Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 12 खनिज पोषण

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 12 खनिज पोषण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 12 खनिज पोषण

Bihar Board Class 11 Biology खनिज पोषण Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
“पौधे में उत्तरजीविता के लिए उपस्थित सभी · तत्वों की अनिवार्यता नहीं है।” टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अभी तक 105 खनिज तत्वों में से 60 से अधिक खनिज तत्व पौधों में पाए गए हैं। लेकिन उनकी उपयोगिता के आधार पर पौधधों के लिए 17 पोषक तत्व अनिवार्य माने जाते हैं। अनिवार्य पोषक तत्वों को उनकी परिमाणात्मक आवश्यकता के आधार पर दो वर्गों में बाँट लेते हैं –
(क) वृहत् या दीर्घमात्रा पोषक तत्व
(ख) सूक्ष्म या लघुमात्रा पोषक तत्व।

(क) वृहत् या दीर्घमात्रा पोषक तत्व (Macronutrient elements):
ये पौधों के शुष्क पदार्थ की 1 से 10 मिलीग्राम/लीटर की सान्द्रता में पाए जाते हैं; जैसे – कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, पोटैशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, सल्फर।

(ख) सूक्ष्म या लघुमात्रा पोषक तत्व (Micronutrient elements):
ये पौधों के शुष्क पदार्थ की 0.1 मिलीग्राम/लीटर की सान्द्रता या उससे कम मात्रा में पाए जाते हैं; जैसे – क्लोरीन, बोरोन, लौह, मैंगनीज, जिंक, ताँबा, निकिल, मॉलिब्डेनमा।

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प्रश्न 2.
जल संवर्धन में खनिज पोषण हेतु अध्ययन में जल और पोषक लवणों की शद्धता जरूरी क्यों है?
उत्तर:
जुलियस वॉन सॉक्स (J.V Sachs) ने मृदा की अनुपस्थिति में पोषक विलयन में पौधों को वयस्क अवस्था तक उगाया। इस विधि द्वारा पोषक तत्वों की उपयोगिता का अध्ययन किया जा सकता है। इसके लिए शुद्ध जल तथा पोषक पदार्थों का होना आवश्यक है। इस विधि में किसी एक तत्व को डाला जाता है या हटाया जाता है और कमी के कारण प्रदर्शित होने वाले लक्षणों का अध्ययन किया जाता है। अशुद्ध पोषक पदार्थों (तत्वों) का उपयोग करके पोषक तत्वों की अनिवार्यता का अध्ययन करना सम्भव नहीं है।

प्रश्न 3.
उदाहरण के साथ व्याख्या कीजिए-वृहत् पोषक, सूक्ष्म पोषक, हितकारी पोषक, आविष तत्व और अनिवार्य तत्व।
उत्तर:
1. वृहत् पोषक (Macronutrients):
शुष्क पदार्थ में अधिक सान्द्रता में पाए जाने वाले तत्वों को वृहत् पोषक (macronutrients) कहते हैं; जैसे-कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, सल्फर, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्सियम आदि।

2. सूक्ष्म पोषक (Micronutrients):
शुष्क पदार्थ में कम सान्द्रता में पाए जाने वाले तत्वो को सूक्ष्म पोषक (micronutrients) कहते हैं। ये पौधों को बहुत सूक्ष्म मात्रा (1.0 ppm या इससे कम) में चाहिए; जैसे- क्लोरीन, बोरोन, लौह, ताँबा, जिंक, निकिल, मॉलिब्डेनमा।

3. हितकारी पोषक (Beneficial Elements):
अनिवार्य पोषक तत्रों के अतिरिक्त कुछ लाभदायक तत्व उच्च श्रेणी के पौधों के लिए आवश्यक होते हैं, इन्हें हितकारी पोषक तत्व कहते हैं।

4. आविष या आविषालु तत्व (Toxic Elements):
किसी खनिज आयन की वह जो सान्द्रता ऊतकों के शुष्क भार में 10% की कमी करता है। आविषालु तत्व माना जाता है। विभिन्न पोषक तत्वों का आविषालुंकता स्तर भिन्न-भिन्न होता है; जैसेमैंगनीज (Mn) आविषालु।

5. अनिवार्य तत्व (Essential Elements):
पौधों के लिए 17 खनिज तत्व अनिवार्य होते हैं। इनकी मात्रा के आधार पर अनिवार्य तत्वों को दो समूहों में बाँट लेते हैं –
(क) वृहत् तत्व
(ख) सूक्ष्म तत्व।
वृहत् तत्वों के अन्तर्गत C, H, O, N, S, K, Ca, Mg, P
और सूक्ष्म तत्व के अन्तर्गत CI, B, Fe, Mn, Zn, Cu, Ni, MO सम्मिलित हैं।

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प्रश्न 4.
पौधों में कम-से-कम पाँच अपर्याप्तता के लक्षण दीजिए। उसे वर्णित कीजिए और खनिजों की कमी से उसका सहसम्बन्ध बनाइए।
उत्तर:
1. पोटैशियम की कमी (Deficiency of Potassium):
इससे पत्तियों पर निर्जीव धब्बे बन जाते हैं। पौधे झाड़ी सदृश (bushy) हो जाते हैं। रोगों के लिए प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है।

2. कैल्सियम की कमी (Deficiency of Calcium):
इससे हरितलवक सुचारु रूप से कार्य नहीं करता। पुष्प शीघ्र झड़ जाते हैं। पौधों में बीज नहीं बनते।

3. मैग्नीशियम की कमी (Deficiency of Magnesium):
इससे हरिमहीनता (chlorosis) हो जाती है।

4. बोरोन की कमी (Deficiency of Boron):
इससे जड़ों का विकास कम होता है। पुष्पों की संख्या कम और फलों का आकार छोटा रहता है। तना भंगुर (brittle) हो जाता है। पौधे बौने रह जाते हैं।

5. जिंक की कमी (Deficiency of Zinc):
इससे पत्तियाँ चितकबरी (mottled) व पीली हो जाती है।

6. ताँबे की कमी (Deficiency of Copper):
इससे पत्तियों में हरिमहीनता (chlorosis) मुरझाना और सूखापन के लक्षण विकसित होते हैं। अग्रस्थ कलिकाएँ नष्ट हो जाती हैं तथा पत्तियाँ मुड़ जाती हैं।

7. नाइट्रोजन की कमी (Deficiency of Nitrogen):
इससे पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। इनकी वृद्धि रूक जाती है। पुष्पम देर से होता है तथा अनाज के दाने सिकुड़ जाते हैं।

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प्रश्न 5.
अगर एक पौधे में एक से ज्यादा तत्वों की कमी के लक्षण प्रकट हो रहे हैं तो प्रायोगिक तौर पर आप कैसे पता करेंगे कि अपर्याप्त खनिज तत्व कौन-से हैं?
उत्तर:
किसी तत्व की अपर्याप्तता से कई तत्वों की कमी के लक्षण प्रकट होते हैं। ये लक्षण एक तत्व की कमी से या विभिन्न तत्वों की कमी के कारण प्रकट हो सकते हैं। अतः अपर्याप्त तत्व को पहचानने के लिए पौधे के विभिन्न भागों में प्रकट होने वाले लक्षणों का अध्ययन करना पड़ता है और उपलब्ध तथा मान्य तालिका से उनकी तुलना करनी पड़ती है। समान तत्व की कमी होने पर अलग-अलग पौधों में अलग-अलग लक्षण प्रदर्शित होते हैं।

प्रश्न 6.
कुछ निश्चित पौधों में अपर्याप्तता लक्षण सबसे पहले नवजात भाग में क्यों पैदा होता है, जबकि कुछ अन्य में परिपक्व अंगों में?
उत्तर:
पोषक तत्वों की कमी से पौधों में कुछ आकारिकीय बदलाव (morphological change) आते हैं। ये परिवर्तन अपर्याप्तता को प्रदर्शित करते हैं। ये विबिन्न तत्वों के अनुसार अलग-अलग होते हैं। अपर्याप्तता के लक्षण पोषक तत्वों की गतिशीलता पर निर्भर करते हैं। ये लक्षण कुछ पौधों के नवजात भागों में या पुराने ऊतकों में पहले प्रकट होते हैं।

पादप में जहाँ तत्व सक्रियता से गतिशील रहते हैं तथा तरुण विकासशील ऊतकों में निर्यातित होते हैं। वहाँ अपर्याप्तता के लक्षण पुराने ऊतकों में पहले प्रकट होते हैं; जैसे – N, K, Mg अपर्याप्तता के लक्षण सर्वप्रथम जीर्णमान पत्तियों में प्रकट होते हैं पुरानी पत्तियों से ये तत्व विभिन्न जैव अणुओं के विखण्डित होने से उपलब्ध होते हैं और नई पत्तियों तक गतिशील होते हैं।

जब तत्व अगतिशील होते हैं और वयस्क अंगों से बाहर अभिगमित नहीं होते तो अपर्याप्तता लक्षण नई पत्तियों में प्रकट होते हैं; जैसे-कैल्सियम, सल्फर आसानी से स्थानान्तरित नहीं होते। अपर्याप्तता लक्षणों को पहचानने के लिए पौधे के विभिन्न भागों में प्रकट होने वाले लक्षणों का अध्ययन मान्य तालिका के अनुसार करना होता है।

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प्रश्न 7.
पौधों के द्वारा खनिजों का अवशोषण कैसे होता हैं।
उत्तर:
पौधे खनिज तत्वों का अवशोषण निम्न प्रकार से करते हैं –

1. ऐपोप्लास्ट पथ (Apoplast pathway):
कोशिका के बाह्य स्थलों से आयन्स का निष्क्रिय अवशोषण तीव्र गति से होता है। कोशिका कला प्रोटीन्स से बनी होती है। इसमें छिद्र पाये जाते हैं।

2. सिमप्लास्ट पथ (Symplast Pathway):
कोशिकाओं के आन्तरिक स्थान में आयन का अन्तर्ग्रहण सक्रिय अवशोषण द्वारा होता है। आयन्स के प्रवेश और निष्कासन में उपापचयी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 8.
राइजोबियम के द्वारा वातावरणीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के लिए क्या शर्ते हैं तथा N2 स्थिरीकरण में इनकी क्या भूमिका है?
उत्तर:
वायुमण्डलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण की शर्ते (Conditions for Atmospheric Nitrogen Fixation)

  1. नाइट्रोजिनेस एन्जाइम (Nitrogenase enzyme)
  2. लेग्हीमोग्लोबीन (Leghaemoglibin, lb)
  3. ATP
  4. अनॉक्सी वातावरण।

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चित्र – नाइट्रोजन स्थिरीकरण में नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की भूमिका।

मुख्यतया मटर कुल के पौधों की जड़ों में ग्रन्थिकाएँ पाई जाती हैं। इनमें राइजोबियम (Rhizobium) जीवाणु पाया जाता है। ग्रन्थिकाओं में नाइट्रोजिनेस (nitrogenase) एन्जाइम एवं लेग्हीमोग्लोबीन (leghaemoglobin) आदि सभी जैवरासायनिक संघटक पाए जाते हैं। नाइट्रोजिनेस एन्जाइम वातावरणीय नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलने के लिए उत्प्रेरित करता है। नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सक्रियता के लिए अनॉक्सी वातावरण आवश्यक होता है।

लेग्हीमोग्लोबीन ऑक्सीजन से नाइट्रोजिनेस एन्जाइम की सुरक्षा करता है। अमोनिया संश्लेषण के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। एक अमोनिया अणु को 8 ATP ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की आपूर्ति पोषक कोशिकाओं के ऑक्सी श्वसन से होती है। अमोनिया ऐमीनो अम्ल में ऐमीनो समूह के रूप में सम्मिलित हो जाती है।

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प्रश्न 9.
मूल ग्रन्थिका के निर्माण हेतु कौन-कौन से चरण भागीदार हैं?
उत्तर:
मूल ग्रन्थिका निर्माण (Formation of Root Nodules):
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चित्र – सोयाबीन में मूल ग्रन्थिका का विकास –
(A) राइजोबियम जीवाणु मूलरोम के समीप बहुगुणित होते हैं।
(B) संक्रमण के पश्चात् मूलरोम में संकुचन, प्रेरित होता है।
(C) संक्रमित जीवाणु मूलरोम द्वारा वल्कुट कोशिकाओं तक पहुँचता है। वल्कुट एवं परिरम्भ कोशिकाएँ विभाजित होने लगती हैं और ग्रन्थिका का निर्माण हो जाता है।
(D) ग्रन्थिका जीवाणुओं का सम्बन्ध पोषक कोशिका से स्थापित हो जाता है।

पोषक पौधों (सामान्यतया मटर कुल के पौधे) की जड़ एवं राइजोबियम में पारस्परिक प्रक्रिया के कारण ग्रन्थिकाओं का निर्माण निम्नलिखित चरणों में होता है –

राइजोबियम जीवाणु बहुगुणित होकर जड़ के चारों ओर एकत्र होकर मूलरोम एवं मूलीय त्वचा से जुड़ जाते हैं। जीवाणु संक्रमण के कारण जीवाणु मूलरोम से होकर वल्कुट (cortex) में पहुँच जाते हैं। वल्कुट में जीवाणुओं के कारण कोशिकाओं का विशिष्टीकरण नाइट्रोजन स्थिरीकरण कोशिकाओं के रूप में होने लगता है। इस प्रकार ग्रन्थिकाओं (nodules) का निर्माण हो जाता है। ग्रन्थिकाओं के जीवाणुओं का पोषक पादप से पोषक तत्वों के आदान-प्रदान हेतु संवहनी सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।

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प्रश्न 10.
निम्नांकित कथनों में कौन सही हैं? अगर गलत है तो उन्हें सही कीजिए –
(क) बोरोन की अपर्याप्तता से स्थूलकाय अक्ष बनता है।
(ख) कोशिका में उपस्थित प्रत्येक खनिज तत्व उसके लिए अनिवार्य है।
(ग) नाइट्रोजन पोषक तत्व के रूप में पौधे में अत्यधिक अचल है।
(घ) सूक्ष्म पोषकों की अनिवार्यता निश्चित करना अत्यन्त ही आसान है, क्योंकि ये सूक्ष्म मात्रा में लिए जाते हैं।
उत्तर:
(क) सत्य कथन।
(ख) असत्य कथन। 105 खनिज तत्वों में से लगभग 60 तत्व विभिन्न पौधों में पाए गए जिनमें से 17 खनिज तत्व ही अनिवार्य होते हैं।
(ग) असत्य कथन। नाइट्रोजन अत्यधिक गतिमान पोषक खनिज तत्व है।
(घ) असत्य कथन। सूक्ष्म पोषक तत्वों की अनिवार्यता निश्चित करना अत्यन्त कठिन कार्य होता है; क्योंकि ये अति सूक्ष्म मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं। सामान्यतया पोषक लवणों में अशुद्धता के कारण इनकी अनिवार्यता स्थापित करना कठिन होता है।

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Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 11 पौधों में परिवहन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology पौधों में परिवहन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
विसरण की दर को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting Rate of Diffusion):
विसरण की दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं –

  1. सान्द्रता की प्रवणता (gradient of concentration)
  2. दो घोलों को पृथक् करने वाली झिल्ली की पारगम्यता (permeability of membrane)
  3. diy (temperature)
  4. दाब (pressure)

विसरण एक सामान्य भौतिक निष्क्रिय क्रिया है। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। यह सजीव और निर्जीव दोनों में होती है।

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प्रश्न 2.
पोरीन्स क्या है? विसरण में ये क्या भूमिका निभाते हैं?
उत्तर:
पोरीन्स (Porins):
जीवाणु, माइटोकॉन्ड्रिया, लवक आदि की बाह्य झिल्ली में पोरीन प्रोटीन्स पाई जाती है। यह बाह्य झिल्ली में बड़े छिद्रों का निर्माण करती है। यह झिल्ली अणुओं के आर-पार जाने के लिए रास्ता बनाती है। ये रास्ते हमेशा खुले रहते हैं और कुछ नियन्त्रित भी हो सकते हैं। कुछ रास्ते बड़े होते हैं जिससे अन्य प्रोटीन्स के छोटे अणु इनसे होकर आ-जा सकें।

चित्र से स्पष्ट है कि बाह्य कोशिका अणु परिवहन प्रोटीन पर अनुबन्धित होकर कोशिका झिल्ली की भीतरी सतह पर पहुँचकर अणु को मुक्त कर देती है। तन्त्रिका कोशिकाओं में तन्त्रिका कला से सोडियम-पोटैशियम का आवागमन विद्युत विभव परिवर्तन द्वारा नियन्त्रित होता है। Na+ तथा K+ गेट विद्युत परिवर्तनों के फलस्वरूप खुलते और बन्द होते हैं।
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चित्रं – सुसाध्य विसरण (Faciliated diffusion)

प्रश्न 3.
पादपों में सक्रिय परिवहन के दौरान प्रोटीन पम्प के द्वारा क्या भूमिका निभाई जाती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सक्रिय परिवहन (Active Transport):
सक्रिय परिवहन सान्द्रता प्रवणता (concentration gradient) के विरुद्ध अणुओं को पम्प करता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा व्यय होती है। गतिज ऊर्जा ATP से प्राप्त होती है। सक्रिय परिवहन झिल्ली प्रोटीन्स द्वारा सम्पन्न होता है। अणुओं को ले जाने वाले पम्प प्रोटीन्स पदार्थों को कम सान्द्रता से अधिक सान्द्रता [शिखरोपरि (अपहिल) परिवहन की ओर ले जाते हैं। पम्प या वाहक प्रोटीन्स पदार्थों को झिल्ली के आर-पार ले जाने के लिए एन्जाइम्स की भाँति अति विशिष्ट होते हैं।

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प्रश्न 4.
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव क्यों होता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योंकि –

1. जल अणुओं में गति ऊर्जा पायी जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है।

2. किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है।

3. जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तन्त्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं।

4. जल विभव को ग्रीक चिह्न Psi or Ψ से चिन्हित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्ति किया जाता है।

5. मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का जल विभव (water potential) शून्य होता है।

6. किसी विलयन यन्त्र का जल विभव उस विलयनन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है।

7. शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अत: सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential ys) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं।

जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाता है। इसे दाब विभव (pressure potential) कहते हैं. दाब विभव प्राय: सकारात्मक होता है। लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसोरोहण में महत्त्वपूर्ण भूमिक निभाता है।

8. किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियन्त्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs) मैट्रिक्स विभव (Ψm) मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है।

अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं –
Ψ = Ψp + ΨS
9. जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीत कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है।

10. जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता है।

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए –
(क) विसरण एवं परासरण
(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण
(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव
(घ) विसरण एवं अन्तःशोषण
(ङ) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ
(च) बिन्दुस्राव एवं परिवहन (अभिगमन)।
उत्तर:
(क) विसरण एवं परासरण में अन्तर (Difference between Diffusion and Osmosis):
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(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण में अन्तर (Difference between Evaporation and Transpiration):
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(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव में अन्तर (Difference between Osmotic Pressure and Osmotic Potential):
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(घ) विसरण एवं अन्तःशोषण में अन्तर (Difference between Diffusion and Imbibition):
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(ङ) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ (Difference between Apoplasty, and Symplast Pathways of Water absorption in Plants):
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चित्र – जल एवं पोषक तत्वों का एपोप्लास्ट तथा सिमप्लास्ट पथ तथा जड़ों में प्रवाह

(च) बिन्दु स्राव एवं परिवहन (अभिगमन) में अन्तर (Difference between Guttation and Transporation):
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प्रश्न 6.
जल विभव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। कौन-से कारक इसे प्रभावित करते हैं? जल विभव, विलेय विभव तथा दाब विभव में आपसी सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योंकि –

1. जल अणुओं में गति ऊर्जा पायी जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है।

2. किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है।

3. जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तन्त्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं।

4. जल विभव को ग्रीक चिह्न Psi or Ψ से चिन्हित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्ति किया जाता है।

5. मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का जल विभव (water potential) शून्य होता है।

6. किसी विलयन यन्त्र का जल विभव उस विलयनन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है।

7. शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अत: सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential ys) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं।

जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाता है। इसे दाब विभव (pressure potential) कहते हैं. दाब विभव प्राय: सकारात्मक होता है। लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसोरोहण में महत्त्वपूर्ण भूमिक निभाता है।

8. किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियन्त्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs) मैट्रिक्स विभव (Ψm) मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है।

अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं –
Ψ = Ψp + ΨS
9. जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीत कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है।

10. जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता है।

प्रश्न 7.
तब क्या होता है जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है।
उत्तर:
जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है तो इसका जल विभव बढ़ जाता है। जब पौधों या कोशिका में जल विसरण द्वारा प्रवेश करता है तो कोशिका आशून (turgid) हो जाती है। इसके फलस्वरूप दाब विभव (pressure potential) बढ़ जाता है। दाब विभव अधिकतर सकारात्मक होता है। इसे (Ψp) से प्रदर्शित करते हैं। जल विभव घुलित तथा दाब विभव से प्रभावित होता है।

प्रश्न 8.
(क) रेखांकित चित्र की सहायता से पौधों में जीवद्रव्यकुंचन की विधि का वर्णन उदाहरण देकर कीजिए।
(ख) यदि पौधे की कोशिका को उच्च जल विभव वाले विलयन में रखा जाए तो क्या होगा?
उत्तर:
(क) रिक्तिकामय पादप कोशिका को अतिपरासारी विलयन (hypertonial solution) में रख देने पर कोशिकारस कोशिका से बाहर आने लगता है। यह क्रिया बहिःपरासरण (exosmosis) के कारण होती है। इसके फलस्वरूप जीवद्रव्य सिकुड़कर कोशिका में एक ओर एकत्र हो जाता है। इस अवस्था में कोशिका पूर्ण श्लथ (fully flaccid) हो जाती है। इस क्रिया का जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) कहते हैं।

जीवद्रव्यकुंचित कोशिका की कोशिका भित्ति और जीवद्रव्य के मध्य अतिपरासारी विलयन एकत्र हो जाता है, लेकिन यह विलयन कोशिकारिक्तिका में नहीं पहुँचता। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोशिका भित्ति पारगम्य होती है और रिक्तिका कला अर्द्धपारगम्य होती है। जीवद्रव्यकुंचित कोशिका को आसुत जल या अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution) में रखा जाए तो कोशिका पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। इस प्रक्रिया को जीवद्रव्यविकुंचन (deplasmolysis) कहते हैं।
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चित्र – जीवद्रव्यकुंचन की विभिन्न अवस्थाएँ: (A) आशून कोशिका, (B) तथा (C) जीवद्रव्यकुंचन की क्रमिक अवस्थाएँ, (D) श्लथ दशा

कोशिका को समपरासारी विलयन (isotonic solution) में रखने पर कोशिका में कोई परिवर्तन नहीं होता, जितने जल अणु कोशिका से बाहर निकलते हैं उतने जल अणु कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं।
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चित्र – कोशिका को समपरासारी, अतिपरासारी तथा अल्पपरासारी विलयन में रखने पर परिवर्तन

(ख) अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution):
कोशिकारस या कोशिकाद्रव्य की अपेक्षा तनु (dilute) होता है, इसका जल विभव (water potential) अधिक होता है। अतः पादप कोशिका को अल्पपरासारी विलयन में रखने पर अन्त:परासरण की क्रिया होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप अतिरिक्त जल कोशिका में पहुँचकर स्फीति दाब (turgor pressure) उत्पन्न करता है।

स्फीति दाब भित्ति दाब (wall pressure) के बराबर होता है। स्फीति दाब को दाब विभव (pressure potential) भी कहते हैं। कोशिका भित्ति की दृढ़ता एवं स्फीति दाब के कारण कोशिका भित्ति क्षतिग्रस्त नहीं होती। स्फीति या आशूनता के कारण कोशिका में वृद्धि होती है। स्फीति दाब एवं परासरण दाब के बराबर हो जाने पर कोशिका में जल का आना रुक जाता है।

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प्रश्न 9.
पादप में जल एवं खनिज के अवशोषण में माइक्रोराइजलीय (कवकमूल सहजीवन) सम्बन्ध कितने सहायक हैं?
उत्तर:
माइकोराइजल या कवकमूलीय सहजीवन (Mycorrhizal Association):
अनेक उच्च पादपों की जड़ें कवक मूल द्वारा संक्रमित हो जाती है; जैसे-चीड़, देवदार, ओक आदि। कवक तन्तु की जड़ों की सतह पर बाह्यपादपी कवकमूल (ectophytic mycorrhiza) बनाता है। कभी-कभी कवक तन्तु जड़ के अन्दर पहुँच जाते हैं और अन्तः पादपी कवकमूल बनाते हैं।

कवक मूल संगठन में कवक तन्तु अपना भोजन पोषक (host) की जड़ों से प्राप्त करते हैं तथा वातावरण की नमी व भूमि की ऊपरी सतह से लवणों का अवशोषण कर पोषक पौधे को प्रदान करने का कार्य करते हैं। कुछ आवृत्तबीजी पौधे; जैसे-निओशिया (Neottia), मोनोट्रोपा (Monotropa) भी कवकमूल सहजीवन प्रदर्शित करते हैं। इन पौधों को अगर कवच सहजीविता समय पर उपलब्ध नहीं होती तो ये मर जाते हैं। चीड़ के बीज कवक सहजीविता स्थापित न होने की स्थिति में अंकुरित होकर नवोद्भिद् (seedlings) नहीं बना पाते।

प्रश्न 10.
पादप में जल परिवहन हेतु मूलदाब क्या भूमिक निभाता है?
उत्तर:
मूलदाब (Root Pressure):
मूल वल्कुट (root cortex) की कोशिकाओं की स्फीत (आशून) स्थिति में अपने कोशिकाद्रव्य पर पड़ने वाले दाब को मूलदाब (root pressure) कहते हैं। मूलदाब के फलस्वरूप जल (कोशिकारस) जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊँचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूलदाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephans Hales, 1927) ने किया।

स्टॉकिंग (Stocking, 1956) के अनुसार जड़ के जाइलम में उत्पन्न दाब, जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं से उत्पन्न होता है, मूलदाब कहलाता है। मूलदाब सामान्यतया +1 से + 2 बार (bars) तक होता है। इससे जल कुछ ऊँचाई तक चढ़ सकता है। शुष्क मृदा में मूलदाब उत्पन्न नहीं होता। बहुत-से पौधों; जैसे-अनावृत्तबीजी (gymnosperms) में मूलदाब उत्पन्न ही नहीं होता। अतः आधुनिक मतानुसार रसारोहण में मूलदाब का विशेष कार्य नहीं है।

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प्रश्न 11.
पादपों में जल परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल की व्याख्या कीजिए। वाष्पोत्सर्जन क्रिया को कौन-सा कारक प्रभावित करता है, पादपों के लिए कौन उपयोगी है?
उत्तर:
रसारोहण या जल परिवहन | (Ascent of Sap or Transport of Water in Plants):
पौधे जड़ों द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। अवशोषित जल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पर्याप्त ऊँचाई तक (पत्तियों तक) पहुँचता है। यह ऊँचाई सिकोया (Sequoia) में 370 फुट होती है। गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण कहते हैं। सर्वमान्य वाष्पोत्सर्जनाकवर्षण जलीय संसंजक मत (Transpiration Pull Cohesive Force of Water Theory) के अनुसार रसारोहण निम्नलिखित कारणों से होता है –

1. वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल):
पत्तियों की कोशिकाओं से जल के वाष्पन के फलस्वरूप कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (Diffusion pressure deficit) अधिक हो जाती है।

इसके फलस्वरूप जल जाइलम से परासरण द्वारा पर्ण कोशिकाओं में पहुँचता रहता है। जलवाष्प रन्ध्रों से वातावरण में विसरित होती रहती है। इसके फलस्वरूप जाइलम में उपस्थित जल स्तम्भ पर एक तनाव उत्पन्न हो जाता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होने वाले इस तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (transpiration pull) कहते हैं।
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चित्र – वाष्पोत्सर्जन के कारण जल का जड़ों से पत्तियों तक पहँचने का प्रदर्शन

2. जल अणुओं का संसंजन बल (Cohesive Force of Water Molecules):
जल अणुओं के मध्य संसंजन बल (cohesive force) होता है। इसी संसंजन बल के कारण जल स्तम्भ 400 वायुमण्डलीय दाब पर भी खण्डित नहीं होता और इसकी निरन्तरता बनी रहती है। संसंजन बल के कारण जल 1500 मीटर ऊँचाई तक चढ़ सकता है।

3. जल तथा जाइलम भित्ति के मध्य आसंजन (Adhesion between Water and wall of Xylem Tissue):
जाइलम ऊतक की कोशिकाओं और जल अणुओं के मध्य आसंजन (adhesion) का आकर्षण होता है। यह आसंजन जल स्तम्भ को सहारा प्रदान करता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न तनाव जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है।

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors affecting Transpiration):
पौधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों को दो समूहों में बाँट लेते हैं –

(अ) बाह्य कारक (External Factors)
(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors)
(अ) बाह्य कारक (External Factors)

1. वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity of Atmosphere):
वायुमण्डल की आपेक्षिक आर्द्रता कम होने पर वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। आपेक्षिक आर्द्रता अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

2. प्रकाश (Light):
प्रकाश के कारण रन्ध्र खुलते हैं, तापमान में वृद्धि होती है, अत: वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। रात्रि में रन्ध्र बन्द हो जाने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

3. वायु (Wind):
वायु गति अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन दर अधिक हो जाती है।

4. तापक्रम (Temperature):
ताप के बढ़ने से आपेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। ताप कम होने पर आपेक्षिक आर्द्रता अधिक हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

5. उपलब्ध जल (Available Water):
वाष्पोत्सर्जन की. दर जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है। मृदा में जल की कमी होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है।

(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors):
पत्तियों की संरचना, रन्ध्रों की संख्या एवं संरचना आदि वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती है।

वाष्पोत्सर्जन की उपयोगिता (Importance of Transpiration):

  • पौधों में अवशोषण एवं परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करता है।
  • मृदा से प्राप्त खनिजों के पौधों के सभी अंगों (भागों) तक परिवहन में सहायता करता है।
  • पत्ती की सतह को वाष्पीकरण द्वारा 10-15°C तक ठण्डा रखता है।
  • कोशिकाओं को स्फीत रखते हुए पादपों के आकार एवं बनावट को नियन्त्रित रखने में सहायता करता है।

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प्रश्न 12.
पादपों में जाइलम रसारोहण के लिए जिम्मेदार कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
रसारोहण (Ascent of Sap):
गुरुत्वाकर्षण के विपरीत मूलरोम से पत्तियों तक कोशिकारस (cell sap) के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण (ascent of sap) कहते हैं। रसारोहण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpiration pull) के कारण होता है। यह निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है –

1. संसंजन (Cohesion):
जल के अणुओं के मध्य आकर्षण।

2. आसंजन (Adhesion):
जल अणुओं का ध्रुवीय सतह (जैसे-जाइलम ऊतक) से आकर्षण।

3. पृष्ठ तनाव (Surface Tension):
जल अणुओं की द्रव अवस्थआ में गैसीय अवस्था। जल की उपर्युक्त विशिष्टताएँ जल को उच्च तन्य सामर्थ्य (high tensile strenght) प्रदान करते हैं। वाहिकाएँ एवं वाहिनिकाएँ (tracheids & vessels) केशिका (capillary) के समान लघु व्यास वाली कोशिकाएँ होती हैं।

प्रश्न 13.
पादपों में खनिजों के अवशोषण के दौरान अन्तःत्वचा की आवश्यक भूमिका क्या होती है?
उत्तर:
जड़ों की अन्तस्त्वचा कोशिकाओं की कोशिकाकला पर अनेक वाहक प्रोटीन्स पाई जाती है। ये प्रोटीन्स जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाने वाले घुलितों की मात्रा और प्रकार को नियन्त्रित करने वाले ‘बिन्दुओं की भाँति कार्य करती हैं। अन्तस्त्वचा की सुबेरिनमय (suberinised) कैस्पेरी पट्टियों (casparian strips) द्वारा खनिज या घुलित पदार्थों के आयन्स या अणुओं का परिवहन एक ही दिशा (unidirection) में होता है। अत: अन्तस्त्वचा (endodermis) खनिजों की मात्रा और प्रकार (quantity & type) को जाइलम तक पहुँचने को नियन्त्रित करती है। जल तथा खनिजों की गति मूलत्वचा (epiblemma) से अन्तस्त्वचा तक सिमप्लास्टिक (symplastic) होती है।

प्रश्न 14.
जाइलम परिवहन एकदिशीय तथा फ्लोएम परिवहन द्विदिशीय होता है। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
जाइलम परिवहन (Xylem Transport):
पौधे अपने लिए आवश्यक जल एवं खनिज पोषक मृदा से प्राप्त करते हैं। ये सक्रिय या निष्क्रिय अवशोषण या सम्मिश्रित प्रक्रिया द्वारा अवशोषित होकर जाइलम तक पहुँचते हैं। जाइलम द्वारा जल एवं पोषक तत्वों का परिवहन एकदिशीय (unidirectional) होता है। ये पौधों के वृद्धि क्षेत्र की ओर विसरण द्वारा पहुँचते हैं।

फ्लोएम परिवहन (Phloem Transport):
प्लोएम द्वारा सामान्यतया कार्बनिक भोज्य पदार्थों का परिवहन होता है। कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषणं पत्तियों द्वारा होता है। पत्तियों में निर्मित भोज्य पदार्थों का पौधे के संचय अंगों (कुण्ड-सिंक) तक परिवहन होता है। लेकिन यह स्रोत (पत्तियाँ) और कुण्ड (संचय अंग) अपनी भूमिकाएँ मौसम और आवश्यकतानुसार बदलते रहते हैं; जैसे-जड़ों में संचित अघुलनशील भोज्य पदार्थ वसन्त ऋतु के प्रारम्भ में घुलनशील शर्करा में बदलकर वर्धी और पुष्प कलिकाओं तक पहुँचने लगता है। इससे स्पष्ट है कि संश्लेषण स्रोत और संचय स्थल (कुण्ड-सिंक) का सम्बन्ध बदलता रहता है। अतः फ्लोएम में घुलनशील शर्करा का परिवहन द्विदिशीय या बहुदिशीय (bidirectional or multidirectional) होता है।

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प्रश्न 15.
पादपों में शर्करा के स्थानान्तरण के दाब प्रवाह परिकल्पना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शर्करा के स्थानान्तरण की दाब प्रवाह परिकल्पना (The Pressure Flow or Mass Flow Hypothesis of Sugar Translocation):
खाद्य पदार्थों (शर्करा) के वितरण की सर्वमान्य क्रियाविधि दाब प्रवाह परिकल्पना है। पत्तियों के संश्लेषित, ग्लूकोस, सुक्रोस (sucrose) में बदलकर फ्लोएम की चालनी नलिकाओं और सहज कोशिकाओं द्वारा पौधों के संचय अंगों में स्थानान्तरित होता है। पत्तियों में निरन्तर भोजन निर्माण होता रहता है।
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चित्र – भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण की प्रक्रिया की आरेखीय प्रस्तुति

फ्लोएम ऊतक की चालनी नलिकाओं में जीवद्रव्य के प्रवाहित होते रहने के कारण उसमें घुलित भोज्य पदार्थ के अणु भी प्रवाहित होते रहते हैं। यह स्थानान्तरण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थानों की ओर होता है। पत्तियों की कोशिकाओं में निरन्तर भोज्य पदार्थों का निर्माण होता रहता है, इसलिए पत्ती की कोशिकाओं में परासरण दाब अधिक रहता है।

जड़ों तथा अन्य संचय भागों में भोज्य पदार्थों के अघुलनशील पदार्थों में बदल जाने या प्रयोग कर लिए जाने के कारण इन कोशिकाओं का परासरण दाब कम बना रहता है। भोज्य पदार्थों के परिवहन हेतु जल जाइलम ऊतक से प्राप्त होता है। संचय अंगों में मुक्त जल जाइलम ऊतक में वापस पहुँच जाता है। इस प्रकार फ्लोएम द्वारा सुगमतापूर्वक कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन होता रहता है।

प्रश्न 16.
वाष्पोत्सर्जन के दौरान रक्षक द्वार कोशिका खुलने एवं बन्द होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
वाष्पोत्सर्जन (Transpiration):
पौधों के वायवीय भागों से होने वाली जल हानि को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) करते हैं। यह सामान्यतया रन्ध्र (stomata) द्वारा होता है। उपचर्म (cuticle) तथा वातरन्ध्र (lenticel) इसके सहायक होते हैं। रन्ध्र रक्षक द्वार कोशिकाओं (guard cellls) से घिरा सूक्ष्म छिद्र होता है। रक्षक कोशिकाएँ सेम के बीज या वृक्क के आकार की होती है। ये चारों ओर से बाह्य त्वचीय कोशिकाओं अथवा सहायक कोशिकाओं से घिरी रहती है। रक्षक द्वार कोशिका में केन्द्रक तथा हरितलवक (chloroplast) पाए जाते हैं। रक्षक द्वार कोशिका की भीतरी सतह मोटी भित्ति वाली तथा बाह्य सतह पतली भित्ति वाली होती है –

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चित्र – (A) पर्ण रन्ध्र की संरचना, (B) खुली अवस्था तथा (C) बन्द

अवस्था रन्ध्र का खुलना या बन्द होना रक्षक द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) पर निर्भर करता है। जब रक्षक कोशिकाएँ स्फीत होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब ये श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाते हैं। रन्ध्र के खुलने में रक्षक कोशिका की भित्तियों में उपस्थित माइक्रोफाइबिल सहायता करते हैं। ये अरीय क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। सामान्यतया रन्ध्र दिन के समय खुले रहते हैं और रात्रि के समय बन्द हो जाते हैं।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 10 कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन

Bihar Board Class 11 Biology कोशिका चक्र और कोशिका विभाजन Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
स्तनधारियों की कोशिकाओं की औसत कोशिका चक्र अवधि कितनी होती है?
उत्तर:
स्तनधारियों (मनुष्य) की कोशिकाओं की औसत कोशिका चक्र अवधि 24 घण्टे होती है।

प्रश्न 2.
कोशिकाद्रव्य (जीवद्रव्य) विभाजन व केन्द्रक विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
कोशिकाद्रव्य विभाजन तथा केन्द्रक विभाजन में अन्तर (Difference between Cytokinesis and Karyokinesis):
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प्रश्न 3.
अन्तरावस्था में होने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कोशिका चक्र (cell cycle) की दो प्रमुख अवस्थाएँ होती हैं –

  1. अन्तरावस्था (interphase) तथा
  2. सूत्री विभाजन अवस्था (M-phase)।

अन्तरावस्था (Interphase):
इस अवस्था में कोशिका विभाजन के लिए तैयार होती है। इस समय कोशिका वृद्धि तथा D.N.A. द्विगुणन की क्रिया होती है। अन्तरावस्था दो क्रमिक एम-प्रावस्थाओं (M-phase) के मध्य की प्रावस्था को व्यक्त करता है।

अन्तरावस्था को तीन प्रावस्थाओं में विभाजित किया जाता है –

  1. पश्चसूत्री विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G1 phase)
  2. संश्लेषण प्रावस्था (S-phase)
  3. पूर्वसूत्री. विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G2 phase)

1. पश्चसूत्री विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G1 phase):
इस प्रावस्था में R.N.A. तथा प्रोटीन का संश्लेषण, D.N.A. संश्लेषण हेतु आवश्यक एन्जाइम्स का संश्लेषण एवं संग्रह होता है। इसमें कोशिका चक्र का लगभग 30-40% समय लगता है। G1 प्रावस्था के बाद कोशिका के दो विकल्प होते हैं। कोशिका S-phase में प्रवेश करती है अथवा G0 phase (शान्त प्रावस्था) में आ जाता है। G0 phase में कोशिका अविभाजित रहती है; जैसे-हृदय पेशियाँ, तन्त्रिका कोशिका आदि।

2. संश्लेषण प्रावस्था (S-phase or Phase of D.N.A. Synthesis):
इसमें D.N.A. का द्विगुणन होता है। प्रत्येक गुणसूत्र से दो अर्द्धगुणसूत्र (chromatids) बनते हैं। इसमें कोशिका चक्र का लगभग 30-50% समय लगता है।
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चित्र-कोशिका चक्र की विभिन्न प्रावस्थाएँ

3. पूर्वसूत्री विभाजन अन्तरालकाल प्रावस्था (G2 phase):
S-phase के पश्चात् यह प्रावस्था आती है। इसमे कोशिका विभाजन की की तैयारी करती है। इसमें कोशिकाचक्र का कुल 10-20% समय लगता है। कोशिका चक्र का नियमन साइक्लिन निर्भर प्रोटीन काइनेस (cyclin dependent protein kinase) एन्जाइम्स द्वारा होता है।

4. एम-प्रावस्था (Mitotic phase or M – phase):
यह G2 phase के पश्चात् आती है। इसमें केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। इसमें कोशिकाद्रव्य का कुल 5-10% समय लगता है।

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प्रश्न 4.
कोशिका चक्र का G0 (प्रशान्त प्रावस्था) क्या है।
उत्तर:
G0 (प्रशान्त प्रावस्था-Quiescent phase) इसमें G1 phase के पश्चात् कोशिका S-phase में प्रवेश नहीं करती। कोशिका G1 phase से निष्क्रिय या प्रशान्त प्रावस्था में पहुँच जाती है। ऐसी कोशिका में कोशिका विभाजन नहीं होता, यद्यपि कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है।

प्रश्न 5.
सूत्री विभाजन को समविभाजन क्यों कहते हैं?
उत्तर:
सूत्री विभाजन के फलस्वरूप बनी संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती है। संतति कोशिकाएँ संरचना एवं लक्षणों में मातृकोशिका के समान होती हैं। इस कारण सूत्री विभाजन को समविभाजन कहते है।

प्रश्न 6.
कोशिका चक्र की उस अवस्था का नाम बताएँ, जिसमें निम्नलिखित घटनाएँ सम्पन्न होती हैं –

  1. गुणसूत्र तङ मध्य रेखा की तरफ गति करते हैं।
  2. गुणसूत्र बिन्दु का टूटना व अर्द्धगुणसूत्र का पृथक होना।
  3. समजात गुणसूत्रों का आपस में युग्मन होना।
  4. समजात गुणसूत्रों के बीच विनिमय का होना।

उत्तर:

  1. मध्यावस्था।
  2. पश्चावस्था।
  3. अर्द्धसूत्री प्रथम पूर्वावस्था की जाइगोटीन उपअवस्था।
  4. अर्द्धसूत्री प्रथम पूर्वावस्था की पैकीटीन उपअवस्था।

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प्रश्न 7.
निम्न के बारे में वर्णन कीजिए –

  1. सूत्रयुग्मन
  2. युगली
  3. काइऐज्मेटा।

उत्तर:
1. सूत्रयुग्मन (Synapsis):
अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रथम पूर्वावस्था (Prophase-I) की युग्मपट्ट (zygotene) उपअवस्था में समजात गुणसूत्र (homologous chromosomes) जोड़े बनाते हैं। इसे सूत्रयुग्मन (synapsis) कहते हैं।

2. युगली (Bivalent):
अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रथम पूर्वावस्था की युग्मपट्ट (zygotene) उपअवस्था में समजात गुणसूत्र जोड़े बनाते हैं। गुणसूत्रों के इन जोड़ों (pairs) को युगली गुणसूत्र (bivalent chromosomes) कहते हैं।

3. काइऐज्मेटा (Chiasmata):
अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम उपअवस्था द्विपट्ट (डिप्लोटीन-diplotene) में युग्मित गुणसूत्रों के अर्द्धगुणसूत्र कुछ स्थानों पर क्रॉस (Cross) बनाते हैं। इन स्थानों को काइऐज्मेटा (chiasmata) कहते हैं। इन स्थानों पर गुणसूत्रों के क्रोमैटिड्स टूटकर पुनः जुड़ते हैं। इस प्रक्रिया में समजात गुणसूत्रों के क्रोमैटिड्स परस्पर बदल जाते हैं। इसे पारगमन या विनिमय (crossing over) कहते हैं।

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प्रश्न 8.
पादप व प्राणी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य विभाजन में क्या अन्तर है?
उत्तर:
पादप और प्राणी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य विभाजन में अन्तर (Difference between Cytokinesis of Plant and Animal Cells):
पादप कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य विभाजन क्रिया में पुत्री केन्द्रकों के मध्य में गॉल्जीकाय के उत्पाद, कुछ कण तथा सूक्ष्म नलिकाएँ एकत्र होकर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, इन्हें प्रैग्मोप्लास्ट (phragmoplast) कहते हैं।

इससे मध्य पटलिका (middle lamellae) का निर्माण होता है। मध्य पटलिका पर सेलुलोस की भित्ति बन जाने से मातृ कोशिका विभाजित होकर दो संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है। जन्तु कोशिकाओं में पुत्री केन्द्रकों के मध्य भाग में प्लाज्मा कला के अन्तर्वलन (invagination) द्वारा कोशिकाद्रव्य का ‘बँटवारा हो जाता है और मातृ कोशिका दो संतति कोशिकाओं में बँट जाती है।

प्रश्न 9.
अर्द्धसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली चार संतति कोशिकाएँ कहाँ आकार में समान और कहाँ भिन्न आकार की होती हैं?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा युग्मक निर्माण होता है। शुक्राणुजनन (spermatogenesis) में मातृ कोशिका के विभाजन से बनने वाली चारों पुत्री कोशिकाएँ समान होती हैं। ये शुक्रकायान्तरण द्वारा शुक्राणु का निर्माण करती हैं। शुक्रजनन में बनने वाली चारों सतति कोशिकाएँ आकार में समान होती हैं। अण्डजनन (oogenesis) में मातृ कोशिका से बनने वाली संतति कोशिकाएँ आकार में भिन्न होती हैं।

अण्डजनन के फलस्वरूप एक अण्डाणु तथा पोलर कोशिकाएँ बनती हैं। पोलर कोशिकाएँ आकार में छोटी होती हैं। पौधों के बीजाण्ड में गुरुबीजाणुजनन (अर्द्धसूत्री विभाजन) के फलस्वरूप गुरुबीजाणु, से चार कोशिकाएँ बनती हैं। इनमें आधारीय कोशिका अन्य कोशिकाओं से भिन्न होती हैं। यह वृद्धि और विभाजन द्वारा भ्रूणकोष (embryo sac) बनाता है। पौधों में लघु-बीजाणु जनन द्वारा लघु बीजाणु या परागकण बनते हैं। ये आकार में समान होते हैं।

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प्रश्न 10.
सूत्री विभाजन की पश्चावस्ता, अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था I में क्या अन्तर है?
उत्तर:
सूत्री विभाजन तथा अर्द्धसूत्री विभाजन की पश्चावस्था I में अन्तर (Difference between the Anaphase Stage of Mitosis and Meiosis 1):
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प्रश्न 11.
सूत्री एवं अर्द्ध सूत्री विभाजन में प्रमुख अन्तरों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
समसूत्री तथा अर्द्धसूत्री विभाजन में अन्तर:
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प्रश्न 12.
अर्द्धसूत्री विभाजन का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व

  1. अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण पीढ़ी पर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या निश्चित बनी रहती है।
  2. गुणसूत्रों में विनिमय के कारण गुणसूत्रों की संरचना एवं जीवधारी के लक्षणों में विभिन्नता आ जाती है।
  3. युग्मक के अनियमित रूप से मिलने के कारण गुणसूत्रों के नये संयोग बनते हैं। इससे नये-नये लक्षणों का विकास होता है। ये भिन्नतायें जैव विकास का आधार मानी जाती हैं।

प्रश्न 13.
अपने शिक्षक के साथ निम्नलिखित के बारे में चर्चा कीजिए –

  1. अगुणित कीटों व निम्न श्रेणी के पादपों में कोशिका विभाजन कहाँ सम्पन्न होता है?
  2. उच्च श्रेणी पादपों की कुछ अगुणित कोशिकाओं में कोशिका विभाजन कहाँ नहीं होता है?

उत्तर:
1. नर मधुमक्खियाँ अर्थात् ड्रोन्स (drones) अगुणित होते हैं। इनमें सूत्री विभाजन अनिषेचित अगुणित अण्डों में होता है। निम्न श्रेणी के पादपों; जैसे-एककोशिकीय क्लैमाइडोमोनास (chlamydomonas), बहुकोशिकीय यूलोथ्रिक्स (Ulothrix) आदि में समसूत्री विभाजन द्वारा जनन होता है। इनमें अगुणित युग्मक बनते हैं। युग्मकों के परस्पर मिलने से युग्माणु (zygote) बनते हैं। जाइगोट में अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। इसके फलस्वरूप बने अगुणित बीजाणु समसूत्री विभाजन द्वारा नए पादपों का विकास करते हैं।

2. उच्च श्रेणी के पादपों में द्विगुणित बीजाण्डकाय में गुरुबीजाणु मातृ कोशिका में अर्द्धसूत्री विभाजन के कारण चार अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं। इनमें से तीन में कोशिका विभाजन नहीं होता। सक्रिय गुरुबीजाणु से भ्रूणकोष (embryo sac) बनता है। भ्रूणकोष की अगुणित प्रतिमुख कोशिकाओं (antipodal cells) तथा सहायक कोशिकाओं (synergids) में कोशिका विभाजन नहीं होता। साइकस के लघुबीजाणुओं (परागकण) के अंकुरण के फलस्वरूप नर युग्मकोद्भिद् बनता है। इसकी प्रोथैलियल chilfgrat (prothallial cell) an africht alleicht (tubecell) में कोशिका विभाजन नहीं होता।

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प्रश्न 14.
क्या S प्रावस्था में बिना डी० एन० ए० प्रतिकृति के सूत्री विभाजन हो सकता है?
उत्तर:
‘S’ प्रावस्था में D.N.A. की प्रतिकृति के बिना सूत्री विभाजन नहीं हो सकता।

प्रश्न 15.
क्या बिना कोशिका विभाजन के डी० एन० ए० प्रतिकृति हो सकती है?
उत्तर:
कोशिका विभाजन के बिना भी D.N.A. प्रतिकृति हो सकती है। सामान्यतया D.N.A. से R.N.A. का निर्माण प्रतिकृति के फलस्वरूप ही होता रहता है।

प्रश्न 16.
कोशिका विभाजन की प्रत्येक अवस्थाओं के दौरान होने वाली घटनाओं का विश्लेषण कीजिए और ध्यान दीजिए कि निम्नलिखित दो प्राचलों में कैसे परिवर्तन होता है?

  1. प्रत्येक कोशिका की गुणसूत्र संख्या (N)
  2. प्रत्येक कोशिका में डी० एन० ए० की मात्रा (C)।

उत्तर:
अन्तरावस्था की G1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है। इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है। S-प्रावस्था में D.N.A. की प्रतिकृति होती है। इसके फलस्वरूप D.N.A. की मात्रा दोगुनी हो जाती है। यदि D.N.A. की प्रारम्भिक मात्रा 2C से प्रदर्शित करें तो इसकी मात्रा 4C हो जाती है, जबकि गुणसूत्रों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता।

यदि G, प्रावस्था में गुणसूत्रों की संख्या 2N है तो G2 प्रावस्था में भी इनकी संख्या 2N रहती है। अर्द्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था प्रथम की युग्मपट्ट (जाइगोटीन) अवस्था में समजात गुणसूत्र जोड़े बनाते हैं। पश्चावस्था प्रथम में गुणसूत्रों का बँटवारा होता है। यदि गुणसूत्रों की संख्या 2N है तो अर्द्धसूत्री विभाजन के पश्चात् गुणसूत्रों की संख्या N रह जाती है। जननांगों (2N) में युग्मकजनन अर्द्धसूत्री विभाजन के फलस्वरूप होता है। इसके फलस्वरूप युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या घटकर अगुणित (आधी-N) रह जाती है।

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 9 जैव अणु

Bihar Board Class 11 Biology Solutions Chapter 9 जैव अणु Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Biology जैव अणु Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
वृहत् अणु क्या है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
वृहत् अणु (Macromolecules):
जीव ऊतक (जैसे – यकृत या सब्जी आदि) को ड्राइक्लोरोऐसीटिक अम्ल के साथ पीसकर जो गाढ़ा तरल (slurry) प्राप्त होता है, उसे कपड़े में रखकर निचोड़ लेते हैं। अम्ल में घुलनशील निस्यंद (filtrate) में जैव अणु (biomolecules) तथा अम्ल अविलेय अंश में वृहत् अणु (macromolecules) पाए जाते हैं; जैसेपॉलीसैकेराइड्स (polysaccharides), प्रोटीन्स (proteins), न्यूक्लीक अम्ल (nucleic acids)। वृहत् अणु बहुलक (polymers) होते हैं। इनका अणुभार बहुत अधिक (दस हजार डाल्टन या अधिक) होता है। लिपिड्स का अणुभार 800 डाल्टन से अधिक नहीं होता; अतः ये वृहत् अणु नहीं कहलाते।

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प्रश्न 2.
ग्लाइकोसिडिक, पेप्टाइड तथा फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ग्लाइकोसिडिक बन्ध (Glycosidic Bonds):
अनेक मोनोसैकेराइड अणु परस्पर ग्लाइकोसिडिक बन्ध से जुड़कर पॉलीसैकेराइड्स बनाते हैं। ग्लाइकोसिडिक बन्ध दो समीपवर्ती मोनोसैकेराइड के मध्य बनता है। यह क्रिया संघनन (condensation) एवं निर्जलीकरण (dehydration) के फलस्वरूप होती है। ग्लाइकोसिडिक बन्ध उत्क्रमणीय होता है, अर्थात् जल अपघटन (hydrolysis) द्वारा जुड़े अणु पृथक् हो जाते हैं।

पेप्टाइड बन्ध (Peptide Bond):
प्रोटीन्स ऐमीनो अम्लो के बहुलक हैं। प्रोटीन अणु में बहुत-से ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्ध (peptide bonds) द्वारा जुड़े रहते हैं। एक ऐमीनो अम्ल का कार्बोक्सिल समूह (-COOH) दूसरे ऐमीनो अम्ल के ऐमीनो समूह (-NH2) से पेप्टाइड बन्ध द्वारा जुड़ा रहता है। यह क्रिया निर्जलीकरण के फलस्वरूप होती है और जल अणु मुक्त होता हैं।

फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध (Phosphodiester Bonds):
न्यूक्लीक अम्ल के न्यूक्लिओटाइड्स (nucleotides) फॉस्फोडाइएस्टर बन्धों (phosphodiester bonds) द्वारा एक-दूसरे से संयोजित होकर पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला बनाते हैं। फॉस्फोडाइएस्टर बन्ध समीपवर्ती दो न्यूक्लियोटाइड्स के फॉस्फेट अणुओं के मध्य बनता है। D.N.A. की दोनों पॉलीन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं के नाइट्रोजन क्षारक हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़े होते हैं।

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प्रश्न 3.
प्रोटीन की तृतीयक संरचना से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रोटीन की तृतीयक संरचना (Tertiary Structure of Protein):
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चित्र – एक कल्पित प्रोटीन अणु की तृतीयक संरचना।

पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में त्रिविमीय वलन (three dimensional folding) से बनी सघन गोलाकार आकृतियाँ प्रोटीन की तृतीयक संरचना को प्रदर्शित करती हैं। यह संरचना ग्लोबुलर प्रोटीन्स (globular proteins) में पाई जाती है। इसमें द्वितीयक संरचना वाली लहरदार या α – कुण्डलिनी श्रृंखलाओं का पुन: कुण्डलन एवं वलन होता है।

ये वलन पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में दूर-दूर स्थित ऐमीनो अम्लों के R – समूहों (पार्श्व शृंखलाओं) के बीच में तथा पास-पास आने और मुड़ने से बनते हैं इसके फलस्वरूप ऐमीनो अम्लों के अध्रुवीय जलविरागी (hydrophobic) R – समूह प्रोटीन अणु के अन्दर की ओर छुप जाते हैं तथा जलस्नेही (hydrophilic) ऐमीनो (NH2) समूह प्रोटीन अणु की सतह पर आ जाते हैं।

प्रोटीन के सक्रिय भाग भी सतह पर आ जाते हैं। प्रोटीन अणु के सक्रिय क्षेत्रों को डोमेन (domaiii) कहते हैं। त्रिविन संरचना वाली पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के ऐमीनो अम्लों के R-समहों के मध्य हाइड्रोजन बन्ध, आयनिक बन्ध, कोवैलेन्ट बन्ध (hydrogen, ionic and covalent bonds) आदि पाए जाते हैं। ये प्रोटीन अणु की संरचना को स्थिरता प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 4.
10 ऐसे रुचिकर सूक्ष्म जैव अणुओं का पता लगाइए जो कम अणुभार वाले होते हैं व इनकी संरचना बनाइए। ऐसे उद्योगों का पता लगाइए जो इन यौगिकों का निर्माण विलगन द्वारा करते हैं? इनको खरीदने वाले कौन हैं? मालूम कीजिए।
उत्तर:
सूक्ष्म जैव अणु (Micro Biological Molecules):
जीवधारियों में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक यौगिकों को जैव अणु कहते हैं।

  1. कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates); जैसे – ग्लूकोस, फ्रक्टोस, राइबोस, डिऑक्सीराबोस शर्करा, माल्टोस आदि।
  2. वसा व तेल (Fat & Oils) – पामिटिक अम्ल, ग्लिसरॉल, ट्राइग्लिसराइड, फॉस्फोलिपिड्स, कोलेस्टेरॉल आदि।
  3. ऐमीनो अम्ल (Amino Acids) – ग्लाइसीन, ऐलेनीन, सीरीन आदि।
  4. नाइट्रोजन क्षारक (Nitrogenous Base) – ऐडेनीन (adenine), ग्वानीन (guanine), थायमीन (thymine), यूरेसिल (uracil), सायटोसीन (cytosine) आदि।

जीव ऊतकों में पाये जाने वाले कम अणुभार के कार्बनिक यौगिकों की संरचनाएँ:
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शर्करा (कार्बोहाइड्रेट्स)
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ऐमीनो अम्ल
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ट्राइग्लिसराइड R2, R2 व R3
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फॉस्फोलिपिड (लेसीथीन)
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वसा व तेल (लिपिड्स)
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शर्करा उद्योग, तेल एवं घी उद्योग, औषधि उद्योग आदि इनका निर्माण करते हैं। मनुष्य इनका उपयोग अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु करता है।

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प्रश्न 5.
प्रोटीन में प्राथमिक संरचना होती है, यदि आपको जानने हेतु ऐसी विधि दी गई है जिसमें प्रोटीन के दोनों किनारों पर ऐमीनो अम्ल है तो क्या आप इस सूचना को प्रोटीन की शुद्धता अथवा समांगता (homogeneity) से जोड़ सकते हैं?
उत्तर:
प्रोटीन्स की पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लम्बी व रेखाकार होती हैं। प्रोटीन कुण्डलन एवं वलन द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृति धारण करती है। इन्हें प्रोटीन्स के प्राकृत संरूपण (native conformation) कहते हैं। प्रोटीन के प्राकृत संरूपण चार स्तर के होते हैं – प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुष्क स्तर। पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े ऐमीनो अम्लों के अनुक्रम प्रोटीन की संरचना का प्राथमिक स्तर प्रदर्शित करते हैं। प्रोटीन से ऐमीनो अम्लों का अनुक्रम इसके जैविक। प्रकार्य का निर्धारण करता है।
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चित्र – कल्पित प्रोटीन के अंश की प्राथमिक संरचना N व C प्रोटीन के दो सिरों को प्रकट करता है। ऐमीनो अम्ल का एकल अक्षरीय कूट तथा 3-अक्षरीय कूट दर्शाया गया है।

पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला के एक सिर पर प्रथम ऐमीनो अम्ल का खुला ऐमीनो समूह तथा दूसरे सिरे पर अन्तिम ऐमीनो अम्ल का खुला कार्बोक्सिल समूह (carboxyl group) होता है। अतः इन सिरों को क्रमश: N – छोर तथा C – छोर कहते हैं। इससे प्रोटीन की शुद्धता या समांगता प्रदर्शित होती है।

प्रश्न 6.
चिकित्सार्थ अभिकर्ता (therapeutic agents) के रूप में प्रयोग में आने वाले प्रोटीन का पता लगाइए व सूचीबद्ध कीजिए। प्रोटीन की अन्य उपयोगिताओं को बताइए। (जैसे-सौन्दर्य प्रसाधन आदि)।
उत्तर:
कुछ प्रोटीन्स विषाक्त (toxic) होते हैं; जैसे – रोगजनक जीवाणुओं के प्रोटीन्स, सर्पविष का प्रोटीन, कपास के बीज में पाए जाने वाला प्रोटीन (Gossypiun) रेंडी के बीज का प्रोटीन (ricin) आदि। इन प्रोटीन्स का उपयोग औषधियों के रूप में रोगों के उपचार हेतु किया जाता है।

प्रोटीन्स के अन्य उपयोग (Other Uses of Proteins):

  1. पोषक प्रोटीन्स: दूध का केसीन (casein), पक्षी के अण्डों का ऐल्बुमिन (albumin), अनाज; जैसे – गेहूँ का ग्लूटेलिन, मक्का का जाइन्स (zeins), मटर का फैसिओलिन (phaseolin) प्रोटीन आदि पोषक प्रोटीन हैं।
  2. रेशम कीट की फाइब्रोइन प्रोटीन सूखकर रेशम धागे का निर्माण करता है।
  3. कुछ पौधों द्वारा निर्मित मोनेलिन (monellin) अत्यन्त मीठा होता है। इसका उपयोग मधुमेह रोगियों के लिए कृत्रिम शर्करा के रूप में किया जाता है।
  4. शीतल जल में रहने वाली मछलियों में रुधिर को जमने. से रोकने के लिए प्रतिहिम प्रोटीन (antifreeze protein) पाया जाता है। इसका उपयोग ट्रान्सजेनिक जन्तु एवं पादपों के लिए किया जा रहा है।

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प्रश्न 7.
ट्राइग्लिसराइड के संघटन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ट्राइग्लिसराइड (Triglyceride):
ग्लिसरॉल (glycerol) का एक अणु वसीय अम्लों (fatty acids) के तीन अणुओं से क्रिया करके वसा का एक अणु बनाता है। ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल अणुओं के बीच सहसंयोजन बन्धों को एस्टर बन्ध (ester bonds) कहते है।

ग्लिसरॉल एक ट्राइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल है जिसकी कार्बन शृंखला के तीनों कार्बन परमाणुओं से एक-एक हाइड्रॉक्सिल समूह (-OHgroup) जुड़ा होता है। इसी कारण वसा अणु को ट्राइग्लिसराइड (triglyceride) कहते हैं। यह क्रिया निर्जलीकरण-संघनन संश्लेषण (dehydrationcondensationsynthesis) द्वारा होती है। ट्राइग्लिसराइड अणु के तीनों वसा अम्ल समान या असमान हो सकते हैं।
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ट्राइग्लिसराइड (R1, R2 व R3 वसीय अम्ल हैं।)

प्रश्न 8.
क्या आप प्रोटीन की अवधारणा के आधार पर वर्णन कर सकते हैं कि दूध का दही अथवा योगर्ट में परिवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
दूध की विलेय प्रोटीन केसीनोजन (caseinogen) की अविलेय केसीन (casein) में बदलने का कार्य रेनिन (rennin) एन्जाइम तथा स्ट्रेप्टोकोकस जीवाणु करते हैं। ये किण्वन द्वारा दूध को दही या योगर्ट में बदल देते हैं; क्योंकि केसीनोजन प्रोटीन अवक्षेपित हो जाती है।

प्रश्न 9.
क्या आप व्यापारिक दृष्टि से उपलब्ध परमाणु मॉडल (बॉल व स्टिक नमूना) का प्रयोग करते हुए जैव अणुओं के उन प्रारूपों को बना सकते हैं?
उत्तर:
बॉल व स्टिक नमूना (Ball and Stick Model) के द्वारा जैव अणुओं के प्रारूपों को प्रदर्शित किया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
ऐमीनो अम्लों को दुर्बल क्षार से अनुमापन (titrate) कर, ऐमीनो अम्ल में वियोजी क्रियात्मक समूहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
ऐमीनो अम्लों का दुर्बल क्षार से अनुमापन करने से कार्बोक्सिल समूह (-COOH) तथा ऐमीनो समूह (-NH2) पृथक हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
ऐलैनीन ऐमीनो अम्ल की संरचना बताइए।
उत्तर:
ऐलैनीन एमीनो अम्ल एक उदासीन अम्ल है जिसका निर्माण एक एमीनो समूह तथा कार्बोक्सिल समूह से होता है।
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एमीनो अम्ल

प्रश्न 12.
गोंद किससे बने होते हैं? क्या फेविकोल इससे भिन्न है?
उत्तर:
गोंद (Gum):
यह एक द्वितीयक उपापचयज (secondary metabolite) है। यह एक कार्बोहाइड्रेट बहुलक, (polymer) है। गोंद पौधों की काष्ठ वाहिकाओं (xylem vessels) से प्राप्त होने वाला उत्पाद है। यह कार्बनिक घोलक में अघुलनशील होता है। गोंद जल के साथ चिपचिपा घोल (sticky solution) बनाता है। फेविकोल (fevicol) एक कृत्रिम औद्योगिक उत्पाद है।

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प्रश्न 13.
प्रोटीन, वसा व तेल, ऐमीनो अम्लों का विश्लेषणात्मक परीक्षण बताइए एवं किसी भी फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण कीजिए?
उत्तर:
प्रोटीन एवं अमीनो अम्ल का परीक्षण (Protein and Amino Acid Test):
प्रोटीन के वृहत् अणु (macromolecules) ऐमीनो अम्लों की लम्बी श्रृंखलाएँ होते हैं। ऐमीनो अम्ल पेप्टाइड बन्धों द्वारा जुड़े रहते हैं। इनका आण्विक भार बहुत अधिक होता है। अण्डे की सफेदी, सोयाबीन, दालों (मटर, राजमा आदि) में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। अण्डे की सफेदी या दालों (सेम, चना, मटर, राजमा) आदि को जल के साथ पोरकर पतली लुगदी बना लेते हैं। इसे जल के साथ उबाल कर छान लेते हैं। निस्वंद द्रव में प्रोटीन (ऐमीनो अम्ल) होती है।

प्रयोग 1:
एक परखनली में 3 मिली प्रोटीन निस्यंद लेकर, इसमें 1 मिली सान्द्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) मिलाइए। सफेद अवक्षेप बनता है। परखनली को गर्म करने पर अवक्षेप घुल जाता है तथा विलयन का रंग पीला हो जाता है। अब इसे ठण्डा करके इसमें 10% सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) विलयन मिलाते हैं। परखनली में विलयन का रंग पीले से नारंगी हो जाता है।

प्रयोग 2:
एक परखनली में प्रोटीन निस्यंद की 1 मिली मात्रा लेकर इसमें लगभग 1 मिली मिलन अभिकर्मक (Millon’s Reagent) मिलाने पर हल्के पीले रंग का अवक्षेप बनता है। इस अवक्षेप में 4-5 बूँदे सोडियम नाइट्रेट (NaNO3) की मिलाकर विलयन को गर्म करने पर अवक्षेप का रंग लाल हो जाता है।

वसा व तेल का परीक्षण (Fat and Oil Test):
ये जल में अविलेय और ईथर, पेट्रोल, क्लोरोफार्म आदि में घलनशील (विलेय) होती है। साधारण ताए पर जब वसाएँ ठोस होती हैं तो वसा (चर्बी – Fat) और जब ये तरल होती है तो तेल (oil) कहलाती है। पादप वस्साएँ असंतृप्त (नारियल का तेल तथा ताड़ का तेल संतृप्त) तथा जन्तु वसाएँ संतृप्त होती हैं।

प्रयोग 1:
मूंगफली के कच्चे दाने लेकर उनको सफेद कागज पर रखकर पीस लीजिए। अब इस कागज के टुकड़े को प्रकाश के किसी स्रोत की ओर रखकर देखिए। यह अल्पपारदर्शी नजर आता है। इस पर एक बूंद पानी डालकर देखिए। कागज पर पानी का प्रभाव नहीं होता। यह प्रयोग जन्तु वसा (देशी घी) के साथ भी किया जा सकता है।

प्रयोग 2:
एक परखनली में 0.5 मिली परीक्षण तेल या वसा तथा 0.5 मिली जल (दोनों बराबर मात्रा में) लेते है। अब इसमें 2-3 बूंदे सुडान – III विलयन की डालकर हिलाते हैं तथा पाँच मिनट तक ऐसे ही रख देते हैं। परखनली में जल तथा तेल की पृथक् पतों में, तेल की पर्त लाल नजर आती है। नोट-फल के रस, लार, पसीना तथा मूत्र में इनका परीक्षण उपर्युक्त विधियों द्वारा किया जा सकता है।

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प्रश्न 14.
पता लगाइए कि जैवमण्डल में सभी पादपों द्वारा कितने सेलुलोस का निर्माण होता है? इसकी तुलना मनुष्यों द्वारा उत्पादित कागज से करें। मानव द्वारा प्रतिवर्ष पादप पदार्थों की कितनी खपत की जाती है? इसमें वनस्पतियों की कितनी हानि होती है?
उत्तर:
सेलुलोस (cellulose) पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाए जाने वाला कार्बोहाइड्रेट है। यह जटिल बहुलक होता है। पादपों में सेलुलोस की मात्रा सर्वाधिक होती है। यह पादप कोशिकाओं की कोशिका भित्ति को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। पौधों के काष्ठीय भागों व कपास तथा रेशेदार पौधों में इसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। काष्ठ में लगभग 50% तथा कपास के रेशे में इसकी मात्रा लगभग 90% होती है। मनुष्य द्वारा सेलुलोस का उपयोग ईधन तथा इमारती लकड़ी के रूप में, तन्तुओं के रूप में वस्त्र निर्माण, कृत्रिम रेशे निर्माण, कागज निर्माण में प्रमुखता से किया जाता है।

नाइट्रोसेलुलोस का उपयोग विस्फोटक पदार्थ के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग पारदर्शी प्लास्टिक सेलुलॉयड (celluloid) बनाने के लिए किया जाता है जिससे खिलौने, कंघे आदि बनाए जाते हैं। मनुष्य सेलुलोस का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वनस्पतियों को हानि पहुँचा रहा है। इसके फलस्वरूप प्राकृतिक वन क्षेत्रों में निरन्तर कमी होतो जा रही है। पारितन्त्र के प्रभावित होने के कारण अनेक पादप प्रजातियाँ विलुप्त होती जा रही हैं।

प्रश्न 15.
एन्जाइम के महत्त्वपूर्ण गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एन्जाइम्स की विशेषताएँ (गण) (Characteristics of Enzymes):
एन्जाइम्स के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –

  1. एन्जाइम्स कोलॉइडी प्रोटीन्स होते हैं। ये जल, नमक के घोल तथा ग्लिसरीन में विलेय होते हैं।
  2. एन्जाइम्स का कार्य-क्षेत्र अति विशिष्ट होता है। सामान्यतया एक एन्जाइम एक प्रतिक्रिया को ही उत्प्रेरित करता हैं।
  3. एन्जाइम्स 25-35°C पर सर्वाधिक क्रियाशील होते हैं। 60°C से अधिक ताप पर ये नष्ट हो जाते हैं। 0°C ताप पर ये निष्क्रिय हो जाते हैं।
  4. इनकी कार्य-क्षमता अत्यधिक होती है। ये प्रति मिनट लाखों अणुओं को उत्प्रेरित कर सकते हैं।
  5. एन्जाइम्स की सूक्ष्म मात्रा ही क्रिया को प्रेरित कर देती हैं।
  6. एन्जाइम्स की क्रियाशीलता pH मान से प्रभावित होती है। pH मान की अधिकता या कमी इनकी कार्य-क्षमता को प्रभावित या नष्ट कर देती है।
  7. एन्जाइम नष्ट नहीं होते। एन्जाइम क्रिया के पश्चात् जैसे के तैसे बच जाते हैं।
  8. एन्जाइम्स सहकारक (cofactor) की उपस्थिति में क्रियाशील होते हैं। सहकारक प्रोस्थैटिक समूह (prosthetic group), सहएन्जाइम (coenzyme) या अकार्बनिक आयन (inorganic ions) होते हैं।
  9. एन्जाइम की क्रियाएँ प्रायः शृंखलाबद्ध होती हैं। एक एन्जाइम क्रिया का उत्पाद (product) दूसरे एन्जाइम के लिए क्रियाधार (substrate) का कार्य करता है।
  10. एन्जाइम सामान्यतया जल-अपघटन (hydrolysis), कार्बोक्सिलीकरण (decarboxylation), ऑक्सीकरण व अवकरण (oxidation and reduction) आदि रासायनिक क्रियाओं को प्रेरित करते हैं।

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पा (पिव् ) (पीना) परस्मैपदी धातु 

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लृट् लकार (भविष्यत् काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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भू (भव) (होना) परस्मैपदी

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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पद् (पढ़ना) परस्मैपदी ।

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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गम् (गच्छ) (जाना) परस्मैपदी

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लृट् लकार (भविष्यत काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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दृश् ( पश्य ) (देखना) परस्मैपदी

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लृट् लकार (भविष्यत काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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अस् (होना) परस्मैपदी

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लृट् लकार (भविष्यत् काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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हन् (मारना) परस्मैपदी

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लट् लकार (भविष्यत् काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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कृ (करना) (उभयपदी)

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लुट् लकार (भविष्यत काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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ब्रू (कहना) परस्मैपद

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लुट् लकार (भविष्यत् काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ् (औचित्य)

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दा धातु (परस्मैपद)

लट् लकार (वर्तमान काल)

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लोट् लकार (अनुज्ञा)

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लृट् लकार (भविष्यत् काल)

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लङ् लकार (भूतकाल)

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विधिलिङ लकार (चाहिए अर्थ)

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Bihar Board Class 7 Sanskrit Solutions व्याकरण कारक

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण कारक

किसी क्रिया के साथ जिसका प्रत्यक्ष संबंध होता है, उसे ‘कारक’ कहते हैं । ‘कारक’ के छह भेद होते हैं- कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान एवं अधिकरण । ‘क्रिया’ के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं रहने के कारण संस्कृत भाषा में ‘सम्बन्ध’ और ‘सम्बोधन’ कारक नहीं कहलाते हैं । इन्हें मात्र ‘विभक्ति’ माना जाता है, जबकि उपर्युक्त छह को कारक-विभक्ति । हिन्दी भाषा में इन आठों को ही ‘कारक’ माना जाता है ।

आगे की पंक्तियों में इन सभी कारकों पर अलग-अलग संक्षेप में सोदाहरण विचार किया जाता है ।

कर्ता कारक

किसी ‘क्रिया’ को करने वाले को ‘कर्ता कारक’ कहा जाता है। कर्तवाच्य और कर्मवाच्य, दोनों में ही कर्ता-पद प्रधान होता है । कर्तवाच्य में कर्ता-पद प्रधान होता है और कर्म-पद गौण । कर्मवाच्य में कर्ता-पद गौण होता है और कर्मपद प्रधान । उदाहरण के लिए नीचे के वाक्यों को देखा जा सकता है

  • कर्तवाच्य – रामः फलम् खादति । (राम फल खाता है ।)
  • कर्तृवाच्य- रामेण फलम् खाद्यते । (राम द्वारा फल खाया जाता है ।)

कर्तृवाच्य के कर्ताकारक में प्रथमा विभक्ति होती है । यथा-बालक: खादति । (बालक खाता है ।) यहाँ ‘खादति’ क्रिया का सम्पादक ‘बालक’ है, इसलिए ‘बालक’ कर्ता हुआ और उसमें प्रथमा विभक्ति हुई। ऐसे ही-सीता पठति, रमा गच्छति आदि में समझना चाहिए । सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति होती है । यथा- हे बालक । (हे बालक) अयि सीते (हे सीते) । अरे बालकाः (ओ लड़के) इत्यादि ।

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‘कर्ता कारक’ के वाक्यों के अन्य उदाहरण हैं –

  1. बालकः क्रीडति । (लड़का खेलता है।)
  2. मयूरः नृत्यति । (मोर नाचता है ।)
  3. नदी प्रवहति । (नदी बहता है ।)
  4. धेनुः रचति । (गाय चरती है।)
  5. फलम् पतति । (फल गिरता है ।)
  6. पत्रम् तरति । (पत्ता तैरता है।)

करण कारक

कोई क्रिया करने में जो अत्यन्त सहायक हो, उसे ‘करण कारक’ कहते हैं। ‘करण-कारक’ में तृतीया विभक्ति होती है । यथा- रामः लगडेन ताडयति । (राम पैने से मारता है ।) यहाँ ‘ताडयति’ क्रिया का अत्यन्त सहायक . ‘लगुड’ (पैना) है, इसीलिए यह करण कारक हुआ और इसमें तृतीया विभक्ति

‘सह’, ‘साकम्’, ‘सार्द्धम्’ (साथ) जैसे शब्दों में योग में भी तृतीया विभक्ति होती है । यथा- भ्रात्रा सह सोहनः आगच्छति (भाई के साथ सोहन आता है ।) त्वया साकं गीता गमिष्यति’। (तुम्हारे साथ गीता जायेगी ।) यहाँ ‘सह’ का योग रहने के कारण ‘भ्राता’ और ‘त्वया’ में तृतीया विभक्ति हुई है।

‘करण कारक’ के अन्य उदाहरण:लेखक:

  1. लेखन्या पत्रं लिखति । (लेखक कलम से चिट्ठी लिखता है।)
  2. रवीन्द्रः नयनाभ्यां चन्द्रं पश्यति । (रवीन्द्र आँखों से चन्द्रमा को देखता है।)
  3. अश्वः पादैः चलति । (घोड़ा पैरों से चलता है ।)
  4. त्वं कर्णाभ्यां शृणोषि । (तुम कानों से सुनते हैं ।)
  5. भवान् कराभ्यां गृह्णाति । (आप हाथों से ग्रहण करते हैं ।)
  6. सः शस्त्रेण छिन्दति । (वह शस्त्र से काटता है।)

सम्प्रदान कारक

जिस व्यक्ति को कुछ दिया जाय, उसे ‘सम्प्रदान’ कहते हैं । सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा- विप्राय गां देहि (ब्राह्मण को गाय दो ।) यहाँ ‘ब्राह्मण’ (व्यक्ति) को कुछ (गाय) दिया रहा है।

अत: इसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है।

नमः स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा आदि के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है; जैसे

  • श्री महादेवाय नमः । (महादेव जी को प्रणाम है ।)
  • अग्नये स्वाहा । (अग्निदेव को समिधा स्वीकार हो ।)

सम्प्रदान कारक के अन्य उदाहरण:-

  1. बालकाय मोदकं देहि । – (लडके को लड्डू दो ।)
  2. भिक्षुकाय अन्नं देहि । (भिक्षुक को अन्न दो ।)
  3. दरिद्राय धनं देहि । (दरिद्र को धन दो.)
  4. श्रीहरये नमः (श्रीहरि को नमस्कार है।)
  5. सोमाय स्वाहा । (सोम देवता को समिधा स्वीकार हो ।)
  6. विवादाय अलम् । (विवाद करना बेकार है ।)

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अपादान कारक

जहाँ व्यक्ति, वस्तु, स्थान आदि को किसी व्यक्ति, वस्तु आदि का अलग होना या उत्पन्न होना सूचित हो, उसे ‘आपादान कारक’ कहते हैं । अपादान कारक में पंचमी विभक्ति होती है । यथा- वृक्षात् फलं पतति । (पेड़ से फल गिरता है।) यहाँ वृक्ष से फल गिरकर अलग होता है, इसीलिए ‘वृक्ष’ में पंचमी विभक्ति हुई है । ऐसे ही-ज्ञानात् सुखं भवति । (ज्ञान से सुख होता है।) दुग्धात् दधि जायते । (दूध से दही तैयार होता है।) आदि वाक्यों में समझना चाहिए।’

‘आपादान कारक’ के अन्य उदाहरण:-

  1. वृक्षात् पत्राणि पतन्ति । (पेड़ से पत्ते गिरते हैं ।)
  2. सः पाटलिपुत्रात् आगच्छति । (वह पटने से आता है ।)
  3. गंगा हिमालयात प्रभवति । (गंगा हिमालय से निकलती है।)
  4. ते काशीत: गच्छन्ति । (वे काशी से जाते हैं ।)

सम्बन्ध (विभक्ति)

संस्कृत भाषा में ‘सम्बन्ध’ को कारक नहीं माना जाता । कारण कर्ता कारक से इसका सीधा सम्बन्ध नहीं होता । इससे किसी व्यक्ति, वस्तु, भाव आदि का दूसरे व्यक्ति, वस्तु, भाव आदि से संबंध ही सूचित होता है । अतः

‘सम्बन्ध’ में षष्ठी विभक्ति होती है । यथा- गोपालस्य भ्राता अस्ति । (गोपाल का भाई है।) यहाँ गोपाल के साथ ‘भाई’ का सम्बन्ध है, अतः ‘गोपाल’ में षष्ठी विभक्ति हुई है । ऐसे ही ‘तव पुस्तिका’ (तुम्हारी पुस्तिका), ‘मम उद्यानम्’, (मेरा बगीचा), तस्य गृहम् (उसका घर), ‘राधाया आभूषणम्’ (राधा का आभूषण) आदि उदाहरणों को देखा जा सकता है।

सम्बन्ध-विभक्ति के अन्य उदाहरण-

  1. अस्मांक देशः भारतवर्षम् (हमलोगों का देश भारतवर्ष है।)
  2. गायत्री शिवशंकरस्य भगिनी । (गायत्री शिवशंकर की बहन है ।)
  3. सुग्रीवस्य मित्रं गच्छति । (सुग्रीव का मित्र जाता है ।)
  4. उद्यानस्य पुष्पाणि विकसन्ति । (उद्यान के फूल खिलते हैं।)
  5. गोपेशस्य पुस्तकानि सन्ति । (गोपेश की पुस्तकें हैं ।)

अधिकरण कारक

किसी भी क्रिया, वस्तु, भाव आदि के आधार को ‘अधिकरण’ कहते हैं। अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है । यथा ‘शिक्षक’ विद्यालये अस्ति ।’ (विद्यालय में शिक्षक है ।) यहाँ ‘शिक्षक’ का आधार या पढ़ाने का अधिष्ठान विद्यालय है। इसीलिए यह अधिकरण कारक हुआ तथा इसमें सप्तमी विभक्ति हुई है । ऐसे ही ‘स्वर्णपात्रे दुग्धम् अस्ति ।’ (स्वर्णपात्र में दुध है।) ‘कृषक: गृहे तिष्ठति ।’ (किसान घर में रहता है ।) आदि उदाहरणों को देखा जा सकता है।

अधिकरण कारके के कुछ आदर्श उदाहरण:-

  1. जनाः गृहे वसन्ति । (लोग घर में रहते हैं ।)
  2. छात्राः कक्षायां पठति । (छात्र वर्ग में पढ़ते हैं )
  3. मत्स्याः नद्यां तरन्ति । (मछलियाँ नदी में तैरती हैं
  4. अश्वाः पथि धावन्ति । (घोड़े सड़क पर दौड़ते हैं ।)
  5. रथाः मार्गे चलन्ति । (रथ रास्ते पर चलते हैं ।)

सूत्रों का सोदाहरण अर्थ-लेखन

1. कर्तरि प्रथमा-कर्तृवाच्य में जहाँ कर्ता उक्त अर्थात् कर्ता के अनुसार क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष हों, तो ऐसे कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है। यथा-बालकः विद्यालयं गच्छति ।

2. कर्मणि द्वितीया-कर्मकारक को द्वितीया विभक्ति होती है। यथा-रामः महाभारतं पठति

3. क्रियाविशेषणे द्वितीया-क्रिया-विशेषण में द्वितीय विभक्ति होती है। क्रियाविशेषण शब्द सदा द्वितीया विभक्ति में एकवचनान्त और नपुंसकलिंग वाला होता है। यथा-सा, मन्द-मन्दं धावति ।

4. करणे तृतीया-क्रिया की सिद्धि में कर्ता के साधक को ‘करण’ कहते हैं और करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। यथा-बालकः लेखन्या लिखिति।

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5. योनगाङ्गविकारः-जिस अंग के विकार में वर्णित अंगों का विकार प्रकट हो, उस विकृतं अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। यथा-सः पादेन खञ्जः अस्ति ।

6. ‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’-‘अपाय’ में अर्थात् पृथक् या अलग होने में जिस निश्चित (ध्रुव) वस्तु से कोई पृथक् होती है, वह अपादान कारक होती है। जैसे-बालकः ग्रामात् आयाति । (बालक गाँव से आता है।) यहाँ ‘ग्रामात्’ में पंचमी कारक-विभक्ति है।

7. प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्-प्रकृति, जाति, आकृति, गोत्र, नाम आदि के वाचक शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यथा-गोत्रेण वत्सः

8. हेतौ तृतीया-किसी कार्य के हेतु अर्थात् कारण में तृतीया विभक्ति होती है। यथा-दण्डेन घटः भवति ।

9. सहयुक्तेऽप्रधाने-‘सह’ अथवा ‘सह’ (साथ) के अर्थवाले शब्दों के योग में जो ‘अप्रधान’ (गौण) व्यक्ति होता है, उसके बोधक पद के साथ तृतीया विभक्ति होती है। जैसे-पुत्रेण सह पिता गच्छति ।

10. सम्प्रदाने चतुर्थी-सम्प्रदान कारक में चतुर्थी वभिक्ति होती है। यथा-सः विप्राय भोजनं पचति ।।

11. स्पृहेरीप्सिततः-‘स्पृह्’ धातु के योग में जिस वस्तु की इच्छा की जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा-योगिनः ज्ञानाय स्पृह्यति।

12. यतश्च निर्धारणम्-किसी व्यक्ति या व्यक्ति-समूह समुदायवाचक शब्द में षष्ठी अथवा सप्तमी विभक्ति होती है। यथा-नदीषु नदीनां वा गंगा पवित्रतमा । अथवा कविषु कविनां वा कालिदासः श्रेष्ठः।

13. दानार्थे चतुर्थी-(यस्मै दानं सम्प्रदानम्)-जिसे कोई वस्तु दानस्वरूप दी जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा-नृपः विप्राय धनं ददाति ।

14. इत्थं भूतलक्षणे-किसी विशेष चिह्न से यदि किसी की पहचान की जाती है तो उसके लिए प्रयुक्त शब्द के साथ तृतीया विभक्ति होती है। यथा-जहाभिः तापसः।

15. अपवर्गे तृतीया-क्रिया की समाप्ति और फल की प्राप्ति के होने पर ‘काल’ वाचक और ‘मार्ग’ वाचक शब्दों के साथ तृतीया विभक्ति होती है। यथा-सोहनः मासेन व्याकरणं पठितवान् । क्रोशेन कथा समाप्ता जाता।

16. रुच्यर्थानां प्रीयमाण:-‘रुच्’ धातु और उसके समानार्थक धातुओं के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा बालकाय मोदकं रोचते । हरयं भक्तिः रोचते।

17. भीत्रार्थानां भयहेतुः-भयार्थक और सार्थक धातुओं के योग में जो ‘भय’ ‘ का कारण हो, उसमें पचमी विभक्ति होती है। यथा-मनुष्यः व्याघ्रात् बिभेति ।

18. अपादाने पञ्चमी-अपादान कारक में पज्ञमी विभक्ति हुआ करती है। यथा-‘वृक्षात्’ फलानि पतन्ति ।

19. सप्तम्यधिकरणे च (आधारोऽधिकरणम्)-कर्ता और कर्म के आश्रय को अधिकरण’ कहते हैं। जिस स्थान पर क्रिया होती है, उसे ‘आधार’ कहते हैं। आधार के साथ सप्तमी विभक्ति होती है। यथा-छात्राः विद्यालये पठन्ति ।।

20. ‘धारि’ धातु के साथ उत्तमर्ण (साहुकार या ऋण देनेवाल) सम्प्रदान कारक होता है। जैसे-रामः श्यामाय शतं धारयति (राम श्याम के सौ रुपये कर्ज धारता है।) यहाँ कर्ज देनेवाला श्याम सम्प्रदाय कारक (श्यामाय) है। किया.

21. भावे सप्तमी ( यस्य च भावेन भावलक्षणम्)-यदि किसी पूर्वकालिक क्रिया के काल से दूसरी क्रिया और उसके कर्ता में सप्तमी विभक्ति लगती है। यथा-‘अस्तं गते सूर्ये बालकाः स्वगृहान् अगच्छन्।

कारक-संबंधी प्रश्न एवं उनके उत्तर-

प्रश्न 1.
‘कोशं दुटिला नदी-इस वाक्य में ‘क्रोशं’ पद में कौन-सी विभक्ति है और किस सूत्र के आधार पर यह विभक्ति है और किस सूत्र के आधार यह विभक्ति हुई है ? विभक्ति एवं सूत्र लिखें।
उत्तर-
‘क्रोश’ कुटिला नदी के ‘क्रोशं’ पद में द्वितीया विभक्ति है और वह ‘कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे’ सूत्र के अनुसार हुई है। अत्यन्त संयोग होने पर ‘मार्ग”के वाचक को द्वितीया विभक्ति होती है।

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प्रश्न 2.
पुत्रेण सह पिता विपणिम् अगच्छत् ।’-इस वाक्य में ‘पुत्रेण’ पद में कौन-सी विभक्ति है?
(क) प्रथमा विभक्ति
(ख) तृतीया विभक्ति
(ग) पञ्चमी विभक्ति
(घ) षष्ठी विभक्ति
उत्तर-
(ख) तृतीया विभक्ति

प्रश्न 3.
(क) रामः पित्रा सह विद्यालयं गच्छति’-इस वाक्य में ‘पित्रा’ पद में कौन-विभक्ति है ? यह विभक्ति किस सूत्र के आधार पर हुई है। उस सूत्र को लिखें।
उत्तर-
‘पित्रा’ में तृतीया विभक्ति हुई है। यहाँ ‘सहार्थे तृतीया’ इस सूत्र के आधार पर ‘पित्रा’ में तृतीया विभक्ति हुई है।

(ख) ‘राभ: सीतया लक्ष्मणेन सह वनम् अगच्छत् ।-इस वाक्य के
‘सीतया’ शब्द में कौन-सी विभक्ति है और यह विभक्ति किस कारक-सूत्र के अनुसार हुई है?
उत्तर –
तृतीया विभक्ति है और ‘सहार्थे तृतीया’ इस सूत्र के अनुसार

प्रश्न 4.
कविना कालिदासः श्रेष्ठः।’-इस वाक्य में ‘कवीनां’ पद में कौन-सी विभक्ति है ?
(क) पञ्चमी
(ख) तृतीया
(ग) षष्ठी
(घ) द्वितीया
उत्तर-
(ग) षष्ठी

प्रश्न 5.
‘बालिका मन्द-मन्दं गायति ।-इस वाक्य में ‘मन्द-मन्दं’ पद में कौन-सी विभक्ति है ?
(क) प्रथमा विभक्ति
(ख) सप्तमी विभक्ति
(ग) तृतीया विभक्ति
(घ) द्वितीया विभक्ति
उत्तर-
(क) प्रथमा विभक्ति

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प्रश्न 6.
‘बालकाय फलं रोचते।’-इस वाक्य में ‘बालकाय’ पद में कौन-सी विभक्ति लगी है और ऐसा किस कारक-सूत्र के अनुसार हुआ है।
उत्तर-
चतुर्थी विभक्ति,-‘रुच्याणां प्रीयमाणः’ इस सूत्र के आधार पर ।

प्रश्न 7.
गोपालः सर्पात् विभेति ।’-इस वाक्य में ‘सत्’ पद में कौन-सी विभदित लगी है और ऐसा किस कारक-सूत्र के आधार पर हुआ है?
उत्तर-
पचमी विभक्ति – ‘भीत्राणां भयहेतुः’ इस सूत्र के आधार पर ।

प्रश्न 8.
‘श्रमेण विना विद्या न भवति।’-इस वाक्य में ‘श्रमेण’ पद में कौन-सी विभक्ति है और किस सूत्र के आधार पर हुई है ?
उत्तर-
‘श्रमेण’ में तृतीया विभक्ति लगी हुई है, जो ‘पृथकविनानानाभ-स्तृतीयान्यतरस्याम’ सूत्र के आधार पर हुई है।

प्रश्न 9.
‘ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे।’ सत्र की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर-
ल्यप्-प्रत्ययान्त शब्दों के लोप होने पर कर्म और अधिकरण कारक में पंचमी विभक्ति होती है। जैसे-गणेशः प्रासादात् पश्यति ।

प्रश्न 10.
‘ईश्वरः पापात् त्रायते -इस वाक्य में ‘पापात्’ में कौन-सी विभक्ति है?
उत्तर-
‘पपात्’ में पंचमी विभक्ति है, जो ‘भीत्राणां भयहेतुः’ से

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प्रश्न 11.
‘ग्रामम् अभितः वृक्षाः सन्ति’-इस वाक्य में ‘ग्रामम्’ शब्द में कौन-सी विभक्ति है ?
उत्तर-
‘ग्रामम्’ में द्वितीया विभक्ति है।

प्रश्न 12.
‘सः मोहनाय शतं धारयति’-इस वाक्य में ‘मोहनाय’ में कौन-सी विभक्ति हैं तथा किस सूत्र से हुई है ?
उत्तर-
‘मोहनाय’ में चतुर्थ विभक्ति है तथा यह धारेत्तमर्णः’ सूत्र के आधार पर हुई है।

प्रश्न 13.
‘यस्य भावेन भावलक्षणम्’ सत्र की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर-
जब एक कार्य के पूर्ण होने के बाद दूसरा कार्य होता हो तो जो कार्य हो चुका है उसमें षष्ठी या सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे-उदिते उदितस्य वा सूर्ये सूर्यस्य वा सः गृहात् प्रस्थितः।

प्रश्न 14.
‘अस्तं गते सूर्ये सः आगतः’-इस वाक्य में ‘अस्तं गते’ में कौन-सी विभक्ति लगी हुई है?
उत्तर-
सप्तमी विभक्ति । ‘यस्य भावेन भावलक्षणम्’ के आधार पर।

प्रश्न 15.
‘उपाध्यायादधीते’ इस वाक्य में ‘उपाध्यायात’ पद में कौन-सी विभक्ति है और यह विभक्ति किस सूत्र के आधार पर हुई है?
उत्तर-
‘उपाध्यायात् अधीते’ में ‘उपाध्यायात्’ में पज्ञमी विभक्ति है और यह ‘आख्यातोपयोगे’ सूत्र के आधार पर हुई है। उपाध्याय’ आख्यात है और । उससे पञ्चमी विभक्ति हुई है।

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प्रश्न 16.
(क) ‘पितृभ्यः स्वधा’-इस वाक्य के पितृभ्यः पद में कौन-सी
विभक्ति है और यह विभक्ति किस सूत्र के आधार पर हुई है? (उस सूत्र को लिखें।)
उत्तर-
पितृभ्यः स्वधा’ इस वाक्य में चतुर्थी विभक्ति है और वह ‘नमः स्वस्तिस्वाहा – स्वधालंवषट् योगाच्च’ इस सत्र के कारण हुई है।

(ख) ‘हनुमते नमः’ इस वाक्य के ‘हनुमते’ पद में कौन-सी विभक्ति है ? यह विभक्ति किस सूत्र के आधार पर हुई है ?
उत्तर-
हनुमते’ में चतुर्थी विभक्ति होती है और ‘नमः स्वस्ति-स्वाहास्वधा’, सूत्र के अनुसार होती है।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण अनुच्छेद-लेखनम

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सत्संगतिः

मानवाः सामाजिकः प्राणी वर्तते । यादृशे समाजे मानवः वसति तादृशमेव गुणं दोष वा स आदत्ते । अतएव उच्यते– संसर्गजा दोष-गुणा भवन्ति इति । यथा चन्दन वृक्ष संपर्केण कुटजादि वृक्षाः अपि चन्दनाः भवन्ति तथैव सतां सम्पर्केण दुष्टाः अपि सज्जनाः भवन्ति ।

पुस्तकालयः

पुस्तकानाम् आलय: पुस्तकालयः कथ्यतं । पुस्तकालये विभिन्नां विषयाणाम् उत्तमोत्तमानि पुस्तकानि सुरक्षितानि तिष्ठन्ति । तेषां पुस्तकानाम् अध्ययनेन मानवानां ज्ञानं वर्धते । ये विद्वांसः यावन्ति अधिकानि पुस्तकानि पठन्ति तेषां तवात् अधिकं ज्ञानम् भवति । पुस्तकालयस्य प्रभावेणैव वयं स्वकीय इतिहास विद्मः । लक्षाणां वर्षाणाम् व्यवधानेन अपि तेषां दर्शनं कुर्मः ।

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परोपकारः

स्वार्थ परित्यज्य परार्थभावनाया परेषा उपकारः परोपकारः कथ्यते । यैः गुणैः मानव श्रेष्ठः गण्यते तेषु गुणेषु परोपकारस्य प्रथम स्थानं वर्तते । यस्मिन् मानवे परोपकाररूपो गुणो नास्ति स पशुः एव विद्यते: । पशवः अपि खादन्ति पिबन्ति तथा शयनं जागरणं च कुर्वन्ति । ईश्वर: वाञ्छति यत् सर्वे परोपकार कुर्वन्तु । प्रकृति अपि परोपकारस्य शिक्षा ददाति ।

विद्या

“विद् ज्ञाने’ इति धातो: विद्या शब्द: सिध्यति । वेत्ति जानति यथा सा विद्या ज्ञानं द्विविधं भवति स्वाभाविक नैमित्तिक च । स्वाभाविक ज्ञानं सर्वेषु प्राणिषु तिष्ठति । नैमित्तकं ज्ञानं मानवानां किमपि निमित्तमासाद्य भवति । मानवानां नैमित्तिके ज्ञाने विद्याया: मुख्यं स्थानं भवति । अतएव उच्यते विद्याविहीनः पशु इति ।

गङ्गा

नदीषु गङ्गा श्रेष्ठा । गङ्गा पवित्रतमा नदी विद्यते । एषा हिमालयात् निःसरति बङ्गीयसागरे च पतति । अस्याः तटे अनेकानि नगराणि तीर्थस्थानानि च सन्ति । गङ्गाजलं रोगनाशकं भवति । अस्याः जलं परमं पवित्रं भवति । गङ्गाजलं कीटाणवोऽपि न जायन्ते ।

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वसन्तः

वसन्तः ऋतुनां राजा कथ्यते । वसन्तो हि प्रकति रञ्जयति । ऋतौ वसन्ते निखिलं जगत् चारुतरं सम्पद्यते । तरवो लताश्च प्रसीदन्ति पुष्पोद्भवे । तरुणा: तरुणयश्च मधुरायनते यौवन-विभ्रमेण कमलानि विकसन्ति, मधुकराः मधुरं गुजन्ति, कोकिला: कलं कूजन्ति मलयानिलश्च मन्दं संचरन् सर्वान् नन्दयति ।

विद्यालयः

विद्यायाः आलयः विद्यालयः कथ्यते । विद्यालये विद्यार्थिनः शिक्षकेभ्यः विद्यां प्राप्नुवन्ति । सम्प्रति प्रायः ग्रामे-ग्रामे विद्यालयाः विराजन्ते । प्रति विद्यालये अनेक अध्यापका: बहवः छात्राश्च भवन्ति । विद्यालयस्य प्रकोष्ठेष श्यामपटाः, शिक्षाकाणाम् उपवेशनार्थ आसन्धः छात्राणां कृते च आसनानि आपि भवन्ति ।

गौः

गौः कृषिप्रधानस्य भारतस्य आर्थिकोन्नतेः सुदृढं मूलमस्ति । गौः वत्सा: वृषभाः सन्तः कर्षन्ति शकटं च बहन्ति । गौः स्वकीयेन दुग्धेन मातृवत् अस्मान् सर्वान् पालयति : गौ: दुग्धम् मानवानां पौष्टिक आहार बालानां रोगिणां च कृते मधुरं पथ्यं भवति । गो: मूत्रं पुरीषं च सर्वेत्ति शस्यखाद्यं भवति । अत: गोपालन अस्माभिः कर्त्तव्यम् ।

अस्माकं ग्रामः

अयं अस्माकं ग्राम: नद्याः तटे विद्यते । अत्रत्यः विशुद्धः शीतलश्च वायुः ग्राम्याणां क्लमं दूरीकरोति । अस्माकं ग्राम्याणां जीवनं सरलं स्वावलम्बिनं च भवति । ग्रामे शान्तिः विराजते । ग्राम गृहाणां समहो भवति. गृहाणि च लध्वाकारी भवन्ति । तेषु गृहेषु प्रकृतेः सर्व सोविध्यं तिष्ठति । तत्र नगराणाम् प्रदूषणं न भवति । शुद्धं वातावरणं शुद्धानि च भोज्यवस्तूनि मिलन्ति ।

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वर्षाकाल:

श्रावणे भाद्रश्चेति मासद्वयं वर्षाः भवति । अस्मिन् ऋतौ मेघाः जलं वर्षन्ति । ग्रीष्मतापतप्ता धरित्री वर्षतौ पुनः सरसा जायते । शुष्यमाणाः पादपाः जीवनं लभन्ते । वापी-कूप-तडागाः नद्यश्च जलौधेन पूर्णाः भवन्ति । कृषकाः कृषिकार्येषु संलग्नाः दृश्यन्ते । प्रकृति नटी नवीनां हरिताम् आकृति- दधाना शोभते । कृष्णवर्णाः मेघघटाः गर्जन्ति, वर्षन्ति च । अस्मिन् काले मयूराः नर्तनं कुर्वन्ति ।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

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अनेक पदों का मिलाकर एक पद हो जाना ‘समास’ कहलाता है । संस्कृत में समास की परिभाषा देते हुए कहा गया है- “समसनम् अनेकेषां पदानाम एकपदी भवन् समासः” ।

उदाहरण के लिए एक समस्तपद लें- “राजपुरुषः” । इसमें दो पद – शामिल हैं, जो ये हैं- “राज्ञः (राजा का) एवं “पुरुषः” (पुरुष या आदमी ।)

संस्कृत में समास के प्रमुख भेद निम्नांकित हैं

  1. तत्पुरुष समास- जैसे, राजपुरुषः आचारनिपुणः ।
  2. अव्ययीभाव समास- जैसे, उपनदम, यथाशक्तिः ।
  3. कर्मधारय समास- जैसे, महाकविः नीलोत्पलम् ।
  4. मध्यपदलोपी समास- जैसे, गुडधानाः, सिंहासनम् ।
  5. बहुव्रीहि समास- जैसे, चन्द्रशेखरः, शूलपाणिः ।
  6. अलुक् समास- जैसे, आत्मनेपदम्, परस्मैपदम् ।
  7. द्विगु समास- जैसे, अस्वस्थः, अनागतः ।
  8. नञ् समास- जैसे, अस्वस्थः, अनागतः ।
  9. द्वन्द्व समास- जैसे, रामकृष्णौ, पुण्यपापे ।
  10. उपपद समास- जैसे, कुम्भकारः, विहगः ।

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स्मरणीयः

समस्त पद – विग्रह

  1. अतिनिद्रम् – निद्रा सम्प्रति न युज्यते
  2. अनुगृहम् – गृहस्य पश्चात्
  3. अतिहिमम् – हिमस्य अत्यय:
  4. अनुरूपम् – रूपस्य योग्यम्
  5. अनभिज्ञः – न अभिज्ञः
  6. अयोग्यम् – न योग्यम्
  7. अन्यायः – न न्यायः
  8. अभाव: – न भाव:
  9. अनन्तः – न अन्तः
  10. अनाहारः – न आहारः
  11. उपगृहम् – गृहस्य समीपम्
  12. उपकृष्णम् – कृष्णस्य समीपम्
  13. उपगङ्गम् – गङ्गायाः समीपम्
  14. कर्मकुशल: – कर्मणि कुशल:
  15. कषोतराजः – कपोतानां राजा
  16. कृष्णसर्पः – कृष्णः सर्पः
  17. कापुरुषः – कुत्सितः पुरुषः
  18. कुपथम् – कुत्सितं पथम्
  19. कमलनयनम् – कमल इव नयनं यस्य
  20. गङ्गाजलम् – गङ्गायाः जलम्
  21. गिरिधरः – गिरि धरति यः सः
  22. गौरीशंकरः – गौरी च शंकरः च
  23. घनश्यामः – घन इव श्यामः
  24. चन्द्रशेखरः – चन्द्रः शेखरे यस्य सः
  25. चन्द्रोदय: – चन्द्रस्य उदयः
  26. चरणकमलम् – चरणे कमले इव
  27. चक्रपाणि: – चक्रं पाणी यस्य सः
  28. जितेन्द्रियः – जितानि इन्द्रियाणि येन सः
  29. जायापती – जाया च पतिश्च
  30. त्रिलोकी – त्रयाणां लोकानां समाहार;
  31. देवभाषा – देवानां भाषा
  32. द्रुतगामी – द्रुतं गच्छति यः
  33. धर्मच्युतः – धर्मात् च्युत
  34. नीलकण्ठः – मोलः कण्ठः यस्य सः
  35. नीलकमलम् – नीलं कमलम्
  36. नीलोत्पलम् – नीलम् उत्पलम्
  37. निर्जनम् – जनानाम् अभाव:
  38. निर्मक्षिकम् – मक्षिकाणाम् अभाव:
  39. प्रतिदिनम् – दिनं दिनं प्रति
  40. प्रत्येकम् – एकम् एकम् प्रति
  41. पितापुत्री – पिता च पुत्रश्च
  42. पीताम्बरः – पीतम् अम्बरं यस्य सः
  43. भवसागरः – भव एव सागरः
  44. मातापितरौ – पिता च माताश्च
  45. मुखकलम् – मुखं कमलम् इव
  46. महाराजः – महान् चासौ राजा
  47. महात्मा – महान् चासौ आत्मा
  48. महाजन: – महान् चासो जनः
  49. महापुरुषः – महान् चासौ पुरुषः
  50. यथाशक्तिः – शक्तिमनतिक्रम्य

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

संस्कृत अनुवाद के कुछ सामान्य नियम

(1) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि अन्य पुरुष एकवचन हो तो उसका क्रिया-पद भी अन्यपरुष एकवचन ही होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. हरिण चरता है । – हरिणः चरति ।
  2. राम पढ़ता है। – रामः पठति ।
  3. घोड़ा दौड़ता है। – घोटक: धावति
  4. बालक पढ़ता है। – बालकः पठति ।
  5. सिंह गरजता है। – सिंह गर्जति ।
  6. मोहन खेलता है। – मोहन: क्रीडति ।
  7. कोयल कूकती है। – कोकिल: कूजति ।
  8. हंस तैरता है। – हंसः तरति ।
  9. मोर नाचता है। – मयूरः नृत्यति ।
  10. वह खाता है । – सः खादति |
  11. फल गिरता है। – फलम् पतति ।
  12. पत्ता है। – पत्रम् अस्ति ।

(2) किस वाक्य का कर्ता-पद भी अन्य पुरुष द्विवचन में हो तो उसका क्रिया पद भी अन्य पुरुष द्विवचन में होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. (दो) हरिण चरते हैं। – हरिणौ चरतः ।
  2. (दो) घोड़े दौड़ते हैं। – घोटको धावतः :
  3. (दो) बालक पढते हैं। – बालको पठतः ।
  4. (दो) सिंह गजरते हैं। – सिंहौ गर्जतः ।
  5. (दो) मोहन खेलते हैं। मोहनौ खेलतेः ।
  6. (दो) कोयलें कूकती हैं। – कोकिलौ कूजतः ।
  7. (दो) हंस तैरते हैं। – हंसौ तरतः ।
  8. (दो) मोर नाचते हैं । – मयूरौ नृत्यतः ।
  9. (वे) दोनों खाते हैं । – तौ खादतः ।
  10. (वे) दोनों खाती हैं। – ते खादतः ।
  11. (दो) फल गिरते हैं। – फले पततः ।
  12. (दो) पत्ते हैं। – पत्रे स्तः

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

(3) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि अन्य बहुवचन में हो तो उसका क्रिया-पद भी अन्यपुरुष बहुवचन में ही होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. (अनेक) हरिण चरते हैं। – हरिणाः चरन्ति ।
  2. (अनेक) घोड़े दौड़ते हैं। – घोटकाः धावन्ति ।
  3. (अनेक) बालक पढ़ते हैं। – बालकाः पठन्ति ।
  4. (अनेक) सिंह गरजते हैं। – सिंहाः गर्जन्ति ।
  5. (अनेक) मोहन खेलते हैं। – मोहनाः क्रीडन्तिः ।
  6. (अनेक) कोयलें कूकती हैं। – कोकिला: कूजन्ति ।
  7. (अनेक) हंस तैरते हैं। – हंसाः तरन्ति ।
  8. (अनेक) मोर नाचते हैं । – मयूराः नृत्यन्ति ।
  9. वे खाते हैं। – ते खादन्ति ।
  10. वे खाती हैं । – ताः खादन्ति ।
  11. (अनेक) फल गिरते हैं। – फलानि पतन्ति ।
  12. (अनेक) पत्ते हैं । – पत्राणि सन्ति ।

(4) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि मध्यमपुरुष एकवचन में हो तो उसका क्रिया-पद भी मध्यम पुरुष एकवचन में ही होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. तुम जाते हो। – त्वम् गच्छसि ।
  2. तुम पढ़ते हो। – त्वम् पठसि ।
  3. तुम खाते हो । – त्वम् खादसि ।
  4. तुम हँसते हो । – त्वम् हससि ।
  5. तुम लिखते हो। – त्वम् लिखसि ।

(5) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि मध्यमपरुष द्विवचन में हो तो उसका क्रिया-पद भी मनपुरुष द्विवचन में ही होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. तुम दोनों जाते हो। – युवां गच्छथः ।
  2. तुम दोनों पढ़ते हो। – युवा पठथः ।
  3. तुम दोनों खाते हो । – युवां खादथः ।
  4. तुम दोनों हँसते हो । – युवां हसथः ।
  5. तुम दोनों लिखते हो । – युवां लिखथः ।

(6) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि मध्यम पुरुष बहुवचन में हो तो उसका क्रिया-पद भी मध्यमपुरुष बहुवचन में होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. तुमलोग जाते हो । – यूयं गच्छथ ।
  2. तुमलोग पढ़ते हो । – यूयं पठथ ।
  3. तुमलोग खाते हो। – यूयं खादथ ।
  4. तुमलोग हँसते हो । – यूयं हसथ ।
  5. तुमलोग लिखते हो। – यूयं लिखथ ।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

(7) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि उत्तमपुरुष, एकवचन में हो उसका क्रिया-पद भी उसमपुरुष एकवचन में ही होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. मैं जाता हूँ। – अहं गच्छामि ।
  2. मैं पढ़ता हूँ। – अहं पठामि ।
  3. मैं खाता है । – अहं खदामि ।
  4. मैं हँसता हूँ। – अहं हसामि ।
  5. मैं लिखता हूँ। – अहं लिखामि ।

(8) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि उत्तमपुरुष, द्विवचन में हो तो उसका क्रिया-पद भी उत्तम पुरुष, द्विवचन में ही होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. हम दोनों जाते हैं। – आवां गच्छावः ।
  2. हम दोनों पढ़ते हैं। – आवां पठावः ।
  3. हम दोनों खाते हैं। – आवां खादवः ।
  4. हम दोनों हँसते हैं। – आवां हसावः ।
  5. हम दोनों लिखते हैं। – आवां लिखावः ।

(9) किसी वाक्य का कर्ता-पद यदि उत्तमपुरुष बहुवचन में हो तो । उसका क्रिया-पद भी उत्तमपुरुष बहुवचन में होगा । उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. हमलोग जाते हैं। – वयं गच्छामः ।
  2. हमलोग पढ़ते हैं। – वयं पठामः ।
  3. हमलोग खाते हैं । – वयं खादामः |
  4. हमलोख लिखते हैं। – वयं लिखामः ।

(10) कोई भी वाक्य काल-भेद की दृष्टि से तीन रूपों में लिखा जा सकता है-हिन्दी भाषा में और संस्कृत भाषा में भी । ये काल-भेद हैंवर्तमानकाल, भूतकाल एवं भविष्यत्काल । वर्तमान काल के लिए संस्कृत में लट् लकार के क्रिया-रूप का प्रयोग होता है। उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. राम जाता है। – रामः गच्छति ।
  2. वह जाता है। – सः गच्छति ।
  3. वह जाती है। – सा गच्छति ।
  4. तुम जाते हो। – त्वं गच्छसि ।
  5. मैं जाता हूँ। – अहं गच्छामि ।

ऊपर अनुवाद के लिए व्यावहारिक नियम-संख्या (1) से (10) तक दिये गये सभी उदाहरण वर्तमानकाल (लट् लकार) के हैं।

(11) संस्कृत में भूतकाल के वाक्य के लिए यों तो एक से अधिक लकार हैं, पर उनमें अधिक लोकप्रिय तथा प्रयोग की दृष्टि से सरल ‘लङ्ग लकार’ ही है । ‘लङ्’ लकार में अन्यपुरुष-मध्यमपुरुष के तीनों वचनों में उदाहरण नीचे दिये जाते हैं

हिन्दी – संस्कृत

  1. (एक) लड़का गया । – बालकः अगच्छत् ।
  2. (एक) लड़की गयी । – बालिका अगच्छत् ।
  3. (दो) लड़का गया । – बालकौ अगच्छताम् ।
  4. (दो) लड़कियाँ गयीं । – बालिके अगच्छताम् ।
  5. (अनेक) लड़के गये । – बालकाः अगच्छन् ।
  6. (अनेक) लड़कियाँ गयीं । – बालिकाः अगच्छन् ।
  7. तुम गये । – त्वम् अगच्छः ।
  8. तुम दोनों गये । – युवाम् अगच्छतम् ।
  9. तुमलोग गये । – यूयम् अगच्छत ।
  10. मैं गया । – अहम् अगच्छम ।
  11. हम दोनों गये । – आवाम् अगच्छाव ।।
  12. हमलोग गये । – वयम् अगच्छाम ।

(12) संस्कृत में भविष्यत्काल के वाक्य के लिए भी एक से अधि। क लकार है, पर उनमें सबसे अधिक लोकप्रिय तथा प्रयोग की दृष्टि से सरल ‘लुद्’ लकार ही है । लृट् लकार में अन्यपुरुष-मध्यम पुरुष-उत्तम पुरुष के तीनों वचनों में उदाहरण नीचे दिये जाते हैं उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. (एक) लड़का पढ़ेगा । – बालकः पठिष्यति ।
  2. (एक) लड़की पढ़ेगी। – बालिका पठिष्यति ।
  3. (दो) लड़के पढ़ेंगे । – बालको पठिष्यतः ।
  4. (दो) लड़कियाँ पढेंगी। – बालिके: पठिष्यतः ।
  5. (अनेक) लड़कें पढेंगे । – बालकाः पठिष्यन्ति ।
  6. (पुं०) वह पढ़ेगा । – सः पठिष्यति ।
  7. (स्त्री०) वह पढ़ेगी । – सा पठिष्यति ।
  8. (पुं०) वे दोनों पढ़ेगी। – तो पठिष्यतः ।
  9. (स्त्री०) वे दोनों पढेंगी। – ते पठिष्यतः ।
  10. (पुं०) वे लोग पढ़ेंगे। – ते पठिष्यन्ति ।
  11. (स्त्री०) वे लोग पढेंगी । – ताः पठिष्यन्ति ।
  12. (पुं०) तुमलोग पढ़ोगे । – यूयं पठिष्यथः ।
  13. (स्त्री०) तुमलोग पढ़ोगी । – यूयं पठिष्यथः ।
  14. (पुं०) मैं पूढूँगा । – अहं पठिष्यामि ।
  15. (पुं०) हम दोनों पढेंगे । – आवां पठिष्यावः ।
  16. (पुं०) हमलोग पढ़ेंगे । – वयं पठिष्यावः ।
  17. (स्त्री०) हमलोग पढ़ेंगी । – वयं पठिष्यामः ।

उपर्युक्त वाक्यों में आये क्रिया-पदों के अनुसार ही अन्य क्रिया-पदों के भी रूप चलेंगे । हिन्दी में वाक्य रचना के वक्ता या लेखक के पुल्लिग या

स्त्रीलिंग होने की सूचना तो मिलती है, पर संस्कृत में नहीं मिलता- वह पुंल्लिग है या स्त्रीलिंग- इस पर सम्बद्ध वाक्य का अर्थ निर्भर करता है।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

(13) संस्कृत में आदेशवाचक या अनुज्ञावाचक वाक्य ‘लोट् लकार में लिखे जाते हैं । लोट् लकार में अन्यपुरुष-मध्यमपुरुष-उत्तमपुरुष के तीनों वचनों में उदाहरण नीचे दिये जाते हैं उदाहरण

हिन्दी – संस्कृत

  1. (एक) बालक पढ़ें। – बालकः पठतु ।
  2. (एक) बालिका पढ़ें। – बालिका पठतु ।
  3. (दो) बालक पढ़ें। – बालको पठताम् ।।
  4. (दो) बालिकाएँ पढ़ें। – बालिके पठताम् ।
  5. (अनेक) बालक पढ़ें। – बालकाः पठन्ताम् ।
  6. (अनेक) बालिकाएँ पढ़ें। – बालिकाः पठन्ताम् ।
  7. (पुं०) वह पढ़े । – सः पठतु ।
  8. (स्त्री०) वह पढ़े । – सा पठतु ।
  9. (पुं०) वे दोनों पढ़ें । – तौ पठताम् ।
  10. (स्त्री०) वे दोनों पढ़ें । – ते पठताम् ।
  11. (स्त्री०) वे लोग पढ़ें । – ते पठन्तु ।
  12. (स्त्री०) वे लोग पढ़ें । – ताः पठन्तु ।
  13. (स्त्री०) हमलोग पढ़ें । – वयं पठाम ।

(14) वाक्य में आनेवाले ‘उद्देश्य’ के कर्ता-पद और ‘विधेय’ के क्रिया-पद के अलावे जो भी शब्द आते हैं, वे इनके ही पूरक या विस्तार के क्रम होते हैं और उनका सम्बन्ध कारक-विभक्तियों द्वारा दिखाया जाता है। जैसे

  1. रामः गच्छनि । – (राम जाता है ।)- कर्ताकारक
  2. रामः विद्यालयं गच्छति । – (राम विद्यालय जाता है। कर्मकारक
  3. रामः पादाभ्यां गच्छति । – (राम पैरों से जाता है ।)- करणकारक
  4. रामः पठनाय गच्छति । – (राम पढने के लिए जाता है।) -साम्प्रदान कारक
  5. रामः गृहा गच्छति । – (राम घर से जाता है ।)- अपादानकारक
  6. सोहनस्य भ्राता रामः गच्छति । – (सोहन का भाई राम जाता है ।) – सम्बन्ध विभक्ति । रामः प्रातः
  7. वेलायां गच्छति । – (राम सुबह में जाता है ।) – अधिकरणकारक
  8. हे गोपाल ! रामः प्रतिदिनं गच्छति (हे गोपाल ! राम प्रति देन जाता है ।) । -सम्बोधन-विभक्ति

उपर्युक्त नियमानुसार ही वाक्यों में आये कर्ता-पदों और क्रिया-पदों के अलावा आये शब्दों की कारक-विभक्ति के विचार से अनुवाद किया जाना चाहिए ।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

(15) हिन्दी से संस्कृत भाषा में अनुवार करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ‘विशेष्य’ (जिसकी कुछ विशेषता बतलायी जाती है) का जो लिंग, वचन और कारक होता है वही ‘विशेषण’ पदों (जिनसे कुछ विशेषता बतलायी जाती है) का भी लिंग, वचन और कारक होता है।
उदाहरण-

  1. सुशीलः बालकः पठति । – (सुशील लड़का पढ़ता है ।)
  2. सुशीलाः बालिका पठति । – (सुशीला लड़की पढ़ती है ।)
  3. कृष्णाः घोटक: अतिशोभन: भवति । – (काला घोड़ा बहुत सुन्दर होता है।
  4. पक्वानि फलानि पतन्ति । – (पके फल गिरता है ।)
  5. पीतानि पत्राणि पतन्ति । – (पीले पत्ते गिरते हैं ।)

वयम् अस्य महान् राष्ट्रस्य नागरिकाः स्म । (हमलोग इस महान् देश के नागरिक हैं ।)

अस्याः नद्यायाः जलं पवित्रं निर्मलं च वर्तते । (इस नदी का जल स्वच्छ और पवित्र है।
उपुर्यक्त वाक्यों में काले अक्षरों में छपे शब्द विशेषण-पद हैं और उनके लिंग, वचन और कारक वही हैं, जो उनके विशेष्य-पदों (क्रमश: बालकः, गौ, फलम, फलानि, पत्राणि, राष्ट्रस्य, नद्यायाः और जलम) के हैं।

(16) हिन्दी भाषा के वाक्यों में आनेवाले क्रियाविशेषण-शब्दों में कौन-सी विभक्ति लगी है, पता नहीं चलता-किन्तु संस्कृत भाषा के वाक्यों में क्रियाविशेषण शब्द हमेशा द्वितीया विभक्ति के एकवचन में होते हैं और उनपर कर्ता पद के लिंग-वचन-पुरुष आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
उदाहरण-

  1. सः मन्दं मन्दं गच्छति । – (वह धीरे-धीरे जाता है।)
  2. सा मन्दं मन्दं गच्छति । – (वह धीरे-धीरे जाती है ।)
  3. त्वं मन्दं मन्दं गच्छसि । – (तुम धीरे-धीरे जाते हो ।)
  4. अहं मन्दं मन्दं गच्छामि । – (में धीरे-धीरे जाता हूँ।)

(17) संस्कृत में अनुवाद करते समय अव्यय-पद बड़े सहायक होते हैं । जैसे- अत्र ( यहाँ), तत्र (वहाँ), इतः ( यहाँ से), ततः (वहाँ से), सर्वत्र (सभी जगह), सर्वदा (हमेशा) आदि ।
उदाहरण –

  1. अहम् इतः गमिष्यामि । – (मैं यहाँ से जाऊँगा ।) :
  2. सः इतस्ततः भ्रमति । – (वह इधर-उधर घूमता है ।)
  3. गोपाल । अत्र आगच्छ । – (गोपाल यहाँ आओ ।)
  4. ते ततः आगमिष्यन्ति । – (वे वहाँ से आएँगे ।)
  5. त्वं तत्र गच्छ । – (तुम वहाँ जाओ ।)
  6. बालकाः वृक्षस्य अधः पठन्ति । – (लड़के वृक्ष के नीचे पढ़ते हैं ।)
  7. भवान् अन्यत्र गच्छतु । – (आप दूसरी जगह जाएँ ।)
  8. रमेश: अग्रे धावति । – (रमेश आगे दौड़ता है ।)
  9. सा इदानीम् आंग्लाभाषा पठति । – (वह इस समय अंग्रेजी भाषा पढ़ती है ।)
  10. गोपालः पीठिकामुपरि उपविशति । – (गोपाल पीढ़े पर बैठता है ।)
  11. ईश्वर सर्वत्र तिष्ठति । – (ईश्वर सब जगह विद्यमान हैं ।)
  12. गृहस्य पश्चात् पुष्पवाटिका वर्तते । – (घर के पीछे फुलवाड़ी है ।)
  13. तदा अस्माकं शिक्षक: अवोचत् । – (तब हम लोगों के शिक्षक बोले ।)
  14. त्व कदा पश्यसि ? (तुम कब देखोगे ?)
  15. यदा व तत्र गमिष्यसि तदा अहम् अत्र आगमिष्यामि । – (जब तुम वहाँ जाओगे तब मैं यहाँ आऊँगा !)

(18) मूलधातु में ‘तुमुन्’ लगाने से ‘निमित्तार्थक’ (के लिए) का अर्थ देने वाले क्रिया बनती है । ‘तुभुन्’ में ‘उन्’ का लोप हो जाता है और मात्र “तुम्’ रह जाता है । जैसे

  • गम् + तुमुन् = गम् + तुम् = गन्तुम (जाने के लिए)
  • पठ् + तुमुन् = पठ् + तुम् – (पढ़ने के लिए)

प्रयोग- मः गृहं गन्तुम् उद्यतः अस्तिः । (वह घर जाने के लिए तैयार हैं।)

सा रामायणं पठितुम् इच्छति । (वह रामायण पढ़ना चाहती है ।)

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण समास

(19) पूर्वकालिक क्रिया (असमापिका क्रिया) का निर्माण मूल धातू में ‘कत्वा’ अथवा ‘ल्यप्’ प्रत्यय लगाकर किया जाता है । जैसे

  1. कृ + क्ला – कृ + त्वा = कृत्वा (करके)
  2. श्रु + क्त्वा = श्रु + त्वा – श्रुत्वा (सुनकर के)
  3. वि + क्री + ल्यप् – वि + क्री + य = विक्रीय (बेचकर)
  4. वि + ज्ञा + ल्यप् = वि + ज्ञा. + य – विज्ञाय (जानकर)

प्रयोग – गोपालः कृत्वा विद्यालयं गच्छति । (गोपाल भोजन करके विद्यालय जाता है ।)
राधा प्रवचनं श्रुत्वा भोजनं करिष्यति । (राधा प्रवचन सुनकर भोजन करेगी।) वस्तूनि विक्रीय कृषकः गृहं गमिष्यति । (सामनों को बेचकर किसान घर जाएगा ।

(20) संस्कृत में ‘स्म’ एक अव्यय-पद हैं जो भूतकाल के अर्थ में प्रयुक्त होता है और ‘था’ का अर्थ देता है । पर यह केवल वर्तमानकाल (लट् लकार) की क्रियाओं के साथ ही अन्यपुरुष के तीनों वचनों में जोड़ा जाता है।
उदाहरण –

  1. गच्छति – जाता है । गच्छति स्म = जाता था ।
  2. गच्छन्ति – जाते हैं । गच्छन्ति स्म – जाते थे।
  3. प्रयोग- सोहनं पठनाय विद्यालयं गच्छति स्म । (सोहन पदने के लिए विद्यालय जाता था ।)

क्रीडानाय क्रीडाक्षेत्रं गच्छन्ति स्म । (लड़के खेलने के लिए खेल के मैदान में जाते थे ।)

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

Bihar Board Class 7 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 2 व्याकरण संधि

BSEB Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

माहेश्वर सूत्र – संस्कृत की वर्णमाला का समावेश महर्षि पाणिनी के व्याकरण-सूत्र में मिलता है । महर्षि पाणिनी के सूत्र ही वह धूरी है, जिनके याकरण शास्त्र चक्रवत् नाचता है । इन पाणिनीय सत्रों के मूल में 14 माहेश्वर सूत्र बैठे हैं । कहते हैं, ये चौदहों सूत्र देवाधिदेव महेश्वर (शंकर) के डमरू-निनाद से निकले थे, अतः माहेश्वर सूत्र कहलाये । ये निम्नलिखित हैं_

  1. अइउण
  2. ऋलुक्
  3. एओङ
  4. ऐऔच
  5. हयवरट
  6. लण,
  7. जमणनम्
  8. झभञ्
  9. घढधः
  10. जबगडदश
  11. खफछठथचटतव्
  12. कपय
  13. शपसर् एवं
  14. हल्

संधि

जब दो वर्ण (स्वर अथवा व्यंजन) एक-दूसरे के अत्यंत समीप चले आते हैं, तो उस स्थिति को ‘संहिता’ कहते हैं । संहिता की स्थिति में उत्पन्न होनेवाले वर्ण-विकार को ही ‘संधि’ कहते हैं । यथा

  • देव + आलयः = देवालयः
  • गिरि + ईशः = गिरीशः
  • राम + इन्द्र = रामेन्द्रः

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

ऊपर के उदाहरणों में जिन दो वर्षों के बीच + (जोड़) का चिह्न दिखलाया गया है, वह संहिता की स्थिति है । संहिता की स्थिति में उत्पन्न होनेवाले वर्ण-विकार ‘आ’ (व + अ – वा), ‘ई (रि + ई = री) एवं ‘ए’ (म + इ – में) वर्ण-विकार ही ‘संधि है।

संधि के भेद- ‘संधि’ के भेद या प्रकार तीन माने यगे हैं । ये हैं

(क) स्वर-संधि
(ख) व्यंजन-संधि एवं
(ग) विसर्ग-संधि ।

आगे इनका सोदाहरण विवेचन किया जा रहा है ।

स्वर संधि

‘स्वर वर्ण’ में साथ जब ‘स्वर-वर्ण’ की संधि होती है तो उसे ‘स्वर-संधि’ कहते हैं । जैसे-

हिम + आलयः = हिम् + आलयः  हिमालयः। गण + ईश = गणेशः । ‘स्वर-संधि’ के मुख्य पाँच भेद होते हैं-

  1. दीर्घ-संधि
  2. गुण-संधि
  3. वृद्ध-संधि
  4. यण-संधि एवं
  5. अयादि संधि ।

दीर्घ संधि

दो समान स्वर वर्णों (ह्रस्व या दीर्घ) के बीच जो संधि होती है, उसे दीर्घ-संधि कहते हैं । जैसे

  1. अ + अ – आ
  2. उ + उ – ऊ
  3. अ + आ + आ
  4. उ + ऊ – ऊ
  5. आ + अ = आ
  6. ऋ + ऋ ऋ
  7. ऊ + उ = ऊ
  8. आ + आ = आ
  9. ऊ + ऊ = ऊ आदि ।

उदाहरण –

  1. मुर + आरिः = मुरारिः
  2. मही + इन्द्रः = महीन्द्रः ।
  3. देव + आलयः = देवालयः
  4. श्री + ईशः = श्रीशः
  5. विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
  6. भानु + उदयः = भानूदयः
  7. विद्या + आलयः = विद्यालयः
  8. लघु + ऊर्मिः = लघूमिः
  9. कवि + इन्द्र = कवीन्द्रः
  10. भा + उन्नतिः = भ्रून्नतिः
  11. गिरी + ईशः = गिरीशः
  12. वधू + कहनम् = वधूहनम्

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

सूत्र- अकः सवर्णे दीर्घ:- ‘अक्’ (अ, इ, उ, एवं ऋ) से परे (बाद में) यदि सवर्ण अच् (अ, इ, उ, एवं ऋ) में से जो वर्ण-विकार उत्पन्न होता है, उसे ‘दीर्घ-संधि’ कहते हैं ।

गुण संधि

  1. अ + इ – ए
  2. अ + ई = ए
  3. आ + इ = ए
  4. आ + ई = ए
  5. अ + उ = ओ
  6. अ + ऊ = ओ
  7. आ + उ = ओ
  8. आ + ऊ = ओ
  9. आ + ऋ – अर्
  10. आ + ऋ = अर्

उदाहरण –

  1. खग + इन्द्रः = खगेन्द्र
  2. अरुण + उदयः = अरुणोदयः
  3. सुर + ईशः = सुरेशः
  4. महा + उदयः = महोदयः
  5. रमा + इन्द्रः = रमेन्द्रः
  6. महा + ऊर्मि = महोर्मि:
  7. गंगा + ईशः = गंगेश |
  8. महा + ऊति = महोति:
  9. देव + ऋषि = देवर्षिः
  10. महा + ऋषिः = महर्षि

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

सूत्र- अदेङ्गु णः- ‘अत्’ के स्थान पर ‘एङ्’ हो जाता है, यदि उसकी गुण-संज्ञा होती है । तात्पर्य यह है कि यदि पहले ‘अ’ या ‘आ’ वर्ण आया हो बाद में ‘इ’, ‘ई’, ‘उ’, ‘ऊ’, ‘ऋ’ या ‘लु’ वर्ण आया जो तो पूर्व वर्ण और परवर्ण, दोनों मिलकर एक गुण-वर्ण (ए, ओ, अर् या अल्) हो जाते हैं ।

उदाहरण-

  1. खगेन्द्रः
  2. अरुणोदयः
  3. देवर्षिः

वृद्धि-संधि –

‘अ’ या ‘आ’ के बाद ‘ए’, ‘ऐ’, ‘आ’ या ‘औ’ हो तो दोनों के मिलने से जो वर्ण विकार उत्पन्न होता है, उसे ‘वृद्धि-संधि’ कहते हैं । जैसे-

  1. अ + ए = ऐ
  2. आ + ए = ऐ
  3. अ + ए = ऐ
  4. आ + ऐ = ऐ
  5. अ + ओ = औ
  6. आ + ओ = औ
  7. अ + औ = औ
  8. आ + औ = औ

उदाहरण –

  1. अद्य + एव = अद्यैव
  2. सूप + ओदनम् = सूपौदनम्
  3. तदा + एव = तदैव
  4. चित्त + औदार्यम् = चितौदार्यम्
  5. परम + ऐश्वर्यम् = परमैश्वर्यम्
  6. गंगा + ओघः = गंगौघः
  7. महा + ऐश्वर्यरम् = महैश्वर्यम्
  8. महा + औषधम् = महौषधम्

सूत्र- वृद्धिरेचि- ‘अत्’ से परे ‘एच’ हो तो वृद्धि-एकादेश हो जाता है। तात्पर्य यह कि यदि पूर्व में ‘अ’ ‘आ’ स्वर वर्ण आया हो और बाद में “ए’ या ऐ अथवा ‘ओ’ या ‘औ’ स्वण-वर्ण आता हैं तो दोनों मिल क्रमश: ‘ए’ या ‘औ’ हो जाते हैं ।

उदाहरण-

  • एकैकः
  • सदैवः
  • महौषधिः आदि ।

यण-संधि

हस्व या दीर्घ ‘इ’, ‘ठ’, या ‘ऋ’ वर्ण के आगे कोई अन्य स्वर आये तो ‘इ’ या ‘इ’ के बदले ‘य’, ‘उ’ या ‘क’ के बदले ‘व्’ तथा ‘ऋ’ के बदले ‘अर्’ हो जाता है । जैसा

  1. इ+ अ- य
  2. अ + अ = व
  3. ऋ + अ = अर
  4. ई + अ = य
  5. क + अ = व

उदाहरण –

  1. यदि + अपि = यद्यपि
  2. मनु + अंतरम् = मन्वन्तरम्
  3. प्रति + एकम् = प्रत्येकम्
  4. वधू + आदिः = वध्वदिः
  5. अनु + एषणनम् = अन्वेषणम्
  6. मातृ + अर्थ = मात्रर्थः

सूत्र- इको यणचि- ‘अच्’ के परे (बाद में अच् के) रहने पर ‘इक्’ (‘इ’, ‘अ’, ‘ऋ’ एवं ‘लु’) के स्थान पर ‘यक्’ (‘य’, ‘व’, ‘र’, एवं ‘ल’) हो जाता है ।

जैसे-

  • इत्यादिः
  • स्वागतम्धा
  • त्रंशः
  • लाकृतिः आदि ।

अयादि-संधि

यदि ‘ए’, ‘ऐ’, ‘औ’ स्वर वर्ण के पूर्व में रहे उसके बाद कोई ‘अच्’ स्वर आता हो तो दोनों मिलकर क्रमश: ‘अय’, आय ‘अव’, आव हो जाता है । जैसे

  1. ए + अ = अय
  2. ऐ + अ = आय
  3. और + अ = आव
  4. ओ + अ = अव

उदाहरण-

  1. ने + अनम् = नयनम्
  2. पो + इत्रः = पवित्रः
  3. गै + अक: = गायक:
  4. पौ + अक: = पावकः

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

सूत्र- एचोऽयवायाव:- ‘एच’ से परे कोई ‘अ’ स्वर आया हो तो उसके स्थान पर क्रमशः ‘अय’, ‘आव’ आदेश हो जाता है । जैस- शयनम्, भवनम, विनायकः, रावणः, द्वावेव आदि ।

पूर्वरूप संधि

किसी पद (सार्थक शब्द) के अंत में रहने वाले ‘एङ्’ (‘ए’ एवं ‘औ’ वर्ण) से परे यदि ‘अत् (अवर्ण) आया हो तो पूर्व पर (पहले एवं बाद में . आये) वर्णों का एकादेश हो जाता है । जैसे-

  1. ए + अ = ए
  2. ओ + अ = ओ

उदाहरण-

  1. सखे + अत्र – सखेऽत्र
  2. गुरो + अत्र = गुरोऽत्र
  3. हरे + अव = हरेऽव
  4. शिवो + अर्य: – शिवोऽर्य:

सूत्र- एक पदान्तादति- किसी पद के अंत में रहने वाले ‘एङ’ के बाद यदि ‘अत्’ आया हो तो पूर्व और पर वणों का पूवरूप एकादश हा जाता है। जैसे- सखेऽत्र, गुरोऽत्र आदि ।

प्रगृह्यसंज्ञक संधि-अभाव

द्विवचनांत पदों के ‘इ’, ‘उ’ वर्ण प्रगृह्य संज्ञक होते हैं अतः इनके बीच संधि नहीं होती है । जैसे

  1. ई + ई = ई ई
  2. क + इ = क इ
  3. ए + ए = ए ए

उदाहरण –

  1. हरी + इमौ = हरी इमौ
  2. साधू + इमौ = साधू इमौ
  3. लते + एते = लते एते ।

सूत्र- इंदूदेद द्विवचनं प्रगृह्यम्- ईत कत्-एत वाले द्विवचनांत पद प्रगृह्यसंज्ञक होते हैं, अतः इनके बीच संधि का अभाव होता है । जैसे- हरी एतौ, मुनी इमो, लते एते, भानू अमू ।

व्यंजन – संधि

पूर्व में (पहले) आये व्यंजन-वर्ण एवं उसके बाद आये स्वर अथवा व्यंजन वर्ण की संहिता की स्थिति में जो वर्ण-विकार उत्पन्न होता है, उसे ‘व्यंजन-संधि’ कहते हैं । जैसे- वाग्जालम्, अजन्तः, उल्लेख, जगन्नाथ आदि ।
व्यंजन-संधि के कुछ प्रमुख रूप हैं

(क) श्चुत्व-संधि
(ख) तृत्व-संधि एवं
(ग) जशत्व-संधि

(1) श्चुत्व-संधि

‘श्चु’ का अर्थ होता है ‘श’ एवं ‘च’ । तात्पर्य यह कि इस संधि में ‘स्’ के स्थान पर ‘श्’ हो जाता है और तवर्ग (‘त’, ‘थ’, ‘द’, ‘ध’, एवं ‘न’) के स्थान पर क्रमशः चवर्ग (‘च’, ‘छ’, ‘ज्’, ‘झ’, एवं ‘अ’) हो जाता है। जैसे

‘स्’ का ‘श्’ ‘त्’ का ‘च’ ‘द्’ का ‘ज’

उदाहरण

  1. रामस् + शते = रामश्शेते
  2. उत् + चरणम् = उच्चारणम्
  3. सत् + चित् = सच्चित्
  4. सत् + जनः = सज्जनः

सूत्र- स्तोः श्चुना श्चुः- ‘स’ व तवर्ग के स्थान पर ‘श्’ एवं चवर्ग हो जाता है । तात्पर्य यह कि ‘श्चुत्व’ में ‘स्’ के स्थान पर ‘श्’ एवं ‘त्’, ‘थ्’, ‘द’, ‘ध्’ एवं ‘न्’ के स्थान पर क्रमशः ‘च’, ‘छ’, ‘ज्’, ‘झ’, एवं ‘ज्’ हो जाता है । जैसे- रामश्चिनोति, सच्चिरित्रः सज्जनः आदि ।

(2) ष्टुत्व-संधि

‘टु’ का अर्थ होता है ” एवं ‘ट्’ । तात्पर्य यह कि इस संधि में ‘स्’ के स्थान पर ‘ए’ एवं तवर्ग (‘त’, ‘थ’, ‘द’, ‘ध’, एवं ‘न्’) के स्थान पर टवर्ग (क्रमशः ‘द’, ‘ठ’, ‘ह’, ‘ढ’, एवं ‘ण’) हो जाता है । जैसे ‘त्’ का ‘श्’ ‘थ्’ का ” ” का ‘द’ ‘त्’ का ‘ट्’ ‘द्’ का ‘ड्’ एवं ‘न्’ का ‘ण’ ।

उदाहरण –

  1. धनुस् + टंकार = धनुष्टंकारः।
  2. पृष् + थम् = पृष्ठम्
  3. तत् + टीका = तट्टीका ।
  4. उद् + डयनम् = उड्यनम् ।

सूत्र- टुना टः- “स्’ एवं ‘तवर्ग’ के स्थान पर क्रमशः ‘श्’ एवं टवर्ग हो जाता है । जैसे- आकृष्टः, तट्टीका, पृष्ठम्, उडयनम् आदि ।

(3) जशत्व-संधि

पद (किसी सार्थक शब्द) के अंत में रहनेवाले ‘झल्’ (झ, भ, घ, ज, ब, ग, ड, द, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, स, एवं ह) के वर्णों के स्थान पर ‘जश्’ (ज, ब, ग, ड, द) के वर्ण हो जाते हैं । जैसे ‘क’ के स्थान पर ‘ग’ के स्थान पर ‘द’ ‘च’ के स्थान पर ‘ज्’ ‘प्’ के स्थान पर ‘ब्’

उदाहरण

  1. दिक् + गजः = दिग्गजः
  2. महत् + दानम् = महद्धानम्
  3. अच् + अंतः = अजन्तः
  4. अप् + जम् = अब्जम्

सूत्र- झलां जशोऽन्ते- किसी पद के अंत में रहने वाले ‘झल्’ प्रत्याहार के वणा क स्थान म ‘जश्’ प्रत्याहार के वर्ण हो जाते हैं । जैसे-वागीशः, दग्गजः, जगदीशः, अजन्तः. अब्जम् आदि ।

अन्य व्यंजन – संधियाँ

सूत्र- तोर्लि- जब पूर्ण वर्ण ‘तवर्ग’ हो और परवर्ण ‘ल’ हो तो पूर्व वर्ण (तवर्ण-त, थ, द, धू, न) का परसवर्ण (ल) हो जाता है । जैसे- तत् + लीन् = तल्लीनः । महान् + लाभः – महाँल्लाभः ।

सूत्र- यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा- जब किसी पद के अंत में ‘यर’ प्रत्याहार का कोई वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्, य, र, ल, व् आदि) हो और परवर्ण . कोई अनुनासिक (न्, म् आदि) हो, तो पूर्व वर्ण अपने वर्ग का पंचम वर्ग (अनुनासिक) हो जाता है । जैसे

  1. प्राक् + मुख: = प्राङमुख्ः
  2. जगत् + नाथ: = जगन्नाथः ।

सूत्र – शश्छोऽटि- जब किसी पद के अंत में ‘झय’ प्रत्याहार का कोई – वर्ण (क, च, द, प् आदि) हो और परवर्ण ‘श्’ हो तो उस ‘श’ का ‘छ’ विकल्प से होता है, यदि उस ‘श’ में ‘अट्’ प्रत्याहार का कोई वर्ण (अ, इ, उ आदि) जुटा हुआ हो । जैसे

  1. तत् + शिवः – तच्छिवः
  2. एतत् + श्रुत्वा – एतच्ध्रुवा ।

सूत्र- मोऽनुस्वार- किसी पद के अंत में रहनेवाले ‘म्’ का अनुस्वार हो जाता है, यदि परवर्ण हल् (व्यंजन-वर्ण) रहे । जैसे

  1. हरिम् + वंदे = हरिवन्दे ।
  2. देशम् + रक्षति = देशं रक्षति ।

सूत्र- अनुस्वारस्य ययि परसवर्णे:- अपदान्त अर्थात् जो पद के अंत में नहीं हो, बल्कि जो किसी पद के मध्यम में हो तो वैसे अनुस्वार का ‘परसवर्ण’ (यानि बाद में रहने वाले वर्ण के समान वर्ण) विकल्प से हो जाता है, यदि उसके बाद में ‘यय्’ (अर्थात् य, व, र, ल, अ, म, उ, न, ण, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, क, छ, ठ, थ, च, ट, त, क एवं प वर्ण में से) प्रत्याहार का कोई वर्ण आया हो । जैसे

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

  1. किम् + करोषि – किङ्करोषि अथवा किं करोषि ।
  2. कथम् + चलसि – कथंचलसि अथवा कथं चलसि ।
  3. अयम् + टीकत – अयण्टीकते अथवा अयं टीकते ।
  4. त्वम् + तिष्ठ – त्वन्तिष्ठ अथवा त्वं तिष्ठ ।

विसर्ग-संधि ।

पूर्व में (पहल) आये (विसर्ग) के साथ जब स्वर वर्ण अथवा व्यंजन वर्ण की संधि होती ,, तो ‘विसर्ग-संधि’ कहते हैं । जैसे: अन्तः करणम्, पुनरागत:, पुरस्कारः, पूर्णश्चन्द्रः आदि । विसर्ग-सौंध के दो मुख्य रूप होते हैं-

  1. सत्व-संधि’ एवं
  2. अत्व-सधि’ ।

(1) सत्व-संधि

किसी पद में आये अन्त्य विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है यदि उसके पश्चात् “खर’ प्रत्याहार का काई वर्ण (ख, फ, छ, च, ट, त, क, प, श, प एवं स में से कोई वर्ण) आया हुआ हो । जैसे- : + क – स्क, : + त = स्त, : _ + च = श्च, : + श : श्श, : + प्य, : + ट = ष्टः आदि ।

उदाहरण-

  1. पुरः + कारः – पुरस्कार:
  2. पूर्णः + चन्द्र – पूर्णचन्द्रः
  3. भाः + करः – भास्कर:
  4. गजः + चलति
  5. यशः + चिनोति – यशश्चिनोति
  6. नि: + चित = निश्चित
  7. रामः + षष्ठ = रामप्यष्ठः
  8. धनुः + टंकारः = धनुष्टंकार:

सूत्र – विसर्जनीयः सः- विसर्ग (:) का ‘स्’ हो जाता है, यदि ‘खर’ प्रत्याहार का कोई वर्ण उसके बाद में आया हो । जैसे- पुरस्कारः, नमस्कारः, भास्कर आदि ।

(2) अत्व-संधि

विसर्ग के पूर्व में ह्रस्व ‘अ’ रहने पर और उसके बाद में ‘हश्’ प्रत्याहार का कोई वर्ण (ह. ब, र, ल, न, म, ङ, ण, न, ण, भ, घ, ढ, ध, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श; ष, र, ह, में से कोई वर्ण) आया हुआ हो तो उसे विसर्ग का अथवा उसके पूर्वः विद्यमान ‘र’ वर्ण का उत्व हो जाता है । जैसे

– व – अ + व : + – उ + द
+ र – उ + र : + घ . उ. घ

उदाहरण

  1. सरः + वरः = सर + उ + वरः = सरोवर:
  2. मनः + रथः – मन + उ + रथः = मनोरथः
  3. पयः + द: = पय + उ + द = पयोद:
  4. पयः + धरः – पय + उ + धरः = पयोधरः

सूत्र- हशि च- विसर्ग के पूर्व हस्व ‘अ’ के रहने पर एवं उसके बाद में ‘हश’ प्रत्याहार का कोई वर्ण रहने पर विसर्ग का अथवा उसके पूर्व ‘र’ का ‘उ’ हो जाता है । जैसे- सरोवरः, पयोधरः, मनोरथः मनोजः आदि ।

वर्ण-विकारों की संधिंगत स्मरणीय तालिक –

I. निम्नांकित की संधि करें।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि 1

II. निम्नांकित शब्दों में किन-किन वर्गों की संधि हुई है?

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि 2

III. वर्गों का मेल, इसमें संधि के कुछ नियम के अनुसार दो वर्णों को रखा जाता है तथा पूछा जाता है कि दोनों वर्गों के मेल से कौन-सा नया वर्ण बनता है । अभ्यास के लिए उसके कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि 3

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

स्मरणीय : प्रमुख संधि-विच्छेद

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि 4

संज्ञा पद का परिचय

संस्कृत में ‘सार्थक’ शब्दों को पद कहते हैं । संस्कृत में जब मूल धातु में प्रत्यय जोड़ा जाता है तो उससे सार्थक शब्द बनता है और उसकी संज्ञा पद होता है। विभक्तियों के बिना संस्कृत में किसी शब्द का न तो कोई प्रयोग होता है और न उनका कोई अर्थ ही होता है।

मूल धातु से जुड़ने वाली विभक्तियों के दो वर्ग हैं- ‘सुप्’ विभक्तियाँ एवं ‘तिङ्’ विभक्तियाँ । इनमें ‘सुप्’ विभिक्तयाँ मुख्य रूप से ‘नाम’ पदों के साथ जुड़ती है । ‘नाम’ पदों का अर्थ है- संज्ञा-पद, सर्वनाम- पद एवं विशेषण पद । ‘तिह’ विभक्तियाँ मुख्य रूप से मूल धातुओं के साथ लगती हैं, जिन्हें ‘आख्यात’ कहते हैं । तिङ् धातु वाले पदों को ‘तिड़न्त-पद’ कहते हैं । संस्कृत भाषा में मुख्य व्यवहार इन्हीं दो वर्गों के पदों का होता है । जैसे

सुबन्त पद- बालकः, यतिः, साधु:, राजा, लता, नदी, फलम् आदि । तिङन्त पद- भवति, भवामि, भविष्यति, अभवत्, भवतु आदि ।

संज्ञा-पद से तात्पर्य उन पदों से हैं, जिनके द्वारा किसी व्यक्ति, वस्तु, भाव आदि के नाम का बोध होता है । स्वरूप की दृष्टि से संस्कृत में संज्ञा-पद दो प्रकार के होते हैं- अजन्त और हलन्त । अजन्त संज्ञा- पद के हैं, जिनके अंत में अ, इ, उ, आ, इ, ऊ, ए, ओ, या औ स्वर लगे होते हैं । जैसे- बालक (बालक + अ + बालक) यति (यत् + इ – यति) साधु (साध् + 3) जैसे शब्द अजन्त संज्ञा-पद हैं। कारण इनके अंत में अ, इ, उ जैसे स्वर लगे हैं।

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि

हलन्त संज्ञा-वद वे हैं, जिनके अंत में कोई हलन्त वर्ण (जैसे- च्, ज, त. द्, न् आदि) लगा होता है । जैसे-जलमुच् (मेघ) सुहृद् (मित्र), पथिन् (रास्ता) आदि ।

संस्कृत में संज्ञा-पद तीन लिंगों एवं तीन वचनों में होते हैं । यथा

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि 5

कारक-विभक्तियों का सामान्य परिचय

नाम-पदों (संज्ञा-पदों, सर्वनाम-पदों एवं विशेषण-पदों) के साथ ‘सुप्’ विभिक्तियाँ निम्नांकित हैं

Bihar Board Class 7 Sanskrit व्याकरण संधि 6

सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति के ही समान रूप होते हैं, केवल एकवचन में रूप कुछ बदल जाते हैं । जैसे- रामः कं विसर्ग का लोप हो जाता है- राम ।

“सुप्’ विभक्तियाँ नाम-पदों के साथ जुड़कर उनके ‘कारक’ एवं संख्या (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) का बोध कराती है- “संख्या-कारक-बोधयत्रि विभक्तिः ।” संख्या (वचन) का संकेत पहले ही किया जा चुका है।

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 12 कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

Bihar Board Class 11 Chemistry कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें Text Book Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 12.1
निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की संकरण अवस्था बताइए –
CH2 = C = O, CH3CH = CH2, (CH3)2CO.CH2 = CHCN, C6H6
उत्तर:
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प्रश्न 12.2
निम्नलिखित अणुओं में तथा आबन्ध दर्शाइए –
C6H6, C6H12, CH2, Cl2, CH2 = C = CH2, CH3NO2, HCONHCH3
उत्तर:
C6H6
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C6H12
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प्रश्न 12.3
निम्नलिखित यौगिकों के आंबध-रेखा-सूत्र लिखिए।
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल, 2, 3-डाइमेथिल ब्यूटेनेल, हेप्टेन-4-ओन
उत्तर:
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल:
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2,3 – डाइथिल व्यूटेनेल:
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हेप्टेन-4-ओन:
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प्रश्न 12.4
निम्न यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 12.5
निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2, 2 – डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2 – डाइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2, 4, 7 – ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2, 5, 7 ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2 – क्लोरी – 4 – मेथिलपेन्टेन अथवा 4 – क्लोरो – 2 मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट – 3 – आइन – 1 – ऑल अथवा ब्यूट – 4 – ऑल – 1 – आइन
उत्तर:
(क) 2, 2 – डाइएथिलपेन्टेन:
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(ख) 2, 4, 7 – ट्राइमेथिल ऑक्टेन:
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(ग) 2 – क्लोरो – 4 – मेथिलपेन्टेन:
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(घ) ब्यूट – 3 – आइन – 1 – ऑल:
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प्रश्न 12.6
निम्नलिखित दो सजातीय श्रेणियों में से प्रत्येक के प्रथम पाँच सजातों के संरचना-सूत्र लिखिए –
(क) H – COOH
(ख) CH3COCH3
(ग) H – CH = CH2
उत्तर:
(क)
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(ख) CH3COCH3
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(ग) H – CH = CH2
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प्रश्न 12.7
निम्नलिखित के संघनित और आबन्ध रेखा-सूत्र लिखिए तथा उनमें यदि कोई क्रियात्मक समूह हो तो उसे पहचानिए –
(क) 2, 2, 4 – ट्राइमेथिलपेन्टेन
(ख) 2 – हाइड्रॉक्सी – 1, 2, 3 – प्रोपेनड्राइ – कार्बोक्सिलिक अम्ल
(ग) हेक्सेनडाइएल
उत्तर:
(क) संघनित सूत्र –
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आबन्ध रेखा सूत्र –
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(ख) संघनित सूत्र –
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आबन्ध रेखा सूत्र –
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क्रियात्मक समूह –
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(ग) संघनित सूत्र –
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आबन्ध रेखा सूत्र –
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क्रियात्मक समूह –
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प्रश्न 12.8
निम्नलिखित यौगिकों में क्रियात्मक समूह पहचानिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 12.9
निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों? O2NCH2CH2O और CH3CH2O
उत्तर:
O2NCH2CH2O में -1 प्रभाव वाला -NO2 समूह ऋणायन पर ऋण-आवेश घटा देता है जिससे यह स्थाई हो जाता है दूसरी ओर CH3CH2O में +1 प्रभाव होता है और ऋणायन पर ऋण-आवेश बढ़ा देता है जिससे यह अस्थाई हो जाता है।

प्रश्न 12.10
निकाय से आबन्धित होने पर ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित क्यों करते हैं? समझाइए।
उत्तर:
ऐल्किल समूह sp3 – संकरण होता है, जबकि π – निकाय से सम्बन्धित होने पर यह sp2 – संकरण में परिवर्तित हो जाता है जो अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है। अतः ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन दाता की तरह व्यवहार प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 12.11
निम्नलिखित यौगिकों की अनुनाद संरचना लिखिए तथा इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन मुड़े तीरों की सहायता से दशाइए =
(क) C6H5OH
(ख) C6H5NO2
(ग) CH3CH = CHCHO
(घ) C6H5 – CHO
(डं) CH6CH2+
(च) CH3CH+2
उत्तर:
(क)
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(ख)
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(ग)
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(घ)
Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 12 कार्बनिक रसायन कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें

(डं)
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(च)
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प्रश्न 12.12
इलेक्ट्रॉनस्नेही तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉनस्नेही (Nucleophiles and Electrophiles):
इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करने वाला अभिकर्मक ‘नाभिकस्नेही’ (nucleophile, Nu:) अर्थात् ‘नाभिक खोजने वाला’ कहलाता है तथा अभिक्रिया ‘नाभिकस्नेही अभिक्रिया’ (nucleophilic reaction) कहलाती है। इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाले अभिकर्मक का इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile E+), अर्थात् ‘इलेक्ट्रॉन चाहने वाला’ कहते हैं और अभिक्रिया ‘इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रिया’ (electrophilic reaction) कहलाती है।

ध्रुवीय कार्बनिक अभिक्रियाओं में क्रियाधारक के इलेक्ट्रॉनस्नेही के केन्द्र पर नाभिकस्नेही आक्रमण करता है। यह क्रियाधारक का विशिष्ट परमाणु अथवा इलेक्ट्रॉन न्यून भाग होता है। इसी प्रकार क्रियाधारकों के इलेक्ट्रॉनधनी नाभिकस्नेही केन्द्र पर इलेक्ट्रॉनस्नेही आक्रमण करता है अतः आबन्धन अन्योन्यक्रिया के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉनस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म प्राप्त करता है।

नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर इलेक्ट्रॉनों का संचलन वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। नाभिकस्नेही के उदाहरणों में हाइड्रॉक्साइड (OH), सायनाइड आयन (CN) तथा कार्बऋणायन (R3C) कुछ आयन सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त कुछ उदासीन अणु (जैसे –Bihar Board Class 11 Chemistry chapter 12 कार्बनिक रसायन कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें  आदि) भी एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म की उपस्थिति के कारण नाभिकस्नेही की भाँति कार्य करते हैं।

इलेक्ट्रॉनस्नेही के उदाहरणों में कार्बधनायन (C+H3) और कार्बोनिल समूह (>C = 0) अथवा ऐल्किल हैलाइड (R3C – X, X = हैलोजन परमाणु) वाले उदासीन अणु सम्मिलित हैं। कार्बधनायन का कार्बन केवल षष्टक होने के कारण इलेक्ट्रॉन-न्यून होता है तथा नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म, ग्रहण कर सकता है। ऐल्किल हैलाइड का कार्बन आबन्ध ध्रुवता के कारण इलेक्ट्रॉनस्नेही-केन्द्र बन जाता है। जिस पर नाभिकस्नेही आक्रमण कर सकता है।

प्रश्न 12.13
निम्नलिखित समीकरणों में रेखांकित किए गए अभिकर्मकों को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉनस्नेही में वर्गीकृत कीजिए –
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उत्तर:
(क) OH नाभिकस्नेही है।
(ख) CN नाभिकस्नेही है।
(ग) CH3CO+ इलेक्ट्रॉनस्नेही है।

प्रश्न 12.14
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए –
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उत्तर:
(क) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।
(ख) इलेक्ट्रॉनस्नेही संकलन अभिक्रिया।
(ग) विलोपन अभिक्रिया।
(घ) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया।

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प्रश्न 12.15
निम्नलिखित युग्मों में सदस्य-संरचनाओं के मध्य कैसा सम्बन्ध है? क्या ये संरचनाएँ संरचनात्मक या ज्यामितीय समावयव अथवा अनुनाद संरचनाएँ हैं –
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उत्तर:
(क) ये स्थान समावयव हैं।
(ख) ये ज्यामितीय समावयव हैं।
(ग) ये अनुनादी संरचनाएँ हैं।

प्रश्न 12.16
निम्नलिखित आबन्ध विदलनों के लिए इलेक्ट्रॉन विस्थापन को मुड़े तीरों द्वारा दर्शाइए तथा प्रत्येक विदलन को समांश अथवा विषमांश में वर्गीकृत कीजिए। साथ ही निर्मित सक्रिय मध्यवर्ती उत्पादों में मुक्त-मूलक, कार्बधनायन तथा कार्बऋणायन पहचानिए –
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उत्तर:
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प्रश्न 12.17
निम्नलिखित कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता का सही क्रम कौन-सा इलेक्ट्रॉन-विस्थापन वर्णित करता है? प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2 COOH
(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2 CHCOOH > (CH3)3 C.COOH
उत्तर:
प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect):
भिन्न विद्युत-ऋणात्मकता के दो परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक आबन्ध में इलेक्ट्रॉन असमान रूप से हसभाजित होते हैं। इलेक्ट्रॉन घनत्व उच्च विद्युत ऋणात्मकता के परमाणु के ओर अधिक होता है। इस कारण सहसंयोजक आबन्ध ध्रुवीय हो जाता है। आबन्ध ध्रुवता के कारण कार्बनिक अणुओं में विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं।

उदाहरणार्थ-क्लोरोएथेन (CH3CH2Cl) में C – Cl बन्ध ध्रुवीय है। इसकी ध्रुवता के कारण कार्बन क्रमांक-1 पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा क्लोरीन पर आंशिक ऋणावेश (δ) उत्पन्न हो जाता है। आंशिक आवेशों को दर्शाने के के लिए (डेल्टा) चिह्न प्रयुक्त करते हैं। आबन्ध में इलेक्ट्रॉन-विस्थापन दर्शाने के लिए तीर (→) का उपयोग किया जाता है, जो δ+ से δ की ओर आमुख होता है।
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कार्बन-1 अपने आंशिक धनावेश के कारण पास के C – C आबन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने लगता है। फलस्वरूप कार्बन – 2 पर भी कुछ धनावेश (∆+) उत्पन्न हो जाता है। C – 1 स्थित धनावेश की तुलना में ∆+ अपेक्षाकृत कम धनावेश दर्शाता है। दूसरे शब्दों में C – Cl की ध्रुवता के कारण पास के आबन्ध में ध्रुवता उत्पन्न हो जाती है। समीप के σ – आबन्ध के कारण अगले-आबन्ध की ध्रुवीय होने की प्रक्रिया प्रेरणिक प्रभाव (inductive effect) कहलाती है।

यह प्रभाव आगे के आबन्धों में भी जाता है, लेकिन आबन्धों में की संख्या बढ़ने के साथ-साथ यह प्रभाव कम होता जाता है और तीन आबन्धों के बाद लगभग लुप्त हो जाता है। प्रेरणिक प्रभाव का सम्बन्ध प्रतिस्थापी से बन्धित कार्बन परमाणु को इलेक्ट्रॉन प्रदान करने अथवा अपनी ओर आकर्षित कर लेने की योग्यता से है।

इस योग्यता के आधार पर प्रतिस्थापित को हाइड्रोजन के सापेक्ष इलेक्ट्रॉन-आकर्षी (electron-with-drawing) या इलेक्ट्रॉनदाता समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हैलोजने तथा कुछ अन्य समूह; जैसे-नाइट्रो (-NO2), सायनों (-CN), कार्बोनिक (-COOH), एस्टर (-COOR), ऐरिलॉक्सी (-OAr) इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह हैं; जबकि ऐल्किाल समूह जैसे-मेथिल (-CH3), एथिल (-CH2 -CH3) आदि इलेक्ट्रॉनदातासमूह हैं।

इलेक्ट्रोमेरी अथवा (E प्रभाव) (Electromeric Effect, E-effect):
यह एक अस्थायी प्रभाव है। केवल आक्रमणकारी अभिकारकों की उपस्थिति में यह प्रभाव बहुआबन्ध (द्विआबन्ध अथवा त्रिआबन्ध) वाले कार्बनिक यौगिकों में प्रदर्शित होता है। इस प्रभाव में आक्रमण करने वाले अभिकारक की माँग के कारण बहु-आबन्ध से बन्धित परमाणुओं में एक सहभाजित π – इलेक्ट्रॉन युग्म का पूर्ण विस्थापन होता है। अभिक्रिया की परिधि से आक्रमणकारी अभिकारक को हटाते ही यह प्रभाव शून्य हो जाता है। इसे E द्वारा दर्शाया जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉन के संचलन को वक्र तीर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

स्पष्टः दो प्रकार के इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव होते हैं –

1. धनात्मक इलेक्ट्रोमरी प्रभाव (+ E प्रभाव):
इस प्रभाव में बहुआबन्ध के π – इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित होता है। उदाहरणार्थ –
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2. ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरी-प्रभाव (-E प्रभाव):
इस प्रभाव में बहु-आबन्ध के π – इलेक्ट्रॉनों कर स्थानान्तरण उस परमाणु पर होता है, जिससे आक्रमणकारी अभिकर्मक बन्धित नहीं होता है। इसका उदाहरण निम्नलिखित है –
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जब प्रेरणिक तथा इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव एक-दूसरे की विपरीत दिशाओं में कार्य करते हैं, तब इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव प्रबल होता है।

(क) Cl3CCOOH > Cl2CHCOOH > ClCH2COOH
यह इलेक्ट्रॉन आकर्षी प्रेरणिक प्रभाव (-I) दर्शाता है।

(ख) CH3CH2COOH > (CH3)2 CHCOOH > (CH3)3 C.COOH
यह इलेक्ट्रॉन दाता प्रेरणिक प्रभाव (+I) दर्शाता है।

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प्रश्न 12.18
प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रमों के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए –
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन,
(ग) क्रामैटोग्रैफी
उत्तर:
(क) क्रिस्टलन:
यह ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की प्रायः प्रयुक्त विधि है। यह विधि कार्बनिक यौगिक तथा अशुद्ध की किसी उपयुक्त विलायक में इसकी विलेयताओं में निहित अन्तर पर आधारित होती है। अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं, जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय (sparingly soluble) होता है, परन्तु उच्चतर ताप पर यथेष्ट मात्रा में वह घुल जाता है। तत्पश्चात् विलयन को इतना सान्द्रित करते हैं कि वह लगभग संतृपत (saturate) हो जाए। विलयन को ठण्डा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टलित हो जाता है, जिसे निस्पन्दन द्वारा पृथक् कर लेते हैं।

निस्पन्द (मातृ द्रव) में मुख्य रूप से अशुद्धियाँ तथा यौगिक की अल्प मात्रा रह जाती है। यदि यौगिक किसी एक विलायक में अत्यधिक विलेय तथा किसी अन्य विलायक में अल्प विलेय होता है, तब क्रिस्टलन उचित मात्रा में इन विलायकों को मिश्रित करके किया जाता है। सक्रियित काष्ठ कोयले (activated charcoal) की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाली जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धियों की विलेयताओं में कम अन्तर होने की दशा में बार-बार क्रिस्टलन द्वारा शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

(ख) आसवन:
इस महत्वपूर्ण विधि की सहायता से (i) वाष्पशील (volatile) द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से एवं (ii) ऐसे द्रवों, जिनके क्वथनांकों में पर्याप्त अन्तर हो, को पृथक् कर सकते हैं। ‘भिन्न क्वथनांकों वाले द्रव भिन्न ताप पर वाष्पित होते हैं। वाष्पों को ठण्डा करने से प्राप्त द्रवों को अलग-अलग एकत्र कर लेते हैं। क्लोरोफॉर्म (क्वथनांक 334K) और ऐनिलीन (क्वथनांक 457K) को आसवन विधि द्वारा आसानी से पृथक् कर सकते हैं।

द्रव-मिश्रण को गोल पेंदे वाले फ्लास्क में लेकर हम सावधानीपूर्वक गर्म करते हैं। उबालने पर कम क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प पहले बनती है। वाष्प को संघनित्र की सहायता से संघनित करके प्राप्त द्रव को ग्राही में एकत्र कर लेते हैं उच्च क्वथनांक वाले घटक के वाष्प बाद में बनते हैं। इनमें संघनन से प्राप्त द्रव को दूसरे ग्राही में एकत्र कर लेते हैं।

(ग) क्रोमैटोग्रैफी (वर्णलेखन):
‘वर्णलेखन’ (क्रोमैटोग्रैफी) शोधन की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तकनीक है, जिसका उपयोग यौगिकों का शोधन करने में, किसी मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने तथा यौगिकों की शुद्धता की जाँच करने के लिए विस्तृत रूप से किया जाता है। क्रोमैटोग्रैफी विधि का उपयोग सर्वप्रथम पादपों में पाए जाने वाले रंगीन पदार्थों को पृथक् करने के लिए किया गया था।

‘क्रामैटोग्रैफी’ शब्द ग्रीक शब्द ‘क्रोमा’ (chroma) से बना है, जिसका अर्थ है ‘रंग’। इस तकनीक में सर्वप्रथम यौगिकों के मिश्रण को स्थिर प्रावस्था (stationary phase) पर अधिशोषित कर दिया जाता है। स्थिर प्रावस्था ठोस अथवा द्रव हो सकती है। इसके पश्चात् स्थिर प्रावस्था में से उपयुक्त विलायक, विलायकों के मिश्रण अथवा गैस को धीरे-धीरे प्रवाहित किया जाता है। इस प्रकार मिश्रण के अवयव क्रमश: एक-दूसरे से पृथक् हो जाते हैं। गति करने वाली प्रावस्था को ‘गतिशील प्रावस्था’ (mobile phase) कहते हैं।

अन्तर्ग्रस्त सिद्धान्तों के आधार पर वर्णलेखन को विभिन्न वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से दो हैं –

1. अधिशोषण-वर्णलेखन (Adsorption chromatography):
यह इस सिद्धान्त पर आधारित है कि किसी विशिष्ट अधिशोषक (adsorbent) पर विभिन्न यौगिक भिन्न अंशों में अधिशोषित होते हैं। साधारणत: ऐल्यूमिना तथा सिलिका जेल अधिशोषक के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं। स्थिर प्रावस्था (अधिशोषक) पर गतिशील प्रावस्था प्रवाहित करने के उपरान्त मिश्रण के अवयव स्थिर प्रावस्था पर अलग-अलग दूरी तय करते हैं। निम्नलिखित दो प्रकार की वर्णलेखन-तकनीकें हैं, जो विभेदी-अधिशोषण सिद्धान्त पर आधारित हैं –

(क) कॉलम-वर्णलेखन, अर्थात् स्तभ-वर्णलेखन (Columan Chrmnatogrophy)
(ख) पतली पर्त वर्णलेखन (Thin Lay of Chromatography)

2. वितरण क्रोमैटोग्रैफी (Partition Chromatography):
वितरण क्रोमैटोग्रैफी स्थिर तथा गतिशील प्रावस्थाओं के मध्य मिश्रण के अवयवों के सतत विभेदी वितरण पर आधारित है। कागज वर्णलेखन (paper chromatography) इसका एक उदाहरण है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार के क्रोमैटोग्रैफी कागज का इस्तेमाल किया जाता है। इस कागज में छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं।

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प्रश्न 12.19
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं,को पृथक करने की विधि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ विलायक s, में भिन्न हैं, को पृथक् करने के लिए क्रिस्टलन विधि प्रयोग की जाती है। इस विधि में अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे विलायक में घोलते हैं जिसमें यौगिक सामान्य ताप पर अल्प-विलेय उच्च ताप पर विलेय होता है। इसके पश्चात् विलयन को सान्द्रित करते हैं जिससे वह लगभग संतृप्त हो जाए।

अब अल्प-विलेय घटक पहले क्रिस्टलीकृत हो जाएगा तथा अधिक विलेय घटक पुनः गर्म करके ठण्डा करने पर क्रिस्टलीकृत होगा। इसके अतिरिक्त सक्रियित काष्ट कोयले की सहायता से रंगीन अशुद्धियाँ निकाल दी जाती हैं। यौगिक तथा अशुद्धि की विलेयताओं में कम अन्तर होने पर बार-बार क्रिस्टलन करने पर शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 12.20
आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अन्तर है? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
आसवन (Distillation):
इस विधि को क्वथनांक में अधिक अन्तर वाले द्रवों को पृथक्कृत करने में प्रयोग किया जाता है। निम्न दाब पर आसवन (Distillation under reduced pressure):
इस विधि को उन द्रवों के शोधन में प्रयुक्त किया जाता है जो अपने साधारण क्वथनांक पर या उससे नीचे अपघटित हो जाते हैं।

भाप आसवन (Steam distillation):
यह तकनीक उन पदार्थों के शोधन के लिए प्रयुक्त की जाती है, जो भाप वाष्पशील हों, परन्तु जल में अमिश्रणीय हों इस विधि द्वारा इन पदार्थों को भाप-अवाष्पशील अशुद्धियों से पृथक्कृत किया जा सकता है।

प्रश्न 12.21
लासेग्ने-परीक्षण का रसायन-सिद्धान्त समझाइए।
उत्तर:
किसी कार्बन यौगिक में उपस्थित नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन तथा फॉस्फोरस की पहचान ‘लासेग्ने-परीक्षण’ (Lassigne’s Test) द्वारा की जाती है। यौगिक को सोडियम धातु के साथ संगलित करने पर ये तत्त्व सहसंयोजी रूप से आयनिक रूप से परिवर्तित हो जाते हैं इनमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं –
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C, N, S तथा X कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्व हैं। सोडियम संगलन से प्राप्त आवशेष को आसुत जल के साथ उबालने पर सोडियम सायनाइड सल्फाइड तथा हैलाइड जल में घुल जाते हैं। इस निष्कर्ष को ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ (Sodium Fusion Extract) कहते हैं।

प्रश्न 12.22
किसी कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन के आकलन की –

  1. ड्यूमा विधि तथा
  2. कैल्डाल विधि के सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर:
नाइट्रोजन में परिमाणात्मक निर्धारण की निम्नलिखित दो विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं –

1. ड्यूमा विधि (Duma’s Method):
नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर इसमें उपस्थित कार्बन, हाइड्रोजन, गन्धक तथा नाइट्रोजन क्रमश:
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चित्र-ड्यमा विधि। कार्बनिक यौगिक को CO2 गैस की उपस्थिति में Cu(0) ऑक्साइड के साथ गर्म करने पर नाइट्रोजन मोटीमों के मिश्रण को पोटैशियम हाइडॉक्साइड विलयन में से प्रवाहित किया जाता है, जहाँ CO2 अवशोषित हो जाती है तथा नाइट्रोजन का आयतन नाप लिया जाता है।

CO2, H2O, SO2 और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों (NO2, NO, N2O) के रूप में ऑक्सीकृत हो जाते हैं। इस गैसीय मिश्रण को रक्त तप्त कॉपर की जाल के ऊपर प्रवाहित करने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का नाइट्रोजन में अपचयन हो जाता है।
4Cu + 2NO2 → 4CuO + N2
2Cu + 2NO → 2CuO + N2
Cu + N2O → CuO + N2

इस प्रकार N2, CO2, H2O तथा SO2 युक्त गैसीय मिश्रण को KOH से भरी नाइट्रोमीटर नामक अंशांकित नली से प्रवाहित करने पर जाता है और बची हुई N2 गैस को नाइट्रोमीटर में जल के ऊपर एकत्र कर लिया जाता है। इस नाइट्रोजन का आयतन वायुमण्डल के दाब तथा ताप पर नोट कर लेते हैं। फिर इस आयतन को गैस समीकरण की सहायता से सामान्य ताप व दाब (N.T.P) पर परिवर्तित कर लेते हैं।
मान लिया, m ग्राम कार्बनिक यौगिक में N.T.P पर x मिली नाइट्रोजन प्राप्त होती है।

∵ N.T.P पर 22,400 मिली नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = 28 ग्राम (N2 का ग्राम अणुभार)
∴ N.T.P पर x मिली नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = \(\frac{28x}{22,400}\) ग्राम
∵ m ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = \(\frac{28x}{22,400}\) ग्राम
∴100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन (N2) की मात्रा = \(\frac{28x×100}{22,400×m}\) ग्राम
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2. कैल्डाल विधि (Kjeldahl’s Method):
यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि जब किसी नाइट्रोजनयुक्त कार्बन यौगिक को पोटैशियम सल्फेट की उपस्थिति में सान्द्र H2SO4 के
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चित्र-कैल्डाल विधि-नाइट्रोजनयुक्त यौगिक को सान्द्र। सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ गर्म करने पर अमोनियम सल्फेट बनता है, जो – NaOH द्वारा अभिकृत करने पर अमोनिया मुक्त करता है। इसे मानक अम्ल के अम्ल आयतन में अवशोषित किया जाता है।

साथ गर्म करते हैं तो उसमें उपस्थित नाइट्रोजन पूर्णरूप से अमोनियम सल्फेट में परिवर्तित हो जाती है। इस प्राप्त अमोनियम सल्फेट को सान्द्र कॉस्टिक सोडा विलयन के साथ गर्म करने पर अमोनिया गैस निकलती हैं, जिसको ज्ञात सान्द्रण वो H2SO4 के निश्चित आयतन में अवशोषित कर लेते हैं। इस अम्ल का मानक NaOH के साथ अनुमापन करके गणना द्वारा अवशोषित हुई अमोनिया की मात्रा ज्ञात की जाती है। फिर नाइट्रोजन के आयतन की गणना कर ली जाती है।

(NH4)2 SO4 + 2NaOH + Na2SO4 + 2H2O + 2NH3
2NH3 + H2SO4 —-> (NH4)2SO4
मान लिया कार्बनिक यौगिक का भार = m
ग्राम प्रयुक्त अम्ल का आयतन = V
मिली प्रयुक्त अम्ल की नार्मलता =N
V मिली N नार्मलता का अम्ल = V

मिली M नार्मलता की अमोनिया 1000 मिली N नार्मलता वाली अमोनिया में 17 ग्राम अमोनिया या 14 ग्राम नाइट्रोजन होगी।
V3 मिली N – NH3 में नाइट्रोजन की मात्रा = 0.014 NV ग्राम
∴ 100 ग्राम कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन की मात्रा
= \(\frac{0.014NV×100}{m}\)
= \(\frac{1.4 NV}{m}\) ग्राम

नाइट्रोजन की प्रतिशत मात्रा –
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प्रश्न 12.23
किसी यौगिक में हैलोजेन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के आकलन के सिद्धान्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1. हैलोजेन का आकलन (Estimation of Halogens):
कार्बनिक यौगिक के ज्ञात भार को सधूम HNO3 के कुछ क्रिस्टलों के साथ केरियस नली का ऊपरी सिरा बन्द कर दिया जाता है। केरियस नली को विद्युत भट्टी में रखकर 180° – 200° C पर लगभग 3 – 4 घण्टे गर्म करते हैं।

यौगिक में उपस्थित हैलोजन (Cl, Br, I), सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप में बदल जाते हैं। सिल्वर हैलाइड के अवक्षेप को धोकर तथा सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त सिल्वर हैलाइड के भार से हैलोजन की प्रतिशत मात्रा निम्नलिखित गणना की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं –
अभिक्रियाएँ –
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चित्र – केरियस विधि-हैलोजेनयुक्त कार्बनिक यौगिक को सिल्वर नाइट्रेट की उपस्थिति में सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म किया जाता है।
मान लिया कि m ग्राम पदार्थ से x ग्राम AgCl प्राप्त होता है। (AgCl का अणुभार = 108 + 35.5 = 143.5)
∵ 143.5 ग्राम AgCl में क्लोरीन की मात्रा = 35.5 ग्राम
∴ x ग्राम ABCl में क्लोरीन की मात्रा = \(\frac{35.5}{143.5}\) × x ग्राम
∴ m ग्राम कार्बनिक यौगिक में क्लोरीन की मात्रा = \(\frac{35.5}{143.5}\) × x ग्राम
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इसी प्रकार,
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2. सल्फर का आकलन (Estimation of Sulphur):
इस सिद्धान्त के अनुसार, सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक को सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर यौगिक में उपस्थित समस्त गनधक, सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाती है। इसमें BaCl2 विलयन मिलाकर इससे BaSO4 अवक्षेपित कर लिया जाता है। इस अवक्षेप को छानकर, धोकर और सुखाकर तौल लेते हैं। इस प्रकार BaSO4 के भार की सहायता से गन्धक की प्रतिशत मात्रा की गणना कर लेते हैं।
अभिक्रियाएँ –
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माना, m ग्राम कार्बनिक यौगिक से x ग्राम BaSO4 बनता है।
∵ 233 ग्राम BaSO4 में की मात्रा = 32 ग्राम
∴ x ग्राम BaSO4 में S की मात्रा = \(\frac{32}{233}\) × ग्राम
∵ m प्राम कार्बनिक यौगिक में s की मात्रा = \(\frac{32}{233}\) × \(\frac{x}{m}\) × 100
S की मात्रा(%) = \(\frac{32}{233}\) × \(\frac{x}{m}\) × 100
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3. फॉस्फोरस का आकलन (Estimation of Phosphorus):
कार्बनिक यौगिक की एक ज्ञात मात्रा को सधूम नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करने पर उनमें उपस्थित फॉस्फोरस, फॉस्फोरिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है।

इसे अमोनिया तथा अमोनियम मॉलिब्डेट मिलाकर अमोनियम फॉस्फोटोमॉलिब्डेट, (NH4)3 PO4.12MoO3, के रूप में हम अवक्षेपित कर लेते हैं, अन्यथा फॉस्फोरिक अम्ल में मैग्नीशिया मिश्रण मिलाकर MgNH4PO4 के रूप में अवक्षेपित किया जा सकता है, जिसके ज्वलन से Mg2P2O7 प्राप्त होता है।
माना कि कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = m ग्राम और
अमोनियम फॉस्फोमॉलिब्डेट = m1 ग्राम
(NH4)PO4.12MoO3 का मोलर द्रव्यमान = 1877 ग्राम है।
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यदि फॉस्फोरस का Mg2P2O7 के रूप में आकलन किया जाए तो
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जहाँ Mg2P2O7 का मोलर द्रव्यमान 222u, लिए गए कार्बनिक पदार्थ का द्रव्यमान m, बने हुए Mg2P2O7 का द्रव्यमान m1 तथा Mg2P2O7 यौगिक में उपस्थित दो फॉस्फोरस परमाणुओं का द्रव्यमान 62 है।

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प्रश्न 12.24
पेपर क्रोमैटोग्रैफी के सिद्धान्त को समझाइए।
उत्तर:
पेपर क्रोमैटोग्रफी:
पेपर या क्रोमैटोग्रैफी वितरण क्रोमैटोग्रैफी पर आधारित है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार का कामैटोग्रैफी पेपर प्रयोग किया जाता है। इस पेपर के छिद्रों में जल-अणु पाशित रहते हैं, जो स्थिर प्रावस्था का कार्य करते हैं। क्रोमैटोग्रैफी कागज की एक पट्टी (strip) के आधार पर मिश्रण का बिन्दु लगाकर उसे जार से लटका देते हैं (चित्र में)।
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जार में कुछ ऊँचाई तक उपयुक्त विलायक अथवा विलायकों का मिश्रण भरा होता है, जो गतिशील प्रावस्था का कार्य करता है। कोशिका क्रिया के कारण पेपर की पट्टी पर विलायक ऊपर की ओर बढ़ता है तथा बिन्दु पर प्रवाहित होता है। विभिन्न यौगिकों का दो प्रावस्थाओं में वितरण भिन्न-भिन्न होने के कारण वे अलग-अलग दूरियों तक आगे बढ़ते हैं। इस प्रकार विकसित पट्टी को ‘क्रोमैटोग्राम’ (chromatogram) कहते हैं। पतली पर्त की भाँति पेपर की पट्टी पर विभिन्न बिन्दुओं की स्थितियों को या तो पराबैंगनी प्रकाश के नीचे रखकर या उपयुक्त अभिकर्मक के विलयन को छिड़ककर हम देख लेते हैं।

प्रश्न 12.25
‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ में हैलोजेन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पूर्व नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?
उत्तर:
हैलोजेन के परीक्षण में सोडियम निष्कर्ष को सान्द्र HNO3 के साथ इसलिये गर्म करते हैं कि विलयन में उपस्थित NaCN तथा Na2S अघटित हो जाए और हैलोजेन के परीक्षण में बाधा न डालें। अन्यथा AgCN या Ag2S के अवक्षेप बनेंगे।
NaCN + HNO3 → HCN + NaNO3
Na2S + 2HNO3 → H2S + 2NaNO3

प्रश्न 12.26
नाइट्रोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के परीक्षण के लिए सोडियम के साथ कार्बनिक यौगिक का संगलन क्यों किया जाता है?
उत्तर:
कार्बनिक यौगिकों को सोडियम के साथ संकलित करने पर उसमें उपस्थित तत्त्व (N. S.P आदि) अपने सोडियम लवणों में परिवर्तित हो जाते हैं जो कि आयनिक यौगिक हैं। ये आयनिक लवण अधिक क्रियाशील होते हैं। अतः इनकी उपयुक्त अभिकारक की सहायता से परीक्षा कर सकते हैं।

प्रश्न 12.27
कैल्शियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।
उत्तर:
इस मिश्रण के अवयवों को पृथक् करने के लिए ऊर्ध्वपातन तकनीय उपयुक्त है क्योंकि कपूर का ऊर्ध्वपातन हो जाता है और कैल्शियम सल्फेट का नहीं।

प्रश्न 12.28
भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत क्यों हो जाता है?
उत्तर:
वास्तव में भाप-आसवन कम दाब होता है। आसवन फ्लास्क में रखे गये जलवाष्प तथा कार्बनिक द्रव दोनों का कुल वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि दोनों अपने सामान्य क्वथनांक पर वाष्पित हो जायेंगे।

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प्रश्न 12.29
क्या CCl4, सिल्वर नाइट्रेट के साथ गर्म करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप देगा? अपने उत्तर को कारण सहित समझाइए।
उत्तर:
CCl4 अध्रुवीय यौगिक है जो जलीय विलयन में आयन नहीं देता है जबकि AgNO3 का आयनन हो जाता है। अतः ये परस्पर क्रिया नहीं करते हैं जिससे AgCl का सफेद अवक्षेप प्राप्त नहीं होगा।

प्रश्न 12.30
किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर:
ऐसा इसलिए किया जाता है; क्योंकि पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षार है तथा CO2 का पूर्णतया अवशोषण कर सकता है। इस प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करके पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलेय पोटैशियम कार्बोनेट बना लेता है जिसका आकलन किया जा सकता है।

प्रश्न 12.31
सल्फर के लेड ऐसीटेट द्वारा परीक्षण में ‘सोडियम संगलन निष्कर्ष’ को ऐसीटिक अम्ल द्वारा उदासीन किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा, क्यों?
उत्तर:
ऐसीटिक अम्ल के स्थान पर सल्फ्यूरिक अम्ल के प्रयोग से लेड ऐसीटेटं सल्फ्यूरिक अम्ल से क्रिया करके लेउ सल्फेट (PbSO4) का सफेद अवक्षेप देगा जो सल्फर के परीक्षण में बाधा उत्पन्न करेगा। (CH3COO2)2 Pb + H2SO4 → PbSO4↓+ 2CH3COOH

प्रश्न 12.32
एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल की मात्राओं की गणना कीजिए।
उत्तर:
उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा की गणना –
यौगिक की मात्रा = 0.20g
कार्बन का प्रतिशत = 69%
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उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा
= \(\frac{69×44×(0.20)g}{12×100}\) = 0.506g
उत्पन्न जल की मात्रा की गणना –
यौगिक की मात्रा 0.20g
हाइड्रोजन का प्रतिशत = 4 8%
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प्रश्न 12.33
0.50g कार्बनिक यौगिक को कैल्डॉल विधि के अनुसार उपचारित करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5M H2SO4 के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण केलिए0.5M NaOH के 50 mL की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर:
अवशिष्ट अम्ल के आयतन की गणना –
NaOH विलयन का आवश्यक आयतन = 50mL
NaOH विलयन की मोलरता = 0.5M
H2SO4 विलयन की मोलरता = 0.5M
अवशिष्ट अम्ल के आयतन की गणना के लिए मोलरता समीकरण का प्रयोग करना होगा।
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प्रयुक्त अम्ल के आयतन की गणना –
मिलाए गए अम्ल का आयतन = 50 mL
अवशिष्ट अम्ल का आयतन = 25 mL
प्रयुक्त अम्ल का आयतन = (50 – 25)
= 25 mL
यौगिक की मात्रा = 0.50g
प्रयुक्त अम्ल का आयतन = 25 mL
प्रयुक्त अम्ल की मोलरता = 0.5M
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प्रश्न 12.34
केरिअस आकलन में 0.3780g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशता की गणना कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, यौगिक की मात्रा = 0.3780g
सिल्वर क्लोराइड की मात्रा = 0.5740g
क्लोरीन की प्रतिशतता
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प्रश्न 12.35
केरिअस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0468g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.686g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ। दिए गए कार्बन यौगिक में सल्फर की प्रतिशता की गणना कीजिए।
उत्तर:
प्रश्नानुसार,
बेरियम सल्फेट की मात्रा = 0.668g
सल्फर की प्रतिशतता
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प्रश्न 12.36
CH2 = CH – CH2 – CH2 – C = CH, कार्बनिक यौगिक में C2 – C3 आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?
(क) sp – sp2
(ख) sp – sp3
(ग) sp2 – sp3
(घ) sp3 – sp3
उत्तर:
(ग) sp2 – sp3

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प्रश्न 12.37
किसी कार्बनिक यौगिक में लासेग्नेपरीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रशियन ब्लू रंग निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?
(क) Na4 [Fe(CN)6]
(ख) Fe4 [Fe(CN)6]3
(ग) Fe2 [Fe(CN)6]
(घ) Fe3[Fe (CN)6]4
उत्तर:
(ख) Fe4[Fe(CN)6]3

प्रश्न 12.38
निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है?
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प्रश्न 12.39
कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) ऊर्ध्वपातन
(घ) क्रोमैटोग्रैफी
उत्तर:
(घ) क्रोमैटोग्रैफी।

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प्रश्न 12.40
CH3CH2I + KOH(aq) → CH3CH2OH + KI अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए –
(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन
उत्तर:
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन

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Bihar Board Class 11 Chemistry Solutions Chapter 11 p-ब्लॉक तत्त्व Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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अभ्यास के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 11.1
(क) B से Tl तक तथा
(ख) C से Pb तक की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की भिन्नता के क्रम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(क) B से Tl तक (बोरॉन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from B to Tl (Boron family)]
बोरॉन परिवार (वर्ग 13) के तत्वों का विन्यास ns2p1 होता है। इसका तात्पर्य यह है कि बन्ध निर्माण के लिए तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन उपलब्ध हैं। इन इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके ये परमाणु अपने यौगिकों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि इन तत्वों की ऑक्सीकरण-अवस्था में निम्नलिखित प्रवृत्ति प्रेक्षित होती है –

1. प्रथम दो तत्व बोरॉन तथा ऐलुमिनियम यौगिकों में केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, परन्तु शेष तत्वगैलियम, इण्डियम तथा थैलियम +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ-साथ +1 ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करते हैं अर्थात् से परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं।

2. +3 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व ऐलुमिनियम से आगे जाने पर घटता है तथा अन्तिम तत्व थैलियम की स्थिति में, +1 ऑक्सीकरण अवस्था, +3 ऑक्सीकरण अवस्था से अधिक स्थायी होती है। इसका अर्थ यह है कि TICI, TIC15 से अधिक स्थायी होता है।

(ख) से Pb तक (कार्बन परिवार) ऑक्सीकरण अवस्था [Oxidation state from C to Pb (Carbon family)]
कार्बन परिवार (समूह-14) के तत्वों का विन्यास ns2p2 होता है। स्पष्ट है कि इन तत्वों के परमाणुओं के बाह्यतम कोश में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं। इन तत्वों द्वारा सामान्यतः +4 तथा +2 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाई जाती है। कार्बन ऋणात्मक ऑक्सीकरण अवस्था भी प्रदर्शित करता है।

चूंकि प्रथम चार आयनन एन्थैल्पी का योग अति उच्च होता है; अतः +4 ऑक्सीकरण अवस्था में अधिकतर यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते हैं। इस समूह के गुरुतर तत्वों में Ge < Sn < Pb क्रम में +2 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

सहसंयोजक कोश में ns2 इलेक्ट्रॉन के बन्धन में भाग नहीं लेने के कारण यह होता है। इन दो ऑक्सीकरण अवस्थाओं का सापेक्षिक स्थायित्व वर्ग में परिवर्तित होता है। कार्बन तथा सिलिकन मुख्यत: +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। जर्मेनियम की +4 ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होती है, जबकि कुछ यौगिकों में +2 ऑक्सीकरण अवस्था भी मिलती है।

टिन ऐसी दोनों अवस्थाओं में यौगिकों बनाता है (+2 ऑक्सीकरण अवस्था में टिन अपचायक के रूप में कार्य करता है)। +2 ऑक्सीकरण अवस्था में लेड के यौगिक स्थायी होते हैं, जबकि इसकी +4 अवस्था प्रबल ऑक्सीकरण है। इस आधार पर स्पष्ट है कि –

  1. SnCl4 तथा PbCl4 की तुलना में SnCl2 तथा PbCl2 अधिक सरलता से बनते हैं।
  2. PbCl2, SnCl2, से अधिक स्थायी होता है चूँकि इसमें अक्रिय युग्म प्रभाव का परिमाण अधिक होता है।

चतुः संयोजी अवस्था में अणु के केन्द्रीय परमाणु पर आठ इलेक्ट्रॉन होते हैं। इलेक्ट्रॉन परिपूर्ण अणु होने के कारण सामान्यतया इलेक्ट्रॉनग्राही या इलेक्ट्रॉनदाता स्पीशीज की अपेक्षा इनसे नहीं की जाती है। यद्यपि कार्बन अपनी सहसंयोजकता +4 का अतिक्रमण नहीं कर सकता है, परन्तु समूह के अन्य तत्व ऐसा करते हैं।

यह उन तत्वों में d – कक्षकों की उपस्थिति के कारण होता है। यही कारण है कि ऐसे तत्वों के हैलाइड जल-अपघटन के उपरान्त दाता स्पीशीज (donor species) से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके संकुल बनाते हैं। उदाहरणार्थ-कुछ स्पीशीज; जैसे –
(SiF6)2-, (GeCl6)2- तथा Sn(OH)62- ऐती होती हैं, जिनके केन्द्रीय परमाणु sp3d2 संकरित होते हैं।

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प्रश्न 11.2
TlCl3 की तुलना में BCl3 के उच्च स्थायित्व को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
बोरॉन (B) परमाणु की स्थिति में, अक्रिय युग्म प्रभाव नगण्य होता है। इसका अर्थ है कि इसके तीनों संयोजी इलेक्ट्रॉन (2s2px1) क्लोरीन परमाणुओं के साथ बन्ध बनाने के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए BCl3 स्थायी होती है। यद्यपि थैलियम (Tl) की स्थिति में, संयोजी s-इलेक्ट्रॉन (6s2) अधिकतम अक्रिय युग्म प्रभाव अनुभव करते हैं। अतः केवल संयोजी p – इलेक्ट्रॉन (6p1) बन्ध के लिए उपलब्ध होते हैं। इन परिस्थितियो में TlCl अत्यधिक स्थायी होता है, जबकि TlCl3 अपेक्षाकृत बहुत कम स्थायी होता है। निष्कर्ष रूप में स्पष्ट है कि TlCl3 की तुलना में BCl, उच्च स्थायी होता है।

प्रश्न 11.3
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड लूईस अम्ल के समान व्यवहार क्यों प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड BF3 अणु में F परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनों से साझा करके केन्द्रीय बोरॉन परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की संख्या 6 (तीन युग्म) होती है। अतः यह एक इलेक्ट्रॉन-न्यून अणु है तथा यह स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए एक इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके लूईस अम्ल के समान व्यवहार प्रदर्शित करता है।

उदाहरणार्थ –
बोरॉन ट्राइफ्लुओराइड सरलतापूर्वक अमोनियाम से एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करके BE3.NH3 उपसहसंयोजक यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 11.4
BCl3 तथा CCl4 यौगिकों का उदहारण देते हए जल के प्रति इनके व्यवहार के औचित्य को समझाइए।
उत्तर:
BCl3 में (B परमाणु ap2 – संकरित हैं), B परमाणु का अष्टक अपूर्ण है तथा इसका असंकरित 2p – कक्षक जल अणु से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करके योगात्मक उत्पाद बना सकता है।
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इस प्रकार जल से अभिक्रिया करने पर एक Cl परमाणु -OH समूह से प्रतिस्थापित हो जाता है। इसी प्रकार अन्य दो Cl परमाणु भी -OH समूहों से प्रतिस्थापित हो जाते हैं।
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इससे प्रदर्शित होता है कि बोरॉन ट्राइक्लोराइड का जल-अपघटन हो जाता है, परन्तु यह CCl4 के साथ सम्भव नहीं है। कार्बन परमाणु का अष्टक पूर्ण होता है तथा H2O अणुओं के साथ योगात्मक उत्पाद बनने की कोई सम्भावना नहीं है। परिणामस्वरूप कार्बन टेट्राक्लोराइड जल-अपघटित नहीं होता। जल में मिलाने पर यह उसमें मिश्रित भी नहीं होता, अपितु एक पृथक तैलीय पर्त बनाता है।

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प्रश्न 11.5
क्या बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल है? समझाइए।
उत्तर:
बोरिक अम्ल प्रोटोनी अम्ल नहीं है। यह एक लूईस अम्ल है तथा H2O अणु के हाइड्रॉक्सिल आयन से इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करता है।
B(OH)3 + 2HOH → B(OH4)] + H3O+

प्रश्न 11.6
क्या होता है, जब बोरिक अम्ल को गर्म किया जाता है?
उत्तर:
370K से अधिक ताप गर्म किए जाने पर बोरिक अम्ल (ऑर्थोबोरिक अम्ल) मेटाबोरिक अम्ल (HBO2) बनाता है, जो और अधिक गर्म करने पर बोरिक ऑक्साइड (B2O3) में परिवर्तित हो जाता है।
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प्रश्न 11.7
BF3 तथा BH4 की आकृति की व्याख्या कीजिए। इन स्पीशीज में बोरॉन के संकरण को निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर:
बोरॉन ट्राइफ्लु ओराइड (Boron trifluoridie, BF3):
इसमें केन्द्रीय परमाणु बोरॉन है जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2, 2s2 2p1 है। तलस्थ अवस्था में इसमें केवल एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है जिसके आधार पर केवल एक सहसंयोजक बन्ध ही बन सकता है। अतः BF3 अणु बनने में यह अवश्य ही उत्तेजित अवस्था में होगा जिस स्थिति में एक s – इलेक्ट्रॉन p – कक्षक में उन्नत हो जाएगा –
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उत्तेजित बोरॉन में तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं जिससे यह तीन. सहसंयोजक बन्ध बना सकता है। तीन फ्लुओरीन BF3 में युग्मन के लिए तीन इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं।
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इसमें एक बन्ध s – इलेक्ट्रॉन के माध्यम से है तथा अन्य दो बन्ध दो p – इलेक्ट्रॉनों के माध्यम से है। अतः तीनों बन्ध समान नहीं होने चाहिए। ऽ तथा px व py कक्षकों की ऊर्जा का संचय होकर तीनों कक्षकों में बराबर राशि में वितरित हो जाता है। इस प्रकार तीन sp2 संकर कक्षकों का उद्भव होता है। इन कक्षकों के बीच 120° का कोण होता है जिससे इलेक्ट्रॉन युग्मों में पारस्परिक प्रतिकर्षण न्यूनतम रहता है।
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चित्र – sp2 – संकरण।

ये sp2 संकर कक्षक F परमाणुओं के कक्षकों के साथ अतिव्यापन करके बन्ध बनाते हैं। इस प्रकार BF3 में बन्ध कोण 120° होता है तथा अणु त्रिकोणीय व समतल होता है।
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चित्र-बोरॉन ट्राइफ्जुओराइड की आकृति।

बोरॉन टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन (BH4):
वर्ग -13 के तत्व MH3 प्रकार के हाइड्राइड बनाते हैं। ये हाइड्राइड दुर्बल लूईस अम्ल होते हैं तथा प्रबल लूईस क्षारकों (:B) के साथ MH3 : B प्रकार के योग-उत्पाद बनाते हैं (M = B, Al, Ga)। इन हाइड्राइडों का निर्माण इनके बाह्यतम कोश में उपस्थित रिक्त p – कक्षकों के कारण होता है। जो हाइड्राइड आयन (H) से तुरन्त इलेक्ट्रॉन युग्म लेकर टेट्रा हाइड्राइडो ऋणायन बनाते हैं। BH4 की संरचना संकरण के प्रकार के आधार पर निर्धारित की जा सकती है। संकरण का प्रकार निम्नलिखित सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है –
H = \(\frac{1}{2}\) [V + M – C + A]

जहाँ H = संकरण में सम्मिलित कक्षकों की संख्या
V = केन्द्रीय परमाणु के संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या
M = एकल संयोजी परमाणुओं की संख्या
C = धनायन पर आवेश
A = ऋणायन पर आवेश
इस प्रकार
H = \(\frac{1}{2}\) [3 + 4 – 0 + 1] = 4

चूँकि संकरण में भाग लेने वाले कक्षकों की संख्या 4 है; अत: यह sp3 संकरण है। sp3 संकरण में एक s – कक्षक तथा तीन p – कक्षकों के सम्मिश्रण से चार समतुल्य संकर कक्षक बनते हैं। इन चारों कक्षकों में अल्पतम प्रतिकर्षण होने के लिए वे एक। समचतुष्फलक के चारों कोनों की ओर दिष्ट होते हैं तथा परस्पर 109°28′ का कोण बनाते हैं। अतः BH4 की आकृति निम्नवत्
होगी –
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चित्र – [BH4] की आकृति।

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प्रश्न 11.8
एल्यूमीनियम के उभयधर्मी व्यवहार दर्शाने वाली अभिक्रियाएँ दीजिए।
उत्तर:
चूँकि एल्यूमीनियम अम्लों तथा ‘क्षारों दोनों से अभिक्रिया कर सकता है, अतः यह उभयधर्मी प्रवृत्ति का होता है; जैसे –
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प्रश्न 11.9
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक क्या होते हैं? क्या BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक हैं? समझाइये।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक-ऐसे यौगिक जिनके अणुओं में केन्द्रीय परमाणु या अधिक इलेक्ट्रॉन-युग्मों को ग्रहण, करने की प्रवृत्ति हो, इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक कहलाते हैं। इन्हें लूईस अम्ल भी कहते हैं।

BCl3 तथा SiCl4 दोनों इलेक्ट्रॉन-न्यून यौगिक हैं। B और Si परमाणुओं में क्रमशः रिक्त 2p – कक्षक तथा रिक्त 3d – कक्षक होते हैं। ये दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉन-दाता स्पीशीज से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं। अत: BCl3 तथा SiCl4 इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक है।

प्रश्न 11.10
CO32- तथा HCO3, की अनुनादी संरचनाएँ लिखिए।
उत्तर:
CO32- की अनुनादी संरचना
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HCO2-3 की अनुनादी संरचना
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प्रश्न 11.11
(क) CO32-, (ख) हीरा तथा (ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था क्या होती है?
उत्तर:
(क) CO32- में कार्बन की संकरण-अवस्था sp2 है।
(ख) हीरे में कार्बन की संकरण-अवस्था sp3 है।
(ग) ग्रेफाइट में कार्बन की संकरण-अवस्था sp2 है।

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प्रश्न 11.12
संरचना के आधार पर हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों में निहित भिन्नता को समझाइए।
उत्तर:
हीरा तथा ग्रेफाइट में अन्तर:
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प्रश्न 11.13
निम्नलिखित कथनों को युक्तिसंगत कीजिए तथा रासायनिक समीकरण दीजिए –
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके PbCl4 देता है।
(ख) लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी है।
(ग) लेड एक आयोडाइड Pbl4 नहीं बनाता है।
उत्तर:
(क) लेड (II) क्लोराइड Cl2 से क्रिया करके लेड (IV) क्लोराइड, PbCl4 देता है क्योंकि क्लोरीन एक प्रबलतम ऑक्सीकारक हैं।
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(ख) चूँकि लेड IV ऑक्सीकरण अवस्था की तुलना में II ऑक्सीकरण अवस्था में अधिक स्थायी होता है; अत: लेड (IV) क्लोराइड ऊष्मा के प्रति अत्यधिक अस्थायी होता है। Pb (IV) क्लोराइड अपघटित होकर Pb (II) क्लोराइड बनाता है और Cl2 गैस मुक्त होती है।
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(ग) चूँकि I आयन के प्रबल अपचायक हैं और यह विलयन में Pb4+ आयन Pb2+ आयन में अपचयित कर देता हैं, अतः लेड एक आयोडाइड PbI4 नहीं बनाता है।
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प्रश्न 11.14
BF3 में BF4 में बन्ध लम्बाई क्रमशः 130 pm तथा 143 pm होने के कारण बताइए।
उत्तर:
BF3 में तथा BF4 में बोरॉन की संकरण – अवस्था निम्नवत् है –
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अतः दिए गए दो फ्लुओराइडों के बन्ध लम्बाइयों में अन्तर बोरॉन की संक्रमण अवस्था में अन्तर के कारण होता है।

प्रश्न 11.15
B – Cl आबन्ध द्विध्रुव आघूर्ण रखता है, किन्तु BCl3 अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है, क्यों?
उत्तर:
B – Cl बन्ध में एक निश्चित द्विध्रुव आघूर्ण होता है। दूसरी ओर BCl3 का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है क्योंकि इसका अणु समतलीय होता है जिसमें आबन्ध ध्रुवताएँ परस्पर निरस्त हो जाती हैं।

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प्रश्न 11.16
निर्जलीय (HF) में एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड अविलेय हैं, परन्तु NaF मिलाने पर घुल जाता है। गैसीय BF3 को प्रवाहित करने पर परिणामी विलयन में से एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड अवक्षेपित हो जाता है। इसका कारण बताइए।
उत्तर:
चूँकि एल्यूमीनियम ट्राइफ्लुओराइड (AIF3) की प्रकृति सहसंयोजी होती है, अत: यह निर्जलीय (HF) अधुलनशील है। यह NaF से अभिक्रिया के पश्चात् एक संकुल यौगिक बनाता है जो जल में विलेय है।
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यह संकुल यौगिक को जलीय विलयन BF3 की वाष्प प्रवाहित करने पर तोड़ा जा सकता है। फलत: AIF3 पुन: अवक्षेपित हो जाता है।
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प्रश्न 11.17
CO के विषैली होने का एक कारण बताइए।
उत्तर:
CO की अत्यंत विषैली प्रकृति हीमोग्लोबिन के साथ एक संकुल बनाने के कारण होती है जो ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन संकुल से 300 गुना अधिक स्थाई होता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन को शरीर में ऑक्सीजन प्रवाह को रोकती है। इससे दम घुटने लगता है और अंततः मृत्यु हो जाती है।

प्रश्न 11.18
CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी कैसे है?
उत्तर:
CO2 में CH4 की तरह ऊष्मा अवशोषित करने की प्रवृत्ति होती है, जिसे हरित-ग्रह गैस करते हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण CO2 की अधिक मात्रा भूमण्डलीय ताप वृद्धि के लिए उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 11.19
डाइबोरेन तथा बोरिक अम्ल की संरचना समझाइए।
उत्तर:
(क) डाइबोरेन की संरचना:
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चित्र – (क) डाइबोरेन (B2H6 ) की संरचना।
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चित्र – (क) डाइबोरेन में बन्धन। डाइबोरेन में प्रत्येक बोरॉन परमाणु sp3 – संकरित होता है। इन चार sp3 – संकरित कक्षकों में से एक इलेक्ट्रॉन रहित होता है, जिसे बिन्दुकृत रेखाओं (Dotted Lines) द्वारा दर्शाया गया है। सिर वाले B – H समान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (2e – 2e) बन्ध हैं, जबकि दो सेतुबन्ध B – H – B त्रिकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (3e – 3e) है। इसे ‘केलाबन्ध’ (Banana Bond) भी कहते हैं।

डाइबोरेन की संरचना को चित्र (क) द्वारा दर्शाया गया है। इससे सिरे वाले चार हाइड्रोजन परमाणु तथा दो बोरॉन परमाणु एक ही तल में होते हैं। इस तल के ऊपर तथा नीचे दो सेतुबन्ध (bridging) हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। सिरे वाले चार B-H बन्ध सामान्य द्विकेन्द्रीय-द्विइलेक्ट्रॉन (two centre-two electron) बन्ध भिन्न प्रकार के होते हैं, जिन्हें ‘त्रिकेन्द्रीयद्विइलेक्ट्रॉन बन्ध’ कहते हैं चित्र (ख)।

(ख) बोरिक अम्ल की संरचना:
ठोस अवस्था में बोरिक अम्ल की पीय संरचना होती है, जहाँ समतलीय BO3 की इकाइयाँ हाइड्रोजन बन्ध द्वारा एक-दूसरे से 3.18pm की दूरी पर जुड़ी रहती हैं।
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चित्र – (ख) बोरिक अम्ल की संरचना में बिन्दुकृत रेखाएँ हाइड्रोजन आबन्ध को प्रदर्शित करती हैं।

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प्रश्न 11.20
क्या होता है, जब –
(क) बोरेक्स को अधिक गर्म किया जाता है।
(ख) बोरिक अम्ल को जल में मिलाया जाता है।
(ग) एल्यूमीनियम की तनु NaOH से अभिक्रिया कराई जाती है।
(घ) BF3 की क्रिया अमोनिया से की जाती है।
उत्तर:
(क) पहले यह जल के अणु का निष्कासन करके फूल जाता है। पुनः गर्म करने पर यह एक पारदर्शी द्रव में परिवर्तित हो जाता है, जो काँच के समान एक ठोस में परिवर्तित हो जाता है। इसे बोरेक्स मनका कहते हैं।
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(ख) यह जल में घुल जाता है। क्योंकि यह इलेक्ट्रॉन-न्यून प्रकृति का होता है।
B(OH)3 + H – OH → [B(OH)4] + H+

(ग) एल्यूमीनियम NaOH विलयन में घुलकर एक विलेय संकुल बनाता है तथा हाइड्रोजन गैस मुक्त करता है।
2Al (s) + 2NaOH (aq) + 6H2O (l) → 2Na+[Al(OH)4] (aq) + 3H2 (g)

(घ) BF3 (लूईस अम्ल) NH3 (लूईस-क्षार) के साथ योगत्मक यौगिक बनाता है।
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प्रश्न 11.21
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को समझाइए –
(क) कॉपर की उपस्थिति में उच्च ताप पर सिलिकन को मेथिल क्लोराइड के साथ गर्म किया जाता है।
(ख) सिलिकॉन डाऑक्साइड की क्रिया हाइड्रोजन फ्लु ओराइड के साथ की जाती है।
(ग) CO को ZnO के साथ गर्म किया जाता है।
(घ) जलीय ऐलुमिना की क्रिया जलीय NaOH के साथ की जाती है।
उत्तर:
(क) सिलिकन कॉपर (उत्प्रेरक) की उपस्थिति में मेथिल क्लोराइड के साथ 570K पर गर्म करने पर डाइमेथिल डाइक्लोरोसिन बनाता है। इसके जल अपघटन पर संघनन बहुलीकरण द्वारा श्रृंखला बहुलक प्राप्त होते हैं।
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(ख) सिलिकन टेट्राफ्लुओराइड (SiF4) बनाता है।
SiO2 + 4HF → SiF4 + 2H2O

(ग) CO (प्रबल अपचायन) द्वारा ZnO का अपचयन Zn में हो जाता है।
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(घ) क्रिया करके एक घुलनशील संकुल बनाते हैं।
Al2O3 (s) + 2NaOH(aq) + 3H22 (l) → 2Na [AI(OH)4] (aq)

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प्रश्न 11.22
कारण बताइए –
(क) सान्द्र HNO3 का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा किया जा सकता है।
(ख) तनु NaOH तथा ऐलुमिनियम के टुकड़ों के मिश्रण का प्रयोग अपवाहिका खोलने के लिए किया जाता है।
(ग) ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक के रूप में प्रयुक्त होता है।
(घ) हीरा का प्रयोग अपघर्षक के रूप में होता है।
(ङ) वायुयान बनाने में ऐलुमिनियम मिश्रधातु का उपयोग होता है।
(घ) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए।
(छ) संचरण केवल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।
उत्तर:
(क) सान्द्र HNO3 प्रारम्भ में ही ऐलुमिनियम से क्रिया करके ऐलुमिनियम ऑक्साइड (Al2O3) बना लेता है। जो पात्र के भीतर एक रक्षी-लेपन कर देता है। इस प्रकार धात्विक पात्र निष्क्रिय (passive) हो जाता है तथा फिर अम्ल से क्रिया नहीं करता। इसलिए अम्ल का परिवहन ऐलुमिनियम के पात्र द्वारा सुरक्षापूर्वक किया जा सकता है।

(ख) ऐलुमिनियम तनु NaOH में घुलकर H2 मुक्त करता है। यह हाइड्रोजन गैस अपवाहिका खोलने में सहायता करती
2Al + 2NaOH + 2H2O → 2NaAlO2 + 3H2

(ग) प्रेफाइट में sp2 – संकरित कार्बन होता है तथा इसकी पीय संरचना होती है। व्यापक पृथक्करण तथा दुर्बल अन्तरपीय बन्धों के कारण इसकी दो समीपवर्ती पर्ते एक-दूसरे पर सरलतापूर्वक फिसल जाती हैं। इस कारण इसे शुष्क स्नेहक की भाँति उन मशीनों में प्रयुक्त किया जा सकता है जिनमें किसी कारणवश तैलीय स्नेहक प्रयुक्त न किए जा सकते हों।

(घ) हीरा समस्त ज्ञात पदार्थों में कठोरतम पदार्थ होता है। अतः इसका प्रयोग अपघर्षक (abrasive) तथा काँच काटने में किया जाता है।

(ङ) ऐलुमिनियम मिश्रधातु – मैग्नोलियम तथा ड्यूरैलियम जिनमें लगभग 95% धातु होती है, को वायुयान बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि ये हल्के, परन्तु मजबूत होते हैं। इसके अतिरिक्त इन पर जंग भी नहीं लगता है।

(च) जल को ऐलुमिनियम पात्र में पूरी रात नहीं रखना चाहिए, क्योंकि लम्बे समय तक नमी तथा ऑक्सीजन से धातु संक्षारित हो सकती है।

(छ) ऐलुमिनियम सामान्यतया वायु तथा नमी से प्रभावित नहीं होती तथा इसकी विद्युत-चालकता कॉपर से दोगुनी होती है। इसलिए संचरण केबल बनाने में ऐलुमिनियम तार का प्रयोग होता है।

प्रश्न 11.23
कार्बन से सिलिकॉन तक आयनीकरण एन्थैल्पी में प्रघटनीय कमी होती है। क्यों?
उत्तर:
कार्बन से सिलिकन तक आयनीकरण में प्रघटनीय कमी होती है; क्योंकि कार्बन की परमाणु त्रिज्या (77pm) की तुलना में सिलिकन की परमाणु त्रिज्या अधिक (118 pm) होती है। इसलिए इलेक्ट्रॉनों का निष्कासन सरलतापूर्वक हो जाता है। सिलिकन से जर्मेनियम तक आयनन एन्थैल्पी में कमी प्रघटनीय नहीं होती; क्योंकि तत्वों के परमाणु आकार एकसमान रूप से बढ़ते हैं।

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प्रश्न 11.24
Al की तुलना में Ga की कम परमाणवीय त्रिज्या को आप कैसे समझाएँगे?
उत्तर:
समूह में नीचे जाने पर प्रत्येक क्रमागत सदस्य में इलेक्ट्रॉनों का एक कोश जुड़ता है। आंतरिक कोड के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास यह देखा जा सकता है कि Ga में उपस्थित 10d इलेक्ट्रॉन बढ़े हुए नाभिकीय आवेश की तुलना में बाह्य इलेक्ट्रॉनों पर दुर्बल परीक्षण प्रभाव डाले हैं। फलत: Ga की परमाणवीय त्रिज्या AI की तुलना में कम होती है।

प्रश्न 11.25
अपररूप क्या होता है? कार्बन के दो महत्त्वपूर्ण अपररूप हीरा तथा ग्रेफाइट की संरचना का चित्र बनाइए। इन दोनों अपररूपों के भौतिक गुणों पर संरचना का क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
अपररूप:
प्रकृति में शुद्ध कार्बन दो रूपों में पाया जाता है:
हीरा तथा ग्रेफाइट। यदि हीरे अथवा ग्रेफाइट को वायु में अत्यधिक गर्म किया जाए तो यह पूर्ण ग्रेफाइट की समान मात्रा दहन की जाती है, तब कार्बन डाइ-ऑक्साइड की बराबर मात्रा उत्पन्न होती है तथा कोई अवशेष नहीं बचता। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि हीरा तथा ग्रेफाइट रासायनिक रूप से एकसमान है तथा केवल परमाणु से बने हैं। इनके भौतिक गुण अत्यधिक भिन्न होते हैं। अतः प्रकार के गुणों को प्रदर्शित करने वाले तत्त्वों को अपररूप कहते हैं।

हीरा:
हीरा में क्रिस्टलीय जालक होता है। इसमें प्रत्येक परमाणु sp3 – संकरित होता है तथा चतुष्फलकीय ज्यामिति से अन्य चार कार्बन परमाणु से जुड़ा रहता है। इसमें कार्बन-कार्बन बन्ध लम्बाई 154 pm होती है। कार्बन परमाणु द्विक (space) में दृढ़ त्रिविमीय जालक (rigid three dimensional network) का निर्माण करते हैं।

इस संरचना में सम्पूर्ण जालक में दिशात्मक सहसंयोजक बन्ध उपस्थित रहते हैं। इस प्रकार विस्तृत सहसंयोजक बन्ध को तोड़ना कठिन कार्य होता है। अतः हीरा पृथ्वी पर पाया जाने वाला सर्वाधिक कठोर पदार्थ है। इसका उपयोग धार तेज करने के लिए अपघर्षक (abrasive) के रूप में, रूपदा (dies) बनाने में तथा विद्युत-प्रकाश लैम्प में टंगस्टन तन्तु (filament) बनाने में होता है।
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चित्र-हीरे की संरचना।

ग्रेफाइट ग्रेफाइट की परतीय संरचना (layered structure) होती है। ये पर्ते वान्डरवाल बल द्वारा जुड़ी रहती हैं। इस कारण ग्रेफाइट चिकना (slippery) तथा मुलायम (soft) होता है। दो पर्तों के मध्य की दूरी 340pm होती है। प्रत्येक पर्त में कार्बन परमाणु षट्कोणीय वलय (hexagonal rings) के रूप में व्यवस्थित होते हैं, जिसमें C – C बन्ध लम्बाई 141.5pm होती है। षट्कोणीय वलय में प्रत्येक परमाणु (sp2) संकरित होता है।

प्रत्येक कार्बन परमाणुओं से तीन सिग्मा बन्ध बनाता है। इसका चौथा इलेक्ट्रॉन π – बन्ध बनता है। सम्पूर्ण परत में इलेक्ट्रॉन विस्थानीकृत होते हैं। इलेक्ट्रॉन गतिशील होते हैं; अत: ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक होता है। उच्च ताप पर जिन मशीनों में तेल का प्रयोग स्नेहक (lubricant) के रूप में नहीं हो सकता है, उनमें ग्रेफाइट शुष्क स्नेहक का कार्य करता है।
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प्रश्न 11.26
(क) निम्नलिखित ऑक्साइड को उदासीन, अम्लीय, क्षारीय तथा उभयधर्मी ऑक्साइड के रूप में वर्गीकृत कीजिए –
CO, B2O3, SiO2, CO2, Al2O3, PbO2, Tl2O3
(ख) इनकी प्रकृति को दर्शाने वाली रासायनिक अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर:
(क) उदासीन ऑक्साइड : Co
अम्लीय ऑक्साइड : SiO2, CO2, B2O3
क्षारीय ऑक्साइड : Tl2O3 + PbO2
उभयधर्मी ऑक्साइड : Al2O3

(ख) CO – उदासीन
B2O3 – अम्लीय
B2O3 + Cu0 → Cu(BO2)2

SiO2 – अम्लीय
SiO2 + CaO → CaSiO3

CO2 – अम्लीय
NaOH + CO2 → NaHCO3
2NaOH + CO2 → Na2CO3 + H2O

Al2O3 – उभयधर्मी
Al2O3 + 6HCl → 2AlCl3 + 3H2O
Al2O3 + 2NaOH → 2NaAlO2 + H2O

PbO2 – क्षारीय
PbO2 + HCl → PbCl4 + 2H20

Tl2O3 – क्षारीय
Tl2O3 + 8H2SO4 → Tl2(SO4)3 + 3H2O

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प्रश्न 11.27
कुछ अभिक्रियाओं में थैलियम, ऐलुमिनियम से समानता दर्शाता है, जबकि अन्य में यह समूह I के धातुओं से समानता दर्शाता है। इस तथ्य को कुछ प्रमाणों के द्वारा सिद्ध करें।
उत्तर:
थैलियम की ऐलुमिनियम से समानता (Similarities of Thallium with Aluminium):
ऐलुमिनियम अपने यौगिकों में +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। थैलियम, वर्ग-13 का अन्तिम तत्व, अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण + 3 तथा +1 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है। अतः ये धातुएँ +3 ऑक्सीकरण अवस्था में समानता रखती हैं। यद्यपि ये +1 ऑक्सीकरण अवस्था में भिन्नता दर्शाती हैं। इनमें समानता के कुछ बिन्दु निम्नलिखित हैं –

  1. दोनों का बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns2np1 होता है।
  2. दोनों वायु में ऑक्साइड बनने के कारण धूमिल पड़ जाती है।
  3. Al तथा Tl दोनों के फ्लुओराइड आयनिक होते हैं तथा इनका गलनांक उच्च होता है।

थैलियम की समूह – I के धातुओं से समानता (Similarities of Thallium with group – I metals):
थैलियम + 1 ऑक्सीकरण अवस्था में समूह – I की धातुओं से समानता दर्शाता है। इनमें समानता के कुछ बिन्दु निम्नलिखित –

  1. NaOH के समान, Tl(OH) जल में विलेय होकर प्रबल क्षारीय विलयन देता है।
  2. क्षार धातुओं के समान, थैलियम (TI) ऐलुमिनियम लवणों के साथ द्विक-लवण बनाता है।
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प्रश्न 11.28
जब धातु x की क्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ की जाती है तो श्वेत अवक्षेप (A) प्राप्त होता है, जो NaOH के आधिक्य में विलेय होकर विलेय संकुल (B) बनाता है। यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर यौगिक (C) बनाता है। यौगिक (A) को अधिक गर्म किए जाने पर यौगिक (D) बनता है, जो एक निष्कर्षित धातु के रूप में प्रयुक्त होता है। X, A, B, C तथा D को पहचानिए तथा इनकी पहचान के समर्थन में उपयुक्त समीकरण दीजिए।
उत्तर:
1. एल्यूमीनियम (X) को NaOH के साथ गर्म करने पर यह Al(OH)3 का सफेद अवक्षेप बनाता है अर्थात् यौगिक (A) बनाता है, जो NaOH के आधिक्य में घुलकर विलेय संकर (B) बनाता है।
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2. यौगिक (A) तनु HCl में घुलकर एल्यूमीनियम क्लोराइड (C) बनाता है।
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3. यौगिक (A) अर्थात् Al(OH), को गर्म करने पर ऐलुमिना (D) में बदल जाता है।
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प्रश्न 11.29
निम्नलिखित से आप क्या समझते हैं?
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव
(ख) अपररूप
(ग) श्रृंखलन।
उत्तर:
(क) अक्रिय युग्म प्रभाव (Inert pair effect):
कोश इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (n-1)d10 ns2 np1 वाले तत्व में, d – कक्षक के इलेक्ट्रॉन दुर्बल परिरक्षण प्रभाव प्रस्तावित करते हैं। इसलिए ns2 इलेक्ट्रॉन नाभिक के धनावेश द्वारा अधिक दृढता से बँधे रहते हैं। इस प्रबल आकर्षण के परिणामस्वरूप, ns2 इलेक्ट्रॉन युग्मित रहते हैं तथा बन्ध में भाग नहीं लेते हैं अर्थात् अक्रिय रहते हैं। यह प्रभाव अक्रिय युग्म प्रभाव कहलाता है। इस स्थिति में, ns2np1 विन्यास में, तीन इलेक्ट्रॉनों में से केवल एक इलेक्ट्रॉन बन्ध-निर्माण में भाग लेता है।

(ख) अपररूप (Allotropes):
किसी तत्व का समान रासायनिक अवस्था में दो या अधिक भिन्न-रूपों में पाया जाना अपररूपता कहलता है। तत्व के ये विभिन्न रूप अपररूप कहलाते हैं। किसी तत्व के सभी अपररूपों के समान रासायनिक गुण होते हैं, परन्तु इनके भौतिक गुणों में अन्तर होता है।

(ग) श्रृंखलन (Catenation):
कार्बन में अन्य परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बन्ध द्वारा जुड़कर लम्बी श्रृंखला या वलय बनाने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को श्रृंखलन कहते हैं। C – C बन्ध अधिक प्रबल होने के कारण ऐसा होता है।

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प्रश्न 11.30
एक लवण x निम्नलिखित परिणाम देता है –
(क) इसका जलीय विलयन लिटमस के प्रति क्षारीय होता है।
(ख) तीव्र गर्म किए जाने पर यह काँच के समान ठोस में स्वेदित हो जाता है।
(ग) जब x के गर्म विलयन में सान्द्र H2SO4 मिलाया जाता है तो एक अम्ल Z का श्वेत क्रिस्टल बनता है।
उपरोक्त अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए और X, Y तथा Z को पहचानिए।
उत्तर:
उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है कि लवण X बोरेक्स (Na2B4O7) है।
(क) बोरेक्स का जलीय विलयन क्षारीय प्रकृति का होता है, जो लाल लिटमस को नीला कर देता है।
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(ख) बोरेक्त तीव्र गर्म किए जाने पर यह स्वेदित हो जाता है, जो क्रिस्टलन जल के अणु खोकर ठोस (Y) बनाता है।
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(ग) बोरेक्स सान्द्र H2SO4 के साथ अभिक्रिया करने पर बोरिक अम्ल (H3BO3) बना है। जब इसे क्रिस्टलीकृत किया जाता है तो यह श्वेत क्रिस्टलों (Z) के रूप में प्राप्त है।
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प्रश्न 11.31
सन्तुलित समीकरण दीजिए –
(क) BF3 + LIH →
(ख) B2H6 + H2O →
(ग) NaH + B2H6
(घ)
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(ङ) Al + NaOH →
(च) B2H6 + NH3
उत्तर:
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प्रश्न 11.32
CO तथा CO2 प्रत्येक के संश्लेषण के लिए एक प्रयोगशाला तथा एक औद्योगिक विधि दीजिए।
उत्तर:
1. कार्बन मोनो-ऑक्साइड (CO)
प्रयोगशाला विधि:
सान्द्र H2SO4 का 273K पर फार्मिक अम्ल के द्वारा निर्जलीकरण कराने पर अल्प मात्रा में शुद्ध CO प्राप्त होती हैं।
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औद्योगिक विधि:
औद्योगिक रूप से कोक पर भाप प्रवाहित करके बनाया जाता है। इस प्रकार CO तथा N2 का मिश्रण प्राप्त होता है। इसे प्रोड्यूसर गैस कहते हैं।
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2. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)
प्रयोगशाला विधि:
प्रयोगशाला में इसे कैल्शियम कार्बोनेट पर तनु HCl की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है।
CaCO3 (g) + 2HCl (aq) → CaCl2 (aq) + CO2 (g) + H2O (l)

औद्योगिक विधि:
इसे चूना पत्थर को गर्म करके बनाया जाता है।
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प्रश्न 11.33
बोरेक्स के जलीय विलयन की प्रकृति कौन-सी होती है –
(क) उदासीन
(ख) उभयधर्मी
(ग) क्षारीय
(घ) अम्लीय
उत्तर:
(ग) क्षारीय।

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प्रश्न 11.34
बोरिक अम्ल के बहुलकीय होने का कारण –
(क) इसकी अम्लीय प्रकृति है।
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।
(ग) इसकी एकक्षारीय प्रकृति है।
(घ) इसकी ज्यामिति है।
उत्तर:
(ख) इसमें हाइड्रोजन बन्धों की उपस्थिति है।

प्रश्न 11.35
डाइबोरेन में बोरॉन का संक्रमण कौन-सा होता है –
(क) sp
(ख) sp2
(ग) sp3
(घ) dsp2
उत्तर:
(ग) sp3

प्रश्न 11.36
ऊष्मागतिकीय रूप से कार्बन का सर्वाधिक स्थायी रूप कौन-सा है –
(क) हीरा
(ख) ग्रेफाइट
(ग) फुलरीन्स
(घ) कोयला
उत्तर:
(ख) ग्रेफाइट।

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प्रश्न 11.37
निम्नलिखित में से समूह – 14 के तत्वों के लिए कौन-सा कथन सत्य है –
(क) +4 ऑक्सीकरण प्रदर्शित करते हैं।
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं
(ग) M2- तथा M4- आयन बनाते हैं
(घ) M2+ तथा M4+ आयन बनाते हैं
उत्तर:
(ख) +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 11.38
यदि सलिकॉन निर्माण में प्रारम्भिक पदार्थ RSiCl3 है तो बनने वाले उत्पाद की संरचना बताइए।
उत्तर:
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