवगंत राजकुमारी के जीवन्त चित्रण की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि वेदना और हृदय के भावों को व्यक्त करने में यह चित्रकला के इतिहास में अद्वितीय है।

अजन्ता के चित्रों की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। श्रीमती हैरिन्थम का कथन है कि अजन्ता के चित्रों के कारण भारत संपूर्ण मानव-जाति की श्रद्धा का अधिकारी है।

(IV) संगीतकला:
इस काल में चित्रकला की भाँति संगीतकला का भी चरम विकास हुआ। गुप्तकालीन साहित्य से हमें ज्ञात होता है कि इस समय गायन, वादन तथा नृत्य कला का प्रचलन था। समुद्रगुप्त के सिक्कों से ज्ञात होता है कि उसकी वीणावादन में विशेष रुचि थी।

उसकी तुलना नारद ऋषि के साथ की गई है। गुप्तकाल में नृत्य का भी काफी प्रचलन था। इसके लिए शिक्षक भी नियुक्त किए जाते थे और विशेष रूप से नारियों इस कला को सीखती थी। इस सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास के कारण ही इस युग को स्वर्ण युग कहते हैं। यह कहना अनुचित न होगा कि यह कला और साहित्य के चरम विकास का युग था।

(V) मुद्राकला:
प्रारंभ में गुप्तकालीन सम्राटों ने विदेशी मुद्राओं का अनुसरण किया परंतु बाद में भारतीयता से प्रभावित मुद्रायें चलायी। गुप्त सम्राटों की अधिकांश मुद्रायें सोने की हैं परंतु कालान्तर में उन्होंने चाँदी की मुद्रायें भी जारी की, ये मुद्रायें सुन्दर और आकर्षक हैं। इनका आकार तथा इन पर अंकित मूर्तियाँ बड़ी सुन्दर है। इन मुद्राओं पर गुप्त सम्राटों की प्रशस्ति भी लिखी गयी है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि गुप्तकाल में भारतीय साहित्य एवं कला का चहुंमुखी विकास हुआ। हेल महोदय ने गुप्तकाल की प्रशंसा करते हुए लिखा है- भारत उन दिनों शिष्य नहीं बल्कि सम्पूर्ण एशिया का शिक्षक था और पाश्चात्य सुझावों को लेकर उसने उन्हें अपने विचारों के अनुकूल बना लिया।”

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प्रश्न 2.
बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे? बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का वर्णन कीजिए। अथवा, बुद्ध की शिक्षाओं की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। उनका जन्म नेपाल के कपिलवस्तु नामक नगर में राजा शुद्धोधन के यहाँ हुआ। उनकी माता का नाम महामाया था। राजा शुद्धोधन के इस पुत्र के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनका विवाह वैशाली की राजकुमारी यशोधरा से हुआ।

उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया । संसार में दु:ख ही दु:ख देखकर उन्होंने घर का त्याग कर दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े उन्होंने ज्ञान-प्राप्ति के लिये घोर तपस्या की। अंत में वे सब कुछ छोड़कर गया के समीप एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।

यहीं उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद उनका नाम ‘बुद्ध’ पड़ गया। ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् बुद्ध ने सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया। यहाँ उनके पाँच शिष्य बन गये। इसके बाद उनके शिष्यों की संख्या लगातार बढ़ने लगी।

बौद्ध धर्म की शिक्षायें:
चार मौलिक सिद्धांत और अष्टमार्ग-बुद्ध की शिक्षा के चार मौलिक सिद्धांत है –

  • दुनिया दु:खों का घर है।
  • इन दु:खों का कारण वासनाएँ अथवा इच्छाएँ हैं।
  • इन वासनाओं को मार देने से दुःख दूर हो सकते हैं।
  • इन वासनाओं का अन्त करने के लिए मनुष्य को अष्टमार्ग (Eight Fold Path) पर चलना चाहिए।

अष्टमार्ग में निम्नलिखित आठ सिद्धांत है:

  • सम्यक् (शुद्धि) दृष्टि
  • सम्यक् संकल्प
  • सम्यक् वचन
  • सम्यक् आचरण
  • सम्यक् जीवन
  • सम्यक् प्रयत्न
  • सम्यक् स्मृति और
  • सम्यक् समाधि।

इस मार्ग को मध्य मार्ग भी कहते हैं, क्योंकि बुद्ध एक ओर ब्राह्मणों के भोगविलासी के जीवन से घृणा करते थे और दूसरी ओर जैनियों के घोर तपस्या वाले सिद्धांत के विरुद्ध थे। वे इन दोनों के मध्य मार्ग अर्थात् सम्यक जीवन व्यतीत करने पर जोर देते थे।

1. अहिंसा:
बुद्ध ने महावीर स्वामी की भाँति अर्थात् जीवों को कष्ट न पहुँचाने पर काफी जोर दिया। उनका यह विचार था कि मनुष्य को न पशुओं का वध करना चाहिए और न उन्हें तंग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रत्येक जीवधारी से प्रेम करना चाहिए, परंतु महावीर की भाँति उन्होंने इस बात का प्रचार नहीं किया कि वृक्षों, पत्थरों में भी जीवन होता है।

2. ईश्वर के अस्तित्व के विषय में मौन:
बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व से संबंधित वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे क्योंकि ऐसा करने से उनका धर्म भी हिन्दू धर्म की भांति समझने में कठिन हो जाता। ईश्वर है या नहीं? और यदि है तो उसका स्वरूप क्या है? वह कहाँ रहता है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर बहुत वाद-विवाद हो सकता है और ऐसे वाद-विवादों से महात्मा बुद्ध बचना चाहते थे।

3. यज्ञ-बलि और कर्मकाण्ड में अविश्वास:
महावीर की भाँति महात्मा बुद्ध का भी यज्ञ और उसमें दी जाने वाली पशुओं की बलि में कोई विश्वास न था। वे तो वेदों और ब्राह्मणों को श्रेष्ठता को भी नहीं मानते थे। उनके विचारानुसार यह बाह्य आडम्बर की चीजें निर्वाण-प्राप्ति के लिए बिल्कुल निरर्थक हैं, इसलिए ऐसी चीजों का उन्होंने विरोध किया।

4. जाति-प्रथा में अविश्वास:
महात्मा बुद्ध को जात-पात के भेद-भाव को नहीं मानते थे। उन्होंने वर्ण-व्यवस्था का कड़े शब्दों में विरोध किया। उनके विचार से समाज में मनुष्य के गुणों के अनुसार श्रेणियाँ बनाई जानी चाहिए न कि जाति के अनुसार।

5. निर्वाण:
बुद्ध के अनुसार जीवन का मुख्य लक्ष्य अच्छा जीवन व्यतीत करके निर्वाण प्राप्त करना है। कोई भी व्यक्ति चाहे ब्राह्मण हो अथवा शूद्र, अच्छा जीवन व्यतीत करके मानसिक शांति प्राप्त कर सकता है। जब व्यक्ति जीवन-मरण के चक्कर से छूट जाता है तो बौद्ध धर्म में यह स्थिति निर्वाण कहलाती है।

6. कर्म सिद्धांत:
महात्मा बुद्ध कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानते थे। वे कहते थे कि व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसी के अनुसार उसे फल मिलता है। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के फल से नहीं बच सकता।

7. शुद्धाचरण पर जोर:
महात्मा बुद्ध ने जीवन को पवित्र बनाने पर बहुत जोर दिया। उनका ध्यान, वाणी और कर्म की सच्चाई तथा पवित्रता की ओर अधिक था। जीवों पर दया करना, सत्य बोलना, चोरी ओर व्यभिचार से बचना, दूसरों की निन्दा न करना आदि तथ्यों को उनके उपदेश का सारांश कहा जा सकता है।

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प्रश्न 3.
महायान की उत्पत्ति कैसे हुई? यह हीनयान से किस प्रकार भिन्न था?
उत्तर:
महायान की उत्पत्ति:
सम्राट कनिष्क के शासन-काल में बौद्ध-धर्म दो भागों में बँट गया-हीनयान और महायान। इसका कारण यह था कि महात्मा बुद्ध ने अनुशासन और अहिंसा के नियमों पर अधिक बल दिया था। भिक्षुओं के लिए यह कठोर जीवन बिताना बहुत कठिन था।

इसके अतिरिक्त इस काल में लोग ज्ञान-मार्ग और कर्म-मार्ग की अपेक्षा भक्ति-मार्ग को अधिक अपना रहे थे। इस परिवर्तन को ध्यान में रखकर बौद्ध धर्म में कुछ सुधार किए गए। यह सुधरा हुआ धर्म महायान कहलाया और बौद्ध-धर्म की प्राचीन शाख हीनयान कहलायी। इन दोनों शाखाओं का मध्य एशिया के उत्तरी भू-भागों में बहुत प्रचार हुआ।

हीनयान और महायान सम्प्रदायों में अन्तर:

  • महायान शाखा के अनुयायी महात्मा बुद्ध को देवता माना और उनकी मूर्तियाँ बनाकर पूजा करने लगे। लेकिन हीनयान शाखा वाले बुद्ध को महान् व्यक्ति मानते थे, देवता नहीं। वे मूर्ति पूजा के पक्ष में भी नहीं थे।
  • महायान शाखा के अनुयायी महात्मा बुद्ध के साथ-साथ कुछ ऐसे बौद्ध भिक्षुओं (बोधिसत्त्वों) की भी पूजा करते थे जिन्होंने आत्म-त्याग द्वारा अपने जीवन को ऊँचा उठा लिया था चाहे घे निर्वाण नहीं पा सके थे। लेकिन हीनयान वाले बोधिसत्त्वों में विश्वास नहीं रखते थे।
  • महायान शाखा के लोग विश्वास और श्रद्धा पर बल देते थे जबकि हीनयान शाखा वाले किसी बात को अपनाने से पहले उसे तर्क की कसौटी पर कसते थे।
  • महायान शाखा के अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य स्वर्ग को पाना है लेकिन हीनयान शाखा के अनुसार अंतिम लक्ष्य निवार्ण प्राप्ति का है।
  • महायान शाखा के लोग अपने प्रचार के लिए संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे लेकिन हीनयान शाखा वालों ने प्रचार करने के लिए पाली भाष्य को अपनाया।
  • महायान धर्म ब्राह्मण धर्म के बहुत निकट है। इसके कई सिद्धांत ब्राह्मण धर्म से मिलते हैं। इसके विपरीत हीनयान ब्राह्मण धर्म के निकट नहीं है।
    वास्तव में महायान धर्म में नवीनता थी क्योंकि इसके सिद्धांत समय के अनुकूल और बहुत सरल थे। बौद्ध भिक्षुओं ने बड़े उत्साह से इसका चीन, जापान, तिब्बत आदि देशों में प्रचार किया।

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प्रश्न 4.
भारत में बौद्ध धर्म के अवनति के कौन-कौन से कारण थे? अथवा, बौद्ध धर्म अपनी ही जन्मभूमि पर महत्त्वहीन हो गया। क्यों? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत में बौद्ध धर्म की अवनति के कारण:
सा०यु०पू० छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म की स्थापना हुई और छठी शताब्दी ई० तक लोकप्रिय रहा, परंतु उसके बाद उसकी अवनति होने लगी। इस अवनति के निम्नलिखित कारण थे

1. ब्राह्मण धर्म में सुधार:
जब हिन्दू लोग अन्य धर्मों में जाने लगे तो ऊँची जाति वाले लोगों और विशेषकर ब्राह्मणों को अपनी त्रुटियों का ज्ञान हुआ। अपने अस्तित्त्व को बनाए रखने के लिए अब उन्हें हठ छोड़ना पड़ा और अपने आचार-व्यवहार को बदलना पड़ा।

इस प्रकार ब्राह्मण लोग फिर से प्रिय होने लगे और उनके साथ-ही-साथ हिन्दू धर्म भी पतन के मार्ग से बच गया। हिन्दू धर्म में बुद्ध को भी एक अवतार मान लिया गया तथा अहिंसा आदि के सिद्धांत को अपना लिया गया। इसी कारण अब बौद्ध धर्म की ओर लोगों का आकर्षण जाता रहा और हिन्दू धर्म ने अपना खोया हुआ गौरव पुनः प्राप्त कर लिया।

2. बौद्ध संघों में अनाचार:
आरम्भ में भिक्षु लोग बड़े ऊँचे चरित्र के व्यक्ति होते थे और बौद्ध संघों में ऐसे व्यक्ति को ही लिया जाता था जो वास्तव में सदाचारी होता था। धीरे-धीरे इन संघों के पास अकूत धन एकत्र हो गया और स्त्रियों को भी लिया जाने लगा। फिर क्या था, इन संघों में अनाचार फैलने गया और भिक्षु लोग लोक-सेवा छोड़कर ऐश्वर्य की ओर भागने लगे। लोगों ने भिक्षुओं से घृणा करनी आरम्भ कर दी और बौद्धमत को त्यागना आरम्भ कर दिया।

3. बौद्ध धर्म का विभाजन:
कुछ समय तक बौद्ध लोग मिलकर प्रेम-भाव से काम करते रहे, परंतु धीरे-धीरे यह प्रेम-भाव लुप्त होता गया और मतभेद बढ़ने लगे। हीनयान और महायान के अतिरिक्त बौद्ध धर्म के सोलह अन्य टुकड़े हो गए। इस प्रकार लड़ाई-झगड़े, मतभेद और ईर्ष्या-द्वेष के बढ़ जाने से बौद्ध धर्म का शक्तिहीन होना स्वाभाविक ही था। एकता ने बौद्ध धर्म को नई ऊँचाइयाँ दी जबकि फूट ने उनका पतन सुनिश्चित कर दिया।

4. बुद्ध की मूर्ति पूजा:
बौद्ध धर्म का प्रसार उसमें मूर्ति पूजा और अन्य अन्धविश्वास न रहने के कारण हुआ। बौद्ध लोगों ने महात्मा बुद्ध को देवता मानकर उनकी मूर्तियाँ बनानी आरम्भ कर दी और उनकी पूजा करनी शुरू कर दी।

लोगों में यह धारणा बनी कि यदि बुद्ध भी एक देवता थे तो उनमें और हिन्दू धर्म के देवताओं में क्या अंतर है? हिन्दू लोगों ने भी बुद्ध को देवता मान लिया इसलिए बौद्ध धर्म में कोई विशेष अंतर न रहा। धीरे-धीरे यह धर्म में ही विलीन हो गया और कुछ समय पश्चात् भारत से बौद्ध धर्म लुप्त होने लगा।

5. बौद्ध धर्म में हिन्दू-दर्शन और संस्कृत:
धीरे-धीरे बौद्धों ने हिन्दू-दर्शन के कई सिद्धांतों को अपना लिया और परिणामस्वरूप उनका धर्म भी जटिल और गूढ़ बनता गया। यही नहीं, धीरे-धीरे बौद्धों ने लोगों की बोल-चाल की भाषा छोड़कर संस्कृत भाषा को अपना लिया। इससे उनकी भाषा फिर से कठिन हो गई। धर्म और भाषा के कठिन होने से लोगों की रुचि इस धर्म से हट गई।

6. हिन्दू धर्म का फिर से उन्नति करना:
गुप्तकाल में हिन्दू धर्म फिर से अपनी खोई हुई शक्ति को प्राप्त करने लगा। ब्राह्मणों का आदर होने लगा व सुन्दर-सुन्दर मंदिर बनने लगे। हिन्दू धर्म एक बार फिर चमक उठा। इस प्रकार राजाओं का संरक्षण मिलने से हिन्दू धर्म फिर से उन्नति करने लगा और बौद्ध लोग अब हिन्दू धर्म में वापस लौटने लगे।

7. हिन्दू उपदेशकों का काम:
हिन्दू धर्म को फिर से उन्नति की ओर ले जाने और पतन से बचाने के लिए उपदेशकों ने भी सराहनीय कार्य किया। आठवीं और नवीं शताब्दी में कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य जैसे प्रकाण्ड विद्वानों ने स्थान-स्थान पर वैदिक धर्म का उपदेश देकर हिन्दू धर्म को बौद्ध धर्म से अच्छा ठहराया और सारे देश में अपने धर्म का डंका बजा दिया। बौद्ध मत वाले ऐसे उपदेशों का सामना न कर सके। इस प्रकार इनका धर्म भारत से धीरे-धीरे लुप्त हो गया।

8. राजाओं के संरक्षण का अंत:
कनिष्क की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध धर्म को राजाओं का संरक्षण मिलना बंद हो गया। गुप्त काल में भी बौद्ध धर्म को भरपूर सहायता नहीं मिली। गुप्त शासक हिन्दू धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार करने के पर्याप्त प्रयास किए। हर्ष ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया परंतु उसकी मृत्यु के बाद संरक्षण मिलना बंद हो गया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
19वीं शताब्दी में किस अंग्रेज विद्वान ने सांची की यात्रा की?
(अ) मेजर अलेक्जेंडर कनिंघम
(ब) हीलर
(स) जॉन मार्शल
(द) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(अ) मेजर अलेक्जेंडर कनिंघम

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प्रश्न 2.
सांची कनखेड़ा क्या है?
(अ) एक गाँव का मेला है
(ब) एक गाँव है
(स) एक शहर है
(द) भोपाल का मुख्य उद्योग केन्द्र है
उत्तर:
(ब) एक गाँव है

प्रश्न 3.
शालभंजिका क्या है?
(अ) शाल धारण करने वाली स्त्री को कहते हैं
(ब) वृक्षों की शाखा को पकड़े हुए स्त्री को कहते हैं
(स) सुन्दर स्त्रियों को कहते हैं
(द) सांची की स्त्री मूर्तियों को कहते हैं
उत्तर:
(ब) वृक्षों की शाखा को पकड़े हुए स्त्री को कहते हैं

प्रश्न 4.
अजंता के चित्र में क्या नहीं दिखाया है?
(अ) राजदरबार का दृश्य
(ब) शोभा यात्राएँ
(स) त्यौहार मनाने के चित्र
(द) खेत की जुताई करते हुए कृषक
उत्तर:
(द) खेत की जुताई करते हुए कृषक

प्रश्न 5.
बोधिसत्वों की परम्परा किससे संबंधित थी?
(अ) महायान
(ब) हीनयान
(स) दिगम्बर
(द) श्वेताम्बर
उत्तर:
(अ) महायान

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प्रश्न 6.
वैष्णववाद में कितने अवतारों की कल्पना है?
(अ) 9
(ब) 10
(स) 11
(द) 12
उत्तर:
(ब) 10

प्रश्न 7.
गांधार कला का संबंध किससे था?
(अ) बौद्ध धर्म
(ब) जैन धर्म
(स) शैव धर्म
(द) वैष्णव धर्म
उत्तर:
(अ) बौद्ध धर्म

प्रश्न 8.
बौद्ध ग्रंथों में कितने सम्प्रदायों का उल्लेख है?
(अ) 61
(ब) 62
(स) 63
(द) 64
उत्तर:
(द) 64

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प्रश्न 9.
निम्नलिखित में कौन त्रिपिटक का भाग नहीं है?
(अ) विनय पिटक
(ब) सुत्तपिटक
(स) अभिधम्म पिटक
(द) उत्तराध्ययन सूत्र
उत्तर:
(द) उत्तराध्ययन सूत्र

प्रश्न 10.
लोकायत परम्परा के कौन लोग थे?
(अ) अध्यात्मवादी
(ब) प्रकृतिवादी
(स) भौतिकवादी
(द) सत्यवादी
उत्तर:
(स) भौतिकवादी

प्रश्न 11.
अष्टांगिक मार्ग किसकी खोज थी?
(अ) बुद्ध
(ब) महावीर
(स) चैतन्य महाप्रभु
(द) गोस्वामी तुलसीदास
उत्तर:
(अ) बुद्ध

प्रश्न 12.
बौद्ध संघ में शामिल होने वाली पहली महिला कौन थी?
(अ) सावित्री फुल्ले
(ब) महाप्रजापति गौतमी
(स) कुसुमावती
(द) पुष्पलता
उत्तर:
(ब) महाप्रजापति गौतमी

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प्रश्न 13.
स्तूप किसकी याद में बनाये गये?
(अ) संतो की याद में
(ब) महापुरुषों की याद में
(स) राजाओं की याद में
(द) बुद्ध की याद में
उत्तर:
(द) बुद्ध की याद में

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में कहाँ पर स्तूप नहीं है?
(अ) दिल्ली
(ब) भरहुत
(स) सांची
(द) सारनाथ
उत्तर:
(अ) दिल्ली

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प्रश्न 15.
सांची के स्तूप में सर्पो का अंकन क्यों किया गया?
(अ) यहाँ के वृक्ष सर्साकार थे
(ब) यहाँ सर्प अधिक मिलते है
(स) यहाँ सर्प पूजा का केन्द्र था
(द) यह शैव धर्म का केन्द्र था
उत्तर:
(स) यहाँ सर्प पूजा का केन्द्र था

Bihar Board Class 8 Hindi Solutions Chapter 18 हौसले की उड़ान

Bihar Board Class 8 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 3 Chapter 18 हौसले की उड़ान Text Book Questions and Answers, Summary.

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Bihar Board Class 8 Hindi हौसले की उड़ान Text Book Questions and Answers

गतिविधि

प्रश्न 1.
आप अपने पास-पड़ोस में किसी ऐसी लड़की या औरत के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए जो रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज बुलंद की हो।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

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प्रश्न 2.
वैसी महिलाओं की सूची बनाइए जिन्होंने अपने कार्यों से समाज में – एक अलग मुकाम प्राप्त किया है।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

हौसले की उड़ान Summary in Hindi

सारांश – खुबसूरत और न्यायप्रिय व्यवस्था निर्माण में शिक्षा और संघर्ष में अहम् भूमिका निभाती है और यह भूमिका यदि बेटियाँ निर्वहण करें तो समाज या देश में अवश्य बदलाव आते हैं। ऐसे ही समाज में बदलाव लाने वाली कुछ बेटियाँ बिहार में हुई हैं जो अपने-अपने ढंग से बिहार को आगे बढ़ाने का काम किया है।

गुड़िया – गुड़िया नोरव प्रखण्ड रोहतास जिला की रहने वाली है। मोअसीन इदरीसी की बेटी मुस्लिम सम्प्रदाय की बंदिशों की चिंता नहीं कर, माता-पिता को ही घर में बंद कर उत्प्रेरण केन्द्र नोखा पहुंची। बाद में उत्प्रेरण केन्द्र के बंद होने पर गाँव के ही स्कूल में अपना नामांकन करवा ली। वह पढ़-लिखकर अध्यापिका बनना चाहती है जिससे वह पढ़ने की ललक रखनेवाली छात्राओं को पढ़ा सके।

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सोनी – कैमूर जिला, चेनारी प्रखंड के मथही गाँव के विष्णुशंकर तिवारी की पुत्री सोनी कैमूर जिला, एथलेटिक्स प्रतियोगिता 400 मीटर एवं 1600 मीटर की दौड़ में प्रथम स्थान पाई, बाद में राज्य स्तरीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता जमालपुर में जाकर राज्य स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया पुनः राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में चौथा स्थान प्राप्त किया। उसे विश्वास है कि देश स्तर पर वह प्रतिनिधित्व करेगी।

कदम – मुंगेर जिला, बख्तियारपुर प्रखंड के गणेशपुर मुशहरी की रहनेवाली “कदम” नरेगा में बच्चों से काम लेने वाले ठेकेदारों के खिलाफ मोर्चा लेकर बच्चों से काम लेना बंद करवाई। कदम पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना चाहती है।

जैनब खानम – मथुरापुर, कहतरवा पंचायत, जिला-शिवहर निवासी 94 वर्षीय मो० अब्दुल रहेमान की पोती जैनब खानम की पढ़ाई तीसरे वर्ग के बाद छुड़ा दी गई । क्योंकि मुस्लिर सम्प्रदाय में पर्दा-प्रथा जो है । जैनब पढ़ने की बात जब भी अपने माता-पिता से करती थी तो उसके पिता मो० मंसर खान एवं माता फूल बीबी पिटती भी थी। मार खाने के बाद भी वह स्कूल जाती रही। आज वह बी० ए० की छात्रा है तथा लड़कियों के आत्मरक्षार्थ कराटे का प्रशिक्षण दे रही है।

इस प्रकार बिहार में अनेक बेटियाँ हुई हैं जो अपनी दृढ़ इच्छा से बिहार – ही नहीं देश की गौरव को बढ़ाई है।