Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?
(क) ऑक्सीजन
(ख) आर्गन
(ग) नाइट्रोजन
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(ग) नाइट्रोजन

प्रश्न 2.
वह वायुमण्डलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है ………………
(क) समताप मण्डल
(ख) क्षोभमण्डल
(ग) मध्य मण्डल
(घ) आयनमण्डल
उत्तर:
(ग) नाइट्रोजन

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प्रश्न 3.
समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी-किससे सम्बन्धित हैं?
(क) गैस
(ख) जलवाष्प
(ग) धूलकण
(घ) उल्कापात
उत्तर:
(ग) धूलकण

प्रश्न 4.
निलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?
(क) 90 किमी
(ख) 100 किमी
(ग) 120 किमी
(घ) 150 किमी
उत्तर:
(ग) 120 किमी

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प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी?
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन
(ग) हिलीयम
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(घ) कार्बन डाइऑक्साइड

प्रश्न 6.
वायुमण्डल की कौन-सी परत पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगों को परावर्तित कर पुनः वापस कर पृथ्वी तल पर भेज देती है?
(क) समताप मण्डल
(ख) मध्य मण्डल
(ग) आयन मण्डल
(घ) बर्हिमण्डल
उत्तर:
(ग) आयन मण्डल

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमण्डल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है और यह पृथ्वी को सभी ओर से ढके हुए है। इसमें मनुष्यों एवं जन्तुओं के जीवन के लिए आवश्यक गैसों जैसे ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन डाईऑक्साइड पाई जाती हैं।

प्रश्न 2.
मौसम और जववायु के कौन-कौन से तत्त्व हैं?
उत्तर:
ताप, दाब, हवा, आर्द्रता, बादल और वर्षण ये मौसम और जलवायु के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं, जो पृथ्वी पर मुनष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं।

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प्रश्न 3.
वायुमण्डल की संरचना के बारे में लिखिए।
उत्तर:
वायुमण्डल का निर्माण लगभग एक अरब वर्ष पूर्व हुआ। यह अनेक गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन 78.8% तथा ऑक्सीजन 20.95% मुख्य गैसें हैं। इनके अतिरिक्त आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, नीऑन, हीलियम, क्रेप्टो, जेनन तथा हाइड्रोजन भी कुछ मात्रा में है। वायुमण्डल में पाँच मुख्य संस्तर हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्ममण्डल । कुल वायुमण्डल का 99% भाग भूपृष्ठ से 32 कि.मी. की ऊँचाई तक सीमित हैं और गुरुत्वाकर्षक बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है। वायुमण्डल को ऊर्जा सूर्य से मिलती है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डल के सभी संस्तरों से क्षोभमण्डल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
उत्तर:
क्षोभमण्डल वायुमण्डल का सबसे नीचे का संस्तर है। इसकी ऊंचाई 13 किमी है, तथा यह ध्रुव के निकट 8 किमी तथा विषुवत् रेखा पर 18 किमी की ऊँचाई तक है। इस मण्डल में धुलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165 मी. की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्तर है।

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प्रश्न 5.
ग्रीन हाऊस प्रभाव से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वायु प्रदूषण से सम्बन्धित एक बड़ी समस्या विश्व के तापमान में वृद्धि (Global Warming) या हरित गृह प्रभाव (Green House effect) है । मानवीय स्त्रोतों से उत्पन्न कुछ गैस कार्बन डायऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रस ऑक्साइड और मीथेन है, जो हरित गृह प्रभाव में वृद्धि करतें हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण कार्बन डाइऑक्साइड है, जो सौर ऊर्जा को पृथ्वी की ओर आने तो देता है, किन्तु पृथ्वी से जो धरातलीय विकरण होता है, उसे बाहर जाने से रोकती है और उसका अवशोषण करता है। अतः वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड के वृद्धि होने से पृथ्वी की सतह और वायुमण्डल के निचले भाग में तापमान की वृद्धि होती है जिसे हरित गृह प्रभाव कहा जाता है।

प्रश्न 6.
वायुमण्डल के मुख्य संघटनों का संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर:
1. वायुमण्डल गैसों का एक आवरण है, जो भूपृष्ठ के ऊपर हजारों किमी. की ऊँचाई तक फैला है। लगभग 90 किमी. की ऊँचाई तक यह तीन प्रमुख गैसों-नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा आर्गन में एक समान है। इसके अतिरिक्त इनमें नियॉन, क्रिप्टन एवं जीनॉन जैसी दुर्लभ गैसें हैं, जिन्हें उत्कृष्ट गैसें कहते हैं।

2. 90 किमी. से ऊपर का संघटन अधिकाधिक हल्की गैसों की वृद्धि के साथ परिवर्तित होने लगता है। इसमें कम मात्रा में कार्बन डाय ऑक्साइड, जलवाष्प, ओजोन, अक्रीय गैसें जैसे जीनॉन, क्रिप्टन, नियान, आखान तथा अधिक मात्रा में ठोस एवं द्रव कण जिन्हें सामूहिक रूप से वायु कहते है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की संरचना की व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है और यह पृथ्वी को सभी ओर से ढके हुए है। इसमें मनुष्यों एवं जन्तुओं के जीवन के लिए आवश्यक गैसों जैसे ऑक्सीजन तथा पौधों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड पाई जाती है। वायु पृथ्वी के द्रव्यमान का अभिन्न भाग है, तथा इसके कुल द्रव्यमान का 99% पृथ्वी की सतह से 32 किमी की ऊँचाई तक स्थित है । वायु रंगहीन तथा गंधहीन होती है, तथा जब यह पवन की तरह बहती है, तभी हम इसे महसूस कर सकते हैं। वायुमण्डल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाले विभिन्न परतों का बना होता है। पृथ्वी की सतह के पास घनत्व अधिक होता है, जबकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ यह घटता जाता है। तापमान की स्थिति के अनुसार वायुमण्डल को पाँच विभिन्न संस्तरों में बांटा गया है। ये हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्यमण्डल।

क्षोभमण्डल वायुमण्डल का सबसे नीचे का संस्तर है.। इसकी ऊँचाई 13 किमी है। यह ध्रुव के निकट 8 किमी तथा विषुवत रेखा पर 18 किमी की ऊँचाई तक है। क्षोभमण्डल की मोटाई विषुवत् रेखा पर सबसे अधिक है; क्योंकि तेज वायु प्रवाह के कारण ताप का अधिक ऊँचाई तक सम्वहन किया जाता है। इस संस्तर में धुलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165मी की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्तर है। वायुमण्डल का सबसे ऊपरी संस्तर जो आयनमण्डल के ऊपर स्थित होता है, उसे बाह्यमण्डल कहते हैं। यह सबसे ऊँचा संस्तर है, तथा इसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। इस संस्तर में मौजूद सभी घटक विरल है, जो धीरे-धीरे बाहरी आंतरिक्ष में मिल जोते हैं।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल की संरचना का चित्र खींचे और व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमण्डल विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है। इनमें सबसे अधिक 78.8% नाइट्रोजन (N2) गैस, ऑक्सीजन (O2)20.95% आर्गन (Ar) 0.93% कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) 0.036% नीऑन (Ne) 0.002% हिलीयम (He) 0.0005% क्रेप्टो (Kr) 00.001% जेनन (Xe) 0.00009% तथा हाइड्रोजन (H20.)00005% पाई जाती है। इसके पांच विभिन्न संस्तर है। वायुमण्डल का चित्र नीचे है।
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Bihar Board Class 11 Geography वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल को कितने भागों में विभक्त किया गया है?
उत्तर:
रासायनिक संघटन के आधार पर वायुमण्डल को दो विस्तृत परतों में विभक्त किया गया है-होमोस्फेयर तथा हेट्रोस्फेयर।

प्रश्न 2.
सीमा किसे कहते हैं ?
उत्तर:
होमोस्फेयर की तीन परतें हैं-क्षोभमण्डल. समतापमण्डल तथा मध्यमण्डल । प्रत्येक उप-परत अपने साथ वाली परत से एक पतले संक्रमण क्षेत्र द्वारा अलग होती है, इसे सीमा कहते हैं।

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प्रश्न 3.
जेट वायुयान वायुमण्डल के किस भाग में उड़ते हैं ?
उत्तर:
जेटवायुयान निम्न समतापमण्डल में उड़ते है, क्योंकि यह परत उड़ान के लिए अत्यन्त सुविधाजनक दशाएँ रखती है। यह मण्डल क्षोभ सीमा के ऊपर स्थित है।

प्रश्न 4.
मौसम और जलवायु के प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
मौसम एवं जलवायु के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित है –

  1. तापमान
  2. वायुदाब एवं पवनें
  3. आर्द्रता एवं वर्षण।

ये जलवायु तत्त्व कहलाते हैं, इन्हीं से विभिन्न प्रकार की जलवायु और मौसम की रचना होती है।

प्रश्न 5.
मौसम किसे कहते हैं ?
उत्तर:
किसी दिए गए समय में वायुमण्डल की भौतिक दशा को मौसम कहते है, जैसे ही. ये दशाएँ बदलती हैं, वैसे ही मौसम बदल जाता है।

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प्रश्न 6.
वायुमण्डल किसे कहते हैं?
उत्तर:
वायुमण्डल गैस का एक आवरण हैं, जो पृथ्वी के ऊपर हजारों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला हुआ है। पृथ्वी पर अधिकांश जीवन तथा जीवन प्रक्रियाओं का अस्तित्व वायुमण्डल से जुड़ा हुआ है।

प्रश्न 7.
वायुमण्डल की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
वायुमण्डल की उत्पत्ति लगभग पाँच अरब वर्ष पूर्व ठण्डे कणों, मुख्य रूप से लोहे एवं मैग्नीशियम के सिलिकेट, लोहे एवं ग्रेफाइट की अभिवृद्धि द्वारा धीमे परिवर्तनों से हुई।

प्रश्न 8.
वायुमण्डल में नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन की प्रतिशत मात्रा कितनी है ?
उत्तर:
ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन मिलकर स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करती हैं फिर भी जलवायु की दुष्टि से इनकी महत्ता कम है।

प्रश्न 9.
कौन सी गैसें हमें हानिकारक किरणों से बचाती हैं ?
उत्तर:
ओजोन गैस अत्यन्त उपयोगी गैस है, क्योंकि यह पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करती है, तथा इन हानिकारक किरणों से पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।

प्रश्न 10.
मौसम तथा जलवायु के प्रमुख चर क्या हैं?
उत्तर:
जलवाष्प एवं धूलकण मौसम एवं जलवायु में प्रमुख चर है। ये सभी प्रकार के संसाधन के स्रोत हैं तथा सूर्य से प्राप्त होने वाली अथवा पृथ्वी से विकसित ऊर्जा के प्रमुख अवशोषक हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न क्षेत्रों में वायुमण्डल का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:

  1. जीवन का आधार-पृथ्वी पर मानव जीवन का आधार वायुमण्डल ही है। सौरमण्डल में केवल पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है. जिस पर वायुमण्डल विद्यमान है। ऑक्सीजन और नाइट्रोजन जीवन का आधार है।
  2. ताप सन्तुलन-वायुमण्डल एक ग्रीन हाउस की भाँति कार्य करता है। इस प्रभाव से पृथ्वी का तापमान औसत रूप से 35°C रहता है। वायुमण्डल के बिना बहुत अधिक तापमान पर जीवन असम्भव होता है।
  3. ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। आयनमण्डल रेडियो. तरंगों को पृथ्वी पर लौटाकर रेडियो प्रसारण में सहायता करता है।
  4. वायुमण्डल की विभिन्न घटनाएँ, जैसे वाष्पीकरण, वर्षा, पवनें आदि मानव जीवन पर प्रभाव डालती है। सौरमण्डल से पृथ्वी पर गिरने वाली उल्काएँ वायुमण्डल में जलकर नष्ट हो जाती है।

प्रश्न 2.
क्षोभमण्डल तथा समतापमण्डल में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
क्षोभमण्डल तथा समतापमण्डल में अन्तर –
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प्रश्न 3.
वायुमण्डल कैसे पृथ्वी से जुड़ा रहता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर अधिकांश जीवन वायुमण्डल की तली, जहाँ स्थल तथा महासागर मिलते हैं, पर मौजद है। जीवन प्रतिक्रियाओं का अस्तित्व इससे जुड़ा हुआ है। मानव पर वायुमण्डल का न केवल प्रत्यक्ष बल्कि अप्रत्यक्ष प्रभाव भी है। कुल वायुमण्डल का 99 प्रतिशत भाग भूपृष्ठ से 32 किमी की ऊँचाई तक सीमित है और गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है।

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प्रश्न 4.
विषमण्डल (हेट्रोस्फेयर) क्या है?
उत्तर:
विषमण्डल (हेट्रोस्फेयर) एक परतदार ऊष्ण मण्डल है, जो मध्य सीमा के ऊपर स्थित है और आंतरिक्ष के आधार तक विस्तृत है। ऊष्ण मण्डल के निम्न भाग में 100 से 400 किमी के मध्य की ऊँचाई तक सीमित है और गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा पृथ्वी से सटा हुआ है।

प्रश्न 5.
वायुमण्डल की स्वच्छ शुष्क हवा के मुख्य संघटक कौन-से हैं ?
उत्तर:
ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन वायुमण्डल की स्वच्छ शुष्क हवा के मुख्य घटक हैं। ये दोनों मिलकर होमोस्फेयर की स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 6.
कौन-सी गैस कम मात्रा में होने पर भी वायुमण्डल प्रक्रियाओं के लिए महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम है, फिर भी वायुमण्डलीय प्रक्रिया में यह एक महत्त्वपूर्ण गैस है। यह ऊष्मा को अवशोषित कर सकता है और इस प्रकार निचले वायुमण्डल को सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म होने का अवसर प्रदान करता है। प्रकाश संश्लेषण क्रिया में हरे पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 7.
वायुमण्डल की परिभाषा बताएँ।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर घिरे हुए वायु के आवरण को वायुमण्डल कहते हैं। पृथ्वी की गुरुवाकर्षण शक्ति के कारण वायुमण्डल सदा पृथ्वी के साथ सटा रहता है, तथा पृथ्वी का एक अभिन्न अंग है। वायुमण्डल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन है, तथा पृथ्वी एक महत्त्वपूर्ण ग्रह है। वायुमण्डल का निर्माण लगभग एक अरब वर्ष पूर्व हुआ वायुमण्डल अनेक गैसों का मिश्रण है। नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन मुख्य गैसें हैं। वायुमण्डल में पाँच मुख्य संस्तर हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल, बाह्यमण्डल।।

प्रश्न 8.
वायुमण्डल का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमण्डल का मानवीय जीवन में बहुत महत्त्व हैं –

  1. ऑक्सीजन गैस पृथ्वी पर जीवन का आधार है।
  2. पेड़ – पौधों तथा वनस्पति के लिए कार्बन डाइऑक्साइड महत्त्वपूर्ण है।
  3. वायुमण्डल सूर्यताप की अवशोषित करके ग्लास हाऊस का काम करता है।
  4. वायुमण्डल का जलवाष्प वर्षा का मुख्य साधन है।
  5. वायुमण्डल फसलों, मौसम, जलवायु तथा वायुमार्गों पर प्रभाव डालता है।

प्रश्न 9.
वायुमण्डल की मुख्य परतों के नाम बताएँ।
उत्तर:
वायुमण्डल में मुख्य रूप से पाँच परतें पाई जाती हैं। रासायनिक संरचना के आधार पर वायुमण्डल को इन परतों में विभक्त किया गया है,

  1. क्षोभमण्डल – यह वायुमण्डल की सबसे निचली परत है।
  2. समतापमण्डल – इस भाग में वायूयान उड़ते है।
  3. आयनमण्डल – इसका तापमान आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ता है।
  4. बाह्यमण्डल।
  5. चुम्बकमण्डल।

प्रश्न 10.
वायुमण्डल की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
वायुमण्डल की उत्पत्ति पाँच अरब वर्ष ठण्डे कणों, मुख्य रूप से लोहे एवं मैग्नीशियम सिलिकेट, लोहे एवं ग्रेफाइट की अभिवृद्धि द्वारा शुरू हुए धीमें परिवर्तनों का परिणाम है। गुरुत्वाकर्षण विखण्डन तथा रेडियोधर्मी क्षति से पृथ्वी गर्म हुई, जिसमें पृथ्वी के केन्द्र में ठोस निकिल, लौह धातु निर्मित क्रोड, द्रव लौह सिलिकेट खोल, मैंटल तथा स्थलमण्डल की रचना हुई। इस प्रक्रिया में गैस का निकास हुआ, जिससे एक नए वायुमण्डल एवं जलमण्डल की रचना हुई। कार्बन नाइटोजन, ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन के यौगिकों की उत्पत्ति, ऊर्जा स्रोतों जैसे बिजली का चमकना, सौर विकिरण अथवा रेडियोधर्मी विसर्जन से हुई।

कार्बन डाइऑक्साइड और भूपर्पटी के सिलिकेट के मध्य हुई प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप कार्बनेट का निर्माण हुआ। अत: कार्बन डाइऑक्साइड धीरे-धीरे वायुमण्डल से लुप्त हो गई। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम हुई। ओजोन ने पृथ्वी पर आने वाली पराबैंगनी विकिरण के विरुद्ध एक परदे या आवरण का काम किया तथा जैविक निक्षेप कोयले एवं तेल भण्डारों के रूप से संचित होने लगे। इन सभी घटनाओं ने मौलिक रूप से पृथ्वी के भू-रसायन को परिवर्तित कर दिया। अधिकांश रासायनिक तत्त्वों के चक्रों का पुन-अभिविन्यास हुआ। इस प्रकार पृथ्वी के वायुमण्डल की रचना हुई।

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प्रश्न 11.
आयनमण्डल का वर्णन करो।
उत्तर:
यह धरातल के ऊपर वायुमण्डल का चौथा संस्तर है। इसकी ऊँचाई 80 से 400 कि.मी. के मध्य है। इस मण्डल में तापमान ऊंचाई बढ़ने के साथ बढ़ता है। यहाँ की हवा विद्युत आवेशित होती है। रेडियो तरंगें इसी मण्डल से परावर्तित होकर पुनः पृथ्वी पर लौट जाती हैं। यह परत रेडियो प्रसारण में उपयोगी है। इसमें तापमान का वितरण असमान एवं अनिश्चित है। इस मण्डल में बड़ी ही विस्मयकारी विद्युतकीय घटनाएँ दृष्टिगोचर होती हैं।

प्रश्न 12.
क्षोभमण्डल सीमा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में एक असमान दर से परिवर्तन होता है –

  1. 15 किमी तक तापमान में एक असमान दर से परिवर्तन होता है।
  2. 80 किमी तक तापमान स्थिर रहता है।
  3. 80 किमी से ऊपर तापमान में वृद्धि होने लगती है।

इस ऊँचाई के पश्चात् क्षोभमण्डल से ऊपर समतापमण्डल का भाग आरम्भ होता है। समताप मण्डल तथा क्षोभमण्डल को अलग करने वाले संक्रमण क्षेत्र को क्षोभमण्डल सीमा कहते हैं।

प्रश्न 13.
वायुमण्डल में धुल कणों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
वायुमण्डल में धूल कण निचले भागों में पाए जाते हैं। वायुमण्डल में धूल कणों का कई प्रकार से विशेष महत्त्व है –

  1. धूल कण सौर ताप का कुछ भाग सोख लेते हैं, तथा कुछ भाग परावर्तन हो जाता है। ताप सोख लेने के कारण वायुमण्डल का तापक्रम अधिक हो जाता है।
  2. धूल कण आर्द्रताग्रही नाभि के रूप में काम करते हैं। इनके चारों ओर जलवाष्प का संघनन होता है, जिससे वर्षा, कोहरा, बादल बनते हैं। धूल कणों के अभाव के कारण वर्षा नहीं हो सकती।
  3. धूल कणों के कारण वायूमण्डल की दर्शन क्षमता कम होती है, तथा धुंधलापन छा जाता है।
  4. धूल कणों के सन्योग से कई रंग-बिरगे दृश्य सूर्य उदय, सूर्य अस्त तथा इन्द्रधनुष दृश्य बनते हैं।

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प्रश्न 14.
क्षोभमण्डल को वायुमण्डल की सबसे महत्त्वपूर्ण परत क्यों माना जाता है?
उत्तर:
क्षोभमण्डल वायुमण्डल की सबसे निचली परत है, जो कई कारणों से महत्त्वपूर्ण हैं –

  1. पृथ्वी के धरातल पर जलवायु स्थितियों का निर्माण करने वाली महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ इसी परत में होती हैं।
  2. इस परत में गैसों, धूल कण तथा जलवाष्म की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसलिए मेघ, वर्षा, कोहरा आदि क्रियाएँ इसी परत में होती हैं।
  3. इस अस्थिर भाग में संवाहिक धाराएँ चलती हैं, जो ताप और आर्द्रता को ऊँचाई तक ले जाती हैं।
  4. इस भाग में संचालन क्रिया द्वारा वायुमण्डल की विभिन्न परतें गर्म होती हैं। ऊंचाई के साथ-साथ तापमान कम होता है। तापमान कम होने की दर 1°C प्रति 165 मीटर हैं।
  5. क्षोभमण्डल में अस्थिर वायु के कारण आँधी-तूफान चलते हैं। वायु परिवर्तन से मौसम परिवर्तन होता है। इसी क्षेत्र मे चक्रवात उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 15.
क्षोभ सीमा पर भूमध्य रेखा के ऊपर न्यूनतम ताप क्यों पाया जाता है?
उत्तर:
पृथ्वी पर निम्नतम तापमान धुवों पर पाया जाता है। परन्तु वायु में क्षोभ सीमा पर निम्नतम तापमान भूमध्य रेखा पर पाया जाता है। क्षोभमण्डल पर भूमध्य रेखा पर -80C तथा ध्रुवों पर-45°C तापमान पाया जाता है। इसका कारण यह है, कि भूमध्य रेखा पर क्षोभ सीमा की ऊँचाई 18 किमी होती है, जबकि ध्रुवों पर यह ऊँचाई केवल 8 किमी होती है। ऊँचाई के साथ तापमान कम होता है, इसलिए अधिक ऊंचाई होने के कारण भूमध्य रेखा पर निग्नताप पाए जाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की संरचना एवं प्रत्येक परत की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रासायनिक संघटन के आधार पर वायुमण्डल को दो विस्तृत परतों में विभक्त किया गया है-होमोस्फेयर हेट्रोस्फेयर। होमोस्फेयर (सममण्डल)-यह 90 किमी की ऊंचाई के मध्य स्थित है। इसकी तीन परतें हैं-क्षोभमण्डल, समतापमण्डल तथा मध्यमण्डल। प्रत्येक उप-परत अपने साथ वाली परत से एक पतले संक्रमण क्षेत्र द्वारा अलग होती है, जिसे सीमा कहते हैं । क्षोभमण्डल वायुमण्डल की सबसे निचली परत है। यहाँ ऊँचाई के साथ तापमान घटता है। इस परत में तापमान प्रत्येक 100 मीटर. की ऊँचाई पर 0.65°C से कम हो जाता है। इसे सामान्य क्रास दर कहते हैं। सभी वायुमण्डलीय प्रक्रियाएँ, जो जलवायु से सम्बन्धित हैं, इस परत में घटती है।

क्षोभ सीमा के ऊपर समतापमण्डल की स्वच्छ एवं शान्त वायु मौजूद है। इस परत में जलवाष्य का पूर्ण अभाव मेघों के निर्माण को रोकता है, जिससे यहाँ दृश्यता सर्वाधिक होती है। ओजोन परत भी समतापमण्डल में ही है। यह पृथ्वी को पराबैगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है। समताप सीमा के ऊपर मध्यमण्डल स्थित है। इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान फिर कम होने लगता है। मध्यमण्डल के उच्च अक्षांशों में गर्मियों में तंतुनुमा मेघ देखने को मिलते है, जो उल्का धूल कणों से परावर्तित सूर्य किरणें हैं।

विषय मण्डल (हेस्ट्रोस्फेयर)-यह एक परतदार उष्णमण्डल है। यह मध्यसीमा के ऊपर स्थिल है और अंतरिक्ष एक विस्तृत क्षेत्र है। उष्णमण्डल के निम्न भाग में 100 से 400 किमी के मध्य की ऊँचाई और वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण हो जाता है। यह परत रेडियो तरंगों को परावर्तित करती है। आयनीकृत धूल कण अंतर्विराम पर चादर के समान प्रकाश फैलाते हैं, जिसे उत्तरी गोलाद्ध ऑरोरा बोरिलिस तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में ऑरोरा आस्ट्रेलिस कहते हैं। ऊष्णमण्डल के ऊपरी भाग में फिर से आयनों का संकेन्द्रण होता है। इसे एलेन विकिरण पट्टी कहते हैं। सबसे ऊपरी परत को चुबकीय मण्डल भी कहते हैं। इस मण्डल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम तथा हाइड्रोजन की विशिष्ट परतें होती है।

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प्रश्न 2.
वायुमण्डल की संरचना एवं प्रत्येक परत की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
पृथ्वी के चारों ओर सैकड़ों किमी की ऊँचाई में आवृत करनेवाला गैसीय आवरण ही वायुमण्डल है। इसकी संरचना लगभग 1 अरब वर्ष पूर्व सम्भावित मानी गयी है, जबकि यह वर्तमान अवस्था में लगभग 58 करोड़ वर्ष पूर्व आया। पृथ्वी का गैसीय आवरण पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही बंधा है। वायुमण्डल में वायु एवं गैसों की अनेक संकेन्द्रित परतें विद्यमान है, जो घनत्व, तापमान एवं संभव की दष्टि से एक दूसरे से पूर्णतः भिन्न है।

सामान्यतः वायुमण्डल पाँच मण्डलों में विभक्त है –

  1. क्षोभ मण्डल
  2. समताप मण्डल
  3. मध्य मण्डल
  4. आयन मण्डल
  5. बाह्य मण्डल

1. क्षोभ मण्डल – मानव हेतु अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। ऋतु एवं मौसम सम्बन्धी लगभग सभी घटनाएँ इसी परत में होती है। बादल, वर्षा, धूलकण, आँधी-तूफान आदि मौसम सम्बन्धी घटनाएँ घटित होती है।

2. समताप मण्डल – की ऊँचाई 50km तक मानी जाती है। यहाँ संवाहनीय धाराएँ, आँधी, बादलों की गरज, धूल-कण आदि कुछ भी नहीं पाया जाता है। कभी-कभी मोतियों जैसे दुर्लभ बादल दिखाई पड़ते हैं।

3. मध्य मण्डल – का विस्तार 50 से 90km. तक है, इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान गिरने लगता है।

4. आयन मण्डल – इसकी सीमा 100 km. से 400 km. ऊ तक है। यहाँ पर उपस्थित गैस के कण विद्युत आवेशित होते हैं। जिसे आयन मण्डल कहा जाता है।

5. बाह्य मण्डल – वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत बाह्य मण्डल कहा जाता है। यहाँ वायु नहीं के बराबर होती है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल की संरचना एवं संघटन का वर्णन करें।
उत्तर:
वायुमण्डल की संरचना –

  • रासायनिक संघटन के आधार पर वायुमण्डल दो विस्तृत परतें होमोस्फेयर तथा हेट्रोस्फेयर में विभक्त है। होमोस्फेयर 90 कि०मी० तक स्थित है।
  • इसकी तीन तापीय परतें हैं-क्षोभमण्डल, समताप मण्डल तथा मध्य मण्डल।
  • प्रत्येक उपपरत अपने साथ वाली परत से एक पतले संक्रमण क्षेत्र द्वारा अलग होती है, जिसे सीमा कहते है और उसे निचले परत के नाम से जोड़ते हैं, जैसे क्षोभ सीमा।
  • ट्रेटोस्फेयर का रासायनिक संगठन असमान है। इसमें क्रमशः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम है। इसमें क्रमशः नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम तथा हाइड्रोजन की परतदार सरचनाएँ हैं।

वायुमण्डल का संघटन –
1. वायुमण्डल गैस का एक आवरण है, जो भूपष्ठ के ऊपर हजारों किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला है। लगभग 90 कि०मी० की ऊंचाई तक यह तीन प्रमुख गैसों-नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा आरगन में एक समान है। इसके अतिरिक्त इनमें नियॉन क्रिप्टन एवं नीयॉन जैसी दुर्लभ गैसें है, जिन्हें उत्कृष्ट गैसें भी कहते हैं।

2. ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन मिलकर होमोस्फेयर की स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करते है। इसके अतिरिक्त कार्बन डायऑक्साइड, जलवाष्प ओजोन, अक्रिय गैसें जैसे-क्रिप्टन निर्यान, आरगन तथा अधिक मात्रा में ठोस एवं द्रव कण जिन्हें सामूहिक रूप से सेरोसॉल या वायुविलय कहते हैं। .

प्रश्न 4.
वायुमण्डल की रचना का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
वायुमण्डल अनेक गैसों, जलवाष्प तथा धूल कणों के मिश्रण से बना हुआ है। वायुमण्डल में ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन प्रमुख गैसें हैं। ये दोनों मिलकर वायुमण्डल का 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करती है। शेष 1 प्रतिशत में अन्य गैसें कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन, ओजोन, आर्गन, हाइड्रोजन, हीलियम आदि शामिल हैं। इन गैसों की मात्रा कम व अधिक होती रहती है। भारी गैसें वायुमण्डल की निचली परतों में तथा हल्की गैसें ऊपरी परतों में पाई जाती हैं ऑक्सीजन, नाइट्रोजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड जीव-जन्तुओं तथा पौधों के जीवन का मूल आधार है।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना
वायुमण्डल में लगभग 2% मात्रा में जलवाष्प पाया जाता है। ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। कुल जलवाष्प का लगभग आधा हिस्सा दो हजार मीटर ऊँचाई के नीचे पाया जाता है। जलवाष्प तापमान पर भी निर्भर करता है। भमध्य रेखा से धवों की ओर जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। पृथ्वी पर वर्षा एवं संघनन का मुख्य स्रोत जलवाष्प ही है। सूर्यताप को सोखकर जलवाष्प तापक्रम नियन्त्रण करता है । इसके अतिरिक्त वायुमण्डल में बहुत अधिक ठोस कण पाए जाते हैं जिनमें धूलकण प्रमुख है। इनके स्रोत मरुस्थलीय मैदान, समुद्री तट, शुष्क घाटियाँ तथा झील तल होते हैं। धूल कण सूर्यताप को बिखेरते तथा विकेन्द्रित करते हैं। धूल कण अधिकतर वायुमण्डल के निचले हिस्सों में पाए जाते हैं। वायुमण्डल में धूल कणों का विशेष महत्त्व है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 5.
वायुमण्डलीय क्रियाएँ मौसम तथा जलवायु को किस प्रकार प्रभावित करती हैं? वर्णन करें। अथवा, मौसम और जलवायु के मुख्य तत्त्वों तथा जलवायु के प्रमुख नियन्त्रकों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मौसम और जलवायु के प्रमुख तत्त्व हैं –

  • तापमान
  • वायुदाब एवं पवनें
  • आर्द्रता एवं वर्षण।

ये जलवायु तत्त्व कहलाते हैं, क्योंकि इन्हीं से विभिन्न प्रकार के मौसम और जलवायु के प्रकारों की रचना होती है। तापमान तथा वर्षण मुख्य आधारभूत तत्त्व है, जिनसे वायुदाब, पवनें तथा अन्य तत्त्व जुडे हुए हैं। व्यावहारिक रूप से पृथ्वी पर समस्त ऊर्जा सूर्याताप अथवा सूर्य से आने वाले विकिरणों को फल है । पृथ्वी के तापमान के असमान वितरण से वायुदाब में भिन्नता आती है, जिससे पवनों की उत्पत्ति होती है। वायुमण्डल में आर्द्रता जलवाष्प के रूप में उपस्थित रहती है, जो अक्सर संघटित होकर मेघों को जन्म देती हैं। इसका वर्षण वर्षा, ओले, बजरी अथवा हिम के रूप में हो सकता है। वायु की अपने अन्दर जलवाष्य रखने की क्षमता इसके तापमान पर निर्भर करती है। जलवायु नियंत्रकों के कारण जलवायु के तत्त्व एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न-भिन्न होते हैं।

जलवायु नियन्त्रक निम्न हैं –

  • अक्षांश अथवा सूर्यताप
  • स्थल एवं जल का वितरण
  • अर्धस्थाई उच्च दाब एवं निम्न दाब की विशाल पट्टियाँ
  • पवनें
  • ऊँचाई
  • महासागरीय धाराएँ
  • विभिन्न प्रकार के तुफान
  • पर्वतीय अवरोध

ये नियन्त्रक विभिन्न गहनता तथा विभिन्न संयोजनों के साथ काम करते हुए, तापमान एवं वर्षण में परिवर्तन लाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की जलवायु और मौसम के लिए उत्तरदायी हैं।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें –

  1. होमोस्फेयर
  2. वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण।

उत्तर:
1. होमोस्फेयर (सममण्डल) – वायुमण्डल की सबसे निचली परत क्षोभमण्डल कहलाती है। यह भूमध्य रेखा पर 16 किमी. तथा धुवों पर 10 किमी की ऊँचाई पर स्थिल है। यहाँ तापमान घटता जाता है, क्योंकि वायुमण्डल अधिकतर भूपृष्ठ द्वारा विकरित ऊष्मा से गर्म होता है। इस परत में तापमान प्रत्येक 100 मीटर की ऊँचाई पर 0.65°C कम हो जाता है। इसे सामान्य ह्यास दर कहते हैं। क्षोभ सीमा के पास यह न्यूनतम -60°C पर पहुँच जाता है सभी वायुमण्डलीय प्रक्रियाएँ जो जलवायविक तथा मौसमी दशाओं के लिए उत्तरदायी हैं, इस परत में घटती हैं।

क्षोभ सीमा के ऊपर समतामण्डल की स्वच्छ एवं शान्त वायु मौजूद है। ओजोन परत भी समतापमण्डल में ही है। इसकी अधिकता 20 से 22 किमी. ऊँचाई वाले क्षेत्र में है। ओजोन परत पृथ्वी को पराबैगनी विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है। तापमान समतापमण्डल के आधार पर -600 C से बढ़कर इसकी ऊपरी सीमा पर जिसे समताप सीमा कहते हैं,0°C हो जाता है। समताप सीमा के ऊपर मध्यमण्डल स्थित है, जो 50 से 90 किमी की ऊँचाई के मध्य स्थित है।

2. वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण – उष्णमण्डल अंतरिक्ष के आधार तक विस्तृत है। इस परत का तापमान आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ता है। उष्णमण्डल के निम्न भाग में 100 से 400 किमी के मध्य ऊँचाई पर वायुमण्डलीय गैसों का आयनीकरण हो जाता है। इन आयनीकृत कणों का 250 किमी. की ऊंचाई पर सर्वाधिक संकेन्द्रता होता है। यह परत रेडियो तरंगों को परिवर्तित करती है।

आयनीकृत धूलकण अंत विराम पर चादर के समान प्रकाश फैलाती है, जिसे उत्तरी गोलार्द्ध में ऑरोरा बोरिलिस और दक्षिणी गोलार्ध में ऑरोरा आस्ट्रेलिस कहते हैं। उष्णमण्डल के ऊपरी भाग में फिर से आयनों का संकेन्द्रण होता है। इसे वान एलेन विकिरण पट्टी कहते हैं। सबसे ऊपरी भाग को चुम्बकीय मण्डल भी कहते हैं । ऊष्णमण्डल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम तथा हाइड्रोजन की विशिष्ट परतें हैं, जो भूपृष्ठ से क्रमशः 200 किमी., 1000 किमी, 2600 किमी. तथा 9600 किमी. की औसत ऊँचाईयों पर स्थित हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 7.
वायुमण्डल के संघटन और ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, तथा कार्बन डाइऑक्साइड के महत्त्व की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
लगभग 90 किमी. की ऊँचाई तक नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा आर्गन एक समान है। इसके अतिरिक्त इनमें नियॉन, क्रिष्टन, एवं जीनॉन जैसी दुलर्भ गैसें हैं। इन्हें उत्कृष्ठ गैसें भी कहते हैं। ये अक्रिय गैसें हैं। यह परत सामान्यतः होमोस्फेयर या सममण्डल कहलाती है। ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन मिलकर होमोस्फेयर की स्वच्छ शुष्क हवा के 99 प्रतिशत भाग का निर्माण करते हैं। इसके अतिरिक्त कम मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प, आजोन, अक्रिय गैसें तथा अधिक मात्रा में ठोस एवं द्रव कण, जिन्हें, सामूहिक रूप से ऐरासॉल या वायु-विलय कहते है, शामिल हैं।

नाइट्रोजन अन्य पदार्थों के साथ रासायनिक संयोग नहीं करता है, लेकिन मृदा में स्थिर हो जाता है। यह एक घोलक का काम करता है तथा दहन को नियन्त्रित करता है। इसके विपरीत, ऑक्सीजन लगभग सभी तत्त्वों के साथ मिल जाता है और अत्यधिक दहनशील है। यद्यपि वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड का भाग कम है फिर भी वायुमण्डलीय प्रक्रिया में यह एक महत्त्वपूर्ण गैस है।

यह ऊष्मा को अवशोषित कर सकता है और इस प्रकार निचले वायुमण्डल को सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण द्वारा गर्म करता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में हरे पौधे वायुमण्डल से कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं। ओजोन बहुत कम मात्रा में समतापमण्डल में भूपृष्ठ के मध्य मिलती है, परन्तु यह अत्यन्त उपयोगी गैस है, यह परबैंगनी किरणों का अवशोषण करती हैं और हानिकारक किरणों से भूपृष्ठ पर जीवन की रक्षा करती हैं।

वायुमण्डल का संघटन – (देखें तालिका 8.1)
जलवाष्प एवं धूल कण मौसम एवं जलवायु के प्रमुख चर हैं। ये सभी संघनन के स्रोत है, तथा सूर्य से प्राप्त होने वाली अथवा पृथ्वी से विकिरित ऊर्जा के प्रमुख अवशोषक हैं। ये वायुमण्डल की स्थिरता को भी प्रभावित करते हैं। वायुमण्डल में जलवाष्य की मात्रा विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने के साथ कम होती जाती है। इसका लगभग 90 प्रतिशत भाग वायुमण्डल से 6 किमी नीचे रहता है। वायुमण्डल के इस भाग में ही धूल कण, नमक तथा पराग आदि के ठोस कण निलम्बित रहते है।

वायुमण्डल की ऊपरी परत मे अति सूक्ष्म धूल कण पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की किरणों को प्रकीर्णन कर देते हैं और नीले रंग के अतिरिक्त सभी रंगों को अवशोषित कर लेते हैं। इसके विपरीत बड़े आकार वाले कण सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय के लाल और नारंगी रंगों के लिए उत्तरदायी हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?
(क) तरुणावस्था
(ख) प्रथम प्रौढ़ावस्था
(ग) अन्तिम प्रौढ़ावस्था
(घ) वृद्धावस्था
उत्तर:
(क) तरुणावस्था

प्रश्न 2.
एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैं; किस नाम से जानी जाती है?
(क) U – आकार की घाटी
(ख) अन्धी घाटी
(ग) गॉर्ज
(घ) कैनियन
उत्तर:
(घ) कैनियन

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प्रश्न 3.
निम्न में से किन प्रदेशों में रसायनिक अपक्षय प्रक्रिया यान्त्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है?
(क) आई प्रदेश
(ख) शुष्क प्रदेश
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश
(घ) हिमनद प्रदेश
उत्तर:
(ग) चूना-पत्थर प्रदेश

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा वक्तव्य लेपीज (Lapies) शब्द को परिभाषित करता है?
(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।
(ख) ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे से कीप के आकार के होते हैं।
(ग) ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं।
(घ) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों।
उत्तर:
(क) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त।

प्रश्न 5.
गहरे, लम्बे व विस्तृत गर्त या बेसिन जिनके शीर्ष दीवार खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं, उन्हें क्या कहते हैं?
(क) सर्क
(ख) पाश्विक हिमोढ़
(ग) घाटी हिमनद
(घ) एस्कर
उत्तर:
(क) सर्क

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प्रश्न 6.
यू-आकार की घाटी बनती है ……………
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
चट्टानों में अध: कर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?
उत्तर:
नदी विकास की प्रारम्भिक अवस्था में प्रारम्भिक मन्द ढाल पर विसर्प लूप विकसित होते हैं और ये लूप चट्टानों में गहराई तक होते हैं, जो प्रायः नदी अपरदन या भूतल के धीमे व लगातार उत्थान के कारण बनते हैं। कालान्तर में ये गहरे तथा विस्तृत हो जाते हैं और कठोर चट्टानी भागों में गहरे गॉर्ज व कैनियन के रूप में पाए जाते हैं।

ये उन प्राचीन धरातलों के परिचायक है जिन पर नदियाँ विकसित हुई है। बाढ व डेल्टाई मैदानों पर लूप जैसे चैनल प्रारूप विकसित होते हैं-जिन्हें विसर्प कहा जाता है । नदी विसर्प के निर्मित होने का कारण तटों पर जलोढ़ का अनियमित व असंगठित जमाव है, जिससे जल के दबाव का नदी पाश्वों की तरफ बढ़ता है। प्रायः बड़ी नदियों के विसर्प में उत्तल किनारों पर सक्रिय निक्षेपण होते हैं और अवतल किनारों पर अधोमुखी (Undercutting) कटाव होते हैं।

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प्रश्न 2.
घाटी रंध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
सामान्यतः धरातलीय प्रवाहित जल घोल रंध्रों व विलयन रंगों में से गुजरता हुआ भूमि के अन्दर नदी के रूप में विलीन हो जाता है और फिर कुछ दूर के पश्चात् किसी कंदरा से भूमिगत नदी के रूप में फिर से निकल आता है। जब घोलरंध्र व डोजाइन इन कंदराओं की छत के गिरने से या पदों के स्खलन द्वारा आपस में मिल जाते हैं, तो लम्बी तंग तथा विस्तृत खाइयाँ बनती है जो कि घाटी का युवाला कहलाती हैं।

प्रश्न 3.
चूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौमजल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि, जब चानें पारगम्य, कम सघन अत्यधिक जोड़ों/सन्धियों व दरारों वाली हो, तो घरातलीय जल का अन्त:स्रवण आसानी से होता है। लम्बवत् गहराई पर जाने के बाद धरातल के नीचे चट्टानों की संधियाँ, छिद्रों व संस्तरण तल से होकर क्षैतिज अवस्था में बहना प्रारंभ करता है।

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प्रश्न 4.
हिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति व नाम बताएं।
उत्तर:
हिमनद घाटियों में निम्नलिखित रैखिक निक्षेपण स्थलरूप पाए जाते हैं –

  1. हिमोढ़-हिमोद, हिमनद टिल (Till) – या गोलाश्मी मृहिका के जमाव की लम्बी कटकें।
  2. एस्कर (Eskers) – बड़े गोलाश्म, चट्टानी टुकड़े और छोटा चट्टानी मलबा हिमनद के नीचे बर्फ की घाटी में जमा हो जाते हैं, जो वक्राकार कटक के रूप में मिलते हैं।
  3. हिमानी धौत मैदान (Outwash plains) – हिमानी-जलोढ़ निक्षेपों से हिमानी धैत मैदान नर्मित होते हैं।
  4. ड्रमलिन का निर्माण हिमनद दरारों में भारी चट्टान मलबे के भरने व उसके बर्फ के चे रहने से होता है।

प्रश्न 5.
मरुस्थलीय क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरनदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?
उत्तर:
उष्ण मरूस्थलों के दो प्रभावशाली अनाच्छादनकर्ता कारकों में से पवन एक महत्त्वपूर्ण अपरदन का कारक है। मरुस्थलीय धरातल शीघ्र गर्म और शीघ्र ठंडे हो जाते हैं। उष्ण धरातलों के ठीक ऊपर वायु गर्म हो जाती है, जिससे हल्की गर्म हवा प्रक्षुब्दता के साथ उर्ध्वाधर गति करती है। इसके मार्ग में कोई रुकावट आने पर भँवर, वातावृत बनते हैं तथा अनुवात एवं उत्वात प्रवाह उत्पन्न होता है।

पवन, अपवाहन, घर्षण आदि द्वारा अपरदन करती हैं। मरुस्थलों में अपक्षय जनित मलबा केवल पवन द्वारा ही नहीं, बल्कि वर्षा च सृष्टि धोवन से भी प्रवाहित होता है। पवन केवल महीन मलबे का ही अपवाहन कर सकती है। जबकि वृहत् अपरदन मख्यतः परत बाढ़ या वृष्टि धोवन से ही सम्पन्न होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आई व शुक्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
आई व शुष्क जलवायु प्रदेशों में, जहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, प्रवाहित जल सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक हैं जो धरातल के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल के दो तत्त्व हैं। एक, धरातल परत के रूप में फैला हुआ प्रवाह है। दूसरा रैखिक प्रवाह है जो घाटियों में नदियों सरिताओं के रूप में बहता है।

प्रवाहित जल द्वारा निर्मित अधिकतर अपरदित स्थलरूप ढाल प्रवणता के अनुरूप बहती हुई नदियों की आक्रामक युवावस्था से संबंधित है। कालांतर में तेज ढाल लगातार अपरदन के कारण मंद ढाल में परिवर्तित हो जाते हैं और परिणामस्वरूप नदियों का वक्र कम हो जाता है, जिससे निक्षेपण आरंभ होता है।

तेज ढाल से बहती हुई, सरिताएं भी कुछ निक्षेपित भू-आकृतियाँ बनाती हैं, लेकिन ये नदियों के माध्यम तथा धीमे ढाल पर बने आकारों की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। प्रवाहित जल का ढाल जितना मंद होगा, उतना ही अधिक निक्षेपण होगा। जब लगातार अपरदन के कारण नदी तल समतल हो जाए, तो अधोमुखी कटाव कम हो जाता है और तटों का पार्श्व अपरदन बढ़ जाता है और इसके फलस्वरूप पहाड़ियाँ और घाटियाँ समतल मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।

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प्रश्न 2.
चूना घट्टानें आई व शुष्क जलवायु में भिन व्यवहार करती हैं क्यों ? चूना प्रदेश में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन-सी हैं और इसके क्या परिणाम हैं।
उत्तर:
चूने का पत्थर पतली एवं मोटी दोनों प्रकार की परतों में पाया जाता है तथा इसके कण महीन भी हो सकते हैं, साथ ही साथ बड़े भी। चूँकि लाइमस्टोन की रचना घुलनशील तत्त्व कैल्शियम कार्बोनेट से होती है, अत: यह आर्द्र जलवायु में शीघ्रता से घुल जाता है। इस कारण इस चट्टान पर रासायनिक अपक्षय का प्रभाव सर्वाधिक होता है।

लेकिन शष्क जलवाय में या शुष्क जलवायु वाले भागों में यह अपक्षय के लिए अवरोधक होता है। इसका मुख्य कारण ह है कि लाइमस्टोन की रचना में समानता होती है तथा परिवर्तन के कारण चट्टान में फैलाव तथा संकुचन नहीं होता है, कारण चट्टान का बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन अधिक मात्रा में नहीं हो पाता है।

चूना पत्थर (Limestone) या डोलोमाइट चट्टनों के क्षेत्र में भौम जल द्वारा घुलन प्रक्रिया और उसकी निशेपण प्रक्रिया से बने ऐसे स्थलरूपों को कार्स्ट (Karst topography) स्थलाकृति का नाम दिया गया है। अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक (दोनों प्रकार के स्थललरूप कार्ट स्थलाकृतियों की विशेषताएँ हैं। अपरदित स्थलरूप-कुंड (Pools) घोलरंध्र (Sinkholes), लैपिज (Lapies), और चूना पत्थर चबूतरे (Limestone pavements) हैं।

निक्षेपित स्थलरूप कंदराओं के भीतर ही निर्मित होते हैं। चूनायुक्त चट्टानों के अधिकतर भाग गतों व खाइयों के हवाले हो जाते हैं और पूरे क्षेत्र में अत्यधिक अनियमित, पतले व नुकीले कटक आदि रह जाते हैं, जिन्हें लेपीस (Lapies) कहते हैं। इन कटकों या लेपोस का निर्माण चट्टानों की संधियों में भिन्न घुलन प्रक्रियाओं द्वारा होता है। कभी-कभी लेपीज के विस्तृत क्षेत्र समतल चूना युक्त चबूतरों में परिवर्तित हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं या किस प्रक्रिया से यह सम्पन्न होता है बताएँ?
उत्तर:
हिमनदों से प्रबल अपरदन होता है जिसका कारण इसके अपने भार से उत्पन्न घर्षण होता है। हिमनद द्वारा कर्षित चट्टानी पदार्थ (प्रायः बड़े गोलाश्म व शैलखंड) इसके तल में ही इसके साथ घसीटे जाते हैं या घाटी के किनारों पर अपघर्षण व घर्षण द्वारा अत्यधिक अपरदन करते हैं। हिमनद अपक्षय रहित चट्टानों का भी प्रभावशाली अपरदन करते हैं, जिससे ऊँचे पर्वत छोटी पहाड़ियों व मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।
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हिमनद के लगातार संचलित होने से हिमनद मलबा हटता जाता है विभाजक नीचे हो जाता है और कालान्तर में ढाल इतने निम्न हो जो हैं कि हिमनद ही संचलन शक्ति समाप्त हो जाती है तथा निम्न पहाड़ियों व अन्य निक्षेपित स्थलरूपों वाला एक, मिनी धौत (Outwash plain) रह जाता है। चित्र (a) तथा (b) हिमनद के अपरदन व निक्षेपण से निर्मित स्थलरूपों को दर्शात हैं। हिमानीकृत पर्वतीय भागों में हिमनद द्वारा उत्पन्न स्थलरंध्रों में सर्क सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सर्क के शीर्ष पर अपरदन होने से हॉर्न निर्मित होते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र के आस-पास के स्थलरूप, उनके पदार्थ तथा वह जिन प्रक्रियाओं से निर्मित हैं, पहचानें।
उत्तर:
अध्यापकों या अपने अभिभावकों के साथ अपने आस-पास के क्षेत्रों में जाएँ और स्थलाकृतियों को पहचानने की कोशिश करें। पाठ्य-पुस्तक साथ में रखें (इस परियोजना का कार्य स्वयं करें)।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘U’-घाटी किस प्रकार बनती है?
उत्तर:
हिम का असमान संचलन हिम को खंडित कर देता है, जिससे इसमें दरारें पड़ जाती हैं। इन्हें हिमबिदर कहते हैं। ‘U’ आकार की हिम गह्वार तथा मेष शिलाएँ बनती हैं।

प्रश्न 2.
तरंगापवर्तन किसे कहते हैं?
उत्तर:
धीमी होने पर तरंगों की पंक्तियाँ विभिन्न खंडों में नहीं बल्कि तरंग शीष के साथ-साथ निरन्तर परिवर्तित होते हुए मुड़ती हैं। इस प्रक्रिया को तरंगापर्वतन कहते हैं।

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प्रश्न 3.
लैगून (Lagoon) कैसे निर्मित होते हैं?
उत्तर:
जब रोधिका तथा स्पिट किसी खाड़ी के मुख पर निर्मित होकर उसके मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं तब लैगून (Lagoon) निर्मित होते हैं।

प्रश्न 4.
पुलिन क्या है? ये कैसे बनते हैं?
उत्तर:
पुलिन अस्थाई स्थलाकृतियाँ हैं। ये अधिकतर थल से नदियों व सरिताओं द्वारा अथवा तरंगों के अपरदन द्वारा बहाकर लाए गए पदार्थ होते हैं।

प्रश्न 5.
स्कंध ढाल किसे कहते हैं?
उत्तर:
उत्तर किनारों का ढाल मंद होता है ओर ये स्कंध ढाल (Slip-off-bank) कहलाते हैं।

प्रश्न 6.
भू-आकृतिक विज्ञान किसे कहते हैं?
उत्तर:
भू-आकृतिक विज्ञान भू-आकृतियों की उत्पत्ति का विज्ञान है। परंपरागत रूप में यह अध्ययन भू-आकृतियों की उत्पत्ति एवं विकास तक ही सीमित था।

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प्रश्न 7.
एकरूपता का नियम क्या है?
उत्तर:
चार्ल्स लीयल के अनुसार प्रकृति सभी कालों में एक समान आचरण करती है। इसे एकरूपता का नियम कहते हैं। वास्तव में भौतिक एवं रसायनिक नियम ही एक समान रहते हैं और भू-वैज्ञानिक क्रियाओं को निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 8.
प्रथम कोटि की भू-आकृतियाँ किस प्रकार की है?
उत्तर:
प्रथम कोटि की भू-आकृतियों में महाद्वीप और महासागर द्रोणियाँ सम्मिलित है, जो पृथ्वी के उच्चावचकी सबसे बड़ी इकाइयों को अपने में समेटे हुए हैं।

प्रश्न 9.
तुषार-क्रिया किसे कहते हैं?
उत्तर:
मध्य एवं उच्च अक्षांशों की जलवायु तथा उच्च तुंगता के क्षेत्रों में पानी का बारी-बारी जमना एवं पिघलना-तुषार क्रिया कहलाता है।

प्रश्न 10.
कणिकी विघटन किसे कहते हैं?
उत्तर:
शैल सबसे पहले खंडों में टूटती है, जिसे खंड विघटन कहते हैं। इसके बाद यह कणों में बदलती है, जिसे किणका विघटन कहते हैं।

प्रश्न 11.
सॉलीफ्लक्शन किसे कहते हैं?
उत्तर:
वृक्ष विहीन टुंडा प्रदेश में मृदा-प्रवाह को अंग्रेजी में सॉलीफ्लक्शन कहते हैं।

प्रश्न 12.
अवसर्पण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब कोई अकेला शैल खंड अपने क्षैतिज अक्ष पर पीछे की ओर सर्पिल होकर एक चक्र विभंग तल पर लढकता है. उसे अवसर्पण कहते हैं।

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प्रश्न 13.
हिमानी का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्राकृतिक रूप से भूमि पर संचित किसी भी विशाल हिमराशि को हिमानों कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘द्रोणी झील’ की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर:
भूमि पर संचित विशाल हिमराशि को हिमानी कहते हैं। हिमानियों द्वारा अपने तल का कर्षण करने से हिमनद-द्रोणी का निर्माण होता है। यदि हिमनद-द्रोणी जल से भर जाता है. तो द्रोणी झील की उत्पत्ति होता है, जो हिमनद द्रोणी समुद्र के पास बनती है, वह समुद्र जल से भर जाती है। प्रत्येक द्रोणी के शीर्ष पर अति तीव्र ढाल वाली एक अर्ध-वृताकार बेसिन की रचना होती है, जिसे गह्वर कहते हैं।

प्रश्न 2.
यान्त्रिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
यान्त्रिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 3.
भू-प्रवाह एवं पंक प्रवाह में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भू-प्रवाह एवं पंक प्रवाह में अन्तर –
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प्रश्न 4.
जलोढ़ पंख एवं डेल्टा में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
जलोढ़ पंख एवं डेल्टा में अन्तर –
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प्रश्न 5.
V आकार घाटी एवं U आकार घाटी में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
V आकार घाटी एवं U आकार घाटी में अन्तर –
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प्रश्न 6.
पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ कौन-सी है?
उत्तर:
पृथ्वी के निर्माण के पश्चात् महाद्वीपों तथा महासागरों का निर्माण हआ। ये प्रथम श्रेणी की भू-आकृतियाँ हैं। इसके पश्चात् विवर्तनिक भू-संचरणों के कारण पर्वत, पठार तथा मैदान बनें। इन्हें पृथ्वी की प्रमुख भू-आकृतियाँ कहते हैं। इन भू-आकृतियों का मानव के लिए अलग-अलग महत्त्व है। पर्वत तथा पठार सम्पदाओं के भण्डार हैं। ये भू-आकृतियाँ भूगोलवेत्ताओं के लिए विशेष महत्त्व रखती है, क्योंकि वह इन क्षेत्रों में मानव-क्रियाकलापों का अध्ययन करता है।

प्रश्न 7.
विवर्तनिक संचरण से उत्पन्न पर्वतों के प्रकार बताएँ एवं उदाहरण दें।
उत्तर:
पर्वत ऐसे उँचे प्रदेश को कहते हैं, जो अपने आस-पास के क्षेत्र में 900 मीटर से अधिक ऊँचा हो। 900 मीटर से कम ऊँचे प्रदेश को पहाडी कहते हैं। कई क्षेत्र सापेक्ष ऊँचाद्र कम होने पर भी पहाडी कहे जाते हैं। जैसे-पारसनाथ की पहाडी. लेकिन कई क्षेत्र कम ऊँचे होते हैं और उनकी ऊँचाई अधिक होती है, पर्वत कहलाते हैं। जैसे-इंग्लैण्ड में पेनाइन पर्वत। भूसंचरण से उत्पन्न पर्वतों को विवर्तनिक पर्वत कहते हैं। ये प्रायः दो प्रकार के हैं-वलित पर्वत तथा खण्ड पर्वत।

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प्रश्न 8.
भू-द्रोणी से आपका क्या अभिप्राय है? उदाहरण देकर बताएँ।
उत्तर:
पतले लम्बे तथा गहरे समुद्री अथवा झील बेसिन को भू-द्रोणी कहते हैं। इन भू-द्रोणियों में एकत्रित मलबे पर दबाव पड़ने तथा उठान से बलित पर्वत बनते हैं। टैथीज भू-द्रोणी में ही हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ है। भूपृष्ठीय ढाल, जो स्थल प्रवाह द्वारा जलमागों के जल के साथ मिलकर एक अपवाह द्रोणी की रचना करता है। इस द्रोणी की सीमा एक रेखा के रूप में पहाड़ियों की अविरत श्रृंखला का अनुसरण करती है।

प्रश्न 9.
युवा वलित तथा प्राचीन वलित पर्वत किसे कहते हैं?
उत्तर:
युवा वलित पर्वत-वे पर्वत जिमका निर्माण हए अधिक समय नहीं हुआ है। इन पर्वतों की निर्माण क्रिया अभी चल रही है। हिमालय पर्वत, रॉकी पर्वत, आल्पस पर्वत इसके प्रमुख उदाहरण हैं। प्राचीन वलित पर्वत-ये पर्वत है, जिनका निर्माण प्राचीन काल में हआ है। ये पर्वत अपरदन के कारण कम ऊँचे हैं। यूराल पर्वत, अप्लेशियन पर्वत तथा शॉन पर्वत इनके उदाहरण हैं।

प्रश्न 10.
मैदानों का मानव के लिए क्या महत्त्व है?
उत्तर:
महत्त्व –

  • मैदानों में निवास की सुविधाएँ होती हैं।
  • मैदानों के समतल धरातल तथा गहरी उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि की सुविधा है।
  • मैदान अन्न के भण्डार है।
  • मैदानों की समतल भूमि पर यातायात के साधन सरलता से बनाए जाते हैं।
  • मैदानों में बड़े-बड़े उद्योग तथा नगर स्थित होते हैं।
  • मैदान प्राचीन सभ्यताओं के पालने हैं।

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प्रश्न 11.
विभिन्न प्रकार की जलवायु में भू-आकृतियों पर भिन्न संरचनाओं वाली चट्टानों के प्रभावों का वर्णन करो।
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र में भू-आकृतियों के निर्माण में चट्टानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। निम्नलिखित गुण महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं –

  1. कठोरता
  2. संधियाँ
  3. पारगम्यता
  4. संरन्ध्रता।

विभिन्न प्रकार की जलवायु में विभिन्न भू-आकृतियाँ बनती है। उष्ण-आर्द्र जलवायु में चूने का पत्थर अपक्षयित हो जाता है। परन्तु शुष्क प्रदेशों में तीव्र ढाल वाली चट्टान के रूप में रहता है। शीत प्रदेशों में पाले के प्रहार से चट्टानें टूट जाती है। शुष्क प्रदेशों में ग्रेनाइट से गुम्बदनुमा भू-आकार बनते हैं, जिन्हें ‘टोर’ कहा जाता है।

प्रश्न 12.
भूस्खलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया से शैल अदृढ बन जाती है। जब गरुत्वाकर्षण बल उन्हें नीचे लाता है, तो इन्हें शैलपात कहते हैं। गिरते हुए शैल खंड छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाते हैं और एक ऐसी ढाल का निर्माण करते हैं, जिस पर अदृढ़ पदार्थ बिखरे पड़े होते हैं, इन्हें शैल मलबा कहते हैं। शैल खंड का अकेले धरातल पर नीचे लुढ़कना भूस्खलन (शैल स्खलन) कहलाता है।
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प्रश्न 13.
नदी निक्षेपण किस प्रकार होता है?
उत्तर:
नदी का वेग कम होने लगता है, गाद के मोटे कण नीचे बैठने लगते हैं, जबकि बारीक मृत्तिका अनिश्चित रूप से परिवहन जारी रखती है। इसे नदी निक्षेपण कहते हैं। मृत्तिका समुद्र में पहुँचकर समुद्र के नमकीन जल के सम्पर्क में आती है और इसमें उपस्थित कण बड़े हो जाते हैं। इसे ऊर्णन कहते हैं। मध्यम तथा मोटे आकार वाले बालू के कण तथा बड़े टुकड़े नदी के तल पर तल भार के रूप में यात्रा करते हैं। नदी विसर्प, बाढ़ के मैदान, गुंफित मार्ग, गोखुर झील तथा डेल्टा आदि का निर्माण नदी निक्षेपण के कारण होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
विभिन्न प्रकार के वृहत क्षरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वृहत क्षरण के रूप प्रलयंकारी अवसर्पण से लेकर जलसंतृप्त मृदा के मन्द प्रवाह तक हो सकते हैं। मृदा लम्बे काल से पर्वत ढाल के सहारे अति मन्द गति से नीचे की ओर निरन्तर संचालित हो रही है। इसे मृदा सर्पण कहते हैं। आर्द जलवायु वाले पर्वतीय तथा पहाड़ी क्षेत्रों में जलसंतृप्त मिश्रित मृदा मृत्तिका खनिजों में धनी रेगोलिथ मृदा प्रवाह का रूप लेती है। जब खनिज पदार्थों के अनुपात में जल की मात्रा अधिक होती है, तो वह वृहत क्षरण पंक प्रवाह का रूप ले लेता है। यह नदी मागों में तेजी के साथ यात्रा करता है।

सीधे शैल-भृगु के किनारे भौतिक अपक्षय की प्रक्रिया शैल को अदृढ़ बना देती है। गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें नीचे लाता है, तो उसे शैलपात का नाम दिया जाता है। शैलखंड टूट-टूटकर एक ऐसे ढाल का निर्माण करती है, जिन्हें शैल मलबा कहते हैं। शैलखंड का धरातल पर नीचे लुढ़कना शैल स्खलन कहलाता है । जब कोई अकेला शेलखंड सर्पिल होकर एक वक्र विभाग तल पर लुढ़कता है, तो उसे अवसर्पण कहते हैं।
अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण की प्रक्रियाएँ अनेक कारकों, जैसे-प्रवाहित जल, हिमनदी । या हिमानी, समुद्री तरंगों तथा पवनों द्वारा क्रियान्वित की जाती है।
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1. प्रवाहित जल – प्रवाहित जल अनाच्छादन का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है। अपक्षय एक वृहत् क्षरण के साथ मिलकर नदी क्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया, जिसे नदीय अनाच्छादन कहते हैं, के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल भू-आकृतिक कारक के रूप में दो आधारभूत विधि से कार्य करता है। पहला है स्थल प्रवाह। इसमें भूपृष्ठ के ऊपर जल प्रवाह ढाल के सहारे लगभग एक विस्तृत परत के रूप में गतिशील रहता है।

दूसरा है मार्ग प्रवाह अथवा नदी प्रवाह, जिसमें जल एक सुनिश्चित लम्बे संकीर्ण तथा गहरे मार्ग से होकर नीचे तल की ओर बहता है, जिसे नदी मार्ग कहते हैं। नदी मार्ग अनेक शाखाओं के रूप में जलमार्ग का एक जाल बनाती है। जब नदी का वेग कम होने लगता है, गोद के मोटे कण नीचे बैठने लगते हैं। यह नदी का निक्षेपण है। नदी विसर्प, बाढ़ के मैदान, गुफीत मार्ग, गोखुर झील तथा डेल्टा आदि का निर्माण नदी के निक्षेपण के कारण होता है।

2. हिमानी – प्राकृतिक रूप से संचित विशाल हिम राशि को हिमानी कहते हैं । हिम विनाश की औसत दर हिमपात से अपेक्षाकृत कम होती है। हिमानी के निचले भाग में अपक्षरण की दर विनाश की संचयन दर से बढ़ जाती है। हिम की शुद्ध हानि का यह क्षेत्र अपक्षरण क्षेत्र कहलाता है।

3. पवनें – पवनें पृथ्वी पर पवन अपरदन तथा निक्षेपण की अवस्थितियों को प्रभावित करती हैं। पवन अपरदन एक प्रकार की अपवाहन है। पवन अपरदन से उत्पन्न उथले गर्तो अपवाहन गर्त अथवा वातगर्त कहते हैं। वालूवात्या क्रिया पवन अपरदन का दूसरा रूप है। यह अपरदन तब होता है, जब बालू के कण शैल पृष्ठ के अनावरित भाग पर जोर से टकराते हैं। छत्रक शैल, खोंच, मधुछत्ता कुछ ऐसे लक्षण है, जो बालूवात्या पवन परिवहन से बनी भू-आकृति को लोएस कहते हैं। बालू टिब्बे मरुस्थलों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भू-आकृतियाँ हैं।
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4. तरंगें – समुद्री तरंगों द्वारा अपरदन विनाशकारी प्रक्रियाएँ है, जो पदार्थों को परिवहन तथा निक्षेपण के साथ क्रियाशील हैं। तरंग-क्रिया अपरदन का प्रमुख कारक है। पवन द्वारा उत्पन्न महासागरीय तरंगें दो प्रकार की होती है-प्रगामी तरंगें, जिसमें जल से होकर तरंगें तेजी से संचलन करती है, तथा दोलनी तरंग, जो केवल ऊपर-नीचे संचलन करती हैं। इससे तरंग-अपरदित आलों (खाँचों) तथा समुद्री गुफाओं की रचना होती है। समुद्र का अपरदन का कार्य मुख्य रूप से तरंग के आकार तथा शक्ति, समुद्र की ओर ढाल, उच्च एवं निम्न ज्वारभाटा के मध्य तट की ऊँचाई, शैल संघटन तथा जल की गहराई पर निर्भर करता है। अपरदन समुद्री तरंगों के घुलनशील तथा रासायनिक क्रियाओं द्वारा भी प्रभावित होता है।
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प्रश्न 2.
मैदान क्या होते हैं? मैदानों का वर्गीकरण करें। प्रत्येक के उदाहरण दें।
उत्तर:
प्रमुख भू-आकृतियों में मैदान सबसे अधिक स्पष्ट तथा सरल है। स्थल के अधिकांश भाग (40 प्रतिशत) पर इनका विस्तार है। मैदान भू-धरातल पर निचले तथा समतल प्रदेश होते हैं। मैदान स्थल के वे समतल भाग हैं, जो सागर तल से 150 मी. से कम ऊँचाई पर हों तथा उनकी ढाल धीमी तथा साधारण हो।

मैदान समुद्रतल से ऊँचे या नीचे हो सकते हैं। परन्तु अपने आस-पास के पठार या पर्वत से कभी भी ऊँचे नहीं हो सकते। सभी मैदान समुद्र तल से समान ऊँचाई पर नहीं होते । कई मैदान समुद्र तल से बहुत ऊँचे होते हैं, जैस संयुक्त राज्य अमेरिका के महान् मैदान 1500 मीटर ऊँचे हैं। परन्तु हॉलैंड का तट समुद्र तल से नीचा है।

मैदान तीन प्रकार से बनते हैं –

  • अपरदन से – बाहरी शक्तियों के अपरदन से ऊँचे-नीचे मैदान बनते हैं।
  • निक्षेपण से – नदी, हिमनदी तथा वायु द्वारा लाई गई सामग्री के निक्षेपण से मैदान बनते हैं।
  • पृथ्वी की हलचल – पृथ्वी की भीतरी शक्तियों की हिलडुल के कारण तटवर्ती मैदान बनते हैं।

वर्गीकरण – रचना के आधार पर मैदानों को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:

  1. जलोढ़ मैदान
  2. अपरदन के मैदान
  3. हिमानी मैदान
  4. सरोबरीय मैदान
  5. तटीय मैदान
  6. लोएस मैदान

1. जलोढ़ मैदान – नदियों द्वारा तलछट के जमाव से विशाल जलोढ़ मैदान बनते हैं। नदियों का उद्देश्य स्थल भाग को काटकर सागर तल तक ले जाना होता है। पर्वतों से निकलकर नदियाँ भाभर का मैदान बनाती है। निचली घाटी में बाढ़ के समय बारीक मिट्टी के जमाव से बाढ़ का मैदान बनता है। सागर में गिरने से पहले एक समतल त्रिकोण आकार का मैदान बनाती है, जिसे डेल्टा कहते हैं। नदियों द्वारा बने मैदान बड़े उपजाऊ होते हैं।

उदाहरण – भारत में गंगा-सतलुज का विशाल मैदान चीन में ह्वांग हो तथा यंगसीक्यांग नदी का मैदान, अमेरिका में मिसीसिपी का मैदान।

2. अपरदन के मैदान – लम्बे समय तक हिम, जल, वायु आदि के निरंतर कटाव के कारण पर्वत या पठार घिस कर नीचे हो जाते हैं तथा मैदानों का रूप धारण कर लेते हैं। ये मैदान पूर्ण रूप से समतल नहीं होते । इन मैदानों का ढाल अत्यन्त हल्का होता है। इनके बीच कठोर चट्टानों के रूप में ऊँचे टीले मिलते हैं। ऐसे मैदान में कठोर चट्टानों के टीले नष्ट नहीं होते । इन्हें मोनेडनाक कहते हैं। इन्हें उपान्त मैदान भी कहते हैं।

उदाहरण – फिनलैंड तथा साइबेरिया का मैदान, भारत में अरावली प्रदेश, अफ्रीका में सहारा मैदान, यूरोप का मैदान ।

3. हिमानी मैदान – ये मैदान हिम नदी या ग्लेशियर के निक्षेप से बनते हैं । हिम नदी कटाव द्वारा ऊँचे भागों को काट-छाँटकर सपाट मैदान का निर्माण करती हैं। इनमें झीलें, जल प्रपात तथा ऊँचे-नीचे दलदली प्रदेश मिले हैं। जब बर्फ पिघलती है, तो अपने साथ बहाकर लाई मिट्टी बजरी, कंकर आदि निचले स्थानों तथा गड्ढों में भर देती है। इससे धरातल समतल बन जाता है। इन मैदानों में हिमोढ़ के जमाव से बने मैदान को ड्रिफ्ट मैदान भी कहते हैं। हिम नदी के अपरदन से भी मैदान बनते हैं, जिनमें छोटे-छोटे टीले इधर-उधर बिखरे होते हैं।

उदाहरण – हिम युग में उत्तरी अमेरिका, कनाडा तथा यूरोप बर्फ से ढके हुए थे। बर्फ पिघलने से वहाँ हिमानी मैदान बन गए। जैसे-उत्तर-पूर्वी लद्दाख का मैदान।

4. सरोवरीय मैदान – झीलों के भरने या सूख जाने से उन स्थानों पर सरोवरीय मैदान बनते हैं। झीलों में गिरने वाली नदियाँ अपने साथ लाई हुई मिट्टी आदि झील में जमा करती हैं, जिससे झील की तली ऊँची हो जाती है, गहराई कम हो जाती है और धीरे-धीरे झील पूरी तरह भरकर एक सपाट मैदान बन जाती है, पृथ्वी की भीतरी हलचल के कारण झील की तली ऊपर उठ जाने से भी मैदान बनते हैं।

उदाहरण – उत्तरी अमेरिका का प्रेवरीज का हरा भरा मैदान, हंगरी का मैदान, भारत में कश्मीर घाटी, मणिपुर में इम्फाल बेसिन ।

5. तटीय मैदान – तटीय मैदान प्रायः समुद्र के किनारे स्थित होते हैं, जो तटीय भाग जल में डूब जाते हैं उन पर तलछट के जमाव के कारण तटीय मैदान बनते हैं। सागरों के पीछे हटने से भी स्थल भाग सूखकर मैदान बन जाते हैं। पृथ्वी की हलचल के कारण तट के समीप कम गहरा समुद्र ऊँचा उठ जाता है। प्रायः तटीय मैदान का ढाल समुद्र की ओर धीमा होता है। इनका महत्त्व बन्दरगाहों तथा समुद्री व्यापार से है।।

उदाहरण – अमेरिका की खाड़ी का तटीय मैदान तथा महान् मैदान, भारत का पूर्वी तटीय मैदान, रूस का मैदान ।

6. लोएस का मैदान – वायु द्वारा बने मैदान की रेगिस्तानी या लोएस का मैदान कहते हैं। वायु रेत को उड़ाकर दूर-दूर के स्थानों में जमा करती है। एक पर्त के ऊपर दूसरी पर्त के बिछ जाने से इन मैदानों की रचना होती है। ऐसे मैदानों में रेत के डिब्बे अधिक होते हैं।

उदाहरण – उत्तर पश्चिमी चीन में सैंसी तथा शांसी प्रदेशों में लोएस का मैदान मिलते हैं। । पंजाब तथा हरियाणा की सीमा पर लोएस का मैदान मिलते हैं, रूसी तुर्किस्तान का मैदान ।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?
(क) निक्षेपण
(ख) ज्वालामुखियता
(ग) पटल विरूपन
(घ) अपरदन
उत्तर:
(घ) अपरदन

प्रश्न 2.
जल योजना प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) क्ले
(घ) लवण
उत्तर:
(घ) लवण

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प्रश्न 3.
मलबा अवधाव की घाटी बनती है।
(क) भूस्खलन
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन
(ग) मंदी प्रवाही वृहत् संचलन
(घ) अवतलन/धसकन
उत्तर:
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन

प्रश्न 4.
भू-आकार की घाटी बनती है।
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रफ़्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे?
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने एवं मुदा निर्माण कार्य में सहायक होती हैं बल्कि वे अपदन्न एवं वृहत संचलन के लिए भी उत्तरदायी हैं । जैव मात्रा एवं जैव विविधता प्रमुखतः वन (वनस्पति) की उपज हैं तथा वन अपक्षयी प्रावार की गहराई अर्थात् न केवल आवरण प्रस्तर एवं मिट्टी अपितु वृहत् संचलन पर निर्भर करता है।

यदि चट्टानों का अपक्षय न हो तो अपरदन का बोई महत्त्व नहीं होता। चट्टान का अपक्षय एवं निक्षेपण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान है। यह कुछ खनिजों जैसे लोहा, मैंगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा अयस्कों के समृद्धिकरण (enrichment) एवं संकेन्द्रण (concentration) में सहायक होता है।

प्रश्न 2.
वृहत् संचलन जो वारविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य (Perceptible) हैं, वे क्या हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
वृहत् संचलन के अन्तर्गत वे सभी संचलन आते हैं, जिनमें चट्टानों के मलवा (debris) का गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढाल के सहारे बना गतिज ऊर्जा या किसी भू-आकृतिक कारक की सहारप्ता के स्थानान्तरण निहित होता है। वृहत संचलन के लिए अपक्षय अनिवार्य नहीं है, यद्यपि वृहत् संचलन को बढ़ावा देता है।

असम्बद्ध कमजोर पदार्थ, छिछले संस्तर वाली चट्टानें, अंश, तीव्रता से झूके हुए संस्तर, खड़े भृगु या तीव्र ढाल, पर्याप्त वर्षा, मूसलाधार वर्षा तथा वनस्पति का अभाव, झीलों, नदियों जलाशयों से भरी मात्रा में जल निष्कासन, विस्फोट आदि वृहत् संचलन को अनुकूलित करते हैं।

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प्रश्न 3.
विभिन्न गतिशिल एवं शक्तिशाली बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य सम्पन करते हैं।
उत्तर:
बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपनी उर्जा से अन्तर्जनित शक्तियों से नियन्त्रित विवर्तनिक (tectonic) कारकों से उत्पन्न प्रवणता द्वारा निर्धारित वायुमण्डल से प्राप्त करते हैं। ढाल या प्रवणता बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारकों से नियन्त्रित विवर्तनिक कारकों द्वारा निर्मित होती हैं। बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपक्षय, वृहत क्षरण संचलन, अपरदन परिवहन आदि सभी प्रधान कार्य सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 4.
क्या मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?
उत्तर:
हाँ, मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है क्योंकि अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों के समुच्चय पर निर्भर करता है। कालान्तर में ये समुदाय (combine) अपक्षयी प्रावार (Mantle) की मूल विशेषताओं को जन्म देते है और यह अपक्षयी प्रवार ही मृदा निर्माण का मल निवेश होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
“हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है,” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धरातल पृथ्वी मण्डल के अन्तर्गत उत्पन्न हुई बाह्य शक्तियों एवं पृथ्वी के अन्दर अद्भुत आन्तरिक शक्तियों से अनवरत प्रभावित होता है तथा यह सर्वदा परिवर्तनशील है। बाह्य शक्तियों को बहिर्जनिक (exogenic) तथा आन्तरिक शक्तियों को अन्तर्जनित (endogenic) शक्तियाँ कहते हैं।

बहिर्जनिक शक्तियों के क्रियाओं का परिणाम होता है उमड़ी हुई भू-आकृतियों का विघर्षण (wearing down) तथा बेसिन/निम्नक्षेत्रों/गों के भराव (अधिवृद्धि/तल्लोचन) धरातल पर अपरदन के माध्यम से उच्चावच के मध्य अन्तर के कम होने के तथ्य को कहते हैं, क्रमस्थापन radation) अन्तर्जनित शक्तियाँ निरन्तर धरातल के भागों के ऊपर उठाती हैं या उनका निर्माण करती है तथा इस प्रकार वे उच्चावच में मिलता को सम (बराबर) करने में असफल रहती है। अतएव भिन्नता तब तक बनी रहती है जब तक बर्हिजनिक एवं अन्तर्जनिक शक्तियों के विरोधात्मक प्रतिकूल कार्य चलते रहते हैं।

सामान्यतः अन्तर्जनित शक्तियाँ मूल रूप से आकति निर्मात्री शक्तियाँ हैं तथा बर्हिजनिक प्रक्रियायें मुख्य रूप से भूमि विघर्षण शक्तियाँ होती हैं। धरातल का निर्माण एवं विघटन क्रमशः अन्तर्जनित एवं बर्हिजनिक शक्तियों द्वारा भूपर्पटी के उद्भव एवं उसके वायुमण्डल द्वारा आवृत होने के समय से चला आ रहा है।

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प्रश्न 2.
‘बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यह कहना बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है कि बाहाजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य गर्मी से प्राप्त करती हैं। तापक्रम तथा वर्षा दो महत्त्वपूर्ण जलवायविक तत्व हैं जो विभिन्न प्रक्रियाओं को नियन्त्रित करते हैं। सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को एक सामान्य शब्दावली अनाच्छादन (denudation) के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अपक्षय,

वहत क्षरण संचलन, अपरदन, परिवहन आदि इसमें सम्मिलित होते हैं। अनाच्छाद प्रक्रियाओं तथा उनसे सम्बन्धित परिचालक/प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। वनस्पति का घनत्व, प्रकार एवं वितरण, जो मुख्यतः उर्जा एवं तापमान पर निर्भर करते हैं, बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्राक्रियाओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। इन सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की शक्ति का स्त्रोत ऊर्जा है। अत: हम कह सकते हैं कि बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियायें अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती है।

प्रश्न 3.
क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय – प्रक्रियाएँ कुछ अनुप्रयुक्त शक्तियों (forces) पर निर्भर करती हैं। ये अनुप्रयुक्त शक्तियाँ हो सकती हैं –
1. गुरुत्वाकर्षण शक्तियाँ, जैसे अधिक भार का दबाव, भार एवं अपरूपण प्रतिबल (sheadr stress)

2. तापक्रम में परिवर्तन क्रिस्टल वृद्धि पशुओं के कार्य के कारण उत्पन्न विस्तारण (expansion) शक्तियाँ, शुष्कण एवं आईन चक्रों से नियामित जल का दबाव। भौतिक अपक्षय प्रक्रियाओं में अधिकांश तापीय विस्तारण एवं दबाव के निर्मुक्त होने (release) के कारण होती है। ये प्राक्रियाएँ लघु एवं मन्द होती हैं।

लेकिन बार-बार संकुचन एवं विस्तारण के कारण चट्टान के सन्तति श्रांति (Fatigue) के फलस्वरूप ये चट्टानों को बड़ी हानि पहुंचा सकती हैं। रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाओं का एक वर्ग, जैसे जलयोजन, ऑक्सीजन न्यूनीकरण, कार्बोनेटीकरण, विलयन, चट्टानों पर उन्हें अपघटित/वियोजित, घुलित या सूक्ष्म खण्डन अवस्था में रसायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ऑक्सीजन, सतही और मृदा जल एवं अन्य अम्ल द्वारा न्यूनीकरण के लिए कार्यरत रहता है।

इसमें ऊष्मा के साथ जल एवं वायु को विद्यमानता सभी रासयनिक प्रतिक्रियाओं को तीव्र गति देने के लिए आवश्यक है। अतः भौतिक एवं रसायनिक अपक्षय की ये प्रक्रियाएँ अतसम्बन्धित हैं। ये साथ-साथ चलती रहती हैं तथा अपक्षय प्रक्रिया को त्वरित बना देती हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 6 भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ

प्रश्न 4.
आप किस प्रकार मृदा निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा निर्माण कारकों के बीच अन्तर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा निर्माण में दो महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाएं सर्वधम अपक्षय पर निर्भर करती हैं तथा अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों समुच्चय पर निर्भर करता है। मृदा निर्माण पाँच मूल कारकों के द्वारा नियन्त्रित होता है। ये कारक हैं –

  • जलवायु
  • स्थलाकृति
  • उच्चावच मूल पदार्थ
  • चट्टान जैविक प्रक्रियाएँ
  • कालावधि वस्तुतः मृदा निर्माण कारक संयुक्त रूप से कार्यरत रहते हैं एवं एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करते हैं।

जलवायु (Climate) – जलवायु मृदा निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण सक्रिय कारक है। मृदा के विकास में संलग्न जलवायविक तत्त्वों में प्रमुख हैं –

प्रवणता, बारम्बारता एवं वर्षा-वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता के सन्दर्भ में नमी।
तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

  • वर्षा से मृदा को जल मिलता है। रासायनिक एवं जैविक क्रियाएँ इसके बिना सम्भव नहीं होती । कुछ रसायन पानी में घुल जाती हैं एवं
  • सकारात्मक तथा नकारात्मक रूप से आवेशित घटकों में अपने को अलग कर लेती हैं।
  • ये तत्त्वों के जटिल रासायनिक अन्तः परिवर्तन/विनिमय में सहायक होते हैं जो मिट्टी के विकास एवं पौधे की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं।

जैविक क्रियायें (Biological Activities) – वनस्पति आवरण एवं जीव जो मूल पदार्थों पर प्रारम्भ तथा बाद में विद्यमान रहते हैं मृदा में जैव पदार्थ, नमीधारण की क्षमता तथा नाइट्रोजन इत्यादि जोड़ने में सहायक होते हैं। मृत पौधे मृदा को सूक्ष्मता विभाजित जैव पदार्थ ह्यूमस प्रदान करते हैं। कुछ जैविक अम्ल जो ह्यूमस बनने की अवधि में निर्मित होते हैं मृदा के मूल पदार्थों के खनिजों के विनियोजन में सहायता करते हैं। बैक्टेरियल कार्य की प्रवणता ठण्डी एवं गर्म जलवायु की मिट्टियों/मृदाओं में अन्तर को दर्शाती हैं।

राइजोबियम (Rhizobium) एक प्रकार के बैक्टेरिया, जंतुवाले पौधे की जड़ ग्राथिका में रहता है तथा मेजबान पौधों के लिए लाभकारी नाइट्रोजन निर्धारित करता है। चींटी, दीमक, केचुए, कृतक (roderts) इत्यादि जानवरों का महत्त्व अभियान्त्रिकी (mechanical) सा होता है, लेकिन मृदा निर्माण में यह महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि वे मृदा को बार-बार ऊपर नीचे करते रहते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने चतुर्दिक विद्यमान भू-आकृतिक/उच्चावच एवं पदार्थों के आधार पर जलवायु, सम्भव अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्त्वों और विशेषताओं को परखिए एवं अंकित कीजिए।
उत्तर:
इस अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित जानकारियों एवं विशेषताओं को सूचीबद्ध करें परियोजना को स्वयं करें। इस अध्याय में जूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ दी गई हैं।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवसर्पण तथा शैल पतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
दाल जिस पर संचलन होता है, के संदर्भ में पश्च-आवर्तन (Rotation) के साथ शैल-मलबा की एक या कई इकाइयों के फिसलन (slipping) को अवसर्पण कहते हैं। किसी तीव्र ढाल के सहारे शैल खण्डों का ढाल से दूरी रखते हुए स्वतन्त्र रूप से गिरना शैल पतन (Fall) कहलाता है।

प्रश्न 2.
अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, अनिवार्य नहीं। इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपरदन द्वारा उच्चावचन का निम्नीकरण होता है। अर्थात् भू-दृश्य विधर्षित होते जाते हैं। इसका तात्पर्य ये है कि अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, लेकिन अपक्षय अपरदन के लिए अनिवार्य दशा नहीं है। अपक्षय, वृहत् क्षरण एवं अपरदन निम्नीकरण की प्रक्रियाएँ हैं।

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प्रश्न 3.
वृहत् संचलन और अपरदन में अन्तर बतायें।
उत्तर:
वृहत् संचलन में शैल मलबा चाहे वह शुष्क हो अथवा नम, गुरुत्वाकर्षण के कारण स्वयं आधार तल पर जाते हैं। लेकिन प्रवाहशील जल, हिमानी लहरें एवं धाराएँ तथा वायु निलाम्बित मलबे को नहीं ढोते हैं। वस्तुत: यह अपरदन ही है जो धरातल में होने वाले अनवरत परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। अपरदन एवं परिवहन गतिज ऊर्जा द्वारा नियन्त्रित होता है। धरातल के पदार्थों का अपरदन एवं परिवहन वायु, प्रवाहशील जल, हिमानी लहरों एवं धाराओं तथा भूमिगत जल द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
मृदा निर्माण में समय (कालवधि-time) की क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाओं के प्रचलन में लगने वाले काल (समय) की अवधि मृदा की · परिपक्वता एवं उसके पार्थिवका (profile) का विकास निर्धारण करती है। एक मृदा तभी परिपक्व होती है जब मृदा निर्माण की सभी प्रक्रियाएँ लम्बे काल तक पार्थिवका विकास करते हुए कार्यरत रहती है। कुछ समय पहले निक्षेपित जलोढ़ मिट्टी या हिमानी टिले से विकसित मृदायें तरुण या युवा (Young) मानी जाती हैं तथा उनमें संस्तर (Horizon) का अभाव होता है अथवा कम विकसित संस्तर मिलता है।

प्रश्न 5.
मृदा निर्माण में जलवायु किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
मृदा के विकास में संलग्न जलवायवी तत्त्वों में प्रमख हैं –

  1. प्रवणता वर्षा एवं बारम्बारता वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता बारम्बारता
  2. तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

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प्रश्न 6.
ऑक्सीकरण एवं न्यूनीकरण में अन्तर बताइए।
उत्तर:
खनिज एवं ऑक्सीजन का संयोग, ऑक्सीकरण कहलाता है। जहाँ वायुमण्डल एवं ऑक्सीजन युक्त जल मिलते हैं। इस प्रक्रिया में लौह, मैंगनीज, गंधक (Suphur) इत्यादि सर्वाधिक शामिल होते हैं। ऑक्सीकरण एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जो लौह धारक बायोटाइट, ओलीवाइन एवं पाइरोक्सीन जैसे खनिजों को प्रभावित करती है। ऑक्सीकरण होने पर लौह का लाल रंग भूरे या पीले रंग में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 7.
अपक्षय के महत्त्व पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ शैलों को छोटे-छोटे टुकड़ो में तोड़ने के लिए तथा न केवल आवरण प्रस्तर एवं मृदा निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करती है अपितु अपरदन एवं वृहत् संचालन के लिए भी उत्तरदायी होती है। यदि शैलों का अपक्षय न हो तो अपरदन का कोई महत्त्व नहीं होता । शैलों का अपक्षय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मूल्यवान कुछ खनिजों जैसे-लोहा, मैगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा के अयस्कों के समृद्धिकरण एवं संकेन्द्रण में सहायक होता है। अपक्षय मृदा निर्माण की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।

प्रश्न 8.
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 9.
अन्तर्जात बल तथा बर्हिजात बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के आन्तरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल अन्तर्जात बल कहे जाते हैं। इन बलों द्वारा भूतल पर असमानताओं का सूत्रपात होता है। पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होने वाले बल बर्हिजात बल कहे जाते हैं। इन्हें समतल स्थापक बल भी कहते हैं। ये बल पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा भूतल पर उत्पन्न विषमताओं को दूर करने में हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं।

प्रश्न 10.
संचलन के कौन-से तीन रूप होते हैं?
उत्तर:
संचलन के निम्न तीन रूप होते हैं –

  1. अनुप्रस्थ विस्थापन (तुषार वृद्धि या अन्य कारणों से मृदा का अनुप्रस्थ विस्थापन)
  2. प्रवाह एवं
  3. स्खलन

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प्रश्न 11.
वृहत् संचलन की संक्रियता के लिए जिम्मेवार किन्हीं तीन कारकों के बारे में बताइए।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक एवं कृत्रिम साधनों के माध्यम से टिकने के आधार का हटना
  2. ढालों की प्रवणता एवं ऊँचाई में वृद्धि
  3. पदार्थों के प्राकृतिक अथवा कृत्रिम भराव के कारण उत्पन्न अतिभार।

प्रश्न 12.
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर –
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प्रश्न 13.
मिट्टी और शैल में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:
मिट्टी और शैल में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ किसे कहते हैं? क्या भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं या दोनों एक ही हैं?
उत्तर:
धरातल के पदार्थों पर अन्तर्जनित एवं बर्हिजनित बलों द्वारा भौतिक दबाव तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। पटल विरूपण (Diastrophism) एवं ज्वालामुखीयता (Volcanism) अन्तर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। अपक्षय, वृहत् क्षरण (Mass wasting), अपरदन एवं निक्षेपण (Deposition) बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। प्रकृति के किसी भी बाह्यजनिक तत्त्व (जैसे जल, हिम, वायु इत्यादि) जो धरातल के पदार्थों का अधिग्रहण (Acquire) तथा परिवहन करने में सक्षम हैं, को भू-आकृतिक कारक कहा जा सकता है।

जब प्रकृति के तत्त्व ढाल प्रवणता के कारण गतिशील हो जाते है तो पदार्थों को हटाकर ढाल के सहारे ले जाते हैं और निचले भागों में निक्षेपित कर देते हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ तथा भू-आकृतिक कारक, विशेषकर बर्हिजनिक, को यदि स्पष्ट रूप से अलग-अलग न कहा जाए तो इन्हें एक ही समझना होगा क्योंकि ये दोनों एक ही होते है।

एक प्रक्रिया एक बल होता है जो धरातल के पदार्थों के साथ अनूप्रयूक्त होने पर प्रभावी हो जाता है। एक कारक (Agent) एक गतिशील माध्यम (जैसे प्रवाहित जल, हिमानी हवा लहरें एवं धाराएँ इत्यादि) हैं जो धरातल के पदार्थों को हटाता, ले जाता है तथा निक्षेपित करता है। इस प्रकार प्रवाहयुक्त जल, भूमिगत जल, हिमानी, हवा, लहरों, धाराओं इत्यादि को भू-आकृतिक कारक कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
गुरुत्वकर्षण बल और पटल विरूपण (Diastrophism) के विषय में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुरुत्वाकर्षण हाल के सहारे सभी गतिशील पदार्थों को सक्रिय बनाने वाला दिशात्मक (Directional) बल होने के साथ-साथ धरातल के पदार्थों पर दबाव (stress) डालता है। अप्रत्यक्ष गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल (stress) लहरों एवं ज्वार भाटा जनित धाराओं को क्रियाशील बनाता है। निःसन्देह गुरुत्वाकर्षण एवं ढाल प्रवणता के अभाव में गतिशीलता सम्भव नहीं है। अतः अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण भी नहीं होगा। गुरुत्वाकर्षण एक ऐसा बल है जो भूतल के सभी पदार्थों के संचलन को प्रारम्भ करते हैं। सभी संचलन, चाहे वे पृथ्वी के अन्दर हो या सतह पर, प्रवणता के कारण ही घटित होते हैं, जैसे ऊँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर, तथा उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु दाब क्षेत्र की ओर ।

पटल विरुपण (Diastrophism) – सभी प्रक्रियाएँ जो भू-पर्पटी को संचालित, उत्थापित तथा निर्मित करती हैं, पटल विरूपण के अन्तर्गत आती हैं। इनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

  • तीक्ष्ण वलयन के माध्यम से पर्वत निर्माण तथा भू-पर्पटी की लम्बी एवं संकीर्ण पट्टियों को प्रभावित करने वाली पर्वतनी प्रक्रियाएँ
  • धरातल के बड़े भाग के उतापन या विकृति में संलग्न महाद्वीप रकम सम्बन्धी प्रक्रियाएँ
  • अपेक्षाकृत छोटे स्थानीय संचलन के कारण उत्पन्न भूकम्प
  • पपटी प्लेट के क्षैतिज संचलन करने में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका।

प्लेट विवर्तनिक/प्रवर्तनी की प्रक्रिया में भू-पर्पटी वलयन के रूप में तीक्ष्णता से विकृत हो जाती है। महाद्वीप रचना के कारण साधारण विकृति हो सकती है। प्रवर्तनी पर्वत निर्माण प्रक्रिया है, जबकि महाद्वीप रचना महाद्वीप निर्माण प्रक्रिया है। प्रवर्तनी, महाद्वीप रचना (Empeirogeny) भूकम्प एवं प्लेट विवर्तनिक की प्रक्रियाओं से भू-पर्पटी में घंश तथा विभंग हो सकता है। इन सभी प्रक्रियाओं के कारण दबाव, आयतन तथा तापक्रम में परिवर्तन होता है, जिसके फलस्वरूप शैलों का कायान्तरण प्रेरित होता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

Bihar Board Class 11 Geography खनिज एवं शैल Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन ग्रेनाइट के दो प्रमुख घटक हैं?
(क) लोहा एवं निकिल
(ख) सिलिका एवं एल्यूमिनिमय
(ग) लोहा एवं चाँदी
(घ) लौह ऑक्साइड एवं पोटैशियम
उत्तर:
(ख) सिलिका एवं एल्यूमिनिमय

प्रश्न 2.
निम्न में से कौन सा कायांतरित शैलों का प्रमुख लक्षण है?
(क) परिवर्तनीय
(ख) क्रिस्टलीय
(ग) शांत
(घ) पल्ल्व न
उत्तर:
(क) परिवर्तनीय

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन सा एकमात्र तत्त्व वाला खनिज नहीं है?
(क) स्वर्ण
(ख) माइका
(ग) चाँदी
(घ) ग्रेफाइट
उत्तर:
(ख) माइका

प्रश्न 4.
निम्न में से कौन सा कठोरतम खनिज है?
(क) टोपाज
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) हीरा
(घ) फेल्डस्पर
उत्तर:
(ग) हीरा

प्रश्न 5.
निम्न में से कौन सी शैल अवसादी नहीं है?
(क) टायलाइट
(ख) ब्रेशिया
(ग) बोरैक्स
(घ) संगमरमर
उत्तर:
(क) टायलाइट

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में कौन सा अवसादी शैल है?
(क) बलुआ पत्थर
(ख) अभ्रक
(ग) ग्रेनाइट
(घ) नीस
उत्तर:
(क) बलुआ पत्थर

प्रश्न 7.
चट्टानों का टूटकर अपने स्थानों पर ही पड़े रहना कहलाता है?
(क) अपक्षय
(ख) अपरदन
(ग) अनाच्छादन
(घ) अनावृतिकरण
उत्तर:
(क) अपक्षय

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
शैल से आप क्या समझते हैं? शैल के तीन प्रमुख वर्गों के नाम बताएँ।
उत्तर:पृथ्वी की पर्पटी चट्टानों से बनी है। चट्टान का निर्माण एक या एक से अधिक खनिजों से मिलकर होता है। चट्टान कठोर या नरम तथा विभिन्न रंगों की हो सकती है। जैसे ग्रेनाइट कठोर तथा सोपस्टोन नरम है। चट्टानों में सामान्यतः पाए जाने वाले खनिज पदार्थ फेल्डस्पर तथा क्वार्ट्ज़ हैं। चट्टानों को उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया गया है –

  1. आग्नेय चट्टान-मैग्मा तथा लावा से घनीभूत
  2. वसादी चट्टान-बहिर्जनित प्रक्रियाओं के द्वारा चट्टानों के अंशों के निक्षेपन का परिणामः तथा
  3. कायांतरित चट्टान-उपस्थित चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण की प्रक्रिया से निर्मित।

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प्रश्न 2.
आग्नेय शैल क्या है? आग्नेय शैल के निर्माण पद्धति एवं उनके लक्षण बताएँ।
उत्तर:
चूँकि आग्नेय चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में मैग्मा एवं लावा से होता है। अतः जब अपनी ऊपरीगामी गति में मैग्मा ठंडा होकर ठोस बन जाता है, तो यह आग्नेय चट्टान कहलाता है। इसकी बनवाट कणों के आकार एवं व्यवस्था अथवा पदार्थ की भौतिक अवस्था पर निर्भर करती है। यदि पिघले हुए पदार्थ धीरे-धीरे गहराई तक ठंडे होते हैं तो खनिज के कण पर्याप्त बडे हो सकते हैं। सतह पर हई आकस्मिक शीतलता के कारण छोटे एवं चिकने कण बनते हैं। शीतलता की माध्यम परिस्थितियाँ होने पर आग्नेय चट्टान को बनाने वाले कण मध्यम आकार के हो सकते हैं। ग्रेनाइट, बैसाल्ट, वोल्कैनिक ब्रेशिया आग्नेय चट्टानों के कुछ उदाहरण हैं।

प्रश्न 3.
वसादी शैल का क्या अर्थ है? अवसादी शैल के निर्माण की पद्धति बताइए।
उत्तर:
अवसादी अर्थात् (Sedimentary) का अर्थ है, व्यवस्थित होना । पृथ्वी की सतह की चट्टानों अपच्छादनकारी कारकों के प्रति अनावृत होती हैं, जो विभिन्न आकार के विखण्डों में विभाजित होती हैं। ऐसे उपखण्डों का विभिन्न बहिर्जनित कारकों के द्वारा संवहन एवं संचय होता है। संघनता के द्वारा ये सचित पदार्थ चट्टानों में परिवर्तित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रस्तारीकरण (Lithification) कहलाती है। इसी कारणवश बालुकाश्म, शैल जैसे अवसादी चट्टानों में विविध सान्द्रता वाली अनेक सतह होती है।

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प्रश्न 4.
शैली चक्र के अनुसार प्रमुख प्रकार की शैलों के मध्य क्या संबंध होता है ?
उत्तर:
चट्टानी चक्र एक सतत् प्रक्रिया होती है, जिसमें पुरानी चट्टानें परिवर्तित होकर नवीन रूप लेती हैं। आग्नेय चट्टानें प्राथमिक चट्टानें हैं, तथा अन्य (अवसादी एवं कायॉरित) चट्टानें इन प्राथमिक चट्टानों से निर्मित होती है। आग्नेय चट्टानों को कायांतरित चट्टानों में परिवर्तित किया जा सकता है। अवसादी चट्टानें अपखण्डों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा ये अपखण्ड अवसादी चट्टानों के निर्माण का एक स्रोत हो सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
‘खनिज’ शब्द को परिभाषित करें, एवं प्रमुख प्रकार के खनिजों के नाम लिखें।
उत्तर:
खनिज एक ऐसा प्राकृतिक, अकार्बनिक तत्त्व जिसमें एक क्रमबद्ध परमाण्विक संरचना, निश्चित रसायनिक संघटन तथा भौतिक गुणधर्म होता है। खनिज का निर्माण दो या दो से अधिक तत्त्वों से मिलकर होता है। लेकिन कभी-कभी सल्फर ताँबा चाँदी, स्वर्ण ग्रेफाइट जैसे एक तत्त्वीय खनिज भी पाए जाते हैं। भूपर्पटी पर कम से कम 2,000 प्रकार के खनिजों को पहचाना गया है, और उनको नाम दिया गया है। लेकिन इनमें से सामान्यत: उपलब्ध लगभग सभी खनिज तत्त्व, छह प्रमुख खनिज समूहों से संबंधित होते हैं, जिनको चट्टानों का निर्माण करने वाले प्रमुख खनिज माना गया है।

कुछ प्रमुख खनिजों के नाम –

  1. फेल्डस्पर – सिलिका, ऑक्सीजन, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, अल्युमिनियम आदि तत्त्व इसमें शामिल हैं।
  2. क्वार्ट्ज – ये रेत एवं ग्रेनाइट के प्रमुख घटक हैं। इसमें सिलिका होता है। यह एक कठोर खनिज है तथा पानी में सर्वथा अघुलनशील होता है।
  3. पाइरॉक्सीन – कैल्शियम, एल्यूमिनियम, मैग्नेशियम, आयरन तथा सिलिका इसमें शामिल हैं।
  4. एम्फीबोल – एम्फीबोल के प्रमुख तत्त्व एल्यूमीनियम, कैल्शियम, सिलिका, लौह, मैग्नीशियम है।
  5. माइका – इसमें पोटैशियम, एल्यूमिनियम, मैग्नेशियम, लौह, सिलिका आदि निहित होते हैं।
  6. धात्विक खनिज – इनको तीन प्रकार में विभाजित किया जा सकता है –
    (i) बहुमूल्य धातु-स्वर्ण, चाँदी, प्लैटिनम आदि।
    (ii) लौह धातु-लौह एवं स्टील के निर्माण के लिए लोहे में मिलाई जाने वाली अन्य धातुएँ।
    (iii) अलौहिक धातु-इनमें कम मात्रा में लौह तत्त्व तथा ताम्र, सीमा, जिंक, टिन, एल्यूमिनियम आदि शामिल होते हैं।

अधात्विक खनिज – गंधक, फॉस्फेट तथा नाइट्रेट अधात्विक खनिज हैं। सीमेन्ट अधात्विक खनिज का मिश्रण है।

प्रश्न 2.
भूपृष्ठीय शैलों में प्रमुख प्रकार की शैलों की प्रकृति एवं उनकी उत्पत्ति की पद्धति का वर्णन करें। आप उनमें अन्तर स्थापित केसे करेंगे?
उत्तर:
चट्टानों को उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया गया है:
1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks) – चूँकि आग्नेय चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के आंतरिक भाग में मैग्मा एवं लावा से होता है, अत: इनको प्राथमिक चट्टानें भी कहते हैं। मैग्मा के ठंडे होकर घनीभूत हो जाने पर आग्नेय चट्टानों का निर्माण होता है। ठण्डा तथा ठोस बनने की यह प्रक्रिया पृथ्वी की पर्पटी या पृथ्वी की सतह पर हो सकती है। आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण इनकी बनावट के आधार पर किया गया है। इसकी बनावट इसके कणों के आकार एवं व्यवस्था अथवा पदार्थ के भौतिक अवस्था पर निर्भर करती है। ग्रेनाइट, ग्रेबो, पेग्मैटाइट, बैसाल्ट, वोल्कैनिक ब्रेशिया तथा टफ आग्नेय चट्टानों के कुछ उदाहरण हैं।

2. अवसादी चट्टान (Sedimentary Rocks) – पृथ्वी की सतह की चट्टानों (आग्नेय अवसादी एवं कायॉरित) अपच्छादनकारी कारकों के प्रति अनावत होती हैं, जो विभिन्न आकार के विखण्डों में विभाजित होती हैं। ऐसे उपखण्डों का विभिन्न बहिर्जनित कारकों के द्वारा संवहन एवं संचय होता है। संघनता के द्वारा से संचित पदार्थ चट्टानों में परिवर्तित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रस्तरीकरण (Lithification) कहलाती है। इसी कारणवश बालुकाश्म, शैल जैसे अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण तीन प्रमुख समूहों में किया गया है –

  • यांत्रिकी रूप से निर्मित – उदाहरणार्थ – बालुकाश्म, पिण्डाशला, चूना-प्रस्तर, शैल, विमृदा आदि।
  • काबनिक रूप से निर्मित – उदाहरणार्थ -गीजराइट; खड़िया, चूना-पत्थर, कोयला आदि; तथा
  • रसायनिक रूप से निर्मित – उदाहरणार्थ – शृंग प्रस्तर, चूना पत्थर, हेलाइट, पोटैश आदि।

3. कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks) – कायांतरित का अर्थ है, ‘स्वरूप में परिवर्तन’ । दाब आयतन एवं तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया के फलस्वरूप इन चट्टानों का निर्माण होता है। जब विवर्तनिक प्रक्रिया के कारण चट्टानों निचले स्तर की ओर बलपूर्वक खिसक जाती हैं, या जब भूपृष्ठ से उठता, पिघला हुआ मैग्मा भू-पृष्ठीय चट्टानों के संपर्क में आता है, या जब ऊपरी चट्टानों के कारण निचली चट्टानों पर अत्यधिक दाब पड़ता है, तब कायंतरण होता है। कायांतरण वह प्रक्रिया है, जिसमें समेकित चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण होता है तथा वास्तविक चट्टानों में पदार्थ पुनः संगठित हो जाते हैं।
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आग्नेय चट्टानों प्राथमिक चट्टानें हैं, तथा अन्य चट्टानें इन प्राथमिक चट्टानों से निर्मित होती हैं। आग्नेय चट्टानों को कायांतरित चट्टानों में परिवर्तित किया जा सकता है। आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानों से प्राप्त अंशों से अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है। अवसादी चट्टानों अपखण्डों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा ये अपखण्ड अवसादी चट्टानों के निर्माण का एक स्रोत हो सकते हैं। निर्मित भूपृष्ठीय चट्टानें (आग्नेय, कायांतरित एवं अवसादी) प्रत्यावर्तन के द्वारा पृथवी के आंतरिक भाग में नीचे की ओर जा सकती हैं।

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प्रश्न 3.
कायांतरित चट्टान क्या है ? इनके प्रकार एवं निर्माण की पद्धति का वर्णन करें।
उत्तर:
दाब आयतन एवं तापमान में परिवर्तन की प्रक्रिया के फलस्वरूप कायांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। जब विवर्तनिक प्रक्रिया के कारण चट्टानें निचले स्तर की ओर बलपूर्वक खिसक जाती हैं, या जब भूपष्ठ से उठता, पिघला हुआ मैग्मा भू-पृष्ठीय चट्टानों के संपर्क में आता है, या जब ऊपरी चट्टानों के कारण निचली चट्टानों पर अत्यधिक दाब पड़ता है, तब कायांतरण होता है । कायांतरण वह प्रक्रिया है जिससे समेकित चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण होता है तथा वास्तविक चट्टानों में पदार्थ पुनः संगठित हो जाते हैं।

बिना किसी विशेष रसायनिक परिवर्तनों के ट्टने एवं घिसने के कारण वास्तविक चट्टानों में यांत्रिकी व्यवधान एवं उनका पुनः संगठित होना गतिशील कायांतरित कहलाता है। ऊष्मीय कायंतरण के कारण चट्टानों के पदार्थों में रसायनिक परिवर्तन एवं पुनः क्रिस्टलीकरण होता है। ऊष्मीय कायांतरण के दो प्रकार होते हैं-संपर्क कायांतरण एवं स्थानीय कायंतरण। संपर्क रूपांतरण में चट्टानें गर्म, ऊपर आते हुए मैग्मा एवं लावा के संपर्क में आती हैं, तथा उच्च तापमान में चट्टान के पदार्थों का पुनः क्रिस्टलीकरण होता है। अक्सर चट्टानों में मैग्मा अथवा लावा के योग से नए पदार्थ उत्पन्न होते हैं।

स्थानीय कायंतरण में उच्च तापमान अथवा दबाव अथवा इन दोनों के कारण चट्टानों में विवर्तनिक दबाव के कारण विकृत्तियाँ होती हैं, जिससे चट्टानों में पुनः क्रिस्टलीकरण होता है। कायांतरण की प्रक्रिया में चट्टानों के कुछ कण या खनिज सतहों या रेखाओं के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। कायांतरित चट्टानों में खनिज अथवा कणों की इस व्यवस्था को पल्लवन या रेखांकन कहते हैं। कभी-कभी खनिज या विभिन्न समूहों के कण पतली से मोटी सतह में इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं, कि वो हल्के एवं गहरे रंगों में दिखाई देते हैं।

कायांतरित चट्टानों में ऐसी संरचनाओं को बैंडिंग (Banding) कहते हैं, तथा बैंडिग प्रदर्शित करने वाले चट्टानों को बैंडेड (Banded) चट्टानों कहते हैं। कायांतरित होने वाली वास्तविकचट्टानों पर ही कायांतरित चट्टानों के प्रकार निर्भर करते हैं। कायांतरित चट्टानें दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत की जा सकती हैं-पल्लवित चट्टान अपल्लवित चट्टान । पट्टिताश्मीय, ग्रेनाइट, सायनाइट, स्लेट, शिल्ट, संगमरमर, क्वार्ट्ज आदि रूपांतरित चट्टानों के कुछ उदाहरण हैं।

Bihar Board Class 11 Geography खनिज एवं शैल Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आग्नेय चट्टानों का रूप कैसा होता है
उत्तर:
शीशे तथा रवेदार जैसा।

प्रश्न 2.
लावा पृथ्वी के धरातल पर तेजी से क्यों ठण्डा हो जाता है?
उत्तर:
वायुमण्डल के सम्पर्क में होने के कारण।

प्रश्न 3.
बाह्य आग्नेय चट्टान का एक उदाहरण दें?
उत्तर:
बैसाल्ट।

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प्रश्न 4.
स्थिति के आधार पर आग्नेय चट्टानों के दो प्रकार लिखो।
उत्तर:
बाह्य तथा भीतरी चट्टानें।

प्रश्न 5.
उत्पत्ति के आधार पर आग्नेय चट्टानें कौन-कौनसी होती हैं?
उत्तर:
ज्वालामुखी चट्टानों तथा पातालीय चट्टानें।

प्रश्न 6.
पातालीय शब्द कहाँ से बना?
उत्तर:
यह शब्द (Pluto) से बना जिसका अर्थ पाताल देवता है।

प्रश्न 7.
बेसॉल्ट में रवे क्यों नहीं होते?
उत्तर:
लावा के तेजी से ठण्डा होने के कारण।

प्रश्न 8.
आग्नेय चट्टानों के निर्माण के लिये मुख्य साधन कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
क्रियाशील ज्वालामुखी।

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प्रश्न 9.
IGNEOUS शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
यह लैटिन शब्द Ignis से बना है (अर्थ अग्नि है)।

प्रश्न 10.
चट्टानों की तीन मुख्य किस्मों के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. आग्नेय चट्टानें
  2. अवसादी या तलछटी चट्टानें
  3. रूपांतरित चट्टानें

प्रश्न 11.
चट्टानों से प्रभावित एक वस्तु का नाम लिखो।
उत्तर:
भू-आकार।

प्रश्न 12.
चट्टान के रंग तथा कठोरता किन तत्त्वों पर निर्भर करते हैं?
उत्तर:
खनिजों की रचना।

प्रश्न 13.
स्थलमण्डल में पाये जाने वाले दो तत्त्वों का नाम लिखें।
उत्तर:
सिलिकॉन तथा एल्यूमीनियम।

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प्रश्न 14.
चट्टान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्थलमण्डल के ठोस पदार्थ।

प्रश्न 15.
बनावट के आधार पर अवसादी चट्टानों की तीन किस्में कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:

  1. यांत्रिक क्रिया द्वारा
  2. रसायनिक क्रिया द्वारा
  3. जैविक क्रिया द्वारा।

प्रश्न 16.
यांत्रिक क्रिया द्वारा बनी अवसादी चट्टानों का उदाहरण दें।
उत्तर:
रेत का पत्थर, चीनी मिट्टी, ग्रिट।

प्रश्न 17.
निट किसे कहते हैं?
उत्तर:
खुरदरे रेत के पत्थर को।

प्रश्न 18.
कांग्लोमरेट से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गोल पत्थरों के आपस में जुड़ने से बनने वाला भू-आकार।

प्रश्न 19.
काबर्न प्रधान चट्टान का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
कोयला।

प्रश्न 20.
कोयले की विभिन्न किस्मों के नाम लिखें।
उत्तर:
पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस तथा एंथ्रासाइट।

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प्रश्न 21.
चूना प्रधान चट्टानों का दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
चाक तथा चूने का पत्थर।

प्रश्न 22.
अवसादी चट्टानों में पाये जानेवाले दो फॉसिल ईंधन बताएँ।
उत्तर:
कोयला तथा पेट्रालियम।

प्रश्न 23.
रसायनिक क्रिया द्वारा निर्मित दो चट्टानों के नाम लिखें।
उत्तर:
जिप्सम तथा चट्टानी नमक।

प्रश्न 24.
तलछट को कठोर बनाने में किस तत्त्व का योगदान है।
उत्तर:
सिलिका, कैल्साइट आदि संयोजक पदार्थ।

प्रश्न 25.
अवसादी चट्टानों के लिए निक्षेप करने वाले कार्यकर्ता बताएँ।
उत्तर:
नदी, वायु, ग्लेशियर।

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प्रश्न 26.
‘Sadimentary’ शब्द किस शब्द से बना है?
उत्तर:
‘Sadimentum’ शब्द से जिसका अर्थ है नीचे बैठना।

प्रश्न 27.
पश्चिमी भारत में बैसाल्ट में घिरे हुए विशाल क्षेत्र का नाम लिखें।
उत्तर:
दक्कन ट्रैप।

प्रश्न 28.
लैकोलिथ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नीचे से मैग्मा के उभार से बने टीले।

प्रश्न 29.
बैथोलिथ शब्द का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
बैथोलिथ भीतरी आग्नेय चट्टान का गुम्बद आकार ग्रेनाइट का भू-खण्ड होता है।

प्रश्न 30.
ग्रेनाइट में बड़े रवे क्यों होते हैं?
उत्तर:
मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने के कारण।

प्रश्न 31.
पातालीय चट्टानों का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
ग्रेनाइट।

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प्रश्न 32.
अधिक गहराई में मैग्मा अन्दर क्यों ठण्डा हो जाता है?
उत्तर:
ऊपरी चट्टानों में दबाव होने के कारण।

प्रश्न 33.
PVT क्रिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
यह कायांतरित क्रिया का संक्षेप रूप है, यह क्रिया P= Pressure, V= Volume, T= Temperature द्वारा होती है।

प्रश्न 34.
निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी शैलों का वर्गीकरण करो।
उत्तर:
निर्माण पद्धति के आधार पर अवसादी शैलों का वर्गीकरण तीन प्रमुख समूहों में किया गया है –

  1. यांत्रिकी रूप में निर्मित उदाहरणार्थ, बालुकाश्म, पिंडशिल, चूना प्रस्तर, शैल, विमृदा आदि
  2. कार्बनिक रूप में निर्मित उदाहरणार्थ, गीजराइट, खड़िया चूना, पत्थर कोयला आदि तथा
  3. रसायनिक रूप से निर्मित-उदाहरणार्थ, शृंग, प्रस्तर चूना पत्थर, पोटैश आदि।

प्रश्न 35.
प्रस्तीकरण (Lithification) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
अपरदन के कार्यकर्ता शैलों को छोटे-छोटे खण्डों में विभाजित करते हैं। सघनता के कारण ये पदार्थ शैलों में बदल जाते हैं। इसे प्रस्तीकरण कहते हैं।

प्रश्न 36.
पेट्रोलॉजी का शुद्ध अर्थ क्या है ?
उत्तर:
पेट्रोलॉजी शैलों का विज्ञान है। एक पेट्रो-शास्त्री शैलों के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन करता है। जैसे-खनिज की संरचना, बनावट, स्रोत, प्राप्ति स्थान, परिवर्तन एवं दूसरी शैलों के साथ सम्बन्ध ।

प्रश्न 37.
निर्माण पद्धति के अनुसार शैलों के प्रकार बताएँ।
उत्तर:
शैलों के विभिन्न प्रकार हैं। जिनको उनकी निर्माण पद्धति के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया जाता है –

  1. आग्नेय शैल – मैग्मा तथा लावा से घनीभूत
  2. अवसादी शैल-बहिर्जनित प्रक्रियाओं के द्वारा शैलों के अंशों के निक्षेपन का परिणाम तथा
  3. कायंतरित शैल उपस्थित शैलों में पुनक्रिस्टलीकरण प्रक्रिया से निर्मित।

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प्रश्न 38.
शैलों का ज्ञान क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
शैलों एवं स्थालाकृतियों तथा शैलों एवं मृदा में निकट सम्बन्ध होने के कारण भूगोलशास्त्री को शैलों का मौलिक ज्ञान होना आवश्यक होता है।

प्रश्न 39.
किन खनिजों का निर्माण एक तत्त्वों से बना है?
उत्तर:
सल्फर, ताँबा, चाँदी, स्वर्ण, ग्रेफाइट।

प्रश्न 40.
शैल तथा कोयला किन चट्टानों में बदल जाते है?
उत्तर:
शैल स्लेट में तथा कोयला ग्रेफाइट में बदल जाता है।

प्रश्न 41.
ग्रेनाइट तथा बैसाल्ट किन चट्टानों में बदल जाती है?
उत्तर:
ग्रेनाइट नीस में तथा बैसाल्ट शिल्ट में बदल जाता है।

प्रश्न 42.
रेत का पत्थर तथा चूने का पत्थर किन चट्टानों में परिवर्तित हो जाता है?
उत्तर:
रेत का पत्थर क्वार्ट्साइट तथा चूने का पत्थर संगमरमर में बदल जाता है।

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प्रश्न 43.
चटटानें अपना रंग तथा रचना क्यों बदल लेती हैं?
उत्तर:
ताप तथा दबाव के कारण।

प्रश्न 44.
रूपांतरित शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
रूप में परिवर्तन।

प्रश्न 45.
रसायनिक क्रिया से बनने वाली चट्टानों में मुख्य क्रिया कौन-सी है?
उत्तर:
वाष्पीकरण।

प्रश्न 46.
शैली चक्र से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शैली चक्र एक सतत् प्रक्रिया है जिसमें पुरानी शैलें परिवर्तित होकर नवीन रूप लेती है।

प्रश्न 47.
पल्लवन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कायांतरण की प्रक्रिया में शैलों के कुछ कण या खनिज सतहों या रेखाओं के रूप में व्यवस्थित हो जाते हैं। इस व्यवस्था को पल्लवन या रेखांकन कहते हैं।

प्रश्न 48.
कायंतरित क्रिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कायांतरित वह प्रक्रिया है जिसमें समेकित शैलों में पनः क्रिस्टलीकरण होता है तथा वास्तविक शैलों में पदार्थ पुनः संगठित हो जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
खनिज की परिभाषा दें।
उत्तर:
शैलों की रचना पदार्थों के इकट्ठा होने से होती है। खनिज प्राकृतिक रूप में पाया जाने वाला एक अजैव तत्त्व (Inorganicelement) था यौगिक (Compound) है । इसकी एक निश्चित रसायनिक रचना होती है । इसके संघटन में आण्विक संरचना पाई जाती है। इसके भौतिक गुण भी निश्चित होते हैं। अतः खनिज प्रकृति में पाये जाने वाले रसायनिक पदार्थ हैं। ये पदार्थ तत्त्व भी हो सकते हैं और यौगिक भी।

प्रश्न 2.
शैल निर्माणकारी खनिज किसे कहते हैं ?
उत्तर:
पृथ्वी पर लगभग 2000 प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। परन्तु इनमें से केवल 12 खनिज ही मुख्य रूप से भू-पृष्ठ की शैलों का निर्माण करते हैं। इन खनिजों को शैल निर्माणकारी खनिज (Rock forming Minerals) कहते हैं इन खिनिजों में सिलिकेट सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्रधान होता है। इन शैलों में सबसे सामान्य खनिज क्वार्ट्ज (Quartz) पाया जाता है।

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प्रश्न 3.
खनिज कितने तत्त्वों से बनते हैं ? मुख्य तत्त्व कौन-से हैं ? सिलिका तथा चूने के कार्बोनेट में कौन-से तत्त्व हैं?
उत्तर:
सामान्य खनिज 8 मुख्य तत्त्वों (Elements) से बनते हैं। इनमें से सिलिकेट कर्बोनेट, ऑक्साइड तत्त्वों की मात्रा अधिक है । भू-पटल के खनिजों में 87% खनिज सिलिकेट हैं। सिलिका में 2 तत्त्व है-सिलिकॉन तथा ऑक्सीजन । चूने के कार्बोनेट में 3 तत्त्व हैं-कैल्श्यिम, कार्बन ऑक्सीजन।

प्रश्न 4.
शैल (Rock) की परिभाषा दो।
उत्तर:
भू-पृष्ठ (Crust) का निर्माण करने वाले सम्पूर्ण ठोस जैव एवं अजैव पदार्थों को शैल (चट्टान) कहते हैं (“Any natural, solid organic or inorganic material out of which the crust is formed is called a Rock”)। शैल ग्रेनाइट की भांति कठोर या पंक की भाँति नरम भी हो सकती है। भू-पृष्ठ शैलों का बना हुआ है। शैल की रचना कई खनिज पदार्थों के मिलने से होती है। कुछ शैल ऐसे भी हैं जिनमें एक ही प्रकार के खनिज पाए जाते हैं । खनिज पदार्थों की विभिन्न मात्रा के कारण ही हर शैल की कोमलता या कठोरता रंग-रूप गुण शक्ति अलग-अलग होती है।

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प्रश्न 5.
स्थलमण्डल किसे कहते हैं? स्थलमण्डल की कितनी गहराई तक चट्टानें पाई जाती हैं?
उत्तर:
स्थल मण्डल (Lithosphere) का अर्थ है चट्टानों का परिमण्डल । पृथ्वी की बाहरी ठोस पर्त को भूपर्पटी (Crust) कहते हैं। यह क्षेत्र चट्टानों का बना हुआ है। धतराल से लगभग 16 कि० मी० की गहराई तक स्थलमण्डल में चट्टानें पाई जाती हैं।

प्रश्न 6.
धात्विक तथा अधात्वि खनिजों में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
धात्विक खनिज – इनमें धातु तत्त्व होते हैं तथा इनको तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है।

  • बहुमूल्य धातु – स्वर्ण, चाँदी, प्लैटिनम आदि।
  • लौह धातु – लौह एवं स्टील के निर्माण के लिए लोहे में मिलाई जाने वाली अन्य धातुएँ।
  • अलौहिक धातु – इनमें ताम्र, सीशा, जिंक, टिन, एलूमिनियम आदि धातु शामिल होते हैं।

अधात्विक गनिज – इनमें धातु के अंश उपस्थित नहीं होते हैं। गंधक फॉस्फेट तथा नाइट्रेट अधात्वि खनिज हैं। सीमेंट अधात्विक खनिजों का मिश्रण है।

प्रश्न 7.
‘चट्टानें पृथ्वी के इतिहास के पृष्ठ हैं।’ व्याख्या करें।
उत्तर:
चट्टानों पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करती हैं। इसमें पाये जाने वाले खनिज तथा इससे बनी मिट्टी प्राकृतिक वातावरण का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं। चट्टानों की तहों में जीव-जन्तु और वनस्पतियों के अवशेष सुरक्षित रहते हैं। ये जीवावशेष इन चट्टानों की उत्पत्ति व समय के बारे में जानकारी देते हैं। इसलिए कहा जाता है, “चट्टानें पृथ्वी के इतिहास के पृष्ठ हैं तथा जीवावशेष उसके क्षर हैं ” (“Rocks are the pages of Earth History and Fossils are the writing on it”.)।

प्रश्न 8.
पृथ्वी की पर्पटी में कौन से प्रमुख तत्त्व हैं ?
उत्तर:
पृथ्वी विभिन्न तत्त्वों से बनी हुई है। इनकी बाहरी परत पर ये तत्त्व ठोस रूप में और और आंतरिक परत में ये गर्म एवं पिघली हुई अवस्था में पाये जाते हैं। पृथ्वी के सम्पूर्ण पर्पटी क, लगभग 98 प्रशित भाग आठ तत्त्वों, जैसे-ऑक्सीजन, सिलिकन, एलुमिनियम लोहा, कैल्शियम, सोडियम पोटाशियम तथा मैग्नीशियम से बना है तथा शेष भाग टायटेनियम, हाइड्रोजन, फॉस्फोरस मैंगनीज सल्फर, कार्बन निकिल एवं अन्य पदार्थों से बना है।
सारणी : पृथ्वी के पर्पटी के प्रमुख तत्त्व
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प्रश्न 9.
भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में निम्नलिखित अंतर हैं –

  1. भौतिक अपक्षय चट्टानों : का विघटन भौतिक बलों द्वारा होता है, जिससे चटटानों में कोई रासायनिक परिवर्तन नहीं होता। जबकि रासायनिक अपक्षय में चट्टानों का अपघटन रासायनिक क्रिया द्वारा होता है, जिससे चट्टानों में रासायनिक परिवर्तन आ जाता है।
  2. भौतिक अपक्षय के मुख्य कारक ताप, पाला तथा दाब है, जबकि रासायनिक अपक्षय के मुख्य कारक ऑक्सीकरण, कार्बोनिकरण जलयोजन तथा बिलयन है।
  3. भौतिक अपक्षय के उदाहरण शुष्क तथा शीत प्रदेश में पाये जाते हैं जबकि रासायनिक अपक्षय के उदाहरण उष्ण तथा आर्द्र प्रदेशों में मिलते हैं।

प्रश्न 10.
स्लेट चट्टानों के किस वर्ग से सम्बन्धित है? इसका क्या उपयोग है? भारत के किन भागों में स्लेट चट्टानों मिलती हैं?
उत्तर:
स्लेट एक रूपांतरित चट्टान है। यह शैल चट्टान पर अधिक दबाव से बनती है। यह भवन निर्माण में छत डालने (Roofing) के काम आती हैं। इसे बच्चों के लिखने में प्रयोग किया जाता है। इसे बिलियर्डस की मेज बनाने में प्रयोग करते हैं। भारत में यह रेवाड़ी (हरियाणा), कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) तथा बिहार में पाई जाती है।

प्रश्न 11.
कोयले के विभिन्न प्रकारों के नाम तथा उनमें कार्बन की मात्रा लिखो।
उत्तर:
कोयले में कार्बन की मात्रा के अनुसार निम्नलिखित प्रकार पाये जाते हैं –

  1. पीट (Peat) – इसमें कार्बन की मात्रा 40% से कम होती है।
  2. लिग्नाइट (Lignite) – इसमें कार्बन की मात्रा 50% से 70% तक होती है।
  3. बिटुमिनस (Bituminus) – इसमें कार्बन की मात्रा 50% से 70% तक होती है।
  4. एन्थासाइट (Anthracite) – इसमें कार्बन की मात्रा 70% से अधिक होती है।

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प्रश्न 12.
संगमरमर मूल रूप से कौन-सी चट्टान है? इसकी रचना कैसी होती? इसका उपयोग बताओ।
उत्तर:
संगमरमर एक परिवर्तित चट्टान है। चूने का पत्थर संगमरमर की मूल चट्टान है। गर्म मैग के संस्पर्श से चूने का पत्थर संगमरमर में परिवर्तित हो जाता है। संगमरमर इमारती पत्थर के मूल्य में बहुमूल्य है। आगरे का ताजमहल संगमरमर का बना हुआ है। भारत में यह अलवर, अजमेर जयपुर तथा जोधपुर के समीप पाया जाता है।

प्रश्न 13.
ग्रेनाइट, चट्टानों के किस वर्ग से सम्बन्धित है? इसका क्या उपयोग है? भारत के किन भागों में ग्रनाइट चट्टानों मिलती हैं?
उत्तर:
ग्रेनाइट पातालीय आग्नेय चट्टान है। यह एक कठोर चट्टान है जो विभिन्न रंगों जैसे-भूरे, लाल तथा सफेद में पाई जाती है। इसका उपयोग इमारतें, किलें, मन्दिर, मर्तियाँ तथा सड़क बनाने में किया जाता है। दक्षिण भारत के दक्कन पठार मध्य प्रदेश, छोटा नागपुर पठार तथा राजस्थान में ग्रेनाइट पत्थर मिलता है।

प्रश्न 14.
दक्कन ट्रैप (Deccan Trap) से क्या अभिप्राय है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारतीय प्रायद्धीप के उत्तर:पश्चिमी भाग में बैसाल्ट चट्टानों से ढंके हए विशाल क्षेत्र को ढक्कन ट्रैप कहते हैं । इस क्षेत्र का विस्तार लगभग 5,00,000 वर्ग किमी है । इन चट्टानों के अपक्षरण से उपजाऊ काली मिट्टी का निर्माण हुआ है जिसे रेगूर (Regur) मिट्टी कहते हैं। यह मिट्टी कपास की कृषि के लिए उत्तम है।

प्रश्न 15.
रवों (Crystals) का निर्माण किस तत्त्व पर निर्भर करता है?
उत्तर:
पिघले हुए लावा के ठण्डा होने से रवों का निर्माण होता है। रवों का आकार छोटा या बडा हो सकता है। रवों का आकार मैग्मा के शीतलन (rate of cooling of magma) की क्रिया पर निर्भर करता है। धरातल पर शीघ्र ही ठण्डा होने के कारण धरातल पर बनने वाले रवों का आकार छोटा होता है। इनका गठन कांच जैसा होता है, जैसे-बैसाल्ट । मैग्मा के शीतलन की क्रमिक क्रिया से बड़े-बड़े रवों का निर्माण होता है। मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से पातालीय चट्टानों में बड़े आकार के रवों या मोटे दोनों वाले गठन का निर्माण होता है. जैसे-ग्रेनाइट।

प्रश्न 16.
चूना पत्थर तथा कोयला के बनने की प्रक्रियाओं में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
चूना पत्थर तथा कोयला के बनने की प्रक्रियाओं में अन्तर –
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प्रश्न 17.
शैल तथा खनिज में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
शैल तथा खनिज में अन्तर –
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प्रश्न 18.
अम्लीय तथा क्षारीय चट्टानों में क्या अन्तर है?
उत्तर:
अम्लीय तथा क्षारीय चट्टानों में अन्तर –
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प्रश्न 19.
निम्नलिखित शैलों को आग्नेय, अवसादी व कायांतरित शैलों में वर्गीकृत कीजिए

  1. ग्रेनाइट
  2. स्टेल
  3. चूना पत्थर
  4. संगमरमर
  5. मृतिका
  6. बेसाल्ट
  7. बलुआ पत्थर
  8. कोयला
  9. खड़िया
  10. जिप्सम
  11. नीस तथा
  12. शिल्ट

उत्तर:
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प्रश्न 20.
मैग्मा एवं लावा में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
मैग्मा तथा लावा में अन्तर –
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवसादी चट्टानें क्या होती हैं? ये किस प्रकार बनती है? इनकी विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
अवसादी चट्टानों का निर्माण अपरदन द्वारा प्राप्त अवसाद के जमाव से होता है। तलछट में छोटे व बड़े आकार के कण होते हैं इन कणों के एकत्र होकर नीचे बैठ जाने से अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है। पृथ्वी के धरातल पर अपरदन से प्राप्त पदार्थ को जल, वायु, हिमनदी जमा करते रहते है। ये तलछट समुद्रों, झीलों, नदियों, डेल्टाओं या मरुस्थलों के धरातल आदि क्षेत्रों में जमा होते है। – इन चट्टानों की रचना कई पदो (Stages) में पूरी होती है। तलछट की परतों के संवहन तथा संयोजन से अवसादी शैलों का निर्माण होता है।

  • तलछट का निक्षेप – यह पदार्थ एक निश्चित क्रम के अनुसार जमा होते रहते हैं। पहले बड़े कण तथा उसके बाद छोटे कण ।
  • परतों का निर्माण – लगातार जमाव के कारण परतों का निर्माण होता है। पदार्थ एक परत के ऊपर, दूसरी परत के रूप में जमा होते हैं।
  • ठोस होना – ऊपरी परतों के भार के कारण परते संगठित होने लगती हैं। सिलिका, कैलसाइट, चिकनी मिट्टी आदि संयोजक चट्टानों को ठोस रूप दे देते हैं। इस प्रकार इन दोनों क्रियाओं के सम्मिलत रूप को शिलाभवन कहते हैं।

तलछटी चट्टान तीन प्रकार से बनती हैं –

  1. यांत्रिक क्रिया द्वारा
  2. जैविक पदार्थों द्वारा तथा
  3. रसायनिक तत्त्वों द्वारा।।

1. यांत्रिक क्रिया द्वारा – इन चट्टानों का निर्माण अपरदन व परिवहन करने वाली शक्तियों द्वारा होता है, जैसे-नदी, पवन, हिम आदि । बालुकामय तथा मृणमय चट्टानें इस प्रकार के उदाहरण हैं।
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2. जैविक पदार्थों द्वारा – इन चट्टानों का निर्माण जीव – जन्तुओं तथा वनस्पति के अवशेषों के दब जाने से होता है। ये चट्टानों मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है

  • काबर्न प्रधान चट्टानें – कोयला इस प्रकार की चट्टान हैं।
  • चूना प्रधान चट्टानें – उदाहरण-चूने का पत्थर, खड़िया, डोलोमाईट आदि।

3. रासायनिक तत्त्वों द्वारा – उदाहरण – नमक, जिप्सम।

4. अवसादी चट्टानों की विशेषताएँ –

  • इन चट्टानों में विभिन्न परतें पाई जाती हैं, इसलिए इन्हें परतदार चट्टानें कहते हैं। दो परतों को अलग करने वाले तल को संस्तरण तल कहते हैं।
  • इनका निर्माण छोटे – छोटे कणों से होता है।
  • इनमें जीव – जन्तुओं तथा वनस्पति के अवशेष पाए जाते हैं।
  • जल में निर्माण के कारण इनमें लहरों, धाराओं और कीचड़ के चिह्न मिलते हैं।
  • ये चट्टानें मुलायम तथा प्रवेशीय होती हैं। इनका अपरदन शीघ्र होता है। अधिकतर क्षैतिज स्थिति में पाई जाती हैं।
  • ये पृथ्वी के धरातल पर 75 प्रतिशत भाग में फैली हुई हैं। परन्तु पृथ्वी की गहराई में 5 प्रतिशत है।

प्रश्न 2.
तीन प्रकार की चट्टानों में सम्बन्ध की व्याख्या चट्टानी चक्र की सहायता से कीजिए।
उत्तर:
एक वर्ग की चट्टानों को दूसरे वर्ग की चट्टानों में बदलने की क्रिया को चट्टानी चक्र (Rock Cycle) कहते हैं। इस चक्र में दो प्रकार की शक्तियाँ कार्य करती हैं –

  1. पृथ्वी के भू – गर्भ की गर्मी
  2. बाह्य शक्तियों से अपरदन

पृथ्वी पर सबसे पहले आग्नेय चट्टानों का निर्माण हुआ। विभिन्न कारकों जैसे पवन, जल, हिम द्वारा अपरदन से तलछट प्राप्त कर तथा जमाव से तलछटी चट्टानें बनती हैं। ये चट्टानें ताप, दाब तथा रसायनिक क्रिया से रूपान्तरित चट्टानें बनाती हैं। रूपान्तरित फिर पिघलकर आग्नेय चट्टानें बन जाती हैं। अपक्षय तथा अपरदन से ये मलछटी चट्टानें बन जाती हैं। इस प्रकार एक वर्ग की चट्टानों में परिवर्तित हो जाती हैं । इस क्रिया को चट्टान चक्र (Rock Cycle) कहते हैं।

उदाहरण के लिए, चूने का पत्थर संगमरमर की मूल चट्टान है। गर्म मैग्मा के सस्पर्श से चूने का पत्थर संगमरमर में परिवर्तित हो जाता है। स्लेट एक रूपान्तरित चट्टान है। यह शैल चट्टान पर अधिक दबाव से बनती है। चूने का पत्थर क्षेत्रीय रूपान्तरण के कारण क्वार्ट्साइट में बदल जाता है।

रूपान्तरित चट्टानें तथा आग्नेय लगभग समान परिस्थितियों में बनती हैं। इस प्रकार, पवन, जल, हिम, ताप तथा दाब के प्रभावों से चट्टानें; एक वर्ग से दूसरे वर्ग की चट्टान में परिवर्तित होती रहती हैं।
Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 5 खनिज एवं शैल

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखें

  1. अवसादी शैल
  2. कायान्तरण के प्रकार
  3. खनिजों का आर्थिक महत्त्व।

उत्तर:
1. अवसादी शैल:
इन शैलों का निर्माण शैलों के अपक्षय तथा अपरदन से प्राप्त अवसादों से होता है। पवन, जल तथा हिम शैलों को अपरदित करते हैं, और अवसाद को निम्न क्षेत्रों में परिवहित करते हैं। जब इनका निक्षेप समुद्र में होता है, वे सन्पीड़ित और कठोर होकर शैल परतों की रचना करते हैं। अवसाद खंडित खनिज तथा जैविक पदार्थ हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, पूर्व स्थित शैलों तथा जीवन-प्रक्रियाओं से प्राप्त होते हैं और वायु, जल अथवा हिम द्वारा परिवहित और निक्षेपित किए जाते हैं बलुआ पत्थर बालू के कणों से बनता है।

खड़िया करोड़ों सूक्ष्म जीवों के छोटे-छोटे कैल्शियम कार्बोनेटी (चूना) अवशेषों से बनती है। कठोर परतों के निर्माण की प्रक्रिया को शिलीभवन कहते हैं कभी-कभी अवसादों में निक्षेप के बाद रासायनिक परिवर्तन भी होते हैं। भौतिक तथा रसायनिक परिवर्तनों की सभी प्रक्रियाएँ जो अवसादों को उनके ठोस शैल में परिवर्तित होने के दौरान प्रभावित करती हैं, प्रसंघनन कहलाती हैं।

अवसादी शैलों को खंडज तथा अखंडज-दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। शैलों का नामकरण, शैलों में उपस्थित खनिज कणों के आकार पर निर्भर करता है। खनिज कणों के आकार के अनुसार कोटि-निर्धारण करने के लिए ‘वेंटवर्थ मापक’ मापन का प्रयोग किया जाता है । अखंडज अवसादी शैल दो प्रकार से बनती है-रासायनिक अवक्षेप तथा जैव पदार्थों से प्राप्त अवसाद। जैव पदार्थों से प्राप्त अवसादों में कोयला, चूना पत्थर इसके उदाहरण हैं। रासायनिक अवसादों के उदाहरण हैं-कैल्शियम सल्फेट, एनहाइड्राइट, जिप्सम (कैल्सियम सल्फेट हाइड्स)।

2. कायान्तरण के प्रकार:
ताप तथा दाब के कारण नई खनिज शैलों का निर्माण होता है। मृतिका ताप तथा दाब से प्रभावित होकर स्टेल में कायान्तरित हो जाती है। इसी प्रकार चूना पत्थर संगमरमर में कायान्तरित हो जाता है। कायान्तरित शैलों को दो बड़ी भागों में बाँटा जा सकता है – अपदलनी तथा पुनक्रिस्टलीकृत शैल। अपदलनी का निर्माण पूर्व-स्थित खनिजों का पर्याप्त रासायनिक परिवर्तन के बिना यौगिक विघटन से हुआ है।

इस प्रक्रिया को गतिक कायान्तरण कहते हैं। पुनक्रिस्टलिकृत शैल मूल खनिजों के पुनः क्रिस्टलीकरण होने से बनती है। पुनर्किस्टलीकृत शैल को दो उपभागों में बाँटा गया है-संस्पर्श कायान्तरित तथा प्रादेशिक कायान्तरित कार्यातरण की प्रक्रिया जारी रहने पर खनिजों का एक बड़ा प्रतिशत प्लेट जैसा शक्ति ग्रहण कर लेता है। ये खनिज शैल एक सामान्तर रेखा में एकत्र हो जाते हैं। इस संरचना को शल्कन कहते हैं।

सुविकसित शल्कन को शिल्ट कहते हैं। शिल्ट की आकृति में वृद्धि हो जाती है जिन्हें पॅफिरोब्लास्ट कहते हैं। कायान्तरित चट्टान का एक अन्य रूप है। सरेखण, इसमें खनिजों के कण एक लम्बी, पतली पेन्सिल जैसी वस्तु के रूप में एकत्र हो जाते हैं।

3. खनिजों का आर्थिक महत्त्व : उपयोगिता की दृष्टि से खनिजों को चार प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है –

(क) आवश्यक संसाधन, ऊर्जा सन्साधन, धातु सन्साधन तथा औद्योगिक सन्साधन । इनमें से सर्वाधिक आधारभूत वर्ग आवश्यक सन्साधन है, जिनमें मृदा तथा जल शमिल हैं।

(ख) ऊर्जा सन्साधन को जीवाश्मी ईंधन तथा परमाणु ईंधन में विभक्त किया जा सकता है। धात्विक सन्साधनों में संरचनात्मक धातुओं, जैसे-लोहा, एल्यूमिनियम एवं रिटेनियम से लेकर अलंकारी एवं औद्योगिक धातुएँ जैसे-सोना, प्लेटिनम तथा गैलियम शामिल हैं।

(ग) औद्योगिक खनिजों में 30 से अधिक वस्तुएँ शामिल हैं। जैसे-नमक, एस्बेस्टस तथा बालु।

(घ) खनिज निक्षेपों को उनके उपभोग की दर के बराबर पैदा करने की हमारी योग्यता तथा क्षमता होने की कोई सम्भावना नहीं है। द्वितीय खनिज निक्षेपों की महत्ता स्थानबद्ध है।

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट करें –

  1. रासायनिक अवक्षेप तथा जैव पदार्थों से प्राप्त अवसाद
  2. अपदलनी शैल और पुनक्रिस्टलीकृत शैल
  3. शल्कण संरेखण।

उत्तर:
1. रासायनिक अवक्षेप तथा जैव पदार्थों से प्राप्त अवसाद –
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2. अपदलनी शैल और पुनक्रिस्टलीकृत शैल –
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3. शल्कन और संरेखण –
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प्रश्न 5.
आग्नेय शैलों के निर्माण का वर्णन, उनके विभिन्न प्रकारों को उपयुक्त उदाहरण देते हुए वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आग्नेय शैलों का निर्माण ज्वालामुखी से निकले हुए लावा से अथवा उष्ण मैग्मा के भूपर्पटी के नीचे ठण्डा होने से हुआ है। ग्रेनाइट मोटे दाने वाली आग्नेय शैल है। यह मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से बनी है। . बैसाल्ट महीन दानों वाली काली आग्नेय शैल है, जो लावा के शीघ्र ठण्डा होने से बनी है। मैग्मा के रासायनिक विभेदन के आधार पर आग्नेय शैलें दो प्रकार की होती है-मैफिक और फेल्सिक।

आग्नेय शैल में खनिज क्रिस्टलों का आकार मैग्मा के ठण्डा होने की दर पर निर्भर है। सामान्य तौर पर मैग्मा के शीघ्र ठण्डा होने पर छोटे क्रिस्टल तथा धीरे-धीरे ठण्डा होने पर बड़े क्रिस्टल बनते हैं। अतिशीघ्र ठण्डा होने से प्राकृतिक काँच या ग्लास की उत्पत्ति होती है, जो क्रिस्टलविहीन होती है। मैग्मा को चारों ओर से घेरने वाली शैले ऊष्मा के निष्कासन में बाधा डालती है।

बड़े क्रिस्टल, जो आँखों से देखे जा सकते हैं, दृश्यक्रिस्टल कहलाते हैं, जो क्रिस्टल केवल माइक्रोस्कोप की सहायता से देखे जाते हैं, ऐफान क्रिस्टल कहलाते हैं। जब शैल में सभी क्रिस्टल एक ही आकार के हों, उस शैल गठन को समणिक कहते हैं। जब बड़े क्रिस्टल छोटे क्रिस्टलों के आव्यूह में अन्तः स्थापित होते हैं, उन्हें दीर्घ क्रिस्टल अन्तर्वेशी या पॅर्फिराइटिक कहते हैं।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

Bihar Board Class 11 Geography महासागरों और महाद्वीपों का वितरण Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 4 महासागरों और महाद्वीपों का वितरण

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?
(क) अल्फ्रेड वेगनर
(ख) अब्राहम आरटेलियस
(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी
(घ) एमंड हैस
उत्तर:
(ख) अब्राहम आरटेलियस

प्रश्न 2.
निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?
(क) अल्फ्रेड वेगनर
(ख) अब्राहम आरटेलियस
(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी
(घ) एमंड हैस
उत्तर:
(ख) अब्राहम आरटेलियस

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प्रश्न 3.
पोलर फ्लिंग बल (Polar fleeing force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(क) पृथ्वी का परिक्रमण
(ख) पृथ्वा का घूर्णन
(ग) गुरुत्वाकर्षण
(घ) ज्वारीय बल
उत्तर:
(ख) पृथ्वा का घूर्णन (ग) गुरुत्वाकर्षण

प्रश्न 3.
इनमें से कौन सी लघु (Minor) प्लेट नहीं है?
(क) नाजका
(ख) फिलिप्पिन
(ग) अरब
(घ) अंटार्कटिक
उत्तर:
(घ) अंटार्कटिक

प्रश्न 4.
सागरीय तल विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हेस ने निम्न से किस अवधारणा को नहीं विचारा?
(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ
(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना।
(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण
(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु।
उत्तर:
(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

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प्रश्न 5.
हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?
(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण
(ख) अपसारी सीमा
(ग) रूपांतर सीमा
(घ) महाद्वीपीय अभिसरण
उत्तर:
(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण

प्रश्न 6.
महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?
(क) वेगनर
(ख) बेकन
(ग) टेलर
(घ) हेनरी हेस
उत्तर:
(ग) टेलर

प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
(क) हिन्द महासागर
(ख) आर्कटिक महासागर
(ग) अटलांटिक महासागर
(घ) प्रशांत महासागर
उत्तर:
(ख) आर्कटिक महासागर

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन-सा पटल विरूपण से संबंधित नहीं है?
(क) पर्वत बल
(ख) प्लेट विवर्तनिक
(ग) महादेश जनक बल।
(घ) संतुलन
उत्तर:
(ग) महादेश जनक बल।

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प्रश्न 9.
समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब कितना होता है?
(क) 1031.25 मिलीबार
(ख) 1013.25 मिलीबार
(ग) 1013.52 मिलीबार
(घ) 1031.52 मिलीबार
उत्तर:
(ख) 1013.25 मिलीबार

प्रश्न 10.
लवणता को प्रति, समुद्र तल में घुले हुए नमक (ग्राम) को मात्रा से व्यक्त किया जाता है
(क) 10 ग्राम
(ख) 100 ग्राम
(ग) 1000 ग्राम
(घ) 10,000 ग्राम
उत्तर:
(ग) 1000 ग्राम

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने निम्नलिखित में से किन बलों का उल्लेख किया?
उत्तर:
वेनगर के अनुसार, महाद्वीपीय विस्थापन के दो कारण थे –

  1. पोलर या ध्रुवीय फ्लिंग बल (Polar fleeing force) और
  2. ज्वारीय बल (Tidal force)| ध्रुवीय फ्लिंग बल पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित है। यह ज्वारीय बल सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण से संबंद्ध है जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते हैं।

प्रश्न 2.
मैटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
ये धाराएँ रेडियाऐक्टिव तत्त्वों से उत्पन्न ताप भिन्नता से मैटल भाग में उत्पन्न होती हैं। आर्थर हाम्स ने तर्क दिया कि पूरे मैंटल भाग में इस प्रकार की धाराओं का तंत्र विद्यमान है।

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प्रश्न 3.
प्लेट की रूपांतर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमान्त में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:

  1. जहाँ न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पर्पटी का विनाश होता है उन्हें रूपान्तरण सीमा (Transform boundries) कहते हैं।
  2. जब एक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे फंसती है और जहाँ क्रस्ट नष्ट होती है,वह अभिसरण सीमा (Convergent boundries) है।
  3. जब दो प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में अलग हटती हैं और नई पर्पटी का निर्माण होता है उन्हें अपसारी सीमा (Divergent boundries) कहते हैं।

प्रश्न 4.
दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?
उत्तर:
आज से लगभग 14 करोड़ वर्ष पहले यह उपमहाद्वीप सुदूर दक्षिण में 50° दक्षिणी आक्षांश पर स्थित था। इन दो प्रमुख प्लेटों को टिथीस सागर अलग करता था और तिब्बतीय खंड एशियाई स्थलखंड के करीब था। इंडियन प्लेट के एशियाई प्लेट की तरफ प्रवाह के दौरान एक प्रमुख घटना घटी-वह थी लावा प्रवाह से दक्कन ट्रेप का निर्माण होना । ऐसा लगभग 6 करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हुआ और एक लम्बे समय तक जारी रहा।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिये गये प्रमाणों का वर्णन करें?
उत्तर:
जर्मन मौसमविद् अलफ्रेड वेनगर (Affred Wegner) ने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत सन् 1912 में प्रस्तावित किया, यह सिद्धांत महाद्वीपीय एवं महासागरों के वितरण से संबंधित था। इस सिद्धान्त के पक्ष में दिए गए प्रमाण इस प्रकार थे –
(a) महाद्वीपों में साम्य – दक्षिणी अमेरिका व अक्रीका के आमने-सामने की तटरेखाएँ अद्भुत व त्रुटिरहित साम्य दिखाती हैं। 1964 ई० में बुलर्ड (Bullard) ने एक कम्प्यूटर प्रोग्राम की सहायता से अटलांटिक तटों को जोड़ते हुए एक मानचित्र तैयार किया था तटों का यह साम्य बिल्कुल सही सिद्ध हुआ।

(b) महासागरों के पार चट्टानों की आयु में समानता – आधुनिक समय में विकसित की गई रेडियोमिट्रिक काल निर्धारण (Radiometric dating) विधि से महासागरों के पार महाद्वीपों के चट्टानों के निर्माण के समय को सरलता से मापा जा सकता है। 200 करोड़ वर्ष प्राचीन शैल समूहों की एक श्रृंखला यही ब्राजील तट और पश्चिमी अफ्रीका के तट पर मिलती है जो आपस में मेल खाती है।

(c) टिलाइट (Tillite) – टिलाइट वे अवसादी चट्टानें हैं जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती है। भारत में पाए जाने वाले गोंडवाना श्रेणी के तलछटों के प्रतिरूप दक्षिण गोलाद्धों के छः विभिन्न स्थलखण्डों में मिलते हैं। गोंडवाना श्रेणी के आधार तल में घने टिलाइट हैं जो विस्तृत व लम्बे समय तक हिम आवरण या हिमाच्छादन की तरफ इशारा करते हैं।

(d) प्लेसर निक्षेप (Placer Deposits) – घाना तट पर सोने के बड़े निक्षेपों कोउपस्थिति व चट्टानों की अनुपस्थिति एक आश्चर्यजनक तथ्य है। अतः यह स्पष्ट है कि घाना में मिलने वाले सोने के निक्षेप ब्राजील पठार से उस समय निकले होंगे, जब ये दोनों महाद्वीप एक-दूसरे से जुड़े थे।

(e) जीवाश्मों का वितरण (Distribution of Fossils) – कुछ वैज्ञानिकों ने इन तीनों स्थलखण्डों को जोड़कर एक सतत् स्थलखण्ड ‘लेमूरिया’ (Lemuria) की उपस्थिति को स्वीकारा । ये ‘लैग्मूर’ भारत, मेडागास्कर व अफ्रीका में मिलते हैं । मेसोसारस (Mrsosaurus) नाम के छोटे रेंगने वाले जीव केवल उथले खारे पानी में ही रह सकते थे। इनकी अस्थियाँ केवल दक्षिण अफ्रीका के दक्षिणी प्रान्त और ब्राजील में इरावर शैल समूहों में ही मिलती हैं। ये दोनों स्थान आज एक-दूसरे से 4,800 किमी. की दूरी पर हैं और इनके बीच में एक महासागर विद्यमान है।

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प्रश्न 2.
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त में मूलभूत अंतर बताइए।
उत्तर:
इस सिद्धांत की आधारभूत संकल्पना यह थी कि सभी महाद्वीप एक अकेले भूखण्ड में जुड़े हुए थे। वेगनर के अनुसार, आज के सभी महाद्वीप इस भूखण्ड के भाग थे तथा एक बड़े महासागर से घिरा हुआ था। उन्होंने इस बड़े महाद्वीप को पैजिया (Pangea) का नाम दिया । पंजिया का अर्थ-सम्पूर्ण पृथ्वी। विशाल महासागर को पैंथालासा (Panthalasa) कहा जिसका अर्थ है-जल ही जल। वेगनर के तर्क के अनुसार लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले इस बड़े महाद्वीप पैजिया का विभाजन आरम्भ हुआ।

पैजिया पहले दो बड़े महाद्वीपीय पिण्डो लारेशिया (Laurasia) और गोंडवाना लैण्ड (Gondwanaland) क्रमश: उत्तरी व दक्षिणी भूखण्डों का रूप में विभक्त हुआ। इसके बाद लॉरशिया व गोंडवानालैण्ड धीरे-धीरे अनेक छोटे हिस्सों में बंट गए जो आज के महाद्वीप के रूप में हैं। प्लेट विवर्तनिकी के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमण्डल सात मुख्य प्लेटों व कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त किया जाता है। नवीन वलित पर्वत श्रेणियाँ खाइयाँ और भ्रंश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं।

ग्लोब पर ये प्लेटें पृथ्वी के पूरे इतिहास काल में लगातार विचरण कर रही हैं। वेगनर की संकल्पना के अनुसार केवल महाद्वीप गतिमान है, सही नहीं है। महाद्वीप एक प्लेट का हिस्सा है और प्लेट चलायमान है। भू-वैज्ञानिक इतिहास में सभी प्लेटें गतिमान रही हैं और भविष्य में भी गतिमान रहेंगी।

प्रश्न 3.
महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरान्त की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?
उत्तर:
महाद्वीपीय प्रवाह उपरान्त अध्ययनों ने महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की जो वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के समय उपलब्ध नहीं थी। चट्टानों के पूरे चुम्बकीय अध्ययन और महासागरीय तल के मानचित्रण ने विशेष रूप से निम्न तथ्यों को उजागर किया।

  1. यह देखा गया है कि मध्य महासागरीय कटकों के साथ-साथ ज्वालामुखी उद्गार सामान्य क्रिया और ये उद्गार इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में लावा बाहर निकालते हैं।
  2. महासागरीय कटक के मध्य भाग के दोनों तरफ समान दूरी पर पायी जाने वाली चट्टानों के निर्माण का समय संरचना संघटन और
  3. चुम्बकीय गुणों में समानता पाई जाती है। महासागरीय कटकों के समीप की चट्टानों में सामान्य चुम्बकत्व ध्रुवण (Normal polarity)
  4. पाई जाती है तथा ये चट्टानें नवीनतम हैं। कटकों के शीर्ष से दूर चट्टानों की आयु भी अधिक है।
  5. महासागरीय पर्पटी की चट्टानें महाद्वीपीय पर्पटी की चट्टानों की अपेक्षा अधिक नई हैं। महासागरीय पर्पटी की चट्टानें कही भी 20 करोड़ वर्ष से अधिक पुरानी नहीं हैं।
  6. गहरी खाइयों के भूकम्प के उद्गम अधिक गहराई पर हैं। जबकि मध्य-महासागरीय कटकों के क्षेत्र में भूकम्प उद्गम केन्द्र (Focil) कम गहराई पर विद्यमान हैं।

इन तथ्यों और मध्य महासागरीय कटकों के दोनों तरफ की चट्टानों के चुम्बकीय गुणों के विश्लेषण के आधार पर हैस (Hess) ने सन् 1961 में एक परिकल्पना प्रस्तुत की, जिसे सागरीय तल विस्तार (Sea floor spreading) के नाम से जाना जाता है। सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् विद्वानों की महाद्वीपों व महासागरों के वितरण के अध्ययन में फिर से रुचि पैदा हुई। सन् 1967 में मैक्कैन्जी (Mackenzie) पार्कर (Parker) और मार्गन (Morgan) ने स्वतंत्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) कहा गया।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
भूकंप के कारण हुई क्षति से संबंधित एक कोलाज बनाइए।
उत्तर:
इस परियोजना को समाचार पत्रों की कटिंग, दूरदर्शन, रेडियों आदि पर वार्ताओं एवं पाठ्य पुस्तक (अध्याय तीन, चार एवं अन्य) से जानकारी इकट्ठा करके स्वयं कोलाज बनाइए ।

Bihar Board Class 11 Geography महासागरों और महाद्वीपों का वितरण Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पेंजिया से पृथक् होने वाले दक्षिणी महाद्वीप का नाम लिखो।
उत्तर:
गौंडवानालैंड।

प्रश्न 2.
गौंडवानालैंड में शामिल भू-खण्डों के नाम लिखो।
उत्तर:
दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा अंटार्कटिका।

प्रश्न 3.
उस पौधे का नाम लिखो जिसका जीवाश्म सभी महाद्वीपों में मिलते हैं।
उत्तर:
ग्लोसोप्टैरिस

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प्रश्न 4.
मूल महाद्वीप का क्या नाम था? यह कब बना?
उत्तर:
पेंजिया – काल्पनिक कल्प में 280 मिलियन वर्ष पूर्व।

प्रश्न 5.
किसने और कब महाद्वीपीय संचलन सिद्धान्त प्रस्तुत किया?
उत्तर:
अल्फ्रेड वैगनर ने 1912 ई० में।

प्रश्न 6.
लैमूरिया से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लैमूर प्रजाति के जीवाश्म भारत के मैडागास्कर व अफ्रीका में मिलते हैं। कुछ वैज्ञानिक ने इन तीनों खण्डों को जोड़ कर एक सतत् स्थलखंड की उपस्थिति को स्वीकारा है जिसे ‘लैमूरिया’ कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्लेसर निक्षेप कहाँ-कहाँ मिलते हैं?
उत्तर:
घाना तट व ब्राजील तट पर सोने के बड़े निक्षेप मिलते हैं। यहाँ सोनायुक्त शिराएँ पाई जाती हैं। इस से स्पष्ट है कि ये दोनों महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे।

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प्रश्न 8.
टिलाइट से क्या अभिप्राय है? ये कहाँ मिलते हैं?
उत्तर:
टिलाइट वे अवसादी चट्टानें हैं जो हिमानी निक्षेपण से निर्मित होती हैं। गोंडवाना श्रेणी के आधार तल में घने टिलाइट हैं जो लम्बे समय तक हिमावरण की ओर संकेत करते हैं। इसी क्रम के प्रतिरूप भारत के अतिरिक्त दक्षिणी गोलार्द्ध में अफ्रीका, फॉकलैंड द्वीप, मैडागास्कर, अंटार्कटिक और आस्ट्रेलिया में मिलते हैं। ये पुरातन जलवायु और महाद्वीपों में विस्थापन का स्पष्ट प्रमाण हैं।

प्रश्न 9.
किस मानचित्रकार ने तीनों महाद्वीपों को इकट्ठा मानचित्र पर दिखाया?
उत्तर:
एन्टोनियो पैलरिगरनी ने।।

प्रश्न 10.
अन्य महासागरीय तटरेखा की समानता का संभावना सर्वप्रथम किसने व्यक्त किया?
उत्तर:
एक उच्च मानचित्र वेता अब्राहम ऑरटेलियस ने।

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प्रश्न 11.
दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका को एक दूसरे से पृथक् होने में कितना समय लगा?
उत्तर:
20 करोड़ वर्ष

प्रश्न 12.
हिमालय पर्वत की उत्पत्ति का क्या कारण था?
उत्तर:
भारतीय प्लेट तथा युरेशियन प्लेट का आपसी टकराव।

प्रश्न 13.
हिन्द महासागर में ज्वालामुखी के दो तप्त स्थलों के नाम बताएँ।
उत्तर:
90° पूर्व कटक तथा लक्षद्वीप कटक।

प्रश्न 14.
सबसे बड़ी भू-प्लेट कौन-सी है?
उत्तर:
प्रशान्त महासागरीय प्लेट।

प्रश्न 15.
स्थलमंडल पर कुल कितनी प्लेटें हैं?
उत्तर:
7

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प्रश्न 16.
संवहन क्रिया सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर:
सन् 1928 ई० में आर्थर होम्स ने।

प्रश्न 17.
प्लेटों के संचलन का क्या कारण है?
उत्तर:
तापीय संवहन क्रिया।

प्रश्न 18.
समुद्र के अधस्तल के विस्तारण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
महासागरीय द्रोणी का फैलना तथा चौड़ा होना।

प्रश्न 19.
प्रवों के घूमने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
विभिन्न युगों में ध्रुवों की स्थिति का बदलना।

प्रश्न 20.
अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका में स्वर्ण निक्षेप कहाँ पाये जाते हैं?
उत्तर:
घाना तथा ब्राजील में।

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प्रश्न 21.
अभिसरण से क्या अभिप्राय है? इसके कारण बताइये।
उत्तर:
जब एक प्लेट नीचे धंसती है और जहाँ भूपर्पटी नष्ट होती है, वह अभिसरण सीमा है। वह स्थान जहाँ प्लेट सती हैं, इसे प्रविष्ठन क्षेत्र (Subduction Zone) भी कहते हैं। अभिसरण तीन प्रकार से हो सकता है –

  1. महासागरीय व महाद्वीपीय प्लेट के बीच
  2. दो महासागरीय प्लेटों के बीच
  3. दो महाद्वीपीय प्लेटों के बीच।

प्रश्न 22.
प्राचीन भूकाल में भारत की स्थिति कहाँ थी?
उत्तर:
पुराचुंबकीय (Palaeomagnetic) आँकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने विभिन्न भूकालों में प्रत्येक महाद्वीपीय खंड की अवस्थिति निर्धारित की है। भारतीय उपमहाद्वीप (अधिकांशतः प्रायद्वीपीय भारत) की अवस्थिति नागपुर क्षेत्र में पाई जाने वाली चट्टानों के विश्लेषण के आधार पर आंकी गई है।

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प्रश्न 23.
प्लेटों के दो प्रमुख प्रकार बताओ।
उत्तर:
एक प्लेट को महाद्वीपीय या महासागरीय प्लेट भी कहा जा सकता है। जो इस बात पर निर्भर है कि उस प्लेट का अधिकतर भाग महासागर अथवा महाद्वीप से संबद्ध है। उदाहरणार्थ प्रशांत प्लेट मुख्यतः महासागरीय प्लेट है जबकि युरेशियन प्लेट को महद्वीपीय प्लेट कहा जाता है। प्लेट विविर्तनिकी के सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का स्थलमण्डल सात मुख्य प्लेटों कुछ छोटी प्लेटों में विभक्त है। नवीन वलित पर्वत श्रेणियाँ खाइयाँ और भ्रंश इन मुख्य प्लेटों को सीमांकित करते हैं।

प्रश्न 24.
महासागरीय तल को किन भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर:
गहराई व उच्चावच के आधार पर महासागरीय तल को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है –

  1. महाद्वीपीय सीमा
  2. गहरे समुद्री बेसिन
  3. मध्य महासागरीय कटक

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
धुवों के घूमने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
घुवों का घूमना (Polar Wandering) – पहले महद्वीप पेंजिया के रूप में परस्पर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, इसका सबसे शक्तिशाली प्रमाण पुराचुबकत्व से प्राप्त हुआ है। मैग्मा, लावा तथा असंगठित अवसाद में उपस्थित चुंबकीय प्रवृत्ति वाले खनिज जैसे मैग्नेटाइट, हेमाटाइट, इल्मेनाइट और पाइरोटाइट इसी प्रवृत्ति के कारण उस समय के चुंबकीय क्षेत्र के समानांतर एकत्र हो गए। यह गुण शैलों में स्थाई चुंबकत्व के रूप में रह जाता है। चुंबकीय ध्रुव की स्थिति में कालिक परिवर्तन होता रहा है, जो शौलों में स्थाई चुंबकत्व के रूप में अभिलेखित किया जाता है।

वैज्ञानिक विधियों द्वारा पुराने शैलों में हुए ऐसे परिवर्तनों को जाना जा सकता है। जिनसे भूवैज्ञानिक काल में ध्रुवों की बदलती हुई स्थिति की जानकारी होती है। इसे ही घुवों का घूमना कहते हैं। ध्रुवों का घूमना यह स्पष्ट करता है कि महाद्वीपों का समय-समय पर संचलन होता रहा है और वे अपनी गति की दिशा भी बदलते है।

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प्रश्न 2.
प्रवालों की स्थिति किस प्रकार स्पष्ट करती है कि भू-खण्ड उत्तर की ओर विस्थापित हुए?
उत्तर:
प्रवाल 30° उत्तर 30दक्षिण अक्षांशों के मध्य कोष्ण जल में पनपता है। इस क्षेत्र से बाहर के महाद्वीपों पर प्रवालों का पाया जाना, इस बात का प्रबल प्रमाण है कि प्राचीन भूवैज्ञानिक काल में ये महाद्वीप विषुवत रेखा के निकट थे। महाद्वीपों का संचलन उत्तर की ओर हुआ और इसलिए ये आज शीत एवं उष्ण जलवायु का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 3.
पैजिया किसे कहते हैं? इसकी उत्पत्ति कब हुई? इसमे मिलने वाले भू-खण्ड बताएँ। पैंजिया के टूटने की क्रिया बताएं।
उत्तर:
विश्व के सभी भू-खण्ड पेंजिया नाम एक महा-महाद्वीपीय से विलग होकर बने हैं, यह बात अल्फ्रेड वेगनर ने 1912 में कही। जिया नामक यह महाद्वीप 28 करोड़ वर्ष पूर्व, कार्बनी कल्प के अन्त में अस्तित्व में आया। मध्य जुरैसिक कल्प तक यानि 15 करोड़ वर्ष पूर्व पंजिया उत्तरी महाद्वीप लॉरशिया तथा दक्षिणी महाद्वीप गौंडवानालैंड में विभक्त हो गया था। लगभग 6.5 करोड़ वर्ष अर्थात् क्रिटेशस कल्प के अन्त में गौंडवानालैंड फर से खंडित हुआ और इससे कई अन्य महाद्वीपों जैसे दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका की रचना हुई।

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प्रश्न 4.
महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटों का वर्णन करें।
उत्तर:
कुछ महत्त्वपूर्ण छोटी प्लेटें निम्नलिखित हैं –

  1. कोकोस प्लेट (Cocoas Plate) – यह प्लेट मध्यवर्ती अमेरिका और प्रशांत मासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  2. नाजका प्लेट (Nazca plate) – यह दक्षिण अमेरिका व प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।
  3. अरेबियन प्लेट (Arabian plate) – इसमें अघितर सऊदी अरब का भू-भाग सम्मिलित है।
  4. फिलिपाइन प्लेट (Philoppine plate) – यह एशिया महाद्वीपी और प्रशांत महासागरीय प्लेट के बीच स्थित है।

प्रश्न 5.
महासागरीय तल के मानचित्र से क्या निष्कर्ष निकलता है?
उत्तर:
महासागरीय तल का मानचित्रण (Mapping of the ocean floor) – महासगरी की तली एक विस्तृत मैदान नहीं है, वरन् उनमें भी उच्चावच पाया जाता है। इसकी तली में जलमग्न पर्वतीय कटके व गहरी खाइयाँ हैं, जो प्रायः महाद्वीपों के किनारों पर स्थित हैं। मध्य महासागरीय कटके ज्वालामुखी उद्गार के रूप में सबसे अधिक सक्रिय पायी गयीं। महासागरीय पर्पटी की चट्टानों के काल निर्धारण (Dating) ने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया कि महासागरों की नितल की चट्टानें महाद्वीपीय भागों में पाई जाने वाली चट्टानें, जो कटक से बराबर दूरी पर स्थित हैं, उन की आयु व रचना में भी आश्चर्यजनक समानता पाई जाती है।

प्रश्न 6.
महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वैगनर ने किन-किन बलों का उल्लेख किया है?
उत्तर:
प्रवाह सम्बन्धी बल (Force for drifting) – वैगनर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थान के दो कारण थे:

  1. पोलर या ध्रुवीय फ्लिंग बल (Polar fleeing force) और
  2. ज्वारीय बल (Tidal force)

घुवीय फ्लिंग बल पृथ्वी की आकृति एक सम्पूर्ण गोले जैसी नहीं है: वरन् यह भूमध्यरेखा पर उभरी हुई है। यह उभार के घूर्णन के कारण है। दूसरा बल, जो वैगनर महोदय ने सुझाया-वह ज्वारीय बल है, जो सूर्य व चन्द्रमा के आकर्षण से सम्बद्ध है, जिससे महासागरों में ज्वार पैदा होते हैं। वैगनर का मानना था कि करोड़ों वर्षों के दौरान ये बल प्रभावशाली होकर विस्थापन के लिए सक्षम हो गये । यद्यपि कि बहुत से वैज्ञानिक इन दोनों ही बलों को महाद्वीपीय विस्थापन के लिए सर्वथा अपर्याप्त समझते हैं।

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प्रश्न 7.
अपसरण क्षेत्र तथा अभिसरण क्षेत्र में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर:
अपसरण क्षेत्र – ये वे सीमाएँ हैं जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से अलग होती हैं। भूगर्भ से मैग्मा बाहर आता है। ये महासागरीय कटकों के साथ-साथ देखा जाता है। इन सीमाओं के साथ ज्वालामुखी तथा भूकम्प मिलते हैं। इसका उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है जहाँ से अमेरिकी प्लेटें तथा यूरेशियम व अफ्रीकी प्लेटे अलग होती है।

अभिसरण क्षेत्र – ये वे सीमाएँ हैं जहाँ एक प्लेट का किनारा दूसरे के ऊपर चढ़ जाता है। इनसे गहरी खाइयों तथा वलित श्रेणियों की रचना होती है । ज्वालामुखी तथा गहरे भूकम्प उत्पन्न होते हैं।

रूपांतर सीमा – जहाँ न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही विनाश होता है, उसे रूपांतरण सीमा कहते हैं। इसका कारण है कि इस सीमा पर प्लेटें एक-दूसरे के साथ-साथ क्षैतिज दिशा में सरक जाती हैं।

प्रश्न 8.
भारतीय प्लेट के विषय में बताएँ। हिमालय पर्वत की उत्पत्ति किस प्रकार हुई?
उत्तर:
भारत में हिन्द महासागर की सतह पर ऊँचे कटक तथा पठार शामिल हैं। इनमें से दो महासागरीय कटक, जिनके नाम नाइंटी ईस्ट कटक एवं मैस्केरेन पठार तथा चैगोस-मालद्वीव-लक्षद्वीप द्वीपीय कटक हैं, तप्त स्थलों के ज्वालामुखी मार्ग समझे जाते हैं। नाइंटी-ईस्ट कटक का उत्तरी विस्तार एक महासागरीय खाई में समाप्त हो जाता है, जिसने भारतीय महाद्वीपीय खंड के उत्तर में स्थित समुद्र अधस्तल को अपने में विलीन कर लिया।

चैगोस-लक्षद्वीप कटक आदि नूतन कल्प में पुरातन कार्ल्सबर्ग कटक को दक्षिण-पूर्व इंडियन कटक से जोड़ती थी। मध्य-महासागर कटक का विस्तार हो रहा है। इसकी गति लगभग 14 से 20 सेमी प्रति वर्ष है। कार्ल्सबर्ग दक्षिण-पूर्व हिन्दमहासागर कटक के पश्चात् भारतीय प्लेट एवं यूरेशियन प्लेट का टकराव भारतीय प्लेट के उत्तर में हुआ, जिससे हिमालय की उत्पत्ति हुई। हिमालय प्रदेश में भारतीय प्लेट एवं यूरेशियन प्लेट के मध्य का जोड़ सिंधु तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के साथ हैं।

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प्रश्न 9.
सर्वाधिक नवीन प्लेट कौन-सी है?
उत्तर:
मुख्य सात प्लेटों में सर्वाधिक नवीन प्लेट प्रशांत प्लेट है, जो लगभग पूरी तरह महासागरीय पटल से बनी है और भूपृष्ठ के 20 प्रतिशत भाग पर विस्तृत है। अन्य प्लेटों का निर्माण महासागरीय तथा महाद्वीपीय दोनों प्रकार के पटलों से हुआ है। कोई भी अन्य प्लेट केवल महाद्वीपीय पटल से निर्मित नहीं है। प्लेटों की मोटाई में अंतर महासागरों के नीचे 70 किमी से लेकर महाद्वीप के नीचे 150 किमी तक है।

प्रश्न 10.
प्रवाह दर पर नोट लिखें।
उत्तर:
प्लेट प्रवाह दरें (Rates of plate movement) – सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकीय । क्षेत्र की पट्टियाँ जो मध्य-महासागरीय कटक के समानंतर हैं। प्लेट प्रवाह की दर समझने में वैज्ञानिकों के लिए सहायक सिद्ध हुई हैं। प्रवाह की ये दरें बहुत भिन्न हैं। आर्कटिक कटक की प्रवाह, दर सबसे कम है (2.5 सेंटीमीटर प्रति वर्ष से भी कम) । ईस्टर द्वीप के निकट पूर्वी प्रशांत महासागरीय उभार, जो चिली से 3,400 किमी पश्चिम की ओर दक्षिण प्रशांत महासागर में है, इसकी प्रवाह दर सर्वाधिक है (जो 5 सेमी प्रति वर्ष से भी अधिक है)।

प्रश्न 11.
प्लेट विवर्तनिकी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्लेट विवर्तनिकी (Plate tectonics) – सागरीय तल विस्तार अवधारणा के पश्चात् विद्वानों की महाद्वीपों व महासागरों के वितरण के अध्ययन में फिर से रुचि पैदा हुई। सन् 1967 में मैक्कैन्जी (Mackenzie) पारकर (Parker) और मोरगन (Morgan) ने स्वतंत्र रूप से उपलब्ध विचारों को समन्वित कर अवधारणा प्रस्तुत की ‘जिसे प्लेट विवर्तनिको’ (Plate tectronics) कहा गया।

एक विवर्तनिक प्लेट (जिसे लिथास्फेरिक प्लेट भी कहा जाता है) ठोस, चट्टान का विशाल व अनियमित आकार खंड है जो महाद्वीपीय व महासागरीय स्थलमण्डलों से मिलकर बना है। ये प्लेटें दुर्बलता मण्डल (Asthenosphere) पर एक दृढ़ इकाई के रूप में क्षैतिज अवस्था में चलायमान हैं। स्थलमण्डल में पर्पटी एवं ऊपरी मैंटल को सम्मिलित किया जाता है, जिसकी मोटाई महासागरों में 5 से 100 किमी और महाद्वीपीय भागों में लगभग 200 किमी है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

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Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Text Book Questions and Answers

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 2 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करती है?
(क) 46 लाख वर्ष
(ख) 4600 मिलियन वर्ष
(ग) 13.7 अरब वर्ष
(घ) 13.7 खरब वर्ष उत्तर
उत्तर:
(ख) 4600 मिलियन वर्ष

प्रश्न 2.
निम्न में कौन-सी अवधि सबसे लम्बी है ………………..
(क) इओन (Eons)
(ख) कल्प (Period)
(ग) महाकल्प (Era)
(घ) युग (Epoch)
उत्तर:
(क) इओन (Eons)

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प्रश्न 3.
निम्न में कौन सा-तत्त्व वर्तमान वायुमण्डल के निर्माण व संशोधन में सहायक नहीं है?
(क) सौर पवन
(ख) गैस उत्सर्जन
(ग) विभेदन
(घ) प्रकाश संश्लेषण
उत्तर:
(क) सौर पवन

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से भीतरी ग्रह कौन से हैं …………………
(क) पृथ्वी व सूर्य के बीच पाए जाने वाले ग्रह।
(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।
(ग) वे ग्रह जो गैसीय हैं।
(घ) बिना उपग्रह वाले ग्रह।
उत्तर:
(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

प्रश्न 5.
पृथ्वी पर जीवन निम्नलिखित में से लगभग कितने वर्षों पहले आरम्भ हुआ।
(क) 1 अरब 37 करोड़ वर्ष पहले
(ख) 460 करोड़ वर्ष पहले
(ग) 38 लाख वर्ष पहले
(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।
उत्तर:
(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?
उत्तर:
ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं और अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। पार्थिव ग्रह जनक तारे के बहुत नजदीक होने के कारण और अत्यधिक तापमान के कारण इनकी गैसें संघनित नहीं हो पाई और घनीभूत भी न हो सकी। ये ग्रह छोटे होने के कारण उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी कम रही जिसके फलस्वरूप इनसे निकली हुई गैस इन पर रुकी नहीं रह सकी।

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प्रश्न 2.
पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधित दिये गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिकों के मूलभूत अंतर बताएँ –
(क) कान्ट व लाप्लेस
(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन
उत्तर:
(क) कान्ट व लाप्लेस की परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल से हुआ जो कि सूर्य की युवा अवस्था से संबद्ध थे।
(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन ने कहा कि ब्रह्मांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के पास से गुजरा। इसके परिणामस्वरूप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से सिगार के आकार का कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया। यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यहीं पर धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।

प्रश्न 3.
विभेदन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान और उत्पत्ति के तुरंत बाद अत्यधिक ताप के कारण, पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई और तापमान की अधिकता के कारण ही हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए । इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए। समय के साथ यह और ठंडे हुए और ठोस रूप में परिवर्तित होकर छोटे आकार के हो गए। अंततोगत्वा यह पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। हल्के व भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है।

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प्रश्न 4.
प्रारंभिक काल में पृथ्वी के धरातल का स्वरूप क्या था?
उत्तर:
प्रारंभ में पृथ्वी, चट्टानी गर्म और वीरान ग्रह थी जिसका वायुमण्डल विरल था जो हाइड्रोजन व हीलीयम से बना था।

प्रश्न 5.
पृथ्वी के वायुमंडल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन-सी थीं?
उत्तर:
हाइड्रोजन व हीलीयम।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
बिग बैंग सिद्धांत का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्न अवस्थाओं में हुआ है –
1. आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड बना है, अति छोटे गोलक (एकाकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। जिसका आयतन अत्यधिक सक्ष्म एवं तापमान तथा घनत्व अनंत था ।

2. बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की , विस्फोट प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ । वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की घटना आज
से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी। ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट (Bang) के बाद एक सेकेंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई। बिग बैंग होने के आरम्भिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ।
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3. बिग बैंग के कारण 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500° केल्विन तक गिर गया और परमाणवीय पदार्थ का निर्माण हुआ। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया। ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ है आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में विस्तार का होना। हॉयल (Hoyle) ने इसका विकल्प ‘स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Concept) के नाम से प्रस्तुत किया । इस संकल्पना के अनुसार ब्रह्मांड किसी भी समय में एक ही जैसा रहा हैं। यद्यपि ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी अनेक प्रमाणों के मिलने पर वैज्ञानिक समुदाय अब ब्रह्मांड विस्तार सिद्धांत के ही पक्षधर हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी के विकास संबंधी अवस्थाओं को बताते हुए हर अवस्था या चरण को संक्षेप में वर्णित करें।
उत्तर:
पृथ्वी की संरचना परतदार है । वायुमण्डल के बाहरी छोर से पृथ्वी के क्रोड तक जो पदार्थ हैं वे एक समान नहीं हैं। वायुमंडलीय पदार्थ का घनत्व सबसे कम है। पृथ्वी की सतह से इसके भीतरी भाग तक अनेक मंडल हैं और हर एक भाग के पदार्थ की अलग विशेषताएँ हैं। उल्काओं के अध्ययन से हमें इस बात का पता चलता है कि बहुत से ग्रहाणुओं के इकट्ठा होने से ग्रह बने हैं, पृथ्वी की रचना भी इसी प्रक्रम के अनुरूप हुई है। जब पदार्थ गुरुत्वबल के कारण संहत हो रहा था, तो इन इकट्ठा होते पिंडों ने पदार्थ को प्रभावित किया । इससे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न हुई। यह क्रिया जारी रही और उत्पन्न ताप से पदार्थ पिघलने लगा।

ऐसा पृथ्वी की उत्पत्ति के समय और उत्पत्ति के तुरंत बाद में हआ। अधिकता के कारण हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए । इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए तथा पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। चंद्रमा की उत्पत्ति के समय, भीषण संघट्ट (Giant impact) के कारण, पृथ्वी का तापमान पुन: बढ़ा या फिर ऊर्जा उत्पन्न हुई और यह विभेदन का दूसरा चरण था।

विभेदन की इस प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी का पदार्थ अनेक परतों में अलग हो गया जैसे-पर्पटी (Crust) प्रवार (Mantle), बाह्य क्रोड (Outer core) और आंतरिक क्रोड (Inner core) वर्तमान वायुमंडल के विकास की तीन अवस्थाएँ हैं। इसकी पहली अवस्था में आदिकालिक वायुमंडलीय गैसों का हास है। दूसरी अवस्था में, पृथ्वी के भीतर से निकली भाप एवं जलवाष्प ने वायुमंडल की संरचना को जैव प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया (Photo-synthesis) ने संशोधित किया। ऐसा माना जाता है कि जीवन का विकास लगभग 380 करोड़ वर्ष पहले आरंभ हुआ। एक कोशीय जीवाणु से आज के मनुष्य तक जीवन के विकास का सार भू-वैज्ञानिक काल मापक्रम से ज्ञात किया जा सकता है।

Bihar Board Class 11 Geography पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
एक भारतीय वैज्ञानिक का नाम बातइए जिसने सूर्य-केन्द्रित परिकल्पना प्रस्तुत की।
उत्तर:
आर्यभट्ट

प्रश्न 2.
सूर्य केन्द्रित सौर मण्डल किसे कहते हैं?
उत्तर:
सौर मण्डल जिसका केन्द्र सूर्य है, सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

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प्रश्न 3.
भू-केन्द्रित परिकल्पना से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इससे अभिप्राय है कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र था तथा सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, आदि पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं।

प्रश्न 4.
ऐसे दार्शनिक का नाम बताओं जिसके अनुसार पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र थी।
उत्तर:
यूनानी दार्शनिक अरस्तू

प्रश्न 5.
पृथ्वी पर ऑक्सीजन का स्रोत क्या है ?
उत्तर:
संश्लेषण क्रिया से महासागरों में ऑक्सीजन का बढ़ना।

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प्रश्न 6.
चन्द्रमा की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
लगभग 4.44 अरब वर्ष पूर्व।

प्रश्न 7.
The Big Splat से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक बड़े पिण्ड का पृथ्वी से टकराना।

प्रश्न 8.
बाहरी ग्रह कौन-से हैं ?
उत्तर:
वृहस्पति, शनि, अरुण, कुबेर।

प्रश्न 9.
आन्तरिक ग्रह कौन-से हैं ?
उत्तर:
बुध, शुक्र, पृथ्वी व मंगल।

प्रश्न 10.
तारों का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
लगभग 5 से 6 अरब वर्ष पहले।

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प्रश्न 11.
प्रकाश वर्ष में प्रकाश कितनी दूरी तय करता है?
उत्तर:
9.461 x 1012 किमी।

प्रश्न 12.
आधुनिक समय में सर्वमान्य सिद्धान्त कौन-सा है?
उत्तर:
बिग बैंग सिद्धान्त (विस्तृत ब्रह्माण्ड परिकल्पना)।

प्रश्न 13.
जींस और जैफरी का कौन-सा सिद्धान्त है?
उत्तर:
द्वैतारिक सिद्धान्त।

प्रश्न 14.
1950 ई० में रूस के किस वैज्ञानिक ने नीहारिका परिकल्पना में संशोधन किया?
उत्तर:
ओटो शिमिड ने।

प्रश्न 15.
अभिनव तारे से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सूर्य की अपेक्षा लाखों गुणा अधिक प्रकाशमय तारा।

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प्रश्न 16.
सूर्य से बाहर निकले जीह्वाकार पदार्थ का क्या आकार है?
उत्तर:
सिगार के आकार का।

प्रश्न 17.
किस वैज्ञानिक ने संघट्ट परिकल्पना प्रस्तुत किया?
उत्तर:
जेम्स जीन्स तथा जेफ्रीज ने।

प्रश्न 18.
किस दार्शनिक ने नीहारिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया?
उत्तर:
जर्मनी के दार्शनिक एमैनुल कान्त ने।

प्रश्न 19.
उस अद्वितीय ग्रह का नाम लिखें जहाँ जीवन मौजूद है।
उत्तर:
पृथ्वी।

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प्रश्न 20.
बाह्य ग्रहों के नाम लिखें।
उत्तर:
वृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, कुबेर।

प्रश्न 21.
आन्तरिक ग्रहों के नाम लिखें।
उत्तर:
बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल ग्रह।

प्रश्न 22.
सौर मण्डल में कितने ग्रह हैं?
उत्तर:
9

प्रश्न 23.
पृथ्वी के वायुमण्डल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन सी थीं।
उत्तर:
पृथ्वी के ठंडा होने और विभेदन के दौरान, पृथ्वी के अंदरुनी भाग से बहुत सी गैसें व जलवाष्प बाहर निकले । इसी से आज के वायुमंडल का उद्भव हुआ। आरम्भ में वायुमण्डल में जलवाष्प, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन व अमोनिया अधिक मात्रा में और स्वतंत्र ऑक्सीजन बहुत कम थी। वह प्रक्रिया जिससे पृथ्वी के भीतरी भाग से गैसें धरती पर आई, इसे गैस उत्सर्जन (Degassir.g) कहा जाता है।

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प्रश्न 24.
वर्तमान वायुमण्डल के विकास की अवस्थाएँ बताएँ।
उत्तर:
वर्तमान वायुमण्डल के विकास की तीन अवस्थाएँ हैं –

  1. इसकी पहली अवस्था में आदिकालिक वायुमण्डलीय गैसों का न रहना है।
  2. दुसरी अवस्था में पृथ्वी के भीतर से निकली भाप एवं जलवाष्प ने वायुमण्डल के विकास में सहयोग किया।
  3. अन्त में वायुमण्डल की संरचना को जैव मण्डल की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया (Photosynthesis) ने संशोधित किया।

प्रश्न 25.
महासागरों की उत्पत्ति कब हुई?
उत्तर:
अधिक संघनन के कारण पृथ्वी पर अत्यधिक वर्षा हुइ। पृथ्वी के धरातल पर वर्षा का जल गर्तों में इकट्ठा होने लगा जिससे महासागर बने । महासागर पृथ्वी की उत्पत्ति से 50 करोड़ सालों के अन्तर्गत बने । इससे पता चलता है कि महासागर 400 करोड़ साल पुराने हैं।

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प्रश्न 26.
सौरमंडल क्या है? इसकी रचना कब हुई?
उत्तर:
हमारे सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं। जिस नीहारिका को सौर मण्डल का जनक माना जाता है उसके ध्वस्त होने व क्रोड के बनने की शुरुआत लगभग 5 से 5.6 अरब वर्ष पहले हुई व ग्रह लगभग 4.6 से 4.56 अरब वर्ष पहले बने । हमारे सौर मण्डल में सूर्य (तारा), 9 ग्रह, 63 उपग्रह, लाखों छोटे पिण्ड जैसे क्षुद्र ग्रह (ग्रहों के टुकड़े) (Asterodis), धूमकेतु (Comets) एवं वृहत् मात्रा में धूलकण व गैसें हैं।

प्रश्न 27.
प्रकाश वर्ष से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रकाश वर्ष (Light Year) समय का नहीं वरन् दूरी का माप है। प्रकाश की गति 3 लाख कि० मी० प्रति सेकण्ड है। विचारणीय है कि एक साल में प्रकाश जितनी दूरी तय करेगा. वह एक प्रकाश वर्ष होगा। वह 9.461 x 1012 किमी के बराबर है। पृथ्वी व सूर्य की औसत दूरी 14 करोड़ 95 लाख, 98 हजार किलोमीटर है। प्रकाश वर्षको सन्दर्भ में यह प्रकाश वर्ष का केवल 8.311 मिनट है।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
आन्तरिक तथा बाहरी ग्रहों की तुलना करें।
उत्तर:
इन नौग्रहों में बुध, शुक्र, पृथ्वी व मंगल भीतरी ग्रह (Inner Planets) कहलाते हैं, क्योंकि ये सूर्य व छुद्रग्रहों की पट्टी के बीच स्थित हैं। अन्य पाँच ग्रह बाहरी ग्रह (Outer Planets) कहलाते हैं। पहले चार ग्रह पार्थिव (Terrestrial) ग्रह भी कहे जाते हैं। इसका अर्थ है कि ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। अन्य पाँच ग्रह गैस से बने विशाल ग्रह या जोवियन (Jovian) ग्रह कहलाते हैं। जोवियन का अर्थ है बृहस्पति (Jupiter) की तरह । इनमें से अधिकतर पार्थिव ग्रहों से विशाल हैं और हाइड्रोजन व हीलियम से बना सघन वायुमण्डल युक्त हैं। सभी ग्रहों का निर्माण लगभग 4.6 अरब साल पहले एक ही समय में हुआ।

प्रश्न 2.
चन्द्रमा की उत्पत्ति सम्बन्धी मत प्रस्तुत करें।
उत्तर:
चन्द्रमा पृथ्वी का अकेला प्राकृतिक उपग्रह है। पृथ्वी की तरह चन्द्रमा की उत्पत्ति सम्बन्धी मत प्रस्तुत किए गए हैं।
1. सन् 1883 ई० में सर जार्ज डार्विन (Sir George Darwin) ने सझाया कि प्रारम्भ में पृथ्वी व चन्द्रमा तेजी से घूमते एक ही पण्डि थे। यह परा पिण्ड डंबल (बीच से पतला व किनारों से मोटा) की अकृति में परिवर्तित हुआ और अंततोगत्वा टूट गया। उनके अनुसार चन्द्रमा का निर्माण उसी पदार्थ से हुआ जहाँ आज प्रशांत महासागर एक गर्त के रूप में मौजूद हैं।

2. यद्यपि वर्तमान समय के वैज्ञानिक इनमें से किसी भी व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। ऐसा विश्वास किया जाता है कि पृथ्वी के उपग्रह के रूप में चन्द्रमा की उत्पत्ति एक बड़े टकराव (giant impact) का नतीजा है जिसे द बिग स्पलैट (The big splat) कहा गया है। ऐसा मानना है कि पृथ्वी के बनने के कुछ समय बाद ही मंगल ग्रह के 1 से 3 गुणा बड़े आकार का पिण्ड पृथ्वी से टकराया। इस टकराव से पृथ्वी का एक हिस्सा टूटकर अंतरिक्ष में बिखर गया । टकराव से अलग हुआ यह पदार्थ फिर पृथ्वी के कक्ष में घूमने लगा और क्रमशः आज का चन्द्रमा बना। यह घटना या चन्द्रमा की उत्पत्ति लगभग 4.44 अरब वर्षों पहले हई।

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प्रश्न 3.
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?
उत्तर:
आधुनिक वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति को एक सतह की रासायनिक प्रतिक्रिया बताते हैं, जिससे पहले जटिल जैव (कार्बनिक) अणु (Complex organic molecules) बने और उनका समूहन हुआ। यह समूहन ऐसा था जो अपने आपको दोहराता था। पुनः बनने में सक्षम था) और निर्जीव पदार्थों को जीवित तत्त्व में परिवर्तित कर सका । हमारे ग्रह पर जीवन के चिह्न अलग-अलग समय की चट्टानों में पाए जाने वाले जीवाश्म के रूप में हैं।

300 करोड़ साल पुरानी भूगर्भिक शैलों में पाई जाने वाली सूक्ष्मदर्शी संरचना आज की शैवाल (Blue green algae) की संरचना से मिलती जुलती है। यह कल्पना की जा सकती है कि इससे पहले समय में साधारण संरचना वाली शैवाल रही होगी। यह माना जाता है कि जीवन का विकास लगभग 380 करोड़ वर्ष पहले आरम्भ हुआ। एक कोशीय जीवाणु से आज के मनुष्य तक जीवन के विकास का सारा भवैज्ञानिक काल मापक्रम से प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
ओटोशिमिड द्वारा संशोधित सिद्धान्त पर नोट लिखें।
उत्तर:
1950 ई० में रूस के ऑटो शिमिड (Otto schmidt) व जर्मनी ने कार्ल वाइजास्कर (Carml weizascar) ने नीहारिका परिकल्पना (Nebular hypothesis) में कुछ संशोधन किया, जिसमें नीहारिका से घिरा हुआ था जो मुख्यतः हाइड्रोजन, हीलियम और धूलकणों की बनी थी। इन कणों के घर्षण व टकराने (Collusion) से एक चपटी तश्तरी की आकृति के बादल का निर्माण हुआ और अभिवृद्धि (Acceretion) प्रक्रम द्वारा ही ग्रहों का निर्माण हुआ।

प्रश्न 5.
ग्रहों का सूर्य से दूरी, घनत्व तथा अर्द्धव्यासकी दृष्टि से तुलनात्मक वर्णन करें।
उत्तर:
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दूरियाँ खगोलीय एकक में हैं। अर्थात् अगर पृथ्वी की मध्यम दूरी 14 करोड़ 95 लाख 98 हजार किमी एक एकक के बराबर है तो बाकी ग्रहों की सूर्य से दूरी ………………..।
@ घनत्व ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर (gm/cm3)
# अर्द्धव्यास : अगर भूमध्यसागर अर्द्धव्यास 6378.137 किमी = 1 है तो ……………….

प्रश्न 6.
तारों के निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन करो।
उत्तर:
तारों का निर्माण-प्रारम्भिक ब्रह्मांड में ऊर्जा व पदार्थ का वितरण समान नहीं था। घनत्व में आरम्भिक भिन्नता से गुरुत्वाकर्षण बलों में भिन्नता आई, जिसके परिणामस्वरूप पदार्थ का एकत्रण हुआ। यह एकत्रण आकाशगंगाओं के विकास का आधार बना। एक आकाशगंगा असंख्य तारों का समूह है। आकाशगंगाओं का विस्तार इतना अधिक होता है कि उनकी दूरी हजारों प्रकाश वर्षों में (Light years) मापी जाती है। एक अकेली आकाशगंगा का व्यास 80 हजार से 1 लाख 50 हजार वर्ष के बीच हो सकता है।

एक आकशगंगा के निर्माण की शुरुआत हाइड्रोजन गैस से बने विशाल बादल के संचयन से होती है जिसे नीहारिका (Nebula) कहा गया । क्रमशः इस बढ़ती हुई नीहारिका में गैस के झुण्ड विकसित हुए। ये झुण्ड बढ़ते-बढ़ते घने गैसीय पिण्ड बने जिनसे तारों का निर्माण आरम्भ हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता है कि तारों का निर्माण लगभग 5 से 6 अरब वर्ष पहले हुआ।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दें –
(i) नीहारिका किसे कहते हैं?
उत्तर:
धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल को नीहारिका कहते हैं। इसमें गर्म गैसीय पदार्थ तथा धूल गैस के बादल होते हैं।

(ii) ग्रहाणु क्या हैं?
उत्तर:
सूर्य तथा गुजरते तारे के टकराव के कारण गैसीय पदार्थ एक फिलामेंट के रूप में पूर्व-स्थित सूर्य से निकल कर बाहर आ गया। यह जिह्वा आकार के पदार्थ छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गए। ये टुकड़े ठंडे पिंडों के रूप में उड़ते सूर्य के चारें ओर कक्षाओं में घूमने लगे इन्हें ग्रहाणु (Planetesimals) कहते हैं ।

(iii) सर्वप्रथम किसने नीहारिका परिकल्पना को प्रस्तावित किया?
उत्तर:
नीहारिका परिकल्पना सर्वप्रथम जर्मनी के दार्शनिक एमैनुल कांट ने 1755 में प्रस्तुत की।

(iv) आदि तारा (प्रोटोस्टार) क्या है?
उत्तर:
गर्म गैसों के बादल से बनी नीहारिका में विस्फोट से अभिनव तारे की उत्पत्ति हुई। इसके सघन भाग अपने ही गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से विखण्डित हो गए। सघन क्रोड विशाल तथा अधिक गर्म हो गया। इसे आदि तारा (Proto Star) कहते हैं जो अन्त में सूर्य बन गया ।

प्रश्न 8.
पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धि दिए गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिक के मूलभूत अन्तर बताइए – (क) कान्त व लाप्लेस (ख) चैम्बरलेन व मोल्टन।
उत्तर:
कान्त व लाप्लेस के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल (नीहारिका) से हुई परन्तु चैम्बरलेन व मोल्टन के अनुसार द्वैतारक सिद्धान्त के अनुसार एक भ्रमणशील तारे के सूर्य से टकराने से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित किसी एक सिद्धांत का वर्णन करें।
उत्तर:
पृथ्वी की उत्पत्ति से सम्बन्धित सन् 1755 में जर्मन दार्शनिक एमैनुल काण्ट ने यह परिकल्पना की कि धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल, जिन्हें निहारिका कहा गया अनेक पृथक-पृथक गोलाकार पिण्डों में निर्दिष्ट तरीके से संघनित हुए हैं। सन् 1796 में फ्रांसिसी लाप्लास ने लगभग इसी प्रकार के सिद्धान्त का प्रस्ताव दिया । काण्ट एवं लाप्लास के अनुसार गैस का मूल पिंड ठंढा होकर सिकुड़ने लगा । कोपीय संवेग के संरक्षण नियमानुसार इसके घूर्णन गति में वृद्धि हुई। इस प्रकार केन्द्रीय गैस पिंड से गैसीय पदार्थों के क्रमिक छल्ले अपकेन्द्रीय बल द्वारा अलग होते हैं। अंतिम चरण में छल्ले संघनित होकर ग्रहों में बदल गये। अर्थात् काण्ट लाप्लास ने पृथ्वी के उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो सिद्धान्त दिये हैं निहारिका सिद्धांत (Nebular Hybothesis) कहलाता है। यह एक तारक सिद्धांत ग्रहों की उत्पत्ति को समझाने का प्रयत्न करते हैं। निहारिका सिद्धांत गरुत्वाकर्षण पर आधारित है।

काण्ट एवं लाप्लास का निहारिका सिद्धांत –

  • काण्ट के अनुसार आदि पदार्थ अन्तरिक्ष में बिखरा पड़ा था।
  • इस आदि पदार्थ का जन्म परा प्रकृति से हुआ था।
  • अन्तरीक्ष में धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल को निहारिका (Nebula) कहा गया है।
  • प्रारंभ में यह पदार्थ ठंढा तथा गतिहीन था, परन्तु यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण गर्म गतिशील हो गया। फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने भी इसी प्रकार की परिकल्पना 1796 में प्रस्तुत किया।
  • कोणीय संवेग के नियमानुसार इस निहारिका की परिभ्रमण गति बढ़ गयी।
  • इस प्रभाव के मध्य भाग से लगातार छल्ले (Rings) अलग होने लगे। कलान्तर में छल्ले संघनित होकर ग्रह बन गया। अवशिष्ट भाग सूर्य के रूप में रह गया।

आलोचना –

  • यह पहला सिद्धान्त पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित होने के कारण सराहा गया।
  • किसी बाह्य शक्ति के बिना गतिहीन निहारिका में गति नहीं उत्पन्न हो सकती।
  • इस आलोचना के बावजूद काण्ट ने कहा “मुझे पर्याप्त पदार्थ राशि दो जिससे इस ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है तो मैं एक नया ब्रह्मांड बना कर दिख सकता हूँ।

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प्रश्न 2.
ग्रहों की उत्पत्ति सम्बन्धी नीहारिका परिकल्पना का वर्णन करें।
उत्तर:
नीहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)-एक तारक सिद्धान्त ग्रहों की सिद्धान्त है। 1755 में एमैनुल कांत नामक जर्मन दार्शनिक ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की। यह परिकल्पना न्यूटन के गुरुत्वाकषर्ण (Newton’s Law of Gravitation) पर आधारित है।

परिकल्पनाकी रूप – रेखा (Qutlines of Hypothesis) –

  • कान्ट के अनुसार आदि पदार्थ अन्तरिक्ष में बिखरा हुआ था।
  • इस आदि पदार्थ का जन्म परा-प्रकृति से हुआ था।
  • आन्तरिक्ष में धीमी गति से चक्राकार घूमते गैस के बादल को नीहारिका (Nebula) कहा गया।
  • प्रारम्भ में यह पदार्थ ठंडा तथा गतिहीन था। परन्तु यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण गर्म तथा गतिशील हो गया । फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने भी लगभग इसी प्रकार की परिकल्पना 1796 में प्रस्तुत की।
  • कोणीस संवेग के नियमानुसार इस नीहारिका की परिभ्रमण गति बढ़ गई तथा विकेन्द्रीय शक्ति भी अधिक हो गई।
  • इस प्रभाव के मध्य भाग से लगातार छल्ले (Rings) अलग होने लगे। कालान्तर में छल्ले संघनित होकर ग्रह बन गए । अवशिष्ट भाग सूर्य के रूप में रह गया।

आलोचना (Criticism) –

  • यह पहला सिद्धान्त होने के कारण सराहा गया।
  • किसी बाह्य शक्ति के बिना गतिहीन नीहारिका में गति उत्पन्न नहीं हो सकती।
  • इस आलोचना के बावजूद कान्ट ने कहा मुझे पर्याप्त पदार्थ राशि दो मैं विश्व का निर्माण करके बता दूँगा। (Give me matter and I can create the earth)।

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प्रश्न 3.
सौर मण्डल के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सौर मण्डल में कई तारा पुंज या मंदाकिनियां (Galaxies) हैं। पृथ्वी की मंदाकिनी को आकाश गंगा (Milky Way) कहते हैं । पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य तथा अन्य ग्रहों के साथ ही एक समय पर हुई। सौर मण्डल का विकास (Evoluation of Solar System)

सौर मण्डल की उत्पत्ति एक अभिनव तारे (Super Nova) – से हुई। ऐसा होयल ने सुझाव दिया है। पूर्व स्थित गैस के बादल में विस्फोट से अभिनव तारे की उत्पत्ति हुई । एक अभिनव तारा सूर्य की तुलना में कई मिलियन गुणा अधिक प्रकाशमय है। इस अभिनव तारे का तापमान तथा दबाव बहुत अधिक हो गया। इससे आण्विक प्रतिक्रिया (Nuclear Reaction) का आरम्भ हुआ। मेघ में उपस्थित कुछ हाइड्रोजन का संगलन हीलियम में हुआ जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा विमुक्त हुई।

अभिनव तारे में विस्फोट से प्रघाती तरंगें (Shock) – उत्पन्न हुई जिन्होंने मेघ के अधिक सघन भाग को धक्का दिया और इससे वे अपने ही गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से विखंडित हो गए। सघन क्रोड (Dense Core) अधिक बड़ा तथा गर्म होता गया। इसके गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से अधिक-से-अधिक पदार्थ इसकी ओर आकर्षित हुए। इस प्रक्रिया से गर्म क्रोड आदि तारे (Protostar) के रूप में विकसित हुआ जो कालान्तर में सूर्य बन गया।

गणा तथा दोष (Merits and Demerits) –

  • यह परिकल्पना अभिनव तारे में सघन तथा हल्के पदार्थों को होना समझाता है।
  • परिभ्रमण गति के बढ़ने से ग्रहों में कोणात्मक गति अधिक है।
  • इससे यह समझा जा सकता है कि ग्रहों में 98% भाग ऑक्सीजन एल्यूमीनियम आदि से बना है जबकि केवल 1% भाग हाइड्रोजन तथा हीलियम से बना है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

Bihar Board Class 11 Geography भूगोल एक विषय के रूप में Text Book Questions and Answers

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने भूगोल शब्द का प्रयोग किया?
(क) हेरोडोटस
(ख) गैलिलियो
(ग) इरेटास्थिनीज
(घ) अरस्तू
उत्तर:
(ग) इरेटास्थिनीज

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?
(क) बंदरगाह
(ख) मैदान
(ग) सड़क
(घ) जल उद्यान
उत्तर:
(ग) सड़क

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है?
(क) क्यों
(ख) क्या
(ग) कहाँ
(घ) कब
उत्तर:
(क) क्यों

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प्रश्न 4.
अनलिखित में से कौन-सा विषयकालिक संश्लेषण करता है?
(क) समाजशास्त्र
(ख) मानवशास्त्र
(ग) इतिहास
(घ) भूगोल
उत्तर:
(ग) इतिहास

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस विद्वान द्वारा क्रमबद्ध भूगोल प्रवर्तित किया गया?
(क) इरेटॉस्थनीज
(ख) इम्बोल्ट
(ग) स्ट्रेबो
(घ) टॉलेमी
उत्तर:
(ख) इम्बोल्ट

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर:
हम विद्यालय जाते समय मानव द्वारा सृजित ग्रामों, नगरों, सड़कों, रेलों, बदंरगाहों, बाजारों एवं मानव-जनित अन्य कई महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं। वे सभी लक्षण असमान हैं। उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि भूगोल एवं सांस्कृतिक लक्षणों के मष्य संवों को समझने का संकेत निहित होता है।

प्रश्न 2.
आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना?
उत्तर:
पृथ्वी का आकार भू-आम (Geoid) है, क्योंकि पूनों पर यह चपटी है। इसलिए व्यवहार में इसे संतरे की तरह गोल माना जाता है।

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प्रश्न 3.
क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधा रोषा क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं?
उत्तर:
जी हाँ, हम अपने विद्यालय में वन महोत्सव का आयोजन करते है। हम इतने पौधा रोपण इसलिए करते हैं कि वृक्ष पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते है। प्रकृति के विभिन्न संघटक जीवन तथा विकास के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते है। स्थलाकृतियाँ, वनस्पति तथा जीव-जन्तु एक-दूसरे से मिलकर एक वातावरण का निर्माण करते हैं. जिसे पारास्थितिक तंत्र कहते हैं।वध रस पारिस्थतिक तंत्र के संतुलन को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण घटक हैं। जैसे वृक्ष वाष्पोत्सर्वन की प्रक्रिया द्वारा विशाल माश में जल मुक्त करते है. इससे वर्षा वाले बादल बनते हैं। वर्षा के ऊपर ही पूरा जैवमण्डल निर्भर करता है। नक्ष उपजाऊ भूमि के अपरदन को रोकने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।

प्रश्न 4.
आपने हाथी, हिरण केंचुए, वृक्ष एवं घास को देखा है। ये कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मण्डल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मण्डल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?
उत्तर:
हाथी, हिरण, केंचुआ, वृक एवं घास को हमने वनों में देखा है जहाँ वे रहते हैं, एवं बढ़ते हैं। उस जगह को जैवमण्डल का नाम दिया गया है। जीवन को आश्रय देने वाला पृथ्वी का यह घेरा हाँ जायमण्डल. स्थलमण्डल तथा जलमहल एक-दूसरे से मिलकर जीवन संभव बनाते हैं उसे जीवमण्डल कहते हैं। सजीय, जीयमण्डल के जैविक और अजैविक घटकों के बीच का सामजस्य जीवमण्डल को गतिशील और स्थिर बनाता है। जैव घटक की पोषण पद्धति के आधार पर, इसे उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक के रूप में वर्गीकृत किया गया है. उनकी भोजन बनाने की तथा उपभोग संबंधित परस्परिक क्रियायें जीवमण्डल का एक अन्य मनोरंजक लक्षण है।

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प्रश्न 5.
आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुंचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी का क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान था, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते?
उत्तर:
हमारे निवास स्थान से विद्यालय जाने में हमें पैदल एक घण्टा लगता है। यदि विद्यालय मेरे घर की सडक के उस पार होता तो गरे । पाटा 30 मिनट लगता। यदि मैं साइकिल दाग विद्यालय आऊं तो मई 20 मिनट लगते हैं। यदि मैं बस द्वारा विद्यालय जाता हूँ तो 15 मिनट लगते हैं। यदि बम विभिन्न स्थानों पर समकर जाने की बजाय सीधे जाय तो में विद्यालय 7 मिनट में पहुँच जाता हूँ। एक स्थान में दूसरे स्थान तक हम बिना रुकं गए तो हम कम समय में पहुँचते हैं। यदि हम तेज गति वाहन का प्रयोग करें तो कम से कम समय में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच सकते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आप अपने परिस्थान (Surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तब्धयों में मिलता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पार एवं पक्षी जिसे आप देशो* भिन-भिन होते है। ये सभी भिन तत्व धरातल पर पाये जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक क्षेत्रीय भिनता का अध्ययन है?
उत्तर:
भूगोल अध्ययन का एक आंतरिक्षण (Interdisciplinary) विषय है। प्रत्येक विषय का अध्यायन कुछ उपागमों के अनुसार किया जाता है। इस दृष्टि से भूगोल के अध्ययन के दो प्रमुख उपागम है –

  1. विषय-वस्तुगत क्रमबद्ध, एवं
  2. प्रादेशिक।

विषय – वस्तुगत उपागम में एक तथ्य को पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है। तत्पश्चात क्षेत्रीय स्वरूप के वर्गीकृत प्रकारों की पहचान की जाती है। पहले विद्वान भौतिक भूगोल पर बल देते थे। लेकिन बाद में स्वीकार कर लिया गया कि मानव धपतल का समाकलित भाग है, वह प्रकृति का अनिवार्य अंग है। उसने सांस्कृतिक विकास के माध्यम से भी योगदान दिया है। विषय-वस्तगत या क्रमबद्ध उपागम के आधार र भूगोल को विभिन शाखाओं में बाँय है-भौतिक भूगोल भू-आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान, जल-विज्ञान तथा मृदा धगेल के विषय में जानकारी देता है।

मानव भगोलके अंतर्गत समाज जया इसकी स्थानिक/प्रादेशिक गत्यात्मकता (Dynamism) एवं समाज के वोगदान से निर्मित सांस्कृतिक तत्वों का अध्यपन आता है। जीव-भगोल के अंतर्गत वनस्पति पारितिक विज्ञान, पर्यावरण का अध्ययन अवा है। प्रादेशिक उपागम के अंतर्गत प्रादेशिक या क्षेत्रीय जानकारियों का अध्यक्त किया जाता है। उपडत ती के आधार पर हम कह सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक वा क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन कराता है।

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प्रश्न 2.
आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।
उत्तर:
भूगल एक संश्लेषणात्मक (Synthesis) विषय है जो क्षेत्रीय संश्लेषण का प्रयास करता है तथा इतिहास कालिक संश्लेषण का प्रवास करता है। इसके उपगम की प्रकृति समवात्मक (Holistic) होती है। भूगोलका एक सरलेषणात्मक विषय के रूप में अनेक प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञानों से अंतरापृष्ठ (Interface) संबंध है। दर्शन किसी विषय को जड़ प्रदान कर उसके क्रमशः विकास की प्रक्रिया में स्पष्ट ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करता है। सामाजिक जिन के सभी विषय यथा समाजशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान, नागरिक भूगोल, अर्थशास्त्र जनकिकी, सामाजिक वाचता का अध्ययन करते हैं।

भूगोल की सभी शाखायें-सामाजिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल (नागरिक शास्त्र), आर्षिक भूगोल, जनसंख्या भूगोत, अधिवास भूगोल आदि विषयों से पनिष्ठता से बड़े हैं क्योंकि इनमें से प्रत्येक में स्थानिक (Spatial) विशेषतायें मिलती हैं। राजनीतिक शास्त्र का मूल उद्देश्य राज्यक्षेत्र, जनसंख्या, प्रभुसत्ता का विश्लेषण है, जबकि राजनीतिक भूगोल एक क्षेत्रीय इकाई के रूप में राज्य तब इसको जनसंख्या के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन करता है।

अर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था की मूल विशेषताओं जैसे उत्पादन, वितरण, बिनिमय एवं उपभोग का विवेचन करता है। इसी प्रकार जनसंख्या विधान भूगोल जनकिकी से निकरण से जुदा हुआ है। उपर्युक्त विवेचन से सष्ट है कि भूगोल इतिहास, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में गहरा संबंध है।

(घ) परियोजना कार्य

प्रश्न 1.
वन को एक संसाधन के रूप में एनिए, एवं
(i) भारत के मानचित्र पर विभिन्न प्रकार के वनों के वितरण को दर्शाइए।
(ii) देश के लिए बनों के आर्थिक महाच’ के विषय पर एक लेख लिखिए।
(iii) भारत में वन संरक्षण का ऐतिहासिक विवरण राजाधान एवं उत्तरांचल में “चिपको आंदोलन’ पर प्रकाश डालते ए प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
(i) (a) पर्वतीय वन
(b) उष्ण कटिबन्धीय शुष्क-महरित एवं भई-सपाहरित वन
(c) उष्ण करिबंधीय पवादीय बन
(d) शुल्क पर्णपाती वन
(e) मॅग्रोव वन

(ii) वनों का भी हमारे जीवित रहने के लिए उतना ही महत्व है, जितना जल का। हमारे देशका लगभग 22.5 प्रतिशत स्थाल भाग वन के रूप में है। वन से हमें लकडी, इंधन, चाय, खाद्य पदार्थ, फल, औषधियाँ, रेशो भावि प्राण होते है। छोटे-छोटे जीवाणुओं से लेकर शेर, चीता आदि वनों में आवास करते हैं. जीव सम्पदा।सभी वन और सौर ऊर्जा को ग्रहण करते हैं, ऑक्सीजन, वातावरण में छोड़ते हैं, उत्पादित पदार्थो को उपभोक्ताओं तक पहुंचाते हैं वर्षा करवाते हैं तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।
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वन प्रदूषण कम करते हैं। वे वातावरण में उपस्थित कर्मों को अवशोषित करते हैं, तब मार्बन डाइऑभमाह का अवशोषण करते हैं। वर्षों से प्रदेश की सुन्दरता बढ़ती है। हमारी पला,
साहित्य तथा संगीत भीमा विशेष महत्व सिटिक प्रवेशालाई भाव इनका प्रयोग अनुसंधान लिए किया विरें में विद्यमान चे मागी मनुष्य के लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकते है. इस पर काफी अनुसंधान हो सास आवास की सुविधा श्री प्रदान करते।

(iii) विषको आन्दोलन र संरक्षण के लिए गढ़वाल क्षेत्र में सुन्दरलाल नाग द्वारा बताया गया था। इसके अंतर्गत नियों वृक्षों से चिपक गयी थी जिससे कोई भीलों को अपने स्वार्थवश न काट पायें। चिपको आन्दोलन की प्रेरणा सुन्दरलाल बहाणा को आज से लगभग 300 साल पूर्व राजस्थान में चलने गए वन संरक्षण आन्दोलन से मिली थी। इस आन्दोलन में भी औरतों पक्षों से चिपककर उनकी रक्षा की थी। खंजरी’ के नाम से प्रसिद्ध आन्दोलन में अमतादेवी विश्नोई नेताब में सियों ने पंडों की रक्षा के लिए नया से विकरकर पक्षों की रक्षा की थी।

Bihar Board Class 11 Geography निर्माण उद्योग Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किन विषय अध्ययन ने भूगोल को पतिय चरित्र दिया।
उत्तर:
सौरमण्डल पच्चीका आकार, शव्या देशान्तर।

प्रश्न 2.
अवारहवी शताब्दी में विद्यालयों में भूगोलको लोकप्रियता क्यों मिली?
उत्तर:
भूगोल का विद्यालय में एक लोकप्रिय विषय बनने का मुख्य कारण यह है कि इसके अध्ययन से पच्ची के निवासियों तथा मानों के विषय में जानकारी प्राण होती है। इससे प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक कार होता है। इस अध्ययन से मनुष्य तथा पर्यावरण सम्बन्धों का अनुमान होता है।

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प्रश्न 3.
उस भूगोलवेत्ता का नाम बताइए जिन्होंने ‘भौतिक तथा मानव भूगाल के संश्लेषण का समर्थन किया था।
उत्तर:
एच. मेकिंडर (H. J. Mac-kinder)।

प्रश्न 4.
भूगोल में कौन-सा आधुनिकतम विकास हुआ है।
उत्तर:
पूर्वसमिकीच विश्लेषण का उपयोग निरन्तर नहा है।

प्रश्न 5.
प्रकृतिक भदाय के मुख्य लक्ष्य बताएं।
उत्ता:
सरिया बनामी आदि।

प्रश्न 6.
बातावरण को कौन-से दो मुख्य भागों में बांटा जाता है।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक
  2. मानवीय

प्रश्न 7.
भौतिक भूगोल के चार मुख्य उपक्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. भू-आकृति विज्ञान, जलवायु विज्ञान
  2. जल विज्ञान

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प्रश्न 8.
18 वीं शताबी में जर्मनी के दो प्रसिद्ध भूगोल-बेताओं के नाम लिखें।
उत्तर:
हम्बोला तथा रिटर।

प्रश्न 9.
भूगोल के हो स्पष्ट क्षेत्र कौन-से है।
उत्तर:
भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल।

प्रश्न 10.
भौतिक भूगोल के दो उपक्षेत्र बताएं।
उत्तर:

  1. भू-आकृतिक विज्ञान
  2. जलवायु विज्ञान

प्रश्न 11.
मानवीय भूगोल के दो उप-क्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. आर्थिक भूगोल
  2. सांस्कृतिक भूगोला

प्रश्न 12.
बाबुमण्डल दशाओं का अध्ययन करने वाले दो विज्ञान बताएँ।
उत्तर:

  1. जलवा
  2. मौसम विज्ञान

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प्रश्न 13.
‘मनुष्य के कार्य प्रकृति द्वारा निर्धारित होते हैं। वह किस भूगोलवेत्ता का कथन है?
उत्तर:
रैसेल (Ratael) का।

प्रश्न 14.
भूगोल किन तीन प्रमुख विषयों का अध्ययन है?
उत्तर:

  1. भौतिक वातावरण
  2. मारलीय क्रियाएं
  3. दोनों का अंतक्रियात्मक सम्बन्य।

प्रश्न 15.
Geography किन दो शब्दों के सुमेल वे बना है?
उत्तर:
यह शब्द ग्रीक भाषा के दो गल (Geo) पुच्ची तय ‘Graphor’ वर्णन से प्राप्त हुआ है।

प्रश्न 16.
मानव भूगोल के चार मुख्य उपक्षेत्र बताओ।
उत्तर:

  1. सांस्कृतिक भूगोल
  2. भार्षिक भूगोल
  3. जनसंख्या भूगोल
  4. ऐतिहासिक भूगोला।

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
‘पृथ्वी की सतह एक सप नहीं है।’ दो उदाहरण दो।
उत्तर:

  1. पृथ्वी के श्रीनिक स्वरूप में भिन्नता होती है। वहाँ पर्वत, पहाड़ियाँ, पारियाँ, मैदान पठार, बन, रेगिस्तान मिलते हैं।
  2. यहाँ सामाजिक तथा संस्कृतिक तत्वों में भी भिन्नता है। यहाँ ग्रामों नगरों सड़को. रेलों. बाजारों के रूप में ना पाई जाती है। पृथ्वी पर मैतिक वातावरण, सम्पविक संगठन तथा सांस्कृतिक विकास में विभिन्नता पाई जाती है।

प्रश्न 2.
‘भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है।’ स्पष्ट को।
उत्तर:
भूगोल पच्ची पर भौतिक तय समाजिक क्षेत्र में मिलताओं का अध्ययन कराता है। भूगोल उन कारकों का भी अध्ययन कराता है जो इस विभिन्नता को उत्पन करते हैं। उदाहरणार्थ: फसल का स्वरूप एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में भिन होता है। यह चिना मिट्टी, जलवायु, तकनीकी निवेश की चिन्नता के कारण प्रकार भूगोल दो तत्वों के मध्य कार्य-कारण (Cause and effect) के सम्बना को ज्ञात करने में सहायक है।

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प्रश्न 3.
भगोल विषय में पच्ची के किन चार परिमण्डलों का अध्ययन होता है?
उत्तर:

  1. स्थल मण्डल
  2. जस पाठल
  3. वायुमण्डल
  4. जैव मण्डल

प्रश्न 4.
हमें भूगोल क्यों पढ़ना चाहिए?
उत्तर:
पृथ्वी मनुष्य का घर है। वहाँ हमारा जीवन अनेक रूपों से प्रभावित होता है। हम आसपास के संसाधनों पर निर्भर करते हैं। हम तकनीकों द्वारा प्राकृतिक संसाधन भूमि, मा, जल का उपयोग करने गए अपच आगार प्राप्त करते हैं। हम मौसमी शाके अनुसार अपना जीवन समायोजित करते है। इसलिए भूगोल का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 5.
भूगोल पच्ची पर विविधताओं को सम्माने के लिए क्षमता प्रदान करता है। दो उदाहरण दो।
उत्तर:
पृथ्वी पर भौतिक वातावरण, सामाजिक संगठन तथा सांस्कृतिक विकास में विविधता मिलती हैं।

  1. आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक तथा भौगोलिक सूचना नत्र (G.LS) ग्लोब पर स्थिति शात करने में सहायक हैं।
  2. संगणक मानचित्र कला (Computer Cartography) मानचित्र बनाने में कुशलता प्रदान करती है।

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प्रश्न 6.
भौतिक भूगोल किस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों के मयांकन सहायक?
उत्तर:
भौतिक पूल प्रकृतिक संसाधनों के मूल्यांकन एवं प्रबंधन सीधा विषय के रूप में विकसित होतास उद्देश्य की पूर्ति हो भौतिक पर्यावरण वंगालमयसम्मयों को समझना आवश्यक।तिक पर्यावरण संसाधन प्रदान करतीवं सं साधनों का उपयोग करते हुए अपन आर्मिक एवं सांस्कृतिक विकास सुनिश्चिातानीकी की सहायता से संसाधनों के बदले उपयोग में विश्व में पारिस्थतिक असन्तुलन अपन कर दिया है। अतएव सतत विकास (Sustainable development) के लिए मैतिक चालवाण का जन नितान्त आवश्यक जोतिक भूगल के महत्व को रेखांकित करता है।

प्रश्न 7.
विश्व एक परस्पर निर्भर है। व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व एक प्रदेश दूसरे प्रदेश से उड़े है तथा एक-दूसरे पर निर है। वर्तमान विश्व को एक वैश्विक मास (Global Village) को संज्ञा दी जा सकती है। परिवार के बीच साधनातीर काकी -दृश्य माध्यमों (Audio – visual) सुचना तकनीको कह को बहर समृद्ध का दिया है। प्रकृतिक विज्ञान तथ साजिक विज्ञान एक-खरे र रिचर।

प्रश्न 8.
भूगोल की परिभाषा लिखें।
उत्तर:
पूर्गाल की परिभाषा (Definition of Geography) – पूस पीक विक्षन है (Geography is the science of the Earh)। भूगोल को औजी पवायोग्राफी’ कहा गता है। ज्योपासी राम पूनी भाषा के जी (Ge) तथा ‘चाको’ (Gerpho) शब्दों से मिलकर बना है। (Geography = Ge + Grapho) ‘जी’ (Ge) का अर्थ है ‘पनी का मान करना। जिस प्रकार असनका मूल माल्य है, -गर्भ विज्ञान चट्टान का अमर वनस्पति विज्ञान पेड़-पौधों से इतिहास समय से सम्बन्धित भूगोल ‘स्थान’ से सम्बन्धित है। ‘पृथ्वी-जाल व भूतल का अध्ययन है। भूगोल पृथ्वी को मानव निवास स्थान पाकर उसका अध्ययन करता है (Geography studies the Earth as home of man)।

प्रश्न 9.
भूगोल को ज्ञान का भण्डार क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
प्राचीनकाल में गीत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य पलीकेचारे में सामान्य ज्ञान प्राप्त करना ही बाब शाम यात्रियों, व्यापारियों, वेषकों तथा विजेताओं को कचाओं न. आधारित पाकिएबीमाकार तथा रेशन्ता, और मालरिकी जनकली का सपकेश पुरोल निगम अनर्गत किया। पृथ्वी के बारे में जानकारी अधिकतर विषयों से प्रजटलरोतको ज्ञानका भण्डारात।

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प्रश्न 10.
‘भौतिक पर्यावरण एक मंच प्रदान करती सिपापाव कार्य को स्पष्ट करें।
उत्तर:
मफेल पच्ची पर भौतिक पर्यावरण तथा सांस्कृतिक लक्षणों के मध्य सम्मका अध्यक्त। अनेकामों में समानता तथा कई में असमाता पाई जाती। भगोल भौतिक वातावरण तथा मानवअन्योन्यक्रिया का अध्ययन है। एक लेखनके अनुहार चौतिक पर्यावरण एक मंच प्रस्तुत करता पर मानव समाज अपने विकाससमाचाकरता. आकनियाँ आश्चर प्रदान करती। जिस पर मानवीय क्रियाएँ होती हैं। गानों परषि , पता, पर खनन, पशुपालन, पर्वतों सेभनि निकलती हैं। जलवाप मारवघरों के प्रकार, सस, भोजन, वनस्पति को प्रभावित करता है।

प्रश्न 11.
भूगोलापानी पुच्ची का अध्ययन किस प्रकार करता है?
उत्तर:
भूगल पवार्यता अध्ययन करता है। पृथ्वी भी पचायतको मातिापायी है। इसलिए इस अध्ययन अनेक प्रकृतिक विज्ञान जैसे-भौमिको मया विद्यार, समुद्र पिताल, वनस्पति शास्त्र, जीवन ग्ज्ञिान, मैसम न्जिान महापक हैं। अन्य सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास. समाज शास्त्र, राजनीतिक विज्ञान -विज्ञान की पराल की बचाता का अध्ययन करते हैं। भूगोल सभी प्राकृतिक तथा सामाजिक विपनों से सुचनाधार प्राप्त करके संश्लेषण करता है।

प्रश्न 12.
भूगोल हमें एक अच्छा नागरिक बनने में कसे सहायता करता है?
उत्तर:
प्रायः यह समझा जाता है कि इतिहास, नागरिक शास्त्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञान हमें अच्छा नागरिक बनाने में सहायता करते हैं। भूगोल भी इसी उरद की पूर्ति करता है।
इसके अध्ययन द्वारा हमें भौतिक पर्यावरण तथा मानवीय क्रियाओं के सम्बन्ध (Man environment relation) की जानकारी होती है।

  1. भूगोल हमें भू-मण्डल पर अपने मिति के बारे में जानकारी देते हए संसार के अन्य देश के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के बारे में अवगत कराता है। अतः भूगोल का अध्यापन एक अन्तर्राष्ट्रीय भावना को जन्म देता है।
  2. भूगोल मानव भूगोल का आधार है। इससे हमें संसार की विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक तक्ष आर्थिक समस्याएं हल करने में सहायता मिलती है।
  3. भूगोल मानवीय कल्याण के लिए विश्व साधनों के उचित उपयोग में सहायता करता है।
  4. भूगोस हमें विभिन्न देशों के विकास स्तर (Stage of development) में अन्तर क कारण समझने में सहायता करता है, इस प्रकार अन्य सामाजिक शास्त्रों की भांति एक अच्छा नागरिक बनने में सहायता करता है।

प्रश्न 13.
भूगोल के अध्ययन में तबादका महत्व बलाएँ।
उत्तर:
भूगोल का अध्ययन दो उपागमों के आधार पर किया जाता है –

  1. विषय वस्तुगत उपागम (Systematic Approach)
  2. प्रादेशिक उपागम (Regional Approach)

1. विषय वस्तुगत उपागम (Systematic Approach)-इस उपागम में एक वष्य का पूरे विश्व स्तर पर अध्ययन किया जाता है। इसके पश्चात् क्षेत्रीय स्वरूप के बाँकृत प्रकारों की पहचान की जाती है। उदाहरणार्थ यदि कोई प्राकृतिक बनस्पति के अध्ययन में रुचि रखता है, तो सर्वप्रथम विश्व स्तर पर उसका अध्ययन किया जायेगा, फिर प्रकारात्मक वर्गीकरण जैसे-विषुवत् रेखीय सदाबहार बन, नाम लकड़ी वाले कोणधारी वर अथवा मानसूनी वन इत्यादि की पहचान उनका विवेचन तथा सीनकन करना होगा।

2. प्रादेशिक उपागम (Regional Approach)-प्रादेशिक उपागम में विश्व को विभिन पदानक्रमिक स्तर के प्रदेशों में विभक्त किया जाय और फिर एक विशेष प्रदेश में सभी भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है। ये प्रदेश प्राकृतिक राजनतिक चा निर्दिष्ट (मित) प्रदेश हो सकते हैं। एक प्रदेश में तथ्यों का अध्ययन समता से विविधता में एकता की खोज कर हए किया जाता है।

दैतवाद का महत्त्व-दैतवाद भरोल की एक मुख्य विशेषता है। इसका प्रारम्भ से ही विषय में प्रवर्तन हो चुका है। बैतवाद (दिया) अध्ययन में महल रिये जाने वाले पक्ष पर निर्भर करते हैं। पहले निदान भौतिक भूगोत पर बल देते थे परनवार में स्वीकार किया गया था कि मानव धरातलका समकलित भागमा प्रकृति का अनिवार्य अंग है। उसने सांस्कृतिक विकास के माध्यम से भी योगदान दिया है। इस प्रकार मनवीय क्रियाओं पर बल देने के साथ मानव भूगोल का विकास हुआ।

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प्रश्न 14.
मानव प्रकृति का वास है।” इस कथन की व्याख्या कौटि।
उत्तर:
मनुष्य तथा प्रकृति के घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रकृति के विभिन्न लक्षण ये भूमि की बनावट, जलवायु, मिट्टी, पदार्थ, जल तथा वनस्पति मनुष्य के रहन-सहन तथा आदिक सामाजि क्रियाओं पर प्रभाव डालते हैं। प्रकृति मनुष्य के कार्य एवं जीवन को निश्चित पा निर्धारित करती है। इस विचारधारा को नियतिवार (determinism) कहा जाता है। जैसे रैसेल के अगसार “मानव अपने बातावरण की उपज है। (Man is the product of environment)। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मानव प्रकृति का दास है।

मानव जीवन प्राकृतिक साधनों पर आधारित है। मानव वातावरण को एक सीमा तक ही बदल सकता है। उसे वातावरण के साथ समायोजन करना आवश्यक है। इस प्रकार मनुष्य तथा प्रकृति एक – दूसरे के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रतिक्रिया द्वारा ही सम्पूर्ण जीवन प्रभावित होता है। इस प्रकार मनुष्य तथा प्रकृति के साबन्धों को देखकर प्रकृति में मनष्य (Man in Nature) कहना ही उचित है। जैसे कि विख्यात भूगोलवेता विडाल-डि-बनाश (Vidal – de -Blach) ने कहा है ‘प्रकृति मानव को मंच प्रदान करती है और यह मनुष्य पर निर्भर है कि बह इस पर कार्य करे।’ (Nature provides the stage and it is for man to act on it.)

प्रश्न 15.
क्रमबद्ध भूगोल से क्या अभिप्रायजसकी उप-शाखाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
भूगोल में भू-पृष्ठ का अध्ययन दो विधियों द्वारा किया जाता है –

(क) क्रमबद्ध भूगोल
(ख) क्षेत्रीय भूगोल।

क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) – विशिष्ट प्रकृतिक अथवा समरिक घटनाओं से पृष्ठ पर उत्पन्न होने वाले क्षेत्रीय प्रतिरूपों तथा संरचनाओं का अध्ययन क्रमबद्ध भूगोल कहलाता है। इस संदर्भ में किसी एक भौगोलिक कारक को चन कर (जैसे जलवाय) अध्ययन किया जाता है। भगोल के उस कारक के क्षेत्रीय वितरण के कारण तथा प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। मुख्य उद्देश्य जलवायु तथा जलवायके प्रकार होते है। कृषि का अध्ययन कृषि प्रदेशों द्वारा किया जाता है। इस प्रकार यह किसी एक परक का विस्तृत अध्ययन होता है। साधारणतः क्रमबद्ध भूगोल को चार प्रमण शाखाओं में बांटा गया है

  • भू-आकृतिक भूगोल-परम्परा अनुसार इसे भौतिक भगोल कहते है।
  • मानव-भूगोल-इसे संस्कृतिक भूगोल भी कहते है।
  • जैव-भगोल-इसमें पर्यावरण भगोल शामिल है।
  • भौगोलिक विधियाँ और तकनीकें-यह विधियों मानचित्र बनाने में प्रयोग की जाती हैं।

प्रश्न 16.
“भूगोल प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञान दोनों ही व्याख्या करें।
उत्तर:
भूगोल एक समकलन का विज्ञान है। भौतिक भूगोल तथा मानव भूगोल के विभिन्न पक्षों का अध्यवन करके किसी क्षेत्र का एक भौगोलिक चित्र प्रस्ता किया जात है। भौतिक बातावरण का अध्यपन करने के लिए प्राकृतिक विज्ञान जैसे भौतिकी, रसायन विज्ञान आदि बहुत उपयोगी हैं। सामाजिक विज्ञान में मानवीय क्रियाओं भौतिक तत्वों का कृषि, मानव बस्तियों आदि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार पुगोल प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञानों को परस्पर जोड़ता है तो दोनों वर्ग के विज्ञान में गिना जाता है।

प्रान 17.
‘भूगोल को समाकलन एवं संश्लेषण का विज्ञान कड़ा जाता है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भूगोल का विज्ञान की कई शाखाओं से निकट का सम्बन्ध है। विभिन्न शाखाओं के कई तलों का अध्ययर भूगोल में उपयोगी होता है। इसमें केवल उन्ही घटकों का अध्ययन किया जाता है जो हमारे उद्देश्य के लिए प्रासंगिक हो। विभिन्न घटकों को आपस में संयुक्त रूप में अध्ययन करने को क्रिया को समाकलन कहते हैं। इन विभिन्न घटकों को संयुक्त (Composite) तथा सश्लिष्ट रूप (Synthetic form) में सम्झना अधिक उपयोग तथा महत्वपूर्ण होता है।

भूगोल को समाकलन एवं संश्लेषण का विज्ञान (Science of Integration of Synthesis) कहा जाता है। विभिन्न शाखाओं के अंश भौगोलिक अध्ययन में सहायक होते है। वह घरक अलग-अलग पहचाने जाते हैं। इन घटकों को आपस में संयुक्त करने को ही समाकलन कहा जाता है। किसी भी प्रदेश के धरातल, कपि, यातायात, जलवान अदि के अलग-अलग मानचिों में सम्बन्ध स्थापित करने से का उपयोगी परिणाम निकल पाते हैं।

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प्रश्न 18.
भौतिक भूगोल की विषय वस्तु का वर्णन करें।
उत्तर:
यहाँ भूगल की इस शाखा के महत्व को बताना युकिा संगा होगा। भौतिक भूगोल में भूखण्ड (भू-आकृतियाँ, प्रवाह, उच्चावच), वायुमण्डल (इसकी बनावट, संरचना तत्व एवं मौसम तथा जलवायु तापक्रम, वायुपाय, वायु वर्षा, जलवायु के प्रकार इत्यादि) जलमण्डल में संबद्ध तत्व जैव मण्डल (जीव स्वरुप-मास तथा नद) जीव एवं उनके पोषक प्रक्रम जैस-पाय शृंखला पारिस्पैतिक प्राचल (Ecological parameters) एवं परिस्थिति सन्तुलन) का सम्मिलित प्राचत (Ecological parameters) एवं पारिस्थितिक सन्तुलन का अध्ययन सम्मिलित होता है। मिट्टियाँ मृदा-निर्माण प्रक्रिया के माध्यम को निर्मित होती है क्या वे मूल चट्टान, जलवायु जैविक प्रक्रिया एवं कालावधि पर निर्भर करती है। कालावधि मिदियों को परिपक्वता प्रदान करती तथा मृदा धाविका (Profile) के विकास में सहायक होती हैं। माना के लिए प्रत्येक तत्व महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 19.
“भूगोल भू-पृष्ठ पर बदलते हए लक्षणों का अध्ययन है।” व्याख्या करें।
उत्तर:
भू-पृष्ठ निरंतर बदल रहा है, कभी धीरे-धीरे तथा अदृश्य रुप में तो कभी बड़ी शीघ्रता से और दृश्य रूप में मान्यता प्राकतिक लक्षण जैसे-पा, नदियाँ गीरों आदि धीरे-धीरे परिवर्तित होते हैं. जबकि सांस्कृतिक लक्षण जैसे भवन, सहर्क, फसलें आदि शीघ्रता से बदलते हैं। भूगोल इन बदलते हुए लक्षणों की उत्पति तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है वो इन लक्षणों को वर्तमान स्वरूप में लाने और बारित करने के लिए उत्तरदायी है। इन लक्षणं की अवस्थिति तथा व्यवस्थाओं का मानवों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है, उसका भी अध्ययन करता है।

प्रश्न 20.
क्षेत्रीय भूगोल से क्या अभिप्राय उसकी शाखाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
बोजीय भूगोल किसी क्षेत्रका समूचा अध्ययर होता है। इसे किसी क्षेत्र, राज्य या नदी घाटी के अध्ययन से आरम्भ किया जा सकता है। फिर इसे विभिन्न विधियों द्वारा अध्यायन किया जाता है। प्रत्येक प्रदेश या क्षेत्र का एक समूचे अध्ययन (Total Setting) के रूप में अध्ययन किया जाता है। प्रदेशों का आधार केवल एक अकेला कारक जैसे उच्चावच वर्षा, बनस्पति साक्षरता हो सकता है। इसी प्रकार बहकारक प्रदेश भी हो सकते हैं। प्रशासनिक क्षेत्र को भी एक प्रदेश लिया जा सकता है। योजना प्रदेश भी बनाए जाते हैं। क्षेत्रीय भूगेल की निम्नलिखित प्रमुख उप-शवाई हैं-

  1. प्रादेशिक अध्ययन
  2. प्रादेशिक विश्लेषण
  3. प्रादेशिक विकास
  4. योजना प्रदेश

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प्रश्न 21.
मानव ने प्रकृति के साथ अनक्ल न (Adaptation) तथा आपरिवर्तन (Modification) द्वारा सम्ता कर लिया है। व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी मानव का घर है। आदिम मानव समान प्रकृति वा पर्यावरण पर सीधे तौर पर निर्भर था। मानव प्रकृति का एक अंग है तब वह भी प्रकति पर अपनी छाप छोड़ता है। मनन ने तकनीकी खोजों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके प्रकृति के बंधन को डीला किया है। मानव ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो सीमित क्षेत्र में जलवायु को अपरिवर्तित कर देती हैं। जैसे-मानानकलक (Air conditioner) वायु शीतक आदि । वर्षा, भूमिगत जल पटक, प्रस्तर (Aquifer) को पुनरावेशित करके कृषि आदि के लिए जल प्राप्त करना । समदी बोत्रों में तेल तथा मैंगनीज पिड प्राप्त काला, मृदा को पुनः नयीकरणीय बनाकर कृषि को स्थापित करन इत्यादि। इस प्रकार मानय ने प्रकृति से समझौता किया है।

प्रश्न 22.
वातावरण एवं मानव के अन्योन्यक्रिया का वर्णन करें।
उत्तर:
मानव और वातावरण में एक अटूट सम्बन्ध है। मानस बालय में प्रकृति की उपल है क्या आ कुछ मा परिवर्तन करता है। मानव विपरीत भौतिक परिमितियों के साथ सदा प्रयत्नशील हा एक कविता संक्षेप में मानस संचाच सिमानालाप के माध्यम से इस सम्बन्धको मल किया गया है। आपने मिट्टी का पूजन किया मैंने कप का निर्माण किया आपने पत्रिकाएर किया मैंने दीपक बनाया, आपरेचरम पहाडी भू-भाग एवं मरुस्थलोका राजन किया मैंने फलों की स्यारी तथा बाग बगीचे बनाए । इस प्रकार मानव ने तकनीकी की लापता से एक स्वतन्त्र साप छोडी तथा प्रकृति के सागसाधावनाओं का सुजन किया। भूगोल इसी अनक्रियात्मक सम्बन्ध का अध्ययर करता है।

प्रल 23.
निम्नलिखित शब्दों की परिभाषाएँ दें –

  1. भौतिक विज्ञान
  2. जैव-भूगोल
  3. भू-आकृति
  4. जलवायु विज्ञान
  5. जल-विज्ञान
  6. मृदया- भूगोल
  7. बनापति भूगोल
  8. प्राणि भूगोल
  9. मानव पारिस्थितिकी
  10. पर्यावरण भूगोल।

उत्तर:

  1. भौतिक विज्ञान (Physiography) – पह वास्तव में मैतिक भूगोल है जो -पृष्ठ -आकारों का पर करत है।
  2. जैव-भूगोल (Bio-Geography) – यह पर्यावरण पर्थमजीव-जन्तुओं का अध्यक्त।
  3. भू-आकृतिक विज्ञान (Geo morphology) – अकारों का अध्यन
  4. जालवायु विज्ञान (Climatology) – यह जलवायु तथा इसके तत्वों का अपन।
  5. जल-विज्ञान hydrology) – यह महासागरों, नदियों हिम नदियों आदि जल की भूमिका का अध्ययन है।
  6. पदा-भूगोल (Soil Geography) – मृदा भूगल मृदा के निर्माण, प्रा या लिलाण का अध्यायन है।
  7. बनायी भूगोल (Plant Geography) – यह परदेशमा चार मैदानों के वितरण का विज्ञान
  8. प्राणि भूगोल (zoo Geography) – यह बीच जनुओं और सूक्ष्म जीवाणुओं के
  9. मानव याशियतिकी (Human Ecology) – मामी बालो सम्बयों का अध्ययन करतो।
  10. पर्यावरण भूगोल (Environmental Geography) – जीवन पर्यावरण की गुणवता तथा मानव उसके प्रभाव का अध्ययन है।

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प्रश्न 24.
भौतिक भूगोल के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल का महत्त-भौतिक भूगोल में सभी त्यों को सम्मिलित किया गया है जो प्राकृतिक उथलमाण, वागमण्डल, जलमण्डल एवं रमाला सलमण्डल में भू-आकृति शमित। वायुमण्डल का सम्बन्ध सभी जीवन वस्तु जैसे-बड़-पौधे, पशुओं सूक्ष्म जीव और मनुष्य अध्ययन से है। मथा भौतिक भूगोल में अध्ययन किए जाने वाले इन चारों तत्वों यामाहाका उत्पाद है।

पर्यावरण निर्धारणहरका सामाजिक निर्धारण के विद्वान एक ऐसी मनोति को जन्म दिया जिसने प्राकृतिक पर्यावरण-भूमि, जल, वायु मुदा, वनस्पति, पशु आदि को कंवस आधिक प्रगति प्राप्तकरलेबले सपना देखा। समापनका हर कांजनेय किया बस गई इससे वायु सहित लगभग सभी प्रकार के प्राकृतिक संसाधन का विनाश प्रदूषण और अधाय मानव ने महसूस किया कि पृथ्वी पर प्रकृतिक संसाधन जीवन को आधार मान करते हैं। उनके निास से पथ्वी पर समस्त जीवन समाप हो सकता है। पान्नु पर्यावरण संकट से उत्पन ह, नवीन परिस्थिति को देखते हुए भूगोल फिर से अपने भौतिक आधार पर सौट आया।

प्रश्न 25.
भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल में अनार स्पष्ट करो।
उत्तर:
मबद्ध भूगोत तथा प्रादेशिक भूगोल अन्तर:
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प्रश्न 26.
प्राकृतिक वातावरण तथा समा वातावरण में अना समट करें।
उत्तर:
प्राकृतिक वातावरण तथा समग्र जतावरण में अन्तर –
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प्रश्न 27.
भूगोल को सभी विद्वानों का जनक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
भूगोल को सभी विद्याओं का जनक कहा जाता है इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. आज भूगोल मात्र एक ऐसा विषय शेष है जो भूतनी मानिक रूपरेखा की परिवर्तनशीलता को समझाने हेतु सभी प्राकृतिक तथा मानव विज्ञान के विद्वानों को एक प्लेटफार्म पर लाता है।
  2. यह एक अन्नविषयक तथा समाकलात्मक (विभिन्न विषयों को जोड़ने वाला) विज्ञान है, जिसकी अनेक शाखायें हैं।
  3. भौगोलिक शब्दावली में दिक, स्थान भूपृष्ठ के सोने का सामूहिक स्वरूप है जिससे प्रतिरूपों तथा संरचनाओं का जन्म होता है और जो जीवन विशेष कर मार जीवन को आधार प्रदान करते है।

प्रश्न 28.
भौतिक भूगोल तथा जैव भूगोल में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
भौतिक भूगोल तथा जैव गोल में अन्नर –
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प्रश्न 29.
भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल में अंतर बतायें।
उत्तर:
भौतिक पूोल-इसाय प्राकृतिक वातावरण को विहोचता वितरण चिनताओं और जटिलता अध्ययन किया जाता है। इसके चार प्रमुख विभाग –

  1. आकृतिक विज्ञान
  2. समुद्र विज्ञान
  3. जलवायु विज्ञान और
  4. वनस्पति एवं जन्तु भूगोल।

मानव भूगोल – नसमें अनुमके विधिन कार्यकलापों, आर्थिक, राजनीतिक एतिहासिक, समाजिक और सांस्कृतिक एवं स्वयं मनुष्य के वितरण और उसके आवास का अध्ययन भौतिक बातमरण के संदर्भ में किया जाता है। इसके कई उपविभाग है जिसमें प्रमुख जनसंख्या भूगोल, आवासीय भूगोल, संसाधन भूगोल आदि हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भूगोल एक प्राकृतिक एवं मानवीय विज्ञान है।’ व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राचीन समाज में मानव और प्रकृति के बीच की अंतःक्रिया एक-दूसरे के साथ प्रावध रूप में घों पर जैसे-जैसे समय गुजरता गया, अनुभवों के संचय में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों को जन्म दिया। संस्कृतियों केवल मानव और प्रकृति के बीच क्रियाओं का ही नहीं बल्कि बिभिन्न प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यावरण में रहने वाले लोगों के बीच होने वाली: क्रियाओं का भी परिणाम हैं। यह एक निस्तर विकासशील तथा परिवर्तनशील घटना है। यही कारण है कि समान प्रकृतिक वातावरण में हमेश एक ही प्रकार की संस्कृति और सध्यता नहीं, मिलती। इसलिए वह मुष्ठ जिसका अध्ययन भूगोलवेता करता है, एक समान नहीं है।

इसके अतिकमा सांस्कृतिक दोनों ही लक्षणं में शान अंतर है। इस प्रकार भूगोल एक प्राकृतिक तथा मालोष विज्ञान है, जो भूपृष्ठ को आकृति, और विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं को जम सेवाले, प्राकृतिक और मानवीय दोनों ही कारकों एवं प्रक्रियाओं का अध्यक्त करता है। यह भोप प्रतिरूप तथा मोचन को जानने के लिए -लक्षणों का वर्गीकरण तथा चित्रण करता है। यह वर्तमान प्राप को बदलने में कार्यरत कारकों तथा प्रक्रियाओं की पहचान भी कराया इनसे होने वाले संभावित परिण की भविष्यवाणी भी करता है।समा भूगोल इन प्रमों का उत्तर देने का प्रयास करता है

  1. भूपृष्ठ पर कौन-कौग में प्रकृतिक तथा सांस्कृतिक लक्षण है?
  2. ये किस प्रकार मास्तित्व में आए?
  3. किस प्रकार वितरित और ऐसे क्यों हैं?
  4. एक-दूसरे से संबंधित हैं?
  5. क्या इनका पर्तमान वितरण-प्रतिरूप मानव कल्याण के अनुकूल है।
  6. रूपांतरित करने के लिए क्या किया जा सकता है।
  7. प्रस्तावित परिवर्तनों का माना पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

इस प्रकार पूल एक विज्ञान प्रकृति और मानव के बीच गतिशील अनक्रियाओं के परिणामस्वरूप उत्पन गाम लक्षणों को स्थानिक व्यवस्था का अध्ययन करता है।

Bihar Board Class 11 Geography Solutions Chapter 1 भूगोल एक विषय के रूप में

प्रश्न 2.
“भूगोल के अनेक उप-विषय विज्ञान पर आधारित है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। अघवा, भूगोल का अन्य विषयों से क्या सम्बन्ध हैं?
उत्तर:
मानवीय विकास भौतिक तत्त्वों के सदुपयोग पर आधारित है। इसलिस भूगोल भौतिक वातावरण तथा सामाजिक वातावरण के विभिन्न तत्त्वों का अध्ययन करता है। भूगोल काफी हद तक प्राकृतिक विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान दोनों पर निर्भर है। कई उप-विषयों (Allied Sciences) में भूगोल अन्य विज्ञान शाखाओं के निकट है। प्राकृतिक विज्ञान के अन्तर्गत भूगोल तथा अन्य विषयों का निम्नलिखित सम्बन्ध है –

1. जीव – भू विस्तार विज्ञान (Chrological Science) – इस विज्ञान का मुम सम्बन्ध क्षेत्रीय अध्ययन (Study of an area) प्रादेशिक अध्ययन से होता। नितान (Astronomy) तथा भूगोल मिलकर जीव-विवार विज्ञान की रचना करते हैं। गया विज्ञान में कई विषय, को-औरमण्डल, पच्ची का आकार, अक्षांश-देशाला भूगोल को एक विज्ञान का रूपरे।

2. कालानुक्रमिक विज्ञान (Chronological Science) – तिहास में समय का तत्व महत्वपूर्ण होता है।तिहास भूगोलके समय के साथ सामन्य स्थापित करता सो प्राचीन काल से लेकर वर्तमाम तक मानवीय विकास को समझने में सहायता मिलती है । इस विज्ञान से भू-संघटनाओंकामानुसार अध्ययन किया जाता है।

3. क्रमबद्ध विज्ञान (Systematic Science) – सके मा पृथ्वी की घरकों का अब अपर किया जाता है। भौतिक विज्ञान, रसायन विधान, पारि विकार ज्या प्रांग विधान किसी प्रदेश के मानव एवं कावरणमयों को सर कर समझनेसहायता करते हैं। यह अमन वर्गकरण (Classification System) के आचरम किया जाता है।

4. अर्थशास्त्र से सम्बन्ध (Relation with Economics Science) – मनुष्य के अधिक कल्याण मनदेशिक विकास सम्बन्धी समाना अध्ययन के लिए भूगोत का सम्बन्ध अर्थशालो किटतम तम उपयोगी होत जाता है।

5. अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध – भूगोल के उप-विषय अन्न विज्ञानों निकर हैं, जैसे- आकृतिक विज्ञान का भूगर्ण विज्ञान से निकर का सम्बम। आर्थिक भूगोल का अर्थशास्त्र से सम्मान भूगोल का प्रामी विज्ञान से गहरा सम्बनी,स्था राजनीतिक भगोरण का राजनीतिक सिरसावा है।