Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 7 पुत्र वियोग

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 7 पुत्र वियोग

 

पुत्र वियोग वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ–

Bihar Board Class 12 Hindi Book Solution प्रश्न 1.
‘मुकुल’ त्रिधारा आदि सुभद्रा कुमारी चौहान की कैसी कृतियाँ हैं?
(क) काव्य कृतियाँ
(ख) नाट्य कृतियाँ
(ग) कहानी–संग्रह
(घ) एकांकी–संग्रह
उत्तर-
(क)

Bihar Board Hindi Book Class 12 Pdf Download प्रश्न 2.
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म कब हुआ था?
(क) 16 अगस्त, 1904 ई.
(ख) 18 अगस्त, 1910 ई.
(ग) 15 अगस्त, 1902 ई.
(घ) 20 अगस्त, 1915 ई.
उत्तर-
(क)

Hindi Book Class 12 Bihar Board 100 Marks प्रश्न 3.
सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी कविता कौन–सी है?
(क) प्यारे–नन्हें बेटे को
(ख) पुत्र–वियोग
(ग) हार–जीत
(घ) गाँव का घर
उत्तर-
(ख)

Class 12 Hindi Book Bihar Board प्रश्न 4.
माँ के लिए अपने मन को समझाना कब कठिन हो जाता है?
(क) घन नष्ट होने पर
(ख) पुत्र मृत्यु पर
(ग) पति मृत्यु पर
(घ) पिता मृत्यु पर
उत्तर-
(ख)

Bihar Board Solution Class 12th Hindi प्रश्न 5.
“बिखरे मोती समा के खेल’ सुभद्रा कुमारी चौहान की कौन–सी कृतियाँ हैं?
(क) कहानी–संग्रह
(ख) उपन्यास
(ग) संस्मरण
(घ) आलोचना
उत्तर-
(क)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

बिहार बोर्ड हिंदी बुक Class 12 Pdf प्रश्न 1.
मेरा खोया हुआ………..।
अबतक मेरे पास न आया।
उत्तर-
खिलौना

Hindi Book Class 12 Bihar Board 100 Marks Pdf प्रश्न 2.
आज दिशाएँ भी हँसती हैं
है उल्लास……… पर छाया।
उत्तर-
विश्व

Bihar Board 12th Hindi Book Pdf प्रश्न 3.
शीत न लग जाए, इस भय से
नहीं ……… से जिसे उतारा।
उत्तर-
गोद

Hindi Class 12 Bihar Board प्रश्न 4.
छोड़ काम दौड़ कर आई,
………. कहकर जिस समय पुकारा।
उत्तर-
‘माँ’

Hindi Book Class 12 Bihar Board 100 Marks Syllabus प्रश्न 5.
……… दे दे जिसे सुलाया,
जिसके लिए लोरियाँ गाई।
उत्तर-
थपकी

पुत्र वियोग अति लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Class 12 Hindi Book Pdf प्रश्न 1.
कवयित्री स्वयं को असहाय क्यों कहती है?
उत्तर-
पुत्र वियोग के कारण।

दिगंत भाग 2 Pdf 12th Download प्रश्न 2.
सुभद्रा कुमारी चौहान का खिलौना क्या है?
उत्तर-
उसका पुत्र।

Bihar Board Class 12 Hindi Book प्रश्न 3.
माँ के लिए अपने मन को समझाना कब कठिन हो जाता है?
उत्तर-
पुत्र की मृत्यु पर।

Hindi Book Class 12 Bihar Board 100 Marks Pdf Download प्रश्न 4.
सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी कविता कौन–सी है?
उत्तर-
पुत्र वियोग।

पुत्र वियोग पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

12th Hindi Book 100 Marks Bseb Pdf Download प्रश्न 1.
कवयित्री का खिलौना क्या है?
उत्तर-
कवयित्री का खिलौना उसका बेटा है। बच्चों को खिलौना प्रिय होता है। उसी प्रकार कवयित्री माँ के लिए उसका बेटा उसके जीवन का सर्वोत्तम उपहार है। इसलिए वह कवयित्र का खिलौना है।

Class 12th Hindi Book Bihar Board प्रश्न 2.
कवयित्री स्वयं को असहाय और विवश क्यों कहती है?
उत्तर-
कवयित्री स्वयं को असहाय तथा विवश इसलिए कहती है कि उसने अपने बेटे की देख–भाल तथा उसके लालन–पालन पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर दिया। अपनी सुविधा असुविधा का कभी विचार नहीं किया। बेटा को ठंढ न लग जाए बीमार न पड़ जाए इसलिए सदैव उसे गोदी में रखा। इन सारी सावधानियों तथा मन्दिर में पूजा–अर्चना से वह अपने बेटे की असमय मृत्यु नहीं टाल सकी। नियमि के आगे किसी का वश नहीं चलता। अतः, वह स्वयं को असहाय तथा बेबस माँ कहती है।

प्रश्न 3.
पुत्र के लिए माँ क्या–क्या करती है?
उत्तर-
पुत्र के लिए माँ निजी सुख–दुख भूल जाती है। उसे अपनी सुख–सुविधा के विषय में सोचने की अवकाश नहीं रहता। वह बच्चे के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का पूरा ध्यान रखती है। बेटा को ठंढ़ न लग जाए अथवा बीमार न पड़ जाए, इसके लिए उसे सदैव गोद में लेकर उसका.. मनोरंजन करती रहती है। उसे लोरी–गीत सुनाकर सुलाती है। उसके लिए मन्दिरों में जाकर पूजा–अर्चना करती है तथा मन्नतें माँगती है।

प्रश्न 4.
अर्थ स्पष्ट करें–
आज दिशाएँ भी हँसती हैं
है उल्लास विश्व पर छाया
मेरा खोया हुआ खिलौना
अब तक मेरे पास न आया।
उत्तर-
आज सभी दिशाएँ पुलकित हैं, सर्वत्र प्रसन्नता छाई हुई है। सारे विश्व में उल्लास का वातावरण है। किन्तु मेरा (कवयित्री) खोया हुआ खिलौना अब मुझे प्राप्त नहीं हुआ। अर्थात् कवयित्री के पुत्र का निधन हो गया है। इस प्रकार वह उससे (कवयित्री) छिन गया है। यह उसकी व्यक्तिगत क्षति है। विश्व के अन्य लोग हर्षित हैं। सभी दिशाएँ भी उल्लासित (प्रमुदित) दिख रही हैं। किन्तु कवयित्री ने अपना बेटा खो दिया है। उसकी मृत्यु हो चुकी है। वह उद्विग्न है शोक विह्वल है। अपनी असंयमित मनोदशा में वह बेटा के वापस आने की प्रतीक्षा करती है और नहीं लौटकर आने पर निराश हो जाती है।

प्रश्न 5.
माँ के लिए अपना मन समझाना कब कठिन है और क्यों?
उत्तर-
माँ के लिए अपने मन को समझाना तब कठिन हो जाता है, जब वह अपना बेटा खो देती है। बेटा माँ की अमूल्य धरोहर होता है। बेटा माँ की आँखों का तारा होता है। माँ का सर्वस्व यदि क्रूर नियति द्वारा उससे छीन लिया जाता है उसके बेटे की मृत्यु हो जाती है तो माँ के लिए अपने मन को समझाना कठिन होता है।

प्रश्न 6.
पुत्र को ‘छौना’ कहने से क्या भाव हुआ है, इसे उद्घाटित करें।
उत्तर-
‘छौना’ का अर्थ होता हे हिरण आदि पशुओं का बच्चा ‘पुत्र वियोग’ शीर्षक कविता में कवयित्री ने ‘छौना’ शब्द का प्रयोग अपने बेटा के लिए किया है। हिरण अथवा बाघ का बच्चा बड़ा भोला तथा सुन्दर दिखता है। इसके अतिरिक्त चंचल तथा तेज भी होती है। अतः, कवयित्री द्वारा अपने बेटा को छौना कहने के पीछे यह विशेष अर्थ भी हो सकता है।

प्रश्न 7.
मर्म उद्घाटित करें–
भाई–बहिन भूल सकते हैं
पिता भले ही तुम्हें भुलाये
किन्तु रात–दिन की साथिन माँ
कैसे अपना मन समझाएँ।
उत्तर-
भाई तथा बहिन, अपने भाई को भूल जा सकते हैं। पिता भी अपने बेटे को विस्मृत कर सकता है, पर उसकी ममतामयी माँ जो सदैव उसके पास रहती है, गोद में लेकर मन बहलाती है। उसको सुलाने के लिए लोरी गीत सुनाती है, वह माँ अपने बेटा को नहीं भूल सकती है। वह तो सदैव एक सच्चे साथी के समान, उसके पास सदैव रही है। उसको दिन रात गोदी में लेकर मन बहलाती रही है। अतः, वे बेटा को मौत के बाद अपने मन को कैसे समझाए।

प्रश्न 8.
कविता का भावार्थ संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
‘पुत्र वियोग’ शीर्षक कविता में अपने बेटे की मौत के बाद उसकी शोकाकुल माँ के मन में उठनेवाले अनेक निराशाजनक तथा असंयमित विचार तथा उससे उपजी विषादपूर्ण मन:स्थिति का उद्घाटित किया गया। कवयित्री अपने बेटे के आकस्मिक तथा अप्रत्याशित निधन से मानसिक तौर पर अशान्त है। वह अपनी विगत स्मृतियों को याद कर उद्विग्न है। एक माँ के हृदय में उठनेवाले झंझावत की वह स्वयं भुक्तभोगी है। कविता में कवयित्री द्वारा नितांत मनोवैज्ञानिक तथा स्वाभाविक चित्रण किया गया है।

बेटा की मौत से कवयित्री विषाद के गहरे सदमे में डूबी है–उसका प्यारा बेटा अब उसे दूर चला गया है। उसने उसे दिन–रात गोद में लेकर ठंड तथा रोग से बचाया, लोरियाँ सुनाकर उसे सुलाया। उसके लिए मंदिरों में पूजा–अर्चना की, मन्नतें मांगी। किन्तु ये सारे प्रयास निरर्थक हो गए। अब वह दुखी माँ एक पल के लिए भी अपने बेटा का मुख देखना चाहती है उसे अपनी छाती से चिपकाकर स्नेह को वर्षा करना चाहती है, उससे बातचीत कर कुछ समझाना चाहती है। शोकाकुल कवयित्री (माँ) भावावेश में इतनी असंयमित हो जाती है कि वह अपने मृत बेटा को संबोधित करते हुए यहाँ तक कहती है–अब तुम सदा मेरे पास रहो, मुझे छोड़ कर मत जाओ।

वस्तुतः कवयित्री ने अपने बेटे की मौत से उपजे दु:खिया माँ के शोकपूर्ण उद्गारों का स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। ऐसी युक्तियुक्तपूर्ण एवं मार्मिक प्रस्तुति अन्यत्र दुर्लभ है। महादेवी वर्मा की एक मार्मिक कविता इस प्रकार है, जो माँ की ममता को प्रतिबंधित करती है, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

प्रश्न 9.
इस कविता को पढ़ने पर आपके मन पर क्या प्रभाव पड़ा, उसे लिखिए।
उत्तर-
‘पुत्र वियोग’ कविता में कवयित्री ने अपने बेटा की मृत्यु तथा उससे उपज विवाद की अभिव्यक्ति की है। कवयित्री की विरह–वेदना, अतीत के पृष्ठों को उलटते हुए विगत की स्मृतियों को दुहराना पाठक के मन में करुणा विषाद की रेखा खींच देती है। उसकी (पाठक) की भावनाएँ कवयित्री (माँ) के शोकाकुल क्षणों में अपनी संवेदना प्रकट करती दिखती है।

मेरे मन में भी कुछ इसी प्रकार के मनोभावों का आना स्वाभाविक है। किसका ‘हृदय संवेदना से नहीं भर उठेगा? कौन कवयित्री के शोकोद्गारों की गहराई में गए बिना रहेगा।

एक माँ का अपने बेटे को दिन रात देखभाल करना बीमारी, ठंड आदि से रक्षा के लिए उसे गोदी में खेलाते रहना। स्वयं रात में जागकर उसे लोरी सुनाकर सुलाना ! अपने दाम्पत्य जीवन को खुशी को संतान पर केन्द्रित करना। अंत में नियति के क्रूर चक्र की चपेट में बेटा की मौत। इन सारे घटनाक्रमों से मैं मानसिक रूप से अशांत हो गया। मुझे ऐसा अहसास हुआ जैसे यह त्रासदी मेरे साथ हुई। कविता में कवयित्री ने अपनी सम्पूर्ण संवेदना को उड़ेल दिया है, करुणा उमड़ पड़ी तथा असहाय दर्द की अनुभूति होती है।

पुत्र वियोग भाषा की बात

प्रश्न 1.
सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य–भाषा पर संक्षिपत टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य–भाषा यथार्थनिष्ठा राष्ट्रीय भावधारा है। वे अपने समकालीन छायावादी काव्यधरा के समान्तर रूप से काव्य रचना करनेवाली राष्ट्रीय भावधारा की प्रमुख और विशिष्ट कवयित्र थी। उनकी इस भावधारा के मूल में सामाजिक, राजनीतिक यथार्थ की प्रेरणाएँ और आग्रह थे।

प्रश्न 2.
कविता से सर्वनाम शब्दों को चुनें।
उत्तर-
मेरा खोया हुआ खिलौना, अबतक न मेरे पास आया।

प्रश्न 3.
‘मलिनता’ में ‘ता’ प्रत्यय है। ‘ता’ प्रत्यय के योग से पाँच अन्य शब्द बनाएँ।
उत्तर-
मानवता, आवश्यकता, दानवता, मनुष्यता, सरलता।

प्रश्न 4.
इनके विपरीतार्थक शब्द लिखें–
मलिनता, देव, असहाय, जटिल, नीरस, कठिन, विकल।
उत्तर-

  • शब्द विपरीतार्थक
  • मलिनता – स्वच्छता
  • देव – दानव
  • असहाय – समर्थ
  • जटिल – सरल
  • नीरस – सरस
  • कठिन – सरल
  • विकल – अविकल

प्रश्न 5.
वाक्य प्रयोग द्वारा इन मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करें
(क) आँखों में रात बिताना
(खं) शीश नवाना
उत्तर-
(क) आँखों में रात बिताना–(राज भर जागना)–माताएँ अपने बच्चों के लिए आँखों में रात बिता देती है।
(ख) शीश नवाना (आदर करना, प्रणाम करना)–मोहन ने अपने गुरु के सामने शीश नवाया।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित शब्दों के समानार्थी शब्द लिखें गोद, छौना, बहन, विश्व, दूध।।
उत्तर-

  • शब्द समानार्थी शब्द
  • गोद – अंक
  • छौना – बालक, शावक
  • बहन – भगिनी
  • विश्व – जगत, संसार
  • दूध – पय, सुधा

प्रश्न 7.
‘उल्लास’ शब्द का सन्धि–विच्छेद्र करें।
उत्तर-
उल्लास = उत् + लास

पुत्र वियोग कवि परिचय सुभद्रा कुमारी चौहान (1904–1948)

कवि परिचय– 16 अगस्त, 1904 को सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म निहालपुर, इलाहाबाद (उ.प्र.) में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती धीराज कुँवरी और पिता का नाम ठाकुर रामनाथ सिंह था। सन् 1919 में इनका विवाह ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से खांडवा, मध्यप्रदेश में हुआ। लेखिका के पति अंग्रेजो सरकार द्वारा जब्त ‘कुली प्रथा और गुलामी का नशा’ नामक नाटकों के लेखक एक प्रसिद्ध पत्रकार, अच्छे स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के सक्रिय नेता थे।

लेखिका की आरम्भिक शिक्षा क्रास्थवेट गर्ल्स स्कूल, इलाहाबाद में हुई जहाँ इनके साथ प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा भी थीं। इसके पश्चात् वाराणसी में थियोसोफिकल स्कूल के नौवीं कक्षा के बाद अधूरी शिक्षा छोड़ कर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़ी। छात्र जीवन से ही इन्हें काव्य रचना की भी अभिरूचि थी। आगे चलकर एक अच्छी कवयित्री एवं साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठा. भी पायौं।

लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान अपने जीवनकाल में समाज सेवा, स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय भागीदारी, राजनीति करते हुए अनेक बार कारावास भी गयीं। अन्त में मध्यप्रदेश के एक विधानसभा में एम. एल. ए. बनकर अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन और जागरण में सक्रिय भूमिका निभाते हुए वसंत पंचमी के दिन इस संसार से “नवश्रृजन के महापर्व” करके चल पड़ी।

इनके जीवन का महामंत्र था। स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व होम करना, इतना ही नहीं, मुक्तिबोध ने तो कहा है “सुभद्रा जी के साहित्य में अपने युग के मूल उद्वेग, उसके भिन्न–भिन्न रूप, अपनी आभरणहीन शैली में प्रकट हुए हैं।”

सुभद्रा कुमारी चौहान की निम्नलिखित रचनायें ‘मुकुल’ (कविता संग्रह), ‘त्रिधारा’ (कविता चयन) बिखरे मोती (कहानी संग्रह) सभा के खेल (कहानी संग्रह) प्रमुख हैं।

पुत्र वियोग कविता का सारांश

अपने पुत्र के असामयिक निधन के बाद माँ द्वारा व्यक्त की हुई उसके अन्दर की व्यथा का इस कविता में सफल निरूपण हुआ। कवयित्री माँ अपने पुत्र–वियोग में अत्यन्त भावुक हो उठती है। उसकी अन्तर्चेतना को पुत्र का अचानक बिछोह झकझोर देता है। प्रस्तुत कविता में पुत्र के अप्रत्याशित रूप से असनय निधन से माँ के हृदय में अपने संताप का हृदय–विदारक चित्रण है। एक माँ के विषादमय शोक का एक साथ धीरे–धीरे गहराता और क्रमशः ऊपर की ओर आरोहण करता भाव उत्कंठा अर्जित करता जाता है तथा कविता के अन्तिम छंद में पारिवारिक रिश्तों के बीच माँ–बेटे के संबंध को एक विलक्षण आत्म–प्रतीति में स्थायी परिवर्तित करता है। यह माँ की ममता की अभिव्यक्ति का चरमोत्कर्ष है।…

कवयित्री अपने पुत्र असामयिक निधन से अत्यन्त विकल है। उसे लगता है कि उसका प्रिय खिलौना खो गया है। उसने अपने बेटे के लिए सब प्रकार के कष्ट उठाए, पीड़ाएँ झेली। उसे कुछ हो न जाय, इसलिए हमेशा उसे गोद में लिए रहती थी। उसे सुलाने के लिए लोरियाँ गाकर तथा थपकी देकर सुलाया करती थी। मन्दिर में पूजा–अर्चना किया, मिन्नतें माँगी, फिर भी वह अपने बेटे को काल के गाल से नहीं बचा सकी। वह विवश है। नियति के आगे किसी का वश नहीं चलता।

कवयित्री की एकमात्र इच्छा यही है कि पलभर के लिए भी उसका बेटा उसके पास आ जाए अथवा कोई व्यक्ति उसे लाकर उससे मिला दे। कवयित्री उसे अपने सीने से चिपका लेती है तथा उसका सिर सहला–सहलाकर उसे समझाती है। कवयित्री की संवेदना उत्कर्ष पर पहुँच जाती है, शोक सागर में डूबती–उतराती बिछोह की पीड़ा असह्य है। वह बेटा से कहती है कि भविष्य में वह उसे छोड़कर कभी नहीं जाए। अपने मृत बेटे को उक्त बातें कहना उसकी असामान्य मनोदशा का परिचायक है। संभवतः उसने अपनी जीवित सन्तान को उक्त बातें कही हों।

सुभद्रा के प्रतिनिध काव्य संकलन ‘मुकुल’ से ली गई। प्रस्तुत कविता, ‘पुत्र–वियोग’ कवयित्री माँ के द्वारा लिखी गई है तथा निराला की ‘सरोज–स्मृति’ के बाद हिन्दी में एक दूसरा
“शोकगीत” है।

पुत्र के असमय निधन के बाद तड़पते रह गए माँ के हृदय के दारूण शोक की ऐसी सादगी भरी अभिव्यक्ति है जो निर्वैयक्तिक और सार्वभौम होकर अमिट रूप में काव्यत्व अर्जित कर लेती है। उसमें एक माँ के विवादमय शोक का एक साथ धीरे–धीरे गहराता और ऊपर–ऊपर आरोहण करता हुआ भाव उत्कटता अर्जन करता जाता है तथा कविता के अन्तिम छंद में पारिवारिक रिश्तों के बीच माँ–बेटे के संबंध को एक विलक्षण आत्म–प्रतीति में स्थायी परिणति पाता है।

कविता का भावार्थ 1.
आज दिशाएँ भी हँसती हैं
है उल्लास विश्व पर छाया,
मेरा खोया हुआ खिलौना
अब तक मेरे पास न आया।
शीत न लग जाए,
इस भय से नहीं गोद से
जिसे उतारा छोड़ काम दौड़ कर आई
‘मा’ कहकर जिस समय पुकारा (पृष्ठ 195)

प्रसंग–प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध कवयित्री ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ द्वारा रचित उनकी कविता ‘पुत्र वियोग’ से उद्धृत है जो उनके प्रतिनिधि काव्य संकलन ‘मुकुल’ में संकलित है। कवयित्री की यह रचना एक शोकगीति है।

यह शोकगीति पुत्र के असामयिक निधन के बाद कवयित्री माँ द्वारा लिखा गया है, जिसमें पुत्र–निधन के बाद पीछे तड़पते रह गए माँ के हृदय के दारुण शोक की मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति है। यह विषादमय शोक गहरा होता हुआ भाव उत्कटता प्राप्त करता जाता है।

व्याख्या–पुत्र की असामयिक मृत्यु से शोक विह्वल माँ अपने शोक संतप्त भावों को प्रकट करते हुए कहती है कि आज जब चारों ओर खुशी का वातावरण है और सारे संसार में खुशियाँ छाई हैं ऐसे में एक दुखी माँ के लिए ये सारी खुशियाँ बेकार हैं। मेरा पुत्र असमय मृत्यु को प्राप्त कर चुका है। मैं उसके इंतजार में दुखी बैठी हूँ। मेरा खोया पुत्र मेरे पास नहीं है।

फिर वह अपने मृत पुत्र को याद करती हुई कहती है कि मैंने अपने पुत्र को सर्दी, गर्मी, बरसात तथा हर दुख से बचाने का प्रयास किया था। मेरे प्रिय पुत्र को सर्दी न लगे, वह बीमार न पड़े, इसलिए मैंने उसे गोद से जमीन पर नहीं उतरने दिया। उसने जब भी माँ कहते हुए मुझे आवाज लगाई मैं अपना सारा काम–काज छोड़कर उसके पास दौड़कर आई, ताकि उसकी जरूरतें पूरी कर सकूँ।

विशेष–

  • पुत्र वियोग में दुखी माँ को उल्लासपूर्ण वातावरण भी उल्लसित नहीं कर पा रहा है।
  • माँ अपने पुत्र के हर दुःख में उसका ध्यान रखती है, यह भाव व्यक्त हुआ है।
  • माँ ने अपने पुत्र को खिलौना कहकर मार्मिकता बढ़ा दी है।
  • ‘हँसती हैं’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • भाषा सहज तथा भावाभिव्यक्त करने में सक्षम है।
  • छंदबद्ध काव्यांश में करुण रस घनीभूत हुआ है।

2. थपकी दे दे जिसे सुलायी
जिसके लिए लोरियाँ गाईं,
जिसके मुख पर जरा मलिनता
देख आँख में रात बिताई।
जिसके लिए भूल अपनापन
पत्थर को भी देव बनाया
कहीं नारियल, दूध, बताशे
कहीं चढ़ाकर शीश नवाया।

प्रसंग–पूर्ववत्। माँ अपने पुत्र से असीम प्यार करती हैं। वह अपने पुत्र को जरा सी तकलीफ में देखकर परेशान हो जाती है। उसकी परेशानी दूर करने के लिए वह तरह–तरह के उपाय करती है। कवयित्री भी अपने पुत्र के साथ किए गए प्यार भरे व्यवहार को याद कर उठती है। उसे वे सारी बातें एक–एक कर याद आने लगती हैं।

व्याख्या–कवयित्री कहती हैं कि उसने अपने प्रिय पुत्र के हर दुख–सुख का ख्याल रखा। उसने उसे प्यार से थपकियाँ देकर सुलाने की कोशिश की। उसे सुलाने के लिए मीठी–मीठी लोरियाँ सुनाईं, जिससे वह सो जाए। अपने पुत्र के चेहरे की चमक फीकी देखकर या उसकी उदासी महसूस कर उसने रात–रात भर जागकर उसका ख्याल रखा।

भलाई और सुख के लिए वह अपना सब कुछ भूल गई। उसे अपना सुख–दुख याद न रहा। इस कारण उसने पत्थर को देवता मानकर उसकी विधिवत् पूजा–अर्चना की। उसने इन देवों की पूजा करते हुए कहीं नारियल, दूध और बताशे चढ़ाए तो कहीं देवालयों में अपने पुत्र की भलाई की कामना करते हुए देवों को प्रणाम किया।

विशेष–

  • माँ अपनी संतान की भलाई के लिए नाना प्रकार के कष्ट उठाती हैं, यह भाव व्यक्त हुआ है।
  • लोरियाँ गाकर बच्चों को सुलाने की प्राचीन परंपरा का वर्णन किया गया है। (iii) दे दे’ में पुनरुक्ति प्रकाश तथा “लिए लोरियाँ’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • आँखों में रात बिताना’ ‘पत्थर को देव बनाना’ तथा ‘शीश नवाना’ आदि मुहावरों का उपयुक्त प्रयोग किया गया है।
  • भाषा सहज, सरल तथा भावों को व्यक्त करने में सक्षम है, जिससे काव्यांश मर्म को छू जाता है।
  • काव्यांश छंदबद्ध तुकांत शैली में है।

3. फिर भी कोई कुछ न कर सका
छिन ही गया खिलौना मेरा
मैं असहाय विवश बैठी ही
रही उठ गया छौना मेरा।
तड़प रहे हैं विकल प्राण ये
मुझको पल भर शान्ति नहीं है
वह खोया धन पर न सकूँगी
इसमें कुछ भी भ्रांति नहीं है।

प्रसंग–पूर्ववत्। कवयित्री ने अपने पुत्र की हर तरह से देखभाल की। उसकी सलामती के लिए पूजा–अर्चना करते हुए देवताओं के सम्मुख सिर झुकाकर दुआएँ भी माँगी, पर मृत्यु के आगे कोई कुछ नहीं कर सका है।

व्याख्या–कवयित्री कहती है कि उसके द्वारा की गई पूजा–अर्चना और माँगी गई दुआएँ भी उसके पुत्र को नहीं बचा सकी। कोई कुछ भी नहीं कर सका और उसका पुत्र असमय मृत्यु को प्राप्त हो गया। एक माँ का खिलौना उससे छिन गया और वह असहाय तथा विवश होकर बैठी रह गई। सकी आँखों से सामने ही उसका प्यारा पुत्र भगवान को प्यार हो गया।

पुत्र वियोग में तड़पती माँ कहती है कि इस असह्य कष्ट को उसका हृदयं तड़प–तड़पकर सह रहा है। उसे पुत्र की मृत्यु के बाद से पल भर के लिए शान्ति नहीं मिल सकी है। एक विवश माँ यह भी जानती है कि उसका जो अनमोल धन (पुत्र) खो गया है, उसे वह वापस नहीं पा सकती है। इस बात में जरा भी संदेह की गुजाइश नहीं है।

विशेष–

  • मृत्यु एक अटल सत्य है और इसे नकारा नहीं जा सकता है यह भाव व्यक्त किया गया है।
  • पुत्र वियोग में व्याकुल एक माँ के हृदय की पीड़ा का हृदय–स्पर्शी चित्रण है।
  • ‘कोई कुछ न कर सका’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • पुत्र के लिए ‘खिलौना’, ‘छौना’, ‘धन’ आदि उपमों के प्रयोग से भाषा–सौन्दर्य में वृद्धि हुई है
  • छंदबद्ध काव्यांश में करुण रस की उद्भावना हुई है।
  • भाषा सरल, सहज, हृदयस्पर्शी, तत्सम शब्दों से युक्त तथा भावों को अभिव्यक्त करने में सफल है।.

4. फिर भी रोता ही रहता है
नहीं मानता है मन मेरा
बड़ा जटिल नीरस लगता है
सूना सूना जीवन मेरा।
यह लगता है एक बार यदि
पल भर को उसको पा जाती
जी से लगा प्यार से सर
सहला सहला उसको समझाती।

प्रसंग–पूर्ववत्।

एक माँ यह बात अच्छी तरह जानती है कि मृत्यु पर किसी का वश नहीं चलता है। मृत्यु को किसी से मोह नहीं होता और जो उसके मुँह में चला गया, वह कभी लौटकर नहीं आता है। किन्तु एक माँ अपने मृत बेटे को कभी भूल नहीं पाती है। वह पुत्र वियोग में सदा तड़पती रहती है।

व्याख्या–अपने पुत्र की असामयिक मृत्यु से दुखी कवयित्री कहती है कि यह जानकर भी कि जो मर गया उसे वापस नहीं पाया जा सकता है। फिर भी उसका पुत्र के लिए रोता ही रहता है। किसी तरह से समझाने पर भी वह नहीं मानता है। पुत्र की मृत्यु के उपरांत उसके जीवन में खुशियाँ नहीं बची हैं। उसका जीवन कठिन और सूना–सूना हो गया है।

कवयित्री सोचती है कि यदि वह अपने खोए (मरे हुए) पुत्र को एक बार फिर से पा जाती, तो उसे जी–भरकर प्यार करती और अपने हृदय से लगा लेती। वह अपने पुत्र का सिर बार–बार सहलाती है और उसे समझाती कि वह अपनी मां को छोड़कर दूर न जाए।

विशेष–

  • पुत्र वियोग में तड़पती माँ के शोकाकुल हृदय (मन) की पीड़ा का हृदयस्पर्शी वर्णन है।
  • माँ का जीवन उसके पुत्र के लिए बिना कितना सूना हो जाता है, यह भाव व्यक्त हुआ है।
  • माँ अपने पुत्र को पुनः पाना तथा प्यार करना चाहती है। इसे असंभव जानते हुए भी माँ की ममता इसे संभव बना लेना चाहती है।
  • ‘मानता है मेरा मन’ में अनुप्रास अलंकार तथा ‘सूना–सूना’ एवं ‘सहला–सहला’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  • काव्यांश छंदबद्ध एवं तुकांतयुक्त है, जिसमें करुण रस घनीभूत है।
  • भाषा सरल, सहज तथा भावाभिव्यक्ति में पूर्णतया समर्थ है।

5. मेरे भैया मेरे बेटे अब
माँ को यों छोड़ न जाना
बड़ा कठिन है बेटा खोकर
माँ को अपना मन समझाना।
भाई–बहिन भूल सकते हैं
पिता भले ही तुम्हें भुलावे
किन्तु रात–दिन की साथिन माँ
कैसे अपना मन समझावे ! (पृष्ठ 196)

प्रसंग–पूर्ववत्।

माँ अपने पुत्र की मृत्यु से बहुत दुखी है। उसका जीवन सूना–सूना हो गया है। वह अपने मृत पुत्र को पुनः पाना चाहती है। वह उसे समझाना चाहती है कि वह अपनी माँ को छोड़कर. कहीं भी न जाए।

व्याख्या–पुत्र वियोग में शोक–संतप्त माँ सोचती है कि यदि उसका पुत्र उसे पुनः मिल जाए तो वह उसे समझाएगी कि मेरे प्रिय पुत्र, मेरे भैया (बेटा) ! अब तुम अपनी माँ को छोड़कर इस तरह मत जाना, जैसे तुम अब चले गए थे। एक माँ से बेटे का यूँ बिछुड़कर दूर चले जाना ही उसके लिए सबसे बड़ा दुख है। अपने दुखी मन को सांत्वना देना और समझाना उसके (माँ के) लिए बड़ा ही कठिन होता है।

पुत्र वियोग में व्याकुल माँ कहती है कि हे बेटा ! तुम्हारे भाई–बहन तथा पिता भले ही तुम्हें. कुछ समय बाद भूल जाएँ, पर माँ तो अपने पुत्र की दिन–रात अर्थात् हर समय की साथिन होती है। वह उसे अपने गर्भ में पालती–पोसती है। उसे अपने साथ लिए हुए घूमती है। इसलिए वह उसे अपने मन को कैसे. और क्या समझाकर अपना दुख कम करे।

विशेष–

  • काव्याश में एक माँ की वेदना का हृदयस्पर्शी एवं मार्मिक वर्णन है।.
  • माँ और बेटे के बीच ममता का अटूट रिश्ता होता है। यह रिश्ता माँ को अपने पुत्र की याद दिलाता है, यह भाव व्यक्त हुआ है।
  • काव्यांश में करुण रस व्याप्त है।
  • भाषा सरल, सहज, बोधगम्य, मर्मस्पर्शी तथा भावों को व्यक्त करने में समर्थ है।।
  • काव्यांश छंदबद्ध तथा तुकांत युक्त है, जिसमें ‘रात–दिन की साथिन’ लोकोक्ति का अत्यन्त सुन्दर प्रयोग किया गया है।
  • अन्तिम पंक्तियों में मानवीय रिश्तों का मर्म छिपा हुआ है।

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions गद्य Chapter 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 गद्य खण्ड Chapter 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions गद्य Chapter 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं

Bihar Board Class 10 Hindi नाखून क्यों बढ़ते हैं Text Book Questions and Answers

बोध और अभ्यास

पाठ के साथ

नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
उत्तर-
नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे उनकी लड़की के माध्यम से उपस्थित हुआ।

Nakhun Kyu Badhte Hai Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?
उत्तर-
प्राचीन काल में मनुष्य जंगली था। वह वनमानुष की तरह था। उस समय वह अपने नाखून की सहायता से जीवन की रक्षा करता था। दाँत होने के बावजूद नख ही उसके असली हथियार थे। उन दिनों अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए नाखून ही आवश्यक अंग थे। कालान्तर में मानवीय हथियार ने आधुनिक रूप लिया और बंदूक, कारतूस, तोप, बम के रूप में मनुष्य की रक्षार्थ प्रयुक्त होने लगा। नखधर मनुष्य अत्याधुनिक हथियार पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़ रहे हैं। बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को याद दिलाती है कि तुम भीतर वाले अस्त्र से अब भी वंचित नहीं हो। तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही प्राचीनतम नख एवं दंत पर आश्रित रहने वाला जीव हो। पशु की समानता तुममें अब भी विद्यमान है।

Nakhun Kyon Badhate Hain Question Answer Bihar Board प्रश्न 3.
लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप देखना कहाँ तक संगत है ?
उत्तर-
कुछ लाख वर्षों पहले मनुष्य जब जंगली था उसे नाखून की जरूरत थी। वनमानुष के समान मनुष्य के लिए नाखून अस्त्र था क्योंकि आत्मरक्षा एवं भोजन हेतु नख की महत्ता अधि क थी। उन दिनों प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए नाखून आवश्यक अंग था। असल में वही उसके अस्त्र थे। आज के बदलते परिवेश में, परिवर्तित समय में, इस आधुनिकता के दौर में सभ्यता के विकास के साथ-साथ अस्त्र के रूप में इसकी आवश्यकता नहीं समझी जा रही है। अब मनुष्य पशु के समान जीवनयापन नहीं करके आगे बढ़ गया है, इसलिए समयानुसार अपने अस्त्र में भी परिवर्तन कर लिया है। प्राचीन समय के लिए अस्त्र कहा जाना उपयुक्त है, तर्कसंगत है। लेकिन आज यह मानवीय अस्त्र के रूप में प्रयुक्त नहीं है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर कक्षा 10 Bihar Board प्रश्न 4.
मनुष्यं बार बार नाखूनों को क्यों काटता है ?
उत्तर-
मनुष्य निरंतर सभ्य होने के लिए प्रयासरत रहा है। प्रारंभिक काल में मानव एवं पशु एकसमान थे। नाखून अस्त्र थे। लेकिन जैसे-जैसे मानवीय विकास की धारा अग्रसर होती गई मनुष्य पशु से भिन्न होता गया। उसके अस्त्र-शस्त्र, आहार-विहार, सभ्यता-संस्कृति में निरंतर नवीनता आती गयी। वह पुरानी जीवन-शैली को परिवर्तित करता गया। जो नाखून अस्त्र थे उसे अब सौंदर्य का रूप देने लगा। इसमें नयापन लाने, इसे संवारने एवं पशु से भिन्न दिखने हेतु नाखूनों को मनुष्य काट देता है। अब वह प्राचीनतम पशुवत् मानव को भूल जाना चाहता है। नाखून को सुंदर देखना चाहता है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं Bihar Board प्रश्न 5.
सुकुमार विनोदों के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है ?
उत्तर-
लेखक ने कहा है कि पशुवत् मानव भी धीरे-धीरे विकसित हुआ, सभ्य बना तब पशुता की पहचान को कायम रखनेवाले नाखून को काटने की प्रवृत्ति पनपी। यही प्रवृत्ति कलात्मक रूप लेने लगी। वात्स्यायन के कामसूत्र से पता चलता है कि भारतवासियों में नाखूनों को जम कर संवारने की परिपाटी आज से दो हजार वर्ष पहले विकसित हुई।

उसे काटने की कला काफी मनोरंजक बताई गई है। त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार, दंतुल आदि विविध आकृतियों के नाखून उन दिनों विलासी नागरिकों के मनोविनोद का साधन बना। अपनी-अपनी रुचि के अनुसार किसी ने नाखून को कलात्मक ढंग से काटना पसंद किया तो कोई बढ़ाना। लेकिन लेखक ने बताया है कि यह भूलने की बात नहीं है कि ऐसी समस्त अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींचनेवाली वस्तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर Pdf Bihar Board प्रश्न 6.
नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं ? इनका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मानव शरीर में बहुत-सी अनायास-जन्य सहज वृत्तियाँ अंतर्निहित हैं। दीर्घकालीन आवश्यकता बनकर मानव शरीर में विद्यमान रही सहज वृत्तियाँ ऐसे गुण हैं जो अनायास ही अनजाने में अपने आप काम करती हैं। नाखून का बढ़ना उनमें से एक है। वास्तव में सहजात वृत्तियाँ अनजान स्मृतियों को कहा जाता है। नख बढ़ाने की सहजात वृत्ति मनुष्य में निहित पशुत्व का प्रमाण है। उन्हें काटने की जो प्रवृति है वह मनुष्यता की निशानी है। मनुष्य के भीतर पशुत्व है लेकिन वह उसे बढ़ाना नहीं चाहता है। मानव पशुता को छोड़ चुका है क्योंकि पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए पशुता की पहचान नाखून को मनुष्य काट देता है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं उत्तर Bihar Board प्रश्न 7.
लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
लेखक के हृदय में अंतर्द्वन्द्व की भावना उभर रही है कि मनुष्य इस समय पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है। वह इस प्रश्न को हल नहीं कर पाता है। अत: इसी जिज्ञासा ।

को शांत करने के लिए स्पष्ट रूप से इसे प्रश्न के रूप में लोगों के सामने रखता है। मनुष्य पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है। इस विचारात्मक प्रश्न पर अध्ययन करने से पता चलता है कि मनुष्य पशुता की ओर बढ़ रहा है। मनुष्य में बंदूक, पिस्तौल, बम से लेकर नये-नये महाविनाश के अस्त्र-शस्त्रों को रखने की प्रवृत्ति जो बढ़ रही है वह स्पष्ट रूप से पशुता की निशानी है। पशु प्रवृत्ति वाले ही इस प्रकार के अस्त्रों के होड़ में आगे बढ़ते हैं।

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solution प्रश्न 8.
देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं ?
उत्तर-
देश की आजादी के लिए प्रयुक्त ‘इण्डिपेण्डेन्स’ शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करते हैं। इण्डिपेण्डेन्स का अर्थ है अनधीनता या किसी की अधीनता का अभाव, पर ‘स्वाधीनता’ शब्द का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। अंग्रेजी में कहना हो, तो ‘सेल्फडिपेण्डेन्स’ कह सकते हैं।

लेखक का निष्कर्ष है ‘स्व’ निर्धारित आत्म-बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है। मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, त्याग में है, अपने को सबके मंगल के नि:शेष भाव से दे देने में है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर Class 8 Bihar Board प्रश्न 9.
लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती ? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रसंग- मैं ऐसा तो नहीं मानता कि जो कुछ हमारा पुराना है, जो कुछ हमारा विशेष है, उससे हम चिपटे ही रहें। पुराने का ‘मोह’ सब समय वांछनीय ही नहीं होता। मेरे बच्चे को गोद में दबाये रखने वाली ‘बंदरिया’ मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती।

लेखक महोदय का अभिप्राय है कि सब पुराने अच्छे नहीं होते, सब नए खराब ही नहीं होते। भले लोग दोनों का जाँच कर लेते हैं, जो हितकर होता है उसे ग्रहण करते हैं।

Class 10th Hindi Godhuli Question Answer प्रश्न 10.
‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है ?
उत्तर-
स्वाधीनता शब्द का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। जिसमें ‘स्व’ का बंधन अवश्य है। यह क्या संयोग बात है या हमारी समूची परंपरा ही अनजाने में हमारी भाषा के द्वारा प्रकट होती रही है। समस्त वर्णों और समस्त जातियों का एक सामान्य आदर्श भी है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर कक्षा 8 Bihar Board प्रश्न 11.
निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है ? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है ?
उत्तर-
लेखक महोदय ने एक ऐसे बूढ़े का जिक्र किया है जो अपनी पूरी जिंदगी का अनुभव कुछ शब्दों में व्यक्त कर मनुष्य का सावधान करता है। जो इस प्रकार है। बाहर नहीं भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओं, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्म-तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो। लेखक की दृष्टि में कथन पूर्णतः सार्थक हैं।

Bihar Board Class 10th Hindi Solution प्रश्न 12.
मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे। प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है ?
उत्तर-
ग्राणीशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि एक दिन मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी झड़ जायेंगे। इस तथ्य के आधार पर ही लेखक के मन में यह आशा जगती है कि भविष्य में मनुष्य के नाखूनों का बढ़ना बंद हो जायेगा और मनुष्य का आवश्यक अंग उसी प्रकार झड़ जायेगा जिस प्रकार उसकी पूँछ झड़ गयी है अर्थात् मनुष्य पशुता को पूर्णत: त्याग कर पूर्णरूपेण मानवता को प्राप्त कर लेगा।

नाखून क्यों बढ़ते हैं का सारांश Bihar Board प्रश्न 13.
‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है ?
उत्तर-
सफलता और चरितार्थता में अंतर है। मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ सफलता नाम दे रखा है। परंतु मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, अपने को सबके मंगल के लिए निःशेष भाव से दे देने में है। नाखूनों को काट देना उस ‘स्व’-निर्धारित आत्म-बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है।

गोधूलि भाग 1 Class 10 Pdf Bihar Board प्रश्न 14.
व्याख्या करें –
(क) काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर।
व्याख्या-
ग्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के नाखून क्यों बढ़ते हैं, शीर्षक से ली गयी हैं। इसका संदर्भ है-जब लेखक की बिटिया नाखून बढ़ने का सवाल पूछती है, तब लेखक इस पर चिंतन-मनन करने लगता है। इस छोटे से सवाल के बीच ही यह पंक्ति भी विद्यमान है जो लेखक के चिंतन से उभरकर आयी है।

लेखक का मानना है कि नाखून ठीक वैसे ही बढ़ते हैं जैसे कोई अपराधी निर्लज्ज भाव से दंड स्वीकार के समय मौन तो लगा जाते हैं लेकिन पुनः अपनी आदत या व्यसन को शुरू कर देते हैं और अपराध, चोरी करने लगते हैं।
यह नाखून भी ठीक उसी अपराधी की तरह है। यह धीरे-धीरे बढ़ता है। काट दिए जाने पर पुनः बेहया की तरह बढ़ जाता है। इसे तनिक भी लाज-शर्म नहीं आती। अपराधी की भी ठीक वैसी ही प्रकृति-प्रवृत्ति है।

लेखक ने मनुष्य की पाश्विक प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। वह बार-बार सुधरने, सुकर्म करने की कसमें खाता है। वादा करता है किन्तु थोड़ी देर के बाद पुनः वही कर्म दुहराने लगता है। कहने का मूल भाव यह है कि वह विध्वंसक प्रकृति की ओर सहज अग्रसर होता है जबकि वह निर्णयात्मक कार्यों में अपनी ऊर्जा और मेधा को लगाता।

(ख) मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के नाखून क्यों बढ़ते हैं’ नामक पाठ से ली गयी हैं। – इन पंक्तियों का संदर्भ मनुष्य की बर्बरता से जुड़ा हुआ है। अपने निबंध में लेखक यह बताना चाहता है कि मनुष्य के नाखून उसकी भयंकरता के प्रतीक हैं। लेखक के मन में कभी-कभी नाखून को देखकर निराशा उठती है। वह इस पर गंभीरता से चिंतन करने लगता है।

कहने का आशय यह है कि मनुष्य की बर्बरता कितनी भयंकर है कि वह अपने संहार में स्वयं लिप्त है जिसका उदाहरण—हिरोशिमा पर बम बरसाना है इससे कितनी धन-जन की हानि हुई, संस्कृति का विनाश हुआ, अनुमान नहीं लगाया जा सकता। आज भी उसकी स्मृति से मन सिहर उठता है। तो यह है मनुष्य का पाशविक स्वरूप। यहीं स्वरूप उसके नाखून की याद दिला देते हैं। उसकी भयंकरता, बर्बरता, पाशविकता, अदूरदर्शिता, अमानवीयता जिसे लेकर लेखक निराश हो उठता है। वह चिंतित हो उठता है।

लेखक की दृष्टि में मनुष्य के नाखून भयंकर पाशवी वृत्ति के जीते-जागते उदाहरण हैं। मनुष्य की पशुता को जितनी बार काटने की कोशिश की जाय फिर भी वह मरना नहीं चाहती। किसी न किसी नवीन रूप को धारण कर अपने विध्वंसक रूप को प्रदर्शित कर ही देती है।

(ग) कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ पाठ से ली गयी हैं।
इन पंक्तियों का संदर्भ जुड़ा है – लेख के अंत में द्विवेदीजी यह बताना चाहते हैं कि ये कमबख्त नाखून अगर बढ़ता है तो बढ़े, किन्तु मनुष्य उसे बढ़ने नहीं देगा।

लेखक के कहने का आशय यह है कि मनुष्य अब सभ्य और संवेदनशील हो गया है, बुद्धिजीवी हो गया है। वह नरसंहार का वीभत्स रूप देख चुका है। उसे यादकर ही वह कॉप जाता है। उसके विनाशक रूप का वह भुक्तभोगी है। हिरोशिमा का महाविनाश उसके सामने प्रत्यक्ष प्रमाण है। अतः, उससे निजात पाने के लिए वह सदैव सचेत होकर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। वह अपने विध्वंसक रूप को छोड़कर सृजनात्मकता की ओर अग्रसर होना चाहता है। वह मानव मूल्यों की रक्षा, मानवीयता की स्थापना में लगे रहना चाहता है। निरर्थक और संहारक तत्वों से बनकर शांति के साये में जीना चाहता है।

मनुष्य के इसी विवेकशील चिंतन और दूरदर्शिता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए लेखक यह बताना चाहता है कि कमबख्त नाखून बढ़े तो बढ़े इससे चिंतित होने की जरूरत नहीं। अब मनुष्य सजग और सचेत है। वह उसे बढ़ने नहीं देगा उसे काटकर नष्ट कर देगा। कहने का भाव यह है कि वह क्रूरतम विध्वंसक रूप को त्याग देगा।

Bihar Board Solution Class 10 Hindi प्रश्न 15.
लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है अपने आप पर अपने आपको द्वारा लगाया हुआ बंधन। भारतीय चित्त जो आज की अनधीनता के रूप में न सोचकर स्वाधीनता के रूप में सोचता है। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता का ही फल है। यह विशेषता हमारे दीर्घकालीन संस्कारों से आयी है, इसलिए स्व के बंधन को आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता है।

प्रश्न 16.
मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ। स्पष्ट . कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी साहित्य के ललित निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ शीर्षक से उद्धृत है। इस अंश में प्रख्यात निबंधकास हजारी प्रसाद द्विवेदी बार-बार काटे जाने पर . भी बढ़ जाने वाले नाखूनों के बहाने अत्यन्त सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकास गाथा उद्घाटित करते हैं। साथ ही नाखून बढ़ने की उसकी भयंकर पाश्विक वृत्ति के जीवंत प्रतीक का भी वर्णन करते हैं।

प्रस्तुत व्याख्येय अंश पूर्ण रूप से लाक्षणिक वृत्ति पर आधारित है। लाक्षणिक धारा में ही निबंध का यह अंश प्रवाहित हो रहा है। लेखक अपने वैचारिक बिन्दु को सार्वजनिक करते हैं। मनुष्य नाखून को अब नहीं चाहता। उसके भीतर प्राचीन बर्बरता का यह अंश है जिसे भी मनुष्य समाप्त कर देना चाहता है। लेकिन अगर नाखून काटना मानवीय प्रवृत्ति और नाखून बढ़ाना पाश्विक प्रवृति है तो मनुष्य पाश्विक प्रवृत्ति को अभी भी अंग लगाये हुए है। लेखक यही सोचकर |

कभी-कभी निराश हो जाते हैं कि इस विकासवादी युग में भी मनुष्य को बर्बरता नहीं घटी है। वह तो बढ़ती ही जा रही है। हिरोशिमा जैसा हत्याकांड पाश्विक प्रवृत्ति का महानतम उदाहरण है। साथ ही लेखक की उदासीनता इस पर है कि मनुष्य की पशुता को जितनी बार काट दो वह मरना नहीं जानती।

प्रश्न 17.
नाखून क्यों बढ़ते हैं का सारांश प्रस्तुत करें।
उत्तर-
उत्तर के लिए सारांश देखें।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के वचन बदलें
उत्तर-
अल्पज्ञ – अल्पज्ञों
प्रतिद्वंद्वियों – प्रतिद्वंद्वी
हड्डि – हड्डियाँ
मुनि – मुनियों
अवशेष – अवशेष
वृतियों – वृत्ति
उत्तराधिकार- उत्तराधिकारियों
बंदरिया – बंदर

प्रश्न 2.
वाक्य-प्रयोग द्वारा निम्नलिखित शब्दों के लिंग-निर्णय करें
उत्तर-
बंदूक – बंदूक छूट गया।
घाट  – घाट साफ है।
सतह – सतह चिकना है।
अनुसधित्सा- अनुसंधिसा की इच्छा है।
भंडार – भंडार खाली है।
खोज – खोज पुराना है।
अंग – अंग कट गया।
वस्तु – वस्तु अच्छा है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित वाक्यों में क्रिया की काल रचना स्पष्ट करें।
(क) उन दिनों उसे जूझना पड़ता था। – भूतकाल
(ख) मनुष्य और आगे बढ़ा – भूतकाल
(ग) यह सबको मालूम है। – वर्तमान कार्ल
(घ) वह तो बढ़ती ही जा रही है। – वर्तमान काल
(ङ) मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा। – भविष्य काल

प्रश्न 4.
‘अस्त्र-शस्त्रों का बढ़ने देना मनुष्य की अपनी इच्छा की निशानी है और उनकी बाढ़ . को रोकना मनुष्यत्व का तकाजा है। इस वाक्य में आए विभक्ति चिन्हों के प्रकार बताएँ।
उत्तर-
शस्त्रों का – षष्ठी विभक्ति
मनुष्य की – षष्ठी विभक्ति
इच्छा की – षष्ठी विभक्ति
उनकी – षष्ठी विभक्ति
बाढ़ को – द्वितीया विभक्ति
मनुष्यत्व का- षष्ठी विभक्ति।

प्रश्न 5.
स्वतंत्रता, स्वराज्य जैसे शब्दों की तरह ‘स्व’ लगाकर पाँच शब्द बनाइए।
उत्तर-
स्वधर्म, स्वदेश, स्वभाव, स्वप्रेरणा, स्वइच्छा।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित के विलोम शब्द लिखें
उत्तर-
पशुता – मनुष्यतां
घृणा – प्रेम
अभ्यास – अनभ्यास
मारणास्त्र – तारणस्त्र
ग्रहण – उग्रास
मूढ – ज्ञानी
अनुवर्तिता – परवर्तिता
सत्याचरण – असत्याचरण:

गिद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण-संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कुछ लाख ही वर्षों की बात है जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा उसे नाखून की जरूरत थी. उसकी जीवन-रक्षा के लिये नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे। दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उसका स्थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था। प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाखून उसके लिए आवश्यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। पत्थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्र जी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे।) उसने हड्डियों के भी हथियार बनाए। इन हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत और सबसे ऐतिहासिक का देवताओं के राजा का वज्र, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। मनुष्य और आगे बढ़ा। उसने धातु के हथियार बनाए।

जिनके पास लोहे के अस्त्र और शस्त्र थे, वे विजयी हुए। देवताओं के राजा तक को मनुष्यों के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी कि मनुष्यों के पास लोहे के अस्त्र थे। असुरों के पास । अनेक विद्याएँ थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे, शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं। आर्य विजयी हुए। फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया। नाग हारे, सुपर्ण हारे, यक्ष हारे, गंधर्व हारे, असुर हारे, राक्षस हारे। लोहे के अस्त्रों ने बाजी मार ली। इतिहास आगे बढ़ा। पलीतेवाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों में इतिहास को किस कीचड़भरे घाट तक घसीटा है, यह सबको मालूम है। नखधर मनुष्य अब एटम बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़ रहे हैं।

अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है, अब भी वह याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष के पहले के नख-दंतावलंबी जीव हो पशु के साथ एक ही सतह पर विचरण करने वाले और चरने वाले।

प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) मनष्य को कब और क्यों नाखन की आवश्यकता थी
(ग) वज्र किसका हथियार था और वह कैसा था?
(घ) असुरों में अनेक विद्याएँ थीं फिर भी आर्यों से क्यों पराजित हुए ?
(ङ) अब भी प्रकृति मानव को क्या याद दिला देती है ?
(च) लेखक ने नख-दंतावलंबी जीव किसे कहा है ?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम- नाखून क्यों बढ़ते हैं।
लेखक का नाम- हजारी प्रसाद द्विवेदी।
(ख) जब मनुष्य वनमानुष जैसा जंगली था तब उसे नाखून की आवश्यकता थी क्योंकि मानव नाखून की सहायता से जंगली जीवों से रक्षा करता था; भोजन उपलब्धि में जीवों को मारने में सहायता लेता था।
(ग) वज्र इन्द्र का हथियार था और वह दधीचि की हड्डियों से बना था।
(घ) असुरों के पास अनेक विधाएँ थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे। शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं इसी कारण आर्य विजयी हुए और असुर पराजित।।
(ङ) मानव को प्रकृति अब भी याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम्हारे अन्दर अब भी पशुता विद्यमान है।
(च) मनुष्य को।

2. मानव शरीर का अध्ययन करनेवाले प्राणिविज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्तं . – की भाँति मानव शरीर में बहुत-सी अभ्यास-जन्य सहज वृत्तियाँ रह गई हैं। दीर्घकाल तक उनकी आवश्यकता रही है। अतएव शरीर ने अपने भीतर एक ऐसा गुण पैदा कर लिया है कि वे वृत्तियाँ अनायास ही, और शरीर के अनजाने में भी, अपने-आप काम करती हैं। नाखून का बढ़ना उसमें से एक है, केश का बढ़ना दूसरा, दाँत का दुबारा उठना तीसरा है, पलकों का गिरना चौथा है। और असल में सहजात वृत्तियाँ अनजान स्मृतियों को ही कहते हैं।

हमारी भाषा में इसके उदाहरण मिलते हैं। अगर आदमी अपने शरीर की, मन की और वाक् की अनायास घटने वाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले। पर कौन सोचता है ? सोचना तो क्या उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है।

उनहें काटने की जो प्रवृत्ति हैं, वह उसकी मनुष्यता की निशानी है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।

प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) प्राणि विज्ञानियों का वृत्तियों के बारे में क्या मत है ?
(ग) लेखक का नख बढ़ाने की प्रवृत्ति से क्या अभिप्राय है?
(घ) मानव शरीर में विद्यमान सहजात वृत्तियाँ क्या-क्या हैं ?
(ङ) नख काटने की प्रवृत्ति किसकी निशानी है?
(च) कौन-सी प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है ?
(छ) मनुष्य को अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में क्या मददगार होगा?
उत्तर-
(क) पाठ का नाम- नाखून क्यों बढ़ते हैं।
लेखक का नाम- हजारी प्रसाद द्विवेदी।
(ख) प्राणी विज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति शरीर में भी बहुत-सी अभ्यासजन्य सहज वृत्तियाँ विद्यमान हैं। ,
(ग) लेखक नख बढ़ाने की प्रवृत्ति को मानव में अंतर्निहित पशुत्व का प्रमाण मानते हैं।
(घ) नाखून का बढ़ना, केश का बढ़ना, पलकों का गिरना, दाँत का दुबारा उठना इत्यादि मानव शरीर में विद्यमान सहजात वृत्तियाँ हैं।
(ङ) नख काटने की प्रवृत्ति मनुष्यता की निशानी है।
(च) अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।
(छ) अगर मनुष्य अपने शरीर की; मन की और वाणी की अनायास घटनेवाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले।

3. सोचना तो. क्या उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उन्हें काटने की जो प्रवृत्ति है, वह उसकी मनुष्यता । की निशानी है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने – की प्रवृत्ति मनुष्यता की क्रोिधिनी है।

प्रश्न-
(क) प्राणीविज्ञानी के अनुसार मानव की सहजात वृत्ति क्या है?
(ख) मनुष्यता की विरोधिनी क्या है?
(ग) नाखून बढ़ना और नाखून काटना किसकी निशानी है ?
(घ). ‘पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता’-स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(क) प्राणीविज्ञानी के अनुसार मानव की सहजात वृत्ति नाखून बढ़ाना है।
(ख) अस्त्र-शस्त्र जमा करना मनुष्यता की विरोधिनी है।
(ग) प्राणीविज्ञानी के अनुसार नाखून बढ़ाना मानव की सहजात वृत्ति है। यदि मनुष्य नाखून काटता है तो काटने की प्रवृत्ति मनुष्यता की निशानी है।
(घ) आदिकाल में मनुष्य को हिंसक होने की जरूरत थी इसलिए उसके बार-बार नाखून उग आए परन्तु आज मनुष्य सभ्य हो चुका है। वह हिंसा की भावना को नष्ट कर देना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि वह हिंसा या पशुता के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। उसे यह भी ज्ञान है कि अस्त्र-शस्त्र जमा करना मानवता का विरोध करना है।

4. हमारी परंपरा महिमामकी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार उज्ज्वल हैं। हमारे अनजाने में भी ये बातें एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती हैं। यह जरूर है कि परिस्थितियों बदल गई हैं। उपकरण नए हो गए हैं और उलझनों की मात्रा भी बहुत बढ़ गई है, पर मूल समस्याएं बहुत अधिक नहीं बदली हैं। भारतीय चित्त जो आज भी अधीनता’ के रूप में न सोचकर ‘स्वाधीनता’ के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। वह ‘स्व’ के बंधन को आसानी से छोड़ नहीं सकता। अपने-आप पर अपने-आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है।

प्रश्न
(क) पाठ और लेखक के नाम लिखें।
(ख) हमारी परम्परा कैसी है?
(ग) भारतीय चित्त में ‘स्व’ का भाव किसका प्रतिफल है?
(घ) गद्यांश का भावार्थ लिखें।
उत्तर-
(क) पाठ- नाखून क्यों बढ़ते हैं।लेखक- हजारी प्रसाद द्विवेदी।।
(ख) हमारी भारतीय परम्परा महिमामयी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार उज्ज्वल हैं। यह . हमारे अनजाने में ही एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती है।
(ग) भारतीय चित्त में ‘स्व’ का भाव हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है।
(घ) हमारी महिमामयी परंपरा और उज्ज्वल संस्कार ही एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देते हैं। परिस्थितियों भले बदल गई हैं, पर समस्याएं बदली नहीं हैं। हमारे मानस में ‘स्व’ का जो भाव है, जो आत्म-बंधन की स्वीकृति है, वह दीर्घकालीन संस्कारों का फल है।

5. जातियाँ इस देश में अनेक आई हैं। लड़ती-झगड़ती भी रही हैं, फिर प्रेमपूर्वक बस भी गई हैं। सभ्यता की नाना सीढ़ियों पर खड़ी और नाना और मुख करके चलनेवाली इन जातियों के लिए सामान्य धर्म खोज निकालना कोई सहज बात नहीं थी।

भारतवर्ष के ऋषियों ने अनेक प्रकार से इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की थी। पर एक बात उन्होंने लक्ष्य की थी। समस्त वर्णों और समस्त जातियों का एक सामान्य आदर्श भी है। वह है अपने ही बंधनों से अपने को बाँधना। मनुष्य पशु से किस बात से भिन्न है। आहार-निद्रा आदि पशु-सुलभ स्वभाव उसके ठीक वैसे ही हैं, जैसे अन्य प्राणियों के। लेकिन वह फिर भी पशु से भिन्न हैं।

उसमें संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति संवेदना है, श्रद्धा है, तप है, त्याग है। वह मनुष्य के स्वयं के उद्भावित बंधन हैं। इसीलिए मनुष्य झगड़े-टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़-दौड़ने-वाले अविवेकी को बुरा समझता है और वचन, मन और शरीर से किए गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं है। यह मनुष्यमात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सब वर्गों का सामान्य धर्म कहा है
प्रश्न-
(क) मनुष्य को संयमित करनेवाला कौन-सा बंधन है ?
(ख) मनुष्य किन गुणों के कारण पशुओं से भिन्न माना जाता है ?
(ग)लेखक ने ‘स्वाधीनता’ को भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा गुण क्यों माना है ?
(घ) गलत आचरण किसे माना गया है ?
उत्तर-
(क) मनुष्य को संयमित करनेवाला बंधन ‘स्व’ है। मनुष्य इस बंधन को स्वयं ही स्वीकार करता है। यही हमारी संस्कृति की विशेषता है।
(ख) लेखक के अनुसार आहार, निद्रा आदि पशुओं जैसी आदतें मनुष्य की भी है परन्तु
संयम, तप, त्याग, सुख-दुख के प्रति संवेदना आदि गुण उसे पशुओं से भिन्न बनाते हैं।
(ग) ‘स्वाधीनता’ का अर्थ है अपने ऊपर लगाया गया बंधन। अपने पर अपने द्वारा रोक लगाना भारतीय परंपरा है। मन में क्रोध आना पशुता की निशानी है परन्तु विवेक द्वारा संयमित करना मनुष्यता है।
(घ) वचन, मन और शरीर से किये गये असत्याचरण को गलत आचरण माना गया है।

6. मनुष्य को सुख कैसे मिलेगा? बड़े-बड़े नेता कहते हैं, वस्तुओं की कमी है, और मशीन बैठाओ, और उत्पादन बढ़ाओ, और धन की वृद्धि करो और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाओ। एक बूढा था। उसने कहा था–बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो; आत्म-तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो।

उसने कहा-प्रेम ही बड़ी चीज है, क्योंकि वह हमारे भीतर है। उच्छृखलता पशु की प्रवृत्ति है, ‘स्व’ का बंधन मनुष्य का स्वभाव है। बूढ़े की बात अच्छी लगी या नहीं, पता नहीं। उसे गोली मार दी गई। आदमी के नाखून बढ़ने की प्रवृत्ति ही हावी हुई। मैं हैरान होकर सोचता हूँ बूढ़े ने कितनी गहराई में पैठकर मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता का पता लगाया था।

प्रश्न-
(क) बड़े-बड़े नेताओं ने क्या कहा है ?
(ख) बूढ़ा कौन था? उसने क्या-क्या करने की सीख दी है ?
(ग) “एक बूढ़ा था”-लेखक ने किस बूढ़े की ओर संकेत किया है ?
(घ) लेखक हैरान होकर क्यों सोचता है ?
उत्तर-
(क) बड़े-बड़े नेताओं ने मशीन बैठाने, उत्पादन बढ़ाने, धन की वृद्धि करने और बाह्य उपकरणों की ताकत बढ़ाने को कहा है।
(ख) बूढ़ा सत्य और अहिंसा का पुजारी था। यहाँ उसने बाहर नहीं, भीतर की ओर देखने, हिंसा को मन से दूर करने, मिथ्या को हटाने, क्रोध और द्वेष को दूर करने, लोक के लिए कष्ट सहने, प्रेम.की बात सोचने, उच्छृखलता को छोड़कर ‘स्व’ को अपनाने की सीख दी है।
(ग) ‘एक बूढ़ा था’-वाक्यांश में लेखक ने महात्मा गाँधी की ओर संकेत किया है।
(घ) बूढ़े द्वारा अच्छी बातें समझाने पर भी उसे गोली मारी गई। पशुता. या हिंसा को जितनी बार भी समाप्त करने का प्रयास किया जाता है, वह बढ़ती जाती है। वास्तविक चरितार्थता का पाठ पढ़ानेवाला भी गोली का ही शिकार हुआ। लोगों की ऐसी पशुवृत्ति को देखकर लेखक हैरान हो जाता है।

7. सफलता और चरितार्थता में अंतर है। मनुष्य मरणास्त्रों के संचयन से, बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ सफलता नाम दे रखा है। परंतु मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, त्याग में है, अपने को सबके मंगल के लिए नि:शेष भाव से दे देने में है। नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना वाहती है, उसको काट देना उस ‘स्व-निर्धारित आत्म-बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है।

प्रश्न-
(क) मनुष्य की चरितार्थता किसमें है?
(ख) मनुष्य ने सफलता का नाम किसे दे रखा है ?
(ग) नाखूनों का बढ़ना और नाखूनों का कटना किस चीज का परिचायक है ?
(घ) सफलता और चरितार्थता में क्या अन्तर है?
उत्तर-
(क) मनुष्य की चरितार्थता आपसी प्रेम, मित्रता और त्याग पर निर्भर करती है वास्तव में उसी का जीवन सफल है. जो दूसरे की भलाई के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दे।
(ख) मनुष्य मरणास्त्रों के संचयन से बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु में भी पा सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ अर्जित किया है। इसी रूप को मनुष्य ने सफलता का नाम दे रखा है।
(ग) नाखूनों का बढ़ना उस हिंसा का परिणाम है जिसके सहारे वह सफलता पाना चाहता है। दूसरी ओर नाखूनों को काटना आत्म-निर्धारित बंधन का फल है। मनुष्य को अपने बनाए गए बंधनों में ही बंधकर रहना चाहिए तभी मनुष्य-जीवन सफल है।
(घ) अपने बंधन में बंधकर जीवनयापन करना ही सफलता हैं जबकि चरितार्थता आपसी प्रेम, मित्रता और त्याग पर निर्भर करती है। परहित के लिए सर्वस्व अर्पित कर देना ही चरित्रार्थता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्व

सही विकल्प चुनें-

प्रश्न 1.
‘नाखून क्यों बढ़ते हैं किस प्रकार का निबंध है?
(क) ललित
(ख) भावात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) विवरणात्मक
उत्तर-
(क) ललित

प्रश्न 2.
हजारी प्रसाद द्विवेदी किस निबंध के रचयिता हैं ?
(क) नागरी लिपि
(ख) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(ग) परंपरा का मूल्यांकन
(घ) शिक्षा और संस्कृति
उत्तर-
(ख) नाखून क्यों बढ़ते हैं

प्रश्न 3.
अल्पज्ञ पिता कैसा जीव होता है ?
(क) दयनीय
(ख) बहादुर
(ग) अल्पभाषी
(घ) मृदुभाषी
उत्तर-
(क) दयनीय

प्रश्न 4.
दधीचि की हड्डी से क्या बना था?
(क) तलवार
(ख) त्रिशूल
(ग) इन्द्र का वज्र
(घ) कुछ भी नहीं
उत्तर-
(ग) इन्द्र का वज्र

प्रश्न 5.
‘कामसूत्र’ किसकी रचना है ?
(क) वात्स्यायन
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) भीमराव अंबेदकर
(घ) गुणाकर मूले
उत्तर-
(क) वात्स्यायन

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

प्रश्न 1.
हर……..”दिन नाखून बढ़ जाते हैं।
उत्तर-तीसरे

प्रश्न 2.
सहजात वृत्तियाँ……”स्मृतियों को कहते हैं।
उत्तर-
अनजान

प्रश्न 3.
अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति………..विरोधी है।
उत्तर-
मनुष्यता

प्रश्न 4.
“इण्डिपेण्डेन्स’ का अर्थ है…………..।
उत्तर-
अनधीनता

प्रश्न 5.
‘स्व’ का बंधन ……….. का स्वभाव है।
उत्तर-
मनुष्य

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जंगली मनुष्य को नाखून की जरूरत क्यों थी ?
उत्तर-
उसकी (जंगली मनुष्य) जीवन-रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी था।

प्रश्न 2.
मनुष्य का नाखून बढ़ना किस वृत्ति का परिचायक है ?
उत्तर-
नाखून बढ़ना मनुष्य की पाशविक वृत्ति का परिचायक है।

प्रश्न 3.
हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत हथियार किसकी हड्डी से बना था?
उत्तर-
हड्डी के हथियारों में सबसे मजबूत हथियार दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था।

प्रश्न 4.
हिरोशिमा का हत्याकांड किसका जीवंत प्रतीक है ?
उत्तर-
हिरोशिमा का हत्याकांड मनुष्य की भयंकर पाशविक वृत्ति का जीवंत प्रतीक है।

प्रश्न 5.
भारतीय संस्कृति की क्या विशेषता है. ?
उत्तर-
भारतीय संस्कृति की विशेषता है अपने-आप पर अपने-आप लगाया हुआ बंधना

प्रश्न 6.
भले और मूढ़ लोगों में क्या अन्तर है ? .
उत्तर-
भले लोग अच्छे-बुरे की जाँच कर हितकर को ग्रहण करते हैं और मूढ़ लोग दूसरों के इशारों पर भटकते रहते हैं।

प्रश्न 7.
महाभारत में सामान्य धर्म किसे कहा गया है?
उत्तर-
महाभारत में निर्वैर भाव, सत्य और क्रोधहीनता को सामान्य धर्म कहा गया है।

प्रश्न 8.
मनुष्य का स्वधर्म क्या है ?
उत्तर-
अपने आप पर संयम और दूसरे के मनोभावों का समादर करना मनुष्य का स्वधर्म है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं लेखक परिचय

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 ई० में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर । प्रदेश) में हुआ । द्विवेदी जी का साहित्य कर्म भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास की रचनात्मक परिणति है । संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला आदि भाषाओं व उनके साहित्य के साथ इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की व्यापकता व गहनता में पैठकर उनका अगाध पांडित्य नवीन मानवतावादी सर्जना और आलोचना की क्षमता लेकर प्रकट हुआ है। वे ज्ञान को बोध और पांडित्य की सहृदयता में दाल कर एक ऐसा रचना संसार हमारे सामने उपस्थित करते हैं जो विचार की तेजस्विता, कथन के लालित्य और बंध की शास्त्रीयता का संगम है । इस प्रकार उनमें एकसाथ कबीर, तुलसी और रवींद्रनाथ एकाकार हो उठते हैं। उनकी सांस्कृतिक दृष्टि अपूर्व है। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति किसी एक जाति की देन नहीं, बल्कि समय-समय पर उपस्थित अनेक जातियों के श्रेष्ठ साधनांशों के लवण-नीर संयोग से विकसित हुई हैं।

द्विवेदीजी की प्रमुख रचनाएँ हैं – ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पलता’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कुटज’,’विचार-प्रवाह’, ‘आलोक पर्व’, ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ (निबंध संग्रह); ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचंद्रलेख’, ‘पुनर्नवा’, ‘अनामदास का पोथा’ (उपन्यास); ‘सूर साहित्य’, ‘कबीर’, ‘मध्यकालीन बोध का स्वरूप’, ‘नाथ संप्रदाय’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास’ (आलोचना-साहित्येतिहास); ‘संदेशरासक’, ‘पृथ्वीराजरासो’, ‘नाथ-सिद्धों की बानियाँ'(ग्रंथ संपादन): ‘विश्व भारती’ (शांति निकेतन) पत्रिका का संपादन । द्विवेदीजी को आलोकपर्व’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ सम्मान एवं लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा डी० लिट् की उपाधि मिली । वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय, . चंडीगढ़ विश्वविद्यालय आदि में प्रोफेसर एवं प्रशासनिक पदों पर रहे । सन् 1979 में दिल्ली में उनका निधन हुआ।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली से लिए गए प्रस्तुत निबंध में प्रख्यात लेखक और निबंधकार का मानववादी दृष्टिकोण प्रकट होता है । इस ललित निबंध में लेखक ने बार-बार काटे जाने पर भी बढ़ जाने वाले नाखूनों के बहाने अत्यंत सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकाम-गाथा उद्घाटित कर दिखायी है। एक ओर नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की आदिम पाशविक वृत्ति और संघर्ष चेतना का प्रमाण है तो दूसरी ओर उन्हें बार-बार काटते रहना और अलंकृत करते रहना मनुष्य के सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक चेतना को भी निरूपित करता है । लेखक ने नाखूनों के बहाने मनोरंजक शैली में मानव-सत्य का दिग्दर्शन कराने का सफल प्रयत्न किया है। यह निबंध नई पीढ़ी में सौंदर्यबोध, इतिहास चेतना और सांस्कृतिक आत्मगौरव का भाव जगाता है।

नाखून क्यों बढ़ते हैं Summary in Hindi

पाठ का सारांश

बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ.दिया कि आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं, तो मैं सोच में पड़ गया, हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें बढ़ने दें, तो माँ-बाप अकसर उन्हें डाँटा करते हैं। पर कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाखन क्यों इस प्रकार बढ़ा करते हैं। काट दीजिए वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भांति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर।

कुछ लाख ही वर्षों की बात है, जब मनुष्य जंगली था; वनमानुष जैसा। उसे नाखून की जरूरत थी। उसकी जीवन-रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे। दाँत भी थे पर नाखून के बाद ही उनका स्थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंदियों को पछाड़ना पड़ता था, नाखून उसके लिए आवश्यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। पत्थर के ढेले और पेंड की डालें काम में लाने लगा। उसने हड्डियों के भी हथियार बनाये। मनुष्यं और आगे बढ़ा। उसने धातु के हथियार बनाए। पलीतेवाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड़ भरे घाट पर घसीटा है, यह सबको मालूम है। नखधर मनुष्य अब एटम बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़ रहे थे।

कुछ हजार साल पहले मनुष्य ने नाखून को सुकुमार विनोदों के लिए उपयोग में लाना शुरू किया था। वात्स्यायन के कामसूत्र से पता चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पहले का भारतवासी नाखूनों को जम के संवारता था। उनके काटने की कला काफी मनोरंजक बताई गई है। त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार दंतुल आदि विविध आकृतियों के नाखून उन दिनों विलासी नागरिकों के न. जाने किस काम आया करते थे। उनको सिक्थक (मोम) और अलंक्तक (आलता) से यत्नपूर्वक रगड़कर लाल और चिकना बनाया जाता था। गौड़ देश के लोग उन दिनों बड़े-बड़े नखों को , पसंद करते थे और दक्षिणात्य लोग छोटे नखों को। लेकिन समस्त अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींचनेवाली वस्तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है, यह बात चाहूँ भी तो भूल नहीं सकता।

15 अगस्त को जब अंगरेजी भाषा के पत्र ‘इण्डिपेण्डेन्स की घोषणा कर रहे थे, देशी भाषा के पत्र ‘स्वाधीनता दिवस की चर्चा कर रहे थे। इण्डिपेण्डेन्स का अर्थ है स्वाधीनता ‘शब्द का – अर्थ है अपने ही अधीन’ रहना। उसने अपने आजादी के जितने भी नामकरण किए, स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वाधीनता-उन सबमें ‘स्व’ का बंधन अवश्य रखा। अपने-आप पर अपने-आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है।

मनुष्य झगड़े-डंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़-दौड़ने वाले अविवेकी को बुरा समझता है और वचन, मन और शरीर से किए गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं है। यह मनुष्यमात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सब वर्गों का सामान्य धर्म कहा है –
एतद्धि विततं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत!
निर्वैरता महाराज सत्यमक्रोध एव च।

अन्यत्र इसमें निरंतर दानशीलता को भी गिनाया गया है। गौतम ने ठीक ही कहा था कि मनुष्य – की मनुष्यता यही है कि वह सबके दुःख-सुख को सहानुभूति के साथ देखता है।

ऐसा कोई दिन आ सकता है, जबकि मनुष्य के नाखूनों का बढ़ना बंद हो जाएगा। प्राणिशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि मनुष्य का अनावश्यक अंग उसी प्रकार झड़ जाएगा, जिस प्रकार उसकी पूँछ झड़ गई है। उस दिन मनुष्य की पशुता भी लुप्त हो जाएगी। शायद उस दिन वह मारणास्त्रों का प्रयोग भी बंद कर देगा। .

नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना उस ‘स्व’-निर्धारित आत्म-बंधन का पुल है, जो .. उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है। कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।

शब्दार्थ

अल्पज्ञ : कम जाननेवाला
दयनीय : दया करने योग्य
बेहया : बिना हया के, निर्लज्ज, वेशर्म
प्रतिद्वंद्वी : विरोधी
नखधर : नख को धारण करनेवाला, नाखून वाला
दंतावलंबी : दाँत का सहारा लेकर जीने वाला
विचरण : घूमना, भटकना
तत:किम : फिर क्या, इसके बाद क्या
असह्य : न सह सकने योग्य
पाशवी वृत्ति : पशु जैसा स्वभाव एवं आचरण
वर्तुलाकार : घुमावदार, गोलाकार
दंतुल : दाँत वाला, जिसके दाँत बाहर निकले हों
दाक्षिणात्य : दक्षिण का (दक्षिण भारतीय)
अभोगामिनी : नीचे की ओर जानेवाली
सहजात वत्ति : जन्म के साथ पैदा होने वाली वृत्ति या स्वभाव
वाक : वाणी, भाषा
निर्बोध : नासमझ, नादान
अनुवर्तिता.: पीछे-पीछे चलना
अरक्षित : जो रक्षित न हो, खुला
अनुसैधित्सा : अनुसंधान की प्रबल इच्छा
सरबस : सर्वस्व, सबकुछ
पर्वसंचित : पहले से इकट्ठा या जमा किया हुआ
समवेदना : दूसरे के दुख को महसूस करना
उद्भावित : प्रकट की गयी, उत्पन्न की गयी
असत्याचरण : असत्य आचरण, लोकविरुद्ध आचरण
निर्वैर : बिना वैर-विरोध के
उत्स : स्रोत, उद्गम, मूल
आत्मतोषण : अपने को संतुष्ट करना, अपने को समझाना ।
चरितार्थता : सार्थकता
नि:शेष : जिसका शेष भी न बचे. सम्पर्ण
तकाजा : माँग

Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 1 कहाँ, कब और कैसे?

Bihar Board Class 7 Social Science Solutions History Aatit Se Vartman Bhag 2 Chapter 1 कहाँ, कब और कैसे? Text Book Questions and Answers, Notes.

BSEB Bihar Board Class 7 Social Science History Solutions Chapter 1 कहाँ, कब और कैसे?

Bihar Board Class 7 Social Science कहाँ, कब और कैसे? Text Book Questions and Answers

पाठगत प्रश्नोत्तर

Bihar Board Class 7 Social Science Solution प्रश्न 1.
प्रौद्योगिकी किसे कहते हैं ?
उत्तर-
मानव जीवन को बेहतर और उन्नत बनाने के लिये विज्ञान के सिद्धांत पर आविष्कृत विभिन्न कल-पुर्जा और मशीनों का खेती और कल-कारखानों आदि में उपयोग ‘प्रौद्योगिकी’ कहलाता है।

Bihar Board Class 7 History Book Solution प्रश्न 2.
आज सिंचाई के लिये किन-किन साधनों का इस्तेमाल किया जाता है ?
उत्तर-
आज सिंचाई के लिये नहर, पइन, नलकूप, कुओं आदि का इस्तेमाल किया जाता है। नलकूपों या तालाबों से पानी खींचने के लिये डीजल इंजन या बिजली का उपयोग कर पंप चलाते हैं।

Bihar Board Class 7 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 3.
मानचित्र-2 में दिखाए गए प्रमुख राज्यों की सूची बनाएँ।
उत्तर-
मानचित्र-2 में दिखाए गए प्रमुख राज्य हैं :

  1. गजनी
  2. कश्मीर
  3. सिंध
  4. मुल्तान
  5. कच्छ
  6. गुजरात
  7. अहमदनगर
  8. बीजापुर तथा
  9. बंगाल

Bihar Board Class 7 History Solution In Hindi प्रश्न 4.
मानचित्र-1 तथा 2, मानचित्रों में आप क्या अंतर पाते हैं ?
उत्तर-
दोनों मानचित्रों के अवलोकन के बाद हम यह अन्तर पाते हैं कि मानचित्र 1 में जहाँ शासक वंशों को प्रमुखता दी गई है तो मानचित्र 2 में राज्यों को प्रमुखता दी गई है। मानचित्र 1 में श्रीलंका को दिखाया गया है। उसके बदले मानचित्र 2 में अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों को दिखाया गया है।

Bihar Board Class 7 Geography Book Solution प्रश्न 5.
मध्यकाल में कौन-कौन से खाद्य-पदार्थ हम आज भी खाते हैं ? उस दौर में आम लोग क्या पहनते होंगे?
उत्तर-
शासक और उनके करीन्दे, धनी व्यापारी और ग्रामीण लोगों के खान-पान में सदा से अंतर रहा है। वह मध्यकाल में भी था और आज … है। मध्य काल के राज्य परिवार तथा सम्पन्न लोग जहाँ पोलाव, बिरयाना, कोरमा, फिरनी, अंगूर आदि खाते थे, सो आज भी खाते हैं।

गाँवों में खाने की वे ही वस्तुएँ होती थीं, जो लोग उपजाते थे । चावल ‘ का मौसम रहा तो चावल और गेहूँ का मौसम रहा तो रोटी खाना मध्यमाल में भी था और आज भी है । आम, अमरूद, केला, शकरकंद तब भी खाते थे और आज भी खाते हैं।

उस दौर में हिन्दू और मुसलमानों के पहनावें में अन्तर था । हिन्दू जहाँ धोती पहनते थे, वहीं मुसलमान लूँगी पहनते थे । गंजी, करता दोनों धर्म के लोग पहनते थे । आज वह भेद मिट चुका है। हिन्दु भी लँगी पहनने लगे हैं और ग्रामीण मुसलमान धोती पहनते हैं । बहुत दिनों तक साथ-साथ रहने के कारण दोनों के खान-पान और पहनावा में बहुत अंतर नहीं रह गया है।

Bihar Board Solution Class 7 Social Science प्रश्न 6.
क्या कारण रहा होगा कि भारत अतीत से ही संसार के लिये आकर्षण का केन्द्र रहा होगा?
उत्तर-
भारत आदि काल से चिंतकों और मनीषियों का देश रहा है । तप और योग यहाँ की खास बात थी और आज भी है। योगी संतों का सम्मान राजा-महाराजा तक करते थे । यहाँ के विद्वानों की धाक विश्व भर में थी । ऋषि दाण्डयायन से बात करके सिकन्दर आवाक रह गया था । सिकन्दर का गुरु अरस्तू ने उसे बताया था कि भारत विजय को जा रहे हो तो वहाँ के ऋषियों से आशीर्वाद लेना । लौटते समय मेरे लिये तुलसी का पौधा तथा गंगा जल अवश्य लाना ।

विश्व में गंगा ही एक ऐसी नदी है जिसके जल में कभी कीड़े नहीं पनपते चाहे वर्षों-वर्ष रखे रहो । भारत के प्रायः हर सभ्रांत घर में हरिद्वार-ऋषिकेश से लाया गंगा जल संजोकर रखा जाता है । मरते समय लोगों के मुंह में गंगाजल-तुलसी पत्ता देना लोग आवश्यक मानते हैं ।

यहाँ की भूमि उपजाऊ है । एक ही देश में सभी मौसमों का आनन्द लिया जा सकता है। वह भी एक ही समय में । खाने की कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो भारत में नहीं उपजती हो । कुछ फल और वन्य पशु ऐसे हैं जो केवल भारत में ही मिलते हैं।

Bihar Board Class 7 History Solution प्रश्न 7.
वैसी वस्तुओं की सूची बनाएँ, जिसे हवन में डाला जाता है ?
उत्तर-
मुख्य रूप से हवन में धूप, जव, तील, घी मिलाया जाता है । लेकिन यह आम है। खास तौर पर हवन में अनेक अन्य वनस्पतियाँ भी डाली जाती हैं।

Bihar Board 7th Class Social Science Solution प्रश्न 8.
हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं के प्रति आस्था व्यक्त करने की अलग-अलग तरीके या पद्धति सम्प्रदाय कहलाती है। व्याख्या करें।
उत्तर-
हिन्दू धर्म कालान्तर में तीन सम्प्रदायों में बँट गया और तीनों के आराध्य देवी-देवता में भिन्नता आ गई । इनके तीन सम्प्रदाय थे : वैष्णव, शैव तथा शाक्त । वैष्णव विष्णु और लक्ष्मी को अपना आराध्य मानते हैं । राम और सीता तथा कृष्ण और राधा को ये क्रमशः विष्णु और लक्ष्मी के अवतार मानते हैं । इस सम्प्रदाय वाले रामलीला और कृष्णलीला कर अपना मनोरंजन करते हैं ।

शैव सम्प्रदाय वाले शिव को पूजते हैं । शाक्त सम्प्रदाय वाले शक्ति के रूप में दुर्गा और काली की पूजा करते हैं। बलिदान देकर बलि के पशु का मांस खाना और मदिरा पीना ये गलत नहीं मानते । ये मछली भी खाते हैं, जबकि वैष्णव और शैव मांस-मछली और मदिरा से दूर रहते हैं।

Bihar Board Class 7 Hamari Duniya Solution प्रश्न 9.
भक्त संत के वैसे दोहों पर चर्चा करें, जिसे आपने हिन्दी की पुस्तक में पढ़ा है।
उत्तर-
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजियो ग्यान ।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहने दो म्यान ।।
माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहिं ।
मनुआ तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं ।।

Bihar Board Class 7 Civics Book Solution प्रश्न 10.
अभिलेखागार क्या है?
उत्तर-
अभिलेखों को जहाँ सुरक्षित रखा जाता है, उसे अभिलेखागार कहते हैं । खासतौर पर अभिलेखागार से तात्पर्य यह लगाया जाता है जहाँ सरकारी अभिलेख रखे जाते हैं । लेकिन कभी-कभी महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपि भी यहाँ रखी जाती है, जो सरकारी न होकर शैक्षिक और सामाजिक होती है। अभिलेखागार राष्ट्रीय भी होता है और राज्यों का भी । अकबर के बाद से अभिलेख रखने की परम्परा चली ।

History Class 7 Chapter 1 In Hindi प्रश्न 11.
‘न्यूमेसमेटिक्स’ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
सिक्कों के अध्ययन को ‘न्यूमै मेटिक्स’ कहते हैं।

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

आइए फिर से याद करें :

प्रश्न 1.
रिक्त स्थानों को भरें :

  1. सोलहवीं सदी के आरम्भ में ………… ने हिन्दुस्तान शब्द का प्रयोग………किया ।
  2. ………. एक विशेष प्रकार का फारसी इतिहास है।
  3. …….लोगों द्वारा भारत में एक नये धर्म का आगमन हुआ।
  4. भारत में कागज का प्रयोग …………. शताब्दी के आस-पास हुआ ।

उत्तर-

  1. बाबर; वस्तुतः सम्पूर्ण उपमहाद्वीप के लिये
  2. तारीख-उल-हिन्द
  3. इन्हीं अरबों के साथ
  4. तेरहवीं ।

प्रश्न 2.
जोड़े बनाइए :

  1. राजतरंगिनी – दरिया साहब
  2. भक्ति संत – सासाराम
  3. तबकात-ए-नासिरी – बैकटपुर का शिव मंदिर
  4. शेरशाह का मकबरा – कश्मीर का इतिहास
  5. मानसिंह – मिनहाज-उस-सिराज

उत्तर-

  1. राजतरंगिनी – कश्मीर का इतिहास
  2. भक्ति संत – दरिया साहब
  3. तबकात-ए-नासिरी – मिनहाज-उस-सिराज
  4. शेरशाह का मकबरा – सासाराम
  5. मानसिंह – बैकटपुर का शिव मंदिर

प्रश्न 3.
मध्य काल के वैसे वस्त्रों की सूची बनाइए, जिसका व्यवहार हम आज भी करते हैं।
उत्तर-
मध्यकाल में सिले हुए वस्त्र बहुत कम लोग ही पहनते थे । कमर के नीचे धोती, कंधे से लेकर कमर के नीचे तक चादर तथा सर पर मुरेठा बाँधने का रिवाज रहा होगा । आज भी उत्तर प्रदेश के अधिकांश ब्राह्मण सिला हुआ वस्त्र पहनकर भोजन नहीं करते । इसी से अनुमान लगता है कि मध्य युग के लोग सिला हुआ वस्त्र नहीं पहनते होंगे । उनके वस्त्रों में से धोती, चादर

और मुरेठा का व्यवहार आज भी लोग करते हैं । सिला हुआ वस्त्र पहनने का रिवाज बहुत बाद में आरम्भ हुआ होगा

प्रश्न 4.
वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में हुए प्रमुख प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों को बताएँ ।
उत्तर-
प्राचीन भारत में वस्त्र उद्योग के लिए सूत तकली पर काते जाते थे, जिसमें काफी समय लगता था । कारण कि तकली को हाथ से नचाना पड़ता था । बाद में 13वीं सदी में परिवर्तन यह आया कि तकली का स्थान चरखे ने ले लिया । अब सूत तेजी से अधिक मात्रा में और कम समय में ही बन सकते थे। पहले सीधे कपास से सूत काता जाता था । बाद में इसमें बदलाव आया धुनिया लोग धनुकी पर रूई धुनने लगे । अब धुनी हुई रूई से सूत कातना आसान हो गया ।

प्रश्न 5. कागज का आविष्कार सर्वप्रथम कहाँ हुआ ?
उत्तर-
कागज का आविष्कार सर्वप्रथम चीन में हुआ ।

प्रश्न 6.
वनवासियों को जंगल क्यों छोड़ना पड़ा ?
उत्तर-
प्रौद्योगिकी में परिवर्तन के फलस्वरूप खेती योग्य भूमि की तलाश हो रही थी । बाहर से आये लोगों के लिये अधिक अन्न की भी आवश्यकता बढ़ी होगी । खेती बढ़ाने के लिए जंगल काटे जाने लगे । फलस्वरूप वनवासियों को जंगल छोड़ने पर विवश होना पड़ा । हालाँकि अनेक वनवासी खेती के काम में लग गए और ग्रामवासी बन गये ।

प्रश्न 7.
गंगा-यमुनी संस्कृति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
दो संस्कृतियों के मेल से जो संस्कृति विकसित हुई, उस संस्कृति को गंगा-यमुनी संस्कृति कहते हैं।

प्रश्न 8. आठवीं शताब्दी के आस-पास हुए परिवर्तनों को लिखिए।
उत्तर-
आठवीं शताब्दी के आस-पास पहला परिवर्तन तो देश के नाम बदलने के रूप में हुआ। अब ‘भारत’ को हिन्दुस्तान भी कहा जाने लगा। यह बदलाव 13वीं शताब्दी में तुर्क-सत्ता की स्थापना के बाद प्रचलित हुआ। उस समय हिन्दुस्तान की भौगोलिक सीमा उतनी ही थीं, जितनी पर तुकों का

अधिकार था । मुगल काल में अकबर से लेकर 17 वीं शताब्दी तक औरंगजेब ने हिन्दुस्तान की सीमा में काफी विस्तार किया । कृषि के साथ-साथ उद्योग-ध धों में भी बदलाव आए ।

प्रश्न 9.
क्या प्राचीन काल की तुलना में मध्य काल के अध्ययन के लिये ज्यादा स्रोत उपलब्ध हैं ?
उत्तर-
हाँ, प्राचीन काल की तुलना में मध्य काल के अध्ययन के लिए आज ज्यादा स्रोत उपलब्ध है। ये स्रोत अनेक लेखकों और इतिहासकारों द्वारा लिखे गये लेख और इतिहास हैं।

सर्वप्रथम इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने 13वीं शताब्दी में इतिहास लिखा, जिसमें उन्होंने बिहार के विषय में लिखा कि इसका नाम ‘बिहार’ क्यों पड़ा ? प्रसिद्ध विद्वान सैयद सुलेमान नदवी ने, एक अरबी गीत का उद्धरण दिया है, जो भारत के लिये प्रमुख है। भक्त कवियों और सूफी संतों ने भी भारत के सम्बंध में बहुत कुछ लिखा है । राजपूत राजाओं के दरबारी कवियों ने भी उस समय के सामाजिक जीवन के विषय में लिखा है । लिखित रचनाएँ या पाण्डुलिपियाँ, अभिलेख, सिक्के, भग्नावशेष, चित्र आदि विविध स्रोत हैं, लेकिन प्रधानता लिखित सामग्री को ही दी जाती है।

13 वीं शताब्दी में कागज का उपयोग शुरू हो जाने के बाद लिखने का काम व्यापक रूप से होने लगा । इस काल में लिखी गई पाण्डुलिपियाँ एवं प्रशासनिक प्रपत्र अभिलेखागारों और पुस्तकालयों में सुरक्षित है । इस काल की अनेक घटनाओं की जानकारी हमें इन्हीं अभिलेखों से प्राप्त होती है। अन्य अभिलेख पत्थरों, चट्टानों और ताम्र पत्रों पर लिखे गये थे

बहुत-से अभिलेख मन्दिरों और मस्जिदों और गाँवों में भी सुरक्षित हैं । कल्हण की राजतरंगिणी, अलबेरूनी की पुस्तक तहकीक-ए-हिन्द, मिन्हाज उससिराज कृत तबकात-ए-नासिरी, जियाउद्दीन बरनी की पुस्तक तवारीख-ए-फिरोजशाही । अबुल फजल ने अकबरनामा लिखा । इसके पहले बाबर ने बाबरनामा लिखा था । इनके अलावा अनेक यात्रियों ने अपने यात्रा वृत्तांत लिखा जो इतिहास से कम नहीं हैं । इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल की तुलना में मध्य काल के अध्ययन के लिये ज्यादा स्रोत उपलब्ध है।

प्रश्न 10.
जब एक ही व्यक्ति या घटना के सम्बंध में अलग-अलग मत आते हैं, तो ऐसी परिस्थितियों में इतिहासकार क्या करते होंगे ?
उत्तर-
प्रश्न में बताई गई परिस्थिति में इतिहासकार समान विशेषता वाले बड़े-बड़े हिस्सों, युगों या कालों में बाँट देते हैं । फिर अनुमान से स्थिति का अवलोकन कर स्वयं जो वे उचित समझते हैं, लिख देते हैं ।

Bihar Board Class 7 Social Science कहाँ, कब और कैसे? Notes

पाठ का सार संक्षेप

समय के साथ समाज में परिवर्तन होते ही रहते हैं। ये परिवर्तन कभी शब्दों के अर्थ में, कभी स्थानों के नाम में, कभी राज्यों की भौगोलिक सीमाओं में और कभी जीवन-शैली के सम्बन्ध में | वर्ग 7 में हम भारत के एक हजार वर्ष के अन्तर्गत होने वाले परिवर्तनों को जानेंगे अर्थात् 750 से 1750 ई० तक के।

कालक्रम में हमारे देश का नाम आर्यावर्त से भारत, भारत से हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान से इण्डिया होते रहा । आज भारत, हिन्दुस्तान और इण्डिया तीनों का प्रचलन है । हालाँकि भारत के संविधान में भारत और इण्डिया का ही उल्लेख है । तेरहवीं शताब्दी में तुर्क सत्ता की स्थापना के बाद भारत का नाम हिन्दुस्तान हो गया । हालाँकि सम्पूर्ण देश में तुर्को का शासन नहीं था । तुको ने लंगभग तीन सौ वर्षों तक ‘दिल्ली सल्तनत’ के नाम से शासन किया, तब शासकों को सुल्तान कहा जाता था ।

अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी था । इब्राहिम लोदी को हराकर बाबर ने यहाँ मुगल वंश की नींव रखी । अब मल्लान के स्थान पर शासकों को ‘बादशाह’ कहा जाने लगा । मुगल बादशाहों में सर्वाधिक नेक और प्रतापी बादशाह अकबर था । अकबर ने सम्पूर्ण भारत उपमहाद्वीप के लिये ‘हिन्दुस्तान’ या ‘हिन्दुस्थान’ नाम दिया ।

शाहजहाँ तक के युग को हिन्दुस्थान के लिए ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है । औरंगजेब ने दक्षिण भारत में कुछ मुगल साम्राज्य का विस्तार किया। औरंगजेब जब दक्षिण में उलझा था तो उत्तर भारत के उसके सूबेदारों ने धोखा देना आरंभ कर दिया। औरंगजेब का शासनकाल विस्तार और विखंडन दोनों के लिये जाना जाता है। यह 17वीं शताब्दी की बात है।

कृषि की प्रधानता से सिंचाई व्यवस्था भी विकसित अवस्था में थी । कुण्ड, ताल, तालाब में वर्षा जल को एकत्र किया जाता था और ‘दोन’ यंत्र से उनसे पानी निकालकर खेतों में पहुँचाया जाता था । कुँओं से भी सिंचाई होती थी । इसके लिए ढेंकी, मोठ, अरघट्ट या घटी यंत्र का व्यवहार होता है। बाद में ‘रहट’ का उपयोग होने लगा ।

समुद्री यात्रा की सुविधा ने व्यापार के क्षेत्र को बढ़ा दिया । अब भारत के लोग सुदूर पूर्व के देशों से व्यापार करते थे तो अरब के लोग भारत से व्यापार करते थे । भारत से व्यापार के सिलसिले में अरबी व्यापारियों का आना-जाना काफी बढ़ गया । इसके लिए अरबी व्यापारी केरल के तटीय क्षेत्रों में बाजाप्ता गाँव, बनाकर बस गये। उनको बसने से वहाँ के राजा ने भी काफी सहयोग दिया, कारण कि उनसे राजा को भारी मात्रा में व्यापारिक कर मिलता था। इतना ही नहीं, भारत में पहला मस्जिद केरल के हिन्दू राजा ने बनवा दिया । भारत में आए इन नये व्यापारियों से नयी प्रौद्योगिकी एवं नई विचारधारा लाने में भी योगदान मिला ।

अरब लोगों ने आठवीं शताब्दी में सिंध पर अपना शासन भी स्थापित कर लिया । इन्हीं के साथ भारत में ‘इस्लाम धर्म का भी आगमन हो गया । ‘इस्लाम’ धर्म को मानने वाले अपने को मुसलमान कहने लगे। ये एक ईश्वर में विश्वास करनेवाले लोग थे । इनका मूल धर्मग्रंथ ‘कुरान शरीफ’ है। अरब लोग अपने साथ अपना खान-पान और पहनावा भी लाये ।

कालक्रम में ये ही सब चीजें तुर्क-अफगान और मुगल भी ले आये । यूरोपीय व्यापारी भी कुछ नई सामग्री भारत में ले आए । पोलाव, बिरयानी, कोरमा, फिरनी, अगूर, मक्का, मिर्च चाय और कॉफी का प्रचलन इन बाहरी लोगों ने ही बढ़ाया। ज्ञान-विज्ञान और वैचारिकता का भी कुछ आदान-प्रदान हुआ ।

इस्लामिक जगत के लोगों के आने से यहाँ कुछ स्थायी राज्य स्थापित हुए, जिससे सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवन में दरगामी प्रभाव पड़े । अब भारत में मिली-जुली परम्परा का विकास हुआ । इन परम्पराओं से भाषा, रहन-सहन, पोशाक, रीति-रिवाज आदि प्रभावित हुए । इसी को ‘गंगा-जमुनी’ संस्कृति कहा गया।

प्रसिद्ध अरबी विद्वान सैयद सुलेमान नदबी ने दिल खोलकर भारत की प्रशंसा की है।

राजपूतों का उदय भी इसी काल में हुआ । इन्हीं की महिमा का गान करने वाले कवि और चारण लोगों का एक अलग समुदाय था । राजाओं के दरबार में लिखने का काम करने वाले कायस्थ लोगों का उदय भी इसी काल में हुआ। जाट और सिक्खों का उदय भी हुआ : राजनीति में इनका स्थान महत्वपूर्ण हो गया । – यात्रियों ने भी बहुत लिखा है । सिक्कों के माध्यम से शासकों के तिथिक्रम का पता लगता है । इस काल के शासकों ने अनेक भव्य मंदिरों, मस्जिदों, मकबरा और किलों का निर्माण कराया जिनसे इनकी आर्थिक समृद्धि और वास्तुकला की जानकारी मिलती है।

दिल्ली से दौलताबाद और दौलताबाद से दिल्ली का वर्णन जियाबरनी ने ही किया है। यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ आने-जाने में ही बहुत लोग मर गये । इतिहास को समझने के लिए समय को सुविधानुसार बाँट दिया गया है।

Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 5 हार की जीत

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 1 Chapter 5 हार की जीत Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 6 Hindi Solutions Chapter 5 हार की जीत

Bihar Board Class 6 Hindi हार की जीत Text Book Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

पाठ से –

हार की जीत कहानी के प्रश्न उत्तर Class 6 Bihar Board प्रश्न 1.
बाबा भारती कौन थे ?
उत्तर:
बाबा भारती एक संत थे । जिनके पास सुलतान नामक एक घोड़ा था।

Har Ki Jeet Chapter Question Answer Bihar Board Class 6 प्रश्न 2.
बाबा भारती अपने घोड़े ‘सुलतान’ से किस प्रकार स्नेह करते थे?
उत्तर:
बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से उसी प्रकार स्नेह करते थे जैसे कोई माँ बेटे से स्नेह करती है, किसान को अपने खेत से स्नेह होता है । और जैसे गुरु शिष्य को स्नेह करता है।

Haar Ki Jeet Question Answer Bihar Board Class 6 प्रश्न 3.
बाबा भारती के घोड़े को देखने के लिए खड्ग सिंह क्यों अधीर हो उठा? घोड़ा देखने के बाद खड्ग सिंह के दिमाग में क्या उथल-पुथल होने लगी?
उत्तर:
बाबा भारती के घोड़े की कीर्ति सुनकर उसे देखने के लिए खड्ग सिंह अधीर हो उठा। घोड़ा देखने के बाद उसके दिमाग में उथल-पुथल होने लगी कि—यह घोड़ा मुझे कैसे प्राप्त होगा।

हार की जीत कहानी के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 6 प्रश्न 4.
खड्ग सिंह ने बाबा भारती के घोड़े को पाने के लिए किस प्रकार का रूप बदला?
उत्तर:
खड्ग सिंह ने बाबा भारती के घोड़े सुलतान को पाने के लिए अपाहिज का रूप बदला।

Haar Ki Jeet Question Answer Class 6 Bihar Board प्रश्न 5.
पाठ के किन वाक्यों से पता चलता है कि बाबा भारती को अपने घोड़े पर गर्व था?
उत्तर:
बड़ा विचित्र जानवर है, देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे। उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी इत्यादि । पाठ के वाक्यों से पता चलता है कि बाबा भारती को अपने घोड़े पर गर्व था।

Har Ki Jeet Question Answer Bihar Board Class 6 प्रश्न 6.
सही वाक्यों के सामने सही (✓) एवं गलत वाक्यों के सामने गलत (☓) का निशान लगाइए।
(क) बाबा भारती का घोड़ा कमजोर एवं दुर्बल था। (☓)
(ख) घोड़ा का नाम सुलतान था। (✓)
(ग) खड्गसिंह को बाबा भारती का घोड़ा पसंद था। (✓)
(घ) बाबा भारती ने सुलतान से बिछुड़ने पर प्रसन्नता व्यक्त की। (✓)
(ङ) खड्गसिंह ने चुपक से घोड़ा को अस्तबल में बाँध दिया। (✓)

पाठ से आगे –

Har Ki Jeet Class 6 Bihar Board प्रश्न 1.
लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वे किसी अपाहिज पर विश्वास न करेंगे।” बाबा भारती के इस वक्तव्य का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
बाबा भारती के इस वक्तव्य का अभिप्राय है कि लोग किसी अपाहिज को मदद करने से दूर भागेंगे।

हार की जीत कहानी का सारांश Bihar Board Class 6 प्रश्न 2.
खड्गसिंह ने चुपके से रात में सुलतान को वापस अस्तबल में बाँध दिया। ऐसा उसने क्यों किया?
उत्तर:
खड्ग सिंह ऐसा इसलिए किया कि-बाबा भारती के वाक्य सुनकर उसका हृदय परिवर्तन हो गया वस्तुतः लोगों को मालूम हो जाने पर कोई भी व्यक्ति लाचार, गरीब और अपाहिज पर विश्वास नहीं करता । अतः उसने बाबा के घोड़े को लौटाने के लिए चुपके से घोड़े को अस्तबल में बाँध -दिया।

हार की जीत Question Answer Bihar Board Class 6 प्रश्न 3.
बाबा भारती के किस व्यवहार से खड्गसिंह के सोच में परिवर्तन हुआ?
उत्तर:
बाबा भारती ने घोड़ा के विषय में बात नहीं कर खड्ग सिंह से कहा-मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह घटना किसी से मत कहना । यदि लोगों को इस घटना के बारे में मालूम हो जायेगा तो गरीब, लाचार पर विश्वास करना छोड़ दंगे । यह कहकर सुलतान को बिना देख वापस चल दिए । बाबा के इस व्यवहार से खड्ग सिंह के सोच में परिवर्तन हुआ।

हार की जीत के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 6 प्रश्न 4.
आपकी प्रिय वस्तु कोई छिनने का प्रयास करे तो आप क्या करेंगे?
उत्तर:
हमारी प्रिय वस्तु यदि कोई छिनने का प्रयास करेगा तो मैं उसका विरोध करूँगा।

हार की जीत पाठ का सारांश Bihar Board Class 6 प्रश्न 5.
अगर आपको बाबा भारती से घोड़ा लेना होता तो आप क्या करते?
उत्तर:
अगर हमको बाबा भारती से घोड़ा लेना होता तो हम उनसे आग्रह करते और उसका उचित मूल्य देने की कोशिश करते।

Bihar Board Solution Class 6 Hindi प्रश्न 6.
कहानी का कोई दूसरा शीर्षक क्या हो सकता है?
उत्तर:
इस कहानी का दूसरा शीर्षक “सुलतान” हो सकता है।

व्याकरण प्रश्न

हार की जीत का प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 6 प्रश्न 1.
(क) किसान अपने लहलहाते खेतों को देखकर बहुत प्रसन्न होता है।
(ख) खड्गसिंह एक कुख्यात डाकू था।
(ग) बाबा भारती के मुख पर प्रसन्नता थी।
(घ) उन्होंने दंढे जल से स्नान किया।
(ङ) सुलतान को देखने के लिए भीड़ लगी रहती थी।

उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्द क्रमशः जातिवाचक, व्यक्तिवाचक, भाववाचक, द्रव्यवाचक एवं समूहवाचक संज्ञा है। इस प्रकार संज्ञा के पाँच भेद है।
निम्नलिखित वाक्यों में मोटे शब्दों को सामने के कोष्ठक में संज्ञा के भेद के रूप में लिखिए।

प्रश्नोत्तर –

  1. वह ईमानदारीपूर्वक काम करता है। (भाव वाचक संज्ञा)
  2. सुलतान बड़ा सुन्दर और बलवान था। (व्यक्तिवाचक संज्ञा)
  3. कार्तिक पूर्णिमा के दिन सोनपुर में मेला लगता है। (समूह वाचक संज्ञा)
  4. दूध स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। (द्रव्य वाचक संज्ञा)
  5. बस घाटी से होकर गुजरती है। (जातिवाचक संज्ञा)

Bihar Board Class 6 Hindi Book Solution प्रश्न 2.
निम्नलिखित शब्दों से वाक्य बनाइए –
(क) पश्चात
(ख) महात्मा
(ग) निश्चय
(घ) प्रशंसा
(ङ) अपाहिज
(च) स्वीकार।
उत्तर:
(क) पश्चात् = श्याम के पश्चात् राम भी यहाँ आया।
(ख) महात्मा = महात्मा लोग दयालु होते हैं।
(ग) निश्चय = निश्चय करके काम करना चाहिए।
(घ) प्रशंसा = अपनी प्रशंसा सुन सब प्रसन्न होते हैं।
(ङ) अपाहिज = अपाहिज लोग दया के पात्र होते हैं।
(च) स्वीकार = उसने मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लिया ।

Kislay Hindi Book Bihar Class 6 Bihar Board प्रश्न 3.
इस पाठ में घोड़े की विशेषता से संबंधित जो शब्द हैं उन्हें चुनकर लिखिए।
उत्तर:
इस पाठ में घोड़े की विशेषता संबंधित शब्द है-बड़ा सुन्दर, बड़ा बलवान, बड़ा विचित्र जानवर है, उसकी चाल मन मोह लेगा। बाँका घोड़ा इत्यादि ।

प्रश्न 4.
निम्नांकित मुहावरों का अर्थ लिखिए
(क) लट्टू होना
(ख) फूले न समाना
(ग) हृदय पर साँप लोटना
(घ) मुँह मोड़ लेना।
उत्तर:
(क) लट्टू होना = लोभ हो जाना।
(ख) फूले न समाना = अत्यन्त खुश होना।
(ग) हृदय पर साँप लोटना = ईर्ष्या होना।
(घ) मुँह मोड़ लेना = नाता तोड़ लेना।

कुछ करने को –

प्रश्न 1.
आपके आस-पास कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपने व्यवहार से आपको प्रभावित करता है । उसका पता कीजिए और उसकी दिनचर्या को लिखिए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

हार की जीत Summary in Hindi

पाठ का सार संक्षेप

बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान को बेहद प्यार करते थे। क्योंकि सुलतान बड़ा ही सुन्दर और बड़ा बलवान था। उस घोड़े का जोड़ सारे इलाके में कहीं नहीं था। वे अपने हाथ से घोड़े का. खरहरा करते, स्वयं उसको दाना खिलाते थे। शाम में उस पर बैठकर 8-10 मील का चक्कर लगाया करते थे।

खड्ग सिंह उस इलाके का कुख्यात डाकू था । लोग उसका नाम खुलकर काँप जाते थे। जब खड्ग सिंह ने सुलतान की बड़ाई सुनी तो वह सुलतान को देखने के लिए बाबा भारती के पास आया और प्रणाम कर सामने बैठ गया। बाबा ने खड्ग सिंह से हाल-चाल पूछा, पुनः आने का कारण पूछा। खड्ग सिंह ने कहा-सुलतान की चाहत यहाँ तक खींच लाई है। बाबा ने भी सुलतान की बड़ाई खड्ग सिंह से की। सुलतान को दिखाया। खड्ग सिंह ने उसकी चाल दिखाने का आग्रह किया तो बाबा ने घोड़े पर सवार होकर उसकी चाल भी दिखा दी। अब तो खड्ग सिंह ने सोच लिया यह घोड़ा मैं अवश्य प्राप्त करूँगा । बाबा से बोला—बाबाजी इस घोड़े को आपके पास नहीं रहनं दूंगा।

बाबा घबड़ा गये। सारी रात स्वयं जगकर घोड़े की रक्षा करने लगे। कुछ दिन बीत जाने पर बाबा कुछ लापरवाह हो गये । एक दिन जब शाम में बाबा भारती घोड़े पर घूम रहे थे तो किसी के कराहट की आवाज आई, “बाबा इस कंगाल की बाते सुनते जाना।” बाबा अपाहिज जैसा देखकर उसे पूछा क्या कष्ट है। उसने हाथ जोड़कर कहा, बाबा मैं दुखियारा हूँ मुझ पर दया करो । कृपा कर रामाबाला तक मुझे पहुँचा दो, भगवान आपका भला करेगा। दयावश बाबा ने अपाहिज को घोड़े पर बैठाकर लगाम पकड़ पैदल चलने लगे। एकाएक जोड़ का झटके के साथ लगाम हाथ से छूट गया । अपाहिज तनकर घोड़े पर बैठकर भागे जा रहा है। वह समझ गये खड्ग सिंह ही है।

बाबा भारती जोर से चिल्लाते हुए कहा-“खड्ग सिंह रूक जाओ, एक प्रार्थना करता हूँ अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जायेगा।”

खड्ग सिंह ने कहा-“आज्ञा दीजिए। आपका दास हूँ केवल घोड़ा नहीं दूंगा।” बाबा ने कहा, घोड़े की बात मत करो। मेरी प्रार्थना केवल यही है कि इस घटना को किसी से मत कहना । यदि लोगों को इस घटना के बारे में पता चल जायेगा तो लोग अपाहिज पर विश्वास नहीं करेंगे। यह कहकर बाबा ने सुलतान की तरफ से मुँह मोड़ लिया।

खड्ग सिंह का मुँह आश्चर्य से खुला ही रह गया। रात्रि के अन्धकार में वह बाबा के मंदिर के पास आकर सन्नाटे में सुलतान को अस्तबल में बाँध दिया और चला गया। कल सुबह बाबा अपने आदत के अनुकूल अस्तबल जाने लगे। लेकिन याद आते ही लौटने लगे। उतनी ही देर में सुलतान की हिनहिनाहट सुनकर आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़कर सुलतान के गले लिपटकर रोने लगे। मानो बिछड़ा बेटा वापस आया हो  पुनः संतोष की श्वास – लेते हुए बोले…..अब कोई गरीब की सहायता करने से मुख नहीं मोड़ेगा।

Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 3 पुष्प की अभिलाषा

Bihar Board Class 7 Hindi Book Solutions Kislay Bhag 2 Chapter 3 पुष्प की अभिलाषा Text Book Questions and Answers and Summary.

BSEB Bihar Board Class 7 Hindi Solutions Chapter 3 पुष्प की अभिलाषा

Bihar Board Class 7 Hindi पुष्प की अभिलाषा Text Book Questions and Answers

पाठ से –

Pushp Ki Abhilasha Question Answer In Hindi Bihar Board प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों के भावार्थ स्पष्ट कीजिए –
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं. देवों के सिर पर,
चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।
उत्तर:
भावार्थ-हे प्रभु! हमारी अभिलाषा सम्राटों के मृत शरीर पर डाले जाने की नहीं और देवताओं के सिर पर चढ़कर अपने को भाग्यशाली मानें ऐसी भी हमारी अभिलाषा नहीं है।

Pushp Ki Abhilasha Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
प्रस्तुत पाठ में “मैं” शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
उत्तर:
पुष्य के लिए।

पुष्प की अभिलाषा के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
हे वनमाली, मुझे तोड़कर उस रास्ते पर फेंक देना, जिस रास्ते से होकर अपनी मातृभूमि पर शीश चढ़ाने वाले वीर जाते हैं।” उपर्युक्त भाव पाठ की जिन पंक्तियों के द्वारा अभिव्यक्ति होती है उन पंक्तियों को लिखिए।’
उत्तर:
मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढाने,
जिस पथ जाएँ वीर अनेक ।।

Pushp Ki Abhilasha Questions And Answers Bihar Board प्रश्न 4.
“भाग्य पर इठलाऊँ” का कौन-सा अर्थ ठीक लगता है ?
(क) भाग्य पर नाराज होना।
(ख) भाग्य पर गर्व करना।
(ग) भाग्य पर विश्वास न करना।
उत्तर:
(ख) भाग्य पर गर्व करना।

पाठ से आगे –

पुष्प की अभिलाषा प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
बड़े-बड़े सम्मान पाने की बजाय पुष्प उस पथ पर फेंका जाना क्यों पसंद करता है, जिस पर मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले दीर जाते हैं ? अपना विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
बड़े-बड़े सम्मान पाना या बड़ों से सम्मानित होना मानव धर्म है लेकिन सबसे बड़ा धर्म है-देश धर्म अर्थात् मातृभूमि के प्रति धर्म का पालन करना । मातृभूमि की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है। अतः पुष्प को चाह है कि-यदि मैं अपनी मातृभूमि के रक्षक वीरों के पैर को कुछ राहत पहुँचा सकूँ तो हमारी सार्थकता सर्वोपरि होगी।

पुष्प की अभिलाषा कविता के प्रश्न उत्तर Bihar Board  प्रश्न 2.
पुष्प की भाँति आपकी भी कोई अभिलाषा होगी। उन्हें दस वाक्यों में लिखिए। .
उत्तर:
पुष्प की भाँति मेरी भी अभिलाषा है कि.-मैं भी देश-रक्षार्थ देश का सिपाही बनें । मेरे शरीर का एक-एक बूंद देश की रक्षा में लगे । हम अपने देश के गौरव को बढ़ावें । हम अपनी मातृभूमि के सम्मान को बढ़ावें । भारत माता को कलंकित करने वालों के सिर को कुचल डालें । देश-प्रेम को छोड़कर तुच्छ मानव के प्रति हमारे प्रेम न हो। जब-जब मैं जन्म लूँ, मातृभूमि की रक्षा करते हुए मरूँ। इससे ही जन्म सफल होता है। अतः भगवान से मेरी प्रार्थना
हे हरि, देश धर्म पर मैं बलि-बलि जाऊँ।
अर्थात् मातृभूमि के रक्षार्थ मैं बार-बार बलिदान हो जाऊँ।

व्याकरण –

पुष्प की अभिलाषा पाठ 1 के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
भाग्य शब्द के पहले सौ उपसर्ग लगाकर सौभाग्य शब्द बनता -है। इसी प्रकार नि, दुः अन् उपसर्ग लगाकर दो-दो शब्द बनाइए।
उत्तर:
नि = निहत्था, निशान ।
दुः = दुष्कर्म, दुश्मन ।
अन् = अनावश्यक, अनुत्तीर्ण ।

कुछ करने को –

Pushp Ki Abhilasha Question Answer In Hindi Pdf Bihar Board प्रश्न 1.
कल्पना के आधार पर इस कविता से सम्बन्धित एक चित्र बनाइए।
उत्तर:
चित्र बनावें।

पुष्प की अभिलाषा Questions Bihar Board प्रश्न 2.
मातृभूमि या देश-प्रेम से सम्बन्धित अनेक कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। उनकी कविताओं को खोज कर पढ़िए और अपनी कक्षा में सुनाइए।
उत्तर:
देशगान सुनायें।

पुष्प की अभिलाषा Summary in Hindi

कविता का अर्थ –

चाह नहीं मैं सुरवाला के ………………….. विंध प्यारी को ललचाऊँ।
अर्थ – हे प्रभु ! हमारी चाह देव कन्याओं के गहनों में गूंथा जाना नहीं है और प्रेमी के माला में गूँथाकर प्रेमिका को ललचाने की चाहत भी नहीं है।

चाह नहीं सम्राटों ………………….. भाग्य पर इठलाऊँ।
अर्थ – हे हरि ! सम्राटों के शव (मृत शरीर) पर डाले जाने की चाहत भी मुझे नहीं है तथा देवताओं के सिर पर चढ़कर अपने भाग्य पर गर्व करूँ, ऐसी अभिलाषा भी मेरी नहीं है।

मुझे तोड़ लेना ………………….. जाएँ वीर अनेक॥
अर्थ – हे वन माली ! मेरी अभिलाषा है कि-मझे तोड़कर उस पथ पर फेंक देना, जिस पथ पर मातृभूमि की रक्षार्थ अनेक वीर पुरुष जाते हैं।

Bihar Board Class 12 English Book Solutions Poem 3 Now the leaves are falling fast

Students who are in search of Class 12 English Answers can use Bihar Board Class 12 English Book Solutions Poem 3 Now the leaves are falling fast Pdf. First check in which chapter you are lagging and then Download Bihar Board Solutions for Class 12 English Chapter Wise. Students can build self confidence by solving the solutions with the help of Bihar State Board Class 12 Solutions. English is the scoring subject if you improve your grammar skills. Because most of the students will lose marks by writing grammar mistakes. So, we suggest you to Download Bihar State Board Class 12 English Solutions according to the chapters.

Rainbow English Book Class 12 Solutions Poem 3 Now the leaves are falling fast

Check out the topics covered in Chapter before you start your preparation. Improve your grammar skills with the help of Bihar Board Class 12 English Poem 3 Now the leaves are falling fast pdf links. The solutions for Bihar State Board Class 12 English Textbook are prepared by the English experts. So, if you follow Bihar Board Class 12 English Textbook Solutions you can cover all the topics in Poem 3 Now the leaves are falling fast. This helps to improve your communication skills.

Bihar Board Class 12 English Now the leaves are falling fast Text Book Questions and Answers

A. Work in small groups and discuss these questions

Now The Leaves Are Falling Fast Question Answer Bihar Board Question 1.
There is a season in which trees shed their leaves. Which season is this? What are the other things that take place in this season?
Answer:
It is autumn. In autumn trees shed their leaves. Fruit ripen. Wheat and barley are sown.

Now The Leaves Are Falling Fast Bihar Board Question 2.
What feelings do the trees without leaves evoke in you?
Answer:
The trees look naked and ugly. The sights evoke a feeling of sympathy for them.

Now The Leaves Are Falling Fast Questions And Answers Bihar Board Question 3.
How do old people think about their own life and age when they see a child?
Answer:
They are reminded of their own childhood. They think of their past with nostalgia.

B. 1. Read the following sentences and write T for true and F for false statements 

(a) The leaves are falling very fast.
(b) The nurses are still there to take care of the flowers.
(c) All the prams are gone to the grave.
(d) Whispering neighbours’ disturb the ‘real delight’ of the ageing persons.
(e) Old persons feel lonely as they gradually become inactive.
(f) Death freezes the body and separates us from the crowd of die people.
(g) The promises of love are often deceptive.
(h) Starvation and suffering do not characterise human life.
(i) Travellers get one relief in the waterfall of the mountain.
(j) The prams go rolling on’ suggests the continuity of life.
Answer:
(a) T, (b) F, (c) T, (d) T, (e) T, (f) T, (g) T, (h) T, (i) T, (j) F.

B. 2. Complete the following sentences on the basis of what you have studied

(a) Nurses to the………………………….rolling one.
(b) The cold, impossible, ahead……………. lovely head
……………………………………………could bless
…………………………………………last distress.
Answer:
(a) Nurse’s flowers will not last;
Nurses to the graves are gone,
And the prams go rolling one.
(b) Cold impossible ahead.
Lists the mountain’s lovely head
Whose white waterfall could bless
Travellers in their last distress.

B. 3. Answer the following questions briefly

Question Answer Of Now The Leaves Are Falling Fast Bihar Board Question 1.
What does the poet mean when he says “Now the leaves are falling fast”?
Answer:
The poet means that the leaves of the branches of the tree are falling and the trees are becoming leafless. It is also meant by a person who slowly goes to its death and at last in a grave. Like a tree, every human life has to be destroyed. There is none who can be alive. Everyone is mortal.

Now The Leaves Are Falling Fast Poem Bihar Board Question 2.
What are the words in the second stanza suggest death and the effect of death on the human body?
Answer:
In the second stanza, the following are the words that suggest death and the effect of death on the human body Wishpering neighbours, Pluck and Freeze.

Now The Leaves Are Falling Fast Summary In Hindi Bihar Board Question 3.
How do we complete our last journey to the grave?
Answer:
When a man is dead hundreds of men carry the dead body in a wooden coffin to the grave. This is our last journey.

Now The Leaves Are Falling Fast Line By Line Explanation Bihar Board Question 4.
What do “Trolls” do in the “leafless wood”?
Answer:
Trolls run in search of their food in the leafless wood. They search for food to live.

Now The Leaves Are Falling Fast Ka Question Answer Bihar Board  Question 5.
Who are the ‘travellers’ and how will they be blessed?
Answer:
Old persons are the travellers and they are blessed with their last distress and that is death.

Now The Leaves Are Falling Fast Meaning In Hindi Bihar Board Question 6.
Which words in the first stanza suggest objects from Nature?
Answer:
‘Nurse’s flowers’ is the word in the first stanza that suggests objects from nature. It means ‘a nurse’.

Now The Leaves Are Falling Fast Summary Pdf Bihar Board Question 7.
Who are the ‘whispering neighbours’?
Answer.
Agents or messengers of death are the whispering neighbours who come when a human body is dead.

Now The Leaves Are Falling Fast Summary In English Bihar Board Question 8.
How does human life become miserable?
Answer:
Suffering from diseases and other problems, make human life become miserable and unhappy.

Now The Leaves Are Falling Fast Ka Hindi Bihar Board Question 9.
In what way will the travellers be blessed?
Answer:
Travellers will be blessed of those white waterfall which comes out from the mountain’s head. They will be blessed in their last distress.

C. 1. Long Answer Questions

Now The Leaves Are Falling Fast Written By Bihar Board Question 1.
Falling of leaves suggests the process of death and human waste on a large scale. Explain with reference to the poem.
Answer:
Falling of leaves suggests the process of death and human waste on a large scale. It means human life is just like a leaf which falls from a tree. Firstly, human life just starts as a baby and slowly it grows. After some time a human life suffers from a lot of diseases. Just like weather a human life also changes. When the weather changes the leaves fall down. In the same way, human life also decreases and decays.

Now The Leaves Are Falling Fast Ka Hindi Meaning Bihar Board Question 2.
The poet is critical of the negative tendencies of human society. What are these tendencies ? Give details.
Answer:
The poet W.H. Auden wants to say that human life is totally dependent on human society. Without a human society, it can’t grow properly and also can’t do anything well. The poet is critical of the negative tendencies of human society. There are different kinds of caste or creed. The poet says that all human life is the same and belongs to the same society but the people create different kinds of caste and divide themselves. The poet says that it is not good.

Question 3.
Who are the ‘Strolls’ in the real world?
Answer:
In this poem “The Leaves Are Falling Fast” is written by the poet W. H. Auden. According to his knowledge, those people are the ‘trolls’ in the real world who divide human life in different caste or creeds. The people who did crime anywhere and give troubles to others always think wrong things. They don’t think about others and their problems. They hurt those people who are gentle. Such types of people are the ‘trolls’ in the real world.

Question 4.
Though the poet refers to ‘death’ several times, yet the poem is not a pessimistic one. Justify your answer.
Answer:
The poet W. H. Auden refers to death several times in his poem, yet the poem is not a pessimistic one. In this poem, the poet tells that a tree becomes leafless in autumn. It looks like an old person who suffers from the illness. It seems that the poet has narrated the reality of life. Everything is bound to come to an end. But the circle of life and death will continue. Yet the poet is not a pessimistic one. In this poem, he tells that a tree becomes leafless in this season. It seems like an old person who suffers from an illness and can’t live for a long such as the tree also seemed that it would soon dry. As different types of seasons people also suffer from different kinds of disease.

Question 5.
Write in short the summary of the poem, “Now the Leaves are Falling Fast” [Board Model, 2009]
Or, write a short note of the poem, “Now the Leaves are Falling Fast” [B.M., 2009 A]
Answer:
“Now the Leaves are Falling Fast” is a simple but revealing poem by W.H. Auden. He is a 20th Century poet who tries to expose the frustration which is naturally present in human life. In this poem, the poet tries to show the crisis that has overtaken modem life. The poet describes the slow dismantling of our aspirations, our loneliness and our frustration against a very suitable background of autumn. Our rising aspirations are falling apart like leaves in autumn. Even the flowers growing under big trees are not able to survive. Death lays its icy hand on all. The poet coins highly suggestive expression to refer to death such as “whispering neighbours” and “pluck us from the real delight”. These two expressions suggest that human life is no better than death. In fact, it is life in death. The poet describes the situation of helplessness with the help of trolls who are mining for food without any success. The shocked silence of the nightingale completes the image of death. However, a sense of optimism is betrayed in the closing lines of the poem :

“Cold, impossible, ahead
Lists the mountains Lovely head
Whose white waterfall could bless
Travellers in their last distress.”

Thus the present poem is a fine lyric written by an accomplished poet like W.H. Auden. He has the most beautifully depicted mortality. Mortality and continuity are the two wheels on which life runs.

C. 3. Composition

Write a paragraph in about 100 words on each of the following:
(a) If winter comes, can spring be far behind?
Answer:
Life is blessed with good and bad. Winter is always associated with sad, dull and gloomy atmosphere whereas spring is the sign of freshness, happiness and enjoyment. Human beings should always be optimistic in their approach to life. They should understand the law of Nature. If there is pain, unhappiness or tears today, how far away is the happiness from us? There are two sides to everything. If today there is sorrow, tomorrow it will be happiness. We should believe that a tune will come when there will be equality justice and love everywhere. So we should never lose our hope and always be optimistic.

(b) Let us make this world a better place to live in.
Answer:
Life is beautiful and the world is a beautiful place to live in. But the fact is that we are trying to destroy this world for our selfish ends. God blessed us with a beautiful world. But human beings are destroying their beauty by bringing destruction to Nature. Man is giving so much pressure on this earth that an imbalance is created. They are not only unbalancing the earth but killing people, damaging their properties and making life fearful. Today, a time has come that there is no fellow feeling among the people. They are scared of believing other people. They are trying to protect and save themselves from their enemies in great fear. So it is our duty to make this world a better place to live in and enjoy its beauty.

D. Word Study
D. 2. Word-formation

Read carefully the following sentence taken from the poem:
And the prams go rolling on.
In the above sentence, the word ‘pram’ is the shortened form of perambulators. Write down the short forms of the following :
examination
programme
department
congratulation
modem
advertisement
Answer:
examination — exam,
programme — prog,
department — dept,
congratulation — congrats
modem — mod.
advertisement — ad.

D3. Word-meaning

Ex. 1. Write the antonyms of the following words and use them in your own sentences:

falling…………..
last……………….
freeze…………..
responsive………..
impossible………..
separate………
fast…………….
real…………
false…………
bless………..
Answer:
falling — raising — The children were raising fund for charity.
fast — slow — Ram is very slow in his reading.
last— first — Tom comes first in class.
freeze — melt — The ice got melt.
separate — together — We must work together.
responsive — unresponsive — He played unresponsive due to his bad health.
false — true — She is a true lady.
impossible — possible — Everything is possible in this world,
bless — curse — I never curse others.

E. Grammar

Ex. 1. Read the following sentences carefully:
’And the prams go rolling on’.
The line suggests continuity of action. It can also be rewritten as: ‘And the prams go on rolling’.
Write five similar sentences with ‘go on using the following verbs:
swim, walk, read, sleep, sketch
Answer:
(1) The students go on swimming.
(2) Healthy people go on walking.
(3) The students go on reading.
(4) The lazy go on sleeping.
(5) ‘The children go on sketching.

Ex. 2. Read the following sentence carefully:
‘And the active hands must freeze. ’In the above line ‘must’ suggests ‘compulsion’ or necessity. ‘Must is different from ‘should’ and ‘ought to’ which suggest ‘suggestion’ or ‘obligation’. Fill in blanks with ‘must’, ‘should’, ‘ought to’ to complete the following sentences
(1) We follow a suitable time-table of study.
(2) The young be considerate about the sentiments of their elders.
(3) Death does not mean the end of everything, life goes on.
(4) Why I always follow fashion.?
(5) We, the Indians show respect to the national flag.
Answer:
(1) should, (2) must, (3) must, (4) should, (5) ought to.

Comprehension Based Questions with Answers

1. Read the following extract of the poetic piece and answer the questions that follow:
Now the leaves are falling fast,
Nurse’s flowers will not last;
Nurses to the graves are gone,
Arid the prams go rolling on.

Questions.
(a) Name the poem and the poet.
(b) What do the falling leaves suggest?
(c) What does “nurses flowers will not last” mean?
(d) Whom the poet says, “nurses to the graves”?
(e) What does “the prans go rolling on”, mean?
Answer:
(a) The poem is “Now The Leaves Are Falling Fast.” and the name of the poet is “Wystan Hugh Auden”.
(b) The falling leaves suggest the process of death and human waste on a large stale, indicating the frustration and un fulfilment of human wishes.
(c) Flowers do not last long, because they are short-lived. It is the process of nature that nothing is everlasting.
(d) The poet explains the mortality of life. Death is inevitable. Since nurses have also to meet the same fate, as such they have gone to the graves.
(e) The prans rolling on proves that life goes on despite mortality. Love and compassion can provide heating touches to our tired nerves in the journey of life.

2. Read the following extract of the poetic piece and answer the questions that follow [Board Model, 2009]
Whispering neighbours left and right,
Pluck us from the real delight
And the active hands must freeze
Lonely on the separate knees.

Questions.
(a) Write the title of the poem and the poet’s name.
(b) Who are the “Whispering neighbours?”
(c) What does, “pluck us from the real delight knees”?
(d) Why the active hands must freeze?
(e) To whom the poet says “lonely on the separate knees”?
Answer:
(a) The title of the poem is, “Now The Leaves Are Falling Fast” and its poet is W. H. Auden.
(b) Agents or messenger of death is the whispering neighbours, who come at the time of death, to inform us of the inevitability of death.
(c) The whispering neighbours who are really the agents of death, spoil the joy of our life by pointing to the inevitability of death.
(d) Death freezes the active hands. It means that life.comes to an end with death. It is bound to come one day or another.
(e) Death separates us from the crowd of the people, to remain peacefully under the graves.

3. Read the following extract the poetic piece and answer the questions that follow [Board Model, 2009]
Dead in hundreds at the back
Follow wooden in our track,
Arms raised stiffly to reprove.
In false attitudes of love.

Questions:
(a) Name the poem and the poet.
(b) What does the poet say of the dead?
(c) Whose arms are raised stiffly?
(d) Why the poet feels “false attitude of love”?
(e) What is the feeling of the poet in these lines of the stanza?
Answer:
(a) The poem is, “Now The Leaves Are Falling Fast” and the name of the poet who wrote the poem is, W.H. Auden.
(b) The poet says that so many persons have died shortly because death cannot be avoided.
(c) Dead persons have raised their arms desperately to rebuke it. They are highly aggrieved with the end of life in such away.
(d) The poet feels false attitude of love because of the uncertainty of life and certainty of death. As such he calls it the false attitude of love.
(e) Poets reaction in this stanza relates to the inevitability of death, which cannot be avoided. It is the reality of human life.

4. Read the following extract of the poetic piece and answer the questions that follow [Board Model, 2009]
Starving through the leafless wood
Golden Series Passport
Trolls ran scolding for their food;
And the nightingale is dumb.
And the angel will not come.

Questions:
(a) Name the poem and the poet.
(b) Who are they starving?
(c) Who is scolding for the food?
(d) Why the nightingale is dumb?
(e) Who will not come there?
Answer:
(a) The poem is, “Now The Leaves Are Falling Fast” and the name of the poet is W.H. Auden.
(b) Wicked and ugly creatures are become starving (“trolls” are wicked and ugly creatures in Scandinavian mythology).
(c) Wicked and ugly creatures (trolls) are scolding for the food they require.
(d) The nightingale has become dumb to see the leafless trees. The trees are looking like death and the nightingale becomes silent to mourn this tragedy.
(e) The angel or innocent persons will not come there to witness the ugly and distressing conditions of the leafless trees.

5. Read the following extract of the poetic piece and answer the questions that follow [Board Model, 2009]
Cold, impossible, ahead
Lists the mountain’s lovely head
Whose white waterfall could bless
Travellers in their last distress.

Questions.
(a) Mention the title of the poem and poets’ name.
(b) What is cold and impossible?
(c) What does mountain’s lovely head mean?
(d) To whom white waterfall could bless?
(e) Who happens to be in last distress?
Answer:
(a) The title of the poem is “Now The Leaves Are Falling Fast” and the name of the poet is W.H. Auden.
(b) There are the lovely mountain peaks ahead, which are cold and it is not possible to climb over them.
(c) Mountain’s lovely head means – lovely peaks of the mountain which Jook beautiful.
(d) White waterfall could bless the travellers passing through that way.
(e) The travellers who are passing through lovely mountain peaks and white waterfall are in last distress.

The main aim is to share the knowledge and help the students of Class 12 to secure the best score in their final exams. Use the concepts of Bihar Board Class 12 Poem 3 Now the leaves are falling fast English Solutions in Real time to enhance your skills. If you have any doubts you can post your comments in the comment section, We will clarify your doubts as soon as possible without any delay.

Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 5 भारतमाता

Bihar Board Class 10 Hindi Book Solutions Godhuli Bhag 2 पद्य खण्ड Chapter 5 भारतमाता Text Book Questions and Answers, Summary, Notes.

BSEB Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्य Chapter 5 भारतमाता

Bihar Board Class 10 Hindi भारतमाता Text Book Questions and Answers

कविता के साथ

भारत माता कविता का सारांश Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 1.
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि भारतमाता का कैसा चित्र प्रस्तुत करता है?
उत्तर-
प्रथम अनुच्छेद में कवि ने भारतमाता के रूपों का सजीवात्मक रूप प्रदर्शित किया है।
गाँवों में बसनेवाली भारतमाता आज धूल-धूसरित, शस्य-श्यामला न रहकर उदासीन बन गई है।
उसका आँचल मैला हो गया है। गंगा-यमुना के निर्माण जल प्रदूषित हो गये हैं। इसकी मिट्टी में पहले जैसी प्रतिमा और यश नहीं है। आज यह उदास हो गई है।

भारत माता कविता का सारांश लिखिए Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 2.
भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है ?
उत्तर-
भारत को अंग्रेजों ने गुलामी की जंजीर में जकड़ रखा था। इस देश पर अंग्रेजी हुकूमत कायम थी। यहाँ की जनता का कोई अधिकार नहीं था। अपने घर में रहकर पराये आदेश को मानना विवशता थी। परतंत्रता की बेड़ी में जकड़ी, काल के कुचक्र में फंसी विवश, भारत-माता चुपचाप अपने पुत्रों पर किये गये अत्याचार को देख रही थी। यहाँ की धरती दूसरे के अधीन थी। भारत माँ के पुत्र स्वतंत्र विचरण नहीं कर सकते थे। इसलिए कवि ने परतंत्रता को दर्शाते हुए मुखरित किया है कि भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी बनी है।

भारत माता कविता की व्याख्या Pdf Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 3.
कविता में कवि भारतवासियों का कैसा चित्र खींचता है ?
उत्तर-
प्रस्तुत कविता में कवि ने दर्शाया है कि परतंत्र भारत की स्थिति दयनीय हो गई थी। अंग्रेजों ने सुसंपन्न, सुसंस्कृत, सभ्य, शिखित और सोने की चिडिया स्वरूप भारत को निर्धनता, दीनता की हालत में ला दिया था। परतंत्र भारतवासियों को नंगे बदन, भूखे रहना पड़ता था। यहाँ की तीस करोड़ जनता, शोषित पीड़ित, मूढ, असभ्य अशिक्षित, निर्धन एवं वृक्षों के नीचे निवास करने वाली थी। कवि ने भारतवासियों के दीन हालत की यथार्थता को दर्शाया है। अर्थात् तात्कालीन भारतीय मूढ़, असभ्य, निर्धन, अशिक्षित, क्षुधित का पर्याय बन गये थे।

भारत माता’ कविता का भाव सौंदर्य स्पष्ट कीजिए Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 4.
भारतमाता का ह्रास भी राहुग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है ?
उत्तर-
विदेशियों के द्वारा बार-बार लूटने रौंदने से भारतमाता चित्र विकीर्ण हो गया है। मुगलों .. के बाद अंग्रेजों ने लूटना शुरू कर दिया है। आज यह दूसरों के द्वारा रौंदी जा रही है। जिस तरह धरती सब बोल सहन करती है उसी तरह यह भारतमाता भी सबका धौंस उपद्रव आदि सहज भाव से सहन करती है। चंद्रमा अनायास राहु द्वारा ग्रसित हो जाता है उसी तरह यह धरती भी विदेशी आक्रमणकारी जैसे राहु से ग्रसित हो जाया करती है।

भारत माता’ कविता की विशेषताएं Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 5.
कवि भारतमाता को गीता प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञान मूठ क्यों कहता है ?
उत्तर-
भारत सत्य-अहिंसा, मानवता, सहिष्णुता, आदि का पाठ सारे विश्व को पढ़ाता था। किन्तु आज इस क्षितिज पर अज्ञानता की पराकाष्ठा चारों तरफ फैल गई है। लूटखसोट, अलगाववाद बेरोजगारी आदि जैसी समस्या उसको नि:शेष करते जा रहे हैं। मुखमण्डल सदा सुशोभित रहनेवाली भारतमाता के चित्र धूमिल हो गये हैं। धरती, आकाश आदि सभी इसके प्रभाव से ग्रसित हो गये हैं। आज सर्वत्र अंधविश्वास, अज्ञानता का साम्राज्य उपस्थित हो गया है। इसी कारण कवि ने इसे ज्ञानमूढ कहा है।

जय जन भारत कविता के प्रश्न उत्तर Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 6.
कवि की दृष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है ?
उत्तर-
विदेशियों द्वारा बार-बार पद-दलित करने के उपरान्त भी भारतमाता के सहृदयता के भाव को नहीं रौंदा गया है। इसकी सहनशीलता, आज भी बरकरार है। आज भी यह अहिंसा का पाठ पढ़ाती है। लोगों के भय को दूर करती है। सबकुछ खो देने के बाद भी यह अपने संतान. में वसुधैव कुटुम्बकम की ही शिक्षा देती है। यह भारतमाता के तप का ही परिणाम है कि उसकी संतान सहिष्णु बने हुए हैं।

भारत माता कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 7.
व्याख्या करें
(क) स्वर्ण शस्य पर पद-तल-लुंठित, धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित
(ख) चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नम वाष्पाच्छादित।
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य के सुमित्रानंदन पंत रचित ‘भारत माता’ पाठ से उद्धृत है। इसमें कवि ने परतंत्र भारत का साकार चित्रण किया है। भारतीय ग्राम के खेतों में उगे हुए फसल को भारत माता का श्यामला शरीर मानते हुए कवि ने कहा है कि भारत की धरती पर सुनहरा फसल सुशोभित है और वह दूसरे के पैरों तले रौंद दिया गया है।

प्रस्तुत व्याख्येय में कवि ने कहा है कि भारत पर अंग्रेजी हुकूमत कायम हो गयी है। यहाँ के लोग अपने ही घर में अधिकार विहीन हो गये हैं। पराधीनता के चलते यहाँ की प्राकृतिक शोभा भी उदासीन प्रतीत हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ कवि की स्वर्णिम फसल पैरों तले रौंद दी गयी है और भारत माता का मन सहनशील बनकर कुंठित हो रही है। इसमें कवि ने पराधीन भारत की कल्पना को मूर्त रूप दिया है।

(ख) प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य के ‘भारत माता’ पाठ से उद्धत है जो सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भारत का मानवीकरण करते हुए पराधीनता से प्रभावित भारत माता के उदासीन, दुःखी एवं चिंतित रूप को दर्शाया है।

प्रस्तुत व्याख्येय में कवि ने चित्रित किया है कि गुलामी में जकड़ी भारत माता चिंतित है, उनकी भृकुटि से चिंता प्रकट हो रही है, क्षितिज पर गुलामी रूपी अंधकार की छाया पड़ रही है, माता की आँखें अश्रुपूर्ण हैं और आँसू वाष्प बनकर आकाश को आच्छादित कर लिया है। इसके माध्यम से परतंत्रता की दुःखद स्थिति का दर्शन कराया गया है। पराधीन भारत माता उदासीन है इसका बोध कराने का पूर्ण प्रयास किया है।

भारत माता सुमित्रानंदन पंत Bihar Board Class 10 Hindi प्रश्न 8.
कवि भारतमाता को गीता प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है?
उत्तर-
यह सर्वविदित है कि प्राचीन काल से ही भारत जगत गुरु कहा है। वेद वेदांग दर्शन, ज्ञान-विज्ञान की शोध स्थली भारत विश्व को ज्ञान देते रहा है। ‘गीता’ जो मानव को कर्मण्यता का पाठ पढ़ाता है जिसमें मानवीय जीवन के गूढ रहस्य छिपे हैं, यही सृजित किया गया है। लेकिन परतंत्र भारत की ऐसी दुर्दशा हुई कि यहाँ के लोग खुद दिशा विहीन हो गये, दासता में बँधकर अपने अस्मिता को खो दिये। आत्मनिर्भरता समाप्त हो या परावलम्बी। जीवन निकृष्ट, नीरस, ‘अज्ञानी, निर्धन एवं असभ्य हो गया। इसलिए कवि कहता है कि भारतमाता गीता प्रकाशिनी है
फिर भी आज ज्ञान मूढ़ बनी हुई है।

प्रश्न 9.
भारतमाता कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
भारत कभी धन-धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी था। किन्तु आज कितना बदला-बदला-सा है यह देश। इसी भारत की यथार्थवादी तस्वीर उतारती पंत की ‘ग्राम्या’ से संकलित यह कविता हिन्दी के श्रेष्ठ प्रगीतों में है। यहाँ कवि ने भारत का मानवीकरण करते हुए उसका चित्रण किया है। . भारत माता गांववासिनी है। दूर-दूर तक फैले हुए इसके श्याम खेत-खेत नहीं, धूल भरे आँचल हैं। गंगा और यमुना के जल, मिट्टी की इस उदास प्रतिमा में आँखों से बरसते हुए जल हैं।

दीनता से दुखी भारतमाता अपनी आँखें नीचे किए हुए हैं, होठों पर निःशब्द रोदन है और युगों से यहाँ छाए अंधकार से त्रस्त, यह अपने घर में ही बेगानी है। सब कुछ इसी का है, किंतु । नियमित का चक्र है कि आज इसका कुछ नहीं है, दूसरे ने अधिकार जमा लिया है।
इसके तीस करोड़ पुत्रों (कविता लिखे जाने तक भारत की आबादी इतनी ही थी) की दशा यह है कि वे प्रायः नंगे हैं, अधपेटे हैं, इनका शोषण हो रहा है ये अशिक्षित, भारत माता मस्तक झुकाए वृक्ष के नीचे खड़ी हैं।

भारत के खेतों पर सोना उगता है, पर इस देश को दूसरे अपने पैरों से रौंद रहे हैं, कुठित मन है हृदय हार रहा है, होंट थरथरा रहे हैं पर मुँह से बोली नहीं निकल रही। लगता है इस शरत चन्द्रमा को राहू ने ग्रस लिया है।

भारत माता के माथे पर चिंता की रेखाएँ हैं, आँखों में आँसू भरे हैं। मुख-मण्डल की तुलना चन्द्रमा से है किन्तु ‘गीता’ के सन्देश देनेवाली यह जननी मूढ़ बनी है। . किन्तु लगता है, आज इसकी अबतक की तपस्या सफल हो रही है, इसका तप-संयम रंग ला रहा है। अहिंसा का सुधा-पान कराकर यह लोगों का भय, भ्रम और तय दूर करनेवाली जगत जननी नये जीवन का विकास कर रही है।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
कविता के अनुच्छेद में विशेषण का संज्ञा की तरह प्रयोग हुआ है। आप उनका चयन करें एवं वाक्य बनाएँ।
ग्रामवासिनी, श्यामल, मैला, दैन्य, नत, नीरख। ।
विषण्ण, क्षुधित, चिर, मौन, चिंतित।
उत्तर-
ग्रामवासिनी – ग्रामवासिनी, अंग्रेजों की अत्याचार से त्रस्त थे।
श्यामल – उसका श्यामल वर्ण फीका हो गया है।
मैला – उसका आँचल मैला हो गया।
दैन्य – उसका दैन्य देखने में बनता है।
नत – उसका मस्तक नत है।
नीरव – नंदी नीरव गति से बह रही है।
विषण्ण – उसका हृदय विषण्ण है।
क्षुधित – क्षुधित मनुष्य कौन-सा पाप नहीं करता है।
चिर – चीर चिर है।
मौन – उसने मौन वर्त रखा है।
चिंतित – उसकी चिंतित मुद्राएँ अनायास आकर्षित करती है।

प्रश्न 2.
निम्नांकित के विग्रह करते हुए समास स्पष्ट करें
ग्रामवासिनी, गंगा-यमुना, शरदेन्दु, दैत्यजड़ित, तिमिरांकित, वाष्पाच्छादित, ज्ञानमूढ़, तपसंयम, जन-मन भय, भव-तम-भ्रम।
उत्तर-
ग्रामवासिनी – ग्राम में वास करने वाली – तत्पुरुष समास
गंगा-यमुना – गंगा और यमुना – द्वन्द
शरदेन्दु – शरद ऋतु की चाँद – तत्पुरुष
दैत्यजड़ित – दैत्य से जड़ित – तत्पुरुष
तिमिराकित – मिमिर से अंकित – तत्पुरुष
वाष्पाच्छादित – वाष्प से आच्छादित – तत्पुरुष
ज्ञानमूढ़ – ज्ञान में मूढ़ – तत्पुरुष
तपसंयम – तप में संयम – तत्पुरुष
जन-मन-भय – जन, मन और भय – द्वन्द
भव-तम भ्रम – अंत में भ्रमित संसार- तत्पुरुष

प्रश्न 3.
कविता से तद्भव शब्दों का चयन करें।
उत्तर-
भारतमाता, ग्रामवासिनी, खेतों, मैला, आँसू, मिट्टी, उदासिनी रोदन, थार, तीस, मूढ़, निवासिनी, चिंतित।

प्रश्न 4.
कविता से क्रियापद चुनें और उनका स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें।
उत्तर-
नत – उसका मस्तक नत है।
फैला – प्रकाश फैल गया।
क्रंदन – उसका क्रंदन सुनकर हृदय द्रवित हो गया।
पिला – उसने उसे अमृत पिला दिया।
धरती – धरती सबका संताप हरती है।

काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

1. भारतमाता ग्रामवासिनी
खेतों में फैला है श्यामल
धूल-भरा मैला-सा आँचल
गंगा-यमुना में आँस-जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी !
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग-युग के तप से विषण्ण मन
वह अपने घर में
प्रवासिनी!

प्रश्न
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) पद्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता- भारतमाता।
कवि- सुमित्रानंदन पंत

(ख) प्रस्तुत पद्यांश में हिन्दी काव्य धारा के प्रख्यात सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने भारतमाता का यथार्थ चित्र खींचा है। गुलामी के जंजीर में जकड़ी हुई भारत माता अंत:करण से कितनी व्यथित है इसी का चित्रण कवि यथार्थवादी धरातल पर कर रहे हैं। यहाँ कवि भारतमाता
को ग्रामवासिनी के रूप में चित्रण किया है क्योंकि भारत की अधिकांशतः जनता गाँवों में ही . निवास करती है। साथ ही प्रकृति का अनुपम सौंदर्य ग्रामीण क्षेत्रों में ही देखने को मिलते हैं।

(ग) कवि मुख्यतः मानवतावादी हैं और प्रकृति के पुजारी हैं। इसलिए यहाँ भी ग्रामीण क्षेत्र के प्रकृति का मानवीकरण करते हुए कहते हैं कि हमारी भारतमाता गाँवों में निवास करती हैं। भारत की भोली-भाली जनता गाँवों में रहती है जहाँ प्रकृति भी अनुपम सौंदर्य के साथ निवास करती है। ग्रामीण क्षेत्रों के विस्तृत भू-भाग में जो फसल लहलहाते हैं वे भारत माता के श्यामले शरीर के समान सुशोभित हो रहे हैं। भारत माता का धरती रूपी विशाल आँचल धूल-धूसरित और मटमैला दिखाई पड़ रहा है। गुलामी की जंजीर में जकड़ी हुई भारत माता कराह रही है। अर्थात् भारतीय जनता के क्रन्दन के साथ ऐसा लगता है कि भारत की प्रकृति भी परतंत्रता के कारण काफी व्यथित है। मिट्टी की प्रतिमा के समान निर्जीव और चेतना रहित होकर चुपचाप शांत अवस्था में भारत माता बैठी हुई है और अंत:करण से कराहती हुई गंगा और यमुना के धारा के रूप में आँसू बहा रही है।

यह भारत माता दीनता से जकड़ी हुई है। भारत की परतंत्रता पर अपने आपको आश्रयहीन महसूस कर रही है और जैसे लगता है कि बिना पलक गिराये हुए अपनी दृष्टि को झुकाये हुए कुछ गंभीर चिंता में पड़ी हुई है। हमारी भारत माता अपने ओठों पर बहुत दिनों से क्रंदन की उदासीन भाव रखी हुई है। जैसे लगता है कि बहुत युगों से अंधकार और विषादमय वातावरण में अपने आपको जकड़ी हुई महसूस कर रही है और यह भी प्रतीत हो रहा है कि अपने ही घर में प्रवासिनी बनी हुई है। इसका अभिप्राय यह है कि अंग्रेज शासक खुद भारत में रहकर भारतवासियों को शासन में कर लिया है।

(घ) प्रस्तुत अवतरण में भारतीय परतंत्रतावाद का सजीव चित्रण किया गया है। भारत के प्राकृतिक वातावरण का मानवीकरण किया गया है जिसमें भारत माता को रोती हुई मिट्टी की प्रतिमा बनाकर दर्शाया गया है। मिट्टी की प्रतिमा खेतों में लहलहाते फसल और धूल-धूसरित आँचल के माध्यम से कवि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति असीस आस्था और विश्वास व्यक्त किया है। साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा में ग्रामीण क्षेत्रों के प्राकृतिक वातावरण की प्राथमिकता देना चाहता है।

(ङ)

  • प्रस्तुत अंश में प्रकृति सौंदर्य का यथार्थवादी और अनूठा चित्र खींचा गया है।
  • प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की सुकुमारता यहाँ पूर्ण लाव-लश्कर के साथ दिखाई पड़ती है।
  • भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग अति प्रशंसनीय है।
  • अलंकार योजना की दृष्टि से मानवीकरण अलंकार का जबर्दस्त प्रभाव है। इसके साथ अनुप्रास, रूपक और उपमा की छटा कविता में जान डाल दी है।
  • कविता में खड़ी बोली का पूर्ण वातावरण दिखाई पड़ता है।
  • शब्द योजना की दृष्टि से तत्सम एवं तद्भव शब्द अपने पूर्ण परिपक्वता में उपस्थित हुए हैं। कविता संगीतमयी हो गयी है।

2. तीस कोटि सन्तान नग्न तन,
तीस कोटि सन्तान नग्न
अर्ध क्षधित, शोषित, निरस्त्रजन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरू-तल निवासिनी !
स्वर्ण शस्य पर-पद-तल लुंठित,
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित
क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी !

प्रश्न
(क) कविता एवं कवि का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) पद्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता.भारतमाता
कवि- सुमित्रानंदन पंत।

(ख) प्रस्तुत अवतरण में हिन्दी छायावादी विचारधारा के महानतम कवि सुमित्रानंदन पंत भारतवासियों का चित्र खींचा है। यहाँ दलित, अशिक्षित निर्धन, कुंठित, भारतवासी अतीत की गरिमा को भुलाकर वर्तमान की वैभवहीनता प्रणाली में जीवनयापन कर रहे हैं। परतंत्रता की जंजीर भारतवासियों को ऐसां जकड़ लिया है कि उनका जीवन अंधकारमय वातावरण में बिलबिलाता हुआ भटक रहा है।

(ग) कवि प्रस्तुत अंश में भारतवासियों के बारे में कहता है कि भारत के तीस करोड़ जनता अंग्रेजों के द्वारा शोषित होने के कारण वस्त्रहीन हो गये हैं। अर्थात् जिस समय भारत गुलाम था उस समय भारत की जनसंख्या तीस करोड़ थी। गरीबी की मार ऐसी थी कि उनके शरीर पर साबुन कपड़े भी नहीं थे। आधा पेट खाकर शोषित होकर, निहत्थे होकर, अज्ञानी और असभ्य होकर जीवनयापन कर रहे थे। दासता का बंधन समस्त भारतीयों को अशिक्षित और निर्धन बना दिया था। जैसे लगता था कि हमारी भारत माता ग्रामीण वृक्षों के नीचे सिर झुकाये हुए कोई गंभीर
सोच में पड़ी बैठी हुई है।

खेतों में चमकीले सोने के समान लहलहाते हुए फसल किसी दूसरे के पैरों के नीचे रौंदा जा रहा है और हमारी भारत माता धरती के समान सहनशील होकर हृदय में घुटन और क्रंदन . का वातावरण लेकर जीवन जी रही है। मन ही मन रोने के कारण भारतमाता के अधर काँप रहे
हैं। उसके मौन मुस्कुराहट भी समाप्त हो गयी है। साथ ही शरद काल में चाँदनी के समान हँसती हुई भारत माता अचानक राहु के द्वारा ग्रसित हो गई है।

(घ) प्रस्तुत अंश में गुलामी से जकड़ा भारतवासियों का बहुत ही दर्दनाक चित्र खींचा गया है। यह चित्र आज भी पूर्ण प्रासंगिक है। इसके माध्यम से कवि समस्त भारतवासियों को अतीत की गहराई में ले जाना चाहते हैं। साथ ही राहुरूपी अंग्रेजों की कट्टरता और संवेदनहीनता का दर्शन करवाते हैं।

(ङ)

  •  प्रस्तुत कविता हिंदी की यथार्थवादी कविता के एक नये उन्मेष की तरह है।
  • यह प्राकृतिक सौंदर्य की छवि को दर्शाती है जिससे यह मनोरम कही जा सकती है।
  • अलंकार योजना की दृष्टि से मानवीकरण अलंकार से अलंकृत है।
  • अनुप्रास, रूपक और उपमा की छटा कविता में जान डाल दी है।
  • कविता संगीतमयी है।

3.  चिंतित भृकटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!
सफल आज उसका तप संयम,
पिता अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भय, भव-तम-भ्रम,
जग-जननी
जीवन-विकासिनी!

प्रश्न
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखें।
(ख) पद्यांश का प्रसंग लिखें।
(ग) पद्यांश का सरलार्थ लिखें।
(घ) पद्यांश का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
(ङ) पद्यांश का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
(क) कविता- भारतमाता।
कवि सुमित्रानंदन पंत।

(ख) प्रस्तुत अवतरण में हिन्दी छायावादी के महान प्रवर्तक सुमित्रानंदन पंत परतंत्रतावाद , में भारतवासियों की स्थिति कितनी कठोरतम थी एवं कितना जटिल जीवन था, इसी का वर्णन यथार्थ के धरातल पर करते हैं।

(ग) कवि भारत माता का नाम लेकर सम्पूर्ण भारतीय भाषावाद, जातिवाद, संप्रदायवाद एवं राजनीतिवाद को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते हैं। तब तो भारत की तीस करोड़ जनता के मनोभिलाषा को दर्शाते हैं। हमारी भारतमाता की भृकुटी चिंता से ग्रसित है। सम्पूर्ण धरातल, परतंत्रारूपी अंधकार से घिरा हुआ है। सभी भारतवासियों के नेत्र झुके हुए हैं। भारतवासियों का हृदय-रूपी आकाश आँसूरूपी वाष्प से ढंक गया है।

चंद्रमा के समान सुन्दर और प्रसन्न मुख उदासीन होकर कोई घोर चिंता के सागर में डूब गया है जो भारतमाता अज्ञानता को समाप्त करनेवाली गीता उत्पन्न की है वही आज अज्ञानता ‘के वातावरण में भटक रही है।

इतने कठोरतम जीवन के बाद भी हमारी भारतमाता का तप और संयम में कमी नहीं आयी है। अपने समस्त भारतवासियों को अहिंसा का दूध पिलाकर उनके मन के भय अज्ञानता, प्रेमहीनता एवं भ्रमशीलता को दूर करती हुई सम्पूर्ण जगत की जननी होकर जीवन को विकास करनेवाली है।

(घ) प्रस्तुत पद्यांश में पराधीन भारत की दीन हालत की वास्तविक झलक मिलती है। इसमें पराधीनता से चिंतित भारतमाता की उदासीन चेहरा को जीवंत रूप में चिंत्रित किया गया है। नम आँखें, अश्रुरूपी वाष्प, गुलामी की अंधकाररूपी छाया के माध्यम से भारत माता दुखी भाव को जीवंत रूप में दर्शाया गया है। पद्यांश में भारतमाता विशाल छवि की कल्पना करते हुए जग जननी की संज्ञा देकर इसकी महत्ता को उजागर किया है। इस काव्यांश के माध्यम से ज्ञान, अहिंसा, तप, संयम को धारण करनेवाली भारत माता जीवन विकासिनी है ऐसी चेतना विश्व में जगाने का
प्रयास किया गया है।

(ङ)

  • यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य का प्रकटीकरण है।
  • भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग अति प्रशंसनीय है।
  • शब्द योजना की दृष्टि से तत्सम एवं तद्भव शब्द अपने पूर्ण परिपक्वता में उपस्थित हए हैं।
  • अलंकार योजना की दृष्टि से मानवीकरण अलंकार है।
  • इसमें अनुप्रास, रूपक और उपमा की छटा निहित है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें-

प्रश्न 1.
‘भारत माता’ किस कवि की रचना है ? या ‘भारत माता’ के रचयिता कौन हैं?
(क) रामधारी सिंह दिनकर
(ख) प्रेमधन
(ग) सुमित्रानन्दन पंत
(घ) कुंवर नारायण
उत्तर-
(ग) सुमित्रानन्दन पंत

प्रश्न 2.
सुमित्रानन्दन पंत कैसे कवि हैं ?
(क) हालावादी
(ख) छायावादी
(ग) रीतिवादी
(घ) क्षणवादी
उत्तर-
(क) हालावादी

प्रश्न 3.
पंतजी की भारत माता कहाँ की निवासिनी है ?
(क) ग्रामवासिनी
(ख) नगरवासिनी
(ग) शहरवासिनी
(घ) पर्वतवासिनी
उत्तर-
(क) ग्रामवासिनी

प्रश्न 4.
भारत माता का आँचल कैसा है ?
(क) नीला
(ख) लाल
(ग) गीला
(घ) धूल भरा
उत्तर-
(घ) धूल भरा

प्रश्न 5.
भारत माता’ कविता कवि के किस काव्य-ग्रंथ से संकलित है?…
(क) वीणा
(ख) ग्रंथि
(ग) ग्राम्या
(घ) उच्छवास
उत्तर-
(ग) ग्राम्या

प्रश्न 6.
पंतज़ी का मूल नाम क्या था?
(क) गोसाईं दत्त
(ख) सुमित्रानंदन
(ग) नित्यानंद पंत
(घ) परमेश्वर दत्त पंत
उत्तर-
(घ) परमेश्वर दत्त पंत

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1.
पंतजी को उनकी साहित्य-सेवा के लिए भारत सरकार ने ………….. से अलंकृत किया।
उत्तर-
पद्मभूषण

प्रश्न 2.
………. पर पंतजी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।
उत्तर-
चिदंबरा

प्रश्न 3.
पंतजी मूलत: ……….. और सौंदर्य के कवि हैं।
उत्तर-
प्रकृति

प्रश्न 4.
कवि के अनुसार गंगा-यमुना के जल …….. के आँसू हैं।
उत्तर-
भारतमाता

प्रश्न 5.
पंतजी का जन्म अल्मोड़ा जिला के ……… में हुआ था।
उत्तर-
कौसानी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पंतजी ने अपनी कविताओं में प्रकृति के किस पक्ष का उद्घाटन किया है ?
उत्तर-
पंतजी ने अपनी कविताओं में प्रकृति के सुकोमल पक्ष का उद्घाटन किया है।

प्रश्न 2.
‘भारत माता’ कविता पर किस विचारधारा का प्रभाव है ?
उत्तर-
भारत माता’ कविता पर प्रगतिवाद का प्रभाव है।

प्रश्न 3.
कवि पंत के ‘भारत माता’ कविता में किस काल के भारत का चित्रण है ?
उत्तर-
कवि पंत के ‘भारत माता’ कविता में भारत के पराधीन काल का चित्रण है।

प्रश्न 4.
‘भारत माता’ कविता में भारत के किस रूप का उल्लेख है ?
उत्तर-
‘भारत माता’ कविता में भारत के दीन-हीन का उल्लेख है।

प्रश्न 5.
‘भारत माता’ कविता में कैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है ?
उत्तर-
‘भारत माता’ कविता में तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

व्याख्या खण्ड

प्रश्न 1.
“भारत माता ग्रामवासनी
खेतों में फैला है श्यामल,
धूल-भरा मैला-सा आँचल
गंगा-यमुना में आँसू जल
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी !”
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘भारत माता’ काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इस कविता के रचनाकार महाकवि पंतजी है। कवि का कहना है कि भारत माता गाँवों में बसती है। उसके रूप की छटा हरियाली के रूप में खेतों में पसरी है। माँ का आँचल धूल से भरा हुआ
मटमैला दिखाई पड़ता है। गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों की तरह आँखों में जल है। भारत माता मिट्टी की सही प्रतिमा है। भारत माता का व्यक्तित्व हर दृष्टि से संपन्न है फिर भी मुखमंडल उदास क्यों हैं ? यह कवि स्वयं से और लोक-जन से प्रश्न पूछता है। इन पंक्तियों में कवि के कहने का भाव यह है कि भारत साधन-संपन्न देश होकर भी अभाव, बेकारी, वैमनस्य के बीच क्यों जी रहा है। इन्हीं कारणों से उसने भारत-भू को लोकदेवी, भारतमाता, भारतदेवी के रूप में , चित्रित कर यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया है। इसमें भारतीय जन-जीवन, उसकी वर्तमान स्थिति का स्पष्ट रेखांकन है, सत्य चित्रण है।

प्रश्न 2.
“दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग-युग के तम से विषण्ण मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी!
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता शीर्षक कविता से ली गयी हैं।
इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता की दैन्य स्थिति का सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है।

कवि भारत माँ की पीड़ा, आकुलता, अभावग्रस्तता को देखकर व्यथित हो उठा है। वह कहता है कि भारत माता दीनता से पीड़ित हैं। आँखें अपलक रूप में नीचे की ओर झुकी हुई हैं। होठों पर बहुत दिनों से मौन दिखायी पड़ता है। युग-युग के अंधकार सदृश्य टूटे मन के साथ निज घर में वास करते हुए भी प्रवासिनी के रूप में यानी अजनबी के रूप में रह रही हैं।

इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारत माता का मानवीकरण किया है और सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है। भारतीय जन की पीड़ा, दीनता, रूदन, नैराश्य जीवन, टूट मन, पुराने कष्टप्रद घावों को देखकर कवि का संवेदनशील हृदय पीड़ित हो उठता है और भारत माता को भारतीय जन की पीड़ाओं, चिन्ताओं, कष्टों के रूप में चित्रित कर दिखाना चाहता है। कविता की इन पंक्तियों में भारतीय जन की पीड़ा, चिंता, भारत माता की चिंता है, पीड़ा है, अभावग्रस्तता है।

प्रश्न 3.
तीस कोटि सन्तान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्रजन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक,
तरु-तल निवासिनी!
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि कल्पना करता है कि तीस करोड़ पुत्रों की स्थिति आज असहनीय है। ये सारी संतानें नंगे तन लेकर रास्ते में भटक रही हैं। भूख भी आधी पूरी हुई है, अर्थात् आधा पेट भोजन ही उपलब्ध है। शोषित रूप में बिना किसी हथियार के यानी निहत्थे रूप में जी रहे हैं। भारतीय जनता कैसी है ? …मूढ़ है, असभ्य है, अशिक्षित है, निर्धन है, उसके मस्तक झुके हुए हैं अर्थात् उसमें प्रतिरोध का साहस नहीं रह गया है। पेड़ों के तल के नीचे निवास करनेवाली भारतीय जनता यानी भारत माता की आज की दुर्दशा और विवशता देखी नहीं जाती।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि के कहने का भाव यह है कि भारत के लोग घोर गरीबी, फटेहाली, बेकारी और अभाव में आज भी जी रहे हैं. और कल भी जीने के लिए विवश हैं।
इन पंक्तियों में कवि ने भारत माता का चित्रण करते हुए भारतीय जनता को पुत्र रूप में चित्रित किया है और उनकी विशेषताओं, अभावों, कष्टों, दुःखों का सटीक वर्णन किया है। .

प्रश्न 4.
“स्वर्ण शस्य पद-तल लुंठित,
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रंदन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु-ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी!”
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता काव्य-पाठ से संकलित हैं। इन पक्तियों में कवि ने भारत माता के रूप-स्वरूप की विशेषताओं को चित्रित किया है। कवि कहता है कि स्वर्ण भंडार से युक्त, भारत की धरती है लेकिन पैरों तले रौंदकर घायल कर दिया गया है ऐसा क्यों ? धरती की तरह सहन शक्ति से युक्त मन है, फिर भी कुंठित क्यों है ? करुण क्रंदन से होंठ काँप रहे हैं। होंठों यानी अधरों पर जहाँ मौन हँसी रहनी चाहिए उसे राहु ने ऐसा ग्रस लिया है जैसे चन्द्रग्रहण लगता है।

शरत के चन्द्रमा की हँसी की तरह यानी चांदनी रात की छटा से युक्त भारत माता का व्यक्तित्व होना चाहिए। वहाँ आज उदासी है, रुदन है, कुंठा है, पीड़ा है, कंपन है, रौंदा हुआ मन है। . इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारतीय जन के अंतर के संत्रास को भारतमाता की पीड़ा, संत्रास, कुंठा के रूप में चित्रित किया है। भारत माता की विवशता, दीनता, दलित, टूटे मन के भाव को दिखाया गया है।

प्रश्न 5.
चिंतित भृकुटी क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाण्याच्छादित,
आनन श्री छाया-शशि उपमित
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के भारत माता काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारत माता के मुखमंडल का कष्टप्रद चित्रण प्रस्तुत किया है।

कवि कहता है कि भारत माता की भौंहें ऐसी लगती हैं मानो अंधकार से घिरा हुआ क्षितिज हो। आँखें झुकी हुई हैं जैसे वाष्प से ढंका हुआ नभ दिखता है। चंद्रमा से उपमा दिये जानेवाले मुख की शोभा आज विलुप्त है। पूरे विश्व के मूर्ख जनों को गीता का ज्ञान देनेवाली भारत माता आज स्वयं अंधकार में यानी घोर ज्ञानाभाव, अर्थाभाव के बीच दैन्य जीवन जी रही है। माँ का मुख-मंडल ज्ञान-ज्योति से, प्रभावान रहना चाहिए वह मलिन है पूरा व्यक्तित्व ही दयनीय दशा का बोध करा रहा है। इन पक्तियों के द्वारा कवि भारत की वर्तमान काल की विवशताओं, अभावों, अंधकार में जीने की विवशताओं, कुंठाओं से ग्रसित मन का चित्रण कर हमें भारत माता के मानवीकरण रूप द्वारा भारतीय समाज का सच्चा प्रतिबिंब उपस्थित कर यथार्थ-बोध करा रहा है।

प्रश्न 6.
सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्नन्य सुधोपम,
हरती जन-मन-भय, भव-तप-भ्रम,
जग-जननी
जीवन विकासिनी !
व्याख्या-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक भारत माता काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि भारतीय सांस्कृतिक गौरव गाथा का चित्रण प्रस्तुत करते हुए भारत माता के विराट उज्ज्वल व्यक्तित्व की व्याख्या कर रहा है।

कवि कहता है कि आज हम सबका जीवन सफल है क्योंकि भारत माता तप, संयम, सत्य और अहिंसा रूपी अपने स्तन के सुधा का पान कराकर जनमन के भय का हरण कर रही है। भय और अंधकार से मुक्ति दिला रही है।

इन पंक्तियों में गांधी और बुद्ध के जीवन-दर्शन और करुणा के उपदेश छिपे हैं। भारत माता के इन सपूतों ने पूरे विश्व को अंधकार से आलोक की ओर चलने का मार्ग दर्शन किया। कवि अपनी काव्य पंक्तियों द्वारा भारतीय सांस्कृतिक गरिमा का गुणगान करता है और विश्व को याद दिलाता है कि भारत माता के आँचल से, भारत माँ की गोद से ही प्रभा-पुंज का उद्भव हुआ जिससे सारा विश्व आलोकित हुआ। सारा विश्व विश्वबंधुत्व, समता, शांति, अहिंसा, सत्य की ओर अग्रसर हुआ।
भारत माता जगत्-माता हैं। जीवन को विकास मार्ग पर ले जानेवाली माता है। वह सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाकर सुयोग्य पुत्र बनानेवाली माता हैं।

भारतमाता कवि परिचय

सुमित्रानंदन पंत का जन्म सन् 1900 में अलमोड़ा जिले के रमणीय स्थल कौसानी (उत्तरांचल) में हुआ था । जन्म के छह घंटे बाद ही माता सरस्वती देवी का देहान्त हो गया । पिता गंगादत्त पंत कौसानी टी स्टेट में एकाउंटेंट थे । पंतजी की प्राथमिक शिक्षा गाँव में हुई और फिर बनारस से उन्होंने हाईस्कूल की शिक्षा पायी । वे कुछ दिनों तक कालाकांकर राज्य में भी रहे । उसके बाद आजीवन वे इलाहाबाद में रहे 1 29 दिसंबर 1977 ई० में उनका निधन हो गया।

पंतजी का आरंभिक काव्य प्रकृति प्रेम और शिशु सुलभ जिज्ञासा को लेकर प्रकट हुआ । उनकी आरंभिक रचनाएँ प्रकृति और सौंदर्य के प्रेमी कवि की संवेदनशील अभिव्यक्तियों से परिपूर्ण हैं।

पंतजी प्रवृत्ति से छायावादी हैं, परंतु उनके विचार उदार मानवतावादी हैं । उन्होंने प्रसाद और निराला के समान छंदों और शब्द योजना में नवीन प्रयोग किए । पंतजी की प्रतिभा कलात्मक सूझ से सम्पन्न है, अतः उनकी रचनाओं में एक विलक्षण मृदुता और सौष्ठव मिलता है । युगबोध के अनुसार अपनी काव्यभूमि का विस्तार करते रहना पंत की काव्य-चेतना की विशेषता है । वे प्रारंभ में प्रकृति सौंदर्य से अभिभूत हुए, फिर मानव सौंदर्य से । मानव सौंदर्य ने उन्हें समाजवाद की ओर आकृष्ट किया । समाजवाद से वे अरविन्द दर्शन की ओर प्रवृत्त हुए। वे मानवतावादी कवि थे, जो मानव इतिहास के नित्य विकास में विश्वास करते थे । वे अतिवादिता एवं संकीर्णता के घोर विरोधी रहे । उनका अंतिम काव्य ‘लोकायतन’ है जो उनके परिपक्व चिंतन को समेट देता है। उनकी प्रमुख काव्यकृतियाँ हैं – ‘उच्छ्वास’, ‘पल्लव’, ‘वीणा’, ‘ग्रंथि’, ‘गुंजन’, ‘युगांत’, ‘युगवाणी’, ‘ग्राम्या’, ‘स्वर्णधूलि’, ‘स्वर्णकिरण’, ‘युगपथ’, ‘चिदंबरा’ आदि । पंतजी ने नाटक, आलोचना, कहानी, उपन्यास आदि भी लिखा । ‘चिदंबरा’ पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ’ भी मिला।

प्रकृति सौंदर्य की कविता के लिए विख्यात कवि की रचनाओं में यह कविता हिंदी की यथार्थवादी कविता के एक नये उन्मेष. की तरह है। प्रख्यात छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत की यह प्रसिद्ध कविता उनकी कविताओं के संग्रह ‘ग्राम्या’ से संकलित है । यह कविता आधुनिक हिंदी के उत्कृष्ट प्रगीतों में शामिल की जाती है । अतीत के गरिमा-गान द्वारा अब तक भारत का ऐसा चित्र खींचा गया था जो ऐतिहासिक चाहे जितना रहा हो, वर्तमान को देखते हुए वास्तविक प्रतीत नहीं होता था । धन-वैभव, शिक्षा-संस्कृति, जीवनशैली आदि तमाम दृष्टियों से पिछड़ा हुआ, धुंधला और मटमैला दिखाई पड़ता यह देश हमारा वही भारत है जो अतीत में कभी सभ्य, सुसंस्कृत, ज्ञानी और वैभवशाली रहा था। कवि यहाँ इसी भारत का यथातथ्य चित्र प्रस्तुत करता है।

भारतमाता Summary in Hindi

पाठ का अर्थ

छायावाद के चार स्तम्भों में एक सुमित्रानंदन पंत द्वारा चित्र भारतमाता शीर्षक कविता एक चर्चित कविता है। कवि प्रवृत्ति से छायावादी है, परन्तु उनके विचार उदार मानवतावादी है। इनकी प्रतिमा कलात्मक सूझ से सम्पन्न है। युगबोध के अनुसार अपनी काव्य भूमिका विस्तार करते रहना पंत की काव्य-चेतना की विशेषता है।

प्रस्तुत कविता कवि की प्रसिद्ध कविता उनकी कविताओं के संग्रह ‘ग्राम्या’ से संकलित है। यह कविता आधुनिक हिन्दी के उत्कृष्ट प्रगीतों में शामिल की जाती है। इसमें अतीत के गरिमा, गान द्वारा अबतक भारत का ऐसा चित्र खींचा गया था जो वास्तविक प्रतीत नहीं होता है। धन-वैभव शिक्षा-संस्कृति, जीवनशैली आदि तमाम दृष्टियों से पिछड़ा हुआ धुंधला और मटमैला दिखाई पड़ता है। परन्तु कवि भारत का यथातथ्य चित्र प्रस्तुत किया है। भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। ऐसी धारणा रखने वाली भारतमाता क्षुब्ध और उदासीन है।

शस्य श्यामला धरती आज धूल-धूसरित हो गई है। करोड़ों लोग-नग्न, अर्द्धनग्न हैं। अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी सुरसा की तरह फैलते जा रहे हैं। चारो तरफ अज्ञानता, अशिक्षा फैली हुई है। गीता की उपदेशिका आज किंकर्तव्य विमूढ़ बनी हुई है। जीवन की सारी भंगिमाएँ धूमिल हो गई है। वस्तुतः कवि यथातथ्यों के माध्यम सम्पूर्ण भारतवासियों को अवगत करना चाहता है।

शब्दार्थ

श्यामल : साँवला
दैन्य : दीनता, अभाव, गरीबी
जड़ित : स्थिर, चेतनाहीन
नत : झुका हुआ
चितवन : दृष्टि
चिर : पुराना, स्थायी
नीरव : नि:शब्द, ध्वनिहीन
तम : अधकार
विषण्ण : (विषाद से निर्मित विशेषण) विषादमय
प्रवासिनी : विदेशिनी, बेगानी
क्षुधित : भूखा
निरस्त्रजन : निहत्थे लोग
शस्य : फसल
तरु-तल : वृक्ष के नीचे
पर-पद-तल : दूसरों के पाँवों के नीचे
लुठित : रौंदा जाता हुआ
सहिष्णु : सहनशील
कुठित : रुका हुआ, रुद्ध, गतिहीन
क्रंदन : रुदन, रोना
अधरं : होठ
स्मित : मुस्कान
शरदेन्दु : शरद ऋतु का चन्द्रमा
भृकुटि : भौंह
तिमिरांकित : अंधकार से घिरा हुआ
नमित : झुका हुआ
वाष्पाच्छादित : भाप से ढंका हुआ
आनन-श्री : मुख की शोभा
शशि-उपमित : चंद्रमा से उपमा दी जानेवाली
स्तन्य : स्तन का दूध

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Bihar Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Textbook Questions and Answers

 

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएं प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:

  • 14-15 वीं शताब्दी में यूनानी और रोम सभ्यता की प्राचीनता को पुनर्जीवित किया गया।
  • प्राचीन लेखकों की रचनाओं का अध्ययन किया गया।
  • उन्होंने मानवतावाद के अध्ययन पर जोर दिया।
  • कला और चित्रकला को पुनर्जीवित किया गया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएं Question Answer Bihar Board प्रश्न 2.
इस काल की इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला की विशिष्टाओं की तुलना कीजिए?
उत्तर:

  • इस काल में इटली की वास्तुकला और इस्लामी वास्तुकला दोनों का प्रयत्न नगरों को सजाने में किया गया।
  • इटली में रोम के अवशेषों के आधार पर एक नवीन वास्तुकला की शैली अपनाई गई जिसको ‘क्लासिकी शैली’ कहा गया। इस्लामी कला में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं किया।
  • इटली में भवनों के चित्र बनाये गये, मूर्तियों का निर्माण किया और विभिन्न प्रकार की आकतियां उकेरी गई। इस्लामी वास्तुकला में इतनी सजावट पर जोर नहीं दिया गया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपरा के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 3.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर:
रोम तथा यूनानी विद्वानों ने कई क्लासिक ग्रंथ लिखे थे। परंतु शिक्षा के प्रसार के अभाव में इन गूढ ग्रंथों को पढ़ना संभव नहीं था। परंतु तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में इटली में शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ इन ग्रंथों का अनुवाद भी हुआ। इन्हीं ग्रंथों तथा इन पर लिखी गई टिप्पणियों ने इटली के लोगों को मानवतावादी विचारों से परिचित करवाया।

इटली में ही सर्वप्रथम विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में मानवतावादी विषय भी पढ़ाए जाने लगे। इन विषयों में प्राकतिक विज्ञान, मानव शरीर रचना विज्ञान, खगोल शास्त्र औषधि विज्ञान, गणित आदि विषय शामिल थे। इन विषयों ने लोगों की सोंच को मानव और उसकी भौतिक सुख-सुविधाओं पर केंद्रित किया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपरा पाठ के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 4.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए?
उत्तर:

  • वेनिस के धर्माधिकारी और सामन्त वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे परन्तु फ्रांस में ये शक्तिशाली थे।
  • वेनिस में नगर के धनी व्यापारी और महाजन लोग नगर के शासन में सक्रियता से भाग लेते थे। फ्रांस में ऐसा नहीं था।

Badalti Hui Sanskritik Parampara Question Answer प्रश्न 5.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादी विचारधारा की विशिष्टायें –

  • मानतावादी विचारधारा के अंतर्गत मानव के विभिन्न कल्याणकारी कार्यों पर ध्यान दिया जाता था।
  • इसमें मानव के सभी पक्षों की ओर आकर्षित किया जाता है इसलिए सभी विषयों-व्याकरण, भूगोल, इतिहास, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्र, कविता और नीति दर्शन के अध्ययन पर जोर दिया जाता है।
  • मानव के कल्याण के लिए सभी को आपस में वाद-विवाद और विचार-विमर्श करना चाहिए । डेला मिरेनडोला के अनुसार ऐसा करना दिमाग को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है।
  • मानवतावादी विचारों को कला के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। इसमें मानव रुचियों का विशेष ध्यान रखा गया । इसी के फलस्वरूप विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्री और कलाकार हुए।
  • मानव के रूप को यथार्थ रूप देने का प्रयास किया गया वैज्ञानिकों से भी इस कार्य में सहयोग दिया।
  • मानवतावाद के अंतर्गत मानव को विशेष महत्व दिया जाने लगा और उसकी प्रशंसा में अनेक कव्य लिखे गये।
  • 15 वीं शताब्दी में अनेक पुस्तकें मुद्रित हुई जिनका मूल विषय मानव ही था।
  • मानवतावाद के महिलाओं की विकृत स्थिति को सुधारने का प्रयास किया गया।

Badalti Hui Sanskritik Parampara Ke Question Answer प्रश्न 6.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपियों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा? उसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए।
उत्तर:
17वीं शताब्दी में विश्व आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका था। अतः इसने एक नया रूप धारण कर लिया था जो पूर्ववर्ती विश्व से निम्नलिखित बातों में भिन्न था –

  • यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या बढ़ रही थी।
  • अब एक विशेष प्रकार की ‘नगरीय-संस्कृति’ विकसित हो रही थी। नगर के लोग यह सोचने लगे थे कि वे गाँव के लोगों से अधिक ‘सभ्य’ हैं।
  • फ्लोरेंस, वेनिस और रोम जैसे नगर कला और विद्या के केंद्र बन गए थे। नगरों को राजाओं और चर्च से थोड़ी बहुत स्वायत्तता (autonomy) मिली थी।
  • धनी और अभिजात वर्ग के लोग कलाकारों तथा लेखकों के आश्रयदाता थे।
  • मुद्रण के आविष्कार से अनेक लोगों को छपी हुई पुस्तकों उपलब्ध होने लगीं।
  • यूरोप में इतिहास की समझ विकसित होने लगी थी। लोग अपने ‘आधुनिक विश्व’ की तुलना यूनान तथा रोम की प्राचीन दुनिया से करने लगे थे।
  • अब यह माना जाने लगा था कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार अपना धर्म चुन सकता है।
  • चर्च के, पृथ्वी के केंद्र संबंधी विश्वासों को वैज्ञानिकों ने गलत सिद्ध कर दिया था । वे अब सौर-मंडल को समझने लगे थे। उन्होंने सौर-मंडल के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
  • नवीन भौगोलिक ज्ञान ने इस विचार को उलट दिया कि भूमध्यसागर विश्व का केंद्र है। इस विचार के पीछे यह मान्यता रही थी कि यूरोप विश्व का केंद्र है।

Bihar Board Class 11 History बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Notes Bihar Board प्रश्न 1.
‘मानववाद’ से आप क्या समझते हैं? पुनर्जागरण काल की कला और साहित्य में मानववाद के उदाहरण दें।
उत्तर:
मानववाद से अभिप्राय उस दृष्टिकोण से है जिसमें वर्तमान समस्याओं को महत्त्व दिया जाता है। पुनरिण काल के साहित्यकारों तथा कलाकारों ने मानव के वर्तमान में विशेष रुचि ली। इसीलिए उस साहित्य को ‘मानविकी’ कहा जाता है।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Ke Question Answer प्रश्न 2.
पुनर्जागरण को आधुनिक युग का प्रारंभ क्यों समझा जाता है? दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • आधुनिक युग का आरंभ पुनर्जागरण से हुआ। इस युग में पुरानी और मध्यकालीन रूढ़िवादी मान्यताएं समाप्त होने लगी। मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन हुए।
  • अनेक नवीन वैज्ञानिक आविष्कार हुए। कला तथा साहित्य के क्षेत्र में नवीन विचाराधाराओं का उदय हुआ।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Question Answer प्रश्न 3.
आधुनिक युग कब आरंभ हुआ? इस युग को लाने में किन बातों ने सहायता की?
उत्तर:
सामंती व्यवस्था के विघटन के साथ ही आधुनिक युग का आरंभ हुआ। चार बातों ने आधुनिक युग लाने में सहायता दी-व्यापार का विकास, नगरों का जन्म, समाज में मध्यम वर्ग का उदय तथा रिनसा (पुनर्जागरण) । भौगोलिक खोजों ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्परा Class 11 Bihar Board प्रश्न 4.
रिनसां अथवा पुनर्जाकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पंद्रहवीं शताब्दी में इटली में पुनर्जागरण आया, जिसे रिनैसा कहते हैं। यूरोप में अज्ञान के लंबे अंधकार युग के बाद ज्ञान का एक नया आंदोलन आरंभ हुआ। यूरोप के लोगों के मन में यूरोप की प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के प्रति फिर से रुचि उत्पन्न हुई।

बदलती हुई सांस्कृतिक परम्परा Pdf Bihar Board प्रश्न 5.
यूरोप में हुए पुनर्जागरण के कोई दो प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
पुनर्जागरण के कारण लोगों के जीवन में निम्नलिखित परिवर्तन हुए –

  • नवीन विचारों भावनाओं तथा मान्यताओं के उदय से अंधविश्वासों का अंत हुआ।
  • लोगों में मानवतावाद का प्रसार हुआ। फलस्वरूप मनुष्य साहित्यिक रचनाओं और कला-कृतियों का मुख्य विषय बन गया।

Badalti Hui Sanskriti Parampara Project In Hindi प्रश्न 6.
छापेखाने का आविष्कारक किनको समझा जाता है? यूरोप में पहली छपी हुई पुस्तक कौन-सी थी?
उत्तर:
छापेखाने का आविष्कारक गुटेनबर्ग तथा कैस्टर नामक दो व्यक्तियों को माना जाता है। उन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में छापेखाने का आविष्कार किया। इस आविष्कार से साहित्य तथा ज्ञान के प्रसार में बड़ी सहायता मिली। यूरोप में छापने वाली सबसे पहली पुस्तक पंभवतः गुटेनबर्ग की बाइबिल थी।

प्रश्न 7.
धर्म-सुधार आंदोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन से हमारा अभिप्राय उस आंदोलन से है जिसे मार्टिन लूथर ने रोमन चर्च में प्रचलित अनुचित रीति-रिवाजों के विरोध में चलाया। इस आंदोलन के समर्थकों ने प्रष्ट परंपराओं को समाप्त करके सुधरी हुई परंपरा स्थापित करने का प्रयत्न किया।

प्रश्न 8.
धर्म सुधार लहर अथवा प्रोटेस्टेंट लहर के कोई दो परिणाम लिखो।
उत्तर:

  • ईसाई धर्म दो भागों में बँट गया और लोगों का धर्म संबंधी दृष्टिकोण बदल गया।
  • स्वयं पोप को भी अपनी बेटियों का पता चला और उसने काऊटर रिफॉर्मेशन द्वारा अपनी स्थिति बचा ली।

प्रश्न 9.
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर:
चौदहवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी के मुख्य स्रोत यूरोप तथा अमेरिका के अभिलेखागारों तथा संग्रहालयों आदि में दस्तावेज, मुद्रित पुस्तकें, मूर्तियाँ, वस्र आदि हैं। कई भवन भी हमें इस समय के इतिहास की जानकारी देते हैं।

प्रश्न 10.
बहार्ट ने 14वीं से 17वीं शताब्दी तक इटली में पनप रही ‘मानवतावादी’ संस्कृति के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
बहार्ट ने लिखा है कि इटली में पनप रही ‘मानवतावादी संस्कृति’ इस नए विश्वास पर आधारित थी कि व्यक्ति अपने बारे में स्वयं निर्णय लेने और अपनी दक्षता को आगे बढ़ाने में समर्थ है। ऐसा व्यक्ति ‘आधुनिक’ था जबकि ‘मध्यकालीन मानव’ पर चर्च का नियंत्रण था ।

प्रश्न 11.
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् इटली की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक दशा कैसी थी?
उत्तर:
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् इटली के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों का विनाश हो गया था। वहाँ कोई एकीकृत सरकार नहीं थी। रोम का पोप केवल अपने ही राज्य में सार्वभौम था। समस्त यूरोप की राजनीति में वह इतना मजबूत नहीं था।

प्रश्न 12.
इटली के वेनिस तथा जिनेवा नगर यूरोप के अन्य क्षेत्रों से किस प्रकार भिन्न थे? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:
इटली के वेनिस तथा जिनेवा नगर यूरोप के अन्य क्षेत्रों से निम्नलिखित बातों में भिन्न थे –

  • यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामंत वर्ग राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली नहीं थे
  • धनी व्यापारी तथा महाजन नगर के शासन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना पनपने लगी।

प्रश्न 13.
पादुआ और बोलोनिया विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन के केंद्र थे। क्यों?
उत्तर:
पादुआ और बालोनिया के नगरों के मुख्य क्रियाक ” व्यापार और वाणिज्य संबंधी थे। इसलिए यहाँ वकीलों और नोटरी की बहुत अधिक आवश्यकता होती थी। इसी कारण यहाँ के विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन का केंद्र बन गए।

प्रश्न 14.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्वों को पुनर्जीवित किया गया?
उत्तर:
14वीं और 15वीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के धार्मिक, साहित्यिक – तथा कलात्मक तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया।

प्रश्न 15.
15वीं शताब्दी के आरंभ में किन लोगों को ‘मानवतावदा’ कहा जाता है?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के आरंभ में उन अध्यापकों को ‘मानवतावादी’ कहा जाता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास तथा नीतिदर्शन आदि विषय पढ़ाते थे।

प्रश्न 16.
प्राचीन रोमन तथा यूनानी लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन पर क्यों बल दिया गया?
उत्तर:
प्राचीन रोमन एवं यूनानी सभ्यता को एक विशिष्ट सभ्यता माना गया। इन्हें बारीकी से समझने के लिए प्राचीन रोमन तथा यूनानी लेखकों की रचनाओं के गहन अध्ययन पर बल दिया गया। पेट्रार्क जैसे दार्शनिकों का मत था कि केवल धार्मिक शिक्षा से कुछ विशेष नहीं सीखा जा सकता।

प्रश्न 17.
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को ‘नये युग’ अथवा आधुनिक युग का नाम क्यों दिया?
उत्तर:
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को मध्यकाल से अलग करने के लिए ‘नये युग’ का नाम दिया। उनका यह तर्क था कि ‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोच को बुरी तरह जकड़ रखा था इसलिए यूनान और रोमवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। परंतु 15वीं शताब्दी के आरंभ में यह ज्ञान फिर से जीवित हो उठा।

प्रश्न 18.
टॉलेमी की रचना ‘अलमजेस्ट’ की विषय-वस्तु की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर:
टॉलेमी रचित ‘अलमजेस्ट’ नामक ग्रंथ खगोल विज्ञान से संबंधित था जो यूनानी भाषा में लिखा गया था। बाद में इसका अनुवाद अरबी भाषा में भी हुआ। इस ग्रंथ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख है जो यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है।

प्रश्न 19.
स्पेन के दार्शनिक इन रूश्द का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
स्पेन का दार्शनिक इन रूश्द एक अरबी दार्शनिक था। उसने दार्शनिक ज्ञान (फैलसुफ) तथा धार्मिक विश्वासों के बीच चल रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। उसकी पद्धति को ईसाई चिंतकों ने अपनाया ।

प्रश्न 20.
लोगों तक मानवतावादी विचारों को पहुंचाने में किन बातों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
उत्तर:

  • स्कूलों तथा विश्वविद्यालायों में मानवतावादी विषय पढ़ाए जाने लगे।
  • कला, वास्तु कला तथा साहित्य ने भी मानतावादी विचारों के प्रसार में प्रभावी भूमिका निभाई।

प्रश्न 21.
आडीयस वेसेलियस (Andreas Vesalius) कौन थे?
उत्तर:
आंड्रीयस वेसेलियस (1514-64 ई.) पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान के प्राध्यापक थे। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ (dissection) की। इससे आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान (Physiology) का प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 22.
‘यथार्थवाद’ क्या था?
उत्तर:
शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी तथा सौंदर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को नया रूप प्रदान किया। इसी को बाद में ‘यथार्थवाद’ (realism) का नाम दिया गया। यथार्थवाद की यह परंपरा उन्नसीवीं शताब्दी तक चलती रही।

प्रश्न 23.
माईकील एंजिलो बुआनारोती (Michael Angelo Buonarotti) कौन था? इटली की कला के क्षेत्र में उसका क्या योगदान था?
उत्तर:
माईकल एंजिलो बुआनारोती (1475-1564 ई.) एक कुशल चित्रकार, मूर्तिकार तथा वास्तुकार था। उसने पोप के सिस्टीन चैपल की भीतरी छत पर चित्रकारी की और ‘दि पाइटा’ नाम से मूर्ति बनाई। उसने सेंट पीटर गिरजाघर के गुबंद का डिजाइन भी तैयार किया। ये सभी कलाकृतियाँ रोम में ही हैं।

प्रश्न 24.
समुद्री खोजों के पीछे वास्तविक प्रेरक तत्त्व क्या थे?
उत्तर:

  • नए स्थानों की खोज करके लोगों को दास बनाना और दास व्यापार से भारी मुनाफा कमाना।
  • व्यापार वृद्धि तथा धन कमाने की प्रबल इच्छा का उत्पन्न होना।
  • मसाले और सोना प्राप्त करके यश कमाना।

प्रश्न 25.
नए देशों की खोजों से कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले?
उत्तर:

  • नए मार्गों का पता लगने के बाद यूरोपीय लोगों ने अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में व्यापार करना आरंभ कर दिया।
    दासों का क्रय-विक्रय होने लगा।
  • पादरियों ने इन उपनिवेशों में ईसाई धर्म का प्रचार शुरू किया जिसके फलस्वरूप यह धर्म विश्व का सबसे महान् धर्म बन गया।

प्रश्न 26.
यूरोपीय लोगों के जीवन पर धर्म-युद्धों के दो अच्छे प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • इन युद्धों से भौगोलिक खोजों के ज्ञान का विस्तार हुआ।
  • यूरोपवासी इस्लामी जगत् के संपर्क में आए। उन्होंने इस्लामिक जगत् की कला एवं विज्ञान संबंधी ज्ञान को अपनाया।

प्रश्न 27.
‘कॉस्टैनटाइन के अनुदान’ नामक दस्तावेज के प्रति मानवतावादियों की क्या प्रतिक्रिया थी? इससे उन राजाओं को क्यों खुशी हुई, जो चर्च के हस्तक्षेप से दुःखी थे?
उत्तर:
मानवतावादियों ने लोगों को बताया कि चर्च को उसकी न्यायिक और वित्तीय शक्तियाँ ‘कांस्टैनटाइन के अनुदान’ नामक दस्तावेज के अनुसार मिली थी। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज जालसाजी से तैयार करवाया गया। इस बात ने चर्च के अधिकारों के औचित्य को चुनौती दी जिससे राजाओं को खशी हुई।

प्रश्न 28.
पाप स्वीकारोक्ति (indulgences) नामक दस्तावेज क्या था?
उत्तर:
पाप स्वीकारोक्ति दस्तावेज चर्च द्वारा जारी एक दस्तावेज था। चर्च कहता था कि यह दस्तावेज व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति दिला सकता है। चर्च इस दस्तावेज को बेचकर खूब धन बटोर रहा था।

प्रश्न 29.
मानवतावादी युग में व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति कैसी थी?
उत्तर:
इस युग में व्यापारी परिवारों में महिलाओं की स्थिति कुछ अच्छी थी। वे दुकान चलाने में अपने पति की सहायता करती थीं । जब उनके पति लंबे समय के लिए व्यापार के लिए कहीं दूर जाते थे, तो वे उनका कारोबार संभालती थीं। किसी व्यापारी की कम आयु में मृत्यु हो जाने पर उसकी पत्नी परिवार का बोझ संभालती थी।

प्रश्न 30.
माचिसा ईसाबेला दि इस्ते (Isabellad’ Este) कौन थी?
उत्तर:
मार्चिसा ईसाबेला दि इस्ते (1474-1539 ई.) मंदुआ राज्य की एक प्रतिभाशाली महिला थी। उसने अपने पति की अनुपस्थिति में अपने राज्य पर शासन किया था।

प्रश्न 31.
दो मानवतावादी लेखकों के नाम बताएँ। यह भी बताएं कि उन्होंने क्या विचार व्यक्त किए? एक-एक बिंदु लिखिए।
उत्तर:
दो मानवतावादी लेखक थे-फ्रेनसेस्को बरबारी (Francesco Barbaro) तथा लोरेंजो वल्ला (Lorenzo’ Valla) –

  • फ्रेनसेस्को बरबारो (1390-1454 ई.) ने अपनी एक पुस्तक में संपत्ति अधिग्रहण करने को एक विशेष गुण कहकर उसका समर्थन किया।
  • लोरेंजो वल्ला (1406-1457 ई.) ने अपनी पुस्तक ऑनप्लेजर में ईसाई धर्म द्वारा भोग-विलास पर लगाई गई पाबंदी की आलोचना की।

प्रश्न 32.
मानवतावादी संस्कृति का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:

  • मानवतावादी संस्कृति से मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर हो गया।
  • इटली के निवासी भौतिक संपत्ति, शक्ति तथा गौरव की ओर आकृष्ट हुए।

प्रश्न 33.
15वीं शताब्दी में यूरोप में विचारों का प्रसार व्यापक रूप से तेजी से क्यों होने लगा?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में यूरोप में बड़ी संख्या में पुस्तके छपने लगीं। इनका क्रय-विक्रय भी होने लगा। अतः अब विद्यार्थियों को केवल अध्यापकों के व्याख्यानों के नोट्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। वे बाजार से पुस्तकें खरीद कर पढ़ सकते थे। इससे विचारों के व्यापक और तीव्र प्रसार में सहायता मिली।

प्रश्न 34.
वाणिज्य और व्यापार की वृद्धि के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:

  • वाणिज्य और व्यापार वृद्धि के कारण यूरोप के लोग समृद्ध बने।
  • यूरोप के देशों ने खोजे गए प्रदेशों में उपनिवेश बसाए जिनको उन्होंने मंडियों के रूप। में प्रयुक्त किया।

प्रश्न 35.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
वंनिस इटली का नगर था। यह गणराज्य था। यह चर्च तथा सामंतो के प्रभाव से लगभग मुक्त था। नगर के धनी व्यापारी तथा महाजन सरकार में सक्रिय भूमिका निभाते थे। नगर में नागरिकता के विचारों का तेजी से प्रसार हो रहा था। इसके विपरीत फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र स्थापित था, जहाँ जनसाधारण नागरिक अधिकारों से वंचित थे।

प्रश्न 36.
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावादा विचारों के मुख्य अभिलक्षण निम्नलिखित थे –

  1. मानव जीवन की धर्म के नियंत्रण से मुक्ति।
  2. मानव का भौतिक सुख-सुविधाओं पर बल।
  3. मानव द्वारा संपत्ति तथा शक्ति का अधिग्रहण।
  4. मानव की गरिमा का बढ़ावा।
  5. मानव का आदर्श जीवन।

प्रश्न 37.
इस काल (पुनर्जागरण काल) की इटली की वास्तुकला और इस्लाम वास्तुकला की विशिष्टताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:
इटली तथा इस्लामी वास्तुकला दोनों में ही भव्य भवनों का निर्माण हुआ। इस्लामी वास्तुकला में विशाल मस्जिदें बनी, तो इटली में भव्य कुथीडूल तथा मठ बनाए गए। इन भवनों की सजावट की ओर विशेष ध्यान दिया गया। मेहराब तथा स्तंभ इन भवनों की मुख्य विशेषताएँ थीं।

प्रश्न 38.
16वीं शताब्दी में यूरोप में होने वाली मुद्रण प्रौद्योगिकी के विकास के लिए यूरोपवासी किसके ऋीण थे और क्यों?
उत्तर:
सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में क्रांतिकारी मुद्रण प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। इसके लिए यूरोपीय लोग चीनियों तथा मंगोल शासकों के ऋणी थे। इसका कारण यह था कि यूरोप के व्यापारी और राजनयिक मंगोल शासकों के राज-दरबार में अपनी यात्राओं के दौरान इस तकनीक से परिचित हुए थे।

प्रश्न 39.
वाद-विवाद को प्लेटो और अरस्तु ने किस प्रकार महत्त्व दिया?
उत्तर:
उनका कहना था कि जहाँ तक हो सके हमें विचारगोष्ठियों में जाना चाहिए और वाद-विवाद करना चाहिए। जिस प्रकार शरीर को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम जरूरी है उसी प्रकार दिमाग की ताकत को बढ़ाने के लिए शब्दों के दंगल में उतरना जरूरी है इससे दिमागी ताकत बढ़ने के साथ-साथ बुद्धि और अधिक ओजस्वी होती है।

प्रश्न 40.
फ़्लोरेंस की प्रसिद्धि में किन दो व्यक्तियों का सबसे अधिक योगदान था?
उत्तर:
फ्लोरेंस की प्रसिद्धि में दाँते अलिगहियरी (Dante Alighieri) तथा कलाकार जोटो (Giotto) का सबसे अधिक योगदान था। अलिगहियरी ने धार्मिक विषयों पर लिखा। जोटो ने जीते-जागते रूपचित्र बनाए जिसने फ्लोरेंस को कलात्मक कृतियों के सृजन का केंद्र बना दिया।

प्रश्न 41.
‘रेनेसा व्यक्ति’ से क्या अभिप्राय है? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
‘रेनेसा व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग प्राय: उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और जो अनेक कलाओं में कुशल हों। पुनर्जागरण काल में ऐसे अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्र और कलाकार हो सकता था।

प्रश्न 42.
पुनर्जागरण की तीन मुख्य विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:
पुनर्जागरण के मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  1. इटली के नगर पुनर्जागरण के प्रथम केंद्र थे।
  2. नवीन कला शैली का जन्म हुआ।
  3. वास्तुकला एवं साहित्य का विकास हुआ।

प्रश्न 43.
पुनर्जागरण यूरोप के किस देश में सबसे पहले आरंभ हुआ और क्यों?
उत्तर:
पुनर्जागरण का आरंभ सबसे पहल इटली में हुआ। इसके निम्नलिखित कारण थे –

  1. इटली के अनेक नगर (रोम, मिलान, फ्लारस) वाणिज्य तथा व्यापारिक केंद्र होने के कारण समृद्धशाली थे।
  2. इटली के नगर सामंती नियंत्रण से मुक्त थे। इसलिए इन नगरों के स्वतंत्र वातावरण से पुनर्जागरण को प्रोत्साहन मिला।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
पुनर्जागरण को इतिहास में पुनर्जन्म, पुनर्जागृति, बौद्धिक चेतना तथा सांस्कृतिक विकास आदि नामों से पुकारा जाता है। 13वीं शताब्दी के पश्चात् ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई जिनके कारण मनुष्य चेतनायुक्त बना। इसी चेतना को पुनर्जागरण का नाम दिया गया है। पुनर्जागरण को अंग्रजी भाषा में ‘रिनेसा’ कहते हैं जो मूलतः फ्रांसीसी भाषा का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है-फिर से जागना। यूरोपीय इतिहास के विश्लेषण के संदर्भ में पुनर्जागरण का अपना अलग काल है।

यह काल साधारणत: 14वीं शताब्दी (1350 से 1550 ई०) के बीच माना जाता है। वास्तव में आधुनिक यूरोप का आरंभ पुनर्जागरण से ही स्वीकार किया जाता है। यूरोप प्राचीनकाल में सभ्यता के उत्कर्ष पर पहुँचा हुआ था। यह उत्कर्ष यूनान तथा रोम में देखा गया। मध्यकाल में यूनानी तथा रोमन सभ्यता लगभग लुप्त हो गई। पुनर्जागरण काल में यह एक बार फिर संजीव हो उठी। एक बार फिर लौकिक जगत् के प्रति आस्था दिखाई गई। मानवता का महत्त्व बढ़ा। रुढ़िवादिता का स्थान तर्क ने ले लिया। प्राकृतिक सौंदर्य की फिर से पूजा होने लगी। इन सब बातों का मध्यकाल में कोई स्थान नहीं रहा था। परंतु पुनर्जागरण काल में ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हुई जिन्होंने प्राचीन मूल्यों को फिर से स्थापित किया।

प्रश्न 2.
‘पुनर्जागरण’ से एक नए युग का आरंभ हुआ, ऐसा क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
‘पुनर्जागरण’ से निःसंदेह एक नए युग का आरंभ हुआ। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे –

  1. पुनर्जागरण के कारण प्राचीन और मध्यकालीन समाज की रूढ़िवादी मान्यताएं समाप्त होने लगीं। अब लोग अपनी समस्याओं पर विचार करने लगे।
  2. इसके कारण सामंतवादी व्यवस्था के बंधन टूटने लगे और राष्ट्र-राज्यों की स्थापना हुई।
  3. पुनर्जागरण से पूर्व लोगों का चर्च के सिद्धांतों में अंधविश्वास था। परंतु अब लोग उन सिद्धांतों की सच्चाई में संदेह करने लगे और प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसने लगे। फलस्वरूप वैज्ञानिक चिंतन का युग आरंभ हुआ।
  4. पुनर्जागरण के कारण कला और साहित्य के क्षेत्र में अनेक नवीन विचारधाराओं का उदय हुआ। अनेक साहित्यकारों के व्यंग्यात्मक लेख और चित्रकारों ने अपने चित्रों में दूषित समाज और राजनीति पर प्रहार किया। ये सभी बातें आधुनिक युग की ही सूचक थीं।

प्रश्न 3.
यूरोप में पुनर्जागरण के उदय के क्या कारण थे?
उत्तर:
यूरोप में पुनर्जागरण के उदय ने निम्नलिखित तत्त्वों ने सहायता पहुँचाई –
1. धर्म युद्ध – नवीन ज्ञान का मार्ग दिखाने में मध्यकाल में लड़े गए धर्म युद्धों ने विशेष भूमिका निभाई। ये धर्म युद्ध (Crusades) तुर्कों से यरुशलम को स्वतंत्र कराने के लिए ईसाइयों ने लई । ये वीं शताब्दी के अंत से 13वीं शताब्दी तक जारी रहे। धर्म युद्धों के कारण यूरोप के सामाजिक, आर्थिक तथा बौद्धिक पक्षों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

2. धर्म सुधार आंदोलन – धर्म सुधार आंदोलन की लहर में अनेक विद्वानों ने चर्च के अधिकारों को चुनौती दी। जनसाधारण पहली बार यह सोचने लगा कि चर्च के नियम अंतिम नहीं हैं। इस नवीन दृष्टिकोण से मनुष्य के विचारों में जागृति आई।

3. भौगोलिक खोजें – भौगोलिक खोजों के कारण भी मनुष्य के विचारों में क्रांति आई। मार्को पोलो के दिशा-सूचक (Compass) के अविष्कार के कारण समुद्री यात्रा करने में सुविधा मिली । इटली के वैज्ञानिक गैलीलियों ने दूरबीन का आविष्कार किया। न्यूटन के ब्रांड के विषय ने वैज्ञानिक अनुमानों को सूत्रबद्ध किया। कोपरनिक्स ने अपनी खोजों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि पृथ्वी स्थिर नहीं है बल्कि यह सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। इन नवीन खोजों के कारण नवीन विचारों का जन्म हुआ।

प्रश्न 4.
विज्ञान और दर्शन में अरबों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पूरे मध्यकाल में ईसाइ गिरजाघरों और मठों के विद्वान यूनान और रोम के विद्वानों की रचनाओं से परिचित थे। परंतु उन्होंने इन रचनाओं का प्रचार-प्रसार नहीं किया। चौदहवीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने प्लेटो और अरस्तु के ग्रंथों के अनुवाद पढ़े। ये अनुवाद अरब के अनुवादकों की देन थे जिन्होंने अतीत की पांडुलिपियों को सावधानीपूर्वक संरक्षण और अनुवाद किया था।

जिस समय यूरोप के विद्वान यूनानी ग्रंथों के अरबी अनुवादों का अध्ययन कर रहे थे, उस समय यूनानी विद्वान अरबी तथा फारसी विद्वानों की कृतियों का अनुवाद कर रहे थे, ताकि उनका यूरोप के लोगों के बीच प्रसार किया जा सके। ये ग्रंथ प्राकृतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान (astronomy) औषधि विज्ञान तथा रसायन विज्ञान से संबंधित थे। टालेमी ने अपनी रचना ‘अलमजेस्ट’ में अरबी भाषा के विशेष अवतरण ‘अल’ का उल्लेख किया है जो यूनानी और अरबी भाषा के बीच रहे संबंधों को दर्शाता है।

मुसलमान लेखकों में अरब के हकीम तथा बुखारा (मध्य एशिया) के दार्शनिक इन-सिना (Ibn-Sina) और आयुर्विज्ञान विश्वकोष के लेखक अल-राजी (रेजेस) शामिल थे। इन्हें इतालवी जगत में ज्ञानी माना जाता था। स्पेन के एक अरब दार्शनिक इब्न-रूश्दी ने दार्शनिक ज्ञान (फैलसुफ) तथा धार्मिक विश्वासों के बीच रहे तनावों को सुलझाने की चेष्टा की। इस पद्धति को ईसाई चिंतकों ने अपनाया।

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण काल में व्यापार में वृद्धि तथा नगरों के उदय का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में व्यापार के विकास तथा नगरों के उदय के कारण कई प्राचीन प्रथाएँ भंग हुई और नवीन बातें आरंभ हुई। वास्वत में यूरोप को अंधकार युग से निकाल कर आधुनिक युग में लाने का पूरा श्रेय व्यापारियों तथा नगरों को ही है। यह बात हम इस प्रकार स्पष्ट कर सकते हैं –

(क) व्यापार में वृद्धि का प्रभाव-व्यापार में विकास का निम्नलिखित प्रभाव हुआ:
1. मध्य श्रेणी का उदय-व्यापार में वृद्धि के कारण समाज में एक नवीन श्रेणी का जन्म हुआ। यह श्रेणी थी मध्य श्रेणी जो सामंतों या कृषकों से बिल्कुल अलग थी। इस श्रेणी के पास धन था और धन की सहायता से यह कुछ भी कर सकती थी।

2. राजा का सबल बनाना-व्यापार को उन्नति से पूर्व राजा सामंतों के हा कठपुतली मात्र था। उसे सामंतों से धन मिलता था और वह उनकी सभी बातें स्वीकार करता था। वे यदि अपनी जनता पर अत्याचार भी करते थे तो राजा चुपचाप सहन करता था। परंतु व्यापार का वृद्धि से व्यापारी वर्ग का विकास हुआ जो राजा का सहयोगी था। इस वर्ग से धन प्राप्त करके राजा अपनी सैनिक शक्ति में वृद्धि कर सकता था। सेना के सबल होते ही सामंतवाद का अंत हुआ और राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ।

3. चर्च और सामंतों की शक्ति का हास – तृतीय श्रेणी को सुरक्षा चाहिए थी। यह सुरक्षा उन्हें केवल एक क्षेत्र में नहीं बल्कि सारे राज्य में चाहिए थी। उनका व्यापार दूर-दूर के क्षेत्रों में होता था। इसलिए इस वर्ग ने जी-जान से राजा की सहायता की। राजा सबल हो गया । सबल राजा ने चर्च और सामंतों की स्वेच्छाचारिता पर प्रहार किया और वह उनके बंधन से मुक्त हो गया। यदि ऐसा नहीं होता तो आधुनिक युग के आने में भी सैकड़ों वर्ष लग जाते ।

(ख) नगरों के उदय का महत्त्व-नगरों के उदय का महत्त्व इस प्रकार जाना जा सकता है –
1. सामंतों की दासता से मुक्ति – नगरों के उदय से सामंतों द्वारा लगाये गये बंधन ढीले पड़ गये। नगरों में धनी व्यापारी वर्ग रहता था। उन्होंने धन देकर नगरों को स्वतंत्र कराया। इन नगरों पर अब सामंतों या राजाओं का कोई प्रभाव न रहा।

2. स्वतंत्र वातावरण-इन नगरों में नागरिकों को पूरी स्वतंत्रता मिली। वे स्वतंत्रतापूर्वक सोच सकते थे और अपनी इच्छा अनुसार कोई भी कार्य कर सकते थे। इन स्वतंत्र विचारों ने अंधकार युग को समाप्त किया और आधुनिक युग लाने में सहयोग दिया।

प्रश्न 6.
धर्म-सुधारकों ने पद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी में रोमन कैथोलिक चर्च और पादरियों की किन रीतियों और प्रथाओं के विरुद्ध आपत्ति की।
अथवा
यूरोपीय धर्म-सुधार आंदोलन (प्रोटेस्टेंट लहर) के उत्थान के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रोटेस्टेंट ‘धर्म सुधार’ से अभिप्राय ईसाई धर्म की उस शाखा से है, जो रोमन कैथोलिक चर्च के रीति-रिवाजों के विरोध में आरंभ हुई। इसका जन्मदाता मार्टिन लूथर था। इस धर्म-सुधार आंदोलन के उत्थान के निम्नलिखित कारण थे –

1. चर्च ने बहुत अधिक धन – संपत्ति इक्ट्ठी कर ली थी। पोप और उच्च पदों पर नियुक्त पादरी लोग भोग-विलास का जीवन व्यतीत करने लगे थे। इस कारण बहुत-से व्यक्ति इनसे घृणा करने लगे थे। यही बात धर्म-सुधार आंदोलन के उत्थान का एक प्रमुख कारण बनी।

2. चर्च में पादरियों के पदों को बेचा जाने लगा था। इसके परिणामस्वरूप लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

3. पोप तथा पादरी माफीनामे (दंडोमुक्तियाँ) बेंचते थे। लोगों को यह बात पसंद न थी। अतः उन्होंने चर्च के विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई।

4. पोप जनता से अनेक प्रकार के कर तथा शुल्क वसूल करता था और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। इससे लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

प्रश्न 7.
लियोनार्दो-द-विंची की प्रतिभा पर नोट लिखिए।
उत्तर:
इटली का लियोनार्दो-द-विंची पुनर्जागरण काल की एक महानतम विभूति था। उसका जन्म 1452 ई० में हुआ। वह एक चित्रकार, मूर्तिकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि एवं गायक सभी कुछ था। यद्यपि उसके चित्र थोड़े हैं, किंतु सभी अनुपम हैं। इन चित्रों में से ‘दि वर्जिन ऑफ दि रॉक्स’ तथा ‘मोनालिसा’ अद्वितीय कृतियाँ हैं। मिलान के गिा घर में चित्रित ‘दि लास्ट सपर’ विश्व के कलात्मक आश्चर्यों में गिना जाता है। उसने एक उड़न मशीन का चित्र बनाया जिसके आधार पर वह ऐसी मशीनें बनाना चाहता था। जिसके द्वारा आकाश में उड़ना संभव हो। ऐसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति संभवतः अभी तक पैदा नहीं हुआ।

प्रश्न 8.
मानवतावाद से तुम क्या समझते हो? पुनर्जागरण काल की कला और साहित्य में मानवतावाद के उदाहरण दो।
उत्तर:
पुनर्जागरण से पूर्व दार्शनिक मृत्यु के बाद के परिणामों पर सोच-विचार किया करते थे और वर्तमान जीवन को परलोक की तैयारी समझते थे। पुनर्जागरण से यह दृष्टिकोण बदल गया। अब विचारक मानव की वर्तमान समस्याओं पर विचार करने लगे। मानव के इस दृष्टिकोण को ‘मानवतावाद’ कहा जाता है। इतिहासकार पेट्रार्क को मानवतावाद का पिता स्वीकार किया आता है। मानवतावाद के लेखकों ने मानव को केंद्र-बिंदु माना और उसे ही दर्शाने का प्रयत्न किया।

मानवतावाद तथा पुनर्जागरण काल की कला-मानवतावाद का पुनर्जागरण की कला-कृतियों पर विशेष प्रभाव पड़ा । रेफल तथा माइकेल एंजिलो ने जो चित्र बनाए, वे भले ही धन से संबंधित थे, परंतु उनका आधार मानव था। उन्होंने अपनी मूर्तियों में जीसस को मानव शिशु के रूप में दिखाया। उन्होंने उनकी माता को वात्सल्यमयी मां के रूप में दर्शाया । इस काल की अन्य मानवतावादी रचनाओं में मोनालिसा, मेडोना आदि विश्व-विख्यात रचनाएँ सम्मिलित हैं।

मानवतावाद तथा पुनर्जागरण काल का साहित्य-मानवतावाद ने पुनर्जागरण काल के साहित्य को भी खूब प्रभावित किया । सेक्सपीयर, दाँते आदि साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का विषय ईश्वर को नहीं बल्कि मानव को बनाया । उन्होंने मानव की भावानाओं, शक्तियों तथा त्रुटियों की पूर्ण विवेचना की। इस काल की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं में यूटोपिया, हैमलेट, डिवाइन कॉमेडी के नाम लिए जा सकते हैं।

प्रश्न 9.
मानवतावादियों ने मध्ययुग तथा आधुनिक युग के बीच किस प्रकार अंतर किया?
उत्तर:
मानवतावादी समझते थे कि वे अंधकार की कई शताब्दियों के बाद सभ्यता को नया जीवन दे रहे हैं। उनका मानना था कि रोमन साम्राज्य के टूटने के बाद ‘अंधकार युग’ शुरू हो गया था। मानवतावादियों की भाँति बाद के विद्वानों ने भी बिना कोई प्रश्न उठाए यह मान लिया कि यूरोप में चौदहवीं शताब्दी के बाद ‘नये युग’ का उदय हुआ। ‘मध्यकाल’ का प्रयोग रोम साम्राज्य के पतन के बाद एक हजार वर्ष की समयावधि के लिए किया गया। उनका यह तर्क था कि ‘मध्ययुग’ में चर्च ने लोगों की सोंच को बुरी तरह जकड़ रखा था। इसलिए यूनान और रोमनवासियों का समस्त ज्ञान उनके दिमाग से निकल चुका था। मानवतावादियों ने ‘आधुनिक’ शब्द का प्रयोग पंद्रहवीं शताब्दी से आरंभ होने वाले के लिए किया।

मानवतावादियों और बाद के विद्वानों द्वारा प्रयुक्त काल क्रम (Periodisation) इस प्रकार था –
Bihar Board Class 11 History Solutions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 10.
रिनेसा अथवा पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
पुनर्जागरण ‘रिनेसा’ का हिंदी रूपांतर है। इसका अर्थ अथवा पुनर्जागृति है। पुनर्जागरण वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी राष्ट्र मध्य युग के अंधकार से निकल कर आधुनिक युग के प्रकाश में साँस लेने लगे। वे आधुनिक युग के विचारों और शैलियों से प्रभावित हुए । मानव ने स्वतंत्र रूप से विचार करना आरंभ किया जिससे साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित हो गए।

विशेषताएँ-पुनर्जागरण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं –

  • इटली के नगर-राज्य पुनर्जागरण के प्रथम केंद्र बन गये।
  • नवीन कला शैली का जन्म हुआ।
  • वास्तुकला एवं साहित्य का विकास हुआ।
  • प्राचीन विधियों तथा ज्ञान को नया जीवन मिला।
  • अनेक नवीन नगरों का उदय हुआ।
  • मानव में स्वतंत्र चिंतन और मानवता का विकास हुआ।

प्रश्न 11.
पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण तथा तीन परिणाम लिखिए।
उत्तर:
कारण-पुनर्जागरण के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

  • मध्यकाल के अंत में नगरों का विकास हुआ। यहाँ का वातावरण स्वतंत्र था तथा लोग संपन्न थे। अतः इस वातावरण ने पुनर्जागरण के विचारों को प्रोत्साहित किया।
  • कुस्तुनतुनिया पर तुकों का अधिकार हो गया। अत: विद्वान इटली आ गए। इधर छापेखाने का आविष्कार हुआ। इससे पुनर्जागरण को बल मिला।

परिणाम –

  • पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप कला तथा साहित्य की कृतियों में मानवतावाद को प्राथमिकता दी गई।
  • विज्ञान के क्षेत्र में दिशासूचक यंत्र, सूक्ष्मदर्शी यंत्र, दूरबीन तथा अन्य खोजें हुई।
  • भूगोल के क्षेत्र में नवीन खोजें हुई। अमेरिका, भारत तथा कई अन्य देशों की खोज की गई।

प्रश्न 12.
कोपरनिकस तथा उसके ब्रह्मांड संबंधी विचारों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
ईसाइयों की यह धारणा थी कि मनुष्य पापी है। इस बात पर वैज्ञानिकों ने एक अलग दृष्टिकोण द्वारा आपत्ति की। यूरोपीय विज्ञान के क्षेत्र में एक युगांतकारी परिवर्तन कोपरनिकस (1473-1543 ई.) के विचारों से आया। ईसाइयों को यह विश्वास था कि पृथ्वी पापों से भरी हुई है और इस कारण वह स्थिर है। यह ब्रह्मांड (Universe) का केंद्र है जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह (Celestial Planets) घूम रहे हैं। परंतु कोपरनिकस ने यह घोषणा की कि पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।

कोपरनिकस एक निष्ठावान ईसाई था। वह इस बात से भयभीत था कि उसकी इस नयी खोज के प्रति परम्परावादी ईसाई धर्माधिकारियों की घोर प्रतिक्रिया हो सकती है। यही कारण था कि वह अपनी पांडुलिपि ‘डि रिवल्यूशनिबस’ (De revolutionibus-परिभ्रमण) को प्रकाशित नहीं कराना चाहता था। जब वह अपनी मृत्यु-शैय्या पर पड़ा था तब उसने यह पांडुलिपि अपने अनुयायी जोशिम रिटिकस (Joachim Rheticus) को सौंप दी। परंतु उसके विचारों को ग्रहण करने में लोगों को थोड़ा समय लगा।।

प्रश्न 13.
कोपरनिकस के सौरमंडलीय विचारा को आगे बढ़ाने में किन-किन वैज्ञानिकों का योगदान रहा ओर क्या?
उत्तर:
कोपरनिकस के सौरमंडलीय विचारों को आगे बढ़ाने में कई वैज्ञानिकों का योगदान रहा –
1. खगोलशास्त्री जोहानेस कैप्लर (Johannes Kepler, 1571-1630 ई.) ने अपने ग्रंथ कॉस्मोग्राफिकल मिस्ट्री (Cosmographical Mystery-खगोलीय रहस्य) में सौरमंडल के सूर्य-केंद्रित सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। इससे यह सिद्ध हुआ कि सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार पथ पर नहीं बल्कि दीर्घ वृत्ताकार (ellipses) पथ पर परिक्रमा करते हैं।

2. गैलिलियो गैलिली (1564-1642 ई.) ने अपने ग्रंथ ‘दि मोशन (The Motion, गति) में गतिशील विश्व के सिद्धांतों की पुष्टि की।

3. न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से विज्ञान को एक नई दिशा मिली।

प्रश्न 14.
‘वैज्ञानिक क्रांति’ क्या थी? इसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
विचारकों (वैज्ञानिकों) ने हमें बताया कि ज्ञान का आधार विश्वास न होकर अन्वेषण एवं प्रयोग है। जैसे-जैसे इन वैज्ञानिकों ने ज्ञान की खोज का मार्ग दिखाया वैसे-वैसे भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रयोग अन्वेषण कार्य होने लगे। इतिहासकारों ने मनुष्य और प्रकृति के ज्ञान के इस नए दृष्टिकोण को वैज्ञानिक क्रांति का नाम दिया। परिणामस्वरूप संदेहवादियों और आस्तिकों के मन में सृष्टि की रचना के स्रोत के रूप में ईश्वर का स्थान प्रकृति लेने लगी। यहाँ तक कि जिन्होंने ईश्वर में अपना विश्वास बनाए रखा वे भी एक दूरस्थ ईश्वर की बात करने लगे।

उनमें यह विश्वास पनपने लगा कि ईश्वर भौतिक संसार में जीवन को प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित नहीं करता है। इस प्रकार के विचारों को वैज्ञानिक संस्थाओं ने लोकप्रिय बनाया। फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र में एक नयी वैज्ञानिक संस्कृति की स्थापना हुई। 1670ई० में बनी पेरिस अकादमी तथा 1662 ई. में लंदन में गठित रॉयल सोसाइटी ने वैज्ञानिक संस्कृति के प्रसार में महत्त्वपूर्ण निभाई।

प्रश्न 15.
विगली पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विगली का जन्म 1484 ई० में स्विट्जरलैंड में हुआ था। उसने धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। लूथर की तरह वह भी क्षमा पत्रों का विरोधी था। उसने ज्यूरिख को अपना केंद्र बनाया और धर्म को नए ढंग से परिभाषित करना आरंभ किया। 1525 ई. में उसने रोम से संबंध तोड़कर एक रिफाई चर्च (Reformed Church) की स्थापना की। उसने बाइबिल को धर्म का एक मात्र स्रोत बताया और पादरियों द्वारा विवाह न करने का डटकर विरोध किया।

अनेक लोग कट्टर कैथोलिक बने रहे। विगली ने इन लोगों को बलात् प्रोटेस्टेंट बनाने का प्रयास किया जिसके कारण स्विट्जरलैंड में गृह युद्ध छिड़ गया। अंत में एक समझौता हुआ जिसके अनुसार धर्म के संबंध में अंतिम अधिकार स्थानीय सरकारों को मिल गया । इस प्रकार आज भी जर्मनी की भांति स्विट्जरलैंड में भी कैथोलिक एवं प्रोटेस्टैंट दोनों ही हैं।

प्रश्न 16.
मानवतावादी संस्कृति ने मनुष्य की एक संकल्पना प्रस्तुत की। वह क्या थी?
उत्तर:
मानवतावादी संस्कति से मानव जीवन पर धर्म का नियंत्रण कमजोर हआ। इटली के निवासी अब भौतिक संपत्ति, शक्ति और गौरव से बहुत अधिक आकृष्ट हुए। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वे अधार्मिक बन गए। वेनिस के मानवतावादी फ्रेनचेस्को बरबारो (Francesco Barbaro) ने अपनी एक पुस्तिका में संपत्ति अधिग्रहण करने को एक विशेष गुण कहकर उसका समर्थन किया। लोरेंजो वल्ला (I renzo Valla) जिसका वह विश्वाः था कि इतिहास का अध्ययन मनुष्य को पराकाष्ठा का जीवन व्यतोत करने के लिए प्रेरित करता है, ने अपनी पुस्तक ‘आनप्लेजर’ में ईसाई धर्म की भोग-विलास पर लगाई गई रोक की आलोचना की।

इस समय लोग शिष्टाचार का भी पूरा ध्यान रखते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को विनम्रता से बोलना चाहिए, ठीक ढंग से कपड़े पहनने चाहिए और सभ्य व्यवहार करना चाहिए। मानवतावादी के अनुसार व्यक्ति कई माध्यमों से अपने जीवन को आदर्श बना सकता है। इसके लिए शक्ति और संपत्ति का होना आवश्यक नहीं है।

प्रश्न 17.
मानवतावाद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
पुनर्जागरण की एक मूल विशेषता मानवतावाद थी। मानवतावाद का अर्थ है-मनुष्यों में रुचि लेना तथा उसका आदर करना । मानवतावाद मनुष्य की समस्याओं का अध्ययन करता है, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा उसके जीवन को सुधारने एवं समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। पुनर्जागरण काल में परलोक की अपेक्षा इहलोक को महत्व दिया गया जिसमें हम रहते हैं, और यही मानवतावाद है। मानवतावाद के समर्थक मानवतावादी कहलाए।

पैट्रार्क अग्रणी मानवतावादी था। उसने अंधविश्वासों तथा धर्माधिकारियों की जीवन प्रणाली की आलोचना की। उसने परलोक चिंतन की अपेक्षा लौकिक जीवन को आनंदपूर्वक व्यतीत करने पर बल दिया। इटली के नागरिकों ने मानवतावाद का समर्थन इसलिए किया क्योंकि वे धार्मिक बंधनों के परिणामस्वरूप अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को विकसित करने में असमर्थ थे। वास्तव में धर्म-निरपेक्षता की भावना मानवतावाद की मुख्य विचारधारा थी।

प्रश्न 18.
पश्चिमी रोम साम्राज्य के पतन के पश्चात् किन परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता पहुंचाई?
उत्तर:
पश्चिमी रोम साम्राज्य के पतन के बाद इटली के राजनैतिक तथा सांस्कृतिक केंद्रों का विनाश हो गया। इस समय कोई भी एकीकृत सरकार नहीं थी। रोम का पोप अपने राज्य में अवश्यक सार्वभौम था, परंतु पूरे यूरोप की राजनीति में वह इतना मजबूत नहीं था। काफी समय से पश्चिमी यूरोप के क्षेत्र सामंती संबंधों के कारण नया रूप ले रहे थे और लातीनी चर्च के नेतृत्व में उनका एकीकरण हो रहा था।

पूर्वी यूरोप में बाइजेंटाइन साम्राज्य के शासन के अधीन बदलाव आ रहे थे। उधर कुछ और पश्चिम में इस्लाम एक साझी सभ्यता का निर्माण कर रहा था। इटली कमजोर देश था। यह अनेक टुकड़ों में बँटा हुआ था। इन्हीं परिवर्तनों ने इतालवी संस्कृति के पुनरुत्थान में सहायता पहुँचाई।

प्रश्न 19.
इटली के नगरों को नया जीवन किस प्रकार मिला?
उत्तर:
बाइजेंटाइन साम्राज्य और इस्लामी देशों के बीच व्यापार की वृद्धि से इटली के तटवर्ती बंदरगाह फिर से जीवित हो उठे । बारहवीं शताब्दी में जब मंगोलों ने चीन के साथ ‘रेशम मार्ग’ द्वारा व्यापार आरंभ किया तो पश्चिमी यूरोप के देशों के व्यापार को बढ़ावा मिला । इसमें इटली के नगरों ने मुख्य भूमिका निभाई। ये नगर स्वयं को स्वतंत्र नगर राज्यों का एक समूह मानते थे। वेनिस और जनेवा इटली के दो सबसे महत्त्वपूर्ण नगर थे।

वे यूरोप के अन्य क्षेत्रों से इस दृष्टि में अलग थे कि यहाँ पर धर्माधिकारी तथा सामंत वर्ग राजनीति में शक्तिशाली नहीं थे। धनी व्यापारी तथा महाजन नगर के शासन में सक्रिय भाग लेते थे। इससे नागरिकता की भावना पनपने लगी। यहाँ तक कि जब नइ नगरों का शासन सैनिक तानाशाहों के हाथ में था, तब भी इन नगरों के निवासी अपने आ को यहाँ का नागरिक कहने में गर्व अनुभव करते थे।

प्रश्न 20.
पुनर्जागरण काल में चित्रकला के विकास पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में जिस कला का सर्वाधिक विकास हुआ वह थी चित्रकला यह धार्मिक प्रभावों से मुक्त हुई और चित्रकारों ने विषयों का चुनाव सीधे जीवन से किया। इस चित्रकला का सर्वाधिक विकास इटली में हुआ। पलास्टर और लकड़ी के स्थान पर कैनवास का प्रयोग होने लगा। इस समय के महान चित्रकारों में:-गियोयो में से कियो, माइकल एन्जेलो एवं लियोनार्डो द विंची प्रमुख था। माईकल ऐन्जेलो ने ‘दि पाइटा’ नामक चित्र में मां की वात्सल्यता को उभारा तो विंची ने मोनालिसा एवं ‘लास्ट सपर’ जैसे चित्रों की जीवंत चित्रकारी के लिये रेखा ज्ञान, नरकंकालों एवं शरीर क्रिया विज्ञान का अध्ययन किया।

प्रश्न 21.
कॉपरनिकस की खोज का महत्व बतावें।
उत्तर:
कॉपरनिकस (1473-1543) ने घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह एक क्रांतिकारी विचारधारा थी जो पूर्व की मान्यताओं के विपरीत थी। ईसाईयों का यह विश्वास था कि पृथ्वी स्थिर है, जिसके चारों ओर खगोलीय ग्रह घूमते हैं। कॉपरनिकस के सिद्धान्त के पश्चात् केपलर (1571-1630 ई०) और गैलिलियो ने भी इस सिद्धान्त के तथ्यों को सिद्ध किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
मानवतावाद के उदय तथा विकास में विश्वविद्यालयों के योगदान की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यूरोप में विश्वविद्यालय सर्वप्रथम इटली के शहरों में स्थापित हुए। ग्याहरवीं शताब्दी में पादुआ और बोलोना (Bologna) विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र थे। इसका कारण यह था कि इन नगरों के मुख्य क्रियाकलाप व्यापार वाणिज्य संबंधी थे। इसलिए वकीलों और नोटरी की बहुत अधिक आवश्यकता होती थी। ये लोग नियमों को लिखते थे, व्याख्या करते थे और समझौते तैयार करते थे। इनके बिना बड़े पैमाने पर व्यापार करना संभव नहीं था।

परिणामस्वरूप कानून को रोमन संस्कृति के संदर्भ में पड़ा जाने लगा। फाचेस्को पेट्रार्क (3041348 ई.) इस परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। पेट्रार्क के लिए पुराकाल एक विशिष्ट सभ्यता थी जिसे प्राचीन यूनानियों और रोमानों के वास्तविक शब्दों के माध्यम से ही अच्छी तरह समझा जा सकता था। अतः उसने इस बात पर बल दिया कि इन प्राचीन लेखकों की रचनाओं का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए।

नया शिक्षा कार्यक्रम इस बात पर आधारित था कि अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। यह सब हम केवल धार्मिक शिक्षा से नहीं सीख सकते । इस नयी संस्कृति को उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने ‘मानवतावाद’ का नाम दिया । पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभ में मानवतावादी शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकार शास्त्र, कविता, इतिहास, नीति दर्शन आदि विषय पढ़ाते थे। मानवतावाद को अंग्रेजी में ‘यूमेनिटिज्म’ कहते हैं ‘ह्यूमेनिटिज’ शब्द लातीनी शब्द ‘ह्यूमैनिटास’ से बना है। कई शताब्दियों पहले रोम के वकील एवं निबंधकार सिसरो (Cicero, 106-43 ई० पू०) ने इसे ‘संस्कृति’ के अर्थ में लिया था। इस प्रकार मानवता पद को ‘मानवतावादी संस्कृति’ कहा गया।

इन क्रांतिकारी विचारों ने अनेक विश्वविद्यालयों का ध्यान आकर्षित किया। इनमें एक नव स्थापित विश्वविद्यालय फ्लोरेंस भी था जो पेट्रार्क का स्थायी नगर-निवास था। इस नगर ने तेरहवीं शताब्दी के अंत तक व्यापार या शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष उन्नति नहीं की थी। परंतु पंद्रहवीं शताब्दी में सब कुछ बदल गया।

किसी भी नगर की पहचान उसके महान् नागरिकों तथा उसकी संपन्नता से बनती है। फ्लोरेंस की प्रसिद्धि में दो लोगों का बड़ा हाथ था। ये व्यक्ति थे-दाँते अलिगहियरी (Dante Alighieri) तथा कालकार जोटो (Giotto)। दाँते ने धार्मिक विषयों पर। लिखा और जोटो ने जीते-जागते रूपचित्र (Portrait) बनाए। उनके द्वारा बनाए रूपचित्र काफी सजीव थे। इसके बाद फ्लोरेंस कलात्मक कृतियों का सृजन केंद्र बन गया और यह इटली के सबसे बौद्धिक नगर के रूप में जाना जाने लगा।

‘रिसा व्यक्ति’ शब्द का प्रयोग, प्रायः उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों और वह अनेक कलाओं में कुशल हो। पुनर्जागरण काल में अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियाँ रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। उदाहरण के लिए एक ही व्यक्ति विद्वान, कूटनीतिज्ञ, धर्मशास्त्रज्ञ और कलाकार हो सकता था।

प्रश्न 2.
पुनर्जागरण से क्या तात्पर्य है? इसकी मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण ‘रिनेसा’ का हिंदी रूपांतर है। इसका अर्थ पुनर्जन्म है। पुनर्जागरण वास्तव में एक ऐसा आंदोलन था जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी राष्ट्र मध्य युग के अंधकार से निकलकर आधुनिक युग के प्रकाश में सांस लेने लगे। वे आधुनिक युग के विचारों और शैलियों से प्रभावित हुए। मानव ने स्वतंत्र रूप से विचार करना आरंभ किया जिससे साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन कीर्तिमान स्थापित हुए।

पुनर्जागरण की विशेषताएँ –
1. तर्क की प्रधानता – पुनर्जागरण ने मध्यकालीन धर्म तथा परमपराओं में बंधे समाज को मुक्त किया और तर्क को बढ़ावा दिया। इस दिशा में अरस्तु के तर्कशास्त्र ने मार्गदर्शन किया। पेरिस, बोलोने, ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज आदि विश्वविद्यालयों ने तर्क की विचारधारा का महत्त्व बढ़ाया। अब उसी बात को सही स्वीकार किया जाने लगा जो तर्क की कसौटी पर सही प्रमाणित हो।

2. प्रयोग का महत्त्व – रोजर बेकर (1214-1294 ई.) के अनुसार हम ज्ञान को दो प्रकार से प्राप्त करते हैं-वाद-विवादों द्वारा तथा प्रयोग द्वारा। परंतु वाद-विवाद से प्रश्न का अंत हो जाता है और हम भी इस पर विचार करना बंद कर देते हैं। इससे न तो संदेह समाप्त होता है और न ही मस्तिष्क को संतुष्टि प्राप्त होती है। यह बात तब-तक नहीं होती जब-तक कि अनुभव एवं प्रयोग द्वारा सत्य की प्राप्ति नहीं हो पाती । रोजर बेकर के इन विचारों ने प्रयोग एवं प्रेक्षण को बढ़ावा दिया।

3. मानववाद – पुनर्जागरण की एक मूल विशेषता मानववाद थी। मानववाद का अर्थ है-मनुष्य में रुचि लेना तथा इसका आदर करना। मानववाद मनुष्य की समस्याओं का अध्ययन करता है, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करता है तथा उसके जीवन को सुधारने एवं समृद्ध बनाने का प्रयास करता है। पुनर्जागरण काल में परलोक की अपेक्षा इहलोक को महत्त्व दिया गया जिसमें हम रहते हैं और यही मानववाद है।

4. सौंदर्य की उपासना – पुनर्जागरण की एक अन्य विशेषता थी-सौंदर्य की उपासना। कलाकारों ने अपनी कतियों में मनष्य की मोहिनी 7.1 प्रस्तुत करने का प्रयास किया। मालसा की मुग्ध करने वाली मुस्कान इस बात का बहुत बड़ा उदाहरण है।

प्रश्न 3.
पुनर्जागरण का जन्म सर्वप्रथम इटली में ही क्यों हुआ?
उत्तर:
पुनर्जागरण का उदय एवं प्रसार 1350 ई० से 1550 ई० के बीच इटली में हुआ। यहाँ से इसका प्रसार जर्मनी, इंग्लैंड, फ्राँस तथा यूरोपीय राष्ट्रों में हुआ। इटली में पुनर्जागरण के उदय के मुख्य कारण इस प्रकार थे –

(क) इटली एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था। इटली के इस बढ़ते व्यापार तथा इसकी समृद्धि ने पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों को बल प्रदान किया।
1. देश में मिलान, नेपल्स, फ्लोरेंस, वेनिस आदि नगरों की स्थापना हुई। इन नगरों के व्यापारी बाल्कन प्रायद्वीप, पश्चिमी एशिया, बिजेंटाइन तथा मिस्र की यात्रा करते थे। यहाँ उनकी भेंट ईरानी व्यापारियों से होती रहती थी। इस संपर्क और विचार-विनिमय से एक-दूसरे के विचारों को अपनाने की क्षमता :त्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त अधिकांश संग्रहालय, सार्वजनिक पुस्तकालय और नाट्यशालाएँ नगरों में ही स्थापित की गईं, गाँवों में नहीं। इससे इटली के सांस्कृतिक जीवन को नवीन दिशा मिली।

2. इटली की समृद्धि ने धनी व्यापारिक मध्यम वर्ग को जन्म दिया। इस वर्ग ने सामंतों तथा पोप की परवाह करना बंद कर दिया और इसने मध्यकालीन मान्यताओं का उल्लंघन किया । इससे इटली में पुनर्जागरण की भावना को बल मिला।

3. अनेक व्यापारियों ने सम्राटों, साहित्याकारों तथा कलाकारों को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप साहित्यकारों तथा कलाकारों को स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। अकेले फ्लोरेंस नगर ने ही असंख्य कलाकारों और साहित्यकारों को आश्रय दिया। दाँते, पेट्रार्क, बुकासियों, एंजेली, लियोनादी, जिबर्टी, मैक्यावली आदि लेखक एवं कलाकार सभी इसी नगर में उभरे थे। अतः स्पष्ट है कि धन की वृद्धि ने कला तथा कलाकारों की शिक्षा को पुनर्जागरण की ओर प्रवाहित कर दिया।

(ख) इटली में पुनर्जाकरण के पनपने का एक अन्य कारण यह था कि यह प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान रहा था। इटली के नगरों में विद्यमान प्राचीन रोमन सभ्यता के अनेक स्मारक आज भी लोगों को पुनर्जागरण की याद मिलाते हैं। वे इटली को प्राचीन रोम की भांति महान् देखना चाहते थे। इस तरह प्राचीन रोमन संस्कृति पुनर्जागरण के लिए प्रेरणा का स्रोत सिद्ध

(ग) रोम सारे पश्चिमी यूरोपीय ईसाई जगत् का केंद्र था। पोप यहीं निवास करता था। कुछ पोप पुना॥रण की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों को रोम लाए और उनसे यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद करवाया। पोप निकोलस पंचम ने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की। उसने सेंट पीटर्स का गिरजाघर भी बनवाया। इन कार्यों का प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ना स्वाभाविक था।

(घ) रानीतिक दृष्टि से इटली पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त था। पवित्र रोम साम्राज्य के पतन के साथ-साथ उत्तरी इटली में अनेक स्वतंत्र नगर-राज्यों का उदय हो रहा था। इसके अतिरिक्त इटली में सामंती प्रथा अधिक दृढ़ नहीं थी। परिणामस्वरूप इन नगर-राज्यों के स्वतंत्र एवं स्वछंद वातावरण ने वहाँ क नागरिकों में नवीन विचारों को विकसित किया।

(ङ) मध्यकालीन यूरोप में शिक्षा पर धर्म का प्रभाव था, परंतु इटली में व्यापार के विकास के कारण शिक्षा धर्म के बन्धनों में मुक्त थी। यहाँ पाठ्यक्रम में व्यावसायिक ज्ञान, भौगोलिक ज्ञान आदि को उपयुक्त स्थान प्राप्त था। परिणामस्वरूप विज्ञान तथा तर्क को बल मिला।

(च) 1453 ई० में तुर्को ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। वहाँ के अधिकांश यूनानी विद्वान, कलाकार और व्यापारी भाग कर सबसे पहले इटली के नगरों में आए और यहीं पर बस गए। ये विद्वान अपने साथ प्राचीन साहित्य को अनेक अनमोल पांडुलिपियाँ भी लाये । कुछ विद्वानों ‘ने इटली के विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य करके नवीन चेतना जागृत की।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण की अग्रणी विभूतियाँ कौन थीं? कला, साहित्य तथा विज्ञान के क्षेत्रों में पुनर्जागकरण को विभिन्न उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जाकरण के काल में अनेक महान् विभूतियों का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी प्रतिभा तथा आविष्कारों से, साहित्य तथा विज्ञान को नये आयाम प्रदान किए। इनमें से प्रमुख विभूतियों तथा उनकी सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है –

1. पेटॉर्क – पेट्रॉर्क इटली का एक महान् लेखक तथा कवित था। उसे रोम के सम्राट ने 1341 ई० में राजकवि की उपाधि से विभूषित किया। उसे मानववाद का प्रतीक स्वीकार किया जाता है। उसने तत्कालीन समाज की आलोचना की और प्रचलित शिक्षा-प्रणाली पर तीखे प्रहार किए।

2. माइकल एंजिलो – यह पुनर्जागरण काल का एक महान् कलाकार था। यह चित्रकार तथा उच्च कोटि का मूर्तिकार था। उसकी चित्रकला की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ रोम के गिरजाघर सिस्तीन की छत में दिखाई देती हैं। उसका एक चित्र ‘दि फॉल ऑफ मैन’ विश्वविख्यात है। उसे मानवतावाद का दूत स्वीकार किया जाता है।

3. रफेल – इटली का यह महान् चित्रकार, माइकेल एंजिली तथा लियोनार्दो-द-विंची का समकालीन था। उसकी सर्वप्रथम कृति ईसा की माता मेंडोना का चित्र है जो आज भी रोम की शोभा है। उसने ईसाई धर्म से संबंधित विषयों पर अनेक चित्र बनाए और गिरजाघरों तथा महलों की दीवारों को उपदेशात्मक विषयों से सुसज्जित किया।

4. टॉमस मोर – टॉमस मोर का जन्म लंदन में हआ था। वह इंग्लैंड का चांसलर भी रहा। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत किया। टॉमस मोर पर इंग्लैंड की सरकार ने मुकदमा चलाया था और 1535 ई० में उसे फाँसी दे दी गई थी।

5. मेकियावली – इटली के नगर फ्लोरेंस के इन निवासी को आधुनिक राजनीति दर्शन का पिता माना जाता है। उसने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक ‘दि प्रिंस (The Prince) में राज्य की नई कल्पना का चित्र प्रस्तुत किया है। इसमें उसने शासन करने की कला का वर्णन भी किया है। उसके अनुसार धर्म और राजनीति का कोई संबंध नहीं है। उसके विचारों का आधुनिक शासन-प्रणाली पर गहरा प्रभाव पड़ा।

6. लियोनार्दो-द-विंची – इटली का यह महापुरुष बहुमुखी प्रतिभा का स्वामी था। वह चित्रकार, मूर्तिकार, इंजीनियर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि और भी सभी कुछ था। उसने हवाई जहाज बनाने का भी प्रयत्न किया। उसके चित्रों में ‘दि लास्ट सपर’ चित्र बहुत प्रसिद्ध है।

7. गुटेनबर्ग – वह जर्मनी के मेंज नगर का निवासी था। प्रारंभ में वह हीरे और दर्पणों पर पॉलिश किया करता था। उसने मुद्रण के लिए आवश्यक वस्तुओं तथा कल पुर्जा का आविष्कार किया। वह प्रथम व्यक्ति था जिसने 1450 ई० के लगभग छापाखाना तैयार किया।

8. मार्टिन लूथर – मार्टिन लूथर जर्मनी का निवासी था। 1517 ई० में उसने रोम की धार्मिक यात्रा की। यहाँ उसने पोप और चर्च की बुराइयाँ देखीं। वापस आकर उसने इन बुराइयों के विरुद्ध सुधार आंदोलन आरंभ किया। इसे आंदोलन के परिणामस्वरूप ईसाई धर्म की प्रोटेस्टेंट शाखा का प्रचलन हुआ। उसने जर्मन भाषा में बाईबिल का अनुवाद किया। चर्च के विरुद्ध लिखे गए ग्रंथ में उसकी पुस्तक
‘टेबल टॉक’ अति प्रसिद्ध है। उसने मुक्ति पत्रों का घोर विरोध किया।

9. जॉन वाइक्लिफ – वह इंग्लैड का रहने वाला था। ‘सुधार आंदोलन’ का ‘प्रभात का सितारा’ कहा जाता है, क्योंकि उराने लूथर से पूर्व ईसाई धर्म में सुधार के प्रयत्न किए। उसने अपने विद्यार्थियों की सहायता से इ. बेल का अनुवाद अपनी मातृभाषा में किया। चर्च ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित किया और उसकी कई रचनाएँ जला दी गई।

10. गैलीलियों – गैलीलियो का जन्म इटली के नगर पीसा में हुआ। वह एक उच्च कोटि का गणितज्ञ था। 1609 ई० में उसने दूरबीन का आविष्कार किया जिसके परिणामस्वरूप सामुद्रिक यात्राएँ सरल बन
गई। वह उन पहले व्यक्तियों में से था जिन्होंने घोषणा की कि पृथ्वी एक ग्रह है जो सूर्य के चारों ओर घूमती है।

11. कोपरनिकस – यह पोलैंड का निवासी था। वह नक्षत्र विद्या का ज्ञाता था। उसका मुख्य योगदान आकाश के विभिन्न ग्रहों की गतियों की जानकारी देना था। उसने यह बताया कि पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं।

12. दाँते – यह इटली का महानतम् कवि था। उसे इतिहास में ‘दस नीरव शताब्दियों की वाणी’ कहा जाता है। उसने सेना में भी कार्य किया था। वह न्यायाधीश भी रहा। उसने जीवन में बहुत कष्ट झेला। उन्हीं यातनाओं ने उसे श्रेष्ठ कवि बना दिया। ‘डिवाइन कॉमेडी’ उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। इसमें दाँते ने स्वर्ग और नरक की काल्पनिक यात्रा का वर्णन किया है।

13. जॉन हस – वह प्राग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक था। उसने चर्च की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। परिणामस्वरूप उसे पोप के आदेशानुसार जीवित जला दिया गया।

14. फ्रांसिस बेकिन – फ्रांसिस बेकिन अंग्रेजी राजनीतिज्ञ तथा साहित्यकार था। वह अपने ‘श्रेष्ठ निबंधों के लिए विश्वविख्यात है।

15. हार्वे – हार्वे इंग्लैंड का इंग्लैंड का रहने वाला था। उसने 1610 ई० में इस बात का वर्णन किया कि रक्त किस प्रकार दिल से शरीर के सब भागों में जाता है और फिर लौलकर दिल में आता है।

16. वेसिलियस – यह बेज्लियम का रहने वाला था। उसने पहली बार मानवीय शरीर का पूर्ण अपनी पुस्तक में किया । पुस्तक का नाम था-De Humani Corporis Fabrica.

17. सर्वेतम – सर्वेतस स्पेन का रहने वाला था। वह एक महान् योद्धा और सफल लेखक था। उसकी रचित Don Quixote विश्व की महानतम् रचनाओं में गिनी जाती है और इसका लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पुस्तक में मध्यकालीन सामंतों की वीर गाथाओं का वर्णन है।

प्रश्न 5.
16वीं तथा 17वीं शताब्दी के दौरान हुए धर्म-सुधार (प्रोटेस्टेंट) आंदोलन के कारणों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
धर्म – सुधार आंदोलन से हमारा अभिप्राय उस आंदोलन से है जिसे जर्मनी के मार्टिन लूथर ने रोमन चर्च में प्रचलित अनुचित रीति-रिवाजों के विरोध में चलाया। इस आंदोलन के समर्थकों ने प्रष्ट परंपराओं को समाप्त करके सुधरी हुई परंपरा स्थापित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने रोमन चर्च से पृथक होकर एक नए प्रोटेस्टेंट चर्च की स्थापना की। इस प्रकार ईसाई धर्म के अनुयायी दो गुटों में विभाजित हो गए-कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट। धर्म सुधार आंदोलन पर्पनी से यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गया । इसे स्विट्जरलैंड में विगली तथा फ्रांस में काल्विन ने आ गे बढ़ाया।

कारण – धर्म सुधार आंदोलन के निम्नलिखित कारण थे –
1. मध्यकाल में रोमन कैथोलिक चर्च पश्चिमी यूरोप में अपना प्रभुत्व जमाए हुए था। इसमें सर्वोच्च स्थान पोप का था। वह यूरोप की समस्त ईसाई जनता का नेतृत्व करता था। चर्च की आपर शक्ति के कारण इसमें कई दोष आ गए थे। पुनर्जागरण के फलस्वयप सामान्य ज्ञान और विवेक के आधार पर जनता का चर्च में विश्वास कम होने लगा। लोग पूजा-पाठ का चर्च के संगठन की आलोचना करने लगे।

2. पोप की शक्ति असीम थी। वह विभिन्न देशों में पादरियों की नियुक्ति करता था। चर्च की अपनी अलग अदालत थी। चर्च के पदाधिकारी राज्य के नियमों से मुक्त थे। पोप राज-कार्यों में हस्तक्षेप किया करता था। इसलिए राजा पोप से मुक्त होने के लिए किसी अवसर की खोज में थे।

3. राष्ट्रीय राज्यों के उदय के साथ राजाओं की शक्ति बढ़ी। वे पोप के अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों पर अंकुश चाहते थे। इसलिए राजाओं ने धर्म सुधार आंदोलन को गति दी।

4. व्यापारी वर्ग भी चर्च के विरुद्ध था। वे चर्च की विपुल संपत्ति का लाभ उठाना चाहते थे। अतः उन्होंने चर्च के विरुद्ध राजाओं का समर्थन किया।

5. पादरी नैतिक रूप से पतन की ओर अग्रसर थे। अत: चर्च में जनता की आस्था कम होने लगी थी। चर्च जन-साधारण से अनेक प्रकार के कर और शुल्क वसूल करता था। यह धन देश के बाहर जाता था। सबसे अधिक भूमि का स्वामी चर्च ही था। चर्च को कर देना पाप समझा जाता था। पश्चिम यूरोप में चर्च की जागीरों में उनके कर्मचारी आतंक मचाते थे। अतः जनता भी कॅथोलिक चर्च के विरुद्ध आवाज उठाने लगी।

6. धर्म सुधार आंदोलन का मूल कारण जनता में पुनर्जागरण का प्रसार ही था। इस युग में प्रचलित मान्याताओं तथा विश्वासों का तर्क की कसौटी पर परीक्षण किया गया। तर्क की कसौटी पर पोष तथा पादरियों के अधिकार तथा व्यवहार खरे नहीं उतरे। अतः धार्मिक दोषों का विरोध होना स्वाभाविक ही था।

प्रश्न 6.
धर्म सुधार आंदोलन के क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
धर्म सुधार आंदोलन के निम्नलिखित परिणाम निकले –
1. सामाजिक परिणाम – इस आंदोलन के कारण अंधविश्वासों और आडंबरों का अंत हुआ। साधारण नागरिक को बाइबिल का अध्ययन करने की सुविधा प्राप्त हो गई। वैज्ञानिकों को भी अपने मध्यकाल में स्वतंत्रता मिली। चर्च की संपत्ति का किसानों तथा मध्य वर्ग में वितरण होने लगा और लोग चर्च के कर-भार से मुक्त हो गए।

2. कैथोलिक धर्म में सुधार आंदोलन – कैथोलिक धर्म में अनेक सुधार हुए। कैथोलिक चर्च में सुधार के लिए ट्रेंट में एक परिषद् बुलाई गई। इसकी बैठकें अठारह साल तक चली। पोप की प्रधानता और उसके चर्च तथा धर्म ग्रथों की व्याख्या के अधिकार स्वीकार किए गए। इबिल का लेटिन में अनुवाद भी प्रामाणिक माना गया। चर्च ने क्षमा-पत्र बेचना बंद कर दिया। चर्च के अधिकारियों के प्रशिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाया गया।

3. गजनीतिक परिणाम – राजनीतिक जीवन में चर्च का प्रभाव कम हुआ। ग तरह राजाआ का शक्ति बढ़ी। पोप का बाहय हस्तक्षेप समाप्त हो गया। इस प्रकार राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण में बड़ा योगदान मिला।

4. वाणिज्य तथा व्यापार को प्रोत्साहन – पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप सामंतवादी व्यवस्था का अंत हो गया तथा व्यापार की प्रगति हुई। व्यापार की प्रगति के कारण एक समृद्ध मध्यम वर्ग का उदय हुआ।

5. राष्ट्रीय भाषा तथा साहित्य का प्रसार – धर्म सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप लोक भाषाओं तथा साहित्य का विकास हुआ। मार्टिन लूथर ने बाइबिल का अनुवाद जर्मन भाषा में किया। धर्म संबंधी लेख उसने जर्मन भाषा में प्रकाशित कराए। अन्य देशों में भी धर्म का प्रचार वहाँ की लोकभाषा में ही किया गया। जो प्रतिष्ठा कभी लैटिन भाषा को प्राप्त थी, वह अब लोक भाषाओं को मिलने लगी।

प्रश्न 7.
प्रति सुधार आंदोलन से क्या तात्पर्य है? वह कैथोलिक चर्च में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में कहाँ तक सफल रहा?
उत्तर:
चर्च तथा पोप की असीमित शक्ति और पोप तथा पादरियों के आडंबरपूर्ण कार्यों के विरुद्ध धर्म सुधार आंदोलन चला था। फलस्वरूप एक नए सुधारवादी धर्म (प्रोटेस्टेंट) का उदय हुआ। आरंभ में पोप तथा चर्च सुधारवादी आंदोलन के प्रति उदासीन रहे। परंतु जब इस आंदोलन ने जोर पकड़ा तो पोप को अपनी बेटियों का अनुभव हुआ। उसने अपने चर्च में सुधार लाने के लिए अपनी ओर से एक आंदोलन चलाया । इस आंदोलन को प्रति सुधार आंदोलन अथवा काउंटर रिफॉर्मेशन कहा जाता है। कैथोलिक चर्च की बुराइयों को दूर करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए

1. प्रति सुधार आंदोलन ने कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च सत्ता को पुनः स्थापित करने के लिए तीन तरफा प्रयास किया। 1545 ई० में पोप पाल तृतीय ने ट्रेंट की परिषद् (Council of Trent) बुलाई। प्रोटेस्टेंटवाद से निपटने के तरीकों पर विचार किया गया। इस उद्देश्य से प्रोटेस्टेंटवादियों तथा कैथोलिक के बीच सैद्धांतिक झगड़ों को समाप्त करने के निर्णय लिया गया। इस परिषद् ने चर्द की प्रशासनिक बुराइयों को समाप्त करने तथा अनैतिक कार्यों पर रोक लगाने का निर्णय भी लिया। इसके अतिरिक्त इस परिषद् ने कुछ पुस्तकों की एक सूची तैयार करवाई। कैथोलिकों को इन पुस्तकों को पढ़ाने के लिए मना कर दिया गया।

2. धर्म प्रचारकों की एक संस्था स्थापित की गई। ये धर्म प्रचारक जेसुइट कहलाए। इस संगठन का नेता लोयोला (Loyola) नामक एक स्पेनिश था।

3. कैथोलिक चर्च ने अपनी इंकविजिशन (चर्च की अदालत) नामक संस्था की पुनः स्थापना की। इन प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भले ही समस्त यूरोप को पोप की सत्ता के अधीन नहीं लाया जा सका, तो भी ये प्रयास प्रोटेस्टेंटवाद के और अधिक प्रसार को रोकने में सफल रहे।

प्रश्न 8.
मानवतावादी विचारों का प्रचार किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
मानवतावादी अपनी बात लोगों तक तरह-तरह से पहँचाते थे। यद्यपि विश्वविद्यालय में मुख्य रूप से कानून, आयुर्विज्ञान और धर्मशास्त्र ही पढ़ाए जाते थे फिर भी धीरे-धीरे मानवतावादी विषय भी स्कूलों में पढ़ाये जाने लगे। ऐसा केवल इटली में ही नहीं, बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी हुआ। पुनर्जागरण काल में मानवतावादी विचारों के प्रसार में केवल औपचारिक शिक्षा ने ही योगदान नहीं दिया। इसमें कला, वास्तुकला और साहित्य ने भी प्रभावी भूमि निभाई।

नए कलाकारों को पहले के कलाकारों द्वारा बनाए गए चित्रों से प्रेरणा मिली। रोमन संस्कृति के भौतिक अवशेषों की उतनी ही उत्कंठा के साथ खोज की गई जितनी कि प्राचीन ग्रंथों की। रोम साम्राज्य के पतन के एक हजार वर्षों बाद भी प्राचीन राम और उसके वीरान नगरों के खंडहरों से कलात्मक वस्तुएँ प्राप्त हुई। शताब्दियों पहले बनी पुरुषों एवं नियों की संतुलित मूर्तियों ने इतालवी वास्तुविदों को उस परंपरा को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। 1416 ई. में दोनातल्लो (Donatello, 1386-1466) ने सजीव मूर्तियाँ बनाकर एक नयी परंपरा स्थापित की।

प्रश्न 9.
चित्रकारों ने इतालवी कला को यथार्थवादी रूप कैसे प्रदान किया?
उत्तर:
कालकारों को मूल आकृति जैसी सटीक मूर्तियाँ बनाने की चाह को वैज्ञानिकों के कार्यों ने और अधिक प्रेरित किया। नर-कंकालों का अध्ययन करने के लिए कलाकार आयुर्विज्ञान कालेजों की प्रयोगशाला में गए। बेल्जियम मूल के आंडीयस बेसेलियम (1514-64 ई.) पादुआ

प्रश्न 10.
ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद कैसे उत्पन्न हुआ? अथवा, धर्म-सुधार आंदोलन की भूमिका कैसे तैयार हुई?
उत्तर:
यात्रा, व्यापार, सैनिक विजय तथा कूटनीतिक संपर्कों के कारण इटली के नगरों तथा राजदरबारों का दूर-दूर के देशों से संपर्क स्थापित हुआ। यहाँ के शिक्षित एवं समृद्ध लोगों ने ‘ इटली की नयी संस्कृति को प्रसन्नतापूर्वक अपना लिया। परंतु नए विचार आम आदमी तक न पहुंच सके, क्योंकि वे साक्षर नहीं थे। नये विचारों का प्रसार-पंद्रहवीं और आरंभिक सोलहवीं शताब्दी में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के अनेक विद्वान मानवतावादी विचारों की ओर आकर्षित हुए।

इटली के विद्वानों की भांति उन्होंने भी यूनान तथा रोम के क्लासिकी ग्रंथों और ईसाई धर्मग्रंथों के अध्ययन पर अधिक ध्यान दिया। परंतु इटली के विपरीत यूरोप में मानवतावाद ने ईसाई चर्च के अनेक सदस्यों को अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने ईसाइयों को अपने प्राचीन धर्मग्रंथों में बताए गए तरीकों से धर्म का पालन करने को कहा। उन्होंने अनावश्यक कर्मकांडों को त्यागने की बात भी की और कहा कि उन्हें धर्म में बाद में जोड़ा गया है। मानव के बारे में उनका दृष्टिकोण बिल्कुल नया था। वे उसे एक मुक्त एवं विवेकपूर्ण कर्ता समझते थे। बाद के दार्शनिक बार-बार इसी बात को दोहराते रहे । वे एक दूरवर्ती ईश्वर में विश्वास रखते थे और मानते थे कि मनुष्य को उसी ने बनाया है।

वे यह भी मानते थे कि मनुष्य को अपनी खुशी इसी विश्व में वर्तमान में ही ढूँढ़नी चाहिए। चर्च पर प्रहार-इंग्लैंड के टॉकस मोर (Thomas More 1478-1535 ई.) और हालैंड के इरेस्मस (Erasmus 1466-1536 ई.) का यह मानन था कि चर्च एक लालची संस्था बन गई है जो मनचाहे ढंग से साधारण लोगों से पैसा बटोर रही है। पादरियों द्वारा लोगों से धन ठगने का सबसे सरल तरीका ‘पाप-स्वीकारोक्ति’ (indulgences) नामक दस्तावेज का विक्रय था जो व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए सभी पापों से छुटकारा दिला सकता था। ईसाइयों को बाईबिल के स्थानीय भाषाओं में छपे अनुवाद से यह पता चल गया कि उनका धर्म ऐसी प्रथाओं की आज्ञा नहीं देता।

किसान तथा राजाओं में चर्च के प्रति असंतोष-यूरोप के लगभग प्रत्येक भाग में किसानों ने चर्च द्वारा लगाए गए विभिन्न करों का विरोध किया। इसके साथ-साथ राजा भी राज-काज में चर्च के हस्तक्षेप से दु:खी थे। परंतु मानवतावादियों ने उन्हें यह बताया कि चर्च की न्यायिक और वित्तीय शक्तियों का आधार कॉस्टैनआइन का अनुदान नामक एक दस्तावेज है। यह दस्तावेज असली नहीं था बल्कि जालसाजी से तैयार किया गया था। यह जानकारी पाकर राजाओं में खुशी की लहर दौड़ गई। इसी घटनाक्रम ने ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद को जन्म दिया और धर्म-सुधार आंदोलन की भूमिका तैयार की।

प्रश्न 11.
यूरोप के (इटली के) साहित्य पर पुनर्जागरण के क्या प्रभाव पड़े।
उत्ता:
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप मानव रोवन के प्रत्येक पक्ष में नवीनता आई। साहित्य में भी इस नवीनता के दर्शन हुए। पुनर्जागरण काल में लातीनी तथा यूनानी भाषाओं की अपेक्षा देशी अर्थात् मातृभाषाओं में साहित्य का सृजन किया जाने लगा। इस तरह इस काल में इतालवो, फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली, जर्मन, अंग्रेजी, डच, स्वीडिश आदि बोलचाल की भाषाएँ विकसित हुई। पॉडत नेहरू भी लिखते हैं कि ‘इस प्रकार यूरोप की भाषाओं ने प्रगति की और वे इतनी संपन्न एवं शक्तिशाली हो गई कि उन्होंने आज की सुंदर भाषाओं का रूप धारण कर लिया।

इन्हीं सुंदर भाषाओं में साहित्य की रचना हुई। और तो और बाइबिल का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। पुनर्जागरण काल में केवल भाषाई परिवर्तन ही नहीं हुआ, बल्कि विषय-वस्तु संबंधी परिवर्तन भी हुए। मध्यकालीन साहित्य का मुख्य विषय धर्म था। परंतु इस युग के साहित्य में धार्मिक विषयों के स्थान पर मनुष्य जीवन और समस्याओं को महत्व दिया गया। अब साहित्य आलोचना प्रधान, मानववादी और व्यक्तिवादी हो गया।

इतालवी साहित्य-पुनर्जागरण काल में इटली के साहित्याकारों ने अपनी रचनाओं द्वारा यूरोप के विद्वानों के लिए नवीन दिशाएँ प्रस्तुत की। इन साहित्याकारों में दाँते (1265-1321 ई.), फ्रांचेस्को पैट्रार्क (1304-1374 ई.), ज्योवानी बुकासियो (1313-1375) प्रमुख थे। इन तीनों ने क्रमशः अपनी कविताओं, जीवनियों और कथाओं से इटली के साहित्य को समृद्ध बनाने का प्रयत्न किया।

1. दाँते (Dante) – दाँते एक महान् कवि था। प्रायः उसकी तुलना विद्वान होमर के साथ की जाती है। उसकी रचना ‘डिवाइन कॉमेडी’ (Divine Comedy) विश्वविख्यात है। यह एक काल्पनिक कथा है। इसमें एक यात्रा का चित्र प्रस्तुत किया गया है। दाँते इस काल्पनिक यात्रा में नरक तथा स्वर्ग की यात्रा करता है। हम सबसे पहले नरक की यातनाओं और पीड़ाओं का दृश्य देखते हैं। इसके पश्चात् हम पापमोचन स्थल देखते हैं जहाँ संयम और कठोर जीवन से आत्मशुद्धि होती है और अंत आत्मिक सुख से होता है।

दाँते ने इसीलिए इसे ‘कॉमेडी’ (सुखांत) कहा है। इस पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य मनुष्य को नैतिक तथा संयमी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देना है। उसने लोगों को मानव प्रेम, देश-प्रेम तथा प्रकृति प्रेम की शिक्षा दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विषय-वस्तु मध्यकालीन और आध्यात्मिक है, फिर भी इसमें साहित्यिक श्रेष्ठता से युका आध्यात्मिक विषय का एक सरस चित्रण है। ‘दाँते को इतालवी कविता का पिता’ कहा जाता है।

2. पेदा (Patrare) – पेट्रार्क को ‘मानववाद का पिता’ कहा जाता है। मानवतावाद के प्रतिनिधि के रूप में उसे पुनर्जागरण का भी प्रथम व्यक्ति स्वीकार किया जाता है। अनेक इतिहासकार उसे दाँते से उच्च स्थान प्रदान करते हैं। उनका कहना है कि दति की ‘डिवाइन कॉमेडी’ में मध्यकाल की झलक है, जबकि पेट्रार्क की कविता नवीनता लिए हुए है। पेट्राक ने लोगों का ध्यान शिक्षा और साहित्य के स्थान पर यूनानी तथा रोमन साहित्य की विशिष्टता की ओर आकर्षित किया। उसकी कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के हर्ष तथा विषाद का मार्मिक वर्णन मिलता है। उसने यूनानी और लातीनी भाषा के पुराने हस्तलिखित ग्रंथों को खोजने और उनका संग्रह करने में बड़ा उत्साह दिखाया।

उसने अनेक पस्तकालय खोले और लोगों में पस्तकों के लिए रुचि पैदा की। कविता के अतिरिक्त उसने होमर, सिसरो, लिवी आदि प्राचीन लेखकों की रचनाओं में गहन रुचि दिखाई । उसने इनके साथ काल्पनिक पत्राचार किया। ये पत्र उसकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुए। इन पत्रों से पता चलता है कि उसका प्राचीन सभ्यात के प्रति बडा लगाव था। उसका सबसे बड़ा योगदान है कि उसने देशवासियों में प्राचीन यूनानी एवं रोमन साहित्य में अभिरुचि पैदा की।

3. बुकासियों (Bocacio) – बुकासियो पेट्रार्क का शिष्य था। उसने पुनर्जागरण का पूर्ण प्रतिनिधित्व किया। कहानीकार के रूप में उसकी सर्वश्रेष्ठ कृति ‘डैकेमैरोन’ (Deccacmeron) है। इस हास्य प्रधान रचना में कुल एक सौ कहानियाँ हैं जिनमें एक नवीन शैली का विकास किया गया है। इनमें इटली के तत्कालीन संपन्न समाज में फैले नैतिक भ्रष्टाचार का वर्णन है। दाँते, पेट्रार्क तथा बुकासियो के अतिरिक्त एरिआस्ट्रो, दासो, सैल्यूतानी आदि ने अपने-अपने ढंग से इतालवी साहित्य को समृद्ध बनाया।

प्रश्न 12.
पुनर्जागरण काल से विज्ञान के क्षेत्र में क्या प्रगति हुई?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण उन्नति हुई। इसके प्रमुख कारण थे –

  • धर्म-सुधार आंदोलर ने लोगों को चर्च के नियंत्रण से मुक्ति दिलाई। अब उन्हें स्वतंत्र रूप से विचार करने का अवसर प्राप्त हुआ।
    मानववाद के विकास से बौद्धिक विकास को बढ़ावा मिला।
  • दार्शनिकों की विचार-प्रणाली में अंतर आया। अब वे भविष्य के विषय में भी सोचने लगे। उनका यह दूरदर्शी दृष्टिकोण नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों का आधार बना।
  • राष्ट्रीय राज्यों के उदय तथा नवीन सामाजिक व्यवस्था के विकास से भी वैज्ञानिक विचारधारा को प्रोत्साहन मिला।
  • नए देशों की खोज से लागों की जिज्ञासा बढ़ी। परिणामस्वरूप उनके दृष्टिकोण में भी परिवर्तन हुआ।
  • पुनर्जागरण काल के विद्वान परंपरागत विचारों को अंधाधुंध स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

वे प्रत्येक बात को तर्क की कसौटी पर कसना चाहते थे। अंग्रेज विद्वान फ्रांसिस बेकन ने लोगों के सम्मुख ये विचार प्रस्तुत किए-“ज्ञान की प्राप्ति केवल प्रेक्षण और प्रयोग करने से ही हो सकती है। जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उसे पहले अपने चारों ओर घटित होने वाली घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए। फिर उसे स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि इन घटनाओं के पीछे क्या कारण हैं। जब वह किसी घटना के संभावित कारण के विषय में कोई धारणा बना ले, तो उसकी प्रयोगात्मक ढंगे से जाँच करे।” इस तार्किक दृष्टिकोण ने वैज्ञानिक प्रगति को संभव बनाया। इस काल में हुई वैज्ञानिक प्रगति का वर्णन इस प्रकार है

1. दूसरी शताब्दी में यूनानी खगोल शास्त्री टॉलमी ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था कि पृथ्वी विश्व के केंद्र में स्थित है। परंतु 16वीं शताब्दी में पोलैंड के वैज्ञानिक कोपरनिकस (1473-1543 ई.) ने इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध कर दिखाया। उसने बताया कि पृथ्वी एक ग्रह है और यह सूर्य के चारों ओर घूमती है। उसने यह निष्कर्ष गणना एवं प्रेक्षण के पश्चात् ही निकाला था। परंतु उसके द्वारा प्रतिपादित इस नवीन सिद्धांत का घोर विरोध हुआ, क्योंकि यह बाइबिल के प्रतिकूल था।

अत: पोप के आदेश पर उसे अपने नए विचारों का प्रसार बंद करना पड़ा। तत्पश्चात् इटली के वैज्ञानिक जाइडिनी ब्रूनो (1548-1600 ई.) ने कोपरनिकस के सिद्धांत का समर्थन किया और इसे फिर से प्रचलित करने का प्रयास किया। परंतु रोम के धर्माधिकारियों के आदेश से उसे जीवित जला दिया गया।

फिर भी तर्क पर आधारित सिद्धांत को काटा नहीं जा सका । जर्मन खगोलशास्त्री जॉन केपलर (1571-1630 ई.) ने भी प्रमाणों द्वारा इस सिद्धांत की पुष्टि की। उसने यह भी बताया कि पृथ्वी की भांति अन्य ग्रह भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। उनका मार्ग वृत्तीय नहीं, अपितु दीर्घवृत्ताकार (अंडाकार) है। इटली के प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो (1564-1642 ई.) ने स्वयं एक दूरबीन बनाई और उसकी सहायता से सूर्य, तारों तथा ग्रहों को देखा। उसने भी घोषणा की कि कोपरनिकम के विचार सत्य हैं। परंतु चर्च ने फिर से अपनी टांगे अड़ाई और उसे यह बात स्वीकार करने र विवश कर दिया कि उसने जो कहा है, वह असत्य है।

2. गैलीलियो ने अरस्तु की इस बात को भी प्रयोग द्वारा गलत सिद्ध किया कि गिरते हुए पिंडों की गति उनके भार पर निर्भर करती है। उसने बताया कि यह भार पर नहीं, अपितु दूरी पर निर्भर करती है।

3. उसी युग में इंग्लैंड के महान् वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ आइजक न्यूटन (1642-17271) ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिससे खगोल विज्ञान को एक नई दिशा मिली। उसने सिद्ध किया की पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु को ऊपर से नीचे खींचती है। न्यूटन के इस अन्वेषण का व्यापक प्रभाव पड़ा । लोग यह सोचने पर विवश हो गये कि विश्व कोई दैव योग (दैवी शक्ति) नहीं चला रहा । यह प्रकृति के सुव्यवस्थित नियमों के अनुसार चल रहा है।

4. पुनर्जागरण काल में खगोल विज्ञान के अतिरिक्त चिकित्सा, रसायन, भौतिक एवं गणितशास्त्र के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उन्नति हुई। नीदरलैंड के वेसेलियस (1514-64 ई.) ने औषधि तथा शल्य प्रणाली का गहन अध्ययन करने के पश्चात् ‘मानव शरीर की संरचना (The Structure of Human Body) नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने मानव शरीर के विभिन्न अंगों का समुचित विवरण प्रस्तुत किया। इंग्लैंडवासी विलियम हार्वे (15781657 ई.) ने पशुओं पर विभिन्न प्रयोग करके रक्त प्रवाह के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इन सिद्धांतों से स्वास्थ्य तथा रोग की समस्याओं का अध्ययन नये ढंग से आरंभ हुआ।

प्रश्न 13.
पुनर्जागरण का लोगों के साधारण जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा? इसका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
पुनर्जागरण के प्रभाव का वर्णन इस प्रकार है –
1. सामाजिक जीवन पर प्रभाव-पुनर्जागरण का यूरोप के समाज पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इससे पूर्व राजा, सामंत और पादरी के अतिरिक्त किसी को समाज में सम्मान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण के साथ-साथ नागरिक जीवन का महत्त्व बढ़ने लगा। नगरों में रहने वाले मध्य वर्ग के लोगों को सम्मान पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। मध्यकाल तक सामाजिक जीवन अपेक्षाकृत सरल ही था। समाज में मुख्यत: सामंत और चर्च ही प्रधान समझे जाते थे।

साधारण लोग भाग्यवादी थे और अंधविश्वासों की बेड़ियों में जकडे हए थे। वे इहलोक से ज्यादा परलोक करते थे। यही कारण था कि पादरी राज्य के अधिकारियों से भी अधिक सशक्त थे। पुनर्जागरण के कारण समाज में व्यवसाय और उद्योगों की भी उन्नति हुई। गाँवों और खेती का महत्त्व घटने लगा। धन के उत्पादन से साधनों में वृद्धि हुई। व्यवसायी, बैंकर, उद्योगपति, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक समाज
में सम्मान प्राप्त करने लगे। सच तो यह है कि पनर्जागरण के साथ सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा और समाज में तनाव बढ़ने लगा।

2. धार्मिक जीवन पर प्रभाव-पुनर्जागरण का धार्मिक स्वरूप, धर्म सुधार आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ। मध्य युग में धर्म समाज की धुरी था। पश्चिमी यूरोप की जनता कैथोलिक चर्च और पूर्वी यूरोप के लोग ग्रीक आर्थोडाक्स चर्च की छत्रछाया में जीवन व्यतीत करते थे। चर्च धर्म के स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करना चाहता था।

चर्च की शक्ति बहुत बढ़ चुकी थी। उसकी शक्ति का प्रमाण इस बात से मिलता है कि जब ग्यारहवीं शताब्दी में पवित्र रोमन सम्राट हेनरी ने पोप ग्रेगोरी के हस्तक्षेप को मानने से इन्कार किया तो उन में उसे सर्दी के दिनों में नंगे पाँव आल्पस पर्वत पार करके पोप से क्षमा माँगने जाना पड़ा था। जब इंग्लैंड में वपाइक्लिफ और हंगरी के हंस ने चर्च में कछ सुधार करने की कोशिश की तो उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी।

चर्च के लिए पोपों का सेवाभाव समाप्त हो चुका था। विभिन्न संतों के अनुयायी होते हुए भी वे स्वयं को कैथोलिक चर्च के अधीन मानते थे। मध्ययुग में प्राचीन धर्म में कोई परिवर्तन न किया गया। परिणामस्वरूप चर्च में अंधविश्वासों और भ्रष्टाचार का बोलबाला होने लगा। राजा और सामंत तो इसके हिस्सेदार बन जाते थे इसका सारा दबाव समाज पर पड़ता था। पुनर्जागरण के कारण जब व्यक्तिवाद की स्थापना हुई तो सबसे पहले धार्मिक स्थिति की आलोचना आरम्भ हुई।

दाँते, एरासमस, टॉमस मोर से वाल्तेयर के समय तक चर्च में परिवर्तन की मांग बढ़ गई। अपने भ्रष्ट स्वरूप और आर्थिक शोषण के कारण चर्च को भी परिवर्तन अनिवार्य लगने लगा। सोलहवीं शताब्दी में चर्च का विरोध करने वालों ने प्रोटेस्टेंट चर्चा की परंपरा आरंभ की। अतः चर्च का एकाधिकार समाप्त होने लगा। मानव किसी भी सिद्धांत को अपनाने से पूर्व उसे विवेक और कसौटी पर परखने लगा।

3. आर्थिक जीवन पर प्रभाव-मध्ययुग में आर्थिक जीवन अपेक्षाकृत सरल और व्यवस्थित था। आर्थिक जीवन मुख्यतः कृषि पर आधारित था। आर्थिक संबंधों की नियोजक संस्थाएँ कम थौं। श्रमिकों और कारीगरों को निर्देशित करने वाली मुख्य संस्था ‘गिल्ड’ थी। इनके संचालक अनुयायियों के हितों की अपेक्षा निजी हितों को अधिक महत्त्व देते थे। परिणामस्वरूप विभिन्न गिल्डों में प्रतिस्पर्धा होती थी। यहाँ तक कि एक ही गिल्ड के सदस्यों में भी परस्पर शत्रुता उत्पन्न होने लगी। ये संस्थाएँ बोझ बन गई और आर्थिक प्रगति में बाधा बनने लगीं। धीरे-धीरे भौगोलिक यात्राएँ आरंभ हुई।

लोगों के व्यवसाय बढ़े और आर्थिक जीवन जटिल होने लगा। 15वीं शताब्दी आते-आते उत्पादन के साधनों में परिवर्तन आने लगा और व्यापार का क्षेत्र बढ़ा । मंडियों की खोज आरंभ हुई। बाजारों की खपत के लिए उत्पादन में वृद्धि हई। लोग गाँव छोड़ नगरों में आ कर बसने लगे। धन संचय हुआ। बैंकों तथा स्टॉक कंपनियों का श्रीगणेश हुआ। पूंजीवाद का जन्म हुआ। अब सब कुछ सरल नहीं था। व्यवस्था के लिए कानून की आवश्यकता पड़ी।

अतः सरकारी हस्तक्षेप आरंभ हुआ। पूंजीपति और सरकार निकट आई। श्रमिक लघु उत्पादन को बेचने के लिए उपनिवेशों का महत्त्व बढ़ा। इससे उपनिवेशवाद को तथा साम्राज्यवाद को बढ़ावा मिला। सच तो यह है कि आर्थिक जीवन जटिल हो गया । धन की वृद्धि अवश्य हुई परंतु आर्थिक विषमता बढी जिससे असंतोष फैला।

4. राजनैतिक जीवन-पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप राजनीतिक जीवन भी अछूता नहीं रहा। पुनर्जागरण से पूर्व यूरोपीय समाज में सामंतों का बोलबाला था। परंतु अब मध्य वर्ग के पास धन था। उन्होंने राजाओं की धन से सहायता की। इससे राजाओं की शक्ति बढ़ी। शीघ्र ही राष्ट्रीय राजतंत्रों का विकास आरंभ हुआ। फ्रांस में फ्रांसिस प्रथम तथा हेनरी चतुर्थ के शासन काल में राष्ट्रीयता के आधार पर केंद्रीय सत्ता दुढ़ और सारे राष्ट्र की शक्ति को राजा में केंद्रित माना जाने लगा।

राष्ट्रीय राजतंत्र के विकास से पोप की सत्ता में कमी आई। राष्ट्रीय भाषाओं अर्थात् अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश के विकास से राष्ट्रों के आंतरिक संगठन मजबूत हुए और उनकी शक्ति बढ़ी। राजाओं की शक्ति के बढ़ने के साथ-साथ शासन में मध्य वर्ग में साझेदारी की वृद्धि हुई। सामंत अकेले पड़ गये। राजा और मध्य वर्ग पहले साथ-साथ चले और फिर मध्य वर्ग ने राजा की सत्ता को भी चुनौती दे दी। फ्रांसीसी क्रांति इस संघर्ष का उज्जवल उदाहरण है।

पुनर्जागरण ने केवल यूरोप की ही नहीं बल्कि विश्व के राजनीतिक जीवन में नवीन परिभाषाएँ जुटाई। राज्य को नवीन परिभाषाएँ दी गई। व्यक्ति तथा राज्य के सम्बन्ध को नये सिरे से प्रस्तुत किया गया। आधुनिक राज्य की नींव डाली गई। सच तो यह है कि जितने नये आधार खोजे गये वे उन मूल्यों से ओत-प्रोत थे जिनका पोषण पुनर्जागरण ने किया।

प्रश्न 14.
मार्टिन लूथर के जीवन तथा सफलताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जर्मनी में प्रोटेस्टेंट लहर (धर्म-सुधार आंदोलन) का प्रवर्तक मार्टिन लूथर था। उसका जन्म 1483.ई० में जर्मनी के एक किसान परिवार में हुआ था। अत: उसमें किसानों जैसी सादगी भी थी और शक्ति भी। उसके पिता चाहते थे कि वह बड़ा होकर वकील बने और घर की प्रतिष्ठा को बढ़ाये। इसी उद्देश्य से विद्यालय भेजा गया। परंतु उसने कानून के साथ-साथ धर्मशास्त्र का अध्ययन भी आरंभ कर दिया। कानून और धर्म-शास्त्र में डिग्री प्राप्त करने के बाद वह ब्रिटेनवर्ग विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुआ। वहाँ उसे धर्मशास्त्र के गहन अध्ययन का अवसर मिला। 1505 ई० में वह अगस्टीनियम भिक्षुओं में शामिल हो गया।

धर्म के संबंध में उसके मन में अनेक प्रश्न एवं शंकाए थीं और वह इनके समाधान की जिज्ञासा रखता था। फिर भी उसकी आस्था अडिग थी। उसका इस बात में पूरा विश्वास था कि केवल आस्था और विश्वास से ही मुक्ति मिल सकती है। 1511 ई० में लूथर ने अपनी शंकाओं के समाधान के लिए रोम की यात्रा की । अभी तक इस पवित्र नगर के प्रति उसकी पूरी श्रद्धा थी। इसलिए रोम पहुँचते ही वह भावुक हो उठा और उसने ये शब्द कहे : “पवित्र रोम तुम्हें शहीदों के खून ने पवित्र बनाया है। मेरा शत-शत प्रणाम स्वीकार करो।” शीघ्र ही रोम में फैले भ्रष्टाचार को देखकर उसका मोहभंग हो गया।

इसी बीच एक ऐतिहासिक घटना घटी जिसने लूथर को पोप एवं कैथोलिक चर्च का विरोधी बना दिया। पोप को सेंट पीटर गिरजाघर के लिए धन की आवश्यकता थी। यह धन उसने क्षमा-पत्रों की बिक्री द्वारा एकत्रित करने का निर्णय किया। 1517 ई० में उसका एक प्रतिनिधि क्षमापत्रों की बिक्री करता हुआ ब्रिटेनवर्ग पहुँचा। वह लोगों से यह शब्द कह रहा था, “जैसे ही क्षमा-पत्रों के लिए दिए गए सिक्कों की खनक गूंजती है, उस आदमी की आत्मा, जिसके लिए धन दिया गया है सीधी स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है।

यह भोली-भाली जनता के साथ एक बहुत बड़ा मजाक था। लोगों को धर्म के नाम पर मूर्ख बनाया जा रहा था और उनका शोषण किया जा रहा था। लथर ने जनता के साथ हो रहे इस मजाक और शोषण का विरोध किया। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्षमा-पत्रों की बिक्री धर्म के मूल्य सिद्धांत की अवहेलना है। इतना ही नहीं, उसने 95 सिद्धांतों (थीसिस) की एक सूची तैयार की जिन पर वह पोप का विरोधी था। यह सूची उसने एक गिरजाघर के द्वार पर चिपका दी। लोगों में तहलका मच गया। लूथर के इस कार्य ने तो उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। “जो प्रायश्चित कर लेता है उसे तो ईश्वर पहले ही क्षमा कर देता है।

उसे क्षमा-पत्र की क्या आवश्यकता है।” यह तर्क इतना ठोस था कि बहुत बड़ी संख्या में लोग लूथर के समर्थ बन गए । लूथर ने पहले अपने सिद्धांत लैटिन भाषा में लिखे थे। परंतु शीघ्र ही उनका अनुवाद जर्मन भाषा में किया गया । परिणामस्वरूप इन सिद्धांतों पर समस्त जर्मनी में तर्क-वितर्क होने लगा।

लूथर मन से तो पोप तथा कैथोलिक चर्च का विरोधी बन चुका था, परंतु उसने अभी तक चर्च के अधिकार को खुली चुनौती नहीं दी थी। पोप ने भी उसके विरोध को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने इसे ‘भिक्षुओं के बीच तू-तू मैं-मैं’ (Squable among monks) कह कर टाल दिया । परंतु 1519 ई० में स्थिति स्पष्ट हो गई। लथर ने जॉन नामक एक धर्मशास्त्र से साफ-साफ कह दिया कि वह इस बात को नहीं मानता कि पोप या चर्च कोई गलती नहीं कर सकता। यह बात चर्च की निरंकुश सत्ता पर सीधा प्रहार थी। इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते थे।

इसी बीच लूथर ने तीन लघु पुस्तिकाएँ (पैंफलेट) प्रकाशित की। इन पुस्तिकाओं में उसने उन मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जो आगे चलकर प्रोटेस्टेंटवाद के नाम से विख्यात हुए। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चर्च में पवित्रता नाम की कोई चीज नहीं है ‘ईश्वर के चर्च की कैद’ (On the Babilonian Captivity of the Church of God) नामक पुस्तिका में उसने पोप एवं उसकी व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया। अपनी दूसरी पुस्तिका ‘जर्मन सामंत वर्ग को संबोधन’ (An Address to the Nobility to German Nation) में उसने चर्च की अपार संपत्ति का वर्णन करते हुए जर्मन शासकों को विदेशी प्रभाव से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया। तीसरी पुस्तिका ‘मनुष्य की मुक्ति’ (On the Freedom of Clinstian Man) में उसने अपनी मुक्ति के सिद्धांतों का उल्लेख किया। इनके अनुसार मुक्ति के लिए मनुष्य का ईश्वर में अटूट विश्वास होना चाहिए।

लूथर की गतिविधियों से क्षुब्ध होकर पोप ने उसे धर्म से निष्कासित करने का आदेश दे दिया। परंतु लूथर ने पोप के आदेश को एक सार्वजनिक सभा में जला कर विद्रोह का झंडा फहरा दिया। 1521 ई० में उसे जर्मन राज्यों की सभा में सम्राट् के सामने प्रस्तुत होने के लिए कहा गया। उसके मित्रों ने उसे समझाया कि वह न जाये, क्योंकि उसे प्राणदंड भी दिया जा सकता है। परंतु उसने बड़े साहसपूर्ण ढंग से उत्तर दिया-“मैं अवश्य जाऊँगा, भले ही वहाँ मेरे इतने शत्रु क्यों न हों जितनी कि सामने के घर में खपरैलें।” आखिर वह गया। उसे कहा गया कि वह अपनी बातें वापस लें। परंतु उसने उत्तर दिया कि वह ऐसा तभी कर सकता है जब उसकी बातें तर्क द्वारा गलत सिद्ध कर दी जाएँ।

अंत में उसने ये शब्द कहे-“मुझे यही कहना था। मैं इसके विपरीत नहीं जा सकता। ईश्वर मेरी रक्षा करें।” (Here I stand; I can’t do otherwise : God help me.”) लूथर के इन शब्दों से समस्त जर्मनी में कौतूहल फैल गया। उसके मित्र घबरा गये। उन्होंने उसे एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जहाँ वह कई वर्षों तक अध्ययन करता रहा। इसी बीच उसने बाइबिल का अनुवाद जर्मन भाषा में किया। उसका यह अनुवाद इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि इसे आज भी जर्मन भाषा एवं साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।

मार्टिन लूथर के विचार एवं उनका प्रसार (The Ideas of Martin Luther and their spread) –

मार्टिन लूथर के मुख्य विचार निम्नलिखित थे –

  • उसने ईसा तथा बाइबिल की सत्ता को स्वीकार किया, परंतु चर्च की सार्वभौमिकता एवं निरंकुशता को नकार दिया।
  • उसने इस बात का प्रचार किया कि चर्च द्वारा निर्धारित कर्मों से मुक्ति नहीं मिल सकती।
  • इसके लिए ईश्वर में अटूट आस्था रखना आवश्यक है।
  • उसने पूर्व प्रचलित सात संस्कारों में से केवल तीन को ही मान्यता दी। ये थेनामकरण, प्रायश्चित तथा प्रसाद।
  • किसी भी व्यक्ति को न्याय से ऊपर न समझा जाए।
    चर्च के चमत्कार व्यर्थ हैं।
  • चर्च में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए पादरियों को विवाह करके सभ्य नागरिकों की तरह रहने की अनुमति दी जाए।
  • उसने घोषणा की कि उसका धर्म-ग्रंथ सबके लिए है और सभी उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

आगामी कुछ वर्षों में नवीन जागृति आई और वे अधिक-से-अधिक संख्या में लूथर द्वारा चलाए गए चर्च विरोधी आंदोलन में भाग लेने लगे। उन्होंने न तो पोप की कोई परवाह की और न ही सम्राट् की। उन्होंने चर्च की संपत्ति छीन ली तथा कैथोलिक पूजा-उपासना का परित्याग कर दिया। कैथोलिक मठ नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए। पोप की राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक सत्ता को अमान्य घोषित कर दिया गया। 1524 ई० तक समस्त जर्मनी में लूथरवादी शिक्षाएँ अनिवार्य लगने लगा।

सोलहवीं शताब्दी में चर्च का विरोध करने वालों ने प्रोटेस्टेंट चर्चा की परंपरा आरंभ की। अतः चर्च का एकाधिकार समाप्त होने लगा। मानव किसी भी सिद्धांत को अपनाने से पूर्व उसे विवेक और कसौटी पर परखने लगा। प्रचलित हो गईं। परंतु इसी समय कुछ ऐसी घटनाएं हुई जिनके परिणामस्वरूप लूथरवादी आंदोलन काफी सीमित हो गया। केवल उत्तरी जर्मन राज्यों में ही उसका प्रभाव बना रहा।

प्रोटेस्टेंट चर्च का जन्म (Establishment of Protestant Church) – 1526 ई० में स्पीयर में पवित्र रोमन साम्राज्य की स्थापना की सभा हुई जिसका उद्देश्य धर्म सुधार आंदोलन की समस्या को हल करना था। परंतु इस समय तक क्योंकि जर्मनी के शासकगण लूथरवाद व कैथोलिक दलों में विभक्त हो चुके थे, अतः यह सभा धर्म-सुधार आंदोलन का कोई स्थायी समाधान न कर सकी। इस सभा ने धार्मिक समस्या के समाधान या धर्म संबंधी निश्चय का उत्तरदायित्व स्थानीय शासकों पर छोड़ दिया। यह निश्चित किया गया कि प्रत्येक राजा धर्म के विषय में ऐसा मार्ग अपनायेगा कि वह अपने आचरण के लिए ईश्वर और सम्राट के पति उत्तरदायी होगा।

1529 ई० में स्पीयर में ही एक अन्य सभा हुई। परंतु इस सभा ने भी सुधार आंदोलन को मान्यता प्रदान न की तथा नये सुधार आंदोलन के विरुद्ध कई कठोर निर्देश पारित कर दिये। सभा के एक पक्षीय निर्णय का लूथरवादी शासकों तथा समर्थकों ने तीव्र विरोध किया । इसी विरोध या प्रतिवाद (प्रोटेस्ट) के कारण इस सुधार आंदोलन का नाम ‘प्रोटेस्टेंट’ पड़ा । औपचारिक रूप से विरोध 19 अप्रैल, 1529 ई० को हुआ। अत: ऐतिहासिक दृष्टि से ‘प्रोटेस्टेंट’ शब्द का उदय इसी तिथि से माना जाता है। 1530 ई० में प्रोटेस्टेट धर्म का सैद्धांतिक रूप निरूपित किया गया जिसमें मार्टिन लूथर के सिद्धांतों को मान्यता मिली। इस प्रकार जर्मनी में चर्च दो भागों में बँट गया-प्रॉटेस्टेट तथा कैथोलिक चर्च।

आंग्सबर्ग की संधि (Augs Burg Treaty) – जर्मन सम्राट् चार्ल्स पंचम लूथरवाद को दबाना चाहता था। परंतु अन्य समस्याओं में उलझा होने के कारण वह ऐसा न कर सका । इसके लिए उसे 1530 ई. के बाद ही समय मिल सका। उसने आग्सबर्ग में एक सभा बुलाव और वहाँ प्रोटेस्टेंट लोगों को आदेश दिया कि वे अपने सिद्धांत सभा के सामने प्रस्तुत करें। अत: प्रोटेस्टेंटों ने एक दस्तावेज के रूप में अपने सिद्धांत सभा में रखे। इस दस्तावेज को ‘आग्सबर्ग की स्वीकृति’ कहते है परंतु चार्ल्स पंचम ने ‘आग्सबर्ग की स्वीकृति’ को अमान्य घोषित कर दिया।

फिर भी लूथरवादियों के प्रभाव तथा तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उसने 1532 ई० में विराम संधि की जो 1546 ई० तक चली। तत्पश्चात् वह पुन: प्रोटेस्टेंटो का समूल नाश करने पर उतर आया। परिणामस्वरूप जर्मनी में 1546 ई० से 1555 ई० तक गृह युद्ध चलता रहा। जर्मनी के लिए इस गृह युद्ध के भयंकर परिणाम निकले। अत: विवश होकर सम्राट् फडीनेंड ने जर्मनी के प्रोस्टेंटों के साथ 15555 में आग्सबर्ग की संधि कर ली।

इस धि के अनुसार –

  • प्रत्येक शासक को (जनता को नहीं) अपना और प्रजा का धर्म चुनने की स्वतंत्रता दे दी गई।
  • 1552 ई० से पहले प्रोटेस्टेंट लोगों ने चर्च की जो संपत्ति अपने अधिकार में ले ली थी; वह उनकी मान ली गई।
    लूथर के अतिरिक्त अन्य किसी को मान्यता नहीं दी गई।
  • यह कहा गया कि कैथोलिक क्षेत्रों में बसने वाले लूथरवादियों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
  • धार्मिक आरक्षण के सिद्धांत के अनुसार यदि कोई कैथोलिक धर्म परिवर्तन करता है तो उसे अपने पद से संबंधित सभी अधिकारों का परित्याग करना होगा।

आग्सबर्ग संधि में धार्मिक संघर्ष की समस्या कुछ सीमा तक सुलझ तो गई, परंतु बहुत त्रुटिपूर्ण ढंग से । संधि में व्यक्ति को नहीं शासक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गई थी जो बहुत दिनों तक मान्य नहीं हो सकती थी। इस संधि द्वारा केवल लूथरवाद को ही वैध मान्यता दी गई। अन्य प्रोटेस्टेंट संप्रादायों (जैसे विग्लीवाद, काल्विनवाद) को कोई मान्यता नहीं मिली। यह संधि धार्मिक कलह का स्थायी निवारण न कर सकी और इस समस्या का समाधान लगभग एक सौ वर्षों के पश्चात् वैस्टफेलिया की संधि द्वारा ही किया जा सका।

प्रश्न 15.
काल्विनवाद की संक्षिप्त जानकारी दीजिए?
उत्तर:
यह सत्य है कि धर्म सुधार आंदोलन का प्रवर्तक लूथर को माना जाता है। परंतु धर्म-सुधार के क्षेत्र में काल्विन को लूथर से भी अधिक सफलता मिली । वह पहला सुधारक था जिसने एक ऐसे पवित्र संप्रदाय की स्थापना करने का प्रयास किया जिसका प्रभाव किसी एक देश में ही सीमित न रह कर पूरे विश्व में हो।

काल्विन का जन्म 1509 में फ्रांस में हुआ था। उसके माता-पिता उसे पादरी बनाना चाहते थे। उसने चर्च की छात्रवृत्ति पर पेरिस में धर्म एवं साहित्य का गहन अध्ययन किया। परंतु बाद में स्थिति को देखते हुए उसके पिता ने उसे वकील बनने का परामर्श दिया। परिणामस्वरूप वह कानून के अध्ययन में जूट गया। एक दिन उसमे एक नई प्रवृत्ति जागृत हुई। उसे अनुभव हुआ कि वह कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए नहीं, अपितु उससे हटकर एक नवीन एवं पवित्र संप्रदाय की स्थापना के लिए पृथ्वी पर आया है।

उसके लिए उसे कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए उसे कैथोलिक चर्च का सफल विरोध करना था। उसका दृढ़ विश्वास था कि वह अपने अकाट्य तों से ही अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। उसने कैथोलिक चर्च से अपना संबंध तोड़ लिया और में अपने विचारों का प्रचार करने लगा। फलस्वरूप उसके प्रशंसकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हुए फ्रांस के शासक फ्रांसिस ने उस पर प्रतिबंध लगाना चाहा। अतः वह फ्राँस छोड़ कर स्विटजरलैंड चला गया।

स्विट्जरलैंड में काल्विन ज्विग्ली के संपर्क में आया । वहाँ उसने ईसाई धर्म के आधारभूत सिद्धांत (Institute of Christian Religion) नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने प्रोटेस्टेंट चर्च के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। यह पुस्तक सम्राट् फ्राँसिस को समर्पित थी। काल्चिन चाहता था कि वह फ्राँस वापस जाकर सम्राट् को अपनी पुस्तक भेंट करे और उसे अपने तर्कों से प्रभावित करे। यदि वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाता, तो पूरा फ्रांस उसका अनुयायी बन जाता। परंतु ऐसा न हो सका। संभवतः फ्राँसिस ने उसको पुस्तक को पढ़ा ही नहीं।

फिर भी एक बात निर्विवाद कही जा सकती है कि यह पुस्तक उस समय तक लिखी गई सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक थी। उसमें काल्विन, विगली तथा लूथर के विचार अवश्य लिये गए थे। परंतु उनकी व्याख्या उसमें सर्वथा अपने ढंग से की थी। पुस्तक में कैथोलिक तथा सुधारवादी चचों की तुलना बड़ी ही प्रभावशाली ढंग से की गई थी। इस पुस्तक ने लोगों पर जादू सा प्रभाव किया और २७ ही नर्च के विरोधी संगठित होने लगे।

1536 ई० में काल्विन जेनेवा गया। वहाँ राजनीतिक तथा धार्मिक आंदोलन पहले से ही चल रहा था। उसने अपनी अद्भुत संगठन शक्ति के बल पर जेनेवावासियों को संगठित किया और उन्हें राजनीतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता दिलाई। शीघ्र ही जेनवा एक धर्म-प्रधान नगर राज्य बन गया जिसका सर्वोच्च नेता काल्विन बना। उसने नगर में एक विशुद्ध नैतिकवादी व्यवस्था का सूत्रपात किया। यदि कोई व्यक्ति अनैतिकता का प्रदर्शन करता, तो उसे कठोर दंड दिया जाता था।

काल्विन स्वयं भी सादा जीवन व्यतीत करता था और नैतिक नियमों का कठोरता से पालन करता था। शीघ्र ही उसकी ख्याति समस्त यूरोप में फैलने लगी और दूर-दूर से आकर लोग उसके विष्य बनने लगे। उसने बाईबिल का अनुवाद फ्रांसीसी भाषा में करवाया, कई स्कूल खुलवायें तथा जेनेवा विश्वविद्यालय को शिक्षा का महान् केंद्र बनाया। परिणामस्वरूप लोगों में उसकी धाक् उसी प्रकार बैठ गई जैसी कि पोप की थी। अतः अब उसे ‘प्रोटेस्टेट पोप’ कहा जाने लगा।

काल्विन को इतनी अधिक सफलता उसके तर्कपूर्ण सिद्धांतों के कारण मिली जो इस प्रकार थे –

मनुष्य की मुक्ति न तो कर्म से हो सकती है और न ही आस्था से। मुक्ति केवल ईश्वर की असीम कृपा से ही मिल सकती है।
मुक्ति का एकमात्र साधन बाइबिल है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति और ईश्वर के अतिरिक्त कोई माध्यम नहीं।
मनुष्य को जीवन में पवित्र आचरण का पालन करना चाहिए।

काल्विन द्वारा प्रतिपादित विचारधारा ‘काल्विनवाद’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसे मध्यम वर्ग में विशेष लोकप्रियता मिली। धीरे-धीरे फ्रांस में भी इस विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा। वहाँ काल्विन के अनुयायी ‘यूनानो’ कहलाये। जर्मनी में जहाँ केवल लूथरवाद को ही मान्यता मिली थी, अब ‘काल्विनवाद’ को भी मान्यता दे दी गई। इस प्रकार यह विचारधारा धीरे-धीरे यूरोप के सभी देशों में फैल गई।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कोलम्बस अमेरिका पहुँचा ………………….
(क) 1492
(ख) 1497
(ग) 1495
(घ) 1473
उत्तर:
(क) 1492

प्रश्न 2.
1861-65 ई० तक दास प्रथा को लेकर गृहयुद्ध किस देश में हुआ?
(क) कनाडा
(ख) आस्ट्रेलिया
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका
(घ) इंगलैंड
उत्तर:
(ग) संयुक्त राज्य अमेरिका

प्रश्न 3.
ऑन दि ओरिजिन ऑफ स्पीशीज पुस्तक किसने लिखी?
(क) चार्ल्स डार्विन
(ख) ग्रेगरी मेंडल
(ग) हरगोविन्द खुराना
(घ) न्यूटन
उत्तर:
(क) चार्ल्स डार्विन

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सी सामंतों की एक श्रेणी नहीं थी?
(क) बैरन
(ख) नाइट
(ग) डयूक
(घ) सर्प
उत्तर:
(क) बैरन

प्रश्न 5.
चर्च को प्रतिवर्ष कृषकों से उसकी उपज का कान-सा भाग लेने का अधिकार था?
(क) उपज का एक तिहाई भाग
(ख) उपज का दसवाँ भाग
(ग) उपज का एक चौथाई भाग
(घ) उपज का छठा भाग
उत्तर:
(ख) उपज का दसवाँ भाग

प्रश्न 6.
अभिजात्य सत्ताधारी वर्ग में प्रवेश के लिये प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन कहाँ होता था?
(क) जापान
(ख) वर्मा
(ग) भारत
(घ) चीन
उत्तर:
(घ) चीन

प्रश्न 7.
सोने और चाँदी के देश के विषय में किसने सुना था?
(क) कैनालल
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) पिजारो
(घ) कोलम्बस
उत्तर:
(ग) पिजारो

प्रश्न 8.
हेलनीज किस देश के निवासियों को कहा जाता था?
(क) रोम
(ख) यूनान
(ग) मिस्र
(घ) चीन
उत्तर:
(ख) यूनान

प्रश्न 9.
ओलंपिक खेल किस प्राचीन सभ्यता की देन है?
(क) रोम
(ख) मिश्र
(ग) यूनान
(घ) चीन
उत्तर:
(ग) यूनान

प्रश्न 10.
यूरोप में सर्वप्रथम विश्वविद्यालय कहाँ स्थापित हुए?
(क) इटली
(ख) जापान
(ग) रूस
(घ) मिस्र
उत्तर:
(क) इटली

प्रश्न 11.
एक चर्चित कलाकार ………………..
(क) कोपरनिकस
(ख) लियानार्डो द विंची
(ग) लूथर
(घ) मार्टिन
उत्तर:
(ख) लियानार्डो द विंची

प्रश्न 12.
लास्ट सपर चित्र का निर्माण वर्ष …………………
(क) 1495
(ख) 1946
(ग) 1947
(ग) 1467
उत्तर:
(क) 1495

प्रश्न 13.
ग्रेगोरिन कलैंडर का आरंभ …………………..
(क) 1582
(ख) 1587
(ग) 1560
(घ) 1547
उत्तर:
(क) 1582

प्रश्न 14.
नाईन्टी फाईव थिसेस की रचना …………………
(क) 1517
(ख) 1518
(ग) 1516
(घ) 1520
उत्तर:
(क) 1517

Bihar Board Class 9 Economics Solutions Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions Economics अर्थशास्त्र : हमारी अर्थव्यवस्था भाग 1 Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science Economics Solutions Chapter 1 बिहार के एक गाँव की कहानी

Bihar Board Class 9 Economics बिहार के एक गाँव की कहानी Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न :

निर्देश : नीचे दिये गये प्रश्न में चार संकेत चिह्न हैं जिनमें एक सही या सबसे उपयुक्त हैं । प्रश्नों का उत्तर देने के लिए प्रश्न संख्या के सामने वह संकेत चिह्न (क, ख, ग, घ) लिखें जो सही अथवा सबसे उपयुक्त हों।

Bihar Board Class 9 Economics Solution प्रश्न 1.
उत्पादन के प्रमुख साधन कितने हैं ?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) दो
उत्तर-
(ग) पाँच

Bihar Board Class 9th Economics Solution प्रश्न 2.
उत्पादन का अर्थ
(क) नयी वस्तु का सृजन
(ख) उपयोगिता का सृजन
(ग) उपयोगिता का नाश
(घ) लाभदायक होना
उत्तर-
(ख) उपयोगिता का सृजन

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 3.
उत्पादन का निष्क्रिय साधन है ?
(क) श्रम
(ख) संगठन
(ग) साहसी
(घ) भूमि
उत्तर-
(घ) भूमि

Bihar Board Solution Class 9 Economics प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से भूमि की विशेषता कौन-सी है ? .
(क) वह नाशवान है
(ख) वह मनुष्य निर्मित है
(ग) उसमें गतिशीलता का अभाव है।
(घ)उसमें समान उर्वरता है
उत्तर-
(क) वह नाशवान है

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र में भूमि का तात्पर्य क्या है ?
(क) प्रकृति प्रदत्त सभी नि:शुल्क वस्तुएँ
(ख) जमीन की ऊपरी सतह
(ग) जमीन की निचली सतह
(घ) केवल खनिज सम्पत्ति
उत्तर-
(क) प्रकृति प्रदत्त सभी नि:शुल्क वस्तुएँ

Bihar Board 9th Class Social Science Book Pdf प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन उत्पादक है ?
(क) बढ़ई
(ख) भिखारी
(ग) ठग
(घ) शराबी
उत्तर-
(क) बढ़ई

Bihar Board Class 9 Economics Notes प्रश्न 7.
उत्पादन का साधन है
(क) वितरण
(ख) श्रम
(ग) विनिमय
(घ) उपभोग
उत्तर-
(ख) श्रम

अर्थशास्त्र कक्षा 9 Chapter 1 Solution प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन उत्पादन का साधन नहीं है ?
(क) संगठन
(ख) उद्यम
(ग) पूँजी
(घ) उपभोग
उत्तर-
(घ) उपभोग

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन पूँजी है ?
(क) फटा हुआ वस्त्र ।
(ख) बिना व्यवहार में लायी जाने वाली मशीन ।
(ग) किसान का हल ।
(घ) घर के बाहर पड़ा पत्थर ।
उत्तर-
(ग) किसान का हल ।

Bihar Board Class 9 Civics Solution प्रश्न 10.
जो व्यक्ति व्यवसाय में जोखिम का वहन करता है, उसे कहते हैं ?
(क) व्यवस्थापक
(ख) पूँजीपति
(ग) साहसी
(घ) संचालक मंडल
उत्तर-
(ग) साहसी

Bihar Board Class 9 Social Science Solution In Hindi प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन श्रम के अन्तर्गत आता है ?
(क) सिनेमा देखना
(ख) छात्र द्वारा मनोरंजन के लिए क्रिकेट खेलना
(ग) शिक्षक द्वारा अध्यापन
(घ) संगीत का अभ्यास आनन्द के लिए करना
उत्तर-
(ग) शिक्षक द्वारा अध्यापन

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. श्रम को उत्पादन का ………………….. साधन कहा जाता है।
2. शिक्षक के कार्य को ………………….. श्रम कहा जाता है ।
3. ……. अर्थव्यवस्था के भौतिक अथवा पूँजीगत साधन है ।
4. सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य की …………. बहुत बढ़ गई है।
5. वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन विभिन्न साधनों के ………………… से होता है।
6. उत्पादन की नयी तकनीक की वजह से उत्पादन क्षमता में अपेक्षाकृत……….होती है।
उत्तर-
1. सक्रिय
2. मानसिक
3. मशीन एवं यंत्र
4. आवश्यकताएँ
5. सहयोग
6. वृद्धि।

लघु उत्तरीय प्रश्न

Bihar Board Class 9th Social Science Solution प्रश्न 1.
उत्पादन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन करना है।

Bihar Board Class 9 History Chapter 1 प्रश्न 2.
उत्पादन तथा उपभोग में अन्तर कीजिए।
उत्तर-
उत्पादन में उपयोगिता का सृजन होता है लेकिन उपभोग में उत्पादित वस्तुओं का प्रत्यक्ष रूप से मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए उपयोग होता है।

अर्थशास्त्र कक्षा 9 Chapter 1 Question Answer प्रश्न 3.
उत्पादन के विभिन्न साधन कौन-कौन-से हैं ?
उत्तर-
उत्पादन के विभिन्न साधन हैं-भूमि, पूँजी, श्रम, संगठन और उद्यम या साहस ।

Bihar Board 9th Class Social Science Book प्रश्न 4.
फतेहपुर गाँव के लोगों का मुख्य पेशा क्या है ?
उत्तर-
मुख्य पेशा कृषि है।

Economics Class 9 Chapter 1 Question Answer In Hindi प्रश्न 5.
भूमि तथा पूँजी में अन्तर करें।
उत्तर-
प्रकृति प्रदत्त यथा पहाड़, नदी, जंगल, सागर सभी भूमि हैं पर प्रकृति प्रदत वस्तुओं को छोड़कर जिससे आय प्राप्त होती है वह पूँजी है।

प्रश्न 6.
क्या सिंचित क्षेत्र को बढ़ाना महत्वपूर्ण है क्यों ?
उत्तर-
सिंचित क्षेत्र को बढ़ाना महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की कृषि मानसून पर आश्रित है जो एक जुआ का खेल है।

प्रश्न 7.
उत्पादन में पूँजी का क्या महत्व है ?
उत्तर-
बिना पूँजी के किसी भी वस्तु या सेवाओं का उत्पादन कर पाना संभव नहीं है । जैसे-बीज के बिना फ़सल का उत्पादन संभव नहीं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्पादन की परिभाषा दीजिए । उत्पादन के कौन-कौन से साधन हैं ? व्याख्या करें।
उत्तर-
अर्थशास्त्र में उत्पादन का अर्थ उपयोगिता का सृजन करना है। जैसे-जब एक बढ़ई लकड़ी को काट-छाँट कर उससे टेबुल चा कुर्सी बनाता है, तब लकड़ी की उपयोगिता बढ़ जाती है, यही उत्पादन है। .
उत्पादन के साधन-

  • भूमि-प्रकृति प्रदत्त सारे मुफ्त उपहार जैसे-नदी, सागर, हवा, धूप खनिज़ आदि सभी भूमि हैं।
  • श्रम-श्रम का मतलब मनुष्य के आर्थिक कार्य से है चाहे वह हाथ से किया जाय या मस्तिष्क से । यह एक सक्रिय साधन है।
  • पूँजी-प्रकृति की निःशुल्क देन को छोड़कर वह सब सम्पत्ति जिससे आय प्राप्त होती है, पूँजी कहलाती है। जैसे-किसान के लिए बीज, कारखानों में कच्चा माल, मशीन आदि।
  • संगठन-उत्पादन का सक्रिय साधन है । विभिन्न साधनों को एकत्रित कर उन्हें उत्पादन में लगाने की क्रिया व्यवस्था या संगठन है।
  • साहस-उत्पादन में जोखिम उठाने के कार्य को साहस कहते हैं और जो व्यक्ति इसे करता है उसे साहंसी कहते हैं जैसे-कारखाने का मालिक ।

प्रश्न 2.
उत्पादन के साधनों में संगठन एवं-साहस की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर-
उत्पादन के साधनों में संगठन एवं साहसी की अहम भूमिका है। क्योंकि भूमि, श्रम तथा पूँजी के होते हुए भी समुचित संगठन और साहसी के बिना उत्पादन संभव नहीं है। पहले संगठन पर विचार करें-भूमि, श्रम तथा पूँजी को एकत्रित कर संगठनकर्ता उसे व्यवस्थित ढंग से उपयोग करता है और उत्पादन का कार्य होता है । इसीलिए संगठन को उत्पादन प्रक्रिया का एक सक्रिय साधन माना गया है।

उत्पादन का कार्य जोखिम भरा हुआ होता है । उत्पादन में लाभ होगा या हानि एक साहसी ऐसा नहीं सोचता है यदि उत्पादन में लगातार घाटा ही होता रहे तो साहसी उत्पादन करने का साहस नहीं छोड़ेगा। साहसी सोच समझकर उत्पादन में पूँजी लगाता है।

प्रश्न 3.
फतेहपुर गाँव में कृषि कार्यों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
फतेहपुर गाँव में खेती ही मुख्य क्रिया है। अन्य कार्यों में पशुपालन, मुर्गी पालन, डेयरी, दुकानदारी. आदि क्रियाएँ हैं । गाँव में अधि कांश लोग भू-स्वामी हैं। इनमें से कुछ बड़े परिवार के हैं जो कृषि कार्य मजदूर किसानों से बातें करवाते हैं । गाँवों में नलकूप भी हैं। नलकूपों से सिंचाई का कार्य होता है। चूँकि फतेहपुर गाँव पटना शहर से बिलकुल , नजदीक है इसलिए कृषि संत आधुनिक यंत्रों का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन करता है। पर्याप्त पत्रा या यों कहें कि अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्नों का उ दन करते हैं तभी तो वे बैल गाड़ियों और ट्रैक्टरों में अनाजों को भरकर विक्रय हेतु बाजार में ले जाते हैं । जो पाठ्यपुस्तक में अंकित चित्र से पता चलता है।

प्रश्न 4.
मंझोले एवं बड़े किसान कृषि से कैसे पूँजी प्राप्त करते हैं ? वे छोटे किसानों से कैसे भिन्न हैं ?
उत्तर-
मंझोले एवं बड़े किसानों के पास अधिक भूमि होती है अर्थात् उनकी जोतों का आकार काफी बड़ा होता है जिससे वे उत्पादन अधिक करते हैं। उत्पादन अधिक होने से वे इसे बाजार में बेच कर काफी पूँजी जमा करते हैं जिसका प्रयोग वे उत्पादन की आधुनिक विधियों में करते हैं । इनकी पूँजी छोटे किसानों से भिन्न होती हैं क्योंकि छोटे किसानों के पास भूमि कम होने के कारण उत्पादन उनके भरण-पोषण के लिए भी कम पड़ता हैं । उन्हें भूमि में अधिकार प्राप्त नहीं होने के कारण बचत नहीं होती इसलिए खेती के लिए उन्हें पूँजी बड़े किसानों या साहकारों से उधार लेना होता है जिस पर उन्हें व्याज भी चुकाना पड़ता है।

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 अधिनायक

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions

Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 अधिनायक

 

अधिनायक वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के बहुवैकल्पिक उत्तरों में से सही उत्तर बताएँ

Adhinayak Kavita Ka Saransh Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
रघुवीर सहाय किस काल के कवि हैं?
(क) आधुनिक काल
(ख) आदिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) छायावाद
उत्तर-
(क)

Adhinayak Kavita Ka Bhavarth Likhe Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
‘अधिनायक’ शीर्षक कविता के कवि कौन है?
(क) नागार्जुन
(ख) शमशेर
(ग) रघुवीर सहाय
(घ) त्रिलोचन
उत्तर-
(ग)

रघुवीर सहाय का जन्म कब हुआ था?
(क) 9 दिसम्बर, 1929 ई.
(ख) 10 दिसम्बर, 1930 ई.
(ग) 15 दिसम्बर, 1935 ई.
(घ) 20 सितम्बर, 1936 ई.
उत्तर-
(क)

Adhinayak Kavita Ka Bhavarth Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 4.
इनमें से रघुवीर सहाय की कौन–सी रचना है?
(क) पद
(ख) हार–जीत
(ग) अधिनायक
(घ) छप्पय
उत्तर-
(क)

अधिनायक कविता का अर्थ Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 5.
पाठ्यपुस्तक में रघुवीर सहाय की संकलित ‘अधिनायक’ कविता कैसी कविता है?
(क) व्यंग्य प्रधान
(ख) हास्य प्रधान
(ग) वीररस प्रधान
(घ) रोमांस प्रधान
उत्तर-
(क)

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

अधिनायक कविता का सारांश Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 1.
फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन………. गाता है।
उत्तर-
हरचरन

Adhinayak Kavita Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 2.
राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत………. विधाता है।
उत्तर-
भाग्य

अधिनायक कविता का भावार्थ Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 3.
मखमल, टमटम बल्लम तुरही………… छत्र चँवर के साथ ताव छुड़ाकर ढोल बजाकर जय–जय कौन करात है।
उत्तर-
पगड़ी

अधिनायक शीर्षक कविता का सारांश Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 4.
पूरब–पश्चिम से आते हैं नंगे–बूचे नरकंकाल सिंहासन पर बैठा, उनके………. लगाता है।
उत्तर-
तमगे कौन

अधिनायक कविता का विश्लेषण Bihar Board Class 12th Hindi प्रश्न 5.
कौन–कौन है वह जन–गन–मन–अधिनायक वह………….. डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज बजाता है।
उत्तर-
महाबली

प्रश्न 6.
राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत राष्ट्रात म भला कान वह भारत………….. विधाता है।
उत्तर-
भाग्य

अधिनायक अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रघुवीर सहाय की कविता है।
उत्तर-
अधिनायक।।

प्रश्न 2.
अधिनायक कैसी कविता है?
उत्तर-
समकालीन राजनीति पर व्यंग्य कविता।

प्रश्न 3.
अधिनायक कौन है?
उत्तर-
सत्ताधारी वर्ग।

प्रश्न 4.
हरचरना कौन है?
उत्तर-
एक आम आदमी।

अधिनायक पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
हरचरना कौन है? उसकी क्या पहचान है?
उत्तर-
हरचरना ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता में एक आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। वह एक स्कूल जानेवाला बदहाल गरीब लड़का है। राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में राष्ट्रगान दुहराता है।।

हरचरना की पहचान ‘फटा सुथन्ना’ पहने एक गरीब छात्र के रूप में है।’

प्रश्न 2.
हरचरना ‘हरिचरण’ का तद्भव रूप है। कवि ने कविता में ‘हरचरना’ को रखा है, हरिचरण को नहीं, क्यों?
उत्तर-
‘हरचरना’ हरिचरण का तद्भव रूप है। कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘अधिनायक’ में ‘हरचरना’ शब्द का प्रयोग किया है, ‘हरिचरण नहीं। यहाँ कवि ने लोक संस्कृति की पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए ठेठ तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है। इससे कविता की लोकप्रियता बढ़ती है। कविता में लोच एवं उसे सरल बनाने हेतु ठेठ तद्भव शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 3.
अधिनायक कौन है? उसकी क्या पहचान है?।
उत्तर-
कवि के अनुसार ‘अधिनायक’ आज बदले हुए तानाशाह हैं। वे राजसी ठाट–बाट में रहते हैं। उनका रोब–दाब एवं तामझाम भड़कीला है। वे ही अपना गुणगान आम जनता से करवाते हैं। आज उनकी पहचान जनप्रतिनिधि की जगह अधिनायक अर्थात् तानाशाह बन गये हैं। यह उनकी पहचान बन गई है।

प्रश्न 4.
‘जय–जय कराना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कवि के अनुसार सत्ता पक्ष के जन प्रतिनिधियों आज अधिनायक का रूप ले लिए हैं। वे ही आज राष्ट्रीय गान के समय आम आदमी को जुटाकर अपनी जय–जयकार मनवाते हैं। माली पहनते हैं और जन–जन के प्रतिनिधि होने अपने को जनता का भाग्य विधाता मानते हैं।

प्रश्न 5.
‘डरा हुआ मन बेमन जिसका/बाजा रोज बजाता है, यहाँ ‘बेमन’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कविता की इस पंक्ति में ‘बेमन’ का अर्थ बिना रूचि से है। आज राष्ट्रीय गान गाने में आम जनता में कोई रूचि नहीं है। वे बिना मन के एक चली आती हुई परम्परा का निर्वहन करते हैं।

प्रश्न 6.
हरचरना अधिनायक के गुण क्यों गाता है? उसके डर के क्या कारण हैं?
उत्तर-
‘अधिनायक’ शीर्षक कविता में ‘हरचरना’ एक गरीब विद्यार्थी है। राष्ट्रीय गान वह गाता है, लेकिन उसे यह पता नहीं कि वह राष्ट्रीय गान क्यों गा रहा है। इस गान को वह एक सामान्य प्रक्रिया मानकर गाता है। एक गरीब व्यक्ति के लिए राष्ट्रीय गान का क्या महत्व। देशभक्ति, आजादी आदि का अर्थ वह नहीं समझ पाता। उसकी आजादी और देशभक्ति का दुश्मन तो वे व्यक्ति हैं जो गरीबों की कमाई पर आज शासक बने हुए हैं। वे तानाशाह बन गये हैं। आम जनता उनसे डरती है। कोई उनके खिलाफ मुँह नहीं खोलता। हरचरना के डरने का कारण यही सभी विषय है। मुँह खोलेगा तो उसे दंड भोगना होगा।

प्रश्न 7.
‘बाजा–बजाना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कविता ‘अधिनायक’ में कवि रघुवीर सहाय ने ‘बाजा–बजाना’ शब्द का प्रयोग गुण–गान करने के अर्थ में किया है। आम जनता जो गरीब एवं लाचार है, बाहुबली राजनेताओं के भय से उनके गुणगान में बेमन के लगी रहती है। यहाँ पर कवि ने आधुनिक राजनेताओं पर कठोर व्यंग्य किया है।

प्रश्न 8.
“कौन–कौन है वह जन–गण–मन अधिनायक वह महाबली” कवि यहाँ किसकी पहचान कराना चाहता है?
उत्तर-
कवि रघुवीर सहाय अपनी कविता ‘अधिनायक’ में प्रस्तुत पंक्ति की रचना कर उन सत्ताधारी वर्ग के जन प्रतिनिधियों की पहचान चाहता है जो राजसी ठाट–बाट में जी रहे हैं। गरीबों पर, आम आदमी पर उनका रोब–दाब है। वह ही अपने को जनता का अधिनायक मानते हैं। वे बाहुबली हैं। लोग उनसे डरे–सहमे रहते हैं। कवि उन्हीं की पहचान उक्त पंक्तियों में कराना चाहता है।

प्रश्न 9.
“कौन–कौन” में पुनरुक्ति है। कवि ने यह प्रयोग किसलिए किया है?
उत्तर-
कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘अधिनायक’ के अन्तिम पद में कौन–कौन का प्रयोग किया है। यह ‘कौन’ पुनरुक्ति है। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि आज देश में अधिनायकों एवं तानाशाहों की संख्या अनेक है। अनेक बाहुबली आज जनता के भाग्यविधाता बने हुए हैं। इसीलिए कविता के अन्तिम भाग में कौन–कौन’ पुनरुक्ति अलंकार का प्रयोग किया गया।

प्रश्न 10.
भारत के राष्ट्रगीत ‘जन–गण–मन अधियानक जय हे’ से इस कविता का क्या संबंध है? वर्णन करें।
उत्तर-
विद्वान कवि रघुवीर सहाय द्वारा रचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता एक व्यंग्यात्मक कविता है। इस कविता में कवि ने सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों को आधुनिक भारत के अधिनायक अर्थात् तानाशाह के रूप में चित्रित किया है। आज राष्ट्रीय गान के समय इन्हीं सत्ताधारियों का गुणगान किया जाता है। जब भी राष्ट्रीय त्योहारों पर “जन–गण–मन–अधिनायक जय हे” का राष्ट्रीय गान गाया जाता है तो आम आदमी जो गरीब और लाचार, जो फटेहाल जीवन बिता रहा है इस राष्ट्रगीत का अर्थ नहीं समझता। वह उसी राजनेता को अधिनायक मानकर इस राष्ट्रगीत को गाता है। वह समझता है कि वह उन्हीं राजनेताओं का गुणगान कर रहा है।

कवि का यह तर्क सही भी है। वास्तव में आज राष्ट्रगीत का महत्व राष्ट्रीयता से नहीं आंका जाता। कौन नेता कितना बड़ा बाहुबली है, कितना प्रभावशाली है उसी आधार पर उस राष्ट्रगीत के महत्व को आंका जाता है। कवि की यह सोच युक्तिसंगत और समसामयिक है। आज राष्ट्रगान की केवल खानापूर्ति होती है। देशभक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है।

प्रश्न 11.
कविता का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-
कविता का सारांश देखें।

प्रश्न 12.
व्याख्या करें
पूरब पश्चिम से आते हैं
नंगे–बूचे नर–कंकाल,
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे लौन लगाता है।
उत्तर-
व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्यपुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने सत्तावर्ग के द्वारा जनता के शोषण का जिक्र किया है। यह एक व्यंग्य कविता है।

अधिनायक भाषा की बात

प्रश्न 1.
अधिनायक में ‘अधि’ उपसर्ग में पांच अन्य शब्द बनाएँ।
उत्तर-
‘अधि’–अधिकरण, अधिकार, अधिपति, अधिराज, अधिभार।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पदों का विग्रह करें और समास बताएं–राष्ट्रगीत, बेमन, पूरब–पश्चिम, महाबली, नरकंकाल।
उत्तर-
Bihar Board Class 12th Hindi Book Solutions पद्य Chapter 10 अधिनायक 1

प्रश्न 3.
कवि ने ‘गुन’ और ‘पच्छिम’ जैसे प्रयोग क्यों किये हैं, जबकि इनका शुद्ध रूप क्रमशः ‘गुण’ और ‘पश्चिम’ हैं।
उत्तर-
‘गुन’ और ‘पच्छिम’ शब्द क्रमशः ‘गुण’ एवं ‘पश्चिम’ का तद्भव रूप है। लोक संस्कृति का. प्रयोग कर कवि अपनी कविता को लोकप्रिय एवं सुगम बनाने का प्रयास किया है। इसलिए कवि ने अपनी कविता में तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 4.
तमगे, रोज, बेमन के समानार्थी शब्द क्या होंगे?
उत्तर-

  • शब्द – समानार्थी शब्द
  • तमगे – तगमा, मेडल, पदक
  • रोज – प्रतिदिन, दैनन्दिन
  • बेमन – अनिच्छा, अमन से

प्रश्न 5.
‘कौन–कौन है वह जन–गण–मन’–अर्थ की दृष्टि से यह किस प्रकार का वाक्य है?
उत्तर-
प्रश्नबोधक वाक्य।

प्रश्न 6.
कवि की काव्य–भाषा पर अपनी टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
कवि रघुवीर सहाय की अपनी काव्य–शैली है। इनकी भाषा सरल, साफ–सुथरी एवं सधी हुई है। ये ‘नई कविता’ के समर्थ कवियों में से एक है जो रोजमर्रा के प्रसंगों को उठाकर उसे अपनी कविता में विशिष्ट शैली में प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त हैं। ज्यादातर बातचीत की सहज शैली में उन्होंने लिखा और खूब लिखा। उनकी कविता की व्यंग्यात्मक शैली उनके साहित्य की विशेषता है। वे आधुनिक काव्य भाषा के मुहावरे को पकड़ने में भी अधिक कुशल है।

अधिनायक कवि परिचय रघुवीर सहाय (1929–1990)

जीवन–परिचय–
नई कविता के प्रमुख कवि रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर, 1929 को लखनऊ, उत्तरप्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री हरदेव सहाय था, जो पेशे से शिक्षक थे। रघुवीर सहाय की सम्पूर्ण शिक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। संगीत सुनने और फिल्में देखने में उनकी विशेष अभिरुचि थी। उन्होंने ‘कौमुदी’ कविता केन्द्र की स्थापना की और उसका संचालन किया।

रघुवीर सहाय पेशे से पत्रकार थे। उन्होंने पत्रकारिता का आरंभ ‘नवजीवन’ लखनऊ से किया। इसके बाद ‘समाचार विभाग’ आकाशवाणी, नई दिल्ली और फिर नवभारत टाइम्स (नई दिल्ली) में विशेष संवाददाता के रूप में काम किया। उन्होंने 1979 से 1982 तक ‘दिनमान’ के प्रधान संपादक के रूप में भी काम किया। उनका निधन 30 दिसम्बर, 1990 को हुआ।

रचनाएँ–रघुवीर सहाय अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के माध्यम से कवि रूप में लोगों के सामने आए। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं

कविताएँ–सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो–हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं, कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ।

काव्यगत विशेषताएँ–रघुवीर सहाय नई कविता के कवि हैं। नई कविता के माध्यम से कविता की अग्रगति तथा विकास के लिए नई रचना भूमि, नई–नई भाषा, मुहावरा और रचनातंत्र की उद्भावना की शुरुआत हुई। श्री सहाय दूसरा सप्तक के सात कवियों में शामिल थे। उनकी कविताएँ संवेदना, सरोकार विषयवस्तु, अनुभव, भाषा, शिल्प आदि अनेक तलों पर अपने संकल्प और व्यवहार में नई थी। उनकी विशिष्ट मनोरचना और व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति कहानियों तथा पत्रकारिता में भी हुई। उनकी पत्रकारिता उनकी कविता को प्रासंगिक एवं प्रभावी बना देती है। उनकी कविताओं में व्याप्त तथ्यात्मकता मात्र तथ्य न रहकर ‘सत्य’ बन जाता है।

रघुवीर सहाय की कविताओं में परिवेश की सच्चाई की साहसपूर्ण प्रतिक्रिया मिलती है। यह प्रतिक्रिया तीखी, दाहक और निर्मम हो उठती है। वे अपनी कविता में व्यंग्य–कटाक्ष, घृणा और क्रोध का सार्थक प्रयोग करते हैं जिसका उद्देश्य परपीड़न का सुख नहीं, सच्ची रचनात्मकता या अर्थपूर्ण नई सामाजिकता होती है।

अधिनायक कविता का सारांश

‘अधिनायक’ शीर्षक कविता रघुवीर सहाय द्वारा लिखित एक व्यंग्य कविता है। इसमें आजादी के बाद के सत्ताधारी वर्ग के प्रति रोषपूर्ण कटाक्ष है। राष्ट्रीय गीत में निहित ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है। आजादी मिलने के इतने वर्षों के बाद भी आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं आया। कविता में ‘हरचरना’ इसी आम आदमी का प्रतिनिधि है।

हरचरना स्कूल जाने वाला एक बदहाल गरीब लड़का है। कवि प्रश्न करता है कि राष्ट्रगीत में वह कौन भारत भाग्य विधाता है जिसका गुणगान पुराने ढंग की ढीली–ढाली हाफ पैंट पहने हुए गरीब हरचरना गाता है। कवि का कहना है कि राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में वह ‘फटा–सुथन्ना’ पहने वही राष्ट्रगान दुहराता है जिसमें इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी न जाने किस ‘अधिनायक’ का गुणगान किया गया है।

कवि प्रश्न करता है कि वह कौन है जो मखमल टमटम वल्लभ तुरही के साथ माथे पर पगड़ी एवं चँवर के साथ तोपों की सलामी लेकर ढोल बजाकर अपना जय–जयकार करवाता है। अर्थात्, सत्ताधारी वर्ग बदले हुए जनतांत्रिक संविधान से चलती इस व्यवस्था में भी राजसी ठाठ–बोट वाले भड़कीले रोब–दाब के साथ इस जलसे में शिरकत कर अपना गुणगान अधिनायक के रूप में करवाये जा रहा है।

कवि प्रश्न करता है कि कौन वह सिंहासन (मंच) पर बैठा जिसे दूर–दूर से नंगे पैर एवं नरकंकाल की भाँति दुबले–पतले लोग आकर उसे (अधिनायक) तमगा एवं माला पहनते हैं। कौन है वह जन–गण–मन अधिनायक महावली से डरे हुए लोग से मन के रोज जिसका गुणगान बाजा बजाकर करते हैं।

इस प्रकार इस कविता में रघुवीर सहाय ने वर्तमान जनप्रतिनिधियों पर व्यंग्य किया है। कविता का निहितार्थ यह है मानो इस सत्ताधारी वर्ग की प्रच्छन्न लालसा ही सचमुच अधिनायक अर्थात् तानाशाह बनने की है।

कविता का भावार्थ 1.
राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत–भाग्य–विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित “अधिनायक” शीर्षक कविता से उद्धृत है। इन पंक्तियों में कवि ने उन जनप्रतिनिधियों पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष किया है जो इतने दिनों की आजादी के बाद भी आम आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं ला पाये हैं।

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि जानना चाहता है कि वह कौन भाग्य विधाता है जिसका गान हरचरना नाम का एक गरीब विद्यार्थी कर रहा है। वह गरीब विद्यार्थी है। अपनी लाचारी का प्रमाण लिए हुए वह राष्ट्रीय गीत गाता है। कवि का यह कटु व्यंग्य बड़ा ही उचित एवं सामयिक है। सचमुच, आज लाखों गरीब छात्र अपने विद्यालयों में बिना मन के राष्ट्रीय गीत का गान करते हैं। उन्हें नहीं पता कि वे किसका गान कर रहे हैं।

इस प्रकार प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने आज के सत्ताधारी नेताओं पर कटाक्ष किया है। ये सत्ताधारी नेता आज तानाशाह बने हुए हैं।

2. मखमल टमटम बल्लभ तुरही
पगड़ी छत्र–चवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय जय कौन कराता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारे पाठ्यपुस्तक दिगंत, भाग–2 के रघुवीर सहाय रचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता से ली गई है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने बदली हुई जनतांत्रिक व्यवस्था में भी सत्ताधारी वर्ग के राजसी ठाट–बाट एवं रोब–दाब का वर्णन किया है। कवि प्रश्न पूछता है कि वह कौन व्यक्ति है जो मखमल, टमटम, बल्लभ, तुरही, पगड़ी छतरी एवं चैवर लगाकर तोप के गोले दागकर, ढोल नगाड़ा बजाकर जय–जयकार करवाता है। इसका अर्थ है कि अभी जनप्रतिनिधि अधिनायकवादी की भूमिका निभा रहे हैं। वे जनता का सेवक नहीं, राजसी। ठाट–बाट में लिप्त तानाशाह है। यह आजाद देश के लिए एक चिन्ता का विषय है। कवि व्यंग्य करते हुए एक कटु सत्य का वर्णन करता है कि क्या वे सच्चे जनप्रतिनिधि हैं। अर्थात् नहीं हैं।

3. पूरब–पश्चिम से आते हैं
नंगे–बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्यपुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने सत्तावर्ग के द्वारा जनता के शोषण का जिक्र किया है। यह एक व्यंग्य कविता है।

कवि के अनुसार राष्ट्रीय त्योहारों के अवसर पर सभी दिशाओं से जो जनता आती है वह नंगे पांव है। वह इतनी गरीब है कि केवल नरकंकाल का रूप हो गयी है। उसकी गाढ़ी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा सिंहासन पर बैठा जनप्रतिनिधि हड़प लेता है। गरीब जनता के पैसे से ही वह मेडल पहनता है। मंच पर फूलों की माला पहनता है। वह राज–सत्ता का भोग करता है। शेष जनता गरीबी को मार से परेशान है।

कवि रघुवीर सहाय ने उक्त पंक्तियों में सत्ता–वर्ग के तानाशाहों का व्यंग्यात्मक चित्रण बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। स्वतंत्र देश की यह दुर्दशा राजनेताओं की ही देन है। वे स्वयं राज–योग में लिप्त हैं और जनता गरीबी और लाचारी की मार झेल रही है।

4. कौन–कौन वह जन–गण–मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।

व्याख्या–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग–2 के रघुवीर सहाय विरचित “अधिनायक” शीर्षक कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने राष्ट्रीय गान में निहित ‘अधिनायक’ शब्द पर कटाक्ष किया है।

कवि ने कविता के अन्तिम पद में कौन–कौन दो बार प्रयोग कर यह बताने का प्रयास किया है कि जन–गण–मन अधिनायक एक नहीं अनेक हैं। आज देश में तानाशाहों की संख्या बढ़ गई है। वे अब महाबली का रूप धारण कर लिया है। अर्थात् देश की सम्पूर्ण शक्ति इन कुछ गिने–चुने अधिनायकों के हाथों में सीमित हो गई है। बाकी जनता डरी हुई है। सहमी हुई है और बिना इच्छा के राष्ट्रीय गान रूपी बाजा बजाती रहती है।

अतः अब इस राष्ट्रीय गान में आम आदमी की कोई रुचि नहीं रह गई है। राष्ट्रीय त्योहार पर वे केवल खानापूर्ति करते हैं। बेमन से वे राष्ट्रीय गान गाते हैं। उन्हें वास्तविक आजादी नहीं मिली है। आजादी का सुख उन्हें नहीं मिला। यह सुख मुट्ठी भर लोगों में सिमट कर रह गया है। देश के लिए यह अच्छा संदेश नहीं।

Bihar Board Class 9 History Solutions Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम

Bihar Board Class 9 Social Science Solutions History इतिहास : इतिहास की दुनिया भाग 1 Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Text Book Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 9 Social Science History Solutions Chapter 2 अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम

Bihar Board Class 9 History अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 1.
अमेरिका की राजधानी कहाँ है ?
(क) न्यूयार्क
(ख) कैलिफोर्निया
(ग) वाशिंगटन
(घ) कोई नहीं
उत्तर-
(ग) वाशिंगटन

अमेरिका की क्रांति के प्रश्न उत्तर Bihar Board प्रश्न 2.
‘कामनसेंस’ की रचना किसने की थी?
(क) जैफर्सन
(ख) टॉमस पेन
(ग) वाशिंगटन
(घ) लफायते
उत्तर-
(ख) टॉमस पेन

Bihar Board Class 9 History Chapter 2 प्रश्न 3.
स्टांप एक्ट किस वर्ष पारित हुआ था ?
(क) 1765
(ख) 1764
(ग) 1766
(घ) 1767 ।
उत्तर-
(क) 1765

Bihar Board Class 9 History Book Solution प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का सेनापति कौन था?
(क) वाशिंगटन
(ख) वेलेजली
(ग) कार्नवालिस
(घ) कर्जन
उत्तर-
(ग) कार्नवालिस

Bihar Board Class 9th History Solution प्रश्न 5.
अमेरिकी संविधान कब लागू हुआ?
(क) 1787
(ख) 1789
(ग) 1791
(घ) 1793
उत्तर-
(ख) 1789

Bihar Board Solution Class 9 Social Science प्रश्न 6.
विश्व में प्रथम लिखित संविधान किस देश में लागू हुआ?
(क) इंग्लैण्ड
(ख) फ्रांस
(ग) अमेरिका
(घ) स्पेन
उत्तर-
(ग) अमेरिका

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम Bihar Board प्रश्न 7.
किस संधि के द्वारा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम को मान्यता मिली?
(क) पेरिस की संधि
(ख) विलाफ्रका की संधि
(ग) न्यूली की संधि
(घ) सेब्रे की संधि
उत्तर-
(क) पेरिस की संधि

Bihar Board Solution Class 9 History प्रश्न 8.
अमेरिकी स्वतंत्रता में अमेरिका का सेनापति कौन था?
(क) ग्रेनविले
(ख) जैफर्सन
(ग) लफाएते
(घ) वाशिंगटन
उत्तर-
(घ) वाशिंगटन

Bihar Board Class 9 Social Science Solution प्रश्न 9.
अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे?
(क) जार्ज वाशिंगटन
(ख) अब्राहम लिंकन
(ग) रूजवेल्ट
(घ) अलगोर
उत्तर-
(क) जार्ज वाशिंगटन

Bihar Board Class 9 History Solution प्रश्न 10.
सप्तवर्षीय युद्ध किन दो देशों के बीच हुआ था?
(क) ब्रिटेन-अमेरिका
(ख) फ्रांस-कनाडा
(ग) ब्रिटेन-फ्रांस
(घ) अमेरिका-कनाडा
उत्तर-
(ग) ब्रिटेन-फ्रांस

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

1. लैसेज फेयर का सिद्धांत ……………. ने दिया थान
2. शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत …………… ने दिया था।
3. सेनापति लफाएते …………… का रहने वाला था।
4. जार्ज तृतीय इंग्लैण्ड का …………… था।
5. धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना, सर्वप्रथम …………… में हुई।
6. नई दुनिया (अमेरिका) का पता …………… ने लगाया था।
7. अमेरिका में अंग्रेजों के …………… उपनिवेश थे।
8. सर्वप्रथम आधुनिक गणतंत्रात्मक शासन की स्थापना ………. में हुई ।
9. अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण …………… था ।
10. ‘राइट्स ऑफ मैन’ की रचना …………… ने की थी।
उत्तर-
1. एडमस्मिथ,
2. माँटेस्क्यू,
3. फ्रांस,
4. शासक,
5. अमेरिका,
6. कोलम्बस,
7. 13,
8. अमेरिका,
9. बोस्टन की टी पार्टी,
10. टामॅस जेफर्सन ।

सही और गलत :

प्रश्न 1.
जार्ज वाशिंगटन अमेरिका के प्रथम प्रधानमंत्री थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
अमेरिका यूरोप महादेश में स्थित है।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वाधीनता के पुत्र एवं पुत्री नामक संगठन का निर्माण हुआ था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 4.
अमेरिका की खोज कोलम्बस ने नहीं किया था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 5.
अमेरिका स्वतंत्रता संग्राम में फ्रांस ने इंग्लैण्ड का साथ दिया था ।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
अमेरिका स्वतंत्रता का घोषणा पत्र जैफर्सन ने तैयार किया था।
उत्तर-
सही

प्रश्न 7.
स्टांप एक्ट ग्रेनविले के समय पारित हुआ था।
उत्तर-
सही

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
(i) गणतंत्र (ii) मौलिक अधिकार (iii) मताधिकार (iv) उपनिवेश (v) राजतंत्र
उत्तर-
(i) गणतंत्र-जनता का शासन जनता के लिए जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ।
(ii) मौलिक अधिकार-संविधान द्वारा देश के नागरिकों को दिया गया अधिकार ।
(iii) मताधिकार-प्रत्येक वयस्क को शासन के प्रतिनिधि चुनने का मताधिकार प्राप्त है।
(iv) उपनिवेश-शक्ति सम्पन्न देशों द्वारा कमजोर देशों के भू-भाग पर बस जाना।
(v) राजतंत्र-राजा द्वारा शासित राज्य को राजतंत्र कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिका,या नई दुनिया की खोज क्यों हुई?
उत्तर-
अमेरिका या नई दुनिया की खोज स्पेन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इससे यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री यात्रा को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 2.
नई दुनिया को खोज इंग्लैण्ड के लिए वरदान साबित हुआ कैसे ?
उत्तर-
नई दुनिया की खोज के कारण इंग्लैण्ड ने अपने 13 उपनिवेश स्थापित कर लिए । इनका प्रशासन इंग्लैण्ड में प्रचलित प्रशासनिक-व्यवस्था के अनुरूप होता था। इसने अमेरिका का भरपूर दोहन किया जिससे उनकी आर्थिक स्थिति समृद्ध होती गई।

प्रश्न 3.
मुक्त व्यापार के सिद्धांत ने उपनिवेशवासियों को क्रांति के लिए प्रेरित किया कैसे?
उत्तर-
उपनिवेशवाद का बुनियादी सिद्धान्त उपनिवेशियों के आर्थिक शोषण एवं उनके संसाधनों का दोहन करना था। इसी के विरोध में मुक्त व्यापार की धारणा विकसित हो रही थी जिसमें राज्य द्वारा व्यापार को नियंत्रित करने का विरोध किया गया था। इस सिद्धान्त के अनुसार उपनिवेशवासी अपने व्यापार एवं अन्य क्रिया-कलापों में इंग्लैण्ड के हस्तक्षेप को नापसंद करते थे। इसी ने उपनिवेशवासियों को क्रान्ति के लिए प्रेरित किया।

प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने फ्रांस पर भी प्रभाव डाला है- कैसे ?
उत्तर-
अमेरिकी स्वतंत्रा संग्राम ने फ्रांस पर भी प्रभाव डाला है । इस संग्राम में लफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सैनिकों ने भी भाग लिया था। युद्ध के बाद जब वे अपने देश लौटे तब उन्होंने वहाँ की जनता को निरंकुश राजतंत्र के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया और दूसरी ओर फ्रांस की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई।

प्रश्न 5.
क्या अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों ने औपनिवेशिक विश्व को प्रभावित किया?
उत्तर-
हाँ, प्रभावित किया । अब सभी उपनिवेश अपनी-अपनी स्वतंत्रता की प्राप्ति तथा अपनी आजादी के लिए व्यग्र हो उठे । यह एक ऐसा विद्रोह था जिसने उपनिवेशवासियों में नव चेतना का संचार किया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के तीन प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसके निम्नलिखित कारण थे

(i) उपनिवेशों में राजनीतिक स्वायत्तता का अभाव-अमेरिकी उपनिवेशों में अधिकतर अंगरेज लोग थे जिन्होंने इंग्लैण्ड की संसदीय व्यवस्था एवं विधि-विधान को देखा था। अतः वे अपने उपनिवेश में भी उसी तरह की प्रजातांत्रिक व्यवस्था एवं विधि-विधान चाहते थे । उपनिवेशों के गवर्नर इंग्लैण्ड के राजा के द्वारा मनोनित किए जाते थे, जो उदार नहीं होते थे। अतः संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। उपनिवेशवासियों को शासन के योग्य नहीं माना जाता था इसलिए इनमें भारी असंतोष था।

(ii) सप्तवर्षीय युद्ध का प्रभाव-सप्तवर्षीय युद्ध इंग्लैण्ड एवं फ्रांस में 1756 ई० से 1763 ई० के बीच हुआ था। इस युद्ध से पूर्व तक उपनिवेशवासी इंग्लैण्ड से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे क्योंकि वे कनाडा में फ्रांसीसियों के विरूद्ध अकेले अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे। लेकिन इस युद्ध में फ्रांस की पराजय के साथ ही यह भय समाप्त हो गया । अब उपनिवेशवासियों का एक मात्र लक्ष्य इंग्लैण्ड को बेदखल करना था। प्रो० पोलार्ड ने कहा था-“फ्रांस की पराजय ने अमेरिकावासियों की स्वतंत्रता की इच्छा को भड़काया”।

(iii) बोस्टन की चाय पार्टी-1773 ई० में चाय कानून द्वारा कंपनी के चाय से लदे जहाज अमेरिका के बोस्टन बन्दरगाह पर पहुँचे । उपनिवेशवासी सरकार द्वारा चाय पर कर लगाए जाने से क्रुद्ध थे। अतः वहाँ के नागरिकों ने रेड इंडियन के वेश में चाय की पेटियाँ समुद्र में फेंक दी। यह घटना बोस्टन की चाय पार्टी के नाम से विख्यात है। ब्रिटिश सरकार ने बन्दरगाह पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिया । इस तरह अमेरिकी उपनिवेश को विद्रोह की आग में धकेल दिया।

प्रश्न 2.
लोकतांत्रिक स्तर पर अमेरिकी संग्राम ने विश्व को कैसे प्रभावित . किया है ?
उत्तर-
अमेरिकी संग्राम का प्रभाव न केवल 13 उपनिवेशों पर पड़ा, बल्कि विश्व स्तर पर प्रभाव डाला।

लोकतांत्रिक स्तर पर इसका प्रभाव :

(i) एक नये राष्ट्र का उदय-13 उपनिवेशों ने आपस में मिलकर सेयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना की । विश्व के मानचित्र पर नए राष्ट्र का उदय हुआ । नए राष्ट्र के लिए 1787 में नया संविधान बना इसे 1789. ई० में लागू किया गया। इसने गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई ।
अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई।

(ii) प्रथम जनतंत्र की स्थापना-संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का पहला राष्ट्र बना जिसने प्रचलित राजतंत्रात्मक-व्यवस्था के स्थान पर जनतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था को अपनाया। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी जार्ज वाशिंगटन को अमेरिका का प्रथम निर्वाचित राष्ट्रपति बनाया गया।
इस प्रकार लोकतांत्रिक स्तर पर विश्व भर में यह प्रभाव पड़ा, अन्य उपनिवेश भी अपनी स्वतंत्रता की कल्पना करने लगे ।

प्रश्न 3.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों की आलोचनात्मक परीक्षण करें।
उत्तर-
अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है । पहली बार 13 उपनिवेशों ने ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ राष्ट्र का निर्माण किया। अमेरिका पहला राष्ट्र बना जहाँ गणतंत्रात्मक व्यवस्था अपनाई गई । अमेरिका में ही पहली बार लिखित संविधान लागू किया गया। धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना भी पहली बार यहीं हुई । अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा लेकर अनेक राष्ट्रों में क्रान्ति की ज्वाला भड़क उठीं।

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से समाज पर भी प्रभाव पड़ा । स्वतंत्रता संग्राम ने अमेरिकी समाज पर प्रभाव डाला । नई परिस्थिति में ब्रिटेन के राज भक्तों को अमेरिका छोड़कर पड़ोसी राष्ट्र कनाडा जाने को विवश होना पड़ा । केवल गणतंत्रात्मक विचार धारा से प्रभावित लोग ही अमेरिका में रह गए । युद्ध में प्रमुखता से भाग लेने के कारण स्त्रियों का समाज  में सम्मान बढ़ा इसलिए उनके नागरिक और आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 4.
अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के पराजय के क्या कारण थे ?
उत्तर-
अंग्रेजों के पराज्य के निम्नलिखित कारण थे :

  • इंग्लैण्ड की दूरी-अमेरिकी उपनिवेश अटलांटिक महासागर के पार 3000 मील की दूरी पर था। इससे युद्ध के सामान और रसद पहुँचाने में कठिनाई होती थी। दूसरी ओर अमेरिका की भौगोलिक स्थिति से भी अंग्रेज सैनिक अपरिचित थे ।
  • अमेरिका की शक्ति को नजरअंदाज किया गया एवं अधिकांश __ अंग्रेज इसे गृहयुद्ध ही समझते रहे ।
  • उपनिवेशवासियों में उत्साह था । वे स्वतंत्रता के लिए कुछ भी करने को तैयार थे।
  • ब्रिटिश सेनापतियों ने कुछ सामरिक भूले की।
  • ब्रिटिश राजनेताओं के बीच गंभीर मतभेद था। जार्ज तृतीय की हठधर्मिता की नीति के कारण योग्य एवं अनुभवी नेता सरकार से अलग रहे।
  • इंग्लैण्ड का अकेले युद्ध लड़ना-यह इंग्लैण्ड की पराजय का मुख्य कारण था। उसे अन्य देशों का सहयोग नहीं मिल सका। जबकि अमरिकी उपनिवेशों को विदेशी सहायता प्राप्त हुई विशेषकर फ्रांस से । इसने धन और सेवा से काफी मदद पहुँचाई।
  • जार्ज वाशिंगटन जैसा सुयोग्य सेना नायक मिल गया जिसने बड़े धैर्य, साहस एवं कुशलता के साथ अंग्रेजी सेना को पराजित किया।