Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण समास

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BSEB Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण समास

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण समास Questions and Answers

समास की परिभाषा-दो या दो से अधिक पदों के मेल या संयोग को समास कहते हैं। उन पदों के मेल से बने हुए शब्द की सामाजिक शब्द कहते हैं।
जैसे-‘पाप’ और ‘पुण्य’ दो पदों को मिलाकर ‘पाप-पुण्य’ एक सामासिक शब्द हुआ।

समास के भेद

पदों की प्रधानता के आधार पर समास के निम्नलिखित चार भेद किए जाते

(1) पहला पद प्रधान-अव्ययीभाव
(2) दूसरा पद प्रधान-तत्पुरुष
(3) दोनों पद प्रधान-द्वंद्व
(4) कोई भी पद प्रधान नहीं-बहुब्रीहि ।

इन चारों प्रमुख भेदों के अतिरिक्त कर्मधारय और द्विगु दो समास और भी हैं, जिन्हें विद्वानों ने तत्पुरुष का भेद बताया है । इनको मिलाकर समास के छ: भेद हो जाते हैं

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1. अव्ययीभाव

जिस समास में पहला पद प्रधान हो और समस्त पद अव्यय (फ़िया, विशेषण) का काम करे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं । जैसे-यथाशक्ति, भरपेट, प्रतिदिन, बीचों बीच।

अव्ययीभाव के कुछ उदाहरण

यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
यथासंभव = जैसा संभव हो
यथामति = मति के अनुसार
यथाविधि = विधि के अनुसार
प्रतिदिन = दिन दिन
प्रत्येक = एक-एक
मनमन = मन ही मन
द्वार-द्वार = द्वार ही द्वार
निधडक = बिना धडक
आजीवन = जीवन-पर्यंत
बाकायदा = कायदे के अनुसार
आसमुद्र = समुद्र पर्यंत
बेखटके = खटके के बिना
दिनों दिन = दिन के बाद दिन

निडर = बिना डर
घर घर = हर घर ।
अनजाने जाने बिना
बीचों बीच = ठीक बीच में
रातों रात = रात ही रात
हाथों-हाथ = हाथ ही हाथ
हर रोज = रोज रोज
बेशक = बिना संदेह
वेफायदा = फायदे (लाभ) के बिना
आमरण = मरण-पर्यंत
आजानु = जानुओं (घुटनों) तक
भर-पेट = पेट भर कर
भरसक = पूरी शक्ति से

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2. तत्पुरुष

तत्पुरुष का शाब्दिक अर्थ है (तत् = वह, पुरुष = आदमी) वह (दूसरा) आदमी । इस प्रकार ‘तत्पुरुष’ शब्द का अपना एक अच्छा उदाहरण है । इसी आध पर पर इसका नाम यह पड़ा है, क्योंकि ‘तत्पुरुष’ समास का दूसरा पद प्रधान होता है। इस प्रकार जिस समास का दूसरा पद प्रधान होता है और दोनों पदों के बीच प्रथम (कर्ता) तथा अंतिम (संबोधन) कारक के अतिरिक्त शेष किसी भी कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे –

राज-पुरुष = राजा का पुरुष
राह खर्च = राह के लिए खर्च
ऋण-मुक्त = ऋण से मुक्त
बनवास = वन में वास

तत्पुरुष के छः भेद हैं जिनका परिचय इस प्रकार है –

(क) कर्म तत्पुरुष

जिसमें कर्म कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है। जैसे –
ग्रंथ-कर्ता = ग्रंथ को करने वाला
आशातीत = आशा को लांघ कर गया हुआ
स्वर्ग प्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
जल-पिपासु = जल को पीने की इच्छा वाला
देशगत = देश को गत (गया हुआ)
गृहागत = गृह को आगत (आया हुआ)
यश प्राप्त = यश को प्राप्त
ग्रंथकार = ग्रंथ को रचने वाला
परलोक गमन = परलोक को गमन
ग्राम-गत = ग्राम को गत (गया हुआ)

(ख) करण तत्पुरुष

जिसमें करण कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है। जैसे –

हस्तलिखित = हस्त से लिखित
ईश्वर प्रदत्त = ईश्वर से प्रदत्त
तुलसीकृत = तुलसी से कृत
कष्ट साध्य = कष्ट से साध्य
बाणबिद्ध = बाण से बिद्ध
गुरुकृत = गुरु से किया हुआ
वज्र-हत = वज्र से हत
मदांध = मद से अंधा
दुःखार्त्त = दुःख से आर्त्त अकाल
पीड़ित = अकाल से पीड़ित
मन-माना = मन से माना हुआ
रेखांकित = रेखा से अंकित
मुँह-मांगा = मुँह से मांगा हुआ
कीर्ति-युक्त = कीर्ति से युक्त
मनगढंत = मन से गढ़ी हुई
अनुभव-जन्य = अनुभव से जन्य
कपड़छन = कपड़े से छना हुआ
गुण-युक्त = गुण से युक्त
मदमाता = मद से माता
जन्म-रोगी = जन्म से रोगी
शोकाकुल = शोक से आकुल
दईमारा – दई से मारा हुआ
प्रेमातुर = प्रेम से आतुर
बिहारी रचित = बिहारी द्वारा रचित
दयार्द्र = दया से आर्द्र

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(ग) संप्रदान तत्पुरुष जिसमें संप्रदान कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है । जैसे

देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
ठकुरसुहाती = ठाकुर को सुहाती
रण-निमंत्रण= रण के लिए निमंत्रण
आरामकुर्सी = आराम के लिए कुर्सी
कृष्णार्पण = कृष्ण के लिए अर्पण
बलि-पशु = बलि के लिए पशु
यज्ञ-शाला = यज्ञ के लिए शाला
विद्यागृह = विद्या के लिए गृह
क्रीड़ा-क्षेत्र = क्रीड़ा के लिए क्षेत्र
गुरु दक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
राह-खर्च = राह के लिए खर्च
हवन-सामग्री = हवन के लिए सामग्री

रसोई घर = रसोई के लिए घर
मार्ग-व्यय – मार्ग के लिए व्यय
रोकड़ बही = रोकड़ के लिए बही
युद्ध-भूमि – युद्ध के लिए भूमि
हथकड़ी = हाथों के लिए कड़ी
राज्यलिप्सा = राज्य के लिए लिप्सा
माल गाड़ी = माल के लिए गाड़ी
डाकगाड़ी = डाक के लिए गाड़ी
पाठशाला = पाठ के लिए शाला
जेब खर्च = जेब के लिए खर्च

(घ) अपादान तत्पुरुष जिसमें अपादान कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है । जैसे

पथ-भ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
आकाश पतित = आकाश से पतित
भयभीत = भय से भीत
धर्म भ्रष्ट = धर्म से भ्रष्ट
पदच्युत = पद से च्युत
देश निकाला = देश से निकालना
ऋणमुक्त = ऋण से मुक्त गुरु
भाई = गुरु के संबंध से भाई
देश निर्वासित = देश से निर्वासित
रोग मुक्त = रोग से मुक्त
बंधन मुक्त = बंधन से मुक्त
कामचोर = काम से जी चुराने वाला
ईश्वर विमुख = ईश्वर से विमुख
आकाशवाणी = आकाश से आगत वाणी
मदोन्मत्त = मद से उन्मत्त
जन्मांध = जन्म से अंधा व
विद्याहीन = विद्या से हीन

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(ङ) संबंध तत्पुरुष जिसमें संबंध कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है। जैसे

मृगशावक = मृग का शावक
राजरानी = राजा का रानी
वज्रपात = वज्र का पात
अमचूर = आम का चूर
घुड़दौड़ = घोड़ों की दौड़
बैलगाड़ी = बैलों की गाड़ी
लखपति = लाखों (रुपये) का पति
वनमानुष = वन का मानुष
दीनानाथ = दीनों का नाथ
देवालय = देवों का आलय
रामकहानी = राम की कहानी
लक्ष्मी पति = लक्ष्मी का पति
रेलकुली = रेल का कुली
रामानुज = राम का अनुज
चायबगान = चाय के बगीचे आदि
पितृगृह = पिता का घर
वाचस्पति = वाचः (वाणी) के पति
राजपुत्र = राजा का पुत्र
विद्याभ्यासी = विद्या का अभ्यासी
पराधीन = पर (अन्य) का अधीन
रामाश्रय = राम का आश्रय
राष्ट्रपति = राष्ट्रपति का पति
अछूतोद्धार = अछूतों का उद्धार
पवनपुत्र = पवन का पुत्र
विचाराधीन = विचार के अधीन
राजकुमार = राजा का कुमार

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(च) अधिकरण तत्पुरुष जिसमें अधिकरण कारक की विभक्ति का लोप पाया जाता है। जैसे-

देशाटन – देशों का अटन
दानवीर = दान (देने) में वीर
वनवास = वन में वास
कविशिरोमणि = कवियों में शिरोमणि
कविश्रेष्ठ = कवियों में श्रेष्ठ
आत्म-विश्वास = आत्म (स्वयं) पर विश्वास
आनंद-मग्न = आनंद में मग्न
आप बीती = अपने घर बीती
गृह प्रवेश = गृह में प्रवेश
घुड़ सवार = घोड़े पर सवार
शरणागत = शरण में आगत
कानाफूसी = कानों में फुसफुसाहट
ध्यानावस्थित= ध्यान में अवस्थित
हरफनमौला = हरफन में मौला कला
प्रवीण = कला में प्रवीण
नगरवास = नगर में वास
शोक मग्न = शोक में मग्न
घर-वास = घर में वास

इनके अतिरिक्त तत्पुरुष के कुछ अन्य भेद और भी माने जाते हैं

(i) नञ् तत्पुरुष
निषेध या अभाव के अर्थ में किसी शब्द से पूर्व ‘अ’ या ‘अन्’ लगाने से जो । समास बनता है, उसे नञ् तत्पुरुष कहते हैं । जैसे –

अहित = न हित
अपूर्ण = न पूर्ण
अधर्म = न धर्म
असंभव = न संभव
अब्राह्मण = न ब्राह्मण
अन्याय = न न्याय
अनुदार = न उदार
अनाश्रित = न आश्रित
अनिष्ट = न इष्ट
अनाचार = न आचार

विशेष-(क) प्रायः संस्कृत शब्दों में जिस शब्द के आदि में व्यंजन होता है,

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तो ‘न’ समास में उस शब्द से पूर्व ‘अ’ जुड़ता है और यदि शब्द के आदि में स्वर होता है, तो उसप्से पूर्व ‘अन्’ जुड़ता है । जैसे –

अन् + अन्य = अनन्य
अन् + उत्तीर्ण = अनुत्तीर्ण
अ + वांछित = अवांछित
अ + स्थिर = अस्थिर

(ख) किन्तु उक्त नियम प्रायः तत्सम शब्दों पर ही लागू होता है, हिन्दी शब्दों पर नहीं। हिन्दी शब्दों में सर्वत्र ऐसा नहीं होता । जैसे –

अन् + चाहा = अनचाहा
‘अ+ काज = अकाज
अन् + होनी = अनहोनी
अन + वन = अनबन
अ + न्याय = अन्याय
अन + देखा = अनदेखा
अ + टूट = अटूट
अ + सुंदर = असुंदर

(ग) हिन्दी और संस्कृत शब्दों के अतिरिक्त ‘गैर’ और ‘ना’ आनेवाले शब्द भी ‘नञ्’ तत्पुरुष के अन्तर्गत आ जाते हैं। जैसे –

नागवर
नापसंद
गैर हाजिर
नाबालिग
नालायक
गैरवाजिब

(ii) अलुक् तत्पुरुष

जिस तत्पुरुष समास में पहले पद की विभक्ति का लोप नहीं होता, उसे ‘अलक्’ समास कहते हैं। जैसे –

मनसिज = मनों में उत्पन्न
युधिष्ठिर = युद्ध में स्थिर
वाचस्पति = वाणी का पति
धनञ्जय = धन की जय करने वाला
विश्वंभर = विश्व को भरने वाला
खेचर = आकाश में विचरने वाला

(iii) उपपद तत्पुरुष

जिस तत्पुरुष समास का स्वतंत्र रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता, ऐसे सामासिक शब्दों को ‘उपमद’ तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे-

जलज = जल + ज (‘ज’ का अर्थ उत्पन्न अर्थात् पैदा होनेवाला है, पर इस शब्द को अलग से प्रयोग नहीं किया जा सकता है ।)

इसी प्रकार –
तटस्थ = तट + स्थ
गृहस्थ = गृह + स्थ
पंकज = पंक + ज
जलद = जल + द
कृतघ्न = कृत + न
उरग = उर + ग
तिलचट्टा = तिल + चट्टा
लकड़फोड़ = लकड़ + फोड़
बटमार = बट + मार
घरघसा = घर + घसा
पनडुब्बी = पन + डुब्बी
घुड़चढ़ी = घुड़ + चढ़ी
कलमतराश = कलम + तराश
सौदागर = सौदा + गर
गरीबनिवाज = गरीब + निवाज
चोबदार = चोब + दार

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(iv) कर्मधारय

जिस समास के दोनों पदों के बीच विशेष्य विशेषण अथवा उपमेय-उपमान का संबंध हो और दोनों पदों में एक ही कारक (कर्ता कारक) की विभक्ति आए, उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
जैसे –

नीलकमल = नीला है जो कमल
महाविद्यालय = महान् है जो विद्यालय
लाल मिर्च = लाल है जो मिर्च
काला-पानी = काल है जो पानी
पुरुषोत्तम = पुरुषों में है जो उत्तम
चरण-कमल = कमल रूपी चरण
महाराज = महान् है जो राजा
प्राण-प्रिय = प्राणों के समान प्रिय
चंद्रमुख = चंद्र के समान है जो मुख ।
बज्र देह = वज्र के समान देह
सिंहपुरुषः = सिंह के समान है जो पुरुष ।
विद्या धन = विद्या रूप धन ।
नील-कंठ = नीला है जो कंठ
देहलता = देह रूपी लता
महाजन = महान् है जो जन
घनश्याम = घन के समान श्याम
पीतांबर = पीत है जो अंबर
काली मिर्च = काली है जो मिर्च
सज्जन = सत् (अच्छा ) है जो जन
महारानी = महान् है जो रानी
भलामानस = भला है जो मानस (मनुष्य)
नील गाय = नीली है जो गाय
सद्गुण = सद् (अच्छे) है जो गुण
कर-कमल = कमल के समान कर
शुभागमन = शुभ है जो आगमन
मुखचंद्र = मुख रूपी चंद्र
नीलांबर = नीला है जो अंबर
नरसिंह = सिंह के समान है जो नर
भव-सागर = भव रूपी सागर
मानबोचित = मानवों के लिए है जो उचित
बुद्धिबल = बुद्धि रूपी बल
पुरुष रत्न = पुरुषों में है जो रत्न
गुरुदेव = गुरु रूपी देव
घृतान्न = घृत में मिला हुआ अन्न
कर पल्ल्व = पल्लव रूपी कर
पर्णशाला = पर्ण (पत्तों से) निर्गत शाला
कमल-नयन = कमल के समान नयन
छाया-तरु = छाया प्रधान तरु
कनक-लता = कनक की सी लता
वन मानुष = वन में निवास करने वाला
मानुष चंद्रमुख = चन्द्र के समान मुख
गुरु भाई = गुरु के संबंध से भाई
मृगनयन = मृग के नयन के समान नयन
बैलगाड़ी = बैलों से खींची जाने वाली गाड़ी
कुसुम-कोमल = कुसुम के समान कोमल
माल-गाड़ी = माल ले जाने वाली गाड़ी
सिंह नाद = सिंह के नाद के समान नाद
गुड़म्बा = गुड़ से पकाया हुआ आम
जन्मान्तर = अंतर (अन्य) जन्म
दही-बड़ा = दही में डूबा हुआ बड़ा
नराधम = अधम है जो नर
जेब-घड़ी = जेब में रखी जाने वाली घड़ी
दीनदयालु = दीनों पर है जो दयालु
पन-चक्की = पानी से चलने वाली चक्की
मुनिवर = मुनियों में है जो श्रेष्ठ

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(v) द्विगु

जिस समास में पहला पद संख्यावाचक (गिनती बताने वाला) हो, दोनों पदों बीच विशेषण विशेष्य संबंध हो और समस्त पद समूह या समाहार का ज्ञान । राए, उसे द्विगु समास कहते हैं। जैसे-

शताब्दी = शत (सौ) शब्दों (वर्षों) का समूह
त्रिवेणी = तीन वेणियों (नदियों) का समाहार
सतसई सात सौ दोहों का समूह सप्ताह
सप्त (सात) अह (दिनों) का समूह
चौराहा = चार राहों का समाहार
सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह
चौमासा = चार मासों का समाहार
अष्टाध्यायी = अष्ट (आठ) अध्यायों का समूह

अठन्नी = आठ आनों का समूह
त्रिभुवन = तीन भुवनों (लोकों) का समूह
पंसेरी = पांच सेरों को समाहार
पंचवटी = पांच बट (वृक्षों) का समाहार
दोपहर = दो पहरों का समाहार
नवग्रह = व ग्रहों का समाहार
त्रिफला = तीन फलों का समूह
चतुर्वर्ण = चार वर्णों का समाहार
चौपाई = चार पदों का समूह
चतुष्पदी = चार पदों का समाहार
नव-रत्न = नव रत्नों का समूह
पंचतत्व = मांन तत्वों का समह

(vi)द्वंद्व

जिस समस्त पद के दोनों पद प्रधान हों तथा विग्रह (अलग-अलग) करने पर दोनों पदों के बीच ‘और’, ‘तथा’, ‘अथवा’, ‘या’, आदि योजक शब्द लगे उसे द्वंद्व समास कहते हैं । जैसे –

अन्न जल = अन्न और जल
दीन-ईमान = दीन और ईमान
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
लव-कुश = लव और कुश
धर्माधर्म = धर्म और अधर्म
नमक-मिर्च = नमक और मिर्च
वेद-पुराण = वेद और पुराण
अमीर गरीब = अमीर और गरीब
दाल रोटी = दाल और रोटी
राजा-रंक = राजा और रंक
नदी-नाले = नदी और नाले
राधा-कृष्ण = राधा और कृष्ण
रुपया-पैसा = रुपया और पैसा
निशि-वासर = निश (रात) और वासर (दिन)
दूध-दही = दूध और दही
देश-विदेश = देश और विदेश
आबहवा = आब (आना) और हवा
माँ-बाप = माँ और बाप
आमद-रफ्त = आमद (आना) और रफ्त (जाना)
ऊंच नीच = ऊंच और नीच
नाम-निशान = नाम और निशान
सुख-दुःख = सुख और दुःख
भाता-पिता = माता और पिता
धन-धाम = धन और धाम
भाई-बहन = भाई और बह’
भला-बुरा = भला और बुरा
रात-दिन = रात और इन
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
घी-शक्कर = घी और शक्कर
छोटा-बड़ा = छोटा या बड़ा
नर-नारी = नर और ना
जात-कुजात = जात या कुजात
गुण दोष = गुण तथा दोष
ऊँचा-नीचा = ऊँचा या नीचा
देश-विदे = देश और प्रदेश
न्यूनाधिक = न्यून (कम) अथवा अधिक
राम-लक्ष्मण = राम और लक्ष्मण
थेड़ा-बहु = थेड़ा बहुत
भीमार्जुन = भीम और अर्जुन

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(vii) बहुब्रीहि

जिस समास का कोई भी पद प्रधान नहीं हो और दोनों पद मिलकर किसी अन्य शब्द (संज्ञा) के विशेषण होते हैं, उसे ‘बहुब्र हि’ समाहस ५ हते हैं । जैसे –

चक्रधर = चक्र को धारण करने वाला अर्थात विष्णु
गजानन = गज के समान आनन (मुख) है जिसका अर्थात् राश
बारहसिंगा = बारह सींग हैं जिसके ऐसा मृग विशेष
पीतांबर = पीत (पीले) अंबर (वस्त्र) हैं जिस्: के अर्थात् ‘कृष्ण’
चंद्रशेखर = चंद्र है शेखर (मस्तक) पर जिसके अर्थात् ‘शिव
नील-कंठ = नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिन
शुभ्र स्त्र = शुभ्र (स्वच्छ) है वस्त्र जिसका अर्थात् सरस्वती
अजातशत्रु- नहीं पैदा हुआ हो शत्रु जिसका (कोई व्यक्ति)
कुरूप = कुत्सित (बुरा) हे रूप, जिसका (कोई व्यक्ति)

बड़बोला = बड़े बोल बोलने वाला (कोई व्यक्ति)
लंबोदर = लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात् गणेश
महात्मा = महान् है आत्मा जिसकी (व्यक्ति-विशेष)
सुलोचना = सुंदर है लोचन (नेत्र) जिसके (स्त्री विशेष)
आजानुबाहु = अजानु (घुटनों तक) लंबी हैं भुजाएँ जिसको (व्यक्ति विशेष)
दिगंबर = दिशाएँ ही हैं वस्त्र जिसके अर्थात् नग्न
राजीव-लोचन = राजीव (कमल) के समान लोचन (नेत्र) हैं जिसके (व्यक्ति-विशेष)
चंद्रमुखी = चंद्र के समान मुख है जिसकी अर्थात् (कोई स्त्री)
चतुर्भुज = चार हैं भुजाएँ जिसकी अर्थात् विष्णु
अलोना = (अ) नहीं है लोन (नमक) जिसमें ऐसी कोई पकी सब्जी
अंशुमाली = अंशु (किरणें) हैं माला जिसकी अर्थात् सूर्य
लमकना = लंबे हो कान जिसके अर्थात् चूहा
तिमजिला = तीन है मंजिल जिसमें वह मकान
अनाथ – जिसका कोई नाथ (स्वामी या संरक्षक) न हो (कोई बालक)
असार = सार (तत्त्व) न हो जिसमें (वह वस्तु)
दशानन = दश हैं आनन (मुख) जिसके अर्थात् रावण
पंचानन = पाँच 3 आनन जिसके अर्थात् सिंह
सहस्रबाहु – सहस्र (हजार) हैं भुजाएँ जिसकी अर्थात् दैत्यराज
षट्कोण = षट् (छ:) कोण है जिसमें (वह आकृति)
मृगलोचनी = मृग के समान लोचन हैं जिसके (कोई स्त्री)
बज्रांगी (बजरंगी) = बज्र के समान कठोर हो हृदय जिसका (कोई व्यक्ति)
पाषाण हृदय = पाषाण के समान कठोर हो हृदय जिसका (कोई व्यक्ति)
सतखंडा = सात है खंड जिसमें (वह भवन)
सितार = सितार (तीन) हों जिसमें (वह बाजा)
त्रिनेत्र = तीन हैं नेत्र जिसके अर्थात् शिव
द्विरद = द्वि (दो) हों दर (दाँत) जिसके अर्थात हाथी
चारपाई = चार हैं पाए जिसमें अर्थात् खाट
कलह प्रिय = कलह (क्लेश, झगड़ा, प्रिय हो जिसको (कोई व्यक्ति)
कनफटा = कान हो फटा हुआ जिसका (कोई व्यक्ति)
मनचल = मन रहता तो चलायमान जिसका (कोई व्यक्ति)
मृत्युञ्जय = मृत्यु को भी जीत लिया जिसने अर्थात् शंकर
सिरकटा = सिर हो कटा हुआ जिनका (कोई भूत प्रेतादि)
पतझड़ = पत्ते झड़ते हैं जिसमें वह ऋतु
भघनाद – मेघ के समान नाद है जिसका अर्थात् रावण का पुत्र
धनश्याम = घन के समान श्याम है जो अर्थात् कृष्ण
मक्खीचूस = मक्खी को भी चूस लेने वाला अर्थात् कृपण (कंजूस)
विषधर = विष को धारण करने वाला अर्थात् सर्प
गिरिधर = गिरी (पर्वत) को धारण करने वाला कृष्ण
जितेंद्रिय = जीत ली है इंद्रियां जिसने (संयमी पुरुष)
कृत-कार्य = कर लिया है कार्य जिसने (सफल व्यक्ति)
इन्द्रजित = इंद्र को जीत लिया है जिसने (मेघनाद)
विष-पायी = विष पी लिया है जिसने (शिव)
चक्रपाणि = चक्र है पाणि : (हाथ) में जिसके अर्थात् विष्णु
त्रिगुण = तीन हैं गुण जिसमें (ऐसी कोई वरतु)
रत्न-गर्भा = रत्न् हैं गर्भ हैं जिसके अर्थात् पृथ्वी
नीरज = नीर (जल) में जन्म लेने वाला अर्थात् कमल
स्वरान्त = स्वर है अंत में जिसके ( ऐसा शब्द)
त्रिभुज = तीन हैं भुजाएँ जिसमें (वह आकृति)
फुल्लोत्पल = फुल्ल (खिले) हैं उत्पल (कमल) जिसमें ऐसा तालाब)
धर्मात्मा = धर्म में आत्मा लीन है जिसकी (कोई व्यक्ति)।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2 Text Book Questions and Answers.

BSEB Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

[जब तक अन्यश्चा न कहा जाए, π = \(\frac{22}{7}\) लीजिए।

प्रश्न 1.
ऊँचाई 14 cm बाले एक लम्बवृत्तीच वेलन का वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल 88 cm² है। बेलन के आधार का व्याम ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना वेलन के आधार को त्रिज्या = r cm तथा ऊंचाई h = 14 cm
तब, वक्र पृष्ठ = 2πrh = 88
⇒ 2 × \(\frac{22}{7}\) × r × 14 = 88
⇒ r = \(\frac{88 × 7}{22×2×14}\) = 1 cm
अत: वेलन के आधार का व्यास (d)
= 2r = 2 × 1 = 2 cm.

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

प्रश्न 2.
धातु की एक चादर से 1 m ऊंची और 140 cm व्यास के आधार वाली एक बन्द बेलनाकार टंकी बनाई जाती है। इस कार्य के लिए कितने वर्ग मीटर चादर की आवश्यकता होगी?
उत्तर:
दिया है, टंकी की ऊँचाई (h) = 1 m तथा व्यास d = 140 cm
अत: त्रिज्या (r) = 70 cm = 0.7 m
टंकी बनाने के लिए आवश्यक चादर
= कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल
= 2πr (r + h)
= 2 × \(\frac{22}{7}\) × 0.7 (0.7 + 1)
= 44 × 0.1 × 1.7 = 7.48 m².

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

प्रश्न 3.
धातु का एक पाइप 77 cm लम्बा है। इसके एक अनप्रस्थकाट का आन्तरिक व्यास 4 cm है और बाहरी व्यास 4.4 cm है (देखिए पाठ्य पुस्तक में दी गई आकृति)। जात कीजिए-
(i) आनारिक वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल
(ii) बाहरी वक पृष्टीय क्षेत्रफल
(iii) कुल पृष्टीय क्षेत्रफल
उत्तर:
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2
दिया है, पाइप की लम्बाई (h) = 77 cm, आन्तरिक व्यास = 4 cm तथा बाहरी व्यास = 4.4 cm
∴ आन्तरिक त्रिज्या (r)
= \(\frac {व्यास}{2}\) = 2.0 m
बाहरी त्रिज्या (R)
= \(\frac {व्यास}{2}\) = 2.2 cm

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

(i) आन्तरिक वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल
= 2πrh
= 2 × \(\frac {22}{7}\) × 2 × 77
= 968 cm²

(ii) बाहरी वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 2.2 × 77
= 1064.8 cm²

(iii) कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल = आन्तरिक वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल + बाहरी वक्र पृष्ठोष क्षेत्रफल + दोनों आधारों का क्षेत्रफल
= 2πrh + 2πRh + 2π (R² – r²)
= 968 + 1064.8 + 2 × \(\frac {22}{7}\) {(2.2)² – 2²}
= 968 + 1064.8 + 5.28 = 2038.08 cm².

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2

प्रश्न 4.
एक रोलर (roller) का व्यास 84 cm है और लम्बाई 120 cm है। एक खेल के मैदान को एक बार समतल करने के लिए 500 चक्कर लगाने पड़ते हैं। खेल के मैदान का m² में क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है, रोलर को लम्बाई (h) = 120 cm, रोलर को त्रिज्या (r) = \(\frac {व्यास}{2}\) = 42 cm
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 13 पृष्ठीय क्षेत्रफल एवं आयतन Ex 13.2
अत: रोलर में एक चक्कर द्वारा तय दूरी
= गेलर का पृष्ठीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 42 × 120
=3.168 m².
∴ मैदान का क्षेत्रफल
= 500 × रोलर की एक कार में तप दूरी
-500 × 3.168 = 1584 m².

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प्रश्न 5.
किमी बेलनाकार नामका व्यास 50 है और ऊँचाई 3.5 m है। Rs 12.50 प्रति m² की दर से इस स्तम्भ के खक पष्ठ पर पेन्ट कराने का व्यय ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है, स्तम्भ को लम्बाई (h) = 3.5 m. व्यास = 50 cm, त्रिज्या = \(\frac {व्यास}{2}\) = 0.25 m
स्तम्भ का षक पृष्टीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 0.25 × 3.5
= 5.5 m
स्वाध पर पेर कराने का व्यय = 5.5 × 12.5 = Rs 68.75

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प्रश्न 6.
एक लम्बवृत्तीय बेलन का बक पृष्टीय क्षेत्रफल 4.4 m² यदि वेलन के आधार की प्रिज्या 0.7 m है, तो उसकी ऊंचाई ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
दिया है, येलन के आधार की प्रिया. r = 0.7 m तथा
वक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल = 2πrh = 4.4
∴ 2 × \(\frac {22}{7}\) × 0.7 × h = 4.4
⇒ h = \(\frac {4.4×7}{2×22×0.7}\) = 1 m

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प्रश्न 7.
किसी वृत्ताकार कुएँ का आनरिक व्याम 3.5 m है और यह 10 m गहरा है। ज्ञात कीजिए
(i) आनरिक बक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल
(ii) Rs 40 प्रति m² की दर से इसके वक़ पृष्ठ पर प्लास्टर कराने का व्यय।
उत्तर:
(i) कुएँ को आन्तरिक त्रिज्या (r)
= \(\frac {व्यास}{2}\) = 1.75 m तमा h = 10 m
कुएँ का वक्र पृष्टीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 1.75 × 10
= 110 m².

(ii) पलास्टर कराने का व्यय = 40 × 110 = Rs 4400

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प्रशन 8.
गरम पानी द्वारा गरम रखने वाले एक संयंत्र में 28 m लम्बाई और 5 cm व्यास वाला एक बेलनाकार पाइप है। इस संयंत्र में गभी देने वाला कुल कितना पृष्ठहै?
उत्तर:
दिया है, सयंत्र की लम्बाई (h) = 28 m.
त्रिज्या (r) = \(\frac {व्यास}{2}\) = 2.5 cm = 0.025 m.
अत: संत्र में गर्मी देने मला पृष्ठ
= पादप का वक्र पृष्टीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 0.025 × 28
= 4.4 m²

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प्रश्न 9.
जान कीजिए-
(i) एक बेलनाकार पेट्रोल की बन्द टंकी का पार्श्व या वन पृष्ठीय क्षेत्रफल, जिसका व्यास 4.2 m है और ऊँचाई 4.5 m है।
(ii) इस टंकी को बनाने में कुल कितना इस्पात (steel) लगा होगा, यदि कुल इस्पात का \(\frac {1}{12}\) भाग बनाने में नष्ट हो गया है?
उत्तर:
(i) दिया गया है. (h) = 4.5 m r = \(\frac {व्यास}{2}\) = 2.1 m
अन: टंकी का वक्र पृप्तीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 2.1 × 4.5
= 59.4 m²

(ii) टंकी का कुल पृष्ठीय क्षेत्रफल = 2π (r + h)
= (2 × \(\frac {22}{7}\) × 2.1) + (2.1 + 4.5)
= 87.12 m²
दिया गया है प्रयुका इरपास का \(\frac {1}{12}\) का भाग यांब हो गया है।
अत: टंकी बनाने में प्रयुका इस्पात
= x का (1 – \(\frac {1}{12}\)) = x का \(\frac {11}{12}\)
∴ \(\frac {11}{12}\) = 87.12
⇒ x = 95.04 m².

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प्रश्न 10.
पाठ्य पुस्तक में दी गई आकृति में आप एक लैंपशेड का फ्रेम देख रहे हैं। इसे एक सजावटी कपड़े से तका जाता है। इस फ्रेम के आधार का व्यास 20 cm है और ऊँचाई 30 cm है। फ्रेम के ऊपर और नीचे मोड़ने के लिए दोनों ओर 2.5 cm अतिरिक्त कपड़ा भी छोड़ा जाना है। ज्ञात कीजिए कि लैंपशेड को बकने के लिए कुल कितने कपड़े की आवश्यकता होगी।
उत्तर:
लैंपशेड की ऊंचाई (h) = 30 cm (r) = \(\frac {व्यास}{2}\) =10 cm
चौक फ्रेम के ऊपर और नीचे मोड़ने के लिए दोनों और 2.5 cm अतिरिक्त कपड़ा भी छेड़ना है।
अतः कुल ऊँचाई = 30 + 2 × 2.5 = 35 cm
∴ कुल कपड़ा = फ्रेम का चक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल
= 2πrh = 2 × \(\frac {22}{7}\) × 10 × 35 = 2200 cm²

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प्रश्न 11.
किसी विद्यालय के विद्यार्थियों से एक आधार वाले बेलनाकार कलमदानों को गले से बनाने और सजाने की प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कहा गया। प्रत्येक कलमदान को 3 cm त्रिज्या और 10.5 cm ऊँचाई का होना या। विद्यालय को इसके लिए प्रतिभागियों को गत्ता देना था। यदि इसमें 35 प्रतिभागी थे, तो विद्यालय को कितना गत्ता खरीदना पड़ा होगा?
उत्तर:
दिया गया है, कलमदान की त्रिज्या (r) = 3 cm, (h) = 10.5 cm
अतः प्रत्येक प्रतियोगी के लिए गला = कलमदान का
वक्रपृष्ठीय क्षेत्रफल + आधार का क्षेत्रफल
= 2πrh + πr²
= 2 × \(\frac {22}{7}\) × 3 × 10.5 + \(\frac {22}{7}\) × 3 × 3
= 226.28 cm²
⇒ 35 प्रतियोगियों के लिए गत्ता
= 35 × 226.28 = 7920 cm².

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Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

Bihar Board Class 9 Hindi Book Solutions Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि Questions and Answers

सन्धि-दो-वर्गों के पारस्परिक मेल को सन्धि कहते हैं, जैसे-देव + आलय = देवालय । कपि + ईश = कपीश । महा + इन्द्र = महेन्द्र । जगत् + नाथ = जगन्नाथ । यहाँ देव + आलय में ‘देव’ (देव + अ) अन्तिम अक्षर ‘अ’ स्वर है और ‘आलय’ में ‘आ’ स्वर लगा हुआ है। इन दोनों के मेल से ‘आ’ हो जाता है इसलिए ‘देव’ और ‘आलय’ (अ + आ) मिलकर देवालय हो गया । इसी प्रकार जगत् + नाथ में ‘जगत्’ में त् व्यंजन है तथा ‘नाथ’ में न व्यंजन है । सन्धि में त् और न मिलकर ‘न्न’ हो गया । सन्धि में अक्षर बदल जाते हैं। तदनुसार उसके उच्चारण में अन्तर पड़ जाता है । जैसे-महा + इन्द्र = महेन्द्र । जिन अक्षरों के बीच सन्धि हुई हो उन्हें सन्धि के पहले रूप से पृथक करने की क्रिया की सन्धि-विच्छेद कहते हैं: जैसे-महेन्द्र का सन्धि-विच्छेद ‘महा + इन्द्र’ होगा । जिन अक्षरों की सन्धि की जाती है उनके बीच ‘+’ चिह्न देने का प्रचलन है।

सन्धि के प्रकार-सन्धि के तीन भेद हैं-(1) स्वर-सन्धि (2) व्यंजन-सन्धि और (3) विसर्ग-सन्धि ।

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(1) स्वर सन्धि

स्वर सन्धि की परिभाषा-दो स्वर वर्णों के पारस्परिक मेल को स्वर-सन्धि कहते हैं। जैसे-देव + इन्द्र । यहाँ ‘देव’ शब्द में ‘अ’ स्वर वर्ण है तथा इन्द्र शब्द में ‘इ’ स्वर वर्ण है । सन्धि में ये दोनों स्वर मिलकर ‘ए’ हो जाते हैं। अतः ‘देव’ और ‘इन्द्र’ मिलकर देवेन्द्र हो जाता है।

स्वर सन्धि के पाँच भेद हैं । (1) दीर्घ-सन्धि (2) गुण-सन्धि (3) वृद्धि-सन्धि (4) यण-सन्धि और (5) अयादि-सन्धि ।

(1) दीर्घ-सन्धि-ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, के बाद यदि हस्व या दीर्घ क्रमशः आ, इ, उ, हो तो दोनों मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। इस प्रकार की सन्धि को शीर्ष सन्धि कहते हैं, जैसे –

अ + अ = आ

अधम + अधम = अधमाधम
क्रम + अनुसार = क्रमानुसार
पर + अधीन = पराधीन
परम + अर्थ = परामर्थ

अ+ आ = आ

गज + आनन = गजानन
चित्र + आलय = चित्रालय ।
छात्र + आलय = छात्रालय
छात्र + आवास = छात्रावास
जल + आधार = जलाधार
जल + आशय = जलाशय

मंगल + आचरण = मंगलाचरण
मृत् + आत्मा = मृतात्मा
मर्म + आहत = मर्माहत
पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
सत्य + आग्रह = सत्याग्रह
शिष्ट + आचार = शिष्टाचार

आ+ अ = आ

कदा + अपि = कदापि
तथा + अपि = तथापि
परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी ।
इच्छा + अनुसार = इच्छानुसार

यथा + अर्थ,= यथार्थ
रेखा + अंकित = रेखांकित
सहायता + अर्थ = सहायतार्थ
मुरा + अरी = मुरारी

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

आ + आ = आ

विद्या + आलय = विद्यालय
महा + आशय = महाशय
महा + आत्मा = महात्मा
कला + आत्मक = कलात्मक

इ + इ = ई

कवि + इन्द्र = कवीन्द्र
रवि + इन्द्र = रवीन्द्र
अति + इव = अतीव
अति + इत = अतीत

इ + ई = ई

गिरि + ईश = गिरीश
कवि + ईश्वर = कवीश्वर
ऋषि + ईश = ऋषीश
अधि + ईश = अधीश

ई + इ = ई

नदी + इन्द्र = नदीन्द्र
महती + इच्छा = महतीच्छा
गौरी + इच्छा = गौरीच्छा
रवी + इन्द्र = रवीन्द्र

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

ई + ई = ई

मही + ईश्वर = महीश्वर
सती + ईश = सतीश
नदी + ईश = नदीश
रजनी + ईश = रजनीश

उ + उ = ऊ

विधु + उदय = विधूदय
भानु + उदय = भानूदय
कटु + उक्ति = कटूक्ति
सु + उक्ति = सूक्ति ।

उ + ऊ = ऊ

लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
गुरु + ऊर्मि = गुरुर्मि
सिन्धु + ऊर्मि = सिन्धूर्मि
वायु + ऊर्ध्व = वायूर्ध्व ।

ऊ + उ = ऊ

वधू + उत्सव = वधूत्सव
भू + उन्नति = भून्नति
स्वयम्भू + उदय स्वयम्भूदय
वधू + उत्सुकता = वधूत्सुकता

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

ऊ + ऊ = ऊ

भू + ऊसर = भूसर
वधू + ऊर्मिला = वधूमिला
वधू + ऊहन = वधूहन
भू + ऊर्ध्व = भूल

(2) गुण सन्धि-यदि अ या आ के बाद ह्रस्व या दीर्घ इ, उ या ऋ रहे तो अ + इ मिलकर ए, अ + उ मिलकर ओ और अ +ऋ मिलकर अर होता है । इस प्रकार की सन्धि को गुण-सन्धि कहते है । जैसे –

अ + इ = ए

देव + इन्द्र = देवेन्द्र
नर + इन्द्र = नरेन्द्र
नव + इन्दु =नवेन्दु
सुर + इन्द्र = सुरेन्द्र

भारत + इन्दु = भारतेन्दु
गज + इन्द्र = गजेन्द्र
रस + इन्द्र = रसेन्द्र
स्व + इच्छा = स्वेच्छा

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

अ + ई = ए

गण + ईश = गणेश
धन + ईश = धनेश
नर + ईश = नरेश

कोशल + ईश = कोशलेश
परम् + ईश्वर = परमेश्वर
सुर + ईश = सुरेश

आ + इ = ए

महा + इन्द्र = महेन्द्र
यथा + इष्ट = यथेष्ट

आ + ई = ए

उमा + ईश = उमेश
रमा + ईश = रमेश

अ + उ = ओ

चन्द्र + उदय = चन्द्रोदय
वीर + उचित = विरोचित
अरुण + उदय = अरुणोदय
ग्राम + उद्धार = ग्रामोद्धार
पुरुष + उत्तम = पुरुषोत्तम

सूर्य + उदय = सूर्योदय
धन + उपार्जन = धनोपार्जन
पत्र + उत्तर = पत्रोत्तर
पर + उपकार = परोपकार
प्रश्र + उत्तर = प्रश्रोत्तर

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

अ + ऊ = ओ

जल + ऊर्मि =जलोमि
नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा

आ + उ = ओ

जीविका + उपार्जन = जीविकोपार्जन
महा + उत्सव = महोत्सव
महा + उदय = महोदय
यथा + उचित = यथोचित

आ + ऊ = ओ

बाल + ऊषा = बालोषा
महा + ऊसर = महोसर

अ + ऋ = अर

देव + ऋषि = देवर्षि
ब्रह्म + ऋषि = ब्रह्मर्षि
राज + ऋषि = राजर्षि
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि

आ + ऋ= अर

महा + ऋषि = महर्षि
राजा + ऋषि = राजर्षि

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(3) वृद्धि सन्धि-अ या आ के बाद यदि ए या ऐ रहे तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ और ओ या औ रहे तो ‘औ’ होता है। इसे वृद्धि-सन्धि कहते हैं। जैसे –

अ + ए = ए = एक + एक = एकैक ।
अ + ऐ = ऐ = मत + एक्य = मतैक्य ।
आ + ए = ऐ = तथा + एव = तथैव ।
अ + ऐ = ऐ = महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य ।
आ + औ = औ = परम + औषध = परमौषध
अ + औ = औ = गुण + औदार्य = गुणौदार्य
आ + ओ = औ= महा + औषधि = महौषधि
आ + औ = औ = कला + औचित्य = कलौचित्य

हित + एषी = हितैषी
परम + ऐश्चर्य = परमैश्चर्य
सदा + एव = सदैव
सखा + ऐक्य = सखैक्य

(4) यण सन्धि-हस्व या दीर्घकार, इकार या ऋ के बाद यदि कोई भिन्न स्वर वर्ण रहे तो दोनों मिलकर क्रमशः य, व, या र होता है । इस प्रकार की सन्धि को यण सन्धि कहते है। जैसे- इ + अ = य्

यदि + अपि = यद्यपि
अति + अन्त = अत्यन्त
प्रति + अंग = प्रत्यंग

वि + अयव्यय
वि + अर्थ = व्यर्थ
वि+ अवस्था = व्यवस्था ।

इ + आ = या

इति + आदि = इत्यादि
अति + आचार = अत्याचार
वि + आख्या = व्याख्या

वि + आकुल = व्याकुल
वि + आपक = व्यापक
वि+ आहार = व्यवहार

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

ई + अ = य = रजनी + अन्त = रजयन्त
ई + आ = या = सती + ओसक्त = सत्यासक्त
इ + उ = यु = प्रति + उत्तर + प्रत्युत्तर
इ + ऊ = यू = नि + ऊन = न्यून
इ + ए =ऐ = प्रति + एक = प्रत्येक
इ + ए = 2 = अति + ऐश्वर्य = अत्यैश्वर्य
इ + अव = अनु + अय = अन्वय
उ + अ = वा = सु + आगत = स्वागत
उ + इ =वि = अनु + इत = अन्वित
उ + ए = वे = अनु + ऐषण = अन्वेषण ।
उ + ओ = वो = सु + औषधि = स्वौषधि

(5) अयादि सन्धि-ए, ऐ, ओ, या औ के बाद कोई भिन्न स्वर आये तो ए का अय, ऐ, का आय, ओ का अव तथा औ का आव हो जाता है। जैसे-
ए + अ = अय = ने + अन = नयन
ऐ + अ = आय = ने + अक = नायक
ओ + अ =अव = पो + अन = पवन
औ + अ = आव् = पौ + अक = पावक
ओ + ई = आवि = पो + इत्र = पवित्र
औ + इ = आवि = नौ + इक = नाविक
औ + उ = आवु = भौ + उक = भावुक

(2) व्यंजन-सन्धि

व्यंजन-सन्धि-व्यंजन के साथ किसी स्वर या व्यंजन के संयोग संधि कहते हैं, जैसे-
Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि - 1

(i) किसी वर्ग के प्रथम वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प) के बाद कोई स्वर वर्ण हो तो प्रथम वर्ण के बदले में उस वर्ग का तीसरा वर्ण होता है, जैसे –

वाक् + इेश = वागीश
तत् + अनुसार = तदनुसार
अच् + अन्ता = अजन्ता
दिक् + अन्त = दिगन्त
दिक् + अम्बर = दिगम्बर
षट् + आनन = षडानन
उत् + हारण = उदाहरण
सत + इच्छा = सदिच्छा
जगत् + ईश्वर = जगदीश्वर
सत् + आचार = सदाचार

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(ii) किसी वर्ग के प्रथम वर्ण के पश्चात किसी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण र, या व् हो तो प्रथम वर्ण के बदले तीसरा वर्ण होता है, जैसे-

षट् + दर्शन = षड्दर्शन
सत् + गति =सद्रति
उत् + घाटन = उद्घाटन
दिक् + गज = दिग्गज

उत् + योग = उद्योग
उत् + वेग = उद्वेग
तत् + रूप = तद्रूप
अज + ज = अब्ज ।

(iii) किसी वर्ग के प्रथम वर्ण के बाद किसी वर्ग का पंचम वर्ण रहे, तो प्रथम – वर्ण का पंचम वर्ण (ङ, न, म) हो जाता है, जैसे

वाक् + मय = वाङ्मय
उत् + मत = उन्मत्त
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
उत् + नत् = उन्नत

सत् + मार्ग = सन्मार्ग
उत् + नायक = उन्नायक
प्राक् + मुख = प्राङ्मुख
उत् + मद = उन्मद।

(iv) यदि म् के बाद किसी वर्ग का कोई वर्ण हो तो म् उस वर्ग का पंचम वर्ण होता है; जैसे-

आलम् + कार = अलंकार
अहम् + कार = अहंकार
सम् + चार = संचार
किम् + तु = किन्तु
सम् + जय = संजय

सम् + देह =सन्देह
सम् + धि = सन्धि
शम् + कर = शंकर
शाम् + ति = शांति
सम् + भव = सम्भव ।

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(v) यदि म् के बाद अन्तस्थ (य, र, ल, व्) या ऊष्म (श्, ष, ह) वर्ण हो तो स् का अनुस्वार होता है, जैसे –

सम् + वाद = संवाद
सम् + सार = संसार
सम् + हार = संहार

सम् + लग्न = संलग्न
सम् + रक्षक = संरक्षक
किम् + वदन्ति = किवदन्ती

(vi) न् या म् के बाद कोई स्वर वर्ण रहे तो दोनों मिलकर संयुक्त हो जाते है, जैसे –

अन् + अंग =अनंग
सम् + सार = संसार
सम् + हार = संहार

सम् + अन्वय = समन्वय
अन् + आदर = अनादर
अन् + इष्ट = अनिष्ट।

(vii) (क) त् के बाद अगर च, ज या ल हो तो त् + च = च्च, त् + ज = ज्ज, त् + ल = ल्ल हो जाता है, जैसे

उत् + चारण = उच्चारण
उत् + ज्वल = उज्जवल
उत्त + लंघन = उल्लंघन
तत् + लीन = तल्लीन
उत् + लेख = उल्लेख

उत् + जयिनि = उज्जयिनी
सत् + जन सज्जन
शरत् + चन्द्र = शरच्चन्द्र
सत् + चरित्र = सच्चरित्र
उत् + लास + उल्लास

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(ख) त् के बाद छ् या श् हो, तो त के बदले में च और श के बदले में छ हो जाता है, जैसे

उत् + छंद = उच्छंद
उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
उत् + शृंखल = उच्छंखल
उत् + श्वास = उच्छवास

(ग) त् के बाद ह हो तो त् के बदले में ट् और ह, के बदले में ‘ध’ हो जाता है, जैसे

तत् + हित = तद्धित
उत् + हित = उद्धत
उत् + हरण = उद्धरण
उत् + हार = उद्धार ।

(घ) त् के बाद क, प् या स् हो तो दोनों मिलकर संयुक्त हो जाता हैं, जैसे

तत् + काल = तत्काल
तत् + त्व = तत्त्व
महत् + त्व = महत्त्व

उत् + पात = उत्पात
सत् + कर्म = सत्कर्म
सत् + संग = सत्संग

(viii) ए के पश्चात् त् या थ् हो तो त् के बदले में ट् और थ् के बदले में ठ हो जाता है, जैसे –

अष् + त= अष्ट
नष् + त =नष्ट
इष् + त = इष्ट
दुष् + त दुष्ट

षष् + थ = षष्ठ
पृष् + थ = पृष्ठ
शिष + त = शिष्ट
कष् + त = कष्ट

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(ix) मूल या दीर्घ स्वर के पश्चात् छ रहे तो छ के पहले च की वृद्धि हाती है, जैसे

अनु + छेद = अनुच्छेद
परि + छेद = परिच्छे
वि + छिन्न = विच्छिन्न

वि + छेद + विच्छेद
प्रति + छाया = प्रतिच्छाया
श्री + छाया = श्रीच्छाया

(x) यदि परि या सम् उपसर्ग के बाद कृ धातु का संयोग हो, तो ष् या स की वृद्धि होती है और म् के बदले अनुस्वार हो जाता है, जैसे –

परि + कार = परिष्कार
परि = कृत = परिष्कृत

सम् + कार = संस्कार
सम + कृत = संस्कृत

(3) विसर्ग सन्धि

विसर्ग सन्धि-विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन के मेल को विसर्ग-सन्धि कहते हैं, जैसे

निः+ फल = निष्फल
दुः+ लभ = दुर्लभ
तपः + वन = तपोवन

अन्तः + आत्मा = अन्तरात्मा
निः + काम = निष्काम
दु: + दशा = दुर्दशा

(i) यदि विसर्ग के पहले इ या उ हो तथा उसके बाद क, ख, ट, उ प या फ हो तो विसर्ग का प् हो जाता है, जैसे

आवि: + कार = आविष्कार
निः + कपट = निष्कपट
दुः+ कार = दुष्कार

धातुः + पद = चतुष्पद
निः + काम = निष्काम
निः+ ठुर = निष्ठुर

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(ii) यदि विसर्ग के पहले इ या उ हो तथा इसके बाद च या छ हो तो विसर्ग के स्थान में श् तथा त या थ रहे तो स् हो जाता है, जैसे

दुः+ चरित = दुश्चरित
दुः+ तर = दुस्तर
निः + छल =निश्छल
निः + तार = निस्तार

(iii) यदि विसर्ग के पहले इ या उ हो तथा विसर्ग के बाद श, ष, या स् हो तो विसर्ग का विसर्ग ही रह जाता है या उसके स्थान पर क्रमशः श, ष, या स् । हो जाता है, जैसे

दु: + शासन = दुःशासन, दुश्शासन
निः + संतान = नि:संतान, निस्संतान
दु: + साहस = दुःसाहस, दुस्साहस
निः + सन्देह = नि:संदेह, निस्संदेह

(iv) यदि विसर्ग के पहले अ या आ तथा उसके बाद कर या कार हो तो विसर्ग का स् हो जाता है, जैसे

तिरः + कार = तिरस्कार
नमः + कार = नमस्कार
भाः + कर = भास्कर
पुरः + कार = पुरस्कार

(v) विसर्ग के पहले अ या आ के अतिरिक्त कोई स्वर हो तथा उसके बाद किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वर्ण हो या य, स, व हो या स्वर वर्ण हो __ तो विसर्ग के स्थान पर र हो जाता है, जैसे-

दु: + दशा = दुर्दशा
निः + धन = निर्धन
दु: + लभ = दुर्लभ
निः + अक्षर = निरक्षर
निः + ईक्षण = निरीक्षण

दुः+ बल = दुर्बल
निः + मम = निर्मम
टुः + वचन = दुर्वचन|
नि: + अन्तर = निरंतर
निः + आदर = निरादर ।

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(vi) यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ हो तथा बाद में किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वर्ण हो या व, र, ल, द, हो तो विसर्ग के स्थान में ‘ओ’ हो जाता है, जैसे

अधः + गति = अधोगति
पयः + धि = पयोधि
मनः + मोहक =मनमोहक
मनः + रथ = मनोरथ
सरः + वर = सरोवर

तपः + बल = तपोबल
मनः + भाव = मनोभाव
मनः + योग = मनोयोग
यशः + लाभ = यशोलाभ
तपः + वन = तपोवन।

(vii) यदि विसर्ग के पहले इ या उ हो तथा उसके बाद र हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है तथा विसर्ग के पहले वाला स्वर दीर्घ हो जाता है, जैसे

दुः + राज = दूराज
निः + रस- नीरस
निः + रव = नीरव
निः + रोग = नीरोग ।

(viii) यदि विसर्ग के पहले ‘अ’ हो और बाद में भी ‘अ’ हो तो विसर्ग और अ मिलकर ओ हो जाता है तथा बाद वाले का लोप हो जाता है, जैसे-

मनः + अनुकूल = मनोनुकूल
मनः + अनुसार = मनोनुसार

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

(ix) र – जात विसर्ग के बाद किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वर्ग हो या य, र, ल, व, ह, हो या कोई स्वर हो तो विसर्ग का र् हो जाता है। जैसे

अन्तः + जातीय = अन्तर्जातीय
अन्तः + यामी = अन्तर्यामी
अतः+ आत्मा = अन्तरात्मा
अन्तः + नाद = अन्तर्नाद
पुनः + जन्म = पुनर्जन्म

(x) स-जात विसर्ग के बाद किसी वर्ग का प्रथम या द्वितीय वर्ण या व हो तो दूसरे नियम के अनुसार का स् य श् हो जाता है, जैसे
अन्तः + तल = अन्तस्थल
मनः + ताप = मनस्ताप

(xi) यदि विसर्ग के पहले अ हो या उसके बाद कोई भिन्न स्वर हो तो विसर्ग लुप्त हो जाता है, जैसे-
अतः + एव = अतएव ।

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण सन्धि

अभ्यास प्रश्न

1. निम्नलिखित प्रश्नों में सन्धि कीजिए-

हिम + आलय
स + अवधान
पो + अक
उत् + ज्वल
सु + अगत
सम् + कृत
सूर्य + उदय
जगत् + ईश

Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण वाच्य परिवर्तन

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Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण वाच्य परिवर्तन Questions and Answers

कर्तवाक्य से कर्मवाच्य बनाने की विधि

(क) कंर्तृवाच्य के कर्ता को करण कारक बना दिया जाता है। अर्थात् कर्ता को उसकी विभक्ति (यदि लगी है तो) हटाकर ‘से’, ‘द्वारा’ विभक्ति लगा दी जाती है। जैसे-
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(ख) कर्म के साथ यदि विभक्ति लगी हो तो उसे हटा दिया जाता है। जैसे –
Bihar Board Class 9 Hindi व्याकरण वाच्य परिवर्तन- 2

(ग) बदले हुए क्रिया के रूप के साथ काल, पुरुष, वचन और लिंग के अनुसार ‘जात्रा’ क्रिया का रूप जोड़ना चाहिए। कर्तृवाच्य की मुख्य क्रिया को सामान्य भूतकाल की क्रिया बना दिया जाता है। जैसे-
लिखता है – लिखा जाता है।
धोए – धोए गए।
तोड़ोगे – तोड़े जाएँगे।

कर्तृवाच्य से भाववाच्य बनाने की विधि

(क) कर्ता के आगे ‘से’ अथवा ‘के द्वारा’ लगाया जाता है। जैसे-
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(ख) गख्य क्रिया को सामान्य भूतकाल की क्रिया के एकवचन में बदल कर उसके साः क्रिया के एकवचन, पुल्लिंग, अन्य पुरुष का वही काल लगाया जाता है जो क क य की क्रिया का होता है। जैसे-
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कर्मचाव्य और भाववाच्य में कर्तृवाच्य बनाने के विधि

कर्मचाव्य और भाववाच्य में कर्तृवाच्य बनाने के लिए ‘से’, ‘द्वारा’; ‘के द्वारा’ आदि की जटा दिया जाता है। जैसे -.
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कर्मवाच्य के प्रयोग स्थल

1. जब वाक्य में कर्ता का निश्चित रूप से पता न हो। जैसे
धन पानी की तरह बहाया जा रहा है।
पत्र भेज दिए गए हैं।
2. जब कर्ता कोई समिति, सभा या सरकार आदि हो जैसे
आर्य समाज द्वारा कई अन्तर्जातीय विवाह कराए गए।
सरकार द्वारा अतुल धनराशि जुटाई जाती है।
3. सूचना-विज्ञप्ति आदि में जहाँ कर्ता निश्चित नहीं होता। जैसे
सड़क पर अवरोध खड़ा करने वालों को दंड किया जाएगा।
आपका प्रार्थना-पत्र रद्द कर दिया गया है।
4. असमर्थता बताने के लिए ‘नहीं’ के साथ। जैसे-
अब अधिक दूध नहीं पिया जाता। गरीब का दुख नहीं देखा जाता।

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भाववाच्य के प्रयोग स्थल ।

1. असमर्थता या विवशता प्रकट करने के लिए ‘नहीं’ के साथ भाववाच्य का __ प्रयोग होता है। जैसे
मुझसे अब हँसा तक नहीं जाता।
सुरेश से चला तक नहीं जाता।

2. ‘नहीं’ का प्रयोग न होने पर मूल कर्ता जन सामान्य होता है। जैसे. सर्दियों में अन्दर सोया जाता है।

परसर्ग ‘ने’ का क्रिया पर प्रभाव

निम्नलिखित वाक्य का अध्ययन कीजिए-

राम खाना खा चुका है। – राम ने खाना खा लिया है।
(‘खा चुका है’ क्रिया ‘ने’ परसर्ग आने पर ‘खा लिया है’ हो गई)

मैं इस गर्जन से डर गया। – मुझे इस गर्जन ने डरा दिया।
(‘डर गया’ की जगह ‘डरा दिया’ हो गया।)

मुझसे डंडा छूट गया। – मैंने डंडा छोड़ दिया।
(‘छूट गया’ की जगह ‘छोड़ दिया’ हो गया।)

वह हिम्मत नहीं हारा। – उसने हिम्मत नहीं हारी।
(यहाँ ‘हारा’ की जगह ‘हारी’ हो गया।)

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘ने’ परसर्ग लगने से क्रिया के स्वरूप में परिवर्तन होता है। इस विषय में कुछ ध्यान देने योग्य तथ्य इस प्रकार हैं

‘ने’ वाले वाक्यों में यदि कर्म के साथ ‘को’ जुड़ जाए तो क्रिया हमेशा पुल्लिंग एकवचन में होती है। उदाहरणतया-
राम ने रावण को मारा। (पुल्लिंग एकवचन)
अशोक ने जलेबी को खाया। (पुल्लिंग एकवचन)
महेश ने गेंद को फेंका। (पुल्लिंग एकवचन)
अश्विनी ने जामुनों को फेंक दिया। (पुल्लिंग एकवचन)

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स्पष्टीकरण-उपर्युक्त वाक्यों में यदि को’ परसर्ग न हो तो वाक्यों का स्वरूप इस प्रकार होगा –

अशोक ने जलेबी खाई। महेश ने गेंद फेंकी।
अश्विनी ने जामुन फेंक दिए।
‘ने’ का प्रयोग सदा क्रिया के पूर्ण पक्ष को दर्शाने के लिए होता है।

उदाहरणतया –

अशोक ने गलती की। मनोहर ने धमकी दी।
बाढ़ ने सारी फसलें तबाह कर दी।
चिंता ने उसे कमजोर बना दिया है।
खुशी ने उसे हृष्ट-पुष्ट कर दिया था।
उत्साह ने सबकी गति बढ़ा दी होगी।

सामान्यतः पूर्ण वर्तमान काल के लिए ‘चुका है’ सहायक क्रिया का प्रयोग होता है। परन्तु ‘ने’ परसर्ग लगने पर ‘चुका है’ की बजाय ‘लिया है’ आदि क्रिया-रूपों का प्रयोग होता है। उदाहरणतया

वह पुरस्कार ले चुका है।
उसने पुरस्कार ले लिया है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 12 हीरोन का सूत्र Ex 12.1

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 12 हीरोन का सूत्र Ex 12.1 Text Book Questions and Answers.

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Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 12 हीरोन का सूत्र Ex 12.1

प्रश्न 1.
एक यातायत संकेत बोर्ड पर ‘आगे स्कूल है’ लिखा है और वह भुजा वाले एक समबाहु त्रिभुज के आकार का है। हीरोन के सूत्र का प्रयोग करके इस बोर्ड का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए। यदि संकेत बोर्ड का परिमाप 180 cm है. तो इसका क्षेत्रफल क्या होगा?
उत्तर:
समबाहु त्रिभुज की भुजा = a
हम जानते हैं,
s = \(\frac{1}{2}\) (a + a + a) = \(\frac{3a}{2}\)
अव: त्रिभुज का क्षेत्रफल
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त्रिभुज का परिमाप = 180 cm
a + a + a = 180 ⇒ 3a = 180 ⇒ a = 60 cm
अत: अभीष्ट क्षेत्रफल = \(\frac{√3}{4}\) (60)² = 900 √3 cm².

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प्रश्न 2.
किसी फ्लाईओवर (flyover) की त्रिभुजाकार दीवार को विज्ञापनों के लिए प्रयोग किया जाता है। दीवार की भुजाओं की लम्बाइयाँ 122 m, 22 m और 120 m. (पाठ्य पुस्तक में आकृति देखिए)। इस विज्ञापन से प्रति वर्ष Rs 5000 प्रति m² की प्राप्ति होती है। एक कम्पनी ने एक दीवार को विज्ञापन देने के लिए 3 महीने के लिए किराए पर लिया। उसने कुल कितना किराया दिया?
उत्तर:
माना दीवार की भुजाएँ a = 120 m, b = 22 m तथा c = 122 m
∵ s = \(\frac{1}{2}\) (a + b + c)
= \(\frac{1}{2}\) (120 + 22 + 122) = 132 m
अत: त्रिभुज का क्षेत्रफल
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= 10 × 11 × 12
= 1320 m²
किराए की दर = Rs 5000 प्रति m² प्रति वर्ष
⇒ 3 महीने के लिए कम्पनी द्वारा विज्ञापन के लिए दिया गया किराया = Rs (5000 × 1320 – \(\frac{3}{12}\)) = Rs 16,50,000

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प्रश्न 3.
किसी पार्क में एक फिसलपट्टी (slide) बनी हुई है। इसकी पाश्वीय दीवारों (sidewalls) में से एक दीवार पर किसी रंग से पेंट किया गया है और उस पर पार्कको हरा-भरा और साफ रखिए” लिखा हुआ है। (पाठ्य पुस्तक में आकृति देखिए)। यदि इस दीवार की विमाएं 15 m, 11 m और 6 m, तो रंग से पेंट ए भाग का क्षेत्रफरल ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
नाना दीवार की भुजाएँ – 15 m, b = 11 m तथा c = 6 m
∵s = \(\frac{1}{2}\) (a + b + c) = \(\frac{1}{2}\) (15 + 11 + 6) = 16 m
∴ त्रिभुज का क्षेत्रफल
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अतरंग से पेट हुए भाग का क्षेत्रफल
= दीवार का के. = 20√2 m²

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प्रश्न 4.
उस त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए जिसकी दो भुजाएं 18 cm और 10 cm तथा उसका परिमाप 42 cm है।
उत्तर:
माना त्रिभुज की तीसरी भुजा c है।
परिमाप = 42
∴ a + b + c = 42
18 + 1 + c = 43
⇒ c = 14 cm
हम जानते हैं, s = \(\frac{1}{2}\) (a + b + c)
= \(\frac{1}{2}\) (18 + 10 + 14) = 21 cm
अत: प्रिभुज का क्षेत्रफल
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प्रश्न 5.
एक त्रिभुज की भुजाओंका अनुपात 12 : 17 : 25 है और उसका परिमाप 540 cm है। इस त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना त्रिभुज ABC की भुजाएँ तथा हैं।
∴ a : b : c = 12 : 17 : 25.
⇒ \(\frac{a}{12}\) = \(\frac{b}{17}\) = \(\frac{c}{25}\) = k (माना)
⇒ a = 12k, b = 17k, c = 25k
तथा परिमार = 540 cm
⇒ a + b + c = 540
⇒ 12k + 17k + 25k = 540 ⇒ k = 10
⇒ k = 10
तथा a = 12k = 12 × 10 = 120 cm
b = 17k = 17 × 10 = 170 cm
c = 25k = 25 × 10 = 250 cm
s = \(\frac{1}{2}\) (a + b + c)
= \(\frac{1}{2}\) × (540) = 270 cm
अत: त्रिभुज का क्षेत्रफल
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= 100 × 3 × 1 × 5 × 2 = 9000 cm².

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प्रश्न 6.
एक समद्विबाहु त्रिभुज का परिमाप 30 cm है और उसकी बराबर भुजाएँ 12 cm लम्बाई की है। इस त्रिभुज का क्षेत्रफल ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
माना बराबर भुनाएँ a = b = 12 cm तथा तीसरी भुजा c है।
परिमाप = 30
⇒ a + b + 0 = 30
⇒ 12 + 12 + c = 30
⇒ c = 6 cm
हम जानते हैं,
s = \(\frac{1}{2}\) (a + b + c) = \(\frac{1}{2}\) (12 + 12 + 6) = 15 cm
∴ त्रिभुज का क्षेत्रफल
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Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 5 यायावर साम्राज्य Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

Bihar Board Class 11 History 5 यायावर साम्राज्य Textbook Questions and Answers

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्वपूर्ण था?
उत्तर:
मंगोलों के लिए व्यापार निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण था –
1. स्टेपी प्रदेश की जलवायु कृषि के अनुकूल नहीं थी। मौसमों के अनुसार प्रायः अत्यधिक ठंडा और गरम होता था। भीषण लम्बी शीत ऋतु के बाद थोड़े समय के लिए शुष्क ग्रीष्म ऋतु आती थी। इसलिए वहाँ व्यापार के अलावा कृषि कार्य संभव नहीं थी।

2. पशुपालक और आखेट संग्राहक अर्थव्यवस्था में घनी आबादी का अस्तित्व संभव नहीं था। इसी कारण इन क्षेत्रों में कोई भी नगर नहीं बन सके। इसलिए उन्हें वस्तुएँ बेचने के लिए दूर जाना पड़ता था।

प्रश्न 2.
चंगेज खान ने यह क्यों अनुभव किया कि मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त करने की आवश्यकता है?
उत्तर:
चंगेज खान को मंगोल कबीलों को नवीन सामाजिक और सैनिक इकाइयों में विभक्त करने की आवयश्कता महसूस हुई। वस्तुत: मंगोलों के विभिन्न निकायों में अविश्वसनीय रूप से अलग अलग प्रकार के लोगों का एक विशाल समूह शामिल था जिन्होंने उसकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया था। इसमें पराजित लोग भी शामिल थे। चंगेज खान उन विभिन्न जनजातीय समूहों की पहचान को क्रमबद्ध रूप से मिटाना चाहता था।

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 3.
‘यास के बारे में परवर्ती मंगोलों का चिंतन किस तरह चंगेज खान की स्मृति के साथ जुड़े हुए उनके तनावपूर्ण संबंधों को उजागर करता है?
उत्तर:
अनेक इतिहासकारों ने यास को चंगेज खान की ‘विधि संहिता’ कहा है। वस्तुतः चंगेज खान ने 1206 ई. में कुरिलताई’ में घोषणा की थी। उसके उन जटिल विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है जो महान खान की स्मृति को बनाए रखने के लिए उसने उत्तराधिकारियों ने प्रयुक्त की थी।

अपने प्रारम्भिक स्वरूप में यह शब्द ‘यसाक’ लिखा जाता था जिसका अर्थ ‘नियम’ ‘आदेश’ या आज्ञा था। प्राप्त अल्प विवरण से ज्ञात होता है कि ‘यासक’ का संबंध प्रशासनिक विनियमों से है। 13वीं शताब्दी के मध्य तक किसी प्रकार से मंगोलों से सम्बद्ध शब्द ‘यासा’ का प्रयोग और अधिक सामान्य अर्थ में करना शुरू कर दिया।

प्रश्न 4.
यदि इतिहास नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर निर्भर करता है तो यायावर समाजों के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जायेंगे क्या आप इस कथन से सहमत हैं? क्या आप इसका कारण बताएंगे कि फारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की इतनी बढ़ा-चढ़ाकर संख्या क्यों बताई है?
उत्तर:
यह सही है कि यदि इतिहास लिखित तथ्यों पर भरोसा रखता है जिसे नगरों में रहने वान साहित्यकारों ने तो यायावार समाजों के बारे में प्रतिकूल विचार ही रखे जाएँगे। वस्तुतः इन लेखकों ने यायावरों के जीवन संबंध में सूचनाएँ अत्यधिक दोषपूर्ण और पक्षापात रूप में प्रस्तुत की है।

फारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियान में मारे गये लोगों की इतनी बढ़ा संख्या चढ़ाकर निम्नलिखित कारण से बताई है –

  • इतिवृत्तकारों की सोच मंगोल के प्रति गलत थी। वे सदैव उनसे गलत कार्य विशेषरूप लूटमार और हत्या की ही आशा करते थे।
  • मारे गये लोगों की संख्या अनुमान पर आधारित है। इल्खन के फारसी इतिवृत्ताकार जुवेनी ने कहा कि मर्व में 1,300,000 लोगों का वध किया गया।
  • उसने इस संख्या का अनुमान इस प्रकार लगाया कि तेरह दिन तक 100,000 शव प्रतिदिन गिने जाते थे।

प्रश्न 5.
मंगोल और बेदोइन समाज की यायावरी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए, यह बताइए कि आपके विचार में किस तरह उनके ऐतिहासिक अनुभव एक दूसरे से भिन्न थे? इन भिन्नताओं से जुड़े कारणों को समझाने के लिए आप क्या स्पष्टीकरण देंगे?
उत्तर:
मंगोल और बेदोइन समाज घुम्मकड़ समाज था। जब तक किसी स्थान पर धन, विलास की वस्तुएँ और अन्य आवश्यकता की वस्तुएँ उपलब्ध रहती, रूके रहते थे और प्रयास, लूट और हत्या की द्वारा इन्हें प्राप्त करते थे। वस्तुत: स्टेपी-प्रदेशों में स्रोतों की कमी के कारण मंगोलों और मध्य एशिया के यायावरों को व्यापार और वस्तुओं के विनिमय के लिए इन अभ्रमणशील चीन बासियों के पास जाना पड़ता था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी।

यायावर कबीले खेती के प्राप्त उत्पादों और लोहे के उपकरणों को चीन से लाते थे और घोड़े, फर और शिकार का विनिमय करते थे। उन्हें व्यापारिक क्रियाकलापों में काफी तनाव का सामना करना पड़ता था, क्योंकि दोनों पक्ष अधिक लाभ प्राप्त करने को होड़ में बेधड़क सैनिक कार्यवाही भी कर बैठते थे। कभी-कभी यायावर व्यापारिक शर्तो को नकार कर तत्काल लूटपाट करने लगते थे। उनकी इन प्रवृत्तियों के कारण सीमा युद्धों ने यायावर समाज को कमजोर बना दिया।

इससे कृषि कार्य में बाधा उत्पन्न हुई और नगर लूटे गये। दूसरी और यायावर, लूटपाटकर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे जिससे उन्हें बहुत कम हानि होती थी। यायावरी समाज का यह कार्य ऐतिहासिक अनुभव से भिन्न नहीं है। इससे पूर्व प्राचीन काल में हुण भी यही कार्य करते थे।

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प्रश्न 6.
तेरहवीं शताब्दी के मध्य में मंगोलिया द्वारा निर्मित “पैक्स मंगोलिका” का निम्नलिखित विवरण उसके चरित्र को किस तरह उजागर करता है? फ्रेन्सिसकन मठवासी, रूबुक के विलियम को फ्रांस के सम्राट लुई IX ने राजदूत बनाकर महान खान के दरबार में भेजा। वह 1254 ई. में मोन्के की राजधानी कराकोरम पहुँचा और वहाँ वह लोरेन फ्रांस की एक महिला पेक्विटे के सम्पर्क में आया। जिसे हंगरी से लाया गया था। यह महिला राजकुमार की पलियों में से एक पत्नी की सेवा में नियुक्त थी जो लेक्टोरियन इसाई थी। वह दरबार में एक पारिशियन स्वर्णकार गुलौम बाउचर के संपर्क में आया, “जिसका भाई पेरिस के ‘ओल्ड पोल्ट’ में रहता था।” इस व्यक्ति को सर्वप्रथम रानी सोरधाक्तानी ने और उसके उपरांत मोन्के के छोटे भाई ने अपने पास नौकरी में रखा। रूबुक ने यह देखा कि विशाल दरबारी उत्सवों में सर्वप्रथम नेस्टोरिन को उनके चिट्ठों के साथ तथा इसके उपरांत मुसलमान, बौद्ध और ताओ पुजारिन को महान खान को आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित किया जाता था –
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी के मध्य में मंगोलिया द्वारा निर्मित “पैक्स मंगोलिया” (मंगोल शांति) का उपरोक्त विवरण उसकी धर्म सहिष्णुता को दर्शाता है। मंगोल राजदरबार में किसी प्रकार का जातीय भेदभाव नहीं था और विभिन्न देशों के निवासी राजदरबार में कार्य करते थे। जहाँ फ्रांस और हंगरी से सम्बद्ध थी, ईसाई थी। पर्सियन स्वर्णकार गुलौम बाउचर का भी देश अलग था। राजदरबार में शासक सभी धर्मों का आदर करता था, इसीलिए उसने ईसाई, इस्लाम, बौद्ध और ताओ धर्म के अनुयायियों को आशिर्वाद दिया। सहिष्णुता इस बात से भी झलकती है। विभिन्न धर्मों के साहित्यकार मंगोल शासकों के दरबार की शोभा बढ़ाते रहे।

Bihar Board Class 11 History यायावर साम्राज्य Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चंगेज खान कौन था? संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
चंगेज खान का जन्म लगभग 1162 ई. में आधुनिक मंगोलिया में हुआ था । उसका प्रारंभिक नाम तेमुजिन था। उसका पिता येसुजेई कियात कबीले का मुखिया था।

प्रश्न 2.
अपने शत्रुओं को पराजित करने के बाद तेमुजिन को किस प्रकार सम्मानित किया गया?
उत्तर:
1206 ई. तक तेमुजिन ने अपने शत्रुओं को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया था। अतः मंगोल कबीले के सरदार ने उसे चंगेजखान, ‘समुद्री खान’ अथवा ‘सार्वभौम शासक’ की उपाधि प्रदान की। उसे मंगोलों का महानायक घोषित किया गया।

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प्रश्न 3.
चंगेज खान के चीन अभियान से पहले चीन कौन-कौन से तीन राज्यों में विभक्त था?
उत्तर:

  • उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में तिब्बती मूल के सी-सिआ लोगों का राज्य।
  • जरचेन लोगों का चिन राजवंश जिसका पेकिंग से उत्तरी चीन के क्षेत्र पर शासन था।
  • शुंग राजवंश जिसका दक्षिणी चीन पर अधिकार था।

प्रश्न 4.
चंगेज खान ने निशापुर को ध्वस्त करने का आदेश क्यों दिया?
उत्तर:
निशापुर के घेरे के दौरान एक मंगोल राजकुमार की हत्या कर दी गई थी। इसी कारण चंगेज खान ने निशापुर को ध्वस्त करने का आदेश दिया।

प्रश्न 5.
चंगेज खान द्वारा निशापुर को ध्वस्त कर देने के आदेश में क्या कहा गया था?
उत्तर:
इस आदेश में यह कहा गया था, “नगर का इस तरह विध्वंस किया जाए कि संपूर्ण नगर में हल चलाया जा सके। ऐसा संहार किया जाए कि बिल्ली और कुत्तों को भी जीवित न रहने दिया जाए।”

प्रश्न 6.
चंगेज खान सिंधु नदी से मंगोलिया असम मार्ग होकर वापस लौटना चाहता था परंतु उसे अपना विचार क्यों बदलना पड़ा?
उत्तर:
चंगेज खान को निम्नलिखित कारणों से अपना विचार बदलना पड़ा।

  • गर्मी बहुत अधिक थी।
  • प्राकृतिक आवास में कठिनाइयाँ थीं।
  • उसके शमन (पैगम्बर) ने कुछ अशुभ संकेत दिए थे।

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प्रश्न 7.
चंगेज खान की सैनिक सफलताओं में सहायक कोई दो कारक बताइए।
उत्तर:

  • मंगोलों तथा तुर्की की कुशल घुड़सवारी ने उसकी सेना को गति प्रदान की थी।
  • उनका घोड़े पर सवार होकर तीरंदाजी का कौशल अद्भुत था।

प्रश्न 8.
1260 के दशक के बाद मंगोल राजनीति में नई प्रवृत्तियों के उदय के क्या कारण थे?
उत्तर:

  • मंगोल हंगरी के स्टेपी क्षेत्र से पीछे हट गए थे।
  • मंगोल सेनाओं को मिस्र की सेनाओं ने पराजित कर दिया था।

प्रश्न 9.
मंगोल सेनाओं को मिस्र के हाथों पराजित क्यों होना पड़ा?
उत्तर:
मंगोल शासक चीन में अधिक रुचि लेने लगे थे। अतः उन्होंने अपनी सेनाओं को मंगोल साम्राज्य के मुख्य भागों की ओर भेज दिया । मिस में केवल एक छोटी सी सेना ही भेजी जा सकी। परिणामस्वरूप मंगोलों को पराजय का मुँह देखना पड़ा।

प्रश्न 10.
मंगोल (चंगेज खान की) सेना ने एक विशाल एवं संगठित सेना का रूप कैसे धारण किया?
उत्तर:
मंगोल जनजातियों के एकीकरण तथा विभिन्न लोगों के विरुद्ध अभियानों से चंगेज खान की सेना में अनेक नए सैनिक शामिल हो गए। ये सैनिक विविध जातियों से संबंध रखते थे। इस प्रकार मंगोल सेना ने एक विशाल एवं संगठित सेना का रूप धारण कर लिया।

प्रश्न 11.
‘बर्बर’ शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘बर्बर’ शब्द यूनानी भाषा के शब्द ‘बारबरोस’ शब्द से निकला है जिसका तात्पर्य गैर-यूनानी लोगों से है। यूनानियों को इनकी भाषा एक बेतरतीब शोर ‘बरबर’ के समान लगती थी।

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प्रश्न 12.
मोंके कौन था? उसने फ्रांस के शासक लुई नौवाँ को क्या चेतावनी दी थी?
उत्तर:
मोंके चंगेज खान का पोता था। उसने फ्रांस के शासक लुई नौवें को यह चेतावनी दी थी कि वह मंगोलों पर आक्रमण करने का साहस न करे।

प्रश्न 13.
चंगेज खान के पोते बाटू के 1236-1241 ई. के सैनिक अभियानों की दो सफलताएँ बताओ।
उत्तर:

  • बाटू ने रूस की भूमि को मास्को तक रौंद डाला।
  • वह पोलैंड तथा हंगरी पर विजय प्राप्त करके वियना तक जा पहुंचा।

प्रश्न 14.
मंगोल कौन थे?
उत्तर:
मंगोल विविध यायावर लोगों का जनसमुदाय था। ये लोग पूर्व के तातार, खितान तथा मंचू लोगों से संबंधित थे। ये पशुपालक तथा शिकार संग्रहक थे। पश्चिम में इनका संबंध तुर्क कबीलों से था। .

प्रश्न 15.
मंगोलों के समय में स्टेपी क्षेत्र में कोई नगर क्यों नहीं उभर पाया?
उत्तर:
मंगोलों ने कृषि को नहीं अपनाया। उनकी पशुपालक तथा शिकार संग्राहक अर्थव्यवस्थाएँ भी घनी आबादी वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं थीं इसलिए स्टेपी क्षेत्र में कोई नगर नहीं उभर पाया।

प्रश्न 16.
धनी मंगोल परिवारों के अनेक अनुयायी होते थे। क्यों?
उत्तर:
धनी मंगोल परिवारों के पास अधिक संख्या में पशु तथा विशाल चारण भूमि होती थी। स्थानीय राजनीति में भी उनका अधिक दबदबा होता था। इसी कारण उनके अनेक अनुयायी होते थे।

प्रश्न 17.
मंगोल कबीलों को चरागाहों की खोज में क्यों भटकना पड़ता था?
उत्तर:
शीत ऋतु में मंगोल कबीलों द्वारा एकत्रित खाद्य सामग्री समाप्त हो जाती थी। वर्षा न होने पर घास के मैदान भी सूख जाते थे। इसलिए उन्हें चरागाहों की खोज में भटकना पड़ता था।

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प्रश्न 18.
उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए कि चंगेज खान द्वारा स्थापित राजनीतिक व्यवस्था बहुत अधिक स्थायी थी।
उत्तर:

  • चंगेज खान द्वारा स्थापित राजनीतिक व्यवस्था उसकी मृत्यु के बाद भी जीवित रही।
  • यह व्यवस्था चीन, ईरान तथा पूर्वी यूरोप के देशों की उन्नत शस्त्रों से लैस विशाल सेनाओं का सामना करने में सक्षम थी।

प्रश्न 19.
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था?
उत्तर:
मंगोल स्टेपी क्षेत्र में रहते थे। इस क्षेत्र में संसाधनों की कमी थी। इसी कारण मंगोलों के लिए व्यापार महत्त्वपूर्ण था।

प्रश्न 20.
वाणिज्यिक क्रियाकलापों (व्यापार के मामलों) में मंगोलों को कभी-कभी तनाव का सामना क्यों करना पड़ता था?
उत्तर:
कभी – कभी व्यापार करने वाले दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने की होड़ में सैनिक कार्यवाही पर उतर आते थे। इसी कारण तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती थी।

प्रश्न 21.
चीन के साथ मंगोलों के व्यापार की मुख्य मदें (वस्तुएँ) बताएँ।
उत्तर:
मंगोल चीन से कृषि उत्पाद तथा लोहे के उपकरण लाते थे। बदले में वे चीनी लोगों को शिकार किए गए पशु, घोड़े तथा फर देते थे।

प्रश्न 22.
‘चीन की महान् दीवार’ क्यों बनवाई गई?
उत्तर:
यायावर कबीले चीन पर बार-बार आक्रमण करते थे और नगरों को लूट लेते थे। उनके आक्रमणों से चीन की सुरक्षा के लिए महान दीवार बनाई गई।

प्रश्न 23.
क्या कारण था कि 13वीं शताब्दी में चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के अनेक नगरवासी स्टेपी के गिरोहों को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे?
उत्तर:
स्टेपी के खानाबदोश गिरोहों ने चंगेज खान के अधीन नगरों को बुरी तरह लूटा था और उन्हें ध्वस्त कर दिया था। उन्होंने अनेक नगरवासियों की निर्मम हत्याएं भी की थीं। इसी कारण चीन, ईरान तथा पूर्वी यूरोप के अनेक नगरवासी स्टेपी के गिरोहों को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे।

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प्रश्न 24.
यास के बारे में परवर्ती मंगोलों का चिंतन किस तरह चंगेज खान की स्मृति के साथ जुड़े हुए उनके तनावपूर्ण संबंध को उजागर करता है?
उत्तर:
परवर्ती मंगोलों ने यास को चंगेज खान की विधि संहिता कह कर पुकारा । इसका अर्थ यह था कि वे स्वयं का विधान लागू करना चाहते थे। यही बात चंगेज खान की स्मृति (विधान) के साथ जुड़े हुए उनके तनावपूर्ण संबंधों को उजागर करती है।

प्रश्न 25.
आज मंगोलिया में चंगेज खान का क्या स्थान दिया जाता है?
उत्तर:
आज मंगोलिया में चंगेज खान को महान् राष्ट्र नायक का स्थान दिया जाता है और उसका सार्वजनिक रूप से सम्मान किया जाता है। वह मंगोलों के लिए एक आराध्य व्यक्ति है।

प्रश्न 26.
चंगेज खान के वंशजों का पृथक्-पृथक् समूहों में बँट जाने का क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
चंगेज खान के वंशजों के पृथक्-पृथक् समूहों में बँटने से उनकी अपने पुराने परिवार से जुड़ी स्मृतियाँ तथा परंपराएँ बदल गईं।

प्रश्न 27.
मंगोलों द्वारा विजित राज्यों के नागरिक प्रशासक कभी-कभी खानों की नीति को भी प्रभावित करने में सफल हो जाते थे। इस संबंध में दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  • 1230 के दशक में चीनी मंत्री ये-लू-चुत्साई ने मंगोल शासक ओगोदेई की लूटमार करने की प्रवृत्ति को बदल दिया था।
  • गजनखान के लिए उसके वजीर रशीदुद्दीन ने एक भाषण लिखा था। इस भाषण द्वारा खान को किसानों को सताने की बजाय उनकी रक्षा करने की बात कही थी।

प्रश्न 28.
मंगोल द्वारा विजित राज्यों के नागरिक प्रशासकों की भर्ती का क्या महत्त्व था?
उत्तर:

  • मंगोलों द्वारा विजित राज्यों के नागरिक प्रशासकों की भर्ती से दूरस्थ राज्यों को संगठित करने में सहायता मिली।
  • इनके प्रशिक्षण से साम्राज्य के स्थानबद्ध लोगों की खानाबदोशों द्वारा होने वाली लूटमार में भी कमी आई।

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प्रश्न 29.
कुबकुर (qubcur) नामक कर क्या था?
उत्तर:
चंगेज खान ने एक हरकारा संचार प्रणाली आरंभ की थी। इसके लिए मंगोल यायावर अपने घोड़ों अथवा अन्य पशुओं का दसवाँ भाग प्रदान करते थे इसे कुबकुर कर कहते थे।

प्रश्न 30.
विजित लोगों को अपने नये यायावर शासकों से कोई लगाव नहीं था। इसके लिए उत्तरदायी कोई चार कारण बताइए।
उत्तर:

  • नव विजित क्षेत्रों के अनेक नगर नष्ट कर दिये गए थे।
  • कृषि – भूमि को क्षति पहुंची थी।
  • व्यापार चौपट हो गया था।
  • दस्तकारियाँ अस्त-व्यस्त हो गई थीं।

प्रश्न 31.
यायावरों द्वारा नव विजित प्रदेशों में भारी पारिस्थितिक विनाश क्यों हुआ?
उत्तर:
यायावर आक्रमणों से अस्थिरता फैली। इस कारण ईरान के शुष्क पठार में भूमिगत नहरों का मरम्मत कार्य नियमित रूप से न हो सका। परिणामस्वरूप मरुस्थल का विस्तार होने लगा जिससे भारी पारिस्थितिक विनाश हुआ।

प्रश्न 32.
मंगोलों के सैनिक अभियानों में विराम आने का व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मंगालों के सैनिक अभियानों में विराम आने के पश्चात् यूरोप और चीन के भू-भाग आपसी संपर्क में आए । फलस्वरूप दोनों भागों के व्यापारिक संबंध गहरे हो गए। मंगोलों की देखरेख में रेशम मार्ग का व्यापार अपने शिखर पर पहुंच गया।

प्रश्न 33.
अपने साम्राज्य में सुरक्षित यात्रा के लिए मंगोलों ने क्या व्यवस्था की हई थी? इसने मंगोल सत्त को किस प्रकार मजबूत बनाया ?
उत्तर:
मंगोल अपने साम्राज्य में सुरक्षित यात्रा के लिए यात्रियों को पास देते थे। इसके लिए व्यापारी (यात्री) टैक्स देते थे और मंगोल चंगेज खान तथा उनके उतराधिकारियों की सत्ता को समर्थन देते थे। इससे मंगोल सत्ता मजबूत बनी।

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प्रश्न 34.
चंगेज खान की मृत्यु के पश्चात् मंगोल साम्राज्य को कौन-कौन से दो चरण में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर:
चंगेज खान की मृत्यु के पश्चात् मंगोल साम्राज्य को निम्नलिखित दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

  • पहला चरण 1236 – 1242 तक का था। इस दौरान मंगोलों ने रूस के स्टेपी-क्षेत्र, बुलघार, कीव, पोलैंड तथा हंगरी में भारी सफलता प्राप्त की।
  • दूसरा चरण 1255 – 1300 तक रहा। इसमें मंगोलों ने समस्त चीन, ईरान, ईराक तथा सीरिया पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 35.
चार उलुस (Ulus) का गठन कैसे हुआ?
उत्तर:
उलुस से अभिप्राय है साम्राज्य सीमा। अपनी नई व्यवस्था में चंगेज खान ने नव-विजित लोगों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चार पुत्रों को सौंप दिया। इस प्रकार चार उलुस का गठन हुआ।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चंगेज खान की सेना विविध जातियों का मिश्रण थी। उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मंगोलों तथा अन्य यायावर समाजों में सभी स्वस्थ वयस्कों के लिए शस्त्र धारण करना अनिवार्य था। आवश्यकता पड़ने पर इन्हीं लोगों से सशस्त्र सेना तैयार की जाती थी। विभिन्न मंगोल जनजातियों के एकीकरण और विभिन्न लोगों के विरुद्ध अभियानों से चंगेज खान की सेना में कई नए सदस्य शामिल हो गए। ये सैनिक विविध जातियों से संबंध रखते थे। इससे छोटी-सी मंगोल सेना एक विशाल संगठन में परिवर्तित हो गई।

इसमें मंगोल सत्ता को स्वेच्छता से स्वीकार करने वाले तुर्की मूल के उइगूर समुदाय के लोग भी सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त इसमें केराइट सम्मिलित थे, जिन्हें अपनी पुरानी शत्रुता के बावजूद महासंघ में शामिल कर लिया गया था।

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प्रश्न 2.
चंगेज द्वारा अपनाई गई संचार प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
चंगेज खान ने एक फुर्तीली संचार (हरकारा) पद्धति अपना रखी थी जिससे राज्य के दूर स्थित स्थानों में आपसी संपर्क बना रहता था। अपेक्षित दूरी पर सैनिक चौकियाँ बनाई गई थों। इन चौकियों में स्वस्थ एवं शक्तिशाली घोड़े तथा घुड़सवार तैनात रहते थे। ये घुड़सवार संदेशवाहक का काम करते थे। इस संचार पद्धति के संचालन के लिए मंगोल यायावर अपने घोड़ों अथवा पशुओं का दसवाँ भाग प्रदान करते थे।

इसे ‘कुबकुर’ कर कहते थे। यायावर लोग यह कर अपनी इच्छा से प्रदान करते थे। इससे उन्हें अनेक लाभ प्राप्त होते थे। चंगेज खान की मृत्यु के पश्चात् इस हरकारा पद्धति (याम) में और भी सुधार लाये गये। इस पद्धति से महान् खानों को अपने विस्तृत साम्राज्य के सुदूर स्थानों में होने वाली घटनाओं पर निगरानी रखने में सहायता मिलती थी।

प्रश्न 3.
मंगोल वंश का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
मंगोल वंश का संस्थापक चंगेज खान था। उसके अनेक बच्चे थे। परंतु उसके वंश को उसकी पटरानी बोरटे के गर्भ से पैदा हुए उसके चार पुत्रों ने आगे बढ़ाया। इनके नाम थे-जोची, चघताई, ओगोदाई तथा तोलोए। चंगेज खान का सबसे बड़ा पुत्र जोची था। उसके पास अपार शक्ति थी। परंतु उसके यहाँ कोई शरवीर पैदा नहीं हुआ। जोची के पुत्र बातू ने ओगोदेई के वंश को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अतः शक्ति तोलोए परिवार के हाथों में आ गई। इस बात ने मोंके र कुबलई के लिए सत्ता के द्वार खोल दिए।

प्रश्न 4.
मंगोलों के सैन्य अभियानों में विराम आने का राज्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मंगोलों के सैन्य अभियानों में विराम आने के पश्चात् यूरोप और चीन के भू-भाग आपसी संपर्क में आए। मंगोल विजय (Pax Mongolica) के कारण आई शांति से दोनों भू-भागों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत हुए। मंगोलों की देख-रेख में रेशम मार्ग (Silknoute) पर व्यापार अपने शिखर पर पहुँच गया। अब व्यापारिक मार्ग चीन में ही समाप्त नहीं हो जाते थे। अब व्यापार मार्ग उत्तर की ओर मंगोलिया तथा नए साम्राज्य के केंद्र कराकोरम तक पहुँच गए।

मंगोल शासन में मेल-जोल बनाए रखने के लिए संचार तथा व्यापारियों एवं यात्रियों के लिए यात्रा को सुलभ बनाना आवश्यक था। सुरक्षित यात्रा के लिएण्यात्रियों को पास जारी किए जाते थे। इन्हें फारसी में फैजा तथा मंगोल भाषा में जेरेज कहते थे। इस सुविधा के लिए व्यापारी ‘बाज’ नामक कर अदा करते थे। इसका तात्पर्य यह था कि वे मंगोल शासक की सत्ता को स्वीकार करते हैं।

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प्रश्न 5.
तेरहवीं शताब्दी में यायावरों तथा स्थायी समुदायों के बीच विरोध कम होने से कृषि को किस प्रकार बढ़ावा मिला? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य में यायावरों और स्थायी समुदायों के बीच विरोध कम होने लगा। इससे कृषि को बहुत बढ़ावा मिला। उदाहरण के लिए 1230 के दशक में जब मंगोलों ने उत्तरी चीन के चिन वंश के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की तब मंगोल नेताओं के एक क्रुद्ध वर्ग ने यह विचार रखा कि वहाँ के सभी कृषकों को मौत के घाट उतार दिया जाए और उनकी कृषि-भूमि को चरागाह में बदल दिया जाए।

परंतु 1270 के दशक में शुंग वंश की पराजय के बाद जब दक्षिण चीन को मंगोल साम्राज्य में मिला लिया गया, तब चंगेज खान का पोता कुलबई खान कृषकों और नगरों के रक्षक के रूप में सामने आया। इसी प्रकार 1290 के दशक में मंगोल शासक गजन खान ने अपने परिवार के सदस्यों तथा संनापतियों को आदेश दिया कि वे कृषकों को न लूटें। एक बार अपने भाषण के दौरान उसने कहा था कि कृषकों को परेशान करने से राज्य में स्थायित्व और समृद्धि नहीं आती।

प्रश्न 6.
मंगोल प्रशासन में विजित राज्यों के नागरिक प्रशासकों की भूमिका की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर:
मंगोलों ने चंगेज खान के शासनकाल से ही विजित राज्यों से नागरिक प्रशासकों को अपने यहाँ भी करना आरंभ कर दिया था। इन्हें कभी-कभी एक स्थान से दूसरे पर भी भेज दिया जाता था। इस तरह इन्होंने दूरस्थ राज्यों को संगठित करने में भी सहायता की। इससे खानाबदोश द्वारा जनजीवन पर होने वाली स्थानबद्ध लूटमार में भी कमी आई। मंगो का इन प्रशासकों पर तब तक विश्वास बना रहता था, जब तक वे अपने स्वामियों के लिए कर एकत्रित करते रहते थे।

इनमें से कुछ प्रशासक काफी प्रभावशाली थे। कभी-कभी वे खानों की नीति को भी प्रभावित करने में सफल हो जाते थे। उदाहरण के लिए 1230 के दशक में चीनी मंत्री ये-लू-चुत्साई ने ओगोदेई की लूटने की प्रवृत्ति को बदल दिया था। जुवैनी परिवार ने भी ईरान में इसी तरह की भूमिका निभाई। इसी प्रकार गजन खान के लिए वह भाषण वजीर रशीदद्दीन ने तैयार किया था, जिसमें उसने कृषक-वर्ग को सताने की बजाय उनकी रक्षा करने की बात कती थी।

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प्रश्न 7.
13वीं शताब्दी में चंगेज खान के वंशजों का अलग-अलग वंश समूहों में विभाजन किस प्रकार हुआ? यह किस बात का संकेत था?
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक भाइयों द्वारा पिता के धन का मिल-बाँटकर उपयोग करने का स्थान व्यक्तिगत राजवंश स्थापित करने की भावना ने ले लिया। प्रत्येक राजवंश का – अपने-अपने क्षेत्रीय राज्य (उलुस) पर स्वामित्व होता था। इसी के परिणामस्वरूप चंगेज खान के वंशजों के बीच महान् पर तथा उत्कृष्ट चरागाही भूमि पाने के लिए होड़ लगी रहती थी। फलस्वरूप उनका अलग-अलग वंशों में विभाजन हो गया।

  • चंगेज खान के वेशज चीन और ईरान दोनों पर शासन करने के लिए आगे आए। टोलुई के वंशजों ने युआन और इल-खानी वंशों की स्थापना की।
  • जोची ने ‘सुनहरा गिरोह’ का गठन किया और रूस में स्टेपी-क्षेत्रों पर शासन किया।

प्रश्न 8.
मंगोल परिसंघ किस प्रकृति के होते थे? अंटीला तथा चंगेज खान द्वारा बनाए गए परिसंघों में क्या समानता तथा क्या असमानता थी?
उत्तर:
मंगोल परिसंघ प्राय: बहुत छोटे और अल्पकालिक होते थे। चंगेज खान ने मंगोल और तुर्की कबीलों को मिलाकर एक परिसंघ बनाया। आकार में यह परिसंघ पाँचवीं शताब्दी के अंटीला द्वारा बनाए गए परिसंघ के बराबर ही था। परंतु अंटीला के बनाए परिसंघ के विपरीत चंगेज खान के परिसंघ की व्यवस्था बहुत अधिक स्थायी सिद्ध हुयी। परिसंघ व्यवस्था इतनी सशक्त थी कि यह चीन, ईरान और पूर्वी यूरोपीय देशों की उन्नत शस्त्रों से लैस विशाल, सेनाओं का सामना करने में भी सक्षम थी।

यही कारण था कि मंगोल इन क्षेत्रों में नियंत्रण स्थापित करने में सफल रहे। उन्होंने जटिल कृषि-अर्थव्यवस्थाओं तथा स्थानबद्ध समाजों का भी बड़ी कुशलता से संचालन किया। एक बात और चंगेज खान द्वारा स्थापित परिसंघा उसकी मृत्यु के बाद भी जीवित रहा।

प्रश्न 9.
चंगेज खान के अधीन मंगोलों की सैनिक सफलताओं में किन कारकों ने सहायता पहुँचाई?
उत्तर:
चंगेज खान के अधीन मंगोलों की सफलता में मुख्य रूप से निम्नलिखित कारकों ने सहायता पहुंचाई –

  • मंगोलों और तुकों के घुड़सवारी कौशल ने उन्की सेना को गति प्रदान की।
  • घोड़े पर सवार होकर मंगोल सैनिकों का तीरंदाजी का कौशल अद्भुत था। यह कौशल जंगलों में पशओं का शिकार करते समय प्राप्त किया था।
  • उनकी इस तीरदाजी ने उनकी सैनिक गति को और अधिक तेज कर दिया।
  • सैनिकों को अपने आसपास के भू-भागों तथा मौसम की जानकारी हो गई थी। इस बात ने सेना को अतिरिक्त क्षमता प्रदान की।
  • अत: उन्होंने प्रचंड शीत ऋतु में युद्ध अभियान प्रारंभ किए तथा शत्रु के नगरों एवं शिविरों में प्रवेश करने के लिए बर्फ से जमी हुई नदियों का राजमार्गों की तरह प्रयोग किया।
  • यायावर लोग यूं तो किलेबंद शिविरों तक पहुँचने में सक्षम नहीं थे; परंतु चंगेज खान। ने घेराबंदी की नीति अपनाकर इस कार्य को सरल बना दिया।
  • चंगेज खान के इंजीनियरों ने हलके चल-उपस्करों का निर्माण किया। ये उपस्कर शत्रु के लिए घातक सिद्ध हुए।

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प्रश्न 10.
मंगोल किम क्षेत्र के निवासी थे। इस क्षेत्र का परिदृश्य कैसा था?
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया के स्टेपी क्षेत्र के निवासी थे। यह प्रदेश आज के आधुनिक मंगोलिया राज्य का भू-भाग था। उस समय इस क्षेत्र का परिदृश्य आज जैसा ही मनोरम था। यह प्रदेश लहरदार मैदानों से घिरा था। इसके पश्चिमी भाग में अल्ताई पहाड़ों की बर्फीली चोटियाँ। थी, जबकि दक्षिणी भाग में गोबी का शुष्क मरुस्थल फैला था। इसके उत्तर और पश्चिम के। क्षेत्र का ओनोन एवं सेलेंगा नदियाँ और बर्फीली पहाड़ियों से निकले सैकड़ों झरने सींचते थे।

पशुपालन के लिए यहाँ पर हरी-भरी घास के मैदान थे। अनुकूल ऋतुओं में यहाँ प्रचुर मात्रा में। छोटे-मोटे शिकार उपलब्ध हो जाते थे। स्टेपी क्षेत्र में तापमान सारा साल लगभग एक समान रहता था। शीत ऋतु के कठोर और लंबे मौसम के बाद छोटी एवं शुष्क गर्मियों की अवधि आती थी। चारण क्षेत्र में साल की कुछ सीमित अवधियों में ही कृषि करना संभव था।

प्रश्न 11.
मंगोल कबीलों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • मंगोल कबीले नृजातीय और भाषायी संबंधों के कारण आपस में जुड़े हुए थे। परंतु उपलब्ध आर्थिक संसाधनों के अभावों के कारण उनका समाज अनेक पितृपक्षीय वंशों में विभाजित था।
  • धनी-परिवार विशाल होते थे। उनके पास अधिक संख्या में पशु और चारण भूमि होती थी। स्थानीय राजनीति में भी उनका अधिक दबदबा होता था। इसलिए उनके अनेक अनुयायी होते थे।
  • समय-समय पर आने वाली प्राकृतिक पदाओं जैसे कि भीषण शात-ऋतु के दौरान उनके द्वारा एकत्रित शिकार-सामग्रियाँ तथा अन्य
  • गद्य भंडार समाप्त हो जाते थे। वर्षा न होने पर घास के मैदान भी सूख जाते थे। इसलिए न्हें चरागाहों की खोज में भटकना पड़ता था।मंगोल कबीलों में आपसी संघर्ष में ता था। पशुधन प्राप्त करने के लिए वे लूटपाट भी करते थे।
  • प्रायः परिवारों के समूह आक्रमण रने अथवा अपनी रक्षा करने के लिए शक्तिशाली जों से मित्रता कर लेते थे और परिसंघ ना लेते थे।

प्रश्न 12.
मंगोल कौन-कौन थे? नके जन-जीवन का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
मंगोल विविध यायावरी लोर का जनसमुदाय था। ये लोग पूर्व में तातार, खितान र मंचू लोगों से संबंधित थे। पश्चि में इनका संबंध भाषागत समानता होने के कारण तुर्की बीलों से था। कुछ मंगोल पशुपालक और कुछ शिकार-संग्राहक थे। पशुपालक भेड़-बकरियाँ, आदि पशु पालते थे।

शिकारी – संग्राहक लोग, पशुपा क कबीलों के आवास क्षेत्र के उत्तर में साइबेरिया के वनों मंहले थे। वे पशुपालक लोगों की अपेक्षा अधिक गरीब थे। अपना जीवन-निर्वाह ग्रीष्म काल में गए जानवरों की खाल के पापार से करते थे। मंगोल तंबुओं और जर में निवास करते थे। मामयों में वे अपने पशुधन के ‘राथ शीतकालीन निवास स्थल से ग्रीष्मकालीन चारण-भूमि की ओर चले जाते थे।

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प्रश्न 13.
मंगोल साम्राज्य को चंगेज खान की क्या देन थी?
उत्तर:
देखने में ऐसा लगता है कि चंगेज खान एक हत्यारा और लुटेरा था जिसने नगरों को ध्वस्त किया और हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इसलिए तेरहवीं शताब्दी में चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के अनेक नगरवासी चंगेज खान के लूटेरे गिराहों को भय तथा घृणा की दृष्टि से देखते थे। परंतु मंगोलों के लिए चंगेज खान अब तक का सबस महान् शासक था।

उसने मंगोलों को संगठित किया और लंबे समय से चली आ रही कबीलाई लड़ाईयों तथा चीनियों द्वारा शोषण से मुक्ति दिलवाई। उसने एक शानदार पारमहाद्वीपीय साम्राज्य स्थापित किया और व्यापार मार्गों और बाजारों को नया जीवन दिया। फलस्वरूप मंगोल सड बने।

प्रश्न 14.
विजित लोग अपने मंगोल शासकों को पसंद क्यों नहीं करते थे? इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
विजित लोग अपने मंगोल शासकों को पसंद नहीं करते थे। इस कई कारण थे –

  • तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुए युद्धों में अनेक नगर नष्ट कर दिए गए थे।
  • कृषि भूमि को भारी हानि पहुंची थी।
  • व्यापार चौपट हो गया था तथा दस्तकारी अस्त-व्यस्त हो गई थी।
  • इन युद्धों में हजारों लोग मारे गए थे और इससे भी अधिक लोग दास बना लिए गए थे।
  • अत: संभ्रांत लोगों से लेकर कृषक-वर्ग तक सभी लोगों को भारी कष्टों का सामना करना पड़ा।

परिणाम – इससे राज्य में अस्थिरता के कारण ईरान के शुष्क पठार में भूमिगत नहरों का मरम्मत कार्य नियमित रूप से न हो सका । नहरों की मरम्मत न होने से मरुस्थल का विस्तार होने लगा, जिससे भारी पारिस्थितिक विनाश हुआ।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चार ‘उलुस’ का गठन किस प्रकार हुआ? इन ‘उलुस’ का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
चंगेज खन ने नव-विजित लोगों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चार पुत्रों को सौंप दिया। इससे चार ‘उलुस’ का गठन हुआ। उलुस से अभिप्राय साम्राज्य की सीमा से था। दूसरी ओर चंगेज खान अभी भी निरंतर विजयों और साम्राज्य को अधिक-से-अधिक बढ़ाने में व्यस्त था। इसलिए साम्राज्य की सीमाएं लगातार बदलती रहती थीं।

चार उलस –

  • चंगेज खान के सबसे बड़े पुत्र जोची को रूसी स्टेपी-क्षेत्र प्राप्त हुआ। परंतु इसकी दूरस्थ सीमा निश्चित नहीं थौं। इसका विस्तार सुदूर पश्चिम तक था।
  • उसके दूसरे पुत्र चघताई को तरान का स्टेपी-क्षेत्र तथा पामीर पर्वत का उत्तरी क्षेत्र मिला जो उसके भाई के प्रदेश के साथ लगता था। संभवतः जैसे-जैसे वह पश्चिम की ओर बढ़ता गया होगा, वैसे-वैसे उसका अधिकार क्षेत्र भी बढ़ता गया होगा।
  • चंगेज खान ने संकेत दिया था कि उसका तीसरा पुत्र ओगोदोई उसका उत्तराधिकारी होगा और उसे महान् खान की उपाधि दी जाएगी। ओगोदोई ने अपने राज्याभिषेक के बाद अपनी राजधानी कराकोरम में स्थापित की।
  • चंगेज खान के सबसे छोटे पुत्र तोलोए को अपनी पैतृक भूमि मंगोलिया प्राप्त हुई।
  • चंगेज खान का विचार था कि उसके पुत्र आपस में मिल कर साम्राज्य का शासन सम्भालेंगे। इसलिए उसने विभिन्न राजकुमारों के लिए
  • अलग-अलग सैन्य टुकड़ियाँ (तामा) निर्धारित कर दी। ये सैनिक टुकड़ियाँ प्रत्येक ‘उलुस’ में तैनात रहती थीं। राज्य में परिवार के सदस्यों की भागीदारी का आभास सरदारों की परिषद् में होता था।
  • इस परिषद् में परिवार या राज्य के भविष्य, अभियानों, लूट के माल के बँटवारे, चरागाह भूमि और उत्तराधिकारी आदि से संबंधित निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते थे।

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प्रश्न 2.
13वीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य की क्या स्थिति थी? इसमें यास की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी के मध्य तक मंगोलों ने एक एकीकृत जनसमूह का रूप धारण कर लिया था। उन्होंने एक बहुत विशाल साम्राज्य का निर्माण किया। उन्होंने अति जटिल शहरी समाजों पर शासन किया जिनके अपने-अपने इतिहास, संस्कृतियाँ और नियम थे। भले ही मंगोलों का अपने साम्राज्य पर राजनैतिक प्रभुत्व था, फिर भी संख्या की दृष्टि से वे अल्पसंख्यक ही थे। वे अपनी पहचान और विशिष्टता की रक्षा केवल उसी पवित्र नियम (यास) द्वारा कर सकते थे, जो उन्हें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ था।

इस बात की पूरी संभावना है कि यास मंगोल जनजाति की ही प्रधागत परंपराओं का एक संकलन था। परंतु उसे चंगेज खान की विधि-संहिता कहकर मंगोलों ने स्वयं के विधान-निर्माता (कानून बनाने वाले) होने का ही दावा किया। इसका अर्थ था। इसका कारण यह था कि दोनों पक्ष अधिक लाभ प्राप्त करने की होड़ में एक-दूसरे के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही पर उतर आते थे।

चीन की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति पर प्रभाव-जब मंगोल कबीलों के लोगों के साथ मिलकर व्यापार करते थे, तो वे चीनी लोगों को व्यापार में बेहतर शर्ते रखने के लिए विवश कर देते थे। कभी-कभी ये लोग व्यापारिक संबंधों की उपेक्षा करके लूटपाट भी करने लगते थे। मंगोलों का जीवन अस्त-व्यस्त होने पर स्थिति चीनियों के पक्ष में हो जाती थी। ऐसी स्थिति में चीनी लोग स्टेपी-क्षेत्र में अपने प्रभाव का प्रयोग बड़े आत्मविश्वास से करते थे।

इन सीमावर्ती झड़पों से चीन का स्थायी कमजोर पड़ने लगा। कृषि अव्यवस्थित हो गई और चीनी नगरों को लूट लिया गया। दूसरी ओर यायावर कबीले लूटमार करके दूर भाग जाते थे जिससे उन्हें बहुत कम क्षति पहुँचती थी। इसके विपरीत चीन को इन यायावरों से बहत अधिक क्षति पहुँची । अतः शताब्दी ई. पू. से इस किलेबंदियों का एकीकरण करके एक विशाल रक्षात्मक ढाँचा तैयार किया गया। यह ढाँचा ‘चीन की महान् दीवार’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 3.
चंगेज खान के बाद मंगोलों की राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
1227 ई. में चंगेज खान की मृत्यु के पश्चात् मंगोल साम्राज्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है –
1. पहला चरण 1236 – 1242 तक था। इसके दौरान मंगोलों ने रूस के स्टेपी-क्षेत्र, बलवार, कीव, पोलैंड तथा हंगरी में भारी सफलता प्राप्त की।

2. दूसरा चरण 1255 – 1300 तक रहा। इसमें मंगोलों ने समस्त चीन, ईरान, ईराक तथा सीरिया पर विजय प्राप्त की। इन दोनों चरणों में मंगोल शासकों की राजनीतिक गतिविधियों का वर्णन इस प्रकार हैं

1230 ई. के बाद के दशकों में मंगोल सेनाओं को बहुत ही कम प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। परंतु 1260 के दशक के बाद पश्चिम के सैन्य अभियानों के आवेश को जारी न रखा जा सका तथा उसमें शिथिलता आ गयी। यद्यपि वियना और उससे आगे पश्चिमी यूरोप एवं मिय, मंगोल सेनाओं के अधिकार में ही रहे, तथापि उन्हें हंगरी के स्टेपी-क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा और मिस्र की सेनाओं के हाथों पराजय का मुंह देखना पड़ा इससे मंगोल राजनीति में नई प्रवृत्तियों का उदय हुआ। इस प्रवृत्ति के दो पहलू थे।

1. पहला था – मंगोल परिवार में उत्तराधिकर को लेकर आंतरिक राजनीति जिसमें जोची और ओगोदोई के उत्तराधिकारी ‘महान खान’ के राज्य पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एकजुट हो गए। वे यूरोप में आभयान जारी रखने की अपेक्षा अपने राजनीतिक हितों की रक्षा करने में जुट गए।

2. दूसरी स्थिति तब उत्पन्न हुई जब चंगेज खान के वंश की तोलयिद शाखा के उत्तराधिकारियों ने जोची और ओगोदेई वंशों को कमजोर बना दिया। चंगेज खान के सबसे छोटे पुत्र तोलुई के एक वंशज मोंके के राज्याभिषेक के बाद तोलुइयों ने 1250 के दशक में ईरान के विरुद्ध शक्तिशाली अभियान किए। परंतु 1260 के दशक में तोलई के वंशज चीन विजय में रुचि लेने लगे। इसलिए सैनिकों तथा रसद-सामग्री को मंगोल साम्राज्य के मुख्य भागों की ओर भेज दिया गया।

परिणामस्वरूप मिस्र की सेना का सामना करने के लिए केवल एक छोटी-सी सैनिक टुकड़ी को ही भेजा जा सका जिसके कारण मंगोलों को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इस पराजय और तोलुई परिवार की चीन के प्रति निरंतर बढ़ती रुचि के कारण उनका पश्चिम की ओर विस्तार चलीं। परंतु चंगेज खान अपने अभियानों की प्रगति से पूरी तरह संतुष्ट था। इसलिए वह उस क्षेत्र के सैनिक मामले अपने अनुयायियों की देख-रेख में छोड़ 1216 में अपनी मातृभूमि मंगोलिया लौट आया।

रुक गया। इसी दौरान रूस और चीन की सीमा पर जोची और तोलूई वंशजों के अंदरूनी झगड़ों ने जोची वंशजों का उनके संभावित यूरोपीय अभियानों से ध्यान हटा दिया। पश्चिम में मंगोलों का विस्तार रुक जाने पर भी चीन में उनके अभियान में कोई बाधा न पड़ी। अत: उन्होंने चीन को एकीकृत किया।

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 6.
चंगेज खान कौन था? वह मंगोलों का महानायक कैसे बना?
उत्तर:
चंगेज खान का जन्म लगभग 1162 ई. में आधुनिक मंगोलिया में ओनोन नदी के निकट हुआ था। उसका प्रारंभिक नाम तेमुजिन था। उसके पिता का नाम येसूजेई (Yesugei) था जो कियात कबीले का मुखिया था। उसके पिता की अल्पायु में ही हत्या कर दी गई थी। अत: उसकी माता ओलुन-इकेले ने तेमुजिन और उसके सगे तथा सौतेले भाइयों का लालन-पालन बड़ी कठिनाई से किया। 1170 के दशक में तेमुजिन का अपहरण कर उसे दास बना लिया गया।

उसकी पत्नी बोरटे (Borte) का भी अपहरण कर लिया गया। अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए उसे लड़ाई लड़नी पड़ी। विपत्ति के इन वर्षों में भी वह अनेक मित्र बनाने में सफल रहा। नवयुवक बोघरचू उसका पहला मित्र था। उसने सदैव एक विश्वस्त साथी के रूप में तेमुजिन का साथ दिया। तेमुजिन का सगा भाई जमूका उसका एक अन्य विश्वसनीय मित्र था। तेजिन ने अपने पिता के वृद्ध भाई तुगरिल उर्फ ओंग खान के साथ पुराने रिश्तों को पुनः जीवित किया। वह कैराईट लोगों का शासक था।

चंगेज खान महानायक बनने की राह पर-तेमूजिन का साग भई जमूका बाद में उसका शत्रु बन गया। 1180 और 1190 के दशकों में तेमुजिन ने ऑग खान की सहायता से जमूका जैसे शक्तिशाली प्रतिद्वनि यों को परास्त किया । जमूका को पराजित करने के बाद तेमुजिन का आत्म-विश्वास बढ़ गया। अब वह अपने शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध के लिए निकल पड़ा। इनमें से उसके पिता के हत्यारे शक्तिशाली तातार, कैराईट और स्वयं ऑग खान शामिल थे। 1206 में उसने शक्तिशाली जमूका और नेमन लोगों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया।

चंगेज खान महानायक घोषित-अपने शत्रुओं पर विजय पा लेने के पश्चात् तेमुजिन स्टेपी-क्षेत्र की राजनीति में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में उभरा । उसकी इस प्रतिष्ठा को मंगोल कबीले के सरदार अर्थात् कुरिलताई की एक सभा में मान्यता दी गई। इस सभा में उसे चंगेज खान ‘समुद्र खान’ अर्थात् ‘सार्वभौम शासक’ की उपाधि देकर मंगोलों का महानायक घोषित किया गया ।

प्रश्न 7.
कुरिलताई से मान्यता मिलने के पश्चात् चंगेज खान की सैनिक सफलताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1206 ई. में कुरिलताई से मान्यता मिलने से पूर्व चंगेज खान ने मंगोलों को एक सशक्त एवं अनुशासित सैन्य शक्ति के रूप में पुनर्गठित कर लिया था। अब वह चीन विजय प्राप्त करना चाहता था। चीन उस समय तीन राज्यों में विभक्त था। वे थे –

  • उत्तर – पश्चिम प्रांतों पर सी-सिआ (Hsi-Hsia) लोगों का शासन था।
  • चिन वंश जो पेकिंग से उत्तरी चीन का शासन चला रहा था।
  • दक्षिणी चीन पर शुंग वंश का आधिपत्य था।

चीन-विजय –

  • 1209 में सी-सिआ लोग मंगोल से परास्त हो गए।
  • 1213 ई. में चीन की महान् दीवार का अतिमण हो गया। इसके दो वर्ष बाद 1215 ई. में पेकिंग नगर को लूटा गया। वहाँ के चिन वंश के विरुद्ध 1234 तक मंगोलों की लंबी लड़ाइयाँ
  • 1218ई. में मंगोलों ने चीन के उत्तर:पश्चिम में स्थित तियेन-शान की पहाड़ियों को नियंत्रित करने वाली करा खिता (qarakhita) को
  • पराजित कर दिया। इस विजय से मंगोलों का साम्राज्य अमूदरिया, तुरान और ख्वारजम राज्यों तक फैला गया। ख्वारजम के सुल्तान
  • मोहम्मद को मंगोल दूतों का वध करने के कारण चंगेज खान की प्रचंड क्रोधाग्नि का सामना करना पड़ा।

अन्य अभियान – 1219.1221 ई. के अभियानों में बड़े-बड़े नगरों-ओट्रार, बुखारा, समरकंद, बल्ख, गुरगंज, पर्व, निशापुर और हेरात-ने मंगोल सेनाओं के सामने आत्म-समर्पण कर दिया। जिन नगरों ने मंगोलों का प्रतिरोध किया उनका विनाश कर दिया गया। निशापुर के घेरे के दौरान जब एक मंगोल राजकुमार की हत्या कर दी गई तो चंगेज खान ने यह आदेश दिया, “नगर का इस तरह विध्वंस किया जाए कि संपूर्ण नगर में हल चलाया जा सके, ऐसा संहार किया जाए कि नगर के बिल्ली और कुत्तों को भी जीवित न रहने दिया जाए।”

इसी बीच मंगोल सेनाएँ सुल्तान मोहम्मद का पीछा करते हुए अजरबैजान तक आ पहुंची। क्रीमिया में रूसी सेनाओं को हराने के बाद उन्होंने कैस्पियन सागर को घेर लिया। सेना की एक अन्य टुकड़ी ने सुल्तान के पुत्र जलालुद्दीन का अफगानिस्तान और सिंध तक पीछा किया। सिंधु नदी के तट पर पहुँच कर चंगेज खान ने उत्तरी भारत और असम मार्ग होते हुए वापिस मंगोलिया लौटने का विचार किया।

परंतु अत्यधिक गर्मी, प्राकृतिक आवास की कठिनाइयों तथा अपने पैगंबर द्वारा दिए गए अशुभ संकेतों ने उसे अपना विचार बदलने पर विवश कर दिया। अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्धों में व्यतीत करने के बाद 1227 में चंगेज खान की मृत्यु हो गई। उसकी सैनिक सफलताएँ नि:संदेह विस्मित करने वाली थीं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
चंगेज खान का जन्म कब हुआ था?
(क) 1062 में
(ख) 1162 में
(ग) 1150 में
(घ) 1170 में
उत्तर:
(ख) 1162 में

प्रश्न 2.
चंगेज खान की मृत्यु कब हुई?
(क) 1227 में
(ख) 1230 में
(ग) 1240 में
(घ) 1260 में
उत्तर:
(क) 1227 में

प्रश्न 3.
तेमुजिन किस मंगोल खान का मूल नाम था?
(क) चंगेज खाँ
(ख) बाटू खाँ
(ग) कुबलई खाँ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) चंगेज खाँ

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प्रश्न 4.
किस मंगोल सेना नायक ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण किया?
(क) चंगेज खाँ
(ख) चगताई खाँ
(ग) कुबलई खाँ
(घ) गजन खाँ
उत्तर:
(घ) गजन खाँ

प्रश्न 5.
अफीम युद्ध किन दो देशों के बीच हुआ?
(क) चीन एवं फ्रांस
(ख) जापान एवं रूस
(ग) चीन एवं जापान
(घ) चीन एवं ब्रिटेन
उत्तर:
(घ) चीन एवं ब्रिटेन

प्रश्न 6.
चीन में साम्यवादी पार्टी की स्थापना कब हुई?
(क) 1911
(ख) 1921
(ग) 1945
(घ) 1947
उत्तर:
(ख) 1921

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प्रश्न 7.
साम्यवादियों के द्वारा पराजित होकर च्यांग काई शेक भागकर कहाँ गया?
(क) ताईवान
(ख) शैन्सी
(ग) कैन्टन
(घ) फुन्ना
उत्तर:
(क) ताईवान

प्रश्न 8.
आधुनिक चीन के संस्थापक माने जाते हैं …………………
(क) माओ-त्से-तुंग
(ख) डा. सनयात सेन
(ग) चियांग काई शेक
(घ) चाऊ एनलाई
उत्तर:
(ख) डा. सनयात सेन

प्रश्न 9.
यायावर का अर्थ है ………………….
(क) घुमक्कड़
(ख) आबारा
(ग) जनजाति
(घ) प्रजाति
उत्तर:
(क) घुमक्कड़

प्रश्न 10.
चंगेज खान का प्रारंभिक नाम था …………………
(क) तेमुजिन
(ख) सीसुजिन
(ग) च्यांग
(घ) सनयात् सेन
उत्तर:
(क) तेमुजिन

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प्रश्न 11.
रूस में मंगोलों का राज्य कितने वर्षों तक रहा?
(क) 300
(ख) 400
(ग) 200
(घ) 600
उत्तर:
(क) 300

प्रश्न 12.
ओगोदेई किसका पुत्र था?
(क) चंगेज खान
(ख) अरब खान
(ग) च्यांग सेन
(घ) गुयूक
उत्तर:
(क) चंगेज खान

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प्रश्न 13.
मंगोलिया गणराज्य कब बना?
(क) 1921 में
(ख) 1920 में
(ग) 1930 में
(घ) 1940 में
उत्तर:
(क) 1921 में

प्रश्न 14.
चीन में यूआन राजवंश का अंत कब हुआ?
(क) 1368 में
(ख) 1360 में
(ग) 1367 में
(घ) 1371 में
उत्तर:
(क) 1368 में

प्रश्न 15.
चंगेज खान का वंशज था …………………..
(क) तैमूर
(ख) अकबर
(ग) जहाँगीर
(घ) गजनवी
उत्तर:
(क) तैमूर

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

BSEB Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 10 Science नियंत्रण एवं समन्वय InText Questions and Answers

अनुच्छेद 7.1 पर आधारित

प्रश्न 1.
प्रतिवर्ती क्रिया तथा टहलने के बीच क्या अंतर है?
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रिया बिना हमारे सोचे-समझे बड़ी तीव्रता से स्वयं होने वाली क्रिया है जबकि टहलना एक ऐच्छिक क्रिया है।

प्रश्न 2.
दो तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन) के मध्य अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) में क्या होता है?
उत्तर:
दो तंत्रिका कोशिकाओं के मध्य अंतर्ग्रथन में विद्युत संकेतों द्वारा कुछ रसायन छोड़े जाते हैं।

प्रश्न 3.
मस्तिष्क का कौन-सा भाग शरीर की स्थिति तथा संतुलन का अनुरक्षण करता है? (2011)
उत्तर:
मस्तिष्क का अनुमस्तिष्क भाग शरीर की स्थिति तथा सन्तुलन का अनुरक्षण करता है।

प्रश्न 4.
हम एक अगरबत्ती की गंध का पता कैसे लगाते हैं?
उत्तर:
हम एक अगरबत्ती की गंध का पता पश्चमस्तिष्क द्वारा नियन्त्रित ज्ञानेन्द्रियों पर स्थित गंधीय संवेदांगों द्वारा लगाते हैं।

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प्रश्न 5.
प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की क्या भूमिका है?
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रिया किसी क्रिया के विपरीत त्वरित गति से स्वयं होने वाली क्रिया है। इसमें हमें कुछ सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती है। ये क्रियाएँ मेरुरज्जु द्वारा नियंत्रित होती हैं तथा इसके पश्चात सूचनाएँ मस्तिष्क को भेजी जाती हैं।

अनुच्छेद 7.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
पादप हॉर्मोन क्या हैं?
उत्तर:
बहुत-से रसायन पौधों की वृद्धि में सहायता प्रदान करते हैं, ये रसायन ही हॉर्मोन कहलाते हैं। इन्हें फाइटोहॉर्मोन भी कहते हैं। उदाहरणार्थ: ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन आदि।

प्रश्न 2.
छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्ररोह की गति से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति दिशिक नहीं होती है अर्थात यह किसी भी दिशा में हो सकती है जबकि प्रकाश की ओर प्ररोह की गति प्रकाशानुवर्ती होती है अर्थात् यह प्रकाश स्रोत की दिशा की ओर होती है।

प्रश्न 3.
एक पादप हॉर्मोन का उदाहरण दीजिए जो वृद्धि को बढ़ाता है।
उत्तर:
ऑक्सिन हॉर्मोन पादपों की वृद्धि को बढ़ाता है।

प्रश्न 4.
किसी सहारे के चारों ओर एक प्रतान की वृद्धि में ऑक्सिन किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
प्रतान छूने के प्रति संवेदी होते हैं अर्थात् जब ये सहारे से छूते हैं तो ऑक्सिन हॉर्मोन इन्हें सहारे से दूर दूसरी दिशा में वृद्धि करने को प्रेरित करता है। इस प्रकार प्रतान का यह भाग तेजी से वृद्धि करता है और सहारे के चारों ओर गोलाकार में वृद्धि करते हुए ऊपर चढ़ता जाता है।

प्रश्न 5.
जलानुवर्तन दर्शाने के लिए एक प्रयोग की अभिकल्पना कीजिए।
उत्तर:
जलानुवर्तन दर्शाने के लिए प्रयोग के प्रमुख चरण निम्नवत् हैं –

  • एक बीकर में थोड़ी-सी मृदा डालिए।
  • इस मृदा को एक प्लास्टिक शीट का प्रयोग करते हुए बीच में से दो भागों में बाँट दीजिए।
  • आधे भाग की मृदा में जल डालिए।
  • अब मृदा में कुछ बीज डाल दीजिए।
  • कुछ दिन बाद पौधे निकलने प्रारम्भ हो जाएँगे। नम मृदा र हम देखते हैं कि इन पौधों की जड़ें नम मृदा कि सूखी मृदा की ओर।Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

अनुच्छेद 7.3 पर आधारित

प्रश्न 1.
जंतुओं में रासायनिक समन्वय कैसे होता है?
उत्तर:
जंतुओं में रासायनिक समन्वय अन्तःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित हॉर्मोनों के द्वारा होता है।

प्रश्न 2.
आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह क्यों दी जाती है?
उत्तर:
आयोडीन युक्त नमक के उपयोग की सलाह इसलिए दी जाती है क्योंकि इसमें आयोडीन होता है जो थायरॉइड ग्रंथि द्वारा थायरॉक्सिन हॉर्मोन का निर्माण करने के लिए आवश्यक होता है। थायरॉक्सिन हॉर्मोन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा का उपापचयन करता है। इसकी कमी से घेघा रोग हो जाता है।

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प्रश्न 3.
जब एडीनलीन रुधिर में स्रावित होता है तो हमारे शरीर में क्या अनुक्रिया होती है?
उत्तर:
जब एड्रीनलीन रुधिर में स्रावित होता है तो हमारा हृदय मांसपेशियों को अधिक O2 की पूर्ति करने हेत तेजी से धडकने लगता है। पाचन तंत्र तथा त्वचा को जाने वाले रुधिर की मात्रा कम हो जाती है और श्वसन दर बढ़ जाती है। ये सभी अनुक्रियाएँ एकसाथ मिलकर जंतु शरीर को स्थिति से निपटने के लिए तैयार करती हैं।

प्रश्न 4.
मधुमेह के कुछ रोगियों की चिकित्सा इंसुलिन का इंजेक्शन देकर क्यों की जाती है?
उत्तर:
मधुमेह के कुछ रोगियों की चिकित्सा इंसुलिन का इंजेक्शन देकर इसलिए की जाती है क्योंकि यह एक प्रमुख हॉर्मोन है जिसका निर्माण अग्न्याशय में होता है। यह हॉर्मोन रुधिर में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में सहायता करता है। यदि इंसुलिन का स्रावण हमारे शरीर में उचित मात्रा में नहीं होगा तो हमारे रुधिर में शर्करा का स्तर बढ़ जाएगा जिसके कारण अनेक रोग जन्म ले लेंगे।

Bihar Board Class 10 Science नियंत्रण एवं समन्वय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा पादप हॉर्मोन है?
(a) इंसुलिन
(b) थायरॉक्सिन
(c) एस्ट्रोजन
(d) साइटोकाइनिन
उत्तर:
(d) साइटोकाइनिन

प्रश्न 2.
दो तंत्रिका कोशिका के मध्य खाली स्थान को कहते हैं –
(a) द्रुमिका
(b) सिनेप्स
(c) एक्सॉन
(d) आवेग
उत्तर:
(b) सिनेप्स

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प्रश्न 3.
मस्तिष्क उत्तरदायी है –
(a) सोचने के लिए
(b) हृदय स्पंदन के लिए
(c) शरीर का संतुलन बनाने के लिए
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4.
हमारे शरीर में ग्राही का क्या कार्य है? ऐसी स्थिति पर विचार कीजिए जहाँ ग्राही उचित प्रकार से कार्य नहीं कर रहे हों। क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
उत्तर:
हमारे शरीर में उपस्थित ग्राही वातावरण से सूचनाओं को एकत्रित करते हैं तथा तंत्रिका कोशिका के शीर्ष पर पहुँचाते हैं, जहाँ से इन्हें पहचाना जाता है। ये ग्राही हमारी ज्ञानेन्द्रियों में उपस्थित होते हैं। यदि हम अपना भोजन करते समय अपनी नाक को बंद कर देते हैं तो हम भोजन के स्वाद की पहचान नहीं कर पाएंगे। इस प्रकार यदि हमारे शरीर में उपस्थित ग्राही या ज्ञानेन्द्री अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं करेंगे तो हम अपने वातावरण की घटनाओं का ज्ञान नहीं वृक्षिकान्त कर पाएँगे।
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प्रश्न 5.
एक तंत्रिका कोशिका (न्यूरॉन) की वृक्षिका- – संरचना बनाइए तथा इसके कार्यों का तन्त्रिकाक्ष – वर्णन कीजिए।(2011, 12, 13, 14, 17)
उत्तर:
कार्य कोई भी सूचना तंत्रिका कोशिका के मायलिन आच्छदद्रुमाकृतिक सिरे द्वारा उपार्जित की जाती है और एक रासायनिक क्रिया द्वारा यह एक विद्युत आवेग पैदा करती है। यह आवेग द्रुमिका से कोशिकाकाय तक जाता है और तब तंत्रिकाक्ष (एक्सॉन) में होता हुआ इसके अन्तिम सिरे तक पहुँच जाता है। एक्सॉन के अंत में विद्युत आवेग कुछ रसायनों का विमोचन करता है। ये रसायन रिक्त स्थान या सिनेप्स (सिनेप्टिक दरार) को पार करते हैं तथा अगली तंत्रिका कोशिका की दुमिका में इसी तरह का विद्यत आवेग प्रारंभ करते हैं। यही हमारे शरीर में तंत्रिका आवेग युग्मानुबन्ध की मात्रा की सामान्य योजना है जो तंत्रिका कोशिका का वृक्षिकान्त प्रमुख कार्य है।

प्रश्न 6.
पादप में प्रकाशानुवर्तन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
प्रकाशानुवर्तन पादपों द्वारा प्रकाश के प्रति की जाने वाली अनुक्रिया है। यदि किसी विशेष दिशा से आता हुआ प्रकाश किसी पादप पर पड़ता है तो पादप का प्ररोह प्रकाश स्रोत की ओर तथा जड़ें प्रकाश स्रोत की विपरीत दिशा में मुड जाती हैं। इसलिए प्ररोह को हम धनात्मक प्रकाशानुवर्ती तथा जड़ को ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती कहते हैं।

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प्रश्न 7.
मेरुरज्जु आघात में किन संकेतों के आने में व्यवधान होगा?
उत्तर:
मेरुरज्जु आघात में प्रतिवर्ती क्रिया अथवा मस्तिष्क तक आने वाली सूचनाओं का आवागमन बाधित हो जाएगा।

प्रश्न 8.
पादप में रासायनिक समन्वय किस प्रकार होता है?
उत्तर:
पादपों में जंतुओं के समान तंत्रिका तंत्र नहीं होता है तथापि वे बाह्य उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया तथा वृद्धि; जैसे – मुड़ना, घूमना, चक्राकार होना आदि दर्शाते हैं। उनकी वृद्धि तथा विकास बाह्य कारकों एवं उनके द्वारा निर्मित कुछ विशेष रसायनों, जिन्हें पादप हॉर्मोन कहते हैं, के द्वारा नियन्त्रित होती है। ये ही पादप हॉर्मोन पादपों की कोशिकाओं एवं ऊतकों में समन्वय स्थापित करते हैं।

प्रश्न 9.
एक जीव में नियंत्रण एवं समन्वय के तंत्र की क्या आवश्यकता है?
उत्तर:
एक जीव में नियंत्रण एवं समन्वय के तंत्र की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से है –

  • बाह्य उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया हेतु
  • जीव की उचित वृद्धि एवं विकास हेतु
  • जीवित रहने हेतु
  • तंत्रिका तंत्र में संचार हेतु
  • जीव और वातावरण के मध्य अन्तक्रिया हेतु।

प्रश्न 10.
अनैच्छिक क्रियाएँ तथा प्रतिवर्ती क्रियाएँ एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रियाएँ तीव्र गति से स्वयं होने वाली अनुक्रियाएँ हैं जो विशेष स्थिति में होती हैं जबकि अनैच्छिक क्रियाएँ बिना हमारी इच्छा या सोच के परन्तु लगातार होने वाली क्रियाएँ हैं। उदाहरणार्थ: हृदय स्पंदन, रुधिर प्रवाह आदि अनैच्छिक क्रियाएँ हैं जबकि जल जाने पर हाथ का स्वयं पीछे हटना प्रतिवर्ती क्रिया है।

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प्रश्न 11.
जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय के लिए तंत्रिका तथा हॉर्मोन क्रियाविधि की तुलना तथा व्यतिरेक (contrast) कीजिए।
उत्तर:
सभी जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय के लिए तंत्रिका तथा हॉर्मोन क्रियाविधि पायी जाती हैं। ये क्रियाविधियाँ केवल नियंत्रण एवं समन्वय का ही कार्य नहीं करतीं बल्कि बाह्य उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया भी करती हैं। तंत्रिका तंत्र द्वारा कार्य बड़ी तीव्रता के साथ किया जाता है परन्तु हॉर्मोनल क्रियाविधि में कार्य धीमी गति से होता है। उपर्युक्त दोनों क्रियाविधियों के कार्यों में निम्नलिखित समानताएँ हैं –

  • ये दोनों ही शरीर के विभिन्न कार्यों के नियंत्रण एवं समन्वय में सहायक हैं।
  • ये दोनों ही शरीर तथा बाह्य वातावरण से संबंध स्थापित करती हैं।

प्रश्न 12.
छुई-मुई पादप में गति तथा हमारी टाँग में होने वाली गति के तरीके में क्या अंतर है?
उत्तर:
छुई-मुई पादप में गति अदैशिक तथा छुने से होती है जबकि हमारी टाँग में होने वाली गति ऐच्छिक होती है।

Bihar Board Class 10 Science नियंत्रण एवं समन्वय Additional Important Question and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तन्त्रिका तन्त्र का कार्य होता है –
(a) संवेदना ग्रहण करना
(b) उत्तेजनशीलता
(c) एन्जाइम का संवहन
(d) आपातकालीन स्थिति में शरीर को तैयार करना
उत्तर:
(a) संवेदना ग्रहण करना

प्रश्न 2.
मेरुरज्जु से निकलने वाली मेरु तन्त्रिकाओं की संख्या होती है – (2017)
(a) 15 जोड़े
(b) 31 जोड़े
(c) 21 जोड़े
(d) अनिश्चित
उत्तर:
(b) 31 जोड़े

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प्रश्न 3.
यदि एक मनुष्य में प्रतिवर्ती क्रियाएँ नहीं हो रही हैं, उसके तन्त्रिका तन्त्र का कौन-सा भाग क्षतिग्रस्त हुआ है? (2012)
(a) प्रमस्तिष्क
(b) अनुमस्तिष्क
(c) मेरुरज्जु
(d) मेड्यूला ऑब्लांगेटा
उत्तर:
(c) मेरुरज्जु

प्रश्न 4.
प्रतिवर्ती चाप बनता है –
(a) संवेदांग-रीढ़रज्जु-पेशी
(b) संवेदांग-मस्तिष्क-पेशी
(c) पेशी-मस्तिष्क-संवेदांग
(d) पेशी-रीढ़रज्जु-संवेदांग
उत्तर:
(a) संवेदांग-रीढ़रज्जु-पेशी

प्रश्न 5.
प्रतिवर्ती क्रिया का उचित उदाहरण है –
(a) सामान्य सांस लेना
(b) पुस्तक पढ़ना
(c) स्कूटर चलाना
(d) यकायक नेत्र के सामने तेज रोशनी फेंकने पर नेत्र झपकाना
उत्तर:
(d) यकायक नेत्र के सामने तेज रोशनी फेंकने पर नेत्र झपकाना

प्रश्न 6.
सामान्य मनुष्य में मस्तिष्क का भार होता है – (2013)
(a) 1000-1100 ग्राम
(b) 1300-1400 ग्राम
(c) 900-1000 ग्राम
(d) 1600-1800 ग्राम
उत्तर:
(b) 1300-1400 ग्राम

प्रश्न 7.
मनुष्य के मस्तिष्क का कौन-सा भाग सर्वाधिक विकसित है ? (2011, 15)
(a) सेरीब्रम
(b) सेरीबेलम
(c) डायएनसिफेलॉन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) सेरीब्रम

Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 7 नियंत्रण एवं समन्वय

प्रश्न 8.
मनुष्य में मस्तिष्क का कौन-सा भाग ताप नियन्त्रित रखता है ? (2012)
(a) पिट्यूटरी
(b) हाइपोथैलेमस
(c) डायएनसिफेलॉन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) हाइपोथैलेमस

प्रश्न 9.
मेड्यूला ऑब्लांगेटा नियन्त्रण करता है – (2014)
(a) ऐच्छिक क्रियाएँ
(b) अनैच्छिक क्रियाएँ
(c) प्रतिवर्ती क्रियाएँ
(d) सभी दैहिक क्रियाएँ
उत्तर:
(b) अनैच्छिक क्रियाएँ

प्रश्न 10.
हॉर्मोन क्या है? (2014)
(a) प्रोटीन
(b) एमीनो एसिड
(c) साधारण कार्बोनेट
(d) जटिल कार्बोनेट
उत्तर:
(a) प्रोटीन

प्रश्न 11.
कौन-सा पादप हॉर्मोन कोशिका विभाजन में सहायक है? (2012)
(a) साइटोकाइनिन
(b) ऑक्सिन
(c) एब्सिसिक एसिड
(d) एथिलीन
उत्तर:
(a) साइटोकाइनिन

प्रश्न 12.
ऑक्सिन की सबसे अधिक सान्द्रता पायी जाती है –
(a) विभिन्न पादप अंगों के आधार में
(b) पौधों के वृद्धि शीर्ष में
(c) पत्तियों में
(d) केवल जाइलम तथा फ्लोएम कोशिकाओं में
उत्तर:
(b) पौधों के वृद्धि शीर्ष में

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प्रश्न 13.
उस हॉर्मोन का नाम लिखिए जिसका उपयोग बिना निषेचन के बीज रहित फल प्राप्त करने में किया जाता है – (2012, 13)
या बीजरहित फलन को प्रोत्साहित करने वाला पादप हॉर्मोन है – (2017)
(a) एथिलीन
(b) जिबरेलिन्स
(c) ऑक्सिन्स
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) जिबरेलिन्स

प्रश्न 14.
पतझड़ से सम्बन्धित हॉर्मोन होता है – (2015)
(a) ऑक्सिन
(b) जिबरेलिन
(c) एब्सिसिक अम्ल
(d) एथिलीन
उत्तर:
(c) एब्सिसिक अम्ल

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में कौन पादप हॉर्मोन है? (2015)
(a) फीरोमोन
(b) जिबरेलिन
(c) हिपैरिन
(d) इन्सुलिन
उत्तर:
(b) जिबरेलिन

प्रश्न 16.
पुरुष के वृषण द्वारा स्रावित हॉर्मोन्स का नाम है – (2011)
(a) एड्रीनेलीन
(b) इन्सुलिन
(c) टेस्टोस्टीरॉन तथा एन्डोस्टीरॉन
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(c) टेस्टोस्टीरॉन तथा एन्डोस्टीरॉन

प्रश्न 17.
नर जनन अंगों से सम्बन्धित ग्रन्थि है. – (2013, 14)
या केवल नर में पायी जाने वाली ग्रन्थि है –
(a) ऐपिडिडाइमिस
(b) अधिवृक्क ग्रन्थि
(c) प्रोस्टेट ग्रन्थि
(d) अग्न्याशय
उत्तर:
(c) प्रोस्टेट ग्रन्थि

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प्रश्न 18.
मादा लिंग हॉर्मोन कहलाता है – (2013, 14, 17, 18)
(a) एण्ड्रोजेन
(b) इन्सुलिन
(c) एस्ट्रोजेन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(c) एस्ट्रोजेन

प्रश्न 19.
ऑक्सीटोसिन का स्रावण कहाँ से होता है? (2015)
(a) थाइरॉइड
(b) थाइमस
(c) पिट्यूटरी
(d) एड्रिनल
उत्तर:
(c) पिट्यूटरी

प्रश्न 20.
किस हॉर्मोन की कमी से मधुमेह रोग हो जाता है ? (2011, 12)
(a) इन्सुलिन
(b) गैस्ट्रिन
(c) रिलैक्सिन
(d) एस्ट्रोजन
उत्तर:
(a) इन्सुलिन

प्रश्न 21.
थाइरॉक्सीन हॉर्मोन की कमी से होता है (2017)
(a) पेंघा रोग
(b) रतौंधी रोग
(c) स्कर्वी रोग
(d) बेरी-बेरी रोग
उत्तर:
(a) घेघा रोग।

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प्रश्न 22.
कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के उपापचय के नियन्त्रण हेतु हॉर्मोन स्रावित होता है (2016)
(a) पैराथाइरॉइड
(b) थाइरॉइड
(c) पिट्यूटरी
(d) अग्न्याशय
उत्तर:
(a) पैराथाइरॉइड

प्रश्न 23.
पिट्यूटरी ग्रन्थि की पश्चपाली से निकलने वाला हॉर्मोन है –
(a) प्रोलैक्टिन
(b) सोमेटोट्रॉपिन
(c) वैसोप्रेसिन
(d) एडरीनो कॉर्टिकोट्रॉपिक
उत्तर:
(c) वैसोप्रेसिन

प्रश्न 24.
वह अन्तःस्रावी ग्रन्थि जो मस्तिष्क में पायी जाती है, है – (2010, 16)
(a) थाइरॉइड
(b) अधिवृक्क
(c) थाइमस
(d) पीयूष ग्रन्थि
उत्तर:
(d) पीयूष ग्रन्थि

प्रश्न 25.
मास्टर गन्थि है – (2018)
(a) थाइरॉइड
(b) एड्रीनल
(c) पीनियल काय
(d) पीयूष
उत्तर:
(d) पीयूष

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प्रश्न 26.
मनुष्य में पायी जाने वाली मिश्रित ग्रंथि है – (2018)
(a) पिट्यूटरी ग्रंथि
(b) थाइरॉइड ग्रंथि
(c) अग्न्याशय ग्रंथि
(d) एड्रीनल ग्रंथि
उत्तर:
(c) अग्न्याशय ग्रंथि

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
होम्योस्टैसिस क्या है? उदाहरण सहित लिखिए। (2010, 16)
उत्तर:
होम्योस्टैसिस या समस्थैतिकता (homeostasis) अन्त:वातावरण की स्थायी नियमित दशा है जो जन्तु के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। यह स्वनियामक होती है तथा शरीर के अन्दर विभिन्न प्रकार के नियमन (regulation), नियन्त्रण (control) तथा समन्वयन (co-ordination) के द्वारा सम्भव होती है। उदाहरणार्थ : रासायनिक समन्वयन व तन्त्रिकीय समन्वयन।

प्रश्न 2.
यदि किसी तन्त्रिका कोशिका के सभी डेन्डॉन्स तथा डेन्डाइट्स काट दिये जायें तो उस जन्तु की दिनचर्या पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (2011)
उत्तर:
जन्तु की बाह्य उद्दीपनों के प्रति संवेदना समाप्त हो जायेगी।

प्रश्न 3.
मेरुरज्जु (सुषुम्ना)की गुहा तथा उसमें पाये जाने वाले द्रव का नाम बताइए। (2009)
उत्तर:
मेरुरज्जु की गुहा न्यूरोसील (neurocoel) कहलाती है तथा इसमें सेरेब्रो-स्पाइनल द्रव्य (cerebro-spinal fluid) पाया जाता है।

प्रश्न 4.
एक व्यक्ति के हाथ में आलपिन चुभा दी गई। उसने हाथ झटके से तुरन्त हटा लिया। इस कार्य में कौन-सी घटना घटित हुई? (2011)
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रिया।

प्रश्न 5.
सरल एवं प्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाओं में अन्तर कीजिए।
उत्तर:
सरल अर्थात् अननुबन्धित (unconditioned) प्रतिवर्ती क्रियाएँ यकायक होती हैं तथा इनमें कोई पूर्व अनुभव, प्रशिक्षण या सीखने की बात सम्मिलित नहीं होती, जबकि प्रतिबन्धित (conditioned) प्रतिवर्ती क्रियाओं में पूर्व अनुभव, प्रशिक्षण आदि का प्रभाव रहता है।

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प्रश्न 6.
ऑक्सिन तथा साइटोकाइनिन के मुख्य कार्य लिखिए। (2017)
उत्तर:
ऑक्सिन पौधों में प्ररोह की कोशिकाओं में दीर्धीकरण प्रेरित करते हैं जबकि साइटोकाइनिन का प्रमुख कार्य कोशिका विभाजन को प्रेरित करना है।

प्रश्न 7.
एथिलीन का पौधों की वृद्धि एवं फल के पकने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
एथिलीन एक पादप हॉर्मोन के समान कार्य करता है तथा तने (पौधे) के लिए वृद्धि रोधक है किन्तु फलों को पकने में सहायता करता है।

प्रश्न 8.
किस अन्तःस्रावी ग्रन्थि के हॉर्मोन की कमी से घंघा रोग हो जाता है? एक प्रारम्भिक बचाव लिखिए। (2009)
उत्तर:
थाइरॉइड ग्रन्थि के थाइरॉक्सिन नामक हॉर्मोन की कमी से घेघा रोग होता है। इसके बचाव के लिए आयोडीनयुक्त नमक खाना चाहिए।

प्रश्न 9.
इन्सुलिन का क्या महत्त्व है? यह कहाँ बनता है? (2009, 12, 14)
उत्तर:
इन्सुलिन ऊतकों, विशेषकर पेशियों में कार्बोहाइड्रेट्स के उपयोग पर नियन्त्रण करता है। यह यकृत कोशिकाओं में ग्लाइकोजेनेसिस (glycogenesis) का प्रेरक है। यह लिपोजेनेसिस (lipogenesis) का भी प्रेरक है। यह अग्न्याशय की लैंगरहैन्स की द्वीपिकाओं में बनता है।

प्रश्न 10.
मनुष्य में उपापचयी रोग विकार का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2013)
उत्तर:
इस रोग में रुधिर शर्करा का ग्लाइकोजन में परिवर्तन नहीं हो पाता है, जिससे रुधिर में शर्करा (ग्लूकोज) की मात्रा में वृद्धि होती है। यह रोग शरीर में इन्सुलिन निर्माण में कमी होने पर होता है।

प्रश्न 11.
इन्सुलिन के अल्पस्राव से रुधिर में ग्लूकोज की प्रतिशत मात्रा बढ़ जाने वाले रोग का नाम लिखिए। (2011)
उत्तर:
डायबिटीज।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तन्त्रिका तन्त्र किसे कहते हैं तथा यह कितने प्रकार का होता है? (2017)
उत्तर:
मनुष्य तथा स्तनियों सहित सभी कशेरुकियों में तन्त्रिका तन्त्र विशेष प्रकार के ऊतक, तन्त्रिका ऊतक द्वारा निर्मित होता है। इस ऊतक में अत्यन्त विशिष्ट कोशिकाएँ होती हैं। यह तीन प्रकार का होता है –

  1. केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र
  2. परिधीय तन्त्रिका तन्त्र
  3. स्वायत्त तन्त्रिका तन्त्र

प्रश्न 2.
मेरुरज्जु (सुषुम्ना) की अनुप्रस्थ काट का नामांकित चित्र बनाइए। (2017)
या सुषुम्ना की संरचना का वर्णन नामांकित चित्र बनाकर कीजिए। (2013, 15)
या मेरुरज्जु किसे कहते हैं? इसके प्रमुख कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मस्तिष्क का पश्च भाग लम्बा होकर, खोपड़ी के पश्च छोर पर उपस्थित महारन्ध्र (foramen magnum) से निकलकर, रीढ़ की हड्डी में फैला रहता है। यही मेरुरज्जु या सुषुम्ना (spinal cord) है। रीढ़ की हड्डी के मध्य में एक तन्त्रिका नाल (neural canal) होती है। मेरु रज्जु तन्त्रिका नाल में स्थित रहती है। मेरु रज्जु मस्तिष्क के समान मृदुतानिका (piamater) तथा दृढ़तानिका (duramater) झिल्ली से ढकी रहती है। इन दोनों झिल्लियों के बीच में एक लसदार तरल पदार्थ सेरब्रोस्पाइनल भरा रहता है।
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मेरुरज्जु के दो प्रमुख कार्य होते हैं –

  • मेरुरज्जु मस्तिष्क से प्राप्त तथा मस्तिष्क को जाने वाले आवेगों के लिए रास्ता प्रदान करता है।
  • प्रतिवर्ती क्रियाओं का संचालन एवं नियमन मेरुरज्जु द्वारा ही होता है।

प्रश्न 3.
प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं? प्रतिवर्ती क्रियाओं के कुछ सामोन्य उदाहरण दीजिए। (2017, 18)
उत्तर:
ऐसी अनैच्छिक क्रियाएँ जो अनायास, अविलम्ब, यन्त्रवत् एवं सहज ही घटित होती हैं और सुषुम्ना में संवेदी प्रेरणा पहुँचने पर चालक प्रेरणा के रूप में अपवाहक अंगों द्वारा तुरन्त ही घटित हो जाती हैं, प्रतिवर्ती क्रियाएँ कहलाती हैं। प्रतिवर्ती क्रियाओं के कुछ सामान्य उदाहरण निम्नवत् हैं –

  1. खाँसना एवं छींकना श्वसन मार्ग में किसी ठोस कण के पहुंचने पर फेफड़ों से मुख के द्वारा तीव्र गति से वायु बाहर निकलती है, जिससे कि अवांछित कण वायु के दबाव से बाहर निकल जायें। तीव्र उच्छ्वास के कारण स्वर पट्टियों में कम्पन्न उत्पन्न होने से खाँसी की ध्वनि उत्पन्न होती है। छींकने में भी ऐसा ही होता है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें वायु मुख के स्थान पर नाक से बाहर निकलती है।
  2. नेत्र प्रतिक्षेप क्रिया किसी वस्तु के अचानक सामने आने पर पलकों का अविलम्ब झपकना नेत्र प्रतिक्षेप क्रिया कहलाता है।
  3. जानु-झटक प्रतिक्षेप यदि किसी व्यक्ति को स्टूल अथवा मेज पर बैठाकर उसके घुटने के जानुफलक स्नायु (knee-cap tendon) पर थपथपाया जाये तो उसकी टाँग स्वत: ही झटके के साथ उठकर आगे बढ़ जाती है। यह भी एक प्रतिवर्ती क्रिया है।
  4. लार स्रावण प्रतिवर्ती क्रिया वांछित भोजन के सामने आने पर लार का स्रावण होने लगना एक प्रतिवर्ती क्रिया है।
  5. अन्य उदाहरण उबासी (yawning) आना, साइकिल चलाना, टाइप करना, नृत्य करना तथा वाद्य संगीत आदि प्रतिवर्ती क्रियाओं के कुछ अन्य सामान्य उदाहरण हैं।

प्रश्न 4.
कृषि में पादप हॉर्मोन्स की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2011)
उत्तर:
आजकल कृषि क्षेत्र में ऑक्सिन्स, जिबरेलिन्स, साइटोकाइनिन्स हॉर्मोन्स का व्यापक उपयोग हो रहा है। ऑक्सिन्स को कलमों में नई जड़ें निकलने, विलगन रोकने, फूलों को झड़ने से रोकने, अनिषेक फल पैदा करने, फलों को अधिक व जल्दी पकाने, फल व बीज संग्रहण आदि में प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 5.
साइटोकाइनिन के मुख्य कार्य लिखिए। (2017)
उत्तर:
1. कोशिका विभाजन साइटोकाइनिन्स ऑक्सिन के साथ स्थायी व जीवित कोशिका में भी विभाजन प्रेरित कर सकते हैं किन्तु ये प्रायः अकेले सक्रिय नहीं होते हैं।

2. कोशिका दीर्घन तथा भिन्नन ये कोशिकाओं में दीर्घन (elongation) को प्रेरित करते हैं। कैलस (callus) में उच्च ऑक्सिन व कम साइटोकाइनिन सान्द्रता से जड़ों के तथा उच्च साइटोकाइनिन व कम ऑक्सिन से प्ररोह के निर्माण का प्रेरण होता है।

3. शीर्ष प्रमुखता का प्रतिरोध शीर्षस्थ कलिका की उपस्थिति में भी पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि साइटोकाइनिन की उपस्थिति से सम्भव हो जाती है। इस प्रकार साइटोकाइनिन तथा ऑक्सिन सान्द्रता के सन्तुलन से शीर्ष प्रमुखता नियन्त्रित होती है।

4. प्रकाश संवेदी बीजों का अंकुरण तम्बाकू व सलाद जैसे बीज जिनको अंकुरण के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, साइटोकाइनिन से उपचारित करने पर अन्धकार में ही उगाये जा सकते हैं। उपर्युक्त के अतिरिक्त खनिजों का एकत्रण, दीप्तिकालिता का प्रतिस्थापन, फ्लोएम में संवहन का नियन्त्रण, प्राथमिक जड़ के दीर्घन का रोधन, जड़ों का प्रेरण, जड़ के व्यास में वृद्धि, वाहिनिकाओं (tracheids) के लिग्नीभवन में वृद्धि आदि भी साइटोकाइनिन से प्रभावित होते हैं। साइटोकाइनिन्स का उपयोग प्रसुप्तावस्था भंग करने में, उच्च ताप तथा रोगों के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ाने आदि में भी किया जाता है।

प्रश्न 6.
गैसीय अवस्था में पाया जाने वाला हॉर्मोन कौन-सा है? तथा इसके मुख्य कार्य क्या हैं? (2015, 16, 18)
या पादप हॉर्मोन एथिलीन के दो प्रभाव लिखिए।
उत्तर:
गैसीय अवस्था में पाया जाने वाला पादप हॉर्मोन एथिलीन है। इसे फल परिपक्वन हॉर्मोन भी कहा जाता है।
एथिलीन के कार्य –

  1. एथिलीन फलों को पकाने में महत्त्वपूर्ण होती है।
  2. इसके प्रभाव से समव्यासी वृद्धि होती है, जिससे आयतन में वृद्धि होती है। इस प्रकार यह तने की लम्बाई में वृद्धि को कम किन्तु मोटाई में अधिक करती है।
  3. इसके प्रभाव से मादा पुष्पों की संख्या में वृद्धि होती है। कुछ पौधों में ऑक्सिन के समान पुष्पन (flowering) तीव्र होता है। जैसे – अनन्नास (pineapple) में। अन्यथा यह पत्तियों, फलों व पुष्पों के विलगन (abscission) को तेज करता है।
  4. इसके प्रभाव से पार्श्व कलियों की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है।
  5. यह कलमों (cuttings) से जड़ की उत्पत्ति, पार्श्व मूलों का निर्माण, मूल रोमों का निर्माण आदि का प्रेरण करता है। उपर्युक्त के अतिरिक्त इसकी अधिक सान्द्रता पुष्पों में निद्रा रोग (sleep disease) उत्पन्न करती है तथा ऑक्सिन के स्थानान्तरण को प्रतिबन्धित करके तने पर गुरुत्वानुवर्तन के प्रभाव को नष्ट कर देती है।

प्रश्न 7.
अन्तःस्रावी ग्रन्थियों या नलिका-विहीन ग्रन्थियों की परिभाषा दीजिए। किन्हीं दो अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों के नाम तथा उनसे स्रावित हॉर्मोन्स के नाम लिखिए। (2011, 12)
या नलिका-विहीन ग्रन्थियों से आप क्या समझते हैं? थाइरॉइड ग्रन्थि का कार्य बताइए। (2013, 17, 18)
या अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ किन्हें कहते हैं? हमारे शरीर में पायी जाने वाली मुख्य अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों के नाम लिखिए। (2015, 17)
उत्तर:
अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ:
हॉर्मोन स्रावित करने वाली ग्रन्थियों को नलिका विहीन ग्रन्थियाँ या अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ कहते हैं, क्योकि इनमें वाहिकाएँ नहीं होती और ये अपना स्राव सीधे रुधिर में छोड़ती हैं। रुधिर के साथ प्रत्येक हॉर्मोन शरीर में विशिष्ट स्थान पर पहुँचकर विशिष्ट परिवर्तन करता है जैसे वृद्धि की दर, गौण लैंगिक लक्षणों का प्रतिलक्षित होना, लैंगिक परिपक्वता आदि।
मानव शरीर में पायी जाने वाली अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ –
मनुष्य के शरीर में पायी जाने वाली प्रमुख अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं –

  1. पीयूष ग्रन्थि (Pituitary gland) यह मस्तिष्क में स्थित होती है। इसके द्वारा स्रावित हॉर्मोन ऑक्सीटोसीन, वैसोप्रेसिन, सोमेटोट्रॉपिक आदि हैं।
  2. थाइरॉइड ग्रन्थि (Thyroid gland) यह गले में स्थित होती है। इसके द्वारा थायरॉक्सिन हॉर्मोन स्रावित होता है।
  3. पैराथाइरॉइड ग्रन्थि (Parathyroid gland) यह भी गले में स्थित होती है।
  4. एड्रीनल ग्रन्थि ( अधिवृक्क) (Adrenal gland) यह उदर में वृक्क के पास स्थित होती है।
  5. थाइमस ग्रन्थि (Thymus gland) यह वक्ष में स्थित होती है।
  6. पीनियल काय (Pineal body) यह मस्तिष्क में स्थित होती है।

प्रश्न 8.
जीवों में विभिन्न क्रियाओं का नियमन और नियन्त्रण करने वाले रसायन का नाम बताइए। यह किन ग्रन्थियों में उत्पन्न होता है?
या हॉर्मोन्स क्या होते हैं? (2014)
उत्तर:
हॉर्मोन ऐसे रासायनिक सन्देशवाहक होते हैं जो अन्तःस्रावी ग्रन्थि से सीधे रुधिर में स्रावित होकर सारे शरीर में संचरित होते हैं और इनकी सूक्ष्म मात्रा ही किन्हीं विशिष्ट कोशिकाओं या विशिष्ट अंगों की कोशिकाओं की कार्यिकी को वातावरणीय दशाओं की आवश्यकतानुसार प्रभावित करती है। हॉर्मोन प्राय: स्टेरॉइड्स, प्रोटीन्स अथवा अमीनो अम्ल होते हैं।

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प्रश्न 9.
एड्रीनल ग्रन्थि के कॉर्टेक्स भाग से स्रावित हॉर्मोन्स के नाम लिखिए तथा उनके कार्यों का उल्लेख कीजिए। (2012, 17)
उत्तर:
एड्रीनल ग्रन्थि के कॉर्टेक्स भाग से एण्ड्रोजेन्स तथा इस्ट्रोजेन्स हॉर्मोन स्रावित होते हैं। इन हॉर्मोन्स का कार्य पेशियों एवं जननांगों के विकास को प्रेरित करना है।

प्रश्न 10.
मास्टर ग्रन्थि शरीर में कहाँ पायी जाती है? इसका क्या महत्त्व है? (2018)
या पीयूष ग्रन्थि कहाँ पायी जाती है? इसके पिछले पिण्ड से स्त्रावित हॉर्मोन का नाम तथा कार्य बताइए। (2012, 17, 18)
उत्तर:
मास्टर ग्रन्थि अर्थात् पीयूष ग्रन्थि (pituitary gland) अग्र मस्तिष्क के पश्च भाग में डाइएनसिफैलॉन नामक संरचना की निचली सतह पर स्थित होती है। यह शरीर की लगभग समस्त अन्तःस्रावी ग्रन्थियों पर नियन्त्रण रखती है। इसके पश्चभाग से निकलने वाला प्रमुख हॉर्मोन ऑक्सीटोसिन है। यह गर्भावस्था में गर्भाशय की पेशियों के संकुचन को प्रेरित कर प्रसव पीड़ा उत्पन्न करता है, यह दुग्ध ग्रन्थियों से दुग्ध स्रावण में सहायता करता है तथा सम्भोगावस्था में गर्भाशय की भित्ति में संकुचन प्रेरित कर शुक्राणुओं का अण्डवाहिनी तक मार्ग प्रशस्त करता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य में पायी जाने वाली किन्हीं चार वाहिका विहीन ग्रन्थियों के नाम तथा उनके कार्य लिखिए। (2014, 15, 17, 18)
या थाइरॉइड ग्रंथि के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
मनुष्य में पायी जाने वाली चार प्रमुख नलिकाविहीन – (अन्तःस्रावी) ग्रन्थियाँ तथा उनके कार्य
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प्रश्न 12.
पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्त्रावित किन्हीं चार हॉर्मोन के नाम लिखिए। प्रत्येक के कार्य का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्रावित चार प्रमुख हॉर्मोन व उनके कार्य इस प्रकार हैं –
1. सोमैटोट्रॉपिक या वृद्धि हॉर्मोन (Growth hormone or GH) यह शरीर की वृद्धि का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रेरक होता है। इसके अल्प स्रावण से व्यक्ति बौना (dwarf) रह जाता है और अति स्रावण से शरीर आनुपातिक भीमकाय हो जाता है।

2. पुटिका प्रेरक हॉर्मोन (FSH) यह पुरुषों में वृषण की शुक्रजनन नलिकाओं की वृद्धि तथा शुक्राणुजनन को प्रेरित करता है। स्त्रियों में यह अण्डाशयों की ग्रैफियन पुटिकाओं की वृद्धि और विकास, अण्डजनन तथा मादा हॉर्मोन्स, एस्ट्रोजेन्स (estrogens) के स्रावण को प्रेरित करता है।

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3. थाइरोट्रॉपिक या थाइरॉइड प्रेरक हॉर्मोन्स TSH यह थाइरॉइड ग्रन्थि की वृद्धि एवं स्रावण क्रिया का प्रेरक होता है।

4. ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) यह गर्भावस्था में गर्भाशय की पेशियों के संकुचन को प्रेरित कर प्रसव पीड़ा उत्पन्न करता है, दुग्ध ग्रन्थियों से दुग्ध स्रावण में सहायता करता है तथा सम्भोगावस्था में गर्भाशय की भित्ति में संकुचन प्रेरित कर शुक्राणुओं का अण्डवाहिनियों तक मार्ग प्रशस्त करता है।

प्रश्न 13.
अग्न्याशय बहिःस्रावी तथा अंतःस्रावी दोनों प्रकार की ग्रन्थि है। स्पष्ट कीजिए। (2014, 15)
या अग्न्याशय एक अन्तःस्त्रावी ग्रन्थि एवं बहिःस्रावी ग्रन्थि का कार्य करती है। इससे उत्पन्न होने वाले प्रत्येक तरह के स्रावित पदार्थों के नाम लिखिए तथा कार्य भी बताइए।
(2015)
उत्तर:
अग्न्याशय (pancreas) एक संयुक्त ग्रन्थि है। यह पाचन के लिए बहिःस्त्रावी ग्रन्थि (exocrine gland) के रूप में कार्य करती तथा अग्न्याशयिक रस (pancreatic juice) बनाती है। इसके अतिरिक्त यह एक अन्तःस्रावी ग्रन्थि (endocrine gland) है तथा इसमें पाये जाने वाली लैंगरहैन्स की द्वीपिकायें, हॉर्मोन्स (hormones) का स्रावण करती हैं, जो विभिन्न प्रकार से कार्बोहाइड्रेट्स के उपापचय में महत्त्वपूर्ण हैं। स्रावित हॉर्मोन व उनके कार्य –

1. इन्सुलिन (Insulin) इन्सुलिन लाल रुधिर कणिकाओं (RBCs) तथा मस्तिष्क की तन्त्रिका कोशिकाओं के अतिरिक्त शरीर की अन्य सभी कोशिकाओं में ग्लूकोज के प्रति पारगम्यता बढ़ाता है। इसलिये ग्लूकोज रुधिर व ऊतक द्रव्य से शरीर की अन्य कोशिकाओं में जाता रहता है। इससे उपचय (anabolism) क्रिया तथा श्वसन क्रिया बढ़ती है।

2. ग्लूकैगोन (Glucagon) यह यकृत में वसा तथा अमीनो अम्लों का ग्लूकोनियोजेनेसिस (gluconeogenesis) कराता है। यह ग्लाइकोजन तथा अन्य कार्बनिक पदार्थों से ग्लूकोज का निर्माण कराता है।

3. सोमैटोस्टैटिन (Somatostatin) यह पचे हुए भोजन के अवशोषण तथा स्वांगीकरण को बढ़ाता है।

4. पैंक्रिएटिक पॉलीपेप्टाइड (Pancreatic polypeptide) इसका कार्य अभी ज्ञात नहीं हो सका है।

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प्रश्न 14.
किसी एक अन्तःस्रावी ग्रन्थि तथा एक बहिःस्रावी ग्रन्थि का नाम तथा प्रत्येक द्वारा स्रावित एक हॉर्मोन का कार्य लिखिए। (2010)
या थाइरॉइड ग्रन्थि से स्रावित हॉर्मोन का नाम बताइए तथा इसके प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। (2018)
उत्तर:
यद्यपि कोई भी बहिःस्रावी ग्रन्थि किसी प्रकार का हॉर्मोन स्रावित नहीं करती है, परन्तु बहिःस्त्रावी ग्रन्थि अग्न्याशय (pancreas) के अन्दर उपस्थित लैंगर हैन्स की द्वीपिकायें (islets of langerhans) अन्तःस्रावी ग्रन्थि की तरह कार्य करती हैं और इन्सुलिन (insulin) सहित कई हॉर्मोन्स का स्रावण करती हैं। इन्सुलिन लाल रुधिर कणिकाओं तथा तन्त्रिका कोशिकाओं के अतिरिक्त शरीर की अन्य सभी कोशिकाओं में ग्लूकोज के प्रति पारगम्यता बढ़ाता है।

सभी अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एक-एक या अधिक संख्या में हॉर्मोन्स स्रावित करती हैं; जैसे-थाइरॉइड (thyroid) से थाइरॉक्सिन (thyroxin) सहित कई हॉर्मोन्स निकलते हैं। थाइरॉक्सिन वृद्धि तथा उपापचय (metabolism) का नियन्त्रण करता है।

प्रश्न 15.
हॉर्मोन तथा विकर क्या होते हैं? इनमें कोई दो अन्तर लिखिए। (2017, 18)
उत्तर:
हॉर्मोन हॉर्मोन्स ऐसे रासायनिक सन्देशवाहक होते हैं जो अन्त: स्रावी ग्रन्थि से सीधे रुधिर में स्रावित होकर सारे शरीर में संचरित होते हैं और इनकी सूक्ष्म मात्रा ही किन्हीं विशिष्ट कोशिकाओं या विशिष्ट अंगों की कोशिकाओं की कार्यिकी को वातावरणीय दशाओं की आवश्यकतानुसार प्रभावित करती है। विकर (एन्जाइम्स) पाचन क्रिया से सम्बन्धित रासायनिक क्रियाओं में कुछ सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले पदार्थ विशेष महत्त्व के हैं, जो इन क्रियाओं को उत्तेजित करते हैं तथा चलाते हैं। इन पदार्थों को विकर या एन्जाइम कहते हैं। ये एन्जाइम्स पाचक रसों में होते हैं।

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प्रश्न 16.
हॉर्मोन्स तथा एन्जाइम्स में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2009, 10)
उत्तर:
हॉमोन्स तथा एन्जाइम्स में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रतिवर्ती क्रिया को चित्र की सहायता से समझाइए। इसका क्या महत्त्व है ? (2011, 18)
या प्रतिवर्ती क्रिया किसे कहते हैं? प्रतिवर्ती चाप को नामांकित चित्र बनाकर उदाहरण सहित समझाइए। (2011, 14, 17, 18) या प्रतिवर्ती क्रिया का महत्त्व बताइए तथा सचित्र वर्णन कीजिए। (2014)
उत्तर:
प्रतिवर्ती क्रिया किसी उद्दीपन के फलस्वरूप शीघ्रतापूर्वक होने वाली स्वचालित और अनैच्छिक क्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं। कार्य-विधि प्रतिवर्ती क्रियाएँ जो अनैच्छिक होती हैं और जिन पर मस्तिष्क का किसी भी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता संवेदी प्रेरणा द्वारा सुषुम्ना अथवा मस्तिष्क में पहुँचने पर तुरन्त ही चालक प्रेरणा के रूप में अपवाहक अंगों में स्थानान्तरित हो जाती हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ती क्रियाएँ अनायास, अविलम्ब, यन्त्रवत् एवं सहज ही घटित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का सर्वप्रथम पता हाल (Hall, 1833) ने लगाया था।

सुषुम्ना से प्रत्येक स्पाइनल तन्त्रिका दो मूलों के रूप में निकलती है –
1. संवेदी तन्तुओं से बना पृष्ठ मूल (dorsal root) तथा
2. चालक तन्तुओं से बना अधर मूल (ventral root)।
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संवेदना प्राप्त होने पर आवेग (impulse) की लहर पृष्ठ मूल से होकर पृष्ठ मूल गुच्छक में स्थित न्यूरॉन तथा उसके एक्सॉन में होती हुई सुषुम्ना के धूसर द्रव्य में पहुंचती है। यहाँ से सिनैप्टिक घुण्डियों से होता हुआ आवेग चालक तन्त्रिका कोशिकाओं के डेण्ड्राइट्स में जाता है। अब यह आवेग ज्यों-का-त्यों चालक प्रेरणा बनकर प्रभावी अंग में पहुँचता है। प्रभावी अंगों की पेशियाँ तुरन्त क्रियाशील होकर इन्हें गति प्रदान करती हैं। संवेदांग से लेकर अपवाहक अंग तक के इस प्रकार के आवेग पथ को प्रतिवर्ती चाप (reflex arc) कहा जाता है।

महत्त्व प्रतिवर्ती क्रियाएँ हमारे लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। जिनके दो प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं –
1. प्रतिवर्ती क्रियायें सुषुम्ना द्वारा सम्पादित होती हैं, अत: मस्तिष्क (brain) का कार्य भार (बोझ) कम होता है।
2. ये तुरन्त तथा तीव्र गति से होती हैं, अतः सम्भावित दुर्घटना को रोकने में सहायता मिलती है।

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प्रश्न 2.
मानव मस्तिष्क का नामांकित चित्र बनाइए तथा संक्षिप्त में वर्णन कीजिए। (2017, 18)
उत्तर:
मनुष्य में मस्तिष्क अत्यन्त विकसित परन्तु अति कोमल अंग होता है। इसका आयतन 1200 cc से 1500 cc होता है। यह मस्तिष्क कोष में सुरक्षित रहता है। मस्तिष्क के चारों ओर झिल्लियों का दोहरा आवरण होता है। दोनों झिल्लियों के बीच में एक तरल पदार्थ भरा रहता है, जो बाहरी आघातों से मस्तिष्क की सुरक्षा करता है। मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग होते हैं – अग्र, मध्य तथा पश्च मस्तिष्क। अग्र मस्तिष्क में घ्राण पिण्ड (olfactory lobes), प्रमस्तिष्क (cerebrum) तथा डाइएनसिफैलॉन (diencephalon) होते हैं।
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1. प्रमस्तिष्क (Cerebrum) यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग होता है; यह सम्पूर्ण मस्तिष्क का लगभग 9/10 भाग होता है। प्रमस्तिष्क धूसर पदार्थ (grey matter) तथा श्वेत पदार्थ (white matter) द्वारा निर्मित होता है। प्रमस्तिष्क को एक लम्बी खाँच दायें तथा बायें गोलार्डों में विभक्त करती है। प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध के अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भाग धूसर द्रव्य में ही स्थित होते हैं; जैसे- स्मृति केन्द्र, सोचने-विचारने का केन्द्र आदि। हृदय की गति, भोजन ग्रहण करना, साँस लेना आदि सभी कार्य प्रमस्तिष्क द्वारा संचालित किए जाते हैं।

प्रमस्तिष्क ही घृणा, प्रेम, हर्ष, विषाद, दुःख व भय आदि संवेगों का केन्द्र है। अग्रमस्तिष्क का पिछला भाग डाइएनसिफैलॉन है। इसमें दो प्रमुख भाग होते हैं- थैलेमस तथा हाइपोथैलेमस। थैलेमस दर्द, ठण्डा व गर्म को पहचानने का कार्य करता है जबकि हाइपोथैलेमस भूख, प्यार, घृणा व ताप नियन्त्रण का केन्द्र है। ये वसा तथा कार्बोहाइड्रेट के उपापचय का भी नियन्त्रण करते हैं। अत: डाइनसिफैलॉन ताप नियमन, उपापचय तथा जनन क्रिया, दृक पिण्ड दृष्टि ज्ञान आदि का नियन्त्रण और नियमन करता है। डाइएनसिफैलॉन के हाइपोथैलेमस से पीयूष ग्रन्थि लगी होती है।

2. अनुमस्तिष्क (Cerebellum) यह प्रमस्तिष्क के पिछले भाग में नीचे की ओर स्थित होता है। यह प्रमस्तिष्क से छोटा होता है तथा दो भागों में विभक्त होता है। चलना, कूदना, दौड़ना आदि गति के सभी कार्य अनुमस्तिष्क द्वारा नियन्तित्र होते हैं। शरीर का सन्तुलन (equilibrium) भी इसी से बना रहता है।

3. मस्तिष्क पुच्छ या मेड्यूला ऑब्लांगेटा (Medulla oblongata) यह अनुमस्तिष्क के सामने स्थित होता है तथा मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है। यह बेलनाकार होता है। यह भाग श्वसन तन्त्र, हृदय व परिसंचरण तन्त्र अर्थात् अनैच्छिक क्रियाओं का केन्द्र है।

प्रश्न 3.
पादप हॉर्मोन्स पर टिप्पणी लिखिए। (2012, 14)
या पादप हॉर्मोन्स क्या है? किन्हीं तीन पादप हॉर्मोन्स के नाम तथा कार्यों का उल्लेख कीजिए। (2014, 16)
या पादप हॉर्मोन्स की चार प्रमुख विशेषताएँ बताइए। (2016)
उत्तर:
पादप हॉर्मोन (Plant hormones) पादपों में वृद्धि तथा विकास को नियन्त्रित करने के लिए कुछ विशिष्ट रासायनिक पदार्थ होते हैं जिन्हें पादप हॉर्मोन या वृद्धि नियामक (growth regulators) कहते हैं। पादप हॉर्मोन्स वे जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं जो पेड़-पौधों में निश्चित स्थानों पर बनते हैं तथा संवहन ऊतकों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में संचरित होकर उनकी वृद्धि को नियन्त्रित करते हैं।

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पादप हॉर्मोन मुख्यतः विभज्योतक कोशिकाओं और नई उगती पत्तियों एवम् फलों में स्रावित होते हैं। पादप हॉर्मोन्स की मुख्य विशेषताएँ
ये जड़, तना एवं कलिका के शीर्षस्थ विभज्योतक में बनते हैं तथा फ्लोएम में से होकर अन्य अंगों में पहुँचते हैं और सभी भागों में विसरित होकर वृद्धि का नियन्त्रण करते हैं।

  1. इन्हें पौधों से निष्कासित किया जा सकता है।
  2. ये पादप वृद्धि तथा वृद्धिरोधन को नियन्त्रित करते हैं।
  3. सामान्य से कम या अधिक मात्रा में होने पर इनका उल्टा प्रभाव पड़ता है।
  4. ये कार्बनिक प्रकृति के होते हैं।
  5. ये अति अल्प मात्रा में ही प्रभावशील होते हैं।

पादप हॉर्मोन्स का वर्गीकरण पादप हॉर्मोन्स को मुख्यत: दो वर्गों में बाँटते हैं –

  1. वृद्धि प्रवर्धक जो वृद्धि की दर को बढ़ाते हैं। उदाहरण : जिबरेलिन्स, साइटोकाइनिन्स।
  2. वृद्धि निरोधक जो वृद्धि की दर को कम करते हैं। उदाहरण : एब्सिसिक अम्ल, एथिलीन।

प्रश्न 4.
ऑक्सिन एवं जिबरेलिन हॉर्मोन्स के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2013, 17)
या ‘ऑक्सिन्स हमारे लिए लाभदायक हैं।’ इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2012)
या दो पादप वृद्धि नियन्त्रक हॉर्मोन्स का नाम बताइए तथा उनके कार्य का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
दो पादप वृद्धि हॉर्मोन ऑक्सिन्स व जिबरेलिन्स हैं।
ऑक्सिन्स के प्रभाव तथा उपयोगिता –
1. कोशिका दीर्घन तथा वृद्धि दर पर प्रभाव ऑक्सिन से कोशिका दीर्घन होने के कारण ही तनों तथा फलों के आयतन में वृद्धि होती है। कोशिका दीर्घन ऑक्सिन्स की उपस्थिति में भित्ति दाब घट जाने तथा जल के लिए भित्ति की पारगम्यता बढ़ जाने के कारण परासरणी सान्द्रता बढ़ने से तथा कोशिका भित्ति का लचीलापन (plasticity) बढ़ जाने के कारण होता है।

2. संवहन एधा में कोशिका विभाजन कोशिका विभाजन की दर तथा एधा की मौसमी सक्रियता ऑक्सिन से नियन्त्रित होती है। रोपण (grafting), क्षति (injury) आदि के समय कैलस (callus) का निर्माण इसी के कारण होता है।

3. शीर्ष प्रमुखता अधिकतर पादपों में शीर्ष कलिका की उपस्थिति में पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि रुकी रहती है। इस स्थिति को शीर्ष प्रमुखता (apical dorminance) कहते हैं। शीर्ष कलिका को हटाने पर पार्श्व कलिकायें तेजी से बढ़ती हैं। ऐसा माना जाता है कि शीर्ष कलिका में अवरोधक, ऑक्सिन बनते हैं जो नीचे जाकर पार्श्व कलिकाओं की वृद्धि को रोकते हैं।

4. वर्तन गतियाँ एकदिशीय प्रकाश के कारण अन्धकार के क्षेत्र में ऑक्सिन की सान्द्रता अधिक हो जाती है। तनों में अधिक सान्द्रता अधिक वृद्धि प्रेरित करती है, अत: तने प्रकाश की ओर मुड़ जाते हैं अर्थात् धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (positive phototropism) प्रदर्शित करते हैं।

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दूसरी ओर जड़ों में ऑक्सिन की अधिक सान्द्रता वृद्धि को संदमित करती है, अत: जड़ें प्रकाश के विपरीत मुड़ जाती हैं और ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन (negative phototropism) प्रदर्शित करती इसी प्रकार गुरुत्वाकर्षण के कारण अनुप्रस्थ स्थिति में निचले तल पर ऑक्सिन की सान्द्रता अधिक होने से तने व जड़ में क्रमशः ऋणात्मक एवं धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (geotropism) प्रभावित होता है।

5. मूल प्रेरण यदि कलम को ऑक्सिन में डुबोकर भूमि में लगाया जाये तो जड़ें शीघ्रता से उत्पन्न होती हैं। ऑक्सिन्स पार्श्व मूलों का प्रेरण भी करते हैं।

6. प्रसुप्तावस्था आलू जैसे कन्दों पर ऑक्सिन के छिड़काव से कलियों का अंकुरण रुका रहता है जिससे उनका संग्रहण अधिक समय तक किया जा सकता है।

7. अनिषेकफलन बीज रहित फलों के निर्माण में ऑक्सिन्स का उपयोग होता है। ये अनिषेकफलन (parthenocarpy) प्रेरित करते हैं।

8. खरपतवारनाशक 2, 4-D जैसे ऑक्सिन संकीर्ण पत्ती वाली फसल (एकबीजपत्री) के साथ उगने वाली बड़ी पत्तियों वाली खरपतवार को नष्ट कर देते हैं।

उपर्यक्त के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रक्रिया आदि में ऑक्सिन्स का उपयोग महत्त्वपूर्ण है; जैसे-पक्वनपूर्व फलों की गिरने से रोकथाम, पातन की रोकथाम, फलों को मीठा करने में, लघु शाखाओं के निर्माण में (जैसे-सेब में), फलन का प्रेरण आदि में।

जिबरेलिन्स के प्रभाव तथा उपयोगिता –
1. बोल्टिंग जिबरेलिन पर्वो की कोशिकाओं का दीर्घन करके तनों की लम्बाई बढ़ाता है। द्विवर्षीय पौधों में जिनका तना अत्यन्त हासित होता है अर्थात् पर्वसन्धियाँ अत्यधिक पास-पास होती हैं; जिबरेलिन देने से तेजी से बढ़ने लगता है। इसे बोल्टिंग कहते हैं; जैसे-चुकन्दर (sugar beat) तथा आनुवंशिक बौने पौधे।

2. दीर्घ प्रकाशावधि वाले पौधों में शीघ्र पुष्पन जिबरेलिन के प्रभाव से दीर्घ प्रकाशावधि पादपों; जैसे-हेनबेन (Hyoscyamus niger) में लघु प्रकाशावधि में ही पुष्प उत्पन्न होने लगते हैं जबकि सामान्य अवस्था में दीर्घ प्रकाशावधि में ही पुष्प उत्पन्न होते हैं।

3. बसन्तीकरण का प्रतिस्थापन कुछ द्विवर्षीय पौधों में पुष्पन के लिए शीतकाल के कम तापमान की आवश्यकता होती है, जिबरेलिन के प्रभाव से यह आवश्यकता समाप्त की जा सकती है।

4. प्रसुप्तावस्था को दूर करना आलू के कन्दों (tubers) व शीतकालीन कलिकाओं को जिबरेलिन देने से उनकी प्रसुप्तावस्था टूट जाती है तथा अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है।

5. अनिषेकफलन सेब, नाशपाती जैसे फलों में ऑक्सिन की अपेक्षा जिबरेलिन द्वारा अनिषेकफलन अधिक सफलता से कराया जा सकता है। इसी प्रकार अनेक फल; जैसे-अंगूर इनके प्रभाव से बड़े तथा बीज रहित उत्पन्न होते हैं। उपर्युक्त के अतिरिक्त बीजों में शीघ्र अंकुरण, जीर्णता नियन्त्रण, पुष्पों व फलों का परिवर्द्धन आदि में जिबरेलिन उपयोगी हैं।

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Bihar Board Class 10 Science Solutions Chapter 6 जैव प्रक्रम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

Bihar Board Class 10 Science जैव प्रक्रम InText Questions and Answers

अनुच्छेद 6.1 पर आधारित

प्रश्न 1.
हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने मेंविसरण क्यों अपर्याप्त है?
उत्तर:
हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में सभी कोशिकाएँ अपने आस-पास के पर्यावरण के सीधे संपर्क में नहीं रहती हैं। इसलिए साधारण विसरण, बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में अपर्याप्त है।

प्रश्न 2.
कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे?
उत्तर:
कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम ‘सजीवों के लक्षण’ मापदंड का प्रयोग करेंगे अर्थात् हम देखेंगे कि उसमें गति हो रही है या नहीं, वृद्धि हो रही है या नहीं, श्वसन क्रिया हो रही है या नहीं आदि।

प्रश्न 3.
किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
किसी जीव द्वारा कार्बन तथा ऑक्सीजन का उपयोग कच्ची सामग्री के रूप में किया जाता है।

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प्रश्न 4.
जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?
उत्तर:
जीवन के अनुरक्षण के लिए हम श्वसन, पोषण, वहन, उत्सर्जन, जनन आदि प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे।

अनुच्छेद 6.2 पर आधारित

प्रश्न 1.
स्वयंपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण में क्या अंतर है?
उत्तर:
स्वयंपोषी पोषण में पर्यावरण से सरल अकार्बनिक पदार्थ लेकर तथा बाह्य ऊर्जा स्रोत जैसे सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके उच्च ऊर्जा वाले जटिल कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण होता है जबकि विषमपोषी पोषण में दूसरे जीवों द्वारा तैयार किये गये जटिल पदार्थों का अंतर्ग्रहण होता है।

प्रश्न 2.
प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?
उत्तर:
पौधे, प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कार्बन डाइ ऑक्साइड को वायु से, प्रकाश को सूर्य से, जल तथा अन्य खनिज लवणों को मृदा से प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 3.
हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका क्या है?
उत्तर:
हमारे आमाशय में उपस्थित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एक अम्लीय माध्यम तैयार करता है जो पेप्सिन एंजाइम की क्रिया में सहायक होता है। यह भोजन में उपस्थित कीटाणुओं को भी नष्ट करता है।

प्रश्न 4.
पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?
उत्तर:
पाचक एंजाइम प्रोटीन को अमीनो अम्ल, कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ तथा वसा को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरोल में परिवर्तित कर देते हैं।

प्रश्न 5.
पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है?
उत्तर:
क्षुद्रांत्र के आन्तरिक आस्तर पर अनेक अंगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं। ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। दीर्घरोम में रुधिर वाहिकाओं की बहुतायत होती है जो भोजन को अवशोषित करके शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाते हैं।

अनुच्छेद 6.3 पर आधारित

प्रश्न 1.
श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है?
उत्तर:
जलीय जीव जल में घुली हुई ऑक्सीजन का प्रयोग श्वसन के लिए करते हैं जबकि स्थलीय जीव वायु में उपस्थित ऑक्सीजन का। चूँकि जल में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा वायु में उपस्थित ऑक्सीजन की मात्रा से कम है इसलिए जलीय जीवों की श्वसन दर स्थलीय जीवों की श्वसन दर से अधिक होती है।

प्रश्न 2.
ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या हैं?
उत्तर:
जीव निम्नलिखित तीन पथों द्वारा ग्लूकोज़ का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं –

  1. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में पायरुवेट का विखंडन
  2. ऑक्सीजन की कमी में पायरुवेट का विखंडन
  3. ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज़ का विखंडन

प्रश्न 3.
मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?
उत्तर:
मनुष्यों में ऑक्सीजन का परिवहन हमारे रुधिर में उपस्थित वर्णक हीमोग्लोबिन वायु में उपस्थित ऑक्सीजन से बंध जाता है तथा उसे फेफड़ों तक ले जाता है जहाँ से वह सभी कोशिकाओं को पहुँचा दी जाती है। मनुष्यों में कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में घुलनशील होने के कारण रुधिर में घुल जाती है तथा श्वसन द्वारा शरीर से बाहर निकाल दी जाती है।

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प्रश्न 4.
गैसों के विनिमय के लिए मानव-फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया है?
उत्तर:
मानव-फुफ्फुस गुब्बारे जैसी संरचनाएँ लिये होते हैं, जिन्हें एल्वियोली कहते हैं। गुब्बारे जैसी ये संरचनाएँ श्वसन के लिए आवश्यक गैसों की मात्रा व अन्य आवश्यकताओं के अनुसार फैल एवं सिकुड़ सकती हैं।

अनुच्छेद 6.4 पर आधारित

प्रश्न 1.
मानव में वहन तंत्र के घटक कौन-से हैं? इन घटकों के क्या कार्य हैं?
उत्तर:
मानव में वहन तंत्र के घटक व उनके कार्य निम्नवत् हैं –

  1. रुधिर रुधिर खनिजों, श्वसन गैसों (CO2 व O2), व्यर्ज पदार्थों, हॉर्मोन्स, जल, अकार्बनिक पदार्थों तथा अन्य रसायनों का वहन करता है।
  2. रूधिर वाहिकाएँ (धमनी तथा शिराएँ) धमनी हृदय से रुधिर को शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचाती हैं जबकि शिराएँ विभिन्न भागों से रुधिर एकत्र करके हृदय तक वापस लाती हैं।
  3. हृदय हृदय एक पंप की तरह प्रत्येक क्षण रुधिर को हमारे शरीर में पंप करता रहता है।
  4. लसीका पचे हुए तथा क्षुद्रांत्र द्वारा अवशोषित वसा का वहन लसीका द्वारा होता है तथा यह अतिरिक्त तरल को बाह्य कोशिकीय अवकाश से वापस रुधिर में ले जाता है।

प्रश्न 2.
स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को अलग करना आवश्यक है, क्योंकि इस तरह का बँटवारा शरीर को उच्च दक्षतापूर्ण ऑक्सीजन की पूर्ति कराता है। स्तनधारी तथा पक्षियों को अपने शरीर का ताप नियंत्रित करने के लिए उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो उन्हें ऑक्सीजन की अधिक मात्रा से ही प्राप्त होती है।

प्रश्न 3.
उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक क्या हैं?
उत्तर:
उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक जाइलम तथा फ्लोएम हैं।

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प्रश्न 4.
पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है?
उत्तर:
पादप में जल और खनिज लवण का वहन जाइलम द्वारा होता है।

प्रश्न 5.
पादप में भोजन का स्थानांतरण कैसे होता है?
उत्तर:
पादप में भोजन का स्थानांतरण फ्लोएम द्वारा होता है।

अनुच्छेद 6.5 पर आधारित

प्रश्न 1.
वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वृक्काणु वृक्क की कार्यात्मक इकाई होते हैं। प्रत्येक वृक्काणु रुधिर को छानता है तथा मूत्र का निर्माण करता है। वृक्काणु के निम्नलिखित भाग होते हैं –

  1. एक बोमैन संपुट ग्लोमेरूलस के साथ।
  2. एक लम्बी नलिका।

वृक्काणु के कार्य निम्नवत् हैं –

  1. रुधिर रिनल धमनी में बहुत उच्च दाब पर बहता है जिससे ग्लोमेरूलस की पतली दीवारों से रुधिर छनता रहता है।
  2. रुधिर कोशिकाएँ और प्रोटीन केशिकाओं में ही रहती हैं जबकि जल की अधिकांश मात्रा और घुले हुए खनिज बोमैन संपुट द्वारा छान दिये जाते हैं।
  3. इस निस्यंद में वर्ण्य पदार्थ जैसे यूरिया के साथ-साथ लाभदायक पदार्थ जैसे ग्लूकोज़ आदि उपस्थित रहते हैं। इनके अतिरिक्त जल की अतिरिक्त मात्रा जो शरीर के लिए उपयोगी नहीं होती वह भी होता है।
  4. जब यह निस्यंद नलिका में आता है तो लाभदायक पदार्थों; जैसे- ग्लूकोज़ अमीनो अम्ल, जल का पुनः नलिका में उपस्थित केशिकाओं द्वारा अवशोषण होता है।
  5. उन वर्ण्य पदार्थों का भी छनन इन केशिकाओं द्वारा होता है जो शेष रह जाते हैं।
  6. अन्त में निस्यद में केवल यूरिया, अन्य वर्ण्य पदार्थ तथा जल ही रह जाता है जिसे अब मूत्र कहा जाता है। यह संग्राहक में एकत्रित होता रहता है।

प्रश्न 2.
उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं?
उत्तर:
उत्सर्जी उत्पादों से छुटकारा पाने के लिए पादप प्रकाश-संश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन, उन पत्तियों को गिराना जिनमें वर्ण्य पदार्थ एकत्र रहते हैं, आदि क्रियाएँ करते हैं। इनके अतिरिक्त वे वर्ण्य पदार्थों को रेजिन तथा गोंद के रूप में एकत्रित करते हैं तथा कुछ वर्ण्य पदार्थों को अपने आस-पास की मृदा में उत्सर्जित भी करते हैं।

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प्रश्न 3.
मूत्र बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है?
उत्तर:
मूत्र बनने की मात्रा का नियमन पुनरवशोषण क्रिया द्वारा होता है। मूत्र में जल की मात्रा शरीर में उपलब्ध अतिरिक्त जल की मात्रा पर तथा कितना विलेय वयं उत्सर्जित करना है, पर निर्भर करता है।

Bihar Board Class 10 Science जैव प्रक्रम Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो संबंधित है –
(a) पोषण से
(b) श्वसन से
(c) उत्सर्जन से
(d) परिवहन से
उत्तर:
(c) उत्सर्जन से

प्रश्न 2.
पादप में जाइलम उत्तरदायी है –
(a) जल का वहन
(b) भोजन का वहन
(c) अमीनो अम्ल का वहन
(d) ऑक्सीजन का वहन
उत्तर:
(a) जल का वहन

प्रश्न 3.
स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है।
(a) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल
(b) क्लोरोफिल
(c) सूर्य का प्रकाश
(d) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(d) उपरोक्त सभी

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प्रश्न 4.
पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-
(a) कोशिकाद्रव्य में
(b) माइटोकॉन्ड्रिया में
(c) हरित लवक में
(d) केंद्रक में
उत्तर:
(b) माइटोकॉन्ड्रिया में

प्रश्न 5.
हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है?
उत्तर:
वसा हमारी आँत में बड़ी-बड़ी गुलिकाओं के रूप में उपस्थित होता है जिसके कारण एंजाइम इसे विखंडित कर पाने में असमर्थ होते हैं। पित्त रस इन बड़ी गुलिकाओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देता है जिससे एंजाइम इनसे क्रिया कर सकें। अग्न्याशय से लाइपेज नामक एंजाइम स्रावित होता है जो वसा का पाचन करने में सहायक होता है। वसा के पाचन की यह सम्पूर्ण प्रक्रिया क्षुद्रांत्र में होती है।

प्रश्न 6.
भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है?
उत्तर:
भोजन के पाचन में लार की निम्नलिखित भूमिका है –
1. लार में एक एंजाइम होता है जिसे सलाइवरी एमाइलेज कहते हैं। यह एंजाइम मंड को विखंडित करके शर्करा में बदल देता है।
2.  लार भोजन को चिकना बना देता है जिससे इसे चबाने तथा सटकने में आसानी होती है।

प्रश्न 7.
स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं?
उत्तर:
स्वपोषी पोषण के लिए सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल, कार्बन डाइऑक्साइड, जल आदि परिस्थितियों का होना आवश्यक है। इसके उपोत्पाद ऑक्सीजन, हाइड्रोजन तथा कार्बोहाइड्रेट होते हैं।

प्रश्न 8.
वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर है? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है। (2015, 17, 18)
उत्तर:
वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में अन्तर –
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अवायवीय श्वसन क्रिया यीस्ट आदि कवक तथा अनेक जीवाणुओं में होती है। मांसपेशियों में ऑक्सीजन के अभाव में लैक्टिक अम्ल बनता है।

प्रश्न 9.
गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?
उत्तर:
1. कूपिकाएँ महीन दीवारों तथा असंख्य रुधिर केशिकाओं वाली रचना हैं जिनके कारण रुधिर तथा कूपिका में भरी वायु के बीच गैसों का आदान-प्रदान सरलता से हो जाता है।
2. कूपिकाओं की संरचना गुब्बारे की तरह होती है जो आवश्यकतानुसार गैसों का आदान-प्रदान करने के लिए फैल तथा पिचक सकती हैं।

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प्रश्न 10.
हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर:
हीमोग्लोबिन की कमी होने से हमारे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है क्योंकि हीमोग्लोबिन ही ऑक्सीजन का वहन करता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
मनुष्य सहित समस्त स्तनधारियों में दोहरा परिसंचरण पाया जाता है। प्रथम परिसंचरण तो हृदय और फुफ्फुस के मध्य पाया जाता है जिसे पल्मोनरी परिसंचरण कहते हैं तथा द्वितीय परिसंचरण हृदय और शरीर के अन्य भागों के मध्य पाया जाता है, जिसे सिस्टेमिक परिसंचरण कहते हैं। यह इसलिए आवश्यक है जिससे शुद्ध व अशुद्ध रुधिर मिश्रित न हो सकें।

प्रश्न 12.
जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?
उत्तर:
जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के वहन में अन्तर –
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प्रश्न 13.
फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना कीजिए।
उत्तर:
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Bihar Board Class 10 Science जैव प्रक्रम Additional Important Question and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पौधों में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण होता है – (2015)
(a) जड़ में
(b) पत्ती में
(c) तने में
(d) फल में
उत्तर:
(b) पत्ती में

प्रश्न 2.
प्रकाश-संश्लेषण क्रिया में ऑक्सीजन गैस निकलती है – (2012, 16)
(a) कार्बन डाइ-ऑक्साइड से
(b) जल से
(c) वायु से
(d) पर्ण हरित के विघटन से
उत्तर:
(b) जल से

प्रश्न 3.
प्रकाश अभिक्रिया होती है – (2016)
(a) माइटोकॉण्ड्रिया में
(b) हरित लवक के ग्रेना में
(c) राइबोसोम में
(d) हरित लवक के स्ट्रोमा में
उत्तर:
(b) हरित लवक के ग्रेना में

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प्रश्न 4.
क्लोरोप्लास्ट के ग्रेनन में बनते हैं – (2018)
(a) ATP तथा NAD.2H
(b) ATP तथा ग्लूकोस
(c) ATP 77891 NADP.2H
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(c) ATP 77891 NADP.2H

प्रश्न 5.
हरितलवक के स्ट्रोमा में कौन-सी क्रिया होती है? (2016)
(a) प्रकाशीय अभिक्रिया
(b) अप्रकाशीय अभिक्रिया
(c) (a) और (b) दोनों अभिक्रियाएँ
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) अप्रकाशीय अभिक्रिया

प्रश्न 6.
प्रकाश-संश्लेषण क्रिया का अन्तिम उत्पाद है – (2011)
(a) प्रोटीन
(b) वसा
(c) मण्ड
(d) खनिज लवण
उत्तर:
(c) मण्ड

प्रश्न 7.
पादपों में वायु प्रदूषण कम करने वाली प्रक्रिया है – (2013, 14)
(a) श्वसन
(b) प्रकाश-संश्लेषण
(c) वाष्पोत्सर्जन
(d) प्रोटीन संश्लेषण
उत्तर:
(b) प्रकाश-संश्लेषण

प्रश्न 8.
आहारनाल की c के आकार की संरचना है – (2015, 16)
(a) आमाशय
(b) ग्रहणी
(c) ग्रसनी
(d) कृमिरूप परिशेषिका
उत्तर:
(b) ग्रहणी

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प्रश्न 9.
मनुष्य में ग्रासनली की लम्बाई होती है – (2018)
(a) 5.8 सेमी
(b) 25-30 सेमी
(c) 1.5 मीटर
(d) 15 फीट
उत्तर:
(b) 25-30 सेमी

प्रश्न 10.
मनुष्यों में लार ग्रन्थियों की संख्या होती है – (2012, 13, 14)
(a) दो जोड़ी
(b) तीन जोड़ी
(c) चार जोड़ी
(d) पाँच जोड़ी।
उत्तर:
(b) तीन जोड़ी

प्रश्न 11.
कृमिरूप परिशेषिका ……….. का भाग है।। (2013, 17)
(a) छोटी आँत
(b) अग्न्याशय
(c) बड़ी आँत (कोलन)
(d) ग्रासनली
उत्तर:
(c) बड़ी आँत (कोलन)

प्रश्न 12.
मनुष्य में कृन्तक या छेदक दाँतों की संख्या होती है – (2010)
(a) आठ
(b) चार
(c) छह
(d) बारह
उत्तर:
(a) आठ

प्रश्न 13.
मनुष्य के प्रत्येक जबड़े में चर्वणक दन्तों की संख्या होती है। (2015)
(a) 2
(b) 4
(c) 6
(d) 8
उत्तर:
(c) 6

प्रश्न 14.
ग्रासनलीद्वार पर लटकी हई पत्ती के समान कार्टिलेजी रचना कहलाती है – (2011, 14)
(a) एपीफैरिंक्स
(b) एपीग्लोटिस
(c) एल्वियोलाई
(d) श्लेष्मावरण
उत्तर:
(b) एपीग्लोटिस

प्रश्न 15.
निम्न में से किसके द्वारा पित्तरस का निर्माण होता है ? (2014, 15)
(a) अग्न्याशय
(b) वृषण
(c) यकृत
(d) पित्ताशय
उत्तर:
(c) यकृत

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प्रश्न 16.
यकृत स्रावित करता है – (2018)
(a) लार
(b) जठर रस
(c) पित्त रस
(d) अग्न्याशयिक रस
उत्तर:
(c) पित्त रस।

प्रश्न 17.
आहारनाल के पेशीय संकुचन को कहते हैं – (2014)
(a) पाचन
(b) क्रमाकुंचन
(c) परिसंचरण
(d) अवशोषण
उत्तर:
(b) क्रमाकुंचन

प्रश्न 18.
जठर रस स्रावित होता है – (2018)
(a) अग्न्याशय में
(b) पित्ताशय में
(c) आमाशय में
(d) यकृत में
उत्तर:
(c) आमाशय में

प्रश्न 19.
जठर रस में निम्नलिखित में से एक नहीं पाया जाता है – (2009)
(a) पेप्सिन
(b) रेनिन
(c) ट्रिप्सिन
(d) जठर लाइपेज
उत्तर:
(c) ट्रिप्सिन

प्रश्न 20.
एमाइलेज एन्जाइम क्रिया करता है – (2012)
(a) प्रोटीन्स पर
(b) कार्बोहाइड्रेट पर
(c) वसा पर
(d) लवणों पर
उत्तर:
(b) कार्बोहाइड्रेट पर।

प्रश्न 21.
वह एन्जाइम जो सुक्रोज को ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज में बदलता है, है (2009)
(a) सुक्रेज
(b) लैक्टेज
(c) लाइपेज
(d) नास्टेज
उत्तर:
(a) सुक्रेज

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प्रश्न 22.
वसा में घुलनशील विटामिन है – (2010)
(a) थायमीन
(b) रेटीनॉल
(c) एस्कॉर्बिक एसिड
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(b) रेटीनॉल

प्रश्न 23.
ट्रिप्सिन पाचन में सहायता करता है – (2010)
(a) कार्बोहाइड्रेट
(b) प्रोटीन
(c) वसा
(d) प्रोटीन और वसा दोनों
उत्तर:
(b) प्रोटीन

प्रश्न 24.
स्टिएप्सिन एंजाइम क्रिया करता है – (2014)
(a) प्रोटीन पर
(b) स्टार्च पर
(c) वसा पर
(d) लवणों पर
उत्तर:
(c) वसा पर

उत्तर 25.
निम्न में से विटामिन्स का कौन-सा जोड़ा जल में घुलनशील है? (2017)
(a) विटामिन A तथा B
(b) विटामिन B तथा C
(c) विटामिन C तथा K
(d) विटामिन D तथा B
उत्तर:
(b) विटामिन B तथा C

प्रश्न 26.
किस विटामिन की कमी से स्कर्वी रोग होता है? (2012)
(a) बी
(b) सी
(c) ए
(d) डी
उत्तर:
(b) सी

प्रश्न 27.
विटामिन ‘C’ का अच्छा स्रोत है – (2015)
(a) अण्डा
(b) मछली
(c) गेहूँ
(d) संतरा
उत्तर:
(d) संतरा

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प्रश्न 28.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी से होता है? (2016)
(a) विटामिन B1
(b) विटामिन B2
(c) विटामिन B3
(d) विटामिन B5
उत्तर:
(a) विटामिन B1

प्रश्न 29.
सन्तुलित आहार में उपयुक्त मात्रा में विद्यमान होते हैं –
(a) प्रोटीन
(b) खनिज-लवण तथा विटामिन
(c) वसा तथा कार्बोहाइड्रेट
(d) ये सभी तत्त्व
उत्तर:
(d) ये सभी तत्त्व

प्रश्न 30.
व्यक्ति को सन्तुलित आहार ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि इससे –
(a) ऊर्जा प्राप्त होती है
(b) भूख मिट जाती है
(c) आहार सम्बन्धी समस्त आवश्यकताएँ पूरी होती हैं
(d) शरीर मोटा हो जाता है
उत्तर:
(c) आहार सम्बन्धी समस्त आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।

प्रश्न 31.
भोज्य-पदार्थ में विद्यमान ऊर्जा के मापन की इकाई है
(a) औंस
(b) ग्राम
(c) डिग्री
(d) कैलोरी
उत्तर:
(d) कैलोरी

प्रश्न 32.
निम्नलिखित में से मनुष्य की लार में पाया जाता है – (2017)
(a) टायलिन
(b) लाइसोजाइम
(b) पेप्सिन
(d) टायलिन व लाइसोजाइम दोनों
उत्तर:
(a) टायलिन

प्रश्न 33.
अग्न्याशयिक रस किसके पाचन में सहायक होता है ? (2011)
(a) प्रोटीन
(b) प्रोटीन एवं वसा
(c) प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट
(d) प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं वसा
उत्तर:
(d) प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं वसा

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प्रश्न 34.
हीमोग्लोबिन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है – (2013, 17)
(a) उत्सर्जन में
(b) श्वसन में
(c) पाचन में
(d) वृद्धि में
उत्तर:
(b) श्वसन में

प्रश्न 35.
ऊर्जा की मुद्रा है – (2018)
(a) डी०एन०ए०
(b) आर०एन०ए०
(c) ए०टी०पी०
(d) क्लोरोफिल
उत्तर:
(c) ए०टी०पी०

प्रश्न 36.
ग्लाइकोलाइसिस की प्रक्रिया सम्पन्न होती है – (2015)
(a) कोशिका द्रव्य में
(b) राइबोसोम में
(c) माइटोकॉण्ड्रिया में
(d) अन्त:प्रद्रव्यी जालिका में
उत्तर:
(a) कोशिका द्रव्य में

प्रश्न 37.
ग्लाइकोजेनेसिस क्रिया में बनता है – (2017)
(a) ग्लूकोज
(b) ग्लाइकोजन
(c) विटामिन्स
(d) प्रोटीन्स
उत्तर:
(a) ग्लूकोज

प्रश्न 38.
ग्लाइकोलाइसिस के अंत में कितने ATP अणुओं का लाभ होता है?
(a) दो
(b) शून्य
(c) चार
(d) आठ
उत्तर:
(a) दो

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प्रश्न 39.
मानव हृदय में कक्षों (वेश्म) की संख्या होती है – (2014)
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर:
(d) चार

प्रश्न 40.
पल्मोनरी (फुफ्फुस)शिरा खुलती है या रुधिर लाती है (2011, 12, 15)
(a) दाहिने अलिन्द में
(b) बायें अलिन्द में
(c) बायें निलय में
(d) दाहिने निलय में
उत्तर:
(b) बायें अलिन्द में

प्रश्न 41.
फेफड़ों से शद्ध रक्त आता है – (2013, 17, 18)
(a) बायें अलिन्द में
(b) दायें अलिन्द में
(c) बायें निलय में
(d) दायें निलय में
उत्तर:
(a) बायें अलिन्द में (2014)

प्रश्न 42.
शुद्ध रुधिर को शरीर के विभिन्न भागों में ले जाती है। (2014, 18)
(a) शिराएँ
(b) महाशिरा
(c) दायाँ निलय
(d) महाधमनी
उत्तर:
(d) महाधमनी

प्रश्न 43.
रुधिर के कितने समूह होते हैं? (2017)
(a) छः
(b) दो
(c) चार
(d) आठ
उत्तर:
(c) चार

प्रश्न 44.
रक्त का लाल रंग किस पदार्थ की उपस्थिति के कारण होता है? (2016)
(a) हीम
(b) न्यूक्लिक अम्ल
(c) विटामिन C
(d) पोटेशियम
उत्तर:
(a) हीम

प्रश्न 45.
लसीका में नहीं पायी जाती है – (2018)
(a) लाल रूधिर कणिकाएँ
(b) लिम्फोसाइट्स
(c) श्वेत रूधिराणु
(d) उत्सर्जी पदार्थ
उत्तर:
(a) लाल रूधिर कणिकाएँ

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प्रश्न 46.
फुफ्फुस धमनियों से अशुद्ध रुधिर चला जाता है – (2011)
(a) हृदय में
(b) फेफड़ों में
(c) शरीर की अग्र एवं पश्च महाधमनी में
(d) दाएँ अलिन्द में
उत्तर:
(b) फेफड़ों में

प्रश्न 47.
फ्लोएम द्वारा भोजन का स्थानान्तरण होता है – (2013, 14)
(a) सुक्रोज के रूप में
(b) प्रोटीन के रूप में
(c) हॉर्मोन्स के रूप में
(d) वसा के रूप में
उत्तर:
(a) सुक्रोज के रूप में

प्रश्न 48.
खनिज लवणों का अवशोषण होता है – (2009)
(a) जड़ों द्वारा
(b) तने द्वारा
(c) पत्तियों द्वारा
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) जड़ों द्वारा

प्रश्न 49.
पौधों में भोजन का स्थानान्तरण होता है – (2012, 14)
(a) जाइलम द्वारा
(b) फ्लोएम द्वारा
(c) कॉर्टेक्स द्वारा
(d) मज्जा द्वारा
उत्तर:
(b) फ्लोएम द्वारा

प्रश्न 50.
किस क्रिया द्वारा जड़ों द्वारा अवशोषित जल तथा खनिज लवण पत्तियों तक पहुँचते – (2013)
(a) वाष्पोत्सर्जन
(b) रसारोहण
(c) रसाकर्षण तंत्र
(d) परासरण
उत्तर:
(b) रसारोहण

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प्रश्न 51.
निम्नलिखित में से कौन-सा त्वचा का कार्य नहीं है? (2016)
(a) संवेदना
(b) सुरक्षा
(c) लैंगिक लक्षण
(d) उत्सर्जन
उत्तर:
(c) लैंगिक लक्षण

प्रश्न 52.
मनुष्य में दुग्ध ग्रन्थि (स्तन ग्रन्थि ) रूपान्तरित रचना है। (2011, 13)
(a) स्वेद ग्रन्थि की
(b) तेल ग्रन्थि की
(c) लार ग्रन्थि की
(d) जठर ग्रन्थि की
उत्तर:
(b) तेल ग्रन्थि की

प्रश्न 53.
त्वचा के रंगाकण ( उपस्थित ) होते हैं – (2010)
(a) डर्मिस में
(b) एपिडर्मिस में
(c) मैल्पीघी स्तर की मैलेनोसाइट कोशिकाओं में
(d) कणि स्तर की कोशिकाओं में
उत्तर:
(c) मैल्पीघी स्तर की मैलेनोसाइट कोशिकाओं में

प्रश्न 54.
यकृत संश्लेषित करता है – (2011)
(a) शर्करा
(b) रुधिर
(c) यूरिया
(d) प्रोटीन
उत्तर:
(c) यूरिया

प्रश्न 55.
अमोनिया का यूरिया में परिवर्तन करता है – (2018)
(a) अग्न्याशय
(b) यकृत
(c) आमाशय
(d) वृक्क
उत्तर:
(b) यकृत

प्रश्न 56.
बोमेन-सम्पुट भाग है – (2017)
(a) पित्तवाहिनी का
(b) अग्न्याशय वाहिनी का
(c) प्रोस्टेट ग्रन्थि का
(d) वृक्क नलिका का
उत्तर:
(d) वृक्क नलिका का

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प्रश्न 57.
गर्मियों के दिनों में किस कारण दोपहर में पौधे मुरझा जाते हैं? (2017)
(a) वाष्पोत्सर्जन की कमी के कारण
(b) वाष्पोत्सर्जन की अधिकता के कारण
(c) प्रकाश-संश्लेषण की कमी के कारण
(d) प्रकाश-संश्लेषण की अधिकता के कारण
उत्तर:
(b) वाष्पोत्सर्जन की अधिकता के कारण

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रकाश-संश्लेषण किसे कहते हैं? प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों के नाम लिखिए। (2013, 14, 15, 17)
या प्रकाश-संश्लेषण की परिभाषा लिखिए तथा इस क्रिया की रासायनिक अभिक्रिया का समीकरण बताइए। (2016, 17)
उत्तर:
प्रकाश-संश्लेषण, वह उपचायक क्रिया है जिसके द्वारा अकार्बनिक सरल यौगिकों, जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड को प्रकाशीय ऊर्जा के द्वारा कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में बदल दिया जाता है। प्रकाशीय ऊर्जा का उपयोग पर्णहरित (chlorophyll) की उपस्थिति में किया जाता है तथा इसमें ऑक्सीजन उप-उत्पाद के रूप में निकलती है।
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विभिन्न घटक प्रकाश-संश्लेषण के लिए निम्न पदार्थ अति आवश्यक हैं –

  1. सूर्य का प्रकाश
  2. कार्बन डाइऑक्साइड
  3. जल
  4. क्लोरोफिल

प्रश्न 2.
मनुष्य के दाँतों की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। (2010)
उत्तर:
मनुष्य के 32 दाँत होते हैं तथा इनकी निम्नलिखित दो विशेषतायें होती हैं –
1. ये गर्तदन्ती (thecodont) अर्थात् अस्थियों के गर्त में फँसे होते हैं।
2. मनुष्य के जीवन में दो बार दाँत निकलते हैं अर्थात् ये द्विबारदन्ती (diphyodont) होते हैं।

प्रश्न 3.
मनुष्य के प्रत्येक जबड़े में अग्रचर्वणक दाँतों की संख्या बताइए तथा इनके कार्य लिखिए। (2012, 18)
उत्तर:
प्रत्येक जबड़े में अग्रचर्वणक दाँतों की संख्या दो जोड़ी होती है। ये भोजन को कुंचने या चबाने का कार्य करते हैं।

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प्रश्न 4.
आहारनली के विभिन्न भागों के नाम लिखिए। (2015)
उत्तर:
आहारनली के विभिन्न भाग निम्नलिखित हैं –

  1. मुख व मुखगुहा
  2. ग्रसनी
  3. ग्रासनली
  4. आमाशय तथा
  5. आँत।

प्रश्न 5.
रसांकुर (villi) कहाँ स्थित होते हैं? इनका क्या महत्त्व है?
या रसांकुर का प्रमुख कार्य लिखिए।
उत्तर:
रसांकुर छोटी आंत में, विशेषकर शेषान्त्र (ilium) में पाये जाते हैं। ये आन्त्र के अवशोषण तल को अत्यधिक (लगभग 10 गुना) बढ़ा देते हैं। इस प्रकार ये पचे हुए भोजन के अवयवों के अधिक अवशोषण में सहायता करते हैं।

प्रश्न 6.
क्रमाकुंचन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। (2011)
उत्तर:
भोजन को आहार नाल में आगे बढ़ाने के लिए क्रमाकुंचन नामक एक विशेष प्रकार की गति होती है जिससे भोजन पाचक रस के साथ अच्छी तरह मिल जाता है।

प्रश्न 7.
अवशोषण तथा स्वांगीकरण में क्या अन्तर है? (2016)
उत्तर:
आहारनाल में पचित भोजन के अणुओं के विसरित होकर रुधिर में पहुँचने की क्रिया को अवशोषण कहते हैं। जबकि पचे हुए भोजन को अवशोषित कर कोशिका के जीवद्रव्य तक पहुँचाने के बाद भोजन के तत्त्वों को कोशिका में जीवद्रव्य के स्वरूप में विलीन होने की क्रिया को स्वांगीकरण (assimilation) कहते हैं।

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प्रश्न 8.
विटामिन ‘डी’ (D) की कमी से होने वाले दो रोगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
विटामिन ‘डी’ (D) की कमी से होने वाले दो रोग निम्नांकित हैं –
1. सूखा रोग या रिकेट्स (rickets)
2. मृदुलास्थिरोग या ऑस्टोमैलेशिया (osteomalacia)।

प्रश्न 9.
प्रोटीन्स क्या है? इनका निर्माण किन-किन अवयवों के भाग लेने से होता है। (2014)
उत्तर:
प्रोटीन की रचना जटिल होती है। ये जीवित शरीर का 14% भाग बनाती हैं। ये सामान्यतः कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन के संयोग से बनी होती हैं। इसके अतिरिक्त गन्धक, फॉस्फोरस, आयोडीन तथा लोहा आदि भी इनमें आंशिक रूप से उपस्थित होते हैं। इनकी संयोजन इकाइयाँ अमीनो अम्ल होते हैं।

प्रश्न 10.
विटामिन ‘ए’ (A) की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है? इसके भोज्य स्रोतों को लिखिए। (2009)
उत्तर:
विटामिन ‘A’ की कमी से रतौंधी (night blindness) नामक रोग हो जाता है। इसके भोज्य स्रोत गाजर, हरी सब्जियाँ, घी, मक्खन, अण्डे, मछली का तेल आदि हैं।

प्रश्न 11.
कौन-सा एन्जाइम प्रोटीन पाचन में सहायक है? (2010)
या किन्हीं दो प्रोटीन पाचक एन्जाइमों के नाम लिखिए। (2009)
उत्तर:
आमाशय के जठर रस में (अम्लीय माध्यम में) पेप्सिन (pepsin) तथा अग्न्याशयिक रस में (क्षारीय माध्यम में) ट्रिप्सिन (trypsin) प्रोटीन पाचन में सहायक हैं।

प्रश्न 12.
सन्तुलित आहार से क्या आशय है? (2017)
उत्तर:
सन्तुलित आहार वह आहार है जिसमें शरीर की वृद्धि, विकास कार्य तथा स्वास्थ्य संरक्षण के लिए सभी आवश्यक तत्त्व विद्यमान हैं। ये तत्त्व उसमें मात्रा व गुणों में सन्तुलित रूप में पाये जाते हैं।

प्रश्न 13.
सन्तुलित भोजन को निर्धारित करने वाले चार मुख्य कारकों के नाम बताइए। (2017)
उत्तर:

  1. व्यक्ति की आयु
  2. लिंग
  3. व्यक्ति के शरीर का आकार
  4. जलवायु तथा
  5. शारीरिक श्रम।

प्रश्न 14.
अन्तर नासिका पट किसे कहते हैं? उसका क्या कार्य है? (2013)
उत्तर:
चेहरे पर स्थित नासिका दो बाह्य नासा छिद्रों के द्वारा बाहर खुलती है। नासिका के मध्य एक नासा पट होता है, इसे अन्तर नासिका पट कहते हैं। इससे नासा गुहा दो भागों में बँट जाती है।

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प्रश्न 15.
NADP का पूरा नाम लिखिए। (2010, 12)
उत्तर:
NADP = निकोटिनैमाइड एडीनीन डाइ न्यूक्लियोटाइड फॉस्फेट (nicotinamide adenine dinucleotide phosphate)

प्रश्न 16.
ए०टी०पी० तथा ए०डी०पी० का पूरा नाम लिखिए। (2012)
उत्तर:
ए०टी०पी० (ATP) = एडीनोसीन ट्राइफॉस्फेट; ए०डी०पी० (ADP) = एडीनोसीन डाइफॉस्फेट।

प्रश्न 17.
श्वसन को परिभाषित कीजिए। (2012, 13, 15, 16)
उत्तर:
श्वसन वह क्रिया है जिसमें कोशिका के अन्दर कार्बनिक यौगिकों; प्राय: ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होता है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस ऊर्जा को विशेष ATP अणुओं में विभवीय ऊर्जा के रूप में संचित किया जाता है।
C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + 673 किलो केलोरी

प्रश्न 18.
एक ग्लूकोज अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण से ए०टी०पी० के कितने अणु प्राप्त होते हैं? (2010)
उत्तर:
एक अणु ग्लूकोज (C6H12O6) के पूर्ण ऑक्सीकरण से कुल 38 ए०टी०पी० अणु बनते

प्रश्न 19.
रुधिर का रंग लाल क्यों होता है?
उत्तर:
रुधिर में उपस्थित ऑक्सीजन युक्त हीमोग्लोबिन के कारण शुद्ध रुधिर का रंग लाल दिखाई देता है।

प्रश्न 20.
हृदयावरणी (pericardial) तरल पदार्थ कहाँ पाया जाता है? इसका महत्त्व लिखिए।
उत्तर:
हृदयावरणी तरल पदार्थ हृदय तथा हृदयावरण के चारों ओर तथा दोनों हृदयावरणी परतों के मध्य पाया जाता है। यह हृदय की बाहरी आघातों से सुरक्षा करता है तथा हृदय को मुलायम व नम बनाये रखता है।

प्रश्न 21.
रुधिर में एन्टीजन एवं एण्टीबॉडी कहाँ पाये जाते हैं? (2013, 17)
उत्तर:
एण्टीजन लाल रुधिर कणिकाओं में तथा एण्टीबॉडी प्लाज्मा में पाये जाते हैं।

प्रश्न 22.
रुधिर की कौन-सी कोशिकाएँ ऑक्सीजन परिवहन में भाग लेती हैं?
उत्तर:
रुधिर की लाल रुधिर कोशिकाएँ या कणिकाएँ (RBCs = red blood corpuscles or erythrocytes) ऑक्सीजन के परिवहन में भाग लेती हैं।

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प्रश्न 23.
कौन-सी शिरा हृदय में ऑक्सीकृत रुधिर लाती है? या किस शिरा में शद्ध रुधिर पाया जाता है? (2009)
उत्तर:
फुफ्फुस शिराओं में शुद्ध रुधिर (ऑक्सीजन युक्त) पाया जाता है। ये हृदय में रुधिर ले जाती

प्रश्न 24.
पल्मोनरी धमनी में किस प्रकार का रुधिर पाया जाता है और क्यों? (2009, 17)
उत्तर:
पल्मोनरी धमनी हृदय से रुधिर फेफड़ों में ले जाती है अत: इसमें अशुद्ध (ऑक्सीजन विहीन) रुधिर होता है।

प्रश्न 25.
रुधिर दाब किसे कहते हैं? (2012)
उत्तर:
रुधिर दाब वह दाब है जो बायें निलय के संकुचन से मुक्त रुधिर द्वारा वाहिनियों की भित्ति पर लगाया जाता है। धमनियों में यह अधिक होता है तथा धीरे-धीरे केशिकाओं में रुधिर के पहुंचने पर कम होने लगता है तथा शिराओं में सबसे कम होता है। रुधिर दाब के कारण ही धमनियों से रुधिर केशिकाओं के द्वारा शिराओं तक पहुँचता है।

प्रश्न 26.
परासरण किसे कहते हैं? (2013)
उत्तर:
परासरण एक विशेष प्रकार की विसरण क्रिया है जिसमें दो विलयनों (घोलों) का विलायक एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली के आर-पार आता-जाता है। इस क्रिया में दो अनुक्रियायें सम्मिलित हैं –
1. अन्तःपरासरण (endosmosis) जिसमें तनु घोल से सान्द्र घोल की ओर होने वाला विसरण तथा
2. बहि:परासरण (exosmosis) जिसमें सान्द्र विलयन से तनु विलयन की ओर विसरण होता है।

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प्रश्न 27.
जाइलम तथा फ्लोएम में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2014, 16)
या पादपों में जल एवं खनिज तथा खाद्य उत्पादों के संवहन हेतु पायी जाने वाली वाहिकाओं के नाम बताइए। (2016)
उत्तर:
जाइलम ऊतक पौधों में जल स्थानान्तरित करता है जबकि पौधों में भोजन का स्थानान्तरण फ्लोएम ऊतकों द्वारा होता है।

प्रश्न 28.
मूलदाब की परिभाषा दीजिए। (2012)
उत्तर:
मूलदाब वह दाब है जो जड़ों की कॉर्टेक्स कोशिकाओं द्वारा पूर्ण स्फीत अवस्था में उत्पन्न होता है जिसके फलस्वरूप कोशिकाओं में एकत्रित जल न केवल जाइलम में पहुँचता है बल्कि तने में भी कुछ ऊँचाई तक चढ़ जाता है।

प्रश्न 29.
वह कौन-सी कार्यिकी की क्रिया है जिसके द्वारा हरे पौधों की वायवीय सतह से पानी का वाष्पीकरण होता है? (2011)
उत्तर:
वाष्पोत्सर्जन।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नामांकित चित्र की सहायता से दिखाइए कि प्रकाश-संश्लेषण के लिए क्लोरोफिल आवश्यक है। (2016)
उत्तर:
इस प्रयोग को करने के लिए क्रोटॉन (Croton), कोलियस (Coleus) या अन्य कोई चित्तीदार पत्तियों का पौधा लेते हैं जिसकी पत्तियों पर हरे रंग के केवल धब्बे होते हैं अर्थात् केवल इन्हीं स्थानों के अन्दर पर्णहरित (chlorophyll) होता है। इसको अन्धकार में रखकर (लगभग 24 घण्टे) मण्डरहित कर लेते हैं।

कुछ समय (लगभग 4-5 घण्टे) सूर्य के प्रकाश में रखने के बाद यदि आप पौधे की एक पत्ती का मण्ड परीक्षण करेंगे तो केवल उन्हीं स्थानों में मण्ड बना मिलेगा जिन स्थानों पर हरा रंग था। क्लोरोफिल युक्त स्थानों को मण्ड परीक्षण से पूर्व ही चिह्नित कर देते हैं (चित्र देखें)। यह प्रयोग सिद्ध करता है कि क्लोरोफिल के बिना मण्ड नहीं बनता अर्थात् प्रकाश-संश्लेषण नहीं होता है।
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प्रश्न 2.
प्रयोगों द्वारा सिद्ध कीजिए कि प्रकाश संश्लेषण के लिए प्रकाश एवं कार्बन डाइऑक्साइड आवश्यक है। (2013, 14, 15, 17, 18)
या प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में CO2 का क्या महत्त्व है? प्रयोग द्वारा स्पष्ट करें। (2014, 17)
उत्तर:
प्रकाश की आवश्यकता का प्रदर्शन –
किसी गमले में लगे पौधे को (जिसकी पत्तियाँ मोटी न हों) अन्धकार में 48-72 घण्टे रखने से पत्तियों का सम्पूर्ण मण्ड घुलकर दूसरे अंगों में चला जाता है। ऐसी पत्तियाँ मण्ड रहित कहलाती हैं।
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गमले में लगी किसी मण्डरहित पत्ती (एक अन्य पत्ती का मण्ड परीक्षण करने से ज्ञात होगा कि पत्तियाँ मण्डरहित हो गई हैं) की दोनों सतहों पर एक-एक काले कागज का टुकड़ा, पेपर क्लिप की सहायता से स्लाइड के नीचे लगाया जाता है (देखें चित्र)। ऊपर के कागज पर कोई भी अक्षर या अन्य चित्र काटकर बनाया जा सकता है।

कुछ समय (4-5 घण्टे) उपकरण को धूप में रख देते हैं। बाद में उपर्युक्त पत्ती का मण्ड परीक्षण करते हैं। यह अक्षर या चित्र नीले या काले रंग में छप जाता है क्योंकि इन स्थानों पर प्रकाश मिला था तथा मण्ड बना है। इस प्रयोग में काले कागज के स्थान पर फोटोग्राफी की नेगेटिव प्लेट भी प्रयोग में ला सकते हैं, वैसा ही चित्र, पोजिटिव प्रिण्ट या स्टार्च प्रिण्ट के रूप में मण्ड से छप जायेगा।

कार्बन डाइऑक्साइड गैस की आवश्यकता का प्रदर्शन –
एक चौड़े मुँह की बोतल रबर के कॉर्क के साथ लेते हैं। कॉर्क को दो अर्धांशों में लम्बाई में काट देते हैं। एक मण्ड रहित पत्ती को पौधे पर लगी हुई अवस्था में ही (अथवा तोड़कर) आधा बोतल के अन्दर तथा आधा बाहर (कॉर्क की सहायता से) लगाकर, कुछ समय के लिए उपकरण को धूप में छोड़ देते हैं। पौधे से पत्ती को अलग किया गया है तो उसके वृन्त को जल में डुबाकर रखना चाहिए। बोतल में पहले से ही पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड (KOH) विलयन रखा जाता है जो बोतल के अन्दर की वायु से CO2 को अवशोषित कर लेता है।
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प्रयोग-प्रयोग विधि। प्रयोग में लायी गई पत्ती को पौधे से अलग करके मण्ड परीक्षण करने पर पता लगता है कि बोतल के अन्दर रहे भाग में कोई मण्ड नहीं बना (यह भाग नीला या काला नहीं होता) जबकि बोतल के बाहर रहे भाग में मण्ड बना है। अत: सिद्ध होता है कि बिना कार्बन डाइऑक्साइड के प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है।

प्रश्न 3.
प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। (2012, 14)
उत्तर:
प्रकाश-संश्लेषण की दर अनेक बाह्य तथा अन्तः कारकों से प्रभावित होती है। ये कारक निम्नलिखित हैं बाह्य कारक प्रकाश, ताप, वायु, जल, प्राप्त खनिज। अन्तः कारक पत्ती की संरचना, स्टोमेटा की स्थिति, संरचना संख्या एवं वितरण तथा पेलिसेड कोशिकाओं में पर्णहरित की मात्रा।

प्रश्न 4.
प्रकाश-संश्लेषण की उपयोगिता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2017)
उत्तर:
1. भोज्य पदार्थों का उत्पादन: (Production of food) प्रत्येक प्रकार के खाद्य पदार्थों (कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन व वसाएँ) के निर्माण का आधार ही प्रकाश-संश्लेषण है। पौधे अपने लिए इन खाद्य पदार्थों को इसी क्रिया के द्वारा बड़े पैमाने पर बनाते हैं। यही पौधे समस्त जीवों के लिए आवश्यक क्रियाओं में भी काम आते हैं। अन्य सभी जीव अपना भोजन इन्हीं पौधों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्राप्त करते हैं।

आपको पहले बताया गया है कि हरे पौधे, जो प्रकाश-संश्लेषक हैं, इसीलिए उत्पादक (producers) तथा शेष सभी जीव उपभोक्ता (consumers) कहलाते हैं। वास्तव में सम्पूर्ण पृथ्वी पर समस्त जीवन ही इस क्रिया पर निर्भर करता है। इस क्रिया में ही सूर्य की विकिरण ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा के रूप में, भोज्य पदार्थों में एकत्रित हो जाती है जो प्रत्येक जीव के लिए आवश्यक है।

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2. ऊर्जा का स्त्रोत: (Source of energy) सजीवों, जिनमें पौधे भी सम्मिलित हैं, के लिए पौधों द्वारा निर्मित भोजन ही ऊर्जा का स्रोत है। शरीर को चलाने के लिये आवश्यक ऊर्जा भोजन से ही मिलती है। कोयला, तेल (पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल आदि), गैसें आदि ईंधन भी तो भूगर्भ में पुरातन काल में संचित स्रोत हैं जो पौधों के द्वारा प्रतिपादित इसी क्रिया में बने थे। आज इन्हीं को हम ऊर्जा के रूप में प्रयोग में लाते हैं। जन्तुओं तथा पौधों के मध्य, प्रकृति में, पदार्थों का चक्रीय उपभोग चलता रहता है तथा इसी से सन्तुलन बना रहता है।

3. वायुमण्डल का नियन्त्रण, शुद्धिकरण तथा जैव सन्तुलन: (Control, purification of atmosphere and biotic balance) प्रकाश-संश्लेषण, वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड तथा ऑक्सीजन गैसों के अनुपात को नियन्त्रित करता है। सभी जीव श्वसन के लिए ऑक्सीजन काम में लाते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड वायुमण्डल में डालते हैं। अत: दोनों प्रकार से ही वायुमण्डल अशुद्ध होता है। प्रकाश-संश्लेषण क्रिया ही बढ़ी हुई कार्बन डाइऑक्साइड के अनुपात को कम और गिरे हुए ऑक्सीजन अनुपात को अधिक करती है। इस प्रकार जैवीय सन्तुलन बना रहता है।

4. अन्तरिक्ष यात्रा में: (In space travel) अन्तरिक्ष यात्रा के लिए ऑक्सीजन तथा भोजन दोनों की उपलब्धि प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा प्राप्त करने के प्रयास किये गये हैं। इन प्रयासों में काफी सीमा तक सफलता भी प्राप्त हुई है। क्लोरेला (Chlorella) जैसे शैवालों इत्यादि को उगाकर इस समस्या को हल किया जा रहा है। उपर्युक्त के आधार पर प्रकाश-संश्लेषण पृथ्वी पर जीवन को चलाये रखने के लिए एक अतिमहत्त्वपूर्ण क्रिया है।

प्रश्न 5.
मनुष्य के पाचनतन्त्र का नामांकित चित्र बनाइये।(वर्णन की आवश्यकता नहीं है।) (2012, 16, 18)
उत्तर:
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प्रश्न 6.
मनुष्य में पाए जाने वाले दाँतों के प्रकार तथा उनके कार्यों का वर्णन कीजिए। (2016)
उत्तर:
एक वयस्क व्यक्ति में निचले तथा ऊपरी जबड़े में कुल मिलाकर 32 दाँत (teeth) होते हैं। मनुष्य के जीवन में दो बार दाँत निकलते हैं अत: इसे द्विबारदन्ती (diphyodont) कहते हैं। दाँतों की संख्या उम्र के साथ बदलती रहती है। इस प्रकार आयु के आधार पर दाँत दो प्रकार के होते हैं –
1. अस्थायी दाँत:
इन्हें दूध के दाँत भी कहते हैं। ये बच्चे में लगभग 6 माह से निकलने प्रारम्भ हो जाते हैं और 2-3 वर्ष तक कुल 20 निकलते हैं। ये 7-8 वर्ष की अवस्था तक रहते हैं।

2. स्थायी दाँत:
ये दूध के दाँतों के गिरने पर निकलते हैं तथा लगभग 20 वर्ष की आयु तक 28 दाँत निकल आते हैं। बाद में, चार और दाँत निकलते हैं। इन्हें अक्ल दाढ़ कहते हैं। स्थायी दाँतों की कुल संख्या 32 होती है। दोनों जबड़ों में स्थायी दाँत निम्नांकित चार प्रकार के होते हैं –

  • कृन्तक: (incisors) ये संख्या में कुल आठ होते हैं। इनके किनारे तेज धार वाले होते हैं, जो भोजन को कुतरने का कार्य करते हैं।
  • रदनक: (canine) इन्हें भेदक भी कहते हैं। इनकी संख्या चार होती है। कुछ लम्बे व नुकीले होने के कारण ये भोजन को चीरने-फाड़ने का कार्य करते हैं।
  • अग्रचर्वणक: (premolars) प्रत्येक जबड़े में दो जोड़ी होते हैं। इनके सिरे पर दो शिखर होते हैं, जो चपटे एवं चौकोर होते हैं। ये भोजन को कुचलने का कार्य करते हैं।
  • चर्वणक: (molars) प्रत्येक जबड़े में तीन जोड़ी अर्थात् कुल बारह होते हैं। इनके सिरे चौरस, तेज धार वाले होते हैं। ये भोजन को पीसते हैं।

प्रश्न 7.
जीभ पाचन तन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। स्पष्ट कीजिए। (2011)
उत्तर:
मुखगुहा के फर्श पर जीभ होती है जो भोजन का स्वाद चखती है, भोजन चबाते समय उसको उलटती-पलटती रहती है, उसमें लार को मिलाने में सहायता करती है और चबाये गये भोजन को निगलने में मदद करती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जीभ पाचन-तन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

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प्रश्न 8.
मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाली लार ग्रन्थियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (2017)
उत्तर:
मुखगुहा में अनेक छोटी-छोटी (सूक्ष्म) मुख ग्रन्थियाँ (buccal glands) उसकी श्लेष्मिका में होती हैं जो थोड़ी मात्रा में लार (saliva) स्रावित करती रहती हैं। जिह्वा की श्लेष्मिका में भी इसी प्रकार की सूक्ष्म ग्रन्थियाँ होती हैं। बड़ी तथा अधिक मात्रा में लार उत्पन्न करने वाली तथा वाहिकाओं द्वारा इसे मुखगुहा में पहुँचाने वाली निम्नलिखित तीन जोड़ी लार ग्रन्थियाँ होती हैं।

  1. कर्णपूर्व लार ग्रन्थियाँ:
    (parotid salivary glands) कानों के पास, कपोलों के पास व कपोलों में स्थित, ये सबसे बड़ी लार ग्रन्थियाँ होती हैं तथा ऊपरी जबड़े में वाहिकाओं, स्टेन्सेन्स नलिका (Stensen’s ducts) द्वारा चर्वणकों के पास खुलती हैं।
  2. अधोजिह्वा लार ग्रन्थियाँ:
    (sublingual salivary glands) जीभ के ठीक नीचे स्थित छोटी व संकरी ग्रन्थियाँ होती हैं और निचले जबड़े में दाँतों के पास ही कई स्थानों पर खुलती हैं।
  3. अधोहन लार ग्रन्थियाँ:
    (submaxillary salivary glands) निचले जबड़े के पश्च भाग में स्थित होती हैं। ये अगले दाँतों (निचले कृन्तकों) के पास लम्बी वाहिनियों, वारटन्स नलिकाओं (Wharton’s ducts) के द्वारा खुलती हैं।
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प्रश्न 9.
आमाशय किसे कहते हैं? उसके तीन प्रमुख कार्य लिखिए। (2014)
उत्तर:
आमाशय उदर गुहा में अनुप्रस्थ अवस्था में स्थित एक मशक के समान रचना है। यह आहारनाल का सबसे चौड़ा भाग है जिसकी लम्बाई लगभग 24 सेमी तथा चौड़ाई 10 सेमी होती है। आमाशय के कार्य

  1. भोजन का संग्रह
  2. भोजन को पतला लेई जैसा बनाना
  3. भोजन का पाचन।

प्रश्न 10.
यकृत के प्रमुख कार्य बताइये। (2018)
या मानव शरीर में पायी जाने वाली सबसे बड़ी ग्रन्थि कौन-सी है? उसके कार्य का वर्णन कीजिए। (2011, 12)
या यकृत क्या है? इसके तीन मुख्य कार्य बताइए। (2013)
उत्तर:
मानव शरीर में सबसे बड़ी ग्रन्थि यकृत है। यकृत के कार्य

  1. यकृत कोशिकाएँ हिपेरिन नामक पदार्थ का स्राव करती हैं जो रुधिर वाहिनियों में रुधिर को जमने से रोकता है।
  2. आमाशयिक रस के अम्ल को प्रभावहीन करने के लिए यह पित्त बनाता है और भोजन को क्षारीय बनाता है।
  3. यह पचे हुए अवशोषित प्रोटीन को पेप्टोन तथा अमीनो अम्ल के रूप में। संचित रखता है।
  4. यकृत द्वारा निर्मित पित्त रस वसा का पायसीकरण करता है।
  5. यकृत शरीर के संचरण का \(\frac {1}{ 3}\) रुधिर संचरित करता है।
  6. यह रुधिर के निर्माण में भी सहायता करता है क्योंकि यकृत के अन्दर लाल रुधिर कणों का संचय, निर्माण व टूट-फूट आदि कार्य होते हैं।
  7. रुधिर में फाइब्रिनोजन का निर्माण होता है जो रुधिर को जमाने में सहायता देता है।
  8. यकृत शरीर का भण्डार गृह है। जब पाचन के बाद रुधिर में आवश्यकता से अधिक ग्लूकोज पहुँचता है तो वह यकृत कोशिकाओं में ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहित हो जाता है।
  9. छोटी आँत, ग्रहणी तथा आमाशय में प्रोटीन के पाचन में बने अमीनो अम्लों को रुधिर यकृत में ले आता है। आवश्यकता से अधिक अमीनों अम्लों को यकृत द्वारा यूरिया में बदलकर मूत्र द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। यदि शरीर में से यूरिया न निकले तो शरीर में गठिया आदि रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
आहारनाल से सम्बन्धित मुख्य पाचक ग्रन्थियों का संक्षेप में वर्णन करते हुए उनके मुख्य कार्य बताइए। (2015)
उत्तर:
आहारनाल से सम्बन्धित पाचक ग्रन्थियाँ:
आहारनाल के अन्दर विभिन्न स्थानों की श्लेष्मकला में उपस्थित विभिन्न पाचक ग्रन्थियों; जैसे – लार ग्रन्थियाँ, जठर ग्रन्थियाँ, आन्त्रीय ग्रन्थियाँ आदि के अतिरिक्त इससे सम्बन्धित तथा बड़ी-बड़ी दो पाचक ग्रन्थियाँ होती हैं।

1. यकृत यकृत शरीर में पायी जाने वाली सबसे बड़ी ग्रन्थि है। यह उदर गुहा में डायाफ्राम के ठीक पीछे, मीसेण्ट्री द्वारा सधा चॉकलेटी रंग का एक बड़ा-सा कोमल, परन्तु ठोस द्विपालित अंग (bilobed organ) होता है। बायीं पाली (left lobe) काफी छोटी तथा दायीं पाली (right lobe) काफी बड़ी होती है। यह हल्की प्रसिताओं (furrows) द्वारा तीन पालियों में बँटी होती है। यकृत की विभिन्न पालियों से छोटी-छोटी वाहिनियाँ निकलकर एक पित्त वाहिनी (bile duct) बनाती हैं। यह ग्रहणी में खुलती है। यकृत में एक क्षारीय रस बनता है जिसे पित्त रस (bile juice) कहते हैं। यह पाचन में सहायक है।

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2. अग्न्याशय ग्रहणी आमाशय के साथ ‘C’ आकार की रचना बनाती है। इसी के मध्य में यकृत तथा आमाशय के पीछे स्थित, मछली के आकार की कोमल एवं गुलाबी रंग की एक चपटी ग्रन्थि होती है, जिसे अग्न्याशय कहते हैं। यह यकृत के बाद शरीर की सबसे बड़ी ग्रन्थि होती है। इसमें दो विभिन्न प्रकार के ग्रन्थिल ऊतक भाग होते हैं –

(i) बाह्यस्रावी (exocrine part) तथा इसी में जगह-जगह अन्तःस्रावी (endocrine) कोशिकाओं के समूह होते हैं जिन्हें लैंगरहैन्स की द्वीपिकायें (islets of Langerhans) कहते हैं।

इस ग्रन्थि में पाचन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, अनेक एन्जाइम्स (enzymes) वाला अग्न्याशयिक रस (pancreatic juice) बनता है। अग्न्याशय की विभिन्न पालियों से छोटी-छोटी वाहिनियाँ उत्पन्न होती हैं, जो मिलकर अग्न्याशयी वाहिनियों (pancreatic ducts) का निर्माण करती हैं। ये वाहिनियाँ पित्त वाहिनी (bile duct) में खुलती हैं, जो स्वयं ग्रहणी के समीपस्थ भाग से सम्बन्धित होती है।

प्रश्न 12.
वसा का पाचन आहारनाल के किस भाग में होता है? उस पाचक रस का नाम लिखिए जो वसा के पाचन में सहायक होता है। (2011, 12)
उत्तर:
ग्रहणी व छोटी आँत में। लाइपेज भोजन की वसा पर क्रिया करके उसे वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में बदल देता है।

प्रश्न 13.
एन्जाइम्स क्या हैं? किन्हीं दो एन्जाइमों के नाम लिखकर उनके कार्य बताइए। (2017)
उत्तर:
पाचन क्रिया में कुछ रासायनिक क्रियाएँ होती हैं जिनमें कुछ सूक्ष्म मात्रा में पाये जाने वाले पदार्थों का विशेष महत्त्व है। ये पदार्थ इन क्रियाओं को उत्तेजित करते हैं तथा चलाते हैं। इन पदार्थों को विकर या एन्जाइम्स कहते हैं। ये एन्जाइम्स पाचक रसों में होते हैं। दो प्रमुख एन्जाइम व उनके कार्य इस प्रकार हैं –
1. ट्रिप्सिन: अधपचे प्रोटीन और पेप्टोन्स पर क्रिया करके उनको ऐमीनो अम्लों में बदलता है।
2. एमाइलोप्सिन: विभिन्न प्रकार की शर्कराओं और मण्ड को ग्लूकोस में बदलता है।

प्रश्न 14.
विटामिन की परिभाषा लिखिए। जल में घुलनशील दो विटामिनों के बारे में लिखिए। (2010)
या विटामिन के प्रकार लिखिए तथा उनके नामों का भी उल्लेख कीजिए। (2016)
उत्तर:
विटामिन्स (Vitamins) ये जटिल कार्बनिक पदार्थ हैं, जो शरीर को प्रतिरक्षा प्रदान करते हैं। इनकी कमी से अपूर्णता रोग (deficiency diseases) होते हैं। इन्हें वृद्धिकारक (growth factors) भी कहते हैं। विटामिन्स मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं –
1. जल में घुलनशील, जैसे विटामिन्स ‘बी’, ‘सी’
2. वसा में घुलनशील, जैसे विटामिन्स ‘ए’, ‘डी’, ‘ई’, ‘के’

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प्रश्न 15.
निम्नलिखित विटामिन्स के स्त्रोत एवं उनकी कमी से होने वाली व्याधियों का वर्णन कीजिए।

  1. विटामिन A
  2. विटामिन B
  3. विटामिन C
  4. विटामिन D (2013)

किन्हीं चार विटामिनों के नाम, स्त्रोत तथा कार्य लिखिए। (2015)
उत्तर:
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प्रश्न 16.
पाचक रस पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2013)
या मनुष्य में पाये जाने वाले पाचक रसों के कार्यों का वर्णन कीजिए। (2013)
या पित्त रस क्या है? यह कहाँ बनता है? इसके कार्य का उल्लेख कीजिए। (2017)
या यकृत तथा अग्न्याशय द्वारा स्रावित पदार्थों की पाचन क्रिया में उपयोगिता को समझाइए। (2017)
या अग्न्याशय द्वारा स्रावित दो पाचक एन्जाइम के नाम तथा कार्य लिखिए। (2018)
उत्तर:
पाचक रस भोजन को पचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पाचक रस निम्न प्रकार के होते हैं –

1. लार: लार भोजन को निगलने में सहायक होती है तथा कार्बोहाइड्रेट को पचाने में भी भाग लेती है। लार में उपस्थित टायलिन नामक एन्जाइम मण्ड को शर्करा में बदल देता है।

2. जठर रस: जठर ग्रन्थियों से जठर रस निकलता है तथा जठर रस में HCl, पेप्सिन तथा रेनिन नामक एन्जाइम होते हैं। HCl भोजन के माध्यम को अम्लीय करता है तथा भोजन के कठोर कणों को गला देता है। पेप्सिन प्रोटीन पर कार्यशील है और प्रोटीन को पेप्टोन्स तथा पेप्टाइड्स में बदल देता है।

3. पित्त रस तथा अग्न्याशयिक रस: ग्रहणी में, अग्न्याशय से निकलने वाला अग्न्याशयिक रस तथा यकृत से निकलने वाला पित्त रस आकर मिलते हैं। पित्त रस में कोई एन्जाइम नहीं होता है, फिर भी भोजन के पाचन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

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क्योंकि यह भोजन के माध्यम को अम्लीय से बदलकर क्षारीय बनाता है। अग्न्याशयिक रस में पाये जाने वाले सभी एन्जाइम क्षारीय माध्यम में ही सक्रिय होते हैं। यहाँ पर काइम में अग्न्याशयिक रस में उपस्थित एन्जाइम्स द्वारा निम्नांकित परिवर्तन किये जाते हैं –

  • ट्रिप्सिन (Trypsin) यह भोजन की प्रोटीन्स, पेप्टोन्स आदि पर क्रिया करता है। यह अग्न्याशयिक रस में ट्रिप्सिनोजन (trypsinogen) के रूप में होता है तथा क्षारीय माध्यम में सक्रिय होता है।
  • लाइपेज (Lipase) यह भोजन की वसा पर क्रिया कर उसे वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में बदल देता है।
  • एमाइलॉप्सिन या एमाइथेज (Amylopsin) यह कार्बोहाइड्रेट्स पर क्रिया कर, उन्हें माल्टोज (maltose) एवं अन्य शर्कराओं में बदल देता है।

4. आँत्र रस इसमें उपस्थित एन्जाइम अधपचे भोजन पर क्रिया करते हैं। आन्त्र रस में उपस्थित निम्नलिखित एन्जाइम अधपचे भोजन पर क्रिया करते हैं –

  • सुक्रेज (Sucrase) यह शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • लेक्टेज (Lactase) यह लैक्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • माल्टेज (Maltase) यह माल्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • इरेप्सिन (Erepsin) यह शेष प्रोटीन तथा उसके अवयवों को अमीनो अम्लों में बदल देता है।

प्रश्न 17.
कुपोषण के मुख्य लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कुपोषण के परिणामस्वरूप कुछ असामान्य शारीरिक लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। ये लक्षण मुख्य रूप से अपोषण से सम्बन्धित होते हैं। अपोषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति के शरीर की मांसपेशियों का गठन कमजोर होने लगता है। अपोषण के परिणामस्वरूप शरीर की अस्थियाँ विकृत तथा कमजोर हो जाती हैं। अस्थि-कंकाल में कुछ असामान्य झुकाव या विकार आ जाते हैं। अपोषण का प्रभाव व्यक्ति की त्वचा एवं बालों पर भी दृष्टिगोचर होता है। त्वचा की स्वाभाविक सुन्दरता व कोमलता समाप्त होने लगती है तथा त्वचा रूखी एवं खुरदरी होने लगती है।

इसी प्रकार कुपोषण की स्थिति में बालों की स्वाभाविक चमक भी घटने लगती है, बाल टूटने लगते हैं तथा उनकी वृद्धि रुक जाती है। कुपोषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की आँखों की स्वाभाविक सुन्दरता कम हो जाती है तथा आँखों की रोशनी भी कम हो जाती है। कुपोषण के परिणामस्वरूप पाचन-संस्थान की क्रियाशीलता भी प्रभावित होती है।

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इस दशा में पाचन-क्रिया में सहायक विभिन्न एन्जाइम तथा रस समुचित मात्रा में नहीं बनते; अत: आहार का पाचन एवं शोषण ठीक प्रकार से नहीं होता। अपोषण के परिणामस्वरूप विभिन्न रोगों से लड़ने तथा मुकाबला करने की शरीर की स्वाभाविक क्षमता क्रमशः घटने लगती है। इस स्थिति में व्यक्ति बार-बार विभिन्न रोगों का शिकार होता रहता है।

प्रश्न 18.
श्वासोच्छ्वास तथा श्वसन में अन्तर कीजिए। (2011, 13)
उत्तर:
श्वासोच्छ्वास एवं श्वसन में अन्तर –
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प्रश्न 19.
कोशिकीय श्वसन को परिभाषित कीजिए तथा उसकी रूप-रेखा बनाइए। (2017)
उत्तर:
यह वास्तविक श्वसन है तथा इसकी क्रियाएँ जीवित कोशिकाओं के अन्दर कोशिका द्रव्य तथा विशेष प्रकार के कोशिकांगों-माइटोकॉण्ड्रिया में होती है। यह क्रिया दो पदों में होती है –
1. ग्लाइकोलाइसिस (glycolysis):
में ग्लूकोज जैसे पदार्थ को पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) में बदला जाता है। यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में होती है। इसके बाद की क्रियाएँ ऑक्सीजन (O2) की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति पर निर्भर करती हैं।

2. क्रेब्स चक्र (Krebs cycle):
में पाइरुविक अम्ल के पूर्ण विघटन से जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। यह क्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया (mitochondria) में सम्पन्न होती है। इसे ऑक्सी या वायव श्वसन (aerobic respiration) कहते हैं।

ऑक्सीजन के अभाव में कोशिकाद्रव्य में ही पाइरुविक अम्ल (pyruvic acid) के अपूर्ण ऑक्सीकरण से एथिल ऐल्कोहॉल (ethyl alcohol) तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। इस प्रक्रिया को अनॉक्सी या अवायव श्वसन (anaerobic respiration) कहते हैं।

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प्रश्न 20.
मानव रक्त की संरचना व कार्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (2017, 18) या रुधिर के चार कार्य बताइए। (2009, 13)
उत्तर:
रुधिर एक तरल संयोजी ऊतक है। रुधिर के निम्नलिखित दो भाग होते हैं –

  1. प्लाज्मा
  2. रुधिर कणिकाएँ

1. प्लाज्मा:
यह रुधिर का पीले रंग का आधारभूत तरल (ground fluid), साफ, चिपचिपा तथा पारदर्शी पदार्थ होता है। यह रुधिर का लगभग 60% भाग (स्वस्थ मनुष्य में लगभग 3,500 मिली) होता है। स्वयं प्लाज्मा का लगभग 90% भाग जल होता है। शेष लगभग 10% भाग में जटिल कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ होते हैं। अकार्बनिक पदार्थों में प्रायः सोडियम, पोटैशियम, कैल्सियम व मैग्नीशियम आदि के क्लोराइड्स, बाइकार्बोनेट्स, फॉस्फेट्स, सल्फेट्स तथा आयोडाइड आदि लवण होते हैं जोकि सामान्यत: आयन्स के रूप में पाये जाते हैं। ये ही रुधिर को हल्का क्षारीय बनाये रखते हैं।

2. रुधिर कणिकाएँ:
रुधिर का लगभग 40-45% भाग रुधिर कणिकाएँ होती हैं। ये प्रमुखतः तीन प्रकार की होती हैं।

  • लाल रुधिर कणिकाएँ
  • श्वेत रुधिर कणिकाएँ तथा
  • प्लेटलेट्स। रुधिर के कार्य इसका प्रमुख कार्य दो ऊतकों के बीच विभिन्न प्रकार के संयोजन करना है। इन कार्यों को हम निम्नलिखित बिन्दुओं में वर्णित कर सकते हैं।

1. ऑक्सीजन व अन्य गैसों का परिवहन:
रुधिर की लाल रुधिर कणिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन ग्रहण करके ऑक्सीहीमोग्लोबिन नामक अस्थायी यौगिक बनाता है। ऊतकों में पहुँचने पर ऑक्सीहीमोग्लोबिन टूटकर ऑक्सीजन तथा हीमोग्लोबिन में बदल जाता है। इस प्रकार, श्वसन के लिए ऊतकों को ऑक्सीजन मिल जाती है। इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड के साथ भी हीमोग्लोबिन कार्बोएमीन यौगिक बनाता है।

2. पोषक पदार्थों का परिवहन:
जल में विलेय खाद्य पदार्थ (पोषक तत्त्व) अवशोषण के समय रुधिर द्वारा ही ग्रहण किये जाते हैं तथा शरीर के अन्य भागों को भी रुधिर द्वारा ही परिसंचरित किये जाते हैं। आँतों से ये पदार्थ पहले यकृत में ले जाये जाते हैं। यकृत इन पोषक तत्त्वों की मात्रा तथा स्वरूप निश्चित करके रुधिर द्वारा सभी ऊतकों को भेजता है।

3. उत्सर्जी पदार्थों का परिवहन:
शरीर में होने वाली अनेक प्रकार की उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप अनेक हानिकारक उत्सर्जी पदार्थ बनते रहते हैं। इनमें नाइट्रोजन यौगिक प्रमुख हैं। इन्हें रुधिर पहले यकृत में तथा बाद में यकृत से वृक्कों में पहुंचाता है। वृक्क इन्हें रुधिर से छानकर मूत्र के रूप में बाहर निकाल देता है। श्वसनांगों से कार्बन डाइऑक्साइड भी प्रमुखतः रुधिर के प्लाज्मा द्वारा फेफड़ों तक पहुँचायी जाती है।

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4. अन्य पदार्थों का परिसंचरण:
अनेक प्रकार के पदार्थों; जैसे-हॉर्मोन्स, एन्जाइम्स, एण्टीबॉडीज आदि को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाने का कार्य रुधिर ही करता है।

5. रोगों से बचाव व घाव को भरना:
शरीर में जब कोई घाव इत्यादि हो जाता है तो श्वेत रुधिर कणिकाएँ वहाँ पहुँचकर रोगाणुओं से लड़ती हैं तथा मवाद या पस (pus) बना लेती हैं। मवाद में रोगाणु भी सम्मिलित होते हैं। साथ ही रुधिर उस स्थान पर आवश्यक पदार्थ आदि को भी पहुँचाता है। इस प्रकार रुधिर घाव के भरने में सहायता करता है।

6. शरीर के ताप पर नियन्त्रण:
रुधिर शरीर के ताप पर नियन्त्रण व नियमन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

7. रुधिर का थक्का बनना:
किसी स्थान पर कट-फट जाने से रुधिर बहने लगता है। यदि यह रुधिर बहता रहे तो जन्तु की मृत्यु हो सकती है। रुधिर में इस प्रकार की सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ होती हैं कि यदि कहीं पर भी रुधिर बाहर के सम्पर्क में आता है तो तुरन्त ही उसमें थक्का बनने की कार्यवाही प्रारम्भ हो जाती है।

प्रश्न 21.
हीमोग्लोबिन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। (2014, 18)
या हीमोग्लोबिन कहाँ पाया जाता है? इसका मुख्य कार्य बताइए। (2018)
उत्तर:
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में उपस्थित रंगायुक्त (लाल रंग) ग्लोब्यूलर प्रोटीन के अणु हैं। हीमोग्लोबिन श्वसन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्राणियों में श्वसन क्रिया में ग्रहण की गई ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन से क्रिया करके ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। कोशिकाओं में ऑक्सीहीमोग्लोबिन विघटित होकर ऑक्सीश्वसन के लिए O2 को मुक्त कर देता है। इस प्रकार हीमोग्लोबिन प्राणियों के शरीर में ऑक्सीजन परिवहन का कार्य करती है।

प्रश्न 22.
रुधिर और लसीका में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2013, 14, 15, 16)
उत्तर:
रुधिर और लसीका में अन्तर –
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प्रश्न 23.
धमनी तथा शिरा को परिभाषित कीजिए। (2016, 17)
उत्तर:
रुधिर परिसंचरण के लिए हृदय एक पम्प के समान कार्य करके जिन वाहिनियों में रुधिर को भेजता है उन्हें धमनियाँ कहते हैं। धमनियाँ ऊतकों में पहुँचकर केशिकाओं में बँट जाती हैं तथा बाद में एकत्रित होकर शिराओं का निर्माण करती हैं। शिराएँ रुधिर को वापस हृदय में लाती हैं।

प्रश्न 24.
धमनी और शिरा में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (2009, 11, 12, 14)
या धमनी और शिरा में चार मुख्य अन्तर बताइए। (2011, 14, 15, 16)
उत्तर:
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प्रश्न 25.
लसिका परिवहन के कार्यों का उल्लेख कीजिए। (2015)
उत्तर:
लसिका परिवहन के कार्य –

  1. कोशिकाओं को पोषक तत्त्वों, गैसों, हॉर्मोन्स तथा एन्जाइम्स आदि को पहुँचाने तथा आदान-प्रदान के लिए माध्यम का कार्य करता है।
  2. कोशिका ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य हानिकारक उत्सर्जी पदार्थों को रक्त तक पहुँचाता है।
  3. लसिका केशिकाएँ जो रसांकुरों में फैली रहती हैं, पचे हुए भोजन का अवशोषण करती हैं।
  4. लसिका कोशिकाओं के चारों ओर जलीय वातावरण बनाकर कोशिका के बाहर एवं भीतर परासरण सन्तुलन बनाये रखता है।
  5. लसिका वाहिनियों में स्थित लसिका ग्रन्थियों में लिम्फोसाइट्स का निर्माण होता है, जो जीवाणुओं का भक्षण करते हैं।
  6. यह कोमल अंगों को रगड़ से बचाता है।

प्रश्न 26.
रुधिर वाहिनियाँ किसे कहते हैं? इनके प्रकार लिखिए। (2017)
उत्तर:
रुधिर का परिवहन जिन नलिकाओं के द्वारा होता है, उन्हें रुधिर वाहिनियाँ कहते हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं –

  1. धमनियाँ: ये रुधिर को हृदय से विभिन्न अंगों में ले जाती हैं।
  2. शिराएँ: ये विभिन्न अंगों से रुधिर वापस हृदय में लाती हैं।
  3. केशिकाएँ: धमनियाँ अंगों में पहुँचकर धमनिकाओं (arterioles) में विभाजित होती हैं, बाद में ये शाखा-प्रतिशाखा बनाते हुए अत्यन्त पतली भित्ति वाली महीन शाखाओं का जाल बना लेती हैं। इन महीन शाखाओं को केशिकाएँ (capillaries) कहते हैं। इनकी भित्ति केवल एक कोशिका मोटी एण्डोथीलियम (endothelium) की बनी होती है।

प्रश्न 27.
पादपों में फ्लोएम द्वारा भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण को समझाइए। (2014)
या मुंच परिकल्पना क्या है? उचित चित्रों के माध्यम से स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर:
पादप शरीर में विभिन्न प्रकार की क्रियाओं (जैविक क्रियाओं) के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से ही प्राप्त होती है। पत्तियों में बना हुआ खाद्य पदार्थ उपयोग, संचय स्थलों अथवा एक अंग से दूसरे अंग तक पहुँचना आवश्यक होता है। खाद्य पदार्थों का इस प्रकार का स्थानान्तरण घुलनशील अवस्था में फ्लोएम (phloem) ऊतक द्वारा ऊपर से नीचे की ओर होता है, किन्तु विशेष अवस्थाओं में संचय के स्थानों से विपरीत दिशा में भी होता है।

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खाद्य के स्थानान्तरण का कार्य मुख्यतः
चालनी-नलिकाओं (sieve tubes) तथा सहकोशिकाओं (companion cells) द्वारा होता है। मुंच परिकल्पना खाद्य पदार्थों के स्थानान्तरण के सन्दर्भ में अनेक परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गई हैं. इनमें से मुंच परिकल्पना सर्वमान्य है। मुंच (Munch, 1927-30) ने फ्लोएम में भोज्य पदार्थों के स्थानान्तरण के सम्बन्ध में कहा है कि यह क्रिया अधिक सान्द्रता वाले स्थानों से कम सान्द्रता वाले स्थानों की ओर होती है।

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पर्णमध्योतकी कोशिकाओं (mesophyll cells) में निरन्तर भोज्य पदार्थों के बनते रहने के कारण परासरण दाब अधिक हो जाता है। उधर जड़ों में या अन्य स्थानों में इन पदार्थों के उपयोग में आते रहने अथवा अघुलनशील रूप में संचित हो जाने से सान्द्रता कम हो जाती है। अत: पर्णमध्योतक कोशिकाओं से फ्लोएम में होकर आवश्यकता के स्थानों को स्थानान्तरण, सामूहिक रूप में अथवा परासरण दाब के कारण होता है।

पर्णमध्योतक कोशिकाओं में निरन्तर शर्करा का निर्माण होता रहता है। इससे इन कोशिकाओं का परासरणी दाब कम नहीं हो पाता। जड़ अथवा भोजन संचय करने वाले भागों में शर्करा के उपयोग के कारण अथवा भोज्य पदार्थों के अघुलनशील अवस्था में बदलकर संचित होने के कारण कोशिकाओं का परासरणी दाब कम रहता है। इसके फलस्वरूप पर्णमध्योतक कोशिकाओं से भोज्य पदार्थ अविरल रूप से फ्लोएम में प्रवाहित होते रहते हैं।

प्रश्न 28.
मूलदाब किसे कहते हैं तथा इसका क्या महत्त्व है? नामांकित चित्र की सहायता से मूलदाब दर्शाइए। (2012)
या पौधों में जल संवहन का सचित्र वर्णन कीजिए। (2013)
या नामांकित चित्र द्वारा मूलदाब के प्रदर्शन का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
मूलदाब वह दाब है जो जड़ों की कॉर्टेक्स-कोशिकाओं द्वारा पूर्ण स्फीत अवस्था में उत्पन्न होता है जिसके फलस्वरूप कोशिकाओं में एकत्रित जल न केवल जाइलम वाहिकाओं में पहुँचता है बल्कि तने में भी कुछ ऊँचाई तक चढ़ जाता है।

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प्रयोग-मूलदाब का प्रदर्शन:
पारा प्रयोग मैनोमीटर मूलदाब दिखाने के लिये गमले में लगा हुआ एक स्वस्थ व के अन्त में शाकीय (herbaceous) पौधा लेते हैं। गमला ऐसा लेते हैं। जिसमें काफी मात्रा में जल दिया जा चुका हो।

पौधे के तने को प्रारम्भ में – गमले की मिट्टी से कुछ सेन्टीमीटर ऊपर से काट देते हैं और तने के बँटे अर्थात् कटे हुये सिरे को रबड़ की नली की सहायता से शीशे के मैनोमीटर से जोड़ देते हैं। इसकी नली मेंरबड़ का छल्ला – कुछ पानी डालकर उसमें पारा भर देते हैं। कुछ समय पश्चात् मैनोमीटर की नली में पारे का तल ऊपर चढ़ता दिखाई देता है। मैनोमीटर की नली में पारे के तल का ऊपर चढ़ना मूलदाब के कारण ही होता है। इसी दाब के कारण मूलरोमों द्वारा अवशोषित जल जाइलम वाहिकाओं में ऊपर तक ढकेल दिया जाता है।
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यदि किसी पौधे का ऊपरी सिरा काट दिया जाये तो कटे स्थान से रस टपकने लगता है। वह मूलदाब के कारण होता है। इसी प्रकार ताड़ी (खजूर) के पौधे के कटे भाग से रस टपकने की क्रिया मूलदाब के कारण ही होती है। निष्कर्ष तने के कटे हुए भाग से पानी का बलपूर्वक निकलना मूल दाब के कारण होता है। पानी के प्रारम्भिक व अन्तिम तलों के अन्तर से मूलदाब को ज्ञात किया जा सकता है।

प्रश्न 29.
मूलरोमों द्वारा जल का अवशोषण किस प्रकार होता है? स्पष्ट कीजिए। (2015, 16)
या जड़ में जल के संवहन का एक स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए। (2011, 12)
या पौधों में जड़ों द्वारा जल के अवशोषण का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाकर वर्णन कीजिए। (2010)
उत्तर:
जड़ के मूलरोम प्रदेश (roothair region) में स्थित मूलरोमों द्वारा जल का अवशोषण प्रायः परासरण दाब भिन्नता के फलस्वरूप होता है। मृदा जल मूलरोम कोशिका के उच्च परासरण दाब के कारण अर्द्धपारगम्य झिल्ली से होकर मूलरोम कोशिका में प्रवेश करता है। मूलरोम कोशिका की स्फीत कोशिका का परासरणीय दाब कॉर्टेक्स की समीपवर्ती कोशिका से कम हो जाता है, मूलरोम कोशिका से जल समीपवर्ती वल्कुट कोशिका में पहुँच जाता है; मूलरोम कोशिका का परासरणीय दाब पुनः अधिक हो जाने से यह पुन: मृदा जल को अवशोषित करके आशून हो जाती है।

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कॉर्टेक्स कोशिकाएँ क्रमशः जल अवशोषित करके स्फीत (आशून-turgid) हो जाती हैं। स्फीत कोशिकाएँ जल को एक दबाव के साथ जाइलम वाहिकाओं में धकेल देती हैं। इस दाब को मूलदाब कहते हैं। जड़ों द्वारा इस प्रकार जल के अवशोषण को सक्रिय अवशोषण (active absorption) कहते हैं। इसमें ऊर्जा व्यय होती है।
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वृक्षों में जल का अवशोषण सामान्यतया वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (transpiration pull) के कारण होता है। इसे निष्क्रिय अवशोषण (passive absorption) कहते हैं। इस क्रिया में ऊर्जा व्यय नहीं होती।

प्रश्न 30.
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं? (2014, 15, 16)
उत्तर:
वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक निम्नवत् हैं –

  • वायुमण्डल में आर्द्रता बढ़ने पर वाष्पोत्सर्जन कम होता है।
  • वायुमण्डलीय ताप बढ़ने पर तथा तेज हवा चलने या आंधी आने पर वाष्पोत्सर्जन बढ़ जाता है।
  • प्रकाश या दिन में वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है और रात में कम क्योंकि दिन में प्रकाश-संश्लेषण के लिए स्टोमेटा खुले रहते हैं जिससे वाष्पीकरण अधिक होता है।
  • पत्तियों पर स्टोमेटा की संख्या व स्थिति वाष्पोत्सर्जन की दर को प्रभावित करते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पोषण क्या है? पोषण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? पोषण के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए। (2013, 16, 17)
या पोषण के प्रकार बताइए। मृतोपजीवी व परजीवी पोषण में अन्तर बताइए। (2015, 16)
उत्तर:
पोषण:
सभी जीवों को जीवित रहने तथा शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी क्रियाओं को करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा भोजन से प्राप्त होती है। विभिन्न प्रकार के जीव भोजन लेने के लिए विभिन्न विधियाँ अपनाते हैं। भोजन ग्रहण करने से लेकर, पाचन, अवशोषण, कोशिकाओं तक पहुँचाने, कोशिका में उसके ऊर्जा उत्पादन में प्रयोग करने अथवा जीवद्रव्य में स्वांगीकृत करने तथा भविष्य के लिए उसे शरीर में संगृहीत करने तक की सभी क्रियाओं का सम्मिलित नाम पोषण है।

इस प्रकार पोषण एक जटिल क्रिया है तथा यह अनेक पदों या चरणों में पूरी होती है; जबकि पाचन पोषण की अन्तक्रिया है।

पोषण की विधियाँ (प्रकार):
पोषण के विभिन्न प्रकारों अथवा विधियों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है –
I. स्वपोषण तथा
II. परपोषण।

I. स्वपोषण Autotrophic nutrition ऐसे सभी जीव स्वपोषी कहलाते हैं, जो अकार्बनिक पदार्थों की सहायता से अपना भोजन स्वयं निर्मित करते हैं तथा ऊर्जा का संचय करते हैं। ऐसा केवल हरे पौधे अपनी पर्णहरित युक्त कोशिकाओं में करते हैं। ये पौधे प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में भोजन निर्मित करते हैं। इस क्रिया में ये कार्बन डाइऑक्साइड तथा पानी का कच्चे पदार्थों के रूप में उपयोग करते हैं।

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II. परपोषण: (Heterotrophic nutrition) वे सभी जीव, जो अपने भोजन का निर्माण नहीं कर सकते अपितु अन्य स्रोतों से तैयार भोजन ग्रहण करते हैं, परपोषी या विषमपोषी कहलाते हैं। परपोषी जीव अपने पोषण के आधार पर निम्नलिखित प्रकार के माने जाते हैं –
(a) प्राणिसमभोजी पोषण Holozoic nutrition ठोस भोजन ग्रहण करने वाले जीव प्राणिसमभोजी कहलाते हैं। ये भोजन का भक्षण करते हैं। सभी जन्तु प्रायः इसी प्रकार के होते हैं।

(b) मृतोपजीवी पोषण: (Saprophytic nutrition) ऐसे जीव, जो अपना भोजन मृत जन्तुओं या पौधों तथा उनके उत्सर्जी पदार्थों आदि से प्राप्त करते हैं, मृतोपजीवी कहलाते हैं; जैसे – अनेक जीवाणु, कवक आदि।

(c) परजीवी पोषण: (Parasitic nutrition) ऐसे जीव, जो अपना भोजन दूसरे जीव के शरीर के बाहर अथवा भीतर रहकर प्रत्यक्ष रूप से उसके जीवित अवस्था में ही प्राप्त करते हैं, परजीवी कहलाते हैं। परजीवी अपने पोषद (host), जिससे वे अपना भोजन आदि प्राप्त करते हैं, में कुछ-न-कुछ व्याधि अवश्य उत्पन्न करते हैं; जैसे – आँतों में रहने वाले कृमि व रुधिर चूसने वाले मच्छर, पौधों के विभिन्न रोग आदि।

प्रश्न 2.
प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया-विधि का संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2011, 18)
या प्रकाश-संश्लेषण को परिभाषित कीजिए तथा इसकी क्रिया-विधि समझाइए। (2013)
प्रकाश-संश्लेषण को परिभाषित कीजिए। प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशीय अभिक्रिया की क्रिया-विधि समझाइए। (2012, 16, 18)
जल का प्रकाश अपघटन क्या होता है? समझाइए। (2012)
प्रकाश-संश्लेषण की क्रियाविधि को समझाइए। प्रकाश-संश्लेषण में प्रकाशिक तथा अप्रकाशिक अभिक्रियाओं पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए। (2015)
उत्तर:
प्रकाश-संश्लेषण:
हरे पौधों में जिनमें क्लोरोफिल या पर्णहरित पाया जाता है, प्रकाश की उपस्थिति में पानी तथा कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से कार्बोहाइड्रेट विशेषकर ग्लूकोज का निर्माण होता है, यह क्रिया प्रकाश-संश्लेषण कहलाती है। इस क्रिया में ऑक्सीजन गैस निकलती है।
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प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया-विधि –
प्रकाश-संश्लेषण एक जटिल आन्तरोष्मी (endothermal) उपचयी अभिक्रिया है। यह क्रिया दो चरणों में पूरी होती है – प्रकाशिक अभिक्रिया तथा अप्रकाशिक अभिक्रिया।

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1. प्रकाशिक अभिक्रिया या हिल अभिक्रिया:
प्रकाशिक अभिक्रिया का अध्ययन सर्वप्रथम हिल (Hill) नामक वैज्ञानिक ने किया था, इसलिए इसे हिल अभिक्रिया कहते हैं। यह क्रिया हरित लवकों के ग्रैना में क्लोरोफिल की सहायता से होती है। यह निम्नलिखित पदों में पूर्ण होती है –

  • सूर्य का प्रकाश अवशोषित कर हरितलवकों के ग्रैना में उपस्थित पर्णहरित सक्रिय हो जाता है और ADP से ATP (एडिनोसीन ट्राइफॉस्फेट) का निर्माण होता है। ATP में प्रचुर मात्रा में ऊर्जा संचित हो जाती है।
  • ऊर्जावित क्लोरोफिल द्वारा जल का H+ तथा OH आयनों में प्रकाशिक अपघटन (photolysis) होता है।
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  • जल के प्रकाश अपघटन से उत्पन्न OH आयन परस्पर मिलकर पानी और ऑक्सीजन बनाते हैं। ऑक्सीजन गैस के रूप में मुक्त होकर स्टोमेटा द्वारा बाहर निकल जाती है।
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  • जल के प्रकाश अपघटन से मुक्त हाइड्रोजन आयन से उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स निकलते हैं जो इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण प्रणाली (electron transfer system) के द्वारा ऊर्जा को ATP के रूप में मुक्त करते हैं। इस क्रिया में H+ आयन NADP को NADPH2 में अपचयित करते हैं।
    4 (H+)+2 NADP → 2NADP H2 ADP + P → ATP
    ATP के निर्माण को फोटोफॉस्फोरिलेशन (photophosphory lation) कहते हैं।

2. अप्रकाशिक अभिक्रिया अथवा केल्विन चक्र –
इस अभिक्रिया का अध्ययन सर्वप्रथम ब्लैकमेन (Blackman) नामक वैज्ञानिक ने किया था, इसलिए इसे ब्लैकमेन अभिक्रिया भी कहते हैं। यह अभिक्रिया हरितलवक के स्ट्रोमा में होती है। इसमें प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। इस अभिक्रिया में CO2 के अपचयन से कार्बोहाइड्रेट बनता है। यह अभिक्रिया निम्न चरणों में होती है –

  • CO2 के 6 अणु कोशिकाओं में उपस्थित रिबुलोज डाइफॉस्फेट (RDP) से संयोग करके 12 अणु फास्फोग्लिसरिक अम्ल (PGA) बनाते हैं। ]
  • फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल NADPH, से हाइड्रोजन प्राप्त करके फॉस्फोग्लिसरेल्डीहाइड (PGAL) में परिवर्तित हो जाता है तथा NADP पुन: प्रकाशिक अभिक्रिया में उत्पन्न हाइड्रोजन आयनों को ग्रहण करने के लिए स्वतन्त्र हो जाता है।
  • फॉस्फोग्लिसरेल्डीहाइड अणुओं में 10 अणु पुन: RDP में बदल जाते हैं तथा शेष दो अणु हैक्सोज शर्करा-ग्लूकोस बनाते हैं।
    6CO2 + 12 ATP + 12NADPH2 → C6H12O6 + 12 ATP + 12 NADP + 6H2O इस सम्पूर्ण चक्र को केल्विन चक्र कहते हैं।

प्रश्न 3.
पाचन से क्या तात्पर्य है? इसमें कौन-कौन से पाचक रस भाग लेते हैं? पचे हुए भोजन के अवशोषण तथा स्वांगीकरण की क्रिया का वर्णन कीजिए। (2011, 12, 13)
या  पाचन किसे कहते हैं? मुँह से लेकर कोशिका में अवशोषित होने तक भोजन में जो परिवर्तन होते हैं, उनका चरणबद्ध वर्णन कीजिए।
या पाचन किसे कहते हैं? आमाशयिक (जठर रस) रस (gastric juice) तथा अग्न्याशयिक रस (pancreaticjuice) में पाये जाने वाले एन्जाइम्स की कार्यिकी समझाइए। (2010, 11) मुख से लेकर आमाशय तक होने वाली पाचन क्रिया को प्रभावित करने वाले विकरों (एन्जाइम्स) के कार्यों का उल्लेख कीजिए। (2016)
उत्तर:
पाचन पाचन का अर्थ है जल में अघुलनशील भोज्य पदार्थों को घुलनशील अवस्था में बदलकर उन्हें अवशोषण के योग्य बनाना, जिससे वे रुधिर में मिलकर अथवा अन्य किसी प्रकार से शरीर के विभिन्न भागों अर्थात् ऊतकों तथा कोशिकाओं में पहुँच जायें। मुँह से लेकर कोशिका में अवशोषित होने तक भोजन में होने वाले परिवर्तन के विभिन्न चरण भोजन का अन्तर्ग्रहण मुख (mouth) द्वारा होता है। मुख से लेकर कोशिका में अवशोषित होने तक विभिन्न पाचन अंगों में होने वाले चरण निम्न प्रकार हैं –

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1. मुख तथा मुखगुहा:
(Mouth and buccal cavity) यह भोजन नली का अग्र भाग है। इसी के द्वारा भोजन का अन्तर्ग्रहण किया जाता है। दाँत भोजन को पीसते हैं। मुखगुहा में लार ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं, जिनसे निकलने वाली लार भोजन को निगलने में सहायक होती है तथा कार्बोहाइड्रेट को पचाने में भाग लेती है। लार में उपस्थित टायलिन (ptyalin) नामक एन्जाइम मण्ड (स्टार्च) को शर्करा में बदल देता है।

भोजन का यहाँ और अधिक पाचन नहीं होता। जीभ पर स्थित स्वाद कणिकाओं द्वारा स्वाद का अनुभव होता है। मुखगुहा के पिछले भाग अर्थात् ग्रसनी (pharynx) के अन्तिम भीतरी छोर पर निगल द्वार (gullet) द्वारा भोजन लसलसी अवस्था में आगे बढ़ता है।

2. ग्रसिका:
(Oesophagus) निगलद्वार से भोजन ग्रसिका या ग्रासनली में आता है। ग्रसिका में कोई पाचन क्रिया नहीं होती। इसके द्वारा भोजन मुखगुहा से आमाशय में आ जाता है।

3. आमाशय:
(Stomach) आमाशय में भोजन आते ही गैस्ट्रिन नामक हॉर्मोन निकलता है, जो जठर ग्रन्थियों (gastric glands) को सक्रिय करता है। जठर ग्रन्थियों से जठर रस (gastric juice) निकलता है। जठर रस में HCI, पेप्सिन (pepsin) तथा रेनिन (renin) नामक एन्जाइम्स होते हैं। HCl भोजन के माध्यम को अम्लीय करता है तथा भोजन के कठोर कणों को गला देता है। यह अक्रिय पेप्सिन अर्थात् पेप्सिनोजन (pepsinogen) को क्रियाशील बनाता है। पेप्सिन प्रोटीन पर क्रियाशील है और प्रोटीन को पेप्टोन्स तथा पेप्टाइड्स में बदल देती है –
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रेनिन दूध को फाड़कर उसमें घुली कैसीन को अलग कर देता है, जिससे उसका आगे पाचन हो सके। आमाशय में भोजन 3 से 5 घण्टे रहता है। यहाँ भोजन अवलेह के रूप में आ जाता है। भोजन के इस स्वरूप को काइम (chyme) कहते हैं।

4. ग्रहणी:
(Duodenum) आमाशय से भोजन छोटी आँत के अग्र भाग अर्थात् ग्रहणी (duodenum) में पहुँचता है। ग्रहणी में, अग्न्याशय (pancreas) से निकलने वाला अग्न्याशयिक रस (pancreatic juice) तथा यकृत (liver) से निकलने वाला पित्त रस (bile juice) आकर मिलते हैं। पित्त रस में कोई एन्जाइम नहीं होता है, फिर भी भोजन के पाचन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि यह भोजन के माध्यम को अम्लीय से बदलकर क्षारीय (alkaline) बनाता है। अग्न्याशयिक रस में पाये जाने वाले सभी एन्जाइम क्षारीय माध्यम में ही सक्रिय होते हैं। यहाँ पर काइम में अग्न्याशयिक रस में उपस्थित एन्जाइम्स द्वारा निम्नांकित परिवर्तन किये जाते हैं –

  • ट्रिप्सिन:
    (Trypsin) यह भोजन की प्रोटीन्स, पेप्टोन्स आदि पर क्रिया करता है। यह अग्न्याशयिक रस में ट्रिप्सिनोजन (rypsinogen) के रूप में होता है तथा क्षारीय माध्यम में सक्रिय होता है।
  • लाइपेज:
    (Lipase) यह भोजन की वसा पर क्रिया कर उसे वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में बदल देता है।
  • एमाइलॉप्सिन:
    (Amylopsin) यह कार्बोहाइड्रेट्स पर क्रिया कर, उन्हें माल्टोज (maltose) एवं अन्य शर्कराओं में बदल देता है।

5. शेषान्त्र:
(Ileum) ग्रहणी में भोजन के लगभग सभी अवयवों पर क्रिया प्रारम्भ हो जाती है तथा अधिकांश पाचन हो जाता है। इसके पश्चात् छोटी आँत के शेष भाग जिसे शेषान्त्र कहते हैं, में उपस्थित ग्रन्थियों द्वारा स्रावित आन्त्र रस में उपस्थित निम्नलिखित एन्जाइम अधपचे भोजन पर क्रिया करते हैं –

  • सुक्रेज (Sucrase) शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • लेक्टेज (Lactase) लैक्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • माल्टेज (Maltase) माल्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।
  • इरेप्सिन (Erepsin) शेष प्रोटीन तथा उसके अवयवों को अमीनो अम्लों में बदल देता है।

पचे हुए भोजन का अवशोषण:
छोटी आंत में भोजन का पाचन पूरा हो जाता है। इसके पश्चात् पूर्ण रूप से पचा हुआ भोजन छोटी आंत में ही विशेषकर इसके पश्च भाग में अवशोषित हो जाता है। छोटी आँत में इसके लिए उपस्थित रसांकुरों (villi) द्वारा अवशोषण तल अत्यधिक बढ़ा हुआ होता है। यह अवशोषित पोषक पदार्थ रुधिर से होते हुए शरीर के विभिन्न ऊतकों तथा ऊतकों में उपस्थित ऊतक द्रव्य के माध्यम से कोशिकाओं में चले जाते हैं।

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6. बड़ी आँत, गुदा तथा गुदाद्वार:
(Large intestine, rectum and anus) आहारनाल के इस भाग में अपच तथा अपशिष्ट भोजन में से जल का अवशोषण होता है। अपशिष्ट को मल के रूप में कुछ समय तक रोका जाता है बाद में उसका बहिःक्षेपण हो जाता है। आहारनाल में भोजन को आगे बढ़ाने की क्रिया प्रमुखतः क्रमाकुंचन नामक गति के द्वारा सम्पन्न होती है।

पचे हुए भोजन का स्वांगीकरण:
पचा हुआ भोजन जो अवशोषित होकर कोशिका के जीवद्रव्य तक पहुँचता है, इस भोजन के तत्त्वों को जीवद्रव्य के स्वरूप में आत्मसात (विलीन) कर लिया जाता है। इस क्रिया को स्वांगीकरण (assimilation) कहते हैं। सभी जीवों में यह क्रिया आवश्यक है। इसी से जीवद्रव्य की वृद्धि होती है, अर्थात् जीव की वृद्धि होती है। पाचन के बाद प्राप्त सरल कार्बनिक अणुओं को कोशिका में होने वाली विशेष क्रियाओं के द्वारा जटिल जैविक अणुओं के रूप में संश्लेषित कर लिया जाता है।

प्रश्न 4.
श्वसन किसे कहते हैं? ऊर्जा का इससे क्या सम्बन्ध है? (2012)
उत्तर:
श्वसन:
पृथ्वी पर पाये जाने वाले प्रत्येक जीव को विभिन्न जैविक क्रियाओं को सम्पन्न करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा जीवों के शरीर की सभी जीवित कोशिकाओं में भोजन के विशेषकर कार्बोहाइड्रेट्स के ऑक्सीकरण से उत्पन्न होती है। इस क्रिया में उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है तथा यह ऊर्जा शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को करने के लिए ए० टी० पी० (ATP) नामक अणुओं में उच्च ऊर्जा बन्धों के रूप में (विभवीय ऊर्जा) संचित की जाती है। यही

ऊर्जा आवश्यकता के समय काम आती है। इन समस्त क्रियाओं को श्वसन (respiration) कहते हैं। प्रायः ऑक्सीकरण की इस क्रिया में बाहर से लायी हुई ऑक्सीजन (O2) का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार, श्वसन वह क्रिया है जिसमें कोशिका में कार्बनिक यौगिकों; प्रायः ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होता है। इस क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड, जल तथा ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस ऊर्जा को विशेष ATP अणुओं में विभवीय ऊर्जा के रूप में संचित किया जाता है।

कोशिकीय ऊर्जा व इसके उपयोग:
श्वसन यद्यपि अतिनियन्त्रित जैव-रासायनिक क्रियाओं के रूप में जीवित कोशिका के अन्दर सम्पादित होता है तथा प्रायः सम्पूर्ण श्वसन क्रिया में उत्पन्न ऊर्जा 673 K cal. होती है –
C6H12O6 + 6O6 → 6CO2 + 6H2O + 673 K cal. ऊर्जा
फिर भी उत्पादित सम्पूर्ण ऊर्जा का ए०टी०पी० (ATP) के रूप में अनुबन्धन नहीं हो पाता है और कुछ ऊर्जा ऊष्मा (heat) के रूप में भी विमुक्त हो जाती है अर्थात् श्वसन में ताप बढ़ता है। दूसरी ओर, जो ऊर्जा ए०टी०पी० में अनुबन्धित हो जाती है उसका उपयोग विभिन्न कार्यों के अतिरिक्त अनेक संश्लेषणात्मक क्रियाओं में भी किया जाता है (चित्र)।
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कोशिकीय ऊर्जा, उपर्युक्त के अनुसार, ए०टी०पी० मुद्रा के रूप में होती है। जिन क्रियाओं में इसको उपयोग में लाया जाता है; वे हैं –

  • कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा इत्यादि के संश्लेषण में
  • कार्बनिक पदार्थों (organic food) के स्थानान्तरण में
  • अकार्बनिक और कार्बनिक पदार्थों के अवशोषण में
  • जीवद्रव्य प्रवाह (protoplasmic streaming) में और
  • वृद्धि (growth) में। इन क्रियाओं में ATP से अन्तिम उच्च ऊर्जा बन्ध (bond) अलग होकर क्रियाओं को आवश्यक ऊर्जा दे देता है। फलस्वरूप ADP शेष रह जाता है। इसीलिए ATP को कोशिका का ऊर्जा सिक्का या ऊर्जा मुद्रा (energy currency) कहते हैं। उपर्युक्त चित्र के मध्य में ATP-ADP चक्र देखिए। इसे कोशिका का ऊर्जा चक्र (energy cycle) कहते हैं।

प्रश्न 5.
मनुष्य के श्वसन अंगों को नामांकित चित्र बनाकर उनके कार्यों का वर्णन कीजिए। (2013)
या मनुष्य के श्वसन तन्त्र की संरचना का वर्णन नामांकित चित्र बनाकर कीजिए। (2013)
उत्तर:
मनुष्य के श्वसनांग (श्वसन तन्त्र) –
मनुष्य में फुफ्फुसीय श्वसन तन्त्र (respiratory system) होता है; अतः प्रमुख श्वसनांग दो फेफड़े (lungs) होते हैं। इनकी वक्षीय पिंजर के अन्दर स्थिति के कारण अनेक सहायक अंग भी महत्त्वपूर्ण हैं, जो निम्नलिखित हैं –

1. नासिका एवं नासा मार्ग: (Nose and nasal passage) चेहरे पर स्थित नासिका (nose) बाहर दो बाह्य नासा छिद्रों (nostrils) के द्वारा खुलती है। नासा गुहा अन्दर की ओर एक नासा पट (nasal septum) के द्वारा दायें तथा बायें दो भागों में बँटी होती है। नासा गुहा अन्दर एक टेढ़े-मेढ़े, घुमावदार रास्ते में खुलती है।

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यह मार्ग टरबाइनल अस्थियों से बना होता है और श्लेष्मिक झिल्ली (mucous membrane) से ढका रहता है। नासा मार्ग में इसी कारण एक चिकना, पतला, तरल श्लेष्मक झिल्ली से स्रावित होता रहता है। नासा मार्ग मुख गुहा के ऊपर उपस्थित तालू (कठोर व मुलायम) के ऊपर स्थित होता है तथा काफी भीतर ग्रसनी (pharynx) में खुलता है।

2. कण्ठ या स्वर यन्त्र: (Larynx) ग्रसनी के भीतरी भाग में, निगल द्वार से पहले एक छिद्र होता है। इसे घाँटी, कण्ठ द्वार या ग्लॉटिस (glottis) कहते हैं। इसको ढकते हुए उपास्थि का बना एक घाँटी ढापन (epiglottis) होता है जो भोजन निगलते समय घाँटी को बन्द कर देता है।

3. श्वास नाल: (Trachea) घाँटी द्वार से सम्बन्धित इसके पीछे गर्दन में सामने की ओर स्थित यह 10-11 सेमी लम्बी 1.5-2 सेमी व्यास की नली होती है। सीने में पहुँचकर यह दो छोटी नलिकाओं में बँट जाती है जिन्हें श्वसनियाँ (bronchi) कहते हैं। प्रत्येक श्वसनी (bronchus) अपनी ओर के फेफड़े में चली जाती है और विभिन्न शाखाओं-दर-शाखाओं में बँट जाती है। श्वास नली की भित्ति में 16 से 20 तक उपास्थियों के अधूरे छल्ले होते हैं। ये छल्ले ‘C’ के आकार के तथा पीछे की ओर अधूरे होते हैं। ऐसे छल्ले श्वसनियों में भी होते हैं। सम्पूर्ण नलियों में भीतर श्लेष्मिक कला होती है, जो श्लेष्मक उत्पन्न करती है।
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4. फेफड़े या फुफ्फुस: (Lungs) संख्या में दो फेफड़े हमारे प्रधान श्वसनांग हैं। ये वक्ष गुहा (thoracic cavity) में हृदय के इधर-उधर स्थित, गहरे कत्थई-सलेटी रंग के, अत्यन्त कोमल तथा लचीले अंग हैं। प्रत्येक फेफड़े के चारों ओर पतली एवं दोहरी झिल्ली से बनी एक फुफ्फुस गुहा (pleural cavity) होती है। इसमें एक लसदार तरल भरा रहता है।

झिल्लियों को फुफ्फुसावरण (pleura) कहा जाता है। यह गुहा तथा इसका तरल फेफड़ों की सुरक्षा करते हैं। वक्ष गुहा में इन दोनों फेफड़ों और उनकी गुहाओं के मध्य केवल एक सँकरा स्थान होता है जिसमें श्वास नाल, श्वसनियाँ, ग्रास नली, हृदय आदि अंग रहते हैं।

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5. तन्तु पट, वक्षीय कटहरा तथा अन्य पेशियाँ:  वक्षीय गुहा के नीचे उदर गुहा से अलग करने वाला तन्तु पट (diaphragm) ऊपर-नीचे होकर वक्षीय गुहा को घटाता-बढ़ाता रहता है और श्वास लेने की क्रिया में सहायता करता है। वक्षीय कटहरा वक्षगुहा को बनाता है। यह मुख्य रूप से पीठ की ओर कशेरुक दण्ड (vertebral column), सामने की ओर स्टर्नम (sternum) तथा सामने से पीठ तक स्थित पसलियों (ribs) से बनता है। पसलियों के बीच-बीच में कुछ विशेष मांसपेशियाँ होती हैं जो पसलियों का स्थान बदलकर वक्षीय गुहा को घटाती-बढ़ाती हैं और साँस लेने की क्रिया में सहायता करती हैं।

प्रश्न 6.
मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना एवं क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए। (2011, 12, 13)
या मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना का चित्रों की सहायता से वर्णन कीजिए। (2013, 17)
या मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए। (2016)
उत्तर:
मनुष्य के हृदय की आन्तरिक संरचना –
मनुष्य का हृदय एक कोमल पेशीय अंग है, जो वक्ष गुहा में डायाफ्राम के ऊपर दोनों फेफड़ों के बीच कुछ बायीं ओर स्थित होता है। यह दोहरी भित्ति की झिल्लीनुमा थैली हृदयावरण या पेरीकार्डियम (pericardium) में बन्द रहता है। दोनों झिल्लियों के मध्य तथा हृदय व हृदयावरण के मध्य हृदयावरणी द्रव (pericardial fluid) भरा रहता है, जो हृदय की बाह्य धक्कों से रक्षा करता है। हृदय हृदयक (cardiac) मांसपेशियों का बना होता है।
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मनुष्य के हृदय में चार वेश्म (4 chambers) होते हैं। ऊपरी चौड़े भाग के दोनों वेश्म बायाँ व दायाँ अलिन्द (auricles) तथा निचले नुकीले भाग के दोनों वेश्म दायाँ व बायाँ निलय (ventricles) कहलाते हैं। अलिन्दों की भित्तियाँ पतली और निलयों की भित्ति मोटी और अधिक पेशीय होती हैं। दोनों, दायें एवं बायें अलिन्दों को बाँटने वाले अन्तराअलिन्दीय पट (inter-atrial septum) के पश्च भाग पर दाहिनी ओर एक छोटा-सा अण्डाकार गड्ढा होता है जिसे फोसा ओवैलिस (fossa ovalis) कहते हैं।

भ्रूणावस्था में इसी स्थान पर फोरामेन ओवैलिस (foramen ovalis) नामक छिद्र होता है। अलिन्द की दीवार का भीतरी स्तर अधिकांश भाग में सपाट (smooth) होता है, केवल कुछ भागों में इससे लगी हुई अनेक पेशीय पट्टियाँ गुहा में उभरी रहती हैं जिन्हें कंघाकार पेशियाँ (musculi pectinati) कहते हैं। दाहिने अलिन्द में दो मोटी महाशिरायें अलग-अलग छिद्रों द्वारा खुलती हैं, जिन्हें निम्न महाशिरा (inferior vena cava) तथा उपरि महाशिरा (superior vena cava) कहते हैं। उपरि महाशिरा का छिद्र इस अलिन्द के ऊपरी भाग में तथा निम्न महाशिरा का निचले भाग में होता है।

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हृदय की दीवार से अशुद्ध रुधिर अलिन्द में लाने के लिए बायें भाग में अन्तराअलिन्दीय पट के पास कोरोनरी साइनस (coronary sinus) का छिद्र होता है। फेफड़ों से शुद्ध रुधिर लाने वाली फुफ्फुसी शिरायें (pulmonary veins) बायें अलिन्द में खुलती हैं। निलय (ventricle) की भित्तियाँ अलिन्द की भित्तियों से अधिक मोटी और मांसल होती हैं, जबकि बायें निलय की भित्ति तो दाहिने निलय की भित्ति से भी मोटी होती है। दाहिने अलिन्द की गुहा बायें अलिन्द की गुहा की अपेक्षा बड़ी होती है। दोनों निलयों को अलग करने वाला तिरछा अनुलम्ब पट होता है जिसे अन्तरानिलय पट (interventricular septum) कहते हैं।

एक-एक बड़े अलिन्द-निलय छिद्र (atrioventricular apertures) द्वारा प्रत्येक अलिन्द अपनी ओर के निलय में खुलता है। प्रत्येक अलिन्द निलय छिद्र पर नियमन हेतु एक झिल्ली के समान कपाट होता है। दाहिना अलिन्द-निलय कपाट तीन चपटे एवं त्रिकोणाकार पालियों (flaps) का बना होता है, इसे त्रिवलनी या ट्राइकस्पिड कपाट (tricuspid valve) कहते हैं। बायाँ अलिन्द-निलय कपाट केवल दो, अधिक बड़ी तथा अधिक मोटी पालियों का बना होता है। इसे द्विवलनी या बाइकस्पिड कपाट (bicuspid valve) कहते हैं।

कपाट, कण्डराओं (tendons) या हृद् रज्जुओं (chordae tendinae) द्वारा निलय की दीवार पर स्थित मोटे पेशी स्तम्भों (columnae carnae or papillary muscles) से जुड़े रहते हैं। कपाट रुधिर को अलिन्दों से निलयों में जाने का मार्ग देते हैं, किन्तु विपरीत दिशा में नहीं जाने देते। दाहिने निलय के अग्र भाग के बायें कोने से पल्मोनरी महाधमनी (pulmonary aorta) तथा बायें निलय के अग्र भाग के दाहिने कोने से कैरोटिको-सिस्टेमिक महाधमनी (carotico-systemic aorta) चापों (arches) के रूप में निकलती हैं। दोनों चापों के गोलाकार छिद्रों पर तीन-तीन छोटे जेबनुमा (pocket-shaped) अर्द्धचन्द्राकार कपाट (semilunar valves) होते हैं, जो रुधिर को निलयों से चापों में ही जाने का मार्ग देते हैं, चापों से वापस निलयों में नहीं आने देते।

दाहिने निलय से निकलकर पल्मोनरी चाप बायीं ओर घूमकर कैरोटिको-सिस्टेमिक चाप के नीचे फेफड़ों में जाने वाली दो पल्मोनरी धमनियों (pulmonary arteries) में बँट जाता है। कैरोटिको-सिस्टेमिक चाप बायें निलय से निकलकर पल्मोनरी चाप के ऊपर से होता हुआ बायीं ओर घूमकर धमनियों में बँट जाता है।

जहाँ दोनों चाप एक-दूसरे के ऊपर से निकलते हैं, एक लिगामेण्ट आरटीरिओसम (ligament arteriosum) नामक ठोस स्नायु (ligament) होता है। भ्रूणावस्था में इस स्नायु के स्थान पर डक्टस आरटीरिओसस या बोटैलाई (ductus arteriosus or botalli) नामक एक महीन धमनी होती है। हृदय की भित्ति के कुछ भागों में सघन तन्तुमय संयोजी ऊतक के छल्ले होते हैं। ये दीवार को सहारा देते हैं, कक्षों को आवश्यकता से अधिक फूलने से रोकते हैं और अनेक हृद् पेशियों को जुड़ने का स्थान देते हैं। अत: इन्हें हृदय का कंकाल कहा जाता है।

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हृदय की कार्य विधि:
हृदय पम्प की तरह कार्य करता है। यह रुधिर को ग्रहण करता है और उसे दबाव के साथ अंगों की
ओर भेज देता है। यह नियमित रूप से, लगातार तथा जीवनपर्यन्त कार्य करता रहता है। एक सामान्य व्यक्ति का हृदय एक मिनट में 70-80 बार धड़कता है। हृदय के सिकड़ने की अवस्था को प्रकुंचन (systole) तथा फैलने की अवस्था को अनुशिथिलन (diastole) कहते हैं।

हृदय की दीवारें विशेष प्रकार की हृद् पेशियों (cardiac muscles) की बनी होती हैं जिनमें प्रकुंचन (systole) तथा अनुशिथिलन (diastole) के कारण एक लहर-सी बन जाती है। एक बार जब ये क्रियायें चालू होती हैं तो बिना रुके हुए मृत्यु के समय तक चलती रहती हैं। अलिन्दों के बाद निलय सिकुड़ते हैं तथा निलय के बाद अलिन्द। इसके बाद फिर निलय सिकुड़ते हैं और इसी तरह दोनों अपनी-अपनी बारी पर फैलते-सिकुड़ते रहते हैं।

हृदय के निलय की कार्डियक पेशियों के शक्तिशाली क्रमिक संकुचनों या एक-बार फैलने व सिकुड़ने की क्रिया से एक हृदय स्पन्दन (heart beat) बनता है अर्थात् प्रत्येक हृदय स्पन्दन में कार्डियक पेशियों का एक बार प्रकुंचन या सिस्टोल (systole) तथा एक बार अनुशिथिलन या डाएस्टोल (diastole) होता है। मनुष्य का हृदय एक मिनट में 72-75 बार स्पन्दित होता है।

यह हृदय स्पन्दन की दर (rate of heart beat) कहलाती है। शरीर के सभी अंगों में भ्रमण करने के बाद अशुद्ध रुधिर उपरि तथा निम्न महाशिराओं (pre and post cavals) द्वारा दाहिने अलिन्द में आता है। इसी प्रकार से फेफड़ों द्वारा शुद्ध किया गया रुधिर बायें अलिन्द में आता है। दोनों अलिन्दों में रुधिर भर जाने के बाद इसमें एक साथ संकुचन होता है जिससे इनका रुधिर अलिन्द-निलय छिद्रों द्वारा अपनी ओर के दोनों निलयों में भर जाता है। निलयों में रुधिर भर जाने पर फिर इन दोनों निलयों में संकुचन होता है।

फलत: दाहिने निलय का अशुद्ध रुधिर पल्मोनरी महाधमनी (pulmonary aorta) द्वारा फेफड़ों में जाता है, जबकि बायें निलय का शुद्ध रुधिर कैरोटिको-सिस्टेमिक महाधमनी (carotico-systemic aorta) द्वारा समस्त शरीर में जाता है। यही महाधमनी कशेरुक दण्ड के नीचे पृष्ठ महाधमनी (dorsal aorta) बनाती है। निलयों का संकुचन जैसे ही समाप्त होता है, वैसे ही अलिन्दों में पुन: संकुचन प्रारम्भ होने लगता है। इस प्रकार हृदय रुधिर का बहाव बनाये रखता है। हृदय में प्रकुंचन तथा अनुशिथिलन की ये क्रियायें आजीवन एक के बाद एक, लगातार तथा एक लय में होती रहती है।

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प्रश्न 7.
रुधिर परिवहन को परिभाषित कीजिए। खुला, बन्द तथा दोहरा रुधिर परिवहन तन्त्र को समझाइए। (2017)
या मनुष्य में दोहरे रक्त परिसंचरण को आरेखित चित्र द्वारा दर्शाइए। (2014)
उत्तर:
ग्रहण किए गये पदार्थों को शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाने तथा वहाँ पर उत्पन्न अतिरिक्त पदार्थों (CO2 तथा NH3) को निश्चित स्थान तक पहुँचाने की क्रिया को संवहन या परिवहन कहते हैं। केवल लाभदायक पदार्थों का ही संवहन नहीं होता, बल्कि अपशिष्ट पदार्थों को भी शरीर में ऐसे स्थान पर पहुँचाया जाता है जहाँ से उन्हें बाहर निकाला जा सके। जिस परिवहन तन्त्र में संवहन माध्यम रुधिर होता है, उसे रुधिर परिवहन तन्त्र कहते हैं।

खुला व बंद परिवहन तंत्र:
कुछ अकशेरुकी जन्तुओं जैसे आर्थोपोड्स एवं मौलस्क में रुधिर मुख्य रुधिर वाहिनियों से निकलकर पूरी देहगुहा में भर जाता है और दैहिक अंगों की कोशिकओं के सीधे सम्पर्क में रहता है। इस प्रकार के परिवहन तंत्र को खुला परिवहन तंत्र कहते हैं। इस प्रकार के परिवहन तंत्र में रुधिर केशिकाएँ, लिम्फ व ऊतक द्रव नहीं होता है।

सभी कॉडेंट्स में रुधिर सदैव बंद वाहिनियों में बहता है। वह ऊतक कोशिकओं के सीधे सम्पर्क में नहीं आता। रुधिर हृदय से धमनियों व धमनियों से धमनी केशिकाओं में पहुँचता है। धमनी केशिकाओं से रुधिर शिरा केशिकाओं में पहुँचता है जिनसे शिराओं और शिराओं से पुनः हृदय में वापस लौट आता है। इसे बंद रुधिर परिवहन तंत्र कहते हैं।

दोहरा परिवहन तन्त्र मनुष्य में रुधिर परिवहन में दो परिवहन पथ होते हैं –
1. फुफ्फुसी या पल्मोनरी परिवहन:
इस परिवहन पथ में दाहिने निलय के संकुचन से उसमें भरा अशुद्ध रुधिर फुफ्फुस धमनियों द्वारा फेफड़ों में शुद्धीकरण के लिए पहुंचता है। फेफड़ों से शुद्ध रुधिर एक जोड़ी फुफ्फुस शिराओं द्वारा बाएँ अलिन्द में पहुँचता है।
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2. दैहिक या सिस्टेमिक परिवहन:
इस परिवहन पथ में बाएँ निलय के संकुचन से शुद्ध रुधिर दैहिक महाधमनी में से होता हुआ धमनियों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचता है और शिराओं द्वारा एकत्रित अशुद्ध रुधिर अग्र एवं पश्च महाशिराओं द्वारा हृदय के दाहिने अलिन्द में पहुँचता है। इस प्रकार मानव में रुधिर दो बार हृदय से गुजरता है।

प्रश्न 8.
उत्सर्जन से क्या तात्पर्य है। मनुष्य के उत्सर्जी अंगों के नाम लिखिए। मनुष्य के वृक्क की संरचना तथा कार्य-विधि को सचित्र समझाइए। (2010, 11, 12, 13, 15, 18)
या उत्सर्जन किसे कहते हैं ? मनुष्य में वृक्क की संरचना व नामांकित चित्र की सहायता से उत्सर्जन को समझाइए। (2011, 18)
या मनुष्य के उत्सर्जन तन्त्र का नामांकित चित्र बनाइए। (2018)
या मनुष्य की वृक्क नलिका संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए। (2010, 15)
या मानव वृक्क की खड़ी काट का नामांकित चित्र बनाएँ। (2016, 18)
या मनुष्यों में वृक्क के दो प्रमुख कार्य बताइए। (2016, 17)
उत्तर:
उत्सर्जन:
शरीर में विभिन्न उपापचयी क्रियाओं में अनेक अपशिष्ट या वर्ण्य पदार्थ बनते हैं। इनका शरीर में कोई उपयोग नहीं होता। कभी-कभी तो ये अत्यधिक विषैले भी हो सकते हैं। विषैले न होने पर भी अपशिष्ट पदार्थ कोशिकाओं में संचित नहीं किये जा सकते, अत: उनको शरीर से बाहर निकालना ही आवश्यक होता है। अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना ही उत्सर्जन (excretion) कहलाता है। प्रमुख उत्सर्जी अंग मानव शरीर में प्रमुख उत्सर्जी अंग एक जोड़ी वृक्क (kidneys) होते हैं। वृक्कों के अतिरिक्त मनुष्य में यकृत, त्वचा, फेफड़े और आंत भी उत्सर्जन में मदद करते हैं।

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मनुष्य के वृक्क की संरचना:
मानव शरीर में वृक्क (kidneys) मुख्य उत्सर्जी अंग होते हैं। इनका कार्य रुधिर से यूरिया व यूरिक अम्ल आदि उत्सर्जी पदार्थों को छानकर अलग करना तथा उन्हें मूत्र (urine) के रूप में शरीर से बाहर निकालना है। मनुष्य में एक जोड़ी वृक्क, सेम के बीज की आकृति वाले होते हैं। ये उदरगुहा में कशेरुक दण्ड के दोनों ओर (दायें व बायें) स्थित होते हैं।

बायाँ वृक्क दायें वृक्क से कुछ नीचे (पश्च) स्थित होता है। प्रत्येक वृक्क का अन्दर का किनारा मध्य में धंसा हुआ होता है। इसे नाभि (hilum) कहते हैं। बाहरी किनारा उभरा या उत्तल होता है। प्रत्येक वृक्क लगभग 10 सेमी लम्बा, 6 सेमी चौड़ा और 2.5 सेमी मोटा होता है। पुरुष के वृक्क का भार लगभग 150 ग्राम, किन्तु स्त्री में कम होता है। वृक्क के ऊपर अधिवृक्क ग्रन्थि पायी जाती है।
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आन्तरिक संरचना में वृक्क दो स्पष्ट भागों में बँटा होता है-बाहरी गहरे रंग का कॉर्टेक्स (cortex) तथा भीतरी हल्के रंग का मेड्यूला (medulla) वृक्क का मध्य भाग खोखला (hollow) होता है। यह भाग क्रमशः सँकरा होकर भीतरी किनारे पर अधिक सँकरा होकर शीर्षगुहा या श्रोणि (pelvis) बनाता है। मेड्यूला कुछ शंक्वाकार पिरामिड जैसे उभारों में श्रोणि की ओर उभरा रहता है। श्रोणि से ही मूत्रवाहिनी (ureter) निकलती है।

वृक्क में अनगिनत वृक्क नलिकायें या नेफ्रॉन्स (uriniferous tubules or nephrons) होती हैं। प्रत्येक नलिका के सिरे पर एक ग्रन्थि के समान भाग होता है, इसको मैलपीघी कणिका (malpighian corpuscle) कहते हैं। मैलपीघी कणिका में भी दो भाग होते हैं: अन्दर केशिकाओं का जाल, केशिकागुच्छ या ग्लोमेरूलस (glomerulus) तथा बाहर एक कप जैसा बोमेन्स सम्पुट (Bowman’s capsule)।
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इसके बाद नलिका को कई भागों में बाँट सकते हैं; जैसे – समीपस्थ कुण्डलित नलिका, हेनले का लूप तथा दूरस्थ कुण्डलित नलिका। प्रत्येक नलिका के बोमेन सम्पुट में जो रुधिर केशिकाओं का जाल फैला रहता है, वह एक अभिवाही रुधिर केशिका से बनता है, बाद में, एक अपेक्षाकृत सँकरी अपवाही रुधिर केशिका सम्पुट से निकलने के पश्चात् नलिका के अन्य भागों पर जाल बनाती है। इन केशिकाओं में बहने वाले रुधिर से वृक्क नलिका में मूत्र छनता है। दूरस्थ कुण्डलित नलिकायें संग्रह नलिका में खुलती हैं और कई संग्रह नलिकायें मिलकर मोटी संग्रह नलिका में खुलती हैं, जो श्रोणि या पेल्विस में खुलती है; यहीं से मूत्रवाहिनी निकलती है।

वृक्क की क्रिया-विधि:
वृक्कों का प्रमुख कार्य शरीर के उत्सर्जी पदार्थों; जैसे – यूरिया, यूरिक अम्ल आदि को रुधिर से अलग कर मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालना है। इसके अतिरिक्त वृक्क रुधिर में उपस्थित अतिरिक्त जल व लवणों को भी शरीर से निकालकर जल सन्तुलन और लवण सन्तुलन को बनाये रखते हैं। वृक्क नलिका की मैलपीघी कणिका में उपस्थित केशिकाओं के जाल, केशिकागुच्छ में एक अपेक्षाकृत चौड़ी रुधिर वाहिनी से रुधिर प्रवेश करता है।

केशिकाओं के जाल के बाद रुधिर को केशिकागुच्छ से बाहर लाने वाली रुधिर वाहिनी अपेक्षाकृत सँकरी होती है; अत: केशिकागुच्छ में जितना रुधिर प्रवेश करता है, उतना बाहर नहीं निकलता, जिसके फलस्वरूप यहाँ रुधिर का दाब बढ़ जाता है। इस अधिक दाब पर रुधिर कोशिकाओं व प्रोटीन को छोड़कर रुधिर का अधिकांश भाग केशिकागुच्छ की पतली भित्ति से छनकर सम्पुट में आ जाता है। इस छने हुए द्रव में अधिकांश जल तथा अन्य घुलनशील पदार्थ; जैसे यूरिया, यूरिक अम्ल, ग्लूकोज, अनेक लवण आदि होते हैं।

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छनने की इस क्रिया को अतिसूक्ष्म निस्यन्दन (ultrafiltration) कहते हैं। जब यह छना हुआ द्रव वृक्क नलिका के कुण्डलित भाग में आगे बढ़ता है, तो उस भाग की रुधिर केशिकायें इसमें उपस्थित लाभप्रद पदार्थों; जैसे – ग्लूकोज, कुछ लवण, जल आदि को अवशोषित करके पुनः रुधिर में पहुंचा देती हैं। धीरे-धीरे वृक्क में यूरिया, यूरिक अम्ल, कुछ जल व अन्य हानिकारक लवण रह जाते हैं, यह मूत्र (urine) कहलाता है। मूत्र वृक्क नलिका से संग्राहक नलिकाओं में होता हुआ मूत्रवाहिनी में पहुँच जाता है। मूत्रवाहिनी द्वारा मूत्र, मूत्राशय में पहुँच जाता है और समय-समय पर मूत्रमार्ग से बाहर निकाल दिया जाता है।

प्रश्न 9.
वाष्पोत्सर्जन से आप क्या समझते हैं? इसका क्या महत्त्व है? (2012, 13, 14, 15, 16, 17, 18)
या वाष्पोत्सर्जन के चार प्रमुख महत्त्व बताइए। (2016)
उत्तर:
वाष्पोत्सर्जन:
(transpiration) वह क्रिया है जिसमें जीवित पौधे, अपने वायवीय भागों; जैसे पत्तियों, हरे प्ररोह आदि के द्वारा आन्तरिक ऊतकों से अतिरिक्त पानी को वाष्प के रूप में बाहर निकालते हैं। वाष्पोत्सर्जन पौधे के सभी वायवीय भागों से होता है, परन्तु पौधे में पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन करने वाले महत्त्वपूर्ण अंग हैं। ये अत्यधिक चौरस होती हैं और पौधे की वायवीय सतह का एक महत्त्वपूर्ण भाग बनाती हैं। इन पर अधिक संख्या में पर्णरन्ध्र (stomata) दोनों सतहों पर वितरित रहते हैं।

वाष्पोत्सर्जन का महत्त्व:
वाष्पोत्सर्जन को ‘आवश्यक बुराई’ (necessary evil) कहा गया है, क्योंकि वाष्पोत्सर्जन के परिणामस्वरूप पौधों में जल की कमी हो जाती है; अत: विशेष (शुष्क) स्थानों के पौधे तो इसे रोकने के लिये भी अनेक उपाय करते हैं फिर भी यह पौधे के लिये अत्यन्त उपयोगी है। पौधे के लिये वाष्पोत्सर्जन के निम्नलिखित महत्त्व हैं –

1. अतिरिक्त जल का निस्तारण पौधे भूमि से लगातार अपने मूलरोमों द्वारा परासरण व अन्तःशोषण (osmosis and imbibition) के द्वारा जल का अवशोषण करते हैं। शरीर में आवश्यकता की अपेक्षा यह जल कई गुना अधिक होता है, अत: वाष्पोत्सर्जन द्वारा अनावश्यक तथा अतिरिक्त जल (excess water) पौधों के शरीर के बाहर निकलता रहता है।

2. खनिज लवणों की प्राप्ति वाष्पोत्सर्जन तथा जल के अवशोषण (absorption) में एक घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। पौधे द्वारा जितना अधिक वाष्पोत्सर्जन होता है उतना ही अधिक भूमि से जल का अवशोषण होता है। मृदा जल में खनिज लवणों की मात्रा बहुत ही कम होती है अत: पौधों के द्वारा जितना अधिक जल का अवशोषण होता है उतने ही अधिक खनिज लवण (mineral salts) इसमें घुलकर पौधे के शरीर में पहुँचते रहते हैं। अधिक वाष्पोत्सर्जन से रिक्तिका रस में परासरण दाब बढ़ जाता है, इस प्रकार और अधिक लवण पादप शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

3. वाष्पोत्सर्जन कर्षण तथा रसारोहण वाष्पोत्सर्जन के द्वारा चूषण बल (suction pressure) उत्पन्न होता है जो रसारोहण (ascent of sap) के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इससे जल बड़े-बड़े वृक्षों में भी उनकी अत्यधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता है।

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4. ताप का नियमन वाष्पोत्सर्जन के कारण ही पौधे झुलसने से बच जाते हैं, क्योंकि जल की वाष्प बनने के कारण ठण्डक पैदा होती है। इस प्रकार गुप्त ऊष्मा के वाष्प में चले जाने के कारण उसका उपयोग पौधा ताप से बचने में करता है।

5. जल का समान वितरण वाष्पोत्सर्जन द्वारा पौधों के सभी भागों में पानी का वितरण (distribution) समान रूप से हो जाता है।

6. फलों में शर्करा की सान्द्रता अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण फलों में शर्करा की सान्द्रता बढ़ जाती है जिससे फल अधिक मीठे हो जाते हैं।

7. यान्त्रिक ऊतकों व आवरण का निर्माण अधिक वाष्पोत्सर्जन से पौधों में अधिक यान्त्रिक ऊतकों की वृद्धि होती है जिसके कारण पौधे मजबूत होते हैं। ये ऊतक पौधे की जीवाणुओं, कवकों आदि से रक्षा भी करते हैं, विशेषकर बाहरी भागों पर बने उपचर्म (cuticle) आदि के आवरण से।

प्रश्न 10.
पौधों में वाष्पोत्सर्जन कितने प्रकार से होता है? रंध्रीय वाष्पोत्सर्जन क्रिया-विधि का सचित्र वर्णन कीजिए। (2017)
या वाष्पोत्सर्जन की क्रिया में स्टोमेटा की क्या भूमिका है? चित्र द्वारा समझाइए। (2016)
या नामांकित चित्र की सहायता से पर्णरन्ध्रों (Stomata) के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए। (2012, 16)
या रन्ध्र (स्टोमेटा) का स्वच्छ एवं नामांकित चित्र बनाइए। (2013)
या रन्ध्र की रचना तथा कार्य का सचित्र वर्णन कीजिए। पौधों में इनकी क्या उपयोगिता है? (2014, 18)
या रन्ध्र का नामांकित चित्र बनाइए तथा द्वार (गार्ड) कोशिकाओं का वर्णन कीजिए। (2015)
उत्तर:
पौधों में वाष्पोत्सर्जन मुख्यत: तीन प्रकार से होता है –
1. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन
2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन
3. वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन।

रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन:
मूलरोमों द्वारा अवशोषित जल जाइलम द्वारा पत्तियों तक पहुँचता है। जाइलम वाहिकाओं (vessels) तथा वाहिनिकाओं (tracheids) द्वारा जल स्फीति दाब के कारण पत्ती की पर्णमध्यक कोशिकाओं (mesophyll cells) में पहुंचता है। पर्णमध्यक कोशिकाओं के मध्य अन्तराकोशीय स्थान (inercellular spaces) होते हैं। पर्णमध्यक कोशिकाओं से जल वाष्पीकरण के फलस्वरूप जलवाष्प में बदलकर अन्तराकोशीय स्थानों में आ जाता है। जलवाष्प सामान्य विसरण द्वारा रन्ध्रों से वातावरण में चली जाती है। वाष्पोत्सर्जन की दर रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने पर निर्भर करती है।

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पर्णरन्ध्र के खुलने-बन्द होने की क्रिया-विधि:
पर्णरन्ध्र का निर्माण दो विशेष आकार-प्रकार की द्वार कोशिकाओं (guard cells) के द्वारा होता है। इन्हीं कोशिकाओं की स्फीति के कारण आकार में परिवर्तन पर रन्ध्र का छोटा या बड़ा होना निर्भर करता है। जब ये कोशिकाएँ स्फीत (turgid) होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब श्लथ (flaccid) होती हैं तो रन्ध्र बन्द हो जाता है। द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) में परिवर्तन उनके परासरण दाब (osmotic pressure) में परिवर्तन पर निर्भर करता है।

परासरण दाब बढ़ने पर आस-पास की सहायक कोशिकाओं (subsidiary cells) से परासरण की क्रिया के द्वारा पानी आ जाता है और द्वार कोशिकाएँ स्फीत हो जाती हैं; अत: भीतरी मोटी भित्ति, बाहरी भित्ति के बाहर की ओर फूलने के कारण, द्वार कोशिका के अन्दर ही घुस जाती है, फलत: रन्ध्र खुल जाता है। परासरण दाब घटने पर द्वार कोशिकाओं से जल पड़ोसी कोशिकाओं में चले जाने के कारण ये श्लथ हो जाती हैं और रन्ध्र बन्द हो जाते हैं।
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उपयोगिता:
रन्ध्रों द्वारा जलवाष्प विसरण द्वारा वायुमण्डल में चली जाती है। लगभग 90% वाष्पोत्सर्जन रन्ध्रों द्वारा ही होता है।

Bihar Board Class 6 Science Solutions Chapter 18 ठोस कचरा प्रबंधन

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अभ्यास और प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रोजमर्रा के जीवन में प्लास्टिक इस्तेमाल करने के लाभ और हानियों को बताएँ।
उत्तर:
रोजमर्रा के जीवन में प्लास्टिक इस्तेमाल करने का लाभ – प्लास्टिक किस तरह हमारे जीवन में घुल-मिल गया है कि बताना बहुत ही मुश्किल तो नहीं है। प्लास्टिक से हमें बहुत से फायदे तो हुए हैं। जैसे- वर्षा – के दिनों में अगर वर्षा होती हैं तो कोई भी वस्तु को ढंक देने में उसमें पानी का प्रवेश नहीं होता है। अनाज, गेहूँ, चावल इत्यादि चीजों को हम लोग इन प्लास्टिक से ढंक कर ही बचाते हैं। प्लास्टिक के खिलौनों को देखिए, बच्चों को कितना भाता है और यह डर भी नहीं रहता है कि बच्चों के हाथ-पैर कट जाएँ या किसी प्रकार का नुकसान हो सकता है। हम लोग टेबल, कुर्सी, कूलर इत्यादि इन सभी चीजें जो प्लास्टिक से बनती हैं उसी का उपयोग करते हैं क्योंकि इनका वजन लकड़ी या लोहे की अपेक्षा काफी कम होता है।

रोजमर्रा के जीवन में प्लास्टिक इस्तेमाल करने की हानियाँ इस प्रकार हैं –

प्लास्टिक इस्तेमाल करने से हमें काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है। प्लास्टिक की कई चीजों की उपयोगिता बहुत कम समय तक के लिए ही होती हैं और वह जल्द ही कूड़े में फेंक दी जाती है। हमलोग अपने घर के कचड़े को प्लास्टिक की थैलियों में भरकर बाहर फेंक देते हैं जो गली, मोहल्लों के आवारा पशु भोजन की खोज में जब इन थैलियों को देखते हैं तो. प्रायः प्लास्टिक की थैली को भी निगल जाते हैं। कभी-कभी तो इस कारण उनकी मृत्यु भी हो जाती है। सड़कों तथा अन्य स्थानों पर असावधानीपूर्वक फेंकी गई ये प्लास्टिक की थैलियाँ अक्सर बहकर नालों अथवा सीवर में पहुँच जाती हैं। इसके फलस्वरूप नाले अवरूद्ध हो जाते हैं और गंदा जल सड़को पर फैलने लगता है।

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प्रश्न 2.
कचरे के प्रबंधन के लिए हम क्या कर सकते हैं?
उत्तर:
कचरे के प्रबंधन के लिए हम यह जान चुके हैं कि आजकल “विभिन्न प्रकार के कचरों से काफी परेशानियाँ खड़ी हो रही हैं। आने वाले समय में इनके निपटान की समस्या और भी गंभीर हो जाएगी। इसलिए इन कचरे को जिनमें प्लास्टिक भी शामिल है, के निपटारे के लिए निम्न “चार आर” सुझाए गए हैं –

“चार “R” को हम अपनाएंगे
कचरे से छुटकारा पाएंगे।
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आइये इनके बारे में एक-एक करके जानकारी प्राप्त करते हैं।

(क) मना कीजिए (Refuse)-जैसा कि ऊपर हमलोगों ने जान लिया है कि प्लास्टिक की बनी थैलियों या सामानों का उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अतः प्लास्टिक का उपयोग नहीं करने के लिए सभी को मना Refuse कराने हेतु जागरुकता लाने हेतु अभियान चलाना चाहिए।

(ख) उपयोग कम (Reduce)-आजकल चीजों को इस्तेमाल करके फेंक दना बहुत आम बात हो गई है। हम बहुत-सी ऐसी चीजें भी इस्तेमाल करते है जिसके बिना भी काम चलाया जा सकता है। यानि जो बहुत जरूरी नहीं होना है। जैसे -जैसे हम अपनी जरूरतें बढ़ाते हैं वैसे-वैसे कचरे भी बढ़ते चलं जान हैं। जैसे- दुकान में कमीज प्लास्टिक में रखी होती है ताकि वह गंदा न हो। जब हम उसे खरीदते हैं तब दुकानदार उसे अलग थैली में देता है जिस पर दुकान का नाम आदि लिखा होता है। जब हम पहनने के लिए कमीज निकाल लेते हैं तब दोनों थैलियों को फेंक देते हैं। हमें ध्यान भी नहीं रहता कि कमीज के फट जाने के कई साल बाद तक भी ये दोनों थैलियों कचरे का हिस्सा बनी रहेंगी।

(ग) पुन. उपयोग (Refuse) – कुछ कचरा ऐसे होते हैं जिसका पुनः – उपयोग किया जा सकता है, आइए ऐसी कुछ चीजों की सूची बनाइऐ जो आपने हाल ही में कूड़े दान में फेकी हो या कबाड़ी से बंची हो। आपस में चर्चा – कीजिए कि उन चीजों को कैसे दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता था। इस प्रकार चीजों को फेंकने के बजाए उन्हें दुबारा इस्तेमाल करने से कचरे के निपटान में मदद हो जाती है।

(घ) पुन:चक्रण (Recycle)-आपने कबाड़ी वाले को घरों से पुराने अखबार, शीशियाँ, प्लास्टिक और धातु से बनी चीजें खरीदते देखा होगा। इन चीजों को वे ले जाकर बेचते हैं और कारखाना में उन चीजों को कुछ प्रक्रियाओं द्वारा नए रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। इसे पुनः चक्रण कहते हैं।

पुन: चक्रण के लिए हमें क्या करना चाहिए?

  1. हम ऐसी चीजें खरीदें जिनका पुन:चक्रण हो सके।
  2. हम ऐसी चीजें खरीदें जिनका पुन:चक्रण से बनी हो। जैसे- पुनः चक्रण द्वारा बनाया गया कागजा
  3. ऐसी चीजें हम इस्तेमाल करें जिसका पुन:चक्रण हो सके।

कम्पोस्ट खाद – कम्पोस्ट खाद रसोई और बगीचे से निकलने वाले कचरे का पुनःचक्रण करने का सबसे अच्छा तरीका है। कम्पोस्ट का अर्थ है- पौधों और जन्तुओं के मृत शरीर और जैव निम्नीकरणीय पदार्थों का सूक्ष्म जीवों द्वारा मिट्टी जैसे पदार्थ में बदलना (यह पदार्थ मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और खाद के रूप में पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायक होता है। इससे हमें दो फायदे हैं-एक तो खाद मिल जाती है और दूसरा कचरे का भी निपटारा हो जाता है।

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प्रश्न 3.
पुनःचक्रण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कबाड़ी वाले को घरों से पुराने अखबार, शीशियाँ, प्लास्टिक और धातु से बनी चीजें खरीदते देखा होगा। इन चीजों को वे ले जाकर बेचते हैं और कारखानों में उन चीजों को कुछ प्रक्रियाओं द्वारा नए रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। इसे पुन:चक्रण कहते हैं।

प्रश्न 4.
पॉलिथीन का बहुत ज्यादा उपयोग करने से हमें किस प्रकार के नुकसानों का सामना करना पड़ रहा है?
उत्तर:
पॉलिथीन का बहुत ज्यादा उपयोग करने से हमें परेशानी झेलनी पड़ रही है। प्लास्टिक की. कई चीजों की उपयोगिता वहुत कम समय तक के लिए ही होती है और वह जल्द ही कड़े में फेंक दी जाती है। हम अपने घर के कचरे को प्लास्टिक की थैलियों में भरकर बाहर फेंक देते हैं। गली-मोहल्ले के आवारा पशु भोजन की खोज में जब इन थैलियों को देखते हैं तो प्रायः प्लास्टिक की थैली को भी निगल जाते हैं। कभी-कभी तो इस कारण उनकी मृत्यु भी हो जाती है।

सड़कों तथा अन्य स्थानों पर असावधानीपूर्वक फेकी गई ये प्लास्टिक की थैलियाँ अक्सर बहकर नालों अथवा सीवर प्रणाली में पहुँच जाती हैं। फलस्वरूप नाले अवरुद्ध हो जाते हैं और गंदा जल सड़कों पर फैलने लगता है। भारी वर्षा के समय तो बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जमीन या मिट्टी में भी प्लास्टिक के जमा होने से मिटटी पौधों के लिए कम उपयोगी ‘हो जाती है। क्योंकि ऐसे में मिट्टी में पानी का सही निकास नहीं हो पाता है। इन्हीं सभी प्रकारों से नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

प्रश्न 5.
आप पॉलिथीन के अत्यधिक उपयोग को कम करने में कैसे मदद कर सकते हैं?
उत्तर:
पॉलिथीन के अत्यधिक उपयोग को कम करने में निम्न प्रकार से मदद कर सकते हैं- प्लास्टिक की इन्हीं सब हानियों को ध्यान में रखकर सरकार ने प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने का निश्चय किया है। इस अभियान में स्कूल के बच्चे भी बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं। प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल न करना इसी अभियान का एक हिस्सा है।

आइए हम देखें कि प्लास्टिक का उपयोग कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं।

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(क) बाजार जाते समय घर से कपड़े अथवा जूट की थैली लेकर जाएँ।
(ख) दुकानदार से प्लास्टिक की थैली न लें। उनको समझाएं कि वे कागज की थैलियों का इस्तेमाल करें।
(ग) हम खाद्य पदार्थों को रखने के लिए प्लास्टिक की थैलियों यानि पॉलिथीन का उपयोग न करें।
(घ) पॉलिथीन की थैलियों को सडक और नालियों में न फेंके।
(ङ) हम प्लास्टिक को कभी भी जलाएँ नहीं. क्योंकि जलाने पर इनसे हानिकारक गैसें निकलती हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। पालिथीन के कम उपयोग करने से हमें मदद मिल सकती है।

प्रश्न 6.
निम्न कथनों में सत्य के सामने (सत्य) तथा असत्य कथन के सामने (असत्य) का चिह्न लगाएँ।
(क) कचरे के कारण वायु, जल एवं भूमि दुषित हो जाते हैं।
(ख) पदार्थ जिनका विघटन आसानी से हो जाता है जैव निम्नीकरणीय पदार्थ कहलाती है।
(ग) पदार्थ जिनका विघटन आसानी से नहीं हो सकता, जैव अनिम्नीकरणीय पदार्थ कहलाती है।
(घ) पुराने अखबार, शीशियों, प्लास्टिक और धातु से बनी चीजों को कुछ प्रक्रियाओं द्वारा नए रूप में परिवर्तित करना “पुन:चक्रण” कहलाती है।
उत्तर:
(क) सत्य
(ख) सत्य
(ग) सत्य
(घ) सत्य।

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अध्ययन सामग्री:

आम तौर पर प्रत्येक व्यक्ति अपने दिनचर्या में कुछ-न-कुछ पदार्थों को – जहाँ-तहाँ छोड़ते चले जाते हैं जिसमें कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनका प्रयोग हम दुबारा नहीं कर सकते हैं। लेकिन कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं। जिसका प्रयोग हम अन्य कार्यों में कर सकते हैं। लेकिन जहाँ-तहाँ छोड़ने पर यह बेकार हो जाते हैं तथा यही कचरा कहलाता है। यानि वे अपशिष्ट पदार्थ जो हमारे पर्यावरण के लिए प्रदूषक का काम करता हो उसे कचरा कहते हैं।

कचरा के रूप में फैले पदार्थों के अध्ययन से पता चलता है कि कुछ ऐसे पदार्थ हैं जो सड़-गल जाते हैं। कुछ सड़ते-गलते नहीं हैं। जो पदार्थ सड़-गल जाते हैं वे जैव निम्नीकरणीय पदार्थ कहलाते हैं। जैसे- फलों एवं सब्जियों के छिलके, कागज, गत्ता, पत्ती आदि। जो पदार्थ सड़ते-गलते नहीं हैं यानि जिसका जैविक विघटन नहीं हो पाता है उसे जैव अनिम्नीकरणीय – पदार्थ कहते हैं। जैसे- प्लास्टिक, धातु, काँच और सीमेंट आदि।

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अपशिष्ट पदार्थ जैसे टूटे खिलौने, पुराने कपड़े, जूते, चप्पल, पॉलीथीन आदि को हमलोग जहाँ-तहाँ फेंक देते हैं जिससे वातावरण दूषित हो जाता है। इन अपशिष्ट पदार्थों के निम्नलिखित दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

  • वायु, जल एवं भूमि प्रदूषित होती है।
  • स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • वातावरण की सुन्दरता नष्ट हो जाती है। आदि।

वर्तमान में प्रदूषण अपने भयावह रूप को धारण करते जा रहा है जिससे पूरा सजीव-जगत के जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे प्रभावित हो रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो पूरे सजीव जगत का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। आजकल पूरे संसार के अधिकांश गाँव और शहर कूड़े के निपटान की समस्या का सामना कर रहे हैं। कचरे को निपटाने के लिए ऐसे तरीके सोचें जा रहे हैं जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाए एवं गाँव/शहर को भी साफ-सुथरा रख सके।

आजकल तो कचरा से कम्पोस्ट खाद आदि बनाया जाने लगा है। पूर्णत: गलने वाला कचरा, जिससे दुर्गध नहीं आती है। परिवर्तित यानि जैविक विघटन के माध्यम से विघटित होकर खाद बनाता हो। खाद बनाने की प्रक्रिया को. कम्पोस्टिंग कहते हैं।

प्रदूषण को रोकने के लिए हमें सरकार तथा गैर सरकारी संस्थान ने अनेक कदम उठाए हैं लेकिन यह सफल तभी होगा जबतक हम-आप जागरूक नहीं होंगे।

अतः हमें ऐसी चीजें इस्तेमाल करना चाहिए जिसका पुन:चक्रण हो सके। कम्पोस्ट खाद रसोई तथा बगीचे से निकलनेवाले कचरे का पुन:चक्रण करने का सबसे अच्छा तरीका है। कम्पोस्ट बनाने का अर्थ -पौधों और जन्तुओं के मृत शरीर और जैव-निम्नीकरणीय पदार्थों का सूक्ष्म जीवों द्वारा मिट्टी जैसे पदार्थ में बदलना। यह खेत को उपजाऊ बनाता है। खाद के रूप में पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायक होता है। इससे हमें दो लाभ होते हैं- एक तो खाद मिल जाती है और दूसरा कचरे का भी निपटारा हो जाता है।

इस प्रकार हम-आप मिलकर कचरा कम फैलाएँ ताकि हमारा पर्यावरण साफ एवं स्वच्छ रह सके।

Bihar Board Class 6 Social Science History Solutions Chapter 3 प्रारंभिक समाज

Bihar Board Class 6 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 1 Chapter 3 प्रारंभिक समाज Text Book Questions and Answers, Notes.

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अभ्यास

आइए याद करें –

प्रश्न 1.
वस्तुनिष्ठ प्रश्न :

प्रश्न (क)
आरंभिक मानव बस्तियों से जुड़ा पैसरा नामक स्थल बिहार के किस जिले में अवस्थित है?
(i) गया
(ii) गोपालगंज
(iii) मुंगेर
(iv) दरभंगा
उत्तर-
(iii) मुंगेर

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प्रश्न (ख)
पुरापाषाण काल को कितने भागों में बाँटा जाता है?
(i) तीन
(ii) पाँच
(ii) दो
(iv) सात
उत्तर-
(i) तीन

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें –

प्रश्न (i)
आरंभिक मानव इधर-उधर क्यों घूमते रहते थे?
उत्तर-
आरंभिक मानव के इधर-उधर घूमने के मुख्यतः चार कारण हो सकते हैं जो इस प्रकार हैं

  1. किसी भी क्षेत्र में फल, कंदमूल और जानवरों की संख्या सीमित रहती थी जब ये खत्म हो जाते तो भोजन की खोज के लिए लोग स्थान । परिवर्तन करते।
  2. मौसम के परिवर्तन के कारण भी स्थान का परिवर्तन करते थे।
  3. कभी-कभी शिकारं को पकड़ने के लिए दूर-दूर तक चले जाते थे।
  4. पानी की खोज के लिए भी इधर-उधर भटकते रहते थे।

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प्रश्न (ii)
मध्यपाषाण काल में क्या बदलाव आए?
उत्तर-
मध्यपाषाण काल में पर्यावरणीय बदलाव आया और वातावरण में गर्मी बढ़ने लगी जिसके कारण गेहूँ, जौ, महुआ जैसे अनाज स्वयं उग आए तथा कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान बनने लगे । घास पर आश्रित जानवरों की संख्या इस वजह से बढ़ने लगी । इस समय लोगों द्वारा पत्थरों के और अच्छे औजार बनाये जाने लगे, जिसे लकड़ी पर लगातार इस्तेमाल किया जाने लगा । मध्यपाषाण काल में यही सब बदलाव आये ।

आइए चर्चा करें –

प्रश्न (i)
आरंभिक मानव पत्थर के औजारों से जो काम लेते थे,उनकी एक सूची बनायें। क्या आपके घर में पत्थर के औजार का इस्तेमाल होता है? यदि होता है तो इससे क्या काम किया जाता है ?
उत्तर-
पत्थर के औजार जो नुकीले थे उससे खुरचने, कंदमूल खोदकर निकालने और पेबुल पत्थर के बने औजार से मांस काटने का काम करते थे। हमारे घरों में इस प्रकार के औजार नहीं हैं।

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प्रश्न (ii)
आरंभिक मानव के भोजन में जो खाद्य-पदार्थ शामिल थे, उनकी एक सूची बनायें।
उत्तर-
आरंभिक मानव, कंदमूल, फल, जानवरों के मांस. मछली ही मुख्य आहार थे।

प्रश्न (iii)
आज के जीवन में इस्तेमाल किए जाने वाले औजरों की तुलना आरंभिक मानव के औजारों से करें और दोनों में क्या अन्तर और समानता है बताएँ ।
उत्तर-
छात्र स्वयं करें ।

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पाठ का सारांश

  • कोर पत्थर और पेंबुल पत्थर से बने औजार बड़े होते थे और इनका उपयोग भूमि खोदने या मांस काटने में किया जाता था
  • आरंभिक मानव ने आग की खोज की।
  • मांस को पकाकर या भून कर खाया जाता था ।
  • ये प्राय: 30-35 लोगों के एक समूह में रहते थे तथा एक समूह में रहने वाले मानवों के बीच सामाजिक सम्बन्ध मजबूत होते थे ।
  • ये भोजन और पानी की खोज में सदा इधर-उधर घूमते रहते थे।
  • ये प्रतीकों, होखाओं या सांकेतिक तरीके से एक-दूसरे से बातचीत करते थे।
  • होमोडुरेक्टस, नियंडरथल और होतोसेपियन्स या ज्ञानी मानव को आरंभिक मानव या आदिम मान कहते है ।
  • आरंभिक मानव भारतीय उपमहाद्वीप में 20 लाख वर्ष पहले रहा करते. थे ।
  • आरंभिक मानव कन्दमूल इकट्ठा कर और शिकार कर अपना जीवन यापन करते थे।
  • आदिम मानव पहाड़ियों में स्थित गुफाओं, कन्दराओं, नदियों और झील के किनारे रहते थे।
  • इनके औजार पत्थरों के बने होते थे ।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Text Book Questions and Answers.

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प्रश्न 1.
सिद्ध कीजिए कि दो प्रतिछेद करते हुए वृत्तों के केन्द्रों की रेखा दोनों प्रतिच्छेद बिन्दुओं पर समान कोण अन्तरित करती है।
उत्तर:
माना O तथा O’ केन्द्र पाले वृत्त परस्पर A तथा B पर प्रतिच्छेद करते हैं। OO’ रेखाखंठ मिलाया।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 1
∆AOO’ तमा ∆BOO’ में,
OA = OB (केन्द्र O वाले व्रत की विश्वा)
OA = OB (केन्द्र O’ वाले वृत्त की त्रिज्या)
OO’ = OO’ (उभयनिष्ठ)
∆AOO’ ≅ ∆BOO’ (SSS गुणधर्म में)
∠OAO’ = ∠OBO’.

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6

प्रश्न 2.
एक वृत्त की 5 cm तथा 11 cm लम्बी दो जीवाएँ AB और CD समांतर है और केन्द्र की विपरीत दिशा में स्थित हैं। यदि AB और CD के बीच की दूरी 6 cm हो, तो वृत्त की जिज्या ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
OM ⊥ AB तथा ON ⊥ CD खींचा तथा OB और OD को मिला।
BM = \(\frac{AB}{2}\) = \(\frac{5}{2}\)
ND = \(\frac{CD}{2}\) = \(\frac{11}{2}\)
माना ON = x अत: OM = 6 – x
∆MOB में, OM² + MB² = OB²
(6 – x)² + (\(\frac{5}{2}\))² = OB²
36 + x² – 12x + \(\frac{25}{4}\) = OB² ……. (1)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 2
∆NOD में,
ON² + NO² = OD²
(x)² + (\(\frac{11}{2}\))² = OD²
⇒ x² + \(\frac{121}{4}\) = OD² …….. (2)
OB = OD (त्रिज्याएँ।)
समो. (1) व (3) से,
36 + x² – 12x + \(\frac{25}{4}\) = x² + \(\frac{121}{4}\)
⇒ 12x = 36 + \(\frac{25}{4}\) – \(\frac{121}{4}\)
⇒ 12x = \(\frac{144+25-121}{4}\) = \(\frac{48}{4}\) = 12
∴ x = 1
समी. (2) से,
(1)² + (\(\frac{121}{4}\)) = OD²
OD² = 1 + \(\frac{121}{4}\) = \(\frac{125}{4}\)
OD = \(\frac{5}{2}\) √5
अतः वृत्त की त्रिज्या = \(\frac{5}{2}\) √5 cm

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6

प्रश्न 3.
किसी वृत्त की दो समांतर जीवाओं की लम्बाइयाँ 6 cm और 8 cm हैं। यदि छोटी जीवा केन्द्र से 4 cm की दूरी पर हो, तो दूसरी जीवा केन्द्र से कितनी दूर है?
उत्तर:
माना O वृत्त वाले केन्द्र को दो जीवाएँ AB तथा CD हैं। OB तथा OD को मिलाया।
MB = \(\frac{AB}{2}\) = 6 = 3 cm
∆OMB में, OM² + MB² = OB²
(4)² + (3)² =OB²
⇒ 16 + 9 = OB²
⇒ OB = 5cm
ND = \(\frac{CD}{2}\) = \(\frac{8}{2}\) = 4 cm
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 3
∆OND में, ON² + ND² = OD²
ON² + (4)² = (5)²,
⇒ ON² = 9
⇒ ON = 3
अत: बड़ी जीवा की केन्द्र से दूरी = 3 cm.

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प्रश्न 4.
मान लीजिए कि कोण ∠ABC का शीर्ष एक वृत्त के बाहर स्थित है और कोण की भुजाएँ वृत्त से बराबर जीवाएँ AD और CE काटती हैं। सिद्ध कीजिए कि ∠ABC जीवाओं AC तथा DE द्वारा केन्द्र पर अंतारित कोणों के अन्तर का आया है।
उत्तर:
∠BDC में,
∠ADC = ∠DBC + ∠DCB …….. (1)
हम जानते है केन्द्र पर बना कोण शेष परिधि पर बने कोप का दो गुना होता है।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 4
समी. (1) व (2) से,
\(\frac{1}{2}\) ∠AOC = ∠ABC + \(\frac{1}{2}\) ∠DOE
[∵ ∠DBC = ∠ABC]
⇒ ∠ABC = \(\frac{1}{2}\) (∠AOC – ∠DOE)
अत: ∠ABC जीवाओं AC तथा DE द्वारा केन्द्र पर अंतरित कोणों के अन्तर का आया है।

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प्रश्न 5.
सिद्ध कीजिए कि किसी समचतुर्भुज की किसी भजा को व्यास मानकर खींचा गया वत्न उसके विकणों के प्रतिच्छेद बिन्दु से होकर जाता है।
उत्तर:
माना ABCD एक समचतुर्भुज है जिसके विकर्ण परस्पर O पर प्रतिच्छेद करते हैं तथा CD को व्यास मानकर वृत्त खींचा। हम जानते है व्यास चाप पर 90° का कोण बनाता है।
∴ COD = 90°
समचतुर्भुज में विकर्ण परस्पर 90 पर प्रतिच्छेद करते हैं।
∠AOB = ∠BOC = ∠COD = ∠DOA = 90°
अता: बिन्दु O वत पर स्थित है।

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प्रश्न 6.
ABCD एक समांतर चतुर्भुज है। A, B और C से जाने वाला वृत्त CD (यदि आवश्यक हो तो बड़ाकर) को E पर प्रतिच्छेद करता है। सिद्ध कीजिए कि AE = AD है।
उत्तर:
माना ∆AED एक समद्विबाहु त्रिभुज है।
AE = AD के लिए सिद्ध करना होगा कि ∠AED = ∠ADE.
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 5
चूंकि ABCE एक चक्रीय चतुर्भुव है।
∴ ∠AED + ∠ABC = 180° …….. (1)
कि CDE एक सीधी रेखा है।
⇒ ∠ADE + ∠ADC = 180° …….. (2)
समी. (1) व (2) से,
∠AED + ∠ABC = ∠ADE + ∠ABC
(∵ ∠ADC = ∠ABC, समाता चतुर्भुज के सम्मुख कोप है।)
⇒ ∠AED = ∠ADE
∴ ∆AED में, ∠AED = ∠ADE
⇒ AD = AE.

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प्रश्न 7.
AC और BD एक वृत्त की जीवाएं जो परस्पर समद्विभाजित करती हैं। सिद्ध कीजिए:
(i) AC और BD व्यास हैं।
(ii)ABCD एक आयत है।
उत्तर:
(1) माना वस का केन्द्र ‘O’ है तथा इसको जीवाएँ AB व CD हैं।
∆AOB तथा ∆COD में,
OA = OC
(O, AC का मध्य बिन्दु है।)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 6
OB = OD (O, BD का मध्य बिन्दु है)
∠AOB = ∠COD (शीर्षाभिमुख)
∆AOB ≅ ∆COD (SAS गुणधर्म से)
AB = CD
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 7
⇒ AC वृत्त को दो भागों में विभाजित करता है।
⇒ AC एक व्यास है, इसी प्रकार BD एक ज्यास है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6

(ii) कि ∆AOB ≅ ∆COD
(कपर सिद्ध किया है।)
⇒ ∠OAB अर्थात् ∠CAB = ∠OCD अर्थात् ∠ACD
⇒ AB || CD
∆AOD ≈ ∆BOC
⇒ AD || BC
⇒ ABCD एक चीय समांतर चतुर्भुज है।
⇒ ∠DAB = ∠DCB ……. (3)
(समांतर चतुर्भुज के सम्मुख कोण)
ABCD एक चक्रीय चतुर्भुज है।
∴ ∠DAB + ∠DCB = 180° ……. (4)
समो.(3) तथा (4) से, ∠DAB = ∠DCB = 90°
अतः ABCD एक आयत है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6

प्रश्न 8.
एक त्रिभुज ARC के कोणों A, B और C के समद्विभाजक इसके परिवृत्त को क्रमश: D, E और F घर प्रतिच्छेद करते हैं। सिद्ध कौजिए कि त्रिभुज DEF के कोण 90° – \(\frac{1}{2}\) A, 90° – \(\frac{1}{2}\) B तथा 90° – \(\frac{1}{2}\) C हैं।
उत्तर:
प्रश्नानुसार, AD, ∠A का अर्जक है।
∴ ∠1 = ∠2 = \(\frac{A}{2}\)
तथा BE, ∠B का अईक है।
∴ ∠3 = ∠4 = \(\frac{B}{2}\)
तथा CF, ∠C का अईक है।
∴ ∠5 = ∠6 = \(\frac{C}{2}\)
समान वृत्तखंड के कोण भी समान होते हैं, अतः
∠9 = ∠3 (AE द्वारा अंतरित कोण) …….. (1)
तथा ∠8 = ∠5 (FA द्वारा अंतरित कोण) ……… (2)
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 8
समी (1) तथा (2) को जोड़ने पर,
∠9 = ∠8 = ∠3 + ∠5
⇒ ∠D = \(\frac{B}{2}\) + \(\frac{C}{2}\)
इसी प्रकार, ∠E = \(\frac{B}{2}\) + \(\frac{C}{2}\) और ∠F = \(\frac{A}{2}\) + \(\frac{B}{2}\)
∆DEF में, ∠D + ∠E + ∠F = 180°
⇒ ∠D = 180° – (∠E + ∠F)
⇒ ∠D = 180° – (\(\frac{A}{2}\) + \(\frac{C}{2}\) + \(\frac{A}{2}\) + \(\frac{B}{2}\))
⇒ ∠D = 180° – (\(\frac{A}{2}\) + \(\frac{B}{2}\) + \(\frac{C}{2}\)) – \(\frac{A}{2}\)
⇒ ∠D = 180° – 90° – \(\frac{A}{2}\)
[∵ ∠A + ∠B + ∠C = 180°]
⇒ ∠D = 90° – \(\frac{A}{2}\)
इसी प्रकार, हम सिद्ध कर सकते हैं कि
∠E = 90° – \(\frac{B}{2}\) तथा ∠F = 90° – \(\frac{C}{2}\)

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6

प्रश्न 9.
दो सर्वागसम वृत्त परस्पर बिन्दुओं A और B पर प्रतिच्छेद करते हैं। A से होकर कोई रेखाखण्ड PAQ इस प्रकार खींचा गया है कि P और Q दोनों वृत्तों पर स्थित हैं। सिद्ध कीजिए कि BP = BQ है।
उत्तर:
माना O तथा O’ ‘दो सागसम वृत्तों के केन्द्र हैं। चूंकि AB इन वृत्तों की उभयनिष्ठ जीवा है।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 9
∴ चाप ACB = चाप ADB
⇒ ∠BPA = ∠BQA
= BP = BQ

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प्रश्न 10.
किसी त्रिभुज ABC में, यदि ∠A का समद्विभाजक तंधा BC का लम्ब समद्विभाजक प्रतिच्छेद करें, तो सिद्ध कीजिए कि वे ∆ABC के परिवृत्त पर प्रतिच्छेद करेंगे।
Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6 Q 10
उत्तर:
दिया गया है: ABC एक त्रिभुल है तथा जलजसकेसीयों से रोका जाता है।
∠A का अर्दक तथा BC का लम्बअर्द्धक परस्पर P पर प्रतिच्छेद करते हैं।
सिद्ध करना है : त्रिभुज ABC की परिधि बिन्दु P से होकर जाती है।
उपपत्ति: लम्ब अईक पर स्थित कोई बिन्दु भुजा के अन्त बिन्दु से समान दूरी पर है।
∴ BP = PC …….. (1)
यह भी है, ∠1 = ∠2 ……. (2)
[∵ AP, ∠A का अर्द्धक है।]
समी. (1) तथा (2) से,
हम जानते है कि समान वृत्तसण्ड समान कोण अन्तरित करते हैं, जोकि A पर अन्तरित होता है।
अत: BP तथा PC, ∆ABC के परिधि की जीवा तथा चाप BP तथा PC सर्वांगसम वृत्त के भाग है। अतः परिवृत्त पर विचत है। अत: बिन्द A, B, P तथा C समचक्रोष है।

Bihar Board Class 9 Maths Solutions Chapter 10 वृत्त Ex 10.6