Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 9 खेलक्षेत्रम् Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit खेलक्षेत्रम् Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिकः

प्रश्न 1.
कोष्ठगत शब्दों को सही रूपों में बदलकर रिक्त स्थानों की पूर्ति करें –
जैसे-अहं विद्यालयं गच्छामि। (विद्यालय)

  1. सः …………… खादति। (ओदन)
  2. इदानी ……….. वर्तते। (संध्याकालः)
  3. युवाम् कुत्र ………………. (गम् = गच्छ)
  4. तदा नवीना क्रीडा ……………..। (भू – भव)
  5. त्वं संध्याकाले प्रतिदिनं …………..। (प)

उत्तर-

  1. सः ओदनं खादति।
  2. इदानीं संध्याकालः वर्तते।
  3. युवाम् कुत्र गच्छथः।
  4. तदा नवीना क्रीडा भवति ।
  5. त्वं संध्याकाले प्रतिदिनं पठसि ।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से एक-एक वाक्य बनायें –

(इदानीम्, खेलक्षेत्रम्, बालकाः, कन्दुकम्, विशालः)
उत्तर-

  1. इदानीम् – इदानीं सन्ध्याकालः वर्तते।
  2. खेलक्षेत्रम् – खेल क्षेत्रम् सुन्दरम् अस्ति।
  3. बालकाः – बालकाः तत्र खेलन्ति।
  4. कन्दुकम् – कन्दुकं त्वं आनय।
  5. विशालः – विशाल: वृक्षः अस्ति।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

प्रश्न 3.
निम्नांकित रिक्तियों को भरकर वाक्य-निर्माण करें –
जैसे –
बालकः – पुस्तक – पठति

  1. अश्वः – धासम् – ________
  2. अजा – फलम् – ________
  3. गजः – भारम् – ________
  4. ________ – फलम् – ________
  5. ________ – शनैः शनैः – ________

उत्तर-

  1. अश्वः – घासम् – चरति ।
  2. अजा – फलम् – खादति ।
  3. गजः – भारम् – वहति ।
  4. बालकः – फलम् – क्रीणति ।
  5. विडालः – शनैः शनैः – धावति ।

लिखित

प्रश्न 4.
उदाहरण के अनुसार रिक्त स्थान भरें –
Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम् 1
उत्तर-
Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम् 2

प्रश्न 5.
निम्नलिखित शब्दों को सुमेलित करें

  1. खेलक्षेत्रम् – (क) मिलति
  2. शीला – (ख) कोलाहल:
  3. महान् – (ग) विस्तृतम्
  4. नवीना – (घ) संध्याकाल:
  5. इदानीम् – (ङ) क्रीडा

उत्तर-

  1. खेल क्षेत्रम् । – (ग) विस्तृतम्
  2. शीला – (क) मिलति
  3. महान् – (ख) कोलाहलः
  4. नवीना – (ङ) क्रीडा
  5. इदानीम् – (घ) संध्याकालः

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

प्रश्न 6.
निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद करें –

  1. इस समय सबेरा (प्रात:काल) है।
  2. चलो , घर चलें।
  3. यहाँ कई (अनेक) लड़के और लड़कियाँ खेलते हैं।
  4. यह मैदान विशाल (बड़ा) है।
  5. यहाँ अनेक खेल होते हैं।

उत्तर-

  1. इदानीं प्रात:कालः अस्ति।
  2. चल, गृहं गच्छाव (चलाव)।
  3. अत्र अनेकाः बालकाः बालिकाश्च खेलन्ति ।
  4. इदं क्षेत्रम् विशालं अस्ति ।
  5. अत्र नाना क्रीड़ाः भवन्ति ।

प्रश्न 7.
निम्नलिखित शब्दों का शद्ध रूप लिखें –

  1. खेलक्षेत्र:
  2. व्यामस्य :
  3. भर्मणाय
  4. कनदुकम्
  5. क्रिडा।

उत्तर-

  1. खेलक्षेत्रम्
  2. व्यायामस्य
  3. भ्रमणाय
  4. कन्दुकम्
  5. क्रीडा।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

प्रश्न 8.
उत्तराणि लिखत

  1. खेलक्षेत्रं किमर्थं भवति ?
  2. आवां कुत्र गच्छावः ?
  3. सर्वे कुत्र प्रविशन्ति ?
  4. कदा महान् कोलाहलो भवति ?
  5. वयं संध्याकाले कुत्र गच्छामः ?

उत्तर-

  1. खेलक्षेत्रं मनोरंजनार्थ व्यायामार्थं च भवति ।
  2. आवां क्रीडाक्षेत्रं गच्छावः ।
  3. सर्वे खेल क्षेत्रे प्रविशन्ति ।
  4. यदा कन्दुकं लक्ष्यं प्रविशति तदा महान् कोलाहलो भवति ।
  5. वयं संध्याकाले खेलक्षेत्रं गच्छामः ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit खेलक्षेत्रम् Summary

पाठ – रमेश – मित्र रहीम! इदानीं सन्ध्याकालः वर्तते। चल, खेलक्षेत्रे गच्छावः।

(अर्थ) रहीम – मित्र रहीम! इस समय सायंकाल है। चलो, हमदोनों खेल के मैदान में जाते हैं।

पाठ – रमेश – खेलक्षेत्रम् अस्माकं मनोरञ्जनस्य व्यायामस्य च स्थलं भवति। अवश्यं गमिष्यामि। (मार्गे शीला मिलति)

(अर्थ) रहीम – खेल का मैदान हमारा मनोरंजन और व्यायाम का जगह होता है। जरूर मैं जाऊँगा। (मार्ग .. में शीला मिलती है)

पाठ – शीला – युवां कुत्र गच्छथ?

पाठ – रमेश – तुम दोनों कहाँ जा रहे हो?

पाठ – रमेश – आवां खेलक्षेत्रं गच्छावः। किं तवापि इच्छा, खेलक्षेत्रस्य भ्रमणाय अस्ति? यदि वर्तते तदा त्वमपि चल। (सर्वे खेलक्षेत्रं प्रविशन्ति)

पाठ – रमेश – हम दोनों खेल के मैदान जा रहे हैं। क्या तुम्हारी भी इच्छा खेल के मैदान घूमने के लिए हो रहा है? यदि है तो तुम भी चलो।

पाठ – रमेश – अत्र अनेके बालकाः बालिकाश्च सन्ति। केचित् कन्दुकेन खेलन्ति। अपरे कन्दुकक्रीडां पश्यन्ति।

पाठ – रमेश – यहाँ अनेक लड़के और लड़कियाँ हैं। कुछ गेन्द से खेलते हैं। बच्चे गेन्द के खेल को देखते हैं।

शीला – आम् आम्! कन्दुकं लक्ष्यं प्रविशति तदा महान् कोलाहलो भवति। पुनः केन्द्रस्थाने कन्दुकं नयन्ति बालकाः। तदा नवीना क्रीडा भवति।

(अर्थ) रहीम – हा! गेन्द गोल में प्रवेश करता है उस समय : जोरों का हल्ला होता है। फिर बीच में गेन्द को । लड़के लाते हैं। तब नये ढंग से खेल होता है।

पाठ – सीमा – शीले ! त्वमत्र कन्दुक क्रीडां पश्यसि। चल, तत्र बालिका: बैडमिन्टन खेलं खेलन्ति। अन्याः तं खेलं पश्यन्ति।

(अर्थ) सीमा – हे शीला! तुम यहाँ गेन्द का खेल देखते हो। चलो, वहाँ लड़कियाँ बैडमिन्टन का खेल-खेल रहे हैं। अन्य लड़कियाँ उस खेल को देख रहे हैं।

पाठ – शीला – चल, आवां खेलदर्शनाय तत्र गच्छाव। इदं खेलक्षेत्रं विशालम्। अनेकाः क्रीडा अत्र भवन्ति। खेलक्षेत्रस्य दर्शनेन महान् उत्साहः आनन्दश्च ‘ भवति। अत: वयं खेलक्षेत्रं सन्ध्याकाले प्रतिदिनं गच्छामः। (खेलक्षेत्रस्य दर्शनात् परं सर्वे स्वंस्वं गृहं गच्छन्ति।)

(अर्थ) शीला – चलो, हमदोनों खेल देखने के लिए वहाँ चलें। यह खेल का मैदान विशाल है। अनेक खेल। यहाँ होते हैं। खेल के मैदान के देखने से बहुतउत्साह और आनन्द होता है। इसलिए हमसब खेल के मैदान संध्या समय प्रतिदिन जाते हैं। (खेल के मैदान देखने के बाद सभी अपने-अपने घर जाते हैं।)

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

शब्दार्थाः – इदानीम् – इस समय, अभी। सन्ध्याकालः – शाम का समय। वर्तते – है। खेलक्षेत्रे – खेल के मैदान में। गच्छाव – (हम दोनों) चलें। अस्माकं- हम लोगों का मनोरंजनस्य – मनोरंजन का। स्थलम् – जगह। भवति – होता है /होती है। मार्गे – रास्ते में । युवाम् – तुम दोनों। तवापि(तव अपि) – तुम्हारा भी/तुम्हारी भी। भ्रमणाय – घूमने के लिए। केचित् – कोई। पश्यन्ति – देखते हैं। कोलाहलः – शोरगुल/हल्ला। केन्द्रस्थाने- बीच में, मध्य में। नवीना – नया। नयन्ति – लाते हैं.ले जाते हैं। त्वमत्र (त्वम् + अत्र) – तुम यहाँ। अन्याः – दूसरे लोग। दर्शनाय – देखने के लिए। दर्शनेन – देखने से/देखकर। अब: – इसलिए। दर्शनात् – देखने के बाद। स्व-स्वं – अपने-अपन। गच्छन्ति – ‘जाते हैं।

व्याकरणम्

1. अनुस्वार और म् का प्रयोग –

संस्कृत भाषा में शब्दरूप और धातुरूपों में ‘म’ का ही प्रयोग होता है। जैसेअहम्, आवाम्, वयम् त्वम्,युवाम्, यूयम आदि। लेकिन संधि में तथा वाक्य में म् का अनुस्वार हो जाता है।

जैसे – सम्य म् – संयम, परम् + सुखम् -परंसुखम, अस्माकं गृहम् – अस्माक गृहमा स्वर वर्ण के पूर्व आने वाला म् नहीं बदलता है। बल्कि म् में स्वर जुट जाता है।

जैसे – अहम् आनयामि अहमानयामि। त्वम् +एव -त्वमेव। व्यंजन वर्ष के पूर्व आने वाला म् का अनुस्वार हो जाता है।

जैसे – अहम् हसामिअहं सामि। त्वम् + पठसि – त्वं पठसि। कोड-दोनों प्रकार से वाक्य में लिखा जा सकता है। म् या अनुस्वार का प्रयोग करना हमारी इच्छा पर हैं।

जैसे – अहम् हसामि या अहं हसामि। त्वम् पठसि या त्वं पठसि। वाक्य के अन्त में आने वाला म् नहीं बदलता है।

जैसे – सः गच्छति गृहम्। लेकिन वाक्य के बीच में म् अनुस्वार में बदल सकते हैं। जैसे – मा गृहम् गच्छति – सः गृहं गच्छति। हम दोनों प्रकार से लिख सकते

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 9 खेलक्षेत्रम्

2. स्थाववाचक अव्यय –

संस्कृत में प्रल् (त्र) प्रत्यय लगाकर स्थानवाचक अव्यय बनते हैं। जैसेइदम् + प्रल अत्र (यहाँ, इस स्थान पर) किम् + त्रल् – कुत्र (कहाँ, किस स्थान पर) तद् + त्रल् – तत्र (वहाँ, उस स्थान पर) सर्व + त्रल – सर्वत्र (सभी स्थानों पर) पर + ल् – परत्र (दूसरे स्थान पर)

विशेषण – विशेष्य-सम्बन्ध –

(विशेष्य यादृशं वाक्ये तादृशं स्याद् विशेषणम्) किसी वाक्य में जिस लिंग और वचन का विशेष्य होता है उसी लिंग और वचन का प्रयोग विशेषण में भी होता है। इतना ही नहीं, विशेषण में विभक्ति भी विशेष्य के अनुसार ही होती है। ”

निम्नलिखित उदाहरणों को देखेंसुन्दरम् पुष्पम् (सुन्दर फूल) पक्यानि फलानि (पके हुए फल)। निपुणाः छात्राः (तेज लड़के, तेज लड़कियाँ)। अल्पानि चित्राणि (कम चित्र) । मूर्खस्य सेवकस्य (मूर्ख सेवक का)। शोभने सरोवरे (सुन्दर तालाब में)।

  • निकटात् ग्रामात् (समीप के गाँव से)।
  • निर्धनाय छात्राय (गरीब छात्र के लिए)।
  • पीतेन वस्त्रेण (पीले कपड़े से)
  • उष्णं जलम् (गर्म पानी)।
  • शुष्कः काष्ठः (सूखी लकड़ी)।
  • गम्भीरः शिक्षकः (गम्भीर शिक्षक)।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

Bihar Board Class 11 Philosophy अवलोकन एवं प्रयोग Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
आगमन का वास्तविक आधार है –
(क) प्रयोग
(ख) निरीक्षण
(ग) दोनों
(घ) कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 2.
निरीक्षण तथा प्रयोग को आगमन के वास्तविक आधार के रूप में किसने स्वीकार किया है?
(क) मिल ने
(ख) बेन ने
(ग) कार्बेथ रीड ने
(घ) जेवन्स ने
उत्तर:
(ख) बेन ने

प्रश्न 3.
निरीक्षण है –
(क) किसी प्रकार देखना
(ख) प्राकृतिक घटनाओं का उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण
(ग) तथ्यों का पर्यवेक्षण
(घ) उपर्युक्त में कोई नहीं
उत्तर:
(ख) प्राकृतिक घटनाओं का उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 4.
प्रयोग है –
(क) प्राकृतिक घटनाओं का निरीक्षण
(ख) मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण
(ग) (क) तथा (ख) दोनों
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(ख) मनुष्य द्वारा निर्मित कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण

प्रश्न 5.
प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष होते हैं –
(क) संभाव्य
(ख) अनिश्चित
(ग) निश्चित
(घ) संदिग्ध
उत्तर:
(ग) निश्चित

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 6.
“निरीक्षण में हम तथ्य को पाते हैं तथा प्रयोग में उसको बनाते हैं।” यह कथन है –
(क) बेन का
(ख) बेकन का
(ग) मिल का
(घ) फाउलर का
उत्तर:
(क) बेन का

प्रश्न 7.
निरीक्षण की शर्त नहीं है –
(क) मानसिक
(ख) शारीरिक
(ग) नैतिक
(घ) आध्यात्मिक
उत्तर:
(घ) आध्यात्मिक

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 8.
निरीक्षण की भूलें (Fallacies) होती है –
(क) अनिरीक्षण की
(ख) मिथ्या निरीक्षण की
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 9.
प्रयोग निरीक्षण से –
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण है
(ख) कम महत्त्वपूर्ण है
(ग) दोनों बराबर महत्त्वपूर्ण है
(घ) अनुपयोगी
उत्तर:
(क) अधिक महत्त्वपूर्ण है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 10.
निरीक्षण है आगमन का –
(क) आकारिका आधार (Formal ground)
(ख) वास्तविक आधार (Material ground)
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) वास्तविक आधार (Material ground)

प्रश्न 11.
किसने कहा था कि आगमन में कल्पना का स्थान प्रमुख नहीं बल्कि गौण है?
(क) जे. एस. मिल
(ख) हेवेल
(ग) पियर्सन
(घ) डेकार्ड
उत्तर:
(क) जे. एस. मिल

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 12.
निरीक्षण में पाया जाता है –
(क) कारण से कार्य की ओर
(ख) कार्य से कारण की ओर
(ग) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों

प्रश्न 13.
इन्द्रियाँ निरीक्षण का एक –
(क) साधन है
(ख) असाधन है
(ग) शारीरिक शर्त है
(घ) (क) एवं (ग) दोनों
उत्तर:
(ग) शारीरिक शर्त है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 14.
निरीक्षण के दोष (Fallacy of observation) है –
(क) गलत निरीक्षण (Mal observation) की भूल
(ख) नहीं निरीक्षण (Non-observation) की भूल
(ग) (क) एवं (ख) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) (क) एवं (ख) दोनों का

प्रश्न 15.
सही कथन को चुनें –
(क) गलत निरीक्षण की भूल भावनात्मक दोष है
(ख) नहीं-निरीक्षण की भूल निषेधात्मक है
(ग) गलत निरीक्षण इन्द्रीय दोष का कारण है, जबकि नहीं निरीक्षण पक्षपातपूर्ण होने का कारण है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

Bihar Board Class 11 Philosophy अवलोकन एवं प्रयोग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निरीक्षण के दोष (Fallacy of observation) कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण के दोष दो प्रकार के होते हैं। वे हैं-गलत निरीक्षण की भूल एवं नहीं निरीक्षण की भूल।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 2.
निरीक्षण की मानसिक शर्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण के लिए मानसिक या बौद्धिक लक्ष्य का होना नितांत आवश्यक है। किसी वस्तु या घटना को जानने की इच्छा से ही वह उसका निरीक्षण करना चाहता है। जानने की इच्छा से मानसिक शर्त का निर्माण होता है।

प्रश्न 3.
प्रयोग (Experiment) क्या है? अथवा, प्रयोग की परिभाषा दें।
उत्तर:
मानव-निर्मित परिस्थितियों में कृत्रिम घटनाओं का निरीक्षण है। फाउलर के अनुसार प्रयोग में हम घटना पर निर्भर नहीं करते हैं। बल्कि घटना हम पर निर्भर करती है तथा हम उसका निर्माण करते हैं। जिस प्रकार की हम घटना चाहें, उपस्थित कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
नहीं-निरीक्षण (Non-Observation) की भूल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नहीं-निरीक्षण की भूल में जिस वस्तु को देखना चाहिए उसे नहीं देखते हैं। जिसे देखना चाहिए उसे नहीं देखना ही नहीं-निरीक्षण की भूल है। यह दोषकर्ता की असावधानी या पक्षपातपूर्ण होने से होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 5.
गलत निरीक्षण की भूल एवं नहीं-निरीक्षण की भूल में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
गलत-निरीक्षण की भूल में भावात्मक दोष है जबकि नहीं निरीक्षण की भूल में निषेधात्मक दोष है। गलत-निरीक्षण इंद्रिय-दोष के कारण होता है जबकि नहीं-निरीक्षण पक्षपात पूर्ण होने के कारण होता है।

प्रश्न 6.
निरीक्षण की शारीरिक शर्त से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण की शारीरिक शर्त का अभिप्राय है कि इंद्रियाँ निरीक्षण के साधन हैं। अतः निरीक्षण के लिए स्वस्थ शरीर का होना अनिवार्य है क्योंकि शरीर के अस्वस्थ रहने पर निरीक्षण दोषपूर्ण हो जाएगा।

प्रश्न 7.
गलत निरीक्षण (Mal-Observation) की भूल क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण में जो वस्तु दी गयी होती है उसे उसके यथार्थ तथा वास्तविक रूप में न देखकर किसी अन्य रूप में देखना ही गलत निरीक्षण की भूल कहलाती है। जैसे-मृगतृष्णा गलत निरीक्षण की भूल है।

प्रश्न 8.
निरीक्षण की परिभाषा दें। अथवा, निरीक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच प्राकृतिक घटनाओं के उद्देश्यपूर्ण प्रत्यक्षीकरण को ही निरीक्षण कहते हैं। प्रो. बी. एन. राय के अनुसार निरीक्षण नियमित प्रत्यक्षीकरण है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 9.
निरीक्षण एवं प्रयोग में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर:
निरीक्षण प्राकृतिक है जबकि प्रयोग कृत्रिम है। निरीक्षण को निष्क्रिय कहा गया है जबकि प्रयोग को सक्रिय कहा गया है। निरीक्षण में परिस्थितियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता है जबकि यहाँ परिस्थितियों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण होता है।

प्रश्न 10.
प्रयोग आगमन का कौन-सा आधार है?
उत्तर:
निरीक्षण की तरह ही प्रयोग आगमन का वास्तविक आधार (Material ground of Induction) है।

प्रश्न 11.
आगमन के वास्तविक आधार किसे कहते हैं?
उत्तर:
निरीक्षण एवं प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी भी तरह के प्रयोग में प्रयोगकर्ता यंत्रों का प्रयोग करता ही है। इसमें इच्छानुसार हेर-फेर करता है। मनचाहे परिवर्तन भी करता है। इन सभी परिवर्तनों के बाद वह घटना का निरीक्षण करता है। परन्तु, निरीक्षण में प्रयोगकर्ता यंत्र का प्रयोग तो करता ही है, किन्तु उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं करता है। परिवर्तन तो मात्र प्रयोग ही में संभव है। चूंकि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है। प्रयोगकर्ता उस घटना को स्वयं बनाकर उसकी जाँच करता है। अतः, निष्कर्ष है कि प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग प्रयोगकर्ता करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 2.
स्थायी कारण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कारण मुख्यतः दो प्रकार के हैं –

(क) स्थायी कारण और
(ख) अस्थायी कारण

इसमें स्थायी कारण वे हैं जो सृष्टि के समय से ही चले आ रहे हैं। जैसे-सूरज, चाँद, सितारे, पृथ्वी संबंधी। इस तरह बहुत-सी विभिन्न परिस्थितियों में उन स्थायी कारणों से कई तरह के कार्य उत्पन्न होते चले आ रहे हैं। इसका अंत कहाँ और कब होगा, यह मानव के ज्ञानसीमा के बाहर है। मिल साहब ने स्थायी कारण के सत्ता को स्वीकार किया है। उनका कहना है कि यह कोई आवश्यक नहीं है कि स्थायी कारण कोई वस्तु या ठोस पदार्थ ही हो। वह इससे भिन्न भी रह सकता है। पृथ्वी अपनी धूरी पर घुमती है। उसका धूरी पर घुमना एक स्थायी कारण है। इसी तरह सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के स्थायी कारण हैं जो घुमते-घुमते अमावस्या या पूर्णिमा को ही लगेगा।

प्रश्न 3.
अस्थायी कार्य क्या है?
उत्तर:
अस्थायी कार्य कुछ ही क्षणों के लिए रहता है। यह भी कारण से ही उत्पन्न होता है। कुछ क्षणों के बाद इस प्रकार से कार्य समाप्त हो जाते हैं। जैसे-बादलों के संघर्ष से बिजली उत्पन्न होती है या बिजली चमकती है। जो अस्थायी कार्य है। विज्ञान में अस्थायी कार्य को उचित मान्यता नहीं दी गई है। बिजली चमकना और गायब हो जाना क्षणभंगुरता होती है। लेकिन ऐसा सोचना शंकारहित भी नहीं है। बिजली जो एक शक्ति है, वह लुप्त नहीं होती है बल्कि उसका रूप बदल जाता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 4.
प्रगतिशील कार्य क्या है?
उत्तर:
प्रगतिशील कार्य की परिभाषा तार्किक ने दी है। “उस मिश्रित कार्य को प्रगतिशील कार्य कहते हैं जो किसी स्थायी कारण से संचित प्रभाव से उत्पन्न होता है।” किसी वस्तु को एक अवस्था में छोड़ दें। उस पर प्रकाश, हवा, धूप, जल आदि का प्रभाव पड़ता रहता है और वह वस्तु दिन प्रतिदिन क्षीण होती है। कई वर्षों के बाद वह वस्तु टूटकर मिट्टी में मिल जाती है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणांशों के प्रभाव से वस्तु विलीन हो जाती है। यही कार्य प्रगतिशील कार्य कहलाता है। क्योंकि कार्य अपने रूप को धीरे-धीरे प्राप्त करता है। इस प्रकार से प्रगतिशील कार्य आगमन तर्कशास्त्र में कारण-कार्य नियम के अंतर्गत ही आता है।

प्रश्न 5.
निरीक्षण और प्रयोग में अंतर बताएँ।
उत्तर:
आगमन में निरीक्षण और प्रयोग दोनों वास्तविक आधार माने गए हैं। दोनों से वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है। फिर भी दोनों में कुछ अंतर हैं –
1. निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं का होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने प्रस्तुत करती है उसी का निरीक्षण हम करते हैं, जैसे-सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, का निरीक्षण करना, किन्तु प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का प्रयोगशालाएँ होता है। प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं घटना को रचकर बनाकर उसका निरीक्षण करता रहता है।

2. निरीक्षण की घटनाएँ जो होती हैं उसकी सभी परिस्थितयाँ प्रकृति के हाथ में रहती है परन्तु, प्रयोग में घटना की सभी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

3. निरीक्षण में यंत्र का व्यवहार कभी-कभी होता है। परन्तु, उसमें परिवर्तन नहीं होता है जबकि प्रयोग में यंत्र का व्यवहार हमेशा होता है तथा उसमें हेर-फेर या परिवर्तन भी होता रहता है। इस तरह निरीक्षण एवं प्रयोग में अंतर अधिक है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 6.
क्या निरीक्षण चयनात्मक है?
उत्तर:
निरीक्षण प्रायः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने जिस रूप में प्रस्तुत करती है, उसी का पर्यवेक्षण हम करते हैं। प्रकृति बहुत विशाल एवं जटिल है। इसमें नित्य प्रतिदिन कई प्रकार की घटनाएँ घटती रहती हैं। सभी घटनाओं का निरीक्षण हम नहीं कर पाते हैं। अतः, इसके लिए हमें किसी एक घटना का चयन करना पड़ता है। यदि हम चयन नहीं करें तो निरीक्षण संभव नहीं है। जैसे-रात्रि में हम प्रतिदिन आकाश की ओर तारों को देखते हैं, किन्तु जब किसी तारे को चयन कर देखते हैं, जैसे-ध्रुवतारा तो इसे निरीक्षण कहेंगे। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि निरीक्षण चयनात्मक होता है।

प्रश्न 7.
क्या निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित है?
उत्तर:
निरीक्षण मूलतः प्रकृति घटनाओं पर आधारित है, किन्तु कभी-कभी कृत्रिम घटनाओं का भी निरीक्षण होता है। यहाँ पर निरीक्षण का अर्थ या निरीक्षण का विषय अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। जैसे-भूकंप, सूर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, बाढ़, महामारी आदि का निरीक्षण करते समय प्राकृतिक घटनाओं पर हमारा कुछ अपना दाब नहीं रहता है। बल्कि प्रकृति में घटनाएँ जिस प्रकार से घटती हैं उसका निरीक्षण हम उसी तरह से करेंगे, उसमें परिवर्तन करना हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए निरीक्षण करते समय हम निष्क्रिय और प्रकृति के गुलाम बने रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि निरीक्षण अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है।

प्रश्न 8.
क्या प्रयोग कृत्रिम होता है?
उत्तर:
ऐसा कहा जाता है कि प्रयोग कृत्रिम होता है क्योंकि प्रयोगकर्ता स्वयं किसी घटना को प्रयोगशाला में बनाता है और इच्छानुसार उसका निरीक्षण करता है। प्रयोग प्राकृतिक घटनाओं का संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक घटनाएँ प्रकृति के हाथ में है। जैसे-आकाश में इन्द्र धनुष को हम नहीं बना सकते हैं। यह प्रयोगशाला में भी संभव नहीं है। इसी तरह चन्द्रग्रहण, भूकंप, सूर्यग्रहण, बाढ़ आदि का निर्माण प्रयोगशाला में नहीं किया जा सकता है। अतः, प्राकृतिक घटनाओं पर ही संभव है। क्योंकि प्रयोग में घटना की सारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में ही रहती है। अतः, निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 9.
कारण और कार्य की पारस्परिकता का वर्णन करें।
उत्तर:
तार्किकों के अनुसार कारण और कार्य की पारस्परिकता का संबंध कारण-कार्य नियम के अंतर्गत ही पाया गया है। कारण और कार्य के बीच एक प्रकार का संबंध पाया जाता है। यदि कारण है तो कार्य भी होगा। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निर्भर करते हैं। जैसे-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी उत्पन्न होता है। फिर उसी पानी से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस भी उत्पन्न किया जाता है। इस तरह की संभावना को ही हम कारण और कार्य की पारस्परिकता कहते हैं।

प्रश्न 10.
कारण के प्रचलित यंत्रों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण के प्रचलित यंत्र को जनसाधारण यंत्र भी कहते हैं। कारण वही है जो घटना के पहले आवे। यहाँ कारण का केवल अनुमान किया जाता है। उसका वैज्ञानिक निरूपण नहीं करते हैं। खाली घड़ा देखने पर गाड़ी छूट जाना, तेली को देखने से यात्रा खराब होना, बिल्ली को मार्ग काटने से किसी अशुभ घटना का कारण समझना आदि अंधविश्वास। इसी तरह के प्रचलित कारण के रूप भी हैं। कभी-कभी दैवी प्रकोप भी कारण बनता है, जैसे-हैजा, प्लेग आदि का होना भगवती या काली माँ का प्रकोप कहा जाता है। लेकिन आज वैज्ञानिक युग में ऐसे कारणों का तर्कशास्त्र में उचित स्थान नहीं दिया गया है। क्योंकि ये सब आकस्मिक घटनाएँ हैं। जो कभी होती है कभी नहीं भी होती है।

प्रश्न 11.
क्या प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी भी तरह के प्रयोग में प्रयोगकर्ता यंत्रों का प्रयोग करता ही है। इसमें इच्छानुसार हेर-फेर भी करता ही है। मनचाहे परिवर्तन भी करता हैं इन सभी परिवर्तनों के बाद वह घटना का निरीक्षण करता है। परन्तु, निरीक्षण में प्रयोगकर्ता यंत्र का प्रयोग तो करता ही है, किन्तु उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं करता है। परिवर्तन तो मात्र प्रयोग ही में संभव है। चूँकि प्रयोग कृत्रिम.घटनाओं का ही होता है। प्रयोगकर्ता उस घटना को स्वयं बनाकर उसकी जाँच करता है। अतः, निष्कर्ष है कि प्रयोग में यंत्रों का प्रयोग प्रयोगकर्ता करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 12.
आगमन का आकारिक आधार क्या है?
उत्तर:
आगमन तर्कशास्त्र में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हेतु आधार की जरूरत होती है। यह आधार दो प्रकार की है-आकारिक आधार और वास्तविक आधार। आकारिक आधार के अंतर्गत प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कार्य-कारण नियम दो प्रकार के आधार हैं। प्रकृति में एक प्रकार की समरूपता है, जिसके आधार समान परिस्थितियों में समान घटनाएँ भविष्य में घटती रहती हैं। इसी तरह कारण-कार्य नियम के अनुसार कारण उपस्थित होने पर कार्य भी अवश्य उपस्थित हो जाएगा। जैसे – यदि बादल आता है तो वर्षा होगी। तीसी, सरसों से तेल अवश्य उत्पन्न होगा। इस तरह प्राकृतिक-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य दो आगमन के आकारिक आधार हैं।

प्रश्न 13.
गलत देखने की भूल क्या है?
उत्तर:
तार्किकों ने निरीक्षण में दो तरह की भूलों का वर्णन किया है, जिसमें एक को गलत देखने की भूल कहा जाता है और दूसरे को नहीं देखने का भूल कहा जाता है। निरीक्षण में ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा कार्य किया जाता है। कर्म करने में कभी ज्ञानेन्द्रियाँ धोखा खा जाती हैं क्योंकि हम किसी वस्तु को गलत देख लेते हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि वस्तु का जो वास्तविक रूप है उसे नहीं देखकर गलत रूप को देखते हैं। अतः, इसे ही Fallacy of mal observation अर्थात् गलत देखने की भूल कहा जाता है। जैसे अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना, ठूठ पेड़ को भूत या चोर समझ लेना आदि गलत देखने की भूल कहा जाता है।

प्रश्न 14.
क्या निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित हैं?
उत्तर:
निरीक्षण मूलतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित है, किन्तु कभी-कभी कृत्रिम घटनाओं का भी निरीक्षण होता है। यहाँ पर निरीक्षण का अर्थ या निरीक्षण का विषय अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। जैसे-भूकंप, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, बाढ़, महामारी आदि का निरीक्षण करते समय प्राकृतिक घटनाओं पर हमारा कुछ अपना दबाव नहीं रहता है। बल्कि प्रकृति में घटनाएँ जिस प्रकार से घटती हैं उसका निरीक्षण हम उसी तरह से करेंगे उसमें परिवर्तन करना हमारे अधिकार में नहीं है। इसलिए निरीक्षण करते समय हम निष्क्रिय और प्रकृति के गुलाम बने रहते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि निरीक्षण अधिकांशतः प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 15.
आगमन का वास्तविक आधार क्या है?
उत्तर:
तर्कशास्त्र में सत्य दो तरह के होते हैं-आकारिक सत्य तथा वास्तविक सत्य। आगमन में वास्तविक सत्य की प्राप्ति के लिए निरीक्षण और प्रयोग दो विधियों की स्थापना की गई है। जबकि आकारिक सत्यता की प्राप्ति के लिए प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम दो बताए गए हैं। निरीक्षण और प्रयोग के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है जिसके आधार पर प्राप्त ज्ञान को सत्य समझा जाता है। जो सत्य के साथ ही साथ वास्तविक भी होता है। इस प्राप्त ज्ञान में शंका की गुंजाइश किसी तरह की नहीं होती है। अतः, आगमन का वास्तविक आधार निरीक्षण और प्रयोग दोनों हैं।

प्रश्न 16.
क्या प्रयोग कृत्रिम होता है?
उत्तर:
ऐसा कहा जाता है कि प्रयोग कृत्रिम होता है क्योंकि प्रयोगकर्ता स्वयं किसी घटना को प्रयोगशाला में बनाता है और इच्छानुसार उसका निरीक्षण करता है। प्रयोग प्राकृतिक घटनाओं का संभव नहीं है क्योंकि प्राकृतिक घटनाएँ प्रकृति के हाथ में है। जैसे-आकाश में इन्द्रधनुष को हम नहीं बना सकते हैं। प्रयोगशाला में कभी संभव नहीं है। इसी तरह चन्द्रग्रहण, भूकंप, सूर्यग्रहण, बाढ़ आदि का निर्माण प्रयोगशाला में नहीं किया जा सकता है। अतः, प्राकृतिक घटनाओं पर प्रयोग कृत्रिम रूप से नहीं हो सकता है। यह कृत्रिम घटनाओं पर ही संभव है। क्योंकि प्रयोग में घटना की सारी स्थितियाँ और परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में ही रहती है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का ही होता है।

प्रश्न 17.
क्या निरीक्षण चयनात्मक है?
उत्तर:
निरीक्षण प्रायः प्राकृतिक घटनाओं का ही होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने जिस रूप में प्रस्तुत करतो है, उसी का पर्यवेक्षण हम करते हैं। प्रकृति बहुत विशाल एवं जटिल है। इसमें नित्य-प्रतिदिन कई प्रकार की घटनाएँ घटती रहती हैं। सभी घटनाओं का निरीक्षण हम नहीं कर पाते हैं। अतः, इसके लिए हमें किसी एक घटना का चयन करना पड़ता है। यदि हम चयन नहीं करें तो निरीक्षण संभव नहीं है। जैसे रात्रि में हम प्रतिदिन आकाश की ओर तारों को देखते हैं, किन्तु जब किसी तारे को चयन कर देखते हैं, जैसे-ध्रुवतारा तो इसे निरीक्षण कहेंगे। अतः, निष्कर्ष के रूप में कह सकते हैं कि निरीक्षण चयनात्मक होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 18.
निरीक्षण और प्रयोग में अंतर बताएँ।
उत्तर:
आगमन में निरीक्षण और प्रयोग दोनों वास्तविक आधार माने गए हैं। दोनों से वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है। फिर भी दोनों में कुछ अंतर हैं –

1. निरीक्षण प्राकृतिक घटनाओं का होता है। प्रकृति जिस घटना को हमारे सामने प्रस्तुत करती है उसी का निरीक्षण हम करते हैं, जैसे सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण का निरीक्षण करना, किन्तु प्रयोग कृत्रिम घटनाओं का प्रयोगशाला में होता है। प्रयोग में प्रयोगकर्ता स्वयं घटना को रचकर, बनाकर उसका निरीक्षण करता रहता है।

2. निरीक्षण की घटनाएँ जो होती हैं उसकी सभी परिस्थितियाँ प्रकृति के हाथ में रहती हैं परंतु, प्रयोग में घटना की सभी स्थितियाँ या परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

3. निरीक्षण में यंत्र का व्यवहार कभी-कभी होता है। परंतु, उसमें परिवर्तन नहीं होता है जबकि प्रयोग में यंत्र का व्यवहार हमेशा होता है तथा उसमें हेर-फेर या परिवर्तन भी होता रहता है। इस तरह निरीक्षण एवं प्रयोग में मात्रा का भेद अधिक है।

प्रश्न 19.
नहीं देखने की भूल क्या है?
उत्तर:
तार्किकों के अनुसार यह भी एक प्रकार से निरीक्षण के दोष के अंतर्गत ही आता है। यह भूल प्रायः तब होती है जब हम उस वस्तु या स्थिति को ठीक से नहीं देखते हैं जिसे हमें देखना चाहिए था। हड़बड़ी, ध्यान का अभाव या पक्षपात के कारण हम बहुत-सी चीजों या परिस्थितियों को नहीं देख पाते हैं जिनके कारण नहीं देखने की भूल होती है। यह दो प्रकार की है –

(क) उदाहरण को नहीं देखने की भूल तथा

(ख) आवश्यक स्थिति या परिस्थिति को नहीं देखने की भूल। कुछ गाढ़े लाल रंग के फूलों को गंधहीन पाकर हम कहते हैं कि सभी गाढ़े लाल रंग के फूल गंधहीन हैं। यहाँ उदाहरण को नहीं देखने की भूल है। इसी तरह कोई गुंडा किसी लड़की के साथ बलात्कार करना चाहता है, किन्तु कोई छात्र उसे बचाने के क्रम में गुंडा उससे चोट खाकर मर जाता है। इस परिस्थिति में यदि उसे सजा मिलती है तो यहाँ आवश्यक परिस्थिति को नहीं देखने की भूल कहा जाएगा।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 20.
प्रकृति-समरूपता नियम का संक्षिप्त व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राकृतिक समरूपता नियम आगमन का आकारिक आधार है। तार्किकों ने इसकी परिभाषा देकर इसकी व्याख्या किए हैं क्योंकि इसकी परिभाषा देना संभव नहीं है। मूल सिद्धान्त या नियम की परिभाषा नहीं दी जाती है बल्कि उसका वर्णन किया जाता है। प्रकृति में जो भी घटना-घटती है वह समरूपता घटती है। इसमें प्रकार की विभिन्नता नहीं रहती है। अतः प्रकृति एकरूप है। अर्थात् प्राकृतिक घटनाएँ एक समान घटती हैं। भविष्य अतीत की तरह होता है। प्रकृति में घटनाएँ पुनः-पुनः उसी रूप में होती रहती है। भविष्य में घटनेवाली घटना की गारंटी प्राकृतिक समरूपता नियम के कारण ही हैं समान कारण से समान कार्य की उत्पत्ति होती रहती है। प्रकृति में कहीं पक्षपात नहीं है। प्रकृति एकरस है।

प्रश्न 21.
कारण-कार्य नियम की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण-कार्य नियम आगमन का एक प्रबल स्तंभ के रूप में आधार है। इसकी भी परिभाषा तार्किक ने न देकर इसकी व्याख्या किए हैं। कारण-कार्य नियम के अनुसार इस विश्व में कोई घटना या कार्य बिना कारण के नहीं हो सकती है। सभी घटनाओं के पीछे कुछ-न-कुछ कारण अवश्य छिपा रहता है। कारण संबंधी विचार अरस्तू के विचारणीय हैं। अरस्तू के अनुसार चार तरह के कारण हैं –

  1. द्रव्य कारण (Material Cause)
  2. आकारिक कारण (Formal Cause)
  3. निमित कारण (Efficient Cause)
  4. अंतिम कारण (Final Cause)

यही चार कारण मिलकर किसी कार्य को उत्पन्न करते हैं। जैसे-मकान के लिए ईंट, बालू, सीमेंट, द्रव्य कारण हैं। मकान का एक नक्शा बनाना आकारिक कारण है। राजमिस्त्री और मजदूर ईंट, बालू, सीमेंट को तैयार कर उसे एक पर एक खड़ा कर तैयार करते हैं। इसमें एक शक्ति आती है जिसे Efficient Cause या निमित कारण कहते हैं। इसी तरह मकान बनाने का उद्देश्य रहता है-अपना रहना या किराया पर लगाना। जिसे अंतिम कारण (Final Cause) कहते हैं। प्रचलित कारण को स्वीकार नहीं किया गया है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 22.
कारण के गुणात्मक लक्षण क्या है?
उत्तर:
कारण के गुणात्मक लक्षण मुख्यतः चार प्रकार के बताए गए हैं –
(क) कारण पूर्ववर्ती होता है
(ख) कारण नियत पूर्ववर्ती होता है
(ग) कारण उपाधिरहित पूर्ववर्ती होता है तथा
(घ) कारण तात्कालिक पूर्ववर्ती होता है।

इन्हीं चारों को आगमन में स्वीकार किया गया है। कारण कार्य की व्याख्या में कहा गया है कि यह एक के उपस्थित में होने पर दूसरा भी उपस्थित होता है। कारण-कार्य के पहले आता है इसलिए इसे पूर्ववर्ती कहा जाता है। कार्य बाद में आता है। इसलिए इसे अनुवर्ती कहा जाता है। कारण नियत पूर्ववर्ती है। क्योंकि हर हालत में बिना कारण के कार्य नहीं होता है। इसके साथ-ही-साथ तार्किकों ने कहा कि कारण उपाधिरहित एवं तात्कालिक पूर्ववर्ती भी होता है।

प्रश्न 23.
कारण के परिमाणात्मक लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
परिमाण के अनुसार कारण और कार्य के बीच मुख्यतः तीन प्रकार के विचार बताए गए हैं –

(क) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में अधिक हो सकता है
(ख) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में कम हो सकता है
(ग) कारण-कार्य से परिमाण या मात्रा में कभी अधिक और कभी कम हो सकता है।

अतः इन तीनों को असत्य साबित किया गया है। यदि कारण अपने कार्य से कभी अधिक और कभी कम होता है तो इसका यही अर्थ है कि प्रकृति में कोई बात स्थिर नहीं है। किन्तु, प्रकृति में स्थिरता एवं समरूपता है, अतः यह संभावना भी समाप्त हो जाता है। इसी तरह पहली और दूसरी संभावना भी समाप्त हो जाती है। ये तीनों संभावनाएँ निराधार हैं। अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि कारण-कार्य मात्रा में बराबर होते हैं और यही सत्य भी है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 24.
कारण और उपाधि की तुलना करें।
उत्तर:
आगमन में कारण का एक हिस्सा स्थित बतायी गई है। जिस तरह से हाथ, पैर आँख, कान, नाकं आदि शरीर के अंग हैं और सब मिलकर एक शरीर का निर्माण करते हैं। उसी तरह बहुत-सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती हैं। परन्तु, कारण में बहुत-सा अंश या हिस्सा नहीं रहता है। कारण तो सिर्फ एक ही होता है। इसमें स्थिति का प्रश्न ही नहीं रहता है। कारण और उपाधि में तीन तरह के अंतर हैं –
(क) कारण एक है और उपाधि कई हैं
(ख) कारण अंश रूप में रहता है और उपाधि संपूर्ण रूप में आता है
(ग) कारण चार प्रकार के होते हैं जबकि उपाधि दो प्रकार के होते हैं। इस तरह कारण और उपाधि में अंतर है।

प्रश्न 25.
भावात्मक कारणांश या उपाधि क्या है?
उत्तर:
भावात्मक कारणांश उपाधि का एक भेद है। उपाधि प्रायः दो तरह के हैं-भावात्मक तथा अभावात्मक। ये दोनों मिलकर ही किसी कार्य को उत्पन्न करते हैं। यह कारण का वह भाग या हिस्सा है जो प्रत्यक्ष रूप में पाया जाता है। इसके रहने से कार्य को पैदा होने में सहायता मिलती है। जैसे-नाव का डूबना एक घटना है, इसमें भावात्मक उपाधि इस प्रकार है – एकाएक आँधी का आना, पानी का अधिक होना, नाव का पुराना होना तथा छेद रहना, वजन अधिक हो जाना आदि ये सभी भावात्मक उपाधि के रूप है जिसके कारण नाव पानी में डूब गई।

प्रश्न 26.
अभावात्मक कारण या उपाधि क्या है?
उत्तर:
कारणांश या उपाधि के मुख्यतः दो भेद हैं –

(क) भावात्मक कारणांश एवं
(ख) अभावात्मक कारणांश।

इसमें घटना के घटने में जो कारण अनुपस्थित रहते हैं उसे अभावात्मक उपाधि कहते हैं जैसे – नाव डूबना एक घटना है। इसमें भावात्मक तथा अभावात्मक उपाधि मिलकर घटना को घटने में सहायता प्रदान करते हैं। इसमें अभावात्मक उपाधि इस प्रकार है जो अनुपस्थित है – मल्लाह का होशियार नहीं होना, किनारे का नजदीक नहीं होना, नाव का बड़ा नहीं होना। इस प्रकार की अनुपस्थिति उपाधि हैं जिससे नाव को डूबने में अप्रत्यक्ष रूप से सहायता मिलती।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 27.
कार्यों के सम्मिश्रण का विवेचन करें?
उत्तर:
जब किसी कमरे में बहुत से दीपक या मोमबत्ती जलाते हैं तो उससे अधिक प्रकाश होता है। यहाँ सभी दीपक और मोमबत्ती मिलकर उस प्रकाश को कार्यरूप में पैदा करते हैं। अतः प्रकाश कार्य-सम्मिश्रण के रूप में आता है। ये कार्य-सम्मिश्रण दो प्रकार के होते हैं –

(क) सजातीय कार्य-सम्मिश्रण तथा।
(ख) विविध जातीय कार्य-सम्मिश्रण।

सजातीय कार्य-सम्मिश्रण में हम देखते हैं कि विभिन्न कारणों के मेल से जो कार्य पैदा होता है उसमें समीकरण एक ही तरह या एक ही जाति के होते हैं, जैसे-घर में एक सौ दीपक के जलाने से अधिक प्रकाश होता है। यहाँ सभी दीपक एक ही जाति के हैं, किन्तु जो कार्य विभिन्न कारणों के मेल से बनता है उसे विविध जातीय कार्य सम्मिश्रण कहा जाता है, जैसे-भात, दाल, दूध, दही, घी, सब्जी आदि से खून का बनाना।

प्रश्न 28.
कारणों का संयोग की व्याख्या करें।
उत्तर:
जब बहुत से कारण मिलकर संयुक्त रूप से कार्य पैदा करते हैं तो वहाँ पर कारणों से मेल को कारण-संयोग कहा जाता है। यह भी कारण-कार्य नियम के अंतर्गत पाया जाता है जैसे-भात-दाल, सब्जी, दूध, दही, घी, फल आदि खाने के बाद हमारे शरीर में खून बनता है। इसलिए खून यहाँ बहुत से कारणों के मेल से बनने के कारण कार्य-सम्मिश्रण हुआ तथा दाल, भात आदि कारणों का मेल कारण-संयोग कहा जाता है। अतः कारणों के संयोग और कार्यों के सम्मिश्रण में अंतर पाया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
क्या आपके विचार से तूफान और भूकंप प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुकूल है? क्या यह कहना सत्य है कि प्रकृति में एक समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताए है।
उत्तर:
कुछ तार्किकों का कथन है कि प्रकृति समरूपता नियम के अनुकूल तूफान और भूकंप नहीं है। प्रकृति समरूपता नियम का अर्थ होता है कि प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता का होना। प्रकृति में जो घटना आज घटती है हमारा विश्वास है कि भविष्य में भी वही घटना घटेगी। भूकंप, तूफान, आँधी एकाएक आ जाती है। प्रकृति के व्यवहार को एक माना गया तो ऐसी घटनाएँ अचानक नहीं होना चाहिए। 1 जनवरी, 1934 ई. में बिहार में भूकंप हुआ था तो जनवरी 1935-36 के महीने में भूकंप होना चाहिए था, किन्तु नहीं हुआ। अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं है।

ऐसा विचार प्रकृति समरूपता नियम का गलत अर्थ लगाने के कारण यह सही लगता है। प्रकृति समरूपता नियम का यह अर्थ नहीं है कि जो घटना आज घटती है वह प्रतिदिन घटनी चाहिए। ऐसा सोचना गलत है कि भूकंप, आँधी रोज आना चाहिए। प्रकृति समरूपता का अर्थ है कि समान परिस्थिति में प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता रहती है। भूकंप होने का कारण प्रत्येक . दिन नहीं हो सकता है। इसलिए भूकंप प्रत्येक दिन नहीं होता है। यदि कारण हो और कार्य न हो तो ऐसा कहा जा सकता है कि प्रकृति में समरूपता नहीं है। समान परिस्थिति में प्रकृति के कार्य में समरूपता रहती है न कि प्रत्येक परिस्थिति में।

एकाएक तूफान या भूकंप का होना प्रकृति समरूपता का खंडन नहीं करता है एकाएक हमारी अज्ञानता का द्योतक है न कि प्रकृति समरूपता की असत्यता का। हम आँधी, तूफान के कारण को नहीं जानते हैं इसलिए कह देते हैं कि एकाएक ये घटनाएँ घटती हैं। भूकंप और तूफान, आँधी, भूकंप, बाढ़ इत्यादि का होना प्रकृति समरूपता नियम के विरुद्ध नहीं जाता है बल्कि ये प्रकृति समरूपता नियम के अनुकूल हैं। एक समरूपता या अनेक समरूपताएँ-बेन साहब (Bain) का कहना है कि संसार में एक समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताएँ हैं।

बेन तथा अन्य तार्किकों के अनुसार, प्रकृति के अनेक विभाग हैं। प्रत्येक विभाग के अलग-अलग नियम हैं। अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं बल्कि अनेक समरूपताएँ हैं। यहाँ विवाद एकवचन और बहुवचन का है प्रकृति में बहुत से विभागों के होते हुए भी उसमें इकाई का रूप पाया जाता है। प्रकृति में अनेकता में भी एकता है। There is unity and wholeness in Nature. हम अपनी सुविधा के लिए प्रकृति को अनेक विभागों में बाँटते हैं और प्रकृति उन विभागों की एक व्यवस्थित समष्टि है। “अनेक समरूपताओं के बीच एक समरूप है”। सभी समरूपताएँ एक समरूपता में आकर मिल जाती है जिस तरह अनेक नदियाँ एक समुद्र में मिल जाती है। अतः, निष्कर्ष यही है कि एक समरूपता है जिसे प्राकृतिक समरूपता नियम कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 2.
आगमन के आकारिक एवं वास्तविक आधार क्या हैं? उन्हें आकारिक एवं वास्तविक आधार क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
आगमन में हम अंशव्यापी से पूर्णव्यापी की ओर जाते हैं इसमें कुछ उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य नियम की स्थापना करते हैं। प्रश्न है कि किस आधार पर हम ‘कुछ’ से ‘सब’ की ओर जाते हैं? किस आधार पर वर्तमान से भविष्य की ओर जाते हैं? इसका उत्तर है कि हम प्राकृतिक समरूपता नियम के आधार पर कुछ से सब की ओर जाते हैं। हमारा विश्वास प्राकृतिक समरूपता नियम में है। समान परिस्थिति में समान कारण की उत्पत्ति हमेशा होती है। भविष्य की गारंटी इस नियम से मिलती है कि अगर मनुष्य मरणशील है तो भविष्य में भी मरणशील रहेगा। अटूट एवं अनिवार्य संबंध किस आधार पर स्थापित करते हैं? इसका उत्तर है कि कार्य-कारण नियम के आधार पर। कार्य-कारण नियम का अर्थ है कि प्रत्येक घटना का एक कारण होता है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य उपस्थित होगा।

अतः, प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य कारण नियम आगमन के आकारिक आधार हैं क्योंकि इन नियमों का संबंध आगमन के आकार से है। ये आगमन के स्वरूप को निर्धारित करते हैं। आगमन की आकारिक सत्यता से इन दोनों का संबंध होने के कारण इन्हें आगमन का आकारिक आधार कहते हैं। इसी तरह निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। अनुमान का विषय वास्तविक रूप से सत्य होता है। विषय कल्पित नहीं रहता है। विषय अनुभव पर आश्रित है।

हम अनुभव में पाते हैं कि आग में ताप है। इसी अनुभव के आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं कि “सभी आग में ताप है।” अनुभव के भी दो स्रोत हैं – निरीक्षण और प्रयोग (Observation and experiment) व्यवस्थित एवं नियंत्रित निरीक्षण ही प्रयोग है। निरीक्षण एवं प्रयोग के द्वारा आगमन के विषय की प्राप्ति होती है। इसलिए आगमन निरीक्षण और प्रयोग विषयगत आधार कहलाते हैं। पुनः आगमन के निष्कर्ष की सत्यता की जाँच निरीक्षण और प्रयोग से होती है, इसलिए भी निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहते हैं। अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्राकृतिक समरूपता नियम और कार्य-कारण नियम आगमन के आकारिक आधार हैं तथा निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। आकारिक आधार का संबंध आगमन के आकस्मिक सत्यता से है और निरीक्षण एवं प्रयोग का संबंध आगमन की वास्तविक सत्यता से है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 3.
प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम के बीच संबंध की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राकृतिक समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम दोनों आगमन के आकारिक आधार हैं। प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुसार, समान परिस्थिति में प्रकृति के व्यवहार में एकरूपता पायी जाती है। समान कारण से समान कार्य की उत्पत्ति होती है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य ही उपस्थित रहेगा। दोनों नियमों के संबंध को लेकर तीन मत हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. मिल तथा बेन साहब के अनुसार प्राकृतिक समरूपता नियम मौलिक है तथा कारणता के नियम प्राकृतिक समरूपंता नियम का एकरूप है। बेन के अनुसार समरूपता तीन प्रकार की है। उनमें एक अनुक्रमिक समरूपता है (Uniformities of succession) इसके अनुसार एक घटना के बाद दूसरी घटना समरूप ढंग से आती है। कार्य-कारण नियम अनुक्रमिक समरूपता है। कार्य-कारण नियम के अनुसार भी एक घटना के बाद दूसरी घटना अवश्य आती है। अतः, कार्य-कारण नियम स्वतंत्र नियम न होकर समरूपता का एक भेद है। जैसे-पानी और प्यास बुझाना, आग और गर्मी का होना इत्यादि घटनाओं में हम इसी तरह की समरूपता पाते हैं।

2. जोसेफ एवं मेलोन आदि विद्वानों के अनुसार कार्य-कारण नियम मौलिक है प्राकृतिक समरूपता नियम मौलिक नहीं है स्वतंत्र नहीं है। बल्कि प्राकृतिक समरूपता नियम इसी में समाविष्ट है। कार्य-कारण नियम के अनुसार कारण सदा कार्य को उत्पन्न करता है। कारण के उपस्थित रहने पर कार्य अवश्य ही उपस्थित रहता है। प्राकृतिक समरूपता नियम के अनुसार भी समान कारण समान कार्य को उत्पन्न करता है। अतः कार्य-कारण नियम से जो अर्थ निकलता है। वही प्राकृतिक समरूपता नियम से भी। अतः, कार्य-कारण नियम ही मौलिक है और प्राकृतिक समरूपता नियम उसमें अतभूत (implied) है।

3. वेल्टन, सिगवर्ट तथा बोसांकेट के अनुसार दोनों नियम एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं दोनों मौलिक हैं। दोनों का अर्थ भिन्न हैं। दोनों दो लक्ष्य की पूर्ति करता है। कार्य-कारण नियम से पता चलता है कि प्रकृति में समानता है। अतः, ये दोनों नियम मिलकर ही आगमन के आकारिक आधार बनते हैं। आगमन की क्रिया में दोनों की मदद ली जाती है। जैसे – कुछ मनुष्य को मरणशील देखकर सामान्यीकरण कहते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील है। कुछ से सब की ओर जाने में प्राकृतिक समरूपता नियम का मदद लेते हैं। प्रकृति के व्यवहार में समरूपता है।

इसी विश्वास के साथ कहते हैं कि मनुष्य भविष्य में भी मरेगा। सामान्यीकरण में निश्चितता आने के लिए कार्य-कारण नियम की मदद लेते हैं। कार्य-कारण नियम के अनुसार कारण के उपस्थित रहने पर अवश्य ही कार्य उपस्थित रहता है। मनुष्यता और मरणशीलता में कार्य-कारण संबंध है। इसी नियम में विश्वास के आधार पर कहते हैं कि जो कोई भी मनुष्य होगा वह अवश्य ही मरणशील होगा। अतः दोनों स्वतंत्र होते हुए भी आगमन के लिए पूरक हैं। दोनों के संयोग से आगमन संभव है। अतः दोनों में घनिष्ठ संबंध है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 4.
कारण के गुणात्मक लक्षणों की सोदाहरण व्याख्या करें। अथवा, “कारण तात्कालिक अनौपाधिक और नियत पूर्ववर्ती घटना है।” इस – परिभाषा को ध्यान में रखते हुए कारण के विभिन्न लक्षणों का सोदाहरण वर्णन करें।
उत्तर:
गुण के अनुसार हम कारण गुण का वर्णन करने में कार्य-कारण के गुणात्मक स्वरूप का वर्णन करते हैं। इसमें कार्वेथ रीड तथा मिल की परिभाषाओं पर विचार करते हैं। मिल ने कारण में पूर्ववर्ती एवं अनौपाधिक लक्षणों पर बल दिया तो कार्वेथ रीड ने पूर्ववर्तिता, नियतता, अनौपाधिता एवं तात्कालिकता चार लक्षणों पर बल दिया है।

इसमें कार्वेथ रीड के अनुसार – “The cause of an event is qualitatively” the immediate, unconditional invariable anticedent of an effect.” अर्थात् गुणात्मक दृष्टि से किसी भी घटना का कारण “कार्य का तात्कालिक, अनौपाधिक नियतपूर्ववर्ती है तथा मिल साहब के अनुसार – The cause of a phenomenon to be “the anticedent or the concurrence of anticedents on which it is invariably and unconditionally consequent.” अर्थात् किसी घटना का कारण “वह पूर्ववर्ती या पूर्ववर्तियों का समूह है जिसके या जिनके होने के बाद कारण के निम्नलिखित लक्षण पाते हैं –

1. पूर्ववर्ती होना (Anticedent):
कारण और कार्य सापेक्ष पद है। एक के बाद दूसरा एक क्रम में पाया जाता है जिसका आदि और अंत हमें नहीं पता चलता हैं अतः, किसे कारण समझा जाए? इस समस्या को समझने के लिए मिल साहब का कहना है कि किसी घटना के पहले घटनेवाली घटना को कारण समझ लेना ठीक होगा। जैसे-शान्त तालाब में पत्थर फेंकने पर पानी में जो कंपन होता है उसका कारण पत्थर फेंकना ही कहा जाएगा।

यह भी सही है कि कारण और कार्य दोनों अलग-अलग नहीं पाए जाते हैं। इसलिए मेलोन साहब (Mellone) का विचार है कि कारण और कार्य के बीच एक गणित की रेखा है जिसमें चौड़ाई नहीं होती है, “अर्थात् कारण और कार्य एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक तथ्य के दो छोर हैं। जो हमें पूर्ववर्ती के रूप में पहले दिखाई पड़ता है उसे कारण कहते हैं और बाद में जो अनुवर्ती के रूप में दिखाई पड़ता है उसे कार्य का रूप देते हैं। अतः, इसके अनुसार कारण-कार्य के पहले आता है।”

2. नियत अनियत होना (Invariable):
पहले घटनेवाली घटना को कारण तो कहा जाता है लेकिन सभी पहले घटने वाली घटना कारण नहीं हो सकता है। ऐसा कहने से अंधविश्वास का जन्म हो सकता है। पहले घटनेवाली घटनाएँ दो तरह की है –

(क) अनियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent)
(ख) नियत पूर्ववर्ती (Variable anticedent)।

(क) अनियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent):
वे घटनाएँ हैं जो कार्य के पहले नियमित रूप से नहीं पायी जाती है। कभी होता है कभी नहीं भी। जैसे-वर्षा के पहले घटनेवाली घटनाओं के रूप में हम फुटबॉल मैच, राम की शादी, कॉलेज में सभा इत्यादि को पा सकते हैं लेकिन नियमित रूप से वर्षा के पहले हमेशा नहीं आते हैं इसलिए ये कारण भी हो सकते हैं। अनियत घटनाएँ कारण कभी नहीं भी हो सकते हैं। अतः, अनियत घटनाएँ कारण कभी नहीं हो सकती है।

(ख) नियत पूर्ववर्ती (Invariable anticedent):
वे घटनाएँ हैं जो किसी कार्य के पहले देखा या निश्चित रूप से पायी जाती है, जैसे-वर्षा के पहले बादल का घिर जाना। जब कभी भी वर्षा होगी आकाश में बादल का रहना जरूरी है। अतः बादल का होना नियत पूर्ववर्ती घटना है। ऐसा विचार ह्यूम (Hume) का है। घटना के पहले जो भी आवे जो कुछ भी घटे सबों को बिना विचारे कारण मान लेना एक दोष पैदा कर सकता है। जिसे हम पूर्ववर्ती घटनाओं के रूप में पाते हैं, परन्तु वे सभी आकस्मिक या परिवर्तनशील हैं। इसलिए अनियत पूर्ववर्ती घटना के कारण बनने का योग कभी भी प्राप्त नहीं होगा। इसलिए ह्यूम साहब ने हमेशा की नियम पूर्ववर्ती घटना को कारण मानना उचित बताया है।

3. अनौपाधिक होना (Unconditional):
कभी-कभी ह्यूम के विचारों को मानने से एक समस्या आ जाती है जिसे Carveth Read ने हमारे सामने दिन और रात का उदाहरण रखा। है। दिन के पहले रात और रात के पहले दिन नियम पूर्ववर्ती घटना के रूप में पाए जाते हैं। यदि हम ह्यूम की बात को न माने तो दिन का कारण रात और रात का कारण दिन का होना ही होगा।

ऐसा कहना हास्यास्पद होगा। क्योंकि दिन और रात का होना एक शर्त पर निर्भर करता है-वह है पृथ्वी का चौबीस घंटे में अपनी कील पर सूरज के चारों तरफ एक बार घूम जाना। वास्तव में यही दिन और रात का अलग-अलग कारण हो सकता है। इस समस्या को दूर करने के लिए मिल साहब कहते हैं कि इसी प्रकार की घटना को नियमपूर्ववर्ती घटना का कारण माना जा सकता है जो किसी शर्त पर निर्भर नहीं करे अर्थात् वह अनौपाधिक (Unconditional) हो।

4. तात्कालिक होना (Immediate):
तात्कालिक कारण का अंतिम गुणात्मक लक्षण तात्कालिकता है। कारण को कार्य तात्कालिक पूर्ववर्ती होना चाहिए। अतः, कारण से तुरन्त पहले आनेवाली पूर्ववर्ती में खोजना चाहिए। दूरस्थपूर्ववर्ती को कारण नहीं मानना चाहिए। जैसे-कॉलेज में सुबह पढ़ना, शाम को टहलना, रात को ओस में सोना इत्यादि घटनाओं के बाद हमें खूब जोर से सर दर्द होता है। यहाँ सर दर्द के पहले ओस में सोना तात्कालिक घटना है और अन्य घटनाएँ दूर की है। इस तरह पूर्ववर्ती नियम अनौपाधिक एवं तात्कालिक मिश्रण है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 5.
कारण सभी उपाधियों-भावात्मक एवं अभावात्मक का दर्शन है। इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मिल साहब के अनुसार हमें कारण और स्थिति (Cause and condition) को ठीक से समझना होगा।

स्थिति उपाधि (Condition):
कारण का एक हिस्सा स्थिति या उपाधि होता है। जिस तरह हाथ, पैर, आँख, नाक, कान इत्यादि मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं उसी तरह बहुत-सी स्थितियाँ मिलकर किसी कारण की रचना करती है। अतः, दोनों में पूर्ण और हिस्से (Whole and part) का संबंध है। स्थिति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी कारण को कार्य के रूप में परिणत होने के लिए सहायक होता है, जैसे यदि बीज (Seed) कारण है और वृक्ष कार्य है तो बीज में धूप हवा, पानी, खाद्य इत्यादि से सहायता मिलती है, जिन्हें हम स्थितियों के रूप में ही पाते हैं।

इसलिए कार्वेथ रीड ने कहा है – “स्थिति कारण का कोई आवश्यकीय भाग है” (Conditions is any necessary factor of the cause) Conditions के दो रूप बताए गए हैं-भावात्मक और अभावात्मक (Positive and Negative)। भावात्मक स्थिति-यह कारण का वह हिस्सा है जो प्रत्यक्ष रूप में पाया जा सकता है। उसके रहने से कार्य को पैदा होने में सहायता मिलती है। जैसे-बीज से वृक्ष होने में खाद्य, पानी, हवा, धूप आदि भावात्मक स्थितियाँ है। नाव से पानी में झांकना और ऐसा करने से पानी में डूबकर मरना भावात्मक स्थिति है। इस तरह भावात्मक स्थिति स्पष्ट रहती है।

अभावात्मक स्थिति (Negative Condition):
यह कारण का वह हिस्सा है जिसकी अनुपस्थिति में कोई कार्य होता है। इसलिए मिल साहब के अनुसार, “बाधा उत्पन्न करनेवाली परिस्थिति का अभाव ही अभावात्मक स्थिति है। जैसे – बीज के वृक्ष होने में हवा, पानी, तूफान का नहीं आना, कड़ी धूप का नहीं होना, जानवरों का नहीं खाना आदि बातें भी अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करती रहती है।

इसलिए वे बीज के लिए अभावात्मक स्थितियाँ हैं। इनका अभाव ही कारण के लिए सहायक होता है। इसी तरह नाव से नदी की धारा में गिरना भावात्मक स्थिति है तो उस आदमी को तैरने नहीं आना, और घबड़ा जाना अभावात्मक स्थिति है। अगर वह तैरना जानता तो डूबता नहीं। इसलिए डूबने का कारण उसका तैरना नहीं आना भी होगा। इसे अभावात्मक स्थिति कहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर भावात्मक और अभावात्मक स्थिति की समान जरूरत है। इसलिए मिल साहब ने कहा कि भावात्मक और अभावात्मक स्थितियों का योगफल ही कारण कहलाता है।

आलोचना –

  1. अभावात्मक स्थितियों को कारण का एक अंश मानना एक उलझन पैदा कर सकता है। क्योंकि जो कारण अनुपस्थित है वह किसी भी कार्य के कारण का एक अंग कैसे बन सकता है?
  2. सभी अभावात्मक स्थितियों का वर्णन करना एक अत्यंत कठिन कार्य है। यह कभी भी पूरा नहीं हो सकता है। सभी अभावात्मक स्थितियों की गणना संभव नहीं है।
  3. भावात्मक उपाधियों में भी एक दिक्कत है सभी गणना संभव नहीं है।

कारण एवं उपाधि में संबंध-उपाधि की परिभाषा से ही संबंध स्पष्ट होता है। उपाधि कारण का अंश है। अनेक उपाधियों के योग से कारण बनता है। अतः, दोनों में वही संबंध है जो संबंध शरीर और अंगों के बीच है। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न अंगों के जोड़ से पूर्ण शरीर बनता है उसी प्रकार उपाधियों में है। अंगों के निकाल देने पर शरीर का अंत हो जाता है। उसी प्रकार उपाधियों को हटा देने से कारण नाम की कोई वस्तु नहीं बचती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 6.
कारण और कार्य दोनों बराबर है। इसकी व्याख्या करें। अथवा, कार्य-कारण से अन्तर्निहित है और कारण कार्य में अभिव्यक्त रहता है इस कथन की व्याख्या करें। अथवा, कार्य-कारण नियम के परिमाणगत लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
कारण और कार्य दोनों परिणाम के अनुसार बिल्कुल बराबर होते हैं (A cause is equal to effect quantity) इसका अर्थ यही हुआ कि कारण और कार्य, द्रव की मात्रा हमेशा ही एक समान रहती है। वह कभी घटती-बढ़ती नहीं है बल्कि उसका रूप परिवर्तन होते रहता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन दो गैस है जिनके मिलाने से पानी बनता है। यहाँ पर भी पानी दोनों गैसों की मात्रा के बराबर रहता है। इसी तरह शक्ति की अविनाशिता का नियम (Law of conservation of Energy) यह कहता है कि दुनिया में शक्ति का विनाश कभी नहीं होता है। वह हमेशा एक ही समान रहती है। केवल उसके रूप में परिवर्तन होता रहता है। शक्ति दो तरह की होती है –

(क) गति संबंधी (Kinetic)
(ख) संभावित शक्ति (Potential Energy)

एक में गति रहती है दूसरे में नहीं। एक किसी वस्तु को गतिशील बनाता है दूसरी स्थिर। इन्हीं दोनों में शक्ति का रूप परिवर्तन होता रहता है। उसका नाश कभी नहीं होता है। दोनों मात्रा में भी बराबर पा सकते हैं।
थोड़ी देर के लिए यदि हम मान लें कि कारण और कार्य बराबर नहीं है तो इसके बाद तीन संभावनाएँ हो सकती है।

(क) कारण-कार्य से मात्रा में बड़ा होता है।
(ख) कारण-कार्य से मात्रा में छोटा होता है।
(ग) कभी कारण बड़ा होता है और कभी छोटा।

इसमें यदि हम पहले को सही मान लें तो बहुत-सी असंभव घटनाएँ हमारे सामने आ जाएँगी। इसी तरह दूसरी संभावना भी गलत है कि जिसमें कारण-कार्य से छोटा कहा गया है। इसी तरह तीसरी संभावना भी नहीं मानी जा सकती है। क्योंकि उसे मान लेने से प्राकृतिक समरूपता नियम का उल्लंघन होता है। प्रकृति की घटनाओं में एकरूपता हो। अतः तीनों को देखने के बाद सही मानना पड़ता है कि कारण और कार्य परिणाम के अनुसार बिल्कुल बराबर होते हैं।

इसे मान लेने के बाद हमें यह भी कहने का अवसर मिलता है कि कारण में कार्य छिपा रहता है और कार्य में कारण का छिपा हुआ रूप रहता है। (Cause is nothing but effect can cealed and effect is nothing but cause evealed) कारण और कार्य परिणामों के अनुसार बराबर होते हैं। कार्य कारण में पहले से ही निवास करता है जैसे-बीज में वृक्ष, सरसों में तेल। वृक्ष बीज का खुला हुआ रूप है और तेल सरसों का। वृक्ष और तेल कोई नया चीज नहीं है। अतः परिणाम के अनुसार कारण और कार्य बिल्कुल बराबर होते हैं केवल उनके रूप में परिवर्तन होता हैं अतः दोनों बराबर है।

कार्य-कारण नियम और प्राकृतिक समरूपता नियम के बीच संबंध (Relation between in law of causation and this Law of uniformity of Nature):
दोनों नियम आगमन की आकस्मिक आधार हैं। इन दोनों की सहायता से ही आगमन में अत्यधिक सत्यता की स्थापना की जाती है। इन दोनों के बीच के संबंध को लेकर विद्वानों में दो मत हैं।

(क) मिल, बेन और वेन आदि विद्वानों के अनुसार कार्य-कारण नियम को प्राकृतिक समरूपता नियम का ही हिस्सा माना गया है। इन लोगों का कहना है कि प्राकृतिक समरूपता नियम एक मूल नियम है जो प्रकृति के सभी क्षेत्रों में पाया जाता है। अतः, कार्य-कारण का नियम भी उसी का एक अंग है।

(ख) Sigwart, Bossanquet, Welton आदि विद्वानों के अनुसार कार्य:
कारण का नियम और प्राकृतिक समरूपता नियम दो अलग-अलग नियम हैं इसमें कोई एक-दूसरे का अंग या अंश नहीं है। ये दोनों नियम अलग-अलग रूप में आगमन की आकारिक सत्यता को पाने में मदद करते हैं। इन दोनों मतों को देखने से पता चलता है कि प्राकृतिक समरूपता नियम सभी प्रकार से आगमन का आधार है और कार्य-कारण नियम वैज्ञानिक आगमन का आधार है। वास्तव में दोनों नियम एक-दूसरे के सहायक एवं पूरक के रूप में हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 7.
बहुकारणवाद की व्याख्या एवं परीक्षण करते हुए उसकी कठिनाइयों का उल्लेख करें। या एक ही घटना विभिन्न कारणों से विभिन्न समय में उत्पन्न होती है। विवेचना करें।
उत्तर:
बहुकारणवाद के अनुसार एक ही घटना अलग-अलग समय में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है। एक कार्य को अनेक कारणों का बहुकारणवाद कहते हैं। जैसे-मृत्यु एक कार्य है जिसकी उत्पत्ति अनेक कारणों से होती है। मृत्यु कभी बीमारी से, कभी विष खाने से, कभी गोली लगने से, कभी दुर्घटना होने से और कभी गिरने से होती है। अतः विभिन्न समय के मृत्यु के विभिन्न कारण हैं। रोशनी, सूर्य, चन्द्र, लालटेन, दीपक, बिजली-मोमबत्ती, अनेक कारणों से उत्पन्न होती है। इस पर कार्वेथ रीड ने कहा है The same event may be due at different times to different antecedents, that in fact there may be various cause अर्थात् एक ही घटना भिन्न-भिन्न समय में अलग-अलग पूर्ववर्ती अवस्थाओं से घटती है।

अतः उसके भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं। मिल साहब ने भी बहुकारणवाद का समर्थन किया है। इनके शब्दों में “Many causes may produce mechanical mot on, many causes may produce. Produce same kind of sensation, many causes may produce death” अर्थात् अनेक कारण यांत्रिक गति उत्पन्न कर सकते हैं, कई कारण समान संवेदना उत्पन्न कर सकते हैं, कई कारणों से मृत्यु हो सकती है। स्पष्ट है कि एक ही घटना विभिन्न समय में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है। जैसे मृत्यु एक घटना है इसके कई कारण हो सकते हैं नदी में डूबना, टी.बी., हैजा, प्लेग, जहर खाना, ट्रेन से कट जाना आदि इसके अनेक कारण बताए जा सकते हैं।

बहुकारणवाद सिद्धांत की कठिनाइयों की आलोचना-() बहुकारणवाद कारण की नियतता के विरूद्ध है। कारण नियम पूर्ववर्ती है। नियम पूर्ववर्ती का अर्थ है कि वही पूर्ववर्ती कारण है जो अपरिवर्तनशील है, जो किसी घटना के पहले सर्वदा उपस्थित है। इसका अर्थ है कि एक कार्य का संबंध सर्वदा एक कारण से रहता है, परन्तु बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य का संबंध अनेक कारण से रहता है। इस सिद्धांत को मान लेने पर Valiable अनियत हो जाता है। अतः यह सिद्धांत कारण की नियतता के विरुद्ध जाता है।

1. यह सिद्धांत विज्ञान के विरुद्ध जाता हैं। विज्ञान के अनुसार एक घटना का एक कारण होता है तथा एक कारण का एक कार्य होता है। बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य में अनेक कारण होते हैं। अतः, सिद्धांत विज्ञान की मान्यता के विरुद्ध जाता है।

2. यह सिद्धांत प्राकृतिक समरूपता नियम के विरुद्ध भी जाता है। समान परिस्थिति में समान कारण से सफल कार्य की उत्पत्ति होती हैं इसका अर्थ होता है कि एक कार्य का एक कारण होता है। लेकिन बहुकारणवाद के अनुसार एक कार्य के अनेक कारण होते हैं। अतः, यह सिद्धांत प्राकृतिक समरूपता नियम के विरुद्ध जाता है जो कठिनाइयों को दूर कर सकते हैं? बहुकारणवाद में जो सत्यता दिखाई पड़ती है वह वास्तविक सत्यता नहीं है। यह तो हमारी असावधानी और अज्ञानता पर आधारित है। वस्तुतः प्रकृति में एक घटना का एक ही कारण है। बहुकारणवाद की असत्यता को दो तरह से दूर किया जा सकता है।

  • कार्यों का विशेषीकरण (specialisation of effects) तथा
  • कारणों के सामान्यीकरण द्वारा (Generalisation of causes) द्वारा।

(i) कार्यों का विशेषीकरण:
हमलोग प्रायः कारण में भेद करते हैं, किन्तु कार्य में भेद नहीं करते हैं। अलग-अलग कारणों से उत्पन्न कार्य जिसे हम एक समझते हैं वास्तव में एक नहीं बल्कि अनेक प्रकार का है। सूर्य, चन्द्र, लालटेन, बिजली, मोमबत्ती, दीपक से उत्पन्न प्रकाश को एक समझते हैं। परन्तु ध्यान से देखने पर भिन्नता दिखाई पड़ती है। बिजली का प्रकाश दीपक से प्रकाश से भिन्न है। दीपक की रोशनी, लालटेन की रोशनी से भिन्न है जब भिन्नता है तो फिर उसे एक नाम से नहीं परखना चाहिए। हमें सूर्य का प्रकाश, बिजली का प्रकाश, लालटेन की रोशनी, दीपक का प्रकाश अलग-अलग कहना चाहिए। जब ऐसा करते हैं तो एक कार्य का एक कारण होगा न कि अनेक।
Bihar Board Class 11 Philosiphy chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

इस तरह एक कार्य का एक ही कारण सिद्ध होता है न कि अनेक। विभिन्न कार्यों की विशेषता बतलाना कार्यों का विशेषीकरण कहलाता है। अतः, कार्य का साफ-साफ व्यक्त करना ही कार्य का विशेषीकरण कहलाता है।

(ii) कार्यों का सामान्यीकरण:
इसका अर्थ है विभिन्न कारणों में निहित सामान्य (Common) तत्त्व का पता लगाना। यदि कारणों में सामान्य तत्त्व का पता लगता है तब एक कार्य का एक कारण होगा। विभिन्न कार्यों की भिन्नता पर ध्यान न देकर उसे एक नाम से पुकारते हैं। यहाँ न्याय का अंतर है कि विभिन्न कारणों की भिन्नता पर ध्यान न देकर उनके सामान्य तत्त्व का पता लगाकर उन्हें एक नाम से जान सकते हैं। जैसे मृत्यु का अनेक कारण कहते हैं-हैजा, प्लेग, विषपान, गोली लगना, नदी में डूबकर आदि, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि उन कारणों में एक सामान्य बात है “हृदय की गति का रुकना या प्राण शक्ति समाप्त होना” यहाँ मृत्यु का एक ही कारण है-प्राण शक्ति का समाप्त हो जाना।

इस तरह कारणों के सामान्यीकरण तथा कार्यों के विशेषीकरण के द्वारा बहुकारणवाद की असत्यता को प्रमाणित किया जा सकता है। बेन ने कहा है “Plurality of causes is more an ancident of our imperfect knowledge than a fact in the nature of things” अर्थात् कारणों की अनेकता वस्तुओं के विषय में कोई सत्यता नहीं हैं बल्कि अधूरे ज्ञान का परिणाम है। इसी तरह जाजेफ के शब्दों में “Plurality is more apparent than real.” अर्थात् अनेक कारण केवल दिखावटी हैं, यथार्थ नहीं। इसी तरह कार्वेथ रीड ने भी कहा है कि “यदि हम तथ्यों को पर्याप्त सूक्ष्मता से समझेंगे तो हम देखेंगे कि प्रत्येक कार्य का एक ही कारण होता है।” अतः, बहुकारणवाद सही सिद्धान्त नहीं है, कार्यों कि यह विज्ञान के विरुद्ध है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 8.
कारण-संयोग एवं कार्य सम्मिश्रण की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
जब बहुत से कारण मिलकर संयुक्त रूप में कार्य पैदा करे तो वहाँ पर कारणों से मेल को कारण-संयोग (conjunction of causes) कहते हैं और उनसे उत्पन्न कार्य को कार्य-सम्मिश्रण (Intermixture of effects) कहते हैं। अतः, अनेक कारणों को मिलकर कार्य करना, कारणों का संयोग कहलाता है। B.N. Roy ने कहा है “The acting together of serveral of causes producing a joint effect is called conjunction of causes.” जैसे दाल, भात, दूध, घी, दही, तरकारी खाने के बाद हमारे शरीर में खून बनता है। इसलिए यहाँ पर ‘खून’ बहुत कारणों के मेल से बनने का कारण कार्य-सम्मिश्रण हुआ भात, दाल, दूध, दही, घी, तरकारी आदि कारणों का मेल कारण-संयोग कहलाया।

इसी तरह यदि हम अपने रूम में एक सौ दीपक जला दें तो उससे एक अच्छा प्रकाश होगा। यहाँ सभी दीपक मिलकर उन प्रकाश को कार्य रूप में पैदा करते हैं। इसलिए वे प्रकाश-सम्मिश्रण कार्य और सभी दीपक कारण संयोग के रूप में होगा। कार्य-सम्मिश्रण (Intermixture of Effects) दो तरह के हैं –

  1. सजातीय
  2. विजातीय।

1. सजातीय कार्य सम्मिश्रण (Homogeneous):
इसमें विभिन्न कारणों के मेल से जों कार्य पैदा होता है उसमें समीकरण एक ही तरह या जाति के होते हैं। जैसे-यदि हम अपने कमरे में एक सौ दीपक जला दें तो उससे खूब प्रकाश होगा। यहाँ प्रकाश कार्य है और इसके कारण सभी एक ही तरह के दीपक हैं इसे सजातीय कार्य सम्मिश्रण कहा जाता है।

2. विजातीय कार्य सम्मिश्रण (Heterogeneous):
इसमें कार्य विभिन्न कारणों के मेल से बनता है। वे सभी कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। जैसे ‘खून’ का कार्य-सम्मिश्रण लेने पर पता चलता है कि इसके कारण भात, दाल, दूध, घी, पानी, तरकारी आदि हैं ये सभी भिन्न-भिन्न जाति के हैं फिर भी इन सबों के मेल से ही ‘खून’ बनता है इसलिए यह विविध जाति जातीय कार्य सम्मिश्रण कहलाएगा।

कारण संयोग एवं बहुकारणवाद में अंतर (Difference between conjunction of causes and plurality):
दोनों में निम्नलिखित अंतर हैं –

(i) बहुकारणवाद में बहुत से कारण मिलते हैं, जैसे – मृत्यु के लिए नदी में डूबना, हैजा, प्लेग, ट्रेन से कटना आदि। किन्तु, एक समय में एक ही कारण काम करते हैं। दूसरी तरफ कारण संयोग में जो अनेक कारण मिलते हैं वे सभी एक-दूसरे से मिलकर ही उस कार्य को पैदा करते हैं अकेले नहीं।

(ii) बहुकारणवाद में जो कारण हमें मिलते हैं उनमें एक कारण अकेला ही उस तरह के कार्य को पैदा करने की ताकत रखता हैं जैसे नदी में डूबना या हैजा या प्लेग आदि में कोई एक अकेले वह कार्य पैदा कर सकता है, परन्तु ऐसी व्यक्ति संयोग में एक कारण के पास नहीं मिलती है। अकेले भात या दाल उस तरह का खून नहीं पैदा कर सकता है अकेलें ऑक्सीजन या हाइड्रोजन पानी पैदा नहीं कर सकता है।

(iii) बहुकारणवाद के कार्य में सरलता रहती है, क्योंकि एक समय में सूर्य के लिए एक ही कारण काम करता है दूसरी तरह कारण-संयोग में सभी कारण मिलकर कार्य करता है इसलिए उससे जो कार्य पैदा होता है वह जटिल या मिश्रित होता है।

(iv) बहुकारणवाद की आलोचना करते हुए इसे गलत और अवैज्ञानिक बताया गया है। परन्तु कारण-संयोग सही और वैज्ञानिक होने का दावा कर सकती है।

अतः, बहुकारणवाद में अनेक कारण Separately and independently कार्य को उत्पन्न करते हैं, किन्तु कारण-संयोग में अनेक कारण Jointly कार्य को उत्पन्न करते हैं। जैसे –
कारण संयोग – A + B + C Produce ‘X’
बहुकारणवाद – A or B or C Produces ‘X’

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 9.
कारण और कारणांश क्या है? दोनों में भेद बतावें।
उत्तर:
कारण और कार्य एक सापेक्ष पद है। एक के आने के बाद दूसरा आता है। कारण उपस्थित होने पर कार्य की उपस्थिति होती है। कारण एक घटना है। दो घटनाओं का संबंध इस तरह है कि जो पहले आता है, वह कारण कहा जाता है और जो बाद में आता है उसे कार्य कहा जाता है। बादल और वर्षा दोनों एक प्रकार के घटना हैं। बादल पहले आता है इसलिए बादल कारण है, वर्षा बाद में होती है, इसलिए वर्षा कार्य है। कारण एक हिस्सा है जो एक अर्थ के रूप में रहता है कारणांश एक प्रकार की स्थिति है यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी कारण को कार्य के रूप में परिणत होने के लिए सहायक होता है जैसे यदि बीज कारण है तो वृक्ष कार्य है। कारणांश के दो भेद हैं –

  1. भावात्मक कारणांश
  2. अभावात्मक कारणांश।

1. भावात्मक कारणांश:
यह कारण का वह भाग है जो प्रत्यक्ष रूप से किसी भी कार्य को होने में सहायक होती है। जैसे बीज से वृक्ष होने में हवा, पानी, धूप, खाद्य आदि भावात्मक स्थितियाँ हैं।

2. अभावात्मक कारणांश:
यह कारण का वह हिस्सा है जो किसी भी कार्य में अनुपस्थित होकर कार्य को करने में सहायता प्रदान करती है। बीज से वृक्ष होने में भावात्मक स्थिति के साथ-साथ अभावात्मक स्थिति का भी होना जरूरी है, जैसे-बीज से वृक्ष होने में धूप, हवा, पानी इत्यादि के साथ-ही-साथ आँधी, तूफान का नहीं आना कड़ी धूप का नहीं होना, जानवरों द्वारा नहीं खाया जाना इत्यादि बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है। अतः, कारणांश में भावात्मक और अभावात्मक दोनों के हाथ हैं। कारण और कारणांश दोनों में निम्नलिखित अंतर भी हैं –

  • कारण एक होता है, किन्तु कारणांश में कई कारण मिलकर किसी कार्य को करते हैं।
  • कारण अंश के रूप में रहता है, किन्तु कारणांश संपूर्ण के रूप में रहता है।
  • अरस्तू ने चार प्रकार के कारण बताए हैं-द्रव्य कारण, आकारिक कारण, विभिन्न निमित कारण और अन्तिम कारण। ये चारों प्रकार के कारण एक साथ मिलकर किसी भी कार्य को करते हैं। लेकिन कारणांश दो प्रकार के हैं भावात्मक और अभावात्मक कारणांश।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 10.
समरूपता के मूल भेद क्या हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन में प्राकृतिक समरूपता नियम तथा कार्य-कारण नियम आकारिक आधार के दो प्रमुख भेद बताएँ गए हैं। आगमन के दो मुख्य आधार भी हैं-आकारिक आधार तथा वास्तविक आधार। आकारिक आधार के अंतर्गत हम लोग प्राकृतिक समरूपता नियम में विश्वास करते हैं क्योंकि प्रकृति हमेशा एक समान व्यवहार करती है। इसमें कभी किसी तरह का हेर-फेर नहीं होता है। इस नियम की परिभाषा नहीं, किन्तु व्याख्या की गई है। प्रकृति एकरूप है। प्रकृति की घटनाएँ समान रूप से घटती है, जो अनुपस्थित है, वह उपस्थित के बराबर है। प्रकृति अपने आप में निष्पक्ष एवं ईमानदार है।

समानकारण से समान कार्य पैदा होता है इसका अर्थ यही हुआ कि जिस कारण से जो घटना आज घटती है यदि वही कारण कल भी उपस्थित हो जाए तो वही घटना घटेगी, जैसे यदि आज सरसों से तेल निकलता है तो कल भी निकलेगा। प्रकृति में जिस कारण से जो घटनाएँ घटती है वही कारण उपस्थित होने पर वही कार्य अवश्य होगा। इस तरह प्रकृति में किसी तरह की भिन्नता नहीं की गई है। यदि आज पानी में प्यास बुझाने की क्षमता है तो कल भी पानी में प्यास बुझाने की क्षमता रहेगी। इसी तरह आज आग में जलाने की शक्ति है तो भविष्य में भी आग में जलन शक्ति रहेगी। – अतः, संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जिन कारणों से जो घटना, आज घटती है कल भी वही कारण से वही घटना अवश्य घटेगी। इसकी गारंटी हम प्राकृतिक समरूपता से प्राप्त करते हैं। यहाँ समरूपता के मुख्यतः तीन मूल भेदों का वर्णन किया गया है।

  1. अनुक्रमिक समरूपताएँ
  2. समसत्ता की समरूपताएँ
  3. समान घटनाओं की समरूपताएँ।

1. अनुक्रमिक समयरूताएँ (Uniformities of succession):
इसे कारणता कहते हैं। इस प्रकार की समरूपता में जहाँ पहली घटना घटेगी वहाँ दूसरी घटना अवश्य घटेगी। जैसे – पानी और व्यास का बुझाना। आग का होना और गर्मी का होना। ये सब अनुक्रमिक समरूपताएँ हैं। इसमें प्राकृतिक समरूपता है।

2. समसत्ता की समरूपताएँ (Uniformities of co-existence):
प्रकृति में कुछ घटनाएँ इस प्रकार की घटती हैं जिन्हें साथ-साथ पायी जाती है या धातु के साथ पारदर्शिता सर्वदा रहती है। इसी तरह कुछ उदाहरण है जिनमें दो बातों की समसत्ता देखकर यह कहते हैं कि उनमें समसत्ता की एकरूपता पायी जाती है।

3. समान घटनाओं की समरूपताएँ (Uniformities of Equality):
इसके अंतर्गत देखा गया है कि अगर समान वस्तुओं के बराबर जितनी वस्तुएँ हैं ये सभी आपस में बराबर हैं। जैसे-गणित, विज्ञान जो अंकों के संबंध पर आधारित है, वह उसी प्रकार के उदाहरण से मिलता-जुलता नजर आता है। रेखा गणित में भी इस प्रकार के उदाहरण मिलते हैं। जैसे किसी चतुर्भुज के आमने-सामने वाले कोण यदि बराबर हों तो आमने-सामने वाली भुजाएँ भी समांतर और बराबर होंगी।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 11.
प्रयोग के ऊपर निरीक्षण के लाभ की व्याख्या करें।
उत्तर:
निरीक्षण और प्रयोग में केवल मात्रा का भेद है फिर भी एक का फायदा दूसरे पर दिखलाया जा सकता है। प्रयोग की अपेक्षा निरीक्षण की विशेष सुविधाएँ या प्रयोग के ऊपर निरीक्षण के निम्नलिखित लाभ हैं।

1. निरीक्षण का क्षेत्र प्रयोग से बड़ा और व्यापक है। निरीक्षण सभी घटनाओं का किया जा सकता है, किन्तु सभी घटनाओं पर प्रयोग नहीं किया जा सकता है। जैसे-सामाजिक, राजनीतिक एवं ग्रह-नक्षत्र-संबंधी घटनाओं पर प्रयोग संभव नहीं है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। इसी तरह अपराध, पाप, आत्महत्या, मानसिक रोग आदि को प्रयोग द्वारा उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन घटनाओं का केवल निरीक्षण ही संभव है।

2. निरीक्षण में कारण से कार्य तथा कार्य से कारण दोनों की ओर जाते हैं, परन्तु प्रयोग में केवल कारण से कार्य की ओर जाते हैं। जैसे किसी पशु को विष की सूई देकर हम देखते हैं कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है। किन्तु, मरे हुए पशु पर प्रयोग कर यह पता नहीं लगाया जा सकता है कि उसकी मृत्यु किस कारण से हुई। लेकिन निरीक्षण में शव को देखकर उसकी मृत्यु के कारण का अनुमान निरीक्षण के आधार पर कर सकते हैं। यहाँ कार्य से कारण की ओर जाते।

3. आगमन में पूर्णव्यापी वास्तविक वाक्य की स्थापना निरीक्षण के आधार पर की जाती है, जैसे-राम, श्याम, मोहन, यदु को मरते देखकर सभी मनुष्य मरणशील हैं, ऐसा निरीक्षण पर ही हम करते हैं। यहाँ प्रयोग से काम नहीं लेते हैं। प्रयोग तो निरीक्षण का संशोधित एवं नियंत्रित।

4. निरीक्षण का दावा है कि वह प्रयोग से पहले (Prior) आता है। प्रयोग करते समय भी हम निरीक्षण करते हैं। अतः, निरीक्षण प्रयोग के पहले आने का सही अधिकार रखता है। प्रयोग करने के पहले यंत्रों तथा उपादानों का निरीक्षण करने के बाद ही प्रयोग किया जाता है। ज्ञान का. प्रारंभ निरीक्षण से होता है। बाद में बुद्धि विकसित होने पर प्रयोग से काम लेते हैं।

5. निरीक्षण सबों के लिए सुलभ है इसके लिए विशेष योग्यता और कुशलता की जरूरत नहीं है। जबकि प्रयोग के लिए विशेष योग्यता एवं कुशलता की जरूरत रहती है। अतः, प्रयोग सबों के लिए सुलभ नहीं है।

6. निरीक्षण में घटनाओं को स्वाभाविक तथा शुद्ध रूप में देखते हैं। उनमें कृत्रिमता नहीं रहती है। जैसे-सूर्योदय, सूर्यास्त, वर्षा के मौसम में रिमझिम वर्षा का निरीक्षण आनन्ददायक होता है। किन्तु, प्रयोग में घटना को कृत्रिम ढंग से बनाते हैं। इसलिए उसमें स्वाभाविकता नहीं रहता है।

7. निरीक्षण से एक विशेष सुविधा मिलती है जो प्रयोग में नहीं मिलती है। प्रयोग की अपेक्षा निरीक्षण में कम मेहनत करनी पड़ती है। प्रयोग में अधिक परिश्रम करना पड़ता है।

परिस्थितियों एवं प्रयोगशालाओं का प्रबंध करना पड़ता है। इसमें यंत्रों की सहायता ली जाती है। अतः, यंत्रों का प्रबंध भी जरूरी है। इसमें बहुत झंझट एवं परेशानी है जबकि निरीक्षण का कार्य सुविधाजनक एवं आसान है। इस तरह निरीक्षण से विशेष लाभ प्रयोग की अपेक्षा है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 12.
निरीक्षण संबंधी दोषों की सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
निरीक्षण में घटनाओं को निष्पक्ष होकर देखा जाता है, किन्तु साधारण लोगों के द्वारा निरीक्षण की क्रिया गलत रूप से भी हो जाती है। इसे निरीक्षण का दोष कहते हैं। निरीक्षण में प्रायः दो तरह के दोष होते हैं। गलत निरीक्षण की भूल और नहीं निरीक्षण की भूल।

1. गलत निरीक्षण की भूल या दोष (Fallacy of mal observation):
निरीक्षण में हमारी ज्ञानेन्द्रियों को बहुत ही काम करना पड़ता है जिसमें कभी-कभी धोखा भी हो जाती है जिससे किसी वस्तु या घटना का गलत ज्ञान हो जाता है जिससे निरीक्षण दोषपूर्ण हो जाता है।

जैसे-चाँदनी रात में शांत वातावरण में बालू के सूखी रेत को पानी, या पानी को ही बालू समझना। अंधेरी रात में रस्सी को साँप या साँप को रस्सी समझना ये सब गलत निरीक्षण का नमूना है। साधारण लोग कहते हैं कि सूर्य पूरब उदय होकर धीरे-धीरे चलकर पश्चिमी में डूब जाता है। ऐसा समझना निरीक्षण का दोष है।

(ii) नहीं निरीक्षण की भूल (Fallacy of non observation):
निरीक्षण के समय हम कभी-कभी बहुत असावधान रहते हैं। इसमें उसके पूरे तथ्य को न देखकर उसमें कुछ ही अंश को देखते हैं। इसमें सत्य के एक पहलू को देखा जाता है तथा दूसरे का निरीक्षण बिल्कुल नहीं करते हैं। यह दोष दो तरह के हैं।

(क) उदाहरणों को नहीं देखना (Non-observation of instances):
सही और वैज्ञानिक निरीक्षण के लिए हमें पक्षपात से दूर रहना पड़ता है। किसी व्यक्ति को ठीक से बताने के लिए उसके भावात्मक तथा अभावात्मक गुणों का वर्णन होना चाहिए। उसके अच्छे-बुरे गुणों का वर्णन होना जरूरी है। यदि उसके बुरे गुणों का वर्णन नहीं करते हैं तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है। अभावात्मक उदाहरणों को छोड़ देना वैज्ञानिक निरीक्षण नहीं है।

जैसे-जब कोई शादी हेतु लड़की वाला लड़का वाला के यहाँ जाता है तो लड़के का गुण बताता है कि लड़का एम. ए. पास है, खिलाड़ी है, समाज सेवक है, सुशील है, गायक है, तेज है। ये सभी उसके गुण हैं। किन्तु, वह शराबी है, झगड़ालू है, बीमार अधिक रहता है, गाली देने का स्वभाव एवं मारपीट करने में आगे रहता है। इन सब उदाहरणों को नहीं देखना केवल एक ही पक्ष देखने से निरीक्षण दोष पूर्ण है, जिसे – Non-observation of fallacy कहते हैं।

(ख) आवश्यक वस्तुओं को नहीं देखना (Non observation of the essential circumstances):
किसी घटना के होने में परिस्थिति का बहुत बड़ा हाथ रहता है। यदि परिस्थिति को तुच्छ और बेकार समझकर ध्यान में नहीं लाते हैं तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है। जैसे-एक छात्र शाम को हॉकी खेलकर हाथ में डंडा लेकर सुनसान बगीचे से गुजर रहा है। एक बदमाश आदमी रुपये के लालच में एक लड़की की हत्या करके उसके आभूषणों को लूटना चाहता है। दोनों में भिड़त हो जाती है। छात्र के डंडे से वह गुंडा चोट खाकर मर जाता है।

इस हालत में परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उस छात्र को निर्दोष पाया जाएगा। उसे खून की सजा नहीं मिलेगी। यदि जज उस परिस्थिति को ध्यान में न रखकर सजा दे देता है तो वहाँ निरीक्षण का दोष हो जाता है, जिसे हम आवश्यक अवस्थाओं के नहीं, निरीक्षण का दोष कहेंगे। इस तरह अनेक परिस्थितियाँ चोरी, डकैती, हत्या की वृद्धि के लिए जिम्मेवार है।

गरीबी का बढ़ना, बेरोजगारी का बढ़ना, महँगाई, सरकार की कमजोरी, बेकारी की समस्या। इसमें केवल एक परिस्थिति सरकार की कमजोरी पर ध्यान देते हैं तथा अन्य परिस्थितियों का निरीक्षण नहीं करते हैं। अतः निरीक्षण के दोष के कारण जो सामान्यीकरण किया जाता है वह वैज्ञानिक नहीं है। सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में जो सिद्धान्त स्थापित किये जाते हैं उसमें निश्चितता नहीं रहती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 13.
निरीक्षण के ऊपर प्रयोग के लाभ की व्याख्या करें?
उत्तर:
1. प्रयोग में जितनी बार चाहें उतनी बार घटनाओं को बार-बार दुहरा सकते हैं इसमें घटना हमारे हाथ में रहती है। किन्तु, निरीक्षण हमारे हाथ में नहीं रहता है। ऐसा मौका मिलता भी नहीं है। परिस्थितियाँ प्रयोगकर्ता के हाथ में रहती हैं।

2. प्रयोग में जाँच की जानेवाली घटना का अध्ययन दूसरी घटनाओं या परिस्थितियों से अलग करके कर सकते हैं। प्रकृति जटिल है। एक घटना दूसरी घटना से मिली रहती है। निरीक्षण में यह संभव नहीं है कि एक तत्त्व को दूसरे तत्त्व से अलग कर अध्ययन करें। प्रयोग में परिस्थितियाँ अलग की जा सकती हैं। किन्तु, निरीक्षण में ऐसा संभव नहीं है। हवा में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बनडाऑक्साइड इत्यादि मिले रहते हैं। एक बरतन में नाइट्रोजन रखते हैं और दूसरे बरतन में ऑक्सीजन। एक जलती मोमबत्ती नाइट्रोजन के बरतन के नजदीक जाने पर बुझ जाती है, किन्तु ऑक्सीजन के बरतन के नजदीक जाने पर तेज होकर जलने लगती है।

3. निरीक्षण की तुलना में प्रयोग से लाभ यह है कि घटना की जाँच परिस्थितियों से बदल-बदल कर करते हैं। परिस्थिति के परिवर्तन से बतलाता है कि किस परिस्थितियों का संबंध जाँच की जानेवाली घटना से है। जैसे-वैज्ञानिकों ने परिस्थिति को बदल करके पता लगाया कि नाइट्रिक एसिड, पीतल, लोहा, ताँबा, चाँदी को गला सकता है, परन्तु सोना को नहीं। निरीक्षण में परिस्थिति को बदली जा सकती है।

4. निरीक्षण की तुलना में प्रयोग से लाभ है कि प्रयोग में घटना की जाँच प्रयोगकर्ता धैर्य, सावधानी, सतर्कता एवं स्थिरता से करता है। इसमें जल्दीबाजी नहीं रहती है। किन्तु, निरीक्षण में यह सुविधा नहीं है।

5. प्रयोग से जो निष्कर्ष निकलते हैं वे निश्चित एवं संदेह रहित होते हैं। प्रयोग पर आधारित जाँच विश्वसनीय होता है। किन्तु, निरीक्षण से जो निष्कर्ष प्राप्त होता है वह संभाव्य होता है। वह सत्य भी हो सकता है और असत्य भी।

6. विज्ञान का जो कुछ विकास हुआ है उसमें प्रयोग का बहुत बड़ा हाथ है। निरीक्षण से उतना लाभ विद्वानों को नहीं पहुँच पाता है। इसलिए प्रयोग की वैज्ञानिक महत्ता निरीक्षण से अधिक है। भौतिकी एवं रसायन विज्ञान प्रयोग पर आधारित है इसलिए इसकी उन्नति अधिक हुई है। किन्तु मनोविज्ञान के सभी क्षेत्रों में प्रयोग संभव नहीं है इसलिए इसका विकास कुछ कम हुआ अतः निष्कर्ष निकलता है कि प्रयोग निरीक्षण की अपेक्षा अधिक लाभदायक है। जहाँ प्रयोग संभव है वहाँ प्रयोग की मदद लेनी चाहिए।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 14.
निरीक्षण की परिभाषा दें। निरीक्षण की मुख्य विशेषताओं की विवेचना करें। अथवा, निरीक्षण क्या है? निरीक्षण के लक्षणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
निरीक्षण का अर्थ प्रायः देखना या प्रत्यक्षीकरण होता है। ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जो प्रत्यक्षीकरण होता है, उसे निरीक्षण कहते हैं। ये देखना या प्रत्यक्षीकरण दो तरह से होता है। “Observation is the equalited perception of natural events under conditions arrange by natures with an end in view.” अर्थात् प्राकृतिक, स्थितियों के बीच प्राकृतिक घटनाओं के उद्देश्यपूर्ण पर्यवेक्षण को निरीक्षण कहते हैं।” इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं।

1. निरीक्षण उद्देश्यपूर्ण-निरुद्देश्यपूर्ण देखना निरीक्षण नहीं है। जैसे-बाजार में अनेक दुकानों को प्रत्येक दिन देखता हूँ, परन्तु यह देखना साधारण देखना है। यह देखना निरीक्षण नहीं कहला सकता है। यदि किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी दुकान को देखता हूँ। जैसे कपड़ा खरीदने के लिए तो वह निरीक्षण कहलाएगा। अतः, निरीक्षण उद्देश्यपूर्ण होता है।

2. निरीक्षण नियमित एवं व्यवस्थित होता है-लक्ष्य की पूर्ति निरीक्षण को नियमित और व्यवस्थित करती है। जैसे-कोई ज्योतिषी सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी एवं नक्षत्रों को ध्यान से नियमित रूप से उनकी गतिविधि को अध्ययन के विचार से उनका प्रत्यक्षीकरण करता है तो यह निरीक्षण कहलाता है। लेकिन लोग रात में चाँद और तारे को प्रतिदिन अनियमित रूप से देखते हैं, जिसे निरीक्षण नहीं कहा जाएगा। अतः निरीक्षण नियमित प्रत्यक्षीकरण (Regulated perception) है।

3. निरीक्षण चयनात्मक क्रिया (Selective process):
प्रकृति में अनेक घटनाएँ घटती हैं। प्रकृति में अनेक वस्तुएँ हैं। निरीक्षण में हम सभी वस्तुओं पर ध्यान न देकर केवल उन्हीं वस्तुओं या घटनाओं पर ध्यान देते हैं जिससे लक्ष्य की पूर्ति होती है। अतः, प्रकृति में से घटनाओं का चयन करते हैं और उन्हें ध्यानपूर्वक निरीक्षण भी करते हैं, अतः निरीक्षण एक चयनात्मक क्रिया है।

4. स्वाभाविक स्थिति:
निरीक्षण में जिन वस्तुओं या घटनाओं को देखते हैं उन्हें स्वाभाविक स्थिति में देखते हैं। उसे बिना परिवर्तन के देखते हैं। प्रकृति में घटनाएँ जिस रूप में पस्थित होती हैं उन्हें उसी रूप में देखते हैं। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, सूर्योदय, सूर्यास्त, बाढ़, वर्षा आदि को हम स्वाभाविक स्थिति में ही देखते हैं। अतः, निरीक्षण में प्राकृतिक घटनाओं को प्राकृतिक अवस्था में देखते हैं।

5. निरीक्षणकर्ता की निष्पक्षता:
वैज्ञानिक तटस्थ होकर घटनाओं का निरीक्षण करता है। अपने भाव, संवेग एवं पूर्वाग्रह से अलग होकर वह घटनाओं का अध्ययन करता है। निष्पक्ष हुए बिना निरीक्षण संभव नहीं हो सकता है।

6. ज्ञानेन्द्रियों द्वारा निरीक्षण:
निरीक्षण ज्ञानेन्द्रियों द्वारा किया जाता है और ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति सीमित होती है। अतः निरीक्षण का स्पष्ट एवं प्रभावशाली बनाने के लिए वैज्ञानिक विभिन्न यंत्रों की सहायता भी लेते हैं। जैसे-दूरबीन का व्यवहार, थर्मामीटर, स्टेथेस्कोप का व्यवहार आदि।

7. निरीक्षण बाह्य घटनाओं तक ही सीमित नहीं है:
हम आंतरिक मनोदशा का भी निरीक्षण करते हैं। जैसे-सुख, दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, इच्छा, घृणा आदि। मनोविज्ञान में इसे अंतर्निरीक्षण कहते हैं। इस तरह हमें उन तथ्यों को, जिनका हम निरीक्षण करते हैं, उन तथ्यों से भिन्न समझना चाहिए जिनका हम निरीक्षित तथ्यों (Observed facts) से अनुमान करते हैं। Jevons का कथन है कि जबतक हम केवल उन्हीं तथ्यों का वर्णन करते हैं, जिन्हें हमने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से निरीक्षित किया है, तो हम त्रुटि नहीं करते हैं, परन्तु जैसे ही हम अन्दाज लगाते हैं या कल्पना करने लगते हैं, वैसे ही गलती कर बैठते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 15.
प्रयोग की परिभाषा दें। प्रयोग की विशेषताओं को लिखें।
उत्तर:
प्रयोग भी आगमन का वास्तविक आधार है। यह भी एक प्रकार का निरीक्षण ही है। इसमें भी एक लक्ष्य रहता है, यह भी निरीक्षण की तरह लक्ष्यपूर्ण होती है। यहाँ पर नियंत्रित परिस्थिति में घटना को, कृत्रिम ढंग से उत्पन्न कर अध्ययन किया जाता है। प्रयोग की परिभाषा इस प्रकार दी गई है (Experiment is the observation of this artificial production of events under conditions prearranged by man”) अर्थात् मनुष्यों द्वारा निर्मित स्थितियों में कृत्रिम स्थितियों में कृत्रिम घटनाओं के निरीक्षण को प्रयोग कहते हैं।” इस परिभाषा के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित लक्षण पाते हैं।

  1. प्रयोग भी एक तरह का निरीक्षण ही है। इसमें भी किसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु ध्यानपूर्वक किसी घटना या वस्तु को नियंत्रित पर्यवेक्षण (Regulated Perception) कहते हैं।
  2. प्रयोग में घटना को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न किया जाता है। जैसे निश्चित मात्रा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर पानी बनाया जाता है। यह पानी कृत्रिम होता है। बिजली, बादल को प्रयोग में उत्पन्न करना प्रयोग है, अतः निरीक्षण में घटना पाते हैं, किन्तु प्रयोग में घटना को बनाते हैं।
  3. घटना की उत्पत्ति हेतु जिन परिस्थितियों एवं स्थान की जरूरत पड़ती है उसका प्रबंध एवं चयन प्रयोगकर्ता स्वयं पहले से करता हैं जैसे-पानी या बिजली उत्पन्न करने के लिए प्रयोगकर्ता उनका प्रबंधन पहले करता है, अतः प्रयोग में वातावरण एवं परिस्थिति पर प्रयोगकर्ता का नियंत्रण रहता है। प्रयोगकर्ता अपनी इच्छानुसार परिवर्तन कर घटना का निरीक्षण कर सकता है।
  4. प्रयोग में घटना की उत्पत्ति के बाद उसका निरीक्षण किया जाता है। घटना का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है। प्रयोग के बाद निष्कर्ष निकाला जाता है।
  5. प्रयोग के लिए वैज्ञानिक औजारों तथा विज्ञानशाला का रहना जरूरी है। घास पर बैठकर कोई प्रयोग खाली हाथ नहीं कर सकते हैं।

इस तरह निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहा जाता है। निरीक्षण और प्रयोग आगमन को विषय प्रदान करते हैं। आगमन में विशिष्ट उदाहरणों के निरीक्षण में आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं। निरीक्षण और प्रयोग ही विशिष्ट उदाहरण प्रदान करते हैं जिनके आधार पर सामान्य नियम बनाते हैं।

जैसे-कुछ मनुष्यों को मरते देखकर ही सामान्य नियम बनाते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। कुछ उदाहरणों के प्रयोग के आधार पर ही विज्ञान में सामान्य नियम बनाते हैं। इसलिए निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार कहलाते हैं। पुनः आगमन के निष्कर्ष की वास्तविक सत्यता की जाँच निरीक्षण और प्रयोग से होती है। इसलिए भी निरीक्षण और प्रयोग को आगमन का वास्तविक आधार कहते हैं। आगमन की वास्तविक सत्यता निरीक्षण और प्रयोग पर निर्भर करती है, इसलिए ये आगमन के वास्तविक आधार कहलाते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 16.
निरीक्षण और प्रयोग में प्रकार का भेद नहीं बल्कि मात्रा का है, विवेचन करें। अथवा, निरीक्षण और प्रयोग में अन्तर बताएँ। अथवा, निरीक्षण की तुलना प्रयोग से करें।
उत्तर:
निरीक्षण और प्रयोग आगमन के वास्तविक आधार हैं। दोनों के द्वारा आगमन की वास्तविक सत्य निर्धारित होती है। निरीक्षण की विशेषतापूर्ण अवस्था ही प्रयोग है। दोनों मिलकर आगमन के तथ्य की पूर्ति करते हैं फिर भी दोनों में कुछ मुख्य अंतर हैं।

1. निरीक्षण प्राकृतिक है जबकि प्रयोग कृत्रिम है। जो घटना जिस रूप में प्रकृति में घटती है उसे उसी रूप में देखते हैं। घटनाओं में हेर-फेर नहीं करते हैं। जैसे – प्रयोगशाला में बिजली, बादल, पानी कृत्रिम ढंग से बनाते हैं। आकाश में बादल, नक्षत्र, चाँद-सितारों का देखना निरीक्षण है, अतः निरीक्षण प्राकृतिक है, जबकि प्रयोग कृत्रिम है।

2. निरीक्षण में हम प्रकृति के दास रहते हैं, परन्तु प्रयोग में ऐसी बात नहीं है। निरीक्षण में हमें प्रकृति पर निर्भर करना पड़ता है। जब प्रकृति में घटना घटेगी तब हम निरीक्षण कर सकते हैं। प्रकृति में जब चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, भूकम्प होगा तब ही हम उन घटनाओं का निरीक्षण कर सकते हैं। अतः यहाँ हम प्रकृति के दास बने रहते हैं। लेकिन प्रयोग में घटना को उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ हमारे नियंत्रण में रहती हैं। इसलिए इच्छानुसार घटना को उत्पन्न करते हैं। हम प्रकृति पर निर्भर नहीं रहकर प्रकृति को ही प्रयोग के अधीन रखते हैं।

3. निरीक्षण में हम परिस्थितियों को उत्पन्न नहीं करते हैं। परिस्थितियाँ प्रकृति के द्वारा प्रदान की जाती हैं। जिस वातावरण में घटना घटती है, उसी वातावरण और परिस्थिति में घटना का निरीक्षण करना पड़ता है, किन्तु प्रयोग में परिस्थितियों और वातावरण को कृत्रिम ढंग से उत्पन्न किया जाता है। अतः निरीक्षण और प्रयोग में अंतर परिस्थितियों को उत्पन्न करने के विषय में है। निरीक्षण में परिस्थिति प्राकृतिक है, परन्तु प्रयोग में परिस्थिति कृत्रिम है।

4. निरीक्षण में हम घटना को पाते हैं, परन्तु प्रयोग में घटना को बनाते हैं (Observa tion is finding fact an experiment is making one)

5. निरीक्षण में प्रासंगिक परिस्थिति को अप्रासंगिक परिस्थिति से अलग नहीं कर सकते हैं। प्रयोग में परिस्थिति को अप्रासंगिक परिस्थिति से अलग कर घटना का अध्ययन करते हैं।

6. बेकन का कथन है कि प्रयोग में हम प्रकृति से प्रश्न पूछते हैं।

7. स्टॉक साहब का कथन है कि निरीक्षण निष्क्रिय है और प्रयोग सक्रिय है। निष्क्रिय इसलिए कहा जाता है कि निरीक्षणकर्ता प्रकृति की घटनाओं को घटते हुए मात्र देखता है। उसे घटना को उत्पन्न करने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता है। प्रयोग में सक्रिय इसलिए रहना पड़ता है कि घटना को उत्पन्न करना पड़ता है। उत्पन्न करने में स्वाभाविक है कि प्रयोगकर्ता को सक्रिय रहना पड़ता है।

8. निरीक्षण और प्रयोग में अंतर है कि निरीक्षण प्रयोग से पहले आता है। निरीक्षण के द्वारा जिस सत्य का पता लगता है उसे ही प्रयोग के द्वारा परीक्षण करते हैं, अर्थात् सत्यापन करते हैं। फिर भी इतना अन्तर होते हुए भी तार्किकों ने कहा कि दोनों में प्रकार का नहीं, मात्रा का भेद है। दोनों में जो अन्तर दिखाये गए हैं वे सही नहीं हैं। निरीक्षण को प्राकृतिक और प्रयोग को कृत्रिम कहना ठीक नहीं है। दोनों पूर्णतः प्राकृतिक और कृत्रिम नहीं हैं।

निरीक्षण में भी कृत्रिमता की कुछ मात्रा है और प्रयोग में भी प्राकृतिक की कुछ मात्रा है। जब निरीक्षण में यंत्रों-दूरबीन, स्टेथेस्कोप, थर्मामीटर, माइक्रोस्कोप आदि का व्यवहार करते हैं तब निरीक्षण भी कृत्रिम हो जाता है। प्रयोगकर्ता स्वयं कृत्रिम नहीं है। बल्कि प्राकृतिक जीता-जागता बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति है। जिसे हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि प्रकृति प्रदत्त हैं।

अतः प्रयोग शुद्ध रूप से कृत्रिम नहीं है इसमें भी प्राकृतिक व्यक्तियों की सहायता की जाती है। निरीक्षण भी शुद्ध रूप से प्राकृतिक नहीं है। अतः निरीक्षण अधिक प्राकृतिक है और कृत्रिम कम है जबकि प्रयोग अधिक कृत्रिम है और कम प्राकृतिक है। अतः, दोनों में प्रकार का भेद नहीं है, बल्कि मात्रा का भेद है।

स्टाक महोदय का विचार है कि निरीक्षण निष्क्रिय और प्रयोग सक्रिय है। ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। निरीक्षण को निष्क्रिय इसलिए कहा गया है कि इसमें हम कुछ करते नहीं हैं, घटना को मात्र घटते हुए देखते हैं। परन्तु, यह कहना ठीक नहीं है। निरीक्षण में मानसिक रूप से सक्रिय रहना पड़ता है। क्योंकि इसमें चुनाव की क्रिया होती है। पुनः निरीक्षण नियमित और व्यवस्थित क्रिया है। इसके लिए सक्रिय होना जरूरी है। निरीक्षण में ध्यान की क्रिया भी सम्मिलित है। ध्यान स्वयं सक्रिय क्रिया है। इसी तरह कुछ वस्तुओं या घटनाओं के लिए हमें शारीरिक रूप से सक्रिय रहना पड़ता है। जैसे, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण के लिए सचेत रहना पड़ता है।

अतः, निरीक्षण पूर्ण रूप से निष्क्रिय नहीं है और प्रयोग पूर्ण रूप से सक्रिय भी नहीं है। प्रयोग में भी प्रयोगकर्ता चुपचाप बैठकर घटना को घटते हुए देखता है। अतः, प्रयोग अधिक सक्रिय है और कम निष्क्रिय। अतः, दोनों में प्रकार का अन्तर नहीं है, बल्कि मात्रा का है। दोनों में विरोध नहीं है दोनों एक ही जाति की दो उपजातियाँ हैं। निरीक्षण जाति है, Genus है। साधारणतः निरीक्षण तथा प्रयोगात्मक निरीक्षण इसका दो उपजातियाँ हैं जिसे हम प्रयोग कहते हैं। यह वास्तव में विशिष्ट निरीक्षण हैं। निरीक्षण को नियमित कर देते हैं तो वह प्रयोग हो जाता है।

प्रयोग में घटना को इच्छानुसार देखना है “Experiment is nothing but observation of facts under condition produced by the observer at will.” पुनः निरीक्षण प्रयोग में बदल जाता है। जब इच्छानुसार परिस्थितियों में लाते हैं, “Observation passes into experiment when we can manipulates the facts as we like.” अतः, निरीक्षण और प्रयोग में प्रकार का भेद नहीं बल्कि मात्रा का है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 2 अवलोकन एवं प्रयोग

प्रश्न 17.
प्राकृतिक समरूपता नियम की व्याख्या करें। इसे आगमन का आकस्मिक आधार क्यों कहा जाता है? इसकी महत्ता का वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन का लक्ष्य एक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करना है जिसमें वास्तविक सत्यता पायी जाए। आगमन में आजीवन सत्यता का अर्थ है उन व्यापक नियमों का पाना जिनके द्वारा हम पूर्णव्यापी वास्तविक वाक्य की स्थापना करते हैं। उन नियमों के रूप में प्राकृतिक समरूपता नियम (Law of use formality of Nature) की सहायता लेते हैं। यह एक मूल सिद्धान्त है इसकी परिभाषा नहीं दी जा सकती है। बल्कि व्याख्या की जा सकती है। इस व्याख्या में प्राकृतिक समरूपता नियम के निम्नलिखित रूप पाते हैं।

(क) प्रकृति एकरूप है (Nature is uniform) अर्थात् प्रकृति की घटनाएँ एक समान घटती हैं।

(ख) प्रकृति में समान घटनाएँ घटती है (Same events happen in the Nature) आज जिस तरह की घटना घटती है उसी तरह की घटना भविष्य में भी घटेगी।

(ग) भविष्य अतीत के समान होगा (The future will reseneble the past) भूतकाल में जो घटनाएँ घटती हैं, वे भविष्य में भी घटेगी। भूत, वर्तमान और भविष्य में एक मेल पाया जाता है।

(घ) प्रकृति अपनी पुनरावृत्ति करती है (Nature repeats it self) एक तरह की घटना बार-बार घटती हुई दिखाई पड़ती है।

(ङ) अज्ञात ज्ञात के बाद होता है (The unknown is like the known) प्राकृतिक घटनाएँ जो घट चुका है वे तो ज्ञात हैं; किन्तु उसके आधार पर अज्ञात को जान सकते हैं।

(च) ब्रह्माण्ड नियमों द्वारा संचालित हैं (The universe is governed by laws) सारा ब्रह्माण्ड नियमों से संचालित होता है सूर्य, चाँद, ग्रह, ऋतु, तारे, पृथ्वी सभी नियमों में बँधे हुए

(छ) समानकारण से समान कार्य पैदा होता है (The same cause will produce the same effect) इसका अर्थ है कि जिस कारण से जो घटना घटती है घटती रहेगी। प्रकृति में जो घटनाएँ घटेगी वह नियमबद्ध मनमाने ढंग से अंधी घटनाएँ नहीं घट सकती हैं। विभिन्नता इस रूप में नहीं हो तो यही प्राकृतिक समरूपता नियम है।

(ज) जो अनुपस्थित है वह उपस्थित के बराबर है। (The absent is like the present) अर्थात् जो घटना या वस्तु आज अनुपस्थित है, वह समान परिस्थिति में उपस्थिति अवश्य होती है। इस तरह का विश्वास जिस आधार पर चलता है, उसे ही प्राकृतिक नियम कहते हैं।

इन सभी विभिन्न व्याख्याओं का एक ही निचोड़ है कि प्रकृति समान परिस्थिति में समान रूप से व्यवहार का कार्य करती है। (Nature behaves in the same way under similar circumstances) इस तरह प्राकृतिक समरूपता नियम की व्याख्या भिन्न-भिन्न रूपों में की गईं हैं जिसका अर्थ स्पष्ट है कि समान कारण समान कार्य को उत्पन्न करता है। (Same cause will produce same effect) जैसे आग में गर्मी, वर्षा में ठंढक, पानी से प्यास बुझाना, जाड़े के दिनों में जाड़ा, गर्मी के मौसम में गर्मी आदि प्राकृतिक घटनाएँ बिल्कुल नियमित रूप से पायी जाती हैं।

इसलिए तार्किकों ने कह डाला कि “प्रकृति में कोई सनक नहीं है। (There is no such thing as whim or caprice in Nature) इसका समर्थन कुमारी स्टेविंग भी करती हैं। “प्रकृति में जो कुछ भी होता है वह नियमानुकूल होता है और ये नियम इस तरह के होते हैं कि इनका पता लगाया जा सकता है। (What happens, happens in accordance with laws and there laws all such that we can discover them”) प्राकृतिक समरूपता नियम की सत्यता पर कुछ लोग संदेह करते हैं जिसमें पहली आपत्ति है-जब प्रकृति की घटनाएँ एक समान घटती हैं तो कभी कड़ी धूप, कभी भूकंप, कभी गर्मी, कभी खूब वर्षा, कभी कम वर्षा, कभी अकाल, कभी सुखाड़, तो कभी बाढ़ और कभी वे एक दम नहीं पाए जाते हैं।

1934 ई. में बिहार में भूकंप हुआ फिर नहीं हुआ ऐसा क्यों? अतः, प्रकृति में समरूपता नहीं है। Mill साहब कहते हैं कि कोई भी मनुष्य इस बात पर विश्वास नहीं करता है कि इस वर्ष जैसी अच्छी वर्षा और ऋतु हुई आगामी वर्षों में भी ऐसी ही बात पायी जाएगी…कोई भी यह आधार नहीं रखता है कि प्रत्येक रात में मनुष्य एक ही तरह का स्वप्न देखता रहेगा…वस्तुतः प्रकृति की गति केवल एक रूप नहीं बल्कि भिन्न भी है। इसी तरह Carveth Read भी कहते हैं कि-“विभिन्न प्रकार से प्रकृति एक रूप नहीं प्रतीत होती है। वस्तुओं के गुण, आकार, रंग आदि में विभिन्नता पायी जाती है। जलवायु तो अनिश्चित होती है-यहाँ तक कि व्यवसाय और राजनीतिक की घटनाएँ भी एक समान नहीं होती हैं। अतः, प्रकृति में समरूपता पाया जाना असंभव है।

इसका उचित उत्तर है कि ये आपत्तियाँ बेकार हैं। प्रकृति इतना विशाल है कि इसमें विभिन्नताओं का होना जरूरी है। प्रकृति समान परिस्थिति में एक समान व्यवहार करती है (Nature acts or behaves in the same way under similar circumstances”)। भूकंप जिस कारण से 1934 में आया था वही कारण यदि पैदा हो गया तो भूकंप होगा। इसका अर्थ है प्राकृतिक समरूपता अर्थात् कार्य-कारण की समरूपता। प्रकृति के कारण जटिलता ज्ञात नहीं होते हैं। सभी घटनाएँ नियमित और कारणवश ही होती हैं।

दूसरी आपत्ति है कि प्रकृति में कोई एक समरूपता नहीं बल्कि बहुत-सी समरूपताएँ हैं। ऐसा Bain साहब कहते हैं कि The course of the world is not a uniformity but uniformities. प्रकृति में भिन्न-भिन्न नियम हैं नदी, जंगल, पहाड़, कीड़े और मनुष्य में अनेक अलग-अलग नियम हैं और इस तरह नियमों की संख्या भी असंख्य हैं। हमारे सामने आपत्ति के रूप में प्रश्न है कि नियम एक नहीं अनेक हैं। यह झगड़ा एक वचन और बहुवचन का है। दर्पण में तो अनेकताओं में एकता पाना साधारण-सी बात है (One in many) प्राकृतिक का क्षेत्र बहुत ही विशाल और जटिल है। हम उसे संपूर्णता में नहीं जान सकते हैं। उससे कई विभागों में बाँटकर ही उसे उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए एक नियम के अंतर्गत ही अनेक नियम उपनियम बना लेते हैं। प्रकृति में समरूपताएँ बाह्रा हैं वास्तव में समरूपता ही है जिसे Ram of uniformity of Nature कहते।

बेल्टन के अनुसार भी प्रकृति, समरूपता में विविधता एवं अनेकता के लिए स्थान है। महत्त्व-प्रकृति समरूपता को आगमन का आधार माना गया है। इसका महत्त्व इतना अधिक है कि इसे बिना माने आगमन की क्रिया संभव ही नहीं है। आगमन में ‘कुछ’ से ‘सब’ की ओर गणना, भविष्य की गारंटी कहाँ से मिलती हैं? प्राकृतिक समरूपता नियम में विश्वास के आधार पर ही सामान्यीकरण करते हैं। विश्वास पर ही निरीक्षित से अनिरीक्षित की ओर जाते हैं। मिल ने भी इसकी महत्ता स्वीकारा है। विज्ञान भी प्राकृतिक समरूपता नियम पर ही आधारित है। इसी पर आगमन और विज्ञान की क्रियाएँ संभव है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

Bihar Board Class 11 Philosophy प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जिस वाक्य में उद्देश्य विधेय पद की गुणवाचकता को व्यक्त न कर उद्देश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देता है, कहलाता है –
(क) यथार्थ वाक्य
(ख) शाब्दिक वाक्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थ वाक्य

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 2.
जिस वाक्य में विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता (Connotation) को व्यक्त करता है, उसे कैसा वाक्य कहते हैं?
(क) शाब्दिक वाक्य
(ख) यथार्थ वाक्य
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) शाब्दिक वाक्य

प्रश्न 3.
आगमन का सार (Essence of induction) है –
(क) आगमनात्मक कूद
(ख) सामान्य वाक्य की स्थापना
(ग) (क) एवं (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) आगमनात्मक कूद

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 4.
यथार्थ वाक्य क्या है?
(क) उद्देश्य के सम्बन्ध में नया ज्ञान देनेवाला
(ख) विधेय में उद्देश्य पद की गुणवाचकता को व्यक्त करनेवाला
(ग) विधेय में उद्देश्य पद की गुणवाचकता को व्यक्त नहीं करनेवाला
(घ) (क) एवं (ख) दोनों
उत्तर:
(घ) (क) एवं (ख) दोनों

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) के मुख्य लक्ष्य क्या हैं?
(क) यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना
(ख) वैज्ञानिक पद्धति का अवलोकन
(ग) यथार्थ व्यापक वाक्य को परिभाषित करना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 6.
“विद्वान का सम्बन्ध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि अध्ययन विषय से” यह कथन किसका है?
(क) कार्ल पियर्सन
(ख) डिल्थे
(ग) गुडे एवं हाट
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कार्ल पियर्सन

प्रश्न 7.
प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान का लक्ष्य है –
(क) एक
(ख) अनेक (भिन्न)
(ग) एक-दूसरे का विरोध
(घ) एक-दूसरे का पूरक
उत्तर:
(क) एक

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 8.
कुछ विशेष उदाहरणों के आधार पर पूर्णव्यापी नियम का यथार्थ अनुमान ही आगमन (Induction) है। यह कथन किसका है?
(क) ज्वाइस (Joyce)
(ख) फाउलर (Fowler)
(ग) मिल (Mill)
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ज्वाइस (Joyce)

प्रश्न 9.
वैज्ञानिक आगमन की विशेषताएँ हैं –
(क) किसी वाक्य की स्थापना करता है
(ख) विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है
(ग) इसमें आगमनात्मक छलाँग (Inductive leap) होता है
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 10.
सरल गणनामूलक आगमन (Induction per simple Enumeration) में अभाव होता है –
(क) कारण-कार्य नियम का
(ख) प्रकृति समरूपता सिद्धान्त का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) कारण-कार्य नियम का

प्रश्न 11.
आगमन एवं सरल गणनामूलक आगमन के आधार में अंतर है –
(क) सिर्फ कारण कार्य नियम का
(ख) प्रकृति समरूपता सिद्धान्त का
(ग) दोनों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) सिर्फ कारण कार्य नियम का

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 12.
“तर्कशास्त्र” (Logic) तर्क करने की कला एवं विज्ञान दोनों हैं, यह किसने कहा था?
(क) हेटली (Whately) ने
(ख) हैमिल्टन (Hamilton) ने
(ग) थॉमसन (Thomson) ने
(घ) मिल (Mill) ने
उत्तर:
(क) हेटली (Whately) ने

प्रश्न 13.
निगमन एवं आगमन का लक्ष्य –
(क) समान है
(ख) भिन्न है
(ग) एक-दूसरे का विरोधी है
(घ) एक-दूसरे का पूरक है
उत्तर:
(घ) एक-दूसरे का पूरक है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 14.
“तर्कशास्त्र विचार के आकार सम्बन्धी विषयों का विज्ञान है।” तर्कशास्त्र की यह परिभाषा किसने दी?
(क) ए. सी. मित्रा
(ख) जे. एस. मिल
(ग) थॉमसन
(घ) हैमिल्टन
उत्तर:
(घ) हैमिल्टन

प्रश्न 15.
“तर्कशास्त्र तर्क करने की कला है।” यह परिभाषा किसने दी है?
(क) हेटली ने
(ख) यूबरबेग
(ग) जे. एस. मिल ने
(घ) एल्ड्रीच ने
उत्तर:
(घ) एल्ड्रीच ने

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 16.
तर्कशास्त्र के अध्ययन का विषय है:
(क) साक्षात् ज्ञान
(ख) परोक्ष ज्ञान
(ग) आध्यात्मिक ज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(घ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 17.
तर्कशास्त्र का सम्बन्ध –
(क) वास्तविक सत्यता से है
(ख) आकारिक सत्यता से
(ग) दोनों से है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) दोनों से है

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 18.
वास्तविक (Material Truth) का अर्थ है?
(क) विचारों का बाह्य पदार्थ से संगति
(ख) विचारों की संगति
(ग) उपर्युक्त दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) विचारों का बाह्य पदार्थ से संगति

Bihar Board Class 11 Philosophy प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Science’ की उत्पत्ति किस मूल शब्द से हुई है?
उत्तर:
विज्ञान का अंग्रेजी रूपान्तर Science का मूल शब्द लैटिन भाषा का ‘Scientia’ है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान या Knowledge।

प्रश्न 2.
आगमनात्मक कूद क्या है? अथवा, आगमनात्मक छलांग (Inductive leap) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आगमनात्मक कूद (Inductive leap) आगमन का सार (essernce of induction) है। ‘कुछ’ को देखकर जब हम ‘सभी’ के बारे में कहते हैं तो यही आगमनात्मक छलांग है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 3.
वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) का मुख्य लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
यथार्थ व्यापक वाक्य की स्थापना करना वैज्ञानिक आगमन का प्रमुख लक्ष्य है।

प्रश्न 4.
शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में विधेय पद की गुणवाचकता (Connotation) को व्यक्त करता है उसे शाब्दिक (Verbal) वाक्य कहते हैं। इस वाक्य से कोई नया ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जैसे-सभी मनुष्य मरणशील होते हैं।

प्रश्न 5.
यथार्थ (real) वाक्य किसे कहते हैं?
उत्तर:
जिस वाक्य में विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को नहीं व्यक्त करता है बल्कि उद्देश्य के सम्बन्ध में कोई नया ज्ञान देता है उसे यथार्थ (real) वाक्य कहते हैं। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील होते है’ – यह एक वास्तविक वाक्य है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 6.
वैज्ञानिक पद्धति (Scientific method) का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
घटनाओं को समझाना, उनसे संबद्ध सामान्य सिद्धान्तों का निरूपण करना वैज्ञानिक पद्धति के उद्देश्य हैं, इसके साथ ही भविष्यवाणी एवं नियंत्रण भी वैज्ञानिक पद्धति के उद्देश्य हैं।

प्रश्न 7.
विज्ञान क्या है? अथवा, विज्ञान की परिभाषा दें।
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा क्रमबद्ध रूप से ज्ञान का संग्रह ही विज्ञान है।

प्रश्न 8.
वैज्ञानिक आगमन की परिभाषा दें।
उत्तर:
विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के पश्चात् कारण-कार्य नियम एवं प्रकृति-समरूपता के वल पर आगमनात्मक कूद लेकर यथार्थ (सामान्य) वाक्य की स्थापना को वैज्ञानिक आगमन कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 9.
अवैज्ञानिक आगमन (Unscientific Induction) किसे कहते हैं? अथवा, सरल गणनात्मक आगमन (Induction per simple Enumeration) की परिभाषा दें।
उत्तर:
विशेष उदाहरण के निरीक्षण के पश्चात् अखंडित अनुभव तथा प्रकृति-समरूपता नियम के आधार पर बिना कारण-कार्य सम्बन्ध को जानते हुए जब यथार्थ सामान्य वाक्य की स्थापना की जाती है तो उसे अवैज्ञानिक या सरल गणनात्मक आगमन कहते हैं।

प्रश्न 10.
किसने कहा कि “विज्ञान का संबंध वैज्ञानिक पद्धति से है न कि अध्ययन विषय से”?
उत्तर:
यह कथन कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) का है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निगमन एवं आगमन में कौन अधिक मौलिक है? वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों के मत की विवेचना करें।
उत्तर:
मिल, बेन आदि वस्तुवादी तर्कशास्त्रियों के मत में निगमनात्मक अनुमान के लिए, कम-से-कम एक सामान्य (universal) वाक्य की आवश्यकता पड़ती है और इस सामान्य वाक्य की स्थापना आगमन को आधार प्रदान करता है। आगमन के द्वारा ही सामान्य नियम की स्थापना होती है और निगमन केवल इसी नियम को व्यक्तिविशेषों पर लागू करता है। जब आगमन के द्वारा यह सामान्य वाक्य स्थापित हो जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं, तो निगमन इसे राम, मोहन आदि व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके कहता है कि राम भी मनुष्य होने के नाते मरणशील है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आगमन ही अधिक मौलिक (fundamental) है और निगमन गौण (secondary)।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 2.
“निगमन आगमन का पूर्ववर्ती है।” विवेचना करें।
उत्तर:
जेवन्स (Jevons) के अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है। इसकी पुष्टि के लिए इन्होंने अपना तर्क इस प्रकार दिया है-आगमन में सामान्य नियम स्थापित किया जाता है। इसके लिए प्राक्कल्पना का सहारा लेकर सामान्यीकरण कर दिया जाता है। किन्तु, बिना जाँच या परीक्षा के कोई सामान्य नियम नहीं बन जाता। प्राक्कल्पना को सत्य मानकर उससे संभावित निष्कर्ष निकालते हैं और इन निष्कर्षों की जाँच वास्तविक घटनाओं से करते हैं। यदि ये निष्कर्ष इन यथार्थ घटनाओं के अनुकूल होते हैं तो हम अपनी प्राक्कल्पना को सही मान लेते हैं। यदि ये अनुकूल या संगत नहीं होते, तो प्राक्कल्पना असत्य सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार, निगमन द्वारा ही प्राक्कल्पना की परीक्षा करके आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसीलिए, निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती कहा जाता है।

प्रश्न 3.
“निगमन अवरोही क्रिया है और आगमन आरोही क्रिया।” बेकन के इस मत की व्याख्या करें।
उत्तर:
बेकन ने निगमन को ‘उतरनेवाली क्रिया’ (descending process) और आगमन को ‘चढ़नेवाली क्रिया’ (ascending process) कहा है। निगमन में सामान्य से विशेष निष्कर्ष निकालते हैं। इसमें हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर आते हैं। जैसे, सभी मनुष्यों को मरणशील पाकर राम को मनुष्य होने के नाते मरणशील बताते हैं। इसीलिए निगमन को उतरने की क्रिया कहा जाता है। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के द्वारा सामान्य नियम की स्थापना की जाती है।

इसमें कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर (from less general to more general) जाते हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत पर चढ़कर वहाँ से हमें नीचे का सामान्य रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार आगमन के निष्कर्ष पर पहुँचते ही हमें एक सामान्य नियम दृष्टिगोचर होता है। ज्यों-ज्यों पर्वत से नीचे उतरने लगते हैं, त्यों-त्यों विशेष पर नजर पड़ने लगती है। इसलिए निगमन को उतरनेवाली क्रिया और आगमन को चढ़नेवाली क्रिया कहा गया है।

प्रश्न 4.
“आगमन और निगमन एक-दूसरे में समाविष्ट हैं।” विवेचना करें।
उत्तर:
जेवन्स के अनुसार आगमन विधि का अंत सत्यापन या जाँच में होता है। इसीलिए, ये निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती मानते हैं। इसके विपरीत, मिल के अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण अंतिम सोपान है और इसके लिए परीक्षा या जाँच की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी कारण इन्होंने आगमन को निगमन का पूर्ववर्ती कहा है। निगमन और आगमन में वस्तुतः न तो कोई पूर्ववर्ती है और न कोई अनुवर्ती। दोनों में परस्पर विरोध का संबंध नहीं है। दोनों परस्पर पूरक हैं। इनके बीच कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। दोनों में परस्पर सहयोग अपेक्षित है। इसलिए, यह कहा गया है कि “दोनों एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं।” (Both run into each other)

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 5.
निगमन और आगमन का भेद सिद्धान्त का नहीं बल्कि आरंभ बिन्दु का है। इस कथन की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
किसी भी विषय का अध्ययन दो तरीके से किया जा सकता है – विश्लेषणात्मक एवं संश्लेषणात्मक तरीके से। निगमन में हम विश्लेषणात्मक विधि को अपनाते हैं और आगमन में संश्लेषणात्मक विधि का सहारा लेते हैं। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य वाक्य की स्थापना करते हैं, जो सत्यापित होने के बाद सामान्य नियम बन जाते हैं। निगमन में सामान्य नियम का विश्लेषण कर उसे विशेष उदाहरणों पर लागू किया जाता है। दोनों विधियों के संयोग एवं सहयोग से ही पूर्ण तत्व का ज्ञान होता है इसलिए यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि आगमन और निगमन दोनों का लक्ष्य एक है, परंतु दोनों के आरंभ बिन्दु में भिन्नता है।

प्रश्न 6.
फाउलर किस प्रकार आगमन और निगमन में भेद करते हैं?
उत्तर:
फाउलर ने आगमन और निगमन में भेद इस आधार पर किया है कि आगमन में हम कार्य से कारण की ओर जाते हैं और निगमन में कारण से कार्य की ओर। आगमन में घटनाविशेष का निरीक्षण करके इसका कारण बताते हैं। इसीलिए आगमन में कार्य से कारण की ओर जाने की बात कही गई है। निगमन में सामान्य नियम यानी कारण से विशेष (कार्य) निष्कर्ष प्राप्त करते हैं। इसलिए निगमन में कारण से कार्य की ओर जाने की बात कही गई है। फाउलर के मत की आलोचना-फाउलर का कहना सही नहीं है। आगमन में केवल कार्य से कारण का पता नहीं लगाया जाता। आगमन में हम दोनों तरफ बढ़ सकते हैं। कार्य ज्ञात रहने पर उसके कारण का पता लगाया जा सकता है और कारण ज्ञात रहने पर आगमन के द्वारा कार्य का भी पता लगाया जा सकता है। अतः, यह कहना भूल है कि आगमन द्वारा केवल कार्य से कारण का पता लगाया जाता है।

प्रश्न 7.
आगमन और निगमन के संबंध में बक्ल के मत की विवेचना करें।
उत्तर:
बक्ल के अनुसार हम आगमन में विशेष तथ्यों से नियमों पर (from facts to laws) जाते हैं और निगमन में नियमों से विशेष तथ्यों पर (from laws to facts) जाते हैं। इसी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है आगमन में वस्तुविशेष (facts) से विचार (ideas) की ओर जाते हैं और निगमन में विचार से वस्तुविशेष का अनुमान लगाया जाता हैं आगमन द्वारा स्थापित नियम सैद्धान्तिक होते हैं और इनका प्रत्यक्ष घटनाविशेषों के द्वारा होता है। किन्तु, हमें इससे यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आगमन के निष्कर्ष केवल सैद्धांतिक या मानसिक होते हैं, यथार्थ नहीं। आगमन के निष्कर्ष यथार्थ होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक सत्यता (material truth) पाई जाती है। निगमन में भी सैद्धांतिक या मानसिक तत्त्व पाए जाते हैं, जिस प्रकार आगमन में यथार्थता के तत्त्व रहते हैं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 8.
आगमन तर्कशास्त्र में ‘आगमनात्मक छलांग’ का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
आगमन तर्कशास्त्र में आगमनात्मक छलांग का बहुत अधिक महत्व है। आगमनात्मक छलांग (inductive leap) में हम ज्ञात से अज्ञात की ओर अथवा कुछ से सब की ओर पहुँचते हैं और यथार्थ वाक्यों की स्थापना करते हैं। आगमनात्मक छलांग के द्वारा ही हम कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। यदि आगमनात्मक छलांग नहीं लगाई जाए तो यथार्थ व्यापक वाक्यों की स्थापना नहीं हो पाएगी।

‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ में मनुष्य जाति के कुछ ही उदाहरणों के आधार पर संपूर्ण मनुष्य जाति के संबंध में जो निष्कर्ष निकाला गया है वह आगमनात्मक छलांग द्वारा ही संभव है। यद्यपि इस छलांग में जोखिम की संभावना रहती है तथापि तर्कशास्त्रियों ने इसे आगमन का प्राण (Essence of Induction) कहा है। जब आगमनात्मक छलांग का निष्कर्ष प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम द्वारा सत्यापित हो जाता है तो कोई भी खतरा नहीं रह जाता। आगमन तर्कशास्त्र में आगमनात्मक छलांग का महत्व मुख्य और सार रूप से इसलिए है कि इसके कारण कुछ निरीक्षित उदाहरणों के आधार पर अनिरीक्षित उदाहरणों के संबंध में सभी सामान्य निष्कर्ष निकल जाता है जो वर्तमान के लिए ही नहीं बल्कि भूत और भविष्य के लिए भी सत्य होता है।

प्रश्न 9.
आगमन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
आगमन का मुख्य उद्देश्य है नए सत्य की खोज करना अर्थात् ज्ञात के आधार पर अज्ञात के संबंध में अथवा ‘कुछ’ के आधार पर ‘सब’ के संबंध में नया ज्ञान प्राप्त करना। संसार में तरह-तरह की वस्तुएँ हैं-ये सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से असंबंधित प्रतीत होती हैं, परन्तु वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। सभी वस्तुएँ नियमित हैं। इन वस्तुओं के अपने-अपने नियम हैं। मनुष्य जगत्, वनस्पति जगत्, पशुजगत्, सभी के अपने-अपने निश्चित नियम हैं जिनके द्वारा ये संचालित होते हैं। आगमन का उद्देश्य है वैसे निष्कर्ष-वाक्य को सत्यापित करना जो प्रकृति-समरूपता नियम के पहल कुलतः ज्ञान एवं इसमें सतत् वान इसके अंतर्गत साथ-साथ कारण-कार्य नियम पर भी आधारित होता हो अथवा जिनका सामान्यीकरण इन दोनों नियमों के आधार होता हो।

संसार में प्रत्येक वस्तु की जाति या वर्ग में एक सामंजस्य है, एक निश्चित व्यवस्था है – आगमन का मुख्य उद्देश्य है इसी सामंजस्य और निश्चित व्यवस्था के नियमों की खोज करना तथा उनके आधार पर निष्कर्ष वाक्यों को प्रमाणित करना। आगमन अपने इसी मुख्य उद्देश्य के द्वारा एक तरफ सभी हंसों के (भविष्य में) उजाले होने का संभाव्य बताता है वहीं दूसरी तरफ सभी मनुष्यों के (भविष्य में) मरणशील होने को सत्यापित करता है। आगमन का उद्देश्य है तरह-तरह के यथार्थ सामान्य वाक्यों की स्थापना करना और अंततः कारण-कार्य के आधार पर उनकी त्रैकालिक सत्यता को प्रमाणित करना।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 10.
विज्ञान क्या है? अथवा, विज्ञान (Science) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हिन्दी के ‘विज्ञान’ शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर ‘Science’ मूल शब्द लैटिन भाषा का ‘Scientia’ है जिसका अर्थ ज्ञान यानि Knowledge होता है। इस प्रकार, विज्ञान ज्ञान से संवद्ध है। इसलिए पद्धतिशास्त्री गुडे एवं हाट ने विज्ञान को एक ‘व्यवस्थित ज्ञान’ के रूप में परिभाषित किया है। विज्ञान के अर्थ के संबंध में दो प्रकार की वैचारिक धारणाएँ हैं। वे हैं स्थिर विचार एवं गत्यात्मक विचार। स्थिर विचार के अनुसार विज्ञान एक ऐसी क्रिया है जिससे विश्व की क्रमबद्ध सूचना प्राप्त होती है।

इस दृष्टि से विज्ञान एक व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान है। गत्यात्मक विचार (Dynamic View) के अनुसार, विज्ञान एक क्रिया है, एक पद्धति है, जो वैज्ञानिकों द्वारा संपादित की जाती है। इसके अंतर्गत न केवल ज्ञान की वर्तमान स्थिति पर बल दिया गया है, बल्कि इसमें सतत् वृद्धि एवं निरंतरता पर जोर दिया गया है। मूलतः ज्ञान एवं वैज्ञानिक गतिविधि, जिसके आधार पर ज्ञान का संचय होता है, विज्ञान के पहलू हैं। विज्ञान ज्ञान का संचय भी है और एक निश्चित विधि या पद्धति भी है। ये दोनों पक्ष अंतः सम्बन्धित हैं। विज्ञान का संबंध ऐसे ज्ञान से है, जिसका संचय व्यवस्थित, नियंत्रित एवं आनुभविक ढंग से किया जाता है। वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता एवं आनुभाविकता विज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 11.
यथार्थ वाक्य से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जिस व्यापक अथवा सामान्य वाक्य (general proposition) में विधेय (Predi cate) उद्देश्य (Subject) पद की गुणवाचकता (connotation) को प्रकट नहीं करता है बल्कि उद्देश्य के संबंध में नया ज्ञान देता है, उसे यथार्थ वाक्य कहते हैं। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक यथार्थ वाक्य है, क्योंकि इसमें विधेय’ (मरणशीलता) अपने ‘उद्देश्य’ (मनुष्य) के संबंध में नया ज्ञान देता है। दूसरी तरफ यदि हम यह कहें कि ‘सभी मनुष्य विवेकशील होते हैं तो यह यथार्थ वाक्य नहीं है, क्योंकि इसमें विवेकशीलता’ ‘मनुष्य’ पद के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं देता है।

‘विवेकशीलता’ तो ‘मनुष्य पद में ही निहित है, क्योंकि ‘मनुष्य’ पद का सार गुण ‘विवेकशीलता’ है, जिसे मनुष्य पद की गुणवाचकता (connotation) कहते हैं। चूँकि उपर्युक्त वाक्य (सभी मनुष्य मरणशील हैं) में ‘मरणशीलता’ ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता को व्यक्त न कर इसके संबंध में नया ज्ञान देता है, इसलिए यह यथार्थ वाक्य है।

‘सभी मनुष्य विवेकशील होते हैं। एक शाब्दिक वाक्य है, क्योंकि ‘विवेकशीलता’ मनुष्य के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं है। शाब्दिक वाक्य की स्थापना आगमन नहीं करता बल्कि यह ऐसे वाक्य की स्थापना करता है जिसमें विधेय अपने उद्देश्य के संबंध में नया ज्ञान देता है और जिसे यथार्थ वाक्य कहते हैं। जिस अनुमान से ज्ञान की वृद्धि होती है उसे आगमनात्मक अनुमान कहते हैं और इसीलिए यथार्थ वाक्य की स्थापना आगमनात्मक अनुमान द्वारा होती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 12.
कारण-कार्य-नियम किस प्रकार वैज्ञानिक आगमन का मुख्य आधार है?
उत्तर:
कारण-कार्य-नियम वैज्ञानिक आगमन का मुख्य आधार इसलिए है क्योंकि आगमन का निष्कर्ष मुख्य रूप से कारण-कार्य-नियम द्वारा ही सत्यापित होता है। सभी आगमनों में वैज्ञानिक आगमन को सबसे अधिक सत्य इसलिए माना गया है क्योंकि इसका सामान्य वाक्य कारण-कार्य-नियम पर आधारित होता है। मनुष्य और मरणशीलता में कारण-कार्य का संबंध है; क्योंकि ‘मनुष्य’ होना ही ‘मरणशीलता’ का कारण है।

यदि मनुष्य होना मरणशीलता का कारण है तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यदि भविष्य में भी मनुष्य रहेगा तो वह मरणशील होगा। वैज्ञानिक आगमन का सामान्य वाक्य ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ जब प्रकृति-समरूपता नियम के द्वारा सत्यापित होता है, तब भी यह अवैज्ञानिक ही रह जाता है क्योंकि तबतक निष्कर्ष की सत्यता संभाव्य रहती है।’ परंतु, जब इसका सामान्य वाक्य कारण-कार्य नियम द्वारा सत्यापित हो जाता है, कि मनुष्य होना ही मरणशीलता का कारण है तो यह पूर्ण वैज्ञानिक हो जाता है। इस प्रकार कारण-कार्य-नियम वैज्ञानिक आगमन की मुख्य आधार है।

प्रश्न 13.
अव्याघातक अनुभव क्या है?
उत्तर:
आज तक जो बात सत्य होती आयी है और उसका कोई भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है तो विरोधी उदाहरण का नहीं मिलन अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experi ence) कहलाता है जिसके सहारे अनुमान कर लिया जाता है कि यह बात भविष्य में भी सत्य रहेगी। सरल परिगणनात्मक आगमन अथवा अवैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष अव्याघातक अनुभव ही आधारित होता है। अव्याघातक अनुभव पर आधारित वाक्य प्रकृति-समरूपता नियम द्वारा तो सत्य सिद्ध होते हैं, परंतु कारण-कार्य नियम के अभाव में कारण संभाव्य साबित होते हैं अर्थात् निष्कर्ष के संबंध में निश्चितता नहीं रहती कि यह भविष्य में भी सत्य रहेगा या नहीं।

जैसे – सभी काग काले होते हैं अव्याघातक अनुभव पर आधारित निष्कर्ष है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार यह संभावना रहती है कि भविष्य में सभी काग काले ही होंगे, परंतु इस निष्कर्ष के साथ कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण यह सत्यापित नहीं हो पाता कि भविष्य में काग अवश्य ही काले ही दिखाई पड़ेंगे अथवा होंगे। अतः, अव्याघातक अनुभव पर आधारित यथार्थ सामान्य वाक्य का निष्कर्ष भविष्य में सत्य भी हो सकता है और असत्य भी। अव्याधातक अनुभव पर आधारित निष्कर्ष की सत्य में निश्चितता नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक माना गया है। क्योंकि वैज्ञानिक निष्कर्ष की सत्यता में निश्चितता रहती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 14.
मिल के अनुसार आगमन निगमन के पहले आता है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
मिल की यह सुदृढ़ मान्यता है कि आगमन निगमन के पहले आता है। मिल साहब का मत जेवन्स के मत से भिन्न है। इनके अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। इसी कारण ये आगमन को निगमन के पहले रखते हैं। न्याय (syllogism) निगमन का मुख्य रूप है और इसके लिए आधार के रूप में कम-से-कम एक पूर्णव्यापी (universal) वाक्य की आवश्यकता होती है और इस वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा ही होती है। इस प्रकार आगमन ही निगमन को आधार प्रदान करता है। इसलिए यह कहना उचित है कि आगमन निगमन के पहले आता है (Induction is prior to Deduction)।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“तर्कशास्त्र सभी विज्ञानों का विज्ञान है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
डन्स स्कॉटस (Dunsscotus) ने तर्कशास्त्र को सभी विज्ञानों का विज्ञान कहा है (Logic is the science of all sciences) यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है। इसका कारण है कि सभी विज्ञानों की आधारभूत मौलिक मान्यताओं का अध्ययन तर्कशास्त्र में किया जाता है। तर्कशास्त्र की विषय-वस्तु की सहायता से ही विज्ञान को पद्धति को और अधिक सुसंगत बनाया जाता है। इसीलिए विज्ञान को विज्ञान कहा जाता है। अतः प्रत्येक विज्ञान किसी-न-किसी रूप में तर्कशास्त्र पर निर्भर करता है। अतः तर्कशास्त्र विज्ञानों का विज्ञान है। तर्कशास्त्र को सभी विज्ञानों की सामग्री के रूप में भी स्वीकार किया गया है। प्रत्येक विज्ञान को चाहे वह भौतिक हो या प्राकृतिक तर्कशास्त्र की विषय वस्तु की आवश्यकता होती है। इसी विषय वस्तु को आधार मान कर विज्ञान अपना निष्कर्ष निष्पादित करता है।

विज्ञान दो प्रकार के होते हैं। वे है-यथार्थपरक तथा आदर्शपरक। जब किसी पदार्थ को देखकर उसके सम्बन्ध में हू-ब-हू चित्रण प्रस्तुत किया जाता है तब वह यथार्थपरक कहलाता है। इसका सम्बन्ध वस्तु जिस रूप में होती है, उसी से है। यहाँ पर वास्तविक वर्णन होता है, इसलिए यथार्थपरक विज्ञान को है “है (is) विज्ञान” भी कहा जाता है। जैसे-‘कमल’ लाल है’ यानि कमल को हमने जिस रूप में देखा उसे उसी रूप में चित्रित और वर्णित किया। यथार्थपरक विज्ञान में घटनाओं का अध्ययन उसी रूप में किया जाता है जिस रूप में वे घटती हैं। इसे वस्तुपरक विज्ञान भावात्मक विज्ञान या वर्णनात्मक विज्ञान भी कहा जाता है।

दूसरी ओर आदर्शपरक विज्ञान का सम्बन्ध चाहिए से होता है, क्योंकि यह विज्ञान वस्तुओं का स्वरूप “कैसा होना चाहिए” का अध्ययन करता है। यह विज्ञान उस आदर्श को बताता है जिसके अनुरूप वस्तुओं को होना चाहिए। चूँकि इस विज्ञान का संबंध चाहिए (Cought) से है, इसीलिए इसे ‘चाहिए विज्ञान’ भी कहा जाता है। जैसे-‘हमें सत्य बोलना चाहिए’। यह आदर्श का निरूपन करता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि क्या होना चाहिए।

तर्कशास्त्र भी वस्तुतः आदर्शपरक विज्ञान है। यह बताता है कि अनुमान किस प्रकार का होना चाहिए जिससे कि वह सत्य, वास्तविक और यथार्थ हो। वस्तुतः तर्कशास्त्र विज्ञान तथा कला दोनों ही है। विज्ञान और कला में किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है। विज्ञान का संबंध जानने तथा कला का सम्बन्ध करने से है। विज्ञान पदार्थों की वास्तविकता से तथा उसके सुव्यवस्थित ज्ञान से संबंधित है तथा कला इस ज्ञान के द्वारा किसी उद्देश्य की प्राप्ति करती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 2.
सरल परिगणनात्मक आगमन क्यों ‘अपूर्ण आगमन’ कहलाता है? इसे वैज्ञानिक आगमन क्यों नहीं समझा जाता है?
उत्तर:
पूर्ण आगमन के विरोधी अथवा विपरीत अर्थ के रूप में सरल परिगणनात्मक आगमन अपूर्ण आगमन भी कहलाता हैं यह अपूर्ण आगमन इसलिए कहलाता है, क्योंकि इसमें कारण-कार्य सम्बन्ध का अभाव होता है। कारण-कार्य नियम के संबंध नहीं रहने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष निश्चित नहीं होता। ‘सभी काग काले होते हैं’ में यह प्रमाणित होता है कि अबतक जितने भी कौए दिखाई पड़े हैं, सभी काले ही दिखाई पड़े हैं।

प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार भविष्य में भी सभी कौए काले ही दृष्टिगोचर होने चाहिए, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन चूँकि कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं होता, इसलिए भविष्य में सभी कौओं के काले होने की केवल संभावना ही होती है, निश्चितता नहीं। अपूर्ण आगमन वह आगमनात्मक आगमन होता है। जिसमें कुछ ही विशेष उदाहरणों की जाँच के बाद पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना कर दी जाती है। इस तरह के निष्कर्ष अपूर्ण इसलिए कहलाते हैं क्योंकि ये कारण-कार्य सम्बन्ध के ज्ञान पर आधारित नहीं होते। सरल परिगणनात्मक आगमन का तर्क अथवा निष्कर्ष इसी प्रकार का होता हैं।

इसी प्रकार हम कह सकते हैं कि सरल परिगणनात्मक आगमन अपूर्ण आगमन इसलिए होता है कि इसका सामान्यीकरण कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित न होकर अपूर्ण उदाहरणों की गणना पर निर्भर करता है। इसमें पूर्ण आगमन की तरह सभी उदाहरणों की गणना से सामान्यीकरण नहीं किया जाता। चूंकि इसमें कुछ ही उदाहरणों की गणना पर सामान्य यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है, इसलिए इसे अपूर्ण आगमन कहा जाता है।

अत: सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ अपूर्ण आगमन है, क्योंकि वस्तुतः इसमें संसार के सभी हंसों की गणना नहीं की गई है बल्कि कुछ ही हंसों को सफेद देखकर यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ पूर्ण आगमन में पूर्ण उदाहरणों की गणना की जाती है, जैसे-‘सभी विद्यार्थी उपस्थित हैं’ इस सामान्य वाक्य में सभी विद्यार्थियों की गणना की गयी है। अतः सरल परिगणनात्मक आगमन को अपूर्ण आगमन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें पूर्ण आगमन की भाँति सामान्य वाक्य स्थापित करने में सभी उदाहरणों की गणना नहीं की जाती। सरल परिगणनात्मक आगमन को हम वैज्ञानिक आगमन इसलिए नहीं समझते, क्योंकि –

1. यह कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं है (It is not based on a casual connection):
वैज्ञानिक आगमन कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित होता है-यह कारण-कार्य नियम के आधार पर किसी घटना की व्याख्या करता है कि यदि कार्य (effect) है तो उसका कोई-न-कोई कारण अवश्य होगा। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ वैज्ञानिक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य है-इसका विरोधी उदाहरण नहीं मिल सकता क्योंकि मनुष्यता ही मरणशीलता का कारण है अर्थात् मनुष्य जन्म लेगा तो मरेगा अवश्य ही। परन्तु, सरल परिगणनात्मक आगमन कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं होता।

केवल कारण-कार्य नियम के लागू नहीं होने के कारण ही इसका निष्कर्ष वैज्ञानिक नहीं होता। जैसे-“इसके निष्कर्ष ‘सभी काग काले होते हैं’ में ‘काग’ और ‘कालापन’ के बीच कारण-कार्य का सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ‘काग’ का होना ‘कालेपन’ का कारण नहीं है। वैज्ञानिक आगमन में कारण-कार्य का नियम लागू होने के कारण हम निश्चिततापूर्वक कह सकते हैं कि मनुष्य मरता है इसलिए क्योंकि वह जन्म लेता है अर्थात् ‘मृत्यु’ इसलिए है क्योंकि ‘मनुष्य’ है और भविष्य में भी यदि ‘मनुष्य’ रहेंगे तो ‘मृत्यु’ अवश्य ही रहेगी।”

लेकिन सरल परिगणनात्मक आगमन में कारण-कार्य का नियम लागू नहीं होने के कारण हम यह नहीं कह सकते कि काग का होना ही कालेपन का कारण है (अर्थात् काला इसलिए है कि क्योंकि काग है)। यह अवैज्ञानिक आगमन इसलिए है कि क्योंकि इसमें निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि भविष्य में यदि कागों का निरीक्षण किया जाएगा तो वे अवश्य ही काले पाये जाएँगे। अतः कारण-कार्य सम्बन्ध पर आधारित नहीं रहने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य वैज्ञानिक सत्यापित नहीं हो पाता, यह अवैज्ञानिक ही रह जाता है।

2. यह वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक भी नहीं पहुंच सकता (It can never reach the certainty of Scientific Induction):
सरल परिगणनात्मक आगमन को वैज्ञानिक आगमन इसलिए नहीं समझा जाता, क्योंकि इसका निष्कर्ष निश्चित न होकर संभाव्य (prob able) होता है। कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण इसके निष्कर्ष की निश्चितता नहीं रहती और न अनिश्चितता ही अर्थात् निष्कर्ष सत्य भी प्रमाणित हो सकता है और असत्य भी। क्योंकि सरल परिगणनात्मक आगमन में हम मात्र विश्वास कर लेते हैं कि अनिरीक्षित उदाहरण निरीक्षित उदाहरणों के समान ही होंगे।

यदि भविष्य में कोई हंस काला, लाल या पीला दिखाई पड़ जाए तो सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष असत्य प्रमाणित हो जाएगा कि ‘सभी हंस सफेद होते हैं’। परन्तु, भविष्य में यदि हंस का रंग केवल सफेद ही रहे तो यह निष्कर्ष सत्य ही रहेगा। सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक इसलिए भी नहीं पहुँच सकता, क्योंकि इसके निष्कर्ष की सत्यता उदाहरणों की गणना पर निर्भर करती है। अतः यह किसी भी हालत में वैज्ञानिक आगमन की निश्चितता तक नहीं पहुंच सकता।

सरल परिगणनात्मक आगमन में हम इस विश्वास पर ‘सभी काग काले होते हैं’, ‘सभी हंस सफेद होते हैं’ आदि सामान्य यथार्थ वाक्यों की स्थापना कर लेते हैं कि काग और कालेपन तथा हंस और उजलेपन में अवश्य ही कोई महत्त्वपूर्ण संबंध है। लेकिन यह संबंध भविष्य में भी रहेगा, इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन नहीं कहलाता। यदि इसमें कभी कारण-कार्य संबंध का पता चल जाए तो इसका निष्कर्ष सत्यापित हो जाएगा और तब यह वैज्ञानिक आगमन का रूप ले लेगा। सरल परिगणनात्मक आगमन को अपूर्ण आगमन माना जाता है। जब हम निश्चित रूप से जान जाते हैं कि इसमें कारण-कार्य का संबंध नहीं है तो इसके अनुमान का उचित कारण नहीं बताया जा सकता।

सरल परिगणनात्मक आगमन में हम सन्देह में घिरे रहते हैं क्योंकि हम विश्वास के आधार पर ही निष्कर्ष निकाल लेते हैं ज्ञान के आधार पर नहीं। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष निश्चितता और अनिश्चितता के दोराहे पर स्थित रहता है। यदि इसमें पूर्णता आ जाए अर्थात् विश्वास ज्ञान में बदल जाए तो यह वैज्ञानिक आगमन बन जाएगा नहीं तो इसकी सामान्यता और यथार्थता समाप्त हो जाएगी। पुनश्चः, सरल परिगणनात्मक आगमन चूँकि वैज्ञानिक आगमन की तरह निश्चित और सत्य निष्कर्षों की स्थापना न कर केवल स्वीकारात्मक (assertory) निष्कर्षों की ही स्थापना करता है, इसलिए इसे वैज्ञानिक आगमन नहीं कहा जा सकता।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 3.
सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के बीच के भेद और समानता का वर्णन करें। सरल परिगणनात्मक आगमन का क्या महत्त्व (मूल्य) है?
उत्तर:
निम्नलिखित वर्णन के द्वारा सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के भेद को स्पष्ट किया जा सकता है –
वैज्ञानिक आगमन प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम पर आधारित होता है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन केवल प्रकृति-समरूपता नियम पर आधारित होता है, उसमें कारण-कार्य नियम लागू नहीं होता। जब हम वैज्ञानिक आगमन में यह निष्कर्ष स्थापित करते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ तो इस सामान्य वाक्य में ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य संबंध होने का ज्ञान रहता है। लेकिन जब हम परिगणनात्मक आगमन में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी हंस उजले होते हैं तो इस सामान्य वाक्य में ‘हंस’ और ‘उजलेपन’ में कारण-कार्य का संबंध है या नहीं, इसका हमें निश्चित ज्ञान नहीं रहता। वैज्ञानिक आगमन में सामान्य वाक्यों की स्थापना कारण-कार्य के ज्ञान के आधार पर होती है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्यों में इस ज्ञान को आधार नहीं बनाया जाता।

जब हम कहते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं तो इस सरल परिगणनात्मक आगमन में हमें यह पता नहीं रहता कि ‘काग’ कालेपन का कारण है या नहीं। ‘काग’ और ‘कालेपन’ के बीच में कारण-कार्य संबंध होने की निश्चितता नहीं रहती। यदि हमें इस बात की जानकारी हो जाए कि सरल गणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्य में कारण-कार्य का संबंध है तो यह वैज्ञानिक आगमन कहलाएगा। सरल गणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्य का सामान्यीकरण प्रकृति-समरूपता नियम की जानकारी के आधार पर होता है, परन्तु वैज्ञानिक आगमन में सामान्यीकरण कारण-कार्य नियम के आधार पर होता है। वैज्ञानिक आगमन के सामान्य वाक्यों पर प्रकृति-समरूपता नियम और कारण-कार्य नियम दोनों ही लागू होते हैं, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य वाक्यों पर केवल प्रकृति-समरूपता नियम ही लागू होता है।

सरल गणनात्मक आगमन जब पूर्णता प्राप्त करता है तब वैज्ञानिक आगमन बन जाता है। इसीलिए इसे वैज्ञानिक आगमन का आरम्भ बिन्दु कहा गया है। कारण-कार्य संबंध पर आधारित न होने के कारण सरल गणनात्मक आगमन का निष्कर्ष संभाव्य होता है, परन्तु कारण-कार्य संबंध पर आधारित रहने के कारण वैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष निश्चित होता है। वैज्ञानिक आगमन का निष्कर्ष सदा सत्य होता है, परन्तु सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष के सत्य होने की सम्भावना रहती है, क्योंकि निरीक्षण का क्षेत्र जितना ही अधिक विस्तृत होता है, निष्कर्ष के सत्य होने की सम्भावना उतनी ही बढ़ जाती है। सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन के बीच उपर्युक्त भेद तो हैं ही, इसके अतिरिक्त इनके बीच कुछ समानताएँ भी हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. सरल परिणगनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में ही सामान्य यथार्थ वाक्य (general proposition) की स्थापना की जाती है। जैसे-‘सभी काग काले होते हैं’ और ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ – दोनों ही सामान्य यथार्थ वाक्य हैं।

2. दोनों वास्तविक घटनाओं के निरीक्षण पर आधारित होते हैं। जैसे अब तक जितने भी काग दिखाई पड़े हैं, सभी काले ही दिखाई पड़े हैं इसलिए ‘सभी काग काले होते हैं’ वास्तविक घटना के निरीक्षण के आधार पर स्थापित हुआ है। आजतक जितने भी मनुष्य हुए हैं सभी मृत्यु को प्राप्त हुए हैं इसलिए ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ वास्तविक घटना पर आधारित सामान्य यथार्थ वाक्य है।

3. सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में ही ‘विशेष’ से ‘सामान्य’ की ओर अथवा ‘कुछ’ से ‘सव’ की ओर आगमनात्मक छलांग (Inductive leap) लगाई जाती है। जैसे-कुछ ही कागों को काला देखकर निष्कर्ष दे दिया जाता है कि ‘सभी काग काले होते हैं’ तथा कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर सामान्य निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ – दोनों में आगमनात्मक छलांग द्वारा निष्कर्ष निकाला जाता है।

4. सरल परिगणनात्मक आगमन और वैज्ञानिक आगमन दोनों में प्रकृति-समरूपता नियम लागू होता है। प्रकृति-समरूपता नियम लागू होने के कारण ही भविष्य में सभी कागों के काला होने तथा सभी मनुष्यों के मरणशील होने की सत्यता पर विश्वास कर लिया जाता है।

सरल परिगणनात्मक आगमन का महत्त्व (मूल्य) (Importance (value) of Induc tion per Simple Enumeration):
यद्यपि सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष सदा सत्य नहीं होता (अर्थात् भविष्य में निष्कर्ष के सत्य होने की केवल संभावना रहती है), तथापि आगमन तर्कशास्त्र में इसका बहुत ही महत्त्व है। व्यावहारिक जीवन में इसका प्रयोग बहुत आसानी से कर लिया जाता है और इसे सत्य मान लिया जाता है, यद्यपि तार्किक दृष्टिकोण से यह सत्य भी हो सकता है और नहीं भी। आगमन तर्कशास्त्र में कई उप-नियमों की स्थापना करने के लिए इसका सहारा लेना पड़ा है। तर्कशास्त्रियों ने सरल परिगणनात्मक आगमन को ‘वैज्ञानिक आगमन तक पहुँचने की आरोहण-शिला’ कहा है।

सरल परिगणनात्मक आगमन को कुछ विद्वानों ने स्वीकारात्मक निष्कर्ष (Assertory Conclusion) कहा है। किसी समूह के सभी उदाहरणों का निरीक्षण करना संभव नहीं है, इसलिए हम दैनिक जीवन में सरल परिगणनात्मक आगमन द्वारा कुछ ही उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाल लेते हैं। इस तरह निष्कर्ष निकालने में समय की बचत होती है। चूँकि सरल परिगणनात्मक आगमन व्यावहारिक जीवन में उपयोगी साबित होता है, इसलिए तर्कशास्त्रियों ने इसे व्यावहारिक आगमन (Popular Induc tion) भी कहा है। नवीन परिस्थितियों के संबंध में निष्कर्ष निकालने में सरल गणनात्मक आगमन का प्रयोग निष्कर्ष की सत्यता के लिए बहुत ही उपयुक्त होता है।

सरल परिगणनात्मक आगमन का महत्त्व इसलिए भी है कि यह वैज्ञानिक आगमन का आरम्भ बिन्दु है। जैसे ही इसका निष्कर्ष कारण-कार्य नियम पर आधारित हो जाता है वैसे ही इसका निष्कर्ष निश्चित हो जाता है और यह वैज्ञानिक आगमन का रूप ले लेता है। सरल परिगणनात्मक आगमन यद्यपि कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं होता तथापि यह कारण-कार्य संबंध की ओर संकेत करता है। इसका मुख्य महत्त्व कारण-कार्य संबंध की तरफ संकेत करने में ही है। इस संबंध में Grumley (ग्रमली) का निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय है –

“The chief value of the enumerative method lies in its power to suggest casual relation. The condition that two phenomenon (subject and predicate)
are always or very frequently connected seems sufficient ground for enter taining the hypothesis that they are casually related.” “इस गणनात्मक विधि का मुख्य महत्त्व कारण-कार्य संबंध को प्रस्तावित करने की सामर्थ्य में है। दो वस्तुओं (उद्देश्य और विधेय) के हमेशा अथवा प्रायः संबंधित रहने की स्थिति इस अनुमान को स्थापित करने के पर्याप्त आधार जान पड़ते हैं कि वे कारण-कार्य द्वारा संबंधित हैं।”

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 4.
सरल परिगणनात्मक आगमन का क्या तात्पर्य है? इसके मुख्य लक्षणों का वर्णन करें। अथवा, अवैज्ञानिक आगमन को परिभाषित करते हुए इसकी विशिष्टताओं की विवेचना करें।
उत्तर:
सरल परिगणनात्मक आगमन हमारे अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है। अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experience) वह अनुभव है जिसमें यह निरीक्षण किया जाता है कि कुछ वस्तुएँ अथवा घटनाएँ ऐसी हैं जिनका विरोधी उदाहरण नहीं मिलता है। सरल परिगणनात्मक आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम (The Law of the uniformity of Nature) के आधार पर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है। सरल गणनात्मक आगमन को ‘मिल’ (Mill) ने इस प्रकार परिभाषित किया है –

“इसका संबंध उन सभी वाक्यों की व्यापक सच्चाइयों की प्रकृति का आरोपण करने में है जो उस प्रत्येक उदाहरण के लिए सत्य होती है, जिनके बारे में हम जान पाते हैं।” (“It consists in ascribing the character of general truths to all proposi tions which are true in every instance that we happen to know of”) बी. एन. राय के अनुसार-“सरल परिगणनात्मक आगमन वह है जिसमें विना कारण-कार्य संबंध की व्याख्या का प्रयास किए ही मात्र एक समान अथवा अव्याघातक अनुभव के आधार पर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है।” (“Induction per simple Enumeration is the establishment of a general read proposition on the ground of mere uni form or uncontradicted experience without any attempt at explaining a casual connection”)

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सरल गणनात्मक आगमन में निरीक्षित घटनाओं को एक ही तरह का पाकर तथा उसका विरोधी कभी कुछ नहीं पाकर व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना की जाती है। सरल गणनात्मक आगमन में विपरीत अथवा विरोध का अनुभव नहीं होता। जब हम हंस को देखते हैं तो उसे सफेद पाते हैं तथा इसके विपरीत अथवा विरोधी रंग का कोई हंस दिखाई नहीं पड़ता। इस प्रकार, हम आजतक निरीक्षित हंसों के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि ‘सभी हंस उजले होते हैं। काग को बराबर काला देखकर तथा उसे इसके विरोधी रंग का कभी न देखकर ही सरल गणनात्मक आगमन में व्यापक यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है कि सभी काग काले होते हैं।

परन्तु, जब हम सरल गणनात्मक आगमन के निष्कर्ष की सत्यता को सत्यापित करना चाहते हैं तो यह प्रकृति-समरूपता नियम के आधार पर प्रमाणित हो जाता है लेकिन कारण-कार्य सिद्धान्त द्वारा प्रमाणित नहीं होता। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार यह प्रमाणित होता है कि भूतकाल में सभी हंस सफेद तथा सभी काग काले रहे थे, वर्तमान में हैं तथा भविष्य में रहेंगे। लेकिन कारण-कार्य सिद्धान्त के अनुसार इस निष्कर्ष की त्रैकालिक सत्यता सत्यापित नहीं होती।

चूँकि सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष पर कारण-कार्य नियम लागू नहीं होता अर्थात् ‘उजलापन’ और ‘हंस’ अथवा ‘कालापन’ और ‘काग’ के बीच कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं होता, इसलिए यह निश्चित रूप से सत्य नहीं माना जा सकता कि भविष्य में सभी हंस उजले ही होंगे अथवा सभी काग काले ही रहेंगे या लाखों वर्ष पहले सभी हंस उजले ही होंगे अथवा सभी काग काले ही रहेंगे या लाखों वर्ष पहले सभी हंस उजले अथवा सभी काग काले ही थे। आगमनात्मक निष्कर्ष तभी त्रैकालिक सत्य माना जाता है, जब वह प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष भविष्य में सत्य रहेगा या नहीं इसके संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है अर्थात् कारण-कार्य नियम लागू नहीं होने के कारण सरल गणनात्मक आगमन का निष्कर्ष संभाव्य रह जाता है, निश्चित नहीं रहता।

वैज्ञानिक आगमन की तरह इसमें, निष्कर्ष की निश्चितत नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक आगमन कहा गया है। इसे सरल परिगणनात्मक आगमन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी विधि उदाहरणों की गणना पर आधारित होती है। ऐसे आगमन के. निष्कर्ष की सत्यता उदाहरणों की संख्या पर निर्भर करती है। जैसे-जितनी ही अधिक संख्या में हंसों को सफेद या कागों को काला देखेंगे उतना ही अधिक उपर्युक्त निष्कर्षों की सम्भाव्यता बढ़ जाएगी। सरल परिगणनात्मक आगमन में अनुमान करने की निम्नलिखित विधि अपनायी जाती है –

अमुक सदा सत्य पाया गया है
इसका एक भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है
∴ अमुक सदा सत्य है
∴ [Such and such has always been found true,
No instance to the contrary has been met with
∴ Such and such is always true]

सरल परिगणनात्मक आगमन अथवा अवैज्ञानिक आगमन के मुख्य लक्षण (Chief characteristics of Induction per simple Enumeration or Unscientific Induction):

सरल परिगणनात्मक़ आगमन की उपर्युक्त विवेचना के आधार पर इसके निम्नलिखित लक्षण परिलक्षित होते हैं –

1. यह सामान्य वाक्य की स्थापना करता है (It establishes a general proposition):
वैज्ञानिक आगमन की तरह सरल परिगणनात्मक आगमन भी सामान्य वाक्य की स्थापना करता है। कुछ कागों को काला देखकर हम सामान्य वाक्य की स्थापना कर देते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं’। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक सामान्य वाक्य (general proposition) इसलिए है, क्योंकि इसमें उद्देश्य पद को संपूर्ण वस्तुवाचकता में काला होने का अनुमान किया गया है। इसमें उद्देश्य पद ‘काग’ है और संपूर्ण वस्तुवाचकता सभी ‘काग’ हैं।

2. यह यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है (Itestablishes a real proposition):
सरल परिगणनात्मक आगमन वैज्ञानिक आगमन की तरह की यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक यथार्थ वाक्य भी है। यह यथार्थ वाक्य इसलिए है, क्योंकि इसमें विधेय ‘काला होना’ उद्देश्य पद ‘काग’ की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता। सरल परिगणनात्मक आगमन अव्याघाती अनुभव पर आधारित होता है, इसलिए इसमें जिस सामान्य वाक्य की स्थापना होती है वह यथार्थ या वास्तविक होता है। इस प्रकार यह वास्तविक वस्तुओं का निरीक्षण करता है, और यथार्थ वाक्य (real proposition) की स्थापना करता है। ‘सभी काग काले होते हैं’ एक यथार्थ वाक्य है, क्योंकि वास्तविक रूप से सभी काग काले होते हैं।

3. इसमें आगमनात्मक छलांग होती है (In it, there is an inductive leap):
वैज्ञानिक आगमन की तरह सरल गणनात्मक आगमन में भी ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लगाई जाती है। जैसे-हमें कुछ कागों का काला होना ही ज्ञात होता है और इसी आधार पर हम अज्ञात की ओर छलांग लगाकर निष्कर्ष स्थापित कर देते हैं कि ‘सभी काग काले होते हैं।

4. यह उदाहरणों की गणना पर आधारित होता है। (It is based on the enumeration of instrances):
सरल परिगणनात्मक आगमन में वस्तुओं के गुणधर्म की जाँच नहीं की जाती बल्कि इसमें उदाहरणों की गणना की जाती है। निरीक्षित उदाहरणों की संख्या जितनी ही अधिक होगी सरल परिगणनात्मक आगमन का सामान्य यथार्थ वाक्य उतना ही सत्य के निकट होगा। हम जितनी ही अधिक संख्या में कागों को काला पाएँगे उतना ही निश्चिय के साथ कह सकेंगे कि सभी काग काले होते हैं।

5. यह प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the principles of the uniformity of Nature):
प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त यह है कि ‘सामान्य स्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है’ (Under similar conditions the same cause produces the same effect’)। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त पर आधारित होता है। इसमें हम ‘सभी काग काले होते हैं’ की सत्यता की जाँच प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त के द्वारा करते हैं तो इसकी सत्यता प्रमाणित हो जाती है कि यदि आजतक काग काले पाये गये हैं तो भविष्य में भी काग काले ही पाये जाएँगे, क्योंकि प्रकृति-समरूपता सिद्धान्त के अनुसार प्रकृति का नियम सभी कालों में एक समान रहता है अर्थात् समान स्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है।

6. यह अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है (It is based on uncontra dicted experience):
आजतक जो बात सत्य होती आयी है तथा उसका कोई भी विरोधी उदाहरण नहीं मिला है, तो वह अव्याघातक अनुभव (uncontradicted experience) कहलाता है। सरल परिगणनात्मक अव्याघातक आगमन अनुभव पर आधारित होता है और इसी अनुभव के आधार पर सामान्य यथार्थ की स्थापना करता है। जैसे-सरल परिगणनात्मक निष्कर्ष (Induction per simple Enumerative conclustion) ‘सभी काग काले होते हैं।

इस अव्याघातक अथवा एक समान (Uniform experience) पर आधारित है कि आजतक जितने भी काग मिले हैं सभी काले रंग के पाए गए हैं और इसके विपरीत या व्याघाती रंग (उजला, पीला आदि) के नहीं पाये गये हैं। सरल परिगणनात्मक आगमन में एक ही तरह का अनुभव होने से अथवा इसके विरोधी अनुभव के अभाव के आधार पर सामान्यीकरण (generalisation) कर सामान्य यथार्थ वाक्य की स्थापना कर दी जाती है। बराबर सफेद हंस को पाकर तथा किसी दूसरे रंग के हंस को नहीं पाकर सामान्यीकरण कर दिया जाता है कि ‘सभी हंस उजले होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सरल परिगणनात्मक आगमन अव्याघातक अनुभव पर आधारित होता है।

7. यह कारण-कार्य से संबंध नहीं रखता (It does not ascribe in the Law of Causation):
सरल परिगणनात्मक आगमन कारण-कार्य संबंध पर आधारित नहीं होता। सरल परिगणनात्मक आगमन का निष्कर्ष यद्यपि सामान्य यथार्थ वाक्य होता है तथापि उसमें विधेय और उद्देश्य पद के बीच कारण-कार्य संबंध स्थापित नहीं होता। उदाहरण के लिए काग काले होते हैं, सामान्य वास्तविक वाक्य में ‘काग’ और ‘काला’ के वीच कारण-कार्य का संबंध नहीं है। सरल परिगणनात्मक आगमन के सामान्य यथार्थ (वास्तविक) वाक्य उदाहरणों की गणना और अव्याघातक अनुभव पर आधारित होते हैं। कारण-कार्य नियम पर सरल परिगणनात्मक आगमन के आधारित नहीं रहने के कारण हम ऐसा नहीं कह सकते कि भविष्य में सभी काग काले ही मिलेंगे।

8. यह संभाव्य निष्कर्ष की स्थापना करता है (It establishes probable conclustion):
सरल परिगणनात्मक आगमन संभाव्य निष्कर्ष की स्थापना करता है अर्थात् इसका निष्कर्ष अनिश्चित होता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सरल परिगणनात्मक आगमन के निष्कर्ष के सत्य होने की केवल संभावना भर रहती है। कारण-कार्य नियम पर आधारित नहीं रहने के कारण ही इसे अवैज्ञानिक आगमन कहा गया है। अवैज्ञानिक आगमन के निष्कर्ष ‘सभी हंस उजले होते हैं’ में भविष्य में सभी हंसों के उजले होने की केवल संभावना व्यक्त होती है निश्चितता नहीं।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 5.
वैज्ञानिक विधि (Scientific method) से आप क्या समझते हैं? वैज्ञानिक विधि की प्रकृति को स्पष्ट करें। अथवा, वैज्ञानिक पद्धति क्या है? वैज्ञानिक पद्धति के लक्ष्यों (aims) को स्पष्ट करें। अथवा, वैज्ञानिक पद्धति के क्या कार्य (functions) हैं?
उत्तर:
वैज्ञानिक पद्धति ही किसी विषय-वस्तु को विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रमुख आधार है। यह पद्धति प्रत्येक विज्ञान में समान है। केवल तथ्य ही विज्ञान नहीं है बल्कि उन तथ्यों का व्यवस्थित संकलन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण उन्हें विज्ञान की श्रेणी में रखता है। वस्तुतः वैज्ञानिक पद्धति विज्ञान की समस्त शाखाओं में एक होती है। चाहे वह प्राकृतिक विज्ञान हो अथवा सामाजिक विज्ञान। कार्ल पियर्सन (Karl Pearson) के अनुसार, The scientific method is one and the same in all branches.

वैज्ञानिक पद्धति एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत तथ्यों का संकलन, सत्यापन, वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति का उद्देश्य सामान्य नियमों की खोज या विवरण प्रस्तुत करना है, जिससे विषय-वस्तु को समझा जा सके। नियंत्रित रूप से पूर्वानुमान के लिए प्रयुक्त किया जा सके। स्पष्टतः वैज्ञानिक पद्धति द्वारा संकलित ज्ञान ही विज्ञान है। वैज्ञानिक पद्धति की प्रकृति या लक्ष्य (Nature or aims of Scientific methods) उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर हम वैज्ञानिक पद्धति के निम्नलिखित प्रकृति या उद्देश्य की चर्चा कर सकते हैं।

1. विवरण एवं समझ:
वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किसी भी विषय-वस्तु की व्यापक जानकारी हेतु विवरण (description) एवं समझ (understanding) देने की कोशिश की जाती है। दूसरे शब्दों में विषय-वस्तु को समझने एवं वर्गीकृत करने का प्रयत्न किया जाता है। तथ्यों के संकलन के आधार पर घटनाओं के विभिन्न पक्षों को वर्णित करना, उनके स्वरूपों एवं विविधताओं को स्पष्ट करना प्रत्येक वैज्ञानिक पद्धति का मुख्य कार्य है। किसी भी विषय के विविध स्वरूपों को वर्गीकरण द्वारा स्पष्ट किया जाता है।

2. व्याख्या यानि विश्लेषण (Explanation):
तथ्यों के आधार पर विषय-वस्तु के पारस्परिक सम्बन्धों की अर्थपूर्ण व्याख्या वैज्ञानिक पद्धति का दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है। विज्ञान केवल अनेक तथ्यों का संकलन नहीं है बल्कि उन तथ्यों के अर्थपूर्ण सम्बन्धों की खोज भी है, जिससे सामान्य नियमों एवं तथ्यों की खोज की जा सके। वैज्ञानिक पद्धति चरों (variables) के पारस्परिक संबंधों को अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।

3. भविष्यवाणी एवं नियंत्रण:
वैज्ञानिक पद्धति की महत्त्वपूर्ण प्रकृति भविष्यवाणी एवं नियंत्रण (prediction and control) भी होती है। जब हम विषय-वस्तु की प्रकृति, स्वरूप एवं विविधताओं को समझकर, स्पष्टकर साथ ही उनके अर्थपूर्ण विश्लेषण एवं सिद्धान्तों के विकास के आधार पर अपनी विषय-वस्तु के बारे में पूर्वानुमान लगा सकते हैं तो उनके सम्बन्ध में भविष्यवाणी कर सकते हैं।

भविष्यवाणी की क्षमता का संबंध वैज्ञानिक ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग से है। विषय-वस्तु से संबंधित विश्लेषण एवं भविष्यवाणी के आधार पर घटनाक्रम पर नियंत्रण भी कर सकते हैं। इसका प्रयोग हम इच्छित उद्देश्य (desired aim) मानव कल्याण की दृष्टि से भी कर सकते हैं। संक्षेप में हम कह सकते कि वैज्ञानिक पद्धति का उद्देश्य घटनाओं की समझ एवं वर्णन, व्याख्या, भविष्यवाणी एवं नियंत्रण है। कहने का अभिप्राय विषय-वस्तु को समझना, संबद्ध सिद्धान्तों का निरूपण, भविष्यवाणी तथा नियंत्रण वैज्ञानिक पद्धति का अंतिम लक्ष्य है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 6.
अध्ययन पद्धति की दृष्टि से प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) एवं समाज विज्ञान (Social Science) में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) एवं सामाजिक विज्ञान (Social Science) के बीच अन्तर का मुख्य आधार यह है कि प्राकृतिक घटनाएँ एवं सामाजिक घटनाएँ एक जैसी नहीं हैं। प्राकृतिक यानि भौतिक विषय-वस्तु का अध्ययन काफी विशिष्टता से किया जाता है। इस वजह से जब भी हम विज्ञान की बात करते हैं तो लोगों का ध्यान भौतिक, रसायन आदि प्राकृतिक विज्ञानों की ओर चला जाता है। यहीं यह सवाल उठता है कि समाज विज्ञान जिसे हम व्यवहार विज्ञान (Behavioural Science) भी कह सकते हैं, का प्राकृतिक विज्ञानों की तरह अध्ययन संभव है कि नहीं। समाज विज्ञान की प्रकृति की भिन्नता के आधार वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग के संबंध में काफी आपत्तियाँ उठाई जाती हैं।

पश्चिमी दार्शनिक डिल्थे (Dilthey) के सामने भी यह प्रश्न था कि सामाजिक घटनाओं का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञान की पद्धति से नहीं किया जा सकता है। क्योंकि दोनों की विषय-वस्तु की प्रकृति एवं दृष्टिकोण भिन्न हैं। प्राकृतिक विज्ञान तथ्यों का अध्ययन करते हैं जबकि सामाजिक विज्ञान का संबंध अर्थपूर्ण व्यवहार से है, जिसकी समझकर ही व्याख्या की जा सकती है। डिल्थे के समकालीन रिकर्ट (Rickert) के विचार उनसे भिन्न थे। उनके अनुसार घटना या विषय-वस्तु अलग हो सकते हैं लेकिन उनकी अध्ययन-पद्धति में समानता संभव है। उनकी दृष्टि में प्राकृतिक घटनाओं की तरह सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन संभव है।

प्राकृतिक विज्ञान एवं समाज विज्ञान में अंतर हम निम्नलिखित ढंग से कर सकते हैं –

1. प्राकृतिक विज्ञान की विषय:
वस्तु मूर्त (concrete) एवं वस्तुनिष्ट होती है। जबकि समाज विज्ञान की प्रकृति अमूर्त (Abstract) एवं जटिल होती है। समाजविज्ञान की अमूर्तता एवं व्यक्तिनिष्ठता के कारण सामाजिक घटना का प्रत्यक्ष अवलोकन एवं निश्चित माप थोड़ा कठिन कार्य है।

2. प्राकृतिक विज्ञान की विषय:
वस्तु की जटिलता एवं परिवर्तनशीलता, समाजविज्ञान की तुलना में कम है। लेकिन गहराई से देखें तो किसी भी विषय की जटिलता सापेक्ष होती है, जैसे-जैसे उनका अध्ययन किया जाता है, वे सरल होती जाती हैं। भौतिक विज्ञान में भी तो ऐसे विषय हैं जो जटिल हैं। उदाहरण के लिए अणुकेन्द्र के चारों ओर घूमने वाले परमाणु की गति के बारे में वैज्ञानिक अभी तक निश्चित अनुक्रम ढूँढ नहीं पाए हैं।

3. वैज्ञानिक शुद्धता के लिए आवश्यक है कि विषय:
वस्तु की गणना एवं माप की जाए। भौतिक विज्ञान की वस्तुएँ गणनात्मक (Quantitative) रूप से विश्लेषित की जा सकती हैं, जबकि सामाजिक विज्ञान की प्रकृति गुणात्मक है। उसके गुणात्मक अध्ययन में परेशानी होती है।

4. प्राकृतिक विज्ञान में कार्य:
कारण सम्बन्ध को प्रदर्शित यानि खोजने हेतु प्रयोगशाला है जहाँ नियंत्रित अवस्था में अध्ययन किया जा सकता है। दूसरी ओर, समाज विज्ञान में मानव-व्यवहार के साथ प्रयोग करना कई सांस्कृतिक एवं नैतिक समस्या उत्पन्न कर सकता है।

5. प्राकृतिक विज्ञान में पूर्वानुमान (Prediction) की पूरी क्षमता होती है, दूसरी ओर, समाज विज्ञान में भौतिक विज्ञान की अपेक्षा मानव व्यवहार के संबंध में पूर्वानुमान लगाना अधिक कठिन होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सामाजिक घटनाओं की जटिलता, परिवर्तनशीलता, अमूर्तता आदि गुणों के कारण उनके संबंध में यथार्थ पूर्वानुमान कठिन है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 7.
आगमन क्या है? वैज्ञानिक आगमन की परिभाषा दें तथा इसकी मुख्य विशेषताओं (लक्षणों) का वर्णन करें।
उत्तर:
आगमन सामान्य वाक्यों की स्थापना करता है। एक ओर जहाँ निगमन अपने सर्वव्यापी आधार वाक्य की वास्तविक सत्यता की कल्पना करता है, वहीं दूसरी ओर आगमन उसकी वास्तविक सत्यता को प्रमाणित करता है। सामान्य वाक्यों (general proposition) की वास्तविक सत्यता (Material Truth) को प्रमाणित करने के लिए आगमन विशेष उदाहरणों को खोजता है। कुछ निरीक्षित घटनाओं के अनुभव के आधार पर जिस सर्वव्यापी अथवा पूर्णव्यापी वाक्य (Universal Proposition) की स्थापना की जाती है, उसे सामान्यीकरण (generalisation) कहते हैं। सामान्यीकरण द्वारा स्थापित पूर्णव्यापी वाक्य सामान्य अथवा व्यापक यथार्थ वाक्य (general proposition) होता है।

आगमन में हम अंशव्यापी वाक्य से पूर्णव्यापी वाक्य (Universal Proposition) की ओर बढ़ते हैं। इसमें हम कुछ उदाहरणों का निरीक्षण कर सबों के बारे में निष्कर्ष निकालते हैं। ज्वाइस ने आगमन को परिभाषित करते हुए कहा है, “Induction is the legitimate derivation of universal laws from individual cases.” (कुछ विशेष उदाहरणों के आधार पर पूर्णव्यापी नियम का यथार्थ अनुमान ही आगमन है।) फाउलर ने आगमन की परिभाषा इस प्रकार दी “Induction is the legitimate inference of the general from the particular or of the more general from the less general.” (विशेष के आधार पर सामान्य अथवा कम व्यापक के आधार पर अधिक व्यापक का यथार्थ अनुमान ही आगमन है)

श्याम, गोपाल, राम आदि मनुष्यों को मरते देखकर हम आगमन में यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। यह एक पूर्णव्यापी वाक्य है और वास्तविक भी। सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) की वास्तविकता आगमनात्मक अनुमान द्वारा प्रमाणित की जाती है। आगमन का मुख्य लक्ष्य है आगमनात्मक अनुमान (Inductive Inference) द्वारा वास्तविक सामान्य वाक्य (Real general proposition) की स्थापना करना। ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक वास्तविक सामान्य वाक्य है, जो पूर्णव्यापी (Universal) है। आगमन प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य नियम के सहारे पूर्णव्यापी वाक्यों की सत्यता को प्रमाणित करता है और उसका निष्कर्ष (Conclusion) वास्तविक पूर्णव्यापी अथवा सामान्य वाक्य (real general proposition) होता है।

वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction):
सामान्य (व्यापक) वाक्यों की स्थापना के कई तरीके हैं जिनमें एक ही तरीका ऐसा है जो वैज्ञानिक (Scientific) है, जिसे वैज्ञानिक आगमन (Scientific induction) कहा जाता है। मिल ने वैज्ञानिक आगमन को परिभाषित करते हुए कहा है – “Scientific Induction is the establishment of a general real proposition, based on the observation of particular instances, in reliance on the Law of Uniformity of Nature and the law of Causation.” (प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण-कार्य के नियमानुसार विशेष उदाहरणों के निरीक्षण पर आधारित सामान्य वाक्य की स्थापना ही आगमन है।) वैज्ञानिक आगमन का उदाहरण है –

श्याम मर गया
करीम मर गया
जौन मर गया
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं

उपर्युक्त उदाहरण में श्याम, करीम, जौन को मरते हुए देखकर सभी मनुष्यों के मरणशील होने का जो अनुमान किया गया है वह वैज्ञानिक आगमनात्मक अनुमान है। इसमें हम कुछ मनुष्यों को मरते देखकर एक सामान्य निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। यह एक सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) है। यह वाक्य केवल श्याम, करीम और जौन के लिए ही सत्य नहीं है बल्कि संसार के सभी मनुष्यों के लिए सत्य है।

सभी मनुष्यों की मरणशीलता का ज्ञान प्रत्यक्ष से संभव नहीं है क्योंकि सभी मनुष्यों को मरते हुए देखा नहीं जा सकता। आगमनात्मक अनुमान में प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान प्राप्त किया जाता हैं आगमनात्मक अनुमान का निष्कर्ष आधार से अधिक व्यापक होता है। ‘श्याम मर गया’ (आधार वाक्य) से अधिक व्यापक है ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ जो निष्कर्ष वाक्य है। ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ निष्कर्ष वाक्य एक सामान्य वाक्य है जो वर्तमान, भूत और भविष्यत् सभी कालों के लिए सत्य है। ‘कुछ’ के आधार पर ‘सभी’ के संबंध में सामान्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) की स्थापना करने की क्रिया ही आगमन कहलाती है।

परन्तु आगमनात्मक अनुमान में ज्ञात के आधार पर अज्ञात की ओर अथवा विशेष के आधार पर सामान्य की ओर छलांग लगाने में गलती की संभावना रहती है, जिसे आगमनात्मक खतरा (inductive Risk) कहा जाता है। हम कुछ ही घटनाओं के आधार पर किस प्रकार सबों के संबंध में निष्कर्ष निकाल सकते हैं? प्रत्यक्ष के आधार अप्रत्यक्ष के संबंध में निष्कर्ष निकालने में गलती हो सकती है। ज्ञात के आधार पर अज्ञात के संबंध में निष्कर्ष निकालने के लिए आगमन के ठोस वैज्ञानिक आधार हैं। ये हैं-प्रकृति-समरूपता नियम (Law of the Uniformity of Nature) तथा कारण-कार्य नियम (Law of Causation)।

इन दोनों नियमों के आधार पर जिस सामान्य वाक्य की स्थापना की जाती है वह सभी स्थान और काल के लिए सत्य होता है। यथार्थ उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर सामान्य वाक्य की स्थापना होती है, इसलिए सामान्य वाक्यों में वास्तविक सत्यता भी होती है। इसलिए इन नियमों पर आधारित सामान्य अथवा व्यापक वाक्य यथार्थ सामान्य वाक्य अथवा वास्तविक व्यापक वाक्य (real general proposition) कहलाते हैं। वैज्ञानिक आगमन में जो बात विशेष उदाहरण के लिए सत्य होती है वह उस तरह के सभी उदाहरणों के लिए सत्य होती है। आगमनात्मक अनुमान के अनुसार यदि ‘मरणशीलता’ कुछ मनुष्यों के लिए सत्य है तो यह मनुष्य जाति के सभी व्यक्तियों के लिए सत्य होगी।

वैज्ञानिक आगमन की विशेषताएँ (Characteristics of Scientific Induction):
वैज्ञानिक आगमन के संबंध में मिल (Mill) ने जो परिभाषा दी है उसके आधार पर इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं –

1. वैज्ञानिक आगमन किसी वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes a proposition):
आगमनात्मक निष्कर्ष कोई वाक्य होता है। दो प्रत्ययों (ideas) का योग कोई वाक्य होता है। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ में ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ दो प्रत्यय हैं, जिसमें ‘मनुष्य’ उद्देश्य के स्थान पर है तथा ‘मरणशीलता’ विधेय के स्थान पर। इन दोनों प्रत्ययों के बीच आगमनात्मक अनुमान द्वारा संबंध स्थापित करने पर एक वाक्य की स्थापना होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आगमन सर्वप्रथम किसी वाक्य की स्थापना करता है।

2. वैज्ञानिक आगमन सामान्य वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes a general proposition):
वाक्य दो प्रकार के होते हैं अंशव्यापी (Particu lar) तथा पूर्णव्यापी (Universal)। जैसे-‘कुछ मनुष्य मरणशील हैं’ एक अंशव्यापी वाक्य है, क्योंकि इसमें ‘मरणशील’ कुछ ही व्यक्तियों को कहा गया है। इस वाक्य में विधेय सम्पूर्ण उद्देश्य के संबंध में ज्ञान नहीं देता है। ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं।’ एक पूर्णव्यापी वाक्य है, क्योंकि इस वाक्य में विधेय सम्पूर्ण उद्देश्य के संबंध में ज्ञान देता है। इस वाक्य में ‘मरणशील’ सभी व्यक्तियों को कहा गया है। पूर्णव्यापी वाक्य का ज्ञान अनुभव द्वारा नहीं होता, क्योंकि हम कुछ ही व्यक्तियों को मरते हुए (अनुभव द्वारा) देख सकते हैं सबों को नहीं।

‘सबों’ के संबंध का ज्ञान आगमनात्मक अनुमान द्वारा होता है जिसका निष्कर्ष सर्वव्यापी अथवा पूर्णव्यापी वाक्य होता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक पूर्णव्यापी वाक्य है और यही आगमन का निष्कर्ष है। आगमन का निष्कर्ष सामान्य वाक्य अथवा व्यापक वाक्य (general proposition) कहलाता है। अतः यह स्पष्ट होता है कि आगमन का संबंध अंशव्यापी वाक्यों से न होकर पूर्णव्यापी वाक्यों से होता है। इस तरह आगमन सामान्य अथवा व्यापक वाक्य की स्थापना करता है। सामान्य वाक्य की पूर्णव्यापी वाक्य अथवा व्यापक वाक्य कहलाता है।

3. वैज्ञानिक आगमन वास्तविक वाक्य की स्थापना करता है (Scientific Induc tion establishes a real proposition):
सामान्य वाक्य अथवा व्यापक वाक्य दो प्रकार के होते हैं-शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) तथा वास्तविक वाक्य (real proposition)। शाब्दिक वाक्य उसे कहा जाता है जिसमें विधेय अपने उद्देश्य के संबंध में कोई नई जानकारी नहीं देता।

शाब्दिक वाक्य में विधेय (predicate) अपने उद्देश्य पद (Subject) की केवल गुणवाचकता को व्यक्त करता है। जैसे – ‘सभी मनुष्य विवेकशील हैं’ एक शाब्दिक वाक्य (Verbal proposition) है, क्योंकि इसमें विधेय अपने उद्देश्य पद के संबंध में कोई नया ज्ञान नहीं देता बल्कि उसकी गुणवाचकता (Connotation) को प्रकट करता है (विवेकशीलता मनुष्य ही गुणवाचकता होती है)। वैज्ञानिक आगमन इस तरह के वाक्यों की स्थापना नहीं करता। वैज्ञानिक आगमन शाब्दिक वाक्यों की स्थापना न कर वास्तविक वाक्यों (real proposition) की स्थापना करता है।

वास्तविक वाक्य (Real proposition) उसे कहते हैं, जिसमें विधेय (predicate) अपने उद्देश्य (Subject) के संबंध में नई जानकारी देता है। जैसे-‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक वास्तविक या यथार्थ वाक्य (real proposition) हैं, क्योंकि ‘मरणशीलता’ ‘सभी मनुष्यों’ के संबंध में एक नवीन ज्ञान है। ‘मरणशीलता’ ‘मनुष्य’ पद की गुणवाचकता नहीं है, मनुष्य पद की गुणवाचकता तो ‘विवेकशीलता’ और पशुता’ है। वास्तविक वाक्य (real proposition) में विधेय अपने उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट न कर उसके संबंध में कोई नया ज्ञान देता है। उपर्युक्त वाक्य में ‘मरणशीलता’ उद्देश्य पद (सभी मनुष्यों) के संबंध में एक नया ज्ञान है। इस तरह वैज्ञानिक आगमन वास्तविक अथवा यथार्थ वाक्य की स्थापना करता है।

4. वैज्ञानिक आगमन विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है (Scientific Induc tion observes particular instances):
आगमन सामान्य और वास्तविक वाक्य की स्थापना विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के आधार पर करता है। किसी सम्पूर्ण जाति या वर्ग के प्रत्येक उदाहरण का निरीक्षण करना संभव नहीं है। इसलिए आगमन कुछ ही या विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करता है जिनके आधार पर सामान्य वास्तविक वाक्य अथवा व्यापक यथार्थ वाक्य (general real proposition) की स्थापना होती है।

5. वैज्ञानिक आगमन में आगमनात्मक छलांग होती है (In Induction there is an Inductive leap):
वैज्ञानिक आगमन में ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लगाई जाती है, जिसे आगमनात्मक छलांग कहा जाता है। आगमन में किसी जाति या वर्ग के सभी उदाहरणों का निरीक्षण नहीं होता है, फिर भी उस जाति के अनिरीक्षित उदाहरणों के लिए सत्य मान ली जाती है। कुछ ही मनुष्यों को मरते देखना निरीक्षित उदाहरण होते हैं, सभी मनुष्यों को मरते नहीं देखना अनिरीक्षित उदाहरण हैं – हम निरीक्षित उदाहरणों के आधार पर ही अनिरीक्षित उदाहरणों को आगमनात्मक अनुमान में सत्य मान लेते हैं अर्थात् ज्ञात से अज्ञात की ओर छलांग लेते हैं अथवा कुछ के आधार पर सब की ओर छलांग लगाते हैं।

‘सभी मनुष्य मरणशील है’ एक व्यापक वाक्य है, परन्तु यह मनुष्य जाति के सभी उदाहरणों के निरीक्षण पर आधारित नहीं है। इस तरह कुछ ही मनुष्यों को मरते देखकर सभी मनुष्यों की मरणशीलता का व्यापक अथवा सामान्य निष्कर्ष निकालने (ज्ञात से अज्ञात) की ओर छलांग लगाने में गलती होने की संभावना रहती है, जिसे आगमनात्मक जोखिम (Inductive Hazard) कहा जाता है। परन्तु, आगमनात्मक जोखिम को मिल (Mill) ने ‘आगमन का प्राण’ (Essence of Induction) कहा है, क्योंकि इसी के आधार पर अंततः व्यापक वास्तविक वाक्यों की स्थापना होती है।

6. वैज्ञानिक आगमन कारण:
कार्य नियम तथा प्रकृति-समरूपता सिद्धांत पर आधारित होता है (Scientific Induction is based on the Law of Causation and the Principle of the Uniformity of Nature):
विशेष उदाहरणों के आधार पर किसी सामान्य वाक्य की स्थापना करने के लिए आगमन कारण-कार्य नियम तथा प्रकृति-समरूपता नियम को सत्य मानता है। कारण-कार्य नियम के अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। जैसे – ‘मनुष्यता’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है और ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य (general proposition) के रूप में इसी नियम के बल पर प्रतिस्थापित होता है।

आगमन प्रकृति-समरूपता नियम पर भी आधारित होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार समान परिस्थितियों में समान कारण समान कार्य उत्पन्न करता है। जब हम यह देखते हैं कि ‘मनुष्यता’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है तब हम यह मान लेते हैं कि कारण-कार्य का यह संबंध समान परिस्थितियों में सभी घटनाओं के लिए सत्य होगा। “सभी मनुष्य मरणशील हैं’, सामान्य वाक्य में मनुष्य होना ही मरणशीलता का कारण है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार जो कारण आज तक जो कार्य उत्पन्न करता रहा है, उसे वह भविष्य में भी उत्पन्न करेगा। इस नियम के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि आज तक मनुष्य मरणशील रहा है तो वह भविष्य में भी मरणशील रहेगा। इन दोनों नियमों के आधार पर प्रत्यक्ष के द्वारा अप्रत्यक्ष के संबंध में सामान्य निष्कर्ष निकालने में कोई आगमनात्मक जोखिम (inductive hazard) नहीं होता है।

7. वैज्ञानिक आगमन नए तथ्यों की स्थापना करता है (Scientific Induction establishes new facts):
वैज्ञानिक आगमन में ज्ञात के आधार पर अज्ञात का अथवा कुछ के आधार पर सब का जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वे नए तथ्य होते हैं। तर्कशास्त्रीय दृष्टिकोण से ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ एक सामान्य वाक्य है जिसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य पद की गुणवाचकता (connotation) नहीं है और जब विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता तो वह उसके संबंध में किसी नए तथ्य की जानकारी देता है ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य है जिसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य पद की गुणवाचकता connotation नहीं है और जब विधेय उद्देश्य पद की गुणवाचकता को प्रकट नहीं करता तो वह उसके संबंध में किसी नए तथ्य की जानकारी देता है ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ सामान्य वाक्य है जो आगमनात्मक अनुमान द्वारा स्थापित किया गया है और इसमें ‘मरणशीलता’ मनुष्य के संबंध में एक नया तथ्य है। इस तरह देखा जाता है कि वैज्ञानिक आगमन अपने सामान्य वास्तविक वाक्य के द्वारा नए तथ्यों की स्थापना करता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 8.
आगमन का परिचय दें तथा इसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
आगमन वह अनुमान है जिसमें हम कुछ (some) के आधार पर सब (all) के संबंध में अर्थात् विशेष (Particular) के आधार पर सामान्य (universal) संबंध में ज्ञान प्राप्ति करते हैं। आगमन पूर्णव्यापी वाक्य की वास्तविक सत्यता (material truth) की स्थापना करता है। हम जानते हैं कि पूर्णव्यापी वाक्य हमारे अनुभव पर आधारित होते हैं और हमें अनुभव विशेष घटनाओं का ही होता है सबों का नहीं। न्यूटन ने कुछ . ही फलों को वृक्ष से धरती की ओर गिरते देखा था। हम कुछ ही व्यक्तियों को मरते हुए देख सकते हैं, एक ही साथ सबों को नहीं। इस तरह निगमन में एक ही विशेष घटना के निरीक्षण के आधार पर पूर्णव्यापी वाक्य (universal proposition) की स्थापना कर दी जाती है। उदाहरण के लिए,

रमेश मरणशील है।
सुरेश मरणशील है।
महेश मरणशील है।
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

उपर्युक्त उदाहरण में ‘कुछ’ मनुष्यों को मरते देख कर ‘सभी’ मनुष्यों की मरणशीलता के संबंध में अनुमान किया गया है अर्थात् विशेष (Particular) के आधार पर सामान्य (universal) का अनुमान किया गया है। इस तरह के अनुमान को आगमन का अनुमान कहा जाता है। आगमनात्मक अनुमान द्वारा वास्तविक सत्यता की स्थापना होती है। इसमें आकारिक और वास्तविक सत्यता दोनों होती है। निगमनात्मक अनुमान में केवल आकारिक सत्यता होती है तथा इसमें व्यापक वाक्य के आधार पर निष्कर्ष निकालने की विधि बतायी जाती है। परन्तु, आगमनात्मक अनुमान का आकार तथा विषयवस्तु दोनों ही शुद्ध होते हैं। आगमन में ‘विषय’ के दृष्टिकोण से शुद्ध निष्कर्ष निकालने की विधि बतायी जाती है। आगमनात्मक अनुमान वास्तविक सत्यता से संबद्ध होता है और वास्तविक सत्यता विचार की दुनिया तथा वास्तविक जगत् दोनों में सत्य होती है।

उदाहरण के लिए, ‘सोने की अंगूठी’ विचार जगत तथा वास्तविक जगत दोनों में सत्य है। परन्तु ‘सोने का पहाड़’ विचार जगत में सत्य हो सकता है लेकिन वास्तविक जगत में नहीं। इस प्रकार ‘सोने का पहाड़’ निगमनात्मक अनुमान है क्योंकि इसमें – आकारिक सत्यता वास्तविक सत्यता नहीं। परन्तु, ‘सोने की अंगूठी’ ‘पत्थर का पहाड़’ आदि आगमनात्मक अनुमान है, क्योंकि इसमें आकारिक और वास्तविक सत्यता दोनों है। निगमनात्मक अनुमान में विचार और वास्तविक में अनुकूलता नहीं रहती, परन्तु आगमनात्मक अनुमान में विचार और वास्तविकता में अनुकूलता रहती है।

‘दुनिया की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ – इस परम व्यापक वाक्य को निगमनात्मक अनुमान द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सकता अर्थात् वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना निगमन विधि से नहीं हो सकती; आगमन विधि द्वारा ही पूर्णव्यापी वाक्य की वास्तविक सत्यता की स्थापना हो सकती है। व्यावहारिक जीवन में हम ऐसा अनुमान करना चाहते हैं जो आकार और विषय दोनों दृष्टिकोण से सही हो। अनुमान के द्वारा सत्यता की प्राप्ति तब होती है जब अनुमान करने का तरीका और अनुमान का विषय वास्तविक होता है। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
मोहन मनुष्य है।
∴ मोहन मरणशील है।

उपर्युक्त उदाहरण में अनुमान के दोनों आधार वाक्य (premises) वास्तविक हैं, इसलिए निष्कर्ष ‘मोहन मरणशील है’ भी सत्य है। अनुमान के निष्कर्ष को सत्य होने के लिए यह आवश्यक है कि उसके आधार वाक्य भी वास्तविक हों। उपर्युक्त उदाहरण न्याय (syllogism) का उदाहरणं है। इसके दोनों आधार वाक्य (‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ ‘मोहन मनुष्य है’) वास्तविक हैं, इसलिए निष्कर्ष भी वास्तविक है। न्याय के आधार वाक्यों में से कम-से-कम एक आधार वाक्य अवश्य ही व्यापक होता है।

व्यापक वाक्य की वास्तविकता को अनुभव से नहीं जाना जा सकता बल्कि इसके लिए आगमनात्मक अनुमान का सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि इसके द्वारा वास्तविक व्यापक वाक्य की स्थापना की जाती है। उपर्युक्त उदाहरण में ‘सभी मनुष्य मरणशील है’ एक व्यापक वाक्य (general proposition) है, जिसके द्वारा वास्तविक व्यापक वाक्य-:मोहन मरणशील हैं’ की स्थापना की गयी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आगमनात्मक अनुमान के द्वारा व्यापक वाक्यों की वास्तविकता को प्रमाणित किया जाता है।

मिल (Mill) ने आगमन के दो प्रकार बतालए हैं उचितार्थक आगमन (induction proper) तथा अनुचितार्थक आगमन (induction improper)। उचितार्थक आगमन वह आगमन होता है, जिसमें ‘कुछ से सब की ओर’ (from ‘some’ to ‘all’) छलांग लगायी जाती है। इसे आगमनात्मक छलाँग (inductive leap) कहा जाता है, जो ज्ञात से अज्ञात की ओर होता है। उचितार्थक आगमन में ज्ञात के आधार पर अज्ञात का अनुमान किया जाता है। अनुचितार्थक आगमन वह है जिसमें उचितार्थक आगमन जैसी छलांग (leap) नहीं पायी जाती; क्योंकि इसके अनुमान वस्तुओं के निरीक्षण पर आधारित नहीं होते। उचितार्थक आगमन (induction proper) के चार भेद किए गए हैं।

ये हैं-वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction), अवैज्ञानिक आगमन (Unscientific Induction), सादृश्यानुमान (Argument from Anal ogy) तथा सम्भावना सिद्धान्त (Argument from probability)। अनुचितार्थक आगमन (Induction improper) के भी तीन भेद किए गए हैं – पूर्ण आगमन (Perfect Induction), तर्कसाम्यमूलक आगमन (Induction by parity of Reasoning) तथा अंश-संकलन आगमन (Induction improper) के भी तीन भेद किए गए हैं – पूर्ण आगमन (Perfect Induction), तर्कसाम्यमूलक आगमन (Induction by parity of Reasoning) तथा अंश-संकलन आगमन (Induction by colligavission of facts)।

उचितार्थक आगमन कार्य-करण सम्बन्ध पर आधारित होता है परन्तु अनुचितार्थक आगमन कार्य-कारण संबंध पर आधारित नहीं होता। आगमन का सही रूप उचितार्थक आगमन (induction proper) आगमन (induction) जैसा लगता है, तथापि इसमें आगमन के मुख्य लक्षणों का सर्वदा अभाव पाया जाता है। वैज्ञानिक आगमन, जो उचितार्थक आगमन का प्रमुख प्रकार होता है, ही आगमन का सर्वोत्तम रूप होला है। वैज्ञानिक आगमन (Scientific Induction) की विधि से जिस सामान्य वाक्य (universal proposition की स्थापना होती है वह आगमन (Induction) का सही निष्कर्ष (valid conclusion) होता है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 9.
निगमन और आगमन के बीच क्या संबंध है? दोनों में कौन अधिक मौलिक है? अथवा, निगमन और आगमन की तुलना करें। इनमें पहले कौन आता है?
उत्तर:
निगमन और आगमन में संबंध (Relation between Deduction and Induction):
इन दोनों के बीच संबंध की विवेचना यहाँ की जा रही है। यहाँ मुख्य रूप से दो प्रश्न उठते हैं –

(a) दोनों में अधिक मौलिक कौन है (Which of the two is more fundamental)?
(b) दोनों में प्राथमिक या पूर्ववर्ती कौन है (Which of the two is prior)?

पहले और दूसरे प्रश्नों को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद पाया जाता है तार्किकों के दो दल हैं-एक दल अनुमान में केवल आकारिक सत्यता (formal truth) ढूँढता है और दूसरा दल वास्तविक सत्यता (material truth) पर जोर देता है। इन दोनों दलों के मत प्रस्तुत प्रश्नों पर भिन्न-भिन्न हैं।

दोनों में अधिक मौलिक कौन है (Which of the two is more fundamental):

1. आकारवादी तार्किकों (Formal logicians) का मत:
इस मत के अनुसार निगमन (Deduction) अधिक मौलिक है और आगमन (Induction) कम मौलिक या गौण है। इस मत के माननेवाले हेटले (Whateley), हेमिल्टन (Hamilton), मैनसेल (Mansel) इत्यादि, आकारवादी तार्किक हैं। इन लोगों के अनुसार, आगमन तीसरे आकार का ही एक योग है; आगमन कोई स्वतंत्र अनुमान नहीं कहा जा सकता। यह निगमन का ही एक रूप है। इसके अतिरिक्त, आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम और कार्य-कारण नियम को आधार मानकर हम ‘कुछ’ से ‘सब’ का जो निष्कर्ष निकालते हैं उसे निगमनात्मक ढंग से निकाला जा सकता है।

‘मनुष्यत्व’ और ‘मरणशीलता’ में कार्य-करण संबंध (causal relation) देखकर और इस नियम को प्रकृति में हमेशा समान होने का विश्वास करके ही हम आगमन में ‘कुछ’ (some) से “सब’ (all) की संभावना का अनुमान करते हैं और कहते हैं, ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’। इसीलिए यह कहा जाता है कि आगमन मूल रूप में निगमनात्मक होता है। (Induction in essence is Deduction in nature)

2. वस्तुवादी तार्किकों (Material logicians) का मत:
इस मत के अनुसार आगमन (Induction) ही अधिक मौलिक है और निगमन इसी का एक रूप है। इसके समर्थक मिल (Mill), बेन (Bain) आदि वस्तुवादी तार्किक हैं। निगमनात्मक अनुमान के लिए कम-से-कम एक सामान्य (universal) वाक्य की आवश्यकता पड़ती है और इस सामान्य वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा होती है। इस प्रकार, निगमन के आधार के रूप में पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करके आगमन निगमन को आधार प्रदान करता है। आगमन के द्वारा ही सामान्य नियम की स्थापना होती है, और निगमन केवल इसी नियम को व्यक्ति विशेषों पर लागू करता है।

जब आगमन के द्वारा यह सामान्य वाक्य सत्यापित हो जाता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं, तो निगमन इसे राम, मोहन आदि व्यक्तियों पर प्रयुक्त करके कहता है कि राम भी मनुष्य होने के नाते मरणशील है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आगमन ही अधिक मौलिक है और निगमन गौण (secondary)। वास्तव में, निगमन और आगमन के विषय में दिए गए उपर्युक्त दोनों मत एकांगी (one sided) हैं।

इन दोनों में किसी एक को अधिक मौलिक और दूसरे को कम मौलिक या गौण बताना उचित नहीं है। दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। ये एक-दूसरे के पूरक हैं और इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है। इनमें किसी एक को दूसरे में परिवर्तित करने से इन दोनों की ही मौलिकता नष्ट हो जाती है। अतः, इनके विषय में अधिक या कम मौलिकता का प्रश्न उठाना व्यर्थ है। दोनों में पूर्ववर्ती कौन है (which of the two is prior)। इस प्रश्न पर तर्कवेत्ताओं में – मतभेद है। यहाँ जेवन्स (Jevons) एवं मिल (Mill) के मतों की विवेचना अपेक्षित है।

जेवन्स (Jevons) का मत:
इनके अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है। (Deduc tion is prior to Induction)। इनका तर्क इस प्रकार है-आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसके लिए प्राक्कल्पना (Hypothesis) का सहारा लेकर हम सामान्यीकरण (generalisation) कर देते हैं। किन्तु, बिना परीक्षा या जाँच (verification) के कोई सामान्य नियम नहीं बन जाता। प्राक्कल्पना की जाँच निगमनात्मक विधि द्वारा की जाती है।

निर्मित प्राक्कल्पना को सत्य मानकर उससे संभावित निष्कर्ष निकालते हैं और इन निष्कर्षों की जाँच वास्तविक घटनाओं में करते हैं। यदि ये निष्कर्ष इन घटनाओं से मेल खाते हैं, तो हम अपनी प्राक्कल्पना को सही मान लेते हैं और संगति या मेल नहीं बैठने पर प्राक्कल्पना असत्य सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार, निगमन विधि के द्वारा ही प्राक्कल्पना की परीक्षा करके आगमन में सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसलिए निगमन का स्थान आगमन से पहले आता है।

मिल का मत:
मिल साहब का मत जेवन्स के मत के भिन्न है। इनके अनुसार, आगमनिक खोज में सामान्यीकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। इसी कारण, ये आगमन को निगमन के पहले रखते हैं। न्याय (syllogism) निगमन का मुख्य रूप है और इसके लिए आधार के रूप में कम-से-कम एक पूर्णव्यापी (universal) वाक्य की आवश्यकता होती है और इस वाक्य की स्थापना आगमन द्वारा ही होती है। इस प्रकार आगमन ही निगमन को आधार प्रदान करता है।

इसलिए यह कहना उचित है कि “आगमन निगमन के पहले आता है।” (Induction is prior: to dedaction) वास्तव में, जेवन्स और मिल के कथन में आंशिक सत्यता (partial truth) है, न कि पूर्ण सत्यता। जेवन्स साहब के अनुसार, आगमन विधि का अंत सत्यापन या जाँच (verification) में होता है। इसी कारण वे निगमन को आगमन के पहले मानते हैं। किन्तु, मिल साहब के अनुसार आगमनिक खोज में सामान्यीकरण ही अंतिम सोपान है और इसके लिए परीक्षण या जाँच की कोई आवश्यकता निगमन और आगमन में किसी एक को पूर्ववर्ती बताना उचित नहीं जान पड़ता। निगमन और आगमन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं।

निगमन और आगमन के संबंध में कुछ अन्य मत –

1. तार्किकों का कहना है कि निगमन तर्कशास्त्र में विश्लेषणात्मक विधि (analytical method) अपनाई जाती है और आगमन में संश्लेषणात्मक विधि (synthetic method) अपनाई जाती है। आगमन में विशेष उदाहरणों का निरीक्षण करके सामान्य नियम बनाए जाते हैं और निगमन में सामान्य नियम का विश्लेषण करके विशेष निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं। पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए विश्लेषणात्मक और संश्लेषणात्मक दोनों विधियों का उपयोग आवश्यक है। अतः, निगमन और आगमन परस्पर पूरक हैं।

2. जेवन्स का मत:
जेवन्स महोदय के अनुसार निगमन आगमन के पहले आता है और आगमन निगमन का ही उत्क्रमिक (inverse) रूप है। सीधी क्रिया (direct process) और उत्क्रमिक क्रिया (inverse process) गणित से ली गई है। सीधी क्रिया वह है जिसमें निश्चित संख्या (data) दी हुई है और उससे निष्कर्ष निकालना रहता है। जैसे, 2 और 4 दिए हुए हैं जिनका गुणनफल 8 होता है उत्क्रमिक क्रिया में फल या परिणाम (result) पहले से दिया रहता है और उन संख्याओं को निकालना पड़ता है, जिनका वह फल या परिणाम है। जैसे, 8 दिया हुआ है और इसके अवयवों (constituents) को ज्ञात करना है। इसके अवयव हो सकते हैं –

4 × 2. 1 × 8 इत्यादि। सीधी क्रिया द्वारा प्राप्त निष्कर्ष निश्चित होता है, किन्तु, उत्क्रमिक क्रियाओं के अर्थ में आगमन को निगमन की उत्क्रमिक (inverse) रूप कहा जाता है। आगमन को निगमन का उत्क्रमिक रूप मानने का यह भी एक आधार है कि निगमन में हम कारण से कार्य की ओर जाते हैं, किन्तु, आगमन में कार्य से कारण की ओर जाते हैं। कारण (cause) का पता रहने पर इसके निश्चित फल (effect) का पता लगाना अत्यंत कठिन काम है और इसमें दोष होने की संभावना बनी रहती है, क्योंकि एक ही कार्य के कई कारण हो सकते हैं।

जेवन्स के मत की आलोचना:
निगमन को आगमन का पूर्ववर्ती कहना उचित नहीं है। आगमन को निगमन का उत्क्रमिक रूप (inverse process) भी कहना ठीक नहीं है। निगमन और आगमन एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए इनमें पूर्ववर्ती (antecedent) और (conse quent) का प्रश्न उठाना ही व्यर्थ है। जेवन्स का यह कहना भी ठीक नहीं है कि कार्य (effect ज्ञात रहने पर उससे निश्चित कारण (cause) ज्ञात नहीं हो सकता, क्योंकि एक कार्य के कई कारण हो सकते हैं।

यह कहना ही दोषपूर्ण है कि एक कार्य के कई कारण होते हैं। वास्तव में, निगमन और आगमन में विरोध लाकर आगमन को निगमन की उत्क्रमिक क्रिया (inverse process) बताना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जा सकता। आगमनिक खोज (inductive enquiry) में निगमन और आगमन दोनों का समान महत्त्व है। ये दोनों परस्पर पूरक हैं। इन्हें विरोधी कहना इनके सही अर्थ को ठुकराना है। बेकन का मत-बेकन ने निगमन को ‘उतरनेवाली क्रिया’ (descending process) और आगमन को ‘चढ़नेवाली क्रिया’ (ascending process) कहा है। निगमन में सामान्य से विशेष निष्कर्ष निकलते हैं। इसमें हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर आते हैं।

जैसे, सभी मनुष्यों को मरणशील पाकर राम को मनुष्य होने के नाते मरणशील बताते हैं। इसलिए निगमन को उतरने की क्रिया कहा जाता है। आगमन में विशेष उदाहरणों के निरीक्षण के द्वारा सामान्य नियम की स्थापना की जाती है। इसमें कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर (form less general to more general) जाते हैं। जिस प्रकार किसी पर्वत पर चढ़कर वहाँ से हमें नीचे का सामान्य रूप दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार, आगमन के निष्कर्ष पर पहुँचते ही हमें एक सामान्य नियम दृष्टिगोचर होता है। ज्यों-ज्यों पर्वत से नीचे उतरने लगते हैं, त्यों-त्यों विशेष वस्तुओं पर नजर पड़ने लगती है। इसलिए निगमन को उतरनेवाली क्रिया और आगमन को चढ़नेवाली क्रिया कहा गया है।

बेकन के मत की आलोचना-बेकन का मत सही नहीं कहा जा सकता। पर्वत पर चढ़ने और उतरने का मार्ग एक ही रह सकता है। इसलिए चढ़ने और उतरने की क्रियाएँ परस्पर विरोधी नहीं कही जा सकती। इसी प्रकार, आगमन और निगमन में भी विरोध नहीं कहा जा सकता। यह सत्य है कि हम आगमन में उदाहरणविशेष से सामान्य नियम पर पहुँचते हैं और निगमन में सामान्य नियम से व्यक्तिविशेष पर पहुंचते हैं। पर, इसका अर्थ यह नहीं होता कि आगमन और निगमन परस्पर विरोधी हैं। इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है।

ये एक-दूसरे के सहयोगी एवं पूरक फाउलर (Fowler) का मत-फाउलर ने आगमन और निगमन में भेद इस आधार पर किया है कि आगमन में हम कार्य से कारण की ओर जाते हैं और निगमन में कारण से कार्य की ओर। आगमन में घटनाविशेष का निरीक्षण करके इसका कारण बताते हैं। इसीलिए आगमन ‘में कार्य से कारण की ओर जाने की बात कही गई है।

निगमन में सामान्य नियम यानी कारण से कार्य की ओर जाने की बात कही गई है। फाउलर के मत की आलोचना-फाउलर (Fowler) का कहना सही नहीं है। आगमन में केवल कार्य से कारण का पता नहीं लगाया जाता। आगमन में हम दोनों तरफ बढ़ सकते हैं। कार्य ज्ञात रहने पर उसके कारण का पता लगाया जा सकता है और कारण ज्ञात रहने पर आगमन के द्वारा कार्य का भी पता लगाया जा सकता है। अतः यह कहना भूल है कि आगमन द्वारा केवल कार्य से कारण का पता लगाया जाता है।

बक्कल (Buckle) का मत-इनके अनुसार हम आगमन में विशेष तथ्यों से नियमों पर (from facts to laws) जाते हैं और निगमन में नियमों से विशेष तथ्यों पर (from laws to facts) जाते हैं। इसी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-आगमन में वस्तुविशेष (facts) से विचार (ideas) की ओर जाते हैं और निगमन में विचार से वस्तुविशेष का अनुमान लगाया जाता है। आगमन द्वारा स्थापित नियम सैद्धांतिक होते हैं और इनका प्रत्यक्ष घटनाविशेषों के द्वारा होता है।

किन्तु, हमें इससे यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि आगमन के निष्कर्ष केवल सैद्धान्तिक या मानसिक होते हैं, यथार्थ नहीं। आगमन के निष्कर्ष यथार्थ होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक सत्यता (material truth) पाई जाती है। निगमन में भी सैद्धान्तिक या मानसिक तत्त्व पाए जाते हैं, जिस प्रकार आगमन में यथार्थता के तत्त्व रहते हैं। उपर्युक्त मतों की विवेचना करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि आगमन और निगमन में विरोध का संबंध दिखाना भ्रामक है। इन दोनों में पूर्ण सहयोग अपेक्षित है। ये एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं (both run into each other)। इनके बीच कोई कृत्रिम रेखा खींचकर इनको एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 10.
निगमन से आगमन किन-किन बातों में भिन्न है? अथवा, निगमन के बाद आगमन की क्या आवश्यकता है? व्याख्या करें।
उत्तर:
तर्कशास्त्र का लक्ष्य सत्यता की प्राप्ति है। इसकी पूर्ति के लिए अनुमान का सहारा लिया जाता है। सत्यता दो प्रकार की होती है –

  1. आकारिक सत्यता (formal truth) और
  2. वास्तविक सत्यता (material truth)।

निगमन तर्कशास्त्र मुख्यतः आकारिक सत्यता से संबद्ध रहता है। सत्यता का आंशिक अध्ययन ही यहाँ हो पाता है। आगमन तर्कशास्त्र में वास्तविक सत्यता प्राप्त करना हमारा लक्ष्य रहता है। इस प्रकार निगमन और आगमन के संयुक्त प्रयास से ही तर्कशास्त्र का लक्ष्य पूरा हो सकता है। अतः, निगमन और आगमन में अत्यधिक घनिष्ठ संबंध है। फिर भी, दोनों में कई अंतर दीख पड़ते हैं।

निगमन और आगमन में अंतर (Distinction between Deduction and Induction):
दोनों में निम्नलिखित अंतर उल्लेखनीय हैं –

1. निगमन के आधार:
वाक्य मान लिए जाते हैं, किन्तु आगमन के आधार-वाक्य निरीक्षण (observation) तथा प्रयोग (experiment) पर आधृत रहते हैं। निगमन के आधार-वाक्यों को सत्य मानकर उनसे निष्कर्ष निकाला जाता है। यहाँ आधार-वाक्यों को बिना निरीक्षण-परीक्षण के ही आँख मूंदकर सत्य मान लेते हैं और इनसे निष्कर्ष निकालते हैं। जैसे –

सभी मनुष्य मरणशील हैं।
राम एक मनुष्य है
∴ राम मरणशील है।

यह निगमनात्मक अनुमान का उदाहरण है। यहाँ ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ और ‘राम एक मनुष्य है’ आधार-वाक्य (premises) हैं, जिन्हें पहले ही सत्य मान लिया गया है और उनसे यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘राम मरणशील है’। किन्तु, आगमन के आधार-वाक्य अनुभव द्वारा प्राप्त होते हैं। बिना निरीक्षण-परीक्षण के आधार-वाक्यों को सत्य नहीं माना जा सकता है। जैसे –

राम मरणशील है
यदु मरणशील है
श्याम मरणशील है
केदार मरणशील है
……………………..
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

यहाँ सभी आधार-वाक्य अनुभव, अर्थात् निरीक्षण और प्रयोग पर आधृत हैं। हम इन व्यक्तियों को मरते हुए देखकर ही यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सभी मनुष्य मरणशील हैं।

2. निगमन में हम सामान्य (universal) से विशेष (particular) या अधिक व्यापक से कम व्यापक की ओर जाते हैं, किन्तु आगमन में कम से सामान्य या विशेष से सामान्य की ओर जाते हैं। निगमन में हम अधिक व्यापकता से कम व्यापकता की ओर जाते हैं, किन्तु आगमन में कम व्यापकता से अधिक व्यापकता की ओर प्रस्थान करते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण से यह अंतर स्पष्ट हो जाता है। निगमनात्मक अनुमान में हम सभी मनुष्यों को मरणशील मानकर राम को मरणशील सिद्ध करते हैं। राम की व्यापकता अवश्य ही सभी मनुष्यों की व्यापकता से कम है। इसीलिए निगमन में अधिक से कम की ओर जाने की बात कही गई है। आगमन के उदाहरण से हम देखते हैं कि राम, यदु, श्याम, केदार इत्यादि व्यक्तिविशेषों को मरणशील पाकर सभी मनुष्यों के मरणशील होने का अनुमान किया गया है। अतः, यहाँ विशेष से सामान्य की ओर प्रस्थान किया गया है।

3. निगमन में आधार-वाक्यों की संख्या निश्चित रहती है, किन्तु आगमन में आधार-वाक्यों की संख्या अनिश्चित रहती है। निगमनात्मक अनुमान के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं साक्षात अनुमान (immediate inference) और असाक्षात अनुमान (mediate inference)। साक्षात अनुमान में एक आधार-वाक्य रहता है और असाक्षात अनुमान में दो आधार-वाक्य होते हैं। किन्तु, आगमन में आधार-वाक्यों की संख्या कोई निश्चित नहीं है। कभी-कभी कार्य-कारण संबंध का पता चलाने के लिए दो, तीन, चार या इनसे अधिक उदाहरणों को देखने की आवश्यकता पड़ती है।

4. निगमन का संबंध आकारिक सत्यता (formal truth) से है; किन्तु आगमन का संबंध वास्तविक सत्यता (material truth) से रहता है-निगमन में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि दिए हुए आधार-वाक्य से निष्कर्ष नियमानुकूल निकाला गया है कि नहीं। यदि निष्कर्ष निकालने में नियमों का पूर्ण पालन किया गया हो तो उस अनुमान का निष्कर्ष सही माना जाता है। इस निष्कर्ष में वास्तविक सत्यता का रहना कोई आवश्यक नहीं है। जैसे –

सभी विद्यार्थी बंदर है,
मोहन एक विद्यार्थी है,
∴ मोहन एक बंदर है।

इस अनुमान में अनुमान के नियमों का पालन किया गया है। इसलिए इसका निष्कर्ष आकारिक दृष्टिकोण से बिल्कुल सही है। इस निष्कर्ष में वास्तविक सत्यता का पूर्ण अभार है; क्योंकि इसके आधार अनुभवसिद्ध नहीं हैं। आगमन का लक्ष्य वास्तविक सत्यता को प्राप्त करना है। इसके आधार-वाक्य निरीक्षण और प्रयोग पर आधृत होने के कारण ऐसे निष्कर्ष देते हैं जो वास्तविक दृष्टिकोण से सही होते हैं। आगमन में आकारिक सत्यता को भी ठुकराया नहीं जाता। आकारिक और वास्तविक दोनों सत्यता की प्राप्ति आगमन में होती है।

5. निगमन के निष्कर्ष आधार-वाक्यों से कम व्यापक (universal) होते हैं, किन्तु आगमन के निष्कर्ष अपने आधार-वाक्यों से सदा अधिक व्यापक होते हैं। इसका कारण यह है कि निगमन के आधार-वाक्यों में ही इसका निष्कर्ष निहित रहता है, किन्तु आगमन के निष्कर्ष में ही इसके आधार-वाक्य चले जाते हैं।

6. निगमन और आगमन के आधारों में भी भिन्नता रहती है-विचार के नियमों (laws of thought) पर निगमन आधृत है। विचार के नियम ये हैं-व्याघातक नियम (law of contradiction), तादात्म्य नियम (law of identity) और मध्यदशा-निषेध नियम (law of excluded middle)। आगमन के आधारस्वरूप के दो नियम हैं-प्रकृति-समरूपता नियम (law of uniformity of nature) और कार्य-कारण नियम (law of causation)।

उपर्युक्त अंतरों को ध्यानपूर्वक देखने से यह संकेत मिल जाता है कि निगमन के बार आगमन की क्या आवश्यकता है। निगमन अनुमान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। परन्तु. अकेले निगमन द्वारा सत्य की प्राप्ति संभव नहीं है। इसमें कुछ कमियाँ रह जाती हैं, जिनकी पूर्ति आगमन द्वारा की जाती है। आगमन की कुछ अपनी विशेषताएँ हैं, जिनका निगमन में अभाव रहता है। निगमन के बाद आगमन की आवश्यकता इसीलिए और अधिक बढ़ जाती है।

निगमन तथा आगमन दोनों का लक्ष्य सत्य की स्थापना करना है। इस प्रयास में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। निगमनात्मक अनुमान सत्य की स्थापना के लिए आगमनात्मक अनुमान पर आश्रित रहता है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है –

(a) निगमन तर्कशास्त्र साधारणतः
आकारिक सत्यता से संबद्ध है। यदि निष्कर्ष निगमन तर्कशास्त्र के नियमों के अनुकूल है, तो इसमें आकारिक सत्यता रहती है। परन्तु, अनुमान में केवल आकारिक सत्यता (formal truth) से काम नहीं चल सकता। इसमें वास्तविक सत्यता (material truth) का होना भी आवश्यक है। इसके निष्कर्ष को यथार्थ घटनाओं से मेल खाना चाहिए। आगमन तर्कशास्त्र में वास्तविक सत्यता की प्राप्ति हमारा प्रमुख लक्ष्य रहता है। इसमें आकारिक सत्यता की उपेक्षा नहीं की जाती। यहाँ वास्तविक सत्यता के साथ-साथ आकारिक सत्यता की प्राप्ति के प्रयत्न किए जाते हैं। इस प्रकार, निगमन के साथ-साथ आगमन का उपयोग करने से संपूर्ण सत्यता की प्राप्ति संभव है।

(b) निगमन के आधार:
वाक्य आँख मूंदकर बिना किसी छानबीन के सत्य मान लिए जाते हैं और उनसे निष्कर्ष निकाले जाते हैं। ऐसे आधार-वाक्यों से विश्वसनीय निष्कर्ष नहीं प्राप्त हो सकते। आगमन तर्कशास्त्र में आधार-वाक्य निरीक्षण एवं प्रयोग द्वारा प्राप्त होते हैं। इन्हें यों ही सत्य नहीं मानलिया जाता।

(c) निगमन में निष्कर्ष इसके आधार:
वाक्यों में ही पहले से छिपा रहता है। ऐसा होने से अनुमान में नयापन की मात्रा कम हो जाती है। आगमन इस कमी को दूर करता है। इसके आधार-वाक्यों में निष्कर्ष निहित नहीं रहता। अनुभव द्वारा प्राप्त आधार-वाक्यों से प्राप्त निष्कर्ष में नयापन रहता है।

(d) निगमन द्वारा किसी सामान्य वाक्य या नियम की स्थापना नहीं होती। यह सामान्य वाक्य को पहले ही सत्य मानकर आगे बढ़ता है। यहाँ सामान्य से विशेष की ओर अथवा अधिक व्यापक से कम व्यापक की ओर जाते हैं। आगमन विशेष तथ्यों का अवलोकन करके सामान्य वाक्य या नियम की स्थापना करता है। इससे अनुमान या तर्क का महत्त्व अधिक हो जाता है।

(e) निगमन तर्कशास्त्र का कोई आधार नहीं दीख पड़ता। बिना आधार के इसका महत्त्व उतना अधिक नहीं रहता। आगमन के दो प्रकार के आधार (grounds) हैं – आकारिक आधार (formal grounds) और वास्तविक दोनों प्रकार की सत्यता पाई जाती है।

(f) निगमन में वैज्ञानिक नियमों का सहारा नहीं लिया जाता। इसीलिए इसके निष्कर्षों में वास्तविक सत्यता एवं प्रामाणिकता का अभाव रहता है। आगमन तर्कशास्त्र इस कमी को महसूस करते हुए प्रकृति-समरूपता नियम एवं कार्य-कारण नियम का सहारा लेता है। इसलिए इसके निष्कर्षों में विश्वसनीयता एवं प्रामाणिकता की मात्रा अधिक रहती है। किसी भी न्याय (syllogism) में निष्कर्ष की सत्यता उसके आधार-वाक्यों की सत्यता पर आधृत है। प्रश्न उठता है कि यह कैसे जाना जा सकता है कि आधार-वाक्य सत्य है। यदि निगमन के आधार पर आधार-वाक्य की सत्यता स्थापित की जाए तो हमारे चिंतन आकारिक मात्र रहता है और उसमें वास्तविक सत्यता का अभाव रहता है।

आगमन के आधार पर हमें वास्तविक सत्यता की प्राप्ति होती है। आगमन हमारे अनुभव पर निर्भर है। निगमन आगमन के बिना संभव प्रतीत नहीं होता। यहीं पर निगमन से आगमन में प्रवेश की आवश्यकता होती है। फ्रांसिस बेंकन आगमनात्मक विधि के प्रणेता माने जाते हैं। उनसे पूर्व अरस्तू ने निगमन को प्रतिपादित किया था। बेकन ने निगमन के आगमन में प्रवेश पर बल दिया, क्योंकि निगमन के सामान्य वाक्य आगमन से ही प्राप्त होते हैं। आगमन में वास्तविक सत्यता पर पहुँचने के लिए विशेष घटनाओं की जाँच की जाती है। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि निगमन के बाद आगमन की आवश्यकता रह ही जाती है।

Bihar Board Class 11 Philosophy Solutions Chapter 1 प्राकृतिक एवं समाजविज्ञान की पद्धतियाँ

प्रश्न 11.
क्या स्वयंसिद्ध वाक्यों तथा निगमन के द्वारा वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना हो सकती है? वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना में आगमन की क्या भूमिका है?
उत्तर:
वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना स्वयंसिद्ध वाक्यों तथा निगमन के द्वारा नहीं हो सकती –

स्वयंसिद्ध (Axioms):
कुछ ही वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयंसिद्ध होते हैं। जैसे-‘कोई वस्तु एक ही समय और स्थान में दो विरोधात्मक गुणों को नहीं रख सकती है। यह वाक्य स्वयंसिद्ध है। ऐसे वाक्य के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अधिकांश वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य (real universal proposition) स्वयं सिद्ध नहीं होते। जैसे-‘पृथ्वी में आकर्षण शक्ति’, ‘पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है’ आदि। जो वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयं सिद्ध नहीं होते, उनकी स्थापना नहीं होती है। चूंकि अधिकांश वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य स्वयं सिद्ध नहीं होते, इसलिए उनकी स्थापना स्वयंसिद्ध वाक्यों द्वारा नहीं हो सकती।

निगमन (Deduction):
एक निगमनात्मक अनुमान का आधार-वाक्य दूसरे निगमनात्मक अनुमान का निष्कर्ष होता है। उदाहरणस्वरूप यदि हमें यह प्रमाणित करना है कि ‘सभी कवि मरणशील हैं तो निगमनात्मक अनुमान के द्वारा हम इसे इस तरह प्रमाणित कर सकते हैं –

सभी मनुष्य मरणशील हैं,
सभी कवि मनुष्य हैं,
∴ सभी कवि मरणशील हैं।

लेकिन अब प्रश्न उठता है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ कैसे प्रमाणित होगा ? इसे हम दूसरे निगमनात्मक अनुमान द्वारा निम्नलिखित ढंग से प्रमाणित कर सकते हैं –

सभी जानवर मरणशील हैं,
सभी मनुष्य जानवर हैं,
∴ सभी मनुष्य मरणशील हैं।

फिर प्रश्न उठता है कि ‘सभी जानवर मरणशील हैं’ कैसे प्रमाणित होगा ? निगमनात्मक अनुमान के द्वारा यह इस तरह प्रमाणित होगा –

सभी जीव मरणशील हैं,
सभी जानवर जीव हैं,
∴ सभी जानवर मरणशील हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि निगमन में एक व्यापक वाक्य की स्थापना करने के लिए दूसरे अधिक व्यापक वाक्य का सहारा लेना पड़ता है और फिर दूसरे व्यापक वाक्य को स्थापित करने के लिए तीसरे अधिक व्यापक वाक्य का सहारा लेना पड़ता है। उपर्युक्त उदाहरणों में हम देखते हैं कि ‘सभी कवि मरणशील हैं’ को प्रमाणित करने के लिए इससे अधिक व्यापक वाक्य ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ की सहायता ली गई है। फिर ‘सभी मनुष्य मरणशील हैं’ को प्रमाणित करने के लिए इससे अधिक व्यापक वाक्य ‘सभी जीव मरणशील हैं’ का सहारा लिया गया है।

इसी तरह यदि. ‘सभी जीव मरणशील हैं’ व्यापक वाक्य को प्रमाणित करना हो, तो हम परम व्यापक वाक्य ‘संसार की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ का सहारा लेते हैं। फिर यदि यह प्रश्न उठे कि इस परम व्यापक वाक्य का क्या प्रमाण है, तो इसका उत्तर निगमनात्मक अनुमान द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस प्रकार हम पाते हैं कि सभी वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना निगमन के द्वारा नहीं हो सकती है।

आगमन की भूमिका (The role of Induction):
वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना स्वयंसिद्धि वाक्यों तथा निगमनात्मक अनुमान द्वारा नहीं हो सकती; आगमनात्मक अनुमान के द्वारा ही वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना हो सकती। आगमन में प्रकृति-समरूपता नियम तथा कारण कार्य नियम के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना होती है। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार प्रकृति का व्यवहार समान परिस्थिति में सदा समान होता है तथा कारण-कार्य नियम के अनुसार संसार में जो भी घटना घटित होती है उसका कुछ-न-कुछ कारण अवश्य होता है।

ये दोनों नियम आगमनात्मक अनुमान में प्रयुक्त होते हैं जिनके द्वारा आगमन विशेष घटनाओं के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना करता है। कारण-कार्य नियम के अनुसार यदि ‘मृत्यु’ है तो उसका वास्तविक सर्वव्यापी कारण अवश्य होगा। प्रकृति-समरूपता नियम के अनुसार प्रकृति का व्यवहार सदा समान रहता है यदि जीव है तो वह मरेगा अवश्य ही। आगमन में इन दोनों नियमों के आधार पर वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्य की स्थापना की जाती है जिसकी सत्यता में कोई सन्देह नहीं रह जाता।

मानलिया कि हमें परम व्यापक वाक्य ‘संसार की सभी वस्तुएँ नाशवान हैं’ को प्रमाणित करना है। संसार की सभी वस्तुएँ समाप्त हो जाती हैं’ – यदि यह कार्य है तो इसका कारण अवश्य ही होना चाहिए। आगमनात्मक अनुमान के द्वारा कारण निर्धारित करने का जो तरीका है उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि संसार में वस्तुओं का होना ही उनके समाप्त होने का कारण है। मनुष्य या किसी जीव का होना ही मर जाने का कारण है।

‘वस्तु’ और ‘नाशवान’ में कारण-कार्य का संबंध है-अर्थात् वस्तु है तो वह नाशवान होगी ही। ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ में कारण-कार्य का संबंध है और यह संबंध भविष्य में भी रहेगा, क्योंकि प्रकृति समरूप है। चूंकि प्रकृति का व्यवहार समान परिस्थिति में समान होता है, यदि आज मनुष्य होना मर जाने का कारण है तो भविष्य में भी मनुष्य होना मर जाने का कारण होगा। इस तरह इन दोनों नियमों के आधार पर आगमनात्मक अनुमान के द्वारा वास्तविक पूर्णव्यापी वाक्यों की स्थापना की जाती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

Bihar Board Class 11 Psychology अभिप्रेरणा एवं संवेग Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अभिप्रेरणा के संप्रत्यय की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अभिप्रेरणा का संप्रत्यय इस बात पर प्रकाश डालता है कि किसी व्यक्ति के व्यवहार में गति कैसे आती है? किसी विशेष लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट सतत व्यवहार की प्रक्रिया, जो किन्हीं अंतर्नाद शक्तियों का नतीजा होती है, उसे अभिप्रेरणा कहते हैं। अभिप्रेरणा के लिए प्रयुक्त अभिप्रेरक वे सामान्य स्थितियाँ होती हैं जिनके आधार पर विभिन्न प्रकार के व्यवहारों के लिये पूर्वानुमान लगा सकते हैं। इसी कारण अभिप्रेरणा को व्यवहारों का निर्धारक माना जाता है। मूल प्रवृत्तियाँ, अंतर्नाद, आवश्यकताएँ, लक्ष्य एवं उत्प्रेरक अभिप्रेरणा के विस्तृत दायरे में आते हैं।

किसी आवश्यक वस्तु का अभाव (भूख, प्यास, तृष्णा) या न्यूनता ही आवश्यकता कहलाते हैं। आवश्यकता अन्तर्नाद (आन्तरिक बल) को जन्म देती है। किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किए गए प्रयासों अथवा उत्पन्न तनाव या उद्वेलन को अन्तर्नाद रूपी बल की तरह प्रयोग करके लक्ष्य की प्राप्ति की जाती है। लक्ष्य मिलने के बाद आवश्यकता की तीव्रता शून्य हो जाती है, प्रयास घट जाता है। अर्थात् व्यक्ति सामान्य स्थिति में पहुँच जाता है।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग img 1
चित्र: अभिप्रेरणात्मक चक्र

जैसे-एक छात्र बरसात में कीचड़ भरे रास्ते से होकर पैदल विद्यालय चला जाता है। विद्यालय जाने की इच्छा जताने का कारण किसी प्रकार के लक्ष्य की पूर्ति करना है। ज्ञान प्राप्ति, मित्र से मिलना, घर के कामों से मुक्त होना, माता-पिता को खुश करना आदि में से किसी लक्ष्य की प्राप्ति इच्छा से एक आंतरिक बल का आभास होता है जिसके प्रभाव में छात्र विद्यालय जाने को तत्पर हो जाता है। जहाँ क्रियाशील आंतरिक बल को ही अभिप्रेरणा मान सकते हैं।

अर्थात् अभिप्रेग्णा एक आन्तरिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति के व्यवहार को अभीष्ट दिशा या गति के साथ बदलने के लिए शक्ति प्रदान करता है तथा किसी विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति के व्यवहार को मोड़ने का कार्य करता है। भूखे के द्वारा भोजन खोजने के लिए, प्यासे को पानी नीचे के लिए जो आन्तरिक बल उकसाता है, प्रोत्साहित करता है, उसे अभिप्रेरणा मान सकते हैं। जीवन में अधिकांश व्यवहारों की व्याख्या अभिप्रेरणा या अभिप्रेरकों के आधार पर की जाती है। अभिप्रेरक व्यवहारों का पूर्वानुमान करने में भी सहायता करते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 2.
भूख और प्यास की आवश्यकताओं के जैविक आधार क्या हैं?
उत्तर:
किसी भी प्राणी की आवश्यकताएँ अंतर्नाद उत्पन्न करती है। व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति कुछ कार्य करने के अंत:प्रेरण को प्रदर्शित करता है। मूल प्रवृत्ति का एक बल यह आवेग होता है जो प्राणी को कुछ ऐसी क्रिया करने के लिए चालित करता है जो उस बल या आवेग को कम कर सके। भूख और प्यास दो प्रमुख जैविक आवश्यकताएँ हैं।

भूख:
जीवधारियों के शरीर में किसी चीज की कमी को आवश्यकता कहा जाता है। जीवन रक्षा तथा शक्ति संचार के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन की आवश्यकता को भूख का कारण माना जा सकता है। भूख लगने पर व्यक्ति को भोजन प्राप्त करने तथा उसे खाने के लिए अभिप्रेरणा करती है। भूख के उद्दीपकों में अमाशय का संकुचन, ग्लुकोज की सान्द्रता में कमी, वस्त्र के स्तर में गिरावट, ईंधन की कमी के प्रति यकृत की प्रतिक्रिया अहम भूमिका अदा करते हैं। यकृत के उपाचचयी क्रियाओं में होने वाला परिवर्तन को भूख की अनुभूति कराने वाला माना जाता है। भोज्य पदार्थों की उपलब्धता, रंग, स्वाद, उपयोग आदि भूख की तीव्रता बढ़ाने वाले कारक माने जाते हैं। हमारी भूख अधश्चेतक में स्थित पोषण तृप्ति की जटिल व्यवस्था, यकृत और शरीर के कुछ अन्य अंगों तथा परिवेशीय कारकों के द्वारा नियंत्रित होती है।

पाश्विक अधश्चेतक भूख संदीपन को समझता है जबकि मध्य अधश्चेतक भूख के अंतर्नाद को विरुद्ध बनाकर भूख को नियंत्रित रखता है। अतः सारांशतः यह माना जा सकता है कि भूख को शान्त करके हम जीवन की सुरक्षा के साथ संतुलित शरीर के लिए आवश्यक तत्त्वों को ग्रहण करके भूख के कारण होनेवाले कष्ट को मिटा पाने में समर्थ होते हैं। प्यास-शरीर को जब पानी की आवश्यकता महसूस होती है तो हम प्यास का अनुभव करते हैं। प्यास को जन्मजात प्रेरक माना जा सकता है।

प्यास लगने पर हमारा मुँह और गला सूखने लगता है और शरीर के उत्तकों में निर्जलीकरण की अवस्था आ जाती है। इन कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए प्यास बुझाने के लिए पानी पीना आवश्यक हो जाता है। पानी नहीं पीने से कोशिकाओं से.पानी का क्षय होना जारी हो जाता है तथा रक्त में पानी का अनुमान लगाकर घटने लगता है। पानी पी लेने के परिणामस्वरूप आमाशय में उत्पन्न उद्दीपन रुक जाता है, परसारग्राही के द्वारा निर्जलीकरण नियंत्रित हो जाता है। प्यास की अवस्था में कोई भी व्यक्ति अधिक कार्यशील बन जाता है। लार का अभाव उसे बेचैन कर देते हैं। अर्थात् प्यास की जैविक आवश्यकता के रूप में संतोषप्रद जीवन जीने के साथ-साथ निर्जलीकरण से मुक्ति के लिए उपाय ढूँढ़ना है। शरीर के उत्तकों को स्वाभाविक कार्य करते रहने के योग्य बनाया जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 3.
किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताएँ कैसे प्रभावित करती हैं? उदाहरणों के साथ समझाइये।
उत्तर:
बाल्यावस्था तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य का संक्रमण काल (11 से 21 वर्ष तक की उम्र) किशोरावस्था कहलाता है। इसे जैविक तथा मानसिक दोनों ही रूप से तीव्र परिवर्तन की अवधि माना जाता है। इस अवस्था की एक मुख्य विशेषता मौन परिपक्वता है। यह भी माना जाता है कि किशोर के विचार अधिक अमूर्त, तर्कपूर्ण एवं आदर्शवादी होते हैं। प्रयत्न-त्रुटि उपागम के विपरीत समस्या समाधन करने में किशोरों का चिंतन अधिक व्यवस्थित होता है। किशोर वैकल्पिक नैतिक संहिता को भी जानते हैं। किशोरों के व्यवहारों में लचीलापन, प्रदर्शन, प्रतियोगिता जैसी भावनाओं का प्रभाव देखने को मिलता है। किशोरों के व्यवहारों को उपलब्धि, संबंधन तथा शक्ति की आवश्यकताओं को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

1. उपलब्धि अभिप्रेरक:
उत्कृष्टता के मापदंड को प्राप्त कर लेने की आवश्यकता उपलब्धि अभिप्रेरक कहलाते हैं। किशोर अपने माता-पिता, मित्र, पड़ोसी, शुभचिंतक जैसे व्यवहार-निपुण लोग से प्रेरित होकर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का उपयोग करके व्यवहारों का अर्जन तथा निर्देशन की युक्ति सोखते हैं। उपलब्धि को पाने के लिए किशोर चुनौती भरे कठिन कार्यों को भी पूरा कर लेना चाहते हैं। जैसे-वर्ग में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए किशोर अध्ययन के विकास के लिए तरह-तरह के प्रस्तावों का अध्ययन करते हैं, साथियों से सहयोग माँगते हैं।

माता-पिता से उचित परामर्श तथा आर्थिक सहयोग चाहते हैं। कई समस्याओं से घिरे होने पर भी किशोर अपने संकल्प की दृढ़ता का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते हैं। अंत में वे वर्ग में प्रथम स्थान पाकर स्वयं तो खुश होते ही हैं और वे प्रशंसा के शब्द भी सुनते हैं। अर्थात् किशोर अपने व्यवहारों में किसी भी तरह का परिवर्तन स्वीकारते हैं जिससे उनका लक्ष्य उपलब्धि के रूप में उन्हें अवश्य मिल जाए।

2. संबंधी:
समूहों का निर्माण मानव व्यवहार की एक विशेषता होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किशोर का प्रयास किस प्रकार से संबंध बनाना होता है। किशोर कभी भी अकेला रहना पसंद नहीं करता है। सच तो यह है कि दूसरों को चाहना तथा भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से उनके निकट आने की चाह को संबंधन माना जाता है। संबंधन में सामाजिक सम्पर्क की अभिप्रेरणा अंतनिर्हित होती है। संबंधन की आवश्यकता उस समय उद्दीपन कहलाती है जब कोई किशोर अपने को खतरे में अथवा असहाय अवस्था में पाता है। कभी-कभी अपनी खुशी को प्रकट करने केलिए भी संबंधन की आवश्यकता महसूस करते हैं।

किशोरों को ऐसे अवसर आते हैं जब वे मित्रातापूर्ण संबंधन के महत्त्व मानते हैं। जैसे, मोटरसायकिल से गिरने के बाद उसे मानव सहायता की आवश्यकता होती है। नौकरी पाने के लिए सही स्थान या मार्गदर्शन बतलाने वाले मित्रों की आवश्यकता होती है। सफलता के कारण मिलने वाले पदक को दिखलाने या अपनी कविता को सुनाने हेतु मित्रों की याद आती है। किसी भी कठिन परस्थितियों (चोर, आतंकवादी, चेकिंग) में किशोर संबंधन का उपयोग करना चाहता है।

3. शक्ति अभिप्रेरक:
शक्ति की आवश्यकता व्यक्ति की वह योग्यता है जिसके कारण वह दूसरों के संवर्गों तथा व्यवहारों पर अभिप्रेत प्रभाव डालता है। डेविड मैकक्लीलैंड ने शक्ति अभिप्रेरक की अभिव्यक्ति के चार सामान्य बताए हैं –

(क) शक्ति पर बाहरी स्रोतों का प्रभाव
(ख) शक्ति पर व्यक्ति को आंतरिक क्षमता का प्रभाव
(ग) शक्ति के प्रयोग में प्रदर्शन की झलक
(घ) संगठन के द्वारा शकित प्रदर्शन का प्रभाव अर्थात् किशोर अपनी शक्ति को समझने के लिए बाहरी साधनों का उपयोग करता है।

जैसे, पत्र-पत्रिकाओं में छपे स्तंभों के पढ़कर किसी लोकप्रिय व्यक्ति के सम्बन्ध में सब कुछ जान लेना चाहता है। कभी-कभी किशोर शारीरिक गठन करके अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना चाहता है। इसमें किशोरों को भावना या संवेग पर नियंत्रण रखना के समीप होता है। प्रतियोगिता, खेल, परीक्षा, इन्टरव्यू, राजनीतिक दल जैसी विभिन्न स्थितियों में किशोर अपनी योग्यता, समझ अथवा निर्णय को सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहता है ताकि लोग उससे प्रभावित हो जाएँ। अर्थात् किशोरों के व्यवहार में नया मोड़ लाने के लिए उपलब्धि (जैसे-एम. ए. की डिग्री), संबंधन (मित्र या शुभचिंतक) और शक्ति, (प्रभाव और प्रदर्शन) की आवश्यकता वांछनीय प्रतीत होती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 4.
मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार क्या हैं? उपयुक्त उदाहरणों की सहायता से व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘भूखे भजन न होय गोपाला’ अर्थात् भोजन की तुलना में भजन निरर्थक है चाहे वह कितना भी गरिमामयी क्यों न हो। मैस्लो ने भी आवश्यकताओं को महत्त्व के आधार पर श्रेणीबद्ध करके बतलाना चाहा है कि जीवन निर्वाह के लिए मूल शरीर क्रियात्मक मूल आवश्यकता है। मैस्लो का पिरामिड संप्रतययित रूप है एक लोकप्रिय मॉडल का जिसमें पदानुक्रम के तल में मूल जैविक आवश्यकताओं को जगह मिली है।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग img 1
चित्र: अभिप्रेरणात्मक चक्र

मैक्लो (1968, 1970) ने मानव व्यवहार को चित्रित करने के लिए आवश्यकताओं को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित किया है। आवश्यकताओं की व्यवस्था से पता चलता है कि मानव अपने स्वभाव से महत्त्वाकांक्षी होता है। भूख समाप्त होते ही वह सुरक्षा की चिन्ता करने लगता है। सुरक्षा की उचित व्यवस्था पाकर वह शुभचिंतकों का समूह पाना चाहता है। इसके बाद सम्मान और आत्मसिद्धि की इच्छा जागती है। मैस्लो के पदानुक्रम के पीछे प्राथमिक विचार बहुत ही स्वाभाविक है। पदानुक्रम में व्यवस्थित निम्न स्तर की आवश्यकता जब नहीं हो जाती तब तक कोई व्यक्ति उच्चस्तरीय आवश्यकता की ओर सोचता तक नहीं है। किसी आवश्यकता की पूर्ति से ज्योंहि व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि उच्चस्तरीय आवश्यकता उसकी चिंता का कारण बन जाती है।

जैसे, भूखे व्यक्ति को रडियो नहीं चाहिए, क्योंकि वह तो रोटी की खोज में व्यस्त है। खा-पीकर जब आदमी संतुष्ट हो जाता है तो उसे मनोरंजन, नाच-गाना सभी कुछ अच्छा लगने लगता है। एक व्यक्ति टमटम चलाता है। सबसे पहले उसे यात्री मिलने की चिन्ता रहती है। ज्योहि उसे एक साथ पाँच यात्री मिल जाते हैं तो वह घर से मिलने के बारे में सोचने लगना है। घर के बच्चे के लिए मिठाई का चयन उसे परेशान कर देते हैं। जब मिठाई लेकर घर पहुँचता है तो किवाड़ नहीं बंद हो सकने की चिन्ता हो जाती है। अत: उसकी चिन्ता बदलती रहती है लेकिन वह पूर्णतः समाप्त नहीं हो पाती है।

प्रश्न 5.
क्या शरीर क्रियात्मक उद्वेलन सांवेगिक अनुभव के पूर्व या पश्चात घटित होता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आधुनिक एवं परिष्कृत उपकरणों की सहायता से शरीर क्रियात्मक परिवर्तनों (क्रोध से शरीर का काँपना, पसीना निकलना, हृदय गति का तेज होना) का यथार्थ मापन किया जा सकता है जो संवेग की शरीर क्रियात्मक सक्रियकरण की श्रृंखला पर निर्भर करता है, जिसमें चेतक, अधश्चेतक, उपवल्कुटीय व्यवस्था का प्रमस्तिष्कीय वल्कुट महत्त्वपूर्ण रूप से अंतर्निहित हो जाते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी विचार या घटना के बारे में सोचते ही उत्तेजित या क्रुद्ध होते हैं तो उसकी हृदय गति बढ़ जाती है। मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में चयनात्मक सक्रियकरण, भिन्न-भिन्न संवेगों का उद्वेलन प्रदर्शित करता है।

जेम्स लांजे सिद्धांत के अनुसार पर्यावरणी उद्दीपक हृदय या फेफड़े जैसे आंतरिक अंग में शरीर क्रियात्मक अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो पेशीय गति से सम्बद्ध होते हैं। जैसे अचानक तीव्र शोर या उच्च तीव्रता वाली ध्वनि सुनने के साथ ही अंत- संगी तथा पेशीय अंगों में सक्रियकरण उत्पन्न हो जाता है जिसका अनुसरण संवेगात्मक उद्वेलन करता है। जेम्स लांजे का तर्कना कि शारीरिक परिवर्तनों का व्यक्ति द्वारा किया गया प्रत्यक्षण (साँस का तेज होना, अंगों का हिलना) संवेगात्मक उद्वेलन उत्पन्न करता है। अर्थात् विशिष्ट घटनाएँ या उद्दीपक विशिष्ट शरीर क्रियात्मक परिवर्तनों के उत्तेजित करती है जो प्रत्यक्षण और संवेगों की अनुभूति से ताल-मेल करता है।

कैननबार्ड सिद्धांत के अनुसार संवेगों की सारी प्रक्रिया की मध्यस्थता चेतक के द्वारा की जाती है जो कि संवेग उद्दीपक करने वाले उद्दीपकों के प्रत्यक्षण के पश्चात् यह सूचना सहकालिक रूप से प्रमस्तिष्कीय वल्कुट, कंकाल पेशियों तथा अनुरूपी तंत्रिका तंत्र को देता है। इसके बाद प्रत्यक्षित अनुभव की प्रकृति का पता लगाया जाता है। स्वायत्त तंत्रिका के द्वारा शरीर की क्रियात्मक उद्वेलन उत्प्रेरित होता है। आजकल जेम्स-लांजे सिद्धांत की अपेक्षा कैननबार्ड सिद्धांत पर ज्यादा विश्वास किया जाता है। कैननबार्ड सिद्धांत के अनुसार अत: अनुकंपी एवं परानुकंपी तंत्र यद्यपि परस्पर विरोधी तरीके से कार्य करते हैं, किन्तु वे संवेगों के अनुभव और अभिव्यक्ति की प्रक्रिया को पूरा करने में परस्पर पूरक हैं।
Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग img 1
चित्र: कैनन-बार्ड का संवेग सिद्धांत

अर्थात् अन्ततः यही सच है कि संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार साथ-साथ होता है। कैननबार्ड ने भी माना है कि सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों साथ-साथ होता है। स्टैनली शैक्टर तथा जेरोम सिंगार ने संवेगों के द्विकारक सिद्धांत के माध्यम से माना है कि हमारे संवेगों में शरीर क्रियात्मक समानता होती है, क्योंकि हृदय तभी धड़कता है जब हम भयभीत होते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 6.
क्या संवेगों की चेतन रूप से व्याख्या तथा नामकरण करना उनको समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है? उपयुक्त उदाहरण देते हुए चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हमारे संज्ञान अर्थात् हमारे प्रत्यक्षण, स्मृतियाँ एवं व्याख्याएँ हमारे संवेग के आवश्यक हैं। संवेग और उसके कारण और प्रभाव का पता बताने के लिए संवेगात्मक क्रिया-कौशल की व्याख्या संवेगों को स्पष्टतः समझने में सहायक होता है। स्टैनली शैक्टर तथा जेरोम सिंगर ने शारीरिक और संज्ञानात्मक संवेगों का अध्ययन कर बताया कि संवेगों की अनुभूति हमारे तात्कालिक उद्वेलन के प्रति जागरुकता के द्वारा उत्पन्न होती है। उन दोनों का मत है कि किसी संवेगात्मक अनुभव के लिए उद्वेलन की चेतना व्याख्या की आवश्यकता होती है।

माना कोई व्यक्ति किसी कविता की रचना करके श्रोता को संगीत-स्वर में सुनाता है। वह अपनी करनी से बहुत खुश और गौरवान्वित है। इसी क्रम में कोई श्रोता उसके प्रयास को फूहर प्रदर्शन कह डाला। व्यक्ति, श्रोता और आलोचना के बीच संवेगात्मक दशा में अंतर आना स्वाभाविक है। हमें इसके कारण, प्रभाव और परिणाम की स्पष्ट जानकारी के लिए सम्पूर्ण घटना की विस्तृत व्याख्या करनी चाहिए।

इसी आवश्यकता अथवा प्रयास के सम्बन्ध में शैक्टर तथा सिंगर (1962) ने प्रतिभागियों को उच्च स्तर का उद्वेलन उत्पन्न करने वाली दवा ‘एपाइनफ्राइन’ की सूई देकर उसे दूसरे से व्यवहारों का प्रेक्षण करने को कहा गया। प्रेक्षण के क्रम में उल्लासोन्माद को व्यक्त करने वाला रद्दी को टोकरी पर कागज फेंक कर अपनी खुशी को व्यक्त किया तथा दूसरा क्रोध का प्रदर्शन करते हुए पैर पटकते हुए कमरे से बाहर निकल गया। इस तरह का व्यवहार संवेगों की चेतना व्याख्या का अवसर जुटा दिया।

संवेगों का नामकरण-कुछ मूल संवेग (भूख, प्यास) सभी लोगों में समान रूप से अभिव्यक्ति का अवसर देता है। चाहे व्यक्ति किसी उम्र, जाति या श्रेणी का हो किन्तु कुछ संवेग विशिष्ट होते हैं। विशिष्ट संवेगों के लक्षणों पर पर्यावरण, स्थान, समझ तथा संस्कार का प्रभाव मिलता है। जैसे-सुख, दुख, प्रसन्नता, क्रोध, घृणा आदि को मूल संवेग और आश्चर्य, अवमानना, शर्म तथा अपराध को विशिष्ट संवेग के रूप में जाना जाता है। क्योंकि भारत में जिस क्रिया के लिए शर्म या आश्चर्य प्रकट किया जाता है, अमेरिका में उसे आधुनिकता मान-लिया जाता है।

संवेगों के स्वरूप की सही पहचान के लिए उनका नामकरण वांछनीय है। जैसे–पत्र-पत्रिकाओं से लगभग दो सौ चित्रों को काटकर उन्हें कूट पर चिपका कर चित्रकार्ड का रूप दे दिया गया। अब उन्हें अलग-अलग संवेगों पर आधारित चित्रों का समुच्चय बना लिया गया। माना हँसता हुआ 20 कार्ड, रोता हुआ 50 कार्ड, क्रोध का मुद्रा वाला 80 चित्र तथा अन्यान्य मुद्रा वाले शेष चित्रों का समूह बनाकर संचित कर लिया गया। अब हमें किस समूह की आवश्यकता है उसे बिना नामकरण का कैसे व्यक्त करना संभव है। अर्थात् संवेगों की चेतन रूप से व्याख्या तथा नामकरण करना उन्हें समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 7.
संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
संवेगों की अभिव्यक्ति में पूरी शक्ति से प्रभाव डालती है। चूंकि संवेग एक आन्तरिक अनुभूति होती है, अतः संवेगों का अनुमान वाचिक तथा अवाचिक अभिव्यक्तियों के द्वारा ही होती है। वाचिक तथा अवाचित अभिव्यक्तियाँ संचार माध्यम का कार्य करती हैं। संचार के वाचिक माध्यम में स्वरमान और बोली का ऊँचापन, दोनों सन्निहित होते हैं।

अवाचिक माध्यकों में चेहरे का हाव-भाव, मुद्रा, भंगिमा तथा शरीर की गति तथा समीपस्थ व्यवहार शामिल रहते हैं। चेहरे के हाव-भावों से होने वाली अभिव्यक्ति सांवेगिक संचार का सबसे अधिक प्रचलित माध्यम है। व्यक्ति के संवेगों का सुखद या दुखद होना, क्रोधित होना, काफी खुश रहना, गौरव महसूस करना, आदि चेहरे को देखकर समझा जा सकता है। भूख द्वारा अभिव्यक्तियों में हर्ष, भय, क्रोध, विरुचि, दुख तथा आश्चर्य आदि जन्मजात तथा सार्वभौम होती है।

शारीरिक गति अर्थात् हाथ:
पैर हिलाना, संवेगों के संचार को अधिक सरल बना देती है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य शरीर की गति के माध्यम से अपनी भावनाओं को सरलता से पेश करने में समर्थ होता है। संवेगों में अन्तर्निहित प्रक्रियाएँ संस्कृति द्वारा काफी प्रभावित होती हैं। स्मृति शोध, मुख की अभिव्यक्ति, जटिलता से मुक्त प्रदर्शन आदि संवेगों का स्वाभाविक चित्र दिखाते हैं। संवेग के आत्मनिष्ठ अनुभव तथा प्रकट अभिव्यक्ति के बीच मुख का प्रदर्शन एक कड़ी का काम करता है।

संवेगों की अभिव्यक्ति में अन्य अवाचिक माध्यमों का प्रभावों भी असरदार होती है। जैसे-टकटकी लगाकर देखने, तरह-तरह की चेष्टा (शारीरिक भाव) का प्रदर्शन, पराभाषा तथा समीपस्थ व्यवहार इत्यादि के माध्यम से भी संवेगों की अभिव्यक्त की जा सकती है। चीन में ताली बजाना आकुलता या निराशा का सूचक है तथा क्रोध को विचित्र हँसी के द्वारा व्यक्त किया जाता है। भारत में मौन रहकर गहरे संवेग को अभिव्यक्ति किया जाता है। संवेगात्मक आदान-प्रदान के दौरान, शारीरिक दूरी (सान्निध्य) विभिन्न प्रकार के संवेगात्मक अर्थों को व्यक्त करती है।

जैसे- भारत के लोग खुशी जाहिर करने के लिए गले मिलते हैं। स्पर्श से संवेगात्मक उष्णता का बोध होता है। कभी विमुखता महसूस करने वाला व्यक्ति दूर से ही अंतःक्रिया करना चाहता है। सारांशतः माना जा सकता है कि संवेगों की अभिव्यक्ति में संस्कृति का प्रबल योगदान है। यह सच है कि संस्कृति की भिन्नता के कारण स्थान बदलने से उनके अर्थ एवं विधियाँ बदल जाते हैं। संवेगों की अभिव्यक्ति मुख, संकेत, हाव-भाव तथा शारीरिक क्रिया के माध्यम से सरलता से संभव होता है। जैसे-कृपया कहने वाला, गाली देने वाले से अलग-संवेग का प्रदर्शन करता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 8.
निषेधात्मक संवेगों का प्रबंधन क्यों महत्त्वपूर्ण है? निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय सुझाएँ।
उत्तर:
संवेग हमारे दैनिक जीवन तथा अस्तित्व के अंश हैं एवं संवेग एक सांतात्मक के प्रमुख हिस्सा बनकर हमें तरह-तरह के अनुभवों से परिचित कराता है। दैनिक जीवन में कई द्वन्द्वात्मक दशाओं तथा कठिन और दबावमय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। भय, दुश्चिता, विरुचि जैसी प्रवृत्ति उत्पन्न होकर निषेधात्मक संवेग के घनत्व को बढ़ा देती है।

यदि निषेधात्मक संवेगों को लम्बी अवधि तक किनारों के अनवरत चलते रहने दिया जाए, तो सम्बन्धित व्यक्ति के शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। हीनता की भावना, द्वेष, क्रोध, चिड़चिड़ापन, रक्तचाप, भोजन से अरुचि जैसी विषय तथा कष्टदायक स्थिति उत्पन्न होने लगती है। संवेगों के उत्तम प्रबंधन के द्वारा निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक संवेगों (भरोसा, आशा, खुशी, सर्जनात्मकता, साहस, उमंग, उल्लास) में वृद्धि लाने का प्रयास करना प्रमुख लक्ष्य माना जाता है।

क्रोध, भय, दुश्चिता, असमर्थता, हीनता की भावना जैसे निषेधात्मक संवेगों से मौन मुक्ति तथा क्रियाकलापों को आशा, उत्साह, खुशी, उमंग आदि से जोड़कर पूरा कर लेने की प्रवृत्ति का सराहनीय विकास निषेधात्मक संवेगों से उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं मानसिक विकारों से यथासंभव मुक्ति मिल सकती है। आजकल सफल संवेग प्रबंधन को प्रभावी सामाजिक प्रबंधन का मुख्य आधार माना जा रहा है ताकि समाज में मनोविकार वाले व्यक्तियों की संख्या में होने वाली वृद्धि को रोका जा सके।

निषेधात्मक संवेगों के प्रबंधन हेतु उपाय-निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक संवेगों में वृद्धि करके वांछित प्रबंधन को सुपरिणामी और सार्थक स्वरूप प्रदान किया जा सकता है जिसके लिए निम्नलिखित युक्तियाँ सफल हो सकती हैं –

1. आत्म-जागरुकता में वृद्धि:
किसी भी परिस्थिति को समझकर उससे संबंधित धनात्मक या ऋणात्मक प्रभावों को जानने तथा उसके प्रति अनुकूलता प्रदर्शित करने के लिए सदा जागरुक रहना खतरा से मुक्ति दिलाने में तथा संभावित लाभप्रद परिणामों के सदुयोग में सरल मार्ग मिल जाता है।

2. परिस्थिति की सम्पूर्ण पहचान:
कोई परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई, इसका क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है, इसका उपयोग किस स्थिति में लाभप्रद या हानिकारक होगा जैसे जिज्ञासु प्रश्नों के. सही उत्तर जानकर उत्पन्न परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने की प्रवृत्ति को बढ़ाना चाहिए।

3. आत्म-परीक्षण:
व्यक्ति को अपनी दक्षता, कौशल या योग्यता का सही अनुमान होना चाहिए। अपने विचारों तथा कला-कौशल को पहचानकर उसके सही प्रयोग की ओर उचित ध्यान देने से ऋणात्मक प्रभाव से मुक्ति मिल सकती है।

4. ऋणात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति:
अपने आपको आत्मग्लानि, भय, चिंता, अवसाद जैसी भावनाओं से मुक्त रखकर सृजनात्मक कार्यों में जुट जाइए। अपनी रुचि या शौक के अनुसार किसी अच्छे कार्य का चयन करके उसे पूरा करने में व्यस्त रहिए।

5. शुभचिंतकों की संख्या में वृद्धि:
अपनी भाषा एवं व्यवहार से लोगों को प्रभावित करके उन्हें शुभचिंतकों की श्रेणी में लाकर लाभ उठाने का प्रयास कीजिए।

6. उत्तम आदत:
पूजा, व्यायाम, निद्रा, सफाई, भोजन आदि से संबंधित अच्छी आदतों को अपनाकर शेष व्यक्तियों के लिए आदर्श बन जाइए। लोगों की प्रशंसा, खुशामद, श्रद्धा के कारण आपका मनोबल बढ़ेगा और आपकी सोच सर्जनात्मक हो जाएगी।

निषेधात्मक संवेगों के कुप्रभाव से बचाने के लिए सबसे सरल उपाय है कि किसी भी प्रभाव को आप स्वाभाविक क्रिया मानकर स्वीकार कीजिए। यह मानकर चलिए कि बहुत से लोग हैं जो हारते हैं, बहुतों के घर में चोरी हुई है। आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए सहयोग, परोपकार, दया, कर्मठता, चिंतन आदि को अपने जीवन में जगह देकर आप अपनी जिन्दगी को गति दे सकते हैं। जमाना बदल रहा है, आप भी बदलिये। किसी को दोषी मानने के पहले, अपनी गलतियों को पहचानिये। अभ्यास और चिंतन समस्याओं से निबटने का महामार्ग है।

Bihar Board Class 11 Psychology अभिप्रेरणा एवं संवेग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेरणा से उत्पन्न व्यवहार कब तक जारी रहता है?
उत्तर:
प्रेरणा से उत्पन्न व्यवहार प्रोत्साहन की प्राप्ति तक जारी रहता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 2.
प्रेरणा प्राणी की किस प्रकार की अवस्था है?
उत्तर:
प्रेरणा प्राणी की आन्तरिक अवस्था है जो व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
प्रेरणा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
प्रेरणा एक आन्तरिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को व्यवहार करने के लिए शक्ति प्रदान करती है तथा किसी विशेष उद्देश्य की ओर व्यवहार को ले जाती है।

प्रश्न 4.
प्रेरण-चक्र क्या है?
उत्तर:
आवश्यकता-प्रणोदन और प्रोत्साहन-सूत्र को प्रेरण-चक्र कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 5.
प्रेरणा की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
प्रेरणा की उत्पत्ति आवश्यकता से होती है।

प्रश्न 6.
संवेग की उत्पत्ति किस ढंग से होती है?
उत्तर:
संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक ढंग से होती है।

प्रश्न 7.
संवेग में क्या सन्निहित होता है?
उत्तर:
संवेग में चेतन अनुभव व्यवहार और अन्तरावयव संबंधी कार्य सन्निहित होता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 8.
संवेग की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
संवेग सतत होता है, संवेग सम्पूर्ण रूप से होता है, संवेग संचयी होता है तथा संवेग का स्वरूप प्रेरणात्मक होता है।

प्रश्न 9.
संवेग का कौन सिद्धांत है जिसमें हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र माना गया है?
उत्तर:
कैनन-बार्ड ने अपने सिद्धांत में हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र माना है।

प्रश्न 10.
वाटसन ने किस संवेग को मौलिक माना है?
उत्तर:
वाटसन ने क्रोध, भय और प्रेम को मौलिक संवेग माना है।

प्रश्न 11.
विलियन जेम्स और कार्ल कहाँ के निवासी थे?
उत्तर:
विलियन जेम्स अमेरिका तथा कार्ल लाँजे डेनमार्क के निवासी थे।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 12.
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के विरोध में किस सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ है?
उत्तर:
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के हाइपोथैलेमिक सिद्धांत का प्रतिपादन कैनन-बार्ड ने किया है।

प्रश्न 13.
जेम्स-लाँजे के अनुसार संवेग का क्रम क्या है?
उत्तर:
जेम्स-लाँजे के अनुसार सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद शारीरिक परिवर्तन और अन्य में संवेगात्मक अनुभूति होती है।

प्रश्न 14.
कैनन-बार्ड के अनुसार संवेग का क्रम क्या है?
उत्तर:
कैनन-बार्ड के अनुसार सबसे पहले संवेगात्मक उद्दीपन का प्रत्यक्षीकरण, उसके बाद संवेगात्मक अनुभूति और संवेगात्मक व्यवहार दोनों साथ-साथ होता है।

प्रश्न 15.
प्रो. मैस्लो द्वारा आवश्यकता के सम्बन्ध में दिये गये विचार को बतायें।
उत्तर:
प्रो. मैसलो ने आवश्यकता पर अधिक बल दिया। उसने आवश्यकता की तीव्रता को आधार बनाया है। उनके अनुसार कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना होता है। कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जो फुर्सत से पूरी की जा सकती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 16.
प्रो. मैस्लो ने अभिप्रेरकों को कितने भागों में बाँटा है?
उत्तर:
प्रो. मैस्लो ने अभिप्रेरकों को दो भागों में बाँटा है-जन्मजात अभिप्रेरक और अर्जित अभिप्रेरक।

प्रश्न 17.
प्रेरकों का द्वन्द्व क्या है?
उत्तर:
प्रेरकों का द्वन्द्व का अर्थ उस अवस्था से है जिसमें दो से अधिक बेमेल व्यवहार प्रकट होते हैं जो एक समय में पूर्ण रूप से संतुष्टि नहीं पा सकते।

प्रश्न 18.
प्रेरणा की विफलता क्या है?
उत्तर:
मनुष्य को कभी-कभी विलम्ब से लक्ष्य की प्राप्ति होती है। कभी-कभी अपने बहुत प्रयासों के बाद भी व्यक्ति अपने लक्ष्य की पूर्ति नहीं कर पाता है। इसे ही प्रेरणा की विफलता कहते हैं।

प्रश्न 19.
सम्प्रत्यय क्या है?
उत्तर:
सम्प्रत्यय व्यक्ति के मानसिक संगठन में एक प्रकार का चयनात्मक तंत्र है जो पूर्व अनुभूतियों तथा वर्तमान उत्तेजना में एक संबंध स्थापित करता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 20.
संचार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
भाषा, संकेत एवं चिह्नों आदि के माध्यम से अपने चिंतन एवं विचार को दूसरों तक पहुँचाने एवं दूसरों के चिंतन एवं विचार से अवगत होना ही संचार है।

प्रश्न 21.
अन्तर्नाद या प्रणोदन क्या हैं?
उत्तर:
अन्तर्नोद या प्रणोदन एक ऐसी अवस्था है, जिससे प्राणी में क्रियाशीलता आती है और उसका व्यवहार एक निश्चित दिशा की ओर क्रियाशील हो जाता है।

प्रश्न 22.
प्रेरणा में प्रोत्साहन क्या है?
उत्तर:
प्रोत्साहन एक बाह्य लक्ष्य या वस्तु है, जिससे ऐसी उत्तेजना प्राप्त होती है जो प्राणी को लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है और जिससे आवश्यकताओं की संतुष्टि होती है।

प्रश्न 23.
प्रेरणा कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
अभिप्रेरकों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-जन्मजात अभिप्रेरक तथा अर्जित अभिप्रेरक।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 24.
जैविक अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
जैविक या जन्मजात अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो प्राणी में जन्म के समय से ही वर्तमान रहता है।

प्रश्न 25.
सामाजिक या अर्जित अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
सामाजिक या अर्जित अभिप्रेरक से तात्पर्य उन प्रेरकों से है, जिसे व्यक्ति अपने जीवन काल में अर्जित करता है; क्योंकि इसके अभाव में उसका सामाजिक जीवन अर्थहीन हो जाता है।

प्रश्न 26.
जैविक अभिप्रेरक कौन-कौन हैं?
उत्तर:
जैविक अभिप्रेरक के अन्तर्गत भूख, प्यास, यौन, मातृक प्रणोदन आदि आते हैं।

प्रश्न 27.
अर्जित प्रेरक के अन्तर्गत कौन-कौन प्रेरक आते हैं?
उत्तर:
अर्जित प्रेरक के अन्तर्गत सामुदायिक, अर्जनात्मकता, कलह, आत्म स्थापना आदि आते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 28.
उपलब्धि अभिप्रेरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
उपलब्धि अभिप्रेरक से तात्पर्य श्रेष्ठता का एक खास स्तर प्राप्त करने की इच्छा से है।

प्रश्न 29.
कोई व्यक्ति किस प्रकार के अभिप्रेरक के कारण विभिन्न परिस्थितियों में कठोर श्रम करेगा?
उत्तर:
कोई व्यक्ति तीव्र उपलब्धि अभिप्रेरक के कारण विद्यालय में, खेल में, संगीत में तथा अन्य कई भिन्न परिस्थितियों में कठोर श्रम करेगा।

प्रश्न 30.
आवश्यकता की उत्पत्ति कब होती है?
उत्तर:
मानव जीवन के लिए किसी वांछनीय वस्तु का अभाव या न्यूनता आवश्यकता की उत्पत्ति का कारण होता है।

प्रश्न 31.
यादृच्छिक क्रिया-कलाप को किसके कारण ऊर्जा उपलब्ध होती है?
उत्तर:
आवश्यकता के कारण उत्पन्न तनाव या उद्वेलन के रूप में जो अंतर्नाद जन्म लेता है, उसी के कारण यादृक्षिक क्रिया-कलाप को ऊर्जा मिलती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 32.
अभिप्रेरक के दो प्रकार क्या हैं?
उत्तर:

  1. जैविक तथा
  2. मनोसामाजिक अभिप्रेरक।

प्रश्न 33.
सामान्य मानवीय मूल प्रवृत्ति के चार उदाहरण दें।
उत्तर:

  1. जिज्ञासा
  2. पलायन
  3. प्रतिकर्षण और
  4. प्रजनन।

प्रश्न 34.
भूख की अनुभूति को तीव्र बनाने में किन बाह्य कारकों का हाथ होता है?
उत्तर:
भोजन का स्वाद, रंग, सुगंध तथा दूसरे को भोजन करते हुए देखना आदि खाने की इच्छा को बढ़ाने वाले कारक हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 35.
जैविक प्रेरकों का मापन किस विधि से होता है?
उत्तर:
जैविक प्रेरक को मापने की कई विधियाँ हैं जिनमें पसंद विधि, अवरोधन विधि, शिक्षण विधि, क्रिया पिंजड़ा विधि आदि मुख्य हैं।

प्रश्न 36.
संवेग की समुचित परिभाषा क्या है?
उत्तर:
संवेग व्यक्ति में एक तीव्र उपद्रव की अवस्था है, जिसका प्रभाव उस पर संपूर्ण रूप से पड़ता है । इसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक ढंग से होती है और जिसमें चेतन अनुभव, व्यवहार और अन्तरावयव संबंधी कार्य सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 37.
प्रभावशाली संचार की बाधाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वैसे कारक जो संचार को प्रभावशाली बनने में बाधा उत्पन्न करती है उसे संचार की बाधाएँ कहा जाता है।

प्रश्न 38.
प्रभावशाली संचार की बाधाएँ क्या हैं?
उत्तर:
सूचना में अस्पष्टता, ग्रहणकर्ता के क्षमता की सीमाएँ, भौतिक बाधाएँ, माध्यम में गुणवत्ता का अभाव, वैयक्तिक बाधाएँ आदि प्रभावशाली संचार की बाधाएँ हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 39.
संचार स्रोत की क्या विशेषताएँ होती हैं?
उत्तर:
संचार स्रोत की विशेषताओं में विश्वसनीयता, आकर्षण तथा समानता आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 40.
संचार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
सूचना भेजने वाले तथा सूचना प्राप्त करने वाले के बीच विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम को संचार कहा जाता है।

प्रश्न 41.
प्रभावशाली संचार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जिस संचार से लक्ष्य की प्राप्ति हो उसे प्रभावशाली संचार कहा जाता है।

प्रश्न 42.
संचार के माध्यम क्या हैं?
उत्तर:
संचार के माध्यम का मतलब यह होता है कि सूचना किस तरह से स्रोत द्वारा व्यक्ति या सूचना प्राप्तकर्ता को दिया जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 43.
द्विवैयक्तिक संचार किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब दो व्यक्तियों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता है तो उसे द्विवैयक्तिक संचार कहते हैं।

प्रश्न 44.
संचार को कितने भागों में बांटा गया है?
उत्तर:
संचार को दो मुख्य भागों में बाँटा गया है-शाब्दिक संचार एवं अशाब्दिक संचार।

प्रश्न 45.
अशाब्दिक संचार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अशाब्दिक संचार का मतलब वैसे संचार से है जिसमें व्यक्ति अशाब्दिक संकेतों का उपयोग कर अपने विचारों एवं भावों को अभिव्यक्त करता है।

प्रश्न 46.
शाब्दिक संचार किसे कहते हैं?
उत्तर:
शाब्दिक संचार उस संचार को कहते हैं जिसमें विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति लिखित या मौखिक रूप से शब्दों या वाक्यों को बोलकर किया जाता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 47.
आनन अभिव्यक्ति से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
चेहरे में परिवर्तन के आधार पर अपने भावों को अभिव्यक्त करना आनन अभिव्यक्ति है।

प्रश्न 48.
संचार की प्रभावशीलता को कौन-कौन कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सूचना को विषय-वस्तु स्रोत की विशेषता, संचार का माध्यम, ग्रहणकर्ता की विशेषताएँ संचार की प्रभावशीलता. को प्रभावित करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आवश्यकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी भी अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की उत्पत्ति आवश्यकता (need) से होती है। प्राणी के शरीर में किसी चीज की कमी या अति की अवस्था को आवश्यकता (need) कहा जाता है। जब व्यक्ति के शरीर में पानी की कमी हो जाती है तब उसमें प्यास की आवश्यकता (need) का अनुभव होता है। उसी तरह जब शरीर में अनावश्यक चीजों जैसे मल-मूत्र का जमाव अधिक हो जाता है तब मल-मुत्र त्यागने की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

ये सभी जैविक आवश्यकता (biological need) के उदाहरण हैं। इन जैविक आवश्यकताओं के अलावा कुछ मनोवैज्ञानिक आवश्यकता (Psychological need) भी होते हैं। जैसे, धन कमाने की आवश्यकता, सामाजिक प्रतिष्ठा पाने की आवश्यकता, स्नेह पाने की आवश्यकता मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के उदाहरण हैं जिनसे भी व्यक्ति का व्यवहार अभिप्रेरित होता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 2.
अभिप्रेरणा का अर्थ बतायें।
उत्तर:
अभिप्रेरणा एक ऐसा आंतरिक बल (intermal force) होता है जो व्यक्ति को किसी उद्देश्य (goal) की ओर व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे, एक भूखे व्यक्ति का उदाहरण लें। भूखे व्यक्ति को होटल या किसी ऐसी जगह जहाँ उसे भोजन मिल सकता है, की ओर ले जाता है। जबतक उसे भोजन नहीं मिल जाता है, उसका व्यवहार भोजन खोजने में लगा रहता है।

इस उदाहरण में भूख आवश्यकता (need) है। इससे व्यक्ति में जो तनाव (tension) की अवस्था उत्पन्न होती है जिसके कारण वह भोजन ढूँढने का व्यवहार करता है, प्रणोद (drive) कहलाता है। भोजन एक प्रोत्साहन (incentive) है जिसके पाने से प्रणोद में कमी तथा आवश्यकता की तुष्टि हो जाती है। इस तरह, प्रत्येक अभिप्रेरण में आवश्यकता-प्रणोद-प्रोत्साहन (need-drive-incentive) का एक क्रम पाया जाता है।

प्रश्न 3.
जन्मजात अभिप्रेरक का अर्थ उदाहरण सहित बताएँ।
उत्तर:
जन्मजात अभिप्रेरक से तात्पर्य वैसे अभिप्रेरक से है जो व्यक्ति में जन्म से ही पाए जाते हैं तथा इनके अभाव में व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है। भूख, प्यास, काम जन्मजात अभिप्रेरक के उदाहरण हैं। इन तीनों के अभाव में व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं है। कोई भी व्यक्ति भूख, प्यास तथा काम की आवश्यकता को संतुष्टि किये बिना जिन्दा नहीं रह सकता है।

प्रश्न 4.
प्रणोद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रणोद (drive) एक ऐसी मानसिक तनाव की अवस्था है जो आवश्यकता के कारण उत्पन्न होती है तथा जो व्यक्ति को क्रियाशील बना देती है। जैसे, भूख की आवश्यकता में व्यक्ति भोजन खोजने के लिए क्रियाशील हो उठता है तथा उसमें एक मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। प्रणोद का स्वरूप जैविक तथा मनोवैज्ञानिक कुछ भी हो सकता है। जब जैविक आवश्यकता अर्थात् भूख, प्यास, काम आदि द्वारा प्रणोद उत्पन्न होता है तो उसका स्वरूप जैविक होता है, परंतु यदि अर्जित आवश्यकता जैसे संबंधन (affiliation) की आवश्यकता, उपलब्धि की आवश्यकता आदि द्वारा प्रणोद उत्पन्न होता है जब उसका स्वरूप मनोवैज्ञानिक या सामाजिक होता है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 5.
आवश्यकता-प्रणोदन-प्रोत्साहन सूत्र का वर्णन करें।
उत्तर:
किसी भी अभिप्रेरित व्यवहार में तीन महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय होता है-आवश्यकता, प्रणोदन तथा प्रोत्साहन। आवश्यकता से तात्पर्य कमी या अति की शारीरिक अवस्था से होता है। जैसे, प्यास की आवश्यकता उत्पन्न होने पर व्यक्ति के शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी पायी जाती है। प्रणोदन जो आवश्यकता से उत्पन्न होता है, एक ऐसी मानसिक तनाव की अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए जल की तलाश में तरह-तरह का व्यवहार करता है। जैसे, एक प्यासा व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए जल की तलाश में इधर-उधर भटकता है। प्रोत्साहन से तात्पर्य उस लक्ष्य से होता है जिसकी प्राप्ति से प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति होती है। जैसे प्यासे व्यक्ति के लिए जल एक प्रोत्साहन है, जिससे प्रणोदन में कमी होती है तथा आवश्यकता की संतुष्टि होती है।

प्रश्न 6.
जन्मजात अभिप्रेरक तथा अर्जित अभिप्रेरक में अंतर बतायें।
उत्तर:
जन्मजात अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो प्राणी में जन्म से ही मौजूद होते हैं। ऐसे अभिप्रेरकों का मुख्य कार्य प्राणी के दैहिक अस्तित्व (physiological existence) को कायम रखना है। भूख, प्यास, काम (sex) तथा मल-मूत्र त्यागना आदि जन्मजात अभिप्रेरक के उदाहरण हैं। अर्जित अभिप्रेरकरक इनसे भिन्न होते हैं। अर्जित अभिप्रेरक वैसे अभिप्रेरक को कहा जाता है जो व्यक्ति में जन्म से तो मौजूद नहीं रहते हैं, परंतु उन्हें व्यक्ति जन्म के बाद अन्य लोगों से सामाजिक अंत:क्रिया (interactions) करने पर विकसित कर लेते हैं। उपलब्धि की आवश्यकता सत्ता तथा सम्मान की आवश्यकता, संबंधन या सामुदायिकता की आवश्यकता अर्जित आवश्यकता के कुछ उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 7.
प्यास की अभिप्रेरक में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्यास एक ऐसा अभिप्रेरक है जिसमें स्पष्टतः कुछ शारीरिक परिवर्तन (bodily changes) होते हैं। कुछ शारीरिक परिवर्तन बाह्य (external) होते हैं तथा कुछ शारीरिक परिवर्तन आन्तरिक (internal) होते हैं। बाह्य शारीरिक परिवर्तनों में जीभ चटपटाना, कंठ सूखना तथा पानी के लिए दौड़-धूप करना प्रमुख हैं। आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन में लार-ग्रन्थियों से कम लार स्राव होना, प्राणी के शरीर की कोशिकाओं में पानी की कमी होना, रक्त की मात्रा (volume) में कमी आना प्रधान है। सामान्यतः तीव्र प्यास की स्थिति में रक्तचाप (blood pressure) में भी कमी आ जाती है।

प्रश्न 8.
अर्जित अभिप्रेरक का अर्थ उदाहरण सहित बतलाएँ।
उत्तर:
अर्जित अभिप्रेरक से तात्पर्य वैसे अभिप्रेरक से होता है जो व्यक्ति में जन्मजात नहीं होते हैं, परंतु जिसे व्यक्ति जीवनकाल में अर्जित करता है। वह सामाजिक मूल्यों के अनुरूप तरह-तरह के व्यवहार करने की प्रेरणा विकसित कर लेता है, इसे ही अर्जित अभिप्रेरक कहते हैं। आक्रमणशीलता, सामुदायिकता, संग्रहशीलता, उपलब्धि अभिप्रेरक, आदत, आकांक्षास्तर, मनोवृत्ति, अभिरुचि आदि अर्जित अभिप्रेरक के उत्तम उदाहरण हैं। इन अभिप्रेरकों से व्यक्ति का सामाजिक जीवन अधिक प्रभावशाली हो पाता है।

प्रश्न 9.
संवेग का अर्थ बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग एक भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है। साधारण अर्थ में संवेग व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था का दूसरा नाम है। लेकिन मनोवैज्ञानिकों ने संवेग का अर्थ इससे भिन्न बतलाया है। इस विशिष्ट अर्थ में संवेग व्यक्ति में समग्र रूप से तीव्र उपद्रव की अवस्था है जिसकी उत्पत्ति मनोवैज्ञानिकों कारकों से होती है तथा जिसमें व्यवहार, चेतनानुभूति तथा अन्तरावयवी कार्य होते हैं। इस परिभाषा से संवेग के कई पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है, जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

  1. संवेग में तीव्र उपद्रव की अवस्था होती है।
  2. संवेग में समग्र रूप से शारीरिक उपद्रव होता है।
  3. संवेग की उत्पत्ति मनोवैज्ञानिक कारणों से होती है।
  4. संवेग में चेतना, अनुभव, व्यवहार तथा अन्तरांगों के कार्यों में परिवर्तन होता है। भय, क्रोध, प्रेम आदि संवेग के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 10.
उपलब्धि अभिप्रेरक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
उपलब्धि अभिप्रेरक से तात्पर्य श्रेष्ठता का विशेष स्तर प्राप्त करने से होता है। जिस व्यक्ति में यह अभिप्रेरक अधिक होता है, वह जिन्दगी में अधिक-से-अधिक सफलता प्राप्त करने में सक्षम होता है। सभी व्यक्तियों में उपलब्धि अभिप्रेरक एक समान नहीं होता है। कुछ में कम होता है तो कुछ में अधिक होता है। जिन व्यक्तियों को बचपन में स्वतंत्र प्रशिक्षण (independent training) अधिक मिली होती है, वयस्कावस्था में आने पर उनमें उपलब्धि अभिप्रेरक (achievement motive) अधिक होता है।

प्रश्न 11.
संवेग में होनेवाले शारीरिक मुद्रा में परिवर्तन की व्याख्या करें।
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने यह स्पष्टतः दिखलाया है कि प्रत्येक संवेग में एक खास प्रकार की शारीरिक मुद्रा (bodily posture) होती है। विभिन्न संवेगों में विभिन्न तरह की शारीरिक मुद्राएँ पायी जाती हैं। इन शारीस्कि मुद्राओं को देखकर संबंधित संवेग का अनुमान लगाया जाता है। जैसे, दु:ख के संवेग में व्यक्ति का शरीर कुछ झुका हुआ तथा क्रोध में उसका शरीर कुछ अकड़ा एवं तना हुआ दिखाई पड़ता है। भय के संवेग में व्यक्ति भागने की मुद्रा बना लेता है। स्पष्ट हुआ कि संवेग में कई तरह के शारीरिक परिवर्तन व्यक्ति में होते पाये जाते हैं।

प्रश्न 12.
संवेग में होने वाले आन्तरिक शारीरिक परिवर्तनों का अर्थ. उदाहरणसहित बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग में कुछ शारीरिक परिवर्तन ऐसे होते हैं जिसे व्यक्ति बाहर से नहीं देख सकता है। इसका प्रेक्षण करने के लिए विशेष यंत्र या उपकरण की जरूरत होती है, क्योंकि ऐसे परिवर्तन शरीर के भीतर में होते हैं। ऐसे परिवर्तनों को आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन कहा जाता है। जैसे, क्रोध के संवेग में यह अन्य संवेगों, जैसे-डर, प्रेम आदि में व्यक्ति के रक्तचाप का स्तर सामान्य से भिन्न हो जाता है। उसी तरह से हृदय की गति, नाड़ी की गति, श्वसन गति आदि में परिवर्तन हो जाते हैं, जिसका सही-सही प्रेक्षण विशेष उपकरण से किया जाता है। ये सभी आन्तरिक शारीरिक परिवर्तन के उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 13.
कैनन-बार्ड सिद्धांत का स्वरूप बतलाएँ।
उत्तर:
कैनन-बार्ड सिद्धांत के अनुसार संवेग का केन्द्र हाइपोथैलेमस (hypothalamus) होता है। जब व्यक्ति किसी ऐसे उद्दीपन (stimulus) को देखता है, जिससे संवेग उत्पन्न हो सकता है, तो उससे उसका हाइपोथैलेमस उत्तेजित हो उठता है। हाइपोथैलेमस से एक ही साथ कुछ स्नायु प्रवाह (nerve impulse), प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुंचते हैं तथा कुछ स्नायु-प्रवाह अन्तरावयव (visceral organs) तथा मांसपेशियों में एक साथ पहुंचते हैं। प्रमस्तिष्क में स्नायु-प्रवाह के पहुँचने से संवेगात्मक व्यवहार होते हैं। अतः इस सिद्धांत के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति तथा संवेगात्मक व्यवहार एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते हैं बल्कि दोनों ही एक साथ उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 14.
जेम्स-लांजे सिद्धांत का स्वरूप बतलाएँ।
उत्तर:
संवेग के जेम्स-लांजे सिद्धांत के अनुसार जब व्यक्ति किसी ऐसे उद्दीपन को देखता है जिससे संवेग उत्पन्न होता है, तो उस उद्दीपन को देखने से उसमें संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) पहले होता है तथा संवेगात्मक व्यवहार बाद में होता है। इसका मतलब यह हुआ कि संवेगात्मक व्यवहार का होना संवेगात्मक अनुभूति के होने पर निर्भर करता है। जैसे, व्यक्ति भालू देखता है, डर जाता है इसलिए भाग जाता है। स्पष्टतः इस सिद्धांत की यह व्याख्या संवेग के सामान्य व्याख्या के विपरीत है।

प्रश्न 15.
अभिप्रेरक के प्रकार बतलाइये।
उत्तर:
अभिप्रेरकों का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जाता है। थामसन के अनुसार अभिप्रेरकों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। ये निम्न प्रकार हैं –

  1. प्राकृतिक, एवं
  2. कृत्रिम।

थामसन ने अभिप्रेरकों को चार भागों में बाँटा है –

  1. सुरक्षा
  2. प्रतिक्रिया
  3. प्रतिष्ठा और
  4. नई अनुभूतियाँ

शेफर महोदय ने अभिप्रेरकों को निम्न चार भागों में बाँटा है –

  1. पुष्टिकरण
  2. विशिष्टता
  3. आदत और
  4. संवेग

विभिन्न प्रकार का वर्गीकरण दो वर्गों में इस प्रकार दिया जा सकता है –

1. जैविक अभिप्रेरक:
वह हैं जो जैविक आवश्यकताओं के कारण उत्पन्न होते हैं। वे हैं-भूख, प्यास, काम, विश्राम, मलमूत्र त्यागने की इच्छा, तापक्रम इत्यादि। इन अभिप्रेरकों का आधार शारीरिक होता है।

2. सामाजिक अभिप्रेरक:
यह सामाजिक अभिप्रेरणा के कारण उत्पन्न होते हैं। ये हैं-प्रतिष्ठा, सुरक्षा, संग्रहता, विशिष्टता, सामाजिकता, पुष्टिकरण, सामाजिक मूल्य, समुदाय के साथ एकीकरण इत्यादि।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 16.
संवेग में हाइपोथैलेमस की क्रियाओं के महत्त्व को बताएँ।
उत्तर:
संवेग की अवस्था में हाइपोथैलेमस की क्रियाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कैनन (Cannon), बार्ड (Bard) इत्यादि ने भी प्रयोगात्मक आधारों पर इस भाग के महत्व पर बल दिया है। देखा गया है कि जिन जानवरों के मस्तिष्क में से हाइपोथैलेमस भाग निकाल दिया गया वे संवेगात्मक प्रकार्य करने में असमर्थ रहे। यह भी देखा गया कि जब मस्तिष्क के दूसरे भाग हटाए गए तो यह असमर्थता रही नहीं।

यह पाया गया कि जब मस्तिष्क के दूसरे भाग को हटाया गया तो हटाने से इस प्रकार की असमर्थता नहीं रही। इस प्रकार संवेगात्मक प्रकाशन में यह भाग अत्यन्त महत्त्व का सिद्ध हुआ। परंतु यहाँ यह याद रखना चाहिए कि संवेग की अवस्था में केवल यही भाग महत्त्वपूर्ण नहीं है। बल्कि वृहत मस्तिष्कीय ब्लॉक तथा स्वतः चालित नाड़ीमण्डल भी संवेगात्मक अनुभूति के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 17.
प्रेरणा की परिभाषा दें तथा उसके प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रेरणा का शाब्दिक अर्थ, जो प्रेरित करें वह प्रेरक है, परंतु यह प्रेरणा का पूर्ण अर्थ स्पष्ट नहीं करता अतः प्रेरणा की परिभाषा तक जारी रखती है। उपरोक्त परिभाषा से निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं –

  1. प्रेरणा एक आंतरिक अवस्था है।
  2. प्रेरणा से क्रिया की उत्पत्ति होती है।
  3. प्रेरणा की क्रिया खास दिशा में होती है।
  4. प्रेरणा का संबंध किसी उद्देश्य से रहता है।
  5. प्रेरणा उद्देश्य प्राप्ति तक जारी रहती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अभिप्रेरणा क्या है? अभिप्रेरणा की परिभाषा दीजिये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा के दो महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं –

1. अभिप्रेरणा व्यक्ति की आन्तरिक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया ज्ञान हमें निरीक्षित व्यवहार की व्याख्या भी देता है और व्यक्ति के भविष्य सम्बन्धी व्यवहार के सम्बन्ध में जानकारी देता है।

2. हम अभिप्रेरणा की प्रकृति निरीक्षित व्यवहार से अनुमान लगाकर. निर्धारित करते हैं। इस अनुमान की सत्यता हमारे निरीक्षणों की विश्वसनीयता पर निर्भर है। यह सत्यता उस समय स्थापित हो जाती है, जब हम दूसरे व्यवहार की व्याख्या करने में उसका प्रयोग कर सकते हैं।

अभिप्रेरणा की परिभाषा (Definition of Motivation):
अभिप्रेरणा की अनेक परिभाषायें विद्वानों ने दी है, जो निम्न प्रकार हैं –

1. बर्नार्ड:
“अभिप्रेरणा द्वारा उन विधियों का विकास कियण जाता है जो व्यवहार के पहलुओं को प्रभावित करती हैं”

2. जानसन:
“अभिप्रेरणा सामान्य क्रिया-कलापों का प्रभाव है जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती हैं।”

3. मैगोच:
“अभिप्रेरणा शरीर की वह दशा है जो कि दिय गये कार्य के अभ्यास की ओर संकेत करती है और उसके संतोषजनक समापन को परिभाषित करती है।”

4. वुडवर्थ:
“अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह भग है जो किसी निश्चित उद्देश्य की शर्त के लिये निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।’

5. शेफर तथा अन्य:
“अभिप्रेरणा क्रिया की एक ऐसी प्रकृति है जो कि प्रणोदन द्वारा उत्पन्न होती है एवं समायोजन द्वारा समाप्त होती है।”

6. मेग्डूगाल:
“अभिप्रेरणा वे शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दशाएँ हैं जो किसी कार्य को करने के लिये प्रेरित करती हैं।”

7. थामसन:
“अभिप्रेरणा आरम्भ से लेकर अन्त तक मानव व्यवहार के प्रत्येक प्रतिकारक को प्रभावित करती है, जैसे अभिवृत्ति, आधार, इच्छा, रुचि, प्रणोदन, तीव्र इच्छा आदि जो उद्देश्यों से सम्बन्धित होती है।”

8. गिलफोर्ड:
“अभिप्रेरणा कोई भी एक विशेष आन्तरिक कारक अथवा दशा है जो क्रिया को आरम्भ करने अथवा बनाये रखने के लिए प्रेरित होती है।”

यदि हम इन परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो निम्नलिखित आधार प्रकट होंगे –

  • अभिप्रेरणा साध्य नहीं साधन है। वह साध्य तक पहुंचने का मार्ग प्रस्तुत करती है।
  • अभिप्रेरणा अधिगम का मुख्य नहीं सहायक अंग है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति के व्यवहार को स्पष्ट करती है।
  • अभिप्रेरणा से क्रियाशीलता प्रकट होती है।
  • अभिप्रेरणा पर शारीरिक तथा मानसिक, बाह्य एवं आन्तरिक परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति के अंदर शक्ति परिवर्तन से प्रारम्भ होती है।
  • अभिप्रेरणा अभिप्रेरणों भावात्मक जागृति द्वारा वर्णित होती है।
  • अभिप्रेरणा पूर्वानुमान द्वारा वर्णित होती है।

अभिप्रेरणा प्रणाली को संगठित उद्देश्य तक पहुँचाने के लिए व्यवहार करने के लिये प्रेरित करती है। अभिप्रेरणा के तीन पक्ष हैं –

  1. प्राणी में निहित प्रेरक अवस्था गति में होती है, शारीरिक आवश्यकता वातवरणीय उद्दीपक, घटनाएँ तथा शृंखला अभिप्रेरणा के लिये उत्तरदायी हैं।
  2. इस अवस्था में व्यवहार उत्पन्न होता है और वांछित दिशा में उसका अग्रेषण होता है।
  3. वांछित उद्देश्य प्राप्ति हेतु व्यवहार उत्पन्न होता है।

अभिप्रेरित व्यक्ति कुछ क्रियाएँ करता है जो उसको अपने उद्देश्य की ओर ले जाती हैं। इन प्रतिक्रियाओं द्वारा व्यक्ति में वह तनाव कम हो जाता है जो शक्ति परिवर्तन से उत्पन्न होता है।

  1. “अभिप्रेरण एक शब्दावली है जो व्यक्ति को शक्ति प्रदान करने में उसके कार्यों को निर्देशित करने को वर्णित करती है।”
  2. “अभिप्रेरण की तुलना कभी-कभी एक इंजन तथा स्वचालित यंत्र के चलाने वाले पहिये से की जाती है।”
  3. “शक्ति एवं निर्देशन अभिप्रेरणा के केन्द्र हैं।”

अभिप्रेरणा:
विभिन्न मत (Motivation : Different Views):
अभिप्रेरणा के विषय में अनेक मत तथा धारणाएँ समाज में प्रचलित रही हैं। उनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं –

1. भग्यवादी मत:
मनुष्य किसी भी कार्य को इसलिये करता है कि वह उसके भाग्य में है। यह मत दैवी शक्तियों और उसके प्रभाव पर आधारित इस बात पर बल देता है कि “मानव दैवी शक्तियों के हाथ की कठपुतली है और अभिप्रेरणा व्यक्ति की बाह्यशक्ति है।” यह मत भाग्य लेखे पर बल देता है।

2. मानव विवेकशील है:
मानव में समय के विकास के साथ-साथ वह विचार भी विकसित हुआ कि वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इस मत का आधार मानव मस्तिष्क है।

3. मानव एक यंत्र है:
वैज्ञानिकों ने मनुष्य को एक यंत्र माना है। इस यंत्र का संचालन उद्दीपनों द्वारा होता है। मनुष्य, वातावरण के विभिन्न उद्दीपनों से क्रियाशील होता है।

4. मानव पशु:
इस मत का प्रतिपादन डार्पिन ने किया था। उसके अनुसार पशुओं और मनुष्य की क्रियाओं में भेद नहीं है। मानव का विकास पशुओं से हुआ है। डार्विन “शक्तिशाली की विजय” पर विश्वास करता है। डार्विन के अनुसार तीन बातें प्रमुख हैं –

  • शारीरिक प्रणोदन (Biological) प्रेरक जो व्यक्ति को क्रियाशील बनाते हैं-भूख, प्यास, भय आदि इसी प्रेरक से दूर होते हैं।
  • अर्जित प्रेरक (Acquired Drives) जो शारीरिक प्रेरक से ही उत्पन्न होते हैं।
  • पशु और मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ एक-सी हैं।
  • मानव सामाजिक प्राणी है-मनुष्य का जन्म समाज में होता है और समाज में ही उसकी मान्यताओं के अनुसार वह अपना विकास करता है। मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामाजिक प्रभावों के कार्य करने के लिए अभिप्रेरित होता है।
  • अचेतन का मत-फ्रायड ने इस मत का प्रतिपादन किया था। मानव की क्रियाशीलता का एक मात्र कारण उसकी अचेतन अभिप्रेरणा है। उसके व्यवहार को अचेतन शक्तियाँ नियंत्रित करती हैं। इस मत के अनुसार अभिप्रेरणा का स्रोत व्यक्ति स्वयं ही है।

अभिप्रेरणा: सम्बन्धित शब्द (Motivation : Glossary):
अभिप्रेरण की विवेचना में कई शब्छ बार-बार आते हैं। इन शब्दों की व्याख्या एवं जानकारी आवश्यक है। ये शब्द इस प्रकार हैं –

1. मानसिक स्थिति (Mental Set):
इस शब्द का अर्थ है व्यक्ति का मानसिक रूप से स्वस्थ होना। मनुष्य जब तक मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं होगा तब तक किसी भी कार्य को करने के लिए अभिप्रेरित नहीं होगा।

2. प्रेरक (Drives):
प्रेरक अभिप्रेरकों को विकसित करने में बहुत सहयोग देते हैं। प्रेरक का सम्बन्ध कार्य या वस्तुओं से होता है। प्रेरक का सम्बन्ध बाह्य परिस्थितियों से होता है। प्रेरकों को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकता।

3. प्रणोद (Incentive):
प्राणी की आवश्यकताओं से प्रणोदन का उत्पत्ति होती है। पानी की आवश्यकता से प्यास की और भोजन की आवश्यकता से भूख की उत्पत्ति होती है। इसीलिये प्रणोदन के बारे में विद्वानों ने कहा है –

(अ) गिबनर एवं सेहोन-“प्रणोदन वह शक्तिशाली उद्दीपन है जो माँग एवं उसकी अनुक्रिया उपस्थित करता है।”
(ब) लैगफील्ड एवं वील्ड-“प्रणोदन आन्तरिक, शारीरिक क्रिया या दशा है जो उद्दीपन के द्वारा विशेष प्रकार का व्यवहार उत्पन्न करती है।”
(स) डैशिल-“मानव जीवन में प्रणोदन शक्ति का मूल स्रोत है जो कि जीव को किसी क्रिया के करने के लिये प्रेरित करता है।”

मनोवैज्ञानिकों ने प्रणोद का वर्गीकरण इस प्रकार किया है –

1. साइमॉड द्वारा किया गया वर्गीकरण –

  • सामूहिकता
  • अवधान केन्द्रितता
  • सुरक्षा
  • प्रेम तथा
  • उत्सुकता

2. कैसल द्वारा किया गया वर्गीकरण:

  • संवेगात्मक सुरक्षा
  • ज्ञान प्राप्ति
  • समाज में स्थान प्राप्त करना
  • शारीरिक संतोष

3. थोर्प द्वारा किया गया वर्गीकरण:

  • शारीरिक क्रियायें
  • जीवन का उद्देश्य एवं कार्य तथा
  • कार्य में स्वतंत्रता

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 2.
जेम्स-लॉर्ज सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
संवेग का यह एक लोकप्रिय सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन विलियम जेम्स (William James) तथा कार्ल-लांजे (Kari Lange) द्वारा स्वतंत्र रूप से अलग-अलग किया गया था। चूँकि संवेग के बारे में इन दोनों मनोवैज्ञानिकों के विचार लगभग एक समान थे, अतः इस सिद्धांत का नाम जेम्स-लॉजे रखा गया।

इस सिद्धांत द्वारा संवेग की व्याख्या संवेग के सामान्य व्याख्या के विपरीत है। सामान्यतः हम यही समझते हैं कि व्यक्ति जब कभी भी संवेदन उत्पन्न करने वाला उद्दीपन (Stimulus) को देखता है, तो पहले उसमें संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होता है तब संवेगात्मक व्यवहार होता है। जैसे, व्यक्ति भालू या बाघ (संवेगात्मक व्यवहार) है।

जेम्स-लॉजे सिद्धांत की व्याख्या ठीक इसके विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति बाघ या भूल को देखता है, भाग जाता है इसलिए डर जाता है। इससे स्पष्ट है कि इस सिद्धांत के अनुसार किसी संवेगात्मक उद्दीपन को देखने के बाद व्यक्ति में पहले संवेगात्मक अनुभूति होती है और तब संवेगात्मक व्यवहार होता है। संक्षेप में, इस सिद्धांत द्वारा संवेग की व्यख्या का विस्तृत इस प्रकार है –

  1. संवेग की उत्पत्ति के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति संवेग उत्पन्न करने वाले उद्दीपन (stimuls) का प्रत्यक्षण करें। इसके फलस्वरूप ज्ञानेन्द्रियों में स्नायु-प्रवाह (nerve impulse) पैदा होती है।
  2. जब स्नायु-प्रवाह मस्तिष्क में पहुँचता है, तो यहाँ से वह फ़िर शरीर के अन्तरावयवों (visceral organs) तथा मांसपेशियों (muscles) में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति संवेगात्मक व्यवहार (emotional behaviour) करता है।
  3. संवेगात्मक व्यवहार उत्पन्न होने के बाद उसकी सूचना स्नायु-प्रवाह द्वारा मस्तिष्क में पहुँचता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होती है।

जेम्स-लाँजे सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ हैं जिनमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. इस सिद्धांत के अनुसार संवेग की अनुभूति अर्थात् संवेगात्मक अनुभूति संवेग के व्यवहार अर्थात् संवेगात्मक व्यवहार पर निर्भर करता है। परंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। प्रायः यह देखा जाता है कि कई तरह के संवेगों में व्यक्ति में लगभग एक ही समान का व्यवहार पाया जाता है। यदि संवेग का अनुभव शारीरिक व्यवहार पर निर्भर करता तो एक तरह के शारीरिक व्यवहार से एक ही तरह के संवेग का अनुभव होना चाहिए था। परंतु एक ही तरह के शारीरिक व्यवहार से भिन्न-भिन्न प्रकार की संवेगात्मक अनुभूति का होना इस बात का द्योतक है कि संवेगात्मक व्यवहार या संवेगात्मक परिवर्तन पर निर्भर नहीं करता है।

2. इस सिद्धांत के अनुसार संवेगात्मक अनुभूति शारीरिक परिवर्तनों पर आधारित होता है। अगर यह बात सच्ची होती तो जब-जब व्यक्ति में किसी कारण से शारीरिक परिवर्तन होता, उसमें संबंधित संवेग की अनुभूति होती। ब्रेडी (Brady, 1958) द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि प्राणी में जब-जब शारीरिक परिवर्तन होता है, तब-तब उसमें संवेग की अनुभूति नहीं होती है। इसका मतलब यह हुआ कि इस सिद्धांत का दावा गलत है।

3. मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभव शरीर के भीतरी अंगों में परिवर्तन होने के कुछ पहले ही हो जाता है। इसका स्पष्ट मतलब यह हुआ कि संवेगात्मक अनुभव पहले हो जाते हैं तथा संवेगात्मक परिवर्तन बाद में होते हैं। ऐसी हालत में इस सिद्धांत का यह दावा कि संवेगात्मक अनुभूति संवेगात्मक परिवर्तन द्वारा उत्पन्न होता है, ठीक एवं अर्थपूर्ण नहीं लगता है।

4. इस सिद्धांत के अनुसार, यदि शारीरिक परिवर्तन न हो या उसकी सूचना मस्तिष्क को किसी कारण से नहीं मिलता है, तो संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) नहीं होती है अर्थात् व्यक्ति में किसी प्रकार संवेग नहीं होता है। परंतु कुछ लोगों, जैसे शेरिंगटन (Sherriangton) द्वारा कुत्ते पर किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हो चुका है कि सिद्धांत का यह दावा गलत है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यद्यपि जेम्स-लाँजे सिद्धांत की आलोचना की गयी है, फिर भी यह सिद्धांत संवेग का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 3.
अभिप्रेरणा का वर्गीकरण क्या है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से अभिप्रेरणा का वर्गीकरण किया है। आगे कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा प्रतिपादित वर्गीकरण प्रस्तुत कर रहे हैं –

1. थामसन द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classication by Thomson):
थामसन ने अभिप्रेरकों को दो भागों में विभाजित किया है –

(i) प्राकृतिक अभिप्रेरक (Natural Motives):
वे अभिप्रेरक हैं जो जन्म से ही व्यक्ति में पाये जाते हैं। भूख, प्यास, सुरक्षा आदि अभिप्रेरकों से मानव जीवन का विकास होता है।

(ii) कृत्रिम अभिप्रेरक (Artificial Motives):
वे अभिप्रेरक होते हैं, जो वातावरण में विकसित होते हैं। इनका आधार तो प्राकृतिक अभिप्रेरणा होते हैं, परंतु सामाजिकता के आवरण में इनकी अभिव्यक्ति का रूप बदल जाता है। जैसे समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करना, सामाजिक सम्बन्ध बनाना आदि।

2. मैस्लो द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classification by Maslow):
मैस्लो ने आवश्यकताओं पर अधिक बल दिया है। उसने आवश्यकताओं की तीव्रता को आधार बनाया है। कुछ आवश्यकताओं ऐसी होती हैं जिन्हें तुरंत पूरा करना पड़ता है। कुछ आवश्यकतायें ऐसी होती हैं जो फुसत से पूरी की जा सकती है। उदाहरणार्थ-भूखा व्यक्ति पहले अपने भोजन की व्यवस्था करता है। भूख मिट जाने के पश्चात् वह सुरक्षा या अन्य किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है।

मैस्लो ने अभिप्रेरकों को दो भागों में बाँटा है –

(i) जन्मजात अभिप्रेरक (Inborm Moties):
इसके अन्तर्गत भूख, प्यास, सुरक्षा यौन आदि आ जाते हैं।

(ii) अर्जित अभिप्रेरक (Acquired Motives):
इसके अन्तर्गत वातावरण से प्राप्त अभिप्रेरक आते हैं इनको भी उसने सामाजिक तथा व्यक्तिगत (Social and individual) भागों में बाँटा है। सामाजिक अभिप्रेरकों के अन्तर्गत सामाजिकता, ययुत्सा और आत्मस्थापना एवं व्यक्तिगत अभिप्रेरकों में आदत, रुचि, अभिवृत्ति तथा अचेतन अभिप्रेरक आते हैं।

3. क्रेच एवं क्रचफील्ड द्वारा किया गया वर्गीकरण (Classification by Krech and Crutchfied):
इस प्रकार का वर्गीकरण अभिप्रेरकों की न्यूनता तथा अधिकता पर आधारित है –

(i) न्यूनता (Deficiency) अभिप्रेरक:
अभिप्रेरक मानव के अभाव तथा कमियों को दूर करने में सहायक होते हैं। क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार, “न्यूनता का अभिप्रेरक आवश्यकताओं से सम्बन्धित है जिनके द्वारा चिन्ता, डर, धमकी या और कोई मानसिक द्वन्द्व दूर हो जाता है।”

इसका ध्येय मानव का संसार में रहना एवं सुरक्षा प्राप्त करना है। इस प्रकार इन अभिप्रेरकों को चार प्रमुख रूपों में बाँटा गया है –

  • शरीर से सम्बन्धित
  • वातावरण से सम्बन्धित
  • समय से सम्बन्धित और
  • स्वयं से सम्बन्धित

(ii) अधिकता (Abundancy) अभिप्रेरक:
इन अभिप्रेरकों का ध्येय संतोष एवं उत्साह है। क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार-“अधिकता के अभिप्रेरक का उद्देश्य संतोष प्राप्ति, सीखना, अवबोध, अन्वेषण तथा अनुसंधान रचना एवं प्राप्ति है।”

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 4.
अभिप्रेरणा की अवधारणाएँ तथा प्रकार बताइये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा की अवधारणायें (Concepts of Motivation)-अभिप्रेरणा की एक विस्तृत अवधारणा है जो शक्ति एवं व्यवहार के निर्देशन के कारकों से जोड़ दी जाती है। जैसे-अभिरुचि, आवश्यकता, मूल्य, प्रवृत्ति, आकांक्षायें, लक्ष्य आदि।

अभिप्रेरणा का व्यवहार प्रभाव –

  1. अभिप्रेरणा व्यवहार को शक्तिशाली बनाती है।
  2. अभिप्रेरणा व्यवहार को उद्देश्य के प्रति निर्देशित करती है।
  3. अभिप्रेरणा व्यवहार के विभिन्न कार्यों की पूर्ति के लिये समय की मात्रा को निर्धारित करती है।

अभिप्रेरणा के प्रकार –

  1. एक-मात्र अभिप्रेरक अवधारणा-फ्रायड के अनुसार मानव के अंदर काम वासना शक्ति का होना है। दूसरे मनोवैज्ञानिकों द्वारा कहा गया है कि मानव व्यवहार चाहे भूख, प्यास, प्रेम आदि से प्रेरित हो इनमें कोई अंतर नहीं आता। तीसरे वह अवधारणा जी सब अभिप्रेरकों को मिलाकर एक सामान्य चिन्ता में बदल देती है।
  2. द्वि-अभिप्रेरक अवधारणा-दो मुख्य विरोधी शक्तियों के रूप में बताया गया है, जैसे-जन्म-मृत्यु, पुरुषत्व-स्त्रीत्व आदि।
  3. बहु-अभिप्रेरक अवधारणा-मेडसन, मेर आदि अनेक विद्वानों ने आवश्यकताओं को मनोवैज्ञानिक प्रकार से सम्मिलित करके उदाहरण प्रस्तुत किया।

प्रश्न 5.
अभिप्रेरणा के व्यवहार के लक्षण बतलाइये।
उत्तर:
अभिप्रेरणा: व्यवहार के लक्षण (Motivation : Behaviour Patterns) अभिप्रेरणा देने के पश्चात् कैसे ज्ञात करेंगे कि उत्प्रेरित व्यक्ति किसी कार्य के लिये तैयार हो गया अथवा नहीं। यह ज्ञात करने के साधन अथवा लक्षण इस प्रकार हैं –

1. उत्सकता (Eagermess):
जब बालक क्रिया को करने के लिये अभिप्रेरित किये जाते हैं तो क्रिया के प्रति उत्सुकता दिखाई देती है। जब उत्सुकता दिखाई दे तो समझे कि बालक क्रियाशील हो गया।

2. शक्ति संचालन (Energy mobilisation):
अभिप्रेरणा प्राप्त होत ही व्यक्ति में अतिरिक्त शक्ति उत्पन्न होती है। अभिप्रेरणा प्राप्त होते ही व्यक्ति घंटों तक बिना थकान के काम करते हैं। शक्ति संचालन में व्यक्ति में बड़े-बड़े कार्य करने की क्षमता पैदा हो जाती है। अभिप्रेरणा प्राप्त करके व्यक्ति श्रेष्ठतम कार्य कर सकते हैं।

3. निरन्तरता (Consistency):
जब तक व्यक्ति को अभिप्रेरणा प्राप्त होती है, तब तक वे कार्य में निरंतर लगे रहते हैं।

4. लक्ष्य प्राप्ति से बैचेनी दूर होना (Reduction of Tension by Achievement of Goal):
अभिप्रेरणा से जो व्यवहार प्रकट होते हैं वे लक्ष्य प्राप्ति के बाद संतोष अनुभव करते हैं। समस्या होते ही बेचैनी दूर हो जाती है।

5. केन्द्रित ध्यान (Concentrated Attention):
अभिप्रेरणा प्राप्त करते ही व्यक्ति क्रिया में ध्यानरत हो जाता है। अभिप्रेरित व्यवहार में व्यक्ति कई प्रकार से उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

अभिप्रेरणात्मक व्यवहार (Motivated Behaviour):
इस प्रकार के. व्यवहार की विशेषतायें निम्न प्रकार हैं –

  • अभिप्रेरकों का निर्माण किया जाता है। इससे शक्ति के विकास तथा वृद्धि में गति मिलती है।
  • अभिप्रेरित व्यवहार में आन्तरिक परिवर्तन होता है। भूख के अभिप्रेरक से शरीर में रासायनिक क्रिया होती है और मुख मुद्रा तथा शरीर के अवयवों में परिवर्तन प्रतीत होता है।
  • भूख के प्रेरक के समान ही यौन अथवा सेक्स का अभिप्रेरक होता है। यौन के प्रति आकर्षण से शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होती है। व्यक्ति किसी भी प्रकार से उसे शान्त करने का प्रयास करता है। अभिप्रेरित व्यवहार में व्यक्ति-व्यक्ति तथा संस्कृति-संस्कृति की भिन्नता पाई जाती है।
  • मनोवैज्ञानिकों अभिप्रेरकों में समस्या की कठिनाई, वर्गीकरण तथा विश्लेषण निहित होता है।
  • मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक व्यवहार में व्यवहार की दशा का निर्धारण करते हैं।
  • संग्रह करने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा तथा ऐश्वर्य प्राप्त के लिये प्रयत्न करता है।
  • अभिप्रेरित व्यवहार में प्राथमिकता पाई जाती है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 6.
अभिप्रेरकों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरकों से तात्पर्य (Meaning of Motives) अभिप्रेरक वह शक्ति है जो एक व्यक्ति को कार्य करने के लिये उत्तेजित करती है। वे व्यक्ति के व्यवहार की दिशाओं को निर्धारित करते हैं और उनकी क्रियाओं की गति का संचालन करते हैं। जब किसी व्यक्ति को अभिप्रेरक मिलते हैं तो वह एक तनाव एवं असंतुलन अनुभव करता है। व्यक्ति की लगभग सभी क्रियाएँ अभिप्रेरकों से ही होती हैं। अभिप्रेरक तीन प्रकार से कार्य करते हैं –

  1. यह कार्य का प्रारम्भ करते हैं।
  2. क्रियाओं को गतिशीलता देते हैं और
  3. जब तक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होती, क्रियाओं को एक निश्चित दिशा की ओर प्रेरित किये रहते हैं।

इस प्रकार हम एक अभिप्रेरक की परिभाषा इस तरह दे सकते हैं-“यह क्रिया करने की वह प्रवृत्ति है जो एक उद्दीपन द्वारा प्रारम्भ होती है तथा अनुकूलन द्वारा समाप्त होती है।” आवश्यकता, अन्तर्नोद, प्रोत्साहन तथा अभिप्रेरकों में अंतर-वास्तव में अभिप्रेरक के सम्बन्ध में बहुत से शब्द प्रयोग किये जाते हैं-क्षुधा, आवश्यकतायें, अन्तर्नाद एवं अभिप्रेरक।

अन्तर्नोद शब्द उस समय प्रयोग किया जाता है जब हमें शरीर की आवश्यकताओं से उत्पन्न मानसिक तनाव की अनुभूति हो, जैसे-भूख, प्यास आदि। वातावरण का वह तत्त्व जो एक अन्तर्नाद को सन्तुष्टि करता है, प्रोत्साहन कहलाता है। “भूख” के अन्तर्नोद के लिये भोजन “प्रोत्साहन” है। अभिप्रेरक में “आवश्यकता” और “अन्तर्नाद” के साथ-साथ लक्ष्य की प्राप्ति की भावना का समावेश हो जाता है। इस अवस्था को “अभिप्रेरक” की संज्ञा देते हैं।

अभिप्रेरक के आवश्यक अंग निम्नलिखित हैं –

  1. आवश्यकता एवं अन्तर्नाद जो व्यक्ति में सक्रियता उत्पन्न करती है।
  2. उद्देश्य-प्राप्ति के ओर व्यवहारों की दिशा का नियंत्रण।
  3. उद्देश्य प्राप्त कर लेने के पश्चात् क्रियाओं का अन्त।

प्रश्न 7.
जेम्स-लॉजे सिद्धांत की सीमाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जेम्स-लॉजे सिद्धांत की कड़ी आलोचना की गई है और इसके अनेकों दोषों का उल्लेख किया गया है –

  1. इस सिद्धांत की आलोचना Cannon तथा Bard ने कड़े शब्दों में की है उन्होंने कहा है कि संवेग का आधार सहानुभूतिक मंडल नहीं है बल्कि Hypothalamus है। बिल्ली पर प्रयोग करते हुए इन्होंने जेम्स लौपे के सिद्धांत को खंडित किया।
  2. इस सिद्धांत की आलोचना Cannon ने करते हुए कहा है कि संवेगात्मक अनुभूति तथा । संवेगात्मक व्यवहार एक ही साथ होते हैं। अतः जेम्स-लॉजे का यह विचार गलत है कि संवेगात्मक व्यवहार पर संवेगात्मक अनुभूति आधारित है।
  3. इस सिद्धांत की आलोचनात्मक रोरिंगटन ने भी की है। उन्होंने अपने प्रयोगों के आधार पर प्रमाणित किया कि सहानुभूतिक मंडल वास्तव में संवेग का केन्द्र का केन्द्र ही है।
  4. शारीरिक परिवर्तनों की चेतना के अभाव में संवेगात्मक अनुभूति संभव नहीं है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 8.
अभिप्रेरणा के प्रभावक प्रतिकारक कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
अभिप्रेरणा: प्रभावक प्रतिकारक (Motivation : Influencing Factors):
अभिप्रेरणा किस प्रकार प्रभावशाली कार्य करती है, इसका निणर्य अनेक प्रभावक प्रतिकारक करते हैं। अभिप्रेरणा पर कई बातें प्रभाव डालती हैं। प्रमुख प्रभावक तत्त्व निम्न प्रकार हैं –

1. आवश्यकतायें (Needs):
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। बालकों तथा बड़ों की भी यही प्रवृत्ति होती है कि वे आवश्यकता के वशीभूत होकर कार्य करते हैं। कार्य से पूर्व आवश्यकता महसूस कराई जाये।

2. अभिवृत्ति (Attitudes):
अभिप्रेरणा व्यक्ति में अभिवृत्ति का विकास करने में सहायक करती है। अभिवृत्ति का विकास होने से वे कार्य को अच्छी तरह करते हैं।

3. रुचि (Interest):
व्यक्ति की जिस काम में रुचि होती है उसे वह तुरंत सीख लेते हैं। प्रस्तुतीकरण से पूर्व व्यक्ति में रुचि पैदा करना आवश्यक है।

4. आदतें (Habits):
आदतें नये ज्ञान को प्रदत्त करने में सहायक होती हैं। नया ज्ञान पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिये।

5. संवेगात्मक (Emotional):
स्थिति-संवेगात्मक स्थिति का ध्यान रखना आवश्यक है। सीखे जाने वाले ज्ञान का संवेगात्मक सम्बन्ध स्थापित करने के पश्चात् अभिप्रेरण प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करेगा।

6. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment):
पुरस्कार एवं दण्ड का अभिप्रेरणा में अधिक महत्त्व है। ये भावी व्यवहार पर असर डालते हैं। कार्य में अभिवृत्ति उत्पन्न होने से पुरस्कार के प्रति लालच पैदा नहीं होता। पुरस्कार से लाभ इस प्रकार है –

  • पुरस्कार से आनन्द प्राप्त होता है।
  • पुरस्कार व्यक्ति को कार्य की अभिप्रेरणा देते हैं।
  • पुरस्कार रुचिवर्द्धक एवं उत्साहवर्द्धक होते हैं।
  • पुरस्कार मनोबल उत्पन्न करते हैं एवं व्यक्ति के अहंकार को सन्तुष्ट करते हैं।

पुरस्कार से हानियाँ इस प्रकार हैं –

  • पुरस्कारों से कार्य में अभिरुचि पैदा नहीं होती है।
  • पुरस्कार प्राप्ति के लिये धोखा भी दिया जा सकता है।
  • बिना त्याग प्राप्ति के भावना को प्रोत्साहन मिलता है।
  • केवल पुरस्कार प्राप्ति के लिये कार्य किया जाता है।

विद्यार्थियों में दण्ड के लाभ कुछ इस प्रकार हैं –

  • दण्ड अवांछित कार्य करते से रोकते हैं।
  • अनुशासन का स्वरूप होते हैं।
  • बच्चों को अवांछनीयता. का विश्वास दिलाते हैं।

दण्ड की हानियाँ भी इस प्रकार हैं –

  • दण्ड का आधर भय होता है।
  • दण्ड ग्रहण करने को तैयार व्यक्ति के लिये दण्ड का महत्त्व समाप्त हो जाता है।
  • इससे अप्रिय एवं दुखद अनुभूति पैदा होती है।
  • दण्ड के परिणाम स्थायी नहीं होते।
  • दण्ड से दुर्भावना पैदा होती है।
  • दण्ड की कठोरता की कोई माप नहीं है।

वास्तव में पुरस्कार एवं दण्ड, दोनों का उद्देश्य एक ही है, यानी भावी व्यवहार पर अनुकूल प्रभाव डालना। पुरस्कार व्यवहार पर वांछित प्रभाव डालने के लिये तथा दण्ड एक अवांछित कार्य को रोकने के लिये उसके साथ एक अप्रिय अनुभूति को जोड़ता है।

7. प्रतियोगिता (Competition):
प्रतियोगितायें ज्ञान प्राप्ति की अभिप्रेरणा दे सकती है। प्रतियोगितयों दो प्रकार की होती हैं –

  • व्यक्तिगत प्रतियोगिता एवं
  • सामूहिक प्रतियोगिता

8. प्रगति का ज्ञान (Knowledge of Progress):
व्यक्ति को अपने ज्ञानार्जन की प्रगति को बताये रहना चाहिये। ऐसा करने से क्रियाशीलता आती है।

9. असफलता का भय (Threat of Fear):
व्यक्ति को कभी उसकी असफलताओं का भय भी दिखाते रहना चाहिये।

10. आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiration):
व्यक्ति को यह अभिप्रेरित करना चाहिये कि उसकी आकांक्षाओं का आधार उसकी शारीरिक, मानसिक परिपक्वता के अनुकूल होना चाहिये। स्तर से ऊपर होने से कार्य में अरुचि एवं अनिच्छा विकसित हो जाती है।

11. परिचर्चायें तथा सम्मेलन (Seminars and Conferences):
सामूहिक कार्य करने के लिये सीखने पर अधिक बल दिया जाता है। समूह में अधिक ज्ञान प्राप्त किया जाता है। परिचर्चायें एवं सम्मेलन ज्ञानवर्धन के लिये अतिआवश्यक हैं।

12. वातावरण (Environment):
वातावरण इतना आकर्षण हो कि सीखने वाले को स्वयं अभिप्रेरणा प्राप्त हो। व्यक्ति तथा समूह ही वातावरण का निर्माण करते हैं।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 9 अभिप्रेरणा एवं संवेग

प्रश्न 9.
संवेग के कैनन-बार्ड सिद्धांत की व्याख्या करें।
उत्तर:
संवेग के इस सिद्धांत की व्यख्या कैनन (Canon) तथा बॉर्ड (Bard) द्वारा किया गया है। इस सिद्धांत द्वारा प्रदत्त व्याख्या जेम्स-लांजे सिद्धांत की व्याख्या के विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार हाइपोथैलेमस (hypothalamus) ही संवेग का केन्द्र (centre) होता है। संवेग में हाइपोथैलेमस के इस महत्त्व के कारण ही इसे हाइपोथैलेमिक सिद्धांत (hyphothamic theory) भी कहा जाता है। इस सिद्धांत द्वारा संवैग की व्याख्या निम्नांकित चरणों में की गयी है –

  • संवेग उत्पन्न करने वाला उद्दीपन (stimulus) को व्यक्ति प्रत्यक्षण करता है जिसके परिणामस्वरूप तंत्रिका आवेग (nerve impuse) व्यक्ति में उत्पन्न होता है।
  • तंत्रिका आवेग हाइपोथैलेमस (hypothalamus) होते हुए मस्तिष्क वल्क (cerebral cortex) में पहुँचता है। इससे हाइपोथैलेमस में हल्का-फुल्का उत्तेजना उत्पन्न हाता है।
  • प्रमस्तिष्क वल्क से विशेष तंत्रिका आवेग पुनः हाइपोथैलेमस (hypothalamus) में पहुँचता है। इस तंत्रिका आवेग के पहुँचते ही पहले से क्रियाशील हाइपोथैलेमस पर से प्रमिस्तिष्क वल्क का नियंत्रण पूर्णतः हट जाता है जिसके परिणामस्वरूप हाइपोथैलेमस पूर्णतः क्रियाशील या उत्तेजित हो उठता है।
  • हाइपोथैलेमस के क्रियाशील होने से वहाँ से एक समय तंत्रिका आवेग दो दिशाओं में जाता है-ऊपरी दिशा तथा निचली दिशा।
  • ऊपरी दिशा में जाने वाला तंत्रिका का आवेग प्रमस्तिष्क (cerebrum) में पहुँचता है तथा निचली दिशा में जाने वाला तंत्रिका आवेग अन्तरावयव (visceral organs) तथा मांसपेशियों में पहुंचता है।
  • प्रमस्तिष्क में तंत्रिका आवेग को पहुँचने के परिणामस्वरूप व्यक्ति को संवेगात्मक अनुभूति (emotional experience) होता है तथा अन्तरावयव एवं मांसपेशियों में पहुंचने वाले तंत्रिका आवेग से व्यक्ति में संवेगात्मक व्यवहार दोनों ही एक साथ उत्पन्न होते हैं न कि इसमें से संवेगात्मक अनुभूति का होना संवेगात्मक व्यवहार पर निर्भर करता है, जैसा कि जेम्स-लाँजे सिद्धांत की मान्यता है।

इस सिद्धांत के समर्थन में कैनन तथा बार्ड द्वारा स्वतंत्र रूप से कुत्ता पर प्रयोग किया गया। प्रयोग काफी सरल था। प्रयोग में कुत्ते के मस्तिष्क से हाइपोथैलेमस को काटकर निकाल दिया गया या कुछ कुत्ते के हाइपोथैलेमस में घाव (wound) उत्पन्न कर दिया गया। इसके बाद इन कुत्तों के सामने बिल्ली (cat) लायी गयी। परिणाम में देखा गया कि कुत्ता शांतभाव से बिना क्रोध दिखलाये चुपचाप बैठा रहा। इन प्रयोगों के परिणाम के आधार पर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संवेग का केन्द्र हाइपोथैलेमस होता है।

इस सिद्धांत की कुछ आलोचनाएँ हैं जिसमें निम्नांकित प्रमुख हैं –

1. मासरमैन (Masserman) द्वारा किये गये प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ है कि हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र मानना अधिक वैज्ञानिक नहीं है। उन्होंने बिल्ली पर प्रयोग करके यह दिखला दिया है कि सिर्फ हाइपोथैलेमस को उत्तेजित करने से जो संवेग उत्पन्न होता है, वह अस्पष्ट, विकीर्ण, यांत्रिक तथा लगभग अर्थहीन होता है।

इनके प्रयोग में देखा गया कि बिल्ली के हाइपोथैलेमस को बिजली से उत्तेजित करने से उसके शरीर के बाल खड़े हो गए मानो वह क्रोधित हो गयी है। परंतु सचमुच में क्रोध या अन्य कोई संवेग के उत्पन्न होने का कोई निश्चित लक्षण उसमें नहीं था जिसका सबूत यह था कि बिल्ली लगभग सामान्य अवस्था में समान भोजन कर रही थी।

2. कुछ मनोवैज्ञानिकों जैसे किंग तथा मेयर (King & Mayer) द्वारा किये गए प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ है कि हाइपोथैलेमस को संवेग का केन्द्र मानना उचित नहीं है, क्योंकि मस्तिष्क के अन्य भाग जैसे लिम्बिक तंत्र, ऐमिगडाला आदि को उत्तेजित करने से भी प्राणी में संवेग उत्पन्न होता है। इन आलोचनाओं के बावजूद कैनन-बार्ड सिद्धांत संवेग का एक प्रमुख सिद्धांत है तथा अनेक मनोवैज्ञानिकों द्वारा इस सिद्धांत की मान्यता स्वीकार की गयी है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 8 मानचित्र अध्ययन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

Bihar Board Class 9 Geography मानचित्र अध्ययन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
कौन सी विधि सर्वाधिक मान्य है ?
(क) प्राकथन
(ख) निरूपक भिन्न
(ग) आरेख
(घ) कोई नहीं
उत्तर-
(ख) निरूपक भिन्न

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
मानचित्र की दूरी को मापनी में कैसे जाना जाता है ?
(क) अंश
(ख) हर
(ग) मापनी का प्रकथन
(घ) कोई नहीं
उत्तर-
(क) अंश

प्रश्न 3.
मापन में हर व्यक्त करता है
(क) धरातल की दूरी
(ख) मानचित्र पर दूरी
(ग) दोनों दूरियाँ
(घ) उनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(क) धरातल की दूरी

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा मापक भिन्न है ?
(क) मीटर
(ख) सेंटीमीटर
(ग) दोनों दूरियाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर-
(ख) सेंटीमीटर

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 5.
निम्न में किस मापनी के द्वारा किलोमीटर और मील दोनों की दूरियों को दर्शाया जा सकता है ?
(क) रेखीय मापनी
(ख) आरेखीय मापनी
(ग) प्रतिनिधि भिन्न
(घ) तुलनात्मक मापनी
उत्तर-
(घ) तुलनात्मक मापनी

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मापक क्या है ? मापक का क्या महत्व है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
मानचित्र पर प्रदर्शित किए गए. किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी और धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की वास्तविक दूरी के अनुपात को मापने की विधि को मापक कहते हैं।
मापक का महत्त्व-मानचित्र बनाने में मापक का उपयोग आवश्यक है। इसके बिना कोई भी मानचित्र बनाना संभव नहीं। जमीन की वास्तविक दूरी के बराबर कागज का प्रयोग करना संभव नहीं है अतः मापनी का विकास किया गया।

मापक धरातल के क्षेत्र को मानचित्र पर सही नहीं प्रदर्शित करने की विधि है । मापक के माध्यम से विस्तृत भू-खण्डों को मानचित्र पर लघु रूप में प्रदर्शित कर सकते हैं। मापक किसी क्षेत्र के क्षेत्रफल की जानकारी देता है । मापक की सहायता से किसी भी धरातल को बड़े या छोटे आकार में प्रदर्शित किया जा सकता है । मापक भू-सर्वेक्षण के लिए भी अनिवार्य होता है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 2.
मापक को प्रदर्शित करने की विधियाँ बताएँ।
उत्तर-
मापक को प्रदर्शित करने की तीन विधियाँ हैं-(i) कथन विधि (ii) प्रदर्शक विधि (ii) रैखिक मापक विधि।

प्रश्न 3.
प्रतिनिधि अथवा प्रदर्शक भिन्न क्या है ?
उत्तर-
प्रतिनिधि भिन्न (Representative Fraction) एक ऐसे भिन्न द्वारा प्रकट किया जाता है जिसका अंश सदैव 1 होता है जो मानचित्र की दूरी को प्रदर्शित करता है तथा ‘हर’ उसी के इकाई में होता है जो धरातल की दूरी को प्रदर्शित करता है । इसे प्रदर्शक भिन्न भी कहा जाता है। जैसे-1 : 250,000,000 का तात्पर्य है मानचित्र का ।” धरातल के 250,000,000 के बराबर है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 4.
मापक कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर-
मापक के दो प्रकार होते हैं- (i) लघुमापक और (ii) दीर्घ मापक ।

प्रश्न 5.
मापक की दो विभिन्न प्रणालियाँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-
मापक की प्रणालियों में-(i) कथन विधि प्रणाली (ii) प्रदर्शक भिन्न प्रणाली।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

प्रश्न 6.
प्रदर्शक भिन्न विधि को सर्वमान्य विधि क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
प्रदर्शक भिन्न विधि द्वारा प्रत्येक देश का नागरिक आसानी से
मानचित्र का अध्ययन कर सकता है । जैसे-50000000 का तात्पर्य मानचित्र का 1 ईंच, धरातल के 250,000,000 ईंच के बराबर है। इसी तरह मानचित्र का 1 से०मी० धरातल \(\frac{1}{1,250,000,000}\) से०मी० का प्रदर्शित कर रहा है। प्रदर्शक भिन्न को विश्व के किसी भी देश की मापन प्रणाली के अनुसार बदल कर समझा जा सकता है। इसलिए इसे अन्तर्राष्ट्रीय मापक भी कहते हैं।

प्रश्न 7.
आलेखी विधि के मुख्य उपयोग क्या हैं ?
उत्तर-
आलेखी विधि का मुख्य उपयोग है दो बिन्दुओं के बीच की दूरी और धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की वास्तविक दूरी को ज्ञात करना।

प्रश्न 8.
तुलनात्मक मापक की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर-
तुलनात्मक मापक में एक या एक से अधिक माप प्रणालियों में दूरियाँ प्रदर्शित की जाती हैं। इस मापक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके द्वितीयक और प्राथमिक मापक की शुरुआत एक हो संदर्भ रेखा अर्थात् शून्य मान से होता है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मापक क्या है ? मानचित्र के लिए इसका क्या महत्व है ? मापक को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न विधियों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
मापक मानचित्र पर किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी तथा पृथ्वी पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की वास्तविक दूरी के अनुपात को कहते हैं। .. मानचित्र के लिए इसका महत्त्व-भूगोल को मानचित्र का विज्ञान भी कहते हैं। अत: मानचित्र बनाने के लिए मापक का उपयोग अनिवार्य है। भू-सर्वेक्षण के लिए भी मापक अनिवार्य होता है। मापक से किसी क्षेत्र के क्षेत्रफल की जानकारी प्राप्त होती है।
मापक को प्रदर्शित करने की विभिन्न विधियाँ-

    • कथन विधि-इस विधि में मापक को एक कथन द्वारा व्यक्त किया जाता है । जैसे-1 सेमी =5 किलोमीटर या 1 ईंच = 18 मील आदि । 1 सेमी० = 5 किमी० का अर्थ यह है कि मानचित्र पर 1 सेमी की दूरी धरातल पर 5 किमी० की दूरी को प्रदर्शित करता है। यह एक सरलतम विधि है।
    • प्रतिनिधि भिन्न-इसे एक भिन्न द्वारा दिखाया जाता है। इसका ‘अंश’ हमेशा (एक रहता है और ‘हर’ इसके इकाई में होता है जैसे-1 सेंटीमीटर = 5 सेंटीमीटर RF (प्रतिनिधि भिन्न) Or, 1:500000.
    • रैखिक मापक-इस विधि को सरल विधि भी कहते है । जब हम मानचित्र पर सरल रेखा का सुविधानुसार विभागों में बाँट देते हैं । मुख्य या मूल भाग पर बड़ी इकाई जैसे-मील अथवा किलोमीटर तथा गौण या उपविभाग पर छोटी इकाई जैसे फलांग या मीटर दर्शाया जाता है।
      Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन - 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए
(i) प्रदर्शक भिन्न, (ii) कर्णवत मापक, (iii) कथात्मक मापका
उत्तर-
(i) प्रदर्शक भिन्न : यह मापक बताने का गणितीय ढंग है। जैसे-या 1: 200 जिसका तात्पर्य है मानचित्र पर 1 सेमी धरती के 200 सेमी० का प्रतिनिधित्व करता है।
(ii) कर्णवत मापक : इसमें एक रेखा खींच कर उसके उपविभाग द्वारा माप के अंक लिखा जाता है। जैसे100Fमाम
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 8 मानचित्र अध्ययन - 2
(iii) कथात्मक मापक : मानचित्र की दूरी और जमीन की दूरी का संबंध शब्दों में विवरण के रूप में बताना । जैसे-1 सेंटीमीटर = 5 सेंटीमीटर या 1 सेंटीमीटर = 1 किलोमीटर आदि ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 7 शश-सिंह कथा Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

Bihar Board Class 6 Sanskrit शश-सिंह कथा Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिक –

प्रश्न 1.
निम्न शब्दों के अर्थ बताएँ –

(भयंकरः, भोजनाय, पशवः, भीताः, तदा, विलम्बेन, आगतः, सर्वान्, अरक्षत्, बलम्)
उत्तर-

  1. भयंकरः – भयानका
  2. भोजनाय – भोजन के लिए।
  3. पशवः – सभी पशु
  4. भीताः – डरा हुआ।
  5. तदा – उस समय।
  6. विलम्बेन – विलम्ब से।
  7. आगतः – आया।
  8. सर्वान् – सबों को।
  9. अरक्षत् – रक्षा किया।
  10. बलम् – बल।

प्रश्न 2.
इच्छानुसारेण’ के समान इन शब्दों को जोड़कर बताएँ –

  1. नियम + अनुसारेण
  2. कर्म + अनुसारेण
  3. विद्या + आलयः
  4. समय + अनुसारेण
  5. धर्म + अनुसारेण।

उत्तर-

  1. नियमानुसारेण
  2. कर्मानुसारेण
  3. विद्यालयः
  4. समयानुसारेण
  5. ध नुसारेण ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न 3.
इन शब्दों का पंचमी एकवचन में रूप बताएँ –

  1. सिंह
  2. शश
  3. शरीर
  4. कूप
  5. बल

उत्तर-

  1. सिंहात्श
  2. शात्श
  3. रीरात
  4. कूपात
  5. बलात्

प्रश्न 4.
‘तत्र’ शब्द से युक्त पाँच वाक्य बोलें ।
उत्तर-

  1. तत्र विद्यालयः अस्ति
  2. तत्र मम् गहं अस्ति
  3. तत्र रमेशः अपि पठति
  4. तत्र गणेशपूजनं अस्ति
  5. तत्र पुष्पाणि सन्ति।

लिखितः

प्रश्न 5.
इन वाक्यों में रिक्त स्थानों को सही शब्दों से भरें

  1. एकस्मिन् ………… एक: भयंकरः सिंहः वसति स्म ।
  2. सर्वे पशवः …………… अभवन् ।
  3. तदा सिंहः ……………. इति अवदत् ।
  4. सः विलम्बेन सिंहसमोपम् ………….. ।
  5. …………. बलं तस्य ।

उत्तर-

  1. एकस्मिन् वने एक: भयंकरः सिंहः वसति स्म ।।
  2. सर्वे पशवः भीताः अभवन् ।
  3. तदा सिंहः आम इति अवदत् ।
  4. सः विलम्बेन सिंहसमीपम् अगच्छत् ।
  5. बुद्धिर्यस्य बलं तस्य ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न 6.
संस्कृत में अनुवाद करें

  1. जंगल में एक सिंह था। (आसीत्)
  2. वह इच्छानुसार भोजन करता है। (भोजनं करोति)
  3. गुस्सा मत करो। (कुरू)
  4. वह गुफा में रहता है। (तिष्ठति)
  5. जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है।

उत्तर-

  1. वने एकः सिंहः आसीत्।
  2. सः इच्छानुसारेण भोजनं करोति।
  3. क्रोधं मा कुरू।
  4. सः गुहायाम् तिष्ठति ।
  5. यस्य बुद्धिः तस्य बलम् ।

प्रश्न 7.
इन शब्दों से वाक्य बनाएँ –

  1. भयंकरः
  2. सिंहः
  3. तदा
  4. वने
  5. बुद्धिमान
  6. कुत्र।

उत्तर-

  1. भयंकर – भयंकरः सिंहः वने वसति।
  2. सिंह – सिंहः भयंकरः आसीत् ।
  3. तदा – तदा सः वनं अगच्छत् ।
  4. वने – वने पशवः वसन्ति ।
  5. बुद्धिमान् – बुद्धिमानः विजयी भवति ।
  6. कुत्र – कुत्र त्वम् गच्छसि?

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न 8.
इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है ? पाँच वाक्यों में लिखें।
उत्तर-
खरगोश और सिंह की कहानी से शिक्षा मिलती है कि

  1. जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है।
  2. जहाँ बल से काम नहीं हो वहाँ बुद्धि का प्रयोम करना चाहिए।
  3. छोटे शरीर वाले भी यदि बुद्धिमान हों तो बलशाली पर विजय प्राप्त कर सकता है।
  4. बल का घमण्ड नहीं करना चाहिए।
  5. गुस्सा करने से बुद्धि मारी जाती है।

प्रश्न 9.
इस कहानी के आधार पर कोई कहानी लिखें।
उत्तर-
किसी पेड़ पर कौवा-कौवी की जोड़ी रहता था। उसी पेड़ के खोखड़ में एक भयंकर काला सौंप भी रहता था। वह साँप कौवा-कौवी के अण्डे को खा जाता था। .. एक रोज कौवी ने कौवा से बोली- नाथ! हमदोनों इस पेड़ को छोड़कर अन्यत्र चलें। क्योंकि यहाँ हमदोनों के बच्चे का जीवन सुरक्षित नहीं है। काला साँप हमारे बच्चे को खा जाता है। कौवा बोला – डरो मत। मैंने उसके अपराध को बहुत सह लिया है। अब नहीं सहूँगा। कौवी बाली – उतने बलवान के साथ कैसे झगड़ा करोगे ।

कौवा बोला- चिन्ता मत करो, यहाँ के तालाब में राजकुमार स्नान करते समय अपना वस्त्र और सोने का सिकरी पत्थर पर रख देता है। जब वह पानी में स्नान के लिए प्रवेश करेगा. तब उसके सोने की सिकरी को चोंच से उठाकर खोखड़ में डाल दूँगा। सिपाही मेरे पीछे दौड़ते हुए खोखड़ के पास आयेंगे । वहाँ साँप को मारकर मिकरी ले जायेंगे । दूसरे दिन कौवा ने वैसा ही किया। साँप मारा गया। कौवी-कौवा निर्भय होकर पेड़ पर रहने लगे। अत: सही कहा गया है – बुद्धि से जो काम होता है वह बल से नहीं हो सकता है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न 10.
निम्नलिखित शब्दों का वर्ण-विच्छेद करें –
जैसे- वने – व + अ + न + अ + ए ।

प्रश्न (क)
वसति …….. ।
उत्तर-
व् + अ + स + अ + त+इ।

प्रश्न (ख)
गच्छतु …….. ।
उत्तर-
ग् + अ + च् + छ + अ + त् + उ ।

प्रश्न (ग)
क्रमश: ……… ।
उत्तर-
क् + र् + अ + म् + अ +श् +अ ।

प्रश्न (घ)
एकस्मिन् …….. ।
उत्तर-
ए + क् + अ + स् + म् ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

प्रश्न (ङ)
राजन् ……….. ।
उत्तर-
र् + आ + ज् + अ + न् ।

प्रश्न 11.
इनका सुमेल करें –

  1. सिंहः – (क) भीताः
  2. शशः – (ख) गर्जति
  3. पशवः – (ग) लघुः पशुः
  4. पशूनां संख्या – (घ) बलम्
  5. बुद्धिः – (ङ) क्षीणा

उत्तर

  1. सिंहः – (ख) गर्जति
  2. शशः – (ग) लघुः पशुः
  3. पशवः – (क) भीताः
  4. पशूनां संख्या – (ङ) क्षीणा
  5. बुद्धिः – (घ) बलम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit शश-सिंह कथा Summary

(खरगोश और शेर की कहानी)

पाठ – एकस्मिन् वने एक: भयंकरः सिंहः वसति स्म । स वने इच्छानुसारेण पशून भोजनाय मारयति स्म। अतः सर्वे पशवः
भीताः अभवन् । ते मिलित्वा विचारम् अकुर्वन् –

अर्थ – एक वन में एक भयंकर सिंह रहता था। वह जंगल में इच्छा अनुकूल पशुओं को भोजन के लिए मारता था। अत: सभी पशु भयभीत हो गये । उन सबों ने मिलकर विचार किया

पाठ – प्रतिदिनम् एकैकः पशुः सिंहस्य भोजनाय स्वयं गच्छतु । स्वविचारं ते सिंहस्य समीपं अस्थापयत् । तदा सिंहः “आम्” इति अवदत् ।

अर्थ – प्रतिदिन एक-एक पशु सिंह के भोजन के लिए स्वयं जाय। अपना विचार वे सभी सिंह के समीप रखा। तब सिंह ने “हाँ” कह दिया।

पाठ – एवम् एकैकः पशुः सिंहस्य भोजनकाले प्रतिदिनम् अगच्छत्।वने पशव: निश्चिन्ताः अभवन् । किन्तु एव पशूनी संख्या क्रमशः क्षीणा अभवत् ।

अर्थ – इस प्रकार एक-एक पशु सिंह के भोजन के समय प्रतिदिन जाते थे। वन में सभी पशु निश्चिन्त हो गये। किन्तु इससे पशुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती गई।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 7 शश-सिंह कथा

पाठ – एकस्मिन् दिवसे एकस्य शशस्य वारः आसीत्। सः विलम्बेन सिंहसमीपम् अगच्छत् । तस्य अल्पशरीरेण, विलम्बेन आगमने च सिंहः कुपितः अभवत् । सः अवदत्रे दुष्ट ! कथं त्वम् एकाकी विलम्बेन च आगतः ? बुद्धिमान् शशः अवदत्- राजन् ! कोपं न कुरू । एक: अन्यः सिंहः मार्गे मिलितः। स गुहायां तिष्ठति ।

अर्थ – एक दिन एक खरगोश की बारी थी। वह विलम्ब से सिंह के समीप गया। उसके छोटे शरीर देखकर और देर से आने के कारण सिंह गुस्सा में आ गया। वह बोला -रे दुष्ट! क्यों तुम अकेले और विलम्ब से आया है? बुद्धिमान खरगोश कहा- हे राजन! गुस्सा नहीं करें। एक अन्य शेर रास्ते में मिला। वह गुफा में रहता है।

पाठ – सिंहः अवदत्-कुत्र सः ? नय मां तत्र । हनिष्यामि तं – दुष्टम् । शशः सिंह कूपसमीपम् अनयत् । तत्र कूपे स्वच्छायाम् सिंह अपश्यत् । अन्यं सिंह मत्वा कोपेन सः कूपे अकूर्दत् । तत्र स कालेन मृतः एवं शशस्य बुद्धिः सर्वान् पशून् अरक्षत् । अतः कथयन्ति-बुद्धिर्यस्य बलं तस्य।

अर्थ – शेर बोला- कहाँ है वह ? मझे वहाँ ले चलो। मैं उस दृष्ट को मार दूंगा। खरगोश सिंह को कुआँ के समीप ले गया। वहाँ कुआँ में अपनी छाया सिंह ने देखा। दूसरा शेर मानकर गुस्सा से वह कुआँ में कूद गया। उसी समय वह मर गया। इस प्रकार खरगोश की बुद्धि ने सभी पशुओं की रक्षा की । इसलिए कहा गया है- जिसके पास बुद्धि है उसी के पास बल है।

शब्दार्थाः– एकस्मिन् – एक (वस्तु) में। वसति स्म – निवास करता था। पशुन् – पशुओं को। भीता अभवन – डर गये थे। मिलित्वा – मिलकर। भोजनाय – भोजन के लिए। गच्छतु – जाय। क्षीणा – कम(नष्ट)। वारः – बारी, पारी। एकाकी – अकेला। विलम्बेन – विलम्ब से। कुपितः – क्रोध से भरा हुआ। अभवत् – हो गया (हुआ)। अवदत् – बोला। कथम् क्यों/कैसे। कुरु – करो। मार्गे – रास्ते में। हनिष्यामि – मार दूंगा । तं दुष्टम् – उस दृष्ट को। कूप-समीपम् – कुएँ के पास । अनयत् – ले गया। स्वच्छायाम् – अपनी परिछाई को । अपश्यत् – देखा । मत्वा – समझकर, कोपेन – गुस्सा से, अकूर्दत् -कूद गया । सर्वान् – सभी को। कथयन्ति – कहते/कहती हैं। बुद्धिर्यस्य (बुद्धिः + यस्य)- जिसके पास बुद्धि है। बलंतस्य – उसी के पास बल

व्याकरणम्

एकस्मिन् – एक (सप्तमी एकवचन (पुं./नपुं.) ।
इच्छानुसारेण – इच्छा + अनुसोरण(तृतीय एकवचन)

  1. एकैक: – एक + एक:।
  2. निश्चिन्ताः – निः + चिन्ताः ।
  3. बुद्धिर्यस्य – बुद्धिः + यस्य ।
  4. आसीत् – अस् + लड्. लकार ।
  5. हनिष्यामि – हन् + लृट् लकार ।
  6. अकूर्दत् – कुर्द + लड् लकार ।
  7. अगच्छत् गम् + लड् लकार ।
  8. अपश्यत् – दृश + लड्लकार।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 6 जनसंख्या Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

Bihar Board Class 9 Geography जनसंख्या Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
भारत में सर्वाधिक साक्षरता दर किस राज्य की है ?
(क) पश्चिम बंगाल
(ख) महाराष्ट्र
(ग) बिहार
(घ) केरल
उत्तर-
(घ) केरल

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 2.
भारत की औसत आयु संरचना क्या है ?
(क) 64.6 वर्ष
(ख) 64.9 वर्ष
(ग) 81.6 वर्ष
(घ) 70.2 वर्ष
उत्तर-
(क) 64.6 वर्ष

प्रश्न 3.
2001 ई० की जनगणना में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं के अनुपात की क्या स्थिति है ?
(क) 927 महिलाएँ
(ख) 990 महिलाएँ
(ग) 933 महिलाएँ
(घ) 1010 महिलाएँ
उत्तर-
(ख) 990 महिलाएँ

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 4.
भारत औसत जनसंख्या घनत्व प्रतिवर्ग कि० मी० क्या है ?
(क) 318 व्यक्ति
(ख) 325 व्यक्ति
(ग) 302 व्यक्ति
(घ) 288 व्यक्ति
उत्तर-
(ग) 302 व्यक्ति

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1951 ई0 में भारत की जनसंख्या कितनी थी ?
उत्तर-
1951 ई० में भारत की जनसंख्या 3.610 लाख थी।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 2.
भारत में 2001 ई० में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत था ?
उत्तर-
भारत में 2001 ई० में नगरीय जनसंख्या 27.78% हो गई।

प्रश्न 3.
केरल में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या क्या है ?
उत्तर-
केरल में प्रति 1000 पुरुष पर महिलाओं की संख्या 1058 है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 4.
भारत की साक्षरता दर का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत की साक्षरता के स्तर में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है । 2001 ई० की जनगणना के अनुसार देश की साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत पुरुषों का 73 प्रतिशत एवं महिलाओं की 53.67 प्रतिशत है।

प्रश्न 5.
भारत में लिंग अनुपात की विशेषताओं को बताएँ।
उत्तर-
प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को लिंग अनुपात कहा जाता है। भारत में लिंग अनुपात महिलाओं के पक्ष में नहीं हैं । सन् 1951 से 2001 के बीच लिंग अनुपात की सारणी इस प्रकार है-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या - 1

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 6.
जनगणना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
एक निश्चित समयांतराल को आधिकारिक गणना को जनगणना कहते हैं। भारत में सबसे पहले 1872 ई० में जनगणना की गई थी। सन् 1881 ई० में पहली बार सम्पूर्ण जनगणना की गयी थी। उसी समय से प्रत्येक 10 वर्ष पर जनगणना होती है।
भारतीय जनगणना जनसंख्यिकी, समसामयिक तथ्यों तथा आर्थिक आँकड़ों का सबसे बृहद स्रोत है।।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की जनसंख्या वृद्धि की विशेषताओं को बताएँ।
उत्तर-
जनसंख्या में वृद्धि की विशेषताएँ मुख्यतः चार हैं-(i) जन्मदर (ii) मृत्युदर (iii) प्रवास तथा (iv) व्यावसायिक संरचना।
(i) जन्मदर-एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों में जितने बच्चों का जन्म होता है, उसे ‘जन्मदर’ कहते हैं। यह वृद्धि का एक प्रमुख घटक है क्योंकि भारत में हमेशा जन्मदर मृत्युदर से अधिक रहा है। भारत की

आबादी 1951 में 3.60 लाख से बढ़कर 2001 में 10.280 लाख हो गई। वार्षिक वृद्धि 1.93% के हिसाब से बढ़ी।

(ii) मृत्युदर-एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों के मरने की संख्या को मृत्युदर कहा जाता है । मृत्युदर में तेजी से गिरावट भारत की जनसंख्या में वृद्धि की दर का प्रमुख कारण है। 1980 तक उच्च जन्मदर में धीमी गति से एवं मृत्युदर में तीव्र गति से गिरावट के कारण जन्मदर और मृत्युदर में काफी बड़ा अन्तर आ गया है । इसके कारण जनसंख्या में विस्फोट हो गया।

(iii) प्रवास-लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में चले जाने को प्रवास कहते हैं। प्रवास केवल जनसंख्या के आकार को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उम्र एवं लिंग के वृद्धि में ग्रामीण-नगरीय प्रवास के कारण शहरों तथा नगरों की जनसंख्या में नियमित वृद्धि हुई है। 1951 में कुल जनसंख्या की 17.29% नगरीय जनसंख्या थी, जो 2001 में बढ़ कर 27.78% हो गई । एक दशक (1991 से 2001) के भीतर 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों की संख्या 23 से 35 हो गयी है।

(iv) व्यावसायिक संरचना-आर्थिक रूप से क्रियाशील जनसंख्या का प्रतिशत विकास का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। विभिन्न प्रकार के व्यवसायों के अनुसार किए गए जनसंख्या के आर्थिक वितरण को व्यावसायिक संरचना कहते हैं । भारत एक कृषि प्रधान देश है अत: 64% जनसंख्या गाँवों में कृषि कार्य पर आधारित है । शहरों में जीविका-निर्वाह के साधनों के बढ़ने से सुरक्षा के ख्याल से भी नगरों की संख्या बढ़ रही

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

प्रश्न 2.
भारत के विषम जनसंख्या घनत्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
जनसंख्या घनत्व का तात्पर्य भूमि के प्रति इकाई पर अधि वासित होनेवाली जनसंख्या है। भारतीय जनगणना विभाग द्वारा स्तरीय मापक के रूप में प्रतिवर्ग कि०मी० को एक इकाई माना गया है । इस दृष्टि से, भारत की जनगणना 2001 के अनुसार, भारत का औसत जनसंख्या घनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है लेकिन इसमें भारत में विषमता है।

मैदानी राज्यों में सर्वाधिक घनत्व है, तरायी राज्यों में भी काफी घनत्व है लेकिन पर्वतीय राज्यों में, अधिवासी आर्थिक संरचनात्मक सुविधा की कमी के कारण घनत्व पाये जाते हैं। पठारी राज्यों में सामान्य घनत्व की स्थिति है। भारतीय राज्यों में सर्वाधिक घनत्व पश्चिम बंगाल का है। यहाँ
औसतन प्रतिवर्ग कि०मी० 904 व्यक्ति रहते हैं। इसके बाद क्रमशः बिहार (881), केरल (819) का स्थान है। सबसे कम घनत्व अरुणाचल प्रदेश अर्थात् पर्वतीय राज्य का है जहाँ औसत घनत्व मात्र 13 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी० है।

केन्द्र शासित प्रदेशों को शामिल कर देखा जाय तो सर्वाधिक घनत्व दिल्ली का है । यह 9340 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी० है । अंडमान निकोवार द्वीप समूह का घनत्व मात्र 34 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी० है ।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 6 जनसंख्या

जनसंख्या वृद्धि दर तीव्र होने के कारण भारत के औसत घनत्व में भी तेजी से वृद्धि हुई है। यह 1901 ई० में मात्र 37 व्यक्ति वर्ग कि०मी० था जो 2001 में बढ़कर 325 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि०मी० हो चुका है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

Bihar Board Class 9 Disaster Management सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
सामान्य आपदाओं को कितने वर्गों में रखा जाता है ?
(क) 1
(ख) 2
(ग) 3
(घ) 4
उत्तर-
(ख) 2

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 2.
तीव्र ज्वर का क्या कारण है ?
(क) जीवाणु
(ख) विषाणु
(ग) फंगस
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) जीवाणु

प्रश्न 3.
नगरों में सड़क कहाँ से पार करनी चाहिए?
(क) जहाँ जेब्रा का चिह्न नहीं बना हो
(ख) जहाँ जेब्रा का चिह्न बना हो
(ग) अपनी स्वेच्छा के अनुसार
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) जहाँ जेब्रा का चिह्न बना हो

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 4.
पैदल चलते समय सड़क पर चलना आदर्श है ?
(क) दायीं तरफ
(ख) बीच से
(ग) बायीं तरफ
(घ) स्वेच्छा से
उत्तर-
(ग) बायीं तरफ

प्रश्न 5.
रेल यात्रा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
(क) रेलफाटकों को पार करते समय दायीं-बायीं नहीं देखना चाहिए।
(ख) रेल यात्रा के दौरान ज्वलनशील पदार्थ नहीं ले जाना चाहिए।
(ग) बच्चों को रेलवे लाइन पार करने के नियमों की जानकारी नहीं होनी चहिए।
(घ) इनमें से कोई नहीं।।
उत्तर-
(ख) रेल यात्रा के दौरान ज्वलनशील पदार्थ नहीं ले जाना चाहिए।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हवाई यात्रा करते समय सुरक्षा के कौन से नियम ध्यान में रखने चाहिए?
उत्तर-
हवाई यात्रा करते समय सुरक्षा के निम्नलिखित नियम ध्यान में रखने चाहिए

  • यात्री. सुरक्षा संबंधी नियमों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और उसका पालन करें।
  • जब सीट पर बैठे तो बेल्ट बाँधे रखें और संकेतों का पालन करें।
  • आपातकालीन द्वार के बारे में पहले से जानकारी प्राप्त कर लें।
  • यात्रियों की शिनाख्त कड़ाई के साथ की जानी चाहिए।
  • विमान में चढ़ने के पूर्व यात्रियों के सामानों की अत्याधुनिक . इलेक्ट्रनिक यंत्रों से जाँच करनी चाहिए।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 2.
रेलवे फाटक पार करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
रेलवे फाटक पार करते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  • जब भी ऐसा कोई समपार आये तब उसे पार करने के पहले चालक वहाँ रुककर स्वयं या अपने संवाहक को उस चिह्न के पास से लाइन के पास भेजेगा। रेलवे लाइन के दोनों तरफ देखेगा कि कोई इंजन, ट्रेन अथवा ट्राली तो नहीं आ रही है अगर नहीं आ रही है तो सावधानी पूर्वक समपार को पार करेगा।
  • रक्षित समपार फाटकों पर गेट लैम्प लगे रहते हैं। रात्रि में आगर लाल बत्ती दिखाई दे तो समझें समपार फाटक बंद है । अगर सफेद , बती दिखाई दे समझें गेट खुला है। दिन के समय तो खुद ही पता चल जाता है।
  • गेट बंद रहने पर उसे पार किया जाय तो उसे तीन साल की सजा भी हो सकती है।
  • गाँवों तथा शहरों में बहुत सारे विद्यालय रेलवे लाइन के पास होते हैं। अतः शिक्षकों को चाहिए कि बच्चों को रेलवे लाइन पार करने के नियमों की पूर्ण जानकारी दें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 3.
सड़क यात्रा के दौरान किन महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए?
उत्तर-
सड़क यात्रा के दौरान निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

  • शहरों में भीड़-भाड़ में कई जगह उपसतही पैदल मार्ग या भूमिगत पैदल मार्ग बने होते हैं। उन्हीं मार्गों को अपनाना चाहिए।
  • कहीं-कहीं भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में पैदल जाने के लिए पुल बने होते हैं उसी के ऊपर चलना चाहिए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क यात्रा के दौरान सड़क के बायें तरफ से चलना चाहिए।
  • सड़क पार करते समय जेब्रा क्रांसिंग से ही पार करना चाहिए ।
  • किसी चौक को पार करते समय रंगीन बत्तियों या चौराहे पर खड़े पुलिस के हाथ के इशारे को समझें तब आगे बढ़े।।
  • अगर किसी वाहन से सड़क यात्रा कर रहे हों तो वाहन एकं । निर्धारित गतिसीमा में चलाएँ।
  • शराब-पीकर वाहन न चलाएँ।
  • वाहन चलाते समय मोवाइल से बात-चीत न करें।
  • अगर दुपहिया वाहन चला रहे हों तो हेल्मेट का प्रयोग अवश्य करें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 4.
आग से उत्पन्न आपदा क्या है ?
उत्तर-
आग से उत्पन्न आपदा मानवजन्य आपदाओं में प्रमुख है। मानवीय भूल से आग लगने पर जान-माल की भारी क्षति होती है । ऐसा भी देखने में आता है कि चक्रवात, भूकम्प और बाढ़ जैसी आपदाओं में प्रतिवर्ष जितने लोग मरते हैं उससे कहीं ज्यादा लोगों की मृत्यु आग से उत्पन्न आयदा से होती है। इधर हाल ही में जयपुर के इंडियन आयल के पेट्रोल पम्प पर आग लगी जिसमें करीब 12 लोगों की मृत्यु हो गई और 300 करोड़ रुपए का पेट्रोल जल गया।

प्रश्न 5.
साम्प्रदायिक दंगों से बचाव के किन्हीं तीन उपायों का वर्णन करें।
उत्तर-
साम्प्रदायिक दंगों से बचाब के तीन उपाय निम्नलिखित हैं

  • साम्प्रदायिक दंगों से बचाव के लिए आवश्यक है कि हम न तो अफवाह फैलावें और न ही उसमें विश्वास करें।
  • अफवाह की सूचना निकटतम पुलिस स्टेशन को दें।
  • साम्प्रदायिक दंगों में लगे हुए लोगों को पनाह नहीं दें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 6.
आतंकवादी आपदा से बचाव के किन्हीं तीन उपायों का वर्णन करें।
उत्तर-
आतंकवादी आपदा से बचाव के तीन उपाय प्रमुख हैं.

  • यदि किसी क्षेत्र में सूटकेस, संदूक या थैला रखा हुआ दिखाई दे तो इसकी सूचना पुलिस को तुरंत ही देनी चाहिए।
  • यदि आपको किसी व्यक्ति की गतिविधियों पर शक हो तो उसकी सूचना तुरंत पुलिस को दें। यदि आप पुलिस तक नहीं जा सकते तो अपने शिक्षक या अभिभावक को दें।
  • अपने मकान में किरायेदार रखने के वक्त उसकी सही शिनाख्त करें और फोटोग्राफ सहित उसकी जानकारी पुलिस को दें।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आग से उत्पन्न आपदा के अंतर्गत आग लगने के कारणों तथा रोकथाम के उपायों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
आग से उत्पन्न आपदा भी भयानक होती हैं- आग लगने के निम्नलिखित कारण हैं.

(i) खाना पकाते समय-खाना पकाते समय किसी व्यक्ति के मौजूद न होने अथवा स्टोव या खाना पकाने वाली किसी अन्य उपकरण में खराबी के कारण आग लगने से दुर्घटनाएँ होती हैं । कभी-कभी गैस रिसाव होने से भी गैस में आग लग जाती है जिससे दुर्घटनायें हो जाती

(ii) पानी या भोज्य सामग्री गर्म करने वाले उपकरणों से आग लगने की संभावना रहती है। बिजली के हीटर पर खाना बनाते समय भी दुघटनाएँ होती हैं।

(ii) घरों में बिजली की वायरिंग में विद्युत भार से अधिक आपूर्ति किये जाने पर वायरिंग में आग लग जाती हैं जिससे विद्युत उपकरण खराब हो जाते हैं।

(iv) किसी कारखाने में जमा की गई पैकिंग सामग्री, तरल पदार्थ, गैस जैसी ज्वलनशील वस्तु में आग लग जाती है जो विकराल रूप धारण कर लेती है।

(v) बीड़ी और सिगरेट को पीने के पश्चात अथवा ज्वलनशील पदार्थों को जंगलों में फेंकने से भी आग लग जाती है। अफ्रीका के जंगलों में जन जातियों के सामने यह आपदा प्रतिवर्ष आती है।

आग की रोकथाम के उपाय

  • घर के भीतर अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ न रखें।
  • घर से बाहर जाते समय बिजली के सभी उपकरणों को बन्द कर दें।
  • खाना बनाने के बाद गैस को बन्द कर दें।
  • एक ही सॉकेट में बहुत सारे उपकरण न लगावें ।
  • जिस घर में धुआँ हो वहाँ हाथ, पैर या पेट के बल चलने का अभ्यास करें।
  • बिजली के कारण आग लगने पर पानी का प्रयोग कभी भी न करें।
  • बच्चों के हाथ में माचिस कभी न दें।
  • कारखानों में अग्निशामन यंत्र अवश्य रखें ।
  • यथासंभव जल का प्रबंध भी करें।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 2.
आतंकवाद क्या है ? आतंकवादी आपदा से बचाव के उपायों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
आतंकवाद मानवजनित वह आपदा है जो हिंसात्मक मार्ग से राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति चाहता है । वह राजनीति से प्रेरित हिंसा होती है इसका एकमात्र उद्देश्य वर्तमान शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। 11 सितम्बर, 2001 को वायुयान की मदद से अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर किया गया आतंकवादी हमला उनकी क्रूरता और कठोरता का चरम स्वरूप है। सैकड़ों लोग अपने जीवन गंवा बैठे। .

26 नवम्बर, 2008 को मुम्बई के कई स्थलों पर फिदायीन आतंकवादियों द्वारा एक साथ कई जगहों पर हमले हुए जिसमें पाँच सितारा होटल में आग लगा दी गयी । कुल मिलाकर 200 व्यक्तियों की जाने गयी । यह भी क्रूरता का एक ज्वलंत उदाहरण है।

आतंकवादी आपदा से वचाव के उपाय-इससे बचाव के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ आवश्यक हैं

  • यदि अचानक कोई गठरी मिल जाय तो उसे छूना नहीं चाहिए बल्कि पुलिस को तत्काल सूचित करना चाहिए।
  • प्रत्येक गाँव और शहरी मुहल्ले में आतंकवाद के विरुद्ध सामाजिक वातावरण बनाने के लिए समिति का गठन करना चाहिए ।
  • सरकार द्वारा आतंकवाद से उत्पन्न समस्याओं में फंसे लड़कों को यह आश्वासन देना चाहिए कि यदि वे हिंसा का मार्ग त्याग दें कर आम लोगों के साथ जीना प्रारंभ करते हैं तो उनके ऊपर दंडात्मक कार्यवाही नहीं होगी बल्कि क्षमादान के साथ-साथ रोजगार के लिए आर्थिक सहायता भी दी जायेगी।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

प्रश्न 3.
विद्यालय स्तरीय आपदा प्रबंधन की जानकारी का वर्णन करें।
उत्तर-
विद्यार्थी सड़क मार्ग से बस द्वारा या पैदल प्रतिदिन विद्यालय आते और जाते हैं। अतः विद्यालय स्तर पर आवश्यक है कि बच्चों को परिवहन से संबंधित दुर्घटना के कारणों और उससे बचाव की जानकारी देनी चाहिए। बच्चों को शिक्षक द्वारा निम्नलिखित जानकारी दी जानी चाहिए

  • सड़क मार्ग पर सदैव बायें चलें।
  • यदि सड़क पार करनी हो तो हरी बत्ती जलने या उपस्थित पुलिस के संकेत पर पार करनी चाहिए।
  • विद्यालय में परिवहन मार्ग और दुर्घटना से जुड़े हुए मॉडल का प्रदर्शन करना चाहिए तथा विद्यार्थियों को इस प्रकार के माडल बनाने का निर्देश देना चाहिए।
  • विद्यालय बस का चालक पूर्ण प्रशिक्षित होना चाहिए और बच्चे को स्पष्ट हिदायत देते रहना चाहिए कि गाड़ी रुकने पर वे उतरें तथा उसमें चढ़ें।
  • गाड़ी में बैठने के बाद बच्चे शरीर का कोई भी अंग खिड़की के बाहर न निकालें।
  • विद्यालय में प्राथमिक उपचार की सुविधा होनी चाहए।
  • विद्यालय में बच्चों को यह बताना चाहिए कि जलने की स्थिति में तुरंत उस पर ठंढा जल डाला जाय । यदि उपलब्ध हो तो वर्फ के टुकड़ों को भी जले हुए अंग पर रखना चाहिए। ये सब जानकारियाँ बच्चों को होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
लघु स्तरीय आपदाओं के कारणों एवं उनसे बचाव के तरीकों का विस्तृत वर्णन करें।
उत्तर-
लघु स्तरीय आपदाओं में कुपाचन जैसे-दस्त, हैजा, प्लेग, कालाजार, मलेरिया तथा तीव्र ज्वर जैसी संक्रामक अथवा महामारी होने वाली बीमारियाँ हो सकती हैं। इन बीमारियों के होने के निम्नलिखित कारण हैं

  • लघु स्तरीय आपदायें मुख्यतः खान-पान और जीवन शैली को स्वस्थ रूप से संचालित न करने से उत्पन्न होते हैं।
  • गरीब परिवारों में भोजन की समस्या होती है। कभी-कभी वे ऐसे पदार्थ खाने के लिए विवश होते हैं जो या तो अपाच्य होता है या अखाद्य । इससे पेट की बीमारियाँ हो जाती हैं।
  • एक कारण यह भी है कि जो भी भोजन उपलब्ध होता है उसे जानकारी अथवा समय के अभाव में ठीक ढंग से प्राप्त नहीं करते हैं । जैसे गर्म भोजन करने से और गर्म जल को ठंढा कर पीने से इस प्रकार की बीमारियों की संभावना नहीं के बराबर रहती है।
  • दूषित जल एवं हवा की गंदगी से हैजा, प्लेग, मलेरिया आदि रोग फैलते हैं।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 12 सामान्य आपदाएँ : निवारण एवं नियंत्रण

लघु स्तरीय आपदाओं से बचाव के तरीके

  • प्रारंभिक प्रबंधन की व्यवस्था पारिवारिक स्तर पर ही होनी चाहिए। जैसे-नमक और चीनी का घोल देना, नींबू चूसना, लौंग को दाँतों तले दबाकर रखना चाहिए। ऐसा करने से आरम्भ में बीमारी पर नियंत्रण हो सकता है।
  • गाँवों में स्वास्थ केन्द्र नहीं के बराबर होते हैं। अतः गाँव में जिसके पास सवारी है.उसे बीमार लोगों की मदद करनी चाहिए। जिसके पास मोबाइल फोन हो उसे तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र को सूचित कर देना चाहिए।
  • इलेक्ट्रॉल पाउडर को घर में रखना चाहिए अगर नहीं है तो नमक चीनी का घोल बनाकर मरीजों को देते रहना चाहिए।
  • स्वयं सेवी संस्थाएँ या ग्राम पंचायतें नुक्कड़ नाटकों या परिचर्चाओं द्वारा लोगों को इस संबंध में सावधानी रखने के लिए जागरूक कर सकती
  • हैजा, प्लेग आदि बीमारियाँ शीघ्र ही महामारी का रूप धारण कर लेते हैं अतः निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र को सूचित कर देना चाहिए ।
  • कुछ बीमारियों के लक्षण जानना आवश्यक है जिससे उनकी पहचान शीघ्र हो सके जैसे-मलेरिया, कालाजार आदि, ये गंदे जल तथा गंदी हवा से फैलते हैं अत: उनसे बचना चाहिए और इलाज की सुविधा के लिए बड़े अस्पतालों में जाना चाहिए।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Amrita Bhag 1 Chapter 8 जलमेव जीवनम् Text Book Questions and Answers, Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

Bihar Board Class 6 Sanskrit जलमेव जीवनम् Text Book Questions and Answers

अभ्यासः

मौखिकः –

प्रश्न 1.
निम्न शब्दों का अर्थ बतावें –
अस्माकम्, धारयति, शुष्यन्ति, क्वचिद्, क्षारम्, कूपान्, यन्त्रेण, क्षेत्राणाम्, जीवम्, सर्वेषाम् ।
उत्तर-
अस्माकम् – हमारा/हमारे/हमारी, धारयति -धारण करता है। शुष्यन्ति – सूख जाते हैं। क्वचिद् -कहीं। क्षारम् – खारा/नमकीन। कूपान् – कुओं को। यन्त्रेण – मशीन से। क्षेत्राणाम – खेतों को। जीवम -प्राणी।। सर्वेषाम् -सबों का।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाएँ –

सूर्यः, पवनः, जलमेव, मधुरम्, अस्ति
उत्तर-

  1. सूर्यः – सूर्यः प्रकाशं ददाति।
  2. पवनः -पवनः मन्द-मन्दं चलति।
  3. जलमेव – जलमेव जीवनम्।
  4. मधुरम् – मधुरम् जलम् पेयम् भवति।
  5. अस्ति – अत्र विद्यालयः अस्ति।

लिखितः

प्रश्न 3.
इन वाक्यों में रिक्त स्थानों को सही शब्दों से भरें-

  1. ……………. जीवनम्।
  2. सर्वेषु जलस्य …………… वर्त्तते।
  3. भूमिः अपि ……….. ।
  4. नद्यां …………….. च जलं मधुरं भवति।
  5. वनस्पतयः वर्षाजलेन ………..।

उत्तर –

  1. जलमेव जीवनम्।
  2. सर्वेषु जलस्य प्रधानता वर्तते।।
  3. भूमिः अपि शुष्यति ।
  4. नंद्यां सरोवरे च जलं मधुरं भवति।
  5. वनस्पतयः वर्षाजलेन जीवन्ति ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 4.
पाठ के आधार पर जल की महत्ता पर पाँच वाक्य लिखें।
उत्तर-
जल ही जीवन है। जल के बिना मनुष्य जीव-जन्तु,पेड़-पौधे कुछ भी जीवित नहीं रह सकते हैं। जल के कारण ही मेघ बरसता है। जल से सिंचाई का काम होता है। जल से ही अन्न की उपज होती है।

प्रश्न 5.
संस्कृत में अनुवाद करें –

  1. जल मीठा है। (अस्ति)
  2. समुद्र का जल खारा होता है। (क्षारम्)
  3. नदी और तालाब का जल मीठा होता है। (मधुरं)
  4. मैं छठे वर्ग में पढ़ता हूँ। (पठामि)
  5. खेतों में अन्न होता है। (क्षेत्रेषु)

उत्तर-

  1. जलं मधुरं अस्ति ।
  2. सागरस्य जलं क्षारं भवति ।
  3. नद्याः तडागस्य जलं मधुरं भवति ।
  4. अहं षष्ठ वर्गे पठामि।।
  5. क्षेत्रेषु अन्नं भवति।

प्रश्न 6.
सन्धि-विच्छेद करेंसागरश्च, जलमपि, कोऽपि, जलमेव, तथापि।
उत्तर-
सागरश्च – सागरः च । जलमपि – जलम् अपि । कोऽपि – कः + अपि। जलमेव जलम् + एव। तथापि – तथा + अपि।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 7.
सही विकल्प चुनिए

  1. खाना – भोजनम्, फलम, मिष्टानम्।
  2. जल – जलम्, जले, जलेन ।
  3. खेत में – क्षेत्राणि, क्षेत्रेषु, क्षेत्रम्।
  4. सूर्य – सूर्यः, सूर्यम्, सूर्याय । ।
  5. सूखता है – शुष्यन्ति, शुष्यति, शुष्यतः ।

उत्तर-

  1. खाना – भोजनम्।
  2. जल – जलम्।
  3. खेतों में – क्षेत्रेषु।
  4. सूर्य – सूर्यः ।
  5. सूखता है – शुष्यति ।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित शब्दों का वर्ण विच्छेद करें –
जैसे – जले – ज् + अ + ल् + ए ।

  1. मेघः – …………………………
  2. पवनः – …………………………
  3. जनाः – ……………………….
  4. जीवनम्

उत्तर-

  1. मेघः – मे + घ।।
  2. पवन: – प + व + नः।
  3. जनाः – ज + नाः।
  4. जीवनम् – जी + व + नम् ।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

प्रश्न 9.
निम्नलिखित वर्गों को मिलाएँ –

जैसे -क् + र = क्रर् + क = क

  1. र् + प = पं
  2. प् + र प्र
  3. ल् + प = ल्प
  4. प् + ल = प्ल
  5. ज् + य = ज्य

उत्तर-

  1. पं
  2. प्र
  3. ल्प
  4. प्ल
  5. ज्य।

Bihar Board Class 6 Sanskrit जलमेव जीवनम् Summary

पाठ – अस्माकं जीवनस्य सुखाय प्रकृतिः नाना पदार्थान् धारयति। तेषु धनस्पतयः पशु-पक्षिणः मेघः,सूर्यः, भूमिः, पर्वतः, पवनः, जलम् इत्येते सन्ति। सर्वेषु च जलस्य प्रधानता वर्तते। जलं विना मानवो .. नजीवति, वनस्पतयः शुष्यन्ति, मेघाः न भवन्ति, अन्नं न जायतेाभूमिः अपि शुष्यति। अती जलं सर्वस्य जीवनम् अस्ति।

अर्थ -हम्मे जीवन के सुख के लिए प्रकृति अनेक पदार्थो को धारण करती है उनमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों, मेघ, सूर्य, भूमि, पर्वत, हवा, पानी आदि : है और सबों में जल की प्रधानता है। जल के बिना मनुष्य नहीं जीवित .. रह सकता है, पेड़-पौधे सूख जाते हैं, मेघ नहीं होते हैं, अन्न नहीं उपजता है, धरती भी सूख जाती है। अतः जल सब का जीवन है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

पाठ – भूमौ जलस्य नाना स्थानानि सन्ति। क्वचित् नदी, क्वचित् । सरोवरः, विशालः सागरश्च अस्ति। सागरे तु जलं क्षारम् । अस्ति। मेघः क्षारं जलं पीत्वा मधुरं जलं ददाति। नद्यां सरोवरे च जलं मधुरं भवति। जनाः कूपान् खनित्वा जलं निष्कासन्ति। क्वचित् कूपे मधुरं पेयं जलं भवति, क्वचित् क्षारम् अपेयं जलं भवति।

अर्थ – भूमि पर जल के अनेक स्थान हैं। कहीं नदी, कहीं तालाब और विशाल समुद्र हैं। समुद में पानी खारा (नमकीन) है। मेघ खारा पानी पीकर मीठा पानी देता है। लोग कुओं को खोदकर पानी निकालते हैं। कहीं कुओं में मीठा पानी पीने योग्य होता है, कहीं खारा नहीं पीने योग्य जल होता है।

पाठ – अधुना भूमिगतं जलमपि यन्वेण निष्कासन्ति क्षेत्राणां सेचने सर्वस्य जलस्य प्रयोगः भवति। सेचनात् क्षेत्रेषु अन्नं भवति। वनस्पतयः वर्षा जलेन जीवन्ति। अतः सर्वेषां जीवानां वनस्पतीनां भूमेश्च जीवनं जलमेव अस्ति।

अर्थ – आजकल भूमि के अन्दर के जल को भी मशीन के द्वार निकाले जाते हैं। खेतों को सींचने में सब प्रकार के जल का प्रयोग होता है। सिंचाई से खेतों में अन्न होता है। पेड़-पौधों
वर्ष के जल से जीवित रहते हैं। अतः सभी जीवों का, पेड़-पौधे का और भूमि का जीवन जल ही है।

Bihar Board Class 6 Sanskrit Solutions Chapter 8 जलमेव जीवनम्

शब्दार्था : – अस्माकम् – हमारा/हमारी/हमारे । जीवनस्य – जीवन के, का, की । सुखाय – सुख के लिए। नाना – अनेक प्रकार के । पदार्थान् – वस्तुओं को । धारयति – धारण करती हैं। तेषु – उन सबों में । वनस्पतयः – पेड़-पौधे । इत्येते(इति एते) – ये सब। सर्वेषु – सबों में । शुष्यन्ति – सूख जाते/जाती हैं । जायते – होता/होती है/उत्पन्न होता है। अपि – भी। भूमौ – धरती पर । क्वचित् – कहीं। क्षारम् – खारा(नमकीन)। पीत्वा — पीकर। नद्यां – नदी में। कूपान् – कुओं को। खनित्वा – खोदकर। निष्कासन्ति – निकालते/निकालती हैं। पेयाम् – पीने योग्य। अपेयम् – नहीं पीने योग्य। अधुना – आजकल। भूमिगत – जमीन के अन्दर का। यन्त्रेण – मशीन के द्वारा। क्षेत्राणाम् – खेतों की/का/के। सेचने – सिंचाई में। सेचनात् – सिंचाई से। क्षेत्रेषु – खेतों में । जीवानाम् – जीवों का ।

व्याकरणम्

सन्धि-विच्छे दः

  • जलमेव – जलम् + एव
  • इत्येते – इति +एते
  • सागरश्च – सागरः + च भूमेश्च – भूमेः + च
  • जलमपि – जलम् + अपि।

वर्ण-विशेषाः

क्ष त्र ज्ञ – देवनागरी लिपि में ये तीनों संयुक्ताक्षर हैं
क् + ष = क्ष। त् + र = त्र। ज् + अ = ज्ञ।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Disaster Management आपदा प्रबन्धन Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Disaster Management Solutions Chapter 10 मानवीय गलतियों के कारण घटित

Bihar Board Class 9 Disaster Management मानवीय गलतियों के कारण घटित Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
इनमें से कौन परमाणु ऊर्जा केन्द्र है ?
(क) केगा
(ख) वाराणसी
(ग) दिल्ली
(घ) मेरठ
उत्तर-
(क) केगा

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 2.
हिरोशिमा किस देश में है ?
(क) भारत
(ख) जापान
(ग) चीन
(घ) ताईवान
उत्तर-
(ख) जापान

प्रश्न 3.
परमाणु विस्फोट से बचने के लिए सर्वप्रथम प्रतीक चिह्न का ‘विकास किसने किया है ?
(क) टोकियो विश्वविद्यालय
(ख) केम्ब्रिज विश्वविद्यालय
(ग) केलिफोर्निया विश्वविद्यालय
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ग) केलिफोर्निया विश्वविद्यालय

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
परमाणु ऊर्जा क्या है ?
उत्तर-
यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों को परिष्कृत कर रिएक्टर के माध्यम से नाभिकीय विखंडन कराया जाता है जिससे ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इसी को परमाणु उर्जा कहते हैं।

प्रश्न 2.
विश्व में सर्वप्रथम परमाणु बम किस देश पर गिराया गया था?
उत्तर-
जापान पर।

प्रश्न 3.
भारत के किस राज्य में परमाणु परीक्षण किया गया?
उत्तर-
राजस्थान के पोखरन में ।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रेडियेशन से क्या-क्या हानि होती है ? मनुष्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी दें।
उत्तर-
रेडियेशन से मनुष्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव निम्नलिखित

  • रेडियेशन के प्रभाव से जीवों में अनुवांशिक पदार्थ (Genetic Materials) में उत्परिवर्तन की दर में वृद्धि होती है जिससे हड्डी का टी० वी०, कैंसर, शारीरिक विकृतियाँ तथा अंगों के समुचित विकास में असमानताएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।
  • पराबैगनी किरणों के प्रभाव से त्वचा संबंधी रोग भी हो सकते हैं।
  • नाभिकीय विस्फोटों से ओजोन की सुरक्षा-परत का क्षय होता है।
  • रेडियोधर्मी पदार्थों के रेडियेशन से रक्त कैंसर, बंध्यता, दृष्टि-दोष आदि रोग हो सकते हैं!

प्रश्न 2.
परमाणु ऊर्जा से क्या लाभ है ? वर्णन करें।
उत्तर-
परमाणु ऊर्जा का विकास विज्ञान की विशिष्ट उपलब्धियों में से एक है। इसके अंतर्गत यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों को परिष्कृत कर रियेक्टर के माध्यम से नाभिकीय विखंडन कराया जाता है जिसमे ऊर्जा की प्राप्ति होती है । यह ऊर्जा आर्थिक-सामाजिक विकास को नः ति दे सकता है । यथा-बिजली का उत्पादन, गाड़ियाँ चलाई जा सकती ‘ आदि कार्य किये जा सकते हैं।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

11.2 रासायनिक आपदा

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
भोपाल में रासायनिक गैस रिसाव कब हुआ था ?
(क) 1984
(ख) 1990
(ग) 1930
(घ) 2004
उत्तर-
(क) 1984

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 2.
तूतीकोरिन में 1997 ई0 में गैस रिसाव से कौन-सी बीमारी उत्पन्न हुई थी?
(क) उल्टी होना
(ख) सर्दी एवं खांसी
(ग) उल्टी होना एवं छाती में जलन
(घ) मस्तिष्क ज्वर
उत्तर-
(ग) उल्टी होना एवं छाती में जलन

प्रश्न 3.
अम्लीय वर्षा का सर्वाधिक प्रभाव कहाँ पड़ा है ?
(क) पटनां महानगर
(ख) दामोदर घाटी क्षेत्र
(ग) उत्तरी बिहार
(घ) असम घाटी क्षेत्र
उत्तर-
(ख) दामोदर घाटी क्षेत्र

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
किस देश द्वारा गैस के प्रयोग से यहूदियों को मारा गया था ?
उत्तर-
जर्मनी के द्वारा गैस के प्रयोग से यहूदियों को मारा गया।

प्रश्न 2.
कीटनाशक में किस रासायनिक पदार्थ का प्रयोग होता है ?
उत्तर-
कीटनाशक में मिथाइल आइसोसायनेट तथा हाइड्रोजन साइनाइड रसायन का प्रयोग होता है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गैस रिसाव होने पर किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिए?
उत्तर-
गैस रिसाव की स्थिति में वहाँ मौजूद लोगों को स्पष्ट दिशा निर्देश देने की जरूरत है कि वे वायु की उल्टी दिशा में जायें।
गैस रिसाव पर लोगों को यथाशीघ्र मास्क लगा लेना चाहिए।
सभी कर्मचारियों की एक निश्चित अंतराल पर चिकित्सों द्वारा जाँच होनी चाहिए। कारखानों में सायरन की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि तत्काल सभी को सूचित किया जा सके ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रासायनिक आपदा के अन्तर्गत आनेवाली समस्याओं का वर्णन
उत्तर-
औद्योगिक विकास के साथ-साथ रासायनिक पदार्थों के उत्पादन से जुड़ी तीन समस्याएँ आती हैं
(i) विषैले रासायनिक उत्पाद से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँ ।
(ii) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँ ।
(iii) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदाएँ।

(i) विषैले रासायनिक उत्पाद से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँइसका सर्वाधिक प्रभाव कृषि उत्पाद पर देखने को मिलता है । रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से न सिर्फ मृदा के सूक्षम जीवों का विनाश होता है बल्कि उत्पाद विषैली हो जाता है । इसके अलावा कई प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है जो जान लेवा सावित होती है। इससे अम्लीय वर्षा का डर बना रहता है विशेषकर महानगरों में।

(ii) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँरासायनिक आयुध के अंतर्गत विविध जहरीले गैसों के प्रयोग के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थों में भी ऐसे गैस सन्निहित होते हैं जिनके प्रभाव से त्वचा में जलन और गलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है । मृत्यु भी हो जाती है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

(iii) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदा-गैस रिसाव बड़ी आपदा का रूप लेता है। भोपाल गैस रिसाव (1984) इसका प्रमाण है । पुनः 1999 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन गैस रिसाव के उदाहरण हैं।

11.3 जैविक आपदा

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
डेंगू बीमारी का क्या कारण है ?
(क) आग लगने से
(ख) एक बर्तन में अधिक समय तक पानी रहने से
(ग) बाढ़ आने से
(घ) गंदे भोजन से।
उत्तर-
(ग) बाढ़ आने से

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 2.
एंथेक्स क्या है ?
(क) अति सूक्ष्म जीव
(ख) युद्धपोत
(ग) जंगली जानवर
(घ) युद्ध का एक अस्त्र
उत्तर-
(ख) युद्धपोत

प्रश्न 3.
भारत में एड्स से लगभग कितने लोग प्रभावित हैं ?
(क) 25 लाख
(ख) 30 लाख
(ग) एक करोड़
(घ) 50 लाख
उत्तर-
(ख) 30 लाख

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्लेग और हैजे का क्या कारण है ?
उत्तर-
प्लेग-वायरल नामक विषाणु से होता है।
हैजा-विब्रियो कॉमा नामक जीवाणु से होता है।

प्रश्न 2.
एड्स की बीमारी के कारणों को बताएँ।
उत्तर-
एड्स की बीमारी जैविक वायरस का फैलाव वंशानुगत तथा दूषित रक्त को चढ़ाने तथा माता के द्वारा बच्चों को होता है । यह बड़ों में गलत एवं असंयमित यौन-संबंध से होता है।

प्रश्न 3.
हिपेटाइटिस बीमारी के कारणों को बताएँ।
उत्तर-
हिपेटाइटिस बीमारी सूक्ष्म जीवाणु और वायरस के शरीर में संक्रमण से होती है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जैविक आपदा कितने प्रकार के हैं ? उनका संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर-
जैविक आपदा चार प्रकार के हैं।
(i) प्रथम वर्ग में उन बीमारियों को रखा गया है जिसका कारण सूक्ष्म जीवाणु तथा वायरस होते हैं। जिनसे चिकेन पॉक्स, हिपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं । इनसे तात्कालिक बचाव के लिए ग्लब्स, मास्क आदि का सतत् प्रयोग करना चाहिए।

(ii) इस जैविक आपदा में वैसी बीमारियों को रखा गया है जिसकी . उत्पत्ति का कारण सूक्ष्म जीवाणु तथा वायरस हैं । इस वर्ग में हिपेटाइटिस . A, B और C इन्फ्लूएंजा, लाइम डिजिज मिजिल्स, चिकेन-पॉक्स और एड्स जैसी बीमारियाँ संभव हैं।

(iii) जैविक आपदा के तीसरे वर्ग में वैसे सूक्ष्म जीवाणु और वायरस को रखा गया है जो मानव समूह के लिए विनाशकारी आपदा ला सकती है। इसके अंतर्गत एंथ्रेक्स, पश्चिमी नील वायरस, वेनेजुएलियन एन्सेफ्लाइटिस, स्मॉल पाक्स, ट्यूवरोक्लोसिस वायरस, रिफ्टबैली बुखार, येलो बुखार तथा मलेरिया, हैजा, डायरिया प्रमुख हैं। यह साधारणतः गरीब देशों की बीमारियाँ हैं ।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

(iv) चौथे स्तर की जैविक आपदा के अंतर्गत अति विनाशकारी वायरस को रखा जाता है। इसके अंतर्गत वायरस वोलिवियन तथा अर्जेंटियन बुखार तथा बर्ड फ्लू, एडस (HIV), डेंगू बुखार, माखर्ग बुखार, एबोला इत्यादि प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
जैविक अस्त्र क्या है ? इससे उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर-
नवीन युद्ध तकनीकी के अंतर्गत जैविक अस्त्रों को सम्मिलित किया गया है। इसे भारी विनाश का अस्त्र (Weapon of Mass . Destruction) कहा गया है। इसका विकास जापानियों ने किया लेकिन जैविक अस्त्रों का वास्तविक प्रयोग 2001 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकी हमले के बाद आरम्भ हुआ। एंथ्रेक्स डाक सेवा के द्वारा अथवा अज्ञात व्यक्तियों के द्वारा पहुँचाया जाने लगा । वास्तव में जैविक आपदा का कारण एक सूक्ष्म जीवाणु हैं।

जैविक अस्त्रों के अंतर्गत उपयोग में लाये जाने वाले और अन्य जीवाणु भी हैं जो रुग्णता लाने वाले जीवाणु है।

इससे उत्पन्न समस्याएँ-(i) जैविक अस्त्र के प्रयोग से इसके सूक्षम जीवाणु श्वसन क्रिया के द्वारा शरीर के अंदर जहर उत्पन्न करता है और वह सूक्ष्म त्रासदी को जन्म देते हैं। इसे गंदा बम (Dirty Bomb) कहा . गया है। (ii) दूसरी समस्या है इससे रुग्णता आती है। शरीर धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।

Bihar Board Class 9 Disaster Management Solutions Chapter 11 मानवीय गलतियों के कारण घटित

प्रश्न 3.
जैविक आपदा से बचाव के उपाय बताएँ।
उत्तर-
जैविक आपदा से बचाव के लिए आपदा जोखिम प्रबंधन की जरूरत है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें हैं –

  • गर्म जल पीना एवं स्वच्छ भोजन ग्रहण करना चाहिए ।
  • आवश्यक कीटनाशक दबावों का छिड़काव तथा प्रशासनिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।
  • अनजान व्यक्ति द्वारा दिये गये किसी भी प्रकार के डिब्बे को हाथ लगाने या छूने की जरूरत नहीं क्योंकि इसमें एंथ्रेक्स की संभावना हो सकती है।
  • किसी अनजान वस्तु को छूने के लिए ग्लब्स का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • डॉग एक्वाइड (कुत्ते के दल) की मदद से जैविक अस्त्रों की जगह की पहचान की जा सकती है।
  • जैविक अस्त्रों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध . लगाना चाहिए।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Geography भूगोल : भारत : भूमि एवं लोग Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

Bihar Board Class 9 Geography क्षेत्रीय अध्ययन Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
क्षेत्र में जाकर इकट्ठे किये गये आँकड़ों को क्या कहा जाता है ?
(क) द्वितीयक आँकड़ा
(ख) प्राथमिक आँकड़ा
(ग) तृतीयक आँकड़ा
(घ) चतुर्थक आँकड़ा
उत्तर-
(ख) प्राथमिक आँकड़ा

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 2.
ल में क्षेत्रीय अध्ययन है
(क) एक उपागम
(ख) एक विधितंत्र
(ग) एक सिद्धांत
(घ) एक मॉडल
उत्तर-
(क) एक उपागम

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय अध्ययन के महत्त्व को स्पष्ट करें।
उत्तर-
क्षेत्रीय एक महत्त्वपूर्ण अंग है, भूगोल का । इसका महत्त्व इस बात पर निर्भर है कि यह एक उपागम है जिसके द्वारा क्षेत्र विशेष के मानव और इसके परिवेश के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 2.
भूमि का कृषि के लिए उपयोग किस क्षेत्र में अधिक होता है ?
उत्तर-
जो क्षेत्र समतल, उपजाऊ एवं सिंचित हो, उसी में कृषि कार्य होता है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 3.
वायु प्रदूषण से किस प्रकार की हानि होती है ?
उत्तर-
वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभाव स्वास पर पड़ता है । साँस लेने के लिए ऑक्सीजन का प्रयोग करते हैं, पर वायु प्रदूषित होने की वजह से ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। और यही प्रदूषित वायु हम साँस लेते हैं जिससे साँस संबंधी बीमारियाँ होती हैं। वायु के प्रदूषित होने से उसमें सी० एफ० सी० गैसों की मात्रा की अहम भूमिका होती है; इस गैस के बढ़ने से ओजोन परत का क्षय होने लगता है जिससे पाराबैगनी गैस की वायुमण्डल में वृद्धि होने लगती है जिससे जीव जन्तु में चर्म कैंसर की संभावना बढ़ जाती है और SO2 की सान्द्रता बढ़ने से अम्ल की वर्षा होती है। प्रदूषण से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है।

प्रश्न 4.
जल-प्रदूषण से होनेवाली हानि की चर्चा करें।
उत्तर-
जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है। लेकिन जल प्रदूषण होने से इसके कुप्रभाव हैं

  • पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है। जलीय वनस्पति, मछलियाँ तथा उस जल को पीने वाले अन्य जीव मर जाते हैं।
  • खेतों में सिंचाई के रूप में प्रदूषित जल प्रयोग करने से उत्पादन मात्रा घट जाती है।
  • प्रदूषित जल में उपस्थित विषैले पदार्थ प्राकृतिक खाद्य-शृंखला (Food Chain) में प्रवेश कर जाते हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से अन्य जीवों तथा मनुष्यों को भी प्रभावित करते हैं।
  • प्रदूषित जल, जल से फैलने वाली बीमारियों को फैलाते हैं-हैजा, तपेदिक, पीलिया, पेचिस, डायरिया आदि रोग महामारी के रूप में फैलते हैं।

प्रश्न 5.
वर्षा जल का संग्रहण किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर-
वर्षा जल का संग्रहण विभिन्न विधियों से किया जाता है।

  • पहला यह है कि जल को विभिन्न प्रकार के भवनों की छतों से ही इकट्ठा कर लेना चाहिए।
  • सीधे जमीन पर पड़ने वाले जल को तालाबों आदि में इकट्ठा कर लेना चाहिए । नाद में इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न मदों में किया जाना चाहिए।
  • वर्षा के मौसम में जब नदियों में बाढ़ आई हुई हो तो उस जल को गढ्ढे में जमा कर लेना चाहिए ।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 6.
एक आरेख की सहायता से वर्षा जल संग्रहण को दिखाएँ ।
उत्तर-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन - 1
पक्के पकानों की छतों से प्राप्त वर्षा जल को पाइप से कुएँ या जलाशयों में जमा किया जाता है।

प्रश्न 7.
क्षेत्रीय अध्ययन से क्या समझते हैं ? .
उत्तर-
क्षेत्रीय अध्ययन एक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत किसी विशिष्ट क्षेत्र में निवास करनेवाले लोगों के जीवन पर स्थलाकृति, जलवायु, अपवाह, कृषि उत्पादकता, औद्योगिक विकास, नगरीकरण इत्यादि का स्पष्टत प्रभाव पड़ता है। इन बातों को समझने के लिए क्षेत्रीय अध्ययन किया जाता है।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 8.
क्षेत्रीय अध्ययन के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
क्षेत्रीय अध्ययन से निम्नलिखित लाभ है

  • इससे क्षेत्र विशेष के मानव और इसके परिवेश की जानकारी मिलती है।
  • मानवीय गतिविधियों एवं क्रियाकलापों की जानकारी मिलती है।
  • क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले लोगों के जीवन पर स्थलाकृति, जलवायु, अपवाह, कृषि उत्पादकता, औद्योगिक विकास, नगरीकरण आदि की जानकारी मिलती है।

प्रश्न 9.
क्षेत्र का चयन करते समय किन बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर-
क्षेत्र चयन हेतु इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उस क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दों को उसमें शामिल किया जाय । जैसे-किसी क्षेत्र के जलस्तर में गिरावट, भूमि उपयोग, प्रदूषण के विभिन्न प्रकार जैसे-वाय प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नीचे दी गई सारणी का अध्ययन कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों
का उत्तर दें-
Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन - 2
(क) उस भू-उपयोग वर्ग का नाम लिखें जिसका क्षेत्रफल लगातार घट रहा है?
(ख) फसल क्षेत्र के लगातार बढ़ने का मुख्य कारण स्पष्ट करें।
(ग) किस भू-उपयोग वर्ग के अंतर्गत सबसे कम भू-क्षेत्र का उपयोग हुआ है ?
उत्तर-
(क) वन-
(ख) देश की जनसंख्या लगातार बढ़ने के कारण खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो रही हैं और खाद्यान्न की समस्या को दूर करने के लिए फसलों का अधिक उत्पादन किया जा रहा है जिसके फलस्वरूप फसल क्षेत्र लगातार बढ़ रहे हैं।
(ग) तृषा भूमि।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 2.
क्षेत्र अध्ययन के लिए प्रश्नावली के विभिन्न विधियों की चर्चा करें।
उत्तर-
क्षेत्र अध्ययन विधि में लोगों से प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रश्नों को
आवश्यकता के अनुसार पहले ही शिक्षक की सहायता से तैयार कर लिया जाता है। सर्वेक्षण के लिए अनेक प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं। प्रश्नों की प्रकृति, वांछित आँकड़ों की प्रकृति तथा वहाँ के लोगों की पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है।

कुछ प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में होगा । बहुविकल्प वाले प्रश्नों के उत्तर में कुछ विकल्प दिए जाते हैं उनमें से केवल एक ही सही होता है। प्रश्नावली के द्वारा जानकारी इकट्ठा इकट्ठी की और प्राप्त आँकड़ों का अध्ययन कर प्रतिवेदन तैयार किया जाता है । जैसे-बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का अध्ययन किसी गाँव या नगर की भूमि के उपयोग में क्या परिवर्तन आया है?

नगर में वाहनों की संख्या में वृद्धि से प्रदूषण के स्तर में कितनी वृद्धि हुईं। इस तरह की प्रश्नावली तैयार की जाती है।

प्रश्न 3.
वायु प्रदूषण के चार स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर-
वायु प्रदूषण के चार स्रोत
(i) उद्योगों से निकलने वाली गैस तथा अन्य उपशिष्ट
(ii) वाहनों द्वारा उत्सर्जित गैसीय एवं कणिकीय पदार्थ
(iii) शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उत्सर्जित गैस तथा
(iv) नाभिकीय परीक्षण ।

(a) वायुमंडल में कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2) गैस की सामान्य मात्रा है 0.03% पर इसकी मात्रा तेजी से बढ़ रही है। उसका कारण है लकड़ी, कोयला तथा अन्य जैविक पदार्थों का दहन, उद्योग, वाहन आदि इस गैस के मुख्य स्रोत हैं।
(b) कार्बन मोनोऑक्साइड-यह अत्यन्त ही हानिकारक वायु प्रदूषक गैस है। यह पेट्रोल तथा डीजल चालित वाहनों से उत्सर्जित होती है। कई बड़े उद्योगों में यह मुख्य प्रदूषक के रूप में वायुमंडल में उत्सर्जित होती है। महानगरों एवं नगरों में इसकी संभावना अधिक रहती है।।
(c) सल्फर डाइ ऑक्साईड (SO2)-गंधक युक्त गैस भी वायुमंडल के मुख्य प्रदूषकों में से एक है। यह तेल शोधक कारखानों तथा वाहनों से निकलती हैं।
(d) क्लोरोफ्लूरो कार्बन गैस (CFCgas)-कार्बन तत्वों से इस गैस का निर्माण होता है। इसका सीधा असर वायुमंडल के ओजोन परत के क्षारण में यह सक्रिय भूमिका निभाती है।

क्षेत्रीय अध्ययन : प्रश्नावली मॉडल

प्रश्न 1.
क्षेत्र का नाम
उत्तर-
आरा ।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 2.
उत्तरदाता का नाम एवं पता।
उत्तर-
उदय सिंह ग्राम + पो०-आरा, जिला-आरा, बिहार ।

प्रश्न 3.
क्या कृषि क्षेत्र में वृद्धि हुई है ?
उत्तर-
हाँ।

प्रश्न 4.
क्या आपके गाँव में नलकूप है ?
उत्तर-
हाँ।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 5.
कुएँ का जलस्तर पिछले पाँच वर्षों में बढ़ा है या घटा है ?
उत्तर-
घटा है।

प्रश्न 6.
सिंचाई के कौन-कौन से साधन इस क्षेत्र में उपलब्ध हैं ?
उत्तर-
नलकूप और सोन नदी।

प्रश्न 7.
एक वर्ष में कौन-कौन-सी बीमारियाँ बड़े स्तर पर उस क्षेत्र में हुई हैं?
उत्तर-
हैजा एवं पीलिया ।

प्रश्न 8.
अध्ययन क्षेत्र में किस प्रकार का प्रदूषण है ?
उत्तर-
जल प्रदूपण।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 9.
जल-स्तर के घटने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
नलकूपों की अधिकता।

प्रश्न 10.
क्या आप वर्षा जल का संग्रह करते हैं ?
उत्तर-
नहीं।

Bihar Board Class 9 Geography Solutions Chapter 9 क्षेत्रीय अध्ययन

प्रश्न 11.
आप वर्ष में कौन-कौन सी फसलें उत्पन्न करते हैं ?
उत्तर-
धान, गेहूँ, दलहन, तेलहन, चना तथा मटर ।